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1. Vyakti Viveka, The Rajanaka Mahima BhattaCSS

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THE

KASHI SANSKRIT SERIES

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THE

VYAKTIVIVEKA

OF

RĀJĀNAKA S'RĪ MAHIMABHAṬṬA

EDITED WITH

A Sanskrit Commentary of Rājānak Ruyyaka and

Hindi commentary and notes

BY

Prof. Rewāprasāda Dwivedī, M. A.

Sāhityāchārya

Govt. Sanskrit College, RAIPUR ( M. P. )

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समर्पण

राष्ट्रभाषा की सेवा में प्रथम बार प्रस्तुत व्यक्तिविवेक का यह रूपान्तर बस्तर के भ० पू० शासक,

तत्प्रभान् महाराज श्री प्रवीणचन्द्र जी भञ्जदेव

CHECKED 1994

सादर अर्पित है,

जिनका व्यक्तित्व ठीक उसी व्यक्तिविवेक के समान है तथा जिनमें काकतीय वंश की इतिहास प्रसिद्ध संस्कृत-निष्ठ श्राज भी उसी प्रकार रक्षित है जिस प्रकार हमारी मातृभूमि

की निचर-संचित श्रादिमतम तथा श्रमूल्य वनश्री बस्तर में—

रेवाप्रसाद द्विवेदी

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ग्रन्थकार

व्यक्तिविवेक मूलतः संस्कृतभाषा में लिखा हुआ एक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ है । इसके रचयिता राजानक महिमभट्ट हैं । इस ग्रन्थ का रचनाकाल ग्रन्थ की अन्तरंग परीक्षा से ईसवीं सन् १००० से १०५० अथवा ११०० के बीच का माना जाता है ।

उपरी सीमा १००० इसलिये निर्धारित होती है कि व्यक्तिविवेक में अभिनवगुप्त के लोचन का एक अंश अक्षरशः उद्धृत मिलता है [ द्र० पृष्ठ ९६ ] । अभिनवगुप्त के अन्य ग्रन्थों का रचनाकाल उनके स्वयं के उल्लेखों के अनुसार ९९०-१ से लेकर १०१४-५ ई० तक निर्धारित है । लोचन भी इसी बीच या इसके आसपास लिखा गया होगा ।

व्यक्तिविवेक की रचना निश्चित ही लोचन के लगमग २५ वर्ष बाद हुई होगी, क्योंकि लोचन में भट्टनायक के दर्पण के उद्धरण हैं और व्यक्तिविवेककार को दर्पण प्राप्त नहीं हुआ था जैसा कि उनके स्वयं के 'अदृष्टदर्पणां मम धीः' ( ११४ मंगलपद्य ) कथन से स्पष्ट है । दर्पण के न मिलने का कारण उसकी प्रतिलिपियों की कमी हो सकती है अथवा उसका लोप हो जाना ।

अभिनवगुप्त महामहेश्वर थे इस लिए कदाचित् उन्होंने शिष्यसाहस्री द्वारा एक आाध प्रति पा ली होगी । लोचन में ध्वन्यालोक की टीका चन्द्रिका का भी उल्लेख है । महिमभट्ट को वह भी नहीं मिली थी ( ११४ मंगलपद्य ) ।

व्यक्तिविवेक की रचना उसके रचयिता ने अपने प्रौढ़ नातियों के लिये की है और उनके खण्डन वाक्यों की भाषा में असहिष्णुता तथा क्षोभ दिखलाई देती है, इससे स्पष्ट है कि व्यक्तिविवेक की रचना के समय वे ६० वर्ष से ऊपर के रहे होंगे ।

अभिनवगुप्त को उन्होंने 'केचिद् विद्धान्मानिनः, आचिस्सचिच्त'। ऐसे शब्दों से सक्जोरा है और उनका नाम नहीं लिया, इससे ऐसा प्रतीत होता है कि महिमभट्ट के समय अभिनवगुप्त जीवित थे ।

वय में अधिक होने के कारण अथवा काश्मीरी-दर्शन के गुरुपीठ मर महामाहेश्वर के रूप में अभिषिक्त होने के कारण उन्हें महिमभट्ट आदर देते थे ।

यह तथ्य इससे भी स्पष्ट है कि द्वितीय विमर्श में अभिनवगुप्त के समकालीन अथवा कुछ पुराने कुन्तक का उन्होंने 'काव्यकाङनकाशममानिना कुन्तकेन०' ( पृ० २८५ ) इसप्रकार नामोल्लेख भी किया है और इसमें कुन्तक के प्रति वे कोई आदर भी व्यक्त नहीं करते ।

इस प्रकार यदि महिमभट्ट अभिनवगुप्त के समकालीन भी हों तो उनका व्यक्तिविवेक लोचन के बाद की ही रचना है फलतः उसके रचनाकाल की उपरी सीमा १००० ई० से अधिक नहीं हो सकती ।

निचली सीमा ११०० ई० से १०५० ई० तक के निर्धारण के अनेक प्रमाण हैं । ११४५ ई० के हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन की स्वोपज्ञ विवृति में व्यक्तिविवेक को पंक्तिशः और

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भूमिका

अक्षरशः उद्धृत किया है। श्रीहर्ष ने अपने खण्डनखण्डखाद्य में वैयात्य को अनौचित्य से अभिन्न मानते हुए उसे दोष ठहराने के लिए व्यक्तिविवेक का सादर उल्लेख किया है—

‘दोषं व्यक्तिविवेकेऽसुं कविलोकविलोचने । काव्यमीमांससिंहु प्रास्तमहिमाSSसदत ॥’ ( खण्डन० विवरणसागरः : चौखम्बा प्रकाशन, पृष्ठ १३२७ )

श्रीहर्ष कान्यकुब्जाधिपति जयचन्द्र के सभापण्डित थे और जयचन्द्र का शासनकाल ११६९-९५ ई० माना जाता है, अतः व्यक्तिविवेक निश्चित ही खण्डनखण्डखाद्य के:६०-७० वर्ष पूर्व ११०० ई० में ही बना होगा। व्यक्तिविवेक की जो संस्कृतव्याख्या इस संस्करण में दी गई है उसके रचयिता, जैसा कि आगे स्पष्ट किया जाने वाला है, रुय्यक या मंख माने जाते हैं। मंख कश्मीराधिप जयसिंह के सान्धिविग्राहिक थे ऐसा राजतरंगिणी के—

‘सान्धिविग्रहिको मंखकाक्षोदल्हणारसोदरः । स मठस्याभवत् प्रस्थः श्रीकण्ठस्य प्रतिष्ठया ॥’ ( ८१३३५४ )

इस पंक्ति से स्पष्ट है। जयसिंह का समय ११२८-४९ ई० माना गया है। मंख ने व्यक्तिविवेक के पाठान्तरों की चर्चा अनेक स्थलों पर की है। अतः इसमें सन्देह नहीं कि मंख के ११२८ ई० तक व्यक्तिविवेक का पुष्कल प्रचार हो चुका था। इसमें निश्चित ही २५, ५० वर्षो का समय लगा होगा। यदि इस न्यायग्रंथ के रचयिता रुय्यक हैं तो कुछ समय और लगा होगा, क्योंकि रुय्यक मंख के गुरु हैं। मंख ने अपने श्रीकण्ठचरित महाकाव्य के अन्तिम सर्ग में उन्हें स्पष्ट रूप से गुरु कहा है—

‘तं श्रीरुच्यपमालोक्य स प्रियं गुरुमप्रहीत । सौहार्द्रश्रेयरसलोभात्संवेदममजनन्म ॥’ ( २५१३० )

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, महिमभट्ट ने अपना व्यक्तिविवेक अपने नातियों के लिए बनवाया अतः उनका वय उस समय ६०-७० से कम का न होगा—उसके अनुसार व्यक्तिविवेक के प्रचार के ’५० वर्ष और जोड़ दिए जाएँ तो महिमभट्ट का स्थितिकाल १००८ या १०१८ से १०५८ या ११०३ ई० के बीच सिद्ध होता है। इस समय अमिनवगुप्त जीवित थे ही।

इन निश्चित प्रमाणों के अतिरिक्त एक प्रच्छन्न प्रमाण उक्त सीमा को और भी संकुचित कर देता है। वह है काव्यप्रकाश में व्यक्तिविवेक को ख्याया। काव्यप्रकाश में पञ्चम उल्लास का लच्पसंहार अनुचितवाद के खण्डन से हुआ है। इस अंश में अनुक्तितवादी आचार्य का नाम

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( सम्प्रदायविमर्शिनी तथा रसगंगाधर-उत्तमोत्तमकाव्य )। परम्परा पर विश्वास काव्यप्रकाश तथा व्यक्तिविवेक की पदावली की तुलना से भी होता है। काव्यप्रकाशकार ने वस्तुध्वनि के रूप में ध्वनिकार द्वारा प्रस्तुत प्रसिद्ध गाथा ‘श्रम धार्मिक०’ को नहीं अपनाया। उन्होंने निषेध से विधि की प्रतीति या न्यायति के लिए भी ‘निश्शेषच्युतचन्दनद्रुम०’ पद्य स्वीकार किया जिसके लिए ध्वनिकार ने ‘अत्ना पृथ्वी०’ गाथा प्रस्तुत की थी। उन्होंने इसे तो पञ्चमोल्लास में प्रसंगान्तर से अपना भी लिया है किन्तु ‘श्रम धार्मिक’ को सर्वथा छोड़ दिया है। किन्तु जहाँ वे अनुमितिवादी का मत उपस्थित करते हैं वहाँ वस्तुध्वनि के उदाहरण के रूप में न तो अपना उदाहरण प्रस्तुत करते और न कोई अन्य श्लोक हो। वे ‘श्रम धार्मिक’ पद्य को ही प्रस्तुत करते हैं। अनुमितिवाद का समर्थक ग्रन्थ संपूर्ण काव्यशास्त्र में केवल व्यक्तिविवेक ही है और इसमें ध्वनिपद्यों को अनुमितिपद्य बतलाने के लिए तृतीय विमर्श का आरंभ इसी पद्य से किया गया है। निश्चित ही मम्मट ने अनुमितिवाद का मूलरूप व्यक्तिविवेक से ही उपस्थित किया है। व्यक्तिविवेक में अनुमिति की उपस्थापना इन शब्दों में की

पदावली भी इसमें प्रमाण है। व्यक्तिविवेक में अनुमिति की उपस्थापना इन शब्दों में की गई है —

‘न च वाच्यादर्थान्तरप्रतीतिरविनाभावसंवन्धस्मरणमन्वेति नैव संभवति सर्वस्यापि तत्प्रतीतितिप्रसङ्गात [ प्र० ८३ ] प्रेढ़ावस्थप्रवृत्तिरनर्थसंशयाभावनिश्चयेन ध्यायात, तद्विरुद्धश्व अनर्थसंशयोऽस्मात् [ श्रम धार्मिक० ] विधिवत् वैयात निझर्थपयीलोचनयाडवसीयते, इति न्यायकविरुद्धोपलब्ध्या००’ ( प्र० ४६५-४६६ )।

काव्यप्रकाश की निम्नलिखित पंक्तियों पर निश्चित ही व्यक्तिविवेक के इन अंशों की प्रतिध्वनिया है —

‘ननु वाच्यादसंबद्धं तावत् प्रतीयते, यतः कृतश्रिद् यस्य कस्यचिदर्थस्य प्रतीतः प्रसंगात, एवं च संबन्धादृश्यदृश्यमानस्य नैयस्य कभायोऽप्रतिबन्धेऽवश्यं न भवति:००, श्रम धार्मिक० अत्न गृहे शनिवास्या भ्रमणं विहितं गोदावरितीरे सिंहोऽलङ्घेरअ्रमणमनुमापयति, यद् यद् भीरुब्रह्मन् तद् तद् भयकारणान्निर्णीयुपलब्धिपूर्वकम् , गोदावरितीरे च सिंहो-पलभिरति:' ( काव्यप्रकाश पञ्चमोल्लासान्त )।

दोषप्रकरण में मम्मट ने प्रायः वे ही उदाहरण दिए हैं जो महिमभट्ट ने द्वितीय विमर्श में दिए थे। न केवल इतना ही, उन्होंने उन पद्यों के सदृशे रूप भी अधिकतर ज्यो-का-त्यों अपना लिया हैं। प्रकरणभेद में प्रकृतिप्रकरणभेद का उदाहरण व्यक्तिविवेककार ने ‘नाथे निशायाः०’ दिया है और उसमें ‘निशापि याता’ का रूपांतर ‘गता निशापि’ किया है। मम्मट ने इसे ज्यो-का-त्यों अपना लिया है ( द्र० सप्तम० भग्नप्रकरणमत्व )। इसी प्रकार ‘यशोऽधिगन्तुं०’ पद्य में ‘सुखंमीहितुम्’, ‘महीमृतः पुत्रवत्’ पद्य में ‘अपस्यवतः’, ‘काचित् कीर्तिः०’ पद्य में

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भूमिका

'काश्चिद० अनुविद्धु:' तथा 'कम्पमापु:' ये रूपान्तर मम्मट ने व्यक्तिविवेक से ज्यो' के त्यों अपना लिए हैं। अन्य उदाहरणों में भी मम्मट ने व्यक्तिविवेक के निर्देशों पर अपनी बुद्धि चलाई है। उदाहरणार्थ व्यक्तिविवेककार ने 'ते हिमालयमानम्रु०' पद्य में 'सिद्धं चास्मै' के 'इदम् पद' को जोड़ में 'नदिस्स्थम्' पद में भी 'इदं पद' का प्रयोग आवश्यक बताया था, किन्तु छन्दोयोजना में उसके न जमने से कोई रूपान्तर नहीं दिया था—भगवन्तं श्लिनिनम् 'इदम्' परामृश्य तेनैव तत्परामर्शः कर्तुं युक्तः, न 'तदा' (पृ. २९२)। मम्मट ने पाठान्तर में 'अनेन विसृष्टा:' ऐसा प्रयोग दिखलाया। निश्चित ही उन्होंने महिमभट्ट के मौन को मुखर करने की उदारता बरती किंतु वे उस मौन का कारण दूर न कर सके। 'गाहन्तामहिषा०' पद्य में महिमभट्ट ने 'विस्रब्धं क्रियतां वराहततिभिरुस्स्ताच्चति:' को 'कुर्वन्स्वस्तिथयो वराहततयो मुस्ताच्चति' इस प्रकार बदला था। मम्मट ने उसे 'विस्रब्धं रचयन्तु शृङ्गरवा मुस्ताच्चति' इसप्रकार बदला। निश्चित ही उन्हें महिमभट्ट के रूपान्तर में विसर्गध-पद का अभाव खटका जिसके लिए उन्होंने 'अस्तभिय:' पद दे दिया था। किन्तु वे अपने पाठ में सैकड़ों की पंक्तियों को न ला सके जिसे 'स पञ्चलोचतीर्णवराहयूथानि' में कवि भुला न सका था। कदाचित मम्मट को तत्कालीन प्रेक्षकों की सुविधा का ध्यान था या पुनरुक्ति प्रतीत हुई, जिससे 'सूकरवरा:' पाठ करने पर भी वे न छूट सके, क्योंकि 'वर' शब्द वहाँ भी अनावश्यक ही है, मुस्ताच्चति तो प्रत्येक धातु का प्रयोग करना पड़ता, जिससे ऐसा कुछ कृत्रिम अर्थ निकलता है। कि जैसे मुस्ताच्चति कोई ताने-बाने में फैला सूत है जिसका वेध बुनना है। फिर यदि चतुराई दिखलानी थी तो आत्मनेपद के प्रक्रम के निर्वाह में दिखलानी थी जो महिमभट्ट के ही समान मम्मट के पाठ में भी तूटा ही हुआ है, वे 'गाहन्ताम्, अभ्यस्यन्ताम्, रचयन्तु या कुर्वन्तु लभन्ताम्'—इसप्रकार आत्मनेपद के उपक्रम और उपसंहार में मम्मट भी महिमभट्ट के ही समान अपना पाठ जमा नहीं सके।

दोषों के विवेचन में मम्मट के काव्यप्रकाश और व्यक्तिविवेक की एकरूपता सर्वनामविधेयादि से भी बहुत स्पष्ट है। महिमभट्ट ने अपने दोषविवेचन की स्वोपज्ञता का संकेत दिया है (१८४ पृ. स्ववृत्तिषु० तथा 'अन्तिम इलोक)। वे अपने आप को कवि भी स्वीकार करते हैं। मम्मट में देनों ही बातें नहीं मिलतीं। उनका पहला 'नियतिकृत०' पद्य भी 'अपूर्वं यद् वस्तु०' इस लोचन के मंगल पर निर्भर है अतः काव्यप्रकाशकार का व्यक्तिविवेककार पर प्रभाव न मानना संभव नहीं है।

नेय और भाषा का इतना अधिक साम्य मिलने पर मम्मट के काव्यप्रकाश से महिमभट्ट के व्यक्तिविवेक को पूर्ववर्ती न मानना तक को भले ही रुचे हृदय को तो नहीं रुचता। मम्मट का रूप दृष्ट्वा हि इन्द्र के बीच का है क्योंकि उदात्तालङ्कार में उन्होंने भोज पर निर्मित

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भूमिका

'यदं विद्धद्भवनेष्टं भोजान्प्रतेशतरथ्यागाढ़लीलायितम्' यह पंक्ति उद्धृत किया है और हेमचन्द्र ने अपने काव्यानुशासन की विवृति में व्यक्तिविवेक के ही समान काव्यप्रकाश को भी पंक्तिशः अपना लिया है। भोज का १०७८ वि० सं० का अभिलेख उपलब्ध है। अतः हेमचन्द्र के ११४३ ई० और भोज के १०२१-२ ई० समय के बीच मम्मट का होना निश्चित है। काव्यप्रकाश की उपलब्ध टीकाओं में माणिक्यचन्द्र की टीका 'संकेत' सबसे परानी है। इसका निर्माण १३४८ ई० में हुआ था। संकेत में भी प्राचीन टीकाओं के निर्देश हैं अतः काव्यप्रकाश ११०० ई० से पहले की ही रचना सिद्ध होता है। इस प्रकार यदि मम्मट को ११०० ई० का भी मान लिया और उक्त संदर्भों के आधार पर महिमभट्ट को उनसे प्राचीन माना जाय तो महिमभट्ट १०५० ई० से नीचे के सिद्ध नहीं होते।

इस प्रकार महिमभट्ट के व्यक्तिविवेक का रचनाकाल १००० से १०५० अथवा ११०० ई० तक सिद्ध होता है।

व्यक्तिविवेक की अन्त्यपुष्पिका से स्पष्ट है कि उनके पिता का नाम धौर्य था और गुरु का नाम र्यामलिक। र्यामलिक को उन्होंने महाकवि कहा है, किन्तु ऐसे किसी महाकाव्य को अभी तक हमें सूचना नहीं है जिसके रचयिता का नाम र्यामलिक हो। पादताडितक नामक भाण के रचयिता अवश्य ही र्यामलिक है, किंतु उन्हें नाटककार और कवि कहा जा सकता है, महाकवि नहीं। फिर पादताडितक गुप्तयुग के मध्य या उत्तर काल की रचना है। डाॅ० बरो के अनुसार डाॅ० मोतीचन्द्र ने स्वसंप्रदित चतुर्भाणी की भूमिका में पादताडितक को ई० ४१०-१५ के बीच की कृति माना है। घटनाएँ, उल्लेख, चित्रण और सामाजिक स्तर के अतिरिक्त भाषा के आधार पर हमें भी पादताडितक बाणभट्ट के पहले और कालिदास के बाद की रचना प्रतीत होती है। गुप्तयुग का परायणता ने घर कर लिया था। वह हर्षयुगीन कामदम्बरी के जरदर्दविड धार्मिक और शूद्रक के मृच्छकटिक से स्पष्ट है। पादताडितक में तो हम उसका और भी वीभत्स रूप पाते हैं। यह न तो सौन्दर्यासमृद्धि के समय में सम्भव है जिसमें रूप को पापबुद्धि नहीं माना जाता और न आठवीं शताब्दी के बाद के अकर्मण्यता के समय में, जब भारतीय जनमानस विकेन्द्रित अधिक था। संस्कृत के तत्कालीन माधुर्य, हर्षविजय आदि प्रतिनि‌धि काव्यों से यह तथ्य स्पष्ट है। यह युग रूढ़ियों के अनुवाद का युग था, सौन्दर्य के साक्षात दर्शन का नहीं। इसीलिए इस समय शब्दों की नक़्काशी अधिक दिखाई देती है, अर्थनिरर्थता और रसपिच्छलता कम। युग के बिम्बविधान का तो उसके सामने टिक नहीं पाते। ऐसी स्थिति में पादताडितक के र्यामलिक को महिमभट्ट के समय १०००-११०० ई० तक खींचना संभव नहीं है। पादताडितक को अभिनवगुप्त ने अपनी

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भूमिका

अभिनवभारती में उद्धृत किया है। निश्चित ही उसके रचयिता रयामलिक उनसे भी अधिक प्राचीन हैं। फलतः महिमभट्ट के गुरु रयामलिक कोई और ही कवि हैं।

महिमभट्ट ने अपने तीन नातियों का उल्लेख किया है (१) क्षेम, (२) योग और (३) भोज। प्राचीन संस्कृतों में ‘भोज’ की जगह ‘भाज’ छपा है। हमने उसे कल्पना से ही भोज मान लिया है। महिमभट्ट ने इन्हें विद्वानों के बीच न्यायशास्त्र के लिए प्रसिद्ध बताया है। इन तीनों के पिता का नाम भीम है, जिन्हें अमितगुण कहा गया है। भीम महिमाचार्य के पुत्र भी हो सकते हैं और जामाता भी। हमारी दृष्टि में इनको पुत्र ही होना चाहिए। मातृकुल में दौहित्र को उसके पिता के नाम के साथ न पुकार कर उसकी माता के नाम के साथ पुकारा जाता है और यही स्वाभाविक भी है। धैयँ, महिमा, भीम, क्षेम, योग, भोज, ये नामपद भी ऐसे हैं जो एक ही घर में संभव हैं। जामाता का नाम श्वशुर जैसा ही हो यह निश्चित नहीं है। डॉ० काणे ने ‘पौत्राणां’ न कहकर ‘नसूनां’ कहने पर भीम और महिमभट्ट के बीच सगुरजमाई के नाते पर जोर दिया है। पौत्र कहने पर सच्चुच तथ्य का स्पष्टीकरण अधिक हो जाता है। किन्तु नस्मा कहने पर पौत्रत्व जितना अस्पष्ट होता है दौहित्रत्व भी। समर-जमाई का संबंध ही बतलाना था तो महिमभट्ट ‘दौहित्रचेमयोगभोजानाम्‌’ लिख सकते थे। यहाँ ‘द्वैदित्यत्व’ में कोई विधेयता विवक्षित नहीं है जिससे उन्हें समास करने में विधेयाविमर्शों का भय होता। सबसे बड़ी बात तो यह है कि लोक में नाती शब्द अधिक प्रचलित है, पोता या दोहता (< पोता < दौहित्र) शब्द कम।

महिमभट्ट का निवासक्षेत्र कश्मीर है यह उनके परावाणी को किए प्रणाम तथा राजानक उपाधि से स्पष्ट है।

महिमभट्ट ने ‘तत्त्वोक्तिकोश’ नामक अन्य भी कोई काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ लिखा था यह उनके द्वितीय विमर्श में किए स्वभावोक्तिनिरूपण से स्पष्ट है (पृ० ४५२-३)। प्रतिबिम्बतत्त्व का जो निरूपण उस ग्रन्थ से महिमभट्ट ने यहाँ प्रस्तुत किया है वह संपूर्ण संस्कृत काव्यशास्त्र में अनूठा है। ऐसी सूक्ष्म और तत्वस्पर्शीनी प्रज्ञा काव्य के उस अंश में, जिसे निगूढ और पिहित माना जाता है, विवादता के साथ और कितनी दूर तक न गई होगी ? दु:ख है कि यह ग्रन्थ अभी तक प्राप्त नहीं है।

ग्रन्थ का आलेख

भारतीय काव्यचेतन काव्य के असाधारण विशेषताओं की खोज में अलंकार और गुण-तत्त्व के द्वंद—

अस्ति: सकृत्स्थिरलक्ष्य: काव्यात्मा यो व्यवस्थित:। वक्तृव्यापारनिष्ठस्तस्य भेदाभेदौ स्मृतौ॥

इत्यादि है। डॅ० वॅरने ‘प्रतीयमान अर्थ’ तक पहुँचा वह सच्चुच परिपूर्ण हो गया। इसे डॅ० कीलॉर्न ने डॅ० वॅर से ‘अधॅबर’ कर लिया। कहा गया कि यह यहाँ नारी अक्षर में आभूषणों से

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भूमिका

अलग प्रतीत हो रहे लावण्य [ ध्वनिकारिका-प्रतीयमानं ] के समान है, या इसके सौभाग्य [वक्रोक्तिजीवित०] के समान है, इसे भी मान लिया गया । और आगे बढ़ कर कहा गया कि वस्तुतः-

यह प्रतीयमान अर्थ ही काव्य की आत्मा है—‘काव्यस्यात्मा स एवार्थः’ तो उसे भी बहुतों ने मान लिया । ( महिमभट्ट ने भी ‘काव्यस्यात्मनि संज्ञिनि रसादिरूपे न कस्यान्वित्-विमति:’—कह कर उसे काव्यात्मा स्वीकार किया ही है ) इसप्रकार काव्यार्थ के दो भाग और

दोनों में द्वितीय = प्रतीयमान की सर्वोच्च महत्ता तक भारतीय काव्यशास्त्र के प्रायः सर्वां चिन्तकों की मति संवादमयी रही, उनमें ऐकमत्य रहा । किन्तु इस प्रतीयमान की प्रतीति में ज्यों-

ही कारण की मीमांसा शुरू हुई, विसंवाद खड़ा हो गया, जिसका अन्त अभी तक नहीं हो पाया है । कारण की मीमांसा में दो प्रमुख दल खड़े हुए जिनमें एक व्याकरण-मतानुयायी है और

दूसरा न्यायानुगामी । दोनों में प्रथम दल के प्रथम समर्थक प्रतीयमान अर्थ की स्थापना करने वाले स्वयं ध्वनिकार हैं । व्याकरण शाखा में अनित्य वैखरी से अर्थज्ञान मानना असंभव देख

एक नित्यवाणी की कल्पना की गई है । नित्यवाणी आकार या समुद्री जल के समान सामान्या-

त्मिका है । किन्तु अनित्यवाणी उसे अपने रूप में व्यक्त करती है । एक प्रकार से अनित्यवाणी टार्च

के समान है और नित्यवाणी दीवाल के समान । टर्च का आकार जैसा होता है उससे वैसी

ही प्रकाशकिरणें निकलती हैं और उसी आकार में भित्ति-अंश व्यक्त होता है । इसप्रकार व्याकरण-

शास्त्र ने अनित्य और नित्यवाणी या शब्दों में व्यङ्गचच्यन्यजकभाव स्वीकार किया था । सर्वविदित

है कि उन्होंने जहाँ वैखरी वाणी का निर्वचन किया वहाँ उसे नाद या गड़गड़ाहट के पर्याय

ध्वनि शब्द से पुकारा है । ध्वनिकार को शब्द अर्थ और प्रतीयमान अर्थ में व्याकरण की उक्त

कल्पना का बहुत कुछ साम्य दिखाई दिया । प्रतीयमान अर्थ-जैसे अव्यक्त होता है वैसे ही

व्याकरण का नित्यशब्द । नित्यशब्द की प्रतीति में जैसे कारण माना जाता है, अनित्य शब्द,

काव्य में वैसे ही प्रतीयमान की प्रतीति में कारण होता है वाच्य और उसके साथ उसका वाचक

इतने साम्य पर ध्वनिकार ने यह समझा कि व्याकरण में नित्यानित्य शब्दों के बीच जो व्यङ्गच्य-

व्यञ्जकभाव सम्बन्ध स्वीकार किया गया है वही काव्य के वाच्य प्रतीयमान में भी स्वीकार कर

लिया जाय । और उन्होंने उसे स्वीकार कर भी लिया । उन्होंने प्रतीयमानार्थ की प्रमुखता वाले

काव्य को ऐसा नाम दिया जिससे व्यञ्जना की सिद्धि के लिए उन्हें व्याकरण की ढाल मिल

जाय । वह नाम है ‘ध्वनि’ । अर्थ यह कि कोई भी विचारक वाच्य और प्रतीयमान के सम्बन्ध

को व्यङ्गचच्यव्यञ्जकभावरूप सिद्ध करने का प्रश्न काव्यशास्त्री से न करे, ध्वनि सुनते ही वह

व्याकरण की ओर मुड़ जाय । काव्यशास्त्री ध्वनिकारों को कहने हैं—विद्वानों में सिरमौर हैं

व्याकरणशास्त्री, क्योंकि व्याकरण ही सब शास्त्रों की जड़ है, अतः उनका बतलाया रास्ता सही

है या गलत, उन्हीं से पूछा जाय, हम तो उनके अनुयायी हैं—

‘प्रथमे हि विद्वांसो वैयाकरणा:, व्याकरणमूलत्वात् सर्ववियानाम् ते हि श्रूयमाणेषु

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६२ भूमिका

वर्णेषु ध्वनिरिति व्यवहरन्ति, तथैवान्यैस्तन्मतानुसारिभि: सुरिभि: काव्यतत्त्वार्थदर्शिभिराचार्यवाचकसंमिश्र: आनन्दात्मा काव्यमिति व्यपदेशो न्यायैकवसाम्याद् ध्वनिरिरयुत्तः ।

( ध्वन्यालोक १ )

जव न्यायानुगामियों ने कहा कि प्रतीमान के प्रति वाच्य को हेतु मान लिया जाय और दोनों में व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव की जगह गम्यगमकभाव ही मान लिया जाय तो अपनी व्याखरण-शक्ति से प्रेरित हो उन्होंने उसमें वैषम्य दिखला दिया । अनुमान एक प्रमाण है । उसमें वही हेतु हेतु होता है जो अव्यभिचारी और निश्चित हो । वाच्य का प्रतीमान के साथ ऐसा सम्बन्ध नहीं होता । तत्पर्यवृत्ति वालों को उन्होंने चुप करने के लिये कह दिया कि तत्पर्योर्थ तो उसी अर्थ को माना जाता है जो अर्थ वहीं शब्दत: कथित हो, हर किसी को नहीं । अन्यथा पूर्व कहने का तत्पर्य परिचम में माना जाने लगेगा और परिचम कहने का पूर्व में । अधिक खोजक्षेम करने पर 'वाच्यत्व, स्वरूप, संख्या, प्रतीतिकाल, आश्रय, विषय' आदि में भेद दिखलाकर इतर चिन्तकों का मुँह बन्द करना चाहा ।

इन व्याकरणानुगामी काव्यमागियों ने व्यञ्जना को शब्द की अभिधा जैसी ही भिन्न शक्ति स्वीकार कर लिया । उन्होंने कहा 'सुरभिमांसं मुझेँ' आदि में सुरभि आदि शब्द प्रकरणादि के अनुसार यदि 'सुगन्ध' रूपी अर्थ बतलाते हैं तो दूसरे 'गाय' आदि अर्थ भी बतलाते ही हैं । पहला अर्थ अभिधा से प्रतीत हो जायगा, दूसरे के लिये अभिधा कारगर नहीं होगी क्योंकि उसे प्रकरण आदि बाधित कर देंगे, अत: दूसरे के लिये व्यञ्जना माननी होगी, क्योंकि मुख्यार्थबाधादि के अभाव से यहाँ लक्षणा भी नहीं होगी । इसी प्रकार 'गङ्गायां घोष:' आदि में शैत्यपावनत्व की प्रतीति में न आभिधा कारण होगी और न लक्षणा, क्योंकि शैत्यपावनत्व में न तो गंगा शब्द का संकत है और न मुख्यार्थबाधादि । अतः व्यञ्जना को ही वहाँ भी कारण माना । इसप्रकार शब्द और अर्थ दोनों में व्यञ्जना का अस्तित्व स्वीकार किया गया । उन्होंने और भी आगे बढ़कर व्यञ्जना को ध्वनि नाम दिया तथा उसकी उत्पत्तिभूमि शब्द और अर्थ, उसके गन्तव्य या लक्ष्य प्रतीमान तथा इन सब की समष्टि काव्य को भी ध्वनि नाम दे दिया—

'यन्त्रार्थ: शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थों । व्यड्क्त: काव्यविशेष: स ध्वनिरिति सुरिभि: कवित: ॥'

इसप्रकार प्रतीमान अर्थ की उद्भावना से संस्कृत काव्यशास्त्र को समृद्ध करने के ही साथ इन व्याकरणानुषावी आचार्यों ने काव्य को ध्वनिमय बना डाला ।

व्यक्तिविवेककार महिमभट्ट ने ध्वनि के इस महामतपक्ष को चुनौती दी । यूं तो चुनौती मनोहर कवि ने भी दी थी जैसा कि ध्वन्यालोक में उद्धृत 'यस्मिन् वाक् सृष्टिर्न वस्तु' इत्यादि पद्य से स्पष्ट है । महिमभट्ट ने भी मुख्याभावकत्व तथा भोज्यभोजकभाव नामक व्यापारों की कल्पना

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कर व्यञ्जना को अमान्य ठहराया था, वक्रोक्तिजीवितकार ने भी प्रकारान्तर से ध्वनिसिद्धान्त का खण्डन किया था, किन्तु महिमभट्ट ने न्यायवादी पक्ष से उसका विरोध किया। न्यायवाद को आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में ही उद्धृत कर दिया था अतः महिमभट्ट को उसका प्रवर्तक तो नहीं माना जा सकता, अथापि इस मत को संश्रयपूर्वक प्रस्तुत करने का श्रेय प्रथम और अन्तिम बार उन्हीं को है। इस प्रकार प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति में अनुमिति की कारणता तथा ध्वनि की अनुमितिरूपता ही व्यक्तिविवेक का प्रतिपाद्य है।

महिमभट्ट ने काव्य की अर्थबोधप्रक्रिया की तात्त्विक मीमांसा कर शब्द और अर्थ के विषय में दो निष्कर्ष निकाले हैं। शब्द के विषय में उनका कहना है कि उसमें केवल एक शक्ति का होना संभव है जो अभिधा से अतिरिक्त नहीं हो सकती, एकाधिक शक्तियों का शब्द में रहना कथञ्चित संभव नहीं। इस पर उनका तर्क यह है कि एकाश्रित अनेक शक्तियों में परस्पर निरपेक्षता दिखाई देती है, जैसे अभि की दाहकता, पाचकता, प्रकाशकता आदि शक्तियों में। शब्द की तथा तदाश्रित व्यञ्जना अथवा लक्षणा इसके विपरीत अभिधाश्रित हैं।

दूसरा तर्क यह भी दिया जा सकता है कि शब्द कर्म और ज्ञान के ही समान तृतीयक्षणनिष्ठध्वंसप्रतियोगी है, अर्थात उसका अस्तित्व केवल दो ही क्षणों तक रहता है—प्रथम क्षण वह जिसमें उसका उच्चारण या ज्ञान होता है और दूसरा क्षण वह जिसमें उससे अर्थज्ञान होता है, तीसरे क्षण में अर्थज्ञान के बाद वह समाप्त हो जाता है। यह सर्वमान्य और अनुभवादिद्ध है। ऐसी स्थिति में अभिधा द्वारा अर्थज्ञान कराने के बाद शब्द का अस्तित्व ही नहीं रहेगा अतः उससे अपरार्थ के ज्ञान तथा उसके लिए लक्षणा या व्यञ्जना नामक अपर शक्तियों की कल्पना निर्मूल है। शब्द का संस्कार शब्दात्मक नहीं होता, न तो उससे प्रतीत अर्थ का ही। ये दोनों ज्ञानात्मक होते हैं। ज्ञान एक भिन्न गुण है। वह शब्द रूप नहीं है। उनसे हुई अपरार्थ की प्रतीति में वे ही कारण माने जाएँगे, शब्द नहीं। मम्मट ने लक्षणा को वस्तुतः अर्थंगत व्यापार ही माना भी है। ‘लक्षणाSडSरोपितक्रिया’-द्वारा उसे शब्द का वास्तविक नहीं आरोपित व्यापार स्वीकार किया है। सच भी है।

'गङ्गा पर घर' कहने पर आधाराधेयभाव के न बनने से जब गङ्गाजी का अर्थ गंगातट किया जाने लगता है तब गंगा शब्द न उससे अभिहित प्रवाह रूपी गंगा अर्थ प्रस्तुत रहता है। उससे तट तक पहुँचा जाता है। दूसरे शब्दों में गंगा शब्द श्रोता के मस्तिष्क को प्रवाह के पास पहुँचा देता है, फिर प्रवाह पर से वह तट के पास पहुँचता है। स्पष्ट हो मस्तिष्क को तट के पास पहुँचाने का व्यापार प्रवाह में रहता है। यह प्रवाह काव्य में शब्द से ही विदित होता है अतः उस व्यापार को शब्दनिष्ठ भी मान लिया जाता है। जो न्याय करण और कारण का भेद करता है, और जो ध्वनिवादी अभिनवगुप्त मीमांसक को प्रपौत्र के प्रति जनक कहकर उसकी बात इसी भेद को स्वीकार करके काटते हैं वे लक्षणा को शब्दाश्रित मान कैसे लेते हैं ? ठीक यही तर्क व्यञ्जना के लिए है।

'अत्र धारिक०' में या 'निरेशषच्युतचन्दनदून' आदि में जहाँ अभिधेय से विरुद्ध प्रतीयमान अर्थ

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भासित होता है वहाँ दितीय विरुद्धार्थ की प्रतीति तक शब्द का रहना संभव ही कैसे ? जहाँ अभिधा यदि जाति आदि विशेषण का ज्ञान कराकर व्यक्ति आदि विशेष्य के ज्ञान तक टिक नहीं पाती, वहाँ अभिधा के ही समान तृतीयक्षणप्रध्वंसी शब्द अभिधेयार्थ के आगे अपरार्थज्ञान तक कैसे टिक सकता है ? अनेकर्थक शब्दप्रयोग स्थल में ‘भद्रातमनो दुर्द्विरोहः’-आदि पद्यों के अनेकार्थक पदों से दोनों अर्थ पहले ही अभिधा द्वारा विदित हो जाते हैं, एकार्थ में अभिधा का संकोच बाद में होता है, और दोनों अर्थों के उपमानोपमेय भाव आदि सम्बन्ध की प्रतीति तक उन शब्दों का अस्तित्व मानना संभव नहीं है ।

अपरार्थ की प्रतीति के लिये शब्द की आवृत्ति मानना इसलिए संभव नहीं कि आवृत्ति उस शब्द के अर्थ ज्ञान के आधार पर ही संभव होगी, तब सीधे अर्थज्ञान से ही अपरार्थ का ज्ञान मान लेना सुक्तर होगा । एक यह तक भी किया जा सकता है कि यदि शब्द की आवृत्ति मानी जाती है तो उसकी अभिधा की भी आवृत्ति मान ली जाय और उसी दितीय अभिधा द्वारा अपरार्थ का ज्ञान मान लिया जाय । योगरूढस्थल में रूढि द्वारा योगार्थ के अपहरण की बात इसलिए अमान्य है कि दूसरे रूढ शब्द के प्रयोग से अथवा कविप्रतिभासंरम्भ के प्रस्तुत से योगरूढ शब्द की रूढि अवश्य ही शिथिल हो जाया करती है । रूढि यदि अपरार्थप्रतीति में अभिधा का निरोध करती है तो व्युत्पत्ति का क्यों नहीं करती ? व्युत्पत्ति उसके निरोध से ही पैदा होती है ऐसा कहने से शब्द में रूढि के रहने पर भी अपरार्थप्रतीयकता की सिद्धि हो जाती है । इस आधार पर रूढि के नियंत्रण में शैविल्य की कल्पना फलवती अवश्य ही मानी जा सकती है । जब रूढि के नैथिल्य का एक कारण माना जा सकता है तो दूसरे को मानना भी असंगत नहीं ।

वस्तुतः शब्द एक जड़ और तटस्थ पदार्थ है, उसमें एक ही शक्ति संभव है—एक स्थान से दूसरे स्थान तक संक्रान्त होना, जो वाण या वायु आदि में देखी जाती है, जिसे अर्थवाचकता कहते हैं वह शक्ति हमारे मानस में रहने वाले शब्दज्ञान में रहती है । हमारे मानस में एक ओर शब्दज्ञान रहता है दूसरी ओर अर्थबोधान । यह सम्बन्ध संस्कारात्मक होता है । जब शब्दज्ञान, अर्थज्ञान और दोनों के मध्यवर्ती सम्बन्धभावात्मक ज्ञान की तीनलड़ी श्रृंखला का कोई एक पार्श्व जगता है तो अन्य पार्श्व मी जाग उठता है, इसी को व्याकरणशास्त्रियों ने शब्द और अर्थ का दाम्पत्य, अभेद, ऐक्य मान लिया है । वस्तुतः शब्द में कोई शक्ति नहीं रहती ।

अर्थ का जहाँ तक संबन्ध है महिमभट्ट का कहना है कि अर्थ की शक्ति शब्दशक्ति नहीं मानी जा सकती । अतः उसे अनुमान आदि के समान कार्येतर तत्व ही मानना होगा । नहीं तो अनुमान को भी काव्यांग मानना होगा जिससे काव्याकाव्यत्व का विवेक असंभव हो जायगा । अर्थ की शक्ति का निर्वाचन करने के लिए महिमभट्ट ने अर्थगत संबन्धों का विशेषण किया है उसे ल्होद्देश्य अनेक उदाहरण देकर सर्वत्र साध्यसाधनभाव का अस्तित्व जतलाया है ।

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वाक्यार्थ में विध्यनुवादभाव रहता ही है। उसमें विधेय साध्य होता है क्योंकि वह असिद्ध रहता है। फलतः शेषार्थ उसके साधक होते हैं। 'भूतभव्यसमुचारणे भूतं भव्यायोपयुज्यते'—सिद्धान्त चलता भी है। यह साध्यसाधनभाव लोक, शास्त्र और अनुभव से सिद्ध रहता है। इसके उदाहरण पृष्ठ ५३ से ५६ तक इसी ग्रन्थ में दे दिए गए हैं। यही साध्यसाधनभाव वाच्य तथा प्रतीतमान

व्यङ्ग्यव्यञ्जकता उन्हीं पदाथों में रहती है जो एक साथ रहते या जिनकी प्रतीति में क्रम नहीं रहता। घट और प्रकाश दोनों पूर्वसिद्ध रहते हैं, प्रकाश और घटज्ञान होने में कोई क्रम भी नहीं दीखता, अतः वहाँ व्यंग्यव्यञ्जकभाव माना जाता है। वाक्यार्थों में वाच्यार्थ और प्रतीतमानार्थ की प्रतीति सर्वत्र क्रमिक होती है। कहीं क्रम लक्ष्य होता और कहीं अलक्ष्य। अतः इनमें कार्य-

कारणभाव ही मानना उचित है। कार्यकारणभाव सम्बन्ध मानने पर अनुमति का माना जाना भी उचित है।

महिमभट्ट के इन तकों पर व्यञ्जनावादी व्याकरणभक्तों का यह कथन असामान्य है कि अनुमान एक प्रमाण है, उसमें वही हेतु हेतु होता है जो निश्चित और प्रामाणिक होता है क्योंकि महिमभट्ट ने यह कहीं भी नहीं कहा कि प्रतीतमान की प्रतीति में प्रमाणात्मक अनुमान कारण है। हेत्वाभास से जो अनुमति होती है वह किसी भी दार्शनिक को व्यञ्जना रूप से मान्य नहीं है। उसे सभी अनुमति ही मानते हैं, केवल प्रामाणिक नहीं मानते। व्यवहार में यह अनुमति

प्रतिपद काम में आती है। आज इसी अनुमति ने पुरातत्त्वेतििहास जैसे महत्त्वपूर्ण विषयों को प्रस्तुत किया है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि काव्य में प्रमाणाप्रमाणत्व की अपेक्षा भी नहीं है। आस्वाद लाभ के लिए यहाँ अप्रामाण्य या आहायंता ही अधिक महत्त्व रखती है। रूपक, उत्प्रेक्षा अपह्नुति, अतिशयोक्ति इत्यादि चमत्कारी हैं। रस में इस अप्रामाण्य का सहयोग ही है। शंकुक का चित्रतुरगन्याय अमिनवगुप्त को भी असामान्य नहीं है। इसीलिए तो आलंकारिक आचार्यों ने बौद्धों के—

'मणिप्रदीपप्रभयोरमणिबुद्धयाभिधावतोः । मिथ्याज्ञानाविशेषेऽपि विशेषोडर्थक्रियासु प्रति ॥'

इस वाक्य को वेदवाक्य के समान स्वीकार कर दुहराया है।

सब कुछ के बाद देखना तो यह है कि जो ध्वनिवादी इसप्रकार दूसरे सिद्धान्तों का साहित्य में सांगोपांग समन्वय देखना चाहता है और उसके अभाव में उन्हें असामान्य ठहराता है। इसका अपना स्वयं का ध्वनिमत अपने मूल से काव्य में कितना सांगोपांग समन्वित हो पाया है। व्याकरणवादी ध्वनि को केवल शब्द और वह भी अनित्य शब्द तक सीमित मानते हैं। इससे न तो शक्ति रूप मानते न नित्यशब्दरूप और न उनके शास्त्रवाक्यों से अभिन्न ही। किन्तु ध्वनिवादी काव्यशास्त्री

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३५६ भूमिका वाचक, वाच्य, व्यञ्जना, प्रतीमान और काव्य सबको ध्वनि कह देते हैं। व्याकरणशास्त्री कफ प्रतीमान अर्थ भी शब्दात्मक ही है, काव्यशास्त्रियों का प्रतीमानार्थ केवल अर्थात्मक है। शब्दात्मक कदापि नहीं। शब्द प्रतीमान केवल तन्त्रशास्त्र में होता है जहाँ बीजमन्त्रों की लिपि संकेतों द्वारा ध्वनित की जाती है जो उच्चारणात्मक नहीं होती, स्वरूपमात्र से प्रस्फुटित होती है। यथा—

'वियदीकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥' अथवा नैषध का—'अवामावामार्घ्येण सकलमुभयाकारघटनानम्'—पद । इसे प्रथेलिका तो मानः जा सकता है काव्य नहीं। काव्य में 'ऋचं कुरुः' आदि में जो अश्लीलार्थबोतक पद निकलता मानः जाता है वह भी उच्चारणात्मक है अतः उसे ध्वनित नहीं माना जा सकता 'निमीलिताचीव भियामरावती' में नागेश ने जो 'मरावती' की प्रतीति के कारण सन्धि को अश्लील कहा है वहाँ अश्लीलता बिना पद के तो प्रतीत नहीं हो सकती और पद का वहाँ उच्चारण हो ही रहा है। अतः काव्य में प्रतीमान हो सकता है केवल अर्थ में। जब कि व्याकरण में प्रतीमान केवल शब्द है। दूसरी वैय्याकरण यहाँ है कि नित्यशब्दकोsपि प्रतीमान का व्यञ्जक व्याकरण में केवल अनित्यशब्द माना जाता है, वह भी व्यञ्जक माना जाता है स्वरूपतः । उससे अर्थप्रतीति नहीं। मानी जाती। अर्थप्रतीति मानी जाती है प्रतीत हुए नित्यशब्द से। अतः अर्थप्रत्यायक व्यापार

जिसे वहाँ केवल अभिधा रूप माना गया है इस व्यञ्जक शब्द में नहीं रहता। इस प्रकार व्याकरण के व्यञ्जक की व्यञ्जना में अभिधानिरपेक्षता है और इसलिये वह टार्च या दीपक आदि के समान ही है। उनमें अभिधा नहीं रहती। काव्य के व्यञ्जक में अभिधा रहती ही है। निपात या पदैकदेश पूर्ण पद से निकलने वाली व्यञ्जना को अभिधा के माध्यम से बढ़ाते हैं, अतः उनमें भी अभिधानिरपेक्षता नहीं है। नो लोक निपातों को वाचक नहीं मानते उन्हें तो अभिनवगुप्त के शब्दों में यह उत्तर दिया जा सकता है कि किसी ने खड्ड का लक्षण किया कि खड्ड एक ऐसी वस्तु है जिसे ओड़ा जा सकता है, लपेटा जा सकता है, और विरोधियों द्वारा यह कहने पर कि ओड़ने और लपेटने योग्य वस्तु तो वस्त्र कहलाती है खड्ड नहीं, लक्षणकर्त्ता ने उत्तर दिया—हम ओड़ने-लपेटने योग्य वस्तु को ही खड्ड कहते हैं—यह ऐसा ही है। भाषाशास्त्र से सिद्ध है कि प्रत्येक शब्द स्वतन्त्ररूप से वाचक है। पाणिनि के कुछ नियम कटने लगते हैं अतः उन्हें वाचक न मानना वैज्ञानिक नहीं है। इसप्रकार व्याकरण का ध्वनि शब्द मेघ को गर्जनाहट के ही समान अवाचक या अभिधाहीन है। संगीत के नाद से जैसे चेतना पर प्रभाव पड़ता है और उसमें विकार, विस्तार या क्षोम का स्फार होता है कदाचित् वैसा ही कोई प्रभाव व्याकरण

के ध्वनि शब्द से भी उनके तथाकथित स्फोटात्मक नित्यशब्द पर पड़ता है। फिर व्याकरण ने शब्द को 'प्रतीतपदार्थक ध्वनि' कहा, और साहित्य ने भी उसे उसी रूप में स्वीकार कर लिया था—

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'मूर्ध्नासुधृतकृत्याविरलङ्गलदररकत्संसक्तधारार०', 'अलमलमालि मृणालै:' आदि ध्वनिग्रामों में गुणों का आभूभविक अस्तित्व भी क्यों स्वीकारं नहीं करते ? ओजस्विता और कोमलता अनुप्रास से व्यक्त होने वाले अलग धर्म हैं। यदि वे सहृदय के हृदय में माने जाते हैं तो उन्हें काव्यगुण कैसे माना जाता है। यदि अभिव्यञ्जकत्व सम्बन्ध से, तो यह अभिव्यङ्कत्व अन्य पद समूहों में क्यों नहीं रहता, उन्हीं में क्यों रहता है। कोष्ठ व्यावर्त्तक वत्व स्वीकार करने पर उसे ही गुण कद दिया जायगा। केवल अनुप्रास व्यावर्त्तक होता तो 'अकुण्ठोेकर्ण्ठया तुङ्गंमाकर्ण्ठं' पद में भी वह माना जाता। फिर गीतगोविन्द्र या गीतगौरीश की पदावलियों में केवल अनुप्रास ही है, माधुर्य नहीं ?

इसलिए एक तो काव्यशब्दों को ध्वनि कहनां ही नहीं था और यदि कहा तो केवल व्यञ्जनात्मकता तकं हो उसे सौमित नहीं रखना था और वहाँ तक सीमित रखना था तो फिर उससे गुणों के सर्वांभिमत अस्तित्व को नहीं हटाना था।

स्पष्ट है कि ध्वनिवादी भी व्याकरण के 'ध्वनिसिद्धान्त' को सर्वोत्तमा जैसा का तैसा स्वीकार नहीं कर सका। उसे उसको अपने अनुरूप ढालना पड़ा। किन्तु आश्चर्य यह है कि अनुमितिवादी, तात्पर्यवादी और अन्य वादियों से दूसरे दर्शनों के सिद्धान्तों के काव्य में अक्षरशः निर्वाह का वह आग्रह करता है।

अनुमिति और ध्वनि के विषय में अन्यतर के निर्वाचन के लिए यदि दार्शनिकों की मतगणना हो तो अनुमिति को ९९% मत मिल जाते हैं। ध्वनि को केवल न्यायकरण ही मानता है। शब्द से अर्थ के ज्ञान में अन्य दार्शनिक पूर्वंपूर्व वर्ण संस्कार से युक्त अन्तिम वर्ण के अनुभव को कारण मानते हैं। संस्कार के उद्बोध में विपर्यय न होता, शाब्दबोधस्थल में प्रकृतिसिद्ध है, अतः संस्कार से शाब्दबोध मानने पर वैयाकरण की 'नदी' की जगह 'दीन' के ज्ञान की सम्भावना का तकं अमान्य है। स्फोटनामक नित्यशब्द की कल्पना न्याकरण के अतिरिक्त कोई करता ही नहीं। वे यदि शब्द को नित्य मानते भी हैं तो किसी अनित्य शब्द की कल्पना नहीं करते। अनित्यता केवल कर्णताल्वादिसंयोग में मानते हैं। अतः तब भी उनके यहाँ शब्दों के दो रूप नहीं रहते। और इसलिए उन्हें व्यञ्जना की आवश्यकता नहीं पड़ती। व्याकरण जिसे अनित्य मानता है उसी में अभिधा स्वीकार कर लेता है। इस प्रकार ध्वनिवादी जिस आधार पर अपना सिद्धान्त बना रहा था स्फोट नामक वह आधार ही विवादास्पद है। इसके विरुद्ध अनुमिति चार्वाक को छोड़ सब को स्वीकार है। जहाँ तक उसके प्रामाण्य का प्रश्न हैं कहा जा चका है कि काव्य में उसकी अपेक्षा ही नहीं रहती। अप्रामाणिक अथवा हेत्वाभासजनित अनुमिति को व्यञ्जना इसलिए नहीं माना जा सकता कि व्यञ्जना प्रकरणादिनिरपेक्ष होती है, दीपक घट की अभिव्यक्ति में न प्रकरण को देखता न देश, काल को। वक्ता, वाच्य, अन्यसंनिधि की वहाँ कोई गुंजाइश है नहीं। 'अप्रामाणिक' अनुमिति में इन सब

२ व्य० वि० भू०

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भूमिका

की आवश्यकता होती है। उपचर व्यक्तियों की चेष्टाओं से, उनके रहन सहन, समय, स्थान आदि के ही आधार पर तो किसी तथ्य को ताड़ते हैं, उनका यह ताड़ना शिशिलानुमान ही तो होता है। उसे व्यञ्जक कौन कहेगा ? काव्य में प्रतोयमान अर्थ की प्रतीति में प्रकरणादि भी सहायक माने गये हैं, परन्तु उतने पर भी ऐसे काव्य में व्यञ्जना स्वीकार कर ली गई, जब कि व्यञ्जना में प्रकरण आदि की कोई आवश्यकता नहीं रहती। यह केवल व्याकरण की अतिशय मक्ति का दुरुपपाक है। वस्तुतः यह भी वृक्ष के लक्षण को खींच पर थोेपने जैसी बात है। जहाँ व्यञ्जना मानी जाती है वहाँ भी अनुमान का अस्तित्व स्वीकार किया ही गया है। मम्मट ने अभिनवगुप्त की रसप्रक्रिया का आरम्भ ही अनुमान से किया है 'स्थाय्यनुमानेsभ्यासपाटववताम्'। शंकुक के 'चित्ततुरगनयाय' को वे मानते ही हैं। तो क्या प्रमादादि से स्थायी का अनुमान प्रामाणिक अनुमान है? शंकुन्तला का 'आसीद् विशिष्टवदना व विमोचन्ती शाखासु वल्कलमसक्तमृदुमांङ्गाम्' आदि द्वारा जो अनुभव वर्णित है क्या दुष्यन्तनविषयक अनुराग के साथ उसका सम्बन्ध असंदिग्ध और प्रामाणिक माना जा सकता है। यह तो स्वयं दुष्यन्त भी नहीं मानता। वह भी उसमें 'कामी स्वप्नान् पश्यति' कह कर सन्देह व्यक्त करता है। लौकिक स्थिति में यह भी अनुमान ही तो है। यदि कोई मनचला युवक किसी साध्वी सुन्दरी पर कटाक्ष कर दे और वह सुन्दरी मुकदमा दायर कर दे तो क्या उसे दण्ड दिया जा सकता है? कदापि नहीं। किन्तु जनमानस उसका सुनिश्चित अर्थ निकाल ही लेता है और युवक अपनी चेष्टा में सफल ही रहता है। कितनी समृद्ध है यह संदिग्धानुमिति?

अनुमिति का नाम सुनते ही लोग चौंकते हैं इसलिये हैं कि वह तर्क के साथ रहती है और तर्क कर्कश होता है अतः उससे चमत्कारानुभूति या आनन्दसंप्लव में व्याघात की संभावना रहती है। किन्तु यह अनुमिति अदालत में ही अनुमिति है नहीं और न बौद्धिक अखाड़ेबाजों की ही अनुमिति है, यह अनुमिति तो जीवित को पदे-पदे व्यापक तथा बुद्धि के दीपक में सनत्कार में सेवन ही हमारी भूतियों के मार्ग प्रशस्त करने वाली अनुमिति है, यह काव्यानन्द के कृष्णाभिसार में विदग्ध दूती का काम करने वाली विदुष है। यदि इसी बौद्धिकतनुुसन्तान को व्यञ्जना कहा जा रहा हो तो विवाद केंवल नाममात्र का है, तत्वतः तो दोनों एक हैं। न्याय की दृष्टि से उसे काव्यानुमिति कहा जा सकता है और व्याकरण के दृष्टि से व्यञ्जना। इतना अवश्य है कि व्यञ्जना की सत्ता भावकता पर लेनी है, हृदय और तर्क पर नहीं। भावकता काव्य में आवश्यक है किन्तु काव्यशास्त्र में नहीं। उसमें तर्क, अनुमूति के नख रूप को ही महत्व दिया जाना चाहिए। अनुमिति के हरत के चौथे ही रसिकों हैं।

अनुमितिरेवादीं प्राहुः साड्नान पूर्व शास्त्रभावमहन्ति। विभावानु-

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भावव्यभिचारिप्रतीतिहि रसादिप्रतीते: साधनमिष्यते । ते हि रस्यादीनां भावानां कारणकार्यंसहकारिभूतास्ताननुमापयन्त एव रसादीन् निष्पादयन्ति । त एव हि प्रतीममान आस्वादपदर्वी गताः सन्तो रसा इत्युच्यन्ते ।' ( पृष्ठ ४३७ )

न्यायनयवादी भी बार-बार यही कहता है कि विभावानुभावव्यभिचारी या इनकी प्रतीति ही रस नहीं है अपितु वे रसके निष्पादक हैं—“न हि विभावानुभावव्यभिचारिण: पूर्व रस: अपितु रसस्तै: ।” परवर्तीं ध्वनिमार्गियों ने विभावानुभावव्यभिचारिणो के समूहालम्बनात्मकज्ञान से व्यंजना का आविर्भाव माना है और उससे रत्यादिविषयक आत्मचैतन्यनिष्ठ मायिक आवरण का भङ्ग स्वोकार किया है ( रसगंगाधर रससूत्र ) इस प्रकार उनके मत में भी व्यंजना रस के नीचे ही रहती है । रसगंगाधरकार ने 'व्यक्त: स तैर्विभावाद्यै: स्थायी भावो रस:'—इस काव्यप्रकाश की पंक्ति के 'व्यक्त' शब्द का अर्थ किया है 'व्यक्तिविषयी:ृत:' ( स्थायी ) और 'व्यक्ति' का अर्थ किया है 'भङ्गनावस्थचित्त' ऐसा मानने पर व्यक्ति व्यापार रूप नहीं रह जाती । जब कि उक्ति व्यंजना-व्यापार को रस रूप सिद्ध नहीं कर सकती और न उन्हें वैसा सिद्ध करना अभीष्ट ही है । उन्होंने तो मम्मट की पंक्ति की शाब्दिक व्याख्या करने का प्रयत्न किया है ।

समूहालम्बनात्मकज्ञान में अवश्य ही व्यंजना मानी जा सकती है, क्योंकि उससे आत्मावरण का भङ्ग होता है, किन्तु यह व्यंजना शब्दवृत्तिरूप तो नहीं हो सकती । आगे बढ़ कर कहा जाय तो इस आवरणभङ्ग में भी सहृदयता या भावक्तामात्र को कारण मानने से भी काम चल सकता है । पंडितराज ने प्रमाता या सहृदय के साधारणीकरण में भावनता के साथ सहृदयता को भी सहयोगी माना है ।

इस प्रकार व्यंजना न व्याख्यरण में ही सिद्ध होती है और न साहित्य में ही । व्याखरण का स्फोट विवादास्पद वस्तु है इसलिए उसके लिए कल्पित व्यंजना की अपेक्षा अपने सर्वमान्य और सत्य प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति के लिए काव्यशास्त्रियों को वैसी ही सर्वसामान्य और सर्वानुभवसिद्ध शिथिलानुमिति को कारण मानने में विचिकित्सा नहीं करनी चाहिये । चादिने पर व्याख्यना के समान अनुभूति का भी वे उतना ही समर्थन कर सकते हैं । व्याख्यना एक भौतिक वस्तु है, प्राकृतिक और जड़ उत्पादन है, अनुभूति बौद्धिक और चेतनाश्रित तत्व है । काव्य का असली रूप ज्ञानात्मक हो है अतः उसमें अनुभूति ही संभव है व्याख्यना नहीं ।

इसी प्रकार महिमभट्ट रक्षणा भी नहीं मानते । जैसा कि पहले बतलाया गया है बोधा की बुद्धि गंगा-शब्द से पहले प्रवाह के पास पहुँचती है, फिर प्रवाह से तट के पास । तब 'गंगाजी पर घर' इस वाक्य का अर्थबोध होता है । इस क्रम से स्पष्ट है कि यहाँ गंगा शब्द यदि मस्तिष्क को कहीं पहुँचाता है तो केवल प्रवाह के पास । तट के पास उसे पहुँचाने वाला गंगा शब्द नहीं, प्रवाहरूपी

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२९ भूमिका

अर्थ का ज्ञान है। अतः तात्पर्याक व्यापारीरूपो लक्षणा का आश्रय गौगा शब्द नहीं प्रवाहरूपी

अर्थ का ज्ञान है, फलतः लक्षणा अर्थव्यापार माना जा सकता है जैसा कि मम्मट ने भी माना

है। और इसलिये वह अनुमान रूप है। 'गोस्वारोएण वाहीके तत्साम्यमवुमीयते'—

गौणी में साम्य का अनुमान होता है अर्थात् अनुमान द्वारा साम्य की प्रतीति होती है।

अभिप्राय यह कि प्रयोजनवती में प्रयोजन और निरूद्ध में साम्यमात्र अनुमान से प्रतीत होंगे,

निरूद्धा अभिधारूप भी मानी जा सकती है।

इसी सन्दर्भ में महिमभट्ट ने तात्पर्यवृत्ति ( पृ० १३७–१४१ ) तथा वक्रोक्ति ( पृ० १४२ )

आदि का खण्डन भी ठीक वैसे ही किया है जैसे अभिनवगुप्त ने ध्वनिसिद्धि में ।

इस प्रकार व्यक्तिविवेक की प्रमुख स्थापना शब्द में असुरूक्ष शक्तियों का अभाव तथा अर्थ

में केवल अनुमिति का सन्निवेश है। अपनी इस स्थापना की पुष्टि में उन्होंने धनिकार का खण्डन

करने के लिए उनके सिद्धान्तों की समीक्षा के साथ ही उनके शब्दों और भाषा की भी समीक्षा

की। यह समीक्षा समीक्षा नहीं ध्वनिकार की भाषा की शल्यचिकित्सा है। उन्होंने ध्वनिलक्षण

'यथार्थः शब्दो वा' में दस प्रसव दोष दिखलाए हैं (पृ०—१३० )। इतने से उन्हें संतोष नहीं हुआ

तो वे 'काव्यस्यात्मा ध्वनि:'० पंक्ति पर टूटे और उसके लिए ग्रन्थ के आधे भाग से बड़े द्वितीय

विमर्श में शब्दानौचित्यों का विचार किया, जो एक स्वतन्त्र ग्रन्थ माना जा सकता है।

व्यक्तिविवेक के इस विमर्श का एक स्वतन्त्र महत्व है और इस दृष्टि से अर्थ को पूर्ण और स्पष्टतम

अभिव्यक्ति के लिए नपी-तुली भाषा के प्रयोग पर विश्व भर में लिखे गए ग्रन्थों में व्यक्तिविवेक का

स्थान भी मूर्धन्य है। इस प्रकार की तीक्ष्ण, तीख्ण और तेजस्वी संद्धर्मीमांसका का लाभ संस्कृत

वाङ्मय को कदाचित् यह अवसर मिला कि परवर्ती दार्शनिकों में नव्यन्याय की प्रवृत्ति जागी और

उपाधि, तद्‌दृष्ट�्ट तथा दोनों के संबन्धों तक को अभिधावृत्ति द्वारा ही कहने योग्य भाषा का अनुसंधान

हुआ, मानी शब्द प्रयोग में शास्त्र व्यवहारीकरण बन गए। नहीं तो स्थिति यह थी कि विवक्षा

कुछ रहती थी और लिखा कुछ जाता था। अभिनवगुप्त, आनन्दवर्धन के ग्रन्थ ऐसे ही हैं। भामह

में तो यह वैषम्य इतना उदय है कि उससे कौटिल्य के अर्थशास्त्र का स्मरण हो आता है। स्वयं

महिमभट्ट भी इस उपालंभ से मुक्त नहीं हैं। भाषा को लेकर जैसी खीचाखींच व्याख्याकार ने की

है वैसी ही इनकी भी की जा सकती है और व्याख्यानकार ने उन्हें आधे हार्थों लिया

भी है। कहीं-कहीं हम भी यह अनभिज्ञ कर बैठे हैं। जहाँ तक सिद्धान्तों को शक्तिशोरने

का सम्बन्ध है। यदि महिमभट्ट ने उसमें संश्रम्भ दिखलाया है और श्वेत बहुत थोड़ी मात्रा में

प्रस्तुत किया है तो कोई अनुचित नहीं। स्वतः बिल्कुल भी न दिया होता तो कोई हानि न

होती, द्विवेक में और होता ही क्या है? परिपवर्तन, तिरस्कार, मालिन्य या छिछोरे किचकिच। सूर्य जब

दत्तचक्षुने कहने लगते हैं तो कोई नई वस्तु थोड़े ही प्रस्तुत करते हैं।

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महिमभट्ट की अन्य उद्भावनाओं में काव्य से सम्बन्ध रखने वाली उद्भावनाओं में पथकाव्यगत छन्दों की शब्दालंकारता अत्यन्त मौलिक और अतिनवीत है। द्वितीय विमर्श के आरंभ में ही (पृ० १८९) उन्होंने यह निरूपण कर दिया है। मम्मट उनकी इस स्थापना को अपना तक नहीं सके। विधेयाविमर्श आदि छह शब्दानौचित्यों को जिस रूप में उन्होंने प्रस्तुत किया है उसी रूप में उन्हें प्रायः सभी आचार्यों ने मान्य माना है। इस संदर्भ में शब्दशास्त्र पर महाकवि रुद्रट के श्लाक्ष्णगता के लिये संस्कृतसाहित्यशास्त्र में अद्यावधि बेजोड़ है। मम्मट ने. न जाने उसे क्यों छोड़ दिया। शायद दशरम उल्लास में वे अन्त में शब्दालंकार के दोषों के बीच इस प्रकरण को देना चाहते रहे होंगे जिसके पहले ही वे चल बसे। अल्लट को उनका ध्यान नहीं रहा। शब्दों की इन विशेषताओं के साथ ही अर्थ की विशेषताओं पर भी महिमभट्ट ने कुछ नई बातें कही हैं। इनमें गुणीभूतव्यंग्य और ध्वनि नाम से अभिहित काव्यों में भेद न मानना (पृ० १४) प्रमुख है। उन्होंने यहाँ उलटी गंगा बहाई है। दीपक में उपमा को प्रधान बतलाया है। प्रत्येक प्रतीयमान को उन्होंने काव्य का प्राणतत्त्व या तात्पर्यभूत अर्थ माना है। कवि का संप्रस्भ वाच्य में भी रहता है ऐसा सकता। उन्हें कदाचित् वैसा ही अनुभव होता रहा होगा। वस्तुध्वनि पर उनकी अनास्था है। उन्हें कदाचित् स्पष्ट, अन्तरितान्तरित आदि प्रतीमान वस्तु को वे प्राहेलिकाप्राय और चमत्कारशून्य मानते हैं। उनकी यह सूक्ष्म और दाक्षिण्यशून्य मति कहीं-कहीं पिटे-पिटाए पथ पर चल पड़ी है। कुन्तक ने अलंकारों को अभिधात्मक माना था। उसे उन्होंने जैसा का तैसा स्वीकार कर लिया है। संभवतः वह कुछ उलट भी गई है क्योंकि उन्होंने अभिधात्मकता के अभिधा शब्द का अर्थ शब्दसंकेत मान लिया है। जिस पर व्याख्याकार को सफाई करनी पड़ी है। काव्येतर विषयों के विषय में महिमभट्ट ने कुछ मौलिक मान्यताएँ प्रस्तुत की हैं। इनमें 'क्रिया की शब्दप्रवृत्तिनिमित्तता' (पृ० ३०) और 'अपशब्दों का निर्णय' (पृ० ४८४) प्रमुख हैं। शाकटायन के व्युत्पत्तिनिमित्तवाद से इसे पुष्ट कर उन्होंने इस मौलिकता की ओर संकेत किया है। निपातसंबंधी विवेचन पर भी वे काफी दूर तक स्वतन्त्रता बरतते हैं।

तृतीय विमर्श में उन्होंने ध्वनिपक्षों में अनुमिति की सामग्रा का स्पष्टीकरण किया है। उसके आधार पर कुछ पचड़ों में अनुमितिप्रकार कुछ ऐसे हो सकते हैं—

१—ग्रंथाधमिक—

गोदावरितीरंभीरुहश्रमणयोग्यं, दूर्संसिहवस्वचातु, यद्यैवं यन्नैवं यथा प्रमदोद्यानम्।

२—अथ्था पंस्तु—

इयं प्रोक्षितपतिका पथिककर्तृकस्वनायनीयोदेशाधीकरणनिष्ठतोपस्थानाभिप्रायवती,

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२३

भूमिका

अविदितस्वरूपपथिकविषयकाकस्मिकनिशान्धतोपप्लेपकर्तृत्वे सति तादृशपथिकोद्देश्यकसस्वशायनीयोद्‌देशदर्शनकतृत्वात्, या नैवं सा नैवं यथा पतिव्रता।

३—वच्‌च महाविआ०—

प्रकृतो नायकः अन्यानुरागातिरायवान् नायिकाकर्तृकनायिकान्तराधिकारणेोद्देश्यकप्रस्थानानुमतिविषयत्वात् यो नैवं स नैवं यथा अहम्।

४—देआ पसिअ०

प्रकृतनायिकावदनं कान्त्यतिरेकविशिष्टं, स्वानुरागिकासेेेविशिष्टश्रृङ्‌ग्यो सन्नाविल्हसतमोनिवहत्वेन वण्यमानत्वात्।

५—कस्य वा न०—

प्रकृतनायिका परपुरुषपरिभोगरहिता सश्रमराम्भोजाम्राणशीतल्वेन अमरदृष्टाधरपल्लवस्वात्।

६—सुवर्णयुप्पास०

शूरादृश्रृय: सर्वत्र सुलभविर्भवा:; सुवर्णयुप्पपृथिवीवीचयनकर्तृणां वेोपादीयमानत्वात्।

७—सिखरिणि०

स्वदृशरपङ्‌क्तावपरिचुम्बनास्मृतं नाल्पपुण्यपुरुषावाप्त्यम, लोकोत्तरपरिणामश्रालिरत्वेन समारोप्यमाणशुकशावककण्ठधममानतस्सादृश्यावलम्विफलसादृश्यप्रतियोगित्वात्।

८—अग्रान्तरे कुसुमसमय०—

(क) प्रकृतं महाकालपदं महाकालदेवताविशेषप्रतिपादनपरं, युगसंहाराद्‌ध्वंसबोधकपदसमभियाहतत्वात्,

(ख) महाकालो नाम देवविशेष: अग्रत्यमहाकालपदप्रतिपाद्य:, युगसंहाराद्‌ध्वंससामान्य अनुमिति से इन अनुमितियों में अनतर यह है कि इनके प्रतिपादक काव्यपदों में साध्य गैर दृष्टान्त र्बदत: कचित नहीं होते अत: ये अनुमितियाँ भी अनुमितिसाध्य हैं। साध्य और दृष्टान्त के कभट पर महिमभट्ट ने उत्तर दिया है—

'तद्भावहेतुभावो हि दृष्टान्ते तद्वेदिन: । क्यापेक्षते चेतुर्षा वाच्यो हेतुरेव हि केवल: ।।' (पृ० ६९)

अभिप्राय यह कि वे लोकानुभव से सिद्ध हैं। उनके शब्दोपादान से अनुमिति में प्रामाण्यमात्र का निष्पादन होता है जो काव्य में अनावश्यक है।

इस प्रकार महिमभट्ट का चिंतन संप्रदायश्रद्धा से जड़ नहीं है, उन्होंने अन्यव्यतिरेक द्वारा सिद्ध है कि काव्य की शोभापथ में चलती है उसे कूठत नहीं होने

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दिया है, और इस प्रकार संस्कृतकाव्यशास्त्र में व्यक्तिविवेक का स्थान प्राचीन के नीरक्षीरविवेक तथा नवीन की विशद् स्थापना दोनों ही दृष्टियों से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

'साधारण्याख्यचणा वक्रोक्तिः'—कहकर प्राचीन आचार्यों ने काव्यक्षेत्र में जिसे असरलव्यवोधी का संकेत किया था केवल उसी को अपना कर जिस प्रकार धनिकार ने स्वतंत्र ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' का निर्माण किया और प्रतिपादित अर्थ की स्थापना को उसी प्रकार प्रतिपादन अर्थ पर 'व्यक्तिविवेक' का निर्माण किया तथा अनुमिति की स्थापना की।

इस प्रकार उन्होंने काव्यविश्व के प्रतीमानरूपों पर एक-एक अंग पर स्वतन्त्र विचार का उपक्रम किया, जिसमें पूर्ववर्ती अभिनवगुप्त और परवर्ती अन्य आचार्य पंक्तिबद्ध दिखाई देते हैं।

प्रतीमान के एकदेश रसध्वनि को अभिनवगुप्त ने ही सर्वाधिक महत्त्व दिया है। वे चाहते तो स्थायी भाव को लोकभूमिका से रस की लोकोत्तर भूमिका तक पहुँचाने वाले अनुमान, विभावनादि व्यापार, साधारणीकरण, विकासादृप भोग या व्यक्ति इत्यादितत्त्वों में से एक-एक तत्त्व का सर्वाङ्गीण विवेचन कर कहीं 'रसालोक' नामक ग्रन्थ भी 'तन्त्रालोक' के ही समान लिख सकते थे, किन्तु मन्दिर की देहली पर ही लोचन और अभिनवभारती के केवल दो ही पुष्प चढ़ा कर उन्होंने सतोत्साहनुभव कर लिया, साहित्यदेवता की साक्षात् पूजा की कोई उत्सुकता उनमें न जागी।

प्रसन्नता का विषय है कि न्यायशास्त्र ने अनुमिति के एक-एक अंग—पक्षता आदि पर स्वतन्त्र ग्रन्थों का निर्माण किया है और इस कार्य में अलंकारों पर साहित्य भी चूका नहीं है।

निःसंदेह महिमभट्ट ने काव्यशास्त्र की आवश्यकता पहचानी थी।

व्यक्तिविवेक कई दृष्टियों से सदोष भी है। सबसे पहले तो उसकी भाषा ही अस्त-व्यस्त है। यद्यपि कुन्तक के समान व्यक्तिविवेककार ने भी भाषा को काव्यात्मक बनाने का प्रयत्न किया है किंतु उन्होंने सदूर पूर्व के विषयों का परामर्श बहुत आगे बढ़कर सहसा सर्वनामपद से जगह-जगह किया है।

काफी उड़ानोद्ध के पश्चात् उसकी पहचान हो पाती है। भाषा की प्रवृत्ति अनेकों स्थलों पर संदिग्ध है। उसका निःसंदेह अर्थ निर्धारित करना कठिन है।

प्रथम विमर्श में ऐसे स्थल अधिकमात्रा में प्राप्त हैं, द्वितीय विमर्श के अन्त में—'तथा एतद्दोषजातयो महाकवीनामपि दुलंल्बा इत्यवसीयते' (पृ० ४५५) पंक्ति के पश्चात् ९१ पंक्तियों में उदाहरणविवेचन कर, बाद में 'यत्तो वस्तुमात्रोपनिबद्धप्रायेडपि पदस्मुच्चये हृश्यन्ते तु ते अन्येऽपि यथा'—यह पंक्ति लिखी गई है।

निःसंदेह ही 'यतः' मध्यवर्ती ९१ पंक्तियों के पहले की 'तथा पथा……सीयते' पंक्ति पर निर्भर सम्बन्ध का घनिष्ठ अव्यय है। इस अंश को योजना वस्तुतः ऐसी होनी चाहिए थी—तथा पथा दोषजातयो वस्तुमात्रोपनिबद्धप्राये पदस्मुच्चयेडपि हृश्यन्ते तु यथा 'काव्यप्रकाशो०' यावन्महाकवीनामपि दुलंल्बा इत्यवसीयन्ते यथा—'उमाचृशांकौ०'।

पंक्तियों का क्रम वैसा ही रखना हो तो 'यतः' के स्थान पर 'एवमेव' और 'अपि' को पदस्मुच्चय के अनन्तर रख देना था।

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व्यक्तिविवेक में विषयों का प्रतिपादन अनावश्यक विस्तार लिए हुए है । प्रथम विमर्श में ‘कल्वा’ की पूर्वकालिकता का प्रपंच इसका जीता-जागता उदाहरण है !

महिमभट्ट आलोचना करते हैं किन्तु आलोच्य के साथ पक्षपात करते हुए । कालिदास के ‘तां जानीया:0’ पद ( प्र० ४८५ ) में द्वितीयान्त पदों को लेखक्रम कह कर प्रथमान्त पाठ को ही कविविवक्षित बतलाते हैं और इसीप्रकार ‘चन्द्र प्रबुद्धोभिनवेनिर्जिर्णश्रावीं’ को ‘चन्द्र प्रबुद्धो जलधिनिर्जीव’ बना देते हैं । व्यक्तिविवेक में उद्धृत पद्यों में भी पर्याप्त पाठान्तर है ।

क्याख्यानकार ने उन्हें सुधारा नहीं है यद्यपि ग्रन्थकार को ‘प्रौढवादरचनाविचक्षण’ कहने में वे नहीं चूके हैं । ऐसे अन्य दोषों के रहते हुए भी ‘व्यक्तिविवेक’ संस्कृतकाव्यशास्त्र का पूरक और अनिवार्य, महत्त्वपूर्ण और आदरणीय ग्रन्थ है । काव्य के निर्माण और अनुशीलन में यह ग्रन्थ आनन्दवर्धन और मम्मट के ग्रन्थों से अधिक व्युत्पादक है । दुःख की बात है कि इसकी गुरु-शिष्य परम्परा नहीं चली और इसपर अच्‍छी टीकाएँ नहीं बनीं । कोई ऐसा पण्डित अभी तक नहीं है जिसने काव्यप्रकाश के समान व्यक्तिविवेक पर दस-बीस वर्ष विशेषाधययन कर इसके एक-एक अंश को स्पष्ट कर लिया हो । यह ग्रन्थ केवल सन्दर्भग्रन्थ के रूप में देखा जाता रहा । मधिनाथ, हेमाद्रि आदि टीकाकार व्यक्तिविवेक को ‘उदाहृत’ करते हैं । मछिनाथ ने एकांली पर टीका लिखी, किन्तु व्यक्तिविवेक पर ‘नहीं’ । सब कुछ के बाद भी यह स्रुष्ट कृति के समान जीवित है, हृदयदर्पण के समान उत्तम न हो गया ।

राष्ट्रभाषा हिन्दी में हमें एक शुभ लक्षण दिखाई दे रहा है कि यह विचारक्षेत्र में पूर्वग्रह से जकड़ी नहीं है, जिसमें पढ़ने से संस्कृत का उत्तरकाल विवेक और न्याय से उद्‌जवल कम, श्रद्धाभक्ति से अन्थकारपूर्ण अधिक है । हमें आशा है कि हिन्दी अन्य पौरुषेय पदार्थ चिन्तन के ही समान व्यक्तिविवेक द्वारा प्रस्तुत काव्यार्थ चिन्तन में भी ध्वनिकाव्यादि सिद्ध होगी ।

व्यक्तिविवेक की जो संस्कृत टीका यहाँ दी जा रही है उसमें उसके रचयिता का नाम नहीं मिलता, किन्तु इसमें ‘साहित्यमीमांसा’ तथा ‘हर्षचरितवार्तिक’ को टीकाकार ने अपनी अन्य कृति बतलाया है—

‘अस्य च वेधेयविनिर्स०००५र्समाभिः साहित्यर्मीमांसायां०प्रपञ्चः प्रदर्शितः हृत्तिग्रन्थवस्तुतत्त्वोदित एव‘निरस्तत’ ( प्र० २८६ ) एतच्चास्माभिः हर्षचरितवार्तिके निर्णय-तेनिरो तरा एवादर्शयिष्यते’ ( प्र० ३९३ )

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इन दोनों ग्रन्थों को अलंकारसर्वस्वकार ने भी स्वकृति कहा है—

'एषापि समस्तोपमाप्रतिपादकविषयेऽपि हर्षचरितवार्तिके साहित्यमोमांसायां च००० उदाहृता, इह तु ग्रन्थविस्तरभयान्न प्रपञ्चिता' (निर्णयसागर सं०-२, पृ० ७७; उत्प्रेक्षाप्रकरण)

अलंकारसर्वस्व के टीकाकार जयरथ भी 'साहित्यमोमांसा' को अलंकारसर्वस्वकार की अपरकृति मानते हैं—

'ग्रन्थकृतापि साहित्यमोमांसायामेतच्च्छ्लोलोकविवृतौ पञ्चदशमेवोक्तम्' (विमर्शिनी, अ० सं० पृष्ठ—१६० संस्करण वही)

'वाच्यस्य प्रतीममानेन तादात्म्यतहुरुपस्यभावादि नेह प्रतन्यते व्यक्तिविवेकविचारे हि मयैतदु वितत्य निर्णयोक्तिमिति भाव:' (वही पृ० १६)

जो साहित्यमोमांसा त्रिवेन्द्रम् से छपी है उसमें दोषप्रकरण खण्डित है अतः विधेयाविमर्शों तो बिल्कुल ही नहीं है, किन्तु उत्प्रेक्षा की वह सामग्री उसमें अवश्य प्राप्त है जिसे सर्वस्वकार ने सर्वस्व में छोड़ दिया है और वहीं से समझ लेना पर्याप्त वतलाया है। यह सामग्री 'मन्ये शंके०' आदि उत्प्रेक्षावाचक पदों की है। जयरथ ने विभावना प्रकरण में जिस 'अनंगलेकाऽ' इत्यादि पथ पर प्रदर्शित तीन मतों में से तृतीय मत को प्रक्षिप्त माना है वह साहित्यमोमांसा में नहीं है, यद्यपि अन्य दो के भी संकेत ही मिलते हैं (पृ० ४७७ सी० मो०)। अतः इस छप्री तक प्राप्त नहीं है, किन्तु साहित्यमोमांसा के साथ समान रूप से उसका दोनों ग्रन्थों में उदाहरण

उसकी अमिन्नकलंकता प्रमाणित कर ही देता है।

जहाँ तक अलंकारसर्वस्व के रचयिता का सम्बन्ध है उसके नाम में भी विवाद है। अलंकारसर्वस्व की छपी प्रतियों में से निर्णयसागरीय प्रति में उसके रचयिता का उल्लेख नहीं है और त्रिवेन्द्रम् से समुद्रबन्ध को टीका के साथ छपी प्रति में उसके रचयिता के लिए यह अनुश्रुत

'इति मंखकौ विरतेन कार्मोरचितिपसंधिविग्रहिकः । सुकविसुखलक्षणां तदिदमलंकाआर्सर्वस्वम् ।।'

निर्णयसागरीय प्रति में 'निजालंकारसूत्राणाम्' यहाँ जो प्रथम पद है, उसके स्थान पर इन दक्षिणी प्रतियों में 'गुरुलङ्कारसूत्राणाम्'-पाठ है। समुद्रबन्ध ने भी वृत्ति का रचयिता मंक को माना है। राजतरंगिणी के ८।३३५४ पर्वोक्त पद्य में मंख को साहित्यविग्रहिक कहा भी गया है।

मंख ने अपने श्रीकण्ठचरित के प्रागुक्त संदर्भ में रुय्यक को अपना गुरु और अनेक शास्त्रों पर सूत्रों का निर्माता बतलाया है। इसके अतिरिक्त अलंकारसर्वस्व की वृत्ति में श्रीकण्ठचरित के

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अनेक पद्य उद्धृत भी हैं यद्यपि उनमें सम्बन्ध सूचना के लिए 'यथा मत श्रीकण्ठचरिते' इत्यादि कुछ भी निर्देश नहीं है। गुरु के पद्यों को उद्धृत करना तो प्रसिद्ध है किन्तु शिष्य के पद्यों को उद्धृत करने का कोई दृष्टान्त नहीं मिलता। निश्चित ही मंख ने अपने पद्यों के साथ सम्बन्ध-सूचक शब्द केवल विनयभाव के कारण नहीं दिये। इस प्रकार सूत्रों के रचयिता रुय्यक और वृत्ति के मंथन की विदित होते हैं।

निर्णयसागर की प्रति में उसके संपादक श्री गिरिजाप्रसाद द्विवेदी ने वृत्ति का रचयिता भी रुय्यक को ही माना है। मंख के विषय में प्राप्त उद्धृत प्रमाण को वे प्रसिद्धि के आधार पर प्रतिलिपिक द्वारा अपनी ओर से जोड़ा हुआ और अप्रामाणिक मानते हैं। उनका कथन है कि मंख सांधिविग्रहिक नहीं थे, उनके बड़े भाई अलंक्कार सान्धिविग्राहिक थे अतः उक्त पुस्तिका पद्य अप्रामाणिक है। कदाचित उन्होंने राजतरंगिणी का ८१३५४ वाँ—

'सांधिविग्रहिको मंखकथयोऽलंक्कारसोदरः । स मठस्थाभवत् प्रस्थः श्रीकण्ठस्य प्रतिष्ठया ।।'

यह पद्य नहीं देखा था। उन्होंने जिन प्रतियों के आधार पर अलंक्कारसर्वस्व की सम्पादन किया है वे अवश्य ही अपूर्ण थीं। यह इसी से सिद्ध है कि उनमें प्रारम्भ में मंगल पद्य है किन्तु अन्त में पुष्टिपक नहीं। उनके अन्य तर्क उक्त प्रमाण से अपने आप कट जाते हैं। 'गुरुवेलङ्कारसूत्राणाम्' में आए गुरु पद को वे गम्भीरता के अर्थ में जमा देना चाहते हैं। किन्तु वह सदोष है। क्योंकि उस अर्थ में गुरु शब्द की आवयकता ही नहीं रहती। सूत्र शब्द अपने-आप में गम्भीर्य को बोधक होता है।

इस प्रकार जब 'अलंक्कारसर्वस्व' की वृत्ति के रचयिता मङ्ख सिद्ध होते हैं तो व्यक्तिविवेक-व्याख्यान का रचयिता भी उन्हें ही मानना पड़ता है। उनका समय ई० ११२८ का विचार पहले ही किया जा चुका है।

इस व्याख्यान की विशेषता यह है कि इसमें जहाँ एक ओर व्यक्तिविवेक के मर्मस्थानों का स्पष्टीकरण किया गया है वहाँ दूसरी ओर ध्वनि के समर्थन में इस पर आक्षेप भी किए गए हैं। न्यायालङ्कार ने मूलकार को 'साहित्यविचारदूषिनिरूपक' तो कहा ही है ( पृ० ४, श्लोक ३२ की न्यायालङ्कार ने निरंकुश भी कहना चाहा है ( पृ० ३१८ ) । महिमभट्ट ने श्लोकारचना में दोष दिखलाए हैं अतः उनके स्वयं के श्लोकों पर उन्हें की दृष्टि से कटाक्ष करने की पूरी छूट न्यायालङ्कार ने बरती है। ध्वनिकार के मत का खण्डन कर जहाँ महिमभट्ट ने संग्रहकारिका द्वारा उसका उपसहार किया है वहाँ ध्वनिकार का समर्थन कर व्याख्याकार ने कारिका द्वारा ही प्रत्युत्तर दिया है। ग्रन्थकार की प्रशंसा भी की है किन्तु दबे स्वर में। इतना होने पर भी इस टीका का शास्त्रीय महत्व उतना ही है जितना ध्वन्यालोक के लोचन का । भाषा की सफाई में तो हम इसे लोचन से भी

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समृद्ध मानते हैं । विधेयाविमर्शों में जहाँ सर्वनाम का विवेचन किया गया है वहाँ व्याख्यान मूलग्रन्थ से आगे बढ़ा दिखाई देता है । विशेषण की प्रौढ़ि-अप्रौढ़ि पर जो सूक्ष्म, विस्तृत तथा सोदाहरण विवेचन किया है वह मम्मट के भी दोषविवेचन का पूरक है ।

न्याकरण और बौद्धसाहित्य तो व्याख्याकार के खिलौने हैं । धर्मकीर्ति की--'नैमित्तिक्याः श्रुततस्तथा' ( पृ० ८९ ) इस कारिका को लेकर जहाँ मनोरथनन्दी और प्रज्ञाकरगुप्त में परस्पर विवाद है वहाँ यह उसे सहज भाव से उद्धृत कर देता है । मनोरथनन्दी उक्त कारिका का चतुर्थ चरण--'अबाधनाहों हि वर्णितः' मानते हैं और प्रज्ञाकरगुप्त 'न बाध्यस्तेन वर्णितः' मनोरथनन्दी श्रुति शब्द को सामान्यशब्दपरक मानते हैं और प्रज्ञाकरगुप्त वेदपरक । व्याख्याकार पाठ मानते हैं प्रज्ञाकरगुप्त का और अर्थ में अनुकरण करते हैं मनोरथनन्दी का । मनोरथ के अनुसार उक्त कारिका का अर्थ यह है--

'नैमित्तिक्याः वस्तुभूतगुणादिनिमित्तवश्या: श्रुते: अर्थं गुणादिकं पारमार्थिकमर्थं गुणिगुणादिसंबन्धं शब्दानां गुणादिवाचिनां प्रतिसन्धानोडबाधनाहों बाधां नाहंति युक्तो भवति ।'

शब्द के प्रवृत्तिनिमित्त गुण, क्रिया, जाति, यदृच्छा हैं । किन्तु वस्तुतः: इनके अर्थ गुणादि न होकर उनके सम्बंध हैं जो ( सिरफिरा ) इन सम्बन्धादि का विरोध करता है ( वह विरोध करता रहे ) उससे कुछ कहने की आवश्यक्ता नहीं । प्रज्ञाकरगुप्त के भाष्य का अभिप्राय ऐसा कुछ है—श्रुति अर्थात् वेद मन्त्रों के निर्माण का प्रयोजन है कोई प्रलोभन, अन्य शब्दों की प्रवृत्ति होती है संकेत से ऐसा नहीं मानना चाहता उसे सताने की आवश्यक्ता नहीं है । व्यक्तिविवेकव्याख्यान में यहाँ निमित्त बल से शब्द की प्रवृत्ति होने पर निमित्त के अभाव में शब्द प्रयोग अनुपपन्न बतलाया गया--दर्शाया गया है और तब यह कारिका प्रमाण रूप से उद्धृत की गई है । अतः यहाँ उसका वही अर्थ मान्य है जो मनोरथनन्दी ने स्पष्ट किया है । प्रथम दोनों संस्करणों में उक्त कारिका अशुद्ध छपनी थी और उसके साथ '?' यह प्रश्न चिह्न लगा हुआ था । इसी प्रकार और भी ऐसे स्थल इस व्याख्यान में हैं जो स्पष्ट नहीं हो पाये थे । उनमें से कुछ अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। इस टीका के अतिरिक्त व्यक्तिविवेक की दो टीकाएँ और हैं एक अकाळजलद कहे जाने वाले चामुण्डसिंह की प्रेरणा से लिखित तिलक नामक और दूसरी पं० महासूदननंजो मिश्र की महासूदनीविवृति । पहली टीका अभी तक प्रकाशित नहीं है उसकी प्रति पूना भण्डारकर प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान में है ।

दूसरी चौखम्बा से बहुत पहले छप चुकी है ।

राष्ट्रभाषा हिन्दी की सेवा में यह ग्रन्थ पहली बार प्रस्तुत हो रहा है । कर्तव्यचिन्त विद्वान् में व्यक्तिविवेक का यह पहला भाषान्तर है । इसमें हमने हिन्दी में मूल और टीका दोनों का अनुवाद कर उनमें अपेक्षित टिप्पणियाँ भी दे दी हैं । यथासम्भव विषय भी स्पष्ट कर दिया है । शीघ्रतावश इसमें क्षेपों के सन्दर्भ ढूँढ़े नहीं जा सके, पुस्तक छपने पर

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हमें रत्नाकर का हरविजय मिला तो उसमें अनेक पयों के पाठ कुछ और ही दिखाई दिये—

'उषसि विगलितान्धकार' (पृ० ४१८) की जगह हरविजय में टीकाकार ने 'विगलित-

विततान्धकार' पाठ माना है ( २८१८२ ह० वि )। इसी प्रकार स्फुटदलनमनाश्व ( पृ०

४१५ ) की जगह हरविजय में 'स्फुटदलनघनाश्व' ( २८१५ ) पाठ है, 'सरसमन्थरतामर-

सोदर०' (पृ० ४१५ ) की जगह 'सरसमन्थरतामरसादर०' ( ३१४५ ) पाठ है, 'संग्रामनाटक०'

(पृ० ४१८) पथ के 'उत्थापनेऽन' के स्थान पर हरविजय में 'उत्थापनेन' ( ४०१३८ ) पाठ है । इन

कारणों से जो-जो कठिनाइयां यहां रह गयी हैं उनका परिहार विद्व् पाठक स्वयं कर लेंगे । इन अंशों

पर व्याख्यान लब्ध नहीं है । राजानक अलक ने उत्थापनेन का अर्थ 'उत्कृष्ट: स्थापक: सूत्र'धार-

इति सकारस्य थकारः; उत्थापको वा सात्वतीवृत्तिभेदः; उत्क च ( खण्डित ) ।' उन्होंने

'उत्थापनेऽन' पाठ पर भी विचार किया है और लिखा है—क्वचित 'उत्थापनेऽन' इति पाठः,

तत्रोथापनम, उत्थापनगतम 'यस्मादुपायनयन्नयत् प्रयोगां नान्दीपाठका:, पूर्वमेव तु रङ्गे-

रङ्गसस्तमादुष्ट्यापनं स्मृतमत्र' इति पूर्वरङ्गाङ्ङ च । नान्दी नगाड़े का भी नाम है । मालविकाग्रि-

मित्र में गणदास जहां प्रयोग का आरम्भ करते हैं वहां उसके आरम्भ की सूचना नगाड़ा बजाकर

दी देते हैं—

जीमूतस्ननितविशंकिमिरमयूरेहृद्ग्रीवैरतुरसितस्य पुष्करसस्य । निर्हादिन्युपहितमध्यमसवरोत्था मायूरी मधयति मार्जना मनांसि ॥

धैय द्वारा वहां वाद्यध्वनि के उत्थापन का उल्लेख भी किया गया है । अतः यहां कदाचित उत्थापन

का नान्दी निनाद अर्थ ही विवक्षित है । उसे सुनते ही सहृदयजन प्रयोगारम्भ की सूचना से

प्रसन्न हो उठते हैं । हमारा अर्थ इस अर्थ के पास तक पहुंचा हुआ है !

व्यक्तिविवेक का प्रथमानन मैंने काशीहिन्दूविश्वविद्यालय के भूतपूर्व साहित्यविभागाध्यक्ष

तथा संस्कृतमहाविद्यालय-प्राचार्य पं० महादेवजी शास्त्री संपत्ति ऊध्वम्नायकाशीपीठाधीश्वर अनन्त-

श्रीविश्रूषित शंकराचार्य श्रीमन्महेश्वरानन्दजी सरस्वती से तथा श्रोशां० का० हि० वि० विद्यालय के

भूतपूर्व- तथा वाराणसेय संस्कृतविश्वविद्यालय के वर्तमान साहित्यविभागाध्यक्ष पं० रामकुबेरजी

मालवीय से पढ़ा है । इन दोनों आचार्यों ने चौखम्बा तथा त्रिवेन्द्रम् की प्रतियों का अपने सुधीर्घ

अध्यापनकाल में जो संशोधन किया था मैंने उसका पूर्ण लाभ लिया है, यद्यपि मैंने स्वयं भी, जहां-

तहां संशोधन किये हैं, उनका मैंने स्पष्ट उल्लेख भी कर दिया है । औपचारिक कृत्तज्ञता प्रकाशित

कर मैं अपने इन गुरुजनों और अपने बीच तटस्थता नहीं लाना चाहता, क्षमा अवश्य चाहता हूं।

यदि इस ज्ञानरत्न को सम्हालने में मुझसे कवचित् स्वल्पन हुआ हो या मैं उनकी प्रतिष्ठा के

अनुरूप कार्य न कर पाया होऊँ ।

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भूमिका

२९.

मेरे प्रेरणागुरु डा० वासुदेवशरणजी अग्रवाल जिन्हें मैं ‘सारस्वतधियोचि’ कहूँ तो तो सरस्वती को प्रसन्नता होगी, कलकत्ता के काव्यशास्त्रविनोदो और कलामर्मज्ञ श्रीमान् गोपीकृष्ण जी कानोडिया, सइज्ज सनातनी श्रीमान् गौरीशङ्कर जी गोयनका तथा उसो नगरी के ‘समृद्ध चारुदत्त’ श्रीयुत सेठ हनुमानप्रसाद जी पोद्दार का मैं हृदय से अनुग्रह मानता हूँ जिनके आधार पर मैं काशी में रह सका अतः जिनकी स्मृति मेरे प्रत्येक ज्ञानकण के साथ सदा संलग्न रहेगी।

इस ग्रन्थ का अधिकांश मैंने काशी के आदरणीय श्री श्रीनन्दनजी शाह के दुर्गाकुण्डस्थ आवास में रहकर निष्पन्न किया है। मुझे दुःख है कि इस प्रकाशन के समय आज वे इस संसार में नहीं हैं।

वाराणसी के विश्वविख्यात प्रकाशन-संस्थान चौखम्बासंस्कृतसीरीज तथा चौखम्बाविद्याभवन के संचालक श्रीयुत मोहनदास जी गुप्त तथा श्रीयुत विद्ठलदास जी गुप्त ने इस भाष्य के निर्माण में आवश्यक ग्रन्थादि देकर सक्रिय सहयोग दिया तथा इसके प्रकाशन का भार स्वयं लेकर इसे यथासमय प्रकाशित भी कर दिया, एतदर्थ मैं उनकी वृद्धिकामना करता हूँ।

राष्ट्रभाषा की सेवा में पहली बार प्रस्तुत हो रहे मेरे इस आरम्भिक प्रयास को विद्वानों में यदि कोई आदर हुआ और छात्रों ने इससे लाभ उठाया तो मैं इसे सफल समझूँगा—

६।१।६४ शासकीय संस्कृतमहाविद्यालय रायपुर रेवाप्रसाद द्विवेदी

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विषय-सूची

प्रथम विमर्श

विषय

पृष्ठ

उपस्थापना

ध्वनिकारिका

अर्थोपादानखण्डन

शब्दोपादानखण्डन

अभिधोपादानसंभावना

अलंकारों की अभिधातमकता

अलंकारों की अभिधातमकता का

व्याख्यानकारद्वारा खण्डन

व्यअनाखण्डन

शब्दचतुष्टयवाद

क्रिया का शब्दप्रवृत्तिनिमित्तत्व

अर्थ निरूपण

अनुमेयार्थ की वस्तुसालंकारता

अनुमेयार्थप्रतीति में विध्यनुवादभाव

और साध्यसाधनभाव का सहयोग

लोक, वेद और अध्यासप्रामाण

शब्द और अर्थसाध्यसाधनभाव

वाच्यार्थविषयक साध्यसाधनभाव

अनुमेयार्थविषयक साध्यसाधनभाव

स्पष्ट-खण्डन

वाच्यार्थव्यसफकभाव और अध्यास्यसामकभाव

का व्याख्यानकारद्वारा स्पष्टीकरण

रसप्रतीति में क्रमिकता की सिद्धि

रसानुमिति निरूपण

कारणादि से विभावादि का अन्तर तथा

विभावादि के लक्षण

काव्य की प्रतीतिमात्र तक सीमितता

तथा मणिप्रदीपप्रभा के दृष्टान्त-

द्वारा उसकी सिद्धि

मुख्यरूप से अर्थ के दो ही प्रकार वाच्य

और अनुमेय उपचार द्वारा तीसरा

व्यङ्ग्य भी

व्यञ्जना के तीन मौलिक रूप और

उनका अनुमान में अन्तर्भाव

प्रकाशक अर्थ की द्विविधता

अन्तरित वस्तुव्यञ्जना चमत्कारशून्य

ध्वनिलक्षण में आप्त 'वा' शब्द पर

विचार

ध्वनिलक्षण के द्विचचन का खण्डन

द्विवचन के अभिनवगुप्त द्वारा किए गए

समर्थन का खण्डन

स्फोटकाव्यविशेष:-में 'स:' का खण्डन

उसी के 'काव्यविशेष' पद के विशेष

शब्दोपादान पर आपत्ति

विशेषपद पर व्याख्यानकार द्वारा

व्यक्तिवाद-का स्पष्टीकरण

'सुरभिः कथित:', में सुरभिः की

व्यर्थता

ध्वनिलक्षण में संभव दश दोषों का

कारिकाद्वारा संग्रह

ध्वनिकारिका का यथार्थरूप

शब्द में अनेक शक्तियों का असंभव

लक्षणा के शब्दव्यापार्त्व का खण्डन

लच्छ्यार्थ की अनुमेयता

'यस्मात् शब्दः स शब्दार्थ:', का खण्डन

दीर्घदीर्घव्यापार का खण्डन

वक्रोक्तिखण्डन

शब्दबुद्धि के रूप में व्यञ्जना अभिधारूप

निपातोपसर्गों की वाचकता का विचार

गुणीभूतव्यङ्ग्य और ध्वनि में भेदाभाव

अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्य-

पर वाच्य का खण्डन

अर्थोऽनतरसंक्रमितत्व का खण्डन

अत्यान्ततिरस्कृत वाच्य का खण्डन

शब्दशक्तिमूलानुरणन व्यंग्य का खण्डन

Page 29

३२

विषय-सूची

द्वितीय विमर्श

विषय

पृष्ठ

विषय

पृष्ठ

पाँच शब्ददोषों का नामोल्लेख

१७९

योग्यता पर व्याख्यानकार का

३३८

दोषसामान्य का लक्षण

१८२

विरोध

३४०

( १ ) विधेयाविमर्श

१८३

प्रकृतिपौनरुक्त्य

३४१

( i ) सरभ्रः कारकादि पर्युदास और प्रसज्यप्रतिषेध

१८५

प्रत्ययपौनरुक्त्य

३४२

( ii ) यौगिकौ-में तदपादान- दोष

१९६

उभयविषयक पौनरुक्त्य

३४४

यत्‍तद् का विवेचन

१९६

पदपौनरुक्त्य

३४५

यत्‍तद् पर व्याख्यानकार का विवेचन

२११

कारकपौनरुक्त्य

३५०

( iii ) अभिधाकाव्यरी-में वस्तु- समासगतदोष

२१८

अलंकारपुनर्हक्ति

३५८

समास में विधेयताहानि का विवेचन

२२८

पुनर्हक्ति के अन्य उदाहरण

३८३

( २ ) प्रक्रमभेद

२८७

( ५ ) वाच्यावचन

३८७

प्रकृतिप्रक्रमभेद

२८८

सर्वनामपरामृश्य का सर्वनाम से अवचन

३८७

सर्वनामप्रक्रमभेद

२९२

योग्यार्थप्रतीतिकृत हेतु का अवचन

३८८

प्रत्ययप्रक्रमभेद

२९३

अन्य अलंकार के स्थान पर अन्य अलंकार

३९१

पर्यायप्रक्रमभेद

२९५

समासोक्ति के स्थान पर श्लेष

३९१

विभक्तिप्रक्रमभेद

२९७

छेकस्थल में उपमा

३९२

उपसर्गप्रक्रमभेद

२९९

रूपकस्थल में उपमा

३९४

वचनप्रक्रमभेद

२९९

सौन्दर्य के लिए काव्यक्रिया

३९७

तिङन्तप्रक्रमभेद

३००

श्लेष का द्वैविध्य

३९९

कालप्रक्रमभेद

३०१

शब्दश्लेष का लक्षण

३९९

कारकशक्तिप्रक्रमभेद

३०२

शब्दश्लेषदोष

४०१

शब्दप्रक्रमभेद

३०५

तन्त्र-लक्षण

४०४

आर्थप्रक्रमभेद

३०८

अर्थश्लेष में हेतुवचन

४२५

क्रमप्रक्रमभेद

३०९

उभय श्लेष में हेतुवचन

४२५

वस्तुप्रक्रमभेद

३१७

अन्य विचार

४२६

कर्तृप्रक्रमभेद की गुणवत्ता

३२०

( ६ ) अवाच्यावचन

४२६

( ३ ) क्रमभेद

३२३

स्वभावोक्ति के अलंकारत्व का समर्थन

४३२

( ४ ) पौनरुक्त्य

३३३

द्वितीय विमर्शों का उपसंहार

४५५

योग्यता विचार

३३६

ध्वन्यानुमिति पच पर दोषों की बौद्धार

४५६

तृतीय विमर्श

ध्वनिकार द्वारा उदाहृत ध्वनिपचों में अनुमानसिद्धि

४६२-५१२

श्लोकानुक्रमणी

५१३-५२२

Page 30

॥ श्रीः ॥

व्यक्तिविवेकः

संस्कृत-हिन्दी-व्याख्याड्योपेतः

प्रथमो विमर्शः

अनुमानेनतभ्रोंवं सर्वेष्यैव ध्वने: प्रकाशयितुम् । व्यक्तिविवेकं कुरुते प्रणम्य महिमा परां वाचम् ॥ १ ॥ श्रद्धां मन्ये मातरं लोकमार्गे सा वै सर्वा ओषधीः संप्रमूते । आन्वीक्षिकीं किंतु मे भावबन्धः सा ता एता निःषुषा: संवितधत्ते ॥ आद्यां गुरुं पितरमेव पुरा नत्वोच्ह्रितमूर्ध्ना च लेखनजन्मों जन्नौभौपि स्वाम् । एकं तयोस्तदनु बिग्रहमद्वितीयं काश्यां महेश्वरयतीन्द्रकवीं श्रितोजस्मि ॥ यन्नाम तत्स्वगुरुविग्रहाभिरामो ज्योतिर्‌मयि प्रतिनवं प्रकटोकृतं तद्व । कल्याणकोषमुपजीव्य मनाडूमदीयः शास्त्राभिधमजनविधावयमस्ति यतः ॥

अनुवाद—सभी प्रकार की ध्वनियों का अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाने के लिए महिमा ( नामक आचार्य ) परा वाणी को प्रणाम कर व्यक्तिविवेक रचता है ॥ १ ॥

व्यक्तिविवेक-व्याख्यानम्—

ग्रन्थारम्भे ग्रन्थकारः शिष्टाचारमनुस्मरन्भुचितदेवताप्रणामपुरस्सरं स्वप्रवृत्तिप्रयोजन-माचष्टे—अनुमानेनतर्भावमित्यादिना । तत्र वाचो विचार्यत्वेन प्रस्तुतत्वात् प्रणामसमुचित-स्वम् । व्यक्तिन्यर्जनं तद्विवेकस्य करणं स्वप्रवृत्ति: । तस्या: प्रयोजनं ध्वनेरनुमानान्तर्भाव-प्रकाशनम् । सर्वग्रहणेन निरवशेषतामाह अन्यथा काव्यानुमानस्याव्याप्ति: स्यात् । महिमेति नामपदं कीर्त्यर्थम् ॥ १ ॥

व्याख्यानुवाद—ग्रन्थकार ग्रन्थ के आरम्भ में शिष्ट जनों के आचरण का स्मरण करते हुए प्रकरण के अनुरूप देवता को प्रणाम करते हैं और ‘अनुमानेनतर्भावम्‌०’ यह कहकर अपनी इस ओर हुई प्रवृत्ति का प्रयोजन बतलाते हैं । यहाँ वाणी पर ही विचार करना है, अतः उसी को प्रणाम करना उचित है । व्यक्ति = व्यक्तिज्ञान, उसका विवेक = यथार्थ निरूपण करना । यही ग्रन्थकार की प्रवृत्ति है । इस प्रवृत्ति का प्रयोजन ध्वनिका अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाना है । सर्व शब्द का प्रयोग कर ध्वनन के किसी भी भेद का अनुमान से अलग न होना बतलाया गया । नहीं तो ‘काव्यानुमा’ वाद में अव्याप्ति होती । वह काव्य का सर्वाङ्गीण तत्त्व न बनता । ‘महिमा’ पद ग्रन्थकारका नामवाचक पद है । वह कीर्तिकामना से श्लोक में अपनाया गया है ॥ १ ॥

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विमर्शः अनुमान-प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन-इन पाँच अवयवों से युक्त वाक्य द्वारा होनेवाला परार्थ अनुमान साथ ही अनुमानानुमापाररूप परामर्श तथा अनुमितिरूप प्रमा । इनमें क्रमशः व्यज्जक, व्यज्यत्ता और व्यंग्य का अन्तर्भाव दिखलाया जाएगा ।

सर्वसैयैव ध्वने:-ध्वनि-संप्रदाय में ध्वनि के भेदों की गणना चौंतीस करोड़, छः लाख, तेईस हजार, नौ सौ तक की जा चुकी है । इसके आगे परार्ध तक चलने की बात है । आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वनिलक्षण में केवल पाँच अर्थों में ध्वनि शब्द का उपयोग किया है, शब्द, अर्थ, व्यज्जना, व्यंग्य और उनसे युक्त वाक्य । इसका स्पष्टीकरण आगे होगा । यहाँ 'सभी प्रकार की ध्वनियों' इसमें आए सर्व शब्द का अभिप्राय इन्हीं भेदों से है । इन्हीं में सभी ध्वनिभेदों का अन्तर्भाव हो जाता है ।

प्रकाशयितुम्-प्रकाश करने के लिए । प्रकाश पहले से सिद्ध वस्तु का ही होता है । ध्वनि भी तथ्यतः अनुमानरूप है । यहाँ उसका अनावरण करना है । वह भी इसलिए कि आनन्दवर्धनाचार्य ने उसे अनुमान से पुथक् सिद्ध करना चाहा है ।

व्यक्तिविवेकम्-व्यक्ति = व्यज्यता, उसका विवेक = सजातीय ( समान ) तत्वों से पार्थक्य । ऐसा करने पर व्यज्यता अनुमान से अलग नहीं हो पाती ।

परां वाचम्-कारमीरी विद्वान् शैवागम के प्रकाश में ही शास्त्र-चर्चा चलाते रहे । वाक्यपदीयकार भर्तृहरि, अभिनवगुप्त आदि शैवागम के सिद्धान्तों पर ही अपने व्याकरण और साहित्य के सिद्धान्त स्थिर करते हैं । शैवागम के अनुसार परमशिव विश्व का मूल तत्व है । उसके दो रूप हैं अक्षर = मन्त्र और प्रपञ्च । अक्षर और संसार-प्रपञ्च की अभिव्यक्ति जिस शक्ति से होती है वह पराशक्ति कहलाती है । वह भी परमशिव का ही एक रूप है । अक्षर रूप होने पर वह परा वाणी कहलाती है । अक्षर रूप में इसके तीन विवर्त्त होते हैं- पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी । वाक्यपदीयकार इन्हीं तीन विवर्त्तों को वाणी कहते हैं । परा को वे शिवरूप ही मान लेते हैं । इन विवर्त्तों को दो भागों में वाँटा जाता है- स्थूल और सूक्ष्म । वाणी के स्थूलविवर्त्त सुनाई पड़ते हैं । वे गले से हृदय तक फैले रहते हैं । उनसे अर्थ भिन्न होता है । क्योंकि स्थूल स्थिति में वे शब्दरूप होते हैं । इन्हें वैखरी और मध्यमा कहा जाता है । वैखरी कण्ठ-नादादि से उत्पन्न ध्वनि को कहते हैं, और मध्यमा हृदयस्थ शब्द को । सूक्ष्म वाणी नाभि से मूलाधार तक सोई रहती है । उससे अर्थ भिन्न नही होते । क्योंकि वह नादात्मक ( संगीत-रूप ) होती है । उसे पश्यन्ती और परा कहा जाता है । पण्डितप्रवर रामेश्वरजी झा ने शैवागम के वाणीसम्बन्धी सिद्धान्तों का इस प्रकार निरुपण किया है-‘अह्मात्मकं परामर्शः परा वाच्यत्वे बुद्धेः ।’

परोक्षलसिषा युक्ता पश्यन्ती प्रोंच्यते खलु:॥ तथा चोल्लसिषवस्थां वाच्यवाचकयो: क्रम: । नोदितो न च भेदस्प स्फुटतैव विभासिता ॥ किन्तु चिद्ज्योतिपत्तत्र प्राधान्याद् दृश्यरूपता । इत्यन्रध्वंतयैचेयं पश्यन्ती परिभण्यते ॥ यत्रासूत्रितविभागो वाच्यवाचकयो: क्रम: । स्फुटास्फुटात्मकप्रवाद ग्रहते खुद्धिमात्रतः । दर्शनेप्यैव प्राधान्याद् मध्यमसूत्रदृशो: क्रियो: । मध्यानम् इत्यनुसृत्य मध्यसमा सा बुद्धेः स्मृत्ता । सूक्ष्मं तन्वा: सकल्त्वं स्यूलमसृत् । सर्व वाक् स्थानीयरणप्रयत्नादिवलात् पुन:॥ गृह्यते तु वणॅरूपयेँ भवत्साद् वैखरी मता ।’

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रुय्यक ने अपने अलंकारसर्वस्व में—‘नमस्कृत्य परां वाचं देवों त्रिविधविग्रहाम् ।’ इस प्रकार मंगल किया । जयरथ ने उसकी टीका विमर्शिनी में उत्तम रीति से ही इसका अर्थ स्पष्ट किया है । उन्होंने प्रत्येक वाणी के लक्षण दिए हैं—‘ध्रेयं विमर्शरूपपैव परमार्थंचमत्कृतेः । सैव सारं पदार्थानां परा वागभिधीयते ।’ जब यही परा वाक् बाहर उन्मिषित होने चलती है तो इसका प्रथम विवर्त्त पश्यन्ती कहलाता है—अविभाग तु पश्यन्ती सर्वतः संहृतकमा । स्वरूपपञ्ज्योतिरेवान्तः सूक्ष्मा वागनपायिनी ।’ इसका अर्थ जयरथ ने इस प्रकार किया है—‘पश्यन्ती में वैखरी-सुलभ तालु आदि स्थान करणप्रयत्नजनित वर्णभेद नहीं होता अतः उसमें क्रम भी नहीं रहता । वह आत्मा की आभ्यान्तर ज्योति होती है । वही सम्पूर्ण वर्णचक्र को पैदा करती है अतः वीज रूप से भीतर स्थित रहती है । वही कुछ परिणमयुक्त होकर परा और मध्यमा की स्थिति को तटस्थ होकर देखती रहती है । अतः पश्यन्ती = देख रही कहलाती है ।’

मध्यमा के लिए उन्होंने लक्षण दिया है—‘अन्तःसंकल्परूपा या क्रमरूपानुपातिनी । प्राणकृत्ति-मतिक्रम्य मध्यमा वाक् प्रवर्त्तते ।’ अर्थात्—मध्यमा में—‘मैं यह कह रहा हूँ’ ऐसा विमर्श भीतर ही भीतर अनुभव में आता है । वह कानों से सुनने योग्य शब्दोच्चारण से दूर रहती है । उसमें वर्णों का क्रम पैदा हो जाता है किन्तु वह एकमात्र मानस रहता है । यह पश्यन्ती और वैखरी के बीच रहने से मध्यमा कहलाती है । वस्तुतः मध्यमा का अर्थ मँझली होनी चाहिए । मँझली कन्या वह होती है जो एक छोटी और एक बड़ी बहिन के बीच की होती है । आरम्भ या अन्त में दो व्यक्ति के रहने पर कोई वस्तु मँझली नहीं कहलाती । अर्जुन और भीम दोनों को मध्यम पाण्डव कहा जाता है । अर्जुन को इसलिए कि वे युधिष्ठिर और भीम से छोटे थे और नकुल और सहदेव से बड़े । भीम को इसलिए कि तीन सगे भाइयों में वे अर्जुन से वड़े और युधिष्ठिर से छोटे थे । इसी प्रकार हृदयस्थवाणी को मध्यमा कहने का अभिप्राय हो यह है कि वस्तुतः परा वाणी वाणी नहीं है । वह तो वाग्ब्रह्म ही है । वाक्यपदीयकार ने शब्दब्रह्म को संसार-चक्र की प्रक्रिया का कारण बतलाया है । ( बृ० का० १ ) उसी कारिका को जयरथ ने परा वाणी के लिए उद्धृत किया है । वह है—‘अनादि निधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम् । विवर्त्ततेर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः ।’ अतः तीन ही वाणी मानने पर हृदयस्थ वाणी को मध्यमा कहना चाहिए ।

वैखरी का लक्षण जयरथ ने इस प्रकार उद्धृत किया है—‘स्थानेपु विवृते वायौ ऋतवर्ण-परिग्रहे । वैखरी वाक् प्रयोक्तॄणां प्राणकृत्तिनिबन्धना ।’ अर्थात् वैखरी तालु आदि स्थान करण और प्रयत्नों से क्रमशः अभिव्यक्त होती है । वीणा आदि के शब्द के समान कान से सुनाई देती है । उसमें गकार आदि वर्णों का समुदय पद और वाक्यरूप से स्पष्ट होता है । यह शब्द ब्रह्म का तृतीय विवर्त्त है । वैखरी शब्द की व्युत्पत्ति जयरथ ने दो प्रकार से की है—( १ ) वि = विशिष्ट ‘ख’ आकार, अर्थात् मुखरूप आकाश । उसको रति=ग्रहण करके व्यक्त होने वाली = विश्रर प्राणवायु के संचार अभिन्न वर्णोच्चारण । उस रूप में अभिव्यक्त वाणी वैखरी । ( २ ) विश्रर=शरीर में होने वाली । यही उद्धृत कारिका में झा जी ने किया है ।

प्रपञ्च रूप में वाणी के ये रूप ब्रह्म के ईश्वर, प्राज्ञ, हिरण्यगर्भ और विराट् से मिलाए जा सकते हैं । कोश की बीजमृत्ति पाण्डितराज जगन्नाथ शास्त्री प्रतिपद् = परा को ईश्वरस्थानीय, वृत्तिते = पश्यन्ती को प्राज्ञस्थानीय, मध्यमा को हिरण्यगर्भस्थानीय और वैखरी को विराट् स्थानीय । इसी प्रकार परा को साक्षी, पश्यन्ती को निर्विकल्पक ज्ञानविषयोभूत शब्द, मध्यमा को सविकल्प-ज्ञानविषयोभूत शब्द और वैखरी को अर्थक्रियाकारी शब्द मान सकते हैं । परा तुरीय अवस्था है पश्यन्ती सुपुप्ति, मध्यमा स्वप्न और वैखरी-जाग्रत् । वाणी क्रा और भी अच्छा तुलनात्मक

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युक्तोडयमात्मसहशान् प्रति मे प्रयल्नो नास्त्येव तज्जगति सर्वमनोहरं यत् । केचितज्ज्वलन्ति विकसन्त्यपरे निमीलन्त्यन्ये यदभ्युदयभाजि जगत्प्रदीपे ॥२॥

युक्तोडयमित्यादिनाधिकारिनिरूपणम् । केचिदिति । श्लेपहेतूूपन्यासः । ज्वलनं क्रोध: सूर्याकान्तसमवन्धनादनुस्यूथानं च । विकाश: प्रमोदानुभव: पङ्जागतं प्रफुल्लत्स्वं च । निमीलन- मसूयाकृतोडनुस्साह: कुसुदाग: सद्बोचश्र । अभ्युदयो महोत्सव: अभिमुखवसुधांश्र । जगत्प्रदीपो विद्यादिना विश्वप्रकाशको रविइश्र । एतच्च गुणगर्वाधिमातमानमुद्रिस्रय भज्झ्या कथितम् ॥ २ ॥

इह सम्प्रतिपत्तिमोंदन्यथा वा ध्वनिकारस्म्य वचोचिवेचनं नः । नियतं यशासे प्रयत्स्यते यन्महतां सन्सतव पव गौरवाय ॥ ३ ॥

हमारे द्वारा किया गया ध्वनिकार की वाणी का विवेचन संसार में सब प्रकार से यशस्कर ही होगा, भले ही वह सम्प्रतिपत्ति से हुआ हो या उसके विरुद्ध । क्योंकि जो महान् होते हैं उनसे किसी भी प्रकार ज्ञान-पहचान होना गौरवप्रद ही होता है ॥ ३ ॥

अनुमानान्तर्भावनरूपस्य स्वप्रत्तिप्रप्रयोजनस्य ध्वनिकृद्वचनविवेचनाख्यस्य यश:-प्रद्रुत्तिलक्षणं प्रयोजनमाह—हेत्स्यादिना । अन्यथा वेति । यदि सम्प्रतिपत्या सौजन्यमूलया परोचया न बुद्धचते तद्विप्रतिपत्तिमाश्रयाम इत्यर्थ: । ( विप्रतिपत्ति: ) विप्रतिपत्त्या कथम् । निश्चियतयाऽप्रतिसंर्थ तु पनमहान्ति । सन्सतव: परिचय: । यथास्थितपाठे तु ध्वनिकारस्यैति वचशब्दान्निवर्तं प्रतिपत्ते । एतच्चास्य साहित्यविचारहुनिरूपकस्य मसुख एव सकलितमिति महान् प्रमाद: ॥ ३ ॥

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प्रथमो विसर्गः

इस ग्रन्थ को लिखने की ( ग्रन्थकार की ) अपनी प्रवृत्ति का प्रयोजन है ध्वनिकार के वचनों का विवेचन और अनुमान में ध्वनि का अन्तर्भाव करना । इस समस्त प्रयत्न का भी प्रयोजन है यथा वटोरना । इसे 'इदं समं' इत्यादि पञ्च से स्पष्ट करते हैं—अन्यथा वा—यदि सम्प्रतिपत्ति = सौजन्यमूलक विवेचन से ( तथ्य ) स्पष्ट नहीं होता तो हम ( उससे उलटे ) विप्रतिपत्ति ( खण्डनात्मक प्रतिक्रिया ) का आश्रय लेते रहे हैं । विप्रतिपत्या = विरुद्ध प्रतिपत्ति ज्ञान, धारणा, उसे लेकर विवेचन करना । यश की निश्चित प्राप्ति का समर्थन करते हैं—यन्महताम्—इसे । संगतव्—परिचय । यहाँ (ध्वनिकारस्य वचो विवेचनं नः = की जगह ) 'ध्वनिकृदाक्यविवेचन तदेतद्र' यह पाठ होना चाहिये । जैसा का तैसा पाठ रखने पर 'ध्वनिकारस्य' इसका अन्वय विवेचन के साथ होता है, जब कि 'वचोः' के साथ होना अभीष्ट है । यह साहित्यसम्बन्धी सम्प्रदायों के कठोर समीक्षक इस ग्रन्थकार की समीक्षारम्भ में ही ज्रुटि हो गयी । इसलिए पूरे ग्रन्थ में उसकी महान् अनवधानता संभव है ॥ ३ ॥

विसर्गः ध्वनिकार—आनन्दवर्धन तथा अभिनवगुप्त । व्यक्तिविवेक में अभिनवगुप्त का भी खण्डन है ।

सम्प्रतिपत्ति—प्रतिपत्ति = ज्ञान, समझ, प्रवृत्ति । सम्प्रतिपत्ते = अनूकूल = ज्ञान, समझ, प्रवृत्ति ।

अन्यथा—उससे उलटे = विप्रतिपत्ति । आश्रय यह कि कहीं समझ कर, पूर्वोपरसंगति लगाकर और अनुभूति से मिलाकर संशोधनात्मक प्रक्रिया से ध्वनिकार के सिद्धान्तों का विवेचन किया है और कहीं उसके विरुद्ध खण्डनात्मक प्रक्रिया से । ध्वनिकार का सिद्धान्त सच्चमुच गम्भीर और तत्वस्पर्शी है । अतः उसकी कैसी भी समीक्षा चिन्तित—ग्राह्य बनेगी ।

सहसा यतोडभिसर्तुं समुद्यतावष्टभ्दरपेण मम धीः । स्वालड्कारविकलप्रकल्पने वेत्ति कथं मिथ्यावचम् ॥ ४ ॥

मेरी बुद्धि ने दर्पण नहीं देखा और एक-एक यश के लिए अभिसार करने उयत हो गयी । वह अपने अलङ्कार को साज-सज्जा में दोष कैसे जान सकती है ॥ ४ ॥

यदि परमत्र विवेचने स्वलितं सम्भाव्यते । तच्च यशोभजनसम्भ्रमेमप्रवृत्तत्ववादनुरूप-ग्रन्थान्तरापरिदृश्यलक्षणाच्च बुद्धिं चेतयते इत्युक्तं—सहसेति । अभिसरतुं आमिमुख्येन गन्तुम् अभिसारिकांवेन च प्राप्तुम् । दर्पणो हृदयदर्पणाद्यो ध्वनिध्वंसग्रन्थोडपि । स्वालङ्कारो व्यक्तिविवेचनाख्यस्तत्र । यद्वा ध्वनिकारं प्रति विकलपप्रकल्पनं तत्र च, स्वस्य च यदलङ्करणं हारकटकादीनां प्रकल्पनं यथास्थानविरचनं तत्र । अवचं दोषम् । विशेषणकिन्तु इस विवेचन में ज्रुटियाँ संभव है । उन्हें बुद्धि इसलिए नहीं समझ पायेगी क्योंकि एक तो वह यत्रा लुटने को हमसे से आगे बढ़ी है और अपने अनुरूप ( समर्थक ) दूसरे ग्रन्थों का उसने परीक्षण नहीं किया है । यही बात कही—सहसा । अभिसरतुम् = अभिमुख का उधर ही जाना और अभिसारिका रूप से ( जिधर प्रिय है ) उधर जाना । दर्पण—हृदयदर्पण नामक ध्वनिखण्डन का ग्रन्थ । स्वालङ्कारो—या तद्विवेचन नाम का अपना अलङ्कारशास्त्र । अथवा अपना जो ध्वनिकृत आनन्दवर्धनाचार्यं द्वारा रचित अलङ्कार ध्वन्यालोक पर विकलपप्रकल्प = द्वोन्द्रक्षेम उसमें । ( अभिसारिका पक्ष में ) अपना जो हार, कटक आदि का यथास्थान विनिवेश उसमें । अवचं—दोष । विशेषण साम्य से अभिसारिकाव्यवहार की प्रतीति होती है ॥ ४ ॥

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विमर्शः दर्‌पण—भट्टनायक का हृदयदर्‌पण या सहृदयदर्‌पण । ग्रन्थकार को दुःख है कि उसे दर्‌पण नहीं मिला । यह यशस्वी ग्रन्थ साहित्यदेवता के दुर्भाग्य से उसके पूर्व ही लुप्त हो चुका था । प्रस्तुत पद्य में समाजसक्ति अलङ्कार है । बुद्धि अभिसारिका रूषि है वह अपना वेष दर्‌पण में बिना देखे एकाएक अभिसार करती है । यहाँ अर्थ बुद्धि के श्रोत्प और अभिसरण तथा दर्‌पण शब्द के सहयोग से निकलता है ।

अलङ्कार—‘काव्यालङ्कार’ शब्द भामह, रुद्रट, उद्भट, वामन और पण्डितराज जगन्नाथ ने अलङ्कार ग्रन्थ के लिये अपनाया । यहाँ अलङ्कार उसी अर्थ में है ।

ध्वनिवर्त्मन्यतिगाहने सकलितं वाण्या: पदे पदे सुलभम् । रभसेन यत् प्रवृत्ता प्रकाशकं चन्द्रिकाद्यहश्रेव ॥ ५ ॥ किन्तु तद्वधीयर्याम्गुणलेशो सततमवहित्वेऽप्यनिद्यम् । परिपवनवदथवा ते जात्यैव न शिक्षितास्तुश्रग्रहणम् ॥ ६ ॥

ध्वनि-पथ अत्यधिक गहन है । उसमें पद-पद पर वाणी का सकलन सहज है । चन्द्रिका आदि प्रकारक तत्वों को बिना देखे जो वह आगे बढ़ी है । किन्तु सत्पुरुषवृन्द उसके थोड़े बहुत गुणों पर ही चित्त दें । या वे तो स्वयं ही चलती के समान भूसा अपनाना नहीं सीखे रहते ।

नन्वसम्भवत एव सकलितस्य कथं सम्भावनं क्रियत इति ध्वनिवर्त्मन्नीत्याादिना सकलि- तस्य सम्भवमाह । अतिगहनं प्रमेयाकुलं सन्तमसावृतं च । सकलितं पदभङ्गोदपि रभसमात्र सुलभम् । कथं तर्ह्यनभ्येत्याह—किन्त्वस्ति । तत् सकलितम् । परिपवनमिति तद्ु तुषोदपी । वैधर्म्यदृष्टान्तमूलको व्यतिरेकः ॥ ६ ॥

विमर्शः : ध्वनिपथ को अतिगहन कह ग्रन्थकार ने यह भी संकेत किया कि इस सम्प्रदाय में सिद्धान्तित तत्व अभी तक खरादे नहीं गये हैं ।

चन्द्रिका—इस नाम की ध्वन्याालोक पर कोई टीका थी । अमितवयुस् लोचन में उसका बार-बार उल्लेख करते हैं ।

वैधर्म्यदृष्टान्तमूलक व्यतिरेक—इष्टान्तालङ्कार साङ्गयसदृश अलङ्कार है । इसमें साङ्गय विम्ब- प्रतिबिम्ब भाव से बतलाया जाता है अथवा विरुद्ध वाक्यार्थमूलक । विरुद्ध वाक्यार्थमूलक दृष्टान्त वैधर्म्य दृष्टान्त कहलाता है । इसमें वैधर्म्य उलट कर साधर्म्य का आक्षेप करता है । तत् पदार्थों में विम्ब- प्रतिबिम्ब भाव होता है ।

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प्रथमो विस्मर्शः

धूलि के कण निर्वात प्रदेश में ही स्थिर रहते हैं।' ( काव्यप्रकाश ) । यहाँ 'धूलिकण वातयुक्त प्रदेश में नहीं ठहरते ऐसा आक्षेप होता है। फिर धूलिकण तथा शत्रु-भट, वात तथा प्रधान राजा, न ठहरना तथा तितर-बितर होना—इनमें विभवप्रतिभव भाव वतलता है। तब सादृश्य का ज्ञान होने से चमत्कार होता है। व्यतिरेकालङ्कार में उपमान की अपेक्षा उपमेय में अतिरेक अर्थात् गुणाधिक्य वतलाया जाता है। प्रस्तुत पद्य में परिपवन और आर्यजनो को सादृश्य वतलाया जा रहा है। दोनों में वाक्यार्थ का सादृश्य है। वह इस प्रकार है—'जिस प्रकार परिपवन भूसा अपनाने में स्वभावतः अभ्यस्त रहता है उस प्रकार दोष अपनाने में सज्जन नहीं।' इस कथन में परिपवन की जगह चत्रा का उपादान करने से यही उदाहरण साधर्म्यमूलक दृष्टान्तालङ्कार का बन जाता है। जिस प्रकार चत्रा सारमाही होता है वैसे ही सज्जन भी गुणग्राही होते हैं। वैधर्म्य-मूलक दृष्टान्त से आर्यों में यह विशेषता झलकती है कि 'यद्यपि दोष और गुण दोनों को परिपवन तथा आर्य दोनों ही अलग करते हैं किन्तु परिपवन अलग कर दोष का ग्रहण करता है और सज्जन गुणों का। वस्तुतः यहाँ उपमालङ्कार है। परिपवन यदि तितउ अर्थात् चलनी हो मानी जाय तो एक. ऐसी भी चलनी होती है जो अनाज को अपने भीतर रखती है। कचरा-कूड़ा अलग करती है। किसानों के खलिहानों में यही काम में लाई जाती है। इसे चूनदेलकण्टी में छत्त्रा कहते हैं। इसे ही यहाँ उपमान मानना चाहिए। तब अर्थ होता है जैसे छत्त्रा भूसा अलग कर सारभूत धान्य वदोेरता है वैसे ही सत्पुरुष भी दोष अलग कर सारभूत गुण अपनाते हैं।

तत्र ध्वनेरेव तावल्लक्षणं वक्तव्यम्। कोऽयं ध्वनिर्‌नामेति। तच्च ध्वनि-कारेणैवोक्तम्। तद्यथा—

'यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुपसर्जनीकृतस्वार्थौ। व्यङ्ग्यः काव्यविशेषः स ध्वनिरिति सूरिभिः कथितः ॥' इति।

यहाँ पहले 'ध्वनि' का ही लक्षण वतलाना चाहिए। ( खण्डन के पहले ) यह जानने के लिए कि यह ( खण्डनीय ) ध्वनि है क्या ? और वह ( लक्षण भी ) वहीं वतलाया जाना चाहिए जो उसके प्रवर्त्तक स्वयंं ) ध्वनिकार ने ही वतलाया हो। वह इस प्रकार है—

'जहाँ अर्थ स्वयं को तथा शब्द अपने अर्थ को अप्रधान कर उस ( प्रतीमान ) अर्थ को ( व्यञ्जना द्वारा ) व्यञ्जित करते हैं ( आलङ्कारिक विद्वानों द्वारा ) वह काव्यभेद ( व्याकरणशास्त्रियों द्वारा समाहित ) 'ध्वनि' ऐसा कहा जाता है।'

तत्रेति व्यक्तिविवेके प्रस्तुते सति तावद्‌ग्रहणं विवेकक्रमद्योतनार्थम्। लक्षणं वक्तव्यं कुत इत्याह—कोऽयं ध्वनिनिर्नामेति। यत इत्यवधिस्य प्रकृतस्य प्रक्षस्यावतार इत्यर्थः। तथाहिति लक्षण-पददूषणक्रमेणैव ध्वन्यनन्तर्भावं स्पष्ठिकावचनं दर्शयति। तद्‌यथाभिचारस्योपसर्जनीकृतात्मतया-विमृश्यस्यानुपसर्जनीकृतात्मत्व-व्यमिचारस्याभावात्।

तत्र-उसमें। अर्थात् प्रस्तुत व्यक्तिसंवन्धी विवेचन में। तावट—यह शब्द विवेचन में क्रम का बोध कराने के लिए अपनाया गया है। लक्षण वतलाना चाहिए। क्यों ? इसी बात को कहते हैं—'कोऽयं ध्वनिः'। जिससे इस प्रकार का प्रश्न उपस्थित हुआ।

विमर्शः : शास्त्र के अर्थविचार में पूर्वपक्ष तथा उत्तरपक्ष की शैली अपनाई जाती है। व्यक्तिविवेक रूपी विचार प्रस्तुत होने पर उसमें पूर्वपक्षरूप से 'ध्वनि' संवन्धी शास्त्र अपनाया गया। उत्तरपक्ष स्थापना के पूर्व पूर्वपक्ष की मान्यता का दूषण का त्यों कथन ( अनुवाद ) कर खण्डन किया जाता है। इससे पाठक को सरलता होती है। वह तब तक खण्डन नहीं समझ सक्ता जब

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तक खण्डनीय विषय का उसे ज्ञान न हो । पूर्वपक्ष के अनुवाद से पाठक को उसका ज्ञान हो जाता है । 'तच्च' ध्वनिकारेणोक्तम्, में पूर्वं पंक्तिस्थ 'वक्तव्यम्' का अध्याहार किया जाना चाहिए । 'तच्च' ध्वनिलक्षणं तदेव वक्तव्यं यतः स्वयं ध्वनिकारेणोक्तम् । इस आशय से ग्रंथकार ने 'तच्च ध्वनिकारेण' इत्यादि पंक्ति दी है ।

उपसर्जनीकृतस्वार्थों—इस पद में कर्मंधारयस्रदित द्वन्द्व है । यथा—स्वं च अर्थश्चेति स्वार्थों । उपसर्जनीकृतौ च तौ स्वार्थों उपसर्जनीकृतस्वार्थों । सिद्धान्त-चिरोमणि श्री विश्वेश्वर जी ने इसका समास इसे प्रकार बतलाया है—'स्वस्व अर्थक्षौ तौ स्वार्थों । तौ गुणीकृतौ याम्यां यथासंस्थयेन स-अर्थों गुणीकृतात्मा, शब्दक्ष गुणीकृताभिधेयः ।' यहाँ बहुत्रीहि अनवबोधक है । बहुत्रीहि मानने पर भी भाषा ऐसी होनी चाहिए—'स्वं च न अर्थक्षौ तौ स्वार्थों, तौ उपसर्जनीकृतौ यथासंस्थयं यथा-संश्रयेन तौ उपसर्जनीकृतस्वार्थों, तत्र अर्थ उपसर्जनीकृतस्वः, शब्द उपसर्जनीकृतार्थः ।' यही 'उपसर्जनीकृतस्वार्थों' पद अर्थ और शब्द दोनों में खण्डनः समन्वित होता है । उसका एक खण्ड है । उपसर्जनीकृतस्वः और दूसरा खण्ड है उपसर्जनीकृतार्थः । पहला अर्थ का विरोधन है, और दूसरा शब्द का । अर्थ पक्ष में उसका अभिप्राय होगा—जिसने अपने आप को उपसर्जन या अप्रधान बना लिया है, और शब्द पक्ष में जिसने अपने अर्थ को उपसर्जन या अप्रधान ।

तस्मर्थ—अर्थात् उस अर्थ का अभिप्राय—प्रतीयमान अर्थ है । आनन्दवर्धन ने पहले वाच्य के अतिरिक्त 'प्रतीयमान नामक' एक अतिरिक्त अर्थ की स्थापना की है । उनकी कारिका है—'योडर्थः सहृदयैः श्लाघ्यः कान्व्यात्मनि व्यवस्थितः । वाच्यप्रतीयमानार्यौ तस्य भेदावुभौ स्मृतौ ।' इस कारिका द्वारा जो प्रतीयमान अर्थ स्थिर किया गया है उसी को 'काव्यस्यात्मा स एवायः:' कह कर काव्य की आत्मा माना । उसको शब्द और अर्थ द्वारा व्यक्त करते रहने से महाकाव्यत्व की प्रसवभूमि कहा = 'सोडर्थः तद्व्यपकिसामर्थ्ययोगी शब्ददक्ष कवित्व । यतः प्रतीयेधयौ तौ शब्दार्थों महाकवे: ।' और अन्त में इस 'ध्वनि-लक्षण में तस्मर्थम्=द्वारा उसी प्रतीयमान अर्थ की व्यञ्जना को ध्वनि काव्य का असाधारण धर्म बतलाया है ।

व्यक्तृ—शब्द ध्वनि लक्षण की इस कारिका का रहस्य शब्द है । मम्मट ने रस का निरूपण करते हुए इसी प्रकार 'व्यक्तृ' शब्द का प्रयोग किया है । 'व्यक्तृ:' और 'व्यक्त' दोनों शब्दों के मूल में जो अभिप्राय है उसे पण्डितराज जगन्नाथ ने स्पष्ट किया है—व्यक्तः = व्यक्तिविषयींकृतः । व्यक्तिविश भासनावरण चित्त । चैतन्यरूप इस व्यक्ति की शक्ति भी व्यक्ति शब्द से कही जाती है । रुथक ने व्यक्ति-विवेक का अर्थ करते हुए व्यक्ति को व्यञ्जना कहा है । यही व्यञ्जना उस व्यक्ति चेतना या आत्मा की शक्ति है । ऊँचे स्तर पर यही शक्ति ब्रह्म को माया, सांख्य के पुरुष को प्रकृति अथवा प्रत्यभिज्ञा-दर्शन के परम शिव की प्रतिभा है । वैयाकरणों की परा वाणी भी यहीं है । प्रस्तुत कारिका में 'व्यक्तृ:' का विधेय व्यञ्जना वृत्ति है । आनन्दवर्धन ने इसके पहले प्रतीयमान अर्थ की हो स्थापना की थी—किन्तु उसका बोधक व्यापार कौन सा है—यह स्पष्ट नहीं किया था । ध्वनि-लक्षण की इस कारिका द्वारा पहली बार ध्वनिकार ने इस व्यापार का स्पष्टी-करण अथवा एक प्रकार से नामोल्लेख किया है । व्यक्ति-विवेककार को इसी व्यञ्जनावृत्तिका खण्डन करना है । व्यञ्जना के ही विभिन्न-उपाय रूप का नाम ध्वनि है । ध्वनि शब्द व्यञ्जना के पूरे परिवार का भी एक समष्टिवाचक शब्द है । अभिनवगुप्त ने इस कारिका के 'सः' शब्द की व्याख्या में व्यञ्जना के पूर्ण परिवार का स्पष्ट उल्लेख किया है । उनका भाष्य है—'सः इति = अर्थो वा शब्दो वा, व्यापारो वा । अर्थोडपि वाच्यो वा ध्वनतीति, शब्दोऽप्येवम् । व्यक्तृधो वा ध्वन्यत इति कारिकया तु प्राधान्येन समुदाय एव काव्यरूपो मुरुतया

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प्रथमो विमर्शः

ध्वनिनिरिति प्रतिपादितम् ।' कारिका में कहा गया—‘वह ध्वनि है’ । प्रश्न उठा वह कौन ? अभिनव गुप्त कहते हैं वह अर्थ भी हो सकता शब्द भी और व्यापार भी । अर्थ दो प्रकार का होता है—वाच्य और व्यङ्गच—इस लिए वाच्य भी ध्वनि हो सकत है और व्यङ्गच्य भी । अर्थ में वाच्यत्व शब्द के बिना सम्भव नहीं, अतः शब्द भी 'ध्वनि हो सकत है । शब्द और दोनों प्रकार का अर्थ तीनों ही बिना किसी व्यापार के प्रतীয়मान अर्थ को सहाँ वतला सकने अतः व्यापार भी 'ध्वननने' अर्थ में ध्वनि हो सकत है और सबके अन्त में जिन काव्य-भूमिक पर इन चारों का समन्वय होता उसे भी ध्वनि कहा जा सकत है ।' वैयाकरण इन 'नामन्'ना को व्युत्पत्ति द्वारा सिद्ध भी कर सकत हैं । कर्तृव्युत्पत्ति से 'ध्वनतीति ध्वनि:' इस मझ्झा द्वारा शब्दार्थ और वाच्य अर्थ 'ध्वन्यते इति' इस भाव-व्युत्पत्ति से व्यङ्गयार्थ, 'ध्वन्यते ऽनेन इति' इस करण व्युत्पत्ति द्वारा व्यापार और 'ध्वन्यते ऽस्मिन्' इस अधिकरण व्युत्पत्ति द्वारा काव्य, सब में अकेला एक ध्वनि शब्द अन्वर्थ सिद्ध होता है । अनुमाने डन त मावं सङ्गेस्येव ध्वनेः प्रकाशयितुम्—इस प्रतिज्ञा कारिका में महिमभट्ट ने 'सब प्रकार' शब्द से ध्वनि के इन्हीं पाँच प्रकारों का निर्देश किया है ।

इस ध्वनि-लक्षण के विरोध में महिमभट्ट सबसे पहले अपनी मूल-मान्यता या 'प्रतिज्ञा' उपस्थित करते हैं—

पतच्च विविच्यमानमनुमानस्यैव सङ्गुच्छते, नान्यस्य ।

'किन्तु यह ( लक्षण ) विवेचना करने पर अनुमान में ही सङ्क्त्त प्रतोत होना है और किसी में नहीं ।'

विमर्शः : 'ध्वनि' नाम से यह जो लक्षण किया गया है वस्तुतः वह प्रसिद्ध प्रमाणों की दृष्टि से देखा जाय तो अनुमान में अभिव हो जाता है । अनुमान के अतिरिक्त कोई पदाथ या प्रमाण मानकर उसमें इस लक्षण का अन्वय किया जाय यह आवयक नहीं ।

आगे इस प्रतिज्ञा का समर्थन और अपने सिद्धान्त का उपपादन किया है । उपपादनार्थ महिमभट्ट ने जो भूमिका स्थिर की है उसमें ( ध्वनि के अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाने में ) विपय प्रतिपादन के अनेक प्रकार अपनाए गये हैं । पहल प्रकार ध्वनिलक्षण वाक्य के शब्दों

तथा हि-अर्थस्य तावडुपसर्जनीकृतातमत्वमनुपादेयमेव । तस्यैतान्तरप्रतीत्यर्थमुपपत्तस्म तद्व्यमिचाराभावात् । न हाग्न्यादिसिद्धौ धूमादिरुपादीयमानो गुणतामतिवर्तते । तस्य तन्मात्रलक्षणत्वात् ।

इस प्रकार पहले तो अर्थ का 'उपसर्जनीकृतातमत्व' ( विशेषण ) हो ( कारिका में ) शबदत: नहीं कहा जाना चाहिए । कारण कि वह ( अर्थ ) दूसरे ( प्रतीमान ) अर्थ की प्रतीति के लिए गृहीत रहता है । ( अतः उसमें ) उस ( दूसरे अर्थ के प्रति ) उपसर्जनीकृतातमत्व का कभी भी अभाव नहीं रहता । कभी भी अग्नि आदि की सिद्धि के लिए अपनाए गए धूम आदि ( अर्थ ) गुणता ( उपसर्जनीकृतातमता, अप्रधानता ) नहीं छोड़ते । क्योंकि उस ( गुण स्वरूप ) भूमादि को असाधारण व्यापार ही वह है ।

तथा हि । सम्भवव्यभिचाराभ्यां विशेषणविशेष्यभावो भवति, न केवलेन व्यभिचारेण शीतोष्णडिरितवत् । नीलोत्पलादौ तु स्वरूपे सम्भवाद्द्रक्तो पलादि ( द्व ) भावाच्च सम्भवव्यभिचारौ विच्छेत इति भवत्येव विशेषणविशेष्यभावः । अर्थस्य पुनरर्थान्तरप्रकाशनं प्रयुपसर्जनीकृतातमत्वन्व्यमिचारो नास्ति

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ततो न तस्य विशेषणत्वं घटते। नहीत्यादिनार्थान्तरप्रतीत्यर्थोपात्तस्यार्थकृतातमतद्ध्यभिचाराभावं निर्दर्शयति। गुणतामुपसर्जनत्वम्। तस्येति गुणस्य पत्वादिति। अन्यसिद्धयर्थसुपादीयमानत्वं गुणस्य लक्षणमित्यर्थः।

'तथाहि' यहां से ध्वनि लक्षण के पदों में दोष दिखलाते हैं। इस क्रम से कर ध्वनि का अन्तभाव दिखलाना शुरू करते हैं। तदन्याभिचारस्य = उपसर्जनकृतातमतद्ध्यभिचार के अभाव से। वह अभाव इस प्रकार है— 'संभव' और 'असंभव' ही हों तो (वाक्य में विशेषण देकर) विशेषणविशेष्यभाव बनाया जाता है। हो तो भी नहीं जैसे—'अग्नि उष्ण है' इसमें और केवल व्यभिचार हो तो भी नहीं शीत है' इसमें। 'नील उत्पल (कमल) आदि में स्वयं (उत्पल) में (नील होने से तथा रक्त उत्पल आदि में उसका अभाव होने से संभव और व्यभिचार विशेषणविशेष्यभाव होता है। जहां तक 'अर्थ' का संबंध है अर्थान्तर के योतन उपसर्जनीकृतातमता का व्यभिचार (अभाव) नहीं है। इसलिए उसका विशेषणत्व 'नहि अन्यादिo' इस वाक्य से अर्थान्तर की प्रतीति के लिए अपनाए गए अर्थकृतातमतव के व्यभिचार के अभाव पर दृष्टान्त देते हैं। गुणताम्=उपसर्जनभाव-उतस्य—गुण का। तन्मात्रलक्षणत्वात्=गुण (अप्रधान) का लक्षण है दूसरे के

अपनाया जाता।

विमर्शः संस्कृत आचार्यों ने विशेषणवाचक शब्द का प्रयोग वहीं ठीक उसके बिना विशेषणीभूत अर्थ का ज्ञान सम्भव न हो। ऐसा अर्थ वह होता है या नीलेतर गुण। कमल में कौनसा रंग है? यह नील, पीत आदि शब्दों के प्रयोग द्वारा नहीं बतलाया जा सकता। जो अर्थ किसी दूसरे अर्थ में नियमित रहता नहीं रहता—उसका विशेषण भाव शब्द द्वारा नहीं बतलाया जाता। उदाहरण में नियमितः रहती है। अतः 'अग्नि उष्ण है' ऐसा कह कर उष्ण शब्द से उसका ज्ञान जाता है। इसी प्रकार शीतता अग्नि में कभी भी नहीं रहती अतः उसका वाचक शीत विशेषण नहीं वन सकता। अतः 'आग शीत है' ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। उदाहरणों में अग्नि को उष्ण कहना व्यर्थ है, और शीत कहना विरुद्ध इस लिए हमें कहने योग्य नहीं हैं। इसी प्रकार काव्य का वाच्यार्थ प्रतीयमान अर्थ के लिए जाता है, इस लिए प्रतीयमान अर्थ नियमितः प्रधान होता है और वाच्यार्थ निय वाच्यार्थ में अप्रभानता का अभाव कभी नहीं रहता। इस लिए उसे अप्रधान—वाचक

वतलायेंगे।

यहां 'अनुपादेयमेव' इस अंश में विषय्याविमर्श और क्रमभेद दोप हैं। उपादेय विवक्षित है न कि अनुपादेयता का विधान। एतदर्थमुपादेय नहीं है—ऐसा कहना प्रकार 'एव' शब्द को अनुपादेय के पहले पढ़ना चाहिये।

व्यक्तिविवेककार ने शास्त्रीय भाषा का आदर्श उपस्थित किया है किन्तु स्वंय नहीं किया। उन्होंने सर्वनाम का अत्यधिक अव्यवस्थित प्रयोग किया है। यह सर्वत्र आती रहेंगी। यहां 'तस्य तन्मात्रलक्षणत्वात्' में 'तस्य' का अर्थ उसके पहले प्रकार प्रधान रूप से कथित धूम होता है और तन्मात्र के 'तत्' का अर्थ 'अग्न्यादि

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प्रथमो विमर्शः

कथित अग्नि । किन्तु धूम का लक्षण उपसर्जनीकृतातमत्व नहीं है। यह लक्षण है—‘गुण’ या ‘अप्रधान पदार्थ’ का धूम भी गुण है अतः धूम का गुणभाव अपनाकर उसी के लिये ग्रन्थकार ने ‘तस्य’ शब्द का प्रयोग किया । सर्वनाम बुद्धिस्थ वस्तु को वतलाते हैं । कभी-कभी वह साफ कह देती है और कभी लपेट कर । प्रसंगानुरूप उसकी योजना कर लेनी चाहिये । सांख्यकारिका में ‘दुःखत्रयाभिघाताजिज्ञासा तदपघातके हेतौ’ में ‘तद्’ का प्रयोग दुःखत्रय के लिये किया गया है । वह अभिप्राय में दुःखत्रय है फिर भी बुद्धि विषय है, अतः उसको ‘तत्’ का परामर्श-विषय मान लिया जाता है ।

इस प्रकार ग्रन्थकार ने ध्वनि-लक्षण में दोष दिखलाया । लक्षण में जब दोष आता है तो वह लक्षण नहीं माना जाता । नैयायिकों का लक्षण ही लक्षण होता है । आनन्दवर्धनाचार्य ने ध्वनि के अतिरिक्त एक गुणीभूतव्यङ्गच्य नामक भेद भी माना है । उसमें व्यङ्गच्यार्थ वाच्यार्थ की अपेक्षा गौण रहता है । अर्थात् वाच्यार्थ ही प्रधान रहता है । ध्वनि में वाच्यार्थ अप्रधान ही रहता है । ध्वनि-लक्षण में उपसर्जनीकृतातमत्व यह विशेषण अपनाया गया । व्यक्तिविवेककार गुणीभूत व्यङ्गच नामक भेद को बिल्कुल नहीं मानते उसको उन्होंने आगे खण्डन किया है । उनकी धारणा से वे यहाँ इस विशेषण को अनुपादेयता दरसाते हैं । आगे भी इसी का खण्डन करते हुए दिखलाते हैं—

यत् पुनरस्म्य कचित् समासोक्त्यादौ प्राधान्यमुख्यते तत् प्रकारणिकतापेक्ष्यैव । न प्रतीममानापेक्षया । यथा— उपोढरागेण विलोलतारकं तथा गृह्णोतं शशिना निशामुखम् । यथा समस्तं तिमिरांशुकं तथा पुरोडपि रागाद्रिलतं न लक्ष्यितम् ॥ अत्र हि प्रतीममानानुगतं वाच्यमेव प्राधान्येन प्रतीयते समारोपित- नायिकानायकवयवहार्योनिशाशशिनोरेव वाक्यार्थत्वात् इति । तदपेक्षया च तस्य लिङ्गत्वादुपसर्जनीभावाव्यभिचार पव ।

और कहीं समासोक्ति आदि में जो इस ( वाच्यार्थ ) की प्रधानता वतलाई गई है वह उसकी प्रकारणिकता को लेकर, न कि प्रतीममान अर्थ को लेकर । जैसे— ‘रागभरे चन्द्र ने निशा के चञ्चलतारायुक्त मुख को इस प्रकार अपनाया कि राग के कारण सामने ही गिरे अनङ्कार के पूरे वपु को उस ( निशा ) ने भी न देखा ।’ यहाँ प्रतीममान अर्थ ( वाच्यार्थ के ) पीछे चलता है और वाच्यार्थ ही प्रधानरूप से प्रतीत होना है । कारण कि यहाँ वाक्य से निशा और शशिन् हो मूलस्वरूप से प्रतीत होते हैं, नायक और नायिका के व्यवहारों का उनपर केवल समारोप रहता है ।

विमर्शः यहाँ की पंक्तियाँ वस्तुतः ऐसी होनी चाहिए—‘००० प्राधान्यमुख्यते यथा—उपोढरागे इति; तत् प्रकारणिकतापेक्ष्यैव, न प्रतीममानापेक्षया । तदपेक्षया ००० एतत् ।’ व्याख्यान के अनुरोध से हमने ऊपर का अनुवाद किया है । तत्प्रकारणिकत्वे ति । यह द्विविधं प्राधान्यं प्रकारणिकत्वस्वरूपं प्राधान्यं प्रतीममानत्व- स्वरूपं चेत् । तत् प्रकारणिकत्वस्वरूपं प्राधान्यं प्रतीममानार्थप्रतीतौर्थे उपात्तस्यार्थस्य समासोक्त्यादौ कामं विच्यते । न तु तदिह लिङ्गण उपयोग्यते ।

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१२

व्यक्तिविवेकः

वितं हि ध्वनिलक्षणम् । तत्र प्रत्याय्यस्योपेयत्वात् प्राधान्यं, प्रस्यायकस्य पुनरुपेयत्वादप्राधान्यम् । एतद् प्रकारणिकत्वसमुत्थापितं भवदपि तस्य प्राधान्यानि ध्वनिलक्षणे नोपयुज्यत इति नोपसर्जनीकृतात्मत्वस्य तद्वयावस्यं भवतीति न तद् विशेषणमुपादेयम् । अत्र च वाच्यस्यैव प्रकारणिकत्वादन्यस्य च प्रकारणिकत्वेपेच्चयेऽर्थो व्याख्येयः । एतद् प्रतियममानपेक्ष्येति न प्रतियोग्यन्तरमपेच्छणीयम्, अपि तु पूर्ववत् स्वापेच्छया व्याख्येयम् । भावप्रत्ययपाठः पुनरनर्थकः । अत्र हेत्यादिना वाक्यार्थत्वादिस्थान्तेन प्रकारणिकत्वनिमित्तं प्राधान्यानि समर्ध्यते ।

तदपेक्ष्येत्यादिना तु प्रतियममाननिमित्तम् । समारोपितनायिकानायकत्ववहारयोरिति ध्वनिकारं प्रति सोऽप्यसं कथितम् । नायिकानायककथ्यवहारयोरिति ध्वनिकारपाठ एकशेष-घभावसमर्थनकल्पना स्यात् ।

प्रधानत्व दो प्रकार का होता है एक् प्रकारणिकत्वस्वरूप ( प्राधान्च ) और दूसरा प्रतीमान्त्वरूप ( प्राधान्च ) । इनमें जो प्रकारणिकत्वस्वरूप प्राधान्च है वह प्रतीममान अर्थ की प्रतीति के ्‌लिए अपनाए गए ( वाच्च ) अर्थ में समासक्ति आदि स्थलों में भले ही हो, किन्तु वह यहाँ ( ध्वनि ) लक्षण में उपयोगी नहीं है । प्रत्याघ्र-प्रत्यायकभाव की प्रथान्तता 'ध्वनि का लक्षण है । प्रत्याघ्र और प्रत्यायक में जो प्रत्याघ्र है वह प्रधान है कारण कि वह उपाय ( साध्च ) है और जो प्रत्यायक है वह अप्रधान, कारण कि वह उपेय ( साध्च ) है । इस प्रकार प्रकारणिकत्वजनित प्राधान्च - उस ( वाच्च ) में रहते हुए भी ध्वनिलक्षण में उपयोगी नहीं । इसलिए उपसर्जनीकृतात्मत्व से उस प्राधान्च का व्यावर्त्तन संगत नहीं । इसलिए वह ( उपसर्जनीकृतात्मत्व ) विशेषण नहीं कहा जाना चाहिए । यहाँ ( ध्वनिलक्षण में ) प्रकारणिकत्व-जनित प्रथानता केवल वाच्च में है कारण कि केवल वहीँ प्रकारणिक है । दूसरी ( प्रतीममान ) में जो प्रथानता है वह ( अप्रथान ) प्रकारणिक अर्थ की अपेक्षा । इस प्रकार 'प्रतीममान की अपेक्षा प्रथान होता है ) रूप में ( प्रतीममानत्व आदि ) किसी दूसरे अर्थ को अपनाना आवश्चक नहीं । स्वयम् प्रतीममान अर्थ ही उसका प्रतीयोगी होता है । यहाँ ( प्रतीममानत्वापेक्ष्य ) इस प्रकार भावप्रत्यय वाना पाठ मिलता है । वह ठीक नहीं है । 'अत्र हि' यहाँ शुुरु कर 'वाक्यार्थत्वादि' यहाँ तक प्राकारिकत्वजनित प्रथानता का स्पष्टीकरण करते हैं 'तदपेक्ष्य' यहाँ से प्रतीममानत्व-जनित प्रथानता का स्पष्टीकरण करेंगे । समारोपितनायिकानायकत्ववहारयोः—यह्‌ ध्वनिकार के प्रति फवती करते हुए कहा गया । 'नायिकानायककथ्यवहारयोः' इस्‌ ध्वनिकार के पाठ में एकशेष के अभाव के समर्थन की कल्पना करनी होगी ।

विमर्शः समासोक्ति-'उपोदरागेण'०' में समासोक्ति अलंकार है । समासोक्ति वहाँ होती है जहाँ विशेष्य एकार्थक हों हों और केवल प्रकारणिक हों । विशेषण द्वयार्थक हों अतः 'अप्रकारणिक अर्थ हैं । वे दोनों प्रकारणिक भी हैं । उनके विशेषण-राग, तारक, मुख, तिमिरांशुक द्वयार्थक हैं । ये निशा के खिलीझ तथा रागी के पुष्टिं की सहायता से खी और पुरूष के अनुराग आँख की पुतली चेहरा तथा तिमिर के समान अंशुक अर्थ का ज्ञान कराते हैं । उससे खी और पुरूष का व्यवहार भी झलक उठता है । यहाँ सोचना है कि निशा और रागी का व्यवहार प्रधान है या खी या 'पष का । इसके पूर्व प्रथानत्व-अप्रथानत्व के निर्णय की कसौटी बनानी होगी ।

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प्रथमो विमर्शः

प्राधान्य-अप्राधान्य——इस विषय में ध्वनिकार और व्यक्तिविवेककार में मतभेद है। दोनों ही प्राधान्य-अप्राधान्य का स्वापद्रण्ड चमत्कारातिशय को मानते हैं। जहाँ प्रतीमयान अर्थ में चमत्कार की अधिकता हो वहाँ प्रतीमयान अर्थ प्रधान होता है। इसके विरुद्ध जहाँ वाच्यार्थ में चमत्कार की अधिकता हो वहाँ वाच्य प्रधान माना जाता है। वाच्य में चमत्कार की अधिकता नहीं यदि प्रतीममानार्थजनित चमत्कार की बराबरी भी हो तो उसे ध्वनिकार प्रधान मान लेते हैं। ध्वनिकार ने चमत्कारंगत उत्कर्षापकर्ष का निर्णायक सहृदयता को प्रकरण आदि के अधीन। अर्थात् वे प्रकरणादि द्वारा सहृदयता को जिस अर्थ में अधिक चमत्कार अनुभव हो वही अर्थ प्रधान मानते हैं। व्यक्तिविवेककार इस कसौटी को नहीं मानते। वे एकमात्र साध्यासाधक भाव को प्राधान्याप्राधान्य का निर्णायक मानते हैं। उनके मत में साध्य प्रधान है, साधक अप्रधान। एतदर्थे उन्होंने अग्नि और धुएँ का उदाहरण दिया है। अग्नि साध्य है अतः वह प्रधान है। धुआँ साधन है अतः अप्रधान काव्य में चमत्कार को भी वे इसी कसौटी पर घटा-बढ़ा मानते हैं। प्रतीमयान साध्य होता है अतः वह सदैव प्रधान रहता है। वाच्य साधन रहता है अतः सदैव अप्रधान। चमत्कार केवल प्रतीमयान से ही होता है। वाच्य बिना प्रतीमयान के काव्यार्थ नहीं बनता।

इस प्रकार ‘उपोदरागेण’ पद्य में ध्वनिकार प्रकरण के अनुसार निशा और रासो को प्रधान मानते हैं। स्त्री और पुरुष का प्रतीमयान व्यवहार उन्हीं के पीछे लगा प्रतीत होता है। व्यक्तिविवेककार साध्य होने से स्त्री-पुरुष व्यवहार को प्रधान मानते हैं। और साधन होने से निशा-रासो के व्यवहार को अप्रधान। प्राकरणिक होने से जो प्रधानता आती है व्यक्तिविवेकार उसे काव्योपयोगी नहीं मानते। क्योंकि प्राकरणिकता से चमत्कार में उत्कर्ष नहीं आता। उसमें उत्कर्ष प्रतीमयान होने से आता है। और चमत्कार ही काव्य का प्राण है। इस प्रकार जब गुणीभूतव्यङ्ग्य स्थल में भी वाच्यार्थ अप्रधान ही रहा तब ध्वन्यलक्षण में उसके लिए उपसर्जनीकृतात्मत्व विशेषण देना आवश्यक नहीं।

यहाँ नायिका-नायक में एकोषष द्वारा ‘नायक’ मात्र प्रयुक्त होना चाहिए। किन्तु ध्वनिकार ने वैसा प्रयोग नहीं किया, उन्होंने लिखा है—‘इत्यादौ व्यङ्ग्योनुगतं वाच्यमेव प्राधान्येन प्रतोयते, समारोपितनायकनायिकव्यवहारयोर्निशाराशिनोरेव वाक्यार्थत्वात्‌। व्यक्तिविवेककार ने यह पंक्ति ऐसी ही उद्धृत की है केवल व्यङ्ग्य को बदल कर प्रतीमयान कर दिया है। वह उन्हें मान्य नहीं है। आगे भी वे वैसे ही करते चले हैं। लोचनकार ने एकोष न करने का अभिप्राय इस प्रकार व्यक्त किया है—‘नायिकाया: नायकस्य यो व्यवहार: स निशायां समारोपितः, नायिकास्य यो व्यवहार: स शशिनि समारोपित इति व्याख्याने नैकेपषप्रसङ्गः‌’ अर्थात् नायिका का जो व्यवहार नायक के साथ हुआ उसका आरोप निशा पर, और नायक का जो व्यवहार नायिका के साथ हुआ उसका आरोप शशि के ऊपर——ऐसी व्याख्या करने पर एकोष की आवश्यक्ता नहीं रहती।

व्यक्तिविवेक-व्याख्यान से ज्ञात होता है कि उसके निर्माणकाल तक व्यक्तिविवेक में कई पाठभेद हो चुके थे। मूल पुस्तक में ‘प्रतीमानापेक्षया’ की जगह कहीं ‘प्रतीममानत्वापेक्षया’ पाठ था। उसका व्याख्यान में खंडन है। उसमें ‘प्रतीमानापेक्षया’ यही पाठ ठीक समझते हैं। वहाँ की पंक्तियाँ दुरुस्त हैं।

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व्यभिचारेडपि वैफल्यादनुपादेयमेवैतद्, गुणीभूतद्यञ्ज्येडपि काव्ये चारुत्वप्रकर्षदर्शनादिति वक्ष्यते ।

उक्तं गुणीभूततातमतयं यदर्थस्य विशेषणम् । गमकत्वान्न तत् तस्य युक्तमन्यविचारत: ॥ ७ ॥

इति सदूषणखण्ड: ।

और उस ( प्रतीमान अर्थ ) को लेकर तो उस ( वाच्यार्थ ) में उपसर्जनीभाव का व्यभिचार ( अयोग ) ही नहीं है कारण कि वाच्यार्थ प्रतीमानार्थ का ज्ञापक हेतु है । व्यभिचार हो तो भी वह ( उपसर्जनत्व ) शब्दतः कथनीय नहीं है । उसका कोई फल नहीं । कारण कि गुणीभूतव्यञ्ज्य काव्य में भी चारुत्व का प्रकर्ष देखा जाता है । यह आगे कहा जायगा ।

इस प्रकार—

'ध्वनिलक्षण में अर्थ का जो 'गुणीभूततातमत्व' यह विशेषण कहा गया है, वह ठीक नहीं है । वह प्रतीमानार्थ का ज्ञापक है अतः उसमें उस ( गुणीभाव ) का व्यभिचार नहीं रहता ॥ ७ ॥

तत्र सत्यपि तस्य व्यावर्त्यर्थे विशेषणमयुक्तं, निष्फलत्वाद्, यतो यत्र गुणीभूतद्यञ्ज्यापेक्षया वाच्यस्य चारुत्वनिस्सित्तं प्राधान्यं व्यभिचार: । नच तत्र वाच्यस्यैव चारुत्ववमिति नियम: व्यञ्ज्यस्यापि प्रकृष्टचारुत्वदर्शनात् । एतदुक्तं भवति । काव्यवैशिष्ट्यनि: करणप्रस्तावे । गमकत्वेनोपायत्वादुपसर्जनीकृततातमत्वव्यभिचाराभाव: । तदेवमभ्यविचारादर्थस्य विशेषणमनुपपन्नम् ॥

अत्र व्यक्तिवादिनोड्यमभिप्राय:—यदेतदर्थस्य गुणीभूततातम्वं तदर्थान्तरप्रतियाय-कव्वेनोपायत्ववादम्राधान्यं, प्रयीयमानापेक्षया अचारुत्वं, विश्रान्ततद्वेनार्थोन्तरानुपकार्यत्वं चेति त्रय: पक्षा: सन्ति । तत्राद्यं पञ्चदशमनूद्य कामं दूषितम् । तथा हि । वाच्यस्यार्थस्य प्रतीमानापेक्षया अप्राधान्यमुपायत्ववादव्यभिचारि 'यो हि यदर्थमुपादीयते' इत्युक्ते । अतचारुत्वेदस्य पुनरव्यवच्छेद्यं नास्ति, गुणीभूतद्यञ्ज्येडपि वाच्यस्याचारुत्वदर्शनात् । तृतीयस्तु पञ्चो गुणीभूतद्यञ्ज्यनिरासाय सिद्धान्तित: । तथा हि । समासोक्त्यादौ प्रतीमानोड्यो वाच्यार्थोंप्यपि न स्वात्मनि विश्रान्तिं भजते, प्रत्यावृत्य वाच्यार्थोंपसकाराय प्रवृत्तत्वात् । एतच्च 'समारोपितनायकानायककदर्यचहार्योनिशाशिनोरेव वाक्यार्थत्वादिति । तत्क्ष गुणेर्भूतद्यञ्ज्ये वाच्यस्य स्वविश्रान्त्वेनार्थोंन्तरानुपकार्यत्वं व्यभिचार्यंमिति विशेषणमनुपपन्नम् ।

गुणीभूततातमतार्थस्य न प्रतीतावुपायता । नाचारुत्वमपि स्वध्वैवैररनुपकार्यता ॥ ९ ॥

इति संग्रहखण्ड: ।

व्यभिचार का अभिप्राय है वाच्य में चारुत्वाधिक्य मान कर प्रतीमान की अपेक्षा प्राधान्य मानना । ऐसा होने पर भी उसकी व्याप्ति के लिए उपसर्जनीकृततातमत्व विशेषण देना ठीक नहीं । कारण कि उससे व्याप्ति नहीं होती । व्याप्ति न होने से क्या कारण है कि व्यभिचार वह गुणीभूतव्यञ्ज्य हो सकता है जिसमें प्रतीमान की अपेक्षा वाच्य का चारुत्व प्रधान है । किन्तु गुणीभूतव्यञ्ज्य में वाच्य का ही चारुत्व प्रधान हो ऐसा नियम नहीं है । वहाँ व्यङ्गच का भी चारुत्व प्रधान होता है । एतद् उपसर्जनीकृततातमत्व । वक्ष्यते काव्य के वैशिष्ट्य के निराकरण के अवसर पर । गमक होने से उपाय हुआ । और इसीलिए उपसर्जनीकृततातमत्व का व्यभिचार नहीं हुआ । तो इस प्रकार अव्यभिचार के कारण अर्थ का विशेषण नहीं बनता ।

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प्रथमो विमर्शः

यहाँ ध्वनिवादी का अभिप्राय यह है—यह जो अर्थ की गुणीभूतता है उसके तीन अर्थ हो सकते हैं—१—दूसरे अर्थ की प्रतीति कराने में उपाय होने के कारण अप्रधानता । २—प्रतीयमान की अपेक्षा अचारुत्व और ३—निराकाङ्क्ष या अपने में पूर्ण होने के कारण दूसरे अर्थ द्वारा उपकार्य न होना । इनमें से प्रथम दो पक्षों को उद्धृत कर व्यक्तिविवेककार ने काफी दोषी ठहराया । जैसे—वाच्य अर्थ प्रतीयमान का उपाय होने से उसकी अपेक्षा सदा अपमान है—जैसा कि जो जिसके लिये ग्रहण किया जाता है—आदि ग्रन्थ द्वारा कहा गया है और अचारुत्व पक्ष में उपसर्जनीकृतात्मतत्व विशेषण का कोई व्यावर्त्य नहीं, इसलिए गुणीभूतव्यङ्ग्य स्थल में वाच्यचारुत्व देखा जाता है । नृतीय जो गुणीभूतकृतात्मतव पक्ष है वह अवश्य गुणीभूतव्यङ्ग्य की व्यावृत्ति के लिये सिद्धान्तित किया है । जैसे—समासोक्ति आदि में प्रतीयमान अर्थ वाच्यार्थ से प्रतीत होने पर भी अपने आप में निरपेक्ष या निराकाङ्क्ष नहीं रहता, इसीलिये वह लौट कर वाच्यार्थ का उपस्कार करता देखा जाता है । ध्वनिकार ने 'समारोपितनायिकानायकत्वबहलर्यान्तराश्रयणशिनोरेव वाक्यार्थत्वात्' द्वारा यही स्पष्ट किया है । इसलिए गुणीभूतव्यङ्ग्य में वाच्यार्थ अपने आप में पूर्ण रहता है और प्रतीयमान अर्थ द्वारा उपस्कृत किया जाता है—इसे ध्वनिलक्षण से दूर करने के लिये 'उपसर्जनीकृतात्मतत्व' अर्थ विशेषण ठीक ही है । रुय्यक ने अपना यह मत ताल ठोंक कर साधा और फिर ग्रन्थकार के समान ही संग्रहरलोक द्वारा स्थिर भी किया है—अर्थ की गुणीकृतात्मता का अभिप्राय प्रतीति का उपाय होना नहीं, और न अचारुत्व ही, अपितु प्रतीत अर्थों की अनुपकार्यता है ।

विमर्शः : व्यक्तिविवेककार ने यह सिद्ध कर दिया कि वाच्य में जो प्रधानता प्राकरणिकत्व द्वारा आती है वह 'ध्वनिलक्षण में अग्राह्य है । इसके बाद यह सिद्ध करते हैं कि प्रतीयमान की अपेक्षा उसमें प्रधानता रहती ही नहीं हैं । उनका अभिप्राय है कि जो साधन या हेतु होता है वह साध्य के प्रति सदा गुणीभूत रहता है । उसकी इस गुणीभूतता का उसमें कभी भी अभाव नहीं रहता । अतः अभि की उष्णता की प्रतीति के लिए उष्ण शब्द के समान उसकी प्रतीति के लिए उपसर्जनीकृतात्मतत्व शब्द नहीं दिया जाना चाहिये । इस प्रकार न प्राकरणिकत्व की दृष्टि से वाच्य का प्राधान्म उपादेय है और न प्रतीमान की अपेक्षा ही । चमत्कार की अपेक्षा यदि वाच्य को प्रतीमान से प्रधान मान उपसर्जनीकृतात्मतत्व विशेषण की सार्थकता सिद्ध करना हो तो वह भी सिद्ध नहीं होती, कारण कि गुणीभूतव्यङ्ग्य में ही वाच्य को प्रतीमान से अधिक चमत्कारी अतः प्रधान माना जा सकता है, परन्तु उसमें भी प्रतीमान ही अधिक चमत्कारी होता है, वाच्य नहीं । इस तथ्य का प्रतिपादन ग्रन्थकार आगे करेंगे ।

व्यारव्याकार ने—प्रतीमान में भी चारुत्वप्रकर्ष देखा जाता है—ऐसा लिखा है । उससे सिद्ध होता है कि वाच्य में भी वह रहता है । किन्तु ग्रन्थकार ऐसा नहीं मानते ।

इस प्रकार प्राधान्म के निर्णायक तत्त्व तीन माने गए—१. प्राकरणिकत्व, २. साध्यसाधनभाव, ३. चारुत्वोत्कर्ष । तीनों में ध्वनिकार और व्यक्तिविवेककार दोनों को दो-दो मान्य हैं । ध्वनिकार प्राकरणिकत्व और चारुत्वोत्कर्ष को मानते हैं और व्यक्तिविवेककार साध्यसाधनभाव तथा चारुत्वोत्कर्ष को । इससे सिद्ध होता है कि प्राधान्म का निर्णायक वस्तुतः चारुत्वोत्कर्ष है । प्राकरणिकत्व और साध्यसाधनभाव—उस चारुत्वोत्कर्ष के निर्णायक हैं । प्राकरणिकत्व ध्वनि-काराभिमत है और साध्यसाधनभाव-व्यक्तिविवेककाराभिमत । चारुत्वोत्कर्ष दोनों को अभिमत है ।

व्यक्तिविवेक के व्याख्यातान में वाच्य की विश्रान्ति और प्रतीमानार्थ द्वारा उसका उपकार—

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व्यक्तिविवेकः

गुणीभूतव्यङ्ग्य में वाच्यप्राधान्य का हेतु वतलाया गया है । पुष्प की सौरभ लौट कर पुष्प का उपकार करने नहीं आती । आनन्द सौरभ में ही अधिक रहता है, पुष्प में कम । अतः प्रतीयमान् अर्थ वस्तुतः चारुत्वाघायक और प्रधान होता है ।

यहाँ तक वतलाया कि अर्थ का तो केवल विशेषण अनुपादेय है । अब वतलाते हैं कि ‘शब्द’

शब्द-खण्डन

शब्दः पुनरनुपादेय एव । तस्य स्वार्थाभिधानमनन्तरेण व्यापारान्तरात् पपत्तेरुपपादयिष्यमाणत्वात् ।

‘शब्द भी सर्वोत्कृष्ट उपादेय नहीं है । कारण कि यह आगे वतलाया जाने वाला है कि उसका अपने अर्थ के अभिधान ( अभिधातृक्ति से कथन ) के अतिरिक्त दूसरा कोई व्यापार नहीं वनता ।’

विमर्शः : महिमभट्ट् शब्द में एक अभिधामात्र मानते हैं । लक्षणा और व्यञ्जना नहीं । अभिधा केवल अपने वाच्यार्थ का बोध कराती है । अतः काव्य में शब्द प्रतीयमान के लिप्युपयोगी नहीं होता । इस स्थिति में ध्वनिलक्षण में उसका उपादान आवश्यक नहीं ।

न च तस्यानुकरणाद्यधिरोच्ये ऽपि सङ्ज्ञाधिकृतार्थकं सरसवति यथा—‘तं कर्णमूलमागत्य पलितच्छद्मना जरा । कैकेयीराङ्ङीयेवाद्र रामे श्रीर्न्यस्यतामिति ॥’

कुतस्तर्हि तदर्थावगतिः। अनुकार्योदिति ब्रूमः तस्य सार्थकनिरर्थकत्व-भेदेन द्वैविध्यात् । न त्वनुकरणात्, तस्येतिनास्य स्वरूप-मात्रेऽवस्थानात् ।

उसका जो उपसर्जनीकृतार्थत्व है वह भी अनुकरण को छोड़कर और कहीं नहीं बनता— जैसे बालों की सफेदी के बहाने जरावस्था ने कान के पास आकर दशरथ से—‘राम को राज्यश्री सौंप दो’—ऐसा मानो कैकेयी की शंका से कहा तो फिर अर्थ का ज्ञान कैसे ( किससे ) होता है ?

हमारी मान्यता है कि वह अनुकार्य ( शब्द ) से होता है । वह ( अनुकार्य ) दो प्रकार का होता है सार्थक तथा निरर्थक । न कि अनुकरण ( शब्द ) से । वह तो इति शब्द द्वारा छुटकर केवल अपने रूप में हो समाप्त हो जाता है ।

शब्दस्वरूपानुपादेयत्वमुक्तम् । तद्विद्विशेषणस्यापि तदाह—न चेति । अनुकरणे शब्द-प्राधान्यादिव्यमाने डन्यर्थ उपसर्जनीकृत एव । तदर्थावगतिरिति रामे श्रीर्न्यसनलक्षणलव्य-वहार्यार्थावगतिरित्यर्थः । अनुकार्योदिति जरासम्बद्धाद्वचनादित्यर्थः । द्विविधो धार्थोंडनु-कार्यशब्दरूपः तत्प्रतिपादितवचवहार्यार्थरूपश्च । तत्राङ्गोडनुकरणशब्दस्यार्थः । ततस्तनुकरण-शब्दाघघपी न व्यवहार्यार्थप्रतीतिस्थितस्थाप्यनुकार्यशब्दस्तदर्थः । प्रत्याय्येदित्यर्थः । सार्थ-कत्वं चानुकार्यस्य यथा—‘हा शेत्यं तुहिनाचलस्य करयोरित्यच्चिवानं सस्मितम्’ मित्यादौ, निरर्थकत्वं यथा—‘दात्यूहगृहीतहलेखोलितकुहकुहारावकान्ता वनान्ता:’ इत्यादौ ।

शब्दस्वरूप का अनुपादेयता वतलाइए और उसके विशेषण की भी अनुपादेयता वतलाते हैं—न च इस प्रकार । अनुकरण में शब्द की प्रधानता रहती है, अतः उपस्थित भी अर्थ अप्रधान ही रहता है । तदर्थवगति—राम पर श्रीविन्यास ( राज्यश्री सौंपना ) रूपी जो करणीय अर्थ उसका ज्ञान । अनुकाय—जरा से सम्बन्धित अर्थ से । अर्थ दो प्रकार का होता

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है, अनुकार्य शब्दरूप और उससे प्रतिपादित व्यवहारीयोग्य अर्थ श्रोत्रों में प्रतिबिम्ब अनुकरण शब्द का अर्थ होता है। अनुकरण शब्द से व्यवहारी योग्य अर्थ की प्रतीति तब ही होनी चाहिए जिस शब्द का अनुकरण किया जाता है वह (अनुकार्य) तो उसका ज्ञात होना आवश्यक है। अनुकार्य की सार्थकता 'अहा ! हिमाचल के हाथ बहुत ठंडे हैं' उन्हें सुनकरादि के मुख बोल उठे (शंकर आपकी रक्षा करें । यह विवाह से पाणिग्रहण के समय अतिविश्रुत रोचिर्दाने के लिये शंकरजी ने कहा । काव्यप्रकाश में यह पंक्ति पूरी है । ) इसीप्रकार में नाना रस हैं, और निरर्थकता 'दात्यूह पक्षियों के समुदाय की क्रोड़ा से उत्पन्न 'कलकल' ध्वनि युक्त जलचरैः' यह बतलाया जा सकता है।

विमर्शः-ध्वनिलक्षण में शब्द का उपादान नहीं किया जाय—यह बतलाया जा चुका है। ग्रन्थकार अब यह कहते हैं कि शब्द का विशेषण—'उपसर्जनीकृतार्थक' भी न कहा जाय । क्योंकि यह बतलाते हैं कि शब्द का अर्थं शब्द की अपेक्षा गौण केवल एक नित्यता में होना है वह है शब्द का अनुकरण । अर्थात् किसी के कहे शब्दों का उसी प्रकार उच्चारण में जो उच्चारणात्मक शब्द हैं वे ही प्रधान होते हैं। वक्ता का तात्पर्य वहाँ उस उच्चारण द्वारा पूर्वोच्चारित शब्द का अनुकरण करना मात्र रहता है। अर्थज्ञान नहीं। इसका उदाहरग—कालिदास के रघुवंश के दशरथ के कान के पास के बाल भी पक गए। यह रघुवंश के आरम्भ का लक्षण है। कवि कहता है कि कान के पास पकें वालों के वेष में दिखाई आई उन ने गजा दशरथ से कहा—'राम को राज्य दे दो ।' यहाँ कवि 'राम को राज्य दे दो' यह जड़ द्वारा कालिदास शब्दों का उपादान किया गया है वह शब्द अनुकरणात्मक ही नहीं है। अतः उसका अर्थ उसकी अपेक्षा गौण नहीं हो सकता फलत: उसका विशेषण—'उपसर्जनीकृतार्थत्व' व्यर्थ है।

यहाँ ग्रन्थकार ने एक प्रासंगिक बात और कही। उन्होंने चूँकि प्रश्न उठाया कि यदि अनुकरणात्मक शब्दों से अनुकार्य शब्द मात्र की प्रतीति होती है तो फिर अर्थ का ज्ञान कैसे होता है। उस पर उत्तर दिया—अर्थ की प्रतीति अनुकरणात्मक शब्दों से उपस्थित अनुकार्य शब्दों द्वारा होती है। अनुकरणात्मक शब्द 'ध्वनि' आदि शब्दों से विरकर अपने स्वरूप में ही स्थित रहते हैं, जैसा कि 'न्यास्यतामिति' से स्पष्ट है।

अन्यस्य तूपसर्जनीभावाद्यविचार एव, तस्य तदर्थमुपादानत्वे यो हि यदर्थमुपादीयते, नासौ तमेवोपसर्जनीकरोति युक्तं वक्‍तुम् । यथोदकाद्यपादानार्थमुपात्तो घटादिस्तदेवोदकादि । अन्यथा प्रधानेतरलयवस्था निन्द्य-नघनेव स्यात् । अत एव घटादिरेव प्रतिनिधीयते नोदकादित्यसम्भवो लक्षणदोषः ।

दूसरा जो (अनुकरण से भिन्न) शब्द है उसके अर्थ का तो उपसर्जनीभाव का अध्यवमिचार ही है। कारण कि वह उसी (अर्थ) का ज्ञान कराने के लिए अपनाया जाता है । इसलिये यह ही है। जैसे जल आदि को प्रधान करना देता है। जैसे जल आदि कहना उचित नहीं है कि वह (शब्द) उसी (अर्थ) को अप्रधान बना देता है। उसे कहने लेने के लिए अपनाये गए घट आदि उसी जल आदि को (अप्रधान बना देता है। ऐसा न मानने पर प्रधान अप्रधान की व्यवस्था का कोई मानदण्ड हो न रहेगा ।

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इसी लिए प्रतिनिधित्व ( दूसरी वस्तु द्वारा पहली वस्तु का स्थान ग्रहण कर कार्य करना ) घट आदि के लिए ही होता है । जलादि के लिए नहीं । इस प्रकार लक्षण में असम्भव दोष आया ।

अन्यस्यत्निति । अनुकरणशब्दस्यतिरिक्तस्य स्वतन्त्रतया वाचकत्व अनुत्कार्यशब्दस्य च । उपसर्जनीभावाच्च्यभिचार एवेतिं । वाच्यं प्रतीति शेषः । ननु शब्दाभिप्रायेणोपसर्जनीकृतार्थत्वे प्रकृतत्व । शब्दस्य स्वरूपेणोपसर्जनीभावः: किञ्चिद्रूपितः । सत्यम् । अर्थस्य तावच्च्छेदप्रत्युपसर्जनीभावविसंवादे: भवति । स एवं शब्दस्योपसर्जनीभावाच्छब्दप्रकाश्यते । य एवं ह्यर्थस्य शब्दं प्रत्युपसर्जनीभावाभावः स एवं शब्दस्योपसर्जनीभावाच्च्यवमिचारस्तयोः परस्परापेच्चया गुणप्रधानभावास्वभावस्थितत्वात् । तत्क्षण शब्दापेच्चया च थ्स्य प्रधान्या च्छेदस्य गुणीभावार्थ एवमसभवि । अयमत्र पिण्डार्थः:-शब्दस्य गुणीभूतार्थ एवं स्वार्थापेच्चया प्रतीममानोपेच्चया चेतिं द्वैतम् । तत्र स्वार्थापेच्चयासमभव उत्कः । प्रतीममानापे च्चया पुनरर्थ न्यायेनाव्यभिचारो योजनीयः, यथानन्तरमेव वक्ष्यते 'नोदकादिति' । यथाहुः—

'गुणा: प्रतिनिर्धीयान्ते घटादीनां न जायते?' इति । ननु मुख्यसदृशः प्रतिनिधिरियुच्यते मुख्यं च प्रधानम् । एवं च कथञ्चिते प्रधानस्य न प्रतिनिधिरिति । सत्यम् । प्रतिनिधीयमानोदमुख्य: एवं भवति केवचं मुख्यामुख्यानां प्रतिनिध्यर्हणामुख्य एव त न मुख्य: प्रधानस्वादियुक्तं नोदकादिति ।

अनुकरण शब्द से भिन्न स्वतन्त्ररूप से वाचक अनुकार्य शब्द का । उपसर्जनी—अर्थों त वाच्य के प्रति । शंका—यहाँ जो शब्द के प्रति अर्थ का अप्रधानता का प्रकरण है इसमें शब्द की शब्द के प्रति अप्रधानता का निरूपण क्यों किया ? उत्तर—ठीक है । यहाँ पहले शब्द के प्रति अर्थ की अप्रधानता का सम्भव न होना बतलाई गई है । यह यहाँ अर्थ के प्रति शब्द की अप्रधानता में अव्यभिचार ( व्यभिचार = अभाव, अव्यभिचार अभावाभाव अर्थात नित्य अस्तित्व ) से वतलाई गई । जो शब्द के प्रति अर्थ में उपसर्जनीभाव ( अप्रधानता ) का अभाव है वही शब्द में ( अर्थ के प्रति ) अप्रधानता का अव्यभिचार है । कारण कि उन दोनों ( शब्द और अर्थ ) का प्रधान-अप्रधानभाव एक दूसरे को लेकर ही होता है । यहाँ निष्कर्ष यह है कि शब्द के अर्थ की अप्रधानता दो प्रकार से होती है अपनी अपेक्षा तथा प्रतीममान अर्थ की अपेक्षा । इनमें से अपनी अपेक्षा असम्भव बतलाया । प्रतीममान की अपेक्षा उसी प्रकार व्यभिचाराभाव वतलाया जा सकता है जिस प्रकार वाच्यार्थ में । जैसा कि अभी आगे कहेंगे—'जलादि नहीं' । जैसे कि कहा है—घट आदि के गुण ही प्रतिनिहित होते हैं जाति नहीं ।

शंका—प्रतिनिधि मुख्य के समान अर्थ ही माना जाता है । मुख्य होता है प्रधान । इसलिए कैसे कहते हैं कि प्रधान का प्रतिनिधि नहीं होता । उत्तर—ठीक है । जो प्रतिनिधि बनाया जाता है वह अप्रधान ही होता है । केवल प्रतिनिधि के योग्य मुख्य और अमुख्य में से अमुख्य ही प्रतिनिधित होता है, मुख्य नहीं । कारण कि वह प्रधान होता है । इसी तथ्य को 'नोदकादि' द्वारा स्पष्ट किया ।

विमर्शः अनुकरणात्मक शब्द में प्रधानता बतलाई जा चुकी है । उससे भिन्न जो शब्द अनुकार्यरूप होते हैं—जिन्हें सामान्यतः वाचक शब्द कहा जा सकता है उनमें अपने अर्थ की अपेक्षा प्रधानता का सर्वथा अभाव रहता है । यहाँ प्रधानता और अप्रशानता का मापक साध्यसाधनभाव है । शब्द अर्थ ज्ञान का साधन होता है अतः वह अप्रधान ही रहता है । प्रधान होता है साध्यभूत अर्थ हो । इसे दृष्टान्त द्वारा भी स्पष्ट किया । जैसे घड़ा जल के लिए अपनाया जाता है । वह जल लाने का साधन है । अतः जल उद्देभूत प्रधान वस्तु है । घड़ा उसकी अपेक्षा अप्रधान ।

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प्रथमो विमर्शः

पात्र का उपयोग किया जा सकता है, किन्तु जल की जगह किसी को नहीं अपनाया जा सकता । घड़े की जगह आये अन्य पात्र उसके प्रतिनिधि कहलायेंगे ।

इसीलिए जिस प्रकार साधनभूत घड़ा साध्यभूत जल की अपेक्षा प्रधान नहीं कहाँ जा सकता वैसे ही साधनभूत शब्द साध्यभूत अपने अर्थ की अपेक्षा प्रधान नहीं कहाँ जा सकता मानने पर प्रधान-अप्रधानभाव की व्यवस्था ही उचित नहीं हो सकती है। जब शब्द में अपने अर्थ के प्रति अभिधानता रहती है तब उसमें उपसरजनाक्रान्तस्वार्थत्व विशेषण का होना संभव नहीं ।

यह ध्वनिलक्षण में एकांगी असम्भव दोष हुआ । लक्ष्य में लक्षण का सर्वांतर्न्त अनन्वय असम्भव दोष माना जाता है—जैसे ‘अग्नि: शीतः' कहने पर अग्नि में शीत का !

व्याख्यान में—शब्दस्य गुणीभूतार्थत्व स्वार्थापेक्षया** और तत् स्वार्थोपेक्षया** ने अर्थ शब्द नहीं चाहिए ।

व्यभिचारसम्भवपरोपि वा यत् स्वार्थयोहपरिज्ञीकृततत्त्ववचनं तत् पुनरुक्तं, तयोरथान्तराभिधायक्यर्थमुपात्तयोरस्सामध्यादेव तद्वगतेरित्यु- कम् । न च स्वरूपमानुवादफलमेतदिति शङ्क्यं वचं तस्य पुनरुक्तिप्रकार- त्वोपपादनत: ।

व्यभिचार और सम्भव होने पर भी शब्द और अर्थ को जो उपसरजनाक्रान्त कहा जाता है वह पुनरुक्त है । उनमें इसका ज्ञान स्वतः हो जाता है कारण कि वे अपने आप ही जुड़े रहते हैं । ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि वह वस्तुनिष्ठाने का कथन करने के लिए अपनाए गए हैं, कारण कि उसी को आगे पुनरुक्ति बनलाया गया है ।

व्यभिच्चा रसम्भवयोरपीति । प्रौढोक्तिवादयसमभ्युपगमवाद: । अर्थाभिप्रायेण व्यभिचार:, गुणीभूतत्वदृश्शये प्रतीयमानापेक्षया वाच्यस्य चारुत्वाभ्युपगमात् । शब्दाभिप्रायेण सम्भव: अर्थान्तरापेक्षया शब्दस्य गुणीकृतार्थत्वात् । स्वार्थयोरिति स्वस्वार्थस्य च । तद्वगतेरिति उपसर्जनीकृततत्त्वागते: । तस्येति स्वरूपमानुवादस्य ।

और कोइँ अधिक समर्थ नर्के होने से ग्रन्थकार यहाँ खण्डित ज्ञान को थोड़ी देर के लिए स्वीकार कर लेते हैं । यहाँ व्यभिचार अर्थ को लेकर ( उसके उपसर्जनीकृततात्वत या ) माना गया है कारण कि गुणीभूतव्यङ्ग्य में प्रतीमयान अर्थ की अपेक्षा वाच्य में अधिक चारुत्व स्वीकार किया गया है । सम्भव शब्द को लेकर माना गया कारण कि शब्द का अपना अर्थ दूसरे अर्थ की अपेक्षा गौण हो जाता है ।

स्वार्थयो:-अपना ( शब्द का ) तथा अर्थ का । तद्वगते:-उपसर्जनीकृततत्व का ज्ञान होने से । तस्य—स्वरूपमात्र के अनुवाद का ।

विमर्शः : पहले ध्वनिलक्षण में अर्थे और शब्द के उपसर्जनीकृततत्व का वास्तविक व्यभिचार और असंभाव दिखलाया गया । यहाँ ग्रन्थकार उसे स्वीकार कर दूसरे ढंग से ध्वनिलक्षण में दोष देता है । वह कहता है भले ही गुणीभूत व्यङ्ग्य में वाच्यार्थ प्रतीमयान की अपेक्षा अधिक सुन्दर हो, और शब्द अपने अर्थ की अपेक्षा, तो भी उनकी यह प्रधानता यहाँ ध्वनि में नहीं रहती ।

यहाँ अर्थ और शब्द दोनों में सदा ही अप्रधानता रहती है ! उसका अभाव वांभी भी नहीं रहता जिसके व्यवर्त्तन के लिए उनकी अप्रधानता को शब्द से कहा जाय ! फलतः उनकी अप्रधानता स्वतः ज्ञात हो जाएगी ! उसको शब्द से कहना ज्ञात तथ्य को शब्द से कहने के कारण होने वाले पुनरुक्ति दोष से दूषित है । इस प्रकार ध्वनिलक्षण में पुनरुक्ति दोष आता है । अब इस प्रसंग को समाप्त कर इसका निष्कर्ष देते हैं ।

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पवक्ष यत् 'सुवर्णपुष्पां पृथिवी'मित्याद्युदाहृतमुपदर्शितं, तदसिद्ध-साध्यसाधनधर्मानुगतिमत्यवगन्तव्यम् ।

इस प्रकार 'सुवर्ण पुष्पाम्' इत्यादि जो ( ध्वनिके ) उदाहरण ( ध्वनिकार ने ) दिखलाए हैं उन सब में असिद्धसाध्यसाधनत्व दोष है । ( उन सब में ध्वनिस्वरूप उस साध्य की सिद्धि का प्रयास किया गया है जो स्वयं असिद्ध है ।)

एवञ्चेति । व्यञ्जकव्यङ्ग्यसङ्कभावो हि परमार्थतो गम्यगमकभावः । एवञ्च शब्दस्य व्यञ्जने 'सुवर्णपुष्पामि'त्यादौ शब्दस्य व्याप्यारान्तराभावात् साध्यसाधनयोरधर्मयोरनुगमस्य सम्भवनध्वस्यासिद्धस्वभावाद् व्यञ्जकभावो न सिद्ध इत्यर्थः । न व्यतिरेकादिनः पुनमते शब्दस्य शावक्यन्तरसमर्थनात् स्वरूपेणोपादानस्य सार्थकत्वं विवेच्यते । तस्य चोपसर्जनीकृतार्थकं विशेषणं प्रयोजनमेव तथा हि 'दृष्ट्या केशव ! गोपरागाहृदया' इत्यादौ प्रतीयमानस्य-थस्य शब्दस्य स्पष्टत्वाद् वाच्यं प्रयुपस्कारकवाद् वाच्यार्थोंपेक्ष्यै शब्दस्य गुणी-

कृतार्थक्वे नास्ति । तद्ववच्छेदार्थं विशेषणमुपादेयमेव । तदेतत् कटाचितं 'यस्मिन्ननुक्तः शब्देन शब्दशक्त्युद्भवो हि सः' इत्यत्र ।

इस प्रकार तद्वत्त्वाद्यभावात् वक्तव्यः गम्यगमकभावः । इसलिए 'सुवर्ण पुष्पां' इत्यादि में ( ध्वनिकार ने ) जो शब्द की व्यञ्जकता या शाब्दी व्यञ्जना मानी थी वह नहीं बनती । कारण कि व्यङ्गयव्यञ्जकभाव की सिद्धि नहीं होती यह इसलिए कि न शब्द की दूसरी शक्ति न होने से साध्य और साधन नामक वस्तुओं के धर्मों में शब्द का कोई अनुगम नामक संबन्ध नहीं बनता ।

व्यक्तिवादी शब्द में दूसरी शक्ति मानता है अतः ध्वनिलक्षण में शब्द का स्वरूपतः कथन सार्थक होता है और उसका उपसर्जनीकृतार्थक्वं विशेषण भी सार्थक है । कारण कि 'दृष्ट्या केशव गोपरागाहृदया' इत्यादि में प्रतीयमान अर्थ शब्द से प्रतिपादित है, अतः वह वाच्यार्थ का उपस्कारक ( उसमें चमत्कार लाने वाला ) होता है, शब्द अपने वाच्यार्थ की दृष्टि से गुणी-कृतार्थक्व नहीं है ( व्यङ्गयार्थ की दृष्टि से वैसा अवश्य है ) । उसके व्यवच्छेद के लिए शब्द के लिए उपसर्जनीकृतार्थक्वं विशेषण

ध्वनिलक्षण में अवश्यमेव उपादेय है । इसी तथ्य का संकेत ध्वनिकार ने-'यस्मिन्ननुक्तः शब्देन शब्दशक्त्युद्भवो हि सः' इस कारिका में किया है ।

विमर्शः : ध्वनिकार ने ध्वनि का लक्षण स्थिर कर उसके भेद भी दिखलाए हैं । ध्वनि के विरुद्ध जो एक अन्तर्भावितवाद या लक्षणा में ध्वनि के अन्तर्भाव का पक्ष है तो उसकी खण्डनभूमिका रखते हुए उन्होंने लिखा है—असिद्धध्वनि: । स च चाविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्रेति द्विविधः । अर्थात्

ध्वनि है और उसके सामान्यतः दो भेद हैं १—अविवक्षितवाच्य तथा २—विवक्षितान्य-परवाच्य ।

दोनों भेदों में प्रथम भेद के उदाहरण में ध्वनिकार ने सुवर्णपुष्पां पृथ्वीं—यह महाभारत का श्लोक उद्धृत किया है । इसका अर्थ है 'सोना फूलने वाली पृथ्वी को तीन पुरुष चुनते हैं । जो शूर होते हैं, जो कृतविद्य होते हैं और जो सेवाकार्य में दीक्षित होते हैं । लोचनकार अभिनवगुप्त उसकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं—पुष्प लगते हैं वृक्ष में । पृथ्वी वृक्ष नहीं हैं, जिसमें फूल लगें । और वृक्षों में भी फूल लगते हैं तो सोने के नहीं । यहाँ शब्दयोजना ऐसी है कि उससे पृथ्वी में सोने के फूल लगने का अर्थ निकलता है, इसलिए इस वाक्य का अपना वाच्यार्थ विवक्षित ही नहीं है । वह लक्षण-लक्षणा

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प्रथमो विमर्शः

द्वारा ही सम्भव है। इस लक्षणा में वाच्यार्थ सर्वथा छूट जाता है। इसलिए ध्वनन को अविवक्षित वाच्य माना जा सकता है।

व्यक्तिविवेककार का कथन है कि इन सब उदाहरणों में किसी असिद्ध वस्तु की सिद्धि का व्यर्थ प्रयास किया गया है। रुय्यक इसका अभिप्राय स्पष्ट करते हुए लिखते हैं—

जब शब्द में अभिधा के अतिरिक्त कोई शक्ति ही नहीं तब सुवर्णपुष्पादि उदाहरणों में प्रतोयमान अर्थ और शब्द में कोई साध्य-साधनभावसंबंध ही नहीं बनता। ऐसी स्थिति में जब व्यंग्य-व्यंजकभाव का ही अस्तित्व उच्छिन्न हो गया तब उसकी सिद्धि करने चलना शून्य में टकर मारने चलना है।

रुय्यक ने महिम भट्ट के इस शब्दप्रत्याख्यान का ध्वनिकार की ओर से उत्तर देते हुए लिखा है—

व्यक्तिवादी ( ध्वनिवादी ) के मत में शब्द में अभिधा के अतिरिक्त और भी शक्तियाँ रहती हैं इसलिए उनके अनुसार वाच्य के समान अन्य अर्थों के साथ भी शब्द का संबंध संभव है। उसी संबंध को लेकर ध्वनिलक्षण में प्रतोयमान अर्थ के प्रति शब्द का गुणवृत्ति दिखलाई गयी है, और उससे यमक आदि में जहाँ शब्द का गुणवृत्ति नहीं होता उन अंशों की व्यावृत्ति की गयी है।

इसी प्रकार उसका उपसर्जनीकृतार्थत्व विशेष भी ध्वनिवादी के मत में सप्रयोजन है। ध्वनिवादियों का यह सिद्धान्त है कि जहाँ व्यंग्य अर्थवाच्य भी बना दिया जाता है वहाँ व्यंग्य वाच्य का ही अंग बन जाता है। उन्होंने इस प्रकार का उदाहरण दिया है—

दृष्ट्या केशव गोपारागहतया किश्चित् दृष्टं मया तेनैव स्वलितास्मि नाथ पतितां किं नाम नालम्बसे । एकस्त्वं विषमेपु खलु खलमनसां सर्वावलानां गति-गोंप्येवं गदितः सलेलशवननाद् गोष्ठी हरिवृन्दपुरम् ॥

अभिनवगुप्त ने इस पद्य के विशेषणों को द्वयर्थक मानते हुए दोनों अर्थों में उनकी संगति दिखलाई है। दो अर्थों में एक है एक गोपी की श्रीकृष्ण के प्रति उक्ति का पक्ष जो गोधूली के समय पैर फिसलने से डगर में गिर पड़ी और दूसरा है श्रीकृष्ण पर अनुरक्त गोपी के पक्ष में इस पद्य का पदच्छेद इस प्रकार है—

केशव, गोपारागहदृया, विषमेपु खलु खलमनसाम् इत्यादि । इस पदच्छेद के अनुसार अभिनवगुप्त ने पद्य का अर्थ इस प्रकार किया है—

हे केशव ! गोधूलों के कारण मुझे कुछ सूझा नहीं इसलिए मैं फिसल पड़ी हूँ। तुम मुझ मार्ग पतिता ( फिसली ) को सँभारा क्यों नहीं दे रहे ? तुम्हीं तो एक वीर हो जो बाल, वृद्ध और स्त्री आदि को गाढ़े समय में साथ देते हो ?

दूसरे अर्थ के अनुसार उक्त पद्य का पदच्छेद अभिनवगुप्त ने इस प्रकार किया है—

हे केशव ? हे गोप ? रागहतया, अथवा केशवगोप-राग-हत्या विषम—इपु ( पद्वबाण ) खलु खलमनसाम् । इसके अनुसार इसका अर्थ उन्होंने यह किया है—हे केशव, हे गोप, प्रीति से मेरी आँखें मिच गई हैं। मैंने कुछ भी नहीं देखा। इसलिए मैं कुलवधूचित शील को कुछ भी न निभा सकी। स्वामिन् ? सुझ पतिता को अपनाते क्यों नहीं ? तुम वड़े सौभाग्यशाली हो। काम

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के वाणों से व्यथित चित्त वाली अवलाएँ आपस की डाढ़ विसरा कर तुम्हारी ही सेवा से अपने प्राण बचाती हैं ?

अभिनवगुप्त ने प्रथम अर्थ को प्रकारणिक और द्वितीय को अप्राकरणिक माना है । दोनों अर्थ उत्तम पद्य के तीन चरणों से स्पष्ट होते हैं । इनमें प्रथम अर्थ वाच्य है । दूसरा व्यंग्य । किन्तु चतुर्थ में यह व्यंग्य अर्थ भी वाच्यतुल्य बना दिया गया है । चतुर्थ चरण का अर्थ है—‘सार में आकर गोपी ने जिन श्रीकृष्ण से इस प्रकार सलेप ( कसकर ) वात कही वे आप और हम सब की रक्षा करें । यहाँ सलेप शब्द तकतक स्पष्ट नहीं होता जवतक व्यंग्यार्थ की प्रतीति नहीं होती । इसलिए व्यंग्यार्थ वाच्यार्थ का उपकारक हुआ । अतः उपकार्य वाच्य ही प्रधान हुआ । व्यक्तिविवेक-व्याख्याकार कवि कथन है कि यहाँ शब्द का अभिधेयार्थ व्यंग्यार्थ के प्रति उपसर्जन नहीं है ।

अतः इस गुणीभूत व्यंग्य में ध्वनिलक्षण की अतिव्याप्ति हटाने के लिए उपसर्जनीकृतार्थत्व यह विशेषण शब्द के लिए अपनाया गया । ध्वनिकार ने अपना यह आशय इस कारिका में व्यक्त किया है—

आक्षिप्त एवालङ्कार: शब्दशक्त्या प्रकाश्यते । यस्मिन्ननुक्तः शब्देन शब्दशक्त्युद्भवो हि सः ॥ (२।२१)

इस प्रकार अभीष्ट ध्वनिलक्षण में अधिकत्व दोष दिखलाया अब न्यूनत्व दोष दिखलाने चलते हैं—

किश्च यथाभिधेयोऽर्थस्तद्रसद्रवोषणं चोपात्तं तद्रदभिधायुपादानमहं त्येव । अन्यथा यत्र दीपकादेरलङ्कारादलङ्कारान्तरस्योपमादे: प्रतीतिस्तत्र ध्वनित्वमिष्टं न स्यात् , तल्लयणेनाव्यासते: । अलङ्काराणां चाभिधातमतवमुपगतं तेषां भङ्गीभणितिभेदरूपत्वात् ।

'अलङ्कारान्तरस्यापि प्रतीतौ यत्र भासते । तत्परत्वं न वाच्यस्य नासौ मार्गो ध्वनेः स्मृतः ॥' २।२७ द्व० ॥

इत्यादिना तत् प्रतिषिध्यते—तत्प्रतिषेधहेतवो हेतवः कार्यातत्प्रतीतिलक्षणस्यासिद्धत्वात् = उपमानोपमेयभावाद्‌भिधानप्रतयैव दीपकादलङ्कारभङ्गीभणितिसमाश्रयणात्; प्रतीयमानस्यैव चालङ्कारादेश्रुात्वातिशाययोगात्

गात् तावन्मात्रनिबन्धनत्वाच्च तद्‌ध्वनित्ववहारस्येति कथं तत्प्रतिषेधसिद्धिः ।

इसके अतिरिक्त, ( ध्वनिलक्षण में ) जिस प्रकार अभिधेय ( वाच्य ) अर्थ और उसके विशेषण का उपादान किया गया । उसी प्रकार अभिधा ( शक्ति ) का भी उपादान किया जाना चाहिए । ऐसा न करने से जहाँ दीपक-अलङ्कार से दूसरे अलङ्कार उपमा आदि की प्रतीति होती है वहाँ ध्वनित्व माना गया है, परन्तु वह सिद्ध न होगा, क्योंकि उसमें ध्वनिलक्षण की व्याप्ति ( पहुँच ) न होगी ( अव्याप्ति नामक लक्षण दोष होगा ) और अलङ्कारों का अभिधाभाव होना माना गया है । कारण कि वे 'भङ्गीभणितिरूप' होते हैं ।

'दूसरे अलङ्कार की प्रतीति होने पर भी जहाँ वाच्य ( अर्थ ) में ( उस प्रतीमान अलङ्कार के प्रति ) तत्परता ( समर्पण, गौणता अप्राधान्यता ) नहीं रहती तो वह 'ध्वनि का रास्ता नहीं माना जाता ।' इस प्रकार उसका ( दीपकादि में उपमादि के ध्वनित्व का ) निषेध कर दिया गया है—(ऐसा) यदि कहें तो ( कहिए परन्तु ) वह निषेध सिद्ध कैसे होता है ? कारण कि उसके निषेध का कारण बताया है काव्य का तत्पर न होना । वही सिद्ध नहीं होता । कारण कि ( एक तो )

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दीपक आदि अलंकार स्वरूप जो भट्टौभणिति अपनाई जाती है वह उपमानोपमेयभाव आदि को वतलाने के लिए ही, ( दूसरे ) जो अलंकार प्रतीममान होता हैं उसी में अतिशय चारुत्व रहता है, और एकमात्र उमसे ( चारुत्वातिशय होने से ) उसे 'ध्वनि' कहा जा सकता है। ( ध्वनिवादी का जो 'ध्वनिव्यवहार है वह उसी चारुत्वातिशय पर निर्भर है )।

तद्रद्भिधानव्यपादानमहैयोनि। अत्र व्यक्तिवादिनोऽयमाशय:-इह चिरन्तनैरलब्ध्वारतन्त्रप्रजापतिभिरंडेःप्रभृतिभिरभि: शब्दार्थधर्मा एवालंबारा: प्रतिपादिता:, नाभिधाधर्मा:। यतोडर्थप्रतिपच्युरे्य: शब्दद्वयापार: शब्दोच्चारणव्यापारो वाभिधा। न च तत्प्रकारस्वमलड्काराणां युक्तिमत्। चारुत्वं हि वैचित्र्यापरपर्यायं प्रकाशमानमलंकृत्तार:। न च शब्दोच्चार-णस्यार्थप्रकाशनस्य वा चारुत्वप्रतीते:। तेन चारुत्वस्य सद्दावाच्छब्दार्थधर्म्मा एवालंबारा न्याय्य:, नाभिधाधर्मा:। शास्त्रेतिहासवैलक्षण्यं तु कार्यस्य शब्दार्थवैचित्र्यादेव नामिधावैचित्र्यादिति भट्टोक्तटादीनां सिद्धान्त:। ततश्व तन्मताश्रयणेन शब्दार्थयोर्ज्ञसकृतवसुच्यमानां तद्रद्भाणामलंकृराराणा-मपि पर्यवसितमिति तत्स्विकारार्थं पृथगभिधानप्रग्रहं न किश्चित्। यदपि दीपकादावुप-मादिं प्रस्यत्परत्वं दूषितं, तदस्मदभिप्रायापर्यालोचनादेव, यतः प्रागुक्तन्यायान्न प्रतीत्य-पायत्वमचारुत्वं वा तत्परत्व, यत्प्रतिपच्यभूतमतत्परत्वमसांभित्युक्तिम्, आप तु प्रत्य-व्येनानुपकार्यत्वम्। न चैतद् दीपकादावस्ति, तन्नोपमादिना दीपकादेरुपकार्यत्वाद। अत एव प्राधान्यादुपमादिव्यपदेशं मुक्ववा तत्र दीपकादिव्यपदेश एव कृतः तत्क्षात्र-तत्परत्वमेव साधीय इति।

'यहाँ व्यक्तिवादी का आशय यह है—अलंकार शास्त्र के जो प्राचीन आचार्य ( प्रजापति ) हैं, भट्ट उद्भट आदि—उन्होंने अलंकारों को केवल शब्द और अर्थ का धर्म माना है। अभिधा का नहीं। कारण कि अभिधा या तो एक शब्द शक्ति है जिसका अर्थबोधन द्वारा अनुमान किया जाता है या शब्द के उच्चारण की शक्ति है ( जो ) उच्चारणकर्ताओं में रहती है। अलंकारों को इस प्रकार की दोनों अभिधाओं का धर्म मानना युक्तियुक्त नहीं। वैचित्र्य नाम से कहा जानेवाला चारुत्व ही वद्दविषय होने पर अलंकार कहलाता है। यह चारुत्व कभी भी शब्दोच्चारण या उसके अर्थ-प्रतीतिकर शब्दव्यापार में नहीं देखा जाता। वह देखा जाता है उसमें जो उच्चारण और ज्ञान का विषय होता है। इनमें उच्चारण का विषय होता है शब्द और ज्ञान का विषय अर्थ। चारुत्व उन्हें में दिखाई देता है। इसलिए अलंकारों को शब्द और अर्थ का धर्म मानना ही उचित है, अभिधा का नहीं। भट्टोद्भट आदि का एक सिद्धान्त यह भी है कि काव्य में शास्त्र, इतिहास आदि से जो भिन्नता आई है उसका कारण शब्द और अर्थ का वैशिष्ट्य ( चारुत्व ) है, न कि अभिधा का वैशिष्ट्य। ध्वनि लक्षण में उसके इस वैशिष्ट्य या चारुत्व का अलग से कथन आवइयक नहीं, क्योंकि उन्हें भट्टोद्भट आदि का उक्त मत मान्य है, इसलिए ध्वनि लक्षण में जहाँ शब्द और अर्थ की व्यञ्जकता कही गई है वहाँ वह ( व्यञ्जकता ) उन ( शब्दार्थ ) के धर्म ( अलंकारों ) में स्वतः सिद्ध हो जाती है। उसके कहने की आवइयकता नहीं है।

और जो 'दीपक' आदि में उपमा आदि के प्रति अतत्परता को ही दूषित ठहराया है वह हमारे ( ध्वनिवादी के ) अभिप्राय को न समझने के कारण। क्योंकि ( गुणीभूतव्यङ्ग्यार्थ इत्यादि ) पूर्वोक्त दृष्टि से 'तत्परता' का अर्थ दूसरे अर्थ की प्रतीति में कारण होना या अचार होना नहीं है, जिसके विरुद्ध हमने यहाँ 'अतत्परता' का प्रतिपादन किया है, अपितु प्रतीममान से उपकृत न होना है। यह तथ्य दीपकादि में नहीं है। वहाँ उपमा आदि दीपकादि का उपकार करते हैं। इसलिए वह

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व्यक्तिविवेक:

प्रधान होता है। अतएव उसे उपमा न कहकर दीपक कहा गया है। इसलिए दीपक आदि वाच्य अलंकार का उपमादि प्रतीयमान अलंकारों के प्रति अतत्परत्व ही ठीक है।

विमर्शः : ( क ) दीपक में उपमा—दीपक सादृश्यमूलक अलंकार है। आचार्यों के मत से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है—

( १ ) अतिन्दुदवेधन—दीपकोपमयोरुदाहरणं व्यङ्ग्येनोत्प्रेक्ष्यतेपमाभ्यां प्रतीतयोरपि प्रधानत्वेन अभिव्यक्त-

त्वात्र तयोर्व्यपदेशः ।

—‘दीपक और अपह्नति आदि में व्यङ्गयरूप से उपमा की प्रतीति होती है तो भी वह प्रधान-

रूप से विवक्षित नहीं होती। अतः अलंकार उस ( उपमा ) के नाम से नहीं पुकारा जाता ।

अभिनवगुप्त—( इसी को व्याख्या में ) उपमाया:-उपमानोपमेयभावस्य ।

( २ ) मम्मट—कारिका = सकृत्‌दृष्टिसतु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनोः—दीपकम् । वृत्ति = प्राक-

रणिकानाम्प्रकारणिकानाम् , अर्थात् उपमानोपमेययानाम् धर्मः ।

नागेश—प्रकृताप्रकृतयोः सजातीयधर्मसम्बन्धस्य उपमायाः पर्यवसानाद् इति भावः । सा

चोपमा व्यङ्गयैव वाच्यराब्दस्य विरुद्ध्यात् ।

( ३ ) पं० जगन्नाथ—दीपकतत्स्ययोगितादृौ गम्यमानौपम्यं जीवातिरिति सर्वेषां सममतम् ।

( ख ) अलंकारों की अभिधात्मकता—अलंकारों को अभिधा स्वरूप मानने में व्यक्तिवि-

वेककार ने जो ‘भण्णीभणितिः०’ यह हेतु दिया है उसका आदि प्रवर्त्तन वक्रोक्ति सम्प्रदाय में

राजानक कुन्तक ने किया है। कुन्तक को व्यक्तिविवेककार ने आगे उद्धृत भी किया है।

कुन्तक की कारिका है—

उभयवेतालङ्कृत्योः पुनरलङ्कृत्तिः । वक्रोक्तिरेव वेद्यैर्गद्यभण्णीभणितिरुच्यते ॥ ( ११९० व० जी० )

‘शब्द और अर्थ अलंकृत्य हैं। उनका अलंकार है—वक्रोक्ति । वह है वैदग्ध्यभण्णीभणिति ।’

‘भण्णीभणिति’ का अर्थ वे स्वयं इस प्रकार करते हैं—‘भण्णी = विच्छित्तिः । तथा भणितिः ।

विच्छिनैवाभिधा वक्रोक्तिः ।’ तथा—‘वक्रतावैचित्र्ययोगितया अभिधानमेव एतयोरलङ्कारः ।’ इस

अभिधा का अर्थ व्यक्तिविवेककार प्रसिद्ध शब्दशक्ति ‘अभिधा’ मानते हैं ।

( ग ) व्यक्तिविवेककार का कथन है कि दीपक स्थल में उपमा ही में अधिक चमत्कार रहता

है। अतः दीपकालंकार को ध्वनिस्थल मानना चाहिए। ऐसा मानने पर प्रतीयमान अर्थ के प्रति

वाच्यार्थे और शब्द के समान दीपक आदि अलंकार भी गुणीभूत सिद्ध होते हैं और तब व्यक्तिवि-

वेककार यह आपत्ति देते हैं कि यदि वाच्यार्थ की गुणीभूतता के लिए ‘ध्वनिलक्षण में वाच्यार्थ

और उसका ‘उपसर्जनीकृतात्मत्व’ यह विशेषण अपनाया तो दीपक आदि की गुणीभूतता

के लिये भी दीपक आदि और उसके ‘उपसर्जनीकृतात्मत्व’ विशेषण को अपनाना चाहिए। और

दीपक आदि अलंकार अभिधास्वरूप हैं इसलिए सभी अलंकारों के लिए एक सामान्य अभिधा

शब्द ध्वनिलक्षण में अपनाया जाना चाहिए। ध्वनिकार ने उसे नहीं अपनाया, अतः लक्षण में

अव्याप्ति दोष हुआ, कारण कि यह लक्षण ‘दीपक में हुई उपमादिव्यतिरेक’ में लागू नहीं हो पाता।

व्यक्तिविवेककार भी अलंकार को अभिधारूप मानते हैं। वस्तुतः उनकी यह मान्यता क्षोदक्षम

नहीं। वस्तुतः अलंकार काव्यचमत्कारधर्मः के ज्ञान का वह धर्म है जो चमत्कारकारी होता है और

रस तथा इतर व्यङ्गचार्थों से भिन्न होता है। अभिधा केवल शब्दज्ञान तथा अर्थज्ञान का बौद्धिक

सन्वन्ध है। शब्द तथा अर्थ दोनों के ज्ञान अन्तःकरण या आत्मा में निहित रहते हैं। वे दोनों

ज्ञान मूलतः असम्बद्ध होते हैं। वक्ता अपने अर्थज्ञान को इतर व्यक्ति के अन्तःकरण तक पहुँचाने

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के शब्दज्ञान से जोड़ता है। यहीं सम्बन्ध अभिधा, शक्ति, वाचकत्व नाम से कहा जाता है। इसे अलंकार नहीं कहा जा सकता। इसमें कोई विचित्रता भी नहीं होती। विचित्रता केवल पदार्थों के सम्बन्ध में होती है। यह सम्बन्ध ज्ञातात्मक होता है। मुख को चन्द्रमा कहने से मुख की अभिधा में कोई विचित्रता नहीं है। उससे तो केवल मुखरूपी अर्थ का ज्ञान होता है। विचित्रता उसे अर्थ को उससे भिन्न चन्द्ररूपा अर्थ में अभित्र बतलाने में है। यह अभिधा नहीं। केवल पदार्थों का सम्बन्ध है। अतः अलंकारों को अभिधा मानना ठीक नहीं है।

दीपक में उपमा को प्रधानता का जो प्रदान है उसमें ध्वनिकार का यह कहना कि 'दीपक प्रधान है कारण कि उस अलंकार को उपमा रहते हुए भी उपमा नहीं कहा जाता' ठीक नहीं। अलंकार व्यवहार अभिधेयार्थ के आधार पर ही हो सकता है। व्यङ्गयार्थ के आधार पर नहीं।

जो अलंकार व्यङ्गय हो जाता है वह वाच्यालंकार के लिए अलंकार नहीं अलंकार्य बन जाता है। इसलिए वहाँ अलंकार केवल वाच्यालंकार ही कहा जा सकता है। जो वाच्य होता है उसी के आधार पर उस अलंकार का नाम होता है। दीपक में उपमालंकार नहीं केवल उपमानोपमेयभाव का ज्ञान होता है। इसलिए अभिनवगुप्त ने 'ध्वनिकार के 'उपमाया:' का अर्थ ऊपर दी हुई पंक्ति में 'उपमानोपमेयभाव' किया है। उपमालंकार नहीं। अलंकार वह तब होता है जब उसमें उपमानोपमेयभाव अलंकारकत्व रहता। उपमा दीपकस्थल में किसी को अलंकृत न कर स्वयं ही अलंकृत होती है, अतः वह अलंकार नहीं है। अलंकार है दीपक। कारण कि वही यहाँ उपमा को अलंकृत करता है।

ध्वनिवादी आचार्य यह नहीं मानते। वे 'उपमा' को भी दीपक का उपस्कारक मानते हैं। उनकी यह मान्यता रस पर भी लागू होती है। जिस वाक्यार्थ से रस अभिव्यक्त होता है उसका सौन्दर्य उस वाक्यार्थ को भी सुन्दर बना देता है। इस प्रकार रस भी वाक्यार्थ का उपस्कारक हुआ। इतने पर भी ध्वनिवादी रस को ध्वनि ही मानते हैं। इस दृष्टि से ध्वनिवादी को दीपक को ध्वनिस्थल मानना पड़ता। किन्तु वे उसे गौणीभूतव्यङ्गयस्थल ही मानते हैं। उसमें ध्वनित्व का खण्डन वे कविसंरम्भ को लेकर करते हैं। उनका कहना है कि कविप्रतिभा ने दीपकस्थल में उपमा के लिए ही प्रयल्न किया और उसी को उसने चमत्कार का माध्यम बनाना चाहा।

उपमा द्वारा उत्पन्न करती हैं और उपमा को व्यङ्गय बनाने के लिए दीपक का आश्रय लेती है। इस प्रकार कविप्रतिभा का संरम्भ उपमा में ही है दीपक में नहीं। अतः उपमा प्रधान है।

इस प्रकार दीपकस्थल में उपमा का ध्वनित्व सिद्ध होता है। किन्तु अलंकार को अभिधावृत्ति-स्वरूप मानने में अनुभूति पक्ष का कोई साक्ष्य नहीं मिलता। वक्रोक्तिजीवितकार ने भणिति को अभिधा या अभिधान अवश्य कहा है, किन्तु उनका अर्थ शब्दशास्त्र पार नहीं है। उनका अभिप्राय अभिधा से केवल प्रतिपादन का है। सम्मट 'वाचक' के लक्षण में 'साक्षात्' संकेतितं योडर्थमभिधत्ते स वाचक:' इस प्रकार 'अभिधत्ते' में अभिधा का प्रयोग करते हैं किन्तु उसका अर्थ 'प्रतिपादयति' अर्थात प्रतिपादन करना है। इस प्रकार वक्रोक्तिजीवितकार का अभिधा शब्द प्रतिपादन, निरूपण, इत्यादि अर्थों में प्रयुक्त है। अतः इस विषय में व्याख्यान का विवेचन आदरणीय है।

अथार्थेऽप्रतीत्यान्यथानुपपत्त्यैव तत्सद्भावावगमः, अर्थशब्दयो रुपसर्जनी-ऋतस्वार्थत्वाभिधानसामर्थ्योऽपि तदुपसर्जनीभावावति:, तस्या: प्राधान्येन तयोरुपसर्जनीभाव इति। एवं तर्ह्यर्थस्यैवोपसर्जनीभाव इति।

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व्यक्तिविवेकः

नीभावोऽभिधेयो न शब्दस्य, तस्याभिधाया इव तदुपसर्जनीभावाभिधानसामर्थ्यादेव तद्वगतिसिद्धेरिति लक्षणवाक्ये व्यर्थं शब्दग्रहणम् , अन्यथाभिधानग्रहणमपि कर्तव्यं प्रसज्येत, विशेषाभावात् । न चास्य स्वार्थाभिधानमात्रपर्यवसितसामर्थ्यस्य व्यापारान्तरमुपपद्यते, येनायमर्थान्तरमवगमयेत्, तदपेक्ष चोपसर्जनीकृतार्थत्वामित् । अर्थस्यैव तदुपसर्जनत्वात् ।

वदति कहा जाय कि— ( बिना अभिधा के ) अर्थ की प्रतीति नहीं होती अतः उसी ( अन्यथानुपपत्ति प्रमाण ) से ( अभिधा का ध्वनिलक्षण में ) सद्भाव समझ में आ जाएगा और इसीलिए समझ में आ जाएगा, क्योंकिं अभिधा प्रधान होगी तो शब्द और अर्थ में उपसर्जनभाव नहीं आ सकता । इस कारण उसके ( अभिधा के ) उपादान की चर्चा व्यर्थ ही है—तो फिर इस प्रकार केवल अर्थ का उपसर्जनभाव ( ध्वनिलक्षण में ) कहा जाना चाहिए, शब्द का नहीं । उस ( शब्द ) के उपसर्जनीभाव का ज्ञान भी अभिधा के ही समान अर्थमात्र के उपसर्जनभाव कथन से ही हो जाएगा । इसलिए ( ध्वनि ) लक्षण वाक्य में शब्द का ग्रहण निरर्थक है । शब्द के विषय में ऐसा न मानने पर ( ध्वनिलक्षण वाक्य में ) अभिधा का ग्रहण भी करना पड़ जाएगा ! कारण कि जो स्थिति शब्द की है वही अभिधा की भी है । और इस ( शब्द ) की शक्ति अपने अर्थ का ज्ञान कराने में ही समाप्त हो जाती है । इसमें दूसरी कोई शक्ति सिद्ध नहीं होती जितने यह दूसरा अर्थ बतला सके । और उसको अपेक्षा ( अपना वाच्यार्थ गौण बनाकर खुद ) 'उपसर्जनीकृतार्थ' बना सके । वह ( दूसरे अर्थ का ज्ञान कराने की शक्ति ) केवल अर्थ में सिद्ध होती है ।

विमर्शः : अभिधा को ध्वनिलक्षण में स्थान नहीं दिया गया । इतने पर भी ध्वनिलक्षण में अव्यभिचरिन आने देने के लिए यह कहा जाय कि अभिधा का ज्ञान ध्वनिलक्षण में अर्थ के समावेश से ही हो जाता है कारण कि अर्थ का ज्ञान बिना अभिधा के नहीं होगा तो यहाँ उपपत्ति शब्द के लिए भी आती है । अर्थ का ज्ञान शब्द के बिना भी नहीं हो सकत, अतः उसकी प्रतीति भी अभिधा के ही सनमान अपने आप हो जानी चाहिए । इस प्रकार ध्वनिलक्षण शब्द का सन्निवेश निरर्थक होता है ! इसी प्रकार शब्द तथा अभिधा के उपसर्जनभाव का ज्ञान भी अर्थ के उपसर्जनभाव का ग्रहण करने से हो जाएगा । यदि अभिधा उपसर्जन न हो तो अर्थ कभी उपसर्जन नहीं हो सकता ।

इस प्रकार अभिधा का ग्रहण न करने पर अन्या्पत्ति या शब्द का ग्रहण करने से पुनरुक्ति दो दोषों में से कोई एक दोष अवश्य आता है । शब्द के अर्थ का उपसर्जनीकृतत्व भी शब्द में 'उपसर्जनीकृतस्वार्थत्व' विशेषण के बिना भी स्वयं अर्थ के उपसर्जनीकृतातमतव विशेषण से ज्ञात हो जाता है । इसलिए वह भी पुनरुक्त है ।

व्यञ्जनाखण्डन

अभोक्त ध्वनिलक्षण के शब्द, और शब्दार्थ दोनों के उपसर्जनीकृतस्वार्थत्व को दूधित ठहराया । अव 'व्यजकू:' इस क्रियापद में आए व्यञ्जना व्यापार की खण्डन भूमिका रचते हैं ।

सर्वे पव हि शब्दो व्यवहारः साध्यसाधनभावगर्भंतया प्रायेणानुमा-

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प्रथमो विसर्गः

नरूपोद्भ्रुपगन्तव्यः, तस्य परप्रवृत्तिनिवृत्तिनिबन्धनत्वात् तयोश्च समप्रतियातमनोरन्यथाकृतुं शक्यत्ववतः । न हि युक्तिमनवगच्छन् कश्चिद्धिपक्षिहितदर्शनाज्ञः सम्प्रतिपयभागः भवति । द्विविधो हि शास्त्रः पदवाक्यप्रमेदात् । तत्र पदमनेकप्रकारं नामाद्यतेरपसर्गेनिपातकर्मप्रवचन-

नीयभेदात् ।

शब्द्र का संपूर्ण व्यवहार सदैव साध्यसाधनभाव ( कार्य कारणभाव ) से युक्त रहता है । अतः उसे प्रायः अनुमान स्वरूप ही मानना चाहिए । कारण वह ( शब्द्र व्यवहार ) अपने वृत्ति ( कार्य में लगाव ) के लिए होता है या निवृत्ति ( कार्य से विलगाव ) के लिए । यदि वह ( प्रवृत्ति-निवृत्ति क्रमशः ) यथार्थज्ञान और अयथार्थज्ञान पर निर्भर है । ( वह तत्वस्वरूप हैं ) । इसलिए बिना शब्द्रव्यवहार के वे नहीं हो सकतीं । ( शब्द्रव्यवहार में भी वक्ता कोर्ई भी समझदार व्यक्ति बिना युक्ति जाने किसी के कथनमात्र से किसी वस्तु को यथार्थ नहीं मान लेता ।

सर्व एवति । इह यः कश्चिच्छाब्दो व्यवहारः स सर्वः परप्रवृत्तिनिवृत्यर्थः, स्वप्रवृत्ति-निवृत्योः शाब्दत्वयहवारमततरे वचनमात्रादेव सिद्धत्वात् । प्रवृत्तिनिवृत्ती च सम्प्रत्य-यासम्प्रत्ययोः युक्तिरुपानुमाननिमित्ता तेन विना निनिबन्धनधनत्वाच्छाब्दव्यवहारेऽपि वचनमात्रात् तयोरनुपपत्तेः । अनुमानं च साध्यसाधनभावागर्भीकारेण व्यवस्थितम् । तच्च परप्रवृत्तिनिवृत्तिफलम् । शाब्दव्यवहारसाध्यतया चाखण्डत्वात् पदमात्रे न सम्भवतांनि पदस-मूर्हासकं वाक्यमवतमते । सम्प्रत्ययासम्प्रत्ययातमनौ निमित्तत्वेन व्यापकत्वात् ।

संसार में जितना भी जो शब्द व्यवहार है वह पूरा दूसरे की प्रवृत्ति के लि‌ए है व निस्पृह के लिए । अपनी प्रवृत्ति-निवृत्ति तो शब्द व्यवहार के बिना भी सिद्ध है ( वचनमात्र से होते हैं ) । इसलिए की प्रवृत्ति-निवृत्ति संप्रत्यय ( यथार्थज्ञान ) और असंप्रत्यय ( अयथार्थज्ञान ) रूप हैं । वे युक्ति के स्वरूप अनुमान से होते हैं । उसके बिना प्रवृत्ति-निवृत्ते होने में कोर्ई कारण नहीं । शब्द्रव्यवहार में केवल कथनमात्र से वे ही नहीं हो सकते ।

जहाँ तक अनुमान का संबंध है उसमें साध्यसाधनभाव रहता ही है । उसका फल भी दूसरे की प्रवृत्ति-निवृत्ति हैं । शब्दव्यवहार को अपनाने वाले व्यक्ति को उसमें साध्यसाधनभाव अ‌निवार्य रूप से स्वीकार करना पडता है । और वह अखण्ड होने से केवल एक पद में नहीं हो मदता । अनः पदसमूहात्मक वाक्य अपनाना पडता है । प्रवृत्ति-निवृत्ति-संप्रत्यय और असंप्रत्ययतद्नक इसीलिए हैं कि ये उनके कारण हैं और उनसे अधिक व्यापक हैं ।’

विमर्शः ग्रन्थकार की भाषा इस स्थलमें भावाभिव्यक्तिक्रम नही हैं । उनसे कुछ संकेत मिलते हैं, जिनकी पुष्टि इतर दर्शनों द्वारा करनी पडती है । यहाँ अन्यकार का अभिप्राय यह है कि शब्द का प्रयोग —सदा किसी अन्य व्यक्ति को किसी कार्य में प्रवृत्त करने या उससे निवृत्त करने के लि‌ए होता है । किन्तु कोर्ई भी मेधावी व्यक्ति केवल किसी के कहे कुछ शब्दमात्र सुन लेने से प्रवृत्त या निवृत्त नहीं होता । शब्द सुनने के बाद और प्रवृत्ति या निवृत्ति के पूर्व श्र्रोता के मन में एक विकल्प उठता है—वह सोचता है—वक्ता ने जिस कार्य में प्रवृत्त होने के लि‌ए इतने वाक्यों का प्रयोग किया है—वह कार्य मेरे अभीष्ट का साधक है या नहीं । इसके लि‌ए वह वक्ता द्वारा प्रयुक्त

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द्वैतों के अर्थ पर ध्यान देता है और जब युक्ति द्वारा उसे उत्त विकल्प का एकतर समाध्यान प्राप्त हो जाता है तो अतिकूलता की स्थिति में वह प्रवृत्त होता है और प्रतिकूलता की स्थिति में वा तो प्रवृत्त नहीं होता और यदि पहले से प्रवृत्त होता है तो उसके बाद प्रवृत्त होने के पश्चात् भी रुक जाता है। वह जिस युक्ति से काम लेता है वह और कुछ नहीं केवल वही साध्य-साधनभाव होता है जिसपर दार्शनिकों का प्रसिद्ध प्रमाण अनुमान स्थितर है। वह पहले वक्ता की पदावली से अपनी अभीष्ट वस्तु और उसके साधन का सम्बन्ध निश्चय करता है और जब वक्ता की पदावली में उत्त सम्बन्ध-निश्चय की क्षमता पढ़ती है तो उसके बाद जैसा सम्बन्ध होता है वैसा ही चेष्टा करता है। यदि सम्बन्ध फल का साधक होता है, तो प्रवृत्त होता है, और यदि बाधक होना है तो निवृत्त या पराड्मुख । अभीष्ट वस्तु के प्रति साधकता का यही यथार्थ निश्चय=ग्रन्थकार के सम्प्रत्यय शब्द का अर्थ है। असम्प्रत्यय उसके विपरीत होता है। उसका अर्थ है अभीष्ट वस्तु के प्रति साधकता का अयथार्थ निश्चय। उत्त साध्य-साधनभावरूप जो युक्ति है उसे ही ग्रन्थकार ने अनुमान या हेतुसाध्यात्मकता कहा, और उसके विना प्रवृत्ति-निवृत्ति के हेतुभूत सम्प्रत्यय और असम्प्रत्यय को असम्भव बताया।

सम्प्रत्यय और असम्प्रत्यय के साथ प्रवृत्ति तथा निवृत्ति का सम्बन्ध व्याख्याकार ने स्पष्ट किया है। ग्रन्थकार ने प्रवृत्ति तथा निवृत्ति को 'सम्प्रत्ययासम्प्रत्ययात्मक' कहा है । व्याख्याकार ने एक बार उसे 'सम्प्रत्ययासम्प्रत्ययौ' कहा । यहाँ ग्रन्थकार के आत्मा शब्द को अमेदार्थक माना गया । दूसरी बार उन्हें 'सम्प्रत्ययासम्प्रत्ययात्मकान्' कहा और उसका स्पष्टीकरण करते हुए लिखा—निमित्तत्वेन व्यापारकत्वात् । इसके अनुसार आत्मा का अर्थ प्रधान हुआ । प्रधानता का अभिप्राय यह कि प्रवृत्ति और निवृत्ति की अपेक्षा सम्प्रत्यय और असम्प्रत्यय व्यापक हैं। उसका अभिप्राय निमित्त कह कर स्पष्ट किया । निष्कर्षतः कार्यकारण में असेद की जो लौकिक प्रथा 'आयुर्घृतमु' आदि में देखी जाती है उसी के अनुसार कारणभूत सम्प्रत्यय-असम्प्रत्यय कार्यभूत प्रवृत्ति-निवृत्ति से अभिन्न कहे गए ।

व्याख्याकार ने सम्प्रत्यय और असम्प्रत्यय का अर्थ स्पष्ट नहीं किया । आरम्भ के 'इह सम्प्रतिपत्तिः' वाक्य में उन्हें सम्प्रतिपत्ति का अर्थ सौजन्यमूला परीक्षा किया था । वह यहाँ अनुपयुक्त है । सम्प्रत्यय का अर्थ इष्टसाधनात्मकनिश्चय और असम्प्रत्यय का अनिष्टसाधनात्मकनिश्चयाभाव हो सकता है ।

वाक्य में हेतु साध्यभाव का निरूपण आगे किया जाएगा ।

तत्र सर्वप्रधानानि नामानि । तान्यपि बहुप्रकाराणि सम्भवन्ति । जातिजातिराद्ब्दः । गुङ्खो नील इति गुणशब्दः । पाचकः पाटक इति क्रियाशब्दः । दण्डी विपाणीति द्रव्यशब्दः ।

शब्दव्यवहार में सत्त्वप्रधान शब्द 'नाम' शब्द कहलाते हैं । वे भी अनेक प्रकार के होते हैं । क्योंकि उनके प्रवृत्ति-निमित्त जाति, गुण, क्रिया, द्रव्य अनेक हैं । शुक्र, नील ये गुण शब्द हैं । पाचक, पाटक ये क्रिया शब्द हैं और दण्डी, विपाणी ये द्रव्य शब्द हैं । सत्त्वप्रधानानीति सत्त्वं निमित्तं वस्तु । यहच्छाशब्दा जातिशब्दादाख्य । एवं द्विविधा जातिरर्थ-जातिरर्थस्वरूपजातिश्र । तदुक्तम्र—

'स्वा जातिः प्रथमं शब्देः सवरैरैव प्रकाश्यते । ततोऽर्थजातिरुपेण तदध्यारोपकल्पना ।'

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इति । तत् यदृच्छाशब्दानां जातिशब्दत्वम् । यदि वा डित्थादिषु वाच्याचवस्थाव्यवेदाद्-भिद्ये-ष्वमिन्नाभिधानप्रसङ्गय्यनिवन्धनं जाति: । तदृशाशब्दयदृच्छाशब्दानां जानिशब्दत्वम् । ये तु दृश्यसमवन्धादर्थान्तरे वाच्यन्ते ते दृश्यशब्दा दण्ड्यादय: । वैयाकरणानां तु गुणवाच्यैवशब्द: । दण्डादेर्वहिरङ्गत्वादिति ।

अस्य ग्रन्थस्य सङ्ग्रहकारिकाभ्यांग्रन्थेन सह विरोधो दृश्यते । तथा हि । अत्र सामानव्याप्तया भवति क्रियाया: वहिरङ्गत्वं विशेषक्रियाया: समनन्तरङ्गत्वं च । स एवं एक्को विरोध: । क्रियद्ध तदृशहु इत्यत्र प्रतीयमानक्रियापेच्चे पूर्वकालं वच्यते इति द्वितीयो ग्रन्थविरोध: । सङ्-विरोष: । इह तावत् सामान्यक्रियाया: वहिरङ्गत्वमप्रयुज्यमानत्वापेच्चयौच्यते, विरोषक्रिया-णान्तरङ्गत्वं च प्रयुज्यमानत्वापेच्चयात्, तत् पुनर्विशेषक्रियाणां वहिरङ्गत्वं व्यसिन्चारित्वात्, सामान्यक्रियाया: स्वान्तरङ्गत्वमध्यभिचारित्वादिल्यपेच्चातो भेदाद्वास्तावक्ल विरोध: । सा-मान्यक्रियां स्वाध्यभिचारिणीं प्रतीममानापेच्चयौ पूर्वकालं समभिति चिरोषस्प्यापेच्चयाच्चन प्रतीते: समन्वयाविरोधाच । तेन द्वितीयोडप्यन न विरोध इति । अत एव 'प्रायेणे' त्युक्तम् ।

सर्व का अर्थ है सिद्ध वस्तु । शब्द दो प्रकार के होते हैं यदृच्छाशब्द और जातिनिवन्धन । जाति भी दो प्रकार की होती हैं अर्थरूप जाति ( जातिवाचक शब्द का जो अर्थ है वह व्यक्तियों की जाति ) दूसरा अर्थ ( द्रव्य ) के आधार में रहनेवाली ( लौकिक ) जाति । कहा भी है- 'पदले नम्न शब्द अपनेां जाति प्रकाशित करते हैं । बाद में उसे अर्थ को जाति के रूप में आरोपित कर नित्य-जाति है ।' उनमें यदृच्छा शब्द जाति शब्द हैं । अथवा वाच्य आद्रि अवस्थाविशेष से भिन्न हुए इदंकारक् ( शब्दों ) के उच्चारणों की एक सी प्रतीति का कारण है (उसकी जाति ) । उक्तं धार्यत पर यदृच्छा शब्द जाति शब्द है और जो द्रव्य के सर्वंश से किसी दूसरे ही अर्थ का बोध करानेवाले शब्द हैं वे द्रव्य शब्द कहलाते हैं जैसे दण्डी आदि । वैयाकरणों के मन में ये शब्द गुणवाच्य हैं क्योंकि दण्ड आदि वाहरी पदार्थ हैं ।

विमर्श: यहाँ व्याख्यानकार की पदावलो अन्य आलंकारिक आचार्यों की पदावलौ से भिन्न है । उनकी संगति पर ध्यान देना चाहिए । महिमभट्ट ने सत्व का अर्थ 'जाति, गुण, क्रिया, यदृच्छा' चार माना है । व्याख्यानकार सत्व को सिद्धवस्तु कहते हैं । मनुत्तम ने सिद्धवस्तु केवल-जानि और गुण को माना है । इसके अतिरिक्त क्रिया को सत्व और यदृच्छा को काल्पनिक ( वान्मययदृच्छासत्निवेशित ) कहा है । व्याख्यानकार ने यदृच्छा और क्रिया को भी सिद्ध शब्द से संगुइत किया है इससे प्रतीत होता है कि व्याख्यानकार का सिद्ध शब्द सम्मत के उपाधि शब्द के अर्थ में है ।

व्याख्यानकार के जाति-विवेचन का अभिप्राय इस प्रकार है-जाति दो प्रकार की होती है शब्दब्रह्मत और अर्थंगत । न्यायकर दर्शन् में शब्दगत जाति एक अखण्ड शब्द धर्म है । इस मत में प्रत्येक शब्द अपने स्कोटरूप में नित्य है । अमिध्याकतकाल में अनेक होने के कारण वहाँ उसमें जाति मानी जाती है । यह जाति शब्दब्रह्मत एक अखण्ड धर्म है । न्यायदर्शन प्रत्येक शब्द को उच्चारित प्रध्वस्त मानता है । उसमें उच्चारण के वाद् तीसरे क्षण में शब्द ध्वस्त हुआ माना जाता है । इस दर्शन में काल और व्यकि्त के भेद से वस्तुत: भिन्न शब्द में भी एकरूपता की प्रतीति का कारण जाति नहीं पूर्व वर्णोपूरी से युक्त अनिर्वच वपुं के आकारभाणा भी एकरूपता की प्रतीति का कारण जाती है । कहा जाता है घट शब्द में 'घटत्व' ये चार वर्ण हैं । तर्-धर्म को मानकर की जाती है । कहा जाता है घट शब्द में 'घट' शब्दों का उच्चारण करते हैं उन नारी, वाल, युवक, वृद्ध भूत, भविष्य, वर्तमान में जिन विभिन्न-मिन्न 'घट' शब्दों का उच्चारण करते हैं उन

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व्यक्तिविवेकः

यह 'अ', 'इ', 'उ' के बाद 'अ', अ के बाद 'इ' और इ के बाद आए 'अ' में रहनेवाले उसके असाधारण धर्म हैं—जैसे 'अ' धर्मी से 'का' घट धर्मी से 'क' में 'अ' धर्मानुरूप से रहता है—इसलिए वे एक से प्रतीत होते हैं। वस्तुतः हैं वे 'अ=अ' 'इ=इ' 'उ=उ' रूप । एक दूसरे से मिले । व्याकरणदर्शन ने यहाँ व्याकरणदर्शनोक्त का अनुसरण किया है ।

उनके अनुसार उनके उक्त काल में 'शब्दजाति' का अर्थ विभिन्न 'घट' आदि शब्दों में अनुस्यूत रहता है । वक्ता को इस जाति का भी ज्ञान होता है । दूसरी ओर 'घट' आदि—घटपदार्थ के आकार में अभिलक्षित होती है । आकार की ( वर्ण के अनुक्रम की ) और शब्द-अर्थ के अभेद के कारण शब्द्रजात घटत्वादि जाति के ज्ञान और शब्द-अर्थ के अभेद के कारण शब्द्रजात घटत्वादि जाति के

केचित् पुनरेषां क्रियैवैका प्रवृत्तिनिमित्तमिति क्रियाशब्दत्वमेव सर्वेषां नामपदानामुपगच्छन्ति । तथा हि—घटादिशब्दाः स्वार्थे प्रवर्त्तमानाः घट-निमित्तक्रियामेवान्वयगतिरेकाभ्यां प्रवृत्तिनिमित्तभावेनावलम्बन्ते । न घटत्वादिसामान्यम् । सा चैषा घटनादिक्रिया घटत्वसामान्ययोगाद्‌नऽयथा वस्तु । नैतावता तस्याः प्रवृत्तिनिमित्तत्वव्याघातः । न च सत्यपि घटत्व-सामान्ये स्वयमघटनं घटातमतमानुपद्मान पवासौ घटस्यपदेशनविषयो भवितुमर्हति ।

पवं धी: पटोडपि घटस्यपदेशनविषयः स्यात् । घटनक्रियाकार्तृत्वामावाविशेषात् । न हि शुक्तिवमनापद्मान पवार्थः शुक्त इति व्यवदेष्टुं शक्यते, अपचक्रव पाचक इति । तस्माद् घटनक्रियाकर्त्तृत्वलक्षणमेव घटत्वं घटशब्दस्य प्रवृत्तिनिमित्तमवस्यम् । न घटत्वमात्रं । तदेव चेद् घटत्वमित्युक्तम् ।

शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त केवल किया है—ऐसा मानकर कुछ लोग सभी नामशब्दों को क्रियावाचक शब्द ही मानते हैं । उनका कहना है—देखा जाता है कि घट आदि शब्द अपने अर्थ में प्रवृत्त होते हैं तो वे प्रवृत्ति के निमित्त रूप से 'घटत' आदि क्रिया को ही अपनाते हैं ।

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प्रथमो विसर्गः

घटत्व आदि सामान्य ( जाति ) को नहीं । यह 'घटनादि' क्रिया घटत्व आदि जाति के अधीन या पृथक् ( स्वतंत्र ) उससे उसके प्रवृत्तिनिमित्तसत्व में कोई आँच नहीं आती । निश्चय ही घटन-

है कि घटत्व जाति रहती आती है तब भी घट घटशब्द से व्यवहार दोन्यों सधाँ नहीं । जबनघट घटनक्रिया से विरहित रहता है और घटस्वरूप को प्राप्त नहीं करता । घटदेख क्रिया के घटन्यवहार ) होता तो पट भी घट कहा जाने लगता । कारण कि पट न घट-क्रिया घट में नहीं है वैसे ही पट में भी वह नहीं है । इसी प्रकार जो घटन चुकने क्रिया से

प्राप्त नहीं होती वह चुकु नहीं कही जा सकती । और पचनक्रिया से नितिन पटक घटनक्रियाकृत्स्वरूप घटत्व घटशब्द की प्रवृत्ति में तिमित्त समझना नादित, निश्च घटनक्रियाकृत्स्व नहीं । उसी ( घटनक्रियाकृत्स्व ) को यहाँ घटन ( क्रिया ) कहा है ।

विसर्गः मन्स्कृत आचार्य अपना मत 'केचित्, अन्ये, अपरे, नैयायिकाः' इस प्रकार अहान नन से चलाते हैं । पंडितरराज जगत्काथकी रसप्रक्रिया से यह स्पष्ट है । वहाँ वे अपने अनेकपदार्थ नयपक्ष को नय के नाम से उपस्थत करते हैं । नागेशभट्ट को भी दार्श्निक प्रवृत्ति है । मतान्तर खंडन उन्होंने इसी प्रकार 'अन्ये, नैयायिकाः' कह कर दिखलाया है । यहाँ केचनिर् इस मत के क्रिय-

प्रवृत्तिनिमित्तवाद' चलाया गया है वह महिमभट्ट का अपना वाद है । इस वाद के प्रवनेर नद महिमभट्ट हैं । ध्वनिकाराचार्य और निरुक्तिकार समी दार्शनिकों को यौगिक न मानने कें । वह नैयैक नद घटत्व की प्रवृत्ति क्रिया से ही होती मानी गई हैं । किन्तु महिमभट्ट ने उसे अपने मत के नयवा वतलाया है । यहाँ कुछ दार्शनिक शब्दों का उपयोग है । उनकी विश्र्लेषणा इस प्रकार है—

प्रवृत्तिनिमित्त—यहाँ मूल ग्रन्थ में इस शब्द का विमर्श दिया हुआ है—'प्रवृदृने हे नादेर को उत्तर है—शब्द की प्रवृत्ति में । इस प्रकार केवल प्रवृत्तिनिमित्त शद का अर्थ और युगपद घट को

प्रवृत्ति में निमित्त । शब्द की प्रवृत्ति अपने अर्थ की ओर होती है । राम शब्द, कृष्ण शब्द राम की ओर । इस प्रकार प्रवृत्तिनिमित्त शद का अर्थ होताहै—वच्य

को अपने वाच्यार्थ की ओर प्रवृत्ति ।

इस प्रवृत्ति का निमित्त क्या? दार्शनिकों का सुविचारित निद्धर्म है कि शद्र प्रददते व निमित्त अर्थगत विशेषता है । इसीलिए—एक ही वस्तु के लिए अनेक शदों के प्रयोग होने कें ?

वे सभी शब्द अर्थ की ही किसी विशेषता से बँधे रहते हैं । यह विशेषता जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छा चार ही भेद की मानी जाती है । यहाँ क्रियामात्र प्रवृत्तिनिमित्त मानी जा गही है ।

अन्वयव्यतिरेक—अन्वय = संबन्ध, व्यतिरेक = अभाव । परिभाषालुप्त में—नननवे तदिन-रकारणसतवे तत्सच्वमन्वयः । अर्थात् कार्य का समी कारणों के अस्तित्व में अस्तित्व । घट,

मृत्तिका और उसके अवयवों का संयोग आदि के रहने पर रहता है : 'पदरमचे नननचे व्यतिरेकः' कार्य का किसी भी कारण के अभाव में अभाव । घट का कोई भी कारण—चेतनकया

या उसके अवयवों का संयोग न रहे तो घट नहीं रहता । इस प्रकार अपने कारण के अन्व और अनस्तित्व से कार्य के अस्तित्व-अनस्तित्व का संबंध अन्वय और व्यतिरेक चलताता है ।

उदृधृत अंश का अभिप्राय इस प्रकार है—

पहले 'नाम' पदार्थों भी चार विभागों में विभक्त किया गया है—जाति, गुण, क्रिया और यदृच्छा । जब पदों का विभाजन होने लगता है तो कुछ (वैयाकरण ) इन्हें के नियमानुसार उन्हें चार भागों में बाँटते हैं, और कुछ (प्रभाकरभट्ट आदि ) सभी पदाथों में एक जाति की कल्पना कर सभी पदों को केवल एक जाति रूप में रखते हैं । महिमभट्ट का कहना है कि सभी

शब्द जातिवाचक नहीं । क्रियावाचक है । उसमें उदाहरण घट को देते हैं । उसमें रहनेवाला घटन

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क्रिया को घट शब्द की प्रवृत्ति का निमित्त बतलाते हैं। उसमें हेतु देते हैं अन्वय व्यतिरेक को। उसकी अभिध्राय है कि घट आदि शब्दों से जिसका कथन होता है उसका कारण घट आदि पदार्थों का अपने रूप में उपस्थि रहना है। इसी उपस्थिति को वे घटन कहते हैं और उसकी अर्थ सत्ता मानते हैं। घट की प्रथम सृष्टि—विशेष प्रकार के अवयवों की संश्लेषणक्रिया से हुर्ई। इसीलिए जिस क्रिया के आधार पर विभिन्न अवयव संक्षिप्त होते हैं, वही घटन है और उसी से घट अपने दृश्यरूप में उपस्थि होता है। जवरक अवयवसंश्लेषण क्रिया बनी रहती है तबतक वह पदार्थ घट व्यक्त्र्र का विषय बना रहता है, घट शब्द उस तक पहुँचता रहता है, जिस क्षण अवयवों की वह संश्लेषण क्रिया समाप्त हो जाती है तो ध्वंस की स्थिति में घट शब्द उन अवयवों तक नदों पहुँचता जिनके संश्लेष से उसका अपना अभिध्रेय पदार्थ निष्पन्न हुआ था। ध्वंस की स्थिति में उसे मृत्किका कहा जाता है या और कुछ। यह है घटनक्रिया का घट शब्द की प्रवृत्ति के साथ अन्वयव्यतिरेक, इसी के आधार पर वह क्रिया—घट शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त कही जा सकती है। यही स्थिति गुण और क्रियावाचक पदों में है। जवरक शुद्ध गुण का स्वरूप बना रहता है, अर्थात वह अपने कारणों से निष्पन्न होता रहता है उसे शुद्ध शब्द अपनी प्रवृत्ति का विषय वनाता है। शुद्ध गुण की निष्पत्ति ज्यों ही समाप्त हो जाती है, वह उसकी ओर प्रवृत्त नहीं होता। क्रियावाचक पदों में तो यह स्पष्ट ही है। पाचक शब्द पाचन क्रिया से युक्त व्यक्ति को तभी तक अपनी प्रवृत्ति का पात्र बनाता है जवर तक उसमें पाचन क्रिया नहीं आती है। इस प्रकार जाति, गुण, क्रिया नाम से कहे जाने वाले सभी पदार्थों में—‘अपने रूप में बना रहना’ या स्वरूपासत्ति रूप क्रिया विद्यमान है। महिमभट्ट केवल घटनत क्रिया को ही नहीं—घटतर पदार्थों में रहनेवाली क्रिया को भी ‘घटन’ शब्द से कहते हैं और उसी क्रिया को प्रवृत्तिनिमित्त मानते हैं।

यहाँ प्रश्न उठता है कि ‘फिर वह घटत्व आदि सामान्य (जाति ) क्या है। इसपर उत्तर देते हुये ग्रन्थकार ने लिखा—सा चेष्टा घटत्वसामान्ययोगादन्यथैवास्तु। इसका मान्य अभिप्राय इतना ही है कि जिस क्रिया को प्रवृत्ति का निमित्त माना जा रहा है, उसमें घटत्व जाति का भी योग रहता है; अर्थात वह क्रिया शुद्ध क्रिया नहीं होती, जाति संक्षिप्त होती है। इसलिए उसका स्वरूप शुद्ध क्रिया ऐसा नहीं होता । क्रिया घटत्वयोग से यदि शब्द प्रवृत्ति निमित्त मानी जाती है तो अकेले घटत्व को ही उसकी निमित्त क्यों नहीं मान लिया जाय, क्रिया को प्र० नि० मानना आवश्यक नहीं। इस कलिप्त वितर्क का उत्तर देते हुए ग्रन्थकार ने लिखा ‘नैतावता तस्य निमित्तत्वव्यास्यातः’ अर्थात घटत्वयोग से क्रिया के प्रवृत्तिनिमित्त को कोई आँच नहीं पहुँचती क्योंकि अनुद्भूतावस्था में घटत्वयुक्त होने पर भी घट पदार्थ तबतक घट शब्द का विषय नहीं वनता जवरक वह घटन क्रियायुक्त नहीं हो जाता। बिना घटनक्रिया के भी यदिघट में घट शब्द का व्यव हार हो तो फिर पट भी घट कहा जा सकता है। इसलिए घटनक्रिया युक्त ही घटत्व घट की प्रवृत्ति में निमित्त हैं। शुद्ध घटत्व नहीं। जो जाति को प्रवृत्तिनिमित्त मानते हैं, वे उसे नित्य भी मानते हैं। ऐसी स्थिति में प्रलय या ध्वंस की स्थिति में घटत्व आदि जाति बनी रहती है परन्तु उस समय उस स्थिति के पदार्थों के लिए घट आदि शब्द का प्रयोग नहीं होता। घट शब्द का प्रयोग तभी होता है जवर वह पदार्थ घटनक्रिया द्वारा स्वरूप का आसादन कर लेता है। यदि इसे व्यवस्था को न माना जाय तो पट पदार्थ भी घट कहा जा सकता है। अव्यक्तावस्था में घट और पट अपने परस्पर के भेद को खो बैठते हैं। घटत्व, पटत्व नित्य हैं इसलिए वे उस समय भी उनमें रहेंगे परन्तु यदि पट को घट और घट को पट कह दिया जाय तो कोई व्यवहारिक उलटफेर नहीं होता। पट को घट कहने से यदि उलटफेर की स्थिति कहीं आती है तो एकमात्र व्यवहार में।

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व्यवहार स्वरूप प्राप्ति के बाद दृढ़ बने पदार्थों पर निर्मित है : अर्थात् दृढ़ता से पदार्थ रहतने वाले वचनक्रिया हों उनमें प्रवृत्ति का नियम = शाब्दतायनः = ‘सर्वं शब्दे भातुजमाह, शाकटायन लोचन’ के अनुयायी मानते हैं । उनसे अपने मन का अन्तर स्पष्ट करने के लिये शंका उठाते हैं—

ननु चेश्वाद्यर्थात् घटत्यादेरेघातोरजादेः घटत इत्यादयेः घटनादिक्रियैव सर्वेऽपि घटादिशब्दानां प्रवृत्तिनिमित्तभावेनास्माभिरपीष्यतां पदैरपि तत्रैव पक्षान्तरोपन्यासः । सत्यमिष्यत एव भवद्भिः । किन्तु सा शाब्दस्मृ चेतन-त्तिनिमित्तं, न प्रवृत्तिनिमित्तम् । अन्यच्च धातुरचितिनिमित्तम्, अन्यच्च प्रवृत्तिनिमित्तम् । यथैकेषां मते गमनादिक्रिया घटादिशब्दानां चेतनपत्ति-निमित्तम् एकार्थसमवायात् गोत्वादि प्रवृत्तिनिमित्तं चेरोति ! अतः पुनर्गच्छत्यगच्छति च गावि गोरवाचः सिद्धो भवति । एवमिहापि चेष्टादिक्रिया घटादिशब्दानां व्युत्पत्तिनिमित्तमिति सिद्धं भवति ।

शंका—एक नए पक्ष का ( ध्वनि के प्रसंग में न होने हुए भी अर्थ-निमित्तवाद का ) उपन्यास कर्थ्य है । कारण कि हम भी ‘घट’ आदि क्रिया से ‘अच्’ आदि प्रत्यय होनेपर बनते हैं । उनका अर्थ होनेपर ( प्रकार ) घटनक्रियायुक्त ।

उत्तर—ठीक है । आप मानने को ही हैं । परन्तु वह क्रिया शब्द की व्युत्पत्ति में निमित्त नहीं । व्युत्पत्तिनिमित्त दूसरी वस्तु है और प्रवृत्तिनिमित्त दूसरी । ( उपाधिशक्तिवाद ) के मत में गमन आदि क्रिया गो आदि शब्दों की व्युत्पत्ति का ही निमित्त होने से गोत्व आदि को प्रवृत्तिनिमित्त वन बैठे । एक ही वस्तु में समवेत होने से गोत्व आदि को प्रवृत्तिनिमित्त मानने से युक्त या रहित ( चल रहे या बैठे ) गो के लिये गौशब्द की प्रवृत्ति होनी चाहिये ।

तथा चेष्टा आदि क्रिया घट आदि शब्दों की व्युत्पत्ति का ही निमित्त सिद्ध होने से घटत्यादेरिति । ‘इक्श्तिपौ धातुनिदर्शे’ इति रूपस्म् । पक्षान्तरं प्रकारान्तरेण क्रिय-शाब्दत्वात् । एकेषां उपधिवादिनाम् । एकार्थसमवायादिति उपकृत् द्वये गमनक्रियागो-जात्योः समवायात् ।

घटति = ‘इक्श्तिपौ धातुनिदर्शे’ सूत्र से निष्पन्नः । पक्षान्तर = दूसरे तत्पश्चात् = होने के कारण । एकेषाम् = उपाधि शक्तिवादियों के अनुसार । एकार्थसमवायात् = होने से !

विमर्शः : धातुरूप क्रिया में प्रत्यय लगने पर हुए शब्द की व्युत्पत्ति उनके व्युत्पत्ति-नियम के बाद की है । इसका निमित्त अवश्य शाब्द है । प्रवृत्ति-निमित्त शब्द की शक्य निष्पत्ति के बाद की वस्तु है । वह उसके प्रयोग से संबंधित है । निष्पन्न शब्द का प्रयोग जिन निमित्तों पर होता है वह हैं प्रवृत्ति-निमित्त । इस प्रकार दोनों परस्पर भिन्न है । महिमभट्ट क्रिया को प्रवृत्ति-निमित्त मानते हैं । उनका यह मत शाकटायनाचार्य के व्युत्पत्तिनिमित्तवाद से भिन्न है !

तदपेक्षमेव च विपच्य घटो भवतीत्यादौ विपाकादिक्रियाया: पौर्वकाल्यं

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एतत्प्रत्ययस्य हि विषयो वेदितव्यः; यथाधिष्ठितस्य पाचकः भवतीत्यादौ पाकक-च्यपेक्षमंधिधायणादेनं भवनक्रियापेक्षम्। सा हि नावश्यं प्रयुज्यते। मतोयतेऽतु पदार्थानां सत्ताड्यविचारात्, न तु तावतां तदपेक्षं तदिति मन्तव्यं, तस्याः क्रियारूपत्वाद् अर्थस्यासत्तिप्रसङ्गाच्च।

नोट—(पृ० २९ के अंश 'प्रायेणैवयुक्तत्वं' इस व्याख्यानांश का अनुवाद)—

“इस ग्रन्थ का सम्पादकादिक तथा दूसरे ग्रन्थों से विरोध दिखाई देता है। यहाँ सामान्यभूत भवन क्रिया को बहिरङ्ग कहा जा रहा है और विशेषरूप (पचन, गमन आदि) क्रिया को अन्तरङ्ग वहाँ (कारिका में और अन्य ग्रन्थांशों में ) दिखाई क्रिया को बहिरङ्ग तथा सामान्य क्रिया को अन्तरङ्ग कहा रहेगा। यह हुआ एक विरोध। इसके अतिरिक्त यहाँ ग्रह्यमान (भू आदि) क्रिया को छोड़ प्रथुच्यमान (पचन) क्रिया को लेकर पूर्वकालिकता ठहराई। आगे 'जो क्रियाएँ भी मेरे पास हैं वह बहुत है, यहाँ प्रतीयमान क्रिया को लेकर पूर्वकालिकता बतलाई। यह दूसरा विरोध हुआ।

(परन्तु) यह विरोध (होता) नहीं हैं। यहाँ जो सामान्य क्रिया को बहिरङ्ग कहा वह उससे अपच्युच्यमान (वाक्य में वक्ता ही बोले काम चला लेने से) होते से। जो विशेष क्रिया को अन्तरङ्ग कहा गया है वह प्रथुच्यमान (वाक्य में अभीष्ट प्रयुक्त) होने से। आगे जो विशेष क्रियाओं को बहिरङ्ग कहा जायगा वह उनके व्यभिचार (वाक्य में अभीष्ट सभी विशेष क्रियाएँ न होनीं) को लेकर और सामान्य क्रियाओं को अन्तरङ्ग कहा गया, वह उनके अव्यभिचार से। इस प्रकार दृष्टिभेद से भेद करने के कारण प्रथम विरोध तो नहीं है। 'दूसरे के लिये ) नियततः प्रतीयमान होनेवाली सामान्य क्रिया को लेकर पूर्वकालिकता कही। विशेष क्रिया (वाक्य में) अपेक्षा लेकर प्रयुक्त होती हैं। अतः दूसरा विरोध भी नहीं होता।

इसलिए ग्रन्थकार ने 'प्रायेण' यह शब्द दिया है।

विमर्शः—'विपच्य घटो भवति' यहाँ तीन क्रियाएँ हैं—विपच्य क्रिया—पचन, घट की घटन तथा भवन्ति क्रिया—भवनन। इनमें पचन पूर्वकालिक क्रियानत के साथ है अतः वह पूर्वकालिक क्रिया है। 'घटन' क्रियान्वितावस्था की क्रिया है और भवन—सामान्यावस्था को। प्रश्न है—पूर्वकालिकता पचन में किस क्रिया की अपेक्षा मानी जाय, घटन क्रिया की अपेक्षा या भवन की अपेक्षा। ग्रन्थकार का मत है कि घटन क्रिया बहिरङ्ग है। अर्थात् उसका प्रयोग न करने पर भी उसका बोध हो जाता है। भवनन=सत्तास्वरूप हैं। सत्ता प्रत्येक पदार्थ में रहती हैं। २. अर्थ की व्यवस्था बिगड़ जाती हैं। इनमें प्रथम हेतु विशेष महत्व का नहीं। कारण कि आगे कई स्थलों में प्रतीत क्रिया को लेकर 'पूर्वकालिकता' मानी

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मई है। यहाँ यह कहा जा सकता है कि जहाँ अनेक क्रियाएँ हैं वहाँ विशेष क्रिया को लेकर ही पूर्वकालिकता मानी जाती नहिंये। दूसरा हेतु महत्वपूर्ण है। 'घट' शब्द तब होता है जब पक जाता है। 'घट-उत्पत्ति होता है जब पक जाता है' इस अर्थ में 'प्रपच्य घटो भाविनि' प्रयोग हुआ है। इसे 'घट-उत्पत्ति होता है जब पक जाता है' ऐसा भी माना जा सकता है किन्तु ऐसे करने पर 'घट' शब्द में अथन्तरसंक्रमितता या उपादान रेक्षणी माननी होगी। जिनका प्रयोग के ऐसा मानना ठीक नहीं।

यहाँ का 'व्यास्यानांश' प्राचीन संश्रण में स्थान पर नहीं छपा। उसे ननु तावता तदपेक्षं तदिति मन्तव्यस्य' की टीका के बाद और 'तत्पूर्वकालत्वभावात' की टीका के पहले छपना चाहिये।

प्रभुज्यमानक्रियापेक्षमेव च प्रायेण पौर्वकाल्यं कत्वो विषयो न प्रतीय-मानापेक्षम्। इतर्था—

'श्रुत्वापि नाम वधिरो हृदय्यान्धो जडो वि-

दितत्वापि । यो देशकालकार्यैधयपेक्षया पणिडतः स पुनः ॥'

इत्यादि प्रयोगजातमनुपपन्नमेव स्वात्, श्रवणादीनां तत्पूर्वकालत्व-भावात्। अन्र तु 'श्रुतवादिरहक्तिनिरहलक्षणभाविर्याप्तिक्रियापेक्षमेव श्रवण-

भावात्। अन्र च ताम्रत्रोत्तरक्रियापेक्षं पूर्वपूर्वक्रियापौर्वकाल्यम्, यथा स्वाच्छा भुक्त्वा पीत्वा ब्रजति। अन्र च विपच्यघटनभवनरूपा वह्नथः क्रिया इत्थन्नापि घटनापेक्षं विपच्यनस्य तद् भविषुन्महत्येव, उभयन्रापि कर्तृप्रत्यय-निर्देशाविशेषात्।

केवलं कदाच्यतया कर्तुरपाधिभावंगमितेति भिच्चकर्तृकतवश्रः। यथा—'नाशिरकालेपापस्य गुणोऽस्य नः क इव शीतचรสय कुचोष्मणः ।

इति धियास्तस्मात् परिरेर्मिरे घनमतो नमतोऽनुमानं प्रियाः ॥'

इत्यत्र कुचोष्मणः कर्तृहेरर्णक्रिया। अन्र एव केवदपाश्र्येयं ल्यवन्त-प्रतिरूपको निपात इति व्याघ्यातवन्तः। यथा चा—

'निरेक्ष्य संरम्भनिरस्तधैर्यं राधेयेमाराधितजामदग्न्यम् ।

अलंसकृतेऽपि प्रसभं भयेऽपि जायेत मृत्युयोरपि पक्षपातः ॥'

इत्यत्र निरीक्षणक्रियाकर्तृर्मृत्योरेप यपक्ष पतनक्रिये विषयविषयिभाव-भङ्गथोपात्ते ।

यथा चा 'यां हृत्वापि समुत्सहे मनसि मे नान्यां करोत्यस्पदम्' इत्थन्न दर्शनेनक्रियाकर्तृर्मनसोन्यंककर्तृकास्पदक्रियान्विचरण भावेनोपात्ते स्वोत्कुक्य-

क्रिया विशेषणभावेनोपात्ता ।

कचिद् कर्तः सम्बन्धितामुपगतासौ ण्रमहेतुः। यथा 'स्मर संस्मृत्य न शान्तिरस्ति मे' इति ।

करवा प्रत्यय का विषय जो पौर्वकाल्य है वह भी प्रयुज्यमान क्रिया की ही अपेक्षा, प्रतीयमान क्रिया की अपेक्षा नहीं। नहीं तो जो व्यक्ति देश काल और कार्य को दृष्टि में रखते हुए सुनकर भी

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बहिरा, देखकर भी अंधा ( और ) जानकर भी अनजान होता हैँ । वहीँ परिज्ञात हैँ । क्रियादि अनेक प्रयोग असंगत हीँ ठहरेंगे क्योंकि सुनना आदि क्रिया मेंँ उभ ( प्रत्ययमान क्रिया ) की अपेक्षा पूर्वकालता नहीं है । इस पक्ष में ( प्रयुज्यमान क्रिया की अपेक्षा 'उभ' नञ पूर्वकालता वाले पद मेंँ ) तो कोईँ अनुपपत्ति होती नहीं कयोंकि इस पक्ष मेंँ सुनने आदि क्रिया के अभाव स्वरूप बाधिर्य आदि किया की अपेक्षा सुनने आदि क्रिया की पूर्वकालता हैँ ।

उनके अनेक होने पर परवर्तीँ क्रियाओं की अपेक्षा पूर्ववर्तीँ क्रियाओं की पूर्वकालता माननी चाहिए, जैसे, खान भोजन और जलपान कर जाता है—इत्यादि मेंँ । यहाँँ भी ( विपच्य माने भवति वाक्य मेंँ ) विपचन, घटन और भवन रूप अनेक क्रियाएँ हैंँ । इस लिय़ए यहाँँ भी पदन नाँँ अपेक्षा विपच्यन का वह ( पूर्वकालत्व ) होना न्याय़य हैँ । ( भवन नाँँ अपेक्षा नहिं ) कयोंकि ( घटन और भवन ) दोनों हीँ मेंँ युगपत् प्रत्यय वा सगान रूप से प्रयोग हैँ । कृतप्रत्यय से वाच्य होने के कारण कर्त्ता की उपाधि जानने से भिन्नकर्तृत्व का भ्रम होता हैँ । जैसे—शोकार काढ़ विलाप देने पर हमारी इस श्रोतृ हरनककारी स्तुति को उछमा वा लाभ हीँ कथा, यह सोच कर क्रियाओं ने मान दूर कर दिया और प्रणाम करते हुए अपने प्रियों का घनाघन आलिङ्गन किया । यहाँँ कृत्यरूप कर्त्ता की हरन क्रिया ! इसीय़लिए कतिपय लोगों ने 'अपास्य' युथ स्वबनत्प्रतिरूपक अन्यय हैँ ।

ऐसी ध्याख्या की हैँ और जैसे—जिसने परशुराम की आराधना की हैँ ऐसे राघापुत्र कर्ण को क्रोध से आगबबूला देखकर मूर्त्तु भी अपने अपरिचित भयों से सविशेष परि.िचत हो सकताँ हैँ । यहाँँ निरीक्षण क्रिया के कर्त्ता मूर्त्तु को डरना, और 'पक्षपात करना' दोनों क्रियायें विपयविपधि-भाव की रीति से ग्रहण की गर्ई हैंँ ।

या जैसे—जिसे देखकर हीँ समुत्सुक हुए मेरे मन में कोईँ दूसरौँ स्थान नहीं बना पाती । यहाँँ दर्शन क्रिया के कर्त्ता मन मेंँ, जो दूसरौँ नाथिका द्वारा की जाने वाली आस्पद क्रिया के अनधिकरणरूप से यहाँँ उल्लिखित हैँ, औरसुक्य क्रिया विशेषण रूप से ग्रहण की गर्ई हैँ । कहींँ कर्त्ता के साथ सम्बन्धित होने के कारण यह भ्रम पैदा करती हैँ । यथा—स्मर ? स्मरण करकै मुर्झे शान्ति नहीं होती ।

तत्पूर्वकालत्वाभावादित्यर्थः । अन्याभिचारितप्रतीयमानभवनक्रियापूर्वकालत्वाभावादित्यर्थः । अत्र त्विति प्रयुज्यमानक्रियापेक्षे पौर्वकाल्ये । उभयत्रापि ति । घट इति भवतीति च द्वयोरपि यथाक्रमं गुणप्रधानक्रियावाचिनोः, कर्त्तरि अचेतनपक्षेपपत्तेः । कर्त्तृरूपाधिमावग्नि ति अपराध-न्यात् । कर्त्तारं प्रति विशेषणावं प्रापित्ता तेन तस्या निम्रग्रहत्वात् । तदपेक्षपौर्वकाल्याभाव-अ्रमः ! कर्त्ता च द्विविधः—शुद्धः क्रियान्तरापेक्षयातुभूतकारकान्तरस्वन्वयः । आद्यो यथा विपच्येत्यादौँ । द्वितीयो यथा 'याँ हन्र्त्तव्यादौँ । विपमविपयिभावेन्ति । भयपद्पतनक्रियाद्ययापेक्षं निरीक्षणस्य पौर्वकाल्यम् । मूर्त्तुरेव हि निरीक्ष्यते विशेषेण पद्ये च पतति । केवलं पद्पतनापेक्षया भयक्रियया एव विषयवम्स । स्मरेंति अहं संस्मृत्य न शा्॑यामीसत्यर्थः ।

( १ ) तत्पूर्वकालत्वाभावात्—नियमतः प्रतीत होनेवाली जो प्रत्ययमान भवन क्रिया उसके पूर्वकालित्व के अभाव से ।

( २ ) अत्र तु—प्रयुज्यमान क्रिया को लेकर पूर्वकालिकता मानने पर ।

( ३ ) उभयत्रापि—'घट' और भवति' इन दोनों मेंँ ( प्रथम ) अप्रधान रूप से क्रिया का वाचक हैँ दूसरा प्रधान रूप से प्रथम ( घट ) मेंँ अच् प्रत्यय हुआ हैँ और दूसरेँ ( भवति ) मेंँ तिप् । दोनों प्रत्यय कर्त्ता अर्थ मेंँ हैंँ ।

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(४) कर्तृहपाधिभावस्थ-अप्रधान होने से क्रिया ( घट में ) कर्ता का विशेषण वन नद्धे । इसलिये उसके ( कर्तृ स्वरूप में ) लिप्त जाने से यह भ्रम होता है कि पौर्वकाल्य उनके लेकर नहीं हो रहा है । कर्त्तृ दो प्रकार का होता है एक शुद्ध जो दूसरी किसी क्रिया को लेकर वनता है, दूसरा वह जिसे किसी दूसरे कारक के सम्बन्ध का अनुभव होता है । प्रथम है—‘विपच्यघटो’ भवति’ में और दूसरा ‘यं ददात्’ इस पद्य में ।

(५) विषयविषयिभाव--भय और पक्षपतन--इन दो क्रियाओं की अवेक्षा निरोक्षण की पूर्व कालिकता है । मृग्यु हो देखता है, डरता है और पक्ष पर टूटती है । केवल पक्षपतन क्रिया को लेकर भयक्रिया ही विषय है ।

(६) स्मर-इति --मैं स्मरण कर द्रांतिलाभ नहीं करती । केचित् पुनः कर्तृक्रिययोरनुपादानमपि हेतुमिच्छन्ति । तत्र कर्तुर्येथा— "नमु सचे पच समवेक्ष्य कमपि गुणमेति पूज्यताम् । सर्वगुणविग्रहितस्य हरे: परिपूजया कुरुनरेंद्र ! को गुणः" अत्र हि समवेक्षापूजयोरेको लोकः कर्ता । स च सामर्थ्यसिद्ध इति नोपात्तः । पूजा चोपात्तापि क्रियाच्यतया कर्मोपसर्जनीभूतत्वेऽप्यभयमहेतुः । क्रियाया यथा— "अकृत्वा परसन्तापमगतच्वा खलनम्रताम् । अनुत्सृज्य सतां मार्ग यत् स्वरुपमपि तद्रहु ।।" अत्र हि प्रकरणादिगम्याया लाभक्रियाया अनुपादानं करणादीनां भिन्न-कर्तृकत्वभ्रमहेतुः । तदुक्तम्— 'कर्तृहपाधितयोक्का क्रियाच्यतया गतान्यगुणतां वा । कर्तॄं भिन्नकर्तृकत्वभ्रमाय भवति क्रियाडवचछ्र तयोः ।।' 'पौर्वापर्य' क्रियाणां यदू वास्तवं तदपेक्षिणि । कर्तॄं: पौर्वकाल्ये किं तद्यां प्राधान्येनोच्यतया ।।' इत्यलमनेन ।

और कुछ लोग कर्ता या क्रिया के अनुपादान को भी कारण मानते हैं । उनमें कर्ता का जैसे— 'सभी लोग कौत गुण देखकर पूज्यता को प्राप्त होते हैं । हे गुरु नरेंद्र ! सभी गुणों से रहित कृष्ण की पूजा से क्या ?'

यहाँ समवेक्षा (देखना) और पूजा दोनों क्रियाओं का एक ही कर्ता है—लोक । वह शब्दशक्ति या वाक्यशक्ति से अपने आप समझ में आ जाता है । इसलिए शब्द द्वारा नहीं कहा गया । पूजा यद्यपि शब्द द्वारा कही गयी है । किन्तु वह भी क्रियाच्य होने से कर्म के प्रति उपसर्जन हो गयी इसलिए शब्द द्वारा नहीं कहा उपसर्जन हो गयी है इसलिए दोनों ही भ्रम के कारण हैं ।

क्रिया का जैसे— 'दूसरों को संतप्त न कर, खलों के प्रति नम्र न बनकर, सज्जनों का मार्ग न छोड़कर जो भी थोड़ा बहुत ( लाभ हो जाय ) वही पर्याप्त है ।

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यहाँ प्रकरणादि से प्रतीत होने वाली लाभक्रिया का उपादान नहीं हुआ है। वह 'करना' आदि क्रिया के निमित्तकर्तृत्व के भ्रम का कारण है। जैसा कि कहा गया है—

‘क्रिया कर्ता प्रत्यय के भेदकर्तृत्व का भ्रम कराती है। यदि वह कर्ता की उपाधि बनकर प्रयुक्त हो या कृतकर्तृत्वों से युक्त, अथवा किसी दूसरे का विरोधी वाचक हुई हो।’

‘क्रियाओं का जो पौर्वापर्य वास्तविक है उसी के पौर्वापर्य ( पूर्वकल्पना ) का ज्ञान करवः प्रत्यय कराता है। ( ऐसी स्थिति में ( जहाँ कर्ता प्रत्यय नहीं रहता वहाँ भी क्रियाओं का पौर्वापर्य रहता ही है इसीलिए ) उन ( क्रियाओं ) के प्रधान अप्रधान होने का चिन्ता ( रोंका ) से क्या ? ( शंका उठती ही नहीं )’

इस प्रकार—इस विषय का इतना ही विवेचन काफी है। अधिक अमासझ़्जिक होगा।

घटतोलिते घटो झेयो नाघटनं घटतामिमात् ।

अघटत्वाविरोधेण पटोडपि स्याद् घटोऽन्यथा ॥ ८ ॥

घटनश्र तदात्मकवापत्तिरूपा क्रिया मता ।

मूलश्र तस्यार्थक्रियार्थोभासाविष्कृतिरीदतुः ॥ ९ ॥

यः कश्चिदर्थः शाब्दबुद्धीनां युतपत्तौ स्याद्विचारनिधानम् ।

प्रवृत्तौ तु क्रियैवैका सत्तासादनलक्षणा ॥१०॥

तस्यामेव क्रियायाश्र विधेयः कर्तृमात्रतः ।

न तूपमानादचारे तयोरर्थात् प्रतीतितः ॥११॥

यथा ह्यश्वत्थे बालेय इत्यतोऽर्थः प्रतीयते ।

अश्वत्थवृक्षसादृश्यति खर इत्यर्थे पुनः ॥१२॥

अश्वतुल्यसमाचारः खर इत्यवसीयते ।

घटन क्रिया-युक्त पदार्थ को ही वट समझना चाहिए। घटनक्रियाहिन घटरूप नहीं हो पाता।

ऐसा न मानने पर पट भी वट हो सकता है, कारण कि घटत्व का अभाव वट के समान उस ( पट ) में भी रहता है। यह घटनक्रिया तद्रूपतापत्ति का नाम है।

इसका कारण ईश्वर या वह निर्माण है जो भाँति-भाँति के पदार्थों को भाषित करता है। शब्दों की व्युत्पत्ति में तो कोई भी अर्थ कारण हो सकता है। प्रवृत्ति में एक मात्र क्रिया ही कारण वनती है।

वह सत्ताप्राप्तिरूप होती है। उसी में कर्त्ता के लिए किप् आदि प्रत्यय होते हैं। वे प्रत्यय उपमान के लिए आचार अर्थ में नहीं होते।

उनकी प्रतीति तो अपने आप हो जाती है। जैसे ‘बालेय अश्वति’ का अर्थ निःकलता है कि गधा घोड़ापन पाता है।

फिर इस अर्थ से ‘गधा अश्व के समान आचार वाला है’ ऐसा प्रतीत होता है।

ननु सर्व एवैति । सर्वः गुणवसमवेन्चितुलोंकस्य कर्तुः स एव कर्मभूतः पूज्यतामेतीत्यर्थः ।

सचों गुणवसमेव्चिता लोके पूज्यो भवतीसर्थः ।

इसमें कर्ता है गुणद्रष्टा व्यक्ति। उसका कर्म है सर्व शब्द से कहा जा रहा व्यक्ति। वहाँ कर्म-भूत व्यक्ति पूज्यता को प्राप्त होता है।

अर्थात् व्यक्तिगुणों को प्राप्त होता है। अथवा प्रत्येक गुणों से युक्त होने वाले व्यक्ति पूज्य होते हैं।

यहाँ देखना और पूज्य होना दोनों क्रियाएँ एक कर्त्ता पर निभ्र्र नहीं लगतीं। ऐसा लगता है—कि जो गुणवान् बनता है वह यह सोच कर कि लोग गुण को देखकर ही आदर देते हैं।

विधोषणसम्बन्धेऽपि यत्व स्वल्पं लाभक्रियाविपयस्तद्ध्रुहेन विशेष्यते ।

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लाभ क्रिया के विषय——‘स्वल्प’ में विशेषण लगाया जा रहा है।

( यह प्रतीक मूल में नहीं है ।)

कतृँसुपाधितयेऽनि । अन्य शा्न्त्यादिक्रियाया: कर्तृँसस्निध्वेनोपादानमपि सड्न्रहीतव्यम्

यहाँ शान्ति आदि क्रिया का, कर्ता के सम्बन्ध से, उपादान भी संगृहीत है ।

पौर्वापर्यं क्रियाणां हि । इह द्विविधं क्रियां पौर्वापर्यं शाब्दं वास्तवं च ।

तत्र शाब्दं प्रायेणास्ति शाब्दवाच्ये हि प्रधानक्रियया सह गुणवक्रियाज्ञा, तासां तथा सह गुणवप्रधान-

भावेन सम्बन्धस्योचि त्वात्, ‘गुणानां च परार्थत्वादसम्बन्धः समत्वात्’ इति न्यायेन

गुणक्रियाणां परस्परं सम्वन्धाभावाच्च । वास्तवं तु यदृस्तुव्यलप्रकृतं, तद् गुणवक्रियाणामपि

सम्भवस्येव । आपेक्षिकस्य गुणवप्राधान्यस्य तास्वपि भावात् सम्वन्धोपपत्तेः, यथा पश्य

मृगः ‘आँतरिति प्रधानक्रियया: । एवं गुणवक्रियाज्ञावास्तवपौर्वापर्येण कस्वाप्रस्तुत्यस्य

अयुज्यमानत्वात् । शाब्दप्राधान्येतरमादौ न प्रयोजकः । अस्य न जायस्यात्नापीथसेव स्थितिरिति

बहुंतररहच्यसिद्धेः ।

क्रियाओं का पौर्वापर्य दो प्रकार का होता है——शाब्द और वास्तत्र । इतनेमें शाब्द प्रधान और

अप्रधान क्रियाओं का ही होता है । प्रधान क्रिया अन्योन्य वाच्य होती है ।

उसके साथ अप्रधान क्रियाओं का सम्बन्ध वन सकता है । ‘गुणानां च’ अप्रधानं प्रधान के हेतु

होते हैं । वे आपस में सम्वन्धित नहीं हो सकते। इस नियम के अनन्तर अप्रधान क्रियाओं का

परस्पर सम्वन्ध नहीं होता । वास्तविक पौर्वापर्य पदार्थों का स्वाभाविक निति पर निर्भर रहता है ।

वह अप्रधान क्रियाओं में भी हो सकता है । अप्रधान क्रियाओं में भी ऐच्छिक प्रधान अप्रधानभाव

हो सकता है । अतः उनमें भी यह सम्बन्ध वन सकता है । जैसे——‘देखो, द्रुत दौड़ रहा है’——

इस वाक्य में प्रधान क्रियाओं का पौर्वापर्य है । अप्रधान क्रियाओं का जो ‘वास्तविक’ ( वत्सु =

शब्द नहीं; उसका अर्थ ) पौर्वापर्य है उसके लिए कस्वा प्रत्यय का प्रयोग होता है । उसमें

( आख्यात और अप्रधान क्रियापद से ) शाब्दतः कथित प्रधानअप्रधानभाव का काम नहीं

पड़ता । इस सिद्धान्त की यहाँ भी इसी प्रकार संगति है । इस प्रकार एक ही सिद्धान्त से बहुत

का काम वन जाता है ।

घटतेत्यादि । घटत्वसामपच्यते । घटतेति प्रातिपदिकाद्वच्यसमासक्रमेण क्रिपि परस्मैपदंम् ।

एवं नाघटतलिति शतृप्रत्ययच । इन्ह हि घटादयः शाव्दाः स्वविषये प्रवर्त्तमानाः ‘प्रकृतितिनिमित्तं

किञ्चिदवलम्व्य प्रवर्त्तन्ते । तच्च तेषां प्रयुक्तिनिमित्तमाश्रयणीयं यत् पदार्थस्य स्वरूप-

मूतंम् । न हि परभूतेन घटत्वसामान्यादिना परत्र ब्यपदेशो न्या्यः परस्वाविशेषे सर्वत्र

सर्वे ब्यपदेशाः स्युः । न हि स्वयमप्रकाशमानस्वभावो वा प्रकाशाद् श्रेत इति ।

एवंच स्वरुपेण घटस्वेन वटो घट इति ब्यप-

दिश्यते । स्वहेतुपूतं च वटस्वं साध्यत्वेन प्रतीत्यैघंटस्वापत्तिलक्षणा क्रियोच्यते ।

सैव च घटना घटातमातास्वपा । तथ्यां च स( न्तु ? तो ? ) (त्यां) नामसामात्नात् किवादयः कायौं ।

आदिम्रहणेन क्वचयडौ गम्यतेते । किञ्चि कृतेँ कर्त्तव्येत्पादकस्यादेराघातुकस्य क्लोपः

कर्त्तव्य । सर्वत्रोपमानप्रकृतितदन्यस्यातन्यरूपापत्तेरौपस्म्यप्राणल्वात् । पुत्रीयति छात्त्रः हंस-

यते काकः इत्यादौ हि च्छात्रकाक्योः कमेग पुत्रस्वहंसस्वापत्तिः साधश्यपर्यवसायिन्येव

प्रतीयते । तत्क्ष प्रतोतियुगुणत्वेन लड्द्यसिद्धघ्यर्थन्न्न्यथा लचणं प्रणोच्यम् ।

प्रसिद्धच्यसिद्धघ्यर्थं लचणं तच भियते ।

अभियोगस्य वैशिश्ठ्यात् तस्कृतं तच गृह्यते ।

॥ १२ ॥ इत्यन्तरश्लोकः ।

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यथा हि भवत्यादिशब्दे लटि तिप् लिपि च केचिदाचक्षते । अन्येतु ( शित् ? )तिङ्शब्दमविकरणं च ब्रुवते । अपरेतु भवत्यादेरतिप्रत्ययं कुर्वन्ति । सर्वेषु पल्‍लेषु भवत्यादिरेव शब्दः साध्यः । एवं घटादयः शब्दा न्युपाद्या: ! ते च लट्याविरोधेन यथाप्रतीति न्युपपाद्यन्ते । अतश्र घटादिशब्दात् किम्‍यजादौ ( च ) प्रत्यये तल्लोपे च ऋते प्रायोगिका घटादयः शब्दा न्युपाद्या: । तल्‍लिङ्गे चैवम्भूतलक्षणामुक्त्वाद्यायेन प्रज्ञाद्यर्थमेव । ननु घटस्वरूपाद्‍यत्तेत्यत्र प्रवृत्तिनिमित्ते कथम् घटशब्द:स्तत्‍त्राप्येवमिति चेदनवस्था । घटेर्धातोरचप्रत्ययेन क्रियते किमपराद्धं, येनैवा धुक्‍कल्पनाश्रीयते । नैतत्त् । प्रायोगिकघटशब्दद्‍लिङ्गाद्‍यं घटिरचप्रत्यम्‍यान्तःप्रवृत्तिनिमित्तेैकदेशाभिधाय्यो उपायो नात्रैवेन गृह्यते । न तु तस्य स्वतन्त्रत्वेन प्रयोगः ! स्वतःपृथक् घटत्वापत्तिलक्षणं हि घटशब्दस्‍य प्रत्तवृत्तिनिमित्तम् । तदेकदेशश्र घटस्वरूपाद्‍यर्थःस्‍तस्‍माद् घटशब्दस्‍यार्थः । स च घटशब्दोडत्र प्रकृतित्वेनैव प्रयुज्यते, यथा ‘कृगाज्‍जनिभासत्त’ मित्यत्र समासविपदयत्वेन निभशब्दः । शक्तिस्‍वाभाव्‍याद्‍लिङ्ग निभशब्दो वाक्‍ये न प्रयुज्यते । एवंमत्र घटशब्दः प्रायोगिकघटशब्दप्रकृतित्वमपहाय न कचित् प्रयुज्यते । घटस्वमापद्यमान ऋत्‍यत्र निवर्त्त्यां घटो भवतीति तु प्रक्रियावाक्‍यमेन तन् । अतश्रानकारान्तेष्‍या इकारान्तादिष्‍यो व्‍यक्‍त्‍यानन्तेष्‍या भ्यश्र किम्‍यजादौ तल्‍लोपे च धि सिप्‌गित्‍यादयः शब्दाःसिद्धा भवन्ति ।

घटनीयादि घटति—घटत्व को प्राप्त होना है । ‘घटति’ इसमें प्रातिपदिक से आगे कहे अन्‍ुनासिक किप् और परस्मैपद् लुड् । इसी प्रकार ‘अवघटन’ में जातप्रत्यय ! लोक में घट आदि शब्द अपने-अपने अर्थों में तभी प्रवृत्त होते हैं जब वे अपने प्रवृत्ति का कोई निमित्त पा लेते हैं । उनकी प्रवृत्ति का निमित्त वही वस्तु माननी चाहिए जो पदार्थ की स्वरूपपभूत वस्तु हो । घटत्व आदि पद्‍द्र थे के स्वरूप से भिन्न है । उनके आधार पर उनसे भिन्न वृत्त वस्तु के लिये शब्द की प्रवृत्ति सातना ठीक नहीं । कारण कि भिन्नत्व अन्य सभी पदार्थों में रहेगा । वे सभी शब्दों के विध्‍मप वन जायेंगे । ऐसा तहीं कहा जाता है कि बिना स्वरूप का प्रकाश हुये ही घट प्रकाशित होता है । कोड़े मकान बिना सफेद हुए सफेद नहीं कहा जा सकता । इस प्रकार घट उस घटत्व से वृत्तल्‍लुव्याच्‍य वृत्तना हैं । जो घटस्वरूप होता है । यहीं लक्‍ष्यालम्‍बन वाक्‍यवत् साध्यत्व से प्रयोग होता है । इनलिए इन्‍‍भो ‘घटत्वमात्रे’ रूप क्रिया कहा दिया जाता है । वही क्रिया घटना है । वह ‘घटत्वमात्र’ आदि शब्दों से अन्य क्‍यान्‍च और क्‍यड् आदि लि‌ए जा सकते हैं । किप् हो जाने पर कर्ता अर्थ में आद अर्थान्तक अच् का लोप करना चाहिए । ऐसी जगह सर्वत्र उपसर्ग की प्रतोति होती है कारण कि उपमा के हो आाधार पर दूसरा पद्‍ाार्थ दूसरे पद्‍ाार्थ का स्वल्‍ूप अमानता है ‘छात्र पुत्र का अञ्चरण करता है’ इन्‍यादि में छात्र और कारक दो कमश: पुच्‍चत्रण तथा हंसतव्व की प्राप्ति साध्‍यत्व में ही पर्यवसित होती है । इसलिये जैसी प्रत्ताति होती है उसकी सि‌द्धि के लि‌ए वैसा हो लक्षण वनाना चा‌हिए ।

‘लक्षण पूर्वसिद्ध लक्ष्य की सि‌द्धि के लि‌ए किया जाता है । यदि अभियोग ( वस्‍तु की प्र‌‌‌‌वृत्ति ) में वञ्‍चि‌ष्ठच हो तो वह वदल दिया जाता है और उसके आाधार पर वनाया गया वह ( लक्षण ) स्वीकृत किया जाता है ।’

जैसे—कुछ लोग भवति आदि शब्‍द्र को ‘लट्, लिप् और शप्‌’ करने पर निष्पन्न मानते हैं । दूसरे लोग ‘ति’ शब्‍द्र और ‘अ’ विकरण मानते हैं और लोग ‘भू’ आदि में ‘अति’ प्रत्यय लगाते

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प्रथमो विमर्शः:

हैं किन्तु सभो प्रकारों में रूप 'भ्रान्ति' ही वनाया जाता है। इसी प्रकार घट आदि शब्दों की दृश्युत्पत्ति करनी चाहिए। उनकी भी दृश्युत्पत्ति लक्ष्य का विरोध न करते हुए प्रतीति के अनुरूप ही की जानी है। इसलिए घट आदि शब्दों से 'किप्''अच्' आदि प्रत्यय, और उनका लोप करने के बाद प्रयोक्त में आने वाले घट आदि शब्दों की दृश्युत्पत्ति करनी चाहिए और उनकी सिद्धि के लिए उत्तम रीति से ऐसा लक्षण वनाना ही चाहिए। शंका—'घटत्व को प्राप्त होता है' यथाँ प्रवृत्तिनिमित्त ( घटत्व ) में घट शब्द कैसे आया? उसमें भी इसी तरह ऐसा कहें तो अनवस्था दोष होगा? घट आदि जाति ने अच् प्रत्यय करने में क्या विगड़ता है जिससे यह कुकल्पना अपनाते हैं?उत्तर = ऐसी बात नहीं है। प्रयोग में आने वाले घट शब्द की सिद्धि के लिए अच् प्रत्यय युक्त घट + अच्, को जो ('घटत्वापत्ति' इस ) प्रवृत्तिनिमित्त के एक अंश ( घटत्व ) का वाचक है, केवल उपागरूप से अपनाते हैं। उसका प्रयोग स्वतन्त्र रूप से नहीं करते। घट शब्द का प्रवृत्तिनिमित्त तो स्वरूपभूत घटत्व की प्राप्तिरूप है उसका एकदेश घटत्व उपायभूत घट शब्द का अर्थ है। वह घट शब्द यद्यपि रूप से ही प्रयुक्त किया जा रहा है जैसे 'मुगादिनिभ आनन्त' में सभि शब्द केवल सामास ( नुगागम् ) के लिए ही अपनाया जाता है। इसी हों शब्दशक्ति है कि सभि शब्द वाक्य में स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त नहीं किया जाता। इसी प्रकार यहाँ घट शब्द है। वह घट शब्द वाक्य में आने वाले घट शब्द की प्रवृत्ति वाच्य ( घटत्वापत्ति या घटत्व या घट ) के अतिरिक और कहीं प्रयुक्त नहीं होता। 'घटत्व को प्राप्त होता है'—इस विवक्षा में 'घट होता है' यह क्रिया वाक्य है? इसलिये अन्निकरान्त एकारान्त और व्यञ्जनान्त शब्दों से किप् अच् आदि प्रत्यय और उनका लोप करते पर द्रव्य भिपक इत्यादि शब्द सिद्ध होते हैं।

मूलं च तस्या इति। तन्वचेतनतानां घटादीनां सत्ताप्रतिलम्भलक्षणायां क्रियायां परामर्श-लक्षणस्वभावं कर्तृत्वं, तस्य चेतयदर्थे:प्वेवोपपत्तेरित्याशङ्क्योक्तं—मूले ति। इह खलु घटादीनां पदार्थानां बहिः सिद्धावपि प्रतिपत्त्र्यसिद्धावसिद्धिरेव, बहिः सत्तासामात्रेण-स्वरूपपतेन व्यवहर्तृणां व्यवहारासिद्धेः। प्रतिपत्त्रि सिद्धिः प्रकाश एव। स चाप्रकाश-मानानां प्रकारों प्रति ताद्रथ्येनावस्थितानां न भवति सम्वन्धानुपपत्तेः। प्रकाशमानत्वं च प्रकाशाविशिष्टेन प्रकाशयितव्येप्रकाशरूपतयेव। प्रकाशेश निष्परासंश्लिष्टेन सुपुरसवारहितस्ववाजड-कल्प एव न। परामर्शः स्वातन्त्र्याख्यं कर्तृत्ववम्। तदिहैकस्मिन् पदाथे: प्रकाशासत्तया स्वभावपरमेश्वरसमवन्धिनों चित्राभासाविष्कृतिं मूलखेनावच्छेद्य घटाद्योदपि प्रकाशै-कारमान: सत्ताध्याप्तौ स्वातन्र्र्यामुभवत्स्येव। अननेनैवाशये नोत्कं 'मूलं च तस्या' इति सत्तायां व्यापृतिश्रेयमिति।

द्रव्यागः सारूप्यमनुत्रान्तश्राविकलष्यश्रे:'ति। ततश्र चिद्वृस्याविष्करणक्रियास्वतन्त्र-स्वभावपरमेश्वरसमवन्धिनों चित्राभासाविष्कृतिं मूलखेनावच्छेद्य घटाद्योदपि प्रकाशै-कारमान: सत्ताध्याप्तौ स्वातन्र्र्यामुभवत्स्येव। अननेनैवाशये नोत्कं 'मूलं च तस्या' इति सत्तायां व्यापृतिश्रेयमिति।

मूलं च तस्या:—शंका: घट आदि अचेतन होते हैं। सत्तासादन-क्रिया में उनमें परामर्श स्वरूप सम्बाव कर्तृत्वं आता है। जब कि वह ( कर्तृत्व ) केवल चेतन पदार्थों में ही संभव है। इस पर उत्तर देते हैं मूलं च तस्या:श्रार्थाभासा। संसार में घट आदि की पदार्थ सिद्धि चाहर होती हैं। तथा भी ज्ञाता में सिद्धि न होने पर उनकी असिद्धि ही रहती है। चाहर तो रूठी सत्ता रहती है। उसी के आधार पर व्यवहार करने वाले व्यवहार चलाते रहते हैं। ज्ञाता में जो सिद्धि हैं वह प्रकाश ही है। वह प्रकाश प्रकाशित न हो रहे अर्थात् प्रकाश के प्रति तटस्थ ( प्रकाश से दूर ) पदार्थों का नहीं होता। कारण कि उनका सम्बन्ध ( प्रकाशानुरूप इन्द्रिय सत्क्रिप्त ) नहीं वनता। उनका प्रकाशित होते रहना भी प्रकाश से भिन्न नहीं होता। प्रकाश रूप से ही वे प्रकाशित

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व्यक्तिविवेक:

होते हैं और वह प्रकाश परमार्थ के बिना स्फुरण ( जैसे तारों की टिमटिमाहट ) मात्र होता है, अन्यथा जड़वन् ही होता है । परमार्थ की कलpanāत्मक है स्वांतंत्र्य नामक कल्पना । इस लिये संसार का प्रत्यक्ष पदाथों प्रकाश रूप होने ने स्वांतंत्र्य-स्वभाव लि‌ए रहता है अनन्य वह परमेश्र्वर रूप होता है और इस प्रकार उसमें कल्पना रहती है । जैसा कि कहा है—'ब्रह्मा का प्रदेश भी ब्रह्मा की सत्ता-तटस्थता से रहित नहीं रहता । और न भिन्न रूप से उसका विकल्प ही होता । तो इस प्रकार विश्व के आविर्भाव ( प्राकट्य ) की क्रिया में स्वातंत्र्य-स्वभाव के परमेश्र्वर की शेच्छा प्रकाश वाले आधि‌ष्कार-प्रयल को करणरूप से अपने भोंतर लेकर घट आधि भी एक माथ प्रकाश रूप होते सत्ता व्यापार में स्वातंत्र्यता का अनुभव करते ही हैं । इसी आशय से कहा—मूलं च तस्याः ! सत्तयां व्याप्तिर्येद्यम् ।

विमर्श: यहां का व्यास्यानव्याकरण तथा शौन दर्शनों की युक्तियों से उलम्म हुआ है । व्याकरण दर्शनों में भी व्यास्यानत्कार की कुदृष्टि स्वतंत्र प्रक्रियाएं हैं । उसका आधार शाब्दर्शनों है । शाब्ददर्शनों से मननदृष्टि करने के लिये व्याकरण के शब्द और उसकी अर्थाभिसुरूच प्रवृत्ति में नड़े कल्पना की गई है ।

( १ ) 'घट' कहते वनता है? वह पहले 'घटरवापत्ति' क्रिया से युक्त होता है । इसी घटरवापत्ति क्रिया से 'घट' शब्द उसकी ओर वढ़ता है । अतः 'घटरवापत्ति' पद शब्द की घट अर्थ की ओर क्रिया अर्थातो उसे कर घट शब्द उत्पन्न ( कारण ) है । कहा होता है कि घटरवापत्ति क्रिया में भी तो 'घटत्व' होने वाली प्रवृत्ति की निमित्त ( कारण ) है । और उसके भीतर 'घट' शब्द है । इस घट शब्द के प्रयोग में प्रवृत्ति‌तिनिमित्त कौन ? यदि वही घटत्वापत्ति तो पुनः उसके घट के प्रयोग में वह कौन ? इस प्रकार के प्रशनों पर इसी प्रकार का उत्तर देते रहने से किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकेगा । इस पर व्यास्यानत्कार समाधान देते हैं कि—यहां 'घट' शब्द ही इस घट का वोधक है । यह ( प्रवृत्ति‌तिनिमित्तगत ) 'घट' शब्द घट जातु में अन्य प्रत्यय लगाने से बना है, और इसका प्रयोग सदैव किसी अन्य शब्द के साथ होता है । स्वतत्र नहीं । स्वतत्र प्रयोगों में न आने वाले और भी शब्द हैं । व्याकरण दर्शनों में 'निमि' को उद्दूत किया है ।

( २ ) घट शब्द का प्रवृत्ति‌निमित्त—न्यायशास्त्र में घटत्व है । यहां 'घटत्वापत्ति' क्रिया है । घटत्व को प्रवृत्ति‌तिनिमित्त न मानने में व्यास्यानत्कार ने हेतु दिया कि 'घटत्व' घटस्वरूप से भिन्न है । टोंक भी है । घटत्व जाति है घट द्रव्य । भिन्न होने से वह प्रवृत्ति‌तिनिमित्त नहीं वन सकता । वही घटत्व जाति और घट रूप । इसी घटना के कारण ही घट को पट नहीं कहा जाता । इस घटत्वापत्ति के साथ उसका आश्रय कर्ता जोड़ा जाता है । उसके लिए किप् आदि प्रत्यय होते हैं । कर्तृ क्रिया ( घटत्वापत्ति ) से अभिन्न हो जाता है । घटत्व घट में आता है । यह आना अवास्तविक है । सांदृश्य मात्र से वह कह दिया जाता है । यही सांदृश्य किप् आदि प्रत्ययों के लिये 'उपमानादाचारेः' आदि सूत्रों द्वारा वतलाया गया है । इस प्रकार घट को घटना क्रिया मान कर उसमें कर्ता को लाना और तत अन्वय किप् आदि करना पड़ता है । व्याकरण दर्शनों में 'घट' क्रिया से अन्य किप् होते हैं । ये ही कर्ता का वोध कर देते हैं ।

( ३ ) जब तक कर्ता को अहंकारानुभूति नहीं होती वह क्रियावान् नहीं वनता । यह अनुभूति

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चैतन को ही हो सकती हैं। घट है अचेतन। उसमें यह अनुभूति संभव नहीं। अतः घट आद्रि पदार्थों में ‘घटात्मतापत्ति’ किया कैसे मानी जाती है? इसका सरल उत्तर शैवदर्शन से यह दिया गया है कि प्रत्येक पदार्थ चेतन शिवतत्व से अभिन्न है। प्रत्येक पदार्थ सच्चिदानन्द शिव का आत्माविष्कार है। अतः उसमें चेतना न मानना अवौद्धिक है। शिव प्रकाश स्वरूप हैं। प्रत्येक पदार्थ भी प्रकाश स्वरूप है; क्यों कि उसका ज्ञान होता है। प्रकाश हीन वस्तु का ज्ञान संभव नहीं। शिव को आत्मानुभव अथवा स्फूर्ति करने के पूर्व ‘मैं’ ऐसा ज्ञान होता है। यह परामर्श या विमर्श है। यही शिव की स्वातंत्र्यशक्ति है। वह जब चाहता है तब यह विमर्शों होता है। यह शक्ति शिव में भोंति-भोंति के पदार्थों का आविष्कार करती है। यह आविष्कार भी शिव से भिन्न नहीं। अतः स्वाविष्कृत घट आदि अचेतन पदार्थ चेतन पदार्थों के ही समान चित्र से अभिन्न हैं वे कर्त्ता हैं। यह स्वातंत्र्य रूप कर्तृत्व प्रत्येक पदार्थ में दिखाई भी देता है। प्रत्येक पदार्थ अपनी क्रिया और अपने आकार में स्वातंत्र है। इस प्रकार घटत्मापत्ति क्रिया घट आदि पदार्थों में भी रहती है। वे सर्वांत्मना जड़ नहीं माने जाते। इस विषय के लिए शैवागम की चर्चा लेनी चाहिये।

यः कश्चिदर्थः क्रिया वान्यो वेत्ति व्यवहारपत्तिनिमित्तं खलु नाध्यासियन् दर्शंयति। भवृत्तिनिमित्तस्य नियमेन क्रियारूपतां दर्शंयितुं रिवति। तयोः खुपमानाचारग्रोः। अश्वत्थ-

भासादयतोऽत्र आत्मदर्शनेनभिप्रायेण । दर्शनेनैव तु अश्व इवाचेतनस्थिरे।

यः कश्चिदर्थः—नयुत्पत्तिनिमित्त होने से शब्द सिद्धि में क्रिया ही नहीं और भी कोई तत्व वयुत्पत्ति का कारण वन सकता है। किंतु भवृत्ति में नियमनः क्रिया ही कारण वनती है। तयोः—उपमान और आचार। अश्वत्थ। यह अपने दर्शन के अनुसार। दूसरों के दर्शन में अश्ववत् आचरण करता है यही अर्थ होगा।

न तत्वसादनं युक्तं तदतुल्यक्रियस्य हि ॥ १३ ॥ सत्तायां व्यापृतिश्रेया चित्रत्वपरिनिष्ठिते। सदृचछते जडस्यापि घटादेश्चेतनादिवत ॥ १४ ॥ नाम्नः सरप्रधानस्य धातुकरोडवद पच हि । शब्दवृत्तिकदेशादेशोऽन्तवर्थेतवमवोचत एवं विपर्यघटो भवतेति कवोदस्य पूर्वकालत्वम् । घटनापेक्षं दृश्यं भवनापेक्षन्तु नासमन्वयत: ॥ १६ ॥ बहिरङ्गत्वाच्च यथा भवत्यङ्गाश्रितस्य पञ्चकोटयिमिति । अन्न हि पाकापेक्षाश्रित्यते: पूर्वकालतावगतिः ॥ १७ ॥ तस्मात्रामपदेश्यो यः कश्चिदर्थः प्रतीयते । न स सत्तामनासाद्य शब्दवाच्यत्वमह्नुते ॥ १८ ॥ इत्थंसत्तास्वितभवत्यादि क्रियासामान्यमुच्यते । नाम्तरङ्गत्वाच्चैककारकत्वं प्रभुज्यते ॥ १९ ॥ क्रियाविशेषो यस्तवस्यः पाकादिवर्गविचारभाकू । बहिरङ्गतया तस्य प्रयोगोऽविशयमिष्यते ॥ २० ॥

इति सङ्ग्रहश्लोका:

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उनके सन्नान क्रिया से युक्त न होनेवाले का उनका रूप पाना युक्तियुक्त नहीं । सत्ता के विषय में यह व्यावहार (आसादन रूप) घट आदि जड़ पदार्थों में भी वृत्त्यादि क्रिया के समान सम्भव है, उनका मूल कारण पदार्थों में विचित्रता है । इसलिये धातुकार (पाणिनि आदि) ने शब्द और मुख का उदाहरण जिसकी कारण है जैसे 'नाम' (गण्ड ) को धातु (गड्) इ अर्थ माना है क्योंकि वह सत्तू प्रदान है और इसी प्रकार 'विपच् वटोभवति' इसके कर्ता की पूर्वकालता घटन क्रिया की अपेक्षा मनझी जाती है ( अर्थात् भवन क्रिया की अपेक्षा सबकी पूर्वकालता नातते पर ) समन्वय नहीं होता और वह बहिरङ्ग भी है, जैसे अयम् अधिष्ठित्य पाचकौ भवति, इस वाक्य में पाक क्रो अपेक्षा अधिष्ठित्य में पूर्वकालता प्रतीत होती है । इस कारण नाम शब्दों से जो भी अर्थ प्रतीत होना है वह तब तक शब्द वाच्य नहीं माना जा सकता जब तक सत्ता नहीं पा लेता और इस प्रकार अस्ति भवति आदि क्रिया सामान्य क्रिया मात्र हैं । वे अन्वयरूप हैं, अन्वय सत्ता उनका प्रयोग अनिवार्य रूप से नहों करते । पाक आदि जो दूसरी क्रियोप किद्र हैं वे वाच्य में तत्ती प्रयुक्त होती हैं और कभी नहीं, कयों कि ये बहिरङ्ग होती हैं । इसलिये उनका प्रयोग आवश्यक होना है । ये हैं संग्रहरहलोक ।

न तु क्रियासादृश्यादिति । यदुक्तमादिमसूत्रेऽवयवसदृशावयविसंशयस्तु न सम्भवति साधर्म्यात् । प्रतीयते, यथाडब्रह्मदत्तं 'ब्रह्मदत्त' इत्याहेल्यत्र ब्रह्मदत्तसादृश्यं गम्यते तद्धदेवात्र दृश्यग्र्यम् । ननु इति । सत्त्वप्रधानत्वात् शब्द:(स्य ?) वक्तृकदेशादिस्वरूपसप नास्ति यो शब्दवत् क्रैकदेशादिरर्थस्तस्य । अन एव सत्तासादनरूपक्रियास्वभावतयैव धात्वर्थःवसुत्तम् । तथा हि अणादयः शब्ददार्थाः गाङि वक्तृकदेश इति धातुकारः पपाठ । धातुशब्देन धातुपारायणं शास्त्रं लङयते । वहेरङ्गत्वादिति । चशब्देन पूर्वकारिकागतातोडसमन्वयः समुच्चीयते । यथा भवत्यधिष्ठित्य पञ्चक्रोऽयमिति उभयवादिसिद्धो दृष्टान्तः । दृश्यं चाशितभवत्यादिति । कारिकाद्वयं पूर्वमेव निर्णीतार्थम् ।

इत्थं चायं ग्रन्थकार:—कर्तृभेदविपयां विशिष्टां कश्चो निअयां वदितुं क्रियाभिधः । प्रौढवादरचनाविचक्षणो लचयसिद्धिमुदितान् कवीन् व्यधात् ॥ ३ ॥

अश्र्चन की प्राप्ति अश्व सङ्ञा क्रियाहीनों में संगत नहीं इस प्रकार सादृश्य अपने आप प्रतीत हो जाता है । जैसे अश्वदत्त (देशदत्त आदि ) को ब्रह्मदत्त कहा । उससे केवल ब्रह्मदत्त का साहश्य समझ में आता है । नास्ति—द्रव्यवाचक ( सत्त्वरूप = द्रव्य ) शब्द का स्वरूप है—(नीचे लिखे अनुसार ) धातुति और उसका उच्चारक सुरयंत्र । इसलिये धातु का अर्थ सत्ता प्राप्ति स्वरूप हो बनलाया गया है । धातुकार के—'अणादि' का अर्थ शब्द है । 'गाङि' धातु मुख के अंश विशेष का द्योतक है, ऐसा धातुपाठ दिया है । यहाँ धातु शब्द से धातुपाठ वाछा पूरा शास्त्र अभीष्ट है । वहेरङ्गत्वाद्—च शब्द से पूर्वकारिकागत अतोडसमन्वयः समुच्चीयते । यथा भवत्यधिष्ठित्य पाचक्रोऽयमिति उभयवादिसिद्धो दृष्टान्तः । दृश्यं चाशितभवत्यादिति । कारिकाद्वयं पूर्वमेव निर्णीतार्थम् ।

भावप्रधानमुख्यातम् । असत्त्वभूतार्था उपसर्गादयः । तेषामसत्त्वभूतार्थे-

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प्रथमो विमर्शः

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त्वाविशेषेऽपि व्यापारनियमात् प्रयोजनियमाच्च जैराश्रयोपगमः । तथाहि—

क्रियारूपातिशायप्रतिपत्तिनिबन्धनुपसर्गः प्रादयः । भावसर्वयोरात्सम्भेदार्थव्याप्तान्निमित्तमच्वृत्तरूपार्थविशेषः स्वरादयो निपाताः ।

आख्यात में क्रिया की प्रधानता रहती है । उपसर्ग, निपात और कर्मप्रवचनীয় शब्दों का अर्थ वह अर्थ है जो सत्त्वरूप नहीं हैं । यद्यपि असत्त्वभूत की सत्त्वकल्पना इन तीनों में एक समान है, इतने पर भी शक्त्ति और प्रयोग की प्रतिनियतता के कारण वे पृथक्-पृथक् तीन वर्णों में गिने गए हैं । स्पष्टता के लिए—प्रादि उपसर्ग क्रिया के स्वरूप में विशेषता उत्पन्न करनेवाले माने गए हैं । स्वर आदि निपात—जिनके स्वरूप और अर्थ दोनों नियत हैं, वे भाव और सत्त्व के सङ्गत भेद की प्रतीति के निमित्त माने गए हैं ।

भावप्रधानमिति । नामपदानां पूर्वोक्तया युक्त्या सत्यपि क्रियाशब्दद्वये क्रियाया अप्राधान्यम् । आख्यातपदान्य पुनः शब्दशक्तिस्वाभाव्यात् क्रियाप्रधानान्यम् । असत्त्वभूतस्य भावस्य च स्वम् । तानवान्तरविशेषणानाह—तेनाभिहिति । व्यापारभेदः क्रियाविशेषकत्वमुपसर्गाणाम् । तेनैषां धातोः पूर्वं प्रयोगः । निपातैस्तु चादिभिरभावसत्त्वयोरात्मभेदः प्रत्यायते इति तथा व्यापारनियमः । तत्र भावगतसाम्यभेदप्रत्यायने यथापंचति पठति च, सत्त्वगतान्तु देवदत्तो यज्ञदत्तश्चेति । रूपं च शब्दस्वरूपादिः । अर्थः समुदचयादिः । प्रयोगनियमश्रादीनां समुच्चेतव्यादिवाचिभिः परप्रयोगादिः । क्रियाविशेषेऽति । तथा हि शाब्दल्यसंहितामनु प्रावृषदित्यादौ निशमनादिक्रियाविशेषोपजनितो यः संहितावर्णयोः कार्यकारण-

सर्ववणस्यस्यावच्छेदः संहिता कारणं वर्णं कार्यमिल्येवंरूपः, तद्वश्यायनं कर्मप्रवचनীয়ानां व्यापारः । प्रयोजनियमोऽत्र निपातवत् ।

भावप्रधान—नामपद भी क्रियापद ही होते हैं । इतने पर भी उनमें क्रिया अप्रधान होती है । इसके विरुद्ध आख्यात शब्दों में क्रिया प्रधान होती है । यह प्रधान शब्दशक्ति के अपने स्वभाव से व्यक्त होती है । असत्त्वभूता—असत्त्वभूतता = अपने रूप का सिद्ध न होना । तीनों का यह सामान्य लक्षण है, कुछ अवान्तर विशेषताएँ यद्यपि रहती हैं । उन अवान्तर विशेषताओं को तेषाम्—इत्यादि द्वारा बतलाते हैं । सब में व्यापार की विभिन्नता रहती है । उपसर्ग क्रिया के ही साक्षात् विशेषण वन कर चलते हैं । उनके प्रयोग का भी नियम है । वे सदा धातु के पहले प्रयुक्त होते हैं । 'च' आदि निपात क्रिया और द्रव्य का परस्पर भेद बतलाते हैं । यहीं उनका नियत व्यापार है । भेद ( क्रिया ) गत भेद वे पचति पठति च—'पकाता है और पढ़ता है'—में बतलाते हैं । द्रव्यगत भेद्र वे देवदत्तो यज्ञदत्तः—देवदत्त और यज्ञदत्त—इत्यादि में बतलाते हैं । उनका रूप हैं शब्द । उनका अर्थ हैं समुच्चय आदि । इन निपातों के प्रयोग का भी नियम है । ये 'समुच्चयनीय' पदों के वाचक पदों के बाद ही आते हैं ।

'शाकल्यसंहितामनु प्रावृषदिति' इत्यादि में सुनना आदि विशिष्ट क्रियाओं से हुआ जो संहिता और वर्णन का कार्यकारणभाव सम्बद्ध है उसमें विमेद करना ( अनु ) का काम है । वह बतलाता है कि संहिता कारण है और वर्ण कार्य—इनका प्रयोग कर्मप्रवचनोय के ही समान होता है ।

विमर्शः : व्याख्याकार वाक्यपदीय से अत्यधिक प्रभावित है । सत्ता के लिए वाक्यपदीय में निम्नलिखित कारिका आई है—

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‘सत्ता सद्रविनिर्धोगेन सत्तैवपाध्यवसित्या । साध्या च व साधनं चैव फलं भोक्ता फलस्य च ।। तं प्रागितद्रिकार्थं च धात्वर्थं च प्रचक्षते । सेयं भावविकारेपु पदवस्था: प्रपद्यते ।। ( वाक्यपदीय क्रियासमुद्देश ३५ कारिका )

हेलाराज—इत्यादि भाष्य इस प्रकार करते हैं—‘सर्वभावातुभयाधिनां सत्तासदिति प्रत्ययहेतुतः; मन्याग्रस्वरूपस्थ सर्वत्रातुभगार्त, नह्यमान्यस्यभावात् सत्ता सर्वचोद्भवानां विषयः ।। ६० ।। तथैच स्वाश्रयित्यलुपोभयाधिनियमिनहग्या संदृष्टकत्कत्समतुभवस्यपी सिद्धसाध्यरूपतया नामारव्यातपदवाच्य- नामनुसवति । नदृष्टदिनिरेकग च पदार्थान्तरभावात् सैष विचित्रवाचित्र्यात् भोग्यभोक्तृतत्सोऽधन- रूपतया विश्चयात्सुसुद्रवति । सर्वत्र भोक्त्रादिपु सन्नामात्रस्य संविद्रूपस्यातुभवात् तसैव सत्यता । विकल्पपरिदितेन्तु तन्नाम्यवान्तारः ।’ इसी प्रकार वाक्यपदीय की यह भी एक कारिका है— ‘साध्यसाधनजन्मन्यदृक् क्रियैष्यद्यपदार्थता । अन्वये वाऽस्मिन् या सत्ता सा क्रिया कैश्चिदिष्यते ।। ( क्रियासमुद्देश )’

कारिकासमुद्देश की कारिका—३ पर हेलाराज ने यह टीका की है—‘निमित्तनासान्याधारां तु कर्मप्रवचन्त्रीमान्न । तथाहि शाकलयसंधितासम्नु- प्रादपेयं इत्थं संदितामुपवर्गणो हेतुहेतुमद्भावो निर्नयतिविभ्रयान्नितः इत्यनुनावेच्यते । तथा क्रियाविशेषोपजनितसमन्यावच्छेदहेतवः कर्मप्रवचनतया । तदुक्तं— ‘क्रिया कैश्चित् पदं भिन्नं चतुर्थी पश्च्यथापि वा । अपोद्यृत्त्यैव वाक्येष्यः प्रकृतिप्रत्ययादिवत् ।।’ इति । एतच्च वक्ष्यते । वाक्यमेकमकारं, क्रियाप्रधान्यात्, तसयाश्चैकत्वात् ।

यदाहु:— ‘साकाङ्क्षावयं भेदे परानपाकाङ्क्षशदकम् । क्रियाप्रधानं गुणवदेकार्थ वाक्यमिष्यते ।।’ क्रमप्रतिपादनीय किरहि क्रियाओं के द्वारा प्रतिपाद्य संबन्ध के निश्चितायक होते हैं। कहा भी है— ‘प्रकृति और प्रत्यय के समान वाक्य से अलग कर किन्हीं ने पदों को दो भागों में विभक्त किया, किन्हीं ने चार भागों में और किन्हीं ने पाँच भागों में । यह आगे कहा भी जाएगा । वाक्य एक ही प्रकार का होता है । कारण कि उसमें क्रिया की प्रधानता रहती है । क्रिया एक ही प्रकार की रहती है जैसा कि कहा है—‘वाक्य माना जाता है वह जिसमें कुछ अवयव हों, वे परस्पर भिन्न और साकाङ्क्ष हों, जिसमें प्रयुक्त शब्द अप्रयुक्त शब्दों की आकांक्षा न रखते हो, जिसमें क्रिया को प्रधानता हो और दोप पदों की अप्रधानता साथ हीं सभों शब्दों का तात्पर्यभूत अर्थ एक ही हो ।’

द्विधेऽपि । सुवन्नतितदन्ततया । चतुर्थेति । नामाश्यातोपसर्गनिपातस्वेन । पञ्चधेति । कर्मप्रवचनतया: पञ्चमो भेदः । अपोद्यृत्त्यैव वैैयाकरणैरपेक्षया वाक्यस्यैवं । ततः पदानामपोद्धृत्यादन्वाख्यानं यथा पदेभ्यः प्रकृतिप्रत्ययादीनाम् । वाक्यमिति । ‘भूतभव्यसमुच्चारणे भूतं भव्यायोपदिश्यते’ इति न्यायेन क्रियादसंपर्य- द्वाक्यस्य क्रियाप्रधान्यम् ।

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प्रथमो विमर्शः:

साकाङ्क्षं पद्य न ति । वैयत्तः काङ्क्षे: स्थाल्यामोदनं पचतीत्यादौ वाक्यैकैकस्य पदस्य स्वपडनायां साकाङ्क्षत्वम् । अखण्डिततैस्तु पदैः परं पदान्तरं साकाङ्क्षयते । गुण अत क्रिया-कारकविशेषणयुक्तस्म् । केचित्तु क्रियाया: प्राधान्‍यस्योक्तौ कारकाणां परार्थत्वाद् गुणत्वमिति तदुक्तमिल्याहुः । एकार्थमिति ति । प्रथानमूतक्रियाारूपैकार्थमित्यर्थः ।

द्वितीया—सुवचन्त और तिङन्त । चतुर्थी—नाम, आख्यात, उपसर्गों और निपात । पञ्चधा—कर्मप्रवचन्तीय पाँचवाँ ।

अपोद्घ्रणय—व्याकरणदर्शन में वाचक होता है वाच्य हाँ। उससे पदों कौ अलग कर बाद में उनका अन्वयारध्यान (निरूपण) होता है जैसे पदों से प्रकृति और प्रत्ययों का । वाच्य—'सिद्ध और साध्य साध्य कहे जायें तो सिद्ध को साध्य के लिए कथित मानना चाहिए'—इस नियम के अनुसार वाक्य का तात्पर्य क्रिया में रहता है अतः वाच्य क्रिया प्रधान माना जाता है ।

साकाङ्क्षं—देवदत्त लकड़ी; से बल्ले; में भात पकाना है इस्यादि वाक्यों में यदि एक-एक पद अलग-अलग बोले जाएँ तो वे साकाङ्क्ष रहेंगे। साथ बोले जाने पर उनमें दूसरे पद की आकाङ्क्षा नहीं रहती।

गुणवत्त—क्रियाकारक विशेषण से युक्त । कुछ लोग क्रिया का प्राधान्‍य माने जाने से कारणों को गुण या अप्रधान मानते हैं कारण कि वे क्रिया के लिए प्रयुक्त माने जाते हैं। इस प्रकार के विशेषणों से युक्त ।

एकार्थम्—प्रथानमूत क्रिया ही हो मुख्यभूत (एक) अर्थ जिनका ।

अर्थनिरीक्षण

अथोंडपि द्विविधो वाच्योऽनुमेयश्च । तत्र शाब्दप्रपारविपच्यो वाच्यः । स पच मुख्य उच्चयते । यदाहुः—

श्रुतिमात्रेण यत्रास्य तादर्थ्यमवसीयते । तं सुश्र्मर्थं मन्यन्ते गौणं यल्लोपपादितम् ॥

इति । तत् पच तद्नुमिताद्द्रा लिख्यभूताद्यर्थोऽन्तरमभुमान्यते साक्षानुमेयः । स च त्रिविधः । वस्तुमात्रलड्काररसाद्यक्ष्येति । तत्रायं वाच्यावपि सम्भवत् । अन्यस्त्वानुमेय एवति । तत्र पदस्यार्थो वाच्य पच नानुमेयः, तस्य निरंश-स्वात् साध्यसाधनभावाभावतः ।

अर्थ भी दो प्रकार का होता है वाच्य और अनुमेय । उनमें जो अर्थ शाब्दशक्ति से प्रतीत होता है वह वाच्य कहलाता है । वही मुख्य भी कहा जाता है । कहा भी है—सुनने मात्र से जिसका तात्पर्य प्रतीत हो जाता हो उसे मुख्य अर्थ माना जाता है, जिसका तात्पर्य यत्नपूर्वक प्रतीत हो वह (अर्थ) गौण । 'अनुमेय अर्थ वह होता है जिसकी प्रतीति में हेतु; वाच्यार्थे अथवा वाक्यार्थ से प्रतीत (अनुमित) किये अर्थ' वह तीन प्रकार का होता है—वस्तु अलङ्कार और रस आदि । उनमें प्रथम दो (वस्तु और अलङ्कार) वाच्य भी हो सकते हैं । अन्तिम (रसादि) के अनुमेय ही होता है । (शब्द प्रतीत अर्थ दो प्रकार का होता है पदार्थ और वाक्यार्थ) उनमें जो अर्थ पद से प्रतोत (पदार्थ) होता है उसमें (कथित) साध्यसाधन भाव नहीं होना, कारण कि वह निरंश (अवयव रहित) होता है । वह वाच्य हाँ होता है अनुमेय नहीं ।

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अथोंडपोतिः । शब्दस्य व्यापारान्तरनिराकर णार्थमर्थक्रियासामर्थ्यै विध्यवत् तम् । तथाहि । बुद्ध-

वहारान्त स्पष्टीकृतान्तरा शब्देऽर्थनिर्णयः । तेषां च यथार्थे विवादस्तन्नैव तस्य वाच्यत्ववमेव । अन्यथा तु तेपामभावादर्थसामध्र्याद्वैषम्यगतिः । न चासावध्दौडर्थान्तरमर्थ प्रञ्चायप्रयत्नि । सम्व-

द्वाच्यार्थादथान्तरमप्रतिपत्तावुमानस्मेव । तेन लक्झणया अनुमानान्तरमावः प्रतिपादितो भवति । तस्य च व्यापकत्वात् । यद्यपि च सौगतैर लक्झणार्थव्यापार इष्यते न शब्ददव्यापारः

'( पचो ? ) धर्मी अवयवैः समुदायैःपचारादिति शब्ददपि चारे परिहार्य समुदायसद्रभावार्थ-

पचारवचनात्, तथापि वच्यमाणयेनानुमानलक्झण्योगादनुमानसैव पाङ्युपगान्त व्या । न न लक्झणायमनुमानस्थाः इति वाच्यं, तस्य तःपरिहारेण दृष्टेऽव्यापकत्वात् ।

व्यभ्नकत्वमनुमानमेवेति वद्यते वितत्स्य । तदेवं वाच्यानुमेयस्वभेदेनार्थस्य द्वैविध्यसम् ।

अथोंडपोतिः—शब्द में अभिधातिरिक्त अन्य किसी भी ( लक्षणा व्यापार ) व्यापार का खण्डन करने के लिए यहाँ अर्थ के केवल दो प्रकार बतलाए हैं । यह इस प्रकार कि—शब्द में अर्थ का बोध करने के लिए यहाँ अर्थ के केवल दो प्रकार बतलाए हैं ।

विमर्शः : ध्वनिवादी वाच्य लक्ष्य और व्यङ्ग्य तीन अर्थ मानते थे । अनुमितिवादी इन्हें व्यङ्ग्यार्थ के तीन भेद द्वैमानता है वस्तु अलङ्कार और रसादि । अनुमितिवादी इन्हीं तीनों को अनुमेयार्थ मान लेता है । ध्वनिवादों ने वस्तु और अलङ्कार को वाच्य कक्ष्म भी माना था और रसादि को नित्य व्यंग्य ।

अनुमितिवादों ने उसे भी अनुमेय के भीतर जोड़ों का त्यों स्वीकार कर लिया । इसके लिए—ध्वन्यालोक, लोचन ।१४ देखना चाहिए ।

यहाँ व्याख्यान में लक्षणा को अर्थ व्यापार माननेवाले बौद्धों का वचन उद्धृत है । वह मन्त्र के सुख्वार्थ वाधेः**के चतुर्थ चरण—लक्षणाडरोपिता क्रिया—'सोडर्थान्तरार्थेनडः शब्द-

व्यापार:' इस वाक्य से मिलता है । वस्तुतः लक्षणा अर्थ व्यापार ही है ।

श्रुतिमात्रेणेति । यत्रास्य शब्दस्य श्रुतिमात्रेणैवारणामात्रेण तादर्थ्यनं अर्थविषयत्वं प्रतियते से मुख्योऽर्थः । गोणम् ।

उक्तयुक्स्या परमार्थत आनुमानिकम् । यलोपपादितं प्रतिबद्धार्थ-सामथ्योँपनोतसम् ।

तत्र एव वाच्यात् तदनुमिताद् वाच्यानुमितात् लिङ्भभूतात् । स च त्रिविध इति । तदेतत् प्रथमसुपचिसम् 'अनुमानेडन्त भावं सर्वस्यैव ध्वने: प्रकाशयितुम्' इति ।

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सूत्रयति । ( योग्यो वा स्वाशब्देन प्रतिपादयितुं योग्यो वाच्यतासहिष्णु: ? ) कविकल्पशब्दवाच्याविति । 'द्विविधो हि शब्दः पदवाक्यभेदादि'ति पूर्वोक्तान्तयो: पदवाक्ययोरेवात्र निरूपयति-निरंशत्वात् भागरहितत्वात् ।

श्रुतिमात्रेण—जहाँ इस शब्द के सुनने भर से अर्थात् उच्चारण मात्र से तादृश्य = अर्थविषयत्व प्राप्त होता है, वहाँ मुख्य अर्थ है । शाब्दम्—अर्थात् प्रकार से वृत्तः: आनुमानिक । यद्यपि प्रतिपादनव्यासि संबन्धयुक्त अर्थ की शक्ति से विज्ञात । तत् एव = वाच्य से ही । तदनुमिताद्-वाच्य से अनुमित और हेतु बना हुआ । स च त्रिविधः-यह 'अनुमानेऽन्तर्भावं तद्वैलक्षण्यं ध्वनेरयः प्रकाशयितुम्' इस प्रथम कारिका में कहा था, उसी का समर्थन करने के लिए कहा गया । ( ×××× ) कहे गये शब्द वाच्य होते हैं । 'शब्द दो प्रकार का होता है पद रूप और वाक्य रूप' इस प्रकार पूर्वोक्त जो पद और वाक्य हैं—उन्हीं का अर्थ बतलाते हैं । निरंशत्वात् = भाग रहित होने से ।

वाक्यार्थस्तु वाच्यस्यार्थस्यांशपरिकलपनाय मंशानां विध्यनुवादभावेनावस्थितेर्विधेयांशस्य सिद्धासिद्धतयोपपादनानपेक्षासापेक्षत्वेन द्विविधो बोद्धव्य: ॥

तत्र सिद्धौ विध्यनुवादभावः स्वरूपमात्रानुवादः, यथा—'अस्युत्तरस्यां दिशि देवतातमा हिमालयो नाम नगाधिराजः', इत्यत्र । असिद्धौ साध्यसाधनभावोपनेयमानस्यांशस्य साधनधुराधिरोहात् ।

जो अर्थ वाक्य से प्रतীত होता है, उसमें अंश की कल्पना की जाती है । उसके कुछ अंश विधेय और कुछ अनुवाद्य ( उद्देश्य ) रहते हैं । विधेयांश दो प्रकार का होता है—सिद्ध और असिद्ध या साध्य । इनमें से सिद्ध अपने उपपादन की अपेक्षा नहीं रखता, साध्य उपपादनसापेक्ष होता है । इस प्रकार वाक्यार्थ सदा दो प्रकार का ( सिद्ध, साध्यभेद से ) होता है । इनमें से जो विध्यनुवादभाव सिद्ध विधेयांश में आता है, वह स्वरूपमात्र का अनुवादमात्र होता है । जैसे—'उत्तर दिशि में हिमालय नाम का देवस्वरूप पर्वतराज है'—इस वाक्य में । सिद्ध न होने पर साध्यसाधन भावात्‌मक होता है । क्योंकि उनमें जो अनुवादांश होता है, वह साधन बना दिया जाता है ।

वाक्यार्थस्त्वति । तथा वाक्यार्थी द्विविधः वाच्योडनुमेयश्र । तत्र वाच्यस्यैव वाक्यार्थत्वात्‌विरंशस्यापि विधेयानुवाद्यांशरूपत्वेनांशकल्पनं क्रियते । विध्यनुवादभावमन्तरेण तयोः समन्वययोगाद् । विधेयश्र कश्चिल्लोकप्रसिद्धतयोपपादनात्पेक्षः ।

सिद्धत्वादुपपादनानपेक्षः । अप्रतीतम्र्रतिबोध्युपपादनाभावाद्, उपपादनं चात्र नानुमानम् । अतश्रोष्टकाव्यहेतुतन्यायेनानु- मानं व्यवस्थितम्, अर्थान्तरन्यासन्यायेन तूपपादनम् । साध्यसाधनभावः पुनर्‌भयानु- यार्थविपयो यथे'ति ।

वाक्यार्थ दो प्रकार का होता है—वाच्य और अनुमेय । उनमें वाच्य ही वाक्यार्थ होता है । अतः उसमें विधेय और अनुवाद्य—अंश की कल्पना की जाती है । यद्यपि वह ( व्याकरणशास्त्र की दृष्टि से ) अंशरहित ( अखण्ड ) होता है । उन अंशों का विध्यनुवादभाव के बिना समन्वय भी संभव नहीं है । कोई विधेय लोकप्रसिद्ध होने से उपपादन की अपेक्षा नहीं रखता और कोई विधेय अप्रसिद्ध होने से उसकी अपेक्षा रखता है । यहाँ उपपादन अनुमानरूप नहीं होता, क्योंकि ( अनुमान में होनेवाली ) अज्ञात ( पर्वत पर अग्नि आदि ) पदार्थों की प्रतीति का यहाँ अभाव

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व्यक्तिविवेक:

रहता है । यहाँ तो शब्द से प्रतीत हुए अर्थ का ही अर्थान्तरन्यास के ढंग से समर्थन भर होता है । अनुमान होता है उक्तकाव्यहेतुन्याय से और उपपादन होता है अर्थान्तरन्यासन्याय से । साध्यसाधन दोनों का अनुप्रास होता है, इसलिए वाच्यार्थ के साध्यसाधनभाव से अनुमेयार्थ का साध्यसाधनभाव अलग वतलायेंगे—‘अनुमेयार्थविषयो यथा ।’

तत्रैति तयो: सिद्धासिद्धयोर्विधेयांशयोरमध्य इ सिद्धौ उपपादनानपेक्षत्वे । शुद्ध उपपादनानपेक्षौ विध्यनुवादभाव: ।

तत्र—उन सिद्ध और असिद्ध विधेयांशों में । सिद्धौ—उपपादन की अपेक्षा न रखने पर ।

शुद्ध:—उपपादनिरपेक्ष विध्यनुवादभाव ।

विमर्श: उक्ताचार्य का ‘काव्यालङ्कारसारसंग्रह’ मिलता है । उसपर प्रतापारेरुद्रराज की लघुवृत्ति भी मिलती है । दोनों ही व्याख्याकार (रुय्यक या मंख) से पहले के हैं । उक्त ने काव्यलिङ्ग को काव्यहेतु कहा है और काव्यलिङ्ग का जो लक्षण किया है, उसे प्रतापारेरुद्रराज भी काव्यहेतु कहते हैं । उक्तट की कारिका है—‘काव्यदृष्टान्तहेतू चेत्यलङ्कारान् परे विदुः ।’ ६१, इसके अनुसार काव्यदृष्टान्त के बाद काव्यहेतु का लक्षण इस प्रकार किया—‘श्रुतमेकं यदन्यत्र स्मृतेऽरनुभवस्य वा । हेतूनां प्रतिपघेत काव्यलिङ्गं तदुच्यते ॥’ ६७ । इसकी वृत्ति में प्रतापारेरुद्राज ने काव्यहेतु का निर्वचन इस प्रकार किया—‘यथा तर्किकप्रसिद्धा हेतवो वैरसस्यमावहान्ति न तथाव काव्यहेतवः ।’ इसका उदाहरण उक्त ने जो दिया है, वह अनुमान से मिलता है । वह है—‘छायेयं तव शोषाझकान्ते: किश्रिदनुज्झ्वला । विभूषाप्रचुरादेशान् दर्शयित्रि दुनोति माम् ।’ इसमें न्यायिका के अविमूढ़ अंगों द्वारा—पूर्वविमूढ़ा का अनुमान निहित है । परवर्ती अलङ्कारिक काव्यलिङ्ग को ऐसा नहीं मानते । वे काव्यलिङ्ग में हेतुहेतुमद्राव निहित मानते हैं । हेतु और कार्य कथित रहते हैं । केवल उनका सम्बन्ध अनुमान द्वारा ज्ञात होता है । यह स्थिति भी केवल ‘पदनिष्ठहेतुत्व’ में होती है ।

हेतुहेतुमद्राव भी कवित ही रहता है । काव्यप्रकाश के ‘काव्यलिङ्गं हेतो: क्रियापदाथेता’ इस लक्षण में जो उदाहरण हैं, उनसे यह तथ्य स्पष्ट है । उक्तट इससे आगे केवल हेतुमात्र को काव्यलिङ्ग में कथित मानते हैं; हेतुमान (कार्य) का और उसके साथ दोनों के हेतुहेतुमद्राव सम्बन्ध का अनुमान । अनुमेयार्थ को भी यही स्थिति है । उसमें एक हेतुभूत अर्थ कथित रहता है, दूसरा साध्यभूत अर्थ अकथित । व्यक्तिविवेकव्याख्याकार (रुय्यक ?) निश्चित ही काव्यप्रकाश के बाद हुए हैं । उनकी काव्यप्रकाश के दशम उल्लास पर टीका मिली है । अत: उन्होंने काव्यप्रकाशकार की व्यावृत्ति के लिए उक्तकाव्यहेतुन्याय कहा । इसमें भी काव्यलिङ्ग की जगह काव्यहेतु शब्द का प्रयोग किया । काव्यप्रकाशकार हेतु अलङ्कार नहीं मानते । उन्होंने ‘पूर्वोक्तकाव्यलिङ्गमेव हेतु:’ कहा है । इस प्रकार ‘उक्तकाव्यहेतु’ शब्द का अर्थ उक्तटाचार्यप्रोक्त काव्यलिङ्गवेनाभिमत काव्यहेत्वलङ्कारन्याय अर्थ करना चाहिए । ‘उक्तदक्षसावो काव्यहेतु:' ऐसा समास कर उसे प्रतिभा के अनुमान से नहीं मिलाना चाहिए । यद्यपि आनन्दवर्धन ने प्रतिभा को अनुमान माना है (सरस्वतीस्वाह० ) तब भी यहाँ पूर्वोक्त अर्थ ही संगत है ।

अर्थान्तरन्यासन्याय—अर्थान्तरन्यास प्रसिद्ध अलङ्कार है । इसमें दो बातें कही जाती हैं । दोनों में समथ्यंसमर्थकभाव (निहित रहता है । इसलिए इसे अर्थान्तरन्यास शब्द दिया गया है । जो बात कहीं गई, उसके समर्थन में एक ऐसी बात कही, जिसका प्रकृत में कोई प्रसंग नहीं था ।

यही बात अर्थान्तर हुई । इसकी न्यास प्रकृत में विन्यास या विनियोग होने से चमत्कार होता है, अतः उसे अर्थान्तरन्यासालङ्कार कहते हैं । इसमें समर्थ्य दोनों ही (उक्त ) शब्दतः कथित रहते

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हैं। उनका समथ्यंसमर्थकभाव भी हि, अथवा, यदि वा, खलु, किल आदि अव्ययों से कथित रहता है। उपपादन में यही क्रम अपनाया जाता है। सिद्धान्तित तथ्य प्रतिपादित तथ्यान्तर से संपूर्ण किवा सिद्ध किया जाता है। यही उपपादन है।

हिमालयो नाम नगाधिराज इति । अत्रास्तीति हि विधिः सुप्रसिद्धस्वादुपपादनानपेक्षः । द्विविधस्सु साध्यासाधनभावविषये द्विविधः अत्यन्तप्रसिद्धत्वादुपपादकोपादानानपेक्षः उपपादक-कोपादानापेक्षश्चेति । उपपादककोपादानापेक्षश्च द्विविधः । शाब्दश्शार्थश्च । तत्र शाब्दो यत्नहेतुनेनोपादानम् । अर्थों यत्रोपात्तस्य हेतुत्वम् । सोऽपि च शाब्दार्थंत्वभेदेन द्विविधः उपपादककोपादानापेक्षः साध्यासाधनभावः प्रत्येकं पदवाक्यार्थरूपतया द्विधा भवंश्र्चतुर्धा भवति । पदार्थों हि पदार्थान्तरं प्रति हेतुत्वं भजते वाक्यार्थों वा वाक्यार्थान्तरं प्रतीति-पूर्वं विधेयस्यासिद्धत्वादुपपादनातेच्च तस्मात् । सोऽपि च साध्यासाधानभावरूपोऽपि च । एकपदार्थंगतत्वेन साध्यासाधनभाव निराकर(ण)ञ्च विरोधः कश्चित् । पदार्थस्य तु जातिगुण-क्रियाद्वयस रूपेण चातुरूप्यं तथाभूतस्य च यथासम्भवतम अनुभयरूपत्वेन धर्मस्यापि सामान्याधिकरणत्वैयाधीकरणयाभ्यां द्वैरूप्यम् । सामान्याधिकरण्ये विशेषणद्वारेण हेतुत्वादर्थः साध्यासाधनभावात् । वैयधिकरण्ये तु शाब्दः पञ्चम्यादिना हेत्वेनोपादानात् । वाक्यार्थस्य कारकवैचित्र्याद् वैचित्र्येऽपि क्रियैक्यादे करूपत्वम् । ( आगमस्य निवन्धाप्रसिद्धिरूपत्वेन द्वैरूप्यम् । अनुमानमात्रं न गणितम् ? ) तत्र यथादिशब्दानां हेतुत्वप्रकाश-कानां प्रयोगे वाक्यार्थंगतः शाब्दः साध्यासाधनभावः । तत्र च कचित् कुमतानुसमेयभावोऽ-प्यसति अप्रतीतस्य प्रतीतिपादनादू यथा 'सरस्यामि'ति वच्यमाणोदाहरणे । यत्र तु हेतुत्वप्रकाशकस्य कस्यचिद् प्रयोगास्तत्रार्थः यथोदाहृष्यते । एवमुपपादककोपादानापेक्षः साध्यासाधनभावः पदार्थवाक्यार्थयोः प्रत्येकं शाब्दार्थंत्वभेदेन चतुर्विधः सन् बहुविधः प्रपञ्चितः । सर्वस्य चास्य साध्यासाधनभावस्य प्रमाणसिद्धाविनाभावमूलत्वम् ।

"हिमालयो नाम नगाधिराज:" इस पच में जो 'अस्ति' (हिमालय) हैं—यह विधान हैं, इसका समर्थन आवश्यक नहीं, क्योंकि वह सुप्रसिद्ध है। दूसरा जो साध्यासाधकभाव है, वह दो प्रकार का है—अत्यन्त प्रसिद्ध होने से उपपादक के कथन के लिए निरपेक्ष और उपपादक के कथन के लिए सापेक्ष। उपपादककोपादान सापेक्ष—दो प्रकार का होता है—शब्द और अर्थ। शब्द वह है, जिसमें ( उपपादक का ) उपादान हेतुरूप से हो । अर्थ वह है, जिसमें उपात्त ( उपपादक में ) हेतुत्व का ज्ञान हो ।

शब्द और अर्थ इन दोनों प्रकारों का जो उपपादककोपादान-सापेक्ष साध्यासाधनभाव सम्बन्ध है, वह पुनः पदार्थ और वाक्यार्थरूप से दो प्रकार का होकर चार प्रकार का हो जाता है। पदार्थ के प्रति हेतु बनता है और वाक्यार्थवाक्यार्थ के प्रति । इसलिए विधेय की सिद्धि पहले से न होने के कारण उसमें उपपादन की अपेक्षा रहती है। वैसा भी है और साध्यासाधनभाव रूप भी है, और कोई विरोध भी नहीं; क्योंकि साध्यासाधनभाव का निराकरण केवल एक पदार्थ में किया गया है। पदार्थ द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्यरूप से चार प्रकार का होता है, इस रूप में वह ( चारों में से ) एक ही कोई हो सकता है, उभयरूप नहीं। उसमें केवल धर्मधर्मिसम्बन्ध बन सकता है। धर्म भी सामान्याधिकरण्य और वैयधिकरण्य से दो प्रकार का होता है। सामान्याधिकरण्य होने पर विशेषण द्वारा हेतुत्व होने से उसमें साध्यासाधनभाव अर्थ होता है। वैयधिकरण्य में वह शब्द होता है। उसका कथन पंचमी आदि से हो जाता है। वाक्यार्थ भी यद्यपि कारकगत भेद से

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निन्न रूप होता है, तथापि क्रियागत अभेद से एकरूप वन जाता है ( ×××××× )। उसमें भी जहाँ वाच्यार्थ के साध्यसाधनभावमें यथा आदि शब्द का प्रयोग होता है, वहाँ वह शब्द माना जाता है। वहाँ कहीं-कभी अनुमानानुमेयभाव संबंध भी रहता है, क्योंकि जो अंश पूर्व प्रतिज्ञा नहीं रहता, उसकी प्रतिति करानी पड़ती है। जैसे-‘सरस्यमेतस्याम्०’ इस आगे कहे उदाहरण में। जहाँ कहीं हेतुहेतुमेयक किसी भी शब्द का प्रयोग नहीं होता, वहाँ वह अर्थ होता है। इसका भी उदाहरण दिया जायगा। इस प्रकार उपपादकपोपाद्यभावेन साध्यसाधनभाव पदार्थ और वाच्यार्थ में शाब्दत्व और अर्थत्वभेद से चार प्रकार का होते हुए भी अनेक प्रकार का वतलाया गया है। इस सब प्रकार के साध्यसाधनभाव की जड़ अविनाभाव होता है। वह होता है प्रमाणों से सिद्ध।

साध्यसाधनभावश्वानयोरविनाभावावसायिकृतोडविन्तव्यः । स च प्रमाणमूलः । तच्च त्रिविधम्। यदाहुः—

“लोको वेदस्तथाध्यात्मं प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम् ।” इति ।

तत्र लोकप्रसिद्धार्थविधयो लोकः । यथा—

“कयासि कोपेन सरसापराधः पादानतः कोपनयावधूतः । यस्या: करिष्यामि हृदयानुतापं प्रचालशाय्याशरणं शरीरम् ॥”

अत्र हि पादानतितद्वधूतयोः सरसापराधकोपनत्वयोश्च लोकप्रमाणसिद्धः कार्यकारणभावस्तन्मूलकः साध्यसाधनभावः । यथा वा—

“चन्द्रं गता पद्मगुणान् न भुड्केे पद्माश्रिता चान्द्रमसीमभिख्यराम् । उमामुखं तु प्रतिपघ लोला द्विसंध्रया प्रीतिमवाप लक्ष्मीः ॥”

अत्र हि पद्मगुणानां चान्द्रमस्या अभिख्यायाश्च मुगपद्भोगे लक्ष्याया यत् कारणद्वयं रातिसङ्कोचवदिवानुदयलक्षणं तल्लोकप्रसिद्धमेवेति नोपादेयतामहंती

इनका यह साध्य-साधनभाव भी अविनाभावसंवन्ध के निश्चय से होता है। यह निश्चय प्रमाणों पर निर्भर है। प्रमाण तीन प्रकार का होता है। जैसा कि कहा गया है—‘लोक, वेद और अध्यात्म ( मानस प्रत्यक्ष ) ये तीन प्रमाण हैं ।’ इनमें लोक प्रमाण का विषय लोक में प्रसिद्ध रहता है। जैसे—

‘हे कामिन् ! तुर्त के अपराधी और पैरों पर पड़े तुम ( ऐसी ) किस कोप्तन ( प्रमता ) द्वारा झिड़क दिये गये हो जिसकी काया को मैं प्रबल तपयुक्त और प्रवाल शाखा पर पड़ी हुई बना दूँ ।’ यहाँ पादानति और उसके अवधूनन तथा सरसापराधता (ताजा अपराध ) और कोपनता का कार्य कारण भाव तथा उस पर आश्रित साध्यसाधन भाव लोकानुमव से सिद्ध है। और जैसे—

‘लक्ष्मीः ( शोभा ) जव चन्द्रमा में रहती है, तब चन्द्रप्रभा का । किन्तु उमा के मुख में पहुँचकर इस चञ्चल लक्ष्मी ने दोनों पर आश्रित आनन्द पाया ।’ यहाँ लक्ष्मी द्वारा पद्मगुणों और चन्द्रकान्ति का एक साथ भोग न कर सकने के जो रात्रि संकोच ( पद्म में ) और दिवानुदय ( चन्द्र में ) दिन में न उगना ये दो कारण हैं, वे लोकप्रसिद्ध ही हैं। इसलिए उनका शाब्दतः कथन आवश्यक नहीं।

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प्रथमो विमर्शः

प्रमाणं च त्रिधा लोके वेदाध्या त्मरू परत्पर वेन । तत्राध्यात्मं प्रत्यक्षम् । निवृन्ध्यानिवन्धप्रसिद्धरू पवेदः । अनिवन्धप्रसिद्धस्वभावं लोकः । भण्य्या प्रत्यक्षागमस्वरूपं प्रमाणद्वयं स्वीकृतम् । आगमस्थ निवन्ध्यानिवन्धप्रसिद्धरू पवेन द्विविध्यम् । अनुमानमत्र न गणितं तस्योपकार्य-स्वेन प्रस्तुतत्वात् । तत्र चन्द्र गतित्वन्न कारणस्वं साधनमत्युपपत्तमति प्रसिद्धत्वात् ।

लोक, वेद तथा अध्यात्म रूप से प्रमाण तीन प्रकार का होता है । उसमें अध्यात्म है प्रत्यक्ष और वाङ्मय रूप है वेद । लोक वह है, जिसका रूप वाङ्मयात्मक नहीं होता । इस प्रकार प्रत्यक्ष और आगम ये दो प्रमाण दूसरे शब्दों में स्वीकार कर लिये । आगम लिखित और अलिखित रूप से दो प्रकार का होता है । यहां अनुमान नहीं गिना गया । वह तो उपकार्य रूप से प्रस्तुत है । इनमें से 'चन्द्र गतिता' यहां कारणभूत साधन नहीं कहा गया; क्योंकि वह अतिप्रसिद्ध है ।

कयासि कामिनि——यहां सापराधत्व पादानतत्वे कारण है, अतः साधन है, वह अर्थ है और पदार्थरूप हैं । और कोपनत्व, अवधूतत्व में उसी प्रकार का साधन है । यहां कार्य-कारण भाव है तो लोक प्रसिद्ध ही, किंतु अति प्रसिद्ध न होने से उसका साधन कहा ही गया ।

शास्त्रमात्रप्रसिद्धार्थविषयो वेदः । वेदग्रहणमितिहासपुराणधर्मशास्त्र-चुपलक्षणं तेषां तन्मूलत्वोपगमात् । यथा—— "अयाचितारं नहि देवमद्रिः सुतां प्रतिग्राहयितुं शशाक । अभ्यर्थनाभूभयेन साधुर्माध्यस्थ्यमिष्टे डयचलम्भतेऽर्थे ॥" अत्र हि कारणभूतस्य भगद्गतस्य सम्प्रदानत्वनिवन्धनस्य याच्ञा-स्वभावे भूधरेन्द्रगतस्य कार्यस्य कन्याग्राहुणशक्तत्वस्याभावोपनिवन्धः शास्त्रमूलः; तथाहि कार्यकारणभावस्य तन्मूलत्वेन प्रसिद्धः । यदाहुः——

"अयाचितानि देयानि सर्वे द्रव्याणि भारत ! अन्नं विद्या तथा कन्या अनर्थिभ्यो न दीयते ॥" अर्थी च सम्प्रदानम् । यदुक्तम्—— "अनिराकरणात् कर्त्तुस्त्यागादिं कर्मणे पिसितम् । प्रेरणानुमितेभ्यो वा लभते सम्प्रदानताम् ॥" एवञ्च कारणानुपल ब्धप्रयोगो डयमार्थे इति मन्तव्यं, यथा नात्र धूमो डग्ने-रभावादिति ।

आध्यात्मिकार्थविषयमध्यात्मम् । यथा—— "पञ्चुपतिरपि तान्‌ध्यानि कृत्स्नादागमयदद्रिसुतासमागमोत्कः । कम परमवशां न विप्रकुरुते विभुमपि तं यदमी स्पृशान्ति भावा: ॥" अत्र हि भगवत्प्रुपतिगतस्य कृच्छ्रादिविषातिवाहनस्य्याद्रिसुतासमाग-

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मोत्कतवस्य चाध्यात्मसिद्ध: कार्यकारणभाव: यन्सूलोङयमनयोस्साध्यसाधनभाव:। स हि द्विविध: शाब्दशार्थश्रेति। सोऽपि च साध्यसाधनयो: प्रत्येकं पदार्थेवाक्यार्थरूपत्वात्, पदार्थस्य च जातिगुणक्रियाद्रव्यभेदेन भेदाद्, धर्माधर्मतया च धर्मस्यापि सामान्याधिकरणय-वैयधिकरणय-भेदाद्, वाक्यार्थस्य च क्रियात्मन: कारकवैचित्र्येण वैचित्र्याद्, यथायोग्यम् अन्योन्यसाड्‌र्याद्द्रुविविध इति तस्य विद्धमात्रमिदमुपदर्श्यते।

वेदप्रमाण वह है, जिसका विषय एकमात्र शास्त्र में प्रसिद्ध हो। वेद शब्द इतिहास, पुराण, धर्मशास्त्र आदि का उपलक्षण है—क्योंकि वे वेदमूलक माने गये हैं। उदाहरण के लिए— ‘न माँगनेवाले महादेव जी को हिमाचल पुत्री स्वीकार नहीं करा सका। साधुजन माँग खाली जाने के डर से अभीष्ट वस्तु के लिए भी उदासीनता लिए रहते हैं।’ यहाँ कारणभूत भगवद्गत सम्प्रदानत्व का कारण याचना के अभाव पर कन्या-ग्रहण करा सकने का अभाव-कथन शास्त्रमात्रसिद्ध है, क्योकि उनके कार्यकारणभाव का शास्त्रमूलत्व ही प्रसिद्ध है। जैसा कि कहा गया है—‘हे भारत ! और सभी पदार्थ बिना माँगे दिए जा सकते हैं, (परन्तु) अर्थ, विद्या और कन्या वैचाह व्यक्ति को नहीं दिए जाते। अर्थी ही संप्रदान है। जैसा कि कहा है— कर्त्तों के त्याग का अङ्क, करण द्वारा ईप्सित पदार्थ निराकरण के अभाव, प्रेरणा और, अनुमति द्वारा सम्प्रदान को प्राप्त होता है।

इस प्रकार यह कारण की अनुपलब्धि का प्रयोग अर्थ माना जाना चाहिए—जैसे यहाँ धुआँ नहीं है, अग्नि न होने से वह। अध्यात्मप्रमाण का विषय आध्यात्मिक होता है (अर्थात्—मानस प्रत्यक्ष हेतु होता है)। जैसे— ‘पार्वती-समागम के लिए उत्सुक पशुपति ने भी वे दिन कठिनाइँ से गुजारे। इन्द्रियों को वश में न रखनेवाले दूसरे किस व्यक्ति को ये मनोव्यवहार विकृत नहीं कर सकते, जब कि विश्व परमेश्वर को भी ये स्पर्श करते हैं !’ यहाँ भगवान् पशुपति द्वारा कठिनाई से दिन बिताने और पार्वती के प्रति उत्सुक होने का कार्यकारणभाव स्वानुभवसिद्ध है, जिससे इनका साध्यसाधन भाव सिद्ध होता है।

वह (साध्यसाधन भाव) दो प्रकार का होता है—शब्द और अर्थ (दो प्रकार का)। वह भी पदार्थ और वाक्यार्थ रूप से दो प्रकार का होता है। पदार्थ भी जाति, गुण क्रिया और द्रव्य के भेद से भिन्न होने से, धर्म और धर्मी होने से, धर्म का सामान्याधिकरणय और वैयधिकरणय होने से, वाक्यार्थ के भी क्रियात्मक होने से कारक की विचित्रता के कारण विचित्र होने से, यथायोग्य परस्पर संमिश्रण से कई प्रकार का होता है, अतः उसका निर्देशमात्र किया जाता है।

अयाचितारमिति। अयाचनं कारणानुपलब्धिरूपमर्थं पदार्थरूपम् । वेदप्रमाणसिद्धकारणभावसमन्वनं याचनं हि कन्याग्राहणशक्तत्वस्य कारणम् । कारणाभावाच्च कार्याभावप्रतीत्युपादानानुमानमेतत् । अनिराकरणादिति । कर्तृनुपादे: । करणेण हिरण्यादिना । ईप्सितम आसुमिष्ठम् । ब्राह्मणादिसम्प्रदानम् । तच्च स्यागार्हं त्यजनस्योपकरणभूतं तेन विनै स्यागसम्भवात् । तच्च त्रिधा

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प्रेरकं याचकब्राह्मणादि । अनुमन्तृ सद्ब्राह्मणादि । अनिराकर्तृ देवतादि । 'पशुपतिरि' त्यादार्थं पदार्थैरुपपद्यात्मप्रामाणसिद्धसम्बन्धं साधनम् ।

१. अयाचितारम्—माँगना कन्या-सम्प्रदान का कारण, न माँगना उसके विरुद्ध उसका आकारण यह है अर्थ और पदार्थ का साधन । याचना कन्यादान की शक्ति का कारण है । उसका कार्यकारणभाव वेदप्रामाणमूलक है । यहाँ कार्य का अभाव साक्ष्य है । उसका साधन है कारण-भाव । यह अनुमान कार्याभाव की प्रतीति कराता है ।

२. अनिराकरणात्—कर्तुं = नृप आदि के । कर्मेणा = हिरण्य आदि से । ईप्सितम् = प्राप्त करने के लिए इच्छित । ब्राह्मण आदि सम्प्रदान । वह त्याग अर्थात् त्यजनक्रिया का उपकरण है । क्योंकि उसके बिना त्याग हो नहीं सकता । वह तीन प्रकार का होता है—१. प्रेरक, माँगनेवाला,

ब्राह्मण आदि । २. अनुमन्ता = अधिकारी ब्राह्मण आदि । ३. अनिराकर्ता = देवता आदि ।

३. पशुपति—इस वाक्य में सम्बन्ध पदार्थ रूप, अर्थ और अध्यात्मप्रामाण सिद्ध है ।

तत्र धर्ममात्रस्य साधनभावे शब्दो यथा—

"प्रजानां विनयाधानाद्रक्षणाद् भरणादपि स पिता पितरस्तस्माद् धर्मस्य समानाधिकरणस्योपादाने सत्यार्थो यथा—

"दृष्टतामुच्य: सुमेधसा गुरुरस्त्वन्ततरस्तु मृष्यते । न महानपि भूतिमिच्छता फलसम्पत्प्रवण: परिक्षय: ॥"

इति । अत्र हि दृष्टिदुदयगतस्यास्वनन्तत्वस्य सुमेधसनत्वस्य च तत्परिक्ष-

यगतस्य फलसम्पत्प्रवणतवस्य दुर्मेधसत्वस्य च वार्ते: साध्यसाधनभावो निबद्ध: ।

धर्मेधर्मिंभावभावे तु पदार्थमात्रस्य साधनत्वाच्छब्द: पव यथा—

"दर्मेन्नात्रनुपतिरविनश्वरति यति: सड्ढात् सतो लालन-

द्विप्रोडनध्ययनात् कुलं कुतनयाच्छीलं बलोपासनात् ।

हीर्मादानवेक्षणादपि कृषि: स्नेह: प्रवासाश्रया-

न्मैत्रो चाप्रणयात् समृद्धिरनयात् त्यज्यत् प्रमादाद्धनम्" इति ।

पवं वाक्यार्थविषयोऽपि साध्यसाधनभावो द्विविधो बोद्धव्य: ।

तत्र "सरस्यामेतस्यामुदरबलिवीचीविलुलितं

यथा लावण्याम्बो जघनपुलिनोल्लड्लनपरम् ।

यथा लक्षयश्वायं चलनयनमनीनयतिकर-

स्थथा मन्ये मरण: प्रकटकुचकुम्भसस्मरगज: ॥" इति ।

उनमें केवल धर्मं की साधनता (हेतुता ) में शब्द ( साध्यसाधनभाव ) जैसे—शिक्षा दिलाने, रक्षा करने और भरण-पोषण करने से प्रजा का ( वास्तविक ) पिता वह था, उसके पिता केवल जन्म के हेतु थे ।

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जव वही धर्मसमन्वयीकरण होता है, तब उसके उपादान में अर्थ ( अर्थात्‌ललभ्य ) साध्य-साधनभाव—यथा—

'सूझ-बूझवाले उत्कृष्ट चछु पुरुष द्वारा दुःखों का अत्यन्त दुःखपरिणामो अभ्युदय भी सह लिया जाता है, फल सम्पत्ति की ओर उन्मुख बहुत बड़ा परिक्षय न हो' यह । यहाँ दुःख-अभ्युदय के अत्यन्त दुःखपरिणामित्व और सुखपूर्वक सहन करना तथा 'परिक्षय के फल-सम्पत्ति-उन्मुखत्व' तथा 'कठिनाई से सहन करना'—इनका साध्यसाधनभाव सम्बन्ध अर्थ दिखलाया गया है ।

धर्मीधर्मिभाव के अभाव में केवल पदार्थ ही साधन ( अहैतु ) होता है, अतः ( वहाँ साध्य-साधनभाव सम्बन्ध ) शब्द ही होता है, यथा—

'उलटी सलाह से राजा विनष्ट होता है, साथ करने से संयमी, दुलार से पुत्र, अ शिक्षा से ब्राक्षण, कुपुत्र से कुल, दुष्टजनों के पास उठने-बैठने से संकोची स्वभाव, नशोले पदार्थों से लज्जा, रखवाली न करने से खेती, परदेश में बने रहने से क्लेश, प्रेम न होने से भित्रता, न्याय न होने से समृद्धि तथा त्याग और अनवधानता से सम्पत्ति' । यह ।

इसी प्रकार वाक्यार्थीष्ट साध्यसाधन भाव भी दो प्रकार का समझना चाहिए । उनमें शब्द, यथा—

क्योंकि त्रिवलीततरंगित लावण्यजल जयनरूपी पुलिन को लोंघता जा रहा है और क्योंकि यह चञ्चल नयनो का मीन भी इसमें पैदा हो गया है, इससे मैं सोचता हूँ, इस सरसी में स्पष्टतः कामरूपी हाथी डूब गया है, जिसका स्तनरूपी कुम्भ दिखाई दे रहा है ।

दृष्टतामिति । तथाहि । शत्रूणां गुरुरपयुदः सुखेन मृष्यते परैः अस्वन्तततरस्वाद्‌

सतिशयेनारमणीयपरिणामल्वात् । तथाहि महानपि परिक्षयः सुखेन न मृष्यते फलसम्प-दौन्मुख्यात् ।

१. दृष्टाताम्—दुःख द्वारा दुःखों का महान् अभ्युदय भी सुखपूर्वक सह लिया जाता है । यदि वह अस्वन्ततर हो अर्थात् परिणाम में अत्यधिक अरमणीय हो तो और बहुत बड़ा भी क्षय नहीं सहा जाता । यदि वह महान् लाभ का उत्पादक हो ।

दुर्मन्त्रान्तकुतनयानम्वादित्यत्र धर्मीधर्मिभावो नास्ति । शब्दं तु पदार्थरूपं साधनम् । लोकप्रसिद्धश्‌ सम्वन्धः ।

२. दुर्मन्त्रान्त—दुर्मन्त्र, कुतनय और अम्वादि यहाँ धर्मीधर्मिभाव नहीं है । साधन जो है, वह पदार्थ रूप और अर्थ है । उनका सम्बन्ध लोक प्रमाण से सिद्ध है ।

अर्थों यथा—

"निवार्येतामालि ! किमप्यसौ बदुः पुनर्‌विवक्षुः स्फुरितोत्तराधरः ।

न केवलं यो महतोऽपभाषते ऋणोति तस्मादपि यः स पापभाक्‌॥"

"दिवं यदि प्रार्थयसे वृथा श्रमः पितुः प्रदेशानुग देवभूमिषः ।

अथोपयन्तारमलं समाधिना न रत्नम्‌न्विष्यति स्म्रियते हि तत्‌॥" इति ।

अर्थ जैसे—

'सखि रोक, इस नामज ब्राह्मचारी का ऊपर का ओंठ फड़क रहा है । फिर से कुछ

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कहना चाहता है। महापुरुषों के प्रति अपशब्दों का प्रयोग करनेवाले ही नहीं, उन्हें सुननेवाला भी पाप में पड़ता है। और जैसे—

‘स्वर्गे यदि चाहनी हो, तो श्रम व्यर्थ है। देवभूमि तो तुम्हारे पिता के ही प्रदेश हैं। यदि पति, तो समाधि आवश्यक नहीं। रख नहीं खोजता, वह खोजा जाता है।’

अत्र वाक्यार्थस्त्य साधनत्वं यत्र तस्स्वन्धो वेदसिद्धः।

निवार्यताम्—यहाँ साधन है वाक्यार्थ। उसका संबन्ध वेदप्रमाणमूलक है।

द्वयं यदि प्रार्थ्यस्य इति। अत्र प्रार्थनीयनिर्हेतुस्य प्रार्थनीयगतं दूरत्ववपरायत्तत्ववाभ्याम्‌सुलभत्वं कारणं, तद्विरुद्धं निकटत्वस्वायत्तत्ववाभ्यां सुलभत्वमिति तदुपलभ्यमानं स्वविरुद्धकार्यस्यैव प्रार्थनस्य श्रमलक्षणप्रकृष्टिपर्यन्तस्तस्यैभावं गमयतीति प्रथमेऽत्रे कारणविरुद्धो-पलधिः।

द्वितीयेऽत्रे तस्मैव प्रार्थ्यितत्वस्याप्रार्थनीयत्वं व्यापकं, तद्विरुद्धं च प्रार्थनीयत्वं तदुपलभ्यमाने स्वविरुद्धस्यैव प्रार्थनस्य तदुपलब्ध्यभावं गमयतीति विरुद्धोपालधिः। ( प्रार्थनीयत्वादेरपि सिद्ध्यं ? ) तदेवं वाक्यार्थंगतात्वेन वाच्यनिष्ठं शुद्धं विध्यनुवादभाव-मस्स्युतरस्यामित्यादौ प्रतिपाद्य तस्मिन्नेव साध्यसाधनभावः प्रतिपादितः।

वाच्यार्थनुमेयार्थविषयत्वेन द्विविधः साध्यसाधनभाव उच्यते।

तत्र वाच्यार्थविषये तस्मिन्निर्णीतेऽनुमेयार्थविषयं निर्हेतुमाह—अनुमेयार्थेति।

अत्र व्यक्तिवादिनो यज्ज्ञात्वेन योज्यं उत्कः स इहानुमेयत्वेनोच्यते, व्यक्‍तेरनुपपत्तेरपि यथ्यमाणत्वात् शब्दस्य व्यापक-रान्तराभावाच्च।

द्वयं यदि प्रा०—यहाँ पूर्वार्ध में कारण के विरुद्ध तत्त्व ज्ञात होते हैं। इस प्रकार की प्रार्थनीय वस्तु की जो प्रार्थना है, उसमें कारण है दूरवर्ती और दूसरे के अधीन होने से प्रार्थनीय की दुर्लमता। उसके विरुद्ध यहाँ प्रार्थनीय निकटवर्ती और अपने अधीन होने से सुलभ बतलाया गया है। प्रार्थनीय के ये ( निकटवर्तित्व और प्रार्थी के अधीन होना ) गुण अपने विरुद्ध श्रमरूप प्रवृत्ति तक की प्रार्थना का अभाव बतलाते हैं।

उत्तरार्ध में व्यापक विरुद्ध वस्तु का ज्ञान हो रहा है। इस प्रकार कि—प्रार्थी वह बनता है, जो स्वयं प्रार्थनीय नहीं बनता। यहाँ उसके विरुद्ध प्रार्थी में प्रार्थनीयता बतलाई जा रही है।

इस प्रकार ‘अस्त्युतरस्यामिति’ इत्यादि में वाक्यार्थ में रहनेवाला वाच्यार्थ का शुद्ध विध्यनुवादभाव बतलाकर उसको संलग्न साध्यसाधन भाव बतलाया है।

वाच्य से अनुमेय अर्थ में दो प्रकार का साध्यसाधनभाव कहा गया है। वाच्यार्थविषय साध्यसाधन भाव का निर्णय हो जाने पर अब अनुमेयार्थ विषयक साध्यसाधन भाव का निर्माण करना आरंभ करते हैं—

अनुमेयार्थविषयो यथा—

"सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषाश्चिरम्‌। शूरैश्च कृतविप्रैश्च यशो जानीत सङ्क्षितुम्‌ ॥"

अत्र हि सर्वत्र सुलभा विभूति: शौरादीनामित्यमर्थोऽनुमीयत इत्ये-तदितिनिष्यते। अनुमितानुमेयार्थविषयो यथा—

"पर्युः शिष्टैन्द्रकलामनेन स्पृशोति सख्या परिहासपूर्वम्‌ । सा रक्ष्यतां चरणौ ऋताश्चीमद्व्येन तां निवंचनं जगात् ॥"

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इत्यग्र हि नखरक्षणानन्तरं परिहासपूर्वं सख्या कृताशिषो ददौ चेद्यौ यदेतद्वचनं माल्येन हननं तत् तदनुभावभूतं तस्या: कौतुकोत्सुक्यप्राहर्‌षलज्जादिष्यभिचारिसम्पदमनुरूपयति । सा चानुमीयमाना सती भगवति भवे भरतैर रतिमनुरूपयति । यथा च—

"एतद्विदाने देवैः पार्श्वे पितुर्‌घोमुखी । लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती ॥"

यथा वा—

"प्रयच्छतौ च्चैः कुसुमानि मानिनी विपक्षगेहं दयितेन लभ्भिता । न किञ्चिदूचे चरणेन केवलं लिलेख वाष्पाकुलल्लोचना भुवम् ॥"

अनुमेयार्थविषयक ( साध्यसाधन भाव ) जैसे— 'सुवर्णपुष्पी पृथवी' को तीर्थ लोग चुनते हैं—'शूर आदि पुरुषों के लिए विभूति सब जगह सुलभ रहती है' यह अर्थ अनुमान द्वारा प्रतीत होता है । इसका विस्तार आगे किया जायगा ।

अनुमित से अनुमेयार्थ सम्बन्धी ( साध्यसाधन भाव ) यथा— 'पैरों में अलता लगाकर सखी द्वारा परिहासपूर्वक यह आशीष देने पर कि—'इससे पति के सिर की चन्द्रकला छूटना' पार्वती ने बिना कुछ कहे उसपर माला से चोट की ।

यहाँ नख को रंगने के बाद परिहास के साथ सखी द्वारा आशीर्वाद पाकर पार्वती का बिना बोले माला द्वारा जो प्रहार करना है, वह अनुभव है । उससे पार्वती के कौतुक, उत्सुकता, प्राहर्‌ष, लज्जा आदि अनेक व्यभिचारी भावों का अनुभव होता है और अनुमान द्वारा प्रतीत उन व्यभिचारों भावों द्वारा भगवान रुद्र पर पार्वती के अनुराग का अनुभव होता है । और जैसे—

'देवों' के ऐसा कहने पर पिता के पास नाँचें मुँह किये बैठी पार्वती नीलकमल की पंखुड़ियाँ गिनने लगी या जैसे—'ऊँचे लगे पुष्पों का उपहार देते हुए प्रियतम द्वारा सपली के नाम से पुकारी गयी मानवती प्रिया बोली कुछ नहीं, केवल डबडबाई आँखों से पैरों तले की भूमि कुरेदने लगी ।'

यहाँ व्यक्तिवादी ने जो-जो अर्थ व्यङ्ग्यरूप से स्वीकृत किये थे, उन सबको अनुमेय स्वीकार किया बताया जा रहा है । कारण कि व्यञ्जना बनती नहीं है, और आगे शब्द में किसी भी अन्य व्यापार का अभाव बताया जानेवाला है ।

पत्‍युर्‌ति । अत्र विशिष्टाशीर्‌वचनमौत्सुक्यादेर्‌थ्यभिचारिणो भाव:, सख्या माल्येन ताडनं च अनुभव: । तौ व्यभिचारिभावं कारणत्वात कार्यंव्‍वाअच गमयत: । स च सहकारिरत्‍वादू रूपमिव रसो रतिस्थायिभावं गमयति ।

पत्‍यु:—इस पद में विशिष्ट आशीर्वाद औत्सुक्य आदि व्यभिचारी भावों का विभाव है । सखी को माला से पीटना अनुभव है । ये व्यभिचारी भाव का अनुभव कराते हैं । विभाव कारण रूप से, अनुभव कार्य रूप से । वह व्यभिचारी भाव ( X X X ) सहकारी होने से रति रूप स्थायीभाव का अनुमान कराता है ।

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एवंवादिनीतिः । अत्र लज्जाद्यस्य व्यभिचारिणो देवर्षेरेकंवादिनं पितृश्र पाथ्रेर्वर्तितवं कारणस्वेन द्वे विभावौ, तथाधोमुखत्वं लीलाकमलपत्रगणनं च कार्यस्वेन स्थितौ । सा च गम्यभूता लज्जा सहचारित्वादिति गमयति । तत्स्वानुमितानुमेयार्थनिष्ठत्वम् ।

एवंवादिनि—यहाँ लज्जा रूप व्यभिचारी के प्रति विभाव हैं—ऋषिका ऐसा कहना और पिता का पास होना । मुख नीचा करना और कमल की पंखुड़ियाँ गिनना अनुभाव है । वह गम्यभूत लज्जा सहचारी होने से रति का अनुमान कराती है । इस प्रकार यहाँ इन दोनों पद्यों में अनुमितानुमेयार्थविषयक साध्यसाधक है ।

विमर्शः—एवंवादिनि देवर्षौ में देवर्षि पद अंगिरा का परामर्शक है । पंडितराज जगन्नाथ उसे नारद का परामर्शक लिख गये । देवर्षिपद से नारद की प्रसिद्धि ने उन्हें भरमाया है दृश्य = रसगंगाधर पूर्वोक्तानन्त ।

एवं प्रयच्छते स्यात्रावसेयम् । अत्र हि माननी प्रकृत्यैवाभिमानवती न तु सर्वसहा दयितेन आत्मरागविषयं न तु पतिमात्रेण । पुष्पाणि प्रदातुम् । विपक्षस्य विद्वेषिण्या: सपत्न्या: न तु तत्सस्थायि: गोत्र गोत्रे त्रायते=न्यासेऽस्माद् व्यभिच्छिन्नान्नियतविषयत्वेन स्थापयति यत्नेन लम्यता गोत्रस्वखलनविषयभावं प्राप्तितविशिष्टमनुभावमकरोदिति तावदर्थः । अत्र लज्जादेव्यभिचारिणो विपक्षगोत्रप्रहणं विभावो 'न किञ्चिदूचे' इत्यनुभावश्र गमकत्वेन स्थितौ । स च लज्जादिः सहचारित्ववादिद्रिव्यप्रलम्भं गमयतीति ।

पूर्वं प्रयच्छते—इसी प्रकार 'प्रयच्छत' इस पद्य में भी योजना करनी चाहिए । यहाँ भामिनी = स्वभावतः अभिमानती, सब कुछ सह लेनेवाली नहीं, दयित—अपने अनुराग का पात्र, न कि केवल पति के, पुष्प देले के लिए, विपक्ष-विद्वेषिणी सौत का, न कि किसी और का, गोत्र = वाणी को त्रायते = दूसरे से हटाकर किसी नियत अर्थ में स्थिर करता है, जो वह 'नाम' उसको स्वखलन द्वारा पहुँचाथी गयी, विशिष्ट अनुभव करने लगी । यहाँ लज्जादि व्यभिचारी का सपत्न्या का नाम लेना विभाव है । कुछ नहीं बोलना अनुभाव है । ये दोनों गमिक हैं । वह लज्जा आदि सहचारी होने से इष्यादिव्यप्रलम्भ का अनुमान कराते हैं ।

यथा च वाक्यार्थविषये साध्यसाधनभावे साध्यसाधनप्रतीत्यो: सुलक्ष्य: क्रमभावः तथा वस्तुमात्रादावनुमेयविषयेडप्यवगन्तव्यः । केवलं रसादृष्ट-नुमेयेष्वयमसंलक्ष्य क्रमो गम्यगमकभाव इति सहभावग्रहान्तिमात्रकृतस्तत्रा-न्येषां व्यङ्गच्यव्यङ्कभावाभ्युपगमः, तत्रिबन्धनश्र ध्वनिव्यपदेशः । स तु तत्रौपचारिक पव् मुख्यो न मुख्यः तस्य वक्ष्यमाणनयेन बाधितत्वात् । उपचारे च प्रयोजनं सचेतनचमत्कारकारित्वं नाम । तद्वि मुख्ये चित्रपु-स्तकादौ व्यक्तिविषये परिदृष्टमेव ।

वाच्यो ह्यर्थो न तथा चमत्कारमातनोति यथा स पव् चिचिनिषेधादि: कारक्विधेयतामनुमेयतां वावतीर्ण इति स्वभाव एवायमार्थानाम् । तथा हि—'मश्रामि कौरवश्रातं समरे न कोपाद् दुःशासनस्य रधिरं न पिबाम्युरस्तः । सश्वर्णयामि गदया न सुयोधनोरू सन्धि करोतु भवतां नृपतिः पशोन ।।'

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इत्यततो

'लक्षागृहानलविषादवधू प्रवेशौः प्राणेषु वित्तनिचयेषु च नः प्रह्हृत्य । आकृष्यपाण्डववधू परिजनकेशःः स्वस्था भवन्तु मयि जीवति धार्तराष्ट्राः ॥' इत्यतश्र यथा विविधनिषेधयोःश्राहतावगतिर् तथा शब्दाभिधेययोरिति । यथा च प्रतिषेधद्रयायुमितस्य प्रकृतस्येवार्थस्य विधेयश्राहतावगतिर् तथा स्वशब्दवाच्यस्य । द्विविधश्र प्रतिषेध उक्तः सुम्रि्टडान्तविषयत्वात् ।

तद्यथा—

'अथाऽऽदिराजादवतार्य चक्षुर्योऽतेति जन्यामवदत् कुमारो । नासौ न काम्यो न च वेद सम्यक् द्रष्टुं न सा मिलरुचिर्fिं लोका: ॥' इति । सम्भाव्यनिषेधनिवर्त्तनं हि प्रतिषेधद्रयस्य विषय द्वति ।

तथा चाह ध्वनिकार:—'सारूप्यो ह्यार्थः स्वशब्दानभिधेयरत्वेन प्रकाशितः सुतरां शोभामावहति । प्रसिद्धिश्रेयमस्त्येव विदग्धपरिषत्सु यदभिमततरं वस्तु व्यङ्ग्यत्वेन प्रकाशयते न वाच्यत्वेन' इति ।

जिस प्रकार वाक्यार्थ गत साध्यसाधन भाव में साध्य और साधन के ज्ञान का क्रम सरलतया प्रतीत हो जाता है, उसी प्रकार जहाँ वस्तुमात्र अथवा अलङ्कार अनुमेय होते हैं, वहाँ भी, केवल रसभाव—आदि के अनुमेय होने पर इस गम्यगमकभाव का क्रम एकाएक प्रतीत नहीं होता, इसलिए दोनों की साथ-साथ प्रतीति के भ्रम से दूसरों ने व्यङ्गय-व्यञ्जकभाव सम्बन्ध मान लिया है और उसके आधार पर ध्वनिव्यवहार। वस्तुतः उसे उन स्थलों में औपचारिक मानना चाहिए । मुख्य या वास्तविक नहीं । क्योंकि उसका आगे दी जानेवाली युक्तियों द्वारा बाध हो जाता है । उपचार का प्रयोजन सहृदयों के प्रति चमत्कारकारिता ही है । और वह ( चमत्कारकारित्व ) वास्तविक चित्र या पुस्तक लिपिकर्म आदि में, जो व्यञ्जना के विषय हैं—देखा ही गया है ।

जो अर्थ वाच्य होता है, वह उतना चमत्कार नहीं करता। जितना विधिनिषेधादि रूप वह्ही अर्थ काकु द्वारा कहे जाने या अनुमान द्वारा प्रतीत होने पर, यह अर्थों का स्वभाव ही है ।

उदाहरणार्थ—

'यदि आप लोगों के राजा साहब किसी शर्त्ते पर सन्धि करें तो क्या मैं सौ कौरवों को युद्ध में नहीं मारूँगा ? क्या दुःशासन की छाती का खून नहीं पीऊँगा ? क्या दुर्योधन की जाँघें गदा से चूर न करूँगा ?? इससे, और

'लक्षागृह की आग, विषमिला अन्न और धृत की सभा में घुसाकर, हमारे प्राण और सम्पूर्ण सम्पत्ति पर आघात करके, पाण्डवों की पत्नी ( द्रौपदी ) के वस्र तथा बाल खींचनेवाले ( वे ) धृतराष्ट्र के वच्चे मैं जीता रहूँ और स्वस्थ बनें ।' इससे विधि और निषेध में जितनी चारुता प्रतीत होती है, उतनी चारुता शब्द द्वारा कहे गये विधि-निषेधों में नहीं । और जिस प्रकार दो निपेधों से सिष्पन्न हुए प्रकृत विध्यर्थ का सौन्दर्य प्रतीत होता है, उस प्रकार अपने वाचक शब्द्रों द्वारा वाच्य नहीं ।

चित्रपुस्तकादाविति । आलेख्यलेख्यादौ सन्तमसावस्थिते प्रदीपादिना प्रकाशिते ह्रटि-स्थायुतार्थप्रकाशनाच्चमत्कारो जायते । तद्वद्रसादाविस्युपचारप्रयोगजनम् ।

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प्रथमो विमर्शः

सर एव विधीति । इहाभिधेयानभिधेयत्वेन द्विविधोऽर्थः । अभिधेयो विधिनिषेधादिः प्रसिद्ध एव । अनभिधेयः पुनः काकाभिधेयोऽनुमेयश्रेति द्विविधः । प्रत्येकं च विधिनिषेध-'घादिरूपपचेन .मेदः । तत्र काकाभिधेयो विधिनिषेधरूप इहोदाहृतः । अनुमेयः पुनः 'अत्ता एथे'स्यादौ 'भम धीमिअ', इत्यादौ चोदाहरिष्यते । यो ह्यनभिधेयो विधिः स कापि निषेधद्वयं नामार्थनिष्ठमाक्ष्यार्थनिष्ठं च द्विविधमुदाहतम् ।

चित्र या लिपि आदि गहरे अंधकार में रखी हो तो प्रदीप आदि द्वारा प्रकाशित होने पर एकाएक अदृष्ट वस्तु के प्रकाश से चमत्कार होता है । उसी प्रकार रस आदि में चमत्कार होता है । यहाँ उपचार द्वारा बतलाता था । रस एवं विधि—अर्थ दो प्रकार का होता है—अभिधेय और अनभिधेय । अभिधेय विधिनिषेध आदि हैं, वे प्रसिद्ध ही हैं । अनभिधेय दो प्रकार का होता है । काकु से कथित और अनुमेय । फिर दोनों विधिनिषेध रूप से दोनों प्रकार के हो जाते हैं । उनमें से काकु द्वारा कथित विधिनिषेधात्मक अभिधेय यहाँ बतलाया गया । अनुमेय आगे 'भमधिमिअ' आदि में बतलाया जायगा। जो अर्थ अनभिधेय विधि है, वह कहाँ भी होता हो । दो निपेध—नामार्थ निष्ठ और आख्यार्थनिष्ठ = भी वतला दिये गये।

प्रतिषेध दो प्रकार का कहा गया है—सुननेवाले-विधेयक और टिड्नते-विपयक । यथा—'इसके बाद अंगराज पर से ऑँखें हटाकर कुमारी (इन्दुमती) ने प्रतिहारों सुन्दरता से कहा—चलो ! यह नहीं कि अंगराज सुन्दर न था और यह भी नहीं कि वधू (इन्दुमती) परख नहीं जानती थी । सच्चि ही लोगों की अलग-अलग होती है ।'

दो निषेधों का विषय होता है संभवित निषेध का परिहार । वैसा ही ध्वनिकार ने भी कहा है—'सारभूत अर्थवाचक वाचन्द्र से (अभिधा द्वारा ) न कहा ( व्यंजक द्वारा ) व्यज्जना से व्यक्त किया जाय तो असाधारण चमत्कारकारी होता है । विदग्धजनों में यह प्रसिद्धि है कि अधिक अभिमत वस्तु व्यङ्गचरूप से ही प्रकाशित की जाती है, वाच्यरूप से नहीं ।

विमर्शः : वैसा ही इस अंश का संबन्ध—पूर्वोक्त जो अर्थ वाच्य होता है, वह उतना चमत्कारी नहीं होता था 'इस वाक्य से है ।'

आचायोस्सु क्रमस्य सुलकसत्वादू आान्तिरपि नास्तीति निनिबन्धन एव तन्नध्यगयपदेशाग्रहः । अत पच श्रूयमाणानां शब्दानां ध्वनिर्यपदेश्यानामन्तः स्फोटोऽभिमतस्यार्थस्य व्यज्जकत्वकभावो न सम्मव-तीति व्यज्जकत्वसाम्यादू यः शाब्दार्थोऽतमानि काव्ये ध्वनिर्यपदेशः सोऽप्यनुप-पत्रः, तत्रापि कार्यकारणमूलस्य गम्यगमकभावस्योपगमात् ।

प्रथम दो वस्तु और अलंकार का क्रम स्पष्ट प्रतीत होने से आान्ति भी नहीं है, इसलिए उनमें व्यज्जकत्व की अभ्रित भी निमूल है । इसलिए ध्वनि नाम से पुकारे जानेवाले और सुने जाते जो शब्द्र हैं, उन्हें उनके अन्त में आनेवाले स्फोटरूप से मान्य अर्थ के साथ व्यज्जकव्यज्जकभाव संभव नहीं। इसलिए व्यज्जकत्व के साम्य से शाब्दार्थरूप काव्य में जो ध्वनि-व्यवहार किया गया, वह भी ठीक नहीं । वहाँ भी कार्यकारणभावमूलक गम्यगमकभाव ही माना जाता है ।

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श्रूयमाणानामिति । वर्णानां ध्वनिव्यपदेश्यानां व्यञ्जकानां तथा स्फुटत्वस्मादर्थ इत्यन्वर्थेनात्रः स्फोटस्यानस्यबुद्धिनिर्ग्राह्यस्वाखण्डवाचकस्य जन्यजनकभावेन गम्यगमकत्वाद् व्यङ्ग्यव्यञ्जकत्वमिति तर्सास्येन व्यङ्ग्यव्यञ्जकत्वघटनमयुक्तमेव ।

श्रूयमाणानाम्——ध्वनि कहलानेवाले वर्ण व्यञ्जक हैं। ‘जिससे अर्थ स्फुट होता है’—इस अभिप्राय से सात्विक नाम का आरोप, जो अन्तिम वर्ण के अन्तिम भाग में परा-परा ज्ञात होता है उसके साथ उन वर्णों का जन्यजनकभाव संबन्ध है। अतः गम्यगमकभाव संबन्ध होने से व्यञ्ज्यव्यञ्जकभाव संबन्ध नहीं बनता। अतः उसके सादृश्य पर व्यङ्गयव्यञ्जकत्व की योजना काव्य में ठीक नहीं ।

विमर्शः : आनन्दवर्धनने ‘ध्वनिरिति० बुत्रैयैंः’ समाम्नातपूर्वः और ‘ध्वनिरिति सूरिभिः कवितः’ द्वारा यह सिद्ध किया था कि वाच्य के अतिरिक्त जो एक प्रतीयमान अर्थ होता है, उसकी प्रतोति अभिधा और लक्षणा से नहीं हो सकती। अतः उन्होंने उनसे भिन्न एक व्यञ्जना नामक शब्दवृत्ति को स्वीकार किया था। उसको प्रामाणिक तथा शास्त्रानुमोदित सिद्ध करने के लिए उन्होंने वैैयाकरणों के स्फोटवाद को अपनाया । वैैयाकरण लोग स्फोट नामक एक व्यापक और नित्य शब्द की कल्पना करते हैं। उसकी अभिव्यक्ति में सुनाई देते शब्दों को कारण मानते हैं। इस प्रकार सुनाई पड़नेवाले शब्द व्यञ्जक और स्फोट व्यङ्गय माना जाता है। महिमभट्ट व्यङ्गयव्यञ्जकभाव वहाँ मानते हैं, जहाँ ज्ञाप्य और ज्ञापक की प्रतोति एक साथ होती हो। आगे-पीछे होने पर उसमें वे कार्यकारणभाव मानते हैं । ध्वनि वर्ण और स्फोट की प्रतोति में यह बात नहीं है। वह एक साथ नहीं होती। अतः वहाँ भी कार्यकारणभाव सम्बन्ध है। जब स्फोट में भी व्यञ्जना नहीं तो उसके आधार पर काव्य में भी व्यञ्जना मानना ठीक नहीं। वस्तु और अलङ्कार ध्वनि में भी प्रतोतिगत पौर्वापर्य है। अतः उनमें भी गम्यगमकभाव ही मानते हैं। रसध्वनि में ‘वह नहीं है। ग्रन्थकार उसे पूर्वपक्ष रूप से उपस्थित करते हैं। यह पूर्वपक्ष ‘तद्‌दृश्‌ व्यङ्गयप्रतीतो वाच्यावभासक इति’ तक चलता है। उसके बाद ‘उच्यते’ से खण्डन चलता है।

न तु विभावादिवाच्यार्थसमकालमेव रसादीनां भावानां प्रतीतिरुपजायमानसर्वैरप्यवधार्यते । न तु तत्रान्तरा सम्बन्धसमरणादिविग्रह्रव्यवधानसंवित्तिः काचिद् ।

सभी सामाजिकों का अनुभव है कि रति आदि स्थायीभावों की प्रतोति उसी समय होती है, जिस समय विभाव आदि वाच्यार्थों की प्रतोति होती रहती है। वहाँ ऐसी तो कोई बात नहीं है कि बीच में किसी संबन्ध आदि के स्मरण से विग्रह्रूप कोई व्यवधान होता हो।

न तु विभावादित्यादिना विभावादिभिस्सह रसादीनां निमित्तनिमित्तभावेन क्रमिकप्रतीतिसिद्धेर्ध्वनिकारेणाभ्युपगतत्वान्मुख्यं व्यङ्गयत्वं दूषयित्वा गम्यत्वं समर्थिततम् । अलौकिकचमत्कारसिद्धिप्रयोजनश्र व्यङ्गयत्वोपपचारः संश्रितः ।

तत्र व्यक्तिवादिनो व्यङ्गयत्वाभ्युपगमेड्यमिप्रायः——यह विभावादिस्वभावनिमित्तप्रतिपत्तिकाले निमित्तिनो रसादेः प्रतिपत्तिनास्ति, निमित्तिनो निमित्तमुखप्रविष्ट्वेन; तततो व्यङ्गयत्वं नोपपद्यते। गम्यत्वं पुनरिन्द्रियोधमेवेति तावद् भवतोऽनुमानवदिनः परमार्थः । न चैतदस्माभिरपहूयते घटप्रदीपादौ व्यक्तिविषये तथैा दर्शनात् । किन्तु व्यङ्गयाभिमतस्य

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प्रथमो विसर्गः

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रसादेर्यंदा प्रतिपत्तिर्जायते, तदा व्यञ्जकस्य विभावादेः प्रतिपत्तिरं निवर्त्तते तत्त्सहभावेन रसादेः प्रतीतेः । अलङ्क्यमव्यङ्ग्यत्वेन तु वास्तविकाभ्युपगमो व्यञ्जकाभिमतविभावादिद्रुपतेःल्युपक्रमाभिप्रायेण । व्यञ्जकप्रतीतिकाले हि नियमेन व्यङ्ग्यप्रतीतिरिति नामाकाङ्क्षयः । व्यङ्ग्यप्रतीतिकाले तु नियमेन व्यञ्जकप्रतीतिरभवत्येव व्याप्तेराक्रम्यं व्यङ्क्तिश्व संसर्गिता। तथा जोक्म्र ‘न हि व्यङ्ग्ये प्रतीयमाने वाच्यबुद्धिदूररीभावति वाच्याविनाभावेन तस्य प्रकाशनादिस्यादि, न तु विपर्ययेरणोक्‌—‘न हि वाच्ये प्रतीयमाने व्यङ्ग्यबुद्धिदूररीभवती’ति ।

निमित्तानिमित्तिभावस्तु नाङ्गीकृतोऽस्माभिः। केवलं सोऽन्यपादशो गम्यगमकभावप्रयोजकौ, यत्र गम्यस्य गमकौपरागो न प्रतीयते। अन्यैरश्र्क्ष व्यङ्ग्यव्यञ्जकङ्कभावप्रयोजको, यत्र प्रत्यायकस्य प्रत्यायकौपरागप्रतिपत्ति। तेन नास्ति रसादीनां व्यङ्ग्यत्वं विप्रतिपत्तिः ।

यदि विभावादीनां रत्यादीनां च कत्र्तिमत्वमाश्रित्यनुमानसैव समर्थितं तम्‌ । औपमानिकं च व्यङ्ग्यत्वं स्थापितम्‌ । तदङ्ग्यसमौचीनम्‌, यतः सहृदयानुमितमेव चर्व्यितृत्स्वाद्वर्णनानुप्राणितवाचो रसस्य तद्रूपमेव रसस्वरूपं निरूपणीयम्‌ । न रसादिरनुकार्यस्थः, नानुकार्यस्थः; केवलं देशकालप्रकृत्यवस्थाप्रतिनियमाविरोधनेन साधारण्येन प्रतीते। । रामानु-कत्नोंरपि तत्रानुप्रवेशात्‌ तद्रुतत्वेनापि व्यपदेशो नातिवासमृद्धः । न तु तद्रुतत्वेनैव तस्य व्यवस्थानं युक्तं यतः ‘स्थायियेव रसो भवेदि’ति मुनिवचनप्रामाण्यात्‌।

स्थायिनो रसत्वे नीरसानां च रसचर्वणाभावे सद्दाविचारसनात्मकरस्यादिस्थायिभावानां चर्वणैकगोचराणां रसत्वमिल्यास्माकीनो राद्धान्तः। न च तत्र रत्यादीनां रसानां कत्र्तिमत्वम्‌ । नापि कारणादीनां साधारण्येन प्रतीतेरविभावादिव्यपदेश्यानां वस्तुसद्भावित्वात्‌ कत्र्तिमत्वम्‌ । तथाभूतसहृदयप्रतीतिगोचराणामेव तेषां मुख्यतया विभावादिस्वम्‌, अन्येषां तु कारणादिस्वम्‌ । ‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः’ इति मुनिनै-तदाश्रयेनैव लोकोत्तरविभावादिरूपद्वयपदिष्टं च । तस्मादिगम्यमान एव वासनात्मा रसत्वादिमेव व्यङ्ग्यत्वं रसस्य नोभपचारिकं तात्प्रयुनुमेयस्वमिति तावत्‌ । एवं भावादीनामपि श्रेयस्मू ।

यत्तु सदसद्विषयत्वेन चतुर्विधा व्यक्तिरत्नमीलिता तदपि न सङ्क्तं घटप्रदीपन्याय-स्थातरेष्ट्रस्वात्‌ । योजपीन्द्रिगोचरताप्रतिप्रसङ्ग उद्दावितः सोऽप्यसमञ्जसः । न ह्यात्मीयेन लकक्षणेन परमतं दूष्यते । न हीनद्रिगोचरतापत्तिः केनचिद्यप्यलकक्षणं कृतं ‘स्वज्ञानेनान्यधी-हेतुः सिद्धोऽर्थो मतः’ । यथा दीपो घटस्ये’ति सामान्येन धीगोचरतापत्तिलकक्षणस्वाध्यक्षे । तत्क्षण रसादौ व्यङ्ग्यत्वमनवद्यमेव ।

यत्‌ पुनर्वस्वलद्वारयोरनियमेन वाच्यानन्तरकालभविल्वेन प्रतीतेऽव्यङ्ग्यत्वमसमञ्जसं भवत्यादियुक्तं, तत्र प्रतीवविधीयते । इह शब्दस्याभिधालकक्षणाभ्यां द्विविधो व्यापारश्विरन्त-नैरस्युपगतः । न स तुतीयकक्षान्निचिसेऽर्थे प्रगल्भते इति तत्र व्यापारान्तरमभ्युपेयसम्‌ । रसादौ च तत्क्षणकक्ष्ये व्यक्ष्णमुपपादितमिति ह्यापि तदेव संश्रयितुं युक्तम्र । यत्तु तत्‌ वाच्यव्यङ्ग्ययोः सहप्रतीतिनोऽस्तीश्रयुक्तं तदपि न युक्तं रसादिन्यायेन व्यङ्ग्यप्रतीतिकाले वाच्यस्यापि प्रकाशकस्य प्रतीतेः । वाच्यकाले तु यद्यङ्ग्यस्य न प्रतीतिस्तन्न दूषण-मिश्रयुक्तमेव ।

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नन्विरोधिन्यञ्ञयप्रतीतिकाले वाच्यस्य कथञ्चित् प्रतीतिरस्तु। 'भ्रम धरिमउ' इत्यादौ तु विरोधिन्यञ्ञयप्रतीतिकाले वाच्यस्य कथं प्रतीति: ? नैप दोष: ! तत्रापि प्रकारकतया ! ( यत्र तु ? ) ततोऽसत्येनापि प्रतीतिसद्भावाद् व्यङ्ग्यत्वं नासमञ्जसं किश्चित् यतः काव्यार्थो गोष्यमानत्वेन प्रतिपत्तुमात्रस्याप्रतिभातः सहृदयस्यैव भासते जातीपलाण्डुन्यायेन न ( गुम्भि ? ) कुसृतस्य प्रकटनात् ( इति ) न्यायक्तिवाचोयुक्तिरेव लो, केकी समीचीनति तत्र व्यक्तिकरवमेव साधीय इति।

ध्वनिकार ने 'न तु विभावादि' इत्यादि द्वारा माना है कि विभावादि के साथ रस का कार्य-कारणभाव संबन्ध है । उनकी प्रतीति आगे-पीछे होती है अतः उनमें क्रम भी है । इसलिए वस्तुतः रस आदि व्यङ्ग्य नहीं कहे जा सकते । उन्हें गम्य ही मानना होगा । लोक की साधारण अनुभूति से मित्र आनन्दानुभूति के रस आदि को लक्षणा द्वारा औपचारिक रूप से व्यङ्ग्य कहा गया है ।

रस आदि का व्यङ्ग्य मानने में ध्वनिकार का अभिप्राय यह है— ( अनुमानवादियों का पूर्वपक्ष)—अनुभव ऐेसा है कि विभावादि रूप कारण की प्रतीति के समय रस आदि रूप कार्य की प्रतीति नहीं होती । क्योंकि कार्य का ज्ञान कारण के ज्ञान के बाद ही हो सकता है । इसलिए रसादि में व्यङ्गयत्व मिद्ध नहीं होता । उसके गम्य होने में कोई वाधा नहीं है यह आप अनुमानवादियों का कथन है ।

( व्यक्तिवादियों का उत्तरपक्ष )—हम ध्वनिवादियों आप लोगों की इस तथ्योक्ति को छिपाते नहीं । क्योंकि ( लोक में ) घट प्रदीप आदि जो व्यक्त्ति के स्थल हैं वहाँ अपने जैसा कहा वैसा ही प्रतीत होता है । इतने पर भी जिस समय व्यङ्ग्यरूप से स्वीकृत रस आदि का ज्ञान होता रहता है उस समय व्यञ्जकरूप से स्वीकृत विभावादि का ज्ञान अलग नहीं हो जाता । रसादि का ज्ञान उसके साथ-साथ देखा गया है । अलक्ष्यक्रम व्यङ्ग्य कह कर क्रम को जो वास्तविक माना गया है उसका इतना ही अभिप्राय है कि व्यञ्जकरूप से स्वीकृत विभाव अनुभव की प्रतीति में उस ( क्रम ) का अस्तित्व है, रस-प्रतीति में नहीं । हमारा अभिप्राय यह नहीं है कि व्यञ्जक के ज्ञान के समय व्यङ्ग्य की प्रतीति होती ही है । हमारा अभिप्राय यह है कि व्यङ्ग्य की प्रतीति के समय व्यञ्जक की प्रतीति अवश्यमेव होती हैं । इसी अभिप्राय से रसरूप व्यङ्ग्य की प्रतीति में अक्रमता और व्यङ्ग्यता साधी गई हैं । कहा भी वैसा ही है—'व्यङ्ग्य की प्रतीति होते तक वाच्य-प्रतीति हटती नहीं । कारण कि व्यङ्ग्य को प्रतीति वाच्य की प्रतीति से अलग न होकर ही होती है । इससे उलटा यह नहीं कहा कि 'वाच्य की प्रतीति होते तक व्यङ्ग्य की प्रतीति दूर नहीं होती ।' हमने कार्यकारणभाव स्वीकार नहीं किया । हमने केवल यह स्वीकार किया है कि वह ( कार्यकारणभाव ) दूसरा है जिससे गम्यगमकभाव सञ्चता है, और जिसमें गम्य की प्रतीति के समय गमक की प्रतीति नहीं हैं, तथा वह ( कार्यकारणभाव ) दूसरा है जिससे व्यङ्गयव्यञ्जकभाव सञ्चता है, जिसमें गम्य की प्रतीति गमक की प्रतीति के साथ होती हैं । इस प्रकार रस आदि की व्यङ्ग्यता में कोई आपत्ति नहीं रहती ।

( व्यक्तिविवेककार ने रस को आगे कृत्यिम और भान्तिरूप माना है उसका खण्डन ) और जो विभावादि तथा रति आदि को कृत्यिम मान कर उन्हें अनुमान द्वारा प्रतीत माना है तथा व्यङ्ग्यता को औपचारिक ठहराया है—वह भी ठीक नहीं । कारण कि रस का प्राण है चर्वणा । वह होती है सहृदय में । इसलिए उन्हें प्रतीत होने वाला रूप ही रस का रूप है ।

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प्रथमो विमर्शः

वास्तविक रूप माना जाना चाहिए। रस आदि अनुकायों ( राम आदि ) में नहीं रहते। न अनुकर्ता ( नट ) में उनकी प्रतीति देश, काल, स्वभाव और अवस्था के असाधारण रूप के टूट जाने पर साधारण रूप से होती है। उस ( रस ) प्रतीति में राम आदि अनुकार्य और नट आदि अनुकर्ता का भी संस्कार रूप से अनुप्रवेश रहता है। इसलिए कचच्वित उनमें भी रस आदि माना जा सकता है। किन्तु केवल उन्हीं में उन ( रस आदि ) का अस्वित्व मानना ठीक नहीं। क्योंकिं- 'स्थायी ही रस वन सकता है'-यह मुनिवचन उसमें प्रमाण है। हमारा सिद्धान्त है कि दो स्थितियों में स्थायिभाव रस अवस्था में आते हैं। एक तो वे व्यक्ति में वासना रूप से स्थित हों और दूसरे उनकी चर्वणात्मक अनुभूति हो। जिनमें रति आदि भाव वासना रूप से स्थित नहीं होते अथवा होने पर भी किसी अन्य कारण से चर्वणात्मक अनुभूति की क्षमता नहीं होती वे व्यक्ति नीरस कहलाते हैं। उन्हें रसादि की अनुभूति नहीं होती। जिन सामाजिकों को रस की अनुभूति होती है, उनमें रति आदि और रस आदि को कृत्स्निम नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार कारण कार्य आदि, साधारणीकरण के बाद जिन्हें विभाव कहा जाता है, भी कृत्स्निम नहीं होते। वे तो प्रत्यक्षतः वास्तविक होते हैं।

विभावादि तभी मुख्य रूप से, सच्चे अर्थ में विभावत्व आदि से युक्त माने जाते हैं जब वे स्थायी भाव की वासना से युक्त सहृदय की प्रतीति के विषय वनते हैं, जो उस प्रतीति के विषय नहीं बनते वे कारण आदि ही रह जाते हैं। इसी आशय से भरतमुनि ने रससूत्र 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः' में विभाव आदि शब्दों का प्रयोग किया, जो लोकोत्तर हैं। इसलिए संक्षेप में ( कृत्स्निम नहीं वास्तविक रूप से ) विभावानुरूप रति आदि स्थायिभाव ही विभावादि द्वारा बिना किसी सम्बन्ध-स्मरण की रुकावट के व्यक्त होता है—ऐसा सिद्ध होने पर रस का व्यङ्गयत्व वास्तविक ही है औपचारिक नहीं, रस का अनुमेयत्व ही अवास्तविक है। इसी प्रकार भाव आदि के विषय में जानना चाहिए।

( आगे व्यक्तिविवेककार ने व्याख्याना चार प्रकार की मानी है सत्पदार्थविषयक और असत्पदार्थविषयक आदि । व्याख्याकार धनिककार की ओर से उसका खण्डन करते हैं— )

महिमभट्ट ने सद्विषयत्व और असद्विषयत्वया व्याख्यना के चार भेदों की कल्पना की है, वह ध्वनि-सिद्धान्त में लागू नहीं होती। ध्वनिसिद्धान्त में व्याख्यना के लिए घटप्रदीपन्याय माना है। इसी प्रकार घटप्रदीप न्याय पर इन्द्रियगोचरता को आपत्ति उपस्थित की है वह भी ठीक नहीं है, अपने मनगढन्त लक्षण से दूसरे का सिद्धान्त दूषित नहीं किया जा सकता। किसी ने व्याख्यना का लक्षण किया है 'व्यज्जक वह होता है जो अपने ज्ञान से दूसरे के ज्ञान का कारण बनता है, जैसे घट का प्रदीप'-इसके अनुसार व्याख्यना में इन्द्रियगोचरतापत्ति सम्भव ही नहीं, क्योंकि इस लक्षण में ज्ञान के लिए केवल ज्ञान शब्द का प्रयोग किया गया है जो ज्ञान सामान्य का वाचक है प्रत्यक्ष आदि विशिष्टज्ञान का नहीं। इस प्रकार रसादि का व्यङ्गयत्व सर्वथा निर्दोष है।

वस्तु और अलङ्कार ध्वनि नियमितः वाच्य के पश्चात् प्रतीत होते हैं। इसलिए उनमें व्यक्ति-विवेककार ने जो व्यङ्गयत्व को अनुचित ठहराया है उसका उत्तर इस प्रकार दिया जाता है— 'यहाँ अभिधा और लक्षणा भेद से दो प्रकार का शब्द-व्यापार प्राचीन आचार्यों ने माना है। दोनों प्रकार का यह शब्द-व्यापार तीसरी कक्षा में बैठे ( वस्तु अलङ्कार रूप ) अर्थ को प्रतीति में सक्षम सिद्ध नहीं होते, इसलिए एक अन्य व्यापार मानना पड़ता है। तीसरी कक्षा में प्रतीत होने वाले रसादि के लिए एक पृथक् व्यापार माना गया है—व्यजना। उसी को रसादि से भिन्न इन तृतीय

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कक्षा वाले वस्तु-अलंकारादि की प्रतीति में मान लेना उचित है । वस्तु और अलंकार :ध्वनि: के स्थलों में वाच्य और व्यङ्ग्य की प्रतीति साथ नहीं होती ऐसा कहा है । वह भी ठीक नहीं, क्योंकि रसादि के समान व्यङ्ग्य-प्रतीति-काल में वाच्य रूप जो प्रकाश्य या व्यञ्जक है उसकी भी प्रतीति होती ही है और यह तो कहा ही जा चुका है कि वाच्य की प्रतीति के समय जो व्यङ्ग्य की प्रतीति नहीं होती वह कोई दोष नहीं हैं ।

शंका होती है—कि व्यङ्ग्य यदि विरोधी न हो तो वाच्य की प्रतीति व्यङ्ग्य की प्रतीति के समय किसी प्रकार हो सकती है । किन्तु 'भ्रम ध्वनिम' आदि स्थलों में जहाँ वाच्य और व्यङ्ग्य का परस्पर विरोध है ( वाच्य विध्यात्मक है, और व्यङ्ग्य निषेधात्मक ) वहाँ व्यङ्ग्य प्रतीतिकाल में वाच्य की प्रतीति कैसे सम्भव है ? ( उत्तर में कहते हैं ) यह दोष लगता नहीं । विरोध स्थल में भी प्रकाशक रूप से वाच्य की व्यङ्ग्य के साथ प्रतीति हो सकती है । प्रकाशक होने के नाते असत्य होते हुए भी उससे व्यङ्ग्य की प्रतीति हो सकती है और होती ही है, इसलिए विरोधस्थल में भी कोई दोष नहीं आता । सबसे बड़ी बात तो यह है कि काव्यार्थ: कवि द्वारा छिपाया जाता रहता है । इसलिए सभी लोगों को समझ में न आकर केवल सहृदय की ही समझ में आता है, क्योंकि ( उसमें ) काव्य में प्रयोजन में जुदी ही के समान छिपा छिपा कर अर्थ प्रकट करने की चाल है । इसलिए व्यञ्जनावादी को युक्ति ही लोकसिद्ध युक्ति है । वही समीचीन है । इसीलिए रसादि और वस्तु अलंकार स्थल में व्यङ्ग्यत्व ही अधिक अच्छा है ।

अधुना अर्थप्रकाशयते । रस्यादि:प्रतीतिरेव रसादिप्रतीतिरिति 'स्थाय्य एव रसीभवे-श्रृङ्गार:' इत्यादि । कारण कि यह कहा गया है कि—'स्थायी ही रस होता है' ।

रस्यादि:प्रतीतिरेव रसादि:प्रतीतिरिति मुख्यवृत्त्यैव व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव-श्रृङ्गार: । तत्र प्रदीपघटादिवदुपपन्नो गम्यगमकभाव: । यत् स एवाह—'व्यञ्जकत्वमार्गे तु यद्यर्थोडर्थान्तरं व्योतयति तदा स्वरूपं प्रकाशयचैवासा-वन्यस्य प्रकाशक: प्रतीत:ते प्रदीपवद् । यथा—

'लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती ।' इत्यादौ' इति । पुनः स एवाह—'नहि व्यङ्ग्ये प्रतीमाने वाच्यबुद्धि-दूरे भवति । वाच्याविनाभावेन तस्य प्रकाशनात् । तस्माद् घटप्रदीपन्याय-स्तयोः । यथैव हि प्रदीपद्वारेण घटप्रतीतावुत्पन्नायां न प्रदीपप्रकाशो निवर्तते रति आदि की ही प्रतीति रस की प्रतीति है इसलिए मुख्यरूप से ही ( उसमें ) व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव स्वीकार किया जाना चाहिए । गम्यगमकभाव वहाँ घटप्रदीपन्याय से लागू हो सकता है । जैसा कि स्वयं उन्हीं ( ध्वनिवादी ) ने कहा है—'व्यञ्जकत्व मानने पर भी जवतक अर्थ दूसरे अर्थ को व्यञ्जना नहीं करता तबतक वह अपने आपको प्रकाशित करता हुआ ही दूसरे को प्रकाशक प्रतीत होता है, जैसे प्रदीप या 'लीलाकमलपत्राणि गणयामास पार्वती' में ।'

उन्होंने और भी कहा है—'व्यङ्ग्य की प्रतीति होते समय वाच्य की प्रतीति मिटती नहीं क्योंकि उसकी प्रतीति वाच्य से अपृथक रहते हुए ही होती है । इसलिए उन दोनों में घटप्रदीपन्याय

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चरितार्थ होता है। जिस प्रकार प्रदीप द्वारा घट की प्रतीति हो जाने पर प्रदीप का प्रकाश लौट नहीं जाता उसी प्रकार व्यङ्गच की प्रतीति हो जाने पर वाच्यार्थप्रतीति। अत्र ध्वनिकृतो नानुमानाङ्गमविनाभावोडभिप्रेतः। किन्तु निमित्तत्वमात्रं यदनुमानेsपि सम्भवति, यथा ‘अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिलक्षणोच्यते |’ अनुमानवादिनस्तु अनेनैव शब्दच्छलेनोच्यमानम्

‘यहाँ ध्वनिकार ने अविनाभाव को व्याप्ति नामक अनुमान के अङ्ग रूप में स्वीकार नहीं किया है। अपितु एक साधारण निमित्तत्व के रूप में। वह अनुमान भी हो सकता है। ‘अभिधेयर्य से अविनाभूत अर्थ की प्रतीति लक्षणा कही जाती है’ इस स्थान पर अविनाभाव का प्रयोग हुआ। अनुमानवादो इसो अविनाभाव शब्द के दूसरे अर्थ को लेकर ध्वनिकार के उक्त कथन का खण्डन करते हैं।’

विमर्शः अविनाभाव शब्द के दो अर्थ होते हैं—सामान्य और विशेष। सामान्य अर्थ सम्वन्धमात्र है। विशेष—व्याप्तिरूप। ‘अभिधेयाविनाभूतप्रतीतिलक्षणोच्यते’ वाक्य में ध्वनिकार ने अविनाभाव को सम्वन्धसामान्य का वाचक माना है। अनुमितिवादी उसे सम्वन्धविशेष ( व्याप्ति ) रूप मानकर ध्वनिकार के उक्त कथन का खण्डन करते हैं—

उच्यते। वाच्यप्रतीयमानयोरर्थयोर्यथा कमेणैव प्रतीतिनं समकालं यथा चानयोगेऽन्ययोगसमकभावः तथा तेनैव व्यङ्गव्यादिना तयोः स्वरूपं निरूपयितुं तदेवास्माभिः समाधित्सुमिरिह लिख्यते परम्‌।

तद्यथा—‘न हि विभावानुभावव्यभिचारिणा रसाद इति कस्यचिद्-वगमः। अत एव विभावादिप्रतीत्यविनाभाविनी रसादीनां प्रतीतिरिति तत्प्रतीत्योः कार्यकारणभावेनावस्थानात्‌ कमोडवश्यम्भावो। स तु लाघवाच्चात्र लक्ष्यत इत्यलक्ष्यक्रमः एव सन्तो व्यङ्गच रसादय इत्युक्तम्‌’ इति ।

पुनश्च ‘तस्मादभिधानाभिधेयप्रतीत्योरिव वाच्यव्यङ्गचप्रतीत्योरिनिमित्त-निमित्तिभावाद्‌ नियमभावी क्रमः। स तु कुतोयुक्तेः कचिल्लक्ष्यते कचित्तु न लक्ष्यत’ इति ।

तदेवं वाच्यप्रतीयमानयोर्व्यक्ष्यमाणक्रमेण लिख्यलिख्याभावस्य समर्थनात्‌ सर्वस्यैव ध्वनेरनुमानान्तर्भावः समन्वितो भवति तस्य च तदपेक्षया महाविषयत्वात्‌। महाविषयत्वं चास्य ध्वनिनिर्यातिरिक्टेडपि विषये पर्यायोक्तादौ गुर्णीभूतव्यङ्गचादौ च सर्वत्र सम्भवात्‌। तच्च वचनव्यापारपूर्वकत्वात्‌ परार्थमित्यवगन्तव्यम्‌। त्रिरूपलिङ्गाद्यानं परार्थमनुमानमिति केवलमुक्त-नयानभिज्ञतया तन्न लक्ष्यतयाविचक्षणो लोकः।

जैसे कि हमने कहा है—‘वाच्य और प्रतीयमान अर्थो की प्रतीति क्रम से होती है, एक साथ नहीं और इसमें परस्पर गम्यगमकभाव सम्वन्ध रहता है। यह तो व्यक्तिवादी ने ही वाच्य और प्रतीयमान के स्वरूप-निरूपण में माना है।’ समाधानों के लिये हम उसी को यहाँ उद्धृत करते हैं। वह इस प्रकार है—विभाव, अनुभव, व्यभिचारी ही रस हैं—ऐसी किसी की मान्यता नहीं है। इसीलिए विभावादि की प्रतीति होने पर रस आदि की प्रतीति होती है, इसलिए उनकी

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प्रतीति में कार्यकारणभाव सम्बन्ध है । अतः क्रम भी अवश्यम्भावी है । वह समझ नहीं पड़ता, इसलिए रस आदि अलङ्क्यमाव माने जाते हैं और व्यङ्गच । ऐसा ही कहा भी जा चुका है ( तृतीय उद्योत पृ० ४०८ चा० सं० ) और भी—इसीलिए वाचक और वाच्य की प्रतीति के समान वाध्य और व्यङ्गच की प्रतीति में भी कार्यकारणभाव है इसलिए क्रम भी निश्चित ही होगा । वह उक्त प्रकार से कहीं समझ पड़ता है और कहीं नहीं ( ४१३ पृ० तृ० उ० ) । इसीलिए इस प्रकार वाच्य और प्रतीयमान अर्थ का आगे कहीं क्रम से लिङ्गलिङ्गिभाव सिद्ध किया जाएगा । उससे सभी प्रकार की ध्वनियों का अनुमान में ही अन्तर्भाव ठीक ठहरता है । उस ( अनुमान ) का मान्य है कि वह ध्वनिकार द्वारा स्वीकार पर्यायोक्त आदि गुणीभूत व्यङ्गच स्थलों में सर्वत्र हो सकता है, जो ध्वनि से भिन्न हैं । वह ( अनुमान ) उक्त रूप होने से पदार्थ ही यहाँ लिय जाना चाहिए । तीन प्रकार के लिङ्गों का कथन पदार्थ अनुमान होता है । यह बात उक्त रीति से अनभिज्ञ होने के कारण मन्द बुद्धि वाले लोग नहीं समझ पाते ।

अक्रमप्रतीतिस्वं समाधित्सुभिः परिहरद्भिः लिङ्गते परमित्यन्वयः । तत्त्वतस्तयोः कार्यकारणभावेनैति । विभावादीनां रसानां च यथासथातो यो व्यङ्गचव्यञ्जक-भावोपयोगी निमित्तनिमित्तिभावस्तदभिप्रायेगैतत् ध्वनिकृतोक्कम् । पर्यायोक्कादौ अलङ्कारविदशेषे । आदिशब्दात् समासोक्त्यादिग्रहः । गुणीभूतव्यङ्गचेऽलं-झारव्यतिरिक्ते 'ग्रामतरुणं तरुण्या' इत्यादौ यदनलङ्कारत्वेनोक्तम् । अन्रादिग्रहणादन्य-तत्त्वप्रतीत्यो—विभाव आदि का और रस आदि का पूर्वोक्त जो व्यङ्गच-व्यञ्जक भावोपयोग गतोडनुमानानुमेयभावः स्वीकृतः ।

तत्त्वप्रतीत्यो—विभाव आदि का और रस आदि का पूर्वोक्त जो व्यङ्गच-व्यञ्जक भावोपयोग गतोडनुमानानुमेयभावः स्वीकृतः । विमर्शः—धुएँ को देखकर आग का अनुमान देखने वाला मन में ही कर लेता है । वह उसे कहता तब ही है जव वह उसका ज्ञान दूसरे व्यक्ति को कराना चाहता है । यही अनुमान परार्थानुमान कहलाता है । इसमें पहले कहलाना पड़ता है—यह वस्तु ऐसी है । फिर उसमें हेतु देना पड़ता है—इस कारण ऐसी है । दोनों की सिद्धि के लिए उदाहरण देना पड़ता है—जैसे वह वस्तु इस कारण ऐसी थी । ये ही वाक्य क्रमशः प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण कहलाते हैं । इसी का उपसंहार—'वैसा ही यह है, अतः ऐसा ही है' इन दो वाक्यों से किया जाता है । इसे पर्वन्तो वहिमान् = प्रतिज्ञा, भूमात् = हेतु, यथा रसवती = उदाहरण, तथा चायम् = उपनय, तस्मात्था = निगमन । पाँचों वाक्यों में से आरम्भिक तीन ही वाक्य काम के हैं । अन्त के दो अपने आप वन जाते हैं । अतः वेदान्त दर्शनों में परार्थ अनुमान को तीन ही अवयवों वाले वाक्य से मानते हैं ।

त्रिविध लिङ्ग—लिङ्ग का अर्थ है हेतु, कारण कि वह लीन = छिपे हुए अर्थ का अवगम कराता है । वह तीन प्रकार का होता है १. जहाँ साध्य का निश्चय हो वहाँ विधमान रहने वाला, २. जहाँ साध्य का सन्देह हो वहाँ भी रहने वाला और ३. जहाँ साध्य का अभाव हो वहाँ न

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प्रथमो विमर्शः

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रहने वाला । न्याय भाषा में साध्य का निश्चय ज्ञान जहाँ होता है उस स्थान को सपक्ष कहते हैं, साध्य के सन्देह वाले स्थान को पक्ष और साध्य विरोध वाले स्थल को विपक्ष ।

पर्यायोक्त -वह अलङ्कार जिसमें एक ही बात एक साथ वाच्य और व्यङ्ग्य रूप से कही जाती है, सिर्फ कहने के ढंग में अन्तर रहता है । जैसे—‘राहुवध के लिए कहा गया—‘राहुवधोज्ज्वलान् उद्दाम विलास से रहित कर दिया ।’ यहाँ वाच्य है राहु खी का आलिङ्गनाभाव, उससे व्यङ्ग्य है राहुवध । दोनों का वास्तविक रूप एक ही है । गुणीभूत व्यङ्ग्य माना जाता है । ग्रन्थकार ने सभी वाक्यार्थों को साध्य साधनयुक्त बतलाया था । उसी पर पुनः विचार आरम्भ करते हैं ।

अथ यदि सर्वे वाक्यार्थे: साध्यसाधनभावगर्भे इत्युच्यते; तदू, यथा साध्यसाधनयोस्स्तत्र नियमेनोपादानं तथा दृष्टान्तस्यापि स्यात्, तस्यापि व्यतिसाधनप्रयाणविषयतयावश्यापेक्षणीयत्वात् । न । प्रसिद्धसामर्थ्येस्य साधनस्योपादानादेव तदपेक्षाया: प्रतिक्षेपात् । तदुक्तम्—

‘तद्वावहेतुभावौ हि दृष्टान्ते तद्वेदिनः ।’

ख्याप्यते विदुषां वाच्ये हेतुरेव च केवलतः ॥’

यदि समस्त वाक्यार्थ साध्यसाधनभाव सम्बन्ध से युक्त होते हैं । ऐसा कहा जाता है तो जिस प्रकार उस ( वाक्यार्थ ) में साध्य और साधन का नियमतः उल्लेखोपादान रहता है उसी प्रकार दृष्टान्त ( उदाहरण ) का भी रहना चाहिए । क्योंकि उसी के आधार पर व्याप्ति की सिद्धि होती है, अतः उसकी अपेक्षा अनिवार्य है ? (, उत्तर ) नहीं । दृष्टान्त का आक्षेप हो जाता है कारण कि प्रसिद्ध शक्ति ( व्याप्ति ) वाले हेतु का ( वाक्यार्थ में ) उपादान रहता है । ऐसा कहा भी गया है—‘साध्य और हेतु को न जानने वाले व्यक्ति के लिए ही दृष्टान्त के साथ साध्य और हेतु बतलाए जाते हैं । जानने वालों के लिए तो केवल हेतु ही बतलाया है ।’

तद्वावहेतुभावौ तादात्म्यतदुत्पत्ति। तद्वेदिन इति। अन्र तद्वेदिनौ तौ परामृश्यौ। नन्वत्र विदुषांविधेयो दृष्टान्तस्योपादानविषयेष्य इत्य प्रयोगश्रुतिकः । ने काव्ये कदाचिद् दृष्टान्तस्य प्रयोगो दृश्यते । तत् कथमत्रानुमानसमर्थनम् । उच्यते । काव्यानुमानं विलक्षणं काव्यस्य चमत्कारसारत्वात् । न्यायमुखेनापि चमत्कार एव विश्रान्ते:। तर्कानुमानं तु तर्कशास्त्रन्यायुपतया प्रवृत्तं तर्कस्य कर्कशतामुद्रहति । काव्ये त्वेतद्वैपरीत्यात् सहृदयानामधिकारात् न व्याप्त्यादिस्मुखेनानुमानप्रदर्शनसमर्थनमिति ।

नद्वावहेतुभावौ—तादात्म्य और तदुत्पत्ति(९) । तद्वेदिन:०—उन दोनों को न जानने वाले।

शब्दा—यह बतलाया गया कि जानकारों के लिए दृष्टान्त का प्रयोग नहीं होता, न जानने वाले के लिए ही होता है । ( सो ठीक पर ) काव्य में तो दृष्टान्त का प्रयोग कहीं नहीं देखा जाता । ( उसका जानकार ही कैसे होगा ? ) अतः काव्य में अनुमान का समर्थन कैसे किया ?

उत्तर—काव्य का अन्तिम तर्कशास्त्र के अनुमान से भिन्न है । काव्य का सार होता है चमत्कार । उसमें अनुमान द्वारा भी चमत्कार तक ही पहुँचा जाता है । तर्कशास्त्र का अनुमान हेतु व्याप्ति आदि कर्कशा सामग्री को लेकर चलता है । इसलिए उसमें कर्कशा तर्क रहता है । काव्य में सहृदयों का अधिकार है । इसलिए यह अपेक्षित नहीं कि व्याप्ति दिखलाते हुए उसमें अनुमान योजना की जाय ।

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व्यक्तिविवेक:

विमर्श: पृष्ठ ५९-से-६१ तक रसादि ध्वनत्ति व्यंग्यत्व को औपचारिक बताया है। उपचार का प्रयोजन बताया है—चमत्कार। आगे इसी पर आपत्ति की जा रही है—

ननु कुतोऽयं रत्यादीनां सुखाध्यवस्थाविशेषाणां काव्यादौ सचेतनचमत्कारी सुखास्वादसम्भवः, यो रसादीनामुमेयानां व्यङ्गच्यत्वोपचारस्य प्रयोजनांशातया कल्प्यते। न हि लोके लिङ्गत: शोकादिष्वनुमीयमानेष्वजुमात: सुखास्वादलवोडपि लक्ष्यते। प्रत्युत साधूनामुदासीनानामपि वा भयशोकदौर्मनस्यादिदु:खसममुपजायमानमवचार्यंते। न च लोके काव्यादौ कदाचिद्रय: येनासौ तत्रैवोपगम्येत, न लोके। त एव हि लौकिका विभावादयो हेतुकार्यसहकारिरूपा गमका:। त एव च रत्याद्योऽवस्थाविशेषरूपा भावा गम्या:। तत् कुतोऽत्र काव्यादौ, यत् तत्रैव रसास्वादो न लोके इति प्रयोजनांशसम्भवाद् रत्यादिषु व्यङ्गच्यत्वोपचारोडनुपपन्न: भाव:

जो रति आदि भाव काव्य में उपात्त रहते हैं, विशिष्ट स्थिति में उनसे सहृदयों को सुख कैसे मिल सकता है? जिसके आधार पर रस आदि पर व्यङ्गच्य का उपचार माना जाय। लोक में हेतु द्वारा भी साध्यभूत शोक आदि का अनुमान होता है, उनसे अनुमापकों को तनिक भी सुख नहीं होता। उलटे, साधु और उदासीन व्यक्तियों को भय, शोक और दौर्मनस्य आदि दु:ख ( लोक की अपेक्षा काव्य में कहीं अधिक ) प्रतीत होते हैं। लोक की अपेक्षा काव्य में कोई विशेष गुण नहीं है, जिससे सुख की यह प्रतीति केवल काव्य में ही मानी जाय, लोक में नहीं। काव्य में जिन्हें विभाव आदि कहा जाता है, वे लोक में अनुमूत रहते हैं। हेतु, कार्य और सहकारी रूप से वे ही ( काव्य में ) अनुमापक बनते हैं और वे ही रति आदि अनुमेय बनते हैं, जिन्हें विशिष्ट स्थिति में भाव कहा जाता है। अतः काव्य में कौन सी विशेषता है, जिससे उसी में रसास्वाद माना जाय, लोक में नहीं? इस प्रकार ( उपचार का ) प्रयोजन ( चमत्कार ) ही नहीं बनता? फलत: कृत्यादि भावों पर व्यङ्गच्यत्व का उपचार भी युक्तिपुष्ट नहीं ठहरता।

विमर्श: अभिप्राय यह कि रति आदि का अनुमान लोक में भी होता है। वहाँ कोई आनन्दानुभूति नहीं होती। उलटे घृणा होती है। वे ही रति आदि काव्य में हैं। काव्य में उन्हें आनन्दानुभूति का कारण कैसे माना जाय।

एक बात यह भी है—रस को व्यङ्गच्य माना था इस साध्य्रय पर कि जैसे अँघेरे में रखी वस्तु उज्ज्वल होते ही एकाएक देखने पर आनन्द आदि पैदा करती है, वैसे ही रति आदि भी विभावादि से स्फुरित हो आनन्द देते हैं। परन्तु जब रति की स्कूर्ति में आनन्द ही नहीं माना गया तो फिर उसमें उपचार या साध्य्रय के आधार पर व्यङ्गच्यता नहीं रहेगी। इसी का उत्तर महिमभट्ट देते हैं—

उच्यते। यत्र विभावादिमुखेन भावानामवगमस्तत्रैव सहदयै:संवेद्यो रसास्वादोदय इति वस्तुस्वभाव एवायं न पर्यनुयोगपदवीमवतरति प्रामाणिकानाम्। यदाह भरत:-‘विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्ति:' इति।

यथोक्तम्—

‘भावसंयोजनाव्यङ्ग्यपरसंवित्तिगोचर:। आस्वादनातमानुभवो रस: काव्यार्थे उच्यते ॥'

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प्रामाणिक पुरुषों को लोक और काव्य की स्थिति पर समान रूप से विचार नहीं करना चाहिए। यह तो एक पारमार्थिक स्थिति है कि रसास्वाद तब भी होता है जब विभावादि द्वारा भावों का अनुभव होता है। यह आस्वाद भी एकमात्र उन्हें होता है जो सहृदय होते हैं। भरत मुनि ने कहा भी है—‘विभाव, अनुभव और संचारीभावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है।’ और भी जैसा कहा गया है—‘रस ही काव्य का सच्चा अर्थ है। उसका स्वरूप आस्वादरूप अनुभव है। वह भावों के संयोग से व्यक्त अर्थ माना जाता है और लोकोत्तर ज्ञान द्वारा उस रूप में प्रतीत होता है।’

भावसंयोजनेऽति। भावानां विभावानुभावव्यभिचारिणां संयोजनया व्यक्तः व्यक्तिवादिना तथाविधेन सन्तु परसंवित्तिगोचरः लोकोत्तराया: प्रतीतेरभिन्नोऽपि साकारतया विषयत्वेन स्फुरत्नास्वादस्वभावः। यद्यपि तस्य ग्राहकस्तथाऽन्यमेदोपचारादियुक्तिः। तस्य प्रयोजनं नित्यं प्रतीतियविनाभावित्व(त?)रसानाम्नातू। काव्यप्रहणे नाटचमण्युपलक्षितम्। स्थेमभाक्स्वेन स्थायित्वरुचितम्॥

भावों की अर्थात् विभाव, अनुभव, व्यभिचारी के संयोजन द्वारा व्यक्त अर्थात् व्यक्तिवादी उपचार माना गया है। (अनुमितिवादी के) इस मत में जिस पर व्यङ्ग्यत्व या विषयत्व का आरोप रहता है वह परसंवेदन (अलौकिक अनुभूति) का विषय बनता है। वह उस लोकोत्तर अनुभूति से अभिन्न भी रहता है और अपने ज्ञान का आकार बन कर (जैसा कि योगाचार बौद्ध मानते हैं) विषयरूप से स्फुरित होता है। इसीलिए यह आस्वाद स्वरूप होता है। यद्यपि अनुभव उसका ग्राहक है, तो भी अभेदोपचार से ऐसा कहा जाता है। इस (उपचार) का प्रयोजन रस का अपनत्व प्रतीति से कदापि अलग न होना है। काव्यार्थ=कारण कि ‘रस’ काव्य में व्यङ्ग्य होकर वाव्यार्थरूप से अवस्थित रहता है। काव्यार्थ=काव्य से नाट्य भी अपनाना चाहिए। स्थेमभाक्=स्थायित्व से युक्त।

विमर्शः रस अनुबूति(मूति)रूप ही है। यह अनुभूति भी आस्वाद और आनन्दरूप है। रस का ज्ञान स्वयं रस से होता है। रस में योगाचार मत का विज्ञानवाद अपनाया जाता है। उसमें विप्रतिपत्ति और कल्पना नहीं, ज्ञान का ही एक रूप है। जैसे ही रस भी ज्ञानमूर्ति का एक रूप है। इसे मम्मट ने ‘स्वाकार इवामिच्छोडपि’ कहा है। व्याख्याविकार का भी यही आशय है।

न च लोके विभावादयो भावा वा सम्भवन्ति हेत्वादोनासेव तत्र सम्भवात्। न च विभावादयो हेत्वादयश्श्रृङ्गारेक एवार्थे इति मन्तव्यम्। अन्ये हेत्वाद्यरत्नादयो रामादिगता: स्थेमभाजोडवस्थाविशेषा: केचित्तु त एव काव्यादौ कविच्रभृतिभिरिवर्णनान्न्यर्थेमात्नन्यनुसंहिता: सन्तो भावयन्ति तांस्तान् रसा-नानामनयसमवन्वाद्रावयान्ति रसानिमान्। यद्वाह भरतः—

‘नानामनयसमवन्वाद्रावयान्ति रसानिमान् । यस्मात्, तस्मादसी भावो विषयो नाटचोक्तिभिः॥’

ये च तेषां हेतव: सीताद्या: केचित्तु, त एव काव्यादिसमर्पिताः सन्तो विभावयन्ते भावा परिप्रिरिति विभावान् इत्युच्यन्ते। यद्वाह भरतः—

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व्यक्तिविवेकः

'वहवोडर्थो विभाव्यन्ते वागङ्गाभिनयाश्रयाः । अनेन यस्मात्, तेनायं विभाव इति संबन्धितः ।।' ये च तेऽपि केचित् कार्यरूपा मुखप्रसादादयोऽर्थस्त एव काव्यादुपदेश्येमाना: सन्तोडनुभावयन्ति तांस्तान् भावानित्यनुभावा इत्युच्यन्ते । यदाह भरत:-

'वागङ्गस्त्वभिनयैर्यैरस्मादर्थोंऽनुभाव्यते । वागङ्गोपाङ्गसंयुक्तः सोऽनुभाव इति स्मृतः ।।' ये च तेऽपमान्तरान्तरभावस्थायिनोडवस्थाविशेषास्तद्वान्तरहेतुजानितोत्त्कलिकाकाराः केचित् चमत्कृतपद्यन्ते, त एव निजनिजविभावानुभाववर्गमुखेनो- पदर्श्येमाना: सन्तो विशेषेणाभिमुख्येन चरन्ति तेषु तेषु भावेष्विति व्यभिचारिण इत्युच्यन्ते । यदाह भरत:-‘विविधमाभिमुख्येन रसेषु चरन्तीति व्यभिचारिण:' इति ।

लोक में विभाव आदि भावों का होना संभव नहीं । लोक में केवल हेतु आदि ही संभव है । यह माना नहीं जा सकता है कि विभाव आदि और हेतु आदि अभिन्न हैं । हेतु आदि भिन्न हैं और विभाव आदि भिन्न । क्योंकि उनके लक्षण भिन्न हैं । जैसे लोक में जो रति आदि विशिष्ट अवस्थाएँ स्थिर रूप से राम आदि में रहती हैं वे ही काव्य ( नाट्य ) में भाव कहलाती हैं । क्योंकि कवि या नट उन्हें वर्णन या अभिनय के लिए अपने ऊपर आरोपित कर लेता है । इसलिए वे उन-उन रसों का आस्वादन कराती हैं । जैसा कि भरत ने कहा है—‘ये ( अवस्थाएँ ) नाट्य- प्रयोक्ताओं के विविध अभिनयों द्वारा रसों का वार-बार आस्वाद कराती हैं; इसलिए इन्हें भाव समझना चाहिए ।’

उनके जो सीता आदि कुछ हेतु हैं वे भी काव्य में ‘विभाव्यन्ते भावा अभि:’ विभावित किए जाते हैं भाव जिनसे—इस व्युत्पत्ति के आधार पर विभाव कहलाते हैं । जैसा कि भरत मुनि ने कहा है—‘विभाव’ इसे कारण कहा जाता है । इसके द्वारा आंगिक और वाचिक अभिनयों के माध्यम से अनेक भावों का विभावन होता है ।

और कार्यरूप जो उनकी मुखप्रसाद, आदि हृदयतत्त्व हैं वे ही काव्य आदि में दिखाई जाने पर—‘अनुभावयन्ति तांस्तान् भावान् = अनुभव कराती हैं उन-उन भावों का’—इस व्युत्पत्ति से अनुभाव कहलाती हैं । जैसा कि भरत ने कहा है—‘वाणी, अंग और सत्त्व के अभिनयों द्वारा अर्थ का अनुभावन होता है, अतः वाणी, अंग और उपांग से युक्त वह अनुभाव कहलाता है ।’

और जो उन्हीं भावों के हेतुओं द्वारा उत्पन्न हुई लहरों के समान वीचि-बीच में उत्पन्न होने वाली अस्थिर मनोदशाएँ हैं वे ही अपने-अपने विभाव और अनुभावों द्वारा प्रदर्शित किए जाने पर—‘विशेषेण आभिमुख्येन चरन्ति तेऽपि भावेपू’—विशेष रूप से अनुरूप होकर संचालित रहते हैं—इस व्युत्पत्ति से व्यभिचारिण कहलाते हैं । जैसा कि भरत ने कहा है—रसों के अनुस्कूल रह कर उनमें आन्ति-आन्ति से स्फुरण करने वाली चित्तवृत्तियाँ व्यभिचारिणी हैं ।

ये चैते स्थायिन्यभिचारिसात्त्विकभेदादेकोनपञ्चाशद्वा उक्तास्ते सर्वे व्यभिचारिणः पृथक् । केवलमेषां प्रातिनियतरूपैकत्वव्यपदेशभिदः । तथा हि स्थायित्वं स्थायिष्वेव प्रतिनियतं, न व्यभिचारिषु । व्यभिचारित्वं व्यभिचारिष्वेव ।

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प्रथमो विमर्शः

व्यभिचारिष्वेव, नेतरस्यः। सात्विकत्वमपि सात्विकेष्वेव, नेतरयोः इति । तत्र स्थायिभावानुमभयी गतिः । न व्यभिचारिसात्विकानाम् । ते हि नित्यं व्यभिचारिण एव न जातुचित् स्थायिनः प्रकल्पन्ते ।

एक विशेष बात यह है कि ये जो ८ स्थायिभाव, ८ सात्विकभाव और ३३ व्यभिचारीभाव—सब मिला कर उनचास भाव कहे गये हैं, वस्तुतः वे सब हैं व्यभिचारी ही; केवल इनके कुछ निश्चित रूपों के आधार पर नाम भिन्न रख दिए गए हैं । जैसे स्थायित्व स्थायिभावों में ही नियमित है, व्यभिचारियों और सात्विकों में नहीं, व्यभिचारित्व व्यभिचारी में ही, दूसरों में नहीं, और सात्विकत्व भी सात्विकों में ही, दूसरों में नहीं । उनमें जो स्थायी कहे जाते हैं उनमें दोनों विशेषताएँ रहती हैं ( वे व्यभिचारियों में भी गिने जा सकते हैं और स्थायियों में भी ) । व्यभिचारीभावों और सात्विक भावों में वह गुण नहीं है । वे सदा व्यभिचारी ही रहते हैं, स्थायी कदापि नहीं बन पाते ।

यत्तु भावाध्याये स्थायिनां लक्षणमुक्तं तद्व्यभिचारिदशापन्नानामेव तेषामेव तत्त्वाद्‌, लक्षणवचनतस्त्य वैचित्र्यप्रसङ्गात् । स्थाय्यनुसन्धानात्मनो हि रसा इष्यन्ते, ते च प्रधानमिति तल्लक्षणमुखेनैव तेषां स्वरूपावगमसिद्धेः, तेषां विश्वप्रतिविम्बनश्रयेनावस्थानात् स्थायिभावेषु च निर्वेदादिषु विवृत्तव्यभिचारिणामनुप्रदानात् । तदुपादाने हि तेषां स्थायित्वमेव स्याद् व्यभिचारित्वं निर्वेदादिषु न तु तस्माद्योग्यतामात्रप्रवर्तितोऽयं वर्गत्रयविभागोपदेश-नय व्यभिचारिष्वपि स्थायिव्यपदेशः;, तन्मात्रविग्रलस्मृतोऽन्येषां स्थायिभावलक्षणभ्रम इत्यलंप्रस्तुतवस्तुविस्तरेण ।

भावाध्याय ( भरतनाट्यशास्त्र के सप्तम अध्याय ) में जो स्थायिभावों का लक्षण दिया गया है, वह लक्षण व्यभिचारित्व दशा में स्थित स्थायिभाव का समझा जाना चाहिए; अन्यथा उनका अलग लक्षण करना ही व्यर्थ सावित होता । क्योंकि स्थायी का अनुकरण हो रस माना जाता है । रस और स्थायिभाव की सत्ता विम्बप्रतिविम्ब रूप मानी जाती है । स्थायी भावों में निर्वेद आदि के समान व्यभिचारियों भावों का उल्लेख नहीं हुआ है, उनका उल्लेख होने पर उनका स्थायित्व हो सिद्ध होता, निर्वेद आदि के समान व्यभिचारित्व नहीं । इसलिए तीन वर्ग दिखलाने के लिए योग्यतामात्र के आधार पर व्यभिचारित्व से युक्त रति आदि को भी स्थायिभाव की श्रेणी में डाल दी गईं है । केवल उस संशा मात्र से कुछ लोगों को स्थायिभाव के लक्षण का भ्रम हो गया है । अस्तु । अप्रासङिक वस्तु के विस्तार से क्या ?

यत्तु भावाध्याय इति । स्थायिनामपि व्यभिचारित्वं भव(ति ?)ति । यथा रतेर्देवादिप्रेय्याराः, हासस्य श्रृङ्गारादौ, शोकस्य विप्रलम्भशृङ्गारादौ, क्रोधस्य प्रणयकोपादौ, र्स्मयस्य वीरादौ, उत्साहस्य श्रृङ्गारादौ, भयस्याभिसारिकादौ, जुगुप्सायाः संसार-निन्दादौ, शमस्य कोप(वि ?)भत्सस्य प्रसादोद्मादौ । अनुकरणस्य विश्वतत्वमनुकरणस्य तिबिम्बतवम् ।

स्थायी भी व्यभिचारी होते हैं । जैसे देवता आदि पर रति, शृङ्गार आदि में हास;

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विप्रलम्भ सृङ्गार में शोक, प्रणयकोप में क्रोध, वीर आदि में विस्मय, सृङ्गार आदि में उत्साह, अभिसारिका आदि में भय, संसार निन्दा में जुगुप्सा, क्रोध के बाद की प्रसन्नता में शम । अनुकार्य होता है विम्व, अनुकर्त्ता प्रतिबिम्ब ।

विमर्शः नाट्यशास्त्र में उक्त आठ भावों का उल्लेख है । उनमें से आठ स्थायी हैं, आठ सात्विक, और शेष तैंतीस व्यभिचारी । इनकी विभिन्नता पर भरत मुनि के वाक्यों के साथ लक्षण-निर्धारण किया गया है । यहाँ ग्रन्थकार का अभिप्राय केवल इतना है कि मूलतः सभी भाव व्यभिचारी हैं । व्यभिचारी का अर्थ यहाँ अस्थिर भाव है । वह उदित होता और डूबता है । जिन्हें स्थायी कहा गया है वे रति आदि भाव भी लहरों के ही समान उठते और विलीन होते रहते हैं । उन्हें स्थायी केवल स्थायित्व की योग्यता के कारण कहा जाता है । स्थायित्व योग्यता का अर्थ पंडितराः जगन्नाथ के प्रकाष में यही किया जा सकता है कि वे भाव प्रवन्ध के अर्थ से इतनी तक व्याप्त रह सकते हैं । जिन भावों में ऐसा संभव नहीं वे व्यभिचारी माने जाते हैं । सात्विक कहे जाने वाले भाव भी कल्लोल के ही समान अस्थिर हैं । उनकी स्थिति मन पर अधिक निर्भर है । सत्व का अर्थ दूसरे के दु:ख-सुखादि की स्थिति में हृदय का अत्यन्त अनुकूल होना किया जाता है । हेमचन्द्र इन्हें मानसिक स्थिति की तरलता में पंचभूतों के संस्कारों से जनित अश्रु आदि विकार रूप मानते हैं । इस प्रकार सात्विक भाव मन की चेतन किन्तु अत्यन्त तोक्षण संवेदना पर निर्भर हैं । स्थायी और सात्विक को व्यभिचारी कहते हुए ग्रन्थकार ने एक उपपत्ति और दी है । मुनि भरत ने रस को स्थायी का ही दूसरा रूप माना है । ग्रन्थकार का कथन है कि यदि भावाध्याय ( सप्तम अध्याय ) में व्यभिचारी भावों के रूप में रति आदि का निर्वचन न करना होता तो रति आदि का निर्वचन अलग से न किया जाता । रस के निर्वचन से ही स्थायी भावों का निर्वचन हो जाता । मुनि भरत ने रसाध्याय ( षष्ठ ) में स्थायी भावों का केवल नामतः उल्लेख किया है । उनका निर्वचन सप्तम में ही किया है ।

एक विशेष तथ्य यह है कि महिमभट्ट ने रस में विम्वप्रतिबिम्बवाद का सिद्धान्त स्थिर किया है । इससे सम्प्रदाय-विरूद्ध एक यह बात आती है कि अनुकार्य और अनुकर्त्ता में भी रस मानना पड़ता है । वस्तुतः सामाजिकानुभूति ही काव्यानुभूति है । जिसमे यह बात अमता नहीं है ।

तदेवं विभावादीनां हेतुत्वादीनां च कृतिमाकृतिमतया काव्यलोकविषयतया च स्वरूपभेदे विषयभेदे चावस्थिते सत्येकत्वसिद्धेरथेदं विभावदिभिर्‌भावे विषयेऽदृष्टे सत्येव प्रतीतिरुपजन्यते तदा तन्मात्रसारत्वात् प्रतीयमाना इति गम्या इति च व्यपदेशा मुख्यकृत्योपपद्यन्ते एव ।

अतः इस प्रकार विभाव आदि और हेतु आदि के कृत्रिमत्व, अकृत्रिम रूप स्वरूप और काव्य नथा लोकरूप विषय की विभिन्नता सिद्ध होने पर जव अभिन्नता सिद्ध नहीं होतीं तो जव विभावादि से असत्य होते हुये भी रति आदि भावों की प्रतीति होती है तव उन्हें प्रतीतिमात्रसार होने से प्रतीयमान और गम्य-मुख्य रूप से भी कहा जा सकता है । इस प्रतीति का परामर्श ही रसास्वाद है जो स्वाभाविक है—यह कहा गया ।

विमर्शः इसका अभिप्राय यह हुवा कि रस कृत्रिम है किन्तु उसका आस्वाद अकृत्रिम है । रस भ्रान्ति है किन्तु उसका आस्वाद प्रमा है ।

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प्रथमो विमर्शः

आस्तां वा रत्यादिनित्यपरोक्श । प्रत्यक्षोडपि ह्यार्थे: साक्षात्संवेद्यमानः सचेतसां न तथा चमत्कारमातनोति यथा स एव सत्कविना वचनगोचरतां गमितः । यदुक्तम्—

‘काव्यार्थाविषयं भावाविस्थानमयी भावियुक्तितः । यथा स्फुरन्न्यमी काव्यात्र तथाध्यक्षत: किल ॥’ इति ।

अथवा रत्यादि नित्य परोक्ष ( सामजिक की अनुभूति से, अनुकार्य और अनुकर्त्ता में ) भी रहे आये । प्रत्यक्ष पदार्थ भी साफ साफ जाना हुआ सहृदयों के लिए उतना चमत्कारकारी नहीं होता जितना वही कुशल कवि द्वारा अपनी वाणी का विषय बना लिया गया ( चमत्कारी होता है )। जैसा कि कहा गया है—

कविशक्ति से उपस्थित पदार्थों में सामाजिक को तन्मय कर देने की असाधारण क्षमता चली आती है, अतः जैसी ( चमत्कारकारिणी) अनुभूति इन पदार्थों की होती है वैसी केवल प्रत्यक्ष दृष्ट पदार्थों की नहीं ।

विमर्श:—पहले शंका की गई थी कि अनुमान प्रमाण द्वारा प्रतीत पदार्थों का अनुभव नहीं होता, क्योंकि वे परोक्ष होते हैं, अनुभव केवल प्रत्यक्ष प्रमाण से ज्ञात पदार्थों का ही होता है । रत्यादि भाव अनुकर्त्ता अथवा अनुकार्य को चेष्टाओं के आधार पर किये अनुमान द्वारा होते हैं, अतः उनसे चमत्कार या आस्वाद रूप अनुभूति सम्भवव नहीं । जिसके आधार पर उन्हें औपचारिक व्यक्‍त‍य मानने का प्रयत्न किया जाय । इसका एक उत्तर ऊपर दिया जा चुका है, जिसमें रत्यादि को प्रत्यक्ष प्रमाण का विषय सिद्ध करने का प्रयत्न किया है । अब पुनः रत्यादि में चमत्कार या आस्वाद रूप अनुभूति की सिद्धि के लिये अभ्युपगमवाद का आश्रय लेते हुये उन्हें परोक्ष अर्थात प्रत्यक्षाविषय और अनुमानप्रमाण-विषय मान लेते हैं और नई युक्ति देते हैं । युक्ति का सार है—कविशक्ति । सामान्य पदार्थों और काव्योपात्त पदार्थों में अन्तर है । जो पदार्थ काव्य में उपात्त होते हैं; कविशक्ति द्वारा काव्य में रूपान्तरित हो जाते हैं । उनमें एक पृथक् शक्ति आ जाती है जिससे वे सामाजिक, काव्यपाठक या नाटक-दर्शक के अन्तःकरण को तन्मय अर्थात अपने रूप में भावित कर देते हैं । अन्तःकरण का विषयरूप में परिणमन भले ही‌ पद‌श्रवणेन्द्रियों द्वारा न होने से अप्रत्यक्ष या परोक्ष कह‌ दियाजाय किन्तु स्वयं मन भी अंशतः इन्द्रिय माना जाता है, और जहाँ तक मन के परिणम का सम्वन्ध है वह‌ अनुभूति के क्षेत्र में प्रत्यक्षानुभव से कम नहीं । मन का परिणम ही प्रधान है, इन्द्रियाँ उसके कारण या असाधारण कारण मानी गई हैं । यदि वह परिणमम किसी अलौकिक शक्ति की सहायता से इन्द्रियानिरपेक्ष रहते हुये भी हो सकता है तो उसे स्थूलतः परोक्ष मानते हुये भी प्रत्यक्ष से अधिक चमत्कारकारी मानना ही होगा । कविशक्ति एक अलौकिक शक्ति ही है ।

सोऽपि च तेषां न तथाऽ‌ स्वदते, यथा तैरैवानुमेयतां नीतः इति स्वभाव एवायं न पर्यनुयोगमर्हति । तदुक्तम्—

‘नानुमितो हेत्वाभ्यां स्वदतेर‌नुमितो यथा । विभावाद्यैः । न च सुखयति वाच्योऽर्थः प्रतीयमानः स एव यथा ॥’ इति । ध्वनिकृताप्युक्तम्—‘सारूप्यो ह्यार्थः स्वशब्दानुसिध्येयत्वेन प्रका-

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व्यक्तिविवेक:

शित: सुतरां शोभामावहति' इति । प्रतीतिमात्रपरमार्थ च काव्यादि तावतैव विनेयेषु विधिनिषेधव्युत्पत्तिसिद्धे । तदुक्तम्—

'आनन्तरापि सम्वन्धतः प्रमा' इति । 'मणिप्रदीपप्रभयोर्मणिग्रुद्ध्याभिधावतो: । मिथ्याभिनिवेशादपि विशेषाद्यत्र प्रमा' इति च ।

वह भी (कविग्रक्त्यंपित पदार्थ भी) उतना चमत्कारकारी नहीं होता जितना उन्हीं विभावादि द्वारा अनुमेयता को प्राप्त हो जाने पर । यह एक प्राकृतक विचित्रता है । इस पर पर्यनुयोग ( उलटा प्रश्न ) नहीं किया जा सकता । वही कहा भी है—

विभावादि से अनुमित पदार्थ जितना चमत्कार पहुँचाता है, उतना हेतु आदि से अनुमित पदार्थ नहीं । प्रतीमान और अभिधा द्वारा कथित ( वाच्य ) अर्थ जितना चमत्कार नहीं पहुँचाता जितना वही अनुमित द्वारा प्रकाशित ( प्रतीमान ) हुआ । धनिकर ने भी कहा है 'सारभूत पदार्थ अपने वाचक शब्द से उत्त्क न होते हुए प्रकाशित होने पर अच्छा रंग लाता है' और काव्य का सर्वस्व प्रतीति ही है । उतने ही से शिक्षणीय व्यक्तियों को विधि और निपेध को समझ मिलती है । कहा गया है—( वेदांत आदि में ) 'प्रातिन भी सम्वन्धविशेष से प्रमा है' और 'मणि तथा दीपक ( इन दोनों ) की प्रभा पर मणि को नियत से टूटे दो व्यक्तियों के मिथ्या ज्ञान में कोर्ई अन्तर न होने पर भी ( अर्थक्रिया ) फल में अन्तर होता है ।'

अत्र वाच्यापेक्षया गम्यतालेत्तणस्य प्रतीममानस्य चारुत्वम् । तस्यापि हेत्वादिलोंकानुमितस्य न तधारस्वाद: यथा काव्ये विभावाद्यैरुनुमीयमानस्यैतथ्यर्थ: । मणिप्रदीपप्रभयोविषये अभिधावतो: प्रतीपद्यो: । अत्र प्रतीतिसारत्वात् काव्यस्यानुमेयगतं वास्तवावास्तवत्वमप्रयोजकम् । उभयथा चमत्कारप्रतीतिलचणार्थक्रियासिद्धे: । प्रत्युतवास्तवत्वे यथा सिध्यति न तथा वास्तवत्व इति काव्यानुमितेवनुमानान्तरविचक्षणते- त्यनुमानवादिनोड्यसम्भाव्य: । व्यक्तिवादिन: पुनरस्तुमुखेन प्रतिपद्याद्रस्तुन: प्रतीतावर्थ-क्रियाविसंवादाद्रस्वानुमानत्वम् । अवस्तुन एव तु प्रतीतो कथमुनुमानत्वं स्यात् । अर्थ-क्रिया तु व्यक्तिपक्षे उपपद्यते । व्यज्यमानस्य वासनात्मन: स्थायिनो वस्तुत्वादित्याशय: ।

यहाँ वाच्य की अपेक्षा गम्यरूप प्रतीमान अधिक चारु होता है । वह प्रतीमान भी लोक में हेतु आदि से अनुमान किए जाने पर उतना चारु नहीं होता जितना काव्य में विभावादि से अनुमान किये जाने पर होता है ।

मणिप्रदीप—अभिधावतो: = दौड़ रहे दो ज्ञाता । काव्य का सार केवल प्रतीति है । अतः उसके अनुमेय में वास्तविकता या अवास्तविकता का कोर्ई परिणाम नहीं । दोनों ही प्रकार से चमत्कार-

अनुमितिरूप अर्थ किया की सिद्धि होती जाती है । वल्कि अनुमानवादी का तो यह भी अभिप्राय है कि वास्तविक होने पर उतना चमत्कार नहीं होता जितना अवास्तविक होने पर होता है । यह काव्यानुमान की शास्त्रानुमान से वड़ी विशोधता है । व्यक्तिवादी का अभिप्राय यह है कि जब अवास्तविक वस्तु के द्वारा वास्तविक वस्तु की प्रतीति हो, तो अर्थक्रिया के विसंवाद न होने से

वहाँ अनुमान ठीक मान लिया जाय । किन्तु जहाँ वास्तविक वस्तु के द्वारा अवास्तविक की प्रतीति होती है वहाँ अर्थक्रिया का विसंवाद होता है । इसलिये वहाँ अनुमान ठीक कैसे माना जा सकता है। अर्थक्रिया केवल व्यक्तिपक्ष में बनती है, क्योंकि उस पक्ष में व्यजना से प्रतीत होने वाले स्थायी-

भाव वासनारूप से विधमान अवास्तविक माने जाते हैं ।

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विमर्शः : अभोष्ट लाभ एकमान यथार्थ ज्ञान से हुयी प्रवृत्ति द्वारा ही होता है। वह अयथार्थ ज्ञान से हुयी प्रवृत्ति द्वारा भी हो जाता है । सफल नमकर्की नौक्री को दूर से सीप समझ कर जो व्यक्ति उसे अपनाने दौड़ता है वह भ्रान्ति से ही प्रवृत्त होना है । किन्तु अन्त में उसे लाभ वही होता है जो निःशयात्मक यथार्थ ज्ञान से होता है। कारयानुभूति भी ऐसी ही है। उसमें अविद्यमान राम, दृश्यन्त आध्रिद की विद्यमान रूप से मिथ्या प्रवृत्ति होती है, परन्तु इससे भी रसानुभूति और राम आध्रिद के सम्यक् आकारण करना नाहिए, रस उपदेश मिल ही जाता है। इसलिये भले ही वह रस मिथ्या हो, परन्तु फल सत्य भी देता है अतः ग्राह्य है। इसमें ‘मणिप्रदीपप्रभयोः’ यह कारिका उद्धृत की जाती है । अभिनवगुप्त के अभिनवभारताती में भी यह पाया मिलता है ( पृष्ठ २७३ बड़ौदा संस्करण न्यायशास्त्र प्रो भा० ) । यह कारिका बौद्ध दार्शनिक धर्मकीर्ति की है। उनके प्रमाणवार्तिक में यह मिलती है । धर्मकीर्ति बौद्ध सातवीं शती के बीच माने जाते हैं । शंकर का बौद्ध न्याय उत्तर भारत के दार्शनिकों में काफी फैला था । आनन्दवर्धन ने धर्मकीर्ति का नाम लिया है। वेदान्त दर्शनों ने उनकी बहुत सी मान्यताओं को क्यों या त्यों अपनाता है । ऐसी ही मान्यताओं में उनको इस कारिका का भी सन्दर्भ भी है । इस कारिका पर उपलब्ध सामग्री का ग्राह्य अंश इस प्रकार है—

प्रमाणवार्तिक—

मणिप्रदीपप्रभयोर्मणिकृत्स्वाभिभावतः । मिथ्याज्ञानाविरोषेपदु मिथ्योपोः्यंक्रियाः प्रति ॥ यथा, तथाऽयथार्थवेद्येऽप्युमानन्दाभ्रयः । अशंकितमनुरोधेन प्रमाणत्वं न विशेताम् ॥ 'मणिप्रभां कुत्रिकाऽऽडिरविनिमित्तमिषोपमान् मणिना डुपमनाश्रितायाम्, प्रदीपप्रभया च सरसिकहररागमणिप्रान्तः परस्परं नैव विशिष्यते । अथ न मणिप्रासिकृतोऽरुणेन कस्यचित्पुद्गलस्य विशेषः । संवादि चाऽमुषद् भ्रान्तलस्यो-

पास्यापि मुच्यते । उत्तरे तापत्रयेणः शुष्कोपासितया नन्था । मणिप्रदीपप्रभयोर्मणिकृत्स्वाभिभावतः । मिथ्याज्ञानाविरोपेपदु विशोपोः्यंक्रियाः प्रति । प्रदीपप्रभापरवलम्यनन्तर्यान्तरं तत्स्पषमा बलिः । दृश्यतेऽन्त द्वार-

ज्ञान द्वारेण । न लभ्यते मणिदीपप्रभा प्रत्यभिजानता । प्रभाएं मणिबुद्धथाऽमिधावतः । प्रभाएं धावतावस्थंय लभ्यते व मणिमेंने: । दीपप्रभामणिप्रान्तः संवादिद्रुम अमुष्तत्। मणिप्रभामणिप्रान्तः संवादिद्रुम उच्यते ॥

इन्हीं की संस्कृतव्याख्या हृ्ट प्रपार मिलती है—‘कस्मिंश्चिद्ध मन्दिरेऽपवरकस्यान्तः दीपो वर्तते । तस्य प्रभा बहिर्द्धोरप्रदेशे रक्तिमव वसुल्ल उपलक्ष्यते । तथा अन्यस्मिन् मनिदरे अपवर-कस्यान्तः रत्नं तिष्ठति । तस्य रत्नस्य प्रभा बहिर्द्धोरप्रदेशे प्रदीपप्रमेव रत्नसमयानोपलभ्यते । तथाविधं जायमानं मणिज्ञानं आनुमेव । अथापि दीपप्रभाएं मणिबुद्धिरिति कृत्वा पुरुपोऽभिधावन् कुरुतः । दृश्योरपि प्रभाविपये या दीपप्रभाएं मणिप्रान्तिरसति तु विश्र्वादिद्रुमः । इति स्मृतो विदद्रुमः, मणिलाभलक्षणार्थंक्रियारहित-

त्वात् । मणिप्रभाएं मणिबुद्धिसुतु मणिलाभलक्षणक्रियात्यात् संवादिद्रुम ह्यच्यते ।’

पहले किवाड़ों में एक एक छिद्र होना था । उनमें सौपल डालकर दरवाजा बंद किया जाता था । इस स्थिति को मन में रखकर आह संगति लगाई गईं कि एक कमरे ( अपवरक ) के भीतर दीपक रखा है और दूसरे के भीतार मणि । दरवाजा बंद हैं । दोनों का प्रकाश दरवाजे के छिद्र में गोल-गोल दिखाई दिया ( दूर से देखने वाले ने न दरवाजा समझा और न उसके विद्ध में प्रभा । उसने धिद्र के भीतर गोल दिखाई पड़ते प्रकाश को मणि समझा । वह उसे उठाने उस ओर चला ।

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यदि वह नगि वाले कमरे के प्रकाश को मणि समझ कर आगे बढ़ा तो उसे दरवाजा खोलने पर कमरे में मणि न मिल गाई और यदि दीपक वाले कमरे के प्रकाश को मणि समझ कर आगे बढ़ा तो मणि नहीं मिली। न मणि की प्रभा ही मणि थी और न दीपक की प्रभा ही मणि। दोनों के विषय में उसको मणिज्ञान भ्रमात्मक था। किन्तु उसे एक जगह अनुरूप फल मिला और दूसरी जगह नहीं। इनमें मणिप्रभा में मणिभ्रान्ति संवादिनी भ्रान्ति कहलाती है और दीपप्रभा में मणिभ्रान्ति विसंवादिनी। संवादिनी इसलिये कि जो समझ कर व्यक्ति प्रवृत्त हुआ था वह उसे प्राप्त हुआ।

मणि और प्रदीप का यह दृष्टान्त भगवत्पाद शंकराचार्यजी को कुछ सुधार के बाद रुचा। उन्होंने प्रकाश को प्रकाशवान् दृश्यरूप ही माना (२।३।२५) में उनका भाष्य इस प्रकार है—‘तस्या ( प्रदीपप्रभाया: ) अपि दृश्यत्वाभ्युपगमात्। निविडावयवं हि तेजोद्रव्यं प्रदीप:, प्रविरलावयवं तु तेजोद्रव्यमेव प्रभा’। इसी सूत्रभाष्य में मणि, प्रदीप और अपवारक तीनों आ गये हैं।

प्रकृत में रस आदि भ्रान्तिरूप हैं तथापि वे आनन्दानुभूति तक पहुँचा देते हैं। इसलिए संवादी भ्रम होने से वे मान्य हैं। काव्य में उनकी भ्रमात्मकता भी किसी प्रकार उपेक्षणीय नहीं।

तेनात्र गस्यगमकयोः सच्चेतसां सत्यासत्यतत्त्वविचारो निरुपयोग एवोति तत् प्रमाणान्तरपरीक्षोपहासायैव सम्पचत इति ।

तत्र हेत्वादिभिरकृतिमैरकर्त्रिमा एव प्रत्यात्म्यनन्ते । तत्रैषामनुमेयत्वमेव न व्यतिरिच्यतिवन्योंडपिति, कुतस्तत्र सुखास्वादलवोडपि सम्भवति । एष एव लोकत: काव्यादावतिशय इत्युपपचत पव रत्यादौ गम्ये सुखास्वादप्रयोजनो व्यतिरिच्यतोपचार इति ।

मुख्यवृत्या द्विविध पवार्थो वाच्यो गम्यश्चेति। उपचारतस्तु व्यतिरिच्य- स्तत्पीयोडपि समस्तीति सिद्धम् ।

इसलिए यहाँ प्राणों के लिए गम्य और गमक की सत्यता तथा असत्यता का विचार उपयोग- शून्य है। काव्य के क्षेत्र में वाच्य और व्यङ्गच प्रतीतियों की सत्यता और असत्यता के विचार को कोई उपयोगिता नहीं। इसलिए वहाँ ( काव्य में ) दूसरे प्रमाण ( शाब्द ) की ( उसके अनुसार की गई काव्य की ) परीक्षा ( समीक्षा ) का फल केवल उपहास होगा। वहाँ ( लोक में ) हेतु आदि वास्तविक पदार्थों से वास्तविक पदार्थों की प्रतीति कराई जाती है। वहाँ ये केवल अनुमेय होते हैं। उनमें व्यङ्गयत्व की गन्ध भी नहीं रहती। अतः वहाँ उन ( रति आदि ) में सुखात्मक आस्वाद का अंश भी सम्भव नहीं। यह ( सुखास्वाद ) ही लोक की अपेक्षा काव्य में अधिक है। इसलिए गम्य रति आदि में सुखास्वाद के आधार पर हुआ व्यङ्गचत्व का उपचार ठीक ही ठहरता है। इससे यह सिद्ध हुआ कि मुख्यरूप से ( वास्तविक ) काव्यगत पदार्थ दो ही प्रकार के होते हैं—वाच्य और गम्य। उपचार द्वारा व्यङ्गच नामक तीसरा पदार्थ भी माना जा सकता है।

विमर्श : ग्रन्थकार ने अर्थ का विवेचन ‘उपसर्जनीकृतस्वार्थौ’ इस ध्वनिलक्षण में उसके उपसर्जनभाव के प्रसंग में किया। उसका उपसंहार कर अब मूल विषय शब्द का ‘उपसर्जनभाव’ उपस्थित करते हैं—

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प्रथमो विमर्शः

वाचो गुणीकृतार्थत्वं न सम्भवति जातुचित् । तदर्थं तदुपादानादुदकार्थं हतेरिव ॥

इति सद्द्रहश्लोकः । 'शब्द का उपसर्जनीकृतार्थत्वं कदापि सम्भव नहीं । इसलिए कि उस ( शब्द ) का उपादान उस ( अर्थ ) के लिए ही है । जैसे जल के लिए इति ( चमड़े की मशक ) का

विमर्शः : व्यकिविवेककार्याख्यान इस सिद्धान्त का खण्डन करता है । वह संग्रहकारिका का उत्तर संग्रहकारिका द्वारा देता है ।

शब्दस्योपसर्जनीकृतार्थत्वं विशेषणं व्यक्तिवादिनो यथा सम्भवति तथा प्राक्‌ प्रतिपादितम् ।

( १ ) वाचो गुणीकृतार्थत्वं व्यञ्जकथर्म प्रति सिध्यतम् । तदर्थं तदुपादानादुदकार्थं हतेरिव ॥ ४ ॥

इति सद्ग्रहश्लोकः । तत्राविवक्षितवाच्ये ध्वनौ व्यवकवाच्यस्यापेक्षणीयत्वमेव शब्दो गुणीकृतार्थः ।

शब्दे गुणीकृतात्मत्वं वाच्यस्य क्राथ्यसम्भवः । बाधितत्वाद्योन्यत्र व्यञ्जकथ्ये प्रयत्नवेच्छयता ॥ ५ ॥

इति सद्ग्रहश्लोकः । 'शब्द का उपसर्जनीकृतार्थत्वं ठीक है । यह व्यञ्जक्य अर्थ के प्रति होता है । क्योंकि वाच्य का उपादान उसी ( व्यञ्जक्य ) के लिए होता है । जैसे जल के लिए द्रिति का ।

विमर्शः : अभिम मूल ग्रन्थ में वाच्य और प्रतीयमान अर्थों के व्यञ्जक्य-व्यङ्ग्यभाव की वास्तविकता का खण्डन करते हुए अभिव्यक्ति पर प्रकाश डाला गया है । इस स्थल पर भाषा की कठिनाई के कारण विषय का स्पष्टीकरण व्यक्तिविवेकव्याख्यान में प्रसंग के आरम्भ में ही इस प्रकार कर दिया गया है—

इह च सद्दृशविषयत्वेनाभिव्यक्तिरिध्द्या प्रतिपादिता । तत्रापि सद्दृशिष्या त्रिपकारा । शक्त्यवस्थस्य व्यक्यीभावः यथा दृश्यादेः । आविर्भूतस्य च दृशादेः सन्तमसादिमप्रति-वन्धकप्रत्ययानिरासादप्रकाशमानस्य प्रदीपादिमकाशेन सह प्रकाशनम् ।

संस्कारोत्पत्तौ स्थितत्वं कृतकृत्य्‌ प्रबोधकप्रत्ययात्‌ प्रबोधमात्रं । तदपि प्रबोधकत्रे-विध्यात्‌ त्रिविधम् । प्रबोधकं च नान्तरीयकं धूसादि, सदृशवस्त्वन्तरं, वाचकः शब्दः इति त्रिविधम् ।

तदेव पञ्चधा सद्दृशिष्याडभिव्यक्तिः । असदृशिष्या त्वेकैवैति षोढा व्य-कृता । यथा च न दोषस्तथोपरादितम् । शिष्टं तु पञ्चपञ्चकमनभ्युपगमपराहतमेव ।

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अभिव्यक्ति दो प्रकार की बतलाई गई है— सद्दिशयक और असद्दिशयक। उनमें सद्दिशयक अभिव्यक्ति भी तीन प्रकार की होती है— ( १ ) शक्तिरूप से स्थित वस्तु का व्यक्तिभाव जैसे दहँी आदि का। ( २ ) रहन अन्धकार आदि प्रतिबन्धक के न हटने से नहीं दिखाई देते हुये व्यक्तिभावापन्न घट आदि वस्तु का भी प्रदीप आदि प्रकाशक द्वारा उसके साथ प्रकाशन। ( ३ ) संस्कार रूप से स्थित पूर्वानुभूत वस्तु का किसी उद्बोधक पदार्थ के कारण उद्बोधन ( स्मरण ) । इनमें भी स्मृति रूप तीसरी अभिव्यक्ति उद्बोधक के त्रिविध्य से तीन प्रकार की होती है—तीन प्रकार के उद्बोधकों में प्रथम है—धूम आदि व्याप्तिसम्बन्ध से सम्बद्ध हेतु, दूसरा है—दूसरे सदृश पदार्थ और तीसरा है—वाचक शब्द। इस प्रकार सद्दिशयक अभिव्यक्ति पाँच प्रकार की हो जाती है। असद्दिशयक अभिव्यक्ति केवल एक ही प्रकार की होती है। इसलिए सब मिलाकर अभिव्यक्तियों की संख्या छः होती है। इन सभी अभिव्यक्तियों का ग्रन्थकार ने खण्डनन किया है। व्यक्तिवादी ने घटप्रदीपान्वय से सद्दिशयक अभिव्यक्ति अपनाई है। वह जिस प्रकार निर्दोष है उसका उपादान किया जा चुका है। शेष पाँच अभिव्यक्तियाँ व्यक्तिवादी को मान्य ही नहीं, इसलिए उनकी स्वीकृति का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता।

नापि वाच्यप्रतीतिमानयोर्मुख्यवृत्त्या व्यङ्गचाव्यञ्जकभावः सम्भवति व्यक्तिलक्षणानुपपत्तेः। तथा हि सतोऽसतः चैव वाच्यस्य प्रकाशोऽनस्य सम्वन्धास्मरणानवेक्षणा प्रकाशाकेन सहैव प्रकाराविषयतापत्तिरभिव्यक्ति-रिति तल्लक्षणमाचक्षते। तत्र सतोडभिव्यक्तिस्त्रिविधा, तस्य त्रैविध्यात्। तत्र कारणात्मनि कार्येस्य शक्त्यात्मनावस्थानात् तिरोभूतस्येन्द्रियगो-चरत्वापत्तिलक्षण आचर्यो भाव एकः, यथा क्षीराद्यावस्थायां दृश्यादेशः। तथावस्थानानुपगमे तु सैवोक्तिरित्युच्यते कैश्चित्। तस्यैवाभिवृतस्य कुतश्चित् प्रतिबन्धादप्रकाशामानस्य प्रकाशाकेनोपसर्जनीकृतातमनः सहैव प्रकाशो द्वितीया, यथा प्रदीपादिना घटादेशः। तदुक्तम्— ‘स्वप्रकाशनव्यापारेऽपि स्फुटतरेऽर्थे प्रकाशकः। यथा दीपोऽन्यथाभावे को विशेषोडस्य कारकात्।।’ इति। ध्वनिकारेगाप्युक्तम्—‘स्वरूपं प्रकाशयितुं परार्थावभासनो व्यङ्गक इत्युच्यते यथा प्रदीपो घटादेशः’ इति।

तस्यैवानुभूतपूर्वस्य संस्कारात्मनान्तर्विपरिवर्तिनः कुतश्चिदङ्गयभिचारिगुणडर्थान्तरात् तत्प्रतिभादकार्षा संस्कारप्रबोधमात्रं तृतीया, यथा धूमादेशः, यथा चालक्ष्यपुस्तकप्रतिबिम्बानुकरणादिभिः शब्दाच्च गवादेशः। असतस्तु एकप्रकारैव, तस्य प्रकारान्तरासम्भवात्, यथार्कालोकादिनेन्द्रियचक्षुषि चादेशः। इति।

और न वाच्य और प्रतीयमान अर्थ का मुख्य रूप से व्यङ्गयव्यञ्जकभाव बनता, क्योंकि व्यक्त-व्यञ्जना का लक्षण ही निष्पन्न नहीं होता। लोग व्यञ्जना का लक्षण ‘समझ में आते हुए सत् या असत् किसी भी पदार्थ का सम्बन्ध स्मरण की अपेक्षा से रहित प्रकाशक द्वारा साथ-साथ प्रकाश-विषयता को प्राप्त होना’ बतलाते हैं। इनमें सत् की अभिव्यक्ति तीन प्रकार की होती है, क्योंकि सत् पदार्थ तीन प्रकार का होता है। उनमें—एक ( सांख्य के अनुसार ) स्वरूप कारण में शक्ति

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प्रथमो विमर्शः

रूप से स्थित होने के कारण तिरोभूत कार्य की इन्द्रियविषयतापत्ति, जैसे दूध आदि अवस्था में दही आदि की। शक्त्यात्मना अवस्थित न मानने पर (न्याय के अनुसार) कुछ लोगों द्वारा उत्पत्ति नाम से पुकारा जाता है। दूसरी है—आविर्भूत पदार्थ का भी, जो किसी प्रतिबन्धक के कारण प्रकाशित न हो रहा हो, किसी प्रकाशक द्वारा, जो स्वयं अप्रधान हो, अपने साथ प्रकाश जैसे प्रदीप आदि द्वारा घट आदि का। जैसा कि कहा गया है—

व्यञ्जक वह होता है जो पदार्थ के आविर्भूत रहने पर अपने ज्ञान के द्वारा उसके साथ दूसरे के ज्ञान का कारण हो यथा दीप। नहीं तो उत्पादक से उसका फरक ही क्या ?

ध्वनिकार ने भी कहा है—‘अपने आकार को प्रकाशित करता हुआ ही दूसरे का प्रकाशन करने वाला ‘व्यञ्जक’ कहा जाता है, जैसे प्रदीप घटादि का।’

तीसरी है—उसी सद् पदार्थ के, जो संस्कार रूप से अन्तःकरण में घूम रहा हो, उससे भिन्न किन्तु उससे नियत सम्बद्ध पदार्थ द्वारा अथवा उसके प्रतिपादक द्वारा, संस्कार का जागरणमात्र। जैसे धूम से अग्नि का, चित्र, लिपि, प्रतिबिम्ब अनुकरण आदि से और शब्द से गवादि का।

असत् की अभिव्यक्ति केवल एक प्रकार की है, क्योंकि जो वस्तु असत् है उसके भेद प्रभेद सम्बन्ध नहीं, जैसे—सूर्यप्रकाश से इन्द्रधनुष आदि की।

अब इन उदाहरणों द्वारा निर्द्धारित उक्त व्यक्तिलक्षण का खण्डन करते हैं—

न चैतल्लक्षणं वाच्ये सङ्गच्छते। तथा हि—सतोऽभिव्यक्तिरा[केयेदा]घ-योरर्थयोरलक्षणं न तत्त्वतीयमानेष्टबेकमपि संसृष्टं क्षमते तस्य दध्यादेरिवेन्द्रियविषयभावापत्तिप्रसङ्गाद् घटादेरिव वाच्यार्थैसहभावेनैदान्ताप्रतीतेः-सम्भवात्। न च स्वरूपासंस्पर्शी लक्षणं भवति ।

तृतीयस्यास्तु यल्लक्षणं तदनुमानस्यैव सङ्गच्छते, न व्यक्तेः। यदुक्तं—‘त्रिरूपालिङ्गादनुमेये ज्ञानं तदनुमान’मिति। तद्वानुमानमेव। न ह्यर्थोऽर्थान्तरप्रतीतिरिङ्गुमानमन्तरेणोपपद्यते। उपमानादीनां च तत्कैवान्तर्भावात्। यदाह—‘न चान्यदर्शनेऽन्यकल्पना युक्तातिप्रसङ्गात्। तस्य नान्तरीय-कतायां स्यात्। न हि यथाविधसिद्धः तथाविधसत्रिधानं सूचयति। सामा-न्येन च सम्बन्धिनार्थप्रतिपत्तिरनुमानमिति द्वे एव प्रमाणे’ इति।

‘व्यक्ति का यह लक्षण वाच्य में नहीं लगता। क्योंकि सत् पदार्थ की अभिव्यक्ति के पक्ष में प्रथम दो ( दही और घट ) पदार्थों की अभिव्यक्ति के जो लक्षण हैं वे प्रतीयमान पदार्थों में से एक का भी स्पष्टीकरण नहीं कर सकते क्योंकि उसमें दध्यादि के समान इन्द्रिय-विषयत्व की प्रसक्ति का भय है और घटादि के समान वाच्यार्थ के ज्ञान के साथ उसके ‘यह इस प्रकार का है’ ऐसे ज्ञान का सम्बन्ध नहीं। वह लक्षण, लक्षण नहीं होता। जो लक्ष्य के स्वरूप से अत्यन्त दूर हो। तीसरी अभिव्यक्ति का जो लक्षण है वह अनुमान ही में संगत होता है, व्यक्ति में नहीं। कहा है ‘त्रिरूप लिङ्ग से अनुमेय विषयक जो ज्ञान है वह अनुमान है’ वस्तुतः वह अनुमान है ही। एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ की प्रतीति अनुमान को छोड़कर और कोई तत्व सिद्ध नहीं होती।

क्योंकि उपमान आदि का उसी में अन्तर्भाव है। जैसा कि कहा है—‘हर किसी के ज्ञान से हर किसी की कल्पना ठीक नहीं, अतिप्रसक्ति के भय से। उसकी ( जिसके दर्शन से जिस किसी अन्य की कल्पना करनी हो ) व्याप्ति ( व्याप्ति सम्बन्ध ) होने पर ही वह ( कल्पना ) हो सकती है।

६ व्या० वि०

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३२

व्यक्तिविवेकः

हर किसी सम्बन्ध से ज्ञात पदार्थ उस तरह के (अव्यवस्थित) सम्बन्धों का बोध नहीं कराते। सामान्य सम्बन्धी द्वारा किसी पदार्थ का ज्ञान अनुमान कहलाता है। इसलिये प्रमाण दो ही हैं।'

विमर्शः—व्यक्ति के दो पक्ष किए हैं—एक सत्सम्बन्धी और दूसरा असत्सम्बन्धी। उनमें से सत्सम्बन्धी व्यक्ति के तीन प्रकार बतलाए गए हैं। उनके उदाहरण दही, अन्धकारमग्र घट आदि और भूमि आदि से वहि आदि, संस्कार उद्बोधक से संस्कार रूप से अवस्थित वस्तु तथा शब्द से अन्तःकरणनिष्ठ अर्थ, उदाहरण दिए गए हैं। इनके आधार पर सत्सम्बन्धी तीनों अभिव्यक्तियों में प्रथम परिणति या उत्पत्ति सिद्ध होती है, द्वितीय शक्तिः और तृतीय स्मृतिः अनुमितिः, स्मृतिः और शब्दबोध। इनके लक्षण भी ग्रन्थकार ने अलग-अलग दिए हैं। ग्रन्थकार का कथन है कि वाच्य से जो प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति होती है उसमें कथित दो प्रकार की अभिव्यक्तियों के लक्षण नहीं घटते। इसमें उन्होंने दोष दिखलाते हुए कहा है—वाच्य से प्रतीयमान की प्रतीति यदि परिणति प्रकार प्रकाशन या शक्तिरूप अभिव्यक्ति मानी जाय तो जैसे दूध से परिणत हुआ दही आँख से देखा जाता है वैसे ही वाच्य से अभिव्यक्त हुआ प्रतीमान भी देखा जाना चाहिए। किन्तु ऐसा नहीं होता। इसी प्रकार प्रकाशक दीपक के साथ ही प्रकाशित घट आदि का ज्ञान होता है, उनमें पौर्वापर्य नहीं रहता, वैसे वाच्य और प्रतीमान की प्रतीति में होना चाहिए। किन्तु वाच्य की प्रतीति पहले होती है और प्रतीमान की बाद में। इस प्रकार वाच्य और प्रतीमान के बीच मानी जा रही अभिव्यक्ति न परिणति रूप मानी जा सकती और न शक्तिरूप ही। अभिव्यक्ति का जो तीसरा प्रकार है वह वाच्य और प्रतीयमान की प्रतीति में लागू होता है, तो भी उससे यह सिद्ध नहीं होता कि वह अभिव्यक्ति एक स्वतन्त्र शब्द शक्ति है। वह अनुमिति से भिन्न कुछ नहीं है।

ग्रन्थकार का कथन बहुत अंशों तक ठीक है। व्यक्तिवादी व्यञ्जना को यह कहकर अनुमान से भिन्न सिद्ध करता है कि अनुमान में हेतु का प्रतीमान के साथ नियत साहचर्य या व्याप्ति ग्रह होता है व्यञ्जना में व्यञ्जक का प्रतीमान के साथ वैसा सम्बन्ध नहीं, केवल सामान्य सम्बन्ध प्रतीत होता है। इसलिए व्यञ्जक कई प्रतीमान की प्रतीति करा सकता है। किन्तु व्यक्तिवादी व्यञ्जक और व्यङ्ग्य के बीच जैसा सम्बन्ध होता है। उसके वक्ता, वेदवाक्य (जिससे कहा जाता है), काकू आदि से युक्त व्यञ्जक को निश्चित प्रतीमान का प्रत्यायक माना है। इस स्थिति में व्यञ्जक हेतु रूप माना जा सकता है।

इस प्रकरण की पुष्टि में—‘यदाहुः न चान्य……एव प्रमाणे’ तक जो ग्रन्थ उद्धृत किया गया है उसको पदावली अत्यन्त प्राचीन है। उसका अभिप्राय प्रसङ्गानुकूल ही निकालना होता है। उसमें ‘अन्यदर्शन’ और ‘अन्यकल्पना’? इन शब्दों के साथ लगे ‘अन्य’ पद का अर्थ कोर्ई ऐसा पदार्थ है जो उसके ज्ञापनीय पदार्थ के साथ कोई नियत सम्बन्ध न रखता हो। ‘सामान्येन सम्बन्धनिधना’ का अर्थ ऐसा सम्बन्धी है जिसमें विशेषरूप से उसके सामान्य-जाति का ही बोध होता हो। वह पदार्थ जो हेतु होता है और वह पदार्थ जो साध्य होता है—दोनों का अनुमिति में केवल अपनी जाति के साथ ज्ञान होता है, जैसे ‘धूमाद् वह्नि’ में भूम का धूमत्वरूप सामान्य के साथ और वह्नि का वह्नित्वरूप सामान्य के साथ। ‘०व्यक्तिरूप०’—‘व्यक्त्यर्थद०’ पढ़ा जाना उचित है।

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प्रथमो विमर्शः:

न च वाच्यादर्थादर्थान्तरप्रतीतिरविनाभावसम्बन्धस्मरणमन्तरेणैव सम्भवति, सर्वस्स्यापि तत्प्रतीतिप्रसङ्गात्। नापि सद्भावेन, धूमादिप्रतीत्योरपि तत्प्रतीत्योरपि ऋमभावस्यैव संवेदनाद् इत्यसम्भवो लक्षणदोषः ।

अथ रसादिपेक्षया तयोः सहभावेन प्रकाशोऽभिमत इत्युच्यते, अव्याप्तिस्‍तदर्हि लक्षणदोषः। इतरतुमालड्ढयोरपिकार्यस्य प्रकाशोऽसहभाविनाव्याप्तः।

न च रसादिव्यपि विभावादिप्रकाशनसहभावेन प्रकाशनसुपपद्यते। यतस्तैरैव कारणादिभिः कृत्स्नैर्विभावाद्यभिधानैरन्त एव रस्यादयः प्रती-विम्बकल्पाः स्थायिभावव्यपदेशभाजः कविभिः प्रतिपत्तृप्रतीतिपथमुपनीयमानाः हृदयसंवादाद् आस्वाद्यत्वमुपयन्ति । सन्तो रसा इत्युच्यन्ते ।

न च कार्यादिभिः कार्योदयः प्रतिविम्बकल्पा: सहैव प्रकाशितुमुत्सहन्ते कार्यकरण-भावावसायस्यैवावसायादप्रसङ्गात् । यत्र तु तत्‌लक्षणं मुख्यतया सम्भवति तत् काव्यमेव न भवतीति कुत एव तद्विशेषध्वनिरूपता स्यात् ।

विमर्शः 'न च वाच्यादर्थादर्थान्तरप्रतीतिः:' से लेकर 'असम्भवो लक्षणदोषः' तक व्यक्ति लक्षण का वाच्य और प्रतीमान अर्थ की प्रतीति में असम्भव दिखलाया गया और उसमें कारण बतलाया गया वाच्य तथा प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति को पूर्वपरामर्श 'भाव यह था कि जहाँ-जहाँ वाच्य से वाच्येतर अर्थ की प्रतीति होती है वहाँ वाच्य की प्रतीति पहले और अर्थान्तर की प्रतीति पीछे होती देखी जाती है।

व्यक्ति में कार्य और कारण व्यञ्जक और व्यङ्ग्य दोनों की प्रतीति साथ होती है इसलिए वाच्य और अर्थान्तर के स्थल को व्यक्ति का स्थल नहीं माना जा सकता ।

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इस पर व्यक्तिवादी की ओर से दूसरे उदाहरणों द्वारा वाच्य और प्रतिपादन की प्रतीति स्थल में व्यक्तिसिद्धि का प्रयत्ल किया गया। व्यक्तिवादी ने रस आदि असंलक्ष्य क्रम-व्यङ्ग्य ध्वनि में वाच्य और अर्थान्तर प्रतीति में क्रमशान का अभाव बतलाकर उनकी प्रतीति में सहभाव के कारण व्यक्ति लक्षण संगत बतलाना चाहा। अनुमितिवादी ने उसका भी प्रतिवाद करते हुए दो दोष दिखे। एक तो अभ्युपगमवाद के आधार पर और दूसरा स्पष्ट खण्डन दृष्टि से। प्रथम दोष अव्यासि है। अनुमितिवादी का कथन है 'कि यदि रसे आदि की प्रतीति में क्रम न भी माना जाय सहभाव ही मान लिया जाय तब भी ध्वनि यदि रस आदि तक ही सीमित होती तो कोई दोष न होता। ध्वनि के अन्तर्गत तो रस के अतिरिक्त वस्तु और अलंकार भी आते हैं और इनकी प्रतीति में क्रम का अस्तित्व स्वयं व्यक्तिवादी को अभिमत है क्योंकि व्यक्तिवादी ने उन्हें संलक्ष्य क्रम व्यङ्गय माना है। ऐसी स्थिति में ध्वनि को व्यक्ति मान लेने पर व्यक्ति का लक्षण रस आदि असंलक्ष्य क्रम ध्वनि में तो संगत हो जायगा, वस्तु और अलंकार ध्वनि में फिर भी वह (व्यक्ति लक्षण) न घटेगा। लक्ष्य के किसी एक देश के लक्षण का न घटना अन्यासि दोष होता है। निदान ध्वनि को लेकर अभिव्यक्ति के लक्षण में अन्यासि दोष होता है। दूसरे रस ध्वनि में भी क्रम का अभाव कैसे मान लिया जाय। विभाव आदि से रस की प्रतीति होती है अतः उन्हें कारण और रस आदि को कार्य मानना न्यायसंगत है। कारण और कार्य कभी भी एक साथ अभिव्यक्त नहीं होते, और जो एक साथ अभिव्यक्त होते हैं उन गाय के सिर पर उगे सींगों आदि में परस्पर कार्यकारण भाव नहीं होता। ऐसा स्थिति में कार्यकारण भाव के रहते हुए भी रस आदि की प्रतीति में क्रम का अभाव नहीं माना जा सकता, फलतः उनमें भी व्यक्ति लक्षण घटता नहीं। जहाँ घटता है वे घट प्रदीप आदि लौकिक पदार्थ काव्य ही नहीं हैं। उन्हें ध्वनि कहा जाय यह भी सम्भव नहीं। इस प्रकार रस, वस्तु और अलंकार तीनों प्रकार को ध्वनि में व्यङ्गच्यन्याय्यभाव नहीं बनता—क्योंकि उनमें व्यङ्गच्यन्याय्यभाव की सिद्धि का जो एकमात्र सम्बल है वह 'सहभावेन प्रतीति' नहीं है।

व्यक्तिवादी की ओर से इन तर्कों का उत्तर पीछे दिया जा चुका है। सारतः व्यक्तिवादी क्रम का अस्तित्व मानते हुए भी व्यङ्गच्यन्याय्यभाव सम्बन्ध स्वीकार करता है। उसकी प्रतीति-योग-पच अनुमितिवादी के प्रतीतियौगपद्य से मिन्न है। अनुमितिवादी वाच्य की प्रतीति पहले होती है इसलिए क्रम भाव मानकर वाच्य और अर्थान्तर में व्यङ्गच्यन्याय्यभाव नहीं मानती, व्यक्तिवादी को लेकर क्रमभाव नहीं मानता। जहाँ तक वाच्य और अर्थान्तर की पुथक् प्रतीति का सम्बन्ध है उसमें व्यक्तिवादी क्रम का खण्डन नहीं करता, इसलिए उसमें रस आदि तीनों-ध्वनियों को क्रम ध्वनि कहा है, केवल इतनी सूक्ष्मता दिखाई है कि रस आदि की ध्वनि में क्रम रहते हुए भी लक्षित नहीं होता अतः वह असंलक्ष्य क्रम ध्वनि है और वस्तु तथा अलंकार ध्वनि में वह लक्षित हो जाता है अतः वह संलक्ष्य क्रम ध्वनि है।

द्विविधो हि प्रकाराकोडर्थ उपाधिरूप: स्वतन्त्रश्चेति। तदुक्तं-“त्रय: प्रकारा: स्वपरप्रकाशा” इति। अन्य: स्वतन्त्रो धूमादि:। तद्विषयस्त्विदं भवेद्धनाभ्युपगन्तव्यं प्रतीयमानार्थविषयै: काव्यतापत्तिप्रसङ्गात्। अन्यस्य तु लिङ्गत्वमेवोपपद्यते न व्यङ्कत्वं व्यक्ते-स्तुपत्ते:।

प्रकाशक दो प्रकार का होता है उपाधिरूप और स्वतन्त्र। उनमें ज्ञान, शब्द और प्रदीप

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प्रथमो विमर्शः

आदि उपाधिरूप है; कहा गया है—प्रकाशक ( प्रकाश ) तीन हैं—स्वप्रकाश, परप्रकाश तथा स्वपरप्रकाश । दूसरा स्वतन्त्र प्रकाशक भूमि आदि है । इनमें प्रथम ( उपाधिरूप ) प्रकाशक को आप मान सकते हो नहीं, क्योंकि केवल प्रत्यक्ष और अभिधेय अर्थों तक ही कार्यत्व सीमित होने का भय है । जो दूसरा ( स्वतन्त्र रूप ) है वह लिङ्ग ( हेतु ) ही सिद्ध होता है नयक नहीं; क्योंकि उसमें व्याप्ति उलङ्घन ही नहीं होता ।

यत्तु तल्लक्षणाभिनि । व्यक्लिलक्षणं प्रदीपवटदौ । स्वाधिरूप इति । उपाधिस्वरूपो-परप्रकाशनेनान्यप्रतीतिहेतुतः । तथा हि—ज्ञानं, येयं गर्भीकृत्य ‘ज्ञातोड्यमर्थः’ इति येयं प्रकाश्यते; शाब्दोऽव्यध्यवसायाश्रयेण स्वरूपं प्रकाशयतेऽनन्यप्रकारकः ।

विषयस्वमनुप्रेक्षरशब्ददेनार्थः: प्रकाश्यते । न सत्तथैव तेऽर्थानासमग्रहीताः: प्रकाशका: आ'

इति । प्रदीपस्योपाधित्वं ‘स्वज्ञानेनानन्यधीहेतुरि'स्यादिना प्रतिपादितम् । तत्र व्यक्लिवादिना यथा प्रदीपप्रकाशान्त इहाहिकृतो नेन्द्रियगोचरतापत्तिसतथा प्रतिपादितं प्राक् । अतएव शतदंशप्रतिपादित्वा थो धूलिप्रसङ्ग: कृतः, स स्वमनोऽपिकया शङ्कितपच-दृश्पनप्रपञ्चो निरूपस्थान एव ।

उपाधि का लक्षण है—'यद् वस्तु जो अपने स्वरूप में लिप्त अर दूसरे किसी पदार्थ की प्रतीति कराता है—जैसे ज्ञान और शब्द । ज्ञान का स्वरूप है 'यह पदार्थ जान लिया गया' इसकी कृति में 'यह पदार्थ' इस स्वरूप से 'यह पदार्थ' भी प्रविष्ट है । इस प्रकार ज्ञान से ज्ञानाकार-कारित जो की प्रतीति होती है । शब्द भी अर्थ का प्रकाशन तभी करता है, जब वह अर्थस्वरूप हो जाता है । कहा गया है—

'शब्दों से तब तक अर्थ का प्रकाशन नहीं होता जबतक वे अर्थ स्वरूप नहीं बन जाते । अर्थात् जबतक अर्थकी सत्ता द्वारा शब्द नहीं पकड़ लिये जाते तबतक वे अर्थ के प्रकाशक नहीं बनते ।' इसी प्रकार प्रदीप भी उपाधिस्वरूप प्रकाशक है । उसका निर्वेचन स्वज्ञानेनानन्यधीहेतु—इत्यादि द्वारा किया जा चुका है । इन प्रकाशकों में से व्यक्लिवादी ने प्रदीपपन्याय से व्यकत्व माना है और उतने पर भी इन्द्रियगोचरतापत्ति नहीं रसती । यह पहले कहा जा चुका है । और इसीलिए अगले 'अथैतदोषभयात्' ग्रन्थ द्वारा जो भूल झोंक दी गई है उसका समस्त प्रपञ्च सामने टकराता है द्वी नहीं, क्योंकि उसमें पूर्वपक्ष की कल्पना तथा उस पर दोपोक्निर्दावन अपनी बुद्धि से किए गये हैं । ध्वनिवादी का मत पूर्वपक्ष रूप से उपस्थित न करके अनुमितिवादी ने अपने ही मन से कल्पित कदन पूर्वपक्ष उपस्तिथ किया है और दोप दिये हैं ।

न च त्रिविधस्यापि व्यकृत्याभिमतस्यार्थस्य प्रकाराकसहभावेन प्रकार-स्तस्यापि ध्वनिकारस्याभिमतः । यदयमाह—'न हि विभावानुभावव्यभिचा-रिणं प्रव रसां इति कस्यचिदचगमः । ततः प्रव तत्प्रतीत्यविनाभाविनी रसादीनां प्रतिपत्तिरिति तत्वतत्त्वया: कार्यकारणभावोऽवस्थानेत् क्रमोऽध-श्यम्भावी । स तु लाघवान्न प्रकारात् इत्यलक्षणकमं पच सन्तो ध्यजड्य्या रसादय:' इति ।

व्यक्त्यरूप से अभिमत तीनों प्रकार के अर्थ ( रस, वस्तु, अलङ्कार ) का प्रकाशक के साथ प्रकारा स्वयं ध्वनिकार को भी मान्य नहीं है—जैसा कि इनका कथन है—

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व्यक्तिविवेक:

'विभावानुभावव्यभिचारी ही रस हों ऐसी किसी की मान्यता नहीं है; किन्तु उनहों से ( विभावादि से ) उनकी प्रतीति के साथ अविनाभाव सम्बन्ध से सम्बद्ध रसादि की प्रतीति होती है, इसलिए उनकी ( विभावादि और रसादि की ) प्रतीतियों में कार्य कारणभाव होने से क्रम अवश्यम्भावी है। वह समझ भर में नहीं आता इतने ही रसादि असंलक्ष्यक्रम और व्यङ्ग्य माने जाते हैं ।'

विमर्श : ध्वनिकार का भाव उक्त कथन में केवल इतना ही है कि एक ओर रसादि की प्रतीति क्रमयुक्त है और दूसरी ओर वे व्यङ्ग्य भी हैं । क्रम होने से उनमें कार्य कारणभाव है किन्तु कार्यात्मक अर्थोत्तर की प्रतीति के समय कारणात्मक वाच्यादि की प्रतीति होती रहती है अतःव्यङ्ग्य हैं। यह अर्थ ध्वनिकार के तत्प्रतीत्यत्यचिनाभाविनि पद से स्पष्ट होता है। व्यक्तिविवेककार अध्यय १ में इसी पद के आधार पर व्यङ्गयत्व का समर्थन किया गया है । अनुमितिवादी इस तथ्य को नर्दी समझता । वह वाच्य और प्रतीयमान की आरम्भिक प्रतीति को लेकर क्रम सिद्ध करना और उसके आधार पर व्यङ्गयत्व का खण्डन करना चाहता है, व्यक्तिवादी के व्यङ्गयत्व की भूमिका तक वह पहुँचता ही नहीं ।

अथैतदोषभयात् सहभावानपेक्ष्मेतल्लक्षणमुख्यतये । तथाप्यनुमाने-डतिर्यास्ति: । तत्राप्युपसर्जनीकृतात्मना धूमादिनां प्रकाश्यस्य प्रकाशो S-स्त्येव । अथासद्ग्रहणेन सा निरस्यतयुच्यते तर्हि सप्रतीपयोगस्तस्यास्ति घटस्य सत्त्वात् ।

अथासद्ग्रहणं न करिष्यत इति तर्हि अर्कालोकैरिन्द्रचापादवव्याप्ति: । अथोभयोरपि ग्रहणं न करिष्यत इति तर्ह्यनुमानस्यैव तल्लक्षणं पर्यवस्यति, न व्यक्‍ते: । तथेन्द्रश्रव नः, वाच्यप्रतीयमानयो: स्तोरेव च क्रमेऽपौव प्रकाशोपगमात् ।

तस्मात् तदवस्थ एवासम्भवो लक्षणदोष: । किञ्च सदसद्भावेन प्रकाश्यस्य विरोषणमनुपपन्नं व्यावर्त्योभावाद् इति ।

और यदि इस दोष के भय से इसका ( व्यक्तित्व का ) ऐसा लक्षण बनाया जाय जिसमें ( ध्यर्थ और व्यङ्गक के ) सहभाव की अपेक्षा न हो तब भी अनुमान में अतिर्यास्ति होती है । वहाँ ( अनुमान में ) भी धूम आदि अप्रधान होकर ( वहि आदि ) प्रकाश्य का प्रकाश करते हैं । यदि असद् ग्रहण द्वारा उसका ( अतिर्यास्ति का ) निरास हो जाता है, ऐसा कहा जाय तो घट प्रदीप में उसकी ( व्यक्तित्व की ) अन्याप्ति होती है, क्योंकि घट सत् है । यदि असद् का ग्रहण नहीं करेंगे तो सूर्य प्रकाश से प्रकाशित इन्द्रचाप आदि में अव्याप्ति होती है, क्योंकि इन्द्रचाप आदि असत् हैं । यदि दोनों का ( सत् असत् का ) ग्रहण नहीं करेंगे तो व्यक्ति के लिए बनाया गया लक्षण अनुमान में ही पर्यवसित होगा, व्यक्ति में नहीं । और वह तो हमारा अभीष्ट ही है क्योंकि वाच्य और प्रतीयमान का तथा केवल सत् पदार्थों का ज्ञान क्रम से ही माना जाता है । इसलिये लक्षण में असम्भव दोष वैसा का वैसा रहा आता है । एक बात यह भी है कि प्रकाश्य के लिए सत् और असत् विशेषण लगाना ठीक भी नहीं है क्योंकि जनता को कोई व्यावृत्ति नहीं हैं ।

विमर्श : उक्त सन्दर्भ में ध्वनि में व्यक्तित्व के लक्षण की असंगति व्यङ्गच और व्यङ्गक की प्रतीतियों में सहभाव का अभाव दिखलाकर की गई । अपना मत संपूर्ण करते हुए ध्वनि में व्यक्तित्व लक्षण

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प्रथमो विमर्शः

संगत सिद्ध करने के लिए उसके विरुद्ध व्यक्तिवादी की ओर से एक उपाय उपस्थित किया गया कि जिस कारण व्यक्ति लक्षण ध्वनि में संगत नहीं होता उस प्रतीति सहभाव को उससे हटा दिया जाय। सहभाव न होने पर विभावादी और रसवादी की प्रतीति में क्रम होने पर भी वे व्यञ्जक और व्यङ्ग्य माने जा सकेंगे। इस आक्षेप को दूषित बतलाते हुए अजुमितिवादी ने कहा—व्यक्तिवादी के अनुसार व्यक्तिलक्षण से यदि प्रतीति-सहभाव हटा दिया जाय तो उसका लक्षण अनुमान में भी संगत हो जाएगा फलतः अतिप्रसङ्ग होगें। इसका उपपादन करते हुए कहा—कि अनुमान में भी प्रकाशक धूम आदि प्रकाश्य वह्नि आदि के प्रति उपसरजन या गौण रहते हैं और क्रम से उसकी प्रतीति कराते हैं। व्यञ्जक और व्यङ्ग्य की स्थिति केवल दोनों की प्रतीतियों में ऐककालिकता या सहभाव के कारण अनुमिति से पृथक होती है, उसके हटा देने से सच्चमुच व्यक्तिलक्षण अनुमिति में भी लागू हो जाता है। इस दोष का निराकरण करते हुए व्यक्तिवादी ने व्यक्तिलक्षण में प्रकाश्य के साथ असत् विशेषण जोड़ना चाहा। अर्थात् प्रतीति में क्रम रहे और प्रकाश्य असत् हो तो प्रकाशक प्रकाश्य में व्यक्ति सम्बन्ध माना जाना चाहिए। अनुमिति-वादी ने इस पर भी दोष दिखलाया। उसका कहना है कि प्रकाश्य को असत् विशेषण देने से रत्यादि तो असत् होते हैं, उनमें व्यक्तिलक्षण लागू हो जाएगा और धूम आदि से प्रतीत वह्नि आदि असत् नहीं होते अतः उनमें व्यक्ति का लक्षण प्रतीतिक्रम रहते हुए भी नहीं जाएगा किन्तु इतने पर भी लोक में जहाँ प्रदीप से घट की प्रतीति होती है वहाँ व्यक्ति मानी जाती है, तथापि व्यक्तिलक्षण उसमें नहीं लगेगा, क्योंकि घट असत् नहीं होता, सत् ही होता है। इस प्रकार अतिप्रसङ्ग होने पर भी अव्याप्ति दोष होगा। साथ ही यदि इस अव्याप्ति के भय से असत् ग्रहण व्यक्तिवादी न भी करना चाहे और सत् का ही ग्रहण करना चाहे तो भी दोष होगा। सूर्य प्रकाश पर अभिव्यक्ति इन्द्रचाप असत् ही होता है। उसमें व्यक्तिलक्षण नहीं जाएगा। इन दोषों के कारण यदि व्यक्तिलक्षण में 'सत् और असत्' दोनों ही विशेषण लगाए जाएँ तो वहीं अनुमान में अतिप्रसङ्ग होती है। और अतिप्रसङ्गि ही नहीं असम्भव दोष भी होता है। व्यक्ति के लिए बनाया गया लक्षण सत् और असत् दोनों प्रकार के पदार्थों में संगत नहीं होता। उसमें प्रतीति सहभाव अपेक्षित होता ही है। उसको हटाने पर व्यक्तिलक्षण अतिरिक्त यदि न्यायपूर्वक विचार किया जाय तो व्यक्तिवादी द्वारा प्रकाश्य के लिए सत् या असत् विशेषण दिए भी नहीं जाने चाहिए, विशेषण वहीं शब्दतः कथित होता है जिससे किसी विरुद्ध-भाव का व्यावर्तन किया जाय। जैसा कि ग्रन्थारम्भ में कहा गया है। इस प्रकार व्यक्तिवादी का व्यक्तिलक्षण अनुमान में व्यभिचारित सिद्ध किया जाता है। यह सब एक वाकेड़ा है। इसका उत्तर

संगति—ग्रन्थकार ने अभीष्ट 'यथार्थः शब्दो वा' इस ध्वनिलक्षण का खण्डन करते हुए पहले अर्थ के उपसरजनीकृतातमत्व—इस विशेषण का, शब्द और उसके उपसरजननीकृतार्थत्व विशेषण का तथा व्यङ्ग्य पद से प्रतीत व्यङ्ग्यता का खण्डन किया। अब पुनः ध्वनिलक्षण में उपात्त पदार्थों की मीमांसा करते हुए उन्हें भी दोषावह सिद्ध करने के लिए—पहले 'अर्थ' शब्द के अर्थ का विचार करते और उससे आनेवाले दोषों का स्पष्टीकरण करते हैं। इस सन्दर्भ में ग्रन्थकार की पदावली का ध्यान रखना अपेक्षित है। वह ध्वनिवादी की ओर से जब पूर्वपक्ष करता है तब व्यङ्ग्य तथा व्यञ्जक तथा व्यक्त शब्दों का प्रयोग करता है और जब अपना पक्ष उपस्थित करता है तो साध्य, साधक या हेतु और अनुमित शब्दों का। कहीं-कहीं ये शब्द एक ही पंक्ति में प्रयुक्त किए गए हैं।

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किंच यत्र वाच्यस्यार्थस्य व्यङ्ग्यकत्वं, स चेदं ध्वनिस्तर्हि तदनुमितस्य व्यङ्ग्यकत्वे ध्वनित्वं न स्यात् तस्य वाच्यत्वाभावात् । ततश्च 'एवं वादिनो देवपि' इत्यादौ 'ध्वनित्वविशिष्टं न स्याद्' इत्यव्याप्तिरलक्षणदोषः । अथार्थशब्देनोभयोरर्थयोर्भयमपि संगृहीतं तस्योभयार्थविषयत्वेनैवश्रुत्वात् । यदाह—

'अर्थौ' अभिधानसिद्धौ। कार्यार्थमभिधा यो व्यवारस्थितः । वाच्यप्रतीममानार्थौ तस्य भेदादुभौ स्मृतौ ॥' इति । सत्यम् । किन्तु तमर्थमिति तच्छब्देनानन्तर्यात् प्रतीममानस्यार्थस्य परामर्शे सति परिशेष्याद् 'अर्थो वाच्यविशेष:' इति स्वयमेव चिद्वृत्तत्वाच्च अर्थशब्दो वाच्यविषय एव विश्रयते नोभयार्थविषय इति तद्वस्त्यो दोषः—

इसके अतिरिक्त जहाँ वाच्य अर्थ व्यङ्ग्यक हो, यदि वह ध्वनि माना जाय तो उससे अनुमित अर्थ का व्यङ्ग्यकत्व होने पर ( भी ) ध्वनित्व सम्भव नहीं । क्योंकि उसमें वाच्यत्व का अभाव है । ऐसा होने पर 'एवं वादिनि देवपि' इत्यादि में माना गया ध्वनित्व माना न जा सकेगा—अतः ध्वनि लक्षण में अव्याप्ति दोष होगा । यदि कहा जाय कि अर्थ शब्द के उभयार्थ विषयक होने से दोनों अर्थों का संग्रह हो जाता है जैसा कि कहा है—

'अर्थ', जो सहृदय शास्त्रज्ञ होने से काव्य की आत्मा माना गया है, उसके वाच्य और प्रतीममान नामक दो भेद माने गए हैं ।'

ठीक है । किन्तु (यहाँ) अर्थशब्द वाच्यार्थमात्र के लिए प्रयुक्त ज्ञात होता है दोनों अर्थों के लिए नहीं । क्योंकि ध्वनिलक्षण 'यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थम्' में 'तम्' पद द्वारा तुर्णन्त पीठे ( प्रतीममानः पुनरन्यदेव, सरस्वती स्वादु' आदि में ) कहे गए प्रतीमान अर्थ का परामर्श हो जाने पर वाच्य ही दोष रहता है और 'अर्थो वाच्यविशेष:' इस प्रकार स्वयंमेव ( अर्थ पद की ) व्याख्या की गई है । अतः दोष पूर्ववत् ही बना रहता है ।

निर्धारण—आनन्दवर्धनाचार्य के ध्वनिलक्षण—'यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थमुप' में एक अर्थ से दूसरे अर्थ की प्रतीति का उल्लेख है । अनुमितिवादियों की शंका है कि जिस अर्थ से अर्थान्तर की प्रतीति होती है वह अर्थ कौन सा है केवल वाच्य, अथवा व्यङ्गय भी । वह स्वतः समाधान भी करता है । कि वह अर्थ वाच्य ही हो सकता है व्यङ्गय या दोनों नहीं । इस समाधान में वह युक्ति और शब्द को प्रमाणरूप से उपस्थित करता है । युक्ति है—व्यङ्गय के विषय में और शब्द है—उभयार्थे विषयकत्व के निराकरण तथा वाच्यसमर्थन में । ( युक्ति ) उसका कहना है कि ध्वनिलक्षण में आए प्रथम अर्थ शब्द का अर्थ प्रतीममान या व्यङ्गय नहीं हो सकता क्योंकि प्रतीममान की प्रतीति के लिए तद् इस सर्वनाम से युक्त दूसरे अर्थ शब्द का उपादान किया है । तद् सर्वनाम प्रकान्त परामर्शक है । प्रकान्त या प्रकरण प्राप्त अर्थ प्रतीममान ही है क्योंकि वही 'प्रतीममान पुनरन्यदेव' तथा 'सरस्वतीस्वादु' इस ध्वनिलक्षण कारिका के पहिले की कारिकाओं में आया है । अतः तद् शब्द का अर्थ भी वही प्रतीममान है । फलतः प्रतीममान या व्यङ्गय अर्थ प्रथम अर्थ का वाच्य हो सकता । दोनों अर्थ शब्दों का एक ही अर्थ मानने पर कर्तृत्व और कर्मत्व का विरोध होगा । इस प्रकार 'अर्थ:' इस प्रथम अर्थ शब्द का पारिशेष्य-प्रमाण से 'वाच्य' अर्थ हो जाने पर ध्वनि लक्षण में अव्याप्ति नामक दोष आता है । क्योंकि एकमात्र वाच्य अर्थ ही व्यङ्गक नहीं होता,

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प्रथमो विमर्शः:

व्यंग्य या वाच्य से प्रतীয়मान अर्थ भी व्यंजक होता है और वह अर्थ भी ध्वनि माना जाता है ‘एवं वादिनि देवपौ’ में वाच्य अर्थ से अवहित्था या लज्जा व्यक्‍त होती है और उससे शिव विषयक पार्वतीनिष्ठ रति । यहाँ दूसरा लज्जा या अवहित्था अर्थ तीसरे ( रति ) अर्थ का व्यंजक होता है और ध्वनि उसे भी माना जाता है । उक्त अर्थ के अनुसार यदि ध्वनित्व केवल वाच्यरूपी व्यंजक तक सीमित हो जाएगा तो लज्जा आदि अर्थों में, जो वस्तुतः व्यंजक हैं, ध्वनिलक्षण न जाएगा । यही अव्यासिदोष होगा । क्योंकि ऐसे अर्थों में भी व्यंजकत्वमूलक ध्वनित्व स्वतः ध्वनिकार ने माना है ।

शब्द प्रमाण द्वारा अर्थ के उभयार्थविषयकत्व का खण्डन करते हुए अनुमितिवादी कहता है— ( पूर्वपक्ष ) यदि ‘अर्थः’ शब्द का अर्थ वाच्य और व्यंग्य दोनों ही अर्थ माने जाएँ जैसा कि ‘अर्थः सहृदयाश्रयः’ कारिका द्वारा आभास मिलता है तो उक्त अव्यासि दोष मिट जाता है— ( उत्तर पक्ष ) किन्तु वह सम्भव नहीं क्योंकि उक्त युक्ति से तमर्थं में आए तत्पद से युक्त अर्थशाब्दका अर्थ अननतरोक्‍त प्रतীয়मान अर्थ हो जाने पर वह व्यंग्य कोटि में चला जाता है, तब व्यंजक रूप से वाच्यार्थ ही शेष रहता है तथा स्वयं आनन्दवर्धन ने ‘अर्थः’ की व्याख्या ‘अर्थों वाच्यविशेषः’ यों ही है । उनका यह वाक्य ही प्रमाण है कि ‘अर्थः’ का अर्थ वाच्य ही हैं । अतः अव्यासि दोष बना ही रहता है ।

अस्तु वोभयार्थविषयः । तथाप्यतिद्वयास्तिलक्षणदोषः, यत्र वाच्यार्थोऽस्तुमात्रेणकेन द्वित्रैवान्तरिता वस्तुमात्रस्यैव साध्यस्य प्रतीतिस्तत्रापि ध्वनित्वआप्ते:, तल्लक्षणानुगमाविरोधात् । न च तत् तत् त्रेश्यते, चाख्यातिवृत्तेः । व्यभिचारिभावालङ्कारान्तरितायां पञ्च तस्या ध्वनिविषयभावाभ्युपगमात्, अन्यत्र तु तद्व्यप्ययात् । चारुत्व-निश्चये च काव्यतत्त्वविदः प्रमाणम् ।

अथवा ( आँखें बन्द करके ) अर्थः शब्द उभयार्थ विषयक हो मान लिया जाय, तब भी लक्षण में अतिव्यासि दोष आता है । क्योंकि वहाँ भी ध्वनित्व मानना होगा जहाँ वाच्यार्थ से केवल किसी एक वस्तु के अथवा दो तीन वस्तुओं के बाद उसी वस्तुमात्र की साध्यरूप से प्रतीति होती है क्योंकि ध्वनि का लक्षण वहाँ भी घटित हो जायगा और वहाँ वह ( ध्वनित्व ) माना नहीं जाता क्योंकि वहाँ तक जाते समय चारुत्व या चमत्कार उड़ जाता है । वह उसी ध्वनि तक रहता है जो व्यभिचारिभाव अथवा अधिक से अधिक अलङ्कार ध्वनियों में वह उलट जाता है । जहाँ तक चारुत्व और अचारुत्व का प्रश्न है उसके विषय में काव्यतत्त्ववेत्ता जन प्रमाण हैं ।

विमर्शः : ध्वनित्व वहाँ माना जाता है जहाँ एक ओर व्यंग्यत्व हो चमत्कार । अनुमितिवादी की मान्यता है कि चमत्कार केवल उन व्यंग्यों में रहता है जो वाच्य से विना किसी वस्त्वन्तर प्रतीति के व्यवधान के प्रतीत होते हैं अथवा ध्वनिभाव होने पर भी केवल व्यभिचारिभाव या अलङ्कार के व्यवधान पर । यदि केवल वस्तुमात्र से वह एक ही क्यों न हो ऐसे व्यंग्य की प्रतीति में जो स्वयं वस्तुमात्र हो विफल पड़ जाता है तो उसमें चमत्कार नहीं रहता । अनेक वस्तुओं की प्रतीति के व्यवधान के बाद प्रतीति होने वाले वस्तुमात्र व्यंग्य की तो बात ही दूर है । यदि ‘अर्थः’ शब्द का अर्थ वाच्य और व्यंग्य दोनों ही अर्थ किया जाएगा

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व्यक्तिविवेक:

तो उन वस्तुमात्र व्यंयों में भी ध्वनिलक्षण चला जायगा जिनकी प्रतीति एक या अनेक वस्तुमात्र प्रन्थोंति के व्यवधान के वाद होती है । फलतः अतिव्याप्ति दोष होगा ही ।

कुछ ऐसे उदाहरण उपस्थिथत करते हैं जिनमें एक या अनेक वस्तु मात्र की प्रतीति के व्यवधान के वाद वस्तुमात्र व्यज्य को प्रतीति देखीं जाती है—

तत्रैकैन वस्तुमात्रे णान्तरिता सा यथा—

'सिहिपिञ्छकण्णऊरा बहुआ वाहस्स गविरी भमइ । मुत्ताहलरिअप्पसाहणाण मज्झे सवत्तीणम्‌ ॥'

( शिखिपिच्छकर्णपूरा वधूवर्याधस्य गर्विणी भ्रमति । मुक्ताफलरचितप्रसाधनानां मध्ये सपलीनाम्‌ ॥ )

अत्र हि वक्ष्यमाणप्रकारेण व्याधवृत्त्या सपत्नीनां सुभाग्यातिरेकोडचु-मेयः । स चाविरतसम्भोगसुखासज्जनिस्सहत्य पत्युरमेयमात्रमार णक्षामत-यानुभीयमानयान्तरितः ॥

उनमें एक वस्तुमात्र से व्यवहित वस्तुमात्र प्रतीति यथा—'मोतियों से अलंकृत सपत्नियों के वीच केवल मोर को करतालफूल पहने हुये बहोलिये की बहू गर्व के साथ घूमती है ।'

यहाँ, जैसा कि आगे ( तृतीय विमर्शों में ) कहा जायगा, व्याधवृत्त का सपलियों की अपेक्षा अधिक सौभाग्य अनुमेय है वह अनुमित हो रही पति की निरन्तर सम्भोगसुख के नशे से केवल मोर को ही मार सकने की शक्ति से व्यवहित है ।

प्रस्तुत पद्य में व्याधवधू के सपत्नियों के बीच गर्वपूर्वक भ्रमण का कारण पति का स्नेेह है, वह शिखिपिच्छकर्णपूर पद से प्रतीत होने वाली व्याधनिष्ठ मयूरमात्रमार णशक्ति के वाद प्रतीत होता है ।

द्वाभ्यामन्तरिता यथा—

'वाणिअअ हलत्थदनता कत्तो अण्ण वगधित्ती अ । जावलुलिआलसुहा परम्म पारसक्क्ख सहला ॥'

( वाणिजक ? हस्तिदन्ता कुतोऽन्य वाग्दक्षिणा । यावलुलितालसुखी गृहे परिण्वकार्ते सुषा ॥ )

अत्र हि वक्ष्यमाणप्रकारेण वृद्धव्याधेन वाणिजकं प्रति हस्तिदन्ताद्यभाव-प्रतिपादनाय व्यापकविरुद्धकार्योपलब्धः प्रयुक्तः । यथा नात्र तुषाररुस्पर्शो धूमादिति ।

हस्तिदन्तव्याघ्रजिनादिसद्रावो ह्यस्मद्गृहे समरथेस्य सतः सुतस्य तद्यापादनव्यापारपरतया व्यासः । तद्विरुद्धं च शुषासुभाग्यातिरेकप्रयुक्त-मविरतसम्भोगसुखासज्जनितसुस्सहत्वम्‌ । तत्कार्यं च शुषाया चिल्ल-लितालकमुखीत्वमिति ।

दो वस्तुमात्र से अन्तरित यथा—सौदागर भाई, हमारे यहाँ हस्ती दाँत और वाघ चमो खाल अव काहाँ, जव से मोंह पर लटें लटकाकर पतोहू ने घूमना शुरू किया है ।

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यहाँ कहे जाने वाले ( तृतीय विमर्शों में ) ढँग से बूढ़े बहेलिये ने पुराने व्यापारी से हाथी दाँत आदि के अभाव की बात कहते हुए व्यापक विरुद्ध कार्य को उपलब्ध कह दी, जैसे यहाँ ठंडक नहीं है, धुऑँ होने से ।

हाथी दाँत और वाघ की खाल आदि का सन्द्राव हमारे यहाँ समर्थ पुत्र की उन्हें मारने की लगन से व्याप्त है । उसके विरुद्ध है पताहू के अत्युक्त आकर्षण से निरन्तर सम्बोगसुख की लाट के कारण उत्पन्न अस्सामर्थ्य उसका फल है पतोहू का अलकसंवृत चेहरा ।

विमर्शः यह बात घर आये किसी पुराने सौदागर से बूढ़ा बहेलिया कह रहा है । पहले के समान अब ऊँचा सौदा मेरे घर नहीं, जब से गर्वीली पतोहू का घर में राज हुआ है । इसका अभिप्राय व्यक्त करते हुए ग्रन्थकार ने अनुमान प्रक्रिया का आश्रय लिया है । अनुमान प्रक्रिया का एक विशिष्ट परिमाणिक शब्द है 'व्याप्त' जिसका उन्होंने प्रयोग किया है । व्याप्त का अर्थ न्यासि युक्त अद्विते के नहीं रह सकता । अद्विते धूम के विना भी अयोगोलक आदि में रहती है । इसलिए धूम वह्नि का व्याप्य और वहि धूम का व्यापक माना जाता है । व्याप्य को न्याप्त भी कह दिया जाता है इसलिए यह भी कहा जा सकता है कि धूम वह्नि से व्याप्त है । इसी प्रकार प्रकृत में बहेलियो के घर व्याप्रचर्म आदि का अस्तित्व तबों सम्मत है जव उसके युवक पुत्र में व्याप्रादि वध की लगन हो । अर्थ यह है कि व्याध पुत्र की व्याप्त्रादि वधपरता व्यापक है । और घर में व्याप्रचर्म आदि का सन्नभाव व्याप्य । फलतः व्याप्रचर्म आदि का सन्नभाव व्याधपुत्र की व्याप्रादि वधपरता से व्याप्त हुआ ।

प्रस्तुत पद्य में पतोहू का कुलितालकसुखीत्व बतलाया गया है जो व्याधपुत्र के उस व्याप्रादि वध से वैसुर्य का ( कार्ये ) फल है, जो व्याधपुत्र की व्याप्रादि वधपरतास्वरूपी व्यापक के विरुद्ध है । यह प्रयोग ठीक वैसा ही हुआ जैसे धूम से वह्नि के अनुमान में व्यापक जो वह्नि है उसके विरुद्ध पदार्थ जल का कार्य ठंडक कहकर उसके अभाव का, व्याप्य धूम द्वारा अनुमान किया जाय ।

इस स्थल में प्रमुख वाक्यार्थ रस्सुपरिष्वङ्गन द्वारा उसके सौभाग्यातिशय का अनुभव होता है, और उसके परिणमास्वरूप वहु के कुलितालकसुखीत्व द्वारा पुत्र के अविरतसम्भोगसुखासद्रपरत्व का, इसके बाद व्याप्त्रवधवैमुख्य की प्रतीति होती है । इस प्रकार वह प्रतोति दो वस्तुध्वनियों से अन्तरित है एक—वधूसौभाग्यातिशय और दूसरे सम्भोगसुखासद्रपरत्व —। फलतः उसमें चमत्कार नहीं है । अतः उसे ध्वनि नहीं माना जा सकता, किन्तु उसे भी ध्वनि मानन्ना ही होगा यदि ध्वनि लक्षण के अर्थ शब्द वाच्य और वाच्य से प्रतीमान दोनों अर्थ का संग्रह किया गया ।

त्रिभिरन्तरिता यथा— 'विवरीअसुरअसंप वहाँ डडहूण णाहिकमलिम्म । हरिणो दाहिणणअं चुम्वद्र हिअइआउला लच्छिओ ।।' ( विपरीतसुरतसमये ब्राणं हृदया नामिकमले । हरदोणनयनं चुम्बति हियङ्कुला लक्मीः ।। )

अत्र हि लक्मीइजनित्यक्तिस्साध्य । तत्र च भगवतो हरेःक्षणस्याक्षः सूर्यात्मनो लक्मीपरिचुम्बनं हेतुः । तदिदि तस्य तिरोधानलक्षणमसस्तमयमनु-मापयति । सोडपि च स्वाहचयोराभिनलिनस्य सड्ङोचभूः । सोडपि ब्रह्मणो दर्शनेनव्यवधानमिति त्रयाणन्तरितानुमेयार्थप्रतिपत्तिः । तदियंमुपायपरम्परो-

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पारोहनिस्सहा न रसास्वादान्तिकमुपगन्तुमलमिति प्रहेलिकाप्रायमेतत् काव्यमित्यतिविद्याति: ।

तीन से अनतरित यथा—'विपरीत चुरत के समय नामिक कमल पर बैठे ब्रह्मा को देखकर बुरे तरह लजाई लक्ष्मी विष्णु का दक्षिण नेत्र चूमने लगी ।'

यहाँ लक्ष्मी की लज्जानिद्रुचित साध्य है । उसमें हेतु है विष्णुभगवान् के सूर्य स्वरूप दाहिने नेत्र का लज्ज्मी द्वारा चुम्बन । वह उसके डर से अस्त का अनुमान करता है । वह भी अपने साथ ही नामिकमल का हूँदना और वह मुॅदना भी ब्रह्मा से आँखों की ओट का अनुमान कराता है—इस प्रकार अनुमेयार्थ की प्रतीति तीन से अनतरित हुइं ( तीन अर्थों की प्रतीति के बाद हुइं ) एक के बाद एक उपस्थित होते जाने वाले ये उपाय साध्य प्रत्यायक हेतु सामाञ्जिक मन्त्रि में चढ नहीं सकते इसलिए रसास्वाद के पास भी पहुँचने में समर्थ नहीं होते, इसलिए केवल ये पहेलियाँ जैसे हैं काव्य नहीं—इसलिए इनमें अतिविद्याति होती है ।

व्यभिचारिभाववचहिता यथा—

'पत्मुः शिरश्छन्द्रकलामनन स्फुरोति सख्या परिहासपूर्वम् । सा रञ्जयित्वा चरणौ कृताशिमौद्येन तां निर्वचनं जगात् ।'

अत्र हर्षोत्कर्षागोगुमितकोत्कौतुकसहचर्यपरिहासालज्जादिरिति गौर्यामाभिलाषिकषड्ढारावगति: ।

व्यभिचारिभाव से अनतरित यथा—दोनों चरणों में अलता लगाकर सखी ने हँसी करते हुए पार्वती को आशीर्वाद दिया कि तुम इससे पतिदेव के शिर की चन्द्रकला का स्पर्श करना तो उसने उस पर मुॅह से थूका कुछ कहे गजरे को चोट की ।

इसमें पार्वती में अभिलाष सम्वन्धी शृङ्गार का अनुमान होता है, जो पहले कथित ( ५१ पृष्ठ पर ) क्रम के अनुसार अनुमान द्वारा ज्ञात कौतुक, औत्सुक्य, प्रहर्ष, लज्जा आदि व्यभिचारिभावों की प्रतीति के बाद होता है ।

अलङ्कारव्यवचहिता यथा—

'लावण्यकान्तिपरिपूरितदिङ्मुखेडस्मिन् स्मरङ्गुरुणा तव मुखतरलयिताक्षि । क्षोभं यदेति न मनागपि तेन मन्ये सुव्यक्तमेव जडराशिरयं पयोधि: ।'

अत्रापि कस्याश्चिदुक्तक्रमेण बदनपूर्णेनुद्विस्मयो रूप्यरूपकभावोऽनु- मित: । तदन्तरिता चानुकार्योवगति: । सैव ध्वनेरविष्यभावेनोपगन्तव्या, नाव्या ।

नच व्यवधानाविरोषाद्व्यभिचार्यलङ्कारव्यवधानपक्षेऽप्येतत् समाना मिति मन्तव्यं, वस्तुमात्रस्य व्यभिचार्यलङ्कारादीनां च मित्रजातीयत्वात् । वस्तु- मात्रं ह्यानुमेयादत्यान्तविलक्षणस्वभावमग्न्यादेरिव धूमादि: व्यभिचार्योदयस्तु तच्छोभानुविभावेनैव परक् । इव तदालिङ्गिता इवात्प्रधनन्ति न तत्तद्वघानमन्यदेव वस्तुव्यवधानादित्यसिद्धस्तद्विरोष: ।

चिलक्षणा पवेत तद्व्यवधानमन्यदेव वस्तुव्यवधानादित्यसिद्धस्तद्विरोष: ।

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अलङ्कारोडप्यलङ्कार्योऽत्र पृथगवस्थातुमर्हाति तयोराश्रयाश्रयिभावेनावस्थानाद् इति तद्व्यवधानस्याप्यविशेषोऽसिद्ध एवेति तद्वस्थैवातिद्यास्ति: ॥

अलङ्कार से व्यवहित यथा— हे चपल नेत्रों वाली सुन्दरी ! मन्त्रहास लिए तुम्हारा चेहरा अपनी लवण्यमयी कान्ति से दिनांशपटल को तिलतिल करके छा देता है। तब भी यदि इसमें थोड़ा भी श्रम नहीं होता तो निश्चित ही यह पर्योधि जड़राशि ( ड-ल के अभेद से जड़राशि अर्थात जड़त्व-मूर्खता ) की झलक है। यहाँ भी पूर्वोक्त प्रकार से किसी सुन्दरी के मुख और पूर्णेन्दु का रूप्यरूपकभाव अनुमानगम्य है। उसके बाद अनुकार्य का बोध होता है। उसी को ध्वनि के विषयरूप से स्वीकार किया जाना चाहिए, किसी अन्य को नहीं।

ऐसा नहीं मानना चाहिए कि ( वस्तुमात्र और अलङ्कार तथा व्यभिचारी दोनों के ) व्यवधान पर भी यह ( चमत्कारजन्यता ) मानी जाय, क्योंकि केवल वस्तु और व्यभिचारी, अलङ्कार आदि भिन्न भिन्न ढंग के तत्व हैं। जो वस्तुमात्र है उसका स्वभाव अनुमेय से एकदम भिन्न है जैसे अभि आदि से धूम आदि का। व्यभिचारी आदि तो उसकी ( रसरूप अनुमेय की ) छटा लिए रहते हैं इसलिए, उससे हिले मिले से, आलिङ्गित से उत्पन्न होते हैं। ( तुमसे खाते हैं ) उससे एकदम भिन्न नहीं होते, इसलिए उनका व्यवधान वस्तुमात्र के व्यवधान से एकदम भिन्न है—इसलिए उसे ( व्यभिचारी आदि के व्यवधान को वस्तुमात्र के व्यवधान से ) अभिन्न कहना युक्ति सिद्ध नहीं। अलङ्कार भी अलङ्कार्य से पृथक् नहीं रह सकता, क्योंकि उनका मूलक है। इसलिए उसके व्यवधान को भी अचिदोष ( वस्तुमात्र के व्यवधान से अभिन्न ) कहना युक्तिसिद्ध नहीं; इसलिए अतिद्यास्ति वैसी ही रही आर्हे।

विमर्शः : उक्त संदर्भ में आशय केवल इतना ही है कि व्यभिचारी भावों और अलङ्कार की प्रतीति के व्यवधान के बाद प्रतीत होने पर भी रस प्रतीति में चमत्कार होता है—क्योंकि वे रस के तारतम्य लिए हुए अन्तरङ्ग तत्त्व हैं। व्यभिचारी रस स्वरूप से पृथक् ही होता, अलङ्कार भी अपने आश्रय अर्थ या शब्द को छोड़कर नहीं रह सकता इसलिए वह भी रस का व्यभिचारी से कुछ उन्नीस अन्तरङ्ग है। क्योंकि रस विभावादि रूप अर्थ से भिन्न नहीं और ‘अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्व शब्देन भासते’ के अनुसार विभावादि स्वप्रत्यायक शब्दों से भिन्न नहीं।

यद्यर्थ इति वाच्योऽर्थोऽभिततोऽन्यतिरेव सा । येनैववादिनीत्या द्वर्थस्यार्थान्तराद्वाति: ॥ २१ ॥

अथोभौ प्रहेलिकादिरूपेडपि काव्ये ध्वन्यात्मता यतः ॥ २२ ॥

इति सदूक्तिरलोके ।

उक्त प्रपञ्च का सार दो श्लोकों में संगृहीत करते हैं— यदि ‘अर्थः’ इससे वाच्य अर्थ अभिमत हो ( तो भी ) वही अवश्य स्वीकार्य रही आती है, क्योंकि ‘एवं वादिनि देवर्षौ’ आदि में अर्थान्तर से अर्थ की प्रतीति होती है। यदि दो तीन ( अर्थ अभिमत हों ) तो प्रहेलिकादिरूप दो तीन वस्तुमात्रों से अन्तरित अर्थ की प्रतीतिवाले काव्य में ध्वनित्व हो जाने के कारण अतिव्याप्ति होती है।

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केचलमत्रैवार्थस्योभयातमनः सामान्येन यः काव्यात्मवेन व्यपदेशः सोऽनुपपन्नः। स हि प्रतीममानार्थैकविषयो युक्तः, तस्यैव काव्यजीवितभूतस्य प्रधानतया ध्वनित्वेनैग्रत्वात्। यत् स एवाह 'काव्यस्यात्मा ध्वनिरे'ति। 'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' इति। 'प्रतीयमाना त्वन्थैव भूरा लज्जेव योपित' इति च। तेन 'यः काव्यस्य व्यवस्थितः' इति तत्रैव चितः पाठः।

केचल यहीं ( यौगर्थ: सहदयश्लाघ्ये में ) वाच्य और प्रतीममान दोनों अर्थों में अर्थ शब्द का प्रयोग किया और फिर उसी अर्थ को अर्थवेन ( न वाच्यार्थवेन और न प्रतीममानार्थवेन ) काव्यात्मा जो कहा गया वह ठीक नहीं। काव्यात्मा संज्ञा एक मात्र प्रतीममान अर्थ के लिये ही ठीक है, क्योंकि काव्यात्माभूत उसको प्रधानता के कारण ध्वनि नाम से पुकारना अभिमत है। जैसा कि स्वयं उन्होंने कहा है—काव्यस्यात्मा ध्वनि;, काव्यस्यात्मा स एवार्थः और प्रतीममानात्वन्यैव भूरा लज्जेव योपिताम्'। इसीलिये वहाँ 'यः काव्यस्य व्यवस्थितः' यह पाठ ठीक है।

विमर्शः : ध्वनिकार ने काव्य की आत्मा ध्वनि को माना है। ध्वनित्व प्रतीममान अर्थ में ही रहता है' वाच्य में नहीं। वाच्य व्यङ्कक होने से ध्वन्यतेनें इस व्युत्पत्ति के आधार पर ध्वनि कह दिया जाता है वस्तुतः प्राधान्येन प्रतीममान या ध्वन्यमान अर्थ ही ध्वनि और काव्यात्मा माना जाता है। ऐसी स्थिति में अनुमितिवादी का कहना है कि 'यौगर्थः सहदयश्लाघ्यः' कारिका में 'अर्थे' का अर्थ अर्थसामान्य है और उसे काव्यात्मा कहा गया है, उससे प्रतीममान के समान वाच्य भी काव्यात्मा माना जा सकता है जैसा कि स्वयं ध्वनिकार को अभिमत नहीं है। उन्होंने केवल प्रतीममान अर्थ को ही काव्य को आत्मा माना है—काव्यस्यात्मा ध्वनि;, काव्यस्यात्मा स एवार्थः और प्रतीममानात्वन्यैव भूरा लज्जेव योपिताम्' आदि । इस आपत्ति के संशोधनार्थ व्यक्तिविवेककारने पाठ परिवर्तित किया—अर्थः सहदयश्लाघ्यो यः काव्यस्य व्यवस्थितः वाच्य प्रतीममानाख्यौ तस्य वेदयितुम्बौ स्मृतौ। इस पाठान्तर में अर्थ के वाच्य और प्रतीममान ये दो भेदमात्र स्पष्ट कर दिये गये, उनका काव्यात्मत्व, नहीं कहा गया जिससे आपत्ति उपशमित होती थी ।

किञ्चात्र वाच्यार्थी किंकाव्यार्थी वा सामान्यार्थी वा। न तावद्वाच्यकलापार्थे पक्षान्तरासम्भवस्य व्युत्पादितत्वात्। सम्भवे वास्य द्विचचनानुपपत्ति;, तयोस्समुच्चयाभावात्। यथा 'शिरः श्वा काको वा दुपदतनयो वा परिमृशेत्' इत्यत्र बहुवचनस्य। समुच्चयार्थत्वे यत्र शब्दार्थयोरेकैकस्य व्यङ्ककत्वं तत्र ध्वनित्वमिष्यं न स्यात्।

इसके अतिरिक्त यहां ( यत्रार्थ: शब्दों वा इस ध्वनि लक्षण में) वा शब्द विकल्पार्थक हो सकता है अथवा समुच्चयार्थक । विकल्पार्थक हो नहीं सकता क्योंकि यह सिद्ध किया जा चुका है कि दूसरा पक्ष सम्भव नहीं है। सम्भव भी हो तो द्विवचन असिद्ध होता है, क्योंकि उसका समुच्चय नहीं है। जैसा 'शिरः श्वा काको वा दुपदतनयो वा परिमृशेत्' में बहुवचन समुच्चयार्थक मानने पर जहाँ शब्द अर्थ दोनों में से केवल एक व्यङ्कक होता है वहां ध्वनित्व लक्षण

विमर्शः : वा शब्द विकल्पार्थक होता है और समुच्चयार्थक । अनुमितिवादी का प्रश्न है कि दोनों में से वह किस अर्थ में प्रयुक्त है। उसका कथन है कि दोनों ही अर्थों में प्रयुक्त होने पर ध्वनि लक्षण

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में दोष आता है। विकल्पार्थक मानने पर अर्थ होगा—‘जहाँ शब्द अर्थवा अर्थ उपसर्जनीकृतास्वार्थे होकर उस अर्थको अभिव्यक्ति कराएँ’ इसमें अर्थके समान शब्द भी व्यञ्जक माना जाएगा। वस्तुतः पूर्वोक्त दृष्टिकोण से शब्द का कोई अभिधातिरिक्त व्यापार होता नहीं जिससे वह व्यञ्जक बने। अतः केवल अर्थ ही व्यञ्जकरूप से अवशिष्ट रहता है, तब विकल्प द्वारा शब्द को भी व्यञ्जक मानने का पक्ष ही नहीं उठता। यदि आँख बंद कर शब्द को भी व्यञ्जक माना जाय तो व्यञ्जक: यह द्विवचनान्त क्रियापद अनुपपन्न होगा क्योंकि विकल्प से प्राप्त पदार्थों का अन्योन्य एक साथ नहीं होता अतः उनके क्रिया आदि पदों में उन्हीं स्वातन्त्र्य पदों के वचन पुरुष प्रयुक्त होते हैं, जैसते ‘शिर को कोई भी छुए—कुत्ता, कौवा या शृगालमुखः १’ यहाँ कुत्ता आदि का शृंगे में स्वातन्त्र्य रूप से अन्वय है अनः उसमें कर्ता के अनुसा एक वचन ही है, बहुवचन नहीं। ठीक ऐसे ही वाक्य शब्द के विकल्पार्थक होने पर ‘शब्दो वा ध्वननक्ति अर्थो वा’ यह वाक्य योजना होगी; व्यञ्जक: नहीं।

यदि समुच्चयार्थक माना जाय तो विकल्पार्थक मानने से उठनेवाले दोष तो हट जाते हैं, किन्तु एक अन्य दोष आ जाता है। वाच्य शब्द के समुच्चयार्थक होने से ध्वन्यित्य सर्वदा शब्द और अर्थ दोनों पर रहेगा, एक पर नहीं। ऐसी स्थिति में जिन स्थलों में केवल शब्द या केवल अर्थ ही व्यञ्जक होता है वहाँ ध्वनि लक्षण की अव्यासि होगी। लोचनकार ने वाच्य शब्द को उभयार्थक माना है। प्राधान्य को लेकर विकल्पार्थक और वास्तविक स्थिति को लेकर समुच्चयार्थक। जहाँ शब्द का व्यञ्जकत्व अर्थ की अपेक्षा प्रधान हो वहाँ और अर्थ का शब्द की अपेक्षा वहाँ—दोनों स्थलों में व्यञ्ज्य की अपेक्षा प्रधान व्यञ्जक उपसर्जन ही रहेगा। साथ ही काव्य में अर्थ शब्दप्रमाण से ही शrey वैच होने से अर्थ जहाँ ( विशिष्टितवाच्यध्वनि में ) प्रधानतया व्यञ्जक होगा, वहाँ शब्द भी व्यञ्जक होगा ही, भले ही वह अप्रधानतया व्यञ्जक हो। इसी प्रकार शब्द में जहाँ ( अभिवक्षितवाच्य में ) प्रधान व्यञ्जकता रहेगी वहाँ भी अर्थ अप्रधानरूप से व्यञ्जक होगा ही क्योंकि शब्द व्यञ्जक तभी होता है जब उससे अर्थप्रतीति होती है। लोचनकार ने ‘व्यञ्जक इति द्विवचनेनैवमाह:’ से लेकर ‘इति सर्वत्रशब्दार्थयोर्ध्वैनिय्यापारः’ तक इस विषय का स्पष्ट निरूपण किया है। यह अंशोऽश्रवय ग्रन्थकार अभिनवगुप्त की इस व्याख्या के अनुसार वाच्य शब्द के विकल्पार्थक होने पर भी समुच्चयार्थ को लेकर व्यञ्जकत्व बना जाता है। साथ ही समुच्चय पक्ष में भी केवल एक की व्यञ्जकता का अभाव होने से दोष नहीं आता।

शब्दस्य च विशोषणमनुपादेयमेव स्यादू अर्थस्य विशिष्टत्वेनैव तद्व्यक्तिसिद्धे:। अतएव च लक्षणवाक्ये दीपकादिलड्कारसुखुबेनोपमाद्यभिव्यक्तौ ध्वनितवामिच्छतागुणीभूतातमनोडभिधाया उपादानं न ऋतम्‌। अन्यथा तदपि कर्तव्यं स्यात्त्‌। तदाश्रितत्वादर्थस्यार्थीश्रितत्वाच्चालङ्काराणामिति पक्षद्वयमप्यनुपपन्नम्‌।

शब्द का विशेषण ( उपसर्जनीकृतास्वत्व ) में हो जाती है। इसीलिए तो लक्षणवाक्य ( यत्रार्थ: शब्दों वा ) में दीपक आदि अलंकार से अभिव्यक्त होते उपमा आदि अलङ्कार में ध्वनित्य मानते हुए भी गुणीभूतात्म-अभिधा का उपादान नहीं किया। नहीं तो वह भी करना चाहिए। है और अर्थ के आश्रित अलङ्कार—इस प्रकार दोनों ही पक्ष ( विकल्प और समुच्चय ) ठीक सिद्ध नहीं होते।

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विमर्शे : इस विषय का पूर्ण विचार आरम्भ में ही कियं जा चुका है । प्रकृत में ‘वा’ शब्द के स्वण्डन में ग्रन्थकार ने उसे दुहरा दिया ।

अत्र केचिद्विद्वन्मानितो द्विवचनसमर्थनमनोरथाक्षतचित्ततया वाच्यवाचकयोरिव स्मृतसुप्रसिद्धप्रतीतिक्रमभावास्तयोरेकालिकतां शब्दस्योक्तनयामतस्तामपि व्यवकतां पश्यन्तस्तत्कथिवन्धनां ध्वान्तभेदयोरविवक्षितविवक्षितान्यपरवाच्ययोध्वननव्यापारं प्रति पर्योयेगानन्योऽपसहकारितां, तदपेक्षां चानयो: प्रधानतदाक्षुपकल्प्य सहकारितया व्यक्तिक्रियां प्रत्युभयोरपि कर्तृत्वात् तदपेक्षं ‘व्यङ्क इति द्विवचननिर्देशः’, प्राथान्त्यपेक्षं ‘यत्रार्थे: शब्दो वेतिं’ विकल्प इतिमन्यमानाः: ‘व्यङ्क इति’ द्विवचननिदेशमाह—

यद्यप्यचिवक्षितवाच्ये शब्द एव व्यङ्ककस्तथाप्यर्थस्य सहकारिता न झुक्यति । अन्यथाड्नातार्थोंडपि शब्दस्तत्कव्यङ्कक: स्यात् । विवक्षितान्यपरवाच्ये च शब्दस्यापि सहकारित्वं भवत्येव । विशेषशब्दाभिधेयतया विना वाच्ये च शब्दस्यापि सहकारित्वं भवत्येव ।

तस्यार्थस्याव्यत्कतावादिति सर्वत्र शब्दार्थयोर्ध्वननव्यापार: । अत्र च भट्टनायक: ‘एकं द्विवचनं यदूदितं तद् गर्जनिमीलिकयैव अर्थ: । शब्दो वेति तु विकल्पाभिधानं प्राधान्याsमिप्रायेण’ इति यदाहुस्तदन्तिमात्रमूलं न तत्त्वमित्यलमवस्तुनिर्वन्धेन ।

इस विषय में कुछ पण्डिताई जताने वाले लोगों ( अभिनवगुप्त ) का चित्त द्विवचन के समर्थन के फेर में पड़ गया, फलत: वे वाच्य और वाचक की प्रतीति के अतिप्रसिद्ध क्रम को भूल गए और उन्हें दोनों की एकालिकता दिखाई देने लगीं, साथ ही शब्द की प्रौक्तन्याय से स्वण्डित व्यक्जकता भी । उन्होंने इन दोनों अ्रमों के आधार पर अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य-वाच्ये च शब्दस्यापि सहकारितवं भवत्येव ।

विमर्शे : अनुमितिवादिनो का कथन है कि अभिनवगुप्त ने सहदयोल्लोलिकोचेतन में जो ‘व्यङ्क:’ इस द्विवचन का समर्थन किया है वह भ्रान्तिपूर्ण है । उन्होंने इस द्विवचन को सिद्ध करने के लिए ध्वननव्यापार में शब्द और अर्थ दोनों की सहकारिता मानी है । वह सम्भव नहीं । सहकारिता उन दो तत्त्वों में सम्भव हो जिनमें एकालिकता या योगपद्य हो । अर्थ और शब्द की प्रतीति में एकालिकता

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नहीं है । क्योंकि शब्द की प्रतीति पहले हो जाती है तब अर्थ की प्रतीति होती है । प्रतीति ज्ञान का पर्याय है । ज्ञान तीसरे क्षण में नष्ट हो जाता है । दूसरा कोई ज्ञान उसके बाद होता है । मन के अनु होने से भी एक बार एक ही ज्ञान होता हैं । इस प्रकार वाच्य और वाचक के ज्ञानों का परस्पर साहचर्यं सम्भव ही नहीं । उसके अभाव में एककालिकता सम्भव नहीं और इसीलिए उनका एक क्रिया में एक साथ अन्य भी सम्भव नहीं । फलतः 'व्दय्‌कू:' यह द्विवचन भी ठीक नहीं ।

इसके अतिरिक्त शब्द की शक्ति केवल एक है अभिधा । उसमें व्यापारान्तर का सर्वथा अभाव है । प्रथमा स्थिति में किसी अन्य क्रिया में वाच्य के साथ उसका साहचर्यं हो भी सकता था, 'व्दय्‌कू:' की क्रिया में तो उसका अन्यथ ही सम्भव नहीं, अन्वय के बाद साहचर्य की बात तो दूर रही । और इस प्रकार जब शब्द में व्यज्जकत्व ही नहीं तो व्यज्यानव्यापार के प्रति उसकी प्राधान्यता या अप्राधान्यता का प्रश्न नहीं उठता, फलतः प्राधान्य अपराधान्य के आधार पर उठने वाला विकल्प भी निर्मूल हो जाता है । इस प्रकार शब्द अर्थ का न तो समुच्चय सिद्ध होता है और न विकल्प ।

फलतः 'वा' शब्द का उपादान एक झमेले की ही चीज ठहरता है । अनुमितिवादी के इस कथन का तात्पर्यं है—शब्द में व्यज्जकता का अभाव अतः उसके आधार पर वाच्य के साथ व्यक्तिक्रिया में उसके अन्वय का अभाव अतः उसके आधार पर प्राधान्य- प्राधान्य का अभाव—और इन तीनों तथ्यों के आधार पर विकल्प या समुच्चय बोधक 'वा' शब्द की उपयोगिता का अभाव ।

वस्तुतः व्यक्तिवादी की दृष्टि अनुमितिवादियों की अपेक्षा अधिक है । यह आवयक नहीं कि शब्द और अर्थ की प्रतीति में साहचर्य तभी हो जब उनका क्रम दूर हो जाय । शब्द की प्रतीति और अर्थ की प्रतीति के मुरहसुः अनुसन्धानात्मक परिज्ञान से उनका आहार्य साहचर्य असम्भव नहीं, अतः उनके प्राधान्य अपराधान्य और तन्मूलक समुच्चय तथा विकल्प भी असम्भव नहीं । पिण्डात्मक पदार्थों में भौतिक साहचर्य के अभाव से ज्ञानात्मक पदार्थों में मानस साहचर्य का अभाव सिद्ध नहीं होता । इसीलिए व्याकरणदर्शन ने स्फोट की कल्पना की है, और न्यायदर्शन ने संस्कारात्मक वर्ण समुचय की ।

किश्च तमिति तद्: पुंस्त्वेन निर्देशोडनुपपन्नः । तस्यानन्तरप्रकान्ताथेपरामर्शिनस्तल्लिखिताविशिष्टा कश्चिदर्थः प्रकान्तः, वस्तुतो नपुंसकलिङ्गस्यानन्तरं प्रकान्तत्वात् । तेन तत्रैव— 'प्रतीममानः पुनरन्य एव सोऽर्थोऽस्ति वाण्यौ महाकवीनाम् । योऽसौ प्रतिपाद्यावयवार्तिकशकासुति लावण्यमिवाझ्नासु ॥' इति, 'सरस्वती स्वादुतमं तमर्थमि'ति च पाठविपर्यस्तः कर्तव्यः । न त्वत्रैव 'वस्तु तद्'इति । तत्रैव हि पाठविपर्य्यसे पर्यायप्रकमभेदः पुस्त्वनिर्देशराश्व परिहतौ भवतः । अज्ञ त्वेक एव तदः पुंस्त्वनिर्देशादोषः । पश्वैव च प्रमेयश्राय्या श्रेयसी ।

इसके अतिरिक्त 'तमथ' ( तमथसुसजनाकृतौ ) इस तद्‌ शब्द का पुथ्विधान्ति निर्देश अयुक्त है । वह पिछले सन्दर्भ से चले आए अर्थ का परामर्शक है अतः उस लिख् से ( पुँल्लिङ्ग से ) विशिष्ट होना आपत्तिजनक है । उस लिङ्ग से युक्त कोई भी अर्थ यहाँ नहीं चला आ रहा है, वस्तुतः नपुंसकलिङ्ग ही पीठे से चला आता ( लिख् ) है । इस कारण वहीं ( पीछे ही ) 'प्रतीममानः पुनरन्य एव सोऽर्थोऽस्तियोऽसौ तिरिक्तशकास्ति'—इस प्रकार और 'सरस्वती स्वादुतमं

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तमर्थम्' इस प्रकार पाठ परिवर्तन करना चाहिए। न कि ( यत्रार्थ: शब्दो वा ) वस्तु तदुपस० इस प्रकार यहाँ। वहाँ का पाठ बदलने से पर्याय प्रक्रममेद दोष और पुंस्त्व निर्देष दोप दूर होते हैं, यहाँ केवल एक ही—तद् का पुंस्त्वनिर्देशादोष। इसी प्रकार का पाठ विन्यास अधिक अच्छा है।

विमर्श: ध्वन्यालोक की कारिकाओं में एक ही अर्थ पदार्थ कहीं पृथक्लिङ्ग कहीं नपुंसकलिङ्ग और कहीं स्त्रीलिङ्ग में मिलता है—'योऽर्थ: सहृदयैः....' इस प्रथम उद्योत की द्वितीय कारिका में अर्थ पुनः कही पृथक्लिङ्ग में प्रयुक्त किया गया। और शब्द का प्रयोग अपने लिङ्ग में ( पृथक्लिङ्ग में ) ही है। उसी अर्थ—'यो चतुर्थी 'प्रतीममानं पुनरन्यद्- देव वस्तुस्वति' इस कारिका में वस्तु नाम से उल्लेखित कर नपुंसकलिङ्ग में प्रयुक्त किया गया। पाँचवीं 'काव्यस्यात्मा स एवार्थः' कारिका का पुनः पृथक्लिङ्ग में। इसके पश्चात् पुनः 'चतुर्थी 'सरस्वती स्वादुतदर्थवस्तु' कारिका में नपुंसकलिङ्ग में। व्यक्तिविवेककार का कथन है कि ध्वनिलक्षण की १३वीं कारिका में उस अर्थ को तम् अर्थम् कहकर पृथक्लिङ्ग में प्रयुक्त नहीं करना चाहिए। उसे 'प्रतीममानं पुनरन्यदेव' और 'सरस्वती स्वादुतदर्थवस्तु' के अनुसार वस्तु शब्द का परामर्शक होने से नपुंसकलिङ्ग में पद जाना चाहिए। उन्होंने इस आपत्ति का संशोधन चौथी और आठवीं कारिका को बदल कर किया—वहाँ प्रतीममान की जगह पृथक्लिङ्ग प्रतीमानः, और स्वादुतमं तमर्थम् पाठ किया। वस्तुतः उनका यह संशोधन कोई आवश्यक कार्य नहीं था। आनन्दवर्धन काव्य की भाषा में रहस्यतत्त्व का विशेषण सच्चिदानन्द रूप से करते हैं। वे श्लोक चमत्कार के लिए अर्थ को नपुंसकलिङ्ग में लाने के लिए वस्तु शब्द से कहते हैं। इसमें वक्रोक्तिजीवितकार की आलोचना के अनुसार एक लिङ्गचकता नामक गुण छिपा रहता है, जो चमत्कार का कारण है।

अपि च काव्यविशेष इत्यत्र काव्यस्य विशिष्टत्वमनुपपन्नम्, काव्यमात्र- ज्रस्य ध्वनिव्यपदेशविशिष्टवेनेष्टत्वात् तस्य रसात्मकत्वोपगमात्। यत्तु स एवाद्-

'काव्यस्यात्मा स एवार्थस्थथा चादिकवे: पुरा। क्रौञ्चद्वन्द्ववियोगोऽस्थात् शोक: शोकत्वमागत:॥'

अपि च, 'काव्यविशेष:' इसमें काव्य का विशिष्टत्व ठीक नहीं। क्योंकि केवल काव्यमात्र को ध्वनि नाम का विषय मानना अभिमत है क्योंकि वहाँ ( ध्वनि ही ) रसात्मक रूप से मान्य है। जैसा कि उसने ( ध्वनिकार ने ) कहा है—'काव्यस्यात्मा स एवार्थ:..... शोकत्वमागतः॥' वही ( रसरूप ) अर्थ काव्य की आत्मा है। इसी से पहले क्रौञ्च पक्षी के जोड़े के वियोग से उठा आदिकवि ( वाल्मीकि ) का शोक ही श्लोक बन गया।

विमर्श: जो काव्य रसात्मक होता है वही ध्वनि माना जाता है। रस और ध्वनि एक ही तत्त्व के दो नाम हैं। वे दोनों ही काव्य को आत्मा माने गए हैं। 'काव्यस्यात्मा ध्वनि:' कहा जा चुक है। 'काव्यस्यात्मा स एवार्थ:' इस उद्धृत पद्य में कहा द्विया गया है कि रस को भी काव्य की आत्मा 'स अर्थ:' का अर्थ ध्वन्यालोक की वृत्ति में निर्दिष्ट रसध्वनि है। व्यक्तिविवेककार का कथन है कि रसविशिष्ट होता है केवल काव्य, काव्यविशेष नहीं। इसकी उपपत्ति में वे आगे काव्यविशेष इत्यत्र इति। अत्र विशेषशब्द: प्रभेदपर्यायोऽदितिशायपपर्ययो वा स्यात्। प्रभेद- पञ्चे 'काव्यमात्रस्य' इत्यादिनाड्यसिलिङ्ग दूषणमुक्तम्। शतिशयपञ्चे 'न च तस्य- त्यादिनाडसरमवाक्यदोषोपन्यास:। काव्यमात्रस्य सामान्येन गुणीकृतस्य्यादेरपि।

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प्रथमो विमर्शः

रतिशयो निर्विशेषः सुखास्वादः । 'पाक्यादि'सत्यादिना भुवाद्यगीतिसामध्यानुगुण्येन व्यविषयरसरूपवर्णनम् । काव्यविषये तु गानवर्यामिति तदेव रसस्वरूपम् । काव्यस्य वैशिष्यं स्वरूपपकृतं रसकृतं वेति पञ्चधायम् । रसस्थापि वैशिष्यं चमत्कारशायकृतं वा, भेदान्तरकृतं वा, रसरहितसुन्दरशब्दार्थोपेत्कृतं, वस्तुमात्रादिव्यङ्ग्यरूपतत् सर्वस्य रसस्वेनैकृतपतयेष्टत्वाच्च स्वरूपकृतः कश्चिद्विशेषः । कुतः पुनस्तकृतः व्यविशेषस्स्यात् । एतेन रसस्य चमत्कारातिशयविशेषपच्चो निराकृतः । भेदान्तरकृतमेदान्तरवतः काव्यस्य ध्वनित्वाभावप्रसङ्गेनाङ्ग्यासीः स्यात् । रसरहितसुन्दरशब्दार्थोपेत्कृतविशेषपच्चे तु रसरहितस्य शब्दार्थयुगालस्य काव्यत्वमेव कुतो विशेषग्रहणेन तद्युक्तिः । वस्तुमात्रादिव्यङ्ग्यकृतविशेषोऽपि नास्ति वस्तुमात्रवैशिष्ये वा वस्तुमात्रादिव्यङ्ग्यैवैचिच्याभावात् ।

प्रंहेलिकादौ वस्तुमात्रादिव्यङ्ग्यसन्दावे रंसाभावे ध्वनित्वं न स्यात् । इत्यर्थे न काव्यस्य रसस्वात्मविश्रान्तत्वेन रष्टेर्वा लचणामाहात्म्यात् तस्य प्रतीतेर्विशेषग्रहणमनर्थकमिति पिण्डितार्थः । अत्रार्थस्तु नस्वेति काव्यस्य । स्वरूपकृतं वैशिष्यं निराकृत्य न च तस्येत्यादिना रसचमत्कारातिशयपच्चो निराकरोति ।

यहाँ विशेष शब्द का अर्थ प्रभेद हो सकता है या अतिशय । प्रथम ( प्रभेद ) पक्ष में 'यमात्रस्य' इत्यादि द्वारा अन्यासक्ति दोष दिया है और अतिशयपक्ष में असम्भव दोष । काव्य का वैशिष्य दो ही प्रकार से हो सकता है स्वरूपकृत या रसकृत । रस का भी भेद पाँच प्रकार से होता! है ( १ ) चमत्कार के अतिशय से, ( २ ) भिन्न-भिन्न भेदों से, ( ३ ) रसरहित सुन्दर शब्दार्थों से, ( ४ ) वस्तुमात्र व्यङ्गय से या ( ५ ) प्रधानता से ।

इनमें स्वरूपकृत वैशिष्य सम्भव नहीं, क्योंकि सभी काव्य रसयुक्त होने से एक से माने ? । इसी तर्क पर रस का अतिशय चमत्कार से उत्पन्न वैशिष्य भी नहीं माना जा सकता । हे शृङ्गार करुण श्रादि भेदों से यदि काव्य में वैशिष्य माना जाय तो किस रस से वैशिष्य किससे नहीं, या सभी से ( वैशिष्य होता है )—ये विकल्प उठेंगे। इनमें से किसी एक से व्य की उत्पत्ति मानी जाय तो दूसरे काव्यों में रस रहते हुए भी वैशिष्य नहीं जासगा । फलतः अन्यासक्ति होगी । सभी से वैशिष्य मानने का कोई अर्थ नहीं होता ।

रसरहित—सुन्दर शब्द और अर्थ के आधार पर काव्य में वैशिष्य माना जाय—तो यह भी नहीं, क्योंकि रसरहित शब्दार्थ तो काव्य ही नहीं होते । उनमें वैशिष्य की सम्भावना व वस्तुमात्र आदि के वैशिष्य से भी काव्य में वैशिष्य मानना ठीक नहीं, क्योंकि वस्तुमात्र व्यङ्गक है, व्यङ्गक के वैशिष्य से व्यङ्गय में वैशिष्य नहीं होता। यदि तकतुमात्र आदि के व्य से व्यङ्गय में वैशिष्य मान भी लिया जाय तो जहाँ केवल रस होता है उस काव्य में व नहीं रहेगा, इसलिए अन्यासक्ति दोष होगा और प्रंहेलिका आदि में जहाँ केवल वस्तुमात्र सेतत्व रहता है, रस का नहीं, ध्वनित्व का समन्वय हो जाएगा, जिससे अतिव्याप्ति दोष

अतिशयपक्ष में रस कभी अंग होता नहीं, क्योंकि वह स्वात्मविश्रान्त होता है इसलिए

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विशेषणता पैदा करने की क्षमता नहीं। इस प्रकार काव्य में स्वरूपकृत और रसकृत दोनों प्रकार का वैशिष्ट्य सम्भव नहीं। यदि वैशिष्ट्य हो भी तो उसका शब्दत: कथन आवइयक नहीं। उसका बोध लक्षण के बल से ही हो जाएगा।

अक्षरार्थ यह है—तस्य = काव्य का। उसका स्वरूपकृत वैशिष्टय का निराकरण कर ‘न च तस्य’ इत्यादि ग्रन्थ द्वारा रसगत चमत्कार के अतिशय के पक्ष का निराकरण करते हैं। तस्य = रस का ( १०२ पृ० के ‘एवं च शृङ्गारमयत:' द्वारा भेदोंनतरकृत वैशिष्टय पक्ष का निराकरण, १०३ पृ० के ‘अतएव च तत्’ द्वारा रसरहित सुन्दर शब्दार्थे पक्ष का, और १०४ पृ० के ‘न च रसात्मन:' द्वारा वस्तुमात्रादि वच्यपक्ष का )।

न च तस्य विशेष: सम्भवति निरतिशयसुखास्वादलक्षणत्वात् तस्य ।

यदाहु:-

‘पाठचादथ भुवागानात् ततः सम्पूरिते रसे। तदास्वादभरैरेकाग्रो हृद्यत्यान्तर्मुखः क्षणम् ॥ ततो निर्विषयस्यास्य स्वरूपावस्थितौ निजः । व्यज्यते हादिनिष्यन्दो येन तृप्यन्ति योगिनः ॥’ इति । तदभावे चास्य काव्यतैव न स्यात् किमुत विशेष इति अनार-स्भण्यीयमेवैतत् प्रेक्षावतां स्याद् वैफल्यात्।

'उस (रस) में कोई वैशिष्ट्य नहीं रहता क्योंकि वह निरतिशय-सुखास्वाद स्वरूप है। जैसे कि कहा गया है—उसके वाच्य पाठ्य से और भुवागान से रस सम्पूरित हो जाने पर आस्वाद्यिता अन्तर्मुख होकर एक क्षण के लिये उसके धनास्त्राद से एकाग्र हो जाता है और प्रहर्ष का अनुभव करता है। उसके पक्षात् उस विद्वत्सम्पर्करून्य आस्वादचिता के स्वरूपमात्र में अवस्थित होने पर अपने आनन्द निष्यन्द की अभिव्यक्ति होती है जिससे योगिजन तृप्ति लाभ करते हैं ।'

उसके ( रस के ) अभाव में यह काव्य ही नहीं होगा—विशिष्ट काव्य कहाँ, अतः प्रेक्षावान् जनों ( कवि और सहृदय ) द्वारा फलशून्यता के कारण यह प्रवृत्ति का किषय ही नहीं बन सकेगा ।

भुवागानादिति । भुवाशब्दगीतयुपपादनेन नाटच्यसम्बन्धी रसस्वरूपप्रदर्शनमित्युचकम् । पतद्-जितरवे तत् काव्यगते रसस्वरूपम् । निरविषयस्यैति । अग्रान्तमुखचवं हेतुः । अस्य चर्चयितुः स्वरूपमन्तमुखा ननन्दरूप-

सविदास्वकम् । तदभावे रसाभावे । एतत् काव्यम् । प्रेक्षावतां विचारयितॄणाम् । वैफल्यादिति फलमत्र चतुवंगसाधनच्युपपत्ति: । रसाभावे काव्यतैव न घटत इति ।

भुवागान = भुवा नाम की गीति निकालने से नाटच्यसम्बन्धी रस स्वरूप की निष्पत्ति होती है । यह कहा जा चुका है। निर्विषय = इसमें हेतु है। अन्तर्मुखता—इस चर्चणा या आनन्दानुभव करनेवाले

विमर्श: अनुमितिवादि के मत में सरस काव्य ही काव्य है। उसमें काव्यसामान्य से अतिरिक्त अर्थ:-वैशिष्टय भी अभिप्राय यही निकाला है। जो कहीं तक संगत भी है। ऐसी स्थिति में रस से युक्त काव्य काव्यसामान्य होगा—विशेष नहीं। सामान्य काव्य में विशेषता तब आती जब उसके विशेषण-

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प्रीतत्व आदि अनेक विशेषताओं से युक्त रहते हैं। किन्तु यदि रंग एक ही होता तो उससे युक्त वस्तु में मनुष्यत्व से युक्त मनुष्यों के समान एकसमानता रहती, कोई विशेषता न होती। रस या उसका पर्याय ध्वनिकाव्य ध्वनिलक्षण में ‘रस’ रूप से ही अपनाया जायगा, शृङ्गार, करुण आदि रूप से नहीं क्योंकि लक्षण में सामान्य ध्वनि का निरूपण किया गया है। इसलिए भी विशेष शब्द का उपादान अनावश्यक है।

कविव्यापारो हि विभावादिसंयोजनात्मा रसाभिव्यक्त्यवयवविचारी काव्यमुख्यते । तद्याभिनेयार्थेनाभिनेयार्थत्वेन द्विविधम् ।

कवि का वह व्यापार जो विभावादि की समीचीन योजना स्वरूप हो और नियमितः रसाभिव्यंजक हो, काव्य कहलाता है। वह दो प्रकार का होता है—अभिनेयार्थ और अनभिनेयार्थ ।

कविव्यापारः । अनेक कवे: कर्म काव्यमिति काव्यकर्तृकविहितां काव्यस्य शब्दव्युत्पत्तिं कविमूलकाङ्गयरप्रतिपादितां दर्शयति । तत्र ह्युक्तं ‘तस्य कर्म स्मृतं काव्यम् ।’ इति । हृदयदर्पणे च ‘तत्कर्ता च कविः प्रोक्तो भेदेऽपि हि तदर्शित यत्’ इति काव्यमूलं कवित्वं प्रतिपादितम् । तत् पुनरस्य ग्रन्थकर्तो नावश्यकम् अपरीक्षितकत्वात् । कविव्यापारक्ष न सामान्येन किन्तु विभावादिवेघटना स्वभावः । अत एवं नियमेन रसापेक्षी ।

कविव्यापार इससे काव्यकौतुक में आई काव्य की शब्दव्युत्पत्ति की ओर संकेत किया गया है। उसमें काव्य की शब्दव्युत्पत्ति कवे: कर्म की गई है। उससे ज्ञात होता है कि काव्य का कारण कवि है। हृदयदर्पण में भी—‘तत्कर्ता च कविः प्रोक्तो भेदेऽपि हि तदर्शित यत्’ के अनुसार काव्य को कविमूलक माना गया है किन्तु रस विषय का जो प्रतिपादन ग्रन्थकार ने किया है वह सुन्दर नहीं है। उससे त्रिष्य का स्पष्टीकरण नहीं होता । ( अथवा वह अनुभव में नहीं आता ) । कविव्यापार ऐसा वैसा नहीं होता । वह विभावादि की घटना रूप होता है। इसलिए वह नियमितः रस की अपेक्षा रखता है ।

सामान्येनोभयमपि च तद् शास्त्रवद् विशिष्टविषयव्युत्पत्तिफलम् । केवलं व्युत्पाद्यजनतया जाड्यतारतम्यापेक्षया काव्यनाट्यशास्त्ररूपोऽयमुपायमात्रभेदो न फलभेदः ।

सामान्य रूप से दोनों ही प्रकार के काव्य का फल शास्त्र के ही समान विधि और निषेध की व्युत्पत्ति है केवल व्युत्पाद्य व्यक्ति की जड़ता या बुद्धिमत्ता के तारतम्य पर काव्य, नाट्य और शास्त्र इन उपायों में भिन्नता आती है, फल में नहीं ।

सामान्येनैति । विशेषः पुनरस्मि सरग्वन्धनाटकादयः । जाड्यं चात्र शास्त्रविषयं शास्त्रं चात्र दृष्टान्ततयेनोपात्तमिति न प्रपञ्चयिष्यते । न फलभेदः न व्युत्पत्तिभेदः ।

सामान्य रूप से इस ( काव्य ) की विशेषता है सर्गबन्ध, नाटक आदि । जड़ता का अर्थ है सुकुमार बुद्धि होना। उसी के लिए काव्य और नाट्य होते हैं। यह सुकुमारमतित्व शास्त्र के प्रति होता है। यहाँ शास्त्र दृष्टान्त रूप से अपनाया गया है तो भी उसका विस्तारपूर्वक विवेचन नहीं किया जायगा । फल विधि निषेध की व्युत्पत्ति में कोई भेद नहीं रहता ।

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तत्राद्यं प्रख्यातरामरावणादिनायकप्रतिनायकसमाश्रयेण प्रसिद्धविधिनिषेधास्पदचरितवर्णनमात्मकम् ।

उनमें से प्रथम (काव्य) हैं प्रसिद्ध राम रावण आदि नायक प्रतिनायक के आश्रय और तत्राद्य चरितों का वर्णन मात्र ।

आद्यं काव्यम् । ( सत्तति तथापि ? ) प्रसिद्धं च विधिनिषेधात्मकं च यच्चरितमिति व्याख्या । यद्यपि चोलपादवस्तु काव्यं भवति, तथापि तत्र तथा हृदयसंवाद इति प्रसिद्धग्रंथनम् ।

तावता काव्यमात्रेण तत्र काव्ये नाट्ये च । प्रभेदपचं दूषयितुं ग्रंथः ।

आद्य-काव्य ( × × )। प्रसिद्ध० की व्याख्या है—जो चरित प्रसिद्ध भी हो और साथ ही विधिनिषेधात्मक भी । यद्यपि काव्य में वस्तु कविकल्पित होती है तथापि उसमें सामाजिक का हृदय एकरस हो जाता है । इसलिए वह प्रसिद्ध कहा गया ।

अपरं पुनरतुक्रमेण साक्षात् तत्प्रदर्शनात्मकम् । यदाहः-

'अनुभावचेभावानां वर्णनं काव्यमुख्यते । तेषामेव प्रयोजकस्तु नाट्यं गीतादिरसात्मकम् ।।'

पचश्र ये सुकुमारमतयः शास्त्रश्रवणादिविमुखाः सुखिनो राजपुत्रप्रभृतयः पूर्वत्राधिकारिता:, ये चात्यन्ततोडपि जडमतयस्तावता व्युत्पादयितुमाक्या: शृङ्गारत्प्रसक्ता उभयेडपि तेडभिमतवस्तुपुरस्कारेण गुढजिहिकया रसास्वादसुखं मुखे दत्वा तत्र कटुकौषधपानादाविव प्रवर्तयितव्या: । अन्यथा यत्प्रवृत्तिरेवैषां न स्यात्, किमुत व्युत्पत्तिः । काव्यारसभस्य साफल्यमिच्छता तत्प्रवृत्तिनिबन्धनभावेनास्य रसात्मकत्वमवश्यमुपगन्तव्यम् । तन्मात्रप्रयुक्तकश्र ध्वनिविप्रपदेशः ।

न च रसानां वैशिष्ट्ये तदात्मनः काव्यस्य विधिष्टत्वमिति युक्तं वक्तुम्, अन्यासः । एवं हि प्रातिनियतरसात्मन् एवं तस्य ध्वनित्वं स्यात्, नान्यस्यन्यरसत्मन्:, वैशिष्ट्याभावात् । इष्यते च तत्रापीत्थव्यासिलक्षणदोषः ।

और दूसरा ( नाट्य ) उन्हीं का अनुकरण द्वारा साक्षात् प्रदर्शन । जैसा कि कहा गया है—

'अनुभाव और विभावों का वर्णन काव्य कहा जाता है, और उन्हीं का गीतादि द्वारा आकर्षक प्रयोग—नाट्य ।'

और इसी प्रकार जिनकी मति सुकुमार होती है, जो शास्त्रचर्चा से विमुख होते हैं, ऐसे नित्यसुखी राजकुमार आदि व्यक्ति पहले ( काव्य ) के अधिकारी हैं। इसी प्रकार ये और इनके अतिरिक्त जो बहुत ही अधिक मन्दमति होते हैं, जो केश्रल उतने (काव्य मात्र ) से नहीं समझाए जा सकते और खी, नृत्य, आतोऽय ( बाजे ) आदि में आसक्त होते हैं—दोनों ही प्रकार के व्यक्ति चाही चीज़ सामने रखते हुए रसास्वाद सुख की चाट लगाकर उसी प्रकार उसे ( विधि निषेधात्मक काव्य या नाट्यवद्ध चरित ) की ओर प्रवृत्त कराए जाने के अधिकारी हैं जिस प्रकार जोम पर गुड़ रखकर कड़वी दवाई की ओर मरीज । इसके बिना किसी दूसरे प्रकार से इनकी

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प्रथमो विमर्शः

प्रवृत्ति ही न होगी, व्युत्पत्ति वहाँ उपाय रूप में इनकी ( काव्य-निबन्ध की ) रसात्मकता स्वीकार करनी ही चाहिये । काव्य को ध्वनि भी एकमात्र उसी के आधार पर कहा जाता है ।

ऐसा कहता भी ठीक नहीं है कि रसों की विशिष्टता से काव्यों में विशिष्टता हो सकती है—क्योंकि इससे अन्यासिद्ध दोष होता है । ऐसा मानने पर किसी एक रस से युक्त काव्य को ध्वनि कहा जा सकेगा, अन्य रस से युक्त अन्य काव्य को नहीं, क्योंकि वैशिष्ट्य का उसमें अभाव रहेगा। काव्य वह भी माना जाता है—इसलिए उसमें अन्यासक्ति रूप लक्षणदोष होगा ।

विमर्शः : व्यकिविवादी विशिष्ट शब्द और विशिष्ट अर्थ के साहित्य को काव्य मानता है । ध्वनि या रम को उसी से भिन्न उसकी आत्मा । अनुमितिवादी रसयुक्त शब्दार्थ को काव्य मानता है । इस प्रकार दोनों के मत एक दूसरे से भिन्न हो जाते हैं । व्यकिवादी के अनुसार काव्य-नीरस होने पर भी गुण और अलंकारों या वस्तु आदि ध्वनि से चमत्कारी हो जाता है । विनेय का अनु- शासन काव्य को काव्य ही नहीं मानता । एक प्रकार से यह कहा जा सकता है कि व्यकिवादी जिस काव्य को उत्तम काव्य मानता है अनुमितिवादी उसके भी एक भाग रसध्वनि को ही काव्य मानता है उत्तम काव्य नहीं, उसके मत में जो उत्तम होता है वही काव्यत्व जाति से युक्त होता है, वह वस्तुध्वनि, अलंकारध्वनि, गुणीभूतव्यङ्गच्य और वाच्य अलंकार से युक्त काव्यों को काव्य नहीं मानता । व्यकिवादी की दृष्टि से काव्य के इतने भेद होने पर ध्वनिकाव्य को काव्यविशेष कहा जा सकता है किन्तु अनुमितिवादी के अनुसार उसे केवल काव्य मात्र कहा जायगा । रस अनेक हैं । उनकी कुछ स्वगत विशेषताएँ हैं । यह कहा जा सकता है कि उनमें से एक किसी रस से युक्त काव्य अनुमितिवादी के मत में भी दूसरे की अपेक्षा विशिष्ट काव्य कहा जा सकता है । अनुमितिवादी उसे अन्यासिद्ध दृष्ट ठहराता है । उसका कहना है कि स्वगत भेद का यहाँ कोई प्रसंग ही नहीं है । यहाँ तो ध्वनिलक्षण किया जा रहा है । लक्षण किसी एक अंग के अनुसार नहीं किया जाता ! उसे सर्वाङ्ग-व्यापी होना चाहिये । इसलिए लक्षण ऐसा होना चाहिए जो रसत्वसामान्य से युक्त सभी काव्य के लिए यह ध्वनिलक्षण किया जायगा तो शेष रसों से युक्त काव्यों में वह लक्षण नहीं जायगा । यही अन्यासक्ति दोष होगा । इसीलिए ध्वनिलक्षण में 'काव्यविशेष:' न कहकर केवल 'काव्य' ही कहना उचित था । इसी तथ्य का स्पष्टीकरण करते हुए वे आगे और भी लिखते हैं—

अत एव च न गुणालङ्कारसंस्कृतशब्दार्थमात्राश्रितं तावत् काव्यम्, तस्य यथोक्तगुण्याद्योपनिबन्धे सति विशिष्टत्वमिति शक्यं वक्तुम् । तस्य रसात्मकताभावे मुख्यवृत्त्या काव्यत्वमेव न स्यात्, किमुत विशिष्टत्वम् ।

'गुण और अलंकार से संस्कृत केवल शब्दार्थमात्र काव्य का शारीर है और उल्लिखित व्यङ्गच के सन्निवेश से उसमें विशिष्टता आ जाती है' यह भी इसीलिए नहीं कहा जा सकता । रस न होने पर वह तावत् काव्य ही नहीं होगा, विशिष्ट काव्य कहाँ ?

अत एवेत्यादिना रसरहितसुन्दरशब्दार्थोपेत्यापचूडोऽपि निराक्रियते ।

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न च रसात्मकं काव्यस्य वस्तुमात्रादिभिरविशेषः शक्यम् आघातुं, तेषां विभावादिरूपतया रसाभिव्यक्तिहेतुत्वोपगमात् न च व्यज्जकानां वैचित्र्ये व्यज्ज्यस्य विशेषोडभुपगन्तुं युक्तः शावलेयादीनामिव गोत्वस्य । ततोडस्य विशेषेष्टोपगमे वा यत्र तयोरभयोरेकस्य वा व्यज्ज्यता तत्रैव ध्वानिद्यपदेशः स्यात् केवलरसात्मकि काव्ये, वैशिष्ट्याभावात् । इष्यते चासौ तत्रापि । प्रहेलिकादौ च नीरसेऽपि स्यात् । तत्राप्युक्तक्रमेण वस्तुमात्रादेरभिव्यज्ज्यत इत्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां काव्यत्वमात्रप्रयुक्तोऽसावित्यनुमीयते ।

संगति = व्यक्तिविवेककार वस्तुध्वनि और अलंकारध्वनि को रसध्वनि का ही पोषक तत्त्व मानते हैं इसी तथ्य को वे इस प्रकार स्पष्ट कर रहे हैं—

'काव्य रसात्मक ही हो, तत्र भी वस्तुमात्रादि से उसमें वैचित्र्य आ सकता है'—ऐसी बात भी नहीं हैं । वस्तुमात्रादि विभावादि रूप होते हैं, अतः वे रस की अभिव्यक्ति के हेतु माने गये हैं । व्यज्जकों के वैचित्र्य से व्यज्ज्य में वैचित्र्य माना जाना ठीक नहीं, जैसे गाय के चितकबरे होने से उसके गोत्व में । उन (वस्तु आदि व्यज्जकों) से यदि इस (काव्य) में विशिष्टता मानी भी जाय तो जहाँ वे दोनों अथवा दोनों में से कोई एक व्यज्जय होगा वहीं (उसकीकाव्य में) ध्वनि व्यवहार हो सकेगा । केवल रसात्मक काव्य में नहीं । क्योंकि उसमें वैशिष्ट्य होता ही नहीं । पर ध्वनितव माना जाता है वहाँ भी । उधर प्रहेलिका आदि रसहीन सन्दर्भों में भी ध्वनितव मान लिया जायगा क्योंकि उनमें भी, जैसा पहले कहा जा चुका है, वस्तुमात्र आदि व्यज्जकथरूप से विधमान माने जाते हैं । इसलिए अन्वयव्यतिरेक से ऐसा लगता है कि ध्वनि व्यवहार एकमात्र सामान्य काव्य में रहना चाहिये ।

न च रसात्मक इत्यादौ वस्तुमात्रादिव्यज्ज्यपक्षः परिहृतः । शक्यभिति सामान्योपक्रमा न्रपुंसकलिङ्गता । वस्तुमात्रादीनां रसेँ प्रति व्यज्जकत्वाद् व्यज्जकवैचित्र्ये च व्यज्ज्यतैव वैचित्र्याभावात् तैरसौ विशेषणीयः । गोत्वस्य विशेष इति सम्बन्धः ।

ततो व्यज्जकाद् । अस्य रसस्य । थोरिति शब्दोपरस्तुमात्रादिग्रहणग्रहीतश्वलक्षणारो गृह्यते । तत्र वस्तुलक्षणारो समस्तौ व्यस्तौ वा यत्र व्यज्ज्यौ व्यज्जके संक्रान्तौ लक्ज्ञारो गृह्यते । तत्रैव ध्वनित्वं स्यात् । न केवलरसयोगिनि काव्य इत्यध्याहिः । प्रहेलिकादाविति अत्यन्तव्यासि: । ननुभयसन्दावे वैशिष्ट्यं प्रस्तुतम् । तत्र का कथा रसाभावे वस्त्वादिमात्रभावे वैशिष्ट्यस्य । नैतत् । वस्त्वादीनामेव प्रयोजकरवात् तन्मात्रकृतं वैशिष्ट्यमुख्यते । तथा हि वस्त्वाद्यभावे रससद्भावेऽपि न ध्वनित्वमिति भवता, वस्त्वादिसद्भावे त्विध्यत इति ।

अतोऽन्वयव्यतिरेकाभ्यां वस्त्वादीनामेव प्रयोजकरवमिति प्रहेलिकादावतिद्य्यति: ।

न च० इत्यादि ग्रन्थ में केवल वस्तु आदि के व्यज्जय होने की मान्यता का खण्डन किया गया ।

शक्यम्—यहाँ 'शक्यम्'यह जो नपुंसकलिङ्ग दिया उसका कारण है विषय का आरम्भ सामान्य रूप से करना ( क्योंकि सङ्कीर्ण में सामान्य वस्तु के लिये नपुंसक लिङ्गों का ही प्रयोग मान्य है ) ।

वस्तुमात्र आदि रस में वैशिष्ट्य इसलिए नहीं ला सकते कि वे हैं रस के प्रतिन्यज्जक और ग्रन्थकार व्यज्जक की विचित्रता से व्यज्ज्य में विचित्रता नहीं मानते । 'गोत्वस्य' इसका सम्बन्ध 'विशेष:' से है ।

ततः = व्यज्जक से । तस्य= रस का । तयोः—शब्दतः कथित वस्तुमात्र और आदि शब्द से अलङ्कार का ग्रहण होता है ।

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प्रथमो विमर्शः

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जहाँ वस्तु और अलङ्कार इकट्ठे या अलग-अलग व्यञ्जक होकर व्यञ्जक बनेंगे केवल वहीं ध्वनित्व आयेगा, केवल रस से युक्त काव्य में नहीं। इस प्रकार अत्याप्ति दोष होगा। अत्याप्ति (पहेली आदि में) वह न माना जाय, यहाँ तो वैशिष्ट्य माना जा रहा है। केवल वस्तु आदि में जनित। इसलिए उनके अभाव में रस के रहते हुए भी ध्वनित्व नहीं माना गया जब वस्तु आदि का सन्दर्भ रहता। इसलिए अन्वय व्यतिरेक के द्वारा यह सिद्ध हुआ कि इस पक्ष में केवल वस्तु आदि प्रयोजक हैं अतः पहेली आदि में अत्याप्ति नहीं होगी।

विमर्शः 'काव्यविशेष:' के समर्थन में एक युक्ति और दी गई। उसमें कहा गया कि भले ही रसात्मक सन्दर्भ काव्य हो किन्तु जब उसमें उसके वस्तु आदि अवान्तर व्यङ्गयों का समावेश हो तब तो वैशिष्ट्य आ ही जायगा। इस पर अनुमितिवादी ने उत्तर दिया। वस्तु आदि का अस्तित्व रस से पृथक् नहीं है। वे रस के ही व्यञ्जक विभावादि अङ्ग हैं। जिस प्रकार गाय के काले, पीले या श्वेत रङ्ग से उसके गोत्व में कोई वैशिष्ट्य नहीं आता ठीक वैसे ही वस्तु या अलङ्कार के वैशिष्ट्य से रस में भी कोई वैशिष्ट्य नहीं आता। यदि मान भी लिया जाय तो अत्याप्ति और अतिव्याप्ति दोष हैं। अन्यथा उस शुद्ध रस वाले काव्य में होगी जहाँ वस्तु और अलङ्कार दोनों या उनमें से कोई एक एक ही व्यञ्जक या व्यञ्जक न होंगे। अत्याप्ति उन 'सहिपिच्छ' आदि पहेलियों में होगी जिनमें अनेक हेतुकल्पनाओं के बाद कोई नीरस वस्तु मात्र व्यङ्ग्य होती है। वस्तुतः काव्यत्व का अस्तित्व अनुसित्व निर्भर है तब शुद्ध काव्य के ही लिए ध्वनि का प्रयोग उचित है- ऐसा प्रतीत होता है। 'उमारसंपव ८१२, ७२; शाकुन्तल ३१४, वामनकृत काव्यालङ्कारसूत्र १११२३ तथा उसमें उद्धृत व्याख्या महाभाष्य के प्रयोग से 'शक्यम्' का प्रयोग शुद्ध है। व्याख्यानकार का संकेत इन्हीं सन्दर्भों की ओर है। 'शक्य:' पाठ अवश्य ही किसी ने बद्रल दिया है।'

अतश्र समासोक्त्यादाव्‍यसाधुपगन्त॒व्य एव, न प्रतिषेध्यः। प्रती-यमानस्य चार्थस्य द्वैविध्यमेव । तृतीयस्य रसादेः प्रकारस्योक्तनयेन काव्य-त्वादेव सिद्धत्वादिति । न च तस्य तदृद्भावो भणितुं युज्यते अज्ञितवेनेष्टतवाद् इति काव्यत्वमेव ध्वनित्वपदेऽविषयोडभ्युपगन्तुं युक्तो न तद्विशेषः ।

और इसीलिए समासोक्त्ति आदि को भी ध्वनि नाम से पुकारा जाना चाहिए। वहाँ उसे निषेध्य नहीं ठहराना चाहिए ( जैसा कि आनन्दवर्धन ने ठहराया है)। इसी प्रकार प्रतীয়मान अर्थ के दो ही भेद माने जाने चाहिए। तीसरा रस आदि (नामक) भेद उक्त रीति से (काव्य के) काव्यत्व से ही सिद्ध हो जायगा। उसके प्रति उसका अज्ञभाव भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह अज्ञीरूप से मान्य है। इसलिए केवल काव्य सामान्य को ही ध्वनि नाम का विषय मानना चाहिए, उसके किसी विशेष (भेद) को नहीं।

तत्रापि रसमयस्वेन काव्यस्वादू रससद्भावे च ध्वनित्वात्। द्वैविध्यमेवति रसस्य काव्यमात्रलक्षणत्वाद् रुस्वलङ्कारद्यपिश्वेन तद्प्रतियोगित्वसामभावान्न प्रकारान्तरं प्रकाइष्टं प्रकारमानत्वात् । न च तस्येल्यादिना अद्वितीयेनेष्टतवादिति चमरकारविश्रान्ति सारस्वादू रसस्याद्वितयमेव नाङ्गीचक्रुम् ।

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व्यक्तिविवेक:

समासोक्त्यादि—वे भी रसमय होने से ही काव्य माने जाते हैं। रसमयता के कारण वे भी ध्वनि हैं ही।

द्वैविध्यस्य—रस ही सभी प्रकार के काव्य का लक्षण है। वह वस्तु और अलङ्कार में भी रहता है। वह किसी में नहीं रहने वाला (प्रतियोगी) नहीं है, अतः वह किसी का अङ्ग या प्रकार नहीं बनता। वह तो प्रकारवान्—अङ्गी के रूप में प्रकाशित होता है!

न च तस्य—इत्यादि, ग्रन्थ से अङ्गत्व से उत्पन्न विशेषता को गलत ठहराते हैं। अङ्गित्वेनेष्टत्वात्—क्योंकि रस रूप चमत्कार अपने आप में पूर्ण (विश्रान्त) है। इसलिए वह अङ्गी ही है। अङ्ग नहीं।

विमर्शः ग्रन्थकार का निष्कर्ष यह है कि ध्वनिकार द्वारा समासोक्ति आदि अलङ्कारों से युक्त वाक्यों का ध्वनि न मानकर गुणीभूतव्यङ्ग्य माना जाना ठीक नहीं। उनमें भी रस रहता है। अतः वे भी ध्वनि ही होते हैं।

ध्वनिवाद्री ने विशिष्ट शब्दार्थ को काव्य मानकर ध्वनि को उसकी आत्मा माना था। साथ ही ध्वनि के वस्तु, अलङ्कार तथा रस ये तीन भेद माने थे। अनुमितिवादी केवल रस को काव्यतक निष्पादक मानता है। और उसी रस को काव्य में ध्वनित्व का निष्पादक। अतः उसकी दृष्टि में सभी काव्य ध्वनि काव्य ही हैं। फलतः वह काव्य के वस्तु और अलङ्कार ये दो भेद नहीं मानता। उन्हें रस में ही अन्तर्भूत कर देता है। रस को वह काव्य की आत्मा और प्रधान, अङ्गी बतलाता है। ध्वनिकार भी ऐसा ही मानते हैं। शब्दार्थ को वह उस अङ्गी का आवास मानता है। अतः शब्दार्थ रस के अङ्ग हैं। प्राचीन उद्भट आदि आचार्यों के मत से यह मत ठीक विपरीत है। वे रस को भी शब्दार्थ का अलङ्कारक तत्त्व मानते हैं। ग्रन्थकार ने इस आशय को उत्तम भाषा में व्यक्त नहीं किया। सर्वेनाम बहुल भाषा में उसे स्पष्ट किया है। अतः उसमें व्याख्याकारों में बुद्धि-संवाद नहीं है।

व्यक्तिविवेकव्याख्यान में उनकी कुछ भी व्याख्या नहीं की गई है, केवल—न च तस्येत्यादिना अङ्गत्वकृतं विशेषं दूषयति ही कहा गया है। 'अङ्गित्वेनेष्टत्वात्' इस हेतुवाक्य पर—भी उसमें—'चमत्कारविश्रान्तिसारत्वाद् रसस्य अङ्गित्वमेव नाङ्गत्वम्' लिखा गया है। इससे तस्य—के तद् का अर्थ तो 'रस' प्रतीत हो जाता है। शङ्का रहती है 'तदङ्गत्वेन' के तद् शब्द पर। महुसूदनो विवृति में उसका अर्थ वस्तुमात्र और अलङ्कार किया गया है, उसका वाक्य इस प्रकार है—'तस्य रसस्य, तदङ्गत्वम् = वस्तुमात्रालङ्काराङ्गत्वम्'। वस्तुतः प्रकार के अनुसार 'प्रतीयमानस्य चार्थस्य = द्वैविध्यस्येव'—कहकर काव्य को जो दो विभागों में बाँटा गया है—उसकी उपपत्ति में हेतु दिया गया है 'नितीयस्य रसादेः प्रकारस्योक्तनयेन काव्यत्ववादेः सिद्धत्वात्' और इस हेतु वाक्यार्थ की मान्यता के लिए दूसरा हेतुवाक्य दिया गया है 'न च तस्य तदङ्गभावो भणितुं युज्यते अङ्गित्वेनेष्टत्वात्'। इससे यह स्पष्ट होता है कि जिस प्रकार वस्तुमात्र और अलङ्कार काव्य शरीर के अङ्ग हैं उस प्रकार यदि रस भी अङ्ग होता तो उसके आधार पर भी काव्य में एक भेद होता, वस्तुतः बात ऐसी नहीं है, रस काव्य का अङ्गी ही, अङ्गी शुद्ध वस्तुरूप काव्य शरीर में भी अभिन्नयाम रहेगा और अलङ्कारोपस्कृत वस्तुरूप काव्य शरीर में भी। अतः तस्य तदङ्गत्वेन प्रथम 'तद्' का रस और द्वितीय 'तद्' का काव्य अर्थ माना जाना चाहिए—'रस का काव्य के प्रति अङ्गभाव कहना ठीक नहीं।' इससे ग्रन्थकार की मूलमान्यता को बल मिलता है। ग्रन्थकार की मूलमान्यता है—समासोक्ति आदि उन स्थलों को भी जिन्हें ध्वनिकार ने ध्वनि से नीचे गुणीभूत व्यङ्ग्य—कोटि में गिनाया है ध्वनि ही मानना।

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सुधाभूत व्यङ्गच्य में व्यङ्ग्य प्रकृतवाक्यार्थ का उपस्कारक माना जाता है या चमत्कार में उसके समानान हो। ऐसी स्थिति में प्रकृतवाक्यार्थ ही प्रधान या अङ्गी माना जाता है और रस आदि ध्वनियों अङ्ग । व्यक्तिविवेककार का कथन है कि उस काव्य में भी रस अङ्गी ही रहेगा। वह प्रकृतवाक्यार्थ का उपस्कारक या अङ्ग नहीं होगा। यह तथ्य उनके ‘अतद्ब्व समासोक्त्यादावप्रत्यसादुपगन्तव्य एव, न प्रतिषेध्यः’ इसी वाक्य द्वारा स्पष्ट होता है। अतः तस्य तद्व्वतत्वात् में ‘रस का काव्य के प्रति’ यही अर्थ चाहिए।

किं तु मुख्ये रसात्मनि काव्ये सम्भवति न तस्य गौणस्याश्रयणं युक्तं गौणमुख्ययोरमुख्ये सम्प्रतय इति नियमात् ।

यस्तु मेघदूतादौ काव्यविशेषव्यपदेशः सोऽभिधेयार्थविशेषसमारोपकृतो न मुख्यः ।

इत्यश्र् काव्यस्य विशिष्टताऽनुपपत्तावितरतल्लक्षणविधायिमततिरिक्तं न किंचिदनेनाभिहितं स्याद्, अन्यत्र ध्वनिव्यपदेशमात्रात् । न च तेनापि किंचित् ।

कथं तर्हि तदुपपत्ताव तद्वाच्यमेव तस्य तत्पर्यवसायिनो लक्षणविशेषसम्बन्धादेव तद्वगतेः ।

अथ पुरुषस्याश्रयविविधग्रस्यैव सतस्तल्लक्षणसम्बन्धो न तु तत् एवास्यवैशिष्ट्यमिति, तथाप्यवाच्यं काव्यत्वादेव तस्याप्यवगतत्वात् ।

तद्युक्तिमित्यवाच्यवचनं दोषः ।

इसके अलावा जब काव्यत्व के लिए आश्रयरूप से उत्कृष्टतम रसात्मक वस्तु का मिलना सम्भव है तब गौण वस्तु का आश्रय ठीक भी नहीं होगा, क्योंकि गौण और मुख्य में मुख्य पर ज़ोर होता है ऐसा नियम है। मेघदूत आदि में जो काव्य विशेष का व्यवहार होता है, वहाँ वर्णित पदार्थ के आधार पर औपचारिक है, वास्तविक नहीं। इस प्रकार काव्य की विशिष्टता सिद्ध न होने पर अन्य काव्य लक्षणकारों के मत के अतिरिक्त इनसे भी ( ध्वनिकार से भी ) कुछ नहीं कहा जा सका, क्योंकि ‘ध्वनि’ इस नाम कथन भर को छोड़कर और उससे भी कोई लाभ नहीं।

यदि किसी प्रकार वह ( ध्वनि ) वास्तविक भी सिद्ध हो जाए तो उसे शब्द द्वारा कहना नहीं था क्योंकि ( जिसे ) काव्य ( कहा जाएगा उस ) का पर्यवसान सदैव उसी में होगा, इसलिए ( उस काव्य के ) विशिष्ट लक्षण कथन से ही उसकी ( ध्वनि ) प्रतीति अपने आप हो जाती । जैसे ‘जो यह घोड़े पर सवार है वह पुरुष राजा है’ यहाँ ( लक्षणगतवैशिष्ट्य से ही पुरुषगत वैशिष्ट्य का बोध हो जाता है ।

यदि पुरुष के अश्वविशिष्ट होने पर ही उसमें लक्षण का समन्वय होता हो, इसके विपरीत लक्षण से उसमें वैशिष्ट्य प्रतीत न होता हो तो इस पर भी उसका ( ध्वनि का ) शब्दतः उपादान किया गया है, इसलिए ( ध्वनिलक्षणकारिका में ) अवाच्य वचन दोष आता है ।

किं तु तस्यादिना अभ्युच्चरमेवादिशो रसप्रतीतियोगिनो गौणस्य काव्यत्ववादौप गौणत्वादेव तदाश्रयत्वं न भविष्यतीसाह ।

अभिधेयार्थविशेषेप्ति । अभिधेयस्यार्थस्य यो विशेषो मेघादेवैचिच्येण वर्णनं तस्य काव्ये समारोपात् काव्यविशेष इत्युक्तिः ।

किं इत्यादि द्वारा ग्रन्थकार ने यह कहा कि ‘भले ही हम ऐसा कोई काव्य मान लें

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व्यक्तिविवेक:

जिसमें रस प्रकार बनकर, गौण रूप से रहता हो, तो भी वह उसका ( ध्वनित्व ? ) आश्रय नहीं बन सकेगा । उसमें कारण उसकी गौणता ही होगी ।

अभिधेय० से अभिधेय अर्थ में स्थित जो विशेषता = मेघ आदि का विचित्र रूप से वर्णन, उसका काव्य में समारोप करके काव्य को विशिष्ट काव्य या उसको 'काव्यविशेष' कहा जा सकता है । इस पूर्वपक्ष का स्पष्टीकरण किया गया ।

तदुपपत्तौ तस्य काव्यस्य । तत्पर्यंवसायिनो विशेषपर्यवसितस्य । तद्वगतेः विशेषावगतेः । योडशमारूढ इति लक्शणविशेषादेव पुरुषविशेषप्रतीतिः । अथेति । इह विशिष्टस्य वलक्षणं लक्शणाद्द्र विशेषप्रतीतिः । तत्रोक्तरस्मिन्नैव पत्ते विशेषग्रहणं न वक्तव्यमित्याध्यः । तत्रापि काव्यमात्रलक्शणादेव विवक्षितविशेषप्रतीतिः काव्यमात्रस्य रसमयत्वेनेष्टत्वात् । अन्यस्याकाव्यत्वम् । रसयोगिनि च ध्वनिल्यव्यवहार इति च सर्वथा विशेषग्रहणं न कर्तव्यम् ।

तदुपपत्तौ—तत् = काव्य । उसकी उपपत्ति में । तत्पर्य० तत् = विशेष रूप में पर्यवसित । तद्वगतेः= तत् = विशेष । उसका ज्ञान । योडशमारूढ:- इस विशिष्ट लक्शन से ही विशिष्ट पुरुष का ज्ञान हो जाता है । अथ—दो बातें होती हैं ( १ ) या तो विशिष्ट का लक्षण होता है या ( २ ) लक्षण से विशिष्ट का ज्ञान होता हैं । दोनों में से दूसरे पक्ष के लिए विशेष शब्द ग्रहण नहीं कहा जाना चाहिए यह कहा गया है अतः प्रथम पक्ष अपनाया जाएगा । उसमें भी काव्य सामान्य के लक्षण से ही अभीष्ट विशेषता की प्रतीति हो जाएगी । कारण कि सभी काव्य रसमय माने गए हैं । जो वैसे नहीं हैं वे काव्य नहीं हैं । और जो रसयुक्त हैं, उनमें ध्वनि शब्द का व्यवहार होता है—इस प्रकार विशेष शब्द का ग्रहण ध्वनिलक्षण में सर्वथा नहीं करना चाहिए ।

अत्र नैयक्तिवादिनस्त्वयमभिप्रायः—इह प्रसिद्धं लक्शणमाश्रित्य लक्शणं प्रवर्तते । लक्श्ये च द्विविधं काव्यं दृश्यते मुख्यं गौणं च । तत्र मुख्यं यत्र व्यङ्ग्यस्य प्राधान्यं, शिष्टं गुणीभूतव्यङ्ग्यादि । उभयं च प्राधान्येनादिकालिकव्यवहारसिद्धत्वात् । तेन गौणमुख्यन्याय इह नाश्रीयते । तत्र च गुणीभूतव्यङ्ग्यनिरासाय विशेषग्रहणं कर्तव्यम् । सर्वस्यैव काव्यस्य रसमयत्वं न गुणीभूतव्यङ्ग्यादिदर्शनाव् इति चेष्ट । अस्फुटतरसस्याङ्गीभूतरसस्य वा काव्यस्य विद्यमानत्वात् । यत्र हि प्राधान्यान्न रस्फुटोऽङ्गी रसः प्रतीतेः तु काव्यान्तरत्वमिति । रसस्य च विश्रान्तिसारत्वादङ्गीभावो नोपपन्न इति चेत् । स्वापेचयितदृपत्वात् । व्यपकरसान्तरापेचया तु न यङ्गभावेनाङ्गस्वाद् विच्छोरभाण्डागारिकवत् । तथाह्यङ्गीभावमेव मुनिना रसेष्वपि स्थायी-

'सर्वेपामेव सन्दावे रूपं यस्य भवेद् बुधः । स मन्तव्यो रसः स्थायी शेषारिणो मतः' इति । केचित् स्थाप्यपेच्चोऽङ्गाङ्गिभावो रसेपूपचर्यंत इत्याहुः । ततश्राङ्गीभूतरसकाव्यं व्यावृत्त्यमस्ति विशेषग्रहणस्य । यतश्रास्फुटरसस्यापि काव्यस्य सम्भववस्तुतो ध्वनिभेदत्रयमश्नुपपद्यते । अस्फुटतरसे हि काव्ये वस्त्वलक्शारध्वनिः । स्कुटाङ्गीभूतरसे तु रसध्वनि: । तत्रैव वस्त्वलक्शारध्वनिसम्बन्धे सङ्करसृष्टिः । तस्माद् ध्वनिमते सर्वमेतरस्मक्नस्मेव ।

'यहाँ व्यक्तिवादी का अभिप्राय यह है—सब जगह सर्वत्र लक्श्य को देखकर लक्षण निर्माण किया जाता है । लक्षण में ( अनुभूति के क्षेत्र में ) दो प्रकार के काव्य देखे जाते हैं,

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प्रथमो विमर्शः:

मुख्य और गौण । उनमें मुख्य वे होते हैं जिनमें व्यङ्ग्य की प्रधानता रहती है और शेष गुणीभूत व्यङ्ग्यादि गौण । काव्य में मुख्यता और गौणता रहते हुए भी उसे मुख्य या गौण नहीं कहा जाता ( ध्वनि या गुणीभूत व्यङ्ग्य कहा जाता है ) क्योंकि अनादिकाल से दोनों ही उपादेय समझे चले आते हैं। इन दोनों में से एक गुणीभूत व्यङ्ग्य का निरास करने के लिए 'विशेष' शब्द का ध्वनिलक्षण में उपादान आवश्यक है। काव्य सभी रसमय हैं, गुणीभूतव्यङ्ग्य नामक कोई वस्तु नहीं है—ऐसी माननी ठीक नहीं। क्योंकि ऐसे भी काव्य देखे जाते हैं जिनमें रस या तो अस्फुट होता है या अङ्गभूत । उनमें जहाँ रस स्फुट और प्रधान होता है उसे ध्वनि तथा तदतिरिक्त को गुणीभूत व्यङ्ग्य माना जाता है । 'रसः स्वात्मविश्रान्त होता है अतः वह किसी का अङ्ग नहीं बन सकता'—ऐसा नहीं, उसका अपना रूप सच्चमुच ऐसा ही है, किन्तु जहाँ एक रस व्यापक हो जाता है वहाँ दूसरा दब जाता है और विच्छित्तिवैचित्र्यगारिकन्याय से अङ्ग हो जाता है। इसमें प्रमाण भरतमुनि का वाक्य है । उन्होंने इसी अङ्गभाव को मन में रखकर रसों में स्थायित्व और संचारित्व माना है— ( उनका वाक्य है ) —

'जहाँ सभी रस उपस्थित हों वहाँ वह रस स्थायी माना गया है जिसका स्वरूप ( वद्रू ) व्यापक हो, शेष संचारियों' कुछ लोग ऐसा भी कहते हैं कि रस में अङ्गी-अङ्गी-भाव उसके स्थायीभाव से उपचालित होता है। जो भी हो— ( ध्वनिलक्षण में उपात्त ) विशेष शब्द से इस अङ्गभूत रस की व्यावृत्ति अपेक्षित है।

ध्वनि के जो तीन भेद माने गए हैं वे भी ठीक हैं, क्योंकि ऐसा भी काव्य होता है जिसमें रस अस्फुट होता है, ऐसे काव्य में वस्तु और अलङ्कार ध्वनि होती हैं । जहाँ रस स्फुट और अङ्गी अर्थात् प्रधान होता है वहाँ रसध्वनि होती है। रसध्वनि में ही वस्तु अलङ्कार ध्वनियाँ जव मिल बैठती हैं तो ध्वनियों का संकरसंसृष्टि मानी जाती है। इसलिए ध्वनि मत में तो यह सब कुछ ठीक ही है ।

विमर्शः 'विच्छित्तिवैचित्र्यगारिक' की व्याख्या त्रिवेन्द्रदत्त से व्यक्तिविवेक का सम्पादन करने वाले—महाशाय ने इस प्रकार की है—'विच्छोरोडपि भाण्डागाराधिपतिरपि । चोरावस्थायां तिरस्कर-णीयः भाण्डागाराधीशावस्थाविमर्दनीयस्तद्वत् । अङ्कुश इति ।' अर्थात् 'विच्छोरभाण्डा-गारिक' का अर्थ है चोर भी और भण्डार का मालिक भी । जैसे चोर की स्थिति में वह तिरस्करणीय होता है और भण्डार मालिक की स्थिति में मान्य वही होता है ।' वस्तुतः प्रसङ्ग के अनुसार इसे 'विच्छोरश्वासौ भाण्डागारिकः' मानकर—'विच्छोरतामपतितो भाण्डागारिक:' ऐसा मानना चाहिए । इससे भाण्डागारिकत्व उद्भेद्य और विच्छोरत्व विधेय वन जाता है, फलतः जहाँ अङ्गीरस की अङ्गता का निरूपण चल रहा है वहाँ आदरणीय भाण्डागारित्व से तिरस्करणीय विच्छोरत्व का स्थिति संवाद हो जाएगा ।

किञ्च 'सूत्रिभिः कथित' इति कथनक्रियाकर्तृनिदर्शः पक्षद्वयेऽप्यवाच्य एव । कर्तुमात्रविवक्षायां क्रियायाः कर्तृव्यभिचारात् कर्तृविशेषविवक्षायामनन्तरोक्तक्रमेण व्यपारविशेषसम्बन्ध्यादेव तद्विरोषावगतिसिद्धेरित्यवाच्यवचनं दोषः ।

इसके अतिरिक्त—'सूत्रिभिः कथितः' इस प्रकार कथन क्रिया के कर्ता दोनों पक्ष में कथनाय नहीं । क्योंकि केवल कर्तृत्व की विवक्षा में किया का कर्ता से व्यभिचार नहीं होता और विशिष्ट कर्तृत्व की विवक्षा में तुर्त पीछे कहे अनुसार ( लक्षण विशेष से विशिष्टता की प्रतीति से )

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विशेष व्यापार से ही उसके वैशिष्ट्य का ज्ञान हो जाता है—इसलिए अवाच्य वचन दोष आता है ।

पक्षद्वयोपेति कर्तृमात्रपक्षे कर्तृविशेषे च । अननंतरोक्तक्रमेणति । योडसौ लक्षणाद्विशेषाप्रचयमः सोननंतरोक्कः क्रमः । व्यापारविशेषो लक्षणवशायातविचारसररिणमाश्रित्य विशेष-विशिष्टं कथनम् ॥

( १ ) पक्षद्वयोपेति—कर्तृमात्रपक्षे कर्तृविशेषे च । अर्थात दो पक्षों का अर्थ है शुद्ध कर्तृत्वपक्ष और विशिष्ट कर्तृत्वपक्ष ।

( २ ) अननंतरोक्तक्रमेणति—योडसौ लक्षण से जो विशिष्टता का भान होता है, वही अननंतरोक्त क्रम है ।

( ३ ) व्यापारविशेषो—लक्षणवशाः = अर्थात लक्षण के आधार पर चली आई विचारपद्धति के सहारे 'विशेष' शब्द के साथ वाक्ययोजना ।

विमर्शः : प्रथम विमर्श का व्यक्तिविवेक व्याख्यान यहीं समाप्त हो जाता है । यहाँ दो गई—व्याख्यान की इन तीन टिप्पणियों के अनुसार उद्दृृत संदर्भ का अर्थ हुआ 'सूत्रमः कथितः' यह न कहकर केवल 'कथितः' ही कह देना पर्याप्त है । कथन किया से हो उसके कर्ता का ज्ञान हो सकता है, इसलिए उसका शब्दतः कथन आवश्यक नहीं । कारण कि यहाँ यदि सामान्य कर्ता की विवक्षा हो तो उसकी प्रतीति क्रिया के कर्ता से नित्य सम्बन्ध होने के कारण स्वतः हो जाएगी और यदि किसी असामान्य कर्ता की विवक्षा हो तो उसकी प्रतीति भी ध्वनि के इस असाधारण लक्षण के कथन से ही हो सकती है । असाधारण लक्षण का वक्ता साधारण नहीं हो सकता । साथ ही लक्षण वाक्य में जो खास वाक्य योजना हुई है उससे भी कर्ता के वैशिष्ट्य का भान हो सकता है ।

व्यापार विशेष शब्द का अर्थ ध्वनिव्यापार भी हो सकता है । ध्वनि संज्ञा किसी साधारणजन के मुख से निकल नहीं सकती । उसका वक्ता अवश्य ही असाधारण होगा ।

यहाँ तक किए गए विवेचन के आधार पर ध्वनिलक्षण में आप दोषों को दो कारिकाओं द्वारा गिनाते हैं—

अर्थस्य विशिष्टत्वं, शब्दः सविशेषणस्तद् पुंस्त्वम्‌, । द्विवचनत्वारब्दौ च, व्यक्‍तिध्वैनिर्निर्णाम, काव्यविशिष्ट्यम्‌, ॥ २३ ॥ वचनभ्र कथनकर्तुः, कथिता ध्वनिलक्षणीति दश दोषाः । ये त्वन्ये तत्तदेप्रपेदलक्षणगता न ते गणिताः ॥ २४ ॥

( १ ) अर्थ का विशेषण, ( २ ) शब्दः, ( ३ ) शब्द का विशेषण, ( ४ ) तत् शब्द का पुंलिङ्ग में प्रयोग, ( ५ ) व्यक्‍तिः में द्विवचन, ( ६ ) वा शब्द, ( ७ ) ( व्यक्‍ति: में अन्तर्हित ) व्याख्याना, ( ८ ) ध्वनि यह संज्ञा, ( ९ ) काव्यविशेष: में काव्य का वैशिष्ट्य और ( १० ) कथन क्रिया के कर्ता का शब्दतः कथन—ध्वनिलक्षण में ये दश दोष आते हैं, इनके अतिरिक्त और दोष जो ध्वनि के भेद-प्रभेद के लक्षणों में आते हैं, उनकी गणना नहीं की गई ।

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तदेवं लक्षणदोषदूष्यपदव्युदासेन परिशुद्धो ध्वनिलक्षणवाक्यस्यायमर्थो—

वाच्यस्तदनुमितो वा यत्रार्थोंडर्थान्तरं प्रकाशयति ।

सम्बन्धत: कुलश्रित् सा काव्यानुमितिरित्युच्यते ॥ २५ ॥ इति ।

एतच्चानुमानस्यैव लक्षणं नान्यस्य । यदुक्तं 'त्रिरूपलिङ्गध्यान पर्याप्तचातुमानस्यैव लक्षणमि'ति ।

केवलं सम्बन्धाभेद: ।

तो इस प्रकार लक्षण दोष से दुष्ट पदों को हटाने के बाद ध्वनिलक्षणवाक्य का यह अर्थ सर्वात्मना शुद्ध ठहरता है—

'जहाँ वाच्य अर्थ या उसे अनुमित अर्थ किसी दूसरे अर्थ को किसी भी सम्बन्ध से प्रकाशित -करे—वह 'काव्यानुमिति' कही गयी है ।'

यह लक्षण अनुमान ही का हो सकता है और किसी का नहीं । जैसा कि कहा गया है 'त्रिरूप लिङ्ग का आख्यान ( कथन ) अनुमान है ।'

संगति—यहाँ तक पूर्वपक्ष तथा उत्तर पक्षों का १९ कारिकाओं द्वारा इस प्रकार संग्रह किया गया है—

काठ्यस्यात्मनि संब्भिनि रसादिरूपे न कस्यचिद्विमति: ।

संज्ञायां सा,

यतः केवलमेषापि व्यक्त्ययोगतोडस्य कुलः ॥ २६ ॥

( १ ) संज्ञीरूप रसादि अर्थ को काव्य की आत्मा मानने में किसी का मतभेद नहीं है, वह केवल संज्ञा ( ध्वनिसंज्ञा ) के विषय में है, क्योंकि यह ( ध्वनिसंज्ञा ) भी इसके ( रसादि के )

साथ व्यक्ति का कोई भी सम्बन्ध न होने से सम्भव ही कैसे ?

शब्दस्यैकामिधा शक्तिरर्थस्यैकैव लिङ्गता ।

न व्यधिकृतवमनयो: समस्तार्थगुणोपादित्सम् ॥ २७ ॥

( २ ) शब्द की शक्ति एक है—अभिधा, अर्थ में केवल ( साध्यानुमापिका शक्ति ) लिङ्गता होती है । इसका युक्ति-प्रत्युक्ति द्वारा निर्णय कर दिया गया है कि इन दोनों में व्यधिकरणता

( व्यञ्जना ) नहीं रहता ।

उक्तं वृत्तौैव शब्दस्योपादानं लक्षणे ध्वने: ।

न हि तच्छक्तिमूलेष्ट्रा काचिदर्थोऽन्तरे गति: ॥ २८ ॥

( ३ ) ध्वनि के लक्षण में शब्द का उपादान व्यर्थ किया, क्योंकि उसकी शक्ति से अर्थान्तर -का बोध नहीं होता ।

न चोपसर्जनत्वेन तयोर्युक्तं विशेषणम् ।

यत: कदर्थ गुणीभूतव्यङ्ग्यडपष्टौ चाक्षता ॥ २९ ॥

( ४ ) इसी प्रकार उसके ( शब्दार्थ के ) उपसर्जनभाव के प्रति प्रतिपादक विशेषण भी ठीक नहीं क्योंकि गुगीभूतव्यङ्गयरूप से अभिमत काव्य में भी ( ध्वनित्व ) चारुता मानी गयी है ।

अत एव विशेषस्योपादानमपि नार्थवत् ।

संज्ञासम्बन्धमात्रैकफलं तदिति गम्यते ॥ ३० ॥

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( ५ ) इसलिए 'विशेष' शब्द का उपादान भी निरर्थक है। ऐसा लगता है कि संज्ञा ( ध्वनि ) के साथ केवल सम्बन्ध की प्रतिपत्ति हो उसका फल है।

तदा चातिप्रसङ्गः स्यात् संज्ञायां यस्य कस्यनिचित्‌ । यद्वाक्यवार्तिनोऽन्यस्य विशेषस्य तदाधितः ॥ ३१ ॥

( ६ ) किन्तु ऐसा करते पर हर किसी की संज्ञा में अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि ( प्रहेलिका आदि ) वाक्य में स्थित विशेष में भी वह ( ध्वनित्व ) संगत होने लगेगा।' [ कारिका उत्तरार्ध का अर्थ 'प्रहेलिकादौ च नीरसेऽस्याद्र' इस मूल वाक्य के आधार पर किया गया है। वैसे यह अव्यक्त है ]

तस्मात् स्फुटतया यत्र प्राधान्येनानन्यथापि वा । वाच्यशक्त्यनुमेयोऽर्थो भाति तत् काव्यमुच्यते ॥ ३२ ॥

( ७ ) इसलिए काव्य उसे कहा जाता है जिससे वाच्य अर्थ की शक्ति ( लिङ्गत्व ) द्वारा प्रधान या अप्रधान—किसी भी रूप से अनुमेय को स्फुट प्रतीति हो।

वाच्यप्रतिपयेयोरस्ति व्यङ्ग्यव्यङ्गकतार्थयोः । तयोः प्रदीपघटवत् साहित्येनाप्रकाशनात् ॥ ३३ ॥

( ८ ) वाच्य और उससे व्यंग्य अर्थों में व्यङ्ग्य-व्यङ्जकभाव सम्बन्ध नहीं हैं, क्योंकि उनकी प्रतीति घट प्रदीप के समान साथ-साथ नहीं होती।

पक्षधर्मतासम्बन्धव्याप्तिसिद्धयपेक्षणात् । वृक्षत्वादिमत्त्वयोरुद्रू यद्यचानलधूमयोः ॥ ३४ ॥ अनुमानत्वमेवात्र युक्तं तल्लक्षणान्वयात् । असतश्रेन्द्रचापादेः का व्यक्तिः कृतिरेव सा ॥ ३५ ॥

( ९ ) पक्षधर्मतासम्वन्ध व्याप्ति ज्ञान द्वारा जैसे वृक्षत्व-आग्रत्व तथा धूम अग्नि में— ( १० ) अनुमान माना जाता है, वैसे ही अनुमान लक्षण का समन्वय हो जाने से यहाँ भी वही मानना उचित है। इन्द्रचाप आदि जो असत् पदार्थ हैं, उनकी अभिव्यक्ति नहीं—उत्पत्ति ही होती है।

कार्यत्वं ह्यस्तोपीष्टं हेतुत्वं तु विरुध्यते । सर्वसामर्थ्यविगमाद् गगनेन्दीवरादिवत् ॥ ३६ ॥

( ११ ) ( क्योंकि) कार्यत्व तो असत् पदार्थ का भी मान्य है, कारणत्वमात्र से विरोध होता है। क्योंकि आकाश कमल के समान उसमें सभी शक्तियों का अभाव रहता है।

शब्दप्रयोगः प्रायेण परार्थमुपयुज्यते । नहि तेन बिना शक्यो व्यवहारयितुं परः ॥ ३७ ॥

( १२ ) शब्द का प्रयोग प्रयः दूसरे के लिये होता है। क्योंकि उसके बिना पर पुरुष की प्रवृत्ति नहीं कराई जा सकती।

न च मुक्तिनिराशांसात् ततः कश्चित् प्रवर्तते । निवर्तते वेत्यस्मेष्टा साध्यसाधनगर्भिता ॥ ३८ ॥

( १३ ) ( शब्द प्रयोग में भी ) युक्ति दिए.विना उससे किसी की प्रवृत्ति नहीं होती और न निवृत्ति ही। इसलिए उस ( शब्द प्रयोग ) के भीतर साध्यसाधन भाव सम्बन्ध माना गया है।

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ते प्रत्येकं द्विधा भोये शाब्दतार्थेतवभेदतः । पदार्थैक्यार्थेतया ते अपि द्विविधे मते ॥ ३९ ॥

( १४ ) वह साध्यसाधनभाव सम्बन्ध भी दो प्रकार का होता है। एक शब्द और एक अर्थ । वे भी दोनों दो-दो प्रकार के होते हैं—पदार्थंगत और वाक्यार्थंगत ।

तत्र साध्या वस्तुमात्रेऽलङ्कारौ रसादयः । इति त्रिधैव, तत्राद्यौ पदं शब्दानुमानयोः ॥ ४० ॥

( १५ ) उसमें साध्य वस्तुमात्र, अलङ्कार और रसादि ये तीन ही होते हैं। उनमें प्रथम दो शब्द और अनुमान के विषय हैं ।

अन्त्योडनुमेयो भक्त्या तु तस्य व्यङ्ग्यत्वमुच्यते । भक्ते: प्रयोजनांशो यश्रमत्कारित्वलक्षणः ॥ ४१ ॥

( १६ ) अन्तिम ( रसादि केवल ) अनुमेय होता है। लक्षणा द्वारा उसे व्यङ्ग्य कहा जाता है। क्योंकि लक्षणा का जो प्रयोजन है चमत्कार—

स तत्रास्तीति, सोऽप्यस्य विभावाद्येकहेतुकः । अत एव न लोकेऽपि चमत्कारः प्रसज्यते ॥ ४२ ॥

( १७ ) वह उसमें रहता है। इसका वह ( चमत्कार ) भी एकमात्र विभावादि द्वारा उत्पन्न होता है, इसीलिए लोक में वह नहीं होता ।

तत्र हेत्वादयः सन्ति न विभावादयो मतः । न चैकार्थत्वमाराङ्गच्यमेषां लक्षणभेदतः ॥ ४३ ॥

( १८ ) क्योंकि वहाँ ( लोक में ) हेत्वादि ही होते हैं, विभावादि नहीं। इन्हें एकार्थक भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि दोनों के लक्षण भिन्न-भिन्न हैं ।

स्वभावश्रृङ्गारर्थानां यत्र साक्षादमो तथा । स्वविदन्ते सक्तोवागीरा गता माचरतां यथा ॥

इति सङ्ग्रहश्लोका: ।

( १९ ) यह तो पदार्थों का स्वभाव ही है कि साक्षात् उनमें उतना स्वाद नहीं होता जितना कुशल कवि के शब्दों से व्यक्त होने पर ।

संगति—अनुमितिवादी ने शब्द की केवल एक अभिधायी शक्ति मानी है । अतः वह— उपोढरागेण विगलिततारकं तथा गृहीतं रशिना निशामुखम् । यथा समस्तं तिमिरांशुकं तथा पुरोडपि रागाद् गलितं न लक्ष्यितम् ॥

आदि द्वयर्थक वाक्यों में द्वितीयार्थ की प्रतीति का उपाय बतलाता है—

यत् पुनरस्यानेकराकिसमाश्रयत्वाद् व्यापरान्तरपरिकलपनं तदर्थस्यैवोप- पद्यते न शब्दस्य, तस्यैकराक्तिसमाश्रयत्वासिद्धेः । तथा हि—एकाश्रया: शक्तयोऽन्योन्यानेपेक्षप्रयुक्तयोडप्राकृतपौर्वापर्यनियमात् युगपदेव स्वकार्य- कारिण्यो हृश्यन्ते, अभ्युपगम्यन्ते वा, नियोगतोऽभिधाशक्तिपूर्वकत्वे- स् तव्य० वि०

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नेतरशक्तिप्रवृत्तिदर्शनात् । तस्माद्विन्नाश्रया एव ता न शाब्दैकसमाश्रया इत्थंवसेयम् ।

शब्द को अनेकार्थबोधक शक्ति का आश्रय मानकर उसके आधार पर व्युत्पत्ति नामक अभिधातिरिक्त शक्ति की ( शब्द में ) जो कल्पना की गई है वह अर्थ में ठीक प्रतीत होती है। शब्द में नहीं, क्योंकि शब्द अनेक शक्तियों का आश्रय सिद्ध नहीं होता।

जिन एकाधिक शक्तियों का आश्रय एक ही होता है उनकी प्रवृत्ति परस्पर निरपेक्ष या स्वतन्त्र होती है। उनमें पौर्वापर्य नियम नहीं रहता—वे सब एक ही साथ अपना कार्य करती देखी जा रही हैं। जैसे—अग्नि की दाहकता, प्रकाशकता आदि। किन्तु जिन शक्तियों को शब्दाश्रित माना जा रहा है उनमें यह न तो देखा जाता है और न माना ही जाता है। क्योंकि उनमें से अन्य शक्तियों की प्रवृत्ति अभिधा पर निर्भर रहती है। इसलिए भिन्न-भिन्न पदार्थों को उनका आश्रय माना जाना चाहिए, एक मात्र शब्द को नहीं।

विमर्श: 'उपोढरागेण' आदि अनेकार्थक श्लोकों में जिन शक्तियों से अनेक अर्थ की प्रतीति होती है वे एकमात्र शब्द पर निर्भर नहीं मानी जा सकतीं। शब्द पर निर्भर मानने से एकाश्रित अनेक शक्तियों की मूल विशेषताओं का हनन होता है। एकाश्रित अनेक शक्तियाँ—अपने आप में स्वतन्त्र होती हैं, वे एक दूसरे पर निर्भर नहीं रहतीं। अग्नि की दाहकता, प्रकाशकता आदि शक्तियाँ इस तथ्य की पोषक उदाहरण हैं। जिनमें शक्तियों को एकसाथ शब्द पर आश्रित माना है उन्हें यह भी मानन्ना पड़ा है कि अन्य सभी शक्तियाँ अभिधा शक्ति पर निर्भर रहती हैं। यह उद्धृत उदाहरण के आधार पर एकाश्रित शक्तियों की प्रवृत्ति के विरुद्ध है। इसलिए अनेकार्थक वाक्यों में विभिन्नार्थप्रत्यायक शक्तियों के आश्रय भी भिन्न माने जाने चाहिए। उनमें अभिधेयार्थ की प्रतीति कराने वाली शक्ति अभिधा है उसका आश्रय शब्द है। दूसरे अर्थों की बोधकशक्ति का आश्रय शब्द नहीं है—उसके आश्रय का निर्णय अनुमितिवादी ने इस प्रकार किया है—

यथ्रासावाश्रयो भिन्न: सोऽर्थ: पृथग्वेति तद्वच्यापारस्याऽनुमानान्तर्भावोऽप्युपगन्तव्य एव । तथा हि । गौरवाधिक इत्यादौ तावद्वयतिरेकी बाधितवाहीकाद्यर्थान्तरैकात्म्यास्त्रादृश्यविधानानन्यथानुपपत्त्या केनचिदङ्गेन तत्र तत्वमनुपयन्न्ति न सर्वात्मना ।

न ह्यनुमत्त: कश्चित् कचित् किश्चित् किश्वित् कथंचित् साधर्म्यमात्रेऽनुत्पश्यच्चेवाक्ष्मात् तत्त्वमारोपयतीति परिशीलितवचक्रूस्वरूप: प्रतीपत्ता तत्त्वारोपनिमित्तं साधश्यमात्रमेव प्रतिपत्तुमर्हति न तत्त्वम् ।

तद्‌ति वाच्यार्थतयोक्तं प्रवृत्तं वासते, न प्रतीतिपर्यवसानस्पदं भवितुमर्हति, तस्य बाधोपपत्ते: ।

तस्य चैवंविधस्योपक्रमस्य निमित्तं साधर्म्यमात्रप्रतिपादनम् । प्रयोजनक्षलाघवेन वाहीकादौ वादिगतजाड्यादिधर्मप्रतिपादने; यस्मादतिदेशापकारोऽयमर्थान्तरे शब्दविनिवेशो नाम । यदुक्तम्—

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प्रथमो विमर्शः

'जातिशब्दोऽन्तरेणापि जातिं यत्र प्रयुज्यते । समवन्धिसद्धर्म्मात् तं गौणमपरे विदुः॥ ४९ ॥

यह जो दूसरा आश्रय है वह है केवल अर्थ, इसलिए उसके व्याप्यार का अनुमान में अन्तर्भाव मानना ही चाहिये । गौर्वाहीक इत्यादि स्थलों में गो आदि अर्थों का वाह्यीक आदि दूसरे अर्थों के साथ अभेद् नहीं हो पाता ।

'कोई भी ऐसा व्यक्ति जो उन्मत्त नहीं है किसी प्रकार कहीं किसी साधर्म्य को देखे बिना सहसा दूसरे का अभेदारोप नहीं करता—' वक्ता की ऐसी प्रवृत्ति का जिसे ज्ञान होता है वह बुद्धिमान् व्यक्ति तत्त्वारोप का निमित्त सादृश्यमात्र को ही मानता है, तत्त्व को नहीं वह तो वाच्यरूप से आरम्भ में ही प्रतीत हो जाता है, इसलिए चरम प्रतीति का विषय नहीं बन सकता । ( तबतक )

कथन की इस प्रवृत्ति का कारण सादृश्यमात्र का ज्ञान कराना है और लाघवार्थ वाह्यीकादि में गो आदि में रहने वाले जाड्य आदि धर्मों का प्रतिपादन प्रयोजन है; क्योंकि दूसरे अर्थ में किसी दूसरे अर्थ के वाचक शब्द का प्रयोग करना अतिदेश का एक भेद माना गया है । जैसेकि कहा गया है—

विमर्शः उपोद्घरागेण आदि स्थलों में शब्द अभिधा द्वारा केवल वाच्य अर्थ का ज्ञान कराता है, अर्थान्तर की प्रतीति जिस शक्ति से होती है वह अर्थ में रहती है । अर्थ द्वारा अर्थान्तर का ज्ञान अनुमान द्वारा ही होता है ( जैसे धूमरूप धर्म से वह्निरूप अर्थान्तर का ) इसलिए अर्थनिष्ठ शक्ति को अनुमान मानना चाहिये । 'गौर्वाहीक:' आदि स्थलों में गोत्व का वाह्यीकत्व से भेद होने से एक-विमक्ति प्रतिपादित अभिन्नता नहीं बनती तब ( जाड्यादि ) अभेद का यही अनुमान कराती है कि इस अभिन्नता का हेतु वाह्यीक में गोत्व्य. जाड्य आदि गोत्व से भिन्न धर्मों का अस्तित्व है ।

ग्रन्थकार ने इस प्रसंग में सादृश्य और साधर्म्य दो शब्दों का प्रयोग एक साथ किया है । उन्होंने लिखा है—कोई भी साधर्म्य को बिना देखे तत्त्वारोप नहीं करता । इसलिए तत्त्वारोप का निमित्त सादृश्यमात्र समझा जाता है । सादृश्य और साधर्म्य साहित्यशास्त्र के दो विवादास्पद शब्द हैं । मम्मट ने उपमा को भेदगर्भित साधर्म्य माना है और परवर्ती आचार्यों ने सादृश्य ।

काव्यप्रकाश की वामन टीका में टंकाकार वामन झलकीकर ने इस विषय का विस्तृत विवेचन किया है । उन्होंने सादृश्य और साधर्म्य के बीच प्रयोज्य-प्रयोजक भाव सम्बन्ध माना है । उनका इस मान्यता पर कथन है कि साधर्म्य सादृश्य का प्रयोजक होता है और सादृश्य साधर्म्य का प्रयोज्य । साधर्म्य शब्द की निरुक्ति है—'समानो धर्मो ययोस्तौ सधर्म्माणौ तयोरभावः' । भरतुहरि ने समास के बाद प्रयुक्त भाववाची तद्धितप्रत्यय का अर्थ समबन्ध किया है । 'कृतद्वितरसमा सेभ्यः समबन्धाभिधानं भावप्रत्ययेभ्यः' साधर्म्य पद में यञ् प्रत्यय भाव अर्थ में ही हुआ है । वामन की टीका पर दी गई

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टिप्पणी में इस मत के समर्थन में कैयट का भाष्य व्याख्यान भी उद्धृत किया है। 'भाव' की व्याख्या 'प्रकृतिजन्यबोधे प्रकाराभूतो भाव:' भी उक्त अर्थ में सहायक है। इसका अर्थ है 'शब्द का वह अंश जिसमें प्रत्यय जुड़ते हैं—उसके गर्भ में निहित जो धर्म वहाँ भाव का अर्थ है। साधर्म्य शब्द में 'धयज्' प्रत्यय जिस शब्द से हुआ है वह है 'सधर्म' या 'सधर्मन्' उसका अर्थ है समान धर्म वाला। इस अर्थ में विशेषण है। समान धर्म और विशेष्य उससे युक्त व्यक्ति। 'धयज्' प्रत्यय भाव में हुआ है अतः उसका अर्थ हुआ 'समानधर्म'। किन्तु समानधर्म का ज्ञान समानशब्द से भी होता है। साधर्म्य द्वारा उसका तो ज्ञान होता हो है उसके आश्रयभूत व्यक्ति और उसके साथ उसके सम्बन्ध का भी ज्ञान होता है। इसलिए भर्तृहरि का उक्त मत वैज्ञानिक

जहाँ तक सादृश्य और साधर्म्य के सम्बन्ध का प्रश्न है साधर्म्य शब्द की उक्त निरुक्ति के अनुसार उन दोनों में भेद बतलाते हुए वामनाचार्य ने लिखा है 'यः साधारणधर्मप्रतियोगिकः उपमानोपमेयोभयानुयोगिकः सम्बन्धः स साधर्म्यमित्युच्यते?—इति साधर्म्यसादृश्ययोर्भेदः ( पृ० ५४१ बालबोधिनी काव्यप्रकाश )

इस न्यायशास्त्र की पदावली में निहित सार इतना ही है कि जो सम्बन्ध उपमान और उपमेय दोनों में एक साथ रहता है वहीं साधर्म्य कहलाता है। सादृश्य इसमें भिन्न होता है। वह एक साथ किन्हीं दो में न रहकर कहीं से उठता है और कहीं जाकर बसता है। सादृश्य एक पदार्थ का दूसरे में होता है, दोनों में परस्पर नहीं।' वस्तुतः साधर्म्य के निरूपण में उसके आश्रयों को उपमान उपमेय नहीं कहा जाना चाहिए। क्योंकि साधर्म्य से जो प्रतीति होती है उसमें दोनों पदार्थों के गुणधर्मों परस्पर प्रतीत होते हैं। सादृश्य में दोनों में कुछ नयूनाधिकता आ जाती है। उसमें एक के धर्म में उत्कर्ष और दूसरे के धर्म में अपकर्ष की प्रतीति होती है। उपमानोपमेयभाव-

जिसका अपकृष्ट होता वह उपमेय माना जाता है। उनमें उत्कृष्ट धर्म वाले पदार्थ का सादृश्य में सम्भव है। अतः साधर्म्य धर्मगत तुल्यकोटिक समानता का बोध कराता है और सादृश्य ऐसी समानता का जिसमें उपमानांश कुछ उत्कट रहता है। साधर्म्य और सादृश्य की विषमता का आधार व्यवहार है। व्यवहार में कहा जाता है—'इन दो पदार्थों में साधर्म्य है' और 'इसका इसमें सादृश्य है।'

वस्तुतः इन दोनों प्रमाणों के आधार पर साधर्म्य और सादृश्य का भेद सिद्ध नहीं होता। व्यवहार ऐसा भी हो सकता है—'इसका इसमें साधर्म्य है और इन दोनों में सादृश्य।' ऊपर के व्यवहार में जहाँ साधर्म्य शब्द की प्रकृति को द्विवचनान्त माना जाता था और सादृश्य की प्रकृति को एकवचनान्त, वहाँ इस व्यवहार में उसके विरुद्ध भी माना जा सकता है।

इसके अतिरिक्त जिन व्याकरण-व्युत्पत्तियों के आधार पर साधर्म्य का अर्थ 'समानधर्म-सम्बन्ध' किया जाता है उन्हीं व्युत्पत्तियों के आधार पर सादृश्य में 'दृश्' का अर्थ ज्ञान करके 'सम्बन्धेन ज्ञानं प्रति तादात्म्येन विषयस्य कारणत्वम्' अर्थात् 'विषयिता-

से कारण होता है। मुखचन्द्र आदि ज्ञान में समता की प्रतीति का कारण मुखचन्द्र आदि में विद्यमान समान धर्म है। यदि इन समान कहे जाने वाले धर्मों का कोई सम्बन्ध निर्धारित किया जाय तो, वह सादृश्य के अतिरिक्त हो ही क्या सकता है। फलतः साधारण या समान धर्म और

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प्रथमो विमर्शः

सादृश्य में प्रयोज्य-प्रयोजकभाव हो सकता है समान धर्म के सम्बन्ध, जिसे साधर्म्य द्वन्द से कहा गया है और सादृश्य का तो अभेद ही सिद्ध होता है। इसीलिए प्राचीन आचार्यों के साधर्म्य और नवीन आचार्यों के सादृश्य शब्द द्वारा उपमानवरूप में कोई भेद नहीं होता। साधर्म्य को छोड़कर नवीन सादृश्य शब्द का प्रयोग करना—एक दृष्टि से अधिक अच्छा है।

प्रत्येक दर्शंक यह मानता है प्रकृति का यह दृश्यरूप उसका वह परिणाम है जो विरूप होता है। सरूप परिणाम में प्रकृति दृश्य नहीं रहती। ऐसी स्थिति में जिन पदार्थों को समान कहा जाता है उनमें तात्त्विक एकता सम्भव नहीं। एकता की प्रतीतिमात्र होती है जो प्रेक्षक की बुद्धि का तद्रूपशित्त्वाभाव—रूप दोष है। सादृश्य शब्द के प्रयोग में यह भाव नहीं होता कि वस्तुतः दोनों पदार्थों के धर्मों समान हैं—अपितु यह प्रतीत होता है कि समान लगते हैं। साधर्म्य जो ज्ञान कराता है उसका आश्रय ज्ञाता की बुद्धि से दूर पदार्थ की स्वगत स्थिति होती है वह समान हो या जैसी भी। अलंकार का महत्त्व ज्ञान तक ही सीमित है। तब तक पहुँचने पर तो वह एक सुनिश्चित वस्तु सिद्ध होती है, इसलिए उपमानलंकार का स्वरूप ज्ञान परक होना चाहिए वस्तु परक नहीं। अतएव उसके स्वरूप में साधर्म्य का निर्देश उतना महत्त्वपूर्ण नहीं जितना सादृश्य का होता है।

सबसे बड़ी बात तो यह है कि समान धर्म की भी स्वगत समानता को मानदण्ड, यदि सूक्ष्मतया लाघव से काम लें तो सादृश्य को ही मानेंगे, अपने भीतर पुनः किसी गुणधर्म को समानता का मानदण्ड मानने पर अनवस्था दोष होगा। इसलिए 'अन्ते रणदाङ्गिवाहनन्याय' से भी—उपमा का मूल सादृश्य ही ठीक है। इस तत्त्व की पुष्टि अलंकारसर्वस्व की जयरथकृत विमर्शिनी टीका से भी होती है। काव्यमाला में निर्णयसागर से द्वितीय वार प्रकाशित अलंकारसर्वस्व के ३५ वें दृष्ट पर 'पाण्ड्योऽयमिति सा नृपः' पद्य की टीका विमर्शिनी में राजानक जयरथ ने लिखा है—

'अस्यास्तावद् धर्मेस्य साधारण्यं जीवितम् । तच्च धर्मस्यैकत्वे भवति । न च वस्तुतोऽन्र धर्मस्यैकत्वम् । नहि य एव मुखगतो लावण्यादिः धर्मः स एव चन्द्रादौ । तस्याऽऽन्वया—संभवाद् । अपितु तज्जातीयोऽन्योऽस्ति धर्मः । एवं धर्मयोरप्यभेदादात् साधारणत्वा—संभवाद् उपमाया : स्वरूपानिष्पत्तिरेव न स्त्यात् । अथ धर्मयोरुपि सादृश्यनिमित्तम् अन्यद् वेष्यम्, तत्राप्यन्वया—द्वैतयस्था स्यात् । ततश्च धर्मयोरपि वस्तुतो भेदेऽपि प्रतीतावेकतावसायाद् भेदेऽपि भेद इत्येतत् त्रिमित्तमेकत्वाश्रयोऽन्योऽपि । अन्यथा हेतूपमाया उत्थानमेव न स्यात् । अतएवात्र विम्बप्रतिविम्बभावोऽप्युपदिशः । लोको हि दर्पणादौ विम्बात् प्रतिविम्बस्य भेदेऽपि मदनमीमेवात्र वदनं नोदियात्, भूषणविन्यासादौ च नायिका नाहियेरन् । एवं चात्रभेदविवक्षैव जीवितम् ।'

रसगंगाधरकार पण्डितराज जगन्नाथ ने भी उपमा में साधारण धर्मों का अभेद आहाय अर्थात् ऐच्छिक ही माना है। यह उनके उपमालंकार विवेचन के आरम्भ से ही स्पष्ट हो जाता है।

शास्त्रों में सादृश्य और साधर्म्य को लेकर विवाद है। व्याकरणशास्त्र दोनों को भिन्न मानता है और न्याय अभिन्न ही मानते हैं। महिमभट्ट को न्यायमत प्रिय है। अतः वे उन्हें अभिन्न मानते हैं। इसलिए पर्यायरूप से दोनों का प्रयोग एक ही सदर्भ में वे कर गए हैं।

एवं 'कृशाङ्ग्याः सन्तापं वदति बिसिनीपत्त्राणम्' इत्यादाववग-स्तव्यम् । अविनाभाववसायपूर्विका ह्यन्वयतोऽन्यस्य प्रतीतिरनुमानमि-त्युमानलक्षणमुक्तम् । तच्चात्रोपलभ्यते एव ।

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तथा हि वदतीत्यादौ वदनादेरर्थान्तरस्य प्रकाशादे: प्रतीतिः । तयोः श्राविनाभावः कार्यकारणभावकृतः । प्रकाशस्य वदनकार्यत्वप्रसिद्धे । न च वदते: प्रकाशो वाच्य इति शङ्क्यं वक्तुं तस्य तत्रासमितत्वात् प्रकाशस्य जातत्वात् । न चायं स्वार्थमेव प्रतिपादयति, तस्य वाच्योपपत्तेः । अथोपचारात् उपपत्तिरन्यथानुपपत्त्या वदनक्रियार्थः सन्देशे प्रकाशनार्थ्ये क्रियांन्तरे वर्तमानोऽयं वदतिरित्युच्यते, तर्ह्यन्यथानुपपत्त्या वदनदे: प्रकाशादि: प्रतीयमानोऽनुमेय एव भवितुमर्हति, अर्थापत्तेरनुमानान्तर्भावाभ्युपगमादित्युक्तम् ।

तस्माद्‌ऽयं वाहीकादौ गवादिसाधर्म्यावगमः स तत्त्वारोपान्‍यथानुपपत्तिपरिकल्पितोऽनुमानस्यैव विषयः । न शब्दव्यापारस्यैति स्थितम् । गोत्वारोपेण वाहीके तत्त्वास्यमनुमीयते । को हेतस्मिन्नतद्वल्ये तस्मं व्यपदिशेद् बुधः ॥ इति सङ्ग्रहश्लोकः ।

इसी पद्धति से 'कृशाङ्गया: सन्तार्य वदति विसिनीवपत्रशायनम्' इत्यादि स्थलों पर विचार करना चाहिए । 'अविनाभाव के निश्चय द्वारा एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ का ज्ञान अनुमान होता है'—ऐसा अनुमान का लक्षण कहा गया है । वह यहाँ लागू होता ही है । क्योंकि 'वदति' इत्यादि के प्रयोगों में वदन आदि से प्रकाशन आदि की प्रतीति होती है । उन दोनों का जो अविनाभाव सम्बन्ध है उसका आधार है कार्यकारणभाव, क्योंकि प्रकाशन 'वदनक्रिया' के कार्यरूप से प्रसिद्ध है । किन्तु 'वदति' क्रिया से 'प्रकाशन अभिधेया प्रतीत होता है' ऐसा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उसका उस अर्थ में संकेतग्रह ( अस्मित ) नहीं है । और प्रकाशन स्वयं वदन से अभिन्न नहीं । उधर वदति क्रियापद द्वारा उसका अपना अर्थ भी प्रतीत हो नहीं पाता क्योंकि उसका उत्तर क्षण में वाच्य हो जाता है । यदि यह कहा जाय कि लक्षणा द्वारा वदति क्रियापद वदन क्रिया के सदृश प्रकाशन नामक तात्पर्य में तत्पर्य है, क्योंकि इधर उसका उपादान इस उपाय के बिना सार्थक सिद्ध नहीं हो पाता—तो ( ऐसी स्थिति में ) अन्यथानुपपत्ति द्वारा अर्थापत्ति द्वारा वदन—आदि से प्रतीयमान प्रकाशन आदि अनुसमेय ही होने चाहिए क्योंकि अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव माना गया है ।

इसलिए वाहीक आदि में जो गो आदि के साधर्म्य का ज्ञान है वह अनुमान है ( अनुमान ) किसी दूसरे उपाय से वाहीक में गोत्व के आरोप की सिद्धि न होने से माना जाता है । वह शब्दव्यापार का विषय नहीं है । यह बात तय हुई । इसका संग्रह यह हुआ कि—

'गोत्व के आरोप से वाहीक में उसके साम्य का अनुमान किया जाता है । कौनसा—बुद्धिमान् व्यक्ति अत्यन्त भिन्न और साम्यवयव पदार्थ में किसी भिन्न पदार्थ के आरोप का अल्लेख करेगा ?'

विमर्शः शब्द की शक्ति केवल एक मानी जाने पर जहाँ एक ओर व्यञ्जना का खण्डन होता है वहीं दूसरी ओर लक्षणा का भी 'गौरवाधिक:' के प्रसङ्ग द्वारा व्यक्तिविवेककार ने खण्डन आरम्भ किया है । उसका आंशिक अभिप्राय 'गौरवाधिक:' के प्रसङ्ग में स्पष्ट कर दिया गया है । शेष जो वदति विसिनीवपत्रशायनम् आदि प्रयोगों में चेतनसूकर बदन कथन आदि क्रियाप्रभृति: गुणों का विसिनी पत्रशयन आदि जड़गतत्वेन व्यवहार है उनका भी स्पष्टीकरण किया है ।

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उसमें 'वदति विसिनोपत्रशयनम्' के विषय में उनका कहना है—वदन क्रिया ध्यान रूप जड़पदार्थों में तथा तक संबन्ध नहीं जन तक उसका अर्थ प्रकाशन नहीं कर दिया जाता । इस प्रकार क्योंकि प्रकाशन अर्थ की 'आपत्ति' ( लाने ) से वदतिक्रियापाद का इलोक में प्रयोग—उपपन्न ( प्रसङ्गानुरूप ) होता है फलतः यहाँ अर्थापत्तिप्रसङ्ग मानना होता है । यह अर्थापत्ति अनुमान से भिन्न नहीं है । उसका अन्तर्भाव अनुमान में किया जा चुका है । इसलिड अर्थापत्ति द्वारा बोधित अर्थ अनुमान द्वारा बोधित माना जाना चाहिए । जो अर्थ अनुमान द्वारा बोधित होता है वह वाक्य नहीं अनुमेय होता है । निदान—'गौरवाहीक' आदि स्थलों में भी वाहीक अ.दि में अमेद ।आरोप की अन्यथानुपपत्ति रूप अर्थापत्ति द्वारा गो आदि के साधनये की प्रतोति होती है अतः वह शब्द का नहीं अनुमान का विषय है ।

अर्थापत्ति का अनुमान में अन्तर्भाव न्यायशास्त्र का प्रसिद्ध विषय है । अर्थापत्ति का प्रसिद्ध उदाहरण है 'पीने देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' ( देवदत्त दिन में नहीं खाता ) न्यायशास्त्र के अनुसार यहाँ—देवदत्तः रात्रिभोजनकर्तृतावच्छिन्नः दिवा न भुजानत्वे सति पीनत्वाद् ।' इस प्रकार अनुमान प्रयोग से काम चला लिया जायगा । अर्थात् उपपाद्य अंश और अनुपपन्नतोपपादक अंश दोनों की समष्टि को हेतु बनाकर उनदोनों के आश्रय में परिशेष पदार्थ का अनुमान किया जा सकता है । उसमें व्याप्ति-व्यतिरेकी रखा जा सकता है—'यन्नैवं तन्नैवम्' आदि । गौरवाहीक इस स्थल में भी अनुमान का रूप इस प्रकार बनाया जा सकता है—'वाहीको गोसाधर्म्यवान्, भिन्नत्वे सति सत्यत्वभिन्नत्वेन व्यपदिश्यमानत्वात् ।'

गडायां घोष इत्यादावपि गडादियोडर्थः स्वात्मन्यनुपपत्तिवाधितघोषा-ध्यकरणभावास्तदुपादानसामथ्याद् सम्वन्धमात्रप्रतिकलिपततत्वारोपं तद-ध्यकरणभावोपगमयोरमथान्तरमेव तटादिरूपमनुमापयति । न हि तत्सादृश्यमेवैकं तत्त्वारोपनिवन्धनमिष्यते, किञ्तर्हि, तत्त्व-स्वन्धादिरपि, इति तत्तस्म्वन्धमात्रसमारोपिततत्त्ववस्तटादिरेव घोषादि-ध्यकरणभावोपादानानुमेयः एवं भवितुमर्हति । शब्दः पुनः स्वार्थप्रतिपादनसामथ्यादन्योन्यपर्यवसितसामथ्योऽनन्तरस्य शब्दस्य पुनः संसर्गमित्युक्तम् । प्रयोजनं पुनरस्यैवंविधस्योक्तिवैचित्र्यपरिग्रहस्य तटादावारोपविषये वस्तुनि आयारोप्यमाणगडादिगतष्ण्यतादिगुणस्य श्रोतृलत्चादिर्धर्मेप्प्रतिपत्ति, न साधश्यमिति पूर्व- स्मादस्य विशेषः । उभयत्रापि तत्त्वारोप एव हेतुः । स हि तत्साम्य-तत्सम्वन्धादिनिवन्धवाद बहुविध इष्यः । यदाहुः—

'अभिधेयेन सम्वन्धात् साधश्यात्समवायतः । वैपरीत्यात्तु क्रियायोगाल्लक्षणात् पश्चाद् मता मता ॥' इति ।

'गडायां घोष:' इत्यादि स्थलों में' गडादि पदार्थों में घोष आदि पदार्थों की अधिकरणता का वाध हो जाता है । ऐसी स्थिति में वे ( गडादिपदार्थ ) अपने साथ किसी भी सम्वन्ध से सम्बन्धित होने के कारण अभिन्न रूप से प्रतीत कराते हुए तट आदि किन्तु अन्य कराते हैं । एक मात्र सादृश्य ही तत्त्वारोप का कारण नहीं होता, संयोग ! उसके कारण बनते हैं । इसलए गङ्गा आदि अर्थों द्वारा तटादि रूप अर्थ

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व्यक्तिविवेक:

अर्थ अन्य किसी वृत्ति द्वारा नहीं वन पाती । इन तटादिरूप अर्थों पर भी अनुमापक अर्थ का अभेद आरोपित नहीं क्योंकि ध्वोपादि की अधिकरणता दूसरे किसी में नहीं बन पाती ।

शब्द की शक्ति तो केवल अपने वाच्यार्थ को ज्ञान कराकर शान्त हो जाती है । दूसरे अर्थ की बात तो नहीं जान सकता, उसके स्वरूप स्पर्श की तो बात ही दूर है ।

विमर्श : लक्षणा के इन पाँचों प्रकारों का स्पष्टीकरण अभिनवगुप्ताचार्य ने व्याख्या लोचन में इस प्रकार किया है—‘सा च लक्षणा पञ्चविधा तद्यथा—संयोगात्; द्विरेफशब्दस्य हि योड्‌भिधेयो भ्रमरशब्दः—दो रेफौ यस्मिन् कृतवा, तेन यः संयोगः सम्बन्धः ।

विशेष : अभिनवगुप्त ने ध्वन्यालोक की प्रथम कारिका के ‘भक्तिमाहुतमन-लोचन में उक्त कारिका भी उद्धृत की है । किन्तु व्यक्तिविवेक के पाठ से उसमें लोचन का पाठ है ‘अभिधेयेन संयोगात्’ और व्यक्तिविवेक का पाठ है ‘अभिधेयेन व्यक्तिविवेककार ने ‘व्यज्यतेऽर्थ:' इस पद के द्विवचन खण्डन में अभिनवगुप्त का लोचन उद्धृत किया है । इससे प्रतीत होता है कि वे पाश्चात्य थे ।

अभिनवगुप्त ने संयोगात् तेन भ्रमरशब्देन ‘यस्य संयोग: सम्बन्ध:' इस प्रकार सम्बन्ध किया है । संयाग शब्द सम का वाचक है और सम्बन्ध शब्द सम्बन्ध सामान्य का ।

सामान्यार्थ में विशेष वाचक प्रयोग ठीक न जानकर व्यक्तिविवेककार ने पाठ बदल दिया होगा ।

( ध्वन्यालोक चौ० सं० पृ० =

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पर वे अपने मन से गढ़कर जोड़ते गए हैं। इसीलिए उनके उदाहृत पद्यों में भी काफी पाठान्तर हैं। कालिदास के प्रायः सभी पद्य कुछ-कुछ बदलकर दिए गए हैं। संभव है लिपिकारों ने ही ऐसें परिवर्तन कर दिए हों।

इसी प्रकार 'अभिधेयेन संयोगात्' कारिका में दूसरा पाठान्तर है—सामीप्यात् की जगह सादृश्यात्। लोचनमें सामीप्यात् पाठ दिया गया है और उसका उदाहृत भी गढ़ा हुआ घोषः व्यक्तिविवेक में वह सादृश्यात् कर दिया गया है। अभिनवगुप्त ने समवाय का अर्थ सम्बन्धमात्र किया है। सामीप्य आदि सम्बन्ध उसी सम्बन्ध में अन्तर्भूत माने जा सकते हैं। सम्भवतः इसीलिए सामीप्य को छोड़ सादृश्य को अपना लिया गया हो। वस्तुतः सामीप्य के समान सादृश्य भी और न केवल सादृश्य ही, वैपरीत्य आदि अन्य सम्बन्ध भी सम्बन्धवाचक समवाय शब्द द्वारा गृहीत हो जाते हैं। वादर के गदाधर भट्टाचार्य आदि आचार्यों ने 'अभिधेयेन सम्बन्ध' को ही लक्षण माना है, उनका लक्षणालक्षण—हि—'शक्यसम्बन्धो लक्षणा'। सम्बन्धमात्र से काम चल सकने पर भी वैपरीत्य आदि विशिष्ट सम्बन्धों का उल्लेख किया जाना केवल स्पष्टता के लिए ही हो सकता है। इस दृष्टि से लोचन या संयोगात् पाठ ही अधिक उचित प्रतीत होता है। सामीप्य के स्थान पर सादृश्य पाठ अभिनवगुप्त के लिए अपेक्षित नहीं क्योंकि उन्होंने 'गौण' संज्ञा द्वारा सादृश्यमूलक लक्षणा का स्पष्टीकरण उद्भूत लक्षणार्थकथन के पहले ही कर दिया है। वस्तुतः सम्बन्ध अनन्त हैं, अतः लक्षणा भी केवल पाँच तक सीमित नहीं, वह भी अनन्तप्रकार की हो सकती है।

तस्य च तैरविभावनीयमो लोकत एवावसित इति न तत् प्रमाणतरोपेक्षाप्रयासः। लोको हि तत्सदृशार्थे तत्सम्बद्धं च तत्त्वेन व्यवहरण द्रश्यते, तथातथा दीर्घग्रन्थैर्विकटकायंश्च कश्चित् पश्यन् करभ इति व्यवहार दिशति, मद्रसम्बद्धांश्च काञ्चित् क्रोशतो मद्रा: क्रोशन्तीति ।

किञ्चोपचारवृत्तौ शब्दस्य मा भूदिति प्रयश्ं किमपि निमित्तमनुसर्तव्यम् । अन्यथान्यत्र प्रसिद्धसम्बन्धः कथमस्मितमेवार्थान्तरं प्रतीयते। यथा तत्रिमित्तं तद्वाचिस्मीयते लिङ्गमत्यन्तम् । युक्तश्चैतत् ।

शब्दस्य तत् व्यापराभावात् । व्यापाराभावक्ष सम्बन्धाभावात् । लिख्याच लिङ्गन प्रतितिरनुमानमेवेति न गुणवृत्तावर्थान्तरप्रतीति: शाब्दीति तस्या वाचकाश्रयत्वमसिद्धमेव ।

उसका उनके ( तत्त्वारोप का साम्य आदि के ) साथ व्याप्ति-सम्बन्ध लोक वाक्यों से निश्चित होता है इसलिए उसमें किसी अन्य प्रमाण की खोज का प्रयास अपेक्षित नहीं । लोग तत्सदृश और तत्सम्बद्ध अर्थ को तत्त्वेन पुकारते हुए देखे जाते हैं जैसे लम्बनी गरदन और विशाल शरीर वाले किसी को देखकर उसे 'करभ' ( हाथी का बच्चा ) कहते हैं और मचाई पर बैठे हुए व्यक्तियों को चिछलाते सुनकर मचाईं चिळ्ह रही हैं—ऐसा ।

इसके अतिरिक्त शब्द की इस उपचारवृत्ति ( लक्षणा ) में अत्यासि न हो जाय इसीलिए—कोई एक कारण अवश्य ही मानना होगा । नहीं तो जिसकी शक्ति दूसरे अर्थ में प्रसिद्ध है ऐसा शब्द उस अर्थ की प्रतीति कैसे करा सकेगा जो उससे असमित (अर्थात्=उस अर्थ में संकेतग्रस्त्य है। वह जो निमित्त है उसी को हमने यहाँ लिख छोड़ा है और यह ठीक भी है । क्योंकि शब्द

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व्यक्तिविवेक:

का व्यापार वहाँ तक नहीं होता। व्यापाराभाव का कारण है सम्बन्ध का अभाव। लिङ्ग से जो लिङ्गी की प्रतीति होती है वह अनुमान है।

इस प्रकार गुणवृत्ति ( लक्षणा ) में होनेवाली दूसरे अर्थ की प्रतीति शाब्दी नहीं होती, इसलिये 'उसका आश्रय वाचक है' यह सिद्ध नहीं होता।

संगति—उक्त विषय का कारिकाओं में संग्रह किया जाता है—

यः सतरवस्मारोऽपस्तत्सम्वन्धानिबन्धनः ।

मुख्यार्थबाधे सोऽप्य्यार्थं सम्वन्धमनुमापयेत् । । ४८ । ।

( १ ) भिन्न पदार्थ में भिन्न पदार्थ का—जो अमेद कश्न है—उसका आधार सम्वन्ध है, ( किन्तु ) वह ( अमेद ) मुख्यार्थ के बाध हो जाने से अनुमान द्वारा उसे ( सम्वन्ध को ) अर्थनिष्ठ ही बतला सकता है।

तत्साम्यतत्सम्वन्धौ हि तद्वारोपैककारणम् ।

गुणवृत्तेरिदं प्रयोऽसत्तप्रतीतिरतोडनुमा । । ४९ । ।

( २ ) तत्साम्य और तत्सम्वन्ध दोनों प्रकार ततवारोप के कारण हैं। इसलिये दो प्रकार की गुणवृत्ति ( लक्षणा ) में उसकी ( प्रयोजन की ) प्रतीति—अनुमिति—( अनुभिति ) ही है।

विमर्शः इस सारगर्भित कारिका की कई बातें नई कही गई हैं। ( १ ) गुणवृत्ति दो प्रकार की होती है। क्योंकि उसमें होनेवाले तद्वारोप के कारण दो कारण हैं एक तत्साम्य और दूसरा तत्सम्बन्ध। उसके प्रयोजन की प्रतीति इसीलिए अनुमिति है।

किश्च—

मुख्यवृत्तिपरित्यागो न शब्दस्योपपद्यते ।

विहितोड्थान्तरे वार्थे: स्वस्साम्यमनुमापयेत् । । ८८ । ।

और—

( ३ ) शब्द द्वारा ( अपनी ) मुख्य वृत्ति ( अभिधावृत्ति ) का परित्याग ( युक्तियों से ) सिद्ध होता नहीं। अर्थान्तर पर आरोपित अर्थ ही अपने साम्य का अनुमान करा सकता है।

तुल्यादिपु हि लोकोडर्थेऽर्थे तदर्थानुस्मृतम् ।

आरोपयेद् शब्दस्तु स्वार्थमात्रानुयायिनम् । । ४९ । ।

( ४ ) जो अर्थ ( पदार्थ ) तुल्य होते हैं उन्हीं पर, उनके ज्ञान से स्मृत दूसरे पदार्थ को संसार आरोपित करता है, उस शब्द को नहीं जिसकी दौड़ केवल अपने अर्थ तक ही होती है।

इत्थमर्थान्तरे शब्दवृत्तेर उपपत्तितः ।

फले लिङ्गैकगाम्ये स्यात् कुतः शब्दः सकलद्रुतः । । ५० । ।

( ५ ) इस प्रकार अर्थान्तर में शब्दवृत्ति सिद्ध न होने से, एकमात्र लिङ्ग द्वारा ज्ञातव्य फलकल्पना अर्थ के लिए ( स्वार्थबोधकता में ) शब्द के पैर लड़खड़ा ही कैसे सकते हैं।

व्यापारोडर्थे ध्वने: साक्षान्मुख्य वृत्तिरुदाहृता ।

अर्थारोपानुगस्त्वेष गौणी तद्वच्यवधानतः । । ५१ । ।

( ६ ) अर्थ में ध्वनि ( ज्ञान ) ( शब्द ) का साक्षात् व्यापार मुख्य वृत्ति कहा गया है। अर्थ के आरोप के बाद का ( व्यापार ) गौणो वृत्ति, क्योंकि बीच में उसका ( अर्थ का ) व्यवधान पड़ जाता है।

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प्रथमो विमर्शः

आशुभावादनालक्ष्यं किन्त्वर्थारोपमनन्तरा । लोको गोशब्द इत्यादौ शब्दारोपमवस्यति ॥ ५२ ॥

( ७ ) इतने पर भी लोग अतिशीघ्रता के कारण समझ न पड़ने वाले अर्थारोप के विना ‘गौशब्द’ इत्यादि स्थलों में शब्द का आरोप समझने लगते हैं ।

प्रधानेतरभावेनावस्थानादर्थशब्दयोः । समशौष्ठिक्यारोपौ न तयोरुपपद्यते ॥ ५३ ॥

( ८ ) शब्द और अर्थ दोनों की स्थिति प्राधान्य-अप्राधान्य के लिये रहती है इसलिये दोनों का एक समान आरोप सिद्ध नहीं हो सकता ।

आरोपविषये यत्र विशेषः सम्प्रतीयते । अर्थादारोपितात् तत्र गुणवृत्तिरुदाहृता ॥ ५४ ॥

( ९ ) वहाँ गुणवृत्ति मानी गई है, जहाँ आरोपित अर्थ से आरोप विषय ( अर्थ ) में अतिशय की प्रतीति होती है ।

गुणवृत्तौ तिरो भावत् सामग्र्रीषा निवन्धनम् । सैव लिङ्गतयास्माभिर्य्यवस्थेति पर प्रति ॥ ५५ ॥

( १० ) शब्दों की गुणवृत्ति में जितनी सामग्री कारणरूप से मानी गई हैं उसको हम अर्थान्तर के प्रति लिङ्गरूप से स्वीकार करते हैं ।

न हि तत् समयाभावाद्वाच्यं शब्दस्य कल्प्यते । प्रतीममानतायां च व्यक्तमस्यानुमेयता ॥ ५६ ॥

( ११ ) वह ( अर्थान्तर ) शब्द का वाच्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि ( उनमें उसकी ) शक्ति नहीं है । इसलिए इसकी प्रतीयमानता में अनुमेयता स्पष्ट ही है ।

तस्मात् स्वार्थातिरेकेण गतिनार्थान्तरे गिराम् । वाचकत्वाश्रयेणातो गुणवृत्तेरसम्भवः ॥ ५७ ॥

( १२ ) इसलिए—शब्द की पहुँच, वाचकत्व ( अभिधा ) मात्र का आश्रय होने से दूसरे अर्थों तक नहीं है, इसीलिए गुणवृत्ति ( शब्द में ) सम्भव नहीं ।

ततश्व—

भक्त्या विभर्ति चैकर्तव्यं रूपामेदादयं ध्वनि: । न च वाव्याप्त्यतिर्याप्त्योरभावाल्लक्ष्यते तयोः ॥ ५८ ॥

और इसीलिए—

( १३ ) ध्वनि नामक यह तत्व लक्षणा से अभिन्न सिद्ध होता है, क्योंकि स्वरूप का भेद नहीं है । और अव्याप्ति अतिव्याप्ति के अभाव से वह उसके ( लक्षणा ) द्वारा लक्षणित नहीं होती ऐसी बात नहीं ।

सुवर्णपुष्पामत्यादौ न वाव्याप्तिः प्रसज्यते । यतः पदार्थचाक्यार्थभेदात् भक्तिद्रियोदिता ॥ ५९ ॥

( १४ ) सुवर्णपुष्पाम्—इत्यादि में अव्याप्ति की प्राप्ति नहीं है, क्योंकि लक्षणा पदार्थ और वाक्यार्थ के भेद से दो प्रकार की कही गई है ।

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अतत्संस्तत्समारोपो भक्तेलक्षणमिष्यते । अथोऽन्तरप्रतीत्यर्थः प्रकारः सोऽपि शास्यते ॥ ६० ॥

रुढा ये विषयेऽनन्य शब्दाः स्वविषयादपि । लावण्याच्च प्रसक्तास्ते न भवन्ति पदं ध्वने: ? ॥ ६१ ॥

मुख्यां वृत्तिं परित्यज्य गुणवृत्त्यर्थदर्शनम् । यदुदिश्य फलं तत्र शब्दो नैव स्खलद्रति: ॥ ६२ ॥

वाचकत्वाश्रयेणैव गुणवृत्तिरसङ्गता । गमकत्वैकमूलस्य ध्वने: स्याद् विषयो न किम् ॥ ६३ ॥

नैकान्त्यैकमूलत्वमसिद्धेऽपि ध्वनेऽपि । गमकत्वाश्रयापेक्षो गुणकृत्तिस्तदाश्रय: ॥ ६४ ॥

समिद्धिमादय: शब्दा: प्रसिद्धा गुणवृत्तय: । ध्वने: पदादिवद्ग्रस्य येनोदाहरणीकृता ॥ ६५ ॥

तस्माद् उत्पत्तिशक्तिभ्यां निवृत्तो य: स्खलद्रति: । शब्दस्य सोऽपि विषयोऽनुमानविषयोऽन्यवत् ॥ ६६ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोका: ।

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विमर्शः: उद्धृत इकतीसवीं कारिकाओं द्वारा संगृहीत विषय का मूल आधार लक्षित करना है । ग्रन्थकार ने उसे गुणवृत्ति, भक्ति और उपचारवृत्ति-नाम से पुकारा है । पहले इन सभी शब्दों की व्युत्पत्ति पर ध्यान देना चाहिए । वस्तुतः ये सभी शब्द आनन्दवर्धन के प्रयुक्त शब्द हैं । आनन्द वर्धन ने 'काव्यस्पात्मा ध्वनिरिति' बुथैयैः समाम्नातपूर्वस्तस्याभावं जगडुरपरे भाक्त-माहुस्मन्ये' इस प्रथम उपस्थापना-कारिका में भाक्त शब्द का प्रयोग किया है । उसकी व्याख्या करते हुए उन्होंने वृत्ति लिखी है-'भाक्तमाहुस्मन्ये'-अन्ये तं ध्वनिसंघितं काव्यात्मानं गुणवृत्तिरित्याहुः । इससे स्पष्ट है कि वे लक्षणा को गुणवृत्ति मानते हैं । भक्तिपद में निहित ध्वनेः । इसी कारिका की वृत्ति में उन्होंने भक्ति को 'उपचरित शब्द वृत्ति' भी लिखा है-'यत्र हि वयधैयकृतं महत् सौष्ठवं नास्ति तत्राप्यनुरितसंवृत्या प्रसिद्धयनुरोधप्रवृत्तिन-व्यवहाराः कवयो दृश्यन्ते ।' अभिनवगुप्त ने आचार्य के इन सभी शब्दों की व्युत्पत्तिपूर्वंक व्याख्या की है ।

अभिनवगुप्त ने लिखा है 'भक्तिहिं लक्षणाव्यापारः' (१४ का लोचन चौ० सं० पृ० ५९) अर्थात्—लक्षणा व्यापार भक्ति है ।

भक्ति—उन्होंने भक्ति शब्द की चार प्रक्रियाओं से व्युत्पत्ति की है और उसे, १. मुख्यार्थ, २. वाच्य और लक्ष्य का सम्बन्ध, ३. लक्ष्यागत धर्म और ४. उन धर्मों की प्रतीति में श्रद्धानिश्रय—रूप चार अर्थों में अन्वित माना है । क्रम से एक-एक व्युत्पत्ति इस प्रकार हैं—

(१) मुख्यस्य चार्थस्य भजो भक्तिः ।

(२) भज्यते सेव्यते परार्थेन प्रसिद्धतया यत्रप्रेक्ष्यते इति भक्तिर्यर्मोऽभिधीयते सामीप्यादिः ।

(३) गुणसमुदायवृत्तेः शब्दस्यार्थभागस्य लक्षणयादिर्भक्तिः ।

(४) भक्तिः प्रतिपद्ये सामीप्य तैक्ष्णयादौ श्रद्धातिशयः, तां प्रयोजनत्वेनोदिहित्य तन्न आगतो भक्तिः ।

अर्थात् (१) मुख्य अर्थ का भजन ।

(२) मुख्यार्थ द्वारा उदयार्थ या प्रतीति के लिए तन्मित रूप से गृहीत सामीप्य आदि सम्बन्ध ।

(३) गौणीलक्षणा को पृथक् मानने वाले मीमांसकों के मत में कुन्ता: प्रविशन्ति आदि में तैक्ष्ण्य आदि गुण, तथा ।

(४) प्रयोजन रूप तैक्ष्ण्यादि विषय में श्रद्धातिशय—भक्ति:

इन चारों व्युत्पत्तियों द्वारा लोचनकार ने लक्षणा के तीन अंगों में भक्ति शब्द का समन्वय माना है पहली व्युत्पत्ति द्वारा मुख्यार्थवाच्य में, दूसरी और तीसरी द्वारा निमित्त में तथा चतुर्थै द्वारा प्रयोजन में । उनका वाक्य है—

''मुख्यस्यार्थस्य भक्तिरित्येवं मुख्यार्थवाचा, निमित्तं प्रयोजनमिति त्रयसन्न्रावा उपचार-वीजम्—इत्युक्तं भवति । १४ कारिका के लोचन में उक्त तथ्य और भी स्पष्ट हो गया है—त्रितय-सन्निधौ हि लक्षणा प्रवर्त्तते । तत्र मुख्यार्थवाचा तावत् प्रत्यक्षादिप्रमाणान्तरमूला । निमित्तं च यदभिधीयते सामीप्यादि, तदपि प्रमाणान्तरावगम्यमेव । यद्विदं घोस्यातिपवित्रत्वशीतलत्वसेव्य-त्वादिकं प्रयोजनमशब्दान्तरगम्यंव । यद्वोवां पराक्रमातिशयशालित्वं, तत्र शब्ददस्य न तावत् व्यापारः ।'

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व्यक्तिविवेक:

इसो सन्दर्भ में आगे चलकर लोचनकार ने लक्षणा का निष्कृष्ट लक्षण भी दिया है—

मुख्यार्थवाधादिसहकार्यपेक्षार्थप्रतिभासनशक्तिलक्षणाशक्ति: ।

गुणवृत्ति:—आनन्दवर्धनाचार्य ने लक्षणा अर्थ में गुणवृत्ति शब्द का प्रयोग प्रथम तथा तृतीय उद्योत में असकृत किया है । लोचन में उसकी व्युत्पत्ति भी उसी प्रकार जगह-जगह पर दी गई है ।

( १ ) गुणा: सामीप्याद्यो धर्मास्तैक्षण्यादयक्ष, तैरपायेर्वृत्तिरथांस्तरे यस्म, तैरपायैर्वृत्तिरस्तिरां ।

शब्दस्य यत्र स गुणवृत्ति: शब्दोऽर्थौ वा । गुणवदारेण वा वृत्तेन गुणवृत्तिमुख्योडभिधीयते । ( २१९ द्व. लोचन चौ. प्र. ३१. पृ० )

( २ ) मुख्यत्वे वाचकत्वम्, अन्यथा गुणवृत्ति: । गुणो निमित्तं साडृश्यादि तदुद्दारिका वृत्ति: ।

शब्दस्य व्यापारो गुणवृत्तिरिति भाव: । ( तृ० उ० प्र० ४२५ चौ० सं० )

( ३ ) गुणतया वृत्तिर्यांपरो गुणवृत्ति: । गुणेन निमित्तेन साडृश्यादिना च वृत्ति: अर्थान्तर-विषयेडपि शब्दस्य सामानाधिकरण्यमू । ( ४३० प्र० चौ० सं० वही )

इन उदाहरणों के आधार पर शब्द, अर्थ और अभिधा—तीनों पदार्थ में गुणवृत्ति शब्द का प्रयोग माना जाना चाहिए ।

उपचार:—आनन्दवर्धनाचार्य ने २।१४ वीं कारिका की वृत्ति में लिखा है—‘उपचारमात्रं तु भक्ति:' । लोचनकार ने उसकी अर्थ 'उपचारो गुणवृत्तिलक्षणा' किया है । और उपचार की व्याख्या करते हुए लिखा है—‘उपचरणमितिशयितो व्यवहार: ।' वलप्रिया टीका में लोचन के इस ग्रन्थांश का अभिप्राय इस प्रकार निकाला गया है—‘यस्मिन्नर्थे यस्य शब्दस्य व्यवहार: प्रसिद्ध:, तमति-लद्‌नय तत्सम्वद्‌धन्यस्मिन्नर्थे तस्य शब्दस्य व्यवहा रोदितिशयितो व्यवहार: ।' अर्थात्—जिस अर्थ में जिस शब्द का व्यवहार प्रसिद्ध हो, उसको लाँघकर उस अर्थ से सम्बन्धित दूसरे अर्थ में शब्द का व्यवहार = अतिशयित व्यवहार है । ( प्र० १४१-चौ० सं० )

ध्वनिवादी के अनुसार—

लक्षणा और ध्वनि में अन्तर—

महिमभट्ट का लक्षणाविवेचन ध्वनिकार के लक्षणाविवेचन का खण्डन है । इसलिए पहले खण्डनोय ( ध्वनिकार के ) लक्षणाविवेचन का स्वरूप जान लेना चाहिए । ध्वनिकार का लक्षणाविवेचन अपने आप में एक स्वतन्त्र विषय है । उसका पञ्चवन ध्वन्यान्तोलोक के प्रथम उद्योत में भी किया गया है और तृतीय में भी । प्रथम उद्योत और तृतीय उद्योत के सम्पूर्ण विवेचन का सार ग्रहण करके महिमभट्ट ने अपनी उक्त खण्डन कारिकाएँ लिखी हैं । उनमें कुछ कारिकाएँ ऐसी हैं जो ध्वनिकार की कारिकाओं का आंशिक परिवर्तन के साथ निषेधात्मक प्रतिक हैं । शेष में, तृतीय उद्योत के वृत्तिग्रन्थ में आए गद्यात्मक विवेचन का सार संक्षेप और उसका खण्डन है ।

प्रथम कारिका 'काव्यस्यात्मा ध्वनि:' में ध्वनि के अभाववाद के पश्चात् भक्ति में उसके अन्तर्भाव-वाद का उल्लेख—‘भाक्तमहस्तमतये' द्वारा किया और उसकी खण्डन प्रथम उद्योत की अन्तिम पाँच ( १४, १६-१९ ) कारिकाओं द्वारा किया—वे कारिकाएँ निम्नलिखित हैं—

भक्त्या विम्रत्ति नैकेन तु रूपभेदादयं ध्वनि: ।

अतिव्यासेरधान्यासो नैवासौ लक्ष्यते तया ॥ ५४

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(उत्सयन्तरेरणाश्रवयँ यत्तच्चारुत्वं प्रकाशयन्‌ । शब्द्रो व्यञ्जकतां विह्रद्रू ध्वनियुक्तत्वविषयौभवेत्‌ ॥ १११५ ॥)

रूढ़ा ये विषयेऽन्विताः शब्दाः स्वविषयादपि । लावण्याचाः प्रयुक्तास्ते न भवन्ति पदं ध्वने: ॥ १११६ ॥

मुख्यां वृत्ति परित्यज्य गुणवृत्त्यार्थदर्शनम्‌ । यदुदीर्यते फलं तत्र शब्दो नैव स्वलद्रुचति: ॥ १११७ ॥

वाचकत्वाश्रयेणैव गुणवृत्तिरव्यवस्थित । व्यञ्जकत्वैकमूलस्य ध्वने: स्याद्लक्षणं कथम्‌ ॥ १११८ ॥

कस्यचिद् ध्वनिमेदस्तस्य सा तु स्यादुपलक्षणम्‌ । लक्षणेऽन्ये: कृते चास्य पक्षसंसिद्धिरेव न: ॥ १११९ ॥

अभिनवगुप्ताचार्य ने लोचन में इन कारिकाओं का पूर्वपक्ष इस प्रकार उपस्थित किया है— भक्तिध्वनिनिश्चेऽति किं पर्यायवत्त्वादृश्यनम्‌ ? अथ पृथिवीतत्त्वमिव पृथिव्या अन्यतो व्यावर्तक- धर्मैरुपतया लक्षणम्‌ ? उत काच इव देवदत्तानुरूपस्य सम्भववमात्रादुपलक्षणगम्‌ ? (चौ० तं० १८० पृ०) । एक-एक पूर्वपक्ष के अनुसार उत्तरपक्ष इस प्रकार है—

(१) पू० प०—क्या भक्ति और ध्वनि का घट-कलश के समान (पर्याय जैसा) तादृश्य है ।

उ० प० = भक्ति और ध्वनि में तादृश्य नहीं हो सकता । क्योंकि उनके स्वरूप भिन्न हैं । (भक्त्या विम्रतिर्नैकत्वं रूपभेदादृश्य ध्वनि: ११८४) स्वरूपभेद वक्तव्ये हृद तृतीय उच्यते में आ० आचार्यं ने तीन प्रमुख तक दिये हैं—(१) गुणवृत्ति-अमुख्य व्यापार है और ध्वनि मुख्य व्यापार ।

(२) गुणवृत्ति अमुख्य वाचकत्व (अभिधा) ही का तो नाम है ? व्यञ्जकत्व वाचकत्व से अत्यन्त भिन्न है ।

(३) गुणवृत्ति में जब एक अर्थ दूसरे अर्थ का ज्ञान कराता है तो वह उसके स्वरूप में परिणत हो जाता है, किन्तु व्यञ्जना में अर्थान्तरप्रतीतिकाल में व्यञ्जकार्थ की प्रतीति भी 'पृथक्‌रूप से होती रहती है । (चौ० सं० पृ० ४३-२५) । इन प्रश्नोत्तरों का सारभूत अर्थ यह है—

'गङ्गायां घोष:' आदि उदाहरणों में प्रवाहार्थ—वाच्य है, वह घोषाधीकरण बनने में असनर्थ होने से अमुख्य हो जाता है । ऐसी स्थिति में दो अन्य अर्थों की प्रतीति होती है, एक तट आदि की ओर दूसरे प्रयोजन रूप तटादि शैत्य पावनत्व आदि की, इनमें द्वितीय अर्थ लक्षणा और तृतीय अर्थ व्यञ्जना द्वारा प्रतीत माना जाता है । लक्षणा से व्यञ्जना भिन्न मानी जाती है—इसीलिये कि गङ्गा पद से अभिधेय प्रतीत प्रवाह अर्थ लक्षणया प्रतीत तटार्थ से अभिन्न हो जाता है किन्तु व्यञ्जना से प्रतीत प्रयोजनभूत शैत्य आदि से नहीं । साथ ही अभिधा की प्रतीति पहले, लक्षणा की उसके बाद और व्यञ्जना की उन दोनों के बाद होती है । इस प्रकार इनमें कालकक्षाक्रम है । अभिन्न पदार्थ में कालकक्षा का कम नहीं होता, एक ही कक्षा रहती है ।'

(२) पू० प०—क्या भक्ति, ध्वनि का ध्वनीतर तत्त्वों से भिन्न लक्षण है, जैसे पृथिवीतव पृथिवी का ।

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मम्मट ने काव्यकारण के प्रतिपादन के पश्चात्—काव्य स्वरूप का निर्वचन करते हुए—जो अवतररणिका दी है उसमें लक्षण के स्थान पर स्वरूप शब्द का प्रयोग किया है—‘एव मस्मृ कारणमुक्त्वा स्वरूपमाह—‘तददोषौ...’। ( प्रथम प्रकाश-काव्यप्रकाश १म सूत्र )। काव्यप्रदीप कार ने काव्यप्रकाशकार की कारिकाओं पर अपनी स्वतन्त्र वृत्ति लिखते हुए स्वरूप शब्द की जगहह् लक्षण शब्द का ही प्रयोग किया है—एवं कारणमुक्त्वा काव्यस्य लक्षणमाह—तददोषौ०। वामनाचार्य ने बालबोधिनी में इसी आधार पर मम्मट की वृत्ति में आश्र स्वरूपशब्द की व्याख्या लक्षणपरक की—स्वं लक्षणपदार्थो लक्ष्यते इतरव्यावृत्ततया ज्ञायत इदनेति व्युत्पत्त्या स्वरूपं लक्षणमित्यर्थः। इतरभेदकामिति यावत्।’ पण्डितराज जगन्नाथ ने काव्यलक्षण की भूमिका में लक्षण को इतरभेदकृत्ति का साधन माना है—

‘तत्र...गुणलाघवारादिर्भिरनिरूपणीये तस्मिन् ( काव्ये ) विशेषतच्च्छेदकं तदितरभेदकृदृद्भौ साधनं च तल्लक्षणं तावद्रुप्यते। इस प्रकार आचार्य आनन्दवर्धन के लक्षण शब्द और उस पर अभिनवगुप्त के लोचन में आई व्याख्या—पश्चाद्दर्शितैराचार्यैः समानरूप से एक ही अर्थ में प्रचलित मिलती है। उसके आधार पर लक्षण का अर्थ एक ही सिद्ध होता है। आचार्य वाचस्पतिमिश्र के शब्दों में उसे निःसंकोच ‘समानासमानजातीयव्यवच्छेदो लक्षणम्’ ( सांख्यकारिका—७ ) कह सकते हैं। समझाने के लिए इस प्रकार सोचा जा सकता है कि जिस धर्म का नाम लक्षण है—जो अपने आश्रय को उससे मिलते-जुलते और एकदम विजातीय पदार्थों से अलग करके समझा सके। उदाहरण अभिनवगुप्ताचार्य ने प्राचीन भाषा में पृथिवी का पृथिवीत्व दिया है। नवीन भाषा में उसे गन्धवत्त्व या गन्ध कहा जाता है। न्याय-वैशेषिक दर्शनों का सिद्धान्त है कि गन्ध केवल पृथिवीमात्र में रहता है—अन्य द्रव्यों में नहीं। वह पृथिवी को उससे मिलते-जुलते ( द्रव्यत्व जाति वाले उसके अपने सजातीय ) द्रव्यों से भिन्न कर देता है और पदार्थैर्वेन—गुण, कर्म, सामान्य, समवाय, अभाव—इन विजातीय तत्त्वों से भी। अतः गन्ध को पृथिवी का लक्षण कहा जाता है। प्रकृत में शंका यह की जा रही है कि यदि ध्वनि को भाक्त कहा जाता है तो उसका ध्वनि से कौन सा सम्बन्ध माना जाता है। तादृश्य का खण्डन किया ही जा चुका है। उसके अतिरिक्त एक सम्बन्ध लक्षणलक्षणभाव है, यदि ध्वनि और भक्ति में यहीं लक्षणलक्षणभाव

उ० प०—तो वह भी युक्ति-संगत नहीं। कारण कि लक्षण वह पदार्थ होता है जिसकी व्याप्ति अपने आश्रय की प्रत्येक इकाई में हो और आश्रयव्यासि से आगे न बढा हो। गन्ध पृथिवी की वृक्ष, पुष्प, पल्लव आदि प्रत्येक इकाई में रहता है और उसकी व्याप्ति से आगे बढकर जल आदि इतर तत्त्वों में व्याप्त नहीं होता। भक्ति में ध्वनि के प्रति ये दोनों सोमाएँ नहीं देखी जातीं। भक्ति ध्वनि के प्रत्येक स्थल में व्याप्त नहीं मिलती और ऐसे स्थलों में भी देखी जाती है जहाँ ध्वनि का सर्वथा अभाव होता है। ‘वदति विसिनोपपत्रशयनम्’ इस प्रयोग में कमलपत्र की श्यारूपी जड पदार्थ में चेतना सुलभ वदन—( कण्ठतल्वाद्यभिघातजन्योचारण रूप व्यापार कं आश्रयता ) का कथन अभिधा का विषय नहीं, मुख्य अर्थ में बाध होने से भक्ति का ही विषय है। यहाँ ध्वनि का सर्वथा अभाव है। ध्वनि वहाँ होती है जहाँ व्यङ्गयार्थ में चारुत्वकृत् प्रथनन्तर रहती है। यहाँ वदति प्रयोग में जडगतवदेन चेतना-सुलभ व्यापार का प्रतिपादन जितना चमत्कारकारक् है, उतना उससे प्रकाशित व्यङ्गयार्थ नहीं। ऐसे ही अनेक उदाहरण मिलते। लावण्य भी उनमें से एक है। वह ‘हयता’ अर्थ में निरूढ है, किन्तु उसका व्युत्पत्तिजन्य अर्थ—‘लक्षणरसयुक्तत्व’ है। मुख्य अर्थ को छोड़कर अमुख्य अर्थ में लावण्य शब्द का प्रचार ‘गज्ञायां

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प्रथमो विमर्शः

घोषः' में तटादि अर्थ के लिये गङ्गाशाब्द के समान काठमप्रकाशकार के अनुसार प्रयोजनमात्र को छोड़कर भले ही मुख्यार्थबाध और मुख्यार्थयोग की अपेक्षा रख्खे । किन्तु अभिनवगुप्ताचार्य के अनुसार तो तीनों की ही अपेक्षा नहीं रखता । ऐसे स्थलों में प्रयोजन ही प्रधान है । ध्वनि का विषय माना जा सकता है किन्तु जहाँ तीसरे प्रयोजन की उपेक्षा कर दी गये, वहाँ ध्वनि का अभाव रहते हुए भी भक्ति का सद्भाव देखा जाता है । ऐसी स्थिति में भक्ति को ध्वनि का लक्षण कैसे कहा जा सकता है ।

इसके अतिरिक्त उन पदार्थों में भी लक्षणलक्षणभाव सम्बन्ध नहीं माना जा सकता, जो भिन्न-भिन्न स्थलों में रहते हों या जिनके कारण भिन्न हों। ध्वनि और भक्ति की यही स्थिति है । भक्ति वाचकलव्धरूप अभिधा पर आश्रित रहती है और ध्वनि व्यञ्जना पर । भक्ति ध्वनि के सर्वाङ्ग में नहीं पाई जाती । ध्वनि का एक भेद विवक्षितान्यपरवाच्य ध्वनि है । उसमें भक्ति का सर्वथा अभाव रहता है। इसलिए भक्ति ध्वनि का लक्षण नहीं हो सकती ।

अभिनवगुप्त ने—भक्ति के इस लक्षणवाद का सार इस प्रकार दिया है—

‘एवं यत्र यत्र भक्तिसतत्त्व तत्र ध्वनिरिरिति तावन्नास्ति । तेन यदि ध्वनेरमेक्तिललक्षणं तदा भक्ति-स्तत्रैव सर्वत्र ध्वनिलयवहारः स्यात् इत्थमित्यास्ति:। अभ्युपगम्यापि तु:--अवधू यत्र यत्र भक्ति-स्तत्र तत्त्व ध्वनिः—तथापि यदिष्यो लक्षणाच्यापारो न तदिष्यो ध्वनन-च्यापारः।न च भिन्नविषययो-र्ध्वनेःपृथक् लिमभावः, धर्म एव च लक्षणमित्युच्यते । तत्र लक्षणा तावदसुध्या वृत्तिः, लक्षगासामध्यभावात् न च प्रयोजनविषयम् । न च तदिष्योदपि द्वितीयो लक्षणाच्यापारो युक्तः, लक्षणगासामध्यभावान् एवमभिप्रायेणाहु अपि नेत्यादि ) मुख्यां वृत्तिममिधाच्यापारं परिगृय परिसमाप्य गुणवृत्या लक्षणरूपयार्थस्यामुख्यस्य दर्शयन् प्रतिपादयति, स यत्किलं कर्मेदृशं प्रयोजनमुखदृशं क्रियते, तत्र लक्षणा तावद् द्वितीयो व्यापारा: । न चासौ लक्षणैव, यतः सवलनित बाधकव्यापारेऽपि विधुररीक-

स्य शब्दस्य बाधकयोगः । तथाभावे तनापि निमित्तान्तरस्य प्रयोजनान्तरस्य चान्वेषणेनानवस्थातात् तेनायं लक्षणलक्षणाया न विधिः:।

अर्थात् = इस प्रकार ( ध्वनि और भक्ति के समन्वय में ) स्थिति ऐसी नहीं है कि जहाँ-जहाँ भक्ति हो वहाँ सर्वत्र ध्वनि भी हो ही । यदि भक्ति को ध्वनि का लक्षण माना जाय तो सभी भक्ति—स्थलों में ध्वनिव्यवहार होगा—जिससे अतिव्याप्ति दोष आयेगा ।

इस बात को मानकर भी हम कहते हैं—भले ही जहाँ-जहाँ भक्ति हो वहाँ सर्वत्र ध्वनि भी हो, किन्तु इतने पर भी लक्षणा ( भक्ति ) व्यापार का जो विषय है ध्वनि का वह नहीं । जिनके विषय भिन्न-भिन्न होते हैं उनमें धर्मीभभावसमन्वन्य नहीं बनता, और धर्म ही तो लक्षण माना जाता है । ध्वनि का विषय प्रयोजन है । प्रयोजन को भी लक्षणा का विषय नहीं माना जा सकता, क्योंकि उसमें लक्षणा की निष्पादक सामग्री नहीं है—( इसी अभिप्राय से कहते हैं—अभिचेत्यादि ) अभिधा—रूप जो मुख्य व्यापार है उसे एकदम समाप्त कर लक्षणारूप लक्षणाच्यापार द्वारा जो असुख्य अर्थ का ज्ञान है, वह जिस कमंबूत फल के उद्देश्य से किया जाता है—वह प्रयोजन किसी दूसरे ही व्यापार का विषय होता है । क्योंकि लक्षणा तो उस शब्द का व्यापार माना जाता है, बाधक-

योग से जिसकी अभिधान-राक्ति कुण्ठित हो जाती है, प्रयोजन का ज्ञान कराते हुए तो शब्द बाधक-योग नहीं रहता । ऐसा माना जाय तो उसके लिये ( ज्ञाः्यां घोषः ) इत्यादि लक्ष

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१३०

व्यक्तिविवेक:

स्थलों में गृहीत पद से लक्षणा द्वारा प्रतीत तट में प्रयोजन रूप से प्रतीत होने वाले शौत्यादि धर्मों में तट के ही समान लक्षणा मानी जाय तो उस लक्षणा के लिये भी नए कारण और नए प्रयोजनों की कल्पना आवश्यक होगी और इसी प्रकार पुनः उसके प्रयोजनों के लिये की जानेवाली लक्षणा के लिये भी इस प्रकार अनवस्था दोष होगा। इसलिए यह लक्षणलक्षणा का विषय नहीं है।

उक्त लोचनांश की अन्तिम पंक्ति 'तेनायं लक्षणलक्षणाया न विषय:' का अर्थ बालप्रियाकार ने 'तेन वाच्यवयोगाभावेन। अर्थात्-प्रयोजनरूपार्थ इत्यर्थ:' इस प्रकार किया है। पूज्यपाद श्री गुरुजी ने भी अपनी दिव्याज्ञा टिप्पणी में इसी प्रकार का 'तेनायमिति। तेन = स्वलद्रव्यति-तटभावेन। अर्थ = शक्त्यपावनल्वादिरूपप्रयोजनात्मकः, लक्षणलक्षणाया न विषयः = लक्षणलक्षणाप्रयोज्यविषयतावाच्य'—ऐसा अर्थ किया है। इन अर्थों से लोचन के प्रतिपाद्य विषय के उपक्रम और उपसंहार की संगति नहीं लगती। 'विषय का उपक्रम 'ध्वं यत्र यत्र भक्तितस्तत्र तत्र ध्वनिरिति तावद्रास्ति' इस प्रकार हुआ है। यदि उपसंहार में आए 'तेनायं लक्षणलक्षणाया न विषय' इति भावः' इस वाक्य का अर्थ—उक्त दोनों विवरणों के अनुसार 'प्रयोजन के प्रति शब्द कुशलित नहीं होता इसलिए प्रयोजन में लक्षणलक्षणा नहीं मानी जा सकती' ऐसा किया जाय तो स्पष्ट रूप से संदर्भ समासि में प्रतिपाद्य विषय का उल्लेख नहीं होता। यद्यपि प्रयोजन को व्याख्या का विषय माना जाता है इसलिए कर्थचित् ध्वनि का आक्षेप इस अर्थ में भी किया जा सकता है तथापि एक दूसरा दोष ऐसा आता है जिससे यह कल्पना भी नहीं की जा सकती। दोनों विद्वत्तियों में 'तेनायं०' में आए 'अयं' इस सर्वनाम का परामर्शी विषय प्रयोजन माना गया है। 'अयं' शब्द इदं शब्द का पुँल्लिङ्ग प्रथमा एकवचन का रूप है। प्रयोजन शब्द नपुंसक लिङ्ग है। संस्कृत भाषा की प्रकृति के अनुसार मित्त्र लिङ्ग-शब्द के लिए मिन्न लिङ्ग सर्वनाम का प्रयोग नहीं किया जा सकता। इस कठिनाई को दूर करने के लिए दोनों विद्वृत्तियों में प्रयोजन शब्द के आगे अर्थ में उससे अभिन्न एक एक शब्द जोड़ दिया गया है—बालप्रिया में 'प्रयोजन रूपार्थ' इस प्रकार 'अर्थ' शब्द और दिव्याज्ञा में 'प्रयोजनात्मक:' इस प्रकार 'आत्मा'। 'अर्थ जोर आत्मन' दोनों शब्द पुँल्लिङ्ग है अतः उनके अनुसार 'अयं' सर्वनाम की संगति हो जाती है, प्रयोजन के साथ पुँल्लिङ्ग शब्द का जोड़ना यह लोचन और मूलग्रन्थ से मेल नहीं खाता। मूलग्रन्थ में—'यदुदितस्य फलं तत्र शब्दो नैव स्वलद्रगति:' इस प्रकार 'फल' शब्द और लोचन में उसका अर्थ करते हुए 'सा यत् फलं कमभूत प्रयोजन-रूपमुदिय कियते' केवल प्रयोजन शब्द का प्रयोग किया गया है। फल और प्रयोजन दोनों ही नपुंसक लिङ्ग के शब्द हैं और उनके साथ ऐसा कोई शब्द भी नहीं जुड़ा है जो उनकी गणना पुँल्लिङ्ग में करा सके।

इसके अतिरिक्त एक जबरदस्त शंका होती है कि ध्वनि के शब्द वृत्तित्व के खण्डन में प्रयोजन की प्रतीति लक्षणा द्वारा मान लेने का जो पक्ष उठाया जाता है उसमें सभी आचार्यों ने केवल लक्षणा शब्द का प्रयोग किया है 'लक्षणालक्षण' का नहीं। काव्यप्रकाशकार ने लिखा है—

'यस्य प्रतीतिमाधायं लक्षणा समुपास्यते ।'( २।१४, १६ )

फले शब्दैक्यमेडेन न व्याख्यानात्रापरा किय ||

और इसकी वृत्ति में—प्रयोजनप्रतिपिपादविषयया यत्र 'लक्षणया' शब्द प्रयोगः । व्याख्या को अभिधा और लक्षणा से अतिरिक्त वृत्ति न मानने पर उन्होंने लिखा है—

( १ ) नामिधा समयाभावात्, ( २ ) हेत्वभावात्न लक्षणा । (२।१५) इसी प्रकार आगे भी उन्होंने केवल लक्षणा शब्द का प्रयोग किया है। यथा—

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प्रथमो विसर्गः

लक्ष्यं न मुख्यं नाप्यत्र बाधो योगः फलेन नो । न प्रयोजनमेतदस्मिन्न च शब्दः स्वलद्रवति: ॥ १२७ नापि प्रयोजने लक्ष्ये किंचित् प्रयोजनम् । नापि गडादिशब्दस्स्तटमिव प्रयोजनं प्रतिपादयितुमस्मर्थः ॥

'एवमप्यनवस्था स्याद् या मूलक्षयकारिणी' ( २-१२७ पू० ) एवमपि प्रयोजने चेत्क्षप्ते तत् प्रयोजनान्तरेणेति तदपि प्रयोजनान्तरेणेति प्रकृताप्रतीतितिक्रद अनवस्था भवेत् ।

विशिष्टे लक्षणा तत् किं व्यत्कानयेत्स्याह— प्रयोजनेन सहितं लक्षणीयं न युज्यते । ( २।१७ उ० )

तत्र इत्याह— ज्ञानस्य विषयो ध्यातन्य: फलमन्यदुदाहततम् । विशिष्टे लक्षणा नैवं विशेषा: स्फुट्ट लक्षिते ॥ ( २।८ )

तटादौ ये विशेषा: पावनत्वादयस्ते चाभिधातात्परयल्लक्षणास्यो व्याख्यातान्तरेण गम्याः ? स्पष्ट है काव्यप्रकाश का यह पूरा सन्दर्भ 'ध्वन्यालोक' और 'लोचन' से यक्षरशः सम्बन्धित है । किन्तु इसमें कहों भी 'लक्षणलक्षणा' शब्द का प्रयोग नहीं है । केवल 'लक्षणा' का प्रयोग मिलता है । काव्यप्रकाश की टीकाओं में इस प्रसङ्ग में केवल लक्षणा का ही प्रयोग है । रसगङ्गाधर में भी 'लक्षणलक्षणा' शब्द का प्रयोग इस प्रसङ्ग में नहीं मिलता ।

लक्षणा के स्वतन्त्र प्रकार में लक्षणालक्षणा लक्षितलक्षणा प्रयोग मिलते हैं । लक्षणगलक्षणा 'गङ्गायां घोष:' आदि स्थलों में मानी जाती है । काव्यप्रकाश में लक्षणा का वर्गीकरण करते हुए शुद्धावर्ग के दो भेद किए गए हैं—उपादानं लक्षणं चेत्युक्ता शुद्धैव सा द्विधा । ( २।१० )

इसमें 'लक्षण' नाम से कथित शुद्धालक्षणा का—'गङ्गायां घोष:' इत्यत्र तटस्य घोषाद्यधिकरणगत- प्रकार विवेचन किया गया है ।

वामनाचार्य ने बालबोधिनी में इस वृत्ति का आशय स्पष्ट करते हुए लक्षणलक्षणा का स्पष्ट उल्लेख किया है— लक्षणेन स्वार्थसमर्पणेन ( उपलक्षित ) एषा लक्षणा लक्षणलक्षणेत्यर्थ: ॥

( इस प्रकरण में अधिक ग्रन्थों के प्रमाणों की आवश्यक्ता नहीं, ) इन प्रकरणों के आधार पर लक्षणलक्षणा का सार इतना ही है कि—इसमें लक्षण का अपना अर्थ लक्षण रूप में सर्वोत्कृष्ट बदल जाता है । गङ्गायां घोष: जो इसका उदाहरण दिया गया है उसे स्पष्ट है कि गङ्गा का तट रूप में सर्वोत्कृष्टना विलय हो जाता है । यद्यपि द्वैत्य पाञ्चनतादि की प्रतीति के लिए तट की प्रतीति तटतयेन न मानकर गङ्गात्वेन मानि जाती है, तथापि उस गङ्गात्व का अर्थ प्रवाह नहीं रहता ।

जहाँ तक ध्वनि प्रकरण का सम्बन्ध है—लक्षणलक्षणा का यह स्वरूप उसमें सार्वत्रिक रूप से संगत नहीं होता । ध्वनि के जो भेद लक्षणा पर आश्रित रहते हैं उनमें अतिशयोक्ति मूल ध्वनि भादि भी गिने जाते हैं । अतिशयोक्ति में लक्षणलक्षणा का अस्तित्व नहीं माना जाता । इसी प्रकार अर्थान्तरसंक्रमित वाच्य ध्वनि में भी लक्षणलक्षणा नहीं होती । उपादान लक्षणा होती है । यदि ध्वनिकार का 'अतिशयासंस्थास्थ्यैरेर्न चासौ लक्ष्यते तया' कारिका द्वारा लक्षणलक्षणामात्रमें ध्वनि के लक्षणत्व की शंका की जाय तो उक्त अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि तथा अतिशयोक्तिमूलक ध्वनि का लक्षणा में अन्तर्भाव—चौका का विषय ही नहीं बन सकेगा । फलतः लक्षणवाद एकदेशीय सिद्ध

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व्यक्तिविवेक:

होगा। इस प्रकार लोचनकार ने ‘लक्षणलक्षणया न विपयः’ इस वाक्य में जो लक्षणलक्षणा शब्द का प्रयोग किया है, उसका अर्थ प्रसङ्गानुरूप दूसरा ही लगाना होगा। यद्यपि दिन्याज्जना—में लोचन के लक्षणलक्षणा शब्द का वही अर्थ माना गया है जो काव्यप्रकाश में बतलाया गया है—अर्थात्—‘गण्नायां घोषः’ इत्यादि लक्षणार्थस्य शाक्यार्थोसवलितत्वेन उपादानलक्षणया अभावात् तीरादौ लक्षणलक्षणया सापि तत्रैव न शैत्यादौ—हेतोरभावादिति तात्पर्यम्।

उक्त कठिनाइयों की निवारण के लिये—हम ‘तेनायं लक्षणलक्षणाया न विषयः’ में अन्य शब्द को ध्वनि का परामर्श मानते हैं और लक्षणलक्षणा को ‘ध्वनिलक्षण रूप से ‘अतिव्याप्तेर्नचासौ लक्ष्यते तथा’ इस कारिका में मानी गईं ‘लक्षणा’ इस अर्थ में प्रयुक्त मानते हैं।

फलतः उपक्रम के अनुरूप उपसंहार, पुंलिङ्ग द्वारा पुंलिङ्ग पदार्थ का परामर्श और ध्वनि में केवल ‘लक्षणलक्षणा रूप’ एकदेशीय लक्षणा की रद्दा तीनों का निराकरण हो जाता है।

पूर्व-पक्ष—अथवा भक्ति ‘ध्वनि’ का उपलक्षण हो सकती है जैसे काव्य देवदत्त के घर का। आचार्यगण वस्तुविवेचन में दो शब्दों का प्रयोग करते हैं—लक्षण और उपलक्षण। इनमें लक्षण शब्द की उद्दृृत निरुक्ति के अनुसार वह वस्तु का असाधारण धर्म का वाचक शब्द है। उपनिषद् और उपवास शब्दों के समान यहाँ भी ‘लक्षण’ का अर्थ सामान्य है। उसके योग से लक्षण शब्द का अर्थ—लक्षण के समीप हुआ। ‘अर्हिसां गौँधी बुद्ध के समीप पहुँच जाते हैं’ आदि वाक्यों के समान, यहाँ ‘के समीप’ शब्द का अर्थ तुल्य किया जायगा। अर्थात् लक्षण जैसा।’ इसमें लक्षण उपमान और उपलक्षण उपमेय हुआ। उपमान उपमेय की अपेक्षा साधारण धर्मसम्पत्ति में वीस माना जाता है और उपमेय उत्तीस। लक्षण और उपलक्षण का मादृश्य जिस धर्म पर अवलम्बित है, वह एकमात्र ‘वस्तुपरिच्छेदकरत्व’ ही है। अर्थात् लक्षण भी वस्तु का तटद्र्व से परिच्छेद कराता है और उपलक्षण भी। अन्तर इतना ही है कि लक्षण लक्ष्य की असाधारणता और उसके विशिष्ट व्यक्तित्व का सार्वंदिक परिच्छेद कराता रहता है। उपलक्षण लक्ष्य के बाह्य परिवेश मात्र का परिच्छेद कराता है, वह भी सदैव नहीं। पृथिवी का धन और गृहविशेष का काक—ये लक्षण और उपलक्षण की उत्त कसौटियों से तौले जा सकते हैं। प्रकृत में ध्वनिवादी का प्रश्न है कि जो ध्वनि को भक्त मानते हैं वे उसके साथ भक्ति का कौन सा सम्बन्ध जोड़ते हैं—तादात्म्य और लक्षणलक्षणभाव को तो निराकरण किया जा चुका है—इनके अतिरिक्त एक उपलक्षण उपलक्षणभाव नामक सम्बन्ध और है, कदाचित् उससे ध्वनि को भक्ति कहा जाय ? किन्तु ध्वनि के साथ भक्ति का वह सम्बन्ध भी नहीं जुड़ता। उसमें भी अन्यायति दोष आता है। कारण कि भक्ति, ध्वनि के सभी स्थलों में नहीं रहती। उसके किसी किसी स्थल में—रहने पर भी सर्वोत्तम ध्वनितत्व का परिच्छेद नहीं होता। अतः वह भी अमान्य है (कस्यचिद् ध्वनिविमेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम्)। लोचनकार ने ध्वनिविकार की (कस्यचिद् ध्वनिविमेदस्य सा तु स्यादुपलक्षणम्) कारिका की अवतरणिका में इस तृतीय पक्ष का स्पष्टीकरण इस प्रकार किया है—‘नतु मा भूद् ध्वनिरिति भक्तिरिति चैकं रूपम्। मा च भूद् भक्तिध्वने-र्लक्षणम्। उपलक्षणं तु भविष्यति, यत्र ध्वनिरभिव्यक्त, तत् भक्तिरुपलक्ष्यते ध्वनि।’ अर्थात्—ध्वनि और भक्ति भले ही एक रूप (अभिन्न) न हों, और भले ही भक्ति ध्वनि का लक्षण न बन सके, किन्तु उपलक्षण तो हो सकती है। जहाँ ध्वनि होते हैं वहीं भक्ति भी, अतः ध्वनि भक्ति से उपलक्षित हो सकती है।’

इस पर स्वयं लोचनकार का उत्तर है—‘न तावदेतद् सर्वत्रास्ति, इतता च किं परस्य सिद्धम्, वा नस्विटितम्—इति तदाह—कस्यचिद् इति। अर्थात्—उक्त स्थिति सर्वत्र नहीं होती।

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इसलिये इतने से भी ( किसी एक स्थान में भक्ति और ध्यान के यौगपद्य से भी ) प्रतिवादी का वनता और हमारा ( वादी ) का बिगड़ता हो क्या है ।

अनुमितिवादी का उत्तर—व्यक्तिवादी के उक्त सिद्धान्त की मीमांसा अनुमितिवादी ने अपने स्वतन्त्र ओर मौलिक विचारों द्वारा की है । लक्षणा को शब्दवृत्ति माना जाय अथवा नहों—इस प्रश्न पर उस ( अनुमितिवादी ) का कथन है कि वस्तुतः शब्द अपने वाच्य अर्थ तक ही सीमित रहता है । उसका यह सिद्धान्त दूसरे दर्जों से भी पुष्टि पाता है । अभिधा के विषय में कहा जाता है — ‘विशेष्यं नाम्ना गृहीत्वा क्षीणशक्तिविशेषणैः’ अर्थात् अभिधा विशेषण का ज्ञान कराकर शान्त हो जाती है अतः विशेष्य का भी ज्ञान उसी से नहीं माना जा सकता ।

उसके शान्त हो जाने में तर्कों का यह सिद्धान्त काम करता है—‘शब्दबुद्धिकर्म्मणां विरम्य व्यापाराभावः ।’ अर्थात् शब्द, ज्ञान और क्रिया—विरत हो जाने पर पुनः (कार्यान्तर के लिये उद्बुद्ध नहीं होते) । अभिधा एक क्रिया ( व्यापार ) हैं । जिस प्रकार वह ( अभिधा ) एक बार विरत हो जाने पर पुनः कार्यान्तर के लिये जागृत नहीं हो सकती ठीक वैसे ही उसका आश्रय शब्द भी एक बार अभिधा को उसके अर्थ की ओर विदा देकर विरत हो जाता है । शब्द को संस्कार रूप से स्थिर मानकर उसी से पुनः किसी शक्ति द्वारा अर्थ ज्ञान कराने की बात इस लिये असंगत है कि उससे प्रवृत्तियों के प्रति अर्थज्ञान की कारणता पर चोट आती है ।

शब्द और अर्थ दोनों यदि अभिन्न माने जाते हैं और ज्ञान के प्रति सर्वत्र शब्द को ही कारण माना जाता है तो फिर अन्य प्रमाणों का उच्च्छेद होता है । वहाँ ज्ञान के प्रति अर्थ कारण होता है शब्द नहीं । यद्यपि वह अर्थ शब्दानुवेध से शून्य नहीं रहता । यह भी आवश्यक नहीं है कि ज्ञान उसी अर्थ से हो जो अपने वास्तविक आकार में अवस्थित हो, ज्ञान अर्थ अथवा अर्थज्ञान से भी होता है, भले ही अर्थउपस्थित हो या नहीं ।

वस्तुतः शब्दवृत्ति नाम की कोई चीज मानी नहीं जा सकती । शब्द जड़ है । उसमें किसी व्यापार की सत्ता नहीं देखी जाती । वह केवल दोपक के समान अन्तःकरणवृत्ति का कारण बनता है । इस प्रकार वृत्ति, व्यापार या ऐसी जो भी वस्तु है वह अन्तःकरण में रहती है । उसका उद्बोध ज्ञात शब्द और उसके साथ पदार्थ सम्बन्ध से होता है ।

‘विषं भक्षय मा चास्य गृहे मुख्या’ इत्यादावपि यदेतद् विषभक्षणानुज्ञानं तदर्थप्रकरणादिस्वरूपं त्वमनुमापयति । न ह्यनुमन्तः सुहृदादौ हितकामः सन्नपि भोजननिषेधं विदधानः अकस्माद् विषभक्षणमनुजानातीयत्यवगतवक्तृप्रकरणादिस्वरूपः प्रतिपत्तुा विषभक्षणानुज्ञानादेव तद्गृहमोजनस्यात्यन्तमकरणीयत्वमतुमाति ।

विषभक्षणानुज्ञानादेवंकीयार्थस्यैाप्रस्तुतत्वयैवोपन्यासो हि पूर्वोक्तेन नये प्रस्तुतातिरिक्तार्थान्तरप्रतिपादनपरत्वात् तत् हेतुतयाsद्वगन्तव्य इति न शब्दस्य तत् व्यापारः परिकल्पनीयः ।

विषभक्षणादिपरामेतद्गृहमोजनस्य दारुणताम् । वाच्यादतोडप्यमिमते प्रकरणवक्तृस्वरूपज्ञाः ॥ ६७ ॥

विषभक्षणमनुमुते न हि कश्चिदकाण्ड एव सुहृदि सुधीः । तेनात्रार्थान्तरगतिरार्थी तात्पर्यशक्तिजा न पुनः ॥ ६८ ॥

इति सङ्ग्रहायै ।

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व्यक्तिविवेक:

'जहर खा ले पर इसके घर मत खा' इत्यादि में भी जो यह जहर खाने की सम्मति है वह अर्थ और प्रकरण आदि की सहायता से अस्य इस इदं शब्द द्वारा प्रतीत व्यक्ति के घर किए जाने वाले भोजन नो उससे ( जहर से ) भी अधिक दारुणपरिणामता का अनुमान कराता है ।

ऐसा तो सम्भव नहीं कि जो 'उन्मत्त न हो वड अपने जन का हितेच्छु होते हुए कहैं उसके भोजन का निषेध करता हुआ बिना किसी कारण के एकाएक जहर खाने की सम्मति देने लगे । वक्ता और प्रकरण आदि के ऐसे स्वरूप के जानकार व्यक्ति को चाहिए कि वह जहर खाने की सलाह देने से ही यह अनुमान करे कि उस ( व्यक्ति विशेष ) के घर का भोजन किसी भी स्थिति में करने योग्य नहीं है। यद्यपि विषभक्षण की सम्मति—आदि वाक्यार्थ प्रस्तुत नहीं है तथापि उसका उद्धेश्य कहा गया है अतः पूर्वोक्त पद्धति से किसी अन्य अर्थ की प्रतीति कराना है, इसलिए उसे उस दूसरे अर्थ की अनुमिति में हेतु माना जाना चाहिए और इसलिए उसकी अनुमिति में शब्द के किसी व्यापार ( शक्ति ) की करपना नहीं की जानी चाहिए ।

विषभक्षणादपि परामर्श... और 'विषभक्षणमनुमनुते'... इन दो आर्याओं में उक्त अर्थ का संग्रह हो जाता है— ( उनका अर्थ )

( १ ) इसलिए प्रकरण और वक्ता के स्वरूप से परिचित व्यक्ति वाच्य अर्थ ( को हेतु बनाकर उस ) के द्वारा अस्य इस इदं शब्द से कहे गए व्यक्ति के घर के भोजन की विष से भी अधिक दारुणता का अनुमान करते हैं ।

( २ ) अपने किसी भाई बन्ध पर हितबुद्धि रखने वाला कोई भी व्यक्ति जहर खाने की सलाह नहीं देता इसलिए यहाँ दूसरे अर्थ की प्रतीति होती है, किंतु वह अर्थशक्ति द्वारा, तात्पर्य शक्ति द्वारा नहीं ।

विमर्शः : प्रस्तुत ग्रन्थांश साहित्यशास्त्र की एक परम्परागत विचार-शैली पर आश्रित है । उसके अनुसार अर्थ की प्रतीति में पूर्वापर भाव द्वारा एक क्रम की कल्पना की गई है । उसमें पहले अभिधा, उसके पश्चात् तात्पर्य शक्ति और तत्पश्चात् लक्षणा को स्थान दिया गया है । व्यञ्जना मानने वाले उसे लक्षणासे भी परे की कक्षा में रखते हैं । इस क्रम का प्रतिपादन अभिनवगुप्त और ध्वनिक—इन दो आचार्यों ने किया है । अभिनवगुप्त ने लोचन में लिखा है—

तयो ह्यत्र व्यापारः संवेद्यते—पदार्थेषु सामान्यात्मसु अभिधाव्यापारः;... 'विशेषरूपे वाक्यार्थे तात्पर्यशक्ति: परस्परान्विते,... 'सिंहो मानुषक' इत्यत्र तु द्वितीयाक्ष्यानिविशिष्टतात्पर्यशक्तिसम-पितान्वयबाधकसमुल्लासानन्तरमभिधातात्पर्यशक्तिद्वयातिरिक्ता तावत् तृतीया शक्ति: तद्व्याधकवि-धुरीकरणानुप्राणिता लक्षणाभिधाना समुल्लसति ।'

अर्थात् व्यापार ( शब्द-शक्ति ) तीन होते हैं । पदार्थ सामान्यस्वरूप ( परस्पर सम्बन्ध से रहित ) होते हैं उनमें अभिधा, एक दूसरे से परस्पर—सम्बन्धित विशेष स्वरूप के पदार्थों में तात्पर्य शक्ति और 'सिंह है यह वच्चा' आदि स्थलों मे—दूसरों कक्षा में आईं तात्पर्य शक्ति द्वारा बतलाए गए पदार्थ सम्बन्ध ( सिंह और बच्चे के बीच अभेद ) में बाधा उपस्थित होने पर अभिधा और तात्पर्य शक्ति से भिन्न एक तीसरी शक्ति लक्षणा होती है, जो उस बाधा को हटाने के काम में आती है । इस कल्पन का फल व्यञ्जना को इन तीनों से पृथक् शक्ति मानना था ।

अभिनवगुप्त ने वह भी स्पष्ट लिखा—

... 'तस्मात् अभिधातात्पर्यलक्षणाव्यतिरिक्तः चतुर्थोंडसौ व्यापारो ध्वननद्योतनव्यञ्जनप्रत्या-यनावगमनादिसोदररप्यपदेशिनिरूपितोडस्युपगन्तव्यः—वे उसे चतुर्थ कक्षा में आई मानते हैं—

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‘चतुर्थ्यौ तु कक्ष्यां ध्वनन व्यापारः’ । शब्दशक्ति की इस कक्षाकल्पना में लक्ष्य को तृतीय कक्षा और व्यञ्जना को चतुर्थ कक्षा में सिद्ध करने के लिये अभिनवगुप्त ने ‘सिद्धो मागधकः’ यह उदाहरण दिया था, किन्तु धनिक ने—वही उदाहरण दिया है जो प्रस्तुत प्रसङ्ग में मम्मटभट्ट ने अपनाया है—‘विषं भुङ्क्ष्व, मा चास्य गृहे सुखथाः’ । साथ ही उन्होंने अभिनवगुप्त द्वारा उपपादित उक्त सभी बातों का इस प्रसङ्ग में सङ्केत किया है । किन्तु अन्त में सिद्धान्त रूप से उन्होंने ऐसे दूरस्थ अर्थ की प्रतीति में ‘तात्पर्यशक्ति’ को ही कारण मानकर व्यञ्जना का उसी तात्पर्य शक्ति में अन्तर्भाव दिखलाया है । उनका कहना है—

तात्पर्यानतिरेकाच्च व्यञ्जकत्वस्य, न ध्वनिः ।

अथांत जिसको व्यञ्जकताव्यापार कहा जाता है वह तात्पर्य से अतिरिक्त कुछ नहीं है, इसलिये ध्वनि नाम का कोई पृथक् व्यापार सम्भव नहीं ।

इस पर वे ध्वनिवादी की ओर से शंका उपस्थित करते हैं—

किसुचं स्यादश्रुतार्थतात्पर्यैदन्योक्तिरुपपद्यते । विषं भक्ष्य, पूर्वों यरचैनं परसुतादिप्रसङ्गते,

अथांत—तात्पर्यशक्ति को ही सब कुछ मान लेने पर पुत्रादि से कहे गये ‘विषं भक्ष्य’ आदि अन्योक्ति स्वरूप वाक्यों में, तथा ‘पूर्वों यरचैनं’ आदि सापेक्ष वाक्यों में केवल तात्पर्य मानने वाला कहेगा जहाँ ‘मा भक्षय’ और ‘परो न धावति’ आदि तात्पर्यभूत अर्थ का अपने शब्द द्वारा अभिधान नहीं है ।

इस शंका के बाद ध्वनिवादी अपना सिद्धान्त उपस्थित करता है—

प्रभानतश्च ध्वनितवं केनवार्यतेऽन स्थलों में दूसरे अर्थ—जिस शक्ति से प्रतीत होते हैं वह व्यञ्जकतरूप व्यञ्जना ही है, और उससे प्रतीत विष मत खाओ तथा ‘वाद वाला नहीं दौड़ता’ इत्यादि अर्थ ही प्रधान हैं । इसलिए ‘यत्रार्थः शब्दो वा तमर्थ’••नियम के अनुसार वहाँ ध्वनि व्यापार भी हो सकता है ! अपने निर्णय के पश्चात् ध्वनिवादी ने तात्पर्यवृत्ति और व्यञ्जना का विषय विभाग भी किया—

‘ध्वनिक्षेत्रे स्वार्थविश्रान्तं वाक्यं अर्थान्तराश्रयम् ।

तात्पर्यं त्वविश्रान्ततौ ।

अथांत—किसी अन्य अर्थ की प्रतीति के लिये कहे गये वाक्य के क्रिया कारक सम्बन्ध से प्रतीत अपने अर्थ में यदि कोई बाधा न हो तो वहाँ ‘अन्य अर्थ की प्रतीति के लिये व्यञ्जना व्यापार मानना चाहिए और यदि वही अन्य अर्थ प्रधान हो तो उसे ध्वनि भी कहना चाहिए, इसके अतिरिक्त जिन स्थानों में वाक्य का अपना मूल अर्थ ही ठीक से न बैठ रहा हो वहाँ तात्पर्यवृत्ति मान लेनी चाहिए ।

ध्वनिवादी की इस व्यवस्था पर तात्पर्यवृत्तिनिराकारी—खण्डनात्मक उत्तर आरम्भ करते हुए कहता है—

••?तत्र, विश्रान्त्यसम्भवात् ।

एतावत्प्र विश्रान्तिरसतत्पर्यास्येति किं कुतः ।

यावत्कार्यप्रसारित्वाच्च तात्पर्य न तुलादृशतम् ।

अर्थात्—ध्वनि और तात्पर्यवृत्ति का यह विषय विभाग मान्य नहीं—क्योंकि उन वाक्यों का अपना मूल अर्थ कभी अपने आप में ठहर कर नहीं रह सकता जो किसी अन्य अर्थ की प्रतीति के

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व्यक्तिविवेक:

लिये कहे गये हों। तात्पर्यवृत्ति को तराजू पर तौलकर किसी नियत स्थान तक सीमित नहीं किया जा सकता, उसकी गति तब तक अखण्ड रहती है जब तक वाक्य प्रयोग का पूरा प्रयोजन सिद्ध न हो जाय।

इस प्रकार तात्पर्यवृत्ति के 'यावत्कार्यप्रसारित' सिद्धान्त की स्थापना की गई। धननिवादों इससे भी आगे कहता है।

भ्रमध्वान्तविध्वंस्मिति अभिकृतास्पदे ।

निव्यापारवृत्तिकथं वाक्यं निषेधमुपस्पृशेत् ? ॥

अर्थात् यदि ऐसी बात है तो 'भ्रम ध्वान्त विध्वंसः स सुनकोट्या मारितस्तेन', वाक्य में जहाँ भ्रमण का विधान प्रतोत होता है, और कोई बाधक तत्त्व शब्द से कहा नहीं गया है वहाँ उसकी ही निषेध तक प्रवृत्ति कैसे मान ली जाय। अर्थात् वाक्य की अपनी प्रवृत्ति उसके पदों द्वारा कथित पदार्थों के सम्बन्ध तक होती है, वह जब तक पूर्ण नहीं होता तब तक वाक्य की शक्ति काम करती रहती है। भ्रम धार्मिक स्थल में भ्रमण विधि तक ही पदार्थ सम्बन्ध पूर्ण हो जाता है, अतः उससे आगे निषेधार्थ तक वाक्य की शक्ति काम नहीं कर सकती। इस पर तात्पर्यवृत्तिवादों का कहना है—

प्रतिपाद्यस्य विश्रान्तिरन्तरपेक्षापूरणाद् यदि ।

वक्तृविवक्षितताप्रसरेरिविश्रान्तिरन्तनंवा कथमु ॥

अर्थात् जिस अर्थ के प्रतिपादन के लिए वाक्य का प्रयोग किया जाता है यदि क्रिया कारक-संसरगों की यथावत् पूर्ति हो जाने से एक ओर उसे पूर्ण माना जा सकता है—तो ठीक उसके विरुद्ध वक्ता के अभीष्ट अर्थ की प्रतोति न होने से दूसरी ओर उसे अपूर्ण भी माना ही जा सकता है।

'तात्पर्यवृत्तिवादी' अपने द्वितीय पक्ष को ही दृढ़ और मान्य सिद्ध करने के लिए अन्तिम एक तकं और देता है—

पौरुषेयस्य वाक्यस्य विवक्षामुपरतन्तता । वक्त्रभिप्रेततात्पर्यैमितः काव्यस्य यद्यते ॥

अर्थात् वस्तुतः क्रियाकारकसंसरगों की पूर्णता पर वाक्य की विश्रान्ति अपौरुषेय वाक्यों में मान्य जा सकती है, जहाँ केवल वाक्य को देखकर अर्थ की करणना की जाती है, वाक्य की स्थिति उससे भिन्न होती है। काव्य पौरुषेय होता है। उनके वाक्यों का प्रयोग कवि की मनोनिहित वस्तु को प्रकट करने की इच्छा से होता है, इसलिए जब तक उसका अभीष्ट ( उसकी उस इच्छा का विषयीभूत ) अर्थ प्रतोत नहीं हो जाता तब तक उसे विश्रान्त या अपने क्रियाकारक संसर्गात्मक वाक्यार्थ में सीमित नहीं माना जा सकता।

इस प्रकार धनिकाचार्य ने अपने काव्यनिर्णय को उद्धृत सात कारिकाओं द्वारा दर्शारूपक की अवलोक टीका में व्याख्या का खण्डन और तात्पर्यवृत्ति की स्थापना की। इस मान्यता के अनुसार 'विषं भक्षय' वाक्य—यदि उसका प्रयोग अपने प्रियजन के लिए हितैषी व्यक्ति ने किया हो, तो 'विष खाले' इतने ही अर्थ तक सीमित नहीं रहेगा अपितु 'मत खा' इस वक्ता के अभीष्ट अर्थ की प्रतीति तक ( व्यापार ) काम करता रहेगा।

यदि धनिक के इस मत को इसी रूप में स्वीकार कर लिया जाय तो ध्वनि या व्यञ्जना वृत्ति का तात्पर्यवृत्ति में अन्तर्भाव मानना होगा और तात्पर्य वृत्ति को शब्दशक्ति स्वीकार करना होगा। किन्तु ऐसा होने पर महिमभट्ट के 'शब्दस्यैकाभिधा शक्ति:' पर आँच आएगी।

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प्रथमो विमर्शः

इसलिए वे तात्पर्य वृत्ति को भी शब्द शक्ति न मानकर उसे भी अनुमान में गतार्थ दिखलाते हैं ।

‘विपं भक्षय’ इस वाक्य का वक्ता कोई ऐसा व्यक्ति है जो जिससे यह वाक्य कहा जा रहा है उसका हितैषी है । उसने इस प्रकार ‘विपं भक्षय’ इस वाक्य के द्वारा—व्यक्ति विशेष के यहाँ किञ्चित् जानने वाले भोजन में विष से भी अधिक हानि प्रदत्ता का अनुमान कर लेगा ।

दूसरे के यहाँ का भोजन विष से भी अधिक दु:खदायी है, क्योंकि उसके निपेष के ळिप्त एक दुःखदायी न होता तो हितैषी व्यक्ति ने अपने प्रियजन यो जहर तक खाना अच्छा बतलाया है । यदि भोजन वैँचा हितैषी व्यक्ति अपने प्रियजन को जहर खाने की सलाह न देना !’ इस प्रकार और—संस्कृत में—

एतद्‌गृहूभोजनम्, विषाद्‌धिकटष्टपरिणामि, हितेच्छुकृत्‌क्‌प्रियजनो हि यत्‌क्‌विषभक्षणाम्‌भनुमत्‌दर्शयति, यत्‌नेवं तन्‌नेवम् ।

इस प्रकार अनुमान द्वारा भोजन विशेष में विष से भी अधिक अभक्ष्यनीयता की प्रतीति हो जाने पर विष भक्षण और भोजन विशेष—दोनों ही अपने आप में शून्य निद्ध हो जाते हैं और तब शब्द में तात्पर्यचृत्ति नामक शक्ति मानने की भी कोई आवश्यकता नहीं रह जाती ।

यद्‌भष्यंये मन्‌यन्ते—याच्‍च्यावगमोपक्रमः प्रतीयमानार्थोन्तरावसायप-र्यन्तोडयमेक एव दीर्घदीर्घः शाब्‍दस्‍येपोरिव व्यापापःः न पुनर्‌र्थान्तरस्‍कथित् संवेद्यते । यथा ह्येक पवेशुर्वलवता धनुष्‍मता मुक्तः शस्‍त्रोहरपच्‍छद्र-सत्‍कविना सकृत् प्रयुक्त एव कमेण स्वार्थाभिधानार्थान्तरप्रतीतिं चैकयैच प्रचृत्‍या वितनोति । न च तस्‍य वृत्तिमेदः;, तथा शब्‍दोडपि

किञ्‍च यत्‌परः शब्‍दः स शब्‍दार्थ इति शाब्‍दस्‍यैवासौ व्‍यापारो न्‍यात्‍यो नार्थस्‍येति ।

‘और जो दूसरे मानते हैं कि—‘वाच्यार्थ के ज्ञान से लेकर प्रतीयमान अर्थ के निश्चित तक ढोने वाला दीर्घ-दीर्घ यह शाब्‍दव्यापार वाण के समान एक ही है, दूसरे अर्थ की प्रतीति के ळिप्त साधु को छाती पर बेँधा कवच और छाती को भी फाड़कर, प्राणों का अपहरण कर लेता है और उसके व्यापार में कोई भिन्नता नहीं आती, उसी प्रकार कुशल कवि द्वारा एक ही बार प्रयुक्त शब्‍द भी कम से अपने अर्थ का अभिधान (अभिधादृत्ति द्वारा कवच ) और दूसरे अर्थ की प्रतीति एक ही व्यापार से करा देता है और उसके व्यापार में ( भी ) कोई भिन्नता नहिं आती ।’

और—‘जिस शब्‍द का जिस अर्थ में तात्पर्य होता है वही अर्थ उस शब्‍द का वास्तविक अर्थ है इसलिए यह ( अर्थान्तर प्रतीति कराने वाला ) शब्‍द का ही व्यापार कहा जाना चाहिए—

विमर्शः—इस पूर्वपक्ष में ‘अन्‍ये’ शब्‍द विशेष रूप से—विचारणीय है । उससे ज्ञात हे कि इस पूर्वपक्ष में दिए गए शर हृष्टान्त और यत्‌परः शब्‍दः स शब्‍दार्थः न्याय उन आचार्यों

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१३८ व्यक्तिविवेकः माने गये थे जो महिमभट्ट से भिन्न थे। दोनों मतों में से 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' को अभिनवगुप्त ने अपने ध्वन्यालोक लोचन में उद्धृत किया है। इससे ज्ञात होता है कि कम से कम इन दो मतों में से एक को मानने वाले आचार्य महिमभट्ट से पूर्ववर्ती अभिनवगुप्त से भी पहिले के थे। इस मत को मानने वाले आचार्य मीमांसाशास्त्र के आचार्य थे। इस तथ्य में दो प्रमाण मिलते हैं— एक तो स्वयं अभिनवगुप्त और दूसरा मीमांसादर्शने। अभिनवगुप्त ने इस मत का खण्डन करते हुए इसके मानने वाले को मीमांसक कहा है। 'नूनं मीमांसकस्य प्रपौत्रं प्रति नैमित्तिकत्वमभिषिततमम्' (चौ० सं० ६६ प्र०) उनका यह मीमांसक शब्द अपने पारिभाषिक अर्थात् मीमांसा दर्शने को मानने वाले व्यक्ति अर्थ में ही प्रयुक्त हुआ है। इस तथ्य की पुष्टि उनके एक दूसरे श्रोन्रिय शब्द से होती है। उन्होंने ठीक उसके पहले लिखा है—'पद्य श्रोत्रियस्योक्तिकौशलम्' (चौ० सं० ६५ प्र०) मीमांसादर्शने में भी जहाँ 'विधि तत्के ऋत्पत्ति, प्रयोग, निमित्त और अधिकार ये चार भेद किए गए हैं वहाँ उनकी मिश्रितावस्था में कोर्द्ध एक संज्ञा निश्चित करने के लिए 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' न्याय स्वीकृत किया गया है। उनके अनुसार एक ही स्थल में यदि एकाधिक विधियों की प्राप्ति हो तो उनमें से एक विधि के नाम से उस विधिवाक्य को पुकारा जाता है जिसमें उस वाक्य का तात्पर्य रहता है। इस सिद्धान्त को मानने में शबर स्वामी ने एक न्याय और भी प्रवर्तित किया है—'भूतभव्यसमुचारणं भूतं भव्यायोपदिशयते' अर्थात्—एक साथ कही गई पुरानी और नई बातों में पुरानी बातें नई बातों के लिए दुहाई जाती हैं।' काव्यप्रकाश-प्रकरणसमाल्यानां समवाये पारदौवल्यमर्थविप्रकर्षात्' (पूर्वमीमांसा ३।१।१४) इस सूत्र पर आपत्ति आती हुई बतलाकर 'सोडयमिषोरिव दीर्घदीर्घांतररो व्यापारः' तथा 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' को अमान्य ठहराया है। इससे भी संकेत मिलता है कि काव्यप्रकाशकार भी उक्त दोनों मतों को मीमांसकों का मत मानते हैं।

अस्तु इन प्रमाणों से यह अवशय सिद्ध हो जाता है कि 'यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' मीमांसा शास्त्र में भी माना गया है। किन्तु यह तथ्य भी सिद्ध नहीं होता कि इसका मूल प्रवर्तक मीमांसा ही है, क्योंकि उसमें भी यह उदाहरण के रूप में उपस्थित किया गया है। जहाँ तक सोडयमिषोरिव दीर्घदीर्घांतररो व्यापारः' का सम्बन्ध है, उसके विषय में कोई भी निश्चित प्रमाण नहीं मिलता जिससे उसे किसी निश्चित आचार्य द्वारा प्रवर्तित माना जा सके। इस पर कुछ परवर्ती टीकाकारों से अवश्य कुछ प्रकाश पड़ता है किन्तु वह भी अनुश्रुतिमात्र पर आधारित दिखाई देता है। टीकाओं में काव्यप्रकाश की काव्यप्रदीप टीका सर्वोत्कृष्ट मानी जाती है। उसके रचयिता मिथिला के प्रसिद्ध नैयायिक गोविन्द ठक्कुर हैं। पण्डितराज जगन्नाथ ने इन्हें उद्धृत किया है। इसलिए इनका समय १६वीं शती माना जाता है। इन्होंने अपने उक्त टीकाग्रन्थ में यत्परः शब्दः और सोडयमिषोरिव**को भट्टमतोपजीवी लोगों का मत माना है—उनका वाक्य है—'अथ सोडयमिषोरिव दीर्घदीर्घांतररो व्यापारः' इति यत्परः शब्दः स शब्दार्थः' इति च 'निश्रेष:' इत्यादौ विधिरेव वाक्यं' इति भट्टमतोपजीविनः।' और इसका अर्थ किया है 'अस्यार्थः—यथा बलवत्ता प्रेरित इपुरेकेनैव गास्येन व्यापारेरण वर्मच्छेद-सुरोमेदं प्राणहरणं च रिपोर्वधत्ते तथैक नैवाभिधानव्यापारेण पदार्थस्मृतिं वाक्य-शानुभवं च न्याय्यप्रतीतिं च विधत्ते। अतो व्यक्त्यर्थावाभिमतस्यार्थस्य बाधात्वमेव। किं च यत्र शब्दस्य तात्पर्येण शब्दार्थः इति 'निश्रेष:' इत्यादौ तात्पर्यविषयतया विशिष्ट एवैति।' (१४९ प्र० काव्यमाला तृतीय संस्करण)। प्रदीप के भट्टमतोपजीवी—शब्द का अर्थ—वामन झल्करी करने 'भट्टोल्टटादयः' किया है। ध्वन्यालोक के हिन्दी रूपान्तकार श्री विश्वेश्वर सिद्धान्त

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प्रथमो विमर्शः

शिरोमणि जी ने भी सम्भवतः वामन के ही आधार पर ‘यत्परः शब्दः...’ इस मत को अपनी अतिरिक्‍ट टिप्पणी द्वारा भट्टलोल्‍लट का मत माना है। साहित्यदर्पण के टिप्पणीकर्ता महामहोपाध्याय पं० दुर्गाप्रसादजी शास्‍त्री ने उसके निर्णयसागरीय षष्ठ संस्करण में यत्‍च केविताद्‌हु: ‘सोडयमिचो-रिव...इति’ (साहित्यदर्पण पंचम परिच्‍छेद २५३ पृ०) के केवित्त का अर्थ—भट्टमतोपजीविनो भट्टलोल्‍लटादयः किया है। हमारे पूज्य गुरूजी (कवितातत्त्वचक्रवर्तीं पं० महादेव जी शास्‍त्री ) ने ध्वन्यालोक के चौथिम्बे संस्करण में दिव्योक्तिनो टिप्पणी देकर उसमें अभिनवगुप्त के टीकातिन्त्रताभिधानवादो ‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ के लोचनान्‍ो के ‘अभिनवताभिधानवादो’ शब्द का केवल ‘प्राभाकर इत्यर्थः’ अर्थ किया है। इस टिप्पणी में वे स्थल-स्थल पर अनेक अन्वितान्वयबद्ध अभ्रों का काव्यप्रकाश और काव्यप्रदीप तथा शाब्दान्तर के आधार पर स्पष्टीकरण करते हैं। उन्होंने इस स्थल पर काव्यप्रदीप का अनुसरण नहीं किया है। और वामन के अनुसार उन्होंने उसे भट्टलोल्‍लट का ही सिद्धान्त माना है। इसके अतिरिक्त रसप्रकरण में जहाँ काव्यप्रकाश में भट्टलोल्‍लट के मत का उल्लेख है वहाँ वे उसे भट्टमतोपजीवी बतलाकर भी अभिनवताभिधानवादी

का अनुयायी नहीं बतलाते; कारण कि भट्ट मत अन्विताभिधानवाद का अनुयायी नहीं प्रकृत अभिहितान्वयवाद का अनुयायी है। इसे भी उक्त टिप्पणी में ‘दवसमिहितान्वयान्न चानन् इचद् अनपदचनीयाम् ( चौ० सं० ६४ ) इस लोचनान्‍ो के अभिहितान्वयवादी शब्द का ‘वैतत्‌सिकमतानुसारेण तान् देवसमिहितान्वयान्न चानन् इत्यर्थः’ अर्थ करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है। इस प्रकार उद्‌धृत लोचन उक्तशोभन टिप्पणी और काव्यप्रदीप तथा वामनकृत उसकी छाया में परस्पर विरोध उपस्थित होता है। काव्यप्रदीप के अनुसार भट्टलोल्‍लट यत्‍ि भट्टमतोपजीवी माने जायें और यह कहा जाय कि ‘यत्परः शब्‍दः’ उन्हीं की मान्यता है तो अभिनवगुप्त द्वारा उसे अन्विताभिधानवादी का मत स्वीकृत किदा जाने पर भट्ट लोल्‍लट को प्राभाकरोजीवी भी मानना होगा कयोंकि अन्विताभिधानवाद के प्रवर्तक आचार्य शाब्‍द में भट्टलोल्‍लट वो ‘यत्परः शब्दः स शब्दार्थः’ का प्रवर्तंक मानने आचार्य हैं। अलंकार शास्‍त्र में भट्टलोल्‍लट की आपत्ति आती है जिस पर सबसे अधिक ध्यान दिदा जाना चाहिए। वह यह कि मीमांसा या साहित्य में भट्टलोल्‍लट का ऐसा कोई भी ग्रन्थ नहीं मिलता जिसमें उन्होंने इन साहित्यिक तत्त्वों पर यत्परः शब्दः द्वारा विचार करने का मार्ग सुझाया हो। साहित्य में अभिनवगुप्त ने लोचन में रसविचेचन करते हुये—भट्टनायक का तो नाम दिदा है किन्तु भट्टलोल्‍लट का नहीं। उनकी नाम-लोचन के बाद दिखाई गई अभिनवगुप्तु मतों में है किन्तु भट्टलोल्‍लट का अवशेष मिलता है। किन्तु वह भी रसप्रकरण में ही। अतः उसकी ‘यत्परः’ आदि से कोई संगति नहीं। मीमांसा में तो भट्टलोल्‍लट का इतना भी उल्लेख नहीं हैं। इस प्रकार जब काव्यप्रदीप और लोचन के विरोध से अनुश्रुति भी असंगत ठहरती है और कोई भट्टलोल्‍लट का स्वलिखित ग्रन्थ

मिलता नहीं तब ‘यत्परः शब्दः’ का प्रवर्तक उन्हें ही मानना बुद्धिसंगत नहीं। वस्तुतः मानांसकों की ओर से पूर्वपक्ष उपस्थित करते हुए इतर दार्शनिकों में भट्ट मत और प्राभाकर मत में भेद होता रहा है। मंजूषा आदि ग्रन्थों में प्रभाकर के मत को भट्ट मत कहकर खण्डन किदा गया है। इसी प्रकार दिनकरी रामशास्त्री में भी। यहाँ प्रस्तुत प्रसंग में मम्मट ने भी इत्यादिनाभिधानवाद-

वाद इत्यादि द्वारा अन्विताभिधानवाद का ही खण्डन किया है, काव्यप्रदीप में भी उपसंहार में वहीं कहा गया है। इसलिए ‘भट्टमतोपजीविनः’ यह कथन भ्रममूलक ही हैं। इसके आधार पर जिन्होंने भट्ट लोल्‍लट को इस मत का प्रवर्तक माना है उनकी भी कथन पुष्ट मूलक ही हैं। मम्मट लोल्‍लट भट्टमतोपजीवी माने जाते हैं जैसा कि उनकी रस व्याख्या से स्पष्ट है किन्तु भट्ट का माना हुआ वाद अभिहितान्वयवाद है, प्रस्तुत प्रसंग में लोचन, काव्यप्रकाश और उपसंहार वाक्य के

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तदयुक्‍तम् । साक्षाच्छब्‍दस्यार्थप्रतीतिहेतुत्‍वासिद्धेः । परम्पयेण तु तस्य हेतुत्‍वोपगमे वस्तूनां हेतुफलभावव्‍यवहारनियमो न व्‍यवतिष्‍ठते । ततश्‍च कुलालोडपि सेक्‍सलिलोपकरणभूतं कुम्भं कुर्वन् मधुमास इव कुसुमविकासहेतुरिति मुख्यतया ख्यायेत, इत्यर्थस्त्‍वैव व्‍यापारोडभ्‍युपगन्तुं युक्तो न शब्‍दस्‍य । न हि यः पुत्रस्‍य व्‍यापारः स पितुरेवति मुख्यतया राक्षते वक्‍कुम्, तयोरन्योन्‍यव्‍यापारसाङ्‍योदोपप्रसङ्‍गात् ।

किञ्‍चायं विषयः श्रुतदर्शनत्‍वोपन्यासः । न हि यथा साधकः स्‍वभावात् एवं हेत्‍वर्थचिन्‍बयमेकैव वृत्त्‍या तत्‍तत्‍कार्य करोति, तथा शब्‍दः । स हि सङ्‍केतसापेक्षः स्‍वच्‍छापारमार्थते न स्‍वभावत एवति यत्रैवास्‍यं सङ्‍केतस्‍तत्रैव व्‍याप्रियते । ततश्‍चाभिधेयार्थविपय प्‍वास्‍य व्‍यापारो युक्‍तो नार्थान्‍तरविष्‍योः, तत्र सङ्‍केताभावात् । तदभावेडपि तव तत्‍परिकल्‍पने सर्वः

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कुतः श््रिदमिधेयार्थेवदर्थान्तरमपि प्रतीयात् । तस्माद्यत्र सङ्केतापेक्षा तत्रैवास्य व्यापार इत्यवगन्तुं युक्तं, नार्थान्तरे, तत्र वाक्यमाणनेयनार्थेस्यैव तदुपपत्ति-समर्थेनादिति ।

'वह ठीक नहीं है । क्योंकि अर्थ की प्रतीति में शब्द साक्षात् हेतु नहीं वन पाता, और परम्परा द्वारा हेतु माने जाने पर वस्तुओं में से किसी को कार्य और किसी को कारण कहने की व्यवस्था कठिन हो जावेगी । क्योंकि तब तो (परम्परा द्वारा कारणता मान लेने वाले ) जैसे मधुमास को पुष्प विकास का मुख्य हेतु माना जाता है वैसे ही सिंचाई के काम में आने वाले घड़े का निर्माण भी पुष्प विकास का मुख्य कारण कहा जा सकेगा । इस कारण शक्ति को अर्थ में ही मानना ठीक है, शब्द में नहीं । ऐसा नहीं हो सकता कि जो व्यापार पुत्र का हेतु है, पिता को उसका मुख्य आश्रय कह दिया जाय, क्योंकि ऐसा करने पर उनके अपने नियत कार्यों में सांकर्य दोष की सम्भावना होगी ।

इसके अतिरिक्त वह शंका का उदाहरण ठीक नही बैठता । क्योंकि जिस प्रकार वाण अपने आप ही छेद्य ( कवच आदि, जो छेद हो सकते हैं ), भेद्य ( जो फोड़े जा सकते हैं—छाती आदि ), पतनार्थ में एक ही शक्ति से 'छेदनेमिदने' आदि कार्य करता है—उसी प्रकार शब्द महा । वह अपनी शक्ति काम में लाता है संकेतग्रह की सहायता से, अपने आप नहीं । इसलिए यह वहाँ प्रवृत्त होता है ( ज्ञान कराने चलता है ) जहाँ उसका संकेत रहता है । इसलिए शब्द की शक्ति केवल अभिधेय अर्थ तक ही चलती है अर्थान्तर ( अभिधेय से भिन्न अर्थों में ) नहीं । क्योंकि उन अर्थों में संकेत नहीं रहता । उस ( संकेत ) के अभाव में भी उस ( शब्द व्यापार ) की कल्पना करने पर सभी लोग किसी भी शब्द से अभिधेय अर्थ के समान दूसरे अर्थों का भी ज्ञान करने लगेंगे । इसलिए जहाँ ( जिस अर्थ के ज्ञान में ) संकेत की अपेक्षा होती है शब्द का व्यापार उसी अर्थ में होता है—ऐसा समझना ठीक होगा, दूसरे अर्थ में ( उसका व्यापार मानना ठीक ) नहीं, क्योंकि उसमें ( दूसरे अर्थ की प्रतीति में ) तो आगे कहे जाने वाले हेतु से अर्थ का व्यापार ही उचित ठहरता है ।

विमर्शः : महिमभट्ट पूर्वपक्ष को असामान्य सिद्ध करते हैं । इसमें उनके दो तर्क प्रमुख हैं—एक तो—शब्द अपने अर्थ के समान दूसरे अर्थ की प्रतीति—साक्षात् नहीं कराता, और दूसरे—वह उसी अर्थ का ज्ञान करा सकता है जिसमें उसका संकेत रहता है ।

इन दोनों तर्कों के समर्थन में उन्होंने निम्नलिखित युक्ति दीं हैं—

( १ ) दर्शन शास्त्र हेतु और हेत्वाभास का भेद मानता है । उसमें कार्य के हेतु का हेतु कार्य का हेतु नहीं माना जाता । उसे अन्यथासिद्ध माना जाता है । उदाहरण घट के प्रति कपाल सयोग और कुम्भकार कारण हैं । कुम्भकार दो कपालों के जोड़ का हेतु है और वह जोड़ घट का हेतु नहीं माना जाता । इसी प्रकार अर्थान्तर की प्रतीति शब्द से नहीं शब्द से प्रतीत अर्थ से होती है । यदि शब्द उसकी प्रतीति का हेतु मान लिया जाएगा तो फिर घट के प्रति कुम्भकार को भी कारण मानना आवश्यक हो जावेगा । इसलिये जिसप्रकार घट का असली कारण कुम्भकार न होकर दो कपालों का जोड़ या कपाल होता है उसी प्रकार अर्थान्तर की प्रतीति का कारण भी पूर्ववर्ती अर्थ होता है न कि—उस अर्थ को वत्तलाने वाला शब्द । ग्रन्थकार ने इसी अभिप्राय से पुष्पविकास में मधुमास और अपनी सिंचाई के काम में आने वाले घड़े को बनाने वाला कुम्भकार दोनों के हेतुत्व की शंका उपस्थित की है ।

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( २ ) वाण एक ही व्यापार से छेदन-भेदन और प्राणहरण रूप अनेक कार्य कर सकता है, किन्तु उसके आधार पर शब्द एक ही शक्ति द्वारा अनेक कार्यों का कर्ता नहीं माना जा सकता । कारण कि वाण और शब्द की कार्य प्रणाली में अन्तर है । वाण का व्यापार ( वेग ) अपने छेदन-भेदन आदि सभी कार्यों में स्वतन्त्र होता है, शब्द का व्यापार परतन्त्र । वह उसी दिशा में होता है, जिसमें उस शब्द का संकेत रहता है । पुस्तक शब्द अर्थ ज्ञान के लिए प्रवृत्त अवश्य होता है कि उसकी यह प्रवृत्ति एकमात्र उसी दिशा में होती है जिसमें किन्हीं लिखित पत्रों का एक विशिष्ट समुदाय रहता है—क्योंकि उसे उसी आकार के पदार्थ तक सीमित कर दिया जाता है । इस स्थिति में उसकी प्रवृत्ति किसी दूसरे पदार्थ का ज्ञान कराने में नहीं होती । निदान वह अपने अर्थ को छोड़कर वाण के समान आगे नहीं बढ़ सकता, फलतः उससे दूसरे अर्थों वली प्रतीति किसी प्रकार मानी नहीं जा सकती । उन अर्थों की प्रतीति शब्द से प्रतीत उसके अपने अर्थ द्वारा होती है । इसलिए उन अर्थों के ज्ञान में शब्द शक्ति को कारण न मानकर अर्थशक्ति को कारण मानना होगा । अर्थ का यहाँ अनुमान ही हो सकता है । इसलिए अन्त में वही निष्कर्ष निकलता है कि दूसरे अर्थ अनुमान से ज्ञात होते हैं ।

यत् पुनः—

‘शब्दार्थौ सहितौ वाक्कृविव्यापारशालिनि । वन्धे व्यवस्थितौ कार्य तद्रिद्दाद्दादकारिणि ॥’

इत्यादिना शास्त्रादिप्रसिद्धशब्दार्थौपनिबन्ध्यतिरेकि यद् वैचित्र्यं तन्मात्रलक्षणं वकृत्वं नाम काव्यस्य जीवितमिति मुख्यदयमानिनः केचिद्- चक्षते तदण्यसमीचीनम् ।

यतः प्रसिद्धोपनिबन्धनव्यतिरेकित्वमिदं शब्दार्थयोरौचित्यमात्रपर्य- वसायि स्यात्, प्रसिद्धाभिधेये अर्थवयतिरेकित्वं वा स्यात् । प्रसिद्धप्रस्थानतिरेकिणः शब्दार्थौपनिबन्धवैचित्र्यस्य प्रकारान्त- रस्सम्भवात् ।

तत्राद्यस्तावत् पक्षे न शङ्कनीय एव, तस्य काव्यस्वरूपनिरूपणसाम- थ्येऽसिद्धस्य स्फुटप्रपादानवैचर्थ्यात् । विभावाद्युपनिबन्ध एव हि कविव्यापारो नापरः । ते च यथाशास्त्रमुपनिबध्यमानाः रसाभिव्यक्तेरिनिबन्धनभावं भजन्ते, nान्यथा । रसात्मकं च काव्यमिति कुतसतग्रानौचित्यपसंश्रयः सम्भाव्यते, यत्रिरासार्थोऽमितस्थं कार्यलक्षणमाचक्षीरन् विचक्षणामन्या: ।

द्वितीयपक्षपरिग्रहे पुनर्ध्वनेरेवेदं लक्षणमनया भङ्गयाभिहितं भवति, अभिधानवाद वस्तुनः । अत एव चास्य त एव प्रभेदास्तान् येऽपोदाहरणानि तैरेव सङ्केतितानि । तदापकर्षकमयुक्तं, वद्यते च ।

और जो—

( ऐसे ) शब्द और अर्थ काव्य होते हैं ( जो ) साहित्य से युक्त ( होते हैं ) और कवि के 'वकृव्यापार' से युक्त 'वन्ध' में व्यवस्थित ( होते हैं ) 1* इत्यादि द्वारा शास्त्र आदि में प्रचलित

  • यह सिद्धान्त वक्रोक्तिजीवितकार कुन्तक का है । दृष्टव्य वक्रोक्तिजीवित ११७ ले०

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प्रथमो विमर्शः

शब्द और अर्थों की योजना से भिन्न जो वैचित्र्य (है) उतने ही तक सीमित वकता नामक (तथा) 'काव्य की आत्मा है' ऐसा जो सहृदयता का अभिनय करने वाले कुछ लोग कहते हैं—

(उनका) वह (कथन) भी समीचीन नहीं है—क्योंकि यह जो (शब्दार्थ) की प्रचलित योजना से भिन्नता (भिन्नयोजना) है वह शब्द और अर्थ की योजनाअथवा अभिव्यक्ति में बतलाये गये सर्वसामान्य अर्थ से भिन्न प्रतीयमान अर्थ की अभिव्यक्ति करना । क्योंकि प्रचलित सर्वसामान्य योजना से भिन्न—शब्दार्थ योजना के वैचित्र्य में कोई तीसरा भेद हो नहीं सकता ।

इनमें से पहला वात कों खंडन नहीं की जा सकती । क्योंकि उस (औचित्य) का अलग से कोई उल्लेख व्यर्थ है, कारण कि उसका निरूपण तो काव्य-स्वरूप के निरूपण से ही हो जाता है—(यह इसलिए कि आखिर) विभाव आदि की योजना ही तो कवि का व्यापार है; इससे भिन्न और कुछ नहीं । और वे (विभाव आदि) नियम के अनुसार ही योजनाबद्ध होने पर रस को अभिव्यक्ति में कारण वन जाते हैं, और कैसे नहीं । और रसात्मक (वस्तु ही) काव्य है इसलिए उसमें (काव्य में) अनौचित्य का स्पष्ट भी कहाँ ? जिसके निराकरण के लिए अपने आपको चतुर मानने वाले लोग इस प्रकार का (वकता|विशिष्ट) काव्य का लक्षण करते फिरें ।

और दूसरां वात को लेने पर इस (नए) ढंग से यह ध्वनि का ही लक्षण वनता है, क्योंकि वात एक ही है । और इसलिए तो उन्होंने उसके वे ही प्रभेद और वे ही उदाहरण दिखलाए हैं । और (जहाँ तक ध्वनि के लक्षण का संबन्ध है। वह ठाक नहीं है—ऐसा पहले ही कहा जा चुका है और आगे भी कहा जाएगा ।

(इस मत के विवेचन से निम्नलिखित निष्कर्ष निकलता है कि)—

प्रसिद्धं मार्गमुत्सृज्य यत्र वैचित्र्यसिद्धये । अन्यथैवोच्यते सोऽर्थः सा वक्रोक्तिरुदाहृता ॥ ६९ ॥

(१) जहाँ वह अर्थ विचित्रता की सिद्धि के लिए प्रचलित ढंग को छोड़कर और ही किसी ढंग से कहा जाता है—वह (ढंग ही) वक्रोक्ति कही जाती है ।

पदवाक्यादिसंयतावात् स चाथों बहुधा मतः । तेन तद्धेतुपीठा बहुधैवेतितद्धिदृः ॥ ७० ॥

(२) यह अर्थ (क्योंकि) पद, वाक्य आदि कईं माध्योंमों से प्रतीत होने के कारण कईं प्रकार का है—इसलिए उसकी वकता भी उसके जानकार की दृष्टि से कई प्रकार की ही मान्य होती है ।

अग्रोच्यतेऽभिधासंबंधः शब्दस्यार्थप्रकाशने । व्यापार एव चेष्टोऽर्थस्तद्वचन्योडर्थस्य सोऽखिलः ॥ ७१ ॥

(३) इस पर हमारा कहना है कि अर्थ की प्रतीति कराने में शब्द का अभिधा ही एक व्यापार माना गया है । दूसरा जो (व्यापार) है वह सारा का सारा अर्थ का ही है ।

ततश्च—

वाच्यादर्थान्तरं भिन्नं यदि तल्लिङ्गमस्य सः । तन्नान्तरीयकतया निबन्धो हास्य लक्षणम् ॥ ७२ ॥?

(४) इसलिए—यदि वाच्येतर अर्थ वाच्य से भिन्न है तो इसका (

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( वाच्य ) लिख्न है । क्योंकि अर्थान्तर की अर्थान्तरता ही इसमें है कि उसके प्रति वाच्य अर्थ हेतुरूप से उपनिबद्ध किया जाय ।

अभेदे वहुता न स्यादुक्तेर्मार्गान्तराग्रहात् । तेन ध्वनिवदेशापि वक्रोक्तिरनुमा न किम् ॥ ७३ ॥

इत्यन्तरश्लोकः

( ५ ) और अभेद होने पर बहुत्व नहीं बनेगा क्योंकि ( उस वक् ) उक्ति का और कोई दूसरा प्रकार हो नहीं सकता ।

इसलिए ध्वनि के ही समान यह वक्रोक्ति भी अनुमान ही क्यों नहीं ( मान ली जाय ) ।

विमर्शः : इस प्रसंग में महिमभट्ट ने वक्रोक्ति का खण्डन किया है । वक्रोक्ति-सम्प्रदाय अलंकार-शास्त्र के सम्प्रदाय-विशेष में ध्वनि-सम्प्रदाय के बाद का तथा महिमभट्ट के पहले का सम्प्रदाय है । इसके प्रवर्त्तक आचार्य का नाम कुन्तक है । इन्होंने ‘काव्यालंकार’ नाम से वक्रोक्ति-सम्प्रदाय पर कारिकाएँ लिखीं हैं और उनपर अपनी स्वरचित वृत्ति का नाम वक्रोक्तिजीवित रखा है । इस समय कुन्तक का ग्रन्थ वक्रोक्तिजीवित नाम से ही प्रसिद्ध है । इस ग्रन्थ के अर्भी तक दो संस्करण हो चुके हैं। पहले एक बार सन् १९२३ में यह ग्रन्थ प्रकाशित हुआ था, और अब १९५५ में तीनवर्ष पहले यह प्रकाशित हुआ है । इस वीच के प्रसिद्ध विद्वानों ने अँग्रेजी हिन्दी में इस सम्प्रदाय को लेकर काम किए हैं । हिन्दी में पं० बलदेव उपाध्याय ( भारतीय साहित्यशास्त्र द्वितीयभाग ) और श्री रमनरेश वर्मा ( वक्रोक्ति और अभिव्यञ्जना ); विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं । डॉ० नगेन्द्र ने भी इस बार प्रकाशित वक्रोक्तिजीवित में एक विस्तृत भूमिका देखकर वक्रोक्ति पर अच्छा प्रकाश डाला है । विशेष रूप से अध्ययन कें लिए वक्रोक्ति-सम्प्रदाय पर लिखे इन ग्रन्थों को देखना चाहिए । यहाँ इस प्रसंग में केवल वक्रोक्ति के मूल रूप का प्रतिपादन पर्याप्त होगा—

पं० बलदेव उपाध्याय ने अपने साहित्यशास्त्र के द्वितीय भाग में ( राजानक रुय्यक कृत ) अलंकारसर्वस्व की एक टीका के रचयिता समुद्रबन्ध का वाच्य उद्धृत किया है, वह इस विषय की जानकारी की एक कुंजी है । इस उसे उस ग्रन्थ से उद्धृत करते हैं—

‘इह विशिष्टौ शब्दार्थों वाच्यम् । तथाच वैशिष्ट्यं ‘धर्मैर्मुखेन’, ‘व्यापारमुखेन व्यक्त्यसमुखेन’ वेतु त्रयः पक्षाः । आचेएडपि अलंङ्कारतो गुणतो ‘वेतु’ दैविध्यम् । द्वितीयेडपि भणितिवैचित्र्येण वक्रोक्तिजीवितकारेण चतुर्थों भट्टनायकेन, पद्मम आनन्दवर्धनेन ।’ ( भारतीय साहित्यशास्त्र पृ० १६६ द्वि० भाग )

इससे स्पष्ट है कि वक्रोक्तिजीवितकार का मूल सिद्धान्त काव्य में व्यापार–प्राधान्य-वादी है । व्यापार-का अर्थ–कविकर्म है । कविकर्म का अर्थ काव्यगतरूप पदार्थों की लोकसामान्य स्थिति से ऊपर उठकर अलोकसामान्य स्थिति में अभिव्यक्ति करना है । इसमें शब्द, शब्द का अंग-प्रत्यंग, उससे और उसकी प्रत्येक इकाई से प्रतीत होने वाले अर्थ और उनके लोक-स्थिति में अनुभूत न होने के कारण एकमात्र काव्य में आए विचित्र सम्बन्ध तथा इन सवके मूल में अवस्थित कवि-प्रज्ञा का कौशल ये सभी तत्त्व चले आते हैं । वस्तुतः काव्यशास्त्र के और किसी सम्प्रदाय में इनसे अतिरिक्त कोई नई वस्तु बची नहीं रहती । इसलिए आनन्दवर्धन का ध्वनि-सिद्धान्त भी, जिसकी सार्वमौम प्रतिष्ठा से भारतीय साहित्यशास्त्र को अपने भावात्मक आलोचना क्षेत्र में

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प्रथमो विसर्गः

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सर्वांधिक संतोष है—उक्त क्षेत्रें में विस्तृत वक्रोक्ति-सिद्धान्त के मान्यक्रम को आँच नहीं पहुँचाता। अन्तर इतना ही है कि आलोचना की वह दार्शनिक कर्कशता इस व्यापारवादी सम्प्रदाय में नहीं है जो काव्यतत्त्व का परिज्ञान स्वगत भेदों से पृथक् कर कराती है । इसमें मानव-मेधा के उन आकर्षण सूत्रों का सांकेतिक उल्लेख है, जिनसे काव्य का स्वातन्त्र्य व्यक्तित्व एक मनोरम रूप में सामने आता है । वस्तुतः भारतीय आलोचना के प्राचीन रूप में काव्यतत्त्वों का सजीव उदाहरणों द्वारा—जो मनोरम रूप आभनवगुप्त तक भी निखर नहीं सका था, वक्रोक्ति-सिद्धान्त ने उसे पूर्ण करने का गौरव प्राप्त किया है । संस्कृत के वर्तमान पठन-पाठन में इस सम्प्रदाय का कोई स्थान नहीं रखा गया है, अतः हम इस प्रसंग में उपयुक्त निवेदन कर रहे हैं । अब हम वक्रोक्ति-सिद्धान्त में वक्रोक्ति की परिभाषा उपस्थित कर अपने प्रासंगिक विषय को अपनाते हैं ।

उभयवेतालङ्कार्यौं तयोः पुनरलङ्कृति। वक्रोक्तिरेव वैदग्ध्यभङ्गीभणितिरुच्यते ॥

यहाँ उभौ का अर्थ 'शब्दार्थों सहित काव्यम्' इस पहले की कारिका से आद्य शब्द और अर्थ हैं । अर्थ—यह हुआ कि ये दोनों शब्द और अर्थ—अलङ्कार्य हैं । और इनका अलङ्कार है एक मात्र वक्रोक्ति । वक्रोक्ति का लक्षण है—वैदग्ध्यभङ्गीभणिति । वैदग्ध्यभङ्गीभणिति शब्द की जो निरुक्ति स्वयम् वृत्ति में दो गईं है उसे हम यहाँ अविकल उपस्थित करते हैं— 'कासौ वक्रोक्तिरेव ?' वक्रोक्ति = प्रसिद्धाभिधानव्यतिरेकेण विचित्रैवाभिधा । किञ्चिदित्थं वैदग्ध्यभङ्गीभणितिः । वैदग्ध्यं = विदग्धभावः = कविकर्म कौशलं, तस्य भङ्गी = विच्छित्तिः, तथा भणितिः ! विचित्रैवाभिधा वक्रोक्तिरित्युच्यते । कारिका में कहा गया था शब्द और अर्थ दोनों का अलङ्कार एकमात्र वक्रोक्ति है । प्रश्न उठा आखिर यह वक्रोक्ति ही है क्या ? उत्तर दिया उसका अर्थ वक्रोक्ति शब्द से ही स्पष्ट है । वक् का अर्थ है कथन के प्रचलित ढंगों से भिन्न एक ( विचित्र ) नवीन ढंग से कहना । इस विचित्र या नवीन ढंग से किए जानेवाले कथन का स्पष्ट रूप है वैदग्ध्यभङ्गीभणिति । उसका अर्थ है वैदग्ध्य = विदग्धता, विदग्धता का अर्थ है—कविकर्म की कुशलता ( कुशलताशाली कविकर्म ) उसका चमत्कारपूर्णता के साथ कथन । इस प्रकार एक विचित्र ढंग का कथन या विचित्र कथन-प्रकार वक्रोक्ति है ।

इस सम्पूर्ण सन्दर्भ का संक्षेप स्वयम् वक्रोक्तिजीवितकार ने इस प्रकार किया है— 'वक्ता-वैचित्र्य-योगितया अभिधानमेवानयोरलङ्कृतिः l' अर्थात् 'बोलने की चतुराई छौंक के साथ कइना ही वक्रोक्ति रूप शब्द और अर्थ का अलङ्कार है ।' इस सन्दर्भ से स्पष्ट है कि अभिधा या अभिधान को वक्रोक्तिजीवितकार राजानक कुन्तक ने शब्द और अर्थ का अलङ्कार माना है । यह अभिधा या अभिधान राजानक महिमभट्ट की दृष्टि में वही अभिधा व्यापार है जिसे दूसरे दर्शनों में शक्ति माना गया है । वक्रोक्तिजीवितकार ने इसे कथन प्रकार को प्रधान मानकर उसमें सम्पूर्ण अलङ्कार-रीति, गुण और ध्वनि का अन्तर्भाव दिखलाया है । महिमभट्ट को अपना अनुमितिवाद स्थापित करना था, इसीलिए वे ध्वनि और उसके विरुद्ध उठे सभी सम्प्रदायों को अपनी दृष्टि से अमान्य ठहराते हैं । उनका कहना है—यह जो अभिधारूप विचित्र कथन नामक वक्रोक्ति व्यापार माना जा रहा है—वह विवेचन करने पर- औचित्य या ध्वनि नाम से प्रचारित वस्तु से भिन्न नहीं हो सकता । औचित्य तो इसलिए, कि

१० ड़य० वि०

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काव्य शब्द और अर्थ के औचित्य के बिना काव्यत्व को प्राप्त नहीं होता। अनौचित्य होते ही उसका सौन्दर्य समाप्त हो जाता है, और सौन्दर्यविशिष्ट ही शब्दार्थ काव्य होते हैं इसलिए सौन्दर्य के नष्ट होते ही शब्द और अर्थ सामानय शब्द और अर्थ रह जाते हैं। यह जो वकतारूप व्यापार है वह इसौ काव्यगत औचित्य का दूसरा नाम है। इस मान्यता का कारण वकता की वैंसी व्याख्या है। वकता के बिना शब्दार्थ में काव्यता नहीं आती, उसका अर्थ यह हुआ कि काव्यता का वकता ही पकमात्र काव्यहेतु है। ऐसा मानने पर औचित्य का तिरस्कार नहीं किया जा सकता, कारण कि कारणता अन्वयव्यतिरेक पर निर्भर रहती है, काव्यत्व औचित्य के बिना नहीं बनता और औचित्य के रहने पर ही वह निष्पन्न होता है—यह सर्वमान्य है। इसलिए वह काव्य की—काव्यता का हेतु है। यदि एकमात्र वक्रोक्ति ही काव्यता का निष्पादक तत्व माना जाय तो नियमित: उसे औचित्य से अभिन्न मानना होगा। और इस प्रकार उसमें औचित्य के अतिरिक्त एक नई संज्ञामात्र की नवीनता रहेगी—तात्कालिक नवीनता नहीं।

यदि यह कहा जाय कि औचित्य से बड़ी वस्तु उससे अभिव्यक्त होने वाला रसरूप अर्थ है और उसे अभिव्यक्त करने वाला शब्द का व्यापार वक्रोक्ति है—तब यह भी ठीक नहीं, क्योंकि यह सिद्धान्त स्थिर किया जा चुका है कि शब्द में अभिधा के अतिरिक्त और कोई व्यापार नहीं रहता। यदि वक्रोक्ति सनुमुन कोई व्यापार है तो उसका अभिधानवत् शब्द से होकर अर्थ होगा। इस प्रकार वक्रोक्ति भी अनुगमात्ररूप ही सिद्ध होगी क्योंकि अर्थ द्वारा अर्थान्तर को प्रतीति के लिये किया जाने वाला व्यापार अनुमान ही होता है।

नापि शब्दस्म्याभिधाव्यतिरेकेण व्यङ्ग्यक्तत्वं व्यापारान्तरमुपपद्यते, येनार्थान्तरं प्रत्याययेद्, व्यक्तेरनुपपत्ते: समवन्धान्तरस्य चासिद्धे:। तदभावेऽपि तस्यार्थेऽनियमो न स्वाद् निवन्धनाभावात्। न ह्रास्य गेयस्यैव रत्यादिभिविभावै: स्वाभाविक पव सम्बन्ध:; सर्वस्यैव तत्प्रतीति-प्रसङ्गात्।

और न शब्द का अभिधा के अतिरिक्त व्यङ्गयकत्वरूप दूसरा व्यापार वन ही पाता है जिससे ( वह ) दूसरे अर्थ का ध्यान करा सके, क्योंकि व्यक्ति व्यञ्जना बनती नहीं और कोई दूसरा सम्बन्ध भी नहीं सघता। और उसके ( व्यक्ति या सम्बन्धान्तर या अभिधातिरिक्त व्यापार के ) न रहते हुए भी उसको ( शब्द में एक नये व्यङ्गयकत्व को ) स्वीकार कर लेने पर उसमें अर्थ न नियम ( नियत अर्थ की प्रतीति कराना ) नहीं रहेगा क्योंकि अभिधा में संकेतग्रह के समान गेय के समान इसका रत्यादि के साथ कोई स्वाभाविक सम्बन्ध ( प्राकृतिक )—भी नहीं है क्योंकि ऐेसे तो ( व्यङ्गयक या वाचक आदि अभिधायक ) सभी ( शब्दों ) से उस ( रत्यादि के साथ स्वाभाविक सम्बन्ध—द्वारा दूसरे अर्थ ) की प्रतीति मानी जाने लगेगी।

नापि समयकृत; व्यङ्गयकत्वस्यौपाधिकत्वाद् उपाधीनां चार्थप्रकर्णादिसामग्रीरूपाणामनन्यपादनियतत्वाच्च प्रतिपदमिव शब्दानुशासनस्य समयस्य कर्तुमशक्यत्वात्।

और ( वह नियत अर्थ का प्रत्यायकत्वरूप नियम ) समय ( शब्दार्थी: संकेत: समय: = के अनुसार = संकेतग्रह ) से भी नहीं बनता, क्योंकि व्यङ्गयकत्व उपाधिजनित होता है और प्रयोजन,

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प्रथमा विमर्शः

प्रकरण आदि ( संयोगो विप्रयोगक्ष इत्यादि—ध्वन्यालोक आदि में उद्धृत वाक्यपदोयकार द्वारा निर्दिष्ट अभिधानियामक ) द्वारा पद-पद पर (क़दम-क़दम पर) शब्दनुशासन के समान संकेतग्रह किया नहीं जा सकता क्योंक वे-(प्रयोजन, प्रकरणादि उपाधि) अनन्वित हैं, साध ही अनियत भी ।

एक एव हि शब्दः सामग्रीवैचित्र्याद् विभिन्नार्थानिवगमयति, यथा ‘रामोऽस्ति सर्वं सहै’ इति, ‘रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्णः प्रिये! नोचितमू’ इति, ‘रामस्य पाणिरसि निर्भरगर्भांकिच्चिताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते’ इति, ‘रामे तटान्तवसतौ कुरातत्पशायिन्यापि नास्ति भगवन्! भवतो व्यपेक्षा’ इत्यादि एक एव रामशब्दः ।

शब्द एक ही होता है किन्तु सामग्री के भेद से नाना प्रकार के अर्थों का ज्ञान कराता है, जैसे—रामोऽस्ति सर्वं सहै । रामेण प्रियजीवितेन तु कृतं प्रेम्णः प्रिये नोचितम् । और रामस्य पाणिरसि निर्भरगर्भांकिच्चिताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते ?

१. ध्वन्यालोक ( चौ० सं० १६९ पृ० ) में इस श्लोक की वृत्ति में लिखा गया है—इदं रामशब्दः । अन्रैन हि व्यपदेशोऽन्तरपरिणतः: संज्ञा प्रयत्नयते न संनिमित्तान् । इह तु लोकोक्तिकरः रामशब्दः । अन्रैन = रामशब्देनानुपयुज्यमानार्थेनेति भावः । वचयस्यं धनंजयं प्रयोक्तॄणां राङ्यनिर्वासनाद्यसंरव्येयम् । उदाहरणचन्द्रिका नामक काव्यप्रकाशटीका में इसका अर्थ—रामोऽस्ति सकलकुःखप्रशात्तये प्रसीदौस्मि । और रामपदेन च सर्वसहत्वानुपयुक्तार्थेया उत्कृष्टेनेकनिस्-वाच्येल पीडासहत्रसम्पातेपि प्राणखारणादात्मनि न्यक्काशो व्यज्यते । (निर्णयसागरीय टि० में काॅव्यप्रदीप के साथ १३२ पृ० ) वामन और प्रदीपकार ने इसे स्वीकार किया है । इसका अर्थ वद है—मैं राम हूँ । वनवासी राम अपने आपको राम कहै बिना भो राम के नान ने प्रसिद्ध हैं !

इतने पर भी वे कहते हैं तो उसका अर्थ प्रकरण के अनुसार ‘सर्व प्रकार से दुःखी’ है । वक्रोक्तिजीवित में ‘दुःखं कठोरहृदयः' 'सर्वं सहै' इति यद् उभाभ्यां प्रतिपाद्यविहितं न पश्यन्ति तद्—( क्लिष्टकथयाम ) एवंविध-विविधोद्भावकविचारविभवसहसनासमर्थ्यंकरणं दुःसहेजनकसुतानिरहहाविसर्गशुल्कादपि सद्यः निरपन्नप-प्राणपरिरक्षणैवैकष्यलक्षणं संज्ञाप्रदानविनिर्वाहनं क्रिमप्यसम्भाव्यमसद्वारगं क्रौर्य प्रतीयते ( व० जी० २९, पृ० १९९ दिल्लीसंस्करण ) स्वयं व्यक्तिविवेककार ने इसका अर्थ तृतीय विमर्श में किया है वह वहीं से देख लेना चाहिए ।

२. इस पद्य के ‘रामेण’ शब्द को ध्वन्यालोककार ने अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य क़लकर ‘अन्न रामेणऽयेतत्परं साहसैकर्सत्वादिव्यधयगम्भिसंक्रमितवाच्यं व्यजकम्’ इस प्रकार उसे साधिसकतव आदि दूसरे अर्थों में संक्रान्त माना है । ध्वन्यालोक की इस वृत्ति के ‘रामेण’ इस अंश को प्रतोोक रूप से देकर अभिनवगुप्त ने उसकी व्याख्या इस प्रकार की है—‘अस्मसाहसर्सतवसत्संधनो-चिकारितावादिन्यधयगयधमन्रपरिणतनेन’ अर्थात् राम का शब्द असमान साहसमवर्गना, सत्यप्रतिशता, नपुंसकताप्रकारिता आदि में तात्पर्य है ( चौ० सं० २३२ पृ० ) वक्रोक्तिजीवित में यह पद्य नहीं आया है । काव्यप्रकाश की प्रदीप और बालबोधिनी दोनों टीकाओं में इस पर कोई विशेष विवेचन नहीं किया गया है । प्रदीप में केवल कातरता की अभिव्यक्ति मानी गई है ।

३. यहाँ राम शब्द का अर्थ अत्यन्त कूरकर्मा व्यक्ति है, योगियों में रमने वाला व्यक्ति नहीं ।

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व्यक्तिविवेक:

'रामे' तटान्तवस्तौ कुशातत्प्रश्नाथिन्यद्यापि नास्ति भगवान् भवतो व्यपेक्षा' आदि में एक ही रामशब्द ।

यथाह ध्वनिकारः——शब्दार्थयोरहिं प्रसिद्धो यः सम्वन्धो वाच्यवाचकभावाख्यस्तमजुह्नादान एव गमकतवलक्षणो व्यापारः सामञ्जयन्तरसद्भावादौपाधिकः प्रवर्तते । अत एव च वाचकत्वात् तस्य विशेषः । वाचकत्वं हि शब्दविशेषस्य नियत आत्मा, सङ्केतव्युत्पत्तिकालाद्रभ्य तद्विनाभावेन तस्य प्रसिद्धत्वात् । स त्वनियत औपाधिकत्वात् प्रकरणादवच्छेदेन तस्य प्रतीतेरि( तरथात्वप्रतीतेरि )ति ।

जैसा कि खुद ध्वनिकार ने कहा है गमकत्वरूप (व्यञ्जनारूप) व्यापार (तथा) विभिन्नसामग्री के सहयोग से औपाधिक है, और वह शब्द तथा अर्थ का जो वाच्यवाचक भाव ( अभिधा ) रूप प्रसिद्ध सम्बन्ध है उसपर निर्भर रहता हुआ ही काम करता है । इसीलिए वाचकत्व ( अभिधा ) से उसका भेद है । वाचकत्व जो है वह शब्दों की अपनी नियत वस्तु है । क्योंकि संकेत ज्ञान के समय से लेकर उसकी ( वाचकत्व की ) उसके ( संकेतज्ञान के ) बिना प्रवृत्ति नहीं देखी जाती । और वह ( व्यञ्जकत्व ) तो अनियत है, क्योंकि औपाधिक है । उसकी प्रतीति प्रकरणादि के निश्चित होने पर होती है, और निश्चित न होने पर नहीं ।

विमर्शः इस प्रसंग में व्यञ्जना वृत्ति पर साक्षात् आक्रमण किया गया है । यहीं वह स्थल है जिसे ग्रन्थकार ने पहले जगह-जगह वक्ष्यमाण कहा है । इस सन्दर्भ में का भाव यह है——

शब्द का यह स्वभाव है कि वह किसी सुनिश्चित अर्थ का ही ज्ञान कराता है साथ ही उसके इस सुनिश्चित अर्थ में काम आती है केवल एक अभिधा शक्ति ही । वही उसका अर्थ से सम्वन्ध मानी जाती है ।

यद्यपि संसार में ऐसे भी कुछ पदार्थ हैं जो अन्य पदार्थों की प्रतीति बिना किसी सम्बन्ध के ही करा देते हैं जैसे राग, वियोग आदि रति आदि भावों की । किन्तु शब्द की गणना उन पदार्थों में नहीं है । उससे होनेवाली अर्थप्रतीति में प्रयोजन, प्रकरण आदि अनेक पदार्थ सहायकरूप से कारण होते हैं । उदाहरण के लिए एक ही शब्द है 'राम', किन्तु

( १ ) मैं राम हूँ सब कुछ सह लूँगा ।

( २ ) हे प्रिये, किन्तु जिन्दगी का मोह रखने वाले केवल इस राम ने ही प्रेमोचित व्यवहार नहीं किया ।

( ३ ) तू राम का हाथ है, उस राम का जिसने कठोरगर्भा जानकी को क्षण भर में छोड़ दिया था, तुझे दया कैसी ? और

( ४ ) भगवान् समुद्र ? किनारे डेरा डालकर कुश की चटाई पर सो रहे राम पर अब तक आप ध्यान नहीं दे रहे हैं ?

इत्यादि भिन्न-भिन्न स्थितियों में उससे सकलदुःखभाजन, कारुणिक या भोरु, क्रूर या निष्ठुर, और सर्वशक्तिमान् तथा सविष्णु होने की प्रतीति होती है ।

१. समुद्र को सम्बोधित करके यह कहा जा रहा है—इसमें राम शब्द का अर्थ त्रिशुलवननायक, साक्षात्परमात्मस्वरूप—व्यक्ति है, जिससे उसका कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम् समर्थत्व जाहिर होता है

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ग्रन्थकार अपनी इस उक्ति को धनिकार के वाक्य द्वारा प्रमाणित करते हैं । उन्होंने 'शब्दार्थयोर्हि प्रसिद्धो यः सम्बन्धः = से लेकर—औपाधिकत्वात् प्रकरणाद्वच्छेदेन तस्य प्रतोते: = तक वाचकत्व या अभिधा को विशिष्ट अर्थ में नियत माना है और अर्थान्तर की प्रतीति में प्रकरण आदि उपाधि को हेतु ।'

इस प्रकार जब यह निश्चित हो गया कि शब्द किसी निश्चित अर्थ का ही ज्ञान करा सकता है तब उक्त राम आदि शब्दों में निश्चित रामत्व आदि के अतिरिक्त अनिश्चित दुःखैकपात्रत्व आदि का ज्ञान शब्द द्वारा कैसे माना जा सकता है । निश्चित अर्थों में तो शब्द का अभिधार्थव्यापार काम करता है, अनिश्चित अर्थों में जब उसकी कोई प्रवृत्ति नहीं होती तब बिना किसी व्यापार के शब्द उन अर्थों की प्रतीति नहीं करा सकता ।

शब्द का दूसरा कोई व्यापार ग्रन्थकार नहीं मानते इसलिए उन्होंने उक्त ढंग से प्रतिवादी का खण्डन किया है, इस प्रकरण में यह बात केवल एक ही पंक्ति से स्पष्ट होतीं है कि अभिधा के अतिरिक्त व्यञ्जना नामक कोई व्यापार नहीं है । वह पंक्ति है—व्यक्तेरचुन्तरस्य सन्निधानान्तरस्य चानुपपत्तेः ।

इससे उक्त उलझे कथन का इतना ही अर्थ निकाला जा सकता है कि संकेतित अर्थों में शब्द की अभिधा शक्ति रहती है, किन्तु औपाधिक अर्थों की प्रतीति में छद्मती कोई शक्ति शब्द में नहीं रहती । अभिधा को ही प्रत्येक अर्थ तक पहुँचाने में उन सभी अर्थों के साथ शब्द का संकेतग्रह अपेक्षित होगा, जो सम्भव नहीं है । प्रत्येक अर्थ में संकेतग्रह कराने की बात तो महाभाष्य के अध्ययन काल ये और तब भी सभी शब्दों का एक-एक करके पूरा परिगणन नहीं किया जा सका ! आखिर कितने अर्थों में संकेत किया जा सकता है । कुछ अर्थों तक वह-ठीक भी है । सभी अर्थों में संकेतग्रह होने पर भी किसी भी शब्द से कोई भी अर्थ निकाला जाने लगेगा जिससे शब्द प्रयोग का कोई फल ही नहीं रहेगा ।

न चानयोरन्यः सम्बन्धः सम्भवतीति तस्या: सामग्र्यैव सम्वन्ध-वलात् तद्रुमकत्वमुपपत्तिं न शाब्दस्स्येति, नार्थापेक्षया कश्चिद्विशेष इति व्यर्थै: सततपक्षोपन्यासै: ।

इन दोनों का ( शब्द और प्रतीमान अर्थ का ) और किसी सम्बन्ध हो सकना भी नहीं अतः उसी सामग्री ( अर्थ-प्रकरण आदि सहकारी परिस्थितिक उपायों ) में सम्बन्ध के द्वारा उसकी ( प्रतीयमान अर्थ की ) गमकता ठीक ठहरती है = शब्द की नहीं । इस प्रकार अर्थ पक्ष की अपेक्षा इसमें कोई विशेषता नहीं है इसलिए उस पक्ष को उठाना वृथा है ।

विमर्श: जब अर्थ की अनेकार्थकता सामग्री पर ही निर्भर है तो सामग्री को ही दूसरे अर्थ की प्रतीति में कारण मान लेना ठीक है । शब्द को नहीं । सामग्री = दूसरे अर्थ की प्रतीति में कारण अपने विभिन्न सम्बन्धों द्वारा सिद्ध होगी । उसकी यह कारणता गमकता = अनुमान रूप होगी । यहाँ 'अनयो:' शब्द किसका परामर्शक है यह स्पष्ट नहीं होता । महासूत्रदी मधुसूदन यहाँ वाच्य और प्रतिपाद्य का परामर्श बताया गया है । वस्तुतः ऊपर से वाच्य और सम्बन्ध की चर्चा नहीं—शब्द और प्रतीमान के सम्बन्ध की चर्चा आ रही है—शब्दाभिधेयतिरेकेण व्यापारान्तरमुपपद्यते येनार्थान्तरं प्रत्यायं साथ ही यहाँ 'सामग्र्यामकत्वमुपपत्तिं न शाब्दस्य' द्वारा शब्द की गमकत

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१५०

व्यक्तिविवेक:

जा रही है—अतः अर्थान्तर = प्रत्येय अर्थ का शब्द से ही सम्बन्ध नहीं रहता; पूथ॑: चानयोरन्य: सम्बन्ध: सम्भवति—में शब्द और प्रत्येयार्थ में ही अन्वयो: वा परस्परं लिङ्गसमझाना चादिये।

ननु यदि शाब्दस्यार्थेनिरपेक्षस्य वृथाऽऽकृतत्वं नेपयते, तन्न कथम् प्रारम्भ- त्यादौ प्रादीनां ज्योतकत्वमुक्तं, न वाचकत्वम्। वाचकत्वे हि हेत्वादि- त्वाद् धात्वर्थेऽङ्गसर्गकृत्स्नप्रसङ्ग: स्यात्। ज्योतकत्वे प्रकाशकत्वे वृथाऽऽकृतत्वे न तद्येक एवार्थ इति। सम्यम्। उक्तमुपचारतो न परमार्थत इति तस्य प्रदीपोपादि-निष्ठस्य वास्तचस्य शाब्दार्थविषयत्वस्य प्रतिपादनात्।

'अचिन्त्या, यदि निरपेक्ष शब्द को 'आकृति' माना नहों, तो 'प्रादि' आदि उपसर्ग पदों में आए 'प्र' आदि उपसर्ग पदों से जो अर्थ प्रोतित ( प्राप्त ) होगो पर तो भ्रात के ( आप आदि वे भूपद जिनमें 'भ' आदि वाचकता ( स्वीकृत करने पर ) होगी पर तो भ्रात के ( आप आदि वे भूपद जिनमें 'भ' आदि उपसर्ग लगते है ) हलादि ( हल् शब्द है आरम्भ में जिसके ) होने से यह् आदि की प्राप्ति होगी। ज्योतकत्व प्रकाशकत्व और वाचकत्व—दोनो एक् बात है ।'

( उत्तर ) ठीक । कहा दिया है कि 'उपचार से, परमार्थ से नहीं । ज्योतकत्व वाचक- मे तो प्रदीपादि में रहता है, शब्दे और अर्थ के बारे में उसका प्रतिपादन—अनुमानादार कर लिया जाता है ।

विमर्श : अनुमितिवादी ने 'रामोडुभिम सर्व: सदै' आदि में प्रकारणादि सामग्री द्वारा ही अथवा = सामग्री के आधार पर अर्थ = वाच्यार्थ द्वारा प्रत्येयार्थ की अनुमति मानों थी । इससे स्पष्ट होता था कि शब्द अपने अर्थ को बोध में रखता है । फिर सामग्री द्वारा उसका जब प्रत्येयार्थ से सम्बन्ध हो जाता है तो उसकी अनुमति कराता है । निष्कर्ष यह कि प्रतीतिमानार्थ की प्रतीति के लिये—वाच्यार्थ का उपस्थित होना अनिवार्य है । इस पर—न्यायनावादी आपत्ति देत है कि 'यदि—प्रतीतिमान अर्थ की प्रतीति में वाच्य अर्थ को प्रतीति अनिवार्य है तो प्रासम्—आदि पदों का 'प्र' आदि उपसर्ग पदों से जो अर्थ प्रतीत होता है—वह वाच्य नहीं बोला माना जाता है—वाच्य इसलिए नहीं माना जाता कि यदि प्र आदि भी वाचक मान लिये जायँ तो उनके साथ लगे क्रियापद के समान उनमें लगे 'प्र' आदि उपसर्ग भी क्रियावाचक होंगे तो उनसे—'यच्छ' प्रत्यय यों प्राप्त हो जायेगी । कारण कि—यदि प्रत्यय हलादि धातु से होते—'प्राप्त' में जब तक 'प्र' स्वतन्त्र अनुवाचक उपसर्ग था तब तक वह धातु नहीं था किन्तु जब वह वाचक हो गया तो क्रियापद हो गया—ऐसी स्थिति में आप् धातु में 'आ' आरम्भ का अक्षर न रहकर 'पू' आरम्भ का अक्षर हो गया । 'पू' 'हल्' है अतः प्राप्त' धातु पद हलादि धातु पद हुआ । और यदि नियम है कि जो क्रियापद 'हल्' अक्षर से आरम्भ होता है उससे यद्यन्त यद्लुगन्त क्रिया के यद् प्रत्यय यों प्राप्त होती है—इसके अनुसार प्राप्त धातु से भी यद् का विधान होने लगेगा, जो कि न्यायकारण विरुद्ध है । ऐसी स्थिति में = 'प्र' आदि वाचक नहीं माने जाने चाहिये ज्योतक ही माने जाने चाहिये । ज्योतक होने पर वे 'क्रियापद' के अङ्ग माने जाकर स्वतन्त्र माने जायेंगे निदान क्रियापद 'आप्' होगा— जो अजादि रहेगा—हलादि नहीं—अतः यद् की प्राप्ति न होगी ।

इसके उत्तर में अनुमितिवादी ने उत्तर दिया कि वस्तुतः प्र आदि उपसर्ग ज्योतक नहीं हैं । वे तो उपचार से ज्योतक मान लिये

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गये हैं। वास्तविक ज्योतक तो प्रदीप आदि ही होते हैं। शब्द नहीं। शब्द में समानता के कारण ज्योतकता का आरोप कर दिया जाता है।

अथोच्यते—पचत्यादयः क्रियासामान्यवचनाः। सामान्यानि चारो-

विशेषान्तर्भावभाजि भवन्तीति तत्प्रतीतिनान्तरीयकत्वयैच विशेषसन्निधौ

सिद्ध्यन्तु। यथा—'तिङ्विक्रोहं न सामान्यं शास्त्रनिषेधनिवृत्तिप्रतिपादनम्' इति

केवलमर्थेसामर्थ्येसिद्धेऽपि विशेषो ज्योतनमपेक्षत इति तन्मात्रव्यापारः

प्रादयः ज्योतका एव भवितुमर्हन्ति न वाचकाः इति।

और यदि कहा जाय कि—पचू आदि धातुपद सामान्य क्रिया के वाच्य हैं। और जो सामान्य

होता है उसमें सभी विशेषों का समाहार होता है, इसलिए सामान्य की प्रतीति से ही लगो-

लगी विशेष की प्रतीति हो जाएगी। जैसा कि कहा गया है—'खरविषाण के सींग' के तनातन सामान्य

विशेष से रहित नहीं हो सकता। इसलिए विशेष प्रतीत तो हो जाता है—सामान्य अर्थ का प्रतीति

से ही, सिर्फ वह (अपने) ज्योतन की अपेक्षा रखता है। वह ज्योतन प्रदीप उपसर्ग कर देते हैं कारण

कि उनका काम ही इतना है। इसलिए वे ज्योतक ही हो सकते हैं—वाचक नहीं।

विमर्शः प्रश्न का आशय यह है कि 'प्राप्त' आदि में 'आप्' आदि की अपेक्षा जो क्रियागत

प्रकर्षता आदि की प्रतीति होती है—वह 'आप्त' आदि सामान्य क्रियाओं के विशेष धर्म हैं। उनकी

प्रतीति सामान्य के साथ 'आप्त' आदि क्रियापदों से ही हो जाती है, कारण कि यह नियम है कि

सामान्य वस्तु विशेष से विहीन नहीं होती, जो विशेष से विशिष्ट होते हैं वह शाश्वतिवशात् के

समान होती ही नहीं—नील, पीत, हरित आदि रंगों हटा दिये जायँ तो रंग नान कं

वस्तु कुछ नहीं रहेंगे—वैसे ही सभी विशेष हटा दिये जाने पर सामान्य का अस्तित्व नहीं

रहेगा—अतः सामान्य विशेष की सत्ता माननी ही होती है। विचित्रता इतनी ही है कि यह विशेष

गुण—सामान्यवाचक पद से—साफ साफ नहीं झलकता। उसके लिये किसी उसके जानने वाले की

आवश्यकता होती है—वह = क्रियाओं में 'प्र' आदि उपसर्ग होते हैं। अतः 'प्र' आदि उपसर्ग

प्रकर्षता आदि विशेष का ज्योतन हो करते हैं, अभिधान नहीं। वे ज्योतक होते हैं, वाचक नहीं।

एतदर्थ—यही मानना ठीक है कि 'प्र' आदि में ज्योतकता ही—परमार्थिक है वाचकता नहीं—

जैसा कि अनुमितिवादी मानता है।

सत्यम्। किन्तु यद्यप्यतोऽपि सामान्यप्रतीतिरेव न पर्यवस्यति तद्विशेष-मात्रं तेऽप्यः प्रतीततां नाम। न तु तावता व्यवहारसिद्धिः काचित्।

तस्यााः प्रतिनियमविशेषावसायिनिवन्धनत्वात्। स तु पूर्ववतया प्रादुर्भावेऽन्यवचनवघ्यार्यते। न पचत्यादिभ्यः। नार्थादपि तत्सन्निधावसिद्धिः काचित्।

अस्याः प्रतिनियमविशेषावसायिनिवन्धनत्वात्।

ठीक है—जिनकी प्रतीति के बिना सामान्य की प्रतीति ही नहीं हो पाती जब वे सभी विशेष

उन (प्रादि) से प्रतीत भले ही हों, किन्तु उतने से सिद्धान्त नहीं चलाया जा सकता—कारण

कि—किसी खास विशेष का निश्चय कराने पर सिद्धान्त प्रचलित किया जाता है। खास—विशेष

का निश्चय पहले से नहीं हुआ रहता इसलिए वह 'प्र' आदि से ही प्रतीत होता—समझा जाता

है। पचू आदि क्रिया पदों से नहीं। अर्थ से भी (अर्थापत्ति प्रमाण से भी) उसके (व्यवहार

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१५२ व्यक्‍तिविवेक:

सिद्धि रूप = मान्यता ), सन्‍द्राव की सिद्धि नहीं होती। क्योंकि यह किसी निश्चित विशेष के निश्‍चयात्मक ज्ञान पर निर्भर रहती है ।

विमर्शः पूर्व पक्ष में कहा गया था कि सामान्य के अन्तर्गत सभी विशेषों की सत्ता रहती है अतः सामान्य के ज्ञान से विशेष का ज्ञान हो हो जायगा। ऐसी स्थिति में ‘प्र’ आदि उपसर्ग से जिस ‘प्रकर्ष’ आदि धर्मविशेष की प्रतीति ‘आप’ आदि क्रियापदों से ज्ञात अर्थ में होती है वह क्रियापद से ही हो जायगी। इस पर अनुमितिवादी उलट कर उत्तर देता है कि ‘ठीक है सामान्य के अन्तर्गत विशेष की प्रतीति हो जाय किन्तु उससे यह नियम नहीं बनाया जा सकता कि विशेष को प्रतीति ‘प्र’ आदि से नहीं होती केवल क्रियापद से ही होती है, कारण कि यह नियम तब बनाया जाता जब किसी खास विशेष की प्रतीति होती। सामान्य के अन्तर्गत तो सभी प्रकार के जाते हैं जैसे ‘गुण’ के अन्तर्गत रक्तत्व, पीलत्व, शुक्लत्व आदि सभी विशेष गुण, किन्तु गुण शब्द से कभी भी रक्तत्वादि विशेष गुण की रक्तत्व रूप से प्रतीति नहीं होती, गुणसामान्य रूप से प्रतीति होती है। रक्तत्वधर्मपूर्वक रक्तगुण की प्रतीति ‘गुण’ पद से नहीं हो सकती है और तभी यह नियम भी बनाया जा सकता है कि रक्तत्व की प्रतीति रक्तपद से ही हो । इसी प्रकार सामान्य क्रियापदों से प्रतीत सामान्य क्रियाओं में सभी विशेष क्रियायें तो रहती अवश्य हैं किन्तु उनकी प्रतीति विशेष रूप से न होकर सामान्य रूप से होती है, विशेष रूप से उनकी प्रतीति तभी होती है जब विशेषताद्योतक ‘प्र’ आदि कहे जाते हैं। अतः जब वहाँ प्र आदि से ही उत्पन्न दिखाई देते हैं तो उसके प्रति ‘प्र’ आदि को जनक माना जाय यही न्यायसंगत है। निष्कर्ष यह कि ‘प्राप्त’ आदि क्रियापदों में प्रकर्ष की प्रतीति ‘प्र’ के बिना नहीं होती। अतः प्रकर्ष का वाच्य वही ‘प्र’ माना जाना चाहिये । क्रियासामान्य = आप्, पच् आदि नहीं।

इसके बाद ‘नार्थान्तरपि तत्सन्‍द्रावसिद्धिः: काचित्—अस्या: प्रतीतिविशेषावसायनिबन्धनत्वात्’ यह पंक्ति उलझी हुयी आती है। इसका कोई निश्चित अर्थ नहीं लगता—‘न अर्थान्तर अपि’ नतु वात्’ यह अर्थ शाब्‍द का अर्थ किया जाय यह विचारणीय प्रश्न है। इसी प्रकार तत्सन्‍द्रावसिद्धि के तत् पद का । मधुसूदनो विद्वत्ति में इनमें से प्रथम—अर्थान्तरपि का = ‘अर्थान्तरस्यापि’ अर्थ किया गया है और ‘तत्सन्‍द्राव’ के तत् का न्यायवहारसचा ।

तस्माद् यत्प्रयोगान्वयवद्यथातिरेकानुविधायिनो यस्‍तत्र प्रतीतिस्‍तथाच वाचकभावव्यवहारविषयत्‍वमेवोपगन्‍तुं युक्तं नामिविध्यचिकीषयत्वम् । यथा घटशब्दतदर्थयोः ।

प्रादिप्रयोगानुचिन्‍यायिनो तत् पचतीत्यादौ प्रकर्षादिप्रतीतिरिरिति तेऽपि तथैव भवितुमर्हन्‍येव । अन्यथा नीलोत्पलादौ सर्वस्‍पैव विशेषणाभिमततस्‍य नीलादिशब्दस्‍य विशेष्यवाचिनश्रोत्पलादेर्‌विशेष्यस्‍मात्‌व्यवहारोSस्‍तुमुपगच्छेत् । तत्‌आपि होतच्छकुयन्‍ वक्तुम्‌ । उत्पलादयः शब्दाः सामान्‍यवचनाः । सामान्यानि च गर्मीकृतविशेषाणि भवन्ति तेभ्यां तत् सन्‍द्रावसिद्धिः सत्या नीलादिशब्दा अपि तत्तद्‌व्योतनमात्रच्‍छायापारा: प्रादिपदं योतकं भवितुमर्हन्ति नामिधायक इति ।

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इसलिए = जिसके प्रयोग के भाव-अभाव में जिसकी प्रतीति का भाव-अभाव हो उन दोनों में वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध ये (अभिधा के ) व्यवहार का विषय माना जाना ही ठीक है,

भिन्न्यस्ति मे न.न.तार था विपय नहिं। जैसे घट शब्द और उसके अर्थ का । 'पचति' आदि स्थलों में 'प्र' आदि वीप्सित 'प्र' आदि के भाव-अभाव का अनुविश्लेषण करने वाले है अतः वे भी

तद्गतान्नि समनन्ध ( सभिधा ) विशिष्ट हो सकतें हैं। यदि ऐसा नहीं मानेंगे तो 'नील उत्पल' आदि स्थानीं में सवंत विशेषण रूप से मान्य नीलादि शब्द और विशेष्यवाची उत्पल आदि

तयों का विशेषण-विशेष्यभाव सम्बन्ध भी समाप्त हो जायगा। क्योंकि यह बात तो वहाँ भी हती जा सकती है कि उत्पल आदि शब्द सामान्य पुष्प के वाचक हैं और सामान्य सभी विशेषों

हो अपने मातर न.ल रहतें है मत्र नियग के अनुसार उनकी ( नील गुण आदि विशेषणार्थों की ) ( उत्पल आदि सामान्य वाचक विशेष्य पदार्थों में ) अस्तित्व के सिद्ध हो जाने पर नील

आदि शबनं मे अननना अर्थीं ( नील आदि अर्थों ) यो केवल घोतित करने वाले ( होने से ) 'प्र' आदि के समान न.हीं वोतिरित हें—होंगे अभिधायक नहीं।

विमर्शः : नियग मत्र नन.तार जाना नाहिपे कि जिस शब्द के प्रयोग पर जिस अर्थ की प्रतीति हो और प्रयोंग न होने पर ( प्रतीति ) न हो—उन दोनों में वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध

हना। अनना नाहिपे । अनमे मे शबनं मेा वाचक और अर्थ को वाच्य माना जाना चहिए। 'प्र' आदि समासं जोर 'पचन्' आभ्दि अर्थों प्रतीति में यह बात देखी जाती है। 'प्र' आदि

के प्रयोग पर ...प्रयायनि: मत्र की प्रतीति हतीी है और प्रयोग न होने पर नहीं। अतः 'प्र' आदि को वानचक और प्रक्तयं आभ्दि को वानच्य माना चहिए। इसमें प्रमाण हैं नीलोत्पलादि विशेषण

विरोषयों मत्र एतत् सार्थ प्रयोम । अकेले सामान्य से सभी विशेषों की प्रतीति मान लेने के अनुसार उत्पल द्रन्या है इसमें गुणा हहतेी ह। नील मत्र एक गुण है अतः उसकी इसमें प्रतीति हो ही

जानां नाहिपे—चूँकि सथति मे उत्पल को ह्री नील का वाचक मानकर नील को गुण विशेष

माना जाना नाहिद, वच.तनु—ऐसा माना नहीं जाता। माना जाता है उन्हें वाचक

ह। नाहिंके लच्तिक मानने आभ्ले वही कारण यही अन्वयव्यतिरेक है—नील शब्द के प्रयोग पर

नील गुणा रूप अर्थ म. प्रतीत हती है और प्रयोग न होने पर नहीं—अतः इस अन्वयव्यतिरेक

के आभ्लार पर 'भ' आह्दि को प्रक्तयं आदि का वाचक मानना ही चहिए।

पचाअन्तर्माच्रिपरिचार्तिततया सिद्धसद्र्दावानां घटादीनां घटादिशब्दा अप द्रोन्तका पत्व स्मृः, न वाचकका इति वाच्यवाचकव्यवहारोडस्तामियात्। नम्मातं भाक्तमत्य्रोतकत्वमुपगन्तव्यं न सुखयम्। भक्तद्रेक्ष प्रयोजनं वाच्य-

स्यार्थेस्य स्फुटतरवग्राह्यतया निमित्तं च विरेषणविशेष्यप्रतीत्योराजुभा- वितया कमानुपलक्षणात्तु सद्भावप्रतीति: ।

और यनित यहाँ माननना हि ( तो ) घट आदि शब्दों को भी घट आदि अर्थों का घोतक

हा मानना चहिए क्योंकि घट आदि अर्थ मनन में ( अन्तः ) विधमान रहते ही है। इस प्रकार

वाच्यवाचकभाव हत्र अस्ना हो जायगा। इसलए घोतकता औपचारिक ही मानी जानी चहिए— पारमाथिक नहह। लपचार था प्रयोजक मानना चहिए वाच्य ( कथनীয় ) अर्थ की साफ-साफ

प्रतीति और कारण माननना चहिए। विरेषण विरोध्य की साथ-साथ प्रतीति, कारण कि वे इतनी

जसर्दी हतीी है कि उनका कम समझ में नहह आता ।

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विमर्शः तस्माद्वाक्तमेव* *इस पङ्क्ति का अर्थ व्यापक भी हो सकता है और संकुचित भी । व्याप्त हो सकता है—इसलिए कि इसे शब्द और प्रतोयमान अर्थ के साथ माने जाने वाले अभिधेयकत्व को औपचारिक सिद्ध करने वाला कहा जा सकता है और—उसके प्रसंग में आये निपात की ‘घोतकता’ को औपचारिक सिद्ध करने वाला । वस्तुतः यहाँ निपात की घोतकता को ही खण्डनार्थ प्रयुक्त मानना चाहिए—कारण कि आगे पुनः निपात के विषय में चर्चा की जाने वाली है ।

द्विविधं हि विशेषणमित्थं* *अन्तरङ्गं बहिरङ्गं चेति । तत्राद्यमञ्जयवद्हिलोहेवर्थेकारि लक्षणावचत् स्पाटिकादेः । द्वितीयञ्जुभयरूपमञ्जयस्कान्तामिव लोहम्य । तदिद व्यबहितमपि लोहे स्वां शक्तिमुपदर्शयत्येव । तदपि द्विविधम् समानाधिकरणं भिन्नाधिकरणं चेति । विशेष्योऽपि द्विविधो द्रव्यार्थे श्रोति । तत्रोपसर्गाः प्रायो द्रव्यर्थो विषयो न नामार्थः । चादीनां तु निपातानामुभयमपि । केवलं तेषां विशेष्यात् पूर्वं पश्चाद्वा क्रमेण प्रयोगे नियोक्तोडवगन्तव्यः । नान्येषां विशेषणानाम् ।

विमर्शः : विशेषण दो प्रकार के होते हैं—अन्तरङ्ग और बहिरङ्ग । अन्तरङ्ग विशेषण वे कहलाते हैं जो विशेष्य से सटकर रहकर ही उसमें विशेषता लाते हैं । उदाहरण के लिए स्फटिक वाली एक कोई चीज ले सकते हैं । ये चीजें दर्पण में अपना रंग तब भी संक्रान्त कर सकती हैं जव वे उसके पास रहें । दूर रहने पर दर्पण पर अपना रंग नहीं जमा सकतीं । यहाँ दर्पण विशेष्य स्थानीय है और लाल, पीली, वस्तु विशेषण स्थानीय । बहिरङ्ग विशेषण वे होते हैं जो पास ही नहीं दूर रहकर भी विशेष्य में विशेष्यता उत्पन्न करते हैं । उदाहरण ग्रन्थकार ने चुम्बक ( अयस्कान्त ) और लोहे का दिया है । चुम्बक दूर रहकर भी लोहे में अपना विद्युत्सञ्चार कर देता है और पास रहकर भी । प्रकृत में निपात और उपसर्गों की गणना पहले प्रकार के विशेषण ( अन्तरङ्ग ) में की गई है । दोनों उपसर्ग और निपात अपने विशेष्य के साथ ही रहकर अपनी शक्ति उसमें अन्तर्हित करते हैं । विशेष्य दो प्रकार के होते हैं धात्वर्थ और नामार्थ । धात्वर्थ का अर्थ है क्रियापदार्थ= पचति, गच्छति, हरति आदि और नामार्थ का अर्थ हैं संज्ञावाचक पदार्थ= गौ, नील, राम आदि—जाति, गुण और द्रव्यवाचक ।

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प्रथमो विमर्शः

क्रियापदार्थ होते हैं और निपात के क्रियापदार्थ तथा संज्ञापदार्थ दोनों, किन्तु उनमें भी संज्ञापदार्थ के लिए ही उपसर्गों का प्रयोग अधिक होता है। उपसर्ग अपने विशेष्य—क्रियापदार्थ के पहले रहते हैं और निपात अपने विशेष्य संज्ञापदार्थ के पीछे। इस नियम में किसी प्रकार का दो अपवाद है।

तदेयं विशेषणविशेष्यस्वरूपेडवसि ते यदेतदन्तरङ्गं विशेष्यमुक्तं तद् गवादीनां गोत्वादिवद् विशेष्यस्वरूपान्तर्भूतमिच्छति तथ्प्रतीत्योत्पत्तौ राधुभावितया क्रमानुपलक्षणात्। स्वभावावयवमे द्योत्यद्योतकभावसमहेतु:। अत: पन केचिदेयां धात्वन्तर्भावमिच मन्यमाना:--

'अडादीनां व्यवस्थार्थं पृथक्त्वेन प्रकल्पनम्। धातूपसर्गयो: शास्त्रे धातुरेव च तादृशा:॥ इत्यादवोचन्।

तो इस प्रकार विशेषण और विशेष्य का स्वरूप निश्चित हो जाने पर—लो। यह अन्वयक विशेषण कहा गया है वह गो आदि में गोत्व आदि के समान अपने विशेष्य स्वरूप में विलीन सा रहता है अतः उनकी प्रतीति के अतिशीघ्र हो जाने से क्रम के न दिखाई देने के कारण (अन्वयक विशेषणों का ) ज्ञान द्योतयद्योतकभाव के भ्रम का कारण है। इसीलिए कुछ लोग इनका (निपात आदि अन्वयक विशेषणों का ) धातु में अन्तर्भाव मानते हुए यहाँ तक कह बैठे हैं कि—

'शास्त्र में धातु और उपसर्ग के मित्र रूप होने की कल्पना अडादि को व्यवस्था के लिए है। वस्तुत: पूरा धातु का ही रूप है।'

विमर्श: अन्तरङ्क विशेषण विशेष्य के रूप में द्विप जाता है, जैसे गो द्रव्य में गोत्व जाति। इसलिये दोनों के ज्ञान इतने शीव्र हो जाते हैं कि उनका क्रम परिलक्षित नहीं हो पाता। इसलिये क्रम ज्ञान के अभाव से ऐसा प्रतीत होता है कि उन (अन्तरङ्क विशेषण और विशेष्य) की प्रतीति एक साथ होती है। वैसे इसीलिए एक साथ दोनों की प्रतीति के भ्रम से लोग उनमें द्योतयद्योतकभाव मान बैठते हैं। वस्तुत: ऐसे विशेषण और विशेष्य दोनों के अपने-अपने अर्थ होते हैं। इसीलिए—भर्तृहरिजी ने वाक्यपदीय में 'अवापत्र' आदि क्रिया पदों में 'अवाप्' इतने को क्रियापद माना है, उनमें 'अव + आप्' इस प्रकार अव उपसर्ग और आप् को वे मिन्न केवल इसलिड़ मानते हैं कि अपूर्णभूत ( Imperfect या लङ्लकार ) सामान्यभूत ( Aorist लुङ् ) और हेतुहेतुमद्भूत ( Conditional mood लङ्लकार ) में धातु के पहिले 'अत्' या आट् ( Augment ) ये दृश्य जोड़े जाते हैं। इन्हें संस्कृत में आगम कहा जाता है। यदि उपसर्गों को धातु रूप में ही लिय। जाना तो इन शब्दों के उपसर्ग के पहिले जोड़े जाने की बात खटकेगी, किन्तु उक्त मन्नों लकारों क्रियाओं में ऐसा नहीं देखा जाता। ये आगम सदैव उपसर्गों के बाद और क्रिया के पहिले जोड़े जाते हैं। यह व्यवस्था बनी रहे इस उद्देश्य से उपसर्गों को धातु से अलग करके गिना। जाता है। अर्थ की दृष्टि से तो धातु और उपसर्ग दोनों एक ही हैं। इस तथ्य की पुष्टि भतृहरि की इस कारिक। से होती है वह इस प्रकार है—

'तथाहि संघामयेते: स्वोपसर्गो विधि: स्मृत:। क्रियाविशेषा: सद्दान्ते: प्रकट्यन्ते तथाविधा:॥' अर्थात् 'संघामन्' एक धातु है। उसके रूप = संघाम्यति, संघाम्यामास, संघामयिता, संघाम-

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२५६

व्यक्तिविवेक:

विषयति, असंग्रामयत इस प्रकार चलते हैं। इस धातु में सम उपसर्ग है। उसके पूर्व-अट देखा जाता है यथा-असंग्रामयत में। अतः उपसर्ग क्रिया के ही रूप हैं।

आधुनिक भाषाविज्ञान शास्त्र से इस तथ्य की पुष्टि और भी हो जाती है। उसके अनुसार-प्रकृति और प्रत्यय—अलग-अलग अर्थों में स्वतन्त्र रूप से व्यवहृत होते मानें जाते हैं। वेद में क्रियापदों से उपसर्गों का स्वतन्त्र रूप से अलग प्रयोग होता भी है। अतः लौकिक संस्कृत में यदि उपसर्ग धातु रूपों के साथ अत्यन्तिक रूप से मिलकर ही प्रयुक्त होने लगे हों—तब भी उनका अपना अर्थ माना जाना चाहिए और उन अर्थों में उनकी स्वतन्त्र शक्ति भी मानी जानी चाहिए। उन्हें शौतिक मानकर उनकी शक्ति का अपलाप नहीं किया जाना चाहिए।

महिमभट्ट ने इतना कहने के बाद भी एक शंका का समाधान नहीं दिया। वह थी यड् आदि प्रत्ययों के विधान की। इसका उत्तर दो प्रकारों से निकाला जा सकता है। एक तो—अडादीनां व्यवस्थार्थम् = इत्यादि वचन से। उसके अनुसार जैसे अड् की व्यवस्था के लिए धातु और उपसर्ग दोनों को दो स्वतन्त्र वाचक मानकर पूर्ण क्रिया की शक्ति दोनों के अर्थों के सम्मिलित रूप में मान ली जानी चाहिए। न्याय और व्याकरण इस बात पर जोर देते भी हैं—वे पचति आदि में पच का विक्षिप्त्यनुकूल व्यापार अर्थ मानते हैं और ‘ति’ का आश्रय तथा वर्तमानकाल, बाद दोनों का सम्बन्ध जोड़ते हैं। वैसे ही उपसर्ग और क्रिया पद का अन्तर मान लिया जाना चाहिए और अर्थावबोध में दोनों को स्वतन्त्र।

चादीनां चोपाधीनां विशेषोऽभ्यो निर्मलेऽभ्यः स्फुटिकोपलेप्य इव लक्ष्य-दीयमानव्यवधानमेव। नान्यत्रेति यत्तेषां भिन्नक्रमतया ऋचिदुपादानं तदनुपपन्नमेव अयथास्थान-विनिवेशिनो हि तेऽर्थान्तरमनभितमेव स्वोपरागेऽपि परज्ञ्येयुः। ततश्च प्रस्तुतार्थस्यासामञ्जस्यप्रसङ्गः। कथं हि वा भिन्नक्रमतयाऽभिमतार्थसम्बन्धो- पकल्पने प्रस्तुतार्थप्रतीतिविघ्नितत्वात् तद्विनन्धने तसास्वादोदपि विध्नितः स्यात् शब्ददोषाणामनौचित्योपगमात् तस्य च रसभङ्गहेतुत्वात्। यथाहु:-

और (इसी प्रकार) ‘च’ आदि (निपात रूप) उपाधियों (विशेषणों) का भी (अपने) विशेष्यों से वैसे ही अवयवधान होता है जैसे=लाह आदि का स्फटिक मणि आदि से। इस कारण—वे (च आदि) जिसके बाद प्रयुक्त किये जाते हैं उसमें विशेष्य का आधेय करते हैं, और किसी में नहीं, इसीलिए इनका कहीं कहीं जो (इस क्रम से) भिन्न क्रम से उपयोग होता है वह अनुपपन्न—अनुचित है। ठीक स्थान पर प्रयुक्त न किये जाने पर वे किसी दूसरे ही अर्थे को जो अभीष्ट न होगा अपने रङ्ग से रँगेंगे (अपनी विशेषता का उसमें आधान करेंगे)—और वैसा होने पर प्रस्तुत अर्थ की सङ्गति ठीक नहीं होगी। मान लीजिये जैसे तैसे क्रम तोड़कर भी अभीष्ट अर्थ से सम्बन्ध जोड़ दिया जाय—तब भी प्रस्तुत अर्थ की प्रतीति में विघ्न पड़ जाने से—उस पर आश्रित रसास्वाद में भी विघ्न पड़ जाएगा, कारण कि शब्द के दोषों को अनौचित्य मान लिया गया है (द्वितीय विमर्श के आरम्भ में) और उसे (अनौचित्य) को रसभङ्ग का हेतु। जैसा कि कहा है—

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प्रथमो विमर्शः

'अनौचित्यादते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ।।' इति अनौचित्य को छोड़कर रसभङ्ग का और कोई हेतु नहीं होता ।... प्रसिद्ध औचित्य की प्रतिष्ठा = रस का मूल रहस्य है ।

विमर्शः : 'च' आदि निपात अन्तरङ्ग विशेषण हैं, वे अपने विशेष्य से लगकर ही आने चाहिए, दूर कर देने से वे जिससे लगकर प्रयुक्त होंगे—उसमें अपने अर्थ का आधान करेंगे । यदि शब्द से भी उनका अर्थ अभीष्ट अर्थ के साथ जोड़ने का प्रयत्न किया जायगा—तो शब्द से रस की प्रतीति तक पहुँचेंगे—यह प्रयत्न विफल बनेगा—जो अनुचित होगा—और अनौचित्य—के कारण दूषित होगा—कारण कि अनौचित्य को ही दोष कहा गया है ।

स्वाभाविकं ध्वननेयुक्तं व्यञ्जकत्वं न दीपवत् । धूमवत् किन्तु कृतकं सम्वन्धादेरपेक्षणात् ।। ५८ ।।

विमर्शः : शब्द सम्बन्धविशेष को लेकर व्यञ्जक माना जाता है ध्वून भी उसी प्रकार सम्बन्ध विशेष को लेकर व्यञ्जक नहीं । व्यञ्जक के समान होता है । सच्चा व्यञ्जक होता है दीपक । वह सम्बन्ध की अपेक्षा नहीं रखता । यहाँ 'ध्वनन' का अर्थ दूसरों द्वारा ध्वनि रूप से मान्य शब्द है । 'ध्वनन' इस द्योत्पत्ति के आधार पर पहले—शब्द को भी ध्वनि कहा जा चुका है ।

प्रादीनां ध्योतकत्वं यत् कैश्चिद्‌भिरुपगम्यते । तद् भाक्तमिव तत्रेष्टं न मुख्यं तदसम्भवात् ।। ७९ ।।

विमर्शः : यह तथ्य अभी निपात उपसर्गों के प्रसङ्ग में उपस्थित किया जा चुका है ।

तथा हि यस्य शब्दस्य भावाभावानुसारिणी । यदर्थबुद्धिस्तस्यासौ वाच्योऽर्थ इति कथ्यते ।। ७६ ।।

क्योंकि जिस अर्थ का ज्ञान जिस शब्द के भाव ( अन्वय ) और अभाव ( व्यतिरेक ) का अनुसरण करता है—वह ( अर्थ ) उस ( शब्द ) का वाच्य कहा जाता है— गोशब्दस्येव गौरर्थे; सान्निध्यात् त्वव्यवस्थिताः । वाच्यत्वव्यवहारेऽपि न स्यादर्थस्य कस्यचित् ।। ७७ ।।

प्रादिप्रयोगानुगमव्यतिरेकानुसारिणी । प्रकर्षादौ मतिस्तेन तस्य तद्वाच्यता न किम् ।। ७८ ।।

इसलिए—जब प्रकर्ष आदि ( अर्थ ) की प्रतीति 'प्र' आदि ( शब्दों ) के अन्वय और व्यतिरेक

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विशेषवगमस्याभुभावादुपलक्षणात्

क्रमस्य सद्भावाच्चैव अमो सक्तेनैवबन्धनम् ॥ ५९ ॥

विशेषणं तु द्विविधमान्तरं वाह्यमेव च ।

नात्राद्यवहेलिनं सदृ यदर्थैकत्वे तदात्मताम् ॥ ६० ॥

स्फुटत्वकसत्त्वे लक्ष्यादि द्वितीयः शुध्यात्मकम् ।

आयससत्त्वेव नर्तकान्तं तदपि त्रिविधं मतम् ॥ ६१ ॥

असमानतमानाविकरणत्वविभेदतः

विशेष्योऽपि द्विधा द्वेयो धातुनामार्थभेदतः ॥ ६२ ॥

शब्ददत्वार्थेल्वभेदेन नामार्थोडपि द्विधा मतः ।

तत्स्वोपसर्गाणां प्रायो वाच्यार्था विशिष्टा मतः ॥ ६३ ॥

चादीनां तु निपातानामध्यं परिक्रीतिनम् ।

क्वेलं तु विशष्यतां स्युः पूर्व पर्यायेनात्रितम् ॥ ६४ ॥

विशेषणानामन्येषां पौर्वापर्यमयन्त्रितम् ।

इत्थं स्थिते स्वरूपेडस्मिन् विशेषणविशेष्ययोः ॥ ६५ ॥

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यदन्तरङ्गमुविद्धंमुभयात्‍मा विशेषणम् । विशेष्ये मञ्ञसदृक् गवि गोत्वमिव स्थितम् ॥ ८६ ॥

अत पच्‍आदुभावित्‍वात् तत्‍प्रतीत्योः कमाद्‍बहः । यन्मूलश्रायमनयोद्योतयोःकतताभ्रमः ॥ ८७ ॥

प्रादीनां धातुगर्भेत्‍वोपगमाच्च युक्तवान् । अडादीनां व्यवस्थार्थेऽमित्यादि विधुपां वरः ॥ ८८ ॥

अत एव व्यघ्रहिताैकुया नेच्छन्ति चादिभिः । सम्‍वन्धं ते हि शक्तिं स्वारुपदध्‍युरन्तरे ॥ ८९ ॥

सान्तरतवे तु तां शक्तिमन्यचैवादध्यमी । तत्‍क्षार्थीसामञ्ञस्यादानौचित्यं प्रसज्यते ॥ ९० ॥

वहिरङ्गान्तरङ्गत्वभेदात् तद् द्विविधं मतम् । तत्र शाब्दैकविषयं वहिरङ्गं प्रचक्षते ॥ ९१ ॥

द्वितीयमर्थविषयं तत् त्‍याघैरेव प्रदर्शितम् । तत्‍स्वरूपमतोडस्माभिरिह नातिप्रतन्यते ॥ ९२ ॥

परम्परासाक्षाच्च तदेतत् प्रतिपच्यते । कवेरङ्गकुसुमरसाभनिमित्तताम् ॥ ९३ ॥

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१६०

व्यक्तिविवेक:

यत् त्वेतच्छब्दविषयं बहुधा परिदृश्यते । तस्य प्रभेदाद्या दोषाः पञ्चैव योनयः ॥ ९४ ॥

यह जो शब्द में रहने वाला (अनौचित्य) है वह दिखाई तो देता है बहुत प्रकार का किन्तु प्रकार भेद आदि पाँच दोष ही उसकी जड़ हैं ।

तेभां संक्षेपतोऽस्माभिः स्वरूपप्रभिदास्यते । यस्तु प्रपञ्चः पञ्चानां स्वयं तमवधारयेत् ॥ ९५ ॥

इति संग्रहश्लोका:

हम उनका ( पाँच दोषों का ) तो स्वरूप संक्षेप में ( आगे द्वितीय विमर्श में ) कहेंगे किन्तु उनका जो विस्तार है उसे पाठक अपने आप समझें ।

विमर्शः संग्रहकारिका ९१ से ९५ तक जो विषय उपस्थित किया गया है वह पहले मूल में नहीं आया है । उसके लिए महिमभट्ट ने द्वितीय विमर्श की रचना की है ।

ध्वनिकार ने ध्वन्यालोक में—काव्य का सामान्य लक्षण नहीं दिया । उन्होंने सीधे-सीधे— ध्वनिकाव्य का लक्षण दिया = 'यत्रार्थः शब्दो वा' इत्यादि । इस पर व्यक्तिविवेककार आपत्ति देते हैं—

किन्तु काव्यस्य स्वरूपं व्युत्पादयितुकामेन मतिमता तललक्षणमेव सामान्येनाख्यातव्यम्, यत्र वाच्यप्रतीयमानयोर्योगेऽस्यगमकभावसंस्पर्शोऽस्ति तत् काव्यमिति, तावतैव व्युत्पत्तिसिद्धे:। यत्तु तदनाख्यायैव तयोः प्रधानेतर- भावकल्पनेन प्रकारद्वयमुक्तं तदप्रयोजकमेव । यो हि यद्विरोधप्रतीतो निमित्तभावेन निश्चितः स एव तदर्थिनः प्रतिपाद्यो भवति नान्यः; अति- प्रसङ्गात् । यथा दण्डप्रतीतौ दण्डः । अनुमेयार्थसंस्पर्शिमात्रं चान्वयव्यतिरे- काव्यां काव्यस्य चारुत्वहेतुर्निश्चितम् । अतस्तदेव वक्तव्यं भवति न त्वस्य प्राधान्याप्राधान्यनिरूपणं विरोधः ।

और काव्य का स्वरूप समझाने के लिए इच्छुक (उस ) बुद्धिमान ( पुरुष = ध्वनिकार ) को उसका ( काव्य ही का ) लक्षण ( वह भी ) सामान्य रूप से इस प्रकार उपस्थित करना चाहिए—‘काव्य वह है जिसमें वाच्य और प्रतीयमान का गम्यगमकभाव सम्बन्ध हो’—कारण कि इतने से ही बात समझ में आ सकती है । उसे बिना कहे ही प्राधान्य तथा अप्रधानता को लेकर जो दो भेद कहे हैं वह अनुप्रयोजक = बे मतलब की बात है । ( कारण कि ) जिस विशेष की प्रतीति में जो निमित्ततरूप से निश्चित होता है उस (विशेष ) के जिज्ञासु के लिए वही (निमित्तभूत अर्थ ही ) कहा जाना चाहिए, और कोई नहीं, क्योंकि (वैसा न करने से ) अति प्रसङ्ग— अतिव्याप्ति होगी; जैसे दण्डी की प्रतीति में दण्ड । और काव्य में चारुत्व का हेतु अन्वय- व्यतिरेक से अनुमेय ( अर्थ के ) अंश का संस्पर्श है, अतः कहना उसी को चाहिए, न कि प्राधान्यता और अप्राधान्यता से उत्पन्न उसके विशेष को ( अर्थ, अंश ) ।

विमर्शः व्यक्तिविवेककार—वस्तु, अलङ्कार और रसध्वनि में चमत्कार को लेकर कोई भेद नहीं मानते । वे उसी काव्य को काव्य मानते हैं जिसमें अनुमेय अर्थ हो । अनुमेय अर्थ उनके मत में सदैव प्रधान ही होता है, अतः ऐसा कोई काव्य ही नहीं है जो अनुमेय अर्थ से रहित हो

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और उसे सामान्य मानकर अनुमेय अंश वाले काव्य को विशेष काव्य माना जा सके। ऐसी स्थिति में सामान्यकाव्य और विशेषकाव्य दोनों में कोई भी काव्य हो—एक दूसरे से भिन्न सिद्ध नहीं होते। ध्वनिकार ने—ध्वनि को लेकर काव्य को विशेष कहा था। उस पर महिमभट्ट का कहना है कि यद्यपि वस्तुतः काव्य में सामान्य या विशेष का अंतर होता नहीं है, यदि बिना तर्क के आँख बंदकर मान भी लिया जाय तो—निर्वाचनकर्ता को विशेष के पहले सामान्य का निर्वाचन करना चाहिए, कारण कि सामान्य काव्य का ज्ञान विशेष काव्य के ज्ञान के प्रति कारण है, जो कारण होता है, उसका ज्ञान पहले करा दिया जाने पर उसके कार्य का ज्ञान संभव होता है। दृण्डी का ज्ञान होने पर दृण्डी (दण्डी/दण्ड वाले) का ज्ञान होता है। आनन्दवर्धनाचार्य ने वैसा न करके ध्वनिकाव्य का ही लक्षण निर्वाचन कर दिया था उसका कारण = काव्य के सामान्य लक्षण पर उनका जोर न देकर ध्वनिलक्षण पर जोर देना था—ध्वन्यालोक में ध्वनि ही प्रतिपाद्य विषय है। उसका निर्वचन किया जाना अपेक्षित था, उसके पहले सामान्य-काव्य का लक्षण—दृण्डी, भामह और वामन कर चुके थे। इस बात को वृत्तिग्रन्थ में ‘शब्दार्थशरीरं तावत्काव्यम्’ द्वारा उन्होंने स्पष्ट भी कर दिया है। इस प्रकार वस्तुतः ध्वन्यालोककार का अपने क्रम में कोई दोष नहीं है, तथापि महिमभट्ट सामान्य और विशेष दोनों काव्यों को एक सिद्ध करने के लिए इस की अपेक्षा रखते थे कि आनन्दवर्धन के ही द्वारा सामान्यकाव्य का भी लक्षण किया गया होता, और तब वे दोनों का अभेद सिद्ध करते। ऐसे यदि अपने मत से ही आनन्दवर्धन को ओर से कोई काव्यसामान्य का लक्षण वे बनाते हैं—तो प्रतिपक्षी उनमें दोष दे सकता है।

यहाँ एक बात ध्यान देने की है—वह यह कि महिमभट्ट ने जो काव्यसामान्य का लक्षण अपने मन से ऊपर किया है—वह अपनी मान्यता के अनुसार। उसमें अनुमेय को उन्होंने जोड़ दिया है—और ध्वनि को हटादिया। साथ ही ध्वनिवाले काव्य को ध्वनिवादी ने विरुद्ध माना था—उसे ध्वनि के स्थान पर अनुमेयार्थ रख कर वे सामान्य मानते हैं।

न हि तयोः सामान्यविशेषयोः स्वरूपपि वस्तुमात्रादिध्वनुमेयेपु चेतन-चमत्कारकारी कश्चिद्विशेषोडवगम्यते ।

तत्र वस्तुमात्रस्य प्रधान्ये यथा—

'वच्च मह विअ एक्काए होन्तु णीसासरोअइअव्वाइमु । मा तुज्झ वि तिप्प विण दक्खिण्णहअस्स जआअन्दु ॥' ( व्रज ममैवैकस्या भवन्तु निःश्वासरोदितानि । मा त्वयापि तथा विना दाक्षिण्यहतस्य जनितपतत् ॥ )

'जाओ, अकेली मेरे ही निःश्वास और अश्रुपात हो, मुलायेज (दाक्षिण्य) के मारे हुए तुम्हारे भी उस (तुम्हारी प्रियतमा) के विरह में हो—यह ठीक नहीं।' इस उदाहरण में।

विमर्शः यहाँ = तृतीय विमर्श पर स्वयं व्यक्तिविवेक के अनुसार नायक का दूसरौ १९ नय० वि०

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१६२

व्यक्तिविवेक:

नाधिकापर अनुराग = प्रधान रूप से व्यक्‍त होता है—यद्यपि जो गमलवार है—उममें अनुप्रेय वस्तु के ही अप्राधान्य में यथा—

तस्यैवाप्राधान्ये यथा— 'लावण्यसिन्धुरपरेव हि केयमत्न यत्रोत्पलानि शशिना सह सम्प्लवन्ते । उन्मज्जति द्विरदकुम्भटी च यत्र यत्रापरे कदलिकाण्डमृणालदण्डा: ॥'

'लावण्य की यह कौन सी कोई दूसरी ही नदी है जिसमें नद्‍‌न के साथ गमल उमड़ते हैं, और जहाँ ( एक ओर ) हाथी के कुम्भटट निकल रहे हैं ( तथा नालों में ) कदली स्तम्भ तथा मृणालदण्ड !'

विमर्श: यद्यपि विरोधमूलक निगीरीयाधयवसाना अतिशयोक्ति ममंकारकृतिरूप है । इसमें उपमेय का शब्दतः उपादान नहीं है, तथा जिस उपमानभूत नदी का उल्लेख है उसमें एक साथ नोलोत्पल तथा चन्द्र, गजकुम्भ तथा मृणाल और—द्विरदकुम्भटी का अतिशय दिखलाया गया है । व्यक्तिविवेककार के अनुसार ऊपर के पद्य से इसमें बोझि विशेष गमकवार नहीं है दोनों में प्रतोयमान अर्थ एक सा ही है ।

यथा च— 'अनुरागवती सन्ध्या दिवसससत्पुरस्सर: । अहो दैवगतिविचित्रा तथापि न समागम:' ।।

साँझ अनुराग ( ललोच् और रतिभाव ) से युक्त है और दिन उसके सामने उपस्थित है । विधाता की गति विचित्र है कि इतने पर भी मिलन नहीं हो रहा था ।

विमर्श: यहाँ भी प्राधान्य है अलंकार की । अलंकार है—समासोक्ति और अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति । समासोक्ति इसलिए है कि संध्या और दिवस के खोलीकृत तथा पुलिकृत से स्री पुरुष के आनुकूल्य या मिलनाभिमुख होने रूपी ब्यापार या ब्यवहार की । इस प्रकार संक्षेप में ही दो वस्तुओं का कथन होने से तो इसे समासोक्ति । विशेषोक्ति और वह भी अनुक्तनिमित्ता इसलिए कि = यहाँ कारण उपस्थित होते हुए भी कार्योत्पत्ति नही देखी जा रही है और उसका बोझि कारण भी नहीं दिया गया है । कारण है—स्री पुरुष का मिलनाभिमुख होना और कार्य है—दोनों का मिल जाना । परन्तु मिलन हो नहीं रहा है । यहाँ 'दैवगति' की विचित्रता दिखलाई गई है किन्तु यह नहीं कहा जा सकता है कि वह कारण रूप से । अतः अनुक्तनिमित्ता विशेषोक्ति अलंकार ही है । महिमभट्ट के अनुसार = 'वच्‍चमहाभविआ' इसमें वस्तु प्रधान थी और लावण्य-सिन्धु तथा अनुरागयती । इनमें—वह अप्रधान । चमत्कार दोनों में बराबर हैं । कारण वह द्वोता है अनुप्रेयांश के परामर्श से । वह दोनों स्थलों में बराबर है । अतः दोनों को भिन्न कथन करना व्युत्पन्न

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प्रथमो विमर्शः

अलङ्कारस्य प्राधान्ये यथा—

'वीराण रमते घुसृणारुणे न तहा पिआहणुच्छले । दिट्ठी रिअगअकुम्भत्थलम्मि जहं वहलसिन्दूरे ॥'

( वीराणं रमते घुसृणारुणे न तथा प्रियास्तनोस्क्षले । दृष्टि रिप्रगकुम्भस्थले यथा वहलसिन्दूरे ॥ )

अलङ्कार की प्रधानता होने पर जैसे— वीरों की दृष्टि प्रिया के कुन्तलरंजित स्तनों पर उतनी नहीं रमती जितनी शब्‍दुओं के स्‍तनियों के सिन्दूररंजित कुम्भस्थलों पर ।

विमर्शः : लोचनकार अभिनवगुप्ताचार्य ने यहाँ—अतिरेकालङ्कार माना है ।

यथा च

'नं ताण सिरिसहोअररअपाहारगम्मि हिअअमेअरसं । विम्वाहरे पिआणं णिवेसिअं कुसुमवाणेण ॥' इति ।

( ततस्तेपां श्रीमदोत्तररत्नाहारगम्भीरे हृदयमकसरसि । विम्बाधरे प्रियां निवेशितं कुसुमवाणेन ॥ )

और भी यथा—

श्री = लक्‍स्मी के सदृश = रत्न ( कौस्तुभ-पारिजात आदि ) के आहरण में ही लगा हुआ उन ( असुरों ) का वह हृदय कुसुमबाण ( कामदेव ) ने प्रियां के विम्बाधर में फँसा दिया ।

विमर्शः : यहाँ लोचनकार ने अतिशयोक्ति अलङ्कार माना है और मधुसूदन जो ने अतिशयोक्ति का 'यदि या यदि के अर्थ के वाक्यार्थ में होना—वेद माना है ।

उन्होंने लिखा है— अथ यद्योक्तौ च कल्पनमिति तृतीयां काव्यप्रकाशकारानुमता अतिशयोक्तिं वाच्याम् । तथा हि—यत्‍ हृदयं रत्नाहारगतं तद् विम्बाधर—सक्तं तन्मति यत्तत्सुन्दर्यपेक्षया अधर- तृष्णा उचित्येन इत्यादि शयोक्‍ति: ।

'यहाँ' 'यद्योक्तौ च कल्पनमु:' ( १५३ सू० काव्यप्रकाश ) इस प्रकार काव्यप्रकाशकार द्वारा अभिमत तीसरी अतिशयोक्ति माननी चाहिए ।

क्योंकि यहाँ जो हृदय रत्न के आहरण में तत्पर था—लगा हुआ था वह विम्बाधर में सटा दिया गया—इस प्रकार जो और वह ( यत्‍-और-तद्‍ ) शब्‍दों द्वारा रत्न की अपेक्षा विम्बाधर में अतिशय कहा जा रहा है ।

यह सब काव्यप्रकाश से है । उनका कहना स्‍पष्‍ट है—'यदर्थस्य यदि शब्‍देन चेच्छब्‍देन व उत्तौ—यत् कल्पनम् ( अर्थान्तर- अस्‍भविनोदर्थस्‍थ ) सा तृतीयातिशयोक्ति:'—( वामनीसंस्करण—६३२ पृ० )

अथवा चेत् शब्‍द से कथन होने पर असम्भव अर्थ की जो कल्पना है—वह तीसरी अतिशयोक्ति होती है ।

काव्यप्रकाशकार ने इसका जो उदाहरण दिया है उससे उत्तक तथ्य*की पुष्टि होती है—

'राकायामकलङ्कं चेदमृतांशोर्भवेद् वपुः । तस्या मुखं तदा साम्यपराभवमवाप्नुयात् ।।'

यदि—पूर्‍णिमा के दिन अमृतांशु ( चन्‍द्र ) का शरीर कलङ्क रहित हो, तो उस ( सुन्दरी) के मुख का साम्य पराभव ( हार ) को प्राप्‍त हो ।

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व्यक्तिविवेक:

का मुख समता रूपी पराभव को पा सकता है।' यहाँ यथार्थ वाचक 'चेत्' शब्द आया है और चन्द्र के कलंक रूपी शल्य होने से इस असंभव अर्थ की कल्पना की गई है—प्रस्तुत पद्य में यदि या चेत् कोई भी शब्द नहीं है। न किसी असंभव अर्थ की कल्पना ही यहाँ की जा रही है। प्रिया के अधरोष्ठ पर प्रिय की दृष्टि का लगना उतना ही संभव और स्वाभाविक है जितना सगन्ध पर नासिका का लगना और संगीत की ओर श्रोत्र का।

ऐसा कुछ लगता है कि इन दोनों पद्यों में उदात्ता‌-लंकार है। 'उदात्तं वस्तुतः सम्पत्त् शौर्यादिवर्णनम्' के अनुसार यहाँ—प्रथम पद्य में वीर पुरुष के शौर्य का और द्वितीय पद्य में कुसुमवाण के शौर्य का वर्णन उदात्त रूप से किया जा रहा है। उसी उदात्त भाव में यहाँ चमत्कार भी है। इनमें वस्तु की अपेक्षा अलंकार प्रधान हैं। प्रधानता का कारण अलंकारकृत चमत्कार की अधिकता है।

तस्यैवाप्राधान्ये यथा— 'चन्द्रमुपहि णिसा णालिणी कमलेहि कुसुमगुच्छेहि लवा । हंसेहि सरससोहा कव्वकहा सजणेहि करइ गुरहि ॥' ( चन्द्रमसि नलिनी कमलैः कुसुमसुगन्धैः लवा । हंसैः शारदशोभा काव्यकथा सजनैः क्रियते गुरुभिः ॥ )

'उसी की ( अलंकार की ) अप्रधानता में यथा— चन्द्र की किरणों से निशां गौरवपूर्ण बनाई जाती है, कमलों से नलिनी, कुसुमस्तवकों से लता, हंसों से तलावशोभा, सजनों से काव्यकथा ।'

विमर्शः यहाँ लोचनकार ने दीपकलंकार माना है। वस्तुतः है भी वही अलंकार। किन्तु वस्तुतः है भी वही अलंकार। किन्तु वस्तुतः जितना समृद्ध है उतना अलंकार कथन नहीं। दीपक अलंकार—हंसों से तलाव की शोभा—आदि चार वस्तुओं को उपस्थापित करने से वे ही प्रधान हो जाते हैं—और दीपक दब जाता है।

यहाँ एक बात ध्यान देने की यह है—कि छहों उदाहरण ध्वनिकार ने अपने ध्वन्या‌लोक में दिए हैं और उनमें—प्रधानता‌-प्रधानभाव भी बतलाया। किन्तु वह वाच्य और व्यङ्ग्य को लेकर व्यङ्ग्य की अपेक्षा वाच्य को अधिक चमत्कारी होने से प्रधान बतलाया गया है और वही यहाँ की स्थिति उससे सर्वथा भिन्न है। यहाँ अलंकार को अपेक्षा वस्तुगत प्रधानता और अप्रधानता तथा वस्तु की अपेक्षा अलंकारगत प्रधानता और अप्रधानता बतलाई गई है। यह बात—लावण्यसिद्धु पद्य में वस्तु को प्रधान कहने से सावित होती है। और कहा गया है कि वह प्रधानता और अप्रधानता अवास्तविक और अमात्र्य है। चमत्कार सभी में बराबर दिखाई देता है।

यथापि—ध्वनिसम्प्रदाय में आनन्दवर्धन और मम्मट ने वस्तु, अलंकार और रस तीनों ध्वनियों को दो भागों में बाँटा है—वाच्यतत्वसह और वाच्यत्वासह । वाच्यत्वसह को भी दो भागों में बाँटा है—अविचित्र और विचित्र अर्थात चमत्कारशून्य और चमत्कारकारी। वस्तु को चमत्कार शून्य माना है और अलंकार को चमत्कारकारी। इसके अतिरिक्त रस को वाच्यत्वासह मानकर उसे सदा निरतिशय चमत्कार रूप ही मान लिया है। इस स्थिति में ध्वनिसम्प्रदाय में तीनों ध्वनियों में चमत्कारकृत भेद भी माना गया है। महिमभट्ट इस भेद को स्वीकार नहीं

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; यहाँ उन्होंने इसी रेदभाव का खण्डन किया है । दोनों आचार्यों के निर्णय में सहृदय ही प्रमाण हो सकते हैं ।

रसादीनां प्राधान्ये यथा कुमारसंभवे मधुप्रसङ्गेऽ वसन्तपुष्पाभरणं न्त्या देव्या आगमनादिर्वर्णने मनोऽभवश्ररसनध्यानपर्यन्तं, रामभोक्ष विवृत्त- स्या चेष्टानिरूपवर्णनात्॥

रस आदि की प्रधानता होने पर जैसे—कुमारसंभव में मधुमास ( वसन्त ) के वर्णन के ॥ में वसन्त पुष्पाभरण को धारण की हुई (देवी) पार्वती के आगमन आदि के वर्णन में देव के शरसंधान तक और धैर्यच्युत होकर की खास-खास चेष्टाओं के वर्णन आदि मे ।

विमर्शः : कुमारसंभव के तृतीय सर्ग में शंकर जी का मन समाधि से मोड़कर पार्वती पर ने के लिए, इन्द्र द्वारा भेजे वसन्त ने जो वैभव फैलाया वह ननिदके श्वर जी डाक्ट से नमासक्त- हो गया—कामदेव असफलता की शङ्का से व्याकुल और किङ्कर्तव्यविमूढ़ था—कि उन्ही समय वसन्ती पार्वतों—वसन्त पुष्पों का शृङ्गार किए दिखाई दीं। कालिदास ने उनकी उक्त स्थिति का न ५२-५७ तक किया है। इसके बाद ६८वें पद्य तक पार्वती को सौन्दर्य विमूर्ति का गाम कविने उपस्थित किया। इस प्रसङ्ग पर आनन्दवर्धनाचार्य ने अपनी नलोकोपस्थित ते हुए लिखा था—

'यत्र साक्षाच्छब्दनिवेदितेभ्यो विभावानुभावव्यभिचारिभ्यो रसादीनां प्रतोति : न तत्र केवलेनैव लक्ष्यीकृतमवयवतयैव ) मार्गः, यथा कुमारसम्भवे मधुप्रसङ्गे वसन्तपुष्पाभरणं वह्नन्वा देव्या रमद्विवर्णनं मनोऽभवश्ररसन्धानपर्यन्तं, रामभोक्ष परिवृत्तधैर्यस्य चेष्टाविशेपवर्णनादि तत्र साक्षा- च्छ- निवेदितम्— ( धन्यालोक—२४८ प्र० तृतीय उ० २२वीं कारिका की वृत्ति—चौ० सं० ) इसके टीकরণ में आचार्य अभिनवगुप्त ने लोचन में लिखा—‘यत्र—हि विभावानुभावेन्य स्थायी- भ्यो व्यभिचारिगतेम्यश्व पूणेभ्यो झटित्येव रसव्यक्तिस्तन्रैव लक्षणं भवति:' यथा— निर्वर्णभूयिष्ठमडस्य वीर्य संशुक्रयन्तीव वपुरुङ्गणम् । अनुप्रयाता वनदेवताभ्यामदृश्यत स्थावराजकन्या ॥

इत्यादौ स्पूर्णालम्बनोद्दपनविभावतां—योग्यतां—स्वभाववर्णनंनम् ।' प्रतिमहीतुं प्रणयितिप्रियत्वात् त्रिलोचनस्तामुपचक्रिमे च । संमोहनं नाम च पुष्पधन्वा धनुष्यमोघं समधत्त वाणम् ॥ यनेन विभावतोपयोग उत्तः ।

हरस्तु किञ्चित् परिलम्भशैर्यश्रनद्रोदयारम्भ इवाम्बुराशेः । उमासुखे विम्बफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि ॥

त्र भगवत्या: प्रथममेव तत्प्रकाशन्वात् तस्य चेष्टीनां तद्नमुखीभूतत्वात् प्रतीयमानत्वा च नक्षत्रान्तस्य चित्तस्य गाढ़ीभावात् रत्यामनः स्थायिभावस्यौत्सुक्यमिवेगच्चापलयहृदादेश वयभिचारिणः साभा- गीभूतोडनुभाववर्गः प्रकार्शित इति विभावानुभावव्यर्च्चणैव व्यभिचारिवर्गानां पर्यवस्यति ! गम्भीरतां यातदेव रक्तस्त्रकल्पोपेत्यापि चर्वणाविश्रान्तौ तत्रैव लक्ष्यीकमवयड्यमवतन ।' प्र० रमिचारिणां ( २४८-९-वहो ) ।

प्रस्तुत प्रसङ्ग में रससिद्धि में जो विभाव आदि सामग्रों व्यक्तिवादी ने मानी है अनुमितिवादी का उससे कोई मतभेद नहीं है, वह केवल यहाँ रस की प्रधानता है—इतना हो नहना चाहता है, जो व्यक्तिवादी को भो मान्य ही है। यहाँ अनुमितिवादी के इस उद्धरण का

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प्रयोजन यह सिद्ध करना है कि रसकृत् चमत्कार रस की प्रधानता में जितना समृद्ध होता है, उसकी अप्रधानता में भी उतना ही। एतदर्थ वह रस की अप्रधानता का उदाहरण प्रस्तुत करता है।

तेषामप्राधान्यं शुद्धसङ्कीर्णतादिभेदाद् द्विविधम्।

तत्र शुद्धं यथा—

'किं ? हस्येन न मे प्रयास्यसि पुनः ? प्रासादशिखरादर्शनेन केयं निष्क्रुणता ! प्रवाससहचिता केनासि दूरोकृता ? । स्वप्रान्तलेशवति ते बदनं प्रियतमन्यासक्तकण्ठग्रहो बुद्ध्वा रोदिति रिक्तवातुवलयस्तारं रिपुर्हीजनः ॥'

उन ( रस आदि ) का अप्रधान्य दो प्रकार का होता है—शुद्ध और सङ्कीर्ण। इनमें से शुद्ध अप्रधान्य का उदाहरण—'हँसी से क्या ? पुनः तुम मुझ से दूर नहीं हो सकोगे, बहुत समय के बाद आँखों के सामने आए हो। हे करुणाश्रु, निर्दयि—कैसी है यह तुम्हारी प्रवास की चाह ? किस बात पर ( इस प्रकार मुझ से ) दूर हटा दिए गए हों। इस प्रकार कहती हुई स्वप्न में—प्रियतमों के गले से लिपटी तुम्हारी—श्रवणालाएँ जागने पर अपने वादुपाशा को खाली देखकर जोर-जोर से क्रन्दन करती हैं ।'

विमर्शः : विजयी राजा का कोई अपना जन मरे श्रत्रुओं- को बिलखती स्त्रियों का वर्णन करता है। इसमें शत्रु नारियाँ आलम्बन, स्वप्न देखना उद्दीपन, उनका बिलखना अनुभाव आदि सभी सामग्री से करुण रस व्यक्त होता है, किन्तु उस सबसे राजा का शौर्य व्यक्त होता है या वक्ता का राजविषयकरतिभाव, अतः वह ( करुणरस ) इस शौर्य या रतिभाव में अंग बन जाता है। यहाँ अकेला करुणरस—शौर्य या रतिभाव का अंग है। अतः शुद्ध का उदाहरण मान्य है। यद्यपि स्वप्न के वर्णित प्रियतममिलन से शृङ्गार व्यक्त होता है। किन्तु वह शौर्य का अंग नहीं अपितु करुण का अंग है। इस प्रकार शृङ्गार करुण का अंग और करुण शौर्य या रतिभाव का अंग है। फलतः यह उदाहरण ठीक है। यह पद्य ध्वन्यालोककार ने भी रसवदलङ्कार के प्रसङ्ग में शुद्ध रस के अंगभाव के उदाहरण के रूप में ही उपस्थित किया है। उनका ग्रन्थ इस प्रकार है—रसादयोऽङ्गभूता दृश्यन्ते। स च रसादिरलङ्कारः शुद्धः

शुद्धस्याङ्गभावात् स्पष्टमेव रसवदलङ्कारत्वम्। एवंविधे विषये रसान्तराणि स्पष्टप्यङ्गभावः ।

( पृ० १९३ )

इस पर लोचन की व्याख्या इस प्रकार है—'शुद्धः—इति । रसान्तरेण अङ्गभूतेऽनलङ्कारान्तरेण वा न मिश्रः, आमिश्रस्तु सङ्कीर्णः । स्वप्नस्यालुबूतसदृशत्वात् भयानकत्वमिति न द्वितीयं दूषयति—इदानीं त्वां विदिततार्भावं बाहुपाशवन्धान्त मोक्ष्यामि। अतएव रिक्तबाहुवलय इति। स्वपार्श्वस्थिततया चोपप्लुतो रसः । इत्याह—केयं निष्क्रु—

णता इति। केनासीति—गोत्रस्खलनादावपि न मया कदाचित् खेदितोडसि स्वप्रान्ते तु खुसप्रलपितेषु पुनःपुनरूढतया बुद्धिःवति बदनं युष्माकं सम्बन्धी रिपुर्हीजनः प्रियतमे विशेषण खुसप्रलपितेषु पुनःपुनरूढतया बुद्धिःवति बदनं युष्माकं सम्बन्धी रिपुर्हीजनः प्रियतमे विशेषण आसक्तः कण्ठग्रहो येन तादृश एव सन् बुद्ध्वा शत्रुवलयाकारिकृतबाहुपाशः सन् तारं मुक्तकण्ठ

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रोदितीति । अत्र शोकस्यादिरभावेन स्तम्भादर्शानोद्दीपितेन करुणरसैत चर्यैमाणेन सुन्दरीभूतो नर- पतिप्रभावो भातिति करुणः शुद्ध एवालङ्कारः । नहि त्वया रिपवो हता इति यदृगनलङ्कृतोदयं वाक्यार्थस्तादृगयम्, अपितु सुनदरतररीभूतत्र वाक्यार्थः । सुन्दर्य च करङ्गरसकृतमेवेति ।

सङ्कीर्णरसादावड्भूते यथा— 'क्षित्पो हस्तावलङ्घः प्रसभममिहतोऽप्याददानौड्कुकान्तं गृणन् केशेष्वपास्तशरणनिपतितो नेक्षितः सम्भ्रमेण । आलिङ्गनयोधवधूत्रिपुरयुवतिभिः शाश्वनेत्रोत्पलाभिः कामीवाद्रापराधः स दहतु दुरितं शम्भवो वः शरान्त्रिः ॥'

सङ्कीर्ण रस आदि के अभिभूत होने पर जैसे— हाथ से लगने पर जो उत्पल के समान आँखों में आँसू लिर त्रिपुरप्रमदाओं द्वारा तुरंत के अपराधी कामी के समान—झिड़क दिया गया, आँचल का छोर हठने पर जोर से फटकार दिया गया, केश पकड़ने पर फेंक दिया गया, पैरों पर गिरने पर संत्रम पूर्वक ( भय और क्रोध के साथ ) देखा तक नहीं गया जो शम्भु का शराधि—वह आपका अनिष्ट जलादि ।'

अत्र हि त्रिपुररिपुभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वे ईर्ष्याद्योविभ्रलम्भस्य श्लेष- सहितस्यैवाङ्गभावः ।

यहाँ—'त्रिपुररिपु शङ्कर का अतिशयित प्रभाव ही प्रधान है, श्लेष के साथ ईर्ष्याद्योविभ्रलम्भ का अङ्गभाव है ।'

विमर्शः यह संदर्भे ध्वन्यालय में भी ज्यों का त्यों इस प्रकार मिलता है—'सङ्कीर्णो रसादिः अभिभूतो यथा—क्षित्पो हस्ता० ( पूर्ण ) इत्यत्र त्रिपुररिपुप्रभावातिशयस्य वाक्यार्थत्वे ईर्ष्याद्योविभ्रलम्भस्य श्लेषसहितस्याङ्गभाव इति, एवंविध एव रसवदालङ्कारस्य न्यायो विचारः । लोचन में उक्त पद्य की व्याख्या इस प्रकार की गई है—

'क्षित्प इति । कामिपक्षे नाद्दात्तः, इतरेतर भ्रुतः, अवभूत इति न प्रतीक्षितः प्रत्यालिङ्गनेन इतरेतर श्लेषानुगृहीतेनेध्योविभ्रलम्भो य आकृष्टस्तस्यैषोपमासहितस्य अङ्गत्वम्, न केवलस्य । यद्यप्यत्र इत्थंव्यत्न करुणो वास्तवोऽप्यस्ति तथापि स तत्त्वालम्बप्रतीतो न व्यभ्रियते इत्यनेनाभिप्रायेण श्लेष- सहितस्यैवाङ्गभावः, न तु करुणसहितस्यैत्यपि । एतर्मींपूर्व्वतयोत्प्रेक्षितं दृढीकर्त्तुमाह— एवंविध एवेति । यतोडत्र विप्रलम्भस्यालङ्कारत्वं न तु वाक्यार्थता, अतो हेतोरित्यर्थः ।

उक्त पूरे संदर्भे का उपसंहार करते हुए लिखते हैं— तदेवं प्रकारत्रयेड्यनुमेयार्थैःसंस्पर्शी एव काव्यस्य चारुत्वहेतुरित्यव- म्नव्यम्। यदाह ध्वनिकारः—'सर्वथा नास्त्येव हृद्यंहारिणः काव्यस्य स प्रकारः, यत्र प्रतीयमानार्थसंस्पर्शी न सौभाग्यम्। तदिदं काव्यरहस्यं परममिति सूरिभिर्विमावनायम् ।

'मुख्या महाकविगिरामलङ्कृतिभूतामि । प्रतीयमानच्छायैषा भूषा लज्जेव योषिताम् ॥' इति ।

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पुनः स एव यथा—

'प्रकारोऽन्यो गुणीभूतव्यङ्ग्यः काव्यस्य हृयते । यत्र व्यङ्ग्यार्थवये वाच्यचारुत्वं स्यात् प्रकारवचत् ॥'

तो इस प्रकार तीनों प्रकारों में अनुमेयार्थ का स्पष्टं ही काव्य की चारता का हेतु है—ऐसा समझना चाहिए। जैसे कि ध्वनिकार ने कहा है—हृदयं को हरण करने वाले काव्य को ऐसा कोई भी प्रकार है ही नहीं, जहाँ प्रतीमयान अर्थ के स्पष्टं से चारता न हो ( सौभाग्य न दिखाई देता हो ) कवियों और विद्वानों को यह समझना चाहिए कि यही काव्य का रहस्य है ।

'अलंकारों से युक्त होने पर भी महाकवि के शब्दों की भूषा यही प्रतीमयान अर्थ की छाया है, जैसे क्रियों की लज्जा ।' इस प्रकार । और भी—जैसे वे ही ( ध्वनिकार ही कहते हैं )—

काव्य का एक दूसरा गुणीभूतव्यङ्ग्य नाम का भेद भी दिखाई देता है; जिसमें व्यङ्ग्य के सम्बन्ध से वाच्य की चारता अधिक बढ़ जाती है ।

विमर्शः: पूरे सन्दर्भं का निष्कर्ष यह कि काव्य में चमत्कार तो आता है केवल प्रतीमयान अर्थ के संस्पर्शं से । भले ही वह प्रतीमयान अर्थं प्रधान हो या अप्रधान । रस की संङ्क्रीणता के जो दो उदाहरण ऊपर दिए गए हैं उनमें जो रस अप्रधान हैं वे भी चमत्कारी है ही ।

सम्भवापेक्षया चास्य ध्वने: स्वरूपमात्रप्रतिपादनार्थेतवोऽपमैड्न्येषामपि तद्राकयव्च्च्तिनां पदवर्णसङ्ख्यादीनां तदुपपदर्शानप्रसङ्गेऽपि विशेषभावदिति सङ्ज्ञासंकरिसमवायगुम्तिमात्रफलमेतत् पर्यवस्यतीति न काव्यविशेषगुम्तपत्तिफलम् । न चायं प्रधानेतरभावेनोपनिबद्धस्तेषामनुमेयतां प्रतिबध्नाति ।

और ध्वनि की संभावना मात्र से ( यत्नार्थ: शब्दो वा में ) उसको उसके स्वरूप मात्र के प्रतिपादनार्थ ( ग्रहण किया गया ) स्वीकार करने पर उसी वाक्य के वर्ण पद वचन आदि और भी जो उस ( यत्नार्थ: ) वाक्य में आए हैं सबका स्वरूप दिखलाना चाहिए, कारण कि स्वरूप मात्र कथन के लिए कल्पित पदार्थ के साथ लागू होता है उसी प्रकार उन वर्ण पद आदि पदार्थों के साथ । इसलिए इस ( ध्वनिलक्षण वाक्य ) का फल केवल ( ध्वनि ) संज्ञा और ( उसका अर्थ ध्वनि पदार्थरूप ) संज्ञी के सम्बन्ध का ज्ञान कराने में चरितार्थ होता है, अतः उससे काव्यविशेष का ज्ञान नहीं वनता । और न यह ( प्रकारोऽन्यो आदि ) प्रधान और अप्रधान रूप से उन ( प्रतीममानार्थों ) का कथन उनकी अनुमेयता को रोकता ।

विमर्शः: उपर के विवेचन से जब ध्वनि का अभाव साबित कर दिया गया तो अनुमितिवादी यह निष्कर्ष देता है कि अभावात्मक होने पर भी ध्वनि का जो ध्वनिलक्षणकारिका में स्वरूपनिर्वचन किया गया है उसका आधार एकमात्र ध्वनि की संभावना हो सकती है अर्थात् उन्होंने ध्वनि के न होने पर भी कदाचित् वह सिद्ध हो जाए—ऐसा सोच कर ध्वनिलक्षण किया, होगा । इस प्रकार संभावित वस्तु के स्वरूप कथन का प्रयास करते हुए ध्वनिवादियों को यह प्रयास भी करना चाहिए था कि—ध्वनिकारिकावाक्य में आए पद, वर्ण और संख्या—अर्थात् वचन का स्वरूप कथन भी करे । कारण कि काव्य में तो ये भी ध्वनि के समान विवेच्य नहीं होते । ऐसी स्थिति में ध्वनिलक्षणकारिका से कोई खास प्रयोजन सिद्ध नहीं होता सिवाय इसके कि उससे कल्पित ध्वनि का कल्पितरूप बतला दिया जाय । फलतः

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सामने आता है कि उससे ध्वनिनामक एक नए शब्द का ध्वन्यात्मक के एक नए अर्थ में जो है वस्तुतः प्रतोयमानरूप, व्यवहार किया गया ।

तदेवश्र नार्थेरगदयो रुपसर्जनीकृतस्वार्थैस्त्वमर्यविचारासम्भवदोषदुष्ट- स्वात् । न वाच्यप्रतीयमानयोरव्यङ्ग्यश्रव्यङ्गकभावस्तल्लक्षणाभावात् । न च काव्यविशेषस्य लक्षणकरणं प्रयोजनाभावात् । नापि ध्वनिलयपदेशः; व्यङ्ग्य- व्यज्जकभावाभावादुपपद्यत इति सर्वमसमञ्जसमिव तल्लक्षणमुपलक्ष्यते ।

तो इस प्रकार—अर्थ और शब्द की ‘उपसर्जनीकृतस्वार्थता—नहीं बनतीं, कारण कि उसमें अव्यङ्ग्यविचार और असम्भव दोष आते हैं । और न वाच्य तथा प्रतीयमान अर्थों का व्यङ्ग्य- व्यज्जकभाव ही वनता है—क्योंकि उसका कोई लक्षण नहीं इन पाता, काव्यविशेष का लक्षण भी करना ठीक नहीं क्योंकि उसका कोई फल नहीं । और न—ध्वनिनाम ही सटीक उत्तर पाता है क्योंकि व्यङ्गचव्यज्जकभाव सिद्ध नहीं होता—इसलिए ध्वनि का पूरा लक्षण ऊलजलूल सा लगता है ।

यदि काव्ये गुणभूतव्यङ्गयेडपि च चारुतां— प्रकटयोलिनी, तर्हि व्यर्थं पर्यादरी भवतौ ॥ ९५ ॥

यदि गुणीभूत व्यङ्गयकाव्य में भी प्रकर्षयुक्त चारुता मान्य ही है तो फिर ध्वनि में आदर व्यर्थ ही है ।

न हि काव्यात्मभूतस्य ध्वनेःस्तत्प्रासित सम्भवः । तेन निर्जीवतैवास्य स्यात् प्रकर्ष कथैव का ॥ ९७ ॥

काव्य में काव्यातमभूत ध्वनि संभव नहीं अतः यह ( ध्वनि ) निर्जीव ही सिद्ध होता है, तव उसके प्रकर्ष की बात ही क्यों ।

अतोडतदात्मभूतस्य येडभावं जगदुर्व्यने: । ते मूढैव प्रतिक्षिता: स्वोक्तिभावमपशयता ॥ ९८ ॥

इसलिए जो काव्यातमभूत नहीं हैं उस ध्वनि का जिन्होंने अभाव बतलाया था उनकी बात का आशय न समझने वाले ( ध्वनिवादी ) ने उन्हें व्यर्थ ही अमान्य ठहराया ।

अथेष्यते स तत्रापि रसादिव्यकषपेक्षया । काव्यमेवान्यथा न स्यादू रसात्मकमिति ॥ ९? ॥

यदि इतने पर भी काव्यात्मरूप से ध्वनि इष्ट ही हो तो उसका अस्तित्व वहां ( गुणीभूत व्यङ्गय में ) भी मानना चाहिए कारण कि रस ( आनन्द चारुत्व और रस ) की अभिव्यक्ति वहां भी होती ही है । नहीं तो ( रस हीन होने पर ) वह काव्य ही नहीं होगा कारण कि यह ( काव्य ) रसात्मक ही होता है ।

इत्येभि रास्यमानार्थेसाकाङ्क्षमलङ्कृति: । इत्येष वाच्यस्येतदुक्तं स्यान्मता सैवानुमता ततः ॥ १०० ॥

इस प्रकार बात तो इतनी ही साबित होती है कि गम्यमान अर्थ का स्फुरण ही वाच्यार्थ की शोभा है । वही ( शोभा है ) उससे ( वाच्य से होने वाली ) अनुमितिरूप से मान्य है ।

इति सङ्ग्रग्रहश्लोका: ।

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प्रथमो विमर्शः:

विमर्श: इस पूरे सन्दर्भ का निष्कर्ष यही कि प्रतीममानार्थ से युक्त काव्य ही काव्य होता है। उसमें प्रतीममान अर्थ को प्रतीति अनुमान से होती है। वह जहाँ भी होती है सदैव प्रधान रहती है। अतः उसको एकाधिक भेद में विभक्त नहीं किया जा सकता। इस प्रकार जब ध्वनि और ध्वन्यन्ति नामक अलग से कोई वस्तु ही नहीं है तब उसका लक्षण ही व्यर्थ है, फिर लक्षण भी यदि सभ्भावना के आधार पर किया तो उसमें अनावश्यक अर्थों की योजना न करनी थी।

अभिनव—ध्वनिलक्षण पर आघात कर व्यञ्जकव्यर्थ के उचिेत्तर को चेष्टा की ओर उसके ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गय इन मौलिक दो भेदों को अमान्य ठहराने की। अन ध्वन्ति के भेदों पर समीक्षा उपस्थित करते हैं —

किं यत् अविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति ध्वने: प्रकारद्वय-मुक्तं, तत् किमिदमविवक्षिततत्वं नामेतत् तात्पर्यतोऽन्यथावक्तव्य: किं, अचिवक्षिततत्वमनुपादेयतत्वम्? उत्त, अन्यपरत्वम्? अनुपादेयत्वं च किं सर्वात्मना अंशोन वा? सर्वात्मनानुपादेयत्वे व्यङ्गयकत्वमनुपादेयम्, तस्य तदाश्रिततत्वात्। ततश्च प्रयोग एवास्य दुष: स्याद् यथान्यस्य पुनरुक्तत्वे। अथांशोनेतस्युच्यते। वक्तव्यस्तर्ह्यासावंश:। स च निरूप्यमाण: स्वप्राधान्यात् पर्यवस्यति। ततश्राविवक्षिततत्वमन्यपरत्वमुपसर्जनीकृतात्मत्वं चेन्येक एवार्थे इत्थ्यनया भ्र्रान्त्या स्वरूपमेव ध्वनेरुक्तं भवति न तु तस्य प्रकारभेद:।

यस्य हि यल्लक्षणानुगमे सति अवानतरविशेषसंस्पर्श: स तस्य प्रकार इत्युच्यते यथा गोत्वस्य शावलेयत्वादि, न तु तस्यैव स एव प्रकारो भवितुमर्हन्ति तदनवस्थाप्रसङ्गात्। न चात्र विशेषसंस्पर्श: कथंसत्य ध्वनिप्रकारत्वोक्तिर्युक्तिमती।

और = जो ‘ध्वनि’ के दो प्रकार कदे हैं—अविवक्षितवाच्य तथा विवक्षितवाच्य—उनमें—‘द्ह अविवक्षितव क्या जीज्ञ’ है? इसके अर्थ का तात्पर्य स्पष्ट करना चाहिए। क्या अदिवक्षित-अनुपादेयत्व स्वरूप है या अन्यपरत्वरूप। और अनुपादेयत्व भी क्या सर्वात्मना या अंशात:। सर्वात्मना-अनुपादेय होने पर इसका व्यङ्गयकत्व भी अनुपादेय हो जाएगा क्योंकि व्यङ्गयकत्व उस पर आाश्रित रहता है। और तब इसका प्रयोग ही दोषवह ठहरेगा’ जैसे कि अन्य पुनरुक्त आदि का। यदि अंशात: तो इस अंश का स्पष्टीकरण किया जाना चाहिए। ध्यानावीन करने पर वह कृतात्मतव—ये सब एक ही सिद्ध होते हैं। इस प्रकार तो ध्वनि का स्वरूप ही सिद्ध होना है, न कि उसका प्रकार भेद। किसी भी वस्तु का प्रकार तो वह कहलाता है जो उसके पूरे लक्षण से युक्त होने के बाद किसी अवान्तर विशेषता से युक्त हो। जैसे गोत्व का शावलेयत्व ( चितकबरापन ) आदि ( होने से चितकबरी गाय गाय का एक प्रकार—भेद कही जाती है ), न कि उस्ती वस्तु का वही वस्तु प्रकार बन सकती है, उसमें अनवस्थादोष आता है। और यहाँ ( अविवक्षितवाच्य में ) विशेष गुण कोई है नहीं। फिर इसे ‘ध्वनि’ का प्रकार कहना कैसे युक्त हो सकता है।

विमर्श: पूरे संदर्भ का निष्कर्ष यह है कि ध्वनिकार ने ध्वनि के दो भेद ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत में किए थे—‘अस्तिध्वनि: स च अविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति’

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प्रथमो विमर्शः

उसका फल केवल ध्वनि-संख्या और उसके कल्पित ध्वनि अर्थ दोनों के सम्बन्ध जोड़ने भर में तात्पर्य है। काव्य में कोई विशेषता-ध्वनिरूपता की सिद्धि में नहीं। साथ ही व्यञ्जनानाम से भी ध्वनिनिन्दा से पुकारा जाने वाला अर्थ यदि प्रधान और अप्रधान भी मान लिया जाय तो अनुमितिवादी को मान्यता को ठेस नहीं लगती। अनुमितिवादी उसे अनुनेय मानना है। वह प्रधान या अप्रधान अनुरूप हो सकता है। और वस्तुतः तो जब ध्वनि कोड़े जोड़े ही नहीं तो प्रथानता या अधानता का कोई प्रश्न नहीं उठता।

इस पंक्ति में एक कठिनाई है। वह यह कि ग्रन्थकार पहले प्रतिपाद्यमान अर्थ को प्रधान या अप्रधानता में चारुतरविरत समनानता का उपपादन कर रहे थे, वह 'प्रकारोडन्ययोग्योभयोनि०' इस ध्वनिकृतकारिका तक समाप्त हो गया। उसके बाद सम्भावापेक्षया-प्रतिवेधाति-तक च ग्रन्थ उपस्थित किया। इसका कोई ऊपर से सम्बन्ध नहीं लगता। अतः हमारी दृष्टि में ग्रन्थकार ने अपने विकीर्ण विचारों को यहाँ संकलन किया है—ऐसा प्रतीत होता है। दूसरी बात यह है कि 'तद्राक्यवाच्यतिनाम-के 'तत्' इस सर्वनाम पद का अर्थ क्या कियाजाय यह एक प्रश्न है। प्रसङ्गानुरूप उसका अर्थ=ध्वनिलक्षण-काव्य-व्यतिरिक्तः शाब्दो वा करना ठीक लगता है। जैसे बाद में जो कहा गया है कि 'अन्येपामपि पद वर्ण संख्यादीनां तदुदेश्येनैवसक्‍‌-इसमे अय के 'तत्' का ध्वनिलक्षण = ( कारिका ) वाच्य अर्थ ठीक न बैठकर काव्यवाच्य ठी न बैठे है। ध्वनिलक्षण का तो उद्देश्य ही ध्वनिस्वरूपप्रकथन होगा—अतः उसमें वयं पद--आद्‌दि दे नचत की कोई अनिवार्यता नहीं। ऐसा कुछ प्रतीत होता है कि ग्रन्थकार यहाँ 'अथवेल' इद ओ स्फोट की छाया में देखकर पदस्फोट, वर्णस्फोट, वचनस्फोट के निर्वाचन की अतिदार्ह च औचित्य सिद्ध करना चाहते हैं। वह इसलिये कि काव्य में ध्वनि को असामान्य घोषित करने न म यदि व्याकरण दर्शने के कल्पित स्फोट के आधार पर ध्वनि नाम के काव्य तन्व दी करणना करते हैं तो वर्णध्वनि, पदध्वनि वचनध्वनि नाम के ध्वनितरस की भी काव्य में कल्पन होने चाहिपे और गुणीभूतव्यङ्ग्यों के साथ उनको भी एक अतिरिक्क अप्रधान वर्ग में द्रि‌व्यमानन चाहिपे। यद्यपि ध्वनिवादो ने व्यङ्क के रूप में वर्ण पद और संख्या को ध्वनि माना है नधापि व्यक्‍‌क्यरूप से ध्वनि नहीं माना है। अनुमितिवादी शायद यहाँ कहना चाहते हैं कि यदि ध्वनि नाम का कोई काव्यतत्त्व न होने पर भी उसकी सम्भावना 'करके' उसकी निरूप करना है तो काव्य में शायद पदध्वनि ( पदव्यङ्गच्य ) आदि व्यवस्थार्थ की कल्पना कर उनका स्वरूप निर्वाचन भी करना चाहिए। अन्त में वह यही कह देता है कि—कुब्ब भी हो ध्वनिनिर्वादो के इन सब कल्पनिक निर्वचनों से प्रतिपाद्यमान अर्थ की अनुनेयता में बट्टा नहीं लगता।

एक तीसरा अर्थ यह भी किया जा सकता है कि अस्य-अर्थात् विशेषगस्य = नाने = अर्थ के उपसर्जनीकृतातात्पर्य-का उपगम यानो ध्वनिलक्षण में उपादान की स्वीक्षति इसलिल मात ल जाय कि उससे ध्वनि के स्वरूप का प्रतिपादन होता है। अर्थात् अप्रधान के कथन से ध्वनि में प्रथानता सिद्ध होती है। और प्रथानता हो ध्वनि का प्राग है, अतः उपसर्जनीकृतातात्परचस्बरूप अप्रधानता से ध्वनि का प्रथानत्व सिद्ध होता है—तो इस पर यह आपत्ति दी जा सकती है—कि फिर अप्रथानता के केवल अर्थ में ही क्या दिखलाई गई—पद और वर्ण संख्या में भी अप्रथानता दिखलाई जानी चाहिए थी, कारण कि वे भी ध्वनि के प्रति अप्रधान हां माने जाते हैं। इस प्रकार ऐसा प्रतीत होता है कि ध्वनिलक्षणकारिका में उपसर्जनीकृतस्सरपद = रूप विशेषण का भी कोई अभिप्राय नहीं, फलतः ध्वनिलक्षण का एक मात्र यही प्रयोजन

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सामने आता है कि उससे ध्वनिनामक एक नये शब्द का ध्वनिनाम के एक नये अर्थ में जो है वस्तुत: प्रतीयमानरूप, व्यक्वहार किया गया।

तदेवक्ष नार्थे शब्दयोरुपसर्जनौकृतस्वार्थौ त्वमव्यभिचारासम्भवदोषदुग्र- त्वात्। न वाच्यप्रतीयमानयोरव्युद्रुण्यवयवकभाववस्तुतद्धक्षणाभावात्। न च काव्यविरोषस्य लक्षणकरण प्रयोजनाभावात्। नापि ध्वनिनवयपदेशः व्यर्थे- न्यत्कभावाभावात् उपपद्यत इति सर्वमसमझसमिव तलक्षणमुपलक्ष्यते।

तो इस प्रकार—अर्थ और शब्द को ‘उपसर्जनौकृतस्वार्थौ—नहीं बनती, कारण कि उसमें अव्यभिचार और असंभव दोष आते हैं। और न वाच्य तथा प्रतीयमान अर्थों का व्यङ्ग्य-व्यञ्जकभाव ही बनता है—क्योंकि उसका कोई लक्षण नहीं बन पाता, काव्यविशेष का लक्षण भी करना ठीक नहीं क्योंकि उसका कोई फल नहीं। और न—ध्वनिनाम ही सटीक उत्तर पाता है क्योंकि व्यङ्ग्यव्यञ्जकभाव सिद्ध नहीं होता—इसलिए ध्वनि का पूरा लक्षण ऊलजलूल सा लगता है।

यदि काव्ये गुणवत्त्वं व्यङ्ग्येsपि पीत्वैव चारुतां— प्रकपंपेशालिनी, तर्हिं व्यर्थ एवादरो ध्वनौ ॥ ९६ ॥

यदि गुणीभूत व्यङ्ग्यकाव्य में भी प्रकर्षयुक्त चारुता मान्य ही है तो फिर ध्वनि में आदर व्यर्थ ही है।

न हि काव्यातमभूतस्य ध्वनेरस्त्यास्ति सम्भवः । तेन निर्जीवतैवास्य स्यात् प्रकर्षः कथञ्च कः ॥ ९७ ॥

काव्य में काव्यातमभूत ध्वनि संभव नहीं अतः यह ( ध्वनि ) निर्जीव ही सिद्ध होता है, तब उसके प्रकर्ष की बात ही क्या।

अतोऽतदात्मभूतस्य येऽभावं जगदुञ्छिते: । ते मृढैव प्रतीक्षन्तः स्वोक्तिभावमपश्यता ॥ ९८ ॥

इसलिए जो काव्यातमभूत नहीं हैं उस ध्वनि का जिन्होंने अभाव बताया था उनकी बात का आशय न समझने वाले ( ध्वनिवादी ) ने उन्हें व्यर्थ ही अमान्य ठहराया।

अथेष्यते स तत्रापि रसादिव्यक्त्यपेक्षया । काव्यमेवान्यथा न स्यादुरसात्मकमिव यतः ॥ ९९ ॥

यदि इतने पर भी काव्यात्मरूप से ध्वनि इष्ट ही हो तो उसका अस्तित्व वहाँ ( गुणीभूत व्यङ्ग्य में ) भी मानना चाहिए कारण कि रस ( आनन्द चरत्व और रस ) की अभिव्यक्ति वहाँ भी होती ही है। नहीं तो ( रस हीन होने पर ) वह काव्य ही नहीं होगा कारण कि यह ‘काव्य’ रसात्मक ही होता है।

इत्थस्व गम्यमानार्थसंस्पर्शोमात्रलड्कृति: । वाच्यस्यैतदुकं स्यान्मता सैवानुमा ततः ॥ १०० ॥

इस प्रकार बात तो इतनी ही साबित होती है कि गम्यमान अर्थ का स्पर्शो ही वाच्यार्थ को शोभा है। वही ( शोभा हमें ) उससे ( वाच्य से होने वाली ) अनुमितिरूप से मान्य है।

इति सङ्ग्रहग्रन्थलोका:

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विमर्शः इस पूरे सन्दर्भ का निष्कर्ष यही कि प्रतीममानार्थे से युक्त काव्य ही काव्य होता है । उसमें प्रतीमान अर्थ की प्रतीति अनुमान से होती है । वह जहाँ भी होती है सद प्रधान रहती है । अतः उसको एकाधिक भेद में विभक्त नहीं किया जा सकता । इस प्रकार जब ध्वनि नामक अलग से कोई वस्तु ही नहीं है तब उसका लक्षण ही व्यर्थ है, फिर लक्षण भी यदि सम्भावना के आधार पर किया तो उसमें अनावश्यक अर्थों की योजना न करनी थी ।

अभितक—ध्वनिलक्षण पर आघात कर व्यञ्ज्यार्थ के उच्छेद्र को चेष्टा की ओर उसके ध्वनि और गुणीभूतव्यङ्गघ्य इन मौलिक दो भेदों को अमान्य ठहराने की । अब ध्वनि के भेदों पर समीक्षा उपस्थित करते हैं —

किम् यत् अविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्र्वेति ध्वने: प्रकारद्वय-मुक्तं, तत्र किमिदमविवक्षितं नामेति तात्पर्यतोऽस्यार्थो वक्तव्य: । किम् अविवक्षिततत्वमनुपादेयत्वम्? उत, अन्यपरत्वम्? अनुपादेयत्वं च किं सर्व-तदाश्रिततत्वात् । तथाहि प्रयोग एवास्य दुष: स्याद् यथान्यस्य पुनरुक्तौदे: । अथांशोतेनुच्यते । वक्तृभयस्तद्भयसङ्करा: । स च निह्नयभाण: स्वप्रतिभान्ध्य एव पर्यवस्यति । तथाह्याविवक्षिततत्वमन्यपरत्वमुपसरर्जनीकृतातमत्क्वं चेत्येक एवार्थे इत्थनया भङ्गया स्वरूपमेव ध्वनेरुक्तं भवति न तु तस्य प्रकारभेद: ।

यस्य हि यल्लक्षणानुगमे सति अवान्तरविशेषसंस्पर्श: स तस्य प्रकार इत्युच्यते यथा गोत्वस्य शाबलेयत्वादि, न तु तस्यैव स एव प्रकारो भवितु-महेँति तदनवस्थाप्रसङ्गात् । न चात्र विशेषसंस्पर्श: कश्चिदिति कथमस्य ध्वनिनि प्रकारत्वोक्ति: युक्तिमती ।

और = जो 'ध्वनि' के दो प्रकार कहे हैं—अविवक्षितवाच्य तथा विवक्षितवाच्य—उनमें—यह 'अविवक्षितत्व क्या जोड़ है? इसके अर्थ का तात्पर्य स्पष्ट करना चाहिए । क्या अविवक्षित-अनुपादेयत्व स्वरूप है या अन्यपरत्वरूप । और अनुपादेयत्व भी क्या सर्वात्मना-अनुपादेय होने पर इसका व्यङ्गकत्व भी अनुपादेय हो जाएगा क्योंकि व्यङ्गकत्व उसी पर आश्रित रहता है । और तब इसका प्रयोग ही दोषवह ठहरेगा जैसा कि अन्य पुनरुक्त आदि का । यदि अंशतः तो इस अंश का स्पष्टीकरण किया जाना चाहिए । छानबीन करने पर वह अपनी अप्रामाणता में ही पर्यवसित होता है । और तब अविवक्षितत्व, अन्यपरत्व और उपसरर्जनी-कृतातमतव—ये सब एक हो सिद्ध होते हैं । इस प्रकार तो ध्वनि का स्वरूप ही सिद्ध होता है, न कि उसका प्रकार भेद ।

किसी भी वस्तु का प्रकार तो वह कहलाता है जो उसके पूरे लक्षण से युक्त होने के बाद किसी अवान्तर विशेषता से युक्त हो । जैसे गोत्व का शाबलेयत्व ( चितकबराापन ) आदि ( होने से चितकबरी गाय गाय का प्रकार—भेद कही जाती है ), न कि उसे वस्तु को वही वस्तु प्रकार बन सकती है, उसमें अनवस्थादोष आता है । और यहाँ ( अविवक्षितवाच्य में ) विशेष गुण कोई है नहीं फिर इसे ध्वनि का प्रकार कहना कैसे युक्ति-युक्त हो सकता है ।

विमर्श: पूरे संदर्भ का निष्कर्ष यह है कि ध्वनिकार ने ध्वनि के दो भेद ध्वन्यालोक के प्रथम उद्योत में किए थे—'अस्तिध्वनि: स च अविवक्षितवाच्यो विवक्षितान्यपरवाच्यश्चेति

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१७२ व्यक्तिविवेकः द्विविधः सामान्यान्येन । अर्थात्—ध्वनि है, और वह सामान्यान्यतः दो प्रकार की है—अविवक्षितवाच्य तथ विवक्षितान्यपरवाच्य ।' इनके उदाहरण भी उन्होंने दिए थे, प्रथम का—

'सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषा अस्मयः ।' शूरश्र कृतविद्याश्र यश्र जगति सेविठुम्‌।

अर्थात् सुवर्णपुष्पा पृथिवी को तीन पुरुष चिन्वन्ति हैं—शूर, विद्वान्‌ और कुशल सेवक । यहाँ उनका कहना यह था कि सुवर्णपुष्पा पृथिवी के चिनयन का अर्थ है—उसको पाना । इसमें वक्ता चयन्‌ अर्थ को नहीं कहन चाहता वह कहना चाहता है अनायासप्राप्तिरूपो अर्थ को अर्थात्‌ उसका विवक्षित अर्थ है—शूर आदि को सम्पत्ति की प्राप्ति अनायास हो जाती है । अतः चयन्‌ का वाच्य अर्थ मूल आदि का चुनना विवक्षित नहीं है । इसी प्रकार विवक्षितान्यपरवाच्य का उदाहरण उन्होंने—शिखरिणी क तु नाम इत्यादि दिया था । उसमें विश्वफल पर चौंच की चोट कर रहे तोते को देखे किसी विदूषक ने किसी सोलोनी सुकुमारी से पूछा—इसने किस पर्वत पर कौनसा तप कितने दिनों किया कि यह तुम्हारे अघर से मेल खाने वाले विश्वफल पर चौंच लगा रहा है ।' इसमें यह ध्वनि निकलती है कि उत्तम फल के लिये श्रीपर्वत आदि पर निरत समय तक कोई निश्चित तप करना पड़ता है । किन्तु तुम्हारे अधर की समानता का सौभाग्य पान वाले पदार्थों को भोग पाने के लिये इतने तप की आवश्यकता है, तुम्हारे सुरदुर्लेभ अधर की तो बात ही क्या ? इस अर्थ के प्रति—वाच्य अर्थ गौण रहता है, यद्यपि वह अविवक्षित नहीं रहता । कारण कि उसकी प्रतीति होने पर ही इस व्यङ्ग्यार्थ की प्रतीति होती है । अतः यहाँ वाच्य अर्थ विवक्षित होते हुए भी व्यङ्ग्यार्थ के प्रति समर्पित है । फलतः = विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि का यह उदाहरण है । उक्त पद्य की बड़ी ही ललित व्याख्या लोचन में दी गई है । अनुमितिवादी का कथन है कि ये दोनों भेद अमान्य है । वस्तुतः ये भेद नहीं, प्रतीयमान का स्वरूपकथन है । कारण कि प्रथम अविवक्षितवाच्य ध्वनि—का अर्थ भेदपरक सिद्ध नहीं होता । क्योंकि अविवक्षित का अर्थ अनुपादेय हो सकता है । तब यह सोचना होगा कि वाच्य अनुपादेय सर्वात्मना होगा या अंशतः । सर्वात्मना होते पर = वाच्य की सभी विशेषतयें अनुपादेय होंगी तो उसमें माना जाने वाला व्यङ्गयकत्व भी अनुपादेय हो जायेगा, फिर उस पर आश्रित ध्वनि भी अनुपादेय हो जायगी । यदि अंशतः अनुपादेय कहा जायेगा तो—व्यञ्जकांश को उपादेय मानकर वाच्यांश को ही अनुपादेय कहा जायेगा, अनुपादेयता का अर्थ—उपसर्जनीकृतातमता ही होगा, क्योंकि वाच्य प्रधानरूप से उपादेय नहीं होगा, किन्तु अप्रधान रूप से और तब उसकी अनुपादेयता रहेगी ही, कारण कि सर्वात्मना वाच्य अनुपादेय नहीं हो सकता यह माना जा चुका है । अप्रधानता और उपसर्जनीकृतातमता एक ही बात है । ऐसी स्थिति में जो ध्वनि का लक्षण था वही रस ध्वनि भेद का लक्षण सिद्ध होता है, कोईँ ऐसी विशेषता सिद्ध नहीं होती जिससे वह ध्वनि का प्रकार सिद्ध हो सके । प्रकार बनने के लिये यह आवश्यक है कि मूल का लक्षण भी उसमें रहे और ऊपर से भी कोई अवान्तर विशेषता उसमें हो । जैसे—चित्रकवरी गाय—गाय का प्रकार है । उसमें गोत्व रहता ही है ऊपर चित्रकवरापन भी रहता है । ऐसी बात ध्वनि के भेद अविवक्षितवाच्य में नहीं है, अतः वह भेद नहीं, ध्वनि ही है ।

सच बात यह है कि अवान्तर पदार्थं विशेषसापेक्ष होता है । मूलं लक्षण एक ही होता है । अवान्तर भेद परस्पर भिन्न होते हैं । गाय का चित्रकवरापन उससे भिन्न—नील, पीतादि की अपेक्षा रखते हैं । वे उन दूसरे रक्खों की अपेक्षा भिन्न और विशेष है, अतः वे उनसे युक्त व्यक्ति को मूल

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व्यक्ति का प्रकार सावित करते हैं। ध्वनि में भी अविवक्षितवाच्य विवक्षितान्यपरवाच्य की तुलना में अवान्तर विशेष ही ठहरता है, अतः वह निश्चित ही ध्वनि प्रकार है। किन्तु बात यह है कि अनुमितिवादी लक्षणा नहीं मानता। अभिधा ही उसके यहाँ एक कृति है। ऐसी स्थिति में उसकी दृष्टि में अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य का भेद लक्षणा नहीं वनता। क्योंकि इन दोनों का भेद लक्षणा और अभिधा के भेद पर निर्भर है। अविवक्षितवाच्य लक्षणामूलक माना जाता है और अविवक्षितवाच्य अभिधामूलक।

किंवेदं विवक्षितान्यपरवाच्यत्वं नाम न बुध्यामहे। यदि विवक्षिततत्वं नाम प्राधान्यमुच्यते तत्तु कथम् तस्यान्यपरत्वं घटते। अन्यपरत्वं हान्यस्याझभावो भण्यते। यस्य चाझभावः स कथं तदैव विवक्षितत्वात् प्राधान्यमनुभवेद्, इति यद् वाच्यस्य विवक्षितत्वमन्यपरत्वविरोधात् तद् विप्रतिपिद्धं विवक्षितान्यपरत्वयोर्विरोधात्।

अब दूसरे भेद विवक्षितान्यपरवाच्य का खण्डन करते हैं—और हम इस विवक्षितान्यपरवाच्यत्व को नहीं समझ पा रहे हैं। यदि विवक्षिततत्व का अर्थ प्राधान्य माना जाय तो उसका अन्यपरत्व कैसे घटेगा। अन्यपरत्व का अर्थ दूसरे के प्रति अझृ बनना कहा जाता है। जो अझृ बन गया वह उसी समय विवक्षित होकर प्राधान्य पा सकता है इसलिये वाच्य का जो विवक्षितत्व और अन्यपरत्व है वह आपस में ही ( विरोधी ) कट मिटने वाली बातें हैं क्योंकि विवक्षितत्व और अन्यपरत्व का विरोध होता है।

एकाश्रयत्वेन हि प्राधान्येतरयोगित्वं विशेषणाभिमतार्थविषयमेव सङृच्छते नान्यविषयम्। तदेव हि विशेष्यस्याझधाननिधनभावेन विवक्षितत्वात् प्राधान्यम् उपाधिमभावाच् वास्तवादप्राधान्यमनुभवितुमलम्, यथा ‘रामस्य पाणिरसि निर्भरगर्भखेदासीतावासनपटोः करुणा कुतस्ते’ इत्युक्तम्।

प्राधान्य और अप्राधान्य दोनों विशेषण रूप से मान्य वस्तु में ही साथ रह सकते हैं, और कहीं नहीं। वह विशेषण ही विशेषेष में उत्कर्ष का आधान करने का हेतु होने के नाते विवक्षित होकर प्राधान्य का और उपाधिरूप होने से अप्राधान्य का अनुभव कर सकता है—राम का हाथ है, परिगत गर्भ से खिन्न सीता को जङ्गल में छुड़वाने में चतुर तुम्हमें करुणा कैसी ? इसमें कहा गया है।

किंवास्य विवक्षितान्यपरवाच्यस्य ध्वनिप्रभेदत्ववेदभ्युपगम्यमाने वाच्यस्यान्यपरत्वमनुपादेयमेव तस्य तत्प्रभेदत्ववादे सिद्धे। अन्यपरत्वं ह्युपसर्जनीकृतातत्त्वम्। तच्च ध्वने: सामान्यं रूपमुक्तमेव। यथात्र तदुपादीयते पूर्ववत् तदुपादीयताम् उपादीय उभयोरपि तत्प्रकारत्वविशेषात्।

इसके अतिरिक्त विवक्षितान्यपरवाच्य को ध्वनि भेद मान लेने पर वाच्य का अन्यपरत्व शब्दतः नहीं कहा जाना चाहिए। क्योंकि उसकी प्रतीति उसका ( ध्वनि ) प्रभेद कहते से हो हो जाती है। अन्यपरत्व है क्या ? (उत्तर) उपसर्जनीकृतातत्त्वम्। और वह ध्वनि का सामान्य रूप है यह पहले ही कहा जा चुका है।

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कह हू दिया है। और यदि यहाँ ( प्रभेद में ) उस ( अन्यपरत्वरूप उपर्जनीकृतात्मत्व का उपादान करते हैं तो प्रथम भेद ( अविवक्षितवाच्य ) में भी उसका उपादान किया जाना चाहिये ? या फिर दोनों ही जगह उपादान न किया जाय, कारण कि दोनों ही ध्वनियों के एक समान प्रकार हैं।

विमर्शे : अनुमितिवादी ने विवक्षितत्व का अर्थ वस्तुमिष्ठ यानी तात्पर्यं विषय माना है, अतः उसके अनुसार जो अर्थ तात्पर्य विषय होगा उसमें अन्यपरता का रहना सुतरां विरुद्ध होगा। कारण कि अर्थपरता का अर्थ उसमें उपर्जनीकृतत्व या अप्रधानत्व किया है। जो तात्पर्य विषय होगा वह अप्रधान कैसे होगा। कारण कि प्रधानत्व और अप्रधानत्व का विरोध होता है। और दो विरुद्ध तत्त्व केन्द्वल विशेषण को छोड़कर और कहीं रह नहीं सकते। विशेषण विशेष्य का उपकारक होने से विवक्षित हो जाता है और उसकी उपाधि होने से अविवक्षित। विवक्षित होने से प्रधान हो जाता है और अविवक्षित होने से अप्रधान। फलतः केवल विशेषण में प्राधानय अप्रधानन्य का युगपत्‌ निर्वाह सम्भव है, और कहीं नहीं। अतः विवक्षितान्यपरवाच्य में वह सम्भव नहीं। तीसरी बात यह है कि जो अर्थ विवक्षित होता है और प्रधान वाच्य का उक्त हो तो उसमें अन्यपरता अपने आप सावित हो जायगी। और सदैव सावित होती रहेगी, तब अन्यपरत्व के शब्दतः कथन की जरूरत ही क्या ? और यदि उसे सचमुच शब्द से कहना ही है तो फिर अविवक्षित वाच्य में भी अन्यपरत्व का शब्दतः उपादान किया जाना चाहिये।

इस प्रकार अविवक्षितवाच्य और विवक्षितान्यपरवाच्य दोनों ही ध्वनिभेद ठीक नहीं लगते। इन दोनों का खण्डन करके अब इनके प्रभेदों का खण्डन करते हैं—

किञ्चार्थोऽन्तरसङ्क्रमितवाच्यस्य यथुदाहरणं तथोभिर्‌माणवक्‌ इति वद्‌ गुणवृत्तेरेव सङ्घ्च्छते तस्य गुणवृत्तिप्रकारत्ववस्मर्थनात्‌। तथाहि प्रसिद्धा-न्यूनातिरिक्तभावस्यन्यस्य साधार्यप्रतिपाद्यर्थमन्यच्चारोप उपचारः। स चायमारोप्यारोपकभावात्मकतया उभयार्थविषयो वेदितव्यः।

और अर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्य का जो उदाहरण है उसे अभिर्‌माणवक: के समान गुणवृत्ति का ही उदाहरण माना ठीक है। क्योंकि उसमें गुणवृत्ति की प्रकारता ( भेदता ) समोचित होती है। वह इस प्रकार कि प्रसिद्ध अन्यून और अनतिरिक्त— जो अन्य पदार्थ, उसका अन्य पदार्थ पर साधर्म्य के ज्ञान के लिये आरोप ( योपना ) उपचार कहलाता है। वह ( उपचार ) आरोप्यारोपकभाव रूप होने से दोनों अर्थों में विद्वमान समझना चाहिये।

तदश्र यदा एक एव शब्दोऽभिधेयः सामान्यविशेषांशापरिकल्पने-नोभयरूपोऽस्तस्य विषयसावं भजते, तदर्थप्रकरणाविधयवसितौत्कर्षापकर्षों स इन्दुरिन्दु:' इति। न तु सामान्यांशः, विशेषस्य सामान्याव्यभिचारात्‌।

और तब; जव एक ही अर्थ एक शब्द से दो बार कहा जाता है अतः सामान्य और विशेष अंशों में दो रूप से - आकार पुनः इसका ( उपचार का ) विषय वनता है तब अर्थ = प्रयोजन और प्रकरण आदि से निर्धारित कर लिया जाता है उत्कर्ष या अपकर्ष जिसका ऐसा विशेषण ही उस पर आरोपित किया जाता है, और उस ( द्वितीय बार उसी शब्द से कथित अर्थों ) में साधर्म्य के ज्ञान का कारण वनता है। यथा—वही अमृत अमृत है, वही चन्द्र चन्द्र है। न कि सामान्यांश, कारण कि विशेष का सामान्य से विलगाव नहीं रहता।

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विमर्शः गुणवृत्ति सादृश्य सम्बन्ध से होती है और सादृश्य को ही बतलाती है इसका स्पष्टीकरण पहले किया जा चुका है। यहाँ पुनः अनुमितिवादी व्यञ्जनावादी के उपर आक्षेप करने के लिये वह पुरानी बात उखाड़ता है। व्यञ्जनावादी ने अधिवक्षितवाच्य के दो भेद किये थे अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरसक्तवाच्य। अर्थान्तरसंक्रमित का उदाहरण खिरगध ० ० ० रामोडसिम सर्वं सहै- दिया था । अतः शब्दों के मूल अर्थ भी बचे रहते हैं और नये अर्थों का आदान भी हो जाता है। यहाँ व्यञ्जनावादियों ने उपादान लक्षणा मानी। पर व्यञ्जनावादी उसमें गौणी लक्षणा सिद्ध करता है—यह अत्यन्त नवीन बात है। व्यञ्जनावादी के यहाँ गौणी लक्षणा रूपक और अतिशयोक्ति अलङ्कार में होती है। अर्थान्तरसंक्रमिततथा च्यध्वनि आदि में नहीं । रूपक में भी यद्यपि उपमान पद का 'स्वसदृश' इस दूसरे अर्थ में संक्रमण होता है और उसमें भी लक्षणा होती है तथा उसका प्रयोजन निरतिशय साम्य की प्रतीति व्यङ्ग्य । किन्तु यह ध्वनि लक्षणामूलक होते हुये भी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि नहीं होती । यह अलङ्कार मूलकवस्तु ध्वनि होती है जो विवक्षितान्यपरवाच्यध्वनि के दूसरे भेद संलक्ष्यक्रम में होती है । अनुमितिवादी उपादान लक्षणा के स्थलों में भी सादृश्य मानता है और उसे गुणवृत्ति कहता है—इसका अर्थ यह है कि वह रूपक आदि में भी अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि अर्थात् अविवक्षितवाच्यता मानता है । उसकी यह मान्यता मौलिक है ।

व्यञ्जनावादी ( ध्वन्यालोककार ) ने अविवक्षितवाच्यध्वनि के दो भेद बतलाए थे अर्थान्तर संक्रमितवाच्य और अत्यन्ततिरसक्तवाच्य । इनमें से अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य का उदाहरण दिया था 'रामोडसिम सर्वं सहै ।' इसमें राम का अर्थ करते हुए उन्होंने लिखा था—'अनेन हि व्यङ्ग्यधर्मोऽन्तरपरिणतः संज्ञी प्रत्यायते न संज्ञिमात्रम्' अर्थात् इस राम शब्द के द्वारा दूसरे व्यङ्ग्य धर्मों में परिणत संज्ञी का ज्ञान कराया जाता है, केवल संज्ञी का नहीं । इसका स्पष्टीकरण करते हुए अभिनवगुप्त ने लिखा था—इस जगह राम शब्द का अर्थ अनुपयोगी है अर्थात् उसका अपना अर्थ—'दशरथ का पुत्र' यदि हटा भी दिया जाय तो पद्य की कुछ हानि नहीं होती, अतः उसका उपयोगशून्य है; अतः उसका राज्यनिर्वासनादिस्वरूप अनेक धर्मों से युक्त राम किया जाता है । उदाहरणार्थ 'रामशब्दः—निर्वासनादिव्यापारः सह ननु राम' इस अर्थ में संक्रान्त होकर वर्धमानाचार्य ने ही दिया था—'रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि'—में द्वितीय कमलपद । उसका अर्थ अभिनवगुप्त ने किया था कि यह द्वितीय कमलशब्द सौन्दर्यंपात्रता आदि दूसरे कई धर्मों से चमत्कारपूर्ण अर्थ में प्रयुक्त हुआ है । इन स्थलों में कौन सी लक्षणा मानी जाय—इसका स्पष्ट उल्लेख काव्यप्रकाश और साहित्यदर्पण में नहीं मिलता, किन्तु लक्षणा मान्य है । यह लक्षणा वहाँ होती है जहाँ सादृश्य की प्राप्ति नहीं होती । अतः इसे शुद्धा माना जाता है । यहाँ एक बात ध्यान देने की यह है कि अनुमितिवादी इसे भी गौणी मान रहा है । वह 'अभिमतप्रदायकः' की कोटि में उसे गिना रहा है, गौणी सादृश्य सम्बन्ध को लेकर होती है, अतः वह इस स्थल में सादृश्य सम्बन्ध भी स्वीकार करता है और उसका निरूपण भी करता है । वह इस प्रकार कि—'कमलानि कमलानि' इस प्रकार एक ही शब्द के दो वार प्रयोग से उसका अर्थ अन्यत्र एक होते हुए भी यहाँ एक नहीं रहता । पहले का अर्थ सामान्य रहा आता है, दूसरे का विशेष हो जाता है । अर्थात्—कमलानि कमलानि में प्रथम कमल का अर्थ सामान्य कमल रहा आता है और द्वितीय का असामान्य या श्रीसम्पन्न-सौरभक्जित कमल हो जाता है । इस

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प्रकार दो भिन्न अर्थों में से एक का दूसरे पर आरोप कर लिया जाता है। यहाँ आरोप की वही प्रक्रिया मानी जाती है जो अभिनिरूषणवकः या गौर्वाहीकः में। वहाँ सदृशय के आधार पर दो पदार्थों का अभेद होता है, यहाँ भी कमलपदेन दोनों कमल का सादृश्य है उनका अभेद विवक्षित है। और ठीक भी है। सूर्य निकलने पर सामान्य कमल ही तो विशेष कमल बन जाता है। दोनों ही स्थितियों में एक रहते हैं। महिमभट्ट ने इस उदाहरण को ‘तद्रूतमसृतम्’ इस उदाहरण के रूप में उपस्थित कर दिया है। किन्तु ‘रामोऽस्मिन् सर्वं सहै’ के विषय में आरोप की प्रक्रिया कैसे होगी यह नहीं कहा। हमारे विचार में यहाँ ‘सहै’ इस उत्तमपुरुष की क्रिया द्वारा वक्ता राम का आरोप ज्ञेय है और पाठक के मस्तिष्क में उपस्थित उस राम पर इस श्लोकवाक्य द्वारा उपस्थित राम का आरोप कमलानि कमलानि वाली रीति से कर लिया जाता है। व्यक्तिविवेककार का कहना है कि यह आरोप्यारोपकभावसम्बन्ध दोनों में बराबर होता है अर्थात्—कमलानि कमलानि में दोनों कमलों का दोनों कमलों पर आरोप हो सकता है। इसी प्रकार राम आदि का भी।

इस सन्दर्भ में एक तथ्य और भी ध्यान देने का है। वह यह कि अभी तक अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि के विषय में व्यक्तिविवेककार ने जो भी कुछ कहा है वह उनकी अपना सिद्धान्तमत वाच्यध्वनि के विषय में व्यक्तिविवेककार ने जो भी कुछ कहा है वह उनकी अपना सिद्धान्तमत नहीं है, कारण कि उनके मत में तो लक्षणाध्वनि शब्दध्वनि ही नहों हैं। अभिधा ही एकमात्र शब्दवृत्ति है। अतः यहाँ तक का सम्पूर्ण विवेचन केवल इस उद्देश्य से किया गया है कि यदि ध्वनिवादी को अपनी मान्यता सिथर करनी ही है, तो उन्हें अधिक ध्यानवीन कर सिथर करे ताकी वे एक दूसरे से अलग रह कर स्वतन्त्र रूप से सामने आ सकें। अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि में कौन-सी लक्षणा काम करती है—इसे वह स्पष्ट करे और फिर उसमें किसकी लक्षणा किस पर होती है यह भी वतलाए। साथ ही यह भी दिखलाए कि आरोप से या उपचार-से उसमें अन्तर है या एकता? ध्वनिवादी ने इन प्रश्नों का उत्तर नहीं दिया है अतः अनुमितिवादी ने ही उनकी ओर से स्वयं समाधान सोचकर इतने तर्क उपस्थित किये—अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य में गौणी-सारोपा लक्षणा होती है। वह उपचार रूप होती है। आरोप दोनों का दोनों पर हो सकता है। फलतः लक्षणा भी दोनों में से किसी की भी की जा सकती है। इस उपरी-अधिक विवेचन के बाद ग्रन्थकार अपने सिद्धान्त पर आते हैं और अब अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य को अनुमान रूप सावित करते हैं।

अर्थान्तरसंक्रमितवाच्योडप्यनुमान एवान्तर्भवति। रामादिशब्दा हि करणाद्यवसितोत्कर्षापकर्षलक्षणधर्मैविरिष्टां संज्ञिनं प्रत्याययन्ति, न संज्ञितत्रम्, अर्थान्तरं यद्जुमितं धर्मरूपं तत्र संक्रमितमाश्रयभावेन परिणतं वाच्यमस्येति कृत्वा। द्विविधो ह्यनुमेयोऽर्थो धर्मरूपो धर्मिरूपप्रकृतेः। तत्राद्योऽस्य विषयः तस्थव वाच्यार्थान्निःछ्छतया प्रतीतः। अन्यस्त्वन्यस्य, मधा, अभिन्न धर्म-दिति। ततो धर्मविशेषप्रतिपत्तौ प्रकरणादिरेव हेतुत्वागन्तव्यः, न रामादि-शब्दा इति।

अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य भी अनुमान में ही अन्तर्भूत हो जाता है। रामादि जो शब्द हैं वे प्रकरण आदि से निश्रित उत्कर्ष या अपकर्ष रूप धर्म से विशिष्ट संज्ञी (धर्मी) का ज्ञान कराते हैं

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प्रथमो विमर्शः

केवल, संज्ञी, ( धर्मी ) का नहीं । और वह अर्थान्तरसंस्क्रिमितवाच्य = शब्द की इस व्युत्पत्ति के आधार पर कि—धर्मरूप जो दूसरा अर्थ अनुमान द्वारा जाना गया है उसमें आश्रयरूप से पढ़ा हुआ है वाच्य जिसका । क्योंकि अनुमेय अर्थ दो प्रकार का होता है—धर्मरूप और धर्मीरूप । उनमें प्रथम इसका विषय होता है । क्योंकि वाच्यार्थ में विधमान रूप से उसी की प्रतीति होती है । और दूसरा दूसरे का । जैसे—यहाँ अग्नि है शुभ्रां होने से यह । इसलिए धर्म विशेष की प्रतिपत्ति के हेतुरूप से प्रकरानदि ही माने जाने चाहिए—राम आदि शब्द नहीं ।

विमर्श—ध्वनिकार ने, जैसा कि टिप्पणों में अभी-अभी स्पष्ट किया गया है, 'रामोऽस्ति' 'कमलानि कमलानि' आदि में—'व्यङ्गचयो धर्मान्तरपरिणत:' संज्ञी प्रतिपाद्यते न संज्ञिमात्रं' अर्थात व्यञ्जित हो रहे दूसरे धर्मों से युक्त संज्ञी का बोध होता है केवल संज्ञी का नहीं ऐसा कहा है । ध्वनिकार की इसी पदावली को अपनाकर व्यक्तिविवेककार अर्थान्तरसंक्रमितवाच्यध्वनि के स्थल माने जाते हैं अर्थात जिनके वाच्य अर्थ दूसरे अर्थों में बदलते माने जाते हैं वे प्रकारणादि की सहाय्यता से वैसे होते हैं । भाव यह कि प्रकारण आदि के आधार पर किसी भी शब्द का अर्थ बदलता है । यहाँ खिलधैयामलकान्ति में आये राम शब्दे भगवतः-सीताया वियोग की स्थिति में भगवान राम द्वारा उस समय कहा गया है जब उनके सामने सर्वोच्च उद्दीपक—वर्षाकाल और उसमें भी उमड़ी घटाओं का समय आया । अतः इस प्रकार के आधार पर भगवान राम अपनी अपकर्षस्थिति को राम शब्द से व्यक्त करते दिखाई देते हैं । वे बतलाना चाहते हैं कि उन्हें एक तो राज्य की जगह वनवास की यातना सहनी पड़ो और ऊपर से सीता का वियोग । अब वे काली घटाओं के मनोरम अवसर से पैदा हुई तड़पन को भी सह ही लेंगे । चिन्ता जानकी की है । उनका हृदय कोमल है । वह वन के कठों से, स्वयं आहत था ऊपर से वियोगजन्य कष्ट से आहत हुआ, तब तक उसकी सत्ता इसलिए मौजूद थी कि समय भी ग्रीष्म आदि रूक्ष था । किन्तु इस समय काली घटाओं के समय में वह कैसे रहेगा ।' इस बात में राम अपने अपकर्ष की स्थिति को रामोऽस्ति कहकर व्यक्त कर रहे हैं । स्वयं राम के द्वारा विशिष्ट स्थिति में कहा गया राम शब्द अपने अर्थ में प्रकारण को हेतु बनाकर उसमें विधमान विशेष धर्मों का अनुमान करा देता है । इस समय अर्थान्तर-संस्क्रिमितवाच्य शब्द का अर्थ—यह किया जाएगा कि राम का वाच्य दूसरे धर्मों के आश्रय रूप में अर्थ में बदल गया ।

होता है । पहले राम शब्द से प्रतीत अर्थ रामत्व आदि का आश्रय प्रतीत होता था, इस राम शब्द से प्रतीत अर्थ = चित्रविचित्रता के आश्रय का । व्यञ्जनावादी के मत में वाच्यार्थ—अवाच्यार्थ से मिलता था और उसमें विशेषता आती थी । अनुमितिवादी के मत में वह वैसा ही रहता है केवल उसमें विशेषता प्रतीत होने लगती है । इस मान्यता पर उपपत्ति देते हुए अनुमितिवादी ने लिखा है कि अनुमेयार्थ यहाँ धर्म रूप है अतः अनुमापक में वह रह सकता है, पर्वतो वहिमान् धूमात् = आदी में जहाँ अनुमेय अर्थ धर्मी रूप होता है उसकी बात भिन्न है ।

अनुमितिवादी ने अनुमिति सामग्री भी कह दी है—प्रकरण, हेतु, वाच्यार्थ और विशिष्टधर्म साध्य । उसने राम शब्द को हेतु न मानने का स्पष्ट निर्देश किया है—धर्मविशेषप्रतिपत्तौ प्रकरणादिरेव हेतुतयावगन्तव्यः । न तु रामादि शब्दः । इसप्रकार अर्थान्तरसंस्क्रिमितवाच्यध्वनि का निर्वचन और अनुमान में अन्तर्भाव बतला कर—अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यध्वनि की समीक्षा करते हैं ।

१२ व्य० वि०

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अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यस्तु पदार्थोंपचार एव यथा गौर्वाहीक इति ।

तस्याप्यनुमानान्तर्भावः समथीत एव । अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य तो पदार्थोंपचार हि है जैसे 'वाहीक बैल है' = यह । उसका भी अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाया जा चुका है ।

शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपतयैवस्तु न सम्भवत्येव । शब्दस्याभिधा-शक्तिव्यतिरेकेण शक्त्यन्तरानभ्युपगमादित्येतदुक्तं, वक्ष्यते च ।

न हि प्रकारस्तस्यैव स एवेत्युपपद्यते ॥ १०१ ॥

अविवक्षितवाच्यस्य ध्वनेर्युत्ता प्रकारता । न विवक्षितवाच्यस्य प्रकारस्तस्यैव स एवेत्युपपद्यते ॥ १०१ ॥

तदुक्तम् 'अनुमानान्तर्भूता' यदुपपादितम् ॥ १०२ ॥

तत् तिरस्कृतवाच्यस्य ध्वनेर्मेदेकदेशे का मता । द्वितीयोऽपि प्रकारो यः सोडपि सङ्च्छते कथं ॥ १०३ ॥

भक्तिद्विविधा मता । तत् तिरस्कृतवाच्यस्य ध्वनेर्मेदेकदेशे का मता । द्वितीयोऽपि प्रकारो यः सोडपि सङ्च्छते कथं ॥ १०३ ॥

परस्परिविरुद्धत्वाद् विवक्षातत्परत्वयोः ।

भक्ति दो प्रकार की होती हैं पदार्थरूप और वाक्यार्थरूप। जब उसका ज्ञान अनुमान में अन्तर्भूत दिखलाया गया तब तिरस्कृतवाच्य के ध्वनि और भक्ति का भेद ही क्या । ( विवक्षितान्यपरवाच्य ) वह भी संगत कैसे ठहर सकता है । क्योंकि विवक्षितता और अन्यपरता दोनों परस्पर विरुद्ध हैं ।

यः शब्दशक्तिमूलोऽन्यः प्रभेदो वर्णितो ध्वनेः ॥ १०४ ॥

सोऽयुयुक्तोऽन्येतरयोस्तत्त्वे मते ।

शब्दे शक्त्यन्तराभावस्यासकृत् प्रतिपादनात् ॥ १०५ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोका ।

इति श्रीराजानकमहिमभट्टविरचिते व्यक्तिविवेकाख्ये काव्यालङ्कारे ध्वनिलक्षणाक्षेपो नाम प्रथमो विमर्शः ।

जो शब्दशक्तिमूलक दूसरा ध्वनिविमेद वतलाया गया है वह ठीक नहीं है—( क्योंकि उसमें होने वाली ) दूसरे अर्थ की प्रतीति और ही कारण से हो जाती है ( वह इसलिये कि ) शब्द में दूसरी शक्ति का अभाव अनेक बार साबित किया जा चुका है ।

इस प्रकार राजानक श्रीमहिमभट्ट-रचित व्यक्तिविवेक नामक काव्यालङ्कार [ ग्रन्थ ] में 'ध्वनि के लक्षण पर आक्षेप' नामक पहला विमर्श पूर्ण हुआ ।

इस प्रकार व्यक्तिविवेक तथा उसके संस्कृतव्याख्यान के प्रथम विमर्श का अनुवाद ( भोपाल म० प्र० ) वासी पं० नर्मदाप्रसाद द्विवेदी के आत्मज पं० रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत हिन्दीभाष्य पूर्ण हुआ ।

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अथ तृतीयो विमर्शः

एवं तावत् प्रथमे विमर्शे ध्वनिलक्षणं दूषयित्वा ध्वनिशास्त्रगतं ‘काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति’ ग्रन्थान्तरं दूषयित्तुं सामान्थेन तावत् काव्यगतमनौचित्योक्त्वासरूपं दूषणप्रपञ्चसुपपादयितुमाह—इह खल्वित्यादिना—

इह खलु द्विविधमनौचित्यमुक्तम् अर्थविषयं शब्दविषयं चेति । तत् तत्र विभावानुभावव्यभिचारिणामयथायर्थं रसेषु यो विनियोगस्तन्मात्रलक्षणमेकमन्तरङ्गमाचैरेवोक्तमिति नेह प्रतन्यते ।

अपरं पुनर्वहिरङ्गं वहुप्रकारं सम्भवति । तद्यथा—विधेयाविमर्शः, प्रक्रमभेदः, क्रमभेदः, पौनरुक्त्यं, वाच्यावचनं चेति ।

इस प्रकार प्रथम विमर्शो में पहले तो ध्वनि लक्षण को सदोष ठहराया, अब ध्वनिशास्त्र में आए एक दूसरे ग्रन्थांश ( काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति… ) को सदोष ठहराने के लिए पहले सामान्य रूप से काव्य में आने वाले दोषों के जो अनौचित्य प्रतिपादित स्वरूप होते हैं, प्रपञ्च का उपपादन करने के लिए कहते हैं—इह खल्व इत्यादि द्वारा—

यहाँ जो है सो, दो प्रकार का अनौचित्य कहा गया है— ( १ ) शब्दविषयक और ( २ ) अर्थविषयक । इनमें से एक का स्वरूप, विभाव, अनुभाव और व्यभिचारों का रसों में जो बेमेल उपयोग है—वह इतना ही है, यह अनौचित्य अन्तरङ्ग होता है, इसका निरूपण पूर्ववत्तों आचार्यों ने ही कर दिया है अतः यहाँ इसका फैलाव नहीं किया जा रहा है । दूसरा जो है, वह वहिरङ्ग होता है, और वह कई प्रकार हो सकता है—जैसे विधेयाविमर्शो, प्रक्रमभेद, क्रमभेद, पौनरुक्त्य और वाच्यावचन ।

उक्तमिति सहदयैः। अन्तरङ्गमिति साक्षाद् रसविषयत्वात्। आचैरेति ध्वनिकारप्रभृति। तदुक्तम्—

‘अनौचित्यादते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् । प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥’ इत्यादिना ।

उक्तम् = कहा है = कहा गया है। = अर्थात् सहदयों द्वारा ।

अन्तरङ्गमिति = अन्तरङ्ग होता है, इसलिए कि वह साक्षात् रस विषयक होता है ।

आचैरेति = ध्वनिकार आदि द्वारा जैसा कि—

रसभङ्ग का कारण अनौचित्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है । प्रसिद्ध औचित्य का निर्वाह रस का परम रहस्य है—इत्यादि द्वारा कहा है ।

वहिरङ्गमिति । वाच्यसुखेन रसे पर्यवसानाद्। विधेयः प्राधान्येन प्रतिपादयिषितो योडर्थस्तस्य तदनुसन्धानम् उपसंजन्तीकारणात्। प्रक्रमः कस्यचिद्रसुनो निर्वाहयारम्भस्तस्य भेद्रो मध्येऽन्यप्रथीकरणम् अन्यथानिर्वाहश्च । क्रमस्य परिपाठ्या भेद उल्‍लङ्घनं व्यतिक्रम इति यावत् । पौनरुक्त्यं पुनःप्रतिपादनस् । वाच्यस्य वक्तव्यस्य अवचनमनुक्तिः ।

वहिरङ्ग = अर्थात्—वाच्य के माध्यम से रस में पर्यवसित होने से ।

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व्यक्तिविवेकः

विभेयं = अर्थांत वह पदार्थ जिसका प्रतिपादन प्रधान रूप से करना हो, उसका अविमर्शं = अर्थांत उपसर्जनीकरण = गौण या अप्रधान बना देने के कारण = अनुसंधान न होना—प्रधान रूप से समझ में न आना।

प्रक्रम = अर्थांत किसी वस्तु के निर्वाह के लिए आरम्भ, उसका भेद = अर्थांत बीच में परिवर्तन या जैसा एक रूप निर्वाह चाहिए वैसे निर्वाह का न होना।

क्रम = अर्थांत परिपाटी का भेद = अर्थांत उल्लंघन, अर्थांत व्युत्क्रम—

पुनरुक्त्यम् = दुबारा प्रतिवाद करना।

वाच्यस्य = जितने कहा जाना चाहिए उसका अवचन = अर्थांत न कहना।

एता अवान्तरभेदभिन्ना: पञ्चदूषणजातय:। यदेतदिह ग्रन्थकृता विचारसरणिमात्रश्रित्य विधेयाविमर्शोन्दोषपञ्चकमुपदर्शितं, न तत्राध्यातनपुरुषमात्रबुद्धिप्रणयनतासूययानादर: करणीय:। पूर्वैरेकविधदोषोद्धावनरुपपसि विचारस्य प्रणीतत्वात्। तथा हि। 'दास्या: पुत्र' इत्यादावाक्रोशेऽपष्ठया अलुकं प्रतिपादयता सूत्रकृता विधेयाविमर्शं: सूचित एव। तथा 'स्वामीश्वराधिपतिदायादे' (२-३-३९) इत्यत्र सूत्रे 'नहि भवति गवां स्वामीऽश्रेधु चे'ति वदता भाष्यकृता स्पष्टमेव प्रक्रमभेद: प्रतिपादित:। तथा 'कृञ्छानुप्रयुज्यते लिटि' (३-१-८०) इत्यत्रानुप्रयोगस्यानुशब्देन पर्यालोच्यतया व्यवहितपूर्वप्रयोगतां पातयाम्प्रथममास' इत्यादौ निपेधता, चादीनां च 'नहि भवति च वृक्ष:' इत्यादिना प्रयोगानियमस्मृत्यापनेनैवोक्तत्वं कथयता अस्थानप्रयोगलक्षण: क्रमभेद: कटाक्षित एव।

तथा 'कर्मन्धारयमतरवरथीयाभ्यां बहुव्रीहिलिङ्गुच्वात् स्यादि'ति वृत्तिलाघवं चिन्तयताकृत्यायनेन पौनरुक्त्यमपि प्रकाशितमेव। तथा ईश्वरसमासौ (५-३-६७) इत्यत्र प्रतिज्ञादायादसाक्षिप्रतिभू''इत्यादि सूत्र पर भाष्य करते हुए 'नहीं होता गायों पर भी' ऐसा कहते हुए भाष्यकार ने भी प्रक्रमभेद स्पष्ट ही बतलाया है। इसी तरह 'कृञ्छानुप्रयुज्यते लिटि (३।१।८०) यहाँ 'अनुप्रयोग' शब्द के 'अनु' उपसर्ग की अनुवृत्ति द्वारा 'तं पातयाम्प्रथममास (रघुवंश ९।६१) इत्यादि स्थलों में व्यवहित प्रयोगों का निषेध करते हुए तथा 'न हि भवति च वृक्ष:' इत्यादि द्वारा चकारादि (निपातों) के प्रयोग का नियम बतलाकर उनकी

दोषों की ये पाँच ही जातियाँ हैं, ये ही अनेक अवान्तर भेदों में बँट जाती हैं। ग्रन्थकार ने ऐसा विचारपथ अपनाकर यह जो विधेयाविमर्श आदि पाँच दोषों की उद्धावना की है उसपर यह सोचकर कि यह इसी के नए व्यक्त की सूझ है—असूया और अनादर नहीं किया जाना चाहिए क्यों इस प्रकार दोषों की उद्धावना करने का विचारपथ पुराने लोगों ने ही बना दिया है। 'दास्या: पुत्र' 'दासी का जाया?'—इसमें षष्ठी का लोप न करने की व्यवस्था देने वाले सूत्रकार (पाणिनि) ने विधेयाविमर्श की सूचना दी है। इसी प्रकार—स्वामीश्वराधिपति दायादसाक्षिप्रतिभू''इत्यादि सूत्र पर भाष्य करते हुए 'नहीं होता गायों पर भी' ऐसा कहते हुए भाष्यकार ने भी प्रक्रमभेद स्पष्ट ही बतलाया है। इसी तरह 'कृञ्छानुप्रयुज्यते लिटि (३।१।८०) यहाँ 'अनुप्रयोग' शब्द के 'अनु' उपसर्ग की अनुवृत्ति द्वारा 'तं

पातयाम्प्रथममास (रघुवंश ९।६१) इत्यादि स्थलों में व्यवहित प्रयोगों का निषेध करते हुए तथा 'न हि भवति च वृक्ष:' इत्यादि द्वारा चकारादि (निपातों) के प्रयोग का नियम बतलाकर उनकी

९. इस सूत्र पर पातञ्जल भाष्य नहीं मिलता।

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द्वितीयो विमर्शः:

चेतकता का कथन करते हुए ‘क्रमभेद्र’ की ओर भी आँख घुमाई, जिसका स्वरूप शब्द का ठीक जगह प्रयोग न करना है। इसप्रकार ‘कर्मधारयमसर्वर्थीयाभ्यां बहुव्रीहिलिङ्गुच्यवात-स्यात’ इसप्रकार सेमास में लाघव की चिन्ता करते हुए कात्यायन ने पौनरुक्त्य भी दिखलाया है।

इसी प्रकार सूत्रकार पाणिनिजो के ईषदसमासौ (५।३।६७) इस सूत्रकथन में कुछ लोग रूपक मानते थे। उसका खण्डन कर अन्य लोगों ने उक्त सूत्र में उपमा स्वीकार की ओर ‘प्रकृतिभूत पद का जो अर्थ तत्सदृश अर्थ में ‘कल्पप’ आदि होते हैं’ ऐसी व्यवस्था दी। इस प्रकार रूपक को छोड़कर उपमा को स्वीकार करने से उन्होंने वाच्यावचन दोष की ओर संकेत कर दिया तथा रूपक स्वीकार करने से अवाच्यावचन दोष की ओर भी।

इस प्रकार व्यक्तिविवेककार महान् विद्वानों का पथ अपना कर ही यह विचार कर रहे हैं। उनका उद्धेश्य निश्चयशिक्षा है, इसलिए थोड़ी भी आपत्ति की कोई गुंजाइश नहीं है। यह विषय बहुत बड़ी है अतः यहीं ठहरना ठीक है।

विमर्श—प्रतिज्ञान-समधिगम्य = प्रतिज्ञान = प्रतिज्ञा = गुरुशिष्यपरम्पर्यं किन्तु यहाँ केवल कथन उससे समधिगम्य = प्रतीत होते योग्य।

तु:श्रवत्वमपि न तस्य शब्दानौचित्यमेच, तस्याद्यनुप्रासादेरिव रसाद्-गुणयेन प्रतृत्तेरिश्त्वात्। केवलं वाचकत्वाश्रयमेतद् भवतीति न तत्तुल्य-कक्ष्यतयोपात्तम्।

वृत्त ( छन्द ) की दु:श्रवता भी दोष तो शब्द का ही है, कारण कि वह ( छन्द ) भी अनुन्रास आदि के ही समान रस की ओर देख कर चलता है। किन्तु ( उसका ) यह ( दु:श्रवत्व दोष ) वाचक शब्द मात्र पर निर्भर नहीं रहता अतः उसे ( विधेयाविमर्श आदि ) उन ( दोषों ) की जोड़ में रख कर नहीं गिनाया गया।

विमर्श—व्यक्तिविवेककार छन्द को शब्दालङ्कार मानते हैं। उन्होंने इसका स्पष्टीकरण ‘अतएव यमकानुप्रासयोरिव वृत्तस्यापि शब्दालङ्कारत्वमुपगतमस्माभि:’ इस प्रकार आगे स्वयं किया है। यह उनकी अस्यन्त मौलिक मान्यताएँ हैं। शब्दालङ्कारों में अनुनाद-वर्धन के परवर्ती आलङ्कारिकों में जो मान्यता स्थिर हुई थी, उसमें उसका रसानुरूप होना आवश्यक था। प्रतिकूल होने पर वही दोष होना माना जाता है। यथा मम्मट ने अनुष्टुप् छन्द में अकुण्ठोल्क्षणया आदि पद्य-रचना का स्पष्ट रूप है। महिमभट्ट भी ध्वनिकार के बाद हुए हैं। कदाचित् उन्हें अनुन्रास सम्भवन्धी इस मान्यता का ज्ञान था। इसीलिए आधार पर उन्होंने छन्द को शब्दों का अलङ्कार माना और इस के प्रतिकूल होने पर उसी को दु:श्रवत्व दोष। मम्मट का सिद्धान्त छन्दों के विषय में अनुन्रास के ही समान सरस काव्य में रसानुरूप होने का था किन्तु वे नीरस काव्य में भी छन्द की मात्नाआच्युति आदि को दोष मानते थे। महिमभट्ट काव्य को सरस ही मानते हैं नीरस नहीं, अतः उनके मत में छन्द यदि विकृत होगा तो वह रस के प्रतिकूल होगा ही। भले ही उसमें मात्रा विराम आदि का दोष हो। ( इस विषय में यहाँ इतना ही जानना पर्याप्त है। आगे इस विषय का विवेचन होगा। )

दोष मानकर भी अन्य दोषों के साथ दु:श्रवत्व को न गिनाने का कारण ग्रन्थकार ने उसका वाचकत्वाश्रय न होना बतलाया। इसका अभिप्राय यह है कि अन्य दोष वाचक शब्दों में रह्ते

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व्यक्तिविवेकः

हैं अतः वे जहाँ जहाँ रहते हैं वहाँ वाचकत्व रहता ही है। वे वाचकत्व-समनियत, वाचकत्व के साथ रहते हैं। दुঃश्रवत्व दोष-छन्द में रहता है। छन्द-संगीत रूप है। संगीत-स्वरूप होता है। स्वर में पद्यान्ती वाणी का रूप है। पद्यान्ती वाणी नाभिचक्र में रहती है। नाभिचक्र तक शब्द और अर्थ में भेद नहीं होता। वे अभिन्न रहते हैं। वहाँ अर्थ और शब्द मिले रहते हैं। उनका भेद हृदयदेश में होता है। हृदयदेश की वाणी मध्यमा कहलाती है। शब्द का अर्थ से विलगाव होने पर—शब्द को अपनी शक्ति से अर्थ का ज्ञान नहीं होता। उसमें अर्थज्ञानकर्ता ( पुरुष ) एक शक्ति आहित करता है। उसी से अर्थ का ज्ञान होता है। यह शक्ति—अभिधा, लक्षणा या व्यञ्जनात्मक होती है। अभिधा को ही ‘वाचकत्व’ कहा जाता है। इस प्रकार विधेयाविमर्श आदि दोष उन्हीं शब्दों में रहते हैं जिनमें अभिधारूप वाचकत्व रहता है। फलतः वे वाचकत्व के आश्रित उसीप्रकार रहते हैं जिसप्रकार पच्चत्व के आश्रित सौरभादि गुण। इस आश्रयता को मम्मट के टीकाकार गोविन्द ठक्कुर ने नियति कहा है। नियति का अर्थ है नियतभाव या नियम। इसीलिए ‘वाचकत्वाश्रय’ का अर्थ वाचकत्वनियत होता है। शाब्दबोध भाषा में ‘नियत’ की जगह ‘समनियत’ शब्द का प्रयोग किया जाता है। अतः हमने ‘वाचकत्वाश्रय’ का अर्थ ‘वाचकत्वसमनियत’ किया है। दु:श्रवत्व के साथ यह नियम नहीं है। कारण कि वह जिसपर आश्रित है वह है स्वरूप छन्द। स्वर में उपर्युक्त विवेचन के अनुसार अभिधारूप—वाचकत्व नहीं रहता। अतः वह वाचकत्व-समनियत नहीं होता। महिमभट्ट ने इस प्रसङ्ग में उन्हीं दोषों को गिनाया है, जो वाचकत्वसमनियत है। अतः दु:श्रवत्व जो वाचकत्वसमनियत नहीं है, उसे नहीं गिनाया।

संगति = अनौचित्यासामान्य का लक्षण—

पतस्य च विवक्षितरसादिप्रतीतिविधायित्वं नाम सामान्यलक्षणम् । अन्तरङ्गबहिरङ्गभावाश्रयणयोः साक्षात् परम्पर्या च रसभङ्गहेतुत्वादिष्टे।

इसका सामान्य लक्षण है इस आदि की अभोभिप्सित प्रतीति में विघ्नकारों होना। इनमें से एक को अन्तरङ्ग और दूसरे को बहिरङ्ग मानने का कारण इनके द्वारा साक्षात् और परम्परा से रसभङ्ग होना है।

एतस्य चैति। सामन्येऽनौचित्यस्य।

एतस्य चैति = सामान्यरूप से अनौचित्य का = अर्थात् अनौचित्य सामान्य का।

विमर्श—‘रस आदि की अभोभिप्सित प्रतीति में विघ्न’—यहाँ आदि पद से भाव, रसाभास, भावाभास—भावशबलता, भावोदय, भावसन्धि, भावप्रशम—विवक्षित हैं। अभोभिप्सित प्रतीति = मुख्यार्थहन्ति। मुख्यार्थे का अर्थ है रस और रति का अर्थ है अपकर्ष। अपकर्ष को व्यासङ्ग्या करते हुए काव्यप्रकाश के टीकाकार गोविन्द ठक्कुर अपने पद्य में लिखते हैं—उद्देश्यप्रतीतिविधायित्वलक्षणोदपकर्षे हतिशब्दार्थः। उद्देश्या च प्रतीति रसवति अविलम्बितता अनपकृष्टरसविषया च। नीरस तु अविलम्बिता चमत्कारिणी च अर्थविषया। अर्थात्—हति शब्द का अर्थ है अपकर्ष। अपकर्ष का अर्थ है उद्देश्य-भूत प्रतीति का विघात। उद्देश्य प्रतीति सरस काव्य में वह है जो रुचि कर न हो, तत्काल हो, और इसलिए जिसमें रसचर्वणा कमजोर न पड़े। इसप्रकार नीरस काव्य में उद्देश्य प्रतीति वह है जो तत्काल हो और चमत्कारपूर्ण हो। नीरस काव्य की यह प्रतीति अर्थविषयक होती है।

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द्वितीयो विमर्शः:

शब्द के अनौचित्य वादिरूप होते हैं । उसका हेतु—व्यक्तिविवेकव्याख्यान के अनुसार रसप्रतीति में परम्परया विघ्न करना है । परम्परया का अर्थ यह कि शब्द अर्थ ज्ञान कराता है । अर्थ विभावादिरूप होकर रस उपस्थित करता है । शब्द में दोष होने से अर्थ का ज्ञान सदोष होता है, और अर्थज्ञान के सदोष होने से उसके द्वारा विभावादिकी प्रतीति भी निर्दोष नहीं होती वह भी सदोष हो जाती हैं । इस प्रकार शब्द दोष अर्थ को वाच्य में रखकर समझकर करते हैं । अर्थ के दोष अनतरूप इसलिए कहलाते हैं कि अर्थ और रस के बीच कोई इतर तरव नहीं रहता जैसे शब्द और रस के बीच अर्थ रहता है । जो दोष अर्थ में रहते हैं वे तत्काल इसकी चर्वणा को विकृत कर देते हैं ।

त पतते विधेयाविमर्शादयो दोषा इत्युच्यन्ते । तानिदानீमखिलान् खलान् इव व्याख्यास्यास्यामः । सुग्धः किं विस्मयैष ष भजते मात्सर्यमौनं नु किं पृष्टो न प्रतिवचकि यः किल जनस्तत्रैति सम्भावयेत् ! छात्राभ्यर्थनया तत्तोडघ सहसैवोत्सृज्य मार्ग सतां पैरोभाग्यसमभाग्यभाजनजनासेध्यं मयाड़ीरुतम् ।। १ ।।

( अनौचित्य रूप ) वे ( हो ) ये विधेयाविमर्श आदि ‘दोष’ नाम से भी पुकारे जाते हैं ! अब हम उन सबकी व्याख्या खल तुल्य वनकर करेंगे ।

‘पूछा जाने पर जो कोई व्यक्ति उत्तर नहीं देता, उसके विषय में—‘क्या यह मूढ़ है, या असभ्य है, अथवा मात्सर्य के कारण ( जानते हुए भी ) चुप्पी साधे हुए है, ऐसी संभावनाएं की जा सकती हैं । इसकारण छात्रों की प्रार्थना पर आज बड़भागी लोगों का पथ एकएक हो छोड़कर मैंने अभागीपुरुष योग्य एकमात्र दोषडौँशन आरम्भ किया है ।’

दोषा इति = काव्यस्य विकृतत्वापादनाद् दूषणाद् दोषा इति । सुग्धः इति । पृष्टस्यप्रतिवचकत्वे त्रीणि कारणानि ( १ ) प्रतिवचनाप्रतिभानलक्षणं मौद्ध्यम् ( २ ) प्रतिभानेऽपि प्रौढरुपत्वमसभ्यत्वम् ( ३ ) प्रौढरेडपि गुणासहिष्णुत्वलक्षणं मात्सर्यम् । तान््यन्र सान्दृष्टप्रतिमानतया क्रमेगोक्तानि । यः किलेष्टव्य इव छात्राभ्यर्थनयेऽति प्रष्टव्यस्य अज्ञानकृतमिति प्रतिवक्तुमस्य च निर्देशः ! पौरोभाग्यं दोषैकग्राहित्वम् ।

काव्य को विकृत करने अर्थात् दूषित करने से इनको दोष कहा गया ।

जिस व्यक्ति से पूछा जाय उसके उत्तर न देने में तीन कारण हो सकते हैं (१) उत्तर न सूझने—रूप मुग्धता (२) सूझ जाने पर भी उसका प्रौढि से ( संक्षेप—विस्तार पूर्वक ) प्रतिपादन न कर सकने = रूप असभ्यता (३) प्रौढि ( अर्थात संक्षेपविस्तार पूर्वक उत्तरक्षमता ) होने पर भी दूसरें के गुण को न सह सकने—रूप मात्सर्य । यहाँ ( १ श्लोक में ) इन तीनों को किसी एक का निश्चयपूर्वक कथन न करते हुए क्रम से उल्लेख किया गया है । यह उल्लेख—‘यः किल’ यहाँ तक है । छात्रों की प्रार्थना = द्वारा ग्रन्थकार ने यह बतलाया कि उनसे दोषों के विषय में प्रक्ष किए गए । अज्ञानकृत = के द्वारा यह बतलाया गया कि ग्रन्थकार ने उन प्रश्नों का उत्तर देना भी स्वीकार किया । पौरोभाग्य का अर्थ है एकमात्र दोष को ही देखना ।

नतु यदि परकीयैः कारने परिहाराय दोषाणां विचारः ! किःपते, तत् किं निजकाव्ये न तेषां परिहारः । तथा च ‘भजते मात्सर्यमौनं नु किं’ इत्यतोडनन्तरम् ‘इति पृष्ट’ इत्येवं तेषां परिहारः ।

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क्रमेणेतिशब्दो निर्देश्यः क्रमान्तरेण निर्देशात् क्रमभेदो न युज्यते । एवमन्यत् क्षेयम् ।

तदर्थमाह—स्वकृतिष्विति

स्वकृतिष्वयन्त्रितः कथमनुशिष्यादन्यमयमिति न वाच्यम् । वारयति भिषग्पथ्यादितरान् स्वयंमाचरन्नपि तत् ॥ २ ॥

कृति: काव्यम् = कृति = काव्य ।

विमर्श—प्रस्तुत पद्य में अवाच्यवचन दोष है।

तत्र विधेयाविमर्शो यथा—

संरम्भः करिक्रीटमेघशकलोडरेशोन सिंहस्य यः सर्वस्यैव स जातिमात्रनियतो हेवाकलेरः किल ।

इत्याशाद्विरदक्ष्याम्बुदघटावबन्धे डप्यसंरब्धवान् योडसौ कुत्र चमत्कृतेरतिशयं यात्वमिवाकेसरः ॥

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द्वितीयो विमर्शः:

और मेघशकल के उलटे कल्पान्ततोयद । इस श्लोक की व्याख्या वाक्योक्ति जीवित में विस्तारपूर्वक की गई है ( व० जी० १९ उदा० ) अब वहीं से इसे समझना उचित है ।

अत्र ह्यसंबध्यमानिते नञ्‌समासस्तावदनुपपन्नः । तस्य हि पर्युदास एव विषयः; तत्रैव विशेषणत्वान्नञ् सुवचनेनोत्तरपदेन सम्बन्धोपपत्तेः ।

तदुक्तम्—

'प्रधानत्वं विधेये च प्रतिषेधेप्रधानता । | पर्युदासः स विज्ञेयो यत्रोत्तरपदेन नञ्‌ ॥' इति ।

यथा—

'जुगुप्सितमानवस्तो भेजे धर्ममनातुरः । | अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ॥'

यहाँ ( संबन्धः करि० पद्य में ) 'असंरब्धवान्‌' यह नञ्‌समास ठीक नहीं बैठता । वह पर्युदास में ही होता है कारण कि उसमें ( पर्युदास में ही ) नञ्‌ का विशेषण रूप से सुवन्त उत्तर पद के साथ ठीक सम्बन्ध बनता है । जैसा कि कहा गया है—

जहाँ विधि की प्रधानता हो और प्रतिषेध की अप्रधानता अतः जहाँ नञ् उत्तर पद के साथ आप्त—उसे पर्युदास समझना चाहिए । उदाहरण यथा—

'उसने ( दिलीप ) अग्रस्त रहते हुए अपनी रक्षा की, अनातुर रहते हुए धर्म किया, अगृध्नु रहते हुए अर्थ ( भूमि, रत्न आदि ) लिया, ( और ) अनासक्त रहते हुए सुख भोगा ।'

तावच्च्छब्दो विधेयाविमर्शत्रयस्यैतच्छ्लोकगतस्योपक्रमेधोतकः । सम्बन्धोपपत्तेरिति ।

अयं भावः—'समर्थः पदविधिः' ( २-१-१ ) इति वचनात् समासः सामर्थ्यनिमित्तकः । सामर्थ्यं च सन्निकर्षत्वं, सन्निकर्षत्वं च सम्बन्धः । स चात्र विशेषविशेष्यभावः । पर्युदासस्यैव नञ्‌ अब्राह्मण इति यथा । न छात्र वच्यमाणन्यायेन पर्युदासो घटत इति ।

ननुब्राह्मण इत्यादौ नञ्‌ कथं विशेषणम् । विशेषणं हि विशेष्यस्योपरञ्जकं भवति । न च नञ्छब्दो विरुद्धस्वादृं विध्यमुपरञ्जयति । तत्तु कथंस्य विशेषणस्वम् । ननु तद्‌ अब्राह्मण इत्यादौ ब्राह्मणशब्ददस्य वृत्तिनंञा योज्यते । तदुक्तम्—'नञ्‌युक्तमन्यसदृशाधिकरणे तथार्थे' इति । तत्र च शब्दशक्तिस्वाभाव्यं कारणम् । तथा चैतत्‌, तथा नञ्‌सूत्रभाध्यादिषेयम्‌ ।

'तावत्‌' शब्द इसी श्लोक में आरम्भ तीन विधेयाविमर्शों दोशों का योतक है ।

सम्बन्धोपपत्तेः***भाव यह कि 'समर्थः पदविधिः' के अनुसार समास सामर्थ्य पर निर्भर है । सामर्थ्य का अर्थ है सन्निकर्ष । संगति का अर्थ है सम्बन्ध । वह ( सम्बन्ध ) है यहाँ विशेषण—विशेष्यभावरूप । पर्युदास का ही नञ्‌ बनता है जैसे अब्राह्मण—इसमें । प्रस्तुत ( असंरब्धवान्‌ ) में जैसा कि आगे दिखलाया जायेगा—पर्युदास वनता नहीं ।

अच्छा ( प्रश्न ) अब्राह्मण—इत्यादि स्थलों में नञ्‌ विशेषण हो कैसे सकता है ? विशेषण तो विशेष्य का उपरञ्जक ( विशेष्य में अनुरूलता के साथ विशेषपाधायक ) होता है । और नञ्‌ का अर्थ है ( विधि के ) विरुद्ध ( निषेध ) अतः वह विधि का उपरंजन करता नहीं । अतः यह विशेषण कैसे बन सकता है ? ( उत्तर ) यह वात नहीं है । अब्राह्मण इत्यादि में ब्राह्मण शब्द ब्राह्मण के समान किसी ब्राह्मणेतर क्षत्रियादि के लिए प्रयुक्त है । ब्राह्मणशब्द की शक्ति का क्षत्रियादि में योतन

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व्यक्तिविवेक:

नञ् द्वारा होता है। जैसा कि कहा गया है—‘नञ्वयुक्तमन्यसदृशाधिकरणे तथाह्यर्थान्वगति:’***। ब्राह्मणेतर अर्थ में ब्राह्मण शब्द नञ् से निकल कर कैसे प्रवृत्त होता है—इसमें शब्द शक्ति का अपना स्वभाव ही कारण जानना चाहिए। इसका जो रूप है उसे नञ्सूत्र के भाष्य से समझ लेना चाहिए।

विमर्श—(नञ्सूत्रभाष्य)—भगवान् पतञ्जलि ने ‘नञ्’ (२।३।६) सूत्र पर तीन प्रश्नों के उत्तर दिए हैं। १—‘चः पुनः असौ?’ नञ् है क्या ?, २—‘किं नञ् प्रयुज्यमान: करोति—’ (वाक्य या समास में ) प्रयुक्त हुआ ‘नञ्’ करता क्या है ! ३—( समास में ) किंप्रधानोऽयं समास: ! नञ्—समास में प्रधान कौन होता है ? पूर्वपद, उत्तरपद यथा अन्य पद का अर्थ ? प्रथम प्रश्न के उत्तर में—उन्होंने नञ् को पदाथों का निवर्तक बतलाया है। द्वितीय प्रश्न इसौ प्रश्न से सम्बन्धित है। उन्होंने नञ् को आपत्ति और अप्राप्ति दोनों का कारण माना है। प्राप्ति के लिए उदाहरण दिया है दीपक का। जैसे दीपक अंधकार की निवृत्ति कर उसमें छिपे पदार्थों की प्राप्ति करा देता है वैसे ही नञ् भी। अप्राप्ति के लिए कौल प्रतिकोळ का उदाहरण दिया है। जैसे गड़ी हुई एक कौल पर दूसरां कौल रखकर ठोंकने से प्रथम कौल निवृत्त हो जाती है। तृतीय प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने नञ् को उत्तरपदार्थ प्रधान माना है। उदाहरण दिया है ‘अब्राह्मण’। वे इसमें ब्राह्मण शब्द को गुणवाचक मानते हैं। उन्होंने ‘तपः शृतं च योनिशुध्येतद् ब्राह्मणकारणम्’ यह पूरा वचन दिया भी है। उनका कहना है समुदायार्थक शब्द समुदाय के एक-एक अंग के भी वाचक होते हैं जैसे पञ्चाल। जैसे पञ्चाल शब्द देश और उस देश के व्यक्तियों का वाचक है वैसे ही ब्राह्मण शब्द ब्राह्मणमात्र तथा गुणवहीन और जातिहीन ब्राह्मण का भी वाचक है। कालाकलूटा, गंदा व्यक्ति ब्राह्मण होते हुए भी अब्राह्मण समझ लिया जाता है। कभी-कभी उसके विरुद्ध गौरा, शुचि व्यक्ति ब्राह्मण न होते हुए भी ब्राह्मण समझ लिया जाता है। भाष्यकार के इस वचन से ‘नञ्वयुक्तं’ वाक्य का अर्थ निष्पन्न होता है। वैयाकरण ने यहीं लिङ्गव भी है।

प्रधानत्वमिति। यत्र विधे: प्राधान्यं प्रतिषेधस्याप्राधान्यं नञ् उत्तरपदेन सम्बन्ध: स्याद्विधिप्रतिषेधयोर्निरास’ इति निगमनात्।

जहाँ विधि की ( १ ) प्रधानता हो और प्रतिषेध की ( २ ) अप्रधानता, नञ् का उत्तरपद से ( ३ ) सम्बन्ध हो, ( ४ ) समर्थ समास हो और ( ५ ) एकाक्षरता हो वहाँ पर्युदास होता है, कारण कि नियम है—किसी को छोड़कर किसी का उपदेश ( विधिरूप वचन = उपादान ) निरास ( पर्युदास ) कहा जाता है। इन पाँचों में से तीन तो ‘प्रधानत्वं विधे:’ सूत्र में कह दिए गए हैं। दो का आक्षेप कर लिया जाता है।

जुगोपेति। अत्र नञर्थविशिष्टस्योत्तरपदार्थस्य विधि:। न त्रस्तस्वादिनिषेध:। तत्राभ्यनुगम्यते। त्रस्तत्वादि: सिद्धस्वभाव: तदनुवादेन गोपनादि विधीयते इति पर्युदासस्वम् ।

इस पद में नञर्थ से विशिष्ट उत्तर पदार्थ का विधान ( प्रथान ) है, त्रस्तत्व आदि का निषेध ( प्रधान ) नहीं। उनमें अत्रस्तत्व आदि सिद्ध हैं, अतः उनका अनुवाद करके गोपन आदि का विधान किया जा रहा है अतः पर्युदास है।

विमर्श: विधि और निषेध की पहचान के लिए—इतना समझना पर्याप्त है कि किसी वस्तु का विधान विधि है जैसे—गुरु शिष्य से कहे—‘पढ़ो’। निषेध के लिए उससे उलटा—

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द्वितीयो विमर्शः: ३८७

'मत पदो' । यदि ये दोनों एक ही वाक्य में आनेवाले हों तो इनका उपयोग वाक्य में कैसे किया जाय—यह एक विचारणीय प्रश्न है । पतदर्थ प्राधान्य और अप्रधानता का सहारा लिया जाता है । यदि विधि में प्राधान्य होता है तो निपेध को उसके साथ लगा दिया जाता है जिसका वह निषेध होता है । ऐसी जगह पर्युदास होता है—उदाहरण—अन्रस्तो जुगोप='विना डरे रक्षा की' । इसमें वाक्य का निषेध और रक्षण का विधान दोनों एक साथ हैं । किंतु रक्षण का विधान प्रधान है, अतः निषेध को त्रस्त शब्द के साथ लगा दिया, कारण कि उसी पद से प्रतीत त्रास का निषेध विशिष्ट है । जहाँ निषेध प्रधान होता है वहाँ उसका उपयोग क्रियापद के साथ कर दिया जाता है । जैसे—'यह काला नहीं है' इसमें निषेध की प्रधनता थी अतः उसको 'है' क्रिया के साथ रखा गया । यह नहीं कहा कि 'यह अ-काला या अकृष्ण है' । इस विषय का स्पष्टीकरण ग्रन्थकार स्वयं करते हैं—

न प्रसज्यप्रतिषेधः तस्य ताद्रूप्यपरितत्वात् । तदुत्तम्—

अप्रधानन्यं विधेयेऽत्र प्रतिषेधे प्राधान्यता ।

प्रसज्यप्रतिषेधोऽस्ति क्रियया सह यत्र नज् ॥ 'इति ।

यथा—

'नवजलधरः सन्नद्र्धोडयं न हसनिशाचरः ।

सुरधनुरिदं दूराकृष्टं न तस्य शरासनम् ।

अयमपि पटुर्धोरासारो न बाणपरम्परा ।

कनकनिकषस्निग्धा विद्युत् प्रिया न ममोर्वशी ॥'

( नञ्समास का विषय पर्युदास ही है ) प्रसज्यप्रतिषेध नहीं, कारण कि वह उससे उलटा है ।

'जब विधि की हो अप्रधानता और प्रतिषेध की प्राधान्यता साथ ही नञ् का उपयोग हो—क्रियापद के साथ तो इसे प्रसज्यप्रतिषेध कहते है ।' यथा—

'उमड़ता हुआ यह नवीन मेघ है, द्रु राक्षस नहीं । दूर तक खिंचा हुआ यह इन्द्रधनुष है, उसका धनुष नहीं । यह अनवरत लगी झड़ी—धारा है—उसकी बाणदृष्टि नहीं । यह कनक निकष (काली और कसौटी पर पीली सुवर्णरेखा) के समान सुहावनी वस्तु—विजली है, मेरी प्रिया उर्वशी नहीं ।

अप्राधान्यमिति । प्रतिषेधस्य प्राधान्यं विधेयेऽप्राधान्यं नञः क्रियापदेन समवन्वग्योडस्मथ्समासः वाक्यभेदेक, तत्र प्रसज्य प्राप्यचय प्रतिषेध इति प्रसज्यप्रतिषेधः । अन्र कारिकायां त्रये निर्दिष्टेऽनूद् द्वयमाचिरस्म ।

नवेति । अन्र हसनिशाचरप्रतिषेधः प्रतीयते न तु अदसनिशाचरवधिरिति प्रसज्यप्रतिषेधता ।

( १ ) जहाँ प्रतिषेध की प्रधनता, ( २ ) विधि की अप्रधानता ( ३ ) नञ् का क्रियापद के साथ सम्बन्ध, ( ४ ) असमर्थे समास तथा ( ५ ) वाक्यभेद हो वहाँ प्रसज्य = 'पहुँचाकर प्रतिषेध = हटाने' के कारण प्रसज्य प्रतिषेध होता है । कारिका में तीन बातें कहीं गई हैं और दो आक्षेप द्वारा ऊपर से ले आई जाती हैं। नव=यहाँ इस निशाचर का प्रतिषेध प्रतीत होता है न कि अद्रु निशाचर की विधि । अतः प्रसज्य-प्रतिषेध हुआ ।

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१९८

व्यक्तिविवेक:

इह च पर्युदासाश्रयणमसज्जतम् अर्थेस्यायुक्तत्वप्रसङ्गात् । संरब्धव-

त्प्रतिषेधो ह्यात्राभिमतः नासंरब्धवद्वृत्ति:, तत्क्रैव क्रियांशप्रतिषेधावगतौ नञ्:

क्रियाभिसम्बन्ध्योपपत्ते: । न चासौ प्रतीयते; गुणीभूतसंरम्भनिषेधस्यार्थो-

नतरस्वैव संरब्धवत्सदृशस्य विधौ प्रतीते:, न च तत्प्रतीतौ विवक्षितार्थे-

लिङि: काचित् । तत्रसिद्धिपक्षे न समासोऽनुपपत्ते:, नञर्थस्य विधीय-

मानतया प्राधान्याॅदुत्थरपदार्थस्य चानूयमानतया तद्विपर्ययात् । समासे

च सति अस्य विध्यनुवादभावस्यास्तमयप्रसङ्गात् । यत्र तु विपर्ययस्तत्र

समासो भवत्येव । यथा—

'काव्यार्थतस्वावगमो न वृद्धाराधनं विना ।

अनिष्ठवान् राजसूयं क: स्वर्ग मुखयमश्नुते ।' इति ।

यहाँ ( असंरब्धवान् ) में पर्युदास का मानना ठीक नहीं है । इससे अर्थ गलत होने लगता है । यहाँ संरब्धवान् का प्रतिषेध कहना अभिष्ट है न कि असंरब्धवत् की विधि ।

( संरब्धवान् के प्रतिषेध का कहना अभिष्ट इसलिए है कि ) वैसा होने पर ही क्रिया-भाग का प्रतिषेध ज्ञात होता है ( और तब ) नञ् का क्रिया से सम्बन्ध बन जाता है ।

( असंरब्धवत् = असंरब्धवत्‌प्रतिषेधो ह्यात्रैति संरब्धवत्सदृशस्य संरम्भ-

तस्य वध्यमानन्याॅयेन प्रतिषेध इत्यर्थ: । असंरब्धवद्विरहिति संरब्धवस-

दृशस्य इह क्रियाकलापस्सहदासीनप्रायस्य विधिरित्यर्थ: । यदुक्तं 'नजिवृत्त्याॅदि'

तत्रैति संरब्धवत्प्रतिषेधे । नासावति प्रतिषेध्यता । तरिसदृकपक्ष इति विरचितो य: प्राधानभूत-

निषेधलचणोडर्थस्तस्य सिद्धिपत्त इत्यर्थ: । अस्य विध्यनुवादभावस्यास्ति नञर्थस्य विधिरुत-

रपदार्थस्यानुवाद इत्यस्य । समासे हि नञ्योऽपसर्जन उत्तरपदार्थ: प्राधान्येन प्रतीयते ।

काव्यार्थेति । अत्र व्यचच्छेद्यं प्रसज्यप्रतिषेधं प्रदर्श्यं परिच्छेद्यं पर्युदासमुदाहर्तित ।

नञु प्रसज्यप्रतिषेधे नञ्: क्रियांन्वयेऽसंरब्धवानित्यत्र संरम्भक्रियानिषेधो भविष्यति ।

तत् कोटत्र दोष इत्याह—क्रियाकर्त्रंशाभागिति ।

असंरब्धवत्प्रतिषेध अर्थात् संरब्धवान् जो पुरुष उसकी जो संरब्धता अर्थात् संरम्भ-क्रिया

आगे कहे जानेवाले क्रम से—उसका प्रतिषेध —( विवक्षित है ) ।

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द्वितीयो विमर्शः:

असंरब्धवद्विधि अर्थात् संरब्धवत् के समान—संरम्भ क्रिया के समान क्रिया का कर्त्ता—जो उदासीन तुल्य हो उसकी विधि । जैसा कि कहा है 'नजिवयुक्तमन्यस्य सदृशाधिकरणे'***इत्यादि ।

तत्रैति अर्थात्—संरब्धवत् प्रतिषेध में !

न चासाविति ( ग्रन्थकार ) न चासौ कहकर उसी का प्रतिषेध करते हैं ।

तत्सिद्धिपक्षे = अर्थात्—विवक्षित जो प्रधान अर्थ विशेषाभिप्राय जो अर्थ या उसकी सिद्धि के लिए ।

अस्य विध्यनुवादभावस्य = अर्थात्—नजर्थ की विधि और उत्तरपदार्थ का अनुवाद होने से !

समास में नजर्थ को उत्तरपदार्थ अपने भीतर छिपा लेता है और वही प्रधान बन जाता है ।

काव्यार्थ—इसमें व्यवच्छेद्य प्रसज्यप्रतिषेध को दिखलाकर परिच्छेद्य पर्युदास का उदाहरण देते हैं ।

( प्रश्न ) यदि प्रसज्य प्रतिषेध में नञ् का सम्बन्ध क्रिया के ही साथ होता है तो असंरब्धवद् में ( नञ् का अन्वय संरब्ध के भीतर बैठीं संरम्भ क्रिया के साथ हो लेगा फलतः ) संरम्भ क्रिया का निषेध होगा । तब ऐसा ( समास ) करने पर भी दोष ही क्या ? इस पर उत्तर देते हैं—

क्रियाकच्रांशभागर्थो वाक्येऽपोह्यो नजाऽयदि ।

क्रियांरा पृथापोह्य: स्यान्नञ्चेष्टवानितिवत् तदा ॥ ३ ॥

अकुम्भकार इत्यवद् वृत्तौ तु स्याद् विपर्यय: ।

इत्येष नियमोऽर्थेस्य शब्दशक्तिस्वभावत: ।

इत्यन्तरंक्षौकौ ।

एक हो वाक्य में यदि नञ् के द्वारा ऐसे शब्द का अर्थ हटाया जा रहा हो जिसका एक अंश क्रियात्मक हो और एक कच्रात्मक तो हटाया जाता है केवल क्रियात्मक अंश ही; जैसे—'न-इष्टवान्' इत्यादि ।

'अकुम्भकार' इत्यादि के समान समास होने पर ( यही ) बात उलट जाती है । शब्द शक्ति के स्वभाव से अर्थ का यह नियम ही है ।

अयं भाव:-असंरब्धवानितयत्र द्वावंशौ क्रियांरा कारकांशौ ।

तत्रोभयांशभागर्थ-निषेधे·शब्दशक्तिस्वभावव्युदचाक्ये क्रियांशनिषेधस्तस्य प्राधान्येन विवक्षितस्यापरामर्शो ( ...मनुक्ताद् ? ) विधेयाविमर्श: ।

भाव यह कि—असंरब्धवान्—यहाँ दो अंश है एक क्रियांरा और दूसरा कारकांश । दोनों में—दोनों से युक्त अर्थ का निषेध प्राप्त होने पर शब्दशक्ति के स्वभाववश वाक्य में क्रियांरा—

मात्र का निषेध होता है । उसी की प्रतीति प्रधानरूप से न होने के कारण विधेयाविमर्शदोष हुआ।

विमर्श—वाक्य में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनके अर्थ में क्रिया और कारक दो तत्त्व संगुफित रहते हैं । उदाहरणार्थ—यहाँ 'संरब्धवान्' इसमें संरम्भक्रिया—है और 'कवतु' प्रत्यय है कारक । दोनों के संगुफ्त से संरब्धवान् शब्द बना है । इसमें यदि नञ् का संबंध करना हो तो क्रियाकारक में से किसके साथ किया जाय—यह प्रक्ष है । पूर्वपक्षी ने यह चाहा था कि क्रिया के साथ ही नञ् का अन्वय किया जाय और ऐसा करके उसने सिद्ध करना चाहा था कि 'असंरब्धवत्' में पर्युदास नहीं अपितु जिसकी अपेक्षा है वही प्रसज्यप्रतिषेध है । उत्तरपक्षी ने पूर्वपक्षी की आधी बात मान ली । उसने यह तो मान लिया कि नञ् का सम्बन्ध क्रियांश के साथ ही होता है ।

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किन्तु उसकी व्यवस्था उसने दूसरी ही दी। उसने पूर्वपक्षी के विरुद्ध यह माना कि नञ् का सम्बन्ध क्रियांश से होता है किन्तु वह परम्परया। न कि साक्षात्। उसके लिए पहले—अस्ति आदि क्रिया का आक्षेप किया जाता है। उसमें नञ् का सम्बन्ध होता है। उस क्रियांश के साथ प्रत्यय से ( जैसे संबन्धवान् में क्तवतु से ) प्रतीत कर्त्ता का और तत् कर्त्ता में विशेषण रूप से प्रविष्ट क्रियांश का। इस प्रकार ऐसे स्थलों में दो क्रियाएँ मानी जाती हैं। एक कर्त्ता में गुणीभूत और एक स्वयं आक्षित्। इनमें से नञ् का सम्बन्ध आक्षित् क्रिया के साथ होता है फिर उस क्रिया के साथ कर्त्ता का और कर्त्ता के माध्यम से उसमें गुणीभूत—क्रिया का। इस प्रकार नञ् का सम्बन्ध क्रियांश से होने पर भी उस क्रियांश से नहीं होता जो कर्त्ता में गुणीभूत होता है। उदाहरणार्थ ‘इष्टवान् नञ्’ इसमें यज् क्रिया का अर्थ है याग। इष्टवान् का अर्थ है ‘याग कर चुकना’ व्यक्ति। उसका सम्बन्ध है ‘न’ से। इस वाक्य में अस्ति क्रिया का अध्याहार होता है। तब अर्थ—निकलता है कि ‘जो याग नहीं कर चुकाया है’। उसमें नञ् का सम्बन्ध अस्ति के अर्थ ‘है’ से होता है। ‘कर चुकना’ इस कर्त्रांश द्रव्य—उस क्रियाद्रव्य के साथ और ‘याग कर चुकना’ में प्रविष्ट ‘याग’ या यजन क्रिया का भी कर्त्ता के माध्यम से उसी क्रियागत अभाव के साथ। ऐसे। नहीं कि ‘न’ इसका सम्बन्ध सीधे ‘इष्टवान्’ के ‘यजन’ क्रियार्थ से हो जाए। समास करने पर गुणीभूत क्रिया के साथ नञ् का सम्बन्ध होता है। प्रधान ‘अस्ति’ आदि क्रिया के साथ नहीं, फलत: नञ् की प्रथमानता नष्ट हो जाती है। ‘अस्तिक्रिया’ का अभाव नहीं। यद्यपि कुम्भ का वनाना भी एक किया है और उसके साथ नञ् का सम्बन्ध है तथापि यहाँ प्रथमानता नहीं माना जा सकता कारण कि प्रसज्यप्रतिषेध क्रियांश के साथ सम्बन्ध के अतिरिक्त नञ् की प्रथमानता भी चाहता है। यहाँ वह प्रथमानता नहीं है। उसकी प्रथमानता प्रधान क्रिया के साथ सम्बन्ध जाने पर ही संभव है। इस। प्रकार—‘इष्टवान् न’ और ‘अकुम्भकार’ दोनों में क्रियांश के साथ नञ् का सम्बन्ध वरावर होने पर भी स्थिति भिन्न है। प्रथम में नञ् का सम्बन्ध प्रधान क्रिया ‘अस्ति’ के साथ होता है अतः वह प्रधान होता है। द्वितीय में गुणीभूत क्रिया—‘कुम्भकत्व’ में अतः वह अप्रधान होता है। ठीक इसी प्रकार ‘असंरब्धवान्’ में भी नञ् का सम्बन्ध संरम्भक्रिया के

निष्कर्ष यह निकला कि प्रसज्यप्रतिषेध में नञ् की प्रथमानता रहती है। उसका सम्बन्ध प्रथानक्रिया से सीधे होता है। पयुर्दास में नञ् प्रधान नहीं रहता और उसका क्रिया से सम्बन्ध होता है किन्तु—अप्रधान क्रिया से। प्रधान क्रिया से भी सम्बन्ध होता है किन्तु सीधे— नहीं। दूसरों के सादृश्य—परम्परया। असंरब्धवान् में नञ् की प्रथमानता और प्रथानक्रिया के साथ होता है अतः प्रसज्यप्रतिषेध का उपयोग—अपेक्षित था। परन्तु कर दिया पर्युदास का उपयोग। फलत: न नञ् की प्रथमानता रही और न नञ् का प्रथानक्रिया से सीधे सम्बन्ध ही हो सका। इसीलिए यहाँ विधेयाविशरण दोष होगा।

जिस प्रकार प्रसज्यप्रतिषेध में समास मान्य नहीं उसी प्रकार पर्युदास में भी समास नहीं चाहिए—इस प्रकार की शंका पर उत्तर देते हुए कहते हैं—

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द्वितीयो विमर्शः

तत्रापि केचिदृश्यामोदाद्वान्न समासमाद्रियन्ते । यथा—

'ननु साधु कृतं प्रजासृजा शाशिकान्तेशु मनो न कुर्वेता ।

न हि चेतनतामवाण्ये ते विरमेयुरगालितेन केवलम् ।।'

यथा चा —

'गृहीतं येनासौ परिभवभयाल्लोचितमपि' इति ।

वहाँ ( पर्युदास में ) भो कुछ लोग भ्रमवश समास छोड़ देते हैं । जैसे—‘चलो ठीक ही किया विधाता ने, जो शाशिकान्तमणियों में मन नहीं बनाया । चेतनता पाकर वे गलने भर से न रुकते ।’ और—‘परिभव के भय से उचित न होते हुए भी जिनमें तुम्हें ग्रहण किया !'

यथा च प्रसङ्ग्यप्रतिपेधे समासो नेदृशस्थथोक्कनयेन पर्युदासेऽध्यसमासो नेद्यत इत्याह—

नतु साधिवति । अन्र 'न कुर्वेता' इति करणक्रियाकृतुसहशेन क्रियान्न प्रतियुदासेनप्रायेणेष्ट्यर्थः ।

अकुर्वंतेति वाच्ये न कुर्वेति क्रियांशनिषेधः । प्रतीतेऽपंपरीयकari । एतद् नौचितमपी—

ननुसाधु—इसमें 'नकुर्वता' का अर्थ है—'करना' रूपी क्रिया के कर्ता के समान बनते हुए अर्थात् वस्तुतः क्रिया को प्रति उद्दासीन रहते हुए । कहूंसी—यहाँ 'अकुर्वता' । कहाँ गय्रा 'न कुर्वता' ।

प्रतीति में विपरीतताकारी बनन बैठा ।

इसी प्रकार 'नोचितमपि' में औचित्यमात्र का निपेध चाहिए था । वह 'न उचितम्' करने पर उलटा ज्ञान पैदा करने वाला बन गया ।

विमर्श—जहाँ नञ् अप्रधान होना चाहिए अतः नञ् का 'उत्तरपद से समान किया जाना

चाहिए, कुछलोग वहाँ भी अमवश समास नहीं करते । जैसे—‘न कुर्वता साधु कृतम्’ वाक्य का

अर्थ हिन्दी में होगा ‘उसने न करते हुए ठीक किया ।’ किन्तु इस अर्थ के किए 'न' को अलग

रखकर ‘न कुर्वता’ वाक्य बनाने पर इसके विरुद्ध अर्थ भी निकल सकता है अर्थात् यह भी

कहा जा सकता है कि 'करते हुए ठीक नहीं किया ।' यह प्रतीति ऊपर की प्रतीति से ठीक

उलटी है । यदि 'न' का संबन्ध 'कुर्वता' के साथ समास में कर दिया जाता तो द्वितीय उलटी

प्रतीति न होती । वस्तुतः ‘ठीक ही किया’ यही अर्थ विवक्षित है और इसीलिए 'न' का संबन्ध

'कुर्वता' के साथ मान्य है । वह 'अकुर्वता' इसप्रकार समास करने पर भी प्रतीत हो सकता था, और

लाभ यह था कि 'ठीक नहीं किया' यह अर्थ प्रतीत न होता । 'न कुर्वता' इस प्रकार समास न

करने से दूसरा अर्थ भी प्रतीत होता है । इसी प्रकार 'उचित न होते हुए भी जिसने तुम्हें

अपनाया ।’ इस अर्थ में ‘अनुचित होते हुए भी…....’ कहना अभिप्रेत है । इसकी प्रतीति 'न' को

उचित से पृथक् कर रखने में ही तो आती है किन्तु तब 'न' का संबन्ध ग्रहण के साथ भी किया

जा सकता है ‘जिससे उचित होते हुए भी जिसने तुम्हें नहीं अपनाया’ अर्थ भी निकल सकता है ।

'यदि अनुचितमपि गृहीतम्—अनुचित होते पर भी लिया' कह दिया जाता तो ऐसी प्रतीति में

होती । यहाँ 'न' का अर्थ गौण है । अतः 'न' को समास में उत्तरपद के साथ जुटा कर रखना

ही ठीक है । यद्यपि हिन्दी में 'उचित न होते हुए भी ग्रहण किया' वाक्य ऐसा है जिससे

कोई दूसरा अर्थ नहीं निकल सकता तब भी संस्कृत में 'न उचितमपि गृहीतम्' वाक्य ऐसा है

जिसमें 'न' को 'गृहींत' तक पहुँचाने में कोई रुकावट नहीं होती । कारण कि संस्कृत का यह वाक्य

अधूरा है । इसमें एक शब्द की कमी है । वह है उचित का पूरक सत् । कहना चाहिए था

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‘उचितं न सद्रपि येन गृहीतम्‌।’ इससे ‘न’ सत् का सम्बन्ध काट कर ‘गृहीत’ के पास नहीं पहुँचता। पर संस्कृत वाक्य में सत् की कोई आवश्यकता न समझ ‘न उचितमपि गृहीतम्‌’ इतना ही कह दिया गया। हिन्दी वाक्य में ‘सत्‌’ का अर्थ ‘होते हुए’ वाक्य में दिया जाता है ‘उचित न होते हुए’—मो इसलिए हिन्दी वाक्य में ‘न’ टस से मस नहीं होता। परन्तु संस्कृत के समान यदि हिन्दी—वाक्य से भी ‘होते हुए’ निकाल दिया जाय तो उसी से भी विशेष प्रतीति होने लगेगी ‘न उचित भी अपनाया’ तो हिन्दी में कहा नहीं जाता और ‘उचित भी न अपनाया’ में ‘न’ ‘अपनाया’ से जुड़ता है फलतः उलटी प्रतीति होती है। अतः एक मात्र यही उपाय रहता है कि ‘न’ को अलग न रखकर उचित के साथ उसे जोड़ दिया जाय ‘अनुचित भी अपनाया’—कहा जाय। इसमें ‘होते हुए’ की आवश्यकता नहीं रहती और ‘न’ का प्रधान क्रिया ‘अपनाया’ से योग नहीं होता। इसौप्रकार संस्कृत में भी या तो ‘सत्‌’ शब्द का उपयोग होना चाहिए या फिर ‘न’ का उत्तरपद से समास कर देना चाहिए। वैसा नहीं किया गया, अतः विवक्षित प्रतीति के साथ अविवक्षित—विरुद्ध प्रतीति भी होती है। इसका एक मात्र कारण—पयंुदास में भी नञ् समास की उपेक्षा है।

इसी प्रकार ‘न कुर्वता’ में ‘न’ को ‘कृतम्‌’ से रोकने वाला ‘सत्‌’ शब्द नहीं है। हिन्दी में ‘न करते हुए’ में ‘हुए’ शब्द ‘सत्‌’ का स्थानापन्न शब्द है। अतः वह ‘कृतम्‌’ इस प्रधान क्रिया से सम्बन्धित होते हुए रुक जाता है। यदि हिन्दी वाक्य से ‘हुए’ हटा दिया जाय तो ‘न करते ठीक किया’ को ‘करते—ठीक नहीं किया?’ भी बनाया जा सकेगा। अतः ‘न कुर्वता’ न कहकर ‘अकुर्वता’ कहना चाहिए। यद्यपि संस्कृत व्याकरण के अनुसार ‘न कुर्वता’ भी समस्तपद माना जा सकता है! परन्तु ‘अकुर्वता’ के समान—वह असमस्त नहीं माना जा सकता हो ऐसी बात नहीं। विरुद्ध प्रतीति के भय से ‘न कुर्वता’ में समास की कल्पना करनी पड़ती है। आपाततः तो—दोनों पद अलग ही प्रतीत होते हैं।

यहाँ ‘व्यक्तिविवेक व्याख्यान’ की ‘अकुर्वतेति वाच्ये न कुर्वतेति क्रियांशप्रतिषेधः । प्रतीते-वैपरीत्यकारो । एवं नोचितमपितयुचितत्वमात्रनिषेधः प्रतीतेवैपरीत्यकरेव?’ इन दो पंक्तियों में कुछ शब्दों की कमी मालूम पड़ती है। मैंने ‘...न कुर्वतेत्युक्ते क्रियांशनिषेधः: प्रधानक्रियाप्रतिषेधप्रतीतौवैपरीत्यकारो’ ऐसा और ‘एवं नोचितमपितोचितत्वमात्रनिषेधः प्रतीतेवैपरीत्यकरेव?’—ऐसा पाठ माना है।

नतु ‘अश्राद्धभोजी’ त्यत्र प्रसज्यप्रतिषेधेऽपि यथा समास इष्यते तद्वदिहापि भविष्यति, संरब्धवचिप्रतिषेधेऽत्र प्रतिपत्स्यते न असंरब्धवद्विचरिति प्रसज्यप्रतिषेध एवायमस्तु कि पर्युदासाश्रयणेन। नैवं शाब्दक्रम्‌, यतो न तावद् नञः श्राद्धे निष्ठारदार्थेनाभिसम्बन्धः कश्चित् प्रतीतेऽपि तु विरोध्यतया प्राधान्येन तद्वोज्यते नैव। तत्रापि क्रियांश एव प्रधानम्‌, न क्रियाज्ञानमात्रम्‌, कर्त्तरि णिनेष्ट्विधानात्‌।

जैसे—‘अश्राद्धभोजी’—इस जगह प्रसज्यप्रतिषेध होने पर भी समास मान्य होता है उसी प्रकार ( असंरब्धवान्‌ ) यहाँ भी होगा और संरब्धवान्‌ का प्रतिषेध ही प्रतीत होगा, असंरब्धवत्‌ की विधि नहीं। इस प्रकार यहाँ प्रसज्यप्रतिषेध ही माना जाय, पर्युदास को गले लगाने से की विधि नहीं।

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द्वितीयोऽवसरः

क्या ? ( उत्तर ) ऐसी शंका नहीं की जानी चाहिए, कारण कि यहाँ ( अश्राद्धभोजी में ) नञ् का श्राद्ध—इस उत्तरपदार्थ से कोई सम्बन्ध नहीं प्रतीत होता, अपितु उस ( श्राद्ध ) का भोजी इस—‘भोजी’ के साथ प्रतীত होता है, कारण कि भोजी ही प्रधान है क्योंकि वह यहाँ विशेष्य है । वहाँ ( ‘भोजी’ में ) भी कर्मंश ( णिच् प्रत्यय से प्रतीत भोजकर्त्ता ) ही प्रधान है न कि ( भुज् ) क्रियांश इससे—श्राद्धभोजन करने वाला कर्त्ता प्रतीत होता है । केवल श्राद्धभोजनमात्र नहीं । क्योंकिं ‘कर्त्ता’ के लिए णिनि प्रत्यय किया गया है ।

ततरस्तदभिसम्बन्ध्येव शब्दो न क्रियाभिसम्बन्ध्यः । स हि सामर्थ्यदवसीयते, तदुपादानमन्यरेषा कर्तृत्वानुपपत्तेः । तच्छब्दवणमात्रविभ्रान्तेः कृतश्रायं प्रसज्यप्रतिषेधेऽश्रः, न पुनराक्षस्येन तत्र तद्रूपता नाम काचित् सम्भवति । सा हि वाक्यादेवावसीयते न वृत्तेः, तयोः सिद्धसाध्यार्थनिश्चिततया मिन्नार्थत्वादिति भवितव्यमेव तत्र समासेन । एवमसूर्यंपश्यादिश्वपि दृश्यव्यम् । इह तु प्रतिषेधस्य प्राधान्याच्चवक्षा, न विधेः । तत् कोडवकारः समासस्य । यथा—

'भुञ्जते सदाऽश्राद्धमयं परांश्रोपतापयेदित्यर्थमेव । सम्यक् स्वभावोऽवगतोडस्य यावन्न श्राद्धभोजी न परोपतापी ।' इत्यज्ञात्न अत्र हि प्रतीयमानसत्तादिक्रियासमन्वयो नञर्थस्य प्राधान्येन प्रतीयते । न तु तद्विशिष्टस्योत्तरपदार्थस्य विधिरित्येष प्रसज्यप्रतिषेधविषयो युक्तो नान्यथाऽपि समासवैशासोपगमप्रसङ्गः पूर्ववत् दुर्निवारः स्याद् विशेषाभावात् ।

तस्मादस्य नञो विधेयार्थेनिष्ठतया प्रधानस्यानूद्यमानार्थेपरतया तद्विपरीतवृत्तिवृच्यर्थेनैव पतितत्वं सरुप्यवत्प्रवृत्ते सद्धेतोरनृतस्यैव प्रतीतं एवेतत् स्थितम् ।

नञर्थस्य विधेयत्वे निषेध्यस्य विपरीये । समासो नेश्यते डर्थस्य विपर्योसप्रसङ्गतः ॥ ५ ॥

इति सड्‌ग्रहश्लोकः ।

इस कारण शब्द द्वारा उस ( कर्तृंश ) के साथ ही सम्बन्ध प्रतीत होता है, क्रिया के साथ नहीं । वह ( क्रिया के साथ सम्बन्ध ) तो ( अपने आप ) वाक्यार्थ के बल से प्रतीत हो जाता है, कारण कि ( कर्त्ता का ) कर्तृत्व क्रिया के बिना बनता नहीं । उस ( क्रियांश ) का शब्द द्वारा कथन होने से ही यह प्रसज्यप्रतिषेध का भ्रम हो उठा है । वस्तुतः वहाँ ( अश्राद्धभोजी में ) तद्रूपता ( प्रसङ्यप्रतिषेध रूपता ) बनती नहीं । उसकी प्रतीति तो प्रकमात्र वाक्य से होती है । समास से नहीं । क्योंकिं वे दोनों ( वाक्य और समास ) मिन्नार्थक होते हैं । वाक्य साध्यार्थक होता है और समास सिद्धार्थक । इसलिए वहाँ ( अश्राद्धभोजी पर्यन्तास में ) तो समास होना ही चाहिए । इसी प्रकार असूर्यंपश्या आदि में समझना चाहिए । यहाँ ( असंरुधवत् ) में

१३ व्या वि०

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१३८

व्यक्तिविवेकः

तो प्रतिषेध की प्रधानता विवक्षित है, विधि की नहीं; इसलिये (वहाँ) समास का गौकः ही कदूँ? जैसे यहाँ—

'यह सदा श्राद्ध खाता है। अतः श्राद्धुओं को भी परास्त कर सके—यह सर्वथा झूठ है। इसका स्वभाव ठीक से जान लिया गया है कि जबतक—श्राद्धभोजी नहीं होता तबतक परोपतापी भी नहीं होता ।'

यहाँ नञ् का सम्बन्ध 'अस्ति' आदि सत्तावाचक क्रियाओं से ही प्रतोत होता है। वह भी प्रसङ्ग-प्रधान होकर उस (नञ्) से विशिष्ट उत्तरपदार्थ की विधि नहीं। अतः यहाँ उदाहरण प्रसङ्ग-प्रतिषेध का ठीक स्थल समझा जाना चाहिए। और कोई नहीं। नहीं तो यहाँ भी (झूठे सदा श्राद्धमयं में भी) समास वैशम्य—समासजन्य विवक्षितार्थघात स्वीकार करना पड़ेगा। जैसे पहले (अश्राद्धभोजीः) स्वीकार किया था। कारण कि अन्तर तो कोई है नहीं।

इसलिये (असंशयवतः के) नञ् का संशयवत् पद के साथ सम्बन्ध विरोधजनः उसी प्रकार नहीं ही मानते जिस प्रकार सदाचारों का पतित के साथ, कारण कि नञ् विधेय- अर्थ-प्रधान होने से प्रधान है, और 'संशयवत्' पद उद्देश्य-अर्थ परक होने से उससे विरुद्ध अप्रधान।

इस सम्पूर्ण विवेचन का संग्रह इस प्रकार होगा—

'जब नञर्थ (निपात) प्रधान हो और निषेध्य अर्थ अप्रधान हो तब समास नहीं माना जाता। उससे वाक्यार्थ में उलट-फेर की सम्भावना होने लगती है।'

तच्च्छ्रवणं क्रियाश्रवणम् । तयोरिति सिद्धार्थो वृत्ति: । साध्यार्थे वाक्यम् । असोऽपपद्यादिपु-दृश्यति । अन्रापि नञ: सूर्येणोत्तरपदार्थेनाभिसम्बन्धः, अपितु तदूद्देश्येनैव । सत्रापि कत्रंशा: प्रधानां न क्रियांश: कर्त्रि खलु विधानादिति पूर्ववदवसाये ।

मुधू इति । अत्र हि वाक्यस्थ क्रियाप्राधान्यं प्रतीयमानत्वादिक्रिया हि द्दश्यापेक्षे नञ: समन्वये श्राद्धभोजी न भवतीति वाक्यार्थः । अश्राद्धभोजी इत्यत्र तु नञा सोंऽससमन्वये श्राद्धभोक्तृयतिरिक्कोडपि विवसाश्रयादिः प्रतीयते । यत्र श्राद्धात् अश्राद्धभोज्यादौ समासे प्रतिषेधो नेद्ष; तत् एवं समर्थसमासस्तद्विपर्ययेगासमर्थसमासक्च कारिकाद्वयेनो-

तच्च्छवणम् = उसका श्रवण अर्थात् क्रिया का श्रवण तक कथन । अर्थात् समास सिद्धार्थ होता है । वाक्य साध्यार्थ ।

असोऽपपद्यादिपु = यहाँ भी नञ् का उत्तरपदार्थ सूर्य के साथ सम्बन्ध नहीं होता अपितु उसके दृष्टा रूपी अर्थ के साथ ही उसमें कत्रंश प्रधान है। क्रियांश नहीं। कारण कि कर्त्तृ-अर्थ में स्वयम् प्रत्यय का विधान किया गया है । इस प्रकार पूर्ववत् संगति लगानी चाहिए ।

मुधू इत्ति = इस झूठ में वाक्यार्थ है—'श्राद्धभोजी नहीं है' । यह वाक्य है । अतः इसमें क्रिया याी प्रधानता है, और नञ् का सम्बन्ध भवति आदि उन क्रियाओं से होता है जो ( झूठ में न्थित न होने से ) ऊपर से लाई जाती है । इसके विरुद्ध 'अश्राद्धभोजी'—इत्यादि में नञ् का सम्बन्ध भोक्ता से मित्र—विवसाशी आदि भी प्रतीत होते हैं । और होता है भोक्ता से । तब श्राद्धभोक्ता से मित्र—विवसाशी आदि भी प्रतीत होते हैं ।

इसलिए यहाँ समथ-सामास भी है, क्योंकि 'अश्राद्धभोजी' इत्यादि समास में प्रतिषेध (निपेष) विवक्षित नहीं है । इसके विरुद्ध असमर्थसमास पिछली दो कारिकाओं द्वारा बतलाया गया है । ( समास करने से वाक्य एक ही रहता है, समास न करने से वाक्य दो हो जाते हैं—ये जो )

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अभेद तथा वाक्य की एकता ( हैं वे स्वयं ही आकांक्षा आदि के ) बल से समझ में आ जाती भत्: उनको नहीं कहा गया ।

विमर्शः: आचार्ये ने यह स्थिर किया था कि प्रसज्यप्रतिषेध में समास नहीं होता। क्योंकि नञ् प्रधान होता है। 'असंरब्धवत्' में नञ् प्रधान है अतः उसे समास में डालकर मान्न करना—'निधेयाविमर्श दोष हैं । प्रतिपक्षी ने प्रसज्यप्रतिषेध में भी समास का अस्तित्व

करना चाहा । उसने एक ऐसा उदाहरण उपस्थित किया जिसमें कारक और क्रिया दोनों थे और उन दोनों में से उसके अनुसार नञ् का अन्वय क्रियांश से था । वह उदाहरण —'अश्राद्धभोजी'। इसमें 'अ' यह नञ् है। श्राद्धकर्मंक भोजन—क्रिया है और णिनि-प्रत्यय

प्रसज्यप्रतिषेध में नञ् का सम्बन्ध क्रिया से ही होता है, अतः उसकी स्थापना है कि समास तो है हो—प्रंसज्यप्रतिषेध भी है । इसलिए असंरब्धवत् में भी प्रसज्यप्रतिषेध के साथ

स सदोष नहीं ।

आचार्यं का उत्तर है कि 'अश्राद्धभोजी' में नञ् का सम्बन्ध क्रियांश से नहीं होता । क्रियांश से हो होता है । यहां कारक दो हैं । एक श्राद्ध और दूसरा 'भोजी' प्रत्यय से प्रतीत

भोजन का कर्त्ता । इसमें से नञ् का सम्बन्ध श्राद्ध-रूप कारकांश से न होकर कर्तृ-रूप 'प्रथयार्थ कारकांश से होता है । ( जैसी स्थिति में उसका अर्थ हो जाता है—श्राद्ध के समान

'विद्वस्'—भोजन के बाद शेष रहां थालों का उच्छिष्ट आदि खाने वाला । ) कारण कि

कर्तृकांश प्रधान है, क्योंकि वही एक विशेष्य है अन्य—श्राद्ध, भोजन—विशेषण हैं ।

रण कभी भी विशेषण में अन्वित नहीं होता । सभी विशेषण केवल विशेष्य में अन्वित होते

इसी प्रकार 'असूर्यंपश्य?'—'सूर्यं को देखने वाली' में भी नञ् का अन्वय—'देखने वाली'

शब्दों से प्रतीत दृश् में होता है ।

इसलिए वस्तुतः 'अश्राद्धभोजी' में भी पर्युदास ही है । प्रसज्यप्रतिषेध नहीं । यदि प्रसज्य-

प्रतिषेध का प्रयोग करना हो तो 'न श्राद्धभोजी'—'श्राद्धभोजी नहीं' इस प्रकार नञ् को

रखना होगा । ग्रन्थकार ने इसी तथ्य को स्पष्ट करने के लिए 'भुक्ते सदा** यह उदाहरण

यत किया है ।

निष्कर्ष यह कि प्रतिपक्षी द्वारा प्रतिपादित प्रसज्यप्रतिषेध में नञ् के समास का औचित्य

नहीं हुआ । फलतः उसके इष्टान्त से 'असंरब्धवत्' में भी प्रसज्यप्रतिषेध में समास का

त्य सिद्ध नहीं हुवा । निदान यहां से विधेयाविमर्श दोष—हट नहीं सका ।

प्रस्तुत प्रकरण के मूल ग्रन्थ की—'अन्यथात्रापि समासवैच्रासोपगमप्रसङ्गः पूर्ववत् दुर्निवारः

:'—इस पंक्ति में—दो कठिनाइयां हैं—एक तो 'अत्र' सर्वनाम का परामर्शं विषय समझना

दूसरी—समासव श्रोपगमप्रसङ्गः में 'समासवैचास' का अर्थ= समासकृत—वैचास अथवा

न विषयक वैचास'। हमने 'अत्र' का परामर्श विषय 'भुक्ते सदा श्राद्ध' पद का 'न श्राद्धभोजी'

म माना है और इसी के अनुसार 'समासवैचास'—का अर्थ समासजनित या समासकृत—

। कारण कि वही सत्रिकृष्ट और प्रसङ्ग में तात्कालिक है ।

वैचमेकं विधेयाविमर्शं विचार्य द्वितीयसुदाहरति— योडसावित्यच्येति । तच्छब्दं प्रत्याकाः

यत: केनाप्यनिवर्त्तनात् ।

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इस प्रकार एक विधेयानिमित्तों का विचार कर दूसरे ( विधेयाविमर्शे ) को दिखलाते हैं—योडसावित्यत्र हत्यादि द्वारा । ( अर्थात् वहाँ केवल यद् का प्रयोग अधूरा है ) कारण किञ्च योडसावित्यत्र यद्: केवलस्यैव प्रयोगोऽुपपन्नः । यत्र यस्तदोःकतरतदोद्देशेनोपक्रमस्तत्र तत्त्वत्यवमार्शिना तदितरे णोपसंहारो न्याय्यः तयोरप्यनुवाद्यविघेयार्थत्वेनेष्टत्वात् तयोश्च परस्परापेक्षया नित्यत्वात् । अत पवाचहु:-‘यस्तदोर्नित्यमभिसम्बन्ध’ इति । स चायम्नयो रुपक्रमोपसंहारो द्विविधः शाब्दश्वार्थश्वेति । तत्रोभयोरुपादाने सति शाब्दः । यथा—‘यदुवाच न तन्मिथ्या यद् ददौ न जहात् तत् ।’

यथा च—‘स दुर्मंतिः श्रेयसि यस्मादरः स पूज्यकर्मासु दृढां शृणोति यः ।’ इति । और भी, 'योडसौ' इस प्रकार केवल 'यद्' शब्द का ही प्रयोग अधूरा रहता है । जहाँ ( किसी ) 'यद्' में से किसी एक के निर्देश से ( वाक्य ) आरम्भ होता है वहाँ उसके प्रतिपयवश्री दूसरे के निर्देश से ही उपसंहार करना उचित है । कारण कि वि दोनो ( यद् और तद् ) भी अनुवाद्य और विधेय पदार्थों के लिए प्रयुक्त होते हैं । और उनमें दोनों एक दूसरे की आकांक्षा सदा रखते हैं । इसलिए कहा है—यस्तदोर्नित्यसम्बन्धः—यद् और तद् वा सम्बन्ध नित्य है ।

इन दोनों का जो यह उपक्रम और उपसंहार ( का क्रम ) है वह भी 'शाब्द और अर्थ' इस प्रकार दो प्रकार का होता है । दोनों में से शब्द वह होता है जिसमें दोनों ( यद् और तद् ) शब्दोपात्त होते हैं । यथा—‘जो कह दिया वह ठीका नहीं किया और जो दे दिया उसे लौटाया नहीं ।’

और जैसे—‘वह दुर्मति है जिसका झुकाव श्रेय की ओर नहीं । उसका कार्य पूज्य है जो सुहज्जनों की सुनता है ।’ एकतरेऽति । ऋचिच्छब्ददेनोपक्रमे तच्छब्ददेनोपसंहारः । ऋचिच्छब्ददेनोपक्रमे यच्छब्ददेनोपसंहारः प्रसज्यते । एतच्च द्वयं शाब्दोऽपक्रमोपसंहारक्रमेणोदाहरिष्यति । तयोरप्यंत । अपिशब्दो नञर्थः समुचिनोति । प्रसज्यप्रतिषेधे हि नञर्थो विधेयो निपेध्योऽनुवाद्यः । यस्तदोर्नित्ययाभिसम्बन्धेऽपि शब्दशक्तिस्वाभाव्याद् यदोऽनुवाद्यविधेयस्वम् । नित्यत्वादिति । अपेक्षाप्राणतयावास्थानानात् । शब्द इति शब्देनोभयोः संस्पर्शात् । उभयोः संस्पर्शाद्वाच अर्थस्वम् । तत्र द्वयोर गति: अन्यतरानुपादानं [ द्वयोरुपादानक्वचिदपि ] द्वयोरुपादानानरपि यत्तदाश्रयभाजेन द्विधा ।

कहीं आरम्भ में 'यद्' शब्द रहता है तो उपसंहार 'तद्' शब्द से होता है । कहीं आरम्भ में 'तद्' शब्द रहता है तो उपसंहार 'यद्' शब्द से होता है । इन दोनों के उदाहरण उपक्रमोपसंहार क्रम के शाब्द-भेद के प्रसङ्ग में देंगे । इसमें अपि शब्द 'नञर्थ' का समुच्चय करता है । जैसे कि पहले कहा है—प्रसज्यप्रतिषेध

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द्वितीयो विमर्शः

में नञर्थ ( निषेध ) विधेय होता है और निषेध्य अर्थ अनुवाद्य या उद्देय और पर्युदास में इसके विरुद्ध ।

यद् और तद् का सम्बन्ध नित्य होने पर भी शब्द को शक्ति का कुछ ऐसा स्वभाव है कि यद् का विषय अनुवाद्य रहता है—और ‘तद्’ का विधेय ।

नित्य होने से अर्थात् अपेक्षा को प्राणतत्व अपनाकर सम्वन्धित रहने मे ।

दोनों का कथन शब्द से होने के कारण । दोनों हों शब्द से कथित न होने से अर्थ ( अर्थात्—एक का शब्द से कथन हो दूसरे का नहीं ) । उसमें ( अर्थात्व में ) भी दो प्रकार होते है—दो में से एक का अनुपादान—शब्द से कथन न होना और दोनों का ही अनुपादान—शब्द से कथन न होना । दोनों का अनुपादान भी दो तरह का होता है यद्—को लेकर और तद् को लेकर ।

विमर्शः व्यक्तिविवेककार—‘संरम्भः करिकीर’ पद्य में दूसरा विधेयाविमर्श दोष दिखलाते हैं ।

वह है यद् और तद् शब्द के आधार पर । यद् ( जो ) और ‘तद’ ( वह—या—सो )—दोनों ऐसे सर्वनाम हैं—जिनका सम्वन्ध प्रत्येक वाक्य में बना ही रहता है । जिस भी वाक्य में ‘यद्’ का प्रयोग होगा उसमें ‘तद्’ की अपेक्षितता होगी । इसी प्रकार जैसे वाक्य में तद् का प्रयोग होगा उसमें यद् को ।

कहीं-कहीं ऐसा भी होता है कि दोनों में से उपादान एक का ही होता है । परन्तु दूसरे की अपेक्षा वहाँ भी होती है । पाठक उसे अपने आप आक्षेप द्वारा खींच लाता है । परन्तु उसकी कुछ खास स्थितियाँ होती हैं जिन्हें अभी-अभी आगे स्वयं ग्रन्थकार ने स्पष्ट किया है ।

ऐसी स्थिति में जब कभी उन स्थितियों के नियमों के न होते हुए भी यद् या तद् में से किसी एक का ही उपादान होता है तो दूसरे के बिना वह वाक्यार्थ अधूरा पड़ा रह जाता है ।

तब दो दोष होते हैं—यद् का उपादान न होकर केवल तद् का उपादान होने से ‘वाच्य-वचन’ और तद् का उपादान न होकर केवल यद् का उपादान ‘विधेयाविमर्श’ ।

कारण कि यद् पूर्वोक्त वस्तु का ज्ञान कराता है, वह किसी नवीन वस्तु का ज्ञापक नहीं, अतः वह अनुवाद्य विषयक—कहलाता है ।

अनुवाद्य का अर्थ है अनुवाद के योग्य अर्थात् जिसका कथन हो चका है, अब केवल उसका उल्लेखमात्र कर देना है । अतः वह अप्रधान होता है ।

कारण कि वह सदैव अप्रधानवाक्य में ही प्रयुक्त होता है ।

तद् सर्वदा नवीन वस्तु का ज्ञापक बनकर आता है—होती तो वहाँ है जिसे पहले उपवाक्य में यद् कह चुकता है, किन्तु तद् द्वारा कहे जाते समय वह अनुवाद्य नहीं रहती ।

उसका सम्वन्ध प्रधान क्रिया से हो जाता है अतः वह विधेय कहलाती है ।

वाक्य में विधेय ही प्रधान होता है और यद् नवीन रूप से उपस्थि‌त होता है ।

पिछले दिए उदाहरण में कहा गया ‘उसे झूठा नहीं किया’ जिज्ञासा होती क्या ? या किसे ? इससे स्पष्ट है कि श्रोता को अभीष्ट ‘उसे झूठा नहीं किया’ इस क्रिया का कर्म विशेष रूप से ज्ञात नहीं हैं ।

वक्ता जब कहेगा तब ज्ञान होगा । ज्ञान होने के बाद यह साबित होगा कि वस्तु वह उसकी पूर्वानुभूत है ।

जैसे इसी वाक्य में वक्ता ने कहा—‘जिसे कह दिया’ ।

अर्थ निकला ‘जिसे कह दिया—उसे झूठा नहीं किया’ ।

श्रोता को ज्ञात हुआ कि ‘झूठा न करने’ का कर्म वाथित ‘वचन’ था ।

वचन का ज्ञान श्रोता को पहले से था, इसीलिए उसने ‘वचन’ के लिए कोईँ जिज्ञासा प्रकट नहीं की ।

इस प्रकार ‘तद्’ शब्द द्वारा कथित पदार्थ—नवीन और प्रधान क्रिया से सम्वन्धित होने के कारण प्रधान होता है ।

'यद्' के रहने से अनुवाद्य का ज्ञान जैसा स्पष्ट चाहिए वैसा नहीं हो पाता ।

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अनुवाद्य का स्पष्ट कथन आवश्यक है और अनुवाद्य के लिए 'यद्' का कथन । इस प्रकार अवदयकथनीय यद् शब्द का कथन न होने से वाच्यावचन दोष होता है । कारण कि वाच्य का अर्थ होता है अवदेयकथनीय और अवचन का अर्थ अकथन । तद् के न रहने से अनुवाद्य की प्रतीति तो जैसी चाहिए वैसी हो जाती है पर विषय की प्रतीति वैसी नहीं होती । विषय की प्रतीति प्रधानरूप से होनी चाहिए । वह तभी संभव है जब उसका स्पष्ट कथन हो । इसलिए तद् शब्द का प्रयोग भी आवश्यक होता है । इस प्रकार तद् शब्द के अभाव में विषय की प्रतीति तो होती है परन्तु अप्रधान रूप से । प्रधानरूप से नहीं । जब कि होनी चाहिए प्रधानरूप से । अतः यहाँ 'विधेयाविमर्श' दोष होता है । विधान जिसका किया जाता है वाक्य में वही प्रधान होता है । जैसे एक बार 'पटं वय'—'कपड़ा बुन दो' कह दिया गया और उसके बाद 'रक्तं पटं वय'—'लाल कपड़ा बुनो' कहा जाय तो द्वितीय वाक्य में 'रक्त' ही नवान तथा विधेय होता है, कारण कि इस वाक्य में उसी का नवान विधान किया गया है । इसलिए 'रक्तं पटं वय' में पट और वयन क्रिया की अपेक्षा वही 'रक्तत्व' प्रधान भी होता है । यदि 'रक्त' शब्द न कहा जाय तो ऐसा हो सकता है कि दैवात् कपड़ा 'लाल' रखा का ही बुन दिया जाय, तब भी 'रक्तं पटं वय' के वचन से लाल कपड़े में जो प्रधानता आती थी वह प्रतीत नहीं होती । इसीलिए प्रकार विधेयाविमर्श में विधेय का कथन न होने से उसकी प्रतीति तो यथार्थसंचित होती ही है कारण कि—यह शब्द का प्रयोग रहता है, तथापि प्राधान्येन नहीं होती अतः—विधेय का प्राधान्येन अविमर्श या अज्ञान होने—से विधेयाविमर्श दोष होता है ।

यद्यपि विधेय भी अवदयकथनीय होता है अतः उसका कथन न होने से वाच्यावचन दोष तद् शब्द के अनुपादान में भी माना जा सकता है, तथापि तद् के अभाव का यह दोष यद् के अभाव के दोष के समान केवल वाच्यावचन मात्र नहीं है, प्रस्तुत वह विधेयाविमर्श भी है । 'यद्' से प्रतीत अर्थ प्रधान नहीं होता—वह अप्रधान होता है, अतः उसके अभाव में प्राधान्येन अप्रतीति रूप विधेयाविमर्श संभव नहीं । इसके विरुद्ध तद् से प्रतीत अर्थ प्रधान होता है । अतः उसके अभाव में वाच्यावचन तो हो सकता है पर विधेयाविमर्श भी संभव है । दोनों दोषों में से विधेयाविमर्श ही अधिक अनौचित्यकारक सिद्ध होता है, अतः वही माना जाना चाहिए । जिसे वाच्यावचन में अधिक अनौचित्य प्रतीत हो वह वाच्यावचन दोष मान सकता है ।

विशेष—इस प्रसङ्ग में व्याक्तिविवेकस्याश्र्यान की एकपंक्तिक खंडन प्रतिपादित होता है । वह है—तत्र द्वयी गति;, अन्यतरानुपादानं द्वयोरनुपादानमपि यथादाश्रयभावेन द्विधा कमेण चेतदुद्राह—'द्वयी गति: अन्यतरानुपादानं द्वयोरनुपादानमपि ।' अर्थात्—'दो पढ़ती है किसी एक का अनुपादान और दोनों का अनुपादान । दोनों का अनुपादान भी ।' यहाँ इसी विषय को स्पष्ट करते हुए 'द्वयोरनुपादानमपि द्विधा'—कहकर व्याख्याकार ने जो कहा है—'क्रमेण चैतदुदाहरणं दर्शयति ।' तदनुसार उभयानुपादान का उदाहरण काव्यप्रकाश में भी आया है । यहाँ अन्यतर के अनुपादान में ही दो भेद परिलक्षित होते हैं ।

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द्वितीयो विषयः

‘दृश्योरुपादान’ का तो जो उदाहरण व्यक्तिविवेककार ने दिया है—‘ये नाम’ पद्य का उत्तरार्ध ‘उत्पत्त्यतेदस्ति मम चोपि समानधर्मा’ वही काव्यप्रकाशकार ने भी अपनाया है । इसी प्रकार हेमचन्द्र ने भी अपने काव्यानुशासन में अन्यत्र अनुपादान के दो भेद माने हैं ।

एकतरस्योपादाने सति अर्थे; तदितरस्य अर्थस्यामध्येनाक्षेपात् । तत् तद्‌: कचेलस्योपादाने सत्यार्थैक्‍काव्यम्; प्रसिद्धानुभूतप्रकान्तवस्तुविषयतयोपकरिपतस्निधिना यद्‌ा तस्याभिसन्धान्त् ।

तत्र प्रसिद्धार्थ-विषयां यथा—

‘दृयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया कपालिनः । कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोकस्य च नेत्रकौमुदी ॥’

(वहाँ उपक्रमौपसंह!र यद्‌ तद्‌ मे सङ्) किसी एक के कथन होने पर अर्थ होता है, क्योंकि वहाँ दूसरे का अर्थ के आधार पर आक्षेप करना पड़ता है ।

उनमें केवल तद्‌ का उपादान होने पर अर्थ तीन प्रकार का होता है—कारण कि वह (तद्‌ शब्द) तीन प्रकार का होता है—प्रसिद्ध वस्तु विषयक, अनुभूत वस्तु विषयक और प्रकान्त वस्तु विषयक । इसलिए यद्‌ु शब्द (उसके पास चले आते है और उसका उससे (तद्‌ शब्द से) सम्बन्ध हो जाता है ।

प्रसिद्धार्थे विषयक—जैसे (तुम्हारे इस) कपालभारी (शरीर) से मिलने के हृदय से (तो) अब दो (चीजें) शोचनीय हो गईं । एक तो कलावान्‌ की वह कान्ति भरी कला और दूसरी इस आँख वाले विश्व की नयनचन्द्रिका तुम ।

अनुभूतविषयो यथा—‘ते लोचन प्रतिदिशं बिधुरे क्षिपन्ती’ति । यथा—

‘तद्वक्त्रं यदि सुधया शिशिकथा तच्‍छेतः स्मितं का सुचि सा’ दृष्टियदि द्वारितं कुवलयैस्तार्क्ष्यद्रुमिरो घिड् मधु । सां चेत् कान्तिरतन्न्रमेव कलकं किं वा बहु ब्रूमहे यत्सत्यं पुलक्‍कवस्तुविमुखः सगणकः वेधाःः ॥’

अनुभूतार्थे विषयक—जैसे (वासवदत्ता के) जलने की खबर सुनकर उदयन रखावली में कहता है )—वे कातर आँखें (इधर-उधर ) फेंकती हुई हैं (और) जैसे—

यदि वह चेष्टरा (विधमान है) तो चाँद की कथा वन्द, यदि वह मुसकान (है) तो अमृत क्या ? यदि वह नज़र है तो नीले कमलों की हार समझिये, यदि वे पदावली हैं तो मधु को धिक्कार, यदि वह कान्ति है तो सुवर्ण की कोई पूछ नहीं । और अधिक क्या कहें—यह सच है कि विधाता की संसार रचना जोड़ी की दो चीजें बनाने में विमुख है ।

प्रकान्तविषयो यथा—

‘कातर्यं केवल नीतिः शौर्यं श्रापदच्‍छेपितम् । अतः सिद्ध समतास्य्यमुभाभ्यामन्वीयषे सः ॥’

प्रकान्तविषयक यथा—‘केवल नीति कातरता है (और केवल ) शौर्यैं शेर (जैसे हिंसक पशुओं) का कार्य है । इसलिये उसने (अतिथि ने) उन दोनों को मिलाकर सिद्धि चाही ।’

उपकलिपतो नित्यसापेक्षत्वादुपस्थापितः । अत्र च प्रसिद्धादिविषयत्वं यदा निश्चितं त

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सा कला या प्रसिद्धेति स्फुटतरस्वेन प्रतीते: । कचित् तदाडपि व्यवदिश्यते तस्य यथोभयदनेकविषयत्वात् । ते इति ये मयैवानुभूते इत्यर्थः । अन्वियेप स इति । अत्र स इति य: प्रकान्त इत्यर्थ: ।

उपकलिप्त—अर्थात् नित्यसापेक्ष होने से उपस्थित। यहाँ प्रसिद्ध-विषयता आदि—यद् शब्द से बताया दी गई है। क्योंकि वह कला जो प्रसिद्ध है—वैसी प्रतीति स्वरूप से हो जानी है । कहीं-कहीं तद् से भी बतलाई जाती है क्योंकि उसका भी वही विषय होता है जो यद् का ।

अन्वियेप स—यहाँ 'स = वह' का अर्थ है वह जो प्रकरण में चला आ रहा है ।

विमर्श: तद् शब्द से चार प्रकार के पदार्थों का परामर्श होता है—

१. एक वे जो पूर्वानुभूत होते हैं ।

२. दूसरे वे जो प्रसिद्ध होते हैं ।

३. तीसरे वे जो प्रकरण से प्राप्त होते हैं और

४. चौथे वे जो इन तीनों से अतिरिक्त होते हैं ।

इनमें अतिरिक्त तीनों के उदाहरण अभी अभी ऊपर दिये गये हैं। व्यक्तिविवेकग्रन्थ्यान की आवश्यकता नहीं होती। उसका स्वयं आक्षेप हो जाता है। 'कला च सा कान्तिमती', 'ते लोचने' और 'अन्वियेप स:' पर ध्यान देने से, यह बात स्पष्ट हो जाती है। अतः तद् शब्द को लेकर होने वाला अर्थ 'उपक्रमोपसंहारभाव' तीन प्रकार का होता है ।

केचित् पुनरुपात्तवस्तुविपयतयोपकलिप्तयोर्येयोस्स्याक्षेपादस्य चतुर्थमपि प्रकारमिच्छन्ति । यथा—

'ये नाम केचिदिह प्रथयन्त्यवज्ञानं जाननित ते किमपि तान् प्रति नैष यत्न: । उत्पस्यते तु मम कोडपि समाधर्माकालो ह्यायं निरवधिरिंपुला च पृथ्वी ॥'

अत्र स कोडन्युत्पस्यते यं प्रति यत्नो मे सफलोभाविष्यतीत्युभयोरप्योरथोदाक्षेप: ।

कुछ लोग इसका चौथा भेद भी मानते हैं, कारण कि जब ये दोनों ( यद् तद् शब्द ) उन स्तुओं के लिये प्रयुक्त होते हैं जो (वह) उपात्त रहते हैं तो दोनों का आक्षेप हो जाता है यथा—

'कुछ लोग, जो यहाँ वहाँ हमारी अवज्ञा करते हैं वे कुछ जानते भी हैं कि हमारा यह प्रयत्न उनके लिये नहीं है । हमारे जैसा तो कोई पैदा होगा । इस काल की सीमा नहीं और पृथिवी भी बहुत बड़ी है ।'

यहाँ 'वह कोई पैदा होगा जिसके लिये मेरा यत्न सफल होगा' इस प्रकार उन दोनों का आक्षेप अपने आप हो जाता है ।

उपात्तवस्तुत्वित वचयमानझोके कोडपित यदुपात्तं वस्तु तद्विषयस्वेनैत्थर्थ: । अस्य उपक्रमोपसंहारस्य प्रकान्तवस्तुविषयस्य ।

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द्वितीयो विमर्शः

२०९

उपात्तवस्तुत्वति— अभिप्रायार्थ यह कि आगे कहे जाने वाले ( ये नाम केचिदिह नः ) पथ में 'कोडपि' इस प्रकार जो वस्तु कथित है उसके लिये ।

अस्य—इसका = अर्थात उपक्रमोपसंहार जो प्रक्रान्त वस्तु विषयक होता है उसका ।

संगति—अयाह्या = तद् शब्द का प्रयोग हर कहीं न हो—एतदर्थ नियम दिखलाते हुये त्याज्य स्थलों का निर्देश करते हुये लिखते हैं—

यथैकवाक्ये कर्तृत्वेनोक्तो यथेदमादिमि: । तच्छब्देन परामर्शो न तयोरुपपद्यते ॥ ६ ॥ यतोऽध्यक्षायमाणोडर्थ: स तेभ्य: प्रतिपद्यते । न चासौं तत्परामर्शोसहिष्णुरस मन्व्यात ॥ ७ ॥

तद्यथा— 'स वः शाङ्कलमौलिस्तादात्म्यायोपकल्पताम् ।' 'द्वैतयुद्धिमपास्येमां सा हि सर्वोपदां पदम् ।' अत्रैवेमामित्यत्रैतदसो: प्रयोगे तयोरप्येतदेवोाहरणं दृश्यतेम् । अत्र चैकात्म्यायेति एषा हि विपदां पदमिति च पाठौ पठितव्यौ ।

और जो ( पदार्थ ) एक वाक्य में कर्ता रूप से कथित हो या इदम् आदि सर्वनाम शब्दों से कथित हो उसका परामर्श 'तद्' शब्द से नहीं होता ।

कारण कि उनके द्वारा ( इदम् आदि द्वारा ) जो पदार्थ निर्दिष्ट किया जाता है वह प्रत्यक्ष होता ( वहीं उपस्थित रहता ) है । इसलिये यह ( अर्थ ) तद् का परामर्श विषय नहीं वन सकता ।

कारण कि ( तद् शब्द परोक्ष का परामर्शी कराता है अतः इदम् आदि द्वारा परामृष्ट प्रत्यक्ष के साथ उसका ) मेल नहीं बैठता । उदाहरणार्थ—

'वे चन्द्रचूड ( शंकर ) आपके लिये तादात्म्य के कारण बनें इस द्वैतभाव को दूर करो । वह सभी आपत्तियों का निधान है ।' यहाँ 'इदम्' की जगह 'एतत्' इस प्रकार 'एतद्' शब्द का प्रयोग तथा 'अमू' इस प्रकार 'अदस्' शब्द का प्रयोग करने पर उनका ( इदम् तथा अदस् शब्दों का ) उदाहरण भी यही पद्य समझना चाहिये । यहाँ ( तादात्म्य की जगह ) ऐकात्म्य

तच्छब्दात् प्रयोगातिप्रसङ्गनियमं प्रकाशयन् परिहाय विषयं प्रदर्शयति । यस्त्वेकवाक्य इति । एकवाक्यग्रहणेन परामृश्यस्य प्रत्यक्षायमाणत्वोक्ता । तत्क्ष वाक्यभेदे न दोषः । कर्तृत्वेनैति प्राधान्यं सूचयति अप्राधान्येडस्य परामर्शो न हुयतेति ख्यापनार्थम् ।

स इत्यर्थ: परामृष्ट: । तेभ्य इति कर्तृत्ववाचकादिदमादिशब्द । असौ तच्छब्दः । अस मन्वयादिति तच्छब्दस्थ परोक्षार्थप्रतिपादकत्वे सम्भवन्धविरोधादिर्यर्थः । तादात्म्यायेति । शाङ्कलमौलिस्वरूपवाविषयर्थः ।

'तद्' के प्रयोग से वाक्य प्रयोग में जो अर्थ विषयक अव्यवस्था होती है उसे बतलाते हुये त्याज्य तरवों पर प्रकाश डालते हैं—एकवाक्यग्रहणेन, 'एक वाक्य' शब्द के प्रयोग से यह बतलाया कि परामर्शी विषय ( वक्ता द्वारा वाक्यप्रयोग के समय ) देखा जाता रहता है । इसलिये जहाँ वाक्य ( एक न होकर ) भिन्न हो तो ( तद् शब्द के प्रयोग में ) कोई दोष नहीं ।

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कर्तृवेन—‘कर्तृन्’ शब्द् द्वारा प्रधानता की सूचना दी। वह यह बतलाने के लिये कि अप्राधान्य ( गौणता ) में इस ( अप्रधान पदार्थ ) का ( तद् शब्द द्वारा किया गया ) परामर्श दो प्रकार होता ।

न ( तेम्य: प्रतिनो )—में ‘स’ इसकै द्वार ( उसी पद् में आया ) ‘अर्थ’ का परामर्श किया गया । तेम्य:—अर्थात् कर्त्तृ आदि के वाचक और इदम्, अदस् आदि से ‘अशिकलामौलिस्वरूप’ बनने के लिये !

विमर्द: सामान्यतः ‘तद्’ शब्द परोक्षपदार्थ का परामर्शक होता है। किन्तु जब वह किसी एक वाक्य में कर्त्ता रूप से गृहीत होना है तत्र प्रत्यक्ष पदार्थ का ही परामर्श कराता है। इदम् अदस् और ‘एतद्’ शब्द् सदा प्रत्यक्ष पदार्थ का ही परामर्श कराते हैं।

इस स्थिति में परोक्षपदार्थवाचो—तद् शब्द द्वारा प्रत्यक्षभूत अर्थ का परामर्श नहीं किया जा सकता। इतने पर भी कुछ स्थल ऐसे भी मिलते हैं जिनमें ऐसे प्रयोग देखे जाते हैं !

उदाहरणार्थ—‘वे भगवान् शंकर आपको उनके रूप में लीन करें’—इसमें ‘वे’ यह सर्वनाम ( तद् ) शब्द कर्त्ता के अर्थ में प्रयुक्त है। वाक्य एक ही है। अतः वह प्रत्यक्ष है और प्रधान भी है।

ऐसी स्थिति में ‘वे’ शब्द का अर्थ पुनः ‘तद् सर्वनाम’ द्वारा नहीं कहा जाना चाहिये । कारण कि बिना किसी सर्वनाम के भी वाक्यार्थ में कमी नहीं आती—‘वे भगवान् शंकर आपको अभिन्न बना लें’—कहने से भी काम चल जाता है।

इस प्रसङ्ग में एक बात सोचने की यह है कि प्रकरण चल रहा था—तद् के प्रयोग में यद्यपि के अध्याहार का। अतः उपयुक्त विषय उससे मेल नहीं रखता। इतने पर भी प्रसङ्गपतित आनुसङ्गिक विषय भी कह दिया जाता है, अतः यह कह दिया गया।

‘इदम्’ और ‘अदस’ की चर्चा भी ‘योडसौ कुच चमत्कुते:’ से संबन्धित नहीं है तथापि—एतद् आदि, शब्दों द्वारा कथित पदार्थ का भी परामर्श कभी-कभी—‘तद्’ शब्द द्वारा कर दिया जाता है—जैसे।

‘इस द्वैतभाव को दूर करो, वह सभी आपदाओं की जड़ है !’ इसमें—‘इस’, द्वारा उक्त द्वैतभाव का परामर्श ‘तद्’ = ‘वह’ द्वारा किया जा रहा है। इस प्रकार के प्रयोगों का निपेषण करने के लिये—‘इदम्-अदस्’ की चर्चा भी की गई।

विशेष—व्याख्यान के ‘तच्च्वबन्धात्’ की पंचमी के स्थान पर वस्तुतः पष्ठी चाहिये ।

यदः पुनरार्थो द्विप्रकारः सम्भवति प्रकान्तवस्तुकलिप्सतत्कर्मोदि-विषयेण तदा तस्याभिसम्बन्ध्यात। यथा ‘यं सर्वंशैलाः’ इत्यादौ ‘स हिमा-लयोडस्ती’ति। यथाच ‘आत्मा जानाति, यत् पापं माता जानाति यत् पिता’ इत्यादौ तदात्मक जानातीयर्थीचगते:।

यद् का अर्थ ( उपक्रमोपसंहार ) दो प्रकार का हो सकता है। कारण कि ‘प्रकान्तवस्तु को’ तथा उसे कर्त्तृ आदि रूप में कल्पित ( यद् शब्द ) को कर्म आदि रूप से विषय बनाकर उपस्थित हूप ( दो प्रकार के ) ‘तद्’ शब्द से उसका सम्बन्ध होता है। जैसे—

‘यं सर्वंशैलाः = जिसे सभी पर्वतों ने’ इत्यादि में ‘स हिमालयोऽस्ति’ ‘ऐसा यह हिमालय है’, इस प्रकार। या जैसे—

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द्वितीयो विमर्शः

'आत्मा जानती है, जिस पाप को मैं जानती हूँ या जिसे पिता'—इत्यादि में 'उस आत्मा जानती है' इस प्रकार का अर्थ समझ में आता है ।

आद्य इति उपक्रमोपसंहारकयो निर्देशः । कतिपयतत्कर्मोदीपिते । कतिपयं यद् यच्छब्दनिर्दिष्टं कर्मोदि निष्योद्यते' इत्यछछब्दार्थः कुसंकरणादितया विषयस्तेनास्य कतिपत

इत्यर्थः ।

आर्थः—इससे उपक्रमोपसंहारकम का निर्देश किया ।

यत्किपततत्कर्मोदी—कतिपत यद् शब्द से निर्दिष्ट कर्म आदि विषय है जिसका । अर्थात 'यद्' शब्द का अर्थ कर्म करण ( आदि कारक ) रूप से जिसके लिए बतलाया गया हो ।

विमर्शः : पहले तद् शब्द के प्रयोग पर आश्रित—अर्थ उपक्रमोपसंहार —दिखलाया ।

अब 'यद्' शब्द के प्रयोग पर आश्रित—अर्थ उपक्रमोपसंहार दिखलाते हैं ।—ग्रन्थकार का कहना है कि वह दो प्रकार का होता है । १. जहाँ प्रकृतानुपरामशक् तद् का आक्षेप होता है और २. जहाँ ऐसा तद् शब्द का ( प्रयोग न हो ) जिसके द्वारा ऐसे पदार्थ का परामर्श हो रहा हो जो 'यद्' शब्द द्वारा कर्म या करण आदि कारक के रूप में कहा जा चुका हो । जैसे—कुमार सम्भव में—प्रथम सर्ग में 'हिमालय' नाम दे दिया गया—'हिमालयो नाम' इत्यादि ।

इसके बाद कहा गया 'यं सवशैलाः परिकलभ्य वत्सं*** = जिसे सब पहाड़ों ने बढ़कर बनाकर*** ।' इस द्वितीय—वाक्य में केवल यद् शब्द्‌ दिया गया है । और उसके द्वारा कर्मककारक के रूप में हिमालय का परामर्श किया गया है । यहाँ 'तद्' शब्द नहीं है, अतः उसका आक्षेप होता है ।

यह आक्षेप स्वयं ग्रन्थकार ने इस प्रकार बतलाया है—जिसको वत्सड़ा बनाकर***पृथिवी दुहृी गइ = 'वह हिमालय है'— इस प्रकार यह अर्थ क्रम हुआ ।

'यत् तदूर्जितमतयुग्मं क्षात्रं तेजोऽस्य भूपते: । दीव्यताक्षैस्तदानन नूनं तदपि हारितम् ।।' इत्यादौ च यद्यापि तदो द्विरुपादानं सकृद् यदः, तथापि तत् तथोक्त- सम्बन्धवैचित्र्यान्नातिच्युत्ति: । तथा हि यद: प्रकृतस्यैव विषयेण तद्पीत्यनेन

तदाभिसम्बन्ध्याच्छब्दः । यत्तदित्यस्य तु प्रसिद्धतेजोनिष्ठतयोपकलिपतेन यदाडभिसम्बन्ध्यादार्थे: ।

इस राजा का जो वह बड़ा चढ़ा अति उग्र क्षात्र तेज था, उस समय पाशे पलटते हुए इसने उसे भी हार दिया ।

इत्यादि ( स्थलों ) में यद्यपि 'तद्' का दो बार उपादान है और 'यद्' का एक बार तथापि वहाँ ऊपर वाके दोनों सम्बन्धों का अभाव नहीं है । कारण कि 'यद्' शब्द 'तदपि' में आए 'तद्'

है । 'यत्तद्' में आया 'तद्' तेज की प्रसिद्धता को बतलाने के लिए प्रयुक्त है, इसलिए उसका 'यद्' से सम्बन्ध अर्थ है ( शब्द नहीं ) ।

सम्बन्धद्वैचित्र्येति शब्दार्थमेदेन द्वैविध्यस्य । यत्तदिति । यच्छब्ददसमीपे समानाधिकरणस्तच्छब्द उपादीयमानः क्रियाशक्तिस्वाभाव्याद् प्रसिद्धस्तुविषयत्वं यच्छब्दस्माक- दर्शति । वैयधिकरण्येन व्यवधानेन च निर्देशे तु निर्दिष्टेनैव यदा समन्वयँ भजते । 'न

केवलं यो महतोऽपमाष्ठते शृणोति तस्मादपि यः स पापभाग्मिस्यन्न यद्यपि 'यः स' इति

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यत्तदौ नैरन्तर्येण सामान्याधि करण्येन च निर्देशः तथापि न 'यत्तदूर्जितमि'मिति न्यायेन । इहं यदि तच्छब्ददो निरन्तरोपात्तयच्छब्दापेक्षयैव प्रयुज्यते तदा स्यादेष दोषः, यावता 'न केवलं य:' इत्यत्र यच्छब्दापेक्षया व्यवधानेन प्राधान्यात् प्रयुक्तस्तच्छब्दान्तरानाकाङ्क्षः प्रसज्येन निरन्तरनिदृष्टयच्छब्दान्वय भजमानः पूर्वसंस्कारेण न तच्छब्दान्तरमाकाङ्क्षति-स्थानव्यमेतत् ।

सम्बन्धदैविध्येति—शब्द और अर्थ इस प्रकार से उसमें द्वैविध्य हुआ ।

'यत्तद्'—जब तद् शब्द यद् शब्द के समीप उसी विभक्ति में प्रयुक्त किया जाता है जिसमें यत् शब्द तो वह प्रसिद्धवस्तुविषयक यद् शब्द की आकाङ्क्षा रखता है । इसमें कारण है शब्दशक्ति का अपना स्वभाव । इसी प्रकार भिन्न विभक्ति में कहीं दूर 'तद्' का उपादान होता है तो वह वहाँ प्रयुक्त यद् शब्द के साथ समन्वय रखता है । यच्यपि = न केवलं य: सः = जो वह भी पापभागी होता है' यहाँ 'य: स:' = जो वह—को गाली देता है—उससे सुनता है । इस प्रकार यद् और तद् का एक ही विभक्ति में और एक हो जगह प्रयोग हुआ है तब भी—'यत्तदूर्जितमतयोर्'—इसमें हुए प्रयोग की भाँति नहीं । यहाँ यदि तद् शब्द—विना व्यवधान के प्रयुक्त यद् शब्द सी आकाङ्क्षा से प्रयुक्त होता तो—यहाँ दोष हो सकता था, क्यो.क—'न केवलं य:' यहाँ के यद् शब्द से बहुत दूर और प्रथमतापूर्वक प्रयुक्त किया गया तद् शब्द एक ओर तो उसके साथ सक्कार प्रयुक्त यद् शब्द से सम्बन्धित होता है, क्योंकि प्रसंग ही वैसा है और दूसरी ओर प्रथम यद् के लिए किसी दूसरे 'तद्' शब्द की जरूरत नहीं रहती । इसलिए यहाँ का ग्रंथ सर्वोत्तमना निदर्श है ।

विमर्शः : न केवलं यो महतोऽपभाषते श्रृणोति तस्मादपि य: स पापभाक्' से लेकर—प्रवृत्तः के अन्त = अनवद्यमेतत्—तक के व्याख्यानांश में—'प्राधान्यात् प्रयुक्तस्तच्छब्दान्तरानाकाङ्क्षः प्रसज्येन निरन्तरनिदृष्टयचछब्दान्वयभजमानः' इतने अंश का—तच्छब्दान्तरानाकाङ्क्ष: इतना अंश अधिक ज्ञात होता है । उसकेी जगह केवल—'तच्छब्द:'—'प्रसज्येन' इतना ही रहना ठीक प्रतीत होता है ।

एवञ्च योडयमिह 'योडसावि'त्यत्र यदः केवलस्यैव प्रयोगः स केन-भिसम्बध्यताम्, न ह्यत्र मुक्तके तदभिसम्बन्धसहः प्रकान्तः कश्चिदर्थः सम्भवति यदभिसम्बन्धोडयं परिकलप्येत । न च प्रकृतस्यमानामिकाकेसरि-विषयोपकलिपतेन तदडस्याभिसम्बन्धः सम्भवति, तदुपादान एव तत्सम्बन्ध-प्रतीतिदर्शानात् । इतस्थाः 'यत्कोपाग्रौ शालभतां लेभे कामः शिवोडवता'—दित्यत्रापि शिवविषयतयोपकलिपतेन तदा तत्सम्बन्धप्रतीतो सङ्गतार्थेतैव स्याद् इत्ययुक्त पवायि यदः प्रयोगः ।

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द्वितीयो विमर्शः

'योगपायो सलभतां लेप्तुं न शाकः सिन्धुरजानात्' इत्यादि । जिसकी चेष्टाओं में काम ने शलभभाव प्राप्त किया, जिस रशना ने 'तद्'.....'प्तौ भी शिव के लिये निलिप्त तद् रशना के साथ—संवन्ध प्रतीत हो गयी है । यद्यपि ( 'तद् रशो' 'रशां रतौ' ) यद् शब्द का प्रयोग गलत नहीं है ।

तद्रिश्रं यत्तद्रोक्रक्रमोपमानारकमो द्विविधः परिगृहीतः । स चात्र श्लोके न युज्यते हेत्यादि । ननु 'तत्' इति । यदि तत्र च्छन्दानन्तरं प्रत्यपेक्ष्यतां यच्छन्दे नात्र तदिति निर्देशो न स्यात् । तदिति निर्देशे सति तस्यैव सम्बन्धप्रतीतिरथः ।

एतत् प्रकार यत् 'तद् रशो' इत्यादिसंहार का अंग दो प्रकार का कहा गया । दोनों ही प्रकार का इस श्लोकी में निपातन कर रहे हैं । तद्पादान रति = अर्थात् 'रतौ' निपातन अस्ति = अथवा 'रतौ' निपातन । यहाँ 'तद्' शब्द का परामर्श में प्रसुतात् होने वाले 'तद्' शब्द का प्रयोग संभव है जव कहीं 'तद्' शब्द का प्रयोग हो ।

'मीलितं यदभिरामतादृके साधु चन्द्रमसि पुष्करैः ऋतम् । उज्ज्वलां जयिनि कामिभिरुक्षे तेन साहससमुच्छितं पुनः ॥'

इत्यत्र तु पादयाः प्रमादजः । पौर्वापर्यविपर्ययम् पवायुक्तो दृश्यः, न यदो मथोःकर्तव्यपरिज्ञानात्कथम् ।

'माने से मीनक मगिराम पद्ममा के उरःस्थल होने पर लमलजो निगोलिता गयी; जलजाने थी किना, अपने विगलित वाभिनिमग्न के सामने लदिया होकर उसने किन्तु साहस किया ।'

यहाँ परप्रथमभाव दोष है, पूर्वार्ध के दो नरण 'साधु चन्द्रमसि पुष्करैः ऋतम्' यहाँ 'मीलितं यदभिरामतादृके' इस प्रकार डा० जाने थे । असावधानों से उनमें उलट फेर हो गया । यद् शब्द यहाँ पर निपात या पूर्वोक्तक्रम के अनुसार अतिक्रमता नहीं होता

ननु प्रयोगदर्शनमेवात्र समर्थकं भविष्यतीत्याशाङ्क्य प्रयोगस्य प्रामादिकपाठचिप-यांसदेतत्कृतवयमाह ।

'मीलित...पुष्करैः' यहाँ 'यद्' शब्द का प्रयोग देखा जाता है, ऐसा कहकर—'मालिनी मतङ्ग...' इत्यादि हे सदतया था, और उसका समर्थन कर सकता था । उसके तारतम्यः ने अभागता में प्रयोग संभव न था ।

विमर्शः : पूर्वाचायाँ का मत यह था कि यद् ता यद् शब्द के बिना प्रयोग = योत्सौ—दल्यादि स्त्रियां निति निति है, चुरित निति निति प्रयोग देखे जाते हैं—और उसमें 'मीलितं यदभिरामतादृके रामादृशो' ग्रहण नित्यते । अन्वयादिकों उसे प्रमादपूर्ण बतलाया । यद् पाद किव उसमें नित न योंकि निति, किन्तु उसने निति नरणों का उलटफेर है । यदि प्रयम निति या fिति निति या प्रयमा नरण बना डाला गया होता तो यद् शब्द का निपात न होता, यदिनिति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति निति नितिििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििििित

यथा — 'चन्द्रदृशा पुण्यः' इत्यादि । ( उदाहरण १८८ काव्यप्रकाश वामनी टीका )

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यत्तदौ नैरनन्तर्येण सामानाधिकरण्येन च निर्देशः तथापि न 'यत्तदूजितस्मि' इति न्यायेन । इह यदि तच्छब्दौ निरन्तरोपात्तौ यच्छब्दापेक्षयैव प्रयुज्यते तदा स्यादेष दोषः, यावता 'न केवलं यः' इत्यत्र यच्छब्दापेक्षया व्यवधानेऽपि प्राधान्यात् प्रयुक्तस्तच्छब्दान्तरानाकाङ्क्षः प्रसज्येन निरन्तरनिदृष्टयच्छब्दान्वयं अजमानः पूर्वसंस्कारेण न तच्छब्दान्तरमाकाङ्क्षति-स्थाने व्यवधिमतत् ।

सम्बन्धद्वैविध्येति—शब्द और अर्थ इस प्रकार से उसमें द्वैविध्य हुआ ।

'यत्तद्'—जब तद् शब्द यद् शब्द के समीप उसी विभक्ति में प्रयुक्त किया जाता है जिसमें यत् शब्द तो वह प्रसिद्धवस्तुविषयक यद् शब्द की आकाङ्क्षा रखता है । इसमें कारण है शब्दशक्ति का अपना स्वभाव । इसी प्रकार भिन्न विभक्ति में कहों दूर 'तद्' का उपादान होता है तो वह वहाँ प्रयुक्त यद् शब्द के साथ समन्वय रखता है । यदापि = 'न केवलं यः' यहाँ 'यः सः' = जो वह—इस प्रकार यद् और तद् का एक ही विभक्ति में और एक हो जगह प्रयोग हुआ है तब भी—'यत्तदूजितमत्युभयम्'—इसमें हुए प्रयोग की भ्रान्ति नहीं । यहाँ यदि तद् शब्द—विना व्यवधान के प्रयुक्त यद् शब्द की आकाङ्क्षा से प्रयुक्त होता तो—यह दोष हो सकता था, क्योंकि—'न केवलं यः' यहाँ के यद् शब्द से बहुत दूर और प्राधान्यपूर्वक प्रयुक्त किया गया तद् शब्द एक ओर तो उसके साथ सत्कर प्रयुक्त यद् शब्द से सम्बन्धित होता है, और दूसरी ओर प्रथम यद् के लिये किसी दूसरे 'तद्' शब्द की जरूरत नहीं रहने देता । इसलिए यहाँ का ग्रन्थ सर्वात्मना निर्दोष है ।

विमर्शः : 'न केवलं यो महतोऽपभाषते शृणोति तस्मादपि यः स पापभाक्' से लेकर—प्रशटुक के अन्त = अनवधिमेतत्—तक के व्याख्यानांश में—'प्राधान्यात् प्रयुक्तस्तच्छब्दान्तरानाकाङ्क्षः' इतने अंश का—तच्छब्दान्तरानाकाङ्क्ष: इतना अंश अधिक ज्ञात होता है । उसकी जगह केवल—'तच्छब्द:'—'प्रसज्येन' इतना ही रहना ठीक प्रतीत होता है ।

एवञ्च योजयमिह 'योडयावि' त्यत्र यद्: केवलस्यैव प्रयोगः स केनाप्यवधिमध्यताम्, न ह्यत्र मुक्तके तदभिसम्बन्धसहितः प्रकान्तः कश्चिदर्थः सम्भवति यदभिसम्बन्धेऽपि परिकलप्येत । न च प्रकृत्यमानास्विकाकेसरी-विषयोपकलिपतेन तदस्याभिसम्बन्धः सम्भवी, तदुपादान पच तत्सम्बन्धप्रतीतिदर्शनात् । इतर्था 'यत्कोपाग्रौ शालभतां लेभे कामः शिवोडवता'-दित्यत्रापि शिवविषयतयाोपकलिपतेन तदा तत्सम्बन्धधतीतौ सङ्केतार्थतैव स्याद् इत्ययुक्त पचायं यदः प्रयोगः ।

इस प्रकार 'योडसौ'—यहाँ जो केवल यद् शब्द का प्रयोग है वह किससे संबंधित हो । यह पद मुक्तक है इसलिए उससे संबंधित होने योग्य कोई प्रकान्त अर्थ भी यहाँ संभव नहीं, जिसमें इस यत् शब्द का सम्बन्ध समन्वित लिया जाए । ऐसा भी नहीं हो सकता कि आगे-आगे वाले 'अभिकाकेशरी' के लिये कल्पित तद् शब्द—से इसका सम्बन्ध—मान लिया जाय, क्योंकि वह तभी संभव होता है जब उसका शब्दतः उपादान हो । नहीं तो ( शब्दतः उपादान न होने पर भी किसी यद् शब्द से ) तच्छब्द के साथ सम्बन्ध मान लेने पर—निम्नलिखित पद का अर्थ भी ठीक बैठा ( संगत ) मान लिया जाएगा—

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द्वितीयो विमर्शः: २०५

'यत्कोपारौ घालभतां लेभे कामः शिवोऽवतत्' अर्थात् 'जिसकी कोपाग्नि में काम ने शांतभाव प्राप्त किया, शिव रक्षा करें'—यहाँ भी शिव के लिए कल्पित 'तद्' शब्द के साथ—संबन्ध प्रतीत हो सकता है। इसलिये ( 'योडसौ' यहाँ का ) यद् शब्द का प्रयोग गलत ही है ।

तदित्थं यत्तदोःपक्रमोपसंहारक्रमो द्विविधः परिगण्टितः । स चात्र श्लोके न युज्यत इत्याह—पञ्चविंशति । तदुपादान हेतु । यदि तुच्छाभिधानस्तरं प्रयुपेत्स्यां यथाछछब्दमनु तदितप्रकान्तस्तत्च्छब्दः परामृश्यते तरसस्बन्धप्रतीताविस्यर्थः ।

इस प्रकार यद् तद् के उपक्रमोपसंहार का क्रम दो प्रकार का ठहरा । दोनों हो प्रकार का इस श्लोक में नहीं बनता ऐसार—'एवञ्च' इत्यादि ग्रन्थ से प्रतिपादित कर रहे हैं । तदुपादान इति = अर्थ यह कि यदि, यद् शब्द के द्वारा यहाँ आगे प्रकरण में प्रयुक्त होने वाले 'तद्' शब्द का परामर्श किया जा रहा है ऐसा माना जाय तो वह तभी संभव है जब वहाँ तद् शब्द का प्रयोग हो ।

'मीहितं यदभिरामाधिके साधु चन्द्रमसि पुष्करेः कृतम् । उदयता जयिनि कामिभिसुखे तेन साहसमनुष्ठितं पुनः ।।'

इत्यत्र तु पादयोः प्रमादः: पौर्वापर्यविपर्यय पदायुक्तो दृश्यव्यः, न यदो यथोक्तविषयातिक्रमः ।

'अपने से अधिक अभिराम चन्द्रमा के उदित होने पर कमल जो सुशोभित हुए; उन्होंने ठीक ही किया, अपने विजेता कामिनीमुख के सामने उदित होकर उन्होंने किन्तु साहस किया ।'

यहाँ पादप्रक्रमभद्र दोष है, पूर्वोक्त के दो चरण 'साधुचन्द्रमसि पुष्करेः कृतं मीहितं यदभिरामाधिके' = इस प्रकार दिए जाने थे । असावधानों से उनमें उलट फेर हो गया । यद् शब्द द्वारा अपने विषय का पूर्वोक्त क्रम के अनुसार अतिक्रमण नहीं होता ।

ननु प्रयोगदर्शनमेवात्र समर्थकं भविष्यतीत्याशङ्क्य प्रयोगस्य प्रामादिकंपाठविप-र्यांसहेतुकत्वमाह—मीहितमिति ।

पूर्वपक्षी—तच्छब्द के बिना भी यद् शब्द का प्रयोग देखा जाता है', ऐसा कहकर—'मीहितं यदभि...' यह उदाहरण दे सकता था, और उसका समर्थन कर सकता था । उसके उत्तर में ग्रन्थकार ने इस उदाहरण को ही प्रमादपूर्ण बतलाया—आत: इस उदाहरण से यद् का तच्छब्द के अभाव में प्रयोग सम्पन्न सिद्ध नहीं हो सका ।

विमर्श : पूर्वपक्षी का यह कथन था कि यद् का तद् शब्द के बिना प्रयोग = योडसौ—इत्यादि स्थलों में ठीक ही है, कारण कि ऐसे कुछ प्रयोग देखे जाते हैं—और उसमें 'मीहितं यदभिरामाधिके' प्रयोग उदाहरण में दिया । ग्रन्थकारने उसे प्रमादपूर्ण बतलाया । यह कहा कि उसमें यद् का प्रयोग अशुद्ध ही है, किन्तु उसका कारण श्लोक के चरणों का उलटफेर है । यदि प्रथम चरण को द्वितीय चरण और द्वितीय चरण को प्रथम चरण बना दिया गया होता तो यद् शब्द का दोष न होता, इसलिए इस श्लोक में वस्तुतः पादप्रक्रमभद्र दोष है ।

काव्यप्रकाशकार ने जहाँ यद् शब्द और तद् शब्द को लेकर विधेयाविमर्श दोष दिखलाया है—वहाँ यह पथ—उसी प्रकार चरणों में परिवर्तन करके हो उपस्थित किया है । यथा— 'साधु चन्द्रमसि पुष्करेः कृतं मीहितं यदभिरामातधिके । उदयता ..................

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उन्होंने इसकी कठिनाई को स्पष्ट करते हुये लिखा है कि यदि यदु शब्द का प्रयोग पूर्व चरण में कर दिया जाय तो वह तच्च्छन्द के बिना साकांक्ष बना रहता है जैसे—इस श्लोक में पूर्वार्द्ध दो चरणों के उलट देने से । इस उदाहरण से उन्होंने यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि उत्तर वाक्य में आया यच्छन्द पूर्व वाक्य में तच्च्छन्द की आकांक्षा नहीं रखता—यह शब्दशक्ति की विशेषता है ।

ननु केवलसकृद्युदः केव्लस्यैवाच्च प्रयोयोगो न तदिति यावतां तद्भिन्नार्थोडप्यादशशब्दः प्रयुक्त एवासांविति । अतश्र तदपेक्षया वाक्यार्थ-विश्रान्तेन कश्चिदुकदोषाविष्कारः । सः खलु ! दुरावारोषा । तस्य तदभिन्नार्थत्वासिद्धेः । तत्सिद्धौ हि प्रयोतेर्निराकाड्क्षत्वैव स्यात्, न तु विवादः, यथा—‘न केवलं यो महालोडपभारते । ऋणोलि तस्मादपि यः स पापभाग्’ इत्यत्र ।

( पूर्व पक्ष ) आचार्य ने कहा कि यहां ( योडसौ में ) केवल यदु शब्द का ही प्रयोग है—तत् शब्द का नहीं, कारण कि 'असौ'—इस प्रकार यहां अदः शब्द का प्रयोग है ही, और वह तदु शब्द का पर्यायवाची है—उसका अर्थ अभिन्न है । इसीलिये असौ को लेकर वाक्यार्थ पूरा हो जाता है और किसी प्रकार का दोष नहीं आता । ( उत्तर पक्ष ) ( सांख्य ) मले आदिमो—दूसरा मत यह कहा है । कारण कि 'योडसौ' में आये असो की तदु शब्द से अभिन्नार्थता सिद्ध नहीं होती । उसके सिद्ध हो जाने पर तो प्रतीति निराकाड्क्ष हो हो जाती, और कोई विवाद ही न उठता—जैसे ‘न केवलं यो...' इस जगह ।

तदभिन्नार्थः तच्च्छब्दाभिन्नार्थः । तस्य अदःशब्दाद्द्रव्याद् ‘योडसौ महदिव्यादौ यच्छब्दाकाड्क्षा न स्पादिति द्वितीयस्म । अत्र यस्य प्रकारोपेतद्रव्याद्द्रव्यद्रहितयाच्छब्दप्रयोगो द्रष्यान्तवेलोकः, ‘यथास्य केव्लस्य तच्च्छब्दाकाड्क्षा तथादशब्दयुक्तस्यापीत्यर्थः ।

तदभिन्नार्थे—तच्च्छब्द से अभिन्नार्थे । तस्य = अदः शब्द का । ‘अदस’ शब्द जब तद शब्द से अभिन्नार्थक हो जाता है तब दोष आता है । एक तो यह कि केवल अदः शब्द का प्रयोग होने पर यदु शब्द की आकाड्क्षा होती है जैसे—असौ मरुचुम्नित०० में, दूसरा यह कि यच्छन्द के साथ अदः शब्द का प्रयोग होने पर तच्च्छन्द की आकाड्क्षा नहीं रहती—जैसे—‘योडसौ जगत्रयलयस्थितिसर्गहेतुः; यावत् स वः शशिकलाकलितावतंसः’ इसी श्लोक के पूर्वार्द्ध—यस्य प्रकारोपलक्षितो परिदीपनिलोडभूष०० में । यहां ग्रन्थकार ने यह बताया कि अदः—शब्दरहित यदु शब्द तदु शब्द की आकांक्षा रखता है । वस्तुतः जैसे केवल यदु शब्द तदु शनुब्द की आकांक्षा रखता है वैसे ही अदः शब्द से युक्त यदु शब्द भी ।

किश्च तदभिन्नार्थेेडस्योपगम्यमाने वियुक्तरामातुरदृष्टिवीक्षितो वसन्तकालो हनुमानिवागतः ।।’ इत्यत्र मुक्के यच्छब्दपरामर्शापेक्षा प्रसज्येत, तस्य यथोक्तवस्तुविषय- त्वासम्भावात् ।

और यदि—अदः शब्द को तदु शब्द का अभिन्नार्थक शब्द माना जाने लगे तो—

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द्वितीयो विमर्शः

२०७

'यह—वसन्तकाळ हनुमान् के समान उपस्थित हुआ। उसके सुन्दर केसर पत्तन द्वारा चूमें गए हैं। वह प्रसन्नताराधिपमण्डलाग्रणी है और वियुक्तरामातुरव्रीक्षित है।'

वसन्त पञ्च :

केसर = केसर वृक्ष

प्रसन्नताराधिप = चन्द्रसण्‌डल जिसका अग्रणी है।

हनुमान् पञ्च :

गरदन के बाल

तारा के पत्‌ति शुग्रीव के कटक का जो अग्रणी है या प्रसन्न है सुग्रीव कटक का अग्‍रणी अज्ञात जिससे।

वियुक्तराम = बिछुड़े रामचन्द्र द्वारा आतुरतापूर्वक देखा गया।

इस मुक्तक पद्य में 'अदस्‌' शब्द के परामर्शों की अपेक्षा आ|धमकेऽपि क्योंकि इस मत में अदस्‌ शब्द की तद्‌ शब्द से भिन्नार्थकता सम्भव नहीं।

तस्य यथोक्तस्वदृति यथा अविरानेन शिष्टप्रसिद्धिपारम्पर्‌येणोक्तं वस्तु तच्च्छब्दार्थव्‍विक्टो विषयस्तत्सम्बते असम्भवः। त्वया द्वादशाब्दस्य तच्च्छब्दार्थंपेषाम्‍प्रसङ्गाद्‌ दृश्यर्थः। तत्र यच्च्छब्दपरामर्शपेऽपि प्रसङ्गाद्‌ दृश्यर्थः।

तस्य यथोक्तस्वदृति = अदः शब्द का जो अर्थ शिष्टजनों में परम्परा द्वारा एक मत से मान्य है, जिसमें वह तच्च्छब्द से भिन्नार्थक है, वह अर्थ तो तुम्हारे मत में सम्मत नहीं। तुम तो अदस्‌ शब्द को तच्च्छब्दार्थक मानते हो। इसलिये 'असौ मरु...' में तच्च्छब्दार्थ के परामर्शों की अपेक्षा है ही।

'यस्य . प्रकोपतिशिखिना परदीपितोऽभूत्तत्कुलकिशुकत्‍वमपतिमो मनोभूः ।

योडसौ जगद्‌ग्‍रयलयस्थितिसर्गहेतुः पायात् स वः शाशिकलाकलितावतंसः ।।'

जिसकी—कोपाग्‍नि द्वारा जलाया काम = फुले हुये 'दस' के पौधे सा रहा गया = जो तीनों लोकों के प्रलय, पालन और सर्ग का सेतु है वह शशिकलाका आभूषण पहना—( चन्द्रमौलि भगवान् शंकर ) आपकी रक्षा करे। यहाँ तच्च्छब्दार्थ का दो बार परामर्श मानना होगा—अतः पुनरुक्ति दोष होगा।

कथं तर्हि यत्तदोर्विषये कविभिरिदंभेदतद्‌:प्रभृत्या: शब्दा: प्रयुक्ता:, प्रयुज्यन्ते च। न च ह्यस्ति पर्यायतवे तस्मिन्नेवार्थे पदान्यतरप्रयोगमद्रियान्ते स्वस्थचेतस: । इति प्रयोगप्रवाहप्रामाण्यादेशां तदभिन्नार्थता परिकल्‍प्यते। न हि तमन्तरेण शब्दानां तदतदर्थनिश्चयानिबन्धनमन्यत्‌

किश्चित्तदतद्‌व्यामः ।

( प्रश्न ) तो कवियों द्वारा यद्‌ और तद्‌ के लिये इदम्‌ अदस्‌ एतद्‌ आदि शब्दों का प्रयोग कैसे किया गया और किया जाता है। जिनकी बुद्धि स्वस्थ होती है वे पर्यायवाची न होने पर ( एक शब्द के स्थान पर ) दूसरे शब्द का प्रयोग अच्छी नहीं मानते। इसलिये चले आ रहे प्रयोग के अमाण पर इन ( इदम्‌ आदि शब्दों ) को उन ( यद्‌ और तद्‌ शब्दों ) से अभिन्नार्थक मानना

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परिकलप्यत इति प्रयोगप्रवाहप्रामाण्यान्यथानुपपत्त्याऽSस्यात्प्राप्त्याडSर्थोपरयेद्यर्थः । तमन्तरेण तच्छब्देन प्रयोगप्रवाहः परामृष्टः । तदनर्थस्वनिश्रयौ त्रिवक्षिताविवक्षितार्थतैव-निश्चयः ।

परिकलप्यते—अर्थात् प्रयोग प्रवाह के प्रामाण्य की और किसी प्रकार से ( उपपत्ति ) मान्यता नहीं होती अतः उपस्थित हुए अर्थापत्ति से यह कल्पना करनी होती है ।

तमन्तरेण—में तद् शब्द से प्रयोगप्रवाह का परामर्श किया गया है ।

तदनर्थस्वनिश्चयौ—विवक्षितार्थकता और अविवक्षितार्थकता का निश्चय ।

यदि तु तामपहतुत्य गतानुगतिकया—

'योऽविकलपमिदमर्थमण्डलं पश्यतीश ! निखिलं भवद्रुपु: । स्वातमपक्षपरिपूर्तिते जगत्यस्य नित्यसुखिनः कुतो भयम् ॥'

इति 'स्मृतिभूःस्मृतिभूर्विहितो येनासौ रक्षतात् क्षतात् गुष्मान्' इत्यादिप्रयोगदर्शनमात्रानुरोधेन तेषां सा परिकलप्यते तर्हि यथादर्शानं व्यवहिता-नामेव, अन्यवबहितत्वे चा भिन्नविभक्तिकानामेव सा परिकलप्यताम् । इतरथा तु तेषां तत्परिकल्पनमन्याय्यमेव ।

इस ( पूर्वपक्ष ) पर ( उत्तर ) देते हैं—

उपयुक्त प्रकार से हमने यह सिद्ध कर ही दिया है कि वे ( अदः आदि शब्द ) उन ( तद् आदि शब्दों ) से अभिन्नार्थक नहीं होते । पर यदि उसे ( अभिन्नार्थकता के अभाव को ) न मानकर केवल अज्ञानुन्व तौर पर जो ( व्यक्ति ) इस समस्त प्रपञ्च को बिना किसी विकल्प के आपका शरीर देखता करता है, हे ईश ! ऐसे नित्य सुखी को किससे भय, उसके लिये तो सारा संसार अपने ही भाइयों से भरा होता है । इस प्रकार के और—‘काम को जिसने केवल स्मरण की वस्तु बना दिया ऐसे ( भगवान् शङ्कर ) आप लोगों की हानि से रक्षा करे ।’—इस प्रकार के प्रयोग को देखकर इतने से ही उनकी ( अदः आदि शब्दों की ) वह ( तदादि से अभिन्नार्थकता ) मानी जाती हो तो फिर ( यदि अदः आदि शब्दों से ) दूरस्थ ( अदस् आदि शब्दों ) की ही ( तदादिशब्दा-मिन्नता ) मानी जानी चाहिये । अथवा समीपस्थ पर अव्यवहित होने पर यदि वे ( अदस् आदि शब्द ) मिन्न विभक्ति में प्रयुक्त हों तब । और प्रकार से तो उनकी तदभिन्नार्थकता ( अदस् आदि की तदादि से अभिन्नार्थकता ) का जानना अन्धेर ही है ।

यदि तु तामिति तदभिन्नार्थताऽनुपपत्तिः परामृष्टा । गतेऽनुगतन्तं यस्य स गतानुगतिकः । मत्स्वर्थोऽयङ् ठनुप्रत्ययः । येनैव पथा एको गच्छति तेनैव यो गच्छति स

इस्यर्थः । ततो भावप्रत्ययः ।

अविकलपमिस्यकारप्रश्लेषः । निश्शब्दकमित्यर्थः । यद्वा न विकल्पमात्रेण, अपि तु साच्छ-दित्स्यर्थः । स्मृतिभूः कामः । द्वितीया स्मृतिभूशब्दः स्मरणविषये प्रयुक्तः । द्रग्धस्ववात् स्मृति-मात्रशेष इत्यर्थः । क्षतात् वधात् ।

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यदि तु ताम् = इसके द्वारा ‘तद्भिन्नार्थान्तानुपपत्ति’ का परामर्श किया गया है । गये के पीछे जो जाए वह होगा गतानुगतिक, इसमें ठीक प्रत्यय मत्स्यर्थीय है । अर्थात् वह ( व्यक्ति गतानुगतिक होता है ) जो जिस रास्ते एक आदमी निकला उस पर बिना विचारे चल पड़े । उससे भावार्थक प्रत्यय हुआ ।

योगविकल्प—इसमें आकार का प्रथलेश है । ( अविकल्प का ) अर्थ हुआ—निरूपण होकर । अथवा केवल विकल्प भर से नहीं अपितु साक्षात् ।

स्मृतिभूः—काम । दूसरा स्मृतिभूः शब्द ‘जिसकी याद की जाय’—उसके अर्थ में प्रयुक्त किया गया है । मनलव यह कि जल कर भस्म हो जाने से केवल स्मरण की चीज बनकर रह गया ।

क्षणात् = बध से ।

तत्र हि प्रत्युत सा तयोस्तदितरपरामर्शे्यपेक्षा सुतरामुन्मज्जति यथा ‘यदिेतचन्द्रान्तर्जलदलवलीलां वितनुते तदाचष्टे लोकः’ इति ‘सोडयं वटः श्याम इति प्रकारास्त्वया पुरस्तादुपपयाचितो य’ इत्यादौ च ।

न चासाविधावश्यं प्रयोक्तव्यः सन् प्रयुक्त इति तदवस्थ एव दोषावकाशः ।

उस स्थिति में तो उलट उनकी वह एक दूसरे के परामर्श की आकांक्षा और अधिक सामने आती है । उदाहरणार्थ—

‘जो यह चन्द्र के बीच मेघखण्ड को छवि पैदा कर रहा है उसे लोग ।’ यह और—

‘( सामने ) यह वह इयाम नामक वट है—पहले जिससे तुमने याचना की थी’ ऐसे प्रयोगों में । ‘योडसो’ इस जगह यह ( अदः = शब्द ) इसलिये प्रयुक्त नहीं है कि उसका प्रयोग अनिवार्य हो, इसलिए दोष की गुञ्जाइश तो वैसी की वैसी ही है ।

अव्यबहितानामेव तति यथा ‘योडविकल्प’मित्यादौ । अव्यवहितत्वेति । यथा ‘स्मृतिभूः’-

स्यादौ । एतदर्थमेवोदाहरणदयमुक्तम् ।

तत्र हि इदमादिसहितप्रयोगे । तयोरिति यस्तदौः । तदितरेति यदच्छब्दयैकतरप्रयोगे अन्यतरापेक्षेस्त्यर्थः । सुतरांभति इदमादिसहितैरपेन प्रयुक्तो यच्छब्दः स्वभावतो विकासी-

तास्य एवं तच्छब्दं प्रतीक्षते, एवं तच्छब्दोऽपि यच्छब्दमिति ज़्ञेयम् । एतच्च क्रमेणोदाहृतं यदेतदिति, सोडयमिति च ।

व्यवहितानामेव—जैसे योडविकल्प इत्यादि पद्य में ।

अव्यवहितत्वे वा—जैसे स्मृतिभूः ( स्मृतिभूः ) पद्य में ।

यहाँ दिखलाने के लिये ये दो उदाहरण दिये हैं ।

तत्र हाँति—इदमादि के साथ साथ प्रयोग होने पर ।

तयोः—अर्थात् यत् और तद् के ।

तदितरः—स्वभावतः किसी एक के प्रयोग किये जाने पर अन्य की अपेक्षा ।

सुतराम्—इदम् आदि के साथ प्रयोग में लाया गया यत् शब्द स्वाभाविक रूप से तच्छब्द की प्रतीक्षा में मानों मुँह बाये रहता है । इसी तरह तच्छब्द यच्छब्द के लिये । इसके उदाहरण भी इसी भ्रम से दे दिये गये हैं—‘यदेतत्’ और ‘सोडयम्’ यह ।

१४ व्य० वि०

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तस्मादपेतप्रकान्तसम्बन्धसहायस्यास्य यदोऽनुपपत्तिप्रकन्स्यमानवस्तुसमन्वयस्यैकाकिनः सार्थेऽग्रस्येव तपस्विनः पथिकस्य सन्मार्गोपदेशिकं तच्छब्दाध्याहारमेवैकं शरणमन्तरेण नापरोऽभिमतार्थेसम्भवोपायः सम्भवति।

इसलिए जैसे सभी संगियों से बिछुड़कर अकेले पदे किसी पथिक वेचारे के लिये सन्मार्गों वतलाने के लिये अपने लक्ष्य तक पहुँचने का उपाय सम्भवव नहीं। वैसे ही इस तच्छब्द के लिये भी तच्छब्द के अध्याहार के बिना विवक्षितार्थ तक पहुँचने का कोई उपाय नहीं रहता, कारण कि वह प्रकरण-प्राप्त अर्थ के सम्बन्ध की सहायाता से छूटा ही हुआ है। ऊपर से आगे आने वाले पदार्थ के साथ समन्वय वनता नहीं है।

यथान्यस्मिन्न् ग्रन्थे न प्रदर्शेऽनुपयुज्यते तदद्रदस्य यच्छछदसस्य न प्रकान्तपरामर्शे सम्वन्धो, नापि प्रकन्स्यमानवस्तुसमन्वयमार्गोपदेशो तच्छब्दाध्याहारः शारणम् । स च सत्काव्यकलङ्कायमानो हेय एव ।

'यथा अन्यस्मिन्न् ग्रन्थे न प्रदर्शेऽनुपयुज्यते तदद्रद:'—इस यद् शब्द का न तो प्रकरण से आ रहे किसी अर्थ के परामर्श से सम्बन्ध है और न आगे प्रकरण में आने वाले पदार्थ के साथ समन्वय करा सकने योग्य कोई तच्छब्द है। उसे प्राप्त है। इसलिए यह किसी भी अच्छे काव्य के लिये कलंकवत है अतः त्याज्य ही है।

विमर्शः यहाँ यथा अन्यत्न तदद्रद् तक का व्याख्यानांश ठीक बैठता नहीं है। कुछ अंश छूटा प्रतीत होता है।

स चैवंविधेऽपि सङ्किरणेऽपि कलङ्कायमानो मनागपि न काव्यमाणिक्यवैकटिकानां सचेतसां मनांस्यावर्जयितुमलमिति ।

और वह ( सदोष साकाङ्क्ष यद् शब्द ) इस प्रकार के उज्जवल पद्यों में कलंकयुक्त होता है । इसलिए सहृदय जनों के हृदय को लेशभर भी आकृष्ट नहीं कर सकता कारण कि वे तो पारखी मणि के पारखी होते हैं।

निरन्तरः पुनस्तत्र तयोरुक्तिनें दुष्यति । तयोर्निरन्तरोपात्तेऽविदमेतददस्सु च । तयोस्तेषां च नापेक्षा तेष्वसत्स्वच शस्यति ॥ ८ ॥ यत् तत्सादृश्यसमुद्धवम् । तस्य दिङ्मात्रसम्भिरुक्तं विस्तारभयाभिभिः ॥ १० ॥

इति सद्दूषणश्लोका ।

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३—इस विषय में उत्की मिलावट से जितने उदाहरण बनते हैं उनमें से कुछेक् ही हमने दिखलाये हैं। हमें विस्तार का भय था।

अनुक्त्वैवेतित यत्तदोःसंधौ परामर्शयमनुक्त्वा यत्र निरन्तरः प्रयोगः यथा ‘यत्तदूर्जितमित्यादौ तत् तयोःस्तदोःस्थायोगं पुनःप्रयोगो न दुष्यति यथा ‘नूनं तदपि हारितमित्यादौ। तथा तयोःस्तदोः निरन्तरनिदर्शेष्टविदमादिपु सुकृतं तयोःस्तदोः तेषामित्थंद्वीनां च सङ्ढितत्वेन स्थितानां यथायोगं यत्तदोः प्रत्यपेक्षा न निवर्त्तते। यथा अप्रयुक्तेष्विदमादिषु केवलयोः पृथगवस्थितयोरेपेक्षा न निवर्त्तन्ते तद्वत् प्रयुक्तेष्वपि तदर्थः। यथा तत्तादृशंयति। यच्छब्दस्य पृथगिदमादिसाहित्ये तच्छब्दस्य च पृथगिदमादिसाहित्ये यत्तदोः परस्परसाहित्ये च बहवो भेदाः, तेषामुदाहरणेषु दिङ्मात्रं दर्शितम्।

सम्प्रति प्रायेण वाक्यार्थंसमन्वयवध्यापिनोयत्तदोयड्‌योः नित्याभिसम्बन्धनियतवेनोपसंहारक्रमः, स प्रसङ्गाद् विचार्यते। स च पुष्टापुष्टप्रुष्टभेदेन त्रिविधः। पुष्टोऽपि प्रथमं शाब्दोऽर्थस्वभेदेन द्विविधः। शाब्दोऽपि यच्छब्दोपक्रमस्तच्छब्दोपक्रमश्रेति द्विविधः। अर्थोऽपि यच्छब्दमात्रानुपादाने तच्छब्दोपपात्तस्य प्रसिद्धानुमूतप्रकान्तविषयेण यद्दर्थानुपादाने तु तच्छब्दानुपपत्तेः केवलोपपत्तस्य प्रकान्तविषयेण तवस्तुविशयताकुल्पन एक एव भेदः। एवं शाब्दो द्विविध आर्थः पदभेद इत्यपविधो यत्तदोःपरस्परसाहित्ये नास्त्येव तदाभिसम्बन्धनियाद् द्विविधः। उभयानुपादाने तु द्वयोरुपायतदोःरूपसंहारक्रमः पुष्टः। तच्चैतच्चेह ग्रन्थकृतोदाहृतम्। यत्तदूर्जितमित्यादौ तु शाब्दस्यार्थस्य चोपसंहारक्रमस्य सङ्ढीर्‌णत्वमिति नास्त्येव पृथगभावः। अपुष्टस्य दुष्टत्वमध्ये प्रसङ्गेन वर्ण्यध्यासमानत्वादिदानीं दुष्टत्वं व्याक्रियते। तत् यत्तदोः स्थाने तच्छब्दद्वयच्छब्दनैरन्तर्येण सामानाधिकरण्येन चेदमादीनां दुष्टत्वै तेऽपामतदर्थत्वात् तन्निकटे च प्रयुज्यमानानां प्रसिद्धिमात्रपरामर्शोक्तत्वाद् यथा ‘योऽसौ कुत्र चमस्कृति’रिति। एवं तच्छब्दसाचिव्येनदमादीनामुदाहरणं सूच्यम्। विप्रकृष्टवेन सन्निकृष्टवेदपि वैषधीकरणयेन वा तेषां प्रयोगे न दुष्टं नादुष्टमित्युपपत्तमेव यथा ‘योऽविकललप्मि’ति ‘स्मृतिभिः स्मृतिभिर्नि’ति च। एवं च तच्छब्दोपक्रम उदाहरणंयम्। तथा तच्छब्दस्य परोक्षायमाणार्थप्रत्यवमर्शित्वादुष्टंव ‘यथा स वः शशिकलामौलिरि’-

त्यादौ। प्रधानग्रहणेन न कृत्स्नात्रे निर्दिष्टम् अपि तु कारकान्तरमपि प्राधान्येन विवक्षिततत्त्वात् प्रत्यचायमानम्। तेन—

'स मेदिन्यास्तचतुर्जलधिमेखलाम्। सचिवार्पिततदङ्घारस्तस्यामास्मे यथासुखम् ॥' इति मेदिन्यास्तचछब्दः परामर्शो न सुन्दर इत्याहः।

अनुक्त्वैव = परामर्शो विषय को कहे बिना ही यत् और तद् का जहाँ निरन्तर ( सत्कर ) प्रयोग होता है—जैसे—‘यत्तदूर्जित’ इत्यादि से। वहाँ उन यद् और तद् का जहाँ जैसा हो—फिर से प्रयोग किया जाना—दोषावह नहीं होता यथा—वहीं ‘नूनं तदपि हारितम्‌’ इत्यादि में।

इसी प्रकार = यद् तद् शब्द के साथ सत्कर इदम् आदि शब्दों का प्रयोग होने पर—उन यत् तद् शब्दों की और उन = सत्कर प्रयुक्त इदम् आदि शब्दों की यद्तद्—विषयक—आकाङ्क्षा, वह भले हो जहाँ जैसी हो—शान्त नहीं होती। अभिप्राय यह कि जैसे इदमादि के

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२१२

व्यक्तिविवेकः

प्रयोग न होने पर स्वतन्त्र रूप से अलग प्रयुक्त यत्-तद् की आकांक्षा शान्त नहीं होती उसी प्रकार—सटकर प्रयुक्त होने पर भी । उदाहरणार्थ—यदेवचन्द्रान्तर्जलदलवललीलाम०० इसमें और सोडयम् वट इयाम इत्यादि में । इसी प्रकार प्रकृत 'योडसौ' में भी—तद् की आकांक्षा अदस् शब्द के रहने पर भी शान्त नहीं होती ।

अलग आए इदम् आदि के साथ यद् शब्द के और, उसी प्रकार—अलग आए इदम् आदि के साथ तद् शब्द के प्रयोग तथा यद् और तद् के अपने सम्मिलित प्रयोग से बहुत से भेद हो जाते हैं । दिए उदाहरणों में उनका रास्ता दिखलाया गया है ।

अब इसी प्रसंग में हम—वाक्यार्थ के समन्वय में कारणभूत यत् और तद् का जो नित्य सम्बन्धित उपक्रम और उपसंहार क्रम है—उसका विचार करते हैं ।

वह 'उपक्रमोपसंहार' क्रम = 'पुष्ट, अपुष्ट और दुष्ट' भेद से तीन प्रकार का होता है । इनमें पुष्ट भी पहले पहल दो प्रकार का होता है—शब्द और अर्थ । इनमें शब्द दो प्रकार का होता है जिसका उपक्रम यद् शब्द से होता है और जिसका ( उपक्रम )—तद् शब्द से । अर्थ भी तीन प्रकार का होता है = वहाँ केवल तच्छब्द का उपादान होता है । फिर वह तच्छब्द यद् शब्द की अपेक्षा करता है । यद् तीन प्रकार का होता है—प्रसिद्धिपरामर्शक, अनुभूतिपरामर्शक और प्रक्रमपरामर्शक । ( इस प्रकार तीन प्रकार के यद् की अपेक्षा रखने से—तच्छब्द मात्र के उपादान से हुआ अर्थ 'उपक्रमोपसंहारभाव'—तीन प्रकार का हुआ ।

केवल यच्छब्द के उपादान होने पर उपक्रमोपसंहार भाव दो प्रकार का होता है—१. जब वह यच्छब्द—प्रकान्तविषयक तच्छब्द की आकांक्षा रखता है और २. जब—यच्छब्द के अर्थ को कर्म आदि रूप में प्रतिनिर्दिष्ट करने वाले तद् शब्द की ।

दोनों के अनुपादान में एक ही भेद होता हैं—उस समय उपात्तवस्तु में से ही किन्हीं को मिलकर = यह यततद् का पुष्ट—उपक्रमोपसंहार भाव < प्रकार का हुआ और वह ( दो प्रकार का शब्द उपक्रमोपसंहार भाव ) तथा—यह ( ६ प्रकार का अर्थ उपक्रमोपसंहार भाव )—ने उदाहरण द्वारा स्पष्ट कर दिया है । 'यत्तदूर्जित' इत्यादि पद्य में शब्द और अर्थ दोनों ही उपक्रमोपसंहार मिले हैं—अतः वह वस्तुतः= दोनों का संकर है । वह अलग कोई भेद नहीं ।

अपुष्ट को दुष्ट के बीच गिना जायगा—इसलिए अब दुष्ट का स्पष्टीकरण किया जाता है ।

यद् और तद् के स्थान पर तद् शब्द और यद् शब्द से मिलाकर इदम् आदि का एक ही वाक्यक्ति में प्रयोग—दोषपूर्ण ही है, कारण कि वे ( इदम् आदि ) तदर्थक् ( तद्—यद् अर्थ के ) नहीं होते और उनके निकट में प्रयुक्त होने पर एकमात्र प्रसिद्धि का परामर्श करते हैं । जैसे—सोडसौ कुतचमत्कुतेरतिशयं या त्वभितकाकेशरी—यहाँ ऐसे ही तच्छब्द के साथ आए—इदम् आदि के उदाहरण भी समझ लेने चाहिए ।

दूर या समीप में भी—भिन्नविभक्तिक रूप से उन ( इदम् आदि ) का प्रयोग हो तो वह सदोष नहीं और न अदोष इसलिए वह अपुष्ट ही होता है । उदाहरणार्थ—'योऽविकल्पमिदमर्थमण्डलम्' = इत्यादि । और 'स्मृतिभूः स्मृतिभूः'—इत्यादि । इसी प्रकार तत् शब्द से आरम्भ होने वाले वाक्यों के उदाहरण ले लेने चाहिए—जैसे तच्छब्दः—परोक्ष—अर्थं का प्रत्यवमर्श कराता है, इसलिए यदि वह एक वाक्य में ही स्थित प्रत्यक्ष अर्थक् प्रत्यवमर्शक बनाकर उपस्थित कर दिया जाय तो सदोष होता है—यथा = 'स वः शाशिकलमौलिः' । प्रधान कहने का

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प्रथमो विमर्शः:

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अभिप्राय यह नहीं कि केवल कर्त्ता ही प्रधान होने से प्रत्यक्ष अर्थ समझा जाय, अपितु प्रधान रूप से विवक्षित अन्य कारक भी प्रत्यक्ष अर्थ माने जा सकते हैं। यथा—

स मेधिनीं विनिजिंत्य चतुरङ्गलधिमेखलाम्। सचीवापिंततद्वारस्तस्यमारत्ते यथा|सुखम्॥

इसमें मेधिनी कर्मैकाकारक है। वह पूर्वार्द्ध में उपात्त हो है, अतः उत्तरार्द्ध में उसका प्रत्यवमर्श = 'तस्याम्' इस प्रकार तद् शब्द द्वारा किया जाता सदोष है। इस शब्द—सोदरो को तच्छब्द से परामर्शो सुन्दर नहीं।

तथा यत्तदोः पदार्थवाक्यार्थंगतत्वेन द्विविधावस्थाने यदेकस्य पदार्थनिष्ठत्वादन्यस्य वाक्यार्थविषयत्वं तद् मिथोविषयत्वेन नित्याभिसम्बन्धधपरिपन्थि दु�्टमेव। यथा—

हेग्रां भारशातानि वा मदमुचां वृन्दानि वा दनितनां श्रीहर्षेण तदार्पितानि गुणिने वाणाय कुतrac्य ततः।

या वाणेन तु तस्य सृक्किविसरैरुष्टट्क्षिताः कीर्त्तय-

स्तत् कथंप्रलयेऽपि यान्ति न मनाङ् मन्ये परिम्लानताम्॥

इति।

या इति पदार्थविषयत्वमभियातस्य यच्छब्दोद्दस्य। तथाहि तु वाक्यार्थविषय-

स्तच्छन्दः। पदार्थत्रिष्ये तत्र इति स्म्यात्। अत्रैव 'यद्वाणेन तु तस्ये'ति 'ततः कलप्रलयेऽपि'

इति च पाठो यदो वाक्यार्थविषयत्वे तदः पदार्थनिष्ठत्व उदाहरणं देयम्। तस्माद्यो वाणेन

विवति तः कलप्रलयेऽपिते च पठनीयम्। इह तु—

इन्दीवरं यदतसीकुसुमस्य वृक्षया यत् केतकं जरठमूर्ज्जदलानुवृक्ष्या।

यन्मन्थ्यसे च बहुलं करचीरवक्ष्या सा साम्प्रतं मधुप ! हन्त तवैव हानिः ॥

इति।

न केवलं यच्छब्दो वाक्यार्थविषये, यावत्तच्छब्दोऽपि। यदिपरं स वाक्यार्थों

हानिपदेन पिण्डीकृत्य प्रकारितस्तत्च्छन्देन परामृश्यः। अत एवात्र तच्छब्दस्य विधेयपदा-

स्थाभिप्रायेण क्षोभितोऽरवम्। अनुवाद्याभिप्रायेण तु तत् साम्प्रतमिति। उभयथापि लिङ्गप-

रिङ्ग्रहः : शिष्टप्रवाहे स्थितः।

किन्तु यत्तदोर्नित्याभिसम्बन्धाद् गुणप्रधानयोगे समवन्धादर्शंवात् परामृश्य पूकत्र

यच्छब्दोद्दवाक्ये तच्छब्दद्वाक्ये वा निर्दिष्ट इतरवाक्ये तदा वा प्रत्यवमर्शयते। यच्छब्द-

वाक्ये तु निर्दिष्टो न यच्छब्दान्तरेण, गुणानां प्रधानानां च परस्परमभिसम्बन्धात्। एवञ्च

तथाडपरामर्शो द्रष्टुमेदेव। यथा—

येषां ताक्षप्रशेभदानसरितः पीताः प्रतापोऽमिभि-

ल्हीलापानभुवश्र नन्दनतरुच्छायासु ये: कलिप्ता: ।

येषां हुडःक्रियतया ऋतामरपुरचूषा रपाचारिणां

किं तैस्त्वरपरितोषकारि बिहितं किन्तु प्रवादोऽचिरम् ॥

इति।

न तच्छब्देन इति शेषः । चपाचारिरिभरिति पाठो न्याय्यः, पृथं तच्छब्दद्वाक्ये निर्दिष्टं

यच्छब्दोद्दैः परामृश्यमानं न बुछ्यति।

इसी प्रकार—यद् और तद् शब्द पदार्थ तथा वाक्यार्थ—विषयक होने से दो प्रकार के होते हैं, इस स्थिति में एक के पदार्थविषयक होने पर अन्य का वाक्यार्थविषयक होना दोषपूर्ण है, कारण कि उनका विषय भिन्न हो जाता है। इस लिए वह ( उनके ) नित्य अभिसम्बन्ध का विरोधी होता है। उदाहरणार्थ—

'श्रीहर्ष' ने गुणी बाण को जो सोने के सैकड़ों भार और मदमाते हाथियों के समुदाय समर्पित

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२१४

व्यक्तिविवेक:

किए—आज वे कहाँ हैं ! किन्तु वाण ने जो उस (श्री) हर्षकी कीर्तिं अपने सूक्तिसमुद्राय से उत्कीर्ण कर दी वह कल्पान्त तक में तनिक भी धूमिल नहीं होगी।

इसमें 'या:' इस प्रकार लिङ्ङ बहुवचन यच्‍छब्द का विषय पदार्थ (कीर्तिं) बनाया गया है किन्तु 'तद्' नपुंसक लिङ्ङ एकवचन प्रथमा का वाक्यार्थ।

यदि उससे पदार्थ का परामर्श अभीष्ट होता तो 'ताः' इस प्रकार पाठ होता। इसी उदाहरण में 'यद्' के वाक्यार्थविषयक होने तथा 'तद्' के पदार्थविपयक होने से (उत्पन्न द्वोष ) का उदाहरण समझा जा सकता है यदि—'यद् वाणेन ***ताः कल्पप्रलयेऽपि।' ऐसा पाठ कर दिया जाय ।

इस प्रसंग में ( यह ध्यान देने की बात है कि ) केवल यच्‍छब्द ही वाक्यार्थनिपयक नहीं होता, तच्‍छब्द भी होता है। जैसे—

'इन्दीवरं यदतीकुसुमस्य वचसा'***सा साम्प्रतं मधुप हन्त तवैव धानिः।

अर्थात्—हे मधु पीने वाले (भ्रमर) तुम जो इन्दीवर (नीलकमल) को अलसी का फूल, केतक को भूरजपत्र और वकुल को करवीर मान रहे हो वह तुम्हारी ही धानिः है। इस पद्य में सिर्फ वह वाक्यार्थ हानिपद् द्वारा इकट्ठा करके प्रकाशित कर दिया गया है और फिर उसका तच्‍छब्द से परामर्श किया गया है।

इसलिए यहाँ विशिष्टपदार्थ के अनुसर तदुत्तरत्र में स्वलिङ्ङ है। अनुवाद के अनुसार ता। तत्। साम्प्रतं' इस प्रकार उसमें नपुंसकलिङ्ङ होता। शिष्टजन दोनों (अनुवादानुसार और विधेयानुसार ) प्रकार से लिख प्रयोग करते हैं।

अपरंच = किसी एक यच्‍छब्दवाक्य में या तच्‍छब्दवाक्य में दिया गया परामर्शविषयभूतपदार्थ—दूसरे वाक्य में तद् शब्द द्वारा या यद् शब्द द्वारा बतलाया जाता है कयोंकि यच्‍छद् का एक दूसरे से नित्य सम्बन्ध होता है और प्रधान तथा अप्रधान का सम्बन्ध हो भी सकता है। ऐसा नहीं कि यच्‍छद् वाक्य में निर्दिष्ट विषय का किसी दूसरे यच्‍छब्द से ही प्रत्यवमर्श हो। कयोद्वि सम्बन्ध सदैव प्रधान और अप्रधान का होता है—(प्रधान प्रधान या अप्रधान अप्रधान का नहीं)।

जिनके प्रताप की गरमी से इन्द्र के हाथी के मद की नदियाँ सूख गईं, जिन्होंने नन्दन के वृक्षों की छाया में लीलापानस्थली बनाई, और जिन राक्षसों की हुक्कार से देवनगर को क्षुब्ध करने वाली थीं—उन्होंने तुम्हें परितुष्ट करने योग्य क्या किया, जैसी कि वे डींगें डौंकते रहते थे ।

यहाँ 'क्षपाचारिणाम्' यह पद्यान्त 'येषां' इस एक यच्‍छब्द से सम्बद्ध है और उसका प्रत्यवमर्श दूसरे यच्‍छब्द से हो किया जा रहा है ( न कि तच्‍छब्द से ) इसलिए 'क्षपाचारिभिः' ऐसा करने से 'क्षपाचारि' पद का सम्बन्ध तच्‍छब्द वाक्य से हो जाता है। फिर उसका सम्बन्ध सभी यच्‍छब्दों से हो सकता है। उसमें कोई दोष नहीं ।

यथा च—

'पुण्ड्रेक्षो: परिपाकपाण्डुनि विटे यो मध्यमे पर्वणि र्‌यात: किञ्च रस: कषायमधुरो यो राजसभूभले । तस्यास्त्वाददशाविलुण्ठनपटुयेषां वचोविच्छ्रम: सर्वत्रैव जयति चित्रमतयस्ते भक्त्र्मे ण्ठादय: ॥' इति।

अत्र द्वितीये यच्‍छब्दवाक्ये रस: परामृश्यो निर्दिष्टस्तच्‍छब्देन परामृश्यते । अत्र प्रथमे यच्‍छब्दवाक्ये तु यच्‍छब्द: परामर्शो न युज्यते द्वयोरसम्बन्धात् ।

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द्वितीयो विमर्शः

परामृश्यस्य तेनैव तत्पदेन प्रत्यवमर्शः, न तु येन भाव्यः तेन यत्पदेन, तत्र दोषं दर्शोयति ) यथा—

'नमोडस्तु ताभ्यो भुवनेजयन्ति ताः सुधासुचस्ताश्र कबीनद्रूसुक्त्तयः ।

भवैकविन्छेदि कथाशरीरतामुपैति यासां चरितं पिनाकिनः ।' इति ।

कवीनद्रूसुक्त्तीनां तच्च्छब्दवति वाक्ये निर्दिष्टानां तच्च्छब्दद्यन्तरे परामर्शो न युक्तः ।

किन्तु यत्तच्छब्ददूयः सवभावेन वाक्यभेदोस्थापकत्वेन यदेकतरवाक्येडन्यतरदेव प्रयुड्यते

तदपि दुष्टमेव । यथा —

'अप्राकृतस्य चरितातिशयैश्र दृश्टेरस्यद्युतैरपहतस्य तथापि नास्था ।

कोडप्येष वीररिषुकाकृतिरप्रमेयमहाल्म्यसारसमुदायसमयः पदार्थः ।'

इत्यत्र यदापीर्यपेदितम् । न च तदेकवाक्यानां समबलं योग्यम् ।

एकत्रापि वाक्ये गुणक्रियादिगतं कल्पितं भेदमाश्रिश्र प्रक्रान्तवस्तुविषयतच्च्छब्दप्र-

योगे, प्रधानक्रियायां परामृश्यस्य प्रधानत्वादेव स्वरूपेण निर्देष्टे, गुणक्रियादिविषये तु

तच्च्छब्दद्यन परामर्शो न्याय्ये, सदृदृप्रथयकरण तद् दुष्टमेव । यथा—

'प्रजानामेव भूतयर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् ।

सहस्रगुणमुरुष्टादत्ते हि रसं रविः ।' इति ।

'वल्लि प्रजाभ्यो जग्राह स तासामेव भूतये' इति युक्तः पाठः ।

और जैसे—

'पौधे गन्ने की पक कर पीली पड़ी बीच वाली पोर में जो रस देखा जाता है और जो रस कषाय-मधुर बड़ो जामुन में, जिनकी वाणी का विलास—उसकी आस्वाद स्थिति को लूट लेने में चतुर है—वे भौंति भौंति की मति वाले भट्टमेण्ठ आदि कवि सब जगत् सर्वोत्कृष्ट हैं ।'

यहाँ द्वितीय—यच्च्छब्द वाक्य में परामर्शो का विषय—‘रस’ कह दिया गया, उसका प्रत्यवमर्शो तच्च्छब्द से किया जा रहा है। वस्तुतः—पहले यच्च्छब्द वाक्य में यच्च्छब्द का परामर्शो ठीक नहीं होता, कारण कि तब दोनों असंबद्ध रहे आते हैं ।

( प्रथमे यच्च्छब्दवाक्ये का अभिप्राय वस्तुतः संगत नहीं है ) जैसे—

उन्हें नमस्कार है, भुवन में उन सर्वविजयी का और उन सुघानिष्यान्निदनी—कविवरों को

सूक्तियों को । भगवान् शंकर का संसारचक्र से छुटाने वाला चरित जिनकी कथा का शरीर बनता है ।' इस प्रकार तच्च्छब्द वाले वाक्यों में बतलाए गए ( कवीनद्रूसूक्ति आदि ) पदार्थों का दूसरे तच्च्छब्दों से परामर्शो ठीक नहीं है ।

अपरं च—यत् और तत् शब्द स्वभावतः वाक्यभेद ( वाक्य में भिन्नता ) उपस्थित करते हैं ।

इस स्थिति में यदि एक वाक्य में किसी एक का ही प्रयोग होता है तो वह भी दुष्ट ही है । जैसे—

'असाधारण कौ और अत्यन्त अद्भुत लोकोत्तर चरित से अपहत की तव भी आस्था नहीं है ।

यह कोई छोटे से वीर शिशु के आकार में—अमित प्रभाव और बल के समुदाय से युक्त पदार्थ है ।'

यहाँ—(तथापि के लिये) यद्यपि चाहिए । और (यद्यपि का प्रयोग करने पर) वह एक वाक्य में

ठीक बैठ नहीं सकता ।

एक वाक्य में भी यदि गुण-क्रिया आदि में कल्पित भेद को लेकर प्रकान्त वस्तु विषयक

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तच्च्छब्द का प्रयोग हो तो जहाँ प्रधान क्रिया में परामर्शनीय होने से प्रधान—पदार्थ का स्वरूप प्रतिपादक स्ववाचक शब्द द्वारा कथन किया जाना चाहिए और अप्रधान क्रिया में परामर्शनीय होने से तच्च्छब्द द्वारा परामर्श किया जाना चाहिए—वहाँ उसके विरुद्ध निर्देश करना दुष्ट ही है। यथा—

प्रजाओं की ही उन्नति के लिए उसने उनसे बलि ली। सूर्य हजार गुना देने के लिए रस लेता है। यहाँ—'बलिं प्रजाभ्यो जग्राह स तस्मैव भूतये' यह पाठ होना चाहिए।

विमर्शः वाक्य-योजना का नियम यह है कि यदि उसमें 'प्रधान कार्य और फलकथन दोनों का उल्लेख—तत् सर्वनाम के प्रयोग द्वारा किया जाए तो सर्वनामको—फलकथन वाले वाक्यांश में रखना चाहिए, और प्रधान कार्यंका निर्देश जिस वाक्यांश में हो उसमें सर्वनाम के परामृश्य को रखना चाहिए—जैसे यदि—'गुरु शिष्यों को पढ़ाता है। कारण कि वह उनकी उन्नति चाहता है;' इस तथ्य को एक वाक्य में कहना होतो—'गुरु शिष्यों का पढ़ाता है—उनकी उन्नति के लिए' यह कहा जायगा—अर्थात फलकथन वाले वाक्यांश में 'उनकी' इस प्रकार सर्वनाम रखा जायगा और उसके द्वारा निर्देश्य—शिष्यपदार्थ—प्रधान क्रिया वाले वाक्य में। ऐसा न कह कर 'गुरु शिष्यों की ही उन्नति के लिए उन्हें पढ़ाता है'—ऐसा कहना ठीक नहीं। इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए व्याख्यानकार ने कालिदास का पद उद्धृत किया है—'प्रजापतिमिव भूतये' इसमें 'भूतये' यह फलकथन का वाक्यांश है। इसमें कवि ने—प्रजापदार्थ को रखा और उसका प्रतिनिर्देश 'तस्मै' द्वारा प्रधान क्रिया अप्रधानों वाले वाक्यखंड में किया।

ऐसा करने से फलकथन जो विधेय है वह गौण हो जाता है, फलतः विधेयता की स्पष्ट प्रतीति न होने से विधेयाविमर्श दोष बन बैठता है। व्याख्यानकार इसका परिष्कार—'बलिं प्रजाभ्यो जग्राह स तस्मैव भूतये'—इस प्रकार पाठ परिवर्तन द्वारा करते हैं। इसमें फलकथन वाक्यांश = 'तस्मैव भूतये' में स्पष्ट रूप से विधेयता की प्रतीति होती है। अतः यही पाठ ठीक है।

तथैकविषयत्वेऽप्यच्चदोरेसस्य द्रव्यादिविषयत्वेऽपि डन्यस्य कालादिगोचरस्य च दुष्टमेव। यथा— 'रसमेव सौन्दर्यं स च रुचिरताया: परिणतिः। कलानां सीमां परमिह युवामेव भजथः। अथ! द्वन्द्वं दिष्ट्या तदिति शुभगे ! संवदतु वा—अथ! मतः शेषं यत् स्याज्जितमिह तदानों गुणितया ॥'

अत्र 'अतः शेषं चेत् स्यादि' ति पठनीयं 'चेच्छब्दार्थवशात् ।

इसौ प्रकार जहाँ यद् और तद् दोनों का विषय एक ही होना चाहिए ( वहाँ दोनों में से ) एक का विषय द्रव्यादि हो जाए और दूसरे का कालादि तो वह भी दुष्ट ही है। उदाहरणार्थ—

'तुम इतनी सुन्दर हो और वह सुन्दरता का पारखी है। तुम्हीं दोनों कला की पराकाष्ठा तक पहुँचे हुए हो। इसलिए हे सुन्दरि ! तुम दोनों का जोड़ा जंचता तो बहुत है पर इसके बाद बचा है—वह हो जाय तब तो फिर सुना की ही विजय है ।' ( यहाँ—अन्तिम चरण में ) 'अतः शेषं चेत्स्याज्जितमिह तदानों गुणितया' इसके बाद जो बचा है यदि वह हो जाय तब तो***ऐसा पाठ चाहिए। क्योंकि चेत् शब्द यदि शब्द का पर्याय है।

विमर्श—अन्तिम चरण में यद् और तदानों में तद् दोनों का प्रयोग है। पर प्रथम यद् मिलन क्रिया का वाचक है और तदानों—'उस समय'—कालका, फलतः दोनों का विषय एक न मिलन किया का वाचक है और तदानों—'उस समय'—कालका, फलतः दोनों का .विषय एक न

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दोकर भिन्न हो जाते हैं। इससे उद्देय-विधेयभाव का ज्ञान नहीं होता। यत् के स्थान पर चेत दे देने से यदि का अर्थ आ जाता है तब तदानों की संगति बैठ जाती है। वह निर्धारणार्थक हो जाता है।

काव्यप्रकाशकार ने प्रस्तुत पथ को अभवनमतयोग का उदाहरण माना है। उन्होंने—इस पथ में दो आवयवक्ताएँ बतलाई हैं। एक तो 'अत: शेषं यत् स्मात्' में यत् के लिए तद् की और 'जितमिह तदानों' में—तदानों के लिए—यदि को। दोनों की पूर्ति के लिए—अत: शेषं यत् तद् यदिस्मात्—जितमिह तदानि पुनरतया' पाठ चाहिए।

प्रदीपोद्योतकार ने इस विषय को और स्पष्ट करते हुए लिखा है कि—प्रस्तुत पद्य में गुणविजय के साथ प्रयोजकनासम्बन्ध से अवशिष्ट घटना का हो जाना विवक्षित है। इसलिए 'शेष का पूर्ण होना' इन पदाथों का गुणविजय के साथ (अन्वय) सम्बन्ध कावि को मान्य है। वह दो प्रकार से हो सकता है। एक तो अगर 'यत्' का अर्थ यदि कर दिया जाय तब और दूसरे तब जब तद् और यदि की विवक्षा मानी जाय। प्रथम पक्ष के अनुसार यदि यत् को यदि माना जाय तो उसमें अवाचकत्व दोष होगा, कारण कि यदि की यदि में शाक्ति नहीं, और दूसरे पक्ष के अनुसार यदि 'तद् यदि' की विवक्षा स्वीकार कर ली जाय तो न्यूनपदत्व दोष होता है। किसी भी प्रकार—

'शेष संपत्ति' का गुणविजय में अन्वय नहीं होता।

सुधासागरकार का कहना है कि यत् का अर्थ यदि ही है। फिर तदानों का प्रयोग बहुत दूर किया गया है अत: अर्थप्रतीति में विलम्ब होने से चमत्कार में विलम्ब होता है अत: यहाँ अभवनमतयोग है।

तथा प्रकान्तविषयत्वे तचछछद्रस्य ह्यवस्थि तत्तद्विषये प्रक्रम्यमाणवस्तुगोचरत्वं दोष पथ । यथा—

'ये सन्तोषसुखप्रबुद्धमनसस्तेषां न भिन्नो मनो येष्यते धनलोभसडुलधियस्तेषां तु पूरे नृषाम् । दृष्टं कुसय कुरते कृतः स विधिना तारक पदं सम्पदां स्वात्मनश्च समासहहेतुममोहिमां मरने न रौचते ॥'

अत्र मेप: प्रक्रम्यमाण: स इत्यनेन परामृष्ट: ।

इसी प्रकार—तचछछद्र के लिए विषय रूप से प्रकान्त वस्तु ही निश्चित है। यदि उसको प्रक्रम्यमाण वस्तु के लिए प्रयुक्त कर दिया जाय तो वह दोष ही होगा। जैसे—

'मे न मुझे नहीं रुचता। उनकी सुवर्ण-महिमा तो अपने ही आप में सीमित है। जिनका मन सन्तोषसुख में प्रभुब्ध है उनका तो 'उससे' मतलब नहीं टूटता, और जिनकी मति धन लोभ से घिरी है उन से दूर है। इस प्रकार ने उतनी बड़ी सम्पत्ति का स्थान उसे वन्या ही क्यों ? यहाँ मे प्रक्रम्यमाण है। और उसे 'स:' = 'वह' इस प्रकार 'तद्' सर्वनाम से वतलाया गया ।

विमर्श : तद् परोक्षार्थ का वाचक है। यहाँ मे परोक्ष नहीं, प्रकरण में प्रत्यक्ष है। अत: उसका तद् से परामर्श ठीक नहीं।

एतद् वाक्यभेद उदाहरणम् । एकवाक्ये तु 'तीर्थे तद्दीये गजसेचुबन्धात् प्रतोपगामुत्तमतोडस्य गजाम् ।' इति देयम् ।

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वाक्यभेद होनेपर यह उदाहरण है—एक वाक्य में—'तीर्थे तदीये' गजसेतुबन्धात् प्रतीपाग-सुत्तर्ततोऽस्य गज्ञाम्' यह उदाहरण देना चाहिए ।

विमर्शः : व्यक्तिविवेक और व्य० र्थ्या० दोनों के रचयिताओं की यह मान्यता है कि इस पद्य में 'तदीय' शब्द से 'गंगासंबन्धी' अर्थ विवक्षित है । ऐसा मानने पर गंगा प्रत्यक्ष है अतः उसके लिए तद् शब्द का प्रयोग दोषावह सावित होता है ।

वस्तुतः 'तीर्थे तदीये' में 'तदीय' से 'विन्ध्यसंबन्धी' अर्थ विवक्षित है । इस विषयपर हम आगे विवेचन करेंगे ।

तथा निर्वीप्से नैकेनोपक्रमे सर्वींषसेनान्येन परामर्शो दुष्ट एव । यथा—

'य: कल्याणबहिर्भूतः स स दुर्गतिमश्नुते ।'

सर्वींषसेन त्वकेक प्रक्रमे निरीप्सेसेनोपसंहारः सर्वीषसस्य प्रत्यवमृष्टत्वाददुष्टोऽप्यन्वयः किन्त्वपुष्ट एव यथा—

इसो प्रकार यदत्र उपक्रम में एक (यद् या तद्) अकेला हो और उपसंहार में दूसरा (तद् या यद्) एकाधिक बार कह दिया गया हो तो वह सदोष है । यथा—

'जो कल्याण से दूर है वह वह दुर्गति पाता है ।' इस उपक्रम में एकाधिक बार किसी का प्रयोग हो और उपसंहार में अकेले एक का तो वह अन्वय निर्दोष होता है । कारण कि वहाँ एकाधिक का प्रत्यवमर्शो हो जाता है, पर वह अपुष्ट होता है—यथा—

'कल्याणानां त्वमसि महसामीशिषे त्वं विधत्से पुण्यां लक्ष्मीमथ मयि चिरं धेहि देव ! प्रसीद । यद्यत् पापं प्रतिजहि जगन्नाथ ! नम्रस्य तन्मे भद्रं भद्रं वितर भगवन्! भूयसे मङ्गलाय !!' इति ।

अत्र यद्यादिति निर्देशं केवलं तच्चोदन परामृश्यत्सु । एतद् यच्चोदस्य सर्व-प्सस्योदाहरणम् । तच्चोदत्व तु सर्वींषसस्य निर्वीप्से परामर्शो उदाहरण यथा—

'दान्तं न समयान् गुरुचेतसुखं त्यक्तं न सन्तोषतः सोढो दुस्सहशोचिवातततपनक्लेशो न तसं तपः । ध्यातं नियमह्नि शं शम्भोः पदं ततत् कर्मं कृतं यदेव मुनिभिरस्तुते फलेवैभविता: ।।' इति ।

विमर्शः : प्रस्तुत पद्य मालतीमाधव का है । इसमें तीन पाठ मिलते हैं—

१—कल्याणानं त्वमिह महसां भाजनं विश्वमूतें दुर्ग्यो लक्ष्मीमथ मयि भूरो धेहि—

२—कल्याणानां त्वमिह महसामीशिषे त्वं विधत्से पुण्यां लक्ष्मीमथ मयि द्रशं धेहि० तथा

३—यहाँ—'कल्याणानां त्वमसि' व्य० र्थ्या० का ।

इनमें प्रथम पाठ—मालती-माधव मूल में मिलता है । उसके टीकाकार त्रिपुरारि और जगद्दर दोनों को यह पाठ मान्य है । साथ ही काव्यप्रकाश में भी यह पाठ प्राप्त होता है ।

दूसरा पाठ—काव्यप्रकाश के नवीन टीकाकार वामन झलकौकर ने (अपनी बालबोधिनी में) दिया है । उन्होंने उसकी उपपत्ति में महसाम् का अर्थ उत्सवानाम् किया है और इसके साथ ईशिषे क्रिया में कल्याणानां महसां की पष्ठी को—'अधोगर्थदयेशां कर्मणि'के अनुसार कर्मार्थक बतलाया है । उनके इस पाठ में केवल तीन क्रिया हैं—ईशिषे, विधत्तां और धेहि । तदनुरूप

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द्वितीयो विमर्शः

कर्म भी हैं—महस्, लक्ष्मी और द्रश्। वय० व्या० के पाठ में इन तीन क्रियाओं के साथ एक ‘असि’ क्रिया और है। और कर्म तीन ही हैं। अतः ठीक अन्वय नहीं बैठता। कर्मों अस्ति, अस्मि आदि को विभक्तिप्रतिरूपक अव्यय मान लिया जाता है जैसे ‘त्वामस्मि विदुषाम्’ और ‘अनयत्र यूं कुसुमावचायं कुरुथ्वमत्रास्मि करोमी सख्यः’—में अस्मि। ‘यहाँ तो त्वम् भी है अतः असि की क्रिया हो मानना पड़ता है। ऐसी स्थिति में यदि ‘डंशित’ विभक्तिप्रतिरूपक अव्यय मान लिया जाय और उसका अर्थ ‘डंशिता’ कर दिया जाय तो यह हो सकता है, किन्तु इसमें संदेह है कि ऐसी क्रियाएँ भी विभक्तिप्रतिरूपक अव्यय मानी हैं या नहीं। ऐसे प्रयोग नहीं मिलते इसके अतिरिक्त जो ‘असि’ के स्थान पर ‘इह’ और इह अन पर अर्थ, पाठ है उसमें कोई खास बात नहीं है।

हम यहाँ काव्यप्रकाश और मल्लतीमाधव के पाठ के अनुसार अनुवाद करते हैं— हे विश्रमूर्त्त—(सूर्य) तुम मंगलमय प्रकाशराशि के केन्द्र हो। तुम मुझपर विपुल मात्रा में लक्ष्मी—(प्रकाश) आहृत करो। हे जगत् के स्वामी—मैं तुम्हारे समक्ष नत हूँ। मेरे जो जो पाप हैं उन्हें दूर करो। पवान् तुम महामंगल के लिए उत्कृष्ट हित की वर्षा करो।

यहाँ—यद्यपद् (जो जो) इस प्रकार (वीप्सा के साथ=दो बार) निर्देश किया गया है और परामर्श के लिए तच्छब्द से किया गया है काव्यप्रकाशकार ने इसे निर्देश माना है। परन्तु उनके कथन से व्या० व्या०कार इस उदाहरण में अपुष्टता मानते हैं— वे स्वयं कहते हैं कि अन्वय हो जाता है। काव्यप्रकाशकार ‘अन्वय दोष का अभाव दिखलाते हैं। अतः दोनों की मान्यताएँ अलग हैं। यह तो हुआ यत् शब्द की वीप्सा का रण। जहाँ वीप्सायुक्त तच्छब्द का वीप्सारहित यच्छब्द से परामर्श होता है उसका रण यह है—

‘सहा, पर क्षमा के साथ नहीं। गृहसुख तजा, पर संतोष से नहीं। दुःसह ठंड, हवा और का क्लेश सहा, पर तप नहीं किया। प्राणों को नियमित करके निरन्तर शिवचरणों को नहीं किया (या = भगवान् शंकर के चरणों का ध्यान किया, किन्तु रात-दिन लगकर और को नियमित करके नहीं) इस प्रकार उन उन कामों को किया जरूर जिन्हें मुनि लोग करते हैं पर उन उन फलों से वंचित रहे।’

विमर्शः यहाँ ‘उन उन कामों’ में आरम्भ किया ‘उन उन’ इस प्रकार वीप्सा से परन्तु केवल एक ‘यद्’ से अतः अपुष्टता हुई।

यत्र तु सर्वीष्सस्य प्रक्रमे सर्वीप्सेन प्रत्यवमर्शस्तत्र पुष्टस्त्वमेव यथा— ‘यो यः शस्त्रं बिभर्ति स्वभुजगुरुमद्: पाण्डवीनां चमूर्त्तां यो यः पाञ्चालजाते: शिशुरधिकवया गर्भाशय्यां गतो वा। यो यस्तरकमस्ताच्ची चरति मयि रणे यश् यश्र प्रतिप: क्रोधान्धस्तस्य तस्य ह्यवयमपि जगतामन्तकस्यांतकोऽहम् ।’ इति ।

जहाँ कहीं वीप्सायुक्त से आरम्भ और वीप्सायुक्त से ही उपसंहार होता है वहाँ—अन्वय पुष्ट है। उदाहरण—

‘पाण्डव सेना में अपनी सुजाताओं का बड़ा गर्व रखने वाले जो जो शस्त्र धारण किए हुए हैं, बुढ़ढा या गर्भ रूपमें जो जो पांचाल गोत्र में हैं, जो जो उस कृत्य का साक्षी है और युद्ध

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२२० व्यक्तिविवेक:

करते समय जो जो मेरे विरुद्ध होगा—क्रोध से अंधा मैं उस उसका और क्या स्वयं जगद् के अन्तक्—यम का भी अन्त करूँगा ।

विमर्शः यहाँ जो जो—और—‘जस उस’ इस प्रकार आरंभ और उपसंहार दोनों वी प्रसयुक्त यत्र तत् पदों से हुआ है ।

यत्र ज्ञानेनैव सतीप्सितस्य चापेक्षया प्रहाणामर्षनिमित्तमात्रं प्रवर्ततेत् । यथा—‘यो यो यं यमवाज्ञुयादवधचोदेष्टं सृप्रशन् पाणिना तत्तन्मात्रक्रमेंव यत्र स स ते रूपं पर्य मन्यते । तज्जात्यन्वेष्टुर्ंहहा करिपते ! नीतोऽसि दुर्वेधसा को नामात्र भवेद् वताखिलभवनन्महातस्यवेदी जनः ॥’ इति ।

यदि परं यूं यम् इति प्रक्रमे तत्तन्मात्रक्रमेवेति प्रत्यवमर्शे विधेयाविमर्शः सर्वीभिसस्य तदर्थस्य समासे गुणीभावाच्च । नैतत्त् । मात्रग्रहणेनावधारणमुख्यते यथा—‘प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे’ इति । तत्त्वावधारणमात्रं परतन्त्र मित्यवधार्यमाण-स्वयंच सर्वीभिसस्य तदर्थस्योद्देकाच्च प्राधान्यस्मखण्डितमेव । पूर्वपदार्थप्राधान्येन कृचित्

‘निर्वाणभूयिष्ठमथास्य वीर्यं सञ्चित्यन्तीव वपुरेण । अनुगमयाता वनदेवताभ्यामड्दर्शयत् स्थावरराजकन्या ॥’ इति ।

अत्र हि भूयिष्ठं निर्वाणं निर्वाणभूयिष्ठमिति समासे निर्वाणार्थस्यैव प्राधान्यं तस्य वीर्यविशेषणत्वेनावस्थितत्वात् । न तद्वदिह तत्तन्मात्रक्रमेति तदर्थस्य प्राधान्यं भविष्पति । केवलं कृतेद्वधारणार्थे मात्रशब्दे किमर्थः कमप्रत्ययः । तस्मिन्नपि वा कृते एवशब्दः किं न क्रियते । नैतत्त् । कमप्रत्ययस्य तावत्तु कृत्स्नाप्रतीयते । मात्रग्रहणे तु पिण्डतस्यैव तदर्थस्य प्रतीतिरित्यविशेषः । यदि परं द्वयो-

रुणप्रतिपदकयोः प्रयोः । यथा—वालो केवलेव रोदिति लेलिहानो ररशुभिः । अत्र तु तदिति निर्वीप्सेन तदा निश्चितं जात्यन्वपुरं निर्वीप्सेनैव यदा प्रयच्यते । ततश्वात्रानु-गुणपरामर्शाश्र दोषः कश्चित् ।

जहाँ अनेक प्रकार की वीप्सा से आरंभ हो और उसी प्रकार अनेक प्रकार की वीप्सा से उपसंहार वहाँ भी अन्वय पुष्ट होता है । यथा—

‘हाथ से छूटते समय जो व्यक्ति जिस जिस अवयव स्थान को पाता है वह वह तुम्हारा रूप केवल उतना उतना ही मानता है । इसलिए वड़े दुःख की बात है कि हे करिराज—तुम्हें वाम विधाता ने जन्मान्त्र्यों के नगर में मेज दिया है । आपके पूरे माहात्म्य को जानने योग्य यहाँ भला कौन मिल सकता है ?'

किमतु—‘यौ यौ’ इस प्रकार आरंभ कर ‘तत्तन्मात्रकम्’ इस प्रकार उपसंहार करने में विधेय-विमर्श दोष है, क्योंकि तद् शब्द का अर्थ दो बार कहा जाने पर भी समास में होने से गुण=अप्रधान हो गया । पर ऐसी बात नहीं है । मात्र शब्द से अवधारण बतलाया गया है जैसे—प्रातिपदिकार्थ-लिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा में । और जो अवधारण है वह अवधार्यमाण पर आश्रित है, इसलिए

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द्वितीयो विमर्शः

यहाँ तत्व शब्द का वोप्सासूक्त जो अर्थ है वह अवधार्यमाण है अतः उसकी प्रधानता खंडित नहीं ही होती । कहाँ पूर्वपदार्थ की प्रधानता लिये हुए 'सुप्सुपा'से समास होता देखा जाता है—जैसे—

काम के निर्वाणभूयिष्ठ वीर्य को धौंकती हुइँ सी, पावती उपस्थित हुइँ । यहाँ 'भूयिष्ठ यत् निर्वाणम्' ऐसा समास करने पर निर्वाण अर्थ ही प्रधान होता है क्योंकि वही वीर्य का विशेषण होकर आता है । (शंका)—यहाँ उस ( निर्वाणभूयिष्ठम् ) के समास तत्नमात्र इस प्रकार तत् के अर्थ की प्रधानता नहीं हो सकती । क्योंकि यदि केवल अवधारण में ही मात्र शब्द का प्रयोग हो

तो उसमें क प्रतयय किस बात के लिये दिया गया है । और यदि मात्र शब्द का अर्थ अवधारण ही मान लिया जाय तो फिर 'एव' शब्द किस लिये ? अकेले 'एव' शब्द का ही प्रयोग क्यों नहीं कर दिया गया ? (उत्तर) ऐसी बात नहीं है—'क' प्रत्यय यहाँ कुरसा का प्रतिपादक है । ('मात्रकमेव' में) पुनरुक्ति भी नहीं है । 'तन्त्रमेव' इस प्रकार यदि 'केवल 'एव' शब्द का प्रयोग करने पर तत् पदार्थ अलग अलग दिखाई देता है, मात्र पद देने से तत् का अर्थ पिण्डित होकर = मिल कर सामने आता है, यह विशेषता है । 'मात्र' और 'एव' दोनों का एक साथ प्रयोग सिर्फ लोक का अनुसरण कर अवधारण की दृढता के लिये किया गया है । ऐसे अनेक स्थल हैं जहाँ—अवधारण प्रतिपादक दोनों का साथ प्रयोग देखा जाता है—जैसे—'बाला केवलमेव रोदिति' ।

यहाँ एक बात और है कि वोप्सासूक्त तत् पद से जन्मान्धपुर को बांध कर दिया । और उप-संहार भी—वैसे ही वोप्सासूक्त यद् पद से । इसलिए इस पद्य में परामर्शो प्रक्रम के अनुरूप

तथा यत्र पूर्ववाक्ये यच्छब्दो निर्दिष्ट उत्तरवाक्ये तु न यच्छब्दो निर्दिष्टः, तत्र साकाड्क्षत्वाद् दुष्टतैव । यथा—

'मीहितं यदभिरामताधि के साधु चन्द्रमा सि पुष्करैः कृतम् ।' इति ।

उत्तरवाक्यगतात्वेन तु यच्छब्दद्रययोगे पूर्ववाक्ये तथच्छब्दद्रययोगे न दुष्टत्वम्, अपि तु प्राक्प्रतिपादितं पुष्करमेव सामान्येनोपक्रमात् । पश्चाद्विशेषोपसर्पणाद् विशिष्टोऽर्थः । पतद्-भिम्रायेण कल्पिततत्कर्मादिविषयत्वमुक्तम् । उदाहरणं तु 'साधु चन्द्रमा सि पुष्करैः कृतं मीहितं यदभिरामताधि के' इति पूर्वोक्तश्लोकादेःपादविपर्यये ।

जहाँ पूर्ववाक्य में यच्छब्द का निर्देश किया गया हो पर उत्तर वाक्य में तत् का नहीं, वहाँ वाक्यार्थ के सांकाङ्क्ष रहे आने से दोष होता है—जैसे—

अधिक सुन्दर चन्द्र के उदित होने पर कमल जो मुर्दे गए, उन्होंने अच्छा ही किया ।

पर जहाँ यच्छब्द का प्रयोग उत्तरवाक्य में होता हो वहाँ पूर्ववाक्य में यच्छब्द का प्रयोग न करने से कोई दोष नहीं होता । उलटे—पूर्वप्रतिपादित पुष्पता ही होती है, कारण कि आरंभ सामान्य रूप से होता है, बाद में विशेष का कथन होता है । इसी अभिप्राय से तत्पद की कल्पित तत्कर्मादि-विपयता बतलाई गई है (मूल ग्रन्थ में—जहाँ यत्पदार्थ के अर्थ उपक्रमोप-संहार का वर्णन आया है ।) इसका उदाहरण—पूर्वोक्तश्लोकार्थ—'मीहितं यदभिरामताधि के' को उलट कर—'साधु चन्द्रमा सि पुष्करैः कृतं मीहितं यदभिरामताधि के' रखने से स्पष्ट है ।

यततच्छब्दयोरविशिष्टदपि परामर्शोकतरे उत्तरवाक्ये निर्दिष्टो यच्छब्दः स्वभावत आवि-

दूर्येण पूर्ववाक्यार्थरक्षितया वस्तु परामृशति, तथच्छब्दस्तु परोचायमानार्थनिष्ठस्वात् वैदूर्येण । आविदूर्य च प्रकृतार्थं प्रकटयतां नयद् वाक्यार्थ श्लेषयति । ततश्र तथा भूते विषये यचछब्दस्य प्रयोगाद् रचे तथच्छब्दस्य प्रयोगोऽपि एव । यथा—

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'तस्याः श्लोकाकाङ्क्षनिरमित्तेच कान्तिश्रवेऽनतरेऽख्ययोर्या । तां वीचिय लीलाचतुरासमङः स्वचापसौन्दर्यमदं सुमोच ॥'

यद्यपि यद् और तद् शब्दों की परामर्श शक्तियों में कोई अन्तर नहीं है, इतनी ही वात शब्द की यह विशेषता है कि जब वह उत्तर वाक्य में प्रयुक्त होता है तो किसी भी परामर्शी आविदूयें = अर्थात् पूर्व वाक्यार्थ से सटाकर करता है । किन्तु तद् शब्द—वैदूर्य अर्थात् पूर्ववाक्य से दूर रखकर, कारण कि उसका—विषय एकमात्र परोक्षस्थित अ होता है । और आविदूर्य का यह गुण है कि वह वाक्यार्थ को इस प्रकार जोड़ता है कि प्रकृत अर्थ प्रकृष्ट रहता है । इस ( आविदूर्य की ) स्थिति में जब विषय—उस प्रकृत ( प्रधान ) रहता है तो उसके लिए होना तो चाहिए यद्यद् का प्रयोग, पर यदि तदतद् प्रयोग कर दिया जाय तो वह—अपुष्ट होता है । जैसे—

उसकी ( पार्वती की ) भौंहों की—सलाई में अंजन लगाकर बनाई गई सी जो थी—लीला में नतुर उसे देख अनङ्ग ने अपने चापसौन्दर्य का मद विस्तार दिया ।'( तृ० १४५ ) ।

यहाँ—'सा याँ वोक्ष्ये' इस प्रकार यद् और तद् दो बदलकर पढ़ना चाहिए ।

विमर्शः—१. व्याख्यानकार का कहना है कि उक्त वाक्य की रचना इस प्रकार होनी चाहिए—'उस ( पार्वती की ) भौंहों की कान्ति ऐसी ( वैसी ) थी जिसे देख—*** इस प्रकार करने में तद् ( वह ) पूर्ववाक्य में चला जाता है और यत् ( यह ) उत्तर वाक्य में । फलतः वाक्यार्थों में दूरी का अनुभव नहीं होता ! याम् की जगह पूर्ववत् 'ताम्' पाठ रखने से वाक्यार्थे उत्तर वाक्यार्थ से दूर मालूम पड़ता है । कारण कि तद् पद दूरेस्थ या परोक्ष अवि- विमर्श कराता है । उसकी जगह याम्—दे देने से परोक्षायमानता पूर्ववाक्यार्थ में चली गई । किन्तु उत्तरवाक्यार्थ पूर्ववाक्यार्थ से प्रत्यक्षतया जुड़ा दिखाई देता है ।

२. तस्या: श्लोकाकाङ्क्षनिरमित्तवचन श्लोक के तीसरे जो पाद हैं—यह—इस है—'यत्न सा वोक्ष्ये'ति यत्तदौ विपर्ययेरण पठनीयौ'। इसमें यत्न की जगह या तो 'अत्र' चाहिए क्योंकि उक्त सब स्थलों के लिये 'अत्र' ही पाठ मिलता है ।

'सा वोक्ष्य' में बीच में 'याम्' चाहिए । सा उत्तरार्ध के अन्त में आद 'या' के स्थान पर उत्तरार्ध के प्रथम शब्द 'ताम्' की स्थान पर याम् पाठ करने पर ही व्याख्यानकार का स्पष्ट होता है ।

यथा च— 'हृष्टिनोमृतवर्षिणी स्मितमधुप्रस्पन्दि वक्त्रं न किं नाद्यन्दैर्हृदयं न चन्दनरसरस्पर्शानि वाङ्मानि च । कोऽस्मिन् लुठधपदेन तै कृतमिदं कारण दूघाध्विना नूनं वज्रमयोऽन्य एव दहनस्तस्येदमाचेष्टितम् ॥'

अत्र यस्येति पठनीयम् । और जैसे—

उसकी चितवन क्या अमृत नहीं बरसाती थी, क्या उसका चेहरा मुस्कुराइट की मिठास चुहाता था, क्या उसका हृदय सभी अत्यधिक सरस न था, और उसके अंग-प्रत्यंग चन्दनरस

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द्वितीयो विमर्शः

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से युक्त न थे, भला किस जगह—स्थान पाया कि—उस क्रूर ( दायक ) आगो ने तु+हैं ऐसा बना दिय। निश्चित ही कोई दूसर ही आगो थी, जो वज्र्रमय थी, उसीकी यह करतूत है ।

यहाँ 'उसकी यह कर०' में तस्य उसकी जगह—यस्य जिसकी—पाठ होना चहिए ।

विमर्शः : १. यहाँ श्लोक पें—कस्मिन् की जगह यस्मिन् अच्छा रहेगा और वृत्ति में—अस्य को जगह यस्य । हमने कस्मिन् पाठ के अनुसार हो अर्थ कर दिया है ।

यथा च—

'आचार्यों मे स खलु भगवानस्मदग्राह्यध्यानामा तस्मादेश धनुरुपनिषत् तत्प्रसादात् जमोडपि । अध्यासीनः कथमहमहो वस्त्रं वैखानसानां मोतापानिग्रहणपणितं चापमारोपयामि ।'

अत्र च 'तस्मादेशा धनुरुपनिषदि'ति पठनीयम् । एतद् प्रागुक्ते 'हेत्नो भारशातानि' तस्मादौ 'ता वाणेन तु तथ्य सूक्तिविसरेष्टरुट्टकिता: कीर्त्यो, या: कल्पप्रलयेऽपि यान्ति न म्नाड मन्ये परिम्लानतामि'ति पठनीयसम् ।

और जैसे—

'वे मेरे आचार्य हैं जिसका नाम हम नहीं ले सकते, उन्हीं से यह धनुर्विद्या और उन्हीं के प्रसाद मे क्षमता भी ( प्राप्त है । फिर ) मैं—वैखानसों के रास्ते कैसे चला आया । सीता के विवाद में—शत्रु रूप से रखे इस धनुष को चढाता हूँ ।' यहाँ—यस्मात् = जिससे यह धनुर्विद्या पाई ।

पाठ चाहिए। इसी प्रकार पहले उदाहृत 'हेम्नां भारशातनि व०' पद्य में भी 'ता वाणेन तु तथ्य सूक्तिविसरेष्टरुट्किता: कीर्त्यो या: कल्पप्रलयेऽपि यान्ति न म्नाड मन्ये परिम्लानतामृ' पाठ नाहिए ।

विमर्शः 'आचार्यों मे०'पद्य में तस्मात् की जगह यस्माद् तो चाहिए ही तत्प्रसादात् के तत् की जगह भी यत् चाहिए ।

अपि च परामृश्यमदुक्तवा यच्च्छब्देन च वाक्यार्थोपक्रमें तच्च्छब्ददवति परामृश्यनिदेशे पूर्ववाक्यार्थ परामृश्यनन्ती उपलक्ष्यमाना प्रतीतिरिति वाक्यार्थप्रतिपत्तिविग्रकर्ष-दपुष्टत्वम् । यथा—

'पादाहतं यदुरुस्थाय मूर्धानमधिरोहति । स्वरस्वदेवावसानेन देहिनस्तद्रर रजः ।'

अत एवात्र श्लोकार्थयोःपर्यैयपाठे पुष्टत्वमेव । तथा पूर्ववाक्यार्थे निर्दिष्टस्यार्थस्योत्तर वाक्यार्थे सर्वनामसमान्त्रेण परामर्शो न्याय्ये यः स्वशब्दसहितस्य सर्वनाम्नो निर्देशः स दुर्वच ।

यथा—

'उदन्वद्विच्चुल्ला भूः स च निधिरपां योजनशतं सद्ा पन्थः पुषा गगनपरिमाणं कलयति । इति प्रागियो भावः स्कुरदरदधिमुद्रामकुलितः सतां प्रज्ञोन्मेषः पुनरयमसीमो विजयते ।' इति ।

अत्र 'स च निधिरपामि'ति सस्वशब्दः सर्वनाम्नो निर्देशः ।

और यदि परामृश्य ना कहा जाय तथा वाक्यार्थ का उपक्रम यच्छब्द से किया जाय तो यदि ( उत्तरवाक्य में ) परामृश्य का कथन तच्छब्द के साथ किया जाता हो तो वह अपुष्टताजनक होता है ।

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व्यक्तिविवेक:

है । कारण कि—इस स्थिति में जो उत्तर वाक्यार्थ-ज्ञान होता है वह पूर्ववाक्यार्थ में आप परामृष्ट्य को झटिति नहीं छूता, फलत:—वाक्यार्थ की प्रतीति में दूरी हो जाती है । उदाहरण—

'लात से ठोकर खाकर जो उठतीं और सिर पर चढ़ जाती है—अपमान होने पर भी स्वस्थ ही बने रहने वाले व्यक्ति से ( तो )—वह धूल अच्छी है ।'

यहाँ इसीलिए—दोनों इलोकार्थीं को उलटकर पढ़ने में पुष्टता आ जाती है ।

इसी प्रकार पूर्ववाक्यार्थ में बतलाया अर्थ उत्तरवाक्यार्थ में सर्वनाम मात्र से बतलाया जाना चाहिए—तब भी यदि स्ववाचक शब्द के साथ सर्वनाम का प्रयोग भी किया जाय तो वह पुष्ट है । यथा—

पृथिवी—समुद्र से घिरी है, वह जलनिधि भी सौ योजनों तक परिमित है । आकाश का जो विस्तार है उसे सततगतिशील सूर्य आँक लेता है, इस प्रकार प्राय: प्रत्येक पदार्थ—में अवधि ( सीमा ) की सूचना दिखाते हैं । विद्वानों की प्रज्ञा का यह उन्नेष ही केवल असीम और सर्वोत्कृष्ट है ।'

यहाँ 'स च निधिरपाम्' इस अंश में समुद्रवाचक शब्द—'निधिरपाम्', के साथ सर्वनाम ( स ) का प्रयोग है ।

विमर्श: एक बात समझने में आती है । पहले जलनिधान दिया है और उसके बाद 'निधिरपाम्' इससे—समुद्र की महिमा व्यक्त होती है । अतः यदि सर्वनाम के साथ किसी पूर्वंपरामृष्ट वस्तु की महिमा का चोतक कोई विशेषण स्वरूप शब्द आए तो उसे—सदोष न मानकर उचित मानना ही ठीक है ।

एवं 'रामगिर्याश्रमेभि:' इति प्रकृते 'तस्मिन्नद्रौ कतिचिद:' इत्यनु झेयस्म । अत्र तु केचित् समर्धयन्ते—'रामगिर्याश्रमेभि:' इति रामगिरि: समास उपसर्जनीभूतो बुद्ध्या बुद्वे: केणानवभासात् कथम् सर्वनाम्ना परामृश्यते 'सर्वनाम्नानुसंधेयत्वात्' इति प्रधानभूतपरामृश्याभिप्रायेण स्थितं यथा 'सम्यग्ज्ञानपूर्विका सर्वपुरुषार्थसिद्धिरिति, तद् न युक्त्यादते' इति । अन्नाद्राविति निर्देश्यमाने डिम्रिमातृपितृनेत्रं प्रकृतमन्द्री गमयेत । तस्मादुभयत्रोपादेयं यथा 'अथ वित्ति निर्देश्यमाने डिम्रिमातृपितृनेत्रं प्रकृतमन्द्री गमयेत । तस्मादुभयमत्रोपादेयं' यथा 'अथ शब्दानुशासनम्' इति । गिरिशब्देन गिरौ प्रकान्त अद्वितीयशब्देन पर्यायान्तरेण स्वागतमसामञ्जस्यं दुष्परिहरमेेति । उदाहरणाच्छ्लोका भूरितरच तु उदन्वतः परामृश्यस्य नैकत्वाद् योग्यत्वाच्च बुवा: क्षीरवेन स इति परामर्शानर्हवाच सर्वनामपरामर्श एव युक्तो न पुनः स्ववशब्दगोचरस्वित्यन दुष्टतैव ।

इसी प्रकार—'रामगिर्याश्रमेषु' ऐसा आरंभ कर 'तस्मिन्नद्रौ' इस प्रकार के कथन में ( दुष्टता ) समझना चाहिए । पर यहाँ तो कुछ लोग समर्थन करते हैं । पर 'रामगिर्याश्रमेषु' इस प्रकारारामगिरि तो समास में गुणीकृत है । वह स्पष्ट रूप से बुद्धि में नहीं आता । अतः उसका सर्वनाम द्वारा परामर्श कैसे किया जा रहा है । और यह जो नियम है कि जो समास में गुणीभूत हो उसका अनुसंधान भी सर्वनाम द्वारा किया जा सकता है उसका तात्पर्य यह है कि जब परामृष्ट प्रधान हो तब भी वह सर्वनाम द्वारा परामृष्ट हो सकता है । जैसे—सभी पुरुषार्थीं की सिद्धि सम्यग् ज्ञानपूर्वक होती है । अतः उसका निर्देश किया जाता है । इसमें यहाँ ( तस्मिन्नद्रौ में ) आद्यमर्थ का कथन होता तो उससे सभी अद्रियों का बोध होता, फलतः वह ( अद्रि शब्द ) केवल प्रकृत अद्रि का बोध न कराता । इसलिए दोनों ( स्ववाचक शब्द परामृष्ट्यवाचक शब्द और तत्परामर्शक सर्वनाम ) हों का उपादान यहाँ ठीक है । जैसे—'अथ शब्दानुशासनम्—केशां शब्दानाम्' यहाँ ।

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द्वितीयो विमर्शः:

तब भी गिरि का उपक्रम गिरिराशब्द से किया और उपसंहार में आ गया अद्रि उसका पर्याय—वाच्यांशब्द । यह जो असामञ्जस्य हुआ—यह—दुष्टपरिहार्य ही है ।

'उदन्वच्छिद्वा भुः' में परामृश्य—'उदन्वान' निकटस्थ है और परामृश्य के योग्य है, साथ ही 'सः' इस पुंलिङ्ग सर्वनाम से 'भूः' इस स्त्रीलिङ्ग अर्थ का परामर्श संभव नहीं, इसलिए केवल सर्वनाम द्वारा ही वस्तु का परामर्श उचित था—अपने वाचक शब्द द्वारा उसका स्पष्ट उल्लेख नहीं । इसलिए यहाँ तो दोष है ही ।

किन्तु समुदायस्य कस्यचित् केनचिद्वाक्येन निर्देँशो वाक्यांतरेऽपि तद्वयवस्य निर्धारणेऽपि तस्य समुदायस्य निर्धारणविषयप्रतीतये यच्छब्देन निर्देशे कर्तव्ये निर्धार्यमाणस्यावयवस्य निर्देँशो दुष्ट एव । यथा—

'तस्मादजायत मतुन्नवराजबीजं यस्यान्वये स सगरः स भीरथश्र । एकेन येन जलधिः परिख्वानितोऽयमन्येन सिद्धसरिता परिपूरितश्र ॥'

अत्र स सगरः स भीरथश्रेति यत्र्रिदृष्टं तस्यैकत्र्यादिना निर्धारणं विहितम् । निर्धार्य-माणं च जातिगुणक्रियाभिः समुदायादेकदेशस्य पृथक्करणम् । नचात्र समुदायः केनचित्पदेन निर्दिष्टः । यच्छब्देनैति निर्दिष्टं तस्य समुदायः, अपि त्वेकदेशः ।

निर्देश्यनिर्देशाच्चात्र दुष्टत्वम् । एवंच समुदायस्यैव निर्धारणविषयस्य यच्छब्देन निर्देशे कर्तव्ये 'एको ययोज्जलनिधीन्' इति निच्छान सत्, गाङ्गेः पयोभिरभिवर्षितवान् द्वितीयः' इति पाठः श्रेयान् ।

और यदि किसी वाक्य द्वारा किसी समुदाय का निर्देश हो—और दूसरे वाक्य में निर्धारण किया जाय उसके अंशविशेष का—तो वह भी दोष है । कारण कि यत् शब्द तो वहाँ समुद्राय की प्रनीति कराएगा । उस जगह—समुदाय के अंश का निर्देश—ठीक नहीं होगा । यथा—

'उससे—नपुंसकलिङ्ग—मनु पैदा हुए, जिनके वंश में वे प्रसिद्ध सगर हुए और वैसे ही वे भगीरथ । जिस एक ने यह समुद्र खोदा और दूसरे ने सिद्धसरित (गंगा) द्वारा उसे भरा ।'

यहाँ 'स सगरः', 'स भगीरथः' इस प्रकार जिसका निर्देश किया उसका 'एक' इत्यादि द्वारा निर्धारण कर दिया । निर्धारण का अर्थ होता है जाति गुणक्रिया द्वारा समुदाय से उसके एक देश को अलग करना । पर यहाँ समुद्राय किसी भी पद द्वारा नहीं बतलाया गया । 'एकेन' इस-प्रकार जिसका निर्देश किया गया है वह समुद्राय नहीं है, अपितु उसका एक देश है । इसलिए जिसका निर्देश करना था उसके अनिदेंर्श से और जिसका निर्देंश नहीं करना था उसके निर्देश से यहाँ सदोषता आ गई । इसलिए यहाँ समुद्राय ही निर्धारणविषय होना चाहिए, और उसका यत् शब्द द्वारा निर्देश किया जाना चाहिए इसलिए ऐसा पाठ अधिक अच्छा होगा—

'एको ययोज्जलनिधीन्' इति निच्छान सत् गाङ्गेः पयोभिरभिवर्षितवान् द्वितीयः ॥'

अर्थात जिनमें से एक ने सात समुद्र खोले और दूसरे ने गंगा-जल से उन्हें भरा ।

विमर्शः : न्यायन्वकार ने जो पाठ दिया है उसमें 'अभिवर्षितवान्' की जगह 'अभिपूरित-वान्' पाठ अच्छा होता ।

तथा—गाङ्गेः पयोभिरभिवर्षितवान् द्वितीयः' की जगह—गाङ्गे: परतश्र सलिलैः कृतवान्शून्यान् । पाठ अधिक अच्छा होता ।

१५ व्या० वि०

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कचिद्यत्तच्छब्दावग्रहणेन विध्यनुवादभावेन वाक्यार्थप्रस्तावे यदन्तरान्वयथाकरणं तत् तु दुष्टत्वं यथा—

'यत् त्वनेत्रसमनाकान्तं सलिले मग्नं तदिन्दीवरम्' इति ।

अत्र प्रथमर्ततीययोः पादयोः तत्‌च्छब्दावग्रहणं दोषः । इन्दीवराणां राजहंसानां च वहुस्वात् सीतासम्भनिधन्वस्तूपमितयोरिन्दीवरराजहंसयोः 'वस्तूपमा' इत्यर्थः । विध्यनुवादभावपरिग्रहः । चन्द्रस्य त्वेकत्वात् तद्वारणमिति केचित् । तदसत् । चन्द्रस्यापि द्वितीयाचन्द्रादिविमेदेन वहुस्वसम्भवात् तत्रापि विध्यनुवादभावो युक्तः । इन्दीवराणां व्यक्तिभेदेन मुख्यो भेदः । चन्द्रस्य पुनरेकव्यक्तिरूपस्य कालभेदादवस्थाभेदाच्च भिन्नत्वमुख्येनानेकप्रकार पूर्णाचन्द्रः । अतश्चैवं द्वितीयाचन्द्रादिव्यावृत्या पूर्णाचन्द्रप्रतीतिस्यर्थं मुख्यच्छायानुकारिति विशेषोऽपि दत्तम् । न हि शशिशब्दः पूर्णाचन्द्राभिधानोऽस्ति । चन्द्रमा अपि द्वितीयाचन्द्राद्यनुकरणवाचकरूपात् । सड़‌ह्याच्चव्यवहारेऽपि चन्द्रस्यैकत्वप्रतीतिरिति चेत् । कचिज्जातिद्रव्यव्यवहारात् तद्वारयितुं शक्यत्वात् । तस्मात् कविव्यवहारे चन्द्रगतरवेनैकत्वस्य किश्चित्स्थानविनिवेशनं तच्छब्ददस्य प्रतीतिचिप्रकर्षोऽपि ।

यथा—

'मसृणचरणपातं गमयतां भूः सदर्भा विरचय सिचयन्तमिति'यत्र तच्छब्दो हेत्वर्थो विनिवेशितः । न च तत् तस्योपयोगः । अतस्तत्र प्रतीतिकुठत्वसमुपजायतेति ।

कहीं-कहीं यदि तद् शब्दों द्वारा वाक्यार्थ का आरंभ विध्यनुवाद-भाव से होने पर बीच में उसे बदल देना दोषावह होता है । यथा—

'यत्वनेत्रसमनाकान्तं सलिले मग्नं तदिन्दीवरम् ।'

'तुम्हारे नेत्र के समान कान्ति वाला जो नील कमल था वह जल में डूब गया ।' इस पद्य में प्रथम और तृतीय पादों में तो यत् और तद् शब्दों के द्वारा—विध्यनुवाद भाव के साथ—कथन हुआ है, पर दूसरे पाद में उसका अभिप्राय है । अतः वह दोष है । कुछ लोगों का कहना है कि 'इन्दीवर' और 'चन्द्र' अनेक हैं । उनमें से केवल सीता के अंगों से मेल रखने वालों को ही ज्यायुक्ति हो सके इसलिए—यहाँ विध्यनुवाद भाव से काम लिया । चन्द्र तो एक ही है अतः उसमें 'वह नहीं किया गया ।'—पर यह ठीक नहीं । चन्द्र भी द्वितीया आदि तिथि भेद से अनेक प्रकार का हो सकता है, अतः उसमें भी विध्यनुवादभाव चाहिये । ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि 'इन्दीवरों में तो व्यक्तिभेद से भेद है अतः वह चन्द्र तो एक व्यक्तित्व है उसमें भेद केवल काल और अवस्था के भेद से आता है—अतः वह अवास्तविक और नगण्य है, क्योंकि चन्द्र भी व्यक्तिशः भिन्न है । द्वितीया का चन्द्र अलग है और पूर्णिमा का अलग । अत एव—यहाँ द्वितीया चन्द्र को हटाकर पूर्णिमा के चन्द्र की प्रतीति करने के लिए 'मुख्यच्छायानुकारिति' कहा । शशो—शशि शब्द पूर्णिमा के चन्द्र का वाचक नहीं है । वह केवल चन्द्र सामान्य का वाचक है । यदि यह कहा जाय कि गिनतीने में तो चन्द्र को एक ही कहा जाता है—तो इन्दीवरों में भी वह बात लागू हो सकती है । इन्दीवरों को भी जाति द्वारा एक मानकर एक कहा जाता है । अतः कवियों के व्यवहार में चन्द्रमा के अनेक होने से उसके लिए भी यहाँ विध्यनुवाद चाहिये ।

इसी प्रकार तद्‌च्छब्द यत्रे ठीक जगह न रखा जाय तब भी वाक्यार्थ प्रतीति में चिप्रकर्ष = देरी ला देता है ।

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द्वितीयो विमर्शः

‘पैर सम्हालकर रखो, जमीन में कुश हैं, सिर पर पल्ला डाल लो—घाम तेज है !’ यहाँ—हेतुर्थक तद्धितच्वबद का प्रयोग—‘विरचय सिचयान्तसुं’ इस वाक्य में होना चाहिए, पर उसका प्रयोग तृतीय नरण के आरंभ में किया गया है । वस्तुतः उसका वहाँ कोई उपयोग नहीं है । इसलिये वह वाक्यार्थप्रतीति को रोकता है ।

विमर्शः : पूरा श्लोक इस प्रकार है—

'मरणचरणपातं गम्यतां भूः सदर्मो विरचय सिचयान्तं सूर्धिन् घर्मः कठोरः । नदिति जनकपुत्री लोचनैः रघुपुर्णः पथि पथिकवधूभिर्‌विक्षिता शिक्षिता न ॥'

कचित् प्रधानक्रियायां तदादिसर्वचाम्ना परामृष्टस्य गुणक्रियायां स्वरशब्देनेतोपादानं दुष्टमेव । यथा ‘प्रत्यासन्ने नभसी’ति । अत्र तस्मै इति सर्वनाम्ना पूर्वंप्रकान्तो मेघः परामृष्ट उत्केतच्छलोकगतो जीमूतः । तत्‌राधे पच्‍ने जीमूतग्रहणमनर्थकं प्रधानक्रियायां तदा परामृष्टस्य पूर्वप्रकान्तस्यैव मेघस्यार्थतः । सर्वनाम्नयोर्गत्यान्त । न हि यावतां येन सम्बन्धस्तावतां प्रत्येकं निर्देशः क्रियते । एकत्र कृतोऽन्वयस्त्राकाङ्क्षादिनोपजीव्यते । तस्माज्जीमूतग्रहणं न कर्त्तव्यं, कृतं प्रत्युत वसवन्नरप्रतीतिं जनयद्‌द्वेरस्यमावहति । अथ तच्छब्देनेतच्छब्दलोकगतो जीमूतः प्रत्यवमृश्यते । तदसद् । सर्वत्रात्र प्रकरणे पूर्वप्रकान्तस्यैव मेघस्य परामर्शः स्थित इितोहापि तद्‌विरोध आलोच्यग्रहणानर्थक्यमेव ।

कहीं—प्रधान क्रिया में तदादि सर्वनाम द्वारा परामृष्ट पदार्थ का अप्रधान क्रिया में स्वराचक शब्द द्वारा कथन—होता है वह भी दुष्ट ही है । यथा—

प्रत्यासन्ने नभसि दयिताजोवितालम्बनार्थां जीमूतान् स्वकुशलमयीं हारयिष्यन् प्रथितिमन् । स प्रत्यग्रैः कुटजकुसुमैः कल्पितपथोय तस्मै प्रीतः प्रीतिप्रमुखवचनं स्वागतं व्याजहार ॥ ( मेघदूत )

‘श्रावण मास के पास आ जाने पर प्रियतमा के प्राणों को सँदर्रा देने के लिए—मेघ द्वारा अपनी कुशलता की खबर मेजने के इच्छुक—उस यक्ष ने—नवीन कुटज पुष्पों से अधे देकर उसे—प्रीतिपूर्ण स्वागत शब्द कहे ।’

यहाँ—( यह प्रश्न उठता है कि ) ‘तस्मै—उससे’ इस सर्वनाम द्वारा पहले के श्लोकों में कहे मेघ का परामर्श कराया जा रहा है अथवा इसी श्लोक में जीमूत शब्द से कहे गए मेघ का ? पहले पक्ष में ( पूर्व श्लोकों में आए मेघ को परामर्श विषय मानने पर ) जीमूतशब्द का उपादान व्यर्थ होता है । कारण कि प्रधान क्रिया—‘व्याजहार’ में तत्पद ( तस्मै ) द्वारा जिसका सम्बन्ध वताया जा रहा है वह पूर्वप्रकान्त मेघ ही है, उसका अपने आप सम्बन्ध हो जाएगा । एक वस्तु से जिन-जिन का सम्बन्ध हो वे सभी नहीं ‘कहीं जातीं’ । कारण कि उनका निर्देश एक जगह कर दिया जाता है और दूसरी जगह आकांक्षा आदि के द्वारा उनका बोध हो जाता है । इसलिए जीमूत का ग्रहण नहीं किया जाना चाहिए । करने पर उलटे विरसता पैदा करता है, कारण कि उससे दूसरे मेघ की कल्पना होने लगती है । यदि ( दूसरे पक्ष के अनुसार ) इसी श्लोक का जीमूत लिया जाय तो वह ठीक नहीं । कारण इस प्रकरण में सर्वत्र, पहले से चले आ रहे मेघ को ही निर्देश है, इसलिए यहाँ भी वैसे ही निर्देश करना ठीक है । इसलिये अव भी जीमूत ग्रहण व्यर्थ ही ठहरता है ।

विमर्शः : ‘प्रत्यासन्ने’ यह पद्य मेघदूत का चौथा पद्य है । इसके पहले दूसरे पद्य में ‘मेघं ददर्श’ आता है, और तीसरे में ‘मेघालोके सुखिनोडपि चेतः अन्यथावृत्ति भवति’ आता है ।

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पुनः मेघ का वाचक जीमूत-पद व्य० व्या० की दृष्टि में व्यर्थ है । उसकी जगह ‘तत्’ इस प्रकान्त परामर्शांक सर्वनाम का प्रयोग करने से प्रसक्त निर्वोध हो सकता था । जैसा कि उत्तरार्ध में कवि ने ‘तस्मै’ द्वारा किया भी है । परन्तु कवि ने ऐसा न कर पूर्वार्ध में जीमूत और उत्तरार्ध में उसका परामर्शांक—‘तस्मै’ दोनों ही शब्दों का प्रयोग किया । व्य० व्या० की शंका है कि यहाँ तस्मै से दो बातों का बोध हो सकता है पहले तो द्वितीय और तृतीय पद्य में आए मेघ का और—

दूसरे इसी पद्य में आए जीमूत का । प्रथम पक्ष में इस पद्य का जीमूत शब्द व्यर्थ होता है । कारण कि तत्पद द्वारा ‘जीमूत अर्थ’ प्रकरण से खींच लिया जाएगा । दूसरे पक्ष में—व्य० व्या० का कहना है कि इस प्रकरण में सब जगह प्रकरणप्राप्त मेघ का परामर्श कराया गया है । जैसा कि—दूसरे और तीसरे पद्य में दिखाई देता है । दूसरे पद्य में कहा गया—‘मेघ ददृशे’ और तीसरे पद्य में मेघ को तत्पद से बतलाते हुए कहा गया—‘तस्य स्थितत्वा कथमपि पुरः’ । अतः यहाँ न तुर्थ पद्य में कवि को वैसा करना चाहिए । न करने से प्रक्रमभङ्ग दोष होता है ।

इतरथं द्वितीयं विधेयाविमर्शं विविच्य तृतीयमप्यन्वयत्नैव श्लोके प्रपञ्चयितुमुपक्रमते अपि चेत्यादिना ।

इस प्रकार द्वितीय विधेयाविमर्श का विवेचन कर चुकने पर तीसरे विधेयाविमर्शों को भी इसी ढंग से बतलाने चलने हैं—आप्तु इत्यादि ।

आपि च अश्वकाकेसरीत्यत्र षष्ठीसमासो नोपपद्यते, यतः सर्वेषामेव समासानां तावत् प्रायेण विशेषणविशेष्याभिधायिपदैरपचितशरीरत्वं नाम सामान्यं लक्षणमाचचक्षिरे विचक्षणाः । इतरथा तेषां समर्यताऽनुपपत्तेः ।

स च विशेषणविशेष्यभावो द्विधैव सम्भवति—समानाधिकरणो व्यधिकरणश्चेति । तत्राद्यः कर्मधारयस्य विषयः । यत्र तु द्वे बहूनि वा पदान्यन्यस्य पदस्यार्थे विशेषणभावं भजन्ते सा बहुव्रीहिः । तत्रैव यदाऽसदृशः—यायाः प्रतिषेधस्य च विशेषणभावो भवेत् तदा स द्विगोर्नञ्समासस्य च विषयः ।

और यहाँ ‘अश्वकाकेसरी’ में षष्ठी समास ठीक नहीं है । क्योंकि विद्वानों ने प्रायः सभी समासों को विशेषणविशेष्यों के वाचक शब्दों द्वारा घटित माना है । कारण कि इसके बिना उनमें समर्थता नहीं बनती ।

वह विशेषणविशेष्यभाव दो ही प्रकार का हो सकता है । समानाधिकरण और व्यधिकरण । उनमें पहला कर्मधारय में होता है । जहाँ दो या दो से अधिक पद किसी अतिरिक्त पद के अर्थ में विशेषण बनते हैं—वहाँ बहुव्रीहि होता है । उसमें भी संख्या या प्रतिषेध ( Negation )

प्रायेणति द्वन्द्वं वर्जयित्वा तत्र युगपदधिकरणवचनतया सामर्थ्यं प्रकारान्तरेण समर्थनतन्मू ।

तत्राद्य इति ‘तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः’ इति ( १-१-४२ ) वचनात् । ‘बहुव्रीहिः समानाधिकरणानाम्’ इति वचनात् प्रायेण बहुव्रीहिः समानाधिकरणविषय एव । सुसूक्ष्मजटके शादौ तु व्यधिकरणानामपि पश्य्यते । तत्रैव समानाधिकरणे पदार्थे । यदा

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सद्द्र्याया इति 'सद्द्र्यापूर्वों द्रिगु:' (२-१-५२) इति वचनात् । प्रतिषेधस्येति 'नज्' (२-२-६) इति नज्सूत्रारम्भात् ।

'प्रायेण' का अभिप्राय यह कि द्वन्द्व को छोड़ कर अन्य समासों में विशेषण विशेष्यभाव होता है । वहाँ सामर्थ्य की सिद्धि दूसरे प्रकार से की जाती है । वह है—'युगवदधिकरणवचनता' व्यधिकरण द्वय अर्थ में परिभाषिक शब्द है । अतः इसका अर्थ हुआ दो द्रव्यों को एक साथ बतलाना हो तो द्वन्द्व समास का प्रयोग होता है । अतः इसमें सामर्थ्य की सिद्धि उक्त ढंग से नहीं होती ।

तत्राऽये—'तत्पुरुष: समानाधिकरण: कर्मधारय:' ११११४२' इस वचन के आधार पर । 'बहुत्रीहि: समानाधिकरणानाम्' इस वचन से प्रायः बहुत्रीहि समानाधिकरण पदार्थों में ही होता है—कभी-कभी 'खुजुसूक्ष्मकेस' आदि में व्यधिकरणों में भी वह हो जाता है ।

तत्रैव—समानाधिकरण पदार्थ में ।

यद्वा संख्याया:—'संख्यापूर्वों द्रिगु:' इस वचन के आधार पर ।

प्रतिषेधस्य—'नज्' इस सूत्र के आधार पर ।

द्वितीय: प्रकार: कारकाणां समवन्यस्म्य च विशेष्यान्ताव् बहुतिथ: । स तत्पुरुषस्य पन्या: । तत्रापि यदाडव्ययार्थस्य विशेष्यता स्यात् तदाs- सावड्ययीभावस्य मार्ग: ।

दूसरा प्रकार अनेक प्रकार का होता है । कारण कि उसमें कारक और सम्बन्ध विशेषण बनते हैं । वह तत्पुरुष का विषय है । उनमें भी जहाँ अव्ययार्थ का प्राधान्य हो वहाँ अव्ययीभाव समास होता है ।

द्वितीय इति व्यधिकरण: । कारकाणामिति 'कर्तृकरणे कृत: बहुलम्' इत्यादिना । समवन्यस्म्येति 'षष्ठी' इत्यादि द्वारा ।

तत्रापि कारकसम्बन्धयोगेsधिक्षि उपकुम्भमित्यादौ ।

तदेवमेषां समासानां विशेषणविशेष्योभयांशसंस्पर्शित्वेडपि यदा विशेषणांश: स्वार्थयो: कारकषाधान्येन वाक्यार्थंचमत्कारकारणतया प्राघान्येन विवक्षितो विशेष्यधुरामधिरोहेद् इतरस्त्वनूद्यमानकल्पतया न्यगभावमेव भजेत तदासौ न कृत्स्नैरपि भावितुमर्हति । तस्मां हि स प्रधाने- तरभावस्तथोरस्तुभियादित्युक्तम् । तच्चैतद्विशेषणमेकं वाडस्तु न तयोर्विशेष: कश्चित् ।

इस प्रकार यद्यपि समास विशेषण और विशेष्य दोनों में होना है तथापि जब विशेषणांशा अपने आश्रय ( विशेष्य ) में उत्कर्ष दिखलाते हुये वाक्यार्थ में चमत्कार का कारण होने से प्रधान हो अतः विधेय बनने लायक हो साथ ही विशेष्य केवल उद्देघ रूप से विशेषण की अपेक्षा घटकर उपस्थित हो रहा हो, तब वहाँ समास नहीं किया जाना चाहिये । समास होने पर विशेषण विशेष्य

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की प्रधानता और अप्रधानता असंमित हो जायेंगी । ( ऐसा हमने पहले कह दिया है ) । और यह विशेषषण एक हो या अनेक उनमें कोई अन्तर नहीं पड़ता ।

स्वाश्रयो विशेष्यम् । विधेयधुरामिति शाब्दवृत्ते यो विधेयस्तथ्य कक्ष्यां वास्तनां विधेय-

तामिस्र्यर्थः । अन्वयमानकल्पतयेन्ति । शाब्दं प्राधान्यानुपपेच्च वास्तवेन प्राधान्यान्वेनैतस्यर्थः ।

अस्तंमियादिति एकार्थीभावात् विभक्तत्वेनाप्रतीतेरिस्यर्थः ।

स्वाश्रयः—विशेष्य ।

विधेयधुराः—शब्द वृत्ति का जो विधेय उसकी कक्षा वास्तविक विधेयता को ।

अन्वयमान कल्पतया—शाब्दगत प्रधानता को छोड़कर वास्तविक प्रधानता के कारण ।

अस्तमियादि—एकार्थीभाव हो जाने के कारण, अलग-अलग प्रतीत न होने से ।

ननु च विशेषणत्वमवच्छेदकत्वाद् गुणभावः विधेयत्वं च विवक्षित-

त्वाद् प्राधान्यं तत्कथमनयोर्भावाभावयोरिवान्त्र्योन्यं विरोधादेकत्र समावेश

उपपद्यते येनैकत्र नियमेन समासो निषिध्येत अन्यत्र चोपकल्प्येत ।

नैष दोषः । विरावस्थामयोभयस्तुलिष्यत्वात् श्रीतोषणादिवत् । न चैव

वस्तुत्वमुभयोः सम्भवति, एकस्यैव वास्तविकत्वात् । अन्यस्य च वैवाक्षिक-

त्वेन विपर्ययात् । न च वस्तुवस्तुनोरविरोधः । न हि सत्यहस्तिनः

कल्पनाकेसरिणश्व कश्चिदन्वन्योन्यं विरोधमवगच्छति । फलभेदरस्त्वनयो-

निर्विवाद एव ।

एकस्य हि सकलजगद्रस्य शाब्दिकैकविषयः पदार्थसम्बन्धमात्रम् ।

अपरस्य पुनः कतिपयसहृदयसंवेदनीयः सन् कवीनामेव गोचरः वाक्यार्थ-

चमत्कारातिशाय इति ।

( शंका ) विशेषणत्व—नतो ( विशेषण के ) अवच्छेदक होने से प्रधानता रूप होता है और विधेयत्व—विवक्षितता रूप होने से प्रधानता रूप । इस प्रकार भावो और अभाव के समान परस्पर विरुद्ध होने से इनका एक जगह समावेश कैसे सम्भव है जिससे एक विषय में ( प्राधान्य के विषय में ) नियमितः समास का निषेध किया जाय और दूसरे के लिये ( अप्रधान के लिये ) विधान ।

उत्तर—यह दोष नहीं उठता । विरोध सदा दो ( वास्तविक ) वस्तुओं में रहता है । शीत और उष्ण आदि के समान । यहाँ दोनों ( अप्रधानन्य और प्राधानन्य ) का वस्तुत्व सिद्ध नहीं होता । कारण कि उनमें से एक हो वास्तविक है । दूसरा तो विवक्षामात्राधीन होने ( इचछा द्वारा कल्पित विषय है । अतः ) उलटा ( अवास्तविक ) है । वस्तु और अवस्तु का कभी विरोध नहीं होता । कोई भी सच्चे और कल्पित शेर का परस्पर विरोध नहीं मानता । जहाँ तक फलभेद का सम्बन्ध है वह तो दोनों में निर्विवाद ही है । एक का फल पदार्थ सम्बन्ध मात्र है, जो सारे संसार में दिखाई देता है और जिसका ज्ञान शाब्दिकों का ही प्रधान विषय है । जो दूसरा है वह है वाक्यार्थ चमत्कार-

तिशय । उसे कुछ ही सहृदय जान पाते हैं, अतः वह कवि गणों ( कवी प्रतिभा ) का हो विषय है ।

एकत्रेति विधेयानुवाद्यत्वैके । अन्यत्रेति सम्वन्धमात्रप्रतिपादने । उपकल्प्यतेतति

महाविभाषया व्यवस्थितविभाषात्वादिति भावः ।

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द्वितीयो विमर्शः

२३९

एकस्यैवेति विशेषणगतस्य प्राधान्यस्य अन्यस्य तद्रतस्यैवाप्राधान्यस्य । एकस्य हीति, अपरस्य पुनरिति च । अत्र फलभेद इत्यत्र प्रकान्तं फलं सम्बन्धनीयम् ।

अत्र चोद्यति—'विरोधस्योभयवस्तुनिष्ठत्वासिद्धेरत्वाभाव उक्तः । तदसत् । न हि सहानवस्थानलक्षणो वस्तुगत एक एव विरोधमेदो, यः शीतोष्णादौ लङ्घ्यत्निति । किन्तहि परस्परपरिहारस्थिततल्लक्षणो वस्तुववस्त्वाश्रयो द्वितीयोऽप्यस्ति विरोधप्रकारः । तदा

हि यदि वस्त्वाश्रयो न सम्भवति विरोधो वस्तुववस्त्वाश्रयस्तु कथं न स्यात् । अतश्च स्यांत् पूर्वपक्षवेलायां 'भावाभावयोर्विरोधे' इत्युक्तम् । नैष दोषः । वस्तुववस्त्वाश्रयस्य विरोधस्य तादात्म्यनिषेधे व्याघातात् । यदि नाम प्राधान्यं, तस्यामेव कच्यियां स्वयमग्राधान्यं न स्याद् अप्राधान्ये वा प्राधान्यम् । प्राधान्यविधेये पुनरपेक्षान्तरेगाम्राधान्यं कथं न स्यात् ? न स्याद्, यदि शीतोष्णवद् द्वयोरवस्तुत्वं स्यात् । न चात्रैतदस्ति वैवक्षिकस्यावस्तुत्वांत् । यथा राजपुरुष इत्यत्र राज्ञो वैकचिकमेव प्राधान्यं वास्तवं पुनरम्राधान्यमेव तद्धद्रात्रापि दृश्यम्यम् । तदयक्षत्र पिण्डार्थः संसर्गनिषेधोऽत्र कतव्यः । स च वस्तुद्र्रयनिष्ठ इति द्वयोरत्वभावांचैकनापरत्र प्रतिपेध इति ।

एकत्र—विधेयता और अनुबाद्यता दोनों से युक्त होने पर ।

अन्यत्र—सम्बन्धमात्र प्रतिपादन होने पर ।

उपकल्प्येत—महाभाष्यादि द्वारा वयवस्थित विभाषात्व के कारण ।

एकस्यैव—विशेषण गत प्राधान्यता का ।

अन्यस्य—उसी में स्थित अप्राधान्यता का ।

एकस्य—अपरस्य इनमें फल का सम्बन्ध समझना चाहिये । जिसे 'फलभेद:' इत्यादि द्वारा इसी प्रकरण में ऊपर कहा जा चुका है ।

अत्र क्रमेणोदाहरणानि तत्र कर्मधारये यथा—

'उत्तिप्रनुत्या रतास्ते भरसुरगपतौ पाणिनैकेन कृतवां धृत्वा चांशेन वासो विगलितकवरीभारमंसि वहन्त्या: । भूयस्तत्कालकान्तिद्रिगुणितसुरतप्रीतिना शौरिणा व: शय्यामालिङ्गच्य नीतं वपुरलसल सदृबाहु लक्ष्म्या: पुनातु ॥'

इत्यत्र विगलितकवरीभारत्वमलसल सदृबाहुत्वं चांशवपुषोर्विशेषणे रतेर्दीपनविभावतापादनेन वाक्यार्थेस्य कामपि कमनीयतामावहत इति प्राधान्येन विवक्षितत्वाद् न ताभ्यां सह समासो न कचिद् गमिते । यथा चांशेन तत्कालकान्तिद्रिगुणितसुरतप्रोतितत्वं हेतुभावगर्भं विशेषणं शौरेःचिता चरणलक्षणगततिशयमादधद् द्वयेयतया प्राधान्येन विवक्षितामिति न तेन सह समासो न गम्यते । न तेन सह समासे निमीलितस्स । पदमेकमननेन वा यद्विघेयार्थतां गतस् । न तत्समासमन्वयेन न चाप्यन्योन्यो न्यसमहति ॥ ११ ॥

तत्रैकमुदाहरणतमेव ।

इस विषय में क्रम से उदाहरण ( भोमिलते हैं । ) पहले कर्मधारय का जैसे—

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२३२

व्यक्तिविवेक:

'सुरत के बाद लक्ष्मी उठने लगीं । उन्होंने एक हाथ टेककर शेष भाग पर वजन डाला, और दूसरे हाथ से अपना वक्ष सम्हाला । उनके केशों कन्धे पर बिखरे हुये थे । उस समय लक्ष्मी की ऐेसी शोभा देख विष्णु की कामेच्छा दुगुनी हो गई और उन्होंने लक्ष्मी का आलस से झुके हाथों वाला शरीर पहले अपनी छाती से लगाया ( आलिङ्गन किया ) और फिर उसे पुनः विस्तृत पर लिटा लिया । लक्ष्मी का ऐसा शरीर आपको पवित्र करे ।'

यहाँ 'विगलितकवरांभारत' और 'अलसलसद्बाहुता' कन्धे और शरीर के विशेषण हैं । उनसे रति का उद्दीपन होता है । इसलिये वे वाक्यार्थ की शोभा बढ़ाते हैं, इसलिये वे प्रधान रूप से कवि को विवक्षित भी हैं, अतएव कवि ने उन्हें समास में डालकर अप्रधान नहीं बनाया ।

इसी प्रकार यहाँ—विष्णु का विशेषण है 'दृककालकान्तिद्रिगुणितसुरतप्रोतिता' । वह हेतु रूप है । उससे विष्णु द्वारा किये गये कार्य में (लक्ष्मी को पुनः लिटाने ) में औचित्य रूप अतिशय की प्रतीति होती है । इसलिये वह विधेय है और इसलिये प्रधान रूप से विवक्षित होने के कारण विष्णु ( रूप विशेष्य ) के साथ समास करके कवि ने उसे अप्रधान नहीं होने दिया ।

'एक या अनेक जो भी पद विधेयता को पहुँच चुका हो उसे दूसरे ( विशेष्य ) थे माझ समास नहीं करना चाहिये, और न परस्पर ( विशेषण के साथ ) । इनमें से एक पद का तो उदाहरण दे ही दिया गया ।

अन्येनेति विशेष्याभिधायिनेत्यर्थः । अन्योन्यमिति । परस्परविशेषणानां यद्यपि 'विशेषणं विशेष्येण' ( २-१-५७ ) इति विशेष्येणैव समास उक्तः, तथापि 'काणखजादिपु सिद्धं विशेषणविशेष्ययोःषष्ठीवादः' इति वचनेनैकस्य विशेष्यतद्विवक्षामाश्रित्य परस्परं विशेषणानां समासः समर्थितः । तदभिप्रायेणान्योन्यमिति सम्भावनां ।

अन्येन—विशेष्य वाचक पद के साथ । अन्योन्य—परस्पर विशेषणों का । यद्यपि 'विशेषणं विशेष्येण' इस सूत्र के द्वारा समास विशेष्य और विशेषणों में वतलाया गया है, तथ् भी 'कालखञ्जादिपु सिद्धं विशेषणविशेष्ययोर्येष्टवादः' द्वारा विशेषणों में किसी एक को विशेष्य मान लेने से विशेषणों में भी परस्पर समास वतलाया गया है । इसी अभिप्राय से 'अन्योन्य' यह कहा गया ।

अनेकं यथा— 'अवन्तिनाथोऽयमुदग्रभाहुरविनाशालवक्षास्तनुजू स्त्रीमध्यः । आरोप्य चक्रभ्रमुषणतेनास्वस्थौच यत्तोल्लिखिती विभाति ॥' इति ।

अनेक ( पदों ) के उदाहरण—यथा— लम्बी भुजा, चौड़ी छाती, और गोल तथा मोटी कमर का यह ( व्यक्त्ति ) अवन्तिनाथ ( है जो ) स्वतः ऋषि द्वारा चाक पर चढ़ाकर यत्नपूर्वक सुधारे गए सूँड़ सा लगता है ।

टिप्पणी : यहाँ सभी विशेषण अलग-अलग हैं ।

यथा च— 'विद्वान् दारसखः परं परिणतो नीवारसृष्टिपचः सत्यज्ञाननिदिर्धघत् प्रहरनं होमाज्युनोहेतुतः ।'

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द्वितीयो विमर्शः

२३३

रे दु:क्षत्रिय ! किं त्वया मम पिता शान्तं मया पुचान् नीत: कोऽन्यैर्वशोषतां तदिह ते दिग् दिग् सहतां भुजान् !!' इति । और जैसे—

रे दुष्ट क्षत्रिय ! तेरी हजार भुजाओं को धिक्कार है । तूने मेरे पिता को किस बात पर मारा । वे विद्वान् थे, तपस्वी थे, कामी न थे । जंगली धान से काम चलाते थे । सत्य और सच्चे ज्ञान को निधि थे । उन्होंने शस्त्र धारण किया था भविष्य के लिये । मुझ जैसा उनका पुत्र था ।

विमर्शः यहाँ पिता के सभी विशेषण स्वतन्त्र रूप से उपस्थित किये गये हैं ।

यथा वा—

'राज्ञो मानधनस्या कामुकभृतो दुयोंधनस्याग्रतः प्रत्यक्षं कुरुवान्धवस्य मिप्टतः कर्णस्य शाल्यस्य च । पौलं तस्य मयाद्य पाण्डववधूकेरामवराकर्षणः कोष्णां जीवत एव तीक्ष्णकरजक्षुण्णादसृग्वक्षसः !!' और ऐसे—

मान को ही धन मानने वाले, धनुष हाथ में लिये हुये, उस राजा दुर्योधन के आगे, कुरुओं में हितैषी कर्ण और शल्य की आँखों के सामने ( दुःशासन को ) ध्यान आज मैंने तीखे नाखूनों से फाड़कर, उस पाण्डवों की पत्नियों के बाल और वस्त्र खींचने वाले की छाती का खून उसके जीते जी पी लिया ।

विमर्शः दुर्योधन के सभी विशेषण स्वतन्त्र हैं ।

यथा च—

'हे हस् ! दक्षिण ! मृतस्य शिशोद्विज्जस्य जीवितश्च विषसृजो मूर्ध्ना रुपाणम् । रामस्य पाण्डवसि निर्भर्संगमेभिक्ष- सीताविवासनपटोः करुणा कुतस्ते !!'

और जैसे—

ओ मेरे हाथ, दाहिने हाथ ? ब्राह्मण के सुत पुत्र के प्राणों के लिये शूद्र मुनि पर कृपाण छोड़ । तू राम का दास है । परिगत गम्भ से खिन्न सीता को जंगल में छुड़वा देने वाले तुझे करुणा कहाँ ।

इसी प्रकार—ओ अग्निदेश के 'राजा, सेना के पति, राजा को प्यारे, द्रोण का उपहास करने वाले ( कर्ण ) वचा ले भीम से दुःशासन को'—इत्यादि में देखना चाहिये ।

दारसख इति दाराणां सखेति तत्सहुपः कर्तव्यः । बहुव्रीहौ 'राजाहससखिभ्य' ( ५-४-९१ ) इति टच् न स्यात् ।

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हे हन्तेति । 'मृतस्य शिशोर्द्विजस्ये' त्यत्र समासः शङ्कितः । 'रामस्य पाणिरसि' इति तु वष्टीमस्मद्‌उदाहरणम् ।

अत्र कचित् कर्तृणां कर्मणाद्‌अभिधान्तानां क्लापि सरस्वत्यभिधानं कर्मणाद्‌अभिधान्तानां कुत्राप्यसम्भवणाम् वष्यमाणयेनैति । 'व्यासः पाराशर्यः' इत्यादिविचारेषु । चापाचार्थ इति । अत्र हि त्रिपुरविजयिस्वाधियचुवादेन चापाचार्यस्वादिविधिः । अनूचानमानश्रावो विधेयत्वेनोत्कर्षंमाविध्यनुवादभावोऽपि वक्ष्यमाणतयेन विशेषेऽपि विनोेषणविशेष्यभावतद्गलितफल इति नत्रापि तद्धदेव समासाभावोऽङ्गन्तद्गयः ।

दारसख—दारागां सखेति तत्पुरुषः कर्त्तव्यः अर्थात् 'दारा का सखा' इस प्रकार तत्पुरुष यहाँ करना चाहिए । बहुत्रांहि करने पर ( 'दारा है सखा जिसका'—इस प्रकार )—'राजाद्‌भयमृत्यु' सूत्र द्वारा टच् प्रत्यय नहीं होगा । ( फलतः 'दारसख' इस प्रकार ह्रस्व आकारान्त रूप नहीं बनेगा ।)

हे हन्त—यहाँ 'मृतस्य शिशोर्द्विजस्य' में 'द्विगुशिशोः' इस प्रकार समास हो सकता था । 'रामस्य पाणिरसि' में भी 'रमपाणि:' समास हो सकता था ।

विध्यनुवादभावोऽपि वक्ष्यमाणतयेन विशोषणविशेष्यभावतद्गलितफल इति नत्रापि तद्धदेव समासाभावोऽङ्गन्तद्गयः । यथा—'चापाचार्यत्रिपुरविजयी कार्तिकेयो विजेयः शस्त्रव्यस्तः सदनखदुदरिभूरियं हन्तकारः । अस्त्येवैतत् किं तु कृतवता रेणुकाकण्ठुवाचां बद्धसपर्वैस्तव परशुना लज्जते चन्द्रहासः ।।' इति ।

विध्यनुवादभाव का फल भी वैसा ही होता है जैसे विशेषण-विशेष्यभाव का । जैसा कि के समान नहीं किया जाना चाहिए । जैसे—धनुविद्या के आचार्य हैं—त्रिपुरासुर के विजेता—शंकर, जिसे जीता है वह है कार्तिकेय, निवासस्थान है—वह समुद्र जिसे शाख से दूर हटा दिया है, यह पृथियों है हन्तकार ( अतिथि धारण करने योग्य अवतार )—यह सब कुछ है तो भी रेणुका का गला काटने वाले तुम्हारे परशु से होड़ लगाते हुए मेरा चन्द्रहास ( तलवार ) लज्जित होता है ।

चिमर्शः यहाँ 'त्रिपुरविजयिचापाचार्यकस्य'—'त्रिजितकार्तिकेयस्य' 'शस्त्रव्यस्तोन्द्‌द्विषदनस्थ'—भूद्दन्तकारस्य—तथा रेणुकाकण्ठुवाचां कृतवता परशुना बद्धसपर्वैःसोद् लज्जते'—इस प्रकार विशेषणों का समास किया जा सकता था परन्तु वैसा करने पर 'त्रिपुरारि' 'कार्तिकेय' और 'जघन्वि' अर्थात् संपूर्ण सुरसमुद्राय का सेनानी सेनानायक इत्यादि अभिप्राय बोहित होते हैं ।

उल्टे उदाहरण जैसे ( प्रत्युदाहरण )

प्रत्युदाहरणं यथा—'तं कृपास्नुतदृक्ष्य भार्गवं राघवः सकलितवोर्यमात्मनि । स्वख्य संहितमोघसायकं व्याजहार हरसूनुसखिभिः ।।' इति ।

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द्वितीयो विमर्शः

तत्राप्यमोघसाधुगमिति युक्तः पाठः ।

यथा वा—

'नस्तान्नित्यवादव्लङ्घवमानां पुनः पुनः केसरपुष्पकार्श्रीकम् । न्यासीकरां स्थानविदा स्मरेण द्वितीयमौर्वीमिव कामुक्षय ॥' इति ।

अत्र मावां 'द्वितीयामौर्वीमिति' युक्तः पाठः । ने चैवं वृत्तभङ्गाशङ्का कार्यो । तस्य श्राव्यतामात्रलक्षणत्वात् । तदपेक्षयैव वसन्ततिलकादाविव गुर्वन्ततानियमसस्य सङ्कर्णकैतवव्यपनाहतत्वात् । अत एव यमकानुप्रासयोरिव वृत्तस्यापि शब्दालङ्कारत्वमुपगतमस्माभिः ।

यथा च—

'कारणगुणाज्ञानेऽपि जो जানে तपसि चातिशयमाततौ । ठ्यासः पाराशर्यः स च रामो जामदग्न्य इह ॥' इति ।

कृपा से कोमल राघव ( राम ) ने उन परशुराम को अपने आप में शक्तिशून्य देखा और अपने अमोघ वाण को धनुष पर नत किया तो कौतुकेक्य के सम्बन्ध—वे बोले ( रघुवंश ११ सर्ग ) यहाँ भी अमोघवसायकम् की जगह अमोघम् आशुगमपाठ होना था । जैसे—

'कमर से बार बार खिसकती जा रही केसरपुष्पनिर्मित करधनी को बार बार सम्हालती जा रही थीं ( पावर्ती ) मानो वह कामदेव के धनुष की अतिरिक्त प्रत्यंचा थीं जिसे उसने उचित स्थान पर धरोहर के रूप में रख दिया था ।'

यहाँ मौर्वीम् द्वितीयाम् यह पाठ टांक है । इस प्रकार छन्द्रोभङ्ग की शंका नहीं करनी चाहिए ।

छन्द का लक्षण ( असाधारण धर्म ) है—श्राव्यता । उसी के आधार पर परिपक्व कान वाले श्रोताओं ने वसन्ततिलका आदि के अन्त में गुरु आने का नियम नहीं माना है । इसीलिए हमने यमक और अनुप्रास आदि के समान छन्द को भी शब्द का अलङ्कार माना है ।

और जैसे—

'कारण के गुण आजाने से दो व्यक्ति ज्ञान और तप में बहुत कुछ हो गए । एक तो वह पराशर का पुत्र व्यास और वह जमदग्नि का पुत्र परशुराम ।'

नचैवमिति उपेन्द्रवज्रस्थाने इन्द्रवज्रप्रयोगात् । उपगतसमाभिरिति । 'दुःश्रवत्वमपि वृत्तस्य शब्दालङ्कार्यमेव । तस्याश्र्यानुप्रासादेरिव'स्यादि वदक्षि: ।

न चैवम्—उपेन्द्रवज्रा के स्थान पर इन्द्रवज्रा के प्रयोग से ।

उपगतसमासभिः—'वृत्त का दुःश्रवत्व भी शब्दालङ्कार्य ही है । वह भी अनुप्रासादि के समान' इत्यादि आरम्भ में कहतें हुए ।

विमर्शः : सस्ताम् । यह उपजाति छन्द है । क्योंकि यहाँ प्रथम तथा तृतीय चरण में इन्द्रवज्रा का प्रयोग किया है और द्वितीय तथा चतुर्थ में उपेन्द्रवज्रा का । उपेन्द्रवज्रा में आरम्भिक स्वर ह्रस्व होता है । वह द्वितीय मौर्वीम् इस मूल पाठ में ही संभव है । मौर्वीं द्वितीयाम् पाठ करने पर 'मौ' का भी प्रथम स्वर दीर्घ हो जाता है । वह नित्यदीर्घ माना गया है । अतः चतुर्थ चरण भी इन्द्रवज्रा का ही हो जाता है । इस प्रकार १, ३ और ४ चरण इन्द्रवज्रा के हो जाते हैं, एक मात्र द्वितीय—उपेन्द्रवज्रा का एक चरण के भेद से कर्णमधुर उपजाति बनना संभव नहीं, अतः

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द्वितीयमौर्वीं की जगह 'सौवीं द्वितीयाम्' पाठ करने से छन्द्रोभंग होता है। यह टीकाकारों मान्यता है। इसके अतिरिक्त एक और कठिनाई आती है। इन्द्रवज्रा में अन्तिम स्वर गुरु होने का नियम है। 'स्मरेण द्वितीय' इस प्रकार जहाँ तृतीय तथा चतुर्थ चरणों का योग होता है वहाँ चतुर्थ चरण के आरंभ में आए 'द्वि' 'के' 'दृ' तथा 'व' इन दो व्यजनों के संयोग से उसके नकट पूर्व 'ण' का ह्रस्व अ गुरु हो जाता है। पर जब 'स्मरेण-मौर्वीं' ऐसा पाठ होता है तब 'ण' का 'अ' ह्रस्व हो रहा आता है कारण कि 'मौ' तो 'द्वि' के समान संयुक्त व्यजनों का समुदाय नहीं है। उसमें एक व्यज्जन है—'मू' और एक स्वर हैं 'औ'। इस प्रकार दो कारणों से वृत्तभंग की शंका की जाती है। ग्रन्थकार का जोर द्वितीय कारण पर दिखाई देता है, क्योंकि उन्होंने—'गुरुत्वेनता' का उल्लेख किया है। उत्तर में उनका कहना है कि वस्तुतः इतनी सी ( छन्दोगत - ) कमी से छन्द्रोभंग नहीं माना जाना चाहिए। उसे छन्द का उद्देश्य भंग नहीं होता। छन्द का उद्देश्य है—श्रव्यता अर्थात् श्रोतिसुखदता—कानों को प्रिय लगना। वह यदि इन्द्रवज्रा के अन्त में गुरु न हो और उपजाति में किसी एक ही छन्द के तीन चरण हो जायें तब भी बिगड़ता नहीं है। इसे वे लोग मानते भी हैं जिनके कान छन्द सुनने में अभ्यस्त और कुशल हो चुके हैं। उन्होंने इसीलिए छन्दःशास्त्र के नियमों में कुछ संशोधन भी किया है। 'वृत्ततातिलका' कर्त्ताओं में अन्तिम स्वर दीर्घ चाहिए। सहृदय लोग ह्रस्व होते पर भी उसे सदोष नहीं मानते। वस्तुतः छन्द या वृत्त भी शब्द का एक अलंकार है। वह भी अनुप्रास और यमक आदि के समान ही शब्द में चातुर्य का आधान करता है। यदि कुछ हैरफेर में भी शब्द का चारुत्व छन्द द्वारा संभृत हो रहा हो तो उसे सदोष नहीं मानना ही समझदारी है।

ननु यदा विशेषणविशेष्ययोविंध्यानुवादभाचो नाभिमतस्तदा स्वरूपमात्रविवक्षायां नीलोत्पलादिवदत्रापि समासः प्रसज्यते, न चेष्यत इत्यन्न हेतुर्वाच्यः।

उच्यते। पाराशर्यत्वाद्यसाधारणविशेषणसामस्त्यावसिता वयासादय इति तेषां पर्यायरूपत्वात् प्रयोग एवं तद्वदनुपपत्तेः पुनः समास इति पर्यायस्वमात्रं तदभावे हेतुर्नान्यः।

तद्यथा—

'शशाङ्कशेखरः शाम्भुः पद्मजन्मा पितामहः' इत्यादाववगतत्वम्।

( शंका )—जब विशेषण और विशेष्य में विध्यानुवाद भाव अभीष्ट न हो, केवल स्वरूप मात्र कहना अभीष्ट हो तब तो नीलोत्पल आदि के समान यहाँ भी समास हो सकता है, पर नहीं नाते, इसमें कारण क्या है ? ( उत्तर देते हैं ) पाराशर्यादि विशेषण व्यासादि के असाधारण विशेषण हैं, उन्हीं विशेषणों के आधार पर वे ( व्यास आदि ) सर्वविदित हैं। इस प्रकार 'पाराशर्य' आदि शब्द व्यास आदि के पर्याय सिद्ध होते हैं, अतः उनका तो व्यासादि के साक्ष प्रयोग ही नहीं होना चाहिए। समास की तो बात ही अलग है। इस प्रकार समास के अभाव में पर्यायत्व मान हेतु है अन्य कोई वस्तु नहीं। जैसे शशाङ्कशेखर शिव और कमलयोनि ब्रह्मा। इसी प्रकार 'तक्षक सर्प', आदि समझना चाहिए।

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द्वितीयो विमर्शः

विमर्शः : पहले यह कहा गया है कि उन विशेषणों का विशेष्य के साथ समास नहीं करना चाहिए जो विधेय होते हैं । परन्तु यदि विशेषण विधेय न होकर केवल ( विशेष्य के ) स्वरूप-मात्र के परिचय की दृष्टि से कहा गया हो तो उसका समास विशेष्य के साथ किया जाय या नहीं यह प्रश्न है । ग्रन्थकार का कहना है कि ऐसा विशेषण कहा ही नहीं जाना चाहिए जो विशेष्यगत-विशेषता के ज्ञान में आवश्यक न हो—विशेष्य का परिचय मात्र कराने हो उसे अभीष्ट हो । ऐसा विशेषण प्रत्युत पुनरुक्तिजनक होता है । ‘कारणगुणानुद्रुत्य’ में ‘पाराशर्य’ यह विशेषण-विशेष्य के समान ही अर्थ के ज्ञान की शक्ति रखता है—कारण कि पराशर के पुत्र रूप में केवल अर्थ व्यास रूप में है । अतः यदि ‘पाराशर्य व्यास’ कहा जाय तो दोनों में से परम काष्ठा तक पहुँचे हुए तप—उनके पुत्र होने से व्यास महाज्ञानी हुए । इस प्रकार विशेषण साभिप्राय सिद्ध होता है । और साभिप्रायता में ही विशेषण की सार्थकता है । नहीं तो वह च, हि, तु, स्वलु, किल आदि के समान निरर्थक ही है ।

लोहितस्तकक्ष इति समासोऽत्रापि नेष्यते । लौहित्यस्य विधायकत्वात्तस्यैव प्रविभक्तितः । स्वरूपमात्रस्योक्तौ तु लोहित्याव्यभिचारतः । उद्णोदश्रितिवत् पक्षौ न चास्त्यनयस्तदत्सये ॥ १३ ॥

इत्थन्तरमश्लोकौ । 'लोहित ( लाल ) तक्ष ( तकक ) —यहाँ भी समास मान्य नहीं है । क्योंकि यहाँ लौहित्य ( लालगुण ) का विधान है, फलतः उपसर्जक्त न्याय से वह ( समास ) हो ही नहीं सकता ॥ १२ ॥ यदि स्वरूपमात्र का कथन अभीष्ट हो तो 'उष्ण अभि' इत्यादि के समान उसका ( लौहित्य विशेषण का ) प्रयोग ही नहीं होना चाहिए, कारणकि लौहित्य विशेषण विशेष्य ( तक्क्षक ) से कभी अलग नहीं होता और इन दो पक्षों को छोड़कर कोई तीसरा तो ( विशेषण विशेष्य के प्रयोग का ) पथ हो ही नहीं है ।

अत्र 'यथा च कारकगुणे' त्यादिग्रन्थः । अन्ररश्लोकपर्यन्तः 'प्रत्युदाहरणं यथा तं कृपामदुरि'स्यतः पूर्वं पठितः समक्षस्यं भजते, प्रत्युदाहरणं चेति उदाहरणग्रन्थः समज्झस एव स्यात् । दर्शयते च पुस्तकेऽपि च पाठ । तस्मादत्र जागरणीयम् ।

विमर्शः : ग्रन्थांशों के परिवर्तित पाठ की जो चर्चा यहाँ की गई है—उसमें असामञ्जस्य का कोई हेतु उपस्थित नहीं किया गया है । ऐसा लगता है कि—'सभी उदाहरण एक साथ रखे जायँ और प्रत्युदाहरण उनके बाद'—व० व्याख्याकार को यह क्रम अच्छा लगता है । ग्रन्थकार ने कर्मधारय के इस प्रसङ्ग में समास न करने के ९ उदाहरण दिये हैं और एक प्रत्युदाहरण । प्रत्युदाहरण को ७ किया जाता है । कुछ पुस्तकों में ऐसा पाठ मिलता भी है । इसलिये इस प्रसङ्ग में जागरूकहोना चाहिये ।

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व्य० व्य० की इस बात पर अधिक बल नहीं दिया जा सकता, कारण कि उन्होंने स्वयं मूल का संशोधन नहीं किया जब कि वे पाठान्तर में वँसा पाठ पा चुके थे, इसका कारण सम्भवतः ग्रन्थकार के प्रति व्य० व्य० कार की घृणा हो। जो कभी-कभी उनमें दोष निकालने से स्पष्ट है। वस्तुतः अन्य ग्रन्थकारों के समान व्यक्तिविवेककार अपनी प्रज्ञा को रोकना नहीं जानते। प्रस्तुतदाहरण के बाद पुनः दो उद्ताहारण सूझ आये होंगे और उन्होंने उन्हें भी जोड़ दिया होगा। अथवा और कोई कारण सोचा जा सकता है।

कारणमत्र पराशारो जमदग्निश्च । तद्भावे हेतुरिति तच्छब्देन समासः परामृश्यः । ततश्रात्र पाराशर्यादिपदं व्यासादाखु- स्वरूपंसमपर्यतं पुनरुक्तम् ।

विमर्शः तद्भावे ततश्रात्र—इस व्याख्यांश में पुनरुक्तं के पहले ‘न’ और चाहिये । तक्षकसर्पं हिति तक्षकशब्दादेव सर्पंपदसुक्त्रप्समपर्यंप्रवृत्तमेवेति तद्रथस्य विधे- यरस्र ।

लोहितस्तक्षक इति यथा तक्षकशब्दादेव सर्पंजातिः प्रतीता तद्वज्ज्ञोहितलक्षणो गुणोऽपि तत् एवाद्यभिवारात् प्रतीतः । ततस्तौ जातिगुणौ विधेयताभिमिप्रायेणौ न समासे न्यग्भावनीयौ । उक्तन्यायादिति विधेयत्वात्न समासः प्रवर्त्तत इत्यर्थः ।

पक्षो न चास्ल्यनस्तद्रथये इति । इन्हह द्वौ पन्थावुल्लिखितौ तक्षकस्य स्वरूपमात्रप्रति- पादनं वा लोहितसाध्यगुणविधिरिवां । उभयत्रापि कृता चर्चा । तद्रथये च कधितपञ्चद्रयाती- क्रमे चान्यस्तृतीयपचो नास्तीतार्थः ।

तक्षकसर्पं—यहाँ केवल तक्षक से ही सर्पं शब्द ( अपने अर्थ में ) उत्कर्ष ज्ञान करा सकता है, अतः उसका अर्थ विधेय हो सकता है । लोहितस्तदथक—जिस प्रकार तक्षक शब्द से सर्पंजाति का ज्ञान हो जाता है वैसे ही 'लोहित' रूप गुण का भी उसी से ज्ञान हो जाता है कारण कि वह ( लोहित गुण ) उस ( तक्षक ) से अब दूर नहीं होता। इतने पर भी अलग अलग रख कर अपने वाचक शब्द्रों द्वारा उनका प्रयोग होने से वे दोनों 'जाति' और 'गुण' विधेय रूप से उपस्थित किए गये हैं, अतः समास में उन्हें दबाना नहीं चाहिये ।

उक्तन्यायात्—विधेय होने से समास नहीं लगता । पक्षो न चास्ल्यनः—इस प्रसंग में दो पक्षों का उल्लेख किया है या तो तक्षक का स्वरूपमात्र प्रतिपादन या लोहित का विधान । दोनों पर विवेचन कर दिया गया ।

तदस्ययेच—इन दोनों पक्षों के अभाव में अन्य अर्थात् तृतीय पक्ष नहीं है । एवमियता—इस प्रकार यहाँ तक के विवेचन से कर्मंधारय ऋका विचार कर वहुत्रीहि के नि रुपण में कहा—

बहुत्रीहो यथा— येन स्थलीकृतो विन्ध्यो येनाचान्तः पयोनिधिः । वातापिस्तापितो येन स मुनिः श्रेयसेsस्तु वः ॥’ इति ।

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द्वितीयो विमर्शः

अत्र विन्ध्यादिविषयतया स्थलीकरणादि यद्विशेषणतयोपास्यं तत्तत्कर्मंकृत्स्नंरेतिदुष्टकारितया कथमपि प्रभावप्रकर्षमवद्योतयति विन्ध्यस्य प्रतिदिनं स्खलद्याच्छादितार्कप्रकाशस्य जगदानन्दव्यवायितया, पयोनिधेरगाधत्वादपात्वाच्च, वातापे: स्वमायापरिग्रहग्रस्तसमस्तलोकत्वात्। तलस्तत् प्रधानैरेव विवक्षितामात् न तैः समासे निजोक्तं कृतम्।

बहुव्रीहि में जैसे—

जिसने विन्ध्य को मैदान जैसा बना दिया और जिसने समुद्र को आन्दमान कर लिया, ( साथ ही ) जिसने वातापी को ( जठराग्नि में ) पचा लिया वह मुनि आपके और हमारे लिये कल्याणकर हो।

यहाँ विन्ध्य आदि में 'स्थल बना देने' आदि को जो विशेषण रूप से कहा गया उससे उस काम को करने वाले मुनि का आतिशय्य दुष्कर कार्य करने का शौर्य व्यक्त होता है और उससे प्रकृष्ट अलौकिक प्रभाव। क्योंकि विन्ध्य रोज रोज ऊँचा होता जाता था। उसने सूर्य प्रकाश दिखा दिया था अतः संसार को अन्यकारमय बना दिया था। समुद्र की खोरे शाख नहीं और न पार। वातापी ने अपनी माया से समूूर्ण विन्ध्य को घ मस लिया था। इसलिए वे विशेषण प्रधान रूप से कहे गये हैं और इसीलिये उनके साथ समास न करके उन्हें निर्जीव नहीं होने दिया।

पत्वमियता कर्मधारयमविचार्य वहुव्रीहिनिरूपणायाह वहुव्रीहौ यथेति। तत्स्तदिति स्थलीकरणादि यद् विशेषणतयोपास्यं तत् परामृश्यते। तैर्विन्ध्यादिभिः।

तत्तस्तत् ( १९३ ) से—स्थलीकरण आदि जो विशेषण दिये गये उन्हें कहा। तैः का अर्थ है विन्ध्यादि द्वारा।

प्रत्युदाहरणं यथा—

'य: स्थलीकृतविन्ध्यादिराचान्तापारवारिधि: । यक्ष तापितवातापि: स मुनि: श्रेयसेsस्तु वः ॥' इति ।

केचित् पुनः अनयोरेवाहरणप्रत्युदाहरणयोरर्थेस्योत्कर्षापकर्षप्रतीतिभेदो न कश्चिदुपलक्ष्यते इति मन्यन्ते । त इदं प्रष्टव्याः। किं सर्वेष्वेव समासेष्वियं तत्प्रतीति: उत्त बहुव्रीहावेवायं शाप इति। तत्र यदि सर्वेष्वेवेत्युमगमस्तर्हि सद्धदया: पृच्छयन्तां वयं तावन्महदन्तरमेतयो: प्रतीत्यो: पश्यामः।

अथ बहुव्रीहावेवेत्युच्यते, तदयुक्तम्। न हि प्रतीतिभेदहेतौ प्रतीति-सामर्थ्ये सति अकस्मात् तदसम्भवो भणितुं न्याय्यः। एवं हि क्षित्यादिसमग्र्यामविकलायामडुरादिकायोत्पादाभावाभ्युपगमेऽपि प्रसज्येत इति सर्वत्रै—

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चायं प्रतीतिमेदोडभ्युपगन्तव्य: । नैव वा कुत्रचित् । न पुनरिदमर्थंजरतीयं लभ्यते ।

प्रत्युदाहरण जैसे—

'जो स्थलीकृतविन्द्यादि है, जो आचान्तापारवाररिथि है, जो तापितवान्तापि—है—वह मुनि आपके लिये श्रेयोजनक हों ।'

कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि यहाँ उदाहरण और प्रत्युदाहरण में कोई उत्कर्षापकर्ष नहीं भासता, उनसे यह पूछना चाहिए कि वह जो उत्कर्षापकर्ष का ज्ञान नहीं होता वह सभी समासों में नहीं होता या केवल बहुत्वर्थिही के लिए ही यह अभिशाप है । यदि सभी समासों में मानते हों तो इसके साक्षी सहृदय हैं उनसे पूछना चाहिए । हम तो इन ज्ञानों में बहुत बड़ा अन्तर देखते हैं ।

और यदि केवल बहुत्वर्थिही में ( यह माना जा रहा हो ) तो ठीक नहीं । जब कर्मधारय आदि समास के ज्ञानों में समास ज्ञान और समासाभाव ज्ञान में भेद दिखलाने की शक्ति है तो निष्कारण उसे संभव न मानना युक्ति संगत नहीं । क्योंकि ऐसे तो भूमि आदि कारण समुद्राय के रहते हुए भी अद्धूरादि कार्य की उत्पत्ति का अभाव माना जाना भी संभव हो सकता है ।

इसलिए यह प्रतीतिमेद ( समास और समासाभाव में ) या ज्ञानगत भिन्नता माननी ही चाहिए । नहीं माननी हो तो कहीं भी नहीं माननी चाहिए । इस अर्थंजरतीय रीति से कोई लाभ नहीं ।

प्रतीतिमेदहेतौ समासासमासयोगे । प्रतीतिसामर्थ्यें कर्मधारयादिविलये । तद्सम्भव: प्रतीतिमेदासम्भव: । अन्यथास्वस्थाप्राप्तकारणेऽपि सुक्कैव कार्थोंऽपचीयत इत्यर्थ: ।

एतदभ्युपगमे दृष्टविरोधमहाम । एतद् हीति । नैव वेलिं न्यायविरोषात् । अर्थंजरतीयमिति अर्थों 'समासाच्च तद्विशयात' (५-२-१०६) इति छप्रत्यय: । यथां जरत्या वराड़्ं कामयते मुखं न कामयते तद्रदेवेत्यर्थ: ।

प्रतीतिमेदो—समास होने और समास होने पर ।

प्रतीतिसामर्थ्यें—कर्मधारिय आदि जिसका विशेष है उन शास्त्रों में ।

तद्सम्भव:—प्रतीतिमेद का अभाव । जब कारण अन्तिम अवस्था तक पहुँच जाते हैं तब कार्य की उत्पत्ति मानना ठीक ही है ।

एतदभ्युप०—ऐसा मानने पर दृष्ट अनुभूत वस्तु का विरोध दिखलाते हैं एवं हि इस प्रकार ।

'नैव वा—किसी भी समास में०' इत्यादि न्याय के आधार पर । ( जिस किसी उपाय से एक समास में प्रतीतिमेद नहीं माना उससे अन्य सभी समासों में प्रतीतिमेद नहीं मानना चाहिए ।

अर्थंजरती—'जरती का आधा' इस विग्रह के अनुसार 'अर्थंजरती'—ऐसा समास होने पर 'समासाच्च तद्विशयात्' इस सूत्र से छ प्रत्यय हुआ ( तब अर्थंजरतीय शब्द बना ) । जराजर्णा, वृद्ध ऋषि का वराङ्ग ( योनि ) तो कामना करता है, पर चेहरा नहीं वैसे ही ।

विमर्श:—यहाँ अर्थंजरतीय न्याय का स्वरूप 'यथां ऋषी न तनुपी श्रथस्तननतत्पात्र कर्णकेशाल्वात्र जरती वक्त्रं शङ्कयते तद्वत' यह होना चाहिए ।

न्या० महाभाष्य में ५।१।११९८ सूत्र पर 'अर्थ जरत्या: कामयतेऽड्रे न' ऐसा अर्थंजरतीय न्याय दिया है । व्याख्यानकार ने कदाचित् यहीं मान लिया है । अर्थंजरतीय न्याय को 'अर्धवै शसन न्याय' भी कहा जाता है ।

[ द्र० लौकिकनैयायिक: निर्णयसागर भाग—१ ]

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द्वितीयो विमर्शः

२४१

इदं वा प्रतीतिवैचित्र्यं स्पष्टतरमवधारयतु मतिमान्, यत्र विध्यनुवाद-भावाभिधित्सयैव पदार्थानामुपनिबन्धस्तत्रापि हि प्रधानतरभावविवक्षानिबन्धनौ समासस्य भावाभावाच्चुपगताच्चेव। यथा—

"सूर्याचन्द्रमसौ यस्य मातामहपितामहौ। स्वयं तौ तु: प्रतिद्वन्द्विभावेन तत्र न तु वा न वा: ॥" इति।

अथवा बुद्धिमान् जी आप यहाँ भी प्रतीतिमेद मानिए ( कहाँ—उत्तर ) जहाँ पदार्थों का कथन विध्यनुवादभाव की विवक्षा से होता है। वहाँ भी तो प्राधान्य-अप्राधान्य की विवक्षा के आधार पर समास का होना न होना स्वीकार किया गया है। ( उदाहरण ) जैसे—

'जिसके मातामह ( नाना ) और पितामह ( आजा ) सूर्य तथा चन्द्र हैं, जो दो के द्वारा स्वयं वरन किया गया पति है—द्यवंशी द्वारा और पृथिवी द्वारा ।'

अत्र हि त्रैलोक्यैकालड्ढारभूतौ चराचरस्य जगतो जीवितायमानौ भगवान्तौ सूर्याचन्द्रमसौ प्रसिद्धावनूद्य यन्मातामहपितामहभाया चिह्नितसतातोऽस्य पूररवस्तौ लोकोत्तराभिजननितं महिमानं कामान्प्रकाष्ठामधिरोपयत: यतो विशेषणविशेष्यभावाभिधितेनैव न्यायेनात्राप्यनूद्यमानगतोदितयौ विधीयमानाकारसड्क्रमणे तत्त्समबन्धिन: पर्यवस्यति। तयोर्हि स्वरूपमात्रं मित्नं फलं पुनः परम्पर्येण वाक्यार्थो-तर्कश्लक्षणमविलक्षणमिति प्राधान्येन विवक्षितत्वात् न तौ ताभ्यां सह समासे म्लानिमानितं।

यहाँ तीनों लोकों के आभूषण और चराचरात्मक विश्व के प्राणरूप प्रसिद्ध भगवान् सूर्य और चन्द्र को शब्दतः कहकर ( उनका ) जो मातामहतव और पितामहतव बतलाया गया ( विहित किया गया ) उससे वे इस पुरुरवा के महर्ष को जो सर्वोत्कृष्ट कुल के सम्बन्ध से उत्पन्न हुआ है, अनूगत परमपाठा को पहुँचा देते हैं। क्योंकि जो न्याय विशेषणविशेष्यभाव के लिए ( समास या असमास का ) बनाया गया है उससे इस पद्य में भी अनुष्ठान ( सूर्य—चन्द्र आदि ) में अवस्थित अतिशय ( महर्ष ) उसके अपने विधीयमान ( मातामह—पितामह ) रूप में पहुँचता है और फिर वहाँ से उसके सम्बन्धी ( पुरुरवा ) में। उन दोनों का स्वरूप भर भिन्न है, जहाँ तक फल का सम्बन्ध है वह है—परंपरा से वाक्यार्थ का उत्कर्ष, वह दोनों में समान है। अतः प्रधान रूप से विवक्षित होने के कारण उनके साथ ( विशेष्यों के साथ ) समास में म्लान नहीं किए गए।

तत्तस्य इति तदिति तस्मात्। तौ सूर्याचन्द्रमसौ। तयोर्हि अनुवाद्यौस्सूर्याचन्द्रमसौ। परम्पर्येणैति विधीयमातामहपितामहस्वद्वारेण। अत एव सूर्याचन्द्रमसाविति द्वन्द्व-निर्देशो द्वयोः स्पष्टितां प्रकटायिति। उवर्यया न तु वा इति समासाभावो वरस्य मुख्यासूक्त्यत्वप्रदर्शनार्थम् एकस्य वास्ताविकत्वादपरस्य कविक्रोधोक्तिनिष्पादितत्वात्।

तत्तस्य—तत् अर्थात् तस्मात्। तौ—सूर्य—चन्द्र । तयो:—अनुवाद्य सूर्य और चन्द्र का ।

१६ दय० वि०

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पारस्पर्येण—विधेयभूत माता-पिता के महत्त्व के द्वारा। अत एतत् ‘सूर्याचन्द्रमसौ’ से, यह द्वन्द्व का निर्देश दोनों के सप्रतिभाव को व्यक्त करता है।

उभयश्या च भुवा—इस प्रकार समास का अभाव-वरण की मुख्यता और अमुख्यता के प्रतिपादन के लिए है। कारण कि उनमें से एक ( उभयश्री द्वारा किया गया ) वरण वास्तविक है और दूसरा ( भू द्वारा किया गया ) कविप्रौढोक्तिमात्र से संपादित है।

विमर्शः : १. अन्य समासों के समान बहुव्रीहि में विशेषण का समास विशेषण की विधेयता को नष्ट नहीं होने देता। कारण कि बहुव्रीहि में अन्य पुरुष की प्रधानता रहती है।

स्थलीकृतविन्‌ध्याद्रि में स्थलीकरणविशिष्ट विन्‌ध्याद्रि स्वनिष्ठ-स्थलीकृतिजनकत्व संबंध से—मुनी में विशेषण है। मुनि स्वांतर्गत रूप से पठित है। विशेषण अलग है और विशेष्य अलग। फलतः विशेषण की प्रधानता आहूत नहीं होती। परन्तु

स्थलीकृतविन्‌ध्याद्रि में स्थलीकरणविशिष्ट विन्‌ध्याद्रि स्वनिष्ठ-स्थलीकृतिक्रियाजनकत्व संबंध से ( अर्थात् विन्‌ध्याद्रि में दिखाईए स्थलीकरण-क्रिया का जनक होने से ) मुनि पदार्थ में विशेषण है। मुनि अलग पठित है। विशेषण अलग है विशेष्य अलग। अतः कहा जा सकता है कि विशेषण की प्रधानता नहीं होती।

परन्तु वस्तुतः—विन्‌ध्याद्रिकर्मक स्थलीकरणक्रिया मुनि में विशेषण है। इसलिए उसी स्थलीकरण को प्रधानता इस वाक्य से प्रतीत होती है। विन्‌ध्य की नहीं।

वस्तुतः यहाँ मुनि में महत्त्व स्थलीकरण द्वारा नहीं दिखाया जा रहा, प्रत्युत, स्थलीकरण में कर्म रूप से विन्‌ध्य के संबंध से दिखलाया जा रहा है, विन्‌ध्य से मुनि में महत्त्व तब आ सकता है जब स्वयं विन्‌ध्य का महत्त्व सामने आए। वह तब भी आ सकता है जब विन्‌ध्य को स्थलीकरण से अलग रखा जाय। ऐसा इस स्थलीकृत विन्‌ध्याद्रि में नहीं होता। वह होता है है ‘येन स्थलीकृतो विन्‌ध्यः’ में ही। फलतः—यह कहना ठीक नहीं कि बहुव्रीहि में समासगत विशेषण प्रधान रहता है।

हमारी दृष्टि में जहां दो या एकाधिक वस्तु मिलकर अन्य पदार्थ में विशेषण बन रही हों—वहाँ यदि दोनों या एक का प्राधान्य बतलाना हो तो समास नहीं किया जाना चाहिए, पर यदि केवल उत्तर पदार्थ का प्राधान्य दिखलाना हो वहुब्रीहि समास करना दोष नहीं है। इतना अवश्य है कि वहाँ उस उत्तर पदार्थ की विधेयता विगृहीत वाक्य के समान पुष्ट न होगो, अतः अपुष्ट दोष आएगा ही।

यह अपुष्टि भी अन्य समासों की अपेक्षा कम होगी। अतः प्रतीतिभेद तो बहुव्रीहि और अन्य समासों में रहेगा ही। उसे सर्वथा अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।

ग्रन्थकारका मत यह है कि दोष तृण भर भी न रहे तो अच्छा। फिर बहुव्रीहि के एक देश में अपुष्ट प्राधान्यता को लेकर विशेषणगत विधेयता लिए सभी समासों को मान्य ठहराना युक्तिसंगत नहीं।

जब बहुव्रीहि में पूर्वपदार्थगत विधेयता की प्रतीति समास द्वारा नहीं हो पाती तब अन्य समासों में उसे कैसे माना जा सकता है। एक अंश में मानना और दूसरे अंश में नहीं—यह सिद्धान्त सिद्धि का प्रकार नहीं।

२. यन्मातामह—पितामहभवो विहितरसततोऽस्य—में आए ततोडस्य के स्थान पर व्य० व्याः कर्तृ तत्स्य पाठ मानते हैं। वस्तुतः ततोडस्य ही अधिक अच्छा है। परन्तु और किसी प्रति में भी है या नहीं—यह देखने की आवश्यकता है यह पाठ संभवतः किसी आधुनिक ने बदला हो।

३. तयोः का अर्थ अनूद्यमान—दोनों टीकाकारों ने किया है। सन्मुच्‍च यदि यहीं अर्थ हो तो 'तयोः स्वरूपमात्रं मिन्र्रम्' कहनाना व्यर्थ है। उसे हटा देने से कोर्इ हानि नहीं होती।

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द्वितीयो विमर्शः

२४३

इह च—

"जनको जनको यस्या या तातस्योचिता वधूः । आर्यस्य गृहिणी या च स्तुतिस्ततस्यास्त्रपदं" ॥ इति ।

अथवा यहाँ ( प्रतीतिमेद मानिये । )

'जनक जिसको जनक हैं, जो पिता जी की मान्य पुत्रवधू हैं वे ही मिथिला रामचन्द्र जी की जो धर्मपत्नी हैं, उनकी स्तुति करना लज्जा की बात है ।'

विमर्शः यहाँ 'जनकजनका जानकी' इस प्रकार समास कर देने पर जनक ( विदेह ) का महत्त्व सामने नहीं आता । वह समास न करने पर ही प्रतীত होता है । इसी प्रकार तात और आर्य का । फलतः बहुव्रीहौ में भी विशेषण का प्राधान्य के लिये समास न करना ही ठीक है ।

इह चैति प्रतीतिवैचित्र्यं स्पष्टतरमवधारयतु मतिमानिनित पाश्र्वात्यं समवनन्धनीयम् । जनक इति । अत्र जनकाद्यराजर्षिप्रभृतयः: पितृत्वाद्देश्टकवर्गसंपन्नि ।

एवं बहुविधिं विचार्य द्रिङ् व्याचष्टे द्रिगौ यथेति ।

द्रिगौ यथेति ।

"उपपन्नं ननु शिवं सततस्ववृत्तेषु यस्स मे । दैवीनां मानुषीणां च प्रतिकार्ता त्वमपादाम्"" इति ।

अत्र हि संख्याया: संख्येयेष्ववृत्तेषु निरवशेषताप्रतिपत्तिफल मतिशय-

मादधानाया: प्राधान्येन विवक्षा । तत एव हि तेषु द्विविधापत्रप्रतीकारेण

राज्ञ: शिवोपपत्तिं परिपुष्यतीति तस्यास्तैः सह समासो न विहितः ।

( राष्ट्र ) के सातों अङ्गों में कुशलता है, सो ठीक ही है, आप जो मेरी दैवी और मानुषी

आपत्तियों के निवारक हैं ।

यहाँ संख्या की प्रतीति प्रधानता लिये हैं । उसमें एक विशेषण है जिससे सभी अङ्गों में कुशलता

की प्रतीति होती है और उससे ( विवक्षा से ) दो प्रकार की आपत्ति के प्रतीकार द्वारा राजा की कुशलता में युक्तता सिद्ध होती है । इसीलिये उसका ( संख्या ) उन ( अङ्गों ) के साथ समास नहीं किया ।

विमर्शः यहाँ ऐसा लगता है कि ग्रन्थकार को उक्त श्लोक का अन्वय—'यस्य मे शिवम् उपपन्नम्', ऐसा मान्य है । मधिनाथ ने—'शिवम् उपपन्नम्, यस्य मे—आपदां प्रतिहर्त्तां त्वम्'

ऐसा अन्वय माना है ।

यथा च—

"निग्रहात् स्वसुरापत्तानां वधाच्च धनदनुजः । रमेण निहितं मेने पदं दशशुचि मूर्ध्नि ॥" इति ।

प्रत्युदाहरणमेतदेवोदाहरणं कृतसमासवैशसं दृष्ट्यम् ।

और जैसे—

बहिन के निग्रह से और अपने पूज्यों के वध से रावण ने अपने दसो सिरों पर राम का पैर

रखा माना ।

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यहाँ भी दशशु अलग ही है। वह भी ऊपर के श्लोक के अनुसार निरवशेष प्रतीति करती है। प्रत्युदाहरण के लिये उन्हें उदाहरणों में समास द्वारा—संख्या को संख्यावान् से जोड़ा जा सकता है।

निरवशेष इति सप्तवसङ्ग्रहण्यां विधेयत्वेन संरंभास्पदत्वं समासे तु न्यग्भावात् । दशस्विति दशशवसङ्ख्याया विधेयत्वं रावणस्य परिभवातिशयैः प्रकाशयति । एकस्मिन्नपि मूर्ध्नि पदन्यासः परिभवास्पदं किं पुनर्दशस्विति । प्रत्युदाहरणं ससाङ्ग्र्यामिह यस्स इतीत्यादिपाठे । वैशासं बाधः ।

एवं द्विगुं व्यास्याय नवसमासेंति । निरवशेष—सप्तत्व संख्या का विधेय रूप से प्रयोग करना। समास में वह द्वय जाती । दशशव—दशशव संख्या में दिखाई विधेयता रावण के अत्यन्त पराभव को प्रकाशित करती है। एक सिर पर भी पैर का रखा जाना परिभव की बात है, दस पर पैर रखना तो दूर की बात है। प्रत्युदाहरण—‘ससाङ्ग्र्याम्’ ( इह यस्स सः )—इत्यादि पाठ करने पर । वैशासं—बाध ।

इस प्रकार द्विगु की व्याख्या कर अब नञ्समास की व्याख्या करते हैं ।

नञ्समासोदाहरणं यथा—“नव जलधरः सन निशाचरः । इत्येवमादि पूर्वमेवोपदर्शितमुपपादितं च । प्रत्युदाहरणं यथा— “वाच्यवैचिच्यरचनाचारु वाचस्पतेरपि । दुर्वचं वचनं तेन बहु तत्राण्यनुक्तवान् ।” इति ।

नञ्समास का उदाहरण जैसे— ‘नवजलधरः सन निशाचरः’—इत्यादि । पहले ही दिखलाया जा चुका है और उसका उपपादन भी किया जा चुका है । प्रत्युदाहरण जैसे— ‘वाच्यगत विचित्रता और रचना से सुन्दर कथन वाचस्पति के लिए भी कठिन है। इससे उस जगह भी बहुत नहीं कहा ।’

उपदर्शितमिति असंरकथानितयत्र विधेयाविमर्शविचारे अनुक्तवानिति नोक्तवानिति व्याख्यम् ।

तत्पुरुषे कर्त्रादीनां षष्ठीनां कारकाणां सम्बन्धषष्ठस्य च ऋमेणोदाहरणान्याह देहेऽत्यादिना । सोऽयमिति अत्र स एवायमिति व्याख्या । आहितसम्बन्धिनां शब्दानां ‘घस्मराणि ग्रसन- शीलानि अत एवायमिति व्याख्या । आहितसम्बन्धिनां शब्दानां ‘घस्मराणि ग्रसन- शीलानि अत एवायमिति व्याख्या । आहितसम्बन्धिनां शब्दानां ‘घस्मराणि ग्रसन-

उपदर्शितम्—असंरकथानितयत्र विधेयाविमर्शविचारे अनुक्तवानिति नोक्तवानिति व्याख्यम् । तत्पुरुषे कर्त्रादीनां षष्ठीनां कारकाणां सम्बन्धषष्ठस्य च ऋमेणोदाहरणानि आह देहेऽत्यादिना । सोऽयमिति अत्र स एवायमिति व्याख्या । आहितसम्बन्धिनां शब्दानां ‘घस्मराणि ग्रसन-शीलानि अत एवायमिति ।

अनुक्तवान्—‘नोक्तवान्’ यह कहाना चाहिये । तत्पुरुष में कर्त्ता आदि छ कारकों और सम्बन्ध के स्वतन्त्र उदाहरण देते हैं—

तत्पुरुषे कर्तुर्येथा— “देशः सोऽयमतिशोणितजलैर्यास्मिन् हृदः पूरितः । क्षत्रादेव तथा विधः परिभवस्तातस्य केशाग्रहः । तान्‍ये वाहितराक्षस्मरगुरुण्यख्राणि भास्वनित मे यद् रामेण ऋतं तदेव कुठते द्रोणात्मजः क्रोधनः ।।” इति ।

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द्वितीयो विमर्शः

अत्र रामेणेति रामस्य कर्तृभावेन करणं प्रति यद्विशेषणत्वं, तत् तस्य दारुणतातिरेकात्मकमुत्कर्षं रौद्ररसपरिपोषपर्यवसायिनं समर्पयति, तस्य निरतिशयशौर्यचालितत्वेन घोरतरनैर्घृण्यनिःश्रितया च प्रसिद्धेः। तेन तत्प्राधान्यान्यत्र विशेष्येण सह समासे गुणतां नोतम्।

कत्रृद्भिन्ना कारकोपमानेनैका संश्लेषिकया विशेषणभावेन यदुपादानं स द्वन्द्वस्य विषय इति तत्स्वरूपनिरूपणावसरं पच तेषां प्राधान्‍यमग्राध्यान्‍यमप्राधान्यं चाभिधास्यत इति न तदुदाहरणमिह प्रदर्शितम्। नापि विध्यनुवादभावोदाहरणं, तस्य विशेषणविशेष्यभावतुल्यकफ्लतया तत्समानकृतान्तत्वोपपादनात्।

प्रत्युदाहरणं यथा—‘यस्यावमत्य गुरुंदत्तमिदं कुठारं डिम्भोडपि राम इति नाम पदस्य हर्त्ता’ इति।

तत्पुरुष में जैसे कर्त्ता का—‘यहाँ वही स्थान है जहाँ शत्रुओं के रक्तपात से जल से तालाब भर गये थे, पिता जी के शराग्रह—वैसा ही क्षत्रिय (श्रेष्ठयुद्ध) से अपमान हुआ, मेरे चमच्चमाते हुये वड़े-बड़े अख्ख भी शस्त्राओं के शखों के भक्षक है ।’ इस प्रकार जो परशुराम ने किया था, वही क्रोधी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा करने जा रहा है ।

यहाँ—‘राम द्वारा’ इस प्रकार राम का ‘उसने’ इस शब्द की करण किया में कर्त्ता रूप से जो विशेषणभाव है वह उसकी ( करण किया की ) दारुणता के अतिरेक रूपी उत्कर्ष को बतलाता है, जिससे अन्ततः रौद्ररस की परिपुष्टि होती है, कारण कि उसकी (अश्वत्थामा ) असामान्य शौर्य से युक्त होने और घोरतर निर्दयता के अर्धीन होने के लिये प्रसिद्धि है। इसलिये उस ( कर्त्ता ) की प्रधानता होने से उसे विशेष्य ( क्रिया ) के साथ समास करके गौण नहीं बनाया ।

कर्ता आदि अनेक का तत्त्व रूप से विशेषण भाव से जो कथन ( होता है ) वह द्वन्द्व का विषय ( माना जाता है ) इसलिये उसके स्वरूप के निरूपण के मौके पर भी उन ( कर्त्ता आदि ) की प्रधानता और अप्रधानता बतलायेंगे, इसलिये उसका उदाहरण यहाँ नहीं दिया । और न विध्यनुवाद भाव का उदाहरण ही दिया । कारण कि फल में उस ( विध्यनुवादभाव के विशेषणविशेष्यभाव के बरावर होने से—स्थिति में भी समास का उपपादन किया गया है ।

प्रत्युदाहरण जैसे—‘जिसके—( परशुराम के ) इस गुरुग्रदत्त कुठार तक का अपमान कर बच्चा होते हुये भी ‘राम’ इस नाम का हरण करने वाला है ।’

करणं प्रतीति क्रियां प्रतीत्यर्थः। न तत्त्वयेत तत्कर्तृविशेष्यस्य करणस्य । तस्यैति रामस्य । शौर्य बलम् । निःश्रः परवशः । तेन तदिति रामेणतिविशेषणम्। अनेकेशामिति । अनेकशब्दस्य नञ्समासे उत्तरपदार्थप्राधान्यादेकत्वप्रसङ्गः । सत्यम् किन्तु नञ्प्रयोगविषये एकशब्दस्यैकत्वातिरिक्तवस्तुविशयत्वं यथा अन्राह्मण इत्यत्र ब्राह्मणशब्दस्य चत्रियादिगोचरत्वम्, एकत्वातिरिक्तं च वस्तु कदाचिदेकवोपरक्तं प्रतीयते, कदाचिच्छिन्निजेनैव स्वरूपेण । आद्ये पदे अनेकमिति भवति द्वितीये त्वनेकान्तीति । यथा च

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पतञ्जलि:-‘प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्’ इति । गुरुदत्तमिति गुरूणा दत्तमिति वाच्यम् ।

करणं प्रति—अर्थात् क्रिया के प्रति ।

तत्तस्थ—प्रकृतिप्राप्त विशेष्य = करण की ।

तस्य—राम का ।

शौर्यम्—बल ।

निद्र—परवश ।

तेन तस्य—‘रामेण’ यह विशेषण ।

अनेकेषाम्—( टेक ) अनेक शब्द में जो नञ्समास है उसमें उत्तर पदार्थ प्रधान होने से एकत्व की आपत्ति है । ( उत्तर ) ठीक है, पर जहाँ ‘नञ्’ का प्रयोग हुआ रहता है, वहाँ एक शब्द का अर्थ एक से भिन्न वस्तु होता है, जैसे ‘अब्राह्मण’ यहाँ ‘ब्राह्मण’ शब्द क्षत्रिय आदि का वाचक है । एक से भिन्न वस्तु कभी एकत्व से युक्त भी दिखाई देती है, कभी अपने ही स्वरूप से । प्रथम पक्ष में ‘अनेकम्’ एक वचन होता है और द्वितीय पक्ष में अनेकानि : बहुवचन । जैसा कि पतञ्जलि ने कहा है—

अनेक लोगों की प्रवृत्ति के भेद में एक ही कारण है ।

गुरुदत्तम्—गुरूणा दत्तम्, इस प्रकार कहना चाहिये ।

कर्मणो यथा—

“कृतकुपितैर्वाष्पाम्भोभि: सदैन्यविलोकितै- व्न्नमसि गता यस्य प्रीत्या धृतापि तथामवया । नवजलधरश्यामाः पश्यन् दिशो भवतां विना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये ! स तव प्रियः ॥” इति ।

अत्र वन्मिति यदू गमनक्रियायाः सीताविशेषणभूतायाः कर्मभावेन विशेषणं तत् तस्याः रामप्रातिपदिकार्थैकत्वात् अन्यत्रकुलपतिलादर्शं दुष्कर- कारित्वं नामोৎकर्षमर्पयति वनवासदुःखस्यातिकथ्वात् । स चोत्कर्षो रामस्य रतेर्हृपनतां प्रतिपद्यत इति प्रधानं, न गतेत्यनेन सह समासे तिरसॄतम् ।

यथा च—“संवर्धितानां सुतनिविशेषषम्” इति ।

यथा च—‘गुर्वर्थर्मी श्रुतपारदरश्वा रघोः सकाशादनवाप्य कामम्’ इति । अत्र गुर्वर्थमित्यर्थिनोडर्थनक्रियामुखेन यद्विशेषणं, तत् तस्य श्लाघ्यतात्मकायाधानदारेण रघोरुत्साहपरिपोषे पर्यवस्यतीति प्राधान्येन विवक्षितत्वाश्राथित्वा सह समासे सतामवमततां गमितम् ।

कर्म का उदाहरण जैसे—

'जिसके प्रेम में—ऊपर क्रोध, आँसुओं और दीनता युक्त दृष्टियों द्वारा माँ के रोकने पर भी तुम बन आई, हे प्रिये—बही तुम्हारा कठोर हृदयवाला प्रिय नवे मेघों से बीती दिशाएँ देखता हुआ भी जी ही रहा है ।'

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द्वितीयो विमर्शः

२४७

यहाँ—गमनक्रिया सीता में विशेषण बनाया गया है वह राम की उत्कृष्टप्राप्ति से युक्त सीता के दुष्कर कार्य के लिये साहस रूपी उत्कर्ष का ज्ञान कराता है, जो अन्य कुलललनाओं में कठिनाइयों से मिल सकता है, कारण कि बनवास का दुःख अतीव कष्टकर है। वह उत्कर्ष भी राम के रतिरूपी स्थायी भाव में उद्दीपन बनता है—अतः प्रधान है, अतः 'गता' इसके साथ समास करके उसे अप्रधान नहीं किया गया ।'

और जैसे—'गुरु के लिये याचनारूप क्रिया करने वाले, जो सुना उसको उत्तम पात्र में पहुँचा हुआ ( कौत्स ऋषि ) रघु के पास से इम्पित वस्तु न पाकर । ( दूसरेए—दाता के पास गया—अपयश का ऐसा नया अवतार न हो । )

यहाँ—'गुर्वर्थम्' यह पदार्थ अर्थों ( याचकरूपी ) पदार्थ में अर्थत्न क्रिया द्वारा—विशेषण है । इससे अर्थी में—

अतिशय—श्लाघ्‍यता की प्रतीति कराता है और उसके द्वारा रघु के उत्साह को बढ़ाने वाला ठहरता है इसलिये प्रधान रूप से कथित है, और अर्थी के साथ समास करके विद्वानों की दृष्टि में हेय नहीं बनाया गया है ।

और जैसे—'पुत्रवत् पाले गये ।'

विमर्शः यहाँ सुतनिर्विशेषप अलग है । अतः समर्धन क्रिया में अतिशयाधान करता है ।

तत् तस्या इति सीताया विशेषणभूताया: सीताकृत्काया गमनक्रियाया इत्यर्थ: । गुर्वर्थमिति गुरवे इदम् गुर्वर्थमिति क्रियाविशेषणमेतत् । क्रियाविशेषणानां कर्मत्वं नपुंसकलिङ्गत्वं च । ईप्सिततमत्वे तु पथ्या स्यात् । अर्थनक्रियामुखेनैति अर्थयत इति निगमनात् । तव् तस्येतितद् गुर्वर्थमिति विशेषणम् । तस्यार्थिन: । अवमतताम् अनभिप्रेतताम् । अवमतत्वं गर्हितत्वम् ।

तत् तस्या:—सीता में विशेषण बनी—सीताकृत्क गमनक्रिया का ।

गुर्वर्थम्—गुरवे इदम्—गुर्वर्थम्—यह क्रिया विशेषण है, क्रियाविशेषण सदा कर्मे होता है और नपुंसक लिङ्ग । यदि अन्तर 'इप्सितता' होती तो पथ्या होती ।

अर्थनक्रियामुखेन—अर्थयते इस प्रकार का कथन होने से ।

तत् तस्य—तत् गुर्वर्थम् के लिये ।

तस्य—अर्थी के लिये ।

अवमतताम्—गर्हितता को ।

प्रत्युदाहरणं यथा—'प्रदक्षिणक्रियातीसतस्तस्या: कोपमजोजन:' इति, 'तमभ्यनन्दत् प्रथमप्रबोधित: प्रजेश्वर: शासनहारिणा हरे:' इति, 'यथाकामाचिन्तार्थिनाम्' इति, यथाकालप्रबोधिनामिति च ।

प्रत्युदाहरण जैसे—

'प्रदक्षिणक्रियाराअनुस्य तुमने उसका क्रोध जगा दिया और इन्द्र के सम्वाददाता द्वारा पहले ही से जान चुके—दिलीप ने ही उसका पहले अभिनन्दन किया ।

और—'यथाकामाचिन्तार्थिनाम्' । 'यथाकालप्रबोधी ।'

सुतनिर्विशेषमिति । क्रियाविशेषणमेव । प्रदक्षिणक्रियेति अन्र प्रदक्षिणक्रियाया अस्ययसुतनिर्विशेषमिति । क्रियाकर्मभूताया अन्रारायहेतुकोपनिमितत्वात् प्राथान्‍यम् । एवं प्रथमप्रबोधित इति प्राथ

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२४८

व्यक्तिविवेकः

स्यस् । तथा यथाकामत्ययाकालतव्योज्जृम्भ्यम् । यदवलोकनेति रूपसम्पत्त् परामृष्टा । स्वहस्तेनेति करणपदम् ।

सुतनिर्विंशेष—क्रियाविशेषण है । प्रदचिणक्रिया—प्रदक्षिणा क्रिया अत्यय ( लंघन ) क्रिया में कर्म है । वही ( सन्तानोत्पत्ति में ) विशिष्टभूत क्रण का कारण है, अतः प्रधान है । इसी प्रकार प्रथम—प्ररोधितः यहाँ ‘प्रथम की प्रधानता होनी चाहिये ( पर वह समास में दब गयी है—‘प्रथमं प्ररोधितः’—होने से वह उभर सकती है । ) इसी प्रकार यथाकामत्य और यथाकालतय के विषय में जानना चाहिये । ( उनमें भी प्रधानता होती थी, पर समास द्वारा उसे दबा दिया गया है । )

यदवलोकन—में ‘यत्’ से रूप-सम्पत्त् का परामर्श किया गया । स्वहस्तेनेति—करण पद यहाँ प्रधान रखा गया ।

करणस्य यथा—

"आलोकमार्गं सहसा व्रजन्त्या कयाचिदुद्देशवतीन्तमाल्यः । बद्धूष्यं न सम्भावित एव तावत् करेण रुद्धोऽपि न केशहस्तः ॥" इति ।

अत्र करेणेति यत् केशहस्तकर्मकस्य सम्भावितस्य रोधनस्य करण- भावेन विशेषणं तत् तस्याः कस्याश्चिद्रभसोत्कुक्प्रहर्षप्रकर्षरूपमति- शायं प्रतिपादयदू वधूवरयो रूपसम्पदमसाधारणीमभियनक्ति यदवलोकन- व्यवधानाधायिनीं तावतीमपि कालकलां विद्रायमानां मन्यमाना नयानया सततं स्वाधीननैकेन करकमलेन रोघोडप्यस्य न कृतः । तेन तत् प्रधानमिति न रुद्ध इत्यनेन सह समासेऽस्तमुपनीतम् ।

यथा च—

"कर्त्तुमक्षमा मानं प्राणेशाः प्रत्यभेदि यत् । सोडयं सखि ! स्वहस्तेन समारुढ्रुस्वयानलत: ॥"

करणकारक का जैसे—

‘झरोक्हे के रास्ते पर तेजी से चल रही किसी का जूड़ा खुल गया और उसकी माला गिर गयी । ऐसी अवस्था में उसने उसे वाँघा तो नहीं ही, हाथ से रोका भी नहीं ।

यहाँ—केशहस्त को कर्म बनाकर सम्भावित रोधन क्रिया में कर ‘करण’ इस प्रकार करणकारक इन कर विशेषण बना । उससे वह (खी) की उत्कृष्ट श्रीमता, उत्सुकता, और प्रसन्नता में प्रकटश्रूपी अतिशय प्रतीत होता है । उससे वधू और वर की आसाधारण रूप-सम्पत्ति का बोध होता है । जिसे देखने में रुकावट डालने वाली उतनी सी घड़ियाँ को भी उसने विध्न मानकर हमेशा अपने अधीन कर कमले से उसे रोका भी नहीं । इसलिये उसे ( करण ) की यहाँ प्रधानता है—इसलिये ‘न रुद्धः’ इसके साथ समास में उसे गुणीभूत नहीं बनाया ।

और जैसे—

मान करने में तुम समर्थ हो नहीं, और प्राणेश का मन खट्टा कर दिया । सखी—यह तुमने अपने हाथ से आग लगा ली ।

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द्वितीयो विमर्शः

प्रत्युदाहरणं यथा—

"यात्रास्वहस्तलिखितानि ललाटपटे । को वक्षराणि परिमार्जयितुं समर्थः?" इति ।

प्रत्युदाहरण जैसे— ललाटपट पर । विधाता द्वारा अपने हाथ से लिखे अक्षरों को कौन मिटा सकता है ।

स्वहस्तलिखितानीति स्वहस्तशब्दोSनादरप्रतीतिहेतुत्वेन लेखनं प्रति उत्कर्षानिमित्तमपि समासे गुणवृत्तः ।

स्वहस्तलिखितानीति—यहाँ स्वहस्त शब्द आदर-ज्ञान कराता और लेखन के प्रति उत्कर्ष का कारण बनता है—इतने पर भी उसे समास में दवा दिया ।

सम्प्रदानस्य यथा—

"पौलस्त्यः स्वयमेव याचति इति श्रुत्वा मनो मोदते देयो नैष हरप्रसादपरिग्रस्तेनाधि ताम्यति । तदू वाच्यंः स्व दशाननो माम गिरा दत्तो द्विजेभ्यो मही

तुभ्यं भुङि रसातलच्युदिवयोर्निर्जित्य किं दीयताम्॥" इति ।

द्विजेभ्य इति निर्जयपूर्वकस्य्य भागवकरत्नकस्य महोदनस्य सम्प्र- दानत्वेन यद्द्विशेषणं तन्मद्याः पात्रसात्करणोत्कर्षमादधद् भागववशौर्यातिरे- कस्य वचक्षणेन दशाननस्य कोपोद्दीपनपर्यवसायि भवतीति प्राधान्येन विवि- क्षितत्वाच्च दत्तेत्यनेन सह समासे कविना विच्छायीकतम् । प्रत्युदाहरणमे- तदेव पूर्ववद् दृश्यम् ।

सम्प्रदान का जैसे— 'पौलस्त्य का वशाज रावण स्वयं' भाग रहा है । है यह सुनकर मन प्रसन्न होता है और शिवप्रसाद से प्राप्त परशु देनेने लायक नहीं है इससे अधिक दुःखी भी होता है । इसलिए मेरे शब्दों में उस दस सिर वाले ( रावण ) से कहो कि—पृथिवी तो ब्राझणों को दे दो, बोलो पाताल और स्वर्ग में तुम्हें क्या जीतकर दे दिया जाय ?'

यहाँ—भार्गव ( परशुराम ) द्वारा जीत कर किए गए पृथिवी-दान में 'द्विजेभ्य:' यह सम्प्रदान रूप से विशेषण है, उससे पृथिवी में सत्पात्र को दिए जाने का गौरव आता है, और उसके द्वारा परशुराम के शौर्यांतिरेक की व्यञ्जना होती है—इस प्रकार वह ( विशेषण ) रावण के कोप को जगानेवाला ठहरता है—इसलिए वह प्रधानरूप से कहा गया है और इसलिए 'दत्ता' के साथ समास करकै उसे कवि ने श्रीहीन नहीं बनाया ।

पहले के समान—( विप्रप्रदत्ता मही ) इस प्रकार समास करने पर ) यहाँ प्रत्युदाहरण बन जाता है ।

पूर्ववदिति कृतसमासवैचैशसम् । तच्च विप्रप्रदत्ता महीति पठ्ठे ।

पूर्ववद्—समासजनित हानि कर देने पर । वह 'विप्रप्रदत्ता मही' इस पाठ में सम्भव है ।

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अपादानस्य यथा—

'ताताजन्म वपुर्विलड्ढितवियत् क्रौञ्चं ऋतान्ताधिकं

शक्ति: ऋत्सनसुरासुरोद्भमशामनी नीता तथोच्चै:पदम् ।

सर्वे वत्स ! त्वातिशायी निधनं शुद्राच्चु यत् तापसात्

तेनाहं त्रपया शुचा च विवशः कष्टां दशामागतः ॥'

अत्र तातादिति शुद्राच्चु यत्तापसादिति च ये जन्मनिधनयोरपादा-

नभावेन विशेषणे ते तातस्य पितामहपितामहतया महामुने: पुलस्त्य-

स्यापत्यतया च शुद्रतापसस्य च गणनानहंतया तयो:ऋत्कर्षोपकर्षद्वारेण

तद्वतः कुम्भकर्णस्य कामपि कुलीनतां शौर्योपकर्षं चादधाने श्रातुर्दर्शन-

नस्य शोकत्रपापावकेन्धनभावेन परिणमत इति प्राधान्येन विवक्षिते न

ताभ्यां सह समासे गुणातां गमिते ।

प्रत्युदाहरणं यथा—अत्रैव 'क्रौञ्चं ऋतान्ताधिकम्' इति । यथा च

'आसमुद्रक्षितीशानामिति' ।

अपादान का जैसे—

'पिताजी से जन्म, आकार नाप लेने वाला शरीर, यम से भी अधिक क्रूरता, और सभी देव

और दानवों की गरमी उतार देनेवाली—उतनी ऊँची पहुँची हुई है शक्ति, इस प्रकार हे वत्स !

तुम्हारा सब कुछ सर्वातिशायी था, किन्तु केवल निधन शुद्र तपस्वी से हुआ, इसलिए मैं लाज

और शोक से विवश हो बड़ी दयनीय हालत में आ पड़ा हूँ ।'

यहाँ ‘तात से’ और ‘शुद्र तपस से’ ये जो दो अपादान रूप से जन्म तथा निधन के विशेषण

बनाए गए हैं, वे उत्कर्ष और अपकर्ष द्वारा उनसे युक्त कुम्भकर्ण की अत्यधिक कुलीनता तथा

शक्तिहीनता का ज्ञान कराते हैं, पितामह पुलस्त्य के पुत्र होने तथा महामुनि पुलस्त्य के

पुत्र होने से—( तातात्—यह अपादान कुलीनता का ज्ञान कराता है ) तथा शुद्र तपस की नगण्यता से

( तपसात्—यह अपादान—और्यापकर्ष का ) । उसके बाद वे ही—भाई दशानन ( रावण ) के

शोक और लज्जा को आग में ईंधन बनते हैं, अतः प्रधानरूप से विवक्षित हैं, इसीलिए—उन ( जन्म

और निधन ) के साथ समास में गुणों/भूत नहीं किए गए ।

प्रत्युदाहरण जैसे—इसी पद्य में 'क्रौञ्चं ऋतान्ताधिकम्' ।

और जैसे—'आसमुद्रक्षितीशानाम्' ।

पितामहपितामहतया पितामहो ब्रह्मा पितामहः पूर्वपुरुषो यस्य । तयोर्जन्मनिधनयोः ।

तद्वतो जन्मनिधनवत: । ताभ्यां जन्मनिधनाभ्याम् । ऋतान्तादधिकमिति आ समुद्रात् चिती-

शानामिति च वाच्यम् । अपादानसमासलन्यायाद्वधिरपि पष्ठयन्तोदत्र गृद्यत इति

प्रत्युदाहरणोपपत्ति: ।

पितामहपितामहतया—पितामह ब्रह्मा है पितामह पूर्वपुरुष जिसका ।

तयो:—जन्म और निधन का ।

तद्वतः—जन्म और निधन युक्त का ।

ताभ्याम्—जन्म और निधन से ।

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द्वितीयो विमर्शः

कृतान्तात्—अधिकृत्’ और ‘आसमुद्रात् क्षितोशानानाम्’ ऐसा पाठ चाहिए । अपादान के समान अवधि ( अभिविधि भी ) पद्यम्‍यन्त—मानी जाती है, इस प्रकार उदाहरण की संगति होती है ।

विमर्शः—अपादान का अर्थ होता है वह पदार्थ जहाँ से विशेष हो, जैसे—वृक्ष से पत्र गिरता है मैं—विशेष वृक्ष से होता है अतः वह अपादान है । अवधि का अर्थ है सीमा । सीमा से किसी का विशेष नहीं होता, प्रत्युत विशिष्ट वस्तु में सीमा भी गिन ली जाती है । अतः वस्तुतः उसमें पद्मी होना नहीं चाहिए, तथापि सीमारूप अवधि अपादानरूप पदार्थ से अधिक भिन्न नहीं है अतः उसमें पद्मी हो सकती है ।

अधिकरणस्य यथा— 'तपस्विभिर्यां सुचिरेण लभ्यते प्रयत्तत: सत्रिभिरेष्यते च या । प्रयान्ति तामशुगतिं यशस्विनो रणाश्वमेधे पशुतामुपागता: । इति । अत्र रणाश्वमेध इति यत्त् पशुताया यशस्विकर्तृकोपागमकर्मभूताया अधिकरणभावेन विशोषणं तत् तस्या इतरपशुवैलक्षण्यलक्षणमतिशयमा- धानं शौराणां समरमरणोत्साहमुद्दीपयतीति प्राधान्‍यन विवक्षिततत्त्वान् तथा सह समासे समशोर्षिकतां नीतम् ।

यथा च— 'शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् । वार्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ।।' इति ।

जैसे—अधिकरण का—‘तपस्वी लोग जिसे देर से पाते हैं, याजिक जिसे पर्याप्त श्रम के पश्चात् प्राप्त करते हैं, उस गति को रणरूप अश्वमेध में पशुता को प्राप्त हुए यशस्वी वो तत्कालुप पा जाते हैं ।’ यहाँ ‘रणाश्वमेधे’ यह जो यशस्वी की गति रूप किया के प्रति कर्म बना पशुता का अधिकरण रूप से—विशेषण है वह उसके अन्य पशुओं से विलक्षणातारूपी अतिशय को साधता है । अतः प्रधानरूप से विवक्षित है । और इसीलिए समास में बराबरी तक नहीं लाया गया ।

और जैसे— 'बचपन में विद्या अभ्यास कर लेने वाले, यौवन में विषय की चाह रखने वाले, वृद्धावस्था में मुनियों के समान रहनेंवाले तथा अन्त में योग से शरीर छोड़नेवाले—रघुवंशियों का'

विमर्शः—यहाँ सभी अधिकरण विषय रूप से कथित हैं ।

उपागमेति उपागता इति निर्दिष्टा उपागमक्रिया । रणभूषित इति । अत्र रणभुविति वाच्यम् ।

उपागम—उपागता इसमे निर्दिष्ट उपागम क्रिया । रणभूषित—यहाँ ‘रणभुवि’ इस प्रकार अधिकरण को पृथक्‌रूप से बतलाना चाहिए ।

प्रत्युदाहरणं यथा— रेतुरक्तविलिसाज्ञो विरुतो वणभूषित: । कदा दुष्टप्रत्यभिज्ञानो भवेयं रणभूषित: ।। इति ।

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प्रत्युदाहरण जैसे—

'धूल और खून से लिप्त शरीर वाला, विकृत भावों से अलंकृत—इस प्रकार रणभूमित होकर मैं कब कठिनाइँ से पहचानने लायक बनूँगा ।

सद्वन्वयस्य यथा—

'दृश्यं गतं सम्प्राप्ति शोचनौयतां समागमप्रार्थनौयतां कपालिनः ।' इति ।

अत्र कपालिन् इति यत् समागमप्रार्थनाया: शोचनौयतागतौ हेतुत्वेनोपात्ताया: सम्बन्धिद्वारेण विशेषणं तत् तस्यास्तत्र यत् सामर्थ्ये तत् सुतरां सूपपद्यते तस्य सकलामडलानिलयतया निन्दिताचारनि-रततया च दर्शानसम्भाषणादीनामपि प्रतिबिद्धत्वात् । अतो विधेयार्थ-यथा च—

'जनकं जनको यस्स्या या तातस्योचिता वधू: । आर्या स्वधर्मिणी या च न स्तुतिस्तत्स्यात् प्रपद्यते ॥' इति ।

'स्कन्दस्य मातुः पयसां रसज्ञ' इति । 'क: क्षमेत तवानुज' इति ।

संवन्य का जैसे—

'उस कपालीधारी के लिए दुराग्रह से—अब दो—शोचननीय वन गये—'

यहाँ—शोचनौयता को प्राप्त होने के प्रति हेतु रूप से जो समागम—प्रार्थना है उसमें सम्बन्धिद्वारा 'कपालिन:' यह विशेषण है । वह उस ( समागमप्रार्थनागता ) ( शोचनौयताप्राप्ति ) के प्रति जो सामर्थ्य है उसे और बढ़ा देता है । कारण कि जो कपालीधारी है वह सब प्रकार के अमंगल का घर है, वह निन्दित आचरण में लगा हुआ है, अतः उसके दर्शन और सम्भाषण आदि भी निषिद्ध है । अतः विधेय होने से—प्रधानतया वह ( विशेषण ), विवक्षित है, फलतः उसे समास में घटने नहीं दिया ।

और जैसे—

'जनक जिसक जनक हैं, जो पिताजी को अनुरूप स्रुषा ( पुत्रवधू ) हैं, जो बड़े भैया की धर्मपल्ली है, उसकी स्तुति लज्जास्पद है ।'

'स्कन्द की मा के दूध का स्वाद जाननेवाला है । 'कौनसा तुम्हारा—छोटा भाई सदृश सकता है ।

शोचनौयतागति: क्रिया । अत्र समागमप्रार्थना हेतुत्वेनोपात्ता । तस्या: सम्बन्धित्त्वमुखेन कपालिन् इति विशेषणम् । अत्र सम्बन्धिशब्दो भाववृत्ति: सम्बन्धित्वे

वर्त्तते, यथा 'दृशेकयोरिवैकवचने' ( ९-४-२२ ) इति, सधीरमुचेति । ततस्तया हति ।

तद्विशेषणम् । तस्यास्समागप्रार्थनाया: । तत् शोचनौयतागतौ सामर्थ्येऽन्वभिचारेण

सर्वपदकत्वम् । तस्य सकलौत तच्छब्द: कपालिन् इत्यस्य परामर्शक: । विशेष्येण समागम-प्रार्थनयेत्यनेन प्रत्ययं गुणभूतम् ।

एवं तातस्येति, आर्यस्येति, स्कन्दस्येति, तवेति चेत्येषां विशेषणानामुत्कर्षेसम्पर्कवचं श्रेयम् ।

शोचनौयतागति:—यह क्रिया है । उसमें समागम की प्रार्थना हेतुरूप से कहींगई है । उसका सम्बन्धित्व द्वारा 'कपालिन:' यह विशेषण है । यहाँ सम्बन्धी शब्द भावार्थक है, उसका तात्पर्य है

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द्वितीयो विमर्शः

सम्बन्धित्व, जैसे—द्वेकयोर्द्वचनैकवचने—में ( द्वि का द्वित्व और एक का एकत्व अर्थ माना जाता है । ) इसलिए उसे ध्वन्य के साथ ( ? ) ( सर्वीरम्‌ ) कहा ।

तत्तत्स्या:—तत्—विशेषण, तस्याः—समागम-प्रार्थना का । तत्—शोचनीयतागति में । सामध्यं—नियमतः ( बिना चूके ) कार्य करने की शक्ति ।

तस्य सकलेऽति—तव शब्द कपालिनः का परामर्शक है । विशेष्येण—समागम-प्रार्थना ( रूपो विशेष्य ) से ।

प्रत्यचरम्‌—गुणभूत—अप्रधान । तातस्य, आर्यस्य, स्वक्नस्य, तव—ये विशेषण उत्कर्षपायक हैं।

विमर्शे : जनकस्य जनकः यस्याः—की जगह ‘जनकस्यात्मजाता या’ यह पाठ प्रकमानुरोधी होना।

प्रत्युदाहरणं यथा—

‘पृथिवि ! स्थिरोभव भुजङ्गम ! धारयेनां त्वं कूर्मराज ! तदिदं द्वितयं दधिथाः ।

दिकुञ्चराः ! कुरुत तत्रितये दिगीशाः देवः करोति हरकर्मकुमतत्क्ष्यम्‌ ।’ इति ।

यत्र हि हरसन्निधाननिवन्धनः कामुकस्य गौरवातिरेको दुरारोपपत चेतित तस्यैव विधेयतया प्राधान্যং न कामुकमात्रस्य, तच्च तस्य च्छत्तावन्तरितं, तेन ‘देवो धनुः पुररिपोविद्धात्यधिज्यं’मित्यत्र युक्तः पाठः । अस्मिन्‌ श्लोके यथा—

‘किं लोभेन विलड्ढितः स भरतो येनैतदेवं कृतं मात्रा, क्षीणघुतां गता किमथवा मातैव मे मध्यमा ।

मिथ्यैतन्मम चिन्तितं द्वितयमध्यार्यानुजोऽसौ गुह-माता तातकलत्रामित्यनुचितं मन्ये विधात्रा कृतम्‌ ।’

यथा च—

‘जयाशा यत्र चास्माकं प्रतिघातोत्थितार्चिषा । हरिच्चक्रेण तेनास्य कण्ठे निष्क इवार्पितः ।’ इति ।

अत्र हरेः सम्वन्धेन चक्रस्य जयाशास्पदत्वेनैति हरेऽरेव प्राधान्या-विवक्षा न चक्रमात्रस्य, तच्च तस्य समासेऽप्यस्तमुपगतम्‌ । विभक्त्यन्वय-व्यतिरेकानुविधायिनी हि विशेषणानां विधेयतागतिः । तत् पच कैषां विशेष्ये प्रधानान्तरसद्भेस्वत्कपदार्थानां शब्दे प्राधान्यानि च शान्दे प्राधान्ये अर्थों गुणभावोऽनूद्यमानत्वा-दित्युक्तम्‌ ।

वक्ष्यते च ।

प्रत्युदाहरण जैसे—

‘हे—पृथिवी ! स्थिर हो जा, शेषनाग—इसे धरे रहो, और कूर्मराज तुम—इन दोनों को

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हे दिग्गजो ! तुम लोग इन तीनों को धारण करने में तत्पर रहो, ( हमारे ) अर्थ— ( रामचन्द्र ) शिवधनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा रहे हैं ।

यहाँ धनुष में गौरव और ताने जाने में कठिनाई शिव के सम्बन्ध से चढ़ी-बढ़ी दिखाई देती है । इसलिए वहाँ ( हरसम्बन्ध ) विधेय है । और इसलिए वहाँ प्रधान, न कि केवल धनुषमात्र । पर वह [ हररूपी विशेषण ] समास में अप्रधान बना दिया गया । अतः—देवो धनुः पररिपोर्विन्दभात्यधिकज्यम् पाठ ठीक है ।

इस पाठ में एक और लाभ है—कि जिसका अर्थ कलिप्त है जिसका प्रयोग भी नहीं होता उस 'आततज्य' शब्द का परिहार भी हो जाता है ।

जैसे—क्या भरत को लोभ ने अन्धा बना दिया, जिससे वे माँ के कहने पर ऐसा कर बैठे, या मेरी मझली माँ ही नारीसुलभ तुच्छता में आ गई? नहीं मेरे ये दोनों वितर्क झूठे हैं, भैया भरत—आर्यांनुज ( बड़े भैया राम के अनुज ) हैं, और माँ तात ( पिता ) पल्ली हैं ।

अतः मैं सोचता हूँ यह अनुचित कार्यं विधाता ने किया । यहाँ—आर्येस्य अनुजः, और तातस्य कलत्रम् कहना उचित था ।

और जैसे—हरिचक्र ( सदर्शन ) ने इसके कण्ठ में निष्क ( गले का हार ) मानो पहनना दिया ।

यहाँ हरि के सम्बन्ध से चक्र के विषय में जयाशा हो सकती है । इसलिए प्राधान्य हरि में ही चाहिए, केवल चक्र में नहीं, पर उसका ( हरि का ) वह ( प्राधान्य ) समास में डूब गया ।

विशेषणों में विधेयता की जो प्रतीति होती है वह विभक्ति के रहने पर ही, विभक्ति के अभाव में उसकी प्रतीति नहीं होती । और उसी से इनमें ( विशेषणों में ) शब्दतः तो अप्रधानता रहती है पर अर्थतः प्रधानता हो, कारण कि ये विशेष्य में—दूसरे प्रमाणों से सिद्ध अपने ( विशेषणों के ) गुणों का उत्कर्ष डालते हैं ।

और उसी से विशेष्यों में शब्दतः प्रधानता तथा अर्थतः अप्रधानता की प्रतीति होती है । क्योंकि उन ( विशेष्यों ) का तो केवल अनुवाद होता है ।

तस्यैवेतिगौरवदुरारोपत्वनिबन्धनस्नस्य हरस्य । तच्चेति प्राधान्यम् । तस्यैवेति हरस्य । कलिप्तार्थस्येति विस्तारितकृत्रिममात्रवाचिनोडधिज्यत्वमात्रलक्षणार्थारोपात् ।

अप्रशंसारयेत्युन्नयेनास्मिन्नर्थे कविभिरप्रयुज्यमानेनस्य । गुणान्तरलाभ इति वचयमाणलक्षणस्य वाच्य-वचनस्य परिहारात् ।

मात्रेति 'पुचं कृत्रिम्' इत्यत्र करणम् । निष्क आभरणविशेषः । विभक्त्यन्वयनेतिश्रूयमाणया विभक्तेरिल्यर्थः ।

तथा च 'पश्यत आक्रोशे:' ( ६-३-२१ ) इति ज्ञापकसुपदेश इष्यत इति प्रमाणान्तरेण 'लोको वेदस्तथाध्यात्मं प्रमाणं त्रिविधमि' स्मृतम् ।

'युक्तरूपेण सिद्धौ यौ स्वस्य विशेषणस्योस्कर्ष-पक्षे तदर्थानाम्' अर्थाद्विशेष्य प्रतिपत्त्यर्थः ।

विभक्त्यन्वययद्यतिरेकः—अर्थात् अपने स्वरूप में दिखाई दे रही विभक्ति के साथ ।

तथा च पश्यथा:—इसके लिए 'पश्यत आक्रोशे:'—( निन्दा व्यक्त होती हो तो पष्ठी का लोप समास में नहीं होता' )—इस सूत्र का ज्ञापक—माना जाता है ।

प्रमाणान्तरे।—'लोको वेदस्तथाध्यात्म्यं प्रमाणं त्रिविधं स्मृतम्' इस प्रकार जो पहले कहा गया ।

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द्वितीयो विमर्शः

९५५

है उससे सिद्ध हुए जो अपने उत्कर्ष तथा अपकर्ष उनका आधार करने वाले अर्थान्तर विशेष्य में ( उनका आधार करने वाले ) ।

अर्थ—वास्तव ।

विमर्शः १. विशेषण विशेष्य में उत्कर्ष की प्रतीति तब भी करा पाते हैं जव उनके शब्दों में विभक्ति का उपयोग किया जाय । कारण कि ऐसा करने से विशेषण अपने उत्कर्ष का आधार विशेष्य में कर सकते हैं, यदि यह शंका की जाय कि विशेष्य में उत्कर्ष विशेषणों द्वारा प्रतीत होता है, पर विशेषण में उसकी प्रतीति कैसे होती है ? तो उसके उत्तर में ग्रन्थकार कहते हैं विशेषेपणों में उत्कर्ष की प्रतीति लोक-वेद तथा अध्यात्म-इन प्रमाणों से हो जाती है ।

२. यहाँ एक बात ध्यान देने की है मूल में प्रमाणान्तरसिद्ध स्वारकरपार्धा। इतना ही पाठ है । उसमें अपकर्ष शब्द का उल्लेख नहीं है । परन्तु व्य० व्य० और महासूत्रदीपनी विवृति दोनों में उत्कर्ष, अपकर्ष दोनों का उल्लेख किया गया है । वस्तुतः उत्कर्षमात्रपाठ ठीक है । विशेषण उत्कर्ष की ही प्रतीति कराते हैं अपकर्ष की नहीं । यदि विशेष्य में अपकर्ष होता भी है तो विशेषण वहाँ उसी अपकर्ष में उत्कर्ष दिखलाते हैं ।

३. विशेष्य शब्ददतः तो वाक्य में प्रधान होता है, क्योंकि सभी विशेषण उसी में संमिलित होते हैं परन्तु 'श्वेत कमल' कह देने के बाद 'नील कमल' कहते समय विशेष्य कमल ही प्रधान होगा, कारण कि विशेषण ठीक उसी में संमिलित होता है, इतने पर भी प्रधान होगा नील ही, कमल तो पहले के वाक्य श्वेत कमल ( श्वेत कमल ) से ही विदित है, अब जो 'नील कमल' वाक्य कहा जा रहा है उसका अभिप्राय कमल का ज्ञानकराना नहीं प्रत्युत उसमें 'नीलिमा' का ज्ञान कराना ही है । अतः तात्पर्यभूत ज्ञान का विषय होने से अर्थात् = नील कमल में नील ही प्रधान माना जाना चाहिए । पूर्व वाक्य से ज्ञात पदार्थ को दूसरे वाक्य में उसका अनुवाद कहा जाता है, जिसका अनुवाद होता है वह प्रधान नहीं होता, वह पूरक होता है । अतः इस दृष्टि से 'नील कमल' का कमल अनुवाद का विषय है अनूदमान है वह प्रधान नहीं पतदाचार्यस्याप्यनुमतमेवेति ज्ञायते, यदयं 'वृषल्या: कामुको'

'दास्या:' पुत्र' इत्यादौ कामुकादेराक्रोशादपकर्षप्रतिपत्तये समासेडपि विभक्तेरलुक् कमाह । कुतस्तर्हि दासीपुत्र इत्यतः पुत्रस्याक्रोशावगति:, न ह्यत्र विभक्तिरस्ति । को वा मन्यते । स्वरूपमात्रमेवातः पुत्रस्य प्रतीते नाक्रोश इति सूत्रारम्भप्रयोजनमेव चिन्त्यम् ।

समासे च विभक्तिलोपाज्ज्ञातोऽपकर्षावगतिरिति न तत्रिबन्धना रसादिप्रतीतिरिति तद्वत्मनः काव्यस्यायं विधेयाविमर्शो दोषतयोक्त इति ।

यह आचार्य को भी मान्य है ऐसा लगता है । क्योंकि उन्होंने 'वृषल्या: कामुक:' 'दास्या: पुत्र' इत्यादि स्थलों में कामुक आदि में आक्रोश [ निन्दा ] जनित अपकर्ष की प्रतीति के लिये समास में भी विभक्ति का लोप नहीं माना । [ शंका ]—तो फिर 'दासीपुत्र' [ इस प्रकार के समासयुक्त शब्द ] से आक्रोश की प्रतीति कैसे होती है ? यहाँ तो विभक्ति है नहीं [ उत्तर ] मानता ही कौन है ? [ कि यहाँ आक्रोश की प्रतीति होती है ] । इससे केवल पुत्र के स्वरूपमात्र की प्रतीति होती है, आक्रोश की नहीं । यही बात तो 'सूत्र' [ षष्ठ्या आक्रोशे ] के निर्माण का प्रयोजन है । विभक्ति

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२५६

व्यक्तिविवेक:

के लोप होने से आक्रोशा की प्रतीति नहीं होती [ इसी तथ्य को बतलाने के प्रयोजन से यह सूत्र बनाया गया है ]

समास में विभक्त का लोप हो जाता है इसलिए उत्कर्ष-अपकर्ष का ज्ञान नहीं होता। इसीलिए उस [ उत्कर्षापकर्ष ] आश्रित रस आदि की प्रतीति नहीं होती। इसीलिए वह [ रस ] जिसकी आत्मा है ऐसे काव्य के विधेयांश को यह [ उत्कर्ष ] प्रतीति न होना दोष समासा गया।

अलुकमाे ‘पष्ठया आक्रोशे’ ( ६-३-२१ ) इत्यनेन चिन्त्यमिदं । पतद्वचगमाय विचार्यं-

मित्यर्थः।

अलुक् समास वतलाते हैं— ( पष्ठया अक्रोशे ) इससे ।

चिन्त्यम्—यह समझने के लिए विचारना चाहिए।

समासे च विभक्ती नापदति । इह हि विभक्तिश्रवणाश्रवणे अन्ययव्यतिरेकाभ्यां विशेपणात्योर्वास्तव्योः प्रयोजकतां भजते। ते तु प्रयायेए वाक्यसमासगतत्वेनोपालभ्यमाने समासस्य विभक्त्यश्रवणाद्विघेयाविमर्शो न्तुपाद्यतेः । अत एव समासेऽपि यदि विभक्तिः श्रूयते तदा न विघेयाविमर्शो यथा दास्या: कामुक इत्यादौ । समासस्तु तत्कैकपद्यादिग्रयोजकत्वेन कृतः ।

तर्किवन्थनो—उत्कर्ष-अपकर्ष पर निर्भर। इन प्रकार विधेयाविमर्शो का अन्वयव्यतिरेक विभक्ति

के सद्भाव और अभाव के साथ दिखलाया गया। उससे विधेयाविमर्शों और विभक्ति के अभाव का व्याप्तिन्यापकभाव वतलाया गया।

विमर्शः : विशेषणों में रहने वाले वास्तव्यो: ‘दो वास्तवों’ के स्थान पर हमें लगता है—

‘वास्तववास्तव्योः’ पाठ। होना चाहिए। इसमें वास्तव का अर्थ साभिप्राय होगा और अवास्तव अभाव निरभिप्राय । ‘वे’ का अर्थ विभक्ति का श्रवण, अश्रवण ही ठीक है। वे विधेयाविमर्श दोष

को जन्म देते हैं । इस कथन में अश्रुति यह आती है कि विभक्ति का सद्भाव तो उलटे विधेया-

विमर्शों को दूर करता है तब विभक्ति के अभाव के समान उसे भी विधेयाविमर्शो जनक कैसे

वतलाया गया ? इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि समूहालम्वन द्वारा पहले दोनों में

विधेयाविमर्शोजकता कदकर बाद में स्पष्टीकरण करते हुए समास मात्न में विभक्ति के

अभाव को विधेयाविमर्शो का कारण वतलाया गया। जैसा कि—आनन्दवर्धन ने भी—‘घोडर्थ: सदृशदृश्यः काव्यस्यात्मा व्यवस्थितः । वाच्यप्रतीयमानाभ्यां तस्य भेदावुभौ स्मृतौ’ में किया

है । इतने पर भी ‘समूहालम्वन’ का कोई अभिप्राय सिद्ध नहीं होता। इसलिए बात बनती

नहीं है । इसके लिए ‘समासस्य = विभक्त्यश्रवणात्’,—इस अंश को ‘उत्पाद्यतेः’ के बाद पढ़ना

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द्वितीयो विमर्शः २५७

चाहिए। इतने पर भी समूहालम्बन और उसके लिए पंक्ति का अन्वय आगे करना अनावश्यक है, वस्तुतः यह ग्रन्थांश साफ नहीं है।

एवञ्च सप्तप्रकारं तत्पुरुषं निरूप्याध्ययीभावं निरूपयति अव्ययीभाव इति। इस प्रकार सात प्रकार के तत्पुरुष का निरूपण कर अब अव्ययीभाव का निरूपण करते हैं—

अव्ययीभावे यथा—

'सा दयितस्य समीपेडवस्थातुं नापि चलितुमुत्सहते। हींसाध्वसरविवशा स्फुरति दशां कामपि नवोढा ।।' इति

अत्र दयितसमीपेति सम्वन्धितया यतू समोपस्य विशेषणं ततू तस्य सुकृतरातलभ्यतलक्षणामुत्कर्षमादघदूरतेरुदीपनेऽ पर्यवस्यतीति प्राधान्येन विवक्षिततत्वादुपदयितमितिवतू समीपार्थेनाव्ययेन सह समासेडवसादं गमितमू।

अव्ययीभाव में जैसे—

'वह प्रिय के पास न तो ठहर पाती है न हट ही पाती। नई वधू वह लाज और भय दोनों के मारे एक चिन्तित दशा का अनुभव कर रही है।'—यह।

यहाँ—जो 'दयितस्य' यह सम्बन्ध तत्व द्वारा—'समीप' का विशेषण है वह दयित में यह उत्कर्ष सिद्ध करता है कि वह ( दयित ) अनभिनत अच्छे कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है, अतः वह रति का उद्दीपक वन जाता है। इसीलिए वह प्रधान रूप से विवक्षित है। और इसीलिए 'उपदयितम्' इस प्रकार समीपार्थक अव्यय ( उप ) के साथ समास में रख कर अप्रधान नहीं बनाया गया।

समीपं विशेष्यं प्रति दयितस्येति यद्विशेषणं तत् तस्य समीपस्येति योजना।

'अत्र दयितस्य—तत् तस्य' इस वाक्यांश की पद योजना इस प्रकार करनी चाहिए—'समीपं विशेष्यं प्रति दयितस्येति यद्विशेषणं तत् तस्य समीपस्य'—अर्थात समीप रूपी विशेष्य के प्रति जो दयितरूपी विशेषण है वह उस समीप का***।

विमर्शः : यहाँ 'तस्य' का अर्थ 'समीपस्य' नहीं होना चाहिए अपितु तु दयित ही होना चाहिए।

प्रत्युदाहरणं यथा—

'मध्येयोम त्रिशङ्कूः शतमखविमुखः स्वर्गेसर्गे चचार'। इति

अत्र हि भगवतो विश्वामित्रस्य तपसः प्रभावप्रकर्षप्रतिपादनं प्रस्तुतमू। स च तस्य निःपकरणस्य सतः शून्ये व्योम्नि स्वर्गेसर्गसामर्थ्येनैव प्रतीपादितो भवतीति विवक्षितं, न तन्मध्यमू। तेनाविषय एवायं समासः कविना कृत इति मध्ये व्योम इति युक्तः पाठः।

प्रत्युदाहरण जैसे—

'सौ यज्ञ करने वाले इन्द्र से बिगड़ कर जिसने त्रिशङ्कु के लिए आकाश के बीच नया स्वर्ग बना दिया'—यह।

यहाँ भगवान् विश्वामित्र कि तप के प्रभाव का प्रकर्ष बताया जा रहा है। और वह बिना सामग्री के सूने आकाश में स्वर्गसृष्टि से प्रतिपादित होता है इसलिए वही [ आकाश ही ] प्रधान

१७ व्या० वि०

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रूप से विवक्षित है, न कि उसका मध्यभाग। इसलिए कवि ने [ मध्येयोमेतिस प्रकार ] यहाँ समास वेमौके किया, अतः [ यहाँ ] 'मध्ये व्योमः' ऐसा पाठ ठीक होता ।

मध्येव्योमेति 'पारे मध्ये षष्ठ्या वा ( २-१-१८ ) द्व्ययीभावः । स चेतित प्रकाशः ।

एवमियता द्वन्द्वजं समासवृत्तिरविचारिता । इदानोंमतिदेशमुखेन कृतद्धिततवृत्तिन-रूप्यते अननेनैवेत्यादिना ।

अननेनै न्यायेन कृतद्धिततवृत्त्योरपि प्रतिषेधोऽवगन्तव्यः तत्राप्युक्तमे-षण प्राधान्येतरभावविवक्षाविशेषात् ।

विवक्षाविशेषादिति कारकाग्रहणेऽपि विवक्षाविशेषात्—में ('विवक्षा अविशेषात्' इस प्रकार ) आकार—की सर्वनामद्वार्घसंधि है ।

तयोरुदाहरणं यथा—

'यः सर्वं कषति खलो, विभर्ति यः कुक्षिमेव सत्यतिथौ । यद्वा विषयं तुदति सदां, शीर्षच्छेदं त्रयोऽपि तेडहन्ति ॥' इति ।

अत्र सर्वादीनां करणादिशु कर्मभावेन विशेषणतयोपात्तानामुत्कर्ष-धायितया प्राधान्येन विवक्षितत्वाच तैः सह वृत्तौ न्यग्भावो विहितः ।

सर्वार्थेस्य भुवनाभयदानदीक्षावद्धकष्याणां बोधिसत्त्वानामपि चरितस्य बद्धनः प्राप्तिल्यात् । खलु; खलु इदमादिदोषारोपेण तदपि तेषां कषण्त्येव ।

कायोपलक्षणस्य कुक्षेः कायस्य सर्वाशुचिनिघानत्वाद्विनश्वरत्वाच । विधोक्ष सकलजगदानन्दहेतुत्वात्, कषणादिकर्तृष्वकारित्यापराधातिरेकलक्षण-मुत्कर्षमादधतां प्राधान्येन विवक्षा शीर्षच्छेदस्य च शरीरेषु निग्रहेषु तदति-रिक्तस्यान्यस्य निग्रहस्यादसम्भवात् ।

उन दोनों—( कृत और तद्धित ) के उदाहरण जैसे—'जो खल सब को दुःख देता है, जो अतिथि उपस्थि‌त रहने पर भी अपना ही पेट भरता है, और जो चंद्रमा को ग्रस्ता है—वे तीनों शिररच्छेद के पात्र हैं ।'

यहाँ 'सर्व' आदि 'कषण' आदि के प्रति कर्मभाव से ग्रहण किए गए हैं । वे उनमें उत्कर्ष का आधान करते हैं । इसलिए प्राधान्य रूप से विवक्षित हैं ।

इसलिए उनके साथ ('सर्वकषः', 'कुक्षिम्भरिः', और 'विधुन्तुदः' ) इस प्रकार कृत वृत्ति करके उन्हें गौण नहीं बनाया ।

'सर्व' शब्द के अर्थ के अन्तर्गत संपूर्ण संसार को अभय दान की दीक्षा में जो कटिबद्ध रहते हैं उन बोधिसत्त्वों के चरितों का भी संग्रह हो जाता है ।

जो खल होते हैं, वे दम्भ आदि दोष का आरोप कर उनके भी चरित को लाञ्छित करते हैं ।

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द्वितीयो विमर्शः

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यहाँ कुक्षि शरीर का उपलक्षण ( प्रतिनिधि ) है और वह सर्वथा अनुचित है और विनश्वर है ।

इस लिए ये सब कषण आदि के कर्ताओं में अकायँ करने के कारण जो अपराध सिद्ध होता है—उसमं उत्कर्ष—लाते हैं, अतः प्रधान रूप से विवक्षित है । शीरश्च्छेद भी उनमें उत्कर्ष का आधार करता है, कारण कि शरीर दण्डों में उससे बड़ा दण्ड संभव नहीं ।

सर्वे कषतीति 'सर्वकूलाभकरीषेपु कष:' ( ३-२-४२ ) इति खच् प्रत्ययः विषयः । विभर्ति यः इति 'कुक्षिम्भरिशचे'ति निपातितस्य कुक्षिम्भरशब्दस्यायं गोचरः । विधुन्तुद इति 'विधुबहु- पोस्तुद्' ( ३-२-३५ ) इति खरप्रत्ययस्थानम् । शीरश्च्छेदमिति 'शीर्षच्छेदाघ्नच्' ( ५-२-३५ ) इति तद्धितस्य यत्प्रत्ययस्येदं पदम् । तैरिति कषणादिभिः । सर्वैरथस्येति, कायोपालक्ष्यस्य कुक्षेरिति, विधोःश्रिति उत्कर्षमादधतां प्राधान्चेन विवक्ष्यत्न्यत समासस्थेन योजनीयम् । शीरश्च्छेदस्य चैति उत्कर्षमादधतः प्राधान्चेन विवचेति सम्बन्धनीयसम् । पूवव्योंडस्य पृथग्निर्देशास्त- न्तरनिर्दिष्टशुवनाभयेल्यादिचतुष्ट्यं क्रमेण हेतुत्वेन दृश्यनुम् । तदपीति चरितम् । कषणादि- कर्तृष्विति खलौदारिकराहुन्भुत्वर्थः ।

सर्वे कषतीति = 'सर्वकूलाभकरीषेपु कप:' (३।२।४२) इस सूत्र से होनेवाला खच् प्रत्यय यहाँ हो सकता है ।

विभर्ति यः—में 'कुक्षिम्भरिक्छ' द्वारा निपातनात् सिद्ध किए गए 'कुक्षिम्भरि' रूप का यह विषय है ।

विधुन्तुदः—यह 'विधुबहु- पोस्तुद्:' इससे हुए खर् प्रत्यय का विषय है ।

शीरश्च्छेदम् = यह 'शीर्षच्छेदाघ्नच्' (५।२।३५) इस सूत्र से हुए तद्धित के यत् प्रत्यय का विषय है।

तैः = कषणादि द्वारा ।

सर्वैरथ—सर्व शब्द का अर्थ कायोपालक्षण कुक्षि और विधु इनका एकवचन वाले शब्दों का 'उत्कर्षम् आदधताम्'—इस बहुवचन वाले शब्द में समूहरूप से अन्वय करके—'उनकी प्रधान रूप से विवक्षा है—इस वाक्य में अन्वय करना चाहिए ।

शीरश्च्छेदस्य—उसका सम्बन्ध भी उत्कर्षाधान करते हुए प्रधान रूप से विवक्षित है—इस प्रकार सम्बन्ध करना चाहिए ।

सर्व, कुक्षि और विधु इन तीनों पूर्ववर्तियों से शीरश्च्छेद का निरूपण अलग किया गया । कारण कि वह शब्द तद्धितवृत्ति का है ( पूर्ववर्ती तीनों कृद् वृत्ति के ) । इसलिए उसकी वृत्ति में विजातीयता है ।

यहाँ सर्वार्थोंदि जो चार शब्द हैं वे उनके द्वारा उत्कर्ष का आधान करने में—उन्हीं के तुरन्त बाद बताए गए—'शुवनाभयदानदीक्षाबद्धकक्ष्यो'०, सर्वार्थोचिनिधानत्वात् विनश्वरत्वात्, जगदा- नन्दहेतुत्वात्, ये—चार—हेतु समझे जाने चाहिए ।

तदपि—चरितम् ।

कषणादिकर्तृषु—अर्थात् खल—पेटभरू, राढु = इनमें ।

विमर्शः : सर्वकष:, कुक्षिम्भरि:, और विधुन्तुद: कहने से जो कृत् प्रत्यय द्वारा समास सा हो जाता—उससे सर्व, कुक्षि और विधु—दव जाते, फलतः खल, पेटू और राढु—में अपराध की मात्रा बड़ी साबित न होती । उनके अलग रहने से उनकी स्वगत विशेषताओं का बोध होता है

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द्वितीयो विमर्शः

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वाक्ये तु यथाप्राप्ति । तत्कृत्स्म- 'क्रियाप्रधानं गुणवदेकार्थं वाक्यमिष्यते' इति । अन्य इति वच्यसमासन्यायेन शाब्दकृत्सामर्थ्येऽपि । स इति प्रधानभावेनैव तत् निर्दिष्टः प्रधानभावः । शाब्दार्थेसामर्थ्येऽपि लक्षणतानां क्रियां ग्रामपीति शब्दकृतं शब्दसंस्कार-सहितया निष्पत्त्रं यथा कर्मंधारयाद्यस्तरपदस्य । अर्थंसामर्थ्यंकृतं वस्त्वृत्तनिष्पादितं यथा 'गृहं सम्मार्जी' त्यादौ ग्रहादे: 'तस्य संस्कार्यत्वेन वस्तुतः प्राधान्यम् । विवक्षाकृतं यथा 'रामस्य पाणिरसि' त्यादौ रामादे: । तत्र त्रिषु प्राधानेषु विवक्षाकृतमेव प्राधान्यं प्रधानम् । तद्वतत्वात् काव्यार्थंचमत्कारस्य । अत एवोक्तं तयोः समीक्षिषकाभावादिति । तयोरिति शाब्दार्थंसामर्थ्यंकृतयोः ननु पूर्वं शाब्दस्म्येव प्राधान्यस्य वैचचिकृतमुक्तम्, अन्यस्य तु वास्तवत्वम् । तत् कथं सिह शाब्दवैचचिकयो रन्यस्वसुच्यते । अन्यत्वे वा प्राधान्यत्रयप्रतिपादने डर्थंसामर्थ्यंकृतविवक्षा-कृतयोरन्यत्वसुच्यते । अन्यत्वे वा प्राधान्यानदन्यदर्थंसामर्थ्यंसुच्यते । तेन विवक्षाकृतस्य उत्कर्षवात् । तत् किमर्थेसामर्थ्यंकृतमवशिष्यते इति । नैष दोषः ; पूर्वं हि शाब्दिककेकगोच-रस्म शाब्दिकविवक्षाकृतचक्राद् वैचचिकृतस्म । अन्यस्य तु कविचरस्य वास्तवस्य तदेव-थंत्वम् । इहं पुनः सहृदयैकगोच-चरस्य कविविवक्षावशादैचचिकृतसुच्यते । शाब्दिककेविषयस्य शाब्दत्वोमित्यपपि भिद्यते । पूर्वस्मिवन्न विरोधः ।

यदपि प्राधान्यत्रयप्रतिपादने डर्थंसामर्थ्यंकृतविवक्षाकृतयोर्भेद उत्कततग्रयं भावः—इहं शब्दं वास्तवं चेति द्विधीभावेन प्राधान्यम् । वास्तवल्वस्य च विवचानपेचत्वेन वस्तुसामर्थ्यंप्रयोजकाधीनत्वादर्थंसामर्थ्यंकृतत्वमुक्तम् । सत्यपि शब्दकृतादन्यस्मव उत्कर्षोपकर्षंप्रति-पादनप्रयुक्तनिविवक्षाकृतत्वे वास्तवल्वमेव विवक्षाकृतं प्रतिपादितम् । तथा च 'गृहं सम्मार्जी' इति वैदिकं विवचानपेचमर्थंसामर्थ्यंकृतस्योदाहरणं दत्तमिति विषयविभागद्यव्यवस्थितेन् द्विती-न्योऽपि विरोध इति समञ्जसं सर्वम् ।

वाक्ये तु यथाप्राप्ति = जैसे कहा है—जिसमें क्रिया प्रधान हो जो अप्रधान कारकों से युक्त हो और सभी शब्दों का अर्थ परस्पर समन्वित हो वह वाक्य कहलाता है ।

अन्य इति—आगे कहे जाने वाले ढंग से अन्य का अर्थ है—शब्दकृत सामर्थ्य ।

स—वह अर्थात् 'प्रधानभावेन' इसमें बतलाया गया प्रधानभाव ।

शाब्दार्थंसंस्कृकृत—शब्दकृत प्राधान्य अर्थात् शब्द-संस्कार से उत्पन्न प्रथानता जैसे कर्मंधारय से उत्तरपद की । अर्थसामर्थ्यंकृत प्राधान्य अर्थात् वस्तु की स्थितिविशेष से निष्पादित प्रथानता—

जैसे—'घर में झाड़ू देता है' इत्यादि में घर आदि का । उस ( घर आदि ) की प्रथानता संस्कार्य होने से वस्तुनित । विवक्षाकृत—प्राधान्य—जैसे—'रामस्य पाणिरसि' इत्यादि में राम आदि का ।

इन तीनों प्रथान्यों में विवक्षाकृत प्राधान्य ही प्रधान प्राधान्य है । कारण कि काव्यार्थ में चमत्कार उसी से आता है ।

अनय दो का अर्थ है = शाब्दसामध्यंकृत और अर्थसामध्यंकृत । इन दोनों का अप्राधान्य जिससे है उस तृतीय विवक्षाकृत प्राधान्य को जो अपने आप हो जाता है ।

शंका होती है कि—'पहले तो [ १७३ तथा २३० पृष्ठ पर ] शब्दसामध्यंकृत प्रथानता दो ही विवक्षा-कृत प्रथानता बतलाया है अर्थंकृत प्राधान्य को दास्तिक ( अर्थात् इच्छा न होने पर भी होने वाला )

तो यहाँ शब्दकृत और विवक्षाकृत प्राधान्यों में भेद कैसे बतलाया जा रहा है । भेद होने पर भी अर्थंकृत प्राधान्य और विवक्षाकृत प्राधान्य में अन्तर क्या ?

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व्यक्तिविवेकः

शाब्दकृत प्राधान्य से भिन्न प्राधान्य एकमात्र अर्थ का प्राधान्य होता है । उसमें विवक्षाकृत प्राधान्य अन्वितभूत हो जाता है । तो अर्थसामर्थ्यंकृत प्राधान्य ( विवक्षाकृत प्राधान्य से भिन्न ) रह ही क्या जाता है ।

( उत्तर )—यह दोष नहीं बनता । कारण कि पहले जो विवक्षाकृत प्राधान्य बतलाया गया है वहाँ की विवक्षा में और यहाँ की विवक्षा में भेद है । वहाँ की विवक्षा व्याकरण के विद्वान् की विवक्षा है इसलिए केवल वैयाकरण तक वह सीमित है । यहाँ की विवक्षा कवि की विवक्षा है । वह सहृदयजनो से संबंधित है । जहाँ शाब्दिक, वैयाकरण की विवक्षा होती है वहाँ उससे भिन्न कवि-विवक्षाकृत प्राधान्य ही वास्तविक प्राधान्य है । वही अर्थतः प्राप्त प्राधान्य है । इसलिए एकमात्र शाब्दिक की विवक्षा का विषय होने से यहाँ प्राधान्य शब्द माना गया है । इस प्रकार विवक्षागत अपेक्षा के भेद से प्रथम जो विरोधरूप दोष है, वह नहीं बनता ।

तीन आधारों में से अर्थकृत प्राधान्य और विवक्षाकृत प्राधान्य—में जो भेद बतलाया गया है—उसमें प्रस्तुतः रहस्य यह है कि—वस्तुतः वाक्यमय में प्राधान्य दो प्रकार का ही है—शब्द और वास्तविक । इनमें जो वास्तविक है उसे विवक्षा की अपेक्षा नहीं होती वह वस्तु-सामर्थ्य से आता है अतः उसके अधीन है । इसलिए वह अर्थसामर्थ्यकृत कहा गया है । इनमें वास्तविक भी दो प्रकार का होता है । विवक्षाज्ञानपेक्ष और विवक्षासापेक्ष । विवक्षा का अर्थ है—उत्कर्ष-अपकर्ष के आधार की इच्छा । ‘गृहं संमार्ष्टि’ जो यह उदाहरण दिया नया है, वह उत्कर्ष-अपकर्ष की विवक्षा से शून्य शुद्ध वास्तविक अर्थकृत प्राधान्य का उदाहरण है, कारण कि वह वैदिक प्रयोग है । इस प्रकार वास्तविक प्राधान्य में भी विषय-विभाग में भी व्यवस्था बन जाती है, अतः दूसरा दोष भी कोई महत्व नहीं रखता ।

एवं कृतकथितदृष्टिविषये आतिदेशिकं गुणप्रधानभावं विचार्य समासगतत्वेनौपदेशिकं प्रकृतमनुसन्धत्ते तदिदमत्रेतिते ।

इस प्रकार तद्धित वृत्तियों में प्रसङ्गागत गुण-प्रधानभाव पर विचार कर प्रकृत समाससक्त की ही ओर ध्यान दिलाते हैं—‘तदिदमत्र’ इत्यादि द्वारा—

तदिदमत्र तप्तः कश्चिदपि प्रधानतया विवक्षितो न त्वद्यियपेक्ष-तरेण सह समासमहंतीति । इतरेतु विशेष्यमप्यद्यैव वस्तु न तत्र नियमः । तेन द्वन्द्वपदानां सरूपाणां च पदनार्यस्यैकत्वेन्योऽन्यं विशेषणविशेष्यभावाच्चेदपि यदा प्रत्येकं क्रियाभिसम्बन्ध्योपगमलक्षणं प्राधान्यं विवक्षिते तदा तेषामपि समास एकशेष नेष्टत एव । यथा—

‘किमझनेनायतलोचनाया द्वारेग किं पीनपयोधराया: । पर्याप्तमेतन्नु मण्डनं ते रूपं च कान्तिश्च विदग्धता च ॥’ इत्यत्र रूपादीनां प्रत्येकं मण्डनक्रियाभिसम्बन्धृतं प्राधान्यं रत्युद्दीपनपयँवसायि विवक्षितामिति न तत् तेषां समासेऽवसादितम् । यथा च—

‘यान्त्या मुहुर्लितकन्धरमन्ननं त- दाकृष्टवक्रान्तरातपत्रनिभं वहन्त्या । दिग्घोडमृतेन च विषेण च पक्षमलाक्ष्या गाढं निषिक्त इव मे हृदये कटाक्ष: ॥’ इति ।

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द्वितीयो विमर्शः

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तो इस प्रसंग का तात्पर्य यह निकला कि जो भी कोई किसी भी तरह प्रथानरूप से विवक्षित हो वह दूसरें के साथ समास में नहीं डाला जा सकता । और यह भी कोई नियत नहीं है कि दूसरा विशेष्य ही हो । वह और भी कुछ हो सकता है । इस नियम के अनुसार द्वन्द्व पद और सरूप पदों के अर्थ में विशेषण-विशेष्यभाव न होने पर भी जब क्रिया के साथ संबन्ध को विवक्षा-रूप प्रथानता विवक्षित हो तो उनका भी समास और एकत्नों नहीं माना जाता । जैसे—

तुम्हारी आँखों में विशालता है अतः अब अज्ञान नर्थ है ( इस भाँति ) तुम्हारे स्तनों में स्थूलता है अतः हार अनावश्यक है । अन्य आभूषण भी अपेक्षित नहीं कयोंकि सुडौल अंग ( रूप ) चमक और सिदग्धता तुम्हारे पास है ही ।

यहाँ रूप आदि प्रत्येक का एक मण्डन-क्रिया से संबन्ध दिखलाया गया है अतः उससे उनकी प्रथानता सिद्ध होती है । वह रति के उद्दोपन के लिए यहाँ विवक्षित भी है । इसलिये उन रूप आदि को यह प्रथानता उन्हें समास में डालकर नष्ट नहीं की । और जैसे—

वह—उलटे कर तिरछे किए गए वृन्त पर लगे षटदल कमल के समान अपना चेहरा गर्दन कुछ टेढ़ेाकर के मेरे ओर किए जा रहा था । उस घनी वरौनी बालों पलकों की आँखों से युक्त सुन्दरी ने अमृत और विष से बुझा अपना कटाक्ष मेरे हृदय में बुरे तरह गड़ा दिया है ।

सरूपाणामिति द्वन्द्वसमाससममानन्यायात्वादेकशेषवृत्तिरपि स्वीकारता । विशेषणविशेष्य-भावाभावेऽपि समासोऽत्र नैकायां प्रायग्रहणप्रयोजनं प्रकाशयति ।

रूपं च कान्तिक्श विदग्धता वेति, अमृतते विषेणेति च अभिहितानभिहितकर्तृंविभागेनोदाह-

रणद्रयम् । रूपमित्यादौ हि गम्यमानसवनक्रियापेक्षं रूपादीनां कर्तृत्वम् । पततेन तत्पुरुष-

वस्य कर्तृन्दाहणप्रस्तावे कर्तृादीनां कारकाणाम् अनेकेषामिति यदुक्तं, तत् समाहतम् ।

सरूपाणामिति—द्वन्द्व समास के समान होने से एकशेष वृत्ति भी अपना ली गई है ।

विशेषणविशेष्यभावाभावेऽपि—इससे समास वाले इस प्रकरण के आरम्भ में जो प्रायः शब्द कहा है उसका प्रयोजन स्पष्ट किया ।

रूपं च कान्तिक्श—एक यह द्वन्द्व समास है जो दो उद्दारण के लिए है । इसमें एक [ प्रथम ] में कर्ता का उल्लेख नहीं है, दूसरे में है । रूपम्—इत्यादि में ऊपर से आने वाली 'भू' भवन (होना) क्रिया को लेकर रूप आदि कर्त्ता हैं । इससे तत्पुरुष के कर्ता के उदाहरण-

के प्रसंग में 'कर्त्तृ-आदि अनेक कारकों का' इत्यादि जो कहा है उसका समाधान किया ।

एकशेषे यथा—

'प्राप्तावेकरथारूढौ पृच्छन्तौ त्वामितस्ततः ।

कश्व कश्व ?

अर्जुनश्व स कर्णारि: स च कू(कृ)पोदर: ॥'

प्रत्युदाहरणमेतदेव कृतेऽकरोषमवगन्तव्यम् ।

एक शेष में जैसे—

'तुम्हें इधर-उधर पूछते हुए एक ही रथ पर बैठे वे दोनों आए ।

[ प्रश्न ] कौन कौन ?

[ उत्तर ] कर्ण का शत्रु वह अर्जुन, और वह कॄप भीम ।

यही उदाहरण एकशेष कर देने पर प्रत्युदाहरण समझा जा सकता है ।

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२६८

व्यक्तिविवेकः

कक्ष करचेचति । अतैकशेषो न कृतः । कृतैकशेषमिति काविति प्रयोगे । अश्रुनातप्रधानेतरभावाप्त्तिदर्शयति यत्र पुनरिति ।

कक्ष कक्ष = यहाँ एकशेष नहीं किया ।

कृतेकशेषम्—अर्थात ‘कौ’ इस तरह प्रयोग करने पर ।

अब प्रधानेतरभाव में छूट दिखलाते हैं—यत्र पुनः इत्यादि द्वारा—

यत्र पुनरेष प्रधानेतरभावो न विवक्षितः स्वरूपमात्रप्रतिपत्तिफलश्र विशेषणविशेष्यभाववस्तु समासासमासयोः कामचारः । यथा—

‘स्तनयुगमश्नातं समीपतरवर्ति हृदयशोकाग्रे । चरति विमुक्ताहारं व्रतमिव भवतो रिपुश्रीणाम् ॥’

इत्यत्र तु भवत इति रिपुश्रीणामिति च रिपुश्रीणां स्तनयुगस्य च सम्बन्धित्वेन यद्विशेषणं न तत्स्तेषामुल्लङ्कर्योगः कश्रिद्दिविवक्षितः;, अपि तु तत्सम्बन्धप्रतीतिमाचम् । तच्च व्रतमिव भवदरिवधूसतनद्वितयमित्यतः समासादपि तुल्यमेव । यथा चात्रैव रिपुश्रीणामिति रिपुसम्भन्धमात्रप्रतीतेः श्रीणामिति ।

जदाँ यह प्रधानेतरभाव विवक्षित नहीं होता विशेषण-विशेष्यभाव केवल स्वरूप मात्र की प्रतीति कराता है, वहाँ समास करना न करना अपनी इच्छा पर है । जैसे—

‘आपकी दाढ़-शिखियों के दोनों स्तन व्रत सा कर रहे हैं । वे आँसू से नहाए हुए हैं । हृदय शोक की अभि के अत्यधिक समीप हैं ‘और विमुक्ताहार ( विमुक्त = त्यक्त आहार वाले, मुक्ताहार विरहित ) हैं ।’

यहाँ जो रिपुषी के प्रति भवतः और स्तनयुग के प्रति रिपुश्री—सम्बन्धी रूप से—उपस्थित किए गए हैं उससे उनका कोई उल्लेख बतलाना अभीष्ट नहीं है । केवल उनकी सम्बन्ध भर की इससे प्रतीति होती है । वह सम्बन्ध-प्रतीति ‘व्रतमिव भवदरिवधूसतनद्वितयम्’ इस समास से भी उसी स्तर की होती है । जैसा कि उसी पद्य में—रिपुश्रीणाम् में भी के साथ रिपु का सम्बन्ध मात्र अभीष्ट है और समास भी प्रतीत हो रहा है ।

भवत इति रिपुश्रीणां सम्बन्धित्वेन, रिपुश्रीणामिति च स्तनयुगस्य सम्बन्धित्वेनेति योजनां । रिपुश्रीणामिति समासस्योदाहरणम् । न चात्र सम्बन्धमात्रादतिरिक्तं प्रतीयते ।

रिपुश्रीणामिति समासस्योदाहरणम् । यहाँ समास से सम्बन्ध के अतिरिक्त कुछ भी प्रतीत नहीं होता ।

चिनोत्तकर्षापकर्षाभ्यां स्वदन्तेऽर्थौ न जातुचित् । तदर्थमेव कवयोऽलङ्कारान् पर्युपासते ॥ १४ ॥

तौ विधेयानुवाद्यत्वविवक्षैकनिबन्धनौ । सा समासेऽस्तमायातीयसकृत् प्रतिपादितम् ॥ १५ ॥

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द्वितीयो विमर्शः

२६४

अत एव च वैदर्भीरीतिरेकैव शस्यते । यतः समाससंस्पर्शोस्तत्र नैवोपपद्यते ॥ ३८ ॥ सम्बन्धमात्रमर्यादां समासो ह्यावबोधयेत् । ot्कर्षापकर्ष वा—

यथा— 'ऊर्ध्वांकिततापरालितेन सुश्लालवक्त्रजीवत्कपालचयमुक्तमहाहृदहास- सन्त्रस्तसुमुग्धगरिजाचलिताक्षसङ्गहृदयं वपुर्जयति हारि पिनाकपाणेः ।' इति ।

उत्कर्ष और अपकर्ष के बिना पदार्थ कदापि चमत्कारी नहीं लगते । उस चमत्कार के लिए ही कविजन अलंकारों का प्रयोग करते हैं । वे ( उत्कर्ष-अपकर्ष ) विषय और अनुबाद रूप से की गईं विवक्षा पर निर्भर होते हैं । और वह ( विवक्षा ) समास में डूब जाती है यह कई बार बतलाया जा चुका । इसलिए एक वैदर्भी रीति ही अच्छी मानी जाती है । क्योंकि उसमें समास का स्पष्ट भी नहीं रहता । समास तो अर्थों का सम्बन्ध भर बतला सकता है । उत्कर्ष-अपकर्ष को नहीं । जैसे—

तदर्थमेवेति उपमोत्रेक्षादयोऽप्यलङ्कारा: उपमेयोत्रेक्ष्यादौ मुक्तकपेमपकपं वा प्रति- पादयितुं विधेयन्ते । अन्यथा तद्विरचनं निष्प्रयोजनं स्यात् । तौ विधेयेति । उत्कर्षापकर्षौ । सा समास इति विवक्षा परामृश्यते । वैदर्भीति यद्यपि वामनमते असमासा पाञ्चाली, मध्यसमासा तु वैदर्भी, तथापि मतान्तरे विपर्ययः स्थित इति तदभिप्रायेणेहासमासा वैदर्भी कथिता ।

तदर्थमेवेति—उपमा उत्प्रेक्षा आदि अलंकार उपमेय और उत्प्रेक्ष्य ( संभावना विषय ) आदि के उत्कर्ष या अपकर्ष के प्रतिपादन के लिए रचे जाते हैं, नहीं तो उनकी योजना निरर्थक हो जाय । तौ विधेयेति—उत्कर्ष और अपकर्ष । सा समास—यहाँ ('सा' इस सर्वनाम द्वारा ) विवक्षा का परामर्श किया जा रहा है । वैदर्भीति—यद्यपि ( रीतिसंप्रदायप्रवर्तक ) वामन के अनुसार समास का अभाव पाञ्चाली में होता है और वैदर्भी में छोटे-छोटे समास, तथापि कुछ मतों में इससे उलटा भी है । यहाँ उन्हीं ( मतों ) के अनुसार वैदर्भी को समासरहित कहा गया है ।

विमर्शः : वामन ने वैदर्भी रीति के दो भेद माने हैं—१. शुद्ध वैदर्भी और २. सामान्य वैदर्भी । इनमें 'समास का अभाव होने पर वैदर्भी को शुद्ध वैदर्भी कहा है । तथा गौड़ी और पाञ्चाली की छटा वाली वैदर्भी को सामान्य वैदर्भी । मूलकार का इंगित शुद्ध वैदर्भी की ओर है, अतः मतान्तरों का आधार लेना अनावश्यक है । [ त० का० सू० वृ० १।२।११, १९ ] सामान्य शब्द हमने जोड़ा है ।

कारिकामध्य एव सम्बन्धमात्रप्रतीतौ समासस्योदाहरणम् । ऊर्ध्वाक्षितापेति । अत्र चतुर्थपादेर्देशयुक्कस्य पादत्रयस्य समासे सम्बन्धमात्रं प्रतीयते नोत्कर्षापकर्षौ ।

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वाक्यार्थभयमप्यदः ॥ ९७ ॥

यथा—

'न्यक्कारो हयमेव मे यदरयस्तत्राऽप्यसौ तापसः सोडप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः । थिग् थिक् शक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन वा स्वर्गग्रामघटीकविलुठननृत्योत्सवच्छुने: किमेभिर्मुंजैः ॥'

'वाक्य से तो ये दोनों ही प्रतीत हो जाते हैं । यथा— पहला अपमान तो मेरा यही है कि मेरे भी शत्रु हैं, तिस पर भी यह तपस्वी ( मेरा शत्रु है ) और वह ( तपस्वी ) भी यहीं ( मेरे क्षेत्र में ) राक्षसकुल को मारता जा रहा है । आश्चर्य है कि इतने पर भी रावण जीता बचा है । इन्द्र के विजेता मेघनाद को धिक्कार है । जगाये गये कुम्भकर्ण से भी क्या और स्वर्ग रूपी गाँवड़े को लूटने से कृत्या मोटी मेरी इन भुजाओं से भी क्या ?

वाक्यार्थभयमिति । उभयं सम्बन्धधरुपसर्गापकार्षरूपं च वस्वर्थः । अत्रोदाहरणं मे यदरय इति । समासे हि मदर्थ इति स्थिते । न चास्मादितिच्छायः प्रतीतः । ननु पदादुतरपदयोर्युष्मदस्मदादेशो: 'तेमयावेकवचनस्य' ( ८-१-२२ ) इति तेमया-वेदेशाहुक्तौ । न चात्र पदात् परोऽस्मच्छब्दः । एतशब्दः पदमिति चेत् । तत्पयोगे 'नंच-निपाताद् युष्मदस्मदादेशः' । एतेन 'नैव 'मे' इति व्यतिरिक्तं पदान्तरमिति' प्रयुक्तम् । उत्तरपद एव मे इति शब्दादेशः ।

अत्र केचिदाहुः वाच्ये तावद्रसप्रतीतिरिनिर्नीयूढा । तामनुपमर्दयेन काव्ये यद्यसाधुशब्दोऽपि स्याद् तदा स्थूलः कश्चिद् दोषः । काव्ये हि रसप्रतीतिः प्रधानम् । तदनिवार्हे काव्यमेव न स्यात् । अपशब्दप्रयोगे तु लचणास्मरणमात्रं तदुक्तम्—

'नीरसस्तु प्रबन्धोऽथ योः सोडपशब्दो महान् कवे: । स तेनाकविरेव स्यादन्यास्मृतलक्षणः ॥' इति ।

अन्ये त्वाहुः । भवतु रसापेक्षयापशब्दस्य स्वल्पदोषत्वं तथापि महानकवीनामपशब्दप्रयोगो योगो महान् दोषः । तेनात्र 'ते-मेऽशब्दौ निपातेपि' इति सहशो विभक्तिप्रतिरूपको मेऽशब्दो निपातः, यथा—अहन्ता अहंयुरित्यादौ 'अह' शब्दः । तत्स्थ नात्र कश्चिद् विशेष इति ।

वाक्यार्थभयमप्यदः—उभय अर्थात् सम्बन्ध और उत्कर्षापकर्ष रूपी पदार्थ । इसमें उदाहरण है 'मे यदरयः' । समास में तो 'मदरय:' इस प्रकार का रूप होता और इससे विशेषता की प्रतीति नहीं होती । ( शंका ) युष्मद् और अस्मद् शब्द जब किसी पद से परे होते हैं तब 'तेमयावेक-वचनस्य' सूत्र के अनुसार उनके स्थान पर 'ते' और 'मे' आदेश होते हैं । यहाँ—'० ० मे यद् ० ० ' में अस्मद् शब्द पद से परे नहीं है । 'एत' शब्द पद है—तैसा यदि कहा जाय तो भी बात नहीं बनती, कारण कि एक तो 'नचवाहाहैवयुक्ते' सूत्र द्वारा 'च वा हा ह एव' इन पाँच के योग में 'ते मे' आदेश की मनाही की गई है और दूसरे 'एव' दूसरे वाक्य में है, 'मे' से नया वाक्य शुरू होता है । वाक्य यदि एक ही हो तो उसमें पद से परे युष्मद् और अस्मद् को 'ते मे' आदेश निपातन से होते हैं । इसीलिये यह भी बात नहीं उठती कि 'मे' यहाँ एक स्वतन्त्र पद है । 'मे' शब्द एक आदेश द्वारा बना शब्द है, वह आदेश सदा उत्तरपद में होता है ।

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द्वितीयो विमर्शः

२६७

इस विषय में कुछ लोगों का कहना है कि [इस पद्य के] वाच्यार्थ (या वाक्यार्थ) में रस की प्रतीति (अनुभूति) का निर्वाह किया गया है; उसकी रक्षा में यदि काव्य में कोई असाधु (व्याकरण से असिद्ध) शब्द भी आ जाये तो कोई बड़ा दोष नहीं होता। काव्य में प्रधान होती है रस की प्रतीति। बिना उसके निर्वाह के काव्य काव्य ही नहीं होता। अपशब्द के प्रयोग में केवल इतना ही होता है कि लोग कवि का नाम रखते हैं।—कहा भी है—नीरस रचना कवि की बहुत बड़ी कुचोंति है। उससे तो वह कवि 'हीन' न हो, जिससे दूसरे नाम न रखे !

दूसरे लोग कहते हैं—यह ठीक है कि रस को सुरक्षित रखने के लिये किया गया अपशब्द का प्रयोग कुछ ही दोषपूर्ण होता है, इतने पर भी जो महाकवि हैं उनके लिये ऐसे शब्दों का प्रयोग बहुत ही बड़ा दोष है। इसलिये यहाँ यह मानना उचित है कि 'ते मे शब्दौ निपातिथ्य:' इस नियम के अनुसार 'मे' शब्द और यहाँ विभक्तिप्रतिरूपक अव्यय है। वह निपात से सिद्ध है, जैसे 'अहंता' और 'अहंयु' आदि शब्दों में अहं। इसलिये यहाँ कोई खास बात नहीं।

विमर्शः अस्मद् शब्द को 'मे' बना दिया जाता है जब वह वाक्य के बीच में आता है। किन्तु यदि च, वा, हि और एव के साथ आता है तो 'मे' नहीं होता। यहाँ 'न्यक्कारो ह्यायमेव यत्' में 'मे' शब्द 'मव' के साथ है और भिन्न वाक्य में है। 'मे यदर्य:' यह इस इलोक का दूसरा वाक्य है। अपने में पूर्ण है। उसके बीच में न आकार यह शब्द उसके आरम्भ में आया है, अतः ठीक नहीं है! उत्तर में यह कहा गया है कि काव्य में प्रधान वस्तु है रस। इस पद्य में उसका निर्वाह भलीभाँति हुआ है अतः इतना दोष नगण्य है। यह भी उत्तर दिया जाता है कि वस्तुतः यहाँ जो 'मे' शब्द आया है वह एक स्वतन्त्र शब्द है, अस्मद् का स्थानापन नहीं, जैसे 'अहंयु' में अहं शब्द स्वतन्त्र होता है। इस प्रकार कोई दोष नहीं उठता।

हमारी दृष्टि में दो समाधान आते हैं—एक तो यह कि वस्तुतः 'न्यक्कारोऽ' पद का अन्वय वाक्य इस तरह का बनता है—न्यक्कारो हि अयमेव यत् अरयः—धिक्कार की बात तो पहले यही है कि मेरे भी अरयु हैं। इसमें 'यत्' यह वाक्ययोजक अव्यय है, इससे 'न्यक्कारो ह्यायमेव' और 'मे अरय:' दोनों वाक्य सम्बन्धित वाक्य होकर एक बन जाते हैं।—जैसे—'विषं मुहुक्ष्व मा चास्य गृहे मुख्या:' में पक्वाक्यता 'च' के आधार पर काव्यप्रकाश (५ उदाहरण) में मानी गई है। दूसरे यह कि भाषाविज्ञान की दृष्टि से 'मे' शब्द अस्मद् का विकार ने मानकर स्वतन्त्र भी माना जा सकता है। यह आग्रह अपने मान्य नहीं कि अत्यन्त विकृत रूप शब्द किसी से उत्पन्न मान लिया जाय। आदेश का अर्थ ही यह है कि एक शब्द के स्थान पर दूसरे शब्द का हठात् प्रयोग। यदि 'मे' शब्द स्वतन्त्र न होता और वह सार्थक न होता तो वह किसी स्थान पर लाया ही कैसे जाता। बात रही प्रयोग की—कि उसका ('मे' का) प्रयोग वाक्य के आरम्भ में नहीं होना चाहिये तो इसका उत्तर 'विषं मुहुक्ष्व' वाली पद्यति से मिल जाता है। आगे बढ़कर यह भी कहा जा सकता है कि रावण जो इसका वक्ता है वह आविष्ट है। आविष्ट के कथन में दोष रसापकर्षक नहीं प्रत्युत चमत्कृतिजनक होते हैं।

इस प्रसङ्ग में यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि व्य० व्याख्यान में—'अपशब्दप्रयोगे तु लक्षणास्मरणमात्रत्र—'धिक्कार प्रमाणरूप से ध्वनि-कारिका 'नीरस्तस्तु प्रयोऽ यो:'*** प्रस्तुत की गई है। इनमें दोनों का कोई सम्बन्ध नहीं। कारिका में अपशब्द का अर्थ गाली है। मूल में अपशब्दों का प्रयोग—अशुद्ध शब्द के लिये है। ध्वनिकारिका में लक्षणास्मरण (नामरखाई से बचाव) को नीरस कवि के लिये काव्य न बनाने में गौरवास्पद तथ्य बतलाया गया है। उसका अपशब्द से सम्बन्ध नहीं है।

कि सर्वासमनाकरणस्य दुष्टस्वमेव ? नेत्याह किन्त्वति।

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क्या समास करना हर हालत में दोषावह हो है ? 'किन्तु' इत्यादि द्वारा इस प्रश्न का नकारात्मक उत्तर देते हैं—

किन्तु प्रवृत्तिरेतस्य रसाभिव्यक्तियपेक्षया । शान्तशृङ्गारकरुणानन्तरेण प्रशस्यते ॥ १८ ॥

यतः समासो वृत्तं च वृत्तयः कौशलस्थितः । वाचिकाभिनयात्मकत्वाद्रसाभिव्यक्तिहेतवः ॥ १९ ॥

स चाधीतावधि: कायों नाधिको गद्यताश्रितः । gद्ये हि वृत्तवैकल्ये न्यूनातद्रयक्तिहेतुता ॥ २० ॥

यथानन्तरोक्त उदाहरणे । तस्याचिच्छन्नः पदार्थानां समन्वयश्च्छेदत् परस्परम् । न विच्छेदोऽन्तरा कायों रसभङ्ककरो हि सः ॥ २१ ॥

इत्यन्तरश्लोकः ।

यथा— 'माद्यहिंर्गजगण्डभित्तिकर्षणैर्भृङ्गप्रसववन्दनदन!' इति अत्र हि शृङ्गद्रवचन्दनदन इति युक्तः पाठः । कचाऽप्ययमपि पाठो दृश्यते ।

किन्तु इस ( समास ) का प्रयोग शान्त, शृङ्गार, करुण रसों में ) अच्छा माना जाता है । इसलिये कि ऐसा ही करने पर रस की अभिव्यक्ति होती है ।

[ अर्थात् शान्त आदि में समास न करने से रस की अभिव्यक्ति होती है और वीर आदि में समास करने से ] कारण कि समास, छन्द (कौशिकी, उपनागरिका आदि ) वृत्ति और काकु ये रस की अभिव्यक्ति के हेतु हैं, कारण कि यह वाचिक अभिनय के अन्तर्गत आते हैं ।

और वह [ समास भी ] आधे पथ तक करना चाहिये [ अर्थात् द्वितीय और तृतीय चरण में नहीं, प्रथम और द्वितीय तथा तृतीय और चतुर्थ चरण में ही समास किया जाना चाहिये ] कारण कि [ वैसा न करने से श्लोक एक प्रकार से ] गद्य सा बन जाता है । गद्य में छन्द नहीं रहते, इसलिये उस ( छन्द ) से होने वाली रस की अभिव्यक्ति में एक कारण कम पड़ जाता है । जैसा कि अभी-अभी दिये उदाहरण [ऊर्ध्वावचिताप**] से स्पष्ट है । यदि समास से उस [ में आए पदों के अर्थों ] के समन्वय आपस में न टूटते हों तो उस ( समास ) को बीच में न तोड़ना चाहिये । वैसा करना रसभङ्ककर होता है । जैसे:—

'माद्यहिंर्गजगण्डो'[ इत्यादि में ] अर्थात् मदमाते दिग्गजों के कपोलतल के घर्षण से टूटे और रस चुआते हैं चन्दन जहाँ । यहाँ 'शृङ्गद्रवचन्दनदन:' इस प्रकार पाठ चाहिये । कहीं-कहीं यह पाठ भी देखा जाता है ।

एतस्य समासस्य । सन्निवेशित विरार्द्धादिसमासेन प्रकाशयित्वा । वृत्तं वसन्ततिलकादि । वृत्तयः कौशिक्याद्या उपनागरिकायाश्च । काकु: काककथ्यायिल- श्लोकापेच्छया अर्थान्तावधि: । न्यूनेऽति पद्यापेच्छया न्यूनं रसाभिव्यक्तिहेतुत्वमिस्यर्थः ।

यथा पूर्वोक्त इति 'ऊर्ध्वावचिताप*'यादौ । समासोऽर्धान्तावधि: कायों नाधिक इत्यनेन व्याव- हारिकाभिनयो वार्णिकारूपोऽनुभावः । अर्थान्तावधिरिति श्लोकापेच्छया अर्थान्तावधि: इति ।

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द्वितीयो विमर्शः

२६९

तस्याधिकारस्य तदुदाहरणम् । तस्येति पदार्थानां परस्परसम्बन्धशून्ये विच्छिन्न्यचते तदा तस्य समासस्थ मध्ये विच्छेदो न कार्य इष्यर्थः ।

एतस्य = इसको = समास की ।

अन्तरेण—वीर रौद्र आदि समास से ही अभिव्यक्त होते हैं इसलिये ।

वृत्तम् = वस्तुतिलक आदि छन्द ।

वृत्तयः = कैशिकी और उपनागरिका आदि ।

काकुः = ( भरतनाट्यशास्त्र के ) काकु अध्याय में बतलाया गया, या फिर स्वरगत अथवा उच्चारणगत विशेषतास्वरूप ।

वाचिकाभिनयः—एक अनुभव जो उच्चारण तथा वाक्प्रयोग की विशेषता से अभिन्न माना जाता है ।

अर्थान्तरावधि—श्लोक में आधा अंश = ( समास की ) अन्तिम सीमा । अर्थात् पूर्वार्ध का समास जहाँ नियमतः समाप्त हो जाता है, आगे नहीं बढता ।

न्यूनेन—श्लोक वाक्य में छन्दः से होनेवाली रसाभिव्यक्ति की कमी [ अर्थात् श्लोकवाक्य = रस की अभिव्यक्ति कई कारणों से करता है । उनमें छन्द भी एक है । तारों चरणों में एक ही समास होने से छन्द का छन्दःत्व नहीं रहता । अतः वाक्य में रसाभिव्यक्ति का एक हेतु समाप्त हो जाता है । उतने अंश में वाक्य में रसाभिव्यक्ति के प्रति क्षमता की कमी रहती है । ]

यथापूर्वोक्त—जैसे—उद्बुद्धक्षिताप—इत्यादि श्लोक में । वह उदाहरण समास की अधिकता का, जिसका व्यावर्त्तन = सिपेध ०—‘समासोऽध्वान्तरावधि: कार्य:, नाधिकः’ इसके द्वारा किया गया है ।

तस्य—यदि पदार्थों का पारस्परिक सम्बन्ध टूटता न हो तो उस समास का बीच में विच्छेद नहीं करना चाहिये ।

विधेयत्वं चैतत् प्राधान्योपलक्षणमध्यभिचारात् । ततत्स्व प्रधाना-विमर्शोऽपि दोषतयावगन्तव्यः । यथा—

‘रत्नैः समापिवति कज्जलमदालिनीं सखीं न गृहाण द्रवति पात्रमधः करोति । योजय कृष्णकणसंभृततात्मा दीपः प्रकाशयति तत्तमसो महत्त्वम् ॥’

अत्र हि प्रकाशनक्रियाया पव प्राधान्यविवक्षा नान्यासामिति तासां तत्समशेषिकया निर्देशो दोष एव । स हि तत्र शत्रादिभिरेव वक्तुं न्य-यो नाख्यातेन । यथा—

‘विभ्राणः शक्तिमाशु प्रशमितबलवत्तारकौजित्यगुर्वां कुवलयललिताधः शशिनमपि लसच्चन्द्रकोप्तिविभासम् । आधेयादन्धकारे रतिमतिशायिनीमावहन् वीक्षणानां वालो लक्ष्मीमपारामपर इव गुहोदहरप्तेरतपो वः ॥’ इत्यादौ ।

और यह जो विधेयत्व है वह प्राधान्य का उपलक्षण है । कारण कि ऐसी बात नहीं देखी जाती

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२७०

व्यक्तिविवेक:

कि जहाँ प्राधान्य हो वहाँ विधेयत्व न हो । इसलिये—प्रधान पदार्थ का प्रधान रूप से उपस्थित न होना भी दोष मानना चाहिये । जैसे:—

'स्नेह ( तैल और प्रीति ) को पीता है । कज्जल = कालिख चढ़ाए रहता है, गुणनाम की चीज ( वत्ती और शील आदि गुण ) को पूर्णरूप से जला डालता है और पात्र ( बरतन और योग्य व्यक्ति ) को नीचे रखता है ! इस प्रकार आग के कणों से बना जो यह दीपक प्रकाश करता है वह महत्त्व है—तम का ।

यहाँ प्रकाशान् क्रिया की ही प्रथानता विवक्षित है, अन्य क्रियाओं को नहीं । इसलिये उन क्रियाओं का उस ( प्रकाशन ) क्रिया के साथ बराबरी से जो निर्देश है—वह दोष ही है । उन क्रियाओं का निर्देश शत् आदि प्रत्ययों से करना ठीक था, आकल्यात से नहीं । जैसे—

'तत्काल बलवान् तारक ( तारकासुर, और तारों ) के पराक्रम को शान्त करने से महती-शक्ति ( एक अत्र और सामर्थ्य ) लिये हुए, खेल-खेल में शिखी ( मयूर-अभि ) को नीचे करते हुए और चमचमाती चन्द्रकान्तमणि को भी नीचे करते हुए, अन्यकारि शिव की आँखों के समान अन्यकार ( घाम ) आपको अपार लक्ष्मी ( श्री सौन्दर्य ) प्रदान करे ।'

विमर्श : यहाँ—दो अर्थ निकलते हैं—एक सूर्यतेज के पक्ष में और दूसरा गुह = कार्तिकेय के पक्ष में । दोनों में—शक्ति, तारक, शिखी, चन्द्रकान्त, अन्यकारे रति बराबर लगते हैं ।

शक्ति = १. गुह—एक अत्र । २. सूर्य—अधिक वर्चस्व । तारक—१. गुह—तारकासुर । २. सूर्य—तारे, सितारे । शिखी—१. गुह—मयूर, २ सूर्य—अभि । चन्द्रकान्त—१. गुह—मयूरपिच्छ का सुन्दर चँदोवा, २. सूर्य—चन्द्रकान्तमणि । अन्यकारे रति—१. गुह—अन्यकारे: रति, अन्यकासुर के अव्यभिचारादिति विधेयत्वं हि प्राधान्या विनाभाव:।

स्नेहमिति । अत्र पानादीनां प्रकाशानस्य च विध्यनुवादलोपैककर्तृकाणां प्राधान्या-भावो नोपस्मर्तव्यम् (?) । अत्र च यौग्यामिति यच्छूब्ददेन द्वीपस्य पदाथस्य परामर्शोऽपक्रमे तत्तमस इति तच्छब्ददेन वाक्यार्थस्य परामर्शो दुष्ट इत्युपपादितं प्राक् ।

विम्राण इति । शक्तिः सामर्थ्यम् आयुधभेदश्र । तारका: ज्योतींषि दैस्यविशेषश्र तारक: अधो निस्तेजस्वेन वाहनत्वेन च । शिखी वहिम्रयूरश्र । चन्द्रस्य सुवर्णस्य समवन्त्री कान्ता-चभासो लसन् देदीप्यमानो यस्मिन् । चन्द्रकान्तां मेचकानामवभासो लसन् स्फुरदू यस्य । अन्यकारे तमसि अन्यकारेहरसि । गुह: कुमार: । अपर इवेति अन्रापरशब्दसामर्थ्याद् गुहे द्वितीयगुहत्स्पतीतौ वस्तुतस्तदसम्भवे तत्सम्भावनायामुपेक्षा । अपरशब्दाभावे तु स्वसस्वरूपस्थितस्यैव वास्तविकस्य गुहस्य प्रतीतावियमुपमा स्यात । एवम् 'अपर इव पाकशासनो'

रेफ: । अत्र धारणादीनां गुणनाव: । आधास्य तु प्राधान्यम् । अन्यभिचारात् = विधेयत्व याति = प्राधान्य के बिना जिसका अभाव हो ( अर्थात् = प्राधान्य के साथ व्याप्ति ) ।

स्नेहम्—पानादीनाम्—नापस्मर्तव्यम्—[ पक्ति स्पष्ट नहीं होती ] अत्र यौडयमिति = यहाँ यौडयम् इस प्रकार शुरु में यत् शब्द से द्वीपसरीपी पदार्थ का परामर्श

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द्वितीयो विमर्शः

करके अन्त में ‘तत्तमसः’ इस प्रकार ‘तत्’ शब्द से वाक्यार्थ का परामर्श करना दोष है—ऐसा स्पष्ट कर दिया गया है ।

विवरण:—शक्ति = सामर्थ्य और एक खास तरह का औजार ।

तारका: = नक्षत्र और तारक नाम का एक दैत्य ।

अध: = निस्तेज बनाने से और वाहन बनाने से ।

शिखी = अग्नि और मयूर ।

चन्द्रकान्तावभास = चन्द्र = सोने का उजला प्रकाश देतीप्यमान है जिसमें । और चन्द्रक-मेचकों ( मयूरपिच्छ के चाँदोवे ) का प्रकाश है झिलमिलाता जिसमें ।

अन्यकारे = अन्‍धेरे में, अन्यकारे: = शिव की ।

गुह: = कुमार ( नामक कार्तिकेय ) ।

अपर इव—यहाँ अपरशब्द के बल पर गुह में द्वितीय गुहत्‍व की प्रतीति होती है, अतः यहाँ ऐसा उत्प्रेक्षालंकार है जिसका विषयी कलिप्‍त है [ ऐसी उत्प्रेक्षा के लिए दृश्य-अलंकारसर्वस्व ]

अपरशब्द न होता तो अपने प्रसिद्ध रूप मात्र से गुह का ज्ञान होता है । तब यहाँ उपमा होती ।—इसी प्रकार—अपर इव पाकशासन:—दूसरे इन्द्र जैसा, ‘मौवीं द्वितीयाम्र’ दूसरी सी प्रत्यंचा = इत्यादि में मानना चाहिये ।

अहंपंते:—यहाँ—‘अहरादीनां पत्यादिषु’ इस नियम से रेफ हुआ । यहाँ धारण आदि अप्रधान है । आधारन मात्र प्रधान है ।

विमर्श : व्य० व्याख्यान में चन्द्रकान्तावभास को तीन खण्डों में विभक्त किया गया है—चन्द्र, कान्त और अवभास इस प्रकार, तथा चन्द्रक-अन्त और अवभास । प्रथम पदच्छेद में चन्द्र का अर्थ सुवर्ण अर्थात् सोना किया गया है ।

मेदिनी और अमर में—चन्द्र को सोने का वाचक माना गया है—चन्द्र: कर्पूरकाम्पिलसुधांशुसुवर्णवारिषु—[ मेदिनी ] स्वर्णेडपि भूरिचन्द्रौ द्वौ ।

[ अमर ]—यहाँ अर्थ यह निकलता है कि सोने के समान कान्तिवाले अग्नि को सूर्यंतेज ने दवा दिया । अर्थ में कोई चमत्कार नहीं। कारण कि इससे सूर्यंतेज से अग्नि का दब जाना भर सिद्ध होता है । दबने से जो विकार आये में आता है इससे ज्ञात नहीं होता । चन्द्रकान्तमणि के सिद्ध होता है ।

दबने से जो विकार आये में आता है इससे ज्ञात नहीं होता । चन्द्रकान्तमणि के सिद्ध होता है ।

चन्द्रकान्तमणि की ज्योति के समान क्षीण रहती है । वेद में सूर्यप्रकाश में अग्नि का अभाव बतलाया जाता है । सायण ने मीमांसा को पद्धति से उसे समझाते हुए लिखता है—धूम एवाग्नेरदिवा ददृशे नान्चि:, तस्मादिंचरेवग्नेर्न्त् ददृशे न भूत्:-तै० ब्रा० २।१।२ । सायण = दुरभ्रुस्‍तव = ‘अभिज्‍योतिज्‍योतीरतिरमिरिति सायं जुहोति । सूर्यो ज्योतिः सूर्य इति प्रातः—इत्येतौ विधौ स्तोतुं सोडस्‍थे-वाद: । यस्मादिंचर्न् दिवा जायते तस्माद् सूर्यंमन्त्र एव प्रातः प्रयोक्‍तव्‍य: ।’ [ ऋगवेद-भाष्‍य भूमिका पृ० ३० चौ० सं० ]

यहाँ व्य० व्याख्यान में ‘अपरशब्दसामथ्यात्’ के बाद आए ‘गुहे’ इस पद के स्थान पर त्रिवेद्रमू तथा ‘चौखम्‍बा व्‍लेशनों से प्रकाशित प्रतियों में ‘भूपे’ पद छपा है, और एक टिप्पणी देकर इसके स्थान पर ‘आतपे’ पद की सम्भावना व्यक्त की है ।

वस्तुतः उत्प्रेक्षा का विषय तो आतप ही है किन्तु उस पर द्वितीय गुहत्‍व की सम्भावना की जा रही है न कि द्वितीयत्‍व की, दितीयत्‍व की सम्भावनाओं का विषय तो गुहँ हो है । अतः हमने अपनी ओर से ‘भूपे’ को बदलकर ‘गुहे’ पाठ बना दिया है ।

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२७२ व्यक्तिविवेक:

प्रस्तुत पद्य मयूरकृत सूर्यशतक का २५वाँ पद्य है। उसके प्राचीन टीकाकार त्रिभुवनपाल ने चन्द्रकान्त का एक अर्थ—चन्द्रकान्तमणि भी किया है। पर उसे शिखी का विशेषण नहीं माना। उन्होंने चन्द्र को वसु, सुवर्ण, रत्न, मणि चार अर्थ में माना है और उसके समान जिसकी कान्ति है—इस प्रकार वहुम्रोहि द्वारा शिखी का विशेषण भी बनाया है। चन्द्रक का अर्थ—मेचक [ मोरङ्गा ] वे भी करते हैं।

सर्वासां पुनः प्राधान्यविचक्ष्षयां नाख्यातचाच्यतवं दोषः। यथा—'सौधादुद्दिजाते, त्यजत्युपचयं, द्वेष्टि प्रभामैन्रवचोः द्वाराात्रश्यति चित्रकैःलिसदसौ, वेषं विंध्यं मन्यते। आस्ते केवलमझिजीकिसलयप्रस्तारशय्यातले सडूल्पो नतत्वदाकुरितसायत्तेन चित्तेन सा ॥'

जब सभी ( क्रियाओं ) का प्राधान्य विवक्षित हो तो उन्हें आख्यात से कहने में कोई दोष नहीं है। जैसे—भावनामात्र से मन में चढ़े तुम्हारे सूरत के अधीन जब से उसका चित्त हुआ—वह चूनें से पुती अटारी की उपरी मंजिल से डरती है, बगीचे को नहीं जाती, चन्द्रमां की ज्योति से नफरत रखती है, चित्रकारी के क़मरे के दरवाजे तक जाकर छिप जाती है, वेष को जहर मानती है, बैठती है केवल कमलिनी की बिद्धी हुई कॉपलों की सेज पर।

कर्त्तां हि गुणक्रियां निष्पादयन् प्रधाक्रियामेवंपर्येण निष्पादयति, न तु ताद्वैदृशमप्ययं। यत्र सर्वास्वेदृश्पं तत्र भवत्येव सर्वासामाख्यातवाच्यतवरवम्। यथा—सौधादित्यादि।

कर्त्ता का स्वभाव है कि वह तात्पर्य रूप से प्रधान क्रिया को निष्पन्न करता है, साथ ही साथ अप्रधान क्रिया को भी निष्पन्न करता जाता है, किन्तु इन अप्रधान क्रियाओं में उसका तात्पर्य नहीं रहता। किन्तु जहाँ सभी क्रियाओं में तात्पर्य होता है वहाँ सभी आख्यात द्वारा कही जाती हैं। जैसे—सौधादुद्दिजाते—में। [ इस तथ्य को पछवबढ़ करते हैं ]—

यत्रैककर्तृकानेका प्राधान्चेतरभाक् क्रिया। तत्राख्यातेन वाच्याद्या शास्त्रादैरपरा पुनः ॥ २२ ॥

इत्यन्तरश्लोकः

'जहाँ कर्त्ता एक हो और उसकी क्रिया एकाधिक, वहाँ यदि क्रिया में प्राधान्य अप्रधान्य हो तो प्रधान क्रियायें आख्यात द्वारा बतलायी जाती हैं और अन्य अप्रधान क्रियाएँ शास्त्र आदि प्रत्ययों द्वारा ।'

इतरदमाधान्यम्। आधा प्रधानभूता। अपरा अप्राधान्यवती।

इतरत्—( प्राधान्य से भिन्न ) अप्राधान्य । आधा—प्रधानभूत । अपरा—अप्रधानभूता क्रिया ।

ननु च, आचार्यैणैवानिष्निनिवृत्यर्थं समासविधौ बहुलग्रहणं कृतम्। अतस्तेनैव विधे विषयेऽत्र किं वृत्तिनो भविष्यति, अन्यत्र भविष्यतीति किमनेन प्रधानेतरभावपरिकल्पनप्रयासेन?

सत्यम्। किन्तु समासविधे: प्राधान्चेतरभावविवक्षानिबन्धनस्य च

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द्वितीयो विमर्शः

२७३

तत्रप्रतिषेधस्योत्सर्गापवादभावेनावस्थानं दृश्यतेऽमित्यपवादस्यैवायं विषयो भवितुमर्हति न बहुलग्रहणस्य ।

यत्र तु क्चिदुत्सर्गापवादयोर्विषयत्वावस्थानीयम् कथमपि कर्तुमशक्यः स तस्य विषयो वेदितव्यः । अन्यथा गोदः कम्बलद इत्यत्राणभावोऽपि तद्विषयः स्यात् । इह तु यथाक्रमेण नियमः शक्यक्रियापवेतिनायं बहुलग्रहणस्य विषयः कल्पनीयः ।

( शंका ) इस प्रधान अप्रधान की लम्बी-चौड़ी कल्पना की मेहनत से क्या ? स्वयं आचार्यं ( पाणिनि ) ने ही गड़बड़ी दूर करने के लिये समास-विधान करते समय बहुल शब्द का प्रयोग किया है । ( अर्थात समास हो तो ठीक न हो तो कोई बात नहीं ) । उसीसे इस तरह के जो कोई विषय होंगे उनमें समास नहीं होगा, अन्यत्र होगा ।

( उत्तर ) ठीक है । किन्तु समास-विधान और प्राधान्य-अप्राधान्य-विवक्षा को लेकर उसका होना वाला निषेध इन्हें उत्सर्गे और अपवाद रूप मानना चाहिये । इसलिये यह ( प्रधानाप्रधानभाव ) केतुल अपवाद का ही विषय हो सकता है । बहुल-ग्रहण का नहीं । हाँ, जहाँ कहीं उत्सर्गे और अपवाद के क्षेत्र-विभाजन का ठीक-ठिकाना किसी भी तरह करना सम्भव न हो—उसे उस ( बहुल ) का विषय मानना चाहिये । नहीं तो 'गोदः' और 'कम्बलदः' आदि में अण् प्रत्यय का अभाव भी 'बहुल' का विषय बन जाएगा । पर यहाँ ( विध्यनुवादभाव में या प्रधानेतरभाव में ) तो उक्त क्रम से नियम ( ठीक-ठिकाना ) किया ही जा सकता है इसलिये इसे बहुल-ग्रहण का विषय नहीं मानना चाहिये ।

बहुलग्रहणमिति । 'विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' ( २-९-५७ ) इत्यत्र । क्चिदित्यादि । क्चिदित्यादि । क्चिदप्रवृत्तिः क्चिदप्रवृत्तिरिति बहुलग्रहणप्रयोजनस्य न्यवस्थितत्वात् । उत्सर्गेति समासविधिः सामन्यरूपपवादुत्सर्गः प्राधान्यादिविवक्षानिमित्तकस्तत्रप्रतिषेधो विशेषरूपपवादः ।

अपवादस्यैवेतित । 'अपवादविषयपरिहारणरसङ्गस्य प्रवृत्तिरिति' न्यायात् । कर्तुमशक्य इति । न्यवस्थितविषयत्वात् । यथा 'उपसर्गस्य घञ्यमनुष्ये बहुलम्' ( ६-३-१२२ ) इत्यत्र । परिवादे स्वयम् भवति—परिवादः, परिवाद इति । विवाद इत्यत्र नैव भवति ।

तद्विषयः स्यादिति 'कृत्पत्युटो बहुलम्' ( ३-३-११३ ) इत्यादिगतस्य बहुलग्रहणस्य विध्यनुवादभावविषये सामर्थ्याभावात् समासाभाव इति भावः ।

बहुलग्रहणम्—'विशेषणं विशेष्येण बहुलम्' इस सूत्र में । क्चिदित्यादि—कहीं लगाना, कहीं न लगाना—इस प्रकार बहुल शब्द को देने का प्रयोजन माना गया है [ यथा—क्चित् प्रवृत्तिः क्चिदप्रवृत्तिः क्चिद् विभाषा क्चिदन्वदेव । विधेर्विधानं बहुधा समीक्ष्य चतुर्विधे बाहुलकं विदन्ति ॥ ]

उत्सर्ग—समासविधान सामान्य विधि है । अतः उत्सर्गात्मक है, उसका प्रतिषेध जो प्राधान्यादि की विवक्षा के अधीन है वह विशेष है अतः वह अपवादात्मक है ।

अपवादस्यैव—'यह एक नियम है कि उत्सर्ग-नियम अपवाद-नियम के क्षेत्र से अतिरिक्त क्षेत्र में लगता है । कर्तुमशक्य—कारण कि उसका क्षेत्र निश्चित है । जैसे—'उपसर्गस्य घञ्यमनुष्ये बहुलम्' ( ६।३।१२२ ) । इसमें ( दीर्घं करने का ) परि उपसर्ग में तो यह ( दीर्घ-विधान ) होता है, परिवाद-परिवाद इत्यादि । किन्तु विवाद में नहीं होता ।

१५ ख्यो वि०

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तद्विषयः स्यात्—‘कृत्यलुटो बहुलम्’ ( ३।३।१३ ) इत्यादि में आये बहुल ग्रहण का विध्यनुवादभाव के विषय में सामर्थ्य नहीं है । अतः समास नहीं होता ।

विमर्शः—व्यक्तिविवेककार ने—इस प्रकरण में यह सिद्ध किया था कि जहाँ विशेषण में प्रधानता हो वहाँ उसका विशेष्य के साथ समास नहीं होना चाहिये । इससे सिद्ध हुआ कि महिमभट्ट को समास का वैकल्पिक होना अभिमत है । महर्षि पाणिनि ने भी अपने सूत्र ‘विशेष्येण बहुलम्’ में बहुल शब्द देकर यही सिद्ध किया था कि विशेषण-विशेष्यों का समास कहीं हो सकता है कहीं नहीं ।

न न्यायमर्थः—समासेनोभयवृत्तिसामानिरुपकल्पितः किन्ताहिं, आचार्य-स्याभिमत एव, यदयं समासविधौ समर्थनं कृतवान् । केवलं तदभिप्रायमनवगच्छद्विर्यो व्याख्यातुं न पुनरेल्ल्यायुक्तिपरतयापीति तदभिप्रायमेवास्माभिः प्रकट-यद्विस्तस्स्येहार्थत्वमपि प्रतिपादितं न तु पूर्वं किश्चित् ।

ऐसी भी बात नहीं है कि यह विषय हमने अपनी बुद्धि से गढ़ा है, आचार्य को भी यह मान्य है, क्योंकि समास-विधान करते समय उन्होंने ‘समर्थः’ शब्द का प्रयोग किया । किन्तु हुआ यह कि व्याख्याता लोगों ने उसका मूल अभिप्राय नहीं समझा और उसका फल ( समर्थन शब्द का ग्रहण ) केवल सापेक्षता आदि मान्य दोषों की व्यावृत्तिमात्र बतलाया, इस प्रधानेतरभाव की व्यावृत्ति को नहीं, इसलिए उसको अभिप्राय स्पष्ट करते हुये हमने उसका यह फल ( प्रधानेतर-की व्यावृत्ति ) भी बतलाया है कोई नई बात नहीं ।

तदभिप्रायमिति आचार्याभिप्रायसम् । साक्षेपतात्विति ऋद्धस्य राज्ञः पुरुह इत्यादौ । तत् समर्थन हणम् । एतद्व्यावृत्तौ पतच्च्छेदेन प्रधानेतरभावः परामृश्यः । तस्येहार्थत्वमपीति समर्थन-ग्रहणं प्रधानेतरभावविषयानिवृत्त्यर्थमपीत्यर्थः ।

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द्वितीयो विमर्शः

तदभिप्रायमिति—प्रधानंतरभावविषय की भी निश्चित्ति के लिये ।

तदभिप्राय = आचार्य का अभिप्राय ।

सापेक्षता आदि = ऋऋद्रस्य राज्ञः पुरुषः इत्यादि में ।

तत् = समर्थ-ग्रहण ।

तद्व्यावृत्ति—यहाँ 'तत्' शब्द से प्रधानंतरभाव का परामर्श किया गया ( 'समर्थः पदविधिः' सूत्र में ।)

तस्येहार्थत्वमपि—समर्थ शब्द का ग्रहण प्रधानंतरभाव के क्षेत्र में समास न होने देने के लिये भी है ।

विधेयोदे श्यभावोडयं वाक्यं वृत्त्या न पारयते । यत् तेनानिधानं वा समर्थग्रहणं च वा ॥ २३ ॥

कारणद्वयमेवेतद् बहुग्रहणं न तु । अशक्यनियमो ह्यर्थो विषयस्तस्य नेतरः ॥ २४ ॥

इति सङ्ग्रहदृशोऽकौ ।

विधेयोदे श्यभाव समास द्वारा नहीं कहा जा सकता । इसलिये दो ही कारण ( समासाभाव में ) माने जा सकते हैं—( प्रधानंतरभाव का ) न कहा जाना या ( 'समर्थः पदविधिः' सूत्र में ) समर्थ शब्द का अपनाया जाना ( 'विधेयोदे श्यं बहुलम्' में आया ) बहुल ( शब्द ) का ग्रहण ( उसका कारण नहीं माना जाना चाहिये ) कारण कि उसका क्षेत्र वही अर्थ है जिसमें कोई नियम न हों, और कोई नहीं ।

विधेयोदे श्येति उद्देश्यकृतो ध्वंसशाह्र्वादनुवाद्यः । यत् तेनैति यच्च्छब्दः पूर्वोर्ध्वसम्बद्धः ।

तेनापारणेन अनभिधानं वेतित अनभिधानलक्षणा हि कृत्तद्धितसमासा इति । समर्थग्रहणं च वेतिं चशब्दोऽत्रातिरिक्तः, समुच्चयविकल्पयोर्विरोधात् ।

एवञ्च—

'दृष्टिनामृतवर्षिणी स्मितमधुप्रसङ्गिन्द वक्त्रं न त-न्नादत्ते हृदयं न चन्दनरसरसस्पृशान्नि चाऽऽननं वा ।'

इत्यत्र च—वाशब्दद्वयं प्रयुक्तं, च-वाशब्दार्थयोरेक्त विरোধात् ।

विधेयोदे श्य—यहाँ उद्देश्य ही उर्ध्व ( वाक्य में पहले ) देश ( स्थान ) योग्य होने ये—अनुवाद हुआ ।

यत् तेन—यहाँ यत् शब्द पूर्वोर्ध्व से सम्बन्धित है । तेन अर्थात न हो सकने से ;

अनभिधानं वा—कृत, तद्धित और समास का स्वभाव ( प्रधानंतरभाव का ) अनभिधान है ।

समर्थग्रहणं च—यहाँ 'च' शब्द अधिक है, समुच्चय और विकल्प का विरोध होने से ।

'दृष्टिनामृत०' इस पद्य में भी 'च' और 'वा' दोनों का एक साथ प्रयोग है, उन दोनों 'च' और 'वा' शब्दों का एक ही वाक्य में विरोध होता है ।

यद्धा कवीनामेव विषयो न खण्डिकोपाध्यायानामित्यनवगततद्भिप्रायैस्तैरुपेक्षितमेतत् ।

ते हि स्वमेधाज्ञानसाहित्यसुधारसास्वादचमत्कारा: शुष्करब्धिगुप्तिपत्तिमात्रोपजनिताभिमानदुर्विग्गा विविधाभिधानोद्दारा अभिधेयप्रतीतिवैचित्र्यविवेककौशलशालीनाः लक्षणमस्तीतयेव-रसाभिव्यक्तिविच्छित्तिभूतमपरमपि बहुतरमवकरमपायं प्रयुञ्जत इति रसास्वादानु-

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२७६

व्यक्तिविवेकः

गुणप्रयोगावहितचेतसां कवीनामेव तचिन्तोचिता नान्येषाम् । अस्माभिस्तु वितस्तरतस्तत् पुरस्तादभिधास्यते । प्रकरणकाकादिसखो यस्स्यार्थोंऽर्थान्तरं प्रकाशायति । इष्टार्थेभङ्ग्यभङ्गीते: शब्दो न समासमर्हति स: ॥ २५ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोका: ।

अथवा यह 'विपय' कवियों के लिये है । खण्डनकोपाध्या:यों का नहीं, इसलिये उन्होंने इसकी उपेक्षा की । वे इसका अभिप्राय नहीं समझ सके । उन्होंने साहित्य के अमृत रस का आस्वाद करके अपने में भी आनन्द नहीं पाया । उन्हें केवल शुष्क शब्दों की व्युत्पत्ति भर का अभिमान है, जिससे वे बिगड़ गये हैं । उनका काम केवल भ्रान्ति-भ्रान्ति के शब्दों का ढेर-फेर हो है । उनमें कौशल है केवल अभिधावृत्ति से शात अर्थ की प्रतीति के वैचित्र्य का । वे रसाभिव्यक्ति में विफल बनने वाले हैं और अनेक शब्दों के कचरे-कूड़े को काम में लाते रहते हैं—केवल इसलिये कि वे प्रयोग व्याकरण-सम्मत है । इसलिये उन कवियों को ही इस प्राधानतरभाव की चिन्ता शोभा देती है जिनका चित्त रसास्वाद के अनुरूप प्रयोग पर लगा रहता है, और लोगों को नहीं । हम इस विषय को आगे और अधिक विस्तार से उपस्थित करेंगे ।

संक्षेप में—प्रकरण, काकु आदि की सहायता से जिस शब्द का अर्थ दूसरे अर्थ को प्रकाशित करता है, अभिमत अर्थ के प्रतीत न होने के भय से वह शब्द समासयोग्य नहीं होता ।

खण्डयैति खण्ढो अन्यथासम्बन्धी न तु समस्तो ग्रन्थ: स चिन्त्यते येषाम् । अनवगततद्भिप्रायै: ति । समर्थग्रहणं प्रति आचार्यस्य हि तैरभिप्रायो नावगत: । अभिधानानां शब्दानामाधनमभिनवानां न्यसनम् उद्धार: पूर्वकाणामुद्दरणम् । शालीना अधृष्ठा .अविचारका इत्यर्थ: । अपरमप:ति पुनरुक्तादिकम् । तचिन्तेति । प्रधानतरभावेन समासासमासचिन्ता ।

प्रकरणेति । यत्रार्थप्रकरणादिना शब्दस्य वाच्योर्थ: प्रकर्षापकर्षादिकमर्थान्तरं प्रकाशयति तत्रामिप्रेतार्थाविनाशभयात् समासो न कर्तव्य: । यथा 'रामस्य पाणिरसि' इति । प्रकरणशब्दादिसख इति पाठ । तथा काकुग्रहणेन स्वरविशेष उच्चयते य: 'कालो व्यक्तिः खण्डिको:' इति काव्यगतत्वेन स्वीकृतः ।

खण्डिको:, खण्ड = किसी ग्रन्थ का अंश, न कि पूरा ग्रन्थ । उतने ही जिनकी थाती हो । अनवगततदभिप्रायैरिति—आचार्य के समर्थ शब्द का अभिप्राय उन्होंने नहीं जाना । अभिधानाधानोद्वार—अभिधान = शब्द—उसका आधान = प्रयोग अर्थात् नवीन शब्दों का प्रयोग, उद्धार = हटाना अर्थात् पुराने शब्दों का त्याग ।

शालीना:—अधिक चतुर नहीं । अर्थात् अधिक विचार न कर सकने वाले । अपरमप—अर्थात् और भी किसी पुनरुक्त द्विरुक्त आदि को । तचिन्ता—उस प्रधानतरभाव से समास के होने न होने की चिन्ता ।

प्रकरण = जहाँ प्रयोजन और प्रकरण आदि से शब्द का वाच्य अर्थ प्रकर्ष और अपकर्षादि दूसरे अर्थों को प्रकाशित करना हो वहाँ विवक्षित अर्थ की प्रतीति के अभाव के भय से समास नहीं करना चाहिये । जैसे—'राम का पाणि है' इत्यादि में । 'कहीं' प्रकरण-शब्दादिसख:' यह ( भी ) पाठ है । काकु शब्द से एक विशेष प्रकार का स्वर कहा गया जो—'कालो व्यक्तिः' ( इत्यादि ) करके काव्य में माना गया है ।

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द्वितीयो विमर्शः

विमर्शः यहाँ यह बात विशेष रूप से ध्यान देने की है कि—‘कलो व्यक्तिः स्वरादयः’ में ‘घर’ शब्द आया है -उसे न्यायग्रंथाकार काकुवाचक मानते हैं । मम्मटाचार्य, विश्वनाथ और जगन्नाथ पण्डितराज ने इस जगह के स्वर शब्द को उदात्त आदि का वाचक नहीं है । मम्मटाचार्य और विश्वनाथ कविराज ने तो यह भी कहा है कि ये स्वर काव्य-मार्ग में गिने जाते, काव्य में उनका उपयोग नहीं होता।

पञ्चं प्रसक्तानुप्रसक्तिक्रिया समासगतस्वेन तदितदिगेन समग्रुप्तिगतस्वेनापि गुणप्रधा-नवृत्त्या महता प्रपञ्चेन परिगटतया प्रकृतोदाहरणे षष्ठीतत्पुरुषगतस्वेन योजयितुमाह-विस्थित इति ।

इस्त प्रकार लगे में लगे—गुणप्रधानभाव का समास में और उससे आगे सभी वृत्तियों में विस्तार से विचार कर प्रकृत उदाहरण में षष्ठी तत्पुरुष समास में उसे दिखलाने के लिये शुरू करते हैं—इत्यमवस्थित इत्यादि ।

इत्यमवस्थिते समाससमासयोविंष्यविभागप्रतिनियमे सति यदेतदिहा-काया: केसरिणो विशेषणभावेनोपादानं तत् किमितरकेशरिग्यादृत्ति-ग्रफलम् आहोस्विदसमासे वा समासादितद्गतगुणप्रसादोप-च्चिश्वातिशायिशौर्यादितरेकप्रतिपादनप्रयोजनम् ।

इस प्रकार समास और असमास दोनों का विषय-विभाग निश्र्चित हो जाने पर केसरि के अम्बिका का जो विशेषण रूप से उपादान है वह क्या—दूसरे केसरियों की व्यावृत्ति के लिये ने की कृपा से उसे प्राप्त है और जो सम्पूर्ण विश्व को मात करता है।

अम्बिकाया उपादानमिति सम्बन्धः । तत् किमिति । विशेषणस्यान्यकेसरिग्यादृत्तिवा, गतप्रकर्षप्रतिपादनं वा फलम् । आद्ये पञ्चे निर्दिष्टचमत्कारासम्भावना । द्वितीये तु तत् किम् = विशेषण का फल क्या है—१—इतर केसरी की व्यावृत्ति या २—केसरी में उत्कर्ष की वत्ति । प्रथम पक्ष में दिखाये जा रहे चमत्कार का असम्भव होगा और द्वितीय में—समास न होना ।

तत्र प्रथमपक्षे तस्य केसरिणो विवक्षितजातिमात्रविहितदेवाकातिरिक्त-मत्कारातिशायाभावोडन्यकेसरिण इव निर्माणन्धन एव स्यात् ।

न हि इतरे भ्योडन्यसम्बन्धिभ्यः स्वतन्त्रेभ्योडपि वा व्यावृत्ततस्य तस्या-कासम्बन्धमात्रात् तस्या: कामन्युकारकर्णिकामनासादयत पचाकस्मात् धाविधचमत्काराविर्भावः सम्भाव्यते ।

दोनों में से प्रथम पक्ष मानने पर इस सिंह में जो उत्कृष्ट ( चमत्कारी ) शौर्य का आविर्भाव कहा गया है—जो सिंहजातिमात्र में प्राप्त होने वाली चेष्टाओं से भिन्न है, अन्य सिंहों के मान, उसके लिये कोई हेतु नहीं रह जाता । ऐसा सम्भव नहीं कि—दूसरों के सम्बन्धी या सम्बन्धही—स्वतन्त्र सिंहों से अलग करके दिखलाये गये इस सिंह में अम्बिका के सम्बन्धमात्र उसका थोड़ा भी अनुग्रह बिना पाये, ऐसे ही—उतना बड़ा शौर्यं आ जाय ।

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व्यक्तिविवेकः

गुणप्रयोगावहितचेतसां कवीनामेव तच्चिन्तोचिता नान्येषाम् । अस्माभिस्तु वितस्तरतस्तत् पुरस्तादमिधास्यते । प्रकरणकाकादिसखो यस्स्यार्थोंडथोऽन्तरं प्रकाशयति । इष्टार्थेभङ्गाभीतेः शब्दो न समासमहोति सः ॥ २५ ॥

इति शब्दार्थः !

अथवा यह 'विषय' कवियों के लिये है खण्डकोपाध्यायों का नहीं, इसलिये उन्होंने इसकी उपेक्षा की । वे इसका अभिप्राय नहीं समझ सके। उन्होंने साहित्य के अमृत रस का आस्वाद करके अपने में भी आनन्द नहीं पाया । उन्हें केवल शुष्क शब्दों की व्युत्पत्ति भर का अभिमान है, जिससे वे बिगड़ गये हैं । उनका काम केवल भावित-भावित के शब्दों का ढेर-फेर ही है । उनमें कौशल है केवल अभिधावृत्ति से ज्ञात अर्थ की प्रतीति के वाचिच्छ्य का । वे रसाभिव्यक्ति में विफल बनने वाले अनेक शब्दों के कचरे-कूड़े को काम में लाते रहते हैं—केवल इसलिये कि वे प्रयोग व्याकरण-सम्पत है । इसलिये उन कवियों को ही इस प्राधान्यतरभाव की चिन्ता शोभा देती है जिनका चित्त रसास्वाद के अनुरूप प्रयोग पर लगा रहता है, और लोगों को नहीं । हम इस विषय को आगे और अधिक विस्तार से उपस्थित करेंगे।

संक्षेप में—प्रकरण, काकु आदि की सहायता से जिस शब्द का अर्थ दूसरे अर्थ को प्रकाशित करता है, अभिमत अर्थ के प्रतीय न होने के भय से वह शब्द समासयोग नहीं होता ।

अनवगततद्भिप्रायैस्तु समर्थग्रहणं प्रति आचार्यस्य हि तैरभिप्रायो नावगतः । अभिधानाधानोद्भवांरिति । अभिधानानां शब्दानामाधानमभिनवानां न्यसनम् उद्धारः पूर्वकाणमुद्धारणम् । शालीनाऽऽद्यष्टा .अविचारक इत्यर्थः । अपरमपि पुनरुक्तादिकम् । तच्चिन्तेति । प्राधान्यतरभावेन समासासमासचिन्ता ।

प्रकरणेति । यत्रार्थप्रकरणादिना शब्दस्य वाच्योऽर्थः प्रकर्षापकर्षादिकमर्थान्तरं प्रकाशयति तत्स्थाभिप्रेतार्थविनाशाभयात् समासो न कर्तव्यः । यथा 'रामस्य पाणिरसौ' इति । प्रकरणशब्दादिसख इति पाठः । तथा काकुग्रहणेन स्वरविशेष उच्यते यः 'कालो व्यक्तिस्वरादयः' इति काव्यगतलवेन स्वीकृतः ।

खण्डिकेति, खण्ड = किसी ग्रन्थ का अंश, न कि पूरा ग्रन्थ । उतने ही जिनकी धात्री हो । अनवगततद्भिप्रायैरिति—आचार्यों के समर्थ शब्द का अभिप्राय उन्होंने नहीं जाना । अभिधानाधानोद्भार—अभिधान = शब्द—उसका आयान = प्रयोग अर्थात् नवीन शब्दों का प्रयोग, उद्धार = इतनाना अर्थात पुराने शब्दों का त्याग ।

शालीनाः—अधिक चतुर नहीं। अर्थात् अधिक विचार न करने वाले । अपरमपि—अर्थात और भी किसी पुनरुक्त द्रिरुक्त आदि को । तच्चिन्ता—उस प्राधान्यतरभाव से समास के होने न होने की चिन्ता ।

प्रकरण = जहाँ प्रयोजन और प्रकरण आदि से शब्द का वाच्य अर्थ प्रकर्ष और अपकर्षादि दूसरे अर्थों को प्रकाशित करना हो वहाँ विवक्षित अर्थ की प्रतीति के अभाव के भय से समास नहीं करना चाहिये । जैसे—‘राम का पाणि है’ इत्यादि में । ‘कहीं’ 'प्रकरण-शब्दादिसखः' यह ( भी ) पाठ है । काकु शब्द से एक विशेष प्रकार का स्वर कहा गया जो—‘कालो व्यक्तिस्वरादयः’ ( इत्यादि ) करके काव्य में माना गया है ।

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द्वितीयो विमर्शः

विमर्शः यहाँ यहाँ बात विशेष रूप से ध्यान देने की है कि—‘कालो व्यक्तिः स्वरादयः’ में जो ‘स्वर’ शब्द आया है—उसे व्याख्याकार काकुवाचक मानते हैं । मम्मटाचार्य, विश्वनाथ कविराज और जगन्नाथ पण्डितराज ने इस जगह के स्वर शब्द को उदात्त आदि का वाचक माना है । मम्मटाचार्य और विश्वनाथ कविराज ने तो यहाँ भी कहा है कि ये स्वर काव्य मार्गों में नहीं गिने जाते, काव्य में उनका उपयोग नहीं होता ।

तत्र असंस्कृत्युपसंस्कृतया समासगतत्वेन तद्विदुषां सम्भवज्जातत्वेनहि रसाभासविवेच्चां महता ग्रपञ्चेन परिगटच्य प्रकृतोदाहरणे षष्ठीतत्पुरुषगतत्वेन योज्यितुमाह—इत्थमवस्थित इति ।

इस प्रकार लगे में लगे—गुणप्रधानभाव का समास में और उससे आगे सभी वृत्तियों में काफी विस्तार से विचार कर प्रकृत उदाहरण में षष्ठी तत्पुरुष समास में उसे दिखलाने के लिये कहनें शुरु करते हैं—इत्थमवस्थिते इत्यादि ।

इत्थमवस्थिते समासासमासयोविंशयविभागप्रतिनियमे सति यदेतदिहा-श्विकाया: केसरिणो विशेषणभावेनोपादानं तत् किमितरकेशरिग्यात्वकित-मार्तफलम् आहोस्विदसमासे वा समासादितभगवतीपादर्पणप्रसादोप नतविश्वातिशायिशौर्यातिरेकप्रतिपादनप्रयोजनम् ।

इस प्रकार समास और असमास दोनों का विषय-विभाग निश्चित हो जाने पर प्रति अभिवकाया का जो विशेषण रूप से उपादान है वह क्या—दूसरे केसरियों की व्यावृत्ति है या समास न कर उस (केसरी) के ऐश्वर्य को बतलाने के लिये जो भगवती रखने की कुपा से उसे प्राप्त है और जो सम्पूर्ण विश्व को मात करता है ।

अभिवकाया उपादानमिति सम्बन्धः। तत् किमिति । विशेषणस्यान्यकेस केसरिगतप्रकर्षप्रतिपादनं वा फलम् । आहो पद्ये निर्दिष्टचमत्कारासम्भावना समासानुपपत्तिरिति तात्पयं ।

‘अभिवका का उपादान’ इस प्रकार अन्वय करना चाहिये। तत् किम्‌ = विशेषण का फल क्या है?—१—इतर केसरी की व्यावृत्ति या २—केसरी की प्रतीति । प्रथम पक्ष में दिखाये जा रहे चमत्कार का असम्भव होगा और द्वितीय का न होना ।

तत्र प्रथमपक्षे तस्य केसरिणो विवक्षितजातिमात्रां चमत्कारातिशायभावोडन्यकेसरिण इव निनिबन्धन प्रव न हि इतरेभ्योडन्यसम्बन्धियः स्वतत्रेभ्योडपि चाऽऽमिवकासम्बन्धमात्रात् तस्या: कामन्युपकारकानिकामना तधाविधचमत्काराविर्भावः सम्भाव्यते ।

‘दोनों में से प्रथम मानने पर इस सिद्ध में जो उत्कृष्ट (च . . . . . . ) दिखलाया गया है—जो सिंहजातिमात्र में प्राप्त होने वाली चेष्टाओं से मित्र है, अन्य सिंहों के समान, उसके लिये शोभे हेतु नहीं रह जाता । ऐसा सम्भव नहीं कि—दूसरे के सम्बन्धी या स्वतन्त्र सिंहों में अभिवका के सम्बन्धमात्र से, उसका थोड़ा भी अनुम्रह बिना पाये, ऐसे ही—उतना बड़ा शौर्य आ जाय ।

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व्यक्तिविवेक:

गुणप्रयोगावहितचेतसां कवीनामेव तचिन्ततोचिता नान्येषाम् । अस्माभिमस्तु वितस्तरतस्तत् पुरस्तादभिधास्यते । प्रकरणकाकूदिसखो यस्यान्तरङ्गोऽर्थान्तरं प्रकाशयति । इङ्गार्थेऽभङ्गभीते: शब्दो न समासमहंन्ति स: ॥ २५ ॥

इति सङ्ग्रहाय:

अथवा यह 'विषय' कवियों के लिये है खण्डकाव्योपाध्यायों का नहीं, इसलिये उन्होंने इसकी उपेक्षा की । वे इसका अभिप्राय नहीं समझ सके । उन्होंने साहित्य के अमृत रस का आस्वाद करके सन्तुष्ट में भी आनन्द नहीं पाया । उन्हें केवल शुष्क शब्दों की व्युत्पत्ति भर का अभिमान है, जिससे वे बिगड़ गये हैं । उनका काम केवल भावित-भावित के शब्दों का हेर-फेर हो है । उनमें कौशल है केवल अभिधावृत्ति से ज्ञात अर्थ की प्रतीति के वैचित्र्य का । वे रसाभिव्यक्ति में विदग्ध बनने वाले हैं और अनेक शब्दों के चमत्कार-कूटे को काम में लाते रहते हैं—केवल इसलिये कि वे प्रयोग व्याकरण-सम्मत है । इसलिये उन कवियों को ही इस प्राधानतरभाव की चिन्ता शोभा देती है जिनका चित्त रसास्वाद के अनुरूप प्रयोग पर लगा रहता है, और लोगों को नहीं । हम इस विषय को आगे और अधिक विस्तार से उपस्थित करेंगे ।

सङ्क्षेप में—प्रकरण, काकु आदि की सहायता से जिस शब्द का अर्थ दूसरे अर्थ को प्रकाशित करता है, अभिमत अर्थ के प्रतीत न होने के भय से वह शब्द समासयोग्य नहीं होता ।

खण्डकशेति खण्डयो ग्रन्थसम्बन्धी न तु समस्तो ग्रन्थ: स विद्यते येषाम् । अनवगततत्- भिप्रायैषि ति । समर्थंग्रहणं प्रति आचार्यस्य हि तैरभिप्रायो नावगत: । अभिधानानां शब्दानामाध्यानमभिनवानां न्यसनम् उद्धार: पूर्वकाणामुद्धारणम् । शाब्दीनां अधृष्टा .अविचारका इत्यर्थ: । अपरमपंन्ति पुनरुक्तादिकम् । तचिन्तेति । प्रधानतरभावेन समासासमासचिन्ता ।

प्रकरणेति । यत्रार्थप्रकरणादिना शब्दस्य वाच्योर्थ: प्रकर्षप्रकर्षादिकर्मान्तरं प्रकाश- यति तत्राभिप्रेतार्थंविनाशाभयात् समासो न कर्तव्य: । यथा 'रामस्य पाणिरसी'ति । प्रकरणशब्दादिसख इति पाठ: । तथा काकुग्रहणेन स्वरविशेष उच्यते य: 'कालो व्यक्ति- स्वरादय:' इति काव्यगतवेन स्वीकृत: ।

खण्डकशेति, खण्ड = किसी ग्रन्थ का अंश, न कि पूरा ग्रन्थ । उतने ही जिनकी थाती हो । अनवगततदभिप्रायैरिति—आचार्य के समर्थ शब्द का अभिप्राय उन्होंने नहीं जाना ।

अभिधानाधानोद्वार—अभिधान = शब्द—उसका आधान = प्रयोग अर्थात् नवीन शब्दों का प्रयोग, उद्धार = हटाना अर्थात पुराने शब्दों का त्याग ।

शाब्दीनाः—अधिक चतुर नहीं। अर्थात् अधिक विचार न कर सकने वाले ।

अपरमपि—अर्थात् और भी किसी पुनरुक्त द्विरुक्त आदि को ।

तचिन्ता—उस प्रधानतरभाव से समास के होने न होने की चिन्ता ।

प्रकरण = जहाँ प्राधान और प्रकरण आदि से शब्द का वाच्य अर्थ प्रकर्ष और अपकर्षादि नहीं करना हो वहाँ विवक्षित अर्थ की प्रतीति के अभाव के भय से समास नहीं करना चाहिये । जैसे—‘राम का पाणि है’ इत्यादि में । 'प्रकरण-शब्दादिसख:' यह ( भी ) पाठ है । काकु शब्द से एक विशेष प्रकार का स्वर कहा गया जो—‘कालो व्यक्तिः' ( इत्यादि ) करके काव्य में माना गया है ।

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द्वितीयो विमर्शः

विमर्शः यहाँ यह बात विशेष रूप से ध्यान देने की है कि—'कालो व्यक्तिः स्वरादयः' में जो 'स्वर' शब्द आया है—उसे व्याकरणकार काकुवाचक मानते हैं । मम्मटाचार्य, विश्वनाथ कविराज और जगन्नाथ पण्डितराज ने इस जगह के स्वर शब्द को उदात्त आदि का वाचक माना है । मम्मटाचार्य और विश्वनाथ कविराज ने तो यह भी कहा है कि ये स्वर काव्य-मार्गों में नहीं गिने जाते, काव्य में उनका उपयोग नहीं होता ।

एवं प्रसक्तानुप्रसक्तिकया समासङ्गतत्वेन तदितदर्शने समप्रधीन्यसहितैः गुणप्रधान-नभावविचारैः महता प्रपञ्चेन परिगणयत्सु प्रकृतोदाहरणे वष्टीतत्पुरुषङ्गतत्वेन योजचितुमाह-इत्थमवस्थित इति ।

इस प्रकार लगे में लगे—गुणप्रधानभाव का समास में और उसे आगे सभी वृत्तियों में काफी विस्तार से विचार कर प्रकृत उदाहरण में षष्ठी तत्पुरुष समास में उसे दिखलाने के लिये कहना शुरू करते हैं—इत्थमवस्थिते इत्यादि ।

इत्थमवस्थिते समासासमासयोरविषयविभागप्रतिनियमे सति यदेतदिहा-स्विकायाः केसरिणो विशेषणभावेनोपादानं तत् किमितरकेशरिण्यादृत्तिमात्रफलम् आहोस्विदसमासे वा समासादितभगवतीपादार्पणप्रसादोप-नतविश्वातिशायशोभातिरेकप्रतिपादनप्रयोजनम् ।

इस प्रकार समास और असमास दोनों का विषय-विभाग निश्चित हो जाने पर केसरों के प्रति अभिव्यका का जो विशेषण रूप से उपादान है वह क्या—दूसरे केसरियों की व्यावृत्ति के लिये है या समास न कर उस ( केसरी ) के ऐसे शौर्य को बतलाने के लिये रखने की कृपा से उसे प्राप्त है और जो सम्पूर्ण विश्व को मात करता है ।

अभिवकायाः उपादानमिति सम्वन्धः। तत् किमिति । विशेषणस्यान्यकेसरिण्यावृत्तिवा, केसरिगतप्रकर्षप्रतिपादनं वा फलम् । आधे पच्छे निश्चितचमत्कारासम्भावना । द्वितीये तु समासानुपपत्तिरिति तात्पर्यम् ।

तत् किम् = विशेषण का फल क्या है—१-इतर केसरियों की व्यावृत्ति या २-केसरों में उत्कर्ष की प्रतीति । प्रथम पक्ष में दिखलाया जा रहा चमत्कार का असम्भव होगा और द्वितीय में—समास का न होना ।

तत्र प्रथमपक्षे तस्य केसरिणो विवक्षितजातिमात्रविहितहेतुकातिरिक्चमत्कारातिशयाभावोडन्यकेसरिण इव निरिन्बन्धन एव स्यात् । न हि इतरेभ्योडन्यसम्वन्धिभ्यः स्वतन्त्रेभ्योडपि व्यावृत्तस्य तस्यास्विकासम्वन्धमात्रालं तस्याः कामन्युपकारकरणिकामनासादयत पवाकस्मात् तधाविधचमत्काराविर्भावः सम्भाव्यते ।

'दोनों में से प्रथम पक्ष मानने पर इस सिंह में जो उत्कृष्ट ( चमत्कारी ) शौर्य का आविर्भाव दिखलाया गया है—जो सिंहजातिमात्र में प्राप्त होने वाली चेष्टाओं से भिन्न है, अन्य सिंहों के समान, उसके लिये कोई हेतु नहीं रह जाता । ऐसा सम्भव नहीं कि—दूसरों के सम्वन्धी या समान, उसके लिये कोई हेतु नहीं रह जाता । ऐसा सम्भव नहीं कि—दूसरों के सम्वन्थी या असम्बन्थी—स्वतन्त्र सिंहों से अलग करके दिखलाये गये इस सिंह में अम्बिका के सम्वन्धमात्र से, उसका थोड़ा भी अनुभव बिना पाये, ऐसे ही—उतना बड़ा शौर्य आ जाय ।

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विवक्षितपदं चमत्कारातिशायिपदेन योजनीयम् । तस्या इत्यश्लोकायास्सनाकाङ्क्षात् ।

विवक्षित पद को चमत्कारातिशाय के साथ जोड़ना चाहिये । तस्या: = अभिप्का के पास से ।

विमर्श: यहाँ मूल में यह कहा गया है—कि अभिप्का के सिंह—में दिग्गज और प्रलयघटा को देखकर भी चमत्कृत न होने का जो एक सर्वातिशायी शौर्य आये है उसका हेतु अभिप्का का प्रसाद ही है, जो अन्य सिंहों को प्राप्त नहीं है । यदि यह मान लिया जाय कि यहाँ अभिप्का-केसरी शब्द में अभिप्का का 'अपन्ह्नु-अभिप्का-सिंह से भिन्न सिंहों से अलग कर अभिप्का-सिंह को बतलाने भर के लिये किया गया है, तो अभिप्का-सिंह में अधिक शौर्य होते हुए भी उसका कोई हेतु प्रतीत नहीं होता जैसे इतर सिंहों में अधिक शौर्य के हेतु का अभाव है । फलतः जिस प्रकार अन्य सिंहों में अधिक शौर्य प्रतीत नहीं होता केवल जातिसुलभ शौर्य हो प्रतीत होता है—अभिप्का-सिंह में भी उतना ही शौर्य प्रतीत होगा । अधिक नहीं जो कि विवक्षित है । इस प्रकार अभिप्का इस विशेषण को केवल इतरव्यावर्तक मानने पर अभिप्काकेसरी में विवक्षित शौर्याधिक्य की प्रतीति नहीं होती, जो वस्तुत: दोष है । यहाँ 'चमत्कारातिशायविरहो:' पाठ मानने पर चमत्कारातिशाय शब्द का अर्थ संरम्भ = करिकृत .... चमत्कुतेरतिशयं यात्वमभिप्काकेसरी—में आए चमत्कारातिशाय-शब्द के अर्थ से भिन्न मानना होगा । श्लोक में वाक्य द्वारा चमत्कारातिशाय का अभाव उस सिंह में बतलाया गया है, आविर्भाव नहीं । इस प्रकार यहाँ चमत्कारातिशाय का अर्थ शौर्याधिक्य करना उचित है । इस अर्थ में 'अन्यकेसरिण इव नित्यनबन्धन एव स्यात्'—इस अंश का अर्थ कठिनाई से निकलता है । 'चमत्कारातिशयाभाव' पाठ मानने पर 'अधिक चमत्कार के अभाव का हेतु जैसे अन्य सिंहों में नहीं वैसे ही इस सिंह में भी नहीं मिलता' यह अर्थ बैठ जाता है । और चमत्कारातिशय शब्द का श्लोक के चमत्कारातिशाय शब्द से समन्वय भी हो जाता है । न्यायाल्यान में केवल चमत्कारातिशय शब्द दिया है—उसका आविर्भाव नहीं ।

अथ जात्यन्तरावच्छिन्नो विशिष्ट एव केसरिशब्देनात्राभिमतः यत्र स्वजातिनियत एव स तादृशोऽतिशयो येनासावितरकेसरिसाधारणे हेत्वकल्वेन लज्जमानः करकृतजलदंशकलावलिया दिग्द्वारदप्रलयपयोदघटाटन्चेडपि न संरम्भते, यथा 'मोहन्तु हरेः किं मो हन्तु' इत्यत्र विध्नङ्कराशब्देन विहङ्कमविशेषो गरुडजात्यवच्छिन्नः कश्चिदेव प्रत्याय्यते । तत्र च यथा भगवतो हरेः शयाध्यानापेक्षयैव सम्वन्धमात्राद् विशेषषणभावस्थितद्विद्वापि भविष्यतीतियुच्यते, तद्रपयुक्तम् । भगवत्यनुगृहमसम्पत्सम्पर्कशून्यस्य कस्यचिदेवंविधस्य केसरिविशेषस्य भगवतीवाह-नत्प्रेनाप्रसिद्धेः ।

और यदि 'दूसरी जाति का कोई अन्य केसरी यहाँ केसरी शब्द से मान्य हो, जिसमें अपनी जाति के गुण से ही वैसा कौतुक वैशिष्ट्य है जिससे वह अन्य सिंहों में प्राप्त तनिक से चमत्कार से लक्षित होता है और छोटे—बुध्दी तथा मेधखण्डों को कुछ न समझकर दिग्गज तथा प्रलयकाल की मेघघटा को भी कुछ नहीं समझता । जैसे—'मोह को हरि का विहङ्कम दूर करे ।' यहाँ विहंगम शब्द से एक विशिष्ट विहङ्कम जो गरुड जाति का होता है, बतलाया जाता है ।

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द्वितीयो विमर्शः

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और वहाँ ('मोहं तु—हन्तु'-में) जैसे भगवान् विष्णु को किसी अतिशयाधान की दृष्टि से नहीं, अपितु संबन्धमात्र से विशेषण बनाया जाता है—उसी प्रकार यहाँ (अभिकाकेसरी) भी— माना जा सकता है—ऐसा कहते हैं—तो वह भी ठीक नहीं । कारण की अभिका के अनुग्रह की संपत्ति से रहित इस प्रकार का अन्य कोई भी सिंह अभिकाकेसरी के वाहन रूप से प्रसिद्ध नहीं है ।

जात्यन्तरं विशिष्टावन्तरकेसरिजाति: तयाबचिछन्नो विशिष्ट: । विशिष्ट एव च लोकोत्तर: । मोहिन्त्वति हरेर्विहङ्ग्मो गरुड: मोहमज्ञानं हन्ति स्वार्थे । गरुडजात्यवचिछन्न सौगतदर्शा गरुडानां बहुविधा इति भाव: । विहङ्गमविशेषवं तु जात्यादिवैलक्षण्यात् ।

जात्यन्तरम् = किसी विशिष्ट केसरी कीँ हू कोई अवान्तर जाति, उससे युक्त । विशिष्ट एव = असाधारण । मोहं तु—हरि का पक्षी मोह = अज्ञान को नष्ट करे । गरुडजात्यवचिछ्न --बौद्धमत के अनुसार गरुड अनेक हैं । विहङ्गमविशेषत्वम्—जाति आदि की विशिष्टता से पक्षी की विशिष्टता ।

न चायमर्थ: केवलबिम्रेत: । तथा ह्यस्माभियोगाभिमुखीभूतभगवत्सर- स्वत:प्रसादासादितसामान्यवैदुष्य्यातिशयशालिनमत्यानं मन्यममानस्य कस्य- चित् कवेरितरमनाङ्गमात्रसमुचितेनाविचारेण लज्जापरस्य महतोऽपि तत्व- चितं कवेरितरमना भ्रमात् ।

नीयानगण्यतो निजगुणगरिमोदार्ङ्कूडूविनोदसुखसमाश्रयमनुरूपमपरमप- श्यत: सहृदयचूडामणिमानिनो विमनस: समानधर्माणामपृकृतमेवाम्बिकाकेस- रिणं पुरस्कृत्य स्वाभिप्रायाविष्करणमेतत् ।

न च तत्र स्वाभाविक एव कवेरिन्द्राचमत्कारातिशयलाभोऽभिमत: अपि तु सरस्वतीपादप्रसादजनित एव । तस्याश्रयात्मनश्शोभयोरपि विश्वप्रतिबिम्ब- भावेनाम्बिकाकेसरिणोरुपादानात् ।

और न कवि को यहाँ अर्थ अभिप्रेत हों है, क्योंकि यह अपने जैसे सिंह को आगेकर किसी ऐसे कवि ने अपना अभिप्राय व्यक्त किया है जो निज को असाधारण उपासना से प्रसन्न भगवती सरस्वती कीँ कृपा से असामान्य और चमत्कारपूर्ण वेशिष्ट्य से युक्त मानता था, जो अन्य सभी विर्दानों के जैसे आचरणों से लज्जित होता था, और बड़े-बड़े प्रसिद्ध् विद्वानों को जो नहीं गिनता था, जिसे अपनी गुणगरिमा की उद्धाम खुजलाइट शांत करने का कोई दूसरा अपने जैसा आश्रय नहीं दीखता था, और जो अपने आपको सहृदयों में भी शिरोमणि मानता था, इसलिये जो उदास था । कवि के इस कथन में कवि की विद्या का अतिदार्घित चमत्कार—( बिना कुछ किड सहज रूप से ) स्वभावतः प्राप्त है ऐसा मान्य नहीं, अपितु उसे वह सरस्वती के प्रसाद से प्राप्त है—ऐसा मान्य है । क्योंकि इसलिये—सरस्वती और खुद दोनों के लिये विश्वप्रतिबिम्बभाव से स्वाभिप्रायाविष्करणमभिति । साधर्र्यमूलक्याडप्रस्तुतप्रशंस्येति भाव: । तस्याश्रिति तच्छब्देन सरस्वत्या अभिका प्रतिबिम्बमू आत्मनश्र केसरित्यर्थ: ।

सरस्वती परामृश्य । सरस्वत्या अभिका प्रतिबिम्बम् आत्मनश्र केसरित्यर्थ: । स्वाभिप्रायाविष्करणमभिति—सादृश्यमूलक अप्रस्तुतप्रशंसा द्वारा । तस्याश्रिति तच्छब्देन ।

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द्वितीयपक्षपरिग्रहे पुनर्नं भवितव्यमेव समासेन, अभिक्काया विशेषणभूताया उत्साहपरिपोषपर्यवसायिकेसरिचमत्कारातिशयाधाननिबन्धनधानभेन विधेयतया प्राधान्यान विवक्षिततत्त्वात् समासे चास्य विध्यनुवादभावस्य निमज्जनादित्युच्यतेव ।

द्वितीयपक्ष इति । केशरिगतप्रकर्षंप्रतिपादनपचे १ द्वितीयपक्ष = केशरी के प्रकर्ष का प्रतिपादन ।

ननु च यदि विशेषणस्य विवक्षितितत्वे सति विशेष्यस्य कोडपि चमत्कार: समुन्मिषति स च तस्य समासेऽस्तमुपयात्यत्युच्यते तहि समासादसौ न प्राप्नोति, इष्ट्यते च कैश्चित् ततोडपीति वृत्तिवाक्ययोरस्तस्य यदेतदुदयास्तमयपरिकलपनं तद्युक्तमेव ।

उदयास्तमययोर्यत् तावदर्थस्य वैचित्र्यं तदुपदर्शितमेव प्राक् । यत् पुनः समासचमत्काराभावप्राप्तिप्रसञ्जनं, न तद्योच्यते, इष्टं हि नामप्राप्तस्य चोद्यते । न चास्माभिरसौ समासादपीष्यते, वाक्यादेव तसिद्धेरिष्ठत्वात् यैस्तु ततोडपीष्यते तेभां वृत्तिवाक्ययोरनूदितमर्यादैचित्र्यं न प्रतिभातमेव ।

समासादसाविति अभिक्काकेसरिशब्दाद् उन्मिषत्येव स चमत्कार इत्यर्थः । उदयास्तमयेतित । वृत्तौ चमत्कारस्यास्तमयता, वाक्ये उदय इति चुलिकाकमेण योगः । उपदर्शितमेव प्रागिति उदाहरणप्रत्युदाहरणप्रदर्शनद्वारेण । दृष्टं हीति अभिप्रेतस्यार्थस्य-

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प्रासिर्यां, सा चोदनाहा हृष्टमेतत्स सिद्ध्यतीति । यत्तु नामिप्रेतं तस्याम्रासिम्भूषणं न तु दूषणमित्यर्थः । अस्माभिरसाविति असौ चमत्कारः । समासादसां—अर्थात् अभिकाकेसरी—इस ( समासयुक्त ) शब्द से भी वह चमत्कार मिलता ही है ।

उदयास्तमय—वृत्ति ( समास ) में चमत्कार अस्त होता है, और वाक्य में उदित,—इस प्रकार उलटकर पदार्थों का योग करना चाहिये । उपदर्शितमेव प्राक्—अर्थात् उदाहरण प्रत्युदाहरण—दिखलाकर । इष्टं हि—मान्य अर्थ का न मिलना। उस पर कहा जा सकता है—यह मान्य है और स्पष्ट नहीं हो रहा है । जो अमान्य नहीं है—उसका न मिलना अच्छा ही है, दोषावह नहीं । अस्माभिरसौ—हमने यह—अर्थात् चमत्कार ।

या पुनरेषां वृत्तेरपि चमत्कारातिशायावगतिः यथा—"मिथ्यैतन्मम चिन्तितं द्वितयमप्यार्यानुजोडसे गुरु-माता तातकलत्रामित्यनुचितं मन्ये विधात्रा हतम्" इति । सा आन्तरेवाभिमानिकी शुक्तिरजतप्रतीतिवत् । परमार्थतस्तु सा व्याख्यावाक्यादेव तेषां, न समास-सात, केवलं तत्रारोपितेत्युदयास्तमयपरिकल्पनमुपपत्तिमेेति सिद्धम् ।

सा आन्तरेवेतिति निविकल्पकाविकल्पमेदेन द्विविधा आन्तिः । तत्राधा तिमिराद्युपप्लुते-निद्रयस्य द्विचन्द्रादिप्रतीतिरूपा । द्वितीया त्वभिमानरूपा शुक्तिरजतादिप्रतीतिस्वरूपा । सैव चमत्कारावगतिः । व्याख्यावाक्यादेवेति अभिकायाः केसर्य्यादि समासविवरणवाक्यात् । तेषामिति प्रतीतिवैचित्र्यानभ्युपगमवादिनाम् । तत्रारोपितेति तत्र समासे शुक्तिस्थानीयेऽ रजत-प्रतीतिरोपितेत्युदयास्तमयपद्यौ क्रमादू वाक्यरसमासगतौ ।

सा आन्तिः—आन्ति दो प्रकार की होती है, निविकल्प और अविकल्पः। दोनों में प्रथम है—रतौंधी आदि रोग से मारी गई आँख वाले को दो चन्द्रों की प्रतीति, दूसरी है अभिमान रूप—जैसे—शुक्ति में रजत की प्रतीति । सा—चमत्कार की अवगति । व्याख्यावाक्यादेव—अभिका का केसर्य्यादि इस प्रकार से समास को तोड़ने से बने वाक्य से । तेषां—अर्थात् जिन्हें प्रतीति में भेद मान्य नहीं है ।

तत्रारोपिता—तत्र समास में अर्थात् शुक्ति के समान समास पर रजत के समान आरोपित अर्थात् अवास्तविक । उदय और अस्तमय की बात क्रमशः वाक्य और समास से लगू होती है । विमर्शः : व्याख्याकार द्वारा यहाँ दो प्रकार की आन्तियों का निरूपण किया गया है एक निविं-कल्प और दूसरी अविकल्प । दोनों के उदाइरण दिए गए हैं । क्रमशः तिमिर ( रतौंधी ) रोग आदि

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व्यक्तिविवेक:

से विकृत नेत्रवाले को दो चन्द्रों आदि की प्रतीति तथा सीप में चाँदी की प्रतीति । इनमें द्वितीय को आभिमानिकी भ्रान्ति कहा गया है । उदाहरणों से स्पष्ट है कि—आभिमानिकी भ्रान्ति वह है जिसमें दोष विषयगत हो प्रमाणगत नहीं । उदाहरण 'शुक्तिकारजत' में चाकचक्यरूपी दोष शुक्तिका में रहता है दृष्टा की आँखों में नहीं । समास में विधेयताकृत चमत्कार की प्रतीति भी आभिमानिकी भ्रान्ति ही है, कारण कि दोष वस्तुतः कवि की समासपूर्ण वाक्ययोजना में ही है, पढ़नेवाले की बुद्धि में नहीं । वस्तुतः यहाँ आभिमानिकी भ्रान्ति का अर्थ प्रतिभासिकी प्रतीति करना चाहिये, जैसे भूत प्रेत की प्रतीति होती है । उसका स्थूल शरीर नहीं रहता किन्तु दृष्टा कभी-कभी देखता है । वस्तुतः वह दृष्टा द्वारा ही कल्पित आकार है । इसी प्रकार समास में चमत्कार कदई रहता ही नहीं । इतने पर भी जिन्हें समास में भी चमत्कार की प्रतीति होती है उनकी यह प्रतीति आभिमानिकी ही है और उसका कोई आधार न होने से वह आभिमानिकी 'भ्रान्तिरेवाभिमानिकी' को बदलकर 'प्रतीतिरेवाभिमानिकी' पाठ बनाना, जैसा कि चौखम्बा के पिछले संस्करण में दिखाई देता है, सर्वथा अनुचित है ।

तस्मादेवमत्र पाठ: कर्तव्य:—

"उद्योग: करिकरीटमेघशकलोडेशेन सिहस्य य: सर्वस्यैव स जातिमात्रनियतो हेयाकलेश: किल । इत्याशाद्दिरदक्ष्यामसृद्घटाबन्धेडपि नोयुक्तवान् योडसौ कुन्त्र चमत्कृतेरतिशायं गौर्यो हरियांतु स: ॥" इति ।

इत्यश्लोकदोषत्रयावकार: प्रतिबिहतो भवति ।

इसलिए यहाँ ऐसा पाठ बना लेना चाहिए—[ उद्योग:—हरियांतु स: ]

'करिकरीट ( छोटे हाथी ) और मेघशकल ( छोटे मेघ ) के प्रति सिह का जो अभियोग है वह एक ऐसी तुच्छ चेष्टा है जो प्रत्येक सिंह में सहज ( जन्मसिद्ध ) है, ऐसा सोचकर जो दिग्गजों तथा प्रलयघटाओं पर भी अभियोग नहीं करता वह भगवती पावर्ती का सिंह, अतिशय चमत्कृत होना तो दूर रहा थोड़ा भी चमत्कृत किसे देखकर हो ।'

इस प्रकार ( का पाठ बनाने से ) तीनों दोषों की जड़ कट जाती है ( उनका निराकरण हो जाता है ) ।

उद्योग इति । संरणभपदं निरस्योद्योगपदकरणं प्रकृत्यमाणोयुक्तवत्पदक्रमाभेदाय ।

योऽसावित्यद: शब्द:प्रसिद्धिपरामर्शक: यच्छब्दप्रतिनिधे:शस्य तच्वब्देन करिष्यमाणत्वात् ।

यद्यपि च योडसावित्यत्र प्रतिपादिताभिसमबन्धकममेकमेव तदुपपादाय सोडयमिति पाटे विपर्यस्ते सत्येकवाक्यतायां न यशोकयत्तदभिसमबन्ध-दोषावकार:; यथा—

"तस्य प्रयातस्य वरूथिनीनां पीडामपर्याप्तसवततीव सोदुम् । वसुन्धरा विष्णुपदं द्वितीयमध्यारुरोहेव रजश्छलेन ॥" इत्यत्र ।

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तथापि तत्रार्थस्य चमत्कारातिशायो न्यग्भवत्येव। स हि भिन्नवाक्यतायामेव सहृदयैकसंवेद्यः समुनिमृश्यतेति तदनुगुणार्थोडयमेव पाठः श्रेयानिति ।

यद्यपि 'यौडसौ' की जगह जिसके अभिसम्बन्ध का प्रकार बतलाया जा चुका है ( केवल तच्छब्द के प्रयोग से भी अर्थ उपक्रमोपसंहार क्रम बतलाया गया है ) ऐसे एक ही तद् शब्द को दे देने से पाठ बदलकर 'सोडयम्' किया जा सकता है, उससे वाक्य एक ही रहेगा और कोई यद्-तद् के अभिसम्बन्ध का दोष भी नहीं रहेगा, जैसा कि—

'चल पड़े उस ( कुश ) की सेनाओं को पीड़ा को सहने में असमर्थ होती हुई सी पृथिवी धूल के बहाने आकाश में चढ़ गई1' ( १६१२८ रकु० ) में हैं, तथापि इस पाठ में अर्थ का चमत्कारतिरेक हीन जाता है । वह भिन्न वाक्य में ही उभरता है और केवल सहृदय-जन को दिखाई पड़ता है । इसलिए इसके अनुरूप यही पाठ अधिक उपयुक्त है ।

प्रतिपाद्यतेति । अर्थो हि केवलतत्छब्दस्य प्रयोजनिवन्धेन उपक्रमोपसंहारक्रमः प्रतिपादित एव ।

रजश्छलेनेति । छलेशब्दप्रयोगे सापह्नवेयमुपेच्छा। केवलच्छलशब्दप्रयोगेऽपहुतिर्न । द्वयप्रयोगे तु शावला प्रतीतिर्न चात्राप्रतीयमानौ सकृदिति । उपेच्छा ह्यपह्नुतिसंभावनाभिनी । साध्वपह्नवः क्रचित् गम्भीरकृता यथा 'नखक्षतानीव वनस्थलीनामी'त्यत्र, न पलाशानि किन्तु सम्भाव्यामि नखक्षतानोति प्रतीते । क्चचिद् शब्देन प्रतिपाद्यते यथा 'अध्यारुरोहद्वे'ति । एवञ्चास्या अपह्नुत्यविनाभाविन्या अपह्नुतिवाषक्वं, न तया सह सकृदिति ।

भिन्नवाक्यतायामेवेति । तत्र हि विध्यनुवादभाव आकाङ्क्ष्येन क्रमेण प्रतीयते ।

प्रतिपाद्यतेति = केवल तद् शब्द के प्रयोग से होने वाला अर्थ उपक्रमोपसंहारक्रम बतलाया ही जा चुका है ।

रजश्छलेन—'छल' और 'एव' शब्द के प्रयोग से यहाँ यह अपह्नव से युक्त उत्क्षेप्ता हुई । केवल 'छल' शब्द के प्रयोग में अपह्नुति होती, और केवल 'एव' शब्द के प्रयोग में सम्भावनामूला उत्क्षेप्ता, दोनों के प्रयोग में जो प्रतीति हो रही है वह दोनों ( अपह्नव और सम्भावना ) से मिश्रित है ।

यहाँ अपह्नुति और उत्क्षेप्ता का संकर भी नहीं माना जा सकता उत्क्षेप्ता तो अपह्नुति से कभी भी अलग नहीं रहती । यह अपह्नव कहीं उत्क्षेप्ता में छिपा रहता है जैसे—'नखक्षतानीव वनस्थलीनामि' में, कारण किन्तु 'पलाश नहीं, ऐसा लगता है कि नखक्षत है' ऐसो प्रतीति होती है । कहीं ( वह = अपह्नव ) शब्दत: कथित होता है जैसे—यहाँ 'अध्यारुरोहद्वे' में । इसलिए उत्क्षेप्ता अपह्नुति के बिना नहीं होते अतः उसे अपह्नुति की बाधिका मानना चाहिए, अपह्नुति के साथ उसका संकर नहीं ।

भिन्नवाक्यतायामेवेति—वाक्य भिन्न होने पर विध्यनुवादभाव साफ-साफ और यथाक्रम सामने आता है ।

विमर्शः इस स्थल में 'व्यक्तिविवेक'-व्याख्याकार ने एक उपांगिक विवेचन किया, उन्हें विवेचन तो करना था 'तस्य प्रयातस्य' पद्य में आई एक व्याख्या पर, किन्तु वे विवेचन कर गए इस पद्य के अलंकार पर । इस पद्य में—शुरू से आखीर तक एक हो वाक्य हैं । जैसे यहाँ यत् और तत् को नहीं दिया, अतः अनेक सम्बन्ध के बनने-बिगड़ने की बात ही नहीं रही—ठीक

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वैसे है 'उद्योग: करिकर:' इसके संशोधित पाठ में भी 'योऽसौ—स:' की जगह 'सोऽयं' पाठ में वह यत्-तत् का दोष नहीं रहता । दोषपरिहार की दृष्टि से यह पाठ भी अच्छा था । परन्तु मूलकार का कहना है कि उद्योगविधेयभाव एक वाक्य में उभरता नहीं है, वह सदा भिन्न वाक्यों में ही उभरता है इसलिये 'योऽसौ—स:' पेसा ही पाठ ठीक है । व्याख्यानकार—याहाँ उत्तमेक्षासिद्धि करते हैं । उनका कहना है कि छल शब्द के आधार पर अपह्नुति भी मानी जा सकती है केवल अपह्नुति नहीं । और न दोनों का संकर । अपह्नुति तो सर्वत्र भासित होती है कहीं स्पष्ट और कहीं अस्पष्ट अतः साधृइय के समान वह भी उत्तमेक्षा द्वारा वाध्य है ।

निदर्शकार ने प्रस्तुत पद्य—'का अर्थ करते हुए लिखा है—'प्रयतस्य युयुत्सार्थमभिगतच्चतत्स्य राघ:' यहाँ एक तो प्र—पूर्वक 'या' धातु का पर्याय 'अभि' पूर्वक 'गम्' धातु नहीं होती, निर्ह—उपसर्गपूर्वक 'गम्' धातु हो सकती है । इसके अतिरिक्त यह पच्य रखुवंश में कुश के लिये लिखा गया है, जब वह कुशावती से राजधानी हटाकर अयोध्या ले जा रहा था, इसलिए 'योऽयं गच्छत:' यह असंगत है । कदाचित उन्हें यह विदित नहीं कि यह पच्य कहाँ का है । इसोलिए उन्होंने 'तस्य' का पर्याय 'राघ:' दिया 'कुशस्य' नहीं ।

मूलकार ने 'संरम्भ: करिकर:' को सुधार कर जो पच्य उपस्थापित किया उस पर अधिक विवेचन किया जाये तो और भी कई दोष दिखाई देते हैं जैसे—

'न युक्त्ववान् यु:' इसमें विधेयाविमर्श । विधेय उद्देष्टव्य के बाद आना चाहिए । युक्त्ववान् यत्पदार्थ में विधेय है अतः 'यो नोयुक्त्ववान्' पाठ होना चाहिए । जैसा कि स्वयं ग्रन्थकार ने—'शक्या शाद्दलम्' पद्य में आगे स्वीकृत किया है

इसी प्रकार अतिशय पद के प्रयोग में अवाच्यवचन दोष है । उसके बिना भी चमत्कारमात्र से काम चल सकता है । अथवा उसे पुनरुक्त कहा जा सकता है जैसे कि 'प्रयुक्त चाप्रयुक्ते च यस्मिन्' से स्पष्ट किया है । यदि चमत्कार में कोई विशेषता लानी है और उससे सिंह में तो उसके साथ लव और लेश आदि शब्द जोड़ने में अतिशय नहीं। कहना था कि जब प्रलयघटा और दिग्गजों पर भी उसे चमत्कार नहीं हुआ तो अब ऐसी कौन सी जगह है जहाँ उसे थोड़ा भी चमत्कार हो । अतिशय से यह अर्थ निकलता है कि वह दिग्गज आदि में थोड़ा बहुत तो चमत्कृत होता ही है—ऐसा कहने पर—'नोयुक्तवान्' को विरोध होता है । चमत्कृत होना भी एक मानस उद्योग है ।

फिर नोयुक्तवान् की जगह—'नोयोगवान्' पाठ चाहिए । 'करिकरीटमेघशकलोहेशोन सिंहस्य उद्योग: स जातिमात्रनियत: हेवाकलेश:, इति आशादिरदक्ष्याम्बुदघटान्धेडपि योऽसौ उद्योगवान्

२—इस प्रकार कहने से छोटे सिंहों में जिस उद्योग का अस्तित्व दिखलाया गया—उसका स्पष्ट अभाव इस सिंह में भासित होता है । उद्योगवान्—में उद्योग अत्यधिक प्रच्छन्न हो जाता है । और भी कई दोष इस संशोधित पद्य में भी है जैसे द्वितीय चरण का अन्तिम स्वर लघु है । गुरु होना चाहिए । वस्तुतः पाठ ऐसा कुछ होना चाहिए—

'संरम्भो गजजाति-मेघनिहोद्ग्रे शुन् सिंहेऽपु य: सर्वेष्वेव तेषु हन्ति सहजो नो मार्दवं कीज्यते । इत्याशादिरदक्ष्याम्बुदघटान्धेडप्युपेक्षावृतो गौर्यो य: कील सिंहराट् स लमतां संरम्भलाभं क वा ॥'

यत्रोत्कर्षोडपकर्षो वा विशेष्यस्य विशेषणात्। तदेव वा विधेयं स्यात् समासस्तत्र नेष्यते ॥ २६ ॥

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द्वितीयो‌ विमर्शः

अन्यत्र त्वर्थंसमबन्धमात्रे वाक्यमभीप्सिते ।

कामचारस्तदर्थं हि समर्थनंग्रहणं मतम्‌ ॥ २७ ॥

न तु सापेक्षताद्यन्यदोषजातनिवृत्तये ।

पित्रोः स्वतेव वन्द्यत्वे सा हि न्यायेन सिद्ध्यति ॥ २८ ॥

इति मङ्गलद्रहश्लोका:

जहाँ विशेषण से विशेष्य का उत्कर्ष या अपकर्ष होता है अथवा वहाँ ( विशेषण ) विधेय होता हो तो वहाँ समास नहीं किया जाता और जहाँ कहीं केवल अर्थों का समबन्धमात्र अभीष्ट हो वहाँ समास करने न करने की छूट है, इसके लिए ही ( समर्थन-महण किया गया है, न कि सापेक्षता आदि अन्य दोषों की निवृत्ति के लिए । वह ( अन्य दोषों की निवृत्ति ) तो अपने आप सिद्ध हो जाती है जैसे माता-पिता के पूज्यत्व में स्वतः ( अर्थात् पुत्र का निजत्व = उसके अपने ही माता-पिता—उसके लिए पूज्य हो सकते हैं ) ।

तदेव वेति विशेषणं , विध्यनुवादभावविवक्ष्यां विधेयम् । अन्यत्रेति उत्कर्षापकर्षयो-विंधेयत्वस्य चाभावे । कामचार इति समासासमास्योः । तदर्थमिति उत्कर्षादिविषयो हि समासनिषेधार्थंम् । सापेक्षत इति सापेक्षमसमर्थं भवतील्येतद्‌वन्‍मात्रप्रतीतये । पित्रोः स्वतेवेति समासनिषेधार्थंम् । यथा पितरौ वन्दनीयाविति नित्यसमबन्धन्यायाद्‌ निजभावे पितरौ प्रतीये, तद्वत्‌ सापेक्ष-णामनभिधानाख्येन न्यायेन समासाभावः प्रत्येष्यते । स्वतां आत्मीयतस्वमिव । सा दोषप्र-कारनिवृत्ति: ।

तदेव वेति = अर्थात् विशेषण । वह ( विशेषण ) विध्यनुवादभाव की विवक्षा में विधेय होता है ।

अन्यत्र—उत्कर्ष, अपकर्ष और विधेयता के अभाव में ।

कामचार:—अर्थात् समास और समासाभाव से ।

तदर्थं—उत्कर्ष आदि के लिये, समास-निषेध करने के लिये ।

सापेक्ष०—जो सापेक्ष होता है वह असमर्थ होता है—इतने ही को बतलाने के लिये ।

पित्रो: स्वतेव—जैसे माता-पिता पूज्य हैं ऐसा कहने पर नित्य समबन्ध होने से अपने ही माता-पिता का ( पूज्यविध्यरूप से ) भान होता है उसे प्रकार 'सापेक्ष पदार्थों का अभिधान नहीं होता' इस न्याय से समास की अप्राप्ति भी भासित हो जायेगी ।

स्वतां = आत्मीयता—अपनापन ।

सा—अन्य दोषों की निवृत्ति ( पूर्वोक्त में कथित । )

अथुना सर्वोत्कृष्टंशालिताप्रकटनार्थं स्वपरिश्रमं ·पिण्डीकृत्य श्लोकेन दर्शंयितुमाह काव्यकाऽ‌ऽनेति ।

अब अपनी सर्वोत्कृष्टता जतलाने के लिये अपने परिश्रम को इकट्ठा कर श्लोक द्वारा दिखलाने के लिये कहते हैं—

काव्यकाऽ‌ऽनकषाश्मममानिना कुन्तकेन निजकाव्यलक्श्मणि ।

यस्य सर्वनिरवद्यतोदिता श्लोक पष स निवर्चितो मया ॥ २९ ॥

'अपने आपको काव्यरूपी सुवर्ण के लिये कसौटी मानने वाले कुंतक ने अपने 'काव्यलक्षण' ग्रन्थ ( वक्रोक्तिजीवित ) में जिसे सब प्रकार से निर्दोष बतलाया था—वही यह श्लोक मैंने भी उपस्थित किया ।

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कान्यसेव परीक्षण्यीयत्वात् सुवर्णं. तत्र परीक्षास्थानं निकषोपलमात्रं मन्यते: न पुनरुक्तक्रमेण परमार्थतस्स निकषोपलः। अत पूर्व कुन्तकेनैति क्यातस्याप्यु हृणगठचचनस्स । श्लोक एष इति । यः सर्वसारतया प्रदर्शितस्तत्रेयती दूषणवृत्तिमुक्ता । तत्रान्यस्य का गणनेति सूचितम् । निर्दशितः स्थालीपुलाकन्यायेनोदाहृतः ।

अत्र श्लोके वद्यमानेतद्यान्यायानुसारेण कषण नियमेन काञ्चनपदं पौनरुक्त्यदोष- हुड्म । निजकाव्यलक्षणपक्षान्तर्गतत्र निजोक्तिस्य सर्वसाम्प्रदायेन विशिष्टवान् समासकर ण विधेयाविमर्शादूषितं केचिदाचक्षते विचक्षणा:। तथ्वनेनैव ग्रन्थकृता 'स्वकृतिष्वयन्त्रित' इत्यादिना दत्तोत्तरमेव । अस्य च विधेयाविमर्शांश्यानन्तरप्रसिद्धलच्यपातिद्वे षेनास्मा- भिनोक्तकभीमांसायां साहिल्यमीमांसायां च तेभु तेभु स्थानेभु प्रपञ्चः ग्रन्थ- विस्तारभयादित एवोपरम्यते ।

काव्य ही परीक्षनीय होनें से सुवर्ण हुआ । उसके लिये परीक्षा का स्थान हुआ कसौटी पत्थर, कुन्तक स्वयं को तद्रूप ( कसौटी रूपी पत्थर रूप ) मानता है, वस्तुतः उक्त ढंग से चर सदृशा निकषोपल नहीं है । इसीलिए—‘कुन्तकेन', इस प्रकार प्रसिद्ध व्यक्ति को भी मत्सैन की दृष्टि से नाम द्वारा वतलाया ।

श्लोकस्य—जिसे सब प्रकार से सुन्दर कहकर उदाहरण रूप उपस्थित किया उसमें इतनी वस्‌तु दोषों की झड़ी लगाई । तब और ( दोष )—ग्रन्थ की तो बात ही क्या ।

निर्दशितः—स्थालीपुलाकन्याय से दिखलाया ( जैसे अंदाज के लिये बतलोई का एक अंश देखा जाता है )

'इस श्लोक में इन्हीं के आगे वतलाये नियम के अनुसार 'कष' कहतें ही प्रतीति हो जाती है अतः काञ्चन पद पौनरुक्त्य दोष से युक्त है । निज काव्यलचण में निजामदराशि पर कवि का संबंध है । अतः वह विधेय है । इसलिए उसके साथ किय समास विधेयाविमर्श दोष से युक्त है ।' ऐसा कुछ उद्दिमान्‌ लोग कहतें हैं किन्तु उन्हें तो स्वयं ग्रन्थकार ने 'स्वकृतिस्वयन्नित्रत:' इस प्रकार पहले ही उत्तर दे दिया है । यह 'विधेयाविमर्श' दोष दुसरे अन्य पच्यों में आता है । उसे हमने नाटकममीमांसा और साहित्यममीमांसा में स्थान-स्थान पर विस्तरारुम्येधि दिखलाया है इसलिए ग्रन्थ के विस्तार के भय से हम इसे यद्यपि छोड़ते हैं ।

विमर्शः राजानक कुन्तक ने अपने 'वक्रोक्तिजीवित' नामक काव्यशास्त्रीय ग्रन्थ में 'संरम्भ: करिकोट०' पद पर इस प्रकार विवेचन किया है—

'अत्र करिणां 'कीर'—व्यपदेशेन तिरस्कारः, तोयदानां च शकलशब्दाभिधानेनालादरः । 'सर्वस्व' इत्य यस्य कस्यचिद् तुछ्छतरप्रायस्येत्यवहेला, जाते श्व मात्रशब्दविशिष्टत्वेनैवधलेप: । हेलाकस्य लेशान्तराभिधानेनात्यल्पताप्रपित्तिरित्यपे विवक्षितार्थकत्वं बोध्यनित । घटावन्त्यादच् प्रतुतमहत्त्वप्रतिपादनपरत्वेनोपात्तत्वात्तन्निबन्धनतां प्रतिपद्यते ।

अर्थात यहाँ ( इस श्लोक में ) 'कीट' कहने से हाथियों का तिरस्कार दिखलाया गया, और 'शकल'शब्द कहकर मेघों का अनादर । 'सर्वस्व' अर्थात् हर किसी—अत्यंत तुच्छ का भी ( उद्योग ) इस प्रकार अवहेलना ( बतलाई गई ) । 'जातिमात्र' इस प्रकार 'जाति' शब्द के साथ मात्र शब्द देने से—( अभिकाकेसरी की का ) अभिमान व्यकत होता है । लेश शब्द के कारण हेलाक में अत्यल्पता की प्रतीति होती है । इस प्रकार यह ( शब्द ) एकमात्र विवक्षित अर्थ को कह सकने का सामर्थ्य सिँड़ करते हैं । और 'घटावन्त' शब्द प्रस्तुत ( मेघ और अभिमन्यु का

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केसरी) के महत्त्व का प्रतिपादन करने के लिये अपनाया गया है, अतः भलीभाँति उसका कारण बन रहा है। [वक्रोक्तिजीवित, द्विळी०संस्करण उद्घाटन सं० २८ ]

इस प्रकार वक्रोक्तिजीवितकार ने इस पद्य के शब्दविन्यास पर आंशिक प्रकार डाला था। उन्होंने इसकी सर्वनिरवद्यता बिलकुल नहीं बतलाई। यह महिमाचायँ की ही महिमा है। महिमभट्ट ने जो श्लोक दिया है उससे वक्रोक्तिजीवित में दिया श्लोक भिन्न है। वक्रोक्तिजीवित में ‘नियतौ’ की जगह ‘विहितो’ है और ‘असंरंभवान्’ की जगह ‘असंरम्भवान्’। संभव है कुल्लक ने कोई दूसरा भी ग्रन्थ इस विषय पर लिखा हो।

‘कारिकाचन’ पद्य में कुछ दोष व्याख्यानकार ने दिखलाए हैं, कुछ दोष इस प्रकार समझे जा सकते हैं—

१. काव्यलक्षणि = के बजाय काव्यलक्षण और २. ‘निर्दर्शितः’ की जगह ‘समोक्षितः’ पाठ करने पर अन्त का लघु गुरु हो जाता है और निर्दर्शितः की जगह समोक्षितः अधिक साफ अर्थ देता है। यदि ‘दृश्’ धातु पर ही आगम्ह हो तो इस प्रकार पाठ करना चाहिए—‘यस्य सर्वनिरव-

व्यतिरिक्ता पद्यमेतदुपपादयितुं मया ।’ इसमें भट्टभूतिके ‘अन्तर्व्याप्तिविरुद्वमुक्तः इव धामभ्युदयस्थादरिः’ के समान तादृशोन्दर्य भी आ जाता है।

२. प्रक्रमभेद

एवं विधेयाविमर्शः प्रकारवैचित्र्येण लभ्यतिश्वा प्रक्रमभेदं लचयितुमाह—प्रक्रमभेदोऽपि इति ।

प्रक्रमभेदोऽपि शब्दानौचित्यमेव। स हि यथाप्रक्रममेकरसप्रवृत्तताया:

प्रतिपत्तृप्रतीतेहत्वात् इव परिस्खलनबोधदायी रसभङ्गाय पर्यवस्यति ।

किश्च सर्वत्रैव शाब्दार्थन्यवहारे विदग्धद्विरपि लौकिक्रमोऽनुसर्त्तव्यः । लोकश्व मा भूद्रसास्वादप्रतीते: परिम्लानतेऽति यथाप्रक्रममेवाद्रियते नान्यथा ।

प्रक्रमभेद भी शब्द का ही अनौचित्य (दोष) है। वही रसभङ्ग का कारण बनता है ( कारण कि ) वह उपक्रम के अनुसार एक रूप से बढ़ती जा रही ज्ञाता की ज्ञानभारा को गिराकर गड़ढे के समान दुःख देता है। और शब्द और अर्थ का जो व्यवहार है उसमें सभी जगह विद्वानों को लोकसंमत-क्रम को ही मानना चाहिए। और लोक की यह प्रवृत्ति है कि वह रसास्वाद की प्रतीति फीकी न पड़े इसलिए उपक्रम के अनुसार होने पर ही इसे ( शब्दार्थ-व्यवहार को ) आदर देता है, नहीं तो नहीं।

प्रतिपत्तृप्रतीतिरिति रथस्यानीयाः प्रतिपत्तृप्रतीतिः । उत्खातो विषमोन्नतत् प्रदेशः । एनमिति शाब्दार्थ्यव्यवहारम् ।

स चायमनन्तप्रकारः सम्मवति । प्रकृतिप्रत्ययपर्यायादीनां तत्त्वद्विषय-

भावाभिमतानामनन्वयात् ।

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तत्र प्रकृतिप्रक्रमभेदो यथा—

"सतततनभिभाषणं मया ते परिपणितं भवतीमनानयन्त्या । गतधृतिगवलम्भितं बतासूननलमनालपनादहं भवत्या: ॥"

अत्र हि भाषतिलपत्योरुभयोरपि वचनार्थाविवक्षोऽपि यद्‌ा भाषतिप्रयोगक्रमेण वस्तु वक्तुमुपकान्तं तद्‌ा तेनैव निर्वाह: कर्तुमुचिनो नेतरेण । पवंविधस्य प्रकमाभेदाख्यस्य शब्दोचित्यस्य विध्यनुवादभावप्रकारत्वोपगमात् यथा—

"णाला जाण्ति गुणा जाला दे सहिअपहि घिसपन्ति । रहकिरणाणुगहिआह होन्ति कमलाइ कमलाइ ॥"

यथा च—

"पमेअ जणो तिस्सा देउ कवोलोपमाल शशिबिम्बम् । परमत्थविआरे उण चन्दो चन्दो वि य वराओ ॥"

अत्र ह्युत्कर्षमात्रविवक्षया परिकलिपतभेदेऽड्येकस्मिन्र्थे विधेयानुवाद्य-विषयेण पकनेनाविधानेन विध्यनुवादभावो भणित इति प्रकमाभेदप्रकारपवायमिति मन्तव्यम् । केवलं पर्यायप्रक्रमभेदनिरुक्त्यै शशिबिम्बमित्यत्र चन्द्रमिणमिति पाठ: परिणमयितव्य: ।

और वह ( प्रकमभेद ) अनेक प्रकार का हो सकता है कारण कि प्रकृति, प्रत्यय, पर्याय आदि उसके क्षेत्र में आने वाले ( तत्त्व ) अनेक हैं । इनमें से प्रकृति-प्रक्रमभेद जैसे—

तुम उन्हें नहीं लाई, इसलिये अब तुमसे मेरा सदा के लिये सम्बन्धग बन्द । मेरा धैयँ छूट चुका है, इसलिये मैं उनकी बोली सुने बिना जा नहीं सकता ।

यहाँ 'भाष' और 'लप्' दोनों क्रियाओं का बोलना अर्थ बराबर है, तब भी वाक्य का आरम्भ 'भाष' क्रिया से किया गया इसलिये निर्वाह भी उसीसे करना उचित था, और किसी से नहीं । कारण कि ऐसी जो 'प्रक्रम का अभेद' कहा जाने वाला शब्दगत औचित्य है, वह भी—विध्यनुवादभाव के ही समान माना गया है । जैसे—

( गुण ) गुण तब होते हैं जब वे सहृदयों द्वारा अपना लिये जाते हैं । कमल तब होते हैं जब वे रवि किरणों का अनुग्रह पा लेते हैं ।

लोग उसके कपोलों की उगमा में शशिबिम्ब को ऐसे हो [ उपमान रूप से ] देते रहते हैं—सच बात तो यह है कि चन्द्र तो बेचारा चन्द्र हो है । ( दोनों पदों को छाया व्याख्यान में देखिए ) ।

यहाँ केवल उत्कर्ष और अपकर्ष की विवक्षा के कारण एक ही शब्द का ( दो वार ) प्रयोग कर विध्यनुवादभाव स्वरूप बताया गया, इसके लिये अर्थ में भेद की कल्पना की, यद्यपि वह एक ही था । इसलिये इसे प्रक्रम के अभेद ( न टूटने ) का ही प्रकार मानना चाहिये । केत्रल पर्यायगत प्रक्रम में भेद आ गया है, उसे हटाने के लिये शशिबिम्ब की जगह 'चन्द्रमिण' यह पाठ कर देना चाहिये ।

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द्वितीयो विमर्शः

तद्विषयभावः प्रक्रमभेदविपर्ययस्वम् । अनभिभाषणं तस्कृतैकभाषणाभावः । एतद्मनालापनं नैअस्यम् । अनलसमर्था । विध्यतुवादभावप्रकारतोपगमादिति प्रकारः साध्यस्यम् । उपकान्तं धनुवादस्थानीयस्यम् । निर्वाहकं च विधेयप्रथमस्म । तत्र स्पष्टं विधेयालुच्याद्यप्रकारसुदाहरणति यथोति ।

'तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहृदयैर्गृह्यन्ते । रविकिरणानुगृहीतानि भवन्ति कमलानि कमलानि ।।' 'एतदेव जनस्तस्या दददाति कपोलोपमायां शिवाशिषम् । परमार्थविचारे पुनर्ग्रहणदूषणं हि वराॠः ।।'

उत्कर्षोपकर्षमात्रेति कमलानुसंकरविवक्षा । अत एवोदाहरणद्वयं दत्तम् । प्रक्रमभेद- प्रकार इति प्रकारोदत्र विशेषः । पर्यायप्रक्रमेति । चन्द्रशब्दार्थस्य शशिशब्देन पर्यायान्तर- निर्देशो न युक्तो वाच्यसमाणप्रक्रमभेदप्रसङ्गात् ।

तद्विषय—प्रक्रमभेदविषय । अनभिभाषणम् = उसके द्वारा किये जाने वाले भाषण ( बोलने ) का अभाव । इसील प्रकार अनुपलपन समझ लेना चाहिये । अनलसम् = असमर्थ । प्रकारः—साध्यस्य । उपकान्तम् जो है यह अनुवाद स्थानीय है और निर्वाहिकं विधेय स्थानीय ।

इस प्रकार स्पष्ट रूप से विधेयानुवाद्य प्रकार उदाहरण देकर सिद्ध करते हैं । यथा—'तदा जायन्ते— हि वराॠः ।' उत्कर्षोपकर्ष—कमलों के उत्कर्ष की विवक्षा । इसलिये दो उदाहरण दिये । प्रकमभेदप्रकारः—

पर्यायप्रक्रम—चन्द्रशब्द के अर्थ के लिये शशिशब्द द्वारा दूसरे पर्याय का निर्देश करना ठीक नहीं, ऐसा करने से आगे बतलाए जाते वाले प्रक्रमभेद दोष की संभावना रहती है ।

विमर्शः सततम् = सत्यादि पद्य में वक्ता पुरुष है । श्रेता = उसकी भेजी दूती, जो उसकी प्रेयसी को नहीं ल्याई । उस पुरुप का कहना है कि मैं तुमसे नहीं बोलूँगा क्योंकि तुम प्यारी को बिना लाये चलो आये, मैं प्यारी से बातचीत किये बिना क्षण भर नहीं जी सकता । इस प्रकार प्रकार 'अनलसम्' यह पुरुप का विशेषण है । व्याख्याकार ने उसे 'खोया' का मान कर उसका अर्थ 'असमर्थ' किया है । प्रक्रम भेद दुग है और प्रक्रम भेद दोष । प्रक्रम भेद विधेयानुवाद भाव मूलक होता है, इसलिये वह विधेयाविमर्श का ही एक प्रकार साधित होता है, परन्तु जहाँ तक दोष का सम्बन्ध है वह विधेय के अधिमर्श से अधिक प्रक्रम के भेद पर निर्भर है । अतः मन्थाकार ऐसों जगढ़ विधेया विमर्श न मानकर प्रक्रम भेद ही मानना ठीक समझते हैं । उदाहरणार्थ—

'कमल कमल तब होते हैं जब वे रविकिरणों के द्वारा अनुपृहीत होते हैं'—इसमें एक ओर प्रथम कमल उद्देय है, दूसरा विधेय और दूसरी ओर रविकिरणों के अनुप्रग्रह का जिसमें विधान करना था उसे ( प्रथम ) कमल शब्द से ( उद्दिष्ट किया ) कहा गया है । इससे जिस ढंग से आरंभ किया था अंत भी उसी ढंग से हुआ । भवन्ति कमलानि पद्यांशि कहने पर वह एकता की प्रतीति न होती और ऐसा लगता जैसे कमल रविकिरण का अनुग्रह या कुछ और ही हो गया अभिन्नता की प्रतीति देर से होती । इतने पर भी उद्देयविधेयभाव में कोई भी कमी न आती । कमल उद्देश्य और पद्य विधेय बन जाता । इसलिये दोष का आधार प्रक्रम का भेद ही हुआ । अतः प्रक्रम भेद को दोष मानना ठीक है—उसे विधेयाविमर्श के भीतर डालना ठीक नहीं । व्याख्याकार ने—'प्रक्रमभेदारव्यस्य

९६ द्यो वि०

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३९०व्यक्तिविवेक:

शब्दौचित्यस्य विध्यनुवादभावप्रकारतोपरमसात्' में प्रकार शब्द का अर्थ सादृश्य किया है । हमारे विवेचन से यह स्पष्ट होता है कि ग्रन्थकार गुण रूप में प्रक्रमाभेद और विधेया विमर्शों को अभिन्न मानते हैं, दोष रूप में भिन्न । अतः प्रकार का अर्थ अग्यान्तर भेद्र मानना भी अनुचित नहीं हैं ।

यथा— "पचमुक्तो मन्त्रमुखदैः रावणः प्रत्यभाषत ।" इति । तेन प्रत्यवोचत इति यत्र पाठो युक्तः ।

यथा च— "नाथे निशाया नियतेर्नियोगादस्तं गते हन्त निशापि यांता । कुलाल्नानां हि दशानुरूपं नाथः परं भद्रतरं समप्सित ।" इति ।

अत्र हि 'गता निशापी'ति युक्तः पाठः । न चैवं शब्दपुनरुक्तिदोषप्रसङ्गः-यथान्ये मन्यन्ते 'नैकं पदं द्विः प्रयोज्यं प्रायेण' ( व मनस्य क सू० ५।१।९ ) इति, तयोरभिन्नविषयत्वात् । यथोद्देश्यं हि प्रतिनिदेशोऽस्य विषयः । उद्देशयप्रतिनिदेश्यभावभावविषयस्तु शब्दपुनरुक्तदोष इति कुतस्तस्य प्रसङ्गः ।

"व्रजत क तात ! व्रजसीति परिज्ञातगतार्थमप्फुटम् । धैर्यमभिनदुदितं शिशुना जननोर्निभर्त्सनंनिवृद्धमन्युना ।" इति । इत्यत्र शिशुना व्रजतिरेव प्रयुक्तो न व्रजति:, तत्रैव परिचयगतार्थैत्वस्फुटत्ववदधैर्यमभेदत्वसम्भवात् । केवलं शक्तिवैकल्याद्रेफोड्डनेन नोच्यारि- त इति प्रत्युदाहरणमेतत् ।

और जैसे— 'मन्त्रियों द्वारा इस प्रकार कहा गया रावण बोला ।' यहाँ प्रत्यवोचत ( कहने लगा ) पाठ करना चाहिए । और जैसे— 'विधिवशात्—जब रात्रि का स्वामी अस्ताचल को चला गया तो वह भी चल बसी । कुल-बालाओं की दशा के अनुरूप इससे अच्छी और कुछ नहीं ।' यहाँ निशा भी 'गता' = ( चली गई ), यही पाठ चाहिये ।

ऐसा करने पर पुनरुक्ति दोष की शंका भी नहीं उठती—जैसा कि दूसरे लोग ( वामन ) मानते हैं—'प्राय: एक शब्द दो बार नहीं कहा जाना चाहिए, कारण कि—दोनों के विषय भिन्न होते हैं । इस ( प्रक्रमाभेद ) का विषय है—आरम्भ में जिस प्रकार की उक्ति हो अन्त में भी उसी प्रकार की उक्ति होना । शब्दपुनरुक्ति दोष वहाँ होता है जहाँ 'उद्देशयप्रतिनिदेश्यभाव' नहीं रहता, इसलिए उसकी यहाँ संभावना ही कैसी ?

'माँ के डाँटने से अधिक चिढ़े बच्चे ने 'तात क ब्रजसि'—'हे तात कहाँ जा रहे हो'—इस प्रकार ( बच्चे की बोली में रेफ आदि के न रहने पर भी उन्हें सुनने का ) अभ्यास होने से जिसका अर्थ समझा जा सकता था और जो वस्तुतः साफ उच्चारित न था ऐसा जो कहा, उससे जाने वाले का धैर्य छूट गया ।

[ 'जननोर्निभर्त्सनंनिवृद्धमन्युना परिज्ञातगतार्थम् अस्फुटम् 'तात क ब्रजसि—इति उदितं व्रजत: धैर्यम् अभिनत्' इत्यान्वयः ] ।

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द्वितीयो विमर्शः

२९१

यहाँ शिशु ने ब्रज धातु का हि प्रयोग किया था, व्रज धातु का नहीं, कारण कि परिचय होने से अर्थ समझ में आने की बात उसो ( ब्रज ) से वन सकती है और उससे अर्थ की ( उसो के रेफ का उच्चारण न करने से ) अस्फुटता तथा धैर्य छूटने की बात भी । यहाँ सिर्फ ( रेफ के उच्चारण की ) शक्ति न होने से इस ( शिशु ) ने रेफ न बोला—इतने से ही यह पद ( प्रक्रमाभेद का ) अत्युदाहरण हो गया ( अर्थात इसमें प्रक्रमभेद नहीं हुआ ) ।

न चैवमिति तेनैव शब्देनोपसंहार इत्यर्थः ।

तथोरिति प्रक्रमाभेदपुनरुक्तयोः । अस्त्येतत् प्रक्रमाभेदस्य परामर्शः । तत्र हि यथोद्देशं प्रतिबिंदेशेन पौनरुक्त्यम्, ऐकरस्येन प्रतीतिमपसरगात् । उद्देश्यप्रतिबिंदेश्यभावो न पौनरुक्त्यस्य विपयः । यथा—

'क्षामाङ्ग्यः चातकोमलाकुलिगलद्रकैः सदर्भाः स्यल्लीः: पातितयावकैरव गलद्राष्पास्वधौताननाः' । इति ।

अत्र गलद्रपदद्रयां निर्दिष्टं यथोद्देशं प्रतिबिंदेशोडस्य विषय इति समक्षसम् ।

न चैवम्—उसी शब्द से उपसंदार करना ।

तथोः—अर्थात् प्रक्रमभेद और पुनरुक्ति का ।

अस्य—इससे प्रक्रमभेद का परामर्श किया । प्रक्रमभेद में उद्देश्य के अनुसार ही प्रतिबिंदेश करने से पुनरुक्तता आती है । ऐसा करने से प्रतीति में एकरस वेदना चलती है । उद्देश्यप्रतिबिंदेश्यभाव में ( शब्द ) पुनरुक्ति दोष नहीं होती जैसे—

क्षामाङ्ग्यः चातकोमलाकुलिगलद्रकैः सदर्भाः स्यल्लीः: पातितयावकैरव गलद्राष्पास्वधौताननाः ।

यहाँ 'गलत्' शब्द दो बार प्रयुक्त किया गया है, इसका अभिप्राय उद्देश्य के अनुसार प्रति-बिंदेश करना है । अतः ठीक है ।

विमर्शे : प्रस्तुत पद्य, ध्वन्यालोक और काव्यप्रकाश में भी आया है । दोनों जगह इसका पाठ भिन्न है ।

ध्वन्यालोके काव्यप्रकाश व्यक्तिविवेककाव्याख्यान

१. क्रामनत्यःवलदरकैः १. क्रामनत्यःगलद्रकैः १. क्षामाङ्ग्य:—गल०

२. पतितयावकैरव गलद्राष्पास्वधौताननाः २. गलद्राष्पास्व० २. गलद्राष्पाम्बु

साहित्यदर्पण, वक्रोक्तिजीवित और स्वयं व्यक्तिविवेक मूल में यह पद्य नहीं है । काव्यप्रकाश वृत्ती टीका काव्यप्रदीप में भी वही पाठ है जो काव्यप्रकाश में है और उदाहरणचन्द्रिका में भी वही । 'क्रामनत्यः' पाठ अर्थ की दृष्टि से उचित हैं । क्षामाङ्ग्य: पाठ में 'क्षामाङ्ग्य:' कर्त्ता बनता है और स्थली कर्म । क्रिया का अभाव रहता है । 'क्षामाङ्ग्य:' पाठ वस्तुतः आन्तिप्रकर्ण है । व्याख्या-

नकार वो केवल इतना हूँ बतलाना था कि इस पद्य में आरम्भ में गलत शब्द दिया गया है उसी प्रकार अन्त में भी गलत शब्द । यहाँ आरम्भ और अन्त दोनों में अभिन्नता दिखलाना अभीष्ट होने से एक ही 'गलत्' के दो बार प्रयोग होने पर भी पुनरुक्ति दोष नहीं हुआ ।

नतु 'व्रजत: क तत् ! वजसी'स्यत्र ब्रजिना प्रक्रमे वजिना च निर्वहे कथं न प्रक्रमभेदः (यतो हि) वजतिरूपि धातुरसि, 'वज व्रज गता'चिन्ति पाटाद् इत्याशाङ्क्योक्तं व्रजत इति । उद्दितमित्यस्य विकल्पणम् परिचयगता श्रोतात् अस्फुटभति चैव नोच चात्र प्रयोजनम् ।

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कार्यार्थं पथि गच्छतः पथ्शब्दामोदर्शनं विरुद्धमिति शिशुना ललितवचसा नाम्न्युदीरिते जनन्यास्य भरस्नं कृतस्मिते तत्तोडस्य मन्युर्विवृद्ध इत्यत्र तात्पर्यार्थः ।

शंका—बतलाइये कि 'ब्रजत:' क तात वजसि? यहाँ आरम्भ में हैं 'ब्रज' धातु और अन्त में 'वज', इसलिये यहाँ प्रक्रम भेद कयों न माना जाय ? यह शंका इसलिए की गई है कि ब्रज के समान जो हैं 'वज' धातु भी हो । 'वज वज शातौ' ऐसा पाठ मिलता है ।

ब्रजतः परिन्चयगतार्थम्—यह शब्द 'उदितंत शिशुना' में आये 'उदितत शब्द' का विशेषण है और 'अस्फुटतम्' यह भी । यहाँ जो प्रत्यय हुआ है वह भाव में है ।

यहाँ यह भाव है—किसी काम से रास्ते में जा रहे व्यक्ति का पीछे से नाम पुकारना ( अथवा 'कहाँ जा रहे हो' ऐसा पूछना—आचार ) विरुद्ध होता है । इसलिये शिशु ने आड़ में जब नाम ले दिया ( या पूछ्‌ दिया ) तो माँ ने उसे डाँटा । उससे इस ( बच्चे ) का क्रोध और बढ़ गया ।

एवं धातुरुपाया: प्रकृतेः प्रक्रमभेदं प्रदर्श्यं सम्प्रति प्रातिपदिकरूपपायास्तस्यैव मध्यै च सर्वनामादीनां प्रकारवैचिच्यण तं दर्श्यति सर्वनामभेदि ।

इस प्रकार धातुरूप प्रकृति का प्रक्रमभेद दिखला कर अब प्रातिपदिकरूप प्रकृति का और उसके बीच सर्वनाम आदि का प्रक्रमभेद भिन्न-भिन्न प्रकार से दिखलाते हैं ।

सर्वनामप्रक्रमभेदो यथा—

"ते हिमालयमानङ्ङय पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम्‌ । सिषेव चास्मै निवेद्यार्थं तद्विसृष्टः खमुदयुज्यः ॥"

अत्र हि भगवान्तं शूलिनं प्रकान्तमिदमां परामृश्य तेनैवोक्तरीत्या तत्परामर्शः कर्तुं युक्तो न तदा तयोदेङ्गदतयैवदतशब्दयोः तदिव भिन्नार्थत्वात् ।

न चैवं यत्तदोः पदमेतददसां चाभिन्नार्थत्वेऽप्येदङ्पयेतदोः विषयतवप्रसङ्ङः ।

तेषामुक्तप्रकारेण स्वभावतोऽन्योन्यापेक्षसम्बन्धोपपादनात् । तेनैवादि-भिन्नाभिस्तस्य परामर्शो, न तदेति स्थितम्‌ ।

सर्वनाम का प्रक्रम भेद जैसे—

'हिमालय से जाने को अनुज्ञा लेकर फिर से शंकर जी के दर्शन कर और उन्हें कार्यं सिद्धि की सूचना दे—उनके द्वारा विसर्जित किये गये वे ( सर्पाणि )—आकाश में उड़ गये ।' ( कुमार सम्भव ३।९४ )

यहाँ भगवान्‌ शंकर प्रकरण प्राप्त है । उनका इदम्‌ ( अस्मै ) द्वारा निर्देश कर पुनः उसौसे ( इदम्‌ ही से ) परामर्शो करना उचित था, जैसा कि पहले बतलाया गया है, न कि तद्‌ शब्द द्वारा, क्योंकि उन ( इदम्‌ तद्‌ ) दोनों के अर्थों में उतना भेद है जितना देवदत्त और यज्ञदत्त के अर्थों में । ऐसा किया नहीं गया, अतः सर्वनाम का प्रक्रम टूट गया ।

ऐसा करने पर यह बात नहीं हैं कि—अभिन्नार्थक इदम्‌ एतद्‌ अदस्‌ शब्दों में भी यह दोष होने लगे, कारण कि जैसा पहले बतलाया जा चुका है—वे ( इदम्‌ एतद्‌ और अदस्‌ ) स्वभावतः एक दूसरे में सापेक्ष सम्बन्धों का प्रतिपादन करते हैं । इसलिये 'उसका ( शिव का ) परामर्शो इदम्‌ आदि तीनों में किसी एक के द्वारा करना चाहिये । तद्‌ के द्वारा नहीं' यही बात सिथर रही ।

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द्वितीयो विमर्शः

२९३

स्तकेपु प्रकृतिप्रक्रमभेदादनन्तरं प्रत्ययप्रक्रमभेदोदाहरणं तत्पक्षश्रात् सर्व-

:तो दृश्यते। तत्र च प्रकृतिरनन्तरं प्रत्ययस्यैव निर्देश उचित इति स

ज्ञायते। ततः परं प्रकृतिविशेषाणां प्रत्ययविशेषाणां तत्समुदायानां च

भिद्यते।

'यस्वेवकार्ये कर्तृवेनोक्तो यथोेदभादिभिर्‌इयत्नोक्केन क्रियतेत्थार्थः।

मे तच्छब्दनेदेर्दमादिभिःव्या कथमुपसंहार इत्याह न चैवमिति। अन्योन्यापेक्षे

।भिसम्बन्ध इत्युक्तम्। एवम् तच्छब्दाद् दूरविप्रकृष्टार्थे‌ऽद्वद्मादिषु प्रागुक्ते

यादौ ज्ञेयम्। तेनैति प्रकृतोपसंहारः। इदमादीनां परस्परावान्तरचैचिच्ये-

कार्थवम्।

कों में प्रकृतिप्रक्रमभेद के बाद प्रत्ययप्रक्रमभेद का उदाहरण मिलता है—

रक्मभेद का निर्देश दिखाई देता है। उस पाठ में इस प्रकार संगति लगानी

है। बाद प्रत्यय का ही निर्देश करना उचित है। उसके बाद विशेष प्रकार की

के प्रत्यय और उनके समुदाय का प्रक्रम भेद दिखलाया जायगा ।

थोंत 'यस्वेवकार्ये कर्तृवेनो' इत्यादि जो कहा गया है—उसी रीति से।

: से जहाँ आरम्भ हो वहाँ तद्‌ पद्र के द्वारा या इदम् आदि द्वारा उपसंहार

? इस पर उत्तर देते हैं न चैवम्—इत्यादि । क्योंकि यद् और तद् का नित्य

ले कन्हा जा चुका है। इसी प्रकार तद् शब्द से दूर या विप्रकृष्ट अर्थों में प्रयुक्त

नित्य सम्बन्ध होता है जो कि 'यौध्दिकरप' इत्यादि में दिखलाया गया।

गा उपसंहार करते हैं। इदम् आदि में परस्पर में अवान्तर भेद है, तब भी मोटे

द्दी होते हैं।

॥दो यथा—

नो कृत एव स पुनर्भवती 'नानुसृतरवाप्यते।

नोकृषु स्वकर्मभिर्‌गतयो मिन्नपथा: शरीरिणाम्‌॥" इति ।

मेद्र यथा—

स ( इन्दुमती ) के पीछे मर कर भी आप उसे नहीं पा सकते। जो शरीर धारी

हैं, उनकी गति के पथ अपने कर्मों के अनुसार मिन्र-मिन्न होते हैं ।' तु सानुरोदनात्' ऐसा पाठ करना ठीक है।

त्र हि कर्तृविशेषणद्वारेणैकस्य हेतुत्वमपरस्य साचादिति प्रक्रमभेदः।

'न्य ( रहस्य का ज्ञात ) तो कर्ता का विशेषण बनाकर क्रिया में संबन्ध होता

ञ्जुमृति का क्ति ) साक्षात्। इसलिये यहाँ प्रक्रम मिन्र हुआ ।

जुत पथ रघुवंश ८।४५वाँ पद्य है। इसके द्वितीय चरण के तीन पाठ हैं

क के अनुसार—अनुसृततेरवाप्यते ।

ैर मधिनाथ के अनुसार—अनुसृतापि लभ्यते और

नुसृततेन लभ्यते ।

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२९२

व्यक्तिविवेक:

कार्योथं पथि गच्छतः पक्षान्नामोदेरणं विरुद्धमिति शिशुना ललितवचसा नाम्न्युदीरिते जननन्यास्य भर्र्स्नं ऋतुमिति तत्सोदस्य मन्युविच्युच इत्यत्र तालपार्थः ।

शंका—बतलाइये कि 'व्रजत:' क्र तात व्रजसि' यहाँ आरम्भ में है 'व्रज' धातु और अन्त में 'वज', इसलिये यहाँ प्रक्रम भिन्न क्यों न माना जाय ? यह शंका इसलिये की गई है कि व्रज के समान जाने अर्थ में 'वज' धातु भी है । धातु पाठ में 'वज व्रज गतौ' ऐसा पाठ मिलता है ।

व्रजत: परिचयगतार्थम्—यह शब्द 'उदितंत शिशुना' में आये उक्तित शब्द का विशेषण है और 'अस्फुटम्' यह भी । यहाँ जो प्रत्यय हुआ है वह भाव में है ।

यहाँ यह भाव है—किसी काम से रास्ते में जा रहे व्यक्ति का पीछे से नाम पुकारना ( अथवा 'कहाँ जा रहे हो' ) ऐसा पूछना—आचार ) विरुद्ध होता है । इसलिये शिशु ने आड़ में जव नाम ले दिया ( या पूछ दिया ) तो माँ ने उसे डाँटा । उससे इस ( बच्चे ) का क्रोध और बढ़ गया ।

एवं धातुरुपाया: प्रकथते: प्रक्रमभेदं प्रदर्श्य सम्प्रति प्राप्तिपदिकरुपायास्तस्यां मध्ये च सर्वनामादीनां प्रकारवैचित्र्येण तं दर्शयति सर्वनामोभेति ।

इस प्रकार धातुरूप प्रकृति का प्रक्रमभेद दिखला कर अब प्राप्तिपदिकरूप प्रकृति का और उसके बीच सर्वनाम आदि का प्रक्रमभेद विभिन्न प्रकार से दिखलाते हैं ।

सर्वनामप्रक्रमभेदो यथा—

"ते हिमालयमानन्र्य पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनं ।

सिद्धं चाश्मै निवेद्यार्थं तद्विसृष्टः खमुध्यगात् ॥"

अत्र हि भगवान्त शंकरं प्रकान्तमिदमा परामृश्य तेनैवोक्तरीत्या तत्परामर्शः कर्तुं युक्तो न तदा तयोदेवदत्तयज्ञदत्तशब्दयोरिव भिन्नार्थत्वंवात ।

न चैवं यत्तदोरिदमेतददसां चाभिन्नार्थत्वेडप्येतददोषविषयत्वप्रसङ्गः ।

तेषामुक्तप्रकारेण स्वभावतोऽन्योन्यापेक्षसम्बन्ध्योपपादनात् । तेनैदमादि-

भिन्नभिस्तस्य परामर्शो, न तदेति स्थितम् ।

सर्वनाम का प्रक्रम भेद जैसे—

'हिमालय से जाने की अनुमति लेकर फिर से शंकर जी के दर्शन कर और उन्हें काःयें सिद्धि की सूचना दे—उनके द्वारा विसृष्ट किये गये वे ( सप्तर्षि ) —आकाश में उड़ गये ।' ( कुमार सम्भव ६।९४ )

यहाँ भगवान शंकर प्रकरण प्राप्त है । उनका इदम् ( अस्मै ) द्वारा निर्देश कर पुनः उसी से ( इदम् ही से ) परामृश करना उचित था, जैसा कि पहले बतलाया गया है, न कि तद् शब्द द्वारा, क्योंकि उन ( इदम् तद् ) दोनों के अर्थों में उतना भेद है जितना देवदत्त और यज्ञदत्त के अर्थों में । ऐसा किया नहीं गया, अतः सर्वनाम का प्रक्रम टूट गया ।

ऐसा करने पर यह बात नहीं है कि—अभिन्नार्थक इदम् एतद् अदस् शब्दों में भी यह दोष होने लगे, कारण कि जैसा पहले बतलाया जा चुका है—वे ( इदम् एतद् और अदस् ) स्वभावतः एक दूसरे में सापेक्ष सम्बन्धों का प्रतिपादन करते हैं । इसलिये 'उसका ( शिव का ) परामर्श इदम्'

आदि तीनों में किसी एक के द्वारा करना चाहिये । तद् के द्वारा नहीं। यही बात स्थिर रही ।

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द्वितीयो विमर्शः

२९३

क्वचित् पुस्तके तु प्रकृतिप्रक्रमभेदादनन्तरं प्रत्ययप्रक्रमभेदोदाहरणं तत्त्वश्रुत् सर्वनामप्रक्रमभेदनिर्देशो दश्यते। तत्र च प्रकृतेरनन्तरं प्रत्ययस्तदेव निर्देश उचित इति स एव कचित् इति सङ्झति। ततः परं प्रकृतिविशेषणां प्रत्ययविशेषणां तत्त्वसुदायानां च तत्त्वप्रक्रमभेदो निरूपयिष्यते।

उत्तरौत्येति। 'यस्त्वेकवाक्ये कर्तृवाच्योक्तो यद्वेदभादिभिरित्यत्रोक्तेन कमेणोत्यर्थः। ननु यच्छब्देन प्रक्रमे तच्छब्देनैवमादिभिः्वा कथमुपसंहार इत्याह न चैवमिति। अन्योन्यापेक्षे इति। यत्तदोर्नित्याभिसम्बन्ध इत्युक्तम्। एवं तच्छब्दाद् दूरीयप्रकृत्याद्यैः्विद्यद्मादियु प्रागुक्ते 'योऽविकलपम्' इत्यादौ श्रेयम्। तेनैति प्रकृतोपसंहारः। इदमादीनां परस्परावान्तरवैचित्र्येऽपि स्थूलदशया एकार्थकवम्।

कहीं कहाँ पुस्तकों में प्रकृतिप्रक्रमभेद के बाद प्रत्ययप्रक्रमभेद का उदाहरण मिलता है—उसके बाद सर्वनामप्रक्रमभेद का निर्देश दिखाई देता है। उस पाठ में इस प्रकार संगति लगानी चाहिये कि प्रकृति के बाद प्रत्यय का ही निर्देश करना उचित है। उसके बाद विशेष प्रकार की प्रकृति विशेष प्रकार के प्रत्यय और उनके समुदाय का प्रक्रम भेद दिखलाया जायगा।

उत्तरौत्येति—अर्थात् 'यस्त्वेकवाक्ये कर्तृवाचे' इत्यादि जो कहा गया है—उस्सी रीति से। शङ्का = यदि पद् से जहाँ आरम्भ हो वहाँ तद् पद् के द्वारा चा इदम् आदि द्वारा उपसंहार क्यों किया जाता है ? इस पर उत्तर देते हैं। न चैवम्—इत्यादि। क्योंकि यद् और तद् का सम्बन्ध है ऐसा पहिले कहा जा चुका है। इसी प्रकार तद् शब्द से दूर या विप्रकृष्ट अर्थ इदम् आदि में भी नित्य सम्बन्ध होता है जो कि 'योऽविकलपम्' इत्यादि में दिखलाया गया है।

तेन—प्रकृत का उपसंहार करते हैं। इदम् आदि में परस्पर में अवान्तर तौर से वे एकार्थक ही होते हैं।

प्रत्ययप्रक्रमभेदो यथा— "रुदता इकृत पत्व सा पुनर्भवता नानुमृतेः परलोकुषां स्वकर्मभिरिगंतयो भिन्नपथा शारीर अत्र हि 'कृत एव तु सानुरोदनात्' इति युक्तः पाठः।

प्रत्यय प्रक्रम भेद यथा— 'रोकर क्या उस ( इहुमती ) के पीछे मर कर भी आप उसे नहीं पा सक परलोक चले जाते हैं, उनकी गति के पथ अपने कर्मों के अनुसार भिन्न-भि- यहाँ 'कृत एव तु सानुरोदनात्' ऐसा पाठ करना ठीक है।

अत्र हीति अत्र हि कर्तृविशेषणद्वारेणैकस्य हेतुत्वसमपरस्य अत्र ह्र एक प्रत्यय ( रुदता का राङ्‌।) तो कर्ता का विशेषण है और दूसरा ( अनुष्मृति का क्कि ) साक्षाद्। इसलिये यहाँ प्रक्रम ।

विमर्शः : प्रस्तुत पद्य रख्यवंश ८४८वाँ पद्य है । इसके द्वितीय चरण में १. व्याक्तिविवेक के अनुसार—अनुमृत्येरप्यते। २. हेमाद्रि और महिमनाथ के अनुसार—अनुमृतापि लभ्यते और ३. एक—अनुसृतेऽन लभ्यते ।

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२९४

व्यक्तिविवेकः

एक चौथा पाठ और है ओ वह्‌मभदेव ने अपनाया है—

हृदितेन न सा निवर्तंतेऽ नृप ! तत्त्वावदनर्थकं तव् । न भवाननुसंस्थितोऽपि तां लभते कर्मवशा हि देहिनः ॥

उक्त पाठों में 'अनुसृता' की दो व्याख्यायें हैं । एक अनुगमनार्थक 'इति' अनुवृत्त—अनुसृता—क्रिये, तेन—अनुमृतवता इत्यर्थः । यह अर्थ मछिनाथ और हेमाद्रि दोनों ने अपनाया है । हमारी दृष्टि से—'अन्वभ्रियत' इति अनुमृत' तेन—अनुसृता—अनुसृतवता—इत्यर्थः; ऐसी व्याख्या उचित प्रतीत होती है । अनुम्रियते इस वतंमान काल से अनुसृता बनाकर उसे भूतार्थ निष्ठाप्रत्यय से युक्त 'अनुमृतवत्'

इस प्रकार गढ़ना ठीक नहीं । हेमाद्रि ने—'अनुसृतां यस्या: सेति प्रथमान्तो वा' इस प्रकार अनुसृता शब्द को टावन्त खोर्लिंग प्रथम का एकवचन भी बतलाया है । 'अनुसृततेन्' पाठ में और मछिनाथ के अर्थ में प्रक्रमभेद नहीं होता । उसमें दोनों प्रत्यय कर्त्ता के विशेषण बनकर क्रिया में अन्वित होते हैं । यद्यपि अनुसृता को खोर्लिंग मानने पर भी उसका प्रत्यय क्रिया में साक्षात् अन्वित नहीं होता, तथापि उसमें प्रक्रमभेद दूर नहीं होता कारण कि प्रथम रुदता का शाब्द प्रत्यय कर्तृँश्रित है—और द्वितीय अनुसृता का टाप् प्रत्यय कर्माश्रित ( जो कर्मवाच्य में कर्त्तारूप से प्रयुक्त है )

इसलिये आरम्भ में जैसा प्रत्यय दिया गया अन्त में 'वह—वैसा नहीं रहा, अतः प्रक्रमभेद दोष होने लगता है । 'अनुसृते:' पाठ में भी वही स्थिति है । अनुसृति—क्रिया में साक्षात् अन्वित होती है, रुदता—रोदन कर्त्ता के माध्यम से । अतः दोनों प्रत्यय एक प्रकार के नहीं रहे फलतः प्रक्रमभेद हुआ ।

यथा च—

"यशोऽधिकन्तुं सुखलिप्सया वा मनुष्यसंख्या|मतिकर्त्तितुं वा । निःसुत्सुकानामभियोगभाजां समुत्सुकेवाड्‌डुपुपैति सिद्धिः ॥"

इदं चाप्रमाण प्रक्रमभेदादुषषि दोषान्तरमध्याविर्भवति, योडयं विकल्पार्थक-शब्दोऽश्रयदस्य समुच्चयार्थस्य च शब्दस्याविषय एव प्रयोग इति वक्ष्यते । तेन 'यशोऽधिकन्तुं सुखमीहितुं वे'ति मुक्तः पाठ ।

और जैसे—

यश को पाने के लिये, सुख पाने की इच्छा से या मनुष्यन—गणना को पार करने के लिये उल्टौठाकूल्य होकर अनवरत कार्ये करने वालों की गोद में लक्म्मी समुत्सुक होकर चली आती है ॥—यहाँ ।

यहाँ एक और दोष प्रक्रमभेद के साथ चला आया, जो यह विकलपार्थक 'वा' शब्द का समुच्चयार्थक च शब्द के समान वेमौके प्रयोग किया गया—इस पर आगे विवेचन करेंगे । इसलिये 'यशोऽधिकन्तुं सुखमीहितुं वा' ( अर्थात्, यश पाने के लिये या सुख चाहने के लिये ) । यह पाठ चाहिए ( अर्थात् तुमुन् प्रत्यय का ही प्रयोग आगे भी होना चाहिए ) ।

यशोऽधिकन्तुमिति अत्र हि तुल्ययातुसुनोः प्रतीतिवैपस्यजननकत्वम् । वाच्यदस्येति । वच्यति हि 'तुल्यकचयतया यत्र पदार्थः' इति । यशोऽधिकन्तुम्—यहाँ तुर्त्तीया और तुमुन् ज्ञानधारा में भेद डालते हैं । वा शब्दस्य—जैसा कि कहेंगे—'जहाँ पदार्थ वरावरी के साथ माने जायँ इत्यादि ।

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"पृथिवि ! स्थिरा भव भुजङ्गम ! धारयैनां त्वं कूर्मराज ! तदिदं द्वितयं दर्धोथा: । दिक्कुञ्जरा: ! कुरुत तद्वितये द्विधीर्ष देव: करोति हरकामुकमततजय्यम्"

इत्यज्ञा पृथिव्यादिविष्यै: प्रेष्यलक्षणाड्यै: कविना वक्तुं प्रकल्पित: । तथ्य प्रत्ययभेदेडपि निर्ङयटत्वात् प्रेष्यार्थानां पद्यानामुचेश्यप्रतिनिर्देश्यभावेनो-पादानं न कृतमिति नैतादृश: प्रत्ययप्रकमभेददोषस्य विषयोडवगन्तव्य: ।

'हे पृथिवि तुम स्थिर हो जाओ । हे सर्पराज—तुम इसे सँभाले रहो । हे कूर्मराज तुम इन दोनों को सँभाले । हे दिग्गजो—तुम लोग इन तीनों को सँभालने में लगे रहो, महाराज राम शिवधनुप पर प्रत्यंचा ( डोरी ) चढ़ा रहे हैं ।'

कवि ने यहाँ पृथिवी आदि के विषय में आज्ञा रूप पदार्थ का विधान शुरू किया । वह प्रत्यय बदल जाने पर भी निवह गया, कारण कि आज्ञार्थक पदों का उपादान उद्देश्य प्रतिनिर्देश्य-भाव से नहीं किया । इसलिये ऐसे स्थल प्रत्यय प्रकमभेद दोष के अन्तर्गत नहीं माने जाते ।

पर्यायप्रकमभेदोऽपि दृष्टस्तस्मिन्नपत्ये न जगाम तृप्तिम् । अनन्तपुष्पस्य मधोर्हि चूते द्विरेफमाला सविधोषसद्म ॥"

इत्यत्र हि पुत्रापत्यशब्दावेव पर्योयत्वात् प्रकमभेदविषयौ, न पुष्पचूत-शब्दौ, तयो: सामान्चविशेषवचनत्वादित्यपत्यचतोडपोति युक्त: पाठ: ।

पर्याय प्रकमभेद—जैसे—पुत्र होते हुए भी पर्वतरात हिमाचल की दृष्टि उस अपत्य ( शिशु ) से च्यक्ती न थी । मौरों की पाँत—वसन्त में अनगिनती फूल होते हैं, तो भी आम पर अधिक दौड़ती है ।' यहाँ—पुत्र और अपत्य ( शिशु ) शब्द ही, कमबेद के विषय हैं, कारण कि वे एक दूसरे के पर्याय हैं । पुष्प और चूत ( आम ) शब्दों में यह बात नहीं है, कारण कि वे 'सामान्यविशेष-वाची हैं । इसलिये 'अपत्यचतोडपोति' यह पाठ चाहिये ।

अपत्यवतोडपोति युक्त: पाठ इति । अत्र केचित् समर्थनते—'(पितरो हि पुत्रेषु) विशेषत: स्थितान्तो डश्यन्ते, तत् पुत्रशब्दस्यापत्यविशेषवाचित्वे अपत्यशब्दस्य च सामान्यवा-चित्वेऽपि सर्वनामवशाद् विशेषपर्यवसानं भवत्येव प्रकृतार्थपरितोष' इति । तदेतदस्य ग्रन्थकारस्य हृद्यमनालोक्यैव, यस्माद् दृष्टान्तदार्शनिकभावेनात्र वाक्यार्थद्वयस्युप-निवद्धम् । तत् च दृश्योरिवमप्रतिविम्वभावेन निर्देशो युज्यते । दृष्टान्ते छात्र सामान्योपक्रम:, विशेषोपसंहार:, पुत्रशब्दस्य सामान्यवाचित्वा चूतशब्दस्य विशेषोभिधायिकत्वात् ।

विशेषस्य चैकृततयैवात्रसि विषयकल्वम् । दार्शनिकैस्तु विशेषोपक्रम: सामान्योपसंहार: । विशेषस्य चोक्तकृततयैवात्र विषयकल्वम् । दार्शनिकैस्तु विशेषोपक्रम: सामान्योपसंहार: । विशेषपर्यवसानरनिदेशो न्याय्य: । स्थितपाठे पुत्रशब्दस्य विशेषवाचित्वम् अपत्यशब्दस्य सामान्यवाचिनो विशेषपर्यवसानसनम् । यदा त्वपत्यवतोडपोति पाठस्तदास्य पुत्रशब्दस्यापत्य-सामान्यवाचिन: विशेषपर्य-वसानम्, यथैकायमते 'तस्माद्द्रौ कतिचिद्बले:'व्यत्र । अपिशब्दद्रर्थसङ्गतिश्वेदृश्येव वसानाद्, यथैकायमते 'तस्माद्द्रौ कतिचिद्बले:'व्यत्र । अपिशब्दद्रर्थसङ्गतिश्वेदृश्येव भासते । यस्मिन् नैवापद्यसम्बन्धस्तस्य मा भूत् कन्यायामेकस्मात्तु: यस्मिन् त्वनेकापत्य-योगस्तस्य कथं नैकस्मिन्नपत्ये सङ्ख्याव्यमिति विस्मय:, एतदर्थ एव अपिशब्दो जीवति ।

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अतुस्सिकारणतवं च कन्याया: परसमर्पणीयतत्वेन । गुणवौरवेऽ च स्नेहपात्रता । एतदर्थमस्या-श्रृतेन प्रतिबिम्बनम् तदित्थमप्यवतोडपीत्थं पश्येथा एतत् पाठ: श्रेयान् ॥

यथा च— "उदन्वच्चिछन्ना भूः स च निधिरपां योजनशातम्" इति । अत्र हि 'मिता भूः पत्या अपां स च पतिरपां योजनशातम्', इति युक्तः पाठः । एवञ्च छिदिक्रियाकर्तुरुदन्वत उत्कनयेन विधेयतया प्राधान्यात् समासानुपपत्तिदोषोडपि परिहृतो भवति ।

'पृथिवी समुद्र से सीमित है, वह समुद्र भी सौ योजन तक ही', यहाँ । यहाँ 'मिता भूः त्यां स च पतिरपां योजनशतम्'—अर्थात् पृथिवी समुद्र से सीमित है और समुद्र भी सौ योजन का है'—यह पाठ ठीक है। ऐसा करने से छिदिक्रियाकर्तृ समुद्र कवित प्रकार से विधेय है,—अतः प्रधान है ( इसलिये समास पर जो आपत्ति आती वह दूर हो जाती है ।

समासानुपपत्ति: । अधिकं न तु तद्वानिर्निति न्यायेन गुणान्तरलाभ इत्यर्थ: । समासानुपपत्ति—'एक चीज और अच्छी वन पड़ती है और मूलहानि होती नहीं, इस प्रकार एक गुण और चला आता है ।

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द्वितीयो विमर्शः

२९७

यथा वा—

"वरं कृतध्वस्तगुणादत्यान्तमगुप्तः पुमान् । प्रकृत्या घृमणि: श्रेयान् नालङ्कृतश्च्युतोपलः ॥"

पद्यं—

"खभियव जलं जलबिन्दु हि हंस इव शशीयक कलहंसः । कुसुदाकारास्तारास्ताराकाराणि कुसुदानि ॥"

इत्यादावपि दृश्यव्यम् ।

और जैसे—

गुणों को अपनाकर छोड़नेवाले की अपेक्षा एकदम गुणहीन आदमी अच्छा । आभूषण, बिना मणि वां अच्छा, किन्तु एकबार मणियुक्त बनकर उसका पत्थररहित होना ठीक नहीं ।

और इसी प्रकार—

'आकाश के समान जल और जल के समान आकाश है । हंस के समान रत्न हैं और रत्नों के समान कलहंस । कुसुम जैसे तारे हैं और तारे जैसे कुसुम ।' इत्यादि में भी देखना चाहिये ।

वरं कृतेऽति । कृताः श्चिताः सन्तो ध्वस्ता नष्टा गुणा यस्मै । अस्माद्विवक्ष्यमाणभेदेनभेदर-

लक्छारः । उपलशब्देनात्र मणिरेव विवक्षितः । तन्नात्र मणिशब्दः प्रयुक्त इति पर्याय- प्रक्रमभेदस्वम् । शभिवेति । हंसश्रन्द्र इव चन्द्र इव हंस इति युक्तः पाठः ।

कृत अर्थात् सीखे जाकर ध्वस्त अर्थात् नष्ट हुए हों गुण जिनके ।

अमणि:—अशोभन्त फेसा अलङ्कार जिसमें मणि न हो ।

उपल शब्द से यहाँ मणि ही विवक्षित है, पर मणि शब्द का प्रयोग नहीं किया, इसलिये पर्यायप्रक्रमभेद हुआ ।

रत्नभिव—हंस चन्द्र के समान और चन्द्र हंस के समान यह पाठ चाहिये ।

विभक्तिप्रक्रमभेदो यथा—

"ध्येयं विश्योसितया महर्षेस्त्वदादर्शतत्प्रतिभानाच्च मत्वोः । वीयं च विद्रत्सु सुते मघोनस्स तेषु नस्थानमवाप शोकः ॥"

न चायं समुचयस्य विषयः । स हि तुल्यकक्ष्यतवादभिन्नविभक्तिकाने- कार्येविषयो चेदिलव्यः यदुक्रमं—

"तुल्यकक्ष्यतया यत्र पदार्थाः स्युविवक्षिताः । समुचयो विकलपो वा तत्सेधौ दुष्टान्तन्या था ॥" इति ।

न चात्र तथाविधोडर्थःसमस्तोति समुचयार्थेपोश्रब्दयोरपि प्रयोगो- नुपपन्नः । तेनात्र 'तीव्रेण विद्रेक्षिभुवागसा च' 'विद्रत्सु वीर्यं तनये मघोन'

इति पाठौ चिप्रणमयितव्यौ ।

विभक्ति प्रक्रमभेद, जैसे—

( अपना ) ध्येय, महर्षि की विश्वसनीयता, शत्रु-जनित तीन्र उदेग और अर्जुन की शक्ति जानने वाले उन ( पाण्डवों ) में शोक नहीं समाया ।

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और यहाँ समुच्चय नहीं किया जाना चाहिये । वह वहाँ होता है जहाँ पदार्थ वरावरों के होते हैं, उनमें एक हो विभक्ति होती है और परस्पर में भिन्नता, जैसा कि कहा है—‘जहाँ पदार्थ वरावरों में विवक्षित हों वही समुच्चय या विकल्प माने जाते हैं। नहीं तो वह दोष होता है। यहाँ वैसी कोई बात नहीं है । इसलिये समुच्चयार्थक दो ‘च’ शब्दों का प्रयोग भी अयुक्तिक है । इसलिये यहाँ—‘तस्म्रेण विद्वे पिवागसा च विद्वत्सु वार्त्तं तनये मवोनः’ पाठ बना लेना चाहिये ।

[ यहाँ शोक न समाने में जो हेतु दिये हैं उनमें से धैर्य और विश्वास्यता में तृतीयो है और मन्यु में पंचमी । इस प्रकार विभक्ति का निर्वाह ठीक नहीं हो सका । ]

मघोन इन्द्रस्य सुते ऽजुने । वार्त्तञ्च विद्वत्स्वति । वीर्यंवेदनञ्चैव हेतुर्वेन विवक्षितम् । समुच्चयो विकल्पो वेति । विकल्पो यशो ऽधिगन्तुमित्यत्रोदाहृतः समुच्चयस्य त्विदं वीर्यंञ्चैव सुताहारगम् । ‘विद्वत्सु वीर्य तनये’ इति पा ठे न वेद नं हेतुर्वेन विवक्षितम् अपि तु वस्तुस्वरूपप्रतिपादनपरत्वेनैव तद् मचते । एवञ्च विद्वत्स्वति विशेषणस्य नैरर्थक्यमापद्यत इति नानेन विचारितम् ।

मवोनः = इन्द्र के सुत अर्जुन पर ।

वीर्यञ्चैव = वीर्य का ज्ञान भी हेतुरूप से अपनाया गया है ।

समुच्चयो विकल्पो—विकल्प ‘यशो ऽधिगन्तुम्’ में बतलाया गया । समुच्चय का विषय यह (‘वीर्यञ्च न’) है । ‘विद्वत्सु वीर्य तनये’ इस पाठ में वेदन ( जानना ) हेतुरूप से प्रयुक्त नहीं है अपितु वस्तु स्वरूप प्रतिपादन मात्र के लिये प्रयुक्त है—ऐसा ग्रन्थकार मानते हैं । पर ऐसा करने पर ‘विद्वत्सु’ इस विशेषण को निरर्थकता चली आती है । यह इन्होंने नहीं विचारा ।

विमर्शः : १. ‘वीर्येण सू नोः सुरतनायकस्य’—पाठ होने पर भी बात बन जाती है । इसलिये ‘विद्वत्सु वीर्यम्’ में ‘विद्वत्सु’ शब्द व्यर्थ है ।

२. समुच्चय और विकल्प वहाँ होते भी हैं जहाँ अनेक पदार्थ समकक्ष हो । जैसे—‘राम, कृष्ण, जयदेव और देवराज’ अथवा—‘राम, कृष्ण, जयदेव या देवराज । यहाँ राम, कृष्ण आदि समकक्ष ( एक विभक्ति वाले ) और भिन्नार्थक हैं, अतः उनका ‘और’ शब्द के द्वारा समुच्चय भी सम्भव है तथा ‘या’ शब्द के द्वारा विकल्प भी । प्रस्तुत पद्य में ‘च’ द्वारा जिनका समुच्चय किया जा रहा है वे भिन्न विभक्ति वाले हैं धैर्य आदि । अतः समुच्चय नहीं होना चाहिये ।

"वभूव भस्मैव सिताङ्गरागः कपालमेवामलशेखरश्रीः । उपान्तभागेऽपु च रोचनाकृद्: सिद्धाञ्जनस्यैव दुकूलभावः ॥"

अञ्ञापि ‘मुगेभिद्रचमैव दुकूलमस्ये’ति युक्तः पाठः । असिमक्ष्र पाढे रोचनाकृतवस्तस्य द्रव्यघर्मैव त्वाद् दुकूलभावविशेषणत्वानुपपत्तिपरिहाराद् गुणान्तरलाभः ।

भस्म ही सफेद और सुगन्धित अञ्जनरागी बन गया, कपाल ही । उद्धल शिरोमणि की शोभा और वाघम्बर ही आसपास रोचना से बने हंसादि चिह्नों से युक्त दुकूल बन गया ।

( इसलिये ) यहाँ ‘मुगेन्द्रचमैव दुकूलमस्य’ पाठ होना चाहिये । इस पाठ में एक लाभ और है—कि रोचनाकृता दुकूलभाव का विशेषण बनने से बच जाती है, कारण कि रोचनाकृता गुण हैं और दुकूलभाव भी गुण है । गुण द्रव्य का ही विशेषण बन सकता है, गुण का नहीं ।

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दुकूल भाव इति । सामान्याधिकारणयेनोपक्रमे वैष्यधिकरणयेन प्रतिनिर्देशः प्रक्रमभेदावहः अन्य चतुर्थे पदे ‘कपालमेव मलशेखरश्रीरिति’ स्वात्र कपालानां बहुत्वे ‘वाच्ये यदेकत्ववचनम् अमलशेखरशरीरित्यत्र च शेखरमात्रे ‘धर्मिणि वक्तव्ये यच्छेखरशरीरीति धर्मवचनं तदुपपन्नमवगान्तव्यम् । एवञ्चोक्तेषु वच्यमाणेषु चोदाहरणेषु सम्भवन्त्रपि विचारो ग्रन्थविस्तरभयान्न निरवशेषतया कृत इति तत्रैवाभियोगः कर्तव्यः ।

यहाँ चौथे चरण में प्रक्रमभेद है । उसका कारण है—आरम्भ में [ भस्म सिताड़रागः,—‘कपालम् अमलशेखरश्रः’ इस प्रकार ] सामान्याधिकारण और अन्त में [ गजाजिनस्य दुकूलभावः इस प्रकार ] वैष्यधिकरण्य । कपाल बहुत हैं अतः कपाल ही अमल शेखर की शोभा’ यहाँ कपाल में बहुत्व संख्या होनी थी, उसकी जगह एकवचन और ‘अमलशेखरश्रीः’ में केवल धर्मी शेखर ही को कहना था सो ‘शेखरश्रः’ इस प्रकार जो ( श्रीरूपि ) धर्मी का कथन हुआ वह गड़बड़ है । इसी प्रकार बीते हुये और आने वाले सभी उदाहरणों में विचार हो सकता हैं, तब भी ग्रन्थ गौरव के भय से पूरी तरह उसका विचार नहीं किया, अतः जितना विचार किया उतने पर ही ध्यान देना ठीक है ।

विमर्शः शिरःकपाल एक ही हो ऐसा चाहिए जो मकुट वन सके, कपाल माला तो वैचित्र्य वन सकती है शिरोभूषण नहीं । अतः न्यायग्रन्थकार का कपाल में बहुत्व-प्रतिपादन असंगत है ।

उपसर्गप्रकमभेदो यथा— "विपदोऽभिभवन्त्यचिक्रमं रहयत्यापदुपेतमायति: । नियता लघुता निरायतेऽरगरीयान्न पदं नृपश्रिय: ॥" इति । तेन ‘तदुपेतं विजहाति चायति’ रिति मुक्तः पाठः ।

उपसर्ग का प्रक्रम भेद यथा—उद्योगहीन को विपत्तियाँ दबोच देती हैं और आपत्ति से युक्त को भविष्य या भाग्य छोड़ देता है । भाग्य या भविष्यहीन का हास होना निश्चित है और जो महान् नहीं होता वह नृपश्री का पात्र नहीं बन सकता । यहाँ ( आरम्भ में कहा गया विपद् और अन्त में आपत्त ) अतः सर्वनाम प्रक्रम भिन्न हो गया । [ और उससे युक्त को भविष्य छोड़ देता है ] पाठ चाहिये ।

तदुपेतमिति । स्वरशब्देन सर्वनाम्ना वा निर्देशास्तुल्यफल इति प्रतिपादयिष्यमाणत्वात् । स्ववाचक शब्द से कहा जाय या सर्वनाम द्वारा दोनों से प्रतीति में भेद नहीं होता—ऐसा आगे प्रतिपादित करने वाले हैं ।

वचनप्रक्रमभेदो यथा— "काचित् कीर्णा रजोभिरदिव मनुविदधे मन्त्रवक्त्रेन दुर्लक्ष्मी- रथीका: काचिदन्तर्दिशा इति दधिरे दाहदूषणभाज्तस्रुचा: । अभ्युद्योत्या इवान्या: प्रतिपदमपरा भूमिवत् कम्पमानाः प्रस्थाने पार्थिवानामशिवमिति पुरो भावि नार्थ: शशाङ्कसु: ॥" अत्र हि ‘काचित् कीर्णा रजोभिरदिव मनुविदधुर्’ मन्त्रद्वक्त्रेन्दुशोभा:’

इति मुक्तः पाठः ।

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३००

व्यक्तिविवेक:

वचनप्रकमभेद यथा—

किसी का सुखचन्द्र फीका पड़ गया था, उसने पराग से बौ (आकाश) को हटाकर अपने जैसा बना दिया [ अर्थात्—पराग से रजस्वला बना दिया और चन्द्ररूप सुख को फीका ] कुछ दिशाओं के समान श्रीविहीन थीं, उनके सत्त्व ( मन और प्राण ) बुरे तरह डोल रहे थे, और उनमें भीतर आग सी जल रही थी, कुछ पद पद पर वाक्य के समान घूम रही थीं कुछ जमीन की तरह काँप रहीं थीं, इस प्रकार राजाओं के प्रस्थान काल में आगे होने वाले अशुभ (अमंगल) की सूचना उन नारियों ने (पहले ही ) दे दी । यहाँ—‘काक्ष्वित किणक रजोभिदिव मनुविदघुमेन्द्र-वकत्रेन्दुशोभा:’—ऐसा पाठ ठीक होता ।

विमर्श : काक्ष्वित, अन्याः, अपरा: इस प्रकार बाद के तीन शब्द बहुवचनान्त हैं, अतः उनमें मिला हुआ प्रथम शब्द भी बहुवचनान्त ही होना चाहिये । इसलिये यहाँ पाठ वतलाया गया है । वस्तुतः आरम्भिक पद के अनुसार अन্তिम पद बदले जाने चाहिये । प्रक्रमाभेद में आरम्भ का अनुसर्त्तन किया जाता है । उसको का अनुसर्त्तन न होने में प्रक्रम भेद दोष होता है । अतः ग्रन्थकार ने जो पाठ बदला है वह सौकर्य की दृष्टि से, न कि दोष की मौलिकता के आधार पर । ठीक भी है । प्रक्रमागत भेद को दूर करना दोनो प्रकार से सम्भवव है । आरम्भ को अन्त के अनुसार बदलने से या अन्त को आरम्भ के अनुसर । परन्तु दोष तो आरम्भ के अनुसार अन्त न होने से होता है । अतः दोप कारणों का सम्बन्ध बाद के चरणों से ही मानना चाहिये ।

यथा च—

'अभिवाञ्छितं प्रसिद्धयतु भगवति युष्मत्प्रसादेन' इति ।

अत्र होकवचनेन भगवतीमेकां सम्बोध्य प्रसादस्तमवन्वितया यस्तस्या और जैसे—

हे भगवती, आपके प्रसाद से मेरा मनोवाञ्छित फल पूर्ण हो ।

यहाँ भगवती एक है । उसका निर्देश एकवचन के साथ ही हुआ फिर प्रसाद के साथ उसमें ( युष्मत्—इस प्रकार ) बहुवचन जोड़ दिया गया । उससे वचन प्रक्रम टूट गया । वह दोष हुआ ।

भगवति युष्मत्प्रसादेन इति । अननेन न्यायेन 'पश्यत मातः' इति वात्तिके धर्मकीर्त्तेः

प्रयोग: प्रयुक्तः ।

इस प्रकार—वात्तिक में धर्मकीर्ति ने जो 'पश्यत मातः' प्रयोग किया है उसका निराकरण भी हो जाता है ।

तिङन्तप्रकमभेदो यथा अत्रैव 'अपरा भूमिवत् कम्पमानाः' इति ।

अत्र हि कम्पमानापुरत्युक्तिः पाठः । एकस्याः क्रियायाः प्राधान्याभिवादितयुक्तम् ।

तिङन्तप्रक्रम भेद यथा—यहाँ 'अपरा भूमिवत् कम्पमानाः' में—यहाँ 'कम्पमानाः' पाठ चाहिये । कारण कि यहाँ कोई एक क्रिया तो प्रधान है नहीं, जैसा कि कहा जा चुका है । प्राथान्याभावादित्युक्तमिति । 'यत्रैककर्तृकानेका प्राधान्ये तरभाक् किया' इत्यत्र । प्राथान्य—यत्रैककर्तृकानेका नेका प्राधान्ये तरभाक् किया इत्यादि द्वारा ।

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द्वितीयो विमर्शः

३०९

कालविशेषप्रक्रमभेदो यथा—

"सस्नु: पयांसि पपुरनेजुरम्वराणि जक्षुर्विसान धृतविकासिविसप्रसूनाः । सैन्याः श्रियामनुपभोगनिरर्थकत्व- दोषप्रवादमसृजनिरगनिर्याननाम्" ॥

अत्र हि स्तानादौ यः कालविशेषः प्रकान्तः स नेनादौ भेदं नीत इति प्रक्रमभेदो दोषः । तेन

"सस्नु: पयांसि पपुरस्वरमानिनेजु- जक्षुर्विसान धृतविकासिविसप्रसूनाः । सैन्याः श्रियामनुपभोगनिरर्थकत्व- दोषं वनेषु सरितां प्रसभं ममार्जुः ॥" इति युक्तः पाठः ।

कालविशेष के प्रक्रम का भेद—जैसे—पर्वतीय नदियों का एक अपयश था—कहा जाता था कि उनमें दोष है कि वे काम में न आने से निरर्थक है । सैनिकों ने उसे मिटा दिया । उन्होंने उनमें स्तान किया । पानो पिया । कपड़े धोए । कमलकल्हड़ो खाई । खिले कमलों के आभूषण पहने ! यहां स्नान आदि में जो [ तत्तद्- इत्यादि ] द्वारा लिटलकार = परोक्षभूतकाल शुरू किया उसे नेजन ( धोना ) आदि ( अनिनेजुः— इस प्रकार अनद्यातन भूतलकार ] में बदल दिया । अतः प्रक्रमभेद दोष हुआ । इसलिये इस प्रकार का पाठ न चादिये—सस्नु: पयांसि पपुरस्वरमानिनेजु:—इत्यादि [ पूर्व पद मूल में ] ।

विमर्शः अनिनेजुः = अपाणिनीय है । पाणिनि के अनुसार 'अनिनेकु' अनिनिक्ताम्, अनिनेजुः, अनिनिजुरचालयन्तु । जक्षुरखादन् । विसप्रसून पद्मम् ।

नेजनादाविति लिटा भूतानद्यतनपरोचप्रक्रमे अनिनिजुरिति तु भूतानद्यतनेन निर्वाहः । तथा 'धृतविकासी'व्यत्र भूतमत्प्रे क्तप्रत्यय इत्यत्रापि कालप्रक्रमभेदः । तत्रोपरि तिडन्त- प्रक्रमभेदो द्वितीयोडत्र स्थितः । एवंबह्वादिग्रहणेन धृतविकासिति गृह्यते 'विकचमस्य दधुः प्रसूनमि'ति । अनिनिजुरित्यत्र संसाधालं न कृतं प्रकरणान्तरेण समर्थनयिष्यमाणत्वात् ।

अनिनिजुः—धोया । जक्षुः—खाया । विसप्रसून—कमल । नेजनादावितिलिटा—[ सस्नुः इस प्रकार ] । लिट् लकार द्वारा परोक्षभूत में आरम्भ दिया— नेनजादाविति लिटा द्वारा परोक्षभूत में आरम्भ किया—

अनिनिजुः इस प्रकार ( लुद्द्वारा ) अनद्यातनभूत से समाप्त किया । इसी प्रकार 'धृतविकासि०' इसमें भी भूतार्थ में प्रयोग है । अतः यहां भी कालप्रक्रम का भेद है । तिस पर सौ यहां—दूसरा तिडन्त प्रक्रम भेद है । इस प्रकार [ स्नानादौ में जो आदि शब्द ग्रन्थकार ने यहां—दूसरा तिडन्त प्रक्रम भेद है । इसको समाधान है ) 'विकचमस्य दधुः प्रसूनम्' । अनिनिजुः में समाधान नहीं किया, कारण कि उसका समर्थन दूसरी प्रकार से किया जाने वाला है ।

यदि वेत्यादिनां प्रक्रमभेदं निराकरोति । यदि वा—इत्यादि ग्रन्थ से इस प्रकमभेद का निराकरण करते हैं ।

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३०२ व्यक्तिविवेक:

यदि वा दोषोऽयमनुन्नावनीय एव । कालविशेषस्य विवक्षामात्रभावितया डनवस्थितत्वात् । यदाहु:—

'परोक्षे च लोकविवाते प्रयोकृतदर्शनानविषये दर्शानयोग्यत्वात् परोक्षस्याविवक्षायां लड् भवत्येव । अजयज्जयन्तीमूतानि' इति । सतोऽपि भावतश्चांपि चाविवक्षा भवति यथा—'अनुंदरा कन्ये'ति ।

अथवा यह ( काल्प्रक्रम दोष ) दोष नहीं माना जाना चाहिये । क्योंकि काल में विशेषता विवक्षामात्र से होती है, अतः उसका कोई निश्चय नहीं रहता । जैसा कि ( भाष्यकार पतञ्जलि ने ) कहा है, 'जिसे लोक में परोक्ष माना जाता है या जिस परोक्ष पदार्थ को लोक जानता है । यदि प्रयोगकर्ता उसे देख सकता हो तो वह परोक्ष प्रयोगकर्तृ के दर्शान योग्य होने से—विवक्षित नहीं होता, तब अनद्यतनभूत ( लङ् ) का ही प्रयोग कर दिया जाता है । जैसे—जयन्त ने भूतों को जीता ।' इसके अलावा परोक्षत्व या दर्शानानविषयता होने पर और न होने पर भी अविवक्षा होती है जैसे—अनुंदरा कन्या—'उस कुआँरी लड़की को कमर नहीं है । अजयोति अत्र परोक्षेऽपि जयाद् दर्शानाहेतुत्वे परोचितत्वे न विवक्षित इति हि लिङ् प्रयोोगो न कृतः ।

विद्यमानस्यापि विवक्षायां दर्शनात्तस्माद अनुदरा कन्येति । नहि कस्याश्चित् कन्याया उदरभाव:; कृशत्वात् पुनः सोऽपि विवच्यते । एवञ्च—

"अभ्रूदभूमि प्रतिपत्निजन्मनां मियां तनूजस्तपनद्युतिंदते: । यमिन्द्रशब्दार्थनिषूदनं हरेहिरण्यपूवॅं कशिपुं प्रचचले ॥" इत्यादेः

"तात ! त्वं निजनतेसैव गमितः स्वर्गं यदि स्वस्ति ते किन्त्वन्येन हता वधूरिति कथा मा सख्युरग्रे कृतः। रामोऽहं यदि़ राववस्तदखिलं ग्रीडानमस्कन्धरं साधं बन्धुजनैर्न सेन्द्रविजयी वक्ता. स्वयं रावणः ॥"

इत्यादेश्च महतः काव्यप्रवाहस्य न किञ्चिद् दुष्टत्वम् ।

'अजयद्' यहाँ परोक्ष जय को भी दर्शानयोग्य होने से परोक्षरूप से नहीं माना, इसलिये लिट् लकार का प्रयोग नहीं किया ।

विधमान वस्तु को भी अविवक्षा होती है—इसका उदाहरण दिया—'अनुंदरा कन्या?' ऐसी कोई कन्या नहीं होती जिसको कमर न हो, पर कृश होने से ऐसा भी कहा जाता है । इसीलिये 'दिति को सूर्य के समान पुत्र हुआ ( अभूत ) जिस पर दानवों से उत्पन्न भय का कोई प्रभाव नहीं होता था । इन्द्र के इन्द्रशब्द को मिटाने वाले जिसे कशिपु शब्द से पुकारते थे, जिसके पहिले हिरण्य शब्द लगा रहता था—इत्यादि और—

हे तात ( जयादयो ) यदि तुम अपने ही पराक्रम से स्वर्ग सिधार गये तो ठीक है, तुम्हारा कल्याण हो; किन्तु अपने मित्र ( दशरथ जी ) के आगे तुम यह घटना न कहनो कि ( पुत्र ) वधू को दूसरा कोई उठा ले गया । यदि मैं रघुवंश का बालक राम हूँ तो उस सारी घटना को अपने समस्त बन्धुओं और इन्द्रजीत मेघनाद के साथ लज्जा से गरदन झुकाए हुए स्वयं रावण ही वहाँ कहेगा—इत्यादि विपुल काव्य सन्दर्भों में कोई दोष नहीं ।

विमर्श : यही आशय रामचरित मानस से गोसाईंजी द्वारा इस प्रकार व्यक्त किया गया है—

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सीताहरण तात जनि कहहु पिता सन जाइ। जो मैं राम तो कूल सहित कहहि दसरथ जाइ॥ [ जरनय का० दो० ३१ ]

अर्थेस्य तद्वतद्रावो विवक्षामात्रतो भवेत् । यत्र, प्रक्रमभेदोऽयं न तत्रोद्द्राव्यते बुधैः ॥ यथा विशेषकल्पस्य, शीलादिप्रत्ययेपु च ।

कर्तुः फलवत्त्वायां, तेन ते नोपदर्शिता: ॥ ३१ ॥

इति सड्ग्रहश्लोकौ ।

अर्थ का सङ्क्रान या अभिप्राय जहाँ विवक्षामात्र पर निर्भर है—वहाँ विद्वान् लोग कालप्रक्रमभेद नहीं समझते । जैसे—वाक्यगत विशेषताओं का या उन शील अर्थ में हुए प्रत्ययों का जिनका फल कर्तृगामी होता है? इसलिए ये ( कालविशेष आदि प्रक्रमभेद के प्रसंग में ) नहीं दिखलाए गए ।

अर्थेस्येति तद्वोदर्थ्यं सत्ता अतद्भाव असत्त्वम् । यत्रेति पूर्वाधीरोषः । यथेऽत्रि । न प्रक्रमभेद इत्यन्वयः। तत्न कालविशेषो दर्शितः । यथा भूतस्य भाविनश्च कालस्याचतनानद्यतनत्वं परोक्षापरोक्षत्वे च वैचचिक्य एनेति । ते शीलादयोऽर्थाः आकांक्षामत्कृलाद्वर्तमानत्साधकारिषु' ( ३-२-१३४ ) इत्यत्र निर्दिष्टाः । तेषां च वैचचिक्ये सत्त्वासत्त्वे । एवं च कचित्ताच्छीलिकादिप्रत्ययप्रमयोगेऽप्यनित्त्र तद्करणमदुष्टम् । यथा—

"जुगोपातमानमत्रस्तो भेजे धर्ममनातुरः । अगृष्णुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ॥"

इत्यत्रागृणुरिति ताच्छील्याद्यर्थप्रत्ययप्रयोगेऽप्यनित्त्र तद्स्तुरित्यकरगेपि न दुष्टत्वम् अग्रम्नुरिति वा निर्देशेऽपि अगृणुरिति निदेशेप्सेव ।

कर्तुः फलवत्त्वम् । तदपिं वैचचिक्यमेव । एवं च 'दृष्टा ददृक्षिमधो ददाति कुर्वते नालापमाभापिताः' इत्यत्र यदिँ कर्तृभिप्रायात्स्वं क्रियाफलस्य, तदा ददातोति परस्मैपदप्रसङ्ग इति प्रक्रमभेदोऽपर्यनुयोगो निरवकाश एव । एवंमन्यत्र वोद्धव्यम् । तेन ते इति । ते कालविशेषादयः तेन विच्छायप्रयुक्तत्वेन कारणेन न दर्शिता इत्थर्थः ।

अर्थ का तद्भाव—सत्ता और अतद्भाव असत्त्व । यत्र—यह पूर्वाधीरोष का अंश है । यथा—( कालविशेष और कर्तृगामिफल के शीलादि प्रत्ययों का विवक्षा पर निर्भर है। ) इनमें से काल विशेष दिखला दिया गया अर्थात यह बताया गया कि भूत और भविष्यत् काल वली उपासना, अचतनता, अनचतनता तथा परोक्षता या अपरोक्षता सब विवक्षा पर निर्भर हैँ । दिये गये हैं । उनका न होना भी विवक्षाधीन है । इसलिये यदि कहीं ताच्छील्यादि में प्रत्यय प्रयुक्त

हो तब भी यादिॅँ उसका अभिप्राय दोषावह नहीं । जैसे :—

विना डरे अपनी रक्षा की । बिना विपत्ति से कातर हुए। धर्मपालन किया । बिना लालची हुए अर्थ लिया और बिना आसक्त हुए सुख भोगा । यहाँ अगृणु में प्रत्यय ताच्छील्यार्थक है । इतने पर भी त्रस्नु की जगद 'अगृणु' न करने में भी कोई दोष नहीं । 'अगृणु' ऐसा प्रयोग करने पर तो अगृणु निर्दोष हैँ ।

कर्तुःफलवसा—कर्तृभिप्रायता । वह भी विवक्षाश्रित है । इस प्रकार—देखने पर आँख नीचे

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३०४

व्यक्तिविवेक:

कर लेती है, बोलने पर उत्तर नहीं देती' इत्यादि में क्रिया का फल कर्ता ( नायिका ) पर आश्रित है; इस स्थिति में तददाति इस प्रकार परस्मैपदी का प्रयोग है । पर यहाँ प्रक्रमभेद दोष नहीं होता । इसी प्रकार अन्य पदों में देखा समझा जा सकता है ।

तेन ते इतित—ते (वै) अर्थात् कालविशेष आदि । तेन = विवक्षाविशीनता के कारण नहीं दिखलाए ।

कारकशक्तिप्रक्रमभेदो यथा—

'गाहन्तां महिषा निपानसलिलं शृङ्गैर्मुहुस्ताडितं

छायावद्धकदम्बकं मृगकुलं रोमन्थमथम्भस्यतु ।

विस्रब्धं क्रियतां वराहततिभिरमुस्ताक्षतिः पल्वले

विश्रान्ति लभतामिदं च सिथिलज्याबन्धमस्मद्वधु:' इति ।

अत्र हि 'कुर्वन्त्वस्तभियो वराहततयो मुस्ताक्षतिममु' इत्युपपन्नः पाठ ।

कारक शक्ति का प्रक्रमभेद —यथा—

जंगली मैसों के पानी पीने से पीटें और उसमें लोटें, हिरने झुंड बनाकर घास में बैठें और जुगाली करें, वाराह पकतियों द्वारा बेधड़क तलेियों के नागरमोथा काटे जाऐं, और हमारा यह धनुष भी डोरी का बंध ढीला होने से आराम करे ।'

यहाँ—'निर्मीक वाराह पंक्ति मोथा कूँचें, पाठ चाहिए ।

गाहन्तामिति । अत्र कर्तुराध्यातेनामिधानं कर्मण्गशानमिधानं प्रकान्तं विसृध्यैरित्यन्यथा कृतमिति कारकप्रक्रमभेदः ।

गाहन्ताम् = यहाँ आरंभ में कर्ता तो आख्यात द्वारा कहा गया है, किन्तु कर्म नहीं कहा गया । उसे 'विसृब्धै:' इत्यादि द्वारा बिगाड़ दिया, इसलिये यह कारकगत प्रक्रमभेद हुआ ।

यथा च—

"कृतवानसि विप्रियं न मे प्रतिकूलं च न ते मया कृतम् ।

किमकरणमेव दर्शने चिलपन्त्यै रतये न दीयते ॥"

अत्रापि 'न च तेडहं कृतवत्यसम्तमतम्' इति । यथा च —

"सजलजलधरं नभो विरजे विह्हितमियाय वचिस्थितडल्तानाम् ।

व्यवहितरतिविग्रहविंतेन जलगुरुभिः स्तनितैर्दिगन्तरेषु ॥"

और जैसे—

तुमने मेरे लिये कोई भी अप्रिय काम नहीं किया । न मेरे द्वारा ही कोई तुम्हारा प्रतिकूल कार्य हुआ । तो बिना कारण ही तुम रो रही रति को दर्शों क्यों नहीं देते ।'

यहाँ भी 'मैंने भी तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कुछ नहीं किया' पाठ चाहिए ।

और जैसे—

पानी भरे मेघों से आकाश सुदावना हो गया । बिजली की बेलें और अधिक डोलने लगीं । जल के कारण काफी मारी और मिलन की फिसादों को मिटाने वाले मेघशब्दों द्वारा चारों ओर दिशाओं में फैल जाया गया ।

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द्वितीयो विमर्शः

६०५

विर्वति विहरणं भङ्गिभाजनत्वमित्यर्थः । विवृतिरिमिति पा ठे विस्तारशालित्वमित्यर्थः । रतौ विग्रहो विरोधः स्तनितैर्‌र्यवहितस्तत्प्रसादाद्विरोधस्य कर्तुमशक्यत्वात् । वितेने इति भावे प्रत्ययः । स्तनितानि विततीभूतानीन्त्यर्थः ।

विर्वति = विहार करना अर्थात् अनेक भंगिमाओं से युक्त होना । 'विवृति'—पाठ में विस्तार युक्त होना । रति में विग्रह अर्थात् विरोध मेघगर्जनों ने दूर कर दिया; उनकी कृपा से रति करना सम्भव नहीं । वितेने =यह् भाव में प्रत्यय है अर्थात् मेघशब्द फैल गये ।

शब्दः प्रक्रमभेदो यथा—

"चारुतां वपुरभूषयदासां तामनूननवयौवनयोगः । तं पुनर्मकरकेतनलक्ष्मीस्तां मदो दयितसङ्गमभूषः ॥" इति ।

अत्र हि 'तमपि वल्लभसङ्ग' इति युक्तः पाठः ।

शब्दगत प्रक्रमभेद—जैसे—

'इतन ( बालाओं ) के शरीरो को सुन्दरता ने—अलंकृत किया । उस ( सुन्दरता ) को पूर्ण यौवनागम ने । उस ( यौवनागम ) को कामकला ने । उस ( कामकला ) को मद ( शराब आदि के नशे ) ने जिसका अलंकार प्रिय का संग था ।'—यहाँ—'उस ( मद ) को भी वल्लभ संग ने' पाठ चाहिए ।

शब्दः प्रक्रमभेद इति शब्दविषयत्वाच्छब्दः । शब्दप्रक्रमभेद इति तु प्रकृतिप्रक्रम-भेदस्यातुक्रमेण ये पठन्ति तैः शब्दश्रुत्यैवोत्तर्रो ग्रन्थो नालोचित इत्युपेक्ष्यमेतत् ।

सक्रमभूष० । अत्र बहुत्रीहावन्यपदार्थोपसर्जनेनार्थेन क्रमेणोपसंहतमिति—भिध्यमान-शब्दविषयत्वाच्छब्दः प्रक्रमभेद । एवमार्थः प्रक्रमभेद इत्यत्र प्रथमप्रकान्तभिध्यमानार्थ-विषयत्वादार्थ इति व्याख्येयम् ।

शब्दः—शब्द विपयक होने से शब्द । जो लोग 'शब्दप्रक्रमभेद' इस शब्द को प्रकृति प्रक्रमभेद आदि के समान उसी क्रम में लगाते हैं उन्होंने शब्द और अर्थ इत्यादि लोगो के ग्रन्थ पर ध्यान नहीं दिया । इसलिए , यह उपेक्षणीय है ।

सक्रमभूष०—यहाँ बहुत्रीहि समास है । इसमें प्रधान है अन्य पदार्थ । इस वाक्य के उपसंहार में जो शब्द आया है उसका अर्थ ( उस अन्य पदार्थ के प्रति ) गुणीभूत है । गुणीभूत से उपसंहार किया अतः शब्द की विशेषता का प्रकट दूर हो जाने से शब्द प्रक्रमभेद दोष हुआ । इसी प्रकार व्याख्या करनी चाहिए ।

विमर्शः : इससे विदित होता है कि व्यक्तिविवेक की ओर भी कोई टीका थी जिसे व्याख्याकार ने देखा था ।

यथा च—

"सस्नुः पयः पपुरनेनिजुरस्बराणि जशुर्विसानां धृतविकासिविसप्रसूनाः ।" इति ।

अत्रापि 'जशुर्विसं विकचमस्य दधुः प्रसूनम्' इति युक्तः पाठः । अस्मिन्श्र पा ठे विसर्गादस्य पौनरुक्त्यदोषपरिहाराद् गुणान्तरलाभः ।

२० व्य० वि०

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३०६ व्यक्तिविवेक: और जैसे— 'सस्तु: पय:—धृतविकासिविस्रसूना:'—( अभी ३०१ पृष्ठ पर अनूदित ) इसमें भी 'जक्ष्यद्विसं विकचमस्य दधु: प्रसूनम्' पाठ चाहिये । इस पाठ में एक लाभ यह भी होना है कि विस शब्द की पुनरक्ति हट जाती है । धृतविकासीतित पूर्व कालप्रकरणोदाहतम् , सम्प्रति शब्दविषयत्वेनोदाहियते, तिड्न्तगतत्वेनाप्यूहनीयम् । धृतविकासीतित—इसे पहले कालप्रक्रमभेद के उदाहरण रूप से दिया था । अब शब्द प्रक्रमभेद के उदाहरण रूप में दे रहे हैं । तिड्न्त प्रक्रमभेद भी इसमें समझ लेना चाहिये ।

यथा च— "समतया वसुधृदृप्तिविसर्जनैनियमनादसतां च नराधिप: । anुययौ यस्पुण्यजनेश्वरौ सवरुणाचरुणाग्रसरं रुचा ॥" अत्र हि अनुयायातिक्रियाकर्मभावो वरुणस्यार्थ: प्रकान्त इति तत्रास्य तादृश एव हेतुरुपादातुं युक्त: । यस्त्वस्त्रियामनलक्षण: शब्दो हेतुरस्यान्ये- सामिवापात्त: स प्रकमभेदो दोष: तस्याप्युक्तयुक्त्या रसभङ्गपरत्वेस्यो- त्वात् । तेनायमत्र पाठ: पठितव्य:—‘नियमयन्नसत: स नराधिप' इति । एवश्र विभक्तिप्रक्रमभेदश्राब्दश्रोकनयनिरस्तसमुच्चयविषयभाव: क्रमभेद- दुष्टश्र परिहतौ भवत: । एवमन्येडप्यवगन्तव्य: ।

और जैसे— 'समान रूप से वसु की वृद्धि और विसर्जन तथा असत्पुरुषों के नियंत्रण से उस राजा ( दशरथ ) ने वरुण सहित यम तथा कुबेर का अनुकरण किया और कान्ति से सूर्य का ।' यहाँ अनुकृति ( अनुकरण ) क्रिया में वरुण का कर्मभाव अर्थतः बताया गया है । इसलिये उसमें ( अनुकरण में ) हेतु भी वैसा ( अर्थ ) ही देना चाहिये था । पर अन्य ( यम आदि ) के समान इसके अनुकरण ( वरुण ) का हेतु भी शब्द दें दिया गया—वह प्रक्रमभेद दोष हुआ । वह भी कहे ढंग ( एकरसप्रवृत्तया: प्रतिपत्तिप्रतीतिरुत्ख्यात इव परिस्फुटनदुःखदायी ) से रसभङ्ग- कारक बनता है । इसलिये यहाँ यह पाठ बदलना चाहिये—‘नियमयन्नसत: स नराधिप:' असत्पुरुषों को नियंत्रित करते हुए उस राजा ने··· ।' ऐसा करने से विभक्ति प्रक्रमभेद और च शब्द भी हट जाते हैं । च शब्द यहाँ उत्कर्षति ( तुल्यकक्षतया पृ० २९७ ) से यहाँ समुच्चय नहीं कर सकता और गलत क्रम से रखा गया है । इसीलिये भेद स्वयं समझ लेने चाहिये ।

[ वसुवृद्धि = सुवर्णवृद्धि, वसुविसर्जन = द्रव्यदान । सुवर्ण हेमहिरण्यहाटकवसून्यष्टापदं काञ्चन- मिति—४१०९ हेमचन्द्र । 'प्राप्त: प्रयाणाभिमुखाय तस्मै सविस्मय: कोशगृहे नियुक्ता: । दिगरणमयीं कोशगृहस्थ्य मध्य वृष्टिं शशसु: पातयित्ता नमस्त: ॥ रघु० ४१२० ]। विभक्तिप्रक्रमभेदचशब्दयोर्द्विचनम् । चशब्दस्यो- भयथा दुष्टता च । चशब्दस्य च समुच्चयो विषय: । तद्वाव: उत्कर्षयेन तुल्यकद्व्य- स्वभावाख्येन निवारित: । प्रक्रमभेदस्वसतातिमित्यसमुच्चेतन्यनिकटप्रयोगात । स हि 'नियमनादि'व्यस्यानन्तरं पठनीय: ।

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द्वितीयो विमर्शः

परिहृतौ भवतः = एक विभक्ति प्रक्रमभेद है और दूसरा च शब्द, इसलिये द्विवचन ( परिहृतौ ) दिया गया है । चशब्द दो प्रकार से सदोष है । चशब्द का प्रयोग समुद्रचय के लिए होना चाहिए । उसका सद्भाव ऊपर कहे नियम के अनुसार तुल्यकक्ष्यता न होने से अलग कर दिया गया । और कसमर्थ दोष है । 'च' के 'अस्तास' इसके पास प्रयोग से जिसका सन्निकर्ष नहीं किया जा रहा है, उसे 'नियमादि' इसके बाद आना चाहिए ।

एषां चान्योन्यासाडूयाल्लोष्टसंस्वारकमेण बहुधा प्रक्रमभेदप्रकाराः समुद्भवन्ति । ते स्वयमेवाभ्यूह्या: । तद्यथा— 'नियता लघुता निरायतैरगर्य्या चान्न पदं नृपाद्रिय:' इति । अत्र हि द्वयोः प्रकृतिप्रत्यययोः प्रक्रमभेदः । तेन 'न लघुर्जातु पदं नृपाध्रिय:' इति युक्तः पाठः ।

इनके परस्पर गुणन से लोष्टसंचारकम से प्रक्रमभेद के अनेक प्रकार निकल आते हैं । उनकी कल्पना स्वयं ही कर लेना चाहिए । जैसे—'नियता लघुता—' यहाँ । यहाँ प्रकृति और प्रत्यय दोनों का प्रक्रमभेद है अतः 'न लघुर्जातु पदं नृपश्रिय:' पाठ ठीक है ।

लोष्टसंचार एकैकस्य भेदस्य भेदान्तरैः सह संयोजनप्रकारैर्यो गणनाविशेषः । प्रकृतिप्रत्ययोरिति लघुशब्दः प्रकृति: । तस्या गुरु शब्देन भेदः । गुरुशब्दे चेयसुन्राधिकः अग्युक्तो यो लघुशब्दे न मुख्यः । तस्य प्रत्यस्य च प्रतिनिदेशो न कृत्त इति प्रत्ययप्रक्रमभेदोदपि ।

लोष्टसंचार = एक प्रकार की गणना, जिसमें एक-एक भेद दूसरे-दूसरे भेदों के साथ मिलाए जाते हैं ।

प्रकृतिप्रत्यययोः—लघुशब्द प्रकृति है, उसका भेद गुरुशब्द से हुआ, और गुरुशब्द में इयसुन् प्रत्यय अधिक दिया गया है जो लघुशब्द में नहीं है । उस प्रत्यय ( इयसुन् ) का पुनर्निदेश नहीं किया इसलिए प्रत्ययत प्रक्रमभेद हुआ । नए पाठ में उस प्रत्यय से रहित ही लघुशब्द प्रदर्शित है ।

विमर्शः : 'लोष्टसंचारकम्' शब्द यहाँ लोष्टप्रस्तारन्यात्याय के लिए प्रयुक्त है । लोष्ट, ढेले, डिंगल, मृत्कणाशकल; उनका प्रस्तार = फैलाव या बिछौना । जैसे मिट्टी के ढेले यहाँ वहाँ से बीन-बीनकर एक ही खेत में फैलाए जाते हैं तो जैसे उनमें परवत्तीं ढेलों के साथ-साथ फैलते हैं, वैसे ही जहाँ किसी एक जगह जब गिनाए गए गुण दोष एक, दो, तीन, चार इत्यादि कम से एकाधिक संख्याओं में एकत्रित होते जाएँ तो उस इकट्ठे होने को लोष्टप्रस्तारन्यात्याय से इकट्ठा होना कहा जाता है । अभिनवगुप्त ने 'ध्वन्यान्तोलोक ३।१६ के उदाहरण 'तद्र्धे न तभित्ति:' के लोचन में 'एतच्च दिशः समस्त्यम्, त्रिशः समस्त्यमिति'—लोष्टप्रस्तारन्यात्यायेनान्तवैचिच्यमुक्तम्—इस प्रकार की गणना के लिए इस न्याय का प्रयोग किया है । छन्दःशास्त्र में गुरु, लघु तथा संगीतराश्र्य में स्वरों के परस्पर संयोजन में यह न्याय अधिक अपनाया जाता है । वहाँ उनका नाम ही छन्दःप्रस्तार और स्वरप्रस्तार है । छन्दःप्रस्तार पर 'प्रस्तार' शब्द का शाब्दकल्पद्रुम देखना चाहिए । 'वस्तुतः यहाँ लोष्टसंस्तारकमेण' पाठ रहना होगा ।' [ दृ० संगीतारबाकर—१ ]

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२०८ व्यक्तिविवेकः

आर्थे प्रक्रमभेदो यथा अनन्तरोदाहरणयोराद्यमाहितविपर्ययम् । तद्यथा—

"मत्तता दयितसख्खमभूषा भूषयतयसमस्सायकलक्ष्मीम् । साप्यनूननवयौवनयोगं तद् वपुस्तदपि चारुत्तरत्वम् ॥" इति ।

अत्रापि हि 'मत्तता' दयितसख्खतिरेषा' इत्युच्यते: पाठः ।

आर्थप्रक्रमभेद, जैसे अभी तुरन्त दिये उदाहरणों में आरम्भ को उलटकर पढ़ने में अर्थात्— मत्तता दयितसख्खमभूषा भूषयतयसमस्सायकलक्ष्मीम् । साप्यनूननवयौवनयोगं तद् वपुस्तदपि चारुत्तरत्वम् ॥

अर्थात् प्रियसंगम जिसका भूषण है ऐसी मत्तता कामकला को भूपित करती है, वह (कामकला) भी यौवन के पूर्ण आविर्भाव को और वह (यौवन) शरीर को, वह (शरीर) भी सौन्दर्य को ।

यहाँ भी 'मत्ततां दयितसख्खतिरेषा' ऐसा पाठ उचित होगा ।

अर्थ: प्रक्रमभेद इति । अत्रोदाहरणद्वितयं दत्तं मत्ततेति समतयेऽत्र । तत्र मत्ततेत्यत्र सख्खम- भूषेत्यार्थेन क्रमेण प्रक्रम:, भूषयतीत्यत्र तु शब्दरूपतया प्रतिनिर्देशो हेत्यार्थ: प्रक्रमभेद: ।

किन्तु तद्वपुस्तदपि चारुत्तरत्वमिति पाठे: स्थितिपरिपाटीमनुगुण्याद्वाच्चैव न्याय्य: । 'चारुतरा स खलु सापि शरीरमि'ति तु पाठ: श्रेयान् ।

एवंच दयितसख्खतिरेषेत्यवच्छेद: पठनीय:, न पुनरासामिति पाठ: ।

तत्र हि मत्तता केन शब्देन परामृश्येत? 'समतये' त्येतत्तु प्रायेण- दर्शेधु शब्दप्रक्रमभेदे उदाहरणतया हृदयते । अन्र आर्थप्रक्रमभेदप्रस्तावे 'अनन्तरोदाहरण- योराद्यमाहितविपर्ययम्' इति पाठ: । एतच्चायुक्तम्, योजनाग्रन्थे वरुणस्यार्थप्रक्रम इति ग्रन्थविरोधात् । किन्तु निशामयन्निति विदग्धघस्मन्न्यतया दत्तोऽपि नो हृदयङ्गम: पाठ:,

वरुणेनैव तत्रसदृदित्यत्र प्रमाणाभावात् । न हि वरुणस्याद्योपसर्जनत्वेन स्थितस्य स्वातन्त्र्यमस्ति । तस्य नैवविधस्यसवन्त्र: पुष्टत्वं धत्ते । आर्थप्रक्रमभेदप्रस्तावे इदमेवोद- हरणमाहितविपर्ययमिति पाठ: श्रेयान् ।

आर्थप्रक्रमभेद = यहाँ दो उदाहरण दिये गये हैं—एक 'मत्तता' और दूसरा 'समतया' । इनमें से 'मत्तता' इत्यादि में 'सक्खमभूष:' इस प्रकार आरम्भ किया आर्थप्रक्रम से और प्रतिनिधि किया 'भूषयति' इस प्रकार 'शब्द' से, इसलिए यहाँ आर्थप्रक्रमभेद हुआ, परन्तु 'तद्वपुस्तदपि

चारुत्तरत्वम्' यह पाठ स्थित पदृत्ति के अनुकूल न होने से ठीक नहीं है । 'चारुतरा स खलु सापि शरीरमे' पाठ अधिक अच्छा है ।

इसी प्रकार 'दयितसख्खतिरेषा' इस प्रकार 'एतद्' शब्द पढा जाना चाहिए । नकि 'आसाम्' यह (अदस् शब्द ) वैसा पाठ होने पर मत्तता का परामर्श किससे होगा ?

प्राय: आदर्शों प्रतियों से शब्दप्रक्रमभेद में समतया' यही उदाहरण रूप से प्रयुक्त दिखाई देता है ।

ऐसी स्थिति में आर्थप्रक्रमभेद के प्रकरण में 'अनन्तरोदाहरणयोराद्यमहितविपर्ययम्' यह जो पाठ है वह ठीक नहीं है, कारण कि [ अन्र हि अनुया/तिकियाकर्मभाव:0' इत्यादि पूर्व ग्रन्थ में ] योजनां करते समय

वरुण का प्रक्रम अर्थ है—इस ग्रन्थांश का विरोध होता है क्योंकि विपर्यय होने पर आर्थप्रक्रमभेद शब्दप्रक्रमभेद के रूप में बदल जाता है ।

और 'नियमयन्0' इस प्रकार जो अधिक विदग्धता की डींग हाँकते हुए पाठ बदला है वह भी, मन में नहीं बैठता, कारण कि वह: निश्चित रूप से वरुण से ही सम्बन्धित होगा इसमें कोई

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द्वितीयो विमर्शः:

३०९

प्रमाण नहीं है । वरुण दूसरे के प्रति उपसर्जन अर्थात् गौण है । वह स्वतन्त्र नहीं है । उसके साथ 'एसा सम्बन्ध ठीक-ठीक नहीं बैठता । इसलिये 'अर्थप्रक्रमभेदप्रस्तावे हेतुमेयोदाहरणमाहितविपर्ययेऽस्म' ऐसा पाठ अधिक अच्छा है ।

विमर्शः: प्रस्तुत व्याख्यान का अभिप्राय इस प्रकार है—मूलग्रन्थ के कई संस्करण हैं । किसी में 'भत्तताऽ' और 'समतया' ये दोनों पद्य प्रक्रमभेद के लिये आये हैं और किसी में केवल समतया हो । दोनों में प्रथम के अनुसार 'अनन्तरोदाहरणयोराध्यमाहितविपर्ययेऽस्म' पाठ ठीक बैठ जाता है । परन्तु, द्वितीय संस्करण में आपत्ति आती है । उस संस्करण में—समतया को बदलना होता है । उस समय एक तो 'आद्यम्' कहना व्यर्थ हो जाता है, दूसरे 'समतया' पद्य को उदाहरणरूप से उपस्थित कर उसमें दोष बतलाते हुए । ग्रन्थकार ने वरुण को अर्थ कहा है और बदलने में अर्थ वरुण शब्द हो जाना है । अतः उसे अर्थप्रक्रमभेद में मिलाना असंगत होगा । व्याख्याकार ने इसका परिहार करते हुए 'अनन्तरोदाहरणयोः**' की जगह यह पाठ माना है—'अर्थप्रक्रमभेदप्रस्तावे हेतुमेयोदाहरणमाहितविपर्ययेऽस्म' । इसके अनुसार 'आद्यम्' पाठ की आपत्ति दूर हो जाती है ।

परन्तु शब्द प्रक्रमभेद में वरुण की आर्थता का पाठ परिरिवर्त्तन करने पर शाब्दता से जो विरोध आता है उसका परिहार विचारणीय है । व्याख्याकार ने सम्बन्ध: इसलिये 'नियमयन्' इत्यादि परिवर्तन करने पर अलंकार व्यर्थ हो जाती है । 'सर्वथा न पर्यनुयोगेन' इस प्रकार के पाठ में वरुण यम आदि के साथ वंया है । अतः उसमें किसी को पदार्थ का अन्वय साक्षात् नहीं हो सकता । ऐसी स्थिति में असत् पुरुषों के नियमन का अन्वय उस वरुण से हो ही जाएगा। यह निश्चित नहीं । वस्तुतः प्रथम संस्करण ही ठीक है ।

क्रमप्रक्रमभेदो यथा—

"तव कुसुमशरत्वं शीततरशिमत्वमिन्दो-

द्वयमपि द्वयमयार्थं हश्यते मधुरिघेषु ।

विसृजति हिमगैर्मैरशिमन्दुरमध्ययूथे-

स्तवमपि कुसुमवाणान् वज्रसारिकरोषि ॥" इति ।

क्रम का प्रक्रमभेद—यथा—

तुम्हारी पुष्पशरता और चन्द्रमा की शीततरशिमत्! दोनों मुझ जैसे लोगों पर झूठी लगती हैं । इन्दु—( चन्द्रमा ) वफींल किरणों से आग बरसा रहा है, और तुम भी अपने फूल के बाणों को वज्रतुल्य कठोर बना रहे हो ।

क्रमेति य उदेष्टक्रमः प्रकान्तः सोऽनूदहेशे वैपर्ययाद् न कृत इति प्रतीतेरेक्यस्य

विरामाद् दुष्टत्वम् ।

तव कुसुमशरत्वमिति । इन्दं क्रमप्रक्रमभेदोदाहरणं न झुक्कम् चूषिकाक्रमस्यैवात्रोचित-

स्वात् । तथाऽहुदेशः । स्मरं प्रति साम्युदयेनासिद्धिं विहाय नेदं ग्रासङ्किं प्रत्ययथार्थज्ञान-

मुचितमिति स्मरस्म तावत् प्रथमस्मिन्देशोऽयम् यतः अनूदहेशे हि विषयं(?) सङ्कवा न प्रासङ्कि-

केन वाक्यार्थपरिसमाप्तौ शोभते इति पायवसानिकेन स्मरेणैव समस्तपदार्थक्रियाणेन वाक्यार्थ:

परिसमापनौ इति पाठक्रमापेच्चया चूषिकाक्रम एव सहृदयरक्षक इति कुशाग्रवीधिष्णु-

निर्पुणं निरुपणीयमिति । तथा च 'पुष्पदस्मदोः' पदस्य पदात् षष्ठीचतुर्थीद्वितीयास्थयो-

चोन्नावो' ( ८-१-२० ) इति चूषिकाक्रमेण व्यवहारो इष्यते । क्रमप्रक्रमभेदस्य पुनरुदा-

हरणं वस्तुप्रक्रमभेदविचारप्रस्तावे निरुपयिष्यते ।

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३१०

व्यक्तिविवेक:

क्रम = आरम्भ में जो क्रम अपनाया गया हो दूसरी बार कहने समय विपरीतता के कारण उसे नहीं लिवाहना । इससे एकरूपता टूट जाती है, अतः यह सदोष है ।

तत्र कुशुमशोभात्वम् ०—यह क्रमभेद प्रक्रमभेद का उदाहरण है । सो ठीक नहीं । यहाँ यह उलटकर कहने का क्रम ( चूलिका क्रम ही ) उचित है । वैसा ही कहा भी गया है । स्मर सम्सुख उपस्थित है, इन्दु प्रासंगिक है । इसलिये स्मर के प्रति बिना कुछ कहे इन्दु के प्रति अग्र्यर्थता का ज्ञान उचित नहीं है । इसलिये पहले तो स्मर का निर्देश पहले किया गया है फिर पुनः निर्देश करने में सामने उपस्थित विषय को छोड़कर प्रासंगिक द्वारा वाक्यार्थ की समाप्ति शोभा नहीं देती इसलिये उपसंहार में सामने उपस्थित स्मर से ही वाक्यार्थ की समाप्ति करनी चाहिये । इसलिये जहाँ तक पढ़ने के क्रम की अपेक्षा है उसमें चूलिकाक्रम ही सहृदयों के हृदयों को सुख देने वाला है । इस प्रकार सूक्ष्म बुद्धिवालों को थोड़ा ध्यानपूर्वक इसे विचरना चाहिये । ऐसा क्रम ‘युष्मदस्मदोः पदस्य पद्यात् पञ्चमीपञ्चम्योःद्वितीयास्थयोर्नान्तोः’ ( ३।२।२० ) सूत्र में भी ( जहाँ द्वितीया, चतुर्थी और षष्ठी यह क्रम होना चाहिये वहाँ षष्ठी, चतुर्थी, द्वितीया इस क्रम में ) उलटे क्रम का व्यवहार देखा जाता है । क्रम प्रक्रमभेद का उदाहरण वस्तु प्रक्रमभेद के विचार के प्रसंग में बताया जायगा ।

विमर्श : चूलिकाक्रम, वाक्य में चूड़ी । जिसे क्रम से पहनते हैं उतारने का क्रम पहनने के क्रम से ठीक उलटा होता है । पहनते समय जो चूड़ी पहले पहन ली जाती है उतारते समय सबके बाद में उतारी जाती है । पदार्थनिर्देश में भी यह क्रम कहीं-कहीं मानना पड़ता है । यहाँ ‘प्रथमनिर्देशोSध्यमतोनूदेशौSपि तं विषयम्’ ऐसा कुछ पाठ चाहिये ।

नञु च प्रकृतिप्रत्ययपर्योयोयादीनां प्रकान्तानां भेदेडपि प्रधानभूतस्यार्थस्यामेदाच्छब्दमात्रस्य भेदे सति न किञ्चिदेकरसता । प्रतितेः परिस्खलनमुपपद्यत इति कथंय प्रकृत्यादिप्रकमभेदो नाम शब्दानौचित्यमित्युक्तम् । उच्चयते । स चैवायमेवज्ञातीयः प्रक्रमभेदः प्रायेण विध्यनुवादभवप्रकार इत्यचगन्तव्यम् । न च तत्राप्यसत्प्रयर्थभेदे शब्दभेदमाद्यन्ते वक्तारः । यथा—

"यदघरदलमाश्रितं प्रियाया वदनसरोरुहसास्पमेति यक्षः । तद्मृतममृतं स इन्दुरिन्दुविशेषमितरतत् तमसा समस्थानीयः ।।" इति ।

उक्तः सोडनुपपत्तः । यतः ‘चारुतया पुरभूषयदासां’मित्यादौ भूषणभूष्य-भावादिरूपं किंपि वस्तु प्रत्याय्यं वर्त्तते । तच्च शब्दादर्थादुद्भाव्यामपि वा प्रतीयताम् । कस्तत्र प्रकमभेदनियमः प्रत्यभिनिवेशः यद्येदाभ्यामनौचित्यं स्यात् ।

न हि । ‘शुचि भूषयति श्वेतं वपुः प्रशमस्तस्य भवत्यलंक्रिया । प्रशमाभरणं पराक्रमः स नयापादितसिद्धिभूषणः ।।’

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द्वितीयो विमर्शः

३११

इत्यादावस्त्यपी प्रतीतिपरिस्खलनेऽनौचित्यसंश्रितौ कश्चिदुपलभ्यत

इति तदेतदविदितशब्दार्थैवयापारविभागस्यैवाभिधानसम् ।

शंका—यह कैसे कहा जाता है कि प्रकृत्यादि का प्रक्रमभेद शाब्दानौचित्य है, कारण कि भले ही प्रकृति प्रत्यय और पर्याय आदि के प्रक्रम में भेद हो किन्तु प्रधानभूत अर्थ में जो भेद नहीं होता ! केवल शब्द में भेद आ जाने से एकरस प्रतीति में स्वखलन मानना ठीक नहीं ।

उत्तर = इस प्रकार का सारा प्रक्रमभेद प्रायः विध्यनुवादभावरूप ही माना जाना चाहिये ।

विध्यनुवादभाव में भी वक्ता लोग शाब्दभेद यों तबतक अच्छी नहीं मानते जवतक अर्थ में भेद नहीं आता । जैसे—

‘जो प्रिया के अधरदल में है और जो सुस्कमल की तुलना में आता है वही अमृत है और वही चन्द्र चन्द्र । उससे भिन्न विष है, और उसके अतिरिक्त अन्थकार के समान :’

शंका—ऐसा ही सही । तब भी जो शब्द और अर्थ इस तरह से दो प्रकार का प्रकमभेद

वतलाया है—वह ठीक नहीं । क्योंकि ‘चारुतापुषु:…’ इत्यादि में भूपणभूष्यभाव आदिरूप कोई

वात वतलानी है । वह शब्द और अर्थ दोनों ही से प्रतीत क्यों न हो । उसमें प्रक्रमभेद के नियम

का आग्रह किस काम का ? जिसके—भेद (विगड़ने) से और अभेद (वनने ) से अनौचित्य हो ।

उत्तर = जी नहीं !

'साफ-साफ किया ज्ञानर्जन शरीर को कुशोभित करता' है उस (शृङ्गार) का अलङ्कार होना

है प्रदर्श, प्रशंसा का आभरण होता है पराक्रम और वह नीति से प्राप्त सिद्धि द्वारा विभूषित होता

है ।' इत्यादि में यद्यपि प्रतीति में परिस्खलन नहीं होता तब भी कुछ तो अनौचित्य दिखाई देता ही

है । इसलिये यह सारी शंका शब्दार्थ व्यापार का विभाग न जाननेवाले व्यक्ति की ही है ।

प्रधानभूतस्यैति । अर्थप्रतिपादनाय शब्दप्रयोगाच्छ्रुतदृष्टयोपायमात्रस्वाद् उपायान् च

नियमाभावात् । तदुक्तम्—

"उपायायापि ये हेतास्तानुपायान् प्रचच्छते ।

उपायान् च नियमो नावश्यकल्कलपते॥" इति ।

प्रक्रमभेद इति । प्रक्रमभेदविषयस्य विध्यनुवादभावप्रकारस्वात् प्रकमभेदोऽप्युपचाराद्

विध्यनुवादप्रकार इत्यर्थः । अननेनैव न्यायेन शब्दद्वार्थश्चेति प्रकमाभेदस्य भेदद्वयं शब्दार्थ-

विषयत्वाद् बोधव्यम् ।

शब्दभेदमिति । एकशब्दाभिधेयत्वेनैकस्य प्रतिभिज्ञायमानत्वोपपत्तये । शब्दभेदे तस्यै-

वार्थस्याऽऽनस्यैव प्रतीतेर्न काऽऽदृशे शाब्दादिवदर्थप्रतीतिस्यर्थं शब्दमात्रं प्रयुज्यते सहित्योः शब्दा-

चिन्ता प्रस्तुता । न च काऽऽदृशे शाब्दादिवदर्थप्रतीतिस्यर्थं शब्दमात्रं प्रयुज्यते सहित्योः शब्दा-

स्थैयस्यानस्यैव प्रतीतेः । न तु योसस्तत्र प्रयोगात् । सहित्यं तुल्यकदर्थवेनानन्योनातिरिक्तत्वम् ।

अस्त्येवमिति । सामान्येन प्रकमभेदाद्युपगसो विशेषे तु पर्यनुयोग इति भावः । प्रक्र-

नियमं प्रतीति हृदयङ्गमः पाठः। यद्वेद्यादिभेदाभ्यांमिति हि यथाऽऽख्यात्

अक्रमसंदानियमे प्रतीति तु पाठः यद्वेदादिभेदाभ्यांमिति प्रक्रमस्यैवोद्घृतस्य

परामर्शो व्याख्येयः ।

अत्र शृङ्गयतीति शब्दं शृङ्गणं प्रकान्तरम् अलङ्क्रियेत्यादार्थेन रूपेण

शुचि भूपयतीति ।

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३१२

व्यक्तिविवेकः

प्रतिनिर्दिष्टस्म् । अत्र च पर्यायप्रक्रमभेदः स्थितोऽपि न साम्प्रतं चिन्त्यते । शब्दार्थप्रक्रमभेद-चिन्तनप्रस्तावात् ।

अत्र विभागोऽपि वेदितुम् ।

प्रधानभूत = शब्द का प्रयोग अर्थज्ञान के लिये होता है अतः शब्द उपायमात्र होते हैं । और उपायों में कोई निश्चित नियम नहीं होता । जैसा कि कहा है—‘अपना कर भी जो त्यागे जा सकते हैं उन्हें उपाय कहते हैं और उपायों में कोई नियम अनिवार्य रूप से नहीं होता ।’

प्रक्रमभेद = प्रक्रम के अभेद का जो विषय है वह विध्यनुवादभाव का अंग है । अतः प्रक्रम का भेद भी—लक्षणया—विध्यनुवादभाव का ही अंग है । इसी प्रकार प्रक्रमभेद के भी दो भेद—शब्द और अर्थ, शब्द विषयक और अर्थविषयक मानने चाहिये ।

शब्दभेद = देखा जाता है कि अर्थ एक ही शब्द से कहे जाने पर पहचचान में आता है । शब्द में अन्तर पड़ जाने से वही अर्थ दूसरा सा प्रतोत होता है । और ठीक से विध्यनुवादभाव का विषय नहीं बनता यहाँ जो विचार चल रहा है वह काव्यगत प्रक्रमभेद का है । काव्य में, शास्त्रादि के समान केवल अर्थ प्रतीति के लिये शब्दमात्र का प्रयोग नहीं होता । वहाँ ( काव्य में ) सहित शब्दार्थ का प्रयोग होता है । साहित्य का अर्थ है वराबरी के साथ कमवढ़ न होना ।

अस्त्वेवम् = भाव यह कि हम प्रक्रमभेद को सामान्यरूप से मान लेते हैं । विशेषरूप से मानने में हमारी आपत्ति है ।

प्रक्रमभेदनियमम् = प्रकम नियम में प्रति यह पाठ अधिक अच्छा है ।

यद्वेदाभेदाभ्याम् = यत् अर्थात् प्रक्रम ‘प्रक्रमभेदनियमं प्रति’ इस पाठ में ‘यदभेदा०’ में यद् शब्द के द्वारा ‘प्रक्रमभेद नियम’ शब्द से प्रक्रम जोड़कर जिस किसी प्रकार उक्त का परामर्श मानना चाहिये ।

शुचि भूषयति = यहाँ भूषयति—इस प्रकार भूषित करना आरंभ किया गया है । उसका प्रतिनिदर्श ‘अलंक्रिया’ इत्यादि अर्थरूप से किया गया । यहाँ पर्यायगत प्रकमभेद है तब भी इस समय उस पर विचार नहीं किया कारण कि यह शब्दगत और अर्थगत प्रक्रमभेद का प्रकरण चल रहा है ।

अन्यो हि शब्दव्यापारविष्योडर्थोडन्यश्वार्थेन्यापारविषयः । तत्र यः प्राथान्यान्नेन प्रतिपादयितुमिष्यते स शब्दव्यापारविष्यः, तस्य साक्षात्तदभिन्नस्वरूपवर्णनसम्भवात् । अन्यस्त्वर्थव्यापारविषयो विपर्ययात् । यद्यपि सति यदयं भूषणभूष्यभावः प्राथान्यान्नेन वकतुं प्रक्रम्यते तदा शब्दव्यापार-स्यैवासौ विषयो भवितुमर्हति नार्थव्यापारस्येति विषयविभागे व्यवस्थिते सति तयोरेव न्थ्याकरनं तदेकसाया: प्रतीतेः परिष्कलनहेतुर्भवत्यन्यो-चिन्यमित्युक्तं यथा पूर्वोक्त उदाहरणद्वये ।

यत् पुनः ‘शुचि भूषयती’त्यादौ सत्यपि प्रक्रमभेददोषे नानौचित्य-संस्पर्शः कश्चित् संवेद्यत इत्युक्तं, तत्र ‘वपुषः शुचि भूषणं श्रुतं’मिति, ‘तां मदस्तमपि वल्लभसखी’ इति चोभयत्रापि पाठविपर्यासात् प्रक्रमभेद-दोषद्वये परिहते सत्यनयोः प्रतीत्योरेवाशमौचित्यमनाविरभवति

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द्वितीयो विमर्शः

तत्र प्रतीतिपरमार्थविदः सहृदया एव विवेक्तुमलमिति त एव प्रधन्या: नान्ये । ते ह्युभयत्रापि साधश्यमेवावगच्छन्ति ।

यदि वा शुचि भूषयतीत्यादौ भूषणभूष्यभावशृङ्खलायां यथासम्भवं भेदाभेदितिवैचित्र्यमात्रं कविविवक्षितं, तच्च निय्यूहामिति तद्पहतचेतसां प्रतीतिस्खलनखेदानुबन्धारणम् ।

अथ यदि शब्दव्यापारविषयस्यैवार्थस्य प्राधान्यं न्यायस्येत्युच्यते, तर्हिं 'चक्राभिधातभस्मे'त्यादौ 'लावण्यकान्तिपरिपूरितदिड्मुबेड स्मिन्' इत्यादौ 'कृतकुपितैवेष्टपाइम्भोमि'रित्यादौ च वस्तुमात्रस्यालङ्कारस्य रसादेश्च प्रतीयमानस्यार्थस्यावृत्यस्यैवाप्राधान्यं स्यात् । तच्चानिष्टं भवति । तयोरसिद्धूमयोरिव गम्यगमकभावेनावस्थानात् प्रधानेतरभाव-

वस्यावश्याभ्युपगम्यत्नात् । अग्रोच्यते । प्रतीत्यपेक्षमनयोः प्राधान्यमप्राधान्यं चावस्थाप्यते । वाच्यस्य प्रतीति: शब्दव्यापारविषय इति तस्य प्राधान्यमवस्थाप्यते । प्रतीयमानस्य पुनरन्यथेति तस्याप्राधान्यमेवेत्युच्यते ।

यत् पुनर्वस्तुमात्रादीनां प्राधान्यमवस्थाप्यते, तद्वाच्यप्रतीयमानयो-धर्माण्योरिव गम्यगमकभावापेक्षयैव न प्रतीत्यपेक्षया । तद्पेक्षयैव च कचिद्वाच्यस्याप्यप्राधान्यमुच्यते ।

शब्द के व्यापार का विषयीभूत अर्थ दूसरा होता है और अर्थ के व्यापार का विषयीभूत अर्थ दूसरा । उनमें जिसे प्रधानरूप से प्रतिपादित करना होता है वह शब्द व्यापार का विषय होता है, उसका उससे ( शब्द से ) साक्षात् सम्बन्ध हो सकता है ! इसलिए ठीक उद्देश्य होने के कारण अर्थ व्यापार का विषयीभूत अर्थ दूसरा ही है। इस प्रकार जो यह 'वाच्यार्थभावनाविमुखप्रधानरूप से कहा जा रहा है, तो यह शब्द व्यापार का ही विषय विभाग हो सकता है। अर्थ व्यापार का नहीं । इस प्रकार विषयविमाग हो जाने पर भी उनको जो उलट कर रखता है वह एकरस प्रतीति में परिस्खलन का कारण = अनौचित्य वनता है, ऐसा हमने कहा है। जैसा कि पूर्वोक्त दो उदाहरणों में दिखाई भी देता है। और जो 'शुचि' भूषयति इत्यादि में प्रक्रमभेद दोष के रहते हुए भी अनौचित्य समझ में नहीं आता—ऐसा कहा, वहाँ (हमारा कहना है कि ) 'वपुः शुचि सूष्यं शृणुतम्' ऐसा और 'तां मरस्तमपि वह्नभस्मकृ' ऐसा दोनों जगह पाठ बदल देने पर दोनों! प्रक्रमभेद दोष दूर हो जाते पर इन प्रतीतियों में जो भी औचित्य या अनौचित्य आता है उसे प्रतिपादित के पारखी सहृदय लोग ही समझा सकते हैं, इसलिये इस विषय में उन्हें से पूछना चाहिये औरों से नहीं ।

अथवा—शुचि भूषयति० इत्यादि में रूपणभूष्यभाव की पंक्ति में कवि को यथासम्भव वैचित्र्य से कहने की विचित्रतामात्र विवक्षित है। और उसका निर्वाह उसने कर दिया है। इससे जिनका चित्त ठग लिया जाता है उन्हीं को प्रतीति में होनेवाले स्खलन की पीड़ा नहों समझ आती।

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झंका—यत्रि ऐसा कहना अभिष्ट हो कि वहीं अर्थ प्रधान होता है जो शब्द व्यापार का विषय बनता है, और कोई नहीं तो 'नक्रोभिघातप्रसभम्' इत्यादि 'लावण्यकान्तिपरिपूरित**' इत्यादि तथा 'कृतककुपिते:0' इत्यादि में वस्तुमात्र, अलंकार और रस आदि प्रतीयमान अर्थ, जो वाच्य नहीं है, उसी की अप्रधानता मानी जाय । (किन्तु) ऐसा माना नहीं जाता कारण कि वे दोनों प्रतीयमान और वाच्य अर्थ अभि तथा भूमि के समान गम्यगामक—भाव को लेकर । उसी को लेकर कहीं वाच्य में अप्रधानता भी कही जाती है ।

समाधान—इस पर हमारा कहना है कि इसकी प्रधानता और अप्रधानता प्रतीति को लेकर स्थिर की जाती है । वाच्य की प्रतीति शब्द व्यापार का विषय है । इसलिये उसमें प्राधान्य माना जाता है । और प्रतीयमान वैसा नहीं होता, अतः उसका अप्रधान्य ही माना जा सकता है । ऐसा ( पहले ) कहा भी है । और जो वस्तु आदि की प्रधानता बतला दी जाती है, वह वाच्य और प्रतीयमान अर्थों के—धूम अभि के समान गम्यगामक—भाव को लेकर । उसी को लेकर कहीं वाच्य में अप्रधानता भी कही जाती है ।

तदभिसम्बन्धः शब्दाभिसम्बन्धः। विपर्ययादिति साक्षाच्छब्दसम्बन्धाभावात्। उदाहरण—पद्धये 'शुचि भूपयती'ति 'चारुता वपुरि'ति च ।

यद्विशेषे स्थितपाठाभ्रयणेनोचिन्यं तत्तपाठाश्रयेण स्वोचित्योक्त्यर्थः । तच्छब्द—तदपहतेः तत्पदेन भणितिवैचित्र्येण परामृश्यते । साक्षाद्रयमेवेति । विवेकाच्छमप्रकर्षवात् ।

तदपहतेति तत्पदेन भणितिवैचित्र्येण परामृष्यम् । उत्कटेन भणितिवैचित्र्येण वर्णनीयमाच्छादितमिल्यर्थः । तदुक्तं वक्रोक्तिजीवितालङ्कारोपमानकृत्य—

'यदुक्तं तद्वदलङ्कारैरभिसमाननिज्जास्मना । स्वशोभातिशयायान्तस्तमलङ्कार्यै प्रकाशयते ॥' इति ।

तदभिसम्बन्धः—शब्द का अभिसम्बन्ध । विपर्ययाद्—साक्षात् शब्द सम्बन्ध न होने से । उदाहरणदये—'शुचि भूपयति' एक, दूसरा 'चारुतः वपु:' ।

यादृश्रयम्—यथास्थित पाठ के आधार पर अनौचित्य बदले पाठ के आधार पर औचित्य तत् शब्द से 'अस्य' परामर्श होता है ।

साक्षाद्रयमेवेति । उनकी प्रज्ञा विवेक ( अलग-अलग ) करने में समर्थ नहीं होती—इससे ।

तदपहृत—तत्पद से भणितिभणिति द्वारा हुआ वैचित्र्य कहा गया कवचन के उत्कट प्रकार से वर्णनीय पदार्थ ढक जाता है । जैसा कि वक्रोक्तिजीवितकार ने लौकिक अलंकारों का उदाहरण देकर कहा है । जैसे—वैसे ही अपने रूप से उद्भासित होते हुए अलंकारों द्वारा अलङ्कार्य अपनी अतिशय शोभा के बाँच ढका हुआ सा दिखलाया जाता है ।

विमर्शः वक्रोक्ति जीवित में—इसके पहले की कारिका इस प्रकार है—

रसरधिमाच्छोटसेकभासुरेभूषणैर्यैथातत्प्रभुतेरिव परिकलपते ॥ १३६ ॥ यत्र तद्वत्**इसी की लम्बी व्याख्या का सार इस प्रकार दिया गया है—अलङ्कारसहितसैव तथाविधोद्धृत

आजते, तस्यावन्तोदितकवृत्ते: स्वशोभातिशयान्तर्गततमलङ्कार्य प्रकाशते । [ प्र० १३३ हि० व० जी० ]

अयं भावः—यदि शब्दव्यापारविषयस्य प्राधान्यसमर्थव्यापारविषयस्य चाप्राधान्यमिति व्यवस्था, तदा त्रिविधस्य प्रतीममानस्य परेध्वन्यममानत्वेन व्यपदि—

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छटस्यास्माभिरनुमेयत्वेनोपपादितस्याप्राधान्यं प्रसज्येत तस्यार्थक्यापारविषयत्वात्, शब्दव्यापारविषयत्वस्य दूषितत्वात् । इदं च प्राधान्यास्पद् । तत् कथमिदं प्राधान्याप्राधान्यप्रतीतिभेदत इति । 'चक्राभिधातेः' श्राद्धौ च पर्यायोक्ते समासोक्तिवद् गम्यगमानस्यैव आधान्यं न वाच्यस्येत्युपपादितं प्राक् । 'एकाभिधानं' इति हयग्रीववधे पाठः स्थितः; सुदर्शनस्य पुंखित्वस्य प्राक्तनत्वाद् य हेतुनेन परामर्शाति । तद्वनवधुज्य चक्रं यदि परामृश्यते, तदोर्च्छेदस्य नापुसक्ता स्यात् । तेनुसारेरवाच्च परामृश्यते इत्याश्रयेन 'चक्राभिधातेः' इति पठन्ति । न वयं तत्र प्रस्तुताः ।

प्राधान्यमप्राधान्यं चेति इह गमककमप्रधानसुपायत्वात् । गम्यं प्रधानसुपेयत्वात् । तेन प्रतीयमानेस गम्यत्वात प्राधान्यच्यवहारः । न प्रतीत्यपेक्ष्यते । शब्देनार्थेन च या प्रतीतिस्तदपेक्षया न प्राधान्याप्राधान्यव्यवहार इत्यर्थः । तयोस्विह गम्यगमकभावविविक्तविषयत्वेन चिन्ता कृता । तदपेक्षया गम्यगमकत्वापेक्षया । काचिद् यत्र प्रतीममानसद्भावस्तत्राप्राधान्यमित्यर्थः । वाच्यस्यापीति-यः शब्दद्वेन प्राधान्यव्यवहारयोग्यस्य स्थितस्यापि । वाच्यं हि प्रतीयमानं प्रति गमकत्वेन व्यवस्थितं तेन तदपेक्ष्वेनाप्राधान्यमिति तात्पर्यम् ।

अप्राधान्यं स्यात्—भाव यह है कि यद्यपि शब्द व्यापार के विषय की प्रधानता हो और अर्थ व्यापार की अप्रधानता—ऐसी व्यवस्था मानी जाय तो तीन प्रकार के प्रतीममान अर्थ हो, जिसे और लोगों ने 'भव'नयमान कहा है और अनुमेय, अप्रधानता आप्त होती है क्योंकि वे अर्थव्यापार के विषय हैं । उनके शब्दव्यापारविषय होने का खण्डन किया जा चुका है । किन्तु मानी तो जाती है उनकी प्रधानता । तो प्रधानता अप्रधानता की व्यवस्था कैसे बने ?

नकाभिधान०—में पर्यायोक्तालंकार है । उसमें समासोक्ति के समान प्रतीममान ही प्रधान है । वाच्य नहीं । ऐस पहले बतलाया जा चुका है । हयग्रीववध में 'एकाभिधान' ऐसा पाठ है । सुदर्शन को पुँल्लिङ्ग में पहुँ गया अतः उसका 'यः' इस ( यत् पद से प्रथमा एकवचनान्त रूप ) से परामर्श हुआ । उसे बिना समझे यदि चक्र इसी पाठ को माना जाय तो यत् शब्द को नपुंसक लिङ्ग में पढ़ा जाना नाहिये । इसलिये विष्णु हो यहाँ यत् शब्द से परामृष्ट माने जाते हैं—ऐसा कहकर कुछ लोग संगति लगाते हैं । पर वहाँ प्रकरण ऐसा नहीं है ।

प्राधान्य-अप्राधान्यम्—यहाँ गमक अप्रधान है, क्योंकि वह उपाय होता है । ऐसे गम्य प्रधान है क्योंकि वह उपेय होता है । इसलिये प्रतीममान गम्य होने से प्रधान है ।

न प्रतीत्यपेक्षया—शब्द अर्थ से जो ज्ञान होता है उसके आधार पर प्राधान्य अप्राधान्य की व्यवस्था नहीं हो सकते । उन शब्द अर्थ से होने वाले प्राधान्य अप्राधान्य का विचार तो यहाँ गम्यगमक भाव ( कृत प्राधान्य अप्राधान्य ) के क्षेत्र से बाहर किया गया है ।

तदपेक्षया—गम्यगमनभाव को लेकर ।

कचित् = कहीं—जहाँ प्रतीममान का सद्भाव हो, वहाँ प्राधान्य नहीं होता ।

वाच्यस्यापीति—उस शब्द रूप से प्रधान कहा जाने योग्य है—उसका भी । तात्पर्य यह कि वाच्य प्रतीममान के प्रति गमक रूप से ही व्यवस्थित है । इसलिये इसको देखते हुए इसका अप्राधान्य है ।

ननु यदि प्रतीतिरेकरसप्रस्तुताया: परिस्फलनहेतुत्वादयं प्रक्रमभेदद्वैचित्र्यमित्युच्यते तदिदानीमेकस्मिन्नेव वस्तुनि निर्वर्ण्यमाने महा-

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व्यक्तिविवेक:

कवीनाां या विचित्रा भङ्गीभणितयोःलङ्कारसङ्ज्ञास्तास्वप्ययं प्रक्रमभेदद्दोषो दुर्निर्णेयः स्याद् विदोषाभावात् ।

मैवं वोचः ।

तत्राऽऽयस्माभिरयमिष्यत एव ।

कथं तर्हि वैचित्र्यं न प्रकाइते ।

तस्याऽऽलङ्कारनेन्दुबिम्बगतस्यैव कलङ्कुलेशस्य स्वादिष्ट्राभरलङ्कारपरम्पराभिरभिभूयमानत्वाद्राक्यभेदाच्चेति । यदुक्तम्—

"एको हि दोषो गुणसन्निपाते निमज्जतीन्दोः किरणेष्विवाऽऽकः ।" इति ।

न तु तावतासौ नास्त्येवेति शक्यं कल्पयितुं तत्सद्भावस्य न्यायसिद्धत्वात् । न हि भङ्गीभणितिविषये वर्तमानाः प्रतीति-

रपरिस्खलितक्रमेणैव प्रवर्त्तते इत्युपपद्यते कारणभेदस्याऽपि कार्यभेदहेतुत्वोपगमात् । तद्वेतदुक्तं भवति सर्वं एव भणितिप्रकारः प्रक्रमभेदस्य विषय इति ।

स च विविच्यमानो वाच्यप्रतीममानार्थानिष्ठैः प्रच पर्यवस्यतीति शब्दार्थैकश्रयेऽति तथैव द्वैविध्येन प्रतिपादितः ।

रौंका—यदि एकरस चल रही प्रतीति में भेद डालने के कारण यह प्रक्रमभेद अनौचित्य—कहा जा रहा है तो इस स्थिति में एक ही बात के कहने में महाकवियों की जो विचित्र उक्तियाँ देखी जाती हैं और जिन्हें अलङ्कार रूप माना जाता है उनमें भी प्रक्रमभेद होगा, वह हटाया नहीं जा सकेगा, कारण कि यहाँ और वहाँ कोई अन्तर नहीं है ।

उत्तर—देस ना कहिए । वहाँ भी हम इसे ( प्रक्रमभेद को ) मानते ही हैं ।

प्रश्न—तो विरसता प्रतीत क्यों नहीं होती ?

उत्तर—इसलिये कि वह सुन्दरी के मुखकमल में पड़े किसी छोटे से काले चिह्न के समान, अत्यन्त स्वादु अलङ्कारोंमें दब जाता है और वाक्यमें विचित्रता चली आती है । जैसा कि कहा है—

जधाां गुणों का जमघट होता है वहाँ एक दोष चन्द्रमा की किरणों में कलंक के समान डूब जाता करता है । इतने से यह (प्रक्रमभेद) नहीं ही है ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती । क्योंकि उसका अस्तित्व न्यायसिद्ध है । जो प्रतीति विचित्र कथन के विषम पथ पर आगे बढ़ती है वह एकरूप से ही आगे

रहती है । ऐसा सिद्ध नहीं हो सकता, क्योंकि कारण में आई भिन्नता कार्य में भिन्नता पैदा करती है—ऐसा माना जा चुका है । इसलिये यह वात स्थिर होती है कि सभी प्रकार के भणिति-भेद में प्रकमभेद रहता ही है ।

और वह ( प्रक्रम भेद ) विवेचन करने पर वाच्य और प्रतीममान अर्थ में रहता जान पड़ता है इसलिये शब्द और अर्थ होता है और इसीलिये वह दो प्रकार का बताया गया है ।

विचित्रा भङ्गीभणितय इति यथा भट्टवाणसि तेथु तेथु स्थानेषु । अभिभूयमानत्वादिति ।

यदुक्त ध्वानिकृता—‘अयुक्तियुक्तिकृतो दोषः शोभां सोऽप्यनुते कवेः’ इति ।

वाक्यभेदाच्चेति वाक्यान्तरापेक्षया हि वाक्यान्तरस्य भङ्गीभणितिवैचित्र्यमिश्रणप्रतीतिवैदूर्याद्भ प्रकमभेददोषः प्रकाशयति ।

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द्वितीयो विमर्शः

न्यायसिद्धत्वादिति । न्यायोऽत्र भणितिवैचित्र्यमस्यम् । कारणभेदस्यापीति न केवलं प्रतीतिभेदो भेदहेतुः; यावत्कारणभेदोऽपि । प्रतीतिभेदो विशिष्टयपेक्षया भेदहेतुः; कारणभेदः पुनःस्वपर्यपेक्ष्येति विशेषः । तदुक्तम्

"अयंसैव भेदो भेदहेतुर्वां भावानां योडयं विरुद्धधर्माध्यासः कारणभेदश्र" इति । इह भणिभणितिवैचित्र्यावैचित्र्ये प्रतीतिपरिस्कलनयोः कारणे ।

स चैति प्रक्रमभेदः ।

शाब्दार्थप्रक्रमभेदाविचेतिं पूर्वं प्रक्रियादिप्रक्रमभेदविलक्षणौ शाब्दार्थप्रक्रमभेदौ लक्षितावुदाहृतौ च । अथुना वाच्यप्रतियोमानार्थोपेत्चया पर्यवसानाभिप्रायेण सर्वप्रक्रमभेदव्यापको सामान्येन शाब्दार्थप्रक्रमभेदादुक्ताविवते, विशेषो बोद्धव्यः ।

विचित्रा—जैसे वाणभट्ट की उक्तियाँ में स्थान स्थान पर । अभिधूयमानत्ववाद—जैसा कि ध्वनिकार आनन्दवर्धन ने कहा है—अध्युत्पत्तिं से पैदा हुआ दोष कवि की शक्ति से दब जाता है । वाक्यभेदाच्च—दूसरे वाक्यों के आधार पर दूसरे वाक्यों में भणिभणिति का वैचित्र्य होता है, इसलिये आंशिक रूप से प्रतीति में दूरी पड़ जाती है, अनः प्रकमभेद दोष दिखाई नहीं देता ।

न्यायसिद्धत्वात्—न्याय ( हेतु ) है यहाँ भणिति की विविधता । कारणभेदस्वापि—केवल प्रतोतीभेद ही भेद का हेतु नहीं है । कारणभेद भी उसको हेतु भी है—'भेद या भेद का हेतु यहीं कहा जाता है कि विरुद्ध धर्मों की प्रतीति या कारण का भेद ।' भणिभणिति के वैचित्र्य और अवैचित्र्य प्रतीति के परिस्कलन में कारण बनते हैं ।

स च—प्रक्रम भेद ।

शाब्द्र आर्थ—पहले प्रकृत्यादि के प्रक्रमभेद से भिन्न शब्द और अर्थ प्रकमभेद सामान्य रूप से बतलाये गये और उनके उदाहरण भी दिये गये । यहाँ उपसंहार करने के लिये वाच्य और प्रतोयमान की दृष्टि से सभी प्रक्रमभेदों में सामान्य रूप से व्यास शाब्द और अर्थ के प्रक्रमभेद कहे गये । यह इसमें अंतर है ।

वस्तुप्रक्रमभेदो यथा

'इयं गेहे' इति । अत्र प्रथंमे पादे साक्षात्कारिकाया: स्वरूपं वर्णयितुमुपक्रम्योत्तरत्र भेदेन तदोयस्पर्शोद्दिर्वणनं निरीहतमिति वस्तुप्रक्रमभेदो दोषः ।

ननूभयत्राप्यर्थेतरत्स्वरूपप्रकर्षप्रतीति: पर्यवस्यतीति कथंमयं दोषः । सत्यम् । स्यादेवं यद्यसाक्षात्कारितयात्रास्यातपरिस्कलनैकरसाभेदैरस्या । सत्यक्कर-सैव पर्यवस्येत् । न चोक्कनयेनैतत्सम्भवतीति दौष्ठतैयैवायमुक्तः । तेन मुखं पूर्णचन्द्र्रो वपुरमृतवार्तिर्नयनयोरित्येवमयम् पाठ: परिणमयितथ्यः ।

वस्तु प्रक्रमभेद यथा—

इयं गेहे लक्ष्मीरियममृतवर्त्मनयनयोरसौष्ठवं बहुलक्ष्मीर्नरसं । अयं बाहुः कण्ठे शिशिरमसृणो मौक्तिकसरः किमस्या न प्रेयो यदे परमसह्यास्तु विरहः ।। 'यह ( सीता ) घर में लक्ष्मी है, यह आँखों में अमृत की वर्ती है । इसका यह स्पर्श शरीर पर घना चन्दन रस है । यह हाथ गले में ठंडा और चिकना मोतों का हार है—( इस प्रकार ) इसका क्या मुझे प्रिय नहीं है । केवल असह्य है तो विरह ही । यहाँ प्रथम चरण में स्वयं

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३१८

व्यक्तिविवेक:

नायिका का वर्णन करना आरम्भ किया, आगे चल कर अन्त तक उसके स्पर्शा आदि का वर्णन स्थिर रखा। इस प्रकार वस्तु के प्रक्रम का भेद यह हुआ।

झाँका—दोनों ही जगत नायिका के स्वरूप की प्रतीति बढती चढती मात्रा में हो ही जाती है, इसलिये यह दोष कैसे ( हो सकता है ) ?

उत्तर—ठीक है। ऐसा सम्भव था यदि यह ( प्रतीति ) दोनों ही जगह टूटने से विरस हुये बिना एक सी बनी रह जाती ? पर उक्त प्रकार से यह सम्भव नहीं, अतः इसे दोष रूप ही माना।

'इसलिये मुख' पूर्णचन्द्र है, शरीर नेत्रों के लिये अमृत वाणी है ऐसा पाठ बदल लेना चाहिये।

वस्तुप्रक्रमभेद इति। वस्तु वर्णनीयं यथा वर्णयितुं प्रक्रान्तं तस्य तथा निर्वाहाभावाद् वस्तुप्रक्रमभेदः। भेदेनेति अवयवसम्बन्धिनियमेनैत्यर्थः। प्रथमे हि पादे अवयवविन एव स्वरूपेण वर्णनं प्रक्रान्तमित्यवसवबन्धित्वेन निर्वाहणं दोषः।

उभयत्रापीति अवयववर्णने अवयववर्णनने च। ननु स्वरूपं नायिकास्वरूपम् । वस्तु प्रक्रमभेद, वस्तु = वर्णनीय। जैसे वर्णन आरम्भ किया उसका वैसा ही अन्त तक निर्वाह न होने से वस्तु प्रक्रमभेद।

भेदेन—अवयव के साथ सम्बन्धित होने से। प्रथम चरण में अवयवी का ही स्वरूपतः वर्णन आरम्भ किया गया है, इसलिये निर्वाह अवश्य सम्बन्धी ( स्पर्शा आदि ) से करना दोष है।

उभयत्रापि—अवयवों और अवयव दोनों के वर्णन में।

तत्स्वरूपम्—नायिका का स्वरूप।

विमर्शः : पाठान्तर यह चाहिये 'मुखे पौर्णचन्द्र:' और 'तनुरसृणवच्चिन्तनयतयोः ।'

यथा च—

"तरङ्गय हरशेखरे ! पततु चित्रामिन्दीवरं स्फुटीकुरु रदच्छदं ब्रजतु विद्रुमः श्वेतताम् ।। क्षणं वपुरपात्रणु स्पृशतु काञ्चनं कालिकामुदश्य मनाङ्मुखं भवतु च द्विचन्द्रम नभः ।।"

अत्र उपमानानामिन्दीवरादीनां निन्दाद्वारेण नयनादीनामुपमेयानां यत् तेष्योडतिशयलक्षणं वस्तु वक्तुं प्रक्रान्तं तस्यनिर्वाहात् भेदः मुखचन्द्रयोः साहश्यप्रतिपादनमात्रपर्यवसानात्। तदेवमत्र पाठः पठितव्यः—

'उदश्य मनाङ्मुखं भवतु लक्ष्मलक्ष्मा राशी'।

और जैसे—

हे सुन्दरी ! जरा आँखें लहरा ( ताकि ) ये घमण्डी नील कमल झुक जायँ; अपने ओंठ खोल ( ताकि ) मूंँगे सफेद ( फक् ) पड़ जायँ । छिन भर के लिये अपना आँग उघाड़ ( ताकि ) सोना काला हो जाय, थोड़ा मुखड़ा उचटाँ कर ( ताकि ) आसमान में दो चाँद हो जायें ।

यहाँ इन्दीवर आदि उपमानों की निन्दा के द्वारा नयन आदि उपमेयों की जो अतिशयितारूपी वस्तु आरम्भ की गई है उसका निर्वाह नहीं किये जाने से ( प्रकम का ) भेद हुआ, कारण कि मुख और चन्द्र का पर्यवसान केवल सादृश्यमात्र के प्रतिपादन में ही हो रहता है। अतः इस प्रकार का पाठ यहाँ न कर लेना चाहिये—

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द्वितीयो विमर्शः

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'उदञ्जय मनाङि सुखं मवतु लक्ष्यलक्ष्मा शाशि' = थोडा चेढर। ऊँचा घर, जिससे चन्द्र वाँँ चलतू दिखाई देवे लग जाय ।

अञ्जने हृत्यामन्त्रणम् । पततु अधस्तात् । गच्छछु ।

सादृश्यप्रतिपादनेति द्विचन्द्रद्रुमिति हि पाढे वदनेन सह चन्द्रो नभसो द्विचन्द्रतामपादयति । तच्च वदनचन्द्रयोः सादृश्यमूलमिति व्यतिरेकप्रक्रमे सादृश्यनिर्वाहात् प्रक्रमभेदः ।

अञ्जने—यह सम्बोधन पद है । पततु = नीचे चला जाय । सादृश्य प्रतिपादन—'द्विचन्द्रौ नभः' इस पाठ में ( एक वदन और एक चन्द्र इस प्रकार ) वदन के साथ चन्द्र आकार्श में दो चन्द्र वाला होना सिद्ध करता है । वह मुख और चन्द्र के सादृश्य का कारण है । ( या वह मुख और चन्द्र के सादृश्य से ही सिद्ध होता है ) इस प्रकार व्यतिरेक के प्रक्रम में सादृश्य से निर्वाह करने में प्रक्रमभेद हुआ ।

विमर्शः : प्रस्तुत पाठ चाहिये 'भजतु चन्द्रमा: पाण्डुताम्' ।

यथा च— 'tदृ वक्त्रं यदि मुद्रिता शाशिकथा तचेतः स्मितं का सुधा सो चेत् कान्तरतमग्रंविकलं तादृशं गिरो विट्टमभु । सा दृष्टिर्यदि हारिता कुवलयैः किं वा वडु ब्रूमहे यत्सत्यं पुनरुक्तवस्तुचिरसः सर्गक्रमो वेधसः ॥' इति ।

अत्राङ्गुपमानादुपमेयस्यातिरेकलक्षणं यद्रस्तु वक्तुमिष्टं तस्यार्थान्तर- न्यासमुखेन प्रक्रमभिदः वस्तुसर्गपौनरुक्त्यस्य सादृश्यमात्रपर्यवसानादिति ।

तेन 'पुनरुक्तवस्तुमुख' इत्यत्र युक्तः पाठः । दोषोडयमेवाङ्गातीयकानामर्थ-दोषाणामन्येषामञुपलक्षणम् ।

तेन 'तपेन वर्षो' इत्याद्यपाकृतं भवति ।

और जैसे— 'यदि वह मुख था तो चन्द्रमा की कथा ही वनद थी, यदि वह मुस्कुराहट थी तो अमृत क्या था ? यदि वह कान्ति थी तो सुवर्ण व्यर्थ, वे शब्द यदि थे तो मधु को ठिकार । वह दृष्टि यदि थी तो कुवलय ( नील कमल ) हारे ही हुए थे, और अधिक क्या कहें—सच है कि विधाता की सृष्टि का क्रम दोहराई चीज बनाने से नीरस है ।' यहाँ भी उपमान की अपेक्षा उपमेय का अतिरेक रूपी जो वस्तु अभीष्ट थी, उसका अर्थान्तर-न्यास के द्वारा प्रक्रमभेद कर दिया गया । वस्तुओं को सृष्टि में पौनरुक्तय ( दोहरापन ) केवल सादृश्य में ही परिगत होता है ! इसलिये यहाँ—'पुनरुक्तवस्तुविसुख:' दोहराई चीज की ओर न मुढ़ने वाला यह पाठ चाहिये । यह दोष ऐते हाँ अन्य अर्थ दोषों का नमूना है । इससे 'तपेन वर्षो' इत्यादि का निराकरण भी हो जाता है ।

सादृश्येन निर्वाहः कृतः; व्यतिरेकेण च प्रक्रम इति दोष प्रबायम् । विमुख इति । केचित् पुनरुक्तवस्तुभु विरसः पुनरुक्तानि वस्तूनि न करोतीति व्याख्यायिनो न्यासितकानिर्वाहाद् न्यथास्थितं पाठं समर्थयाञ्चकिरे ।

अर्थदोषाणामिति प्रक्रमातिक्रमरूपाणामित्यर्थः ।

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३२०

व्यक्तिविवेकः

तपेन वर्षा इति— "तपेन वर्षा: शरदा हिमागमो वसन्तलक्ष्म्या शिशिर: समेल्य च । प्रसूनकृत्यं ददत: सदर्त्तव: पुरेडसय वास्तव्यकुटुम्बितां दधुः ॥" (माघे १६६) अत्र हि श्रीपुरुषयुगलत्रयरूपतया ऋतुतृत्रयं वर्णने प्रस्तुते श्रीरूपाणामृततां तृतीयासम्व- न्धसम्राधानये विवक्षिते यतु तपेन वर्षा इत्यत्र विपर्ययः कृतः, कृतं वा, तथा तिदेशो हि शरद्- हिमागम इत्यादौ यदन्यथाकरणं स प्रक्रमभेद एव । यदि परं श्रीपुंसयोगत्र चेत् क्रमेण प्रक्रमः तस्याऽन्यथा निर्वाहात्तु क्रमप्रक्रमभेदसिमं विधा। तेन पूर्वं क्रमप्रक्रमभेदस्येदमेवोद- ाहरणं देयम् । तेन वरं 'धनाश्रियोणः शरदा हिमागम' इति पाठः कर्तव्यः ।

वस्तुसंगपौनरुक्तयस्य—"पुनरुक्तवस्तु विरस" इस पाठ में 'पुनरुक्तवस्तुभिरस:' इस प्रकार की व्याख्या करके सदृटृय द्वारा निर्वाह किया गया है, और आरम्भ व्यतिरेक से हुआ है, अतः यह दोष ही है ।

विमर्श—कुछ लोगों ने—"पुनरुक्तवस्तुपु विरस" इस प्रकार पुनरुक्त वस्तु नहीं बनाता—ऐसी व्याख्या कर व्यतिरेक का निर्वाह किया और यथा स्थित पाठ का समर्थन भी किया है !

अर्थदोषाणाम्—अर्थात् प्रक्रम का अतिक्रमण आदि रूप अर्थ दोषों का ।

तपेन वर्षा इति—इस ( रावण) के नगर में सभी ऋतु एक साथ रहने वाले कुटुम्बी कुटुम्बिनी से वन गये थे, वे सभी मिलकर पुष्प का कार्य पूर्ण करते थे । ग्रीष्म से वर्षा मिलकर शरद् से हेमन्त और वसन्त लक्ष्मी से शिशिर । यहाँ ऋतुओं का वर्णन श्री-पुरुष के तीन जोड़ों के रूप में शुरू हुआ । उसमें भी ऋतुओं का तृतीय द्वारा अप्राधान्य बतलाना अभीष्ट था ।' पर उसे 'तपेन वर्षा:' में उलट दिया गया ( यदि ऐसा किया था तो अन्त तक ऐसा ही करना चाहिये था पर उसे पुनः 'शरदा हिमागमः' में उलट दिया । इसलिये यहाँ यह प्रकमभेद हुआ पर हम इसे क्रमागत प्रकमभेद समझते हैं । कारण कि श्री पुरुषों का जो क्रम शुरू किया था उसका उलटे क्रम से अन्त किया । इसलिये पहले जो ( तव कुसुमशरत्व में ) क्रम का प्रकमभेद बतलाया है उसके लिये इसो पछ का उदाहरण देना चाहिये । इसलिये—'धनाश्रियोणः शरदा हिमागम:' पाठ चाहिये ।

विमर्शः 'तपोडश्रलक्ष्म्या शरदा हिमागमो वसन्तकाळ: शिशिरश्रिया तथा । प्रसूनकृत्याय सदर्त्तवोऽन्विता: पुरेडसय वास्तव्यकुटुम्बितां दधुः ।' ऐसा पाठ अधिक अच्छा माना जा सकता है ।

ननु कत्रूप्रक्रमभेदोऽपीह कस्मान्न प्रदर्शितः । असद्भवाविति ब्रूमः । यस्तु कचित् कविमिः प्रयुज्यमानो दृश्यते स कत्रूपव्यतिर्यासो नाम गुण एव, न दोषः । तत्रैव चायं प्रक्रमभेदभ्रमो भवतां यदाह—

"पक्त्रान्तरपि हितत्वं कृत्वा युष्मदस्मदर्थदर्शय । चारुत्वायात्रारोप्येत गुणः स तु न दोषः ॥" "यत्र यथा प्रकान्तोऽभिधातुमर्थस्तथैव तस्य न चेत् । निर्वाहः स प्रक्रमभेदो न प्रकरणावसिथः ॥" इति । मिन्नलक्षणत्वान्न प्रक्रमभेददोषारूढावकाशः ।

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द्वितीयो विमर्शः

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झंका—इस प्रकरण में कर्तृप्रक्रमभेद्र क्यों नहीं दिखलाया ?

उत्तर—हमारा कहना है कि वह असंभवव है। जो ( यह कर्तृप्रक्रमभेद्र ) कहाँ-कहाँ कवियों द्वारा प्रयुक्त दिखाई देता है वह तो प्रस्तुत कर्तृव्यत्यास नाम का गुण है, दोष नहीं। आप लोगों को उक्तां पर प्रक्रमभेद्र का भ्रम हो गया है, वस्तुतः उन दोनों के स्वरूप मिलते हैं। जैसा कि कहा है—

जहाँ युष्मद् और अस्मद् शब्द के अर्थ प्रकृत ( प्रसंगप्राप्त ) हों, तब भी यदि उन्हें छोड़कर उनका कर्तृत्व चारुत्व के लिये किसी और पर आरोपित कर दिया जाय तो वह गुण ही होता है दोष नहीं।

जो विषय ( पदार्थ ) जिस ढंग से कहना शुरू किया गया, यदि उसका निर्वाह उसी ढंग से न हो तो, वह प्रकमभेद दोष होता है। प्रकरण से वह नहीं जाना जाता। इस प्रकार लक्षण भिन्न होने से यहाँ ( कर्तृप्रक्रमभेद में ) प्रकमभेद दोष की शंका की कोई गुंजाइश नहीं।

कर्तृप्रक्रमभेदोऽपि क्तिः। यत्र युष्मदस्मदर्थगतं कर्तृत्वं शेषेष्टं चेतनेsचेतने वा वाक्यबुद्धिपूर्वंकमेवारोप्यते, तत्र कर्तुरन्यस्यारोपश्राहत्वाय व्यत्यासो गुण एवेत्यर्थः। तयोरिति। कर्तृव्यत्यासप्रक्रमभेदयोः। न प्रकरणावसित इति। युष्मदस्मदर्थस्य हि क्वचिचत् कर्तृत्वं प्रकरणाद्यवसितं न शब्देन—

भिधातुं प्रक्रान्तमिति नायं प्रकमभेददोषस्य विषयः।

कर्तृप्रक्रमभेद्र :-जहाँ युष्मद् और अस्मद् शब्द के अर्थ में स्थित कर्तृत्व वक्ता द्वारा जानबूझ कर अन्य किसी चेतन या अचेतन पर आरोपित किया जाता है, वहाँ दूसरे कर्ता का आरोप चारुत्वजनक होता है इसे व्यत्यास नाम का गुण मानते हैं।

तयोः—कर्तृव्यत्यास और कर्तृप्रक्रमभेद दोनों का।

न प्रकरणावसित—कहीं-कहीं युष्मद् अस्मद् अर्थ की कर्तृता प्रकरण आदि से समझ ली जाती है, शब्द से कहा नहीं जाता। इसलिये यह प्रकमभेद दोष नहीं।

तत्र युष्मदर्थस्य यथा ‘रामाद् सततं वैकुण्डतातार’ इति। अत्र हि यथात्यथ् त्वमिति युष्मदर्थस्य कर्तृत्वं प्रकृतमपहाय चारुत्वाय ततोऽन्य-

ज्ञारोप्यैवमुक्तम्। द्वारार्थी रामं प्रति हि कस्याचित् समक्षमियामुक्तिः।

अस्मदर्थस्य यथा—‘नाभिवादनप्रसाद्यो रघुकापुत्रः’, गरीयान् हि गुरुधनुरभङ्गापराध’ इति। अग्रापि हि नाभिवादनप्रसाद्योऽस्मीति वक्तव्ये पूर्ववच्चारुत्वायैवमुक्तम्। पथा हि भार्गवस्यात्मनमुर्दिश्योक्तिः।

यथा च—

“अयं जनः प्रश्टुमनास्तपोधने ! न चेदृ रहस्यं प्रतिवकतुमर्हसि” इति।

अत्राप्ययहं प्रश्टुमनः इति वक्तव्येऽस्मदर्थस्य कर्तृत्वमन्यत्रारोप्यैवमुक्तम्।

दोनों में युष्मद् अर्थ का ( प्रकृत कर्तृत्व हटाकर उसका अन्यत्र आरोप ) यथा—

‘वैकुंठ के सातवें अवतार ( आप ) की जो आज्ञा !’ यहाँ ‘तुमने जो कहा’ इस प्रकार युष्मद् अर्थ को उपस्थित कर्तृता हटाकर, चमत्कार के लिये उसका दूसरे ( अन्य पुरुष वैकुण्ठ के अवतार ) पर आरोप करके ऐसा कहा गया। दशरथ के पुत्र राम के सामने वह किसी की उक्ति है।

२१ व्य० वि०

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और अस्मद् अर्थ का जैसे—

‘रेणुका का बेटा प्रणाम से प्रसन्न होने वाला नहीं, गुरु के धनुष को तोड़ने का अपराध बहुत बड़ा है ।’ यहाँ भी ‘मुझे प्रणाम से खुश नहीं किया जा सकता ।’ ऐसा कहता था । पर चारुता के लिये पूर्ववत् ऐसा कहा । यह परशुराम का अपने प्रति कथन है ।

और जैसे—

‘यह जन पूछना चाहता है, हे तपोधन ! यदि कोई छिपाने योग्य बात न हो तो बतलाए ।’ यहाँ भी ‘मैं पूछना चाहता हूँ ।’—ऐसा कहता था । सो अस्मद् अर्थ की कर्रृता को दूसरे पर आरोप कर यह कहा गया ।

अन्यत्रारोप्यैवमुक्तामिति श्रेष्ठवेन विवक्षिते रामभद्रे । एवमुच्यतां भार्गवे वटौ चान्यस्येव योजनीयम् ।

अन्यत्रारोप्यैवमुक्तामिति-श्रेष्ठ ( अन्यपुरुप ) रूप से विवक्षित राम पर । और अगले पद्यों में इसी ढंग से परशुराम और वटु पर अन्यता वा आरोप किया गया है ।

नहि युष्मदस्मदर्थस्य चेतनत्वात् तदपेक्ष्याचेतनस्यैवान्यस्यस्वुचितमिति कथं चेतनस्यै-वान्यस्यविम्याहं द्विविधो हीति ।

शंका—‘युष्मद् का अर्थ चेतन होता है, उससे भिन्न अचेतन को ही मानना चाहिए, फिर चेतन को ही भिन्न कैसे मानना ।’ इस पर उत्तर देते हैं—

द्विविधो हन्यार्थैकश्र्चेतनाचेतनभेदात् । तत्र चेतनेडन्यत्रारोपो हि दर्शित एव ।

अचेतने तु यथा—

‘चापाचार्ये: पशुपतिरसौ कार्तिकेयो विजेयो वाणव्यस्त: सदनमुदधिमूर्तिरं हन्तकार: । अस्त्येवैतत् किन्तु कृतवता रेणुकाकण्ठवाधीं बद्धस्पर्धोऽस्तव परशुना लज्जते चन्द्रहास: ॥’ इति ।

अत्र हि त्वां रेणुकाकण्ठवाधीं कृतवानिति त्वया बद्धस्पर्धोऽहं लज्ज इति वाक्ये चारुत्वायैव गुष्मदर्थयाः कर्तृत्वसुभया: परशुचन्द्रहासयोर्जिडयो-रारोप्यैवमुक्तम् ।

यथा च—

‘भो लड्डेश्वर ! दीयतां जनकजा राम: स्वयं याचते कोऽयं ते मतिविभ्रम: स्मर नयं नाद्यापि किश्चित् गतम् । नैवं चेत् खरडूषणान्त्रिशिरसां कण्ठास्त्रुजा पड्किल: पत्त्री नैष सहिष्यते मम धनुर्ज्यावन्धवच्यूरुत: ॥’ इति ।

अत्रापि हि ‘अहं न सहिष्ये’ इति वाक्ये पूर्ववदस्मदर्थेस्य कर्तृत्वसमारोप्यैवमुक्तम् ।

अन्य शब्द का अर्थ दो प्रकार का होता है चेतन और अचेतन—इनमें से चेतनरूप अन्य पर आरोप दिखला दिया गया । ( रहा ) अचेतन पर, ( तो ) वह इस प्रकार है :—

ये भगवान् पशुपत्ति चापविद्या के आचार्य हैं, जिसे जीता वह कार्तिकेय, शाख से अलग किया समुद्र घर है, यह पूर्ण पृथिवी हन्तकार है, यह सब कुछ है, पर रेणुका का गला काटने वाले तुम्हारे परशु के साथ स्पर्धा लिए हुए—मेरे चन्द्रहास ( खड्ग ) को लाज आती है ।

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द्वितीयो विमर्शः

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यहाँ तुमने रजुका का गला काटा, इसलिए तुम्हारे साथ स्पर्धाँ करते हुए मुझे लाज आती है ऐसा कडना था, किन्तु सौन्दर्य के लिये युष्मद् और अस्मद् दोनों का अर्थ परशु तथा चन्द्रहास पर आरोपित करके ऐसा कहा । और जैसे—

हे लंकेश्वर रावण ! जनक की बेटी ( सीता ) को लौटा दो, खुद राम ही माँग रहे हैं । तुम्हारी वृद्धि में यह हेर-फेर कैसा ? न्याय को याद करो, अभी भी कुछ नहीं गया है । नहीं तो धनुष पर चढ़ा हुआ मेरा यह खरदूषण और त्रिशिरा के गले के खून से सना वाण सहेगा नहीं ।

यहाँ भी—मैं नहीं सहूँगा—ऐसा कहना था पर पहले के समान अस्मद् शब्द के अर्थ का कर्तृत्व अचेतन वाण पर आरोपित करके ऐसा कहा ।

अयं भावः । न युष्मदस्मदर्थगतचेतनस्वापेक्षया वस्तुस्वरूपस्यान्यत्वम्, अपि तु युष्मदस्मदर्थौ च क्रमात् सम्बोध्यमानवस्तुनिष्ठः परभावोद्भवितताक्ष्यप्रत्यक्ता च । ततश्व तदपेक्षया शेषस्यान्यत्वम् । तस्य च चेतनाचेतनस्वाद् द्वैविध्यमिति न विरोधः कश्चित् ।

परशुना चन्द्रहास इति क्रमेण द्वयोरपि युष्मदस्मदर्थयोश्चेतनाविषयकर्तृताव्यस्यास उदाहरणम् ।

भो लंकेश्वर इति । अत्र रामः स्वयं याचते इति अस्मदर्थकर्तृतावस्य चेतनाविषयत्वन्यास-स्थान्यत् स्थितमप्युदाहरणीयं न चिन्तितं, पूर्वमुदाहरणान्तरे चिन्तितत्वात्, चिन्तान्तरप्रस्तावाच्च ।

भाव यह है कि—युष्मद् और अस्मद् अर्थ की चेतनता को लेकर किसी दूसरे को अन्य नहीं माना जा रहा है अपितु युष्मद् और अस्मद के अर्थत्व को लेकर । युष्मद् और अस्मद् के अर्थ क्रम से—सम्बोध्यमान ( जिसको सम्बोधित करके कुछ कहा जा रहा हो ) वस्तु में रहने वाली भिन्नता ( परत्व ) अस्मिता ( अपनेपन का मान ) रूप—प्रत्यक्त्व ( आत्माभिमुखता ) है । उनको लेकर उनसे भिन्न वस्तु में अन्यता रही और वह उनसे भिन्न चेतन और अचेतन करके दो प्रकार के ही होते हैं । इसलिए कोई विरोध नहीं ।

परशुना चन्द्रहासः—इस प्रकार क्रम से दोनों युष्मद् अस्मद् अर्थों के कर्तृत्व का अचेतन विषय में व्यत्यास ( परिवर्तन ) उदाहरण रूप से उपस्थित किया गया ।

भो लंकेश्वरः—यहाँ ‘राम खुद’ माँगते हैं—इस अंश के अस्मद् के अर्थ का कर्तृत्व चेतन विषय ( इस लोक के वक्ता ) पर ही आरोपित हुआ है । अर्थात् याचना करता है दूत और कहलाता है कि राम याचना कर रहे हैं—इसमें अपने ऊपर राम ( चेतन ) का आरोप दूत ने किया । इस प्रकार यह चेतन का चेतन पर आरोप होने का उदाहरण भी बन गया । इसका भी एक उदाहरण दिया जा सकता है, पर ( ग्रन्थकार ने ) उस पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि पहले ( अयं जनः इत्यादि में ) उसको वतलाया जा चुका है और यहाँ का प्रकरण दूसरे विषय का है ।

तदेवमियता प्रवृत्तेन क्रमभेदं विचार्य क्रमप्राप्तं क्रमभेदं विचार्यितुमाह क्रमभेदो यथेति ।

इस प्रकार इतने ग्रन्थ से प्रक्रमभेद का विचार कर वे अब क्रमप्राप्तं क्रमभेदो का विचार करना शुरू करते हैं ।

( ३ ) क्रमभेद

क्रमभेदो यथा—

"तीर्थे तदीये गङ्गेतुनन्ध्यात् प्रतिपगामुक्तरतोऽस्य गङ्गाम् ।" इति । अत्र हि परामर्शनीयमर्थमनुक्त्वैव यस्तस्य सर्वनामपरामर्शः स क्रमभेदः ।

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व्यक्तिविवेकः

मेदो दोषः। तस्य हि प्रकान्तोदर्थों विषय इष्टो न प्रकृत्यमानः तस्य स्मृतिपरामर्शोऽपत्वात्। स्मृतेश्चानुभूत एवार्थों विषयो नानुभूतविषयमात्रः। अज्ञ च प्रतीतिमात्रमनुभवोद्भमतो नेन्द्रियविषयभावः। न स्ता गृह्यार्थे प्रतीतिपूर्वो, यः परामृश्यते'ति परामर्शोपक्रमभेदो दोषः।

यथो—

उसके तीर्थों में हाथों के पुल से प्रतिपद्गा (पश्चिमवाहिती) गंगा को पार कर रहे—इसके (लिये) आकाश में उड़ रहे अतः पंख डुलाते हंस प्राकृतिक चामर वन बैठे। यहाँ परामर्शनीय विषय को कहे बिना ही उसका जो (तद्वाचक सर्वनाम से परामर्शों किया वह क्रमभेद हुआ। उस (सर्वनाम) का विषय माना जाता है प्रकरण से प्राप्त अर्थ, न कि आगे आने वाला। क्योंकि वह सर्वनाम परामर्शों स्मरण रूप परामर्शों ही होता है। और स्मृति का विषय अनुभूत ही होता है, आगे चलकर अनुभव में आने वाला नहीं। यहाँ (सर्वनाम से होनेवाले स्मरणरूप परामर्शो में) केवल प्रतीतिसामान्य को अनुभव माना गया है। इन्द्रियों से होने वाला प्रत्यक्ष नहीं। (यहाँ) यह गृह्यारूपी अर्थ पहले हुआ ज्ञान नहीं है जिसका परामर्शों किया जा सके। इसलिये यहाँ परामर्शो का क्रमभेद हुआ।

ननु यदि स्मृतिपरामर्शकस्य तच्छब्ददस्यालुसूत एवार्थों विषय इष्यते, येऽस्यान्तपरोच्चा रामादयस्तेऽश्वा कविना काव्ये तच्छब्ददेन कथं परामृश्यः क्रियते तेषामतीन्द्रियत्वादिन्यायः—अज्ञ च प्रतीतिमात्रभिप्रायः। येन बिना न्यायोपपद्यते तस्य तदपेक्षा न्याख्या। स्मृतिश्व प्रतीतिमात्रमन्वेरणानुपपद्यमाना तदपेक्षिणी स्यात्, नैन्द्रियिकप्रतीतिय-पेष्चिणी, ऐन्द्रियिकप्रतीतिं विनापि शब्दादिस्थः प्रतीतो तयाः सम्भवदर्शनात्। रामादीनां च यदि नैन्द्रियिकी प्रतीतिस्तदा शब्दात् प्रसिद्धेरां प्रतीतिरस्तु। तञ्चिन्बन्धनश्र स्मृतिपराशंका—तच्छब्दबद् स्मृति द्वार पदार्थज्ञान कराता है। उसका विषय यदि अनुभूत विषय ही माना जाय तो राम आदि जो अत्यन्त परोक्ष पदार्थ है काव्य में उनका परामर्शों तच्छब्द द्वारा कवि कैसे करते हैं? इस पर उत्तर देते हैं—अज्ञ च प्रतीतिमात्रभिप्रायः—अभिप्राय यह है—जिसके बिना जो सिद्ध नहीं होता उसे उसकी अपेक्षा होती है। स्मृति केवल सामान्य प्रतीति के बिना नहीं होती, इसलिए वह केवल उसी (प्रतीति-सामान्य) की अपेक्षा रख सकती है। उस प्रतीति विशेष की नहीं जो इन्द्रियों से उत्पन्न होती है। और देखा तो यह जाता है कि इन्द्रिय से होने वाली प्रतीति के बिना भी शब्दादि प्रमाणों से होने वाली प्रतीति के रहने पर स्मृति होती है। इसलिये यदि राम आदि इन्द्रियों द्वारा न देखे गये हों। तब भी शब्द द्वारा उनकी प्रसिद्धि होने से उनकी प्रतीति हो सकती है। उसके आधार पर स्मृति परामर्शक तच्छब्द द्वारा उनका परामर्शों हो सकता है। इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं।

विमर्शः तीर्थे तदर्थो = रघुवंश का १६।३३ वाँ पद्य है। १३वें पद्य में कुश द्वारा विन्ध्यागिरि के लाँघने का उल्लेख है। तीर्थ का अर्थ अवतार (हिन्दी में उतार) होता है। यह रीवर नदियों का अवतार केवल जल का ही हो। पहाड़ की तलहट्टी के उतार को भी अवतार कहा जा सकता है। यहाँ विन्ध्य की उँचाई पार कर कुश ने उसकी तलहट्टी के पास गंगा के पश्चिमगामिनी प्रवाह को पार किया—यह अभिप्राय निहित है। मिर्जापुर के पास यह स्थिति आती है। इस प्रकार तद्वाचक 'तीर्थे' का अर्थ उतार करने में प्रतीति-परामर्शों की कोई आपत्ति नहीं।

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द्वितीयो विमर्शः

आती। मधिनाथ ने भी इस पद का ऐसा ही अर्थ किया है—तद्वितये वैन्थे, तीर्थेऽदवतारे.....प्रतीप-

प्तौ = पश्वाद्वाहिनौ।

ननु पदार्थबुद्धचुपक्रम एवायमवभासते दोषः यत्र पदार्थपौर्वापर्यप्रकाशः

यत्समाश्रयोडयं दोष उत्पद्युष्यते, न वाक्यार्थेविचाराश्रयाम्। तत्र हि न

पौर्वापर्यप्रतीतिनियमावभासः तस्य निराकृतत्वात्। वाक्यार्थे च पदार्थबुद्धचरनन्त-

रड्यश्व वाक्यार्थेविचारो इति कथमयं दोषः?

सत्यम्, अस्त्येतत्। किन्तु स वाक्यार्थेविचारो प्रवर्त्तमानो वक्त्राभिप्र-

यप्रतिरूप एव प्रवर्त्तते, नान्याह्रः, तत्संचारमयत्वाच्छन्दद्वयवहारस्य।

यदाहुः—‘वक्तुरभिप्रयं सूचयेयुः’ इति। तत्र चाशौ सूक्ष्मतयानभिव्यक्-

तपदार्थस्वरूपः स्थित एव पदार्थबुद्धौ स्थूलतया केवलं व्यक्तोडवभासत

इति पदार्थसमाश्रयोडयं दोषस्तत्रापि दुर्निषेध एव।

शंका—जब पदार्थों का ज्ञान एक-एक करके शुरू होता है तभी यह दोष समझ पड़ता है वहीं ( पदार्थ ज्ञान काल में ) पदार्थ आगे पीछे ज्ञान पड़ते हैं, जिस पर [ पूर्व = आगे, अपर = पीछे, पौर्वापर्य = आगे पीछे सूझना = इस क्रम पर ] यह ( क्रमभेद ) दोष निर्भैर बतलाया गया है, वाक्यार्थ का ज्ञान होते समय नहीं [ यह दोष नहीं सूझता ] उस समय पौर्वापर्य ( आगे पीछे ) का कोई नियमित क्रम नहीं रहता, कारण कि उस ( वाक्यार्थ ) में अखण्ड नहीं होते वह अखण्ड होता है। पदार्थ की प्रतीति बहिरङ्ग है—बाहरी चीज है। वाक्यार्थ अन्तरङ्ग होता है। इसलिये—(उसमें) यह दोष कैसे ( सम्भव है ) ?

उत्तर—सचमुच, यह कहना ठीक है, पर वाक्यार्थ का यह विचारों (ज्ञान) जब भी होता है तब वक्ता के अभिप्राय का प्रतिभास ही होता है, और किसी तरह का नहीं, कारण कि शब्द का व्यवहार वक्ता के अभिप्राय पर ही निर्भर है, जैसा कि कहा गया है—‘(ये) वक्ता के अभिप्राय की सूचना देते हैं।’ उस ( वाक्यार्थ ) में यह (दोष) वैसे ही सूक्ष्मरूप से छिपा रहता है, जैसे पदार्थ। पदार्थज्ञानकाल में यह साफ दिखाई देता है। इसलिये यह ठीक है कि यह दोष पदार्थाश्रित है, किन्तु इतने पर भी वाक्यार्थ में इसका निषेध नहीं किया जा सकता।

नन्वति। अयमत्रार्थः। वाक्यार्थविमर्श इति। पदार्थविमर्शवेलायां भवत्प्रियमाशङ्का।

वाक्यार्थेविचारोसमये त्वखण्डप्रतीतो पौर्वापर्यभावनियमावभासनाभावान्नास्य दोषस्याव-

काशः। उदयेऽपि वाक्यार्थप्रतीतिरनन्तरङ्क्षवमिति तदाश्रयेणैव व्यवस्थोपपत्तौ न क्रमदो-

षचिन्ता काचिदिति। प्रतिरूपः प्रतिविमर्शरूपः तत्स्वारो वक्त्राभिप्रायसङ्क्रमणम्।

शब्दव्यवहारस्योति। शब्दव्यवहारमुखेन श्रोतृगृहीतो वाक्यार्थविचारः स्वीकृतः। वक्तुरिति।

यदि श्रोतृविमर्शपर्यवसायो शब्दव्यवहारो वक्तृविमर्शप्रतिच्छन्दरूपो न स्यात्, तदा

शब्दैवंकृतुविचारस्थ्यासम्वन्धवातानुमानं न स्यादित्यर्थः।

तत्र चास्मृति। वक्तुश्रोत्रुगते वाक्यार्थविमर्श सूचकमखनास्पुटतरूपोऽस्यैच पौर्वापर्यप्रतिभास

इति यावत्। पदार्थबुद्धाविति वाक्यार्थपूर्वभाविसिन्याम्। तत्रापिति। वक्तृश्रोत्रुगत-

वाक्यार्थेविचारेऽपि सूचकः पदार्थाश्रयो दोषो दुर्निवारः पदार्थनतिक्रमेणैव वाक्यार्थविम-

र्शस्य व्यवस्थितस्वादित्यर्थः।

नन्वति। यहाँ अभिप्राय यह है कि—पदार्थज्ञानकाल में यह आशंका ( दोष सम्भावना ) हो

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व्यक्तिविवेक:

सकती है। पर वाक्यार्थज्ञानकाल में तो प्रतीति अखण्ड रहती है। उसमें पूर्वोपरभाव ( आगे पीछे होना ) का नियमतः ज्ञान नहीं होता, इसलिये वहाँ इस दोष की गुँजाइश नहीं। वाक्यार्थ प्रतीति उद्देय होती है। अतः वह अनतरंग भी होती है। इस प्रकार उसी ( वाक्यार्थ ) के आसरे व्यवस्था ( पदार्थों के क्रम का ठीक विन्यास ) बन जाता है। क्रमभेद दोष की कोई बात नहीं रहती।

प्रतिरूप:-प्रतिबिम्बरूप ।

तत्सद्भार:-वक्ता के अभिप्राय का संक्रान्तरण ।

शब्दव्यवहारस्य :-यहाँ शब्दव्यवहार से श्रोता द्वारा जाना गया वाक्यार्थबिमर्श लिया गया ।

वक्तुः:-शब्दव्यवहार यदि श्रोता के ज्ञान तक ही सीमित मान लिया जाय और उसे वक्ता के ज्ञान का प्रतिरूप न माना जाय तो शब्दों द्वारा उनसे असम्बन्धित वक्ता के ज्ञान का अनुमान न हो।

तत्त्वचासौ:-वक्ता और श्रोता को वाक्यार्थ का जो ज्ञान होता है उसमें पौर्वापर्य क्रम है ही। वह सूक्ष्म होने से स्फुट नहीं रहता।

पदार्थैकबुद्धौ :-वाक्यार्थ ज्ञान के पहिले होने वाली पदार्थ बुद्धि ( पदार्थ ज्ञान ) में ।

तत्रापि :-वक्ता और श्रोता को होने वाले वाक्यार्थ ज्ञान में भी पदार्थोंश्रित यह अति सूक्ष्म दोष मिटाया नहीं जा सकता, कारण कि वाक्यार्थ का ज्ञान पदार्थों के अनुसार ही होता है।

न छात्र प्रमादजः पादयोः पौर्वापर्यविपर्यय इति शक्यते वक्तुम् । तत्रापि गङ्गाप्रतीपगमनहेतोः श्राब्दस्य तदीयतीर्थासंबिधानव्यवधाने सत्त्यन्यस्य प्रक्रमभेददोषस्याविश्रवापत्तेः । तेन पादयोरिविपर्ययः श्राब्दस्य च हेतोर्गङ्गा-विशेषणमुखेनार्थविमत्युभयविपर्ययोडत्र श्रेयानिति ।

परामृश्यमुक्त्वैव परामर्शोऽस्य यस्तदा । स दोषो वक्ष्यमाणार्थसंचित्तावक्ष्मो हि सः ॥ ३२ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोकः ।

यहाँ यह भी नहीं कहा जा सकता कि ( तीर्थे तदीये इस पद्य के ) चरण असावधानों से उलट गये हैं कारण कि चरणों में परिवर्तन करने पर भी प्रक्रमभेद दोष होने लगता है। क्योंकि चरण परिवर्तन करने पर गंगा के उलटे बहने और उसके 'शब्दतः कथित हेतु' ( गज सेतुबन्ध ) के बीच तदीयतीर्थ' शब्द चला आता है। इसलिये यहाँ दोनों ही का उलटना अधिक अच्छा होगा [ चरणों का भी और शब्द हेतु का भी ] शब्द हेतु को गङ्गा का विशेषण बना देने से वह अर्थ हो जाता है। इस प्रकार :

परामृश्य को बिना ही कहे तत् पद के द्वारा जो इस ( परामृश्य ) का परामर्श किया जाता है वह दोष है, वह ( परामर्शों ) अर्थ की प्रतीति करने में सक्षम नहीं होता, कारण कि वह आगे कहा जाने वाला होता है ( उक्त नहीं ) ।

प्रमादज इति । एवं सति प्रकृत्यमाने वस्तुपरामर्शदोषस्तावत् परिहतो भवति । प्रतीपगमनहेतोरिति गजसेतुबन्धादिस्थस्य । श्राब्दस्येति पद्यस्यैवत्स्वात् । तदीयतीर्थासंबिधाननेति हेतुहेतुमतोस्तदीयतीर्थशब्देन व्यवधाने सतीत्यर्थः । गङ्गाप्रतीपगमनहेतुर्नेत्यनेन सत्स्वेत्यर्थः । गङ्गाविशेषणमुखेनैति गजसेतुबन्ध-मिति पठे ।

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द्वितीयो विमर्शः:

अयमत्राशयः—शाब्दो यत्र हेतुहेतुमद्भावस्तत्र हेतुवेनोपन्यासान्न तयोद्यवंधानं किश्चित् कार्यम्, प्रतीतिविप्रकर्षप्रसङ्गात् । अर्थे हेतुहेतुमद्भावे उपन्यासस्तस्य हेतुत्वाद् विशेषणभूतस्य हेतोविशेष्यस्वरूपवर्णनैनेन चरितार्थत्वात् । सस्यपि वस्वभावे न प्रतीतिविम्रकर्षः कश्चित्, पर्यालोचनसामर्थ्यादहेतुत्वप्रतीते: । अत्र च शब्दके तीर्ये तदীয়े इति पदद्वयाकरणेऽपि तदोति तच्छब्देन । स इति तच्छब्दः ।

प्रमा|दज :—ऐसा करने से कम से कम आगे कही जाने वाली वस्तु के परामर्श का दोष मिट जाता है ।

प्रतीपगमनहेतोः—'गजसेतुबन्धात्' इसका ।

शाब्दस्य :—पदसम्बन्ध होने से ।

तद्रीय तीर्थोभिधान—हेतु और हेतुमान (कार्य) के बीच में तद्रीयतर्थक शब्द के आ जाने से ।

गङ्गाविशेषण—'गजसेतुबन्ध्याम्' ऐसा पाठ करने पर ।

अयमत्राशयः—जहाँ हेतुहेतुमद्भाव शब्द हो वहाँ हेतु का स्वरूपतः कथन होने से बीच में कोई व्यवधान न करनाचाहिये । वैसा करने से ज्ञान में दूरों पड़ जाती है । जहाँ हेतुहेतुमद्भाव अर्थ होता है वहाँ हेतु हेतुरूप से दे तो दिया जाता है पर वह विशेषणरूप रहता है, वह विशेष्य के रूप के वर्णन से चरितार्थ हो जाता है । इसलिये व्यवधान होने पर भी प्रतीति में कोई विप्रकर्ष नहीं होता । उस समय हेतु का हेतुत्व सोचने में समझ में आ जाता है । इस श्लोक में 'तीर्थे और तदीये' दोनों पद हटा भी दिये जायँ तो वाक्यार्थ ( कोइ हानि नहीं होती इसलिए वह ) निराकाङ्क्ष रहता आता है । अतः इनका देना अपुष्ट है, अधिक महत्व नहीं रखता ।

तद—तच्छब्देन । सः = वह अर्थात् तद् शब्द ।

विमर्श : मूल और टीका दोनों से तेर्थे तदीये*** पद्य पर दो बातें नई ज्ञात होती है । मूल से ज्ञात होता है कि—प्रतीपगामर् का अर्थ है 'उलटी बह रही' और गंगा के उलटे बहने का हेतु है उसमें हाथी का पुल बाँधना । अर्थात् हाथी का पुल बाँधने से गंगा उलटी बहने लगी थी अर्थात् उसकी धारा मुँहानी की ओर बढ़ने लगी थी । एक बात यह भी मूलकार ने बतलाई है कि उक्त श्लोक के प्रथम दो चरणों को उलटकर—'प्रतीपगामुस्तततोऽस्य गङ्गां, तीर्थे तदीये गजसेतुबन्धात्'—

पाठ मान लिया जाय तो तद्-पद से जिसका परामर्श करना है—वह गंगा पदार्थ पहले आ जाता है, अतः क्रमभेद दोष नहीं रहता । किन्तु ऐसा करने पर दूसरा प्रक्रमभेद दोष आ पड़ता है—कारण कि गंगा का प्रवाह—उलटकर ऊपर की ओर बहने लगा इसमें हेतु हैं—गजसेतुबन्ध । वह 'तीर्थे' और 'तदीय' पदों के बाद आता है । इसलिये गजसेतुबन्ध और प्रतीपगाम् का सम्बन्ध देर से समझ में आता है । इसलिये 'गजसेतुबन्ध्याम्' पाठ कर देना चाहिये । इससे हेतु में हेतुत्ववाचक पदसम्बी हेतु जाता है अतः उसका शाब्दतः कथन रुक जाता है और उसमें—आर्थभाव ( अर्थात् कथन ) आ जाता है । इसलिये वह गंगा पदार्थ से सम्बन्धित होता है । गंगा का ही विशेषण प्रतीपगामत्व है । दोनों विशेषण विशेष्य में इकट्ठे हो जाते हैं । बाद में उनका हेतुहेतुमद्भाव भी समझ में आने लगता है । व्याख्याकार ने एक बात और जोड़ दी । उन्होंने कहा कि यदि—प्रतीप*** 'गजसेतुबन्धाम्' पाठ भी मान लें तब भी इसमें तद्रीय और तीर्थ शब्द अधिक महत्व नहीं रखते । अतः वे अपुष्ट = व्यर्थ हैं । उन्हें हटा देने पर भी वाक्यार्थ प्रतीति में कोई कभी नहीं आती ।

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व्यक्तिविवेक:

हमारी समझ में यह सब इत महामहिम विद्वानों का मतिभ्रम है। इसका एकमात्र कारण—'तीर्थ' और 'तट' शब्द का अर्थ न समझ पाना है। मल्लिनाथ का जो अर्थ हमने ऊपर दिया है वह मान लेने पर कोई कठिनाई नहीं रहती। 'प्रतीपगा' का अर्थ मल्लिनाथ ने भी वही माना है जो महिमभट्ट ने। 'प्रतोपगाम् प्रतिमवाहितीम्'। किन्तु उसमें उन्होंने गङ्गेतुबन्ध को हेतु माना है। यह हेतु है अवश्य, परन्तु राजा को उतरण ( पार करना ) किया का हेतु है, गंगा की प्रतीपगमन क्रिया का नहीं। विष्ण्यपिरि के पास प्रयाग और काशी के बीच में गंगा अपने आप 'प्रतीपगा' है। 'प्रतीपगा' पद से कवि ने इस भौगोलिक तथ्य का निर्देश भर किया है।

यथा च— 'नवजलधर: सन्नद्धोयं न हसनिशाचर' इति। अत्र हि आरोपनिवृत्तौ तद्विषयवाचिनोः सुरधनुर्धारारासारशब्दयोरिव नवजलधरपदस्यापि पूर्वं पश्चाद् वा 'इदंशब्द:' प्रयोक्तव्यः शुक्तिकौयं न रजतमितिवद् इत्येष क्रमो न्याय्यः, यस्तु हसनिशाचरविशेषणवाचिनः सन्नद्धपदानन्तरं तस्य प्रयोगः स क्रमभेदो दोषः। एवमेव— 'कला च सा कान्तिमती कलावतस्त्वमस्य लोकस्य न वेत्सिकौमुदी' इति। अत्र हि द्वितीयकशब्दे भिन्नक्रमः स हि त्वमित्यस्यनन्तरं प्रयोक्तव्यः। और जैसे—'नवीन जलधर यह उमड़ा आ रहा है न कि इस राक्षस !' यहाँ आरोप की निवृत्ति हो जाने पर उसके ( आरोप के ) विषय का अभिधायक सुरधनुष और धारासार शब्दों के समान ही नवजलधर के भी पहले या पीछे 'इदम्' शब्द देना चाहिए; जैसे—'यह सीप है (या सीप है यह) रजत नहीं'। अतः यही क्रम उचित है। परन्तु उस ( इदम् ) का प्रयोग हसनिशाचर—विशेषणवाची सन्नद्ध पद के बाद है, अतः वह क्रमभेद दोष है। इसी प्रकार—'कला च सा०' में द्वितीय 'कलार' क्रम से नहीं रखा गया। उसे 'त्वम्' के बाद रखना था।

आरोपनिवृत्तौ तस्मिन्नारोप्यामोदन्यस्थानव्येन प्रतीति:, यथा नवजलधरस्य सन्नद्ध- दसनिशाचरवेन । तत्रैववक्तव्यमारणायामारोपविषयस्य जलधरादेरवस्तुसतः प्रकाश- मानस्येदमादिना न्याय्ये निर्देशे तस्य परामृश्यसमीप एव प्रयोगो भवितुमर्हति । यस्त्ववस्तु- सदारोप्यमाणनिकटे प्रयोश: स क्रमभेदो भवहति । यस्त्वत्रैवापविषयस्वरूपया विद्युतो निकट इदमाद्यप्रयोगः, तत् द्वेषणान्तरावकाशः । आरोप = भ्रम अर्थात दूसरे की दूसरे रूप से प्रतीति। जैसे नभ में मेघ की सन्नद्ध दसनिशाचर रूप से। उसकी निवृत्ति यहाँ कहीं जा रही है। उसमें आरोप के विषय जलधर आदि जो वस्तुतः है और दिखाई दे रहे हैं उनका निर्देश 'इदम्' आदि शब्द से चाहिए। इसलिए भी कि इस (इदम्) का प्रयोग सदा परामृश्य के पास चाहिए। पर उसका आरोप्यमाण जो अवस्तुतसद् = वस्तुतः मिथ्या है, उसके साथ प्रयोग किया गया। उससे क्रमभेद दोष हुआ। यही एक दूसरा दोष—आरोप विषय रूप से उपस्थित की गईं विद्युत के साथ इदम आदि का प्रयोग न होना भी है।

यथा च—'मीलितं यदभिरामताधिके साधु चन्द्रमसि पुष्करैः ऋतम्। उद्यता जयन्ति कामिनीमुखे तेन साहसमनुष्ठितं पुनः ॥' इत्यच पुनःशब्दः । स हि तेनल्यतोऽनन्तरं वक्तव्यः ।

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द्वितीयो विमर्शः

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'उक्खअदुमं व सेलं हिमहअकमलाअरं व लच्छिअविमुक्कम्‌ । पीअइरं व वसअं बहुलपओंसं व मुग्धअंदविरहिअम्‌ ।।'

इत्यत्र ह्युपमानवाचिभ्यां शब्दाभ्यामेवानन्तरमिवशब्दः प्रयोक्तव्यः न साधारणधर्मवाचिभ्याम्‌, यथात्रैव कमलाकरवबहुलप्रवेशशब्दाभ्यामिति । स हि यदनन्तरं श्रूयते तत्‍त्रैवोपमानतामाधातुमलमिति, अन्यथार्थस्यासङ्गात्‌- प्रसङ्गात्‌ । न हि भवति 'गोरमिवेन्दुविम्बं तव मुखमि'ति । न चासौ तथाप्रयुक्त इति क्रमभेदो दोषः । तेन 'सेलं व उक्खअदुममि'ति च पाठः पठितव्यः ।

यथा वा— 'उपालम्भेवोचैर्गिरिपतिरिति श्रीपतिमस्सा'विति । अत्र हि 'इत्थमुपालम्भ क्षितिधरपतिः श्रीपतिमसावि'ति पाठः श्रेयान् ।

यतो नात्रोपालम्भवाचैर्गिरिपतिरित्येतत्पर्यन्तमपेक्ष्यतेनभिमता । न च पदसम्बन्धस्य पुरुषाधीनत्वात्‌ प्राप्तिपयिषुपदेनैवास्याभिसम्बन्धो न गिरिपतिपदेनैति शङ्क्यते वक्तुम्‌, तस्य तदधीतत्बासिद्धेरुपपादयिष्यमाणत्वात्‌ ।

( व्याख्याने छाया )— उत्खातदुममिव शैलं हिमहतकमलाकरमिव लच्मीविमुक्तकम्‌ । पीतमदिरमिव चषकं बहुलप्रदोषमिव मुग्धचन्द्रविरहितम्‌ ।।

और जैसे — 'मोलितं यदभिरामता'***। में पुनः शब्द । उसे 'तेन' के बाद देना था ।

उखाड़ दिए गए वृक्षों ( वाला ) सा पर्वत, पाले से नष्ट कमलकुंज या तालाब सा श्रीहीन, पी ली गई मदिरा ( वाला ) सा चषक, कृष्णपक्ष के प्रदोष सा तारे चन्द्र से रहित !'

यहाँ उपमानवाची पदों के बाद 'इव' शब्द देना चाहिए था जैसे कि यहाँ 'कमलाकर' और 'बहुलप्रदोष' शब्दों के बाद दिया है । वह जिसके बाद आता है उसी में उपमानभाव की प्रतीति कराता है और कहीं आने से अर्थ बदलने की सम्भावना रहती है । ऐसा प्रयोग नहीं होता—कि 'गोरा सा चन्द्रविम्ब तुम्हारा मुख' । इस ( इव शब्द ) का प्रयोग ऐसा नहीं हुआ अतः क्रमभेद हुआ । इसलिये 'सेलं व उत्क्खअदुसम्‌' ऐसा पाठ पढ़ना चाहिए । या जैसे—'उपालम्भेवोच्चैः*** ।' यहाँ 'इत्थमुपालम्भ***' इत्यादि पाठ चाहिए । क्योंकि यहाँ 'उपालम्भेवोच्चैर्गिरिपति' इ इतने को ( इति द्वारा ) अवधृत ( अलग ) नहीं करना है । यह नहीं कहा जा सकता कि शब्द सम्बन्ध पुरुषाधीन है अतः इसका ( इति ) सम्बन्ध 'प्राप्तिपयिषु' से ही है, गिरिपति से नहीं, कारण कि— हम आगे बतलाने वाले हैं कि उसे ( पदप्रयोग ) को पुरुषाधीनता नहीं बनती ।

इतीवेतिअत्रोपालम्भरूपः पूर्ववाक्यार्थे इतिशब्दावचिछन्न उद्देक्ष्यत इत्युपाल- म्भे स्यात्‌ पूर्वमितिवशब्दौ प्रयोज्यौ विषयानन्तरे तु प्रयोगाद्‌ क्रमभेदः । प्राप्तिपयिषुपदेनैति पूर्ववाक्यार्थस्थितेन । तदधीनत्वं पुरुषयत्तवस्‌ ।

इतीव०—यहाँ उपालम्भ रूप जो पूर्व वाक्यार्थ है, उसी को इति शब्द से अलग कर उद्देक्षा है, उसमें 'इव' शब्द का प्रयोग किया गया है । विषय के अनन्तर प्रयोग होने से क्रमभेद हुआ है । 'प्राप्तिपयिषु' पद से ही उसका सम्बन्ध है जो पूर्ववाक्यार्थ में स्थित है । उसका अधीन होना पुरुष की यत्नता पर है ।

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व्यक्तिविवेक:

द्वारा उपस्थित किया जा रहा है। अतः उपालब्ध इसके पहले ‘इतीव’ शब्दों का प्रयोग चाहिए। अन्यत्र प्रयोग करने से क्रमभेद हुआ। प्राप्तपयि:पु = जो कि पूर्ववाक्य में है। तदर्थीन = पुरुषार्थीन।

विमर्श: पूरा श्लोक इस प्रकार है— ‘धरस्योदतोंडने’ त्वमिति ननु सर्वत्र जगति प्रतीतस्त्वं ममभ्रमध: प्रापिपयि:पु:। उपालब्धेवोचैंगिरिपतिरिति श्रीपतिमसौ बलाक्रान्त: कीडद्वीरद:मथितोर्वींरहरवै: ॥ [ माघ ५।६९ ]

अर्थात्—‘संसार भर में तुम पहाड़ का उद्धार ( उखाड़ कर ऊँगली पर रखना और विपत्ति निवारण ) करने वाले—रूप से प्रसिद्ध हो, तो मुझ स्वयं ही अत्यधिक बोध्विल को नीचे क्यों पहुँचाना चाहते हो—इस प्रकार मानों—सेना से दबे पचैतराज ( गिरिनार ) ने श्रीकृष्ण को क्रोडानिरत हाथियों द्वारा मरोड़े जा रहे वृक्षों की आवाज से—उलहना दिया ।’ यहाँ प्रापिपयि:पु ( पहुँचाना चाहते ) के बद्र इतिव चाहिए ।

यथा च— ‘प्रतीक्ष्यं च’ प्रतीक्ष्यायै पितृस्वस्सु तत्तस्ये । सहिष्ये शतमागांसि प्रत्यश्रौषी: किलेतिं यत् ॥’ इति । अत्रापि हि ‘सहिष्ये शतमागांसि’त्मत्यभ्युपपैयत किल स्वयं'मिति युक्त: पाठ इति ।

और जैसे :— और—प्रतीक्षा करनी चाहिए, पूज्य सुआ को ‘तुम्हारे पुत्र के सौ अपराध सहूँगा । पहले वचन दिया है, इस प्रकार जो ।’ यहाँ भी ‘सहूँगा सौ अपराध’ ऐसा स्वीकार किया है ‘जो पहले खुद ने’ ऐसा पाठ चाहिए ।

विमर्श: यह पथ शिशुपालवध में इस प्रकार है । सहिष्ये शतमागांसि सुनोस्त इति यत्कथया । प्रतीक्ष्यं त्वत् प्रतीक्ष्यायै पितृस्वस्से प्रतिश्रुतम् ॥ [ २।१०८ ] महिमभद्र स्वयं सम्भवत: पाठ बदल लेते हैं। या दोष दर्‌शन् के समय उनके सामने सही श्लोक भी उलट जाते हैं। यहाँ काव्यादास के भी बहुत से पथ इसी प्रकार बदले हुए हैं।

अनेनैव तज्‌जातीयार्थानामन्येषामडययानां प्रयोगनियमो दृश्यते इति तेऽपि क्रमभेदो दोष एव । तद्यथा— ‘किं क्रिमिष्यति किलैष वामनो यावदित्यमहसन् दानव: । तावदस्य न ममौ नमस्तले लड्डितार्कराशिमण्डल: क्रम: ॥’ इत्यत्रैवशब्ददस्स्य । यथा च— ‘स्तस्मैरस: परिणिनंसुरसाभुपैति बिडगैरगच्‍छत स्तसम्भ्रममेवमेक’, इत्यत्रैवंशब्ददस्स्य । स तु उपेत्यैवयतोडनन्तरं दृश्यत: । तेन ‘स्तस्मैरस: परिणिनंसुरसौ समभियेत्येवं ससम्भ्रमममभण्यत कापि बिडगे’रिति युक्त: पाठ: । अत्र च यत् प्रतीतिवैचिड्यं स मतिमतामेव विषय: ।

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द्वितीयो विमर्शः

इसीसे उत प्रकार के दूसरे अव्ययों के प्रयोग का नियम भी बतला दिया गया, इसलिए उनके क्रम का भेद भी दोष ही है। जैसे—‘यह बौत ठहरा, कहाँ लौँधेगा’—जब तक इस प्रकार दानवों ने हँसी की नहीं कि तब तक इसकी सूर्य चन्द्रमण्डल को पार कर नेवाली डग आकाशतल में उठी नहीं। यहाँ इत्यं शब्द का। उसे वामन शब्द के बाद आना चाहिये। और जैसे :—

हाथों दूसा देने आ रहा है—ऋषियों ने एकएक किसी एक खो से कहा—इस प्रकार।—यहाँ ‘एवं’ ( इस प्रकार ) शब्द का ( क्रमभेद )। उसे ‘उपैति’ ( आ रहा है ) के बाद भाना चाहिये। इसलिए ‘स्तम्बेरमः परिणिनसुरसौ समभ्येत्येवं ससंभ्रमममभण्यत कविरदेके’—ऐसा पाठ चाहिये।

स्तम्बेरम् इति पीनोन्नतस्तनद्ययदर्शनादियं प्रशंसोक्ति। षिद्ना: विटा। प्रतीतिवैचित्र्यमिति वाक्यार्थस्य तिलतण्ढुलीकरुतस्यावगमानवर्गमौ।

स्तम्बेरम:—मोटे और ऊँचे उभरे हुए दोनों स्तनों को देखकर किसी ने प्रशंसा में यह कहा। षिद्ना—विट। प्रतीतिवैचित्र्यम् :—तिलतण्ढुल के समान मिले वाक्यार्थ को जानना और उसका आस्वाद होना। तथा न होना।

उक्तिस्वरूपावच्छेदफलो यत्रेतिरियते । न तत्र तस्मात् प्राक् किन्चिदुक्केरन्यत् पदं वदेत् ॥ ३३ ॥

उपाधिभावात् स्वां शाक्तिं स पूर्वत्रादधाति हि । न च स्वरूपावच्छेदः पदस्यान्यस्य सम्मतः ॥ ३४ ॥

इतिनैवेतरेपामव्यन्वययानां गति: समा । झयेत्थमेवमादीनां तज्जातीयार्थयोगिनाम् ॥ ३५ ॥

यतस्ते वदते इत्य भ्रूभङ्गय् वदनन्तरम् । तदर्थमेवावचिछन्न्युरासमकक्ष्यस्यमन्यथा ॥ ३६ ॥

यथानन्तर्यमस्तेषामर्थौचिवीचिवशात् । अन्यतस्तहि तत्कार्यसिद्धेस्ते स्वपुरार्थकाः ॥ ३७ ॥

केश्चिदेव हि केषाश्चिद् दूरस्थैरपि सङ्गतिः । न जातु स्तवैः सर्वेषामित्येतदभिधास्यते ॥ ३८ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोका: । जहाँ ‘इति’ शब्द का प्रयोग ( किसी के ) कथन ( दूसरे के कहे हुए वाक्य के अनुवाद ) के स्वरूप को अलग करके बतलाना हो वहाँ उसके पहले कथन ( अनुवादात्मक उक्ति ) के अतिरिक्त और कोई शब्द न हो। ‘इति’ उपाधि है अतः वह अपनी शाक्ति अपने से निकट पूर्ववर्ती पर आहित करता है। ( उसके द्वारा कथनांश के अतिरिक्त ) किसी अन्य पद का अवच्छेद मान्य नहीं होता। इति के ही समान उसे जैसे अर्थ के वाचक अन्य ‘एवम्’—आदि अव्ययों की स्थिति भी जाननी चाहिए। कारण कि ‘च’ आदि के समान वे जिसके बाद आते हैं उसकी के अर्थ को अविच्छिन्न करते हैं। वैसा नहीं होने से सामञ्जस्य नहीं बनता। यदि उनके आनन्तर्य ( किसके बाद आना किसके

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व्यक्तिविवेक:

वाद नहीं— ) यह नियम अर्थंगत औचित्य पर निर्भर मान लिया जाय तो वे ( इतिआदिः ) निरर्थक हो जाते हैं, कारण कि तब उनसे बननेवाला कार्य अन्य उपाय से ( अर्थ के औचित्य से ही ) वन जाता है। यह हम बतलावेंगे कि पदार्थों में से निश्चित पदार्थों की निश्चित पदार्थों से भले ही वे दूर हों, संगति होती है। सभी की सभी के साथ—कदापि नहीं !

उक्तिस्वरूपेति। उक्ति: 'स्तम्बेरमः परिणिनंसुरसादुपैति' त्वेषा। तस्या विशिष्टस्वान्य-

न्या: स्वरूपम् इतिशब्देनोपलक्षणत्वाद् एवंशब्दादिना व्यवच्छेद्यं तु मिथः । अतश्र तत्र तस्माद् इतिशब्दादितिशब्दोपलक्षितादेवमादेश्र प्राक् पूर्वं उक्तः पूर्वप्रदर्शितायाः । अन्यत् किश्चित् पदं शि(ड्ढ़) इत्यादि न कथनीयमित्यर्थः । एवंसुदाहरणान्तरेsपि योजनीयम् ।

उपाधिभावादिति इतिशब्दस्य स्वा शक्तिः पूर्ववाक्यावच्छेदकत्वा । तां पूर्ववर्त्ती वाक्ये पदस्यास्त्येति उपाधिरितिशब्दः सम्पद्यते । अतश्र न तस्याऽन्वयप्रयोगः कर्तव्य इत्यर्थः ।

पदस्यान्वय इति डिड्गैरित्यादेः । अन्यथेति विषयान्तरप्रयोगे आसमञ्जस्यं विरारूप्रतीतितस्वम् । आनन्तर्य नियम इति ।

'यस्य येनाभिसम्बन्धः दूरस्थस्यापि तेन सः । अर्थतो ह्यसम्बन्धानामनन्तर्यकारणम् ॥'

इति न्यायेनाथोंचित्यवाद् व्यवहितानामप्यानन्तर्यनियमो भविस्यत इत्यर्थः । अन्य-

तस्तह्हीति । अन्यतोङ्थोंचित्यवशात् । तर्कार्यसिद्धेः इत्यादिकर्तव्यसिद्धेः । इति तेषां प्रयोगो नियतः स्याद् इत्युक्तम् ।

ननु 'यस्य येनाभिसम्बन्धः' इति न्यायः कुत्रावतिष्ठता मित्याह—ऐक्षिदेवेति । अन्य-

भावः—इत्यादिशब्दद्वर्जनेनोक्तक्रमेण शब्दद्वहेरदिवर्जनेन चान्येषां शब्दानामयं न्यायः । इत्यादीना मयं पुनर्नियतप्रयोगविषय इति नान्यथा तेषां प्रयोगः कर्तव्य इति ।

उक्तिस्वरूप = उक्ति—'स्तम्बेरमः परिणिनंसुरसादुपैति' यह । उसका वक्ता है विट । उसका स्वरूप 'इति'—शब्द से लियो जाये, ( उसके सभी समानार्थक शब्दों में आए ) एवं शब्द द्वारा व्यवच्छिन्न करना चाहा है। इसलिये उस 'इति' शब्द और उससे उपलक्षित किए गए तद्र्शक एवम् आदि शब्दों के पहले पूर्वप्रदर्शित उक्ति के अलावा दूसरा कोई भी पदरुगा आदि पद नहीं कहा जाना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे उदाहरणों में भी लगाना चाहिए।

उपाधिभावात् :- 'इति' शब्द की अपनी शक्तिः है पूर्ववाक्य का अवच्छेद । उसे पूर्ववर्त्ती वाक्य में लगाते हुए इति शब्द उसका उपाधि वन जाता है। इसलिये उसका प्रयोग और कहीं नहीं किया जाना चाहिए।

पदस्यान्वयस्य :- पदरुगा इत्यादि पदों का । अन्यथा—दूसरे विषय में प्रयोग होने से आसमञ्जस्य = अर्थात् प्रतीति की विरारूपता = टूटा फूटा होना ।

आनन्तर्य नियम:-जिसका जिससे सम्बन्ध होता है, दूर होने पर भी उसका उससे सम्बन्ध होता है । जो अर्थ की दृष्टि से असमान होते हैं उनका आनन्तर्य कोई मूल्य नहीं रखता । इस न्याय से अर्थ के औचित्य के आधार पर दूरस्थ पदों का भी आनन्तर्य नियम वन सकता है ।

अन्यतस्तहि्ं —अन्यत: = अर्थोंचित्य से ।

तर्कार्यसिद्धेः—'इति'—आदि से होने वाला काम वन जाने पर । इस प्रकार उनका प्रयोग निश्चित होना चाहिए ।

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द्वितीयो विमर्शः

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शंका :—‘यस्य येनाभिसंबन्धः’ यह न्याय कहाँ लागू हो—? इस पर उत्तर देते हैं—कैश्चिदेव०। भाव यह है कि—यहाँ जो न्याय है वह ‘इति’—आदि शब्दों को और हेतुर्थंक शब्दों को छोड़कर अन्य शब्दों में लागू होता है। इति आदि का प्रयोग तो बिल्कुल निश्चित होता है। इसलिये—

( ८ ) पौनरुक्त्य

एवसुबोधक्रमेण क्रमभेदे विस्मृश्य पौनरुक्त्यं विचारयितुमाह पौनरुक्त्यमिति । इस प्रकार उद्देशकम ( दोषों को जिस क्रम से पहले गिनाया है—उसी क्रम से ) क्रमभेद का विचार कर पौनरुक्त्य पर विचार प्रस्तुत करते हैं ।

पौनरुक्त्यमार्थमेकमेवाभ्युपगन्तुं युक्तं न शब्दं तस्यार्थमेदे सत्यहुप्र-

त्वात् । यदुक्तं ‘तच्च न शब्दपुनरुक्तं पृथग्वाच्यम् अर्थपुनरुक्ततैव गतार्थ-

त्वाद् । न ह्यार्थमेदे शब्दस्यैवेडपि कश्चिद्धोषः। यथा—

हसति हसति स्वामिन्युच्चैः रुदत्यपि रोदिति ।

द्रविणकणिकाक्रीतं यन्त्रं प्रणृत्यति नृत्यति !’ इति ।

तद्भेदे तु दुष्टतैव । अन्यत्र तात्पर्यमेदात् तच्च भषणमेव न दूषणम् ।

तस्यानुप्रासविरोषविषयत्वेनेष्टत्वाद् । यथा—

वह्रयान्ते नदीनां सितकुसुमधारा: शशकडाराशा ! काशा:

काशाभा भान्ति तासां नवपुलिनगता: श्रीनदीहंस ! हंसा: ।

हंसाभोडम्भोदशुक्तिस्फुरदमलकपुमें दिनीचन्द्र ! चन्द्र-

श्रन्द्राभ: शारदस्ते जयतुुपगतो विद्रुमां काल ! काल: ॥’ इति ।

पौनरुक्त्य एक मात्र अर्थे ( अर्थंगत ) ही माना जाय यहाँ ठीक है, शब्द ( शब्दगत ) नहीं । क्योंकि वह ( शब्द ) अर्थभेद होने के कारण दुष्ट नहीं होता । जैसा कि कहा है—‘शब्द पुनरुक्त दोष अलग नहीं बतलाया जाचिये । वह अर्थ पुनरुक्त में ही गतार्थ हो जाता है । अर्थ यदि

हो तो शब्द-साम्य होने पर भी दोष नहीं होता?’—( उदाहरण ) जैसे—

‘मालिक कै हँसने पर हँसता है, रोने पर जोर से रोता है, नाचने पर नाचता है ( क्योंकि ) वह द्रविण ( धन ) के किनके से खरीदा यन्त्र जो होता है ?’

उस ( अर्थ ) के अभिन्न होने पर तो दोष होता ही है । तात्पर्य भिन्न होने पर अर्थ का स्वरूप यदि एक ही हो तो उसे दोष नहीं माना जाता उलटे अलंकार माना जाता है । उसे एक विशेष प्रकार का अनुप्रास ( लाटानुप्रास ) माना गया है । जैसे :-

'हे इन्द्रसकाशा ( इन्द्रतुल्य ) ! सफेद फूल धारण किये हुए काशा नदियों के वक्ष वन रहे हैं । हे लक्ष्मीरूपी नदी के ईंस ! ( उनकी ) बालू में बैठे हंस काश के समान मालूम पड़ रहे हैं।

हे पृथ्वीचन्द्र ! चन्द्रमा—मैवावरण से दूध कर निर्मल हो गया है और हंस जैसा ज्ञात होता है ।

हे राक्षों के लिये काल ! तुम्हें विजय देने वाला शरदृतु का यह चन्द्राभ ( चन्द्रतुल्य उज्ज्वल और चन्द्र की आभा जिसमें है ) समय आ गया है ।

इह खलु द्विविधं पौनरुक्त्यं शब्दपौनरुक्त्यमर्थपौनरुक्त्यं चेति। तदुक्तमचपादमुनिना-

'शब्दार्थयो: पुनर्वचनं पुनरुक्तम्, अन्यत्रानुवादात्’ इति । तत्र शब्दपौनरुक्त्यमर्थोपौ-

नरुक्त्येन दुष्टत्वे अर्थस्यैव प्रयोजकत्वात् अर्थपौनरुक्त्यमेवैकं

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पौनरुक्त्यं न शब्दपौनरुक्त्यमिति समुदायार्थः । आर्थीमिति अर्थाश्रितम् । एवं शब्दमित्यत्रापि वाच्यम् । यदुक्तमिति वादन्याये । हसतातिरेको हसति शब्दः शास्त्रात् स्वामिविशेषणम्, अपरः क्रियापदम् । एवमुत्तरत्र वाच्यम् । यन्मतम् । अभेदोपचारेण भृत्यस्य निर्देशः; कृतानुकरणत्वात् । अन्यत्र तात्पर्यभेदादिति तात्पर्यभेदे हि स्वरूपार्थाविशेषे लाटानुप्रास इच्छः । तदुक्तम्-

'स्वरूपार्थाविशेषे हि पुनरुक्तिः फलान्तरात् । शब्दानां वा पददानां वा लाटानुप्रास इष्यते ।' इति ।

शकसङ्कादौ श्रीनदीहंससेति मैदिनीचन्द्रेति विदिशिां काल इति च चत्वार्यामन्त्रणानि । अत्र तात्पर्यभेदः स्फुट एव । तथा चैवः काशशब्दो वन्हाग्नामुपमेयत्वेन स्थितः; अन्यस्तु हंसनामुपमानत्वेनैति भिन्नम् तात्पर्यम् । एवंमन्यदपि योजनीयम् ।

पौनरुक्त्य दो प्रकार का होता है—शब्दपौनरुक्त्य और अर्थपौनरुक्त्य । जैसा कि मुनि अक्षपाद ने कहा है—‘शब्द और अर्थ का पुनः कथन, पुनरुक्त होता है, अनुवाद को छोड़ कर ।’ दोनों में अर्थ की पुनरुक्ति न हो तो शब्द की पुनरुक्ति दोष नहीं होती । ( शब्द में ) दोष आता है, अर्थ की पुनरुक्ति से, अतः अर्थ ही ( दोष का ) कारण है, ( अतः ) ‘एकमात्र अर्थगत पुनरुक्ति ही पुनरुक्ति दोष है । शब्द की पुनरुक्ति नहीं’—यह इस प्रघट्टक का अभिप्राय हुआ ।

आर्थ्यम् :-अर्थ पर आधृत । इसी प्रकार शब्द का भी अर्थ करनां चाहिये ( अर्थात् शब्द पर ) ।

यदुक्तम् :-वादन्याय में ।

हसति—एक ( द्वितीय ) 'हसति' शब्द शास्त्र प्रत्ययान्त है, वह स्वामी का विशेषण है । दूसरा ( प्रथम ) क्रियापद है । ऐसा ही आगे भी समझना चाहिये ।

यन्त्रम् :-अभेदोपचार से भृत्य को ( यन्त्र शब्द से ) कहा, कारण कि वह किये की नकल करता है ।

अन्यत्र :-तात्पर्य भिन्न होने पर तो शब्द के स्वरूप का अर्थ एकसा भी हो तो लाटानुप्रास अलंकार माना गया है । जैसे कि कहा गया है—‘स्वरूपतः यदि शब्द या पद ( विभक्तियुक्त शब्द ) में भिन्नता न हो तो भी पुनरुक्ति—लाटानुप्रास मानी जाती है क्योंकि उसमें एक और लाभ—चमत्कार निष्पन्न होने से लगता है ।

शकसंकाश, श्रीनदीहंस, मैदिनी चन्द्र और ‘विदिशां काल’ ये चार आमन्त्रण = सम्बोधन हैं । यहाँ तात्पर्य भेद स्पष्ट ही है । एक काश शब्द वर्णों के उपमेय के लिये है, दूसरा हंसों के उपमान के लिये । इसी प्रकार और भी लगा लेना चाहिये ।

विमर्शः : अर्थभिन्न न होने पर उसी शब्द का पुनः प्रयोग दोष माना जा सकता है । मम्मट आदि ने—‘अधिकरतलततल्पं कल्पतस्वापलीलाः’—इत्यादि पद्य में लीलापद के दो वार एक ही अर्थ में प्रयोग को दोष माना है । इससे कवि का शब्ददारिद्र्य सानित होता है । स्वयं मधिमभट्ट भी यही कहने जा रहे हैं—

‘जशुविसान्धृतविकासिबिसप्रसून’ इति । सर्वनामपरामर्शस्य ह्ययं विषयो बिसार्थो न स्वराद्दस्य । न च घास-क्रियाकर्मभावाभिधानपरः प्रथमो बिसदाव्दः परक्ष प्रसूनसम्बन्ध्याभिधानपरः

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इत्यत्रापि तात्पर्यभेद इत्याराढुनोयम् । स्वार्थेऽमिभिदधत् पच हि शब्दस्यार्थ-

न्तरप्रतोतिप्राचण्यं तात्पर्यमुच्यते । न चाऽऽगेतत् सम्भवति उक्तयोरर्थयोरभि-

ध्येतयार्थान्तरतयाSSभावात् । तदुक्तम्—

'सर्वनामपरामर्शोयोग्यस्यार्थस्य यत्पुनः ।

स्वशब्देनाभिधानं सा शब्दस्य पुनरुक्तता ॥'

प्राघान्यमथ सम्बन्धिनिवन्धो योग्यता द्वार्यी ।

नातः समासगस्यापि परामर्शोSस्य दुष्यति ॥' इति ।

( अर्थ और तात्पर्ये ) दोनों ( में भेद ) न हो तो पुनरुक्ति दोष ही है । जैसे—

'जसुर्विसं ध्रुतविकासिकिसिप्रसून्ते' में । यहाँ विसशब्द का अर्थ सर्वनाम द्वारा कहा जाना

चाहिये, विस शब्द से नहीं । यह शंका नहीं करनी चाहिये कि—'पहला ( विस शब्द ) वाच्य

( भक्षण ) क्रिया को कर्मता का कथन करने के लिये है और दूसरा प्रसून के साथ उसके सम्बन्ध

का कथन करता है—इसलिये यहाँ भी तात्पर्य में भेद है, ( क्योंकि ) तात्पर्य कहलाता है अपने

अर्थ को कह रहे शब्द का दूसरे किसी अर्थ की ओर उन्मुख रहना । यहाँ ऐसी कोई बात सम्भव

नहीं है । कहे हुये दोनों अर्थ अभिधेय होते से—अर्थान्तर नहीं हो सकते ( वाच्य से भिन्न अर्थ

नहीं माने जा सकते ) । वही कहा ( भी गया है )—

'जिस अर्थ का परामर्श सर्वनाम द्वारा कराया जा सकता हो—उसका अपने वाचक शब्द द्वारा

कथन पुनरुक्ति ( दोष ) होता है । ( सर्वनाम द्वारा परामर्श की ) योग्यता दो प्रकार से होती है—

प्राधान्य से और सम्बन्धी के कथन से । इसलिये समास में आये हुये अर्थ का भी ( सर्वनाम द्वारा )

परामर्श दोष नहीं होता ।

उभयाभावे इति अर्थभेदस्य तात्पर्यभेदस्य चाऽSभाव इत्यर्थः । न च घासेति कम्ब्वेन

सम्बन्धित्वेन चास्तु तात्पर्यभेद इत्यर्थः । एतन्न चेतिं निषिध्यते । स्वार्थेऽमिति । एतदुक्तं

भवति—न स्वार्थोऽमिधानमेव तात्पर्यं अपि तु सत्येव स्वार्थेऽमिधानेSधिकमरथान्तरो-

न्मुखत्वं तात्पर्यं, यथा क्रियाशब्दयोः । तत्र क्रियात्वजात्यवच्छिन्नद्रव्यप्रतिपादनादतिरिक्त

उपमानोपमेयभावः प्रतिपाद्यते । न चैवं विसशब्दयोः । नहि तत्र विसतत्त्ववाच्यत्वप्रतिप्तिकि-

दृशिद्रस्तु प्रतीयते । यतु कर्मत्वं सम्बन्धित्वं च तदभिधेयस्यैव तथावस्थानं नोद्रेक्षण-

न्यतामावहतीति स्वशब्दपरिहारेण सर्वनामपरामर्शस्यैव विषयो न्याय इति ।

ननु पुनरुक्तं किसुच्यते? यत्र तात्पर्ययोगे विनार्थप्रतीतिः । यत्र च तत्त्वमानपदान्तर-

प्रयोगोSवश्यमुपुज्यते, तत्र कथं पुनरुक्तत्वम् । यत्रैकार्थ्येन प्रतीतिनं तात्पर्यभेदः, तत्र

तत्प्रयोगकृतं वैरस्यं पौनरुक्त्यप्रयोजकमिति तदाश्रयेणाऽयं दोष उक्तः ।

सर्वनामेति 'जसुर्विसमि'स्त्यत्र निर्दिष्टे विससुक्ततत्र प्रसूतसम्बन्धित्वेन सर्वनामपराऽSम-

शोऽहं सद् यत् स्वशब्देनोक्तं तत् शब्दपुनरुक्तम् । यदाऽऽर्यर्थपुनरुक्तमेवैकं पुनरुक्तं प्रागुक्तं,

तथाऽपि शब्दस्य पुनरुक्तत्वकम् अर्थमुखेनैव शब्दस्यापि पुनरुक्ततेऽस्यभिप्रायेण ।

'सर्वनामपरामर्शोयोग्यस्ये'ति निर्देशां योग्यतां विभक्तुमाह प्राधान्यमिति । द्विविधं परा-

मर्शोयोग्यत्वं शाब्दुमार्थी चेति । तत्र यस्मिन् परामृश्यस्य स्वातन्र्येण कर्तृत्वादिना निर्दे-

शेन प्राधान्यं तत् शब्दम् । यत्र पुनः परामृश्यस्यस्याऽऽन्यः कश्चिद् सम्बन्धित्वेन निर्देश्यते,

तत्रार्थम् । तत्र हि सम्बन्धित्वं प्रति अस्योपयोग एव योग्यतत्वम् । तथा चैकसुदाहतम् ।

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उभयाभावे :-अर्थभेद और तात्पर्यभेद का अभाव ।

न च घास :-कर्मरूप से और सम्बन्धधीरूप से तात्पर्यभेद हो सकता है—इसका निषेध करते हैं—‘ऐसा हो?’—इस प्रकार ।

स्वार्थम् :-अभिप्राय यह कि—‘अपने अर्थ का कथन ही तात्पर्य नहीं होता, अपितु अपने अर्थ के अभिधान के साथ साथ अतिरिक्त अर्थ की ओर उन्मुख रहना भी तात्पर्य है। जैसे—काश शब्दों का । वहाँ काशत्व—जाति से युक्त द्रव्य के प्रतिपादन के अतिरिक्त उपमानोपमेयभाव का प्रतिपादन किया जा रहा है। ‘विस’ शब्दों में ऐसी बात नहीं है । यहाँ विसत्‌व जाति से युक्त वस्तु के अतिरिक्त और कोई वस्तु प्रतीत नहीं होती । जो कर्मता और सम्बन्धिता है—वह अपने अभिधेय अर्थ का ही उस रूप से अस्तित्व बतलाती है । स्पष्टरूप से अतिरिक्त को नहीं । इसलिए अपने शब्द को छोड़कर सर्वनाम द्वारा परामर्श करना ही उपयुक्त है ।

शंका :- पुनरुक्त कहते किसे हैं ? (उत्तर) जहाँ उसके (शब्द के) प्रयोग के बिना अर्थ की प्रतीति हो । परन्तु जहाँ उस ( अर्थ ) के वाचक किसी दूसरे शब्द का उपयोग होना आवश्यक होता है—वहाँ पुनरुक्तता कैसी ? (उत्तर ) जहाँ एक रूप के अनेक अर्थों की प्रतीति होती हो, तात्पर्यभेद न हो, वहाँ पुनरुक्ति दोष होता है, उससे प्रयोग में विरसता आती है । जहाँ उसके समानार्थक शब्द का उपयोग हो या नहीं, पर उसके (किसी भी प्रकार के ) प्रयोग से विरसता आती हो तो उसे—पुनरुक्ति का कारण माना जाता है । इसलिये—यह दोष उस पर आश्रित है ।

सर्वनाम—जक्‍वृविसानू यहाँ विस शब्द पुनरुक्त है । आगे आया विस प्रसून से सम्बन्धित दिखलाया गया है । अतः उसका परामर्श सर्वनाम द्वारा होना चाहिये । अपने वाचक शब्द से नहीं । यद्यपि अर्थ पुनरुक्त भी एक प्रकार का पुनरुक्त दोष पहले बतलाया गया है । इतने पर भी ( केवल ) शब्द में ( जो ) पुनरुक्तता बतलाई गई वह इसलिये कि शब्द भी पुनरुक्त होता है, अर्थ के द्वारा ।

सर्वनामपरामर्शोयोग्यस्य—इस प्रकार दिखला दी गई योग्यता को ( दो भागों में ) बाँटने के लिये कीजिये—आरम्भ । परामर्शोयोग्यता दो प्रकार की होती है—शब्द और अर्थ । उनमें से जहाँ परामर्श का स्वतन्त्र रूप कर्त्तृ आदि के रूप में निर्देश होने के कारण प्राधान्य होता है वहाँ शब्द परामर्शोयोग्यता होती है । जहाँ परामृश्य का कोई दूसरा सम्बन्धी पदार्थ सम्बन्धी रूप से दिखलाया जाता है वहाँ ( परामर्श योग्यता ) अर्थ होती है । वहाँ इसकी योग्यता का अर्थ केवल सम्बन्धी के साथ इसका उपयोग है । इस प्रकार एक का उदाहरण दे दिया गया ।

द्विविधा हि योग्यता शाब्दी चार्थी च । तत्र शाब्दस्य प्राधान्ये सति शाब्दी साक्षात्परामृश्यार्थप्रतीते: । यथा—‘चारुता च पुरुषयदासां तमनूननवयौवनयोग: ।

ते पुनमेकरकेनलक्ष्मींस्तां मदस्तमाप्ति वलुभसक्‍त: ॥’ इति । विपर्यये त्वार्थी । सम्बन्धीप्रतीतिमुखेन तत्प्रतीते: । यथा—‘भाति सितभ्रूलतिलिप्त: शाशाङ्‌क मौलिसतदंगुनिचित इव’ । इति ।

अत्र हि शाब्दूसम्वन्धिनामशूनां निवन्धस्तत्परामर्शोयोग्यता । स हि समासे गुणीभूत: ।

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यथा वा—

'जयति निशापतिमौलिरन्ध्रधनमहाकालविश्रान्तमाजधाम् । तत्तमसामिव लक्षणं कण्ठविषच्छाययाच्छुरितः ॥' इति ।

अत्र हि निशासम्बन्धिनि तमसां निवन्धो योग्यता । सा हि गुणीभूत- स्यापि गुणीभूता ।

योग्यता दो प्रकार की होती है शब्दी और आर्थी। उनमें से शब्द की प्राधान्यता होने पर शब्दी योग्यता (होती है) उसमें परामर्श अर्थ सीधे सीधे ज्ञात होता है, जैसे—'चारता वपुरुपयदासाम*......'।

उलटे होने पर आर्थी। क्योंकि तब उसकी प्रतीति सम्बन्धी के ज्ञान के द्वारा होती है। जैसे—'सफेद भस्म से लिपटे चन्द्रचूड ( भगवान् शंकर ) उसकी किरणों से खचित से लगते हैं ।' यहाँ शशांक सम्बन्धी किरणों का कथन है—यही उसके ( शशांक ) परामर्श की योग्यता है। वह ( शशांक ) तो समास में अप्रधान होकर आया है ।

और जैसे—निशा के पति ( चन्द्रमा ) का मुकुट पहनने भगवान् शिव की जय हो । वे सदैव महाकाल की चपलता को जलाते रहते हैं—इसलिये कण्ठस्थित विष के वहाने उसी ( निशा ) के अँधेरे से मुक्त रहते हैं ।

यहाँ—निशा सम्बन्धी अन्य कारकों का उल्लेख—योग्यता है । वह गुणीभूत में गुणीभूत है । सम्बन्धीप्रतीतिमुखेनैति । अत्र सम्बन्धी हरः तस्य मौलिद्धारण शशाङ्कसम्बन्धिनिरसत्वात् ।

तत्प्रतीतिमुखेनैव छात्र शशाङ्कः प्रतीयते, न तु 'चारता वपुरि'त्यादौ चारुतादेरिव साक्षादेव शशाङ्कस्य प्रतीति: ।

शशाङ्कसम्बन्धिनामिति । अत्र 'सम्बन्धिनिवन्धन' इति कारिकायां यः सम्बन्धी उत्कः, s निर्दिष्टः ।

तथा चात्रांशावः सम्बन्धित्वेन निर्दिष्टः । तत्परामर्शयोग्यतैति तच्च्छन्देन परामृश्यः शशाङ्को निर्दिष्टः ।

सा हि गुणीभूतस्यैति । हरमन्यपदार्थं प्रति निशापतिगुणीभूतः । तस्यापि निशा गुणीभूता ।

सम्बन्धीप्रतीतिमुखेनेति—यहाँ सम्बन्धी है हर, वह मौलि द्वारा शशांक का सम्बन्धी है, अतः पहले उसकी प्रतीति होती है तब उसके द्वारा शशांक की ।

शशांक की प्रतीति साक्षात् नहीं होती जैसे 'चारता वपुरुपयद' इत्यादि में चारता आदि की होती है । शशांक सम्बन्धिनाम***।

यहाँ 'सम्बन्धनिवन्धन' इस प्रकार कारिका में जो सम्बन्धी कहा गया है, उसों का निर्देश दिया गया । यहाँ 'अंशु' ( किरणें ) सम्बन्धी रूप से बतलाये गये हैं ।

तत्परामर्श*** यहाँ तत् शब्द से परामृश्य शशांक का संकेत किया गया है । सा हि—हर रूप अन्य पदार्थ के प्रति निशापति गुणीभूत है ।

और उस ( निशापति ) के प्रति निशा गुणीभूत है ।

सम्बन्धिनिवन्धनाभावे तु सम्बन्ध्यस्यैव तस्य योग्यता यथा— 'जयति जगद्रयजनको नगेन्द्रसुतया निबद्धदेहार्धः । सा च सुवने कजननी यया विना सोडपि हि विहस्तः ॥' इति ।

समासगतस्य यथैव नगेन्द्रतनयेतिपाठे । सम्बन्ध्य का उल्लेख न होने पर तो समास में न आने पर ही उसमें योग्यता रहती है जैसे—

२२ व्य० वि०

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व्यक्तिविवेक:

'तीनों लोकों को पैदा करने वाले की जय हो ।' उसका आधा शरीर पर्वतराज की पुत्री द्वारा घिरा हुआ है । यह भी तीनों लोकों की एक ही माता है, जिसके बिना वह ( जगत्पिता ) भी निहत्था है ।' समास में आए ( पदार्थ के परामर्श ) का उदाहरण यहीं बन जाता है—'नगेन्द्र-

सुतया' के स्थान पर 'नगेन्द्रतनयानिरुद्ध०' पाठ कर लेने पर । सा च सुत्ननेति । अत्र नरेन्द्रतनयाया: सम्वन्धी निर्दिष्टः । अपि तु सा चेतनेन स्वरूपम् निर्दिष्टम् । विवस्तो न कचिच्छुक्तः ।

समाङ्गतर इति परामृश्यतेति सम्वन्धः । तत्र हि परामृश्यस्य समासे गुणोभावात् सम्वन्धिनश्शानिदेंशात् परामर्शो न न्याय्यः ।

सा च भुव—यहाँ नगेन्द्रतनया का सम्बन्धी नहीं बताया गया है, अपितु वही 'सा च' इस प्रकार स्वरूपतः बतलाई गयी ।

विवस्तः—किसी काम में समर्थ नहीं । समासगतस्य—इसका सम्वन्ध परामृश्य के साथ है । परामृश्य समास में गुणीभूत हो जाता है । और सम्वन्धी का निर्देश न होने से सर्वनाम द्वारा परामर्श ठीक नहीं होता ।

अयं च योग्यायोग्यतत्त्वविवेको न सर्वजनसंवेदनीय इति प्राधान्यमेव तावत् प्रथमं योग्यतालक्षणम्, तद्भावे तत्सम्वन्धिनिबन्ध इत्युभयं योग्यता- लक्षणमुक्तम् इतरथा तत्प्रतीतितेरसम्भवात् ।

अत्र तु सत्यपि सम्वन्धिनिबन्धने यत् पुनः स्वरब्देनाभिधानं तच्छब्द- पुनरुक्तमिति । तेन 'जच्छुविँ विकचमस्य दधु: प्रसूनमित्यत्र युक्तः पाठः ।

यह जो योग्यता और अयोग्यता का विवेक ( विचार ) है उसे सभी लोग नहीं कर पाते इसलिए योग्यता का प्रथम लक्षण है प्रधानता, ( अथवा ), यदि वह न हो तो उस ( परामर्श ) के सम्वन्धी का उल्लेख । इस प्रकार ये दो ( परामर्श ) योग्यता के लक्षण कहे गये । इनके बिना उस ( परामृश्य, की प्रतीति सम्भव नहीं ) । यहाँ ( जच्छुवि॑स में) सम्वन्धी का उपादान रहते हुए भी जो —अपने वाचक शब्द (विस) से पुनः कथन हुआ—वह पुनरुक्ति दोष है । इसलिए—'जच्छुविँ विकचमस्य दधु: प्रसूनम्' पाठ चाहिए । ऐसा करने से अर्थप्रक्रमभेद भी मिट जाता है । न सर्वजनसंवेदननीय इति ।

अस्यार्थः—'यथास्मै रोचते विश्वं तथेदं परिवर्ततेऽति न्यायेनात्रातिप्रौढतया ग्रन्थ- कारो निजायत्तां पदार्थव्यवस्थां कर्तुमारब्धः, येन 'तदङ्गयुनिचित' इति 'तत्तमसाम' इति व शाशाङ्कस्य निशायाश्र तच्छब्देन परामर्शोऽङ्गीकृतममानपि समर्थयते, 'जच्छुविँ ध्वतविकासि- वेस्रसूना' इत्यत्र च विप्रसूनशब्ददस्थ संज्ञापदस्यापि विश्राद्धात्रयेण सूक्ष्मेष्टिकया पौनरुक्स्यं दोषमुद्धावयति । न चैतत् समर्थेन हृदयहारि, यस्माच्छशाङ्कमौलिरिति च संज्ञाशब्दावेतौ । संज्ञाशब्दानां च विद्यमानस्थाप्यर्थानुगमस्य न प्रयोजकत्वं रूढ: प्राधान्याति । तत्त्वशास्त्र न शाशाङ्कार्थी न निशार्थ: कश्चित् । किन्तूपायमात्रे- णैतावर्थावाश्रित्य संज्ञिविशेष एवात्र विवक्षितः । एवं संज्ञय॑न्तर्गतयोः शाशाङ्कनिश्रयोस- च्छब्दपरामर्शो न सह्दयहृद्यावर्जयतीति हृटसमर्थनमेव तत् । किं च शशाङ्कमौलिरि- स्यत्र वरं शाशाङ्कस्य भवतु सर्वनाम्ना परामर्शः तस्य वकाकृतेष्टच सन्निहितत्वात, निशाप- तिमौलिरित्यत्र तु निशाया: परामर्श: पापात् पापीयान्, निशापतिरेवोक्तक्रमेण तत्र सन्नि-

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द्वितीयो विमर्शः

हितत्वात् । निशाया उपलब्धणमात्रस्वेनोपयोगिन्यासत्तत्र सम्भवाभावात् । यत्र च तस्या उपलब्धणमात्रस्वेनोपयोगिन्यासत्तत्र सम्भवाभावात् । यत्र च तस्या उपलब्धणमात्रस्वेनोपयोगिन्यासत्तत्र सम्भवस्स्तत्र का वार्ता तमसाम् । तदयस्य ‘अन्धो मणिमविन्दत्, तमनन्धो लिलिरानयद्’ इति न्याय आयातः । अपि च यत्र प्रसारितानुगमेन शब्देन संज्ञिनः प्रत्यायनं क्रियते, परं तत्रानुगमोऽस्तिर्वाद् भवति सर्वनामपरामर्शः । यथा—

‘उत्सवाय जगतः स जायतां रोहिणीरमणखण्डमण्डनः । तत्प्रभाभिरिव पूरितं वपुरोति यस्य शिवभसमुपिण्ठतम् ॥’ इति ।

अत्र हि पदऽयापिनी संज्ञानवर्थे्यमेवोक्तर्षण्यति । तेनात्र परामर्शो नाप्रतीतकरः । भ्रकुते तु तादृश्यपि गतिर्‌नास्ति । आस्तां वा प्रकृतम् । अत्रापि हि रोहिणीरमणोत्यादौ यदि सूक्ष्मेष्टिका क्रियते तदा संज्ञाप्राधान्यात् तदंशस्य सर्वनामपरामर्शो नादुष्टतां भजते । भ्रकुते तु पापात् पापीयान् परामर्शः । कृत्तं चात्र समर्थनं ग्रन्थकृता । तदेतदस्य विश्वमगणनीयं मन्यमानास्य स्वादशेन सर्वोऽकरोशलिताह्ययापनमिति ।

ग्रन्थकर्तुः पुनर्‌यमद्रयः—इह तु द्विविधा: संज्ञाशब्दाः, रूढा योगरूढाश्च । तत्र रूढनामर्थानुगमाभावात् तदुन्सरङ्ग न कर्तव्यम् । ये तु योगरूढयस्तेषां यदि योग उत्कटतां अर्जते तदा तदाऽध्ययो व्यवहारे न हृद्यति । अत एव तिसृत्तबलेऽन प्रवृत्तस्य शब्दस्य निमित्तान्तरेऽपि प्रयोगः सौगतैर्‌निषिद्ध एव । यदाहुः—

‘नैमित्तिक्या श्रुतेर्थर्मथ वा पारमार्थिकम् । शब्दानां प्रतिह्न्याने न वाध्यस्तेन वर्जितः ॥’

[ प्रमाणवार्त्तिके ४१२९ का० ] इति ।

एवं स्थिते योगाश्रिते व्यवहार यद्य संज्ञावयवभूतार्थस्याऽभिचारी कश्चित् प्रतिपाद्य्रिषितः स्यात् तदा तदभिसम्बन्धाय तस्यावयवस्थ्य सर्वनामपरामर्शो न दुष्टः । यदुक्तम्—‘सर्वनाम्नालुब्धस्य वृत्तेरिच्छन्नरस्य’ ( का० सू० ५-१-११९ ) इति । मौलिरित्यत्र रशान्नालुब्धव्यभिचारिणो रशमयः सम्वन्धाद्वेन प्रतिपादिता । निशापतिमौलिरित्यत्र निशाद्यव्यभिचारीण तमांसि तेषां चावास्तवरवसपि न तथा दुष्टम् उत्प्रेक्ष्यागोचरत्वेन प्रतिपादितत्त्वात् । केवलं पूर्वत्र संज्ञिसम्बन्धी परन्त्र तु सम्बन्धिसम्वन्धीयो परामृष्ट इति विशेषः । तदेवं यौगिकानां संज्ञाशब्दानां योगानिमित्तो व्यवहारः कचित् कचित् सुव्यवस्थित एव । यत् कुयां हरस्यापि पिनाकपाणिपदस्य संज्ञाशब्दस्य सतोडर्थानुगमो निवार्यिष्यते येन संज्ञावगमार्थ हरशब्दः प्रयुक्तः, तन्नार्थानुगमभावप्रतिपादनपरेण, किन्त्वन्वयमानस्यार्थस्य संस्मार्प्रदत्वेन विरोचतस्यैव पृथक् संज्ञाप्रयोगमन्तरेण न निर्वहति संज्ञार्थस्यार्थानुगमस्य च युगपत् प्राधान्याभावादिति ह्यप्रयोग एवंविधेषु स्थानेषु ह्रस्यते इत्यमिप्रायेण ।

प्रकृते वस्तुस्वरुपमात्रप्रतिपादने संज्ञाशब्दत्वेऽप्यर्थानुगमानुसरणमन्याहतमिति ।

न सर्वज्ञनसर्वेन्दनोय—इसका अभिप्राय है—यहाँ अन्यकार—‘जैसा इसे रूचता है वह्ह विश्वभर को उसी प्रकार उल्लङ्कता पलटता जाता है’ ( आनन्दवर्धन—ध्वन्यालो० ८ ) इस उक्ति के अनुसार अत्यन्त हठ के साथ सारी पदार्थव्यवस्था अपनी इच्छा के अनुसार करने चला है । जिससे ( आविष्ट होकर वह्ह ) ‘तदंशगुनिचित ह्व’ और ‘तत्तमसाम्’ में तत् शब्द से रशांक और निशा का परामर्श भी वतलाता है, जो वस्तुतः वनता नहीं है । इसी प्रकार ‘जकुर्‌विन्दं वृत्तविकार्शिषत्सरसूनाः’ में ‘विस्रसून’ संज्ञाशब्द है, तव म्री उसके एकांश विस् शब्द को लेकर वड़ी वार्तों के साथ पुनरुक्ति दोष थोपता है । ऐस्री करतूत मन को नहीं भाती । कारण कि ‘रशांकमौलि’ और

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‘निशापतिमौलि’ ये संज्ञाशब्द हैं। जो संज्ञाशब्द होते हैं भले ही उनसे ( यौगिक ) अर्थ निकले किन्तु वे उसके अभिधायक नहीं होते, कारण कि ( योग से ) रुद्ध प्रधन होती है । इसलिये इन शब्दों में शशांक और निशा अर्थ मान्य नहीं है, केवल इन अर्थों को उपाय रूप से अपनाकर एक विशिष्ट संज्ञान (अर्थ) यहाँ—कहना अभिप्रेत है । इसलिये संज्ञान के भीतर आये शशांक और निशा का तत् शब्द से परामर्श सहृदयजनों के चित्त को आवर्जित नहीं करता, इसलिये यह स्थापना—हठमूलक है । एक बात यह भी ध्यान देने की है कि सर्वनाम द्वारा—शशांक का भले ही परामर्श हो जाय, क्योंकि वह वक्ताकार से वहाँ ( शिव के पास ) सन्निहित रहता है । पर निशापतिमौलि—यहाँ तो निशा का परामर्श पापात् पापीयान् (बुरे से बुरा ) है, कारण कि उक्त क्रम ( विशेषण रूप ) से निशापति ही वहाँ सन्निहित हैं । निशा केवल—‘उपलक्षण रूप से उपयोगी है’ अतः उसका ( शिव में ) होना सम्भव नहीं । फिर जहाँ वृत्ति ( नित्या ) नहीं है वहाँ उसके सम्बन्धी ‘तमसू’ की तो बात ही दूर है । इस प्रकार यहाँ ‘अन्धे ने हीरा देखा, लूले ने उसे उठाया’—कहावत चरितार्थ होती है ।

फिर यहाँ संज्ञाशब्द अपने अर्थ का ज्ञान अपनी अभिधा का विस्तार ( योगार्थ तक फैला ) कर करा रहा हो वहाँ अभिधा ( अनुग्रहम ) के विस्तार से ( यौगिक अर्थ का भी ) सर्वनाम द्वारा परामर्श होता है । जैसे— 'रोहिणी ( के ) पति ( का ) डकड़ा भूषण बनाकर पहनने वाला वह ( शिव ) संसार भर वही प्रसव्रता का कारण बने, सर्पेद भस्म से भरा जिसका शरीर उस ( रोहिणीरमण = चन्द्र ) की प्रभा से लिपा हुआ सा दिखाई देता है ।’

यहाँ ( रोहिणीरमणखण्डनः = इस ) पद में जो संज्ञा ( संकेत अभिधा ) है वह आदि से अन्त तक व्याप्त है, अतः वह अभिधा अपने प्रधान अर्थ ‘शशांक’ का ज्ञान कराने के साथ साथ ( ‘रोहिणीरमण-’ आदि ) अन्य ( यौगिक ) अर्थों का भी ज्ञान करा देती है । इसलिए यहाँ सर्वनाम ( द्वारा यौगिक अर्थों का ) परामर्श हो सकना है, किन्तु प्रकृत ( ‘निशापतिमौलि—तत्‌तस्साम’ ) में तो वह भी बात नहीं । प्रकृत दूर रहे, यहाँ भी इस ‘रोहिणीरमण’—इत्यादि में यदि सूक्ष्मता से विचार किया जाय तो संज्ञा की प्रधानता होने से सर्वनाम द्वारा परामर्श निर्दोष नहीं रहता । प्रकृत में तो वह और भी अनुचित (पापात् पापीयान्) है । परन्तु ग्रन्थकार ने यहाँ समर्थन किया है । तो ग्रन्थकार का आशय यह है—संज्ञा शब्द दो प्रकार के होते हैं—रुद्ध और योगरुद्ध । उनमें से रुद्ध में ( अवयव का ) अर्थ नहीं माना जाता । अतः वहाँ अर्थ का अनुगमन नहीं करना चाहिये । पर जो शब्द योगरुद्ध है, उनका योग यदि उक्तट हो जाता है तो उसको लेकर किया व्यवहार दोषावह नहीं होता । इस निमित्त के आधार पर चलः शब्द निमित्त का अनन्तभाव होने पर सोगतों ( बौद्धों ) द्वारा निषिद्ध वतलाया गया है । जैसी कि कहा है—( अर्थ भूमिका में देखे ) ऐसी स्थिति में यदि व्यवहार में यौगिक शब्द आयें और तब उसे संज्ञाशब्द के अवयवभूत—( शब्दार्थ ) का नित्य सम्बन्धी ( अव्यभिचारी अलग न होने वाला पदार्थ ) वतलाना अभीष्ट हो तो उसके अभिसम्बन्ध ( परामर्श ) के लिये अवयव का सङ्केतनम से परामर्श दोषावह नहीं । जैसा कि कहा है कि—समास में छिपे अर्थ का सर्वनाम से परामर्श होता है । ‘मौलि’ = इसमें शशांक से अलग न होने वाले किरणें सम्बन्धी रूप से उपस्थित की गई हैं ( और ) ‘निशापति-मौलि’ में निशा से अलग न होने वाला अन्थकार । वह ( अन्थकार ) अवास्तविक है ( किसी शब्द से नहीं कहा गया है ) तथापि कोई दोष नहीं, कारण कि वह उत्प्रेक्षा द्वारा उपस्थित किया जा

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द्वितीयो विमर्शः

३४९

रहा है। अन्वर है कि पहले ( शशांकमौलि ) में संज्ञाशब्द ( शशांक ) से सम्बन्धित ( किरण ) का परामर्श किया गया है और दूसरे में ( निश्चापति मौलि ) में सम्बन्धी ( पति ) से सम्बन्धित ( निश्चा ) का। इस प्रकार संज्ञा शब्दों में भी उनके अर्थ के आधार पर किया गया व्यवहार कभी समाप्त बैठ जाता है।

'पिनाकपाणि:' में जो 'पिनाकपाणि' इस संज्ञाशब्द से हर शब्द का प्रयोग होने के 'कारण' जो योगिक अर्थों की प्रतीति का अभाव बताया जाएगा उसका अभिप्राय यह नहीं है कि संज्ञाशब्दों से योगिक अर्थों का प्रतिपादन सर्वथा नहीं होता। अपितु यह है कि वहाँ प्रधान अर्थ पर बल दिया जा रहा है जो पृथक् संज्ञाशब्द के बिना निर्बहता नहीं है क्योंकि संज्ञार्थ और अनुगा्त ( योगतम, पिच्छलगू ) अर्थ—दोनों ही एक साथ प्रधान नहीं हो सकते, अतः ऐसे स्थलों में हि पृथक् पृथक् संज्ञाशब्दों का प्रयोग अच्छा माना जाता है। परन्तु प्रकृत ( 'शशांकमौलि' और 'निश्चापतिमौलि' ) में वस्तुस्वरूप का प्रतिपादन करने के लिए संज्ञाशब्द आए हैं तथापि उक्त अर्थ का प्रतिपादन भी रुकता नहीं।

विमर्शः मुख्यकार से टीकाकार का यहाँ मतभेद है। 'शशांकमौलि' और 'निश्चापतिमौलि' शब्दों को मुख्यकार योगिक मानते हैं और उनके भीतर आए शब्दों द्वारा अपने स्वतन्त्र अर्थ का प्रतिपादन भी। टीकाकार ऐसा नहीं मानते। वे शशांकमौलि आदि शब्दों में योगार्थ को प्रयोग न मानकर रूढ़ार्थ को प्रधान मानते हैं। साथ ही ये योगार्थ को निकलता नहीं मानते। उन्होंने मुख्यकार को यहाँ तानाशाह और हठधर्मी कहा है।

उदाहृत सौराष्टिका रिका का पाठ पुराने संस्करणों में—'नैमित्तिकाः शब्दानामसुहृन्थानो न बाधः' ऐसा था। अर्थ भूमिकान्तर्गत देखिए।

इतरथेति उभयविधयोग्यताभावे परामृष्ट्यप्रतीतेरभावादित्यर्थः। अत्र द्विति। 'जड्यादि-समिस्पयत्नः स च शब्द-निघन्थने उपादाने। स च सर्वत्र निधानं प्रसूनस्य निवन्धने उपादाने। अर्थ इति। क्रियाकारकभावस्याख्यायातपदवाच्यत्वेन शब्देन कमेण प्रस्तावेऽत्र विशेष-

पद्धारण समासेन प्रतीतेरर्थस्वम्।

इतरथा—दोनों योग्यताओं के अभाव में परामृष्ट्य की प्रतीति नहीं होती ।

अनन्तु—जडत्वादिसमु यहाँ ।

सम्बन्धिनः—प्रसुत के ।

निवन्धे—उपादान में ।

अर्थ—क्रियाकारकभाव का आख्यात शब्द से उल्लेख करते हुए शब्दक्रम से आरम्भ और यहाँ—'वृत्तविकासप्रसूतं' में—विशेषण द्वारा समास से प्रतीति होने से अर्थ ।

सञ्चेपण पद्य प्रकार पौरुष्यं निर्देशयते। तद्वानेकप्रकारमिति।

अत्र संस्कृतसरूप से पाँच प्रकार के पौरुष्य दोष का निरूपण करते हैं—

तच्चाने कप्रकारं सम्भवति । प्रकृतिप्रत्ययौ भयपदवाक्यवाक्यार्थविषयत्वात् ।

तत्र प्रकृतिविषयं यथा—

'अश्रथीःसंहतिर्भिरुद्धतसुदृढघुराभिभूरेरणुजालमिविलं वियददातताम् ।' इति ।

अत्र हि समुदार्थायाः प्रकृते; संहनेदृशं पौरुष्यम् ।

वहं ( पौरुष्य ) अनेक प्रकार हो सकताहै । पर संक्षेप करके पाँच प्रकार का पौरुष्य बतलाते हैं । प्रकृति, प्रत्यय, प्रकृतिप्रत्यय, पद, वाक्य विपयक होने से । उनमें से प्रकृतिविषयक—

जैसे—प्रयाणोक्त 'अश्रथीःसंहति:' द्वारा उड़ाई गई धूल ने आकार को छा दिया ।—यहाँ

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३४० व्यक्‍तिविवेक:

'निशापतिमौलि' ये संज्ञाशब्द हैं। जो संज्ञाशब्द होते हैं भले ही उनसे (योगिक) अर्थ निकले किन्तु वे उसके अभिधायक नहीं होते, कारण कि (योग से) रुद्धि प्रधान होती है। इसलिए इन शब्दों में शाशांक और निशा अर्थ मान्य नहीं है, केवल इन अर्थों को उपाय रूप से अपनाकर एक विशिष्ट संज्ञान (अर्थ) यहाँ—कहना अभिप्रेत है। इसलिये संज्ञानान् के भीतर आये शाशांक और निशा का तत् शब्द से परामर्श सहृदयजन्तों के चित्त को आवर्जित नहीं करता, इसलिये यह स्थापन—हठमूलक है। एक बात यह भी ध्यान देने की है कि सर्वनाम द्वारा—शाशांक का भले ही परामर्श हो जाय, क्योंकि वह वक्तृकार से वहाँ (शिव के पास) सन्निहित रहता है। पर निशापतिमौलि—यहाँ तो निशा का परामर्श पापात् पापीयान् (बुरे से बुरा) है, कारण कि निशा केबल—'उपलक्षण रूप से उक्त क्रम (विशेषण रूप) से निशापति ही वहाँ सन्निहित हैं। निशा का (द्रव्य में) होना सम्भव नहीं। फिर जहाँ वहाँ (निशा) नहीं है वहाँ उसके सम्बन्धी 'तमस्' की तो बात ही दूर है। इस प्रकार यहाँ 'अन्धे ने देखा, लुले ने उसे उठाया'—कहावट चरितार्थ होती है।

फिर यहाँ संज्ञाशब्द अपने अर्थ का ज्ञान अपनी अभिधा का विस्तार (योगार्थ तक फैला) कर करा रहा हो वहाँ अभिधा (अनुगम) के विस्तार से (योगलक्ष्य अर्थों का भी भाग) सर्वनाम द्वारा परामर्शौ होता है। जैसे— 'रोहिणी ( के ) पति ( का ) टुकड़ा भूपण बनाकर पहनने वाला वह (शिव) संसार भर की प्रसन्नता का कारण बने, सफेद भस्म से भरा जिसका शरीर उस (रोहिणीरमण = चन्द्र) को प्रभा से लिपा हुआ सा दिखाई देता है।'

यहाँ (रोहिणीरमणखण्डनः = इस) पद में जो संज्ञा (संकeta अभिधा) है वह आदि से अन्त तक व्याप्त है, अतः वह अभिधा अपने प्रधान अर्थ 'चाँकर' का ज्ञान कराने के साथ साथ ('रोहिणीरमण-' आदि) अन्य (योगिक) अर्थों का भी ज्ञान कराती है। इसलिये यहाँ सर्वनाम ( 'रोहिणीरमण-' आदि ) द्वारा योगिक अर्थों परामर्शौ हो सकता है, किन्तु प्रकृत ('निशापतिमौलि—तत्‌तमसाम्' ) में तो वह भी बात नहीं। प्रकृत दूर रहे, यहाँ भी इस 'रोहिणीरमण'-इत्यादि में यदि सूक्ष्मता से विचार किया जाय तो संज्ञा की प्रथमान्यता होने से सर्वनाम द्वारा परामर्शौ निर्दोष नहीं रहते। प्रकृत में तो वह और भी अनुचित (पापात् पापीयान) है। परन्तु ग्रन्थकार ने यहाँ समर्थन किया है। तो वह तो विश्व को कुछ न गिनने वाले इस ग्रन्थकार का अपनी सर्वज्ञख्यता खो भुगतना है।

ग्रन्थकार का आशय यह है—संज्ञा शब्द दो प्रकार के होते हैं—रुद्ध और योगरुद्ध। उनमें से रूढ़ में (अवयव का) अर्थ नहीं माना जाता। अतः वहाँ अर्थ का अनुगमन (चाहिये = करना चाहिए) । पर जो शब्द योगरुद्ध है, उनका योग यदि उत्त्कट हो जाता है तो उसको लेखक किया गया जानने पर सौगतों (बौद्धों) द्वारा निषिद्ध बतलाया गया है। जैसा कि कहा है—( अर्थ भूमिका में देखें ) ऐसी स्थिति में यदि व्यवहार में योगिक शब्द आयें और तब उसे संज्ञाशब्द के अवयवभूत— ( शब्दार्थ ) का नित्य सम्बन्धी (अव्यभिचारी = अलग न होने वाला) बतलाना अभीष्ट हो तो उसके अभिसम्बन्ध (परामर्श) के लिये अवयव का संज्ञेनाम से परामर्श दोपावह नहीं। जैसा कि कहा है कि—समास में क्रिपे अर्थ का सर्वनाम से परामर्शौ होता है। 'मौलि' = इसमें शाशांक से अलग न होने वाले किरणें सम्बन्धीरूप से उपस्थित की गई हैं (और) 'निशापति-मौलि' में निशा से अलग न होने वाला अन्धकार। वह (अन्यकार) अवास्तविक है (किसी शब्द से नहीं कहा गया है) तथापि कोई दोष नहीं, कारण कि वह उत्प्रेक्षा द्वारा उपस्थित किया जा सकता है।

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द्वितीयो विमर्शः:

अर्थे अस्ति के अर्थ ( सत्ता ) का अनुसंधान करते हुए मतवर्थीय माने जाते हैं। ( तो ) ‘उन्हें बहुव्रीहि द्वारा वाच्य क्यों नहीं बतलाया ।’ इस पर उत्तर देते हैं—मतोभूम्ना० । मतुव् मात्र का कथन मतवर्थीय समी—प्रत्ययों के लिये । भूम आदि अर्थ केवल मतुप् आदि प्रत्ययों से नहीं जान पड़ते, अपितु तद्धित प्रतीत होते हैं । जब वे प्रकरण आदि से युक्त होते हैं, इसलिये मतुवादि के निर्देश द्वारा उनके उदाहरण नहीं दिये । उनकी प्रतीति नियमतः हो ही जाती हैं ।

विमर्शः जिस प्रकार ‘पीतगुणवान्’ न कहकर पीतगुण किसीने से भी व्यक्ति विशेष में पीत गुण के अस्तित्व का ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार—विसकिसलयच्छेदपथ्यः (मेवदूत) और ‘त्वगुत्त-रासङ्गान्’ ( कुमारसम्भव ) कहने से भी हंसों तथा पावतों में क्रम से विसकिसलयच्छेद्र के पाथेय 'मतुप्' प्रत्यय ( पाथेयवस्तु : )—( उत्तरासङ्गवतीन् ) लगाना। वस्तुतः पुनरुक्त है ।

मतुप् आदि प्रत्यय उक्त ६ अर्थों में होते हैं । ग्रन्थकार ने केवल एक मतुप् का उदाहरण द्विया शेष पाँच छोड़ दिये । इसका कारण स्पष्ट करते हुये उन्होंने कहा कि वे प्रकरण आदि की सहायता से अपना अर्थ बतलाते हैं । उनकी ऊहा स्वयम् भी की जा सकती है ।

यथा वा—

‘वासो जाम्बवच्चेलिवान् जघने गुज्जार्ज्जा भूषणम्’ इति, ‘तेनोयमातुढ-घटाविवर्त्तिते’ इति, ‘येनाकुम्भनिमग्रश्वन्यकरणां यूथैः पयः पोयते’ इति । इत्यादौ तद्धितप्रत्ययस्य पौनरुक्त्यं षष्ठीसमासाश्रयेणैव तदर्थावगतिसिद्धे ।

और जैसे—

‘कपड़े हैं जामुन सम्वन्धी पत्ते, भूषण है गूँजा की मालायें’ यह—‘उत्तसे सम्वन्धित हाथियों की घटाओं टकरों से’ यह, जिससे माथे तक डूबे जंगलों हाथियों के यूथों द्वारा जल पिया जाता है यह । ऐसे उदाहरणों में तद्धित प्रत्यय की पुनरुक्ति है । षष्ठी समास से ही उस अर्थ की प्रतीति हो सकती है ।

जाम्बववति तद्धिते वन्येति च तद्धितप्रत्ययस्य पौनरुक्त्यम् । जम्बूपलञ्चवानीति, तन्मात्रङ्केति, वनकरिणामिति च षष्ठीसमासेनैव तद्धितकमध्यस्थलङ्गणग्रसिद्ध्यार्थप्रतीति: ।

जाम्बव, तद्धीय, वन्य—इनमें तद्धित प्रत्यय पुनरुक्त है । जम्बूपलञ्चव, तन्मात्रङ्क, ‘वनकरिणाम्’—इस प्रकार पञ्चमी समास द्वारा भी तद्धित और कर्मधारय स्वरूप दोनों वृत्तियों का काम चल सकता है ।

यत्र त्वर्थान्तरे तद्धितस्योभपत्तिनं तत्र समासात् तत्प्रतीतिरिति न तस्य पौनरुक्त्यम् । यथा—

‘अथ भूतानि वार्त्र्ङ्ग्रशारेभ्यस्तत्न तत्रसु:’ । इति ।

अत्र ह्यपत्यार्थे तद्धितोत्पत्तिनिमित्तमर्थ इति ।

जैसे ( कहाँ ) दूसरे अर्थों में तद्धित का प्रयोग होता है वहाँ समास से उसकी प्रतीति नहीं होती, इसलिये वह पुनरुक्त नहीं होता । जैसे—

जीव-जन्तु—सब वातत्र्न ( वृत्त एक असुर, उसका = वध = मारने वाला = वृत्रहन्, वातत्र्न = वृत्रहन् का पुत्र, उस ) के बाणों से भयभीत हो गये । यहाँ तद्धित अपत्यार्थक है, इदमर्थ ( किसी के सम्बन्ध ९ के अर्थ ) में नहीं । ( अतः यहाँ पुनरुक्ति नहीं है )

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व्यक्तिविवेक:

समूहार्थक प्रकृति ( अश्रीय, अक्ष शब्द से समूहार्थक छ + ईय प्रत्यय ) और संहति दोनों पुनरुक्त है ।

तच्छ्येति तच्छब्देत पौनरुक्त्यं परामृश्यते ।

अश्रीयते । अत्र ‘केशाश्वाभ्यां यजत्‍‌यो’ ( ४ । २ । ४८ ) इति समूहेडर्थे छप्रत्ययः संहतिशब्देऽपि भिसः प्रकृतित्वेन निर्दिश्यौ पुनरुक्तौ । अशैैरित्येव हि वाच्यम् ।

तच्छ्येति—तत् शब्द से पौनरुक्त्य का परामर्श किया ।

अश्रीय—‘केशाश्वाभ्यां यजत्‌यो’—सूत्र से समूह अर्थ में छ प्रत्यय हुआ है । ( छ को ईय हो जाता है ) और संहति शब्द से बहुवचनान्त ‘भिस’ प्रत्यय आया है । दोनों पुनरुक्त हैं । संहति कहने पर बहुवचन की जरुरत नहीं और अश्रीय—अक्षसमुदाय कहने पर संहति को, इसलिये अक्षे: केवल कहा जाना चाहिये ।

प्रत्ययविषयं यथा—‘विसकिसलयच्‍छेदपाथेयवन्त’ इति, ‘त्वगुत्‍तरासङ्घतौसीधीतिनौमी’ति च । अत्र हि मतुपर्थीयस्य पौनरुक्त्यम् वहुव्रीहिसमाश्रयेणैव तदर्थोवगतिसिद्धे: । यदाहुः—‘कर्मधारयमतुपर्थीयाम्यां वहु-व्रीहिरित्युक्तौ भक्‍षरुक्‍तस्य’ इति ।

प्रत्यय सम्बन्धी यथा—‘विसकिसलयच्‍छेदपाथेयवन्तः । (कमल-कमल के डंठल के लिये) और—‘त्वगुत्‍तरासङ्घतीम’ ।

यहाँ मतुप् प्रत्यय पुनरुक्त हैं । केवल बहुव्रीहि से ही उसका अर्थ निकल आता है । जैसा कि कहा है—कर्मधारय और मतुप्—को बहुव्रीहि वाधता है—धोंड़े से समास से काम चल जाने के कारण । मतुप् प्रत्यय के जो भूमा आदि अर्थ हैं वे अस्तित्त्व के अर्थ ( सत्ता ) का अनुगमन करते हुए प्रकरण आदि से स्वयमेव समझ में आ जाते हैं, अतः अलग से उनके उदाहरण नहीं दिये ।

दर्शेति ‘विसकिसलयच्‍छेदपाथेया’ इति ‘त्वगुत्तरा-सङ्घाम’ इति च वाच्यसम् । बहुव्रीहि-वि-धानम् कर्मधारयमतुपर्थीयाम्याम् इति । कर्मधारयसमुपचयेनाव-स्थितौ वृत्तिलाघवात् बहुव्रीहिणा वाध्यते इत्यर्थे: ।

न च—

‘भूमानन्दाप्रशंसासु नित्ययोगेडतिशायने ।

संसर्गेडस्थितिविच्छायां भवन्ति मतुपादयः ॥’ इति ।

इति बहवो भूसादयोऽर्था असत्यर्थमनुगच्छन्तो मतुपर्थीयतया विषयवेनोक्ताः । ते किमिति न बहुव्रीहिवाच्यवेनोक्‍ताः इत्याह सतोऽरिति । मतुपग्रहणं मतुपर्थीयानुपलक्षणम् । भूमा-दयो ह्यार्था न केवलेभ्यो मतुपादिभ्यः प्रत्ययान्ते, किन्तु प्रकरणादिसहायेभ्यस्तेभ्य इति न मतुपादिविचारेणोदाहृत्य, नान्तरीयकतया तेषां गतत्वात् ।

बहुव्रीहि—यहाँ मतुप् अर्थ में बहुव्रीहि का विधान हैं ।

कर्मधारय—कर्मधारय और मतुप्‍र्थीय प्रत्यय इकट्ठे होकर यदिआँ हों तो समासलाघव के कारण बहुव्रीहि से वाधित हो जाते हैं ।

शङ्का—भूमा, निन्दा, प्रशंसा, नित्ययोग, अतिशय, संसर्ग में मतुप् आदि प्रत्यय होते हैं यदि सत्ता की विवक्षा हो ( अर्थात् उनका अस्तित्व बतलाना हो ) इस प्रकार बहुत से भूसादि

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अर्थ अस्‍ति के अर्थ ( सत्ता ) का अनुगमन करते हुए मत्‍वरथीय माने जाते हैं। (तो) 'उन्हें बहुत्री:हि द्वारा वाच्य क्यों नहीं बतलाया।' इस पर उत्तर देते हैं—मतोभृंमा:। मतुब मात्र का कथन मत्‍वरथीय सम्‍बो—'प्रत्ययों के लिये। भूम आदि अर्थ केवल मतुप् आदि प्रत्ययों से नहीं जान पड़ते, अपितु तव्‍ प्रतीय होते हैं जब वे प्रकरण आदि से युक्त होते हैं, इसलिये मतुवादी के निर्देशा द्वारा उनके उद्‍दाहरण नहीं दिये। उनकी प्रतीति नियमत: ही हो जाती है।

विमर्श: जिस प्रकार 'पोतगुणवान्' न कहकर पीतगुण कदने से भी व्यक्तिविशेष में पीत गुण के अस्तित्व का ज्ञान हो जाता है उसी प्रकार—विसकिसलयच्छेदपाथेया: (मेघदूत) और 'त्वसुत्‍तरासज्ञ' ( कुमारसम्भव ) कहने से भी हंसों तथा पावतों में क्रम से विसकिसलयच्छेद के पाथेय तथा—त्वसुत्‍तरासज्ञ का अस्तित्व मालूम हो जाता है, इतने पर भी उनमें अस्तित्व का बोधक 'मतुप्' प्रत्यय ( पाथेयशब्द: )—( उत्तरासज्ञवतीम् ) लगाया। वस्तुत: पुनरुक्त है। मतुप् आदि प्रत्यय उक्त ६ अर्थों में होते हैं। ग्रन्थकार ने केवल एक मतुप् का उदाहारण दिया शेष पाँच छोड़ दिये। इसका कारण स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि वे प्रकरण आदि की सहायता से अपना अर्थ बतलाते हैं। उनकी उहा स्वयं भी की जा सकती है।

यथा च—

'वासो जाम्बवपल्‍ववानी जघने गुज्झास्रजां भूषणम्' इति, 'तद्रीयमातिङ्ग-घटाविवरान्तरै:' इति, 'शेनाकुम्भनिमग्नदवन्यकरिणां यूथै: पय: पीयते' इति। इत्यादौ तद्धितप्रत्ययस्य पौनरुक्त्यं पश्‍तोसमासाथ जनेव तदर्थोवगतिसिद्धे।

और जैसे—

'कपड़े हैं जामुन सम्‍बन्धी पत्ते, भूषण है गूँज की मालाओं' यह—'उससे सम्‍बन्धित हाथियों की घटाओं टकरों से यह, जिससे माथे तक डूबे जंगली हाथियों के यूथों द्वारा जल पिया जाता है यह। ऐसे उदाहरणों में तद्धित प्रत्यय की पुनरुक्ति है। पश्‍टी समास से ही उस अर्थ की प्रतीति हो सकती है।

जाम्बवेतितद्धितेतिवन्येति च तद्धितप्रत्ययस्य पौनरुक्त्यम्। जम्बूपल्‍ववनीति, तन्‍मातङ्गेति, वनकरिणामित च पश्‍तोसमासेनैव तद्धितकर्मधार्यप्रक्‍षतद्‍वृत्तिद्‍वयाथप्रतीति:।

जाम्बव, तद्रीय, वन्य—इनमें तद्धित प्रत्यय पुनरुक्त है।'जम्बूपल्‍ववत्, तन्‍मातङ्ग', 'वनकरिणाम्'—इस प्रकार पश्‍टी समास द्वारा भी तद्धित और कर्मधारय स्वरूप दोनों वृत्तियों का काम चल सकता है।

यत्र त्वर्थान्तरे तद्धितस्योभपदित्‍नं तत्र समासात तत्‍प्रतीतिरिति न तस्य पौनरुक्त्यम्। यथा—नि वार्तेप्रशारे भ्‍यस्तत्र तत्‍ससु:'। इति ।

अथ भूतानि वार्तेप्रशारेभ्‍यस्तत्र तत्‍ससु:'। इति । अत्र ह्यपत्यार्थे तद्धितोत्पत्तिरनदर्थ इति ।

जदों ( कहीं ) दूसरों अर्थों में तद्धित का प्रयोग होता है, वहाँ समास से उसकी प्रतीति नहीं होती, इसलिये वह पुनरुक्त नहीं होता। जैसे—

जीष-जन्तु—सब वार्त्रेण ( वृत्र एक असुर, उसका = वृत्र = मारने वाला = वृत्रघ्न, वार्त्रघ्न = वृत्रण का पुत्र, उस ) के बाणों से भयभीत हो गये। यहाँ तद्धित अपत्यार्थक है, इत्‍दमर्थ ( किसी के सम्‍बन्धी के अर्थ ) में नहीं। ( अत: यहाँ पुनरुक्ति नहीं है )

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वार्त्रघ्नेति वृत्रघ्न इन्द्रस्यापत्यमत्र विवक्षितं, नेदमर्थे इति नात्र तद्वितस्य पौनरुक्त्यम् ।

वार्त्रघ्न—यहाँ वृत्रघ्न = इन्द्र का अपत्य विवक्षित है । न कि इदमर्थ ( तस्येदम् आदि द्वारा प्रतिपादित ) । अतः यहाँ तद्धित की पुनरुक्ति नहीं हुई ।

उभयविषयां यथा—

'छायामपास्य मधतीरमपि वर्त्मानामागामिनीर् जगृहिरे जनतास्तरू-

णाम्' अत्र हि समूहार्थीया: प्रकृतेर्बहुवचनस्य चोभयो: पौनरुक्त्यम् ।

उभयविषयक यथा—

'उपस्थित ( सामने की ) विशाल छाया को भी छोड़कर जनता ने आगामी छाया को अपनाया । यहाँ ( जनशब्द से ) समूहार्थक प्रकृति ( जनता शब्द ) और उससे आया बहुवचन दोनों ही पुनरुक्त है ।

समूहार्थोया इति । 'ग्रामजनवन्धुसहायेभ्य:' इति ( ४-३-७ ) समूहे तत्प्रत्यय: । अत्र जनशब्देनैव समूहार्थप्रतिपत्तेस्तत्प्रत्ययरुपाया: प्रकृतेर्बहुवचनस्य प्रत्ययस्य च पौनरुक्त्यम् ।

समूहार्थ—ग्रामजनबन्धुसहायेभ्य: इस सूत्र से तल् प्रत्यय हुआ । यहाँ केवल् जन शब्द से ही समूहार्थ की प्रतीति हो सकती है, इसलिए तल प्रत्ययरूप प्रकृति और उससे भी आए बहुवचन—वाचक प्रत्यय पुनरुक्त हैं ।

विमर्श: तल प्रत्यय का विधायक सूत्र—इस प्रकार है—'ग्रामजनवन्धुभ्यस्तल्' । उसमें सहाय शब्द नहीं है, जैसा कि न्यायख्या में मुद्रित है । सहाय शब्द इसी सूत्र के वार्तिक में है—

पदविषयं यथा—

'दलत्कनदलभाग भूमिस्सललम्बाम्बुदस्बरम् ।

वाप्य: फुल्लाम्बुजयो जाता इष्ठेविषं मम ॥' इति ।

अत्र हि भज: सहायाब्दो युजिश्व पुनरुक्तार्थ:, पूर्ववद् बहुव्रीहिसमासा-

श्रयणेनैव तदर्थावगते: ।

पदविषयक पौनरुक्त्य जैसे—

'खिलते कनदलों वाली भूमि' नोचे उतरे मेघों सहित आकाश, खिले कमलों से युक्त तलैयाँ—

मेरी दृष्टि के लिये जहर बन गईं । यहाँ—( वाली सहित, युक्त ये ) भज सहाय शब्द और युज धातु के अर्थ पुनरुक्त हैं । पहले के समान बहुव्रीहि द्वारा ही उनके अर्थ का ज्ञान हो सकता है ।

पूर्ववद् हि सलक्नदलेति लम्बाम्बुदमिति फुल्लाम्बुजा इति च द्वयो: प्रत्यय: पुनरुक्तरुपम् ।

पूर्ववत्—दलक्नदला, लम्बाम्बुदम्, फुल्लाम्बुजा—इस प्रकार बहुव्रीहि द्वारा ही भज आदि के अर्थ की प्रतीति हो सकती है । अतः वे पुनरुक्त हुए ।

विमर्श—यहाँ पूर्ववत् द्वारा 'विसकिसलयच्छेदपाथेयवन्त:' और 'त्वग्युतरासज्ञवतीम्'—की ओर निर्देश है, जिन्हें ग्रन्थकार ने अभी-अभी उपस्थित किया है ।

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द्वितीयो विमर्शः

३४५

यत्र च विशेषणाद् विशोष्यमात्रप्रतिपत्तिरिष्यते तत्र तदुक्ते: पौनरुक्त्यं यथा—‘पायात् स शीतकिरणाभरणो भवो व:' इत्यच भवशब्दस्य ।

यथा वा— 'चकासतं चारुचचूचर्मणां कुथेन नागेन्द्रमिचेन्द्रवाहनम् ।' इत्यत्र नागेन्द्रेन्द्रद्रवाहनाद्रशब्दद्योरेकतरस्य ।

और जहाँ विशोषण से विशेष्यमात्र की प्रतीति अभीष्ट हो वहाँ उस ( विशेष्य ) का कथन पुनरुक्त होता है । जैसे— शीतल किरणों वाले का सुकृत पहने वे शंकर आप की रक्षा करें । यहाँ 'भव' ( शंकर ) शब्द का ( कर्थन ) । और जैसे—'चुन्दर चमर चर्म्म से चमचमाते कुथ (झूल) से इन्द्र के वाहन गजराज के समान ।' यहाँ नागेन्द्र और इन्द्रवाहन शब्दों में से किसी एक का कथन ।

विशेष्यमात्रेति विशेष्यस्याविशिष्टविशिष्टविशेष्यरूपतया विशिष्टविशेष्यरूपतया वा प्रतीति: । तत्र विशिष्टविशेष्यरूपतया प्रतीतौ तत्र विशेषणमात्रादेव विशेष्यस्यैव प्रतीति: तत्र विशेष्यप्रयोगो न दुष्यति यथा 'तव प्रसादादि'त्यत्र वच्यते ।

भावशब्दस्येति शीतकिरणाभरण डीयनेनैव प्रतीतत्ववाद् भावार्थस्य, यथा 'निधानगर्भिव सागराम्बराम्' इत्यत्र सागराम्बराशब्ददेन मेदिन्या: ।

नमूर्स्संगविशेष: कुथ: वर्णकमवल: । एकतरस्येति इन्द्रवाहनशब्दप्रयोगे कुथसामर्थ्याद् नागेन्द्रप्रतीतिर्‌नागेन्द्रशब्दप्रयोगे च शुद्धवर्णस्य वर्णितस्वाद् इन्द्रवाहनप्रतीतिरित्येकतर- विशेष्यप्रयोगो न्याय्य: ।

विशेष्यमात्र —विशेष्य की प्रतीति या तो अविशिष्ट रूप से होती है, या विशिष्ट रूप से । उनमें प्रतीति सामान्त्य: हो रही हो । जैसे—'तव प्रसादात्‌००' पद्य में बतलाएँगे ।

भवशब्दस्य—शीतकिरणाभरण कथने भर से भवशब्दरूप अर्थ की प्रतीति हो जाती है । इसलिये भव शब्द का देना पुनरुक्त है, जैसे—'निधानगर्भोमिव सागराम्बराम्‌'—में सागरम्बरा शब्द से मेदिनी की ।

चमर—एक तरह का मृग । कुथ—कई रंग का कम्बल, हिन्दी में जिसे झूल कहते हैं । एकतरस्य—इन्द्रवाहन शब्द के प्रयोग में कुथ शब्द के आधार पर नागेन्द्र की प्रतीति हो जाती है और नागेन्द्र शब्द के प्रयोग में शुद्धवर्ण के वर्णन से इन्द्रवाहन की प्रतीति, अतः किसी एक का प्रयोग ठीक था ।

यत्र तदित्यादिना विशिष्टविशेष्यरूपतया विशेष्यप्रतिपत्तिमुदाहारति ।

यत्र तद्धिशेषप्रतिपत्तिनं तत्र पौनरुक्त्यम्— 'तव प्रसादात् कुसुमायुधोडपि सहायमेकं मधुमेच लभध्वा । कुयो हरस्यापि पिनाकपाणेर्‌युचित के मम धन्विनोडन्ये ॥' इति ।

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जहाँ—उसकी प्रतीति विशेष रूप से हो रही हो वहाँ पुनरुक्ति नहीं होती । जैसे—तवप्रसादात्००० इत्यादि । यहाँ हर शब्द का ( कथन दोषावह नहीं ) ऐसा आगे कहेंगे ।

तद्विशेष: विशेष्यगतो विशेष: । हरशब्दस्येति पिनाकपाणिपदेन हरगतो विशेष: प्रतिपादितो य: सवौत्कर्षहेतुत्वेन विवक्षितो न संज्ञिमात्रमित्यर्थ: ।

तद्विशेष:—विशेष्यगत विशेष । हरशब्दस्येति—पिनाकपाणिपद से हर की विशेषता का प्रतिपादन किया जा रहा है जिसे ( विशेषता को ) सबसे उत्कृष्ट होने के कारण रूप से कहना अभीष्ट है । केवल संज्ञी ( शिव ) का प्रतिपादन यहाँ अभीष्ट नहीं है ।

अथ यथात्रैव 'तव प्रसादात् कुसुमायुधोडपी'त्यत्र विशेष्योपादानमन्तरेणाप्यर्थप्रतिपत्तिस्तद्रपि । उत्तमपुरुषयेऽप्यस्मदर्थस्य प्रतिपादितत्वात् तदनुपादानासिद्धे: ।

( शंका )—जैसे—यहाँ 'तवप्रसादात् कुसुमायुधोडपि' में विशेष्य का कथन किए बिना भी दोनों अर्थों का ज्ञान हो जाता है—उसौ प्रकार यहाँ ( पिनाकपाणि में ) भी होगा?—( उत्तर )—ऐसा कहना ठीक नहीं है । उत्तम पुरुप द्वारा ही उसका ( अस्मद् शब्दार्थ रूपी ) विशेष्य बना दिया गया है, अतः 'उसका उपादान नहीं किया है'—ऐसा तहाँ कहा जा सकता ।

विशेष्योपादानमन्तरेणाप्यर्थप्रतिपत्तिस्तद्रपि । कुसुमायुधशब्दोडपि हि विशेषणमपि विशेष्यमप्यवगमयत्यत्र । न तु तस्य पृथक्प्रमेयांग: ।

अन्नापि—पिनाकपाणिरिस्यत्र । लिडुतमपुरुषघटनेवैति 'अस्मद्युक्तम:' ( १-४-९७ ) इत्यत्र हि स्थानिन्यपि स्थानिवदन्वर्त्तनादप्रयुक्तेडप्यस्मच्छब्दे तदर्थसमभवे उत्तमपुरुषो भवत्येव । तदनुपादानं विशेष्यानुपादानम् ।

विशेष्योपादान—कुसुमायुध शब्द में भी विशेषण होते हुए—विशेष्य को भी अवगत करा देता है । ( विशेष्य से ) अलग न रहने के कारण उसका अलग से प्रयोग नहीं भी हुआ है ।

अन्नापि—पिनाकपाणि में भी ( हर की जरूरत न होगी ) लिड्लकार के उत्तम पुरुष 'कुर्याम्' द्वारा ही । 'अस्मद्युक्तम:' में स्थानिन्यपि का अनुर्वतंन होता है, अतः अस्मद् शब्द का प्रयोग न होने पर भी उसका अर्थ निकल आता है, इसलिये उत्तम पुरुष आ ही जाता है ।

तदनुपादान—विशेष्य का अनुपादान ( कुसुमायुध में विशेष्य ( काम ) का अनुपादान ) ।

यथा च— 'निर्जाय विद्याथ दिनादिरम्यादृ बिस्वादिचार्कस्य मुखान्महार्ष: । पार्थाननं वह्निकणाददाता दीक्ष: स्फुरत्पदमिवांभिपेदे ॥' इति ।

अथ हि महर्षिमुखादेविम्वयाद्विद्यादानस्याः पार्थाननपज्जयाश्रोंपमानोपमेयभावावगतिरेकस्यैवशब्दस्य व्यापार: । तथा हि महर्षिमुखादृ विद्या निर्याय पार्थाननमभिपेदे अर्कबिस्वादिच दीक्ष: पज्जयमिति । एवं पदर्थसमन्वये सति सर्वेषामुपमानोपमेयभावोऽभिमत: ।

सिद्धयत्येवेति यत् तत् तत्रैवेषां साम्याभिधायिनासुपादानं तत् पुनरुक्तमेव अन्यथा विद्या दीक्षिरिवेति ।

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द्वितीयो विमर्शः

स्यापीवरशब्दस्य प्रयोगः प्रसज्येत इति 'सकुरतपदामभिपपेद' इत्यत्र युक्तः पाठः । यथा वा—

'दिने दिने स परिवर्धमानो लङ्घोदयाच चान्द्रमसीव रेखा । सुपोष लावण्यमयान् विशेषान् ज्योत्स्नान्तराणीव कलान्तराणि ॥' इति ।

और जैसे—

विद्या, महर्षि के सूर्य विम्ब के समान प्रभातरम्य मुख से निकल कर खिल रहे कमल तक चिनगारियाँ जैसी दोपथि के समान अर्जुन के मुख तक पहुँची ।

यहाँ केवल एक ही इव शब्द महर्षि मुख और अकुबिम्ब, विद्या और दीप्ति, पार्थानन और पद्म के उपमानोपमेयभाव का ज्ञान करा सकता है [ यदि ऐसी वाक्य योजन हो ] 'महर्षि के मुख से निकल कर विद्या पार्थ के मुख तक पहुँची, जैसे सूर्य विम्ब से निकल कर प्रकाश-पद्म तक [ पहुँचता है ] । इस प्रकार पदार्थों का समन्वय हो जाने पर सकल उपमानोपमेयभाव जो कि अभीष्ट हैं, सिद्ध हो ही जाता है, इसलिये वहाँ जो अन्य ( द्वितीय ) उपमावाचकों ( वाचक पद ) का उपादान है, वह पुनरुक्ति हो है ( ऐसे तो ) विद्या दीप्ति के समान—इस प्रकार तीसरे इव शब्द का भी प्रयोग अभिहित हो जायगा। इसलिये—'सकुरतपदामभिपपेद' पाठ चाहिये ।

अन्येपामिति । बहुवचनाद्दिहेतु स्थानेष्वेवकेनैवेवशब्देन गतार्थत्वाद अन्येपां प्रयोगो विफल इत्यभिप्रायः । तृतीयया पृथक्तिं वाक्यार्थैरपम्यविवक्षायामेक एवशब्दः प्रयोक्तव्यः । न तु पदर्थोपम्यविवक्षणे तु यावन्तो विशेष्यभूताः पदार्थास्तावन्त एवशब्दाः प्रयोक्तव्याः । न स्वधंर्जरतीयं कार्यमित्यर्थः । एतच्चाभ्युपगमवादेनोक्तम् ।

पदार्थोंपमा कार्य इत्यस्य पदः । तथा च दिनेदिने इत्यादिना दृश्यतिष्यति ।

दिने दिने इति । अत्र चान्द्रमसी लेखायाः पार्वत्युपमानं, विशेषाणां च लावण्यमयान्ति विशेषणम् । तत्तस्थानीयं कलान्तराणि ज्योत्स्नान्तराणीति । ज्योत्स्नान्तरे येषामिति हि व्याख्या । 'दिनेदिने' इत्यादि पार्वतीन्दुलेख्योः साधारणो धर्मः । न तु कलान्तराणि कृत्वणि ज्योत्स्नान्तराणीति पुष्णातीति साध्वी व्याख्या वचनभेदादिदोषप्रसङ्गात् ।

अन्येपाम् ००—इसमें बहुवचन होने से बात यह आईं कि ऐसे स्थलों में एक ही इव शब्द द्वारा काम चल जाता है, इसलिये दूसरों का प्रयोग व्यर्थ होता है ।

तृतीयस्यापि—वाक्यार्थ की उपमा की विवक्षा होने पर एक ही इव शब्द प्रयुक्त किया चाहिये । जहाँ पदार्थंगत उपमा की विवक्षा हो वहाँ जितने विशेष्यभूत पदार्थ हों उतने ही इव शब्द प्रयुक्त किये जाने चाहिये ।

अर्थेजरतीं ( पहले व्याख्यात ) काम ठीक नहीं । यह अभ्युपगमवाद द्वारा ( मानने भर के आधार पर ) कहा ।

इतना पक्ष तो यह है कि जहाँ वाक्यार्थोपमा हो सकती है वहाँ पदार्थोंपमा नहीं की जानी चाहिये ।

उससे 'दिने-दिने' पर दोष दिखलावेंगे ।

दिने·दिने—यहाँ चन्द्रलेखा का उपमान है पार्वती, अंगों के हैं कला भाग । विशेष ( अंग के पर्याय ) का विशेषण है—'लावण्यमयानी' उसके स्थान पर कला·अन्तर का विशेषण है—'ज्योतखान्तर पर्याय' का विशेषण है—'लावण्यमयानी' उसके स्थान पर कला·अन्तर का विशेषण है—'ज्योतखान्तर

जिसकी व्याख्या है—'ज्योत्स्ना है अन्दर जिसके' । 'दिने-दिने' ( दिन-दिन बढ़ना ) आदि पार्वती

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व्यक्तिविवेकः

और चन्द्र लेखा का साधारण धर्म है । इसे कला भागों को कर्त्ता मान कर वे ज्योत्स्ना को पुष्ट करते हैं—ऐसी व्याख्या ठीक नहीं । इसमें वचन भेद ( पुष्णान्ति की जगह पुष्णगाति का प्रयोग ) आदि दोष आते हैं । यहाँ—‘जैसे चन्द्र लेखा दूसरी कलाओं को पुष्ट करती है’—इस प्रकार एक ही ( एव ) शब्द से वात निकल आने पर भी जो द्वितीय एव-शब्द दिया गया है वह पुनरुक्त है ।

विमर्श—व्याख्यान में ‘अत्र चान्द्रमस्या लेखायाः पार्वत्युपमानम्’—ऐसा छपा है ! हमने उसी के अनुसार उसका अनुवाद कर दिया है । वस्तुतः पार्वती उपमेय है उपमान नहीं । मालूम पड़ता है । यह मूल लेखक की है । क्योंकि ‘विशेषणानि कलान्तराणि उपमानानि’—इस प्रकार जो वाक्य बनता है उसके समक्षता में पार्वत्या: चान्द्रमसी लेखा उपमानम्, यह पूर्व वाक्य चाहिये तभी चन्द्रलेखा उपमान, पार्वती उपमेय, कलान्तर उपमान और विशेष ( अंग ) उपभेय बन सकते हैं । कुछ लोग कलान्तर को कर्त्ता मानते और ज्योत्स्नान्तर को उसका कर्म मानते हैं । उनके अनुसार व्याख्या करने में पुणोष इस एकवचनान्त क्रियापद को बदल कर ‘पुष्णान्ति’ इस प्रकार बहुवचनान्त क्रिया पद बनाना पड़ेगा । ऐसा करने पर छन्द दोष भी होगा और पूर्व वाक्य से उत्तर वाक्य की संगति न रहेगी । इत्यादि कई दोष होंगे । मधिनाथ ज्योत्स्नान्तर दो व्याख्या व्याख्यान में ‘ज्योत्स्नान्तराणि पुष्णगाति’—यह जो वाक्य है इसमें पुष्णगाति के स्थान पर ‘पुष्णान्ति’ पद चाहिए । क्योंकि मूलश्लोक में तो ‘पुपोष’ पद है । उसका उपमानगतरूप पुष्णान्ति ही हो सकता है । ऐसा मानने पर वचनभेद उपमान और उपमेय में मानना चाहिए । पार्वती में एकवचन है कलान्तराणि में बहुवचन ।

यथा च—

'यं समेत्य च ललाटलेखया युक्तः सपदि शम्भुविश्रमम् । चण्डमारुतमिव प्रदीपवच्चेदिपस निरवाद् विलोचनम् ॥'

अत्रापि 'दैपमचिरिव चण्डमारुतमि'ति युक्तः पाठः ।

और जैसे—

आँधी के समान जिससे मिलने पर दीप के समान शिखुपाल का वह नेत्र नष्ट हो गया, जिसे ललाट में रेखा रूप से धारण कर वह शंकर भगवान् का रूप धारण कर सकत था ।'

यं समेत्येति । अत्र यमित्यस्य चण्डमारुत उपमानं, चेदिपस च प्रदीपः । तुल्यार्थे वति: । विलोचनप्रशमनवेद शम्भुविश्रमस्यागा: । अत्र च दत्तेडपि पाढे कर्मभूतयोरुपमेयो-पमानयोर्ललाटलेखयेत्यादिविजातीयपदगर्भितत्वं विकृतपदप्रयोगो वैरसयं च दुष्टपरिहर-मेव । तेन ‘चण्डमारुतनवप्रदीपवद्ध’ इति पाठः श्रेयान् । एवं हि मिथोऽदसस्थाने नशब्दमात्र-करणेन स्तोकेमात्रव्यत्यासेन सौकर्येण दोषपरिहारप्रतीति: सौन्दर्यं च ।

यंसमेत्य—यहाँ ‘यम्’ इसका उपमान चण्डमारुत है और चेदिपति ( शिशुपाल ) का दापक । वति प्रत्यय—तुल्य अर्थ में है । आँख के नष्ट होने से शम्भुविश्रम ( शिव की आकृति धारण करना ) समाप्त हुआ । यहाँ सुधार कर दिये गये पाठ में भी कर्म रूप से आए उपमान और उपमेय दोनों के बीच एक बेतुका—‘ललाटलेखया’—शब्द आ गया है । इसलिये इस विकृत शब्द का प्रयोग विरसता को पैदा करता है । इसलिये ‘चण्डमारुतनवप्रदीपवद्’ पाठ अधिक अच्छा हो । इसमें ‘मि’ शब्द की जगह केवल ‘न’ शब्द करना पड़ता है, जरा से बदलने से सुख के साथ दोष मिट जाता है और सौन्दर्य भी चला आता है ।

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द्वितीयो विमर्शः

विमर्श—टीकाकार ने एक बात ‘ललाटललटया’ की कही और दूसरी अपने पाठ की । दोनों में से प्रथम बात तो कहते हैं । द्वितीय के लिये यदि पाठ बदलना ही हो तो—‘चण्डवेगमनिलं प्रदीपवत्’ पाठ करना चाहिये । इससे ‘यं समेष्य’ द्वारा जैसे उपमेय स्वतंत्र रूप से कथित है वैसे ही उसका उपमान चण्डवेगपवन भी कथित हो जाता है । फलतः उपमा के दोनों अंग प्रमुख रूप से सामने आ जाते हैं । समास करने पर उपमान प्रदीप में समा जाता है ।

यथाह च—

‘नवचन्द्रकाकुशुमकर्णर्णतमः—कवरीभृतो मलयजार्द्रमिव । ददृशे ललाटतटद्युतिरहरेर्हरितो मुखस्य हिमरश्मिदलमिव ॥’ इत्यत्रापीचशब्दप्रयोगः पुनरुक्तो हारस्यननेनैव तदभिन्नार्थेन तदर्थस्य प्रतिपादितत्वात् । नचाऽभयोरभिन्नार्थत्वेऽपि हारस्य पौनरुक्त्यं युक्तं वकुं तस्य यथास्थानमवस्थानादिवशब्दस्य च विपर्ययेगण क्रमभेददुष्टत्वा- दिति ‘ददृशे ललाटतटमिन्दुद्युतो वदनस्य हारि हिमरश्मिदलमि’ति वरमत्र- पाठो युक्तः । यथाह च—

वर्णः कोऽप्यरवेद श्रेष्ठतस्य स्वरैरैच । अनन्ता वाक्प्रसस्याहो गेयस्यैव विचित्रता ॥’ इत्यत्र द्वितीय इवशब्दः पुनरुक्तः । एवम् इवशब्दौ युक्तौ ‘गेयस्य वाड्- यस्मादाहोऽपर्यन्ता विचित्रता’ इति ।

जैसे और— इन्द्र की दिशा ( पूर्व ) के मुख ( आरंभ और चेहरे ) का हिमरश्मिदल ( चन्द्रविम्ब और ठण्डी किरणों का समुद्राय ), जो कि नई नाड़नदी के तारों से कहूँ-कहूँ अंधकार की कवरों ( केशपाश ) से युक्त था उसेके मलयागिर चन्दन से भीगा हुआ सा ललाटतट के समान आकृष्ट dिखाई दिया ।

यहाँ इस इव शब्द का प्रयोग पुनरुक्त है । ‘हारि’—शब्द से ही उसका अर्थ निकल सकता है । उसका अर्थ उससे अभिन्न है । दोनों अभिन्न हैं तो भी ‘हारि’ को पुनरुक्त नहीं कहा जा सकता । वह अपने ठींक स्थान पर प्रयुक्त है । इव शब्द ही अपने स्थान पर नहीं है । इसलिए इसमें क्रमभेद दोष है । अतः ‘ददृशे—हिमरश्मिदलम्’ = ‘पूर्वदिशा के मुख का हिमरश्मिदल ( चन्द्रविम्बरूप ) आकर्षक ललाटतट दिखाई पड़ा’ पाठ अधिक अच्छा होगा ।

और जैसे— स्वरों के समान कुछ ई वर्णों से बने वाक्य की संगीत के ही समान बड़ी विचित्रता है । यहाँ दूसरा इव ( सम ) शब्द पुनरुक्त है—ऐसा पाठ यहाँ ठीक होगा—‘गेय और वाड्मय की विचित्रता का अन्त यहीं ।

मलयजार्द्रभिवेति हिमशुक्लण्डस्योरपे दग्धस्वेनोपनिबद्धमाकाड्‌लासक्रिधिसामध्यां ललाटत- टस्य विशेषणं यथावस्थितं कवरीमग्रयः । वस्तुतस्तु वाक्यद्वयप्रयोगेनात्रापीचसिद्धेरिव- शब्दः पुनरुक्तः । न चन्द्रवण्‌डस्य मलयजार्द्रस्वोप्रे च्छने प्रयोजनं किञ्चित् । यत्र चैतद्‌धि- विशेषणमुपयुज्यते, तत्नेवशब्दप्रयोगो व्यर्थः ।

तदभिन्नार्थनेति समास इवार्थंगर्भीकरणात् । विपययेगण इति ललाटतटनिकटे प्रयोगाहंवात् । वरमिति इवशब्दस्य भिन्नकमत्स्वापरिहारादनवत्सः । केवलं हारिक्यस्य समासकरणादिवार्थे

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३५०व्यक्तिविवेक:

प्रतीतेरिवशब्दो न पुनरुक्त इति पौनरुक्त्यपरिहारः कृतः । अहो अपर्यन्तेति 'ओद्र' ( ९-९-९५ ) इति प्रगृृद्यसंज्ञा ।

मलयजाद्रे—यह उत्प्रेक्षा द्वारा हिमांचलसुन्दर के लिए आया है, तो भी आकांक्षा और सन्निधि के बल पर ललाटतट का विशेषण बन जाता है । यह है कवि का अभिप्राय । वस्तुतः इस शब्द का विकल्प प्रयोग न होने पर भी वात वन सकतीं है इसलिए इस शब्द पुनरुक्त है । चन्द्रखण्ड की मलयजाद्रे रूप से उत्प्रेक्षा करने का कोई मतलव नहीं । जहाँ इस विशेषण की उपयोगिता है वहीं इस शब्द का प्रयोग अपेक्षित नहीं ।

तद्भिन्नार्थे तद्वेन—समास में इसशब्दार्थ आ जाने से ।

विपर्ययेण—अर्थात् उस ( इन ) का प्रयोग ललाटतट के पास चाहिए था ।

वरम्—अर्थात् इस शब्द की भिन्नकमता ( क्रमभेद दोष ) का परिहार न होने से उसे सर्वथा वदलना पड़ा । केवल 'हारि'—यहाँ समास करने से इसशब्द का अर्थ वतला देता है, इसलिए इसशब्द पुनरुक्त है, अतः पौनरुक्त्य का परिहार किया ।

अहो अपर्यन्ता = यहाँ 'ओद्र' सूत्र से प्रगृद्यसंज्ञा होने के कारण पूर्वसवर्ण नहीं हुआ ।

उपमारूपवेत्यादिना—

'अलङ्कारस्य कस्यापि यत्रोल्लङ्घनमन्तरम् । असन्तुष्टा निवर्तन्ते हारादेमणिवन्धवद् ॥' [ वक्रोक्तिजीविते ९९३५ ]

इति वक्रोक्तिजीवितकृतोक्तमलङ्कारयुपपातिनमलङ्कारं दूषयति ।

उपमारूपकेत्या(दे)— ग्रस्थ द्वारा अव ग्रन्थकार—वक्रोक्तिजीवितकार के—'जहाँ कविलोग असंतोष के कारण एक अलंकार में दूसरा अलंकार जोड़ते हैं, जैसे हार आदि में मणि आदि ।'—इस प्रकार प्रतिपादित 'अलंकारों के पीछे अलंकारों के प्रयोग' को दृष्टि ठहराते है—

पदमुपमारूपकेऽपि इवशब्दप्रयोगः पुनरुक्तोऽवगन्तव्यः । यथा—'निम्नकमुक्तिमिव गगनोरगस्य लीलाललाटिकामिव त्रिविष्टपटस्य' इति । यथा च 'शान्तः श्यामालतताया: परशुरिव तमोडरणयवहेरिवाचि'रिति । अत्र हि रूपकस्योपनिबन्धः श्रेयान्, नोपमाया:, तस्यास्तनमुखेनैव प्रतीतिसिद्धः । न व्यासति साधर्र्ये कचित् स्वस्थधीरतसिमस्तत्वमारोपयति । यथा—

'आलानं जपलक्षणस्य करिणः सेतुविंपद्याधरे: पूर्वाद्रिः कर्वालचण्डमहसो लीलोपधानं श्रियः । सद्रत्नामृतसागरप्रमथनकीडाविधौ मन्दरो राजन् ! राजति वीरचैरविनितावैधव्यदस्ते भुजः ॥' इति ।

इसी प्रकार उपमारूपक में इस शब्द का प्रयोग पुनरुक्त जानना चाहिए ।

उदाहरणार्थ:—आकाशा रूपी साँप की छूटी हुई सौ केंचुल, स्वर्गरूपो विट की लीलाललाटिका ( ललाट-भूषण ) सी । और जैसे—

'श्यामालतता का छेदक फरसा सा, अंधकाररूपी जंगल के लिये अमि की ज्वाला सी ।' यहाँ रूपक का प्रयोग ठीक है, उपमा का नहीं, उस ( उपमा ) की प्रतीति उसी ( रूपक ) के द्वारा हो जाती है । ऐसा नहीं है कि सादृश्य न होने पर भी सही दिमाग का कोई भलामानस किसी का किसी पर आरोप कर दे ।

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द्वितीयो विमर्शः:

जैसे—राजन् ! दाढ़ वीरों की खियों को विधवा करने वाली आपकी मुजा विजयरूपी हाथी के लिये आलान ( हाशी का खूँटा ) मालूम पड़ती है, विपत्तिरूपी समुद्र के लिये सेतु, तलवाररूपी प्रखर सूर्य के लिये उदयाचल, लक्ष्मी के लिये लीलोपधान ( सुन्दर तकिया ) और संग्रामरूपी अमृतसागर को मथने के खेल के लिये—'मन्दराचल ।'

निरोंकमुक्तिभिवेति अत्रोपमारूपकत्वं परप्रसिद्धयोक्तम् । न तु विद्वदुपमारूपकम् । उत्प्रे- क्षारूपं तु स्यात्, निरोंकसुक्तिससम्भाध्यमानस्ववेन प्रतीते:। तथा हि निरोंकानुगुण्यात् तावद् गगनस्योरगेव रूपणम् । निरोंकसुक्तिनां ताटस्थ्येन प्रतीयते किंतु गगनोरगसस्वन्धावेन । गगनोरगसस्वन्वन्धावेन च प्रतीतौ न साध्यम् अपि स्वध्यवसाय: ।

तस्य च प्रवर्त्तमानत्वमित्युच्चैव उचायसी प्रतीतौ । अतःश्रवैदं मुक्तिपदं कृततम् । अन्थया शुद्धसादृश्यप्रतिपादने धर्म्यंव विशिष्टो निरोंक उपमानस्ववेन निर्देश्य: स्यात् । भिन्नरिङ्यो- रूपमाया दुष्टत्वान्निर्दिष्ट इति चेत्, साधारणधर्मस्यानिर्देशे निर्देशस्यापि वा द्वैरूप्याभावे भिन्नरिङ्यो- रूपि 'शोभा रचिकृति रगडोदय'मित्यादौ 'हन्ति वहन्ति दोष इव नृपतीनां गुणान् इह ( सहैव ? ) दुर्विनयम्' इत्यादौ चोपमानोपमेयभावेप्टस्ात् । तस्मादुपमायां निरोंक इवेति स्यात् । उद्देश्यां क्रियामत्रोऽप्येच गम्युपपद्यत इत्युप्रेक्षारूपकमेतत्परमार्थतः ।

एतदस्माभिहेतुंचारितवतां तत्रैव विस्तरुण्य प्रतीपादितं तैैवावसेयम् । एवं परगुरिवेत्यादौ वाच्यम् । 'तमोरण्यवहरिरा'ंच:'रिति । अत्र तमसोऽरण्येल्ल रूपणे वहिरचिस्समस्वन्धितया विवक्षितः समासे निवेशनीयः यतो न क्रशिदत्र निर्दिष्टे यो वहिना रूप्येत । तस्मात् तमोरण्यस्य वह्यर्चिरिति वाक्यन्यम् इत्यत्र वाच्यावचनं दोषः ।

आलानमिति सत्रैव साधश्ये आरोप्यारोपकभावस्थ्य निदर्शनम् । निरोंकमुक्तिरिव—यहाँ उपमारूपक—केवल प्रसिद्धि के कारण बतलाया गया है, वस्तुतः

वतलाना चाहिये उत्क्षेपारूपक, कारण कि निरोंकमुक्ति की प्रतीति सम्भाव्यमान रूप से मान्य है । उसी प्रकार निरोंक के अनुरोध से गगन पर साँप का आरोप किया गया है । रूपक बन जाने पर निरोंकमुक्ति तत्स्थरूप से ( स्वतंत्र रूप से ) प्रतीत नहीं होती, अपितु गगनोरगसस्वन्धपूर्वक् ही प्रतीत होती है । और—गगनोरगसस्वन्धपूर्वक् प्रतीत होने में साध्यस नहीं अपितु अध्यवसाय होता है । वही प्रवर्त्तमान है । इसलिये प्रतीति में तो उत्क्षेपक्षा ही प्रवृत्त है । इसलिये मुक्तिपद भी दिया गया । शुद्ध सादृश्य का प्रतिपादन करना होता तो विशिष्ट धर्मी = निरोंक ही उपमान रूप से कहा गया होता—यदि यह कहा जाय कि जिनमें लिङ् भिन्न होते हैं उनमें उपमा द्रोषावह होती है तो भी ठीक नहीं, साधारण धर्मों का निर्देश न होने, अथवा निर्देश होने पर भी भिन्नरूपता न हो तो लिङ् संख्या में भेद रहने पर भी 'यह—नपुंसक लिङ् के समान चलता है—इत्यादि में' जैसी मजे की बात है कि राजाओं के दोष उनके गुणों के समान ही—दुर्विनय को समाप्त कर देते हैं ( ?) इत्यादि के समान—उपमानोपमेयभाव माना ही जाता । इसलिए उपमा होने पर तो केवल 'निरोंक इव' यहाँ पाठ होता । उत्क्षेपक्षा में केवल क्रिया की

सम्भावना की जा रही है अतः वस्तुतः यह उत्क्षेपारूपक है । इसे हमने हेतुंचारितवार्त्तिक में विस्तारपूर्वक समझाया है, उसे वहीं से देख लेना चाहिये । इसीलिये प्रकार परगुरिवेत्यादि में समझना चाहिये ।

तमोऽरण्यवहिः—में तम को अरण्य रूप से उपस्थित कर वहि को अर्चि से संबन्धित दिखलाना चाहा है, अतः उसे समास में ('वह्यर्चि:'—इस प्रकार ) दिखलाया जाना चाहिये, कारण कि ऐसा कोई भी पदार्थ नहीं दिया गया है जो वहिरूप से उपस्थित किया जाय ।

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३५२

व्यक्तिविवेक:

इसलिये 'तमोडणयस्य वह्न्याद्नेः'—इस प्रकार कदनना चादिये । ( ऐसा नहीँ कहा ) इसलिये वाच्यावचनदोय हुआ ।

आलानम्—यह साधुरस्य होने पर ही आरोप्य—आरोपकभाव होने का उदाहरण है ।

यथा च—

'अडुल्लोभिरिव केशाश्रयं सन्निगृह्य तिमिरं मरीचिभिः । कुङ्गमलीकृतसरोजलोचनं चुम्वतीव रजनोमुखं राघवोः ।।' इति ।

ग्रत्न हि चुम्वतीवेत्यत्रेवशब्दः पुनरुक्तः चुम्वतेपुज्यार्थवाघे सति तत्सदृशार्थेप्रतीतेस्सामर्थ्येसिद्धत्वोपपादनादिति ।

एवम्

'रमरहुताशनमुखरचूणर्तां दधुरिवाग्रवणस्य रजःकणाः । निपतिता परितः पथिकव्रजानुपरि ते परिणतेभुरतो भूराम् ।।' इत्यत्रापि वेदतद्यम् ।

और जैस—

'डंगालियों से केशपाशाके के समान किरणों से अंधेरे को बेघोर कर, चन्द्रमाँ सुन्दरकमल रूपी आँखों से युक्त निशामुख ( निशा—रात्रिका मुख और रात्रि का आरंभ ) को चूम सा रहा है ।' यहाँ—'चुम्वतीव' मे इव शब्द पुनरुक्त है । चुम्बन क्रिया के मुख्यार्थ का वाघ हो जाने पर उसके समान अर्थ का ज्ञान उसी की शक्ति से हो जाता है—ऐसा पहले बतलाया जा चुका है । इसी प्रकार—'अमराई की ( पुञ्ज ) घूली ममानों कामद्रि के अंगारों का घूरा वन गई थी इसलिये ( उसके ) चारों ओर पथिकों पर झड़ने से वे दुःखी हुए ।' यहाँ भी जानना चाहिये ।

चुम्वतां ति । अत्रोभयेर्थे प्रयुक्तस्येवशब्दस्य लचणासमर्थितेनार्थेन कृतार्थत्वात् पुनरुक्तंवम् । अत्र चोपमारुपकाभिमते ।

एवंविधे च पदेशे ग्रन्थकारो हेवाकितयैव दूषणमदात् । तथा च शब्दार्थयोर्विच्छित्ति-रहुक्कारः । विच्छित्तिशब्दः क्रियाप्रतिभोद्दासरूपकवात् क्रियाप्रतिभोल्लासस्य चानन्वयादनन्वतवं रहुक्कारः ।

'वाचस्पतिसहस्राणां सहसैरपि यत्नतः । निबद्धा सा चयं नैति प्रकृतिजर्जरामिव ।।' [ ध्वन्यालोके-४ ] इति ।

अन्यत्राप्युक्तम्—'अजवि अभिणमुद्दो पजइ वाओ परिसप्पदो' । इति ।

( अद्वाध्यभित्रमुद्रः प्रजयति वाण्या: परिस्पन्दः । )

एवञ्च यदि विच्छित्त्यनंतरापेच्चया तस्य विच्छित्यानंतरस्य पौनरुक्रयं तदोपमाया रूप-काव्यपेचया पौनरुक्रयं स्यातं । उपमापेच्चया हि रूपकमतिशयोत्कर्षा बलोयसी । न चैवं प्रयुज्यते, विवक्षा या नानावात् । तथा हि कचित् साध्यमात्रं विवक्षितं । तत्रापि कचित् क्रचिदारोपः । क्रचिदध्यवसायेडपि क्रचित् साध्यत्वं क्रचित् सिद्ध(सिद्ध)ोपमादिकमेवात्र विवक्षितं । तथा च संयोजनक्रमेण नवं क्रचित् सिद्ध(सिद्ध)ोपमादिकमेवात्र विवक्षितं । तथा च संयोजनक्रमेण नवं विचित्रवैचित्र्यसमु भूयमानमाश्रितं च महाकाव्यविमः कथं संक्षेप हचिच्छेवनोपपदूदूयते । न हीदं वाक्यं लचणशब्दं, येन मात्रालाववं चिन्म्यते । तत्रापि वा न नियमेन लाववमाश्रितं महद्धिः । तथा हि वाग्रहणस्य स्थाने डन्यतरस्यां ग्रहणमपि कृतं । विचित्रवैचित्र्यं तैर-स्पाश्रितमेव । तदुक्तं 'विचित्रा हि सूत्रस्य कृतिः पाणिने:' इति ।

एवञ्चात्र कृतेपि रूपके

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द्वितीयो विमर्शः

उत्प्रेक्षादिनिवन्धः कथमपि गुणमुत्कर्षयति न दोपमिति सहदयैर्नैवंपुनी रुपपणीयम् । नतु हेत्वाकस्य पश्चाल्लगनीयसिद्धास्तां तावत् । प्रकृतमनुसाराम् । सुमुरः = अग्नारः । आश्रवणं (प्रतिरन्त्र) सूत्र ८।४।५) रति पदार्थम् । पधिकन्रजान परित इति । परितः शब्दद्योेऽभितः परितः समयानिकषा' इति द्वितीया । अन्र द्रुरिवेति 'दूव'-शब्दः पुनरुक्त एव, वसवन्नरभूतानां रजःकणानां वसवन्नरभूतमुखुरचूर्णस्वधारणेन सुप्तुसादृश्यप्रतीते । एवं-

'तत् पातु वः श्रीपतिनाभिपदं स्वाध्यायशाला कमलासनस्य । दीर्घेर्निनादैर्दीर्घटेनुकरं सामध्वनिनामिव यत्र भृङ्गः ।'

इत्यादावनुकारशब्दप्रयोगे इवादिशब्दप्रयोगस्य पौनरुक्त्यमवसेपम् । चुम्वतीव—यहाँ उत्क्षाँ अर्थ में प्रयुक्त इव शब्द का अर्थ—लक्ष्यगा द्वारा उपस्थित किये अर्थ से निकल आता है। अतः पुनरुक्त है। यहाँ उपमा-रूपकादि रूप से अभिमत उदाहरणों में और ऐसे हो अन्य क्षेत्र में—ग्रन्थकार ने ऐेसे हो दोप हठराए हैं, कारण कि—अलङ्कार है—'शब्द और अर्थ की विच्छित्ति'। और विच्छित्ति अनन्त प्रकार की होती है, कारण कि वह कविप्रतिभो-लास-स्वरूप होती है और कविप्रतिभा का उछलास अनन्त प्रकार का होना है। इसलिए उस (अनन्तता को प्राप्त विच्छिति) को समीचीन नहीं किया जा सकता। इसीलिए द्वानिकार ने कहा है—'यह हजाओं हजार नाचस्पति द्वारा यत्नपूर्वक ग्रन्थ रूप में उपस्थित किये जाने पर भी क्षीण नहीं होती, जैसे हजाओं हजार बर्षों में परिणत होने पर भी प्रकृति ।' एक दूसरे स्थान पर कहा है—

'आज भी जिसकी मोहिनी नहीं टूटी वह वाणी का परिस्पन्द सबसे उत्कृष्ट है—।' इसीलिए यदि एक विच्छित्ति को लेकर दूसरी विच्छित्ति को पुनरुक्त माना जाय तो रूपकादि की अपेक्षा उपमा-रूपक या अतिशयोक्ति उपमा को लेकर हाँ होते हैं। कहाँ केवल सादृश्य की विवक्षा होती है, उसमें भी कहाँ अभेद, उसमें भी कहाँ आरोप और कहाँ अध्यवसाय । अध्यवसाय में कहीं साध्यता होती है कहीं सिद्धता—इस प्रकार विच्छित्ति के प्रकार अनन्त होते हैं। इतने पर भी महाकवियों ने मिलाकर अनेक प्रकार के नये नये विच्छित्ति-प्रकार अपनाए हैं, जो अनन्तसमय में आते जा रहे हैं। उन्हें केवल इसीलिए कि (आपको) संक्षेप प्यारा है (भला) क्यों बिगाड़ा जा रहा है। यह वाक्य (काव्यवाक्य) लक्षण (व्याकरानादि) शास्त्रस्वरूप नहीं है, जिसमें—मात्रा तक वचन पर ध्यान दिया जाय। वहाँ भी (पाणिनि आदि) महर्षियों ने नियमपूर्वक मात्रालाघव का पालन नहीं किया। देखा जाता है—कि ('वा पदान्तस्य' आदि के समान) जहाँ 'वा' शब्द के बिना पर्याप्त था वहाँ ('जराया जरसन्यतरस्याम्'—आदि में) 'अन्यतर-

रस्यान' का ग्रहण किया गया है। विच्छित्ति को उन्होंने अपनाया ही । जैसा कि कहा भी जाता है—कि—'पाणिनि की सूत्ररचना वैचिच्यपूर्ण है। इस प्रकार इन पद्यों में रूपक करने पर भी उल्लेख्या आदि का पुट एक प्रकार की शोभा को ही बढ़ाता है, दोष को नहीं। इस पर सहदयों को जरा गहरे जाकर विचारना चाहिये। न कि हेत्वाक के पीछे लगना चाहिये। अस्लु, इस चर्चा को यहीं छोड़ें और प्रकृत का अनुसरण करें :

सुमुरः = अंगारा ।

आश्रवण—'प्रतिरन्त्र' सूत्र० ८।४।५ से (वन के) 'न' को 'ण' हुआ ।

पधिकन्रजान—परितः शब्द के योग में ('अभितःपरितः'...) इत्यादि से द्वितीया। यहाँ 'द्रुरिव' इसमें इव शब्द सच्चमुच पुनरुक्त है। रजःकण दूसरी चीज है और सुमुर दूसरी चीज ।

२३ तृ० वि०

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व्यक्तिविवेक:

इतने पर भी रजःकरणों ने सुरुरचूर्णतत्व धारण किया ऐसा कहने से ( रजःकरण और सुरुरचूर्ण में ) साधृश्य की प्रतीति अच्छी तरह हो जाती है। इसी प्रकार—विष्णु का वह नाभिपद्म आपको रक्षा करे जो ब्रह्मा की स्वाध्यायशाला है, जहाँ भौरे अपनी ऊँची गुंजार से सामध्वनि का अनुकरण सा करते है²—इत्यादि में अनुकरण शब्द का प्रयोग होने पर भी इस शब्द का प्रयोग ( ग्रन्थकार के अनुसार ) पुनरुक्त ही समझना चाहिये ।

यथा च—

'तृतीययोग: परेणापि न महिषा महीयसाम् । पूर्णशशान्द्रोदयाकाङ्क्षी दृष्टान्तोऽत्र महानपि ॥

अत्र हि प्रतिवस्तुपालड्कारान्महर्णवमहीयसासुपमानोपमेयभावमवगम्यमानमचर्धीर्ये यद् दृष्टान्तशब्देन पुनरम्हार्णवस्स्योपमानतववचनं तत् पुनरुक्तम् । मानमचर्धीर्ये यद् दृष्टान्तशब्देन पुनरम्हार्णवस्स्योपमानतववचनं तत् पुनरुक्तम् ।

वाच्यो हार्थों न तथा स्वदते, यथा स एव प्रतীয়मानः । अत एवम्— 'सद्वारपूरानि दिगन्तराणि कृतवा दिनान्ते निलयाय गन्तुम् । प्रचक्रमे' पल्वलश्रेणी प्रथमा पतङ्गस्य गन्तुम् ॥'

इत्यत्र प्रभाधेन्वो: 'प्रभेव भानो: सुरभिमर्महर्ष'रिंति रिंशब्दवाच्यामुपमामनाड्तस्य कविना पूर्ववद् दीपकमुखेनोपमेयभावो भणित: । एवमलड्कारान्तवाच्यामुपमा-

रूपकादिरितत् श्रेयानलड्कारेषु नोपमा ॥ ३९ ॥ इति सद्दूषणदशोका:

और जैसे :— प्रभूत प्रसुत्व मिलजाने पर भी बड़ों को तृप्ति नहीं मिलती, चन्द्रोदय की आकाङ्क्षा रखने वाला पूर्ण महारणव इसका उदाहरण है ।³ यहाँ—प्रतिवस्त्वलङ्कार द्वारा महारणव और 'महीयस' ( बड़ों ) का उपमानोपमेयभाव समझ में आता है, इतने पर भी उसे छोड़कर जो दृष्टान्त शब्द द्वारा फिर से 'महारणव' का उपमानभाव बतलाया गया वह पुनरुक्त हुआ । वाच्य अर्थ उतना स्वाद नहीं देता जितना प्रतिपमान देता है ।

इसलिये = 'अपने' भ्रमर से दिगन्तराल को पवित्र कर दिन डूबा—कि घर पहुँचने के लिये पत्तों की ललोई सी लाल-सी की प्रभा ने—लौटना शुरू किया और मुनि को धेतु ने भी । यहाँ कवि ने—प्रभा और धेतु का 'सूर्यप्रभा' के समान मुनि की धेतु' इस प्रकार उपमान को शब्दवाच्य नहीं बनाया, प्रत्युत उसकी उपमेयता पहले के समान दीपक द्वारा बतलाई । इस प्रकार अन्य अलङ्कारों में भी यथायोग समझना चाहिये । वाच्य की अपेक्षा प्रतिपमान अर्थ उसके जानकारों को अधिक अच्छा लगता है । इसलिये अलङ्कारों में रूपक आदि अधिक अच्छे होते हैं—उपमा नहीं ।

प्रतिवस्त्वलङ्कारादिति 'पूर्ण: शशाङ्काम्बुयुग्मसाकाङ्क्षिति महारणव:' इति प्रतिवस्तूपमया साधृश्यप्रतीतौ दृष्टान्तशब्दोक्तिदुष्ट । नच दृष्टान्तालङ्कारव प्रतिपाद्यितुं दृष्टान्तशब्द: । दृष्टान्तशब्दाद् दृष्टान्तालङ्कारस्वप्रतीते: । न हि षष्ठ्यादिपरिहारेण सम्बन्धिशब्दात् सम्बन्ध- प्रतीति: । अदूरविप्रकर्षण तुविधानं वस्तुसंस्पर्शि भवतीति ।

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ननु स्वकप्ठेनाभिधानमपहाय किमिति साधार्यप्रतीतिराश्रीयत इत्याह वाच्यो ह्यर्थ इति । पञ्चवदति । पूवॅं यथा ‘आलान’मित्यादौ रूपकमुखेनैतोपमानोपमेयभावः कथितस्तद्र-दिह द्रौपकमुखेनैवर्थः । अत्र च द्वयोः प्रभावेन्वोः प्रकारणिकत्वात् तत्रत्ययोगितामध्यतना मन्यन्ते । द्व्योरपि प्रकारणिकत्वे महाप्रकरणापेक्षया धेनोः प्रकृष्टं प्रकारणिकत्वं प्रभावा-स्त्वप्रकृष्टमित्येतदपेक्षया चिरन्तनैर्दीपकमेतत् स्थापितम् तदपेक्षयात्रानेन तद्वाच्यांयुक्तिः कृता । एवमलङ्कारान्तरे’पि समासोक्त्यादिप्रस्तुतप्रशंसादिषु । तत्राप्युपमानापेक्षयैव स्वक-प्ठेन नोपनिवन्धनीयः । तथा—

‘द्रविणमापदि भूषणमुल्सवे शरणमास्मभये निशि दीपिकाः । वहुविधाधुरुपकारभरच्चमो भवति कोऽपि स्वानिव सन्मणिः ॥’ इत्यादिप्रस्तुततप्रशंसया भवदर्थस्य सदृशार्थेने प्रतिते: पुनर्वचनं न कर्तव्यस्मिति वच्यते । अस्माभिश्रैतत्पपञ्चो बृहत्यां करिष्यते ।

प्रतिवस्तूपमा—‘पूर्णमदाङ्गं भीष चन्द्रोदय को चादित है?’ इस प्रतिवस्तूपमा द्वारा साधृश्य की प्रतीति होते पर भी दृष्टान्त शब्द का कधन दोषावह है ।—दृष्टान्त शब्द दृष्टान्तालङ्कार के प्रतिपादनार्थ भी नहीं है। दृष्टान्त शबद से दृष्टान्तालङ्कार की प्रतीति नहीं होती । ऐसा नहीं होता कि पृथक आदि दो वाक्य कहकर ‘सवैंचो’ शब्द से संबन्ध की प्रतीति हो जाय । जो बात पस्तुत और जल्दी से कही जाती है वही वस्तु को छूने है ।—अपने आप-वात को अभिधा द्वारा न कहेने उपमा द्वारा कहने का क्या अभिप्राय ?—इस पर कहते हैं—वाच्यो हि अर्थः—इत्यादि ।

पूर्ववदिति—पहले जैसे रूपक द्वारा उपमानोपमेयभाव वतलाया, उसी प्रकार यहाँ दीपक द्वारा । आज के लोग यहाँ तुल्ययोगिता मानते हैं, कारण कि प्रभा और धेनु दोनों ही प्रकार-णिक है । पुराने लोगों ने यहाँ दीपक इसलिये माना है कि सर्ग में आरम्भ से चले प्रकरण ( महाप्रकरण ) में धेनु ही प्रधान रूप से ( प्रकारणिक है ) वर्णित है, उसकी अपेक्षा प्रभा की प्रकारणिकता कम है । उन्हीं पुरानों की वात लेकर इस ग्रन्थकार ने भी लिख दिया ।

एवमलङ्कारान्तरे’पि—समासोक्त्य अप्रस्तुतप्रशंसा आदि में । वहाँ भी उपमानोपमेयभाव शब्दतः नहीं कहा जाना चहिये । जैसे:—

'धन आफ़त में उपकार करता है, उत्सवकाल में आभूषण, अपने ऊपर भय आने पर ( किसी की ) शरण और रात में दीपक, बहुत प्रकार से याचकों का अनेक उपकार करने वाले आप जैसा सज्जनरत्न कोई एक होता है ।'

यहाँ अप्रस्तुतप्रशंसा द्वारा भवत्-शब्द के अर्थ ( आप ) की जो प्रतीति सदृशशब्द से होती है—उसे पुनः ( इस शबद द्वारा ) नहीं कहना चहिए था । इसे आगे कहा जायगा । और हम इसे बृहत्यां में भली भाँति दिखलायेंगे ।

विमर्शः : वस्तुतः ‘द्रविणमापदि’ इत्य पद में [ उपमेयोल्कर्षपैवाचकपदयुक्त ] वयतिरेकालङ्कार है, अप्रस्तुतप्रशंसा नहीं । यहाँ भवत्पदवाच्य ( राजा आदि किसी ) में अन्य उपकारक पदार्थों की अपेक्षा उच्चता और उससे अन्य उपकारक पदाथों में निम्नता—वतलाने से चमत्कार होता है ।

इव पद कहा गया है, पर उपमालङ्कार के लिए नहीं। कारण कि उपमा का कथन उसके निषेध इव पद कहने के लिये है । जिस उपमा का निषेध किया जा रहा है—उसमें द्रविण आदि उपमेय नहीं वनते—अपितु कोऽपि में किप् प्रत्यय से कधित ( कोड़ै ) पदार्थ उपमेय वनता है, और भवत्पदवाच्य ( आप ) उपमान । द्रविण आदि को उपमेय न वनने देने के लिये उनकी और

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व्यक्तिविवेकः

भवत्प्रदचाच्य ( आप ) की विशेषताएं उपस्थित की गईं हैं । वे आपद् आदि में काम देते हैं । आप अनेक अवसरों पर । इसलिये यहां अप्रस्तुतप्रशंसा नहीं व्यतिरेक अलंकार है । प्रतीपा-लंकार में उपमान उपमेय बना दिया जाता है । यहां भी उपमान ( भगवान् ) उपमेय बना दिया गया है, किन्तु नमत्कार का कारण है उत्कर्ष-अपकर्ष की प्रतीति तथा उपमा का निषेध । इसलिये व्यतिरेक ही प्रधान माना जाना चाहिये । सन्मपि में एकदेशविवर्त्तिंरूपक है । इसलिये अंगाङ्गिभाव संकर माना जाना चाहिये । अलंकारसर्वस्वकार ने अप्रस्तुतप्रशंसा के उदाहरण में ऐसा ही यह एक पद्य दिया है—

'इन्दुलिप्त इवाझनेन जडितातदृष्टिसृष्टगोणामपि प्रह्लानारुणिम्नेऽपि विधुमुखरुचि र्यामेनैव हेमप्रभा । कारकेयं कलयामि कोकिलवधूकण्ठेषु निष्ठितप्रिया प्रस्तुतं सीताया: पुरतश्च हन्त निशाकिनां वह्न: सगह्न इव ।।' इनमें उन्होंने कार्य से कारण की प्रतीतिरूप अप्रस्तुतप्रशंसा मानी है । उनका कथन है कि यहां—चन्द्रमा आदि के कज्जललेपरीतपी कार्य से सीतासौन्दर्यरूप कारण, जो कि प्रस्तुत है; उसका अनुमान होता है । अतः यहां अप्रस्तुतप्रशंसा है । ऐसी ही स्थिति 'द्रविणमपद्रे' इस पद्य में भी है । किन्तु इस पद्य का कोई प्रसंग ज्ञात नहीं । इसलिये कारण पूछे जाने पर कार्य का कथन मानना निर्मूल है । अतः यहां अप्रस्तुतप्रशंसा बनती नहीं ।

यथा च—

'शिशिरकालमपास्य गुणोडस्य नः क इव शीतहरस्य कुचोष्मणः । इति धियासतरुषः परिरेभिरे घनमतों नमतोडनुमतां प्रिया: ।।' इत्थं धीराशब्दोऽत इति च हेत्वर्थे शब्द: पुनरुक्तौ, हेत्वर्थेन इतिनैव तदथेस्योकर्त्वात् ।

यथा 'अश्वेतिचिदुतमजुद्रवतान्यस्मविमि'ति । तेन वरम् 'इति यतोऽस्त-रुष:' इति युक्त: पाठ: । यथा वा—

'आ: किमर्थमिदं चेतः सतामम्भोधिदुर्भरम् । इति मन्ते हतद्यो: परमथैवास्यत इति । अत्र हि मननार्थ: पुनरुक्तः, इतिनैव क्रोधपरामर्शिना तस्यावगमितत्वात् । तेन 'इति क्रुधेव तद्र्रेषा' इति युक्त: पाठ: । एवञ्च वेधसो दुप्रतवस्यानिबन्ध-स्वभावाच्चस्य यद्वचनं तदपि परिहृतं भवति ।

'शिशिरकाल को छोड़कर इस शीतहारी कुचोष्मा का फल ही क्या?—यह सोचकर प्रियाओं का रूप हट गया, इसलिये उन्होंने नमन कर रहे प्रियजनों की अनुमति देकर दृढ़ आलिंगन करना शुरू कर दिया ।' यहां 'धी:' और 'अत:' ये हेतुवाचक शब्द पुनरुक्त हैं । दोनों के अर्थे दौड़ने वाले)—यहां । इसलिये अच्छा तो हो कि 'इति यतोऽस्तरुष:' पाठ कर दिया जाय । और जैसे—'आ: सज्जनों का हृदय समुद्र के समान गहनार्णव क्यों है ? यहांँ मानकर दुष्ट विधाता ने उसे दूसरे के दुःखों से भर दिया ।' यह । यहांँ ('मत्था' इसका अर्थ ) 'मानकर' पुनरुक्त है । क्रोध वो बतलाने वाले इति शब्द से ही प्रतीति हो जाती है । इसलिये 'इति क्रुधेव तद्रेषा'—ऐसा पाठ ठीक है । ऐसा करने से विधाता की दुष्टता जिसका कोई कारण नहीं दिया गया अतः जो कहा नहीं जाना चाहिये, उसका कथन ( अवाच्यवचन ) भी दूर हो जाता है ।'

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द्वितीयो विमर्शः

इतिनैवैति इति शब्दो है स्वार्थे प्रयुज्यमानः स्वभावतः पूर्ववाक्यार्थस्योच्यमानत्वं बोधयति वरमिति उत्तदोषद्वयानिवारणमात्रमेतत्। न तु सर्वथा निरवद्यमिदं, यतस्तरशब्दातरशब्दयो-वैयर्थ्यात्।

अनिवारणस्थैति नहि दुःपूर्वणीयपूरकरणेन दुष्टत्वसम् ।

अध्यभिचारिणः कारकस्याविशेषणः प्रयोगः पुनरुक्तः । तत्र कर्तुर्यथाऽपतितोऽपतितैः शस्त्रुशिरोभिः समराड्ढणे । यः कनकैरिवोच्यणः क्रीडन् लोकैर्यम लोकयत् ॥ इत्यत्र लोकशब्दस्य, विलोकनक्रियायास्तं कर्तृकत्वाद्यभिचारात् सविशेषणस्य न तस्य पुनरुक्त्यम् । यथा—‘जनेरजातस्खलन्नैव जातु द्वयेऽप्यसुचयन्त विनीतमार्गाः ॥’ इति ।

कर्मणो यथा—‘उवाच दूतस्तमचोदितोऽपि गां न हीऽऽितगौडवसरेऽवसीदति ।’ इति । सविशेषणस्य यथा—‘ञुचिस्मितां वाचमवोचच्युत’ इति । करणस्य यथा—‘यदा हशा कुशाङ्कुशासिम हश्रे, जातं तदैव मे । प्रजागराग्रस्तसमस्तप्रसरं मनः ॥’ इति ।

अस्येव सविशेषणस्य यथा—‘तं चिलोक्य सुरसुन्दरीजनो विस्मयस्थितिमिततया दशा ।’ इति ।

पचं कारकान्तरेप्यवश्यवगन्तव्यम् ।

यदि कारण अव्यभिचारी हो तो बिना विशेषण के उसका प्रयोग भी पुनरुक्त होता है । इनमें से कर्त्ता का जैसे—‘जो युद्धाङ्गन में भिरे पड़े शस्त्रुशिरों से गेदों से खेलता हुआ सा लोगों द्वारा देखा गया ।’ वहाँ ‘लोक’ शब्द की पुनरुक्ति है । विलोकन क्रिया के प्रति उसका कर्तृत्व निश्चितरूप से रहता हो है । ( किन्तु ) जब वह ( कर्त्ता ) विशेषण से युक्त होता है तो पुनरुक्त नहीं होता । जैसे—‘अजातस्खलन ( फिसलने से रहित ) लोगों द्वारा दोनों ही स्थितियों में विनीत मार्ग नहीं छोड़ें जाते ।’ यहाँ ।

कर्म का जैसे —दूत ने बिना पूछे ही बात कही । जो इशारा समझता है वह मौके पर नहीं चूकता । ( किन्तु ) सविशेषण होने पर ( पुनरुक्त नहीं होता ) जैसे—

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व्यक्तिविवेक:

'श्रीकृष्ण उज्ज्वल मुसकुराहट से युक्त वाणी बोले ।' यहाँ—

'करण का जैसे—

'उस तन्वी ( दुबली ) ने जब से मुझे आँख से देखा तभी से मन प्रजागर ( निद्रानाश ) रूपी विष से सन गया ।' ( किन्तु )—सविशेषण होने पर ( पुनरुक्त नहीं ) जैसे—

'अपराओं ने आँखें से स्थिर पुतली वाली आँखों से उस ( पुरुप ) को देखकर***यह ।' इसी प्रकार दूसरे कारकों में समझ लेना चाहिए ।

अविशेषणं हि विशिष्टार्थमव्यभिचारिणोडपि प्रयोग: शस्यत इत्यर्थ: तथा चाह वामन:—'विशेषणस्य च' ( २।२।१८ का० सू० ) इति ।

व्यलोकयतनि विलोकनक्रियैव लोकितारं लोकमाचिपतिति लोकशब्दस्य पौनरुक्त्यम् । दृयेऽपि प्रस्थानवशादिति वशादाश्रियन्ते ।

गामिति गोशब्दो वाक्प्रयायस्य वचनक्रियायामव्यभिचारात् प्रयोगो न कार्य: । दृष्ट इति दर्शनक्रियाया दृशेव करणत्वेनादिसेति दृक्शब्द: पुनरुक्त: कारकान्तरेऽपि—

यथा 'स्थाने तिष्ठति' त्यत्राधिकरणस्य पौनरुक्त्यम् । विविक्ते स्थाने तिष्ठतीति तु विशेषणार्थं प्रयोगो न दुष्ट: ।

अविशेषण—विशेषण देने के लिये जो अव्यभिचारिणो होता है उसका प्रयोग भी अच्छा माना जाता है । जैसा कि वामन ने कहा है—'विशेषणस्य च' ( का० सू० २।२।१८ )

व्यलोकयत—विलोकन ( देखना ) एक क्रिया है वह लोकन ( दर्शन ) करने वाले कर्त्ता का आक्षेप कर लेती है, इसलिए लोक शब्द पुनरुक्त है ।

दृयेऽपि—प्रस्थान के कारण और नीति के कारण ।

गाम—गो शब्द वाणी का पर्यायवाची है । उसका प्रयोग नहीं होना चाहिये वह 'वचन' रूपी क्रिया के साथ नियमित: रहती है ।

दृष्ट—देखना क्रिया में आँख ही कारणरूप से आती है—इसलिए दृक्शब्द पुनरुक्त हुआ ।

कारकान्तरेऽपि—जैसे 'स्थाने तिष्ठति' में अधिकरण—( स्थान ) पुनरुक्त है । पर 'विविक्ते स्थाने तिष्ठति' कहने पर विशेषण के लिये अधिकरण का प्रयोग दुष्ट नहीं होता ।

एकवाक्यत्वेऽप्यर्थे शब्दतत्वार्थत्वभेदतः । द्विरुच्यते तां मन्यन्ते पुनरुक्तिमतिस्फुटाम् ॥ ४० ॥

तद् यथा—

'उमाचुपाड़ौ शरजन्मना यथा यथा जयन्तेन शाचीपुरन्दरौ । तथा तृप: सा च सुतेन मागधी ननन्दतुरुस्तत्सहशोभन तत्समौ ॥'

यस्य यद्रूपताव्यक्ति: सामर्थ्यादेव जायते । तस्योपमा रूपकं वा तदर्थ पौनरुक्त्यकृत् ॥ ४१ ॥

तत्रोपमा यथा—

'सुरेन्द्रवीराट्क्षितिपालना मुहुः प्रियामिवागीततारहारोहिणी । जलधरावलिरप्रतिपालितस्नसमया सम्याज्जगतीधरम् ॥'

अत्र जगतीधरजलघरावलयो: प्रियप्रणयिनीतुरयत्वे समासोक्तयैवाच- सते सति यदेतजगतीधरस्य प्रियतुल्यत्ववचनं तत् पुनरुक्तकम् ।

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द्वितीयो विमर्शः

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जहाँ एक ही अलंकार शब्दरूप से और अर्थरूप से दो बार कहा जाता है वहाँ स्पष्टतया पुनरुक्त दोष मानते हैं। जैसे—

'जिस प्रकार पार्वती और शिव कांतिकेय से, जिस प्रकार इन्द्राणी और इन्द्र जयन्त से, उसी प्रकार उनके समान राजा और वह रानी (दिलीप—सुदक्षिणा) उनके समान उस पुत्र से—प्रसन्न हुए।' यहाँ—

यदि किसी पदार्थ का कोई रूप अपने आप प्रतीत हो जाता हो तो उस रूप के लिये उसकी उपमा या रूपक का प्रयोग पुनरुक्ति (दोष) जनक होते हैं। दोनों में से जैसे उपमा—

'चंचल माति और चंचल विजली की आँखें और उठे हुए उरत पयोघ्र (मैव-स्तन) से युक्त—मेघमालाएँ अपना समय (ऋतुकाल—संक्रेत) का ध्यान न रखकर पहले ही प्रिय के समान उस पर्वत पर आ पहुँचतीं।' यहाँ पहाड़ और मेघमालाओं की प्रिय और प्रिया से तुलना—समासोक्ति से ही आ जाती है, इतने पर भी पदार्थ को प्रिय के समान कहना पुनरुक्त है।

शब्दद्वयं श्रोतत्वं यथेवादिशब्दप्रयोगात्। अर्थंतवं सदृशादिशब्दप्रयोगात्। अतिस्फुटमिति स्थूलदृष्टयैव दृश्यमित्यर्थः।

उमावपार्श्वस्थिति अत्र शरजनमनना यथेत्यादिनो प्रतीतौपमेयोपमानयोरभावस्तस्यादिनां पुनरुक्तिः। कवेष्टु नन्दननिमित्तः पूर्व उपमानोपमेयभावः। प्रतीत्यमानप्रतिभानिमित्तमित्तस्स्वपरः तथ्य चायं 'दिलीप इति राजेन्द्रुरिन्दुः क्षीरनिधाविव' इत्येवंविधसुपमानोऽपेयभावमातनोति। ग्रन्थकारस्तु विशिष्टोपमाननिर्देशानान्तरीयकतया प्रभावादिप्रतीतिरभंवतीति न हृपादानं कार्यमिति मन्यते।

यस्य यस्य पर्वतादेशदूपताया: प्रियतमादिरूपत्वप्रतीतिस्तस्य तस्य विशेष-शिलष्टपदोपतिवन्धनरूपाद् भवति, तस्य पर्वतादेशदृशे प्रियतमादिरूपत्वप्रतीत्यर्थमुपमा रूपकं वा यत्नाद्विध्यते तत्र पुनरुक्तिमित्यर्थः।

ऊरुच महान्तः पयोधरा मेघाः ऊरू च पयोधरौ स्तनौ च। समयात् सङ्झतेत्थ्यर्थः।

एकैत्र—एक ही उपमादि (अलंकारि)।

शाब्दद्वयम्—श्रोतत्व, यथा इव आदि शब्द द्वारा। आर्थंतवम्—सदृश आदि शब्दों के प्रयोग से।

अतिस्फुटम्—स्थूलदृष्टि से भी दिखाई पड़ने वाला।

उमावपार्श्वस्थौ—यहाँ 'शरजनमनना, यथा', इत्यादि के द्वारा प्रतीत हुआ उपमानोपमेयभाव—'तत्सादृश्येन' इत्यादि के द्वारा पुनरुक्त हुआ। कवेष्टु नन्दननिमित्तः पूर्व उपमानोपमेयभावः।

(आनन्दित होने) को लेकर कहना अभिप्ट है और दूसरा प्रभाव आदि को लेकर। इसी प्रकार यह परन्तु ग्रन्थक यह मानता है कि विशिष्ट उपमान के निर्देश से वह आप उसी से लगे-लगे हो जाती हैं—इसलिए दूसरी बार उसका उपादान नहीं करना चाहिए।

यस्य—यस्य = पर्वतादि की; यदृदूपता = प्रियतम आदि रूपता, उसकी अभिव्यक्ति सामर्थ्यो से अर्थात् लिङ्ग (खोलना पुष्टिक) से और इलङ्गयुक्त शब्दों के प्रयोग से होती है। उस पर्वत आदि की उसके लिए प्रियतमादिरूप प्रतीति के लिए उपमा या रूपक जो भी रचा जाता है वह पुनरुक्त होता है।

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उदयौ—बड़े-बड़े पयोधाराः—मेघ, तथा ऊरू = जाँघें और पयोधर—स्तन । समयात्—समय से जा पहुँचीं ।

यथात्र तथैवोत्तरेषु चोदाहरเษपु । यथा—

'निद्रावशेन स्ववता ध्यानवैक्ष्यमापा पर्यत्सु कृतवमवेलां निशि खोण्डितवेचे ।

लक्ष्मीर्विनोदयति येन दिगन्तलस्बी सोडिप त्वदननसरुचि विजहाति चन्द्रः ।|' इति ।

अत्र हि लक्ष्यया अवला खोण्डिततेचेति यदुपमानमुक्तं तत् पुनरुक्तं तस्यास्ततुल्यवृत्तान्ताभिधानसामर्थ्यादेवान्तरोक्तनयेन तदर्थावगते ।

यथा च—

'सुरभिसदृशं वनमालया नवपलाशमधार्यत भजुरम् ।

रमणदत्तमिवार्दैनखक्षतं प्रमदया मदयापितलज्जया ।।'

इत्यादौ । अत्र द्र्ष्टव्यसादृश्येन, उपमानवाचकशब्दार्थः; तादृशोपमा येनि त्रितयमापि पुनरुक्तं तदर्थस्योपमानादेव प्रतीतर्गंतार्थत्वात् । तथा हि—सुरभिशब्दात् पुस्त्ववचिछिश्राद् रमणार्थोंडचगम्यते वनमालाशब्दाच्च क्षीत्वाविंशिरात् कामिन्यर्थः । तद्विशेषणोः पदार्थोः व्यावर्त्याभावात् । तेन यथा कामुकसज्जमसमुत्थमदजननया लोहितं वक्रं च नखक्षतं धार्यते, तदृदृनमालया वसन्तसमागमजनितं नवं भजुरं च पलाशमधार्यतेति समुदायादयसमर्थे: सचेतसामुनिष्पत्त्येव यतोडलङ्कारान्तरोपकृताल्लिङ्गविशेषणविदर्शादेवार्थोनां स्त्रीपुंसत्वाजुमितरनुमतेव मदाकरोननाम् ।

जिस प्रकार यहाँ उक्ता प्रकार और भी अनेक उदाहरणों में । जैसे—निद्रा के वश में होने से आपके द्वारा भी नहीं देखी जाती लक्ष्मीं रात को खण्डिता नायिका के समान जिससे अपनी उत्कृष्टता बहलाती थी वह चन्द्रम भी अब अस्ताचल को पहुँच कर आपके मुख की कान्ति को छोड़ रहा है ।'

यहाँ लक्ष्मी के लिए जो 'खण्डिता अवला के समान' इस प्रकार उपमान का प्रयोग किया वह पुनरुक्त है । उसके अर्थ की प्रतीति घटना-साम्य के आधार पर अभी वतलाए नियम से अपने आप हो जाती है ।' और जैसे—

'वनमाला ने वसन्त के समागम में पैदा हुआ टेढा तथा पलाशा धारण किया, जैसे नशे से लाज खो चुकी प्रमदा प्रिय के बनाए ताजे नखक्षत को धारण करती हैं ।' यहाँ आर्द्र नखक्षत यह विशेषण तथा प्रमदा पदार्थ और उसका विशेषण ये तीनों ही पुनरुक्त हैं । उसका अभिप्राय उपमान से ही निकल आता है । इस प्रकार—पुस्त्व से युक्त सुरभिशब्द से रमण की प्रतीति होती है और कीर्त्तव से युक्त वनमाला पदार्थ से कामिनी की । उनसे किसी का व्यावर्त्तन (हटाना, निराकरण) नहीं करना है । इसलिये—जिस प्रकार कामुक के समागम से बनाए गये लाल और टेढ़े नखक्षत को कामिनी धारण करती है—उसी प्रकार वनमाला ने भी वसन्त के समागम से पैदा हुआ लाल और टेढ़ा पलाश पुष्प धारण

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द्वितीयो विमर्शः:

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किया । इस प्रकार समुदाय से यह अर्थ सहृदयों को समझ में आ जाता है । कारण कि दूसरे अलंकारों से सहित लिखे विशेष के निर्देश से ही अर्थों में शीलत्व और पुस्त्व का अनुमान महाकवियों को मान्य हो है ।

आद्रे नखक्षत मिवेति भिन्नक्रम एव शब्दः यापितो गमितः निर्वाहित इत्यर्थः । उपमानादेवेति आकारसादृश्येन पदानां प्रति दीयमानाद् आद्रे नखक्षत मित्यस्मात् । तद्विशेषणोपादानेऽभिमत रमणदत्तामित्याद्रे नखक्षता विशेषणोपादानं मदयापितलज्जयात प्रमदाविशेषणोपादानं चेत्यर्थः । यत इति नखक्षत मिवेस्युपमोपकृतात सुरभि वनमालादीनां पुस्त्व-शीलवनिदर्शादितिवर्थः । त्रोपुस्त्वानुमितिरिति प्रथमविमर्शोक्तप्रकारेण व्यक्‍तेरगुमितिरूपपवेनोपपादितस्‍वात् ।

आद्रे नखक्षतभव = इस प्रकार इव का क्रम भिन्न है ।

यापितः—विताया, समाप्त किया ।

उपमानादेव—आकार की समानता पर पलाश के प्रति—दिये जा रहे—( उपमान द्वारा )

तद्विशेषणोपादानम् = रमणदत्त—यह आद्रे नखक्षत का विशेषण है । मदयापित ***यह प्रमदां का विशेषण है । इन दोनों का उपादान ।

यत—‘नखक्षत के समान’ इस उपमा से उपकृत सुरभि और वनमाला आदि में पुष्टिंग शीलत्व का निर्देश है ।

शीलोपुस्त्वा—इसलिये कि प्रथम विमर्श में बतलाये ढंग से व्यक्तिं ( अव्यक्तना ) को अनुमिति रूप बतलाया गया है ।

विमर्शः ' सुरभिसङ्गमजम्'०—इत्यादि पथ्य का पूर्वार्ध मधिनाथ के अनुसार ऐसा है—‘उपहितं शिशिरापगमश्रिया नवपलाशमधायं त भङ्कुरम् ।' दोनों पाठों में उपादेय पाठ के लिये दृश्य—हमारा संस्कृत निवन्ध—‘भट्टहेमाद्रे रघुवंशदर्पणः १’ ( मेघा—१९६१—६२ रायपुर संस्कृत महाविद्यालय ) ।

यथा च—

'पेन्र्रं धनुः पाण्डुपयोधरेण शरद्धानाद्रे नखक्षताभमू । प्रसादयन्ती सकलकुलीं मिन्दु तापं रवे रवे रस्याधिका चकार ॥' इति ।

अत्र हि शरदो नायिकात्वस्येनदो रवेश्व नायकत्वप्रतिनायकत्वयोर्भिन्‍यक्तिः ।

यथा वा—

'अत्‍यान्तपरिणाहित्वादत्‍यान्तश्‍कषणतावशात् । न काचिदुपमारोद्धुमू मू शाक्रोति सुध्रुवः ॥' इति ।

अत्र 'अद्‍नू नोरू मणिस्‍तम्भाचि'ति ।

'ताजे नखक्षत के समान—इन्द्रधनुप को अपने पाण्डु पयोधरों ( मेघ—स्तन ) पर धारण किये शरद् कलंक्री चन्द्र को प्रसन्न ( दिसिमान्—खुश ) करने में निरत होने के कारण सूर्य को अत्यधिक तपाने लगी ।' यहाँ 'शरद्' की नायिका रूप से और चन्द्र की नायक तथा सूर्य की प्रतिनायक रूप से प्रतीति होती है । और जैसे—

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'अच्छी बौधों वाली के ऊरू पर, अत्यन्त मोटे और अत्यधिक चिकने होने के कारण कोई भी उपमा चढ़ नहीं पाती ।' यहाँ जैसे—

'अंगना के ऊरू मणिसतम्भ हैं' ऐसी—अनुमिति हो जाती है ।

ऐन्द्रं धनुरिति अत्यन्तेति आभोगीति चोदाहरणत्रयं वैधर्म्यैकस्मेष्टकम् । उपपन्नक्रमस्या-सदृशावात् न्यायकत्वप्रतिनिर्णायकत्वेऽपि अनुमीयेते इति शेषः ।

त्रिमर्शः मूल और व्याख्यान में 'अङ्गनोरू' वही जगह 'अङ्गनेव'-पाठ छपा मिलता है । यहाँ अर्थ संगति के आधार पर उसे बदल दिया गया है ।

यथा च—

'आभोगिनेत्रपरिवर्त्तनविभ्रमेण मूर्त्या नितम्बचलनाकुलतां वहन्त्या । यस्याश्चानिरोचरलतिका लकांककलापपप्यांकुल हृदयमभ्युनिद्रेमनन्थ ॥' इति ।

अत्र हि आरोहार्थी हृदयार्थैच लक्षणयोपात्तौ, न मुख्यतया, तयोर-जीवव्यापारतत्काथैकदेशाविरोषरूपत्वात् । लक्षणयाश्रयालङ्कारान्तरत्वसुपपादितमेव ।

एवम् अङ्गनोरू मणिस्तम्भाविति अनुमीयते इति शेषः ।

भोगी वासुकिः स एव नेत्रसमाकर्षणरजुजुस्तस्य आसमान्ताद् यत्परिवर्त्तनरूपो विशेषेण अमो अमणं तेन, मन्त्रस्य मूर्तिः नितम्बे मध्ये भागे चलनं परिवर्त्तनं तेनाकुला जाता । तथा आभोगि विस्तरत्वात् यननेत्रं नयनं तस्य परिवर्तनं कटाक्षीकरणं स एव विभ्रमो विलासः । मूर्त्या समारोपितनायिकाव्यवहार्या । उत्कलिकास्तरङ्गा इहिरहिकाश्र हृदयं मध्यदेशाश्रितत्वात् ।

आरोहार्थी इति आरोडुमिति पूर्वश्लोके मतिः । हृदयार्थश्चैवति । हृदयमसृजुनिधेरिस्थियत्त्र स्थितः तयोरिति आरोहो जीवव्यापारविशेषः । हृदयं जीविकायैकदेशविशेषः । अलङ्कारान्तरस्वमिति साधश्यालङ्कृता वक्रोक्तिरित्यादिप्रकारेण ।

भोगी = वासुकिं हो नेत्र = नेत्री, उसका अलौकिक भ्रमि भुमाना, तन्द्रूप जो विशेषेष्ट भ्रम, भ्रमण

उससे मन्त्र = पहाड़ की मूर्ति नितम्ब = मध्य भाग में घूमने से आकुल हो गई है । और—

आभोगि = विस्तृत जो नेत्र = आँख, उसका परिवर्तन अर्थात् कटाक्षीकरण, वही विभ्रम अर्थात विलास । मूर्ति—जिस पर नायिका का व्यवहार आरोपित है । उत्कलिका—तरंगे और मन की

उत्सुकता । हृदय = बीच का भाग और चित्त ।

आरोहार्थ—'आरोडुम'—यह जो प्रथम श्लोक में आया है ।

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द्वितीयो विमर्शः

३६३

हृदयार्थशब्द—‘हृदयसमवुनिधे:' इसमें आया हृदय । तयोः—आरोह सजीव वस्तु का एक विशेष व्यापार है । हृदय—जीव के काय = शरीर का एक विशेष अंग । लक्षणिकहृदया-दृशब्दप्रयोगे स्वशब्दं विनाप्यर्थान्तरं प्रतीत इत्याह यदर्थेति । अलङ्कारान्तरत्वम्—‘सादृश्यालक्षणा वक्रोक्ति:' [ वक्रोक्ति का सू० ] इत्यादि द्वारा । लक्षणिक हृदय आदि शब्द के प्रयोग में अपने वाचक शब्द के बिना भी दूसरा अर्थ प्रतीत हो जाता है—इस बात को कहा—यदर्थेति—

विमर्शः मूल और व्याख्यान में आए 'अलङ्कारान्तरत्व' की जगह केवल 'अलङ्कारत्व' चाहिए ।

[ किञ्च ]—

यदर्थैकाश्रयो धर्मों यत्र स्यादधिरोपितः । उपमानोपमेयत्वं न तयोः शब्दविषयते ॥ ६२ ॥

यथा—

'अपरागसमोरितः क्रमशोणाकुलमूलसन्ततिः । तद्वतेव सुकरः साहङ्गुल्या रिपुमूलनिबर्हणाय तु महीपतिः ॥ इत्यत्र तरुरिपुः । तद्धि सामर्थ्यादेव तयोः सिदध्यति, उन्मूलनस्य तरुधर्मस्य रिपावारोपितत्वात् ।

और जिसके अर्थ का एकाश्रित ( उसी पर निर्मित ) धर्मे किसी पर आरोपित किया जाय—उन दोनों का उपमानोपमेयभाव शब्ददत्तः नहीं कहा जाना चाहिए। जैसे—‘जो अपराग ( रागप्रजा का स्नेह और धूल उसे रक्षित ) रूपी वायु द्वारा हिलाया गया हो और घोरेघोरे ( वृक्षपक्ष में आकुल हो गई कुलक्रमागत मूलसंतति ( जड़ का घिराव या घेर ) शोण हो गई हो ( वृक्षपक्ष में ) जड़ जिसकी ) वह शाखु वृक्ष के समान बड़ा भारी होने पर भी जरा में उखाड़ा जा सकता है ।' यहाँ वृक्ष और शत्रु का ( उपमानोपमेयत्व ) । वह तो अपने आप उनमें सिद्ध हो जाता है क्योंकि उन्मूलन रूपी धर्मं तत्पर आरोपित किया गया है ।

यत्रोपमेयड्मुनिधिप्रभृतौ यदर्थैकाश्रयो नायकादिरुपोपमानविषयो धर्मो हृदयादिरोपितो लकक्षणया भवेत्, तयोरनायकादेरुपमानस्यास्मुनिध्यादेश्रोपमेयस्योपमानोपमेय-भावः शब्ददत्तो नेद्यते गम्यमानसिद्ध एवेष्ट्यर्थः ।

अत्रैव अपरागस्यादिना शब्दद्वे दोषोदाहरणमाह । मूलानस्यमात्रादिप्रकृतिवर्गः वृक्ष-वन्धनानि च उन्मूलयितुं सुकर इति योजना ।

तद्धीति उपमानोपमेयत्वम् । यत्र—उपमेय—अस्मुनिधि आदि में । यदर्थैकाश्रय—नायक आदि रूप उपमान—हृदयादि के लक्षणा द्वारा आरोपित हो उन नायक आदि उपमान और अस्मुनिधि आदि उपमेय का उपमानोपमेयभाव शब्द से कहा जाय यह मान्य नहीं, हाँ गम्यमान = अनुमान द्वारा प्रतीत हो तो मान्य है ।

अत्रैव—अपराग ( आदिपच ) द्वारा—शब्ददत्तः कथन होने से दोष का उदाहरण देते हैं । मूलान्—अमूल्य आदि प्रकृतवर्ग और वृक्ष का बन्धन जड़, वे—उन्मूलित करने में सरल होते हैं । तद्धी—उपमानोपमेयत्व ।

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रूपकं यथा—

'अनुरागवन्तमपि लोचनयोरदघतं वपुः सुखमतापकरम् । निरकासयद् रविमपेतवसुं वियदालयादपरावृङ्गाणिकाः ।।' इति ।

अत्र हि लिङ्गविशेषणिर्देशात् ख्रीत्वस्य, कार्यतश्च तद्विशेषस्याभिव्यक्तौ सामध्यादेवापरांशो गाणिकारूपत्वं वियते श्लाघ्यतया वगतं यत् तयोः स्त्रीपु- व्यवचनं तत् पुनरुक्तम् । पुनस्तद्वचने वा रवेरेपि कामुकरूपतावचनप्रसङ्गः, विशेषाभावात् । यदुक्तम्—

'उभयार्थपदनिबन्धो लिङ्गविशेषः पदस्य गुणकृत्ति । उपमानविशेषाश्रयमर्थं गमयति स न हि पुनर्वाच्यः ॥ ४२ ॥' इति ।

रूपक जैसे—

'पश्चिम दिशारूपी गणिका ने आँखों में अनुरागयुक्त होते हुए भी; ताप नहीं पहुँचाने वाला आकार लिये रद्रने पर भी वसु (तेज, धन) रहित रविगणिकारूप भृगन से निकाल दिया ।' यहाँ लिङ्गविशेष के निर्देश से ख्यात्व की, और कार्य से उसको 'विशेषता की अभिव्यक्ति होती है, ऐसा हो जाने पर अपने आप ही अपर दिशा की गाणिकारूपता और आकार की आलयरूपता समझ में आ जाती है । उसके रूपक का जो कष्टन किया वह पुनरुक्त है । ऐसा कहने पर रवि को भी कामुक कहा जाना चाहिये । कारण कि कोई अन्तर तो है नहीं । ऐसा ही कहा भी गया है—'श्लिष्ट पद, लिङ्ग, लाक्षणिक शब्द यदि उपमान विशेष पर निर्भर अर्थ को वतलाते हों तो—उसे कहाना नहीं चाहिये ।'

रूपकं यथेति । 'तस्योपमा रूपकं वे'स्त्यानुसन्धत्ते । अनुरागो लौहित्यमपि । अपिशब्दः सुखादिपदानिकरे योजनीयः । वसुशब्ददस्तेजोधनयोः । अत्र निष्कासनसुक्तरटस्वेन गाणिका- धर्मों रूपकस्य साधकः प्रमाणम् ।

कार्यतश्च कार्यमन्विति निष्कासनम् । तद्विशेषस्य ख्रीत्ववविशेषस्य गाणिकारूपस्यैति । उभयार्थपदप्रयोगः 'पाण्डु पयोधरेणे'त्यादौ । लिङ्गविशेष: 'शारदू' 'रवेः' हन्त्यादौ । गुणकृत्ति पदस् 'आरोहं' 'हृदयमि'त्यादौ उपमानविशेषो यथा आदर्शेनखताभ- मिल्यादौ ।

रूपकं यथा—'तस्योपमा रूपकं वा' इति पूर्वं ग्रन्थ के अनुसार अव रूपक का उदाहरण देते हैं । अनुराग = लालरंग की । अपि शब्द सुख आदि में भी जोड़ना चाहिये । वसुशब्द—तेज और धन का वाचक है । यहाँ निष्कासन धर्म गाणिका का है अतः रूपक का साधक प्रमाण है ।

कार्यतत्क्ष—कार्य है । यहाँ निष्कासन । तद्विशेषस्य—गणिकारूप ख्यात्व विशेष का । उभयार्थपदनिबन्ध—द्व्यर्थक पद का प्रयोग—पाण्डु पयोधर आदि में । लिङ्गविशेष—शारदू—रवि आदि में । गुणकृत्तिपदम्—आरोहम् हृदय आदि में । उपमानविशेष—आदर्शेनखक्षताभ आदि ।

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द्वितीयो विमर्शः

३६५

यथा—

'राहुक्षीसतनयोरकारि सहसा येनारुधालिङ्गन- व्यापारैकविनोददुल्ललितयोः कार्श्यलक्ष्मीचृथा । तेनाक्रोशात् एव तस्य सुरजित् तत्काललोलानल- ज्वालापटलविततं मूर्धाविकलं चक्रं निहतं नाके चक्रुः ॥' इति ।

अत्र हि अनुप्रासैकरसिकेन कविना पौनरुक्त्यदोषमपश्यता पर्योयो- कृत्यनुमितोडपि चक्रशब्दार्थः प्रयुक्तः । तेन 'मूर्धाविकलामक्ष्णेण तेन तनुम्' इति मुक्तः पाठः । अनेनानुप्राससड्यसनिता काव्यस्य परिपुष्टतत्येव । यतः— 'समासे चासमासे चानुप्रासेष्ट्व खिलेष्वपि । पदादिगर्णानुप्रासः कवीनामधिकः प्रियः ॥ ४८ ॥' इति ।

तत्र समासे यथा— 't्वत्कीर्तिंकेतकीकोलत्कान्तकरणावतंसकः । दिगद्गणागणो राजन् ! राजतया मोहनिर्मरः ॥' इति ।

असमासे यथा— 'कुतः कुवलयं कर्ण करोषि कलभाषिणि ! । किमपाङ्गमप्यास्मस्मिन् कर्माणि मन्यसे ॥' इति । अलमननेन ।

यथा च— 'tं जिगीषुरिव शात्रवं ततो लोकलोचनपथोपरोधकम् । रश्मिभिः कनकसायकोपमैरन्चकारमहणोडस्तमानयत् ॥' इति ।

अत्र लोचनपथोपराधापराधिनोडन्धकारस्य कनकसायकोपमैः रश्मि- गिर्यदेवतस्तनयत् तज्जिगीषोरेव व्यापार इत्यहणस्यान्धकारस्य च यत् कर्तृकर्मभावेनोभयत्र तत् सामर्थ्योज्जिगीषुशात्रवतुल्यवृत्तान्ततामवगमय- तीति यदेतत् तयोर्जिगीषुरिव शात्रवमित्युपमानोपमेयभावेनाभिधानं तत् पुनरुक्ततां नातिवर्तते ।

जैसे :— 'जिसने राहु की स्त्रियों के गादालिङ्गन की विनोद में डुलर रहे स्तनों की कर्कशता की शोभा को वृथा कर दिया उस अतिज्याला से जल रहे चक्र के द्वारा श्रीकृष्ण ने गालो दे रहे उस ( शिशुपाल ) का धारार—शिर से रहित कर दिया ।'

यहाँ अनुप्रास पर ही रुचि रखते हुए कवि ने—पौनरुक्त्य दोष न देखते हुए पर्यायोक्त से अनुमित हुए चक्र पदार्थ को प्रयुक्त किया । इसलिये 'मूर्धाविकलामक्ष्णेण तेन तनुम्'—यह पाठ ठीक है । क्योंकि— 'समासे चा

जैसे समास में :— त्वत्कीर्तिं 'दिशारूपी खियों—तुम्हारी कीर्तिरुपी केतकी को कान का आभूषण बना—आमोद ( सुगन्ध और खुसी ) से फूली नहीं समातीं ।'

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३६६ व्यक्तिविवेकः

समासाभाव में—हे कलभाषिणि ? कान में कुवलय ( नीलकमल ) क्यों पहन रही हो, क्या अपाझ को इस कार्य में अक्षम मानती हो ।—इतना ही काफ़ी है । और जैसे—‘संसार के दृष्टि पथ को रोकने वाले उस अंधकार को सुवर्ण के वाजों के समान अपनी किरणों से अरुण ने दूर कर दिया, जैसे कोई विजयेच्छु अपने राहु समुचय को ।’ यहाँ जो लोचनपथ को रोकने का अपराध करने वाले अंधकार का सुवर्ण के वाजों के समान किरणों से जो अस्तमित करना है—वह विजयेच्छु का ही कार्य है, इसलिये कर्ता और कर्मरूप से जो अरुण और अंधकार का उपयोग है, वहाँ अपनी शक्ति से राहुसमुदाय और विजयेच्छु के ब्यवहार को वशला देता है । इसलिये यह—जो—उनका ( विजयेच्छु राहुसमुदाय का ) इस प्रकार उपमानोपमेयभावपूर्वक कथन किया गया वह पुनरुक्ति से बच नहीं सकता ।

'आक्रोशो' गालिदानम् ।

पर्यायोक्तीति येन राहुग्रस्तनयोः कारकशयलच्मीभूथ्या दृष्टेन्नेन भजद्यनन्तरेगण राहोः शिरश्छेदः प्रकाशित इति तात्साधनमसाधारणं चक्रं प्रतीत्यत एवेद्यर्थः । पदादीयत पदादिगतानामच्चराणामतुप्रासो गुम्फमभूज्ज दर्शनं कवीनामत्नतवल्लाभ इत्यर्थः । कलभाषिणीति । अत्र कमलेच्छणे इत्यर्थानुगुणः पाठः । अन्थाथानुप्रासहेवाकितैव स्यात् । शत्रुर्व शत्रुव इति प्रज्ञादित्वात् स्वार्थेडण् ।

अक्रोशः—गाली देना । पर्यायोक्ति—जिसने राहु की शिखों की स्तन श्री को व्यर्थ किया—इस प्रकार एक खास ढंग से राहु का शिर क़ाटना—चतुराई, इसलिये उसका असाधारण कारण चक्र प्रतीत हो जाता है । पदादि—पदादि में आप अक्षरों का अनुप्रास = गुम्फ़ ( जोड,़ योग ) की विचित्रता का प्रदर्शन करता है और कवियों को अधिक आकृष्ट करता है । कलभाषिणि—यहाँ ‘कमलेच्छणे’ यह वाक्यार्थ के अनुरूप पाठ है । नहीं तो केवल अनुप्रास की ओर लपकाना भर रह जाता है । राहु ही शत्रुव, प्रज्ञादिगण से स्वार्थ में अण् ।

यथा वा—

'परिहाससरसाक्षि दधदनतवल्लभ इति । दिक्कामिनीमुखान्यारात् पठवासैरिवाकिरत् ।' इति ।

अत्र परिहासरते: कामुकस्य कर्पूरपांशुभिरमुखावकिरणव्यापारः प्रायेण कामिनीविषय एव प्रसिद्ध इति दिशां मुखसम्वन्धाल्लिङ्गचिह्ननिदर्शाच्च व्यङ्कातं कामिनीपतावगतावपि यत्तासां कामिनीत्वेन रूपणं तत् पुनरुक्तं अत एव कर्पूरपांशूनामपि पठवासरूपत्वेऽपि तेपां तद्रूपणमेव न च सामर्थ्येसिद्धेर्डथे शब्दप्रयोगाद्रियन्ते सत्कवयः । यथा—

प्रणयमपणयित्वा यन्ममापद्यतस्य अधरमिव मदान्धा पातुमेषा प्रवृत्ता फलमभिनवपाकं राजजम्बूद्रुमस्य ।' इति ।

अत्रेतिशब्ददस्य ।

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द्वितीयो विमर्शः

३६७

यथा च—

‘चन्दनासक्तमुजगनि:श्वासानिलसूचिच्छत: । मूर्च्छयत्ययेष पथिकान् मधौ मलयमारुत: ॥’ इति ।

अज्ञोत्प्रेक्ष्यायामिवशब्ददस्य ।

यथा च—

‘अयं मन्तद्युतिभ्राजस्वानस्तं प्रति यियासति । उदय: पतनायेति श्रोमतो बोधयन् नृान् ॥’ इति ।

अत्र निदर्शने ममेति ।

और जैसे:—‘जो परिहास में रुचि रखता है, जिसने अपनी कोमलरूप कपूरी की भूमली से दिशारूपी सुन्दरियों का सुख पास पहुॅंचकर पथवास से मानो रच दिया ।’ यहाँ—विनोदी कासवक का कामिनी के ही मुख पर कपूरी का चूरा विखेरना स्पष्ट है, इसलिए दिशाओं में—मुख के संबन्ध से और लिंग विशेष (कोइलिंग) के निर्देश से कामिनों भाव प्रतीत हो जाता है, वे उसके दृश्यतक बन जाते हैं,—इतने पर भी उनका कामिनीरूप से निरूपण करना पुनरुक्त है, इसलिए—कपूर चूर्ण की पथवासता प्रतीत ही होती है । इसलिए उनका उसे रूप से निरूपण भी पुनरुक्त है । उपमानोपमेयभाव की तो बात ही अलग है । वह तो अपने आप निकल आता है । अच्छे कवि अपने आप आ जाने वाले पदार्थ के लिये शब्द का प्रयोग नहीं करते । जैसे—ठीक ही कहा है—‘दूसरे का वड़ा दु:ख भी ताप नहीं देता—अथ्योंकि विपदा में पड़े मेरी प्रार्थना को न गिनकर यह (कोयल) रायजासुन चक्षु के पके फलों को अंधर के समान चूसने में लग गई ।’ ( विक्रमोर्वशीय-४ ) यहाँ—इति शब्द का ( कर्थन कवि ने नहीं किया ) । और जैसे—‘वन्दन में लिपटे साँपों की लम्बी साँसों से मूर्च्छित कर रहा है ।’ यहाँ—उत्प्रेक्षा के लिये इव शब्द का

और जैसे:—

‘मन्दप्रभ यह सूर्य अस्ताचल को जाना चाह रहा है श्रीमान् लोगों को यह बतलाता हुआ कि उदय पतन के लिये होता है ।’—यहाँ निदर्शोऽलङ्कार में ‘ममेव’ ( मेरे समान ) यह नहीं कहा ।

नतद्रूपणमेवेति उपमाेच्चया रूपकस्य गम्यमानोपम्यपौनरुक्त्याद् प्रयोगाह्वेदपि साम्यावगतरूपपञ्चाद् यत्राभिधानं पुनरुक्तं तत्रोपमायां का शङ्का इति ।

इवशब्दस्यैति मूर्च्छित इव मूर्च्छ्यतित्यर्थप्रतीतेः: सिद्धत्वात् । विषादिसम्पर्कोंद्भि मोहं प्राप्न: परानपि मोहयति प्रसिद्धम् ।

अयं मन्तद्युतिरिति निदर्शनायां ममेवेल्यर्थात् प्रतीतं न पुनरुक्तम् ।

तद्रूपक—उपमा की अपेक्षा रूपक में साधिदय गम्य होता है—इसलिए उसका कथन हो सकता था, तो भी अपने आप प्रतीत हो सकने से उसका भी कथन पुनरुक्त है, वहाँ उपमा की तो बात ही अलग है ।’

इवशब्द :—मूर्च्छित इव—यह अर्थ ‘मूर्च्छ्यति’ इसी से सिद्ध हो जाता है । विष आदि के सम्पर्क से मूर्च्छित हुआ दूसरों को भी मूर्च्छित करता है यह बात प्रसिद्ध है ।

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३६८

व्यक्तिविवेक:

अयं मन्त्रद्युतिः—निदर्शनता में 'ममेव' (मेरे समान) यह अपने आप प्रतीत हो जाता है इसलिए उसे शाब्दतः नहीं कहा ।

( पुनः पुनरुक्ति का उदाहरण देते हैं— )

'स्वाभाविकं विनीतत्वं तेषां विनयकर्मणाम् । सुसूच्यते सहजं तेजो हाविपेच हविभुंजाम् ॥' इति ।

अत्र विनीतत्वस्यैव विशेषोऽपि तदु बाधकसत्त्वाभावेऽपि समानवि-भक्तत्वाविशेषात् तेजसां पुनरुज्जयत पवेतित यत् पुनस्तेजसस्तद्रचनं तत्पौनरुक्त्यमावहति ।

धर्मस्तुल्यविभक्तीनामेकस्यां युदितिनोडखिलान् । तान्न्येति ति पर्यायैस्तदुक्तिः पौनरुक्त्यकरृत ॥ ४८'९ ॥ इति ।

४ सद्ग्रहश्लोकः ।

'वे विनय का आचरण करते थे—उनमें विनय स्वभाविक था। अतः उसने उनकी तेजस्विता को और बढ़ाया, जैसे हविष्य अभि को तेजस्विता को बढ़ाता है ।

यहाँ विनीतत्व का जो विशेषण है—( स्वाभाविक ) वह बाधक के अभाव में और समान विभक्ति के कारण तेज का विशेषण सी बुत सकता है। इसलिये तेज के लिये जो पुनः विशेषण ( सहज ) दिया गया वह पुनरुक्त है ।

फलतत्—'समान विभक्ति वाले पदार्थ का धर्मं एक पदार्थ के लिये प्रयुक्त करने पर उन सभी में अन्वित हो जाता है, इसलिये पर्यायवाची शब्दों द्वारा उस ( धर्मं ) का बार-बार कथन पुनरुक्तिकारी होता है ।'—संग्रहकारिका ।

सुमूच्यते इति प्रससरादेरत्यर्थः । वायकनद्रावाभा ! इति अन्वेन यत्रैकस्यैव विशेषस्योपमानोपमेयसम्बन्धबाध कमस्ति तत् पृथक्प्रयोगेऽपि न दोषः यथा—

'चकोयं पदव चतुराश्चन्द्रिकाचामकमंजि । आवन्त्य पय निपुणाः सुदृशो रत्नमंजि ॥'

इत्यादौ प्रतिवस्तूपमेयसिद्धयाह । अत्र हि इवादिशब्दाभावेऽपि सादृश्य वाक्यभेदः । प्राक-रणित्वप्रकारणिकस्याभ्युपमेयभावप्रतिपत्तौ साधारणधर्मेस्य पृथक्प्रयोगोऽनन्तरेण वाक्यार्थसङ्झतिनं भवतीति पृथक्प्रयोगोऽन दुष्टः । तद्वचनमिति सहजपदेन स्वाभाविकत्व-वचनम् ।

तुल्यविभक्तीन् मर्थात् उपमानोपमेयानाम् । एषा निर्धारणेऽपि । एतन्मध्ये एकस्येत्यर्थः । पर्यायेऽपि । स्वाभाविकपदादि़ु सहजपदादिभिः ।

सुमूच्यते—फैला ।

बाधकसत्त्वाभावे—इसके निष्कर्ष यह हुआ कि जहाँ एक ही विशेषण के उपमान और उपमेय दोनों में अन्वित होने का कोई बाधक हो तो उसका अलग से प्रयोग करना भी दुष्ट नहीं होता । जैसे—'चाँदनी को पीने में चकोरी ही चतुर है, सुन्दरी के सुरतकाव्य में अवन्ती जनपद की निवासी ही चतुर हैं ।' इत्यादि प्रतिवस्तूपमा के स्थलों में । यहाँ इव शब्द के अभाव में ही दो शाक्य बनते हैं । प्राकरणिकता और अग्राकरणिकता से उपमानोपमेय भाव की प्रतीति हो जाती है

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द्वितीयो विमर्शः

और साधारण धर्म के सादृश्य प्रयोग के बिना वाक्यार्थ नहीं बैठता—इसलिये उसका अलग से प्रयोग करना दोषावह् नहिं है ।

तद्वचनम्—सादृश्यात् से स्वाभाविकता का कथन ।

तुल्यविभक्ति = तुल्यविभक्ति वाले उपमानोपमेय । यह पञ्चमी निरूरणार्थक है 'अर्थात् इनके बीच में एकता ।'

पर्थ्यये:—स्वाभाविक आदि पद् दे देने पर सहज आदि द्वारा ।

'कैरवचन्द्र्रीचर्चितायो नोभयुमाधवमाधवौ । ब्रह्मार्चितनखानुतो निहततान्धककालियौ ।।' इति ।

अत्र प्रथमो ध्वराब्दो द्वितीयश्च ब्रह्मराब्द: पुनरुक्तौ, तावन्तरेणापि समासान्तराथ्रयणेन विवक्षिताथैप्रतीतिसिद्धे: प्रत्युदाहरणयो: प्रथमचतुर्थ-योरिव पादयो: । अन्यथा तत्प्रापि छायानिहतपदयोर्द्विरुपादानप्रसङ्ग: स्याद् विशेषाभावात् ।

अस्तु का दोषः? उभयोरपि लक्षणानुगमसम्भवादिति चेत् । सत्यं, किन्तु प्रतीतिरिह प्रधानमिति सैचाजुसत्त्वव्या न लक्षणमात्रं, तस्य तदर्थ-स्वादित्युक्तम् । स च यावद्विरुपजायते तावतामेव प्रयोगो युक्तो नातिरिक्तानाम् ।

उभा येऽथः (पति विष्णु और मा लक्ष्मी के ) चो प्रणाम् करता हूँ । (दोनों में से ) र्त्रि 'अर्चन' शब्द के हैं और दुसरे 'इन्द्रादि'वर्ग्ण के, एक् श्रद्वा द्वारा पूजित है और दुसरे ब्रह्मा द्वारा वन्दित है, र्त्रि ने अनाद्यागुर को मारा है, और दुसरे ने कालिय नग् को । यहाँ प्रथम ध्व-रब्द पदार्थ की प्राप्ति के बना समासान्तराथ्रयणेन । जैसे कि न प्रत्युदाहरणस्वरुप (इसी श्लोक के ) प्रथम और चतुर्थ चरणों में ( छाया और निहततल की प्रतीति एक बार प्रयोग करने से भी हो जाती है । )

तौ उद्दाहरणेऽपि छाया और निहतत् शब्दों का प्रयोग दो बार करना चाहिये । क्योंकि स्थिति उनमें भी वही है ( जो दुसरे और तृतीय चरण में है । )

( शंका )—ऐसा हैँ, क्या है? उन दोनों में लक्षण का समन्वय हो सकता है ।

( उत्तर )—ठीक है, पर यहाँ प्रधान है प्रतीति, इसलिये उसी का अनुसरण यहाँ करनाआधि, केवल लक्षण का नहीं । यह् ( लक्षण ) उसी ( प्रतीति ) के लिये होता है । वह ( प्रतीति ) जितनों से हो सकती है, उननों का ही प्रयोग आवश्यक है उनसे अधिक का नहीं ।

नमामान्तराश्रयणेन उमा च मा च उमामे तयो: धवाविध्रयादि द्वन्द्वपूर्वकतपुरुषाश्रयणे-नेत्यर्थ: । छायानिहतपदयोस्तु प्रथमं छायाशब्द: द्वितीयश्च निहतशब्द: कर्तव्य: स्यादिति द्वष्टान्तिकक्रमणव ह्रान्ताबुक्को ।

अस्त्वति छायानिहतशब्दयो: प्रयोग: उभयोरपि । द्वन्द्वपूर्वकस्य बहुमीहेवबहुमीही-पूर्वकस्य वा द्वन्द्वस्यैवर्थ: । एतच्च दृष्टान्तगतत्वेनोक्तमपि दार्ष्टान्तिकगतत्वेनापि पर्यवसानं नेयम् । दर्शान्तिके हेतुं योजना । तत्पुरुपपूर्वकस्य वा तत्पुरुषस्य लक्षणानुगम: सम्भवतीति ।

तदर्थत्वादित्युक्तं विधेयाविमर्शविचारे याथाद्दिरिति पदैरित्यर्थात् ।

२४ व्या० वि०

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न च प्रतीतिमनहत्यैव लक्षणमस्तीतयेवातिरिच्चपदप्रयोगो युक्तः, तस्यार्थप्रयुक्तत्वाद्, अर्थेस्य चाधिक्यात्। तदुक्तं 'तदर्थावगतयर्थों हि शब्दप्रयोगेण'-ति। तस्मादुभयोरपि लक्षणानुगमसम्भवे सति च लक्षणोपयोगे पदार्थसद्भावस्थितौ लक्षणप्राप्त्यर्थं भवति नेतरत्, तत्पुरुषलक्षणाश्रयणेन चोपायलाघवाच्चमिति तदेवात्रयितं युक्तं, न द्रन्दलक्षणम्।

न चैवं तस्य विषयापहारः स्यादित्याशङ्कनीयं 'जगतः पितरौ चन्द्रे पार्वतीपरमेश्वरौ' इत्यादावतज्जातीये विषये तस्य चरितार्थत्वादित्यलमचिन्तया।

प्रतीति को ओर ध्यान न देकर केवल इसलिये कि (वैसा) लक्षण (बना हुआ) है, (किसी भी) अतिरिक्क (अनावश्यक) पद का प्रयोग ठीक नहीं होता। वह अर्थ पर निर्भर रहता है और अर्थ (आवश्यकता) से अधिक हो जाता है (अर्थात् उस अतिरिक्क पद का प्रयोग करने से)। यही बात भी है—उस अर्थ का ज्ञान हो गया तो फिर शब्द के प्रयोग से क्या? इसलिये लक्षण का अनुगम दोनों में होना सम्भव हो तब भी जिस लखु उपाय से लक्ष्य की सिद्धि होती है वही लक्षण अपनाना उचित होता है, और कोई नहीं। तत्पुरुष का आश्रय करने में उपाय का लाघव है, उसी का प्रयोग करना चाहिये, द्रन्द्ध का नहीं।

ऐसा नहीं कि उसका (द्रन्द्ध) कोई स्थान ही नहीं रहेगा? इससे भिन्न—'जगत् के पिता-पार्वतीपरमेश्वर' को प्रणाम करता हूँ।—ऐसे स्थलों में उसको जगह है। असतु अधिक ऊपरी बातों से लाभ नहीं।

तत्पुरुषलक्षणाश्रयणेनैति प्रकृतेऽद्रन्द्वलक्षणपूर्वकत्वं नेभ्यम्। एवं न द्रन्द्वलक्ष्मभिलयत्र तत्पुरुषलक्षणपूर्वकत्वं बोध्दव्यम्। तस्येति द्रन्द्वस्य। तज्जातीय इमि यत्र तत्पुरुषशब्दा नास्तीति पार्वतीपरमेश्वरावित्यत्रापि परमेश्वरपदे कर्मधारयाश्रयणतदर्शनेन तत्पुरुषपूर्वकत्वं योजनीयम्। अवान्तरचिन्तयेतिति पौन-रुक्त्यप्रस्तावे समासचिन्तयेत्यर्थः। अत्र साधवस्य योगिकत्वेऽपि संज्ञात्वेन निरूढे:

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द्वितीयो विमर्शः

उमा-माधवाविति प्रयोगो उमाया माधवस्य च स्पृष्टत्वेन प्रतीति:, न तु द्वन्द्वपूर्वक-तत्पुरुषार्थस्येति द्वन्द्वलक्षणं नातीव हृदयङ्गमित्याहु: ।

तत्पुरुषलक्षणाश्रय—प्रकृत में द्वन्द्वलक्षणपूर्वकता जाननी चाहिये। इसी प्रकार—‘न द्वन्द्वलक्षणम्’ तस्माद्—द्वन्द्व का ।

तज्जातीय—जहाँँ तत्पुरुष की शंका नहीं है—वहाँँ ‘पार्वतीपरमेश्वरो’ आदि में भी परमेश्वर पद में कर्मधारय है । इसलिये ‘तत्पुरुषपूर्वकता लगानी चाहिये’—द्वन्द्व का विषयापहार हो जायगा, जैसे न कह कर ‘तत्पुरुषपूर्वक द्वन्द्व का विषयापहार’— कहना चाहिये, क्योंकि—पार्वती-परमेश्वर में भी शुद्ध द्वन्द्व नहीं है । उसमें भी परमेश्वर शब्द में कर्मधारय है ही । इसी प्रकार और कहींँ

तत्पुरुषपूर्वक द्वन्द्व हो जायगा ।

अवान्तरचिन्तया—पुनरुक्ति के प्रसंग में समास की चिन्ता, यहाँ माधव योगिक है,—तथापि संज्ञा रूप से निरूढ़ होने के कारण ‘उमा-माधव’ ऐसा प्रयोग करने पर स्पष्टतः प्रतीति तो उमा और माधव की होती है, द्वन्द्वपूर्वकतत्पुरुषार्थ ( उमा और ‘मा’ में द्वन्द्व, ‘उनके धन’ में तत्पुरुष ) की नहींँ होती इसलिये द्वन्द्व का विचार भलीभाँति गले उतरता नहीं है ।

‘द्विपद्‌दधूलोचनचन्द्रकान्तनिष्यानन्दतनूदयसन्त्रिभावडयम् ।’

इत्यत्रेन्दूदयस्य यथाशब्दान्तविषयो निष्यानन्दव्यापार: स प्रसिद्ध इति नोपादेयतामह्हति यथा ‘रजनीपुंराग्रोल्लध्रातिलक:, तिमिरद्विपयूथकेसरी’—

त्यत्र प्रसाधननिर्मंथनद्यापार उपादीयमान: पौनरुक्त्यमेव पुष्णाति ।

यस्त्वप्रसिद्ध;, अस्साबुपादीयत एव, यथा “संसारसम्भवनिराकरण-करेखे’ -त्यत्र निराकरणम् । रेखा हि हेयोपादेययोग्योरिभागहेतु: पदार्थ:

प्रसिद्ध इत्यनभिमतपक्षप्रतिक्षेपाय तदचगुणस्य व्यापारस्योपादानमुपपन्न-मेव । अभिमतपक्षपरिग्रहार्थापि यथा—

‘त्वष्ट्र: सदनेऽसृजताशिल्पविज्ञानसम्पत्तिसीमाम् ।’

इत्यत्र प्रसरस्य ।

'शिल्पनारियों की आँखोंरूपी चन्द्रकान्तमणि को पिघलाने के लिये यह चन्द्रदय के समान हैँ'—यहाँ चन्द्रोदय से चन्द्रकान्त में निष्यानन्द व्यापार दिखलाया गया, वह प्रसिद्ध ही है अत:

नहीं दिखलाया जाना चाहिये । और जैसे—‘रात्रिरुपी सुहागिन का लोभ्रातिलक’, अन्याकारुपी गजयूथ के लिये केसरौ—यहाँ प्रसाधन और निर्मंथनव्यापार’ शब्द से कहें जायँ तो उनमें पुनरुक्ति होगी । जो प्रसिद्ध नहीं होता, वह शब्दतः कहा जाता ही है—‘संसार की उत्पत्ति के निराकरण

की प्रधान सीमा रेखा’—इस वाक्य में—‘निराकरण’ । रेखा हेय और उपादेय दोनों के विभाग के कारणरूप से प्रसिद्ध पदार्थ है, इसलिये अनभिमत वस्तु के त्याग के लिये—उसके अनुर्पयुक्त व्यापार का उपादान ठीक ही है ।

अभिमत पक्ष के परिग्रह के लिये भी—‘त्वष्ट्रके सतत अश्यास से अर्जित शिल्प विज्ञान की सम्पत्ति के फैलाव की सीमा’—यहाँँ ( उपादेय ) प्रसृत का ( परिम्रह्) ।

रेखे-ति रेखा मध्योदा अवधिः सीमेति पर्यायाः । तत्र हेयपक्षप्रतिक्षेपेण प्रयोगो यथा मन्मारोति अत्र संसारसम्भवस्य निराकरणमिति हेयस्य प्रतिषेध: ।

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३७२

व्यक्तिविवेक:

रेखा—रेखा, मर्यादा, अवधि, सीमा ये सब पर्यायवाची हैं। दोनों में से हेय पक्ष के निषेध के लिये प्रयोग का उदाहरण दिया—‘संसार’ इत्यादि। यहाँ—‘संसार के सम्भव का निराकरण’ इस प्रकार हेय का प्रतिषेध होता है।

किञ्चात्र यद् ‘इन्दूदयस्येव सन्निभा यस्ये’तीन्दूदयतुल्यत्वं राज्ञः शब्द-मुक्तं तत् तस्य तत्त्वारोपितमेव युक्तिमत्युपात्तपदार्थतरिकृत्स्य सन्निभोपदस्य पौनरुक्त्यमावहतीत्युक्तम्‌।

‘अयथार्थक्रियारम्भै: पतिभि: किं तवेष्टितै:। अरुन्ध्येतामितीवास्य नयने वाष्पवारिणा ॥’ इति ।

अत्र हि वाष्पस्य वारिरूपत्वाद्यमिच्छारेडपि यद् चारित्रमुक्तं तदस्ति प्रयोजने पौनरुक्त्यं करोति । न चात्र किञ्चित्प्रयोजनमुक्तपश्य्याम: । तस्माद् वाष्पसम्पदेत्ययमत्रोचित: पाठ: । अस्मिन् हि सति पौनरुक्त्यपरिहार: सम्पद: स्फीतत्वात् स्फीतत्वस्यैकतो लेशतोऽर्थान्तरागतिश्रेत्युभयं सिद्धं भवति ।

सति तु प्रयोजने न दोष: । यथा—

‘पृथ्वीपाल ! प्रतापस्ते वैजुतेनाश्रिना सम: ।

यो वैरिनितान्तवाष्पवारिणा वर्धते डधिकम्‌ ॥’ इति ।

और यदि यहाँ ‘चन्द्रोदय जैसी अच्छी कान्ति जिसका’ ऐसा विमर्श हो तत्र भी—राजा में चन्द्र का सांदृश्य शब्दत: प्रतीत होता है। उसे उसके धर्म का आरोप होने से अर्थ ही लेना चाहिये। इसलिये उपात्त शब्दों से अतिरिक्त ‘सन्निभा’—शब्द पुनरुक्ति उत्पन्न करता है।

‘गलतें काम में लगे इन’ पतियों को देखने से क्या ?’—मानों इसलिये उसके दोनों आँखों के पानी से रोक ली गयी। यहाँ वाष्प तो जल रूप ही होता है। इसलिये उसे जो ‘वारि’ कहा गया वह कोई प्रयोजन न होने से पुनरुक्त ही है। यहाँ हम कोई प्रयोजन भी नहीं देख पाते। इसलिये ‘वाष्प-सम्पद्’ यही पाठ यहाँ ठीक है। इस पाठ में दो बातों सिद्ध होती हैं—एक तो—पौनरुक्त्य हट जाता है दूसरे सम्पद् खुोलिझ है, इसलिये उसमें स्फीतत्व का भान होने लगता है—जिससे एक और अर्थ ( सखी द्वारा—अपनी सखी को समझाना ) निकल आता है।

प्रयोजन होने पर कोई दोष नहीं। जैसे ‘हे पृथिवी के रक्षक ! तुम्हारा प्रताप विजली की आग के समान है जो वैरियों की आँखों के वाष्पवारि से और ज्यादा बढ़ता है ।’ यहाँ बिजली उपादेयरूपग्रहो यथा त्वद्वृत्ति । अत्र सम्पद: प्रसरो विस्तार: इत्युपादेयस्य परिग्रह: ।

इन्दूदयस्येव सन्निभा यस्येति अत्र सन्निभाशब्द: प्रभापर्यायो ध्यातव्यात: । यथा तु दृशिडनो ग्रन्थस्तथा सन्निभशब्द: सदृशपर्यायोऽस्ति तदुक्तम्—

‘इवचदूवाथाशब्दा: समाननिभसन्निभा:’ [ काव्यादर्श: ] इति ।

तदनुसारेणेन्दूदयेन सहृश इन्दूदयसन्निभ इति व्याख्येयम्‌ ।

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द्वितीयो विमर्शः:

यथा च—

'मार्गैकार्थमिव कृत्वामारुतेन संभुक्षितः स्वपदि यस्य पुष्टत्वकवद्धिः ।' इत्यग्रिमसनभुक्षणस्य मारुतकार्यत्वेन प्रसिद्धे ।

यथा च—

'अवदितन्वेतनामः पथि जनस्म्य कुतः स्वलितामिति । चेतनमेतत् 'अमो' नामतया सुव्यवुरया तत्रैवास्या वृत्तिरुपपद्य । या तनुगत्न पुङ्खादानस्य रुष्टयतेऽस्मा तत्स्मृत्यादिति तद्विशिष्टेन चेतसा जनतथ्य यां,शोपणं तत्र चेतस उपादानं पुनरुक्तं तदुस्यैव तदवगते ।'

यथा च—

'अनगचर्यात् सूदृढे चेतसि प्रियानाशं हृदि शल्यमर्पितम् ।' इति । 'व्रजतु नो मूढात्मा परमभवं भवन्न् मायाचिप्टु यत् न मां स्पृशेत् ।' इति । कवचतादृशे तत्कष्यन्वात् तदवगतिरभेवत्वयेच, यथा— 'नं कवास्मृदृशेक्ष्य मार्गंचं राघवः स्वलितवीर्यमात्मनि ।' इति ।

यथा च—

'दारिककथापि कृतमे मूढाः पापानि कुर्वते ।' इति । 'मूढोऽनात्ममयः कर्त्त' इति च ।

इससे बोध होता है कि वागादि और क्रोधादि वृत्तियाँ गानां उसने अपनी वृत्ति को दबा दिया था प्रसिद्ध है। जैसे मनुष्यनादि के द्वारा धोना प्रसिद्ध है?—कैसे किसलल सवांता है ?—वह रास्ते में कहा जासता है?—मुख्य रूप से वही है। (वास्तव में) विशिष्ट चिस द्वारा जन को जो विद्वान् हैं वे उसकता यह्। अस्तित्व देखा जाता है (सावधानी) विशिष्ट चिस द्वारा जन को जो विद्वान् हैं वे उसकता यह्। अस्तित्व देखा जाता है उसकना भर कहने से उसकी प्राप्ति हो जाती है। जाते है।

'किमिह मति मूढे हृदयं चूर्ण गढा हुआ शूल सा जान पड़ता है ।' (कौन) 'ब मनुष्यतां लंघते । जो मृढी के साथ नहीं बनते ।'—कृपा से देवत उमके (मूढ़व) सम्बन्ध से उस (बुद्धि) को प्राप्ताति को आती है जैसे—'कृपा से शान्त राम ने परशुराम को अपने आप में द्रष्टिहीन देखकर' और जैसे—इस तुच्छ शरीर के लिये भी मूढ़ लोग पाप करते हैं ।' और—'दही मूढ अनात्ममय (को कहा जाता है )—यह ।

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तदुक्तयैवेति अवहितस्वोक्त्येर्थ्यर्थः । मूढचेतन इति मूढधिय इति च मोहनाख्यो मूढस्वस्य बुद्धिधर्मस्वात् चेतनधर्मस्वात् चेतनधीशब्दयोः पौनरुक्त्यम् । तत्सम्बन्ध्यात् तदधिगतिरिति चेतनसम्बन्ध्याच्चेतन्यावगतिरित्यर्थः । कृपामदुरिति । कृपा चेतनधर्म इति चेतन्यवाचिपदं न कृतम् । एवं मूढा’ ‘मूढ’ इत्यत्रापि वाच्यसम् ।

तदुक्त्यैव—अवहिततत्त्वमात्र के कथन से । मूढचेतन—और मूढधी यहाँ मोहननात्मक मूढत्व बुद्धि का ही धर्म है । इसलिये चेतन और धीशब्द पुनरुक्त है । तत्सम्बन्ध्यात्—चेतन के सम्बन्ध से चैतन्य का ज्ञान । कृपामदु—कृपा चेतन का धर्म है इसलिये यहाँ चैतन्य का वाचक पद नहीं दिया । उसी प्रकार ‘मूढा:’ और ‘मूढ:’ में भी समझना चाहिये ‘वहाँ भी मूढता के आश्रय बुद्धि चेतना आदि को नहीं कहा ।’

उदितवपुषीति पौनरुक्त्यमेवानुसन्धत्ते । मनःकर्तृकत्वं प्रमोदस्य । उदितवपुषि = यहाँ से पौनरुक्त्य के उद्भावन पुनः शुरू करते हैं । प्रमोद मन का धर्म ( कार्य ) है ।

यथा च— ‘उदितवपुषि दिननाथे प्रविकसितातमसु कुलेषु कमलानाम् । जगति प्रमुदितमनसि च कोऽनन्यो विमनायतेऽत्र हृदये ॥’ इति । अत्र हि चपुरातममनश्शब्दानां त्रयाणामपि पौनरुक्त्यम् । तत्र द्वयोः स्वरूपमात्रवचनात् तस्य च पदार्थेष्वव्यभिचारात्, तृतीयस्यापि प्रमोदस्य मनःकर्तृकत्वादव्यभिचाराद् इत्यनन्तरमेवोक्कम् ।

यथा च— ‘किं पुनरीदृशो दुर्जाते जातामर्षनिभरे च मनसि नास्त्येव वाचकाशः शोक-क्रियाकरणस्ये’ति अत्र क्रियाकरणशब्दयोः ।

यथा च— ‘पातु वस्तारकाकान्तकलाकलितशेखरः । जगद्रयपरिज्ञानक्रियाविधिविचक्षणः ॥’ इति । अत्र क्रियाविधिशब्दयोः पौनरुक्त्यम् । तत्राद्यस्य तावत् परित्राण-क्रियाविशेषमात्र्यप्रतीतिसिद्धे विशेषस्य च सामान्याद्यमिचारात्, द्वितीयस्यापि क्रियाप्रयोज्यत्वेन तत्सुल्यधृच्यन्तत्वात् ।

और जैसे—‘दिननाथ ( सूर्य ) के उदय आने पर, कमल के फूल जाने पर, संसार का मन प्रसन्न हो जाने पर, उल्लू के अलावा और कौन उदास हो सकता है ।’ यहाँ वपुः, आत्मा और मन तीनों शब्द पुनरुक्त हैं । तीनों में दो आकार मात्र के वाचक हैं । वह पदार्थ में सदा रहता ही है । तीसरा प्रमोद मन का कार्य है । वह भी उससे कभी नहीं हटता ।

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द्वितीयो विमर्शः

३७५

यहाँ शोक-कार्य करने का मौका नहीं है—यह बात दोनों शब्द पुकारते हैं । जैसे—आपकी पत्नी का पति अर्थात् आप तीनों लोकों के नाथ हैं, विधि (विधाता) द्वारा पुनरुक्त यहाँ शब्द से तो आत्मा है, दूसर (विधि) से भी किया का ही एक पर्याय है। अतः यहाँ 'शोक' और 'क्रिया'—दोनों का समान अभिप्राय है कि करणभावनया इत्यादि ।

अत्र गोः शावलेय इतिवच्छ्लोकक्रियांशस्सामान्यविशेषभावेन प्रयोक्ता: । करणालम्बन इत्यादि । सामान्यस्य विशेषेऽपि योजयागात् क्रियाकरणाश्रयोरपि ग्रन्थकृदनस्तु । तदुक्तं च—'कचिन्न क्रियते कचिन्न क्रियाकाराश्रयोरपि । इत्यभिप्रायेण शोकशब्द एव कर्त्तव्य:' इति ।

यथा च—

'मूलप्रकृतिं कान्तां सर्वज्ञै: परस्परतोऽनिराम् । वियोगदुःखानुभवक्लेशो बत तथा अपि मे ॥' इति ।

अत्र हि सकृत्प्रानुभवक्लेशशब्दयोरपि पुनरुक्ता: । तत्नावस्य तावत् यत् पौनरुक्त्यं, तदर्थस्य कल्पनायां करणभावाद्व्यभिचारात् ।

द्वितीयस्य दु:खस्यानुभवविशेषात्प्रतीत्योपनमे सन्ति व्यक्तिरेकाभावात् ।

तत्रैवन्धन: पञ्चीसमा-

सन्नेन सदृश न सम्भवन्ति । न च विशेषस्य सामान्जेन सह समास इष्यते न हि अन्यत्र शावलेयग्रस्य गौरवति । नापि विशेषणसमास: । विशेषप्रतीतेऽपि सामान्यप्रतीतिर्नासिद्धे मतयोविचारादसिद्धमेव ।

पवमेव—

'अगाधापारं संसारसागरोत्तारसेतवे । देहार्धश्रुतकान्ताय कन्दर्पदर्पहरेपिने नमः ॥' इति ।

अत्र सागरोत्तारशब्दावुभयावपि पुनरुक्तौ, एकस्यासागधत्वापारत्वलक्षण-साधारणसागरधर्माध्यारोपसामर्थ्यात् सेतुसमबन्ध्याच्च संसारस्य तद्रूपतागते: । अर्थी पद्य हि अर्थ रूपेण युक्ता अनुमेयत्वात्, न शाब्दी ।

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३७६ व्यक्तिविवेक:

'चुम्वने विपरिवर्तिताधरं हस्तरोधि रशनाविघट्टने । विप्रितेच्छुपि तस्य सर्वतो मन्मथेनेधनमभूद् वधूरतम् ॥'

इत्यन्र मन्मथस्यात्मकत्वेन । इतरस्म च सेतोर्नियमेनोच्चारणार्थत्वेन प्रसिद्धे । अननेन च 'सकलकलाकनिकषपात्राणि' इत्यादि कनकादिशब्दानामपि पौनरुक्त्यं व्याख्यातम् ।

और जैसे:—'मैं भावना द्वारा निर्मित प्रिया को हर एक जगह देखता रहता हूँ इतने पर भी वियोग दुःख के अनुभव का क्लेश मुझसे देखा जाता है ही ।'

यहाँ—संकल्प अनुभव और क्लेश तीनों पुनरुक्त हैं । इनमें पहले ( संकल्प ) की पुनरुक्तता इसलिये है कि कल्पना क्रिया में करण रूप से संकल्प अवश्य ही रहता है । दूसरा ( दुःख ) भी एक प्रकार का अनुभव ही है, इसलिये ( अनुभव से दुःख को ) भिन्नता न होने के कारण उनपर आश्रित घटनाओं समास भी नहीं हो सकता क्योंकि वह उन्हीं पदों में होता है जिनके अर्थों में एक दूसरे से भिन्नता हो । विशेष का सामान्य के साथ समास नहीं होता । ऐसा कहीं कहा जाता है कि—'शावलेयकौ गाय'। विशेषण समास भी नहीं हो सकता । क्योंकि विशेष्य की प्रतीति से ही सामान्य की प्रतीति हो जाने से उन दोनों में 'विशेषणविशेष्यभावः' नहीं बनता । 'शावलेय गौ' यह प्रयोग नहीं होता । तीसरा भी—( क्लेश ) दुःख का पर्याय ही है, इसलिये उस ( दुःख ) के ही कथन से गतार्थ हो जाता है । इस प्रकार तीनों की पुनरुक्ति पर कोई विवाद नहीं ?

'काम के शत्रु ( शिव ) को नमस्कार है, वे अगाध और अपार संसारसागर को पार करने के एकमात्र सेतु हैं, कान्ता को उन्होंने अपने आधे शरीर में धारण कर रखा है ।' यहाँ सागर और उत्तर दोनों शब्द पुनरुक्त है । एक ( सागर ) इसलिये कि संसार में उसकी प्रतीति हो जाता है, कारण : कि अगाधता और अपारता सागर के असाधारण धर्म हैं जिनका आरोप किया जा रहा है, और सेतु का सम्बन्ध वतलाया जा रहा है । यहाँ आरोप अर्थ ही ठाँक है, शब्द नहीं । जैसे:—चुम्वन में अधरोष्ठ अलग कर लिया । करधनी छुड़ाने में हाथ रोक लिया ? इस प्रकार इच्छाओं में भिन्न होने पर भी वधू के साथ सुरत सब प्रकार से—काम का इन्हीं बना ।' यहाँ—मन्मथ पर अनल का आरोप । दूसरे ( उत्तर ) की ( पुनरुक्तता ) इसलिये है कि सेतु नियमितः पार उतारने के लिये ही प्रसिद्ध है । इसीलिए—'सभी कलरूपों सोने के लिये क सौटी का पत्थर' इत्यादि में कनक ( पाषाण ) आदि शब्दों की पुनरुक्तता भी स्पष्ट हो जाती है !

अनुभवविशेषात्मकत्वोपगम इति सौगतप्रक्रिययैतदुक्तम् । वैशेषिकस्तु जडमेवात्मगुणम् एकार्थसमवायिना ज्ञानन ग्राह्यं सुखमाहुः । तत्प्रक्रियायां कर्तृव्यतिरेकानुभवग्रहणम् । एकस्यैति सागरस्य इतरस्म चैति उत्तराराथंस्य । तद्रूपतावगतेः त्युभयत्न तद्रूपता सागररूपता उत्तररूपता च ।

अनुभवविशेषात्मकत्वो—सौगत = बौद्धों के अनुसार यह कहा । वैशेषिक तो सुख को आत्मा का गुण मानते हैं । वे उसे जडे ( निष्क्रिय ) मानते और उसको आत्मा में समवाय सम्बन्ध से करना ही चाहिये ।

एकस्य = सागर का, इतरस्म च = उत्तररूप अर्थ का । तद्रूपतावगतेः—दोनों जगह तद्रूपता, सागररूपता और उत्तररूपता ।

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यथा च—

'करकलिततनुर्न शातोर्न खातखड्गाग्रप्रहारा- ढढतरत्वनिपाताच्चिलस्नदुप्रारिक्‌षठः ।' इति ।

अत्र नवानां पद्यानामवकरत्वम् । तत्र यत् खड्गस्य करकलिततत्त्वादिविशेषणचतुष्टयं तत्र तस्य व्यापार्यमाणस्य तत्त्वाव्यभिचारात् । यच्चाप्रतत्ववाराश्रधाया भाराया वचनं तत्र पुनरुक्तं खड्गस्यैव करणतत्त्वविवक्षायामेवान्यत्रादेव तत्प्रतीतिसिद्धेः । यथात्र ढढतरत्वविशिष्टो विनिपातः करणभावेनोपास्तो, यद्वाप दृढत्वमर्यादां विशेषणं तदुभयमपि पुनरुक्तमेवार्थ-सामर्थ्यादिसिद्धत्वात् । अतश्र खड्गगतिच्छेद्यारिक्‌षठ सारभू । अन्यरत्नकप्रायं नृत्यस्य पूरणायैव परिगण्यते नार्थविशेषस्य कम्यार्थत्वादिति । यथा—

'श्रीभुरसनिविभ्रपानक्रियावशवातिजन्ममददिवेशा । मतदृष्टकृतेऽपि सुखायिते क्रिमपि कमितुरचिरोढा ॥' इति ।

अत्र द्रवदीनां सत्यानामवकरत्वम् । यथा चा—

'मादिराद्रवपानवशावशोऽयमर्दो मदाविघूर्णितातमेव । तव तर्कणात ! मदनदीपानमिदमक्षियुगं समाभाति ॥' इति ।

अत्र द्रवादीनां पोडशानामवकरपदानां पौनरुक्त्यं प्रयुक्तान्तर्गताश्या द्वाःयामेव मादिराद्रपानाद्भ्यां सम्बोधनोकृताभ्यां तदर्थप्रतीतिसिद्धेः । यथाद्‌ भरतः—

'आगूर्णमात्रंनमध्ये या श्चामा चाञ्जिततारका । स्वप्नावकरहितापाङ्गा मदिरा तरुणे मते ॥' इति ।

पपां चावकरपदानां पर्यायेण यथायोगमेकादिपयोगे सति लोकसदृशार-कमेगांतबहवाडवकरप्रकाराः समुद्धवन्ति, येषु प्रयुक्तेष्चप्रयुक्तेष्वपि तुल्यै-रार्थैवर्गतिरिति ते तत्र श्लाघ्यायमानाः श्लाघिकैकैः केवलमाद्रियान्ते । कविविभस्तु प्रस्तुतनरभार्भक्‍ठयवधाननिबन्धनधनाधीररणीया पच ।

यथा हि— 'क भुनोक्तक्न कियाकारकयोरपि । भद्रोऽपि च्छेद्यादिवगतिमस्तद्गतैरपि का ॥ ८' ॥

'मा भचन्तमनल्तः पवनो वा शारणो मदकलः परशुरवा । वज्रामिन्द्रकरावपतत्‌नं वा स्वस्ति तेडस्तु लतया सद् वृक्षः ॥' इति ।

कारकस्य यथा— 'मा धाक्षीन्मा भाद्धीन्मा मैत्रसीजातुचिद् वत भचन्तम् । सुहृतेरध्वन्यन्यान् मार्गंतरः ! स्वस्ति तेऽस्तु सद्‌ लतया ॥' इति ।

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और जैसे—हाथ में रखी तीखी खुनी तलवार के अग्रभाग की धारा के कठोरतर प्रहार से कटी हुई दुष्ट शत्रु की गरदन'—यहाँ शब्द कचरे जैसे हैं। खड्ग के जो चार विशेषण हैं वे पुनरुक्त हैं, चलाये जाते उस ( खड्ग ) में वे रहते ही हैं। अगत्व से युक्त भाराका कथन भी पुनरुक्त है। कारणरूप से विवक्षित खडग में वे अपने आप प्रसिद्ध हैं। कारणरूप से कथित दृढतर विशेषण से अन्वित विनिपात भी पुनरुक्त है, और शत्रुओं का विशेषण दुष्ट भी दोनों अपने—आप प्रतीत हो जाते हैं। इसलिये 'खड्गच्छिन्नग्रीविकण्ठ:' ये चार ही शब्द काम के हैं। और सबतों कचरे के बराबर हैं। वे केवल छन्द को पूरा करने के लिये लाये गये सिद्ध होते हैं किसी विशेष अर्थ के लिये नहीं ?

और जैसे—‘कामुक के लिये नवोढा एक अजीव सुख देती है, जब वह शराब के रस के विषय को पान क्रिया से जन्म को प्राप्त मद से विशेष हो जाती है और उसका अंचल सरक जाने से सुख दिखाई देने लगता है ।’—

यहाँ—रस—आदि सात कचरे जैसे हैं। और जैसे—‘शराब के द्रव के पान के वश से उदय को प्राप्त मद से घूमते आकार वाली तुम्हारी—दोनों, आँखें—हे तरुणी ? मदन को दीप्त करने वाली जान पड़ती है ।’ यहाँ द्रव आदि सोलह पद पुनरुक्त हैं। प्रयुक्त पदों में से ही मदिरा और अक्षि—शब्दों के सम्बोधन द्वारा कथन से ( मदिराक्षि ) उनके अर्थ समझ में आ जाते हैं। जैसा कि भरत ने कहा है ।—‘जब नशा चढ़ा हुआ हो, उस समय विकसति पलकों वाली उस दृष्टि को—मदिरा कहते है जिसमें पुतली घूम रही हो, ठीक से दिखाई न पड़ रहा हो, और कनीनिका—अख्वितनात्मक एक प्रकार की मुद्रा में हो ।’ इन व्यर्थ पदों का क्रम से यथासम्भव एक दो आदि करके प्रयोग होने पर लोष्टसंचारक्रम से बहुत से पुनरुक्त भेद चले आते हैं जिनके प्रयोग होने पर या प्रयोग न होने पर अर्थ का ज्ञान समान ही हो वे शब्द शव्यभूत होते हैं। उन्हें केवल शाब्दिक लोग अपनाते हैं। कवियों को चाहिये कि वे प्रस्तुत रस की अभिव्यक्ति में विघ्न-बाधा करने वाले इन शब्दों को न अपनाएँ। अथवा—और कितना कहा जाय, जहाँ क्रिया और कारक की प्रतीति भी औचित्य द्वारा ही होती है—वहाँ और कथा ही क्या ?

क्रिया की प्रतीति जैसे:—‘आपको न अग्नि, न वायु, न मदमत्त हाथी, न फरसा, न—इन्द्र के हाथ से छूटा वज्र ( खण्डित करे ) । हे वृक्ष ! लता के साथ तुम्हारा कल्याण हो ।’

कारक की प्रतीति जैसे:—हें रास्ते के वृक्ष ? ( आपको कोई ) न जलाए, न उखाड़े, न तोड़े, रास्तागीरों के पुण्य से आप—लता के साथ सकुशल रहें ।

सप्तानामिति शीघ्रमदविशेष्येव वाच्यम् । मदिराद्रवेत। अत्र समाभातीयेकं पदं गणितस् उपसर्गाणां द्वैत्पयारतन्ड्येण पृथक्पदाह्वस्वाभावात् । एकादिप्रयोगे सति एकस्य प्रयोगाभ्युपगमेऽन्येषामेव तत्त्वम् । तत्राप्येकस्यमनियतम् । सस्यानाम्—शीघ्रमदविवश—इतना ही कहा जाना चाहिये । मदिराद्रव—यहाँ समाभाति यह एक ही पद गिनना चाहिये । क्योंकि उपसर्ग पृथक् पद नहीं होते। वे घोत्प अर्थ के पोछे चलते हैं ।

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द्वितीयो विमर्शः

वाक्यार्थाविचयं पौनरुक्त्यं यथा—

सकृद्विद्वान् न क्रियाविशेषः परामृश्य पदं। जुगुप्सते हि विमृश्यकारिणं गुणवृद्धा: स्वयंमेव सम्पद:॥

अत्र हि अविच्छेकप्रयुक्तविमृश्यकारित्वलक्षणं सहसाकार्येककारित्वं नामपदामचिकलं कारणमिति तेनैव कार्यकारणभावेन प्रतिपाद्य पुनः कारणाभावरूपं विमृश्यकारित्वमनूद्य तत्कार्यीभूतविपदभावरूपाणां सम्पदां सदृशो भाव: इतिसूचनायै प्रतिपाद्यते।

किञ्चान्ययथार्थतिरेकवाक्ययोरेवान्यस्म्य न हेतुहेतुमद्भावः सम्भवति। न हि यथाम्नाय सप्ति यस्यावगतिस्तत्रस्य प्रत्युत स एव हेतुरिति गम्यते वचुं हेतूहेतुमदभावाविपर्य्यस्मप्रसङ्गाद्।

इति व्यतिरेकवाक्ये तद्भिः शब्दैः साध्यपार्थकैः पृथक् कुत्रस्तर्हि द्वितीयैडघंडधीस्र्य चाङ्कतावगति:? उच्यते। लिखुविच्छोःपाकु धर्मविरोपाच्च सम्पदां नाधिकत्वेऽवसि सति समासोक्तिरिवेतद् वक्ष्यते।

यथा च—

'यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥'

अत्र हि धर्मस्यैवश्लायातपयोरिव अन्योन्यपरिहारेणावस्थितयो-र्यंदेवैकस्य ग्लानिसंदृष्टेोतरस्याभ्युत्थानमिति तयोरेवैकमन्वाच्यं वचनं तत् पुनरुक्तमिति—

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३८०

व्यक्तिविवेक:

वैधर्म्य से भी अन्वय बोध ( कथन ) हो सकता है; कारण कि उसके न रहने पर साम्य का अभाव हो जाता है और उसे हेतु का अभाव असिद्ध ! इसलिये दो अर्थों का प्रयोग नियमतः नहीं किया जाना चाहिये ।

और जो दो अर्थ अन्वय और व्यतिरेक द्वारा कहे जाते हैं । उनमें परस्पर हेतुहेतुमद्भाव नहीं बनता। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि, जिसके रहने पर जिसका ज्ञान होता है—उलटे वहीं उसका हेतु है । ऐसा करने पर हेतुहेतुमद्भाव ही उलट जायगा। इसलिये व्यतिरेक वाक्य में उस (हेतुत्व ) का अभिधायक—‘हि’ शब्द भी निरर्थक हो है ।

( प्रश्न )—तो फिर उत्तरार्थ में अर्थंगत चाहता कैसी प्रतीति होती है । (उत्तर) इसपर हमारा उत्तर है कि—‘समासोक्ति से । लिङ्गविरोध और धर्मविरोध के कारण संपत्तियों में नाधिकात्व क्यों प्रतीति हो जाती है ।

और जैसे :—‘धर्मं का हास जन-जन होता है और अधर्म का अभ्युत्थान, तब मैं अपने आप को उत्पन्न करता हूँ । यहाँ धर्म और अधर्म द्वाया है और आतप के समान एक दूसरे के साथ सदैवानस्थान विरोध द्वारा मिले दिखाई देते हैं। इसलिए दो में से किसी एक की ही हानि होने पर दूसरे का उत्थान निश्चित ही है । अतः एक ही को कहना था । दोनों का कथन पुनरुक्त है ।

अविवेकप्रयुक्तिमिति । यद्यप्यविमृश्यकारिसत्वस्यैवाप्रकटकारणत्वं, तथाप्यविवेकस्याविमृश्यकारिसत्वमेव कारणमुक्तं भवति ।

न हीति यस्मिन् सति ‘वह्नौ धूमः’ इत्यादिके प्रतिवन्धकाभावान्यथे सति विशेषस्य यस्मादिव्यतिरेकस्य गति: प्रतीति:, तस्यान्वयस्य स एव व्यतिरेको हेतुतनं युक्तः: न्यावस्थितस्य हेतुहेतुमद्भावस्य वैपरीत्यप्रसङ्गात्‌। अन्वयप्रतीति-हेतुको हि व्यतिरेकप्रतीतिसुपक्रमो न तु विपर्ययः। विशेषाद्वैति , गुणवृद्धा इति साधारण-स्वादिसत्यर्थ: ।

अविवेकप्र०—यद्यपि अधिमृश्यकारिता ही आपत्ति का कारण है, तो भी अविमृश्यकारिता उत्पन्न होती है अविवेक से, इसलिए कारण होना चाहिए अविवेक ही, परन्तु कहाँ जाएगी कारणता अविमृश्यकारित की ।

नहि = ‘वह्नौ धूम:’ इत्यादिके प्रतिवन्धकभाव से युक्त अन्वय बोध हो जाने पर विशेषपरूप वहि के अभाव में धूम का अभाव । ऐसी व्यतिरेक प्रतीति होती है—तो उस अन्वय के प्रति उसी व्यतिरेक को हेतु—नानाना ठीक नहीं । क्योंकि इससे व्यवस्थित हेतुहेतुमद्भाव उचिछन्न होता है । व्यवस्था यही मान्य है कि व्यतिरेक की प्रतीति के प्रति अन्वय प्रतीति कारण है ।

उक्तो—नहीं ।

धर्मविरोधाच्च—गुणतुल्यत्वरूपो साधारणधर्मः ।

विमर्शो : मूल में ‘साधर्म्येणापि प्रयोक्तव्योऽर्थात वैधर्म्येणान्वयगम्य:' असति तस्मिन् साम्याभावे हेतुभावस्यासिद्धे:'—पंक्ति का ‘असति’ से असिद्धे: तक का अंश स्पष्ट नहीं होता । इसका उदाहरण कौन सा माना जाय ? तस्मिन् के तत् पद का अर्थ—वैधर्म्य किया जाय या साधर्म्य ?

और साम्य में अन्तर माना जाय या ऐक्य ? इन्तने पर भी—‘हेतुभाव नहीं बनता’ की अर्थ— संगति कैसे लगाई जाय ? टीकाकारों ने इस पंक्ति का स्पष्ट भी नहीं किया । इतना तो स्पष्ट है कि इस पंक्ति के दो अंश हैं ‘एक—अन्वयांश और दूसरा व्यतिरेकांश—‘साधर्म्येणापि प्रयोक्तव्योऽर्थात वैधर्म्येणान्वयगम्य:' यह साधर्म्य और वैधर्म्य—की प्रतीतियों का अन्वय हुआ । ‘असति तस्मिन् साम्याभावे’—से उनका व्यतिरेक बतलाया गया । वैधर्म्यं न होने पर साधर्म्य नहीं

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द्वितीयो विमर्शः

सामर्थ्येऽसिद्धस्यार्थस्य यथाड्‌ड्यर्थी पुनरुक्तता ।

तात्पर्ये भेदाच्छन्दस्य द्विरुक्तिः शाब्द्यपीष्यते ॥ ४६ ॥

पौनरुक्त्याभाविनी द्वैधा संश्लेष्येतया स्थितिः ।

तत्र द्रुपणमेवाद्यमपरं भूषणं स्मृतम्‌ ॥ ४७ ॥

शाब्दालंकारनिपुणेर्लटानुप्राससंभया

तच्योदाहृतमेव प्राग् द्रुपणं तु चितन्यते ॥ ४८ ॥

प्रकृतिप्रत्ययार्थोंड्म्य पदवाक्यार्थे पव च ।

विपर्यया हेतुः स क्रमेणोपदर्श्यते ॥ ४९ ॥

प्रकृत्यर्थे प्रत्ययार्थः प्रत्ययार्थे प्रकृतिः ।

प्रकृतिप्रत्ययसमुदायार्थ इति व्यस्तसमस्तस्त्वेन योज्यम्‌ ।

अन्यथा प्रादून्‌निर्दिष्टस्य पञ्चविधस्य

पौनरुक्त्यस्यासहप्रक्षः स्वातः ॥ ४९-५० ॥

अभिन्न पच् यथार्थे प्रकृते: प्रत्ययस्य च ।

तत् पौनरुक्त्योपहतं पदमादौ विवर्ज्येप्त् ॥ ५० ॥

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द्वितीयो विमर्शः

विशेषणसाम्यं 'विशातिप्रविष्ट:' आदि विशेषण के माध्यम से, विशिष्ट उत्कर्ष अपकर्ष से युक्त होकर आदि संज्ञा आती है। जैसे 'पयःपयः शीतोदकं भवति वः'—में (भव पुनरुक्त है)।

सकृदेव प्रयुक्तेन यत्र साम्याभिधायिना । अन्येऽप्यनुप्रयोजितत्वात् सामर्थ्यादेव गम्यते ॥ ५४ ॥

तत्रासकृत् प्रयोगोऽस्य पौनरुक्त्याय कल्पते ।

यद्वद्वयाभिवारस्य कारकस्याविशेषणात् । अर्थस्यैवानुभितस्यैवोक्तिरन्वात्येति पुनरुक्तताम् ॥ ५५ ॥

यद्वाश्राद् यदभिव्यक्तिस्तदुक्तौ नाददौ तत् तत् ॥ ५६ ॥

सकृदेवति साम्याभिधायी छदशब्दादिः; 'निरण्य विषयेऽ्यदौ' ॥ ५७ ॥

यथाश्रुति तु स्थान्तरमुखेन 'जनैरजातसक्वलनेतिरि'स्यादि सदृग्रृहीतम् ॥ ५८ ॥

अर्थस्य तु 'राहुक्रान्तनयोरिरि'स्यादौ । यदश्रुति ति यत्र कारकविशेषवशात् क्रियाया: प्रतीतिः क्रियाविशेषवशाद् वा कारकस्य तत् क्रियाकारकयोः प्रयोगो न कार्य इत्थ्यमर्थः ।

यथा 'मा भवन्तमि'स्यादौ ॥ ५९ ॥

विमर्शः : नैयंबा के पिटकले (न्याय-वै०) संस्मरण में 'यदश्रादिति'—वो जगह 'अथवा' रखा है। अथौनित्य को वात पर धरने उसे बदल दिया है।

या यद्रुमपत्तारणे यत्रसम्बन्धान्विततादृशो वा । तस्य तदूणार्थीग्रा न शाब्दी पौनरुक्त्यता ॥ ५७ ॥

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यो यद्र्रमेंति 'अपरदिगणिके'स्यादौ यो दिगलङ्कणोडर्थो यद्र्रमेय गणिकाधर्मस्य निष्कास- सनादेरुपचारेणोपलक्षितः, तथा 'अम्बुनिधेरस्मन्थे' इत्यादौ यस्य कामुकस्य समबन्धं यद् हृदयादि तेनान्वितोऽम्बुनिधिलचणो यथार्थः, तस्य तद्रूपणा गणिकाकामुकरूपाणा शाब्दो नेष्यते आर्थी पुनरिष्यत एव ॥ ५७ ॥

यो यद्र्रमें ( अनुरागवत्तमपि लोचनयोः = पद्य के ) 'अपरदिगणिका' इत्यादि में जो दिशारूपों पदार्थ उसमें गणिका के असाधारण धर्मों निष्कासन ( घर से निकाल देना ) आदि का आरोप- चारिक प्रयोग हैं इसी प्रकार 'अम्बुनिधेरस्मन्थे' में कामुक से सम्बन्धित हृदय आदि का, अतः उन ( दिशा और अम्बुनिधि ) पर गणिका और कामुक का शाब्दतः आरोप उचित नहीं, जहाँ तक आर्थी आरोप का संवन्थ है वह तो मान्य ही है ।

विमर्शः 'आभोगिनेत्र'० इत्यादि पद्य में अम्बुनिधिपर कामुक का आ आरोप शाब्दतः नास्ति है । 'अपरदिगणिका' में अवश्य है ।

प्रयुक्तान्तर्गतैरेव यत्र सोडर्थः प्रतीयते । प्रयोगस्तत्र शेषाणां पदनां पौनरुक्त्येन कृत् ॥ ५८ ॥

जहाँ प्रयुक्त पदों में से ही अर्थ की प्रतीति हो रहती है वहाँ उससे शिष्य अन्य पदों का प्रयोग पुनरुक्तिनिके होता है ।

प्रयुक्तान्तर्गतैरवेति 'मदिराद्र्रवे'स्यादौ ॥ ५८ ॥ प्रयुक्तान्तर्गत = 'मदिराद्र्रवे'० इत्यादि पद्यों में ।

कर्त्र्योऽपि न रूढायां तत्क्रियायां च नेष्यते । वाक् साधकतमाझानामौचित्यादेव तद्र्रते ॥ ५९ ॥

प्रधानकर्ता और उसकी निरूढक्रिया में साधकतम अङ्गों का कथन ( वाक् ) मान्य नहीं । उसकी प्रतीति स्वतः औचित्य द्वारा हो जाते है ॥ ५९ ॥

कर्त्तरि इति प्रधानभूते राजादौ कत्त्ररि तत्क्रियायां च खड्गेन छेदक्रियायां रूढायां साधकतमस्य खड्गस्य बहुनि तदपेक्ष्याझानि धाराविनिपातादीनि वचर्नानि नेष्यते तेनैवाझेन प्रधानभूतानान्त- राज्ञानामौचित्यात् ॥ ५९ ॥

कर्त्तरि—प्रधानभूत राजा आदि कर्त्ता में और उसकी क्रिया में अर्थात 'खड्ग' से की जाने वाली छेदन-क्रिया में, साधकतम = खड्ग = खड्ग के बहुत से अंग = धारानिपात आदि का कथन मान्य नहीं । जैसे—'करकलित' इत्यादि पद्य में ।

अभिप्राय यह कि राजा आदि कर्त्ता हो और छेदन आदि क्रिया तो उसका साधकतम प्रधान अङ्ग खड्ग ही होता है उस ( खड्ग ) के धारानिपात आदि अङ्गों का कथन नहीं होना चाहिए । उसे प्रधानभूत अङ्ग से उसके अपने अङ्गों की प्रतीति हो जाती है ॥५९॥

दोषद्र्यमिदं प्रायः समासविषयं मतम् । यतोऽवकवकल्पनालक्षणकपरीत्यजन् ॥ ६० ॥

ऋताः प्रतीतिविमुखैर्हि शयन्तेऽनेकधा हि ते । समाससमत एवाहुः कवीीनां निकषं परम् ॥ ६१ ॥

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क्रियाप्रतीतौ करणप्रत्ययानुभवारिणी ।

तदप्रतीतौ तादात्म्यात् सैवानुसंसिता भवेत् ॥ ६५ ॥

यदेतत् त्यागपाकादौ क्रियेत्युक्तेर्निबन्धनम् ।

तदव्यक्तियेनदर्शयस्य तदुक्तौ नाददौ तत् ॥ ६६ ॥

क्रियेति क्रियाया: शोकादिलक्षणया: प्रतीतिः करणक्रियाप्रतीतिं न व्यभिचरति करणमेव यतः क्रिया, तदप्रतीतौ करणाप्रतीतौ सैव शोकादिलक्षणा क्रिया न निश्चिता स्यादेकत्वात् ।

त्यागक्रियेत्यत्रैतद् क्रियाशब्दप्रवृत्तिनिवृत्तिनिमित्तम् ॥ ६५ ॥

तत् तस्मात् यदत्र शोकादिशब्दप्रयोगवशाद् यस्य करणस्य व्यक्तिः प्रकाशास्तदुक्तौ तत् करणादिपदं न प्रयुज्यीत एव्यर्थः यथा ‘शोकक्रियाकरणस्ये’ त्यादौ ।

प्रयुक्ते चाप्रयुक्ते च यस्मिन्नर्थगतिः समा ।

न तत् पदमुपादेयं कविनाडवकरो हि सः ॥ ६७ ॥

जिसका प्रयोग भी न हो परन्तु अर्थ का ज्ञान एकसा रहे उस पद का प्रयोग कवि न करे, वह फिजूल होता है ॥ ६७ ॥

प्रयुक्ते चैति प्रकृत्यादिपुनरुक्तानां चतुर्णामुपसंहारः ॥ ६७ ॥

अन्योऽन्याक्षेपकत्वे सति न्वयवयतिरेकयोः ।

उभयो:कर्तृकरेसस्य नात्येति पुनरुक्तताम् ॥ ६८ ॥

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द्वितीयो विसर्गः

अन्वय और व्यतिरेक दोनों एक दूसरे की अपेक्षा रखते हैं, अतः दोनों का साथ-साथ कथन होने पर कहीं एक अवयव ही पुनरुक्त होता है ।

अन्योन्येति वाक्यपौनरुक्त्यसड्‌ग्रहः । उभयोरुक्तिरेकस्य । उभयमध्यात कस्माचित् । पौनरुक्त्यं नातिक्रामति । यथा ‘सहसा विदधीते’ल्यादौ ॥ ६८ ॥

अन्योन्येति इसके द्वारा वाक्यपौनरुक्त्य भी संगृहीत कर लिया गया । उभयोरुक्ति-दोनों में से किसी एक की पुनरुक्ति टाल नहीं पाता । जैसे—‘सहसा विदधीते’ इत्यादि पद्य में ।

पुनरुक्तिप्रकारणामिति दिड्‌मात्रमीरितम् । विवेकतुं को हि कात्स्न्र्येन शक्कोत्यवकरोत्करम् ॥ ६९ ॥

इति सद्‌ग्रहश्लोकः ।

इस प्रकार हमने पुनरुक्तिदोष के कुछ भेदों का संक्षिप्त निर्देश किया, भला बेकाम की चीजों को पूरी तौर से कौन गिन सकता है ॥ ६९ ॥

( ५ ) वाच्यावचन

एवं पौनरुक्तं .समप्रपञ्चं विचार्य वाच्यावचनं प्रपञ्चयितुमाह वाच्यस्यावचनं यथेति । एवं पौनरुक्तम् = इसप्रकार विस्तारपूर्वक पुनरुक्तिदोष का विचार किया अब वाच्यावचन दोष का प्रपञ्च उपस्थित करने के लिए कहते हैं—‘वाच्यस्यावचननम्’ आदि ।

अत्र हि भ्रान्तो निर्देशायां तद्विषयासूतयः सुरधनुर्धारासङ्योरिव विद्युतेलपि इदृशा परामर्शा वाच्यं यत् तस्यावचनं स वाच्यावचनदोषः; यथा ‘कनकनिकषासङिग्धा विद्युत् प्रिया न ममोर्वशी । सा च शुकुमारसुभगेत्युत्पातपरम्परा केयम् ॥’

अत्र हि द्वितीया: कमलार्थ: सर्वनामवाच्य: । तस्य यत् स्वशब्देन वचनं स वाच्यावचनं दोष: । तेनात्र ‘तस्मिन्नश्रु कुवलये’ इति युक्तः पाठः । सर्वनामपरामर्शाच्विषये योडर्थवस्तुनी । स्वशब्दवाच्यतादोष: स वाच्यावचनाभिध: ॥ ७० ॥

इति सद्‌ग्रहश्लोकः ।

वाच्य की अवचचन (जिसका अवश्य कहना चाहिए उसका न कहना ) जैसे—‘कनकनिकषासङिग्धा विद्युत प्रिया न ममोर्वशी ।’ ( कसीौटी पर पड़ी सुवर्ण लेखा ) के समान सुहावनी बिजली है, मेरी प्रिया उर्वशी नहीं । यहाँ आन्ति दूर होने पर उसका धिपय बने धनुष और धारासार के समान बिजली का निर्देश भी ‘इदम् =यह’ ‘विदुली है यह,’ इस प्रकार शब्द से होना चाहिए था, उसको उस रूपसे नहीं कहना वाच्यावचन दोष हुआ ।

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३८८

व्यक्तिविवेक:

और जैसे—

स्थल पर कमल, कमल पर कुवलयों की जोड़ी, वे सब कनकलता में, वह भी सुकुमार सलोनी, यह उपद्रवों का ताँता कैसा ? यहाँ दूसरा कमलशब्द सर्वनाम द्वारा कहा जाना चाहिए । उसका अपने वाचक शब्द द्वारा कहा जाना—वाच्यावचन दोष हुआ इसलिए यहाँ 'तस्मिश्र कुवलये' पाठ चाहिए ।

'किसी भी सर्वनाम परामर्श योग्य अर्थ का अपने वाचक शब्द से कहने में जो दोष होता है वही वाच्यावचन है ।'

असमासेन निर्देशो वच्यसमाणमेतत्समामान्यायमवाच्यस्य वचनमपि कटाक्षयितुं । इदमापरामर्श इति अवाधितप्रत्यक्षान्निमित्तकत्वाद् भ्रान्तिनिदृत्तये प्रत्यक्षस्य च विपय-मुखेन परामर्शाहंवात् । तस्य यत् स्वशब्देन वचनमभिति पूर्वं सत्येव सर्वनाम्नि पुनः स्वशब्देन प्रतिपादनम्—

'सर्वनामपरामर्शयोग्यस्यार्थस्य यत् पुनः । स्वशब्देनाभिधानं सा शब्दस्य पुनरुक्तता ।' इति ।

इदानीं तु सर्वनामस्थानीयत्वेन स्वशब्देन वचनं वाच्यावचनमुख्यते । 'वाच्यस्य अवचननम्' इस प्रकार समास तोड़कर कहने का अभिप्राय अवाच्यवचनरूप एवं ऐसे ही दोष को भी वतलाना है ।

इदमापरामर्श = भ्रान्ति दूर होती है उस प्रत्यक्ष से जो वाधित नहीं होता । और जो प्रत्यक्ष होता है उसका विषय द्वारा निर्देश किया जाना चाहिए । 'तस्य यत् स्वशब्देन वचनम्'—इस प्रकार पहले सर्वनाम के रहते हुए पुनः वाचक शब्द का प्रयोग पुनरुक्त दोष बतलाया गया था—'सर्वनामपरामर्शयोग्यस्यार्थस्य**' इत्यादि द्वारा । यहाँ जो कहा जा रहा है, उसमें ऐसे शब्द के कथन में दोष का प्रतिपादन है जो सर्वनाम के स्थान पर प्रयुक्त होता है ( सर्वनाम नहीं रहता, केवल उसके लिये स्ववाचक रहता है । पुनरुक्त सर्वनाम भी रहता है और स्ववाचक भी ) ।

'द्वयं गतं सम्प्रति शोचनीयतां समागमप्रार्थनया कपालिन्' इति । अत्र कपालिशब्दो धूमाङ्गाराभ्यां चक्र्यर्थे युज्यते : सङ्घिमात्रं वा प्रत्याययेत्, कपाल-सम्बन्धकृतं वा गरिंतत्वम्, उभयमपि वेति त्रयः पक्षाः । तत्र प्रथमे पक्षे द्वितीये पक्षे तस्याश्रयप्रतिपत्तये तेनैव तत्पर्योयेण सर्वनाम्ना वा विशेष्यम्-वश्यमुपादेयं भवति येन तस्य विरक्तितार्थसिद्धावायो हेतुभावोद्वकलष्येत ।

तत्र तेनैवोपादाने यथा—

'सततमनड्नोडनझो न वेत्ति परदेहदाहडुःखमहो । यदयमदयं दहति मामनलशरो भुवमसौ न कुशुमशरः ॥' इति ।

पर्यायोपादाने यथा—

'कुयां हरस्यापि पिनाकपाणेःधैर्यच्युति के मम धैर्यनोडने ।' इति ।

अत्र हरस्येति पर्यायशब्देनोपादतस्यार्थस्य पिनाकपाणितवं धैर्यच्युतेश्च्युतेर-शाक्यकरगीयतायामार्थो हेतुः अन्यथा हरग्रहणस्य पौनरुक्त्यं स्यादिति ।

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द्वितीयो विसर्गः

३४८

यथा च—

'पक्वः शाखामहिकुलरिपोरत्यकद्वैनतेयादि'ति ।

सर्वनाम्ना यथा—

'दृशो दृश्ये मनसिजं जीवयन्ति दृशो यतः ।

विरूपाक्षस्य जयिनीस्ताः स्तुमो वामलोचनात्व ॥' इति ।

अत्रापि सर्वनाम्नोऽपात्स्वस्यार्थस्य वामलोचनात्वं मनसिजदाहजीवनयोर्-

न्योन्यविभिन्नयोरप्योरप्यविभिन्नहेतुकत्वोपपत्तावार्थों हेतुः इतरथा वामलोचना-

त्वस्य पुनरुपादानप्रसङ्गः ।

अत्रैव तृतीयोऽपि पक्षो न सम्मवतयेच एकस्यैव शब्दस्यावृत्तिमन्तरेणा-

नेकार्थप्रतिपादनसामर्थ्याभावात् । न चासावनिबन्धना शङ्क्या कल्पयितु-

मिति वक्ष्यते । न वात्र किश्चित्क्वचनधनमुक्तमिति तस्य वाच्यस्यावचनं

दोषः । तेन वरमथमत्र पाठः श्रेयान् अल्पदोषत्वात् 'दृश्यं गतं सम्प्रति तस्य

शोचयतां समागमप्रार्थनया कपालिनः ।' इति ।

अर्थभेदाद्विभिन्नेऽपि शब्दे साधर्श्यमात्रजः ।

आवृत्तिद्यपहारोडयं मूलमस्यैकताश्रमः ॥ ७१ ॥

अतश्च—

तत्पयोरेव तेनैव सर्वनाम्ना विनिदिशेत् ।

अर्थेहेतुत्वनिष्पत्तौ धर्मिण्गोऽभ्यात्मकम् ॥ ७२ ॥

इत्यनन्तरश्लोकौ ।

'दृश्यं गतं'—इस पद्य में कपालिन् शब्द धर्मी और धर्म दोनों अर्थ का वाचक है। यहाँ वह ( १ ) या तो केवल धर्मी का बोध करा सकता है या ( २ ) कपाल सम्बन्ध से उत्पन्न गर्हितता रूपी धर्म का ( ३ ) अथवा दोनों का—ये तीन पक्ष संभव हैं ।

इन्में से प्रथम पक्ष में ( संबोधनमात्र का बोध मानने पर ) विशेष ( कपालवत्व ) का ज्ञान कराने के लिये एक दूसरे कपाली शब्द का प्रयोग आवश्यक होगा। जिससे इनका गर्हितत्व प्रतीत हो सके । द्वितीय पक्ष में—उस ( धर्म ) के आश्रय का बोध कराने के लिये उसी ( धर्मिवाचक शब्द ) के अर्थ पर्यायवाची शब्द और सर्वनाम में से किसी के द्वारा विशेष का उपादान अवश्यमेव करना होगा जिससे विशिष्ट अर्थ का ज्ञान होने पर उसको अर्थ हेतुत्व सिद्ध हो सके ।

दोनों तीनोंमें से उस ( धर्मि-वाचक शब्द )—के द्वारा उपादान होने पर यथा १—

'अनलः सर्वदा अनलः हि हैं, दूसरे के देह-दाह का दुःख नहीं जानता, यह स्पष्ट निर्दय होकर जला रहा है, इसलिए यह कुसुमशर नहीं अनलशर है ( आग के बाण वाला ) है ।' पर्याय द्वारा उपादान करने पर—'पिनाकपाणि हर का भी धीरज छूट सकता हूँ— यहाँ 'हर' इस पर्याय शब्द द्वारा जिस अर्थका उपादान किया गया उसकी पिनाकपाणिता = धैर्यच्युति की अशक्तता में अर्थ हेतु है । नहीं तो हर का उपादान पुनरुक्त हो जाय । और जैसे :—'एक का सर्पैकुल के राक्षस गरुड से भय छूट गया' ( रघुवंश-१७ )—यहाँ ( गरुड ) । सर्वनाम द्वारा जैसे—'आँख से

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व्यक्तिविवेक:

जले काम को जो आँखों द्वारा ही जला देते हैं हम उन त्रिनेत्र ( शंकर ) को जीतने वाली सुन्दर आँखों वाली लियों की तारोफ करते हैं ।'

यहाँ भी सर्वनाम द्वारा कथित अर्थ का वामलोचनात्व—काम के दाह और जिलानेरूप दो विभिन्न कार्यों में एक ही की हेतुता को बतलाने वाला अर्थ हेतु है । नहीं तो वामलोचनात्व पुनरुक्त होता । इसलिये तीसरा पक्ष नहीं हो सकता, एक ही—शब्द पुनः कथन के बिना अनेक अर्थ का प्रतिपादन नहीं कर सकता । यह हम आगे ( तृतीय विमर्श में ) बतलायेंगे कि बिना हेतु के यह ( प्रतिपत्ति ) नहीं कराई जा सकती । यहाँ ( द्वयं गतं*** में ) कोई भी हेतु नहीं बतलाया गया, इसलिये वाच्यावचन दोष है । इसलिये यह पाठ अधिक अच्छा होगा—‘द्वयं गतं सम्प्रति तस्य शोच्यतां समागमप्रार्थनया कपालिन्':—उस कपाली के समागम की प्रार्थना से अब दो चीजें शोचनीय हो गई हैं । इस पाठ में दोष कम हैं । यहाँ जो यह ( एक ही शब्द की ) आहृत्ति—बतलाई जा रही है इसका कारण आकारसाम्यमात्र से उत्पन्न एकता का अभम है, यद्यपि शब्द अर्थ के भेद से भिन्न हो जाता है । इसी से—‘उसी के पर्याय से या—स्वयंं उससे या फिर सर्वनाम से निर्देश करे, यदि धर्मी और धर्म दोनों के बोध के लिये—अर्थ हेतुता सिद्ध करनी हो ।'

धर्मिधर्मोहरैक्येनोद्यत्: धमै: कपालिसम्बन्धन गाहितत्वम् । उभयेतो धर्मिधर्मो-त्मकम् । विशेषप्रतिपत्तय इति गर्हितत्वमत्र विशेषः । तस्यैति गर्हितत्वस्य । एवं तस्य विवक्षितेत्यत्र श्रेयम् । विवक्षितोऽर्थ: शोच्यतावल्चणः । अर्थ इति विशेषणद्वारेग् भावात् ।

वामलोचनात्वमिति । न चात्र वामलोचनादि विशेष्यपदं । यतो यत्सच्‍च्‍बुददृशद्योत्था-पितवाक्यार्थद्वयसास्मध्यान्न्र्रायिकालच्‍णसय विशेष्यस्य प्रतीति: । विशेषणमेवात्र वामलोचनापदम् ।

तृतीय इति उभयदृष्टितवाश्रय: । न चासाविति आहृत्ति: । न चाश्रामिति तेनैव तत्पर्याय-येण सर्वनाम्ना चेत्येषां प्रकाररणाम् । अल्पदोषत्वादिति । तस्यैति व्यवहितसम्बन्धात् किश्चित्-दु:खष्टत्वम् । तस्य समागमप्रार्थनयेतित वाच्यम् ।

अर्थमेदादिति । अर्थमेदे: एकस्यैवैकद्रृक्‍द्वित्रित्रयोराहृत्ति:, यथा द्विरन्द्वाणां भोजनकांस्य-पाक्यो: । तदु:खष्टम्—‘आहृत्ति: सकृदृक्‍दृत्ति:' इात । न चार्थमेदे शब्दस्यैकत्वं न्याय्यसम् अर्थ-भेदस्य प्रधानमूतस्य गुणवमूतं शब्दं प्रति मेदकत्वात् । तस्मादत्र द्वयो: शब्दयोर्वस्तुवृत्तेन यत् सादृश्यं यश्र सादृश्यहेतुक: प्रतिपत्तिपूर्वमेकताऽभूत्, तत्‍त्रिबन्धनोडयं मुख्य एवावृत्ति-व्यवहार इति ।

अतद्रेति । यत आहृत्तिन्मं युज्यते, तत् इत्थर्थ: । धर्मिधर्मोंभयात्मकमिति । उभयमये वस्तुनि प्रतिपत्‍तिसते इत्थर्थ: ।

धर्मी धर्मं—धर्मी हरस्वरूप पदार्थ, धर्मं = कपाल सम्बन्ध से प्रतीत गर्हितता, उभय—धर्मी और धर्मं दोनों ।

विशेषप्रतिपत्तय इति—यहाँ विशेष हैं गर्हितता ।

तस्य—अर्थात् गर्हितत्व की । इसी प्रकार ‘तस्य विवक्षित’ इस जगह भी समझना चाहिये ।

विवक्षित अर्थ—शोच्यतास्वरूप ।

आर्थ—अर्थात् विशेषण द्वारा कारण होने से ।

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द्वितीयो विमर्शः

वामलोचनत्व :—पहले वामलोचनत्व यह पद विशेषणवाचक नहीं है, क्योंकि यत् और तत् दोनों शब्दों से प्रतीत दो किञ्चार्थों के सामर्थ्य से न्यायिकास्वरूप विशेष्य की प्रतीति होती है। अतः वामलोचनत्वा शब्द विशेषण हैं।

तृतीय—उभयत्रैकत्व समया। न न्यासायिति—अर्थाद् आवृत्ति: । न जैपाम्—उपको दागा, उसके पर्याय के द्वारा या सर्वनाम द्वारा—इसप्रकार इतने प्रकारों वा।

अल्पदोपलब—'तस्या' इसवातो समन्वय व्यवहित होने से कुछ उल्टताई आती है। (पूरी नहीं)। कदुनना था 'तस्या' जो 'समागमप्रार्थना' के साथ—'तस्य समागमप्रार्थनया' इसप्रकार ।

अर्थमेदाद्—अथ1—आवृत्ति या। मतलब यह है एक का अनेक बार प्रयोग, जैसे—'दरिद्रलोगों द्वारा भोजन कराने में नांसे की आनी या। कचरा भी है—अस्फुट वृत्ति आवृत्ति। अर्थ भिन्न हो जाने से शब्द जो किञ्चित् भोज्य नादिये अर्थ का बोध प्रधान होता है। वह अप्रधानभूत शब्द के मेट का कचरा बनता है। इसलिये यद्यपि स्पष्टतः द्विस्मान दो बारों का जो स दृश्य और उस साधुत्य बो द्वारा उत्पन्न जो आभासा था। एकता वा। अम—उसके आधार पर यह आवृत्ति—व्यवहार नले पड़ा है।

अतद्रक्ष—अथया1कि आभ्रितों ठीक नहीं होती इसलिये । धर्मिभेदर्भो—दोनों वस्तु प्रतिपादन के लिये अभीष्ट है ।

यत्रान्यस्येयतयादि ना वाच्यावचनोदाहरणप्रसझेन श्लेषपं गुणदोषवत्तया विततं विचारयति। यत्रान्यस्य—इल्वादि अन्य द्वारा वाच्यावचन दोप के उदा1हरणों के ही प्रसझ में शेष के गुण दोषों का विवरण विस्तारपूर्वक बताते हैं ।

यत्रान्यस्यालड्कुरसय विपयेऽटकारान्तरनिबन्धः सोऽपि वाच्यावचनं दोषः । तत् समासोक्तिचिषये श्लेषस्योपनिबन्धो यथा—'अलङ्कारिकुलतुलाकर्पणमारक्तकुचकुन्दसुन्दरम् । आमोदर्णिकाकान्तं भाति तेडङ्मनिवाननम् ।।'

अत्र हि अबउसमुचितविशेषणोपादानसामध्योऽक्षिसस्याऽऽजस्योपमान-भावावगमः समासोक्तिरेव विषयो न श्लेषस्य, तत्रैव तस्यानुमीय-मानतया सचेतनचमत्कारकारितयोपपत्तेः, श्लेषे तु तस्य वाच्यतया तद्वि-परितत्वादित्युक्तम् ।

यद्यपि कोप अन्य अलङ्कार उपयुक्त हो वहां अन्य किसी अलङ्कार का उपयोग वाच्यावचन दोष होता है। यथा—समासोक्त के क्षेत्र में श्लेष का उपयोग । यथा—अलङ्कारिकुल से घिरा कुछ-कच क लाल रंग के कुच ( पच ओर अधर ) से सुन्दर, आमोद ( सुगन्ध और प्रफुल्ल ) से युक्त कान्तिका ( वर्णफूल और बीजकोष ) से अच्छा लगने डाला तुम्हारा सुख कमल के समान दिखाई देता है ।

यद्यपि—धमल यो योग्य विशेषणों के उपादानों से ही—आक्षित हुए कमल का उपमान रूप से बोध हो जाता है, उसे समासोक्ति का ही विषय बनना चाहिये, श्लेष का नहीं। समासोक्ति

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३९२

व्यक्तिविवेक:

में वह अनुमान द्वारा प्रतीत होता है, अतः सहृदयों को चमत्कृत भी करता है । श्लेष में तो वह वाच्य हो जाता है, अतः चमत्कारी नहीं हो पाता ।

अलकालीकति । अलकान्येवालिकुलम् अलकसदृशं चालिकुलम् । छद्रैरडधरः पन्नाणि च ।

प्रसोदः प्रहर्षं सौरभं च । कर्णिका कर्णाभरणं द्वीजकोशश्र ।

न श्लेषस्थ्येति । ननु श्लेष्यस्ताहे कः प्रसादोऽर्जुनस्योपमानस्य च्छायाम् ? नैतत् । अङ्ङालि-

रान्तरविच्छिन्नविषयाभावेन सर्वालङ्ङारापवादस्वाच्छ् श्लेषस्थ्य, उपमाप्रतिषेधोऽस्पत्तिहेतुतः श्लेप

एवात्र न्याय्यो नोपमेत्यभिप्रायः । अत एव श्लेषे तु तस्य वाच्यान्वयेऽयुक्तम् ।

अलकाली—अलक ही अलिकुल, और अलकसदृश अलिकुल । छद्र—अधर और पत्ते । 'अमोदः=

प्रहर्षं और सुगन्ध, कर्णिका = कान का फूल और द्वीजकोश ।

न श्लेषस्थ्य—( शंका )—श्लेष के प्रसंग में कवि को उपमान बनाने की बात कैसी ?—

यह ( प्रश्न ठीक ) नहीं । श्लेष का अन्य अलङ्कारों से अलग कोई—क्षेत्र नहीं, वह सभी अलङ्कारों का साधक है,—इसलिये यहाँ श्लेष ही मान्य है, उपमा नहीं । श्लेष से उपमा द्वव

जाती है इसका केवल आभासमात्र होता है । इसीलिए कहा कि 'श्लेष में वह वाच्य हो

जाता है ।'

विमर्शः वस्तुतः यहाँ श्लेषमूला उपमा या रूपक ही माना जाना चाहिये । 'येन ह्यस्तमनो-

भवेत्' आदि में श्लेष स्वतंत्र पाया जाता है । अतः वह शाब्दिक नहीं माना जा सकता । उपमा,

रूपक आदि अलङ्कार ही साधारण धर्म की निष्पत्ति के लिये श्लेष का वाध करते हैं क्योंकि साधा-

रण धर्मं बिना श्लेष के सम्भव नहीं । अतः उपमा ही श्लेष को दवया देती है और उसका आभास-

मात्र होने देती है । श्लेष सामान्य अलङ्कार है । उपमा आदि विशेष । वे श्लेष का वाध कर सकते

हैं, श्लेष उनका नहीं ।—यही व्यवस्था परवर्तीं आलङ्कारिक आचार्य—मम्मट आदि को मान्य है ।

[ द्र० काव्यप्रकाश नवम उल्लास ]

यथा च—

'बंह्यीया सो गरियांस: स्यवगीया सो गुणा स्तव च ।

गुणा इव निबन्धनन्ति कस्य नाम न मानसम् ।' इति ।

अत्र हि मुख्यवृत्त्या निबन्धोडप्रस्तुतरज्ज्वादिगुणैककार्यः शौर्यादिशु

गुणेवारोपितस्तेषां सामर्थ्यादेव तत्साम्यमवगमयतीत्यमपि समासोक्तिरेव

विषयो युक्तो न श्लेषस्थ्य ।

न हि विशेषणसाम्यमेवैकमप्रस्तुतार्थावगतिहेतोः, यथा—

'प्रकृतार्थेन वाक्येन तत्समानैर्विशेषणैः ।

अप्रस्तुतार्थेकरथनं समासोक्तिरुदाहता ॥' इति ।

किं तर्हि ? तत्कार्येसमारोपपीति गुणा इवेत्यपास्यमेव ।

'तुम्हारे गुण अधिक वड़े, अधिक गम्भीर और अधिक स्थूल हैं । वे किसके मन को गुण

( रस्सी ) के समान नहीं बांध लेते ।' यहाँ वस्तुतः निबंध ( बन्धन ) मुख्य रूप से रज्जु आदि

गुण का ही कार्य है वह शौर्य आदि गुण पर आरोपित है, वह अपनी शक्ति से शौर्य आदि का ज्ञान

करा देता है । इसलिये यह भी समासोक्ति का ही विषय माना जाना चाहिये । श्लेष का नहीं ।

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कोवल विशेषणों वा साम्य होने अप्रसुत अर्थ का ज्ञान नहीं कराता है, जैसा कि कहा है—“प्रकृतिप्रत्ययों आदि द्वारा उससे के समास विशेषणों से अप्रसुत अर्थ का कथन समासोक्ति—कहा गया है । अपितु उसके अर्थ या आरोप भी ( अप्रसुतार्थ यो प्रतिपत्ति कराने वाला माना गया है ) इसलिये 'यणादि' इत्यादि से 'तेन । निहिते' इत्यादि ।

नित्ये इति निवधनन्तीति निर्दिष्टः । तत्साम्यं रजचादिसाम्यम् । न इलेपस्येति उपमाश्लेषस्येत्यर्थः । तेन रजवादिप्रतिपादकं गुणा हवेत न वाच्यसम् ।

ननु विशेषणसाम्येनिवध्यना समासोक्तिरन च निवधनन्तीति विशेषणसिद्ध्याह— न हि 'गुणैरैरप्यलंयौवनं मेघेति । यत्साम्येभावात् 'निरन्तरावलिर्' इति तत्र प्वावगन्तव्यसम् ।

ह्रस्वं 'ह्रस्वमितरत्' इत्यादि में 'इवधनान्ति किया' से प्रतोतिल । निसाम्यं-- नश्ट । निहित इति इलेष्य ।

( 'निहित' )— 'निहित' आदि समासा से समासोक्तिहोती हैं । किन्तु यहाँ ( 'निहोयांसो'० ) में आह ( 'न हि' )— 'न हि' इत्यादि । इसे हमने पहले ही समझ लेना चाहिए ।

श्लेषस्य विपये उपमाया यथा— 'भैररवाचायंस्त द्वादेव हृद्रा राजानं शाशिनमिव जलनिधिशश्वचाल' इति ।

अत्र हि राजशब्द पत्नोभ्यायार्थत्वाच्छशिनमादेलि श्लेषस्यायं विषयो युक्तः । यदत्र पृथकू तमुपादाय राजशाशिनोरुपमानोपमेयभावोपनिबन्धः स ह्यार्थ पृथक्त्वादिकं स्वदते न शब्द इत्युक्तम् ।

'तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः । दिलीप इति राजेन्दुरिन्दुः क्षीरनिधाविव ।'

इत्यत्रापि दृप्र्यर्थम् । अत्र हि श्लेषविषये रूपकसूचकचित्रमनाहृत्योपमाजुगागिणा कविना सैकैोपनिबद्धा । न चासौ ताभ्यां स्पर्धिंतुमुत्सहते तयो-र्यथापूर्वं प्रतोयमानाश्रयसंश्रयातिरेकात् तदनुविधायिनः सहृदयैकसंवेद्यस्य चमत्कारातिरेकस्य सम्बवादित तस्य वाच्यस्यावचनं दोषः ।

'ज्यों ज्यों उमंग में भरता हूँ— 'बन्धनाहिं' माला वो हरि में हरी पड़ता ज्यों ज्यों मन्द्रभा को देखकर समुद्र ।' यहाँ अकेला 'भाला' शब्द मन्द्रमभा को भी जान करा देता क्योंकि वह उपचार्थक है, अतः यहाँ श्लेष ही बोहिए था । यों ( राजा शब्द जो ) अलंकार से प्रयुक्त होकर राजा और चन्द्रमभा को साहदर्य कराया गया वह अलंकार्य है । वह अर्थ रसता तो विदगध विदानों को अधिक स्वाद देता, श्लेष नहीं ।

इसी प्रकार — 'उसके शुद्ध वंश में दिलीप नामक अधिक शुद्ध राजेन्दु हुआ जैसे क्षीरसागर में चन्द्र ।' [रख० ]

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यहाँ भी समझना चाहिए । यहाँ श्लेष के स्थान पर रूपक दिया गया है । अन्त में उपमानुरागी कवि ने उपमा ही मढ़ दी । यह ( उपमा ) उन दोनों ( श्लेष और रूपक ) से होड़ नहीं लगा सकतीं । उनमें क्रम से ( रूपक की अपेक्षा श्लेष में ) प्रतीयमान अर्थ का स्पष्ट अधिक रहता है । इसलिये उस ( प्रतीयमान ) के ऊपर निर्मल सहृदयमात्र को समझ में आने वाला चमत्कारविषय भी संभव होता है । इसलिये वाच्य ( अवचनीयर्थनीय ) होने पर भी उस ( श्लेष ) का अवचचन ( अकथन ) वाच्यावचन दोष हुआ ।

पृथकृतमुपादाय ति । तचछछदेन ह्राशी परामृष्टः । स ह्यार्थ एवति उपमानोपमेयभावः । श्लेषविषये इति । अन्र तिस्रः कच्याः । राजशब्दस्योभयार्थत्वाच्छू श्लेषः । तदनाश्रयश्लेषविषये इति । घनेनदुना रूपं तथृष्ठे चेनदुरिवेत्युपमा । ननु राजेन्दुरित्यग्र तूपमारूपकयोरेकपरिग्रहे सा धकवाधकाभावात् सङ्करो न्याय्यः, न नियमेन रूपकस्य । तत् कथं तु 'रूपकमात्रिसंश्रितम्' । उपमाया अभानवे तु सङ्कर एवात्र युक्तः । यद्रूपमापेच्चया रूपकस्यात्र समासो र्फुटतरेन प्रतिपेते रूपकं संश्रितम् । अनेनैव ह्यभिप्रायेण वाच्यतिरूपकस्य विषये उपमाया यथेति । ताभ्यां स्पर्धितुमिति श्लेषरूपकाभ्याम् । तयोर्यथापूर्वमिति । उपमापेच्चया रूपकस्य रूपकापेच्चया श्लेषस्यैव यर्थः ।

पृथकृतमुपादाय—तत् शब्द से ह्राशी का निर्देश किया । स हि—उपमानोपमेय भाव । श्लेषविषये—इस विषय में तीन कोटियाँ हैं । राजशब्द उभयार्थ है इसलिये श्लेष हुआ, उसे छोड़कर राजा पर इन्दु का आरोप रूपक और उसके सहारे 'इन्दुरिव' यह उपमा । शंका—'राजेन्दु' यहाँ उपमा और रूपक में से किसी एक को मानने में न कोई साधक है और न बाधक, इसलिये यहाँ संकर मानना ठीक है । रूपक मानना ठीक नहीं । इसलिये ग्रन्थकार ने यह कैसे कहा कि—'रूपकमात्रिसंश्रितम्' । उत्तर—राजा के साथ इन्दु की उपमा अलग से—'इन्दुः क्षोभनिधाविव' दी गई है । राजेन्दु पद में भी उपमा मानने से उपमा पुनरुक्त हो जाती इसलिये रूपक माना । यदि वह उपमा होती तो वहाँ संकर ही माना जाता । अथवा यहाँ समास में उपमा की अपेक्षा रूपक अधिक स्पष्ट है । इसलिये रूपक ही वतलाया गया है । इसी अभिप्राय को लेकर ग्रन्थकार आगे भी कहेंगे—'रूपक के विषय में उपमा का' इत्यादि ।

ताभ्यां स्पर्धितुम् = श्लेष और रूपक से । तयोर्यथापूर्वम्—उपमा की अपेक्षा रूपक का और रूपक की अपेक्षा—श्लेष का ।

रूपकस्य विषये उपमाया यथा— ततो दृशं वैरमदभितत्नः सोदतीव रस्म्यादू भवानाद्रिकुञ्जात् । विनीयते दनवर्गनन्धहस्ता महाद्रिकुञ्जादव गन्धहस्ता ॥ न चात्राद्याविन्दुगन्धहस्तिराशब्दौ प्रशंसावाचिनावपरो पुनरुपमानवाचिनाविति तयोर्भिन्नार्थत्वाच्च यथोक्तदोषावकार इति मुक्तं वक्तुम् । आदाभ्यामेव ताभ्यां तदुभयार्थवगतिसिद्धेः ।

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द्वितीयो विमर्शः

नन्वेवम्—

'अनिराकृततापस पदं फलहीनां शुमनोभिरजिताम् । खलतां खलतामिवसतां प्रतिपद्येत कथं बुधो जनः ॥' इत्यादिकाव्यमुक्तदोषयोगादसदेव स्यात् । नैवं वाचः । यत्र हि यद्‌रूपप्रतिभानुगुणशब्दपरचितः श्लेषस्तत्र तद्‌रूपनिबन्धस्तमेव श्लेषमाभि- व्यानक्ति न तु तस्य विपयमाकामतीति निवन्धनान्तरभावे सत्युपात्तस्यापि शब्दस्य यदेतदुपमानविधायितया द्विरूपदानं सा श्लेषयैवाभिव्यक्ति; न तु तत्रालंकारान्तरसंस्पर्शी इति तद्‌द्विषयताश्रयालंकारनिवर्ततीत्युक्तदोषो नद्‌द्रय- योंगासिद्धे: कथमिवास्य काव्यस्य दुष्टता स्यात् ।

यदलंकारभक्तये ये शब्दास्तदितरेऽपि तैरेव । व्यपेक्ष्यतापतद्‌भेदि तदसोऽर्थो लाघवाच्चान्यः ॥ ७२ ॥ न ह्यस्ति निजे कर्मण्यलंकारतों स क्षणातिशायः । येन विधीयेतैकः परान्नि‌पिध्यते वा कवीनामिति ॥ ७३ ॥

इति सङ्ग्रहग्रन्थे !

रूपक भी जगत् उपमा का ( कल्पना ) जैसे —— 'उसके बादल और मत्स्य से गरम बहुत राक्षस-रूप गन्धराज अपने अतीव रम्य भवन से निकला जैसे—ऊँचे पठार्य की गुरुतम्ट में से गन्धगज ।'

यहाँ ऐसा कहना ठीक नहीं पड़ता कि 'बादल और गन्धगज शब्द प्रश्नो‌क्तवाची है और बादल के उपमा‌वाची । इसलिए दोनों के अर्थ मिल होने से उपयुक्त दोष नहीं आता'—द‌ारण कि शुरू के ही दोनों शब्दों से उन दोनों अर्थों की प्रतीति हो जाती है । शंका—यदि ऐसा है तो— 'विद्युल्ल‌त‌ा ( आकाश ) लता के समान खेल ( दुष्टता ) को कर अपने, जो तपस्विनी‌तों दूर नहीं कर पातीं, जिसमें क्षोभ भी नहीं, और जो सुमनों से रहित रहतीं है !— मत्यादि काव्यों में उक्त दोष के दारण हेतता आ जायगी ।'

( उत्तर — ) ऐसा न कहिए—जहाँ जिस अलंकार का आभासमात्र कराने के लिये भी ग‌ईं पद‌र्थना से हलेप बनाया गया हो, वहाँ वह अलंकार उक्त हलेप को अभिव्यक्त करता है, उस ( हलेप ) के क्षेत्र में वह सत्यं न‌र्हीं आ घुसता । इसलिये और किसी कारण ये अभाव में केवल उपमा का आभास कराने ये लिये यहा मार वाचित शब्द का जो पुःपः दूसरे नार क‌र्ता है । उससे हलेप ही मिलता है, वाछाॅं दूसरे किसी अलंकार था । स्पष्टं थी न‌र्हीं है । इसलिये यद्हाँ यह शंका थी नहीं उठती कि इस पद्य में बादल ( उपमा ) था हलेप ? इसलिये उक्त दोनों दोषों के प्रसिद्ध हो जाने से यह काव्य दोष से दू‌षित मही होता है । इस प्रकार 'जिस अलंकार का आभासमात्र कराने के लिये जो शब्द दिये ग‌ये हो‌' यदि उससे 'भिच्छ अलंकार थी उ‌पेक्ष्य ही गिने शब्दों से युक्त होता हो तो उसी ( दूसरे नयत्नधो रद्र ) अलंकार को मानन‌ा च‌ाहिये और किसी को नहीं ।' कवियों की अपनी कृति ( काव्य ) में अलंकारमात्र ए‌सी को‌र्द्ध विशेषता न‌र्हीं हो‌गी जिससे एक अलंकार का विधान किया जाय और दूसरे का निपेध ।

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नन्वे सतीति । अस्य दोषस्यातिप्रसङ्गं ब्रूते । ताप आतपोऽपि । फलं शाल्यादिकमपि । सुमनसः पुष्पाण्यपि । खलता दुर्जनत्वं, धान्यादिच्चोदनस्थां च । असती दृपणीयाऽशोभना च ।

चदलङ्कारेतित । खलतामिस्यादिरूपनोस्थापिते श्लेहे नोपमा श्लेषवाधते । तस्य विविक्तविषयत्वाभावात् । श्लेषस्तु तां वाञ्छते इति युक्तम् । अस्य न्यायस्यालङ्कारान्तरेऽपि भावाद् । व्यासिङ्गरभसुक्तं यदलङ्कारेतित ।

निवन्धनान्तरभावे इति । सन्ति समासोक्त्यादिनिवन्धने पूर्ववच् श्लेषोस्थापितोपमा न कर्तव्या स्यात् । नचात्रानिराकृतेत्यादिविशेषणसाम्यात् समासोक्तिरिति वाच्यम् । विशेषणानां नियतोपमानगामित्वाप्रतीते: ।

विषयताश्रयत्वेति उपमाविषयत्ववसभभावनेयथार्थ: । कचिद् तु तत्तद्विपयतेति पाठ: । तत्र श्लेषविषयत्वमुपमाविषयत्वं च युगपन्न शङ्कनीयं तयो: स्वरूपवादभाबेन व्यवस्थिततेरित्यर्थ: ।

उक्तदोषद्वयेतित । उक्तं यच् श्लेषविषये दोषद्वयं-यत्र समासोक्तिविपये श्लेष: कृत: श्लेषविषये चोपमा इति, तस्यात्र सम्वन्धाभावादित्यर्थ: ।

यदलङ्कारेतित । श्लेषोपमादीनामलङ्काराणामविच्छृङ्खलकारेभ्य इतर: समासोक्तिश्लेषादि:, तैरैव शब्दै: अतिप्रसङ्गमिवेत्यादिरहिते-यदि व्यज्यते । तदासौ समासोक्तिश्लेषादिलक्षितचुत्वाद् ग्राह्यो, नापर: श्लेषोपमादिरित्यर्थ: ।

ननु शोभातिशयहेतुत्वमलङ्कारान्तराणां लचणम् । तद्विरोध्यते । तत् कथंमिदंमुक्तमिल्याह-न ह्यस्तीति । शोभातिशयजननं न व्यपारे नास्त्यलङ्काराणां विशेष: । ततश्वैको गृहीतेऽपरस्म्यज्यते इति न युक्तम् । गृहीतघुर्वमाश्रित्य पुनरुज्ज्वलयेतन्नान्यथेति तात्पर्यम् । वाच्यातिशयापेक्षया चैतदुच्यते प्रतोयमानस्वापेक्षया तु समनन्तरं विशेषो वच्यते ।

नन्वे सन्ति—इस दोष की अतिव्याप्ति दिखलाते हैं । ताप—आतप भी । फल = धान आदि भी, सुमनस: = फूल भी । खलता—दुर्जनता और धान्य आदि थी दौरी, धान्वन्त आदि द्वारा साफ करने का स्थान = खल ( खलियान ) उसका भाव । असती—दृपणीय और अशोभन भी ।

यदलङ्कार—‘खलता’ इत्यादि । उपमा से उठाए श्लेष को उपमा नहीं दबातीं क्योंकिं श्लेष का स्वतन्त्रं स्थान नहीं है । यह ठीक है क़ि श्लेष उसको दबा देता है । यह बात और अलङ्कार में भी सम्भव है—इसलिये अधिक व्याप्ति को मन में रख कर कहलाते हैं ।—यदलङ्कार ।

निवन्धनान्तरभावे—समासोक्ति आदि के होने पर पहले के समान श्लेष से उत्पादित उपमा नहीं करनी चाहिये । यहाँ ‘अनिराकृत ।’ आदि पद में विशेषण समान है इसलिए समासोक्ति है—ऐसा नहीं मानना चाहिये, कारण कि विशेषण किसी निश्चित उपमान में लगते हुये प्रतीत नहीं होते ।

विषयतां—उपमाविषयत्व की सम्भावना । कहाँ कहाँ—‘तत्तद्विपयता’ ऐसा पाठ है । वहाँ यह अर्थ होगा—श्लेष-विषयत्व और उपमाविषयत्व इसकी शंका एक साथ नहीं करनी चाहिये । वे उत्सर्ग ( सामान्य ) और अपवाद ( विशेष ) रूप से व्यवस्थित हैं ।

उक्तदोषद्वय—श्लेष के विषय में जो दो दोष दिये ‘एक जहाँ समासोक्ति के विषय में श्लेष किया जाय और दूसरा श्लेष के विषय में उपमा’ उसका यहाँ कोई सम्बन्ध नहीं है ।

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द्वितीयो विमर्शः

यद्यपि हार o —श्लेष-सङ्गा आदि अलङ्कारों की अभि यक्ति के लिये जो शब्द—अनज आदि ( जाते हैं ) उनत अलङ्कारों से श्लेष—समासोक्ति श्लेष आदि, तैरेक = उनहीं, शब्दद्वारा, अलङ्कारः = 'शब्दालङ्कार' शब्दादि से रहित जो अर्थ माला में रते हैं—यदि व्यकत हें तो लाघव के कारण समासोक्ति और श्लेष आदि ह गा होने यादि, श्लेपोभया आदि नहिं ।

सोऽलङ्कारो भहार में fिताfि लानों पाला तर्य जन्यां शोभातिशय उपपाद करने की शाक्ति है. इसलिये अलङ्कार परस्पर विरुध्द होते हैं । फिर यह कैसे सदस पर उतरार देते हैं नहिं०० अलङ्कारों का अपना शभा शोगतिशय अलाघ करना है । इसममें कोर्ई अन्तर नहिं है । इसलिये एक अलङ्कार गानाl आह जो सोगरा सत्या—यह तोवा नहिं । ला पार्ये यह कि अल गौरव और लाघव के आारार पर रचfि होते हैं । यह सव नायम अलङ्कारों को अतिदिशय वो लेपार वतलाया, प्रतीममान अलङ्कारं तो fिलर if ary । it आयो ।

किच्च सौन्दर्योत्कर्षनिष्पत्तयेऽर्थस्य कान्यक्रियारम्भः कवे;, न त्वलङ्कारनिष्पत्तये, तेभां नान्तरीयकतयैव निष्पत्तिसिद्धेः भङ्ग्यणितिभेदानामेवालङ्कारत्वोपगमात् । तेनात्र समासोक्तिश्लेषभङ्ग्यामेवार्थस्य यथोक्तचमत्कारित्वसिद्धिः, नोपमयोतिर्योर्वच्यायोऽर्थदर्शनं स हि अप्रतीत प्रत्यये रसबन्योऽच्यत; कविः । यतन्ते हि तत्स्वदिनान्तरीयकसिद्धयः । ॥ ६९ ॥

यत;— रसमस्यादृं विभावाद्या: साक्षाच्चित्रपादकत्वात् ! तद्रेचिच्योक्तिपुरोडलङ्कारास्तु तदाध्रयाः ॥ ६९ ॥ तेनेपामप्रधानत्वादाधानोद्दरणादृशः । चारुतापेक्ष्यार्थेस्य कल्पनान्ते कविना स्वयम् ॥ ७० ॥

यदाह;— 'मुखहया महाकविगिरामलङ्कृतिभृतामपि । प्रतीयमानच्छायैव भूषा लज्जेव योपिताम् ।' इति । अत: पच बहुप्रपञ्चवलङ्कारेऽपि सत्स्वपि । काञ्चिदेव निवज्घाति शक्तिमानपि सत्कविः ॥ ७८ ॥ यत: सर्वशकलङ्कारेषूपमा जीवितायते । सा च प्रतीयमानैव तद्विद्रां स्वदनतराम् ॥ ७९ ॥ रूपकादिरलङ्कारवर्गो यमक एव च । तत्पक्षपातया प्रोक्तः केषिच्चर्थदर्शिभिः ॥ ८० ॥

इति शब्दालङ्कोका: ।

और शlम्भे न्दा नात जो गहै नो कfि का यननिर्माण में प्रभुत्व होता ह—अर्थ में सौन्दर्य लाने के लिये, अलङ्कार लाने के लिये नहिं । ये ( अलङ्कार ) तो अपने आप चले ही आते हैं । कारण कि विभिन्न ढंग से रचfि हई तो अलङ्यार है । इसलिये यद्यपि समासोक्ति और श्लेष—इन्हीं

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व्यक्तिविवेक:

दो ढंगों से पूर्व निश्चित चमत्कार आता है, उपमा से नहीं। उन (समासोक्ति और इलेष) का कहा जाना आवश्यक था, इतने पर भी उन्हें नहीं कहा गया यह वाच्यावचन दोष हुआ।

संक्षेप में—

'कवि रसनिष्पत्ति में उदयत रहता है, अलंकार-निष्पत्ति में नहीं। वे (अलंकार) तो उस (रस) की निष्पत्ति के संग लगे निष्पन्न हो जाते हैं।' क्योंकि—रस के अङ्ग होते हैं विभाव आदि। क्योंकि वे उसे साक्षात् निष्पन्न करते हैं। अलंकार उसपर आधित होते हैं। वे उस (रस) की विचित्र ढङ्ग से कथन की पुष्टि करते हैं। इसलिए ये अप्रधान होते हैं। चरुत्व के लिए कवि उनका उपादान और परित्याग स्वयं समझता रहता है। जैसा कि कहा है—

महाकवियों की वाणी अलंकार से युक्त होती है, तब भी उनकी वास्तविक शोभा इसी प्रतीयमान की झलक में होती है। जैसे खियों की लज्जा में (ध्वन्यालोक ३)

इसीलिए कवि शक्तिमान् होते हुए भी किसी एक अलंकार को अपनाता है, यद्यपि अलंकार बहुत से उपस्थि‌त रहते हैं।

क्योंकि सभी अलङ्कारों में उपमा प्राण है। वह भी प्रतीयमान होने पर ही जानकार लोगों को अच्छी लगती है। (इसलिए) कुछ तत्त्वदर्शी लोगों ने रूपक आदि अलंकार वर्गों और यमक (इलेष) को भी उसी (उपमा) का प्रपञ्च बतलाया है।

किन्त्वेत्यादिना काव्यक्रियायां सौन्दर्यनिष्पत्तेः प्रयोजकत्वमलङ्कारनिष्पत्तेश्चानुनिष्पादितेऽनुनिष्पादिवद् यथा पक्वावोधनाच्चास्मयोरित्याह। समासोक्तिच्छेषभङ्गिभ्यामेवति। समासोक्त्या तु 'अलकाली'त्यादौ। श्लेषेण 'भैरवाच्चार्य' इत्यादौ। नोपमयेतिः। अलकालीत्यादाखुपमा श्लेषोपमा। मैरवाचार्य इत्यादौ उपमेयोपमा। 'अत्र समासोक्तिच्छेषभङ्गिभ्यामेव' इत्येतदग्रन्थानुसारेण 'रूपकस्य विपये उपमाया यथे'त्यादिग्रन्थः प्रक्षिप्त इव लच्यते। रूपकस्येहानुपसंहारात्, 'उक्तदोषद्वययोगालुपपत्तेः' इत्यस्य च। पूर्वोक्तग्रन्थस्यात्र पद्ने अनाकलनात् अतश्रैवायं कच्चिदादर्शे न पच्यते। अप्रक्षेपे तु रूपक-ग्रहणमिह कर्तव्यं स्यात। तस्मात् स वा ग्रन्थो निवार्य इह वा रूपकग्रहणं प्रयोजयम्। उक्तदोषद्वये'ति च प्रकटौचित्येन व्याख्यातमसि।

ते हि तत्सिद्धीति। रसबन्धसिद्धावलङ्काराः अवश्यं सिद्ध्यन्तीतस्यर्थः। निष्पादकरवमिहानुमपकत्वम्। अत एव भरतेः 'रसनिष्पत्तिरि'त्यत्र रसानुमितिरिति व्याख्येयम्। तद्वै—तदाश्रया: परम्परया रसज्ञसहितेव इत्यर्थः। तेनैपामिति। कवेरथंगतं चारुत्वं तात्पर्येण सम्पादं, नालङ्कारोपनिबन्धः अलङ्काराणां तत्रान्तरीयकत्वेनाप्राधान्यात्। अतश्वारुत्वं यथा निष्पाद्यते तथा तेऽमुपनिबन्धः कार्यः। तत्रप्रयोजनाच्चाधानोद्धरणादय इत्युक्तस्य अलङ्काराणां परस्परं वाक्यवचनिष्पादने विशेषः प्रतिपादितः। पूवं च 'न धारयित नित्ये' इत्यादिना विशेषाभाव उक्तः। तत् कथं न विरोधः। पूवंनन्यवधानान्ते चारुत्वनिष्पादनं मनसिकृत्य विशेषाभाव उक्तः। इह तु विभावाद्युपकरणस्वेन गुरुलघुत्वादिना विशेष उक्त इत्यपेक्षाभेदान्न विरोधः कश्चित्।

कैश्चिदिति वामनप्रस्तुतिभिः। किंच—इत्यादि से यह कहते हैं कि—काव्य-निर्माण में सौन्दर्य-निष्पत्ति प्रधान कारण है अलंकार-निष्पत्ति उसके पीछे लगे होती रहती है वैैसे ही जैसे पाक क्रिया में भात और आचमन।

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इत्थं समासतो ज्ञेयं शाब्दश्लेषस्य लक्षणम् ।

अपरस्तु प्रसिद्धत्वादिव हास्माभिर्‌नैव लक्षणितः ॥ ८२ ॥

उभयत्राप्यविभक्यैव वाच्यं किं त्वन्वयनं धनम् ।

अन्यथा व्यर्थ एव स्याच्छलेपवन्धो भवेद्‌यथा ॥ ८३ ॥

वह श्लेष दो प्रकार का होता है शब्दविषयक और अर्थविषयक । दोनों में से शब्दविषयक जैसे—जहाँ दो वस्तुओं का एकसा आभास जो न कम हो न अधिक केवल शब्द द्वारा कहा जाता हो—उसे शाब्दश्लेष कहते हैं । वह दो प्रकार का होता है; कारण कि उसके प्रतिपादक कर्तृ-कर्मेत्य आदि कारकभाव से 'नित्यशुच्‌' शब्द दो प्रकार के होते हैं धर्मिवाचक और धर्मवाचक । इस प्रकार शाब्दश्लेष का लक्षण संक्षेप में समझ लेना चाहिये ।

दूसरा ( अर्थश्लेष ) प्रसिद्ध है, अतः हमने उसे तहाँ बतलाया । अभिव्यक्ति भूतद्रव्य हो इसके लिये ( दोनों ही श्लेषों में ) कोई न कोई कारण देना ही होता है । नहीं तो वाकि का श्लेषरचना न चायं कृति । यस्य समासोक्तिविषये कृतो यस्य च विषये उपमा कृता स इत्थर्थः ।

द्विविध इति वाच्यमात्रस्योभयश्लेषस्यैवात्रान्तर्भावः । आद्यामेव समुचिताभ्यां तस्योत्थापनात् ।

यत्रान्यूनोति यत्र विशेष्यस्य विशेषणं न न्यूनोभवति नाप्यतिरिक्ते तत्र श्लेषः । मात्रग्रहणं लिङ्गवचनानां भेदादुभयसम्बन्धसहितं यथाशब्दतापरिग्रहार्थम् ।

कर्तृकर्मरूपः आदि ग्रहणात् क्रियारूपो यत्र प्रधानभूतो‌र्थः श्लेषेण स्वरूपहानिं नो‌यते, न तत्र श्लेषो निरवद्य इत्थर्थः । तस्य च धर्मप्रतिपादकशब्दविषयत्वेन च द्वैविध्यसम् ।

उभयप्रतिपादकशब्दविषयत्वं तु नोपपद्यते ।

अपरसत्त्वित । अर्थश्लेषः ।

उभयत्रापि शब्दश्लेषेऽर्थश्लेषे च । यावत् इवादि निर्वन्धनं नाश्रितं तावदर्थान्तरम्‌प्रसङ्गकमेवेति श्लेषाभिव्यचर्यर्थं निर्वन्धमाश्रयणीयम् ।

स चायम्—जिसे समासोक्ति की जगह प्रयुक्त किया गया और जिसकी जगह उपमा प्रयुक्त कर दी गई—वहीं यह श्लेष ।

द्विविध—आगे जो उभयश्लेष कहा जाने वाला है—उसका अन्तर्भाव इन्हीं में होता है क्योंकि इन्हीं के मिल जाने से वह भी निकलता है ।

यत्रान्यून—यहाँ विशेष्य का विशेषण न तो कम होता है और न अधिक वहाँ श्लेष होता है । मात्र शब्द इसलिये दिया कि जिससे लिङ्ग और वचन के भेद होने पर भी दोनों ओर अन्वित होने योग्य शब्द लिये जा सकें ।

कर्तृकर्मेतित—जहाँ कर्तृरूप, कर्मरूप और आदि शब्द से क्रियारूप प्रधान पदार्थ की श्लेष द्वारा स्वरूपहानि होती हो, वहाँ श्लेष निर्दोष नहीं होता । वह दो प्रकार का होता है, धर्मप्रतिपादक शब्दविषयक और धर्मप्रतिपादक शब्दविषयक । उभयप्रतिपादक शब्दविषयक को दूषित बतलाया जाएगा ।

अपरसत्त्वित—अपर = अर्थश्लेष ।

उभयत्रापि—शब्दश्लेष और अर्थश्लेष में । जबतक इवदि कारण नहीं दिये जाते तब तक

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वह किसी दूसरे ही अर्थ की प्रतीति कराता जाता है—इसलिए श्लेष की अभिव्यक्ति के लिए कोई कारण दिया जाना चाहिए।

तत्र धर्म्यर्थस्य श्लेषादभिन्नत्वं यथा—

‘अग्रान्तरे फुल्लमल्लिकाधवलाट्टहासः कुसुमसमयुगुपसंहरणतज्जुम्भत्‌ ग्रीष्मोऽम्बन्धनां महाकालः ।’ इति ।

अत्र हि समासोक्तिनिबन्धनां देवताविशेषवाचिनो महाकालशब्दस्याऽऽवृत्ति: न तु तद्यपेक्षोभयार्थत्वनिबन्धनेऽपि वक्ष्यते ।

उनमें धर्म्यर्थक ( शब्द वाच्य ) श्लेष से अभिन्नता यथा—

'इस बीच कुसुमसमयुग का संहार करता हुआ फुल्लमल्लिकाधवलाट्टहास ग्रीष्म नामक महाकाल विकसित हुआ ।' यहाँ देवताविशेष—( रुद्र ) वाच्य महाकालशब्द की समासोक्ति द्वारा आवृत्ति होती है, न कि उभयार्थकता के कारण उसी ( श्लेष ) को—जैसा कि आगे चलकर कहेंगे ।

अग्रान्तरे इति । फुल्लमल्लिकामिरधवला येडत्रापि परचतुष्परमाह्लादकारा आपणा वा नै: विकासो हासो यस्य तद्वच्‌ धवलाट्टहासो यस्य । कुसुमसमयुगां मासद्रयं रस्यस्वेन तत्सदृशं च युगं ऋतादिसुपसंहरणं अजृम्भत विकसितवान्‌ व्यक्ताननश्राभूदू महाकालो दीर्घसमय: संहर्तृदेवताविशेषश्र । समासोक्तिः । महाकाल इत्यत्र महासमय इत्यऽखिलष्टे विशेष्यपदे प्रयुक्ते विशेषणसाम्यादेव देवताविशेषप्रतीतः समासोक्तिरभवन्ती महाकालशब्दस्याऽऽवृत्तौ प्रमाणम्‌ । नचात्र महाकालशब्दे प्रयुक्ते प्रयासः कष्टित । येन 'अलकालीकुले'तिवत्‌ समासोक्त्या श्लेषस्य वैध्यं शङ्क्येत ।

अग्रान्तरे फुल्लमल्लिकां द्वारा धवल जो अग्र अर्थात्‌ त्रिपुर ( त्रीन मंजिल ) चतुष्पुर ( चार मंजिल ) के बड़े विशाल प्रकार या बाज़ार उनके द्वारा, विकसित होना ही है हास जिसका और उनके समान है हास जिसका ।

कुसुमसमयुग—वसन्त का दो महीने का समय, रम्यतारूप साधारण धर्में से कृतयुग आदि भी, उन्हें समाप्त करता हुआ अजृम्भत—विकसित हुआ और मुख फैलाया । महाकाल—लम्बा समय और एक संहारक देवता ।

समासोक्ति 'महाकाल'—इसकी जगह 'महासमय' इसी सरल विशेष्यशब्द का प्रयोग करने पर देवताविशेष की प्रतीति विशेषणों की समता से ही हो जाती । उससे समासोक्ति होती और महाकाल शब्द की आवृत्ति भी । महाकाल शब्द का प्रयोग करने में थोड़ा प्रयास भी नहीं है जिससे 'अलकालीकुल'०—इत्यादि के समान समासोक्ति द्वारा श्लेष की व्यर्थता सावित हो ।

निबन्धनाभावे तु तस्य दुष्टत्वै यथा—

आच्छादितायतदिगन्तरमचककार्ग्यमाक्रस्य च स्थितसद्गुणविशालशब्दम्‌ । सूर्धि स्खलच्चुहिनदीधितिकोटिमेनमुद्रीक्ष्यको भुवि न विस्मयते गिरिशम्‌ ।’ इति ।

कारण के अभाव में तो वह दुष्ट ही होता है । यथा—अचोदितायत— । ( श्लोक का अनुवाद व्याख्यान के अनुवाद से स्पष्ट है ) २६ व्य० वि०

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आच्छादितेति। पर्वतपक्षे आच्छादितं वैपुल्याद् दिशश्वाश्रयमाकाशं च येन, उच्चकैःस्न्रतानां गां भूमि चाक्रम्य वतमानं महारोहपरिणाहान्नि शृङ्गाणि शिखराणि यस्म, तदौत्र-त्याच्छ शिरसि र्फुरच्चन्द्रलेखम, एवंविधं नगेन्द्रं पर्वतराजं द्रष्टा को न विस्मितो भवती-त्यर्थः। हरपच्चे तु आच्छादितं परिधानीकृतं दिशं एतद् आयतं वस्त्रं येन तथा उन्नतं स्थूल-विषाणं च वृषभसदृशरुद्र स्थतं, मस्तके चन्द्रकलाल्वितं च नगेन्द्रं कैलासाधिपतिं साच्चा-त्कृत्य अनुगृहोतमनन्यत्वेन को न विस्मयत इत्यर्थः।

पर्वतपक्ष मेंः—आच्छादित किया है ( ढँक लिया है ) विपुलता से दिशाओं और आकाश को जिसने, ऊँची गाय और भूमि को आक्रान्त करके विद्यमान हैं अत्यधिक ऊँचाई और चौड़ाई वाले शृंग-शिखर जिसके। उन ( शिखरों ) की ऊँचाई से सिर पर चन्द्रलेखा स्फुरित दिखाई देती है ऐसे नगेन्द्र अर्थात् पर्वतराज को देखकर कौन नहीं—विस्मित होता।

शिवपक्ष मेंः—आच्छादित किया है—परिधान बना लिया है दिशारूपी चौड़े वस्त्र को जिसने, और उन्नत अर्थात् ऊँचे और मोटे हैं सींग जिसके ऐसे बैल पर आरूढ़ मस्तक में चन्द्रकला से युक्त, नगेन्द्र अर्थात् कैलाशाधिपति ( शिव ) को देखकर अपने आपको अनुगृहीत मानकर कौन विस्मित नहीं होता।

विमर्शः—मूल में गिरीश शब्द है किन्तु व्याख्यान में नगेश शब्द माना गया है। मूल माध में ‘नगेन्द्र’ ही है ४१९।

अत्र हि आच्यृत्तिनिवन्धनं न किञ्चिदुक्तमिति तस्य वाच्यस्मावचनं दोषः। न च सकृत्प्रयुक्तोऽयं गिरीशशब्द एवोभययार्थत्वाच्छेदेतो धावतीतिवद्य-थायोगं प्रदीपवत् तन्न्रेण प्रसज्येन वार्थान्तरप्रतीतिनिवन्धनमिति शङ्क्यते वक्तुं, तयोः प्रतिपत्तृपरामर्शानपेक्षं प्रदीपस्यापरपदार्थविषयत्वेन प्रभृत्तिदर्श-नात् , न शब्दविषयतैवम्; शब्दो हि प्रतिपत्तृपरामर्शमनन्तरेण नार्थान्तरे प्रतीतिमधत्ते, परामर्शानन्तरं निवन्धनं न भवितुमर्हति अतिप्रसङ्गात्, निवन्धनं चात्र न किञ्चिदुपकल्प्यत इति त्वर्थः स्पष्टार्थैराव्दान्वेषणप्रयासः कवे:।

यहाँ आवृत्ति का कोई कारण नहीं बतलाया, इसलिये—उसका अवचन ( न कहा जाना ) वाच्यावचन दोष हुआ। ऐसा नहीं कहा जा सकता कि एक ही बार प्रयुक्त हुआ यह गिरीश शब्द ही उभयार्थक होने से—‘श्वेतो धावति’ के समान यथायोग प्रदीप के समान, तन्न्रद्वारा या प्रसज्ज द्वारा दूसरे अर्थ की प्रतीति का कारण है—क्योंकि जो शब्द और प्रदीप हैं उनमें से प्रदीप दूसरे-पदार्थ की प्रतीति इस प्रकार कराता है कि उसमें ज्ञाता द्वारा ( अपने ) ज्ञान की अपेक्षा नहीं रहती। शब्द ऐसा नहीं करता। शब्द का यह स्वभाव है कि वह ( अपने ) परामर्श ( ज्ञान ) के बिना दूसरे अर्थ का ज्ञान ज्ञाता द्वारा नहीं करा सकता। और परामर्श बिना कारण पच में ऐसा कोई कारण नहीं बतलाया जा रहा है। इसलिये श्लेष युक्त शब्दों का अन्वेषण व्यर्थ ही है।

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द्वितीयो विमर्शः

भवतो भासनातिव्याप्ति न शङ्केतनत्रम् । प्रदीपोपनति—जुनरथंतनत्रम् । यथायोगमिति तुल्यप्रधानत्वेन साधारण्यं तन्त्रम् । अतुल्यप्रधानत्वेन तु प्रसङ्गः । तनयोः प्रतिपत्तिरिति । किञ्चित् वस्तु वस्तु शक्त्यैव कार्यकारि यथा दीपादि । किञ्चित् तु परामर्शपेक्षं यथा धूसादि लिङ्गम् । यत्र यस्मिन् त्रिपये परामर्शनेरपेक्षयेण वस्तुशक्त्यैवेष्टकारित्वं तत्र तन्त्रादि नान्यत्र । शब्दः परामर्शपेक्षोऽर्थप्रतिपादिकारी । परामर्शो न निमित्तनिमित्तभावादिति नात्र तन्त्रादिम्रव्याप्तिः ।

तत्रैवोपनति—मृत ऊत्रा शब्द तन्थ । प्रदीपवत् यत्र गुआ अर्थतन्थ ।

साथारण्य तेम्मी साथारणता ( देन्मों ओर ल्गाना ) तन्त्र कहलाती है जिसमें ( दोनों को ) प्रथमानता बराबर हेे । जिस साधारणता में प्रथमानता बराबर नहीं होती वह प्रसंग कहलाती है ।

तनयोः पतिपत्तिः..... मूत ऊत्र र र्ललतः कार्य मरती है जैसे प्रदीप । कुन् श्यात होने पर कार्य शरित हैे ते... मुगाति अनुमा पक हेतु । तन्त्र आदि न्हीं हेते हैे जबतक् परामर्श की आवश्यकता न होऔं परामर्शनिरपेक्ष िो कार्य के लि मसृप से ही दोनों कार्य करने की शाक्ति हो, अन्यत्र नहीं । ाक् जो है.....नः परामर्श की सापेक्षता से अर्थबोध नराता है । और परामर्श ििना किसी हेतु के न्ही। आादि न्ा अवसर न्हीं ।

विमर्शः पूँ०प्क्ष ---अपे क जिस प्मू तो हेतुमने के लिये जालाया जाता है उसके अतिरिक्त शत्य प्द्युमों न्हो मात ह । जैसे क्ती शब मात जिस अर्थ के लिये प्रयुक्त हेता है उसके शलिलक् अथे न्हो मात वमलता है । ततर प्क्ष.....दपक अन्य पदाथों का भास करा सकता है िोते शबः मो । fितत् दपिका इनर पदार्थों के ज्ञान में अपने ज्ञान की और अपने साथ दूसरें पदारथों के स्मबन म्र् ज्ञान न्ही अपेक्षा रहता । शब् यद अपेक्षा रखता है । शब् से स्र्पान न्हो में स्र्य सब् का ज्ञान अपेक्षित होता है और साभ ही शब् और अथ् की सक़ेत शरित ाा ज्ञान म्र् । ाो अनेदेाअथों में शब् प्रयोग हेता है वल्कों प्रकरण द्वारा ज्ञाता का ज्ञान यथ्, आपेक्षा न ििम् । द्वितेरे अर्थ के लिये उसका पुनर्जागरण आवश्यक हेता है ।

यथा च—

‘चिद्रघत: पथिकक्षपणं प्रति स्मृतिभुचो निजशक्त्युपवृंहणम् । दृगुरहार्यभट्टा: सहकारितामनचमा नवमाधवसड्ढिन: ॥’ अत्र हि सहकारिशब्देन सहकर्तृ शीलत्वं सहकारतसम्बन्धश्रयेऽुभयोडर्थ: श्लेर्पेण विवक्षितः । तथ रस्म्यातिरेकलक्षण पंक पव ततः प्रतोयते नापरो निवन्धनभावादिति तस्य वाच्यस्यवाच्चनं दोपः ।

और जैसे—“अनवमम्” ( न अवम = तुच्छ = छोटे ) उंचेचे:डचे और नवमाधवसड्ढी ( नप वसन्त से युक्त ) अह्हाये भट्टों (अद्भार्य पर्वत भट वीर ) ने स्मरण से उत्पन्न ( काम ) की

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अपनी शक्ति को पथिकक्षपण ( राहगीरों को दुःखी बनाने ) में और अधिक बढ़ाने के लिये सहकारिता ( सहयोग, सहकारी = सहकार वृक्षवान्, तद्राव = सहकारिता धारण करो ।

यहाँ 'सहकारी' शब्द द्वारा श्लेष से दो अर्थ विवक्षित हैं—एक सहयोग देना और दूसरा सहकार नामक आम्र वृक्ष से युक्त होना। उनमें से एक ( सहकारवृक्ष समवन्त्री ) अधिक रम्य है रम्यता का अत्यधिक आधारभूत है ) वही प्रतोत होता है। दूसरा नहीं। क्योंकि उसकी प्रतीति में कोई कारण नहीं बतलाया गया। इसलिये उसका अकथन वाच्यार्थवचन हुआ।

अहार्यः पर्वतः सहकारिता सहकरणशीलत्वं सहकारसमवन्त्वृक्ष । अनवमा उत्कृष्टा । नवः प्रत्यग्रः। माधवो वसन्तः। रम्यातिरेकेऽति सहकारसमवन्त्ररूप इष्टार्थः । तस्य वाच्यस्येति । तच्छब्देन निबन्धनं परामृश्यते ।

अहार्यः—पर्वत ( महीश्रेष्ठ शिखरादिरूपभूधरायर्धरपर्वता—अमरः ) । सहकारिता—सहयोग दान का स्वभाव और सहकारवृक्ष का संबंध । अनवमा—उत्कृष्ट । नवः—ताजा । माधव—वसन्त । रम्यातिरेक—सहकार समवन्त्र रूप अर्थ । तस्यवाच्यस्य—तद् शब्द से निबन्धन ( कारण ) की ओर संकेत है ।

विमर्शः : क्षपण, स्मृतिभू, शक्तिः आहार्यः, भट, अनवम, नवमाधवसक्ति और सहकारिता के दूसरे भी कोई अर्थ होने चाहिये। इनके लिये विशिष्ट कोशों से सहायता लेनी चाहिये ।

एकोदनेकार्थींकृतु यत्र स्वभावेनैव दीपवत् । समयस्मृत्यन्वितैरस्तन्त्रस्य विषयो हि सः ॥ ८५ ॥

शब्दे त्वसिद्धमेकत्वं प्रत्ययस्तस्य भेदतः । साध्वर्थ्यविग्रलब्ध्यस्तु लोकस्तत्रवमवस्यति ॥ ८६ ॥

नैतावतावगन्तव्या तस्यानेकार्थवृत्तिता । नातः पदं प्रसज्येत शब्दैरनेकलक्षिते ॥ ८७ ॥

न चानिबन्धनायुक्ता शब्दस्यार्थान्तरे गति: । तस्यानेकार्थविद्योक्तमथयोयानवयात्मकम् ॥ ८८ ॥

तस्मादर्थान्तरव्यक्तिहेतौ कंसिमश्रनास्सति । यः श्लेषवन्यनिबन्धः क्लेशायैव कचेरसौ ॥ ८९ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोका: ।

जहाँ एक ही ( शब्द ) दीप के समान स्वभावतः अनेक अर्थ का बोधक हो और उसकी ग्रहीत संकेत का स्मरण अपेक्षित न हो, वहाँ तन्त्र माना जाता है । शब्द में एकता सिद्ध नहीं होती । वह प्रत्येक अर्थ में ( 'प्रत्यर्थं शब्दा सिध्यन्ते' न्याय से ) बद्ध जाता है। लोग साधृश्य ( एकरूपता ) के कारण ( भिन्न अर्थ में प्रयुक्त शब्द को भी ) तद्रूप सञ्ज्ञते हैं । इस ( सादृश्यमात्र ) से उस ( शब्द ) की अनेकार्थता नहीं माननी चाहिये । इसलिये शब्द प्रसंग का विषय भी नहीं बनता और शब्द की जो दूसरे अर्थ में प्रवृत्ति होती है, वह बिना किसी कारण के नहीं हो सकती । शब्द भी अनेक प्रकार का माना गया है । अव्ययरूप और उससे भिन्न प्रकार का । इसलिये बिना

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और जैसे—

उषाकाल में उधर तो घनवर्त्मन् ( मेघपथ का आकाश ) अत्यधिक विगलितान्धकारपक्षपात् और मधुरतरङितापयोगतार था और ( इधर ) कमलवन में मधुपों की पाँत् विगलितान्धकार पक्षपात्—शवलङ्घनवर्त्मदूषरमा तथा अरम् ( अत्यधिक ) मधुरत—रणिता—पयोगता थी। यहाँ न शब्द श्लेष की अभिव्यक्ति का हेतु है।

उपसूच्यते। अन्धकार एव मलिनत्वात् पङ्क्रः,‘ तस्य विगलितस्य प्लवोदनवस्थानं तेन शवलं विचित्रं, घनवर्त्मन् वियत्, दूरमस्यर्थस्, मधुरः सुकुमारो यस्तरणितापो रविप्रभा तद्योगेन तारं हृदयं, मधुपातिनो अमरास्तेषां पङ्क्तिः अन्धकारपक्षपात् शवलं एवं विगलनेन निःसारत्वाच्छवः तस्य लङ्घनेन वर्मसु पच्मसु दूरमा अरसणीप्रश्रृः:, मधुरता मकरन्दसक्ता तथा रणिता रशब्दा, यद्वा मधुरतेन मकरन्दासृजेन रणितं गुञ्जितं यस्तथा:, पयोगता जल्पगता, अरमत्यर्थम्। अत्र घनवर्त्मशब्दस्योपमेयवाचिनः श्लेषेन्तर्भावात् धर्मिधर्मोर्भ्यार्थस्योदाहरणत्वे न्याय्ये धर्मार्थस्योदाहरणत्वं चिन्त्यम्।

( आकाश पक्ष में )—अन्धकार ही मलिन होने से पङ्क्तः हुआ अर्थात् किञ्चित् हुआ। उस विगलिता हुए अनन्धकार का जो सुव—चञ्चलता, उससे शवलं अर्थात् रंगविरंगा ( जो ) घनवर्त्मन् आकाश ( वह ) मधुर = सुकुमार जो तरणि = सूर्य का आतप = प्रभा; उसके योग से तारं = हृदय था।

( मधुप के पक्ष में )—मधुपाती और उनकी पङ्क्ति = पाँतें, अनन्धकार—पक्षपात् ही विगलित होने से और निःसार ( प्राणरहित ) होने से शव = मुरदा हुआ, उसके लङ्घन से वर्मन् में पाँखों में, ( या देखने वालों की आँखों में ) दूरमा—अरमणीय शोभा है जिसका। मधु—रता मकरन्द पर आसक्त, और रणिता—गूँजती, अथवा मधुरत से = मकरन्द के आसंग ( पान ) से रणित = गूँंजन है जिसका। पयोगता—जल में विद्धमान। अरम्—अत्यधिक। यहाँ उपमेय वाची घनशब्द श्लेष में अन्तर्भूत हो जाने से जहाँ धर्मीं और धर्म दोनों का उदाहरण बनना चाहिये था वहाँ केवल धर्मार्थी का ही उदाहरण वन पाता है यह विचारणीय बात है।

विमर्शः : यहाँ व्यास्या में ‘विगलितान्धकारपक्षपातशवल’ शब्द को मधुपपङ्क्ति के साथ लगाने का जो प्रयत्न किया गया है वह अधिक अच्छा नहीं है। हमारी समझ में विगलितान्धकारपक्षपातशवल शब्द का अर्थ मधुपपङ्क्ति के साथ अन्वित करना चाहिये। ऐसा करने से एक लाभ यह होता है कि ‘च’ इस समुच्चयबोधक अव्यय द्वारा पङ्क्ति के साथ समुच्चोयमान घनवर्त्मन् का भी बोध होता रहता है। शव—लङ्घन—वर्त्म—दूरमा करने पर पङ्क्ति के साथ घनवर्त्मन् का बोध नहीं होता। इसका कारण उसके वाचक घनवर्त्मन् शब्द का अभाव है। इस प्रकार का पद बनाने से घनवर्त्मन् शब्द नहीं रहता।

केचित् पुनः धर्मिधर्मोर्भ्यार्थस्यापि शब्दस्य श्लेषमिच्छन्ति, यथा—

‘अनवरतनयननिःसोल्लाससच्यमानस्तरुरिव चिप्लवोदप् सहस्रधा प्ररोहति ।’ इति।

अत्र विपल्‍लवशब्दस्य। तच्चायुक्तम्। तथाहि—विपल्‍लवशब्दस्य धर्मिंधर्मोभ्यार्थत्वेऽपि न धर्मार्थत्वम्, यतोऽयसुपमानस्य विशेषणभावमुपगन्तुं न शक्ष्यति।

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द्वितीयो विमर्शः

नोत्सहते, तस्योपमेयाभिधाने चरितार्थस्यैवात्रुपपत्तेरस्तत्स्वरूपापहारप्रसङ्गात् ।

कुछ लोग धर्मी और धर्म दोनों ही पदार्थों के वाचक शब्दों का भी 'श्लेष' मानते हैं जैसे— अनन्वयं तन्वयमनसद्विलिलिच्छ्यमान विपद्यद् भी वृक्ष के समान सहस्रों शाखाओं में अंकुरित होने लगता है ।

यद्यो विपद्यद् शब्द का ( धर्मी और धर्मी दोनों में ही रूप मानते हैं ) पर यह ठीक नहीं । कारण कि विपद्यद् शब्द धर्मी और धर्मी दोनों अर्थों में है तब भी वहाँ धर्मार्थक ( पहलेवरादित्य-वाचक ) माने हीो शाब्दता । क्योंकि यह उपमान ( तरु ) का विशेषण नहिं हो सकता । वह उपमेय ( विपत्ति के लेए ) को विल्क्षणर समास हो जाता है । अतः उसकी आादृत्ति नहीं हो सकती । आादृत्ति के अभाव में भी धर्मार्थकं माननेमं पर ) उपमेय का स्वरूप उल्लङ्घ्यद्धा होने लगता है ।

अनन्वयं ति । अनवरतं नयनसलिलेन सिच्यमानो वृन्द्ध नीपमानः । तथा अनवरतनयनं प्रापणं यस्मात् तेन सलिलेन सिच्यमान आद्देव्हवं प्राप्यमाणः विपदो लवः सूक्ष्मभागो विपद्यो विगतकिसलयशाख् । प्ररोहति विस्लोर्‌णाभवति अदुरांग्श्र सुख्वति ।

अत्र स्थितमपि धर्मोर्थद्वयं नोपमानविशेषणतयाालं विशेषणत्वकच्‌च्रान्तरभाच्यल्च्यात् । ने चादृत्तिमन्तरेण कच्‌च्यान्तरपरिग्रहो न्याय्यः । ने चादृत्तिग्रस्तस्य तस्यामेव कच्‌च्यायां विशेषणत्वे उपमेयस्वरुपापहारप्रसङ्गात् ।

प्रमाणाभावात् । अनावृत्तो तु तस्यामेव कच्‌च्यायां विशेषणत्वे उपमेयस्वरुपापहार-प्रसङ्ग इति पदार्थः । तस्योपमाेति । तच्चृकुब्बदनं विपद्वशब्दः परामृष्टः ।

य पुनरपि श्लेषप्रयोजकः शब्दः । अप्रधानं विशेषणभूतम् । प्रधानस्य हि पूर्वोक्तन्या-येनावृत्तिन्योर्ध्या ।

अनवरतं—लगातार, नयनसलिल = आँसुओं से-सिच्यमान सींचा जाता—आपत्तिकाल । अनवरत—लगातार नयनं = ले जाना ( दोना ) हो रहा है जिसका ऐेसा जो सलिलजल उससे सिच्यमान भिगोया जा रहा वृक्ष ।

विपद्—विपत्ति का लव = टुकड़ा, छोटा सा हिस्सा । विपद्यो पद्‌वर-रहित—वृक्ष । प्ररोहति—विरहति होता है, और अंकुर निकलता है ।

धर्मोर्थद्वय—यहाँ धर्मोर्थद्वय है, तब भी वह उपमान का विशेषण बनने में समर्थ नहीं । इसलिये कि उसमें विशेषणरुपता आती है—दूसरी कक्षा में और दूसरी कक्षा का ज्ञान आादृत्ति के बिना मान्य नहीं । ( वही ) आादृत्ति यहाँ काँ नहीं जा सकती क्योंकि उसमें कोई प्रमाण ( हेतु ) नहीं हैँ । आादृत्ति के अभाव में उसी कक्षा में विशेषण-भाव प्रतीत होने से उपमेय का स्वरूप समाप्‍त होने की सम्भावना रहती है ।

तस्यो॰—यहाँ तद् शब्द्द से विपद्वशब्द का परामर्श किया गया है । यः पुनः—श्लेषोत्थापक पद । अप्रधान—विशेषणभूत । पूर्वोक्त रीति से प्रधान की आावृत्ति मान्य है ।

निबन्धनमिवादि ।

यः पुनरप्रधानमेवार्थमभिदध्‌ते न प्रधानसादुपयुक्तार्थोंडपि निबन्धन-सन्दर्भे सत्यावृत्तं पच् ।

यथा—

'साजुस्थितिर्जनकराजसुतेऽपि भास्वद्दृशोर्लिपल्ववतया थ्रियमेति यस्य ।' इति ।।

अत्र भास्वद्दृशोर्लिपल्ववताशब्दः ।

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इह पुनर्द्विरुपादानद्वेवैकमुपमानसम्बन्धबुद्धिनिबन्धनमवसेयं न चेत्याद्यव्ययमनवययमलङ्कारान्तरं वा किश्चित् ।

किन्तु जो किसी अप्रधान अर्थ का अभिधान करता है प्रधान का नहीं, वह अपना अर्थ वतलाकर समाप्त हो जाता है इतने पर भी यदि कोई कारण उपस्थित हो तो उसकी आवृत्ति हो जाती है। जैसे—‘जिसकी सन्नुस्थिति में भास्वदड्ढपल्ववर्ती के कारण सीता के समान सुहावनी लगती है ।’ यहाँ ‘भास्वदड्ढपच्छवत्ता’ शब्द ।

यहाँ ( विप्रलष्वशब्द में ) एकमात्र दो वार उपादान करना ही उपमान—सम्बन्ध का ज्ञान कराने में हेतु माना जाना चाहिये । न कि इव आदि अन्य अव्यय अथवा अव्यय से भिन्न और कोई या कोई अन्य अलङ्कार ।

सातुः पर्वतस्य मालभूभागः । अज्जोळ्हाद्यास्तरवः तेभां पल्लवाः भास्वन्तो यत्र । अज्जोळ्हशब्दः प्राकृतभाषापदमपि क्वविभरतिप्रसिद्धया श्लेषादिषु प्रयुज्यते । तथा च ‘सकुसाड़ज्जोळ्हपल्लवा मैथिलीं श्रियं धत्ते’ इति परिमलेन प्रयुक्तम् । संस्कृते पुनरड्ढोठशब्दः स्थितः । तथा भास्वानड्ढ उत्पन्नः सुःखरः लवाख्यः पुत्रो यत्रेति सामान्येनान्यपदार्थों गृह्यते ।

इहैव विप्रलष्वशब्दे । इवाऽच्ययमिति तस्माद्वात् प्रयुक्तस्यवशब्दस्यान्यथा न्यवस्थोपविष्यमाणत्वात् । अलङ्कारान्तरं समासोक्त्यादि ।

सातुः—पर्वत की चोटी का भाग ।

अज्जोळ्ह—इस नाम का एक वृक्ष, जिसके चमचमाते पत्ते हैं जहाँ । अज्जोळ्ह—शब्द प्राकृत भाषा का है । अतिप्रसिद्ध होने से कवि उसे श्लेष आदि में संस्कृत के बीच में दे देते हैं । परिमल कवि ने भी लिखा है—‘सकुसाड़ज्जोळ्हपल्लवा मैथिलीं श्रियं धत्ते’ । संस्कृत में तो ‘अड्ढोठ’ शब्द है । और ( सीता पक्ष में ) भास्वान् = तेजस्वी तथा अड्ढ = गोद में उत्पन्न बोल रहा लव = नाम का पुत्र है जिसका । इस प्रकार दूसरा पदार्थ ( सीता ) यहाँ सामान्यरूप से लिया जाता है ।

( ‘मालभूभाग’ = ‘मालमूर्धतृणमलम्’—इत्युक्तप्रकारा—मेघदूत ११६ सद्दीविन्द्री । )

इह—विप्रलष्वशब्द में ।

इवाऽच्ययय—तस्माद्वात् —यहाँ जो इव शब्द है उसको आगे और सिद्ध किया जानेवाला है ।

अलङ्कारान्तर—समासोक्ति आदि ।

यत्र च प्रधानार्थसंस्पर्शमात्रादेवो भयार्थस्य शब्दस्य द्विरुपादानमशश्यं कार्यं तत्‌द्वेकार्थस्य तत्‌ स्थितमेव । यथा—‘वह्नस्पयेव्वा रचिरिव रचितस्यास्तुये वस्तुनोऽस्तु ।’ इति ।

यथा च—‘खलतां खलतामिवास्ति प्रतिपद्येत कथं बुधो जनः ।’ इति ।

जहाँ कहीं उपमयार्थक शब्द का प्रधान अर्थ के संस्पर्श मात्र से दो वार उपादान नियमित करना ही पड़ता है वहाँ केवल एक अर्थके वाचक शब्द का वह ( दो वार प्रयोग ) नियमित होता ही है । जैसे—

चाहिये हुये वस्तु की प्राप्ति के लिये इदृ ( थथकती ) रुचि के समान सूर्य की इदृश रुचि

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( दीसि ) आपके लिये चादृश्री वस्तु की प्राप्ति का कारण बने ।' और जैसे—( पहले आया ) खलतां खलताभिवास्ती' ।

प्रथानार्थंसंस्पर्शोमात्राति । यतः तेन पदेन सम्भावद्रधानार्थैनापि प्रधानभूतोऽर्थः संस्पृष्टः ततोडन्तरसम्बन्धाशहि णुस्वात् द्विरुपादानाहेत्वम् । यत्र च प्रधानामधानोभया-थेस्य द्विरुपादानमवश्यं कार्यं, तत्र दण्डापूपिकया तदेकार्थस्य प्रधानमात्राथंस्य शब्ददस्य द्विरुपादानं न्यायसिद्धमेव ।

रुचिद्दीसि: अभिलाषार्थ रुचि: । अत्र द्वौ रुचिशब्दौ विशेष्यवाचित्वात् प्रथानार्थौ । ननूपमानस्य यदि विशेष्यत्वं नोपमेयविशेषणत्वं तत् कथमुपमेयसम्बन्धिन्युपमानस्य विभक्ति: । यथा 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ' इति । नैष दोष: । विशेषणस्वमवच्छेदकत्वं तद्योग-मानस्योपमेयं प्रतीपमितिक्रियायां विद्यते एव । अन्यथा तयो: सम्बन्धाभावादन्वय-प्रसङ्गः । स्थिते विशेषणत्वे तस्य न विशेष्यविभक्तेर्हानि: काचित् । यत् पुनरिहोपमान-शब्ददस्य विशेष्यवाचित्वमुक्तं तद् धर्मिताभिप्रायेण । धर्मी ह्युपरमानम् । न च स्वतन्त्रत्वात् विशेष्यार्थ: । अतश्र्वंवायं 'श्रीव गच्छति षण्ढोदियम्' इत्युपमेयलिङ्गं न भजते । धर्मवाची तु विशेषणं विशेष्यालिङ्गमेव । तदुक्तम्—'गुणवचनामात्राथंते शिख्यवचनानामिति अवान्ति' इति । तदेवमुपमानमुपेयविभक्ति भजते धर्मित्वं च न जहाति । खलत्ता आकारावक्लृी ।

प्रधानार्थंसंस्पर्शोमात्रात्—योऽपि उस पदेन, जिसका कोई अप्रधान अर्थ भी सम्भव है, प्रधान भूत का स्पर्श किया है, अतः उसका और विस्र्री अर्थ से सम्बन्ध न हो सकने के कारण दूसरौ बार उपादान चाहिये । जबौं प्रधान और अप्रधान दोनों अर्थों का दो बार उपादान आवश्यक ही करना हो यहाँ दण्डापूपिका न्याय से—तदेकार्थ—प्रधानमात्राथे शब्द का दो बार उपादान स्वतः सिद्ध है । अर्थात यदि किसी ने दण्डे ( साँक ) में रोटी परोकर रखी हो और यदि उस दण्डे खो चूूहा खा जाथ या खोंच ले जाथ तो रोटी का खाया या खोंचा जाना जैसे स्वतः सिद्ध होता है वैसे ही उपमार्थक शब्द का यदि दो बार प्रयोग आवयक हो तो एकार्थक के प्रयोग का दो बार होना स्वतः हि सिद्ध है ।

रुचि—दीसि, और अभिलापा भी रुचि । यहाँ दो रुचि शब्द विशेष्य वाची होने से प्रधानार्थक हैं ।

( साँका )—यदि उपमान विशेष्य हैं, उपमेय का विशेषण नहीं तो उपमेय सम्वन्धी में उपमान वी विभक्ति कैसे देखी जाथ है जैसे—'वागर्थाविव संपृक्तौ' में ।

( उत्तर )—यह दोष नहीं । विशेक्षणत्व होता है—अवच्छेदकत्व और वह उपमिति क्रिया में उपमान का उपमेय के प्रति है । ऐेसा न होता तो उनमें सम्वन्ध न रहता और तब अन्वय न होता । विशेक्षणत्व होने पर भी उनमें विश्रष्य की विभक्ति छूटती नहीं । यहाँ जो कि उपमानवाची शब्द को विशेष्यवाची बललाया वह इसलिए कि उपमान धर्मी ( साडृश्य या साधर्म्यरूपधा धर्मी से युक्त ) होता है । उसे स्वतन्त्रता के आधार परत विश्रष्य नहीं—कहा गया है । इसील्ये ( धर्मी होने के कारण ) यह ( उपमान रूप विशेष्यवाची ) शब्द गच्छति षण्ढोदियम्—देखो देखो यह नपुंसक ख्री के समान चल रहा है—इत्यादि में उपमेय का लिङ्ग नहीं अपनाता । जो विशेक्षण धर्म—वाची होता है वह विश्रष्य के लिङ्ग और वचन विशेष्य के लिङ्ग और वचन पर निर्भर रहते हैं । इस प्रकार उपमान उपमेय की विभक्ति धारण करता है और धर्मित्व को नहीं छोड़ता । खलत्ता—आकारावक्लृता—

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विमर्शः : व्यक्तिविवेककार की यह स्थापना अत्यंत मौलिक है। इससे यह अभिप्राय निकलता है—उपमान उपमेय में विशेषण होता है, किन्तु अन्य विशेषणों के समान नहीं । अन्य विशेषण धर्मी रूप होते हैं जब कि उपमान धर्मी होता है। उपमान की धर्मिता की पहचान यह है कि वह उपमेय रूप विशेष्य का लिङ्ग नहीं अपनाता। वह केवल अवच्छेदक होता है। अवच्छेदक का अर्थ—परिमापक है। 'मुख सुन्दर है' कहने पर यह प्रश्न उठता है कि उसमें सुन्दरत्व कितना है ? उसके उत्तर में चन्द्र आदि उपमान उपस्थित कर दिये जाते हैं। उनसे यह प्रतीत होता है कि मुख का सुन्दरत्व, सुन्दरत्व के अगाध समुद्र का उतना बड़ा हिस्सा है जितना बड़ा चन्द्र का सुन्दरत्व । इसप्रकार चन्द्र मुख के सुन्दरत्व की लाप बन गया। इतने ही अर्थ में वह मुख आदि का विशेषण कहा जा सकता है। इस प्रकार उपमान—अवच्छेदकता—मात्र के आधार पर विशेषण माना जाता है। उपमान को धर्मी होने के आधार पर विशेष्य भी कहा जा सकता है। इसी अभिप्राय से ग्रन्थकार ने 'रुचिरिरवह्नि:'—यहाँ दोनों रुचि को विशेष्य माना है।

( दण्डापूपिकान्याय—मूषकेण दण्डो भक्षितस्तेनोदृष्टः पूरोडपि तेन भक्षित इति न्यायो दण्डापूपिका—साहित्य कौमुदी )

न चोऽग्रपदनिवन्धनामुपसर्जनदूषणम् । प्रयोज्यार्थोसंस्कृतकुल"वचाऽग्रुप्तानिवन्धनामुपसर्जनदूषणम् । तद्विप्रुपादानप्रसङ्ग इति शङ्क्यते वक्तुं, तस्य तद्विप्रुपद्यो रुपमानोऽपमेयभावोऽचोतनमात्रचरितार्थेस्य तयोर्विशेषणविशेष्यभावाभिधानसामर्थ्योभावात् ।

अथ विप्रलम्भस्य तद्विशेषणभावोऽपगमयोग्यार्थान्तरसम्भवे तस्य तरणा सामानाधिकरण्ये सत्याकाङ्क्षासन्निधियोग्यतावशात् तयोर्विशेषणविशेष्यभावोऽवगम्यत इति चेत्, तन्न; वाक्यप्रभेदप्रसङ्गात् 'विप्रलम्भस्तरुरिव स च तद्विप्रलम्भः' इति ।

अथ समासोक्तिवादुकतयेन तयोः सम्बन्धावगतिरिति । तदयुक्तम् ।

तस्या उपमानभूतधर्मिमात्रप्रतीतिसामर्थ्योऽपगमात् । इदं तु तरुरिवेति तदुपत्तमेवेति व्यर्थ एवायमनेकार्थपदो पादानप्रयासः कवे: ।

तस्मात् सलिलासिच्यमानत्वसहस्रधापररेहादिसमानधर्मोऽपेक्ष्ययैवात्र तरुचिपलम्वयरुपमानोऽपमेयभावोऽवगन्तव्य: न तु श्लेष:; स हि भान्तिमात्रकृतः ।

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द्वितीयो विमर्शः

जा सकता है? क्योंकि ऐसा करने पर वाक्यभेद की आपत्ति आती है। ‘विपहलव तरह’ के समान और वः तरह विपहलव (= पहलव रहित )—इस प्रकार ( का वाक्यभेद होगा )। यदि यह माना जाय कि ‘समासोक्ति के आधार पर कचित रीति से उनके समासान्य का बोध हो जायगा—‘तो वह भी ठीछि नहिँ’ क्योँकि उस ( समासोक्ति ) में केवल उपमानभूत धर्मी ( जो कि शब्दतः कचित नहीं रहता ) की प्रतिपत्ति यौी शक्ति मानी जाती है। यहाँ तो वह ( उपमान ) ‘तरुरिव’ इस प्रकार शाब्द द्वारा वह दिया गया है, इसलिये यदि वह अनेकौर्थक पदों को प्रयोग न्याय्य हो जाता है। इसलिये यहाँ सल्लिल द्वारा सिन्धुमानता और सहस्रधा-प्ररोहयुक्तता आदि साधारणधर्मी को लेकर ‘ती तरह’ और ‘विपहलव’ का उपमानोपमेयभावमात्र माना जाना चाहिये, नलै। उसकी प्रतिपत्ति तो केवल भान्ज्ञा से होती है।

अथ प्रयुक्तं इति । तरुरिवेत्यत्र । वाक्यभेदप्रसङ्गादिति "सर्वभवद्येकवाक्यत्वे वाक्यभेदश्र नेष्यत" इति वाक्यभेदस्य प्रतिपत्तिगौरववस्वादेयस्सम् ।

अथ समासोक्तिः । अनवरतजलेत्यादेःविशेषणस्य दृश्यर्थत्वात् । उपमानभूत इति । यत्रोप- मानभूतस्य धर्मिणोऽन्यस्यार्थस्य गम्यमानत्वं तत् समासोक्तिः;, न साच्छादुपादान इत्यर्थः ।

अथ प्रयुक्त = तरुरिव यहाँ प्रयुक्त है ।

वाक्य भेद प्रसङ्ग—यदि अन्योन्य अन्वय न हो तो वाक्यभेद अच्छा नहीं, इसप्रकार वाक्यभेद प्रतिपत्तिगौरव ( ज्ञानगौरव ) का कारण बतलाया—गया है ।

अथ समाससोक्तिः—‘अनवरतजल’ इत्यादि विशेषण दृश्यर्थक है । ( इससे समासोक्ति ) । उपमानभूता—जहाँ उपमानभूत किसी धर्मी का दूसरा अर्थ गम्य हो वहाँ समासोक्ति होती है, उसके शब्दतः उपादान में नहीं ।

यथा च—

"कचित् तटतलविवरवल्लीनो बध्रव कचित् स्वच्छन्दचारिणो हरिणा: कम्बितः कपिला" इति ।

और जैसे :—कहीं तटतल और विवर में स्थित बध्रु ( पीले और नकुल = चातक ) कहीं स्वच्छन्दचारिणी हरिण—( हरे रंग के और मृग ) कहीं जटावल्कलावलम्बी कपिल—( पीले और कपिलमुनि ) ।

क्चिदिति । बध्रुवः कपिलाः । एतद् दावाग्निविशेषणं सन्नकुलललक्षणमर्थं प्रतिपादय- तीति धर्मिधर्मोभयात्मकस्सम् । एवं हरिणा हरिता मृगाश्र । जटा मूलानि केशास्विवेशाश्र । वल्कलं वृक्षत्वक् तरकुतं च वासः । कपिलाः पिङ्गला मुनिविशेषाश्र । आरोपविषयबहुरवा- दारोप्यमाणानामपि बहुस्वम् ।

क्चिद्—कचु: कपिल वर्ण के । यह दावाग्नि का विशेषण होते हुए नकुल ( नेवला ) का ज्ञान कराती है इसलिये धर्मरूप भी है और धर्मरूप भी ।

इसीप्रकार हरिण—हरे रंग के और मृग । जटा—जड़ और केशों का एक विशेषण रूप । वल्कल = वृक्ष की छाल और उसके द्वारा बनाया कपड़ा ।

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दपिल—पीले और उस नामके एक मुनि। आरोपविषय बहुत होने से आरोप्यमाण भाँति बहुत हुए।

एवमर्थश्लेषेऽध्यवगतस्यम्। यथा— समन्ततः केसरिणां वसन्तं भीमं च कान्तं च वपुर्धन्तम्। विलोक्य दूरात् हरसाधिमनो दूवारणः कोपि गत्वा से मत्सः॥ इति।

इसाँ प्रकार अर्थालंलेप में भी समझना चाहिये। जैसे—‘केसरी भीम ( भयंकर, वियोगियों के लिये दु:खद ) और कान्त ( शरार ) धारण किये हुए वसन्त को चारों ओर देखकर वह दुर्वारन अभिमान दूर से—ही बड़े वेग के साथ मुझ से हट गया।’ ( वह मतवाला ओर बिगड़ा हाथी शेर को रहता देख कहीं चला गया )।

केसरिणं वकुलपुप्पवन्तं सिंहं च। वसन्तं माधवं निवसन्तं च। अभिमानो धाराधिरुढो मानो महामपाणश्र। दुर्वार्णोऽशक्यवारणो दुष्टश्र करी। मत्तो मत्सकाशात् समदश्र। अभिमान इति न तथा हृदयङ्मः पाठः।

केसरिणम्—वकुलपुष्पयुक्त ( वसन्त को ) और सिंह को। ( केसर = वकुल पुष्प और सिह ) वसन्तम्—वसन्त ऋतु को और रहते हुए ( शेर ) को। अभिमानः—धाराधिरूढ़ मान और बहुत बड़े ( मान ) आकार का ( हाथी )। दुर्वार्णः—जिसका निवारण सम्भव नहीं, और दुष्टगज । मत्तः—मुझसे, और मद से युक्त । यहाँ अभिमान यह उतना अच्छा पाठ नहीं है।

अत्र हि केसरिदुर्वार्णयोर्वसन्ताभिमानयोक्र धर्मिङ्गर्मोभयार्थयोरन्योन्यं विशेषणविशेष्यभावो वा रूप्यरूपकभावो वा निवद्धः। स तु चायुक्तः। न हि स्वतन्त्रपरतन्त्रतात्रत लक्षणविशेषण विशेष्याद्यात्मकविरुद्धोभयार्थोभिधानं सकृ- दुपात्तैरेवैशै शब्दैः शक्यते कतुं म् अर्थोऽरन्योन्यविरोधात्। द्विरुपादाने तु तयाँभिन्नार्थत्वात्र क्वचित् दोषः। यथा— 'अलि भिरज्जनबिन्दुमनोहरैः कुसुमपङ्किनिपातिभिरड्डितः। न खलु शोभयति स्म वनस्थलं न तिलकस्तिलकः प्रमदामिव ॥' इत्युक्तप्रायम्।

न च तदुपात्तमिति तस्य वाच्यस्यावचनं दोषः।

यहाँ केसरी और दुर्वारन या वसन्त और अभिमान जो धर्मी और धर्म दोनों के अर्थ में है, उनका विशेषणविशेष्यभाव या रूप्यरूपकभाव निवद्ध किया गया है। वह अयुक्त है। केवल एक बार कथित शब्द के द्वारा स्वतन्त्रता जिसका असाधारण धर्म है वह विशेष्य और परतन्त्रता जिसका असाधारण धर्म है वह विशेषण तथाः ऐसे और भी परस्पर विरोधी दो अर्थों का अभिधान नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे अर्थ परस्पर विरुद्ध होते हैं। दो बार उपादान होने पर वे भिन्न-भिन्न अर्थ के वाचक हो जाते हैं, अतः कोई दोष नहीं रहता। जैसे—‘काजल की बूंद के समान मनोहर और पुष्पपंक्क्ति पर डड़ते वाले भौरों से चिहित तिलक ( वृक्ष ), जिस

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द्वितीयो विमर्शः

प्रकार प्रमदा को ( माथे पर लगा ) तिलक सुशोभित करता है उसीप्रकार तिलक वसनस्थली को शोभित नहीं कर रहा था ऐसी बात नहीं । इत्यादि में प्रायः कहा दिया गया हो । परन्तु ( समन्ततः इत्यादि पथ में ) वह ( द्वितीय पद ) नहीं दिया गया अतः वाच्य होने पर भी उसका अवचचन ( अकथन ) वाच्यावचचन दोष हुआ ।

अन्योन्यन्यस्ति वसन्तमित्यस्य केसरिणमिति विशेषणं, सिंहपदे च केसरिण-मित्यस्य वसन्तमिति । रूप्यतेति यः केसरः प्रतीतः स वसन्तस्य रूपकत्वेन न ताट-स्थेयेन । एवं वसन्तमित्यस्य निवसनार्थंयौगपद्य वसनार्थः केसरिणो रूपकत्वेन योज-नीयः । इदंस्थलेव दुवांरणाभिमानयोर्वाच्यम् । विशेष्यत्वेन रूप्यत्वेन च स्वतन्त्रत्वं, तद्वि-पर्ययेगण परतन्त्रत्वम् । विशेष्याच्चात्मकेति । आदिग्रहणेन रूप्यरूपकभावो गृह्यते ।

तिलकस्तुरविशेषस्तलकः विशेषकश्र ।

अन्योन्येति—केसरी यह वसन्त का विशेषण है और वसन्त केसराँ का । रूप्य—जो केसराँ प्रतीत हुआ वह वसन्त के रूपक के रूप में, तटस्थरूप में नहीं । इसी प्रकार 'वसन्तम्' का रहने अर्थ में प्रयोग होने पर भी वसन्त ऋतुरूपी अर्थ केसराँ के साथ रूपक रूप से मिलना चाहिये । इसप्रकार दुवांरण और अभिमान का माना जाना चाहिये । विशेष्य होने और रूप्य होने से स्वतन्त्रता, उसके विपरीत होने से परतन्त्रता ।

विशेषाधातमक—आदि शब्द से रूप्यरूपकभाव का ग्रहण किया जाता है । तिलक—एक वृक्ष और भाल का टीका ।

तदभिव्यक्तिनिबन्धनसदृशाये तु तयोः प्रधानतराभिव्यक्तौ विशेषणविशे-ष्यप्रतिनियमो युक्त पच । यथा—'अतिगम्भोरे भूय इव जनस्य निरवतारस्य । दृश्यति समीहितसिद्धि गुएवन्तः पार्थिवा घटकाः ॥' इति ।

अत्र हि इवशब्दनिबन्धनो गुणवत्त्वघटकत्वयोर्विशेषणविशेष्यभावः, न पार्थिवत्वस्यापि, तस्योभेयतया प्राधान्यात तस्य स्वरूपापहारापत्तेरि-त्युक्तम् ।

उसकी अभिव्यक्ति का कारण विधमान हो तो उनकी प्राधान्यता और अप्राधान्यता की अभिव्यक्ति हो जाती है, और तब विशेषणविशेष्य का निश्चितरूप ठींक ही रहता है ।—उदाहरणार्थ—'जो राजा कूप के समान अतिगम्भीर होता है उसमें उतरने में असमर्थ व्यक्ति जो इष्टसिद्धि गुणवाना और पार्थिव घटक करते हैं ।'

यहाँ इव शब्द के कारण गुणवत्त्व और घटकत्व का विशेषणविशेष्यभावसम्बन्ध है न कि पार्थिव का भी, क्योंकि वह उपमेय होने से प्रधान है । नहीं तो, उस ( प्राधान्य ) का स्वरूप ही उच्छिन्न होने लगेगा ।

तदभिव्यक्तिं रुबयार्थाभिव्यक्तिः । तयोरर्थयोः । गुणवन्तो रजयुक्ता अपि । घटकाः सद्दष्टचयितारो हस्वाक्ष घटाः । पार्थिवा राजानः, नतु वाच्यमाणयुक्ता पृथिवीविकारा व्याख्येयाः ।

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गुणवत्त्वघटक्तव्योरिति यद्यप्यत्र समीहितसिद्धौ हेतुत्वेन व्यवस्थितस्य घटका इत्यस्य पार्थिवा इति प्रतिबिशेषणत्वं, तथापि रूप इवेह्युपमासामर्थ्याद् विशेष्यत्वमपि घटते ॥

गुणवन्तः—रङ्जु से युक्त भी । घटक—घटना ( मिलन ) कराने वाले और छोटे-बड़े घड़े भी । पार्थिव—राजा, न कि आगे कहे जाने वाले ढंग से पृथिवी के विकार भी ।

गुणवत्त्वघटक्तव्योः—यद्यपि यहाँ समीहितसिद्धि में हेतु रूप से व्यवस्थित 'घटका' इसका 'पार्थिव' इसके प्रति विशेषणभाव है तो भी 'रूप इव' इस उपमा के आधार उसकी विशेष्यता भी वन जाती है ।

किश्च मत्त इत्यस्य द्विरुपादानेऽपि नार्थश्लेषो घटते तयोरभिन्नविभक्ति-कत्पादिति भान्तिमात्रघटतस्तज्जार्थश्लेषाभिमानः ।

किश्च लक्षणवाक्ये शब्दमात्रेणैति यन्मात्रग्रहणं तदुपमानसामानाधिकरण्य-स्यादितरयोग्ययोगरुपी शब्द्योः परस्परह्यर्थम् । तेन लिख्यादिविभक्ति-विशेषयोगे सति यस्मै तद्योग्यत्वमुपजायते तेनापि साध्रश्यं कथनीयमित्य-यनुशयं भवति ।

तत्र लिख्यादिविशेषयोगे सति यथा—

'उपस्ति विगालितान्धकारपङ्कप्लुतवशाबलं घनवर्त्म दूरमासितं । मधुरतरङ्गितापयोगतारं कमलवनं मधुपायिनां च पङ्क्तिः ॥' इति ।

अत्र चशब्ददनिबन्धना श्लेषाभिव्यक्ति: ।

और 'मत्त' इसका दो बार उपादान होने पर भी अर्थ श्लेष वनता नहीं है क्योंकि उन दोनों ( मत्तः मत्तः इसप्रकार दो बार प्रयुक्त हुए मत्त शब्दों ) में विभक्ति भिन्न है । ( एक में प्रथमा है और इसमें पंचमी ।) इसलिये वहाँ अर्थश्लेष की मान्यता केवल भान्तिजन्य है । और ( यत्रान्यूनातिरिक्तेन—इस ) लक्षणवाक्य में 'शब्द मात्रेण' इसप्रकार जो मात्रशब्द का ग्रहण है वह ( १ ) उपमान सामानाधिकरण्य और ( २ ) उससे भिन्न ( वैषयिकरण्य ) के योग्य इसप्रकार के दोनों शब्दों के संग्रह के लिये । इससे विशेष प्रकार के लिङ्ग, वचन, विभक्ति का योग होने पर जो उसके योग्य ठहरता है उससे भी साध्रश्य कहा जाना ही चाहिए । ऐसा भी अर्थ अभिमत है ।

लिङ्गविशेष का योग होने पर जैसे—(पूर्वोक्त)

'उपस्ति विगालिता‧‧‧‧‧‧—यहाँ 'च' शब्द से श्लेष की अभिव्यक्ति होती है ।

विमर्शः यहाँ घनवर्त्म इत्यादि संस्कृतिङ्ग है और पङ्क्ति पंङ्क्तिः इतने पर भी दोनों का साध्रश्य बताया गया है । व्यक्तिविवेक व्याख्यान अभी तक इससे आगे नहीं मिला है । त्रिवेन्द्रम् और चौखंबा, वाराणसी, से वह यहीं तक प्रकाशित हुआ है ।

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द्वितीयो विमर्शः

वचनविशेषयोरगे यथा—

'वघटिततिमिरोधविक्रषबन्धप्रकटनभस्न्यभवव्रिशावसानेऽपि ।

स्फुटदलनमनाक्षि पद्मपणडुसस्पदि हिमेतेतरदीधितिश्र तेषाम् ॥' इति ।

अत्र वचोऽव्दनिबन्धनायुक्तिः ।

विमर्शविशेषण के योग में उक्त—'राग से बालने पर अंखेरे का डर निवारित हो गया और दिशाओं का आकार स्पष्ट दिखाई देने लगा, तो कमल के समूह तत्काल स्फुटदलनमन हो गये, और सूर्य भी उसने लिये स्फुटदलनमनाः होने लगा ।' यहाँ 'न' शब्द से ल्लेप की अभिव्यक्ति होती है ।

विमर्शः स्फुट—शिले, दल, पलाशियों से, नमन = झुकने वाले—कमल, स्फुट = साफ-साफ, दलन = खिलाना, को लिये—मनाः—मनःसुख—सूर्य न शब्द के कारण यहाँ स्फुट**—इत्यादि विशेषण नत्न कमलपणड् और मूर्त्त्त दोनों में अन्वय होता है । यहाँ अभवत्रिशिष्ट सनिध के कारण 'अभवत्' नत्न पाद्यननन्न किया गया उससे—नञ्चुवन्न्त भी आ गया । 'मनसः' शब्द सान्त्त होने से प्रशंसा के नत्न ननन में वेसादृशी बना गया जैसा रमन शब्द—पुल्लिंग में बहुवचनान्त्त होने पर होता है ।

यथा च —

'तनुत्वरपयोदस्य मध्यस्य च भुजस्य च ।

अभवच्वितरां तस्य चलयः कान्तिकृदृदृगे ।' इति ।

और जैसे—'बलमः' ( बल्लियों और भृंगन ) उस सुन्दरी के तनुता से रमणीय मध्य और भुज दोनों के लिये अल्यधिक कान्तिवर्धक हुआ ।'

विमर्शः—यहाँ 'बलमः' नत्न मध्य के साथ खिल्ली के अर्थ में सम्बन्ध हो जाने पर भी 'च' शब्द के आधार पर सुज के साथ कंकण के अर्थ में सम्बन्ध होता है ।

विमक्तिविशेषयोरगे यथा—

'सरस्मन्थरतामरसोदरेभ्रमरसजलया नलिनी मचौ ।

जलधिदेवतया सदृशों श्रियं स्फुटतरागतरागरुचि दधौ ॥' इति ।

अत्र साधश्यमन्वयमात्रुक्तिनिबन्धनम् ।

विमक्तिविशेष के योग में, यथा :—

सरस—मन्थर—तामरसोदरेभ्रमर—सजलया ( जल वाली )—समुद्र देवता के सदृश स्फुटतर—आगत—रागरुचि—श्री को धारण किया । यहाँ ( सदृशी पद से न्यक्क्त ) साधश्य जो अत्यय नहीं है वह साधश्य का कारण है ।

विमर्शः तामरसोदर = कमल के भीतरी भाग में बैठे भौंरे के सरस और मधुर गुंजार से युक्त-नलिनी । यहाँ 'कुवल्या' में स्त्रीलिंग एक वचन है । सरस = प्रलोभन से युक्त, मन्थर—रत = मथने में लगे, अमर = देवता और उनके सोदर = सहोदर भाई देवत्य, उनके अम्रम = भुमाने से, रसत् = आवाज करता हुआ है—जल जिसका ऐेसो जल की अधिदेवता ( देवता शब्द संस्कृत में स्त्रीलिंग है । ) समुद्र का अधिदेवत रूप ( खी ) । यहाँ जलया में स्त्रीलिंग तृतनया का एक वचन है ।

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'स्फुटतरागतररुचि'—स्फुटतर-आगत-राग-रुचि । साफ साफ आई लाल वर्ण की कान्ति ( नलिनी पक्ष में )। राग = चमक की कान्ति-( समुद्र पक्ष में )। समुद्र पक्ष में एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि—मन्थन काल में मन्थन स्वर एक विशेष राग = लय से युक्त प्रतीत हो रहा था । दधी-मथते समय महिलाएँ अरदै से विशेष स्वर निकालती हैं । यहाँ सदृशी शब्द से 'सरस-जलया' को जलधि देवता और नलिनी दोनों पक्षों में लगाना ही पड़ता है ।

न्यूनीतिरिक्तप्रतिपेधविश्र्वास्य प्रधानविशेषणसाम्यप्रतिपाद्यर्थः । तेन यत्र तत्र सम्भवति स दुस्तर एव श्लेष इत्यवसेयम्‌।

तत्र न्यूनीत्वं यथा— 'इध चडुलतया विलोचनौधे: स्फुटशालितारकविभ्रमैरस्तृण्ण्य: । दृश्यति मधुकरैश्वर कोरकान्तस्थितिरमणीयतरै: श्रियं नलिन्य: ।।' इति । अत्र मधुकरपक्षे न्यूनीत्वम्‌।

( श्लेष के लक्षण में )—न्यून और अतिरिक्त शब्द का निपेध इस ( श्लेष ) के प्रधान विशेषण की समता का ज्ञान कराने के लिये है । उससे यह तथ्य स्पष्ट हुआ कि—जिसमें वह नहीं होता वह श्लेष दुष्ट ही होता है । इसमें न्यूनता जैसे—'इस जगह तरुणियाँ और कमलिनियाँ—सौन्दर्य धारण करती है । तरुणियाँ काली पुतली के साफ साफ विश्रम वाली अनन्त आँखों से और कमलिनियों—कमल के बीच बैठने से अधिक सुन्दर भौरों से ।' यहाँ मधुकर पक्ष में ( चडुलता की ) न्यूनता है ।

विमर्श: यह न्यूनता कैसे है यह इस प्रकार पाढ़ बदलने से विदित होता है—'दृश्यति सरसिज्ञ जैस्रथा द्विरेफस्थितिरमणीयतरै: ।' इस पाठ में चडुलता धर्म सरसिज में अन्वित हो जाता है किन्तु वह भ्रमरों में अन्वित नहीं होता । भ्रमरों की स्थिति ( बैठने ) का उल्लेख किया गया है, इस लिये उनकी चंचलता नहीं मानी जा सकती । साथ ही आँखों का अर्थ केवल आँख की पुतली नहीं है, पलक, बरौनें और पुतली के समुदाय का नाम आँख है । मधुकर की तुलना केवल आँख की पुतली से दी जा सकती है, पूरी आँख से नहीं । पूरी आँख से जिसकी तुलना होती है वह है उस ( भमर ) से युक्त कमल । इसके लिये कालिदास का यह पद्य प्रमाण है—

'तद् वल्गुना युगपदुन्‍मिषितेन तावत् सब: परस्परतुलामधिरोहतां द्रे । प्रस्पन्दमानपरुषे तरतमन्‍तकक्ष्यस्तव प्रचालितभ्रमरं च पङ्कम्‌ ।।' (रघु० ५।६८)

इसलिए चडुलता का भ्रमर में अन्वय नहीं होता यह कमी रह जाती है ।

अतिरिक्तत्वं यथा— 'दिशि दिशि विहगस्तनूषसमन्तादनलसपक्षतयोषपच्‍योयमानाः । उपसि जिगमिषाकुलास्तददानां दयितवियोगदशा वधूूदृशो देहु: ।।' इति । अत्र दयितवियोगदशापक्षे डतिरिक्तत्वम्‌। अध्ययमावृत्तिहेतुः ।

अतिरिक्तता ( अधिकता ) जैसे— 'पाइ फडकत हौ अनलस—पक्षता ( पंखों की अधिकस्य निकल जाने ) से उपचायमान ( उपचय = वृद्धि को प्राप्त हो रहे ) अपने झारोरों को पक्षी गण दिशाओं में ( क्रिया का अभाव ) और अनल अभिसारिकाओं को जलाने लगी ।'—यह

यहाँ दयितवियोगदशापक्ष में अतिरिकता ( अधिकता ) है और आवृत्ति का हेतु अव्यय ('च') शब्द है ।

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द्वितीयो विमर्शः

विमर्शः : इस पद्य में दो पक्ष हैं एक विहग पक्ष और दूसरा दश्यादर्शा पक्ष । पहले का कर्ता है विहग और दूसरे का द्रष्टा । तीनों पक्षों में पद्य के अन्य पदार्थों की योजना इस प्रकार होगी—

'उपचीयमानाः' तद्बूजैर्दिशि दिशि विहगाः जिगमिषाकुलाः ( सन्तः ) अनलस-पक्षतया उपचीयमानाः ( सतीः ) तनूः समन्तात् ( क्रियापद नहीं दिया है ) दृश्यादृश्यादर्शा: ( दृश्यं ) च अनल-सपक्षतया उपचीयमानाः ( सत्यः ) जिगमिषाकुलाः ( सर्ताः ) बधूः देहुः ।'

इससे दो बातें स्पष्ट होती है, एक तो यह कि 'देहुः' यह क्रिया विहग पक्ष में अन्वित नहीं होती क्योंकि जलाने अर्थ की √दृह् धातु के परोक्षभूत में अन्य पुरुप के बहुवचन का वह रूप है, उसमें बोध्ये दूसरा अर्थ नहीं है, फलतः पक्षियों में भार्यों का जलाना असङ्गत है । मधुसूदनी विवृति में 'देहुः' का अर्थ 'उपानयन् नकु:' भी किया गया है, निश्चित ही वहाँ इस क्रियापद को 'उपानय' अर्थ की √दृश् धातु से निष्पन्न माना गया है जो अत्यन्त असङ्गत है, 'दृश्' का परोक्षभूत में अन्य पुरुप के बहुवचन का रूप 'ददृशुः' होता है, 'देहुः' कदापि नहीं ।

दूसरा वात है 'उपचीयमानाः' और 'जिगमिषाकुलाः' इन विशेषणों के अन्वय में विषमता । 'उपचीयमानाः' विहगपक्ष में जहाँ कर्म में = 'तनू' में अन्वित होता है वहाँ दश्यापक्ष में कर्ता = दशा में । यहाँ प्राप्त 'जिगमिषाकुलाः' जहाँ विहगपक्ष में कर्ता = विहग में अन्वित होता है वहाँ दश्यापक्ष में कर्म = बधू में । उपचीयमानाः = बढ़ रहे थे फल रहे—इस भाव की संगति प्राप्तकाल केवल विहगों के शरीर में ही। यह सम्भव है, विहगों की संख्या में उपचय केवल सायंकाल होता है, प्राप्तःकाल प्रत्सुत कन्या होती हैं अतः 'उपचीयमानाः' वा अर्थ 'भूष्यतां यथेमानाः' भी नहीं किया जा सकता,

इसके अतिरिक विहगों के मांस इस विशेषण की संगति अन्य किसी प्रकार से संभव नहीं हैं । दश्यापक्ष में उपनय दृश्यादर्शा में ही संभव है । वधूजनों में उपचय अस्वाभाविक और अत्यंत अद्भुत है । इसी प्रकार 'जिगमिषाकुला:' 'जाने की इच्छा से आकुल'—यह भाव प्राप्तःकाल विहगपक्ष में विहगों में संभव और स्वाभाविक है तथा दश्यापक्ष में वधूजनों में । दशाओं में 'जिगमिपया आकुला अधिकं मूलनिश्चितता:'—ऐसी व्याख्या कर 'जिगमिषाकुलत्व' की संगति खिलष्ट करनी है, और तब भी वधूजनों में 'जिगमिषाकुलत्व' अन्वित हुए बिना रहता नहीं है ।

यद्यपि यहाँ में अतिरिकता दिखाई जा रही है । वह उक्त विवेचन के अनुसर 'देहुः' में स्पष्ट है क्योंकि वह केवल दशा पक्ष में ही अन्वित होता है विहगपक्ष में नहीं । 'जिगमिषाकुलत्व' विहगपक्ष में 'उपचीयमानत्व' अधिक हो जाता है, फिर जहाँ तक दोनों पक्षों का प्रश्न है उनमें

किसी एक पक्ष में न्यूनाधिकभाव नहीं बताया जा सकता । वस्तुतः 'इदं चडुलतया' को अति-रिक्त वा और 'दिशि दिशि विहगाः' को न्यूनतत्व का उदाहरण मानना चाहिए । 'इदं चडुलतया' पद्य में 'शुकद्वयस्थितितारकभ्रमं३' समनारूप से अन्वित होता है अतः इससे विकल्पनौ घ तथा मधुक्रांतां का साम्य वन जाता है । 'कोरकान्तःस्थिततरमणीयतरत्व' केवल मधुकरों में अन्वित होता है अतः वह मधुकरपक्ष में अधिक है । इसी प्रकार 'दिशि दिशि'—में 'देहुः' क्रिया का

विहगपक्ष में अन्वय न होने से किसी अन्य क्रिया की अपेक्ष्यक्ता है, किन्तु वह वहाँ नहीं है अतः उस पक्ष में उसकी न्यूनता है । इसी प्रकार उपचीयमानत्व की कमी वधुओं में दिखाई जा सकती है और 'जिगमिषाकुलत्व' की 'तनूः' में उपचीयमानत्व केवल दशा में लगता है, विहग में नहीं अतः एक में अधिकता और दूसरे में न्यूनता दिखाई जा सकती है ।

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'प्रचलच्चामरच्चारहदेमभाण्डम्' ।

'भाण्डं पात्रे वणिग्धनूल्यथने भूपाश्वभूपूपयोः'—मेदिनी ने 'भाण्ड' के ५ अर्थों का उल्लेख महाभारत के साथ के १५ वें पर्व की टीका में किया है । जवनिका = तिरस्करिणी या परदा, और जवनिका—घोड़े के पीठ पर पहनाया गया कपड़ा—अथवा नाल । घोड़ों की नाल का उल्लेख महाभारत ने साध के ५१ वें पर्व की टीका में किया है । धारा के पांच भेदों में एक मध्य-

जबा भेद है । ज्ञात होता है 'जवनिका' धारा सामान्य के लिये आया है । धारा गति का नाम है और 'जन्'—वेग का । धारा मति लघ्वी मध्य और दीर्घा—तीन उपभेदों में विभक्त की गई है, जवनिका उसी का मध्यभाग होना चाहिये । चुनदेलखण्डी भाषा में उसे दुङ्की नाल कहते हैं । इस नाल में ही घोड़े की अच्छाई देखी जाती है । इस चाल में चलते घोड़े की पीठ एकदम स्थिर रहती है, यों चल पैर ही चलते हैं । यहाँ तक कि परिक्षा लेने के लिये घुड़सवार लोग पीठ पर बैठते और हाथ में लबालब भरा कटोरा रख लेते हैं । घोड़ा चलता रहै और पीठ पर बैठे सवार के हाथ का कटोरा न छलके तो घोड़ा की गमती माना जाता है । यहाँ—नैयायिक पक्ष में उसके कर्त्ता वा तिरोधान होता है ।

एवम्—

'अवनध्यकोपस्य विहन्तुरापदां भवन्ति वश्याः स्वयमेव देहिनः । असपत्नसून्येन जनस्य जन्तुना न जातहृदेन न विचित्रपादः ॥'

इत्यादावपि दृश्यते। अत्र हि 'न विचित्रा भीः सुहृदा च नादरः' इति

युक्तः पाठः ।

इसी तरह—'अवनध्यकोपस्य………' शास्त्रकारों का कहना है कि उस व्यक्ति के वश में स्वयं प्राणी आ जाते हैं, जिसका, क्रोध निष्फल न हो और जो आपत्ति का निर्वाहन करता है ( जन्तु ) मित्र हो जाय तो किसी के मन में उसके प्रति आदर नहीं होता, और शत्रु बन जाय तो डर नहीं होता । इत्यादि में भी देखना चाहिये । यहाँ 'न विचित्रा भीः सुहृदा च नादरः' यह पाठ ठीक है ।

विमर्शः : 'विचित्रपादः' पाठ में एक दर की आयुक्ति होती है । जब उसके 'जातहृदेन' से अन्वय नहीं होता तो गवेषणा करने पर आदर शब्द की प्रतिति होती है । प्रस्तावित पाठ में 'भीः' ( भय ) और 'आदर' दोनों ही शब्दतः कथित है ।

कर्मणो यथा—

'कुन्तालीभिर्युद्धमिव गहनामेतामसाद्योच्चैः श्वेतशातचचारचातसडूणीर्णः । अस्मिन् नानाफलकवलनसंस्कृता वल्गन्त्येते दिशि दिशि हरिसैन्यौघाः ।।' इति ।

कर्म में था—'इनकी कुन्तालियाँ ( कुन्त = भाले, आळी = पंक्ति ) से युद्ध के समान तालध्वनियों से दुर्गम भूमियों में पहुंचकर हरि की ये सेनायें जो लम्बे और तीखे सेकड़ों वाणों से लैस हैं, जो अनेक फल खाने और भालों के फल चमकाने में लगी हुयी हैं, प्रत्येक दिशा में यहाँ वहाँ घूम फिर रहीं हैं ।'

विमर्शः : यहाँ 'कुन्तालीभिः युधमिव गहनाम्ना' यह एक क्रियाव्यांश है, इसकी क्रिया है 'आसाद्य' । शेष वाक्यांश से यह प्रतीत होता है कि भालों की पंक्तियों से युक्त युद्ध के समान ( को पाकर ) । इसमें जो पदार्थ समान है वह नहीं आता । वस्तुतः वह पदार्थ है पृथिवी । उसे 'कुन्तालीभिः' शब्द के

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क्रियाया यथा—

‘कुसुमेऽपि कृतवासनः समन्तादपि निद्रात्वमुपेयिवान्‌ रसिमन्‌ । श्रुतिमन्त्रगणाभिरामरूपपैर्नवौष्ठपदशोभिभि: समीर: ॥’ इति ।

क्रिया का यथा—यहाँ ( इस समय ) चारों ओर विकास को प्राप्त हो रहे और वेदमन्त्रों के समान सुन्दर रूप वाले पुष्पों से—सुगन्धित पवन नहीं वहाँ !'

विमर्शः ‘न वौष्ठपदशोभिभि: कुसुमेऽपि कृतवासन: समीर:’—पवन अपने आप में पूर्ण है । किन्तु ‘श्रुतिमन्त्रगणाभिरामरूपै:' शब्द द्वारा जो वेदमन्त्रों की उपमा फूलों को दीं वह साधारण धर्मों खोजती है । ‘सम नहीं वहाँ’—अर्थ में वह नहीं मिलता । उसके लिये—‘नव वौष्ठ-पद- शोभिभि:' ‘नवीन वौष्ठ पद शब्द से सुशोभित’ । इस प्रकार का पदच्छेद करना पड़ता है तथ अर्थ निकलता है—इस पाठ में ‘वौष्ठ’ किया नहीं बनती । अतः क्रियापद अलग से दिया जाना चाहिये ।

एष चार्थो न्यायसिद्धोऽपि स्फुटमतिभि: प्रति सुखप्रतिपत्तये वचनेन प्रतिपादित: ।

सा चेयमखलस्यैव पदस्यावृत्तिरिष्यते । निबन्धनबलोद्भूता न तदंशस्य जातुचित्‌ ॥ ९० ॥

उपयुक्तार्थता हस्य पदस्येव न विद्यते । अधुना तूपयोगेऽस्य पूर्वस्यार्थस्तिरोभवेत्‌ ॥ ९८ ॥

अर्थप्रयोगो युगपल्लाघवेनोभयोरपि । स्यादयं कामचारो यथकनोक्कद्योभयेत्‌ ॥ ९९ ॥

इत्थन्तरश्लोक:

यह विषय अपने आप समझ में आ सकता है तो भी कोमलमति वाले व्यक्तियों के लिये सुखपूर्वक बोध हो जाय—इसलिये शब्दतः कहकर बतलाया ।

संक्षेप में—यह आऱत्ति पूरे पद की ही होती है, किसी एक अंश की नहीं । इसका कारण भी अवश्य ही कथित होता है । अंश से अर्थ को पद के अर्थ के समान उपयोगिता नहीं होती । पदांश के उपयोग में पद की उपयोगिता छिप जाती है । दोनों के अर्थों का प्रयोग एक साथ—थोड़े में हो जाता है । यह स्वेच्छा तब बरती जा सकती है, जब दोनों का कथन एक ( एक पद ) से हो ।

यथा ‘चञ्चन्मन्या: शीलवत्यश्च गावो रिवमेवरतास्ते श्यामा: पद्मरागिण्यश्व धवलद्विजशुचिवदना मदिरामोदिनिश्वसिताश्व प्रमदा ।’ इति । अत्र च्छान्दावेदितो विरोध: तस्यार्थाभिधानसामध्यो- पगमान्‌ ।

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यहाँ दोनों पादों का व्यतिरेक अनुमेय है। उसमें इनके-विशेषणों का भेद ही कारण है। यदि विशेषण अभिन्न हो और कोई कारण दे दिया जाय तो उससे केवल सादृश्य की प्रतीति होती है व्यतिरेक की नहीं। यथा—भगवान् विष्णु के दोनों नेत्र या शरीर आपकी सांसारिक व्याधि शान्त करे, जो (दोनों)—

१. भक्तिप्रहृद्-विलोकन-प्रणयन्ती है:—(भक्ति से हृदय व्याकुलता को देखने और उनके द्वारा देखे जाने का प्रणय है जिनमें (जिससे) ।

२. नीलोत्पल-स्पर्धिनी = नीले कमल से स्पर्धा रखती है।

३. ईंहित और हित प्राप्ति के लिये जो समाधि निरत व्यक्तियों द्वारा ध्यान की आधारता को पहुँचाई गई तथा पहुँचाए गये हैं।

४. जो लावण्य की विपुल निधि है। और—

५. जो लक्ष्मी की आँखों में रसिकता बढ़ाती हैं।

विमर्शः यहाँ भागागत वैचित्र्य से नपुंसकलिङ्ग द्विवचनान्त नेत्र और स्त्रीलिङ्ग एक वचनान्त तनु—दोनों के साथ 'भक्ति' आदि विशेषण लागू होते हैं। 'इन' प्रत्ययान्त शब्द का जो रूप प्रथमा विभक्ति स्त्रीलिङ्ग के एकवचन में बनता है वहीं नपुंसक लिङ्ग द्विवचन में। अतः प्रपञ्चिनी—और—स्पर्धिनी दोनों के विशेषण हैं। 'नीतेहितप्राप्तौ' में 'नीते हित' पदच्छेद द्वारा नेत्रों का विशेषण सिद्ध होता है। 'नीता ईहितप्राप्तये' द्वारा—तनु का। 'महानिधी रसिकतां'—में—'निधि: रसिकता' इस संधि के अनुसार विसर्ग का लोप और ई को दीर्घ होना पड़ता है अतः महानिधी-रसि रूप बन जाता है और तनु के साथ एकवचनान्त होकर अन्वित हो जाता है। महानिधि इस प्रकार निधि शब्द विशेष्यनिध्न न होने से पुल्लिङ्ग रहता है और द्विवचन में हरि शब्द के समान निधी बनकर नेत्रे का विशेषण बन जाता है। इस प्रकार नेत्र और तनु दोनों का विशेषण एक ही है। उनमें सादृश्य प्रतीति होता है।

मिन्नविशेषणत्वे तु तेषामन्योन्यविशेषप्रतिपत्तिः। विशेषो हि न भेदमात्रेण भवति न च व्यतिरेको नापर इति मिश्रविशेषणत्वानुमेय एवैषा न शब्दशक्तिमूलः।

तदभिन्नव्यक्तिनिबन्धनं कचिदन्यदीयं वचनमपि भवति। यथा वेणीसंहारेः—:'रक्तप्रसाधितभुवः क्षतविग्रहाश्र स्वस्था भवन्तु कुरुराजसुता:।' इति शैलूषवचनाकर्णनकृतः 'आर्य! अनमतमेव नो भरतपुत्रस्य वचनम्' इति वचनम्।

विशेषण भिन्न होते हैं तो उनके पारस्परिकवैशिष्ट्य या अन्तर का ज्ञान होता है। विशेष्यता भेद के बिना संभव नहीं होती। वह विशेष ही (तो) व्यतिरेक है; न कि अन्य कोई वस्तु। इसलिये यह व्यतिरेक विशेषणों में भिन्नता द्वारा विदित होता है। वह भी अनुमान से, शब्दशक्ति से नहीं उस (रूढेः) की अभिव्यक्ति का कारण कहीं कहीं दूसरे का कथन भी होता है। जैसे वेणी संहार में—'रक्त प्रसाधितभू और क्षतविग्रह कौरव अपने नौकरों के साथ स्वस्थ हों'—यहाँ शैलूष (नट) के वचन से कुपित भीमसेन को सान्त्वना देने के लिये सहदेव का यह कथन—'पूज्यवर, भरतपुत्र (नट) का वह कहना हमें मान्य है।'

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जैसे कि शब्द इलेष में—

'इस क्ष्माभृत् ( राजा-पर्वत ) का विकट कटक ( सैन्य, निचला भाग ), जो पृछ = हाथी के सदृश से युक्त है, जिसमें सैकड़ों हरि ( घोड़े, शेर ) की भीड़ है जो 'व्यपासतना-नानाधिकामच्वर-मागध-राजितश्री:'—रaja अर्थात् नाना प्रकार की व्याधियों से दूर स्वेच्छाचारी, स्तुतिकारक व्यक्तियों द्वारा शोभित हो शोभा जिसकी—

( राजा ) व्यापस्तना-नाधि-काम्- ( स्त्रियों के प्रलय ) दूर हो गई नाना प्रकार की व्याधियाँ जिससे ऐसी लक्ष्मी को, और—अच् + रस = पूर्व, अंग = पर्वत, उसकी धरा-भूमि, उसकी श्री को जीत लिया है जिनने ( पर्वत ) यहाँ राजा और पर्वत दोनों का इलेष है। किन्तु शब्दों द्वारा कोई एक ही अर्थ निकाला जा सकता है। दूसरे अर्थ के लिए कोई उत्थापक हेतु यहाँ नहीं है।

यथा च—'येन द्वस्तम्भने'भदेन बलि-जित्काय: पुरा ऋषी-ऋतॊ

यस्रोद्रिक्तमुज्झर्हारवलयॊ गॊडां च योद्धारयत् ।

यस्याह: शाशिमच्छिरो हर इति स्तुत्यं च नामाम्बरा:

पालयत्सु धरम्न्य-धैर्य-करसत्वा सर्वदा-मोदित: ॥' इति ।

एवमू—'कह पाँम पा होसि तुम भाणम-सम-मज्ज-सस्सण रणाह ! ।

णिच्चं चेअ कुणन्तो जदिहिच्छम-त्थाण विणिओअम् ॥'

['कथं नाम न भवसि त्वं भजन-सम-मज्-जस्स न-रनाथ ?

नित्यं चैव कुर्वन् यथेच्छम-थों विनियोगम् ॥']

इत्यादावपि दृश्यते । न ह्यत्र चाटॊ निन्दा-यां वा निश्र-यॊ निवन्धनाभावा-

दिति ।

और जैसे—'येन घ्वस्त'—कृष्णपक्ष—स्वयं वह माधव आपकी रक्षा करे, जो सब कुछ देने वाला है, अन्धक कुल के लिये क्षय ( मकान ) और ( विनाश ) वनाने वाला है, देवता जिसका 'शाशिम-च्छिरो-हर:'—यह स्तुत्य नाम लेते हैं—( शशिनं मथ्नाति—शशिमत् = राक्षः, तस्य शिरसो हर: चन्द्रमां को ग्रसनेवाला = राहु, उसके, सिर को हरने वाला—विष्णु, विष्णु ने राहु का सिर काटा था ), जो मदमत्त ( कालिय या कुञ्जरया-पीड ) नाग ( सर्प या हाथी ) का हनन करने वाला है, अरच—( लोचनकार के अनुसार 'अकारो विष्णु:' इस प्रमाण से—'अ' इस 'रु' अर्थात् ध्वनि या शब्द के साथ ऐकात्म्य है जिसका, जिसने गोवर्धन पर्वत और ( पाताल गई ) पृथिवी को धारण किया, जिसने बलि को जीतने वाला अपना शरीर खी बना दिया, जो अजन्मा हैं और जिसने शाकटासुर को नष्ट किया ।

शिवपक्ष—स्वयं वह उमाधव ( उमा = पार्वती के धव = पति, अर्थात् शिव ) आपकी सदा रक्षा करे जो अनुकार के संहारक है। 'हर' ऐसा नाम देवता लोग गाया करते हैं, जिसका सिर चन्द्रमां से युक्त है, जो फुफकारते सॉपों का द्वार और कंकण पहनते हैं, जो गजां को धारण किये हुए हैं, जिनने विष्णु के शरीर को खी बनायाऔर जिनने मनोभव काम को ध्वस्त किया ।

इसी प्रकार—हे न-रनाथ तुम अनौचित्य के भजन क्यों नहीं होते। प्रतिदिन अर्थों का विनियोग यथेच्छ जो करते हैं ।

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द्वितीयो विमर्शः

इत्यादि में भी देखना चाहिये। यहाँ चाड़ या निन्दा दोनों में से किसी एक का निश्चय नहीं होता, कारण कि उसका हेतु कोई नहीं है।

अर्थश्लेषे यथा—

‘दत्तानन्दाः प्रजानां समुदितसमयाकृष्टहृदसुग्रेहे: पयोधे: पूर्वोहणो विकाराणां दिशो दिशो निरयमतिदुस्तरम्भान् । द्विसां शोकर्द्धदुःखप्रभवभवभयोदनवधुत्तारणवो गावो वः पावनानां परस्परिमितां प्रीतिमुत्पादयन्तु ।।’ इति ।

अत्र हि गाव इत्यस्य विशेष्यवाचिन उपमानाभिमततयाऽन्तरचालितथे डंपि विशेषणानाश्रोभयार्थानुगुणथे डन्युपमानस्य तत्समबन्धाभिधायिनश्रावश्यवाच्य-स्यावचनं यत् स दोष इत्येतद्वितनिष्यते ।

अर्थश्लेष में यथा :-

सूर्य की वे गौएँ आप पवित्र लोगों को अपरिमित प्रीति प्रदान करें उचित समय पर सड़लता से बरसापे पय द्वारा जो प्रजाओं को आनन्द देती हैं, सवेरे जो दिशाओं में विखर जाती हैं और दिन डूबे लौट आती हैं जो द्वेष दु:ख का उद्भवस्थान जो संसार तद्रूपी भय के समुद्र को पार करने की नौका है।

यहाँ ‘गाव:’ यह विशेष्यवाची है। इसका एक अर्थ उपमान भी है। विशेषण भी उपमान उपमेय दोनों अर्थों के अनुरूप है, इतने पर भी उपमान और इसके सम्बन्ध का अभिधान करने वाला कोई हेतु अवश्यमेव कहा जाना था। उसे जो नहीं कहा गया यही दोष हुआ। इसे आगे ( तृतीय विमर्शों में ) विस्तारपूर्वक बतलाएंगे।

विमर्शः—गौ = गाय, पय = पानी और दूध।

गाएँ और किरणें दोनों सवेरे दिशाओं में विखर जाती हैं और शाम को इकट्ठी हो जाती हैं। सूर्य किरणों की उपासना से मुक्ति मिल जाती है और गाय की पूँछ पकड़ कर वैतरणी पार कर ली जाती है।

दत्तानन्दा: प्रजानां आदि शब्दों की जगह दूसरे शब्द भी यहाँ रखे जा सकते हैं अतः अर्थ श्लेष है किन्तु—गाव: और पय: में शब्द श्लेष ही है, वहाँ शब्द नहीं बदले जा सकते।

उभयश्लेषे यथा—

‘सर्वैंकशरणमक्षयमघौशर्माशीं विंयां हरिं कृष्णम् । चतुरात्मानं निष्क्रियमरिमथनं नमत्त चक्रधरम् ।।’ इति ।

इहापि वाच्यावचनमवगन्तव्यम् ।

उभयश्लेष में जैसे—श्री कृष्ण को प्रणाम करें। वे सभी के एक ही शरण हैं, अक्षय हैं, अधोक्ष है, धी = बुद्धि और इन्द्रियों के ईश हैं, हरि हैं, कृष्ण हैं, चतुरात्मा हैं, निष्क्रिय हैं, अरिमथन हैं, चक्रधर हैं।

यहाँ भी वाच्यवचन मानना चाहिये।

विमर्शः —

विरोध—

सर्वैंकशरण = सभी के एक शरण—घर ।

क्षय = घर उससे रहित अक्षय ।

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अर्धांशा = धी के अंश नहीं, धी का अंश ।

हरि = हरे रंग के, कृष्ण काले ।

चतुरात्मा—संकर्षण, वासुदेव, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध चाररूपधारी, निष्क्रिय = क्रिया रहित ।

अरौ = अर से युक्त अरौ चक्र, उसका मथन करने वाले ।

चक्रधर = चक्र को धारण करने वाले ।

परिहार—

शरण = सभी के त्राता, अक्षय = क्षय—विनाशरहित ।

अर्धांशा = अधि—सब ओर से अंश स्वामी ।

हरि—विपत्ति हारी ।

अरि = शत्रु को मथन—मारने वाले ।

चक्रधर—सुदर्शनचक्र धारी ।

यहाँ विरोध का स्पष्टोक्तरण किसी भी शब्द से नहीं किया गया ( उसकी कमी वाच्यावचन दोष हुआ ) अतः श्लेष नाहक ही दिया गया ।

यथा—

'पतत्ते पतत्र्मग्रराजि निजप्रतिबिम्बरोषित इवाम्बुनिधौ ।

अथ नागयूथमलिनानि जगत्परितस्तमांसि परितस्तरिरे ।' इति ।

अत्र नागयूथेन धर्मिणा साम्यं तमसां वकुंभिमतं क्वचि:, न तद्र्मेण मलिनत्वमात्रेण । सृगपतौ पतत्ते निष्प्रतिपक्षतया तस्यैव स्वेच्छाविहारित्रोपपत्तेः, न तद्वन्मलिनानां तमसां, पतत्रस्थ सृगराजरुपणैवर्थंप्रसङ्गात् । न च तत् मलिनादिशब्दः शत्रुवचन्ति वकुं हारिसुन्दरस्यभगवदरासनिभादिशब्दानामेव तदसिधानसामर्थ्यंदर्शनात् ।

अन्यथा—

'सरोजकर्णिकागौरों गौरीं प्रति मनो दधेौ ।'

इत्यादौ गौरादिशब्दा अपि धर्मिसाम्यमेवावगमयेशु: न धर्ममात्रसाम्यम् ।

तच्चानिष्टं गौरत्वमात्रसाम्यम्यकृतस्य गौर्यः सरोजकर्णिकासाम्यस्मैव कत्वात् ।

'अपने प्रतिबिम्ब के रोष से समुद्र में जब पतत्र्मृगराज गिर पड़े तब हाथियों के समुदाय के समान मलिन अन्यकार ने जगत् को—चारों ओर से ढँक लिया ।'

यहाँ—कवि केो नागयूथ रूपी धर्मी से अंधकार का साम्य बतलाना अभीष्ट है और वह केवल उसके मलिनत्व धर्मँ द्वारा । सृगराज का नाश हो जाने पर वह ही ( नागयूथ हो ) अपना शत्रु न होने से स्वेच्छा विहार कर सकता है, उसके समान मलिन—अंधकार नहीं । इसलिए पतत्र्मृगराज का रूपक व्यर्थ होने लगता है । उस ( सादृश्य ) को केवल मलिनादि शब्द अभिधा द्वारा नहीं बतला सकते । उसके अभिधान की शक्ति 'हरि' सुन्दर, सुभग, सदृश—सुरभि आदि शब्दों में ही देखी गई है । नहीं तो—

'सरोज कर्णिका के समान गौरी ( गौरवर्ण की ) गौरी के प्रति मन किया ।' इत्यादि में गौरादि शब्दों में ही देखी गई है ।

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'मेघ नाहर पानी वरस कर चले जाते हैं किन्तु जर्जर मकानों में भीतर पानी की बूंदें पड़ती ही रहती हैं, वे मकड़ो के जाल को तोड़ जाती हैं—और उनका रंग श्वेतद्र की बूंद के समान लाल पीला हो जाता है ।' यहाँ—पयोविन्दु में—श्वेतद्र की बूंद की ललोऽद्र के साहचर्यं से गोलाकारत्व की भी प्रतीति होती है—

यह ठीक नहीं।—क्योंकि ऐसा मानने पर साध्यसाधन की भी प्रतीति माननी पड़ेगी, क्योंकि जैसे पिञ्जलत्व ( पीले रंग ) का साहचर्यं गोल आकार के साथ है—वैसे ही साध्यं के साथ भी है । जहाँ तक रूप आदि के रहने पर उनकी प्रतीति का सम्बन्ध है वह हेतु और धर्म के अनुमान से ( कार्य से कारण का अनुमान; धर्मों से धर्म का अनुमान ) मानी जाती है, किन्तु यहाँ उन दोनों का हेतु-हेतुमद्राव भी असिद्ध है अतः साहचर्य प्रतीत नहीं होता। इसलिये दूसरे धर्मों की प्रतीति बनती ही कैसे ? और यदि साहचर्य सिद्ध भी हो जाय तो उससे युक्त धर्मों में से किसी एक का साधन रूप से निर्देश न होने के कारण दूसरे धर्म की प्रतीति कैसे हो ?

ऐसा होने पर तो—'दुःख से तपे आदमी को अग्नि पाले के समान ठंडी लगती हैं।'—यहाँ अग्नि में भी शीतत्व के साहचर्य से उसकी पाण्डुता ( शुब्रता ) की प्रतीति माननी चाहिए । और—अन्य धर्म की प्रतिपत्ति यदि सच्चमुच हो रही हो तो उसके लिए साहचर्य या और कोई हेतु कल्पित किया जाय । यहाँ तो वहाँ ( प्रतीति ) ही नहीं होती—इसलिए अन्य धर्म की कल्पना का प्रयत्न ही व्यर्थ हैं । उसकी कल्पना के बिना यहाँ बिगड़ ही क्या जायगा ? जल की बूंदों के समान ह्रस्वता ( पोलकारता ) की प्रतीति बिगड़ती हो तो उसे भली भाँति बिगड़ जाने दीजिए । प्रमाण की व्यवस्था अपने मत को हल करने के लिए नहीं की जा सकती ।

तस्मादनेकधर्मन्त्वेऽप्यर्थेस्य यस्सयेव धर्मस्य निर्देशस्तस्यैव प्रतिपत्ति-न्यास्यास्येत्यग्र तमसां नागयूथसदृशये वाच्ये यत् तेषां मलिनत्वमुक्तं स वाच्यावचनं दोषः । एवं च पृष्टपदार्थप्रयोगोऽत्रातिरिच्यमानोऽनुप्रासक्तपरिपूरणायैव पर्य-वस्यति न बिन्दूनां चैत्तवप्रतिपत्तये इति 'नागयूथसदृशानां'—त्यग्र पाठा युक्त इति ।

यत्— 'करिकरभ ! विमुञ्ज लोलतां चर विनयव्रतमनुव्रताननः । मृगपतिनखकोटिभङ्गुरो गुरुरुपरि क्रमते न तेजःकुशः ॥' इत्यग्रादुन्नास्य मृगपतिनखकोटिभङ्गुरत्वं दुस्सहत्वं चेति धर्मद्वयं वक्तुमभिमतम् । न तदुक्तनैव भङ्गुरशब्द एवावगमयितुं क्षमते, तस्य कौटिल्य-मात्राभिधायित्वेनैव प्रसिद्धेः । यत् तु तस्य दुस्सहत्वं तत् मृगपतिपदसम्ब-न्धसामध्यैदेव प्रतायते न भङ्गुरत्वसाहचर्यादिति ।

एवम्— 'प्रभवति च समरमूर्छेन नवनीरदनील एष तव खड्गः । विशाति च मानससममलं सतां यशो हंसविस्तरसितम् ॥'

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द्वितीयो विमर्शः

इत्यत्रापि खड्गस्य यशासकृदुक्तेन नयेन नवनिरदहंसविसररुपताप्रतोतस्तव्धनायारथान्तरप्रतोतेऽनुपपत्तिरिति भान्तिमात्रकृतोऽसौ-चिति मन्तव्यम्। तेन ‘नवनोरदसुन्दरः कुपाणः' इति 'हंसविसरसम्' इति चात्रानुगुणौ पाठौ।

धर्मिस्साम्यविवक्षायां धर्ममात्राभिधायिनाम्। नेदृशः प्रयोगः शब्दानां समासोपमितौ कुग्धैः॥ ९३ ॥

इति सड्ग्रहश्लोकः

इसलिए धर्मं अनेक हों तो भी प्रतिपत्ति उसी की मानी जानी चाहिये जिसका निर्देश हो, अन्य की नहीं। इसलिए नागय्यूथ के साध्यय को प्रतीति करने में उसका जो मलिनत्व बतलाया उससे वाच्य (साड्ख्य वाचक पद) का अवचचन दोष हुआ। इसी प्रकार यहाँ पृष्ठ पद भी अतिरिक्त (व्यर्थ) है। उससे केवल अनुप्रास और छेकानुप्रास की ही सिद्धि होती हैं। उससे विन्दुओं का गोल आकार प्रतीत नहीं होता—इसलिए 'नागयूथ सदृशान्ति' पाठ चाहिये।

तस्‌ सिर झुकाओ और विनय का व्रत पालो। और जो—'हं कारिकेलिं?' नचंचति को निन्दन्ति। तुम्हारे ऊपर मृगराज के नाखूनों के समान टेढ़ा और कठोर अंकुश नहीं चलाया जा सकता।

यहाँ अंकुश के दो धर्म बतलाना अभीष्ट है एक सिंह के नाखून के अग्रभाग के समान टेढ़ापन और दूसरा—दुःसहत्व'। सो उसे ऊपर बतलाए अनुसार एक अकेला मृगुर शब्द हो नहीं बतला सकता। वह तो एकमात्र टेढ़ेपन (क्रूरता) के अभिधान के लिए प्रसिद्ध है। उसका जो दुःसहत्व है वह मृगपति-सम्बन्ध के बल से ही प्रतीत हो जाता है भदुर शब्द के साहचर्य से नहीं।

इसी प्रकार—'युद्ध भूमि में आपका नए मेघ के समान यह नीला खड्ग; चमकता है और सज्जनों के हंस-विसर—सित मानस में हंसविसरसति यश प्रवेध करता है यहाँ भी खड्ग और यश दोनों की उपर्युक्त नियम के अनुसार नवनिरदरूपता और हंसविससरूपता प्रतीत नहीं होती

इसलिए उस पर आघारित दूसरे अर्थ की प्रतीति भी नहीं होती। इसे लिए 'यहाँ यह' (रलेश)

एकमात्र भान्तिमूलक है। इसलिये—ये पाठ अनुरूप होंगे—'नवनिरदसुन्दर' और 'हंस-विसरसम्' ।

संक्षेप में—'धर्मी' के साम्य की विवक्षा होने पर केवल धर्मं मात्र को बतलाने वाले शब्दों का प्रयोग समास और उपमा (सादृश्य) में मान्य नहीं।'

विमर्शः :—हंस—विसर हंस पक्ति के समान सित = उज्ज्वल, कालुष्यहीन सन्तों का मन । उसमें राजा का—हंस-विसर—हंसपक्ति के समान सितउज्ज्वल यशा प्रवेध करना है।

यहाँ मानस से मन और मानससर दोनों प्रतीत होते हैं। मानससर की जो प्रतीति होती है उसमें 'हंस विसरसितम्' का अर्थ निकलता है हंस नामक जो 'वि'—पक्षी उनके द्वारा 'सरसित'—शब्द सहित ।

अभिप्राय यह है कि बरसात में जब मेघ आकाश में छाते हैं तो मानस-सरस हंसों से सफेद हो जाता है। हंसों का यह स्वभाव है कि वे बरसात में मानससर चले जाते हैं। मेघदूत में 'संपत्स्यन्ते नमसि भवतोः सहायाः' और 'कति-पयदिन्स्वाथिहंससादृशार्णा:'—द्वारा यह तथा स्पष्ट है। युद्ध भूमि में नीला खड्ग नीलमेघरूप है और उज्ज्वल यशा सफेद हंस रूप। जब खड्गमेघ युद्धाकाश में आता है तो यह यशाहंस मानस में

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पहुँच जाते हैं। किन्तु यक्ष, नील मेघ, मानस और हंस के व्यवहार को प्रतीति के विषय में ग्रन्थकार को यह अरुचि है कि वह स्पष्ट रूप से सामने नहीं आती।

यथा च—

'तेनावरोधप्रभदासखेन विगरहमानेन सरिद्विरां ताम्‌ । आकाशगङ्गारतिरप्सरोभिरूतो नुयातलील;॥' इति ।

अत्रानुयातिक्रियापेक्षो राजमरुत्वतोः कर्तृकर्मभावोद्मियानुमभिमतः कवे;। न चासौ तत्तत्समवन्वयस्तयोः साक्षादुक्तः, जललोलासमवन्वधमुखेन राज- समवन्वधस्योक्तत्वात्‌ । अतोडत्र साक्षात्त्‌ तत्समवन्वयो वा वाच्यः, तदर्थमभ्यत्‌ क्रियान्तरं वा, येन कर्तृकर्मभावस्तयोर्घटना भियात्‌ ।

न चोभयोरेकमप्युक्तमिति तस्य वाच्यस्यावचनं दोषः । तेन वरमत्र पाठः श्रेयान्‌ 'आकाशगङ्गारतिरप्सरोभिरूतोनुयातो मघवा चिलासैः' इति । न चैवं क्रियान्तराकाङ्क्षाप्रसङ्गः ।

और जैसे :—अपने रनिवास की प्रमदाओं के साथ उस उत्तम नकती (सरयू) में जलक्रीड़ा कर रहे इन्द्र का अनुकरण किया गया हो ) हुए [रघु० १६], यहाँ कवि को अनुकृति ( अनुगमन, अनुकरण ) क्रिया को लेकर राजा और इन्द्र का कर्तृकर्मभाव कहना अभीष्ट है। किन्तु इन दोनों का यह समवन्वय साक्षात्‌

नहीं कहा, कारण कि राजा का समवन्वय जल लीला के समवन्वय से बतलाया गया, इसलिए या तो उनका वह समवन्वय साक्षात्‌ बतलाना चाहिये या फिर उसके लिये किसी और क्रिया का उपादान करना चाहिये जिससे उनका यह कर्तृकर्मभाव बन सके पर दोनों में कुछ भी नहीं किया गया, इसलिए ( दोनों में से कोई ) एक वाच्य ( था उस ) का अवचन ( अकथन ) दोष हुआ । इसलिए यहाँ यह पाठ अधिक अच्छा है—

विलासों से आकाश गंगा में अप्सराओं से घिरे इन्द्र का अनुकरण किया ऐसा करने पर अन्य क्रिया की भी आकांक्षा नहीं होगी।

यथा वा—

'लच्छो दुहिआ जामाडुओ हरों तहँ घरल्लिआ गढ़ा । अमिय मि अइहडा अ सुआ अहो ? कुडुमवं महोइहिणो ॥' इति ।

'लक्ष्मीर्दुहितृता जामाता हरिस्तस्य गृहिणी गृध्रा । अमृतमृगाढ़ो च सुतो ग्राहो कुटुम्ब महोदधे:॥'

अत्र लक्ष्म्या दुहितृत्वममृतमृगाढ़ोः सुतत्वं च विधेयमानं तेषां त्रैलोक्यैकसृग्रहणीयतया तत्कुटुम्बवस्य महोदधे: स्राश्रया आस्पदत्वमुपपद्यत इति द्वयमेवोपादेयं दृश्यते नान्यत्‌ ।

तत्र हि भगवतो हरेःग्रज्ञायाश्च सकलत्रैलोक्यालड्कारत्वेडपि न तथोर्जा- मात्रा गृहिणीभावेन विधानमिति न महोदधे: स्राश्रयातिशययोगो यद्विन्धनमत्य- सृता स्पदत्वमस्य स्याद् इति तद्विधानस्य वाच्यस्यावचनं दोषः ।

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द्वितीयो विमर्शः

अथ हरिजामाता गङ्गा गृहिणीस्त्रीषु विपर्ययेप्यात्र सम्बन्धः करिष्यते तस्य पुरुषाधीनत्वात् । तथा च न ग्रथोक्तदोषावकाशः इति । सत्यम् । किन्तु न सर्वविषयोडयं सम्बन्धःस्य पुरुषाधीनत्वोपगमः । तस्य हि विशेषणविशेष्यभाव एव विपर्ययेऽपि तयोरन्योन्यापेक्षो विध्यनुवादभावः तच्च हि यथाश्रुतपदार्थसंबन्धानवलम्बनाऽथ प्रतिपत्तिक्रम इति तच्च पदाथैपौर्वापर्थनियमोऽवगन्तव्यः । यथा—

त्वक् तारत्वे निष्पन्नं मृगचर्म शाख्या मेहं गृह्णा विपुलपतत्रपुटा घटाश्र्र । मूलं दलं च कुशुमं च फलं च भोज्यं पुत्रस्य जातमटव्योगृह्मेऽधिनस्ते ।

प्रत्युदाहरणं यथा—

शाङ्या शाद्वलमासनं शुचिशिला सङ्ग्र द्रुमाङ्गामधः शान्ते निःसरचारी पनिमशोचि कन्दःः स्वहायो मृगाः । इत्यप्रार्थितलभ्यसर्वविभवे द्रोपडयमेको वने दुष्प्रापार्थिन यत् परार्थघटनावन्ध्यैकृत्या स्थीयते ।

अत्रोदाहरणप्रत्युदाहरणप्रतीत्योपर्यदन्तरं तन्मातिमतामेवावभासते ।

अन्येषां तु शपथप्रत्ययेमेव ।

और जैसे—'लक्ष्मां पुत्रा, जमाई विष्णु, उसक्री घर वाली गंगा, अमृत और चन्द्र पुत्र, आश्चर्यकारो हैं समुद्र का कुङमम् ।

यहाँ लक्ष्मी का पुत्रीत्व तथा अमृत तथा चन्द्र वां पुत्रत्व बतलाया जा रहा है । उससे समुद्र के कुङमम् में ऐलोक्यरुपूरणीयता आती है और समुद्र में ऐलोक्यतिआ । इसलिए केवल इन्दौ दो ( पुत्राथ और पुत्रत्व ) का उल्लेख किया जाना नाधिये । अन्य का नहीं भगवान् विष्णु और गंगा समस्त त्रिलोकों के भूपण हैं, उऽहे यदि यहाँ जामाता और पली सिद्ध किया जाता तो बात दूसरी थी, किन्तु ( यहाँ तो जामाता में और पली में हरित्व और गंगात्व सिद्ध किया गया है ) वैसा नहीं किया गया इसलिये महोदधि में श्राघ्यता की उच्चता नहीं आती, जिससे उसमें अत्युक्तिता आये, इसलिये उस प्रकार के कथन का अभाव वाच्यावचन दोप हुआ ।

कहा जाय कि ( श्लोक में शब्द जैसे भी दिये जायं ) उनका अन्वय हरि जामाता, गंगा गृहिणी, इस प्रकार किया जा सकता है, क्योंकि वह ( अन्वय ) तो—पुरुषाधीन है, अतः कोई दोप नहीं होता'—तो यह ठीक है ।

किन्तु पुरुपाधीनता अन्वय में सदाैत्र नहीं रहती केवल विशेषणविशेष्यभाव संबंध में ही वह रहती है । जहाँ अपने सौन्दर्य से विशेप्यनुवादभाव परस्परापेक्षी होता है, वहाँ अर्थप्रतीति का क्रम—शब्द—प्रयोग ( शब्दों की—आनुपूर्वी ) पर निर्भर रहता है ।

इसलिये प्रयोग में ही पदों का पौर्वापर्य नियम मानना च्चाहिये ( उसी से पदाथों के संबंध में सौन्दर्य आता है ) जैसे—मेरे पुत्र के लियेके दोने घड़े, मूल, पत्ते, फूल और फल—भोजन दो गे है ।

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४३२

व्यक्तिविवेक:

उलट्या उदाहरण—“स्थ्यया वास, आसन पवित्र साफ शिला, घर वृक्षतल, झरने का ठंडा जल पेय, भोजन कन्द साथी संगी और मौके बेमौके काम पड़ने वाले लोग—हिरने हैं, इसप्रकार जिसमें सम्पूर्ण वैभव बिना माने प्राप्त है उस वन में दोप केवल एक है—कि याचक दुष्प्राप्य होता है फलतः परोपकार निरत लोगों को हाथ पर हाथ रखे बैठे रहना—पड़ता है ।’

इन उदाहरण और प्रत्युदाहरणों में जो अन्तर है वह बुद्धिमानों की समझ में ही आता है । और लोगों के लिये तो वह पृथक् पृथ्येय ( समझदारी से समझ में आता ) है । संक्षेप में—

अनुवाद्यमनुक्तवैव न विधेयमुदीरयेत् । न ह्यलग्न्यास्पदं किश्चित् कुत्रचित् प्रतितिष्ठति ॥ ३४ ॥ विधेयोद्‌देश्यसावोड्यं रूप्यरूपकतात्मकः । न च तत्र विधियोक्किरुद्‌देश्यात् पूर्वमिष्यते ॥ ३५ ॥

इत्यनन्तरश्लोकौ । यथा— ‘स्पष्ट्रोचच्हूसत्किरणकेसरसूर्यैबिम्बविस्तोर्णकर्‌णिकमथो दिवसारविन्दम् । श्रीखण्डग्रस्तदिग्दन्तकलापमुखलावतारवद्‌धाङ्‌कुरामधुपाली सख्युकोच ॥’ इत्यादौ केसरादौः ।

पदानामभिसम्बन्धस्यान्यथाभावमात्रतः । यत्रानिष्प्रतितिः स्याद् रचनां तां परित्यजेत् ॥ ३६ ॥

यथा— ‘तव कण्ठासक्ता करवाललतां द्विषाम् ! प्रसूते स्मरारण्ये यशःकुसुमसम्पदम् ।’ इति । अत्र हि चाटुके गुष्पदर्थेऽस्य च पौर्वापर्यविपर्यये समासे वा वाच्ये यत् तयोः स्चनं तदेवानिष्टार्थप्रतिपत्तिमूलमिति दोषतयावगन्तव्यम् ।

यथा च— ‘महुश्रु ते मनस्मथ ! साहचर्यादसावलुब्धकोऽपि सद्‌गाय एव । समीरः प्रेरयिता भवति व्यादिश्यते केन हुताशनस्य ॥’ इति ।

अत एव— “येन यस्यानभिसम्बन्धो दूरस्थेनापि तेन सः ! पदानामसमासानामनन्तयं च कारणम् ॥” इति प्रतीतयोर्वाच्यद्ययमनालोच्यैव चर्चितम् । गुणदोषमपश्यन्‍द्रूादूरोस्थयोस्तयोः: स्वरूपेडवस्थितिर्येषां शब्दानामिति नेष्यते ॥ ३७ ॥ न तालन्यकवहितान् प्रयुङ्क्ते विचक्षणः ।

इति सङ्‌ग्रहश्लोका: ।

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द्वितीयो विमर्शः ४३२

तेन 'द्विपत्कण्ठासङ्गासिक्ता त्वत्कृपापाणलता वरा' ॥ इत्येकत्र युक्तः पाठः, अपरत्र 'व्यादिशयते केन समोरणो वा हविभृङ्जश्रोदयिता भवेत्' इति ।

'अनुवाद बिना कहे विधेय को न कहे' कोई भी वाक्य बिना आधार पाये कहीं भी जमती नहीं । यह जो विशिष्टोक्तिरूप भाव है वह रूप्यरूपकरूप है इसलिये उसमें विधेय का कथन उद्देश्य के पहले अकस्मात् नहीं आता । जैसे—

'स्पष्टरूप से फेंलती किरणें थीं केसर और सूर्य की वितृष्ण कांणिकाओं से जो युक्त था वह दिन रूपी अरुणिद्र अव एलन दूसरे से सटी आठ दिशाओं की पंखुड़ियों के अगले हिस्से में उतर कर बंधे—अंभकार की अभ्रसमाला को लिये हुए बद्ध हो गया था ।' यहाँ केसर आदि का उपादान बाद में किया गया है ।

उस रचना को जोड दे जिसमें पदों के अभिसंबंध ( पारस्परिक सम्बन्ध ) के उलटने से प्रतीति बिगड़ती हो ॥ ९६ ॥

जैसे—'आप से सम्भ्रमित खोंठ के खून से सनी शाखु मवन्त्री तलवाररूपी लता युद्धवन यशरूप्पा पुष्ट सम्पत्ति पैदा करती हो ।' चापलुत्री की इस उक्ति में युष्मदर्थ ( तुम-आप और शाखु ) का पौर्वापर्य—उलटने पर था ( तुम की जगह द्विपास चोधिये था और द्विपां की जगह तव ) या समास धरना था, नत्र जो नहीं किया वत्रु विपरीत अर्थ वां प्रतीति का कारण है, अतः उसे दोष मानना नाहिये ।

और जैसे—हे मन्मथ, इस मधु के साथ तुम्हारा संग है । यह बिना वाहे तुम्हारा साथ देगा । हुआ को पेटा कौन कहता है । 'अथि यों प्रेरणा दो?' ( पौको ) । यहाँ अभि को प्रेरणा दो इस प्रकार अर्थ आसक्त है । इसलिये 'जिससे जिसकी समासक्त हे हुदराने पर भां उससे उसका संबंध होता है'—यह उन शब्दों की दूर और पास में रखे पद हुए प्रतीतियां के भेद को और गुण दोष को बिना ही देखे सुंह से निकाल दिया गया, 'नन्वो पूर्णता अपने स्वरूप में होती है । इसलिये—एक जगह—'द्विपत्कण्ठासङ्गासिक्ता त्वत्कृपापाणलता वरा'—यह पाठ ठीक है और दूसरी जगह 'व्यादिशयते केन समोरणो वा हविभृङ्जश्रोदयिता भवेत्'—यह । ( वरा की जगह—'डसिता' या श्लोका पाठ अच्छा होगा ) ।

अनन्वयोऽप्यस्यूयार्थत्वाद्रसभङ्गादहेतुरिति सोऽपि वाच्यावचनं दोषः ।

यथा—

'निर्घांतौघेः कुञ्जलोनर जिध्वांकुज्योनिघोंपेः क्षोभयामास सिंहान् । नूनं तेषामभ्यसूयापरौष वोयंस्तद्रे राजशब्दे मृगाणाम् ॥' इति ।

अत्र हि सिंहानां तावन्न राजशब्ददसम्बन्धः सम्भवति तेषां तद्वाच्यत्वाभावात् । नतुसम्वन्धाभावाच्च । तत्पर्योयस्य मृगराजशब्दस्य सङ्क्रण्यसावनुपयुक्तपचव तस्य प्रकारान्तरभावाच्च । मृगाणामित्यत्र मृगराजनामित्येवमनुक्तेऽपि ।

किञ्च मृगेपु राजत्वं भवति सिंहानां नतु शब्द इति वीर्योदग्रत्वं तद्विरोधनमनुपपत्तेः । तेन न सिंहानां न मृगाणां न वीर्योदग्रत्वस्यार्थे निःश्रितत्वेनोपपत्तेः । तेन न सिंहानां न मृगाणां न वीर्योदग्रत्वार्थेनान्वयः सङ्कृच्छत इत्यवाच्य एवासौ । तेन राज-भाव इति मृगेप्वति चा वाच्ये तदवचनं दोषः । यथा—

२५ व्य० वि०

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अन्वय का न होना भी वाच्यावचन दोष है क्योंकि तब भी उसके अर्थ कल्पना करके निकाला जाता है अतः वह रसमभ्र करता है। जैसै—

'रगड़ के कारण उम् मृगयंचा के निर्घोंपों से कुछों में छिपे शेरों को उसने शुद्ध किया। निश्चित ही वह उनके पौरुष के झापक मृगों के 'राजा' शब्द पर इध्र्यालु था।' [रघु० ९] यहाँ सिंहों का राजा शब्द से सम्बन्ध नहीं वनता। क्योंकि न 'राजा' शब्द की सिंह में अभिधा है और न उन (सिंहों) का उस ( राजशब्द ) से कोई सम्बन्ध ही है। उस (सिंह) के पर्याय मृगराज शब्द का सम्बन्ध होने पर भी यह ( सम्बन्ध ) यहाँ उपयोग में नहीं लाया गया क्योंकि यहाँ वह ( मृगराज शब्द ) न तो पहले कभी कहा गया और न यहाँ, जव कि यहाँ मृगाणां—की जगह मृगराजानाम् कहा जा सकता था। इसके अतिरिक्त सिंह का राजस्वमृग ( जॄली ) पतुओं पर होता है, मृग शब्द पर नहीं। वह सदा अर्थ में रहता है। इसलिये उस (सिंह शब्द) का 'विर्योदग्रे' यह विशेषण नहीं वनता। वह सदा अर्थ में रहता है। इसलिये न सिंहों का, न मृगों का और न वीर्योदग्रता का 'राजशब्द' पद से अन्वय बना इसलिये यह राजा शब्द यहाँ अवाच्य ही है। इसलिये 'राजमाये' या 'मृगेपु' ऐसा कड़ना था, उसका न कहना—वाच्यावचन दोष हुआ।

'तपने वर्षाः शरदा हिमागमो

वसन्तलक्ष्म्या शिशिरः समेत्य च ।

प्रसूनकल्तिं दधत: सदस्त्वः

पुरेडस्य वासत्यकुटुम्वितां दधुः ॥' इति ।

अत्र हि तपत्तोंलिडिरविशेषानुमितपुरुषभावस्य कर्तृत्वात्माधान्यं वक्तुमु-चितम्, वर्षाणां च क्षीरोत्सस्य सद्भावेन निदेशाद्रपाधान्यम्, यथान्येषां हिमागमादीनाम्, अन्यथा तेषां कुटुम्विरूपतानुपपत्तेः। न च तथोक्तमिति तस्य वाच्यस्यावचनं दोषः ।

'किमवेध्य फलं पयोऽधरान् ध्वनतः प्रार्थयते मृगाधिपः ।

प्रकृतिः खलु सा महीयस: सहते नान्यसमुन्नतिं यया ॥'

इत्यत्र महीयसामिति वहुवचनं वा वोपस्समानफलं प्रयोक्तव्यम्, यथा—

'यावदर्थपदां वाचमेवमादाय माधवः ।

विरराम महीयांस: प्रकृत्या मितभाषिणः॥'

इत्यत्रार्थान्तरन्यासे, सर्वादिशब्दो वा यथा—

'छायामपास्य महतीमपि वर्तमानामागामिनों जगतिहिरे जनतास्तरुणाम् ।

सर्वो हि नोपनतसाम्यपचीयमानं वर्धिष्णुमास्थयमनागतं मन्युपैति ॥

इत्यत्र। अन्यथा समर्थकस्य प्रकृतिमहोयसत्वस्य हेतोरन्यसमुन्नतत्यस्य-

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हि।षणुत्वलक्षणेन साधनेन सर्वोपसंहारव्यासिनं प्रतीपते। तस्मादेवमन्त्र पाठः परिणमयितव्यः—

'प्रकृतिः खलु सा महीयसी न सहन्तेऽन्यसमुन्नतिं यया ।' इति ।

और 'ऋतु का निवास इसके नगर में सदा ही नगरवासी कुटुम्बियों के समान था, वसन्त के साथ रङ्ग, शरद् के साथ हेमन्त और वसन्तश्री के साथ शिशिर रहते थे तथा पुष्प और पल्लव प्रदान किया करते थे । इस पय में तप ऋतु ( ग्रीष्म ), जिसमें लिखित विशेष ( पुलिङ्ग ) से पुरुषभाव भी प्रतीति होती है, कर्ता हैं, अतः उसका प्राधान्य होना चाहिये । और वसन्त का अप्राधान्य क्योंकि वह स्त्रीरूप से प्रतात हो रही है और उसमें सहभाव ( अप्रधान ) है भी । जैसा कि—अन्य दिन-रात्रि में बतलाया गया है । उसके बिना उनमें कुछमात्र प्रतीत नहीं होती । वैसा कहा नहीं गया इसलिये वाच्यावचन दोष हुआ ।

'मुगाराज क्या लाभ देखता है जो गड़गड़ाते मेघों को ललकारा करता है । बड़प्पन वाले व्यक्तियों का यह स्वभाव ही है कि वे दूसरों की उन्नति नहीं सहता ।' यहाँ यदि तो दीपक ( अनेकत्व ) की प्रतीति कराने में सक्षम 'गर्जितसारङ्ग'—ऐसा बहुवचन देना चाहिये जैसा कि—इस प्रकार समस्त विषय से युक्त वचन कहकर श्रोत्रगण को तृप्त कर दिया जाय । बड़े लोग—'स्वभावतः कम बोलते हैं ।' इस प्रकार इस अर्थान्तरन्यास में, ( दिया गया है ) अथवा ( यदि एकवचन देना हो तो ) सखे आदि शब्द देना चाहिये—जैसा कि—बड़ों के उपसि।त—लम्बी छाया को भी छोड़कर आने वाली मरत्ना दिखाई थी लोगों ने अपनाया । सब था । यह स्वभाव है कि घटाने वाले प्राप्त पदार्थों को नष्ट, बढ़ने वाले आगामी पदार्थ को अपनाते हैं ।' यहाँ ( दिया गया है ) । नहीं तो प्रकृतिमहत्तरनारूप हेतु और अन्यसमुन्नति की सहिष्णुता रूपी साध्य का न्यायाप्ति संबंध सर्वथा में नहीं बनेगा । ( ऐसा प्रतीत होगा कि—कुछ ही ऐसे बड़े होते हैं, जो दूसरे की उन्नति नहीं सहते, सभी नहीं ) इसलिये यहाँ ऐसा पाठ करना चाहिये—'बड़ों का वह स्वभाव ही है—कि दूसरे की उन्नति नहीं सहते ।'

यथा— 'निशि नान्तिकस्थितिमपि चक्राद्रिः सहचरं विलोकयति । चक्राद्रापि न सहचरमहो मुदुरहृत्ता नीयते ॥' इति ।

अत्र हि चक्राद्रिसहचरौ न स्वशब्दपरामर्शविषयौ भवितुमर्हतः;, तयोरुक्तत्वेन सर्वनामपरामर्शविषयत्वोपपादनात्, अन्यथा तयोः पौनरुक्त्यं सर्वनाम्नां च विषयापहारः; स्यात् । न चात्र तथा परामर्शो विहित इति वाच्यावचनं दोषः । तेन 'विरहविधुरा न श्वापि त'मित्यत्रानुगुणः पाठः ।

एवम्— 'परिपाति स केवलं शिशूनिति तन्नामनि मस्म विश्वसति ।'

निशि नान्तिकस्थितिमपि चक्राद्रिः सहचरं विलोकयति । चक्राद्रापि न सहचरमहो मुदुरहृत्ता नीयते ॥ ९९ ॥

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इत्यादावष्ययं दोषो दृश्यते। तस्य हि शिशुपाल इति नाम प्रसिद्धं न तु शिशुपरिप इति। तेन 'स शिशून् किल पालयत्यभी:' इति युक्तः पाठ: इत्यलं बहुभाषितेन।

( ६ ) अवाच्यवचन

अनेन च वाच्यावचनेन सामर्थ्यादवाच्यवचनममपि सङ्गृहीतं वेदितव्यम्। तस्यापीश्रार्थविपर्ययात्मक्त्वात्। तथ्यथा—

'सरित्समुद्रान् सरसांश्च गत्वा रक्षःकपीन्द्रैरुपपादितानि । तस्यापतनं मूर्छिनि जिष्णोरिन्द्रयस्य मेघप्रभवां इवापः ।।' इति ।

अत्र ह्येकस्यैवार्थस्य यः पर्यायमात्रभेदेन भेदाभुपकल्प्यो उपमानो उपमेय-भावो निवद्धः सोडवाच्यवचनं दोषः, तस्य भिन्नार्थेनिष्ठत्वात्। तदयमात्र पाठो युक्तः 'विन्ध्यस्य मेघप्रभवानी यद्दतत्' इति। अस्मिँश्र पाढे भिन्नालिङ्गत्वमुप-मादोपोडपि परिह्तो भवति ।

पर्यायमात्रभिन्नस्य यदेकस्यैव वस्तुनः । उपमानोपमेयत्वमवाच्यवचनं च तत् ।। १०१ ।।

इति सङ्ग्रहश्लोकः ।

अवाच्यावचन—इस वाच्यावचन में अवाच्यवचन दोष भी अपने आप अपना लेटा चाहिए। वह भी अभीष्ट अर्थ को उलट देता है। जैसे—'नदियों, समुद्रों और तालाबों तक जाकर राक्षसों और वानरों के स्वामी लोगों द्वारा लाये गये जल उसके सिर पर छूटे, जैसे विन्ध्य के सिर पर मेघमुक्त आप् ( जल ) ।' यहाँ एक ही अर्थ का जो पर्याय भेद से भेद बनाकर उपमानोपमेयभाव बतलाया गया वह अवाच्यवचन दोष है। वह (उपमानोपमेयभाव) भिन्न अर्थों में रहता है। इसलिये

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द्वितीयो विमर्शः

यहाँ यह पाठ ठीक है—‘विन्ध्यस्य मेघप्रभवानी यद्वत्’—‘जैसे विन्ध्य के ( सिर पर ) मेघ से उत्पन्न ( जल ) । इस पाठ में ( जलानि = नपुंसकलिङ्ग, आपः = स्त्रीलिङ्ग इस प्रकार का ) लिङ्गभेद दोष भी दूर हो जाता है ।

संक्षेप में— पर्यायोक्त से भिन्न एक ही वस्तु का जो उपमानोपमेयभाव वह अवाच्यावचन दोष है— यथा च— 'इयं गेहे लक्ष्मीरियममृतवर्तिर्नयनयोर- रसास्वादास्पर्शो वपुषि वहलशश्न्दनरसर । अयं कण्ठे वाहुः शिशिरमसृणो मौक्तिकसरः किमस्या न श्रेयो यदि परमसदृशस्तु विरहः ॥' इति ।

अत्र यत् साक्षाद्वाच्यैकवर्णनं तदवाच्यमेव । तत्रैव तद्विनियोगेऽपि स्पर्शादि- दीनामिव रस्यानामर्थानां विरहव्यतिरेकेणाऽऽभोगमादधौ । न तस्या एव विरहस्य तत्समवन्धित्वेऽप्यसह्यत्वाभिधानादिति तस्याऽवचनं दोषः । तेन 'मुखं पूर्णेन्द्रो वपुरमृतवर्तिर्नयनयोर्यित्यत्र युक्तः पाठः ।

दूसरे उदाहरण जैसे— 'या घर में लक्ष्मी है, आँखों की अमृतवर्त्ती है, शरीर पर इसका यह स्पर्श गहटा चन्दन रस है, यह हाथ कण्ठ में मोतियों का ठंडा और चिकना हार है । इसकी कौन सी वस्तु प्रिय रस है, यह हाथ कण्ठ में मोतियों का ठंडा और चिकना हार है । इसकी कौन सी वस्तु प्रिय नहीं ? केवल असह्य हे तो इसका विरह ।'

यहाँ ( इयं गेहे लक्ष्मी = यह घर में लक्ष्मी है इस प्रकार ) साक्षात् नायिका का वर्णन है वह अवाच्य है, ( वह वैसा नहीं है ) यहाँ नायिका सम्बन्धी स्पर्श आदि रम्यपदार्थों को, केवल विरह वही छोड़कर नायिका का अंग रूप्यांक कर किया गया है; उसका विरह भी उसी का सम्बन्धी है किन्तु वह असह्य है इसलिए उसको अंग नहीं माना गया । इसलिए उस ( नायिका ) का कथन दोष है । इसलिए ( ‘इयं गेहे लक्ष्मीः’ के स्थान पर भी ) ‘मुखं—पूर्णेन्द्रोः’ सुखपूर्ण चन्द्र है ऐसा पाठ ( कर लेना ) ठीक है । ( यहाँ विरह को अंग न मानने की बात अनुसंगत है ) ।

यथा च— 'शोكانलदूूमसम्भारसम्भृताम्भोदभरितमिव वर्षति नयनवारिरापाविसरं शरीरम् ।' इति । अत्र हि शोफस्य केनचित् साधारण्येन यदनलतवेन रूपणं तत् तावद्- रूप्यस्य सन्नावाद्युक्तमेव । धूमस्य पुनर्नं किश्चित् रूप्यमस्तीत्पयवासौ । यथा 'शोकानलदाहभीतेव न हृदयमवतरति'त्यत्र । रूप्यांतरसद्भावे तु न कश्चिद् दोषः । यथा— 'तस्या धौताज्जनश्यामा हृदयं दहतोडनिराम् । शोकाग्नेधूममलेखेव गलत्यक्ृणावलिः ॥' इति ।

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४३८

व्यक्तिविवेकः

अनलकार्येत्वात् तस्य वाच्यत्वमदुष्ट्रमिति चेत्, न, अनवस्थापत्तेरति-प्रसङ्गाच्चेति तस्य वचनं दोष एव ।

यथा च —

'तत्ते महाविरहवहिनि:खभावलीभिरापादयन् सन्ततटे हृदये प्रियाया: ।' इत्यादि ।

उपचारसहैवेऽपि रूपकस्स्येष्यते क्रिया ।

यथानलस्य दाहादिरूपे कार्योदिरसम्भवात् ॥ १०२ ॥

इति सङ्ग्रहदशक्लोकः ।

और जैसे:-

'शरीर अशुधारा बरसा रहा है, मानो वह शोकानल के धूमसमुदाय से बने मेघ से भर गया है ।' यहाँ किसी साधर्म्य के आधार पर शोक का जो—अग्निरूप से रूपण ( शोक पर अग्नि का आरोप है ) वह ठीक है क्योंकि उसका रूप्य ( उपमेय ) विद्यमान है किन्तु धुएँ का तो कोई रूप्य नहीं है, इसलिए यह तो अवाच्य ही है । जैसे कि—'शोकानल को जलन से डरौ हुदै सी वह हृदय में नहीं उतरती' में ( हूँआ नहीं दिया गया ) दूसरा कोई रूप्य हो तो कोई दोष नहीं ।

जैसे—

'धुले काजल से काली उसकी अशुधारा हृदय को दिनरात फूँक रहे शोकानल की धूम रेखा के समान झड़ रही है ।' यहाँ ।

यदि यह कहा जाय कि 'वह ( धूम ). अनल का कार्य है इसलिए उसका उपादान दोषावह नहीं'—तो वह ठीक नहीं, ऐसा करने से अनवस्था होगी और अत्य्यासत्ति भी, इसलिए उसका कथन दोष ही है । और जैसे—

उतकट विरहाग्रि की शिक्षावली से तस् प्रिया के स्तनतट पर कुञ्ज पीला, इत्यादि में । यहाँ

संक्षेप में—

( धर्मों के ) रूपक में ( धर्मेङ्गत ) उपचार ( गौणी सारोपा लक्षण ) केवल एक ही क्रियारूपी धर्म में हो सकता है जैसे यदि अग्नि का आरोप किया जाय तो आरोप विषय ( विरह आदि ) गत ( सन्तापादि ) धर्मं पर उसकी दाह क्रिया का आरोप किया जा सकता है, किन्तु यह कदापि संभव नहीं कि उसके कार्य ( जैसे अग्नि का कार्य धूम ) का भी आरोप किया जाय ।

विमर्शः : धूम अग्नि का कार्य है इतने भर से वह अग्नि के साथ सदृत्त्र बोला जाय तो—कृष्ण ने राधा का आलिङ्गन किया—यहाँ भी प्रद्युम्न का कहना जरूरों होगा । इसी प्रकार—

जहाँ प्रधुम्न ने रति का—यहाँ कारण—( पिता ) श्रीकृष्ण का भी उल्लेख होना ही चाहिये । और इसी प्रकार तत्तेमहाविरहवहिनि:खभावलीभिरापादयन्—में शिक्षा शब्द के बिना भी ताप की प्रतीति संभव है, परन्तु उसे दुष्ट नहीं कहा जा सकेगा । स्तनस्थ वस्तु में आपाण्डुरता की सिद्धि के लिए हृदयस्थ अग्नि पर्याप्त नहीं अतः वहाँ से उठकर स्तनों तक आने वाली अनेक लपटें उसके लिए आवइयक है, इसलिए शिक्षा और अवल्ली दोनों का उपादान उचित है । अनुचित है केवल ( अवल्ली में ) बहुवचन का उपादान । बहुत्व की प्रतीति अवल्ली शब्द से ही हो जाती है ।

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द्वितीयो विमर्शः

'डहतरनिवस्सुमुहे: कोशानिषण्णस्य सहजमलिनस्य । कृपणस्य कृपणस्य च्च केवलमाकारतो भेदः ॥' इति ।

अत्र रूपणकृपाण्योराकारमात्रतो व्यतिरेक उत्कः स चायुक्तः, द्विविधो ह्याकारार्थः सविशेषलक्षणोदक्षरविशेषलक्षणश्च ।

तत्राग्रस्तावदिहानुपादेय पच, सहजानवस्थानतार्थंयोसतद्र्वभिचाराभा- वात्ति नासौ सचेत्तसां चमत्कारमाचहति ।

द्वितीयमस्तु न सम्भवत्येव, अक्षर- कर्तृविशेषस्य शब्दैकिपयत्वात् ।

यद्यपि हि स्वरूपमपि शब्दस्यार्थे पच । यदाहुः—

'विषयंवमनापण्णे: शब्दैनार्थे: प्रकाशयते । न सत्तयैव तंडश्रोणामगृह्हीता: प्रकाराकाः ॥' इति ।

तथापि तस्य तात्पर्येणाचिरचक्षिततत्वात न तदपेक्ष्यमर्थविषयत्वमस्य शक्यं वक्तुम् ।

वाच्यदशापत्तावपि तस्य शब्दस्वरूपतानपायादिति ।

यथा च— 'येनालड्कृतसुधियां विहरेणामुना तव । तेनैव निर्विकारेण करिकुम्भनिभौ कुचौ ॥' इति ।

इह तु मुक्त पदासौ 'अक्षराणामकारोऽहमिति यः स्वयमभ्यधात् । सोडपि त्वयामुना स्वामिन्नाकारेण लघूकृतः ॥' इति ।

तेनाक्षरविरोषात्मकाकारभेदलक्षणस्य शब्दधर्मस्यार्थैविरोषणभावेनाव- कर्षम् यद्वावतं सोडपि दोष एवोक्त दूषणम् ।

यद्यप्यर्थाडSडभौ शब्दः क्रमेणाभिदधात्ययम् । स्वरूपप्यार्थरूपं च तथाभ्यस्याभिधा क्रिया ॥ १०३ ॥

तत्परत्वादु विवक्षाया विश्राम्यत्यर्थे पच हि । भिन्नधर्मंतया तेन भिन्नकक्ष्यतयापि च ॥ १०४ ॥

नार्हतो जातुचिदिमौ श्लिष्यमेकं विरोषणम् । मा भूदेकात्मकपक्षे दोषसावेत्योरिति ॥ १०५ ॥

इति सड्ग्रहश्लोका: ।

'जिसकी मुट्ठि खुले हुए हाथ के साथ बंधी रहती है, जो स्वभावतः मलिन होता है और कोश में प्रविश्ट रहता है ऐसे कृपण और कृपाण था भेद केवल आकार ( आकृति तथा 'आ' अक्षर ) को लेकर है ।'

[ मुष्टि—तलवार—की मूठ, सुरठी, मलिन = मैलाम और गन्दा, कोश = म्यान और खजाना ]

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यहाँ कृपण-और-कुपाण का भेद केवल आकार को लेकर बतलाया गया है ! पर वह ठीक नहीं है । आकार के दो अर्थ होते है—आकृति और ('आ' यह ) एक अक्षर उनमें से प्रथम (आकृति) को यहाँ अपनाया नहीं जा सकता, क्योंकि जो दो वस्तुएँ एक जगह कदापि नहीं रह सकतीं ( अर्थात जिनमें भिन्नता रहती है ) उनमें उस ( आकृति भेद ) का-व्यसिचार ( अभाव ) नहीं होता ( जिस = भेद के आधार पर—कमल आदि के साथ नील आदि विशेषण अपनाए जाते है ) वह ( आकृति के अर्थ में अपनाया 'आकार') सद्दयों को अच्छा नहीं लगता । दूसरा 'अक्षार' के आधार पर जो भेद या अभेद दो बात है वह केवल कृपण और कुपाण ) शब्दों में संभव है । यद्यपि शब्दों का स्वरूप भी ( एक ) अर्थ है । जैसा कि कहा गया है—'शब्द जड तं जड जानि तं लह अथंज्ञान नहीं कराते । वे संकेतित रूप से न जाने-जाने पर केवल अपन सत्ता मात्र से अर्थ का ज्ञान नहीं कराते ।' ( सत्तामात्र में शब्द भी अर्थ ही है । )

इतने पर भी यहाँ वह ( शब्द ) तात्पर्य रूप से शिक्षित नहीं है, इसलिए इसको लेकर शब्द-स्वरूप को अर्थ नहीं माना जा सकता । वह ( शब्द् ) वाच्य भी होता है, तथ भा स्वरूप से वह शब्द ही रहता है । ऐसा प्रकार—'तुम्हारे जिस इस विचार से उद्यान वी अलंकृत किया ( और ) विचार ( वि उपसर्ग ) रादेत हुए ( हार ) ने करिकुंभ के समान तुम्हारे कुचों को' यहाँ भी । ( विचार से 'वि' हटाने पर हार अतः नायिका स्तनों दो हार ने, उद्यान वी विचार ने अलंकृत किया )

यहाँ तो वह ठीक है—'मैं अक्षरों में आकार हूँ, ऐसा जिसने सयं कहा, हे स्वामिन् उसे भी तुमने अपने इस आकार से छोरा बना दिया ।' इसलिये अक्षर विशेषरूप 'आकार' की भिन्नता जो शब्द में रहने वाला धर्म है—उसे अर्थ का धर्म नहीं कहन चाविए । इसलिये ऐसा कथन दोष ही है ।

संक्षेप में—

यद्यपि शब्द क्रम से स्व-स्वरूप और अर्थस्वरूप दोनों अर्थों का अभिधान करता है तथापि इसको अभिधान क्रिया विश्रांत होतीं है क्योंकि उसकी विवक्षा उक्ती में रहती है । इसलिये भिन्न-धर्मता या भिन्न सत्ता के आधार पर दोनों कभी भी किसी एक विशिष्ट विशेषण से कहने योग्य नहीं । ऐसा करने से इन दोनों के अभिन्न रूप से प्रतीत होने का भय रहता हैं । ऐसा होना यह ( अवाच्य-वचन ) दोष है ।

'यमिन्द्रशब्दार्थानिषूदनं हरेरहिरण्यपूर्व कशिपुं प्रचक्षते ॥' इति । अत्र हिरण्यकशिपुमिति दक्खग्ये हिरण्यपूर्व कशिपुमित्युक्तं सोडवाच्य- वचनं दोषः ।

यतोऽत्र हिरण्यशब्दः कशिपुशब्दस्वाभिधेय्यप्रधानौ वा स्वरतां स्वरूप- मात्रप्रधानौ वा । तत्र न तावदभिधेयप्रधानौ अनभ्युपगमाद, अर्थेस्यासम- न्वयात् ; कशिपुशब्दस्य नपुंसकलिङ्गतापत्तेश्च । नापि स्वरूपप्रधानौ । नह्यो- मसुरविशोषस्य हिरण्यकशिपोरभिधानानुकारः प्रथ्यानक्रियाकर्मभावेनाभि- हितो भवति ।

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द्वितीयो विमर्शः

द्विविधो हि शब्दानुकारः शब्दतवार्थेतवभेदात् । तत्रेतिना व्यवच्छेदे शब्दः प्रसिद्ध एव। अर्थवचछेदेभावादार्थे; यथा ‘महदपि परदुःखं शीतलं सम्यगाहुः' इति ।

इह चायमर्थोऽनुकारः, इतिनानवचछेदात् । केवलं यत् तस्याभिधानमनुकाय तन्नानुकृत्, यच्चानुकृत् तत् तस्याभिधानं न भवति । लोके—हिरण्यकशिपुरिति तस्याभ्यानं न हिरणपूर्वः कशिपुरिति, अतस्तस्यावाच्यस्य वचनं दोषः । यथा वा—‘श्रुणं यदन्तःकरणेन वृक्षाः फलन्ति कलुपोपपास्तदेव !’ इत्यत्र ।

अत्र—‘श्रुणं यदन्तःकरणेन नाम तदेव कलपद्रुमकाः फलन्ति !’ इति मुक्तः पाठः । अस्मिन् श्लोके श्रुणणस्यार्थस्यैव कलपद्रुमाणां वाच्यावगतो गुणान्तरलाभः । पदम्—‘दशापूर्वर्थं यमाख्ययया दशाकर्णठारिगुरुं प्रचक्षते !’ इत्यादौ दृश्यदयम् ।

द.न्द्र को इन्द्र शब्द से अर्थ को मटियामेट कर देने वाले जिस ( त्रैत्य ) वो हिरण्यपूर्वक कशिपु कहा करते है । क्योंकि यहाँ हिरण्य और कशिपु दोनों शब्द अर्थप्रधान हो सकते हैं या स्वरूप प्रधान । दोनों में अभिधेय ( अर्थ ) प्रधान तो हो नहीं सकते—क्योंकि वह कविविवक्षित नहीं है, अर्थ ( साध्या ) का समन्वय नहीं होता और कशिपु शब्द में नपुंसक लिङ्गता ( कशिपु शब्द पुलिङ्ग और नपुंसक दोनों लिङ्गों में होता है । ग्रन्थकार को एकमात्र नपुंसक का संस्कार रहा ।) चलती आती है । स्वरूप प्रधान भी नहीं हो सकते क्योंकि ऐसा करने पर असुरविशेष = हिरण्यकशिपु के नाम का अनुवाद ‘प्रद्योतन ( प्रचक्षते ) किया?’ के रूपरुप से कथित नहीं होता । शब्द का अनुकरण दो प्रकार का होता है शब्द और अर्थ दोनों में इति ( आदि शब्दों ) से व्यवच्छेद हो जाने पर शब्द तो ( प्रथम विमर्श के आरम्भ में बतलाया जा चुका है अतः) प्रसिद्ध ही है, अर्थ के अवच्छेद से अर्थ होता है—जैसे ‘महदपि परदुःखं शीतलं सम्यगाहुः’ = दूसरे के भारी दुःख को भी शीतल ठोक ही कहा है । यहाँ अनुसरण अर्थ ही है, क्योंकि इतिशब्द से तो व्यवच्छेद किया नहीं गया । किन्तु अनुसृत अर्थ जो है—उसके नाम ( हिरण्यकशिपु ) का अनुसरण नहीं किया गया, जिसका अनुसरण किया गया है, वह ( हिरण्यपूर्वक कशिपु जो ) उसका नाम नहीं है । लोक में उसका नाम ‘हिरण्यकशिपु’ है न कि ‘हिरण्य पूर्व कशिपु’ अतः जिसका सहीं कहना था उसका कथन अवाच्य-

और जैसे—‘जो असत्ताधारण चाहता है कल्प उपपद्य वृक्ष वही फलते हैं ।’ यहाँ ‘श्रुणं यदन्तः-करणेन नाम ‘कलपद्रुमका फलन्ति’ यह पाठ न्यादिय । इस पाठ में एक और विरोषता आ जाती है—( नाम शब्द से ) अर्थ ( अभीष्ट वस्तु ) और ( कत् प्रत्यय से ) कल्पद्रुम की क्षुद्रता भी प्रतीत होती है । इसी प्रकार—‘दशकर्ण ( रावण ) के शत्रु के ( राम के ) पिता जिस ( राजा ) को… दशा पूर्वक रथ कहते थे ।’ इत्यादि में समझना चाहिये ।

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४४२

व्यक्तिविवेक:

'या धर्मेभासस्तनयापि शीतलैः

स्वसा यमस्यापि जनस्य जीवने।

कृष्णापि शुद्धेरधिकं विधातृभि-

विहन्तुमंहांसि जलैः पटीयसी ॥' इति ।

अत्र धर्मेभासस्तनयत्वादीनां शीतलत्वादीनां च धर्माणामेकाश्रयत्वेन विरोधो वक्तुं युक्तो, न भिन्नाश्रयत्वेन, तस्य तथानुपपत्तेः । नचासौ तथोक्तः, एकेषां यमुनाश्रयत्वेन अन्येषां जलाश्रयत्वेनोपादानात् ।

यद्यपि यमुनायास्तज्जलानां च तात्त्विकमेवैक्यं, तथापि तेषां शब्देन कर्तृकरणतया निर्देशाच्छाब्दं भिन्नत्वमस्त्येव । शब्द एव विरोधो वक्तुमिष्यः कवेरीति तस्यावाच्यस्य वचनं दोषः तेनायमत्र पाठः श्रेयान् ।

'या धर्मेभासस्तनयापि शीतला

स्वसा यमस्यापि जनस्य जीवनी ।

कृष्णापि शुद्धेरधिकं विधायिनी

विहन्तुमंहांसि जलैः पटीयसी ॥' इति ।

स्वयं श्याम होने पर भी अधिक शुद्धि करने वाले उज्ज्वलधृति—सूर्य की पुत्री होने पर भी ठण्डे, और यमराज की बहन होने पर भी जान ला देने वाले जलों से पाप दूर करने में अधिक चतुर है ।'—यहाँ सूर्य की पुत्री होना और शीतल होना आदि धर्मों का विरोध एक वस्तु में बतलाना ठीक था; भिन्न-भिन्न वस्तुओं में नहीं, भिन्न-भिन्न वस्तुओं में बतलाने से विरोध नहीं होता । यहाँ वैसा किया नहीं गया, कुछ का यमुनाश्रितरूप से और-कुछ का जलाश्रितरूप से उपादान किया गया है ।

यद्यपि यमुना और जल दोनों तत्वतः एक है, इतने पर उनका शब्दतः जो निर्देश हुआ है उसमें भेद है क्योंकि एक को करण के रूप में उपस्थित किया गया है और दूसरे को कर्ता के रूप में । इसलिए शब्दतः भिन्नता तो है ही । और विरोध जो है सो शब्द ही तो कवि को कहना है अतः उसका न कहना अदाच्यवचन दोष है । इसलिये यह पाठ यहाँ अधिक अच्छा है—'जो सूर्य की पुत्री होने पर भी ठण्डी है, यम की बहन होने पर भी उनको जीवन देने वाली है, श्याम होने पर भी अधिक शुद्धि का विधान करती है और अपने जल से पापों को दूर ( नष्ट ) करने में चतुर है ।'

यथा च—

'हरेच हिमाचलतुङ्गमूर्ध्नि मुखः पयसा प्रवाह इव सौरसन्धवः' अत्र हि पयसा इति यत्प्रवाच्यस्य सम्बन्धितया विशेषणं तद्वाच्यमेव तस्य हि तत्स-म्वन्धिताडन्यभिचारात् । यच्यात्र सौरसन्धव इति विशेषणं तत्र तद्विततदनिदेशो-प्र्याच्य पच, षष्ठीनिदेशे च षष्ठीनिदेशनैव तदर्थावगतिसिद्धेः । तेन 'सुम-हान् प्रवाह इव सौरसन्धवमः' इत्यत्र युक्तः पाठः । यथा च—

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द्वितीयो विमर्शः

‘लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य हरिप्रभावः प्रेक्ष्य स्थितं सहचरं व्यवधाय देहम् । आकार्णकृष्णमपि कामितया स धन्च्या वाणं रूपामृदुमना: प्रतिसंजहार ॥’

‘रहोयष्यन्ति तं लक्ष्मीं नियाचिमुखो नापदां पदं क इव । स च तव रिपुरेवमतो भावी तस्यापि तद्विद्रहः ॥’ इति ।

अत्र प्रतिज्ञानिगमनयोः पौनरुक्त्यम् । प्रसिद्धदृश्याक्षिकस्य हेतोर्धर्मिण्युपसंहारवचनैनैव तदुभयार्थसिद्धेरिति । यदुक्तं ‘प्रतिज्ञा पव तावदृगम्यमानार्थोया वचनं पुनर्वचनं, किं पुनरस्या: पुनवैचनमित्यपार्थकं निगमनम्’-इति ।

इदं तु न दोषः—

‘यो यत्कथाप्रसङ्गे छिन्नाच्छिन्नायतोणनिश्वासितः । स भवति तं प्रति रक्तस्त्वं तथा हृश्यसे सुतचु ! ॥’ इति ।

और जैसे—‘हिमालय की गुफाओं की ओर जा रहा वह् जल के सुरसिन्धु ( गङ्गाजी ) सम्बन्धी प्रवाह जैसा लगा।’ इसमें पयसाम्—यहाँ जो ‘सुरसिन्धोः—इस प्रकार ( ) ‘पक्षा’ विभक्ति देने से ही उसका काम—हो जाता है; ‘इसलिये सुमहान् प्रवाह इव जह्नुजन्मना:’ पाठ चाहिये ।

और जैसे—

‘सिंधु के समान शक्ति वाले ( दशरथ ) ने जिस हिरन पर धार साधा किन्तु उसे ओट में करके खड़ी उसकी सहचरी को देख कान तक खींचे तीर वो भी दयाद्रविष्ट: होकर उसने उलटा उतार लिया ।’ ( तथा )—

‘उसे लक्ष्मी छोड़ देगी, नीति चिसुख कौन सा व्यक्ति आपत्ति का आस्पद नहीं होता । तुम्हारा वह शरु ऐसा ही है, अतः उसे भी उस ( संपत्ति—लक्ष्मी ) का विरह भोगना होगा ।’ यहाँ प्रतिज्ञा ( नान्तिर्भिसुख000होता ) और निगमन ( अतः उसे विरह भोगना होगा ) पुनरुक्त होगा । जिस हेतु की व्याप्ति प्रसिद्ध होती है उसका धर्मी ( पक्ष ) में उपसंहार वतलाने देने से ही दोनों कार्यो ( प्रतिज्ञा, निगमन ) की सिद्धि हो जाती है । जैसा कि कहा है—‘प्रतिज्ञा का ही ( निगमन में पुनः ) कथन पुनरुक्ति है ययोति: उसशा अर्थ: स्वयमेव गम्यमान होता है’

किन्त निमित्तालिखितस्थल में उक्त दोष नहीं हत—

‘जिसकी बात चलने पर जो रुष्ट-रुष्ट कर गरम साँसें लेता है वह उसके प्रति अनुरक्त होता है और हे सलोने सखी तुम पेसो ही दिखाई दे रही हो ।

विमर्शः : ‘लक्ष्यीकृतस्यो’ पद में ‘रूपामृदुमना:’ का ‘मनः’ शब्द पुनरुक्त है । कृपा तो मनका ही धर्म है अतः मन अपने आप प्रतीत हो जाता है । इसप्रकार प्रतिसंजहार में ‘प्रति’

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पुनरुक्त है। संधान किये वाण को बिना छोड़े वापस करलेना केवल 'संधार' से प्रतोत हो जाता है। इसौ प्रकार कानतक खींचा जाता है धनुष न कि वाण, अतः वाण का कानतक खींचा जाना अवाच्यवचन है। फलत:—‘आकरणकृशमपि कामितया सुधन्वा चापं कृपासृदुरसौ द्विधिली-चकार' पाठ ( उत्तरार्ध ) चाहिये। 'सुधन्वा' पद देने से 'स-असौ' इन सर्वनामों में अन्यतर की प्रतिपत्ति हमें ज्ञातो है।

यत्राप्रस्तुतादेव प्रस्तुतस्यार्थस्य प्रतिबिम्बादिवि विसंवसय साम्यादवगतिनस्तत्रासौ वक्तव्यतामवतरति तद्रभिधानसामध्यादेव तद्वगमादू उत्तमाववाच्य-वचनदोषानुषङ्गात् । यथा—

'आहूतेऽपु विहङ्गमेऽपु मधाकृो नायान् पुरा वार्थते मध्चेऽवारिधि वा वसन्तुणमणिर्धत्ते मणीनां पदम् । खद्योतोडपि न कम्पते प्रचलितं मध्चेडपि तेजस्विनां धिक् सामान्यमचेतनं प्रभुमिवानामृदुतरस्वान्तरम् ॥' इति ।

अत्र प्रभुमिवानुपमिनभवः प्रेऽः । यथा च—

'द्राविर्णमापदि भूषणमुत्ससृचे शरणमात्मभये निशि दीपकः । बहुविधार्थमुपकारभटष्मो भवति कोऽपि भवानिव सन्मणिः ॥' इति ।

जहाँ अप्रस्तुत से हो प्रस्तुत का साम्य प्रतिबिम्ब से विसंव के समान समझ में आ जाता हो वहाँ वह ( प्रस्तुत ) कहा नहीं जाता। उस ( अप्रस्तुत ) के कथन से हो उस ( प्रस्तुत ) की प्रतीति हो जाती है अतः ( प्रस्तुत को ) कहने पर अवाच्यवचन दोष का भय रहता है।

उदाहरणार्थ—

'यदि आचार्यो को बलाया जाय और उसमें यदि मुचर्चा भी आय तो वह रोका नहीं जा सकता, समुद्र में रहती तृणमणि भी मणियों का स्थान पाती हैं, ( सूर्य, चन्द्र आदि ) तेजस्वी लोगों के बीच अवस्थित जुगनू ( खद्योत ) भी टिमटिमाता मस नहीं होता। अतः तत्‍वभेद करने में असमर्थ स्वामी के समान इस जड़ सामान्‍यतत्‍व ( जाति ) को धिक्कार है।' यहाँ स्वामी ( की प्रतीति स्वतः हो जाती है अतः उस ) का उपमानरूप से उपस्थित किया जाना ( अवाच्यवचन दोष है)। और जैसे—

'घन केवल आपत्ति में उपकार करता है, भूषण केवल उत्सवों में, रक्षा करने वाला केवल प्राणभय के समय और दीपक केवल रात्रि में। आप जैसा बहुविध उपकार करने में समर्थ और सत्पुरुषों में रत्न दोऊ विरला हो होता है।' यहाँ जिसके लिए 'आप' ( भवान् ) शब्द कहा गया है उसे उपमानरूप से श्राद्रत: कहना ( दोषावह है)।

प्रस्तुताच तद्र्यस्य प्रतीतिरनिबन्धना न सम्पचत्येवेति तत् तस्यो-क्किरुपपद्यत एव ।

'निम्मुंक्तमतमवस्थितं चलं वाङ्मार्गैवगुणान्वितं च यत् । सर्वमेव तमसा समीकृतं घिड् महतामसतां हताऽऽन्तरम् ॥' इति ।

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द्वितीयो विमर्शः

अत्र तमसः प्रस्तुतत्वाद्दुक्केरसत्पुरुषमहत्त्वप्रतीतावसामर्थ्योमिति तद्रकथ्यमेव भवतीति न तत्प्रतिपाद्यवचनदोषानुषङ्गः ।

जधां तक प्रस्तुत से अप्रस्तुत की प्रतीति का सम्बन्ध है वह बिना कोई कारण उपस्थित किए नहीं होती अतः उस ( अप्रस्तुत ) को अवश्य ही शब्दतः कहना पड़ता है, अतः उसका शब्दतः वर्णन दोष नहीं माना जाता।

जैसे—

'नीचा, कंचा, सिर पर नाल, टेढ़ा, सीधा जो भी है अन्यकार ने उस सबको बराबर कर दिया है । अन्तर न जाननेवाले यों संतपुरुषों यों प्रभुता को धिक्कार है ।' यह यों अन्यकार प्रस्तुत हैं ( केशव ) उसके ( ही ) कथन से असत्पुरुषों के महत्त्व का ज्ञान होना सम्भव नहीं, इसलिए उसे कहना ही पड़ता है ) उसमें अवाच्य वचन दोष नहीं ।

अप्रस्तुतोक्तिसामर्थ्याद् प्रस्तुतं यत्र गम्यते ।

प्रतिविम्बाद् यथा विम्बं तस्योक्तिसतत्र नेद्यते ॥ १०६ ॥

प्रस्तुताच्च तदन्यस्य प्रतीतिरनिबन्धना ।

न सम्भवत्येव ततस्तदुक्तिसतत्र शस्यते ॥ १०७ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोकौ ।

संक्षेप में ( सार यह कि )—

'अत्र अप्रस्तुत के कथन के बल से प्रस्तुत का बोध हो जाता है जैसे प्रतिबिम्ब से विम्ब का बोधाँ अप्र ( प्रस्तुत ) का कथन आवश्यक नहीं । किन्तु प्रस्तुत से अप्रस्तुत की प्रतीति बिना किसी कारण ये नहीं होती अतः उसका कथन आवश्यक माना जाता है ।'

किश्च यत्राप्रस्तुतप्रशंसासायामप्रस्तुतस्यार्थस्य श्लेषमुखेनासन्नेवोक्तिरपोंड-पकपों चा तदितरस्स्य तथाप्रतिपत्त्येडभ्रियीयते नासौ तात्त्विक इति न तत् तामसीत्वमुत्सहते तद्विप्रतिपत्तिसम्भावनावस्थानोपगमादित्याचार्यपादैः ।

तस्य वचनं दोषः । तत्रोत्कर्ष यथा--

'सद्वृत्ते महति स्वभावसरले बद्धोदरस्यिमन् गुणै-

युंक्ते संयमहेतुतामुपगते यत्रापि विश्राम्यसि ।

तस्याक्षेपपरस्पराभिरभितो दौलायमानस्थिते-

रालानस्य मतङ्गजेष कतमो निर्मूलने दुर्ग्रहः ॥' इति ।

अत्र सद्वृत्तादिमिरिविरोषणैरदन्तुदस्यालानस्याप्रस्तुतस्य श्लेषवलोपक-लिप्तेन सदाचारत्वादिगर्मसमवन्धेनोत्कर्षोंडभिहितः, न चासौ वास्तविक इति तदुन्मूलनग्रहो गद्योचित पच न दुष्ट इत्युपालभ्ययोग्यत्वे तत्रासिद्ध-मेव ।

यच्च विम्बभूते तसिमन्नसिद्धं, तत् कयं प्रस्तुतेऽर्थे दर्पणप्रतिमे प्रति-विम्बीभवेदिति श्लेषपक्षस्यावाच्यस्य वचनं दोषः ।

तस्यैव निराकाङ्क्षाकाकुमेण किन्हाब्दस्यार्थी व्याख्येयः ।

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दुर्घ्रह' इत्यत्र 'न खलु कश्चिदित्युचित एवायं निर्मूलनेडभिनिवेशास्तच' इत्ययमथोंडचातिष्ठत इति । एवमपकर्षेडपि दृश्यव्यम् ।

इसके अतिरिक्त अप्रस्तुतप्रशंसा में जहाँ उत्कृष्ट को अपकृष्ट तथा अपकृष्ट को उत्कृष्ट सिद्ध करने के लिए अप्रस्तुत अर्थ का अवास्तविक ( झूठा ही ) उत्कर्षं या अपकर्षं श्लेष के द्वारा उपस्थित किया जाता है वहाँ वह अवास्तविक होने के कारण वही सिद्ध नहीं हो पाता । कारण कि प्रस्तुत और अप्रस्तुत परस्पर में विश्व और प्रतिबिम्ब के समान माने जाते हैं । इसलिए वह ( अप्रस्तुत का अवास्तविक उत्कर्षापकर्ष ) अवाच्य ही है और उसका कथन अवाच्यवचन दोष है । जैसे कि उत्कर्ष में—

हे गजराज जिसका वृत्त ( व्यवहार और घेरा ) बहुत अच्छा है, जो महान् ( उदात्त और लम्बा ) है, स्वभाव से सरल ( सीधा ) है, जिसमें तुम बँधे हो, जो गुणों ( शील आदि तथा रस्सी ) से युक्त और संयम ( इन्द्रिय निग्रह, बन्धन ) का कारणभाव प्राप्त कर लेता है जिसके सहारे तुम विश्वास भी करते हो, आक्षेप ( लाञ्च्छन, टककर ) की परम्परा द्वारा हिल रहे उस आलान ( हाथी को वाँधने के खूटे ) को जड़ से उखाड़ फेंकने में यह आपका आग्रह कैसा ?

यहाँ सदृशता आदि ( विशेषता ) द्वारा तमसेच्छया अप्रस्तुत आलान को उत्कर्ष श्लेष के द्वारा सदाचार आदि कलिप्त गुणों के आधार पर वतलाया गया, पर यह वास्तविक नहीं है, इसलिए हाथी का उसे 'उखाड़ फेंकने का आग्रह अनुचित सिद्ध नहीं होता, इसलिये उसमें ( हाथी में ) उपालंभ ( उलाहने की ) योग्यता नहीं बनती । ( क्योंकि ) विश्वभूत उसमें ( अप्रस्तुत में ) जो सिद्ध नहीं होता वह दर्पण के समान प्रस्तुत अर्थ में प्रतिबिम्बित कैसे हो सकता है, इसलिए श्लेष किं ( कुत्सित ) शब्द का अर्थ श्लेष को छोड़ कर केवल काकु के आधार पर करना चाहिये । इस प्रकार काकु से अर्थ निकलगा—'उखाड़ फेंकने का आग्रह दुष्ट क्यों माना जाय', फलतः 'तुम्हारा उखाड़ फेंकने का आग्रह उचित ही है'—ऐसा अभिप्राय निकलैगा । इसी प्रकार अपकर्ष में भी देखना चाहिये ।

विमर्श : अपकर्ष के लिये 'शिरःशार्वैर्गण्णा०' ( इत्यादि भर्तृहरिरत्नक का ) पद्य ठीक है । गज्या का नींचे आना अधःपतन नहीं है । अतः विवेकयुक्त लोगों का अपकर्ष गढ़ना में सिद्ध नहीं होता ।

सर्वेनाम्ना परामृष्टस्यस्याप्यर्थेस्य यत्पुनः स्वशब्देन वचनं सोडवाच्यवचनं दोषः । यथा—

'उदन्वचिछत्रा भूर;', स च निधिरपां योजनशतम्, इति ।

अत्र निधिरपामिति । यस्यार्थस्य समासोक्त्या देवैरपि मानभाजो डचासतां नै तस्यासौ पुनर्वाच्यो भवति अवाच्यवचनदोषानुषङ्गात् । यथा—

'अतिभिरक्षनबिन्दुमनोहरैः कुसुमपडिक्कनिपातिभिरड्डितः । न खलु शोभयति स्म वनस्थलीं न तिलकस्तिलकः प्रमदामिव ॥' इति ।

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द्वितीयो विमर्शः

अत्र तिलकप्रसादगोरेकतरस्मिन् वाच्ये यदुभयोरर्थचन्‍नं तदवाच्यवचनं दोषः।

ये तु गण्डस्योपमिति पिटकोद्भेदमिव तत्‍त्राप्यार्थमेव तस्योपमानत्वसुपरचयन्ति, नमस्तेऽस्‍त्र्य कविवरेभ्यः।

तद्वाथा—'जघनकाण्डरुणिमा नखाकिरणलसत्केसरालोंकराल: प्रत्यग्रालक्तककाभाप्रसरकिसलयो मञ्जुमञ्जीरम्‍ञ्जू:। भत्‍सू‍ नृत्तानुकारे जयति निजतनुस्‍वच्छलावण्यबापी-सम्भूताम्भोजशोभां विदधदभिनवो दण्डपादो भवान्याः'।। इति।

अत्र हि समासोक्‍तयैव दण्डपादस्याम्भोजतुल्यत्वेऽपगते यत् तस्याम्भोजशोभां विदधदिति पुनर्‍वचनं तदवाच्यवचनदोषतां नातिपतति।

सर्वनाम द्वारा कहे अर्थ को पुनः अपने वाचक शब्द द्वारा कहना भी अवाच्यवचनदोष है। जैसे—'भूगोल समुद्र से सीमित है और वह समुद्र भी सौ योजन का है'—इसमें (निधि‍रपां समुद्र) का।

जिसकी उपमानता समासोक्‍ति द्वारा ही प्रतीत हो रही हो उसका अर्थ को कहना नहीं चाहिए।

रत्नाहरण—अलि‍भिः (इत्यादि‍ि पूर्वोक्त) यहां तिलकं और प्रमदा दोनों में से किसी एक का कथन चाहिए। दोनों के कथन में अवाच्यवचन हुआ गूंम के ऊपर फून्सी फूटने के समान ( उपमान भाव अर्थे रूप से ही उपस्थि‍त करते हैं—उन कविपुङ्गवों भो सम्‍स्‍तार है।

जैसे—'पति के नृत्य या अनुसरण करने में अपने शरीर को स्वच्छलावण्यरूप वपिका में उत्‍पन्‍न धमल धों शोभा लिये कुते पावती के दण्डपाद की जय। जघनकाण्ड (घुटनों से नीचे और पैर की पहुँची‍‍‍‍ची‍‍‍‍‍‍स तक का शरीरभाग जिसे हिन्दी में पिधुरी कहा जाता है) उसमें लम्‍बी नाल है, नाखूनों की किरण उसमें चमचमाती पंखु‍डि‍यां हैं तुरन्त लगे अलक्‍तक की कान्ति का फैलाव कोपले है और मञ्जुल मञ्जीर भौरे। यहां दण्डपाद का आरण दिये हुये? ऐसा कहा गया, यह अवाच्यवचन दोप हुआ।

विमर्शः: दण्डपाद के लिये देखि‍ए वामनी काव्य प्रकाश २७६। नाट्यशास्‍त्र ४।१४२—३,—अभिनव भारती।

संक्षेप में यह समझना पर्यास्‍त है कि नृत्य में दाहिने पैर पीछे पीठ की ओर से शिर की दिशा में ऊपर दण्डे के समान ऊँचा ताना जाता है। उसका तलवा जूड़े से लग जाता है।

यत् पुनस्तत्राप्यार्थम्भोजस्यार्थमुपमानत्वमुपपत्तं तद्‍व्ययुक्तमेव, तस्योर-नालत्‍वादिधर्मसम्बन्धोपगमयोग्‍यतानुपपत्तेः। केवलमकेनैव समासान्त-र्भावाद् वापीसम्भूतरवेनास्य विशेषणविशेष्यभावः स्‍पष्‍टच्‍छते।

किन्‍तु समास पवात्रोक्‍तयेनानुपपन्‍न इवावभासते सचेतसां प्रक्रमभेदप्रसङ्‍गादितियुक्‍तम्।

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न च दण्डपादस्य तत्सम्बन्धो घटिष्यत इति शक्यते वक्तुं, तस्य तद्‌-मंसम्बन्ध्यथासम्बन्धात्‌ । तेनात्राम्भोजस्य शाब्दसमुपमानत्वं वा, दण्डपादस्य वाम्भोजत्वेन रूपणं कर्तव्यम्‌, येनास्य प्राधान्ये सति विशेषणसम्बन्धोपगमयोग्यता स्यात्‌ ।

किश्च भर्तुरृत्तस्येदं तस्य ताण्डवात्मनो योगानुरूपस्तस्य दण्डपादविप-यभावेनोपादानाद्‌,जद्धिकाण्डनादित्वविशिष्टतया संस्थाविशेषवशाच्च पादस्य दण्डाकारता अभिनवत्वं चेत्युभयमध्यवगतमिति न तद्‌पुनरुपादेयतामर्हति ! अतो वरमयमत्र पाठः श्रेयान्‌—

'स्वच्छलावण्यवापीसभृतो भक्तिभाजां भवद्‌वद्‌दहनः पादपद्मो भवान्या:'इति ! पवर्ग धारणमात्रविवक्षायां विपूर्वस्य दधातेः प्रयोगः परिहृतो भवति, स हि विपूर्वः करोत्यर्थे वर्तते न धारण इति ।

यत्रार्थस्योपमानत्वं समासोक्त्यैव गम्यते । न तत् तत् पुनर्वाच्यमुक्तौ वा शाब्दमस्तु तत्‌ ॥ १०८ ॥

अन्यथा त्वनयधमैः कः सम्बन्धोडन्यस्य वस्तुनः । तेन वाच्यत्वमार्येत्वं चेत्यस्य द्वयमध्यसत्‌ ॥ १०९ ॥

इति सङ्‌ग्रहपक्षोक्तिः ।

यहाँ अम्भोज का जो अर्थः उपमानभाव बतलाया गया वह भी ठीक नहीं है, उस ( अम्भोज ) में उरुनालत्व आदि धर्मों का संबंध नहीं हो सकता । केवल एक ही 'वापीसंभृतत्व-' रूप विशेषण के साथ अम्भोज का विशेषणविशेष्यभाव संबंध बन सकता है क्योंकि वह समास के अन्तर्गत ही है । किन्तु यहाँ तो समास ही ठीक नहीं बैठता, सहृदयों को उससे प्रकटभेद का अनुभव होता है ।

यदि यह कहा जाय कि उन उरुनालत्व आदि विशेषणों का संबंध दण्डपाद के साथ हो जायेगा, तो वह ठीक नहीं, क्योंकि वह अम्भोज के धर्मों से युक्त नहीं हो सकता । इसलिये इस पद में या तो उपमानभाव शाब्द द्वारा कहा जाना चाहिये, या फिर दण्डपाद का अम्भोज के साथ रूपक होना चाहिये जिससे इस ( अम्भोज ) का प्राधान्य होने से विशेषणों के संबंध वो स्वीकार करने की योग्यता आ जाय और भर्त्तृ का जो ताण्डवात्मुप उद्दत नृत्य है उसका जो अनुकरण है उसका दण्डपादरूप से उपादान किया गया है—इस कारण और विशेषण अंग के जद्धिकाण्डनादि से 'विशिष्ट' होने के कारण पाद का दण्डत्व आरोपित औप और औपम्यत्व—दोनों ही जान लिये गये, इसलिये उन्हें फिर से नहीं कहना चाहिये । इसलिये यहाँ यह पाठ अच्छा है—'लावण्य दो स्वच्छवापी' से उत्पन्न हुआ भवान्या का भक्तों की संसार-अटवी का दावक पादपद्म ।' रहने से धारण मात्र की विवक्षा में धि उपसर्ग सहित दधाति ( धा ) का प्रयोग भी हट ्‌ । वि उपसर्ग से युक्त वह ( धा ) धातु विधान करने अर्थ में है, धारण करने अर्थ में नहीं ।

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सार यह कि—जहाँ अर्थ की उपमानता समासोक्ति से ही ज्ञात हो जाती हो वहाँ उसका कष्ठन नहीं होना चाहिये, कष्ठन हो भी तो वह शब्द हो। नहीं तो अन्य वस्तु का अन्य धर्मों से सम्बन्ध ही क्या बन सकेगा ?

इमलिए इम ( उपमान ) का वाच्यत्व और अर्थत्व दोनों ही गलत है ।

विमर्शः ‘जलप्रकाण्ड०’ पाठ में नाल यद्यपि अर्थों का कष्ठन है । उससे-पाद का अम्भोज-सादृश्य बिना कहे प्रतीत हो जाता है । अतः ‘अम्भोजशोभां विद्रधत्’ ऐसा नहीं कहना चाहिये । कहना भी हो तो—उपमान को स्वतन्त्र रखकर उसकी उपमा शब्दवाच्य करनी चाहिये । यहाँ ‘अम्भोजशोभां विद्रधत्’ में अम्भोज समास में दब गया है । अतः उसका दण्डपाद से स्पष्ट सादृश्य नहीं दीखता । अर्थात्: उसकी प्रतीति होती है । अर्थात्—जो जिसकी शोभा धारण करता है वह वही असदृश नहीं हो सकता । इसलिये ‘अम्भोज शोभा धारण’ के बल पर अम्भोज का सादृश्य-पाद्र में प्रतीत होता है । यह सादृश्य अर्थ हुआ । शब्द नहीं । ऐसा नहीं होना चाहिये । इससे नाटिनार्थ यह आती है कि उपमान के धर्म उपमान में ही अन्वित नहीं हो पाते । जैसे नाल होकर अम्भोजशोभा से होता है, जो गलत है । ‘नाल’ शोभा का अंग नहीं—अम्भोज का अंग है ।

इसी प्रकार ताण्डव का अनुकरण जिस ढंग से किया जाता है उसमें पैर की दण्डायमानता अवश्यम्भावी आ जाती है । यहाँ पैर में दण्डतुल्यता का ज्ञान—जैसे नाल के रूपक से भी प्रतीत होता है । नाल यदि प्रकाण्ड नहीं होती तो पुष्प भी ताजा नहीं रहता । इसलिये दण्ड और अभिनव दोनों पदों का कहना आवश्यक नहीं । इसके अतिरिक्कि वि पूर्वक या धातु का अर्थ धारण करना नहीं होता, निर्माण करना होता है; और प्रयोग है यहाँ धारण करने के अर्थ में, अतः वि उपसर्ग भी बेकाम है । इन सब का कथन अवाच्यम्वचन है । इनके परिहार के लिये ग्रन्थकार ने नया—पाठ दिया है । उस पाठ में भी पुष्प के लिये दहन का रूपक अत्यन्त अनुचित है । काव्यप्रकाशकार आदि ने ‘निज’ के प्रयोग में अभिनवमतयोग दोष बतलाया है । उससे प्रतीत यह होता है कि वह वापी दण्डपाद की है, भवानी की नहीं ।

पत्ता णिअवफंसं द्वाणुत्तिण्णाप सामलड्डीप । चिहुरा हूअन्ति जलबिन्दुपहि बन्धरस व भण्ण ।।

[ ‘प्राप्ता नितम्बस्पर्शं ज्ञानोत्तीर्णोया श्यामलाडम्बया । चिकुरा ह्रान्ति जलबिन्दुभिर्‌वन्धस्रस व भणेन ।। ]

इत्यन्न रोदनं वनेचनभयश्रेति यद् दयमुप्रेक्ष्यितं वर्तते, तत्र प्राधान्यान्न-रोदनाभिधायिनि पदे वाच्ये यत् तस्यान्यतो-वचनं सोडवाच्यवचनं दोषस्तस्य तादर्थ्येनाप्राधान्यात् । प्रधानेचोत्प्रेक्षिते तदितरदर्थादुप्रेक्षितमेव भवति । यथा—

‘ज्योतीरसाश्मसवनाजिरदुग्धसिन्धुरभ्युनिमिषत्प्रचुरतुरङ्गमरीचिवीचि: । चातायनस्थितवधूवदनेन्दुविम्बसन्दर्शानादनिराझुलुसतीव यस्याम् ।।’

२६ व्य० वि०

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४५०

व्यक्तिविवेक:

इत्यग्रेन्दुविम्बसन्दर्भानम्। तेन 'जलबिन्दुपहि रुदितं चिहुरचयौ बन्धनभयणा' इति अग्र युक्तः पाठः ।

एकत्रोत्त्पेक्ष्यतत्वेन यत्रार्थो बहवो मताः ।

तत्रैवादि: प्रयोकव्य: प्रधानादेव नान्यत: ॥ १९० ॥

इति सङ्ग्रहश्लोकः ।

'नहाकर निकली गोरी के नितम्बों से छुआ रहे बाल बन्धन के भय से पानी की बूँद चुआकर मानो रो रहे हैं। यहाँ रोदन और बन्धन भय—इन दो की उत्प्रेक्षा की जा रही है । यहाँ उत्प्रेक्षावाचक 'इति' पद का कथन रोदन के अनन्तर करना चाहिये, क्योंकि वही प्रधान है । ऐसा न करके उसका प्रयोग बन्धन भय के बाद किया गया । यह अवाच्य वचन हुआ । क्योंकि वह ( बन्धनभय ) अप्रधान है वह रोदन के लिये उपात्त है । प्रधान की उत्प्रेक्षा हो जाने पर उसके सम्बन्धी अन्य सकी उत्प्रेक्षा तो हो ही जाती है ।

जैसे—'चन्द्रकान्त मणि के बने महलों के आंगन का दुग्ध सिन्धु, खिड़की पर हवा खा रहाँ ललनाओं के मुख रुपी इन्दु बिम्ब के देखने से निकल रही ऊँची किरणरुपी तरंगों से सदा उमड़ता सा रहता है यहाँ इन्दु बिम्ब का दर्शन (अपने आप उत्प्रक्षित हो जाता है ।) इसलिये—

'जलबिन्दुभी रोदितीव चिकुरचयो बन्धनभयेन' यद् पाठ ठीक है ।

सारांश यह कि—

जहाँ बहुत से पदार्थ एक जगह उत्प्रक्षित किये जा रहे हों वहाँ इव आदि शब्द प्रधान के बाद ही देने चाहिये, अन्य के साथ नहीं ।

'तच वदनपदार्थश्रन्द्रशब्दार्थतुल्यो हृदयकुमुदवस्तूज्जृम्भयतेष यन्र्मे'

इत्यत्र समासान्तर्गतैन वदनशब्देनैकेनैव वदने वाच्ये यद् बहुभी: शब्दस्तस्य वचनं सोडवाच्यवचनं दोष: ।

तथा हि वदनं च तत्पदार्थश्राश्राविति कर्मधारयौ वा कल्पयेत, वदनपदार्थ इति तत्पुरुषो वा । तत्राद्यस्तावदर्थयोरन्योन्यवृत्तिवचछेद्यावयवचछेदकभावादानुपपन्न:, द्वितीयोऽपि प्रयोजनाभावात् । न हि समासे सत्यवार्थस्य कश्चिद्दिरोषोडवगम्यते अन्यत्र प्रतिपत्तिगौरवादित्यवाच्यवचनप्रकार एवायमिति ।

यथा च—'कुरां ड्रिशामडुं रवस्तु विद्वान्' इति

'तुन्दिलारा वदन ( मुख ) शब्द ( का ) अर्थ, चन्द्र शब्द ( के ) अर्थ के समान है, क्योंकि वह मेरी हृदय कुसुद रूपी वस्तु को मचला रहा है ।' यहाँ समास में आये एक ही वदन शब्द से वदन अर्थ का कथन पर्याप्त था । इतने पर भी अनेक शब्दों से उसका कथन अवाच्य वचन है । क्योंकि उसमें 'जो, वदन वही पदार्थ,' ऐसा कर्मधारय यहाँ मानना होगा अथवा 'वदन पद का अर्थ' ऐसा

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द्वितीयो विमर्शः

तत्पुरुष । उनमें प्रथम तो बनता नहीं क्योंकि अर्थों में व्यवच्छेद्य ( विशेष्य ) व्यवच्छेदक-(विशेषण) भाव सम्बन्ध नहीं है, दूसरा भी नहीं बनता, कारण कि उसका यहाँ कोई प्रयोजन नहीं है । समास होने से पदार्थ में कोई विशेषता नहीं आती, केवल समझाने में कठिनाई के अतिरिक्त । इसलिये यह भी एक प्रकार से अवाच्यवचन का भेद ही है । इसी प्रकार और भी जैसे—‘कुछ को—शब्द के लिये अँकुश वस्तु समझता हुआ ।’ इसमें ( वस्तु शब्द में अवाच्यवचन दोष है ) ।

यत्स्वरूपानुजावैकफलं फल्गु विशेषणम् । अप्रत्यक्षायमानार्थी स्मृतमप्रतिभोद्धरदम् ॥ १११ ॥ तद्वाच्यमिति श्लोयं वचनं तस्य दूषणम् । तद् वृत्तपूरणायैव न कवित्वाय कल्पते ॥ ११२ ॥

यथा— ‘ककुभां शश्वानि सहस्रोज्ज्वलयन् दददाकुलत्चमधिकं रतये । दिदीपयदिन्दुरपरो दहनः कुशुमेषुमचिनयनप्रभवः ॥’ इति ।

अत्र हि यदचिन्यनप्रभवत्वमिन्दोर्विशेषणं न तु स्वरूपमात्रानुगतादफल- स्मित्यवाच्यमेव, तस्य तद्व्यभिचारात् । न चाव्यभिचारिणोऽपि ततस्तत्स्योत्कर्षः कश्चिद्धिवक्षितः कवे:, यथा— ‘अत्रैलोचनशुक्तिमौक्तिकमणेरेंवात्सुधादीधिते- गोत्रं हेभयभुजां यदुदगात तस्मिन्नभूदजुनः,’

इत्यत्र सुधादिधितेरिति तस्यावाच्यस्य वचनं दोषः । यच्चात्र दहनस्याप- पर इति वचनिरेकप्रतीतिफलदं विशेषणं तद्वाच्यमेव तस्यात्रिनयनप्रभव इति नञ्समासेनैव प्रतिपादितत्वात् । तस्मादुदित इति तत्स्त्रगुणः पाठः ।

जो विशेषण एकमात्र विधेय के स्वरूप का ज्ञान करता हो, अनः निःसार हो, और जिसका अर्थ सामने न आता हो—जो एक प्रकार से प्रतिभा-शून्यता के कारण आ गया हो, अतः जिसे कदापि नहीं प्रयुक्त करना चाहिये, इसलिये उसका प्रयोग दोष ( अवाच्यवचन ) समझना चाहिये । वह केवल वर्णनःपूर्णि मात्र के काम का होता है, इससे कवित्व सिद्ध नहीं होता ।

जैसे—‘इन्दु, जो एक प्रकार से अत्रिनयनप्रभव अत्रि ऋषि की आँख से पैदा हुआ ( और त्रिनयन शिव से नहीं उत्पन्न ) दूसरी आग था, उसने दिशाओं को उज्ज्वल करते हुए, उनमें रति के लिये अधिक आकुलता भरते हुए कामदेव को उद्दिष्ट किया ।’ यहाँ—चन्द्रममा का ‘अत्रिनयन- प्रभवत्व’ विशेषण एकमात्र उसके स्वरूप का अनुवाद करता है, इसलिये निष्फल है, अतः उसे नहीं ही कहना चाहिये, उसका ( चन्द्र में ) कभी भी अभाव नहीं रहता । अथ्यभिचारी (अल्ग न होने वाला होने पर भी ) उससे चन्द्र का कोई उत्कर्ष कवि को नहीं बतलाता है । जैसे—‘अत्रिमुनि को आँखरूपी सीप की मुक्तामणि, सुथामय किरणों वाले देव चन्द्रममा से हैहयराजाओं का जो वंश पैदा हुआ, उसमें अर्जुन पैदा हुआ ।’

यहाँ—सुधादीधिति से ( चन्द्र का उत्कर्षं विवक्षित है ) अतः उस (अत्रि-नयनप्रभवस्व रूपी अवाच्य ) का कथन दोष ( अवाच्यवचन ) ही है ।

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व्यतिरेक का ज्ञापक विशेषण है वह भी अवाच्य ही है । उसका प्रतिपादन अ-त्रिनयनप्रभव इस प्रकार के नञ् समास से ही हो जाता है, इसलिये ( अपर की जगह ) उदित पाठ चाहिये ।

यथा च— 'नाडीजद्वो निजघ्ने ऋततदुपकृतियर्तकृते गौतमेन' इति । अत्र हि तच्छब्दपरामर्शो गौतमस्यावाच्य पव तमन्तरेणाप्युपकारस्य तद्विषयभावावगते: । तेन परमपकृतवानिति वरमत्र युक्तः पाठः । यथा च— 'कटस्थलप्रोषितदानवारिभि:'इति । अत्र हि दानवारिप्रवासस्य यदेतत् कटस्थलमवधिभावेन विशेषणमुपात्तं तत्र वाच्यमध्यभिचारात् ।

एवम्— 'उत्कुल्लकमल्लकेसरपरागगौरच्यते ! मम हि गौरि ! । अभिवाञ्छितं प्रसिध्यतु भगवति ! युष्मत्प्रसादेन ।।' इत्थंप्राप्ति दृश्यमू, उत्कुल्लकेसरगौरशब्दानां पौनरुक्त्यात् ।

और जैसे—'जिसके लिये गौतम ने उसका उपकार करने वाले नाडी जञ को मारा' यहाँ गौतम को तत्पद से नहीं वतलाया जाना चाहिये । उसके बिना भी यह ज्ञात होता ही है कि उपकार गौतम का ही है । इसलिये यहाँ 'परमुपकृतवान्' यह पाठ उपयुक्त है । और जैसे— 'कट-स्थल से दूर ( प्रोक्षित ) हो गया है मदजल जिनके' यहाँ कटस्थल को विशेषणरूप से मदजल के प्रवास का अपादान ( वियुक्तिस्थान ) वतलाया गया यह नहीं वतलाया जाना चाहिये, वह तो मदजल से नित्य संबंधित ही है ।

इसी प्रकार—'खिले हुए कमल की पखुड़ियों के पराग के समान गौरयुति वाली हे भगवति ! आपके प्रसाद से मेरा मनोवाञ्छित कार्य सिद्ध हो जाय ।' यहाँ भी देखना चाहिये । यहाँ उत्कुल्ल, केसर तथा गौर शब्द पुनरुक्त है ।

कथं तर्हि स्वभावोक्तेरलङ्कारत्वमिष्यते । न हि स्वभावमात्रोक्तौ विशेष: कश्चनानयो: ॥ ९९३ ॥

उच्यते वस्तुनस्तावद्वैदैरीरूप्यमिह विद्यते । तत्कैमत्र सामान्यं यद्विकल्पैकगोचर: ॥ ९९८ ॥

स पव सर्वशब्दानां विषय: परिकोर्तित: । अत एवाभिधेयं ते सामान्यं बोधयन्न्यलम् ॥ ९९४ ॥

विशिष्टमस्य यद्रूपं तत् प्रत्यक्षस्य गोचर: । स पव सत्वविगिरां गोचर; प्रतिभाभावाम् ॥ ९९६ ॥

यत:— रसानुगुणशब्दार्थचिन्तास्तिमितचेतस: । क्षणं स्वरूपसंस्पर्शोत्या प्रज्ञैव प्रतिभा कवे: ॥ ९९७ ॥

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द्वितीयो विमर्शः

सा हि चक्षुर्भेगवतस्तृततीयमिति गीयते ।

येन साक्षात्करोत्येष भावांस्तैकाल्यवर्तिनः ।। ११८ ।।

इत्यादि प्रतिभातस्त्वमस्माभिरुपपादितम् ।

शास्त्रे तत्त्वोक्तिकोशाख्य इति नेह प्रपञ्चितम् ।। ११९ ।।

अर्थेस्वभावस्योक्तिर्योऽलङ्कारतया मता ।

यतः साक्षादिवाभान्ति तज्ज्ञार्थःः प्रतिबिम्बिताः ।। १२० ।।

शंका—यदि ऐसा है तो फिर स्वभावोक्ति को अलङ्कार कैसे माना जाता है । केवल स्वभाव के कथन का जहाँ तक सम्बन्ध है, उपर्युक्त कथन और इसमें कोई अन्तर नहीं है ।

उत्तर—इस पर हमारा कहना है कि संसार में वस्तु के दो रूप होते हैं—उनमें से एक सामान्य होता है—उसमें प्रायः सन्देह रहता है । वही अर्थ सभी शब्दों का विषय बतलाया गया है । इसलिये वे ( शब्द ) केवल सामान्य अर्थ का बोध कराते हैं । जो इस ( वस्तु ) का विशिष्ट रूप है वह प्रत्यक्ष का विषय है, वही अच्छे कवियों की प्रतिभा|प्रसूत वाणी का विषय होता है । क्योंकि कवि की वह प्रज्ञा ही तो प्रतिभा है जो रस के अनुरूप शब्द और अर्थों के सोधन विचार में निश्शल निश्चत होने पर स्वरूप का स्पर्श करने से उन्मीलित होती है । वही तो भगवान् शंकर का तृतीय नेत्र है । जिससे वे तीनों कालों के पदार्थों का साक्षात् दर्शन करते हैं । हमने ( अपने ) 'तत्त्वोक्तिकोश' नामक शास्त्र में प्रतिभा तत्व का यह विवेचन विस्तार पूर्वंक किया है, अतः यहाँ उसे नहੀਂ बढाया । अर्थ के स्वभाव की जो उक्ति है—वह अलङ्कार इसलिये मानी गई है क्योंकि (उक्त ) प्रतिभा उसमें पदार्थों को चित्रित करती है और वे आँखों देखे से लगते हैं [ उदाहरण आगे वहीं दिए जा रहे हैं ] ।

विमर्श : दण्डी ने 'स्वभावोक्ति और जाति' आदि को अलङ्कार माना था । कुन्तक ने उसका जोरदार खण्डन करते हुए लिखा—

अलङ्कारकृतां येषां स्वभावोक्तिरलङ्कृति ।

अलङ्कार्यतया तेषां किमन्यदवशिष्यते ।।

स्वभावन्यतिरेकेण वक्तुमेव न युज्यते ।

वस्तु तद्र्रहितं यस्मादत्ररूपाख्यं प्रसज्यते ।।

शरीरं चेदलङ्कारः किमलङ्कुरते परम् ।

आत्मैव नात्मनः स्कन्धः क्वचिद्रप्यधिरोहति ।।

भूषणत्वे स्वभावस्य विधिते भूषणान्तरे ।

भेदावबोधः प्रकटस्तयोरप्रकटयोध्वा ।।

स्पष्टे सर्वत्र संसृष्टिरसंसृष्टे संक्रस्सतत् ।

अलङ्कारान्तराणां च विषयो नावशिष्यते ।।

काव्यालङ्कार ( ग्रन्थ ) बनाने वाले जो महानुभाव स्वभावोक्ति को अलङ्कार मानते हैं उनके यहाँ अलङ्कार्य क्या रह जाता है क्योंकि जो भी कुछ कहा जाता है वह स्वभाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता, स्वभाव से रहित वस्तु का निरूपण ही संभव नहीं । इस प्रकार स्वभाव की

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उक्ति तो ( काव्य का ) शरीर है, वह स्वयं अलंकार और स्वयं ही अलंकार्य कैसे बन सकती है भला कोई स्वयं अपने ही कंधे पर चढ़ सका है ।

यदि स्वभावोक्ति को अलंकार मान उसे अलंकार्य बनाने के लिए कोई दूसरा अलंकार दिया जाना अभीष्ट हो तो प्रश्न उठेगा कि ये दोनों भिन्न-भिन्न होंगे या अभिन्न । भिन्न होने पर प्रत्येक काव्य में संसृष्ट अलंकार होंगे और अभिन्न होने पर संकर । इस प्रकार अन्य अलंकार के लिए कोई जगह नहीं रहेगी एक प्रकार से वे उच्छिन्न हो जाएंगे ।

ग्रन्थकार इसके उत्तर में स्वभावोक्ति के मार्मिक समर्थन में लिखते हैं—वस्तु के दो रूप होते हैं एक स्थूल और दूसरा वारीक़ी से युक्त । शब्द से जो वस्तु बतलाई जाती है, वह स्थूल रूप से समझ में आती है । वस्तु का समस्त वारीकियों से अविततरूप आँखों से देखने पर ही समझ में आता है किन्तु कुछ शब्द भी ऐसे होते हैं जो वस्तु की यह वारीक़ी पूर्ण रूप से सामने ला देते हैं । ये शब्द प्रतिभा-सम्पन्न कवि के होते हैं । इन शब्दों से होता तो वस्तु के स्वभाव का ही कथन है; किन्तु वह अन्य शब्दों से अधिक अच्छा होता है अतः उसे अलंकार माना जाता है । यह अनुभूति का विषय है ।

स्वरूप-स्पष्टीकरण का अर्थ शब्दार्थ के स्वरूप का स्पष्टीकरण भी किया जा सकता है और आत्मा का स्पष्टीकरण भी । कवि का अन्तःकरण जब समाधि गुण से केन्द्रित होता है तो उसमें विस्फार होता है, इसे सत्त्व गुण का उद्रेक भी कहते हैं । इस स्थिति में कवि को आत्म-साक्षात्कार होता है और बुद्धि सत्त्वप्रकर्षता का अनुभव करती है । इस स्थिति में कवि के अन्तःकरण में काव्यानुरूप शब्द और अर्थों का स्मरण और स्फुरण होता है । इसी बुद्धि को प्रतिभा कहते हैं । कवि इससे अतीत अनागत और वर्तमान सभी पदार्थों को सामने पाता है । इसे ज्ञानचक्षु कहते हैं । वही भगवान् शंकर के तीसरे नेत्र के रूप में समझा जाता है । अपने तर्कशक्तिकोष ग्रन्थ में ग्रन्थकार ने इसका विस्तृत विवेचन किया था किन्तु वह अब तक प्राप्त नहीं हैं । स्वभावोक्ति के अच्छे उदाहरण

यथा—

ऋजुतां नयतः स्मरामि ते शरमुत्सृज्झनिषण्णधन्वनः । मधुना सह संस्मताः कथा नयनो- पान्तविलोकितं च तत् ।' इति ।

यथा च—

'कुर्वन्न्रासुमुपुष्टो मुखनिकटकरटटः कन्धरामातिरक्ष्णां लोलेनाह्न्यमानस्तुहिनकणमुचा चक्षुषा केसरेण । निद्राकण्ठीकृतायं कृपणति निविडितश्रोत्रश्रुतिस्तुरङ्ग- स्वहस्तावलम्बप्रचलनयनतभ्रुकुटिमुद्रणं चक्रमः ।' इति ।

यथा वा—

'ग्रीवाभङ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यन्दने बृंहद्गत्रिः पश्चार्धेन प्रविश्ठः शरपतनभयाद् भूयसा पूर्वकायम् ।'

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द्वितीयो विमर्शः

दृशेरर्धावलिहैः श्रमचित्रतसुखभ्रंशाभिः कीर्णवर्त्मा पश्योदग्रप्लुतत्वाद् वियति बहुत्तरं स्तोकमुच्यः प्रयाति ॥

जैसे— 'वसन्त के साथ कमानो को गोद में रखकर तीर को सीधा करते हुए उस प्रकार मुसकुराकर बातें करना और वह तिरछी आँखों से देखना मुझे याद आ रहा है ।' ( कुमारसंभव में रति विलाप )

और जैसे— 'घोड़ा अपनी आँख के कोने से वो खुर से खुजलाता है । उसमें चंचल बरोनियों के ऊपर छोटा सा भूरा का झुकड़ा लगा हुआ है, वह ( आँख का कोना ) नींद की खुजलाइट से गहुआ हो गया है । ऐसा करते समय उस घोड़े के सीप ( झिल्ली ) जैसे कान की नोंकें मिल जातीं हैं । उसकी पीठ टेढ़ी है, घोड़े के पास आ गयी है । वह गर्दन टेढ़ी कर रहा है, इसलिए गर्दन के वालों से टपकी ओस भी बूंदे उसे नालुक सा लगा रही हैं ।'

या जैसे—देखो ( यद्-वरिंग ) अत्यधिक कुलाचें भरने से आमसमान में अधिक और जमीन पर कम जल रहा है । वह करावर गर्दन टेढ़ी और आँख रथ की तरफ किये दृष्टिपात हो रहा है । उसे तीर के लगने का भय है अतः उसने अपना दम दोगली दिग्गल शरीरे ( गर्दने ) से बहुत अधिक सटा लिया है । उसका मुंह थकावट से खुल गया है और उसके अधरचबे दानों ( कुशाग्रों ) से रास्ता बचा सा गया है ।'

सामान्यस्तु स्वभावो यः सोडन्यालङ्कारगोचरः । मित्रग्रमथेमलङ्कार्त्तमन्यथा को हि शक्नुयात् ॥ १२९ ॥ वस्तुमात्रानुवादस्तु पूरणैकफलो मतः । अननतरोक्यारेव यद्वान्तर्भावमर्हति ॥ १२२ ॥ यथायोग्यं दोषस्तेन पृथ्चैव ते मताः ।

इत्यन्तरश्लोका ।

( विशिष्ट स्वभाव तो स्वभावोक्ति का विषय हुआ अब ) जो सामान्य स्वभाव है—वह दूसरे अलंकारों में आता है । नहीं तो छिपे हुये ( अव्यक्त ) अर्थ को कौन अलंकृत कर सकता है । यदि वस्तु का केवल अनुवाद कर दिया जाय तो वह एक प्रकार से छन्दः पूर्ति मात्र के लिये है जो वस्तुतः दोष है । यह दोष पिछले बतलाये—( पुनरुक्त, वाच्यावचन )—दो दोषों में अन्तर्भूत हो जाता है, इसलिये केवल पाँच ही दोष बतलाये हैं ।

विमर्शः यहीं तक दोषों का निरूपण किया, अब प्रकृत प्रसंग में उसे घटाने के लिये उपसंहार करते हैं । प्रकृत प्रसंग ध्वनिविवणॅडन है । ग्रन्थकार ध्वनिकार के श्लोक 'काव्यस्यात्मा या ध्वनिनिरृति बुधैः' में ये दोष दिखलायेंगे । इसी के लिये उन्होंने इतने दोषों का निर्वचन किया है । इसके पहले वे—'इन दोषों का समझ सकना बहुत कठिन है—'इस तथ्य को बतलाने के लिये महाकवि कालिदास के श्लोक को उपस्थित करते हैं—

ता पता दोषजालयो महाकवीनामपि दुरलक्ष्य इत्यवस्यन्ते । यथा— 'उमावृषाढू शरजननना यथा यथा जयन्तेन शचीपुरन्दरौ । तथा नृपः सा च सतेन मागधी ननन्दततस्तत्सदृशोन तत्समौ ॥'

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इत्यत्र यथातथाशाब्दाभ्यामेव मागधीर्नुपयोरुमावृशाड्साम्यं शाचीपुरन्दरसाम्यं च, सुतस्य च शारजन्मजयन्तसाहश्यमवगमितमिति यत् तयोस्तत्सादृश्यवचनं तत् पुनरुक्तम्।

तथोपमानयोर् निर्देशशक्रम् प्रकान्तः स उपमेययोः क्रमे भेदं नीत इति निर्देशप्रक्रमभेदो दोषः; तत् एव च तत्समावित्यचावाच्यवचनदोषोडपि तावत् स्फुट एव गुणवाच्यवचनदोषोऽपि तावत् स्फुट एव गुणवाच्यवचनदोषोपपत्तेः।

किञ्च तथा शाब्दस्य यद्वचनं सोऽव्याच्यवचनं दोषः, तदुग्यतिरेकेणाप्यर्थयोर्विंपर्यासमात्रेण तदर्थीगतिसिद्धेः। तस्मादेवमन्त्र पाठः श्रेयान् ‘सुजनन्मना तेन सुतेन ताहुभौ ननन्दतुः सा च विशांपतिश्व सः’ इति ।

ये जो दोष जातियाँ हैं उन्हें ऐसा समझा जाता है कि वे महान् कवियों को भी कठिनाइँ से समझ में आती हैं। यथा—उमावृशांकौ*** (यह पूर्वोदृत पद्य)। यहाँ—यथा और तथा शब्दों से ही मागधी और राजा का उमावृशांक—साम्य और शचीपुरन्दर—साम्य समझा दिया जाता है और पुत्र का कार्तिकेय तथा जयन्त से साम्य।

इतने पर भी जो उनका फिर से उन उपमानों के साथ सादृश्य बताया गया। वह—पुनरुक्त हुआ। इसके अतिरिक्त उपमानों का निर्देश जिस क्रम से किया गया था वह क्रम उपमेयों के क्रम में तोड़ दिया गया, इसलिये निर्देशप्रक्रमभेद दोष हुआ। इसौसे तत्समौ इसमें अवाच्यवचन दोष भी स्पष्ट ही है। (उसके बिना तो उपमानयोग्यता ही न बनती (अतः उसकी प्रतीति तो अपने आप हो सकती थी) और तथा शब्द का कथन अवाच्यवचन दोष है। इसके बिना भी आधे-आधे भागों को उलट कर रख देने से उसके अर्थ का ज्ञान हो जाता है, इसलिये यहाँ यह पाठ—ठीक है सुजनन्मना तेन० (इत्यादि मूल में दत्त)।

विमर्शः अथों का विपर्यय इस प्रकार होगा—

‘सुजनन्मना तेन सुतेन ताहुभौ ननन्दतुः। सा च विशांपतिश्व सः।’

‘तत्सदृशेन, तत्समौ’ के सर्वनामों के परामर्शे उत्तरार्ध में आने के कारण ‘तथा नृपः सा च सुन्दती मागधी ननन्दतुसत्सदृशेन तत्समौ’—को पूर्वार्ध नहीं बनाया जा सकता।

यतो वस्तुमात्रोपनिबन्धप्रायेडपि पदसमुदाये दृष्ट्यन्त पदं ते—अन्येषां यथा—

‘काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति बुधैर्यः समाम्नातपूर्व- स्तस्य स्वभावं जगदुरपरे भाक्तमाहुस्तमये। केचिद्वाचां स्थितमविषये तत्स्वरूपचस्तदीयं तेन भूमः सहृदयमनःप्रीतये तत्स्वरूपम् ।’ इति।

अत्र ‘काव्यस्यात्मा ध्वनिरिति’ इति ‘इति’-शब्दस्य तावत् क्रमभेदः। स हि काव्यात्मपददानन्तरं प्रयोक्रव्यः काव्यस्यात्मेति। अन्यथा ध्वनिनैवास्य सम्बन्धे विज्ञायमाने तस्य सर्वनामपरामर्शोभावे अभावो भाक्त्वं वागविष-

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सम्बन्धित है और उनका कोई प्रयोजन नहीं है, अतः उनका उपादान पुनरुक्त है । (ध्वनिकार ने बुछैवैयाकरणैः प्रथमे हि विद्वांसो वैयाकरणाः, व्याकरणमूलत्वात् सर्वविद्यानाम्’ इत्यादि द्वारा प्रयोजन वतलाया है ।

किश्च ‘भक्तिमाहुरस्तमन्ये’ इत्यत्रापि पूर्ववद् इतिहासाद्: प्रयोक्तव्य: उत्तरत्र च । अन्यथा अन्येषां केषांचिद् अनुयुक्ता स्यात् ।

ततश्र भक्तो यो ध्वनिस्तमाहुरन्य इति, वाचामविषये स्थितं यत् तदीयं तत् केचिद् चुरिति प्रतीतौ; ध्वनेर्भक्तत्वोक्तौ; अन्येषां केषांचिद् वाचामविषये स्थितत्वे यत् तदीयस्य तत्‌त्वस्य, तदुक्तिनोऽनुयुक्ता स्याद्, इतिना व्यवच्छेदाभावाद् इति वाच्यावचनं दोषः ।

सामर्थ्यादुक्तेरनुकरणानुगमे वा पूर्वत्रेतिशब्दस्य पौनरुक्त्यप्रसङ्गः । किश्चात्र वचनार्थो गदति: प्रयुक्त एवेति तस्यैवाधिकरण्यायेनानुयुक्‍ति-युक्ता न तु तद्भिन्नार्थस्य ब्रवीतेरुपादानमित्यु भयत्राप्युक्तदोषद्वयानाति-कृतिः ।

कालविशेषप्रक्रममभेदश्रात्रावगन्तव्यो जगदुरित्येच्चुरिति च कालविशेष-घस्य प्रकान्तस्यानिर्वाहात् ।

किश्च ध्वनेस्तत्त्वं ध्वनिरेव वा स्याद् अन्यदेव वा । तत्र ध्वनिरूपत्वे तत्त्वमूढुस्तदोयमिति त्रितयमपि पुनरुक्तं स्यात् । केचिद् वाचां स्थितम-विषये जगदुरित्येतावद्रि: प्रयुक्तान्तर्गतैरेव पदैस्तदर्थावगतिसिद्धे ।

प्राक्—

‘प्रयुक्तान्तर्गतैरेव यत्र सोऽर्थः प्रतीयते । प्रयोक्तृस्तत्र नोक्तानां पदानां पुनरुक्तिकृदिति ॥’

अन्यरूपत्वे त्वन्यस्य वागविषयत्वाभावे ध्वनेस्तद्विषयत्वं नोक्तं स्यात् तयोर्भेदात् ।

किश्च भक्तेरेव ध्वनिरूपतामन्ये मन्यन्ते न तत्सम्बन्धिनोडन्यस्य ध्यापा-रादेरिति व्यर्थस्तद्वितानिर्देशः ।

यत् स एवाह भक्तिरेव ध्वनिरिति—‘भक्त्या विमुक्तिं नैकत्वं रूपभेदाददयं ध्वनि: ।’ इति ।

‘कुरालत्वं सन्तापं वदति बिसिनीपत्त्रशायिनम्’ इत्यत्र वदतर्थादवाच्यादनुसमस्य व्यक्तिलक्षणस्यार्थस्य तात्पर्योंऽपक-रणमिति ध्वनिलक्षणानुगमात् भक्तेरेव तत्त्वमुपपद्यते नान्यस्येति व्यर्थ-स्तद्वितानिर्देशः ।

सहृदयमनःप्रीतय इत्यत्र च मनश्शब्द: पुनरुक्त: प्रीतेऽमनोधर्मतया तद्-विकरणभावाग्यविचारादित्येतत् प्रपञ्चितमेव प्राक् ।

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द्वितीयो विमर्शः

इसो प्रकार—‘उसे लोगों ने भक्त कहा है’ इसमें भी पहिले के ही समान इति शब्द का प्रयोग होना चाहिये, और आगे भी, नहीं तो जो ‘अन्य’ शब्द से कहे गये हैं और जो ‘केचिद्’ शब्द से उन लोगों के कथन का अनुकरण नहीं हो पायेगा। तब ऐसी प्रतीति होगी—‘भक्त जो ध्वनि है उसे दूसरों ने कहा है’ वाणी के अविषय में स्थित जो उसका तत्त्व है, उसे किसी ने कहा है। और ऐसा होने पर ध्वनि के भक्तित्व का कथन और वाणी के अविषय में स्थित होने का कथन इनका अनुकरण नहीं किया जा सकेगा क्योंकि ‘इति’ द्वारा उनका व्यवच्छेद नहीं हुआ, अतः वाच्यावचन दोष हुआ। यदि यह कहा जाय कि इन स्थानों में इति का कथन वाक्य-सामर्थ्य से ही हो जायेगा या एक बार जो प्रयोग किया गया है, उसका अनुमान कर लिया जायेगा तो—पहली बार जो इति शब्द दिया गया उसके लिये भी यहीं कहा जा सकता है, फलतः वह भी पुनरुक्त होता है और कहने अर्थ में ‘नाद’ धातु का प्रयोग किया ही गया है, आदि-दीपक-न्याय से उसी का अनुमान बाद में भी होना ठीक है, न कि ‘भू’ धातु का, क्योंकि दोनों का अर्थ एक ही है। इसलिए—‘आहुः और उचुः’ दोनों में उपयुक्त दोनों दोष ( पुनरुक्ति या वाच्यावचन ) आ ही जाते हैं। ( किसी भिन्नार्थक धातु का प्रयोग करना था वह नहीं किया, इसलिए वाच्यावचन )।

यहाँ कालविशेष ( भूतकाल ) का प्रक्रम भेद भी है। (‘आहुः’ इस वर्तमान काल की क्रिया को) जगदुः ‘ऊचुः’ ( इन परोक्षार्थक भूत किया ) में बदल दिया गया है। और ध्वनि का तत्त्व ध्वनि ही हो सकता है, या ध्वनि से भिन्न। ध्वनिरूप होने पर ‘तत्त्वमूलस्तद्वदीयम्’ ये तीनों व्यर्थ हो जाते हैं। क्योंकि उसका अर्थ ‘केचिद् वाच्यां स्थिततत्वविषय उचुः’ इतने ही शब्दों से चला आता है, जो प्रयुक्त शब्दों के अंतरंग है; जैसा कि पहले ( तीसरे पृष्ठ पर ) कहा है—प्रयुक्तान्तरंग-तैरेक……। यदि भिन्न है तो दूसरे की वाच्यविषयता सिद्ध होती है, ध्वनि की नहीं। कारण कि दोनों में भेद है, [ अतः अवाच्यवचन या वाच्यावचन होता है। मुक्ति प्रति में ‘वागविषयत्वभावे’ छपा है। हम उसे ‘वाग्विषयत्वभावे’ या ‘वागविषयत्सभावे’ मानते हैं। ] इसी पाठ में सुविधा सौकर्य है और दूसरे लोग भक्ति को ध्वनिरूप मानते हैं। उससे सम्बन्धित व्यापार आदि को नहीं।

इसलिये ( भक्ति में तद्भिन्न ) का निर्देश व्यर्थ है जैसा कि ध्वनिकार ने कहा है—‘ध्वनि और भक्ति एक नहीं मानी जा सकतीं, उनके रूपों में भेद हैं और यह ठीक भी है क्योंकि—‘कमल पखुड़ी की सेज उस ऋषि के सन्ताप को कहती है’ में ‘वदति = कहती है’ का अर्थ जो वाच्य है उससे ‘सूचित करना’ आदि अर्थ तात्पर्य रूप से बतलाया जाता है, इसलिये ध्वनि लक्षण का अनुमान करने से भक्ति ही ध्वनि-रूप मानी जा सकती है, और कुछ नहीं। अतः तद्भिन्ननिर्देश व्यर्थ है। ‘सहृदयमनःप्रीतये’ में मन शब्द पुनरुक्त है। प्रीति मन का ही धर्म है, अतः प्रीति की अधिकरणता उससे दूर नहीं होती—इसका विस्तारपूर्वक विवेचन किया जा चुका है।

तेन वरमयमत्र पाठः श्रेयान् अपदोषत्वात्— 'काव्यस्यात्मेत्यमतिभियाम् ध्वनिनिर्‌णाम गीत- स्तन्मयतामपादु यत्र भक्तिरिदंमन्ये । केचिद्वाचामविषय इति प्रास्फुरत्तत्त्ववमन्त- स्तेन ब्रूमः सहृदयजनप्रीतये तत्स्वरूपम् ।।' इति ।

उक्त दोषों के कारण यहाँ यह पाठ अच्छा है—‘काव्य की आत्मा’ इस प्रकार से शुद्ध बुद्धिवाले लोगों ने जिस ध्वनि का विवेचन किया था दूसरों ने उसका अभाव बतलाया, और लोगों

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व्यक्तिविवेक:

ने उसे भक्ति ही माना, कुछ लोगों ने वाणी का अधिष्ठय । अतः अन्तःकरण में सुप्रतिष्ठित हो रहे उसके स्वरूप को सहृदयजन ही प्रीति के लिये बतलाते हैं ।

यथा—

इदमध्यतनाच्च भाविनां चानुशासनम् । लेशातः कृतमस्माभिः कवितर्मोरुकक्षिताम् ॥ १२६ ॥

इत्यलमप्रस्तुततवस्तुविषतरेग।

अस्तु, हमने यह अनुशासन ( दोषशिक्षा ) इस समय विद्यार्थन तथा भावी कविपथ पर चलने के लिये इच्छुक व्यक्तियों के लिये संक्षेप में किया । क्योंकि यह 'व्यक्तिविवेक' में अप्रस्तुत है इसलिए इसका विस्तार अधिक नहीं करते ।

तस्मात् स्थितमतदर्था यथा रागद्वेषार्थाभिधानमन्यत्रण न व्याप्तिपारमतां सम्भवतीति ।

गमयन्त्यर्थमुखेन हि सुप्तिडवचनाद्योडपरानर्थान् । तेन ध्वानिलक्ष्मविधौ शब्दग्रहणं विपकलमेव ॥ १२७ ॥

इति सङ्ग्रहार्या ।

इति श्रीराजानकमहिमभट्टविरचिते व्यक्तिविवेकाख्ये काव्यालङ्कारलङ्कारे शब्दानौचित्यविचारो नाम द्वितीयो विमर्शः ।

इस प्रकार यह निष्कृष्ट हुआ कि शब्द में अन्य कोई व्यापार नहीं हो सकता केवल अर्थ के अभिधान ( अभिधा शक्ति ) को छोड़कर ।

सुवन्त और तिडन्त सभी शब्द दूसरे अर्थों को अपने अभिधेय अर्थ के द्वारा बोधित करते हैं अतः ध्वनि का स्वरूप ( यत्रार्थः शब्दो वा० ) बतलाते समय उस ( शब्द ) का ग्रहण करना सर्वथा व्यर्थ है ।

इस प्रकार राजानक श्रीमहिमभट्ट द्वारा रचित व्यक्तिविवेक नामक काव्यशास्त्र में शब्दानौचित्यविचारणनामा द्वितीय विमर्शो पूर्ण हुआ ।

इस प्रकार व्यक्तिविवेक तथा उसके संस्कृत व्याख्यान के द्वितीय विमर्शो का नादनेर ( भोपाल, म० प्र० ) वासी पं० श्री नमदार्प्रसादद्विवेदी के आत्मज श्री रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत हिन्दीभाष्य पूर्ण हुआ ।

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व्यक्तिविवेक:

धार्मिक से उसके हित की बात कहने की चाल चली और सिंह के निरतिशय क्रौध्र को जानतें हुष भी इस पद्य में केबल कुत्सित के मरने की बात कहकर भय उपस्थि द्रिखलाया । इस तरह 'घूमो' इस प्रकार घूमने के विधान के वहाने उसमें न घूमने ( निषेध ) की संमति दी । यहाँ दो अर्थ हैं । एक वाच्य और दूसरा प्रतोयमान । वाच्य ( 'हे धार्मिक तुम खूब घूमो'-इस प्रकार का ) विधिरूप है और प्रतोयमान ( वहाँ शेर है अतः न घूमो-यह ) निपेधरूप । वे दोनों क्रम से जान पड़ते हैं। कारण कि उनके बीच साध्यसाधनभाव सम्बन्ध है, वाच्य जो है सो धूम के समान साधन है और प्रतोयमान अभि के समान साध्य । दोनों में प्रथम ( विधिरूप वाच्य अर्थ ) तो स्पष्टतया से समझ में आ ही रहा है, कारण कि उसके ( प्रतिपादक वाक्य-भ्रम धार्मिक में ) भ्रमण-विधानरूपो साध्य ( 'भ्रम'-इस अनुज्ञार्थक लकार से युक्त क्रियापद द्वारा ) और अभ्रमणविरोधी दुष्ट कुत्सित का मारा जाना-रूपो कारण ( मारित:-पद द्वारा ) दोनों-ही कह दिये गये हैं। परन्तु दूसरा-( प्रतोयमान ) इसी ( वाच्यार्थ = विधि ) से प्रतोत होता है । इसके ('मारित' में दिखाई देने वाले ) निःर्थ ( निच्-प्रतय = प्रयोजकार्थक प्रत्यय उसका अर्थ प्रेरणा ) के ऊपर ध्यान देने से और प्रयोजक ( मारने वाले ) के स्वरूप का ज्ञान करने से सामर्थ्यवशात्— ( वाक्यार्थशक्ति द्वारा ) विवेकी ज्ञाता के समझ में आ जाता है । वह—सामर्थ्य और कुछ नहीं—कुरा या मर जाने पर भी । वहाँ उससे अधिक क्रूर प्राणी के सद्भाव को कथन है ।

इन साध्य और साधक दोनों का व्याप्ति-संवन्ध विरोधमूलक है, ( भोःश्रमण—साध्यः भ्रमणस्थल में भयानक प्राणी का सद्भाव साधन—दोनों विरुद्ध हैं ) इस विरोध में लोकानुभव प्रमाण है । ( ऐसा प्रथन विद्वानों में ही कहा जा चुका है ) ।

ननु यद्यतो वाक्यादर्थड्यावगमस्तत्कथं मुत्तरेस्मिन्नेव नियमित:, न पूर्वस्मिन् उभयत्रापि च, तयोः प्रकारणिकत्वेन विशेषाभावात् । न तावत्त्वाच्यानुमेययोरर्थयोः समुद्चयेन अवगतिरुपप-घते ऽभ्रम मा च भ्रमोरिति विधिनिषेधयोरेकाश्रयत्वविरोधात् । नापि विकलपनं, श्रम वा मा चा भ्रमोरिति वचनाच्चारणानर्थक्यप्र-सङ्गात् ।

नाध्यझाङिभावेन, विधिनिषेधयोस्तदसम्भवात् । केवलं योडसौ भ्रमणविधौ हेतुभावेन हेतुपक्षाननद्धयापारस्तत्रोपाप्तः स एव विमृश्यमानः परम्परया धार्मिकस्य तन्निषेधे पर्यवस्यति तयोर्बोध्य-बाधकभावेनावस्थानात् ।

को हनुनमत्तः कुत्कुरमात्रसद्भावभयात् परिहृतभ्रमणस्त्रैव हस-सिद्धसद्भावाराङायामपि सविषमं भ्रमेदित्यनुमेयार्थविश्रान्तिनियमहेतु-वाध्यबाधकभावेनावस्थानात् ।

अवश्यं चैतद्भ्युपगन्तव्यम् । अन्यथा शुक्तिकारजतप्रतीत्योरपि क्रम-भाविन्योरेतत्पर्यनुयोगप्रसङ्गः केन वार्यते । तस्माद् वाध्यबाधकभावावस्-यक्त एवात्रोत्तरार्थविश्रान्तिनियम इति स्थितम् ।

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तृतीयो विमर्शः

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( शंका )—यदि इस वाक्य से दो अर्थ ज्ञात होते हैं तो सद्यो अन्तिम ( निषेध ) अर्थ में ही वाक्यार्थ की समात्ति क्यों होती है ? प्रथम अर्थ ( विधि ) में, या दोनों ( विधिनिषेध ) में क्यों नहीं होती ? क्योंकि वे दोनों अर्थ समान रूप से प्राकरणिक हैं ।

( उत्तर )—स्थिति ऐसी हैं कि वाच्य और प्रतोयमान् अर्थों की समुच्चयात्मक ( साथ-साथ ) प्रतीति नहीं हो सकती, कारण कि—( विधि ) 'घूम' और ( निपेध ) 'मत घूमो' ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं । वे एक ही अर्थ में नहीं रह सकते ( जो घूमेगा, उसमें घूमने का अभिप्राय नहीं रहेगा ) । इनकी प्रतीति विकल्पात्मक ( घूमो या न घूमो ) भी नहीं बन सकती; क्योंकि विकल्प जो—'घूमो' या 'न घूमो' ऐसा कहना है, कोई मतलब नहीं रखता । और न दोनों एक दूसरे के अथवा अथों ही वन सकते, क्योंकि विधि और निषेध में वह ( अथवा अथों भाव ) हो नहीं सकता ।

केवल यह जो ( धार्मिक के ) घूमने में कारणरूप से जंगलो शेर का व्यापार घूमने की जगह ( गोदावरी तीर में ) बतलाया गया है, उसी पर विचार करने से वही आगे चलकर धार्मिक के घूमने का निषेध बतलाता है, क्योंकि उन ( भ्रमण विधि और निषेधस्तव ) दोनों का बाध्यबाधक-भाव सम्बन्ध है । भला ऐसा कौन होगा जो यदि पागल न हो तो केवल कुत्ते के सङ्कटाव से तो डर करके घूमना रोक दे किन्तु वहाँ विगड़े शेर के सङ्कटाव का डर रहते हुए खुशी के साथ घूमे ? इसलिये यहाँ अनुवेय अर्थ में ही वाक्यार्थ का विराम होता है । उसका हेतु है बाध्यबाधकभाव ( शेर-भ्रमण और भय कारण के सङ्कटाव का ज्ञान ) । यहाँ ( बाध्यबाधकभाव ) वाच्य और प्रतोय-मान दोनों में अन्तर डालता है । और इसे अवश्य ही मानना पडता है, नहीं तो सीप और रजत की प्रतीति में भी जो कि क्रम से होती है यह प्रश्न उठाया जा सकेगा, ओर उसे कोई नहीं हटा सकेगा, इसलिये बाध्यबाधकभाव के निश्चय से परवर्ती ( निपेध ) अर्थ में ही वाक्यार्थ विश्रान्त होता है, यहीं बात सिद्ध होती है ।

तत्र 'भम धमिमभ ! वीसदो' इति वाक्यार्थरूपो भ्रमणविधिरेवोच्यः, तस्य 'सोऽसुणाओ अज्ज मारिओ देअ' इत्यादिना कूकुक्कुरमारणं हस्सिद्ध-विहितं वाक्यार्थरूपमेवार्थो हेतुः। तत्प्रतिषेधस्त्वनुमेय पव न वाच्यः,

तत्र 'गोलाणइकच्छकुडडवासिणा' इति गोदावरोकच्छकुहरासय धम्मित्त-निद्देसा । 'दरिअसीहेहो'त्ति श्वमारणकारणाभिधानादारेणोपात्तस्य हस्सिद्ध-सद्दावस्स्य हेतुभावः । कुडडवासिणेति तद्द्रिशेषणेन तस्य धर्मिणि सद्दावोप-पादनम् ।

तस्यास्य हेतोः साध्यस्य च निर्भयभ्रमणविधिलक्षणास्य सद्भाववस्थाने-लक्षणो विरोधः प्रसिद्ध एवेत्येकस्य सद्भावावेदनेनापरस्स्य स्वभावविरुद्धो-पलञ्चया प्रतिषेधे विज्ञायमाने सति समशीर्यिंकयोभयार्थप्रतीतिरेवात्र न समस्तीति तद्द्विश्रान्तिरप्यनुयोगो निरवकाशा पव ।

तदनुमेय पव भ्रमणास्य निषेधो न विधेयसेयं यथा नात्र शीत-स्पर्शोऽग्नेरित्यतः । यदि वा प्रेक्षावतां प्रवृत्तिरनर्थसंशायाभाव-निश्चयेन व्याप्ता, तद्धितुरुद्धशास्त्रानर्थसंशायोऽरमादू विधिवाक्यार्थपिण्डजर्थपय्या-

३० व्या० वि०

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लोचनयावसाय इति न्यायपकविरुद्धोपलब्ध्या, यथा नात्र तुषारसंस्पर्शोंड्गने-

रित्यत: तुषारसंस्पर्शोऽया ।

यहाँ 'भ्रम धार्मिक विश्वासः = धार्मिक जी प्रेम से घूमिये' यह वाक्यार्थ रूप भ्रमण विधि वाच्य है, उसका 'स झुनकौडच मारितस्तेन'—वह दुष्ट कुत्ता आदि इत्यादि से कूर कुत्ते का सिंह द्वारा किया गया मारण हेतु है, वह वाक्यार्थ रूप है। उसे ( भ्रमण ) का निषेध अनुमेय ही है, वाच्य नहीं। उसका आक्षेप होता है। उसकी प्रक्रिया ऊपर वतलाई गई है। ( अनुमान में ) 'गोदावर्योक्चक्रकुहरवासिना' इस प्रकार गोदावरी कच्छकुहर को धर्मी सन्दर्भ को हेतु वतलाया गया। 'दृरासिंहेन' इस प्रकार कुत्ते को मारने वाले के रूप से 'दृरासिंह' के सन्दर्भ को हेतु वतलाया गया। और उस ( सिंह ) के विशेषण = 'कुहरवासिना' 'कुहर में रहे'—द्वारा उसका धर्मी में सन्दर्भ दिखलाया गया।

इसके हेतु और निर्भयश्रमणरूप साध्य का एक साथ न रहना प्रसिद्ध ही है, इसलिये एक ( हेतु ) के सन्दर्भ के कथन से दूसरे ( साध्य ) के निषेध का ज्ञान होता है। यह ज्ञान—उनके स्वाभाविक विरोध के ज्ञान से होता है। इस स्थिति में ( समझदारिकया ) वरावररी से दोनो अर्थी की प्रतीति नहीं होती, इसलिये उस ( वाच्य प्रतीति में वाक्यार्थ ) के पर्यवसान का प्रश्न ही नहीं उठता। इसलिये भ्रमण का निषेध अनुमेय ही है, वाच्य नहीं। इसे समझना चाहिये। जैसे— ( दूरसे कहाँ आग जलती देखकर कहा जाय कि ) 'शीतस्पर्शौ ( ठंडक ) नहीं होना चाहिये क्योंकि यहाँ अग्नि है'—यहाँ शीतस्पर्शौ का निषेध ( अनुमान द्वारा प्रतीत होता है ) दूसरौ वात यह है कि बुद्धिमान लोग वहीं जाते हैं जहाँ अनर्थ का भय नहीं रहता। यहाँ उसके विरुद्ध इस विधि-वाक्य ( घूमो ) और मारित के 'णि' प्रत्यय से प्रतोत प्रयोजक ( सिंह ) के पर्यालोचन से अनर्थ का भय जान पड़ता है। इसलिये ( सिंह सन्दर्भ का ) जो ज्ञान हो रहा है वह प्रवृत्तिजनक ( अनर्थ-संशयभावनिश्रयरूप ) ज्ञान के विरुद्ध है।

जैसे—यहाँ 'शीतस्पर्शौ' है—क्योंकि यहाँ अग्नि है—यहाँ शीतस्पर्शौ का निषेध ( शीतस्पर्शौ का व्याघात है अग्न्यभाव, यहाँ उससे उलटा अग्नि ही विद्यमान है अतः भले ही अभिधा द्वारा शीतस्पर्शौ की प्रतीति की जाय परन्तु :सिद्धि होती है उसके अभाव की ही )।

आप शास्त्रमनुदाहरेदाहरणतरौनंतरान्नृक्षप्रभृतौंत प्रसिद्धतदग्रापारान-पास्य यदेतत् करिकलभकुम्भनिभेंदैकहेवाकिनः केसरिणः कौलेकवधाभिधानमौचित्यैकनिकेतनस्य कवेस्तत्न चिरं चिन्तयन्तोड्यभिप्रायं न चिग्रः । न हि हसनाया यत्किञ्चनकारणोडन्यस्यापि स्वजातिसमुचितं चरितम-पहायाप्रसिद्धमेव किमापि रसभङ्गभीरचः कवयो वर्णयितुमाद्रियन्ते किमुत अनौचित्यनिबन्धो हि परं रसभङ्गकारणं कवयो वदन्ति । यत् स 'अनौचित्याहते नान्यद् रसभङ्गस्य कारणम् ।

प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा ॥' इति ।

तस्मादरिआरिक्खेणेत्यत्र पाठः श्रेयान् ।

इसके अतिरिक्त कवि एकमात्र औचित्य पर निर्भर रहता है क्योंकि उसने इस उदाहरण में

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तृतीयो विमर्शः: ४६७

ऋष्ठी के मस्तकविदारण का चाव रखने वाले सिंह की प्रवृत्ति रौद्र आदि अन्य अधिक भयंकर जानवरों ( के साथ ) की ओर न दिखलाकर कुत्ते के वध की ओर दिखलाई इसका अभिप्राय काफ़ी सोचने पर भी हम नहीं समझ पाते । यह ठीक है कि जो इस प्रकार होता है वह कुछ का कुछ करने लगता है किन्तु इतने पर भी कविजन प्राणियों की जाति के अनुकूल कार्य को छोड़कर तुच्छ प्राणी के भी किसी जाति विरुद्ध कार्य को ( कविता में ) अपनाते नहीं, क्योंकि वे रसमग्न से डरते हैं, फिर सिंह को तो बात ही क्या ? उनकी चेष्टा तो जगत प्रसिद्ध है । कवियों का कहना है कि एक मात्र औचित्य का विधान हो रसमंग का कारण है । जैसा कि स्वयं उन्हीं ( आनन्दवर्धन ) ने कहा—‘औचित्य को छोड़कर रसमंग का और कोई कारण नहीं । और औचित्य का विधान रस की प्रधान क़ुंजी है ।’ अतः—‘इतस्तत्क्षेप’ ऐसा पाठ अधिक अच्छा है । अर्थात् शेर की जगह रौद्र को कुत्ता मारने के लिये अपना ठीक है ।

विमर्श: ग्रन्थकार ने ध्वनि धार्मिक पथ में अमरण विधान से अमरण निषेध की प्रतीति व्यञ्जना नामक एक अतिरिक्‍त शब्दशक्ति द्वारा मानी थी । ग्रन्थकार का कहना है कि व्यञ्जना के अभाव में भी अनुमान द्वारा इसकी प्रतीति हो सकती है, और ऊपर उसका प्रकट बतलाया । उन्होंने बतलाया कि—‘अमरण विधान के प्रति कुत्सित के भय को निःसृति को कारण बतलाया । इससे सिद्ध होता है कि घूमने वाला भयकर ( डरपोक ) है और वह भयकारण का अभाव ज्ञात होने पर ही कहीं घूम सकता है, यह ठीक है कि यहाँ कुत्तारूपी भयकारण का अभाव है अतः भैरु घूम सकता है, किन्तु उसी के साथ वहीं सिंह रूप भयकारण का सद्भाव बतला दिया गया है, अतः भले ही घूमने को कहा जाय, परन्तु अर्थ वहाँ निकलता है कि भैरु वहाँ न घूमे ।

मम्मट ने इसका खण्डन किया है । उन्होंने वही चाल चली जो अनुमान के खण्डन में प्रत्येक प्रतिवादी चलता है । जब अनुमान का खण्डन करना होता है तो प्रतिवादी अनुमान के हेतु को दूषित ठहराने का प्रयत्न करता है । मम्मट ने भी हेतु को दूषित ठहराने का प्रयत्न किया । उनका कहना है कि—‘भयकरअमरण और भयकारणभावज्ञान में व्यतिरेकी सम्बन्ध नहीं है । कहीं कहीं भय-कारण का ज्ञान होने पर भी भय अमरण देखा जाता है । गुरु की आज्ञा से, प्रिया के अनुराग से या स्वामी के आदेश से व्यक्ति डरता जाता है और आगे बढ़ता जाता है । इसके अतिरिक्त एक बात यह है कि वाच्यार्थ के साथ प्रतिवादमान अर्थ का जो सम्बन्ध होता है उसमें सन्देह रहता है । अनुमिति में हेतु के साथ साध्य का सम्बन्ध निश्चित होता है । ( उसमें सन्देह नहीं होता ) ऐसे ही और भी तक है । इसका उत्तर यह दिया जा सकता है कि हेतु के समान हेत्वाभास से भी अनुमिति होती है । यह अलग बात है कि वह अनुमति प्रमाण-त्मक अर्थात् वाच्यार्थ से अर्थान्तर की प्रतीति भी इसी प्रकार अनुमिति रूप है । उसको काव्य में प्रमाण माना अभीष्ट भी नहीं । व्यञ्जना द्वारा जो अर्थ प्रतीत माना जाता है उसमें भी प्रामाण्यक्ता नहीं मानी जाती । अतः हेत्वाभास से होने वाली अनुमति में पूर्ण व्यञ्जना की अन्तर्भाव हो जाता है । और जहाँ तक ‘अमरण धार्मिक पथ का’ सम्बन्ध है इसमें तो हेतु साध्य में कोई सन्देह नहीं । वक्ता का जो आशय निकलता है उसमें जो हेतु है और जो साध्य वह लोक सिद्ध है । हाँ यह हो सकता है कि यह वत्‍तना ही असत्य मानी जाय । उक्त उदाहरण में विधि से निषेध का अनुमान बतलाया गया और उससे उल्टा निषेध से विधि का अनुमान बतलाया जाता है—

'अत्ता पथ्थ णिमउज्जइ पत्थ अहं दिअसप्प. पलोपहि । मा पहिअ ! रतिअंघअ सेउज्जाअे महँणिमज्जहिसि ।'

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[ ग्रार्यो ग्रात्र निमज्जति ग्रात्र ग्रहं दिवसके प्रलोकय । मा पथिक रात्नयन्त्र ? शब्द्यायां मम निमांक्षीः !! ]

अत्र हि चलितचारित्रशुद्रा प्रोक्षितपथिकयुवति: काश्चिद् युवानं वासरावसानेऽवसन्ति प्रातर्‌थ्यमानसुदिश्योत्पन्नस्मन्थयथाचेशं श्वश्रूसन्निधौ तस्मै शय्यासनं त्रियुक्तुपरिदर्शं निशान्धतिमिरोपगतेषु स्वप्ननिद्रसमर्पणप्रतिषेधमुखेन श्वश्रूश्वशुर्य्यसस्निवेशादेशं दर्‌शयन्ती रात्नावत्र मदीयं एव शयनीयये त्वया निर्भृतमुपस्थातव्यमिति तैरतैराकारै: प्रतिषेधसुमु खेन स्वाभिप्रेतमर्‌थमस्मै निवेदयते ।

आर्यो = सास यहाँ डूवी हुई है ( और ) मैं यहाँ, दिन में हूँ देख ले हे रतौधी से पीडित बढ़ेही ? ऐसा नहीं कि रात में मेरी खाट पर गिरते फिरो ।

प्रसङ्ग—कौई एक चारित्र से च्युत हुई युवती खोई थी, जिसका पति परदेश गया हुआ था । उसने दिन डूबे ठहरने की जगह चाहा रहे किसी युवक रास्तागीर को देखा । उसके प्रति उस क्री के मन में काम व्यथा जाग उठी। किंतु वहाँ उसकी सास थी । उसने इस पथ से सास के सामने अपने अलकों-अलकों स्थान को जोर सेकते किये—और रात में अन्धे होने का आरोप कर अपनी खाट को छूने का निषेध कर उसने सास के सोने को जगह भी दिखलाई और वस्तुतः ऐसा करके उसने—‘अपनी मनचाही रात में मेरे ही विस्तरे पर तुम चुपके से चले आओ—’ यह बात उन-उन चेष्टाओं द्वारा निषेध के बहाने पथिक को बतला दी ।'

तत्र च केचिद्विचित्रस्वरूपस्नैव पथिकस्याकस्मान्निशान्त्यतोऽपक्षेप: श्वश्रूयन्त्रौद्देशदार्शनं चेष्टयुभयन्त्रमिच्छार्घ साधनमिति मन्यन्ते । तद्रशार्घ तस्य नायिकाशय्योद्‌देशोपसर्पणमपि कल्पनीयं स्यादिति । श्वश्रूवाश्र तस्याविच्छिन्नदर्शनसंसकारादेव तदुभयमभिमतं सिध्यति ।

यच्चात्र श्वश्रूयन्त्रादर्शनं तत् तदार्घानिरासार्थमेव न पथिकप्रवर्त्तनाज्ज्ञतां गच्छति । आत्मन एव शयनीयोद्‌देशदार्शनं हि तस्याः शङ्का स्यादिति तत्र शयनीयविप्रकर्षप्रकारानुपरं तदू, इति तत्सूत्रयड्‌मसैवास्तु तदिति च तद्वायुक्तम्, अत्र हि श्वश्रू: प्रत्यग्रया वत्त्रते नान्य । न चायं चिरपरिशीलनावसेयो निशान्धताम्राख्यो हेतुरुस्तां प्रति सिध्य । तथाविधश्रवणादीयमान: प्रत्युत तस्या: शङ्कामुपजनयेत् । उभयार्थकाररी ह्यात्र हेतुरुपादेयो भवति य: न श्वश्र्रा: शङ्कामधत्ते पथिकं च प्रवर्त्तयति । नचायं निशान्त्यतांक्यो हेतुस्तथोक्त दुपन्याय: निशान्त्यतांख्यो हेतुस्तथोक्त दुपदर्शानसंसकारादेव तदुभयसिद्धे: ।

ये तु शयनीययोर्विप्रकर्षदर्शननेनायिकयो: शयकृत्सङ्केतमुक्तवन्तस्तन्मतसङ्कतमुपसङ्गृहीतुमेवोक्तम् ‘अत्र पथ निमज्जति’ इति पठन्ति तेऽप्ययुक्तवादिन: । अनैकान्तिकत्वात् । दृश्यन्ते व्याचलितचारित्राणामपि युवतीनामेवंविधा: सन्दावगर्भा: भणितय: ।

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व्यक्तिविवेक:

एक प्रकार से यहाँ बहुत कुछ सोचने पर भी कोई हेतु समझ में ही नहीं आता। हेतु या तो विधेय ( प्रतियमान ) के अनुकूल हो सकता या प्रतिबंध ( वाच्य ) के या दोनों के। उनमें से पहला ( विधेय 'आ जाना'-के अनुकूल हेतु ) साक्ष के मन में शंका ही पैदा करता है। वह असिद्ध है, ठीक वैसे ही जैसे—शब्द से ( शब्द को हेतु बनाकर ) चाक्षुपता ( का ज्ञान कराना ) दूसरा भी विवाद्यितार्थ को सिद्ध नहीं कर सकता, वह विरुद्ध है, जैसे कि घट की नित्यता सिद्ध करने में उसकी कृत्रिमता ( कृत्रिमवस्तु सदा अनित्य ही होती हैं)। तीसरा उलटा सन्देह ही पैदा करता है, साक्ष्य से उसका निश्चित सम्बन्ध नहीं है। जैसे—('यह मनुष्य है, क्योंकि झूठा है'—इसमें ) झूयत्व का ( मनुष्यत्व )। जैसा कि कहा है—असिद्ध पदार्थ साक्ष्य का हेतु नहीं होता, ( इसी प्रकार ) न तो व्यभिचारी और न उभयाश्रित और न विरुद्ध। ऐसा होने पर साक्ष्य की सत्ता कैसे सँभ सकती है ? और जैसे पहले उदाहरण ( अम धूमिक…… ) में अमण विधान का हेतु ही पर्यालोचन करने पर प्रतिबंध में पर्यवसित होता है, वैसे यहाँ निषेध का हेतु विधान में ( पर्यवसित ) नहीं ( होता )। इसलिये यहां विविध रूप दूसरे अर्थ का ज्ञान हो कैसे सकता है। इसलिये दूसरा, अर्थ जो विधेय है, उसके प्रति कोई ठीक कारण नहीं होने से उसकी प्रतीति नहीं होती। इसलिये वह व्यभिचार भी कैसे हो सकता है। अतः यह उदाहरण ही गलत है।

व्रज ममैकस्या भवन्तु निःश्वासरोदितग्यानि । मा तुज्झा वि तिप्प विण दक्खि॑हणहुअस्स जआन्तु ॥ [ व्रज ममैकस्या भवन्तु निःश्वासरोदितग्यानि । मा त्वापि तया विना दाक्षिण्यहततस्य जायन्ताम् ॥ ]

अत्र कयाचित् खादितयातर्ज्ज्वालितेष्ट्र्याप्रकोपया सवहित्थं सोल्लुण्ठनं सप्रणयौचित्यं च यः प्रियं प्रति भेदो विहितरसतत्र तस्यामेव भवन्निव्र्याजम- तुरक्तहृदयो मयि तु किञ्चित् ! तच कृत्रकोपचारवचनरचनामात्रमेतदिति नाय- कस्यान्यत्रानुरागातिशायः साध्यः ।

तत्र च गच्छ्छ लघिरहविलतानि निःश्वासरोदितानि भववन्तु मा त्वापि दाक्षिण्यमात्राच्चिवशस्य तया चिना तानि भव्वति तत् तस्य प्रस्थानानुमतिहेतुः । प्रस्थाने हि तस्य तद्दिरहविरतिः । तद्दिरतां च तद्देतुकां निःश्वासरोदनादिदुःखानामपि विरतिः । स्नेहोत्तरेषां विधायिनां हि प्राणिनां विरहव्यथावेश भवन्ति तेषां तत्कार्येत्वात् कार्यकारणभावश्रैषामध्यात्मप्रसाणासिद्धः । धमिङि सन्द्रावसिद्ध- श्वास्य हेतोस्सतोडसस्ल एव चा प्रतिषेधसामध्योदवसीयते, प्राप्तिपूर्वकं हि प्रतिषेधा भवन्तीति ।

तस्य च सत्यासत्यत्वविचारो निरुपयोग एव प्रतीतिमात्रपरमार्थत्वात् काव्यनाट्यादीनामिति विरहव्यथावसितोडनुरागातिशायः कान्तस्यानुमेय एव भवति, न व्यङ्गच इत्यवसीयम् ।

'जाओ मुझी अकेली के उदास और आँसू बहें, तुम जो मेरे मुलाहिजे में यहाँ चले आये हो, इससे ऐसा न हो कि उसके बिना तुम्हारे भी बहने लगे ?'

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एक खण्डिता ने जिसके भीतर इंद्रियों—कोप जल रहा था अपनी मंसा छिपाते हुये उलहने के साथ और प्रीति की रीत निवाहते हुये प्रिय के प्रति यह ‘जाओ’ कह कर अपनी तटस्थता वतलाई उससे यह झलकता है कि श्रीमान् उसी खी पर निश्चित् रूप से चित लगाये हुए है, मेरे साथ तो तुम कोरा व्यवहार निवाह रहे हो । इस प्रकार यहां नायक का दूसरी खी में अधिक अनुराग साध्य है ।

उसमें—‘जाओ तुम्हारे विरह से उत्पन्न विश्राम और रोदन—माथा की अवेली को झेलने पढ़े उसके बिना एकमात्र मेरे दाक्षिण्य में पड़े तुम्हें भी न झेलने पड़े । इस प्रकार जो प्रस्थान ( जाने ) की अनुमति है वह हेतु है । क्योंकि उसके प्रस्थान से उसके विरह की शान्ति संभव है और उस कारण उस विरह से उत्पन्न निश्वास और रोदन आदि के दुःख को । प्राणियों को जो विरह व्यथा की लहर उठती है वह स्नेह की बढ़ौती के कारण । क्योंकि विरह व्यथा की लहर स्नेह का कार्य है ( स्नेह से उत्पन्न होती है ) । इस प्रकार इनका कार्यकारणभावसम्बन्ध स्वयं अनुभव से सिद्ध है । धर्मी अर्थात्—पक्ष में इस हेतु के समर्थन की सिद्धि ( आँसू से रोदन न हो इस ) निपेध के आधार पर होती है भले ही वह ( निपेध ) सच्चा हो या झूठा । कारण कि निपेध तब होता है जब वस्तु की प्राप्ति ( सत्ता ) रहती है । उस ( निपेध ) के सच या झूठ होने का विचार फिजूल ही है । क्योंकि कार्य और नाटक का फल केवल ज्ञान करा देना भर है । इसलिये प्रिय का अनुराग विरह व्यथा से जाना जाता है । फलतः वह अनुमेय हो हुआ । वयक्ष्य नहीं—ऐसा समझना चाहिये ।

‘दे आ पसिअ णअत्तसु अहहससिजोअद्वाहिचुलुत्ततणणिवहे ? । अहिसारिआणं विग्गहं करेसि अण्णाणं वि हआसे ! ॥’ इति ।

[ प्राथये तावत् प्रसीद निवर्तस्व मुखशशिरुज्योत्स्नाच्छुलुसतनो निवहे । श्रमिसारिकाणां विग्रहं करोशि न्यासामपि हताशो ! ॥ ]

अत्र कान्चित् कामपि निशान्धकाराभिसरणसमुद्रतां सहजसौन्दर्यंका- न्निकमनोयमुखीं सक्रीमालोक्य मुदितान्तःकरणा प्रणयोपालम्भनिभेन तस्यास्तां रूपसम्पदंमिस्थमुपवर्ण्यते—इति चाटुकार्थोंडत्र प्रतीमानोडनुमेयः ।

तत्र च वाच्यस्य प्रतिषेधानुपपत्तिरेव हेतुः । तदनुपपत्तेश्च सम्बोधनद्वा- रेणोपात्तस्य मुखशशिरुज्योत्स्नाविलुसततनो निवहतस्य हेतोरर्थस्यासिद्धे:, परमार्थतो माजुश्रीमात्रस्य तथाविधाया वदनेन्दुकान्तेरसभ्भवात् ।

अतस्तस्यास्तदन्यासां चाभिसारिकाणामभिसरणविग्रह न सम्भव- तीति तत्प्रतिषेधप्रणयप्रयासस्सस्सख्यास्तस्यामनर्थक एवेति प्रतिषेधविधेरनुप- पत्तिसिद्धिः।

अतों वदनेन्दुकान्तेर्यदेद्विलुसततनो निवहतवधूपात्तं तद्न्यथानुपपद्यमानं वदनस्य कान्त्यातिरेकलक्षणमर्य्यान्तरमेव चाटुरुपमया भ्रद्याजनुमापयति कान्त्यातिरेकमनन्तरेण निर्मूलसस्य तदतिरायारोपस्य लोकैकरसाहततत्त्वादिति तत्- माणसिद्ध एवनयोः समबन्धो बोद्धव्यः ।

‘प्राथेना करती हूँ मत जा लौट चल । तू अपने मुखचन्द्र की किरणों से रास्ते की अंधियारी दूर कर रही है तथा हे इतासो और दूसरी अभिसारिकाओं को भी विग्रह पहुँचा रही है ।’

यहाँ—किसी सखी ने अँधेरी रात में अपनी सखी को चोरी से प्रिय के पास जाते देखा ।

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सखी का चेहरा स्वाभाविक सौन्दर्य की लुनाई से दमक रहा था। सखी को देखकर उसे काफी खुशी हुई और उसने नेह भरती बोली बोलते हुए उसकी रूपराशि का इस प्रकार वर्णन किया है। इसलिये यहाँ चाटरूप अर्थ प्रतीयमान है। वह अनुमान से प्रतीत होता है। उसमें वाच्यार्थ का जो प्रतिषेध किया गया है वह नहीं बनता। वही हेतु है। उसके न बनने का कारण यह है कि सम्बोधन द्वारा जो (नायिका को) मुखचन्द्र की रोशनी से अन्यकार को नष्ट कर देने का विशेषण (मुखशशि—निवहे) दिया है, जो अभिसारिकाओं के गमनागमन में विप्र का आरम्भ हेतु है, वह नहीं बनता, कारण कि जो स्त्री केवल मानुषी हो उसके मुख में इतनी अधिक कान्ति का होना संभव नहीं। इसलिये उस नायिका में अन्य अभिसारिकाओं के अभिसरण में विप्र करना सिद्ध नहीं होता, फलतः उसके विध्व के लिये सखी का उस नायिका के प्रति किया गया प्रयत्न बेकार है। इस प्रकार प्रतिषेध कार्य नहीं बनता। इसलिये मुखचन्द्र की कान्ति में जो यह अन्यकारपुञ्ज के नाश करने का गुण वतलाया गया है वह और किसी प्रकार सिद्ध नहीं होता, निदान वह मुख में अत्यधिक कान्तिरूप दूसरे अर्थ की सिद्धि करता है जो चाटरूप है। कथन के इस ढंग से वह उसी का अनुमान कराती है। यदि अत्यधिक कान्ति न हो तो उसका आरोप भी संभव नहीं। अतः उसे लोग मान नहीं सकते। इसलिये लोक-प्रमाण से ही उन दोनों का सम्बन्ध सिद्ध होता है।

'कस्य व ण होइ रोसो दटूण पिआए सच्चणं अह्हरम्। सब्भमरपदुमाधाइणि वारिअवामे सहसु णहिम्॥' [ कस्य वा न भवति रोशो हृदयम् प्रियायाः सज्जनस्य । सहसमरपद्माश्रायिणि ? वारितवामे ! सहस्रवेदानिम्न्॥ ]

अत्र काचिद् विदधा सखी कामपि कामुकान्तिके परपुरुपपरिक्षताधर- पल्लवामालोक्य तदसहिनस्वभावं च तं कामुकमाकलध्य तस्यापरपरिभोग- गराहाकलड्कमपाकर्तुं मघरक्षतस्यान्यथासिद्धत्वमुपालम्भनिभेन तामाह । तत्र सवरणवहलभाधरदलदर्शन् सर्वस्यैव कामुकलोकस्येष्यप्रकोपकरणं भवतीति व्यतिव्यतिगम्।। तथा च वारितवामाश्रयो जघनाश्रोलि- यास्तच्चिनन्धनमिदमघरस्य सज्जरणत्वमिति पक्षधर्मोपसंहारः । सद्यतामिदानीं तस्य निजस्याविनयस्य विपाकः प्रियतमप्रकोपरूपस्त्वयि निगमननिदर्शः । इयं वाच्यार्थेविषयः साध्यसाधनभावस्तावत् स्पष्ट एव ।

अनुमेयार्थविषये तु तस्मिन् परपुरुषपरिभोगगराहाकलिङ्के निरासः साध्यः । तस्य सभ्रमराम्भोजप्राणशोलत्चेन सम्वोधनसम्पिंतेनानुमितमघरपल्लवपरिक्षते- रप्यथासिद्धत्वमाश्रों हेतुः । तयोश्चाविनाभावनियमोऽनुरागिणामध्यात्मप्रमाण- सिद्ध एवेति सिद्धम् ।

अत्र वाच्यानुमेययोरर्थयोरपि प्रतीतावनुमेय एव विश्रान्तिर्न वाच्ये तस्य तदुक्तमेव ।

'प्रिया के अधर को धायल देख किसे रोष नहीं होता इसलिये, अरी मौरें से युक्त कमल को सूँघने की शौकीन और मना करने पर उलटी-चलने वालों—तू अपना किया भोग । यहाँ कर्ई चतुर सखी कामुक को लक्ष्य करके कह रही है। उसने किसी सखी को दूसरे पुरुष द्वारा अधर

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दोता है जिसमें उपचार किया जाता है (तट आदि), और वहाँ प्रधान (भी) होता है। उनका जो अविनाभावसम्बन्ध है वह लोकप्रसिद्धि से सिद्ध है और जो साध्य होता है वहाँ अनुमेय ही दोता है उसे शब्द से नहीं कहा जाता है। जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है।

'शिखरिणि क नु नाम कियचिरं किमविधानमसाकरोत्पलः । तरुणि ! येन तवाधरपल्लवं दर्शयन् बिम्बफलं शुश्राववाक्;' इति ।

अत्र त्वदधरपल्लवपरिचुम्बनासृतं नार्पपुण्यः पुमानासाद्यतेऽत्रति चाटु- करुपोडर्थः साध्यः । तत्तादृशलावलाम्बिनो बिम्बफलस्यापि परिखण्डन- विधौ शुश्रावावकस्य लोकोत्तरतपःपरिणामशालित्वसमारोपो हेतुः ।

यत्र खलु यत्साध्यसदृशावमात्रभाजो भावस्य पुण्योपचयपरितिश्रमपरि- प्रापणीयत्वमात्रादृश्यते तत्र तस्य तत्सम्बन्धिनो मुख्यस्यैव तत् कथं नावग- म्यते । तस्मादत्रापि साध्यासाधनभावगर्भतैवोपपत्तेः सिद्धम् ।

'कौन से पहाड़ पर कितने दिनों तक किस नाम का तप किया है । इसने कि हे तरुणि ! यह तोते का बच्चा तुम्हारे अधर के समान पाटल (श्वेतरक्त) बिम्बफल को डँस रहा है ।'

यहाँ 'जो अधिक पुण्यात्मा होता है वहाँ तुम्हारे अधरपल्लव के चुम्बनासृत को पाता है यह नाड्रूप अर्थ साध्य है । हेतु है—'अधर के समान बिम्बफल के काटने में शुश्रावावक के ऊपर अदृष्ट अलौकिक तप के फल से युक्त होने का आरोप ।' जहाँ वस्तु के केवल साधुर्य से युक्त वस्तु को राशि राशि पुण्य जोड़ने के श्रम से लभ्य बतलाया जा रहा हो वहाँ स्वयम् उस वस्तु में वह (पुण्याति- तिशय से लभ्य होना) क्यों नहीं जाना जा सकता । इसलिए यहाँ भी वाक्यार्थे में साधनभाव है ही ।

'स्त्रिग्धश्यामलकान्तिलिलसितवियतो वेलावडलाका घना वाताः शोकरिणः पयोदसुहृदामनन्दकेकाः कलाः ।

कामं सन्तु हृदयं कठोरहृदयो रामोऽपि सवैंः सहै- वैदेही तु कथं भविष्यति हहा हा देवि ! घोरं भव ।' इति ।

अत्र मदनदहनोपीपनचन्द्रोदयौद्योगानादिदारणपदार्थसार्थदर्शीन्दुःखसहि- ष्णुत्वं नाम रामस्य साध्यम् । तत्र च रामत्वमेवार्थो हेतुः ।

रामशब्दो ह्ययं स्वेच्छापरिलकिपतप्रकरणाद्यवसेयसकलक्लेशभाजनत्व- लक्षणधर्मविशिष्टं संबिनं प्रत्याययति न संज्ञिमात्रम् । तयोश्व व्यतिपक- भावलक्षणः सम्बन्धः प्रसिद्धिरुतोऽध्यात्मप्रसिद्ध एवगन्तव्यः, यथा वृक्ष- शिंशापयोः ।

यच्च तद्गुणितं धर्मान्तरं तत् सर्वसहत्वस्योपपत्तेः साधनं, न रामत्व- मेवेत्यजुमितानुमेयं तत् । एवमस्मीत्यस्मदर्थे धर्मिणि रामत्वमात्रनिबन्धनाया सकलक्लेशभाजनत्वलक्षणसाध्यधर्मसिद्धौ स्फुटं प्रवास्यानुमानान्तरभावः ।

ततश्व रामस्य यत् कठोरहृदयत्वाभिधानं तत् पुनरुक्तमेव, अनुवादपक्षस्या- तितुच्छत्वात् ।

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वृत्तीयो विमर्शः

‘भले ही—मेघ चिकनी और श्याम आभा से आसमान लीपें; उनमें बगुलों की पांत भी जुड़ती रहें, फहराते लेकर हवा के झोंके बहें, मेघों के मित्रों ( मयूरों ) को आनन्द से भरी सुन्दर केंकड़ा कूजे, ( परन्तु ) मैं तो राम हूँ, कठोर हृदय वाला, सब कुछ सह लूँगा । परन्तु, हाय-हाय सीता का क्या होगा । हे देवि ? तुम भी धीरज रखना ।’ यहाँ—राम द्वारा कामादि को बढ़ाने वाले चन्द्रोदय, उद्यान आदि दारुण पदार्थों के देखने के दु:ख को सहना साध्य है। यहाँ रामत्व ही हेतु है, वह आर्थ है । यह जो राम शब्द है वह केवल संज्ञानान् को नहीं वतलाता, आप्तु उस संज्ञानान् को वतलाता है जिसमें अपनी इच्छा से कल्पित प्रकरणादि द्वारा समझ में आने वाला—‘क्लेशाभाजनत्व’—रूप धर्मों का बोध होता है । उन ( रामत्व और क्लेशसहित्वरूप धर्मों ) का व्याध्यव्याप्यभाव रूप सम्बन्ध प्रसिद्ध ही है, अर्थात् वह अध्यात्म ( स्वानुभूति ) प्रमाण से ही सिद्ध है । ठीक वैसे ही जैसे वृक्ष ( सामान्य ) और ( उसका कोई एक भेद ) अश्वत्थ आदि का ।

जो ( सकलक्लेशसहिष्णुत्व ) दूसरा धर्म उस ( रामत्व ) से अनुमित हो रहा है वह शाब्दतः कथित सर्वसहिष्णुता का साधक हेतु है; इस प्रकार केवल रामत्व ही ( वियोगदुःखसहिष्णुत्व रूप धर्मे कथित सर्वसहिष्णुता का साधक हेतु है,—अपितु रामत्व से अनुमित ( क्लेशाभाजनत्व ) धर्म में भी उसका अनुमापक नहीं है । अतः वियोगानुभवसहिष्णुता धर्म में अनुमित अर्थ द्वारा अनुमित होता है ।

इसो प्रकार ‘अस्मि’ यहाँ अस्मद् शब्द का अर्थ ( मैं धर्मी ) है । उसमें केवल ‘रामत्व’ से सब प्रकार के दु:खभाजनत्व ( रूपी ) धर्म की सिद्धि होती है । अतः स्पष्ट रूप से ही इसका अनुमान में अन्तर्भाव है । और राम की कठोरहृदयता का जो कष्पन है वह पुनरुक्त है । ऐसा करने से अनुवाद पक्ष ( ‘कठोरहृदय मैं सब कुछ सह सकता हूँ’ )—इसमें जो कठोरहृदय मैं अनुवाद्यांश है वह ) अति हेय हो जाता है । ( क्योंकि वह सदोष हो जाता है ) ।

विमर्शः : ‘राम वियोग को सह सकने हैं यह है—तात्पर्यभूत अनुमेय । उसका हेतु है—रामत्व और ऐसा रामत्व जिसमें सर्वविधदुःखसहिष्णुत्व का अनुमान होता है और यह अनुमित धर्म में भी रामत्व के साथ-साथ वियोग सहने की क्षमता का अनुमान कराता है, अतः वियोग-दुःख को सहने की क्षमता अनुमित अर्थ से अनुमित होती है, वह अनुमितानुमेय है । ‘सर्वविधदुःख-सहिष्णुत्व’ धर्म की एक विशेषता यह भी है कि वह अनुमित वियोगसहिष्णुत्व के साथ ही—‘सर्व सहेँ’ इत्यादि प्रकार कथित सर्वसहिष्णुता का भी हेतु है ।

‘ताला जान्ति गुणा जाला दे सहितअपहि घेघ्पन्ति । रविफिरणाणुगहिआइ होन्ति कमलाइ कमलाइ ।।’

[ तदा जायन्ते गुणा यदा ते सहदयगृहीयते । रविकिरणानुगृहीतानी भवन्ति कमलानि कमलानि ]

इत्यग्राद्यस्तावत् कमलशब्दः सामान्यचृत्तिद्रितीयो विशेषवृत्तिः । स चास्य विशेषो निरतिशयशोभाभिरामत लक्षणोऽर्थः प्रकरणादिगम्यो रविकि-रूणा नुगृहीतिः प्रमाणान्तरसिद्धस्सामान्यनिष्ठोऽनुमेयः; । तत्र च तयोः सामान्यान्यवशेषार्थयोरविजातीयोरपि सजातीययोरप्यारोप्यारोपकभाव एव हेतुः; यथा सिंहो माणवक इति ।

न च भिन्नजातीयत्वमेवार्थानामादरोपिबन्धनमिति नियमः सम्भवति

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भाग में क्षत ( घाव ) युक्त देखा और सोचा कि वह कामुक ऐसी घटना को सह नहीं सक्ता तो उस सखी के अन्यत्र भोग की शंका के कलंक को दूर करने के लिये उपालम्भ के बहाने अधरतण को और किस्सी कारण से उत्पन्न बतलाने के लिये यह कहती है। इस कचन में व्यासि-कथन है—‘प्रत्येक कामुक के लिये अपनी प्रिया के घायल प्रियाधर का दर्शन इष्ट्याजनित प्रकोप का कारण होता है।’

‘तुझे मना करने पर और उलटी चलने वाली और भौरे युक्त कमल को सूँघने वाली के अधर में घाव हुआ—यह पक्ष में धर्म ( हेतु ) का कथन हुआ।’

‘अब तू अपनी दुष्टता का फल ‘प्रिय का रोष’ सह’ यह हुआ निगमन। इस प्रकार वाच्यार्थ में आया साध्यसाधनभाव तो साफ है। अनुभेय अर्थ के विषय में—जो साध्यसाधनभाव है उसमें परपुरुष शंका का निरास ( हताना ) साध्य है। उसमें जो हेतु दिया गया है वह अर्थ है वह—संबोधन द्वारा बतलाया गया है। संबोधन का अर्थ है—‘भौरे से युक्त कमल को सूँघने के चौकौन’। इसमें ‘अधर के क्षतियुक्त होने का कारण और ही कोई है’ यही है ( उस अनुभेयार्थ के प्रति) हेतु। साध्य और साधन ( हेतु ) का व्यासि-संबंध अनुरागियों में अपने अनुभव से सिद्ध है।’

यहाँ प्रतीति दोनों की होती है वाच्य की भी और अनुभेय की भी। परंतु वाक्यार्थ की प्रतिपत्ति अनुमेय में ही होती है; वाच्य में नहीं, कारण कि वाच्य अनुमेय का अंग है। ऐसा कहा जा चुका है।

‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषाख्रय:। शूरश्र कृत्तविद्याश्र यश्र जानाति सेवितुम् ॥’ इति। अत्र शूरादीनां त्रयाणां सर्वत्रैव स्वाधीनाः सम्पदो भवन्तीति साध्यम् । तत्र सुवर्णपुष्पपृथिवीचयने कर्तृत्वाभिधानं तेषां हेतुः। तद्वि मुख्यमनुपपद्यमानां वाक्यार्थोपचारगत्या तत्सदृशामेव सर्वत्र सुलभविभवत्वमनुमापयति यथा पदाथोंपचारे गड्गायां घोष इत्यत्र गङ्गाशब्दो गढ़ासमीपवर्ति तटम् ।

द्विविधो ह्युपचार इष्यः, पदार्थवाक्यार्थविषयत्वात् उपचारे च वाच्यस्योपपायतत्वात् अप्रधान्ये सत्यविवक्षितत्वमेव भवति, उपचारविषयस्यैवोपेयतया प्राधान्यात् । तयोश्च प्रसिद्धितृत एवाविनाभावनियमोडवगन्तव्यः, साध्य-सोनं फूलती धरतां को बड़ोरतें हैं तीन लोग शूर, विद्वान्, और सेवा की कला जानने वाला।’ यहाँ साध्य है—‘शूर आदि तीन लोगों के लिये सम्पदाएँ सदा स्वाधीन रहती है।’ उसमें हेतु है सुवर्णपुष्पा पृथिवों के बड़ोरने में उन ( शूर आदि ) को कर्त्ता बतलाना। वह ( सुवर्णपुष्पा पृथिवी का बटोरना ) मुख्य ( बटोरने ) में तो वनता नहीं, इसलिए उपचारदृष्टि ( लक्शगा ) से तद्वि मुख्यमनुपपद्यमानां वाक्यार्थोपचारगत्या तत्सदृशामेव सर्वत्र सुलभविभवत्वमनुमापयति यथा पदाथोंपचारे गड्गायां घोष इत्यत्र गङ्गाशब्दो गढ़ासमीपवर्ति तटम् ।

उपचार दो प्रकार का मान्य है, पदार्थविषयक और वाक्यार्थविषयक। उपचार में वाक्य उपाय ( हेतु ) होता है। अतः वह अप्रधान होने से विवक्षाविषयक नहीं होता। उपाय ( साध्य ) वही

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तृतीयो विमर्शः

आकारविशेषाणां हेतुत्वपरिकल्पनमुपपादासायैव तेषां वाच्यत्वाभावात् वाच्यस्यैव व्यकक्तत्वेन प्रकृतत्वात् ।

यहाँ कुछ लोग दो पदार्थों को 'अव्यभिचारी हेतु' मानते हैं—एक पथिक पर एक-एक रात्रि बंधता का आरोप जो पथिक के स्वरूप को बिना जाने ही किया गया है और दूसरा अपने बिछौने की जगह का बतलाना। उसी के आधार पर पथिक के स्वाभाविक बिछौने तक पहुँचने की कल्पना की जा सकती है। और सास की उस नायिका के प्रति चांचल्य-शंका दूर हो जाती है। इस प्रकार दोनों अभीष्ट बातें सध जाती हैं और यहाँ जो सास के विस्तार का दिखलाना है वह केवल उस ( सास ) को आशंका को दूर करने के लिये ही है। वह पथिक की प्रवृत्ति में कारण नहीं बनता। यदि वह केवल अपना बिछौना ही दिखलाती तो सास को शंका हो जाती। अथवा ( उसे ) साम के बिछौने की दूरी बतलाने के लिये माना जा सकता है, इससे वह ( सास के बिछौने का निर्देश ) पथिक की प्रवृत्ति का अंग भी बन सकता है ।¹—यह सब युक्तिसंगत नहीं है। यहाँ केवल सास को भरोसा दिलाना है, और किसी व्यक्ति को नहीं । उसके प्रति यह 'निःशङ्कता' रूपी हेतु नहीं बनता, कारण कि वह बहुत कुछ सोचने के बाद समझ में आता है । बल्कि ऐसा हेतु देने से तो उलटी शंका हो सकती है । ऐसी जगह जो हेतु दिया जाता है, उसे दोनों ओर लगने वाला होना चाहिये जिससे सास को भी शंका न हो और पथिक भी प्रवृत्त हो सके । निःशङ्कता रूप हेतु वैसा नहीं है, अतः उसे देना व्यर्थ है और यह निःशङ्कता का उल्लेख दोनों ही पक्षों में किसी काम का नहीं। केवल बिछौने की जगह बतलाने पर से वे दोनों ( सास का विश्वास और पथिक की प्रवृत्ति रूपी ) काम बन जाते हैं । जो लोग यह कहते हैं कि विस्तारों का उल्लेख इसलिये किया गया है कि पथिक यह समझ जाय कि वे लोग दूर से सास को दिखलार्ड न देंगे, यह बात अनुमान से आती है और उसे पथिक का आमंत्रण प्रतीत होता है, इसलिये 'सास यहाँ ड़बी है'—ऐसा कहा गया, उनके पास भी कोई अच्छी युक्ति नहीं है। कारण कि यह हेतु साध्य के साथ नित्य सम्बद्ध नहीं हैं। ऐसी भी कुछ युक्तियाँ दिखाई देती हैं जो साध्वी होती हैं और एक मात्र संदर्भ से युक्त बात कहती हैं । आकारविशेष को कारण मानना मजाक की बात है, ये यहाँ कहीं नहीं गई हैं, और जो कहा जाता है 'वहीं व्यभिचार माना जाता है ।'

किश्चात्र निरूप्यमाणो हेतुरेव न लभ्यते । स हि विधेयानुगुणो वा स्यात् प्रतिबेध्यानुगुणो वा । तत्राद्यः श्वश्रूः शङ्कामेव जनयेदसिद्धत्वाच्छुष्रूषत्वादिति । द्वितीयो न विवक्षितार्थसिद्धिहेतुत्वात् कृतकत्वमिव नित्यत्वे । तृतीयस्तु सन्देहमेव जनयत्यनेकान्तिकत्वात् । प्रभेयत्वादिवदिति ।

'नासिद्धो भावधर्मोऽस्ति तद्व्यभिचार्युभयाश्रयः । धर्मों विरुद्धो भावस्य स न सत्ता साध्यते कथम् ॥' इति ।

अपि च तत्र यथाच उदाहरणे भ्रमणविधिहेतुरेव निरूप्यमाणः प्रतिबेधे पर्यवस्यति न तथेह प्रतिषेधहेतुरेव विधाविति कुतो विधिरूपार्थान्तरप्रतीति-सिद्धिः । तस्माद्विधेयस्यार्थान्तरस्य निवन्धनाभावात् प्रतीतिरेव नास्तीति कुतस्तस्य व्यभिचारत्वमित्युक्तमेवेदमुदाहरणम् ।

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अथ तृतीयो विमर्शः:

तदेवं ध्यानिलक्षणस्य तद्भेदानां चानुमानेडनन्तभावसुपपाद्य सम्प्रति तदुदाहरणानां यथायोगं क्रमेणासाभुपदर्श्यते । तत्र वस्तुमात्रस्य तावत्—

'भम धम्मिअ! चीसद्धों सो सुणओ अज्ज मारिओ देहो । गोआणइकच्छकुडण्वासिणा दरिअसीहेण ॥' इति ।

[ भ्रम धार्मिक ! शृणु अद्य मारितस्तेन गोदानदीकच्छकुड्यवासिना हरिसिंहेन ॥ ]

अथ केनचित् सुकविना यूनां सह विरामभस्सम्पभोगसुखास्वादलालसया विजने वने विविधकुसुमामोदमुदितमधुक्रुति कृतसज्जंतया कयाचित् कुसुमापचितोषया भ्रमतां धार्मिकस्य मनोरथपरिपन्थि तद्देशासादनं विह्रभिच मन्यमानया जानानयापि केसरिकिशोरकस्य कौर्यांतिकं कुक्कुरमारणमात्रत्रासोपन्यासेनास्य धियामवेदयितुकामया विदग्धयापि मुग्धयेव विधि-

मुखेन भ्रमणस्य प्रतिषेधो चिहितः ।

अत्र हि द्वावर्थौं वाच्यप्रतीयमानौ विधिनिषेधात्मकौ क्रमेण प्रतीतिपथमवतरत:, तयोर्धर्माग्न्योरिव साध्यसाधनभावेनावस्थानात् । तत्राद्यस्तावद्विवेकसिद्धः स्पष्ट एव, भ्रमणविधिलक्षणस्य साध्यस्य तत्परिपन्थिकुक्कुरमारणात्मनः साधनस्य चोभयोरस्युपादानात्।

द्वितीयस्त्वत् पच हेतोः पर्यालोचितणिजर्थस्य विवेकिनः प्रतिपत्तुः प्रयोजकस्वरूपणिरूपणेन सामर्थ्यात् प्रतीतिमवतरति । तच्च सामर्थ्य मृतेऽपि कौलेयके कृततरसृप सर्वान्तरस्य तत् सद्भावावेदनं नाम नापरम् । तदेव च साधनम् । तयोश्च साध्यसाधनयोरविनाभावनियमो विरोधमूलः । स चानयोलोंकप्रमाणसिद्ध इत्युक्तम् ।

तो इस प्रकार ध्यानि के लक्षण और उस ( ध्यानि ) के प्रभेदों का अनुमान में अन्तर्भाव सिद्ध किया अब क्रम से उस ( ध्यानि ) के उदाहरणों का यथायोग [उस्सी अनुतमान में]अन्तर्भाव दिखलाया जाता है । उन ( ध्यानि-उदाहरणों ) में पहले वस्तुमात्र का उदाहरण—‘हे धार्मिक, बेखटके घूम । वह दुष्ट कुत्ता आज उस गोदावरी के कछार की झुरमुट में रह रहे हनुमत् सिंह ने मार डाला ।’ ( प्रसंग )—एक चतुर नायिका किसी भाग्यवान् युवक के साथ सुरत का निर्भंर आस्वाद लेना चाहती थी । उसने एक निजनवन में जहाँ भौंति-भौंति के फूलों की सुगन्ध से भौरे आनन्द कर रहे थे, उस युवक से मिलने का समय निश्चित किया । किन्तु उसे वहाँ फूल तोड़ने के लिये झुकता हुआ एक धार्मिक दिखाई दिया । नायिका नहीं चाहती थी कि धार्मिक वहाँ पहुँचे ।

उसने उसे चित्त माना और उसे रोकने के लिये चतुर होते हुए भी भोली भाली बनकर उसने

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द्वितीयो विमर्शः

यत्वं च न प्रतोयेत। तस्याभिधानात्मन इतिना व्यवच्छेदात् , अन्यस्य च ध्वनेरनुपददानात् ।

स ह्यभावादिधर्माधिकरणभावेन सर्वनामपरामर्शयोग्योडवश्यमुपादेयः, नचोपात्तः । यश्रोपात्तः स तदभिधानानुकारस्वरूपमात्रप्रधा्नो नार्थाभिमुख इतो काव्यात्मनः पवाथस्य तदधिकरणभावो विशन्यते न ध्वनेन ।

स हि तत् संबामात्रं। यत् स एवाह 'काव्यस्यात्मा ध्वनिसं-

क्षित' इति ।

( ये दोष महानकवियों में भी कठिनाइँ से दिखाई पड़ते हैं ) क्योंकि ( कविता की तो बात दूर रहे ) साधारण सी बात को लेकर बनाये गये पदसमुदाय ( वाक्य ) में भी ये दिखाई देते ही है । जैसे—और दूसरों ( आनन्दवर्धनाचार्य ) का ( पथ )—

“काव्य की आत्मा ध्वनि' इस प्रकार विद्वानों ने जिसे पहले ही स्पष्ट घोषित किया है, दूसरों ने उसका अभाव बतलाया, दूसरों ने उसे भक्ति कहा, किन्हों ने उसके तत्व को वाणी के अविषय में स्थित माना, इसलिए सहृदयों के मन को प्रसन्नता के लिये 'हम उसका स्वरूप बतलाते है' यह ।

यहां पहले तो इसमें 'काव्य की आत्मा ध्वनिरिति' इस प्रकार इति शब्द में कम भेद है । उसका प्रयोग काव्यात्मा पद के बाद 'काव्यस्यात्मेति'-इस प्रकार किया जाना चाहिये नहीं तो इस ( इति ) का सम्बन्ध ध्वनि से ही ज्ञात होता है, तब उसका सर्वनाम से परामर्श नहीं होता, इसलिए उसके अभाव, भक्तितत्व और वागविषयत्व का बोध नहीं होता, क्योंकि उस ( ध्वनि ) का नाम—शब्द बनकर रह जाता है । अन्य किसी ध्वनि का प्रयोग किया नहीं गया है, ( जिससे अभाव आदि के सम्बन्ध के लिये सर्वनाम परामर्श हो सके ) उस ( दूसरे ध्वनि शब्द ) कहा जो अभाव आदि का अधिकरण बन सके और सर्वनाम परामर्शो के योग्य हो, अवश्य ही प्रयोग होना चाहिये परन्तु प्रयोग नहीं हुआ । जिसका प्रयोग हुआ है उसमें उस ( ध्वनि तत्व ) के नाम शब्द का अनुकरण मात्र प्रधान है, वह अर्थ ( ध्वनि अर्थ ) की ओर नहीं बढता, इसलिए अभाव आदि की अधिकरणता ( उलटे ) काव्यात्मा में ही समझ पड़ती है । ध्वनि में नहीं । ध्वनि केवल संज्ञारूप है, इसमें स्वयं ध्वनिकार का 'काव्य की आत्मा ध्वनि नामक'—यह वाक्य प्रमाण है ।

तच्चानिष्टमेव। न हि केचित् काव्यात्मनो रसादिरभावं भाक्तत्वं वाभ्युपगच्छन्ति । मुख्यचर्य्या च काव्यात्मशब्दवाच्यो रसादिरेव युक्तो नापरः ।

तदभावे प्रतोयमानाथनतरसंस्पर्शोंऽव्यथापस्यादिवाक्यवत् काव्यस्य निर्ज्ज-

वतच्च रसस्वरूपमुपक्रम्य स एवाह—

‘काव्यस्यात्मा स पवार्थस्तथा चादिकवे: पुरा ।

कौश्रद्रव्द्रविगोस्त्र: शोक: शोकत्वमागत: ॥' इति ।

और वह ( काव्यात्मा में—अभाव आदि का अधिकरणत्व ) मान्य नहीं । काव्यात्मा है—रस

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द्वितीयो विमर्शः ४५९

ज्योत्स्नावती है, अतः त्रिलोकी भूषण है, इस प्रकार, वह व्यवच्छेदक नहीं है—ऐसा स्वयं आगे कहा जायेगा ।

अथ काव्यात्मानुवादेन विहितस्य ध्वने: समाख्यानक्रियाकर्मभावावच्छेद-

देन सञ्जुदायादयमितिशब्द: प्रयुक्त इत्यर्थप्रधान पवायं ध्वनिशब्दो न स्वरूप-

प्रधान इति तस्य सङ्केतनपरामर्शयोग्यत्स्याभिव्यक्तिदशमम्बन्धी घटत एव तथा हि वाक्यार्थावच्छेद: प्रतीयेत, तत्क्ष तत्परामर्शिन:

सर्वनामपदादेरञ्पुसकलिङ्गनिर्देशाप्रसङ्ग: । यथा—‘तदवितथमेव मन्ये विषया

आशीविषा इति यदाहु: । इति ।

तस्मादात्मशब्दान्तरमेवाऽऽश्रितिशब्द: प्रयोक्तव्य: । स च हेत्वर्थकवृत्ति: यथा—‘रम्या इति प्राप्तचतो: पताका रागं विविक्ता इति वर्धयन्ती:' इत्थग्र ।

तेनायमर्थ:-यतः काव्यस्यात्मा जीवितभूतस्ततो बुधै: ध्वानिनिर्णय समाख्या-

तपूर्व इति । पद पदार्थोंडभिमतः क्वेरिति विश्रायते यदयं तत्र तत्र ध्वने:

काव्यकलावितत्त्वमोहै ।

किश्च समाख्यानेऽपि तो: कर्मणि भूते च कप्रत्ययोत्पत्तौ कर्मण एव

प्राधान्ये तस्यैव निर्देशो न्याय्यो न कर्तुरपि पूर्वशब्द्तस्य, अद्यभिचारात

प्रयोजनाभ/वाच्चेति यदेतयोरुपादानं तत् पुनरुक्तमेव ।

शंका—काव्यात्मा का अनुवाद किया जाय और उस पर ध्वनि का विधान, तथा उसे समाख्यान-

क्रिया का कर्म माना जाय । इसके बाद 'इति' द्वारा उसका व्यवच्छेद हो । इस प्रकार 'इति' शब्द

का प्रयोग समुद्राय ( काव्यात्मा ध्वनि है, ऐसा विद्वानों ने कहा है—इस वाक्य में काव्यात्मा ध्वनि

है, इस समुदाय ) के लिए हुआ माना जाय । इस ढंग से ध्वनि शब्द अर्थे प्रधान हो जाता है,

स्वरूप ( शब्द ) प्रधान नहीं रहता, इसलिए उसकी सर्वनामपरामर्शयोग्यता बन जाती है और

अभाव आदि के साथ सम्बन्ध भी ।

उत्तर—इस पर हमारा उत्तर है कि—ऐसा मानने पर 'इति' से वाक्यार्थ का अवच्छेद

( बिगाड़ ) प्रतीत होगा और तब सर्वनामपद नपुंसकलिङ्ग के होंगे ( क्योंकि वाक्यशब्द नपुंसक

लिङ्ग है । ) जैसे—‘विषय विषैले सांप है, ऐसा जो कहा गया है, उसे ( तत् ) मैं सर्वथा झूठ मानता

हूँ’ यहां । इसलिये इतिशब्द का प्रयोग आत्मशब्द के बाद ही होना चाहिये । तब वह हेतुर्थंक

होगा, जैसे—‘रम्य इसलिए पताका ( प्रसिद्धि और झण्डी ) को प्राप्त, विविक्त ( स्वच्छ और निर्जन )

इसलिए राग बढ़ाने वाली—' यहां । तब यह अर्थ निकलेगा—'क्योंकि काव्य की आत्मा है, अर्थात्

उसका प्राणभूत तत्व है, उसी से विद्वानों ने जिस ध्वनि का पर्याय निर्माण किया है ।' और ऐसा

लगता है कि यही अर्थ उस ( 'काव्यस्यात्मा' ) इस इलोक के निर्माता ) विद्वान् को भी मान्य है ।

उसने जगह-जगह पर 'ध्वनि' को काव्य का प्रधान प्राण ( प्राणभूत प्रधान तत्व ) कहा है । ( लोचन-

कार ने वाक्य-विच्छेदक रूप में इति को मानना भी चाहा है, पर वे सफल नहीं हुए हैं ) और

( 'समाम्नात' में ) समाम्नान क्रिया से कर्म में भूतार्थक 'तत्'—प्रत्यय का उपयोग किया गया है ।

इसलिए प्राधान्य कर्म की ही है; अतः निर्देश उसी ( कर्म ) का होना चाहिये, न तो कर्ता ( बुघै: )

का और न पूर्व शब्द का । वे तो ( कर्म के साथ कर्ता और तृ के साथ पूर्व शब्द का अर्थ ) नित्य

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द्वितीयो विमर्शः

‘लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य हरिप्रभावः

प्रेध्य स्थिततां सहचरियों व्यवधाय देहम् ।

आकर्णकृष्टमपि कामितया स धन्वी

वाणं रूपसमुदुमना: प्रतिसंहार ॥’

‘रहयिष्यति तं लक्ष्मींनियविमुखो नापदां पदं क इव ।

स च तव रिपुरेवमतो भावी तस्यापि तद्विद्रहः ॥’ इति ।

अत्र प्रतिज्ञानिगमनयो: पौनरुक्त्यम् । प्रसिद्धयार्थिकस्य हेतोर्धर्मिणि प्रयु-पसंहारवचननेनैव तदुभयार्थसिद्धेरिति । यदुक्तं ‘प्रतिज्ञाया एव तावद्गम्य-मानार्थया वचनं पुनर्वचनं, किं पुनरस्या: पुनर्वचनमित्यपार्थकं निगमनम्’-इति ।

इह तु न दोषः—

‘यो यत्कथाप्रसङ्गे छिन्नच्छिन्नायतोत्कण्ठानिश्वासितः ।

स भवति तं प्रति रक्तस्त्वं च तथा हश्यसे सुतनु ! ॥’ इति ।

और जैसे—‘हिमालय की गुफाओं में ओर जा रहा वह जल के सुरसिन्धु ( गङ्गाजी ) सम्बन्धी प्रवाह जैसा लगाव,’ इसमें पयसाम—यह जो सम्बन्धी रूप से प्रवाह का विशेषण है, वह अवाच्य है, वह तो उसके साथ नित्य संबन्धित है । और जो यहाँ ‘सौरसेन्धव’ यह विशेषण है उसमें जो तद्धित निर्देश है—वह भी अवाच्य ही है, ( सुरसिन्धो:-इस प्रकार ) ‘पष्ठी’ विभक्ति देने से ही उसका काम—हो जाता है; ‘इसलिये सुमहान् प्रवाह इव जहुजन्मनः’ पाठ चाहिये ।

और जैसे—

‘सिंह के समान शक्ति वाले ( दशरथ ) ने जिस हिरन पर वार साधा किन्तु उसे ओट में करके रीझ जिसकी महज्जा को देख कान तक रींचें तीर को भी द्वियादर्शित् होकर उसने उल्टा उतार लिया ।’ ( तथा )—

‘उसे लक्ष्मा व्‍ोड़ देगी, नीति विमुख कौन सा व्यक्ति आपत्ति का आस्पद नहीं होता । तुम्हारा वह शत्रु ऐसा ही है, अतः उसे भी उस ( संपत्ति—लक्ष्मी ) का विरह भोगना होगा ।’ यहाँ प्रतिज्ञा ( नीतिभिमुखो$होता ) और निगमन ( अतः उसे उसका विरह भोगना होगा ) पुनरुक्त होगा । जिस हेतु की व्याप्ति प्रसिद्ध होती है उसका धर्म ( पक्ष ) में उपसंहार बतलाने से ही दोनों कार्यो ( प्रतिज्ञा, निगमन ) की सिद्धि हो जाती है । जैसा कि कहा है—‘प्रतिज्ञा का ही ( निगमन में पुनः ) कथन पुनरुक्त है ।

किन्तु निम्नोिखितस्वलप में उसका द्वाप नहीं होता—

‘जिसकी बात चलने पर जो रुक-रुक कर गरम साँसें लेता है वह उसके प्रति अनुरक्त होता है । और हे सलोनों सखी तुम्हें ऐसी ही दिखाई दे रही हो ।

विमर्शः : ‘लक्ष्यीकृतस्य’ पद्य में ‘रूपसमुदुमना:’ का ‘मनः’ शब्द पुनरुक्त है । कृपा तो मनका ही धर्म है अतः मन अपने आप प्रतीत हो जाता है । इसप्रकार प्रतिसंझहार में ‘प्रति’

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द्वितीयो विमर्शः

शंका—ग्रा० भ० आदि० शा० के समान साक्षात् धर्मी का ही साम्य बतलाते, पर वह मान्य नहीं। सरोजा० का० का साम्य इसलिए गौरवद्य—धर्म में वही लक्षण विरक्षित है ।

विमर्शः—ग्रा०र०जि = में 'भूरुराज' शा० का० ग्रहण्त्त है । आगमविधि के अनित्य होने से यहां 'राजाहृयादित्यः०' सूत्र से नञ् न.त्.हुआ जैसे वासुल द्वीप मंदरसौर प्रसिद्ध में वीर्यावस्कतराज्ञः (देशान्)—मिति । [ग्रं० Select लेक्चर्स् । Inscriptions—आ०बालकृष्ण]

अथोच्यते मौरपदिशब्दा अपि सदृशादृशब्दवत् साक्षाद् धर्मिसाम्यमे-वार्थेऽन्वयु:, साम्ये तु धर्म्ममात्रसाम्यावगति: कर्णिकाया गौरत्वाद्यभि-चारद् इति । तद्युक्तम् । तच्चिन्तनधनभूताया: श्रुतहाने:श्रुतकल्पनायाश्चान्या-ग्यत्ताव् । युज्येत पुनरिचं, यद्य प्रतीति: क्षमतेति ।

गत् पुनर्धर्मयोरेकनिर्देशेऽन्यधर्मप्रतिपत्तिः: साधर्चर्योदित्यन्ये मन्यन्ते, यथा—'नितृप्रेडपि व हि ग्नेन न विरमन्त्यान्तर्जरद्रेश्मनां लृतातन्तुतनितिच्छदां महुपुपरतिपदां: पयोविन्दवः !'

इत्यग्रं पयोविन्दूनां महुप्रुप्रदप्रतिपदत्वात् पिद्धत्वसदृचर्यतवृतत्वस्य प्रति-पत्तिर्‌गति, तदनुपपत्तिम् । माधुर्येर्दैप प्रतिपत्तिप्रसङ्गात् साहचर्योदिरो-वान् । या तु रूपादेशत्तो गतिः सा हेतुधर्मानुमानेनैव लभ्यते । इह तु हेतुहेतुम-

मद्धावस्तयोरासदृश्वात् साहचर्यीसिद्धौ कुतोड्यधर्मप्रतिपत्तिसिद्धिः । सिक् डेडपि वा तस्मिस्तस्ग्येकस्य धर्मस्य साधनभावेनानिर्देशे कथमन्यधर्मंप्रति-पत्तिसिद्धिः ।

पचं हि—

'दूःखाभितप्तस्य जनस्य जाने त्रिपारशीत: प्रतिबिन्दु वह्निः ।'

इत्यग्रं वह्नावपि शीतत्वसाहचर्यांत् पाण्डुत्वप्रतिपत्तिप्रसङ्गः ।

किं सत्यामन्यधर्मप्रतिपत्तिसिद्धौ तद्वते: साहचर्यम्‌न्यद्धा परिकलप्येत । अत्र तु सेच न सिद्ध्येति व्यर्थस्सतत्परिकल्पनप्रयासः ।

किं हि तत्परिकल्पनं विनात्र परिहीयेत । पयोविन्दूनां मधुपुप्रदग्युक्तत्व-मिति चेत्, कामं परिहीयताम् । न च प्रयोजनवशात् प्रमाणव्यवस्था

भवितुमर्हति ।

यदि कक्षा जाय कि सदृश आदि शा० के समान गौरादि शब्द साक्षाच्च धर्मी का ही साम्य बतलाते हैं, और धर्मी साम्य थी प्रतीति उसी के बल से हो जायगी क्योंकि कर्णिका और गौरत्व का सम्बन्ध नित्य है तो वह ठीक नहीं, उससे श्रुत = पटित वस्तु की हानि और अश्रुत = अपठित वस्तुर्थी कल्पना होती है, जो ठीक नहीं । यह हो तो सका था यदि—प्रतीति हो रही होती तो दूसरे लोग जो यह मानते हैं कि दो धर्मों में से एक का निर्देश न होने से दूसरे धर्म का ज्ञान हो जाता है—साहचर्य के कारण ( कार्यालम्बनारसूतवृत्ति ४२।१० ) जैसे—

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द्वितीयो विमर्शः

४२३

विमर्शः : रक्तप्रसाधितभू, क्षतविग्रह और स्वस्थ शब्द के दो दो अर्थ हैं।

१-रक्त = अनुरक्त प्रसाधित = व्यवस्थित कर दी है भू जिन्होंने (ऐसे पाण्डव)।

२-रक्तसे = खून से संवार दी है भू = पृथिवी जिन्होंने। (ऐसे कौरव)

१-क्षत हो गया है विग्रह—युद्ध या विरोध जिनका (ऐसे पाण्डव)

२-क्षत हो गये हैं विग्रह धारकर जिनके (ऐसे कौरव)

१-स्वस्थ—शरीर से ठीक (पाण्डव)

२-स्वस्थ—स्व-स्वर्ग में पहुँचे = मरे (कौरव)

नट के वेश्मन से पहले भीम कौरवों के लिये पहलवान (कल्याणकारी) अर्थ अभिप्रेत समझते हैं, और क्रूर होते हैं। सहृदय उन्हें दूसरा (अमंगललिक) अर्थ समझाते हैं। इस प्रकार दूसरा अर्थ सहृदय के कथन से स्पष्ट होता है।

कचित् पुनः प्रतीयमानार्थस्तदभावविषयक्तिनिवन्धनं भवति यथा—

'आलिङ्गनादरचितास्थितिरवभौ या पत्स्युरिकासिपरिखालनीविवन्ध्या।

विस्तारिसालजघनं परिवर्तंमाननक्षत्ररतरत्नाशनागुणमुद्रहन्ती॥' इति।

विमर्शः : यहाँ नायिका—रतिस्थितवशेपणसाम्यध्योपस्थापितो नायिकार्थः पत्सुरालिङ्गनादर-

स्थितवशेपणसाम्यध्योपस्थापितो नायिकार्थः पत्सुरालिङ्गनादर-स्थितिस्थितवश्लेषप्रस्त्य।

वह्नि प्रतीयमान अर्थ उस (श्लेष) का अभिव्यक्त का कारण बतलाता है—जैसे 'विकासि-परिखा

जलनीदिवन्धा और पति के लिये आलिङ्गनादरचित स्थितिस्थिति—जो परिवर्तमान-नक्षत्र-रत्न-रशनागुण-

विस्तारि साल = प्राकार हों है विस्तृत जघन जिसका (पुरी), विस्तारी साल के समान है

जघन जिसका (नायिका) परिवर्तमान = घूम रहे नक्षत्र हों हैं रत्नरशनागुण (करधनी) जिसका

(पुरी) नक्षत्र के समान हैं रत्नों की करधनी जिसकी (नायिका)। यहाँ जब नायिका रूपी अर्थ

प्रतीत होता है तो श्लेष अभिव्यक्त होता है।

यत्र तु आवृत्तिनिवन्धनगन्धोडपि न सम्भवति न तत्रार्थान्तरावगतिरिति

चृथैव तत्र कवीनामुभयार्थपदोपनिबन्धप्रयासः, वाच्यावचनदोषदुष्टत्वात्।

तत्र शब्दश्लेषे यथा—

'क्ष्माभृत्स रस्य विकटः कटकः सपोलु-

पालीकुलस्सहृरिसैन्यरातावमर्दः।

लक्ष्मीं विलासघटनां नयति वयपास्त-

नानाधिकारमचरमागधराजितश्रीः॥' इति।

विमर्शः : जहाँ आवृत्तिकरण का गन्ध भी सम्भव नहीं वहाँ दूसर अर्थ को यौग्य नहीं होता। इसलिये

कवियों का उभयार्थक शब्दों के प्रयोग का प्रयास व्यर्थ होता है, कारण कि उनमें वाच्यावचन

दोष होता है।

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द्वितीयो विमर्शः

यथा—‘घृणो करणः प्रमादी च तेन मेडभ्यर्थयो मतः।’ इत्यसिद्धं विरोधस्य साक्षाचछब्देनाप्रदर्शितत्वम् ।

जहाँ प्रमदाएँ मातृकाभिनो—मातृक = चाण्डाल के पास गमन करने वाली और मातृक = हाथी के समान चलने वाली, और शौल्युक्त गोरी ( पावर्ती, गोरे रंग की ) और विभव रत्न ( धन से रत, विभव = सम्पत्ति में रत ) इत्यादि ( साँवली, पोड़शार्प की ) और पद्मरागिणी ( पद्मराग मणि के रंग की लालकमल पर रक्तिपूर्ण ) उज्ज्वल द्विजों ( दाँत, ब्राक्षण ) से शुचि ( सफेद, पवित्र ) मुंहुबालों और मदिरा की गन्ध से युक्त निश्वासवाली। यहाँ ‘न’ शब्द द्वारा निरोध बतलाया गया, नञ् ( न ) भा अपि शब्द के समान विरुद्धार्थ का कथन करने में समर्थ माना गया है।

यथा—करण—ञ्ज्ञा ( द्रालू है ) सा तु हि प्रपात्री ( असावधान हैं ) । इसलिए मैं उसे अर्थरथ मानता हूँ । इसलिए यहाँ विरोध का साक्षात् शब्द द्वारा न बतलाया जा॥ असिद्ध है ।

विमर्शः अभिनिकार ने ‘यथा न मातृकाभिनिः—प्रमदाः’ उदाहरण दे॥ कहा था ‘अच हि वाच्यो विरोधस्तथैवान्यत्रापि न शङ्क्यं यकुतस्तम्, साक्षाच्छब्देनैव विरोधालिङ्गारस्थाप्रकाशितत्वात्— ( २।२९ ) । ग्रन्थि—चोखंबासंस्करण के पृथ २४५ ) अर्थात् यहाँ इस उदाहरण में विरोधालङ्कार किसी शब्द द्वारा अभीष्ट से प्रतिपादित नहीं है । कथिता—विवेककार ने उसका विरोध किया। अभिनिकार ने ‘अपि’ शब्द द्वारा विरोध को वाच्य माना है । व्यक्तिविवेककार ने ‘न’ और ‘अपि’ का पर्याय मानकर उससे भी विरोध को वाच्य बतला रहे हैं ।

'खं मेडभ्रयुज्ज्वलयन्ति लूनतमसां ये वा नखोन्नासिनो

ये पुष्पनन्ति सरोरुहश्रियमधिक्षिताजभासस्र्धये ।

ये मूर्धसस्वभासिनः क्षितिभृतां ये चामराण शिरां-

स्याक्रामन्तुभयेडपि ते दिनपते: पादा: श्रियै सन्तु वः ॥'

इत्यत्रोभयेषां पादानां व्यतिरेकोडनुमेयस्तत् चैषां भिन्नविशेषणत्वमेव हेतुः।

अभिन्नविशेषणत्वे हि निम्नन्धनसद्भावे सति साधश्यमात्रं प्रतीयते न व्यतिरेकः, यथा—

'भक्तिप्रहेलिकानप्रणयिनी नीलोत्पलस्पर्धिनी

ध्यानालम्बनतां समाधिनिरतैर्नीतेऽपि तित्प्राप्तये ।

लावण्यस्य महानिधी रसिकतां लक्ष्मीं दशोस्तन्वती

युष्माकं कुरुता भवर्तिशमनं नेत्रे तनुर्वा हरे: ॥' इत्यादौ ।

'तम को नष्ट कर जुङ्के जो ‘ख’ को खूब प्रकाशित करते हैं, और जो नखोन्नासिनो ( ख आकाश को उद्भासित न करने वाले तथा नखों से चमकने वाले ) हैं; जो सरोरुह की शोभा बढ़ाते हैं, और अब्ज—( कमल, चन्द्र ) की कान्ति को तिरस्कृत करते हैं, जो क्षितिभृत् ( पर्वत, राजा ) लोगों के शिरों ( मस्तकों, मस्लकों ) पर भासित होते हैं, और जो देवताओं के सिर पर भी ( आकर्षण ) चढ़ते हैं—दिनपति के वे दोनों पाद ( किरण और चरण ) आपके लिये श्रीजनक हों !

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द्वितीयो विमर्शः

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विमर्शः रक्तप्रसाधितभू, क्षतविम्रह और स्वस्थ शब्द के दो दो अर्थ हैं।

१-रक्त = अनुरक्त प्रसाधित = व्यवस्थित कर दी है भू जिन्होंने ( ऐसे पाण्डव ) ।

२-रक्तसे = खून से संवारा दी है भू = पृथिवी जिन्होंने । ( ऐसे कौरव )

१-क्षत हो गया है विम्रह—युद्ध या विरोध जिनका ( ऐसे पाण्डव )

२-क्षत हो गये हैं विम्रह शरीर जिनके ( ऐसे कौरव )

१-स्वस्थ—शरीर से ठीक ( पाण्डव )

२-स्वस्थ—स्वर्ग में पहुँचे = मरे ( कौरव )

नाट के वचन से पहले भीम कौरवों के लिए पहला ( कल्याणकारी ) अर्थ अभिप्रेत समझते हैं, और कद्र होते हैं। सहदेव उन्हें दूसरा ( अमंगलिक ) अर्थ समझाते हैं। इस प्रकार दूसरा अर्थ सहदेव के कथन से स्पष्ट होता है।

कञ्चित् पुनः प्रतीयमानार्थस्तदभिव्यक्तिनिबन्धनं भवति यथा—

'आलिङ्गनादराचितस्थितिरभावमौ या पत्युरधिकासिपरिरक्षणीवनध्या ।

विस्तारिसालजघनं परिवर्त्तंमाननक्षत्ररतरशनागुणमुद्धहन्ती ॥' इति ।

विमर्शः चित्रम्थितस्य श्लोेपस्य ।

कहीं प्रतीयमान अर्थे उस ( इलैप ) का अभिव्यक्ति का कारण बनता है—जैसे 'विकासि-परिखा जलन्ध्या और पति के लिये आलिङ्गनादरचित स्थिति—जो परिवर्त्तमान-नक्षत्र-रत्न-रशनागुण-विस्तारिसाल-जघन को धारण किये हुए। सुशोभित हुई ।' यहाँ—उस ( नायिका ) के योग्य विशेषण के आधार पर उपस्थित नायिका रूपी अर्थ पति के आलिङ्गनादरचित-स्थित इलैप का ( अभिव्यक्ति कारण हैं )।

विमर्शः विकार्सी परिवा-जल ही है। नीविवन्ध जिसका—( पुरी ), विकार्सी-परिखा-जल के समान है। नीविवन्ध जिसका ( नाथिका ) पति = ( रक्षक-स्वामी पुरी, पाणिग्रहीता ) आलिङ्गन के आदर से युक्त है—( निमित्त है ) स्थिति जिसका ( नाथिका ) ।

विस्तारि साल = प्रकार ही है, विस्तृत जघन जिसका ( पुरी ), विस्तारी साल के समान है जघन जिसका ( नाथिका ) परिवर्त्तमान = घूम रहे नक्षत्र हो हैं रत्न-रशनागुण ( करधनी ) जिसका, ( पुरी ) नक्षत्र के समान हैं रत्नों की करधनी जिसकी ( नाथिका )। यहाँ जब नायिका रूपी अर्थ प्रतीत होता है तो इलैप अभिव्यक्त होता है।

यत्र तु आहत्यनिवचनगन्धोऽपि न सम्भवति न तत्रार्थान्तरावगतिरिति

बृथैव तत् कवीनामुभयार्थपदोपनिबन्धप्रयासः;, वाच्यावचनदोषदुष्टत्वात् ।

'क्ष्माभर्त्तु रस्य विकटः कटकः सपीलु-

पालीकुलसहहरिसैन्यश्रातावमर्दः।

लक्ष्मीं विलासघटनां नयति व्यपास्त-

नानाधिकामचरमागधराजितश्रीः ॥' इति ।

जहाँ आहत्यनिकारण का गन्ध भी सेम्भव नहीं, वहाँ दूसरे अर्थ का बोध नहीं होता । इसलिये कवियों का उभयार्थक शब्दों के प्रयोग का प्रयास व्यर्थ होता है, कारण कि उनमें वाच्यावचन दोष होता है।

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मधुसूदन मिश्र ने 'वियोगदशा:' में 'दशा:' शब्द को अधिक माना है क्योंकि विह्रगों के लिये 'विह्रगसंघ:' आदि शब्द न देकर केवल विह्रग: शब्द ही दिया गया है। वस्तुतः दशा शब्द प्रधान विशेषण नहीं है जिसकी कमी या अधिकता पर इलेष में दोष माना जाय। फिर दशा शब्द समूह वाचक नहीं है जिससे विह्रग में भी 'संघ' आदि किसी शब्द की योजना की जाय। दशा तो शृंगार में वियोग काल की विशेष वस्तु है। इस प्रकार तो न्यूनता के उदाहरण 'इह चढुलतया विकोचतश्च' में भी आधेय शब्द अधिक हैं और मधुसूदन में कम। वहाँ भी उत्तम सादृश्य योगा ऐसी ही दोष संगति दिखलाती थी। उन्होंने निजको साहित्यार्थौकरण्यवार' ठीक ही कहा है। भला कर्णधार 'आपातालनिविष्ट'—मध्याचल का कार्य कैसे कर सकता है। उसमें तो 'साहित्यरत्नाकरमस्थशैल' हो समर्थ है।

किश्चात्र शब्दश्लेषे न कर्तृकर्मादिप्रधानार्थपदोपनिबन्धेन शब्दसादृश्यमुपकल्पनीयं प्रधानस्वरूपापहारप्रसङ्गात्। तत्र कर्तुः स्वरूपापहारो यथा— 'इह चिरुध्वजस्य करणतालस्वलनसमीरविधूतकुम्भघातोः। वहति मदनदीपराक्त्या रतिगृहभित्तिरिव श्रियं पराद्यस्यम् ।।' इति ।

प्रधान का स्वरूप मिटाने के भय से शब्द इलेष में कर्ता, कर्म आदि प्रधानार्थक शब्दों को देखकर शब्द सादृश्य की कल्पना करनी चाहिए। इनमें— कर्ता के स्वरूप का परिहार, जैसे— 'कर्णताल के हिलाने से उत्पन्न हुई हवा के द्वारा सिर पर लगी थातु ( गैरिक आदि ) को मिटा चुके विष्णुभग ( पैरावत ) को मदनदी पराग से रंगी मदनदीप के राग से लाल रतिगृह की भित्ति के समान उत्कृष्ट शोभा धारण करती है।

विमर्शः यहाँ मदनदी कर्ता है। वह उपमान पक्ष में लुप्त हो जाता है। अतः उसे स्वतन्त्र शब्द द्वारा वतलााा दिया जाना चाहिए।

यथा च— 'मदनमदाकुलतनूभृतां तदनुरूपस्थापनन देहति मुदमुदञ्चनैः । विस्पष्टभाण्डरुचयोऽतिविचित्ररूपैर्लक्ष्मीं दधुर्जवनिकामहितास्तुरङ्गाः ।।' इति ।

और जैसे—संग्रामरूपक नाटक में शूरूहलपूर्ण उत्तम लोगों के घोड़ों ने शोभा धारण की जो अतिविचित्ररूप की थीं, वे उत्थापन से अधिक प्रसन्नता धारण किये हुए थे, उनके भाण्ड ( अश्व अलंकारों ) की कान्ति स्पष्ट थी, और वे जवनिका ( चाल या पीठ पर पहनाया गया कपड़ा ) में प्रशस्त थे ।

विमर्शः यहाँ घोड़ों पर नटों का आरोप है। दोनों में विशेषण योजना इस प्रकार है— अतिविचित्ररूप—रूप = वेप भांति भांति के अद्भुत वेश । उत्थापन—स्थापना आदि अथवा उत्तम सहहदयों के बढ़ावे से प्रसन्न हो रहे । घोड़ों का उत्थापन—पर ऊपर उठाना या चलने के लिये तैयार होना :

भाण्ड—अश्वालंकार, अश्वभूषा ने—अश्ववर्णन में उसके आभूषणों के लिये भाण्ड शब्द का प्रयोग किया है—

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किसी कारण का उपादान किये, दूसरे अर्थ का बोध कराने के लिये किसी की शेषयोजना दुःखदायी ही होती है ।

समयस्मृति: सङ्केतस्मरणम् । असिद्धमेकत्वमिति । तततत्त्वं नायं तन्त्रादेःविषयः । तत्त्वम् एकत्वम् । अव्ययानव्ययात्मकमिति । अव्ययमिवादि । अनव्ययम्—सदृशादि ।

समयस्मृति:—सङ्केतस्मरण । असिद्धमेकत्वम्—इसलिये यह तन्त्रादि का विषय नहीं । तत्त्वम्—एकत्व । अव्ययानव्ययात्मक—अव्यय इव आदि । अनव्यय—सदृशादि ।

धर्मार्थस्य यथा— 'प्रकटकुलिझाकुन्तचक्रभास्वत्परवलभीहितमत्तवारणाढुः । दिशि दिशि ददृशो निशान्तपदिझः समरविमर्देभुवं विडम्बयन्ती ॥'

धर्मार्थक ( शब्द ) की ( श्लेप से अभिव्यता ) जैसे— प्रत्येक दिशा में निशान्त ( अन्तःपुर ) की पीठ युद्धसंघर्ष की भूमि की विडम्बना ( अनुकरण, भर्त्सना ) करती दिखाई दी । 'प्रकटकुलिझाकुन्तचक्रभास्वत्परवलभीहितमत्तवारणाढुः' थी ( प्रकट कुलिझाकुन्त = चक्रभास्वत् = परवलभी = हित = मत्त = वारण = आढुः ) ।

आदि विशेषण का अर्थ नीचेक व्याख्यान में देखिए ) । यहाँ व्यतिरेकालङ्कार से श्लेष अभिव्यक्त होता है ।

धर्मार्थस्येति श्लेषादभिन्नत्वमिति योज्यम् । प्रकटेति कुलिझश्रटका: तदुक्कम्—'कुलिझश्रट्क' इति, त च ते शकुन्ताः शकुनयः तेषां चक्रेण समूहेन भास्वतीनां वलभीना हिता: अनुरूपा मत्तवारणाः अटृः: चिह्न यस्या:, निशान्तोऽन्तःपुरम् । विडम्बयन्ती उपहसन्ती । समरभूमिपक्षे कुलिझा = वज्ञ्र, कुन्त = भाला ( प्रास ), चक्र = अर—चके, भासित होने वाले इनसे ।

धर्मार्थस्य = इसकी श्लेष से अभिन्नता—ऐसी योजना कर लेनी चाहिए । प्रकट—कुलिझ = चटका—गौरैया ( चिड़िया ) जैसा कि कोष में है, 'कुलिझ: कुलिझश्रट्क:' वे ही शकुन्त—चिड़िया, उनके चक्र समूह से भासित हो रही बलभी के हित = अनुरूप जो मत्तवारण

रूप अंक = चिह्न है । जिसमें ऐसी निशान्तः—अन्तःपुर ( की पंक्ति ) विडम्बयन्ती—हँसती हुई । समरभूमिपक्ष में—कुलिझा = वज्ञ्र, कुन्त = भाला ( प्रास ), चक्र = अर—चके, भासित होने वाले इनसे ।

विडम्बयन्ती—कहकर व्यतिरेक बतलाया । प्रकट—इत्यादि विशेषण भाग में यहाँ श्लेष है !

यथा च— 'उषसि विगलितान्धकारपङ्कप्लवचछवालं घनवर्म दूरमासीन् । मधुरतराणितापयोगतां कमलवने मधुपायिनां च पद्धीः ॥' इति ।

अत्र चाछादः श्लेषाभिव्यक्तिहेतुः ।

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समासोक्तिश्लेषभङ्ग्यादिभ्यश्च—समासोक्ति द्वारा ‘अलङ्कालि’—आदि में । श्लेष द्वारा ‘भैररवाचायँ’ इत्यादि में ।

नोपमया—अलङ्कालि आदि में उपमा-श्लेषोपमा । और वाच्यार्थ इत्यादि में उपमेयोपमा ।

अत्र समासोक्तिश्लेषभङ्ग्यादिभिः इस ग्रन्थ के अनुसार—‘रूपकस्य विषये उपमानं यथा’ इत्यादि ग्रन्थ प्रकृष्ट दिखाई देना है । क्योंकि यहाँ रूपक का उपसंहार नहीं हुआ ।

इस पक्ष में ‘उक्तदोषद्रययोगानुपपत्तेः’ इस पूर्वोक्त ग्रन्थ का समन्वय नहीं हो पाता । इसलिए कुछ आदर्श प्रतियों में यह पाठ भी है । प्रकृष्ट न मानने पर यहाँ रूपक—ग्रहण पाता । इसलिए या तो वह ग्रन्थांश हटा देने योग्य है या यही ग्रन्थ प्रकृष्टपयोग्य है ।

उक्त-ते हि तत्सिद्धौ—रसवत् सिद्ध हो जाने पर अलङ्कार अपने आप सिद्ध हो जाते हैं । निष्पादकत्व करनी चाहिये ।

तद्वैचित्र्यम्—विभावादिक का वैचित्रय ।

तदाश्रया:—परम्परा द्वारा आश्रय अर्थात् रसानुभव के हेतु ।

तेनैपाम—कवि को अर्थ में चातुर्य प्रधानरूप से—(तत्पर्यरूप से) निष्पन्न करना होता है, अलङ्कारों का प्रयोग नहीं । अलङ्कार चातुर्य से नित्य सम्बद्ध नहीं रहते हैं, अतः गौण होते हैं ।

इसलिए उन अलङ्कारों को योजनाआँ ऐसी करनी चाहिये जिससे चातुर्य आ सके । उसके लिए—(अलङ्कारों का) आदान और परित्याग भी किया जाता है ।

आङ्का = कहाँँ आदान और परित्याग द्वारा अलङ्कारों में परस्पर विशेषता बतलाई जा रही है । और पहले ‘न ह्यस्ति निन्दा’ इत्यादि द्वारा विशेषता का अभाव बतलाया गया है ।

यहाँ विरोध क्यों नहीं ? उत्तर = ऐसा नहीं । पहले अध्यवधान को मन में रखकर विशेषता का अभाव बतलाया गया ।

वैचित्र्याद्—वैमन आदि ने ।

विमर्शः : व्यक्तिविवेक के प्राचीन चौखम्भा संस्करण में अनुमापकत्व को जगह अनुमावकत्व छपा है ।

अधुना यत् प्रतिज्ञामात्रेण प्रतिपादितं यथा ‘शब्दस्य रक्थन्तराभावाद् व्यङ्क्करत्वं न सम्भवती’ति तद्वच्यावचनोदाहरणत्वोपयोगि—श्लेषप्रसङ्गेनोपपाद्यितुमासूत्रयति—

अब पहले जो केवल प्रतिज्ञामात्र से बतलाया गया था कि शब्द की दूसरी शक्ति न होने से व्यञ्जकता सम्भव नहीं—उसी को इस प्रकार के श्लेष-प्रसङ्ग से उपपन्न करने के लिये लिखते हैं—‘स च’ आदि जो वाच्यावचन का उदाहरण माना जा सकेगा ।

स चायं द्विविधः श्लेषः शाब्दार्थविषयतयोच्यते । तत्र शब्दविषयो यथा-यत्रान्यूनातिरिक्तेन साधश्यं वस्तुनोर्ययोः ।

शब्दसाम्येन कथयेत स शब्दश्लेष इष्यते ॥ ८१ ॥

स शब्दः कर्तृकर्मादिप्रधानार्थाविनाकृतः ।

निवद्धो धार्मिकर्मोभ्यां द्विविधः परिकीर्तितः ॥ ८२ ॥

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वह किसी दूसरे ही अर्थ की प्रतीति कराता जाता है—इसलिए इलेष की अभिव्यक्ति के लिए कोई कारण दिया जाना चाहिए।

तत्र धम्र्यर्थस्य श्लेषानभिन्नत्वं यथा—

'अत्रान्तरे फुल्लमल्लिकाधवलाद्रिदासः कुसुमसमयुगमुपसंहरन्नजृम्भत ग्रीष्माभिधानो महाकालः' इति।

अत्र हि समासोक्तिनिवन्धनां देवताविशेषवाचिनो महाकालशब्दस्यार्थदृत्ति:, न तु तस्यैवोभयार्थत्वनिवन्धनेति वक्ष्यते।

उनमें धम्र्यैक ( शब्द की ) श्लेष से अभिन्नता यथा—

'इस बीच कुसुमसमयुग का संहार करता हुआ फुल्लमल्लिकाधवलाद्रिदास ग्रीष्म नामक महाकाल विकसित हुआ ।' यहाँ देवताविशेष— ( रुद्र ) वाचो महाकालशब्द की समासोक्ति द्वारा आहुति होती है, न कि उभयार्थकता के कारण उसी ( श्लेष ) की—जैसा कि आगे चलकर कहेंगे ।

अत्रान्तरे इति फुल्लमल्लिकाभिरधवला येधद्रिपुरचतुष्पुरमहम्राकारा आपणा वा तै: विकसो हासो यस्य तद्वच धवलाद्रिदासो यस्य।

कुसुमसमयुगमुपसंहरन्नजृम्भत विकसितवान् व्यक्ताननश्राभ्रदू महाकालो दीर्घसमय: संहरन्देवताविशेषश्व।

समासोक्तिः। महाकाल इत्यत्र महासमय इत्यत्रैकस्थे विशेष्यपदे प्रयुक्ते विशेषणसाम्यादेव देवताविशेषप्रतीतः समासोक्तिरभवन्नी महाकालशब्दस्यार्थदृत्ति: प्रमाणम्।

नचात्र महाकालशब्दे प्रयुक्ते प्रयास: कश्चित्। येन 'अलकालिकुले' तिवत् समासोकत्या श्लेषस्य वैयध्र्यं शङ्क्येत ।

अत्रान्तरे फुल्लमल्लिकाओं द्वारा धवल जो अद्रि अर्थात् त्रिपुर ( तिन मंजिल ) चतुष्पुर ( चार मंजिल ) के बड़े विशाल प्राकार या बाजार उनके द्वारा, विकसित होना ही है हाँस जिसका और उनके समान हैं हाँस जिसका और।

कुसुमसमयुग—वसन्त को दो महीने का समय, रम्यतारूप साधारण धर्म से कृतयुग आदि भी, उन्हें समाप्त करता हुआ अजृम्भत—विकसित हुआ और मुख फैलाया । महाकाल—लम्बा समय और एक संहारक देवता ।

समासोक्त 'महाकाल'—इसकी जगह 'महासमय' इसी सरल विशेष्यशब्द का प्रयोग करने पर देवताविशेष की प्रतीति विशेषणों की समता से ही हो जाती । उससे समासोक्ति होती और महाकाल शब्द की आहुति भी । महाकाल शब्द का प्रयोग करने में कोई प्रयास भी नहीं है जिससे 'अलकालिकुल०'—इत्यादि पद के समान समासोक्ति द्वारा इलेष की व्यर्थता सावित हो ।

निवन्धनाभावे तु तस्य दुष्टतैव यथा—

आच्छादितादित्यतदिगम्बरमुचकैर्गैर्माक्रम्य च स्थितस्तदग्रविशालश्रृङ्गम्। सूचै: स्वखलचुहिनदीधितिकोटिमेनमुद्दोक्ष्यको भुवि न विकसत्यले गिरौशम् ॥' इति ।

कारण के अभाव में तो वह दुष्ट ही होता है । ( श्लोक का अनुवाद व्याख्यान के अनुवाद से स्पष्ट है )

२६ व्य० वि०

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ये दो द्वोप शब्द: समासविषयौ माने जाते हैं । क्योंकि केवल लक्षणमात्र में जुड़े रहने वाले और प्रतीति से विमुक्त रहने वाले कविच समासों में कन्यरे-कूड़े जैसे इस प्रकार के अनेक शब्द भर दिये जाते हैं । इसीलिए तो समास दो अवधियों की वसौटी कहा जाता है ॥ ६०-६१ ॥

द्वोपद:'प्रयुक्त'ति 'कर्तृ'रीति च प्रतिपादितम् । ते इति समासा: ॥ ६०-६१ ॥

द्वोपद: = अर्थात् 'प्रयुक्त:'समेत:' कहा|ति द्वारा प्रतिपादित तथा 'कर्तृ'ऋचि'नाम प्रतिपादित । ते = ये अर्थात्=समास ।

नुक्तावितस्तथा चोक्ते नान्यभाजि विशेषणे ।

विरोष्योक्तिरुक्तैव स्यात् तदन्यभिचारत: ॥ ६२ ॥

समास गौ·मि·खि· विग्रह में गौ· ऐसे विशेषण का, जो विशेष्य गो शब्दो करके और कहीं न लगाया|ति, नोना|तो नो गौ| विशेष्य था मघन शोक नहिं होता ।

प··ति·खि·त विशेषण गो निः|पेषण प्राप्त हो जाता है ।

दोनों में निः·खि· ( गौ·खादि से अलग रहते ) जो नपुंसकलिङ्ग होता ।

युक्ता|ति । समासे वाच्यं चा असाधारणं यच्च विशेषणं तत् विशेष्यं न वाच्यं यथा 'दुःखानुभवोऽन्वाद:' ॥ ६२ ॥

प··ति··खि··मा ।। प··ति में गौ| विशेषण में असाधारणता हो|तो विशेष्य का कथन नहीं होना|ति··मा|मु·खि·म|ति·मा ·· ।

यों यदातमा तदुक्त्यैव तस्यार्थस्य गतियंत: ।

तेन प्रयोजनामावे द्वयोक्किः पुनरुक्तिकृत् ॥ ६३ ॥

सी ( गौ·आदि ) जिस ( जल आदि ) के साथ देने से यत् ( अन्वादि ) प्राप्ति हो|तो आ|ति है । इस अन्वादि पद से युक्त द्वोर्थ प्रयोजन न हो तो दोनों कथन पुनरुक्ति-जनक होता है ।

यो वाच्योऽर्थो द्विपदैरुपपद्योभ्यामविचारितप्रयोजनामावे जलादिपदप्रयोगे न कार्य हेत्वर्थ: । यथा 'नयने वाजप्वारिण:'स्यादौ ॥ ६३ ॥

यो यदा|मे·मि······मा|दि निगम|मा: जलादिरूप त·ा होते हैं इसलिए निषिद्धप्रयोजन जलादि पद का प्रयोग ··| ··| न ··|रना ··|ति·, जैसे कि 'नयने वाजप्वारिणा:'—इस·ा|दि में हुआ है ।

यों यस्म्य नियतां धर्म्मस्तस्य तेन न धर्मिणा ।

समास: शास्त्र्यते डन्यार्थेसतत न तु तद्वते: ॥ ६४ ॥

जो यमा| गिरा अर्‌मां नियत|मा: रहते ·ो तो उस ( अर्थ ) के साश्र उस ( धर्म्मे ) का समास अन्य| न ·| माथा आ|मा, प··थि· समास आ|न् ( साधुश्य आदि ) अर्थ के लिए होता है, और यस्मि·खि· पद पतों नो दो पत|त है ॥ ६४ ॥

यो यस्मिन्न्यनदनादि: यस्म्य चन्द्रकान्तादेर्धर्म्मिणोऽन्यभिचारो धर्म्म:, तयो:

समासो न प्रशस्यते, यथा 'द्विपदपलोचने'स्यादौ । अन्यार्थ इत्यर्थ: । साधर्म्यार्थ इत्यर्थ: ॥६५॥

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चिह्नितस्य बहुत्वीहे: कर्मधारयरवाद्‌याद्‌व्यर्थीयाादेर्यंकैक पुनरुक्तता ॥ ५१ ॥

विहितस्यैति । वस्तुवृत्या स्थितस्य बहुव्रीहेर्या कर्मधारयरवाद्‌ख्या तथा मत्‍वर्थीयाादि: शब्द: कृतो विसकिसलयच्छेदेपाथेयवन्त इत्यादौ । तस्य स्फुटं पौनरुक्त्यं वृत्तिद्वयस्य गौरवात्‌ ॥ ५१ ॥

यस्मिन् यत्‍च्‍छिदितोत्पत्तिरर्थस्तेनैव जातुचिह्नत्‌ । न तदन्त: समस्‍नेत तद्‌दितव्‍यर्थताभ्‍यात्‌ ॥ ५२ ॥

यस्मिन्निति 'जाम्बवपल्‍लवानी'स्यादौ यस्मिन् पल्‍लवशब्द इत्यर्थ: । अर्थ: इदन्तस्वलक्षण: । यत्‍च्‍छिदितोत्पत्ति: यस्मादणप्रत्ययाख्‍यात्‌ तद्‌दितादुत्पत्ति: प्रतीतिविषयत्वापत्तिरस्यार्थस्य, तदन्तस्तद्‌दितप्रत्ययाख्‍यान्तो जाम्बवशब्दादि:, तेनैव पल्‍लवशब्देन न समसनीय:, जम्बूपल्‍लवानिति समासेन गतार्थत्वात्‌ तद्‌दितवैयर्थ्‍यप्रसङ्‌गात्‌ ॥ ५२ ॥

विशेषणव्‍यादिच्‍छेदू विशिष्‍टं यत्न संश्‍निनम्‌ । युक्ता तन्‍न विशेष्योक्‍तिरन्या‍था पौनरुक्त्‍यक्‍कृत्‌ ॥ ५३ ॥

विशेषणव्‍यादिति । विरूपकपाण्‍यादिविशेषणमाहात्‍म्‍यात्‌ । विशेषष्‍टमुरक्ष्‍योपरक्ष्‍वन्तं संश्‍निनं हरादिकं यत्रेच्‍छेद्‌ । न तत्र पौनरुक्त्‍यसम्‌ । अन्यथा तु पौनरुक्त्‍यसम्‌ । यथा 'पायात्‌ स शीत-किरणाभरणो भवो व्' इत्यादौ ॥ ५३ ॥

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तृतीयो विमर्शः

भाग में क्षत ( घाव ) युक्त देखा और सोचा कि वह कामुक ऐसी घटना को सह नहीं सकतां तो उस सखी के अन्यकृत भोग की शंका के कलंक को दूर करने के लिये उपालम्भ के बहाने अधरत्रग को और किस्सी कारण से उत्पन्न बतलाने के लिये यह कहती है । इस कथन में व्याप्ति-क्षण हेतु है-'प्रत्येक कामुक के लिये अपनी प्रिया के घायल प्रियाधर का दर्शन ईर्ष्योंजनित प्रकोप का कारण होता है ।'

'तुझे मना करने पर और उलटी चलने वाली और भौरे युक्त कमल को सूँघने वाले के अधर में घाव हुआ—यह पक्ष में धर्म ( हेतु ) का कथन हुआ ।'

'अब तू अपनी दुष्टता का फल 'प्रिया का रोष' सह' यह हुआ निगमन । इस प्रकार वाच्यार्थ में आया साध्यसाधनभाव तो साफ है । अनुमेय अर्थ के विषय में—जो साध्यसाधनभाव है उसमें परपुरुष शंका का निरास ( हटाना ) साध्य है । उसमें जो हेतु दिया गया है वह आक्षेप है वह—संबोधन द्वारा बतलाया गया है । संबोधन का अर्थ है—'भौरे से युक्त कमल कों सूँघने के चौकीन' । इसमें 'अधर के क्षतियुक्त होने का कारण और ही कोई है' यही है ( उस अनन्वयार्थ के प्रति) हेतु । साध्य और साधन (हेतु) का व्याप्ति-संबंध अनुरागियों में अपने अनुभव से सिद्ध है ।'

'सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुषाख्ययः । शूरक्ष कृतविद्याश्र यथाऽऽजानाति सेवितुम् ॥' इति ।

अत्र शूरादीनां चयाणां सर्वत्रैव स्वाधीनाः सम्पदो भवन्तीति साध्यम् ।

तत्र सुवर्णपुष्पपृथिवीचयनेऽत्र कर्तृत्वाभिधानं तेषां हेतुः ।

तद्धि मुख्यमनुपद्यमानं वाक्यार्थोपचारवृत्या तत्सदृशामेव सर्वत्र सुलभविभवत्वमनुपापयति यथा पदार्थोपचारे गडायां घोष इत्यत्र गङ्गासमीपवर्तिनं तम् ।

द्विविधो ह्युपचार इष्यते; पदार्थवाक्यार्थविषयत्वात् उपपाद्यते च वाक्यस्यो- पायत्वात् अप्राधान्ये सत्यविवक्षितत्वमेव भवति, उपचारविषयस्यैवोपेयतया प्राधान्यात् । तयोःश्र प्रसिद्धिरुत एवाविनाभावनियमोऽङ्गान्तव्यः; साध्य-

शानुमेय एव, न वचनगोचरतां गच्छतीत्युक्तम् ।

सोना फूलती धरती को बटोरते हैं तीन लोग शूर, विद्वान्, और सेवा कों कला जानने वाले ।'

यहाँ साध्य है—'शूर आदि तीन लोगों के लिये सम्पदाएँ सदा स्वाधीन रहती हैं ।' उन्होंने हेतु हैं सुवर्णपुष्पा पृथिवी के बटोरने में उन ( शूर आदि ) यो कर्त्ता बतलाना । वीर ( चुवंअमुप्पा पृथिवी का बटोरना ) मुख्य ( बटोरने ) रूप में तो दत्तता नहीं, इसलिए उपचारवृत्ति ( लक्षणा ) से यहाँ साध्य है—'शूर आदि सब में वैभव की सुलभता का अनुमान कराता है । यह ( उपचार ) वृत्ति यहाँ वाक्यार्थ में होती है । ठीक वैसे ही जैसे पदार्थ के उपचार के स्थान 'गङ्गा पर घर' में गंगा द्वार

गंगा के पास के तट का अनुमान कराता है । उपचार दो प्रकार का मान्य है, पदार्थविषयक और वाक्यार्थविषयक । उपचार में वाक्य उपाय ( हेतु ) होता है । अतः वह अप्रधान होने से विवक्षाविषयक नहीं होता । उपाय ( साध्य ) वही

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होता है जिसमें उपचार किया जाता है (तट आदि), और वहीं प्रधान (भी) होता है। उनका जो अविनाभावसम्बन्ध है वह लोकप्रसिद्धि से सिद्ध है और जो साध्य होता है वह अनुमेय ही होता है उसे शब्द से नहीं कहा जाता है। जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है।

'शिखरिणि क जु नाम कियचिरं किमविधानमसावकरोऽतपः। तस्मिन् येन तथाविधरत्नपाटलं दर्शितं विम्बफलं शुष्कशायकम् ॥' इति ।

अत्र त्वदधरपल्लववर्णितचुम्बननामृतं नालपुण्यः पुमानासादयतीति चाटूकरूपोऽर्थः साध्यः । तत्तादृश्यलचावलाम्बनो विम्बफलस्यापि परिखण्डनविच्छेद शुष्कशायकस्य लोकोत्तरतपःपरिणामप्रशालितवससमरोपो हेतुः ।

यत्र खलु यत्सादृश्यसादृश्यात् मात्रभाजो भावस्य पुण्योपचयपरिश्रमपरिप्रापणीयत्वमाश्राडूख्यते तत्र तस्य तत्सम्बन्धिनो मुख्यस्यैव तत् कथं नावगम्यते । तस्मादत्रापि साध्यसाधनभावगर्भैतैवोपपत्तिभिरिति सिद्धम् ।

'कौन से पेड़ पर कितने दिनों तक किस नाम का तप किया है ? इसने किस हे तरुणि ? यह तोते का बच्चा तुम्हारे अधर के समान पाटल (इवेतरक्त) विम्बफल को डँस रहा है ।'

यहाँ 'जो अधिक पुण्यात्मा होता है वह वही तुम्हारे अधरपल्लव के चुम्बननामृत को पाता है यह नादरूप अर्थ साध्य है । हेतु है—'अधर के समान विम्बफल के काटने में शुष्कशायक के ऊपर अदृष्ट अलौकिक तप के फल से युक्त होने का आरोप ।' जहाँ वस्तु के केवल सादृश्य से युक्त वस्तु को राशि राशि पुण्य जोड़ने के श्रम से लभ्य बतलाया जा रहा हो वहाँ स्वयम् उस वस्तु में वह (पुण्यातिशय से लभ्य होना) क्यों नहीं जाना जा सकता । इसलिए यहाँ भी वाक्यार्थ में साध्य-साधनभाव है ही ।

'क्षीणघश्यामलकान्तिलिलसितपतितो वेधद्वलाका घना वाता: श्वासरिण: पयोदसुद्दामानन्दकेकाः कलाः । कामं सन्तु दृढं कठोरहृदयो रामोऽस्मि सर्वे सहे वैदेही तु कथं भविष्यति हहा हा देवि ! धीराः भव ॥' इति ।

अत्र मदनदहनोद्दीपनचन्द्रोदयोद्यानादिदारुणपदार्थैरर्थदर्शनदुःखसह-ऋजुत्वं नाम रामस्य साध्यम् । तत्र च रामत्वमेवार्थों हेतुः ।

रामरामेति ह्ययं स्वेच्छापरिकल्पितप्रकरणाद्यवसेयसकलकलेशाभाजनत्व-लक्षणधर्मविशिष्टं संज्ञिनि प्रतिपाययति न संज्ञिमात्रम् । तयोश्च व्यतिरकव्यापक-भावलक्षणः सम्बन्धः प्रसिद्धिरुतोदध्यात्मप्रसिद्ध एवावगन्तव्यः, यथा वृक्ष-शिंशापयोः ।

यच्च तदनुमितं धर्मिन्तरं तत् सर्वसहत्वस्योपपत्तस्य साधनं, न रामत्वमेवानुमितानुमेयं तत् । एवमस्मीत्यसदर्थे धर्मिणि रामत्वमात्रनिबन्धनायां सकलक्लेशाभाजनत्वलक्षणसाध्यधर्मसिद्धौ स्कुट एववास्याचुमानान्तर्भावः ।

ततक्ष्र रामस्य यत् कठोरहृदयत्वाभिधानं तत् पुनरुक्तमेव, अनुवादपक्षस्यातितुच्छत्वात् ।

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ऋतीयो विमर्शः

'भले ही—मेघ चिकनी और श्याम आभा से आसमान लिपें; उनमें वझुलों की पांत भी जुड़ती रहें, फुद्दारे लेकर हवा के झोंके बहें, मेघों के मित्रों ( मयूरों ) की आनन्द से भरी सुन्दर केका कूजें, ( परन्तु ) मैं तो राम हूँ, कठोर हृदय वाला, सब कुछ सह लूंगा । परन्तु, हाय-हाय सीतासा का क्या होगा। हे देविये ? तुम भी धीरज रखना !' यहाँ—राम द्वारा कामात्ति को बढ़ाने वाले चन्द्रोंदय, उद्यान आदि दारुण पदार्थों' के देखने के दुःख को सहना साध्य है।यहाँ रामत्व ही हेतु है, वह अर्थ है । यह जो राम साहब है, वह केवल संशयात्मक तो नहीं कलपता, अपितु उस संशयात्मक् को वतलाता है जिसमें अपनी इच्छा से कल्पित प्रकरणादि द्वारा समझ में आने वाला—'कलेष्ट्रभजनतत्व'—रूप धर्म का बोध होता है । उन ( रामत्व और कलेष्ट्रासहत्वरूप धर्मों ) का न्यायान्ययापकत्वभाव रूप सम्बन्ध प्रसिद्ध ही है, अथच् वह अध्यात्म ( स्वानुभूति ) प्रमाण से ही सिद्ध है । ठीक वैसे ही जैसे वृक्ष ( सामान्य ) और ( उसका कोई एक मेघ ) चिनिशा ( शिशिर ) ।

जो ( सकलक्लेशासहिष्णुत्व ) दूसरा धर्म उस ( रामत्व ) से अनुमित हो रहा है वह शब्दतः कथित सर्वसहिष्णुता का साथम हेतु है; इस प्रकार केवळ रामत्व ही ( वियोगाद्‌खसहिष्णुत्व रूप धर्म माङ्ग ) अनुमापक नहीं है,—अपितु रामत्व से अनुमित ( क्लेशाभजनत्व ) धर्म में भी उसका अनुमापक है, अतः वियोगानुभवसहिष्णुता धर्म अनुमित अर्थ द्वारा अनुमित होता है ।

इसकी पकृत 'अर्थ' यहाँ अभिप्रेत अर्थ का ( या धर्मों ) है । इसमें केवल 'रामत्व' से सब प्रकार के दुःखभाजनत्व ( रूपी ) धर्म की सिद्धि होती है । अतः स्पष्ट रूप से ही इसका अनुमान में अन्तर्भाव है । और राम की कठोरहृदयता का जो कथन है वह पुनरुक्त है । ऐसा करने से अनुवाद पक्ष ('कठोरहृदय मैं सब कुछ सह सकता हूँ ।—इसमें जो कठोरहृदय मैं अनुवाद्यांश है वह ) अति हैय हो जाता है । ( क्योंकि वह सदोष हो जाता है ) ।

विमर्शः 'राम वियोग को सह सकते हैं यह है—तात्पर्यमूत अनुमेय । उसका हेतु है—रामत्व और ऐसा रामत्व जिसमें सर्वविधदुःखसहिष्णुत्व का अनुमान होता है और यह अनुमित धर्म भी रामत्व के साथ-साथ वियोग सहने की क्षमता का अनुमान कराता है, अतः वियोग-दुःख षणुत्व' धर्म की एक विशेषता यह भी है कि वह अनुमित वियोगसहिष्णुत्व के साथ ही—'सर्व सहेँ' इमे प्रकार कथित सर्वसहिष्णुत्व का भी हेतु है ।

'ताला जाआन्ति गुणा जाला दे सहिअप्पहि घेसप्पन्ति । रककिरणाणुगहिआइ होन्ति कमलाइ कमलाइ ।।' [ तदा जयन्ते गुणा यदा ते सहद्रयैरग्रह्रयन्ते । रविकिरणानुगृहीतानी भवन्ति कमलानि कमलानि ]

इत्यत्राद्यस्तावत् कमलशब्दः; सामान्यवृत्तिद्रवित्तीयो विशेषवृत्तिः । स चास्य विशेषो निरतिशयशोभाभिरामतालक्षणोद्र्थः प्रकारणादिगम्यो रविकिरणानुग्रहकृतः प्रमाणान्तरसिद्धस्सामान्यनिष्ठोऽनुमेयः । तत्र च तयोः सामान्यान्यविशेषार्थयोंविंजातीयोभयोरिव सजातीयोयोरप्यारोप्यारोपकभाव पव हेतुः; यथा सिंहो माणवक इति । न च भिन्नजातीयत्वमेवार्थानामरोपनिबन्धनमिति नियमः सम्भवति

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येनात्र सजातीयत्वादसौ न स्यात् तस्य भिन्नार्थमात्रप्रयुक्तत्वात् । तच्चानयोर्हक्तनयेनास्येति नासिद्धो हेतुः।

सामान्यविशेषगृहीतत्वं चेदं शब्दानां विवक्षामात्रनिर्मितमिति न तस्य पूर्वपक्षश्रद्धावनियमः कश्चित् ।

ततश्च—

'कमलेऽपि तरसा डिंडिकोलोपमायां शशिबिम्बम् ।

परमार्थविचारे पुनःक्षीरशचन्द्र इव वाराकः ]

इति विपर्ययेगणापि तदुपपद्यत एव ।

एवं स्वास्याप्यनुमानान्तर्भाव एवावगन्तव्य;

'गुण तब गुण होते हैं जब उन्हें सहृदयों द्वारा मान्यता दी जाती है । सूर्यंकिरणों से अनुगृहीत होने पर ही कमल-कमल ( होते हैं ) । यहां प्रथम कमल शब्द सामान्य कमल का वाचक है और दूसरा कमल विशेष कमल का ( वाचक है ) । कमल का यह जो विशेष धर्म है वह है—लोकोत्तर शोभा और सुगन्ध से सुन्दर होना । वह प्रकार आद्र्र से प्रतीत होता है, उसकी उत्पत्ति रथिकिरणों के अनुग्रह से होती है । अतः वह लोकोपमान से ही !सिद्ध है । फलतः वह अनुमेय है । सामान्य और विशेष दोनों अर्थ हैं सजातीय किन्तु विजातीय के समान उनका आरोप्यारोपकभाव वतलाया गया है । यहीं विशेषार्थ का अनुमापक है ठीक वैसे ही जैसे 'सिद्धो माणवक:' में । यह कों नियम नहीं है कि पदार्थ विजातीय हो तभी उनमें आरोप हो । जिससे सजातीयता के कारण यहां यह—( आरोप ) न हो । वह ( आरोप ) तो केवल अर्थ—की भिन्नता पर निर्भर है । और वह ( भिन्नार्थता ) ऊपर कहे अनुसार इन ( सामान्य विशेष कमलों ) में है ही । इसलिये हेतु असिद्ध नहीं है । शब्दों का यह सामान्य और विशेष अर्थ में प्रयुक्त होना विवक्षामात्र पर निर्भर है, इसलिये उसमें कोई पूर्वापरभाव ( आगे-पीछे होना ) निश्चित नहीं—इस कारण—'लोग—ऐं यों ही उसके कपोल को उपमा में रच देते हैं, वास्तविकता पर विचार करने से तो चन्द्रमा बेचारा चन्द्रममा ही है ।'

विमर्शः : ताल₀ पद्य में प्रथम कमल सामान्य का उस पर विशेष का आरोप होता है । यहां प्रथम चन्द्र विशेष है, उस पर सामान्य का आरोप होता है । वही—विपर्यय हुआ ।

'निःश्वासान्ध इवार्कशचन्द्रमा न प्रकाशते' इति ।

अत्रादर्शेऽस्य विच्छायत्वमनुमितस्युपमानम् ।

तदनुमितौ चादर्शस्य—

रुप्याभिधानं साधनम् ।

तद्धि तत् मुख्यं न सम्पभवति प्राणिधर्मत्वात् ।

अतस्तत्सादृश्योत्पत्तलपिहितस्येव नयजनस्य निःश्वाससमर्पितं दर्शयिष्यत् ।

विच्छायत्वमेवानुमापयतीत्यन्वयातिरसृुतवाच्योऽपि सिंद्धो माणवक इत्यैवम्—

तस्य चानुमानान्तर्भावः समर्थित एव प्राप्त् ।

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तृतीयो विमर्शः

४७७

'गआणं च मत्तमेहं धारालुलिअज्जुणाइ अ चणाइ । पिरहडूआरमियड्ढा हरन्ति णीलाओ वि णिसाओ ।।'

[ गगनं च मत्तमेघं धारालालितार्जुनानि च वनानि । निरहंकारमगाधा हरन्ति नीला ऽपि निशा: ]

इत्यच मत्तनिरहंकारारोपद्वारेण दृष्टान्तम् ।

'निःश्वास सं अनंध दर्पण के समान चन्द्रममा चमक नहीं रहा हैं—यहाँ दर्पण का निष्प्रभ होना अनुमित होता है । वही उपमान है । उसकी अनुमति में दर्पण की अनंधता का कथन हेतु है । वह् ( अनंधता ), उस ( दर्पण ) में वास्तविकरूप से नहीं बनती, क्योंकि अनंधता प्राणवान् का धर्म है । इसलिये उस ( अवास्तविकता ) के आधार पर वह् ( अनंधत्व ) पटल से ढंकी आँख की निष्प्रमता जैसी निष्प्रमता का अनुमान कराता है । इसप्रकार अत्यन्ततिरस्कृतवाच्य के भी 'माणवक सिंह है' के समान—पदार्थ का उपचार ही है । उसका अनुमान में अन्तर्भाव पहले ही वतलाया दिया गया है । इसी प्रकार—'आकाश में मतवाले मेघ हैं । जंगलों में अर्जुन वृक्ष—धारा से चमचमा रहा है । निशाएँ—काली हैं और उनमें चन्द्रममा का अंहकार मिट गया है इतने पर भी मनोहर हैं ।' यहाँ पर मत्त और निरहंकार शब्द में समझना चाहिये ।

विमर्शः : मत्त का अर्थ है पागल । पागल होना—प्राणी का धर्म है । मेघ प्राणी नहीं है, अतः उसमें वह चरितार्थ न होकर उससे सम्बन्धित वासजनकत्व रूप धर्म का अनुमान कराता है । इसी प्रकार चन्द्रममा भी जड़ है । उसमें अहंकार का अभाव उसकी निष्प्रभता का अनुमान कराता है ।

यापि विभावादिश्यं रसादीनां प्रतीति: सानुमानैवैान्तर्भावमहंतोति । विभावानुभावव्यभिचारिभ्रतिभातीरतिंहि रसादिप्रतीतः: साधनमिष्यते । ते हि रत्यादीनां भावानां कारणकार्यसहकारिस्भूतास्तानुपयन्ति एव रसादीन् निष्पादयन्ति । त एव हि प्रतीमाना आस्वादपदवीं गताः सन्तो रसा इत्युच्यन्ते इत्यवश्यंभाविनो तत्प्रतीतिक्रमः । केवलमात्रुभावितयासौ न लभ्याने यतो व्यभिचार्यसिद्धव्यक्तिक्रम:' इत्यक्षरम् ।

अत्रोदाहरणानि यथा कुमारसम्भवे मधुप्रसङ्गे वसन्तपुष्पाभरणं वहन्त्या देव्या आगमनादिवर्णनानि मनोभवशरसंघानपर्यन्तं शम्भोश्व परिवृत्तधैयैस्य चेष्टाविशेषवर्णनादीनि ।

विभाव आदि से रस आदि की जो प्रतीति है, वह भी अनुमान में ही अन्तर्भाव के योग्य है । विभाव, अनुभाव और व्यभिचारीभावों की प्रतीति को रस की प्रतीति का कारण माना जाता है । वे ( विभाव आदि ) रति आदि ( स्थायी ) भावों के प्रति कारण—कार्य—सहकारी रूप से उपस्थित होते हैं और उनकी—( रति आदि ) अनुमिति कराते हैं, और अनुमिति कराते हुए ही रसादि को निष्पन्न करते हैं । वे ही जब अनुमान द्वारा आस्वादित होते हैं तो रस कहलाते हैं, इसलिए उन ( व्यभिचारी आदि और रति आदि या रसादि ) की प्रतीति में क्रम पौर्वापर्य—होना निश्चित ही है । केवल यह क्रम प्रतीति में अत्यन्त शिथिलता के कारण समझ में नहीं आता । इसलिये—उदाहरण जैसे कुमारसम्भव में वसन्त वर्णन के अवसर पर वसन्त-पुष्पों का शृंगार किये पार्वती जी के आने आदि का कामद्वारा शरसंधान करने तक का वर्णन और भगवान् शिव का घे़र्य छूटने—पर विशेष चेष्टाओं का वर्णन ।

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'अचाऽन्तरे कुसुमसमययुगमुपसंहरन्नुदञ्जुम्भत् श्रीष्माभिधानः फुल्लमल्लिकाङ्घवलाङ्घ्रिद्दासो महाकालः' इत्यग्रापाराणिकमहाकालाख्यदेवता विशेषविषयाप्रतीतिस्साध्या। तस्याऽऽदिद्दाससम्बन्धो युगासंहारव्यापारश्चेत्युभयं साधनं तस्य तत्त्वार्थस्त्वान् । कार्यकरणभावाविषयेऽप्यनोरगमप्रमाणमूल इतत तत् पद समासोक्तिक्रमेणाप्रकारणिकार्थेन्तरप्रतीतिसिद्धिः, न त्वभयार्थवृत्तेर्महाकालशब्दस्य सा शक्तिरित्येतदुक्तं वक्ष्यते च ।

यहाँ अप्रकरणिक महाकाल नामक विशेष देवता ( रुद्र ) की प्रतीति साध्य है । उसके प्रति हेतु है—अदिद्दास का सम्बन्ध और युग के संहार का कार्य। क्योंकि ये दोनों देवताविशेष ( शिव ) के कार्य हैं । इनका कार्यकरणभाव—शाब्दमूलक है । इसलिये इसी हेतु और व्याप्ति से समासोक्तिक्रम से अप्रकरणिक दूसरे अर्थ की प्रतीति होती है । महाकालशब्द को अर्थों में अभिधा नहीं मानी जा सकती ऐसा कह चुके हैं, और कहेंगे भी !

'उद्भ्रत् प्रोल्लसद्दारः कालागुरुमलीमसः । पर्योधरभरस्तन्व्याः' के न चक्रुडभिलाषणम् ॥'

इत्यत्र त्वनन्तरोक्तः प्रकारो न सम्भवतीति कृतोऽर्थान्तरप्रतीतिः । उद्भ्रत, प्रोल्लसद्दार, कालागुरु-मलीमस, तन्व्यां का पर्योधरभर किसे अभिलाषी नहीं बना देगा ।

विमर्शः : उद्भ्रत = स्तनपक्ष में ऊँचा, मेघपक्ष में भी ऊँचा । प्रोल्लसद्दारः = स्तनपक्ष में द्वार से युक्त; मेघ पक्ष में धारा से युक्त । कालागुरुमलीमस—स्तनपक्ष में काले अगर से कृष्ण मेघ पक्ष में काले अगर के समान कृष्ण । पर्योधरभर—पर्योधर = स्तन और मेघ । अभिलाषी—इच्छुक, और उत्कण्ठित ।

यहाँ पीछे बतलाया प्रकार ( समासोक्ति ) नहीं हो सकता अतः दूसरे अर्थ की प्रतीति कैसे हो सकती है?

'दत्तानन्दा: प्रजतां समुचितसमयाक्रुष्टशृङ्गे: पयोभिः पूर्वाञ्छे विग्रक्रीर्णा दिसि दिसि विरमत्यहिः संहारभाजः । द्विसांश्चोर्ध्वडुकप्रभवभवभयोदन्वदुस्तारनावो गावो वः पावनानां परमपरिमितां प्रीतिमुपादयन्तु ॥'

इत्यत्र तु गोशब्दस्यानेकार्थत्वे डप्रकरणिकार्थान्तरप्रतीतिपत्तौ न किश्चिद्विवन्धनमवचार्यामः । तथा हि—गोशब्द एवानेकार्थत्वात् निवन्धनमुपकल्प्येत, तद्विशेषणजातम्, उभयमपि वाऽन्यस्यार्थप्रकरणादेरसम्भवात् तत् न तादृग् गोशब्द-प्रवृत्ति शक्त्यते वक्तुम्, सुराभिव्यतिरिक्त वज्रादिवनाभिमतेऽप्यथैन्तर प्रतीत्युपजननप्रसङ्गात्, तस्यानेकार्थत्वाच्छेषे नियमहेतोरभावात् । अथ विशेषणजातमेव नियमहेतुस्तद् यदर्थगुणमुपलभ्यते तच्च प्रतोतिमुपजनयतीति उच्यते । तहि ततोऽपि सा तद्गुणार्थोवगतिनिर्निब-

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तृतीयो विमर्शः

कथं तर्हि देवाकस्मिकोऽर्थः कथं विवोच्यते ? । विशेष्यवाचिनोडनेकार्थस्य तु तत्त्विनन्धनभावोपगमे अन्योन्याश्रयदोषः ।

न चोभयमण्यन्योन्यानुगृहीतदुपजनननसामर्थ्येमव निपतनादिकमिवाड्ढरमर्थान्तरप्रतिभासुपजनयति, यो जडपदार्थविषय एवाश्रयमुपपन्नः क्रमः, यत्र स्वाभाविक एवायं जन्यजनकभावः, न वाच्यवाचकभावविषयः, तत्र हि प्रतिपत्तिपरामर्शापेक्षाप्रतिबन्धोऽर्थाध्यवसायोपजनो न स्वाभाविकः ।

तत्र वाच्यार्थविषयस्य वाचक एव तत्संस्कारप्रबोधानिवन्धनं नान्यः । अर्थान्तरविषयस्य तु तस्यावश्यमन्यदेवापेक्षणीयं युक्तं न पुनरेक एवोभयत्रापि: एकहेतुकत्वेऽर्थयोः क्रमनियमातुपपत्तेः; प्रत्यर्थे शब्दनिवेशोपगमविरोधाच्चेति तयोर्भिन्नहेतुकत्वमवगन्तव्यम् ।

तच्च तदावृत्या वस्तु अर्थप्रकरणादिना वा, न तत्रास्माकमभिनिवेशः कश्चित् । केवलमन्यत्तत्प्रतिभोद्रेद्रेदाभ्युपगमेऽनुमानान्तरभावः स्फुट एव तस्यैव लिख्यतापत्तेरिति शब्दस्यानेकार्थतावगममात्रमूलोऽयमपि कवीनामर्थान्तरप्रतीतिभ्रम इति वार्थः शब्दशक्तिपरिकल्पनप्रयासः ।

एवं चास्य वाच्यातिरिक्तोऽर्थान्तरस्म प्रतीतिरेव न समस्तीति यत्प्रस्तुताभिधानप्रसङ्गभ्यात् तयोरुपमानोपमेयभावप्रकल्पनं तदपि निर्मूलमेवेत्यवगन्तव्यम् ।

( पद्य का अनुवाद द्वितीय विमर्श में किया जा चुका है ) यहाँ गौशब्द अनेकार्थ है । उससे अप्राकरणिक भी एक अर्थ निकल सकता है किन्तु उसका कोई हेतु यहाँ नहीं है । क्योंकि—कारण माना जा सकता है तो अनेकार्थ होने से वही गौशब्द, या उसके विशेषण या फिर दोनों ( गो शब्द और उसके विशेषण ) इनके अतिरिक्त और कोई प्रयोजन, प्रकरणादि यहाँ संभव नहीं है । इनमें से गौशब्द कारण नहीं माना जा सकता । उसे कारण मानने पर गाय के अतिरिक्त वज्र आदि—अन्य अर्थों की प्रतीति भी मानने की आपत्ति उठेगी क्योंकि जब वह ( गौशब्द ) अनेकार्थक है तो किसी की प्रतीति मानने और किसी की प्रतीति न मानने का नियम नहीं बन सकता । यदि विशेष—

णों को कारण माना जाय, और किसी को नहीं तो विशेषण जिस पदार्थ के लिये आता है, उसी में विशेषता की प्रतीति कराता है, तो उससे भी वह दूसरे अर्थ के अनुरूप प्रतीति बिना किसी कारण के कैसे होगी । यदि विशेष्यवाची ( गो ) शब्दों की अनेकार्थकता को उसका कारण माना जाय तो अन्योन्याश्रय दोष होगा । और—एकदूसरे की सहायता करके मिट्टी से पानी आदि, जैसे अंकुर उगते है वैसे ही विशेषण-विशेष्य दोनों एक दूसरे के सहयोग से उस अर्थ को उत्पादन करें ऐसा भी संभव नहीं, क्योंकि अन्योन्य सहयोग से वस्तु का उत्पादन जड़ पदार्थों में ही देखा गया है । वहाँ ( जड़ में ) यह जन्यजनकभाव सम्बन्ध स्वाभाविक होता है । वहाँ वाच्यवाचकभाव की अपेक्षा नहीं । विशेषणविशेष्य स्थल में—अर्थ का ज्ञान ज्ञाता के संकेतग्रह की अपेक्षा रखता है; वहाँ वह स्वाभाविक नहीं । वाक्यार्थविषयक जो अर्थाध्यवसायोपजन = ज्ञाननिष्पत्ति है उसमें उसके संस्कार का जनक उसका वाचक ही होता है । और कोई नहीं । ऐसी स्थिति में दूसरे अर्थ के लिये किसी दूसरे को ही कारण मानना जरूरी है; उसी वाचक को दोनों जगह कारण मानना ठीक नहीं

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कारण कि यद्यि अर्थों का ज्ञापक हेतु एक ही होगा तो उनके ज्ञान में कम नहीं रहेगा। और यह जो माना जाता है कि 'प्रत्येक अर्थ के साथ शब्द बदलता है'—इसका भी विरोध होगा। इसलिये उन दोनों अर्थों के ज्ञापक शब्दों में भी भेद मानना ही चाहिये। वह ( भेद ) या तो आकृति द्वारा हो सकता है या प्रयोजन, प्रकारण आदि द्वारा । किसी के द्वारा हो हमारा उसमें कोई आग्रह नहीं : हमारा कहना केवल इतना ही हँ कि और किसी से अर्थ का ज्ञान होता हुआ स्वीकार करने पर उसका अनुमान में अन्तर्भाव साफ ही है, क्योंकि जो उसका ज्ञान कराया वहाँ अनुमान = हेतु बन जाएगा । इस प्रकार अभी तक जो दूसरे अर्थों की प्रतीति में शब्द को अनेकार्थतामात्र को कारण माना जा रहा है वह कवियों ( विद्वानों ) का भ्रम ही है। इसलिये शब्द की अतिरिक्त शक्ति मानने की कोशिश निष्फल ही है। और इस प्रकार इस वाच्य से भिन्न अर्थों को जब प्रतीति ही नहीं है, तब अप्रस्तुत = असंबद्ध—अर्थ के कथन की कल्पनामात्र से उनके उपमानोपमेयभाव की कल्पना करना भी वे सिर-पैर की बात है।

किश्च न स्वभावत एव शब्दानामर्थप्रतीतिक्रम इति नियमसम्भवः, किन्तर्हि? : सामग्रीवशात्। सा हि यदर्थानुगुणा उपलब्ध्यते तमेव तस्यार्थे कल्पयतीति सर्वे शब्दाः; सर्वार्थविषयः सर्वशक्तः सर्वशब्दविषयो भवितुमर्हति। ततश्व अतदर्थोडप्यन्वयः; शब्दः सामग्रीवशात् समासोक्तिन्यायेन तमवगमितुं क्षमेतैव, न पुनस्तदर्थोडपि सामग्रीविकलो गवादिशब्दः । आस्तां वान्यः शब्दो, यः साधुत्वेन प्रसिद्धः। असाधुरपि यावत् तद्र-शादनुमितवाचकभावोऽभिमतार्थमभिदध्यात्स्येवेति सामग्रीसन्निधावन्वयव्यतिरेकानुविधायिनोऽर्थान्तरप्रतीतीरिति रित्यचसीयते। यदाहुः—

'असाधुरनुमाने वाचकः कश्चिद्रिष्यते । वाचकत्वाच्छेदपि नियमः पुण्यपापयोः ।।' इति । न चैतावता तस्याप्रशब्दत्वं कल्पयितुं युक्तम्। यतः शब्दरसतावच्छेद्यते विमृश्यते डिमिधीयते डेननार्थ इति शब्दानाक्रियाकरणभावपन्नोऽर्थः कथ्यते । स च त्रिविधः । साधुत्साधुरपशब्दश्रेति । लक्षणानुगतः साधुः; प्रकृतिप्रत्य-यादिविभागपरिकल्पनया लक्षणेनानुगम्यत इति । यतोऽन्योऽसाधुरव-तपन्नो डित्यादिवत् । शब्दादपेतोऽपशब्दः योडर्थ न प्रतिपादयति विरुण-

सामग्रीक इत्थर्थः । एवं च साधुरब्दस्यापि सामग्रीवैगुण्येनावाचकत्वादप्रशब्दत्वमुपपन्नं भवति। ततश्व वाचकत्वावाचकत्वमात्रनिवन्धने शब्दापशब्दत्ववचहारे व्यवस्थिते सति ये केचिदितिहासपुराणादावागमशास्त्रादौ च कश्चित् केषु-च्चिदानामसाधुत्वादप्रशब्दत्वमुद्भावयन्ति ते प्रत्युक्ता भवन्ति ।

'शब्द जिन अर्थों का कथन कराते हैं, उनमें ज्ञान का आगे पीछे होना ( क्रम ) अपने आप होता है ऐसी कोई बात नहीं है, वह तो कारणों से होता है। वे कारण जिस अर्थ के अनुरूप मिलते हैं उसी अर्थ को उस शब्द का अर्थ मान लिया जाता है, इसलिये प्रत्येक शब्द प्रत्येक अर्थ का ज्ञापक हो सकता है, और प्रत्येक अर्थ प्रत्येक शब्द का ज्ञाप्य । इस कारण जो शब्द जिस

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वृत्तीयो विमर्शः

८४९

अर्थ का वाचक शब्द नहीं होता, वह भी सामग्री के आधार पर समासोक्ति के समान इस अर्थ का ज्ञान करा देता है। और उस अर्थ का वाचक होने पर भी सामग्रीहित गोआदि शब्द उस अर्थ का ज्ञान कराता सकना। अथवा उसे दूसरा हीं शब्द मान लिया जाय जो कि साधु ( संस्कृत और अभिधाशक्तिसंपन्न ) शब्द रूप से प्रसिद्ध है। ( तब भी ) हमारा तो यह कहन। है कि असाधु शब्द भी सामग्री ( कारण विशेष ) होने पर अपने वाचकत्व का अनुमान करा लेता है और ( विवादग्रस्त ) अर्थ का अवबोधन कराता है, इसलिये दूसरा जब का प्रतिनिधि सामग्री के अध्यास-

त्यादिक का अनुमान करते हैं ( अर्थात् सामग्री के होने पर वह होती है न होने पर नहीं )— अर्थ वा वनते हैं। जैसा कि कहा है—‘कुछ लोग असाधु शब्दों को भी अनुमान द्वारा वाचक मान लेते हैं। जैसा होने पर वाचकता सभी अर्थों में वराबर ही होती है—इतने पर भी पुण्य और पाप बराबर नहों होते ।’ इतने पर से उसे अपशब्द नहीं माना जा सकता। क्योंकि शब्द उम वर्ग को कहते हैं, जिसमें—‘शब्दित किया जाता है, विशिष्ट किया जाता है या अभिधान द्वारा क्रिया आता है—अर्थ जिसे'—इस व्युत्पत्ति के अनुसार शब्दन = कथन नामक क्रियाकारित्व रहता है। वह तीन प्रकार का होता है, साधु, असाधु और अपशब्द । जो लक्षणानुगत होता है वह साधु कहलाता है। जो लक्षणानुगत का अर्थ है—प्रकृति, प्रत्यय आदि के विभाग की ठीक-ठीक व्यवस्था कर अपने स्वरूप में आया। उससे भिन्न असाधु होता है, वह प्रकृति, प्रत्यय आदि से रहित होना है, जैसे इत्यादि । ऐश्वरिक प्रयोग से रहित शब्द अपशब्द

होता है, जो अर्थ वा ज्ञान नहीं कराता अर्थाद जिसकी कारण-सामग्री ठीक नहीं होती । इस प्रकार यदि कारण-सामग्री ठीक नहीं हो तो साधु शब्द भी अपशब्द हो जाता है। कारण कि वही दिखलाई भी अर्थ का वाचक नहीं होता। इस प्रकार जब शब्दत्व और अपशब्दत्व की व्यवस्था न बरावर और अवाङ्कत्व पर मान ली गई तब जो लोग इतिहास, पुराण और शास्त्रों में कहीं-कहीं

भिन्नी शब्दों को असाधुत्व के कारण अपशब्द बतलाया करते हैं —नतका भेद बन्ट हो जाता है।

अस्मान् प्रति पुनरपि सये प्रयुज्यमानः शब्दोऽपरशब्द इति । तथ्यथा—

'सधुकैरपवादकैरिव स्मृतिभुवः पथिका हरिणा इव ।

कलतया वचसः परिप्लादिनीस्वरजिता रजिता वशमायुः ॥' इति ।

अत्र हरिणानामुपमानत्वादपाधान्यमविगणयैय यः कविना रजिल्स्तानु-

नासिकः प्रयुक्तः सः। डपरशब्द पच् तत्प्रयोगसयोमेमेयाथतुगुणयेनो पपन्नत्वात्,

तस्मयैव प्राधान्यात्, प्रधाने च कार्यसमप्रत्ययोपगमात् । केवलमप्रधाना-

दक्षया शब्दसंसकारविचारणामेन व्याघ्रयानमत्र श्रेयो न पुनस्तत्स्य प्रयोजः ।

गृद्यते पुनरेतद् यद् पथिकानां हरिणतया रूपणं स्याद् आरोपो वा, यथा—

'स्मृतिभुवो वत पन्थमृगव्रजा' इति, यथा वा—'स्मृतिभुवः पथिका हरिण-

व्रजा' इति । अन्यथा त्वपरशब्द एवायमविषये प्रयुक्तवाद् अस्वगोण्यादि-

शब्दवत् । यदुक्तम—

'अस्वगोण्यादयः शब्दाः माधवो विषयान्तरे ।

निमित्तमात्रे सङ्क्रुत्व च व्यवस्थितम् ॥' इति ।

हमारे लिये तो वे ही शब्द अपशब्द हैं, जो जिस अर्थ में प्रयुक्त नहीं किये जाने चाहिये उस अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। जैसे—

३१ वृ० वि०

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व्यक्तिविवेक:

'वाणी की मधुरता से वीणा के स्वर को जीतने वाले या उससे जीते गये आसक्त ( रजित ) पथिकों को हरिणों के समान अपवाद करो जैसे भौरों ने स्मृतिभू के वश में कर दिया' ।

रजिता = आसक्त, अनुरजित ।

स्मृतिभू= काम, हिरण के पकड़ने का गड्ढा ।

अपवाद—विश्वास, हिरण पकड़ने के लिये बजाया जाने वाला ( घंटा आदि ) छोटा बाजा ।

रजित—'रजि' धातु का प्रयोग मृगों को लुभाने के लिये होता है तो उसके 'न' का लोप हो जाता है ।

—'रञ्जेणां-मृगरमणे नलोपो वक्तव्य:' वा-४८६७ ।

यहाँ हरिण उपमान है । अतः अप्रधान है । उनको अप्रधानता को बिना विचारे ही कवि ने 'रजि' धातु को विन नकार के प्रयुक्त कर दिया । वह अपशब्द है । उस ( रजि ) का प्रयोग उपमेय के अनुरूप ही हो सकता क्योंकि वही प्रधान है । जो प्रधान होता है उसी में कार्य ( विशेषण ) का निश्चय माना जाता है ( इसलिए यहां प्रयोग होना था रजिता: का और ) उसको बदलकर ( रजित ) करना चाहिये था । अप्रधान ( उपमान ) के लिये बदलने योग्य ) शब्द ( रजित ) का प्रयोग नहीं । यह भी ठीक हो सकता यदि पथिकों का हरिणरूप से निरूपण किया गया होता या पथिकों पर हरिण का आरोप किया गया होता । वह इसे प्रकार हो सकता था—'स्मृतिसुधा वच: पाथिकमृगव्रज:' या 'स्मृतिसुधा: पाथिका हरिणप्रजा:' ।

ऐसा न करने से वह अपशब्द ही है । उसका प्रयोग जहां नहीं करना चाहिये वहां किया गया है । अतः वह भी गोपी आरति के ससान अपशब्द है । कहा भी है—'असु, गोणी आदि शब्द दूसरे क्षेत्र में साधु हैं । साधुत्व की व्यवस्था निमित्त के भेद से सर्वत्र है अर्थात् कारणभेद से प्रत्येक शब्द साधु होता है ।

शब्दप्रयोग: कर्तृद्वय: प्रधानार्थद्यपेक्षया ।

तद्न्यापेक्षया त्वर्थद्वेनं विपरिणामयेल्लम् ॥ १ ॥

विपरीतमती यत् स्यादपशब्द: स मां प्रति ।

हेतुद्वयेनैवाश्रयमेव प्रयोगपरिणामयो: ॥ २ ॥

परिणामो बहुविधो वाचो लिङ्गादिभेदतः ।

स च प्रसिद्ध एवेति नास्माभिरिह दर्शित: ॥ ३ ॥

इति संग्रहद्रलोका: ।

संक्षेप में—'शब्द का प्रयोग प्रधान अर्थ को देखकर करना चाहिये । दूसरे के लिये, उसका ऊपर से विपरिणाम ( परिवर्तन ) कर लेना चाहिये । जो इसके विपरीत होता है, वह हमारे लिये अपशब्द है । यहां ('दत्तानन्द:' में ) यही 'वचनि का हेतु माना गया है । शब्द के प्रयोग और परिणाम में से परिणाम कई प्रकार का होता है, उसके लिंग आदि के भेद होते हैं । वह तो प्रसिद्ध है अतः हमने उसे नहीं दिखलाया ।

निष्कर्ष: रजि धातु का 'रजित', शब्द विशेषण है । वह प्रधान विशेष्य में लगता है । प्रधान विशेष्य होता है उपमेय । उपमेय पथिक और पथिक अर्थ में रजि का नकार लुप्त नहीं होता । वह जिसके लिये प्रयुक्त होने पर उस होता है वह है हरिण । और हरिण यहां उपमान होने से अप्रधान है अतः रजित का हरिण के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता । फलतः रजित केवल पथिक का विशेषण वनता है । संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से वह पथिक के लिये अशुद्ध है

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तृतीयो विमर्शः

ग्रन्थकार ने इसके दो उपाय बतलाए हैं। एक तो—पथिक पर हरिण का आरोप और दूसरा रूपण। ये दोनों हैं एक ही वस्तु। प्रयोग के भेद से दोनों—भिन्न माने जा सकते हैं। इनके प्रयोग भी ग्रन्थकार ने उपस्थि‌त किये हैं। ग्रन्थकार की यह मान्यता है—कि यहाँ पथिक का हरिण के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है न आरोप और न रूपण। महिनाथ यहाँ लिखते हैं—इह उपमानसादृश्यद्वैपचारिके मृगत्वसुपमेयेपु पथिके‌ऽवस्तुत्वात्‌विरोधः। अर्थात् सादृश्य के कारण उपमान मृग का उपचार पथिक पर आरोप है। परन्तु ऐसी मान्यता का कोई शाब्दिक आधार उस पक्ष में नहीं है। वह तभी सम्भव था जब—'पथिकामृगा:' या 'पथिकमृगा:' ऐसा पाठ होता। इसीलिये 'रजिता:' अशुद्ध हो है। अतः अपशब्द ही है। ग्रन्थकार का सुझाव है कि ऐसी जगह 'रजिता:' प्रयोग होना था। हरिण पक्ष में लगाने के लिये उसे 'रजिता:' बना लिया जाता।

यद्यपि च केचिदचक्षते समानायामर्थंगतौ शब्देऽनपराशब्देन च शास्त्रे धर्मनियमः क्रियते साधुमिरेव भासितत्वं नासाधुमिरिंति, तत्र कूपखानकचंद कुत्रिभेदविषयतांप्राप्तिनैव तैरेक प्रतिविहितम्। सा चेतिहासपुराणागमशास्त्रेष्वप्यस्त्येवेति नागमविरोधः। त्रिविधं हि शास्त्रं शब्दप्रधानमर्थप्रधानमुभयप्रधानश्रुति। तत्र शब्दप्रधानं वेदादि अध्ययनादेवाभ्युदयश्रवणात् मनागपि पाठविचर्यसेपि प्रत्यवायाश्रवणाच्च। अर्थप्रधानमितिहासपुराणादि तस्यार्थवादमात्ररूपत्वात्। उभयप्रधानं सर्गवन्त्यादि काव्यं तस्य रसात्मकत्वाद्रसस्य चोभयौचित्येन परिपोषदर्शनात्। काव्यस्यापि शास्त्रत्वमुपपादितं सेव। तदेवं यदर्थप्रधानमिष्यते तच्च्छ्रवणचारणार्थवोधानुप्ठानोत्थितेन धर्मेनासाधु‌शब्दोदितोऽर्थोऽपि तत्कृतो भवतीतीयमसो कूपखानकवृत्ति। धर्मस्य तदुत्थितत्वात्तदुपगतमेव—

'यस्तु प्रयुङ्क्ते कुशलः सविशेषे शब्दान् यथावद् व्यवहारकाले। सोडनन्तमाप्नोति जय परत्र वाङ्ग्यौविद्यं दुश्यते चापशब्दः ।।' इति।

यद्यपि कुछ लोग कहते हैं कि 'अर्थ' का ज्ञान शब्द और अपशब्द दोनों से वरावर होता है। शास्त्र तो उसपर धर्म ( कर्तव्य ) को व्यवस्था देता है कि साधु शब्दों से ही व्यवहार करना चाहिये, असाधु शब्दों से नहीं। इस पर उत्तर भी उन्हीं लोगों ने दिया है कि कूपखानक के समान वहाँ काम चलेगा। यह स्थिति इतिहास, पुराण आदि में भी है। अतः आरम्भ का कोई विरोध नहीं। शास्त्र तीन प्रकार के होते हैं—शब्दप्रधान, अर्थप्रधान और उभयप्रधान। उनमें शब्दप्रधान है वेद आदि। श्रुति का कहना है उनमें पाठमात्र से अभ्युदय होता है और थोड़े से पाठभेद से अनिष्ट होता है। अर्थप्रधान होते हैं इतिहास, पुराण आदि। वे केवल अर्थवादस्वरूप से पाठभेद से अनिष्ट होते हैं। उभयप्रधान होते हैं महाकाव्य। वे रसात्मक होते हैं और रस शब्द और अर्थ दोनों के औचित्य पर परिपुष्ट होता है। हमने काव्य की शास्त्रता भी सिद्ध की है। इस प्रकार जो वस्तु अर्थप्रधान होती है उसके सुनने‑समझने और अर्थ जानने से जो धर्म उत्पन्न होता है उससे असाधु शब्द के उच्चारण से उत्पन्न अभद्र समास हो जाता है, यहीं कूपखानकवृत्ति है। धर्म उससे होता है—ऐसा माना हो गया है—जो वाणी का उपयोग जानता है और चतुर व्यवहारकुशल में शब्दों को ठीक‑ठीक बतलाता है वह दूसरों पर अनन्त विजय प्राप्त करता है। वह अपशब्दों से दूषित भी होता है।

विमर्शः 'चापशब्दे:' पाठ की जगह अन्य पुस्तकों में 'नाथ शब्दे:' भी पाठ है।

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कूपखानक :—कुएँ।खोदने वाले। जैसे वे खोदते समय शरीर में लगी मिट्टी को खोदने से निकले जल से धोकर निर्मल हो जाते हैं वैैसे ही प्रकृत में इतिहास, पुराण, काव्य आदि में दिये अपशब्दों से उत्पन्न अधर्म साधुशब्दों द्वारा उत्पन्न धर्म से धुल जाना है।

असाधुश्रापशब्दश् द्विधा शब्द: प्रकीर्तित:।

तत्रासाधूनं साध्यो य: प्रकृतिप्रत्ययादिभि:॥ ८ ॥

शब्दादपेतोपशब्द: शब्दनाकरणात्मक:।

शब्दना हि परामर्शो वाच्यार्थविषयोडस्य य:॥ ९ ॥

एवश्वासाधुशब्दोऽपि नापशब्दत्वमर्हति ।

न सोडष्यम्येति साधुत्वं तयोर्विषयमेदत:॥ ९० ॥

ततश्र—सामर्थ्योद्देश शब्दस्य विषयेऽवगते सति।

न प्रयोगोडस्य न होष: स्वनिष्पत्तयै प्रवर्त्तते॥ ९९ ॥

अत एव प्रकृत्यर्थमात्रं तत्र प्रयुज्यते ।

सड़ूण्यासाधनकालादेरानुगुण्यानुपेक्षणा:॥ ९२ ॥

इयता चापशब्दत्वं न तेऽप्यवकल्पते ।

अर्थेषु शब्दनाकर्मकरणत्वानपायत:॥ ९३ ॥

असाधूच्चारणाद् यस्तु तत्कार्धर्म: प्रवर्त्तते ।

कूपखानकवद्वृत्ते: सोडर्थज्ञानाशिवर्सते॥ ९૪ ॥

अथवाथंपरिज्ञानमात्रं तत्पठनादपि ।

धारणादपि वा पुंसां श्रूयते डभ्युदय: पर:॥ ९५ ॥

संक्षेप में—शब्द दो प्रकार का माना गया है, असाधु और अपशब्द। उनमें वह असाधु है जो प्रकृतिप्रत्यय आदि से साध्य नहीं होता। 'शब्दनारूप' शब्द—न्यापार से रहित शब्द अपशब्द होता है। शब्दना शब्द के वाच्यार्थ का ज्ञान करानेवाली शक्ति है। इस प्रकार असाधु शब्द भी अपशब्द नहीं कहा जा सकता। वह साधु नहीं हो पाता। क्योंकि दोनों के विषयों में (ज्ञाप्य अर्थों में) भेद है। इसलिए—शब्द के अर्थ का ज्ञान सामर्थ्य से ही हो जाता है तो इस (शब्द) का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिये। यह अपनी निष्पत्ति के लिये समर्थ नहीं होता। अतएव शब्द के लिये—केवल प्रकृति का प्रयोग होता है। वह अपने आप में—वचन, कारक, विभक्ति और काल आदि को अपेक्षा नहीं रखता। इतने से उन्हें अपशब्द नहीं कहा जा सकता। क्योंकि उनमें अर्थ का ज्ञान कराने की क्षमता का अभाव नहीं रहता। वाक्य—प्रयोग में असाधु शब्दों के उच्चारण से जो अधर्म पैदा होता है वह कूपखानक के व्यवहृत के समान अर्थज्ञान से दूर हो जाता है। या यह कहा जा सकता है कि उन अपशब्दों के पाठ से केवल अर्थज्ञान हो। उनके भी अर्थज्ञान से तो अभ्युदय समझा सुना जाता है।

तस्मादुपपत्तिशून्य एवायं गतानुगतिकतया अनेकर्थशब्दप्रयोगविप्रलद्ध-व्याख्यातृपरम्परासमात्रप्रवर्त्तित; शब्दशक्तिमूलानुस्वानरूपार्थान्तर-प्रतीतिपक्ष; ।

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तृतीयो विमर्शः

व्याख्यातारोडप्यलतीकचिद्धनमानितया प्रायेणापद्याख्यानैर्न केवलत्मानं याचत् । तत्रभवतो महाकवेरपि हेयत्वन्तो दृश्यन्ते । तदर्था—

‘तां जानীয়ाः परिमितकथां जीवितं मे डितीयं दूतीभते मति सहचरे चक्रवाकीमिवैकाम् । गाढोत्कण्ठागुरुषु दिवसेष्वेषु गच्छत्सु बालाजाता मन्ये शिशिरमथिता पद्मिनीवान्तरूपा ॥’

इत्यत्र पाउमिममुदूद्धचैव कलितकविहेवाका: पराकृतप्रतीतिचारुतातिरायास्ते

‘अवैव तदवज्ञानाद्यतापेक्षों मनोरथः !’

इत्यादौ हग्रामपि वाक्यार्थकरन्तां मन्यतेरपशयन्तों बालायाः कर्मतामस्य मन्यमाना: स्वरसन्निधानात् चिरुतमिवरोदनमेव भ्रमात् वाराह्दं परिकलप्यापव्याख्यामारभन्ते । न चैचमर्थस्यैव चित्री काचित् सुल्निर्मति । नापि महाकवेः कालिदासस्यान्वयगतिरियं कचनापि प्रवन्धेडवधारितपूर्वा यदयं रसस्निधाने काव्ये व्याधिमिव वाराह्दमिवार्थे प्रयुज्यीतति ।

कथं तर्हिं ‘चन्द्रं प्रतुद्धोमिरिवोमिमालो’ति तद्येव कवेरीं प्रयोग: । उच्चयते । श्लेषशुत्वादविभावितार्थपाठेन केनचित् कलिपतोडयं पाउ: । स हि जलधिनिर्शोवेति दृश्यत: ।

इसलिये शब्दशक्तिमूलक अनुकरणनरूप—जो दूसरे अर्थ की प्रतीति को बात है वह तकशून्य है । वह तो एक पिटी-पिटाई बात है । अनेकार्थक शब्दों के जाल में पड़कर व्याख्याताओं ने अमवश उसे फैला दिया है । व्यारव्याकारों की ऐसी कुछ खोटी स्थिति है कि वे गलत व्याख्या द्वारा अपने आप को ही नहीं उन पूर्व महाकवियों को भी लज्जित रहते हैं । जैसे उदाहरणार्थ—तुम जब अपने कम-बोलने वाली को मेरा द्वितीय प्राण समझो, चक्रवाकी के समान मुझ साथी के छूट जाने पर वह अकेली होगी । गहरी हूक से बीते हुए इन पहाड़ जैसे दिनों में वह बेचारी शिशिर ऋतु से मसली गई पङ्किनी के समान और भी और हो गई होगी ( मेघदूत ) । यहाँ इस ( ग्रन्थकार द्वारा दर्शित ) पाठ को न जानकर कवि के आशय को समझाने की चेष्टा करने वाले व्याख्याताओं ने सौन्दर्य की जो पराकाष्ठा यहाँ है उसे ध्यान में नहीं रखा । जैसा कि—‘उसकी अवज्ञा से तुम्हारी इच्छा प्रयत्न से सफल होगी—ऐसा मानता हूँ’ ( रघुवंश—१ ) इत्यादि में देखा जाता है कि ‘मन्ये, अवैमि’ आद्रि में जो ‘मानने’ अर्थे की किय्रा आती है उसका कर्म होगा वाक्यार्थ,—सो उन व्याख्याताओं ने इस ओर भी ध्यान नहीं दिया । और ( वाल्मीकिपाठ मनाकर ) उसका कर्म ‘बाला’—ताङ ने इस ओर भी ध्यान नहीं दिया । और ( वाल्मीकिपाठ मनाकर ) उसका कर्म ‘बाला’—

को माना । उ उन्होंने स्वर-सन्धि के कारण बदले ‘इव’ शब्द को अमवश ‘वा’ शब्द समझ लिया । और गलत व्याख्या कर दी । इस प्रकार की व्याख्या से अर्थ की कोई विचित्रता समझ में नहीं आती । और महाकवि कालिदास के किसी भी काव्य में इस प्रकार का अन्वय नहीं देखा जाता । जिससे यह मान लिया जाता कि वह ( कालिदास ) रस के निधान इस ( मेघ ) काव्य में ‘इव’ शब्द्र के अर्थ में व्याधि जैसे इस ‘वा’ शब्द्र का प्रयोग करता ।

शंका—( यदि कालिदास में इतनी शक्त्ति मानी जा रही है कि वह दोष कर ही नहीं सकता )

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तो फिर 'चन्द्रं प्रभुद्धोऽमिरिवोन्मालीं' ( रघुवंश ५।६१ )—इस पद्यांश में उसी कवि का (ऊर्मि शब्द के दो बार प्रयोग के कारण कवित-पदत्व दोष होने से प्रयोग कैसे ठीक माना जाय ? ) उत्तर—वस्तुतः यहाँ 'चन्द्रं प्रभुद्धो जलधिंनिशीं' पाठ था । छलेप के कारण अर्थ न समझकर किसी ने उसे बदल दिया है ।

विमर्शः : 'ऊर्मिमालीं' इस प्रकार ऊर्मिमाली के बाद प्रयुक्त होने योग्य 'इव' पद का प्रभुद्धोऽमि के बाद जो प्रयोग हुआ, वह अस्थानस्थपदत्वदोष से दूषित हुआ । यह दोष सुधारे गए पाठ में तदवस्थ है । क्योंकि सादृश्यवाचक सदैव उपमान के बाद ही प्रयुक्त होते हैं । काव्यप्रकाशकार ने—'यथैववादयः शब्दा यत्परारास्तस्यैवोपमानताप्रतीति:' इस प्रकार उक्त तथ्य दशम उल्लास स्पष्ट भी किया है ।

यथा च—'ग्रामेऽस्मिन् पथिकाय पान्थ ! वसतिनैवाऽघुनो दीयते रात्रावत्र विहारमण्डपतले पान्थः प्रसुस्सो यथा ! तेनोद्द्राय खलेऽर्जति घने स्मृत्वा प्रियां तत्कुलं येनाद्यापि करङ्कडणडपतनाराक्री जनस्तिष्ठति ।।' इत्यत्र हि कविचत् 'वसति' प्रातिपदिकानुसन्धानमुद्देश्यतया पक्रम्यमन्वय-

व्यथावेशात् तस्यान्यालुरागितामाराङ्गमाना दारुणतरपिण्डामोदन्यासक्तजनासुराग इति न चेदसि कस्याऽऽश्रितसुरकस्तदिदमखिलमेव गृहम्, अयं च जनस्तव वायत्त एव, अन्यथा गम्यतामिति स्वाभिप्रेतमर्य्यमस्मै निवेदयितुकामाः पूर्ववृत्तान्तं वसति विहितोपकारकामिनोमरणावेदनफलं वक्तुमुपक्रमत इति तदतत्सयुक्तमेव रसाभिव्यक्तिसङ्कात् । उभयोर्नुरागातिशययौगेनऽपि पुरुषवध-वर्णनस्यात्यन्तमनुचितत्वात् खलार्थकथनार्थयो रसङ्गतिप्रसङ्गात् ।

न हि योड्स्ववराः सुन निधीयते तस्य तनुक्षणं यच्चापि कस्यचिदुपकथापकाराय वा स्यात् तदपेक्ष्यमस्य सौजन्यं खलत्वं वा न शक्यं व्यवपदे-ष्टुम् । तावद्विसन्ध्याय मरणे तस्य तद्व्यपदेश्यतवो पत्ते:, अन्यथा तिम्रसङ्घ-दिति तन्मतानुविधायिनोड्न्वपरम्पराक्रमेण व्याहृत्यतारोड्यापि तेनैवोपप-त्युपपादिना पथा सङ्क्रान्त इति स्थितम् ।

और जैसे—'अब इस गाँव में राहगीरों को ठहरने नहीं दिया जाता । बीती रात को यहाँ कोई युवा पथिक विहार-मण्डप के नीचे सो गया । जव मेघ गर्जे तो प्रिया का स्मरण कर उस दुष्ट ने चिल्ला कर ऐसा किया कि अब तक सब लोग करङ्क दण्ड के भय से व्याकुल है ।'—यहाँ किसी ऐसी स्त्री ने जो ठहरने की प्रार्थना कर रहे किसी रास्तगीर युवक पर कामाविष्ट हो गई और उसमें वासना और खोई हुई प्रीति अनु( ४८७ )राग की शङ्का कर यहाँ सोचने लगी कि दूसरे खेत पर आसक्त व्यक्ति से किये गये प्रेम का फल वढ़ा ही दारुण होता, उसने उस युवक से कहा कि यदि किसी और को नहीं चाह रहे हो तो यह सारा ही घर तुम्हारा है और यह जन भी तुम्हारे अधीन है । यदि ऐसा न हो तो जाओ ।' इस प्रकार अपने अभिप्राय को उस युवक को बतलाने की इच्छा से उस नायिका ने पहले कभी हुई ऐसी घटना को कहना आरम्भ किया . जिससे निवास स्थान देने का

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ननु—यावदिरर्थैः समवन्यः प्राक्‌छब्दस्यावधारितः । तावत्स्वान्यनिराशंसः श्रुतः समः कुरुतेऽङ्गितम् ॥ १२ ॥

तेनो यथाश्रुगुणा सामग्रयस्योपलभ्यते । स पञ्चार्थोऽव्यवस्थाप्यः: सत्त्वस्यान्येष्टवाधितः ॥ १३ ॥

तेनोभयार्थानुगुणा व्यनक्त्यर्थानुभावचपि । ययोः सामर्थ्यतः सिद्धयेदुपमानोपमेयता ॥ १४ ॥

इत्थमर्थान्तरे बुद्धिः ध्वनिरेवाधिगायत्ययम् । तत्रिवन्धननिर्बन्धो निरिनन्धन एव सः ॥ १५ ॥

पञ्चश्रातमन्यदृक्षेप्ये किमर्थं तत्त्वदर्शिनः । व्याख्यातारोड्यधिकृत्सिता मोहात्‌ को वेध्चि वा हितम् ॥ १६ ॥

उच्यते—यथाप्यर्थेषु सर्वेषु प्राक्‌छब्दः कुरुतेऽङ्गितम् । तथापि तत्त्ववस्थार्थे विशेषणमपेक्षते ॥ १७ ॥

तच्चेत् तद्‌दननेकार्थ मुख्योऽर्थः कोडवतिष्ठताम् । यस्तत्र प्राकरणिकः पौर्वापर्यगतिः कुलः ॥ १८ ॥

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सा चेत् प्रकारणाद्यो हि प्रकृतस्तस्य सा पुरः ।

पश्वादन्यस्य सामर्थ्येऽपमानेता ॥ १९ ॥

यतो न तावतैवं व्यापारो विरतो 'चने ।

व्यापारविरतैः हि स्याद्व ततोडर्थान्तरे मति: ॥ २० ॥

'चनेरनेकार्थस्यापि यथा प्रकरणादिभिः ।

अनाहत्यैव तच्च्छक्तिं प्रस्तुतार्थविनिश्चय: ॥ २१ ॥

क्रियते तद्वदेवान्य नेष्ट्यतेऽर्थान्तरेऽपि किम् ।

को विशेषोऽस्य यद्यं शाब्दशक्तिनिबन्धन: ॥ २२ ॥

विशेषणानुगुण्यं चेदर्थान्तरगते: पदम् ।

यतस्तद्रूप्यनेकार्थमिश्रमेव विशेष्यवत् ॥ २३ ॥

अनेकार्थत्वमप्रयस्य कुतस्तद्वचसीयते ।

एवमेवावसायित्वे द्विरोष्येडवगतिर्‌निम्न ।

किम् ॥ २४ ॥

तत् एव विरोष्याच्छेद भवेदन्योन्यसंश्रय: ।

अथोऽभयपरामर्शोऽद्विष्यतेऽथान्तरे मति: ॥ २५ ॥

स्यादेवं प्रकृतार्थेऽपि सिध्येद्वार्यं तया विना ।

ततोडनया विमर्श: स्यादन्यथातिप्रसज्यते ॥ २६ ॥

तस्मादनेकार्थत्वेडपि विशेषणविशोष्ययो: ।

अर्थान्तरप्रतीतिस्यर्थ वाच्यमेव निवन्धनम् ॥ २७ ॥

इति सद्रहस्लोका: ।

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तृतीयो विमर्शः

और विशेष्य की भी अनेकार्थकता जानी कैसे जाती है ? यदि कहें कि यूं ही ( बिना कारण ) तो फिर विशेष्य में भी ( अनेकार्थकता का ज्ञान बिना विशेषण की सहायता के ) क्यों नहीं होता ? यदि कहें उसी विशेष्य से उसके ( विशेषण की ) अनेकार्थता का ज्ञान होता है तो अन्योन्याश्रय दोष आना ( विशेष्य अनेकार्थक प्रतीत हो तो विशेषण में अनेकार्थकता प्रतीत हो और विशेषण में अनेकार्थकता प्रतीत हो तो विशेष्य अनेकार्थक ) यदि यह माना जाय कि दोनों के परामर्श से दूसरे अर्थ का ज्ञान होता है तो प्रकृत अर्थ भी अर्थान्तर के ज्ञान की बिना ( सिद्ध नहीं होता, इसका! ज्ञान उसी ( अर्थान्तरज्ञान ) से होगा । ऐसा मानने पर अतिप्रसङ्गि होगा । ( प्रकृत अप्रकृत-सापेक्ष अभिप्राय यह कि प्रकृत के अर्थ की प्रकृतता का निश्चय भी अप्रकृत अर्थ के ज्ञान पर निर्भर है । ) इसलिये विशेषण और विशेष्य अनेकार्थक हों तो भी दूसरे अर्थ के ज्ञान के लिये वाच्यार्थ को ही कारण मानना पड़ता है ।

अर्थशक्तिमूलक ध्वनि

अर्थशक्तिमूल: पुनरुपपद्यत एव ध्वनादिवाच्ये: सम्बन्धावधारणपुरस्सरीकारेण ततोडर्थान्तरप्रतीतिरुपपादितत्वाद्, यथा ‘पञ्च वाणादिनि देवर्षीन्‌’ वाक्यादौ लीलापत्रगणनं गौण्या: शब्दव्यापारं विनैवर्थान्तरं रतिभावव्यभिचारिलक्षणं लज्जादिकमनुमापयतीति ध्वनिम्‌। सर्वोऽथ: कवे: कविनिबद्धस्य वा वत्सु: प्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरीर: स्वतस्सम्भवी वास्तु । नैतावता तस्य गमकताया: फलभेद: कश्चित्‌। गम्यस्य पुनरर्थस्य प्राधान्येन निवन्धनो व्यपदेश इति तस्य प्रधानतरभावेन द्वैविध्यमुपगम: सफल एव । तथाहि— ‘प्राप्तश्रीरेव कस्मात् पुनररपि मयि तन्मनथ्बेदं विदध्या- न्निद्रामप्यस्य पूवोऽमनलसमनसो नैव सम्भावयामि । सेतुं वध्नाति भूय: कीर्तिमती च संकल्पद्वोपान्थानुयात- स्वप्नायायते वितर्कान्निति द्रवति इवाभाति कम्प: पयोधे: ॥’ इति । यत्र लक्मीला लम्पटतया पयोनिधौ मन्थनद्रयथावितरणं विलासालस- तया योगनिद्रासुखास्वादो द्रुपान्तराधीरदर्शनान्निधिया सेतुबन्धश्रुति भगवतो वासुदेवस्यामो व्यापारा: प्रसिद्धास्सन्तो यदस्यत्र राजादावारोप्य तस्य समीहितप्राप्त्या निषिध्यन्ते तेन तत्कार्यत्वात कारणभूतभगवदृपता- रोपमेव तज्जानुमापयतीति रूपकानुमितिरिति व्यपदेश: प्रवर्त्तते ।

धूम से अग्नि के सम्बन्ध का ज्ञान जैसे व्याध्यव्यापकभाव सम्बन्ध के ज्ञान से होता है उसी प्रकार अर्थशक्तिमूलक अर्थान्तर की प्रतीति भी उसी सम्बन्ध से होती है । उक्त बतला दी गई है जैसे— ‘पञ्चवाणादिनि देवर्षीन्‌’ यहाँ पार्वती जी का लीलाकमल की पंखुड़ियों का गिनना स्थायीभाव रति के सञ्चारी, लज्जा आदि भावों का अनुमान शब्दव्यापार के बिना करा देता है । सब अर्थ चाहे वे कविप्रौढोक्तिसिद्ध हों, कविनिबद्ध वक्रोक्तिप्रौढोक्तिसिद्ध हों या स्वतःसम्भवी,

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व्यक्तिविवेक:

इससे उसकी अनुमाप्यता में कोई अन्तर नहीं आता। जो अर्थ गम्य होता है वह प्रधान होता है। अतः उसको ऊपर उस वाच्य का नाम रखा जाता है। इसलिये अर्थ को दो प्रकार का माना जा सकता ही है। प्रधान और अप्रधान। यथा—

जब तुम तट पर पहुँचते हो तो समुद्र कांपने लगता है, मालूम पड़ता है उसके मन में ये वितर्क उठते हैं—इसे श्री तो मिल ही चुकी है, अतः यह मुझे मथने का कष्ट पुनः क्यों करेगा, पहले जैसी नींद भी इसमें दिखाई नहीं देती क्योंकि इसका मन आलस्यरहित है, और इसके पीछे सभी द्वीपों के राजा चल रहे हैं अतः यह पुल भी फिर से क्यों बाँधेगा ?—यह ।

यहाँ १—लक्ष्मी पाने के लिये समुद्र को मथा ।

२—अपनी इच्छा से आलसी बन कर योगनिद्रा का समुद्र में आनन्द लिया ।

३—दूसरे द्वीप के रावण को मारने के लिये पुल बाँधा—ये तीनों काम भगवान् विष्णु के लिये प्रसिद्ध हैं। किन्तु यदि ये राजा आदि पर आरोपित किये जाते हैं और उनका निषेध इष्ट फल-प्राप्ति हो जाने से किया जाता है तो वे अपने वास्तविक कारण उस राजा पर भगवान् विष्णु के आरोप का अनुमान कराते हैं—क्योंकि वे वस्तुतः विष्णु भगवान् के कार्य हैं। इसलिये इसे रूपकानुमिति कहा जाता है।

'ज्योत्स्नापूरप्रसरधवलं सकृत्स्विमन् सरय्वा वादचूतं सुचिरमभवत् सिद्धयूनोः कयोऽधितम् ।

एकः प्राह प्रथमनिहतं केशिनं कंससन्न्यः: स त्वं तरस्वं कथय भवता को हतसतत्र पूर्वम् ॥' इति ।

अत्र केशिकंसासुरयोः कतरौ भवता पूर्वं हत इति योऽयं वधपौर्वापर्य- विपर्ययानुयोगस्तस्य साक्षाद् भगवान्ैव विषयभवेन वक्तुमुचिनो नापरो राजादि:, तयोरेव धूमाग्न्योरिव कार्यकारणभावप्रसिद्धेः । सोऽयमन्न्यविषयत- यौच्यमाने स तत्र भगवानूपरोपमनतरेणानुपपद्यमाने

रूच्यरूपकभावमनुमापयिताति रूपकानुमितिर्यपदिश्यते ।

चाँदनी की फेनिल बाढ़ से सफेद इस सरयू की रेत में वड़ी देर तक किन्हीं दो सिद्ध जाति के युवकों का वादविवाद हुआ। उनमें से एकने केशी नामक राक्षस को पहले मरा बतलाया—और दूसरे ने कंस को! अब आप ठीक बतलाइए कि आपने किसने पहले मारा? (यह बात किसी राजा से कही गई है) यह जो यहाँ प्रश्न किया गया है कि 'केशी और कंस में से आपने किसे पहले मारा'—यह साक्षात् भगवान् से पूछा जा सकता है, राजा आदि से नहीं क्योंकि (ये कार्य भगवान् के ही हैं) उन्हीं दोनों (उन कार्यों और भगवान्) का कारण-कार्य भाव धूम और अग्नि के समान प्रसिद्ध है। उसे जब दूसरे आदमी पर लादा जा रहा है तो यह उस आदमी पर भगवान् का आरोप कराता है। क्योंकि बिना आरोप के ये बातें उस राजा में नहीं बन सकतीं। इस प्रकार इस काव्य से रूपकभाव का अनुमान होता है। अतः इसे रूपक ध्वनि कहा जाता है।

'लावण्य कान्ति परिपूरितदिङ्मुखेडस्मिन् स्मेरेऽघुना तव मुखे तरलायताक्षि ।।

क्षोभं यदेत न मनागपि तेन मन्ये सुव्यक्तमेव जडराशिरस्मि पयोदधि: ॥² इति ।

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तृतीयो विमर्शः

अग्रापि यदेतत् कस्माश्रिद् यथोदितगुणगणोदितसौन्दर्यसम्पादि वदने सति समुद्रसङ्क्षोभाविर्भावस्योचितस्यापि कुतश्चित् कारणादभावाभिधानं तत्तस्मात् पूर्णेन्दुरूपतारोपमनुत्तरेणानुपपद्यमानं मुख्यस्य तादृश्यमुपकल्पयत् पूर्ववत् तयो रूपककथावनुमित्यापयतीति रूपकानुमितिर्यपदेशो भवति । केवलेप्यदभ्रविचार्यत इदेतदुद्भवन्न्द्रुबिम्बसन्निधाव सत्या अपि पर्याधिस्सैललोल्लासलक्षणक्षोभाविर्भावनिबन्धनधिया सलिलसमूहमात्रपरमार्थे-‘यथास्य कारणं चेतनचमत्कारकणिका समस्तीतये’वमर्थेतात्पर्येण जलराशित्वमुप-पञ्चं तत् तस्य सदैव सच्चिहितामिस्रणारोपितरुप्यामिनीरमणोद्रयसमयेडपि नाम्नि सङ्क्षोभाविरभावो भवेत् तदापि जलराशित्वाविशेषात्।

हे नंचल और चौड़ी नितवनवाली ! तेरा चेइरा अपना लुनाइ और दमक से दिशाओं को लवालव भर देता है । जव यह मुसकुराता है उस समय भी ( यह समुद्र ) तनिक भर भी आन्दो-लित नहीं होता तो यह समुद्र निश्चित ही जलराशि है ।’ यहाँ भी रूपकानुमिति ही कही जाती है ! यहाँ किसी सुन्दरी के तथावर्णित गुणगणों से उत्पन्न सौन्दर्य-संपत्ति वाला मुख होने पर भी समुद्र के सङ्क्षोभरूप कार्य को जिसकी होने ऊँचते थे किसी कारण से जो अभाव कहा गया वह उस ( मुख ) के ऊपर पूर्णचन्द्र के आरोप के बिना सम्भव नहीं । अतः मुख की ताद्रूपता ( चन्द्रूपता ) का अनुमान करता है । यहाँ ( हम ) केवल इतना विचार करते हैं—कि यहाँ जो मुखरूपो चन्द्रविम्ब के रहने पर भी समुद्र में ज्वाररूपो क्षोभ के अभाव थी बात पैदा कर केवल भौतिक अचेतन तोयाशय के रूप में जो उसकी जलराशिता वनल्गई जिससे यह अभिप्राय निकला कि इस समुद्र में चेतन-सुलभ हर्षोद्रेक आदि का लवलेश भी नहीं है, सो वह ( जलराशिता ) तो समुद्र में सदा रहती ही है । वास्तविक चन्द्रमा के उदित होने पर भी समुद्र में ज्वार नहीं आता, उस समय भी वह समान रूप से जलराशि रहता है ।

अथ मदनोन्मादलक्षणक्षोभाविरभावनिबन्धनवृत्त्या सदसद्विवेकविकलोऽयं जड इति नैक्यप्रतिपादनपरतया तदुपपादानमिति । यथापि वदनस्य सौन्दर्यांतिशयशालिनः सौभाग्यातिरेक एवानुमितो भवति, यथात्रैव पाठविप-र्यंसे सति-‘यत् प्रह्मभावमुपयाति न, तेन मन्ये सुवयक्तमेव जलराशिरयं पर्याप्तः’ इति सुवयक्तमेव

न पुनः पूर्णेन्दुरूपतद्भू। तदृशि तत्कार्येस्य सदुद्रसङ्क्षोभस्याविकलकारणतया सम्भाव्यमानोत्पादस्य सतः प्रतिबन्धकप्रत्ययबलादनुत्पादे सत्य-जुमीयते नान्यथा । यथा—होइ ण गुणाणुराओ जडाण णवरं पसिद्धिसरणाण । किं पण्णचइ सोसिमेणा चन्देण ण पियामुहं दिट्ठे ॥ [ भवति न गुणानुरागो जडानां केवलं प्रसिद्धिशरणानाम् । किल प्रज्ञायते शशिमणिशशिन्द्रे, न प्रियामुखे दृश्ये ॥ ]

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इत्यत्र प्रियामुखस्य पूर्णेन्दुरूपत्वं तत्कार्यस्य चन्द्रकान्तमणि प्रस्नुतिलक्षणस्य सम्भाव्यमानोत्पादस्य सतो जाड्यजनितप्रसिद्धिशरणत्वरूपप्रतिबन्धकप्रतययवलादनुत्पादे सत्यनुमीयते ।

न चेह चन्द्रविम्बकार्यस्य किमपि प्रतिबन्धकारणभूतामिति कथम् तस्य पूर्णेन्दुरूपत्वानुमितिसिद्धिः ।

और यदि बुद्धि की जड़ता के अभिप्राय से यह कहा गया हो, जिससे यह प्रतीत हो कि कामिनी का मुख देखकर भी कामोन्माद-रूपी क्षोभ का आविर्भाव न होने से 'यह समुद्र अच्छे-चुरे का मैत्र करने की कुशलता नहीं रखता', तो इससे भी अतिशय सौन्दर्य से युक्त मुख की निरतिशय-प्रियता ( सौभाग्य ) अनुमानित होती है ।

जैसा कि इसी पथ्य में पाठ बदलने पर—'यह प्रह्लाद = चित्तद्रुति को प्राप्त नहीं होता तो समुद्र सचमुच जल(ल)राशि ही है [ संस्कृत में 'ड' और 'ल' अभिन्न माने जाते हैं ]

किन्तु मुख के पूर्णचन्द्र स्वरूप होने का अनुमान नहीं होगा । वह तो तब अनुमित होता जब समुद्री जवार के सभी कारण उपस्थित होते और जब समुद्भव होता तब भी किसी प्रतिबन्धक ( बाधक ) के ज्ञान के कारण वह नहीं पैदा हो रहा होता ।

उसका अनुमान और किसी स्थिति में हो नहीं सकता । जैसे—

'जो जड़ होते हैं वे केवल प्रसिद्धि पर चलते हैं, उन्हें गुणों पर अनुराग नहीं होता । देखिये न चन्द्रकान्त का पत्थर पिघलता है केवल चन्द्रमा के उगने पर प्रियामुख के दिखाई पड़ने पर नहीं ।

यहाँ प्रियामुख का पूर्ण चन्द्र स्वरूप होना चन्द्रकान्तमणि के पिघलने से अनुमित होता है क्योंकि पिघलना—चन्द्रोदय का कार्य है और यहाँ उसके अभाव में जड़ता से उत्पन्न प्रतिबन्धि-परायणता को प्रतिबन्धक बतलाया गया है ।

किन्तु यहाँ ( लावण्यकान्ति पथ्य में ) चन्द्रविम्ब के कार्य ( समुद्री जवार ) का कोई भी बाधक नहीं बतलाया गया, इसीलिए उसके पूर्णेन्दु रूप होने का अनुमान कैसे हो सकता ?

यत्र हि यत्कार्यस्य यत् प्रतिबन्धनिवन्धनभावेनोपकल्प्यते तत्र तस्यैव तदुपपादकत्वेन तस्यैव कारणत्वातिशयसिद्धौ ।

मुखे च सौभाग्यादितिरेककार्यस्य मदनोन्मादलक्षणस्य क्षोभस्याचेतनत्वं परमार्थेजलराशित्वं प्रतिबन्धनिवन्धनभावेनोपलक्ष्यते ।

अतस्तस्यैव तत्र प्रतीतिरुपपन्ना न चन्द्रत्वादेः ।

अन्यथा कमलत्वादेरपि सा स्याद् विशेषभावात् ।

तस्मादुभयार्थसाधारणक्षोभपदप्रयोगमात्रत्रिप्रतलम्भृकृतोडयं मुखेन्दुवि-म्वयो रुप्यरूपकभावभ्रम इति स्थितम् ।

तस्मादेवमत्र पाठः कर्त्तव्यः:-

'क्षोभं यदेति न मनागपि तेन मन्ये रूपान्तरं पतितमपि किं नु प्रपद्येतः' इति ।

अत्र हि न केवलं वदनस्यैन्दुत्वं प्रतीयते, यावदपां पत्मुः श्रृङ्गारितव्-मपि ।

तेन तव वदनेन्दुतये सत्यनेकसुन्दरीरूपलावण्यसम्पदामन्तरझोड्य-पांपतिर्यन्न मनागपि क्षोभमुपयाति तन्मन्ये रूपान्तरं किमपि प्रपन्न इत्ययम्-

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तृतीयो विमर्शः

थोड़वतिष्ठते। एष वाननतरोक्पाठार्थाद् विशेष्यते न वेति सह्हदया एव प्रमाणमिति । यथास्थितपाठपक्षे तु नेदं रूपकानुमितेरुदाहरणमुपपद्यते ।

जहाँ जिसके कार्य ( फल ) का जो प्रतिबन्धक कहा गया हो, वहाँ उस प्रतिबन्धक का उल्लेख होने से ( जिसका फल हो ) उसे वस्तु का अनुमान होता है अन्य किसी का नहीं, पेसा करने से अव्यवस्था हो सकती है ( आग-दियासलाई और मनुष्य-प्रयत्न का फल है आग की उत्पत्ति वाथक है)—काँडी का सींड खा जाना, सींड़ खा जाने का उल्लेख हो और आग उत्पन्न न होने का भी है—तो उसमें दियासलाई का अनुमान हो:गा, लकड़ी चकमक पत्थर आदि का नहीं—) और मुख में सौभाग्यादिरेकरूपा कार्य कारणभूत क्षोभ के प्रतिबन्धक अचेतनता और वास्तविक जल ( ड ) राशि-त्य ये ( दो ) धर्म बतलाये गये हैं। इसलिये उस ( सौभाग्य ) की प्रतीति हो सकती है, ननद्रत्व आदि की नहीं। नहीं तो फिर मुख में कमलत्वादि की प्रतीति भी माननी जानी चाहिये कारण कि उपर्युक्त नियम न मानने पर कोई अन्तर नहीं रहता। इसलिये वात यह तय हुई कि दोनों अर्थों में लगने वाले थोभ शब्द के प्रयोग से लोगों को मुख और चन्द्र के रूप्यरूपक भाव का भ्रम हो गया था। इसलिये यहां ऐसा पाठ बदल देना चाहिये ।

इसमें थोड़ा भी क्षोभ नहीं हो रहा है अतः विदित होता है कि ‘यह जलों का भण्डार किसी और ही रूप में आ गया है ।’ इसमें केवल मुख का चन्द्ररूप होना ही प्रतीत नहीं होता, जलनिधि समुद्र था शश्वत्कारी होना भी प्रतीत होता है । उससे यह अर्थ निकलता है कि तुम्हारे मुखचन्द्र का उदय होने पर भी यद्यपि यह समुद्र जिन्होंने अनेक सुन्दरियों के रूप और लावण्य की सम्पत्ति का रहस्य अनुभव किया है थोड़ा भी चलायमान नहीं होता तो—मैं सोचता हूँ कि यह किसी ऐसे व्यक्ति का हृदय है जिसका हृदयगण हैं प्रमाण हैं । पाठ जैसा का तैसा रखने पर तो यह रूपकानुमिति का उदाहरण नहीं माना जा सकता ।

‘वीराणां रमणं घुस्सणानुरूपम् पा तहा पिआणं च्छड्डे । दिट्ठी रिउगअकुम्भत्थलम्मि जह बहलसिन्दूररे ॥’ इति । [ वीराणां रमतां घुस्सणारुप्यो, न तथाऽऽप्रियांस्तनोऽसंे । दृष्टि रिरुगकुम्भस्थले यथा बहलसिन्दूररे ॥ ]

अग्र कान्ताकुचतटकरिकुम्भस्थलयोः प्रकारणकेतयोः प्रमाणान्तरप्रतिपन्नसंस्थानविदोषयोः कुजूमसिन्दूराहितलौहिल्यलक्षणनिबन्धनसादृश्यवसाद्यमूलोऽयमुपमानोपमेयभावावगम इति तस्यैव तत्न हेतुत्वम् अप्रतिपन्नसंस्थानस्य निरुपितसाधारणधर्मेस्वरूपसदृश साधश्यावगमासम्भवात् इत्थु मानानुमितिरितीयमुच्यते । एवम्—

‘तं ताण सिरिसहोअररअणाहरणम्मि हिअअमेकरसम्म । विम्वाहरेँ पिआणं निवेसिअं कुसुमबाणेण ॥’ [ तत्तदा श्रीसहोदरल्लाहरयो हृदयमेकरसं । बिम्बाधरे प्रियां निवेशितं कुसुमबाणेन ॥ ]

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इत्यत्रापि वेदितव्यम्। केचलमत्र साधारणो धर्मों लौहित्यलक्षणो रत्न उपमानेऽनुमेयो न शाब्दोपारूढो, विश्वरूपतयाधरस्य विवक्षितत्वात्।

'वारों का दृष्टि कुडुमलिश्र प्रियास्तनो पर उतना नहीं रमतां जितना रूधिर हार्थो के सिन्दूरलिप्त मस्तकों पर !'

यहाँ काव्यात्मकचमत्कारप्रकारणिक है और करिकुम्भ अप्रकरणिक है। यह उपमानानुमिति है। यहाँ कावताकुचमण्डल प्रकारणिक है और करिकुम्भ अप्रकरणिक। दोनों का रूप लोकप्रमाण से सिद्ध है। इनका साधर्म्य कुंकुम और सिन्दूर के लाल रंग से बनता है। साधृश्य के ज्ञान से इस उपमानोपमेयभाव का ज्ञान होता है। इसलिए ये वही उसमें हेतु हैं। क्योंकि जिसे स्तन और हाथों के माथे का वैसा रूप ज्ञात नहीं होता और जिसे साधारण धर्मों का स्वरूप नहीं जान पड़ता उसे साधृश्य का ज्ञान नहीं होता।

इसी प्रकार—तं ताण०००, यहाँ भी जानना चाहिए। केवल यहाँ साधारण धर्म ललेंहै रत्नरूपी उपमान में अनुमान से ज्ञान होता है, शब्द से कथित नहीं। क्योंकि वह ( रत्न ) अधर के विश्व-रूप से विवक्षित हैं।

'स वक्तुमखिलाज्छक्तो हयग्रीवाश्रितान् गुणान् । योजयितुकुंदगौः: परिच्छेदे शक्तो न महोदधे:' इति॥

अत्र हयग्रीवगुणान् साकल्येनाभिधातुं न कश्चित् समर्थ इति साध्यम् ।

तत्र तद्विधानराक्तत्वस्य कुम्मकरणकार्म्मोविच्छेदज्ञानशक्तत्वस्य चोष्मयः प्रकारणिकतयोरेककर्तृनिष्ठयोस्समशौर्यिकयोपाच्चतयोसतुल्ययोगिता-

दिवदृ गर्भीकृतोपमानोपमेयभावयोः परिकलिप्तेन व्यतव्यपकभावेनोप-निवन्धो हेतुः।

तयोर्हि व्यत्पकस्य धर्मस्य वृक्षत्वादेरिवास्मुभेरस्सः कुम्भैः परिच्छेद-

ज्ञानशक्तत्वस्य प्रमाणान्तरावसितायामभावप्रतीतोतौ व्यव्यस्यापि शिशुपालत्वादेर्हि हयग्रीवगुणधर्माभिधानसामर्थ्यस्याभावाच्चगतिरिति तस्यामनुमेयत्व-मिति ।

अतिचार्योक्तिगर्भेऽध्यायमुपमानोपमेयभावावस्तायो हयग्रीवगुणानां साक-ल्येनावर्णनीयतात्मकसाधारण्यविशेषप्रतिपादनपरमाक्षेपपपीत्याक्षेपानु-मितिरित्युच्यते ।

'हयग्रीव के सभा गुणों को वही कह सकता है जो घड़ों में पानी भर भर कर समुद्र का जल नाप सक्ता हो' यहाँ साध्य है—'हयग्रीव के गुणों को कोई भी समग्र रूप से नहीं कह सक्ता'। इसमें हेतु है 'गुणों' के कथन की शक्ति और घड़ों में जल भर भर कर समुद्र के जल को नापने की शक्ति, इन दोनों का कल्पित व्याप्ति-व्यापकभाव सम्बन्ध द्वारा एक साथ कथन। दोनों में हयग्रीव-गुणों को गिनती प्राकरणिक है; जलघटों से समुद्र को जल नापने अप्राकरणिक है। दोनों का उल्लेख एक ही कर्त्ता में बराबरी के साथ किया गया। उनमें मुख्ययोगिता आदि के समान उपमानोपमेय भाव छिपा है। इनमें व्यापकधर्म है समुद्रजल को घड़ों से नापने की शक्ति, जिसका अभाव दूसरे प्रमाणों से सावित होता है। यह अभाव जब ज्ञान हो जाता है तो हयग्रीव-गुण की शक्ति जो यहाँ व्याप्य है; उसका अभाव भी प्रतीत हो जाता है अतः वह अनुमेय कहा जाता है।

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तृतीयो विमर्शः

उपमानोपमेय भाव सम्बन्ध में अतिशयोक्ति छिपी है। उसका ज्ञान आक्षेप का आक्षेप कराता है। आक्षेप द्वारा हयग्रीव के गुणों का समग्रूप से कड़ा न जा सकना रूप असाधारण विशेषता का ज्ञान होता है। अतः यह आक्षेपालंकार अनुमिति कहा जाता है :

'देठवअत्तमि फले किं कोरइ पत्तिअं उण भणामि । कड्डोलिपल्लवा पल्लवाण अण्णाण ण सरिच्छा ॥' [ देइअत्तेडि फले किं क्रियतामेतत् पुनर्भणामि । कंकेल्लीपल्लवाः पल्लववतामन्येषां न सदृक्षाः ॥ ]

इत्यत्रार्थान्तरोपन्याससामर्थ्यादेव वस्तुनां समध्यैसमर्थकभावावसायो न शब्दशक्तिमूलं इति । तदर्थस्य हि शब्दादेरप्रयोगो गतार्थत्वात् ।

फल तो देवदारुन हैं। उसके विषय में कहा ही क्या जाय । इतना अवश्य कहना पड़ता है कि—‘अशोक के पत्ते अन्य वृक्षों के पत्तों के समान नहीं हैं ।’ यहाँ दोनों वस्तुओं का समध्यक-सम्बन्ध अर्थान्तरन्यास की शक्ति से होता है, शब्द की शक्ति से नहीं। अर्थान्तर-न्यासार्थक 'हि' आदि शब्द का प्रयोग नहीं है, क्योंकि लक उसका अर्थ अपने आप निकल आता है :

'हिअअदुअवि असण्णुं अवरुणमुहं पि मं पसाणन्त ! । अवरदरअस्स वि णा हु दे वहुजाणअ ! रोविसुं सक्कमु ॥' इति । [ हृदयस्थापितमन्युमपरुद्धसुखोऽपि मां प्रसादयन् । अग्रपराद्धस्यापि ण खलु ते बहुधा रोहितुं शक्त्यमु ॥ ]

यत्रानाविष्कृतकोपचिह्नायाः कस्याश्चिदन्तर्गतसङ्गर्योंऽनिन्याः केनचित् कृत्रिम प्रसाद्यमानार्या यत् तत् तत्र रोपविषयेऽपि न तव रोपितुं शक्त्यमि-त्युक्तं तदर्थपद्यमानतया समर्थनोयमेवेति यत्तत्र वल्लभसम्बोधनद्वारेण वहुजत्वेऽप्यर्थान्तरभूतमुपात्तं तदेव तत्समर्थकहेतुत्वात्; तत् एव हि पर-हृदयवेदिनि जने कः खलु कोपं कर्तुं महतीस्य्यार्थस्य प्रतीतिसिद्धे: ।

द्विविधो हि हेतुरुक्तः शब्दार्थश्रयेऽर्थेति । तेनेयमार्थस्य हेतोरुपादानादर्था-न्तरन्यासानुमितिरित्युच्यते ।

'रोष को मैंने मन में छिपा लिया है और मुँह से भी कुछ नहीं कह रही हूँ जिससे रोष व्यक्त हो । इतने पर भी तुम मुझे क्षुब्ध कर रहे हो । इसलिये तुमने अपराध किया है। तब भी हे बहुज्ञ ? तुम पर रोष नहीं किया जा सकता ।' यहाँ मानवती खो, जितने कोप व्यक्त 'नहीं किया था, उसे मन ही में छिपा रखा था, उसका किसी कृतापराध व्यक्ति द्वारा खुश करने की कोशिश करने पर यह कहना कि तुम पर रोष नहीं किया जा सकता—ठीक से बैठता नहीं है। अतः उसे ठीक-ठीक बैठाने के लिये उसका समर्थन करना होता है। यह समर्थन प्रिय को बहुज्ञ कहने से उसकी जो बहुतता सिद्ध होती है—उससे होता है। क्योंकि इस बहुतता का यहाँ वाक्यार्थ से कोई उपयोग नहीं। क्योंकि उसी से यह अर्थ निकलता है कि दूसरे के चित्त को जाननेवाले पर कौन-सा व्यक्ति कोप कर सकता है ।

हेतु दो प्रकार का बताया गया है—शब्द और अर्थ । यह अनुमिति अर्थान्तरन्यास की हुई क्योंकि यहाँ अर्थहेतु का उपादान है ।

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'जाएज्ज वणुज्दसे खुजोचिअ पाओवो घडिअवत्तो । मा माणुस्ससिम् लोए ताएकरसो दलिद्दो अ ॥'

[ जायेय वनोद्देशो कुज्ज एव पादपो घटितपत्तः । मा मानुषे लोके त्यागैकरसो दरिद्रद्श्व ॥ ]

इत्यग्र यथोक्तस्वरूपस्याप्रस्तुतस्यैव वनपादपस्य, पुंसस्ख कस्चिद् दरिद्रद्रस्य प्रस्तुतस्यादुपयोगितया निष्फलयोर्भयोरभिन्न-यजन्-मताप्रतीतो तुल्यायां यदेतदेकस्यैव जन्मानभिन्नदर्शनं नेतरस्य तत् तस्य शोध्यतातिरेकलक्षणं व्यतिरेकमनुमापयतीत्यस्य व्यतिरेकानुमितिव्यपदेशसिद्धिः ।

मैं किसी जंगल में खूँखार हो वन जाऊँ वह अच्छा है, परन्तु इस लोक में मनुष्य न होऊँ, जो त्याग की गहराई रुचि रखने वाला हो और दरिद्र हो । यहाँ उत्कृष्टवरूप का वृक्ष अप्राकरणिक है और कोई दरिद्र पुरुष प्राकरणिक । दोनों का कोई उपयोग नहीं । अतः दोनों ही निष्फल हैं । अतः उनका जन्म की अश्लाघ्यता दोनों में बराबर है । इतने पर भी एक ही के जन्म की अश्लाघ्यता कही गई, दूसरे की नहीं । यहाँ उसके शोचनीय होने का अनुमान कराता है । यही व्यतिरेक हैं । अतः इस पद्य में व्यतिरेकानुमिति का व्यवहार ठीक ही वनता है ।

'चन्दनासक्तकुजगनिःश्वासानिलमूर्छिच्छन् । मूर्छ्छोयतयेप पथिकान् मघौ मलयमारुतः ॥'

इत्यग्र चन्दनासक्तभुजगनिःश्वासानिलसम्पर्केन्मात्रेण मूर्छ्छोहेतुत्वं मलयमारुतस्य मुख्यमनुपपद्यमानं मूर्छ्छोकारित्वलक्षणात् साधर्म्यात् सिंहो माणवक इत्यत्र सिंहत्वमिचोपचरितमाश्रोयत इतीवाथमनुमापयति ।

मुख्यतयानुपपत्तौ च निमित्तं भुजगनिःश्वाससम्पर्कमात्रेण मलयमारुतस्य न्यगभावमाजो वहलोभावसम्भवः ।

यद्वा मुख्य्यमर्थमनूद्यार्थान्तरे प्रयुज्यमानः शब्दो यथाकथित साध-श्यमेवावगमयति ।

न चैवंविधे विषये इवारादिश्रयोगमनन्तरेणासमबद्धार्थतैवेत्याशङ्कनीयं प्रकरणादितोऽपरर्थस्य स्वसौन्दर्यादेव वार्थान्तरावगते; यथा—

'ईसाकलुसस्स वि तह सुहस्स णं एस पुण्णमाचन्द्दो । अज्ज सरिस्सट्ठणं पाविऊण अड्डे विअ ण माइ ॥'

[ ईष्याकलुषस्यापि तथ सुखस्य नन्वेव पूर्णिमाचन्द्रः । अद्य सरिसृष्टणं प्राप्य अर्धेऽपि च न माति ॥ ]

इत्यत्रैवशब्दस्य श्रयत् सदृशत्वं प्राप्याज्ञ इव न माति ॥

'वसन्त में यह मलयपवन पथिकों को तो मूर्छित करता ही है, यह स्वयं चन्दनों में लिपटे साँपों को कुरकार से मूर्छित है ।' इसमें मलयपवन में चन्दन में लिपटे साँपों की कुरकार मात्र से

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मूचछ्रों कारितव का आना अपने इसी रूप में (मूचछ्रों में ) तो अनुपपन्न है । इसलिये 'सिंहोमाणवक:' में जैसे सिहतव उपचारित है वैसे ही यहाँ भी मूचछ्रांकारितवकार साधारण धर्म के सम्बन्ध से—उसे उपचरित ही मानना होता है । अतः यहाँ वह इव शब्द के अर्थ = 'सादृश्य' का अनुमान होता है ।

यहाँ ( मलयपवन में मूचछ्रोंकारिता ) सुन्द्यता को अनुपपत्ति में कारण है—केवल सौंप की फुकार के सम्पर्क से मलयपवन का गहित होना, इसलिये उसमें बहुलीभाव ( अधिकता ) का न होना या यूँ कहिए कि जो शब्द मुख्य अर्थ में प्रयुक्त न होकर किसी गैर अर्थ में प्रयुक्त होता है, वह जिस किसी तरह सादृश्य का ही ज्ञान कराता है । यहाँ यह नहीं सोचना चाहिये कि 'इव है, वह जिस किसी तरह सादृश्य का ही ज्ञान कराता है । यहाँ यह नहीं सोचना चाहिये कि 'इव आदि शब्दों का प्रयोग न होने से दोनों अर्थ असंबद्ध पड़ जाते हैं क्योंकि दूसरे अर्थ का ज्ञान प्रकरण आदि से भी होता है अथवा पदार्थ के अपने खुद के सौन्दर्य से भी । जैसे—

'आज यह पूनम का चाँद तुम्हारे ईर्ष्या से बिगड़े चेहरे की समानता पाकर अपने आप में ऐंठ नहीं रहा है ?' यहाँ 'इव' शब्द का ( प्रयोग नहीं है ) ।

यथा च—'ग्रासाकुल: परिपतन परितो निकेतान् पुनरपि केशिश्रिदपि धनिन्भिरन्ववन्ध । तस्मात्तथापि न मुग्ध: कचिदद्भुताभिरार्कार्जपूर्णनयनैः पुहतलेक्षपश्रीः ॥' इत्यत्र ।

शब्दार्थैकवहारेऽपि प्रतीतिरेव प्रमाणम् । प्रतीतार्थशब्द: प्रयुज्यमानः पौनरुक्यमेवावहतीति अत्यन्तेऽर्थस्यावगमादुत्प्रेक्षानुमितिरित्येषा वयपदिश्यते ।

एवम्—'अत्युच्चपदाध्यास: पतनायेत्यर्थशालिनां शस्तत् । आपाण्डु पतति पत्रं तरोरिदं वन्धनग्रन्थे: ॥' इति

निदर्शनानुमितावश्यसेम् ।

और जैसे—'एक हिरन घरों के पास पहुँच गया' उसके पीछे एक भी अहेड़ीं न था । इतने पर भी वह कहीं भी ठहरा नहीं और डर के मारे उछलता कूदता भाग गया । बालाओं की कान तक लम्बी आँखों के वाण से उसकी नेत्र—शोभा इत जो हो गई थी' यहाँ ।

शब्दार्थ के व्यवहारे में प्रमाण केवल प्रतीति ही हैं । शब्द का जो अर्थ प्रतीत हो चुकता है उसके लिये शब्द का प्रयोग पुनरुक्तिदोष पैदा करता है । इसलिये यहाँ 'इव' शब्द का अर्थ मालूम पड़ने से यह अनुमिति उत्प्रेक्षानुमिति कहलाती है ।

इसी प्रकार—

'पेड़ से यह पकड़ हुआ पत्ता बेटे से फिसलकर गिर रहा है— समझदारों को यह समझाते हुए कि अति ऊँचे स्थान पर पहुँचना कभी न कभी पतन का कारण बनता है ।' इस निदर्शनानु- मिति में भी समझ लेना चाहिये ।

'रस्म्या इति प्राप्तवती: पताका रागं विविक्ता इति वर्धयन्ती: । यस्यामसेवित नमद्वलोकां सभाभ्यन्तर्भूमिभोगीषवान् ॥' इत्यत्र ।

इत्यत्र वाक्यार्थप्रतीतेरनन्तरमुपमाप्रतिमोदनेन वन्धनभूतं न किञ्चिद्- वधारयामः, यत्सामथ्याद् वध्व इव वलभ्य इत्यसुर्थमवगच्छेम । न चोभ-

३२ तृ० वि०

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यार्थेसाधारणस्य वलभीविशेषणकलापस्यैव तत्र निवन्धनभावोऽवगन्तुं युक्तः; तस्य भिन्नविभक्तिकत्वं वधूभिरभिसम्बन्धानुपपत्तेरित्युक्तमेव ।

अथ सममित्यस्य तुल्यार्थस्य वधूवलभीसरवन्यन्वयात् विभक्तिविपरिणामेन कल्पिततदुचितविभक्त्यन्तानां वधूनां विशेषणकलापाभिसम्बन्धसहतुल्यार्थेसाधारणस्य तुल्यार्थस्य वधूवलभीसरवन्यन्वयात् विभक्तिविपरिणामेन कल्पिततदुचितविभक्त्यन्तानां वधूनां विशेषणकलापाभिसम्बन्धसह- त्वाद् वलभीभिरुपमानोपमेयभावावगतिरपेक्षते, यथा सकलकलोल्लासस्थित इति ।

एवं ताहि तुल्यतासम्बन्धावधारणत निवन्धनेयं वधूवलभी नाझुपमानोपमेयभावावगतिरपेक्षति नासावनुमेयतासम्भिपततती श्लेषानुमितिरित्युच्यते ।

'रम्या इति'—इस (पूर्वानूदित) पद् में वाक्यार्थ की प्रतीति के वाच्य उपमा का ज्ञान कराने का कोई भी हेतु हमें दिखाई नहीं देता जिससे यह समझा जा सके कि वलभियाँ वधुओं के समान हैं। दोनों अर्थों में लगने वाले वलभी आदि शब्दों को भी कारण माना नहीं जा सकता क्योंकि उनमें विभक्तियाँ भिन्न हैं। अतः वे 'वधुभिः' उस पद के साथ मेल नहीं खा सकते । यह बात हम कह चुके हैं।

यदि यह कहा जाय कि जैस—'इन्दु के समान सकलकल समृद्ध बढ़ा' में विभक्ति बदल कर ('सकलकल' 'इन्दु' का विशेषण मान लिया जाता है और उपमा की प्रतीति होती है । ) उपमानोपमेयभाव निकाल लिया जाता है, इसी प्रकार यहाँ भी सभी विशेषणों में वधू की विभक्ति लगाकर वधू के साथ वलभी का साम्य बना लिया जायगा, और ऐसा करने में सहायक होगा 'सम' इस सादृश्यता के प्रतिपादक शब्द का प्रयोग ।

उत्तर—यदि इस प्रकार तुल्यता के सम्बन्ध के ज्ञान से वधू और वलभी की समता ज्ञात होती है तो इससे वलभी उपमेय नहीं बनती । इसलिये इसे श्लेष की अनुमिति कहना ठीक होगा ।

विमर्शः—यहाँ साम्यब्बर शब्द साम्य का प्रतिपादक नहीं अपितु सहभाव का प्रतिपादक है । अतः वलभी में उपमेयता नहीं बन पाती ।

'अङ्कुरितः कोरकितः पल्लवितः कुशुमितश्र सहकारः । अङ्कुरितः कोरकितः पल्लवितः कुशुमितश्र हृदि मदनः ।।'

इत्यत्र मुख्यामुख्याडुरितत्वादि धर्ममविशिष्टयोः सहकारमदनयोः प्रमाणान्तरावगतकार्यकारणभावयोः अप्यतिशयोक्तिच्छायया यस्तुल्यकालतयोः पनिन्धस्तत्र कार्यकारणधर्माणां यथाश्रुतक्रमं संख्यासाम्यमेव यथासङ्ख्यमनुसमाप- यति, यथाश्रुतक्रमातिक्रमे प्रयोजनाभावात् निवन्धनाभावाच्च ।

को ह्यविफलमतिरसति बाधके श्लुतस्मृतिमनाहृत्याश्रुतं परिकलपयेदिति यथासङ्ख्यमनुमितिरित्युच्यते ।

'इधर तो सहकारतक अंकुरित, कौरिकत, पल्लवित तथा कुशुमित हुआ और उधर हृदय में मदन ( काम ) ।'

यहाँ अंकुरित होना आदि सहकार में (वास्तविक) मुख्य है और मदन में असुख्य ( झूठ ), इन धर्मों से युक्त सहकार व मदन का कार्यकारणभाव लोकप्रमाण से सिद्ध है । इतने पर भी अतिशयोक्ति की भूमिका पर इनमें जो एक साथ अंकुरित आदि होने की बात कही गई उसमें

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तृतीयो विमर्शः:

कारण (सहकार) और कार्य (साधन) के (अंकुरित आदि) धर्मों का क्रम एक सा ही बतलाया गया है, अतः यथासंख्या अलंकार का अनुमान होता है। जिसमें संख्या की समानता प्रतीत होती है। निर्दिष्ट क्रम को तोड़ने में न कोई प्रयोजन सघता है और न उनका कोई कारण ही है। भला ऐसा कौन होगा जिसकी बुद्धि लुप्त न हुई हो और वह कथित अर्थ को छोड़कर अकथित अर्थ की कल्पना करे। अतः यहाँ यथासंख्या अलंकार की अनुमिति है। क्योंकि संख्याक्रम कथित है।

यत्र प्रकरणादिप्रतिपर्य्यानुमितविशेषो वाच्योऽर्थः प्रतीयमानस्यार्थस्य लिङ्भभावसुपयोगी सोऽपि यथासंख्यानुमानस्यैव मार्गः।

यथा—‘उच्चिणु पडिथं कुसुमं मा घुण सेआलिअं हलिअसोह ? । अह दे विसमविराओ ससुरेण सुओ वलयसद्दो ॥’ इति।

[ उच्चिनु पतितं कुसुमं मा घुण शेफालिकां हालिकसुन्दे ? । अहह दे विसमविरावः श्वशुरेण श्वश्रुना वलयशब्दः ॥ ]

अत्र ह्यन्वयप्रातिपदिका सङ् रसपाणां काचित् वहिश्रुतवचनयकलकलया संख्या प्रतिबोध्यते इत्थंतदपेक्षणीयं वाच्यस्य प्रतिपत्तथे प्रतिपन्ने च वाच्येऽर्थे तस्याविनयप्रच्छादनतत्परेयामाभिधोयमात्रान्तवादनुमेयार्थप्रेवलस्यानुमानपतान्तर्भावः।

पत्वमन्यासामपि वाच्यवयतिरेकिणोऽनालङ्कृतिनां यथायोगमनुमानान्तर्भावः।

भावः स्वयमेवानुसर्त्तव्यः।

जहाँ प्रकरण आदि का ज्ञान होने पर अनुमित हुआ कोई वाच्य अर्थ प्रतीमान अर्थ का लिङ्‌ग (हेतु) बनता हो वहाँ भी अनुमान ही होता है। यथा—

'हे हालिक की पुत्रवधू, शेफालिका (हरसिंगार या पारिजात) को झाड़ क्यों रही हो, पड़े हुए पुष्प ही वीन ले। तेरे कंगनों का यह अटपटा शब्द सुनने तक पहुँच रहा है। यहाँ अभिनीत पति से संभोग कर रही किसो दुश्चरित्र स्त्री को बाहर से चूड़ी (या कंगनों) की आवाज सुन कर सखी साजग कर रही है। यह बात वाच्यार्थी को निष्पत्ति के लिये अपेक्षित है। और जब वाच्यार्थ का ज्ञान हो जाता है, तब उसे उस पुरुष के अविनय को ढँकने के लिये कहा गया समझा जाता है; अतः वह अनुमेय का अङ्ग ही सिद्ध होता है। अतः उसका अन्तर्भाव भी अनुमान में ही है। इसी तरह और भी वाच्यान्तरित (प्रतीमान) अलंकारों का जहाँ जैसे अन्तर्भाव हो, अनुमान में अन्तर्भाव कर लेना चाहिये।

एवं वस्तुमात्रान्तरं गम्यत्वं प्रतिपाद्यते।

गमकत्वं प्रतिपाद्यते।

तत्र वर्णसङ्कटटनानां तावद् गमकत्वमथद्द्वारकमेव । तथा हि विशिष्टवर्णसङ्कटटनोपकृतशब्दप्रतिपादिते नार्थेन रत्यादयः स्थायिनोऽनुमीयमानाः स्पष्टतरमवभासन्ते इति शब्दोपाधिभूतयोर्वर्णसङ्कटटनयोरपि गमकत्वमुपपन्नमेव परस्परेण, न साक्षात्।

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तथाविधशाब्दसन्दर्भाभिधेयहितस्यार्थस्य रत्यादेश्र भवस्य तार्णपार्णयोरिव धूमाग्न्यो: कार्यकारणभावेनावस्थानात् ।

तथा हि ये ये रतिशोकाक्रान्तान्त:करणा: ये च क्रोधोत्साहादिविवशास्ते मध्युरतरवर्णविरचितामसमास्रां रेफशाकारटकारककाराद्दीर्घसमासभूयिष्ठां च सङ्कटनामाश्रितिय भूयिष्ठां भाषमाणा हृश्यन्त इति स्वभाव एवायम् ! सङ्कटनावर्णाहिलविरोषवाचकसमर्पितादर्थात् । क्रोधादिविरोषगतिधूमविरोषादिव कुशलानो: ॥ २८ ॥ इति सङ्क्षहायो ।

इस प्रकार वस्तुमात्र आदि की गम्यता ( अनुमेयता ) सिद्धकर अब वर्ण, पद, वाक्य, सङ्कटना आदि की अनुमापकता का प्रतिपादन आरम्भ किया जाता है—वर्ण आदि में वर्ण और सङ्घटना अर्थ द्वारा ही गमक होते हैं । विशिष्ट वर्णों की सङ्घटना से युक्त शब्द जो अर्थ उपस्थित करते हैं उससे रति आदि स्थायी भावों का अनुमान होता है । और वे अधिक स्पष्ट होकर अनुभूत होने लगते हैं । अतः शब्दों के उपरिथरूप वर्ण और सङ्घटना दोनों ही गमक सिद्ध होते हैं । किन्तु उसकी गमकता परम्परया होती है, साक्षात् नहीं । उस प्रकार के शब्द सन्दर्भों से कथित अर्थ और रति आदि भावों का कार्यकारणभाव वैसा ही है जैसा तिनके और पत्तों से उत्पन्न धुँआ और अभि का होता है । ( तिनके से आग पैदा होती है और आग से धुआँ, वैसे वर्णसङ्घटनायुक्त शब्दों से वाच्यार्थ प्रतोत होता है और उससे रति आदि ) यह इस प्रकार का होता है कि रति और शोक आदि से जिसके हृदय युक्त रहते हैं और जो क्रोध और उत्साह आदि से अभिभूत होते हैं वे जब बोलते हैं तो प्राय: मधुर वर्ण से युक्त और समास से रहित सङ्घटना का और रकार, शाकार और टकार से युक्त होने के कारण कठोर शब्द तथा लम्बे समास से युक्त सङ्घटना का प्रयोग अधिक करते हैं । यह एक स्वभाव ही है, उन बोलने वालों का । इस प्रकार—

'सङ्कटना और वर्णों से उत्पन्न विरोषता वाले शब्द से ज्ञात अर्थ से क्रोध आदि विरोष धर्मों का ज्ञान होता है, जैसे विशिष्ट धूम से अभि की ।'

पदवाक्ययो: पुन: साक्षादर्शहेतुत्वारकं गमकत्वं न वर्णसङ्कटनयोरिव वाचकोपाधिभावेनिवन्धनमिति न तुल्यकक्ष्यतया निर्देशास्त्योरुपपन्नः । पदवाक्ययोरिं हृदयर्थान्तरप्रतीतौ निवन्धनमिष्यते, उपचार: प्रकरणादिसामग्री त्रेति ।

यत्र हि तत् समारोपितं तत्र यथाकथञ्चित् तत्सादृश्यं तत्समवन्धादवगम्यते, न तत्त्वम्, तदभावे साधश्यानुपपत्तेरिति तदेतदचानुमेयमित्युक्तम् ।

एकोडपि हि शब्द: सामग्रीवैचिच्यात् तदर्थविशिष्टं स्वार्थमेवावगमयति तीतितदेव तत्र लिङ्गमवगन्तव्यं न शाब्दमात्रकम् । तद्धि सङ्घिनमेव प्रत्याययितमलं न सङ्घिविरोषमित्येतदणुक्रमेव ।

पद और वाक्य भी अर्थ के द्वारा गमक होते हैं, ये साक्षात् गमक होते हैं, वर्ण और सङ्कटना के समान शब्द की उपाधि बनकर नहीं । इसलिए उन ( वर्णसङ्घटना ) का पद-वाक्य के समान रूप से निर्देश नहीं बनता । पद और वाक्य द्वारा अर्थान्तर की प्रतीति में दो ही कारण है ।—उपचार और प्रकरणादि की सामग्री । जहाँ वह ( अर्थान्तर ) समारोपित होता है वहाँ उसके

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तृतीयो विमर्शः:

सम्बन्ध से जिस किसी प्रकार उसके साटृश्य का ज्ञान होता है, तद्रूपता का नहीं। क्योंकि उस ( समारोप ) के अभाव में साटृश्य ही नहीं बनता अतः उसे अनुमेय कहा ।

शब्द एक हो पर यदि सामग्री भिन्न हो तो वह बतलाता है अपने वाच्यार्थ को ही, परन्तु किन्हीं विशिष्ट धर्मों के साथ । अतः उसी ( सामग्रीवैचित्र्य को ) उस जगह लिङ्ग ( हेतु ) समझा चाहिये । केवल शब्द को नहीं। शब्द तो केवल साधारण संज्ञान अर्थात् ज्ञान करा सकता है। विशिष्ट संज्ञान का नहीं। यह तो कहा ही जा चुका है।

तत्र पदस्य पचारतो यथा महर्षेर्व्यासस्य ‘सन्निधौ समिधाश्रयः’ इति, यथा च वाल्मीके: ‘निश्वासान्ध इवादर्शेऽनन्द्रमा न प्रकारते ।’ इति, यथा च कालिदासस्य ‘कः सन्नद्धे विरहविधुरां त्वय्युपेक्षेत जायाम्’ इति, यथा च—

'सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं मलिनमपि हिमांशोरलक्ष्म लक्ष्मीं तनोति । इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकुतीनाम् ॥'

इत्यत्र समिदन्वितसन्नद्धमधुरपदानी गमकत्वाभिप्रायेणैव प्रयुक्तानीति उत्तमेव । तस्यैच सामग्री वैचित्र्ये यथा ‘रामेण प्रियजीवितेन तु ऋतं प्रेषण: प्रियेणोचितम्’ इत्यत्र रामेणोऽयेतत् पदं प्रकरणादिसामग्रीवशात् साहसै- करसिकत्वादिर्धर्मविरोषस्य रामार्थस्य गमकम् ; अन्यथा हि मयेत्येव वक्तव्यं स्यात् ।

दोनों में पद का उपचार द्वारा ( गमक होना ) यथा महर्षि व्यास का वाक्य—‘ये सात (पदार्थ) श्री की समिधाएँ हैं;’—जैसे महर्षि वाल्मीकि का कथन—‘चन्द्रमा निःश्वास से अन्धे दर्पण के समान चन्द्रमा का कालिमा भी उसकी शोभा बढाता है यह तन्वी वककल से भी अधिक सुन्दर लगती है, भला मधुर आकृतियों के लिये कौन सी वस्तु शोभादायिनी नहीं होती हैं ।

यहाँ—समिधू, अन्ध, सन्नद्ध, मधुर आदि शब्द गमकरूप से ही प्रयुक्त किये गये हैं । वही शब्द सामग्री की विचित्रता होने पर जैसे—‘किन्तु प्राणों के लिये कातर राम ने अपने प्रेम के अनुरूप नहीं किया?’ यहाँ ‘राम’ यह पद प्रकरण आदि की सामग्री की सद्धायता से साहसैकरसिक होना आदि धर्मों से युक्त रामरूपी अर्थ का गमक है । नहीं तो ‘मया’ ही कहना चाहिये था ।

यच्चापि चेत्कस्यचिदर्थस्यैकसामग्र्याख्यने चोत्कर्षपकर्षतथाभिधित्सयो: पक- तिप्रदेशस्य विध्यनुवादभावेनोपनिबन्ध:, तत्र प्रकरणादि:स्य पचास्योत्कर्षो- डपकर्षै: तत्चं चानुभयैमू; न तु तत एव । न हि विधेयाभिधायिन: शब्दस्यैव सा शक्तिस्तयोरिविरोधात् । तत्रोत्कर्षो यथा—

'रत्नकरण्डमुग्रहिआइ होन्ति कमलाइ कमलाइ ।' इति ।

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अत्र द्वितीयः कमलशब्दः । अपकर्षों यथा—

'पमेअ जणो तिस्सा देउ कवोलो पमाइ ससिविम्वम् । परमस्थविआरे उण चन्दो चन्दो वि वराओ ॥'

इति ।

अत्र द्वितीयाचन्द्रशब्दः । अत्र हि विधेयाभिधायिनो द्वितीयाचन्द्रशब्दाद् यथापकर्षोऽवगम्यते न तथा पूर्वोक्तकमलशब्दादित्यर्थप्रकरणादिरेव तत् हेतुभावेनोपगतं न शब्दशक्तिः । तस्याः सुतरां प्रकर्षापकर्षावगमः पूर्वोत्तरपदार्थैकनियत एव स्यात्, नानियतः ।

तत्त्वे यथा— 'काचो मणिरिण; काचो येसां लेअन्थे हि देहिनः । सन्ति ते सुधियोल्लेसु काचः काचो मणिर्मणिः ॥'

इत्यत्र द्वितीयौ काचमणिशब्दौ ।

जहाँ कहीं एक ही अर्थ को उत्कर्ष अपकर्ष या तादृश्य के कथन की इच्छा से भिन्न मान विधायानुवादभाव से एक ही शब्द द्वारा कहना अभीष्ट हो, वहाँ उत्कर्ष, अपकर्ष या तद्रूपता प्रकारादि की सहायता से अनुमान द्वारा प्रतीत होते हैं, न कि उसी ( शब्द ) से ( उद्देयवाचक शब्द का प्रयोग कर यदि केवल विधेयवाचक शब्द का प्रयोग कर दिया जाय और केवल उससे उक्त वातों निकालन अभीष्ट हो तो वह असंभव है कारण कि केवल ) विधेयवाचक शब्द ( उद्देयभूत अर्थों ) और तद्धित उत्कर्षादि की प्रतीति कराने में ) असमर्थ होता है । यह इसलिए कि दोनों ( विधेय-

उद्देयभूत अर्थों ) का परस्पर विरोध होता है । उत्कर्ष का उदाहरण— रडकिरणानु० ( पूर्वानूदित च्वाया )—इस पद्य में दूसरा कमलशब्द ।

अपकर्ष का उदाहरण यथा—'पमेअ जणो० ( पूर्वानूदित च्वाया ) इस पद्य में दूसरा चन्द्रशब्द यहाँ जिस प्रकार विधेयता के वाचक द्वितीय चन्द्रशब्द से अपकर्ष प्रतीत होता है, उस प्रकार पहले उदाहारण में ( द्वितीय ) कमल शब्द से नहीं । अतः इस उत्कर्ष-अपकर्ष में प्रकारादि ही हेतु माने जाने चाहिये । शब्दशक्ति नहीं ।

उससे होनेवाला उत्कर्ष तथा अपकर्ष पूर्व और पर पदार्थों में ही रहता है ( पूर्व में उत्कर्ष पर में अपकर्ष ) वह भी नियत रूप से, अनियत रूप से नहीं ।

तद्रूपता का उदाहरण—'वे जारोधारी और हो हैं जिनके लिये काँच मणि होता है और मणि काँच । वे लोग सुधी = समझदार होते हैं, जिनके लिप काँच-काँच और मणि-मणि होती है ।'

यहाँ द्वितीय काँच तथा द्वितीय मणि शब्द ।

शब्दशक्तिमूलाया अर्थान्तरप्रतीतेः अनवन्धनायाः पराकृतत्वाच्च तन्मूलापदवाक्यप्रकारता सम्भवति । यथा—

'प्रातुं धनैरर्थिजनस्य वाच्छा देवेपि सृष्टो यदि नासि नास्मि । पथि प्रसन्नासुधरस्तटाकः कूपोऽथवा किन्न कुतो जडोदहं ॥' इति ।

अत्र हि जड इत्येतत् पदं निर्विण्णेन केनचिद् वाक्यार्थेन कूपसमानाधिकरण-तयैव प्रयुक्तं, नात्सममानाधिकरणतया 'कूपोऽथवा किं न कुतो जडोदहं'-

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तृतीयो विमर्शः

मित्यात्मनो जडत्वांशस्पदत्वेनेष्टत्वाद्, इत्यमेव वाच्यस्य चारुत्वोपपत्तेः, यतोड्यमर्थों विवक्षितः 'किं समानेऽन परदुःखभाजा हतचेतन्येन कृत्यं, जड़-स्तत्कृत पवासिम कुस्माच कृत' इति ।

न चैतन्येन निर्वन्धानन्तरमनन्तरण स्वशक्त्यचानुरणनरूपतयार्थान्तरसम्ब-न्धिकरणतां प्रतिपत्तुमलमित्यनुदाहरणमेतत् ।

विना किसी हेतु के शब्दशक्तिमूलक अर्थान्तर की प्रतीति का खण्डन किया जा चुका है, अतः शब्दशक्तिमूला पद और वाक्य की गमकता ( अनुमापकता ) संभव ही नहीं होती ।

जैसे :— यदि वाचकों की इच्छा को धनद्वारा पूर्ण करने के लिये विधाता ने मुझे नहीं बनाया तो किसी रास्ते में स्वच्छ जल वाले तालाब या कुएँ के रूप में जड़ ही क्यों नहीं बना दिया गया ?

यहाँ 'जड़' यह शब्द किसी दु:खी व्यक्ति ने कुएँ के साथ ही लगाकर बोला, अपने साथ नहीं । किन्तु चाहता है वह उस ( जड़ ) का अपने साथ भी योग क्योंकि वह इस प्रकार कहना चाहता है 'मुझे जड़ कुआँ ही क्यों नहीं बना दिया गया'-और इसी प्रकार वाच्य में चमत्कार सिद्ध होता है । क्योंकि यहाँ अर्थ यह विवक्षित है कि मेरी चेतना से क्या जिसमें दूसरे के दु:ख के निराकरण की शक्ति नहीं । मुझे दूसरे के दु:ख की शान्ति करने में सक्षम जड़ तालाब या कुआँ ही क्यों नहीं बना दिया गया ?

ऊपर वतलाए क्रम से विना किसी और कारण के अपनी ही शक्ति से वह ( जड़ ) घण्टे की गूँज के समान दूसरे अर्थ के साथ लागू होता नहीं समझा जा सकता । अतः यह् उदाहरण नहीं माना जा सकता ।

'असमर्प्पिअं वि गहिअं कुसुमरारेण मडुमासलच्छिअमुहं ।' इति ।

[ असमर्पितमपि गृहीतं कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्मीसुखम् ।

अथ वा ह्यसमर्पितमपि कुसुमशरेण मधुमासलक्ष्म्या सुखं गृह्णीतामित्यसमर्पित-तमप्येतदर्थमभियायि पदमर्थशक्त्या कुसुमशरवशात्कारमनुमापयति ।

'वर्णअ ! हत्थिदन्ता कत्तो अल्लाण वद्धइत्ती अ । जाव लुलिआलअसुहो घरम्मि परिसक्कड़ सोण्णो ।'

इत्यत्र द्विरदरदनव्याघाजिनानां प्रतिषेधावगतिरु क्रमेण व्यापकविरुद्ध-कायोंपल बिधनिवन्धनेत्यनुमान एवान्तर्भावमरहती ।

केवलामिदमग्र निरूप्यते यदुक्त कस्येयमुक्तिः, किं श्वशुरयोरुत तटस्थ-स्यच कस्यांचिदाति । तत्र श्वशुरस्य तावत् दुहितृदुहितृस्नुषाया: सौभाग्य-तिशायवर्णनमिदमुच्यतिमेव । श्वश्वा अपि पुत्रस्नेहाद्विकुवाया: स्वसद्वासमृद्धिं-समोहमनाया वा तट्सौभाग्यातिरेकमसूयमानाया वृद्धिकं प्रति नास्ति हस्तदन्तादि विक्रयमिहेत्येतावति वक्रकथे तद्वर्णनं निष्फलमनुचितं चेत् तटस्थस्यैवेयमुक्तिरहचिता तत्रैव लेशतो रसास्वादसम्भवात् ।

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'चिवरेऽसुरअसम्पद ब्रह्म दुढउण पाहिकमलसिम् । हरिणो दारुणअं चुम्बड हिलिआउला लच्छछी ॥' इति प्रहेलिकादावपि मुख्यगुरुस्या काव्यव्यपदेशः स्वयात् । केवलं तत्पक्षेऽज्ञान इत्यत्र एआण इति पाठः परिणामयितव्यः ।

'वसन्तश्री ने अपना मुँह सम्पित नहीं किया' तब भी कुसुमशर ( कामदेव ) ने उसे अपना लिया ।' यहाँ उत्त अर्थ का अभिधान करने वाले 'सम्पित नहीं किया तब भी' ये पद अर्थ शक्ति से कुसुमशर के बलात्कार का अनुमान करते हैं ।

'हे व्यापारी जी ! हमारे यहाँ अब कहाँ हाथी-दाँत और कहाँ बाघ की दाढ़ जब से चंचल अलकों से घिरे मुहँ वाली यह पतोहू घर में जमुही रहती है ?' यहाँ हाथी-दाँत और व्याघ्र-चर्म के निषेध का ज्ञान 'भम धमिमअ' में कहे गये क्रम से व्यापकविरुद्ध कार्य के ज्ञान से होता है । अतः यह भी अनुमान में अन्तर्भाव के योग्य है । हमारा यहाँ केवल इतना कहना है कि—'यह उक्ति किसकी है ? सांस-ससुर की है या और कोई ? यदि ससुर की है, तो पुत्री के पतिओहू के अतिशय पतिप्रेम का कछिना अनुचित है । और यदि सांस की हो तो भी वह व्यर्थ है और अनुचित भी क्योंकि उसे व्यापारी से 'हाथी-दाँत' के अभाव की बात कहनी है तो उसका उतनी हों बात कहना उचित है, नकि घर की उन्नति की इच्छा से अथवा पुत्र के प्रेम में विहल होने से पतोहू के ऊपर पुत्र के स्नेहातिरेक के प्रति ईर्ष्या की भी बात कहना । अतः यह किसी तटस्थ व्यक्ति का ही कथन हैं । उसी की उक्ति मानने पर कुछ रसास्वाद हो सकता है । नहीं तो—

'विपरीतसुरतसमये' (पूर्वानूदित) आदि पहेलियों में भी काव्य का व्यवदार यथार्थरूप से माना जाने लगेगा । केवल तटस्थ पक्ष में 'अज्ञान' की जगह 'एआण' इतना पाठ-भेद कर दिया जाना चाहिए ।

विसङ्गः —प्रतीमार्थ की प्रतीति वक्ता और श्रोता (बोद्धव्य) के ऊपर भी निर्भर है । यहाँ का वक्ता कोर्ह जंगली भील है । वह अपनी पतोहू के श्रृंगार का वर्णन कर सकता है । अशिक्षित की उक्ति में सभ्यता पर आक्षिप्त औचित्य नहीं देखा जाना चाहिए ।

'उत्कटसिपनी भयपरिस्खालिताशुकान्ता ते लोचने प्रतिदिशां विधुरे क्षिपन्ती । क्रूरेण दारुणतया सहसैव दग्धा धूमायितेन दहनेन न वोक्षितासि ॥' इति ॥

अत्र ते इति योज्यमसमसौन्दर्यनिधानभूतयोः पुरःपरिस्फुरतोरिच लोचननयोः परामर्शः स हि सामग्र्योऽङ्गाङ्गिकरुच्य लोकदर्शदर्शोद्दौपनिबन्धनमोघ-योरनुपपत्तीति मुख्यगुरुतया तद्वाच्यस्यार्थस्यैव लिख्यतां, न पदस्य । यथा च—

'झटति कनकचित्रे तत्र दृष्टे कुरङ्गे रमसचकसितास्ते दृष्टिपाता: प्रियाया: । पवनविलुलितानामुत्पलानां पलाश-प्रकरमिव किरन्तः स्मरयन्ति दहन्ति ॥' इति ।

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तृतीयो विमर्शः

'हे प्रिये ? निश्चित ही तुम्हारा अंशुक भय से खिसक गया होगा, तुम अपनी वे व्याकुल आँखें नधुँओर घुमा रही होगी, ऐसी स्थिति में ( तो तुम्हारा सौन्दर्य और अधिक निखर उठा होगा ) किन्तु ( तब भी ) क्रूर अभी ने दारुणतावश तुम्हें एकाएक भस्म कर दिया, निश्चित ही उस समय उसने तुम्हें देखा नहीं ।'

यहाँ 'ते' (ते) यह जो अदितीय सौन्दर्य के निधि नेत्र जो मनों को अपने खँड से ही जोते हैं, की कथन है, वह सामग्री के सहारे नायक के मन में शोकाक्रि की जलन में .उन (नेत्रों) की विभावता का अनुमान कराते हैं, अतः यहाँ खास तौर से 'ते' का वाच्य अर्थ ही लिेझ—हेतु है । शब्द नहीं । और जैसे—

मैं प्रिया के उन दृष्टिपातों का स्मरण करता हूँ तो हृदय में आग सी भड़क उठती है । जो सोने पर खुले, या सोने के समान पीले और चमकीले हिरन को देखकर एक क्षण में ही खिल उठे और हवा से चंचल नीलकमलों की पहुँचियों का समुदाय सा दिखेरने लगे । ( यहाँ भी नेत्रों की विपुलता के प्रति विभावता प्रतीति होती है ) ।

पदावयवेडपि विशेषष्ट: पदार्थ एव, न शब्दमात्रं तस्य व्यापारान्तरप्रति-पेक्षात् । विशेषष्ट्वं 'चकितहरिणीहारिणा नेत्रेण सम्बन्धितया त्रिभागस्य विशिष्टतत्वात् तथा-विधस्य चास्य गमकत्वात्।

पद के अवयव को जहाँ गमक माना है वहाँ भी वस्तुतः विशिष्ट पदार्थ ही गमक होता है, एक मात्र शब्द ( पद ) गमक नहीं होता क्योंकि उसमें दूसरे व्यापार का अभाव सिद्ध किया जा चुका है । विशिष्टता 'उसी हिरनी के मनोहर नेत्रों के तृतीय भाग के समान सुन्दर कटाक्ष मुझ पर गड़ा दिया' में दिखाई देती है । यहाँ चकित हरिणी के सुन्दर नेत्र से सम्बन्धित होने के कारण नेत्र के तृतीय भाग में विशिष्टता आती है और फिर वह गमक बनता है ।

वाक्यस्य चोपचारतोऽथोलान्तरप्रकाशानं यथा—

'यां निशां सम्भ्रूतानां तस्यां जागर्त्ति संयमी ।। यस्यां जाग्रति भूतानि सा रात्रि: पश्यतो मुनेः ।।' इति । अनেন हि वाक्येन न निशार्थो नापि जागरणार्थ: क्रियते— विवक्षित: ; किं तर्हि ? तत्वज्ञानावहितरत्समतत्त्वपराड्मुखतवं च मुनेः प्रतिपाद्यत इति तिर-स्कृतवाच्यस्थास्य गमकत्वम् । यथा च—

'सुवर्णपुष्पां पृथिवीं चिन्वन्ति पुरुपाश्रय: । शूरश्र क्रतुविद्यश्र यश्र जानाति सेवितुम् ।।' इत्युक्तम् । तस्यैव प्रकारणादिते। यथा—

'निसर्गभूयोनिमित्ते काण विं काण विं बालिश अनमांणिम्माओं । काण विं विश्वासमसों काण विं अविस्सामओ कालो ।।' इति [ विषमय इव केशामपि केशामपि प्रयात्यमृतमय: । केशामपि विषासृत्समय: केशामप्यविषासृत: काल: ।। ]

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इत्यत्र वाक्ये प्रकरणादिवशाद् विषामृतशब्दाभ्यां सुखदुःखस्वरूपसङ्क्रमितवाच्याभ्यां व्यवहार इत्यर्थान्तरसङ्क्रमितवाच्यस्यैवास्य गमकत्वम् ।

उपचार द्वारा वाक्य की अर्थान्तर के प्रति गमकता—‘जो सब भूतों के लिये रात है उसमें संयमी लोग जागते हैं, और जिसमें सभी भूत जागते हैं वह उन्मीलित आँखों वाले मुनि के लिये रात हैं—इस वाक्य में न तो कोई निराकृत्य पदार्थ विवक्षित हैं, और न ग्राह्याकृत्य पदार्थ । जो विवक्षित हैं वह है मुनि का तत्वज्ञान पर एकचित्त होना और तत्वविरुद्ध पदार्थों से पराङ्मुख होना । इसलिये यह वाक्य अपने अभिधेयार्थ को हटाकर गमक बनता है । और जैसे—‘सुवर्णपुष्पां पृथिवीं ।’ इसमें वतलाया जा चुका है । वही वाक्य प्रकरणादि द्वारा भी गमक होता है । यथा ‘समय किसी के लिये विषमय होता है, किसी के लिये अमृतमय और किसी के लिये न विषमय और न अमृतमय ।’ इस वाक्य में प्रकरणादि के आधार पर विष और अमृत शब्दों से दुःख और सुखरूप वाच्यों का ज्ञान होता है । अतः यहां अर्थान्तरसंक्रमितवाच्य वाक्य गमक है ।

शब्दस्याभिधातिरेकेण शक्त्यन्तरानुपपत्तेस्तन्मूलं पदस्यैव वाक्यस्याप्यर्थान्तरप्रकाशनं न सम्भवत्येव, यथा हर्षचारिते सिंहनादवाक्ये—

‘प्रवृत्तेऽस्मिन् पदे प्रायो भ्रमजालावृतचेतनां त्वां नो वेक्ष्यः ।’ इति ।

नहेतुद्वाक्यमनुरणनरूपमर्थान्तरं शब्दशक्त्येवान्वनधनं प्रकाशायितुं क्षममित्युक्तमेव ।

‘सज्जेद सुरधिमासो ण आ पणावेइ जुबइजणलक्खवसहहे । अहिणवसहआरमुहे णवपल्लवपत्तले अणङ्गस्स सरे ॥’

[ सज्जति सुरधिमासो न तावदर्पयति युवतिजनलक्ष्यवशङ्काम् । अभिनवसहकारमुखान् नवपल्लवपत्रलाञ्छनानङ्गस्य शरान् ॥ ]

इत्यत्र कविप्रौढोक्तिमात्रनिष्पन्नशरोरे सुरभिमाससभमभावानामाविर्भूताभिनवपल्लवानां तरुणामचिरमभियुवतिजनमदनानां मदनानामाददायित्वमनुभेयम् ।

तत्र च सहकारसुरभिमासमदनानां रूपकोपनिबन्धने शरशरकाराधानुस्कतुल्यधृत्तान्तत्वे सति यदसम्पन्नरसपूर्णारूपतया सम्प्रति सहकाराणां शरारामिवानङ्गायाससंपर्णं स हेतुः । तदसमर्पणमात्रान्तरायो हि तस्य तद्व्यापारः ।

कन्दर्पोद्दोपनसार्थस्वभावसम्पादनमेव च तेषां सुरभिमासेन कन्दर्पयासमर्पणं नान्यदिति ।

शब्द की अभिधातिरिक्त शक्ति नहीं बनती अतः पद के समान वाक्य की भी तन्मूलक अर्थान्तरप्रकाशकता नहीं बनती । जैसे हर्षचारित में सिंहनाद के समय—‘चल रहै इस महाप्रलय में धरणी-धारण करने के लिये तुम रोष हो ।’

यहां वाक्य गूंज के समान पीछे से ध्वनित होते अर्थान्तर को बिना किसी कारण के शब्दशक्ति से प्रकाशित नहीं कर सकता ।

‘चैत्र का महीना अभी केवल काम के बाण तैयार कर रहा है, जिनके लक्ष्य युवतियां हैं जो इन्हें अभी सह लेतीं हैं । उन ( बाणों ) के मूंह हैं आम के बौर, और उनके पुंख हैं नई कोपलें । अभी चैत्र मास ये बाण काम को दे नहीं रहा है ।’

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तृतीयो विमर्शः

यह शुद्ध कविप्रौढोक्ति है। इसमें अनुमेय 'वृक्षों का कुछ ही समय बाद युवतियों को कामोन्माद प्रदान करना' है, क्योंकि वे वृक्ष नट कोपलों से मण्डित हैं, अतः वसन्त के अविलम्ब आगमन की सूचना देते हैं। यहाँ सहकार चैत्र मास आदि का रूपक है! सहकार है शार। चैत्र मास है शृङ्गार = काम बनाने वाला, और काम है धनुर्धर। इन सखियों के व्यवहार समान है, अतः शरों के समग्र रूप से न बन सकने के कारण इस समय सहकार (आत्म पुष्पों) का कामदेव को समर्पित न करना हेतु है। काम के बाण चलाने में विघ्न है केवल बाणों का काम को न दिया जाना। यह जो बाणों का काम को न देना है वह और कुछ नहीं, वसन्त का व्यक्तियों के स्वभाव को कामोदीपन में सक्षम बनाना ही है।

'सिहिपिञ्छुकण्णऊर जाया वाहुस्स गविररो समइ । मोत्ताफलरअअपसाहणाण मज्झे सवत्तीण ॥'

इत्यत्र नवोढाया व्याधवध्वा; सपल्लोभ्य: सौभाग्यातिरेकोऽनुमेयः। तत्र चास्त्याः शिखिपिच्छकपूराया अपि सङ्गेव भ्रमणं हेतुः, यतः सङ्गेऽपि सङ्ग्राह्यस्तस्या——मयि सत्यां सम्भोगैकरतिकां व्याधो वारितान्यकार्त्तव्ययो दिवानिशं मतपरायण एव केवलं मधुनीनोदार्थी यहच्छयाल्लिङ्कापतितमयूरमात्र-मारणव्यापारो वर्त्तत इति शिखिपिच्छमात्रकरणपूराहं जाता, भवतीहि सतीहि दूरदेशकालव्यवधानस्थ्यमहासारम्भमतङ्झमारणादिव्यापारनिरतोऽयमासीदिति मुक्ताफलरचितप्रसाधना भवत्य इति। तेन यदेतत् सङ्गेव भ्रमणं तदेव तस्या: सपल्लोभ्य: सौभाग्यतिरेकमनुमापयतीत्यवसेयम् ।

सिहिपिञ्छ ( पूर्वानूदित छाया ) यहाँ नई व्याधवधू बहुलिया की शोभा के प्रति की गयी है अपेक्षा अधिक अनुमेय है। इसमें व्याधवधू को मोरों के करनफूल पहनने पर भी उसका गर्व के साथ घूमना हेतु है। क्योंकि उस खो का अभिप्राय यह है कि——मेरे रहते हुए यह बहेलिया मेरे ही संमोग में लगा रहना है। उसने और सभी काम त्याग दिये हैं। दिन रात सुझोपर आसक्त रहता है। वह केवल मुझे वेढ़लाने के लिये पास में आ पहुँचे मोर को ही मारने का काम करता है। इसीलिये मैं केवल मोर के मोरंगे का भूषण पहने हुए हूँ। आप लोगों के साथ रहते पर वह दूर जाता है। बड़ा यत्न करता था। हाथियों के मारने आदि में लगा रहता था। इसीलिये आप लोग मोतियों के हार पहने हुए हैं! इसीलिये यह जो उसके गर्व के साथ घूमना है वह उसके की सौतों की अपेक्षा अधिक पतिप्रेम का अनुमान कराता है।

वाक्यार्थस्य विवादिरूपस्य रसादीनां चालक्ष्यक्षमो गम्यगमकभाव इति प्रसाधितमेव। स च वाक्यार्थः; शुद्धोऽलङ्कारान्तरसङ्घीर्णश्वेति द्विविधा सम्भवति।

तत्र शुद्धो यथा रामाभ्युदये 'कृतककुपितैः'—इत्यादिश्लोकः। एतद्वि-वाक्यं परस्परानुरागं परिपोषप्राप्तं प्रकाशयत्त् सर्वत एव परं रसतत्त्वं प्रकाशयति।

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अलङ्कारान्तरसङ्कीर्णो यथा—

'स्मररसमदोपरेणोढा: पुनर्गुरुरसतेतुभि- र्यंदिपि विश्रृता दुःखं तिष्ठुन्त्यपूर्णमनोरथा: । तदिपि लिखितप्रख्यैरद्रै: परस्परमुखासुखा नयनालीनोनालान्तं पिबन्ति रसं प्रिया: ॥' इति ।

अत्र हि रूपकेण यथोक्तलक्षणगमकाजुगतेनात्रगमितोदयं रसः सुतरां प्रकाशते इति मुख्यवृत्त्यार्थसैव गमकत्वं न शब्दसयेति स्थितम् ।

विभावादिरूपवाक्यार्थं और रसादि के गम्यगमकभाव में क्रम लक्षित नहीं होता ( अर्थात् वाक्यार्थे गमक हैं और रस गम्य, पर इनका गम्यगमकभाव समझ में नहीं आता । ) यह कहा ही जा चुका है। वह वाक्यार्थ दो प्रकार का होता है, शुद्ध और अन्य अलङ्कार से युक्त । दोनों में से शुद्ध—रामाभ्युदय में—‘कृतककुपिते:'—[ वाक्यपदीयभाष्य: सदैनऽन्यथाकृतेऽनपि गंता यस्य प्रीत्या धृताऽपि तथाऽऽब्धया । नवलझरीयासा: पश्यनू दिशो भवतां बिना कठिनहृदयो जीवत्येव प्रिये स तव त्रिप: ॥१॥] माँ ( कौसल्या ) के रोने पर माँ जो अपने कोड़े आँसू तथा दैनदृष्टि से मेरे साथ वन आई उसी तुम्हारे बिना नड़े मेघों से श्याम दिखाईँ देखता हुआ तुम्हारा कठिन हृदय वाला प्रिय ( राम ) अभी जीवित है हो ] पद्य । यह वाक्य एक दूसरे के पुष्ट अनुराग को प्रकाशित करता है। और सर्वोपरि रस को प्रकाशित करता है । अन्य अलङ्कार से युक्त यथा—

'प्रियजन कामरस की नदी की बाढ़ में वह जाते हैं' किन्तु गुरुजनों के बाँध उन्हें रोके रहते हैं । अतः वे, उनकी अभिलाषाएँ पूरि नहीं होतीं, इसलिये दुःख में डूबे रहते हैं । इतने पर भी अपने चित्रलिखित से अंगों से एक दूसरे के प्रति उन्मुख होकर आँखरूपी कमलिनी की नाल से आया कुछ रस पाते रहते हैं ।

यहाँ पहले ( लावण्यकान्ति पद्य में ) वतलाए लक्षण से युक्त रूपक द्वारा प्रतीत हुआ यह रस स्पष्ट रूप से प्रकाशित होता है, अतः प्रसुखरूप से अर्थ ही यहाँ गमक हैं, शब्द नहीं ।

वाक्यार्थसैव प्रवन्धस्यापि रसादीनां च योङ्मलक्ष्यक्रमो गम्यगमक- भावो महाभारतरामायणादौ प्रसिद्ध: तस्य विभावानुभावव्यभिचार्यौचित्य- चारणां वृत्तस्योऽपेक्ष्यतस्य व कथाशरीरस्य रसाभिव्यक्त्याजुगुपण्येनोपन- वन्ध एव निवन्धनम् तस्य रसादीनां च कार्यकारणभावस्य प्रतिपादितत्वात् ।

यदाह ध्वनिकार:—

'विभावभावानुभावसंघ्रायौचित्यचारण; । विंशे: कथाशरीरस्य वृत्तस्योऽपेक्ष्यतस्य च ॥ इतिवृत्तवशात्त्यक्त्वाननुगुणां स्थितिम् । उत्प्रेक्ष्याद्यनुसारामोष्टरसोचितकथोडन्वय: ॥ सन्धिसन्ध्यङ्गटनं रसाभिव्यक्त्यपेक्षया । न तु केवलया शास्त्रस्थितिसंपादनेच्छया ॥'

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तृतीयो विमर्शः

उद्दोपनप्रशमनेऽथावसरमनन्तरा । अलङ्कृतिनां शक्तावण्यानुरूप्येण योजनम् । प्रवन्धस्य रसादीनां व्यक्तिकत्वे निबन्धनम् ॥ इति ।

वाक्यार्थ के समान प्रवन्धादि और रस का भी जो अलंकार्यमाण, शक्यभाव, रामायण और महाभारत आदि में प्रसिद्ध है वहाँ विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के औचित्य से सुन्दर इतिहास-प्रसिद्ध या कल्पित कथावस्तु को रसाभिव्यक्ति के अनुरूप योजना ही कारण है, क्योंकि उस (योजना) का और रसादि का कार्यकारणभाव बतलाया जा चुका है । जैसा कि 'ध्वनिकारने कहा है—

'प्रवन्ध द्वारा रसादि की अभिव्यक्ति में कारण है—ऐतिहासिक या कल्पित ऐसे कथा-शरीर का विधान जो विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के औचित्य से सुन्दर हो, जो कथा इतिहास से भी चलती आ रही हो उसमें रस के प्रतिकूल घटना का छोड़ देना, और बीच में रसभङ्गपत्ति के लिये और भी कुशल कल्पना कर लेना, रस को अभिव्यक्त करने के लिये सन्धि और सन्धि के अङ्गों की योजना करना केवल इसलिये नहीं कि शास्त्र की मर्यादा का पालन करना है, बीच में (रसादि का) उद्दोपन और तिरोभाव भी यथावसर करना, अलङ्कार योजना की शक्ति होने पर भी रसात्मक (अलङ्कार) ही उपस्थापित करना ।

'न्यक्कारो ह्यामेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापसः । सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जीवत्यहो रावणः ॥ धिग् धिक् कृ शक्रजितं प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन मे स्वर्गग्रामटिकाविलुण्ठनवृथोच্ছूनैः किमेभिर्भुजैः ।' इति ।

ऊर्ध्वं सर्वत्र रसोत्कर्षे हि गमकत्वं दर्शयति । 'तत्र मे यदरयः' इति सुत्रसम्बन्धवचनानामुक्तनये गमकत्वम्, यथायोगमुत्तरत्र च । 'तत्राप्यसौ तापसः' इति निन्दितानिपातयोः 'सोऽप्यत्रैव निहन्ति राक्षसकुलं जघ्न्यहो रावणः' इति तिङ्ङारकशकोनाम् 'धिग् धिक् शक्रजितम्' इत्यादौ श्लोकार्थः कुतश्चिद्वितसमासोपसर्गाणामिति ।

सुस्निग्धसम्बन्धाद्या: क्रोधोत्साहादिकान् यथा भावान् । गमयन्ति, तद्विप्रयेऽपिर्मशोऽप्योकसस्माभिः ॥ २९ ॥ इत्थन्तरायैः ।

सुख आदि विभक्तियाँ अन्वय-अतिरेक द्वारा यदि किसी विशेष अर्थ का ज्ञान करा रही हो, अतः उनका विनियोग आवश्यक हो तो उन्हें भी गमक ही मानना चाहिये । कारण कि—अर्थ तो विभावादि रूप ही होता है और विभावादि और रस का कार्यकारण सम्बन्ध निश्चित है । अतः सुस्निग्धादिमूलक लक्ष्यगमकभाव मानना चाहिये । उदाहरण—न्यक्कारो० इस (पूर्वोक्त) पद्य में—

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प्रायः सभी साफ साफ गमक है 'मे यदरयः' सुप्सम्नन्ध द्वारा उत्त प्रकार से गमक है । और अन्य सब भी अपनी अपनी विशेषता द्वारा 'तत्प्रत्यसौ तापसः' इसमें तद्धित गमक है । 'सोप्यत्रैव' आदि में तिङ् और कारक की शक्ति । 'धिङ् धिक्' इत्यादि आखे इलोकों में कृदन्त, तद्धित और उपसर्ग गमक है ।

'सुवन्त और तिङन्त आदि ( तद्धित ) क्रोध, उत्साह आदि भावों को जिस प्रकार अनुमित करते हैं वह हमने विधेयाविमर्शों में ही बतला दिया है ।

निपातोपसर्गादीनामसत्वभूतार्थानामुपाधिरूपतया पदार्थसमाश्रयेणैवर्थौवगतिरिति पदवाक्ययोर्थावगमकत्वोक्त्यैव तेषामपि गमकता प्रतिपादितैव । केचित् पुनर्निपाताः क्रोधाद्युत्प्रशोकोदीन् भावान् प्रदीपचद् वक्तृगतानुवाच्योत्पन्न न वाच्यगतान् । यथा—

'आस्तिष्ठ रक्षः ! क से प्रियतमामादाय गच्छसि' इति क्रोधः । 'अहो वतासि सुप्रहणीयवयीर' इति विस्मयः ! 'हा धिक् कथमहो क यासि शरणम्' इति शोकः ।

अत पच तेषां द्वित्राणां त्रिचतुराणां वा प्रयोगे पुनरुक्तता नाशङ्कनीयासमुदितानां प्रदीपादीनामिव स्वकार्यं प्रकाशदानात् । तिङ्कम—

'नामवदुपसर्गास्ते किन्त्वन्योपहितमाहुरथ स्वम् । दीपकवतु निपाताः शोकादीन द्योतयन्ति वक्तृगतान् ॥ गमयन्ति कार्यभूतान् गदद्दिकादिवदवाचका पदच । सड्ढटनाावणर्याः क्रोधोत्साहादिकान् भावान् ॥' इति ।

तदेवं ध्वनेरनुमानान्तर्भावाश्युपगमः श्रेयानिति ।

निपात और उपसर्ग जो द्रव्येतर वस्तु के वाचक होते हैं वे उपाधिरूप हैं, वे उपाधियुक्त अर्थ के द्वारा ही दूसरे अर्थ को ज्ञापन कराते हैं । अतः उनकी गमकता पदे और वाक्य की गमकता से ही चरितार्थ है । कुछ निपात क्रोध अदसुत और शोक आदि भावों को दीपक के समान वक्ता के भीतर ही सिद्ध करते हैं । वाच्य के भीतर नहीं । जैसे—'आ' ठहर रे राक्षस' मेरी प्रिया को लेकर वड़ा खेद है, भला किसी शारण में जاؤँ—इसमें शोक । अतः उनमें से दो-तीन या तीन-चार का एक साथ प्रयोग हो जाने पर भी पुनरुक्ति नहीं माननी चाहिये । एकट्ठे होने से प्रदीप आदि के समान उनके कार्य में कुछ उत्कर्ष दिखाई देता है । जैसा कि कहा है—'उपसर्ग नाम शब्द के समान उनके कार्य में कुछ समान है, वे अपने अर्थ को बतलाते हैं किन्तु तब जब वह अर्थ किसी अन्य अर्थरूपा उपाधि से युक्त हो ।' निपात जो है सो दीपक के समान शोक आदि का वक्ता में ज्ञान कराते हैं । शोकादि के निपातादि कार्य हैं । वे वाचक होते हुये भी स्वर की गदगदता के समान शोकादि को व्यक्त करते ही हैं ।

इस प्रकार ध्वनि का अनुमान में अन्तर्भाव मानना ही अच्छा है ।

तदिदं विस्तारस्यास्य तात्पर्यमवधार्यंताम् । यार्थान्तराभिव्यक्कौ वस्सामग्रीष्ठा निबन्धनम् ॥ ३० ॥

Page 556

तृतीयो विमर्शः

सैवानुमितिपक्षे नो गमकत्वेन सम्मता ।

अन्यतोऽन्यस्य हि ज्ञानमनुमैकसमाश्रयम् ॥ ३१ ॥

वाच्यवाचकयोः स्वार्थप्राधान्यप्रतिपेधतः ।

ध्वने: शाक्त्यन्तराभावाद् व्यक्ते: शाब्दानुपपत्तित: ॥ ३२ ॥

प्राणभूता ध्वनिव्यङ्क्यौक्तौ सैव विरेचिता ।

यस्मिन् यत् तत्र विमति: प्रायो नास्तीत्यूक्षितम् ॥ ३३ ॥

प्राय: प्रतीतिवैचित्र्यरसास्वादविद: प्रति ।

सूपकारक्रियेयं मे साफल्यमुपयास्यति ॥ ३४ ॥

इति सङ्ग्रहश्लोक: ।

इस प्रकार यहाँ जो विस्तारपूर्वक विवेचन किया है उसका तात्पर्य यह समझिये कि आप ( ध्वनिवाद्री ) को दूसरे अर्थ की अभिव्यक्ति में जो सामग्री मान्य है वही हमें गमक रूप से हमारे अनुमिति पक्ष में मान्य है । दूसरे से दूसरे का ज्ञान एकमात्र अनुमान पर आश्रित है । वाच्य वाचक का अर्थ प्रधान नहीं होता और वाचक का अर्थ भी प्रधान नहीं होता । जहाँ तक हमारी शक्ति नहीं होती अतः व्यक्ति बनती नहीं । और ध्वनि का प्राण यही व्यक्ति ( व्यञ्जना व्यापार ) है । हमने उसी का विवेचन किया । और जो कुछ है उसमें हमारा मतभेद नहीं अतः हमने उसकी विवेचना नहीं की । मुझे आशा है कि प्रतीति की विभिन्नतारूप रसास्वाद के जानकारों के प्रति मेरा यह सूपकार जैसा कार्य सफल ही होगा ।

आधातुं व्युत्पत्तिं नष्टाणां क्षेमयोगभोजनाम् ।

सत्सु प्रथितनयानां भीमस्यामितगुणस्य तनयानाम् ॥ ३५ ॥

श्रीधैर्यस्याऽऽत्मवा महाकवे: श्यामलस्य शिष्येण ।

व्यक्तिविवेकेऽयं विदधे राजानकमहिमकेनायम् ॥ ३६ ॥

प्रतिपाध्यबुद्ध्यपेक्षौ प्राय: संक्षेपविस्तरौ कचुं: ।

तेन न बहुश्रुतत्वं विद्वद्भिरसूयितव्यं न ॥ ३७ ॥

अन्यैरुल्लिखितपूर्वकमिदं ब्रुवाणो

नूनं स्मृतिर्विषयतां विदुषामुपेयाम् ।

हासैककारणगवेषणया नवार्थ-

तत्त्वामर्शपरितोषसमीहया वा ॥ ३८ ॥

इति श्रीराजानकमहिमभट्टविरचिते व्यक्तिविवेकाख्ये काव्यालङ्कार-

ध्वनिवादिनोद्देश्येन तृतीयो विमर्श: ।

अति गुणवान् भीम के विद्वानों में प्रसिद्ध (तथा) क्षेम, योग तथा भोज नामक अपने पौत्रों की व्युत्पत्ति के लिये, श्रीधैर्य के पुत्र, महाकवि श्यामल के शिष्य इस विनीत राजानक महिमा ( चर्य ) ने यह व्यक्तिविवेक बनाया ।

Page 557

९२

व्यक्तिविवेक:

ग्रन्थकार प्रायः शिष्यों की बुद्धि को ध्यान में रखकर ही ग्रन्थ में संक्षेप या विस्तार करते हैं, अतः विद्वज्जन मेरे विस्तारपूर्ण विवेचन पर दोष न दें। मुझे विश्वास है कि 'मैं विद्वज्जनों के स्मरण का पात्र अवश्य होऊँगा, भले ही वे मेरा स्मरण परिहास के लिए करें या नवीन विषय के तरंग-ज्ञान द्वारा आत्मतोष के लिए, क्योंकि मैंने ऐसे तथ्य उपस्थित किए हैं जिनपर दूसरों की दृष्टि नहीं गई थी ॥

विमर्शः प्रकाशित प्रतियों में भोज की जगह भोज पाठ है ।

इस प्रकार राजानक महिमभट्ट द्वारा रचित व्यक्तिविवेक नामक काव्यालङ्कार ( ग्रन्थ ) में 'ध्वनि का अनुमान में अन्तर्भाव-निरूपण' नामक तृतीय विमर्श पूर्ण हुआ ।

[ भोपाल म० प्र० ] वासी पं० श्री नर्मदाप्रसाद द्विवेदी के आत्मज पं० श्री रेवाप्रसाद द्विवेदी कृत हिन्दीभाष्य पूर्ण हुआ ।

मल्लिनाथमिव प्राज्ञं श्रीहर्षमिव निर्भयं । लोचनस्य विधातारमिव भाषितसंविददम् ॥ वाणवाणिजगन्नाथैः समं वाचां विजृम्भणे । पाण्डेश्रीमहादेवशास्त्रचिन्ति जगति श्रुतम् ॥ पुरा प्राचार्यतां हिन्दूविश्वविद्यालये यथा । तथा स्वयं वृतवती शंकराचार्यताड् यमुम् ॥ विद्यात्रयीमूर्तिरराध्य वादं यस्योक्तमाश्रिताद् वहति धुसिन्धु: । महेश्वरानन्दतरसरस्वती यतो यमार्यां ब्रुवते स श्रीमान् ॥ तस्यैव पाण्डित्यकलां श्रयाणः साहित्यवाचाड्‌वनी सादृशोभौमः । साहित्यपोठेऽथ च विश्वविद्यालयेऽध्यक्षपदं दधानः ॥ मल्लः शरीरेण हृद्रा श्रदधीयान् साररयसौजन्यनिधिमहीयमान् । कविर्महाशनू रामकुबेरनामा स मालवीयश्र बुद्धो गरौयान् ॥ गुरू यद्रीयो शिवराजधान्यां काऽऽयां तदीशाऽऽशिव शुद्धसच्चौ । रेवाप्रसादः स कृतौ महिम्नां हिन्दीमयं भाष्यमिदं व्यतानौत् ॥ सेतुं यथा वारारथिर्महाब्धौ मन्थानभूतं यदि वा गरुत्मान् । ध्वनौ विवेकं य इमं ततान तस्मै महिम्ने शुश्रुमादिताः स्मः ॥

पुष्पाश्रयं ग्रन्थ.

Page 558

श्लोकानुक्रमणी

[ प्रतीक—आनन्द = आनन्दवर्धन, उत्तर = उत्तररामचरित, का = कारिका, किरात = किरातार्जुनीय, कुमार = कुमारसम्भव, चण्डी = चण्डीशतक, प्र० वा० = प्रमाण वार्तिक, ध्वन्या = ध्वन्यालोक, माध = माधकाव्य या शिशुपालवध, मालती = मालतीमाधव, रघु = रघुवंश, वक्रोक्ति = वक्रोक्तिजीवित, विक्रमो = विक्रमोर्वशीय, वेगी = वेगिसंहार, व्या० = व्यासक्यांत, शाकुन्त० = शाकुन्तल, सूर्यश० = सूर्यशतक, हरवि० = हरविजयमहाकाव्य, हृर्षच = हर्षचरित । ]

पृष्ठांक

अकुंभकार इति वडु

(क) ३७

अकुंवा परसंतापस्म

३७

अथोंभो नभ्रुति

(का) ९२

अनवरतनयनसलिलसिच्यमानः

४०६

अनिराकरनातू कर्तुः

(का) ५२

अनिराकृततापसि पदं

३९५

अनुक्लेव परामृश्यं

(का) २९०

अनुभावविमवानाम्र

(का) १०२

अनुसंस्कारवमेवाय युक्तं

(का) ११२

अनुसाने डन्थंभवम्

अनुरागवनी संध्या

१६२

अनुरागवन्तमपि लोचनयोः

३६९

अनुचाघमनुकुचैव

(का) ४३२

अनेकार्थत्वमप्यस्य

(का) ४८८

अतश्चित्यादिते तान्यद

(का) १९७

अतएवाशुभाविस्वात्

(का) १५९

(व्या) १५९, ४६६

अतस्मिन् तत्त्वमारोपो

(का) १२४

अन्योडनुमेयो भकस्या

(का) १९२

अन्यतोऽन्यस्य हि ज्ञानम्

(का) ५५९

अन्यच्च त्वर्थसन्वनन्य

(का) २८३

अन्यथा त्वन्वधर्मः

(का) ४४८

अन्यैरतुल्यलि‌वित पूर्वम्

५९१

अन्योऽन्याच्चेपकलवे

(का) ३८६

अपरागसम्भरणे रितः क्रम

(किरात) २६२

अप्रस्तुतोऽपिसमार्थ्यात्

४३५

अप्राकृतस्य व्वरितातिशयैश

(व्या) २१५

अप्राधान्यं विधेयन्त्र

(का) १८७

अवन्ध्यकोपसय

(किरात) ४१९

अभिधेयाविनाभूतयतीतिः

(व्या) ६७

अभिधेयेन संबन्धात्

(का) ११९

३३ ठय० वि०

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अभिन्न एव यत्रार्थः

अभिवाञ्छितं प्रसिद्ध्यतु

अभूद्भूमिः प्रतिपचजनमनाम्ना (व्याघ्र, माधव)

अभेदे वहुता न स्यादुक्ते (का)

अयं जनः प्रप्टुमनास्तपोधने ! (कुमार)

अयं मन्त्रः युतिभास्वान

अयथार्थक्रियारम्भैः

अयाचितानि देयानि

अयाचितारं नहि देवमन्त्रिः (कुमार)

अर्थः सहृदयैः शाधयः (का)

अर्थप्रयोगो युगपत्न्ना (का)

अर्थमेदाद् विभिन्नोडपि (का)

अर्थस्य तदतद्धावो

अर्थस्य विशिष्टस्वम्

अर्थस्वभावस्योक्तिर्या (का)

अलकालीकुलाकीर्ण

अलङ्कारस्य कवयो यत्रा (का) (व्या)

अलङ्कारान्तरस्यान्तरपि प्रतीतो (का)

अलिङ्गिरत्नविन्द्रुमनोहरैः (रघु ९)

अवगच्छति मूढचेतनः (रघु ८)

अवन्तिनाथोड्यमुदग्रवाहु (रघु ०)

अवहितचेतसः पथि

अदैमि तदवज्ञानाद् (रघु)

अश्वतुल्यसमाचारः (का)

अश्वीयसंहतिभिरुद्धत

अश्वेति विद्रुतमनुद्रवता (माघ)

असमञ्जपि वि गाहिअं

असमानसमनाधिकरण (का)

असाधुरनुमानेन (का)

असाधुश्रवणाद्दश

असाधूच्चारणाद् यस्तु (का)

असौ मरुचुम्बित

अस्त्युतरस्यान् दिशि (कुमार)

अस्त्युब्जाते सुरसरिज्जल (हरवि ९१८)

अस्वरोण्यादयः शब्दाः (का)

अहो बतासि सृपणीयचीर्या (कुमार)

आः किमर्थमिदं चेतः

आपुर्णमानमध्या या

आचर्योऽने से वल्नु (व्याघ्र)

आच्छादितायततिगम्बर (माघ)

आघातुं नयुपपत्ति

आभोगिनेत्रपरिवर्त्तन (हरवि ४९९)

आरोपविषये यत्र (का)

आलानं जयकुञ्जरस्स

आलिङ्गनादरचित (हरवि ११२३)

आलोकमार्ग सहसा (रघु कुमार)

आशुर्भावदनालच्यं (का)

आसमन्ताच्चिततीक्ष्णाग्नम्

आसित्वष्ट रक्तः

आहूतेपु चिह्नेषु

इतिनार्थों व्यवचिछिन्नः (का)

इतिनैवेतरेषामपि (का)

इति प्रतीत्योंचिच्चिय (का)

इति यतोऽस्तरुषः (माघ)

इति वृत्तवशायातां (का)

इत्थमर्थान्तरे बुद्धिम् (का)

इत्थमर्थान्तरे शाब्दवचः (का)

इत्थं समस्तो इत्रयं (का)

इत्थं च गम्यमानार्थ (का)

इत्थं चाश्रित भव्यादि (का)

इत्यादि प्रतिभातरं (का)

इदमचयतमानां च भाविनां (का)

इन्द्रेर्वार यदतसीकुसुमस्य (व्या)

इयं गेहे लद्मीः (उत्तर)

इयता चापशब्दत्वम् (का)

ईह चटुलतया विलोचनौघैः

ईह विभुधगजस्य (हरवि ५१९)

ईह सम्प्रतिपत्तोडन्यथा

ईसकालकुसुमस्स वि

उत्क्षअदुमं व सेलं

उक्त गुणीकृतात्मस्वम् (का)

उक्तं वृथैव शब्धस्योपादानं (का)

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उक्तिस्वरूपावच्छेद

(का)

३३९

एवं च विपच्य घटो

(का)

४३२

उचितकारित्वं प्रति किमुच्यते

२८०

एवमुक्तो मंत्रिमुख्यैः

२९०

ऐन्द्रं धनुः पाण्डुपयोधरेण

३६१

उचिछु पदिअं

४९९

ककुम्भां सहसाज्वलयन्तं

४५५

उच्यते वस्तुनस्तावदू

(क)

६४२

कटस्थलप्रोषितदनवारिभिः

४५२

उत्कम्पिनी भयपरिस्खल

४०८

कथं तर्हि स्वभावो

(का)

४५२

उत्तिष्ठन्त्या रतान्ते

२३९

कनकनिकषस्निग्धा

३८७

उत्फुल्लकमलकेसर

४५२

कमलमनरभासि कमले

३८७

उत्सवाय जगतां स

(व्या)

३३९

कयासि कामिन् सरसाप

(कुमार)

५२

उदन्वच्छिन्ना भूः

(व्या)

२२३, २९६, ४५६

करकलितनिशातोरस्खात

२१०

करिकलभ विमुख

३७८

४२८

उदाहरणजातं यत्

उदितवपुषि दिननाथे

कर्त्र्यझ्झिनि रुद्रायां

(का)

३८४

उद्धपनप्रशमने

(का)

५०९

कर्तुमनया मानं

२४८

उद्योगः करिकीरमेघ

२१२

कर्तुंरपाहितयोन्ता

(का)

३७

उन्नतः प्रोझसद्वार

४७८

कर्तृभेदविपयां विरुद्धतां

(का)

(व्या)

४४

उपचारसहैकैव

(का)

४३८

कलां च सा

(दूयंगत)

(कुमार)

३२८

उपपत्रं नतु शिवं

(रघु)

२४३

कल्याणानां स्वमसि

(व्या)

(मालती)

२१८

उपयुक्तार्थता ह्यस्य

(का)

४२०

कविशस्यर्पिता मावा

(का)

७५

उपादायापि ते हेयाः

(व्या)

३९९

कस्स वण होई

४७२

उपाधिभावात् स्वां शक्तिं

(का)

३३९

कह णाम ण होसि

४२४

उपालयधे वोचैः

निरिपति

३२९

काचो मणिर्मणिना

५०२

उपोढरागेण विलोल

९९

काचित् कीर्णा रजोमिभः

(माघ)

२९९

उभयन्त्राभ्युदियक्रियै

(का)

४००

उभयार्थंपदनिबन्धो

(का)

३६४

कातर्यं केवला नीतिः

(रघु)

१९९

उमावृषांकौ शरजन्मना

(रघु)

३५८, ४५५

कारणगुणानुवृत्त्या द्वौ

२३५

उवाच दूतस्ततोदितोऽपि

३५७

कारणद्रयमेवेष्टं

(का)

२७५

उपसि विगलितान्धकार

(हरवि २८८२)

४०५, ४१८

कार्यंत्वं ह्यस्तोदपीष्टं

(का)

११२

काव्यकाङ्क्षनकाश्ममानिता

२८५

ऊध्र्वाचिंतापगालितेन्दु

२६५

काव्यस्यास्तु संहिति

(का)

१११

ऋजुतां नयत: स्मरामि ते

(कुमार ४)

४५४

काव्यस्यास्तमा ध्वनि

(ध्वन्या)

(का)

९४ ४५६

एकः शांकामहिकुल

(रघु १६)

३८९

काव्यस्यास्तमा स एवार्थः

(ध्वन्या)

एकत्रोप्रे चित्वेन

(का)

४५०

काव्यस्यास्तमेतरमतिभिः

४६१

एकैकालंकृतियंत्र

(का)

३७८

काव्यार्थंतरवादिगमो

१८८

एको डनेकार्थंकृद् यत्र

(का)

४०८

किं लोमेन विलंबितः

२५३

एको हि दोषो गुणसन्निपते

(कुमार)

३९६

किं हास्येन न मे

१६६

एमेअ जणो तिस्सा

२८८, ४७६, ५०२

किं क्रमिष्यति किलेष वामनः

३३०

एवं चात्मन्यधिशेष्ये

(का)

४८७

किन्तु तदवधीर्यायैः

एवं चासाऽऽशुबन्धोऽपि

(का)

४८८

एवं वादिनि देवर्षौं

(कुमार)

५०

Page 561

किन्तु प्रवृत्तिरेतस्य

किमअनेनायततलोचनाया:

किमवेच्च्य फलं

कि पुनरोदशो दुर्जाते

कुतः कवलये कर्ण करोषि

कुस्तालीभिरुन्धमिव

कुयां हरस्यापि

कुवेष्टा शुष्पृष्ठो

कुशं द्विषामंकुशवस्तु

कुसुमैः ऋतवासनः

कृतककुपितैवांपाम्भोभिः

कृतयान्ति लिपिमिञं

कृताः प्रतीतिविसुखैः

कृशाझ्या: संतापं वदति

कैरवेन्दीवरच्छायौ

कैक्रिदेव हि केषांचिदू

क्रियते हृददेवायं

क्रियाकत्रंशाभागयोः

क्रियाप्रतीति: करण

क्रियाविशेषो यस्वनन्यः

क्रौञ्चं ऋतान्तधिकार्त

क्रौचितं तरुतलाविवरावस्तिनः

ज्ञान्तं न जयया

ज्ञानाडम्बय: ज्ञतकोमला

चित्सो हस्तावलम्बः

चूर्णं यदन्तःकरणेन नाम

चोभं यदेति न मनागं

च्माभर्तुरस्य विकृतः

खं येडभ्युञ्जवलयन्ति

खमिव च जलं जलमिव खं

खलतां खलतामिवास्तस्मै

गअर्णं अ मत्तमेहं

गमयन्ति कार्यंभूतानू

गमयन्ग्रथर्थमुखेन हि

गाहन्तां महिषा निपान

गुणदृत्तौ गिरां यावत्

गुर्वन्धंर्मथी श्रुतपारदृशा

गृहीतं येनासौ: परिभव

गोत्सवारोपेण वाहिके

गोक्षीरदस्येव गौरर्थः

ग्रामतरुणां तरुण्या

ग्रामेडस्मिन् पथिकाय

ग्रीवाभङ्गाभिरामं

घटतेतित घटो जेयो

घटनं च तदात्मतावाप्ति

चूर्णी करणः प्रमादी च

चकासतं चारुचमूर्हु

चकोयं एव चतुरा:

चक्राभियातप्रसभ

चन्दनौसक्तभुजगा

चन्द्रमऊपहि निसां

चन्द्रं गता पद्मगुणात्र

चन्द्रं प्रद्युदोमिरिलोचने

चादीनां तु निपातनमुभयं

चापाचार्यः पश्युपतिरसौ

चापाचार्यस्खिपुरविजयी

चारुता वपुरभूषयदासां

चुम्बने विपरिवर्तिताधरं

छायामपास्त महतों

जचुरिसानू धृत

जड्वाकाडोहरुनालो

जनको जनको यस्यां

जनैरजातस्खलनेर्न जातु

जयति जगत्रयजनको

जयति निश्शापतिमौदिलिः

जयाशा यत्र चास्माकं

जाएजगणुदेशे

जातिशब्दोऽन्तरेरेणापि

जुगो पाल्यमानमभ्रस्तो

उस्सोतीरसाशमभवनाजिर

झटिति कनकचित्रे

तं विलोकय सुरसुन्दरीजिनो

तं करणमूलमागस्य

तं कृपामृदुरवेच्च्य

Page 562

तच्चेत् तद्धदनेकार्थं

तं जिगीषुरिव शात्रवं

ततो हृते वीरमदाभितसः

ततोडनया विसंशः

ततो निर्विषयस्यास्य

ततो यदर्थानुगुणा

ततोडर्थ एव काच्यास्ता

तत् तिरसकृतवाच्यस्य

तत्परत्वाद् विवक्षाया:

तत्पर्यायेण तेनैवं

तत् पाहु वः श्रीपतिनाभिपं

तत्र साध्यो वस्तुमात्रं

तत्र हेत्वादयः सन्ति

तस्सामयतत्समवन्धौ

तथा हि यस्य शब्दस्य

तदन्वये शुद्धिमति

तदवाच्यमिति झेयं

तदवितथमेव मन्ये

तदा चातिप्रसंगः स्यात्

तदिदं विस्तारस्यास्य

तदीयमातङ्घटाविधक्तिते:

तद्रावहेतुभावौ हि

तद् वक्त्रं यदि मुद्रिता

तनुःवरमणीयस्य

तं ताण सिरिसहोऽर

तपस्विभिर्या सुचिरेण

तपेन वर्षा शरदा

तप्ते महाविरहवहिहशिखा

तमभ्यनन्ददत् प्रथमप्रबोधि

तं पातयां प्रथममास

तद्योगेनिन्द्रपोपान्

तरङ़्य द्रशोङ्कने

तव कण्ठासृजासिक्ता

तव कुसुमशरस्त्वं शीत

तव प्रसादात् कुसुमायुधोडपि

तव वदनपदारथश्रनन्द्र

तस्मात्रामपदेभ्यो

तस्मात् स्वार्थान्तिरेकेण

तस्मात् स्फुटतया यथ्र

तस्माद्जायत मनुः

तस्मादनेकार्थत्वेऽपि

तस्मादर्थोऽन्तरव्यक्तिहेतौ

तस्य प्रयातस्य वरूथिनीना

तस्या: श्लाघाकाञ्जन

तस्याच्छिन्नः पदार्थोनाम्

तस्या धौताज्जनरस्यामा

तस्यामेव किवाद्याश्र

तां जानीयाः परिमितं

तात खं निजतेजसैव

ताताजन्म वपुर्‌विलिच्चित

ताला जान्ति गुणा

तीर्थे तदीये

तुल्यकचयतया यत्र

तुल्यादिपु हि लोकोडर्थे

तृषियोगः परेणापि न

तेनावरोधप्रमदासखानां

तेनैषामप्रधानत्ववादः

तेनोभयार्थानुगुणा

तेनोभयोरैक्यमेवो

ते प्रत्येकं द्विधा झेया:

तेषां संचेपतोऽस्माभिः

ते हिमालयमामनु्य

तौ विधेयानुवाद्यत्व

त्रासाकुलः परिपतन्

त्वक् तारावी निवसनं

स्वगुत्तरासंगवतीमधीति

त्वस्कीर्तिंकेतिकीकृत्स

स्वमेवंसौन्दर्यो

स्वष्ट्रः सदाश्रयास

दत्तानन्दा: प्रजानाम्

दलकन्दलभाङ्ग् भूमिः

दशापूर्वर्षथं यमाश्रया

दिने दिने सा परिबर्धंमाना

दिवं यदि प्रार्थयसे वृथा

दिशि दिशि विहगा:(हरवि २८।४७)४१६

दुःखाभिततस्य जन्तस्य

Page 563

दुर्मन्त्रानुपतिविनाशयति

हृदतरनिबद्धमुष्टे:

हृशा दृश्ंं मनसिजं

हृष्टा दृष्टिमध्ये ददाति

हृष्टिरनृतवर्षिणी (व्या)

हृष्ट्या केशव गोपराग

दे आ पसिअ

देव्वाअत्तमिम् फले

दृशा: सो डयमराति

दोषद्रयमिदं प्राय:

द्वचिणमापदि भूषण (व्या)

दृव्यं गतं संप्रति शोचनীয়तां (कुमार ५)

द्वितीयस्मर्थविषयम्

द्विधा कैश्चित् पदं भिन्नं

द्विपतामुदय: सुमेधसा (किरात)

द्विपदबधूलोचनचन्द्रकान्त

धर्मस्तुल्ययविभक्तीनाम् (का)

धर्मिसाम्यविवचायां

धान्त्रा स्वहस्तलिलितानि

धैयेण् विश्वस्यतया

ध्वनिवर्मेन्यतिगहने

ध्वने: शक्स्यान्तराभावाद् (का)

ध्वनेरनेकार्थस्यापि

न च युक्तिनिराशंसात्

न चानिबन्धना युक्ता

न चालड्कारनिष्पर्यै

न चोपसर्जनत्क्वेन

नजर्थस्य विधेयत्वे

न तु सापेक्षताद्यम्नु

ननु सर्व एव समवेच्य

ननु साधु कृतं प्रजासुजा

नमोडस्तु ताभ्यो

नवचन्द्रिकाकुसुमकीर्णं

नावजलधर: सनद्धो (विक्रमो)

नवनीरदसुन्दर: कृपाण:

न हि कान्यात्समभूतस्य

न हि तत् समयाभावाद्

न ह्यस्ति निजे विषये

नाथे निञ्ञाया नियते:

नानाभिनयसम्बन्धाद्

नानुमितो हेत्वाभौ: स्वदारो

नामिवादनप्रसाद्यो रेणुकापुत्र:

नामवदुपसर्गास्ते

नाम्न: सर्वप्रधानस्य

नाहं ततो जातुविदिमौ

नालीजह्नो निजदने

नाविवचितवाच्यस्य

नासिद्धो भावधर्मोऽस्ति

निग्रहात् स्वसुराग्रानां

निदाक्षेप्त भवताप्यनु

निज्झसुमुन्तमवस्थितं (कुमार ८)

नियतता लघुता निरायते: (किरात)

निरोचय संरम्भनिरस्तधैयं

निर्वांतोग्रै: कुशलीलान्

निर्मोंसुक्तिरिव गागनोरगस्य

निर्यायो विद्याथा

निर्वाणभूयिष्ठमाथास्य

निर्विशेषं न समान्त्र्यं

निर्वृत्तेऽपि बहिर्गने

निवार्यंतामालि किमप्ययं (कुमार)

निशि नान्तिकस्थितामपि

निश्वासान्ध इवादर्श:

नीरसस्तु प्रबन्धो य: (का) (व्या)

नेतावतावगन्तव्या

नैमित्तिक्या: श्रुतेरथं

न्यकारो ह्यायमेव मे

पत्तधर्मंतवसम्बन्धव्याप्ति

पतिते पतझ्मुसाराजि

पातिताल्पातिते शत्रुशिरोभि:

पत्ता णिअंबफंसं

पस्यु: शिरश्छदकला (कुमार)

पद्मेकमनेकं वा

पदवाक्यादिगम्यत्वात्

पदानामभिसम्बन्ध

परस्परविरुद्धत्वात्

Page 564

परामृश्यमनुकृत्तवैच (का) ३२६ प्रयुक्तान्तर्गतैरैव (का) ३८४, ४६०

परिणामो बहुविधो (का) ४८२ प्रयुक्ते चाप्रयुक्ते च (का) ३८६

परिपाति स केवलं शिशून् (माघ) ४३५ प्रवृत्तेsस्मिन् महाप्रलये ५०६

परिहासरतियशः २६६ प्रसिद्धस्य सित्र्यर्थस्य (का) (व्या) ३९

पर्यायमात्रभिन्नस्य (का) ४३६ प्रसिद्धं मार्गं सुष्ठु स्य (का) १४२

पशुपतिरपि तान्यहानि (कुमार) ५२ प्रस्तुतान्तु तदन्वयस्य (का) ४५४

पार्वादथ ध्रुवागानाद (का) १०० प्रातु धनेः सर्थजनस्य ५०२

पातु वस्तारकाकान्त ३७४ प्रातिप्रियोगाजुगम (का) १५७

पादाहतं यदुरस्थाय (व्या, माघ) २२३ प्रादीनां ज्योतिष्कव यत् (का) १५७

पायात् स शीतकिरणाभरोऽपि ३४५ प्रादीनां धातुगर्भवो (का) १५९

पारम्पर्येण साचाच्च (का) १५९ प्राधान्यादथ सम्वन्ध (का) ३२८३

पुण्ड्रेक्षोः परिपाकपाण्डु (व्या) २१४ प्राप्तश्रीरेष कुसुमाद ४८९

पुनरुक्तिप्रकाराणाम् (का) ३८७ प्राप्तावेकरथारूढो (वेणी) २६३

पृथिवि सिथरा भव २९५ प्रायः पतितविपर्यय (का) ५११

पृथिवि सिथरी भव २५८ वन्हीयांसो गरियांसः ३९२

पृथ्वोपाल प्रतापस्ते ३७२ बभूव भस्मैव सितारागः (कुमार) २९८

पौनरुक्स्यमिति (का) ३८१ वहवोडर्था विभाग्यन्ते (का) ७२

पौर्वापर्यं क्रियां यद् ३७ बहिरङ्गान्तरङ्गस्य (का) १५९

पौलस्यः स्वयमेव याचत २४९ बहिरं तद्वाच यथा (का) ४३

प्रकटकुलिशाकुन्तचक्र (हरवि २४९० ) ८०५ वाचा केवलमेव रोदिति (व्या) २२०

प्रकरणकाकादिसखो (का) २७६ विभ्राणः शक्तिमाशुप्रशमित २६९

प्रकारोडन्यो गुणीभूत (का) १६८ विसकिसलयच्छेदपाथेवान्तः (मेघ) ३४२

प्रकृतमपि यत्र हि स्वा (का) ३२० ब्रह्मणस्येदं हविः (सूर्यंशतक) ४०८

प्रकृतार्थं वाक्येन (का) ३९२ भक्तिः पदार्थवाच्यार्थे (का) १७८

प्रकृतिप्रत्ययार्थौडस्य (का) ३८९ भक्तिप्रह्ह्विलोकन ४२९

प्रजानां विनयाभानाद् (रघु) ५५ भक्त्या विर्भाति चैकत्वं (का) १२३

प्रजानामेव भूत्यर्थं (व्या, रघु ९) २१५ भक्त्या विर्भाति नैकरवं (का) ४६०

प्रतिपाद्यबुद्धयपेक्षौ ५९९ भम धम्मिल्ल वी सद्दो ४६३

प्रतीच्यं च प्रतीच्यायै (माघ) ३३० भाति स्थितभूतिलिसः ३३६

प्रतीयानः पुनरन्य एव (का) ९७ भावसंयोजनादृश्यडय (का) ७०६

प्रतीयमानाः स्वन्यैव (का) ९८ मुहुः सदा श्राद्धमयं ९५३

प्रत्यासन्ने नभसि (व्या, मेघ) २२७ भूमननन्दाप्रमांसासु (का) (व्या) ३५२

प्रदक्षिणक्रियातातस्तस्या (रघु ९) २४७ भैरवाचार्यस्त दूरेव (हर्षच) ३५३

प्रधानस्वं विधेयत्र (का) १८५ भो लक्ष्मीश्वर दयर्तां जनकजा ३२२

प्रधानतरभावेना (का) १२३ मणिप्रदीपप्रभयोः (प्र० व०) ७

प्रभवति च समरमूर्धनि ४२८ मतेर्भूयादयो येडर्थः (का) ३४२

प्रयच्छतोच्चेः कुसुमानि (किरात) ५८ मत्तता दयितसङ्गमभूषा ३०८

मथ्नामि कौरवातं (वेणी) ५९

Page 565

मदिराद्रवपानवशा

मधुश्रु ते मन्मथ साह (कुमार ३)

मध्येयोम त्रिशङ्कोः

मसृणचरणपातं गम्यतां (व्या)

महदपि परडुःखं (विक्रमो)

महीमृतः पुत्रवतोऽपि (कुमार)

माधुर्यगजगण्डभित्ति

मा धार्तराष्ट्रमा

मा भवन्तमनलः पवनो वा

मिथ्यैतन्मम चिन्तितं

मीहितं यदभि (व्या)

मुख्यवृत्तिपरित्यागो (का)

मुख्यां वृत्ति परित्यज्य (का)

मुख्यामहाकविगिरा (का)

मुग्धः किं किमसभ्य

मूढोऽनास्मयः क्वचित्

यः कश्चिदर्थे शब्दानां

यः कल्याणबहिर्मूतः (व्या)

यः सत्स्वसमारोपः (का)

यः सर्वं कषति खलः

यः स्थलीकृतविन्ध्याद्रिः

यं समेत्य च ललाटलेखा (माघ)

यतः समासो वृत्तं च

यतः सर्वेऽपिकाव्येषु (का)

यतस्ते चादय इव

यतोऽध्यगच्छामाणो

यतो न तावतैवायं

यत् तद्रजितमत्युग्रं (वेङ्गी)

यत् स्वनत्रसममानक्ति (व्या)

यसवन्यत् तत् विमतिः (का)

यत् त्वेतच्च्छन्दविषयं

यत्र च मातृगामिन्यः

यत्रान्यूनातिरिकेन (का)

यत्रार्थः शब्दो वा (का)

यथार्थस्योपमानत्वं (का)

यत्रैककर्तृकाडनेका (का)

यत्रोक्तश्रोड़पकर्षो

यत् स्वरूपानुवादैकफलं (का)

यथाकायार्चितार्थिनाम् (रघु ९)

यथाकालप्रबोधिनाम् (रघु)

यथानन्तर्यनियमः (का)

यथायोगमयं दोष (का)

यथा विशोषकाळस्य (का)

यथाह ससमो वैकुण्ठावतार

यथा ह्रस्वति बालेय

यदधरदलमाश्रितं प्रियाया:

यदनन्तरमुदिष्ट (का)

यदर्थैकाश्रयो धर्मो (का)

यदलङ्कारन्यक्तैव ये (का)

यदा दशा ऋषाडृगयास्मि

यदा यदा हि धर्मस्य (गीता)

यदि काव्ये गुणीभूत (का)

यदुवाच न तन्मिथ्या (रघु)

यदेतचन्द्रान्तर्जलदलवलीलं

यदेतत् त्यागपाकादेः (का)

यचप्यर्थांवुभौ (का)

यचप्यर्थेऽपु सर्वेषु (का)

यदर्थ इति वाच्यो (का)

यद्वत् तद्वदलङ्कारे (व्या०, वक्रोक्ति)

यद्वदव्यभिचारस्य (का)

यद्वा किं बहुनोक्तेन (का)

यतश्चार्थप्रकाशनं (माष)

यामिन्द्रशब्दार्थनिर्बन्धनं (माध)

यशोऽधिगन्तुं सुखशालो (किरात)

यश्र यथा प्रकान्तो (का)

यश्चैकवाक्ये कर्तृत्वेन (का)

यस्तु प्रयुक्ते कुशालो

यस्मिन् यत्तद्वितो (का)

यस्य प्रकोपशिखिना

यस्य यद्रूपताव्यक्तिः (का)

यस्य येनाभिसंवन्धो (व्या)

या धर्मभाससस्तनयापि शीतला

या धर्मभाससस्तनयापि शीतलः

या निशा सर्वभूतानां

यान्त्या मुदंवलीत (मालती)

यार्थान्तराभिव्यक्तौ (का)

यावदर्थपदां वाचं (माघ)

Page 566

यावदिरेऽथः संबन्धः

युक्तोऽयमात्मसदृशान्

येन ध्वस्तमनोभवेन

(का)

४३२

येन यसाभिसंबन्धः

(का)

२३८

येन स्थलीकृतो विन्ध्यः

येनाकुंभनिमग्रवन्यकरिणां

ये नाम केचिदिह नः (मालती)

येनालङ्कृतमुद्यानं

येषां ताविदशोभदान

(ख्या)

२१३

ये सन्तोषसुखप्रसन्न

(ख्या)

२९७

यो यः शस्त्रे विभर्ति

(ख्या)

२९९

यो यस्कथाप्रसङ्गे

यो यदात्मा तदकुर्वीत

(का)

३८५

यो यद्भमोंपचारेण

(का)

३८३

यो यस्मिन् नियतो धर्मः

(का)

३८५

यो यो यं यमवाप

(ख्या)

२२०

यौडविकलपमिदमर्थं

रडिकिरणानुगमहार्ड

रक्तप्रसाधितभुवः

(वेणी)

४२२

रस्या इति प्राप्तवतीः (साध)

४५९, ४५७

रसर्यादृं विभावाव्या:

(का)

३९७

रसानुगुणराब्दार्थे

(का)

४५२

रहयिष्यति तं लब्ध्वा:

४४३

राज्ञो मानधनस्य

(वेणी)

२६३

रामगिर्याश्रमेषु

(ख्या०, मेघ)

२२४

रामस्य पाणिरसि

१४७, १७३

रामेऽङ्ग प्रियजीवितेन

१४७

रामे तटान्तवसन्तौ

"

रामोऽस्मि सर्वं सहै

१४७, २६०

राहुग्रस्तनयोःकारि सहसा

३६५

रुदता कृत एव सा

(रघु)

२९३

रुद्रे हिमाचलगुहासुखो

४५२

रुद्रा ये त्रिषुयेडन्यत्र

(का)

१२४

रूपकादिरलङ्कारवर्गों

(का)

३९७

रेरुरक्तविलिखाझो

२५१

लक्ष्यीकृतस्य हरिणस्य (रघु ९)

४५३

लच्छी दुहुिआ जामादुओ

४३०

लाञ्छाग्रहानलविसान्न

(वेणी)

६०

लावण्यकान्तिपरिपूरित

९२, ३१३

लावण्यसिन्धुरपरैव

१६२

एवं वादिनि लीलाकमल (कुमार)

६६

लोको वेदस्तथाध्यास्यं

(का)

५२

लोहितस्तत्कक इति

(का)

२३७

वचनभङ्ग कथनकर्तुः

(का)

९१०

वचच मह न्विअ एक्काए

१६१, ४५०

वरं कृतध्वस्तगुणादू

२९७

वर्णः कतिपयैरैव

३४९

वस्तुमात्रानुवादस्तु

(का)

४५५

वस्त्वायनते नदीना

३३३

वाग्झरसत्वाभिनयैः

(का)

७२

वार्थश्लिष्ट संप्रकृतौ (व्या० रघु)

४०९

वाचकत्वाश्रयेणैव

(का)

१२४

वाचस्पतिसहस्राणाम्

(न्या)

३५२

वाचो गुणीकृतार्थत्वं न संभवति (का)

७९

वाचो गुणीकृतार्थत्वं व्यवस्यय (न्या)

७९

वाच्यप्रवेययोर्नास्ति

(का)

९१२

वाच्यवैचिच्यरचनाचाह

२४४

वाच्यस्तदजुमितो वा

(का)

९९१

वाच्यात् प्रतीममानोडर्थः

(का)

३५४

वाच्यादर्थोऽन्तरं भिन्नं

(का)

९४३

वाणीरअ हृत्विदन्ती

५०, ५०२

वासो जाम्बवदपल्लवचनि

३४८

विधटिततिमिरौघदकिम्बन्ध

(हरवि० २८ । ९५)

४९५

विदधतः पथिक त्वपणं प्रति

८०३

विद्वान् द्वारसखः

(वेणी)

२३२

विधेयोद्देश्यभावोयं (का)

२७५, ४३२

विनोत्कर्षपौपकर्षाभ्याम्

(का)

२६४

विपदोऽभिनवत्न्यविक्रमं

२९९

तिवरीअसुरअ

९९, ५०४

विपरीतमतो यत्

(का)

४८२

विभावभावानुभाव

(का)

५०८

विशिष्टमस्य यद् रूपं

(का)

४५२

विशेषणवशाद्विच्छेद्

(का)

३८२

विशेषणं तु द्विविधं

(का)

९५८

Page 567

विशेषणानु गुणं चेद्

(का) ४८०

संवर्धितानां सु तनिर्विशेषम् (रघु) २४६

विशेषणानामन्येषाम्

(का) १५८

स एतत् सर्वशब्दानां

(का) ४५२

विशेषावगमस्याशु

विपभक्त्यनुमन्यते

(का) १३३

सङ्कदेव प्रयुक्तेन

(का) ३८३

त्रिपभक्त्यादपि पराम्

(का) १३३

सङ्कल्पकल्पितां कान्तां

३७५

विषयत्वमनापन्नैः (व्या)(का) ८५, ४३९

सड्ग्रहमानाटककृतूहलिनां

४९८

विस्मइडो चिचअ

४०५

सड्घटनावर्ण्योहित

(का) ५००

विहितस्य बहुत्वीहे:

(का) ३८२

स चार्थान्तावधि:

(का) २६८

वीराण रमड् गुसिणा

१६३, ४९३

सजलजलधरं नभो विरेजे

३०४

वृत्तावितरथा चोक्ते

(का) ३८५

सड्जेइड सुरहिमासो

५०६

व्यञ्जकत्वैकमूलम्

(का) १२४

सन्नारपूतानि दिगन्तराणि (रघु) ३५४

व्यापारोऽर्थे ध्वने:

(का) १२२

सततमतज्ञोऽडनज्ञो

३८८

व्रजतः क तात

२९०

सततमतभिभाषणां

२८८

व्रजन्ति ते मूढधियः (करात) ३७३

स तत्रास्तीत सोऽपयस्य (का) ११३

शब्दप्रयोग: कर्त्तव्य:

(का) ४८२

सत्तायां व्याप्तिरिश्वपा

(का) ४३

शब्दप्रयोग: प्रायेण

(का) ११२

स दुर्मति: श्रेयसी यस्म

१९६

शब्दस्यैका भिधा शक्ति:

(का) १११

सद्वृते महति स्वभावसरले

४४५

शब्दादपेतोऽपशब्द:

(का) ४८४

सनिष्यसन्ध्याद्वचनं

(का) ५०८

शब्दार्थीौ सहितौ वक्तृ (वक्रोक्ति०) १४२

समतया वसुवृद्धिविसर्जने: (रघु० ९) ३०६

शब्दालङ्कारनिपुणै:

(का) ३८१

समनतत: केसरिण वसन्तं

४१२

शब्दे गुणवृत्तातमस्वं

(का) ७९

समासे चासमासे (का) ३६५

शब्दे त्वसिद्धमेकस्वम्

(का) ४०४

समिद्धमादय: शब्दा:

(का) १२४

शक्या शास्त्रलमासनं

४३१

स मेदिनीव विनिर्जित्य (न्या०) २११

शरीरकस्यापि कृते

३७३

सम्बन्धधर्मात्रमर्थानां

(का) २६५

शाशाङ्कशोखर: शम्भु:

२३६

सरससन्मथरतामरसोदर

शात: श्यामालतायाः

३५०

(हरवि० ३१९५)

४१५

शाब्दत्वार्थत्वभेदेन

(का) १५८

सरसिजमुखुविच्छृङ्गं (शाकु०) ५०१

शिखरिणि क नु

४७४

सरस्यामे तस्याम्

५५

शिर: श्वा काको वा (वेणी) १४

सरस्वतीस्वादुतमं

९७

शिशिरकालमपास्य (माध०) ३५, ३५६

सरित्समुद्रान् सरसीश्र (रघु १४) ४३६

शीघुरसविषयपान

३७७

सरोजकर्णिकागौरीम्

४२६

शुचि मूषयति श्वेत वपु: (करित) ३१०

सर्वनामपरामर्शोयस्स

शैववेदव्यस्तविद्यानाम् (रघु) २५१

(वा) (का) ४३५

शोकानलधूमशिखा

४३७

सर्वनामपरामर्शोयस्स

श्रीधैर्यानाङ्गसुता

५११

(पु०) (का) (न्या) ३३५ ३८८

श्रुतिमात्रेण यत्रास्य

(का) ४७

सर्वनामपरामर्शोयोगो

(का) ४५८

श्रुत्वापि नाम बन्धिरो

३५

सर्वनामपरामर्शविषये

(का) ३८७

संरम्भ: करिकट

१८४

सर्वेषामेव सद्रवै (न्या) (का) १०८

Page 568

श्लोकार्थक्रमणी

पृ०

पृ०

सर्वैकशरणमच्नयमधीश (आनन्द)

४२५

सौधादुद्रिजते त्यजतयुपवनं

२७२

स वः श्लिकलामौलिः

२०९

स्कन्दस्य मातुः पयसां (रघु)

२५२

स वसुधमखिलान्

४९४

स्तनयुगमश्रुंस्नातं (कादम्बरी)

२६९

स शब्दैः कर्तृकर्मादि

(का)

३९९

स्तस्मैरसः परिणिनंसु (माघ)

३३०

सस्नु पयः पयः

३०९, ३०५

सिनग्धशश्यामलकान्ति

४७४

सस्नु पयांसि पपुः

३०९

स्नेहं समापिवति

२६९

सहसा यशोऽभिसतुंम्

स्पष्टशश्चूससकिरण (हरवि)

९१९ ४३२

सहसा विदधीत न क्रियाम्

(किरात)

३७९

स्फुटिकस्येव लाछादि (का)

९५८

साकांचावयवं भेदे

(का)

४६

स्फुरदधीरतडिण्णयना (माघ)

३५८

सा चेत् प्रकरणाद् यो

(का)

४८८

स्मररसेनदापूरणेढा

५०८

सा चेयमखिलस्यैव

(का)

४२०

स्मर संस्मृत्य न शान्ति (कुमार)

३९

सा दयितस्य समीपे

२५७

स्मरहुताशानमुरुमुर (माघ)

३५२

सानुस्थितिरंजनकराजसुतेच

४०९

स्मृतिभूः स्मृतिभूः

२०८

सान्तरश्वे तु तां शक्तिं

(का)

९५९

स्वस्तां नितम्बवदलम्ब (कुमार)

२३५

सामध्यंसिद्धस्यार्थेस्य

(का)

३८९

स्वकृतिस्वयमनित्रितः

९८४

सामध्योंदेव शब्दस्य

(का)

४८४

स्वज्ञानेनानन्यधीहेतु (का)

८०

सामान्यस्तु स्वभावो यः

(का)

४५५

स्वरूपमात्रस्योचकौ (का)

२३७

साहायकार्थमिव फूक्रत

३७३

स्वकपार्थोंविकोचेऽपि हि (व्या)

३३९

सा हि च्चुभ्रंगवतः

(का)

४५३

स्वरूपपेडवसस्थितियेषां (का)

४३२

सिहिपिच्छकृकणालरा

९०, ५०७

स्वा जातिः प्रथमं शब्दः (व्या)

२८

सुसिडःसरबन्धाध्या:

(का)

५०९

स्वाभाविकं ध्वनेनयुक्तं (का)

९५७

सुरभिसंगमजं वनमालया (रघु)

३६०

स्वाभाविकं विनीततवं

३६८

हंसविसरसमम्

४२९

सुवर्णपुष्पाम्

२०, ९७, ४७३, ५०५

हसति हसति स्वामि

३३३

सुवर्णपुष्पामित्यादौ

(का)

९२३

हा धिकष्टमहो

५९०

सूर्याचन्द्रमसौ यस्य (विक्रमो)

२४९

हिअअट्ठाविअमण्णं

४९५

सोऽयं वटः (व्या०, रघु ९२)

२९९

हेम्नां भारहारातिने (व्या)

२९३

सोऽयुक्तोऽन्यत एवासौ (का)

९७८

हे हसत दृच्चिण (उत्तर)

२३३

Page 569

पृष्ठ

पंक्ति

अशुद्ध

शुद्ध

9

10

जननीमपि

जाननं मथि

नी०

संचार

संचार से

१७

१०

ग्रन्थकार

ग्रन्थकार

१९

१२

शब्दों का

शब्दों के

२९

नो०

विज्ञानसाम

विज्ञानमसाम

२३

वैचित्र्यापरपर्याय

वैचित्र्यापरपर्यायं

२४

१३

तयाडययैव

तयाडययैव

२५

के शब्द ज्ञान से

के लिये शब्द ज्ञान से

२८

पहती

रहती

३०

रहने वाले उसके

रहनेवाला उसका

३०

अथ यह एक धर्म

अथच

३०

रुयक

रुयाध्यनकार

४३

२९

न नरवसा०

न तरवासा०

१२८

प्रथम प्रकाश

प्रथम उल्लास

१४६

काव्यहेतु

हेतु

१६९

उसका फल

उसका

२०८

१५

स्मृतिभूस्मृति०

स्मृतिभूः स्मृति०

२२७

२९

कल्पितर्ध्याय

कल्पितार्धोय

२७४

१३

प्रधानंतर

प्रधानंतरभाव

२७४

२५

स्वमनोषिकयै०

स्वमनीषिकयै०

३४२

नी०

१९

भुवननन्दा

भुवनानन्दा

४०९

नी०

मुद्रीचयको

मुद्रीचय को

४५१

नी०

१३

वश्रव

वश्रवः

४५५

वघटित

विघटित

४९६

नी०

१३

सरसिंश

सरसींश

४९९

१५

येनालडकृत

येनालडकृत

४६२

शुकनो

शुकनो

४७२

११

व्यक्तिविवेक तथा उसके

व्यक्तिविवेक के

संस्कृत व्याख्यान के

४९२

१३

निर्भरयम्

निर्भरयम्

  • 'नी०' का अर्थ है नीचे से ।

सूचना—अशुद्धियाँ इनके अतिरिक्त भी संभव है । सहृदय पाठक उन्हें स्वयं सुधर लेवें ।