1. Yoga-Chudamani Upanishad
Text (part 1)
1.0
योगचूडामणिं वक्ष्ये योगिनां हितकाम्यया। कैवल्यसिद्धिदं गूढं सेवितं योगवित्तमैः ॥
yogacūḍāmaṇiṃ vakṣye yogināṃ hitakāmyayā। kaivalyasiddhidaṃ gūḍhaṃ sevitaṃ yogavittamaiḥ ॥
योग चूड़ामणि उपनिषद् को योगियों के हित की कामना से वर्णन करता हूँ, जो योगवेत्ताओं के द्वारा सेवन किया जाने वाला परम गूढ़ तथा कैवल्य (मोक्ष) सिद्धि देने वाला है ।। I would tell Yoga Chudamani Upanishad with a view to do good to yogis. This is being appreciated by those elders who know Yoga well. This is secret and is capable of giving the post of salvation. 1
2.0
आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारश्च धारणा। ध्यानं समाधिरेतानि योगाङ्गानि भवन्ति षट् ॥ ||२||
āsanaṃ prāṇasaṃrodhaḥ pratyāhāraśca dhāraṇā। dhyānaṃ samādhiretāni yogāṅgāni bhavanti ṣaṭ ॥
आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—इस प्रकार योग को छ: अंगों वाला कहा गया है। दो प्रकार के आसनों का यहाँ वर्णन है, एक सिद्धासन दूसरा पद्मासन। अपने शरीर के भीतर जो साधक षट्चक्र, षोडश-आधार, त्रिलक्ष्य और पाँच आकाशों को नहीं देख पाता, उसे सिद्धि कहाँ मिल सकती है? शरीर में स्थित षट्चक्रों में आधारचक्र (मूलाधार चक्र) चार दल वाला है, स्वाधिष्ठान चक्र में छः दल हैं। दस दल वाला चक्र नाभि में स्थित है, द्वादशदल का पद्मचक्र हृदय में है, विशुद्धचक्र षोड्श दल वाला तथा दो दल का चक्र भ्रूमध्य में (आज्ञाचक्र के रूप) में स्थित है ।। not available
3.0
एकं सिद्धासनं प्रोक्तं द्वितीयं कमलासनम् । षट्चक्रं षोडशाधारं त्रिलक्ष्यं व्योमपञ्चकम् ॥ ||३||
ekaṃ siddhāsanaṃ proktaṃ dvitīyaṃ kamalāsanam । ṣaṭcakraṃ ṣoḍaśādhāraṃ trilakṣyaṃ vyomapañcakam ॥
आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—इस प्रकार योग को छ: अंगों वाला कहा गया है। दो प्रकार के आसनों का यहाँ वर्णन है, एक सिद्धासन दूसरा पद्मासन। अपने शरीर के भीतर जो साधक षट्चक्र, षोडश-आधार, त्रिलक्ष्य और पाँच आकाशों को नहीं देख पाता, उसे सिद्धि कहाँ मिल सकती है? शरीर में स्थित षट्चक्रों में आधारचक्र (मूलाधार चक्र) चार दल वाला है, स्वाधिष्ठान चक्र में छः दल हैं। दस दल वाला चक्र नाभि में स्थित है, द्वादशदल का पद्मचक्र हृदय में है, विशुद्धचक्र षोड्श दल वाला तथा दो दल का चक्र भ्रूमध्य में (आज्ञाचक्र के रूप) में स्थित है ।। not available
4.0
स्वदेहे यो न जानाति तस्य सिद्धिः कथं भवेत्। चतुर्दलं स्यादाधारं स्वाधिष्ठानं च षड्दलम् ।। ||४||
svadehe yo na jānāti tasya siddhiḥ kathaṃ bhavet। caturdalaṃ syādādhāraṃ svādhiṣṭhānaṃ ca ṣaḍdalam ।।
आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—इस प्रकार योग को छ: अंगों वाला कहा गया है। दो प्रकार के आसनों का यहाँ वर्णन है, एक सिद्धासन दूसरा पद्मासन। अपने शरीर के भीतर जो साधक षट्चक्र, षोडश-आधार, त्रिलक्ष्य और पाँच आकाशों को नहीं देख पाता, उसे सिद्धि कहाँ मिल सकती है? शरीर में स्थित षट्चक्रों में आधारचक्र (मूलाधार चक्र) चार दल वाला है, स्वाधिष्ठान चक्र में छः दल हैं। दस दल वाला चक्र नाभि में स्थित है, द्वादशदल का पद्मचक्र हृदय में है, विशुद्धचक्र षोड्श दल वाला तथा दो दल का चक्र भ्रूमध्य में (आज्ञाचक्र के रूप) में स्थित है ।। not available
5.0
नाभौ दशदलं पद्मं हृदये द्वादशारकम् । षोडशारं विशुद्धाख्यं भ्रूमध्ये द्विदलं तथा ।। ||५||
nābhau daśadalaṃ padmaṃ hṛdaye dvādaśārakam । ṣoḍaśāraṃ viśuddhākhyaṃ bhrūmadhye dvidalaṃ tathā ।।
आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि—इस प्रकार योग को छ: अंगों वाला कहा गया है। दो प्रकार के आसनों का यहाँ वर्णन है, एक सिद्धासन दूसरा पद्मासन। अपने शरीर के भीतर जो साधक षट्चक्र, षोडश-आधार, त्रिलक्ष्य और पाँच आकाशों को नहीं देख पाता, उसे सिद्धि कहाँ मिल सकती है? शरीर में स्थित षट्चक्रों में आधारचक्र (मूलाधार चक्र) चार दल वाला है, स्वाधिष्ठान चक्र में छः दल हैं। दस दल वाला चक्र नाभि में स्थित है, द्वादशदल का पद्मचक्र हृदय में है, विशुद्धचक्र षोड्श दल वाला तथा दो दल का चक्र भ्रूमध्य में (आज्ञाचक्र के रूप) में स्थित है ।। not available
6.0
सहस्त्रदलसंख्यातं ब्रह्मरन्ध्रे महापथि । आधारं प्रथमं चक्रं स्वाधिष्ठानं द्वितीयकम् ॥ ||६||
sahastradalasaṃkhyātaṃ brahmarandhre mahāpathi । ādhāraṃ prathamaṃ cakraṃ svādhiṣṭhānaṃ dvitīyakam ॥
सहस्त्र दल-कमल ब्रह्मरन्ध्र के महापथ में स्थित है। मूलाधार प्रथम चक्र है तथा स्वाधिष्ठान दूसरा चक्र है। दोनों के बीच में योनि स्थान (कुण्डलिनी) स्थित है। जगत् की उत्पत्ति का कारण होने से उसे कामरूप कहा जाता है। गुदास्थान में चार दल वाला कमल स्थित है, जिसे ‘काम' कहा गया है। उसी के बीच सिद्ध पुरुषों के द्वारा वन्दित पश्चिमाभिमुख महालिंग स्थित है ॥ not available
7.0
योनिस्थान द्वयोर्मध्ये कामरूपं निगद्यते । कामाख्यं तु गुदस्थाने पङ्कजं तु चतुर्दलम् ॥ ||७||
yonisthāna dvayormadhye kāmarūpaṃ nigadyate । kāmākhyaṃ tu gudasthāne paṅkajaṃ tu caturdalam ॥
सहस्त्र दल-कमल ब्रह्मरन्ध्र के महापथ में स्थित है। मूलाधार प्रथम चक्र है तथा स्वाधिष्ठान दूसरा चक्र है। दोनों के बीच में योनि स्थान (कुण्डलिनी) स्थित है। जगत् की उत्पत्ति का कारण होने से उसे कामरूप कहा जाता है। गुदास्थान में चार दल वाला कमल स्थित है, जिसे ‘काम' कहा गया है। उसी के बीच सिद्ध पुरुषों के द्वारा वन्दित पश्चिमाभिमुख महालिंग स्थित है ॥ not available
8.0
तन्मध्ये प्रोच्यते योनिः कामाख्या सिद्धवन्दिता । तस्य मध्ये महालिङ्गं पश्चिमाभिमुखं स्थितम् ॥ ||८||
yonisthāna dvayormadhye kāmarūpaṃ nigadyate । kāmākhyaṃ tu gudasthāne paṅkajaṃ tu caturdalam ॥
सहस्त्र दल-कमल ब्रह्मरन्ध्र के महापथ में स्थित है। मूलाधार प्रथम चक्र है तथा स्वाधिष्ठान दूसरा चक्र है। दोनों के बीच में योनि स्थान (कुण्डलिनी) स्थित है। जगत् की उत्पत्ति का कारण होने से उसे कामरूप कहा जाता है। गुदास्थान में चार दल वाला कमल स्थित है, जिसे ‘काम' कहा गया है। उसी के बीच सिद्ध पुरुषों के द्वारा वन्दित पश्चिमाभिमुख महालिंग स्थित है ॥ not available
9.0
नाभौ तु मणिवद्बिम्बं यो जानाति स योगवित् । तप्तचामीकराभासं तडिल्लेखेव विस्फुरत् ॥ ||९||
nābhau tu maṇivadbimbaṃ yo jānāti sa yogavit । taptacāmīkarābhāsaṃ taḍillekheva visphurat ॥
नाभि स्थान में मणि की आकृति वाले मणिपूर चक्र को जानने वाला ही योगी है । तपाये हुए सोने के समान आभा वाला, विद्युत् की तरह प्रकाशमान त्रिकोण युक्त अग्नि मेढ्र में प्रतिष्ठित है। समाधि अवस्था में उस स्थान पर अनन्त विश्वतोमुख (सब ओर प्रकाशित) परमज्योति के दर्शन होते हैं।। not available
10.0
त्रिकोणं तत्पुरं वह्नेरधोमेढ्रात्प्रतिष्ठितम्। समाधौ परमं ज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् ॥ ||१०||
trikoṇaṃ tatpuraṃ vahneradhomeḍhrātpratiṣṭhitam। samādhau paramaṃ jyotiranantaṃ viśvatomukham ॥
नाभि स्थान में मणि की आकृति वाले मणिपूर चक्र को जानने वाला ही योगी है । तपाये हुए सोने के समान आभा वाला, विद्युत् की तरह प्रकाशमान त्रिकोण युक्त अग्नि मेढ्र में प्रतिष्ठित है। समाधि अवस्था में उस स्थान पर अनन्त विश्वतोमुख (सब ओर प्रकाशित) परमज्योति के दर्शन होते हैं।। not available
11.0
तस्मिन्दृष्टे महायोगे यातायातो न विद्यते । स्वशब्देन भवेत्प्राणः स्वाधिष्ठानं तदाश्रयः ।। ||११||
tasmindṛṣṭe mahāyoge yātāyāto na vidyate । svaśabdena bhavetprāṇaḥ svādhiṣṭhānaṃ tadāśrayaḥ ।।
योगाभ्यास के समय उस अग्निमयी ज्याला के दर्शन कर लेने पर संसार के आवागमन से मुक्ति मिल जाती है। प्राण का निवास स्वाधिष्ठान चक्र में कहा गया है। प्राण को ही ‘स्व' कहते हैं। स्वाधिष्ठान में स्थित होने के कारण उसे ‘मेढ्र' भी कहते हैं। जिस प्रकार मणि में तागा पिरोया होता है, उसी प्रकार कन्द (नाड़ी समूह ) सुषुम्ना से युक्त है ॥ not available
12.0
स्वाधिष्ठाना श्रयादस्मान्मेढ्रमेवाभिधीयते । तन्तुना मणिवत्प्रोतो योऽत्र कन्दः सुषुम्नया ॥ ||१२||
svādhiṣṭhānā śrayādasmānmeḍhramevābhidhīyate । tantunā maṇivatproto yo'tra kandaḥ suṣumnayā ॥
योगाभ्यास के समय उस अग्निमयी ज्याला के दर्शन कर लेने पर संसार के आवागमन से मुक्ति मिल जाती है। प्राण का निवास स्वाधिष्ठान चक्र में कहा गया है। प्राण को ही ‘स्व' कहते हैं। स्वाधिष्ठान में स्थित होने के कारण उसे ‘मेढ्र' भी कहते हैं। जिस प्रकार मणि में तागा पिरोया होता है, उसी प्रकार कन्द (नाड़ी समूह ) सुषुम्ना से युक्त है ॥ not available
13.0
तन्नाभिमण्डले चक्रं प्रोच्यते मणिपूरकम् । द्वादशारे महाचक्रे पुण्यपापविवर्जिते ॥ ||१३||
tannābhimaṇḍale cakraṃ procyate maṇipūrakam । dvādaśāre mahācakre puṇyapāpavivarjite ॥
नाभि मण्डल में स्थित द्वादशदल युक्त मणिपूर चक्र पाप-पुण्य रहित है, जब तक इसका तत्वज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव को संसार चक्र में ही भ्रमण करना पड़ता है । पक्षी के अण्डे के आकार वाली योनि अर्थात् कुण्डलिनी, मेढ्र और नाभि के मध्य स्थित है। बहत्तर हजार नाड़ियों का जाल परे शरीर में वहीं से फैला है, उनमें से बहत्तर नाड़ियाँ मुख्य हैं। इनमें भी प्रमुख नाड़ियाँ दस कही गई हैं। १. इड़ा, २. पिंगला, ३. सुषुम्ना, ४, गांधारी, ५. हस्तिजिह्वा, ६. पूषा, ७, यशस्विनी, ८. अलम्बुसा, ९. कुहू और १०. शंखिनी ॥ not available
14.0
तावज्जीवो भ्रमत्येवं यावत्तत्त्वं न विन्दति। ऊर्ध्वं मेढ्रादधो नाभेः कन्दे योनिः खगाण्डवत्॥ ||१४||
tāvajjīvo bhramatyevaṃ yāvattattvaṃ na vindati। ūrdhvaṃ meḍhrādadho nābheḥ kande yoniḥ khagāṇḍavat॥
नाभि मण्डल में स्थित द्वादशदल युक्त मणिपूर चक्र पाप-पुण्य रहित है, जब तक इसका तत्वज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव को संसार चक्र में ही भ्रमण करना पड़ता है । पक्षी के अण्डे के आकार वाली योनि अर्थात् कुण्डलिनी, मेढ्र और नाभि के मध्य स्थित है। बहत्तर हजार नाड़ियों का जाल परे शरीर में वहीं से फैला है, उनमें से बहत्तर नाड़ियाँ मुख्य हैं। इनमें भी प्रमुख नाड़ियाँ दस कही गई हैं। १. इड़ा, २. पिंगला, ३. सुषुम्ना, ४, गांधारी, ५. हस्तिजिह्वा, ६. पूषा, ७, यशस्विनी, ८. अलम्बुसा, ९. कुहू और १०. शंखिनी ॥ not available
15.0
तत्र नाडयः समुत्पन्नाः सहस्त्राणां द्विसप्ततिः । तेषु नाडीसहस्त्रेषु द्विसप्ततिरुदाहृता ॥ ||१५||
tatra nāḍayaḥ samutpannāḥ sahastrāṇāṃ dvisaptatiḥ । teṣu nāḍīsahastreṣu dvisaptatirudāhṛtā ॥
नाभि मण्डल में स्थित द्वादशदल युक्त मणिपूर चक्र पाप-पुण्य रहित है, जब तक इसका तत्वज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव को संसार चक्र में ही भ्रमण करना पड़ता है । पक्षी के अण्डे के आकार वाली योनि अर्थात् कुण्डलिनी, मेढ्र और नाभि के मध्य स्थित है। बहत्तर हजार नाड़ियों का जाल परे शरीर में वहीं से फैला है, उनमें से बहत्तर नाड़ियाँ मुख्य हैं। इनमें भी प्रमुख नाड़ियाँ दस कही गई हैं। १. इड़ा, २. पिंगला, ३. सुषुम्ना, ४, गांधारी, ५. हस्तिजिह्वा, ६. पूषा, ७, यशस्विनी, ८. अलम्बुसा, ९. कुहू और १०. शंखिनी ॥ not available
16.0
प्रधानाः प्राणवाहिन्यो भूयस्तासु दश स्मृताः । इडा च पिङ्गला चैव सुषम्ना च तृतीयगा॥ ||१६||
pradhānāḥ prāṇavāhinyo bhūyastāsu daśa smṛtāḥ । iḍā ca piṅgalā caiva suṣamnā ca tṛtīyagā॥
नाभि मण्डल में स्थित द्वादशदल युक्त मणिपूर चक्र पाप-पुण्य रहित है, जब तक इसका तत्वज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव को संसार चक्र में ही भ्रमण करना पड़ता है । पक्षी के अण्डे के आकार वाली योनि अर्थात् कुण्डलिनी, मेढ्र और नाभि के मध्य स्थित है। बहत्तर हजार नाड़ियों का जाल परे शरीर में वहीं से फैला है, उनमें से बहत्तर नाड़ियाँ मुख्य हैं। इनमें भी प्रमुख नाड़ियाँ दस कही गई हैं। १. इड़ा, २. पिंगला, ३. सुषुम्ना, ४, गांधारी, ५. हस्तिजिह्वा, ६. पूषा, ७, यशस्विनी, ८. अलम्बुसा, ९. कुहू और १०. शंखिनी ॥ not available
17.0
गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषा चैव यशस्विनी। अलम्बुसा कुहूशचैव शङ्खिनी दशमी स्मृता ॥ ||१७||
gāndhārī hastijihvā ca pūṣā caiva yaśasvinī। alambusā kuhūśacaiva śaṅkhinī daśamī smṛtā ॥
नाभि मण्डल में स्थित द्वादशदल युक्त मणिपूर चक्र पाप-पुण्य रहित है, जब तक इसका तत्वज्ञान प्राप्त नहीं हो जाता, तब तक जीव को संसार चक्र में ही भ्रमण करना पड़ता है । पक्षी के अण्डे के आकार वाली योनि अर्थात् कुण्डलिनी, मेढ्र और नाभि के मध्य स्थित है। बहत्तर हजार नाड़ियों का जाल परे शरीर में वहीं से फैला है, उनमें से बहत्तर नाड़ियाँ मुख्य हैं। इनमें भी प्रमुख नाड़ियाँ दस कही गई हैं। १. इड़ा, २. पिंगला, ३. सुषुम्ना, ४, गांधारी, ५. हस्तिजिह्वा, ६. पूषा, ७, यशस्विनी, ८. अलम्बुसा, ९. कुहू और १०. शंखिनी ॥ not available
18.0
एतन्नाडीमहाचक्रं ज्ञातव्यं योगिभिः सदा । इडा वामे स्थिता भागे दक्षिणे पिङ्गला स्थिता ॥ ||१८||
etannāḍīmahācakraṃ jñātavyaṃ yogibhiḥ sadā । iḍā vāme sthitā bhāge dakṣiṇe piṅgalā sthitā ॥
नाड़ियों के इस महाचक्र का ज्ञान योगियों को होना चाहिए। शरीर में इड़ा नाड़ी (नासिका के) बायीं ओर और पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर स्थित रहती है। इड़ा-पिंगला के बीच में सुषुम्ना नाड़ी है। दायें नेत्र में हस्तिजिह्वा और पायें नेत्र में गांधारी का निवास है। पूषा तथा यशस्विनी क्रमशः दायें-बायें कान में स्थित हैं। मुँह में अलम्बुसा का निवास है। जननेन्द्रिय में कुहू एवं मूलस्थान में शंखिनी नाड़ी का निवास है ॥ not available
19.0
सुषुम्ना मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुषि। दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे॥ ||१९||
suṣumnā madhyadeśe tu gāndhārī vāmacakṣuṣi। dakṣiṇe hastijihvā ca pūṣā karṇe ca dakṣiṇe॥
नाड़ियों के इस महाचक्र का ज्ञान योगियों को होना चाहिए। शरीर में इड़ा नाड़ी (नासिका के) बायीं ओर और पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर स्थित रहती है। इड़ा-पिंगला के बीच में सुषुम्ना नाड़ी है। दायें नेत्र में हस्तिजिह्वा और पायें नेत्र में गांधारी का निवास है। पूषा तथा यशस्विनी क्रमशः दायें-बायें कान में स्थित हैं। मुँह में अलम्बुसा का निवास है। जननेन्द्रिय में कुहू एवं मूलस्थान में शंखिनी नाड़ी का निवास है ॥ not available
20.0
यशस्विनी वामकर्णे चानने चाप्यलम्बुसा। कुहूश्च लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने तु शङ्खिनी ॥ ||२०||
yaśasvinī vāmakarṇe cānane cāpyalambusā। kuhūśca liṅgadeśe tu mūlasthāne tu śaṅkhinī ॥
नाड़ियों के इस महाचक्र का ज्ञान योगियों को होना चाहिए। शरीर में इड़ा नाड़ी (नासिका के) बायीं ओर और पिंगला नाड़ी दाहिनी ओर स्थित रहती है। इड़ा-पिंगला के बीच में सुषुम्ना नाड़ी है। दायें नेत्र में हस्तिजिह्वा और पायें नेत्र में गांधारी का निवास है। पूषा तथा यशस्विनी क्रमशः दायें-बायें कान में स्थित हैं। मुँह में अलम्बुसा का निवास है। जननेन्द्रिय में कुहू एवं मूलस्थान में शंखिनी नाड़ी का निवास है ॥ not available
21.0
एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ते नाडयः क्रमात् । इडापिङ्गलासौषुम्नाः प्राणमार्गे च संस्थिताः ॥ ||२१||
evaṃ dvāraṃ samāśritya tiṣṭhante nāḍayaḥ kramāt । iḍāpiṅgalāsauṣumnāḥ prāṇamārge ca saṃsthitāḥ ॥
सम्पूर्ण शरीर के भीतर एक-एक द्वार पर एक-एक नाड़ी स्थित है और प्राणमार्ग में इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ स्थित हैं ॥ not available
22.0
सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः । प्राणापानसमानाख्या व्यानोदानौ च वायवः ॥ ||२२||
satataṃ prāṇavāhinyaḥ somasūryāgnidevatāḥ । prāṇāpānasamānākhyā vyānodānau ca vāyavaḥ ॥
सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि देवता प्राणों के वाहक हैं। प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान—ये पाँच प्राणवायु कहे गये हैं। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनञ्जय—ये पाँच उपप्राणवायु कहे गये हैं। शरीर के अन्दर हृदय में (मुख्य) प्राणवायु, गुदा स्थान में अपान, नाभि स्थान में समान, गले में उदान एवं पूरे शरीर में व्यानवायु स्थित रहता है। ये प्रधान प्राणवायु शरीर के पाँच स्थानों में स्थित हैं ॥ not available
23.0
नागः कूर्मोऽथ कृकरो देवदत्तो धनंजयः । हृदि प्राणः स्थितो नित्यमपानो गुदमण्डले ॥ ||२३||
nāgaḥ kūrmo'tha kṛkaro devadatto dhanaṃjayaḥ । hṛdi prāṇaḥ sthito nityamapāno gudamaṇḍale ॥
सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि देवता प्राणों के वाहक हैं। प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान—ये पाँच प्राणवायु कहे गये हैं। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनञ्जय—ये पाँच उपप्राणवायु कहे गये हैं। शरीर के अन्दर हृदय में (मुख्य) प्राणवायु, गुदा स्थान में अपान, नाभि स्थान में समान, गले में उदान एवं पूरे शरीर में व्यानवायु स्थित रहता है। ये प्रधान प्राणवायु शरीर के पाँच स्थानों में स्थित हैं ॥ not available
24.0
समानो नाभिदेशे तु उदानः कण्ठमध्यगः । व्यानः सर्वशरीरे तु प्रधानाः पञ्च वायवः ॥ ||२४||
samāno nābhideśe tu udānaḥ kaṇṭhamadhyagaḥ । vyānaḥ sarvaśarīre tu pradhānāḥ pañca vāyavaḥ ॥
सूर्य, चन्द्र एवं अग्नि देवता प्राणों के वाहक हैं। प्राण, अपान, उदान, समान, व्यान—ये पाँच प्राणवायु कहे गये हैं। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त एवं धनञ्जय—ये पाँच उपप्राणवायु कहे गये हैं। शरीर के अन्दर हृदय में (मुख्य) प्राणवायु, गुदा स्थान में अपान, नाभि स्थान में समान, गले में उदान एवं पूरे शरीर में व्यानवायु स्थित रहता है। ये प्रधान प्राणवायु शरीर के पाँच स्थानों में स्थित हैं ॥ not available
25.0
उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने तथा। कुकरः क्षुत्करो ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे ॥ ||२५||
udgāre nāga ākhyātaḥ kūrma unmīlane tathā। kukaraḥ kṣutkaro jñeyo devadatto vijṛmbhaṇe ॥
ऊर्ध्ववायु (डकार) में नाग नामक उपप्राण, आँखों की पलक झपकने में कूर्मवायु, कृकल छींकने में एवं देवदत्त की स्थिति जँभाई लेने में होती है ॥ not available
26.0
न जहाति मृतं वापि सर्वव्यापी धनंजयः। एते नाडीषु सर्वासु भ्रमन्ते जीवजन्तवः ॥ ||२६||
na jahāti mṛtaṃ vāpi sarvavyāpī dhanaṃjayaḥ। ete nāḍīṣu sarvāsu bhramante jīvajantavaḥ ॥
सम्पूर्ण शरीर में धनञ्जय वायु इस प्रकार से व्याप्त है कि मृत्यु के बाद भी शरीर को नहीं छोड़ता है। इन्हीं नाड़ियों में जीव (प्राण) भ्रमण करते रहते हैं ॥ not available
27.0
आक्षिप्तो भुजदण्डेन यथा चलति कन्दुकः । प्राणापानसमाक्षिप्तस्तथा जीवो न तिष्ठति ॥ ||२७||
ākṣipto bhujadaṇḍena yathā calati kandukaḥ । prāṇāpānasamākṣiptastathā jīvo na tiṣṭhati ॥
खिलाड़ियों के द्वारा इधर से उधर फेंकी हुई गेंद की तरह जीव भी प्राण, अपान आदि वायुओं से स्थिर नहीं रह पाता अर्थात् सदैव गतिशील रहता है ॥ not available
28.0
प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च गच्छति। वामदक्षिणमार्गाभ्यां चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥ ||२८||
prāṇāpānavaśo jīvo hyadhaścordhvaṃ ca gacchati। vāmadakṣiṇamārgābhyāṃ cañcalatvānna dṛśyate ॥
यह जीव प्राणादि वायुओं के वशीभूत होकर नीचे-ऊपर गमन करता हुआ बायें एवं दायें मार्ग में भी आता-जाता है। गमनचक्र तीव्रता से चलने के कारण वह दिखाई नहीं पड़ता ॥ not available
29.0
रज्जुबद्धो यथा श्येनो गतोऽप्याकृष्यते पुनः। गुणबद्धस्तथा जीवः प्राणापानेन कर्षति ॥ ||२९||
rajjubaddho yathā śyeno gato'pyākṛṣyate punaḥ। guṇabaddhastathā jīvaḥ prāṇāpānena karṣati ॥
रस्सी से बँधा हुआ श्येन पक्षी ऊपर उड़ता हुआ भी जिस प्रकार खींच लिया जाता है, ठीक उसी प्रकार गुणों से आबद्ध यह जीव भी प्राण और अपान वायुओं के द्वारा खींचा जाता है ॥ not available
30.0
प्राणापानवशो जीवो ह्यधश्चोर्ध्वं च गच्छति। अपानः कर्षति प्राणं प्राणोऽपानं च कर्षति । ऊर्वाध:संस्थितावेतौ यो जानाति स योगवित्॥ ||३०||
prāṇāpānavaśo jīvo hyadhaścordhvaṃ ca gacchati। apānaḥ karṣati prāṇaṃ prāṇo'pānaṃ ca karṣati । ūrvādha:saṃsthitāvetau yo jānāti sa yogavit॥
प्राण अपान को खींचता है एवं अपान प्राण को खींचता है, इसलिए यह जीव प्राण और अपान की इस क्रिया के द्वारा निरंतर ऊपर-नीचे आता जाता रहता है। प्राण एवं जीव की इस अध: एवं ऊर्ध्वगमन प्रक्रिया को जानने वाला ही योगवेत्ता है॥ The Jeevatma (the soul of the physical individual) is under the control of prana which goes up and down as well as apana. Apana pulls Prana. Prana pulls Apana. He who knows and realizes this mutual pull which is pulling to the top and bottom, understands yoga. 30
31.0
हकारेण बहिर्याति सकारेण विशेत्पुनः । हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥ ||३१||
hakāreṇa bahiryāti sakāreṇa viśetpunaḥ । haṃsahaṃsetyamuṃ mantraṃ jīvo japati sarvadā ॥
श्वास ‘स' कार ध्वनि (वायु) के माध्यम से भीतर और ‘ह' कार के साथ बाहर आती है। इस तरह यह जीव हंस-हंस (हंसमंत्र) का जप सदैव करता रहता है ॥ It goes outside with the sound "ha" and goes again inside with the sound "sa". The beings keeping on chanting this mantra as "Hamsa", "Hamsa". 31
32.0
षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्त्राण्येकविंशतिः । एतत्संख्यान्वितं मंत्रं जीवो जपति सर्वदा॥ ||३२||
ṣaṭśatāni divārātrau sahastrāṇyekaviṃśatiḥ । etatsaṃkhyānvitaṃ maṃtraṃ jīvo japati sarvadā॥
दिन-रात निरन्तर जप करते रहने से यह जीव इक्कीस हजार छ: सौ मंत्र नित्य जपता है ॥ The beings always keep on chanting this mantra day and night twenty one thousand and one hundred times. 32
33.0
अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदा सदा। अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ||३३||
ajapā nāma gāyatrī yogināṃ mokṣadā sadā। asyāḥ saṃkalpamātreṇa sarvapāpaiḥ pramucyate ॥
योगियों के लिए मुक्ति प्रदात्री सही अजपा गायत्री है। इसके संकल्प मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसके समान न कोई विद्या, न कोई जप, न कोई ज्ञान पहले हुआ है और न भविष्य में होगा ।। This mantra which is called "Ajapa Gayatri" would give salvation to all yogis. Just a thought of this mantra, would help one get rid of all sins. 33
34.0
अनया सदृशी विद्या अनया सदृशो जपः। अनया सदृशं ज्ञानं न भूतं न भविष्यति ॥ ||३४||
anayā sadṛśī vidyā anayā sadṛśo japaḥ। anayā sadṛśaṃ jñānaṃ na bhūtaṃ na bhaviṣyati ॥
योगियों के लिए मुक्ति प्रदात्री सही अजपा गायत्री है। इसके संकल्प मात्र से सभी पापों से मुक्ति मिल जाती है। इसके समान न कोई विद्या, न कोई जप, न कोई ज्ञान पहले हुआ है और न भविष्य में होगा ।। There are no practices as holy as this, no chanting which is equivalent to this, and no wisdom equivalent to this and in future also this is not likely to be there. 34
35.0
कुण्डलिन्या समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी। प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स वेदवित्।। ||३५||
kuṇḍalinyā samudbhūtā gāyatrī prāṇadhāriṇī। prāṇavidyā mahāvidyā yastāṃ vetti sa vedavit।।
यह गायत्री प्राण को धारण करने वाली प्राणविद्या है-महाविद्या है, जो कुण्डलिनी से उद्भूत है। इस प्रकार जो जान लेता है, वहीं वेदवेत्ता है ॥ This Ajapa Gayatri which rises from the Kundalani supports the soul. This is the greatest among the sciences of the soul. He who knows this will know the Vedas. 35
36.0
कन्दोर्ध्वे कुण्डलीशक्तिरष्टधा कुण्डलाकृतिः । ब्रह्मद्वारमुखं नित्यं मुखेनाच्छाद्य तिष्ठति ॥ ||३६||
kandordhve kuṇḍalīśaktiraṣṭadhā kuṇḍalākṛtiḥ । brahmadvāramukhaṃ nityaṃ mukhenācchādya tiṣṭhati ॥
कुण्डलिनी शक्ति कन्द के ऊर्ध्वभाग में आठ कुण्डलों की आकृति में व्याप्त होकर ब्रह्म द्वार के मुँह को अपने मुख से ढककर सदैव स्थित रहती है ॥ The Kundalani power which is above the mooladhara, in its eight studded form would always be covering the mouth of Sushumna which is the gate of Brahman. 36
37.0
येन द्वारेण गन्तव्यं ब्रह्मद्वारं मनोमयम् । मुखेनाच्छाद्य तद्द्वारं प्रसुप्ता परमेश्वरी ॥ ||३७||
yena dvāreṇa gantavyaṃ brahmadvāraṃ manomayam । mukhenācchādya taddvāraṃ prasuptā parameśvarī ॥
जिस मनोमय ब्रह्म द्वार (सुषुम्ना) में प्रवेश किया जाता है, उसी द्वार (मुख) को अपने मुख से ढककर यह परमेश्वरी शक्ति (कुण्डलिनी) सोई रहती है ॥ The Kudalani Parameshwari (goddess of the universe) who should go through the disease less gate of Brahma, closes this gate with her mouth and sleeps. 37
38.0
प्रबुद्धा वह्नियोगेन मनसा मरुता सह । सूचीवद्नात्रमादाय व्रजत्यूर्ध्वं सुषुम्नया ॥ ||३८||
prabuddhā vahniyogena manasā marutā saha । sūcīvadnātramādāya vrajatyūrdhvaṃ suṣumnayā ॥
वह्नियोग (अग्नियोग) के द्वारा जाग्रत् होकर यह प्रकाश के रूप में मन और प्राणवायु के साथ सुषुम्ना नाड़ी के भीतर होकर सुई की तरह ऊपर की ओर चलती है ॥ Because of the heat generated by the practice of yoga, because of the speed of wind, and because of her mental power, she stands up and using her needle shaped body, she would go up through the Sushumna Nadi. 38
39.0
उद्घाटयेत्कवाटं तु यथा कुञ्चिकया गृहम् । कुण्डलिन्यां तथा योगी मोक्षद्वारं प्रभेदयेत्॥ ||३९||
udghāṭayetkavāṭaṃ tu yathā kuñcikayā gṛham । kuṇḍalinyāṃ tathā yogī mokṣadvāraṃ prabhedayet॥
कुंजी के द्वारा जिस तरह से घर का किवाड़ ( ताला )खोलते हैं, उसी प्रकार कुण्डलिनी के द्वारा योगी लोग मुक्ति का द्वार खोल लेते हैं ॥ Similar to opening the doors of the house by using the key, the yogi should open the gate to salvation using Kundalini. 39
40.0
कृत्वा संपुटितौ करौ दृढतरं बध्वा तु पद्मासनं गाढं वक्षसि संनिधाय चुबुकं ध्यानं च तच्चेष्टितम्। वारंवारमपानमूर्ध्वमनिलं प्रोच्चारयेत्पूरितं मुञ्चन्प्राणमुपैति बोधमतुलं शक्तिप्रभावान्नरः ॥ ||४०||
kṛtvā saṃpuṭitau karau dṛḍhataraṃ badhvā tu padmāsanaṃ gāḍhaṃ vakṣasi saṃnidhāya cubukaṃ dhyānaṃ ca tacceṣṭitam। vāraṃvāramapānamūrdhvamanilaṃ proccārayetpūritaṃ muñcanprāṇamupaiti bodhamatulaṃ śaktiprabhāvānnaraḥ ॥
दृढ़तापूर्वक पद्मासन लगाकर हाथों को ऊपर-नीचे गोदी में रखकर सम्पुटित करे, पुनः सिर नीचा करके ठोड़ी को छाती से लगाये, इसके बाद ब्रह्म में ध्यान को एकाग्र करके, बार-बार श्वास को भीतर खींचे और बाहर निकाले । प्राणवायु अन्दर ले जाए और अपान वायु ऊपर ले जाए। इस तरह प्राणायाम करने से मनुष्य को अतुल शक्ति की अनुभूति होती है ॥ not available
41.0
अङ्गानां मर्दनं कृत्वा श्रमसंजातवारिणा । कट्वम्ललवणत्यागी क्षीरभोजनमाचरेत् ॥ ||४१||
aṅgānāṃ mardanaṃ kṛtvā śramasaṃjātavāriṇā । kaṭvamlalavaṇatyāgī kṣīrabhojanamācaret ॥
इस प्रकार प्राणायाम के अभ्यास के श्रम से जो पसीना निकलता है, उसे शरीर में ही मसल लेना चाहिए तथा नमकीन, खट्टे, कड़ुवे पदार्थों का परित्याग करना चाहिए और दूध एवं दूध से बने भोजन का विशेष रूप से प्रयोग करना चाहिए ॥ not available
42.0
ब्रह्मचारी मिताहारी योगी योगपरायणः । अब्दादूर्ध्वं भवेत्सिद्धो नात्र कार्या विचारणा ।। ||४२||
brahmacārī mitāhārī yogī yogaparāyaṇaḥ । abdādūrdhvaṃ bhavetsiddho nātra kāryā vicāraṇā ।।
ब्रह्मचारी और मिताहार वाला योगी यदि योग के अभ्यास में लग जाए, तो एक वर्ष में ही योग की सिद्धि प्राप्त कर लेगा, इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए ॥ not available
43.0
सुस्निग्धमधुराहारश्चतुर्थांशविवर्जितः । भुञ्जते शिवसंप्रीत्या मिताहारी स उच्यते ॥ ||४३||
susnigdhamadhurāhāraścaturthāṃśavivarjitaḥ । bhuñjate śivasaṃprītyā mitāhārī sa ucyate ॥
योग के साधक को मधुर और स्न्निग्ध भोजन ही लेना चाहिए,(आधा पेट भोजन, चौथाई पानी तथा) चौथाई भाग खाली रखे। इस प्रकार भगवान् को समर्पित करके जो भोजन करता है, उसे मिताहारी कहते हैं ।। not available
44.0
कन्दोर्वे कुण्डलीशक्तिरष्टधा कुण्डलाकृतिः। बन्धनाय च मूढानां योगिनां मोक्षदा सदा ॥ ||४४||
kandorve kuṇḍalīśaktiraṣṭadhā kuṇḍalākṛtiḥ। bandhanāya ca mūḍhānāṃ yogināṃ mokṣadā sadā ॥
आठ कुण्डलों वाली कन्द के ऊर्ध्वभाग में जो कुण्डलिनी शक्ति है, वह योगियों के लिए मोक्ष देने वाली तथा अज्ञानियों के लिए बन्धनकारक कही गई है ॥ not available
45.0
महामुद्रा नभोमुद्रा ओड्याणंच जलन्धरम्। मूलबन्धं च यो वेत्ति स योगी मुक्तिभाजनम्॥ ||४५||
mahāmudrā nabhomudrā oḍyāṇaṃca jalandharam। mūlabandhaṃ ca yo vetti sa yogī muktibhājanam॥
महामुद्रा, नभोमुद्रा, उड्डियान बन्ध, जालन्धर बन्ध और मूलबन्ध को जो जानता है, वह योगी मुक्ति को प्राप्त करता है ॥ not available
46.0
पार्ष्णिघातेन संपीड्य योनिमाकुञ्चयेदृढम् । अपानमूर्ध्वमाकृष्य मूलबन्धो विधीयते ॥ ||४६||
pārṣṇighātena saṃpīḍya yonimākuñcayedṛḍham । apānamūrdhvamākṛṣya mūlabandho vidhīyate ॥
एड़ी से दबाव डालकर योनि (सीवन) स्थान को पीड़ित करते हुए दृढ़तापूर्वक संकुचित करे, अपान वायु को ऊपर की ओर खींचने की इस प्रक्रिया को मूलबन्ध कहा जाता है ।। not available
47.0
अपानप्राणयोरैक्यं क्षयान्मूत्रपुरीषयोः । युवा भवति वृद्धोऽपि सततं मूलबन्धनात् ॥ ||४७||
apānaprāṇayoraikyaṃ kṣayānmūtrapurīṣayoḥ । yuvā bhavati vṛddho'pi satataṃ mūlabandhanāt ॥
इस प्रकार प्राण और अपान को एक में मिलाया जाता है, इससे मल-मूत्र कम हो जाता है। इस प्रकार मूलबन्ध का अभ्यास करने से वृद्ध भी युवा हो जाता है ।। not available
48.0
ओडयाणं कुरुते यस्मादविश्रान्तं महाखगः । ओड्डियाणं तदेव स्यान्मृत्युमातङ्गकेसरी ॥ ||४८||
oḍayāṇaṃ kurute yasmādaviśrāntaṃ mahākhagaḥ । oḍḍiyāṇaṃ tadeva syānmṛtyumātaṅgakesarī ॥
महापक्षी (गिद्ध आदि) जिस प्रकार विश्राम के लिए.(आकाश में अत्यधिक ऊँचे) उड़ते हैं, उसी तरह उड्डियान बन्ध का अभ्यास मृत्यु रूपी हाथी को पछाड़ने के लिए सिंह के समान है। (बड़े पक्षियों को एक विशेष प्रकार से उड़ने में विश्राम प्राप्त होता है, जिससे उन्हें शक्ति प्राप्त हो जाती है। ) ॥ not available
49.0
उदरात्पश्चिमं ताणमधोनाभेर्निगद्यते । ओड्याणमुदरे बन्धस्तत्र बन्धो विधीयते ॥ ||४९||
udarātpaścimaṃ tāṇamadhonābhernigadyate । oḍyāṇamudare bandhastatra bandho vidhīyate ॥
पेट को नाभि के नीचे तानना अर्थात् खींचना पश्चिमोत्तान कहलाता है। वहीं पेट में यह उड्डियान बंध भी किया जाता है ॥ not available
50.0
बध्नाति हि शिरोजातमधोगामि नभोजलम् । ततो जालन्धरो बन्धः कष्टदुःखौघनाशनः॥ ||५०||
badhnāti hi śirojātamadhogāmi nabhojalam । tato jālandharo bandhaḥ kaṣṭaduḥkhaughanāśanaḥ॥
जो शरीर में नीचे की ओर प्रवहमान आकाश-जल (खेचरी मुद्रा द्वारा क्षरित होने वाला) को शिरोभाग में रोककर रखता है, उसे जालंधर बंध कहते हैं, यह दु:खों और कष्टों का नाश कर देता है ॥ not available
51.0
जालन्धरे कृते बन्धे कण्ठसंकोचलक्षणे । न पीयूषं पतत्यग्नौ न च वायुः प्रधावति ॥ ||५१||
jālandhare kṛte bandhe kaṇṭhasaṃkocalakṣaṇe । na pīyūṣaṃ patatyagnau na ca vāyuḥ pradhāvati ॥
जालन्धर बंध में सामने की ओर सिर झुकाकर गले से नीचे ठोढ़ी को हृदय से स्पर्श करना होता है। इस से अमृत न तो अग्नि की ओर गिरता है और न वायु की ओर गमन करता है, स्थिर हो जाता है ।। not available
52.0
कपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा । भ्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ।। ||५२||
kapālakuhare jihvā praviṣṭā viparītagā । bhruvorantargatā dṛṣṭirmudrā bhavati khecarī ।।
दृष्टि को दोनों भौंहों के मध्य स्थित करे एवं जीभ को गले की ओर पीछे लौटाकर कपाल कुहर (गले के मध्य तालु) में प्रवेश कराये, इस प्रकार की क्रिया को खेचरी मुद्रा कहते हैं ॥ not available
53.0
न रोगो मरणं तस्य न निद्रा न क्षुधा तृषा। न च मूर्च्छा भवेत्तस्य यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्॥ ||५३||
na rogo maraṇaṃ tasya na nidrā na kṣudhā tṛṣā। na ca mūrcchā bhavettasya yo mudrāṃ vetti khecarīm॥
जो खेचरी मुद्रा को जानता और साधना करता है उसे रोग, मरण, भूख-प्यास और मूर्छा आदि से छुटकारा प्राप्त हो जाता है ।। not available
54.0
पीड्यते नच रोगेण लिप्यते न स कर्मभिः । वाध्यते न च केनापि यो मुद्रां वेत्ति खेचरीम्॥ ||५४||
pīḍyate naca rogeṇa lipyate na sa karmabhiḥ । vādhyate na ca kenāpi yo mudrāṃ vetti khecarīm॥
खेचरी मुद्दा जानने वाला न तो रोग से कष्ट पाता है और न कर्मों में ही उसकी आसक्ति होती है तथा उसके पास तक कोई विघ्न भी नहीं पहुँच पाते ॥ not available
55.0
चित्तं चरति खे यस्माज्जिह्वा चरति खे यतः । तेनेयं खेचरी मुद्रा सर्वसिद्धनमस्कृता॥ ||५५||
cittaṃ carati khe yasmājjihvā carati khe yataḥ । teneyaṃ khecarī mudrā sarvasiddhanamaskṛtā॥
जिसकी साधना करने से चित्त और जिह्वा आकाश में विचरण करते हैं, उस खेचरी मुद्रा को सभी सिद्ध लोग प्रणाम करते हैं ॥ not available
56.0
बिन्दुमूलशरीराणि शिरास्तत्र प्रतिष्ठिताः। भावयन्ती शरीराणि आपादतलमस्तकम्॥ ||५६||
bindumūlaśarīrāṇi śirāstatra pratiṣṭhitāḥ। bhāvayantī śarīrāṇi āpādatalamastakam॥
सिर से लेकर पैर तक शरीर के सभी अंगों का जिनके द्वारा पोषण होता है, उन सभी शिराओं का मूल बिन्दु खेचरी मुद्रा ही है ॥ not available
57.0
खेचर्या मुद्रितं येन विवरं लम्बिकोर्ध्वतः । न तस्य क्षीयते बिन्दुः कामिन्यालिङ्गितस्य च ॥ ||५७||
khecaryā mudritaṃ yena vivaraṃ lambikordhvataḥ । na tasya kṣīyate binduḥ kāminyāliṅgitasya ca ॥
खेचरी मुद्रा के द्वारा जिस साधक ने जीभ के ऊपर कपाल कुहर को ढक लिया है, उस साधक का रमणी के आलिंगन से भी बिन्दुपात नहीं हो सकता ॥ not available
58.0
यावद्बिन्दुः स्थितो देहे तावन्मृत्युभयं कुतः । यावद्बद्धा नभोमुद्रा तावद्बिन्दर्न गच्छति ।। ||५८||
yāvadbinduḥ sthito dehe tāvanmṛtyubhayaṃ kutaḥ । yāvadbaddhā nabhomudrā tāvadbindarna gacchati ।।
जब तक साधक ने खेचरी मुद्रा को बाँध रखा है, तब तक बिन्दु नहीं जाता है और जब तक शरीर में बिन्दु स्थित है, तब तक मृत्यु का क्या भय है ? ॥ not available
59.0
ज्वलितोऽपि यथा बिन्दुः संप्राप्तश्च हुताशनम्। व्रजत्यूर्ध्वं गतः शक्त्या निरुद्धो योनिमुद्रया ।। ||५९||
jvalito'pi yathā binduḥ saṃprāptaśca hutāśanam। vrajatyūrdhvaṃ gataḥ śaktyā niruddho yonimudrayā ।।
यदि जाज्वल्यमान अग्नितत्व में बिन्दुपात भी हो जाये, तो उसको योनिमुद्रा के द्वारा बलपूर्वक रोका और ऊर्ध्वगामी बनाया जा सकता है ॥ not available
60.0
स पुनर्द्विविधो बिन्दुः पाण्डरो लोहितस्तथा । पाण्डरं शुक्लमित्याहुर्लोहिताख्यं महारजः ।। ||६०||
sa punardvividho binduḥ pāṇḍaro lohitastathā । pāṇḍaraṃ śuklamityāhurlohitākhyaṃ mahārajaḥ ।।
सफेद और लाल दो वर्ण (रंग) का बिन्दु होता है। श्वेत को शुक्ल (शुक्र) नाम दिया गया तथा लाल को महारज कहा गया है ।। not available
61.0
सिन्दूरव्रातसंकाशं रविस्थानस्थितं रजः । शशिस्थानस्थितं शुक्लं तयोरैक्यं सुदुर्लभम् ॥ ||६१||
sindūravrātasaṃkāśaṃ ravisthānasthitaṃ rajaḥ । śaśisthānasthitaṃ śuklaṃ tayoraikyaṃ sudurlabham ॥
सिन्दूर के समान ज्योतित रविस्थान में रज का निवास स्थान है तथा चन्द्रस्थान में शुक्ल का निवास स्थान है। शुक्ल और रज का संयोग बड़ा कठिन होता है ॥ not available
62.0
बिन्दुर्ब्रह्मा रजः शक्तिर्बिन्दुरिन्दू रजो रविः । उभयोः सङ्गमादेव प्राप्यते परमं पदम् ॥ ||६२||
bindurbrahmā rajaḥ śaktirbindurindū rajo raviḥ । ubhayoḥ saṅgamādeva prāpyate paramaṃ padam ॥
बिन्दु ब्रह्मारूप है तथा रज शक्तिस्वरूप है, बिन्दु चन्द्ररूप और रज सूर्यरूप है। इन दोनों का योग (मिलन) होने से ही परमपद की प्राप्ति होती है ॥ not available
63.0
वायुना शक्तिचालेन प्रेरितं च यथा रजः । याति बिन्दुः सदैकत्वं भवेदिव्ययपुस्तदा ॥ ||६३||
vāyunā śakticālena preritaṃ ca yathā rajaḥ । yāti binduḥ sadaikatvaṃ bhavedivyayapustadā ॥
जब वायु (प्राणायाम) से शक्तिचालिनी मुद्रा के द्वारा गमनशील रज बिन्दु से एकाकार हो जाता है, तब शरीर दिव्य हो जाता है ॥ not available
64.0
शुक्लं चन्द्रेण संयुक्तं रजः सूर्येण संगतम्। तयोः समरसैकत्वं यो जानाति स योगवित्॥ ||६४||
śuklaṃ candreṇa saṃyuktaṃ rajaḥ sūryeṇa saṃgatam। tayoḥ samarasaikatvaṃ yo jānāti sa yogavit॥
रज का संयोग सूर्य में और शुक्ल (शुक्र) का संयोग चन्द्र में जिस प्रकार होता है, उस विषय को और दोनों के एकाकार होने को जानने वाला साधक योगवेत्ता कहा जाता है ॥ not available
65.0
शोधनं नाडिजालस्य चालनं चन्द्रसूर्ययोः । रसानां शोषणं चैव महामुद्राभिधीयते ॥ ||६५||
śodhanaṃ nāḍijālasya cālanaṃ candrasūryayoḥ । rasānāṃ śoṣaṇaṃ caiva mahāmudrābhidhīyate ॥
जिस साधना के द्वारा नाड़ी-समूह का शोधन किया जाता है तथा सूर्य-चन्द्र को चलाया जाता है एवं रस का शोषण किया जाता है, उसे ‘महामुद्रा' कहते हैं ॥ not available
66.0
वक्षोन्यस्तहनुः प्रपीड्य सुचिरं योनिं च वामाङ् घ्रिणा हस्ताभ्यामनुधारयन्प्रसरितं पादं तथा दक्षिणम्। आपूर्य श्वसनेन कुक्षियुगलं बध्वा शनै रेचयेत्सेयं व्याधिविनाशिनी सुमहती मुद्रा नृणां कथ्यते ॥ ||६६||
vakṣonyastahanuḥ prapīḍya suciraṃ yoniṃ ca vāmāṅ ghriṇā hastābhyāmanudhārayanprasaritaṃ pādaṃ tathā dakṣiṇam। āpūrya śvasanena kukṣiyugalaṃ badhvā śanai recayetseyaṃ vyādhivināśinī sumahatī mudrā nṛṇāṃ kathyate ॥
बायें पैर से योनि स्थान पर दबाव डालते हुए, ठोढ़ी को छाती से लगाये और दायाँ पैर सीधा फैलाकर दोनों हाथों से पैर की अँगुलियों सहित पैर पकड़कर दोनों कुक्षियों अर्थात् पेट में पूरा श्वास भरकर धीरे-धीरे बाहर निकाले । यह महामुद्रा की क्रिया समस्त प्रकार की व्याधियों को नष्ट करती है ।। not available
67.0
चन्द्रांशेन समभ्यस्य सूर्यांशेनाभ्यसेत्पुनः या तुल्या तु भवेत्संख्या ततो मुद्रां विसर्जयेत् ॥ ||६७||
candrāṃśena samabhyasya sūryāṃśenābhyasetpunaḥ yā tulyā tu bhavetsaṃkhyā tato mudrāṃ visarjayet ॥
अभ्यास क्रम में सर्वप्रथम बायीं नासिका ‘चन्द्रअंश' से श्वास खींचकर रेचन करते हुए अभ्यास करे, फिर दायीं नासिका ‘सूर्य अंश' से श्वास खींचकर रेचन का अभ्यास करना चाहिए। जब दोनों स्वर (चन्द्र-सूर्य) समान हो जाएँ, तब अभ्यास बन्द करना चाहिए ॥ not available
68.0
नहि पथ्यमपथ्यं वा रसाः सर्वेऽपि नीरसाः । अतिभुक्तं विषं घोरं पीयूषमिव जीर्यते ॥ ||६८||
nahi pathyamapathyaṃ vā rasāḥ sarve'pi nīrasāḥ । atibhuktaṃ viṣaṃ ghoraṃ pīyūṣamiva jīryate ॥
इस ‘महामुद्रा' के करने से पथ्य-अपथ्य अथवा सभी तरह का नीरस भोजन सरस हो जाता है। भोजन अधिक कर लेने पर तथा विष भी खा लेने पर वह अमृत के समान पच जाता है ।। not available
69.0
क्षयकुष्ठगुदावर्तगुल्माजीर्णपुरोगमाः । तस्य रोगाः क्षयं यान्ति महामुद्रां तु योऽभ्यसेत् ॥ ||६९||
kṣayakuṣṭhagudāvartagulmājīrṇapurogamāḥ । tasya rogāḥ kṣayaṃ yānti mahāmudrāṃ tu yo'bhyaset ॥
इस महामुद्रा के अभ्यास करने वाले साधक को इसके प्रभाव से क्षय, कुष्ठ, गुदावर्त (भगन्दर), गुल्म (तिल्ली बढ़ना), अजीर्ण आदि एवं भविष्य में होने वाले सभी रोगों से छुटकारा मिल जाता है ॥ not available
Text (part 2)
70.0
कथितेयं महामुद्रा महासिद्धिकरी नृणाम्। गोपनीया प्रयत्नेन न देया यस्य कस्यचित् ॥ ||७०||
kathiteyaṃ mahāmudrā mahāsiddhikarī nṛṇām। gopanīyā prayatnena na deyā yasya kasyacit ॥
यह महामुद्रा साधकों को महासिद्धि देने वाली है, इसको हर किसी को (अनधिकारी को) नहीं बताना चाहिए, प्रयत्नपूर्वक गुप्त रखना चाहिए ॥ not available
71.0
पद्मासनं समारुह्य समकायशिरोधरः । नासाग्रदृष्टिरेकान्ते जपेदोंकारमव्ययम् ॥ ||७१||
padmāsanaṃ samāruhya samakāyaśirodharaḥ । nāsāgradṛṣṭirekānte japedoṃkāramavyayam ॥
एकान्त स्थान में पद्मासन लगाकर कमर से सिर तक शरीर को सीधा करके नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि को जमाकर अव्यय प्रणव (ॐ) का जप करना चाहिए ॥ not available
72.0
ॐ नित्यं शुद्धं बुद्धं निर्विकल्पं निरञ्जनं निराख्यातमनादिनिधनमेकं तुरीयं यद्भूतं भवद्भविष्यत् परिवर्तमानं सर्वदाऽनवच्छिन्नं परं ब्रह्म तस्माज्जाता परा शक्तिः स्वयंज्योतिरा-त्मिका। आत्मन आकाशः संभूतः। आकाशाद्वायुः । वायोरग्निः । अग्नेरापः। अद्भयः पृथिवी। एतेषां पञ्चभूतानां पतयः पञ्च सदाशिवेश्वररुद्रविष्णुब्रह्माणश्चेति। तेषां ब्रह्मविष्णुरुद्राश्चोत्पत्ति-स्थितिलयकर्तारः। राजसो ब्रह्मा सात्त्विको विष्णुस्तामसो रुद्र इति एते त्रयो गुणयुक्ताः। ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव। धाता च सृष्टौ विष्णुश्च स्थितौ रुद्रश्च नाशे भोगाय चेन्द्रः प्रथमजा बभूवुः। एतेषां ब्रह्मणो लोका देवतिर्यङ्नरस्थावराश्च जायन्ते । तेषां मनुष्यादीनां पञ्चभूतसम-वायः शरीरम्। ज्ञानकर्मेन्द्रियैर्ज्ञानविषयैः प्राणादिपञ्चवायुमनोबुद्धिचित्ताहंकारैः स्थूलकल्पितैः सोऽपि स्थूलप्रकृतिरित्युच्यते। ज्ञानकर्मेन्द्रियैर्ज्ञानविषयैः प्राणादिपञ्चवायुमनोबुद्धिभिश्च सूक्ष्मस्थोऽपि लिङ्गमेवेत्युच्यते। गुणत्रययुक्तं कारणम्। सर्वेषामेवं त्रीणि शरीराणि वर्तन्ते । जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तितुरीयाश्चेत्यवस्थाश्चतस्त्रः तासामवस्थानामधिपतयश्चत्वारः पुरुषा विश्वतैजस-प्राज्ञात्मानश्चेति। विश्वो हि स्थूलभुङ्नित्यं तैजसः प्रविविक्तभुक् । आनन्दभुक्तथा प्राज्ञः सर्वसा-क्षीत्यतः परः ॥ ||७२||
oṃ nityaṃ śuddhaṃ buddhaṃ nirvikalpaṃ nirañjanaṃ nirākhyātamanādinidhanamekaṃ turīyaṃ yadbhūtaṃ bhavadbhaviṣyat parivartamānaṃ sarvadā'navacchinnaṃ paraṃ brahma tasmājjātā parā śaktiḥ svayaṃjyotirā-tmikā। ātmana ākāśaḥ saṃbhūtaḥ। ākāśādvāyuḥ । vāyoragniḥ । agnerāpaḥ। adbhayaḥ pṛthivī। eteṣāṃ pañcabhūtānāṃ patayaḥ pañca sadāśiveśvararudraviṣṇubrahmāṇaśceti। teṣāṃ brahmaviṣṇurudrāścotpatti-sthitilayakartāraḥ। rājaso brahmā sāttviko viṣṇustāmaso rudra iti ete trayo guṇayuktāḥ। brahmā devānāṃ prathamaḥ saṃbabhūva। dhātā ca sṛṣṭau viṣṇuśca sthitau rudraśca nāśe bhogāya cendraḥ prathamajā babhūvuḥ। eteṣāṃ brahmaṇo lokā devatiryaṅnarasthāvarāśca jāyante । teṣāṃ manuṣyādīnāṃ pañcabhūtasama-vāyaḥ śarīram। jñānakarmendriyairjñānaviṣayaiḥ prāṇādipañcavāyumanobuddhicittāhaṃkāraiḥ sthūlakalpitaiḥ so'pi sthūlaprakṛtirityucyate। jñānakarmendriyairjñānaviṣayaiḥ prāṇādipañcavāyumanobuddhibhiśca sūkṣmastho'pi liṅgamevetyucyate। guṇatrayayuktaṃ kāraṇam। sarveṣāmevaṃ trīṇi śarīrāṇi vartante । jāgratsvapnasuṣuptiturīyāścetyavasthāścatastraḥ tāsāmavasthānāmadhipatayaścatvāraḥ puruṣā viśvataijasa-prājñātmānaśceti। viśvo hi sthūlabhuṅnityaṃ taijasaḥ praviviktabhuk । ānandabhuktathā prājñaḥ sarvasā-kṣītyataḥ paraḥ ॥
ॐ निरंजन, निर्विकल्प, नामरहित, शुद्ध, बुद्ध, नित्य, अनादिनिधन (शाश्वत), एक, तुरीय, भूत, भविष्यत्, वर्तमान में एक रस रहने वाले परब्रह्म से स्वयं प्रकाशरूपी पराशक्ति प्रकट हुई । आत्मा (परमात्म।) से आकाश प्रकट हुआ, आकाश से वायु, वायु से अग्नि, अग्नि से जल, जल से पृथ्वी प्रकट हुई। सदाशिव, ईश्वर, रुद्, विष्णु और ब्रह्मा ये पाँच देवता इन पाँच महाभूतों के पाँच स्वामी हैं। इसमें ब्रह्माणी उत्पत्ति करने वाले, विष्णु पालन करने वाले तथा रुद्र संहार करने वाले हैं। सतोगुणरूप विष्णु, रजोगुणरूप ब्रह्मा, रामोगुणरुप रुद्र हैं। देवताओं में पहले ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई। सृष्टि की उत्पत्ति के लिए ब्रह्मा, सृष्टि के पालन अर्थात् विकास करने के लिए विष्णु, सृष्टि के विनाश के लिए रुद्र, भोगों के लिए इन्द्र की उत्पत्ति सर्वप्रथम हुई । लोक, देव, तिर्यक्, नर और स्थावर इन सबकी उत्पत्ति ब्रह्माजी के द्वारा हुई। उनमें मनुष्य आदि का शरीर पंचभूतों के संयोग से बनता है। ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, ज्ञान के विषय, प्राण आदि पंच वायु, मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार (अपेक्षाकृत) स्थूल रचना होने से (इनके मूल कारण को) स्थूल प्रकृति कहा जाता है। कर्मेन्द्रिय, ज्ञानेन्द्रिय, ज्ञान के विषय (शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध), पंचवायु, मन और बुद्धि को सूक्ष्म (लिंग) शरीर कहा जाता है। कारण शरीर तीन गुणों से युक्त है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण ये तीन शरीर सबके होते हैं। जाग्रत, स्वप्न, शुषुप्ति और तुरीय चार अवस्थाएँ होती हैं, तैजस, प्राज्ञ, विश्व और आत्मा ये चार पुरुष इन सब (अवस्थाओं) के अधिपति हैं । विश्व स्थूल का नित्य भोग करने वाला है, तैजस एकान्त का भोग करने वाला है, प्राज्ञ आनन्द का भोगने वाला है और सबका साक्षी (आत्मा) इससे परे कहा जाता है ।। Para Brahman is Om, is that which exists, which is clean, which is full of wisdom, which does not have any draw backs, which is without stains, which cannot be described, which does not have beginning or end, which is one and only one, which is thuriya, which exists in things of past, present and future and which will never get divided at any time. From that Para Brahman emerges Para Shakthi (the female aspect). That is the soul which is self resplendent. From that soul arose the ether. From ether arose wind. From wind arose fire. From fire arose water and from water arose the earth. These five elements are ruled by the five Godheads viz. Sadasiva, Easwara, Rudra, Vishnu and Brahma. Among them Brahma, Vishnu and Rudra would do the job of creation, upkeep and destruction. Brahma is Rajasic, Vishnu Sathvic and Rudra Thamasic. They are thus with three different properties. 72.1 Among devas Brahma arose first. Among those who arose first, Brahma became the creator, Vishnu the one who upkeeps and Lord Rudra, the destroyer. Among them from Brahma arose worlds, devas, men and those in between them. From him arose those things which do not move. In case of men, the body is the unified form of Pancha Boothas (five elements). The organs of wisdom, (jnanendriyas), the organs of action (karmendriyas), those activities related to wisdom, the five body airs (prana, apana etc) are taught by the macro portion of mind, intellect, decision making power and the feeling of self and are called macro body (Sthoola sareeram). The organs of wisdom, the organs of action, things related to wisdom, the five body airs and the micro aspect of mind and intellect are called Linga sareera. The body has three types of properties. Thus all people have three bodies. There are four states of the body viz wakeful state, dream, sleep and Thuriya (exalted spiritual state). Those purushas who reside in our body and control these states are Viswa, Thaijasa, Pragna and Atma. Viswa will always have macro experiences. Different from that is Thaijasa who has micro experiences. Pragna has pleasant experiences. Athma is a witness to all these. 72
73.0
प्रणवः सर्वदा तिष्ठेत्सर्वजीवेषु भोगतः । अभिरामस्तु सर्वासु ह्यवस्थासु ह्यधोमुखः ॥ ||७३||
praṇavaḥ sarvadā tiṣṭhetsarvajīveṣu bhogataḥ । abhirāmastu sarvāsu hyavasthāsu hyadhomukhaḥ ॥
सर्वव्यापी प्रणव (परमात्मा) जीवों की सभी आनन्दमय अवस्थाओं के भोग के समय अधोमुख अर्थात् उदासीन होकर रहता है ।। The Atma which is of the form of "Om", will be in all beings and at the time of passion, downward looking. At all other times it would be pretty and downward face. 73
74.0
अकार उकारो मकारश्चेति त्रयो वर्णास्त्रयो वेदास्त्रयो लोकास्त्रयो गुणास्त्रीण्यक्षराणि त्रयः स्वरा एवं प्रणवः प्रकाशते । अकारो जाग्रति नेत्रे वर्तते सर्वजन्तुषु । उकारः कण्ठतः स्वप्ने मकारो ह्यदि सुप्तितः ।। ||७४||
akāra ukāro makāraśceti trayo varṇāstrayo vedāstrayo lokāstrayo guṇāstrīṇyakṣarāṇi trayaḥ svarā evaṃ praṇavaḥ prakāśate । akāro jāgrati netre vartate sarvajantuṣu । ukāraḥ kaṇṭhataḥ svapne makāro hyadi suptitaḥ ।।
(प्रणव ॐ कार में निहित) तीन अक्षर ‘अ' कार, ‘उ' कार एवं ‘म' कार तीन वेद, तीन लोक, तीन गुण, तीन अक्षर और तीन स्वर के रूप में प्रणव (ओंकार ही) प्रकाशमान है।‘अ' कार समस्त जीवधारियों के जाग्रत् अवस्था में नेत्रों में निवास करता है, सोते समय ‘उ' कार कण्ठ में निवास करता है और ‘म' कार सुषुप्ति अवस्था में हृदय प्रदेश में निवास करता है ।। In the three letters Aa, Uu and Ma, three Vedas, three worlds, three characteristics, three letters and three sounds shine. Thus Pranava shines. When you are awake, the letter Aa exists in the eyes of all beings, when you are dreaming the letter Uu exists in the neck of all beings and the letter Ma exists in the heart of all beings when they are asleep. 74
75.0
विराड्विश्वः स्थूलश्चाकारः । हिरण्यगर्भस्तैजसः सूक्ष्मश्च उकारः । कारणाव्याकृतप्राज्ञश्च मकारः। अकारो राजसो रक्तो ब्रह्मा चेतन उच्यते । उकारः सात्त्विकः शुक्लो विष्णुरित्यभिधीयते ॥ ||७५||
virāḍviśvaḥ sthūlaścākāraḥ । hiraṇyagarbhastaijasaḥ sūkṣmaśca ukāraḥ । kāraṇāvyākṛtaprājñaśca makāraḥ। akāro rājaso rakto brahmā cetana ucyate । ukāraḥ sāttvikaḥ śuklo viṣṇurityabhidhīyate ॥
यह स्थूल विराट् विश्व ‘अ' कार ही है, सूक्ष्म तेजस्वी हिरण्यगर्भ के रूप में ‘उ'कार कहा जाता है और ‘म' कार अव्याकृत (अप्रकट) कारण प्राज्ञ कहा जाता है। ‘अ' कार की प्रकृति राजसी, वर्ण लाल है, उसे सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा कहा गया है।‘उ' कार की प्रकृति सात्त्विक, वर्ण श्वेत है, उसे पालनकर्ता विष्णु कहा गया है। ‘म' कार की प्रकृति तामस, वर्ण कृष्ण है, उसे संहारकर्ता रुद्र कहा गया है, इस तरह ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र की उत्पत्ति का कारण प्रणव (ॐ) ही कहा गया है। प्रणव ही सबका अनादि कारण परतत्त्व है।‘अ' कार में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा समाहित है, उकार में विश्व समाहित हैं तथा मकार में रुद्र समाहित हैं। एकमात्र प्रणय ही (सर्वत्र) प्रकाशमान रहता है। यह प्रणव ज्ञानौ मनुष्यों में ऊर्ध्वमुख एवं अज्ञानी मनुष्यों में अधोमुख वाला कहा गया है। इस प्रकार सर्वत्र समरूप से प्रणव (ॐ कार) ही प्रतिष्ठित है, इसको इस प्रकार से जो जानता है, वही वेदविद् है। ज्ञानी साधकों में यह प्रणव अनाहत रूप से ऊर्ध्वगति वाला होता है।। The letter Aa exists in the egg state as Viswa and Pinda state as Virat Purusha. The Letter Uu exists as Thaijasa and Hiranya Garbha in the micro state. The letter Ma exists as the causal state and as Pragna. The letter Aa has Rajasa qualities is red and its form is that of Lord Brahma. The letter Uu has Sathvika qualities and its form is that of white Vishnu. The letter Ma has Thamasic qualities and its form is that of black Rudra. Brahma took birth from Pranava. Vishnu also came out of it. Rudra also came out of it. Pranava is the Para Brahma (ultimate god). Brahma merges with the letter Aa. Vishnu merges with letter Uu and Rudra merges with the letter Ma. In people with wisdom, Pranava would be upward looking and among ignorant people Pranava would be looking downward. 75-78
76.0
मकारस्तामसः कृष्णो रुद्रश्चेति तथोच्यते । प्रणवात्प्रभवो ब्रह्मा प्रणवात्प्रभवो हरिः ।। ||७६||
makārastāmasaḥ kṛṣṇo rudraśceti tathocyate । praṇavātprabhavo brahmā praṇavātprabhavo hariḥ ।।
यह स्थूल विराट् विश्व ‘अ' कार ही है, सूक्ष्म तेजस्वी हिरण्यगर्भ के रूप में ‘उ'कार कहा जाता है और ‘म' कार अव्याकृत (अप्रकट) कारण प्राज्ञ कहा जाता है। ‘अ' कार की प्रकृति राजसी, वर्ण लाल है, उसे सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा कहा गया है।‘उ' कार की प्रकृति सात्त्विक, वर्ण श्वेत है, उसे पालनकर्ता विष्णु कहा गया है। ‘म' कार की प्रकृति तामस, वर्ण कृष्ण है, उसे संहारकर्ता रुद्र कहा गया है, इस तरह ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र की उत्पत्ति का कारण प्रणव (ॐ) ही कहा गया है। प्रणव ही सबका अनादि कारण परतत्त्व है।‘अ' कार में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा समाहित है, उकार में विश्व समाहित हैं तथा मकार में रुद्र समाहित हैं। एकमात्र प्रणय ही (सर्वत्र) प्रकाशमान रहता है। यह प्रणव ज्ञानौ मनुष्यों में ऊर्ध्वमुख एवं अज्ञानी मनुष्यों में अधोमुख वाला कहा गया है। इस प्रकार सर्वत्र समरूप से प्रणव (ॐ कार) ही प्रतिष्ठित है, इसको इस प्रकार से जो जानता है, वही वेदविद् है। ज्ञानी साधकों में यह प्रणव अनाहत रूप से ऊर्ध्वगति वाला होता है।। 75 to 78 translation in Column F75
77.0
प्रणवात्प्रभवो रुद्रः प्रणवो हि परो भवेत्। अकारे लीयते ब्रह्मा ह्युकारे लीयते हरिः ॥ ||७७||
praṇavātprabhavo rudraḥ praṇavo hi paro bhavet। akāre līyate brahmā hyukāre līyate hariḥ ॥
यह स्थूल विराट् विश्व ‘अ' कार ही है, सूक्ष्म तेजस्वी हिरण्यगर्भ के रूप में ‘उ'कार कहा जाता है और ‘म' कार अव्याकृत (अप्रकट) कारण प्राज्ञ कहा जाता है। ‘अ' कार की प्रकृति राजसी, वर्ण लाल है, उसे सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा कहा गया है।‘उ' कार की प्रकृति सात्त्विक, वर्ण श्वेत है, उसे पालनकर्ता विष्णु कहा गया है। ‘म' कार की प्रकृति तामस, वर्ण कृष्ण है, उसे संहारकर्ता रुद्र कहा गया है, इस तरह ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र की उत्पत्ति का कारण प्रणव (ॐ) ही कहा गया है। प्रणव ही सबका अनादि कारण परतत्त्व है।‘अ' कार में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा समाहित है, उकार में विश्व समाहित हैं तथा मकार में रुद्र समाहित हैं। एकमात्र प्रणय ही (सर्वत्र) प्रकाशमान रहता है। यह प्रणव ज्ञानौ मनुष्यों में ऊर्ध्वमुख एवं अज्ञानी मनुष्यों में अधोमुख वाला कहा गया है। इस प्रकार सर्वत्र समरूप से प्रणव (ॐ कार) ही प्रतिष्ठित है, इसको इस प्रकार से जो जानता है, वही वेदविद् है। ज्ञानी साधकों में यह प्रणव अनाहत रूप से ऊर्ध्वगति वाला होता है।। 76 to 78 translation in Column F75
78.0
मकारे लीयते रुद्रः प्रणवो हि प्रकाशते। ज्ञानिनामूर्ध्वगो भूयादज्ञाने स्यादधोमुखः ॥ ||७८||
makāre līyate rudraḥ praṇavo hi prakāśate। jñānināmūrdhvago bhūyādajñāne syādadhomukhaḥ ॥
यह स्थूल विराट् विश्व ‘अ' कार ही है, सूक्ष्म तेजस्वी हिरण्यगर्भ के रूप में ‘उ'कार कहा जाता है और ‘म' कार अव्याकृत (अप्रकट) कारण प्राज्ञ कहा जाता है। ‘अ' कार की प्रकृति राजसी, वर्ण लाल है, उसे सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा कहा गया है।‘उ' कार की प्रकृति सात्त्विक, वर्ण श्वेत है, उसे पालनकर्ता विष्णु कहा गया है। ‘म' कार की प्रकृति तामस, वर्ण कृष्ण है, उसे संहारकर्ता रुद्र कहा गया है, इस तरह ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र की उत्पत्ति का कारण प्रणव (ॐ) ही कहा गया है। प्रणव ही सबका अनादि कारण परतत्त्व है।‘अ' कार में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा समाहित है, उकार में विश्व समाहित हैं तथा मकार में रुद्र समाहित हैं। एकमात्र प्रणय ही (सर्वत्र) प्रकाशमान रहता है। यह प्रणव ज्ञानौ मनुष्यों में ऊर्ध्वमुख एवं अज्ञानी मनुष्यों में अधोमुख वाला कहा गया है। इस प्रकार सर्वत्र समरूप से प्रणव (ॐ कार) ही प्रतिष्ठित है, इसको इस प्रकार से जो जानता है, वही वेदविद् है। ज्ञानी साधकों में यह प्रणव अनाहत रूप से ऊर्ध्वगति वाला होता है।। 77 to 78 translation in Column F75
79.0
एवं वै प्रणवस्तिष्ठेद्यस्तं वेद स वेदवित् । अनाहतस्वरूपेण ज्ञानिनामूर्ध्वगो भवेत् ॥ ||७९||
evaṃ vai praṇavastiṣṭhedyastaṃ veda sa vedavit । anāhatasvarūpeṇa jñānināmūrdhvago bhavet ॥
यह स्थूल विराट् विश्व ‘अ' कार ही है, सूक्ष्म तेजस्वी हिरण्यगर्भ के रूप में ‘उ'कार कहा जाता है और ‘म' कार अव्याकृत (अप्रकट) कारण प्राज्ञ कहा जाता है। ‘अ' कार की प्रकृति राजसी, वर्ण लाल है, उसे सृष्टि-कर्ता ब्रह्मा कहा गया है।‘उ' कार की प्रकृति सात्त्विक, वर्ण श्वेत है, उसे पालनकर्ता विष्णु कहा गया है। ‘म' कार की प्रकृति तामस, वर्ण कृष्ण है, उसे संहारकर्ता रुद्र कहा गया है, इस तरह ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र की उत्पत्ति का कारण प्रणव (ॐ) ही कहा गया है। प्रणव ही सबका अनादि कारण परतत्त्व है।‘अ' कार में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा समाहित है, उकार में विश्व समाहित हैं तथा मकार में रुद्र समाहित हैं। एकमात्र प्रणय ही (सर्वत्र) प्रकाशमान रहता है। यह प्रणव ज्ञानौ मनुष्यों में ऊर्ध्वमुख एवं अज्ञानी मनुष्यों में अधोमुख वाला कहा गया है। इस प्रकार सर्वत्र समरूप से प्रणव (ॐ कार) ही प्रतिष्ठित है, इसको इस प्रकार से जो जानता है, वही वेदविद् है। ज्ञानी साधकों में यह प्रणव अनाहत रूप से ऊर्ध्वगति वाला होता है।। Pranava exists like this. The one who knows this knows the Vedas. In the anahatha sound form, it grows upwards in case of wise people. 79
80.0
तैलधारामिवाच्छिन्नं दीर्घघण्टानिनादवत् । प्रणवस्य ध्वनिस्तद्वत्तदग्रं ब्रह्म चोच्यते ॥ ||८०||
tailadhārāmivācchinnaṃ dīrghaghaṇṭāninādavat । praṇavasya dhvanistadvattadagraṃ brahma cocyate ॥
तैलधारवत् अविच्छिन्न, घण्टा के गम्भीर स्वर की तरह प्रणव (ओंकार) की ध्वनि वाला अनाहत नाद होता है, जिसका मूल ‘ब्रह्म' कहा जाता है ॥ The sound Pranava is continuous like the flow of oil, and like the long sound of the bell. Its peak is Brahman. 80
81.0
ज्योतिर्मयं तदग्रं स्यादवाच्यं बुद्धिसूक्ष्मतः । ददृशुर्ये महात्मानो यस्तं वेद स वेदवित्॥ ||८१||
jyotirmayaṃ tadagraṃ syādavācyaṃ buddhisūkṣmataḥ । dadṛśurye mahātmāno yastaṃ veda sa vedavit॥
महापुरुषों के द्वारा सूक्ष्म बुद्धि से जानने योग्य प्रणव का वह अग्रभाग (मूल) प्रकाशमय और वाणी से परे है, इस प्रकार से जानने वाला महात्मा ही वेदविद् है ॥ That peak would be lit so brilliantly, that it cannot be described by words. The great savants find it out using their sharp intellect. The one who knows that, is considered as one who knows Vedas. 81
82.0
जाग्रनेत्रद्वयोर्मध्ये हंस एव प्रकाशते । सकारः खेचरी प्रोक्तस्त्वंपदं चेति निश्चितम् ॥ ||८२||
jāgranetradvayormadhye haṃsa eva prakāśate । sakāraḥ khecarī proktastvaṃpadaṃ ceti niścitam ॥
दोनों नेत्रों के बीच जाग्रत् अवस्था में हंस ज्योतित रहता है।‘स' कार खेचरी के रूप में कहा गया है, जो निश्चित रूप से ‘त्वं' का स्वरूप है। ‘ह' कार पद परमात्मा का द्योतक है, जो निश्चित रूप से ‘तत्' पद के रूप में है। जो भी प्राणी ‘स' कार का ध्यान करता है, वह निश्चित रूप से ‘ह' कार रूप हो जाता है । यही सोऽहम् और तत्त्वमसि की साधना है ॥ [ऋषि यहाँ ‘सोऽहम्' और ‘तत् त्वम्' बोध वाक्यों की समानता-एकरूपता प्रदर्शित कर रहे हैं। साधक जब तात्विक दृष्टि से ‘स्व' की ओर देखता है, तो ‘सोऽहमस्मि' का बोध करता है तथा जब बाहर की ओर उसी दृष्टि से देखता है, तो तत्त्वमसि का अनुभव करता है।] The "Hamsa (swan) mantra", shines in the middle of the two eyes. The letter Sa is known as Kechari which means "that which travels in the sky". It has been decided that it is the word "Twam (you)" in the famous Vedic saying, "Tat Tvam Asi (You are That)". 82
83.0
हकारः परमेशः स्यात्तत्पदं चेति निश्चितम् । सकारो ध्यायते जन्तुर्हकारो हि भवेदध्रुवम्॥ ||८३||
hakāraḥ parameśaḥ syāttatpadaṃ ceti niścitam । sakāro dhyāyate janturhakāro hi bhavedadhruvam॥
दोनों नेत्रों के बीच जाग्रत् अवस्था में हंस ज्योतित रहता है।‘स' कार खेचरी के रूप में कहा गया है, जो निश्चित रूप से ‘त्वं' का स्वरूप है। ‘ह' कार पद परमात्मा का द्योतक है, जो निश्चित रूप से ‘तत्' पद के रूप में है। जो भी प्राणी ‘स' कार का ध्यान करता है, वह निश्चित रूप से ‘ह' कार रूप हो जाता है । यही सोऽहम् और तत्त्वमसि की साधना है ॥ [ऋषि यहाँ ‘सोऽहम्' और ‘तत् त्वम्' बोध वाक्यों की समानता-एकरूपता प्रदर्शित कर रहे हैं। साधक जब तात्विक दृष्टि से ‘स्व' की ओर देखता है, तो ‘सोऽहमस्मि' का बोध करता है तथा जब बाहर की ओर उसी दृष्टि से देखता है, तो तत्त्वमसि का अनुभव करता है।] It has been decided that the letter "Ha" which is the Lord of all universe is the word "Tat (that)" in the above Vedic saying. We have to meditate that the letter "Sa" as the soul traveling between birth and death and the letter "Ha" as the stable God. 83
84.0
इन्द्रियैर्वध्यते जीव आत्मा चैव न बध्यते । ममत्वेन भवेज्जीवो निर्ममत्वेन केवलः ॥ ||८४||
indriyairvadhyate jīva ātmā caiva na badhyate । mamatvena bhavejjīvo nirmamatvena kevalaḥ ॥
जीव को इन्द्रियाँ बन्धन में बाँधती हैं, आत्मा को इन्द्रियाँ नहीं बाँध सकती हैं। जब तक ममता होती है, वह जीव रहता है, ममता के बन्धन समाप्त हो जाने पर कैवल्य रूप हो जाता है ॥ The living being is tied up by his organs but Paramatma is not so tied. The living being is egoistic and the soul is not tied by egoism and is independent. 84
85.0
भूर्भुवः स्वरिमे लोकाः सोमसूर्याग्निदेवताः । यस्य मात्रासु तिष्ठन्ति तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ ||८५||
bhūrbhuvaḥ svarime lokāḥ somasūryāgnidevatāḥ । yasya mātrāsu tiṣṭhanti tatparaṃ jyotiromiti ॥
सूर्य, चन्द्र और अग्नि देवता एवं भूः, भुवः स्वः लोक जिसकी मात्राओं में स्थित रहते हैं, वह परम प्रकाशरूप ओंकार है ॥ The ethereal light which is "om" is that Athma in whose aspects stand the three worlds Bhu, Bhuva and Suva and also the place where three gods moon, Sun and fire reside. 85
86.0
क्रिया इच्छा तथा ज्ञानं ब्राह्मी रौद्री च वैष्णवी । त्रिधा मात्रास्थितिर्यत्र तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ ||८६||
kriyā icchā tathā jñānaṃ brāhmī raudrī ca vaiṣṇavī । tridhā mātrāsthitiryatra tatparaṃ jyotiromiti ॥
परम प्रकाशमान ओंकार की तीन मात्राओं में क्रिया, इच्छा और ज्ञान तथा ब्राह्मी, रौद्री एवं वैष्णवी शक्तियाँ विराजमान है॥ The ethereal light which is "Om", is that Atma in whose aspects stand "work" which is the power of Brahma, "desire" which is the power of Rudra and "wisdom" which is the power of Vishnu. 86
87.0
वचसा तज्जपेन्नित्यं वपुषा तत्समध्यसेत् । मनसा तज्जपेन्नित्यं तत्परं ज्योतिरोमिति ॥ ||८७||
vacasā tajjapennityaṃ vapuṣā tatsamadhyaset । manasā tajjapennityaṃ tatparaṃ jyotiromiti ॥
सदैव वाणी से उसका जप करे तथा शरीर से उसी के प्रति आचरण करना चाहिए। मन से उसी का जप करते हुए उसी परमप्रकाशरूप ओंकार में स्थिर हो जाए ॥ Because Om is the ethereal light, it has to be pronounced by words, practiced by the body and meditated upon by the mind. 87
88.0
शुचिर्वाप्यशुचिर्वापि यो जपेत्प्रणवं सदा। न स लिष्यति पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ ||८८||
śucirvāpyaśucirvāpi yo japetpraṇavaṃ sadā। na sa liṣyati pāpena padmapatramivāmbhasā॥
पवित्र या अपवित्र किसी भी अवस्था में ओंकार का जप करने वाला पाप-पंक में नहीं फँसता, संसार में वह जल से अलिप्त पद्मपत्र की तरह निर्लिप्त बना रहता है ।। The one who goes on chanting Pranava whether he is clean or unclean will not be attached to the sins he does, similar to the lotus leaf which never gets wet. 88
89.0
चले वाते चलो बिन्दुर्निश्चले निश्चलो भवेत्। योगी स्थाणुत्वमाप्नोति ततो वायुं निरुन्धयेत।। ||८९||
cale vāte calo bindurniścale niścalo bhavet।
जब तक वायु चलती रहेगी, तब तक बिन्दु भी चलायमान होगा, वायु के स्थिर हो जाने पर योगी स्थिरता (निश्चलता) को प्राप्त हो जाता है। इसलिए वायु की स्थिरता (प्राणायाम) का अभ्यास करना चाहिए ॥ not available
90.0
यावद्वायुः स्थितो देहे तावज्जीवोन मुञ्चति । मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायु निरुन्धयेत्॥ ||९०||
yāvadvāyuḥ sthito dehe tāvajjīvona muñcati । maraṇaṃ tasya niṣkrāntistato vāyu nirundhayet॥
शरीर में जब तक वायु विद्यमान है, तब तक शरीर में जीव स्थिर रहेगा। शरीर से वायु निकल जाना ही मृत्यु है, इस कारण वायु का निरोध (प्राणायाम) करना चाहिए ॥ not available
91.0
यावद्बद्धो मरुत् देहे तावज्जीवो न मुञ्चति । यावद्दृष्टिर्भ्रुवोर्मध्ये तावत्कालभयं कुतः ॥ ||९१||
yāvadbaddho marut dehe tāvajjīvo na muñcati । yāvaddṛṣṭirbhruvormadhye tāvatkālabhayaṃ kutaḥ ॥
जीव शरीर से तब तक नहीं निकल सकता, जब तक शरीर में वायु आबद्ध (स्थित) है, जो व्यक्ति दोनों भृकुटियों के बीच में दृष्टि को स्थिर रखता है, वह काल को जीत लेता है, उसे काल का भय कैसा ? ॥ not available
92.0
अल्पकालभयाद्ब्रह्मा प्राणायामपरो भवेत्। योगिनो मुनयश्चैव ततः प्राणान्निरोधयेत् ॥ ||९२||
alpakālabhayādbrahmā prāṇāyāmaparo bhavet। yogino munayaścaiva tataḥ prāṇānnirodhayet ॥
ब्रह्मा भी अल्प काल के भय से (अल्पायु से) मुक्ति पाने के लिए प्राणायाम करते हैं। इसलिए प्राण का निरोध करने के लिए योगियों और मुनियों को प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए ॥ not available
93.0
षड्विंशदङ्गुलिर्हंसः प्रयाणं कुरुते बहिः। वामदक्षिणमार्गेण प्राणायामो विधीयते ॥ ||९३||
ṣaḍviṃśadaṅgulirhaṃsaḥ prayāṇaṃ kurute bahiḥ। vāmadakṣiṇamārgeṇa prāṇāyāmo vidhīyate ॥
यह प्राण हंस रूप है, जो श्वास के माध्यम से छब्बीस अंगुल बाहर आता है। प्राणायाम नासिका के दोनों छिद्रों अर्थात् बायें-दायें मार्ग से करना चाहिए ॥ not available
94.0
शुद्धिमेति यदा सर्वं नाडीचक्कं मलाकुलम् । तदैव जायते योगी प्राणसंग्रहणक्षमः ॥ ||९४||
śuddhimeti yadā sarvaṃ nāḍīcakkaṃ malākulam । tadaiva jāyate yogī prāṇasaṃgrahaṇakṣamaḥ ॥
सभी प्रकार के मलों से नाड़ी चक्र के शुद्ध हो जाने पर योगी प्राणों का निरोध करने (प्राणायाम-सिद्ध होने) में समर्थ हो जाता है ।। not available
95.0
बद्धपद्मासनो योगी प्राणं चन्द्रेण पूरयेत्। थारयेद्वा यथाशक्त्या भूयः सूर्येण रेचयेत्।। ||९५||
baddhapadmāsano yogī prāṇaṃ candreṇa pūrayet। thārayedvā yathāśaktyā bhūyaḥ sūryeṇa recayet।।
योग का अभ्यास करने के लिए बद्ध पद्मासन लगाकर चन्द्र नाड़ी (बायें स्वर) के द्वारा वायु को भीतर खींचे-पूरक करे, पुनः कुछ समय भीतर रोके-कुम्भक करे फिर सूर्य नाड़ी (दायें स्वर) के द्वारा रेचन करे अर्थात् बाहर निकाले ॥ not available
96.0
अमृतोदधिसंकाशं गोक्षीरधवलोपमम्। ध्यात्वा चन्द्रमसं बिम्बं प्राणायामे सुखी भवेत्॥ ||९६||
amṛtodadhisaṃkāśaṃ gokṣīradhavalopamam। dhyātvā candramasaṃ bimbaṃ prāṇāyāme sukhī bhavet॥
प्राणायाम के समय अमृत समुद्र से निकले हुए गो-दुग्ध के समान श्वेत वर्ण के चन्द्रबिम्ब का ध्यान करने से साधक सुखी होता है ॥ not available
97.0
स्फुरत्प्रज्वलसंज्वालापूज्यमादित्यमण्डलम्। ध्यात्वा ह्यदि स्थितं योगी प्राणायामे सुखी भवेत्।। ||९७||
sphuratprajvalasaṃjvālāpūjyamādityamaṇḍalam। dhyātvā hyadi sthitaṃ yogī prāṇāyāme sukhī bhavet।।
पुनः हृदयकमल में स्थित प्रज्वलित ज्वालासदृश भगवान् सूर्य के ध्यान के साथ प्राणायाम करना योगी के लिए सुखदायी होता है ॥ not available
98.0
प्राणं चेदिडया पिबेन्नियमितं भूयोऽन्यथा रेचयेत्पीत्वा पिङ्गलया समीरणमथो बद्धवा त्यजेद्वामया। सूर्याचन्द्रमसोरनेन विधिना बिन्दुद्वयं ध्यायतः शुद्धा नाडिगणा भवन्ति यमिनो मासद्वयादूर्ध्वतः ॥ ||९८||
prāṇaṃ cediḍayā pibenniyamitaṃ bhūyo'nyathā recayetpītvā piṅgalayā samīraṇamatho baddhavā tyajedvāmayā। sūryācandramasoranena vidhinā bindudvayaṃ dhyāyataḥ śuddhā nāḍigaṇā bhavanti yamino māsadvayādūrdhvataḥ ॥
प्राणायाम में सर्वप्रथम इड़ा नाड़ी अर्थात् वायें स्वर से श्वास खींचे (पूरक करे) । पुनः पिंगला नाड़ी अर्थात् दायें स्वर से श्वास का रेचन करे (पुनः इसके विपरीत करे) । इस प्रकार प्राणायाम करते समय चन्द्र और सूर्य दोनों का पूर्व वर्णित तरीके से ध्यान का अभ्यास करने पर मात्र दो महीने में नाड़ीशोधन हो जाता है ।। not available
99.0
यथेष्टधारणं वायोरनलस्य प्रदीपनम्। नादाभिव्यक्तिरारोग्यं जायते नाडिशोधनात् ॥ ||९९||
yatheṣṭadhāraṇaṃ vāyoranalasya pradīpanam। nādābhivyaktirārogyaṃ jāyate nāḍiśodhanāt ॥
‘नाङ़ीशोधन प्राणायाम' करने से नाड़ी शुद्ध होने पर वायु को यथेष्ट धारण करने की क्षमता प्राप्त हो जाती है तथा आरोग्य के लाभ के साथ जठराग्नि प्रबल हो जाती है और दिव्यनाद सुनाई पड़ने लगता है ॥ not available
100.0
प्राणो देहस्थितो यावदपानं तु निरुन्धयेत्। एकश्वासमयी मात्रा ऊर्ध्वाधो गगने गतिः ।। ||१००||
prāṇo dehasthito yāvadapānaṃ tu nirundhayet। ekaśvāsamayī mātrā ūrdhvādho gagane gatiḥ ।।
प्राणायाम में कुंभक की स्थिति में जब तक वायु भीतर रुकी रहे, तब तक अपान वायु को भी रोके रखे। इस प्रकार हृदयाकाश में एक श्वास की मात्रा ऊपर और नीचे गमनशील होती है ॥ not available
101.0
रेचकः पूरकश्चैव कुम्भकः प्रणवात्मकः। प्राणायामो भवेदेवं मात्राद्वादशसंयुतः ॥ ||१०१||
recakaḥ pūrakaścaiva kumbhakaḥ praṇavātmakaḥ। prāṇāyāmo bhavedevaṃ mātrādvādaśasaṃyutaḥ ॥
प्राणायाम की पूरक, कुम्भक और रेचक ये तीनों क्रियाएँ साक्षात् प्रणव का ही रूप हैं (इस चिन्तन के साथ) द्वादश मात्रायुक्त प्राणायाम करना चाहिए ॥ not available
102.0
मात्राद्वादशसंयुक्तौ दिवाकरनिशाकरौ। दोषजालमबध्रन्तौ ज्ञातव्यौ योगिभिः सदा ।। ||१०२||
mātrādvādaśasaṃyuktau divākaraniśākarau। doṣajālamabadhrantau jñātavyau yogibhiḥ sadā ।।
सूर्य और चन्द्र का यह द्वादश मात्रा वाला प्राणायाम साधक के सभी दोषों को समाप्त कर देता है ।। not available
103.0
पूरकं द्वादशं कुर्यात्कुम्भकं षोडशं भवेत् । रेचकं दश चोंकारः प्राणायामः स उच्यते ॥ ||१०३||
pūrakaṃ dvādaśaṃ kuryātkumbhakaṃ ṣoḍaśaṃ bhavet । recakaṃ daśa coṃkāraḥ prāṇāyāmaḥ sa ucyate ॥
पूरक में द्वादश मात्रा, कुम्भक में षोडश मात्रा और रेचक में दस मात्रा के प्राणायाम को ओंकार प्राणायाम कहा जाता है।। Twelve repetitions of "Om" which is called is a pooraka followed by sixteen repetitions of "Om" which is called is the Kumbhaka and then ten repetitions of "Om" which is called Rechaka, is called Pranayama. 103
104.0
अधमे द्वादश मात्रा मध्यमे द्विगुणा मता। उत्तमे त्रिगुणा प्रोक्ता प्राणायामस्य निर्णयः ॥ ||१०४||
adhame dvādaśa mātrā madhyame dviguṇā matā। uttame triguṇā proktā prāṇāyāmasya nirṇayaḥ ॥
यह प्राणायाम द्वादश मात्रा का सामान्य कोटि का, इससे दुगुनी मात्रा का मध्यम स्तर का और उसकी तिगुनी अर्थात् छत्तीस मात्रा का प्राणायाम उत्तम कोटि का होता है।। The basic rule for chanting Pranayama is at least 12 times and is termed as poor, twice that amount (24) is medium and thrice that (36) is Uthama (best). 104
105.0
अधमे स्वेदजननं कम्पो भवति मध्यमे। उत्तमे स्थानमाप्नोति ततो वायुं निरुन्धयेत् ॥ ||१०५||
adhame svedajananaṃ kampo bhavati madhyame। uttame sthānamāpnoti tato vāyuṃ nirundhayet ॥
अधम अर्थात् सामान्य प्राणायाम पसीना लाने वाला होता है, मध्यम प्राणायाम में शरीर काँपने लगता है तथा उत्तम कोटि के प्राणायाम में शरीर आसन से ऊपर उठने लगता है, इसलिए इसी तरह का प्राणायाम करना चाहिए।। In the lowest, there would be sweating, in the medium there would be trembling and in Uthama there is attainment of the objective. After that control the breath. 105
106.0
बद्धपद्मासनो योगी नमस्कृत्य गुरु शिवम्। नासाग्रदृष्टिरेकाकी प्राणायाम समभ्यसेत् ॥ ||१०६||
baddhapadmāsano yogī namaskṛtya guru śivam। nāsāgradṛṣṭirekākī prāṇāyāma samabhyaset ॥
योग का अभ्यास करने के लिए एकान्त में बद्धपद्मासन लगाकर बैठे और शिवस्वरूप गुरु को नमस्कार करके नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाकर प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए ॥ The Yogi should first salute his teacher and Lord Shiva and sit in the lotus posture, concentrate his sight on the edge of the nose and practice pranayama alone. 106
107.0
द्वाराणां नव संनिरूध्य मरुतं बध्वा दृढ धारणां नीत्वा कालमपानवह्निसहितं शक्त्या समं चालितम्। आत्मध्यानयुतस्त्वनेन विधिना विन्यस्य मूर्ध्नि स्थिरं यावत्तिष्ठति तावदेव महतां सङ्गो न संस्तूयते ।। ||१०७||
dvārāṇāṃ nava saṃnirūdhya marutaṃ badhvā dṛḍha dhāraṇāṃ nītvā kālamapānavahnisahitaṃ śaktyā samaṃ cālitam। ātmadhyānayutastvanena vidhinā vinyasya mūrdhni sthiraṃ yāvattiṣṭhati tāvadeva mahatāṃ saṅgo na saṃstūyate ।।
जिन नव द्वारों से वायु का गमनागमन होता है, उनका विरोध करके वायु को रोके और अपान को अग्नि से मिलाकर ऊर्ध्वगामी बनाकर शक्तिचालिनी मुद्रा द्वारा कुण्डलिनी मार्ग से दृढ़तापूर्वक ऊपर मस्तिष्क में आत्मा के ध्यान के साथ स्थापित करे। जब तक यह स्थिर रहे, तब तक वह (अन्य) महापुरुष की संगति नहीं चाहता अर्थात् वह स्वयं सर्वश्रेष्ठ हो जाता है ॥ not available
108.0
प्राणायामो भवेदेवं पातकेन्धनपावकः। भवोदधिमहासेतुः प्रोच्यते योगिभिः सदा॥ ||१०८||
prāṇāyāmo bhavedevaṃ pātakendhanapāvakaḥ। bhavodadhimahāsetuḥ procyate yogibhiḥ sadā॥
संसार-सागर से मुक्ति के लिए यह प्राणायाम महासेतु के सदृश है और पाप रूपी ईंधन को जलाने वाले अग्नि की तरह है, ऐसा योगियों द्वारा प्रायः कहा जाता है।। not available
109.0
आसनेन रुजं हन्ति प्राणायामेन पातकम्। विकारं मानसं योगी प्रत्याहारेण मुञ्चति ॥ ||१०९||
āsanena rujaṃ hanti prāṇāyāmena pātakam। vikāraṃ mānasaṃ yogī pratyāhāreṇa muñcati ॥
योग के आसनों से (शारीरिक) रोग समाप्त होते हैं, प्राणायाम करने से पापों का विनाश होता है तथा प्रत्याहार करने से मानसरोग (विकार) समाप्त होते हैं॥ By posture one avoids diseases, by pranayama one avoids sins and by Pratyahara (see 120 below for explanation) he controls his mental activity. 109
110.0
धारणाभिर्मनोधैर्यं याति चैतन्यमद्भुतम्। समाधौ मोक्षमाप्नोति त्यक्त्वा कर्म शुभाशुभम् ॥ ||११०||
dhāraṇābhirmanodhairyaṃ yāti caitanyamadbhutam। samādhau mokṣamāpnoti tyaktvā karma śubhāśubham ॥
योग की धारणाशक्ति द्वारा योगी का मन धैर्यवान् बनता है, समाधि से जीव के शुभाशुभ कर्म समाप्त हो जाते हैं तथा मुक्ति मिल जाती है ॥ By beliefs, the mind becomes strong and Samadhi gives the being wonderful knowledge and he attains salvation after destroying sinful and holy actions. 110
111.0
प्राणायामद्विषट्केन प्रत्याहारः प्रकीर्तितः प्रत्याहारद्विषट्केन जायते धारणा शुभा॥ ||१११||
prāṇāyāmadviṣaṭkena pratyāhāraḥ prakīrtitaḥ pratyāhāradviṣaṭkena jāyate dhāraṇā śubhā॥
बारह बार प्राणायाम करने से प्रत्याहार की स्थिति बनती है तथा बारह बार इसी तरह प्रत्याहार करने से शुभफलदात्री धारणा की सिद्धि होती है। इसी प्रकार धारणा की द्वादश आवृत्ति पर ध्यान बनता है तथा द्वादश बार ध्यान होने पर समाधि अवस्था प्राप्त होती है, ऐसा योग के विशारदों का मत है ॥ not available
112.0
धारणा द्वादश प्रोक्तं ध्यानं योगविशारदैः। ध्यानद्वादशकेनैव समाधिरभिधीयते ॥ ||११२||
dhāraṇā dvādaśa proktaṃ dhyānaṃ yogaviśāradaiḥ। dhyānadvādaśakenaiva samādhirabhidhīyate ॥
बारह बार प्राणायाम करने से प्रत्याहार की स्थिति बनती है तथा बारह बार इसी तरह प्रत्याहार करने से शुभफलदात्री धारणा की सिद्धि होती है। इसी प्रकार धारणा की द्वादश आवृत्ति पर ध्यान बनता है तथा द्वादश बार ध्यान होने पर समाधि अवस्था प्राप्त होती है, ऐसा योग के विशारदों का मत है ॥ not available
113.0
यत्समाधौ परंज्योतिरनन्तं विश्वतोमुखम् । तस्मिन्दृष्टे क्रियाकर्म यातायातो न विद्यते ॥ ||११३||
yatsamādhau paraṃjyotiranantaṃ viśvatomukham । tasmindṛṣṭe kriyākarma yātāyāto na vidyate ॥
समाधि की स्थिति में साधक परमप्रकाशरूप अनन्त विश्वतोमुख अर्थात् सर्वत्र समभाव प्राप्त कर लेता है, इस स्थिति को प्राप्त होने पर न तो कुछ करना शेष रहता है, न किये हुए कर्म मनुष्य को बन्धन में डालते हैं, इससे आवागमन से छुटकारा मिल जाता है ॥ After seeing the Param Jyothi which is spread everywhere, in Samadhi duties and action neither come nor goes. 113
114.0
संबद्धासनमेढ्रमङिघ्रयुगलं कर्णाक्षिनासापुटद्वाराद्यङ्गुलिभिर्नियम्य पवनं वक्त्रेण वा पूरितम्। बध्वा वक्षसि बह्वपानसहितं मूर्ध्नि स्थिरं धारयेदेवं याति विशेषतत्त्वसमतां योगीश्वरास्तन्मनाः ॥ ||११४||
saṃbaddhāsanameḍhramaṅighrayugalaṃ karṇākṣināsāpuṭadvārādyaṅgulibhirniyamya pavanaṃ vaktreṇa vā pūritam।badhvā vakṣasi bahvapānasahitaṃ mūrdhni sthiraṃ dhārayedevaṃ yāti viśeṣatattvasamatāṃ yogīśvarāstanmanāḥ ॥
दोनों पैर की एड़ियों को मेढ्र अर्थात् सीवन स्थान में लगाकर आसन में दृढ़तापूर्वक बैठे, तत्पश्चात् आँख, कान एवं नाक को अँगुलियों से बन्द करे और मुँह से वायु खींचे। पुनः नीचे से अपान वायु को ऊर्ध्वगामी बनाए, फिर दोनों वायुओं को हृदय प्रदेश में रोके। पुनः ऊर्ध्वगामी बनाकर मस्तिष्क में स्थिर करके मन को उसी में लगाए, इस क्रिया से योगियों को विशेष समत्वभाव प्राप्त होता है ।। not available
115.0
गगनं पवने प्राप्ते ध्वनिरुत्पद्यते महान्। घण्टादीनां प्रवाद्यानां नादसिद्धिरुदीरिता ॥ ||११५||
gaganaṃ pavane prāpte dhvanirutpadyate mahān।ghaṇṭādīnāṃ pravādyānāṃ nādasiddhirudīritā ॥
ऊपर और नीचे दोनों ओर से गतिशील वायु जब आकाशमण्डल (हृदय प्रदेश) में स्थिर होती है, तब साधक को महान् ध्वनि सुनाई पड़ने लगती है, घण्टा आदि वाद्यों की तरह ध्वनि सुनाई पड़ती है तथा नादयोग की सिद्धि होती है ॥ not available
116.0
प्राणायामेन युक्तेन सर्वरोगक्षयो भवेत्। प्राणायामवियुक्तेभ्यः सर्वरोगसमुद्भवः ॥ ||११६||
prāṇāyāmena yuktena sarvarogakṣayo bhavet। prāṇāyāmaviyuktebhyaḥ sarvarogasamudbhavaḥ ॥
विधिवत् प्राणायाम के अभ्यास से सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है। प्राणायाम के न करने से यह शरीर रोगों का उत्पत्तिस्थान बना रहता है॥ If we stand together with Pranayama, all diseases would be destroyed. All diseases appear only to those who are not able to do Pranayama. 116
Text (part 3)
117.0
हिक्का कासस्तथा श्वासः शिरःकर्णाक्षिवेदनाः। भवन्ति विविधा रोगाः पवनव्यत्ययक्रमात्॥ ||११७||
hikkā kāsastathā śvāsaḥ śiraḥkarṇākṣivedanāḥ। bhavanti vividhā rogāḥ pavanavyatyayakramāt॥
वायु के विकृत होने के कारण ही खाँसी, श्वास, हिचकी, सिर, कान, आँख की पीड़ा होती है और नाना प्रकार के रोग पैदा होते हैं॥ not available
118.0
यथा सिंहो गजो व्याघ्रो भवेद्वश्यः शनैः शनैः। तथैव सेवितो वायुरन्यथा हन्ति साधकम्॥ ||११८||
yathā siṃho gajo vyāghro bhavedvaśyaḥ śanaiḥ śanaiḥ।tathaiva sevito vāyuranyathā hanti sādhakam॥
हाथी, सिंह, व्याघ्र आदि हिंस्त्र पशु जिस प्रकार से धीरे-धीरे अभ्यास के द्वारा वश में होते हैं, उसी तरह। प्राणवायु को शनैः-शनैः अभ्यास के द्वारा वश में करे। यदि साधक ऐसा नहीं कर पाता है, तो उसका विनाश हो जाता है ॥ not available
119.0
युक्तंयुक्तं त्यजेद्वायु युक्तंयुक्तं प्रपूरयेत् । युक्तंयुक्तं प्रबध्नीयादेवं सिद्धिमवाप्नुयात् ॥ ||११९||
yuktaṃyuktaṃ tyajedvāyu yuktaṃyuktaṃ prapūrayet । yuktaṃyuktaṃ prabadhnīyādevaṃ siddhimavāpnuyāt ॥
समुचित तरीके से प्राणवायु को खींचे, समुचित तरीके से प्राणवायु को बाहर निकाले तथा समुचित तरीके से ही प्राणवायु को रोकने से सिद्धि प्राप्त होती है ॥ not available
120.0
चरतां चक्षुरादीनां विषयेषु यथाक्रमम् । तत्प्रत्याहरणं तेषां प्रत्याहारः स उच्यते ॥ ||१२०||
caratāṃ cakṣurādīnāṃ viṣayeṣu yathākramam ।
आँख आदि इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों की ओर भागती हैं, उनको वहाँ से रोकना (और इष्ट साधना में लगाना) प्रत्याहार कहा जाता है।। Pratyahara is the state where sensory organs like the eye do not concern themselves with things outside but turn themselves inwards. 120
121.0
यथा तृतीयकाले तु रविः प्रत्याहरेत्प्रभाम्। तृतीयाङ्गस्थितो योगी विकारं मानसं हरेत् ॥ इत्युपनिषत् ॥ ||१२१||
yathā tṛtīyakāle tu raviḥ pratyāharetprabhām। tṛtīyāṅgasthito yogī vikāraṃ mānasaṃ haret ॥
जैसे-जैसे तृतीय प्रहर (सायंकाल) होता जाता है, वैसे ही सूर्य अपने प्रकाश को समेटता जाता है और सायंकाल को पूरी तरह समेट लेता है, ठीक उसी प्रकार योगी अपनी साधना का स्तर बढ़ाते हुए ( तीन अवस्था, तीन गुण, तीन शरीर से आगे बढ़ते हुए ) जब अपने तृतीयांग (उच्च योग के तृतीयांग-समाधि) में स्थित हो जाता है, तो वह अपने मन के समस्त विकारों का शमन कर लेता है। यही उपनिषद् (रहस्य विद्या) है॥ Similar to the Sun taking his rays inwards at the third period of dusk, the yogi who is in the third stage would control his mind. 121
Shanti Patha
Om! Let my limbs and speech, Prana, eyes, ears, vitality. And all the senses grow in strength. All existence is the Brahman of the Upanishads. May I never deny Brahman, nor Brahman deny me. Let there be no denial at all. Let there be no denial at least from me. May the virtues that are proclaimed in the Upanishads be in me, Who am devoted to the Atman; may they reside in me. Om! Let there be Peace in me! Let there be Peace in my environment! Let there be Peace in the forces that act on me!