Books / Akshi Upanishad

3. Akshi Upanishad

Text (part 1)

6.0

अनन्योद्वेगकारीणि मृदुकर्माणि सेवते । पापादिभेति सततं न च भोगमपेक्षते ।।

ananyodvegakārīṇi mṛdukarmāṇi sevate । pāpādibheti satataṃ na ca bhogamapekṣate ।।

Always one hesitates as regards the instinctive actions of the unregenerate; one never refers to what may compromise others, but attends to their righteous deeds. One does gentle deeds that pain none; always dreads sin and avoids all forms of sense-gratification.

जिन कृत्यों से किसी प्राणी को उत्तेजित न होना पड़े, ऐसे दया और उदारतापूर्ण सौम्य कर्मों को यह करता है। वह पाप से भयभीत रहता और भोग साधनों की अभिलाषा नहीं करता। यह ऐसी वाणी का प्रयोग करता है, जिसमें सहज स्नेह और प्रेम का प्राकट्य हो तथा जो मृदुल और औचित्यपूर्ण होने के साथ साथ देश, काल, पात्र के अनुकूल हो।।


7.0

स्नेहप्रणयगर्भाणि पेशलान्युचितानि च । देशकालोपपन्नानि वचनान्यभिभाषते ।।

snehapraṇayagarbhāṇi peśalānyucitāni ca । deśakālopapannāni vacanānyabhibhāṣate ।।

Such a one's speech is informed by affection and love; it is lovely and fit, with due regard to time and place.

जिन कृत्यों से किसी प्राणी को उत्तेजित न होना पड़े, ऐसे दया और उदारतापूर्ण सौम्य कर्मों को यह करता है। वह पाप से भयभीत रहता और भोग साधनों की अभिलाषा नहीं करता। यह ऐसी वाणी का प्रयोग करता है, जिसमें सहज स्नेह और प्रेम का प्राकट्य हो तथा जो मृदुल और औचित्यपूर्ण होने के साथ साथ देश, काल, पात्र के अनुकूल हो ।।


8.0

मनसा कर्मणा वाचा सज्जनानुपसेवते । यत:कुतश्चिदानीय नित्यं शास्त्राण्यवेक्षते ।।

manasā karmaṇā vācā sajjanānupasevate । yata:kutaścidānīya nityaṃ śāstrāṇyavekṣate ।।

With proper thought, act and speech, one waits upon the virtuous. Getting them from all conceivable sources, one studies the Shastras.

मन से, वचन से और कर्म से श्रेष्ठ पुरुषों का सत्संग करते हुए जहाँ कहीं से भी प्राप्त हो सके, प्रतिदिन सद्ग्रन्थों का अध्ययन करता है ।।


9.0

तदासौ प्रथमामेकां प्राप्तो भवति भूमिकाम्। एवं विचारवान्यः स्यात्संसारोत्तारणं प्रति ।।

tadāsau prathamāmekāṃ prāpto bhavati bhūmikām। evaṃ vicāravānyaḥ syātsaṃsārottāraṇaṃ prati ।।

Then one attains the first stage of Yoga. Whoever entertains such thoughts as regards the crossing of transmigratory life is said to have attained a state of Yoga. The rest are said to be just 'noble' (arya).

इस स्थिति में ही वह प्रथम भूमिका वाला कहलाता है। भवसागर से उस पार जाने की जो अभिलाषा करता है, वही इस प्रकार के विचार को प्राथमिकता देता है। वह भूमिकावन् कहा जाता है और शेष 'आर्य'( दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ) कहे जाते हैं। जो योग की दूसरी विचार भूमिका से युक्त हैं, उनके लक्षण इस प्रकार से हैं ) ।।


10.0

स भूमिकावानित्युक्तः शेषस्त्वार्य इति स्मृतः। विचारनाम्रीमितरामागतो योगभूमिकाम्।।

sa bhūmikāvānityuktaḥ śeṣastvārya iti smṛtaḥ। vicāranāmrīmitarāmāgato yogabhūmikām।।

Then one attains the first stage of Yoga. Whoever entertains such thoughts as regards the crossing of transmigratory life is said to have attained a state of Yoga. The rest are said to be just 'noble' (arya).

इस स्थिति में ही वह प्रथम भूमिका वाला कहलाता है। भवसागर से उस पार जाने की जो अभिलाषा करता है, वही इस प्रकार के विचार को प्राथमिकता देता है। वह भूमिकावन् कहा जाता है और शेष 'आर्य'( दूसरों की तुलना में श्रेष्ठ) कहे जाते हैं। जो योग की दूसरी विचार भूमिका से युक्त हैं, उनके लक्षण इस प्रकार से हैं ) ।।


11.0

श्रुतिस्मृतिसदाचारधारणाध्यानकर्मणः । मुख्यया व्याख्यया ख्यातञ्छ्रयति श्रेष्ठपण्डितान्।।

śrutismṛtisadācāradhāraṇādhyānakarmaṇaḥ । mukhyayā vyākhyayā khyātañchrayati śreṣṭhapaṇḍitān।।

Coming to the next stage of Yoga, called 'Analysis' (vichara), the sadhaka resorts to the foremost scholars, well-known for their serious interpretations of Sruti and Smriti, good conduct, fixed attention, contemplation and activities.

वह ऐसे ख्यातिलब्ध श्रेष्ठ विद्वानों का आश्रय ग्रहण करता है, जो श्रुति, स्मृति, सदाचार, धारणा और ध्यान की उत्तम व्याख्या के लिए अधिक चर्चित हो ।।


12.0

पदार्थप्रविभागज्ञः कार्याकार्यविनिर्णयम्। जानात्यधिगतश्चान्यो गृहं गृहपतिर्यथा ।।

padārthapravibhāgajñaḥ kāryākāryavinirṇayam। jānātyadhigataścānyo gṛhaṃ gṛhapatiryathā ।।

As a house-holder (knows) his homestead, (so), having mastered all that has to be learned, the sadhaka comes to know the categories, and the doctrines, vis-à-vis what has to be done and avoided.

वह पदार्थों के विभाग और पद को उचित रीति से जानता है तथा श्रवण करने योग्य सत्शास्त्रों में पारंगत हो जाने पर कर्तव्य अकर्तव्य के निर्णय में कुशल हो जाता है।


13.0

मदाभिमानमात्सर्यलोभमोहातिशायिताम्। बहिरप्यास्थितामीषत्त्यजत्यहिरिव त्वचम्।।

madābhimānamātsaryalobhamohātiśāyitām। bahirapyāsthitāmīṣattyajatyahiriva tvacam।।

As a snake sheds its Slough, so sheds he even a slight attachment to external objects when intensified by pride, conceit, intolerance, greed and delusion.

मद, अहंकार, मात्सर्य, लोभ और मोहादि की अधिकता उसके चित को डाँवाडोल नहीं करती, बाह्य आचरण में यत्किंचित् यदि उसकी स्थिति रहती है, तो उसका भी उसी प्रकार परित्याग कर देता है, जैसे साँप अपनी केंचुल को छोड़ देता है।


14.0

इत्थंभूतमतिः शास्त्रगुरुसज्जनसेवया । सरहस्यमशेषेण यथावदधिगच्छति ।।

itthaṃbhūtamatiḥ śāstragurusajjanasevayā । sarahasyamaśeṣeṇa yathāvadadhigacchati ।।

With a mind disciplined through devotion to the Shastras, teacher, and the company of the virtuous, he truthfully masters the entire body of knowledge including the secret doctrines.

इस प्रकार का सद्ज्ञान सम्पन्न साधक शास्त्र, गुरु और सत्पुरुषों के सेवा-सहयोग द्वारा रहस्यपूर्ण गूढ़ज्ञान को भी प्रयापूर्वक स्वाभाविक रूप में हस्तगत कर लेता है ।


15.0

असंसर्गाभिधामन्यां तृतीयां योगभूमिकाम्। ततः पतत्यसौ कान्तः पुष्पशय्यामिवामलाम्।।

asaṃsargābhidhāmanyāṃ tṛtīyāṃ yogabhūmikām। tataḥ patatyasau kāntaḥ puṣpaśayyāmivāmalām।।

Just as a lover repairs to a spotless bed of flowers, from the second, he (the sadhaka) proceeds to the third state styled Non-attachment.

इसके पश्चात् वह योग की असंसर्गनाम्नी तीसरी भूमिका में प्रवेश करता है-ठीक उसी प्रकार, जैसे कोई सुन्दर मनुष्य साफ-सुथरे फूलों के बिछौने पर अवस्थित होता है। शास्त्र जैसा अभिमत व्यक्त करते हैं, उसमें अपनी स्थिर मति को संयुक्त करके, तपस्वियों के आश्रम में वास करता हुआ अध्यात्म शास्त्र की चर्चा करते हुए (कष्टकर) पाषाण-शय्या पर आरूढ़ होते हुए ही वह सम्पूर्ण आयु बिता देता है। वह नीति पुरुष चित्त को शान्ति पहुँचाने वाले अधिक शोभाप्रद वन भूमि के विहार द्वारा विषयोपभोग से विरत होकर स्वाभाविक रूप में उपलब्ध सुख-साधनों को भोगता हुआ अपना जीवनयापन करता है। सद्ग्रन्थों के अभ्यास और पुण्य कर्मों के किये जाने से प्राणी की वास्तविक पर्यवेक्षण दृष्टि पवित्र होती है। इस तृतीय भूमिका को प्राप्त करके साधक स्वयमेव ज्ञानवान् होकर इस स्थिति का अनुभव करता है॥


16.0

यथावच्छास्त्रवाक्यार्थे मतिमाधाय निश्चलाम्। तापसाश्रमविश्रान्तैरध्यात्मकथनक्र मैः ।।

yathāvacchāstravākyārthe matimādhāya niścalām। tāpasāśramaviśrāntairadhyātmakathanakra maiḥ ।।

Fixing his steady mind on the truthful import of the Shastras and busy with the recitation of spiritual texts proper to the hermitages of the ascetics, he expends his long life, seated on a bed of stone or a slab, diverting himself with ramblings in the forest, made beautiful by his placid mind.

इसके पश्चात् वह योग की असंसर्गनाम्नी तीसरी भूमिका में प्रवेश करता है-ठीक उसी प्रकार, जैसे कोई सुन्दर मनुष्य साफ-सुथरे फूलों के बिछौने पर अवस्थित होता है। शास्त्र जैसा अभिमत व्यक्त करते हैं, उसमें अपनी स्थिर मति को संयुक्त करके, तपस्वियों के आश्रम में वास करता हुआ अध्यात्म शास्त्र की चर्चा करते हुए (कष्टकर) पाषाण-शय्या पर आरूढ़ होते हुए ही वह सम्पूर्ण आयु बिता देता है। वह नीति पुरुष चित्त को शान्ति पहुँचाने वाले अधिक शोभाप्रद वन भूमि के विहार द्वारा विषयोपभोग से विरत होकर स्वाभाविक रूप में उपलब्ध सुख-साधनों को भोगता हुआ अपना जीवनयापन करता है। सद्ग्रन्थों के अभ्यास और पुण्य कर्मों के किये जाने से प्राणी की वास्तविक पर्यवेक्षण दृष्टि पवित्र होती है। इस तृतीय भूमिका को प्राप्त करके साधक स्वयमेव ज्ञानवान् होकर इस स्थिति का अनुभव करता है॥


17.0

शिलाशय्याऽऽसनासीनो जरयत्यायुराततम्। वनावनिविहारेण चित्तोपशमशोभिना ।।

śilāśayyā''sanāsīno jarayatyāyurātatam। vanāvanivihāreṇa cittopaśamaśobhinā ।।

Fixing his steady mind on the truthful import of the Shastras and busy with the recitation of spiritual texts proper to the hermitages of the ascetics, he expends his long life, seated on a bed of stone or a slab, diverting himself with ramblings in the forest, made beautiful by his placid mind.

इसके पश्चात् वह योग की असंसर्गनाम्नी तीसरी भूमिका में प्रवेश करता है-ठीक उसी प्रकार, जैसे कोई सुन्दर मनुष्य साफ-सुथरे फूलों के बिछौने पर अवस्थित होता है। शास्त्र जैसा अभिमत व्यक्त करते हैं, उसमें अपनी स्थिर मति को संयुक्त करके, तपस्वियों के आश्रम में वास करता हुआ अध्यात्म शास्त्र की चर्चा करते हुए (कष्टकर) पाषाण-शय्या पर आरूढ़ होते हुए ही वह सम्पूर्ण आयु बिता देता है। वह नीति पुरुष चित्त को शान्ति पहुँचाने वाले अधिक शोभाप्रद वन भूमि के विहार द्वारा विषयोपभोग से विरत होकर स्वाभाविक रूप में उपलब्ध सुख-साधनों को भोगता हुआ अपना जीवनयापन करता है। सद्ग्रन्थों के अभ्यास और पुण्य कर्मों के किये जाने से प्राणी की वास्तविक पर्यवेक्षण दृष्टि पवित्र होती है। इस तृतीय भूमिका को प्राप्त करके साधक स्वयमेव ज्ञानवान् होकर इस स्थिति का अनुभव करता है॥


18.0

असङ्गसुखसौख्येन कालं नयति नीतिमान्। अभ्यासात्साधुशास्त्राणां करणात्पुण्यकर्मणाम्।।

asaṅgasukhasaukhyena kālaṃ nayati nītimān। abhyāsātsādhuśāstrāṇāṃ karaṇātpuṇyakarmaṇām।।

As a result of his meritorious actions, the righteous (sadhaka) passes his time in the delights of detachment, repeatedly studying the positive Shastras.

इसके पश्चात् वह योग की असंसर्गनाम्नी तीसरी भूमिका में प्रवेश करता है-ठीक उसी प्रकार, जैसे कोई सुन्दर मनुष्य साफ-सुथरे फूलों के बिछौने पर अवस्थित होता है। शास्त्र जैसा अभिमत व्यक्त करते हैं, उसमें अपनी स्थिर मति को संयुक्त करके, तपस्वियों के आश्रम में वास करता हुआ अध्यात्म शास्त्र की चर्चा करते हुए (कष्टकर) पाषाण-शय्या पर आरूढ़ होते हुए ही वह सम्पूर्ण आयु बिता देता है। वह नीति पुरुष चित्त को शान्ति पहुँचाने वाले अधिक शोभाप्रद वन भूमि के विहार द्वारा विषयोपभोग से विरत होकर स्वाभाविक रूप में उपलब्ध सुख-साधनों को भोगता हुआ अपना जीवनयापन करता है। सद्ग्रन्थों के अभ्यास और पुण्य कर्मों के किये जाने से प्राणी की वास्तविक पर्यवेक्षण दृष्टि पवित्र होती है। इस तृतीय भूमिका को प्राप्त करके साधक स्वयमेव ज्ञानवान् होकर इस स्थिति का अनुभव करता है॥


19.0

जन्तोर्यथावदेवेयं वस्तुदृष्टिः प्रसीदति । तृतीयां भूमिकां प्राप्य बुद्धोऽनुभवति स्वयम् ।।

jantoryathāvadeveyaṃ vastudṛṣṭiḥ prasīdati । tṛtīyāṃ bhūmikāṃ prāpya buddho'nubhavati svayam ।।

One's perception of reality becomes clear only in due course. The enlightened one, reaching the third stage, experiences this for himself.

इसके पश्चात् वह योग की असंसर्गनाम्नी तीसरी भूमिका में प्रवेश करता है-ठीक उसी प्रकार, जैसे कोई सुन्दर मनुष्य साफ-सुथरे फूलों के बिछौने पर अवस्थित होता है। शास्त्र जैसा अभिमत व्यक्त करते हैं, उसमें अपनी स्थिर मति को संयुक्त करके, तपस्वियों के आश्रम में वास करता हुआ अध्यात्म शास्त्र की चर्चा करते हुए (कष्टकर) पाषाण-शय्या पर आरूढ़ होते हुए ही वह सम्पूर्ण आयु बिता देता है। वह नीति पुरुष चित्त को शान्ति पहुँचाने वाले अधिक शोभाप्रद वन भूमि के विहार द्वारा विषयोपभोग से विरत होकर स्वाभाविक रूप में उपलब्ध सुख-साधनों को भोगता हुआ अपना जीवनयापन करता है। सद्ग्रन्थों के अभ्यास और पुण्य कर्मों के किये जाने से प्राणी की वास्तविक पर्यवेक्षण दृष्टि पवित्र होती है। इस तृतीय भूमिका को प्राप्त करके साधक स्वयमेव ज्ञानवान् होकर इस स्थिति का अनुभव करता है॥


20.0

द्विप्रकारमसंसर्ग तस्य भेदमिमं शृणु । द्विविधोऽयमसंसर्गः सामान्यः श्रेष्ठ एव च॥

dviprakāramasaṃsarga tasya bhedamimaṃ śṛṇu । dvividho'yamasaṃsargaḥ sāmānyaḥ śreṣṭha eva ca॥

Non-attachment is of two kinds: listen to the distinction as it is being drawn. This non-attachment is of two-kinds; one general and the other, superior.

असंसर्ग-सामान्य और श्रेष्ठ भेद से दो तरह का है। (उनके इस प्रकार के भेदों पर अब प्रकाश डालते हैं-) मैं न तो कर्ता, न भोक्ता, न बाध्य और न बाधक ही हूँ- इस प्रकार से विषयोपभोग में आसक्ति से रहित होने की भावना हो सामान्य असंसर्ग कहलाती है। सब कुछ पूर्वजन्म कृत कर्मों का प्रतिफल है या सब कुछ परमात्मा के अधीन है-ऐसी मान्यता रखना, सुख हो या दुःख इसमें मेरे किये गये कार्यों का अस्तित्व ही क्या है ? भोगसाधनों का अतिसंग्रह महारोगरूप है और समस्त वैभव परम आपत्तियों के स्वरूप हैं। सभी संयोगों को अन्तिम परिणति वियोग के रूप में है। मानसिक चिन्ताएँ अज्ञानग्रस्तों के लिए व्याधिरूप हैं। सभी क्षणभंगुर पदार्थ अनित्य हैं, सभी को काल-कराल अपना ग्रास बनाने में संलग्र है। (शास्त्रवचनों को जान लेने से उत्पन्न) अनास्था से मन में उनके अभाव को भावना को पैदा करता है, यह सामान्य असंसर्ग कहलाता है।।


21.0

नाहं कर्ता न भोक्ता च न बाध्यो न च बाधकः । इत्यसंजनमर्थेषु सामान्यासङ्गनामकम् ॥

nāhaṃ kartā na bhoktā ca na bādhyo na ca bādhakaḥ । ityasaṃjanamartheṣu sāmānyāsaṅganāmakam ॥

The general non-attachment is non-involvement in objects, (based on the perception) 'I am neither agent nor enjoyer, neither the sublater nor the sublated'.

असंसर्ग-सामान्य और श्रेष्ठ भेद से दो तरह का है। (उनके इस प्रकार के भेदों पर अब प्रकाश डालते हैं-) मैं न तो कर्ता, न भोक्ता, न बाध्य और न बाधक ही हूँ- इस प्रकार से विषयोपभोग में आसक्ति से रहित होने की भावना हो सामान्य असंसर्ग कहलाती है। सब कुछ पूर्वजन्म कृत कर्मों का प्रतिफल है या सब कुछ परमात्मा के अधीन है-ऐसी मान्यता रखना, सुख हो या दुःख इसमें मेरे किये गये कार्यों का अस्तित्व ही क्या है ? भोगसाधनों का अतिसंग्रह महारोगरूप है और समस्त वैभव परम आपत्तियों के स्वरूप हैं। सभी संयोगों को अन्तिम परिणति वियोग के रूप में है। मानसिक चिन्ताएँ अज्ञानग्रस्तों के लिए व्याधिरूप हैं। सभी क्षणभंगुर पदार्थ अनित्य हैं, सभी को काल-कराल अपना ग्रास बनाने में संलग्र है। (शास्त्रवचनों को जान लेने से उत्पन्न) अनास्था से मन में उनके अभाव को भावना को पैदा करता है, यह सामान्य असंसर्ग कहलाता है।।


22.0

प्राक्कर्मनिर्मितं सर्वमीश्वराधीनमेव वा । सुखं वा यदि वा दुःखं कैवात्र मम कर्तृता ॥

prākkarmanirmitaṃ sarvamīśvarādhīnameva vā । sukhaṃ vā yadi vā duḥkhaṃ kaivātra mama kartṛtā ॥

Everything, be it pleasure or pain, is fashioned by prior deeds; or, everything is under the sway of the Lord. I do nothing in regard to it'.

असंसर्ग-सामान्य और श्रेष्ठ भेद से दो तरह का है। (उनके इस प्रकार के भेदों पर अब प्रकाश डालते हैं-) मैं न तो कर्ता, न भोक्ता, न बाध्य और न बाधक ही हूँ- इस प्रकार से विषयोपभोग में आसक्ति से रहित होने की भावना हो सामान्य असंसर्ग कहलाती है। सब कुछ पूर्वजन्म कृत कर्मों का प्रतिफल है या सब कुछ परमात्मा के अधीन है-ऐसी मान्यता रखना, सुख हो या दुःख इसमें मेरे किये गये कार्यों का अस्तित्व ही क्या है ? भोगसाधनों का अतिसंग्रह महारोगरूप है और समस्त वैभव परम आपत्तियों के स्वरूप हैं। सभी संयोगों को अन्तिम परिणति वियोग के रूप में है। मानसिक चिन्ताएँ अज्ञानग्रस्तों के लिए व्याधिरूप हैं। सभी क्षणभंगुर पदार्थ अनित्य हैं, सभी को काल-कराल अपना ग्रास बनाने में संलग्र है। (शास्त्रवचनों को जान लेने से उत्पन्न) अनास्था से मन में उनके अभाव को भावना को पैदा करता है, यह सामान्य असंसर्ग कहलाता है।।


23.0

भोगाभोगा महारोगाः संपदः परमापदः । वियोगायैव संयोगा आधयो व्याधयोऽधियाम्॥

bhogābhogā mahārogāḥ saṃpadaḥ paramāpadaḥ । viyogāyaiva saṃyogā ādhayo vyādhayo'dhiyām॥

Enjoyments and non-enjoyments are dread diseases; possessions are great disasters. All contacts just promote separation. Sufferings are diseases of thoughts'.

असंसर्ग-सामान्य और श्रेष्ठ भेद से दो तरह का है। (उनके इस प्रकार के भेदों पर अब प्रकाश डालते हैं-) मैं न तो कर्ता, न भोक्ता, न बाध्य और न बाधक ही हूँ- इस प्रकार से विषयोपभोग में आसक्ति से रहित होने की भावना हो सामान्य असंसर्ग कहलाती है। सब कुछ पूर्वजन्म कृत कर्मों का प्रतिफल है या सब कुछ परमात्मा के अधीन है-ऐसी मान्यता रखना, सुख हो या दुःख इसमें मेरे किये गये कार्यों का अस्तित्व ही क्या है ? भोगसाधनों का अतिसंग्रह महारोगरूप है और समस्त वैभव परम आपत्तियों के स्वरूप हैं। सभी संयोगों को अन्तिम परिणति वियोग के रूप में है। मानसिक चिन्ताएँ अज्ञानग्रस्तों के लिए व्याधिरूप हैं। सभी क्षणभंगुर पदार्थ अनित्य हैं, सभी को काल-कराल अपना ग्रास बनाने में संलग्र है। (शास्त्रवचनों को जान लेने से उत्पन्न) अनास्था से मन में उनके अभाव को भावना को पैदा करता है, यह सामान्य असंसर्ग कहलाता है।।


24.0

कालश्च कलनोद्युक्तः सर्वभावाननारतम्। अनास्थयेति भावानां यदभावनमान्तरम्। वाक्यार्थल-ब्धमनसः सामान्योऽसावसङ्गमः॥

kālaśca kalanodyuktaḥ sarvabhāvānanāratam। anāsthayeti bhāvānāṃ yadabhāvanamāntaram। vākyārthala-bdhamanasaḥ sāmānyo'sāvasaṅgamaḥ॥

Time is ceaselessly fashioning all things' - so the general non-attachment of (the sadhaka) who has grasped the import of (the major texts) consists in being averse to all things and in not dwelling on them mentally.

असंसर्ग-सामान्य और श्रेष्ठ भेद से दो तरह का है। (उनके इस प्रकार के भेदों पर अब प्रकाश डालते हैं-) मैं न तो कर्ता, न भोक्ता, न बाध्य और न बाधक ही हूँ- इस प्रकार से विषयोपभोग में आसक्ति से रहित होने की भावना हो सामान्य असंसर्ग कहलाती है। सब कुछ पूर्वजन्म कृत कर्मों का प्रतिफल है या सब कुछ परमात्मा के अधीन है-ऐसी मान्यता रखना, सुख हो या दुःख इसमें मेरे किये गये कार्यों का अस्तित्व ही क्या है ? भोगसाधनों का अतिसंग्रह महारोगरूप है और समस्त वैभव परम आपत्तियों के स्वरूप हैं। सभी संयोगों को अन्तिम परिणति वियोग के रूप में है। मानसिक चिन्ताएँ अज्ञानग्रस्तों के लिए व्याधिरूप हैं। सभी क्षणभंगुर पदार्थ अनित्य हैं, सभी को काल-कराल अपना ग्रास बनाने में संलग्र है। (शास्त्रवचनों को जान लेने से उत्पन्न) अनास्था से मन में उनके अभाव को भावना को पैदा करता है, यह सामान्य असंसर्ग कहलाता है।।


25.0

अनेन क़मयोगेन संयोगेन महात्मनाम् । नाहं कर्तेश्वरः कर्ता कर्म वा प्राक्तनं मम ||

anena ka़mayogena saṃyogena mahātmanām । nāhaṃ karteśvaraḥ kartā karma vā prāktanaṃ mama॥

By cultivating this sequence (of stages), the superior non-attachment in the case of the magnanimous (sadhakas) supervenes. It is said to be silence, repose and quiescence. For speech and import have been flung far away in the light of the truth, 'I am no agent; the agent is God or my own prior actions'.

इस प्रकार महान् पुरुषों के निरन्तर सत्संग से जो यह कहे कि मैं कर्ता नहीं, ईश्वर ही कर्ता है या मेरे पूर्व जन्म में किए गये कर्म ही कर्ता हैं। इस प्रकार से समस्त चिन्ताओं और शब्द-अर्थ के भाव को विसर्जित कर देने के पश्चात् जो मौन (मन-इन्द्रियों का संयम), आसन (आन्तरिक अवस्था) और शान्त भाव (बाहरी भावों के विस्मरण) की प्राप्ति होती है, वह श्रेष्ठ असंसर्ग कहा जाता है॥


26.0

कृत्वा दूरतरे नूनमिति शब्दार्थभावनम्। यन्मौनमासनं शान्तं तच्छृष्ठासङ्ग उच्यते॥

kṛtvā dūratare nūnamiti śabdārthabhāvanam। yanmaunamāsanaṃ śāntaṃ tacchṛṣṭhāsaṅga ucyate॥

By cultivating this sequence (of stages), the superior non-attachment in the case of the magnanimous (sadhakas) supervenes. It is said to be silence, repose and quiescence. For speech and import have been flung far away in the light of the truth, 'I am no agent; the agent is God or my own prior actions'.

इस प्रकार महान् पुरुषों के निरन्तर सत्संग से जो यह कहे कि मैं कर्ता नहीं, ईश्वर ही कर्ता है या मेरे पूर्व जन्म में किए गये कर्म ही कर्ता हैं। इस प्रकार से समस्त चिन्ताओं और शब्द-अर्थ के भाव को विसर्जित कर देने के पश्चात् जो मौन (मन-इन्द्रियों का संयम), आसन (आन्तरिक अवस्था) और शान्त भाव (बाहरी भावों के विस्मरण) की प्राप्ति होती है, वह श्रेष्ठ असंसर्ग कहा जाता है॥


27.0

संतोषामोदमधुरा प्रथमोदेति भूमिका । भूमिप्रोदितमात्रोऽन्तरमृताङ्करिकेव सा ॥

saṃtoṣāmodamadhurā prathamodeti bhūmikā । bhūmiproditamātro'ntaramṛtāṅkarikeva sā ॥

The first stage that occurs is sweet on account of the satisfaction and joy (that attend it). The sadhaka (puman) has just stepped into the sequence of states. The first is an ambrosial sprout.

अन्त:करण की भूमि में अमृत के छोटे अंकुर के प्रस्फुटन की तरह ही सन्तोष और आह्लादप्रद होने से मधुर प्रतीत होने वाली प्रथम भूमिका का अभ्युदय होता है। इसके उत्पन्न होते ही अन्तरंग में शेष भूमिकाओं के लिए भूमि तैयार हो जाती है। इसके बाद होने वाली दूसरी एवं तीसरी भूमिका में भी साधक कुशलता प्राप्त कर लेता है। इस तीसरी भूमिका को इसलिए सर्वोत्कृष्टता की श्रेणी में गिना गया है; क्योंकि इसमें साधक सभी संकल्पजन्य वृत्तियों को पूर्णतः त्याग देता है। अद्वैतभाव की दृढ़भावना से द्वैतभाव स्वत: समाप्त हो जाता है। चौथी भूमिका को प्राप्त साधक इस लोक को स्वप्न की तरह स्वीकार करता है ॥


28.0

एषा हि परिमष्टान्तरन्यासां प्रसवैकभूः। द्वितीयां च तृतीयां च भूमिकां प्राप्नयात्ततः ॥

eṣā hi parimaṣṭāntaranyāsāṃ prasavaikabhūḥ। dvitīyāṃ ca tṛtīyāṃ ca bhūmikāṃ prāpnayāttataḥ ॥

The first stage is the internal, cleansed, birth-place of the other stages. Thence one attains the second and third stages.

अन्त:करण की भूमि में अमृत के छोटे अंकुर के प्रस्फुटन की तरह ही सन्तोष और आह्लादप्रद होने से मधुर प्रतीत होने वाली प्रथम भूमिका का अभ्युदय होता है। इसके उत्पन्न होते ही अन्तरंग में शेष भूमिकाओं के लिए भूमि तैयार हो जाती है। इसके बाद होने वाली दूसरी एवं तीसरी भूमिका में भी साधक कुशलता प्राप्त कर लेता है। इस तीसरी भूमिका को इसलिए सर्वोत्कृष्टता की श्रेणी में गिना गया है; क्योंकि इसमें साधक सभी संकल्पजन्य वृत्तियों को पूर्णतः त्याग देता है। अद्वैतभाव की दृढ़भावना से द्वैतभाव स्वत: समाप्त हो जाता है। चौथी भूमिका को प्राप्त साधक इस लोक को स्वप्न की तरह स्वीकार करता है ॥


29.0

श्रेष्ठा सर्वगता ह्येषा तृतीया भूमिकात्र हि। भवति प्रोज्झिताशेषसंकल्पकलनः पुमान्॥

śreṣṭhā sarvagatā hyeṣā tṛtīyā bhūmikātra hi। bhavati projjhitāśeṣasaṃkalpakalanaḥ pumān॥

Among these, the all-pervading third (stage) is superior. Here the sadhaka has outgrown all proneness to imagine (and get ensnared).

अन्त:करण की भूमि में अमृत के छोटे अंकुर के प्रस्फुटन की तरह ही सन्तोष और आह्लादप्रद होने से मधुर प्रतीत होने वाली प्रथम भूमिका का अभ्युदय होता है। इसके उत्पन्न होते ही अन्तरंग में शेष भूमिकाओं के लिए भूमि तैयार हो जाती है। इसके बाद होने वाली दूसरी एवं तीसरी भूमिका में भी साधक कुशलता प्राप्त कर लेता है। इस तीसरी भूमिका को इसलिए सर्वोत्कृष्टता की श्रेणी में गिना गया है; क्योंकि इसमें साधक सभी संकल्पजन्य वृत्तियों को पूर्णतः त्याग देता है। अद्वैतभाव की दृढ़भावना से द्वैतभाव स्वत: समाप्त हो जाता है। चौथी भूमिका को प्राप्त साधक इस लोक को स्वप्न की तरह स्वीकार करता है ॥


30.0

भूमिकात्रितयाभ्यासादज्ञाने क्षयमागते । समं सर्वत्र पश्यन्ति चतुर्थी भूमिकां गताः॥

bhūmikātritayābhyāsādajñāne kṣayamāgate । samaṃ sarvatra paśyanti caturthī bhūmikāṃ gatāḥ॥

Those who reach the fourth (stage) after the dwindling of nescience through the exercises of the three stages look on all things with the same eye.

अन्त:करण की भूमि में अमृत के छोटे अंकुर के प्रस्फुटन की तरह ही सन्तोष और आह्लादप्रद होने से मधुर प्रतीत होने वाली प्रथम भूमिका का अभ्युदय होता है। इसके उत्पन्न होते ही अन्तरंग में शेष भूमिकाओं के लिए भूमि तैयार हो जाती है। इसके बाद होने वाली दूसरी एवं तीसरी भूमिका में भी साधक कुशलता प्राप्त कर लेता है। इस तीसरी भूमिका को इसलिए सर्वोत्कृष्टता की श्रेणी में गिना गया है; क्योंकि इसमें साधक सभी संकल्पजन्य वृत्तियों को पूर्णतः त्याग देता है। अद्वैतभाव की दृढ़भावना से द्वैतभाव स्वत: समाप्त हो जाता है। चौथी भूमिका को प्राप्त साधक इस लोक को स्वप्न की तरह स्वीकार करता है ॥


31.0

अद्वैते स्थैर्यमायाते दैते च प्रशमं गते । पश्यन्ति स्वप्नवल्लोकं चतुर्थी भूमिकां गताः ॥

advaite sthairyamāyāte daite ca praśamaṃ gate । paśyanti svapnavallokaṃ caturthī bhūmikāṃ gatāḥ ॥

When non-duality is established and duality dissolved, those who have reached the fourth stage look upon the phenomenal world as a dream.

अन्त:करण की भूमि में अमृत के छोटे अंकुर के प्रस्फुटन की तरह ही सन्तोष और आह्लादप्रद होने से मधुर प्रतीत होने वाली प्रथम भूमिका का अभ्युदय होता है। इसके उत्पन्न होते ही अन्तरंग में शेष भूमिकाओं के लिए भूमि तैयार हो जाती है। इसके बाद होने वाली दूसरी एवं तीसरी भूमिका में भी साधक कुशलता प्राप्त कर लेता है। इस तीसरी भूमिका को इसलिए सर्वोत्कृष्टता की श्रेणी में गिना गया है; क्योंकि इसमें साधक सभी संकल्पजन्य वृत्तियों को पूर्णतः त्याग देता है। अद्वैतभाव की दृढ़भावना से द्वैतभाव स्वत: समाप्त हो जाता है। चौथी भूमिका को प्राप्त साधक इस लोक को स्वप्न की तरह स्वीकार करता है ॥


32.0

भूमिकात्रितयं जाग्रच्चतुर्थी स्वप्न उच्यते । चित्तं तु शरदभ्रांशविलयं प्रविलीयते ।।

bhūmikātritayaṃ jāgraccaturthī svapna ucyate । cittaṃ tu śaradabhrāṃśavilayaṃ pravilīyate ।।

The first three states are said to be the waking state; the fourth is called the dream state. And the mind dissolves like the fragments of an autumnal cloud.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


33.0

सत्त्वावशेष एवास्ते पञ्चमी भूमिकां गतः । जगद्विकल्पो नोदेति चित्तस्यात्र विलापनात्॥

sattvāvaśeṣa evāste pañcamī bhūmikāṃ gataḥ । jagadvikalpo nodeti cittasyātra vilāpanāt॥

He who reaches the fifth stage survives but as bare being. Due to the dissolution of the mind in this stage the world-manifold does not present itself at all.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


34.0

पञ्चमीं भूमिकामेत्य सुषप्तपदनामिकाम् । शान्ताशेषविशेषांशस्तिष्ठत्यद्वैतमात्रकः ॥

pañcamīṃ bhūmikāmetya suṣaptapadanāmikām । śāntāśeṣaviśeṣāṃśastiṣṭhatyadvaitamātrakaḥ ॥

Reaching the fifth stage called 'deep sleep', the sadhaka remains as pure non-dual being, all particulars having completely vanished.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


35.0

गलितद्वैतनिर्भासो मुदितोऽन्तःप्रबोधवान् । सुषुप्तघन एवास्ते पञ्चमी भूमिकां गताः ।।

galitadvaitanirbhāso mudito'ntaḥprabodhavān । suṣuptaghana evāste pañcamī bhūmikāṃ gatāḥ ।।

Having reached the fifth stage, one stays consolidated in deep sleep, joyful, inwardly awake, all dual appearances gone.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


36.0

अन्तर्मुखतया तिष्ठन्बहिर्वृत्तिपरोऽपि सन् । परिश्रान्ततया नित्यं निहारित लभ्यते ।।

antarmukhatayā tiṣṭhanbahirvṛttiparo'pi san । pariśrāntatayā nityaṃ nihārita labhyate ।।

Looking inwards, even when attending to outer things, he appears always indrawn, being extremely exhausted.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


37.0

कुर्वन्नभ्यासमेतस्यां भूमिकायां विवासनः । षष्ठीं तुर्याभिधामन्यां क्रमापतति भूमिकाम्।।

kurvannabhyāsametasyāṃ bhūmikāyāṃ vivāsanaḥ । ṣaṣṭhīṃ turyābhidhāmanyāṃ kramāpatati bhūmikām।।

Practicing in this fifth stage, free from all innate impulses, one reaches, as a matter of course, the sixth stage named 'the Fourth'.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥

Text (part 2)

38.0

यत्र नासन्नसनूपो नाहं नाप्यनहंकृतिः । केवलं क्षीणमननमास्तेऽद्वतेऽतिनिर्भयः ॥

yatra nāsannasanūpo nāhaṃ nāpyanahaṃkṛtiḥ । kevalaṃ kṣīṇamananamāste'dvate'tinirbhayaḥ ॥

Where there is neither the non-existent nor the existent, neither the 'I' nor the non-'I', with all analytic thinking gone, one stays alone, totally fearless, in non-duality.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


39.0

निर्गन्धिः शान्तसंदेहो जीवन्मुक्तो विभावनः। अनिर्वाणोऽपि निर्वाणश्चिदीप इव स्थितः ।।

nirgandhiḥ śāntasaṃdeho jīvanmukto vibhāvanaḥ। anirvāṇo'pi nirvāṇaścidīpa iva sthitaḥ ।।

Beyond knots, with all doubt vanquished, liberated in life, devoid of imaginations, though un-extinguished yet extinguished, he is like a painted flame.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


40.0

षष्ठयां भूमावसौ स्थित्वा सप्तमीं भूमिमाप्नुयात्। विदेहमुक्तताऽत्रोक्ता सप्तमी योगभूमिका ।।

ṣaṣṭhayāṃ bhūmāvasau sthitvā saptamīṃ bhūmimāpnuyāt। videhamuktatā'troktā saptamī yogabhūmikā ।।

Having dwelt in the sixth stage, he shall reach the seventh. The state of disembodied liberation is called the seventh stage of Yoga.

प्रारम्भिक तीन भूमिकायें जागत् स्वरूपा हैं तथा चौथी भूमिका स्वप्न कही जाती है। पंचम भूमिका में आरुढ़ होने पर साधक का चित्त शरद्ऋतु के बादलों की तरह विलीन हो जाता है, मात्र सत्तव ही शेष बचता है। चित्त के विलीन हो जाने से जागतिक विकल्पों का अभ्युदय नहीं होता। सुषुप्तद नाम की इस पंचम भूमिका में सम्पूर्ण विभेद शान्त हो जाने पर साधक मात्र अद्वैत अवस्था में ही अवस्थित रहता है। द्वैत के समाप्त हो जाने से आत्मबोध से युक्त हर्षित हुआ साधक पंचम भूमिका में जाकर सुषुप्तघन (आनन्दप्रद अवस्था) को प्राप्त कर लेता है। वह बहिर्मुखी व्यवहार करते हुए भी हमेशा अन्तर्मुखी ही रहता है तथा सदा थके हुए की तरह निद्रातुर सा दिखता है। इस भूमिका में कुशलता हासिल करते हुए वासनाविहीन होकर वह साधक क्रमशः तुर्या नाम याली छठी भूमिका में प्रविष्ट होता है। जहाँ सत्-असत् का अभाव है, अहंकार-अनहंकार भी नहीं है तथा विशुद्ध अद्वैत स्थिति में मननात्मक वृत्ति से रहित होने पर वह अत्यन्त निर्भयता को प्राप्त करता है। हृदय ग्रन्थियों के उद्घाटित होने पर संशय मिट जाते हैं। जीवन्मुक्त होकर उसकी भावशून्यता की सी स्थिति रहती है। निर्वाण को उपलब्ध न किये जाने पर भी उसकी स्थिति निर्वाण पद को प्राप्त साधक जैसी हो जाती है। उस समय यह निश्चेष्ट दीपक की तरह निश्चल रहता है। छठी भूमिका के पश्चात् वह सातवीं भूमिका की स्थिति प्राप्त करता है, विदेह-मुक्त की स्थिति ही सातवीं भूमिका कही गयी है॥


41.0

अगम्या वचसां शान्ता सा सीमा सर्वभूमिषु । लोकानुवर्तनं त्यक्त्वा त्यक्त्वा देहानुवर्तनम् ॥

agamyā vacasāṃ śāntā sā sīmā sarvabhūmiṣu । lokānuvartanaṃ tyaktvā tyaktvā dehānuvartanam ॥

This is the acme of all stages, beyond words, quiescent. Avoiding conformity with the ways of the world, and the ways of the body, avoiding conformity with Shastras, get rid of all super-impositions on the Self.

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हुँ, ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ।।


42.0

शास्त्रानुवर्तनं त्यक्त्वा स्वाध्यासापनयं कुरु। ओंकारमात्रमखिलं विश्वप्राङ्गादिलक्षणम्॥

śāstrānuvartanaṃ tyaktvā svādhyāsāpanayaṃ kuru। oṃkāramātramakhilaṃ viśvaprāṅgādilakṣaṇam॥

This is the acme of all stages, beyond words, quiescent. Avoiding conformity with the ways of the world, and the ways of the body, avoiding conformity with Shastras, get rid of all super-impositions on the Self. All that is (here), the vishva, the prajna, etc., is nothing but Om.

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हुँ, ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ।।


43.0

वाच्यवाचकताभेदात् भेदेनानुपलब्धितः । अकारमात्रं विश्वः स्यादुकारस्तेजसः स्मृतः॥

vācyavācakatābhedāt bhedenānupalabdhitaḥ । akāramātraṃ viśvaḥ syādukārastejasaḥ smṛtaḥ॥

Because there is non-difference between import and expression, and because, as distinct from each other, neither of these two is known, the Vishva is just the letter 'a' and 'u' is said to be the Taijasa.

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हुँ, ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ।।


44.0

प्राज्ञो मकार इत्येवं परिपश्येत्क्रमेण तु । समाधिकालात्प्रागेव विचिन्त्यातिप्रयत्नतः ।।

prājño makāra ityevaṃ paripaśyetkrameṇa tu ।samādhikālātprāgeva vicintyātiprayatnataḥ ।।

The Prajna is the letter 'm'. Thus know in order, discriminating with great effort, before Concentration (Samadhi) sets in.

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हुँ, ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ।।


45.0

स्थूलसूक्ष्मक्रमात्सर्वं चिदात्मनि विलापयेत् । चिदात्मानं नित्यशुद्धबुद्धमुक्तसदद्वयः ॥

sthūlasūkṣmakramātsarvaṃ cidātmani vilāpayet । cidātmānaṃ nityaśuddhabuddhamuktasadadvayaḥ ॥

In this due order the concrete and the subtle should all be dissolved in the spiritual Self and the spiritual Self (should be dissolved) perceiving 'I am the Om Vasudeva, ever pure, awake, free, existent, non-dual massed and supreme bliss'; because all this (objective world) is pain in the beginning, middle and end.

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हुँ, ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ।।


46.0

परमानन्दसंदोहो वासुदेवोऽहमोमिति । आदिमध्यावसानेषु दुःखं सर्वमिदं यतः ।।

paramānandasaṃdoho vāsudevo'hamomiti । ādimadhyāvasāneṣu duḥkhaṃ sarvamidaṃ yataḥ ।।

In this due order the concrete and the subtle should all be dissolved in the spiritual Self and the spiritual Self (should be dissolved) perceiving 'I am the Om Vasudeva, ever pure, awake, free, existent, non-dual massed and supreme bliss'; because all this (objective world) is pain in the beginning, middle and end.

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हुँ, ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ।।


47.0

तस्मात्सर्वं परित्यज्य तत्त्वनिष्ठो भवानघ। अविद्यातिमिरातीतं सर्वाभासविवर्जितम्।।

tasmātsarvaṃ parityajya tattvaniṣṭho bhavānagha। avidyātimirātītaṃ sarvābhāsavivarjitam।।

Therefore, thou sinless one, renouncing everything, be devoted to Truth. Think: I am Brahman, solid Intelligence and Bliss, free from impurity, holy, lifted above mind and words, beyond the darkness of ignorance, beyond all appearances. This is the secret doctrine. Om! May He protect us both together; may He nourish us both together; May we work conjointly with great energy, May our study be vigorous and effective; May we not mutually dispute (or may we not hate any). Om! Let there be Peace in me! Let there be Peace in my environment! Let there be Peace in the forces that act on me!

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास से रहित, आनन्दरूप, मलरहित, शुद्ध, मन और वाणी से अगोचर, प्रज्ञानघन, आनन्दस्वरूप ब्रह्म हुँ, ऐसी भावना करे। यही उपनिषद् (रहस्यमयी विद्या) है ।।


48.0

आनन्दममलं शुद्धं मनोवाचामगोचरम्। प्रज्ञानघनमानन्दं ब्रह्मास्मीति विभावयेत्। इत्युपनिषत्

ānandamamalaṃ śuddhaṃ manovācāmagocaram। prajñānaghanamānandaṃ brahmāsmīti vibhāvayet। ityupaniṣat ।।

Therefore, thou sinless one, renouncing everything, be devoted to Truth. Think: I am Brahman, solid Intelligence and Bliss, free from impurity, holy, lifted above mind and words, beyond the darkness of ignorance, beyond all appearances. This is the secret doctrine. Om! May He protect us both together; may He nourish us both together; May we work conjointly with great energy, May our study be vigorous and effective; May we not mutually dispute (or may we not hate any). Om! Let there be Peace in me! Let there be Peace in my environment! Let there be Peace in the forces that act on me!

यह भूमिका परम शान्त की हैं तथा वाणी की सामर्थ्य से अवर्णनीय है। यह सब भूमिकाओं की सीमारूप है तथा यहाँ सम्पूर्ण योग भूमिकाओं की समाप्ति है। लोकाचार, देहाचार और शास्त्रानुगमन को छोड़कर अपने अध्यास को नष्ट करे । विश्व, प्राज्ञ और तैजस के रूप में यह समस्त विश्व ' ॐ कार' स्वरूप ही है । वाच्य और वाचक में अभेदता रहती है और भेद होने पर इसकी उपलब्धि सम्भव नहीं। इन्हें क्रमशः इस प्रकार जाने-प्रणव की प्रथम मात्रा 'अकार विश्व, उकार तैजस और मकार प्राज्ञ रूप है। समाधिकाल से पहले विशेष प्रयासपूर्वक इस सम्बन्ध में चिन्तन-मनन करके स्थूल और सूक्ष्म से क्रमशः सब कुछ चिदात्मा में विलीन करे। चिदात्मा का स्व-स्वरूप स्वीकार करते हुए ऐसा दृढ़ विश्वास करे- मैं ही नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, सत्तारूप, अद्वितीय, परमानन्द सन्दोह रूप एवं वासुदेव प्रणव ॐ कार हूँ। चूँकि आदि, मध्य और अन्त में यह सम्पूर्ण प्रपञ्च दुःख देने वाला ही है, इसलिए हे निष्पाप ! सबका परित्याग करके तत्त्वनिष्ठ बने। मैं अज्ञानरूपी अन्धकार से अतीत, सभी प्रकार के आभास