10. Bhagavad Gita — Chapter 10
Chapter 10 (Part 1)
【 Verse 10.1 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वच: | यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṁ vacaḥ | yatte’haṁ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Lord Kṛṣṇa says; bhūyaḥ: again; eva: surely; mahābāho: mighty-armed; śṛṇu: hear; me: My; paramaṁ: supreme; vacaḥ: words; yat: that which; te: to you; ahaṁ: I; prīyamāṇāya: dear to Me; vakṣyāmi: say; hita- kāmyayā: with the desire for your benefit.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.1 Lord Kṛṣṇa says: Listen carefully again, Oh mighty-armed Arjuna! Because you are My dear friend, I shall speak further on the Supreme knowledge for your welfare.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.1।।श्रीभगवान् बोले -- हे महाबाहो अर्जुन मेरे परम वचनको तुम फिर सुनो? जिसे मैं तुम्हारे हितकी कामनासे कहूँगा क्योंकि तुम मेरेमें अत्यन्त प्रेम रखते हो।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.1।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे महाबाहो पुन तुम मेरे परम वचनों का श्रवण करो? जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.1 भूयः again? एव verily? महाबाहो O mightyarmed? श्रृणु hear? मे My? परमम् supreme? वचः word? यत् which? ते to thee? अहम् I? प्रीयमाणाय who art beloved? वक्ष्यामि (I) will declare? हितकाम्यया wishing (thy) welfare.Commentary I shall repeat what I said before (in the seventh and the ninth discourses). My essential nature and My manifestations have already been pointed out. As it is very difficult to understand the divine nature? I shall describe it once more to you? although it has been described already. I shall tell you of the divine glories and point out in which forms of being I should be thought of.I will speak to you as you are delighted to hear Me. Now your heart is taking delight in Me.The Lord wants to encourage Arjuna and cheer him up and so He Himself comes forward to give instructions to Arjuna even without his reest.Paramam Vachah supreme word. Paramam means supreme? revealing the unsurpassed truth (Niratisaya Vastu which is Brahman).O Arjuna You are immensely delighted with My speech? as if you are drinking the immortalising nectar.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.1. The Bhagavat said O mighty-armed [Arjuna] ! Yet, again listen to My best message, which, with good intention, I shall declare to you, who are dear to Me.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.1 "Lord Shri Krishna said: Now, O Prince! Listen to My supreme advice, which I give thee for the sake of thy welfare, for thou art My beloved.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.1 The Lord said Further said, O Arjuna, listen to My Supreme word. Desirous of your good, I shall speak to you who love Me.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.1 The Blessed Lord said O mighty-armed one, listen over again ot My supreme utterance, which I, wishing your welfare, shall speak to you who take delight (in it).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.1 The Blessed Lord said Again, O mighty-armed Arjuna, listen to my supreme word which I will declare to thee who who art beloved, for thy welfare.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.1 See Comment under 10.5
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.1 The Lord said Listen with rapt attention to these words which I shall utter - words which are supreme and which give you a much wider understanding of My greatness. I shall speak out to you about the rise and growth of devotion to Me, as you are pleased with listening to My greatness and as I too love you.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.1 O mighty-armed one, srnu, listen; bhuyah eva, over agiain; me, to My; paramam, supreme; vacah, utterance, which is expressive of the transcendental Reality; yat, which supreme Truth; aham, I; vaksyami, shall speak; te, to you; priyamanaya, who take delight (in it). You become greatly pleased by My utterance, like one drinking ambrosia. Hence, I shall speak to you hita-kamyaya, wishing your welfare. 'Why shall I speak?' In answer to this the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.1।। प्रथम अध्याय के अनिश्चय की स्थिति में देखे गये कम्पित अर्जुन ने अब तक एक अतुलनीय आन्तरिक सन्तुलन प्राप्त कर लिया था। हिन्दू दर्शन के बुद्धिमत्तापूर्वक किये गये अध्ययन से? जो आन्तरिक शान्ति प्राप्त होती है? उसे भगवान् इस अध्याय के प्रारम्भ में ही अपने शिष्य अर्जुन को प्रीयमाण कहकर स्पष्ट करते हैं। प्रीयमाण का अर्थ है जो प्रसन्न हो। यहाँ अर्जुन की प्रसन्नता का कारण भगवान् के उपदेश का श्रवण है।शिष्यों के उत्साह एवं रुचिपूर्ण श्रवण से गुरु का उत्साह भी द्विगुणित हो जाता है। वेदान्त दर्शन के गूढ़ अभिप्रायों को अधिकाधिक समझने पर आन्तरिक शान्ति और सन्तोष का अनुभव हुए बिना नहीं रह सकता। गीताचार्य श्रीकृष्ण पुन उत्साह से भरकर इस ज्ञान का विस्तार से वर्णन करते हैं। पुन तुम मेरे परम वचनों को सुनो? जो मैं तुम्हारे हित की इच्छा से कहूँगा।यहाँ अर्जुन को महाबाहो कहकर सम्बोधित किया गया है। यह सम्बोधन अर्जुन को इस बात का स्मरण कराता है कि उसको अपने आन्तरिक जीवन में भी एक वीर पुरुष के समान प्राप्त परिस्थिति में से ही एक दिव्य आनन्द के राज्य का निर्माण करना चाहिए? जो कि उसकी वास्तविक धरोहर है यह स्पष्ट है कि भगवान् का प्रवचन किसी लौकिक विषय पर न होकर मनुष्य में ही निहित आध्यात्मिक श्रेष्ठता की सम्भावनाओं तथा उन्हें उजागर करने के उपायों पर है क्योंकि यहाँ कहा गया है कि तुम मेरे परम वचनों को सुनो? जो मैं तुम्हारे (आध्यात्मिक) हित की इच्छा से कहूंगा।पुन प्रवचन प्रारम्भ करने का क्या प्रयोजन है? इसे वे अब बताते हैं --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.1।।सप्तमेऽध्यायऽष्टमे च भगवतस्तत्त्वं सोपाधिकं विभूतयः सविशेषबोधोपयोगिन्यः प्रकाशिताः? नवमे च तत्त्वं निरुपाधिकं विभूतयो निर्विशेषबोधोपायोगिनः। अथेदानीं सविशेषध्याने निर्विशेषज्ञाने चोपायभूता येषु येषु भावेषु चिन्तयः परमेश्वरस्ते ते भावा वक्त्व्याः? तत्त्वं च यद्यप्युक्तं तथापि दुर्विज्ञेयत्वात्पुनरपि वक्तव्यमिति मन्यमानो भगवानुवाच -- भूत इति। भूयएव पुनरपि हे महाबाहो? मे मम परमं प्रकृष्टं वचो वचनं श्रुणु। वचसः प्रकृष्टं वचो वचनं श्रुणु। वचसः प्रकष्टत्वं च प्रकृष्टवस्तुप्रकाशकत्वेन यत् परमं वचस्ते तुभ्यं अहं वक्ष्यामि। कुत इत्यत आह। प्रीयमाणाय यतस्त्वं मद्वचनं श्रृण्वन्नमृतमिव पिबन्नत्यन्तं प्रीयसेऽतस्त्व हितकाम्यया हितकामनया यद्वक्ष्यामि तच्छ्रण्वित्यर्थः। श्रुत्वा च महाबाहुत्वं सार्थकं कुर्विति संबोधनाशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.1।।यद्राजविद्या किल राजगुह्यं पवित्रमेकं निजरूपरूपम्। येनोपदिष्टं श्रुतिवाक्यमाद्यं तं काशिराजं गुरुराजमीडे।।एवं सप्तमाष्टमनवमैस्तत्पदार्थस्य भगवतस्तत्त्वं सोपाधिकं निरुपाधिकं च दर्शितं? तस्य च विभूतयः सोपाधिकस्य ध्याने निरुपाधिकस्य ज्ञाने चोपायभूताःरसोऽहमप्सु कौन्तेय इत्यादिना सप्तमे?अहं क्रतुरहं यज्ञः इत्यादिना नवमे च सङ्क्षेपेणोक्ताः। अथेदानीं तासां विस्तरो वक्तव्यो भगवतो ध्यानाय? तत्त्वमपि दुर्विज्ञेयत्वात्पुनस्तस्य वक्तव्यं ज्ञानायेति दशमोऽध्याय आरभ्यते। तत्र प्रथममर्जुनं प्रोत्साहयितुं श्रीभगवानुवाच -- भूयएव पुनरपि हे महाबाहो? शृणु मे मम परमं प्रकृष्टं वचः। यत्ते तुभ्यं प्रीयमाणाय मद्वचनादभृतपानादिव प्रीतिमनुभवते वक्ष्याम्यहं परमाप्तस्तव हितकाम्ययेष्टप्राप्तीच्छया।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.1।।सप्तमे त्वंपदवाच्योऽर्थो निरूपितः? तदुपासनाच्च क्रममुक्तिरित्यष्टमे प्रोक्तं? नवमे तत्पदलक्ष्यार्थ उक्तस्तत्प्राप्तये च विश्वतोमुखं सर्वत्र भगवद्भावभावनात्मकं भगवद्भजनमुक्तम्? तद्रागद्वेषकलुषितमनसामशक्यमिति मन्वानो भगवांस्तत्सिद्धये स्वविभूतीः केषुचिदेव पदार्थेषु भगवद्बुद्धिविधानार्थास्तावद्दर्शयति दशमे। तत्फलभूतं विश्वतोमुखस्योपासनं तेन च विश्वरूपदर्शनमेकादशे। द्वादशे पुनस्तत्पदलक्ष्यस्याव्यक्तस्योपासनं तदुपासकलक्षणानि चोक्त्वा उपासनाकाण्डं तत्पदार्थशोधनार्थं समापयिष्यति तत्र वात्सल्यात्स्वयमेव श्रीभगवानुवाच -- भूय एवेति। हे महाबाहो? भूयः प्रागुक्तमपि पुनर्मे परमं निरतिशयवस्तुनः प्रकाशकं वचः शृणु। प्रीयमाणाय अमृतपानादिवन्मद्वचनात्प्रीतिमनुभवते वक्ष्यामि। हितकाम्यया तव हितेच्छया।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.1।।नवमे भक्तिरूपं यदुक्तं तत्सिद्धये हरिः। स्वविभूतिस्वरूपं च कृपया दशमेऽब्रवीत्।।1।।पूर्वाध्याये सर्वकर्मसमर्पणमुक्तं? ततश्च भक्ितकरणमाज्ञप्तम्? तच्च स्वरूपाज्ञानेन कृतमप्यकृतप्रायमिति स्वरूपज्ञानार्थं स्वस्वरूपं स्वविभूतिरूपं वदन् पार्थं श्रवणार्थं सावधानतया सम्मुखीकुर्वन् प्रतिजानीते -- श्रीभगवानुवाच भूय एवेति। हे महाबाहो भजनौपयिककृपाशक्ितमन् भूय एव पुनरपि मम वचनश्रवणेन प्रीयमाणाय परमानन्दं प्राप्नुवते ते हितकाम्यया यदहं वक्ष्यामि तत् परमं परो मीयते ज्ञायतेऽनेनेति परमार्थरूपमुत्कृष्टं मे वचः शृणु।प्रीयमाणाय इति पदेनान्येभ्योऽवक्तव्यत्वं गोप्यत्वं च ज्ञापितम्।हितकाम्यया इतिपदेन परमकृपा दर्शिता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.1।।उक्ताः संक्षेपतः पूर्वं सप्तमादौ विभूतयः। दशमे ता वितन्यन्ते सर्वत्रेश्वरदृष्टये।।1।।एवं तावत्सप्तमादिभिस्त्रिभिरध्यायैर्भजनीयं परमेश्वररूपं निरूपितम्। तद्विभूतयश्च सप्तमेरसोऽहमप्सु कौन्तेय इत्यादिना संक्षेपतो दर्शिताः। अष्टमे चअधियज्ञोऽहमेवात्र इत्यादिना? नवमे चअहं ऋतुरहं यज्ञः इत्यादिना। अथेदानीं ता एव विभूतीः प्रपञ्चयिष्यन् स्वभक्तेश्चावश्यंकरणीयत्वं वर्णयिष्यन् श्रीभगवानुवाच -- भूय एवेति। महान्तौ युद्धादिस्वधर्मानुष्ठाने महत्परिचर्यायां वा कुशलौ बाहू यस्य हे महाबाहो? भूयएव पुनरपि मे वचः शृणु। कथंभूतम्। परमं परमात्मनिष्ठं मद्वचनामृतेनैव प्रीतिं प्राप्नुवते ते तुभ्यं हितकाम्यया हितेच्छया यदहं वक्ष्यामि तत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.1।।अथोक्तभक्तिवृद्ध्यर्थं स्वयोगप्रभवं हरिः। भूय एवाहानुपृष्टो विभूतिं चापि केशवः।।1।।सच्चिदानन्दसम्भूतं जगदेतत्सदा(मदा)त्मकम्। इति सर्वात्मदृष्ट्यर्थं सर्वस्याह विभूतिताम्।।2।।पूर्णस्य तत्पूर्णमदः पूर्णमेवावशिष्यते। इति श्रुत्यांशिनो विष्णोस्तथात्वे नास्त्यपूर्णता।।3।।समुद्रस्येव पूर्णस्य कोटिब्रह्माण्डदेहिनः। सर्वा विभूतयस्तस्य मुख्या एवात्र कीर्त्तिताः।।4।।तथाहि श्रीभगवानुवाच -- भूय एवेति। स्वधर्मानुष्ठानार्थं विद्यमानौ महान्तौ बाहू यस्य हे महाबाहो भूयस्तन्मे वचः श्रृणु? यत्तेऽहं वक्ष्यामि हितकाम्यया। किम्भूताय मन्माहात्म्यं श्रुत्वा प्रीयमाणाय। वचश्च किम्भूतं परमं मद्योगवैभवज्ञापनविषयकम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.1।।सातवें और नवें अध्यायमें भगवान्के तत्त्वका और विभूतियोंका वर्णन किया गया। अब जिनजिन भावोंमें भगवान् चिन्तन किये जाने योग्य हैं उनउन भावोंका वर्णन किया जाना चाहिये। यद्यपि भगवान्का तत्त्व पहले कहा गया है परंतु दुर्विज्ञेय होनेके कारण फिर भी उसका वर्णन होना चाहिये? इसलिये श्रीभगवान् बोले --, हे महाबाहो फिर भी तू मेरे परम उत्तम निरतिशय वस्तुको प्रकाशित करनेवाले वाक्य सुन? जो कि मैं तुझ प्रसन्न होनेवालेके हितकी इच्छासे कहूँगा। मेरे वचनोंको सुनकर तू अमृतपान करता हुआसा अत्यन्त प्रसन्न होता है? इसीलिये मैं तुझसे यह परम वाक्य कहने लगा हूँ। ,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.1।। व्याख्या -- भूयः एव -- भगवान्की विभूतियोंको तत्त्वसे जाननेपर भगवान्में भक्ति होती है? प्रेम होता है। इसलिये कृपावश होकर भगवान्ने सातवें अध्यायमें (8वें श्लोकसे 12वें श्लोकतक) कारणरूपसे सत्रह विभूतियाँ और नवें अध्यायमें (16वें श्लोकसे 19वें श्लोकतक) कार्यकारणरूपसे सैंतीस विभूतियाँ बतायीं। अब यहाँ और भी विभूतियाँ बतानेके लिये (टिप्पणी प0 535.1) तथा (गीता 8। 14 एवं 9। 22? 34 में कही हुई) भक्तिका और भी विशेषतासे वर्णन करनेके लिये भगवान् भूयः एव कहते हैं।श्रृणु मे परमं वचः -- भगवान्के मनमें अपनी महिमाकी बात? अपने हृदयकी बात? अपने प्रभावकी बात कहनेकी विशेष आ रही है (टिप्पणी प0 535.2)। इसलिये वे अर्जुनसे कहते हैं कि तू फिर मेरे परम वचनको सुन।दूसरा भाव यह है कि भगवान् जहाँजहाँ अर्जुनको अपनी विशेष महत्ता? प्रभाव? ऐश्वर्य आदि बताते हैं अर्थात् अपनेआपको खोल करके बताते हैं? वहाँवहाँ वे परम वचन? रहस्य आदि शब्दोंका प्रयोग करते हैं जैसे -- चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें रहस्यं ह्येतदुत्तमम् पदोंसे बताते हैं कि जिसने सूर्यको उपदेश दिया था? वही मैं तेरे रथके घोड़े हाँकता हुआ तेरे सामने बैठा हूँ। अठारहवें अध्यायके चौंसठवें श्लोकमें श्रृणु मे परमं वचः पदोंसे यह परम वचन कहते हैं कि तू सम्पूर्ण धर्मोंका निर्णय करनेकी झंझटको छोड़कर एक मेरी शरणमें आ जा मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा? चिन्ता मत कर (18। 66)। यहाँ श्रृणु मे परमं वचः पदोंसे भगवान्का आशय है कि प्राणियोंके अनेक प्रकारके भाव मेरेसे ही पैदा होते हैं और मेरेमें ही भक्तिभाव रखनेवाले सात महर्षि? चार सनकादि तथा चौदह मनु -- ये सभी मेरे मनसे पैदा होते हैं। तात्पर्य यह है कि सबके मूलमें मैं ही हूँ। जैसे आगे तेरहवें अध्यायमें ज्ञानकी बात कहते हुए भी चौदहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने फिर ज्ञानका वर्णन करनेकी प्रतिज्ञा की है? ऐसे ही सातवें और नवें अध्यायमें ज्ञानविज्ञानकी बात कहते हुए भी दसवें अध्यायके आरम्भमें फिर उसी विषयको कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं। चौदहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने,परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् कहा? और यहाँ (दसवें अध्यायके आरम्भमें) श्रृणु मे परमं वचः कहा इनका तात्पर्य है कि ज्ञानमार्गमें समझकी? विवेकविचारकी मुख्यता रहती है अतः साधक वचनोंको सुन करके विचारपूर्वक तत्त्वको समझ लेता है। इसलिये वहाँ ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् कहा है। भक्तिमार्गमें श्रद्धाविश्वासकी मुख्यता रहती है अतः साधक वचनोंको सुन करके श्रद्धाविश्वासपूर्वक मान लेता है। इसलिये यहाँ परमं वचः कहा गया है।यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया -- सुननेवाला वक्तामें श्रद्धा और प्रेम रखनेवाला हो और वक्ताके भीतर सुननेवालेके प्रति कृपापूर्वक हितभावना हो तो वक्ताके वचन? उसके द्वारा कहा हुआ विषय श्रोताके भीतर अटलरूपसे जम जाता है। इससे श्रोताकी भगवान्में स्वतः रुचि पैदा हो जाती है? भक्ति हो जाती है? प्रेम हो जाता है। यहाँ हितकाम्यया पदसे एक शङ्का हो सकती है कि भगवान्ने गीतामें जगहजगह कामनाका निषेध किया है? फिर वे स्वयं अपनेमें कामना क्यों रखते हैं इसका समाधान यह है कि वास्तवमें अपने लिये भोग? सुख? आराम आदि चाहना ही कामना है। दूसरोंके हितकी कामना कामना है ही नहीं। दूसरोंके हितकी कामना तो त्याग है और अपनी कामनाको मिटानेका मुख्य साधन है। इसलिये भगवान् सबको धारण करनेके लिये आदर्शरूपसे कह रहे हैं कि जैसे मैं हितकी कामनासे कहता हूँ? ऐसे ही मनुष्यमात्रको चाहिये कि वह प्राणिमात्रके हितकी कामनासे ही सबके साथ यथायोग्य व्यवहार करे। इससे अपनी कामना मिट जायगी और कामना मिटनेपर मेरी प्राप्ति सुगमतासे हो जायगी। प्राणिमात्रके हितकी कामना रखनेवालेको मेरे सगुण स्वरूपकी प्राप्ति भी हो जाती है -- ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः (गीता 12। 4)? और निर्गुण स्वरूपकी प्राप्ति भी हो जाती है -- लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणं ৷৷. सर्वभूतहिते रताः (गीता 5। 25)। सम्बन्ध -- परम वचनके विषयमें? जिसे मैं आगे कहूँगा? मेरे सिवाय पूरापूरा बतानेवाला अन्य कोई नहीं मिल सकता। इसका कारण क्या है इसे भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.1 -- 10.5।।प्राक्तनैर्नवभिरध्यायैर्य एवार्थो लक्षितः? स एव प्रतिपदपाठैरस्मिन्नध्याये प्रतायते। तथा चाह -- भूय एव इति। उक्तमेवार्थं स्फुटीकर्तुं (?N?K विस्पष्टीकर्तुं) पुनः कथ्यमानं श्रृण्विति। अर्जुनोऽपि एवमेवाभिधास्यति भूयः कथय (X? 18) इति। इत्यध्यायतात्पर्यम्। शिष्टं निगदव्याख्यातमिति ( -- व्याख्यानमिति) किं पुनरुक्तेन सन्दिग्धं तु निर्णेष्यते।भूय इत्यादि पृथग्विधा इत्यन्तम्। असंमोहः उत्साहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.1।।अध्यायद्वये सिद्धमर्थं संक्षेपतोऽनुभाषते -- सप्तम इति। तत्त्वं सोपाधिकं निरुपाधिकं च। विभूतयः सविशेषनिर्विशेषरूपप्रतिपत्त्युपयोगिन्यः। उत्तराध्यायस्याध्यायद्वयेन संबन्धं वदन्नध्यायान्तरमवतारयति -- अथेति। वक्तव्याः सविशेषध्याने निर्विशेषप्रतिपत्तौ च शेषत्वेनेति शेषः। ननु सविशेषं निर्विशेषं च भगवतो रूपं प्रागेव तत्र तत्रोक्तं तत्किमिति पुनरुच्यते तत्राह -- उक्तमपीति। यद्यपि तत्र तत्र तत्त्वमुक्तं तथापि पुनर्वक्तव्यं दुर्विज्ञेयत्वादिति यतो मन्यतेऽत इति योजना। प्रकृष्टत्वं वचसः स्पष्टयति -- निरतिशयेति। तदेव वचो विशिनष्टि -- यत्परममिति। सकृदुक्तेरर्थसिद्धेरसकृदुक्तिरनर्थिकेत्याशङ्क्याह -- प्रीयमाणायेति। ततो वक्ष्यामि तुभ्यमिति पूर्वेण संबन्धः। हितं दुर्विज्ञेयं तत्त्वज्ञानम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.1।।प्रकृतसङगतत्वेनाध्यायप्रतिपाद्यं दर्शयति -- उपासनार्थमिति। षष्ठे ध्यानमुक्तं तन्नवमान्तेमन्मना भव इति स्मारितं? तच्च ध्येयसापेक्षं? विशिष्टाधिकारिणां च भगवद्विभूतय उपास्या अतस्ता आहानेन दशमाध्यायेन। तत्रादौ केषाञ्चिद्बुद्ध्यादीनां महर्ष्यादीनां च विशेषकारणत्वमपि भगवत आहेत्यर्थः। विभूतिशब्दार्थस्तात्पर्यनिर्णयेऽभिहितः। तदुक्तेर्भूयस्त्वात्प्रथममुपादानम्। अत एवैकवाक्यता। ननु विभूतयःरसोऽहं [7।8] इत्यादिनोक्ता एव सत्यम्? अत एवविस्तरेणात्मनः [10।18] इति वक्ष्यति विशेषकारणत्वं नाम सामर्थ्यातिशयोपेततया निर्माणम्। प्राक्शोकसंविग्नमानसः [1।47] इत्युक्तम्? तद्विरुद्धं कथंप्रीयमाणाय इत्युच्यत इत्यतो व्याचष्टे -- प्रीयमाणायेति। पूर्वं बन्धुस्नेहाच्छोक उक्तः? इदानीं भगवद्वचनश्रवणनिमित्तात्सन्तोषप्राप्तिः श्रोतृत्वसम्पत्प्रतिपादनायोच्यत इति न विरोध इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.1।।म्। उपासनार्थं विभूतीः विशेषणकारणत्वं च केषाञ्चिदनेनाध्यायेनाह -- प्रीयमाणाय श्रुत्वा सन्तोषं प्राप्नुवते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.1।।श्री भगवानुवाच -- मम माहात्म्यं श्रुत्वा प्रीयमाणाय ते मद्भक्त्युत्पत्तिविवृद्धिरूपहितकामनाय भूयः मन्माहात्म्यप्रपञ्चविषयम् एव परमं वचो यद् वक्ष्यामि तद् अवहितमनाः श्रृणु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.1।। --,भूयः एव भूयः पुनः हे महाबाहो श्रृणु मे मदीयं परमं प्रकृष्टं निरतिशयवस्तुनः प्रकाशकं वचः वाक्यं यत् परमं ते तुभ्यं प्रीयमाणाय -- मद्वचनात् प्रीयसे त्वम् अतीव अमृतमिव पिबन्? ततः -- वक्ष्यामि हितकाम्यया हितेच्छया।।किमर्थम् अहं वक्ष्यामि इत्यत आह --,
───────────────────
【 Verse 10.2 】
▸ Sanskrit Sloka: न मे विदु: सुरगणा: प्रभवं न महर्षय: | अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वश: ||
▸ Transliteration: na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṁ na maharṣayaḥ | ahamādirhi devānāṁ maharṣīṇāṁ ca sarvaśaḥ ||
▸ Glossary: na: not; me: My; viduḥ: know; suragaṇāḥ: demigods; prabhavaṁ: glories; na: not; maharṣayaḥ: great sages; ahaṁ: I; ādiḥ: origin; hi: certainly; devānāṁ: of the gods; maharṣīṇāṁ: of the great sages; ca: and; sarvaśaḥ: in all respects.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.2 Neither the hosts of deities nor the great sages know My origin, My opulence. I am the source of the deities and the sages.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.2।।मेरे प्रकट होनेको न देवता जानते हैं और न महर्षि क्योंकि मैं सब प्रकारसे देवताओं और महर्षियोंका आदि हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.2।। मेरी उत्पत्ति (प्रभव) को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.2 Commentary Prabhavam Origin. It may also mean great lordly power.Maharshis great sages like Bhrigu.As I am the source of all these gods? sages and living beings? it is very difficult for them to know Me.Sarvasah In every way -- not only am I the source of all the gods and the sages but also their efficient cause? their inner ruler and the dispenser or ordainer and the guide of their intellect? etc.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.2. Neither the hosts of gods, nor the great seers know My origin. For, I am the first, in every respect, among the gods and great seers.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.2 Neither the professors of divinity nor the great ascetics know My origin, for I am the source of them all.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.2 Neither the host of the gods nor the great seers know My power. Indeed, I am the only source of the gods and of the great seers.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.2 Neither the gods nor the great sages know My majesty. For, in all respects, I am the source of the gods and the great sages.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.2 Neither the hosts of the gods nor the great sages know My origin; for in every way I am the source of all the gods and the great sages.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.2 See Comment under 10.5
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.2 However supernatural the vision and however great the knowledge of the host of the gods and the wise seers may be, they cannot comprehend My powers. They do not know My name, actions, essence, attributes etc., for the reason that I am the source in every way of these gods and great seers. I am the source of their nature and knowledge, power etc. The knowledge given to them by Me according to their meritorious deeds constitutes the cause of their being gods, the great seers etc. That knowledge is limited. Thus, they have limited knowledge and do not know the real nature of My essence.
Sri Krsna proceeds to explain that knowledge about His real nature, which is beyond the grasp of gods etc., and which is the means for release from the evil that stands in the way of the rise of devotion.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.2 Na sura-sanah, neither the gods-Brahma and others; viduh, know;-what do they not know?-me, My; prabhavam (prabhavam), majesty, abundance of lordly power-or, derived in the sense of 'coming into being', it means origin. Nor even the maharsayah, great sages, Bhrgu and others [Bhrgu, Marici, Atri, Pulastya, Pulaha, Kratu and Vasistha.-Tr.] devanam, of the gods; ca, and; maharsinam, of the great sages. Besides,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.2।। जब कभी हम प्रत्यक्ष प्रमाण या अनुभव के द्वारा कोई ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकते हैं? तब हम उसे उस विषय के ज्ञाता पुरुषों से समझना चाहते हैं। उन्हें आप्त पुरुष कहा जाता है। किन्तु ब्रह्मविद्या के क्षेत्र में आत्मप्रशिक्षण की यह अप्रत्यक्ष विधि भी कठिन है? क्योंकि? भगवान् कहते हैं? मेरी उत्पत्ति को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन।बाद में? भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही स्पष्ट करेंगे कि महर्षि शब्द से उनका निश्चित अभिप्राय क्या है। ये महर्षिगण पुराणों में बताये हुए भृगु आदि सप्त ऋषि नहीं है। सप्त ऋषियों का दार्शनिक अर्थ निम्न प्रकार से है। जब अनन्तस्वरूप ब्रह्म केवल आभासिक रूप से समष्टि बुद्धि (महत् तत्त्व) के साथ तादात्म्य को प्राप्त कर अपना एक व्यक्तित्व प्रकट (अहंकार) करता है? तब वह स्वयं ही स्वयं को? स्वयं के आनन्द के लिए इस विषयात्मक जगत् में प्रपेक्षित करता है अथवा व्यक्त करता है। वास्तव में? ये भोग के विषय सूक्ष्म होते हैं? जिन्हें तन्मात्रा कहते हैं। इन सबको पुराणों में सप्त ऋषि कह कर विभिन्न नाम भी दिये गये हैं वे सप्तर्षि हैं महत् तत्त्व? अहंकार और पंचतन्मात्राएं। पुराणों में इन्हें मानवीय रूप दे दिया गया है। संयुक्त रूप में ये सप्तर्षि मनुष्य के बौद्धिक और मानसिक जीवन के तथा सृष्टि के निमित्त और उपादान कारण के प्रतीक हैं।देव (सुर) शब्द का वाच्यार्थ स्वर्ग के निवासी यहाँ अभिप्रेत नहीं है? यद्यपि वह अर्थ भी संभव है। देव शब्द द्यु धातु से बनता है? जिसका अर्थ है प्रकाशित करना। अत हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ ही वे देव हैं? जो हमारे असंख्य अनुभवों के लिए विषयों को प्रकाशित करते हैं।इसलिए यह कथन उचित ही है कि चिन्मय स्वरूप मैं सब देवगणों तथा महर्षिजनों का आदिकारण हूँ। अर्थात् आत्मा हमारे स्थूल और सूक्ष्म? शारीरिक और मानसिक जीवन का अधिष्ठान है। यद्यपि वे इस सत्य आत्मा में ही स्थित रहते हैं? किन्तु वे मेरे प्रभव को नहीं जान सकते।चैतन्य आत्मा हमारे हृदय में द्रष्टा के रूप में स्थित है? इसलिए वह इन्द्रियों का दृश्य विषय? या मन की भावना अथवा बुद्धि के ज्ञान का विषय कदापि नहीं बन सकता।तब क्या यह सत्य है कि सम्पूर्ण जगत् के आदिकारण इस आत्मा का ज्ञान और अनुभव किसी को भी नहीं हो सकता है ऐसी आशंका को दूर करने के लिए भगवान् कहते हैं --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.2।।ननु किमर्थं वक्ष्यसि त्वया वक्ष्यमाणस्य सुरादिभिर्ज्ञातत्वात्ततएव ममापि ज्ञानसंभवादितिचेत्तत्राह -- नेति। मे मम प्रभवं पभूत्वातिशयं उत्पत्तिं वा सुरराणा इन्द्रादयो न विदुः न जानन्ति। नापि भृग्वादयो महर्षयः। कुत इत्याह। हि यस्मातहं देवानां महर्षीणां च सर्वशः सर्वप्रकारैरुपादानत्वादिभिरादिः कारणं तत्मादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.2।।प्राग्बहुधोक्तमेव किमर्थं पुनर्वक्ष्यसीत्यत आह -- प्रभवं प्रभावं प्रभुशक्त्यतिशयं? प्रभवनमुत्पत्तिमनेकविभूतिभिराविर्भावं वा। सुरगणा इन्द्रादयो महर्षयश्च भृग्वादयः सर्वज्ञा अपि न मे विदुः। तेषां तदज्ञाने हेतुमाह -- अहं हि यस्मात्सर्वेषां देवानां महर्षीणां च सर्वशः सर्वैः प्रकारैरुत्पादकत्वेन बुद्ध्यादिप्रवर्तकत्वेन च निमित्तत्वेनोपादानत्वेन चेति वा कारणम्। अतो मद्विकारास्ते मत्प्रभावं न जानन्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.2।।दुर्ज्ञेयत्वाच्च मत्स्वरूपस्याहं त्वां ब्रवीमीत्याह -- न मे इति। प्रभवं प्रकृष्टं भवमैश्वर्यं वियदादिसृष्टिसामर्थ्यं न विदुः। तत्र हेतुराह अहमिति। अयं भावः -- देहोत्पत्त्यनन्तरं हि देवादीनां बुद्ध्यादिलाभो न चार्वाचीनैर्बुद्ध्यादिभिः स्वोत्पत्तिप्राक्कालीनोऽर्थः परिच्छेत्तुं शक्यत इति। पदार्थः स्पष्टः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.2।।अथ स्वकृपां विना अस्योक्तस्वस्वरूपस्यातिदुर्ज्ञेयत्वेन दुर्लभत्वमाह -- न म इति। मे मम प्रभवं प्रकृष्टं भवं जन्म -- प्रादुर्भावमिति यावत् -- सुरगणा ब्रह्मेन्द्रादयो महर्षयो भृग्वादयो न विदुः न जानन्ति। अहं देवानां ब्रह्मादीनां सर्वशः सर्वप्रकारैः आधिदैविकत्वेन देवत्वेन च आदिर्मूलभूतः। च पुनस्तथैव महर्षीणाम्। हीति निश्चयेन सन्देहाभावार्थं देवत्वात् ऋषित्वात् स्वमूलभूतत्वेन ज्ञानमावश्यकं? तथापि भूभारहरणार्थं स्वरक्षार्थं धर्मरक्षार्थं प्रादुर्भावं जानन्ति परं यदर्थं यद्रूपश्च प्रादुर्भावस्तं मत्कृपां विना न जानन्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.2।।उक्तस्यापि पुनर्वचने दुर्ज्ञेयत्वं हेतुमाह -- न म इति। मे मम प्रकृष्टं भवं जन्मरहितस्यापि नानाविभूतिभिराविर्भावं सुरगणा अपि महर्षयो भृग्वादयोऽपि न जानन्ति। तत्र हेतुःअहं हि देवानां महर्षीणां चादिः कारणम्? सर्वशः सर्वप्रकारैरुत्पादकत्वेन बुद्ध्यादिप्रवर्तकत्वेन च। अतो मदनुग्रहं विना मां केऽपि न जानन्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.2।।उक्तस्यापि पुनः परमतया कथने दुर्विज्ञेयत्वं हेतुमाह -- न मे विदुरिति। प्रभवं योगवैभवं जन्मादिकं वा महर्षयः अतीन्द्रियार्थदर्शिनोऽपि हि यतस्तेषामादिरहं इत्यतो न विदुः अर्वाचीनाः? नहि जन्यो जनकस्यादिं जानाति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.2।।मैं ( ऐसा ) किसलिये कहता हूँ सो बतलाते हैं --, ब्रह्मादि देवता मेरे प्रभवको यानी अतिशय प्रभुत्वशक्तिको अथवा प्रभव यानी मेरी उत्पत्तिको नहीं जानते और भृगु आदि महर्षि भी ( मेरे प्रभवको ) नहीं जानते। वे किस कारणसे नहीं जानते सो कहते हैं --,, क्योंकि देवोंका और महर्षियोंका सब प्रकारसे मैं ही आदि -- मूल कारण हूँ।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.2।। व्याख्या -- न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः -- यद्यपि देवताओंके शरीर? बुद्धि? लोक? सामग्री आदि सब दिव्य हैं? तथापि वे मेरे प्रकट होनेको नहीं जानते। तात्पर्य है कि मेरा जो विश्वरूपसे प्रकट होना है? मत्स्य? कच्छप आदि अवताररूपसे प्रकट होना है? सृष्टिमें क्रिया? भाव और विभूतिरूपसे प्रकट होना है? ऐसे मेरे प्रकट होनेके उद्देश्यको? लक्ष्यको? हेतुओंको देवता भी पूरापूरा नहीं जानते। मेरे प्रकट होनेको पूरापूरा जानना तो दूर रहा? उनको तो मेरे दर्शन भी बड़ी कठिनतासे होते हैं। इसलिये वे मेरे दर्शनके लिये हरदम लालायित रहते हैं (गीता 11। 52)।ऐसे ही जिन महर्षियोंने अनेक ऋचाओंको? मन्त्रोंको? विद्याओंको? विलक्षणविलक्षण शक्तियोंको प्रकट किया है? जो संसारसे ऊँचे उठे हुए हैं? जो दिव्य अनुभवसे युक्त हैं? जिनके लिये कुछ करना? जानना और पाना बाकी नहीं रहा है? ऐसे तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महर्षि लोग भी मेरे प्रकट होनेको अर्थात् मेरे अवतारोंको? अनेक प्रकारकी लीलाओंको? मेरे महत्त्वको पूरापूरा नहीं जानते।यहाँ भगवान्ने देवता और महर्षि -- इन दोनोंका नाम लिया है। इसमें ऐसा मालूम देता है कि ऊँचे पदकी दृष्टिसे देवताका नाम और ज्ञानकी दृष्टिसे महर्षिका नाम लिया गया है। इन दोनोंका मेरे प्रकट होनेको न जाननेमें कारण यह है कि मैं देवताओँ और महर्षियोंका सब प्रकारसे आदि हूँ -- अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः। उनमें जो कुछ बुद्धि है? शक्ति है? सामर्थ्य है? पद है? प्रभाव है? महत्ता है? वह सब उन्होंने मेरेसे ही प्राप्त की है। अतः मेरेसे प्राप्त किये हुए प्रभाव? शक्ति? सामर्थ्य आदिसे वे मेरेको पूरा कैसे जान सकते हैं अर्थात् नहीं जान सकते। जैसे बालक जिस माँसे पैदा हुआ है? उस माँके विवाहको और अपने शरीरके पैदा होनेको नहीं जानता? ऐसे ही देवता और महर्षि मेरेसे ही प्रकट हुए हैं अतः वे मेरे प्रकट होनेको और अपने कारणको नहीं जानते। कार्य अपने कारणमें लीन तो हो सकता है? पर उसको जान नहीं सकता। ऐसे ही देवता और महर्षि मेरेसे उत्पन्न होनेसे? मेरा कार्य होनेसे कारणरूप मेरेको नहीं जान सकते? प्रत्युत मेरेमें लीन हो सकते हैं।तात्पर्य यह हुआ कि देवता और महर्षि भगवान्के आदिको? अन्तको और वर्तमानकी इयत्ताको अर्थात् भगवान् ऐसे ही हैं? इतने ही अवतार लेते हैं -- इस मापतौलको नहीं जान सकते। कारण कि इन देवताओं और महर्षियोंके प्रकट होनेसे पहले भी भगवान् ज्योंकेत्यों ही थे और उनके लीन होनेपर भी भगवान् ज्योंकेत्यों ही रहेंगे। अतः जिनके शरीरोंका आदि और अन्त होता रहता है? वे देवता और महर्षि अनादिअनन्तको अर्थात् असीम परमात्माको अपनी सीमित बुद्धि? योग्यता? सामर्थ्य आदिके द्वारा कैसे जान सकते हैं असीमको अपनी सीमित बुद्धिके अन्तर्गत कैसे ला सकते हैं अर्थात् नहीं ला सकते।इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें अर्जुनने भी भगवान्से कहा है कि आपको देवता और दानव नहीं जानते क्योंकि देवताओंके पास भोगसामग्रीकी और दानवोंके पास मायाशक्तिकी अधिकता है। तात्पर्य है कि भोगोंमें लगे रहनेसे देवताओँको (मेरेको जाननेके लिये) समय ही नहीं मिलता और मायाशक्तिसे छलकपट करनेसे दानव मेरेको जान ही नहीं सकते। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें कहा गया कि देवता और महर्षिलोग भी भगवान्के प्रकट होनेको सर्वथा नहीं जान सकते? तो फिर मनुष्य भगवान्को कैसे जानेगा और उसका कल्याण कैसे होगा इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.1 -- 10.5।।प्राक्तनैर्नवभिरध्यायैर्य एवार्थो लक्षितः? स एव प्रतिपदपाठैरस्मिन्नध्याये प्रतायते। तथा चाह -- भूय एव इति। उक्तमेवार्थं स्फुटीकर्तुं (?N?K विस्पष्टीकर्तुं) पुनः कथ्यमानं श्रृण्विति। अर्जुनोऽपि एवमेवाभिधास्यति भूयः कथय (X? 18) इति। इत्यध्यायतात्पर्यम्। शिष्टं निगदव्याख्यातमिति ( -- व्याख्यानमिति) किं पुनरुक्तेन सन्दिग्धं तु निर्णेष्यते।भूय इत्यादि पृथग्विधा इत्यन्तम्। असंमोहः उत्साहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.2।।कश्चिदन्योऽपि परमं वचो मह्यं वक्ष्यति तेन च मम तत्त्वज्ञानं भविष्यत्यतो भगवद्वचनमकिंचित्करमिति शङ्कित्वा परिहरति -- किमर्थमित्यादिना। इन्द्रादयो भृग्वादयश्च भगवत्प्रभावं न विदन्तीत्यत्र प्रश्नपूर्वकं हेतुमाह -- कस्मादिति। निमित्तत्वेनोपादानत्वेन च यतो देवादीनां भगवानेव हेतुरतस्तद्विकारास्ते न तस्य प्रभावं विदुरित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.2।।प्रभवशब्दः केनचित्सामर्थ्यमात्रवाचित्वेन व्याख्यातः? अन्येन तु भगवदुत्पत्तिवाचित्वेन? तदुभयमङ्गीकुर्वन्नधिकमपि विवक्षुराह -- प्रभवमिति। मदीयामुत्पत्तिमिति सम्बन्धः। जगदुत्पत्तिर्म इति कथं विशेष्यते इत्यत आह -- तदिति। जगदुत्पत्तिरिति वर्तते। एवं तर्हि भगवत्प्रभाववज्जगदुपत्तिवच्च भगवदुत्पत्तिरस्त्येव? किन्तु दुर्ज्ञानैवेत्यापन्नमित्यत आह -- यदीति। भगवदुत्पत्तिरिति शेषः। सर्वज्ञत्वात् सामान्यत इति शेषः। ततः परं न च सामान्यतोऽपि जानन्तीत्यध्याहारः। अतः सर्वथाऽनुपलम्भात्। प्रभावादिकं तु विशेषत एव न जानन्ति? न तु सामान्यतोऽपीति भावः। ननु भगवदुत्पत्तेरभावश्चेदत्राभिप्रेतस्तदाअहमादिर्हि इति हेतुवचनं न सङ्गच्छते। अत्र हि देवादयोऽर्वाक्तना मया सृष्टाः कथं पूर्वतनीमुत्पत्तिं जानीयुः इति प्रतीयत इत्यत आह -- अहमिति। अपिशब्दोऽध्याहृतेन सर्वस्येत्यनेन सम्बध्यते। कुतः जनकात्। नन्वत्र सर्वस्याप्युत्पत्तिर्भगवदधीनेति नोच्यते किन्तु देवादीनामेव? तत्कथमनेन कारणाभावः सिध्यति इति चेत्? न देवादिशब्दस्योपलक्षणार्थत्वात्। तत्कुत इत्यत आह -- अहमिति। उक्तमर्थत्रयमुपपादयति -- उक्तं चेतिं। इयं विसृष्टिर्विविधा जगत्सृष्टिः कुतः कारणादाजातेति कः पुरुषः कुतः प्रमाणादद्धा वेद कश्चेह लोके प्रावोचत् न कोऽपि कुतश्चित्। यतो देवा अस्येश्वरस्य विसर्जनेन निष्प्रभा अर्वाचीनाः। सर्वथाऽप्यज्ञाने तदभावः स्यादित्यत उक्तं? अथान्यत् यतो यस्मात् इयमा बभूव स कः प्रजापतिर्भगवानद्धा वेदेत्यर्थः। न तत्प्रभावमित्यत्राद्धेति द्रष्टव्यम्। अत एव व्युत्क्रमः। प्रमाणं प्रमा। अन्यस्त्वर्थो भगवतो जन्माभावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.2।।प्रभवं प्रभावं? मदीयां जगदुत्पत्तिं वा। तद्वशत्वात्तस्येत्युच्यते। यद्यस्ति तर्हि देवादधोऽपि जानन्ति? सर्वज्ञत्वात् अतो नास्तीति भावः।अहमादिर्हि इति तूत्पत्तिरपि यस्य वशा? कुतस्तस्य जनिरिति ज्ञापनार्थम्।अहं सर्वस्य जगतः प्रभवः प्रलयः [7।6] इति चोक्तम्। उक्तं चैतत्सर्वमन्यत्रापि। को अद्धा वेद क इह प्रवोचत्कुत आ जाता कुत इयं विसृष्टिः। अर्वाग्देवा अस्य विसर्जनेनाथा को वेद यत आ बभूव [ऋक्सं.8।7।17।6तै.ब्रा.2।89] इति न तत्प्रभावमृषयश्च देवा विदुः कुतोऽन्येऽल्पधृतिप्रमाणाः इति ऋग्वेदखिलेषु। अन्यस्त्वर्थोयो मामजं [10।3] इति वाक्यादेव ज्ञायते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.2।।सुरगणा महर्षयः च अतीन्द्रियार्थदर्शिनः अधिकतरज्ञाना अपि मे प्रभवं प्रभावं न विदुः? मम नामकर्मस्वरूपस्वभावादिकं न जानन्ति। यतः तेषां देवानां महर्षीणां च सर्वशः अहम् आदिः? तेषां स्वरूपस्य ज्ञानशक्त्यादेः च अहम् एव आदिःतेषां देवत्वदेवऋषित्वादिहेतुभूतपुण्यानुगुणं मया दत्तं ज्ञानं परिमितम्? अतः ते परिमितज्ञानाः मत्स्वरूपकादिकं यथावत् न जानन्ति।तद् एतद् देवाद्यचिन्त्यस्वरूपयाथात्म्यविषयज्ञानं भक्त्युत्पत्तिविरोधिपापविमोचनोपायम् आह --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.2।। --,न मे विदुः न जानन्ति सुरगणाः ब्रह्मादयः। किं ते न विदुः मम प्रभवं प्रभावं प्रभुशक्त्यतिशयम्? अथवा प्रभवं प्रभवनम् उत्पत्तिम्। नापि महर्षयः भृग्वादयः विदुः। कस्मात् ते न विदुरित्युच्यते -- अहम् आदिः कारणं हि यस्मात् देवानां महर्षीणां च सर्वशः सर्वप्रकारैः।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 10.3 】
▸ Sanskrit Sloka: यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् | असम्मूढ: स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते ||
▸ Transliteration: yo māmajamanādiṁ ca vetti lokamaheśvaram | asaṁmūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate ||
▸ Glossary: yo: who; mām: to Me; ajaṁ: unborn; anādiṁ: without beginning; ca: and; vetti: know; loka: worlds; maheśvaram: supreme lord; asaṁmūḍhaḥ: without doubt; sa: he; martyeṣu: mortal; sarva: all; pāpaiḥ: sins; pramucyate: delivered.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.3 He who knows Me as the unborn, without beginning, and supreme Lord of all the worlds, Only he, who has this clarity, is wise and freed from all bondage.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.3।।जो मनुष्य मुझे अजन्मा? अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है? वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.3।। जो मुझे अजन्मा? अनादि और लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है? र्मत्य मनुष्यों में ऐसा संमोहरहित (ज्ञानी) पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.3 यः who? माम् Me? अजम् unborn? अनादिम् beginningless? च and? वेत्ति knows? लोकमहेश्वरम् the great Lord of the worlds? असम्मूढः undeluded? सः he? मर्त्येषु amongst mortals? सर्वपापैः from all sins? प्रमुच्यते is liberated. Commentary As the Supreme Being is the cause of all the worlds? He is beginningless. As He is the source of the gods and the great sages? there is no source for His existence. As He is beginningless He is unborn. He is the great Lord of all the worlds.Asammudhah Undeluded. He who has realised that his own innermost Self is not different from the Supreme Self is an undeluded person. Through the removal of ignorance the delusion which is of the form of mutual superimposition between the Self and the notSelf is also removed. He is freed from all sins done consciously or unconsciously in the three periods of time.The ignorant man removes his sins through the performance of expiatory acts (Prayaschitta) and enjoyment of the results. But he is not completely freed from all sins because he continues to do sinful actions through the force of evil Samskaras or impressions because he has not eradicated ignorance? the root cause of all sins? and its effect? egoism and superimposition or the feeling of I in the physical body. As he dies? swayed by the forces of evil Samskaras? he engages himself in doing sinful actions in the next birth. But the sage of Selfrealisation is completely liberated from,all sins because ignorance? the root cause of all sins? and its effect? viz.? the mistaken notion that the body is the Self on account of mutual superimposition between the Self and the notSelf? is eradicated in toto along with the Samskaras and all the sins. The Samskaras are burnt completely like roasted seeds. Just as burnt seeds cannot germinate? so also the burnt Samskaras cannot generate further actions or future births.For the following reason also? I am the great Lord of the worlds.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.3. Whosoever knows Me as the unborn and beginningless Absolute Lord of the universe, that person, not deluded among the mortals, is delivered from all sins.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.3 He who knows Me as the unborn, without beginning, the Lord of the universe, he, stripped of his delusion, becomes free from all conceivable sin.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.3 He who knows Me as unborn and without a beginning and the great Lord of the worlds - he among the mortals is undeluded and is released from every sin.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.3 He who knows Me-the birthless, the beginningless, and the great Lord of the worlds, he, the undeluded one among mortals, becomes freed from all sins.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.3 He who knows Me as unborn and beginningless, as the great Lord of the worlds, he, among mortals, is undeluded and he is liberated from all sins.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.3 See Comment under 10.5
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.3 He who exists 'without being born' at any particular time unlike other beings is 'unborn' in the sense of being eternal. For, this attribute denotes a unie state distinct in kind both from insentient things which are subject to modifications, and from the self in Its state of involvement in Samsara when It is united with insentient matter. In that state the birth of the self involved in matter is generated by Karma. The temr 'Anadi', or without beginning, is used to distinguish the state of the Lord, which is distinct in kind, from that of the liberated state which is birthless but can be said to have a beginning. For, to the liberated self, the state of liberation has a beginning, because, in regard to this, conjunction with matter which deserves to be abandoned, existed previously. Hence the term 'Anadi' implies that the Lord is without such conjunction and does not deserve the same description. The Sruti also says: 'Him who is stainless' (Sve. U., 4.19).
Thus, he who is undeluded among the mortals understands Me as 'the great Lord of the worlds,' as the Lord of the lords of the worlds. My nature is incompatible with association with evil which has to be given up. What is called 'delusion' is the wrong knowledge of taking Me as one among other entities of the same kind. To be bereft of this delusion is to be 'undeluded'. Such a person is released from all sins which stand against the rise of Bhakti to Me.
The meaning is this: In this world, the king who rules over men is only like all those men. He has become a ruler by some good Karma. Such is not the case with the Lord of the gods (the Supreme Being). Even the lord of the cosmic egg (Brahma) is of the same class as other beings in Samsara, because he too is a created being coming within the threefold classification of beings according to the three innate tendencies for growth - namely Karma-bhavana, Brahma-bhavana and Ubhaya-bhavana. These three are described respectively as fitness to practise work alone, fitness to practise meditation alone and fitness to practise both together. Brahma comes under the third group. The Sruti also says, 'He who creates Brahma' (Sve. U., 6.18). The same is the case with all those who have acired the eight superhuman powers like becoming atomic etc. But I, the Supreme Being, is the great Lord of the worlds. He who is not subject to the delusion of regarding Me as of the same order as others, - such a person knows Me as distinct in kind from non-conscient matter in its states as cause and effect, from the self whether bound or free, and from everything else, on account of all of them being subject to My control. I am antagonistic to all that is evil and I am the sole centre of innumerable
Chapter 10 (Part 2)
auspicious attributes, unsurpassed and incomparable. It is also My inherent nature to be the controller of everything. One who understands Me to be all this is released from every sin.
Thus, after showing the annihilation, by meditation on His nature, of all evil impeding the rise of Bhakti, and also of the rise of devotion, through implication, by the destruction of such opposing factors, Sri Krsna now explains the way in which Bhakti develops by meditation on His sovereign power and on the multitude of His auspicious attributes:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.3 Yah, he who; vetti, knows; mam, Me; ajam, the birthless; and anadim, the beginningless: Since I am the source of the gods and the great sages, and nothing else exists as My origin, therefore I am birthless and beginningless. Being without an origin is the cause of being birthless. He who knows Me who am thus birthless and beginningless, and loka-maheswaram, the great Lord of the worlds, the transcendental One devoid of ignorance and its effects; sah, he; the asammudhah, undeluded one; martyesu, among mortals, among human beings; pramucyate, becomes freed; sarva-papaih, from all sins-committed knowingly or unknowingly. 'For the following reason also I am the great Lord of the worlds:'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.3।। जो मुझे जानता है यह जानना केवल भावना के प्रवाह में अथवा बुद्धि के विचारों से जानना नहीं है? वरन् यह पूर्ण और वास्तविक आत्मानुभूति है? जो आत्मा के साथ घनिष्ठ तादात्म्य के क्षणों में होती है। आत्मा को किसी दृश्य के समान नहीं किन्तु स्वस्वरूप से इस प्रकार जानना है कि वह अजन्मा? अनादि और सर्वलोकमहेश्वर है। जो लोग वेदान्त दर्शन की प्राचीन परम्परा से कुछ परिचित हैं? उनके लिए उपर्युक्त ये तीन विशेषण अत्यन्त सारगर्भित हैं? जबकि उससे अनभिज्ञ लोगों को ये विशेषण निरर्थक ही प्रतीत होंगे। अनात्म जड़ जगत् परिच्छिन्न है? जहाँ कि प्रत्येक वस्तु? प्राणी या अनुभव अनित्य हैं? अर्थात् समस्त वस्तुएं आदि (जन्म) और अन्त (मत्यु) से युक्त हैं।असीम अनन्त परमात्मा का कभी जन्म नहीं हो सकता? क्योंकि जो उत्पन्न हुआ है? वह परिच्छिन्न है और किसी भी परिच्छिन्न वस्तु में अनन्त तत्त्व कभी अपने अनन्त स्वरूप में व्यक्त नहीं हो सकता। स्थाणु (स्तम्भ) में जब भ्रान्ति से पुरुष (या प्रेत) की प्रतीति होती है? तब पुरुष का नाश (अप्रतीति) हो सकता है? क्योंकि वह उत्पन्न हुआ था। परन्तु? वास्तव में यह नहीं कहा जा सकता कि स्थाणु ने प्रेत को जन्म दिया? अथवा स्तम्भ से प्रेत की उत्पत्ति हुई। स्थाणु तो वहाँ पहले भी था? है और रहेगा। आत्मा नित्य सनातन है? इसलिए वह जन्मरहित है। अन्य वस्तुओं का जन्म? स्थिति और नाश इस आत्मा में ही होता है। तरंगे समुद्र से उत्पन्न होती हैं? परन्तु समुद्र स्वयं अजन्मा है। प्रत्येक तरंग का आदि है? मध्य है और अन्त भी। किन्तु उन सबका सारतत्त्व इन समस्त विकारों से सर्वथा मुक्त है और इसलिए? इस श्लोक में आत्मा को अनादि विशेषण दिया गया है।लोकमहेश्वर लोक शब्द का अर्थ जगत् करने से इस संस्कृत शब्द के व्यापक आशय की उपेक्षा हो जाती है। लोक शब्द जिस धातु से बनता है उसका अर्थ है देखना? अनुभव करना। अत इसका सम्पूर्ण अर्थ होगा अनुभव का क्षेत्र। हमारे दैनिक जीवन में भी इसी अर्थ में लोक शब्द का प्रयोग किया जाता है? जैसे धनवानों का लोक? अपराधियों का लोक? विद्यार्थी लोक? कवियों का लोक आदि। इसलिए? उसके व्यापक अर्थ में लोक शब्द से मात्र भौतिक जगत् ही नहीं? बल्कि भावनाओं एवं विचारों के जगत् का भी बोध होता है।इस प्रकार? मेरा लोक वह है? जो मैं अपने शरीर? मन और बुद्धि के द्वारा अनुभव करता हूँ। यह तो स्पष्ट है कि जब तक मुझे इनका निरन्तर भान नहीं होता तब तक ये अनुभव मेरे नहीं हो सकते। यह चैतन्य तत्त्व? जिसके कारण ही मैं जीता हूँ और जगत् का अनुभव करता हूँ? वास्तव में मेरे लोक का ईश्वर होना ही चाहिए।जो मेरे व्यष्टि के विषय में सत्य है? वही जगत् के समस्त प्राणियों के विषय में भी सत्य है? क्योंकि आत्मा सर्वत्र एक ही है। इस समष्टि लोक का शासक? महान् ईश्वर स्वयं परमात्मा ही हो सकता है। यह लोक महेश्वर शब्द का वास्तविक अर्थ है। ईश्वर कोई निरंकुश एवं क्रूर शासक अथवा आकाश में बैठा कोई सुल्तान नहीं। आत्मा हमारे लोक का ईश्वर ऐसे ही है? जैसे? दिन के समय सूर्य इस बाह्य जगत् का स्वामी है? क्योंकि वही जगत् को प्रकाशित करता है।जो मुझे अजन्मा? अनादि और लोक महेश्वर के रूप में जानता है? वह संमोहरहित हो जाता है। स्थाणु में प्रेत देखकर भयभीत व्यक्ति जैसे ही उस स्थाणु को पहचानता है? वैसे ही वह मोह और भ्रान्ति से मुक्त हो जाता है। हिन्दू धर्म में पाप की कल्पना किसी विकराल अवश्यंभाविता का भयंकर चित्र नहीं है। मनुष्य अपने पापों के लिए दण्डित नहीं? वरन् अपने पापों के द्वारा ही दण्डित होता है। पाप वह स्वअपमानजनक कर्म है? जिसका कारण है मनुष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का अज्ञान।जब कोई व्यक्ति अपने शुद्ध आत्मस्वरूप से भटक कर दूर चला जाता है? तब वह जगत् की घटनाओं के साथ तादात्म्य कर सुखदुख का अनुभव करता है। वह जगत् में इस प्रकार व्यवहार करता है? मानो वह एक घृणित मांसपिण्ड ही है? अथवा स्पन्दनशील भावनाओं की गठरी अथवा विचारों का समूह मात्र है। उसका यह व्यवहार अपनी एकमेव अद्वितीय ईश्वरीय? दिव्य प्रतिष्ठा का अपमान ही है। ऐसे कर्म और विचार मनुष्य को निम्न स्तर के भोगों में आसक्त कर बाँध देते हैं? जिसके कारण वह उनसे ऊपर उठकर वास्तविक पूर्णत्व के शिखर तक कभी नहीं पहुँच पाता।आत्मस्वरूप को पहचान कर उसमें दृढ़ निष्ठा प्राप्त कर लेने पर वह व्यक्ति पुन कभी पापकर्म में प्रवृत्त नहीं होता। पापवृत्तियाँ वे विषैले फोड़े हैं? जिनके कारण हम अपनी परिच्छिन्नताओं की पीड़ा और बंधनों के दुख सहते रहते हैं। जिस क्षण हम अपने आत्मस्वरूप को पहचानते हैं कि वह अजन्मा और अनादि है तथा उसका विकारी और विनाशी उपाधियों के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है? उस समय हम वह सब कुछ प्राप्त कर लेते हैं जो जीवन में प्राप्तव्य है? और वह सब कुछ जान लेते हैं जो ज्ञातव्य है। ऐसा सम्यक् तत्त्वदर्शी पुरुष स्वयं ही लोकमहेश्वर बन जाता है।निम्न कारण से भी आत्मा लोकमहेश्वर है --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.3।।अजत्वेन सर्वभूतमहेश्वरत्वेन च मज्ज्ञानं केषांचिदसंमूढानां सुरादीनां भवति तु एतावानीश्वर प्रभावः इदं परमेश्वरस्य जन्मेत्यतस्तावज्ज्ञानेन केवलं सर्वपापैः प्रमुच्यन्ते नतु प्रभववर्णने शक्ता भवन्तीत्यतः स्वप्रभवमहमेव वक्ष्यामीत्यभिप्रायेणाह -- य इति। यो मानीश्वरं सर्वकारणं कारणवर्जितमतएवाजमुत्पत्तिरहितं लोकानां महान्तमीश्वरं निरति शयैस्वर्यवन्तं वेत्ति परमात्मानादित्वेनाजः सर्वलोकमहेश्वर इति यो जानाति स मर्त्येषु असंमूढः। संमोहो नाम देहेन्द्रियादिविलक्षण ईश्वरादिभिन्नोऽकर्ताऽभोक्ता चाहमिति स्वस्वरुपास्फुरणं तेन मत्कृपया रहितः सर्वैः ज्ञाताज्ञातै संचितक्रियमाणैः प्रकर्षेणाविद्यानिवृत्तिपूर्वकमुच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.3।।महाफलत्वाच्च कश्चिदेव भगवतः प्रभावं वेत्तीत्याह -- सर्वकारणत्वान्न विद्यते आदिः कारणं यस्य तमनादिं अनादित्वादजं जन्मशून्यं लोकानां महान्तमीश्वरं च मां यो वेत्ति स मर्त्येषु मनुष्येषु मध्ये असंमूढः सन्मोहवर्जितः सर्वैः पापैर्मतिपूर्वकृतैरपि प्रमुच्यते प्रकर्षेण कारणोच्छेदात्तत्संस्काराभावरूपेण मुच्यते मुक्तो भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.3।।कस्तर्हि त्वां वेत्तीत्यत आह -- य इति। योऽसंमूढः स मां वेत्ति। स एव सर्वपापैः प्रमुच्यत इति संबन्धः। जडाजडयोर्बुद्ध्यात्मनोरेकीभावेनान्योन्याध्यासलक्षणेन मूढः संमूढस्तद्विपरीतोऽसंमूढस्तत्त्वज्ञानेन बाधिताध्यासः स एवात्मवित्त्वादितरस्य जनिमनुभवन् मां प्रत्यगात्मानं लोकमहेश्वरमनादिं आदिः कारणं तच्छून्यमतएवाजमजातं वेत्ति स सर्वैः कृतैः क्रियमाणैर्वा पापैः प्रमुच्यते मर्त्येषु मध्ये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.3।।एवं स्वकृपां विना स्वाज्ञानात् देवानां देवत्वमपि जातं व्यर्थमेवेत्युक्त्वा स्वकृपया ज्ञानेन मनुष्याणामप्युत्तमत्वं भवतीत्याह -- यो मामजमिति। यो मां मनुष्येषु च अजं जन्मादिदोषरहितम्? अनादिं लीलादिभिर्नित्यमेवम्भूतमेव लोकमहेश्वरं लोकानां परमेश्वरं कर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थम्? असम्मूढः प्रमादरहितः सन् जानाति स सर्वपापैः मद्भक्तिप्रतिबन्धरूपैः प्रमुच्यते प्रकर्षेण मुच्यतेः मनुष्यभावरहितो देवरूपो भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.3।। एवंभूतात्मज्ञाने फलमाह -- यो मामिति। सर्वकारणत्वादेव न विद्यते आदिः कारणं यस्य तमनादिम्। अतएवाजं जन्मशून्यं लोकानां महेश्वरं च मां यो वेत्ति स मनुष्येष्वसंमूढः संमोहरहतिः सन्सर्वपापैः प्रमुच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.3।।अत एव मन्त्रद्रष्टृभिरप्यनुलभ्यमानप्रभवत्वादहमज एव श्रौतानुभवगम्यः? अन्यत्तु गुणप्रकृतिवियदादि जायते एवमतः तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः [तै.उ.2।1] इत्यादिश्रुतेः। तत्संसृष्टा जीवाश्च हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत् [ऋक्सं.8।7।3।1यजुस्सं.23।1] इत्यादिश्रुतेः। अनादिरप्यहमेव मुक्तात्मा अजो भवामि। यद्यपि नचाऽनादिरित्येतदर्थमुक्तमनादिरिति अन्यथा एकार्थवाचकत्वे पृथङ्निरूपणं न कृतं स्यात्। अतएवाधस्ताज्जाता गुणसंसृष्टाः सर्वे ये लोकास्तेषां 2महाश्वरोनियन्ताऽहं इत्येवम्भूतं मां मर्त्येष्वसम्मूढा यो वेत्ति मर्त्येषु स्वेच्छया 2सर्वे रर्थे2 विजातीयविलक्षणं वेत्ति स सर्वपापैः संसारहेतुभूतैः भक्त्युत्पात्ताविरोधिभिः प्रमुच्यत इति तथा ज्ञान तवास्तु इति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.3।।तथा --, क्योंकि मैं महर्षियोंका और देवोंका आदिकारण हूँ? मेरा आदि दूसरा कोई नहीं है? इसलिये मैं अजन्मा और अनादि हूँ। अनादित्व ही जन्मरहित होनेमें कारण है। इस प्रकार जो मुझे जन्मरहित अनादि और लोकोंका महान् ईश्वर अर्थात् अज्ञान और उसके कार्यसे रहित ( जाग्रत? स्वप्न? सुषुप्ति -- इन तीनों अवस्थाओंसे अतीत ) चतुर्थ अवस्थायुक्त जानता है? वह ( इस प्रकार जाननेवाला ) मनुष्योंमें ज्ञानी है अर्थात् मोहसे रहित श्रेष्ठ पुरुष है और वह जानबूझकर किये हुए या बिना जाने किये हुए सभी पापोंसे मुक्त हो जाता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.3।। व्याख्या -- यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् -- पीछेके श्लोकमें भगवान्के प्रकट होनेको जाननेका विषय नहीं बताया है। इस विषयको तो मनुष्य भी नहीं जानता? पर जितना जाननेसे मनुष्य अपना कल्याण कर ले? उतना तो वह जान ही सकता है। वह जानना अर्थात् मानना यह है कि भगवान् अज अर्थात् जन्मरहित हैं। वे अनादि हैं अर्थात् यह जो काल कहा जाता है? जिसमें आदिअनादि शब्दोंका प्रयोग होता है? भगवान् उस कालके भी काल हैं। उन कालातीत भगवान्में कालका भी आदि और अन्त हो जाता है। भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके महान् ईश्वर हैं अर्थात् स्वर्ग? पृथ्वी और पातालरूप जो त्रिलोकी है तथा उस त्रिलोकीमें जितने प्राणी हैं और उन प्राणियोंपर शासन करनेवाले (अलगअलग अधिकारप्राप्त) जितने ईश्वर (मालिक) हैं? उन सब ईश्वरोंके भी महान् ईश्वर भगवान् हैं। इस प्रकार जाननेसे अर्थात् श्रद्धाविश्वासपूर्वक दृढ़तासे माननेसे मनुष्यको भगवान्के अज? अविनाशी और लोकमहेश्वर होनेमें कभी किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं होता।असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते -- भगवान्को अज? अविनाशी और लोकमहेश्वर जाननेसे मनुष्य पापोंसे मुक्त कैसे होगा भगवान् जन्मरहित हैं? नाशरहित हैं अर्थात् उनमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। वे अजन्मा तथा अविनाशी रहते हुए भी सबके महान् ईश्वर हैं। वे सब देशमें रहनेके नाते यहाँ भी हैं? सब समयमें होनेके नाते अभी भी हैं? सबके होनेके नाते मेरे भी हैं और सबके मालिक होनेके नाते मेरे अकेलेके भी मालिक हैं -- इस प्रकार दृढ़तासे मान ले। इसमें सन्देहकी गन्ध भी न रहे। साथहीसाथ? यह जो क्षणभङ्गुर संसार है? जिसका प्रतिक्षण परिवर्तन हो रहा है और जिसको जिस क्षणमें जिस रूपमें देखा है? उसको दूसरे क्षणमें उस रूपमें दुबारा कोई भी देख नहीं सकता क्योंकि वह दूसरे क्षणमें वैसा रहता ही नहीं -- इस प्रकार संसारको यथार्थरूपसे जान ले। जिसने अपनेसहित सारे संसारके मालिक भगवान्को दृढ़तासे मान लिया है और संसारकी क्षणभङ्गुरताको तत्त्वसे ठीक जान लिया है? उसका संसारमें मैं और मेरापन रह ही नहीं सकता प्रत्युत एकमात्र भगवान्में ही अपनापन हो जाता है। तो फिर वह पापोंसे मुक्त नहीं होगा? तो और क्या होगा ऐसा मूढ़तारहित मनुष्य ही भगवान्को तत्त्वसे अज? अविनाशी और लोकमहेश्वर जानता है और वही सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उसके क्रियमाण? संचित आदि सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं। मनुष्यको इस वास्तविकताका अनुभव करनेकी आवश्यकता है? केवल तोतेकी तरह सीखनेकी आवश्यकता नहीं। तोतेकी तरह सीखा हुआ ज्ञान पूरा काम नहीं देता।असम्मूढ़ता क्या है संसार (शरीर) किसीके भी साथ कभी रह नहीं सकता तथा कोई भी संसारके साथ कभी रह नहीं सकता और परमात्मा किसीसे भी कभी अलग हो नहीं सकते और कोई भी परमात्मासे कभी अलग हो नहीं सकता -- यह वास्तविकता है। इस वास्तविकताको न जानना ही सम्मूढ़ता है और इसको यथार्थ जानना ही असम्मूढ़ता है। यह असम्मूढ़ता जिसमें रहती है? वह मनुष्य असम्मूढ़ कहा जाता है। ऐसा असम्मूढ़ पुरुष मेरे सगुणनिर्गुण? साकारनिराकार रूपको तत्त्वसे जान लेता है? तो उसे मेरी लीला? रहस्य? प्रभाव? ऐश्वर्य आदिमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। सम्बन्ध -- पहले श्लोकमें भगवान्ने जिस परम वचनको सुननेकी आज्ञा दी थी? उसको अब आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.1 -- 10.5।।प्राक्तनैर्नवभिरध्यायैर्य एवार्थो लक्षितः? स एव प्रतिपदपाठैरस्मिन्नध्याये प्रतायते। तथा चाह -- भूय एव इति। उक्तमेवार्थं स्फुटीकर्तुं (?N?K विस्पष्टीकर्तुं) पुनः कथ्यमानं श्रृण्विति। अर्जुनोऽपि एवमेवाभिधास्यति भूयः कथय (X? 18) इति। इत्यध्यायतात्पर्यम्। शिष्टं निगदव्याख्यातमिति ( -- व्याख्यानमिति) किं पुनरुक्तेन सन्दिग्धं तु निर्णेष्यते।भूय इत्यादि पृथग्विधा इत्यन्तम्। असंमोहः उत्साहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.3।।इतश्च कश्चिदेव भगवत्प्रभावं वेत्तीत्याह -- किञ्चेति। कोऽसौ प्रभावो भगवतो यं बहवो न विदुरित्यपेक्षायां पारमार्थिकं प्रभावं तद्धीफलं च कथयति -- यो मामिति। पदद्वयापौनरुक्त्यमाह -- अनादित्वमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.3।।अजशब्दागतार्थतयाऽनादिशब्दं व्याचष्टे -- अन इति। सर्वस्येत्युभयशेषः। अन्तर्णीतण्यर्थादनतेः पचाद्यच्। न विद्यते आदिकारणमस्येत्यनादिरिति अन्ये? तदसत् आर्थिकपुनरुक्तेरपरिहारादित्याह -- अजत्वेनेति। इतरस्य कारणराहित्यस्य। अजत्वे हेतुरयमुच्यत इति चेत्? मेवम् तज्ज्ञापकविभक्त्याद्यभावात्। गत्यन्तराभावे हि गमनिकैषा। चेष्ट कत्वं प्रागनुक्तं कथमनूद्यते इति चेत्? न प्रभावे सर्वस्यान्तर्भावात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.3।।अनश्चेष्टयिता आदिश्च सर्वस्येत्यनादिः। अजत्वेन सिद्धेरितरस्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.3।।न जायते इति अजः? अनेन विकारिद्रव्याद् अचेतनात् तत्संसृष्टात् संसारिचेतनात् च विसजातीयत्वम् उक्तम् संसारिचेतनस्य हि कर्मकृताचित्संसर्गो जन्म।अनादिम् इति अनेन पदेन आदिमतः अजात् मुक्तात्मनः विसजातीयत्वम् उक्तम्। मुक्तात्मनो हि अजत्वम् आदिमत्? तस्य हेयसम्बन्धस्य पूर्ववृत्तत्वात् तदर्हता अस्ति? अतः अनादिम् इति अनेन तदनर्हतया तत्प्रत्यनीकता उच्यतेनिरवद्यम् (श्वे0 उ0 6।19) इत्यादिश्रुत्या च।एवं हेयसम्बन्धप्रत्यनीकस्वरूपतया तदनर्हं मां लोकमहेश्वरं लोकेश्वराणाम् अपि ईश्वरं मर्त्येषु असंमूढो यो वेत्ति इतरसजातीयतया एकीकृत्य मोहः संमोहः तद्रहितोऽसंमूढः स मद्भक्त्युत्पत्तिविरोधिभिः सर्वैः पापैः प्रमुच्यते।एतद् उक्तं भवति -- लोके मनुष्याणां राजा इतरमनुष्यसाजीतयः? केनचित् कर्मणा तदाधिपत्यं प्राप्तः? तथा देवानाम् अधिपतिः अपि? तथा ब्रह्माण्डाधिपतिः अपि इतरसंसारिसजातीयः तस्यापि भावनात्रयान्तर्गतत्वात्यो ब्रह्माणं विदधाति (श्वे0 उ0 6।18) इति श्रुतेः च। तथा अन्ये अपि ये केचन अणिमाद्यैश्वर्यं प्राप्ताः।अयं तु लोकमहेश्वरः -- कार्यकारणावस्थाद् अचेतनाद् बद्धात् मुक्तात् च चेतनाद् ईशितव्यात् सर्वस्मात् निखिलहेयप्रत्यनीकानवधिकातिशयासंख्येयकल्याणैकतानतया नियमनैकस्वस्वभावतया च विसजातीय इति? इतरसजातीयतामोहरहितो यो मां वेत्ति स सर्वैः पापैः प्रमुच्यते इति।एवं स्वस्वभावानुसंधानेन भक्त्युत्पत्तिविरोधिपापनिरसनं विरोधिनिरसनाद् एव अर्थतो भक्त्युत्पत्तिं च प्रतिपाद्य स्वैश्वर्यस्वकल्याणगुणगणप्रपञ्चानुसंधानेन भक्तिवृद्धिप्रकारम् आह --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.3।। --,यः माम् अजम् अनादिं च? यस्मात् अहम् आदिः देवानां महर्षीणां च? न मम अन्यः आदिः विद्यते अतः अहम् अजः अनादिश्च अनादित्वम् अजत्वे हेतुः? तं माम् अजम् अनादिं च यः वेत्ति विजानाति लोकमहेश्वरं लोकानां महान्तम् ईश्वरं तुरीयम् अज्ञानतत्कार्यवर्जितम् असंमूढः संमोहवर्जितः सः मर्त्येषु मनुष्येषु? सर्वपापैः सर्वैः पापैः मतिपूर्वामतिपूर्वकृतैः प्रमुच्यते प्रमोक्ष्यते।।इतश्चाहं महेश्वरो लोकानाम् --,
───────────────────
【 Verse 10.4 】
▸ Sanskrit Sloka: बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह: क्षमा सत्यं दम: शम: | सुखं दु:खं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च ||
▸ Transliteration: buddhirjñānam asaṁmohaḥ kṣamā satyaṁ damaḥ śamaḥ | sukhaṁ duḥkhaṁ bhavo ’bhāvo bhayaṁ cābhayameva ca ||
▸ Glossary: buddhih: intelligence; jñānam: knowledge; asaṁmohaḥ: free from doubt; kṣamā: forgiveness; satyaṁ: truthfulness; damaḥ: control of senses; śamaḥ: control of mind; sukhaṁ: happiness; duḥkhaṁ: distress; bhavo ’bhāvo: birth and death; bhayaṁ: fear; cā: and; abhayaṁ: fearlessness; eva: also; ca: and
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.4,5 Intelligence, knowledge, freedom from doubt and delu- sion, forgiveness, truthfulness, control of the senses, control of the mind, happiness, distress, birth, death, fear, fearlessness, non-violence, equanimity, satisfaction, austerity, charity, fame and infamy, all these various qualities of living beings are created by Me alone.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.4।।बुद्धि? ज्ञान? असम्मोह? क्षमा? सत्य? दम? शम? सुख? दुःख? भव? अभाव? भय? अभय? अहिंसा? समता? तुष्टि? तप? दान? यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलगअलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.4।। बुद्धि? ज्ञान? मोह का अभाव? क्षमा? सत्य? दम (इन्द्रिय संयम)? शम (मन संयम)? सुख? दुख? जन्म और मृत्यु? भय और अभय।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.4 बुद्धिः intellect? ज्ञानम् wisdom? असंमोहः nondelusion? क्षमा forgiveness? सत्यम् truth? दमः selfrestraint? शमः calmness? सुखम् happiness? दुःखम् pain? भवः birth or existence? अभावः nonexistence? भयम् fear? च and? अभयम् fearlessness? एव even? च and. Commentary Intellect is the power which the Antahkarana (the fourfold inner instrument -- the mind? the subconscious mind? intellect and egoism) has of understanding subtle objects. Wisdom is knowledge of the Self. Nondelusion is freedom from illusion. It consists in acting with discrimination when anything has to be done or kown at the moment. Patience is the nonagitation of the mind when assaulted or abused. Not thinking of any harm of evil for those who ahve assulted or abused is also patience. Patience is enduring without lamentation the three kinds of pains? Adhyatmika? Adhidaivika and Adhibhautika Taapas. Fever? etc.? is Adhyatmika pain. Pain or discomfort from severe cold? heat? too much rain? thunder? and lightning is Adhidaivika pain. Pain from scorpionsting? snakite? and wild animals is Adhibhautika pain.Satyam or truth is veracity. It is speaking of ones own actual or real experience of things as actually heard or seen. There is not the least twisting or exaggeration or the slightest modification of facts. Dama or selfrestraint is control of the external senses. It is withdrawal of the senses (ear? skin? eyes? tongue and nose) from their respective objects (viz.? sound? touch? form? palatable foods and fragrance). Sama is calmness or tranillity of the mind produced by checking the mind from thinking of external objects of the senses and by disconnecting it from the senses.Sukham Happiness. That which has Dharma or virtue as its chief cause and that which is favourable to all beings? is happiness. Duhkham That which has Adhrama as its cause and that which is unfavourable to all beings? is pain.That which appears is Bhavah. Sat is Bhavah. Asat or unreality is Abhavah.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.4. Intellect, knowledge, steadiness, patience, truth, control [over sense-organs], tranility [of mind], pleasure, pain, birth, death, fear and courage;
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.4 Intelligence, wisdom, non-illusion, forgiveness, truth, self-control, calmness, pleasure, pain, birth, death, fear and fearlessness;
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.4 Intelligence, knowledge, non-delusion, forbearance truth, restraint, self-control, pleasure, pain, exaltation depression, fear and fearlessness;
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.4 Intelligence, wisdom, non-delusion, forgiveness, truth, control of the external organs, control of the internal organs, happiness, sorrow, birth, death and fear as also fearlessness;
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.4 Intellect, wisdom, non-delusion, forgiveness, truth, self-restraint, calmness, happiness, pain, existence or birth, non-existence or death, fear and also fearlessness.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.4 See Comment under 10.5
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.4 - 10.5 'Intelligence' is the power of the mind to determine. 'Knowledge' is the power of determining the difference between the two entities - non-sentient matter and the individual self. 'Non-delusion' is freedom from the delusion of perceiving as silver the mother-of-pearl etc., which are different from silver etc., previously observed. 'Forbearance', is a non-disturbed state of mind, even when there is a cause for getting disturbed. 'Truth' is speech about things as they are actually seen, and meant for the good of all beings. Here, the working of the mind in conformity with the ideal is intended, because the context is with reference to the working of the mind. 'Restraint' is the checking of the outgoing organs from their tendency to move towards their objects and generate evil. 'Self-control' is the restraint of the mind in the same manner. 'Pleasure' is the experience of what is agreeable to oneself. 'Pain' is th experience of what is adverse. 'Exaltation' is that state of elation of the mind caused by experiences which are agreeable to oneself. 'Depression' is the state of mind caused by disagreeable experiences. 'Fear' is the misery which springs from the perception of the cause of future sufferings. 'Fearlessness' is the absence of such feelings. 'Non-violence' is avoidance of being the cause of sorrow to others. 'Eability' is to become eable in mind whether good or bad befalls and to look upon with the same eanimity on what happens to oneself, friends and enemies. 'Cheerfulness' is the natural disposition to feel pleased with everything seen. 'Austerity' is the chastising of the body by denying to oneself pleasures, as enjoined by the scriptures. 'Beneficence' is giving to another what contributes to one's own enjoyment. 'Fame' is the renown of possessing good alities. 'Infamy' is notoriety of possessing bad alities. The workings of the mind which are in accordance with fame and infamy must be understood here, because it is the subject-matter of the context. Austerity and beneficence are to be understood in the same way. All these mental faculties - these functioning of the mind - resulting either in activity or inactivity, are from Me alone, i.e., are dependent on My volition.
Sri Krsna declares: 'Thos agents who direct the creation, sustentation etc., of all beings, have their activity dependent on My Will.'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.4 See Commentary under 10.5.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.4।। See commentary under 10.5.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.4।।स्वस्य लोकमहेश्वरत्वं देवादिबुद्य्धगोचरत्वेन साधितं तदेव प्रपञ्चयति। बुद्धिरन्तःकरणस्य सूक्ष्माद्यर्थावबोधनसामर्थ्यम्। ज्ञानमात्मादिपदार्थावबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु ज्ञातव्येषु विवेखपुरःसरा बुद्धिप्रवृत्तिः। आकुष्टस्य ताडितस्य वाऽविकृतचित्तता क्षमा। प्रमाणावगतार्थस्य यथार्थभाषणं सत्यं। बाह्येन्द्रियोपशमो दमः। अन्तःकरणशान्तिः शमः। आह्लादः सुखम्। तापो दुःखम्। भव उत्पत्तिः। अभावो नाशः। भयं त्रासः। अभयमत्रासः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.4।।आत्मनो लोकमहेश्वरत्वं प्रपञ्चयति -- बुद्धिरन्तःकरणस्य सूक्ष्मार्थविवेकसामर्थ्यम्। ज्ञानमात्मानात्सर्वपदार्थावबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु बोद्धव्येषु कर्तव्येषु वाऽव्याकुलतया विवेकेन प्रवृत्तिः। क्षमा आकुष्टस्य ताडितस्य वा निर्विकारचित्तता। सत्यं प्रमाणेनावबुद्धस्यार्थस्य तथैव भाषणम्। दमो बाह्येन्द्रियाणां स्वविषयेभ्यो निवृत्तिः। शमोऽन्तःकरणस्य सा। सुखं धर्मासाधारणकारणमनुकूलवेदनीयम्। दुःखमधर्मासाधारणकारणकं प्रतिकूलवेदनीयम्। भवः उत्पत्तिः। भावः सत्ता। अभावोऽसत्तेति वा। भयं च त्रासस्तद्विपरीतमभयम्। एवंच एकश्चकार उक्तसमुच्चयार्थः। अपरोऽनुक्ताबुद्ध्यज्ञानादिसमुच्चयार्थः। एवेत्येते सर्वलोकप्रसिद्धा एवेत्यर्थः। मत्तएव भवन्तीत्युत्तरेणान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.4।।मम महेश्वरत्वादेव मत्तो बुद्ध्यादयो भवन्तीत्याह -- बुद्धिरिति। बुद्धिरन्तःकरणस्य सूक्ष्मार्थावबोधने सामर्थ्यम्? ज्ञानमात्मानात्मादिपदार्थावबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु बोद्धव्येष्वव्याकुलतया विवेकपूर्विका प्रतिपत्तिः। क्षमा आकृष्टस्य ताडितस्य वाऽविकृतचित्तता। सत्यं प्रमाणेनावगतस्यार्थस्य यथार्थत्वेन भाषणम्। दमो बाह्येन्द्रियनियमः। शमो मनोनिग्रहः। सुखमाह्लादः। दुःखं तापः। भव उत्पत्तिः। भावः सत्ता अभावस्तद्विपर्ययः। भयं त्रासः। अभयमेव च तद्विपरीतम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.4।।एवं ये जानन्ति तेषामन्येषामजानतां च सर्वेश्वरत्वात् मत्त एव नानाविधा भावास्तत्तज्ज्ञानानुरूपा भवन्तीत्याह द्वयेन -- बुद्धिर्ज्ञानमसम्मोह इति। बुद्धिः धर्मज्ञानकौशलं? ज्ञानं स्वरूपात्मकम्? असम्मोहो मायाविलासेषु? क्षमा दुष्टादिकृतिसहिष्णुता? सत्यं आपदादिष्वपि यथार्थभाषणं? दम इन्द्रियनिग्रहः? शमः परमानन्दाप्तिरूपा शान्तिः? सुखं मद्भावानन्दरूपं? दुःखं आनन्दतिरोधानात्मकं? भवः संसारात्मकः? अभावो नाशः? भयं मृत्युकालादीनाम्। चकारेण यमयातनादयः। अभयं मच्चरणाप्त्या कालादिभयाभावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.4।। लोकमहेश्वरतामेव स्फुटयति -- बुद्धिरिति त्रिभिः। बुद्धिः सारासारविवेकनैपुण्यम्? ज्ञानमात्मविषयम्? असंमोहो व्याकुलत्वाभावः? क्षमा सहिष्णुत्वम्? सत्यं यथार्थभाषणम्? दमो बाह्येन्द्रियसंयमः? शमोऽन्तःकरणसंयमः? सुखमनुकूलसंवेदनीयम्? दुःखं च तद्विपरीतम्? भव उद्भवः अभावस्तद्विपरीतः? भयं त्रासः? अभयं तद्विपरीतम्। अस्य लोकस्य मत्त एव भवन्तीत्युत्तरेणान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.4 -- 10.5।।किञ्च अचिन्त्यैश्वर्ययोगकल्याणगुणान्मत्त एव बुद्धिर्ज्ञानं च भवति। ज्ञानमित्युपलक्षणं सर्वस्य सदसद्गुणसर्गस्यमत्तः सर्वं प्रवर्त्तते [10।8] इति वाक्यात्। तथाहि बुद्धिरित्यादि। बुद्धिः तत्त्वतोऽध्यवसायरूपा? ज्ञानमुपदेशजन्यम्?असम्मूढः [10।3] इत्यत्रोक्तोऽसम्मोहोऽपि मत्त एव भवति। क्षमा सहिष्णुता सत्यं प्रमाणेनावबुद्धस्यार्थस्य तथैव भाषणम्? दमो बाह्येन्द्रियाणां स्वविषयेभ्यो निवृत्तिः? शमोऽन्तःकरणस्य? सुखमात्मानुकूलानुभवः? दुःखं तद्विपरीतं च मत्त एव भवति। मार्गत्रयाधिष्ठाताऽहं यथामार्गानुसरणं तत्तदधिकृताय तथैव दुःखं सुखं प्रयच्छामीति भावः। एवं भवः उद्भवः? अभावस्तद्विपरीतः? भयमभयं च दानं यशः अयशश्चेति विंशद्भावास्तत्तन्मार्गरतानां प्राणिनां यथासर्गं पृथग्विधा मत्त एव भवन्तिरूपनामविभेदेन जगत् क्रीडति यो यतः इति निबन्धोक्तेः। अनेन स्वस्य मुख्यं कर्तृत्वं सर्वकारणत्वं चोक्तम्। प्रकृत्यादेस्तु करणत्वमेव? न कारणत्वं साधकतमत्त्वादिति स्वयोगमहिमोक्तः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.4।। इसलिये भी मैं लोकोंका महान् ईश्वर हूँ --, सूक्ष्म? सूक्ष्मतर आदि पदार्थोंको समझनेवाली अन्तःकरणकी ज्ञानशक्तिका नाम बुद्धि है। उससे युक्त मनुष्यको ही बुद्धिमान् कहते हैं। ज्ञान -- आत्मा आदि पदार्थोंका बोध? असंमोह -- जाननेयोग्य पदार्थ प्राप्त होनेपर उनमें विवेकपूर्वक प्रवृत्ति? क्षमा -- किसीके द्वारा अपनी निन्दाकी जाने या ताड़ना दी जानेपर भी चित्तमें विकार न होना? सत्य -- देखने और सुननेसे जिस प्रकारका अपनेको अनुभव हुआ हो? उसको दूसरेकी बुद्धिमें पहुँचानेके लिये उसी प्रकार कही जानेवाली वाणी सत्य कहलाती है? दम -- बाह्य इन्द्रियोंको वशमें कर लेना? शम -- अन्तःकरणकी उपरति? सुख -- आह्लाद? दुःख -- सन्ताप? भव -- उत्पत्ति? अभाव -- उत्पत्तिके विपरीत ( विनाश ) तथा भय -- त्रास और अभय -- उसके विपरीत जो निर्भयता है वह भी।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.4।। व्याख्या -- बुद्धिः -- उद्देश्यको लेकर निश्चय करनेवाली वृत्तिका नाम बुद्धि है।ज्ञानम् -- सारअसार? ग्राह्यअग्राह्य? नित्यअनित्य? सत्असत्? उचितअनुचित? कर्तव्यअकर्तव्य -- ऐसा जो विवेक अर्थात् अलगअलग जानकारी है? उसका नाम ज्ञान है। यह ज्ञान (विवेक) मानवमात्रको भगवान्से मिला है।असम्मोहः -- शरीर और संसारको उत्पत्तिविनाशशील जानते हुए भी उनमें मैं और मेरापन करनेका नाम सम्मोह है और इसके न होनेका नाम असम्मोह है।क्षमा -- कोई हमारे प्रति कितना ही बड़ा अपराध करे? अपनी सामर्थ्य रहते हुए भी उसे सह लेना और उस अपराधीको अपनी तथा ईश्वरकी तरफसे यहाँ और परलोकमें कहीं भी दण्ड न मिले -- ऐसा विचार करनेका नाम क्षमा है।सत्यम् -- सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके लिये सत्यभाषण करना अर्थात् जैसा सुना? देखा और समझा है? उसीके अनुसार अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये न ज्यादा? न कम -- वैसाकावैसा कह देनेका नाम सत्य है।दमः शमः -- परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखते हुए इन्द्रियोंको अपनेअपने विषयोंसे हटाकर अपने वशमें करनेका नाम दम है? और मनको सांसारिक भोगोंके चिन्तनसे हटानेका नाम शम है।सुखं दुःखम् -- शरीर? मन? इन्द्रियोंके अनुकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो प्रसन्नता होती है? उसका नाम सुख है और प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो अप्रसन्नता होती है? उसका नाम,दुःख है।भवोऽभावः -- सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? भाव आदिके उत्पन्न होनेका नाम भव है और इन सबके लीन होनेका नाम अभाव है।भयं चाभयमेव च -- अपने आचरण? भाव आदि शास्त्र और लोकमर्यादाके विरुद्ध होनेसे अन्तःकरणमें अपना अनिष्ट होनेकी जो एक आशङ्का होती है? उसको भय कहते हैं। मनुष्यके आचरण? भाव आदि अच्छे हैं? वह किसीको कष्ट नहीं पहुँचाता? शास्त्र और सन्तोंके सिद्धान्तसे विरुद्ध कोई आचरण नहीं करता? तो उसके हृदयमें अपना अनिष्ट होनेकी आशङ्का नहीं रहती अर्थात् उसको किसीसे भय नहीं होता। इसीको अभय कहते हैं।अहिंसा -- अपने तन? मन और वचनसे किसी भी देश? काल? परिस्थिति आदिमें किसी भी प्राणीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न देनेका नाम अहिंसा है।समता -- तरहतरहकी अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिके प्राप्त होनेपर भी अपने अन्तःकरणमें कोई विषमता न आनेका नाम समता है।तुष्टिः -- आवश्यकता ज्यादा रहनेपर भी कम मिले तो उसमें सन्तोष करना तथा और मिले -- ऐसी इच्छाका न रहना तुष्टि है। तात्पर्य है कि मिले अथवा न मिले? कम मिले अथवा ज्यादा मिले आदि हर हालतमें प्रसन्न रहना तुष्टि है।तपः -- अपने कर्तव्यका पालन करते हुए जो कुछ कष्ट आ जाय? प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय? उन सबको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नाम तप है। एकादशीव्रत आदि करनेका नाम भी तप है।दानम् -- प्रत्युपकार और फलकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा न रखकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी शुद्ध कमाईका हिस्सा सत्पात्रको देनेका नाम दान (गीता 17। 20)।यशोऽयशः -- मनुष्यके अच्छे आचरणों? भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी प्रसिद्धि? प्रशंसा आदि होते हैं? उनका नाम यश है। मनुष्यके बुरे आचरणों? भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी निन्दा होती है? उसको अयश (अपयश) कहते हैं।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः -- प्राणियोंके ये पृथक्पृथक् और अनेक तरहके भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उन सबको सत्ता? स्फूर्ति? शक्ति? आधार और प्रकाश मुझ लोकमहेश्वरसे ही मिलता है। तात्पर्य है कि तत्त्वसे सबके मूलमें मैं ही हूँ।यहाँ मत्तः पदसे भगवान्का योग? सामर्थ्य? प्रभाव और पृथग्विधाः पदसे अनेक प्रकारकी अलगअलग विभूतियाँ जाननी चाहिये।संसारमें जो कुछ विहित तथा निषिद्ध हो रहा है शुभ तथा अशुभ हो रहा है और संसारमें जितने सद्भाव तथा दुर्भाव हैं? वह सबकीसब भगवान्की लीला है -- इस प्रकार भक्त भगवान्को तत्त्वसे समझ लेता है तो उसका भगवान्में अविकम्प (अविचल) योग हो जाता है (गीता 10। 7)।यहाँ प्राणियोंके जो बीस भाव बताये गये हैं? उनमें बारह भाव तो एकएक (अकेले) हैं और वे सभी अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाले हैं और भयके साथ आया हुआ अभय भी अन्तःकरणमें पैदा होनेवाला भाव है तथा बचे हुए सात भाव परस्परविरोधी हैं। उनमेंसे भव (उत्पत्ति)? अभाव? यश और अयश -- ये चार तो प्राणियोंके पूर्वकृत कर्मोंके फल हैं और सुख? दुःख तथा भय -- ये तीन मूर्खताके फल हैं। इस मूर्खताको मनुष्य मिटा सकता है।यहाँ प्राणियोंके बीस भावोंको अपनेसे पैदा हुए और अपनी विभूति बतानेमें भगवान्का तात्पर्य है कि ये बीस भाव तो पृथक्पृथक् हैं? पर इन सब भावोंका आधार मैं एक ही हूँ। इन सबके मूलमें मैं ही हूँ? ये सभी मेरेसे ही होते हैं एवं मेरेसे ही सत्तास्फूर्ति पाते हैं। सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने मत्तः एव पदोंसे बताया है कि सात्त्विक? राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उनके मूलमें मैं ही हूँ? वे मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सत्तास्फूर्ति पाते हैं। अतः यहाँ भी भगवान्का आशय विभूतियोंके मूल तत्त्वकी तरफ साधककी दृष्टि करानेमें ही है।विशेष बातसाधक संसारको कैसे देखे ऐसे देखे कि संसारमें जो कुछ क्रिया? पदार्थ? घटना आदि है? वह सब भगवान्का रूप है। चाहे उत्पत्ति हो? चाहे प्रलय हो चाहे अनुकूलता हो? चाहे प्रतिकूलता हो चाहे अमृत हो? चाहे मृत्यु हो चाहे स्वर्ग हो? चाहे नरक हो यह सब भगवान्की लीला है। भगवान्की लीलामें बालकाण्ड भी है? अयोध्याकाण्ड भी है? अरण्यकाण्ड भी है और लङ्काकाण्ड भी है। पुरियोंमें देखा जाय तो अयोध्यापुरीमें भगवान्का प्राकट्य है राजा? रानी और प्रजाका वात्सल्यभाव है। जनकपुरीमें रामजीके प्रति राजा जनक? महारानी सुनयना और प्रजाके विलक्षणविलक्षण भाव हैं। वे रामजीको दामादरूपसे खिलाते हैं? खेलाते हैं? विनोद करते हैं। वनमें (अरण्यकाण्डमें) भक्तोंका मिलना भी है और राक्षसोंका मिलना भी। लंकापुरीमें युद्ध होता है? मारकाट होती है? खूनकी नदियाँ बहती हैं। इस तरह अलगअलग पुरियोंमें? अलगअलग काण्डोंमें भगवान्की तरहतरहकी लीलाएँ होती हैं। परन्तु तरहतरहकी लीलाएँ होते हुए भी रामायण एक है और ये सभी लीलाएँ एक ही रामायणके अङ्ग हैं तथा इन अङ्गोंसे रामायण साङ्गोपाङ्ग होती है। ऐसे ही संसारमें प्राणियोंके तरहतरहके भाव हैं? क्रियाएँ हैं। कहींपर कोई हँस रहा है तो कहींपर कोई रो रहा है? कहींपर विद्वद्गोष्ठी हो रही है तो कहींपर आपसमें लड़ाई हो रही है? कोई जन्म ले रहा है तो कोई मर रहा है?,आदिआदि जो विविध भाँतिकी चेष्टाएँ हो रही हैं? वे सब भगवान्की लीलाएँ हैं। लीलाएँ करनेवाले ये सब भगवान्के रूप हैं। इस प्रकार भक्तकी दृष्टि हरदम भगवान्पर ही रहनी चाहिये क्योंकि इन सबके मूलमें एक परमात्मतत्त्व ही है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.1 -- 10.5।।प्राक्तनैर्नवभिरध्यायैर्य एवार्थो लक्षितः? स एव प्रतिपदपाठैरस्मिन्नध्याये प्रतायते। तथा चाह -- भूय एव इति। उक्तमेवार्थं स्फुटीकर्तुं (?N?K विस्पष्टीकर्तुं) पुनः कथ्यमानं श्रृण्विति। अर्जुनोऽपि एवमेवाभिधास्यति भूयः कथय (X? 18) इति। इत्यध्यायतात्पर्यम्। शिष्टं निगदव्याख्यातमिति ( -- व्याख्यानमिति) किं पुनरुक्तेन सन्दिग्धं तु निर्णेष्यते।भूय इत्यादि पृथग्विधा इत्यन्तम्। असंमोहः उत्साहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.4।।भगवतो लोकमहेश्वरत्वे हेत्वन्तरमाह -- इतश्चेति। मुमुक्षुभिराराध्यत्वसिद्धये बन्धमोक्षसाधनं पुरस्कृत्याशेषजगत्प्रकृत्यधिष्ठातृत्वलक्षणं सोपाधिकं भगवत्प्रभावमभिधत्ते -- बुद्धिरिति। सूक्ष्मादीत्यादिशब्देन सूक्ष्मतरः सूक्ष्मतमश्चार्थो गृह्यते। उक्तं सामर्थ्यं बुद्धिरित्यस्मिन्नर्थे प्रसिद्धिं प्रमाणयति -- तद्वन्तमिति। आत्मादीति। तदवबोधवन्तं हि ज्ञानिनं वदन्ति। अन्तःकरणस्योपशमो विषयेभ्यो व्यावृत्तिरिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.4।।तर्ह्यादिमित्यनेन बुद्धिरित्यादिकं गतार्थमित्यत आह -- तदिति। सर्वादित्वं बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानमित्यनर्थान्तरमिति गौतमवचनात्। बुद्धिर्ज्ञानमिति पुनरुक्तिरित्यत आह -- कार्येति। कुत एतदित्यत आह -- ज्ञानमिति। ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानं शास्त्रमित्यसत्? अध्यात्मिकधर्मप्रसङ्गात्। दमो बाह्येन्द्रियोपशमः? शमोऽन्तःकरणस्योपशम इति कश्चित् (शं.) तदसत्? एकेनैव शब्देन सिद्धत्वात्? किन्तु दमः क्रियासु विनयः? शमो बाह्यान्तःकरणसंयम इत्यपरः? तदप्यसदिति भावेनाह -- दम इति। कुत इत्यत आह --,शम इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.4।।तत्प्रथयति -- बुद्धिरित्यादिना। कार्याकार्यविनिश्चयो बुद्धिः। ज्ञानं प्रतीतिः।ज्ञानं प्रतीतिर्बुद्धिस्तु कार्याकार्यविनिश्चयः इति ह्यभिधानम्। दम इन्द्रियनिग्रहः। शमः परमात्मनि निष्ठा।शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रियनिग्रहः [11।17।36] इति भागवते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.4।।बुद्धिः मनसो निरूपणसामर्थ्यम्? ज्ञानं चिदचिद्वस्तुविशेषविषयः निश्चयः। असंमोहः पूर्वगृहीताद् रजतादेः विसजातीये शुक्तिकादिवस्तुनि सजातीयताबुद्धिनिवृत्तिः। क्षमा मनोविकारहेतौ सति अपि अविकृतमनस्त्वम्। सत्यं यथादृष्टविषयं भूतहितरूपं वचनम्? तद्नुगणा मनोवृत्तिः इह अभिप्रेता? मनोवृत्तिप्रकरणात्। दमः बाह्यकरणानाम् अनर्थविषयेभ्यो नियमनम्। शमः अन्तःकरणस्य तथा नियमनम्। सुखम् आत्मानुकूलानुभवः। दुःखं प्रतिकूलानुभवः। भवो भवनम् अनुकूलानुभवहेतुकं मनसो भवनम्। अभावः,प्रतिकूलानुभवहेतुको मनसः अवसादः। भयम् आगामिनो दुःखस्य हेतुदर्शनजं दुःखम्? तन्निवृत्तिः अभयम्। अहिंसा परदुःखाहेतुत्वम्। समता आत्मनि सुहृत्सु विपक्षेषु च अर्थानर्थयोः सममतित्वम्। तुष्टिः सर्वेषु आत्मसु दृष्टेषु तोषस्वभावत्वम्। तपः शीस्त्रीयो भोगसंकोचरूपः कायक्लेशः। दानं स्वकीयभोग्यानां परस्मै प्रतिपादनम्। यशो गुणवत्ताप्रथा? अयशः नैर्गुण्यप्रथा? कीर्त्यकीर्त्यनुगुणमनोवृत्तिविशेषौ तथा उक्तौ? मनोवृत्तिप्रकरणात्। तपोदाने च तथा। एवमाद्याः सर्वेषां भूतानां भावाः प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतवो मनोवृत्तयो मत्त एव मत्संकल्पायत्ताः भवन्ति।सर्वस्य भूतजातस्य सृष्टिस्थित्योः प्रवर्तयितारः च मत्संकल्पायत्तप्रवृत्तय इत्याह --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.4।। --,बुद्धिः अन्तःकरणस्य सूक्ष्माद्यर्थावबोधनसामर्थ्यम्? तद्वन्तं बुद्धिमानिति हि वदन्ति। ज्ञानम् आत्मादिपदार्थानामवबोधः। असंमोहः प्रत्युत्पन्नेषु बोद्धव्येषु विवेकपूर्विका प्रवृत्तिः। क्षमा आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा अविकृतचित्तता। सत्यं यथादृष्टस्य यथाश्रुतस्य च आत्मानुभवस्य परबुद्धिसंक्रान्तये तथैव उच्चार्यमाणा वाक् सत्यम् उच्यते। दमः बाह्येन्द्रियोपशमः। शमः अन्तःकरणस्य उपशमः। सुखम् आह्लादः। दुःखं संतापः। भवः उद्भवः। अभावः तद्विपर्ययः। भयं च त्रासः? अभयमेव च तद्विपरीतम्।।
───────────────────
【 Verse 10.5 】
▸ Sanskrit Sloka: अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयश: | भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधा: ||
▸ Transliteration: ahiṁsā samatā tuṣṭis tapo dānaṁ yaśo ’yaśaḥ | bhavanti bhāvā bhūtānāṁ matta eva pṛthagvidhāḥ ||
▸ Glossary: ahiṁsā: non-violence; samatā: equanimity; tuṣṭis: satisfaction; tapo: auster- ity; dānaṁ: charity; yaśo: fame; ayaśaḥ: infamy; bhavanti: become; bhāvā: nature; bhūtānāṁ: living beings; matta: from me; eva: surely; pṛthagvidhāḥ: in various forms
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.4,5 Intelligence, knowledge, freedom from doubt and delu- sion, forgiveness, truthfulness, control of the senses, control of the mind, happiness, distress, birth, death, fear, fearlessness, non-violence, equanimity, satisfaction, austerity, charity, fame and infamy, all these various qualities of living beings are created by Me alone.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.5।।बुद्धि? ज्ञान? असम्मोह? क्षमा? सत्य? दम? शम? सुख? दुःख? भव? अभाव? भय? अभय? अहिंसा? समता? तुष्टि? तप? दान? यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलगअलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.5।। अहिंसा? समता? सन्तोष? तप? दान? यश और अपयश ऐसे ये प्राणियों के नानाविध भाव मुझ से ही प्रकट होते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.5 अहिंसा noninjury? समता eanimity? तुष्टिः contentment? तपः austerity? दानम् beneficence? यशः fame? अयशः illfame? भवन्ति arise? भावाः alities? भूतानाम् of beings? मत्तः from Me? एव alone? पृथग्विधाः of different kinds. Commentary Ahimsa is noninjury to living beings in thought? word and deed. Samata is that state wherein there is neither Raga (like) nor Dvesha (dislike)? when one gets pleasant or unpleasant objects. There is neither exhilaration when one gets pleasant or favourable objects nor depressions when one gets unpleasant or unfavourable objects. Tushtih is satisfaction or contentment. The man of contentment is satisfied with whatever object he gets through Prarabdha. He is satisfied with his present acisitions. He is free from greed and so he has peace of mind. Contentment makes a man very rich. It annihilates greed. Greed makes even a rich man a beggar of beggars. A greedy man is ever restless. Tapas is restraint of the senses? with bodily mortification through the practice of fasting and slow reduction of food. The strength of the body and the senses is reduced through fasting.Danam is beneficence. It is sharing of ones own things with others according to ones own means? or distribution of rice? gold? cloth? etc.? to a worthy person? in a fit place and time? especially to one who can do nothign in return.Yasas is fame due to Dharma or virtuous actions.Ayasah is illfame or disgrace due to Adharma or sinful actions.All these different kinds of alities of living beings arise from Me alone? the great Lord of the worlds? according to their respective Karmas.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.5. [Also] non-injury, eanimity, contentment, austerity, charity, repute and ill-repute - all these diverse dispositions of beings emanate from none but Me.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.5 Harmlessness, equanimity, contentment, austerity, beneficence, fame and failure, all these, the characteristics of beings, spring from Me only.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.5 Non-violence, eality, cheerfulness, austerity, beneficence, fame and infamy- these different alities of beings arise from Me
Chapter 10 (Part 3)
alone.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.5 Non-injury, eanimity, satisfaction, austerity, charity, fame, infamy-(these) different dispositions of beings spring from Me alone.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.5 Non-injury, eanimity, contentment, austerity, beneficence, fame, ill-fame (these) different kinds of alities of beings arise from Me alone.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.1-5 The subject-matter that has been indicated in the previous nine chapters - the same in being detailed here in this chapter by citing individual instances. That is why [the Bhagavat] says 'Yet again etc.' (10.X, 1). He thus indicates 'Hear the subject matter, which has already been related to you, but which once again being explained in order to make it clear'. Arjuna too says in the seel likewise 'Tell me once again etc.' (10.X, 18). This is the purport of [this] chapter. Other items are clear by mere reciting. Hence, why to repeat them ? However, whatever is doubtful that shall be decided [then and there].
Bhuyah etc. upto prthagvidhah. Steadiness is that which induces one.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.4 - 10.5 'Intelligence' is the power of the mind to determine. 'Knowledge' is the power of determining the difference between the two entities - non-sentient matter and the individual self. 'Non-delusion' is freedom from the delusion of perceiving as silver the mother-of-pearl etc., which are different from silver etc., previously observed. 'Forbearance', is a non-disturbed state of mind, even when there is a cause for getting disturbed. 'Truth' is speech about things as they are actually seen, and meant for the good of all beings. Here, the working of the mind in conformity with the ideal is intended, because the context is with reference to the working of the mind. 'Restraint' is the checking of the outgoing organs from their tendency to move towards their objects and generate evil. 'Self-control' is the restraint of the mind in the same manner. 'Pleasure' is the experience of what is agreeable to oneself. 'Pain' is th experience of what is adverse. 'Exaltation' is that state of elation of the mind caused by experiences which are agreeable to oneself. 'Depression' is the state of mind caused by disagreeable experiences. 'Fear' is the misery which springs from the perception of the cause of future sufferings. 'Fearlessness' is the absence of such feelings. 'Non-violence' is avoidance of being the cause of sorrow to others. 'Eability' is to become eable in mind whether good or bad befalls and to look upon with the same eanimity on what happens to oneself, friends and enemies. 'Cheerfulness' is the natural disposition to feel pleased with everything seen. 'Austerity' is the chastising of the body by denying to oneself pleasures, as enjoined by the scriptures. 'Beneficence' is giving to another what contributes to one's own enjoyment. 'Fame' is the renown of possessing good alities. 'Infamy' is notoriety of possessing bad alities. The workings of the mind which are in accordance with fame and infamy must be understood here, because it is the subject-matter of the context. Austerity and beneficence are to be understood in the same way. All these mental faculties - these functioning of the mind - resulting either in activity or inactivity, are from Me alone, i.e., are dependent on My volition.
Sri Krsna declares: 'Thos agents who direct the creation, sustentation etc., of all beings, have their activity dependent on My Will.'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.5 Buddhih, intelligence-the power of the internal organ to know of things which are subtle etc. Indeed, people talk of a man possessed of this (power) as intelligent. Jnanam, wisdom-knowledge of entities such as the Self etc. Asammohah, non-delusion-proceeding with discrimination with regard to things that are to be known as they present them-selves. Ksama, forgiveness-unperturbability of the mind of one who is abused or assulted. Satyam, truth-an utterance regarding what one has seen, heard, and felt oneself, communicated as such to others for their understanding, is said to be truth. Damah, control of the external organs. Samah, control of the internal organs. Sukham, happiness. Duhkham, sorrow. Bhavah, birth; and its opposite abhavah, death. And bhayam, fear; as also its opposite abhayam, fearlessness. Ahimsa, non-injury-non-cruely towards creatures. Samata, eanimity. Tustih, satisfaction-the idea of sufficiency with regard to things acired. Tapah, austerity-disciplining the body through control of the organs. Danam, charity-distribution (of wealth) according to one's capacity. Yasah, fame-renown arising from righteousness. On the contrary, ayasah is infamy due to unrighteousness. (These) prthak-vidhah, different; bhavah, dispositions-intelligence etc. as described; bhuanam, of beings, of living bengs. bhavanti, spring; mattah, eva, from Me alone, [This is said in the sesne that none of these dispositions can exist without the Self.] from God, in accordanced with their actions. Moreover,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.5।। प्रस्तुत प्रकरण के विचार को ही आगे बढ़ाते हुए कि परमात्मा ही सम्पूर्ण विश्व का उपादान और निमित्त कारण है? भगवान् श्रीकृष्ण इन दो श्लोकों में उन विविध गुणों को गिनाते हैं? जो मनुष्य के मन और बुद्धि में व्यक्त होते हैं।साधारणत? सृष्टि शब्द से केवल हम भौतिक जगत् ही समझते हैं। परन्तु उपर्युक्त समस्त गुण उसके व्यापक एवं सर्वग्राहक अर्थ को सूचित करते हैं। उनसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि जगत् शब्द के अर्थ में हमारे मानसिक और बौद्धिक जीवन भी सम्मिलित हैं।पुन सभी मनुष्यों और प्राणियों का वर्गीकरण इन्हीं गुणों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने गुण या स्वभाव के वशीभूत है। यथा मन तथा मनुष्य। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ केवल शुभ दैवी गुणों का ही गणना की गई है। संस्कृत व्याख्याकारों की पारम्परिक शैली का अनुकरण करते हुए? श्लोक में प्रयुक्त च शब्द की व्याख्या यह की जा सकती है कि उसके द्वारा विरोधी अशुभ गुणों को भी यहाँ सूचित किया गया है। तथापि भगवान् केवल शुभ गुणों को ही स्पष्टत बताते हैं? क्योंकि जिस व्यक्ति में इन गुणों का अधिकता होती है? उसमें आत्मा की शुद्धता एवं दिव्यता के दर्शन होते हैं।इन विभिन्न प्रकार की भावनाओं एवं विचारों से प्रेरित होकर प्रत्येक व्यक्ति अपनेअपने संस्कारों के अनुसार कर्म में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार यहाँ विविध प्रकार के जीवन दृष्टिगोचर होते है। ये समस्त गुण? मुझसे ही प्रकट होते हैं। स्तम्भ में प्रतीत हुआ प्रेत चाहे प्रेम से मन्दस्मित करे या क्रोध से खिसियाये अथवा प्रतिशोध की भावना से धमकाये? उसका मन्द स्मित या धमकाना इत्यादि गुणों का केवल एक अधिष्ठान है स्तम्भ। आत्मचैतन्य के बिना बुद्धि? ज्ञान आदि गुणों का न अस्तित्व है और न भान।इन गुणों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों का तथा उनके अनुभवों का प्राय पूर्ण वर्गीकरण किया गया है। इसलिए जैसा कि शंकराचार्य कहते हैं? ये दो श्लोक आत्मा का सर्वलोकमहेश्वर होना सिद्ध करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.5।।अहिंसा प्राणिनामपीडा। समता समचित्तता। तुष्टिः संतोषोऽलंबुद्धिः। इन्द्रियसंयमपुरःसरं शास्त्रीयं देहपीडनं तपः। देशकालानुरोधेन शक्तिमतिक्रम्य श्रद्धयापात्रेऽर्थानामर्पणं दानम्। धर्मनिदाना कीर्तियेशः। अधर्मनिदानाऽपकीर्तिरपयशः। एते यथोक्ता भावाः पृथग्विधा नानाप्रकारा भूतानां स्वकर्मानुसारेण मत्तएवेश्वराद्भवन्ति। अतोऽहमेव सर्वलोकमहेश्वरः सर्वैर्भोगमोक्षार्थं शरणीकरणीय इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.5।।अहिंसा प्राणिनां पीडाया निवृत्तिः। समता चित्तस्य रागद्वेषादिरहितावस्था। तुष्टिर्भोग्येष्वेतावताऽलमिति बुद्धिः। तपः शास्त्रीयमार्गेण कायेन्द्रियशोषणम्। दानं देशे काले श्रद्धया,यथाशक्त्यर्थानां सत्पात्रे समर्पणम्। यशो धर्मनिमित्ता लोकश्लाघारूपा प्रसिद्धिः। अयशस्त्वधर्मनिमित्ता लोकनिन्दारूपा प्रसिद्धिः। एते बुद्ध्यादयो भावाः कार्यविशेषाः सकारणकाः पृथग्विधा धर्माधर्मादिसाधनवैचित्र्येण नानाविधा भूतानां सर्वेषां प्राणिनां मत्तः परमेश्वरादेव भवन्ति नान्यस्मात्। तस्मात्किं वाच्यं मम लोकमहेश्वरत्वमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.5।।अहिंसा प्राणिनामपीडा। समता मित्रामित्रादौ समचित्तता। तुष्टिः संतोषो लब्धे पर्याप्तबुद्धिः। तप इन्द्रियसंयमपूर्वकं शरीरपीडनम्। दानं यथाशक्ति संविभागः। यशो धर्मनिमित्ता कीर्तिः। अयशोऽधर्मनिमित्ता अकीर्तिः। एते बुद्ध्यादयो विंशतिर्भावा मत्त एव प्राणिनां भवन्ति। पृथग्विधाः प्रत्येकं नानाप्रकाराः। तत उत्तमगुणलाभायाहमेव त्वया शरणीकरणीय इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.5।।अहिंसा दयात्मिका? समता सर्वत्र मद्भावः? तुष्टिः सदा मद्भावसन्तोषः? तपो मदर्थक्लेशसहनं? दानं मदुपदेशादीनां? यशो मत्सेवकत्वेन सत्कीर्तिः? अयशो दुष्टत्वादिलक्षणात्मिकाऽपकीर्तिः। भूतानां एते भावाः पृथग्विधाः भिन्नाः मत्कृपाविशिष्टमज्ज्ञानवतां बुद्ध्यादयः सर्वे भवन्ति। अन्येषाप्नयशस्सहितदुःखादिचतुष्टया भावा भवन्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.5।।किंच -- अहिंसेति। अहिंसा परपीडानिवृत्तिः? समता रागद्वेषादिराहित्यं? मित्रामित्रतुल्यता च? तुष्टिर्दैवलब्धेन संतोषः? तपः शारीरादि वक्ष्यमाणम्? दानं न्यायार्जितधनादेः सत्पात्रार्पणम्? यशः सत्कीर्तिः? अयशोऽपकीर्तिः? एते बुद्धिर्ज्ञानमित्यादयस्तद्विपरीताश्चाबुद्ध्यादयो नानाविधा भावाः प्राणिनां मत्तः सकाशादेव भवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.4 -- 10.5।।किञ्च अचिन्त्यैश्वर्ययोगकल्याणगुणान्मत्त एव बुद्धिर्ज्ञानं च भवति। ज्ञानमित्युपलक्षणं सर्वस्य सदसद्गुणसर्गस्यमत्तः सर्वं प्रवर्त्तते [10।8] इति वाक्यात्। तथाहि बुद्धिरित्यादि। बुद्धिः तत्त्वतोऽध्यवसायरूपा? ज्ञानमुपदेशजन्यम्?असम्मूढः [10।3] इत्यत्रोक्तोऽसम्मोहोऽपि मत्त एव भवति। क्षमा सहिष्णुता सत्यं प्रमाणेनावबुद्धस्यार्थस्य तथैव भाषणम्? दमो बाह्येन्द्रियाणां स्वविषयेभ्यो निवृत्तिः? शमोऽन्तःकरणस्य? सुखमात्मानुकूलानुभवः? दुःखं तद्विपरीतं च मत्त एव भवति। मार्गत्रयाधिष्ठाताऽहं यथामार्गानुसरणं तत्तदधिकृताय तथैव दुःखं सुखं प्रयच्छामीति भावः। एवं भवः उद्भवः? अभावस्तद्विपरीतः? भयमभयं च दानं यशः अयशश्चेति विंशद्भावास्तत्तन्मार्गरतानां प्राणिनां यथासर्गं पृथग्विधा मत्त एव भवन्तिरूपनामविभेदेन जगत् क्रीडति यो यतः इति निबन्धोक्तेः। अनेन स्वस्य मुख्यं कर्तृत्वं सर्वकारणत्वं चोक्तम्। प्रकृत्यादेस्तु करणत्वमेव? न कारणत्वं साधकतमत्त्वादिति स्वयोगमहिमोक्तः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.5।।अहिंसा -- प्राणियोंको किसी प्रकार पीड़ा न पहुँचाना? समता -- चित्तका समभाव? संतोष -- जो कुछ मिले उसीको यथेष्ट समझना? तप -- इन्द्रियसंयमपूर्वक शरीरको सुखाना? दान -- अपनी शक्तिके अनुसार धनका विभाग करना ( दूसरोंको बाँटना )? यश -- धर्मके निमित्तसे होनेवाली कीर्ति? अपयश -- अधर्मके निमित्तसे होनेवाली अपकीर्ति। इस प्रकार जो प्राणियोंके अपने अपने कर्मोंके अनुसार होनेवाले बुद्धि आदि नाना प्रकारके भाव हैं? वे सब मुझ ईश्वरसे ही होते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.5।। व्याख्या -- बुद्धिः -- उद्देश्यको लेकर निश्चय करनेवाली वृत्तिका नाम बुद्धि है।ज्ञानम् -- सारअसार? ग्राह्यअग्राह्य? नित्यअनित्य? सत्असत्? उचितअनुचित? कर्तव्यअकर्तव्य -- ऐसा जो विवेक अर्थात् अलगअलग जानकारी है? उसका नाम ज्ञान है। यह ज्ञान (विवेक) मानवमात्रको भगवान्से मिला है।असम्मोहः -- शरीर और संसारको उत्पत्तिविनाशशील जानते हुए भी उनमें मैं और मेरापन करनेका नाम सम्मोह है और इसके न होनेका नाम असम्मोह है।क्षमा -- कोई हमारे प्रति कितना ही बड़ा अपराध करे? अपनी सामर्थ्य रहते हुए भी उसे सह लेना और उस अपराधीको अपनी तथा ईश्वरकी तरफसे यहाँ और परलोकमें कहीं भी दण्ड न मिले -- ऐसा विचार करनेका नाम क्षमा है।सत्यम् -- सत्यस्वरूप परमात्माकी प्राप्तिके लिये सत्यभाषण करना अर्थात् जैसा सुना? देखा और समझा है? उसीके अनुसार अपने स्वार्थ और अभिमानका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये न ज्यादा? न कम -- वैसाकावैसा कह देनेका नाम सत्य है।दमः शमः -- परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखते हुए इन्द्रियोंको अपनेअपने विषयोंसे हटाकर अपने वशमें करनेका नाम दम है? और मनको सांसारिक भोगोंके चिन्तनसे हटानेका नाम शम है।सुखं दुःखम् -- शरीर? मन? इन्द्रियोंके अनुकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो प्रसन्नता होती है? उसका नाम सुख है और प्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर हृदयमें जो अप्रसन्नता होती है? उसका नाम,दुःख है।भवोऽभावः -- सांसारिक वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? भाव आदिके उत्पन्न होनेका नाम भव है और इन सबके लीन होनेका नाम अभाव है।भयं चाभयमेव च -- अपने आचरण? भाव आदि शास्त्र और लोकमर्यादाके विरुद्ध होनेसे अन्तःकरणमें अपना अनिष्ट होनेकी जो एक आशङ्का होती है? उसको भय कहते हैं। मनुष्यके आचरण? भाव आदि अच्छे हैं? वह किसीको कष्ट नहीं पहुँचाता? शास्त्र और सन्तोंके सिद्धान्तसे विरुद्ध कोई आचरण नहीं करता? तो उसके हृदयमें अपना अनिष्ट होनेकी आशङ्का नहीं रहती अर्थात् उसको किसीसे भय नहीं होता। इसीको अभय कहते हैं।अहिंसा -- अपने तन? मन और वचनसे किसी भी देश? काल? परिस्थिति आदिमें किसी भी प्राणीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न देनेका नाम अहिंसा है।समता -- तरहतरहकी अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिके प्राप्त होनेपर भी अपने अन्तःकरणमें कोई विषमता न आनेका नाम समता है।तुष्टिः -- आवश्यकता ज्यादा रहनेपर भी कम मिले तो उसमें सन्तोष करना तथा और मिले -- ऐसी इच्छाका न रहना तुष्टि है। तात्पर्य है कि मिले अथवा न मिले? कम मिले अथवा ज्यादा मिले आदि हर हालतमें प्रसन्न रहना तुष्टि है।तपः -- अपने कर्तव्यका पालन करते हुए जो कुछ कष्ट आ जाय? प्रतिकूल परिस्थिति आ जाय? उन सबको प्रसन्नतापूर्वक सहनेका नाम तप है। एकादशीव्रत आदि करनेका नाम भी तप है।दानम् -- प्रत्युपकार और फलकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा न रखकर प्रसन्नतापूर्वक अपनी शुद्ध कमाईका हिस्सा सत्पात्रको देनेका नाम दान (गीता 17। 20)।यशोऽयशः -- मनुष्यके अच्छे आचरणों? भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी प्रसिद्धि? प्रशंसा आदि होते हैं? उनका नाम यश है। मनुष्यके बुरे आचरणों? भावों और गुणोंको लेकर संसारमें जो नामकी निन्दा होती है? उसको अयश (अपयश) कहते हैं।भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः -- प्राणियोंके ये पृथक्पृथक् और अनेक तरहके भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उन सबको सत्ता? स्फूर्ति? शक्ति? आधार और प्रकाश मुझ लोकमहेश्वरसे ही मिलता है। तात्पर्य है कि तत्त्वसे सबके मूलमें मैं ही हूँ।यहाँ मत्तः पदसे भगवान्का योग? सामर्थ्य? प्रभाव और पृथग्विधाः पदसे अनेक प्रकारकी अलगअलग विभूतियाँ जाननी चाहिये।संसारमें जो कुछ विहित तथा निषिद्ध हो रहा है शुभ तथा अशुभ हो रहा है और संसारमें जितने सद्भाव तथा दुर्भाव हैं? वह सबकीसब भगवान्की लीला है -- इस प्रकार भक्त भगवान्को तत्त्वसे समझ लेता है तो उसका भगवान्में अविकम्प (अविचल) योग हो जाता है (गीता 10। 7)।यहाँ प्राणियोंके जो बीस भाव बताये गये हैं? उनमें बारह भाव तो एकएक (अकेले) हैं और वे सभी अन्तःकरणमें उत्पन्न होनेवाले हैं और भयके साथ आया हुआ अभय भी अन्तःकरणमें पैदा होनेवाला भाव है तथा बचे हुए सात भाव परस्परविरोधी हैं। उनमेंसे भव (उत्पत्ति)? अभाव? यश और अयश -- ये चार तो प्राणियोंके पूर्वकृत कर्मोंके फल हैं और सुख? दुःख तथा भय -- ये तीन मूर्खताके फल हैं। इस मूर्खताको मनुष्य मिटा सकता है।यहाँ प्राणियोंके बीस भावोंको अपनेसे पैदा हुए और अपनी विभूति बतानेमें भगवान्का तात्पर्य है कि ये बीस भाव तो पृथक्पृथक् हैं? पर इन सब भावोंका आधार मैं एक ही हूँ। इन सबके मूलमें मैं ही हूँ? ये सभी मेरेसे ही होते हैं एवं मेरेसे ही सत्तास्फूर्ति पाते हैं। सातवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने मत्तः एव पदोंसे बताया है कि सात्त्विक? राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं अर्थात् उनके मूलमें मैं ही हूँ? वे मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सत्तास्फूर्ति पाते हैं। अतः यहाँ भी भगवान्का आशय विभूतियोंके मूल तत्त्वकी तरफ साधककी दृष्टि करानेमें ही है।विशेष बातसाधक संसारको कैसे देखे ऐसे देखे कि संसारमें जो कुछ क्रिया? पदार्थ? घटना आदि है? वह सब भगवान्का रूप है। चाहे उत्पत्ति हो? चाहे प्रलय हो चाहे अनुकूलता हो? चाहे प्रतिकूलता हो चाहे अमृत हो? चाहे मृत्यु हो चाहे स्वर्ग हो? चाहे नरक हो यह सब भगवान्की लीला है। भगवान्की लीलामें बालकाण्ड भी है? अयोध्याकाण्ड भी है? अरण्यकाण्ड भी है और लङ्काकाण्ड भी है। पुरियोंमें देखा जाय तो अयोध्यापुरीमें भगवान्का प्राकट्य है राजा? रानी और प्रजाका वात्सल्यभाव है। जनकपुरीमें रामजीके प्रति राजा जनक? महारानी सुनयना और प्रजाके विलक्षणविलक्षण भाव हैं। वे रामजीको दामादरूपसे खिलाते हैं? खेलाते हैं? विनोद करते हैं। वनमें (अरण्यकाण्डमें) भक्तोंका मिलना भी है और राक्षसोंका मिलना भी। लंकापुरीमें युद्ध होता है? मारकाट होती है? खूनकी नदियाँ बहती हैं। इस तरह अलगअलग पुरियोंमें? अलगअलग काण्डोंमें भगवान्की तरहतरहकी लीलाएँ होती हैं। परन्तु तरहतरहकी लीलाएँ होते हुए भी रामायण एक है और ये सभी लीलाएँ एक ही रामायणके अङ्ग हैं तथा इन अङ्गोंसे रामायण साङ्गोपाङ्ग होती है। ऐसे ही संसारमें प्राणियोंके तरहतरहके भाव हैं? क्रियाएँ हैं। कहींपर कोई हँस रहा है तो कहींपर कोई रो रहा है? कहींपर विद्वद्गोष्ठी हो रही है तो कहींपर आपसमें लड़ाई हो रही है? कोई जन्म ले रहा है तो कोई मर रहा है?,आदिआदि जो विविध भाँतिकी चेष्टाएँ हो रही हैं? वे सब भगवान्की लीलाएँ हैं। लीलाएँ करनेवाले ये सब भगवान्के रूप हैं। इस प्रकार भक्तकी दृष्टि हरदम भगवान्पर ही रहनी चाहिये क्योंकि इन सबके मूलमें एक परमात्मतत्त्व ही है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.1 -- 10.5।।प्राक्तनैर्नवभिरध्यायैर्य एवार्थो लक्षितः? स एव प्रतिपदपाठैरस्मिन्नध्याये प्रतायते। तथा चाह -- भूय एव इति। उक्तमेवार्थं स्फुटीकर्तुं (?N?K विस्पष्टीकर्तुं) पुनः कथ्यमानं श्रृण्विति। अर्जुनोऽपि एवमेवाभिधास्यति भूयः कथय (X? 18) इति। इत्यध्यायतात्पर्यम्। शिष्टं निगदव्याख्यातमिति ( -- व्याख्यानमिति) किं पुनरुक्तेन सन्दिग्धं तु निर्णेष्यते।भूय इत्यादि पृथग्विधा इत्यन्तम्। असंमोहः उत्साहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.5।।यथाशक्तीति। पात्रे श्रद्धया स्वशक्तिमनतिक्रम्यार्थानां देशकालानुगुण्येन प्रतिपादनमित्यर्थः। उक्तानां बुद्ध्यादीनां साश्रयाणामीश्वरादुत्पत्तिं प्रतिजानीते -- भवन्तीति। नानाविधत्वे हेतुमाह -- स्वकर्मेति। कथंचिदपि तेषामात्मातिरेकेणाभावान्मत्त एवेत्युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.5।।सुखशब्दागतार्थतया तुष्टिशब्दं सप्रमाणकं व्याचष्टे -- तुष्टिरिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.5।।तुष्टिरलम्बुद्धिः।अलम्बुद्धिस्तथा तुष्टिः इत्यभिधानात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.5।।बुद्धिः मनसो निरूपणसामर्थ्यम्? ज्ञानं चिदचिद्वस्तुविशेषविषयः निश्चयः। असंमोहः पूर्वगृहीताद् रजतादेः विसजातीये शुक्तिकादिवस्तुनि सजातीयताबुद्धिनिवृत्तिः। क्षमा मनोविकारहेतौ सति अपि अविकृतमनस्त्वम्। सत्यं यथादृष्टविषयं भूतहितरूपं वचनम्? तद्नुगणा मनोवृत्तिः इह अभिप्रेता? मनोवृत्तिप्रकरणात्। दमः बाह्यकरणानाम् अनर्थविषयेभ्यो नियमनम्। शमः अन्तःकरणस्य तथा नियमनम्। सुखम् आत्मानुकूलानुभवः। दुःखं प्रतिकूलानुभवः। भवो भवनम् अनुकूलानुभवहेतुकं मनसो भवनम्। अभावः,प्रतिकूलानुभवहेतुको मनसः अवसादः। भयम् आगामिनो दुःखस्य हेतुदर्शनजं दुःखम्? तन्निवृत्तिः अभयम्। अहिंसा परदुःखाहेतुत्वम्। समता आत्मनि सुहृत्सु विपक्षेषु च अर्थानर्थयोः सममतित्वम्। तुष्टिः सर्वेषु आत्मसु दृष्टेषु तोषस्वभावत्वम्। तपः शीस्त्रीयो भोगसंकोचरूपः कायक्लेशः। दानं स्वकीयभोग्यानां परस्मै प्रतिपादनम्। यशो गुणवत्ताप्रथा? अयशः नैर्गुण्यप्रथा? कीर्त्यकीर्त्यनुगुणमनोवृत्तिविशेषौ तथा उक्तौ? मनोवृत्तिप्रकरणात्। तपोदाने च तथा। एवमाद्याः सर्वेषां भूतानां भावाः प्रवृत्तिनिवृत्तिहेतवो मनोवृत्तयो मत्त एव मत्संकल्पायत्ताः भवन्ति।सर्वस्य भूतजातस्य सृष्टिस्थित्योः प्रवर्तयितारः च मत्संकल्पायत्तप्रवृत्तय इत्याह --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.5।। --,अहिंसा अपीडा प्राणिनाम्। समता समचित्तता। तुष्टिः संतोषः पर्याप्तबुद्धिर्लाभेषु। तपः इन्द्रियसंयमपूर्वकं शरीरपीडनम्। दानं यथाशक्ति संविभागः। यशः धर्मनिमित्ता कीर्तिः। अयशस्तु अधर्मनिमित्ता अकीर्तिः। भवन्ति भावाः यथोक्ताः बुद्ध्यादयः भूतानां प्राणिनां मत्तः एव ईश्वरात् पृथग्विधाः नानाविधाः स्वकर्मानुरूपेण।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 10.6 】
▸ Sanskrit Sloka: महर्षय: सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा | मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमा: प्रजा: ||
▸ Transliteration: maharṣayaḥ sapta pūrve catvāro manavastathā | madbhāvā mānasā jātā yeṣāṁ loka imāḥ prajāḥ ||
▸ Glossary: maharṣayaḥ: great sages; sapta: seven; pūrve: before; catvāro: four; manavas: Manus; tathā: and; madbhāvā: endowed with My power; mānasā: from the mind; jātā: born; yeṣāṁ: of them; loka: worlds; imāḥ: all this; prajāḥ: living beings.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.6 The seven great sages and before them, the four great Ma- nus, endowed with My power, They arose from My mind and all the living beings populating the planet descend from them.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.6।।सात महर्षि और उनसे भी पूर्वमें होनेवाले चार सनकादि तथा चौदह मनु -- ये सबकेसब मेरे मनसे पैदा हुए हैं और मेरेमें भाव (श्रद्धाभक्ति) रखनेवाले हैं? जिनकी संसारमें यह सम्पूर्ण प्रजा है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.6।। सात महर्षिजन? पूर्वकाल के चार (सनकादि) तथा (चौदह) मनु ये मेरे प्रभाव वाले मेरे संकल्प से उत्पन्न हुए हैं? जिनकी संसार (लोक) में यह प्रजा है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.6 महर्षयः the great Rishis? सप्त seven? पूर्वे ancient? चत्वारः four? मनवः Manus? तथा also? मद्भावाः possessed of powers like Me? मानसाः from mind? जाताः born? येषाम् from whom? लोके in world? इमाः these? प्रजाः creatures. Commentary In the beginning I was alone and from Me came the mind and from the mind were produced the seven sages (such as Bhrigu? Vasishtha and others)? the ancient four Kumaras (Sanaka? Sanandana? Sanatkumara and Sanatsujata)? as well as the four Manus of the past ages known as Savarnis? all of whom directed their thoughts to Me exclusively and were therefore endowed with divine powers and supreme wisdom.The four Kumaras (chaste? ascetic youths) declined to marry and create offspring. They preferred to remain perpetual celibates and to practise BrahmaVichara or profound meditation on Brahman or the Absolute.They were all created by Me? by mind alone. They were all mindborn sons of Brahma. They were not born from the womb like ordinary mortals. Manavah? men? the present inhabitants of this world? are the sons of Manu. The Manus are the mindborn sons of God. These creatures which consist of the moving and the unmoving beings are born of the seven great sages and the four Manus. The great sages were original teaches of BrahmaVidya or the ancient wisdom of the Upanishads. The Manus were the rulers of men. They framed the code or rules of conduct or the laws of Dharma for the guidance and uplift of humanity.The seven great sages represent the seven planes also. In the macrocosm? Mahat or cosmic Buddhi? Ahamkara or the cosmic egoism and the five Tanmatras or the five rootelements of which the five great elements? viz.? earth? water? fire? air and ether are the gross forms? represent the seven great sages. This gross universe with the moving and the unmoving beings and the subtle inner world have come out of the above seven principles. In mythology or the Puranic terminology these seven principles have been symbolised and give human names. Bhrigu? Marichi? Atri? Pulastya? Pulaha? Kratu and Vasishtha are the seven great sages.In the microcosm? Manas (mind)? Buddhi (intellect)? Chitta (subconsciousness) and Ahamkara (egoism) have been symbolised as the four Manus and given human names. The first group forms the base of the macrocosm. The second group forms the base of the microcosm (individuals). These two groups constitute this vast universe of sentient life.Madbhava with their being in Me? of My nature.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.6. The ancient Seven Great-Seers and also the Four Manus, of whom these creatures in this world are offsprings-they have been born as My mental dispositions.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.6 The seven Great Seers,* the Progenitors of mankind, the Ancient Four,** and the Lawgivers were born of My Will and come forth direct from Me. The race of mankind has sprung from them. [* Mareechi, Atri, Angira, Pulah, Kratu, Pulastya, Vahishta. ** The Masters: Sanak, Sanandan, Sanatan, Sanatkumar.]
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.6 The seven great seers of yore and similarly the four Manus, all possessing My mental disposition, were born of My mind. All these creatures of the world are descended from them.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.6 The seven great sages as also the four Manus of anceint days, of whom are these creatures in the world, had their thoughts fixed on Me, and they were born from My mind.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.6 The seven great sages, the ancient four and also the Manus, possessed of powers like Me (on account of their minds being fixed on Me), were born of (My) mind; from them are these creatures born in this world.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.6 See Comment under 10.11
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.6 'The seven great Rsis of yore', namely, those seven great Rsis like Bhrgu etc., were from the mind of Brahma in the cycle of the past Manu to perpetuate the creation permanently; and the four Manas called the sons of Savarna existed for the work of eternal sustentation. All creatures in the world are their progeny. So they are the generators of this progeny as also their sustainers till the time of Pralaya. These Bhrgu etc., and the Manus, derive their mental condition from Me. Their disposition is My disposition - they subsist on My disposition. The meaning is they follow My will.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.6 Sapta, the seven; maharsayah, great sages-Bhrgu and others; tatha, as also; catvarah, the four; manavah, Manus [Savarni, Dharma-savarini, Daksa-savarni, and Savarna.-Tr.]- well known as Savarnas; purve, of ancient days; yesam, of whom, of which Manus and the great sages; imah, these; prajah, creatures, moving and non-moving; loke in the world, are the creation; madbhavah, had their thoughts fixed on Me-they had their minds fixed on Me, (and hence) they were endowed with the power of Visnu; and they jatah, were born; manasa; from My mind-they were created by Me through My mind itself.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.6।। इस अध्याय के दूसरे श्लोक में जिस सिद्धांत का संकेत मात्र किया गया है कि किस प्रकार सप्तर्षि? सनकादि चार कुमार और चौदह मनु? परमेश्वर के मन से उत्पन्न हुए हैं। ये सभी मिलकर जगत् के उपादान और निमित्त कारण हैं? क्योंकि यहाँ कहा गया है? इनसे यह सम्पूर्ण प्रजा उत्पन्न हुई है।सप्तर्षि जिन्हें पुराणों में मानवीय रूप में चित्रित किया गया है? वे सप्तर्षि अध्यात्मशास्त्र की दृष्टि से महत् तत्त्व? अहंकार और पंच तन्मात्राएं हैं। इन सब के संयुक्त रूप को ही जगत् कहते हैं।व्यक्तिगत दृष्टि से? सप्तर्षियों के रूपक का आशय समझना बहुत सरल है। हम जानते हैं कि जब हमारे मन में कोई संकल्प उठता है? तब वह स्वयं हमें किसी भी प्रकार से विचलित करने में समर्थ नहीं होता। परन्तु? किसी एक विषय के प्रति जब यह संकल्प केन्द्रीभूत होकर कामना का रूप ले लेता है? तब कामना में परिणित वही संकल्प अत्यन्त शक्तिशाली बनकर हमारी शान्ति और सन्तुलन को नष्ट कर देता है। ये संकल्प ही बाहर प्रक्षेपित होकर पंच विषयों का ग्रहण और उनके प्रति हमारी प्रतिक्रियायें व्यक्त कराते हैं। यह संकल्पधारा और इसका प्रक्षेपण ये दोनों मिलकर हमारे सुखदुख पूर्ण यशअपयश तथा प्रयत्न और प्राप्ति के छोटे से जगत् के निमित्त और उपादान कारण बन जाते हैं।पूर्वकाल के चार (सनकादि) और मनु श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में इस प्रकार पदच्छेद करते हैं कि पूर्वकाल सम्बन्धी और चार मनु। यहाँ इसका आध्यात्मिक विश्लेषण करना उचित है जिसके लिए हमें दूसरी पंक्ति में आधार भी मिलता है। भगवान् कहते हैं? ये सब मेरे मन से अर्थात् संकल्प से ही प्रकट हुए हैं।पुराणों में ऐसा वर्णन किया गया है कि सृष्टि के प्रारम्भ में ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी से चार मानस पुत्र सनत्कुमार? सनक? सनातन और सनन्दन का जन्म हुआ। हममें से प्रत्येक (व्यष्टि) व्यक्ति में निहित सृजन शक्ति अथवा सृजन की प्रवृत्ति के माध्यम से व्यक्त चैतन्य ही व्यष्टि सृष्टि का निर्माता है। यह सृजन की प्रवृत्ति अन्तकरण के चार भागों में व्यक्त होती है तभी किसी प्रकार का निर्माण कार्य होता है। वे चार भाग हैं संकल्प (मन)? निश्चय (बुद्धि)? पूर्वज्ञान का स्मरण (चित्त) और कर्तृत्वाभिमान (अहंकार)। मन? बुद्धि? चित्त और अहंकार इन चारों को उपर्युक्त चार मानस पुत्रों के द्वारा इंगित किया गया है।इस प्रकार एक ही श्लोक में समष्टि और व्यष्टि की सृष्टि के कारण बताए गए हैं। समष्टि सृष्टि की उत्पत्ति एवं स्थिति के लिए महत् तत्त्व? अहंकार और पंच तन्मात्राएं कारण हैं? जबकि व्यष्टि सृष्टि का निर्माण मन? बुद्धि? चित्त और अहंकार की क्रियाओं से होता है।संक्षेप में? सप्तर्षि समष्टि सृष्टि के तथा चार मानस पुत्र व्यष्टि सृष्टि के निमित्त और उपादान कारण हैं।व्यष्टि और समष्टि की दृष्टि से? सृष्टि के अभिप्राय को समझने की क्या आवश्यकता है सुनो --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.6।।स्वसामर्थ्यंयुक्तानां स्वेनोत्पादितानां भृग्वादीनामपि लोकेश्वरत्वं प्रसिद्धं किं वक्त्वयं मम लोकमहेश्वरत्वमित्याह -- महर्षय इति। महर्षयः सप्त भृग्वादयः पूर्वेऽतीतकालसंबन्धिनोभृगु मरीचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुं। वसिष्ठं च महातेजाः सोऽसृजन्मनसा सुतान् इत्युक्ताःचत्वारो मनवस्तथा? सावर्णिस्तु मनुर्योऽसौ मैत्रेय भविता ततः। नवमो दक्ष्सावर्णिर्मैत्रेय भविता मनुः। एकादशश्र्च भविता धर्मसावर्णिको मनुः। रुद्रपुत्रस्तु सावर्णो भविता द्वादशो मनुः।। इति विष्णुपुराणादौ सावर्णा इति प्रसिद्धाः। महर्षयः सप्त भृग्वादयः। तेभ्योऽपि पूर्वे प्रथमाश्चत्वारः सन्काद्या महर्षयः मनवस्तथा स्वयंभुवाद्याश्चतुर्दशेति वा। अस्मिन्पक्षे सनकाद्याश्र्चतुर्दशेत्यध्याहारदोषमभिप्रेत्याचार्यैरयं पक्षो न प्रदर्शितः। ते च मद्भावा मद्भतभावना मयि परमात्मनि भावना येषामतो वैष्णवेन सामर्थ्येन युक्ता मानसा मया मनसैवोत्पादिताः सन्तो जाताः उत्पन्ना यथायथं योनितोऽयोनितश्च येषां महर्षीणां मनूनां च लोके इमा विद्यया च जन्मना च सन्ततिभूताः प्रजाः स्थावरजंगमलक्षणाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.6।।इतश्चैतदेवमाह -- महर्षयो वेदतदर्थद्रष्टारः सर्वज्ञा विद्यासंप्रदायप्रवर्तका भृग्वाद्याः सप्त पूर्वे सर्गाद्यकालाविर्भूताः। तथाच पुराणंभृगुं मरिचिमत्रिं च पुलस्त्यं पुलहं क्रतुम्। वसिष्ठं च महातेजाः सोऽसृजन्मनसा सुतान्। सप्त ब्रह्माण इत्येते पुराणे निश्चयं गताः इति। तथा चत्वारो मनवः सावर्णा इति प्रसिद्धाः। अथवा महर्षयः सप्त भृग्वाद्याः?तेऽभ्योऽपि पूर्वे प्रथमाश्चत्वारः सनकाद्या महर्षयो? मनवस्तथा स्वायंभुवाद्याश्चतुर्दश मयि परमेश्वरे भावो भावना येषां ते मद्भावा मच्चिन्तनपराः। मद्भावनावशादाविर्भूतमदीयज्ञानैश्वर्यशक्तय इत्यर्थः। मानसाः मनःसंकल्पादेवोत्पन्ना नतु योनिजाः। अतो विशुद्धजन्मत्वेन सर्वप्राणिश्रेष्ठा मत्तएव हिरण्यगर्भात्मनो जाताः सर्गाद्यकाले प्रादुर्भूताः। येषां महर्षीणां सप्तानां,भृग्वादीनां चतुर्णां च सनकादीनां मनूनां च चतुर्दशानां अस्िमँल्लोके जन्मना च विद्यया च सन्ततिभूता इमा ब्राह्मणाद्याः सर्वाः प्रजाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.6।।एतदेव शिष्टाचारप्रदर्शनेन द्रढयति -- महर्षय इति। सप्त भृग्वाद्याश्चत्वारः सनकादयश्च पूर्वे प्रसिद्धा महर्षय इति संबन्धः। तथा मनवश्चतुदर्श प्रसिद्धाः। ते सर्वे मानसा हिरण्यगर्भरूपस्य मम मनस एवोद्भूता अयोनिजा जाता उत्पन्नाः। इमाः प्रजाश्चतुर्विधा अयं लोकश्च तदाधारभूतः तदुभयं येषां यत्संबन्धि संततिर्येषां संततिरित्यर्थः। यद्ववा येषामिति षष्ठी पञ्चम्यर्थे। येभ्य इमाः प्रजा अयं लोकश्च जाता इत्यर्थः। तेऽपि मद्भावा मय्येव भावो मनो येषां ते। प्रसिद्धमहिमानोऽप्येते यतो मामेवोपासतेऽतस्त्वमपि मामुपास्वेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.6।।ननु कृष्यादिप्रयुक्तधर्माचरणादिभिः सर्वेषां तत्तत्फलरूपा भावा भवन्ति? तत्कथं भवत एव इत्याकाङ्क्षायामाह -- महर्षय इति। महर्षयः सप्त भृग्वादयः? ततः पूर्वे अन्ये चत्वारो महर्षयः? तथा स्वायम्भुवादयो मनवः? हिरण्यगर्भात्मनो मम मानसा मद्भावा मदीयोऽनुभावो मत्क्रीडार्थरूपो येषु तादृशा जाताः। येषां लोके इमाः प्रजास्तदुक्तप्रवर्तमाना भवन्तीत्यर्थः। अतोऽपि मत्त एव भवन्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.6।।किंच -- महर्षय इति। सप्त महर्षयोभृग्वादयः सप्त ब्राह्मणा इत्येते पुराणे निश्चयं गता इत्यादि पुराणप्रसिद्धाः। तेभ्योऽपि पूर्वेऽन्ये चत्वारो महर्षयः सनकादयः? तथा मनवः स्वायंभुवादयः मद्भावा मदीयो भावः प्रभावो येषु ते हिरण्यगर्भात्मनो ममैव मनसः संकल्पमात्राज्जाताः। प्रभावमेवाह -- येषामिति। येषां भृग्वादीनां च सनकादीनां चेमा ब्राह्मणाद्या लोके वर्धमाना यथायथं पुत्रपौत्रादिरूपाः शिष्यादिरूपाश्च प्रजा जाता वर्तन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.6।।एवं जातस्य गुणसर्गस्य हेतुरहमज एक इत्युक्त्वाअहमादिर्हि देवानां [10।2] इति व्याचष्टे -- महर्षय इति। गुणसंसर्गिण एते पूर्वे भृग्वादयःसप्त ब्रह्माण्ड इत्येते पुराणे निश्चयं गताः [म.भा.12।208।5],इत्यादिपुराणप्रसिद्धाः। मानसाः तथा चतुर्दशसु मनुषु पूर्वे प्रथमाश्चत्वारो मनवः स्वायम्भुवस्वारोचिषोत्तमतामसाख्या इत्येते नित्यसर्गप्रवर्त्तनार्था मद्भावा जाताः? मत्त एवेत्यनुवर्त्तनीयम्। एतेन कारणभूतसर्वर्षिमनुदेवानामादिभूततयाऽनादित्वं स्वस्योक्तम्। एतेषां तु बुद्ध्यादिवन्न प्राकृतभावत्वमेव? किन्तु मद्भावत्वमिति। तदाह -- मद्भावा इति। मम भावः सामर्थ्यं तेजोभावो वा येषु ते तथा? एते मानसा भावाश्चेतनाः मत् मत्तो जाता इति वा? अथवा बुद्ध्यादयो येषां लोक इमाः प्रजास्ते महर्षिमन्वादयश्चेत्येते सर्वे भावा मत् मत्तो मानसा जाताःइच्छामात्रेण मनसा प्रवाहं सृष्टवान् हरिः इति भगवन्मुखोक्तेः सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय [तै.उ.2।6।1] इति असतोऽधिमनो यस्य मनः प्रजापतिमसृजत? प्रजापतिः प्रजा असृजत? तद्वा इदं मय्येव परमं प्रतिष्ठितम्। मनसो ह्येव खल्विमानि भूतानि जायन्ते? मनसो वशे सर्वमिदं बभूव? कामस्तदग्रे समवर्त्तताधीः इत्यादिश्रुतेश्च।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.6।।तथा --, भृगु आदि सप्त महर्षि और पहले होनेवाले चार मनु जिनका अतीत कालसे सम्बन्ध है और जो सावर्ण इस नामसे पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं? ये सभी मुझमें भावनावाले -- ईश्वरीय सामर्थ्यसे युक्त और मेरे द्वारा मनसे उत्पन्न किये हुए हैं? जिस मनु और महर्षियोंकी रची हुई ये चर और अचररूप सब प्रजाएँ लोकमें प्रसिद्ध हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.6।। व्याख्या -- [पीछेके दो श्लोकोंमें भगवान्ने प्राणियोंके भावरूपसे बीस विभूतियाँ बतायीं। अब इस श्लोकमें व्यक्तिरूपसे पचीस विभूतियाँ बता रहे हैं? जो कि प्राणियोंमें विशेष प्रभावशाली और जगत्के कारण हैं।]महर्षयः सप्त -- जो दीर्घ आयुवाले मन्त्रोंको प्रकट करनेवाले ऐश्वर्यवान् दिव्य दृष्टिवाले गुण? विद्या आदिसे वृद्ध धर्मका साक्षात् करनेवाले और गोत्रोंके प्रवर्तक हैं -- ऐसे सातों गुणोंसे युक्त ऋषि सप्तर्षि कहे जाते हैं (टिप्पणी प0 540.1)। मरीचि? अङ्गिरा? अत्रि? पुलस्त्य? पुलह? क्रतु और वसिष्ठ -- ये सातों ऋषि उपर्युक्त सातों ही गुणोंसे युक्त हैं। ये सातों ही वेदवेत्ता हैं? वेदोंके आचार्य माने गये हैं? प्रवृत्तिधर्मका संचालन करनेवाले हैं और प्रजापतिके कार्यमें नियुक्त किये गये हैं (टिप्पणी प0 540.2)। इन्हीं सात ऋषियोंको यहाँ महर्षि कहा गया है।पूर्वे चत्वारः -- सनक? सनन्दन? सनातन और सनत्कुमार -- ये चारों ही ब्रह्माजीके तप करनेपर सबसे पहले प्रकट हुए हैं। ये चारों भगवत्स्वरूप हैं। सबसे पहले प्रकट होनेपर भी ये चारों सदा पाँच वर्षकी अवस्थावाले बालकरूपमें ही रहते हैं। ये तीनों लोकोंमें भक्ति? ज्ञान और वैराग्यका प्रचार करते हुए घूमते रहते हैं। इनकी वाणीसे सदा हरिः शरणम् का उच्चारण होता रहता है (टिप्पणी प0 540.3)। ये भगवत्कथाके बहुत प्रेमी हैं। अतः इन चारोंमेंसे एक वक्ता और तीन श्रोता बनकर भगवत्कथा करते और सुनते रहते हैं।मनवस्तथा -- ब्रह्माजीके एक दिन(कल्प) में चौदह मनु होते हैं। ब्रह्माजीके वर्तमान कल्पके स्वायम्भुव? स्वारोचिष? उत्तम? तामस? रैवत? चाक्षुष? वैवस्वत? सावर्णि? दक्षसावर्णि? ब्रह्मसावर्णि? धर्मसावर्णि? रुद्रसावर्णि? देवसावर्णि और इन्द्रसावर्णि नामवाले चौदह मनु हैं (टिप्पणी प0 540.4)। ये सभी ब्रह्माजीकी आज्ञासे सृष्टिके उत्पादक और प्रवर्तक हैं।मानसा जाताः -- मात्र सृष्टि भगवान्के संकल्पसे पैदा होती है। परन्तु यहाँ सप्तर्षि आदिको भगवान्के मनसे पैदा हुआ कहा है। इसका कारण यह है कि सृष्टिका विस्तार करनेवाले होनेसे सृष्टिमें इनकी प्रधानता है। दूसरा कारण यह है कि ये सभी ब्रह्माजीके मनसे अर्थात् संकल्पसे पैदा हुए हैं। स्वयं भगवान् ही सृष्टिरचनाके लिये ब्रह्मारूपसे प्रकट हुए हैं। अतः सात महर्षि? चार सनकादि और चौदह मनु -- इन पचीसोंको ब्रह्माजीके मानसपुत्र कहें अथवा भगवान्के मानसपुत्र कहें? एक ही बात है।मद्भावाः -- ये सभी मेरेमें ही भाव अर्थात् श्रद्धाप्रेम रखनेवाले हैं।येषां लोकमिमाः प्रजाः -- संसारमें दो तरहकी प्रजा है -- स्त्रीपुरुषके संयोगसे उत्पन्न होनेवाली और शब्दसे (दीक्षा? मन्त्र उपदेश आदिसे) उत्पन्न होनेवाली। संयोगसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा बिन्दुज कहलाती है और शब्दसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा नादज कहलाती है। बिन्दुज प्रजा पुत्रपरम्परासे और नादज प्रजा शिष्यपरम्परासे चलती है।सप्तर्षियों और चौदह मनुओंने तो विवाह किया था अतः उनसे उत्पन्न होनेवाली प्रजा बिन्दुज है। परन्तु सनकादिकोंने विवाह किया ही नहीं अतः उनसे उपदेश प्राप्त करके पारमार्थिक मार्गमें लगनेवाली प्रजा,नादज है। निवृत्तिपरायण होनेवाले जितने सन्तमहापुरुष पहले हुए हैं? अभी हैं और आगे होंगे? वे सब उपलक्षणसे उनकी ही नादज प्रजा हैं। सम्बन्ध -- चौथेसे छठे श्लोकतक प्राणियोंके भावों तथा व्यक्तियोंके रूपमें अपनी विभूतियोंका और अपने योग(प्रभाव) का वर्णन करके अब भगवान् आगेके श्लोकमें उनको तत्त्वसे जाननेका फल बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.6 -- 10.11।।महर्षय इत्यादि भास्वता इत्यन्तम्। परस्परबोधनया अन्योन्यबोधस्फारसंक्रमणात् सर्व एव हि प्रमातारः एक ईश्वर इति विततव्याप्त्या (S??N वितत्य व्याप्त्या) सुखेनैव सर्वशक्तिकसर्वगतस्वात्मरूपताधिगमेन (S -- ताधिशयनेन अधिगमेन) माहेश्वर्यमेषामिति भावः (After इति भावः ?N add तेषां सततयुक्तानाम् इत्यतः प्रभृति अध्यायान्ता टीका उट्टङ्किता युगपद्धि वेद्या। तेषामेव अनु च अर्जुनप्रश्नपद्यानि षट् उल्लिखति। श्रीभगवान् अथवा बहुना इति पर्यन्तानि पद्यानि 23 वक्ति।। These sentences are obviously of some copyist. It is to be noted however,that the Mss. generally contain seven (not six) verses of Arjuna and then 24 (not 23) verses of the hagavan) ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.6।।न केवलं भगवतः सर्वप्रकृतित्वमेव किंतु सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्वरूपमधिष्ठातृत्वमपीत्याह -- किञ्चेति। आद्या भृग्वादयो वसिष्ठान्ताः सर्वज्ञा विद्यासंप्रदायप्रवर्तकाः। तथेति मनूनामपि पूर्वत्वेनाद्यत्वमनुकृष्यते। के ते मनवस्तत्राह -- सावर्णा इतीति। प्रसिद्धाः पुराणेषु प्रजानां पालकाः स्वयमीश्वराश्चेति शेषः। महर्षीणां मनूनां च तुल्यं विशेषणं -- ते चेति। मयि सर्वज्ञे सर्वेश्वरे गता भावना येषां ते तथा। भावनाफलमाह -- वैष्णवेनेति। वैष्णव्या शक्त्याधिष्ठितत्वेन ज्ञानैश्वर्यवन्त इत्यर्थः। तेषां जन्मनो वैशिष्ट्यमाचष्टे -- मानसा इति। मन्वादीनेव विशिनष्टि -- येषामिति। विद्यया जन्मना च संततिभूता मन्वादीनामस्मिंल्लोके सर्वाः प्रजा इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.6।।महर्षयः सप्त भृग्वादय इति शङ्करः? तदसत् पूर्व इति विशेषणेन प्रथममन्वन्तरस्थानामेव ग्रहणस्योचितत्वात् मोक्षधर्मसंवादाच्चेति भावेनाह -- पूर्व इति। इतोऽपि मरीच्यादय एवेत्याह -- ते हीति। निरुपपदेन सप्तर्षिशब्देनेति शेषः।पूर्वे इत्यस्योत्तरत्र सम्बन्धेऽपि एतत्सिद्धमिति भावेनानेकप्रमाणोपन्यासः। ब्रह्मसावर्ण्यो रुद्रसावर्ण्यो दक्षसावर्ण्यो धर्मसावर्ण्य इति भविष्यन्तश्चत्वारो मनव इत्यन्ये? तदसदिति भावेनाह -- चत्वार इति। स्वायम्भुवस्वारोचिषरैवतोत्तमाः। प्रथमातिक्रमे कारणाभावादिति भावः। किञ्चयेषां लोक इमाः,प्रजाः इति विशेषणमेष्वेव सम्भवति? नेतरेष्वतोऽप्येवमित्याह -- तेषां हीति। इमा वर्तमानाः प्रजा अपत्यानि। ननु चतुर्दशमनवस्तेषु चतुर्णां यत्पृथक्करणं तत्र कारणेन भाव्यम्। अस्ति च तत्परोक्तेषु संज्ञासाम्यम् न तु स्वायम्भुवादिषु अतः कथमेतत् इत्यत आह -- विभाग इति। प्राधान्यादेवेति शेषः संज्ञासाम्यस्याप्रयोजकत्वात्। अन्यथा मेरुसावर्णेरपि ग्रहणप्रसङ्गादिति भावः। अस्त्वेवं प्राधान्यं च परोक्तानामेवेत्यत आह -- प्राधान्यं चेति। स्वायम्भुवादीनामिति शेषः। किञ्च श्रुतौ स्वायम्भुवादीनामेव पृथक्करणात्त एवात्रेत्याह -- गौतमेति। पृथक्करणे न फलमिति शेषः। प्राथमिकत्वादेव प्राधान्यं भवतीत्युक्तं तत्कथं इत्यत आह -- पूर्वेभ्यो हीति। तत्सन्ततावित्यर्थः। तेषां पूर्वेषां उत्तरान्प्रति। तत्सन्ततावजातान् प्रति प्रथमानां कथं प्राधान्यं इत्यत आह -- अजातेष्विति। विषयसप्तमीयम्। ज्यैष्ठ्यं प्रथमानां प्राधान्यमित्यर्थः। इदमुक्तं भवति -- प्रधानगुणभावो हि सति सम्बन्धे भवति। अयुगपद्भाविषु चैतेषु प्रथमानामेव प्राधान्यं? उत्तरेषगुणत्वमुक्तविधया सम्भवति। न त्वन्यथा कथमपीति। प्रथमाश्चेद्गृह्यन्ते तदा चतुर्थस्तामसो गीताभिप्रेततया कुतो न व्याख्यायते इत्यत आह -- तामसस्येति। अनुक्तिरव्याख्यानं भगवति चमद्भावा मानसा जाताः इति विशेषणासम्भवादिति भावः। तामसस्य भगवदवतारत्वं कुतः इत्यत आह -- तच्चेति।चतुर्थ उत्तमभ्राता मनुर्नाम्ना च तामसः। [भाग.8।1।27] हरिरित्याहृतो येन गजेन्द्रो मोचितो ग्रहात् [भाग.8।1।30] इत्यादिना। ननु यदि विशेषणासम्भवात्प्रथमप्राप्तातिक्रमेण तत्सम्भवतां ग्रहणम्। तर्हिमानसा जाताः इति विशेषणासम्भवादेतान्परित्यज्य ब्रह्मसावर्ण्यादय एव ग्राह्यास्तेषु तत्सम्भवादिति भास्करः तत्राह -- मानसत्वं चेति। चतुर्णां दक्षदुहितरि किल भावो युगपदासीदित्येवंविधं मानसत्वं न सर्वेषामिति चेत्? न अत्रार्थे तद्धितोत्पत्तेरस्मरणात्। ननु ब्रह्मपुत्राः सन्तु मानसाः? न तु तदा ते मनवः? किन्तु मच्छरीरं परित्यज्य प्रियव्रतादिपुत्रा जातास्तदैव? अतो मनुषु मानसत्वमसम्भाव्यमित्यत आह -- अन्येति। तन्मानसं शरीरं
Chapter 10 (Part 4)
अपरित्यज्य स्थितानामप्यन्यपुत्रत्वं सम्भवतीति योजना। द्वितीये शरीरे जाते तत्पूर्वशरीरेणैक्यमापद्यत इति सम्प्रदायविदः। किमत्र प्रमाणं इत्यत आह -- प्रमाणं चेति। मनूनामेव ब्रह्ममानसपुत्रत्ववाक्यं प्रियव्रतादिपुत्रत्ववाक्यं चेत्युभयविधवाक्यम्। उपचारत्वकल्पना क्लिष्टैव। किञ्चपूर्वे इति विशेषणं पूर्वेणैव सम्बध्यते? परेणैव वोभाभ्यामपीति त्रयः पक्षाः? पक्षत्रयेऽपि चत्वारो मनवः प्रथमा एवेति सिध्यति आद्ये सप्तर्षीणां प्रथमत्वेन तत्साहचर्यात्? द्वितीयतृतीययोर्वचनादेवेति भावेनाह -- पूर्व इति। मयि भावो येषामिति व्याख्यानं प्रकृतासङ्गतं कारणत्वस्यात्र प्रकृतत्वादिति भावेनाह -- मत्त इति। भावो जन्म। ननुमानसा जाताः इत्यनेन भगवतस्तत्कारणत्वमुच्यते? मैवम्ततो मनून् इति वचनस्य सत्वेन ब्रह्मणो मानसा जाता इति व्याख्येयत्वात्? तर्हि कथं न व्याहतिः इत्यत आह -- ये त इति। मत्त एव ब्रह्मान्तर्यामिणः। ब्रह्मा तु द्वारमात्रमिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.6।।पूर्वे सप्तर्षयः -- मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलहः क्रतुः। वसिष्ठश्च महातेजाः इति मोक्षधर्मोक्ताः [म.भा.12।335।28]। ते हि सर्वपुराणेषु उच्यन्ते। चत्वारः प्रथमाः स्वायम्भुवाद्याः तेषां हीमाः प्रजाः -- नहि भविष्यतामिमाः प्रजा इति युक्तं -- विभागः प्राधान्यं च प्राथमिकत्वादेव भवति। गौतमखिलेषु चोक्तम् -- स्वायम्भुवं रोचिषं च रैवतं च तथोत्तमम्। वेद यः स प्रजावान् इति। पूर्वेभ्यो ह्युत्तरा जायन्त इत्येषां प्राधान्यम्। अजातेषु च ज्यैष्ठ्यम्।तामसस्य भगवदवतारत्वादनुक्तिः। तच्च भागवते प्रसिद्धम्। मानसत्वं च सर्वेषां मनूनामुक्तं भागवते ()ततो मनून्ससर्जान्ते मनसा लोकभावनान् [ ] इति। अन्यपुत्रत्वं त्वपरित्यज्यापि शरीरं तद्भवति। प्रमाणं चोभयविधवाक्यान्यथाऽनुपपत्तिरेव। पूर्व इति विशेषणाच्चैतत्सिद्धिः। मत्तो भावो येषां ते मद्भावाः। ये ते ब्रह्मणो मानसा जातास्ते मत्त एव जाता इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.6।।पूर्वे सप्त महर्षयः अतीतमन्वन्तरे ये भृग्वादयः सप्त महर्षयो नित्यसृष्टिप्रवर्तनाय ब्रह्मणो मनसः संभवाः नित्यस्थितिप्रवर्तनाय ये च सावर्णिका नाम चत्वारो मनवः स्थिताः येषां संतानमये लोके जाता इमाः सर्वाः प्रजाः? प्रतिक्षणम् आप्रलयाद् अपत्यानाम् उत्पादकाः पालकाश्च भवन्ति? ते भृग्वादयो मनवः च मद्भावाः? मम यो भावः स एव येषां भावः ते मद्भावाः? मन्मते स्थिताः मत्संकल्पानुवर्तिन इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.6।। --,महर्षयः सप्त भृग्वादयः पूर्वे अतीतकालसंबन्धिनः? चत्वारः मनवः तथा सावर्णा इति प्रसिद्धाः? ते च मद्भावाः मद्गतभावनाः वैष्णवेन सामर्थ्येन उपेताः? मानसाः मनसैव उत्पादिताः मया जाताः उत्पन्नाः? येषां मनूनां महर्षीणां च सृष्टिः लोके इमाः स्थावरजङ्गमलक्षणाः प्रजाः।।
───────────────────
【 Verse 10.7 】
▸ Sanskrit Sloka: एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्वत: | सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते नात्र संशय: ||
▸ Transliteration: etām vibhūtiṁ yogaṁ ca mama yo vetti tattvataḥ | so ’vikampena yogena yujyate nātra saṁśayaḥ ||
▸ Glossary: etāṁ: all this; vibhūtiṁ: glory; yogaṁ: powers; ca: and; mama: My; yo: who; vetti: knows; ta tvataḥ: truth; so: he; ’vikampena: without distraction; yogena: in yoga; yujyate: engaged; nā: not; atra: here; saṁśayaḥ: doubt.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.7 He who knows all this glory and powers of mine, truly, he is fully united in Me; Of that there is no doubt.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.7।।जो मनुष्य मेरी इस विभूतिको और योगको तत्त्वसे जानता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानता है? वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.7।। जो पुरुष इस मेरी विभूति और योग को तत्त्व से जानता है? वह पुरुष अविकम्प योग (अर्थात् निश्चल ध्यान योग) से युक्त हो जाता है? इसमें कुछ भी संशय नहीं है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.7 एताम् this? विभूतिम् (manifold) manifestation of My Being? Commentary Knowledge of the glory of the Lord is really conducive to Yoga. He who knows in essence the immanent pervading power of the Lord by which He causes the manifestations? and His diverse manifestations (Vibhutis)? unites with Him in firm unalterable Yoga and attains eternal bliss and perfect harmony. From the ant to the Creator there is nothing except the Lord. He who knows in reality this extensive manifestation of the Lord and His Yoga (Yoga here stands for what is born of Yoga? viz.? infinite Yogic powers as well as omniscience)? is endowed with firm unwavering Yoga. He lives in the Eternal and is endowed with the highest knowledge of the Self. He who has realised this Truth is free from the superiority and inferiority complexes. There i real awakening of wisdom in him. He will behold the Lord in all beings and all beings in the Lord. He will never hate any creature on this earth. This is a rare living cosmic experience. The Yogi realises that the Lord and His manifestations are one. He attains the supreme goal and is absorbed in Him through his wholehearted devotion. He is perfectly aware of his oneness with the Supreme by My divine Yoga.He can keep his balance of mind now in whatever environments and circumstances he is placed and can do any action without losing his consciousness of oneness or identity with the Supreme Self. (Cf.VII.25IX.5XI.8)What is that unshaken Yoga with which they are endowedThe answer follows.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.7. He, who knows correctly this extensively manifesting power and the Yogic power of Mine-he is endowed with the unwavering Yoga. There is no doubt about it.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.7 He who rightly understands My manifested glory and My Creative Power, beyond doubt attains perfect peace.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.7 He who in truth knows this supernal manifestation and splendour of auspicious attributes of Mine, becomes, united with the unshakable Yoga of Bhakti. Of this, there is no doubt.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.7 One who knows truly this majesty and yoga of Mine, he becomes imbued with unwavering Yoga. There is no doubt about this.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.7 He who in truth knows these manifold manifestations of My Being and (this) Yoga-power of Mine becomes established in the unshakable Yoga; there is no doubt about it.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.7 See Comment under 10.11
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.7 'Supernal manifestation' is the glory (Vibhuti) of the Lord. He who in truth knows this supernal manifestation that all origination, sustentation and activity depend on Me, and also that Yoga of Mine which is in the form of auspicious attributes antagonistic to all that is evil - such a person becomes united with the Yoga or Bhakti of an unshakable nature. Of this, there is no doubt. The meaning is: You yourself will see that the knowledge concerning the supernal manifestation and auspicious attributes of Mine will increase devotion.
Sri Krsna now shows that the growth of devotion is of the form of the development of knowledge of His supreme state.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.7 Yah, one who; vetti, knows; tattvatah, truly, i.e. just as it is; etam, this, aforesaid; vibhutim. majesty, (divine) manifestations; [Omnipresence.] and yogam, yoga, action, My own ability to achieve [God's omnipotence. (God's power of accomplishing the impossible.-M.S.)]-or, the capacity for mystic powers, the omniscience resulting from yoga (meditation), is called yoga; sah, he; yujyate, becomes imbued with; avikampena, unwavering; yogena, Yoga, consisting in steadfastness in perfect knowledge. [After realizing the personal God, he attains the transcendental Reality; the earlier knowledge leads to the latter.] There is no samsayah, doubt; atra, about this. With what kind of unwavering Yoga does he become endued? This is being answered:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.7।। जो इस मेरी विभूति और योग को तत्त्व से जानता है? वह ब्रह्मज्ञान में निष्ठा प्राप्त करता है। इस श्लोक में प्रयुक्त इन दो शब्दों विभूति और योग का जो अर्थ सदैव बताया जाता है वह क्रमश भूतमात्र का विस्तार और ऐश्वर्य सार्मथ्य है।यद्यपि ये अर्थ सही हैं? तथापि वे इतने प्रभावी नहीं हैं कि पूर्व श्लोक में वर्णित सिद्धांत और इस श्लोक के साथ उसकी सूक्ष्म और सुन्दर संगति को व्यक्त कर सकें। सप्तर्षियों के माध्यम से समष्टि विश्व की अभिव्यक्ति ही परमात्मा की विभूति है जबकि चार मानस पुत्रों द्वारा सृष्ट जीव (व्यष्टि) के अनुभव का जगत् आत्मा का दिव्य योग है। व्यष्टि जीव के जगत् का अधिष्ठान आत्मा ही परमात्मा (ब्रह्म) है? जो सम्पूर्ण विश्व का आधार है। अत? यहाँ कहा गया है कि? जो पुरुष विभूति और योग इन दोनों को ही परमात्मा की दिव्य अभिव्यक्ति के रूप में साक्षात् जानता है? वही पुरुष अनन्त ब्रह्म का अपरोक्ष अनुभव करता है।उपर्युक्त विवेचन द्वारा पूर्व श्लोक में कथित सप्तर्षि तथा चार कुमारों की ब्रह्माजी के मन से उत्पत्ति हुई की उपयुक्तता को समझने में कठिनाई नहीं रह जाती। जब परमात्मा व्यष्टि और समष्टि मनों से अपने तादात्म्य को त्याग देता है? तब वह अपनी स्वमहिमा में ही प्रतिष्ठित होकर रमता है। समष्टि उपाधि के साथ तादात्म्य से वह ब्रह्म ईश्वर बन जाता है? और व्यष्टि के साथ संबंध से जीवभाव को प्राप्त हो जाता है। वेदान्त के इस अभिप्राय को समझना और उसी अनुभव में जीना ही अविकम्प योग है। इस योग से ही आत्मानुभूति में दृढ़ और स्थायी निष्ठा प्राप्त होती है। योग शब्द से कुछ ऐसा अर्थ समाज में प्रचलित हो गया था कि लोगों के मन में उसके प्रति भय व्याप्त हो गया था। गीता में? महर्षि व्यास? स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण के मुखारविन्द से इस परिचित शब्द योग का अर्थ नए सन्दर्भ में इस प्रकार स्पष्ट करते हैं कि उसके प्रति व्याप्त आशंका निर्मूल हो जाती है और वह सबके लिए कल्याणकारक भी सिद्ध होता है। अविकम्प योग उतना ही अपूर्व है जितनी कि योग शब्द की विविध परिभाषायें हैं? जो गीता के पूर्वाध्यायों के विभिन्न श्लोकों में दी गयी हैं। गीता हिन्दूपुनरुत्थान की रचनात्मक क्रांति का वह एकमात्र धर्मग्रन्थ है? जिसका स्थान अन्य कोई ग्रन्थ नहीं ले सकता।आत्मस्वरूप के अखण्ड अनुभव में दृढ़ और स्थायी निष्ठा प्राप्त करने के लिए कौन सा निश्चित साधन है भगवान् श्रीकृष्ण अगले श्लोक में बताते हैं --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.7।।स्वप्रभावमुक्त्वा तज्ज्ञानफलमाह -- एतामिति। एतां यथोक्तां विभूतिं विविधभावं विस्तीरमितियावत्। परमात्मनस्तदर्थघटनसामर्थ्यं योगः यल्लेशसंबन्धेन भृग्वादयो ज्ञानादिमन्तो भवन्ति। यद्वा योगैश्वर्यसामर्थ्यं सर्वज्ञत्वं योगजन्यं योगशब्देनाभिधीयते। तं यस्तत्त्वतो यथावद्वेत्ति जानाति सोऽप्रकम्पेनाप्रचलितेन योगेन निरुपाधिब्रह्मसम्यग्ज्ञानलक्षणेन युज्यते युक्तो भवति। अस्मिन्नर्थे संशयो नास्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.7।।एवं सोपाधिकस्य भगवतः प्रभावमुक्त्वा तज्ज्ञानफलमाह -- एतां प्रागुक्तां बुद्ध्यादिमहर्ष्यादिरूपां विभूतिं विविधभावं तत्तद्रूपेणावस्थितिं योगं च तत्तदर्थनिर्माणसामर्थ्यं। परमैश्वर्यमिति यावत्। मम यो वेत्ति तत्त्वतः यथावत्सोऽविकम्पेनाप्रचलितेन योगेन सम्यग्ज्ञानस्थैर्यलक्षणेन समाधिना युज्यते। नात्र संशयः प्रतिबन्धः कश्चित्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.7।।उपास्तावधिकारिणमाह -- एतामिति। एतां वक्ष्यमाणां विभूतिं योगं च विश्वतोमुखे भगवति मनःसमाधानं यस्तत्त्वतो वेत्ति सम्यगनुष्ठातुं ज्ञातुं च समर्थो भवति सोऽविकम्पेनाचलेन निर्विकल्पकेन षष्ठाध्यायोक्तेन योगेन मद्विषयेण समाधिना युज्यते ततश्च कृतकृत्यो भवति। नात्र संशय इति प्रवृत्त्यतिशयार्थमुच्यते। भगवद्वचसि संशयासंभवात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.7।।एतन्निरूपणप्रयोजनमाह -- एतामिति। एतां मदनुभावरूपां भृग्वादिलक्षणां तां मम विभूतिं क्रीडार्थैकप्रकटिताम् च पुनः क्रीडार्थप्रकटितसामग्र्या मम योगं तत्त्वतः मल्लीलारूपेण यो वेत्ति सः? अविकम्पेन निश्चलेन मद्वियोगादिरहितेन योगेन मत्संयोगेन भक्तिरूपेण युज्यते? युक्तो भवतीत्यर्थः। नात्र संशयः? अत्र सन्देहो नास्तीत्यर्थः। अनेन सन्देहे सति न भवतीति ज्ञापितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.7।।यथोक्तविभूत्यादितत्त्वज्ञानस्य फलमाह -- एतामिति। एतां भृग्वादिलक्षणां मम विभूतिं? योगं चैश्वर्यलक्षणं तत्त्वतो यो वेत्ति सोऽविकम्पेन निःसंशयेन योगेन सम्यग्दर्शनेन युक्तो भवति। नास्त्यत्र संशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.7।।एतां विभूतिमिति। तथाविधैश्वर्यं च यो वेत्ति तत्त्वतः स भक्तिरूपेण योगेन युज्यते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.7।।मेरी इस उपर्युक्त विभूतिको अर्थात् विस्तारको और योग -- युक्तिको अर्थात् अपनी मायिक घटनाको? अथवा योगसे उत्पन्न हुई सर्वज्ञतारूप सामर्थ्यको जो कि योगशब्दसे कही जाती है? जो तत्त्वसे -- यथार्थ जानता है? वह पुरुष पूर्ण ज्ञानकी स्थिरतारूप निश्चल योगसे युक्त हो जाता है? इस विषयमें ( कुछ भी ) संशय नहीं है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.7।। व्याख्या -- एतां विभूतिं योगं च मम -- एताम् सर्वनाम अत्यन्त समीपका लक्ष्य कराता है। यहाँ यह शब्द चौथेसे छठे श्लोकतक कही हुई विभूति और योगका लक्ष्य कराता है।विभूति नाम भगवान्के ऐश्वर्यका है और योग नाम भगवान्की अलौकिक विलक्षण शक्ति? अनन्त सामर्थ्यका है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्की शक्तिका नाम योग है और उस योगसे प्रकट होनेवाली विशेषताओंका नाम विभूति है। चौथेसे छठे श्लोकतक कही हुई भाव और व्यक्तिके रूपमें जितनी विभूतियाँ हैं? वे तो भगवान्के सामर्थ्यसे? प्रभावसे प्रकट हुई विशेषताएँ हैं? और मेरेसे पैदा होते हैं,(मत्तः मानसा जाताः) -- यह भगवान्का योग है? प्रभाव है। इसीको नवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें,पश्य मे योगमैश्वरम् (मेरे इस ईश्वरीय योगको देख) पदोंसे कहा गया है। ऐसे ही आगे ग्यारहवें अध्यायके आठवें श्लोकमें अर्जुनको विश्वरूप दिखाते समय भगवान्ने पश्य मे योगमैश्वरम् पदोंसे अपना ऐश्वर्यम् योग देखनेके लिये कहा है।विशेष बातजब मनुष्य भोगबुद्धिसे भोग भोगता है? भोगोंसे सुख लेता है? तब अपनी शक्तिका ह्रास और भोग्य वस्तुका विनाश होता है। इस प्रकार दोनों तरफसे हानि होती है। परन्तु जब वह भोगोंको भोगबुद्धिसे नहीं भोगता अर्थात् उसके भीतर भोग भोगनेकी किञ्चिन्मात्र भी लालसा उत्पन्न नहीं होती? तब उसकी शक्तिका ह्रास नहीं होता। उसकी शक्ति? सामर्थ्य निरन्तर बनी रहती है।वास्तवमें भोगोंके भोगनेमें सुख नहीं है। सुख है -- भोगोंके संयममें। यह संयम दो तरहका होता है -- (1) दूसरोंपर शासनरूप संयम और (2) अपनेपर शासनरूप संयम। दूसरोंपर शासनरूप संयमका तात्पर्य है -- दूसरोंका दुःख मिट जाय और वे सुखी हो जायँ -- इस भावसे दूसरोंको उन्मार्गसे बचाकर सन्मार्गपर लगाना। अपनेपर शासनरूप संयमका तात्पर्य है -- अपने स्वार्थ तथा अभिमानका त्याग करना और स्वयं किञ्चिन्मात्र भी सुख न भोगना। इन्हीं दोनों संयमोंका नाम योग अथवा प्रभाव है। ऐसा योग अथवा प्रभाव सर्वोपरि परमात्मामें स्वतःस्वाभाविक होता है। दूसरोंमें यह साधनसाध्य होता है।स्वार्थ और अभिमानपूर्वक दूसरोंपर शासन करनेसे? अपना हुक्म चलानेसे दूसरा वशमें हो जाता है तो शासन करनेवालेको एक सुख होता है। इस सुखमें शासककी शक्ति? सामर्थ्य क्षीण हो जाती है और जिसपर वह शासन करता है? वह पराधीन हो जाता है। इसलिये स्वार्थ और अभिमानपूर्वक दूसरोंपर शासन करनेकी अपेक्षा स्वार्थ और अभिमानका सर्वथा त्याग करके दूसरोंका हित हो? मनुष्य नश्वर भोगोंमें न फँसें? मनुष्य अनादिकालसे अनन्त दुःखोंको भोगते आये हैं अतः वे सदाके लिये इन दुःखोंसे छूटकर महान् आनन्दको प्राप्त हो जायँ -- ऐसी बुद्धिसे दूसरोंपर शासन करना बहुत श्रेष्ठ और विलक्षण शासन (संयम) है। इस शासनकी आखिरी हद है -- भगवान्का शासन अर्थात् संयमन। इसीका नाम योग है।योग नाम समता? सम्बन्ध और सामर्थ्यका है। जो स्थिर परमात्मतत्त्व है? उसीसे अपार सामर्थ्य आती है। कारण कि वह निर्विकार परमात्मतत्त्व महान् सामर्थ्यशाली है। उसके समान सामर्थ्य किसीमें हुई नहीं? होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। मनुष्यमें आंशिकरूपसे वह सामर्थ्य निष्काम होनेसे आती है। कारण कि कामना होनेसे शक्तिका क्षय होता है और निष्काम होनेसे शक्तिका संचय होता है।आदमी काम करतेकरते थक जाता है तो विश्राम करनेसे फिर काम करनेकी शक्ति आ जाती है? बोलतेबोलते थक जाता है तो चुप होनेसे फिर बोलनेकी शक्ति आ जाती है। जीतेजीते आदमी मर जाता है तो फिर जीनेकी शक्ति आ जाती है। सर्गमें शक्ति क्षीण होती है और प्रलयमें शक्तिका संचय होता है। तात्पर्य यह हुआ कि प्रकृतिके सम्बन्धसे शक्ति क्षीण होती है और उससे सम्बन्धविच्छेद होनेपर महान् शक्ति आ जाती है।यो वेत्ति तत्त्वतः -- विभूति और योगको तत्त्वसे जाननेका तात्पर्य है कि संसारमें कारणरूपसे मेरा जो कुछ प्रभाव? सामर्थ्य है और उससे कार्यरूपमें प्रकट होनेवाली जितनी विशेषताएँ हैं अर्थात् वस्तु? व्यक्ति आदिमें जो कुछ विशेषता दीखनेमें आती है? प्राणियोंके अन्तःकरणमें प्रकट होनेवाले जितने भाव हैं और प्रभावशाली व्यक्तियोंमें ज्ञानदृष्टिसे? विवेकदृष्टिसे तथा संसारकी उत्पत्ति और संचालनकी दृष्टिसे जो कुछ विलक्षणता है? उन सबके मूलमें मैं ही हूँ और मैं ही सबका आदि हूँ। इस प्रकार जो मेरेको समझ लेता है? तत्त्वसे ठीक मान लेता है? तो फिर वह उन सब विलक्षणताओंके मूलमें केवल मेरेको ही देखता है। उसका भाव केवल मेरेमें ही होता है? व्यक्तियों? वस्तुओंकी विशेषताओँमें नहीं। जैसे? सुनारकी दृष्टि गहनोंपर जाती है तो गहनोंके नाम? आकृति? उपयोगपर दृष्टि रहते हुए भी भीतर यह भाव रहता है कि तत्त्वसे यह सब सोना ही है। ऐसे ही जहाँकहीं जो कुछ भी विशेषता दीखे? उसमें दृष्टि भगवान्पर ही जानी चाहिये कि उसमें जो कुछ विशेषता है? वह भगवान्की ही है वस्तु? व्यक्ति? क्रिया आदिकी नहीं।,संसारमें क्रिया और पदार्थ निरन्तर परिवर्तनशील हैं। इनमें जो कुछ विशेषता दीखती है? वह स्थायीरूपसे व्यापक परमात्माकी ही है। जहाँजहाँ विलक्षणता? अलौकिकता आदि दीखे? वहाँवहाँ वस्तु? व्यक्ति आदिकी ही विलक्षणता माननेसे मनुष्य उसीमें उलझ जाता है और मिलता कुछ नहीं। कारण कि वस्तुओंमें जो विलक्षणता दीखती है? वह उस अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्वकी ही झलक है? परिवर्तनशील वस्तुकी नहीं। इस प्रकार उस मूल तत्त्वकी तरफ दृष्टि जाना ही उसे तत्त्वसे जानना अर्थात् श्रद्धासे दृढ़तापूर्वक मानना है।यहाँ जो विभूतियोंका वर्णन किया गया है? इसका तात्पर्य इनमें परिपूर्णरूपसे व्यापक परमात्माके ऐश्वर्यसे है। विभूतियोंके रूपमें प्रकट होनेवाला मात्र ऐश्वर्य परमात्माका है। वह ऐश्वर्य प्रकट हुआ है परमात्माकी योगशक्तिसे। इसलिये जिसकिसीमें जहाँकहीं विलक्षणता दिखायी दे? वह विलक्षणता भगवान्की योगशक्तिसे प्रकट हुए ऐश्वर्य(विभूति) की ही है? न कि उस वस्तुकी। इस प्रकार योग और विभूति परमात्माकी हुई तथा उस योग और विभूतिको तत्त्वसे जाननेका तात्पर्य यह हुआ कि उसमें विलक्षणता परमात्माकी है। अतः द्रष्टाकी दृष्टि केवल उस परमात्माकी तरफ ही जानी चाहिये। यही इनको तत्त्वसे जानना अर्थात् मानना है (टिप्पणी प0 542)।सोऽविकम्पेन योगेन युज्यते -- उसकी मेरेमें दृढ़ भक्ति हो जाती है। दृढ़ कहनेका तात्पर्य है कि उसकी मेरे सिवाय कहीं भी किञ्चिन्मात्र भी महत्त्वबुद्धि नहीं होती। अतः उसका आकर्षण दूसरेमें न होकर एक मेरेमें ही होता है।नात्र संशयः -- इसमें कोई संदेहकी बात नहीं -- ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि अगर उसको कहीं भी किञ्चिन्मात्र भी संदेह होता है तो उसने मेरेको तत्त्वसे नहीं माना है। कारण कि उसने मेरे योगको अर्थात् विलक्षण प्रभावको और उससे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंको (ऐश्वर्यको) मेरेसे अलग मानकर महत्त्व दिया है।मेरेको तत्त्वसे जान लेनेके बाद उसके सामने लौकिक दृष्टिसे किसी तरहकी विलक्षणता आ जाय? तो वह उसपर प्रभाव नहीं डाल सकेगी। उसकी दृष्टि उस विलक्षणताकी तरफ न जाकर मेरी तरफ ही जायगी। अतः उसकी मेरेमें स्वाभाविक ही दृढ़ भक्ति होती है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जाननेवाला अविचल भक्तिसे युक्त हो जाता है। अतः विभूति और योगको तत्त्वसे जानना क्या है इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.6 -- 10.11।।महर्षय इत्यादि भास्वता इत्यन्तम्। परस्परबोधनया अन्योन्यबोधस्फारसंक्रमणात् सर्व एव हि प्रमातारः एक ईश्वर इति विततव्याप्त्या (S??N वितत्य व्याप्त्या) सुखेनैव सर्वशक्तिकसर्वगतस्वात्मरूपताधिगमेन (S -- ताधिशयनेन अधिगमेन) माहेश्वर्यमेषामिति भावः (After इति भावः ?N add तेषां सततयुक्तानाम् इत्यतः प्रभृति अध्यायान्ता टीका उट्टङ्किता युगपद्धि वेद्या। तेषामेव अनु च अर्जुनप्रश्नपद्यानि षट् उल्लिखति। श्रीभगवान् अथवा बहुना इति पर्यन्तानि पद्यानि 23,वक्ति।। These sentences are obviously of some copyist. It is to be noted however that the Mss. generally contain seven (not six) verses of Arjuna and then 24 (not 23) verses of the hagavan) ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.7।।सोपाधिकं प्रभावं भगवतो दर्शयित्वा तज्ज्ञानफलमाह -- एतामिति। बुद्ध्याद्युपादानत्वेन विविधा भूतिर्भवनं वैभवं सर्वात्मकत्वं तदाह -- विस्तारमिति। ईश्वरस्य तत्तदर्थसंपादनसामर्थ्यं योगस्तदाह -- आत्मन इति। योगस्तत्फलमैश्वर्यं सर्वज्ञत्वं सर्वेश्वरत्वं च मदीयं शक्तिज्ञानलेशमाश्रित्य मन्वादयो भृग्वादयश्चेशते जानते च तदाह -- अथवेति। यथा तौ विभूतियोगौ तथा वेदनस्य निरङ्कुशत्वं दर्शयति -- यथावदिति। सोपाधिकं ज्ञानं निरुपाधिकज्ञाने द्वारमित्याह -- सोऽविकम्पेनेति। उक्तेऽर्थे प्रतिबन्धाभावमाह -- नास्मिन्निति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.7।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.7।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.7।।विभूतिः ऐश्वर्यम्? एतां सर्वस्य मदायत्तोत्पत्तिस्थितिप्रवृत्तिरूपां विभूतिं मम हेयप्रत्यनीककल्याणगुणरूपं योगं च यः तत्त्वतो वेत्ति? सः अविकम्पेन अप्रकम्पेन भक्तियोगेन युज्यते? न अत्र संशयः।मद्विभूतिविषयं कल्याणगुणविषयं च ज्ञानं भक्तियोगवर्धनम् इति स्वयम् एव द्रक्ष्यसि इत्यभिप्रायः।विभूतिज्ञानविपाकरूपां भक्तिवृद्धिं दर्शयति --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.7।। --,एतां यथोक्तां विभूतिं विस्तारं योगं च युक्तिं च आत्मनः घटनम्? अथवा योगैश्वर्यसामर्थ्यं सर्वज्ञत्वं योगजं योगः उच्यते? मम मदीयं योगं यः वेत्ति तत्त्वतः तत्त्वेन यथावदित्येतत्? सः अविकम्पेन अप्रचलितेन योगेन सम्यग्दर्शनस्थैर्यलक्षणेन युज्यते संबध्यते। न अत्र संशयः न अस्मिन् अर्थे संशयः अस्ति।।कीदृशेन अविकम्पेन योगेन युज्यते इत्युच्यते --,
───────────────────
【 Verse 10.8 】
▸ Sanskrit Sloka: अहं सर्वस्य प्रभवो मत्त: सर्वं प्रवर्तते | इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विता: ||
▸ Transliteration: ahaṁ sarvasya prabhavo mattaḥ sarvaṁ pravartate | iti matvā bhajante māṁ budhā bhāvasamanvitāḥ ||
▸ Glossary: ahaṁ: I; sarvasya: all; prabhavo; source; mattaḥ: from Me; sarvaṁ: all; pravar- tate: emanates; iti: thus; matvā: knowing; bhajante: pray; māṁ: to Me; budhā: wise; bhāvasamanvitāḥ: surrender
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.8 I am the source of all the spiritual and material worlds. Everything arises from Me. The wise who know this are de- voted to Me and surrender their heart to Me.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.8।।मैं संसारमात्रका प्रभव (मूलकारण) हूँ? और मेरेसे ही सारा संसार प्रवृत्त हो रहा है अर्थात् चेष्टा कर रहा है -- ऐसा मेरेको मानकर मेरेमें ही श्रद्धाप्रेम रखते हुए बुद्धिमान् भक्त मेरा ही भजन करते हैं -- सब प्रकारसे मेरे ही शरण होते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.8।। मैं ही सबका प्रभव स्थान हूँ मुझसे ही सब (जगत्) विकास को प्राप्त होता है? इस प्रकार जानकर बुधजन भक्ति भाव से युक्त होकर मुझे ही भजते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.8 अहम् I? सर्वस्य of all? प्रभवः the source? मत्तः from Me? सर्वम् everything? प्रवर्तते evolves? इति thus? मत्वा understanding? भजन्ते worship? माम् Me? बुधाः the wise? भावसमन्विताः endowed with meditation. Commentary Waves originate in water? depend on water and dissolve in water. The only support for the waves is water. Even so the only support for the whole world is the Lord. Realising this? feeling the omnipresence of the Lord? the wise worship Him with devotion and affection in all places. The Supreme is the same in all countries and at all times. He is the material and the efficient cause.As Mulaprakriti or Avyaktam the Lord is the source of all forms. The Lord is the primum mobile. He gazes at His Sakti (creative power) and the whole world evolves and the forms move. The worldly man who has neither sharp nor subtle intellect beholds the changing forms only through the fleshly eyes. He has no idea of the Indwelling Presence? the substratum? the allpervading intelligence or the blissful consciousness. He is allured by the passing forms. He fixes his hopes and joy on these transitory forms. He lives and exerts for them. He rejoices when he gets a wife and children. If these forms pass away he is drowned in sorrow. But the wise ones constantly dwell in the Supreme? the source and the life of all? and enjoy the eternal bliss of the immortal? inner Self? their own nondual Atman? albeit all these forms around them change and pass away. They are steadfast in Yoga. They are endowed with unshakable Yoga. They are enthroned in Yoga. They worship the Supreme in contemplation and enjoy the indescribable bliss of Nirvikalpa Samadhi.Para Brahman? known as Vaasudeva? is the source of the whole world. From Him alone evolves the whole world with all its changes? viz.? existence (Sthiti)? destruction (Nasa)? action (Kriya)? fruit (Phala) and enjoyment (Bhoga). Understanding thus? the wise adore the Supreme Being and engage themselves in profound meditation on the Absolute. (Cf.IX.10)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.8. 'He is the source of all and from Him all comes forth' - Thus viewing, the wise men revere Me with devotion.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.8 I am the source of all; from Me everything flows. Therefore the wise worship Me with unchanging devotion.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.8 I am the origin of all; from Me proceed everything thinking thus the wise worship Me with all devotion (Bhava).
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.8 I am the origin of all; everything moves on owing to Me. Realizing thus, the wise ones, filled with fervour, adore Me.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.8 I am the source of all; from Me everything evolves; understanding thus, the wise, endowed with meditation, worship Me.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.8 See Comment under 10.11
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.8 I am the 'origin', namely, the cause of originating everything in this universe consisting of wonderful sentient and non-sentient beings. From Me proceed everything. Thinking thus of My sovereignty, natural and unhindered, and knowing Me as endowed with a multitude of auspicious attributes like condescension, beauty, parental affection etc., the wise or the men of knowledge worship Me with devotion endowed as I am with all auspicious attributes. 'Bhava' is a particular disposition, here a loving disposition, of the mind. The meaning is that they worship Me with intense yearning of the heart.
How?
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.8 Aham, I, the supreme Brahman called Vasudeva; am the prabhavah, origin; sarvasya, of all, of the whole world; sarvam, everything, the whole world of changes, consisting of continuance, destruction, action and enjoyment of the fruits of action; pravartate, moves on; mattah, owing to Me alone. Matva, realizing; iti, thus; the budhah, wise ones, the knowers of the supreme Reality; bhava-samanvitah, filled with fervour-bhava is the same as bhavana, meaning ardent longing for the supreme Reality; filled (samanvitah) with that, i.e. imbued with that; bhajante, adore; mam, Me. Besides,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.8।। व्यष्टि और समष्टि में जो भेद है वह उन उपाधियों के कारण है? जिनके माध्यम से एक ही सनातन? परिपूर्ण सत्य प्रकट होता है। इन दो उपाधियों के कारण ब्रह्म को ही क्रमश जीव और ईश्वर भाव प्राप्त होते हैं जैसे एक ही विद्युत् शक्ति बल्ब और हीटर में क्रमश प्रकाश और ताप के रूप में व्यक्त होती है। स्वयं विद्युत् में न प्रकाश है और न उष्णता। इसी प्रकार स्वयं परमात्मा में न ईश्वर भाव है और न जीव भाव। जो पुरुष इसे तत्त्वत जानता है वह अविकम्प योग के द्वारा ब्रह्मनिष्ठता को प्राप्त होता है।एक कुम्भकार कुम्भ बनाने के लिए सर्वप्रथम घट के निर्माण के उपयुक्त लचीली मिट्टी तैयार करता है। तत्पश्चात् उस मिट्टी के गोले को चक्र पर रखकर घटाकृति में परिवर्तित करता है। तीसरी अवस्था में घट को सुखाकर उसे चमकीला किया जाता है और चौथी अवस्था में उस तैयार घट को पकाकर उस पर रंग लगाया जाता है। घट निर्माण की इस क्रिया में मिट्टी निश्चय ही कह सकती है कि वह घट का प्रभव स्थान है। चार अवस्थाओं में घट का जो विकास होता है? उसका भी अधिष्ठान मिट्टी ही थी? न कि अन्य कोई वस्तु। यह बात सर्वकालीन घटों के सम्बन्ध में सत्य है। किसी भी घट की उत्पत्ति? वृद्धि और विकास उसके उपादान कारणभूत मिट्टी के बिना नहीं हो सकता। इसी प्रकार एक ही चैतन्यस्वरूप परमात्मा? ईश्वर और जीव के रूप में प्रतीत होता है।जिस पुरुष ने विवेक के द्वारा व्यष्टि और समष्टि के इस सूक्ष्म भेद को समझ लिया है? वही पुरुष अपने मन को बाह्य जगत् से निवृत्त करके इन दोनों के अधिष्ठान स्वरूप आत्मा में स्थिर कर सकता है। मन के इस भाव को ही यहाँ इस अर्थपूर्ण शब्द भावसमन्विता के द्वारा दर्शाया गया है।प्रेम या भक्ति का मापदण्ड है पुरुष की अपनी प्रिय वस्तु के साथ तादात्म्य करने की क्षमता। संक्षेपत? प्रेम की परिपूर्णता इस तादात्म्य की पूर्णता में है। जब एक भक्त स्वयं यह अनुभव कर लेता है कि एक परमात्मा ही समष्टि और व्यष्टि की अन्तकरण की उपाधियों के माध्यम से मानो ईश्वर और जीव बन गया है? तब वह पराभक्ति को प्राप्त भक्त कहा जाता है।जिस भक्ति के विषय में पूर्व श्लोक में केवल एक संकेत ही किया गया था? उसी को यहाँ क्रमबद्ध करके एक साधना का रूप दिया गया है? जिसके अभ्यास से उपर्युक्त ज्ञान प्रत्येक साधक का अपना निजी और घनिष्ट अनुभव बन सकता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.8।।ननु कथं तावकविभूतियोगज्ञानेनाविकम्पयोगप्राप्तिस्तवोपासनायास्तत्प्राप्तिसाधनत्वादित्याशङ्क्य विभूतियोगज्ञानमहिम्ना प्राप्त्या मदुपादनया मद्गतेनाविकम्पयोगेन युज्यते इत्याह -- अहमिति चतुर्भिः। अहं परमात्मा वासुदेवाभिधः सर्वस्य ब्रह्मादिस्थावरान्तस्य प्रभवः प्रभवत्यस्मादिति प्रभवः प्रकृतिरभिन्ननिमित्तोपादानं मत्त एव सर्वज्ञानत्सर्वेश्वरात्सर्वं स्थितिनाशक्रियाफलोपभोगलक्षणं जगत्प्रवर्तते इति मत्वा वासुदेवएव सर्वात्मा सर्वेश्वरः सर्वज्ञः सर्वोपादानं सर्वनियन्ता भजनीय इत श्रुत्वा मननेन निशित्य भजन्ते सेवन्ते। के ते इत्यत आह -- बुधा अवगतसंसारतत्त्वाः। संसारासारज्ञानवतामेव भगवद्भजनेऽधिकार इति भावः। भावो भावना अयमेव भगवान्वासुदेवः परमार्थतत्त्वं इत्यभिनिवेशस्तेन सम्यक् युक्ताः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.8।।यादृशेन विभूतियोगयोर्ज्ञानेनाविकम्पयोगप्राप्तिस्तद्दर्शयति चतुर्भिः -- अहं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यं सर्वस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिकारणमुपादानां निमित्तं च। स्थितिनाशादि च सर्वं मत्त एव प्रवर्तते भवति। मयैवान्तर्यामिणा सर्वज्ञेन सर्वशक्तिना प्रेर्यमाणं स्वस्वमर्यादामनतिक्रम्य सर्वं जगत्प्रवर्तते चेष्टत इति वा। इत्येवं मत्वा बुधा विवेकेनावगततत्त्वाभावेन परमार्थतत्त्वग्रहणरूपेण प्रेम्णा समन्विताः सन्तो मां भजन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.8।।उपासनास्वरूपमाह द्वाभ्याम् -- अहमिति। बुधा मां प्रत्यगात्मानमिति मत्वा भजन्ते। इति कथम्। अहमेव सर्वस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिः। मत्तो मदनुग्रहं प्राप्यैव सर्वं बुद्ध्यादिकं स्वस्वकार्याय प्रवर्तते। अहमेव,जगतः कर्तान्तर्यामी चेत्यहंग्रहेणात्मानमुपासीतेति भावः। भावसमन्विताः भावनायुक्ताः एतच्चोत्तरार्थम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.8।।एवं ज्ञानिनो भक्तियुक्तत्वं विशदयति -- अहमिति चतुर्भिः। अहं सर्वस्य जगतः प्रभव उत्पत्तिस्थानं? सर्वं जगत् मत्तःबुद्धिर्ज्ञानं [10।4] इत्यादिरीत्या भृग्वाद्युक्तधर्मादिरीत्या च प्रवर्तते? मत्क्रीडार्थकभावयुक्तं भवतीत्यर्थः। भावंसमन्विताः मत्सेवनैकप्रयत्नवन्तः सन्तो बुधाः पण्डिता विवेकिनः? इति अमुना प्रकारेण क्रीडात्मकतया प्रकटीभूतरूपं मां भजन्ते सेवन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.8।। यथा च विभूतियोगयोर्ज्ञानेन सम्यग्ज्ञानावाप्तिस्तद्दर्शयति -- अहमित्यादिचतुर्भिः। अहं सर्वस्य जगतः प्रभवो भृग्वादिरूपविभूतिद्वारेणोत्पत्तिहेतुः। मत्त एव चास्य सर्वस्यबुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः इत्यादि सर्वं प्रवर्तत इति? एवं मत्वाऽवबुध्य बुधा विवेकिनो भावसमन्विताः प्रीतियुक्ता मां भजन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.8 -- 10.10।।विभूतियोगज्ञानविपाकरूपभक्तिविवृद्धिं दर्शयति चतुर्भिः पुमर्थरूपैः अहमित्यादिभिः -- अहं सर्वस्य प्रभव इत्यादि। विश्वोत्पादकत्वप्रवर्त्तकत्वरूपस्वयोगविभूतिस्वरूपाविष्करणं इत्येवं मम योगं विभूतिं च भगवन्मार्गीयाचार्योपदेशद्वारा मयि भावो भक्तिस्तया समन्विता मां सेवन्ते बुधाः। एते च माहात्म्यज्ञानपूर्वकभक्तिमन्तो भगवत्सेवकाः स्वरूपतो निर्दिश्यन्ते भगवन्मार्गीया उद्धवादय इव। मच्चित्ता इति मदर्पितान्तःकरणाः। मद्गतप्राणा इति -- प्राणशब्द इन्द्रियप्राणवाचक इति मदर्पितेन्द्रियप्राणाः मयि सततं युक्ता देहेनेति? समर्पितदेहाः आत्मना वा भगवति सततं युक्ताः अयमेव ब्रह्मसम्बन्धः भगवते कृष्णाय दारागारपुत्राप्त -- इतिवाक्यात्आत्मना सह तत्तदीहापराणि देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणानि तद्धर्मांश्च समर्पयित्वा स्वयं दासभूता नित्यं भगवन्तं भजन्ते सेवामार्गप्रकारेण सेवन्ते? न पूजाडम्बरेणेति? सेवायां स्थितिस्तेषामुक्तासेवायां वा कथायां वा इति भक्तिवर्द्धिन्यां कथायां च स्थितिमाह -- परस्परं बोधयन्तः कथयन्तश्च मां इति। तदपि नित्यं? न तु नैमित्तिकम्। तथैव च तुष्यन्ति मनउत्सवादिषु च रमन्ति अनुकरणेन वा क्री़डन्ति तथाभूतानां तेषां प्रीतिपूर्वकं पुष्टिमर्यादानुकूलापरानुरक्तिरीश्वरे सर्वात्मना प्रीतिस्तत्पूर्वकं भजतां सेवतां -- अनेनचेतस्तत्प्रवणं सेवा इति मानसीस्वरूपमुक्तं -- तेषामेव बुद्धियोगं विपाकदशामापन्नं ददामि येन ते मां पुरुषोत्तमं उप समीप एव प्राप्ता भवन्ति। इत्थं तेषां निर्गुणमुक्तिर्भावितया सूचिता।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.8।।किस प्रकारके अविचल योगसे युक्त हो जाता है सो कहा जाता है --, मैं वासुदेव नामक परब्रह्म समस्त जगत्की उत्पत्तिका कारण हूँ? और मुझसे ही यह स्थिति? नाश? क्रिया और कर्मफलोपभोगरूप विकारमय सारा जगत् घुमाया जा रहा है। इस अभिप्रायको ( अच्छी प्रकार ) समझकर भावसमन्वित -- परमार्थतत्त्वकी धारणासे युक्त हुए? बुद्धिमान् -- तत्त्वज्ञानी पुरुष? मुझे भजते हैं अर्थात् मेरा चिन्तन किया करते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.8।। व्याख्या -- [पूर्व श्लोककी बात ही इस श्लोकमें कही गयी है। अहं सर्वस्य प्रभवः में सर्वस्य भगवान्की विभूति है अर्थात् देखने? सुनने? समझनेमें जो कुछ आ रहा है? वह सबकीसब भगवान्की विभूति ही है। मत्तः सर्वं प्रवर्तते में मत्तः भगवान्का योग (प्रभाव) है? जिससे सभी विभूतियाँ प्रकट होती हैं। सातवें? आठवें और नवें अध्यायमें जो कुछ कहा गया है? वह सबकासब इस श्लोकके पूर्वार्धमें आ गया है।]अहं सर्वस्य प्रभवः -- मानस? नादज? बिन्दुज? उद्भिज्ज? जरायुज? अण्डज? स्वेदज अर्थात् जडचेतन? स्थावरजङ्गम यावन्मात्र जितने प्राणी होते हैं? उन सबकी उत्पत्तिके मूलमें परमपिता परमेश्वरके रूपमें मैं ही हूँ (टिप्पणी प0 543)।यहाँ प्रभव का तात्पर्य है कि मैं सबका अभिन्ननिमित्तोपादानकारण हूँ अर्थात् स्वयं मैं ही सृष्टिरूपसे प्रकट हुआ हूँ।मत्तः सर्वं प्रवर्तते -- संसारमें उत्पत्ति? स्थिति? प्रलय? पालन? संरक्षण आदि जितनी भी चेष्टाएँ होती हैं? जितने भी कार्य होते हैं? वे सब मेरेसे ही होते हैं। मूलमें उनको सत्तास्फूर्ति आदि जो कुछ मिलता है? वह सब मेरेसे ही मिलता है। जैसे बिजलीकी शक्तिसे सब कार्य होते हैं? ऐसे ही संसारमें जितनी क्रियाएँ होती हैं? उन सबका मूल कारण मैं ही हूँ।अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते -- कहनेका तात्पर्य है कि साधककी दृष्टि प्राणिमात्रके भाव? आचरण? क्रिया आदिकी तरफ न जाकर उन सबके मूलमें स्थित भगवान्की तरफ ही जानी चाहिये। कार्य? कारण? भाव? क्रिया? वस्तु? पदार्थ? व्यक्ति आदिके मूलमें जो तत्त्व है? उसकी तरफ ही भक्तोंकी दृष्टि रहनी चाहिये।सातवें अध्यायके सातवें तथा बारहवें श्लोकमें और दसवें अध्यायके पाँचवें और इस (आठवें) श्लोकमें मत्तः पद बारबार कहनेका तात्पर्य है कि ये भाव? क्रिया? व्यक्ति आदि सब भगवान्से ही पैदा होते हैं? भगवान्में ही स्थित रहते हैं और भगवान्में ही लीन हो जाते हैं। अतः तत्त्वसे सब कुछ भगवत्स्वरूप ही है -- इस बातको जान लें अथवा मान लें? तो भगवान्के साथ अविकम्प (कभी विचलित न किया जानेवाला) योग अर्थात् सम्बन्ध हो जायगा।यहाँ सर्वस्य और सर्वम् -- दो बार सर्व पद देनेका तात्पर्य है कि भगवान्के सिवाय इस सृष्टिका न कोई उत्पादक है और न कोई संचालक है। इस सृष्टिके उत्पादक और संचालक केवल भगवान् ही हैं।इति मत्वा भावसमन्विताः -- भगवान्से ही सब संसारकी उत्पत्ति होती है और सारे संसारको सत्तास्फूर्ति भगवान्से ही मिलती है अर्थात् स्थूल? सूक्ष्म और कारणरूपसे सब कुछ भगवान् ही हैं -- ऐसा जो दृढ़तासे मान लेते हैं? वे भगवान् ही सर्वोपरि हैं भगवान्के समान कोई हुआ नहीं? है नहीं? होगा नहीं तथा होना सम्भव भी नहीं -- ऐसे सर्वोच्च भावसे युक्त हो जाते हैं। इस प्रकार जब उनकी महत्त्वबुद्धि केवल भगवान्में हो जाती है तो फिर उनका आकर्षण? श्रद्धा? विश्वास? प्रेम आदि सब भगवान्में ही हो जाते हैं। भगवान्का ही आश्रय लेनेसे उनमें समता? निर्विकारता? निःशोकता? निश्चिन्तता? निर्भयता आदि स्वतःस्वाभाविक ही आ जाते हैं। कारण कि जहाँ देव (परमात्मा) होते हैं? वहाँ दैवीसम्पत्ति स्वाभाविक ही आ जाती है।बुधाः -- भगवान्के सिवाय अन्यकी सत्ता ही न मानना? भगवान्को ही सबके मूलमें मानना? भगवान्का ही आश्रय लेकर उनमें ही श्रद्धाप्रेम करना -- यही उनकी बुद्धिमानी है। इसलिये उनको बुद्धिमान् कहा गया है। इसी बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायमें कहा है कि जो मेरेको क्षर(संसारमात्र) से अतीत और अक्षर(जीवात्मा) से उत्तम जानता है? वह सर्ववित् है और सर्वभावसे मेरा ही भजन करता है (15। 18 19)।माम् भजन्ते -- भगवान्के नामका जपकीर्तन करना? भगवान्के रूपका चिन्तनध्यान करना? भगवान्की कथा सुनना? भगवत्सम्बन्धी ग्रन्थों(गीता? रामायण? भागवत आदि) का पठनपाठन करना -- ये सबकेसब भजन हैं। परन्तु असली भजन तो वह है? जिसमें हृदय भगवान्की तरफ ही खिंच जाता है? केवल भगवान् ही प्यारे लगते हैं? भगवान्की विस्मृति चुभती है? बुरी लगती है। इस प्रकार भगवान्में तल्लीन होना ही असली भजन है।विशेष बातसबके मूलमें परमात्मा है और परमात्मासे ही वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? घटना आदि सबको सत्तास्फूर्ति मिलती है -- ऐसा ज्ञान होना परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले सभी साधकोंके लिये बहुत आवश्यक है। कारण कि जब सबके मूलमें परमात्मा ही है? तब साधकका लक्ष्य भी परमात्माकी तरफ ही होना चाहिये। उस परमात्माकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही सम्पूर्ण विभूतियों और योगके ज्ञानका तात्पर्य है। यही बात गीतामें जगहजगह बतायी गयी है जैसे -- जिससे सम्पूर्ण प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है और जिससे सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? उस परमात्माका अपने कर्तव्यकर्मोंके द्वारा पूजन करना चाहिये (18। 46) जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें विराजमान है और जो सब प्राणियोंको प्रेरणा देता है? उस परमात्माकी सर्वभावसे शरण जाना चाहिये (18। 61 62) इत्यादि। कर्मयोग? ज्ञानयोग और भक्तियोग -- ये साधन तो अपनीअपनी रुचिके अनुसार भिन्नभिन्न हो सकते हैं? पर उपर्युक्त ज्ञान सभी साधकोंके लिये बहुत ही आवश्यक है। सम्बन्ध -- अब आगेके श्लोकमें उन भक्तोंका भजन किस रीतिसे होता है -- यह बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.6 -- 10.11।।महर्षय इत्यादि भास्वता इत्यन्तम्। परस्परबोधनया अन्योन्यबोधस्फारसंक्रमणात् सर्व एव हि प्रमातारः एक ईश्वर इति विततव्याप्त्या (S??N वितत्य व्याप्त्या) सुखेनैव सर्वशक्तिकसर्वगतस्वात्मरूपताधिगमेन (S -- ताधिशयनेन अधिगमेन) माहेश्वर्यमेषामिति भावः (After इति भावः ?N add तेषां सततयुक्तानाम् इत्यतः प्रभृति अध्यायान्ता टीका उट्टङ्किता युगपद्धि वेद्या। तेषामेव अनु च अर्जुनप्रश्नपद्यानि षट् उल्लिखति। श्रीभगवान् अथवा बहुना इति पर्यन्तानि पद्यानि 23,वक्ति।। These sentences are obviously of some copyist. It is to be noted however that the Mss. generally contain seven (not six) verses of Arjuna and then 24 (not 23) verses of the hagavan) ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.8।।कथं तावकविभूत्यैश्वर्यज्ञानमुक्तयोगस्य हेतुरिति मत्वा पृच्छति -- कीदृशेनेति। उक्तज्ञानमाहात्म्यात्प्रतिष्ठिता भगवन्निष्ठा सिद्ध्यतीत्याह -- उच्यत इति। प्रभवत्यस्मादिति प्रभवः सर्वप्रकृतिः सर्वात्मेत्याह -- उत्पत्तिरिति। सर्वज्ञात्सर्वेश्वरान्मत्तो निमित्तात्सस्थितिनाशादि भवति मया चान्तर्यामिणा प्रेर्यमाणं सर्वं यथास्वं मर्यादामनतिक्रम्य चेष्टते तदाह -- मत्त इति। इत्थं मम सर्वात्मत्वं सर्वप्रकृतित्वं सर्वेश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं च महिमानं ज्ञात्वा मय्येव निष्ठावन्तो भवन्तीत्याह -- इत्येवमिति। संसारासारताज्ञानवतां भगवद्भजनेऽधिकारं द्योतयति -- अवगतेति। परमार्थतत्त्वे पूर्वोक्तरीत्या ज्ञाते प्रेमादरावभिनिवेशाख्यौ भवतस्तेन संयुक्तत्वं च भगवद्भजने भवति हेतुरित्याह -- भावेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.8 -- 10.10।।ननुएतां विभूतिम् [10।7] इति परिज्ञातुः फलमुक्तं तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यतस्तात्पर्यान्तरमाह -- सन्ति चेति। उक्तफले विश्वासजननार्थमिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.8 -- 10.10।।सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह -- अहमित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.8।।अहं सर्वस्य विचित्रचिदचित्प्रपञ्चस्य प्रभवः उत्पत्तिकारणम् सर्वं मत्त एव प्रवर्तते इति इदं मम स्वाभाविकं निरङ्कुशैश्वर्यं सौशील्यसौन्दर्यवात्सल्यादिकल्याणगुणगणयोगं च मत्वा बुधाः ज्ञानिनो भावसमन्विताः मां सर्वकल्याणगुणान्वितं भजन्ते। भावो मनोवृत्तिविशेषः? मयि स्पृहयालवो मां भजन्त इत्यर्थः।कथम् --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.8।। --,अहं परं ब्रह्म वासुदेवाख्यं सर्वस्य जगतः प्रभवः उत्पत्तिः। मत्तः एव स्थितिनाशक्रियाफलोपभोगलक्षणं विक्रियारूपं सर्वं जगत् प्रवर्तते। इति एवं मत्वा भजन्ते सेवन्ते मां बुधाः अवगतपरमार्थतत्त्वाः? भावसमन्विताः भावः भावना परमार्थतत्त्वाभिनिवेशः तेन समन्विताः संयुक्ताः इत्यर्थः।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 10.9 】
▸ Sanskrit Sloka: मच्चित्ता
Chapter 10 (Part 5)
मद्गतप्राणा बोधयन्त: परस्परम् | कथयन्तश्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च ||
▸ Transliteration: maccittā madgataprāṇā bodhayantaḥ parasparam | kathayantaśca māṁ nityaṁ tuṣyanti ca ramanti ca ||
▸ Glossary: maccittā: with mind engaged in Me; madgataprāṇā: lives absorbed in Me; bodhayantaḥ: enlightening; parasparam: one another; kathayantaḥ: talkin about My glories; ca: and; māṁ: about Me; nityaṁ: always; tuṣyanti: satisfied; ca: and; ramanti: enjoy bliss; ca: and
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.9 With mind and lives absorbed on Me, always enlightening one another and talking about My glories, the wise are content and blissful.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.9।।।(टिप्पणी प0 544) मेरेमें चित्तवाले? मेरेमें प्राणोंको अर्पण करनेवाले भक्तजन आपसमें मेरे गुण? प्रभाव आदिको जानते हुए और उनका कथन करते हुए ही नित्यनिरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं और मेरेमें प्रेम करते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.9।। मुझमें ही चित्त को स्थिर करने वाले और मुझमें ही प्राणों (इन्द्रियों) को अर्पित करने वाले भक्तजन? सदैव परस्पर मेरा बोध कराते हुए? मेरे ही विषय में कथन करते हुए सन्तुष्ट होते हैं और रमते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.9 मच्चित्ताः with their minds wholly in Me? मद्गतप्राणाः with their life absorbed in Me? बोधयन्तः,enlightening? परस्परम् mutually? कथयन्तः speaking of? च and? माम् Me? नित्यम् always? तुष्यन्ति are satisfied? च and? रमन्ति (they) are delighted? च and.Commentary The characteristics of a devotee who has attained the realisation of oneness are described in this verse. The devotee constantly thinks of the Lord. His very life is absorbed in Him. He has consecrated his whole life to the Lord. According to another interpretation? all his senses (which function because of the Prana)? such as the eye are absorbed in Him. He takes immense delight in talking about Him? about His supreme wisdom? power? might and other attributes. He has completely dedicated himself to the Lord.He feels intense satisfaction and is delighted as if he is in the company of his Beloved (God). The Purana says? The sum total of the sensual pleasures of this world and also all the great pleasures of the divine regions (heavens) are not worth a sixteenth part of that bliss which proceeds from the eradication of desires and cravings. (Cf.XII.8)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.9. Having their mind fixed on Me, their life gone into Me, enlightening each other, and constantly talking of Me, they are pleased and are delighted.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.9 With minds concentrated on Me, with lives absorbed in Me, and enlightening each other, they ever feel content and happy.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.9 With their minds focussed on Me, with their Pranas centred in Me, inspiring one another and always speaking of Me, they live in contentment and bliss at all times.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.9 With minds fixed on Me, with lives dedicated to Me, enlightening each other, and always speaking of Me, they derive satisfaction and rejoice.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.9 With their mind and their life wholly absorbed in Me, enlightening each other and ever speaking of Me, they are satisfied and delighted.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.9 See Comment under 10.11
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.9 They live with their minds 'focussed' on Me, namely, with their minds fixed on Me; with their 'Pranas', i.e., life, centred on Me - the meaning is that they are unable to sustain themselves without Me. They 'inspire one another' by speaking about My attributes which have been experienced by them and narrating My divine and adorable deeds. They live in contentment and bliss at all times. The speakers are delighted by their own speech, because it is spontaneous, without any ulterior motive; the listeners too feel the speech to be unsurpassingly and incomparably dear to them. They thus live in bliss.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.9 Maccittah, with minds fixed on Me; mad-gata-pranah, with lives (pranas) dedicated to Me, or having their organs, eyes etc. absorbed in Me, i.e. having their organs withdrawn into Me; bodhayantah, enlightening; parasparam, each other; and nityam, always; kathayantah, speaking of; mam, Me, as possessed of alities like knowledge, strength, valour, etc; tusyanti, they derive satisfaction; and ramanti, rejoice, get happiness, as by coming in contact with a dear one.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.9।। जब मन सुगठित और एकाग्र होता है? तभी साधक उस मन के द्वारा परमात्मा का ध्यान सफलतापूर्वक कर सकता है। ध्येय से भिन्न विषय का विचार उठने पर यह एकाग्रता भंग हो जाती है। विद्युत् के सभी उपकरणों में विद्युत् शक्ति देखने? अथवा मिट्टी से बने घटों में मिट्टी को पहचानने में हमें कोई कठिनाई उत्पन्न नहीं होती अथवा कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता? क्योंकि उनका हमें दृढ़ ज्ञान होता है। इसी प्रकार? एक बार निश्चयात्मक रूप से यह जान लेने पर कि ईश्वर और जीव का वास्तविक स्वरूप एक चैतन्य आत्मा ही है? मन में किसी भी प्रकार की वृत्ति उठने पर भी सत्य के साधक को इस आत्मा का भान बनाये रखने में कोई कठिनाई नहीं होती। इस्ा आशय को यहाँ मच्चिता इस शब्द से स्पष्ट किया गया है।समस्त प्राणों अर्थात् इन्द्रियों को मुझमें अर्पित करके (मद्गतप्राणा) प्राण शब्द से केवल प्राणवायु से ही तात्पर्य नहीं समझना चाहिए। प्राणियों के शरीर में होने वाली पाचनादि क्रियाओं को प्राण शब्द से दर्शाया जाता है। किन्तु यहाँ इस शब्द का प्रयोग मुख्यत पाँच ज्ञानेन्द्रियों को सूचित करने के लिए किया गया है। ये इन्द्रियाँ ही वे पाँच द्वार या वातायन हैं? जिनके द्वारा मन बाह्य विषयों में विचरण करता है और इनके माध्यम से ही जगत् के विषय मन में प्रवेश करते हैं। वेदान्त कभी भी इन विषयों से पलायन का उपदेश नहीं देता। इस जगत् में जीते हुए विषयों से पलायन कदापि सम्भव नहीं हो सकता। ज्ञानमार्ग विवेकपूर्ण विचार का मार्ग है। इसमें विवेक के द्वारा मन को इस प्रकार संयमित और प्रशिक्षित किया जाता है कि जब कभीभी बाह्य विषय मन पर अपना प्रभाव डालते हैं? तत्काल ही साधक को अपने उस आत्मस्वरूप का स्मरण हो जाता है? जिसके बिना वे विषय कभी प्रकाशित नहीं हो सकते थे।परस्पर चर्चा करते हुए किसी एक विषय में समान बौद्धिक रुचि के विद्यार्थीगण जब आपस में उस विषय की चर्चा करते हैं? तब न केवल वे अपने ज्ञान को स्पष्टत व्यक्त करते हैं? वरन् इस प्रक्रिया में उनका ज्ञान दृ88ढ़ निश्चयात्मक रूप भी ले लेता है जो प्रारम्भ में केवल पुस्तकीय ज्ञान ही था। परिसंवाद की इस सर्वविदित पद्धति का वेदान्त में अथक रूप से अनुमोदन एवं उपदेश दिया गया है। वेदान्त में इसका नाम है ब्रह्माभ्यास जो साधना का एक महत्त्वपूर्ण अंग है।अध्यात्म का सच्चा साधक वही है? जो अपने मन और इन्द्रियों की सभी प्रकार की क्रियाओं में आत्मा का स्मरण बनाये रखता है। इसका एक उपाय है आत्म विषय में अन्य साधकजनों के साथ चर्चा एवं निदिध्यासन। ऐसे साधक साधना के फलस्वरूप उस परम आनन्द को प्राप्त करते हैं? जो उनके जीवन रथ के चक्रों के लिए पथरीले मार्ग पर सरलता से अग्रसर होने के लिए चिकने तेल का काम करता है और यात्रा को सुगम बना देता है। तुष्यन्ति और रमन्ति के भाव को ही उपनिषदों में सुन्दर प्रकार से क्रीडन्ति और रमन्ति शब्दों के द्वारा इंगित किया गया है।भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ आश्वासन देते हैं कि पूर्णत्व का साधक जब विचार मार्ग पर अग्रसर होता है तब उसी समय उसे सन्तोष और रमण का अनुभव होता है। सन्तोष और आनन्द से मन में ऐसा सुन्दर वातावरण निर्मित होता है? जो आध्यात्मिक प्रगति के लिए अत्यन्त अनुकूल बनकर साधक की सफलता निश्चित कर देता है। सदैव असन्तुष्ट? शोक मनाने वाले मानसिक स्तब्धता और बौद्धिक दरिद्रता का चित्र प्रस्तुत करने वाले साधक कदापि अपने इस परम आनन्दस्वरूप में प्रवेश नहीं कर सकते हैं।प्रगति की इस सीमा तक पहुँचने पर साधकों को कहाँ से मार्गदर्शन और बल मिलता है जिससे वे अपनी यात्रा के लक्ष्य तक पहुँचते हैं इसका उत्तर है --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.9।।किं चैवं भजन्तीत्याह -- मच्चित्ता मयि वासुदेवे चित्तं येषां ते मा गताः प्राप्ताः प्राणाश्र्चक्षुरादयो येषां ते मय्युपसंहृतसर्वकरणाः? सद्गतजीवना इति वा। आचार्यात् श्रुत्वा वादकथया समानेषु परस्परं बोधयन्तः मां ज्ञानबलादियुक्तं शिष्येभ्यः कथयन्तः मद्भजनेनैव तुष्यन्ति संतोषमुपयान्ति तेनैव च रमन्ति रतिं प्राप्नुवन्ति न स्त्र्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.9।।प्रेमपूर्वकं भजनमेव विवृणोति -- मयि भगवति चित्तं येषां ते मच्चित्ताः। तथा मद्गता मां प्राप्ताः प्राणाश्चक्षुरादयो येषां ते मद्गतप्राणाः? मद्भजननिमित्तचक्षुरादिव्यापारा मय्युपसंहृतसर्वकरणा वा। अथवा मद्गतप्राणा मद्भजनार्थजीवनाः। मद्भजनातिरिक्तप्रयोजनशून्यजीवना इति यावत्। विद्वद्गोष्ठीषु परस्परमन्योन्यं श्रुतिभिर्युक्तिभिश्च मामेव बोधयन्तः तत्त्वबुभुत्सुकथया ज्ञापयन्तः। तथा स्वशिष्येभ्यश्च मामेव कथयन्त उपदिशन्तश्च। मयि चित्तार्पणं तथा बाह्यकरणार्पणं तथा जीवनार्पणमेवं समानामन्योन्यं मद्बोधनं स्वन्यूनेभ्यश्च मदुपदेशनमित्येवंरूपं यन्मद्भजनं तेनैव तुष्यन्ति च। एतावतैव लब्धसर्वार्था वयमलमन्येन लब्धव्येनेत्येवंप्रत्ययरूपं संतोषं प्राप्नुवन्ति च। तेन संतोषेण रमन्ति च रमन्ते च। प्रियसङ्गमेनेवोत्तमं सुखमनुभवन्ति च। तदुक्तं पतञ्जलिनासंतोषादनुत्तमः सुखलाभः इति। उक्तंच पुराणेयच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्। तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम् इति। तृष्णाक्षयः संतोषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.9।।एवं ध्याने भावनाप्रकारमुक्त्वा व्युत्थाने तमाह -- मच्चित्ता इति। अहमेव चित्ते येषां ते मच्चित्ताः। तथाहमेव गतो विद्यमानो येषु ते मद्गतास्तथाविधाः प्राणा इन्द्रियाणि येषां ते मद्गतप्राणाः। चित्तेनेन्द्रियैर्वा यद्गृह्यते तत्सर्वं प्रत्यगात्मा वासुदेव इति भावयन्त इत्यर्थः। इममेवार्थं परस्परं बोधयन्तः श्रुतियुक्तिप्रदर्शनेन समानानां समुदायं ज्ञापयन्तः। कथयन्तश्च शिष्यान्प्रति। तुष्यन्ति तेनैव ज्ञानेन न तु मिष्टान्नादिना। रमन्ति च तत्रैव नतु स्त्र्यादावित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.9।।भजने प्रकारमाह -- मच्चित्ता इति। मय्येव चित्तं येषां ते मच्चिन्तनपराः लीलावस्थमत्स्वरूपविचारणपराः। मद्गतप्राणाः मय्येव गताः प्राप्ताः प्राणा येषां ते? मद्दुःखदुःखिता मत्सुखसुखिता इत्यर्थः। तादृशाः सन्तः परस्परं तादृशानेव मामेतादृशं स्वानुभवप्रमाणादिभिर्बोधयन्तस्तदनुकथयन्तः कीर्तनरीत्या कीर्तयन्तः। चकारेणाऽन्यकीर्त्तनं श्रृण्वन्तः। च पुनः। तद्भाने सति तुष्यन्ति ज्ञानेन वा रमन्ते च। स्वयं कीर्त्तनेनानन्दयुक्ता भवन्ति रमन्ते वा। तोषमानन्दं च प्राप्नुवन्तीति भावः। यद्वा मां विप्रयोगादिलीलावस्थासु नित्यं कथयन्तः सततं परस्परं बोधयन्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.9।। प्रीतिपूर्वकं भजनमेवाह -- मच्चित्ता इति। मय्येव चित्तं येषां ते मच्चित्ताः। मामेव गताः प्राप्ताः प्राणा इन्द्रियाणि येषां ते मद्गतप्राणाः मदर्पितजीवना इति वा। एवंभूतास्ते बुधाः अन्योन्यं मां न्यायोपेतैः श्रुत्यादिप्रमाणैर्बोधयन्तः? बुद्ध्या च मां कथयन्तः संकीर्तयन्तः सन्तो नित्यं तुष्यन्त्यनुमोदनेन तुष्टिं यान्ति। रमन्ति च निर्वृत्तिं यान्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.8 -- 10.10।।विभूतियोगज्ञानविपाकरूपभक्तिविवृद्धिं दर्शयति चतुर्भिः पुमर्थरूपैः अहमित्यादिभिः -- अहं सर्वस्य प्रभव इत्यादि। विश्वोत्पादकत्वप्रवर्त्तकत्वरूपस्वयोगविभूतिस्वरूपाविष्करणं इत्येवं मम योगं विभूतिं च भगवन्मार्गीयाचार्योपदेशद्वारा मयि भावो भक्तिस्तया समन्विता मां सेवन्ते बुधाः। एते च माहात्म्यज्ञानपूर्वकभक्तिमन्तो भगवत्सेवकाः स्वरूपतो निर्दिश्यन्ते भगवन्मार्गीया उद्धवादय इव। मच्चित्ता इति मदर्पितान्तःकरणाः। मद्गतप्राणा इति -- प्राणशब्द इन्द्रियप्राणवाचक इति मदर्पितेन्द्रियप्राणाः मयि सततं युक्ता देहेनेति? समर्पितदेहाः आत्मना वा भगवति सततं युक्ताः अयमेव ब्रह्मसम्बन्धः भगवते कृष्णाय दारागारपुत्राप्त -- इतिवाक्यात्आत्मना सह तत्तदीहापराणि देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणानि तद्धर्मांश्च समर्पयित्वा स्वयं दासभूता नित्यं भगवन्तं भजन्ते सेवामार्गप्रकारेण सेवन्ते? न पूजाडम्बरेणेति? सेवायां स्थितिस्तेषामुक्तासेवायां वा कथायां वा इति भक्तिवर्द्धिन्यां कथायां च स्थितिमाह -- परस्परं बोधयन्तः कथयन्तश्च मां इति। तदपि नित्यं? न तु नैमित्तिकम्। तथैव च तुष्यन्ति मनउत्सवादिषु च रमन्ति अनुकरणेन वा क्री़डन्ति तथाभूतानां तेषां प्रीतिपूर्वकं पुष्टिमर्यादानुकूलापरानुरक्तिरीश्वरे सर्वात्मना प्रीतिस्तत्पूर्वकं भजतां सेवतां -- अनेनचेतस्तत्प्रवणं सेवा इति मानसीस्वरूपमुक्तं -- तेषामेव बुद्धियोगं विपाकदशामापन्नं ददामि येन ते मां पुरुषोत्तमं उप समीप एव प्राप्ता भवन्ति। इत्थं तेषां निर्गुणमुक्तिर्भावितया सूचिता।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.9।।तथा --, मुझमें ही जिनका चित्त है वे मच्चित्त हैं तथा मुझमें ही जिनके चक्षु आदि इन्द्रियरूप प्राण लगे रहते हैं -- मुझमें ही जिन्होंने समस्त करणोंका उपसंहार कर दिया है वे मद्गतप्राण हैं अथवा जिन्होंने मेरे लिये ही अपना जीवन अर्पण कर दिया है वे मद्गतप्राण हैं। ऐसे मेरे भक्त आपसमें एक दूसरेको ( मेरा तत्त्व ) समझाते हुए एवं ज्ञान? बल और सामर्थ्य आदि गुणोंसे युक्त मुझ परमेश्वरके स्वरूपका वर्णन करते हुए सदा संतुष्ट रहते हैं अर्थात् संतोषको प्राप्त होते हैं और रमण करते हैं अर्थात् मानो कोई अपना अत्यन्त प्यारा मिल गया हो उसी तरह रतिको प्राप्त होते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.9।। व्याख्या -- [भगवान्से ही सब उत्पन्न हुए हैं और भगवान्से ही सबकी चेष्टा हो रही है अर्थात् सबके मूलमें परमात्मा है -- यह बात जिनको दृढ़तासे और निःसन्देहपूर्वक जँच गयी है? उनके लिये कुछ भी करना? जानना और पाना बाकी नहीं रहता। बस? उनका एक ही काम रहता है -- सब प्रकारसे भगवान्में ही लगे रहना। यही बात इस श्लोकमें बतायी गयी है।]मच्चिताः -- वे मेरेमें चित्तवाले हैं। एक स्वयंका भगवान्में लगना होता है और एक चित्तको भगवान्में लगाना होता है। जहाँ मैं भगवान्का हूँ ऐसे स्वयं भगवान्में लग जाता है? वहाँ चित्त? बुद्धि आदि सब स्वतः भगवान्में लग जाते हैं। कारण कि कर्ता(स्वयं) के लगनेपर करण (मन? बुद्धि आदि) अलग थोड़े ही रहेंगे वे भी लग जायँगे। करणोंके लगनेपर तो कर्ता अलग रह सकता है? पर कर्ताके लगनेपर करण अलग नहीं रह सकते। जहाँ कर्ता रहेगा? वहीं करण भी रहेंगे। कारण कि करण कर्ताके ही अधीन होते हैं। कर्ता स्वयं जहाँ लगता है? करण भी वहीँ लगते हैं। जैसे? कोई मनुष्य परमात्मप्राप्तिके लिये सच्चे हृदयसे साधक बन जाता है? तो साधनमें उसका मन स्वतः लगता है। उसका मन साधनके सिवाय अन्य किसी कार्यमें नहीं लगता और जिस कार्यमें लगता है? वह कार्य भगवान्का ही होता है। कारण कि स्वयं कर्ताके विपरीत मनबुद्धि आदि नहीं चलते। परन्तु जहाँ स्वयं भगवान्में नहीं लगता? प्रत्युत मैं तो संसारी हूँ? मैं तो गृहस्थ हूँ -- इस प्रकार स्वयंको संसारमें लगाकर चित्तको भगवान्में लगाना चाहता है? उसका चित्त भगवान्में निरन्तर नहीं लगता। तात्पर्य है कि स्वयं तो संसारी बना रहे और चित्तको भगवान्में लगाना चाहे? तो भगवान्में चित्त लगना असम्भवसा है।दूसरी बात? चित्त वहीं लगता है? जहाँ प्रियता होती है। प्रियता वहीं होती है? जहाँ अपनापन होता है? आत्मीयता होती है। अपनापन होता है -- भगवान्के साथ स्वयंका सम्बन्ध जोड़नेसे। मैं केवल भगवान्का हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं? शरीरसंसार मेरा नहीं है। मेरेपर प्रभुका पूरा अधिकार है? इसलिये वे मेरे प्रति चाहे जैसा बर्ताव या विधान कर सकते हैं। परन्तु मेरा प्रभुपर कोई अधिकार नहीं है अर्थात् वे मेरे हैं तो मैं जैसा चाहूँ? वे वैसा ही करें -- ऐसा कोई अधिकार नहीं है -- इस प्रकार जो स्वयंको भगवान्का मान लेता है? अपनेआपको भगवान्के अर्पित कर देता है? उसका चित्त स्वतः भगवान्में लग जाता है। ऐसे भक्तोंको ही यहाँ मच्चित्ताः कहा गया है।यहाँ मच्चित्ताः पदमें चित्तके अन्तर्गत ही मन है अर्थात् मनोवृत्ति अलग नहीं है। गीतामें चित्त और मनको एक भी कहा है और अलगअलग भी जैसे भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च (7। 4) -- यहाँ मनके अन्तर्गत ही चित्त है और मनः संयम्य मच्चितः (6। 14) -- यहाँ मन और चित्त अलगअलग हैं। परन्तु इस श्लोकमें आये मच्चित्ताः पदमें मन और चित्त एक ही हैं? दो नहीं।मद्गतप्राणाः -- उनके प्राण मेरे ही अर्पण हो गये हैं। प्राणोंमें दो बाते हैं -- जीना और चेष्टा। उन भक्तोंका जीना भी भगवान्के ही लिये है और शरीरकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ (क्रियाएँ) भी भगवान्के लिये ही हैं। शरीरकी जितनी क्रियाएँ होती हैं? उनमें प्राणोंकी ही मुख्यता होती है। अतः उन भक्तोंकी यज्ञ? अनुष्ठान आदि शास्त्रीय भजनध्यान? कथाकीर्तन आदि भगवत्सम्बन्धी खानापीना आदि शारीरिक खेती? व्यापार आदि जीविकासम्बन्धी सेवा आदि सामाजिक आदिआदि जितनी क्रियाएँ होती हैं? वे सब भगवान्के लिये ही होती हैं। उनकी क्रियाओँमें क्रियाभेद तो होता है? पर उद्देश्यभेद नहीं होता। उनकी मात्र क्रियाएँ एक भगवान्के उद्देश्यसे ही होती हैं। इसलिये वे भगवद्गतप्राण होते हैं।जैसे गोपिकाओंने गोपीगीत में भगवान्से कहा है कि हमने अपने प्राणोंको आपमें अर्पण कर दिया है -- त्वयि धृतासवः (श्रीमद्भा0 10। 31। 1)? ऐसे ही भक्तोंके प्राण केवल भगवान्में रहते हैं। उनका जितना भगवान्से अपनापन है? उतना अपने प्राणोंसे नहीं। हरेक प्राणीमें किसी भी अवस्थामें मेरे प्राण न छूटें इस तरह जीनेकी इच्छा रहती है। यह प्राणोंका मोह है? स्नेह है। परन्तु भगवान्के भक्तोंका प्राणोंमें मोह नहीं रहता। उनमें हम जीते रहें यह इच्छा नहीं होती और मरनेका भय भी नहीं होता। उनको न जीनेसे मतलब रहता है और न मरनेसे। उनको तो केवल भगवान्से मतलब रहता है। कारण कि वे इस बातको अच्छी तरहसे जान जाते हैं कि मरनेसे तो प्राणोंका वियोग होता है? भगवान्से तो कभी वियोग होता ही नहीं। प्राणोंके साथ हमारा सम्बन्ध नहीं है? पर भगवान्के साथ हमारा स्वतःसिद्ध घनिष्ठ सम्बन्ध है। प्राण प्रकृतिके कार्य हैं और हम स्वयं भगवान्के अंश हैं।ऐसे मद्गतप्राणाः होनेके लिये साधकको सबसे पहले यह उद्देश्य बनाना चाहिये कि हमें तो भगवत्प्राप्ति ही करनी है। सांसारिक चीजें प्राप्त हों या न हों? हम स्वस्थ रहें या बीमार? हमारा आदर हो या निरादर? हमें सुख मिले या दुःख -- इनसे हमारा कोई मतलब नहीं है। हमारा मतलब तो केवल भगवान्से है। ऐसा दृढ़ उद्देश्य बननेपर साधक भगवद्गतप्राण हो जायगा।बोधयन्तः परस्परम् -- उन भक्तोंको भगवद्भाववाले? भगवद्रुचिवाले मिल जाते हैं तो उनके बीच भगवान्की बात छिड़ जाती है। फिर वे आपसमें एकदूसरेको भगवान्के तत्त्व? रहस्य? गुण? प्रभाव आदि जनाते हैं तो एक विलक्षण सत्सङ्ग होता है (टिप्पणी प0 546.1)। जब वे आपसमें भावपूर्वक बातें करते हैं? तब उनके भीतर भगवत्सम्बन्धी विलक्षणविलक्षण बातें स्वतः आने लगती हैं। जैसे दीपकके नीचे अँधेरा रहता है? पर दो दीपक एकदूसरेके सामने रख दें तो दोनों दीपकोंके नीचेका अँधेरा दूर हो जाता है। ऐसे ही जब दो भगवद्भक्त एक साथ मिलते हैं और आपसमें भगवत्सम्बन्धी बातें चल पड़ती हैं? तब किसीके मनमें किसी,तरहका भगवत्सम्बन्धी विलक्षण पैदा होता है तो वह उसे प्रकट कर देता है तथा दूसरेके मनमें और तरहका भाव पैदा होता है तो वह भी उसे प्रकट कर देता है। इस प्रकार आदानप्रदान होनेसे उनमें नयेनये भाव प्रकट होते रहते हैं। परन्तु अकेलेमें भगवान्का चिन्तन करनेसे उतने भाव प्रकट नहीं होते। अगर भाव प्रकट हो भी जायँ तो अकेले अपने पास ही रहते हैं? उनका आदानप्रदान नहीं होता।कथयन्तश्च माम् -- उनको भगवान्की कथालीला सुननेवाला कोई भगवद्भक्त मिल जाता है? तो वे भगवान्की कथालीला कहना शुरू कर देते हैं। जैसे सनकादि चारों भगवान्की कथा कहते हैं और सुनते हैं। उनमें कोई एक वक्ता बन जाता है और तीन श्रोता बन जाते हैं। ऐसे ही भगवान्के प्रेमी भक्तोंको कोई सुननेवाला मिल जाता है तो वे उसको भगवान्की कथा? गुण? प्रभाव? रहस्य आदि सुनाते हैं और कोई सुनानेवाला मिल जाता है तो स्वयं सुनने लग जाते हैं। परन्तु उनमें सुनाते समय वक्ता बननेका अभिमान नहीं होता और सुनते समय श्रोता बननेकी लज्जा नहीं होती।नित्यं तुष्यन्ति च -- इस तरह भगवान्की कथा? लीला? गुण? प्रभाव? रहस्य आदिको आपसमें एकदूसरेको जनाते हुए और उनका ही कथन तथा चिन्तन करते हुए वे भक्त नित्यनिरन्तर सन्तुष्ट रहते हैं। तात्पर्य है कि उनकी सन्तुष्टिका कारण भगवान्के सिवाय दूसरा कोई नहीं रहता? केवल भगवान् ही रहते हैं।रमन्ति च -- वे भगवान्में ही रमण अर्थात् प्रेम करते हैं। इस प्रेममें उनमें और भगवान्में भेद नहीं रहता -- तस्मिंस्तज्जने भेदाभावात् (नारदभक्तिसूत्र 41)। कभी भक्त भगवान्का भक्त हो जाता है? तो कभी भगवान् अपने भक्तके भक्त बन जाते हैं (टिप्पणी प0 546.2)। इस तरह भगवान् और भक्तमें परस्पर प्रेमकी लीला अनन्तकालतक चलती ही रहती है? और प्रेम प्रतिक्षण बढ़ता ही रहता है।इस वर्णनसे साधकको इस बातकी तरफ ध्यान देना चाहिये कि उसकी हरेक क्रिया? भाव आदिका प्रवाह केवल भगवान्की तरफ ही हो। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भक्तोंके द्वारा होनेवाले भजनका प्रकार बताकर अब आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् उनपर विशेष कृपा करनेकी बात बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.6 -- 10.11।।महर्षय इत्यादि भास्वता इत्यन्तम्। परस्परबोधनया अन्योन्यबोधस्फारसंक्रमणात् सर्व एव हि प्रमातारः एक ईश्वर इति विततव्याप्त्या (S??N वितत्य व्याप्त्या) सुखेनैव सर्वशक्तिकसर्वगतस्वात्मरूपताधिगमेन (S -- ताधिशयनेन अधिगमेन) माहेश्वर्यमेषामिति भावः (After इति भावः ?N add तेषां सततयुक्तानाम् इत्यतः प्रभृति अध्यायान्ता टीका उट्टङ्किता युगपद्धि वेद्या। तेषामेव अनु च अर्जुनप्रश्नपद्यानि षट् उल्लिखति। श्रीभगवान् अथवा बहुना इति पर्यन्तानि पद्यानि 23,वक्ति।। These sentences are obviously of some copyist. It is to be noted however that the Mss. generally contain seven (not six) verses of Arjuna and then 24 (not 23) verses of the hagavan) ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.9।।न केवमुक्तमेव भगवद्भजने साधनां साधनान्तरं चास्तीत्याह -- किञ्चेति। ईश्वरात्प्रतीचः प्रागुक्तादन्यत्र चित्तप्रचारराहित्यं भगवद्भजनोपायमाह -- मयीति। चक्षुरादीनां भगवत्यप्राप्तिस्तदगोचरत्वात्तस्येत्याशङ्क्याह -- मय्युपसंहृतेति। भगवदतिरेकेण जीवनेऽपि नादरस्तदपि मय्येवार्पितं भक्तानामित्याह -- अथवेति। आचार्येभ्यः श्रुत्वा वादकथया परस्परं भगवन्तं सब्रह्मचारिणो बोधयन्ति तदपि भगवद्भजनसाधनमित्याह -- बोधयन्त इति। आगमोपपत्तिभ्यां भगवन्तमेव विशिष्टधर्माणं शिष्येभ्यो गुरवो व्यपदिशन्ति तदपि भगवद्भजनमेवेत्याह -- कथयन्त इति। भक्तानां तुष्टिरती स्वरसतः स्यातामित्याह -- तुष्यन्तीति। मनोरथपूर्त्या रतिप्राप्तौ कामुकसंमतमुदाहरणमाह -- प्रियेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.8 -- 10.10।।ननुएतां विभूतिम् [10।7] इति परिज्ञातुः फलमुक्तं तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यतस्तात्पर्यान्तरमाह -- सन्ति चेति। उक्तफले विश्वासजननार्थमिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.8 -- 10.10।।सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह -- अहमित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.9।।मच्चित्ताः मयि निविष्टमनसः? मद्गतप्राणाः मद्गतजीविताः मया विना आत्मधारणम् अलभमाना इत्यर्थः। स्वैः स्वैः अनुभूतान् मदीयान् गुणान् परस्परं बोधयन्तः? मदीयानि दिव्यानि रमणीयानि कर्माणि च कथयन्तः तुष्यन्ति च रमन्ति च। वक्तारः तद्वचनेन अनन्यप्रयोजनेन तुष्यन्ति? श्रोतारश्च तच्छ्रवणेन अनवधिकातिशयप्रियेण रमन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.9।। --,मच्चित्ताः? मयि चित्तं येषां ते मच्चित्ताः? मद्गतप्राणाः मां गताः प्राप्ताः चक्षुरादयः प्राणाः येषां ते मद्गतप्राणाः? मयि उपसंहृतकरणाः इत्यर्थः। अथवा? मद्गतप्राणाः मद्गतजीवनाः इत्येतत्। बोधयन्तः अवगमयन्तः परस्परम् अन्योन्यम्? कथयन्तश्च ज्ञानबलवीर्यादिधर्मैः विशिष्टं माम्? तुष्यन्ति च परितोषम् उपयान्ति च रमन्ति च रतिं च प्राप्नुवन्ति प्रियसंगत्येव।।ये यथोक्तैः प्रकारैः भजन्ते मां भक्ताः सन्तः --,
───────────────────
【 Verse 10.10 】
▸ Sanskrit Sloka: तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् | ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते ||
▸ Transliteration: teṣāṁ satatayuktānāṁ bhajatāṁ prītipūrvakam | dadāmi buddhiyogaṁ taṁ yena māmupayānti te ||
▸ Glossary: teṣāṁ: to them; satatayuktānāṁ: always engaged; bhajatāṁ: praying; prītipūr- vakam: with love; dadāmi: I give; buddhiyogaṁ: intelligence; taṁ: that; yena: by which; mām: to Me; upayānti: come; te: they
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.10 To those who are always engaged in Me with love, I give them enlightenment by which they come to Me.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.10।।उन नित्यनिरन्तर मेरेमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ? जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.10।। उन (मुझ से) नित्य युक्त हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को? मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त होते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.10 तेषाम् to them? सततयुक्तानाम् ever steadfast? भजताम् (of the) worshipping? प्रीतिपूर्वकम् with love? ददामि (I) give? बुद्धियोगम् Yoga of discrimination? तम् that? येन by which? माम् to Me? उपयान्ति come? ते they.Commentary The devotees who have dedicated themselves to the Lord? who are ever harmonious and selfabiding? who are ever devout and who adore Him with intense love (not for attaining any selfish purpose)? obtain the divine grace. The Lord gives them wisdom or the Yoga of discrimination or understanding by which they attain the knowledge of the Self. The Lord bestows on these devotees who have fixed their thoughts on Him alone? devotion of right knowledge. (Buddhi Yoga) by which they know Him in essence. They know through the eye of intuition in deep meditaion the Supreme Lord? the One in all? the Self of all? as their own Self? destitue of all limitations. Buddhi here is the inner eye of intuition by which the magnificent experience of oneness is had. Buddhi Yoga is Jnana Yoga. (Cf.IV.39XII.6and7)Why does the Lord impart this Yoga of knowledge to His devotees What obstacles does the Buddhi Yoga remove on the path of the aspirant or devotee The Lord gives the answer in the following verse.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.10. To these persons, who are [thus] mingling [with Me] and revere [Me] with love, I grant that knowledge-Yoga by means of which they reach Me.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.10 To those who are always devout and who worship Me with love, I give the power of discrimination, which leads them to Me.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.10 To those, who are ceaselessly united with Me and who worship Me with immense love, I lovingly grant that mental disposition (Buddhi-yoga) by which they come to Me.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.10 To them who are ever devoted and worship Me with love, I grant that possession of wisdom by which they reach Me.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.10 To them who are ever steadfast, worshipping Me with love, I give the Yoga of discrimination by which they come to Me.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.10 See Comment under 10.11
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.10 To those 'ceaselessly united with Me,' namely, those who desire ceaseless union with Me, and who are worshipping Me, I grant with love, that same 'Buddhi-yoga' or devotional attitude of a mature state. By that they come to Me.
Likewise:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.10 Tesam, to them, who, becoming devotees, adore Me in the manner described earlier; satata-yuktanam, who are ever devoted, ever attached, who have become free from all external desires; and bhajatam, who worship-. Is it because of hankering for possessions? The Lord says: No, (they worship) priti-purvakam, with love. To them who worship Me with that (love), dadami, I grant; tam, that; buddhi-yogam, possession of wisdom-buddhi means full enlightenment with regard to My real nature; coming in possession (yoga) of that is buddhi-yoga; yena, by which possession of wisdom consisting in full enlightenment; upayanti, they reach, realize as their own Self; mam, Me, the supreme God who is the Self. Who do so? Te, they, who adore Me through such disciplines as fixing their minds on Me, etc. 'For what purpose, or as the destroyer of what cause standing as an obstacle on the way of reaching You, do You bestow that possession of wisdom to those devotees of Yours?' In reply to such a ery the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.10।। जब तक सबसे श्रेष्ठ आनन्ददायक वस्तु या लक्ष्य को नहीं पाया गया है जिसमें हमारा मन पूर्णतया रम सके? तब तक बाह्य विषयों? भावनाओं तथा विचारों के जगत् के साथ हुए तादात्म्य से हमारी सफलतापूर्वक निवृत्ति नहीं हो सकती। आनन्दस्वरूप आत्मा में ध्यानाकर्षण करने की ऐसी सार्मथ्य है और इसलिए? जिस मात्रा या सीमा तक इस आत्मस्वरूप में मन स्थित होता है? उसी मात्रा में वह दुखदायी मिथ्या बंधनों की पकड़ से मुक्त हो जाता है। इस वेदान्तिक सत्य का भगवान् श्रीकृष्ण इस वाक्य में वर्णन करते हैं? जो मेरा भक्तिपूर्वक भजन करते हैं।प्रिय के साथ तादात्म्य का ही अर्थ है प्रेम। आत्मा के साथ हुए तादात्म्य के अनुपात में ही जीव भक्त कहलाता है और जब वह सततयुक्त हो जाता है? तभी वह वास्तविक रूप में हृदयस्थित अपनी अव्यक्त दिव्यता को अभिव्यक्त कर पाता है।ऐसे भक्त जो निरन्तर भक्ति? सन्तोष और आनन्द के वातावरण में सतत आत्मा का चिन्तन करते हैं उन भक्तों को स्वयं भगवान् ही वह बुद्धियोग देते हैं? जिसके द्वारा वे भगवान् को ही प्राप्त होते हैं।बुद्धियोग का पहले भी वर्णन किया जा चुका है। आत्मा के अनन्त स्वरूप पर निदिध्यासन से सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना ही बुद्धियोग है। प्रस्तुत संदर्भ में उसकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है कि उपर्युक्त पद्धति से साधनाभ्यास करने वाले साधक को सत्य का बौद्धिक ग्रहण होता है। निसंदेह हमारा वह अभिप्राय कदापि नहीं है कि परिच्छिन्न बुद्धि के द्वारा कभी अनन्त वस्तु का ग्रहण किया जा सकता है। हम केवल लौकिक जगत् के एक सुपरिचित वाक्प्रचार का उपयोग ही कर रहे हैं। जब तक बुद्धि से ग्रहण किया गया एक अनुभव किसी अन्य अनुभव से बाधित नहीं होता? तब तक उस पूर्व अनुभव को प्रामाणिक और संदेह रहित माना जाता है। आत्मा का अनुभव्ा कदापि बाधित नहीं हो सकता? क्योंकि वह अनुभवकर्ता का ही स्वरूप है। ऐसा दृढ़ ज्ञान केवल उन साधकों को ही प्राप्त होता है जिनमें आत्मानुसंधान करने की परिपक्वता एवं स्थिरता आ जाती है।इस प्रकार? उक्त ध्यानाभ्यास के द्वारा सत्य पर पड़े आवरण और तज्जनित विक्षेपों की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है? तब वह साधक समाधि का साक्षात् अनुभव करता है? जो बुद्धियोग की परिसमाप्ति और पूर्णता है।इस बुद्धियोग के द्वारा भगवान् अपने भक्तों के लिए निश्चित रूप से क्या करते हैं? इसका वर्णन अगले श्लोक में है --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.10।।तेषां सततयुक्तानां सततं निरन्तरमभियुक्तानाम्। किमर्थित्वादिपूर्वकं नेत्याह। प्रीतिः स्नेहस्तपूर्वकं भजताम्। प्रेमलक्षणभक्तिमतामित्यर्थः। तं सम्यग्ज्ञानलक्षणमविकल्पबुद्धियोगं ददामि। येन बुद्धियोगेन मां परमात्मानमात्मत्वेपयान्ति प्रतिपद्यन्ते। साक्षात्कुर्वन्तीत्यर्थः। ते ये मां मच्चित्तत्वादिप्रकारैर्भजन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.10।।ये यथोक्तेन प्रकारेण भजन्ते मां -- तेषां सततं सर्वदा युक्तानां भगवत्येकाग्रबुद्धीनां। अतएव लाभपूजाख्यात्याद्यनभिसंधाय प्रीतिपूर्वकमेव भजतां सेवमानानां तेषां अविकम्पेन योगेनेति यः प्रागुक्तस्तं बुद्धियोगं मत्तत्त्वविषयसम्यग्दर्शनं ददामि उत्पादयामि। येन बुद्धियोगेन मामीश्वरमात्मत्वेनोपयान्ति ये मच्चित्तत्वादिप्रकारैर्मां भजन्ते ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.10।।उपासनायाः फलमाह -- तेषामिति। सततयुक्तानां नित्योत्साहवताम्। प्रीतिः प्रेमा तत्पूर्वकं भजतां सेवमानानां तेभ्यो ददामि तं बुद्धियोगं ज्ञानरूपं योगं समाधिम्। ज्ञाननिष्ठामित्यर्थः। तां ददामि येन यया निष्ठया ते मामुपयान्ति समुद्रमिव नद्योऽभेदेन प्रविशन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.10।।एवम्भावेन भजतामहं फलं ददामीत्याह -- एवमिति। एवममुना प्रकारेण सततयुक्तानां निरन्तरं मत्कृपाविशिष्टानां प्रीतिपूर्वकमनुद्वेगेन भजतां तं बुद्धियोगं मत्स्वरूपानुभवात्मकभक्त्युपायरूपं ददामि? येन ते मामुपयान्ति प्राप्नुवन्ति। उपसर्गेण तथा यान्ति यथा तद्भावच्युतिः कदापि न भवतीति ज्ञापितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.10।।एवंभूतानां च सम्यग्ज्ञानमहं ददामीत्याह -- तेषामिति। एवं सततयुक्तानां मय्यासक्तानां प्रीतिपूर्वकं भजतां तेषां तं बुद्धिरूपं योगमुपायं ददामि। तमिति कम्। येनोपायेन ते भक्ता मां प्राप्नुवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.8 -- 10.10।।विभूतियोगज्ञानविपाकरूपभक्तिविवृद्धिं दर्शयति चतुर्भिः पुमर्थरूपैः अहमित्यादिभिः -- अहं सर्वस्य प्रभव इत्यादि। विश्वोत्पादकत्वप्रवर्त्तकत्वरूपस्वयोगविभूतिस्वरूपाविष्करणं इत्येवं मम योगं विभूतिं च भगवन्मार्गीयाचार्योपदेशद्वारा मयि भावो भक्तिस्तया समन्विता मां सेवन्ते बुधाः। एते च,माहात्म्यज्ञानपूर्वकभक्तिमन्तो भगवत्सेवकाः स्वरूपतो निर्दिश्यन्ते भगवन्मार्गीया उद्धवादय इव। मच्चित्ता इति मदर्पितान्तःकरणाः। मद्गतप्राणा इति -- प्राणशब्द इन्द्रियप्राणवाचक इति मदर्पितेन्द्रियप्राणाः मयि सततं युक्ता देहेनेति? समर्पितदेहाः आत्मना वा भगवति सततं युक्ताः अयमेव ब्रह्मसम्बन्धः भगवते कृष्णाय दारागारपुत्राप्त -- इतिवाक्यात्आत्मना सह तत्तदीहापराणि देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणानि तद्धर्मांश्च समर्पयित्वा स्वयं दासभूता नित्यं भगवन्तं भजन्ते सेवामार्गप्रकारेण सेवन्ते? न पूजाडम्बरेणेति? सेवायां स्थितिस्तेषामुक्तासेवायां वा कथायां वा इति भक्तिवर्द्धिन्यां कथायां च स्थितिमाह -- परस्परं बोधयन्तः कथयन्तश्च मां इति। तदपि नित्यं? न तु नैमित्तिकम्। तथैव च तुष्यन्ति मनउत्सवादिषु च रमन्ति अनुकरणेन वा क्री़डन्ति तथाभूतानां तेषां प्रीतिपूर्वकं पुष्टिमर्यादानुकूलापरानुरक्तिरीश्वरे सर्वात्मना प्रीतिस्तत्पूर्वकं भजतां सेवतां -- अनेनचेतस्तत्प्रवणं सेवा इति मानसीस्वरूपमुक्तं -- तेषामेव बुद्धियोगं विपाकदशामापन्नं ददामि येन ते मां पुरुषोत्तमं उप समीप एव प्राप्ता भवन्ति। इत्थं तेषां निर्गुणमुक्तिर्भावितया सूचिता।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.10।।जो पुरुष मुझमें प्रेम रखते हुए उपर्युक्त प्रकारसे मेरा भजन करते हैं --, उन समस्त बाह्य तृष्णाओंसे रहित निरन्तर तत्पर होकर भजन -- सेवन करनेवाले पुरुषोंको? किसी वस्तुकी इच्छा आदि कारणोंसे भजनेवालोंको नहीं? किंतु प्रीतिपूर्वक भजनेवालोंको यानी प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवालोंको? मैं वह बुद्धियोग देता हूँ। मेरे तत्त्वके यथार्थ ज्ञानका नाम बुद्धि है? उससे युक्त होना ही बुद्धियोग है। वह ऐसा बुद्धियोग मैं ( उनको ) देता हूँ कि जिस पूर्णज्ञानरूप बुद्धियोगसे वे मुझ आत्मरूप परमेश्वरको आत्मरूपसे समझ लेते हैं। वे कौन हैं जो मच्चित्ताः आदि ऊपर कहे हुए प्रकारोंसे मेरा भजन करते हैं।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.10।। व्याख्या -- [भगवन्निष्ठ भक्त भगवान्को छोड़कर न तो समता चाहते हैं? न तत्त्वज्ञान चाहते हैं तथा न और ही कुछ चाहते हैं (टिप्पणी प0 546.3)। उनका तो एक ही काम है -- हरदम भगवान्में लगे रहना। भगवान्में लगे रहनेके सिवाय उनके लिये और कोई काम ही नहीं है। अब साराकासारा काम? सारी जिम्मेवारी भगवान्की ही है अर्थात् उन भक्तोंसे जो कुछ कराना है? उनको जो कुछ देना है आदि सब काम भगवान्का ही रह जाता है। इसलिये भगवान् यहाँ (दो श्लोकोंमें) उन भक्तोंको समता और तत्त्वज्ञान देनेकी बात कह रहे हैं।]तेषां सततयुक्तानाम् -- नवें श्लोकके अनुसार जो भगवान्में ही चित्त और प्राणवाले हैं? भगवान्के गुण? प्रभाव? लीला? रहस्य आदिको आपसमें एकदूसरेको जानते हुए तथा भगवान्के नाम? गुणोंका कथन करते हुए नित्यनिरन्तर भगवान्में ही सन्तुष्ट रहते हैं और भगवान्में ही प्रेम करते हैं? ऐसे नित्यनिरन्तर भगवान्में लगे हुए भक्तोंके लिये यहाँ सततयुक्तानाम् पद आया है।भजतां प्रीतिपूर्वकम् -- वे भक्त न ज्ञान चाहते हैं? न वैराग्य। जब वे पारमार्थिक ज्ञान? वैराग्य आदि भी नहीं चाहते? तो फिर सांसारिक भोग तथा अष्टसिद्धि और नवनिधि चाह ही कैसे सकते हैं उनकी दृष्टि इन वस्तुओंकी तरफ जाती ही नहीं। उनके हृदयमें सिद्धि आदिका कोई आदर नहीं होता? कोई मूल्य नहीं होता। वे तो केवल भगवान्को अपना मानते हुए प्रेमपूर्वक स्वाभाविक ही भगवान्के भजनमें लगे रहते हैं। उनका,किसी भी वस्तु? व्यक्ति आदिसे किसी तरहका कोई सम्बन्ध नहीं रहता। उनका भजन? भक्ति यही है कि हरदम भगवान्में लगे रहना है। भगवान्की प्रीतिमें वे इतने मस्त रहते हैं कि उनके भीतर स्वप्नमें भी भगवान्के सिवाय अन्य किसीकी इच्छा जाग्रत् नहीं होती।ददामि बुद्धियोगं तम् -- किसी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिके संयोगवियोगसे अन्तःकरणमें कोई हलचल न हो अर्थात् संसारके पदार्थ मिलें या न मिलें? नफा हो या नुकसान हो? आदर हो या निरादर हो? स्तुति हो या निन्दा हो? स्वास्थ्य ठीक रहे या न रहे आदि तरहतरहकी और एकदूसरेसे विरुद्ध विभिन्न परिस्थितियाँ आनेपर भी उनमें एकरूप (सम) रह सकें -- ऐसा बुद्धियोग अर्थात् समता मैं उन भक्तोंको देता हूँ।ददामि का तात्पर्य है कि वे बुद्धियोगको अपना नहीं मानते? प्रत्युत भगवान्का दिया हुआ ही मानते हैं। इसलिये बुद्धियोगको लेकर उनको अपनेमें कोई विशेषता नहीं मालूम देती।येन -- मैं उनको वह बुद्धियोग देता हूँ? जिस बुद्धियोगसे वे मेरेको प्राप्त हो जाते हैं।मामुपयान्ति ते -- जब वे भगवान्में ही चित्त और प्राणवाले हो गये हैं और भगवान्में ही सन्तुष्ट रहते हैं तथा भगवान्में ही प्रेम करते हैं? तो उनके लिये अब भगवान्को प्राप्त होना क्या बाकी रहा? जिससे कि भगवान्को यह कहना पड़ रहा है कि वे मेरेको प्राप्त हो जाते हैं मेरेको प्राप्त हो जानेका तात्पर्य है कि वे प्रेमी भक्त अपनेमें जो कमी मानते हैं? वह कमी उनमें नहीं रहती अर्थात् उन्हें पूर्णताका अनुभव हो जाता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.6 -- 10.11।।महर्षय इत्यादि भास्वता इत्यन्तम्। परस्परबोधनया अन्योन्यबोधस्फारसंक्रमणात् सर्व एव हि प्रमातारः एक ईश्वर इति विततव्याप्त्या (S??N वितत्य व्याप्त्या) सुखेनैव सर्वशक्तिकसर्वगतस्वात्मरूपताधिगमेन (S -- ताधिशयनेन अधिगमेन) माहेश्वर्यमेषामिति भावः (After इति भावः ?N add तेषां सततयुक्तानाम् इत्यतः प्रभृति अध्यायान्ता टीका उट्टङ्किता युगपद्धि वेद्या। तेषामेव अनु च अर्जुनप्रश्नपद्यानि षट् उल्लिखति। श्रीभगवान् अथवा बहुना इति पर्यन्तानि पद्यानि 23,वक्ति।। These sentences are obviously of some copyist. It is to be noted however that the Mss. generally contain seven (not six) verses of Arjuna and then 24 (not 23) verses of the hagavan) ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.10।।यदुक्तं सोऽविकम्पेनेत्यादि तदर्थं भूमिकां कृत्वा तदिदानीमुदाहरति -- ये यथोक्तेति। नित्याभियुक्तानामनवरतं भगवत्यैकाग्र्यसंपन्नानामित्यर्थः। पुत्रादिलोकत्रयहेत्वर्थित्वेन वा गर्भदासत्वेन वा प्रत्यहं जीवनोपायसिद्धये वा भजनमिति शङ्कित्वा दूषयति -- किमित्यादिना। प्रागुक्तां ज्ञानाख्यां भक्तिं स्नेहेन कुर्वतामित्यर्थः। तेभ्योऽहं तत्त्वज्ञानं प्रयच्छामीत्याह -- ददामीति। उक्तबुद्धिसंबन्धस्य फलमाह -- येनेति। ध्यानजन्यप्रकर्षकाष्ठागतान्तःकरणपरिणामे निरस्ताशेषविशेषभगवद्रूपप्राप्तिहेतौ बुद्धियोगे प्रश्नपूर्वकमुक्तानधिकारिणो दर्शयति -- के त इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.8 -- 10.10।।ननुएतां विभूतिम् [10।7] इति परिज्ञातुः फलमुक्तं तत्किमर्थं पुनरुच्यते इत्यतस्तात्पर्यान्तरमाह -- सन्ति चेति। उक्तफले विश्वासजननार्थमिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.8 -- 10.10।।सन्ति च भजन्तः केचिदित्याह -- अहमित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.10।।तेषां सततयुक्तानां मयि सततयोगम् आशंसमानानां मां भजमानानाम् अहं तम् एव बुद्धियोगं विपाकदशापन्नं प्रीतिपूर्वकम् ददामि येन ते माम् उपयान्ति।किं च --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.10।। --,तेषां सततयुक्तानां नित्याभियुक्तानां निवृत्तसर्वबाह्यैषणानां भजतां सेवमानानाम्। किम् अर्थित्वादिना कारणेन नेत्याह -- प्रीतिपूर्वकं प्रीतिः स्नेहः तत्पूर्वकं मां भजतामित्यर्थः। ददामि प्रयच्छामि बुद्धियोगं बुद्धिः सम्यग्दर्शनं मत्तत्त्वविषयं तेन योगः बुद्धियोगः तं बुद्धियोगम्? येन बुद्धियोगेन सम्यग्दर्शनलक्षणेन मां परमेश्वरम् आत्मभूतम् आत्मत्वेन उपयान्ति प्रतिपद्यन्ते। के ते ये मच्चित्तत्वादिप्रकारैः मां भजन्ते।।किमर्थम्? कस्य वा? त्वत्प्राप्तिप्रतिबन्धहेतोः नाशकं बुद्धियोगं तेषां त्वद्भक्तानां ददासि इत्यपेक्षायामाह --,
───────────────────
【 Verse 10.11 】
▸ Sanskrit Sloka: तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तम: | नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता ||
▸ Transliteration: teṣāṁ evānukampārtham aham ajñānajaṁ tamaḥ | nāśayāmy ātma-bhāvastho jñānadīpena bhāsvatā ||
▸ Glossary: teṣāṁ: to them; evā: also; anukampārtham: out of compassion; aham: I; ajñā- najaṁ: born of ignorance; tamaḥ: darkness; nāśayāmi: destroy; ātma: within; bhāvasthaḥ: themselves; jñānadīpena: lamp of knowledge; bhāsvatā: shining
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.11 Out of compassion to them, I destroy the darkness born out of their ignorance by the shining lamp of knowledge.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.11।।उन भक्तोंपर कृपा करनेके लिये ही उनके स्वरूप (होनेपन) में रहनेवाला मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको देदीप्यमान ज्ञानरूप दीपकके द्वारा सर्वथा नष्ट कर देता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.11।। उनके ऊपर अनुग्रह करने के लिए मैं उनके अन्तकरण में स्थित होकर? अज्ञानजनित अन्धकार को प्रकाशमय ज्ञान के दीपक द्वारा नष्ट करता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.11 तेषाम् for them? एव mere? अनुकम्पार्थम् out of compassion? अहम् I? अज्ञानजम् born of ignorance? तमः darkness? नाशयामि (I) destroy? आत्मभावस्थः dwelling within their self? ज्ञानदीपेन by the lamp of knowledge? भास्वता luminous.Commentary Luminous lamp of knowledge The Lord dwells in the heart of the devotees who constantly think of Him and destroys the veil or the darkness born of ignorance due to the absence of discrimination? by the luminous lamp of knowledge fed by the oil of pure devotion? fanned by the wind of profound meditation on Him? provided with the wick of right intuition? generated by the constant cultivation of celibacy? piety and other divine virtues held in the chambers of the heart free from worldliness? placed in the innermost recesses of the mind free from the wind of senseattractions (withdrawn from the objects of the senses) and untainted by likes and dislikes? and shining with the light of knowledge of the Self caused
Chapter 10 (Part 6)
by the constant practice of meditation.The lamp is not in need of an instrument or means or any sort of practice for the removal of darkness. The generation of the light itself is ite sufficient to remove the darkness. As soon as the darkness is removed by the light? the pot? the chair and the other articles are seen. Even so the dawn of knowledge of the Self itself is ite sufficient to remove ignorance. No other Karma or,practice is necessary. After the ignorance is removed by the knowledge of the Self? Brahman alone shines in Its pristine glory.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.11. Out of compassion only towards these men, I, who remain as their very Self, destroy with teh shining light of wisdom, their darkness born of ignorance,
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.11 By My grace, I live in their hearts; and I dispel the darkness of ignorance by the shining light of wisdom.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.11 Out of compassion for them alone, I, abiding in their mental activity as its object, dispel the darkness born of ignorance by the brilliant lamp of knowledge.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.11 Out of compassion for them alone, I, residing in their hearts, destroy the darkness born of ignorance with the luminous lamp of Knowledge.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.11 Out of mere compassion for them, I, dwelling within their Self, destroy the darkness born of ignorance by the luminous lamp of knowledge.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.9-11 Maharsaya etc., upto bhasvata. Through the process of mutual enlightening, the wisdom-shock is transmitted to each other. On account of that, they get the all-inclusive [knowledge] 'Indeed all sentient subjects are only a single Absolute Lord'. By means of this extensive pervasion, they easily come to realise their own Self as Omnipotent and omnipresent and by that they attain the Absolute Lordship. This is the idea here.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.11 To show favour to them alone, abiding in their mental activity, i.e., established as the object of thought in their mind, and manifesting the host of My auspicious attributes by the brillinat lamp called knowledge relating to Me, - I dispel the darkness incompatible with knowledge. This darkness is born of ignorance in the form of old Karma consisting of attachment to objects other than Myself, to which they were previously habituated.
Thus having heard of the Lord as having a host of auspicious attributes, and of the extent of His sovereign glories which are unie and different from all others and which generate unsurpassed bliss in listeners, - Arjuna desired to listen to the details about them and said:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.11 Anukampartham, out of compassion; tesam eva, for them alone, anxious as to how they may have bliss; aham, I; atmabhavasthah, residing in their hearts-atmabhavah means the seat that is the heart; being seated there itself; nasayami, destroy; tamah, the darkness; ajnanajam, born of ignorance, originating from non-discrimination, the darkness of delusion known as false comprehension; jnana-dipena, with the lamp of Knowledge, in the form of discriminating comprehension; i.e. bhasvata, with the luminous lamp of Knowledge-fed by the oil of divine grace resulting from devotion, fanned by the wind of intensity of meditation on Me, having the wick of the intellect imbued with the impressions arising from such disciplines as celibacy etc., in the receptacle of the detached mind, placed in the windless shelter of the mind withdrawn from objects and untainted by likes and dislikes, and made luminous by full Illumination resulting from the practice of constant concentration and meditation. After hearing the above-described majesty and yoga of the Lord,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.11।। कभीकभी कोई वस्तु विद्यमान होते हुए भी हमारी दृष्टि के लिए आच्छादित रहती है? क्योंकि उसे देखने के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियों की आवश्यकता होती है। ध्वनि सुनने के लिए उसमें आवश्यक स्पन्दन होने चाहिए तथा यह भी आवश्यक है कि वे ध्वनि तरंगे हमारे कानों तक पहुँचे। इसी प्रकार? अपेक्षित प्रकाश के अभाव में वस्तु के समक्ष होने पर भी उसका नेत्रों द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता।यदि हम अन्धकार में मेज पर पड़ी अपना कुंजी (चाभी) को टटोलकर खोज रहे हों और उसी समय कोई व्यक्ति स्विच दबाकर कमरे को प्रकाशित कर देता है? तो हमें अपनी कुंजी दिखाई पड़ती है। हम कह सकते हैं कि उस व्यक्ति के इस दयापूर्ण कार्य ने हमें कुंजी की प्राप्ति करायी? परन्तु यह कहना सर्वथा असंगत होगा कि प्रकाश ने उस कुंजी को उत्पन्न किया।इस दृष्टान्त के द्वारा वेदान्त में यह ज्ञान कराया जाता है कि आत्मा तो सदा हमारे हृदय में ही विद्यमान है? किन्तु प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण यथार्थ अनुभव के लिए उपलब्ध नहीं है। उन प्रतिकूल तत्त्वों की निवृत्ति होने पर वह आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप से अनुभव किया जा सकता है। आत्मा को आच्छादित करने वाला वह आवरण है अज्ञानजनित अंधकार। स्मरण रहे कि इस अज्ञान अवस्था में भी आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप से विद्यमान रहता है? परन्तु हमारे साक्षात् अनुभव के लिए उपलब्ध नहीं होता। जो साधक बुद्धियोग में दृढ़ स्थिति प्राप्त कर लेते हैं? वे आत्मा के अपरोक्ष ज्ञान के पात्र बन जाते हैं।बुद्धियोग की साधना अवस्था में ध्याता और ध्येय में भेद होता है? जिसे सविकल्प समाधि कहते हैं। इस श्लोक में यह कहा गया है कि इस सविकल्प अवस्था से वह साधक? मानो किसी ईश्वरीय कृपा से पूर्ण निर्विकल्प समाधि की स्थिति में स्थानान्तरित किया जाता है। वस्तुत? सविकल्प समाधि की स्थिति तक ही साधक अपने पुरुषार्थ के द्वारा पहुँच सकता है। यह बुद्धियोग भी मानो किसी अन्य स्थान से प्राप्त होता है? तात्पर्य यह है कि वह कोई सावधानीपूर्वक किये गये किसी प्रयत्न का फल नहीं? वरन् सहज स्वाभाविक आंशिक दैवी प्रेरणा है। अहंकार और शुद्ध आत्मा के मध्य का सघन कुहासा जब विरल हो जाता है? तब इस दैवी प्रेरणा का अनुभव होता है। जब यह कोहरा पूर्णतया नष्ट हो जाता है? तब पूर्ण आत्म साक्षात्कार अपने स्वयंप्रकाश स्वरूप में होता है।एक अन्धेरे कमरे में मेज पर रेडियम के डायल की एक घड़ी रखी हुई है? जिस पर कागज? पुस्तक आदि पड़े हुए होने से वह दिखाई नहीं देती। जब कोई व्यक्ति अन्धेरे में ही उसे खोजता हुआ उन कागजों को हटा देता है? तो वह घड़ी स्वयं ही चमकती हुई दिखाई पड़ती है। उसकी चमक ही उसकी परिचायक होती है। सनातन सत्य भी अज्ञान से आवृत्त हुआ अभाव रूप प्रतीत हो सकता है? किन्तु अज्ञान की निवृत्ति होने पर? वह स्वयं अपने प्रकाश से ही प्रकाशित होता है? और उसे जानने के लिए अन्य किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।जब अज्ञान का अन्धकार? प्रकाशमय ज्ञान के दीपक से नष्ट हो जाता है तब आत्मा अपने एकमेव अद्वितीय? सर्वव्यापी और परिपूर्ण स्वरूप में स्वत प्रकट होता है। अपने भक्तों के हृदय में स्थित स्वयं भगवान् इस आत्मा के प्रकटीकरण की क्रिया को उनके ऊपर अनुग्रह करने के भाव से सम्पन्न करते हैं? किन्तु वास्तविकता यह है कि यह अनुग्रह स्वयं के ऊपर ही है। जब मैं चलतेचलते थक जाता हूँ तब मैं किसी स्थान पर बैठ जाता हूँ केवल अपने ही प्रति अनुकम्पा के कारण।इस अनुकम्पा के लिए उचित मूल्य चुकाये बिना साधक को सीधे ही इसकी प्राप्ति नहीं हो सकती। दिन के समय? मेरे कमरे की खिड़कियां खोल देने पर? सूर्य प्रकाश अनुकम्पावशात् मेरे लिए कमरे को प्रकाशित करता है। जैसा कि हम जानते हैं कि जब तक वे खिड़कियां खुली रहती हैं? तब तक सूर्य को यह स्वतन्त्रता नहीं है कि वह अपनी दया का द्वार बन्द कर ले। उसी प्रकार उसकी दया तब तक प्रकट भी नहीं होगी? जब तक मैं अपने कमरे की खिड़कियां नहीं खोल देता हूँ। संक्षेपत? सूर्य प्रकाश का आह्वान उसी क्षण होता है? जब उसके मार्ग का अवरोधक दूर हो जाता है।इसी प्रकार? प्रारम्भिक साधनाओं के अभ्यास से साधक बुद्धियोग का पात्र बनता है। तत्पश्चात् इसके निरन्तर प्रयत्नपूर्वक किये गये अभ्यास से वह अज्ञान तथा तज्जनित विक्षेपों के आवरण को सर्वथा नष्ट कर देता है। तत्काल ही आत्मा अपने स्वयं के प्रकाश में ही प्रकाश स्वरूप से प्रकाशित होता है। मेघों को चीरकर जाती हुई विद्युत् को देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं होती।जीवन के सर्वोच्च व्यवसाय अथवा लक्ष्य चित्तशुद्धि और आत्मसाक्षात्कार की प्राप्ति के लिए दिये गये उपदेश का खण्ड यहाँ पर समाप्त हो जाता है? तथापि अर्जुन को इससे सन्तोष नहीं होता? और इसलिए वह अपनी शंका को व्यक्त करते हुए भगवान् से सहायता के लिए अनुरोध करता है? जिससे कि साक्षात् अनुभव के द्वारा वह स्वयं सत्य की पुष्टि कर सके।भगवान् के मुख से उनकी विभूति और योग के विषय में श्रवण कर? अर्जुन अपनी जिज्ञासा प्रकट करता है --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.11।।मत्प्राप्तिबन्धकनाशकं बुद्धियोगं ददामीत्याशयेनाह। तेषामेव मच्चित्तत्वादिप्रकारैर्भजतामनुकम्पार्थ दयाहेतोरहमज्ञानजं मूलाज्ञानाज्जातं मिथ्याप्रत्ययलक्षणं तमो मोहाबन्धकारं ज्ञानदीपेन नाशयामि। अचेतनस्य नाशकत्वासंभवादहमित्युक्तं निखिलभ्रामधिष्ठानत्वेनाखिलभासकल्य केवलचैतन्यस्यापि तदसंभवात्। आत्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वतेत्युक्तं। आत्मनो भावोऽन्तःकरणाशयस्तस्मिन्नवस्थितः तत्त्वमस्यादिमहावाक्योत्यान्तःकरणवृत्त्यभिव्यक्तः सन् तेनैव वृत्तिज्ञानदीपेन भक्त्यादिना भास्वता देदीप्यमानेन समूलाज्ञानं मत्प्राप्तिप्रतिबन्धकं मिथ्याप्रत्यवलक्षणं तमो नाशयामीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.11।।दीयमानस्य बुद्धियोगस्यात्मप्राप्तौ फले मध्यवर्तिनं व्यापारमाह -- तेषामेव कथं श्रेयः स्यादित्यनुग्रहार्थं आत्मभावस्थ आत्माकारान्तःकरणवृत्तौ विषयत्वेन स्थितोऽहं स्वप्रकाशचैतन्यानन्दाद्वयलक्षण आत्मा तेनैव मद्विषयान्तःकरणपरिणामरूपेण ज्ञानदीपेन दीपसदृशेन ज्ञानेन भास्वता चिदाभासयुक्तेनाप्रतिबद्धेनाज्ञानजमज्ञानोपादानकं तमो मिथ्याप्रत्ययलक्षणं स्वविषयावरणमन्धकारं तदुपादानाऽज्ञाननाशेन नाशयामि। सर्वभ्रमोपादानस्याज्ञानस्य,ज्ञाननिवर्त्यत्वादुपादाननाशनिवर्त्यत्वाच्चोपादेयस्य। यथा दीपेनान्धकारे निवर्तनीये दीपोत्पत्तिमन्तरेण न कर्मणोऽभ्यासस्य वापेक्षा विद्यमानस्यैव च वस्तुनोऽभिव्यक्तिस्ततो नानुत्पन्नस्य कस्यचिदुत्पत्तिस्तथा ज्ञानेनाज्ञाने निवर्तनीये न ज्ञानोत्पत्तिमन्तरेणान्यस्य कर्मणोऽभ्यासस्य वापेक्षा विद्यमानस्यैव च ब्रह्मभावस्य मोक्षस्याभिव्यक्तिस्ततो नानुत्पन्नस्योत्पत्तिर्येन क्षयित्वं कर्मादिसापेक्षत्वं वा भवेदिति रूपकालंकारेण सूचितोऽर्थः। भास्वतेत्यनेन तीव्रपवनादेरिवासंभवनादेः प्रतिबन्धकस्याभावः सूचितः। ज्ञानस्य च दीपसाधर्म्यं स्वविषयावरणनिवर्तकत्वं स्वव्यवहारेण सजातीयपरानपेक्षत्वं स्वोत्पत्त्यतिरिक्तसहकार्यनपेक्षत्वमित्यादिरूपकबीजं द्रष्टव्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.11।।किं च तेषां भक्तानामुपर्यनुकम्पार्थं न स्वप्रयोजनसिद्ध्यर्थं राजवत्। बुद्धियोगप्रदानेनाज्ञानजमविवेकादुत्थितं मिथ्याप्रत्ययलक्षणं मोहान्धकारं तमोनामकं सर्वानर्थनिदानमूलाज्ञाननाशेन नाशयामि। आत्मभावस्थ आत्मनो भावोऽन्तःकरणगृहं तत्स्थः। ज्ञानरूपेण दीपेन। भास्वता प्रबलेन। अयं भावः -- तत्त्वमसीति वाक्यजा ब्रह्माकारान्तःकरणवृत्तिः स्वोत्पत्तये श्रवणमननध्यानानि शमादीनि कर्माणि चापेक्षते। यथा दीपः स्वोत्पत्तये तैलवर्त्यग्न्यादीन्। उत्पन्ना तु तमोनाशेन स्वविषयप्रकाशनार्थं प्रत्ययावृत्तिलक्षणं प्रसंख्यानं च कर्मभिरुपकारं वा नापेक्षते। नहि ज्ञाते घटे तदाकारप्रत्ययावृत्तिर्वा कर्मापेक्षा वा तज्ज्ञानदार्ढ्यायापेक्षते। प्रमाणव्याप्तिमात्रसापेक्षत्वात् ज्ञानस्य। तस्माद्ये उत्पन्नज्ञानानामपि प्रसंख्यानापेक्षां कर्मभिरुपकारापेक्षां च वदन्ति ते बलादेव मोक्षस्य कृतकतामनित्यतां च प्रार्थयन्त इति दिक्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.11।।नन्वन्यबोधने तेषामज्ञत्वाद्बहुकालव्यासङ्गेन सेवावियोगक्लेशः स्यादिति कथं बोधनं स्यात् इत्याशङ्क्याहतेषामेवेति। तेषामेव भक्तानामेव अनुकम्पार्थं मत्सेवाविप्रयोगक्लेशाभावार्थम्? आत्मभावस्थेषु तेषु स्वीयत्वभावयुक्तोऽहमन्येषामज्ञानजं तमः संसारात्मकं भास्वता स्फुरद्रूपेण ज्ञानदीपेन नाशयामि। ततः संसाराज्ञानविमुक्तानां शीघ्रं स्वरूपबोधात् पुनः परस्परं मद्गुणकथनेन परमानन्द एव भवति? न तु क्लेश इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.11।।बुद्धियोगं दत्त्वा च तस्यानुभवपर्यन्तं तमापाद्याविद्याकृतं संसारं नाशयामीत्याह -- तेषामिति। तेषामनुकम्पार्थमनुग्रहार्थमेवाज्ञानाज्जातं तमः संसाराख्यं नाशयामि। कुत्र वा स्थितः सन्केन साधनेन तमो नाशयसीत्यत,आह। आत्मभावस्थः बुद्धिवृत्तौ स्थितः सन् भास्वता विस्फुरता ज्ञानलक्षणेन दीपेन नाशयामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.11।।आत्मज्ञानमपि तेषां मयैव सम्पाद्यते इत्याह -- तेषामेवानुकम्पार्थमिति।जनो वै लोक एतस्मिन्नविद्याकामकर्मभिः। उच्चावचासु गतिषु वेद स्वां गतिं भ्रमन्। इति सञ्चिन्त्य भगवान्महाकारुणिको विभुः। तेषामन्तरात्मत्वं अङ्गीकृत्य स्थितो भास्वता ज्ञानदर्पणेनात्मविषयकसाक्षात्कारेणोभयाज्ञानजं तमो देहाध्यासादिना विषयप्रावण्यरूपं पूर्वाभ्यस्तं सर्वं नाशयामि। एवं च भगवदीयानां निजानामहमेव सर्वयोगक्षेमसाधको नान्य इति द्योत्यते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.11।।आपकी प्राप्तिके कौनसे प्रतिबन्धके कारणका नाश करनेवाला बुद्धियोग आप उन भक्तोंको देते हैं और किसलिये देते हैं इस आकाङ्क्षापर कहते हैं --, उन ( मेरे भक्तों ) का किसी तरह भी कल्याण हो ऐसा अनुग्रह करनेके लिये ही मैं उनके आत्मभावमें स्थित हुआ अर्थात् आत्माका भाव जो अन्तःकरण है उसमें स्थित हुआ उनके अविवेकजन्य मिथ्या प्रतीतिरूप,मोहमय अन्धकारको प्रकाशमय विवेकबुद्धिरूप ज्ञानदीपकद्वारा नष्ट कर देता हूँ। अर्थात् जो भक्ितके प्रसादरूप घृतसे परिपूर्ण है और मेरे स्वरूपकी भावनाके अभिनिवेशरूप वायुकी सहायतासे प्रज्वलित हो रहा है? जिसमें ब्रह्मचर्य आदि साधनोंके संस्कारोंसे युक्त बुद्धिरूप बत्ती है? आसक्ितरहित अन्तःकरण जिसका आधार है? जो विषयोंसे हटे हुए और रागद्वेषरूप कालुष्यसे रहित हुए चित्तरूप वायुरहित अपवारकमें ( ढकनेमें ) स्थित है और जो निरन्तर अभ्यास किये हुए एकाग्रतारूप ध्यानजनित? पूर्ण ज्ञानस्वरूप प्रकाशसे युक्त है? उस ज्ञानदीपकद्वारा ( मैं उनके मोहका नाश कर देता हूँ )।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.11।। व्याख्या -- तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः -- उन भक्तोंके हृदयमें कुछ भी सांसारिक इच्छा नहीं होती। इतना ही नहीं? उनके भीतर मुझे छोड़कर मुक्तितककी भी इच्छा नहीं होती (टिप्पणी प0 547)। अभिप्राय है कि वे न तो सांसारिक चीजें चाहते हैं और न पारमार्थिक चीजें (मुक्ति? तत्त्वबोध आदि) ही चाहते हैं। वे तो केवल प्रेमसे मेरा भजन ही करते हैं। उनके इस निष्कामभाव और प्रेमपूर्वक भजन करनेको देखकर मेरा हृदय द्रवित हो जाता है। मैं चाहता हूँ कि मेरे द्वारा उनकी कुछ सेवा बन जाय? वे मेरेसे कुछ ले लें। परन्तु वे मेरेसे कुछ लेते नहीं तो द्रवित हृदय होनेके कारण केवल उनपर कृपा करनेके लिये कृपापरवश होकर मैं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारको दूर कर देता हूँ। मेरे द्रवित हृदय होनेका कारण यह है कि मेरे भक्तोंमें किसी प्रकारकी किञ्चिन्मात्र भी कमी न रहे।आत्मभावस्थः -- मनुष्य अपना जो होनापन मानते हैं कि मैं हूँ तो यह होनापन प्रायः प्रकृति(शरीर) के साथ सम्बन्ध जोड़कर ही मानते हैं अर्थात् तादात्म्यके कारण शरीरके बदलनेमें अपना बदलना मानते हैं? जैसे -- मैं बालक हूँ? मैं जवान हूँ? मैं बलवान् हूँ? मैं निर्बल हूँ इत्यादि। परन्तु इन विशेषणोंको छोड़कर तत्त्वकी दृष्टिसे इन प्राणियोंका अपना जो होनापन है? वह प्रकृतिसे रहित है। इसी होनेपनमें सदा रहनेवाले प्रभुके लिये यहाँ आत्मभावस्थः पद आया है।भास्वता ज्ञानदीपेन नाशयामि -- प्रकाशमान ज्ञानदीपकके द्वारा उन प्राणियोंके अज्ञानजन्य अन्धकारका नाश कर देता हूँ। तात्पर्य है कि जिस अज्ञानके कारण मैं कौन हूँ और मेरा स्वरूप क्या है ऐसा जो अनजानपना रहता है? उस अज्ञानका मैं नाश कर देता हूँ अर्थात् तत्त्वबोध करा देता हूँ। जिस तत्त्वबोधकी महिमा शास्त्रोंमें गायी गयी है? उसके लिये उनको श्रवण? मनन? निदिध्यासन आदि साधन नहीं करने पड़ते? कोई परिश्रम नहीं करना पड़ता? प्रत्युत मैं स्वयं उनको तत्त्वबोध करा देता हूँ।विशेष बातभक्त जब अनन्यभावसे केवल भगवान्में लगे रहते हैं? तब सांसारिक सिद्धिअसिद्धिमें सम रहना -- यह,समता भी भगवान् देते हैं और जिसके समान पवित्र कोई नहीं है? वह तत्त्वबोध (स्वरूपज्ञान) भी भगवान् स्वयं देते हैं। भगवान्के स्वयं देनेका तात्पर्य है कि भक्तोंको इनके लिये इच्छा और प्रयत्न नहीं करना पड़ता प्रत्युत भगवत्कृपासे उनमें समता स्वतः आ जाती है। उनको तत्त्वबोध स्वतः हो जाता है। कारण कि जहाँ भक्तिरूपी माँ होगी? वहाँ उसके वैराग्य और ज्ञानरूपी बेटे रहेंगे ही। इसलिये भक्तिके आनेपर समता -- संसारसे वैराग्य और अपने स्वरूपका बोध -- ये दोनों स्वतः आ जाते हैं। इसका तात्पर्य है कि जो साधनजन्य पूर्णता होती है? उसकी अपेक्षा भगवान्द्वारा की हुई पूर्णता बहुत विलक्षण होती है। इसमें अपूर्णताकी गंध भी नहीं रहती।,जैसे भगवान् अनन्यभावसे भजन करनेवाले भक्तोंका योगक्षेम वहन करते हैं (गीता 9। 22)? ऐसे ही जो केवल भगवान्के ही परायण हैं? ऐसे प्रेमी भक्तोंको (उनके न चाहनेपर भी और उनके लिये कुछ भी बाकी न रहनेपर भी) भगवान् समता और तत्त्वबोध देते हैं। यह सब देनेपर भी भगवान् उन भक्तोंके ऋणी ही बने रहते हैं। भागवतमें भगवान्ने गोपियोंके लिये कहा है कि मेरे साथ सर्वथा निर्दोष (अनिन्द्य) सम्बन्ध जोड़नेवाली गोपियोंका मेरेपर जो एहसान है? ऋण है? उसको मैं देवताओंके समान लम्बी आयु पाकर भी नहीं चुका सकता। कारण कि बड़ेबड़े ऋषिमुनि? त्यागी आदि भी घरकी जिस अपनापनरूपकी बेड़ियोंको सुगमतासे नहीं तोड़ पाते? उनको उन्होंने तोड़ डाला है (टिप्पणी प0 548)। भक्त भगवान्के भजनमें इतने तल्लीन रहते हैं कि उनको यह पता ही नहीं रहता कि हमारेमें समता आयी है? हमें स्वरूपका बोध हुआ है। अगर कभी पता लग भी जाता है तो वे आश्चर्य करते हैं कि ये समता और बोध कहाँसे आये वे अपनमें कोई विशेषता न दीखे इसके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं कि हे नाथ आप समता? बोध ही नहीं? दुनियाके उद्धारका अधिकार भी दे दें? तो भी मेरेको कुछ मालूम नहीं होना चाहिये कि मेरेमें यह विशेषता है मैं केवल आपके भजनचिन्तनमें ही लगा रहूँ।, सम्बन्ध -- भक्तोंपर भगवान्की अलौकिक? विलक्षण कृपाकी बात सुनकर अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ जाती है और उस कृपासे प्रभावित होकर वे आगेके चार श्लोकोंमें भगवान्की स्तुति करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.6 -- 10.11।।महर्षय इत्यादि भास्वता इत्यन्तम्। परस्परबोधनया अन्योन्यबोधस्फारसंक्रमणात् सर्व एव हि प्रमातारः एक ईश्वर इति विततव्याप्त्या (S??N वितत्य व्याप्त्या) सुखेनैव सर्वशक्तिकसर्वगतस्वात्मरूपताधिगमेन (S -- ताधिशयनेन अधिगमेन) माहेश्वर्यमेषामिति भावः (After इति भावः ?N add तेषां सततयुक्तानाम् इत्यतः प्रभृति अध्यायान्ता टीका उट्टङ्किता युगपद्धि वेद्या। ,तेषामेव अनु च अर्जुनप्रश्नपद्यानि षट् उल्लिखति। श्रीभगवान् अथवा बहुना इति पर्यन्तानि पद्यानि 23,वक्ति।। These sentences are obviously of some copyist. It is to be noted however that the Mss. generally contain seven (not six) verses of Arjuna and then 24 (not 23) verses of the hagavan) ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.11।।भगवत्प्राप्तेर्बुद्धिसाध्यत्वे सत्यनित्यत्वापत्तेस्त्वमापे भक्तेभ्यो बुद्धियोगं ददासीत्ययुक्तमिति शङ्कते -- किमर्थमिति। तेषां बुद्धियोगं किमर्थं ददासीति संबन्धः। भगवत्प्राप्तिप्रतिबन्धकनाशको बुद्धियोगस्तेन नास्ति तत्प्राप्तेरनित्यत्वमित्याशङ्क्याह -- कस्येति। भक्तानां तत्प्राप्तिप्रतिबन्धकं विविच्य दर्शयति -- इत्याकाङ्क्षायामिति। अविवेको नामाज्ञानं ततो जातं मिथ्याज्ञानं तदुभयमेकीकृत्य तमो विवक्ष्यते। नच तन्नाशकत्वं जडस्य कस्यचित्तदन्तर्भूतस्य युक्तं तेनाहं नाशयामीत्युक्तम्। केवलचैतन्यस्य जडबुद्धिवृत्तेरिवाज्ञानाद्यनाशकत्वमाशङ्क्य विशिनष्टि -- आत्मेति। तस्याशयस्तन्निष्ठो वृत्तिविशेषः। वाक्योत्थबुद्धिवृत्त्यभिव्यक्तश्चिदात्मा सहायसामर्थ्यादज्ञानादिनिवृत्तिहेतुरित्यर्थः। बुद्धीद्धबोधस्याज्ञानादिनिवर्तकत्वमुक्त्वा बोधेद्धबुद्धेस्तन्निवर्तकत्वमिति पक्षान्तरमाह -- ज्ञानेति। देहाद्यव्यक्तान्तानात्मवर्गातिरिक्तवस्तुगोचरत्वमाह -- विवेकेति। भगवति सदा विहितया भक्त्या तस्य प्रसादोऽनुग्रहः स एव स्नेहस्तेनासेचनद्वाराऽस्योत्पत्तिमाह -- भक्तीति। मय्येव भावनायामभिनिवेशो वातस्तेन प्रेरितोऽयं जायते? नहि वातप्रेरणमन्तरणादौ दीपस्योत्पत्तिरित्याह -- मद्भावनेति। ब्रह्मचर्यमष्टाङ्गमादिशब्देन शमादिग्रहः। तेन हेतुनाहितसंस्कारवती या प्रज्ञा तथाविधवर्तिनिष्ठश्चायं नहि वर्त्यतिरेकेण दीपो निर्वर्त्यते तदा -- ब्रह्मचर्येति। न चाधारादृते दीपस्योत्पत्तिरदृष्टत्वादित्याह -- विरक्तेति। यद्विषयेभ्यो व्यावृत्तं चित्तं रागाद्यकलुषितं तदेव निवातमपवारकं तत्र स्थितत्वमस्य दर्शयति -- विषयेति। भास्वतेति विशेषणं विशदयति -- नित्येति। सदातनं चित्तैकाग्र्यं तत्पूर्वकं ध्यानं तेन जनितं सम्यग्दर्शनं फलं तदेव भास्तद्वता तत्पर्यन्तेनेत्यर्थः। तेनाज्ञाने सकार्ये निवृत्ते भगवद्भावः स्वयमेव प्रकाशीभवतीति मत्वा व्याख्यातमेव पदमनुवदति -- ज्ञानेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.11।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.11।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.11।।तेषाम् एव अनुग्रहार्थम् अहम् आत्मभावस्थः तेषां मनोवृत्तौ विषयतया अवस्थितो मदीयान् कल्याणगुणगणान् च आविष्कुर्वन् मद्विषयज्ञानाख्येन भास्वता दीपेन ज्ञानविरोधिप्राचीनकर्मरूपाज्ञानजं मद्व्यतिरिक्तविषयप्रावण्यरूपं पूर्वाभ्यस्तं तमः नाशयामि।एवं सकलेतरविसजातीयं भगवदसाधारणं श्रृण्वतां निरतिशयानन्दजनकं कल्याणगुणगणयोगं तदैश्वर्यविततिं च श्रुत्वा तद्विस्तारं श्रोतुकामः अर्जुन उवाच --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.11।। --,तेषामेव कथं नु नाम श्रेयः स्यात् इति अनुकम्पार्थं दयाहेतोः अहम् अज्ञानजम् अविवेकतः जातं मिथ्याप्रत्ययलक्षणं मोहान्धकारं तमः नाशयामि? आत्मभावस्थः आत्मनः भावः अन्तःकरणाशयः तस्मिन्नेव स्थितः सन् ज्ञानदीपेन विवेकप्रत्ययरूपेण भक्तिप्रसादस्नेहाभिषिक्तेन मद्भावनाभिनिवेशवातेरितेन ब्रह्मचर्यादिसाधनसंस्कारवत्प्रज्ञावर्तिना विरक्तान्तःकरणाधारेण विषयव्यावृत्तचित्तरागद्वेषाकलुषितनिवातापवरकस्थेन नित्यप्रवृत्तैकाग्र्यध्यानजनितसम्यग्दर्शनभास्वता ज्ञानदीपेनेत्यर्थः।।यथोक्तां भगवतः विभूतिं योगं च श्रुत्वा अर्जन उवाच --,अर्जन उवाच --,
───────────────────
【 Verse 10.12 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् | पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān | puruṣaṁ śāśvataṁ divyam ādidevamajaṁ vibhum ||
▸ Glossary: Arjuna uvāca: Arjuna says; paraṁ: supreme; brahman: truth; paraṁ: supreme; dhāma: light; pavitraṁ: pure; paramaṁ: supreme; bhavān: yourself; puruṣaṁ: person; śāśvataṁ: original; divyam: godly; ādidevam: original god; ajaṁ: unborn; vibhum: glorious
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.12 Arjuna says: You are the supreme truth, supreme suste- nance, supremely purifier, the primal, eternal and glorious Lord.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.12।।अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म? परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत? दिव्य पुरुष? आदिदेव? अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सबकेसब ऋषि? देवर्षि नारद? असित? देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.12।। अर्जुन ने कहा आप परम ब्रह्म? परम धाम और परम पवित्र हंै सनातन दिव्य पुरुष? देवों के भी आदि देव? जन्म रहित और सर्वव्यापी हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.12 परम् supreme? ब्रह्म Brahman? परम् supreme? धाम abode? पवित्रम् purifier? परमम् supreme? भवान् Thou? पुरुषम् Purusha? शाश्वतम् eternal? दिव्यम् divine? आदिदेवम् primeval God? अजम् unborn? विभुम् omnipresent.Commentary Param Brahma The highest Self. The word Param indicates the pure and attributeless Absolute? free from the limiting adjuncts. It is Satchidananda Brahman. The inferior Brahman is the Brahman with alities (Saguna) or Isvara? Brahman with the limiting adjuncts or the chosen object of meditation by the devotees.Param Dhama means Param Tejah or the supreme light. From the Creator down to the blade of grass the Supreme Being is the support or substratum. Therefore He is known as the supreme abode.Adideva The primeval God or the original God Who existed before all other gods. This God is Para Brahman Itself. It is selfluminous.Pavitram Paramam Supreme purifier. The sacred rivers and holy places of pilgrimage can remove only the sins but Para Brahman can destroy all sins and ignorance? the root cause of all sins. Therefore Para Brahman or the Supreme Self is the supreme purifier.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.12. - 10.13. Arjuna said You are the Supreme Brahman, Supreme Abode, Supreme Purifier. All the seers and also the divine seer Narada, Asita Devala, Vyasa describe You as the Eternal Divine Soul, the unborn, all-manifesting First-God. You too say so to me.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.12 Arjuna asked: Thou art the Supreme Spirit, the Eternal Home, the Holiest of the Holy, the Eternal Divine Self, the Primal God, the Unborn and the Omnipresent.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.12 - 10.13 Arjuna said You are Supreme Brahman, the Supreme Light, and the Supreme Sanctifier. All the seers proclaim You as the eternal, divine Person, the Primal Lord, the unborn and all-pervading. So also proclaim the divine sages Narada, Asita, Devala and Vyasa. You Yourself also proclaim this.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.12-10.13 Arjuna said You are the supreme Brahman, the supreme Light, the supreme Sanctifier. All the sages as also the divine sage Narada, Asita, Devala and Vyasa [Although Narada and the other sages are already mentioned by the words 'all the sages', still they are named separately because of their eminence. Asita is the father of Devala.] call You the eternal divine Person, the Primal God, the Birthless, the Omnipresent; and You Yourself verily tell me (so).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.12 Arjuna said Thou art the Supreme Brahman, the supreme abode (or the supreme light), the supreme purifier, eternal, divine Person, the primeval God, unborn andn omnipresent.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.12 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.12 - 10.13 Arjuna said You are He whom the Srutis proclaim as the Supreme Brahman, the Supreme Light, the Supreme Sanctifier. Thus the Srutis assert: 'From whom all these beings are born, by whom, when born, they live and unto whom they go when they perish - desire to know that well. This is Brahman' (Tai. U., 3.1.1); 'He who knows Brahman attains the Highest' (Ibid., 2.1.1); and 'He who knows the Supreme Brahman becomes the Brahman' (Mun. U., 3.2.9). Likewise He is the Supreme Light. The term 'Dhaman' connotes light. He is the Supreme Light as taught (in the Upanisads): 'Now, the light which shines higher than this heaven ৷৷.' (Cha. U., 3.13. 7); 'Attaining the Supreme Light. He appears with His own form' (Ibid., 8.12.2); 'The gods worship Him as the Light of lights' (Br. U., 4.4.16). So also He is the Supreme Sanctifier: He makes the meditator bereft of all the impurities, and also destroyes them without any trace. The Srutis declares: 'As water clings not to the leaf of a lotus-flower, so evil deeds cling not to him who knows thus' (Cha. U., 4.14.3): 'Just as the fibre of Isika reed (reed-cotton) laid on a fire is burnt up, so also all his sins are burnt up' (Ibid., 5.24.3); and 'Narayana is Supreme Brahman, Narayana is Supreme Light, Narayana is Supreme Self' (Ma. Na., 9.4).
Sages are those who know in reality the higher truth (the Supreme Brahman), and the lower truth (individual selves); they speak of You as the eternal Divine Person, Primal Lord, the unborn and all-pervading. So also divine sage Narada, Asita, Devala and Vyasa declare: 'This Narayana, Lord of Sri, the resident of the Milk Ocean, has come to the city of Mathura abandoning his Serpent-couch.' 'Where Madhusudana is, there is the blessed Dvaravati. He is the Lord Himself, the ancient One and Eternal Dharma (Ma. Bh. Vana. 88. 24-25). Those who know the Vedas and those who know the self declare the great-minded Krsna to be the eternal Dharma. Of all sanctifiers, Govinda is said to be the most sanctifying, the most auspicious among the auspicious. The lotus-eyed God of gods, the eternal, abides as the three worlds ৷৷. Hari who is beyond thought, abides thus. Madhusudana is there alone' (Ma. Bha. Vana., 88.24-28). Similarly it is stated: 'O Arjuna, where the divine, the eternal Narayana the Supreme Self is, there the entire universe, the sacred water and the holy shrines are to be found. That is sacred, that is Supreme Brahman, that is sacred waters, that is the austerity grove ৷৷. there dwell the divine sages, the Siddhas and all those rich in austerities where the Primal Lord, the agent Yogin Madhusudana dwells. It is the most sacred among the sacred. For you, let there be no doubt about this' (Ibid., 90.28-32); 'Krsna Himself is the origin and dissolution of all beings. For, this universe, consisting of sentient and non-sentient entities, was generated for the sake of Krsna' (Ma. Bha. Sabha., 38.23). And you yourself say so in the passage beginning with 'Earth, water, fire, ether, mind, intellect and Ahankara - this Prakrti, which is divided eightfold, is Mine' (7.4) and ending with 'I am the origin of all; from Me proceed everything' (10.8).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.12 Bhavan, You; are the param brahma, supreme Brahman, the supreme Self; the param dhama, supreme Light; the paramam pavitram, supreme Sanctifier. Sarve, all; rsayah, the sages-Vasistha and others; tatha, as also; the devarisih, divine sage; naradah, Narada; Asita and Devala ahuh, call; tvam, You; thus: Sasvatam, the eternal; divyam, divine; purusam, Person; adi-devam, the Primal God, the God who preceded all the gods; ajam, the birthless; vibhum, the Omnipresent-capable of assuming diverse forms. And even Vyasa also speaks in this very way. Ca, and; svayam, You Yourself; eva, verily; bravisi, tell; me, me (so).
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.12।। See commentary under 10.13.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.12।।मच्चित्तत्वादिप्रकारभक्तिद्वाराऽविकम्पयोगसाधनभूतौ विभूतियोगौ संक्षेपतः श्रुत्वा विस्तरश्रवणोत्सुकः अर्जुन उवाच -- परमिति। भवान् वासुदेवः परं अक्षरं निरञ्जनं निर्गुणं ब्रह्म। परस्य ब्रह्मणो लक्षणमाह। परं धाम परं तेजः सूर्यादितेजसामपि तेजः।यस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति श्रुतेः। अस्यार्थस्य निरञ्जने ब्रह्मणि सामञ्जस्यमभिप्रेत्य परं धाम परं स्थानमित्यर्थ आचार्यैरुपेक्षितः। पवित्रं पावनं परमं प्रकृष्टं ज्ञानमात्रेण सवासनाऽविद्याकामकर्मेभ्यो मोचकत्वात्। एतादृशं परं ब्रह्म भवानेव नान्यः। नन्वेत्त्वया कुतो ज्ञातमिति चेदाप्तवाक्यादित्याह। पुरुषं परि शयं पूर्णं परमात्मानं अतएव शाश्वतं सर्वदैकरसं दिव्यं दिवि परमे व्योम्नि हृदयाकाशे भवं दिव्यम्। आदिदेवं सर्वेषां ब्रह्मादिदेवानामादिभवं अतएवाजं। विभुं विभवनशीलं। विभवनमित्यस्य विविधं भवनमिति व्यापनमिति वार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.12।।एवं भगवतो विभूतिं योगं च श्रुत्वा परमोत्कण्ठितः अर्जुन उवाच -- परं ब्रह्म परं धामं आश्रयः प्रकाशो वा। परमं पवित्रं पावनं च भवानेव। यतः पुरुषं परमात्मानं शाश्वतं सर्वदैकरूपं दिवि परमे व्योम्नि,स्वस्वरूपे भवं दिव्यं सर्वप्रपञ्चातीतमादि च सर्वकारणं देवं च द्योतनात्मकं स्वप्रकाशमादिदेवं अतएवाजं विभुं सर्वगतं त्वामाहुरिति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.12 -- 10.13।।एवं एतां विभूतिं योगं चेत्यादिना विभूतिज्ञानस्य फलोदर्कं श्रुत्वा तत्प्राप्त्युत्सुकः प्रथमं स्तुत्या भगवन्तमावर्जयन्नर्जुन उवाच -- परमिति। परं ब्रह्म नत्वपरमुपास्यम्।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते इति श्रुतेः। परं धाम ज्योतिः नत्वपरं वृत्तिरूपं ज्ञानम्। एतस्यह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव इति श्रुतेर्वृत्तिरूपत्वात्। परमं पवित्रं न तु तीर्थादिवदपरमं भवान्। तत्र मानमाह -- पुरुषमिति सार्धेन। पुरुषं देहान्तरस्थम्। शाश्वतं नित्यं। दिव्यं दिवि हार्दाकाशे आविर्भूतम्। आदिदेवं सूत्रात्मनोऽप्याद्यम्। अतएव अजं विभुं व्यापकम्। त्वां ऋषय आहुरिति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.12।।एवंन मे विदुः सुरगणाः [10।2] इत्यादिना सर्वेषां स्वावेदनयुक्तानांयो मामजमनादिं च [10।3] इत्यादिना स्वज्ञानस्योत्तमत्वं प्रतिपादितम्। ततः सर्वभावोत्पत्तिः स्वत उक्ता स्वरूपा या? स्वस्वविभूतिज्ञस्य स्वभजने स्वप्राप्तिमुक्तवान्? एतत्सर्वजिज्ञासुरर्जुनः प्रभुं विज्ञापयति सप्तभिः। विज्ञप्तेरपि भगवदात्मत्वाय षड्गुणधर्मिसमसङ्ख्यैः श्लोकैर्विज्ञापयति -- अर्जुन उवाच। परं ब्रह्मेति। परं पुरुषोत्तमाख्यं ब्रह्म बृहद्व्यापकं परं धाम पुरुषोत्तमात्मकतेजोरूपं रमणात्मगृहात्मकं वा? परमं पवित्रं सर्वोत्कृष्टं सर्वपावनम्? एतत्सर्वरूपो भवान् सत्यमेवेत्यर्थः। कथमेवमवगतं इत्यत आह -- पुरुषमिति। पुरुषं पुरुषोत्तमम्। अन्यत्रापि तथात्वमाशङ्क्य शाश्वतं नित्यमिति। अक्षरादिष्वपि नित्यत्वमाशङ्क्य दिव्यमित्याह क्रीडनैकरूपम्। अवतारादिष्वपि तथात्वमाशङ्क्याह -- आदिदेवमिति। मूलरूपमित्यर्थः। परिदृश्यमानजन्माद्याशङ्कायामाह -- अजमिति। जन्मरहितम्। जन्माभावे जन्मप्रतीतिः कथं इत्यत आह -- विभुमिति। समर्थमित्यर्थः। तथाप्रतीतिकरणसमर्थमिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.12।। संक्षेपेणोक्ता विभूतीर्विस्तरेण जिज्ञासुर्भगवन्तं स्तुवन्नर्जुन उवाच -- परं ब्रह्मेति सप्तभिः। परं ब्रह्म च? परं धाम च आश्रयः? परमं च पवित्रं भवानेव। कुत इत्यत आह। यतः शाश्वतं नित्यं पुरुषं तथा दिव्यं द्योतनात्मकं स्वप्रकाशं च आदिश्चासौ देवश्च तं। देवानामादिभूतमित्यर्थः। तथा अजमजन्मानं विभुं व्यापकं त्वामेवाहुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.12 -- 10.14।।एवं सकलेतरविसजातीयं भगवतो योगप्रभावं तादृशविभूतिहेतुत्वं स्वानन्यजनकात्मत्वं च निशम्य तद्विस्तारं ज्ञातुकामो भगवन्तं स्तुवन् अर्जुन उवाच -- परं ब्रह्मेति सप्तभिः धर्मधर्म्यभिप्रायेण। इदं च सर्वं श्रुतेरिव प्रतिवाक्यभूतं भवान् परं ब्रह्मेत्यादि। त्वामेवाहुः सर्वे ऋषयः? तथा महाभगवदीयो मर्यादापुष्टिभक्तः देवर्षिर्नारदः आह असितो देवलो व्यासश्च -- एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः। नागपर्यङ्कमुत्सृज्य ह्यागतो मधुरां पुरीम् [म.भा.3।88।24] इति भारते।कृष्ण एव हि भूतानामुत्पत्तिरपि चाव्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम् इत्यादीनि भूयांसि महर्षिवचनानि श्रूयन्ते। भागवते [10।37।10] देवर्षिवचनं -- कृष्ण कृष्ण प्रमेयात्मन्योगेश जगदीश्वर इत्यादि। स्वयं च ब्रवीषिअहं सर्वस्य प्रभवः [10।8] इत्यादि। पुरुषोत्तम एव स्वमुखेन स्वस्वरूपं स्वमाहात्म्यं च वदति? नान्य इति। तदेतत्सर्वोक्तत्वात्सत्यमेव मन्ये यन्मां त्वं च वदसि। अतो भगवन् षडगुणपूण ज्ञानं त्वय्येव गुणः त्वद्दत्तमेवान्यत्रोद्भवतीति नान्ये देवा दानवाश्च ते व्यक्तिं अनन्यसाधारणं योगप्रभावं तत्तद्विभूतिरूपां व्यक्तिं च ते विदुः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.12।।ऊपर कही हुई भगवान्की विभूतिको और योगको सुनकर अर्जुन बोला --, आप परमब्रह्मपरमात्मा? परमधाम -- परमतेज और परमपावन हैं तथा आप नित्य और दिव्य पुरुष हैं अर्थात् देवलोकमें रहनेवाले अलौकिक पुरुष हैं एवं आप सब देवोंसे पहले होनेवाले आदिदेव? अजन्मा और व्यापक हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.12।। व्याख्या -- परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् -- अपने सामने बैठे हुए भगवान्की स्तुति करते हुए अर्जुन कहते हैं कि मेरे पूछनेपर जिसको आपने परम ब्रह्म (गीता 8। 3) कहा है? वह परम ब्रह्म आप ही हैं। जिसमें सब संसार स्थित रहता है? वह परम धाम अर्थात् परम स्थान आप ही हैं (गीता 9। 18)। जिसको पवित्रोंमें भी पवित्र कहते हैं -- पवित्राणां पवित्रं यः वह महान् पवित्र भी आप ही हैं।पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं ৷৷. स्वयं चैव ब्रवीषि मे -- ग्रन्थोंमें ऋषियोंने? (टिप्पणी प0 549.1) देवर्षि नारदने (टिप्पणी प0 549.2)? असित और उनके पुत्र देवल ऋषिने (टिप्पणी प0 549.3) तथा महर्षि व्यासजीने (टिप्पणी प0 549.4) आपको शाश्वत? दिव्य पुरुष? आदिदेव? अजन्मा और विभु कहा है।आत्माके रूपमें शाश्वत (गीता 2। 20)? सगुणनिराकारके रूपमें दिव्य पुरुष (गीता 8। 10)? देवताओँ और महर्षियों आदिके रूपमें आदिदेव (गीता 10। 2)? मूढ़लोग मेरेको अज नहीं जानते (गीता 7। 25) तथा असम्मूढ़लोग मेरेको अज जानते हैं (गीता 10। 3 ) -- इस रूपमें अज और मैं अव्यक्तरूपसे सारे संसारमें व्यापक हूँ (गीता 9। 4) -- इस रूपमें विभु स्वयं आपने मेरे प्रति कहा है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.12।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.12।।निरस्ताशेषविशेषं निरुपाधिकं सोपाधिकं च सर्वात्मत्वादि भगवतो रूपं तद्धीफलं च श्रुत्वा निरुपाधिकरूपस्य प्राकृतबुद्ध्यनवगाह्योक्तिपूर्वकं मन्दानुग्रहार्थं सर्वदा सर्वबुद्धिग्राह्यं सोपाधिकं रूपं विस्तरेण,श्रोतुमिच्छन्पृच्छतीत्याह -- यथोक्तामिति। परं ब्रह्म भवानिति लक्ष्यनिर्देशः। तस्य लक्षणार्थं परं धामेत्यादिविशेषणत्रयम्। धामशब्दस्य स्थानवाचित्वं व्यावर्तयन्व्याचष्टे तेज इति। तस्य चैतन्यस्य परमत्वं जन्मादिराहित्येन कौटस्थ्यम्। प्रकृष्टं पावनमत्यन्तशुद्धत्वमुच्यते। यदेवंलक्षणं परं ब्रह्म तद्भवानेव नान्य इत्यर्थः। कुतस्त्वमेवमज्ञासीरित्याशङ्क्याप्तवाक्यादित्याह -- पुरुषमिति। दिवि परमे व्योम्नि भवतीति दिव्यस्तं सर्वप्रपञ्चातीतं दीव्यति द्योतत इति देवः स चादिः सर्वमूलत्वादत एवाजस्तं त्वां सर्वगतमाहुरिति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्मविभुशब्दावैकार्थ्यपरिहाराय क्रमेण सप्रमाणकं व्याचष्टे -- ब्रह्मेति। परं वस्तु ब्रह्मेति,कस्मादुच्यते बृहतिं पूर्णं भवति बृंहयति पूरयति चान्यान्। बृहतेर्मन्प्रत्ययोऽमागमश्च। ईश्वरो ब्रह्मणोऽन्यः स कथं परं ब्रह्मेत्युच्यते इत्यत उक्तम् -- परममिति। विविधमनेकरूपत्वेनाभवत्। मेहनावतः सेचकस्य भगवतः प्रथमं रूपं विभु प्रभु चेत्येतदनूद्य व्याख्यायते। प्राभवत्समर्थोऽभवदिति प्रभुः विविधोऽभवदिति विभुः। सोऽकामयत इति विविधभवने श्रुत्यन्तरम्। विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् [अष्टा.3।2।180] इति च स्मृतिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्म परिपूर्णम्। अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म ৷৷. बृहद्बृहत्या बृंहयति [अ.शिर.4] इति च श्रुतिः। बृह बृहि वृद्धाविति पठन्ति।परमं यो महद्ब्रह्म [म.भा.13।149।9] इति च। विविधमासीदिति विभुः। तथा हि वारुणशाखायाम् -- विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतः [ऋक्सं.2।7।2।5] इति स ह्येव प्रभावाद्विविधोऽभवत् इति। सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय [तै.उ.2।6] इत्यादेश्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.12।।अर्जुन उवाच -- परं ब्रह्म परं धाम परमं पवित्रम् इति यं श्रुतयो वदन्ति स हि भवान्।यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते? येन जातानि जीवन्ति? यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति? तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मेति (तै0 उ0 3।1)ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै0 उ0 2।1)स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति (मु0 उ0 3।2।9) इति।तथा परं धाम धामशब्दो ज्योतिर्वचनः परं ज्योतिःअथ यदतः परो दिव्यो ज्योतिर्दीप्यते (छा0 उ0 3।13।7)परं ज्योतिरूपसंपद्यस्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते (छा0 उ0 8।12।2)तद् देवा ज्योतिषां ज्योतिः (बृ0 उ0 4।4।16) इति।तथा च परमं पवित्रं परमं पावनं स्मर्तुःअशेषकल्मषाश्लेषकरं विनाशकरं च।यथा पुष्करपलाश आपो न श्िलष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्िलष्यते (छा0 उ0 4।14।3)तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैव्ँहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते (छा0 उ0 5।24।3)।नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः।। (महाभा0 9।4) इति हि श्रुतयो वदन्ति।ऋषयः च सर्वे परावरतत्त्वयाथात्म्यविदः त्वाम् एव शाश्वतं दिव्यं पुरुषम् आदिदेवम् अजं विभुम् आहुः। तथा एव देवर्षिः नारदः असितो देवलो व्यासः च।एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः। नागपर्यङ्कमुत्सृज्य ह्यागतो मथुरां पुरीम्।।पुण्या द्वारवती तत्र यत्रास्ते मधुसूदनः। साक्षाद्देवः पुराणोऽसौ स हि धर्मः सनातनः।।ये च वेदविदो विप्रा चे चाध्यात्मविदो जनाः। ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम्।।पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते। पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां च मङ्गलम्।।त्रैलोक्ये पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः। आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः।। (महा0 वन0 88।2428) तथायत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः। तत्र कृत्स्नं जगत्पार्थ तीर्थान्यायतनानि च।।तत्पुण्यं तत्परं ब्रह्म तत्तीर्थं तत्तपोवनम्। ৷৷. तत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः।।आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः। पुण्यानामपि तत्पुण्यं माभूत्ते संशयोऽत्र वै।। (महा0 वन0 90।2832)कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम्।। (महा0 सभा0 38।23) इति।तथा स्वयम् एव ब्रवीषि चभूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।। (गीता 7।4) इत्यादिना?अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते (गीता 10।8) इत्यन्तेन।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.12।। --,परं ब्रह्म परमात्मा परं धाम परं तेजः पवित्रं पावनं परमं प्रकृष्टं भवान्। पुरुषं शाश्वतं नित्यं दिव्यं दिवि भवम् आदिदेवं सर्वदेवानाम् आदौ भवम् आदिदेवम् अजं विभुं विभवनशीलम्।।ईदृशम् --,
───────────────────
【 Verse 10.13 】
▸ Sanskrit Sloka: आहुस्त्वामृषय: सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा | असितो देवलो व्यास: स्वयं चैव ब्रवीषि मे ||
▸ Transliteration: āhustvāmṛṣayaḥ sarve devarṣiṛnāradastathā | asito devalo vyāsaḥ svayaṁ caiva bravīṣi me ||
▸ Glossary: āhuh: say; tvām: to you; ṛṣayaḥ: sages; sarve: all; devarṣiḥ: sage of gods; nāradaḥ: Nārada; tathā: and; asitaḥ: Asita; devalaḥ: Devala; vyāsaḥ: Vyāsa; svayaṁ: personally; ca: and; eva: surely; bravīṣi: explain; me: to me
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.13 All the sages like Nārada, Asita, Devala, and Vyāsa have explained this. Now you are personally explaining to me.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.13।।अर्जुन बोले -- परम ब्रह्म? परम धाम और महान् पवित्र आप ही हैं। आप शाश्वत? दिव्य पुरुष? आदिदेव? अजन्मा और विभु (व्यापक) हैं -- ऐसा सबकेसब ऋषि? देवर्षि नारद? असित? देवल तथा व्यास कहते हैं और स्वयं आप भी
Chapter 10 (Part 7)
मेरे प्रति कहते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.13।। ऐसा आपको समस्त ऋषिजन कहते हैं वैसे ही देवर्षि नारद? असित? देवल ऋषि तथा व्यास और स्वयं आप भी मेरे प्रति कहते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.13 आहुः (they) declared? त्वाम् Thee? ऋषयः the Rishis? सर्वे all? देवर्षिः Devarshi? नारदः Narada? तथा also? असितः Asita? देवलः Devala? व्यासः Vyasa? स्वयम् Thyself? च and? एव even? ब्रवीषि (Thou) sayest? मे to me.Commentary Rishi is a holy sage of disciplined mind and senses.Devarshi A divine sage more highly evolved than a Rishi.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.12. - 10.13. Arjuna said You are the Supreme Brahman, Supreme Abode, Supreme Purifier. All the seers and also the divine seer Narada, Asita Devala, Vyasa describe You as the Eternal Divine Soul, the unborn, all-manifesting First-God. You too say so to me.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.13 So have said the seers and the divine sage Narada; as well as Asita, Devala and Vyasa; and Thou Thyself also sayest it.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.12 - 10.13 Arjuna said You are Supreme Brahman, the Supreme Light, and the Supreme Sanctifier. All the seers proclaim You as the eternal, divine Person, the Primal Lord, the unborn and all-pervading. So also proclaim the divine sages Narada, Asita, Devala and Vyasa. You Yourself also proclaim this.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.12-10.13 Arjuna said You are the supreme Brahman, the supreme Light, the supreme Sanctifier. All the sages as also the divine sage Narada, Asita, Devala and Vyasa [Although Narada and the other sages are already mentioned by the words 'all the sages', still they are named separately because of their eminence. Asita is the father of Devala.] call You the eternal divine Person, the Primal God, the Birthless, the Omnipresent; and You Yourself verily tell me (so).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.13 All the sages have thus declared Thee, as also the divine sage Narada; so also Asita, Devala and Vyasa; and now Thou Thyself sayest so to me.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.13 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.12 - 10.13 Arjuna said You are He whom the Srutis proclaim as the Supreme Brahman, the Supreme Light, the Supreme Sanctifier. Thus the Srutis assert: 'From whom all these beings are born, by whom, when born, they live and unto whom they go when they perish - desire to know that well. This is Brahman' (Tai. U., 3.1.1); 'He who knows Brahman attains the Highest' (Ibid., 2.1.1); and 'He who knows the Supreme Brahman becomes the Brahman' (Mun. U., 3.2.9). Likewise He is the Supreme Light. The term 'Dhaman' connotes light. He is the Supreme Light as taught (in the Upanisads): 'Now, the light which shines higher than this heaven ৷৷.' (Cha. U., 3.13. 7); 'Attaining the Supreme Light. He appears with His own form' (Ibid., 8.12.2); 'The gods worship Him as the Light of lights' (Br. U., 4.4.16). So also He is the Supreme Sanctifier: He makes the meditator bereft of all the impurities, and also destroyes them without any trace. The Srutis declares: 'As water clings not to the leaf of a lotus-flower, so evil deeds cling not to him who knows thus' (Cha. U., 4.14.3): 'Just as the fibre of Isika reed (reed-cotton) laid on a fire is burnt up, so also all his sins are burnt up' (Ibid., 5.24.3); and 'Narayana is Supreme Brahman, Narayana is Supreme Light, Narayana is Supreme Self' (Ma. Na., 9.4).
Sages are those who know in reality the higher truth (the Supreme Brahman), and the lower truth (individual selves); they speak of You as the eternal Divine Person, Primal Lord, the unborn and all-pervading. So also divine sage Narada, Asita, Devala and Vyasa declare: 'This Narayana, Lord of Sri, the resident of the Milk Ocean, has come to the city of Mathura abandoning his Serpent-couch.' 'Where Madhusudana is, there is the blessed Dvaravati. He is the Lord Himself, the ancient One and Eternal Dharma (Ma. Bh. Vana. 88. 24-25). Those who know the Vedas and those who know the self declare the great-minded Krsna to be the eternal Dharma. Of all sanctifiers, Govinda is said to be the most sanctifying, the most auspicious among the auspicious. The lotus-eyed God of gods, the eternal, abides as the three worlds ৷৷. Hari who is beyond thought, abides thus. Madhusudana is there alone' (Ma. Bha. Vana., 88.24-28). Similarly it is stated: 'O Arjuna, where the divine, the eternal Narayana the Supreme Self is, there the entire universe, the sacred water and the holy shrines are to be found. That is sacred, that is Supreme Brahman, that is sacred waters, that is the austerity grove ৷৷. there dwell the divine sages, the Siddhas and all those rich in austerities where the Primal Lord, the agent Yogin Madhusudana dwells. It is the most sacred among the sacred. For you, let there be no doubt about this' (Ibid., 90.28-32); 'Krsna Himself is the origin and dissolution of all beings. For, this universe, consisting of sentient and non-sentient entities, was generated for the sake of Krsna' (Ma. Bha. Sabha., 38.23). And you yourself say so in the passage beginning with 'Earth, water, fire, ether, mind, intellect and Ahankara - this Prakrti, which is divided eightfold, is Mine' (7.4) and ending with 'I am the origin of all; from Me proceed everything' (10.8).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.13 Bhavan, You; are the param brahma, supreme Brahman, the supreme Self; the param dhama, supreme Light; the paramam pavitram, supreme Sanctifier. Sarve, all; rsayah, the sages-Vasistha and others; tatha, as also; the devarisih, divine sage; naradah, Narada; Asita and Devala ahuh, call; tvam, You; thus: Sasvatam, the eternal; divyam, divine; purusam, Person; adi-devam, the Primal God, the God who preceded all the gods; ajam, the birthless; vibhum, the Omnipresent-capable of assuming diverse forms. And even Vyasa also speaks in this very way. Ca, and; svayam, You Yourself; eva, verily; bravisi, tell; me, me (so).
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.13।। अर्जुन वैदिक साहित्य से परिचित था। वह यहाँ कहता है कि प्राचीन ऋषियों ने अनन्त सनातन सत्य को जिन शब्दों के द्वारा सूचित किया है? उससे वह परिचित है? जैसे परं ब्रह्म? परं धाम? परम पवित्र आदि। परन्तु उसने अब तक यही समझा था कि ये सब परम सत्य के गुण हैं। इसलिए? जब वह भगवान् को इन्हीं शब्दों का प्रयोग स्वयं के लिए करते हुए सुनता है? तब वह कुन्तीपुत्र आश्चर्यचकित रह जाता है। उसे समझ में नहीं आता कि वह अपने रथसारथि श्रीकृष्ण को विश्व के आदिकारण के रूप में किस प्रकार जानेव्यावहारिक बुद्धि का व्यक्ति होने के नाते अर्जुन को श्रीकृष्ण के स्वरूप को समझने के लिए अधिक तथ्यों की जानकारी की आवश्यकता थी। हम देखेंगे कि उसकी मांग को पूर्ण करने हेतु इसी अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण ने पर्याप्त सूचनाएं और तथ्य प्रस्तुत किये हैं। परन्तु? अर्जुन को सन्तुष्ट करने के स्थान पर वह जानकारी उसकी उत्सुकता को द्विगुणित कर देती है? और वह बाध्य होकर भगवान् से उनके विश्वरूप को दिखाने की मांग प्रस्तुत करता है भक्तवत्सल करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अगले अध्याय में अपने विश्वरूप को दर्शाकर अर्जुन को कृतार्थ कर देते हैं।यद्यपि अर्जुन ने इसके पूर्व भी परम पुरुष आदि शब्दों को ऋषियों से सुना था? किन्तु उसे वे अर्थहीन और निष्प्रयोजन ही प्रतीत हुए थे। उसका आश्चर्य इन शब्दों में स्पष्ट रूप से व्यक्त होता है कि? आप भी मेरे प्रति ऐसा ही कहते हैं। यहाँ उनके कुछ आश्चर्यचकित एवं भ्रमित होने का अवसर इसलिए था कि वह समझ नहीं पाया कि उसके समकालीन श्रीकृष्ण जो उसके समक्ष खड़े थे? जिन्हें वह कई वर्षों से जानता था और जो उसके सम्बन्धी भी थे किस प्रकार अनन्त? परम? जन्मरहित और सर्वव्यापी हो सकते हैं।अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को अपने चर्म चक्षुओं से देखता है और इसलिए उसे उनका केवल शरीर ही दिखाई देता है। सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण स्वयं को आत्मस्वरूप में ही प्रकट करते हैं? और न कि समाज के एक सदस्य के रूप में। गीता के उपदेष्टा श्रीकृष्ण परमात्मा हैं? वसुदेव के पुत्र या गोपियों के प्रियतम नहीं। श्रीकृष्ण को सदैव मित्र या प्रेमी अथवा एक विश्वसनीय बुद्धिमान्? कूटनीतिज्ञ के रूप में देखते रहने से अर्जुन आत्मस्वरूप श्रीकृष्ण को पहचान नहीं पाया। यही उसके आश्चर्य और भ्रम का कारण था।अगला श्लोक अर्जुन में स्थित एक जिज्ञासु साधक के भाव को स्पष्ट करता है --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.13।।ईदृशं त्वामेव ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः सर्व आहुः। नारदादीनां श्रेष्ठ्यद्योतनार्थं पृथग्ग्रहणम्। किमन्यैरिति सूचयन्नाह -- स्वयं चैव ब्रवीषीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.13।।आहुः कथयन्ति त्वामनन्तमहिमानं ऋषयस्तत्त्वज्ञाननिष्ठाः सर्वे भृगुवसिष्ठादयः। तथा देवर्षिर्नारदः असितो देवलश्च धौम्यस्य ज्येष्ठो भ्राता व्यासश्च भगवान् कृष्णद्वैपायनः। एतेऽपि त्वां पूर्वोक्तविशेषणं मे मह्यमाहुः साक्षात्किमन्यैर्वक्तृभिः। स्वयमेव त्वं च मह्यं ब्रवीषि। अत्र ऋषित्वेऽपि साक्षाद्वक्तृ़णां नारदादीनामतिविशिष्टत्वात्पृथग्ग्रहणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.12 -- 10.13।।एवं एतां विभूतिं योगं चेत्यादिना विभूतिज्ञानस्य फलोदर्कं श्रुत्वा तत्प्राप्त्युत्सुकः प्रथमं स्तुत्या भगवन्तमावर्जयन्नर्जुन उवाच -- परमिति। परं ब्रह्म नत्वपरमुपास्यम्।तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते इति श्रुतेः। परं धाम ज्योतिः नत्वपरं वृत्तिरूपं ज्ञानम्। एतस्यह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव इति श्रुतेर्वृत्तिरूपत्वात्। परमं पवित्रं न तु तीर्थादिवदपरमं भवान्। तत्र मानमाह -- पुरुषमिति सार्धेन। पुरुषं देहान्तरस्थम्। शाश्वतं नित्यं। दिव्यं दिवि हार्दाकाशे आविर्भूतम्। आदिदेवं सूत्रात्मनोऽप्याद्यम्। अतएव अजं विभुं व्यापकम्। त्वां ऋषय आहुरिति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.13।।एवंविधं त्वां सर्वे वदन्तीत्यनेनावगतमित्याह -- आहुरिति। सर्वे ऋषयो भृग्वादयः? तथा देवर्षिः देवानामपि मन्त्रद्रष्टा नारदः सर्वमोक्षदः। असितः भगवद्धर्मरूपः। देवलः देवानुग्रहकृत्। व्यासः ज्ञानावतारः च पुनः स्वयमेव त्वमेव साक्षान्मे मह्यम्अहमादिर्हि देवानाम् [10।2] इत्यादिना ब्रवीषि। अतस्त्वां तथा जानामीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.13।।के त इत्यत आह -- आहुरिति। ऋषयः भृग्वादयः सर्वे देवर्षिर्नारदः असितश्च देवलश्च व्यासश्च स्वयं त्वमेव साक्षान्मे मह्यं ब्रवीषि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.12 -- 10.14।।एवं सकलेतरविसजातीयं भगवतो योगप्रभावं तादृशविभूतिहेतुत्वं स्वानन्यजनकात्मत्वं च निशम्य तद्विस्तारं ज्ञातुकामो भगवन्तं स्तुवन् अर्जुन उवाच -- परं ब्रह्मेति सप्तभिः धर्मधर्म्यभिप्रायेण। इदं च सर्वं श्रुतेरिव प्रतिवाक्यभूतं भवान् परं ब्रह्मेत्यादि। त्वामेवाहुः सर्वे ऋषयः? तथा महाभगवदीयो मर्यादापुष्टिभक्तः देवर्षिर्नारदः आह असितो देवलो व्यासश्च -- एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः। नागपर्यङ्कमुत्सृज्य ह्यागतो मधुरां पुरीम् [म.भा.3।88।24] इति भारते।कृष्ण एव हि भूतानामुत्पत्तिरपि चाव्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम् इत्यादीनि भूयांसि महर्षिवचनानि श्रूयन्ते। भागवते [10।37।10] देवर्षिवचनं -- कृष्ण कृष्ण प्रमेयात्मन्योगेश जगदीश्वर इत्यादि। स्वयं च ब्रवीषिअहं सर्वस्य प्रभवः [10।8] इत्यादि। पुरुषोत्तम एव स्वमुखेन स्वस्वरूपं स्वमाहात्म्यं च वदति? नान्य इति। तदेतत्सर्वोक्तत्वात्सत्यमेव मन्ये यन्मां त्वं च वदसि। अतो भगवन् षडगुणपूण ज्ञानं त्वय्येव गुणः त्वद्दत्तमेवान्यत्रोद्भवतीति नान्ये देवा दानवाश्च ते व्यक्तिं अनन्यसाधारणं योगप्रभावं तत्तद्विभूतिरूपां व्यक्तिं च ते विदुः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.13।।ऐसे --, आपका वसिष्ठादि सब महर्षिगण वर्णन करते हैं तथा असित? देवल? व्यास और देवर्षि नारद भी इसी प्रकार कहते हैं एवं स्वयं आप भी मुझसे ऐसा ही कह रहे हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.13।। व्याख्या -- परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् -- अपने सामने बैठे हुए भगवान्की स्तुति करते हुए अर्जुन कहते हैं कि मेरे पूछनेपर जिसको आपने परम ब्रह्म (गीता 8। 3) कहा है? वह परम ब्रह्म आप ही हैं। जिसमें सब संसार स्थित रहता है? वह परम धाम अर्थात् परम स्थान आप ही हैं (गीता 9। 18)। जिसको पवित्रोंमें भी पवित्र कहते हैं -- पवित्राणां पवित्रं यः वह महान् पवित्र भी आप ही हैं।पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं ৷৷. स्वयं चैव ब्रवीषि मे -- ग्रन्थोंमें ऋषियोंने? (टिप्पणी प0 549.1) देवर्षि नारदने (टिप्पणी प0 549.2)? असित और उनके पुत्र देवल ऋषिने (टिप्पणी प0 549.3) तथा महर्षि व्यासजीने (टिप्पणी प0 549.4) आपको शाश्वत? दिव्य पुरुष? आदिदेव? अजन्मा और विभु कहा है।आत्माके रूपमें शाश्वत (गीता 2। 20)? सगुणनिराकारके रूपमें दिव्य पुरुष (गीता 8। 10)? देवताओँ और महर्षियों आदिके रूपमें आदिदेव (गीता 10। 2)? मूढ़लोग मेरेको अज नहीं जानते (गीता 7। 25) तथा असम्मूढ़लोग मेरेको अज जानते हैं (गीता 10। 3 ) -- इस रूपमें अज और मैं अव्यक्तरूपसे सारे संसारमें व्यापक हूँ (गीता 9। 4) -- इस रूपमें विभु स्वयं आपने मेरे प्रति कहा है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.13।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.13।।उक्तविशेषणं त्वामृषयः सर्वे यस्मादाहुस्तस्मात्तद्वचनात्तवोक्तं ब्रह्मत्वं युक्तमित्याह -- ईदृशमिति। ऋषिग्रहणेन गृहीतानामपि नारदादीनां विशिष्टत्वात्पृथग्ग्रहणम्। असितो देवलस्य पिता। किमन्यैस्त्वं स्वयमेवात्मानमुक्तरूपं मह्यमुक्तवानित्याह -- स्वयं चेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्मविभुशब्दावैकार्थ्यपरिहाराय क्रमेण सप्रमाणकं व्याचष्टे -- ब्रह्मेति। परं वस्तु ब्रह्मेति कस्मादुच्यते बृहतिं पूर्णं भवति बृंहयति पूरयति चान्यान्। बृहतेर्मन्प्रत्ययोऽमागमश्च। ईश्वरो ब्रह्मणोऽन्यः स कथं परं ब्रह्मेत्युच्यते इत्यत उक्तम् -- परममिति। विविधमनेकरूपत्वेनाभवत्। मेहनावतः सेचकस्य भगवतः प्रथमं रूपं विभु प्रभु चेत्येतदनूद्य व्याख्यायते। प्राभवत्समर्थोऽभवदिति प्रभुः विविधोऽभवदिति विभुः। सोऽकामयत इति विविधभवने श्रुत्यन्तरम्। विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् [अष्टा.3।2।180] इति च स्मृतिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्म परिपूर्णम्। अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म ৷৷. बृहद्बृहत्या बृंहयति [अ.शिर.4] इति च श्रुतिः। बृह बृहि वृद्धाविति पठन्ति।परमं यो महद्ब्रह्म [म.भा.13।149।9] इति च। विविधमासीदिति विभुः। तथा हि वारुणशाखायाम् -- विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतः [ऋक्सं.2।7।2।5] इति स ह्येव प्रभावाद्विविधोऽभवत् इति। सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय [तै.उ.2।6] इत्यादेश्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.13।।अर्जुन उवाच -- परं ब्रह्म परं धाम परमं पवित्रम् इति यं श्रुतयो वदन्ति स हि भवान्।यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते? येन जातानि जीवन्ति? यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति? तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्मेति (तै0 उ0 3।1)ब्रह्मविदाप्नोति परम् (तै0 उ0 2।1)स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति (मु0 उ0 3।2।9) इति।तथा परं धाम धामशब्दो ज्योतिर्वचनः परं ज्योतिःअथ यदतः परो दिव्यो ज्योतिर्दीप्यते (छा0 उ0 3।13।7)परं ज्योतिरूपसंपद्यस्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते (छा0 उ0 8।12।2)तद् देवा ज्योतिषां ज्योतिः (बृ0 उ0 4।4।16) इति।तथा च परमं पवित्रं परमं पावनं स्मर्तुःअशेषकल्मषाश्लेषकरं विनाशकरं च।यथा पुष्करपलाश आपो न श्िलष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्म न श्िलष्यते (छा0 उ0 4।14।3)तद्यथेषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैव्ँहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते (छा0 उ0 5।24।3)।नारायणः परं ब्रह्म तत्त्वं नारायणः परः। नारायणः परं ज्योतिरात्मा नारायणः परः।। (महाभा0 9।4) इति हि श्रुतयो वदन्ति।ऋषयः च सर्वे परावरतत्त्वयाथात्म्यविदः त्वाम् एव शाश्वतं दिव्यं पुरुषम् आदिदेवम् अजं विभुम् आहुः। तथा एव देवर्षिः नारदः असितो देवलो व्यासः च।एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः। नागपर्यङ्कमुत्सृज्य ह्यागतो मथुरां पुरीम्।।पुण्या द्वारवती तत्र यत्रास्ते मधुसूदनः। साक्षाद्देवः पुराणोऽसौ स हि धर्मः सनातनः।।ये च वेदविदो विप्रा चे चाध्यात्मविदो जनाः। ते वदन्ति महात्मानं कृष्णं धर्मं सनातनम्।।पवित्राणां हि गोविन्दः पवित्रं परमुच्यते। पुण्यानामपि पुण्योऽसौ मङ्गलानां च मङ्गलम्।।त्रैलोक्ये पुण्डरीकाक्षो देवदेवः सनातनः। आस्ते हरिरचिन्त्यात्मा तत्रैव मधुसूदनः।। (महा0 वन0 88।2428) तथायत्र नारायणो देवः परमात्मा सनातनः। तत्र कृत्स्नं जगत्पार्थ तीर्थान्यायतनानि च।।तत्पुण्यं तत्परं ब्रह्म तत्तीर्थं तत्तपोवनम्। ৷৷. तत्र देवर्षयः सिद्धाः सर्वे चैव तपोधनाः।।आदिदेवो महायोगी यत्रास्ते मधुसूदनः। पुण्यानामपि तत्पुण्यं माभूत्ते संशयोऽत्र वै।। (महा0 वन0 90।2832)कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिरपि चाप्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम्।। (महा0 सभा0 38।23) इति।तथा स्वयम् एव ब्रवीषि चभूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।। (गीता 7।4) इत्यादिना?अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते (गीता 10।8) इत्यन्तेन।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.13।। --,आहुः कथयन्ति त्वाम् ऋषयः वसिष्ठादयः सर्वे देवर्षिः नारदः तथा। असितः देवलोऽपि एवमेवाह? व्यासश्च? स्वयं चैव त्वं च ब्रवीषि मे।।
───────────────────
【 Verse 10.14 】
▸ Sanskrit Sloka: सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव | न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवा: ||
▸ Transliteration: sarvametadṛtaṁ manye yanmāṁ vadasi keśava | na hi te bhagavanvyaktiṁ vidurdevā na dānavāḥ ||
▸ Glossary: sarvam: all; etad: these; ṛtaṁ: truths; manye: accept; yan: which; māṁ: to me; vadasi: say; keśava: Keshava; na: not; hi: surely; te: your; bhagavan: lord; vyaktiṁ : express; viduḥ: know; devā: gods; na: nor; dānavāḥ: demons
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.14 Oh Keśava, I accept all these truths that You have told me. Oh Lord, neither he gods nor the demons know You.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.14।।हे केशव मेरेसे आप जो कुछ कह रहे हैं यह सब मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन् आपके प्रकट होनेको न तो देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.14।। हे केशव जो कुछ भी आप मेरे प्रति कहते हैं? इस सबको मैं सत्य मानता हूँ। हे भगवन्? आपके (वास्तविक) स्वरूप को न देवता जानते हैं और न दानव।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.14 सर्वम् all? एतत् this? ऋतम् true? मन्ये (I) think? यत् which? माम् to me? वदसि (Thou) sayest? केशव O Krishna? न not? हि verily? ते Thy? भगवन् O blessed Lord? व्यक्तिम् manifestation? विदुः know? देवाः gods? न not? दानवाः demons.Commentary Bhagavan is He? in whom ever exist the six attributes in their fullness? viz.? Jnana (wisdom)? Vairagya (dispassion)? Aisvarya (lordship)? Dharma (virtue)? Sri (wealth) and Bala (omnipotence). Also? He Who knows the origin? dissolution and the future of all beings and Who is omniscient? is called Bhagavan.Vyakti Origin.Danavah Demons or the Titans.Arjuna addresses the Lord as Keshava (Lord of all) because the Lord knows what is going on in his mind? as He is omniscient. As the Lord is the source of the gods? the demons and others? they cannot comprehend His manifestation or origin. (Cf.IV.6)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.14. What You tell me, I take all to be true, O Kesava ! For, O Bhagavat, neither the gods nor the great seers know Your manifestation.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.14 I believe in what Thou hast said, my Lord! For neither the godly not the godless comprehend Thy manifestation.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.14 I deem as true all this that you say to Me, O Krsna. Verily O Lord, neither the gods nor the demons know Your manifestation.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.14 O Kesava, I accept to be true all this which You tell me. Certainly, O Lord, neither the gods nor the demons comprehend Your glory.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.14 I believe all this that Thou sayest to me to be true, O Krishna; verily, O blessed Lord! neither the gods nor the demons know Thy manifestation (origin).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.14 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.14 Therefore, I deem all this to be a statement of facts as they are in reality, and not merely an exaggeration - all this which You tell me of Your sovereign glory and infinite auspicious attributes which are unie, unbounded, unsurpassed and natural. Therefore, O Lord, O Treasure of unsurpassed knowledge, power, strength, sovereignty, valour and radiance! - neither the gods nor the demons who possess limited knowledge know 'Your manifestation', the way in which You manifest Yourself.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.14 O Kesava, manye, I accept; to be rtam, true indeed; sarvam, all; etat, this that has been said by sages and You; yat, which; vadasi, You tell, speak; mam, to Me. Hi, certainly; bhagavan, O Lord; na devah, neither the gods; na danavah, nor the demons; viduh, comprehend; te, Your; vyaktim, glory [Prabhavam in the Commentary is the same as prabhavam, glory, the unalified State.]. Since You are the origin of the gods and others, therefore,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.14।। यहाँ अर्जुन अपने मन के भावों को स्पष्ट करते हुए गुरु के प्रति अपनी अटूट श्रद्धा को भी व्यक्त करता है जो कुछ आप मेरे प्रति कहते हैं उसे मैं सत्य मानता हूँ। केशव शब्द का अर्थ है जिनके केश सुन्दर हैं अथवा केशि नामक असुर का वध करने वाले। यद्यपि वह श्रीकृष्ण के कथन को सत्य मानता है? परन्तु वह उनके सम्पूर्ण आशय को ग्रहण नहीं कर पाता। तात्पर्य यह है कि उसे हृदय से भगवान के वचनों में पूर्ण विश्वास है? किन्तु उसकी बुद्धि अभी भी असन्तुष्ट ही है।ज्ञानपिपासा के वशीभूत अर्जुन का असन्तुष्ट व्यक्तित्व मानो कराहता है । यह ज्ञानपिपासा दूसरी पंक्ति में प्रतिध्वनित होती है जहाँ वह कहता है आपके व्यक्तित्व को न देवता जानते है और न दानव। दानव दनु के पुत्र थे? जो प्राय स्वर्ग पर आक्रमण करते रहते थे? यज्ञयागादि में बाधा पहुँचाते थे और आसुरी जीवन जीते थे। इसके विपरीत? पुराणों के वर्णनानुसार? देवतागण स्वर्ग के निवासी हैं जो र्मत्य मानवों की अपेक्षा शारीरिक? मानसिक और बौद्धिक क्षमताओं में अधिक शक्तिशाली होते हैं।वैयक्तिक दृष्टि से? देव और दानव हमारे मन की क्रमश शुभ और अशुभ प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। जब अर्जुन कहता है कि आत्मा के स्वरूप का निर्धारण न तो सूक्ष्म और शुभ के दर्शन के समान हो सकता है? और न ही दानवी प्रवृत्ति के समान? तब उसकी निराशा स्पष्ट झलकती है। न तो हमारी दैवी प्रवृत्तियां सत्य का आलिंगन कर सकती हैं? और न ही दानवी गुण उसको युद्ध के लिए आह्वान करके शत्रु रूप में हमारे सामने ला सकते हैं। जगत् में हम वस्तुओं या व्यक्तियों को केवल दो रूप में मिलते हैं प्रिय और अप्रिय अथवा मित्र और शत्रु के रूप में। आत्मा के व्यक्तित्व की पहचान इन दोनों ही प्रकारों से नहीं हो सकती? क्योंकि वह योग और विभूति की अभिव्यक्तियों में द्रष्टा है।यदि सत्य को कोई नहीं जान सकता है? तो फिर अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से उसका वर्णन करने का अनुरोध क्यों करता है उनमें ऐसा कौन सा विशेष गुण है? जिसके कारण वे उस वस्तु का वर्णन करने में समर्थ हैं? जिसे अन्य कोई जान भी नहीं पाता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.14।।एतस्सर्वं सत्यं मन्ये यन्भां वदसि केशव ब्रह्मादीन्प्रत्यन्तर्यामितया गच्छतीति सः तस्य संबोधनं हे केशवेति। ब्रह्मदिमुखेनापि त्वमेव वदसीति भावः। हि यस्मात्त तव व्यक्तिं प्रभावं देवा न विदुःऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। वैराग्यस्य च ज्ञानस्य षण्णां भग इदीङ्गना इत्युक्तो भगवांस्तत्वमेव स्वप्रभावं कथयितुं समर्थोऽसि नत्वन्यः स्वसामर्थ्येनेति सूचयन्नाह -- हे भगवनन्निति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.14।।सर्वमेतदुक्तमृषिभिश्च त्वया च तदृतं सत्यमेवाहं मन्ये यन्मां प्रति वदसि केशव। नहि त्वद्वचसि मम कुत्राप्यप्रामाण्यशङ्का। तच्च सर्वज्ञत्वात्त्वं जानासीति केशौ ब्रह्मरुद्रौ सर्वेशावप्यनुकम्प्यतया वात्यवगच्छतीति व्युत्पत्तिमाश्रित्य निरतिशयैश्वर्यप्रतिपादकेन केशवपदेन सूचितम्। अतो यदुक्तंन मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः इत्यादि तत्तथैव -- हि यस्मात् हे भगवन् समग्रैश्वर्यादिसंपन्न? ते तव व्यक्तिं प्रभावं ज्ञानातिशयशालिनोऽपि देवा न विदुर्नापि दानवा न महर्षय इत्यपि द्रष्टव्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.14।।व्यक्तिं प्रभवम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.14।।परोक्ते स्वानुभवाभावे न विश्वासः स्यादित्यत आह -- सर्वमेतदिति। सर्वं पूर्वोक्तं परं ब्रह्म [श्वे.उ.3।7गी.10।12] इत्यादि अहं स्वानुभवात् ऋतं सत्यं मन्ये। किञ्चन मे विदुः [10।2] इत्यादिना देवाः क्रीडारूपाः। दानवाविरोधेऽपि मोक्षदातुः हे भगवन् ते व्यक्तिं प्राकट्यं स्वरूपं वा न विदुरिति। केशव दुष्टगुणव्याप्तयोरपि मोक्षदायक यत् मां वदसि एतत्सर्वं हि निश्चयेन ऋतं मन्ये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.14।। अतो ममेदानीं त्वदैश्वर्येऽसंभावना निवृत्तेत्याह -- सर्वमिति। एतद्भवानेव परं ब्रह्मेत्यादि सर्वमप्यृतं सत्यं मन्ये यन्मां प्रति त्वं कथयसिन मे विदुः सुरगणा इत्यादि तदपि सत्यमेव मन्य इत्याह -- न हीति। हे भगवन्? तव व्यक्तिं देवा न विदुः। अस्मदनुग्रहार्थमियमभिव्यक्तिरिति न जानन्ति। दानवाश्चास्मन्निग्रहार्थमिति न विदुरेवेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.12 -- 10.14।।एवं सकलेतरविसजातीयं भगवतो योगप्रभावं तादृशविभूतिहेतुत्वं स्वानन्यजनकात्मत्वं च निशम्य तद्विस्तारं ज्ञातुकामो भगवन्तं स्तुवन् अर्जुन उवाच -- परं ब्रह्मेति सप्तभिः धर्मधर्म्यभिप्रायेण। इदं च सर्वं श्रुतेरिव प्रतिवाक्यभूतं भवान् परं ब्रह्मेत्यादि। त्वामेवाहुः सर्वे ऋषयः? तथा महाभगवदीयो मर्यादापुष्टिभक्तः देवर्षिर्नारदः आह असितो देवलो व्यासश्च -- एष नारायणः श्रीमान् क्षीरार्णवनिकेतनः। नागपर्यङ्कमुत्सृज्य,ह्यागतो मधुरां पुरीम् [म.भा.3।88।24] इति भारते।कृष्ण एव हि भूतानामुत्पत्तिरपि चाव्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम् इत्यादीनि भूयांसि महर्षिवचनानि श्रूयन्ते। भागवते [10।37।10] देवर्षिवचनं -- कृष्ण कृष्ण प्रमेयात्मन्योगेश जगदीश्वर इत्यादि। स्वयं च ब्रवीषिअहं सर्वस्य प्रभवः [10।8] इत्यादि। पुरुषोत्तम एव स्वमुखेन स्वस्वरूपं स्वमाहात्म्यं च वदति? नान्य इति। तदेतत्सर्वोक्तत्वात्सत्यमेव मन्ये यन्मां त्वं च वदसि। अतो भगवन् षडगुणपूण ज्ञानं त्वय्येव गुणः त्वद्दत्तमेवान्यत्रोद्भवतीति नान्ये देवा दानवाश्च ते व्यक्तिं अनन्यसाधारणं योगप्रभावं तत्तद्विभूतिरूपां व्यक्तिं च ते विदुः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.14।।हे केशव उपर्युक्त प्रकारसे ऋषियोंद्वारा और आपके द्वारा कही हुई ये सब बातें जो कि आप मुझसे कह रहे हैं? मैं सत्य मानता हूँ क्योंकि हे भगवन् आपकी उत्पत्तिको न देवता जानते हैं और न दानव ही जानते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.14।। व्याख्या -- सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव -- क नाम ब्रह्माका है? अ नाम विष्णुका है? ईश नाम शंकरका है और व नाम वपु अर्थात् स्वरूपका है। इस प्रकार ब्रह्मा? विष्णु? और शंकर जिसके स्वरूप हैं? उसको केशव कहते हैं। अर्जुनका यहाँ केशव सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि आप ही,संसारकी उत्पत्ति? स्थिति और संहार करनेवाले हैं।सातवेंसे नवें अध्यायतक मेरे प्रति आप यत् -- जो कुछ कहते आये हैं? वह सब मैं सत्य मानता हूँ और,एतत् -- अभी दसवें अध्यायमें आपने जो विभूति तथा योगका वर्णन किया है? वह सब भी मैं सत्य मानता हूँ। तात्पर्य है कि आप ही सबके उत्पादक और संचालक हैं। आपसे भिन्न कोई भी ऐसा नहीं हो सकता। आप ही सर्वोपरि हैं। इस प्रकार सबके मूलमें आप ही हैं -- इसमें मेरेको कोई सन्देह नहीं है।भक्तिमार्गमें विश्वासकी मुख्यता है। भगवान्ने पहले श्लोकमें अर्जुनको परम वचन सुननेके लिये आज्ञा दी थी? उसी परम वचनको अर्जुन यहाँ ऋतम् अर्थात् सत्य कहकर उसपर विश्वास प्रकट करते हैं।न हि ते भगवन् व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः -- आपने (गीता 4। 5 में) कहा है कि मेरे और तेरे बहुतसे जन्म बीत चुके हैं? उन सबको मैं जानता हूँ? तू नहीं जानता। इसी प्रकार आपने ( 10। 2 में) कहा है कि मेरे प्रकट होनेको देवता और महर्षि भी नहीं जानते। अपने प्रकट होनेके विषयमें आपने जो कुछ कहा है? वह सब ठीक ही है। कारण कि मनुष्योंकी अपेक्षा देवताओंमें जो दिव्यता है? वह दिव्यता भगवत्तत्त्वको जाननेमें कुछ भी काम नहीं आती। वह दिव्यता प्राकृत -- उत्पन्न और नष्ट होनेवाली है। इसलिये वे आपके प्रकट होनेके तत्त्वको? हेतुको पूरापूरा नहीं जान सकते। जब देवता भी नहीं जान सकते? तो दानव जान ही कैसे सकते हैं फिर भी यहाँ दानवाः पद देनेका तात्पर्य यह है कि दानवोंके पास बहुत विलक्षणविलक्षण माया है? जिससे वे विचित्र प्रभाव दिखा सकते हैं। परन्तु उस मायाशक्तिसे वे भगवान्को नहीं जान सकते। भगवान्के सामने दानवोंकी माया कुण्ठित हो जाती है। कारण कि प्रकृति और प्रकृतिकी जितनी शक्तियाँ हैं? उन सबसे भगवान् अतीत हैं। भगवान् अनन्त हैं? असीम हैं और दानवोंकी मायाशक्ति कितनी ही विलक्षण होनेपर भी प्राकृत? सीमित और उत्पत्तिविनाशशील है। सीमित और नाशवान् वस्तुके द्वारा असीम और अविनाशी तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है।तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य? देवता? दानव आदि कोई भी अपनी शक्तिसे? सामर्थ्यसे? योग्यतासे? बुद्धिसे भगवान्को नहीं जान सकते। कारण कि मनुष्य आदिमें जितनी जाननेकी योग्यता? सामर्थ्य? विशेषता है? वह सब प्राकृत है और भगवान् प्रकृतिसे अतीत हैं। त्याग? वैराग्य? तप? स्वाध्याय आदि अन्तःकरणको निर्मल करनेवाले हैं? पर इनके बलसे भी भगवान्को नहीं जान सकते। भगवान्को तो अनन्यभावसे उनके शरण होकर उनकी कृपासे ही जान सकते हैं। (गीता 10। 11 11। 54)।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.14।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.14।।ऋषिभिस्त्वया चोक्तत्वादुक्तं सर्वं सत्यमेवेति मम मनीषेत्याह -- सर्वमिति। किं तदित्याशङ्क्यात्मरूपमित्याह -- यन्मामिति। देवादिभिः सर्वैरुच्यमानतया त्वद्रूपे विशिष्टवक्तृग्रहणमनर्थकमित्याशङ्क्याह -- नहीति। प्रभवो नाम प्रभावो निरुपाधिकस्वभावः? यदा देवादीनामपि दुर्विज्ञेयं तव रूपं तदा का कथा मनुष्याणामित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्मविभुशब्दावैकार्थ्यपरिहाराय क्रमेण सप्रमाणकं व्याचष्टे -- ब्रह्मेति। परं वस्तु ब्रह्मेति कस्मादुच्यते बृहतिं पूर्णं भवति बृंहयति पूरयति चान्यान्। बृहतेर्मन्प्रत्ययोऽमागमश्च। ईश्वरो ब्रह्मणोऽन्यः स कथं परं ब्रह्मेत्युच्यते इत्यत उक्तम् -- परममिति। विविधमनेकरूपत्वेनाभवत्। मेहनावतः सेचकस्य भगवतः प्रथमं रूपं विभु प्रभु चेत्येतदनूद्य व्याख्यायते। प्राभवत्समर्थोऽभवदिति प्रभुः विविधोऽभवदिति विभुः। सोऽकामयत इति विविधभवने श्रुत्यन्तरम्। विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् [अष्टा.3।2।180] इति च स्मृतिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्म परिपूर्णम्। अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म ৷৷. बृहद्बृहत्या बृंहयति [अ.शिर.4] इति च श्रुतिः। बृह बृहि वृद्धाविति पठन्ति।परमं यो महद्ब्रह्म [म.भा.13।149।9] इति च। विविधमासीदिति विभुः। तथा हि वारुणशाखायाम् -- विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतः [ऋक्सं.2।7।2।5] इति स ह्येव प्रभावाद्विविधोऽभवत् इति। सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय [तै.उ.2।6] इत्यादेश्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.14।।अतः सर्वम् एतद् यथावस्थितवस्तुकथनं मन्ये न प्रशंसाद्यभिप्रायम्। यद् मां प्रति अनन्यसाधारणम् अनवधिकातिशयं स्वाभाविकं तव ऐश्वर्यं कल्याणगुणगणानन्त्यं च वदसि। अतो भगवन् निरतिशयज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजसां निधे ते व्यक्तिं व्यञ्जनप्रकारं न हि परिमितज्ञाना देवा दानवाः च विदुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.14।। --,सर्वमेतत् यथोक्तम् ऋषिभिः त्वया च एतत् ऋतं सत्यमेव मन्ये? यत् मां प्रति वदसि भाषसे हे केशव। न हि ते तव भगवन्,व्यक्तिं प्रभवं विदुः न देवाः? न दानवाः।।यतः त्वं देवादीनाम् आदिः? अतः --,
───────────────────
【 Verse 10.15 】
▸ Sanskrit Sloka: स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम | भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते ||
▸ Transliteration: svayamevātmanātmānaṁ vettha tvaṁ puruṣottama | bhūtabhāvana bhūteśa devadeva jagatpate ||
▸ Glossary: svayam: own; evā: surely; atmanā: by yourself; atmānaṁ: yourself; vettha: know; tvaṁ: you; puruṣottama: perfect man; bhūtabhāvana: origin of beings; bhūteśa: lord of beings; devadeva: god of gods; jagatpate: lord of the world
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.15 Surely, You alone know Yourself by Yourself, Oh Perfect One, the origin of beings, Oh Lord of beings, Oh God of gods, Oh Lord of the world.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.15।।हे भूतभावन हे भूतेश हे देवदेव हे जगत्पते हे पुरुषोत्तम आप स्वयं ही अपनेआपसे अपनेआपको जानते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.15।। हे पुरुषोत्तम हे भूतभावन हे भूतेश हे देवों के देव हे जगत् के स्वामी आप स्वयं ही अपने आप को जानते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.15 स्वयम् Thyself? एव only? आत्मना by Thyself? आत्मानम् Thyself? वेत्थ (Thou) knowest? त्वम् Thou? पुरुषोत्तम O Purusha Supreme? भूतभावन O source of beings? भूतेश O Lord of beings? देवदेव O God of,gods? जगत्पते O ruler of the world.Commentary Purushottama means the best among all Purushas. He assumes the four forms? viz.? the source of beings? the Lord of beings? God of gods and ruler of the world. Hence He is called Purushottama.Devadeva is He who is worshipped even by Indra and other gods.Jagatpati The Lord protects the world and guides the people through the instructions given in the Vedas. Hence the name ruler of the world.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.15. Only Yourself know Yourself by Yourself, O Supreme Purusa, Creator of all beings, Lord of beings, God of gods, Lord of the Universe !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.15 Thou alone knowest Thyself, by the power of Thy Self; Thou the Supreme Spirit, the Source and Master of all being, the Lord of Lords, the Ruler of the Universe.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.15 O Supreme Person, O Creator of beings, O Lord of beings, O God of gods, O Ruler of the universe, You Yourself know Yourself by Yourself.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.15 O supreme Person, the Creator of beings, the Lord of beings, God of gods, the Lord of the worlds, You Yourself alone know Yourself by Yourself.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.15 Verily, Thou Thyself knowest Thyself by Thyself, O Supreme Person, O source and Lord of beings, O God of gods, O ruler of the world!
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.15 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.15 O Supreme Person, You Yourself know Yourself by Yourself; namely, by virtue of Your knowledge! O Creator of beings, namely, O Originator of all beings! O Lord of all beings, namely, O Controller of all beings! O God of gods, namely, O the Supreme Deity even of all divinities! Just as the gods surpass men, animals, birds, reptiles etc., in beauty, condescension and the host of auspicious alities, You, O Lord, in the same manner, transcend all these gods in all these attributes! O Ruler of the universe, O Master of the universe!
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.15 Purusottama, O supreme Person; bhuta-bhavana, O Creator of beings, one who brings the creatures into being; bhutesa, the Lord of beings; deva-deva, O God of gods; jagat-pate, the Lord of the worlds; tvam, You; svayam, Yourself; eva, alone; vettha, know; atmanam, Yourself, as God possessed of unsurpassable powers of knowledge, sovereignty, strength, etc.; atmana, by Yourself.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.15।। यह श्लोक दर्शाता है कि किस प्रकार श्रीकृष्ण उस परम सत्य का वर्णन करने में सक्षम हैं? जिसे न स्वर्ग के देवता जान सकते हैं और न दानवगण। आत्मा को कभी प्रमाणों (इन्द्रियों) के द्वारा दृश्य पदार्थ के रूप में नहीं जाना जा सकता है? और न वह हमारी शुभ अशुभ प्रवृत्तियों के द्वारा ही अनुभव किया जा सकता है। परन्तु? आत्मा चैतन्य स्वरूप होने से स्वयं ज्ञानमय है और ज्ञान को जानने के लिए किसी अन्य प्रमाण (ज्ञान का साधन) की आवश्यकता नहीं होती। इसलिए अर्जुन यहाँ कहता है? आप स्वयं अपने से अपने आप को जानते हैं।सांख्यदर्शन के अनुसार प्रतिदेह में स्थित चैतन्य? पुरुष कहलाता है। यहाँ श्रीकृष्ण को पुरुषोत्तम नाम से सम्बोधित किया गया है? जिसका अर्थ है? वह एकमेव अद्वितीय तत्त्व जो भूतमात्र की आत्मा है। पुरुषोत्तम शब्द का लौकिक अर्थ है पुरुषों में उत्तम तथा अध्यात्मशास्त्र के अनुसार अर्थ है परमात्मा। अब अर्जुन? भगवान् श्रीकृष्ण के शुद्ध ब्रह्म के रूप में स्वीकार करके उनका गौरव गान करते हुए उन्हें इन नामों से सम्बोधित करता है? हे भूतभावन (भूतों की उत्पत्ति करने वाले) हे भूतेश हे देवों के देव हे जगत् के शासक स्वामी किसी भी वस्तु का सारतत्त्व उस वस्तु के गुणों का शासक और धारक होता है। स्वर्ण आभूषणों के आकार? आभा आदि गुणों का शासक होता है। परन्तु चैतन्य की नियमन एवं शासन की शक्ति अन्य की अपेक्षा अधिक है? क्योंकि उसके बिना हम न कुछ जान सकते हैं और न कुछ कर्म ही कर सकते हैं। वस्तुओं और घटनाओं का भान या ज्ञान तभी संभव होता है जब इनके द्वारा अन्तकरण में उत्पन्न वृत्तियाँ इस शुद्ध चैतन्यरूप आत्म्ाा से प्रकाशित होती हैं।अपने आश्चर्य? आदर और भक्ति को व्यक्त करने वाले इस कथन के बाद? अब अर्जुन सीधे ही भगवान् के समक्ष अपनी बौद्धिक जिज्ञासा को प्रकट करता है --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.15।।अतः सर्वेषामादिस्त्वं स्वयमेवान्योपदेशमन्तरेणात्मना नत्वन्तःकरणादिकरणेनात्मानं निरुपाधिकं सोपाधिकं च निरतिशयज्ञानैश्वर्यबलादिशक्तिमन्तं जानासि नत्वन्यस्त्वदननुग्रीतः। भगवतः निरुपाधिकात्मज्ञानसामर्थ्यं संबोधनेनाप्याह -- हे पुरुषोत्तमेति। निरुपाधिकः परमात्मा त्वं निरुपाधिकं स्वस्वरुपं वेत्थेति भावः। सोपाधिकोऽपि जगत्कर्तृत्वादिमांस्त्वमेवातस्तमपि त्वमेव जानासीति ध्वनयन् चतुर्धा संबोधयति। भूतभावनेत्यादिना। भूतोत्पादक? भूतेष भूतनियन्तः। देवदेव देवानां सूर्यादीनामपि द्योतक? जगत्पते जगत्पालक। तथाच जगत उत्प्तिस्थितिनियमकर्ता त्वमेव। ननु ब्रह्मादयः सूर्यादयो रुद्रादय एतत्कर्तारो दृश्यन्ते इत्याशङ्क्य देवानां ब्रह्मादीनामपि देव? त्वदधिष्ठिता एव ते उत्पत्त्यादिकर्तारो न स्वतन्त्रा इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.15।।यतस्त्वं तेषां सर्वेषामादिरशक्यज्ञानश्चातः -- स्वयमेव अन्योपदेशादिकमन्तरेणैव त्वमेवात्मना स्वरूपेणात्मानं निरुपाधिकं सोपाधिकं च? निरुपाधिकं प्रत्यक्त्वेनाविषयतया सोपाधिकं च निरतिशयज्ञानैश्वर्यादिशक्तिमत्त्वेन वेत्थ जानासि नान्यः कश्चित्। अन्यैर्ज्ञातुमशक्यमहं कथं जानीयामित्याशङ्कामपनुदन्प्रेमौत्कण्ठ्येन बहुधा संबोधयति। हे पुरुषोत्तम? त्वदपेक्षया सर्वेऽपि पुरुषा अपकृष्टा एव। अतस्तेषामशक्यं सर्वोत्तमस्य तव शक्यमेवेत्यभिप्रायः। पुरुषोत्तमत्वमेव विवृणोति पुनश्चतुर्भिः संबोधनैः -- भूतानि सर्वाणि भावयत्युत्पादयतीति हे भूतभावन सर्वभूतपितः। पितापि कश्चिन्नेष्टस्तत्राह हे भूतेश सर्वभूतनियन्तः। नियन्तापि कश्चिन्नाराध्यस्तत्राह हे देवदेव देवानां सर्वाराध्यानामप्याराध्य। आराध्योऽपि कश्चिन्न पालयितृत्वेन पतिस्तत्राह हे जगत्पते हिताहितोपदेशकवेदप्रणेतृत्वेन सर्वस्य जगतः पालयितः। एतादृशसर्ववविशेषणविशिष्टस्त्वं सर्वेषां पिता सर्वेषां गुरुः सर्वेषां राजा अतः सर्वैः प्रकारैः सर्वेषामाराध्य इति किं वाच्यं पुरुषोत्तमत्वं तवेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.15।।हे भूतभावन भूतानां भावक।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.15।।यतोऽन्ये न विदुरतः स्वस्वरूपं स्वयमेव जानासीत्याह৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷. -- स्वयमेवेति। स्वयं स्वेच्छयैव? न केनचित् प्रेरितः। आत्मना स्वस्वरूपेणैव आत्मानं यादृशोऽसि तादृशं त्वमेव वेत्थ? जानासीत्यर्थः। अन्यथा ज्ञानहेतुभूतत्वेन सम्बोधयति। हे पुरुषोत्तम केन कथं वा ज्ञातुं योग्य इत्यर्थः। अतएव ब्रह्माण्डपुराणे -- नैष भावयितुं योग्यः केनचित् पुरुषोत्तम् इत्युक्तम्। ननु तर्हियो मामजमनादिं च वेत्ति [10।3] इति कथमुक्तं इत्याशङ्क्य तत्कृपया स्ववेदनात्मकस्वशक्तिदानेन ज्ञापयतीतिददामि बुद्धियोगं तम् [10।10] इत्यादिनोक्तम्। तथात्वेनैव सम्बोधयन्नाह -- भूतभावनेत्यादिभिः। हे भूतभावन भूतानि भावयसि स्वभावयुक्तानि करोषीति तथा। कथमेवं करोतीत्यत आह -- भूतेश तेषां स्वामी नियामकः तेन स्वीयत्वेन करोतीति भावः। ईशत्वेऽपि कथमेवं करोति इत्यत आह -- देवदेव पूज्यानामपि पूज्य तत्पूजादिसन्तुष्टस्तथा करोतीति भावः। तर्हि देवेष्वेव तथोचितं? न तु सर्वेष्वित्यत आह -- जगत्पते इति। जगतः सर्वस्यैव पतिः पालको रक्षक इति यावत् रक्षार्थं तथा करोतीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.15।।किं तर्हि -- स्वयमिति। स्वयमेव त्वमात्मानं वेत्थ जानासि नान्यः तदप्यात्मना स्वेनैव वेत्थ न साधनान्तरेण। अत्यादरेण बहुधा संबोधयति हे पुरुषोत्तम। पुरुषोत्तमत्वे हेतुगर्भाणि संबोधनानि। हे भूतभावन भूतोत्पादक भूतानामीश नियन्तः? देवानामादित्यादीनां देव प्रकाशक? जगत्पते विश्वपालक।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.15।।किं तर्हि स्वयमेव वेत्थेति तदप्यात्मना? न साधनान्तरेण।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.15।।क्योंकि आप देवादिके आदि कारण हैं? इसलिये --, हे पुरुषोत्तम हे भूतप्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले भूतभावन हे भूतेशभूतोंके ईश्वर हे देवोंके देव हे जगत्पते आप स्वयं ही अपनेद्वारा अपने आपको अर्थात् निरतिशय ज्ञान? ऐश्वर्य? सामर्थ्य आदि शक्तियोंसे युक्त ईश्वरको जानते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.15।। व्याख्या -- भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते पुरुषोत्तम -- सम्पूर्ण प्राणियोंको संकल्पमात्रसे उत्पन्न करनेवाले होनेसे आप भूतभावन हैं सम्पूर्ण प्राणियोंके और देवताओंके मालिक होनेसे आप भूतेश और देवदेव हैं जडचेतन? स्थावरजङ्गममात्र जगत्का पालनपोषण करनेवाले होनेसे आप जगत्पति हैं और सम्पूर्ण पुरुषोंमें उत्तम होनेसे आप लोकमें और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे कहे गये हैं (गीता 15। 18) (टिप्पणी प0 550)।इस श्लोकमें पाँच सम्बोधन आये हैं। इतने
Chapter 10 (Part 8)
सम्बोधन गीताभरमें दूसरे किसी भी श्लोकमें नहीं आये। कारण है कि भगवान्की विभूतियोंकी और भक्तोंपर कृपा करनेकी बात सुनकर अर्जुनमें भगवान्के प्रति विशेष भाव पैदा होते हैं और उन भावोंमें विभोर होकर वे भगवान्के लिये एक साथ पाँच सम्बोधनोंका प्रयोग करते हैं (टिप्पणी प0 551)। स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वम् -- भगवान् अपनेआपको अपनेआपसे ही जानते हैं। अपनेआपको जाननेमें उन्हें किसी प्राकृत साधनकी आवश्यकता नहीं होती। अपनेआपको जाननेमें उनकी अपनी कोई वृत्ति पैदा नहीं होती? कोई जिज्ञासा भी नहीं होती? किसी करण(अन्तःकरण और बहिःकरण) की आवश्यकता भी नहीं,होती। उनमें शरीरशरीरीका भाव भी नहीं है। वे तो स्वतःस्वाभाविक अपनेआपसे ही अपनेआपको जानते हैं। उनका यह ज्ञान करणनिरपेक्ष है? करणसापेक्ष नहीं।इस श्लोकका भाव यह है कि जैसे भगवान् अपनेआपको अपनेआपसे ही जानते हैं? ऐसे ही भगवान्के अंश जीवको भी अपनेआपसे ही अपनेआपको अर्थात् अपने स्वरूपको जानना चाहिये। अपनेआपको अपने स्वरूपका जो ज्ञान होता है? वह सर्वथा करणनिरपेक्ष होता है। इसलिये इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि आदिसे अपने स्वरूपको नहीं जान सकते। भगवान्का अंश होनेसे भगवान्की तरह जीवका अपना ज्ञान भी करणनिरपेक्ष है। सम्बन्ध -- विभूतियोंका ज्ञान भगवान्में दृढ़ करानेवाला है (गीता 10। 7)। अतः अब आगेके श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्से विभूतियोंको विस्तारसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.15।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.15।।कश्चिदेव महता कष्टेनानेकजन्मसंसिद्धो जानाति त्वदनुगृहीतस्त्वद्रूपमित्यभिप्रेत्याह -- यत इति। स्वयमेवोपदेशमन्तरेणेत्यर्थः। आत्मना प्रत्यक्त्वेनाविषयतयेति यावत्। आत्मानं निरुपाधिकं रूपम्। नच तव सोपाधिकमपि रूपमन्यस्य गोचरे तिष्ठतीत्याह -- निरतिशयेति। पुरुषश्चासावुत्तमश्चेति क्षराक्षरातीतपूर्णचैतन्यरूपत्वं संबोधनेन बोध्यते। सर्वप्रकृतित्वं सर्वकर्तृत्वं च कथयति -- भूतानीति। सर्वेश्वरत्वमाह -- भूतानामिति। उक्तं ते सोपाधिकं रूपं देवादीनामाराध्यतामधिगच्छतीत्याह -- देवेति। जगतः सर्वस्य स्वामित्वेन पालयितृत्वमाह -- जगदिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्मविभुशब्दावैकार्थ्यपरिहाराय क्रमेण सप्रमाणकं व्याचष्टे -- ब्रह्मेति। परं वस्तु ब्रह्मेति कस्मादुच्यते बृहतिं पूर्णं भवति बृंहयति पूरयति चान्यान्। बृहतेर्मन्प्रत्ययोऽमागमश्च। ईश्वरो ब्रह्मणोऽन्यः स कथं परं ब्रह्मेत्युच्यते इत्यत उक्तम् -- परममिति। विविधमनेकरूपत्वेनाभवत्। मेहनावतः सेचकस्य भगवतः प्रथमं रूपं विभु प्रभु चेत्येतदनूद्य व्याख्यायते। प्राभवत्समर्थोऽभवदिति प्रभुः विविधोऽभवदिति विभुः। सोऽकामयत इति विविधभवने श्रुत्यन्तरम्। विप्रसम्भ्यो ड्वसंज्ञायाम् [अष्टा.3।2।180] इति च स्मृतिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.12 -- 10.15।।ब्रह्म परिपूर्णम्। अथ कस्मादुच्यते परं ब्रह्म ৷৷. बृहद्बृहत्या बृंहयति [अ.शिर.4] इति च श्रुतिः। बृह बृहि वृद्धाविति पठन्ति।परमं यो महद्ब्रह्म [म.भा.13।149।9] इति च। विविधमासीदिति विभुः। तथा हि वारुणशाखायाम् -- विभु प्रभु प्रथमं मेहनावतः [ऋक्सं.2।7।2।5] इति स ह्येव प्रभावाद्विविधोऽभवत् इति। सोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेय [तै.उ.2।6] इत्यादेश्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.15।।हे पुरुषोत्तम आत्मना आत्मानं त्वं स्वयम् एव स्वेन एव ज्ञानेन वेत्थ। भूतभावन सर्वेषां भूतानाम् उत्पादयितः? भूतेश सर्वेषां भूतानां नियन्तः? देवदेव दैवतानाम् अपि परमदैवत? यथा मनुष्यमृगपक्षिसरीसृपादीन् सौन्दर्यसौशील्यादिकल्याणगुणगणैः दैवतानि अतीत्य वर्तन्ते तथा तानि सर्वाणि दैवतानि अपि तैः तैः गुणैः अतीत्य वर्तमान? जगत्पते जगत्स्वामिन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.15।। --,स्वयमेव आत्मना आत्मानं वेत्थ जानासि त्वं निरतिशयज्ञानैश्वर्यबलादिशक्तिमन्तम् ईश्वरं पुरुषोत्तम। भूतानि भावयतीति भूतभावनः? हे भूतभावन। भूतेश भूतानाम् ईशितः। हे देवदेव जगत्पते।।
───────────────────
【 Verse 10.16 】
▸ Sanskrit Sloka: वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतय: | याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि ||
▸ Transliteration: vaktumarhasyaśeṣeṇa divyā hyātmavibhūtayaḥ | yābhirvibhūtibhirlokān imāṁstvaṁ vyāpya tiṣṭhasi ||
▸ Glossary: vaktum: say; arhasi: deserve; aśeṣeṇa: in detail; divyā: divine; hi: surely; ātma: Your; vibhūtayaḥ: glories; yābhir: by which; vibhūtibhiḥ: glories; lokān: worlds; imān: these; tvaṁ: You; vyāpya: pervade; tiṣṭhasi: remain
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.16 Only You can describe in detail Your divine glories by which You pervade this universe.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.16।।जिन विभूतियोंसे आप इन सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं? उन सभी अपनी दिव्य विभूतियोंका सम्पूर्णतासे वर्णन करनेमें आप ही समर्थ हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.16।। आप ही उन अपनी दिव्य विभूतियों को अशेषत कहने के लिए योग्य हैं? जिन विभूतियों के द्वारा इन समस्त लोकों को आप व्याप्त करके स्थित हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.16 वक्तुम् to tell? अर्हसि (Thou) shouldst? अशेषेण without reminder? दिव्याः divine? हि indeed? आत्मविभूतयः Thy glories? याभिः by which? विभूतिभिः by glories? लोकान् worlds? इमान् these? त्वम् Thou? व्याप्य having pervaded? तिष्ठसि existest.No Commentary.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.16. You are [alone] capable of fully declaring the auspicious manifesting powers of Yours, by which manifesting power You remain pervading these worlds.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.16 Please tell me all about Thy glorious manifestations, by means of which Thou pervadest the world.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.16 You should tell Me without reserve Your divine manifestations whery You abide pervading all these worlds.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.16 Be pleased to speak in full of Your own manifestations which are indeed divine, through which manifestations You exist pervading these worlds.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.16 Thou shouldst indeed tell, without reserve, of Thy divine glories by which Thou existest, pervading all these worlds. (None else can do so.)
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.16 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.16 Whatever manifestations there be that are divine, unie to Yourself - You alone are capable of describing them without exception. 'You reveal them Yourself' is the meaning. With these innumerable Vibhutis, these instances of your manifestation indicating Your will to rule, You abide, pervading all these worlds as their controller.
What is the need for such description? The answer follows:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.16 Arhasi, be pleased; vaktum, to speak; asesena, in full; atmavibhutayah, of Your own manifestations; divyah hi, which are indeed divine; yabhih, through which; vibhutibhih, manifestations, manifestations of Your glory; tisthasi, You exist; vyapya, pervading; iman, these; lokan, worlds.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.16।। राजपुत्र अर्जुन को इस बात का निश्चय हो गया है कि भगवान् ही विश्व के अधिष्ठान हैं? जिनके बिना विश्व का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। परन्तु जब वह अपने उपलब्ध और परिचित प्रमाणों इन्द्रियों? मन और बुद्धि के द्वारा बाह्य जगत् को देखता है? तब उसे केवल विषयों? भावनाओं और विचारों का ही अनुभव होता है जिन्हें किसी भी दृष्टि से दिव्य नहीं कहा जा सकता।जब किसी उत्सव के अवसर पर किसी इमारत पर विद्युत् की दीपसज्जा की जाती है? तब वहाँ विविध रंगों के तथा विभिन्न विद्युत् क्षमताओं के बल्बों से प्रकाश फूटकर निकल पड़ता प्रतीत होता है। परन्तु जब हमें बताया जाता है कि एक ही विद्युत् इन सबमें व्यक्त होकर इन्हें धारण कर रही है? तो कोई अनपढ़ अज्ञानी पुरुष? स्वाभाविक ही? प्रत्येक बल्ब में व्यक्त हुई विद्युत् को देखने की इच्छा प्रकट करेगा विराट् ईश्वर के रूप में भगवान् ही इस नामरूपमय संसार की समष्टि सृष्टि (विभूति) और व्यष्टि सृष्टि (योग) बने हुए हैं। यद्यपि श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय के द्वारा इसे अनुभव किया जा सकता है? परन्तु बुद्धि के तीक्ष्ण होने पर भी उसके द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। इसलिए? स्वाभाविक ही? अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण से उन विभूतियों का वर्णन करने का अनुरोध करता है? जिनके द्वारा वे इस जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं। कर्मशील होने के कारण अर्जुन अत्यन्त व्यावहारिक बुद्धि का पुरुष था इसलिए वह और अधिक पर्याप्त तथ्यों को एकत्र करना चाहता था? जिन पर वह विचार करके और उनका वर्गीकरण करके उन्हें समझ सके।क्या अर्जुन की यह केवल बौद्धिक जिज्ञासा ही है? जिसके कारण वह ऐसा प्रश्न करता है वह स्वयं स्पष्ट करते हुए कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.16।।अतोऽप्राकृता हि आत्मनो विभूतयः माहात्म्यविस्ताराः यास्ताः वक्तुमर्हसि। याभिर्विभूतिस्त्वमिमाँल्लोकान्वाप्य तिष्ठसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.16।।यस्मादन्येषां सर्वेषां ज्ञातुमशक्या अवश्यं ज्ञातव्याश्च तव विभूतयः? तस्मात् -- याभिर्विभूतिभिरिमान्सर्वांल्लोकान्व्याप्य त्वं तिष्ठसि तास्तवासाधारणा विभूतयो दिव्या असर्वज्ञैर्ज्ञातुमशक्या हि यस्मात्तस्मात्सर्वज्ञस्त्वमेव ता अशेषेण वक्तुमर्हसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.16।।एवं स्तुत्वात्मनो बुभुत्सितमाह -- वक्तुमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.16।।एवं सम्बोध्य जगत्पतित्वेन स्वस्यापि पतित्वं सम्पाद्येदानीं स्वीयत्वेनानुग्रहं कुरु यथाऽहं पूर्वोक्तं त्वत्स्वरूपं ज्ञात्वा प्रपन्नो भवामीत्याह -- वक्तुमर्हसीति। दिव्याः क्रीडारूपाः? आत्मविभूतयः स्वविभूतयः कार्यार्थं स्वयमेवांशरूपाः? अशेषेण वक्तुं त्वमेवार्हसि योग्योऽसि। योग्यत्वोक्त्या विभूतिज्ञानमपि नान्यस्य? यत्र तत्र साक्षात् त्वदज्ञाने किं वाच्यमिति व्यञ्जितम्। यतस्त्वमेव योग्योऽस्यतः कृपया वदेति भावः। याभिर्विभूतिभिः इमान् लोकान् व्याप्य स्वीयत्वेनाङ्गीकृत्य तिष्ठसि ता वक्तुमर्हसीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.16।।यस्मात्तवाभिव्यक्तिं त्वमेव वेत्सि न देवादयस्तस्माद्वक्तुमर्हसीति या आत्मनस्तव दिव्या अत्यद्भुता विभूतयस्ताः सर्वा वक्तुं त्वमेवार्हसि योग्यो भवसि। याभिरिति विभूतीनां विशेषणं स्पष्टार्थम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.16।।यतो देवादयो न विदुस्तस्माद्वक्तुमर्हसि अशेषेणेति। या दिव्यास्तवासाधारण्यो विभूतयः ता अशेषेण वद। याभिः स्वांशभवनरूपैर्नियमनविशेषैर्गुणभूतैस्तदात्मभूतैश्चेमाँल्लोकांस्त्रीन् व्याप्य तिष्ठसि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.16।।अपनी दिव्य विभूतियोंका पूर्णतया वर्णन करनेमें ( आप ही ) समर्थ हैं -- आपकी जो विभूतियाँ हैं? जिन विभूतियोंसे अर्थात् अपने माहात्म्यके विरतारसे आप इन सारे लोकोंको व्याप्त करके स्थित हो रहे हैं? उन्हें कहनेमें आप ही समर्थ हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.16।। व्याख्या -- याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि -- भगवान्ने पहले (सातवें श्लोकमें) यह बात कही थी कि जो मनुष्य मेरी विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जानता है? उसका मेरेमें अटल भक्तियोग हो जाता है। उसे सुननेपर अर्जुनके मनमें आया कि भगवान्में दृढ़ भक्ति होनेका यह बहुत सुगम और श्रेष्ठ उपाय है क्योंकि भगवान्की विभूतियोंको और योगको तत्त्वसे जाननेपर मनुष्यका मन भगवान्की तरफ स्वाभाविक ही खिंच जाता है और भगवान्में उसकी स्वाभाविक ही भक्ति जाग्रत् हो जाती है। अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं और कल्याणके लिये उनको भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ उपाय दीखती है। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि जिन विभूतियोंसे आप सम्पूर्ण लोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं? उन अलौकिक? विलक्षण विभूतियोंका विस्तारपूर्वक सम्पूर्णतासे वर्णन कीजिये। कारण कि उनको कहनेमें आप ही समर्थ हैं आपके सिवाय उन विभूतियोंको और कोई नहीं कह सकता।वक्तुमर्हस्यशेषेण -- आपने पहले (सातवें? नवें और यहाँ दसवें अध्यायके आरम्भमें) अपनी विभूतियाँ बतायीं और उनको जाननेका फल दृढ़ भक्तियोग होना बताया। अतः मैं भी आपकी सब विभूतियोंको जान जाऊँ और मेरा भी आपमें दृढ़ भक्तियोग हो जाय? इसलिये आप अपनी विभूतियोंको पूरीकीपूरी कह दें? बाकी कुछ न रखें।दिव्या ह्यात्मविभूतयः -- विभूतियोंको दिव्य कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो कुछ विशेषता दीखती है वह मूलमें दिव्य परमात्माकी ही है? संसारकी नहीं। अतः संसारकी विशेषता देखना भोग है और परमात्माकी विशेषता देखना विभूति है? योग है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.16।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.16।।यस्मादस्मादृशामगोचरस्तवात्मा जिज्ञासितश्च। तस्मात्त्वयैव तद्रूपं वक्तव्यमित्याह -- वक्तुमिति। दिव्यत्वमप्राकृतत्वम्। संप्रत्यन्वयमन्वाचष्टे -- आत्मन इति। वक्तव्या विभूतीर्विशिनष्टि -- याभिरिति। यद्द्वारा लोकान्पूरयित्वा वर्तसे ता विभूतीरशेषेण वक्तुमर्हसीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.16।।विभूतय ऐश्वर्याणि पृष्टानि नानारूपाणि वक्ष्यन्ते। किं केन सङ्गतं इत्यत आह -- विभूतय इति। विविधभूतयो नानाभूतानि रूपाणि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.16।।विभूतयो विविधभूतयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.16।।दिव्याः त्वदसाधारण्यो विभूतयो याः ताः त्वम् एव अशेषण वक्तुम् अर्हसि त्वम् एव व्यञ्जय इत्यर्थः। याभिः अनन्ताभिः विभूतिभिः यैः नियमनविशेषैः युक्त इमान् लोकान् त्वं नियन्तृत्वेन व्याप्य तिष्ठसि।किमर्थं तत्प्रकाशनम् इति अपेक्षायाम् आह --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.16।। --,वक्तुं कथयितुम् अर्हसि अशेषेण। दिव्याः हि आत्मविभूतयः। आत्मनो विभूतयो याः ताः वक्तुम् अर्हसि। याभिः विभूतिभिः आत्मनो माहात्म्यविस्तरैः इमान् लोकान् त्वं व्याप्य तिष्ठसि।।
───────────────────
【 Verse 10.17 】
▸ Sanskrit Sloka: कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् | केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया ||
▸ Transliteration: kathaṁ vidyāmahaṁ yogiṁs tvāṁ sadā paricintayan | keṣu keṣu ca bhāveṣu cintyo’si bhagavanmayā ||
▸ Glossary: kathaṁ: how; vidyām: know; ahaṁ: I; yogins: yogi; tvāṁ: you; sadā: always; paricintayan: contemplation; keṣu-keṣu: in which; ca: and; bhāveṣu: nature; cintyo’si: contemplated; bhagavan: lord; mayā: by me
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.17 How may I know You by contemplation? In which forms should I contemplate on You, Oh Lord?
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.17।।हे योगिन् हरदम साङ्गोपाङ्ग चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और हे भगवन् किनकिन भावोंमें आप मेरे द्वारा चिन्तन किये जा सकते हैं अर्थात् किनकिन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.17।। हे योगेश्वर मैं किस प्रकार निरन्तर चिन्तन करता हुआ आपको जानूँ? और हे भगवन् आप किनकिन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.17 कथम् how? विद्याम् shall know? अहम् I? योगिन् O Yogin? त्वाम् Thee? सदा always? परिचिन्तयन् meditating? केषु केषु in what and what? च and? भावेषु aspects? चिन्त्यः to be thought of? असि (Thou) art? भगवन् O blessed Lord? मया by me.Commentary Arjuna says O Lord? how may I know Thee by constant meditation In what aspects art Thou to be thought of by me Even when I think of external objects I can meditate on Thee in Thy particular manifestations in them if I have a detailed knowledge of Thy glories. Therefore deign to tell me? without reserve? of Thy own glories. Then only can I behold oneness everywhere.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.17. O Mighty Yogin ! How should I know You, meditating on You ? In what several entities, O Bhagavat, are You to be contemplated upon by me ?
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.17 O Master! How shall I, by constant meditation, know Thee? My Lord! What are Thy various manifestations through which I am to mediate on Thee?
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.17 How can I, Your devotee, know You by constantly meditating on You? And in what modes, O Lord, are you to be meditated upon by Me.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.17 O Yogi, [Here yoga stands for the results of yoga, viz omniscience, omnipotence, etc.; one possessed of these is a yogi. (See Comm. on 10.7)] how shall I know You by remaining ever-engaged in meditation? And through what objects, O Lord, are You to be meditated on by me?
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.17 How shall I, ever meditating, know Thee, O Yogin? In what aspects or things, O blessed Lord, art Thou to be thought of by me?
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.17 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.17 I, 'Your devotee' (Yogin), namely, one engaged in Bhakti Yoga, and 'constantly meditating on You' with devotion, namely, embarked on meditation on You, - how am I to know You, the object of meditation, as possessing a multitude of auspicious attributes like sovereignty etc.? And in what varied modes of mental dispositions, which are as yet untold and which are different from the intelligence, knowledge etc., described earlier, are You the Controller of all, to be meditated upon by me.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.17 O Yogi, katham, how; aham vidyam, shall I know tvam, You; sada pari-cintayan, by remaining ever-engaged in meditation? Ca, and; kesu kesu bhavesu, through what objects; bhagvan, O Lord; cintah asi, are You to be meditated on; maya, by me?
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.17।। किस प्रकार मैं आपका चिन्तन या ध्यान करूँ जिससे कि मैं आपको साक्षात् जान सकूँ साधक का लक्ष्य है एकत्व भाव से आत्मा को साक्षात् जानना। अब तक के अध्यायों में कहीं भी गीता ने ध्यानाभ्यास के लिए किसी नदी के तट पर या एकान्त गुफा में जाकर संन्यास का जीवन व्यतीत करने का समर्थन नहीं किया है। श्रीकृष्ण का मनुष्य को आह्वान कर्त्तव्य कर्म करने के लिए है और अपने इसी व्यावहारिक जीवन में ईश्वरानुभूति में जीने के लिए है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि गीताशास्त्र का उद्घोष महाभारत के समरांगण में उस क्षण हुआ था? जब तत्कालीन समस्त राष्ट्र अपने समय की सबसे बड़ी ऐतिहासिक क्रांति वेला का सामना करने के लिए उद्यत थे। यह क्रांति वेला लौकिक और आध्यात्मिक दोनों ही मूल्यों की निर्णायक थी।अर्जुन कर्त्तव्य पालन के गीताधर्म में पूर्णतया परिवर्तित हो गया था। उसका यह परिवर्तन श्रीकृष्ण को सम्बोधित किये योगिन शब्द से विशेष रूप से दर्शाया गया है। श्रीकृष्ण ऐसे सर्वश्रेष्ठ कर्मयोगी थे? जिन्होंने विविध घटनाओं से परिपूर्ण जीवन में अत्यन्त व्यस्त रहते हुए भी कभी अपने शुद्ध दिव्यस्वरूप का विस्मरण नहीं होने दिया।इस श्लोक में अर्जुन अपने अनुरोध का कारण भी बताते हुए कहता है? आप किनकिन भावों में मेरे द्वारा चिन्तन करने योग्य हैं व्यावहारिक जीवन जीते हुए और उसकी चुनौतियों का सामना करते हुए? यदि सर्वत्र व्याप्त आत्मा का अखण्ड स्मरण बनाये रखना हो? तो साधक को निश्चित रूप से यह जानना आवश्यक होगा कि वह उस तत्त्व को प्रत्येक वस्तु? वस्तुओं के समूह और मनुष्यों के समाज में कहाँ और कैसे देखे।अर्जुन अपनी इच्छा को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहता है कि यदि भगवान् का उत्तर विस्तृत भी हो? तब भी उन्हें सुनने और समझने में वह थकान नहीं अनुभव करेगा
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.17।।हे योगन्? अहं स्थूलबुद्धिस्त्वां केन प्रकारेण परि समन्ताच्चिन्तयन् सूक्ष्मबुद्धिर्भूत्वा जानीयाम्। अघटितघटनं योगस्तद्वान् त्वम्। मामपि त्वां ज्ञातुमयोग्यं योग्यं कर्तुमर्हसीति संबोधनाशयः। केषुकेषु च भावेषु पदार्थेषु मया ध्येयोऽसि तत्तत्पदार्थेषु स्वैश्वर्यादिमत्पदार्थ वदेति द्योतयन्नाह -- हे भगवन्निति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.17।।किं प्रयोजनं तत्कथनस्य तदाह द्वाभ्याम् -- योगो निरतिशयैश्वर्यादिशक्तिः सोऽस्यास्तीति हे योगिन्निरतिशयैश्वर्यादिशक्तिशालिन्? अहमतिस्थूलमतिस्त्वां देवादिभिरपि ज्ञातुमशक्यं कथं विद्यां जानीयाम्। सदा परिचिन्तयन्सर्वदा ध्यायन्। ननु मद्विभूतिषु मां ध्यायन्? ज्ञास्यसि तत्राह -- केषु केषु च भावेषु चेतनाचेतनात्मकेषु वस्तुषु त्वद्विभूतिभूतेषु मया चिन्त्योऽसि हे भगवन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.17।।योग ऐश्वर्यं तद्वन् हे योगिन्? त्वां कथं चर्मचक्षुषा विद्यां न कथमपीति विश्वरूपदर्शनस्य दौर्लभ्यं मन्वानः कतिपयेष्वेव स्थानेषु भगवन्तं चिन्तयिष्यामि विश्वरूपदर्शनेऽधिकारसिद्ध्यर्थमित्याशयेनाह -- केष्विति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.17।।कथनप्रयोजनमाह -- कथमिति। हे योगिन् सर्वव्यापक सर्वकरणसमर्थ अहं प्रकटरूपमानन्दमयं त्वां सदा परिचिन्तयन् परितो बाह्याभ्यन्तरभेदेन चिन्तयन् विभूतीः कथ विद्यां जानामीत्यर्थः।अत्रायं भावः -- साक्षाद्भगवच्चिन्तने विभूतिज्ञाने तत्र मनोनिवेशने चिन्तनविच्छेदो भविष्यतीति कथं जानामि ननु तर्हि प्रश्नः किमर्थं इत्याशङ्क्य यत्पूर्वमुक्तम्एतां विभूतिं [10।7] इत्यारभ्ययेन मामुपयान्ति ते [10।7] इत्यन्तं तेन त्वत्प्राप्त्यर्थं पृच्छामि? तत्रापि स्वाधिकारानुसारेण यत्स्वस्यावश्यकं तत्कथयेति विज्ञापयति -- केष्विति। केषु लोकेषु? च पुनः केषु भावेषु पदार्थेषु भगवन् षड्गुणैश्वर्य पूर्णगुणैः सर्वव्यापक मया चिन्तनीयोऽसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.17।।कथनप्रयोजनं दर्शयन्प्रार्थयते -- कथमिति द्वाभ्याम्। हे योगिन्? कथं कैर्विभूतिभेदैः सदा परिचिन्तयन्नहं त्वां विद्यां जानीयाम्। विभूतिभेदेन चिन्त्योऽपि त्वं केषु केषु पदार्थेषु मया चिन्तनीयोऽसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.17 -- 10.18।।किमर्थं तत्प्रकाशनं इत्यपेक्षायामाह -- कथं विद्यामिति। अहं त्वया योगी विधीये तस्य च चिन्तनं युक्तमेवेति। केषुकेषूभयविधेषु भावेषु मया चिन्त्योऽसि।योगिन् इति पाठे तद्वत्त्वात्तव योगमपि कथमहं विद्यामिति प्रश्न उपलभ्यते। ततो विस्तरेणेति समस्तप्रश्नस्फोरणं विभूतिं योगं चेति। यद्यपि पूर्वं त्वयोक्ता विभूतिस्तथ पि सङ्क्षेपेणेत्यधुना विस्तरेण वदेति पृच्छति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.17।।हे योगिन् आपका सदा चिन्तन करता हुआ मैं आपको किस प्रकार जानूँ हे भगवन् आप किनकिन भावोंमें अर्थात् वस्तुओंमें मेरे द्वारा चिन्तन किये जानेयोग्य हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.17।। व्याख्या -- कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् -- सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है? वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसलिये अर्जुन भगवान्से पूछते हैं कि हरदम चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया -- आठवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि जो अनन्यचित्त होकर नित्यनिरन्तर मेरा स्मरण करता है? उस योगीको मैं सुलभतासे प्राप्त हो जाता हूँ। फिर नवें अध्यायके बाईसवें श्लोकमें कहा कि जो अनन्य भक्त निरन्तर मेरा चिन्तन करते रहते हैं? उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ। इस प्रकार चिन्तनकी महिमा सुनकर अर्जुन कहते हैं कि जिस चिन्तनसे मैं आपको तत्त्वसे जान जाऊँ? वह चिन्तन मैं कहाँकहाँ करूँ किस वस्तु? व्यक्ति? देश? काल? घटना? परिस्थिति आदिमें मैं आपका चिन्तन करूँ [यहाँ चिन्तन करना साधन है और भगवान्को तत्त्वसे जानना साध्य है।]यहाँ अर्जुनने तो पूछा है कि मैं कहाँकहाँ? किसकिस वस्तु? व्यक्ति? स्थान आदिमें आपका चिन्तन करूँ? पर,भगवान्ने आगे उत्तर यह दिया है कि जहाँजहाँ भी तू चिन्तन करता है? वहाँवहाँ ही तू मेरेको समझ। तात्पर्य यह है कि मैं तो सब वस्तु? देश? काल आदिमें परिपूर्ण हूँ। इसलिये किसी विशेषता? महत्ता? सुन्दरता आदिको लेकर जहाँजहाँ तेरा मन जाता है? वहाँवहाँ मेरा ही चिन्तन कर अर्थात् वहाँ उस विशेषता आदिको मेरी ही समझ। कारण कि संसारकी विशेषताको माननेसे संसारका चिन्तन होगा? पर मेरी विशेषताको माननेसे मेरा ही चिन्तन होगा। इस प्रकार संसारका चिन्तन मेरे चिन्तनमें परिणत होना चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.17।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.17।।किमर्थं विभूतीः श्रोतुमिच्छसीत्याशङ्क्य ध्यानसौकर्यप्रकारप्रश्नेन फलं कथयति -- कथमिति। योगो नामैश्वर्यं तदस्यास्तीति योगी हे योगिन्? अहं स्थविष्ठमतिस्त्वां केन प्रकारेण सततमनुसंदधानो विशुद्धबुद्धिर्भूत्वा निरुपाधिकं त्वां विजानीयामिति प्रश्नः। प्रश्नान्तरं प्रस्तौति -- केषु केष्विति। चेतनाचेतनभेदादुपाधिबहुत्वाच्च बहुवचनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.17।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.17।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.17।।अहं योगी भक्तियोगनिष्ठः सन् भक्त्या त्वां सदा परिचिन्तयन् चिन्तयितुं प्रवृत्तः चिन्तनीयं त्वां परिपूर्णैश्वर्यादिकल्याणगुणगणं कथं विद्या पूर्वोक्तबुद्धिज्ञानादिभाव्यतिरेक्तेषु अनुक्तषु केषु केषु च भावेषु मया नियन्तृत्वेन चिन्त्यः असि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.17।। --,कथं विद्यां विजानीयाम् अहं हे योगिन् त्वां सदा परिचिन्तयन्। केषु केषु च भावेषु वस्तुषु चिन्त्यः असि ध्येयः असि भगवन् मया।।
───────────────────
【 Verse 10.18 】
▸ Sanskrit Sloka: विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन | भूय: कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् ||
▸ Transliteration: vistareṇātmano yogaṁ vibhūtiṁ ca janārdana | bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me’mṛtam ||
▸ Glossary: vistareṇā: in detail; atmano: of Yourself; yogaṁ: powers; vibhūtiṁ: glories; ca: and; janārdana: Janārdana; bhūyaḥ: again; kathaya: say; tṛptiḥ: satisfaction; hi: surely; śṛṇvato: hear; nā: not; asti: is; me: my; amṛtam: nectar
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.18 Tell me in detail of your powers and glories, Oh Janār- dana. Again, please tell for my satisfaction as I do not tire of hearing your sweet words.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.18।।हे जनार्दन आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनतेसुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.18।। हे जनार्दन अपनी योग शक्ति और विभूति को पुन विस्तारपूर्वक कहिए? क्योंकि आपके अमृतमय वचनों को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं होती।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.18 विस्तरेण in detial? आत्मनः Thy? योगम् Yoga? विभूतिम् glory? च and? जनार्दन O Janardana? भूयः again? कथय tell? तृप्तिः contentment? हि for? श्रृण्वतः (of) hearing? न not? अस्ति is? मे of me? अमृतम् nectar.Commentary The Lord is called Janardana because all pray to Him for worldly success? prosperity and also salvation. Arjuna also prays to the Lord to explain His Yogic power and glory? for his salvation.Arjuna says to Lord Krishna Tell me in detail of Thy mysterious power (Yoga) and sovereignty (Aisvarya) and the various things to be meditated upon. Tell me again though You have described earlier in the seventh and the ninth chapters succinctly for there is no satiety in hearing Thy ambrosial speech or nectarlike conversation. However much of it I hear? I am not satisfied surely it is nectar of immortality for me.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.18. In detail, please expound, once again Your own Yogic power and the manifesting power. O Janardana ! I don't feel contended in hearing Your nectar-[like exposition].
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.18 Tell me again, I pray, about the fullness of Thy power and Thy glory; for I feel that I am never satisfied when I listen to Thy immortal words.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.18 Speak to me again in full, O Krsna, about Your attributes and glories. For I am not satiated by hearing Your ambrosial words.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.18 O Janardana, narrate to me again [In addition to what has been said in the seventh and ninth chapters.] Your onw yoga and (divine) manifestations elaborately. For, while hearing (Your) nectar-like (words), there is no satiety in me.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.18 Tell me again in detail, O Krishna, of Thy Yogic power and glory; for I am not satiated with what I have heard of Thy life-giving and nectar-like speech.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.18 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.18 Speak to me again in full, your association with the alities of being the creator etc., and Your sovereignty, Your rulership, which have been briefly described in 'I am the origin of all; from Me proceed everything' (10.8). For I am not satiated by hearing Your ambrosial words. The meaning is, 'My enthusiasm to know more and more of your ambrosial teachings is known to You.'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.18 O Janardana: ardana is derived from ard, in the sense of the act of going; by virtue of making the janas, the demons who are opposed to the gods, go to hell etc. He is called Jana-ardana. Or, He is called so because He is prayed to [The verbal root ard has got a second meaning, 'to pray'.] by all beings for the sake of human goals, viz prosperity and Liberation. Kathaya, narrate to me; bhuyah, again, though spoken of earlier; atmanah, Your own; yogam, yoga-the special ability in the form of mystic powers; and vibhutaim, the (divine) manifestations-the variety of the objects of meditation; vistarena, elaborately. Hi, for; srnvatah, while hearing; (Your) amrtam, nectar-like speech issuing out of Your mouth; na asti, there is no; trptih, satiety; me, in me.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.18।। दर्शनशास्त्र के तथा अन्य किसी विषय के विद्यार्थी में भी? सर्वप्रथम प्रखर जिज्ञासा का होना अत्यावश्यक है। विषय को जानने और समझने की इस जिज्ञासा के बिना कोई भी ज्ञान दृढ़ नहीं होता है और न विद्यार्थी के लिए वह लाभदायक ही हो सकता है। आत्मविकास के आध्यात्मिक ज्ञान में यह बात विशेष रूप से लागू होती है क्योंकि अन्य ज्ञानों के समान? न केवल इसे ग्रहण और धारण ही ऋ़रना है? वरन् यह आत्मज्ञान होने पर उसे अपने जीवन में दृढ़ता से जीना भी होता है। इसलिए श्रवण की इच्छा को एक श्रेष्ठ और आदर्श गुण माना गया है? जो वेदान्त के उत्तम अधिकारी के लिए अनिवार्य है। इस गुण के होने से ज्ञानमार्ग में प्रगति तीव्र गति से होती है।पाण्डुपुत्र अर्जुन इस श्रेष्ठ गुण से सम्पन्न था जो कि उसके इस कथन से स्पष्ट होता है कि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर मेरी तृप्ति नहीं होती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वेदान्त का शुद्धिकारी प्रभाव रुचिपूर्वक श्रवण करने वाले सभी बुद्धिमान विद्यार्थियों पर पड़ता है। एक सच्चे ज्ञानी गुरु के मुख से आत्मतत्त्व का उपदेश सुनकर प्रारम्भ में शिष्य को होने वाला आनन्द क्षणिक उल्लास ही देता है? जो स्थिर नहीं रह पाता। जब वह शिष्य प्रवचन के बाद अकेला रह जाता है? तब उसका मन पुन अनेक कारणों से अशान्त हो सकता है। और फिर भी? कितना ही क्षणिक आनन्द क्यों न हो? उसमें अर्जुन के समान नवदीक्षित विद्यार्थियों को आकर्षित करने की सार्मथ्य होती है? जिसके कारण उनकी उस विषय के प्रति रुचि एक व्यसन के समान बढ़ती ही जाती है। वेदान्त प्रवचनों के श्रवणार्थ इस अधिकाधिक अभिरुचि को यहाँ स्पष्ट दर्शाया गया है। यद्यपि यह साधना है? साध्य नहीं? तथापि? निसन्देह यह एक शुभ प्रारम्भ है। जिन लोगों को तत्त्वज्ञान के बौद्धिक अध्ययन से ही सन्तोष का अनुभव होता हो? वे भी निश्चय ही उन सहस्रों लोगों से श्रेष्ठतर हैं? जो दिव्य आत्मस्वरूप को दर्शाने वाले एक भी आध्यात्मिक प्रवचन को नहीं सुन सकते? या सह नहीं सकतेएक अथक धर्म प्रचारक के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त धैर्य के साथ? अर्जुन से कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.18।।ननु सप्तमे नवमे च विभूतिरैश्यवर्य च दर्शितं तत्किमिति पुनः पृच्छसि तत्राह -- विस्तरेणेति। स्वस्य योगैश्वर्यशक्तिविशेषं विभूतिं च पूर्वोक्तमपि योगादि भूयो विस्तरेण कथय। हे जनार्दन देवशत्रुजनानां असुराणां प्राणवियोगनरकादिगमयितृत्वातं। तथा चास्मच्छत्रुजनानां रोगद्वेषादीनां नाशनाय ध्येयोगविभूति कथनं तव नामानुरुपत्वाद्योग्यमित्याशयः। यद्वाभ्युदयनिःश्रेयसपुरुषार्थप्रयोजनं सर्वैजनैर्याच्यते इति तथा संबोधयन् ममापि याञ्चा त्वयि युक्तेवेति सूचयति। हि यस्मात्तव वाक्याभृतं श्रृण्वतो मम तृप्तिर्नास्ति। नीरसत्वप्रयुक्ततृप्तिव्यावृत्तयेऽमृतमित्युक्तम्। रसाज्ञानप्रयुक्ततृप्तिव्यावर्तनाय मे लसज्ञस्येत्युक्तम्। उदरे पूर्णेऽभृतेऽप्यलंबुद्धिर्भवतीति तद्य्ववच्छेदाय श्रृण्वत इत्युक्तम्। आकाशात्मकस्य श्रोत्रस्य शब्देन गुणे पूर्णताया असंभवात्तृप्तिर्नास्तीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.18।।अतः आत्मनस्तव योगं सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वादिलक्षणमैश्वर्यातिशयं विभूतिं च ध्यानालम्बनं विस्तरेण,संक्षेपेण सप्तमे नवमे चोक्तमपि भूयः पुनः कथय। सर्वैर्जनैरभ्युदयनिःश्रेयसप्रयोजनं याच्यस इति हे जनार्दन? अतो ममापि याञ्चा त्वय्युचितैव। उक्तस्य पुनः कथनं कुतो याचसे तत्राह -- तृप्तिरलंप्रत्ययेनेच्छाविच्छित्तिर्नास्ति। हि यस्माच्छृण्वतः श्रवणेन पिबतस्त्वद्वाक्यामृतममृतवत्पदे पदे स्वादु स्वादु। अत्र त्वद्वाक्यमित्यनुक्तेरपह्नुत्यतिशयोक्तिरूपकसंकरोऽयं माधुर्यातिशयानुभवेनोत्कण्ठातिशयं व्यनक्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.18।।योगं वैश्वरूप्यम्। विभूतिं ध्यानालम्बनम्। अमृतं अमृतस्य मोक्षस्य साधनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.18।।यच्चिन्तनात् त्वां प्राप्नोमि याथातथ्येन जानामि तादृशमात्मनो योगं पदार्थेषु क्रीडात्मकं योगम्। च पुनः। तादृशीमेव विभूतिं हे जनार्दन सर्वाविद्यानाशक पूर्वं सङ्क्षेपकथितामपि भूयो विस्तारेण कथय। हि यस्मात् अमृतं मोक्षात्मकं मरणनिवर्तकमानन्दरूपं त्वद्वाक्यं शृण्वतो मे तृप्तिः अलम्भावो न भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.18।।तदेवं बहिर्मुखेऽपि चित्ते तत्र तत्र विभूतिभेदेन त्वच्चिन्तैव यथा भवेत्तथा विस्तरेण कथयेत्याह -- विस्तरेणेति। आत्मनस्तव योगं सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वादिलक्षणं योगैश्वर्यं विभूतिं च विस्तरेण पुनः कथय। हि यस्मात्त्वद्वाक्यममृतरूपं शृण्वतो मम तृप्तिरलंबुद्धिर्नास्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.17 -- 10.18।।किमर्थं तत्प्रकाशनं इत्यपेक्षायामाह -- कथं विद्यामिति। अहं त्वया योगी विधीये तस्य च चिन्तनं युक्तमेवेति। केषुकेषूभयविधेषु भावेषु मया चिन्त्योऽसि।योगिन् इति पाठे तद्वत्त्वात्तव योगमपि कथमहं विद्यामिति प्रश्न उपलभ्यते। ततो विस्तरेणेति समस्तप्रश्नस्फोरणं विभूतिं योगं चेति। यद्यपि पूर्वं त्वयोक्ता विभूतिस्तथ पि सङ्क्षेपेणेत्यधुना विस्तरेण वदेति पृच्छति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.18।।हे जनार्दन अपने योगको -- अपनी योगैश्वर्यरूप विशेष शक्तिको और विभूतिको यानी चिन्तन करनेयोग्य पदार्थोंके विस्तारको? विस्तारपूर्वक कहिये। गमन जिसका कर्म है ऐसी अर्द धातुका रूप जनार्दन है। असुरोंको यानी देवोंके प्रतिपक्षी मनुष्योंको नरकादिमें भेजनेवाले होनेसे भगवान्का नाम जनार्दन है। अथवा उन्नति और कल्याण -- ये दोनों पुरुषार्थरूप प्रयोजन सब लोगोंके द्वारा भगवान्से माँगे जाते हैं? इसलिये भगवान्का नाम जनार्दन है -- यद्यपि आप पहले कह चुके हैं तो भी फिर कहिये क्योंकि आपके मुखसे निकले हुए वाक्यरूप अमृतको सुनतेसुनते मुझे तृप्ति नहीं होती है -- संतोष नहीं होता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.18।। व्याख्या -- विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन -- भगवान्ने सातवें और नवें अध्यायमें ज्ञानविज्ञानका विषय खूब कह दिया। इतना कहनेपर भी उनकी तृप्ति नहीं हुई? इसलिये दसवाँ अध्याय अपनी ओरसे ही कहना शुरू कर दिया। भगवान्ने दसवाँ अध्याय आरम्भ करते हुए कहा कि तू फिर मेरे परम वचनको सुन। ऐसा सुनकर भगवान्की कृपा और महत्त्वकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि विशेषतासे जाती है और वे भगवान्से फिर सुनानेके लिये प्रार्थना करते हैं। अर्जुन कहते हैं कि आप अपने योग और विभूतियोंको विस्तारपूर्वक फिरसे कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनते हुए तृप्ति नहीं हो रही है। मन करता है कि सुनता ही चला जाऊँ। भगवान्की विभूतियोंको सुननेसे भगवान्में प्रत्यक्ष आकर्षण बढ़ता देखकर अर्जुनको लगा कि इन विभूतियोंका ज्ञान होनेसे भगवान्के प्रति मेरा विशेष आकर्षण हो जायगा और भगवान्में सहज ही मेरी दृढ़ भक्ति हो जायगी। इसलिये अर्जुन विस्तारपूर्वक फिरसे कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम् -- अर्जुन श्रेयका साधन चाहते हैं (गीता 2। 7 3। 2 5। 1)? और भगवान्ने विभूति एवं योगको तत्त्वसे जाननेका फल अपनेमें दृढ़ भक्ति होना बताया (गीता 10। 7)। इसलिये अर्जुनको विभूतियोंको जाननेवाली बात बहुत सरल लगी कि मेरेको कोई नया काम नहीं करना है? नया चिन्तन नहीं करना है? प्रत्युत जहाँकहीं विशेषता आदिको लेकर मनका स्वाभाविक खिंचाव होता है? वहीँ उस विशेषताको भगवान्की मानना है। इससे मनकी वृत्तियोंका प्रवाह संसारमें न होकर भगवान्में हो जायगा? जिससे मेरी भगवान्में दृढ़ भक्ति हो जायगी और मेरा सुगमतासे कल्याण हो जायगा। कितनी सीधी? सरल और सुगम बात है इसलिये अर्जुन विभूतियोंको फिर कहनेके लिये प्रार्थना करते हैं।जैसे? कोई भोजन करने बैठे और भोजनमें कोई वस्तु प्रिय (बढ़िया) मालूम दे? तो उसमें उसकी रुचि बढ़ती है और वह बारबार उस प्रिय वस्तुको माँगता है। पर उस रुचिमें दो बाधाएँ लगती हैं -- एक तो वह वस्तु अगर कम मात्रामें होती है तो पूरी तृप्तिपूर्वक नहीं मिलती और दूसरी? वह वस्तु अधिक मात्रामें होनेपर भी पेट भर जानेसे अधिक नहीं खायी जा सकती परन्तु भगवान्की विभूतियोंका और अर्जुनकी विभूतियाँ सुननेकी रुचिका अन्त ही नहीं आता। कानोंके द्वारा अमृतमय वचनोंको सुनते हुए न तो उन वचनोंका अन्त आता है? और न उनको सुनते हुए तृप्ति ही होती है। अतः अर्जुन भगवान्से प्रार्थना करते हुए कहते हैं कि आप ऐसे अमृतमय वचन सुनाते ही जाइये। सम्बन्ध -- अर्जुनकी प्रार्थना स्वीकार करके भगवान् अब आगेके श्लोकसे अपनी विभूतियों और योगको कहना आरम्भ करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.18।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.18।।प्रकृतं प्रश्नमुपसंहरति -- विस्तरेणेति। अर्दतेर्गतिकर्मणो जनार्दनेति रूपम्? तद्व्युत्पादयति -- असुराणामिति। प्रकारान्तरेण शब्दार्थं व्युत्पादयति -- अभ्युदयेति। ननु पूर्वमेव सप्तमे नवमे च विभूतिरैश्वर्यं चेश्वरस्य दर्शितं तत्किमिति श्रोतुमिष्यते तत्राह -- भूय इति। अमृतममृतप्रख्यमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.18।।अर्द गतौ याचने च [धा.पा.1।55] इति वचनात् आसुरजनानां नरकादिगमयितृत्वाज्जनैर्याच्यत्वाद्वा जनार्दन इति शङ्करः? तदप्रामाणिकं व्याख्यानम्। इदं तु श्रौतत्वादुपादेयमिति भावेनाह -- न जायत इति। नञः परनिपातः। अत एव नलोपाभावः उत्तरपदे तस्य स्मरणात् अर्दयति गमयति। स ह्यासीदिति। भूतः। अनादितः सत्तावानित्यर्थः। स नासीन्न स जन्मवान्सोऽर्दयतीति जनार्दनः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.18।।न जायतेऽर्दयति च संसारमिति जनार्दनः। तथा च बाभ्रव्यशाखायाम् -- स भूतः स जनार्दनः इति। स ह्यासीत्स नासीत्सोऽर्दयत् इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.18।।अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते (गीता 10।8) इति संक्षेपेण उक्तं तव स्रष्टृत्वादियोगं विभूतिं नियमनं च भूयः विस्तरेण कथय। त्वया उच्यमानं त्वन्माहात्म्यामृतं श्रृण्वतो मे तृप्तिः न अस्ति हि -- मम अतृप्तिः त्वया एव विदिता इति अभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.18।। --,विस्तरेण आत्मनः योगं योगैश्वर्यशक्तिविशेषं विभूतिं च विस्तरं ध्येयपदार्थानां हे जनार्दन? अर्दतेः गतिकर्मणः रूपम्? असुराणां देवप्रतिपक्षभूतानां जनानां नरकादिगमयितृत्वात् जनार्दनः अभ्युदयनिःश्रेयसपुरुषार्थप्रयोजनं सर्वैः जनैः याच्यते इति वा। भूयः पूर्वम् उक्तमपि कथय तृप्तिः परितोषः हि यस्मात् नास्ति मे मम शृण्वतः त्वन्मुखनिःसृतवाक्यामृतम्।।श्रीभगवानुवाच --,
───────────────────
【 Verse 10.19 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतय: | प्राधान्यत: कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ | prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāstyanto vistarasya me ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: The Lord says; hanta: yes; te: to you; kathayiṣyāmi: I will talk; divyā: divine; hi: surely; ātma: My; vibhūtayaḥ: glories; prādhānyataḥ: main; kuruśreṣṭha: great among the Kurus; na: not; asti: there; antaḥ: end; vistarasya: detail; me: My
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.19 Kṛṣṇa says, ‘Yes, Oh kuruśreṣṭha, I will talk to you surely of My divine glories; but only of the main ones as there is no end to the details of My glories.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.19।।श्रीभगवान् बोले -- हाँ? ठीक है। मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे (संक्षेपसे) कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.19।। श्रीभगवान् ने कहा हन्त अब मैं तुम्हें अपनी दिव्य विभूतियों को प्रधानता से कहूँगा। हे कुरुश्रेष्ठ मेरे विस्तार का अन्त नहीं है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.19 हन्त now? very well? ते to thee? कथयिष्यामि (I) will declare? दिव्याः divine? हि indeed? आत्मविभूतयः My glories? प्राधान्यतः in their prominence? कुरुश्रेष्ठ O best of the Kurus? न not? अस्ति is? अन्तः end? विस्तरस्य of detail? मे of Me.Commentary Now I will tell you of My most prominent divine glories. My glories are illimitable it is not possible to describe all of them.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.19. The Bhagavat said Yes. O the best among the Kurus ! I shall expound to you, only the chief auspicious manifesting powers of Mine. For, there would be no end to My details.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.19 Lord Shri Krishna replied: So be it, My beloved fried! I will unfold to thee some of the chief aspects of My glory. Of its full extent there is no end.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.19 The Lord said Indeed I shall tell you, O Arjuna, My auspicious manifestations (Vibhutis) - those that are prominent among these. There is no end to their extent.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.19 The Blessed
Chapter 10 (Part 9)
Lord said O best of the Kurus, now, according to their importance, I shall described to you My onw glories, which are indeed divine. There is no end to my manifestations.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.19 The Blessed Lord said Very well! Now I will declare to thee My divine glories in their prominence, O Arjuna; there is no end to their detailed description.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.19 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.19 The Lord said O Arjuna, I shall tell you My auspicious manifestations - those that are prominent among these. The term 'Pradhanya' connotes pre-eminence. For it will be said, 'Know Me to be the chief among family priests' (10.24). I shall declare to you those that are prominent in the world. For it would not be possible to tell or listen to them in detail, because there is no limit to them. To be a Vibhuti, the manifestation referred to should be under the control of the Lord; because it is stated: 'He who in truth knows this supernal manifestation and the seat of auspicious attributes' (10.7), after listing the various kinds of mental dispositions like intelligence etc., of all beings. Similarly it has been stated there that 'being the creator etc.,' is meant by the term Yoga, and that their 'being actuated,' meant by the term Vibhuti. Again it is stated: 'I am the origin of all; from me proceed everything; thinking thus, the wise worship Me with all devotion' (10.8).
Sri Krsna clearly declares that he rules over all creatures by actuating them from within as their Self. He also declares His being the creator, sustainer and destroyer of everything, as connected by the term Yoga.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.19 Kuru-srestha, O best of the Kurus; hanta, now; since, on the other hand, it is not possible to speak exhaustively of them even in a hundred years, (there-fore) pradhanyatah, according to their importance, according as those manifestations are pre-eminent in their respective spheres; kathayisyami, I shall described; te, to you; atma-vibhutayah, My own glories; which are (hi, indeed) divyah, divine, heavenly. Na asti there is no; antah, end; me, to My; vistarasya, manifestations. 'Of those, now listen to the foremost:'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.19।। प्रस्तुत अध्याय को बृहत् आकार देने वाला भगवान् श्रीकृष्ण का यह विस्तृत एवं व्याख्यापूर्ण उत्तर? एकएक वस्तु और व्यक्ति में तथा उनके समूह में आत्मा की वास्तविक पहचान का वर्णन करता है। यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपनी विभूति और योग का वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्ण निम्नलिखित दो बातों को बताने का विशेष ध्यान रखते हैं। (क) प्रत्येक वस्तु में अपना सर्वोच्च महत्त्व? (ख) उनके बिना किसी भी एक वस्तु या समूह का सामञ्जस्यपूर्ण अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता।इस खण्ड का प्रारम्भ जिस हन्त शब्द से होता है? वह अर्जुन के प्रति गीताचार्य के प्रेमपूर्ण सहानुभूति को दर्शाता है? तथा उससे अर्जुन में प्रतीत होने वाली अक्षमता के प्रति भगवान् की चिन्ता भी व्यक्त होती है? क्योंकि उस अक्षमता के कारण वह उस तत्त्व को नहीं अनुभव कर पा रहा था जो उसके अत्यन्त समीप है? उसका स्वरूप ही है। हन्त शब्द को इस खण्ड के प्रारम्भ का केवल सूचक मानने में उसमें निहित गूढ़ अभिप्राय का लोप हो जाने के कारण वह अर्थ स्वीकार्य नहीं हो सकता।समष्टि और व्यष्टि उपाधियों के द्वारा इस बहुविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुए आत्मा के विस्तार का अन्त नहीं हो सकता। इसलिए उसका वर्णन करना असंभव है? तथापि करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अपने शरणागत् शिष्य अर्जुन के प्रति अपनी असीम अनुकम्पा के कारण इस असंभव कार्य को अपने हाथ में लेते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनके विस्तार का कोई अन्त नहीं है फिर भी वे अर्जुन को अपनी प्रधान विभूतियाँ बतायेंगे।भौतिक जगत् में यह एक अनुभूत सत्य है कि सूर्यप्रकाश सभी वस्तुओं की सतह पर से परावर्तित होता है चाहे वह पाषाण हो या दर्पण किन्तु दर्पण में उसका प्रतिबिम्ब या परावर्तन अधिक स्पष्ट और तेजस्वी होता है। भगवान् वचन देते हैं कि वे ऐसे दृष्टान्त देंगे जिनमें दिव्यता की अभिव्यक्ति के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं।परन्तु? उन विभूतियों के वर्णन में प्रवेश करने के पूर्व एक मूलभूत सत्य को बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.19।।एवं पृष्टो भगवानुवाच। हन्तेदानीं या आत्मनो विभूतयस्ताः कथियिष्यामि प्राधान्यतः। प्रधानां तां तां विभूतिमित्यर्थः। कुरुश्रेष्ठेति संबोधयन् स्वमधिकारीति सूचयति। विस्तरेण कथयेत्युक्तं तत्राह। मे विभूतीनां विस्तरस्यान्तो नास्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.19।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- हन्तेत्यनुमतौ। यत्त्वया प्रार्थितं तत्करिष्यामि मा व्याकुलोभूरित्यर्जुनं समाश्वास्य तदेव कर्तुमारभते। कथयिष्यामि प्राधान्यतस्ता विभूतीर्या दिव्या हि प्रसिद्धा आत्मनो ममासाधारणा विभूतयः हे कुरुश्रेष्ठ? विस्तरेण तु कथनमशक्यम्। यतो नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे विभूतीनां? अतः प्रधानभूताः,काश्चिदेव विभूतीर्वक्ष्यामीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.19।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच -- हन्तेति। हन्त इदानीम्। हन्तेत्यनुमतौ वा। दिव्याः पुराणान्तरेष्वपि श्रेष्ठत्वेन प्रसिद्धाः या आत्मविभूतयस्ताः कथयामीति योजना। प्राधान्यत इति। योगोपकारित्वेन विभूतय इह प्राधान्येन? योगस्तु संक्षेपेणैवोच्यते। तस्याग्रे वक्ष्यमाणत्वादिति भावः। अन्यथा योगं विभूतिं च कथयेति पुष्टे विभूतिमात्रकथनेनानवहितचित्तत्वं भगवतः स्यात्। नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे विभूतिनामिति विपरिणामेनानुषञ्जनीयम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.19।।एवं जिज्ञासुनाऽर्जुनेन प्रार्थित आह -- हन्तेति। स्वस्वरूपज्ञानार्थकतादृक्प्रार्थनया हन्तेति हर्षे। हे कुरुश्रेष्ठ भक्तवंशोद्भव दिव्याः क्रीडारूपा विभूतयः ते प्राधान्यतस्त्वद्योग्यास्त्वदर्थं कथयिष्यामि। ननु विस्तरेण कथं नोच्यते इत्यत आह -- नास्तीति। मे विभूतीनां विस्तरस्य अन्तो नास्ति। अतस्त्वत्पृष्टत्वाद्योग्या एव कथयिष्यामीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.19।। एवं प्रार्थितः सन् श्रीभगवानुवाच -- हन्तेति। हन्तेत्यनुकम्पासंबोधनम्। दिव्या या मम विभूतयस्ताः प्राधान्येन तुभ्यं कथयिष्यामि। यतोऽवान्तरस्य विभूतिविस्तरस्य मदीयस्यान्तो नास्त्यतः प्रधानभूताः कतिचिद्वर्णयिष्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.19।।एवं प्रार्थितः श्रीभगवानुवाच -- हन्तेति। अनुकम्पा सम्बोधने। या दिव्या ममात्मविभूतयस्ता वक्ष्यामि। तत्रापि प्राधान्यतः? न तु सामस्त्येन अनन्तत्वात्तदाह -- नास्त्यन्त इति। विभूतिर्हि विविधतया स्वांशरूपेण प्रकृतौ भूतिराविर्भूतिः केनचिद्विशेषेण युक्ता सर्वत्र सत्ता वा स्वस्य विविधा सर्वेषां नियम्यत्त्वोक्त्या स्वांशत्वकथनमभिप्रेतम्। एवं च सर्वस्य विभूतिरूपत्वे प्राधान्यतो विभूतय इहोच्यन्ते।पुरोधसां च मुख्यं मां [10।24] इति रीत्या मुख्यभावो ज्ञेयः। एवमपि भगवानव्ययोऽचिन्त्यैश्वर्यादिधर्मकत्वादिति योगः स च तदन्ते वक्ष्यतेविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् [10।42] इति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.19।।श्रीभगवान् बोले -- हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अब मैं तुझे अपनी दिव्य -- देवलोकमें होनेवाली विभूतियाँ प्रधानतासे बतलाता हूँ अर्थात् मेरी जहाँजहाँपर जोजो प्रधानप्रधान विभूतियाँ हैं? उनउन प्रधान विभूतियोंका ही मैं प्रधानतासे वर्णन करता हूँ। सम्पूर्णतासे तो वे सैकड़ों वर्षोंमें भी नहीं कही जा सकतीं क्योंकि मेरे विस्तारका अर्थात् मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.19।। व्याख्या -- हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः -- योग और विभूति कहनेके लिये अर्जुनकी जो प्रार्थना है? उसको हन्त अव्ययसे स्वीकार करते हुए भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी दिव्य? अलौकिक? विलक्षण विभूतियोंको तेरे लिये कहूँगा (योगकी बात भगवान्ने आगे इकतालीसवें श्लोकमें कही है)।दिव्याः कहनेका तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु? व्यक्ति? घटना आदिमें जो कुछ भी विशेषता दीखती है? वह,वस्तुतः भगवान्की ही है। इसलिये उसको भगवान्की ही देखना दिव्यता है और वस्तु? व्यक्ति आदिकी देखना अदिव्यता अर्थात् लौकिकता है।प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे -- जब अर्जुनने कहा कि भगवन् आप अपनी विभूतियोंको विस्तारसे? पूरीकीपूरी कह दें? तब भगवान् कहते हैं कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा क्योंकी मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है। पर आगे ग्यारहवें अध्यायमें जब अर्जुन बड़े संकोचसे कहते हैं कि मैं आपका विश्वरूप देखना चाहता हूँ अगर मेरे द्वारा वह रूप देखा जाना शक्य है तो दिखा दीजिये? तब भगवान् कहते हैं -- पश्य मे पार्थ रूपाणि (11। 5) अर्थात् तू मेरे रूपोंको देख ले। रूपोंमें कितने रूप क्या दोचार नहींनहीं? सैकड़ोंहजारों रूपोंको देख इस प्रकार यहाँ अर्जुनकी विस्तारसे विभूतियाँ कहनेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् संक्षेपसे विभूतियाँ सुननेके लिये कहते हैं और वहाँ अर्जुनकी एक रूप दिखानेकी प्रार्थना सुनकर भगवान् सैकड़ोंहजारों रूप देखनेके लिये कहते हैं,यह एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि सुननेमें तो आदमी बहुत सुन सकता है? पर उतना नेत्रोंसे देख नहीं सकता क्योंकि देखनेकी शक्ति कानोंकी अपेक्षा सीमित होती है (टिप्पणी प0 553)। फिर भी जब अर्जुनने सम्पूर्ण विभूतियोंको सुननेमें अपनी सामर्थ्य बतायी तो भगवान्ने संक्षेपसे सुननेके लिये कहा और जब अर्जुनने एक रूपको देखनेमें नम्रतापूर्वक अपनी असमर्थता प्रकट की तो भगवान्ने अनेक रूप देखनेके लिये कहा इसका कारण यह है कि गीतामें अर्जुनका भगवद्विषयक ज्ञान उत्तरोत्तर बढ़ता जाता है। इस दसवें अध्यायमें जब भगवान्ने यह कहा कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है? तब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की अनन्तताकी तरफ चली गयी। उन्होंने समझा कि भगवान्के विषयमें तो मैं कुछ भी नहीं जानता क्योंकि भगवान् अनन्त हैं? असीम हैं? अपार हैं। परन्तु अर्जुनने भूलसे कह दिया कि आप अपनी सबकीसब विभूतियाँ कह दीजिये। इसलिये अर्जुन आगे चलकर सावधान हो जाते हैं और नम्रतापूर्वक एक रूपको दिखानेके लिये ही भगवान्से प्रार्थना करते हैं। नेत्रोंकी शक्ति सीमित होते हुए भी भगवान् दिव्य चक्षु प्रदान करके अर्थात् चर्मचक्षुओंमें विशेष शक्ति प्रदान करके अपने अनेक रूपोंको देखनेकी आज्ञा देते हैं।दूसरी बात? वक्ताकी व्यक्तिगत बात पूछी जाय और अपनी अज्ञता तथा अयोग्यतापूर्वक अपने जाननेके लिये प्रार्थना की जाय -- इन दोनोंमें फरक होता है। यहाँ अर्जुनने विस्तारपूर्वक विभूतियाँ कहनेके लिये कहकर भगवान्की थाह लेनी चाही? तो भगवान्ने कह दिया कि मैं तो संक्षेपसे कहूँगा क्योंकि मेरी विभूतियोंकी थाह नहीं है। ग्यारहवें अध्यायमें अर्जुनने अपनी अज्ञता और अयोग्यता प्रकट करते हुए भगवान्से अपना अव्यय रूप दिखानेकी प्रार्थना की? तो भगवान्ने अपने अनन्तरूप देखनेके लिये आज्ञा दी और उनको देखनेकी सामर्थ्य (दिव्य दृष्टि) भी दी इसलिये साधकको किञ्चिन्मात्र भी अपना आग्रह? अहंकार न रखकर और अपनी सामर्थ्य? बुद्धि न लगाकर केवल भगवान्पर ही सर्वथा निर्भर हो जाना चाहिये क्योंकि भगवान्की निर्भरतासे जो चीज मिलती है? वह अपार मिलती है। सम्बन्ध -- विभूतियाँ और योग -- इन दोनोंमेंसे पहले भगवान् बीसवें श्लोकसे उनतालीसवें श्लोकतक अपनी बयासी विभूतियोंका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.19।।प्रष्टारं विश्रम्भयितुं भगवानुक्तवानित्याह -- श्रीभगवानिति। हन्तेत्यनुमतिं व्यावर्त्य जिज्ञासावच्छिन्नं कालं दर्शयति -- इदानीमिति। दिवि भवत्वमप्राकृतत्वमस्मदगोचरत्वम्। वाक्यान्वयं द्योतयति -- यास्ता इति। सर्वविभूतीनां वक्तव्यत्वप्राप्तावुक्तम् -- यत्रेति। किमित्यनवशेषतो विभूतयो नोच्यन्ते तत्राह -- अशेषतस्त्विति। तत्र हेतुर्यत इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.19।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.19।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।10.19।।श्रीभगवानुवाच -- हे कुरुश्रेष्ठ मदीयाः कल्याणीः विभूतीः प्राधान्यतः ते कथयिष्यामि। प्राधान्यशब्देन उत्कर्षो विवक्षितः?पुरोधसां च मुख्यं माम् (गीता 10।24) इति हि वक्ष्यते। जगति उत्कृष्टाः काश्चन विभूतीः वक्ष्यामि? विस्तरेण वक्तुं श्रोतुं च न शक्यते? तासाम् आनन्त्यात्। विभूतित्वं नाम नियाम्यत्वम्? सर्वेषां भूतानां बुद्ध्यादयः पृथग्विधा भावा मत्त एव भवन्ति इति उक्त्वाएतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः। (गीता 10।7) इति प्रतिपादनात्। तथा तत्र योगशब्दनिर्दिष्टं स्रष्टृत्वादिकं विभूतिशब्दनिर्दिष्टं तत्प्रवर्त्यत्वम् इति युक्तम्। पुनश्चअहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते। इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः।। (गीता 10।8) इति उक्तम्।तत्र सर्वभूतानां प्रवर्तनरूपं नियमनम् आत्मतया अवस्थाय इति इमम् अर्थं योगशब्दनिर्दिष्टं सर्वस्य स्रष्टृत्वं पालयितृत्वं संहर्तृत्वं च इति सुस्पष्टम् आह --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.19।। --,हन्त इदानीं ते तव दिव्याः दिवि भवाः आत्मविभूतयः आत्मनः मम विभूतयः याः ताः कथयिष्यामि इत्येतत्। प्राधान्यतः यत्र यत्र प्रधाना या या विभूतिः तां तां प्रधानां प्राधान्यतः कथयिष्यामि अहं कुरुश्रेष्ठ। अशेषतस्तु वर्षशतेनापि न शक्या वक्तुम्? यतः नास्ति अन्तः विस्तरस्य मे मम विभूतीनाम् इत्यर्थः।।तत्र प्रथममेव तावत् श्रृणु --,
───────────────────
【 Verse 10.20 】
▸ Sanskrit Sloka: अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थित: | अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च ||
▸ Transliteration: ahamātmā guḍākeśa sarvabhūtāśayasthitaḥ | ahamādiśca madhyaṁ ca bhūtānāmanta eva ca ||
▸ Glossary: aham: I; ātmā: soul; guḍākeśa: Arjuna; sarva: all; bhūtā: living beings; aśayas- thitaḥ: situated in; aham: I; ādiḥ: beginning; ca: and; madhyaṁ: middle; ca: and; bhūtānām: of living beings; anta: end; eva: also; ca: and
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.20 I am the Spirit, Oh Guḍākeśā, situated in all living beings. I am surely the beginning, middle and end of all beings.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.20।।हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.20।। हे गुडाकेश (निद्राजित्) मैं समस्त भूतों के हृदय में स्थित सबकी आत्मा हूँ तथा सम्पूर्ण भूतों का आदि? मध्य और अन्त भी मैं ही हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.20 अहम् I? आत्मा the Self? गुडाकेश O Gudakesa? सर्वभूताशयस्थितः seated in the hearts of all beings? अहम् I? आदिः the beginning? च and? मध्यम् the middle? च and? भूतानाम् of (all) beings? अन्तः the end? एव even? च and.Commentary O Gudakesa I am the soul (Pratyagatma) which exists in the hearts of all beings and I am also the source or origin? the middle or stay? and the end of all created beings. I am the birth? the life and the death of all beings. Meditate on Me as the innermost Self.Gudakesa means either coneror of sleep or thickhaired.He who is able to meditate on the Self with Abheda Bhavana (attitude of nonduality)? is a alified aspirant (Adhikari) of the first class. He who is not able to meditate on the Self should think of the Lord in those things which are mentioned below. This type of meditation is for the aspirants of the middle class.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.20. O coneror of sleep ! I am the Soul residing in the heart of all beings; I am the beginning, and the middle and also the very end of beings.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.20 O Arjuna! I am the Self, seated in the hearts of all beings; I am the beginning and the life, and I am the end of them all.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.20 I am the Self, O Arjuna, dwelling in the hearts of all beings. I am the beginning, the middle and also the end of all beings.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.20 O Gudakesa, I am the Self residing in the hearts of all beings, and I am the beginning and the middle as also the end of (all) beings.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.20 I am the Self, O Gudakesa, seated in the hearts of all beings; I am the beginning, the middle and also the end of all beings.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.20 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.20 I am the Self dwelling in the heart of all beings who constitute My body. What is called 'Self' is in every way the supporter, controller and the principal of a body. It is further declared: 'And I am seated in the hearts of all; from Me are memory, knowledge and their removal' (15.15), and 'The Lord dwells, O Arjuna in the heart of every being causing them to spin round and round by His power, as if set on a wheel' (18.61). The Srutis also declare: 'He who, dwelling in all beings, is within all beings, whom all beings do not know, whose body all beings are, who controls all beings from within, is your Inner Controller, immortal Self (Br. U., 3.7.15); and 'He who, dwelling in the self is within the self, whom the self does not know, whose body the self is, and who controls the self from within, He is your Inner Controller and Immortal Self' (Sata. Br., 14.5.30). Thus, I am the Self of all beings and I am their beginning, the middle and also the end. The meaning is that I am the cause of their origination, sustentation and dissolution.
Thus, having explained that the Lord's immanence in all beings, which are His manifestations having Him, as their Self, is the ground for naming them in the manner of Samanadhikaranya or co-ordinate predication with Him (i.e., predication that they are He Himself), Sri Krsna proceeds to present some specific or distinguished manifestations in the same style of co-ordinate predication. As the Lord abides as the Self in all, the final significance of all terms culminates in Him. Terms such as god, man, bird, tree etc., though they signify the respective physical forms of those objects, they culminate through them in the selves in them as their final significance. Just like that here it is going to be stated in the conclusion of the account of the manifestations of the Lord, that the Lord's immanence in them all as their Self is the basis for describing them in such co-ordinate predication (as He Himself). The text 'There is nothing, moving or unmoving, apart from Me' (10.39) says that they are inseparable from Him, and this inseparability is the result of their being under His control. This has been initially declared in the words 'All proceed from Me' (10.8).
[This word Samanadhikaranya is translated by some also as 'grammatical co-ordination.' It is a context in which a number of words, usually having varying denotations, are used to signify an identical object. This kind of co-ordinate relation occurs in all the following verses in which Sri Krsna eates Himself with various objects having different denotations as Atman, Visnu among the Adityas, Indra, Marici, Sankara, Kubera, etc. Further explanation is given in the commentary.]
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.20 Gudakesa, O Gudakesa-gudaka means sleep, and isa means master; master of that (sleep) is gudakesa, i.e. one who has conered sleep; [See also under 1.24.-Tr.] or, one who has got thick hair; aham, I; am the atma, Self, the indwelling Self; who is to be ever-meditated on as sarva-bhuta-asaya [Asaya-that in which are contained the impressions of meditations (upasanas), actions and past experiences.]-sthitah, residing in the hearts of all beings. And, by one who is unable to do so, I am to be meditated on through the following aspects. I am capable of being meditated on (through them) becasue aham, I; am verily the adih, beginning, the origin; and the madhyam, middle, continuance; ca, as also; the antah, end, dissolution; bhutanam, of (all) beings. 'I am to be meditated upon thus also:'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.20।। भूतमात्र के हृदय में स्थित आत्मा मैं ही हूँ इस सामान्य कथन के साथ श्रीकृष्ण इस प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं। वैज्ञानिक विचारपद्धति से शोधकार्य करने का एक सुप्रशिक्षित प्राध्यापक? अनुसंधान के अपने प्रिय विषय की चर्चा का प्रारम्भ एक संक्षिप्त व सारपूर्ण कथन के साथ करता है। तत्पश्चात् वह उस विषय का विस्तार से विचार करके युक्तियुक्त विवेचन के द्वारा अन्त में उसी प्रारम्भिक कथन के निष्कर्ष पर पहुँचता है। यहाँ पर भी हम देखेंगे कि इस अध्याय की समाप्ति पर भगवान् इसी विचार को और अधिक प्रभावशाली ढंग से दोहराते हैं कि मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।इस श्लोक की पहली पंक्ति में भगवान् अपनी सर्वात्मकता दर्शाते हैं और दूसरी पंक्ति में इसी भाव को प्रकारान्तर से बताते हैं कि मैं समस्त भूतों का आदि? मध्य और अन्त हूँ। वस्तुत बाह्य चराचर जगत् मन की प्रक्षेपित सृष्टि है दूसरे शब्दों में बाह्य जगत् परिच्छिन्न मन के द्वारा किया गया अनन्त का अन्यथा दर्शन है। यह तथ्य आन्तरिक वैचारिक जगत् से सम्बन्धित भी समझा जा सकता है। प्रत्येक बुद्धिवृत्ति चैतन्य में प्रकट होकर उसी में लीन हो जाती है। चैतन्य के अभाव में वृत्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती। आगे भी इसी विचार को दोहराया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण इस महान् सत्य को दोहराते कभी नहीं थकते हैं।इस चराचर जगत् में रहते हुए ईश्वरोपासना की साधनाओं को या पद्धति को अब बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.20।।योगं विभूतिं च कथयेति त्वया पृष्टं तत्र प्रथमं तावन्मदीयं योगं श्रुणु। अहं वासुदेव आत्मा प्रत्यगात्मा सर्वेषां भूतानामाशयेऽन्तःकरणे स्थितः। एतज्जिताज्ञाननिद्रैरेव ज्ञातव्यमिति द्योतयन् संबोधयति -- हे गुडाकेशेति। एतदशक्तस्याह। अहमादिः कारणं भूतानां मध्यः स्थितिरन्तः प्रलयश्च। तथाच सर्वभूतान्तरात्मत्वेन ध्यातुमशक्तेनोत्पत्त्यादिकर्तृत्वेनाहं ध्येय इत्याशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.20।।तत्र प्रथमं तावन्मुख्यं चिन्तनीयं शृणु -- सर्वभूतानामाशये हृद्देशेऽन्तर्यामिरूपेण प्रत्यगात्मरूपेण च स्थित आत्मा चैतन्यानन्दघनस्त्वयाहं वासुदेव एवेति ध्येयः। हे गुडाकेश जितनिद्रेति ध्यानसामर्थ्यं सूचयति। एवं ध्यानासामर्थ्ये तु वक्ष्यमाणानि ध्यानानि कार्याणि। तत्राप्यादौ ध्येयमाह -- अहमेवादिश्चोत्पत्तिः भूतानां प्राणिनां चेतनत्वेन लोके व्यवह्रियमाणानां? मध्यं च स्थितिः? अन्तश्च नाशः। सर्वचेतनवर्गाणामुत्पत्तिस्थितिनाशरूपेण तत्कारणरूपेण चाहमेव ध्येय इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.20।।संक्षेपेण योगमाह -- अहमिति। हे गुडाकेश हे जितनिद्र घनकेशेति वा। अहं वासुदेव आत्मा अततीत्यात्मा व्यापकः। अतएव सर्वेषां भूतानामाशयः एकीभावस्थानं जलानामिव कासारो जलाशयस्तद्वदहं सर्वभूताशयः। स्थितः अचलः।खर्परे शरि वा विसर्गलोपो वक्तव्यः इति वार्तिकेन पक्षे विसर्गलोपः। भाष्ये तु सर्वेषां भूतानामाशयेऽन्तर्हृदि स्थित इति व्याख्यातम्। सर्वभूताशयत्वादेवाहं आदिर्जन्मकारणम्। मध्यं स्थितिकारणम्। भूतानामन्तः लयस्थानम्। सर्वमिदं ब्रह्माण्डं मय्येवास्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.20।।एवं कथनं प्रतिज्ञाय प्रथमं सर्वत्र स्वयोगमाह -- अहमिति। अतन्द्रितभावेन श्रवणार्थं सम्बोध यति -- हे गुडाकेश सर्वभूतानामाशयेषु अन्तःकरणेषु स्थितः आत्मा अहम्? तेन मदात्मकात्मसम्बन्धेन सर्वेषां जीवानां विषयानन्दमारभ्य ब्रह्मानन्दानुभवान्तानन्दानुभवो भवतीत्यर्थः। त्वयाऽपि तेषु आनन्दानुभवार्थकमदंशात्मकसंयोगात्मकोऽहं चिन्तनीय इति भावः। एतच्चिन्तनं च माहात्म्यज्ञानायोपयोक्ष्यतीति भावः। ननु त्वदात्मसंयोगे नाशः कथं भवति इत्याकाङ्क्षायामाह -- अहमिति। भूतानामादि उत्पत्तिस्थानं,चाहम्? च पुनः मध्यं स्थितिः। अन्तश्च लयस्थानमहमेव। यतो मदिच्छया मत्क्रीडार्थमुत्पादिताः यावत्क्रीडनं च रक्षिताः? क्रीडोपसंहारेच्छायां च लयं प्रापिता अतो न दोष इति भावः। मयोत्पादितानां मदात्मांशसंयुक्तानामन्यतो नाशेऽन्यलीनत्वे दोषः स्यात्? न तु मयि लीनानाम्। इदमेवैवकारेण द्योतितम्। अत एव निर्दोषभावेन मदंशात्मसंयोगं सर्वेषु चिन्तयेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.20।।तत्र प्रथममैश्वरं रूपं कथयति -- अहमिति। हे गुडाकेश? सर्वेषां भूतानामाशयेष्वन्तःकरणेषु सर्वज्ञत्वादिगुणैर्नियन्तृत्वेनावस्थितः परमात्माहम्। आदिर्जन्म? मध्यं स्थितिः? अन्तः संहारः? सर्वभूतानां जन्मादिहेतुश्चाहमेवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.20।।तत्र प्रथमं योगं लक्षयन्नाह -- अहमिति। गुडाका निद्रा तस्या ईशः नियन्ता भवेति निरालस्यतयैव चिन्तनीयमिति सम्बोधयति। अहं स्वांशभूतस्य प्राकृतस्य सर्वस्यैव प्रथममात्मा। स्वशरीरभूतस्य पृथिव्यादेः सर्वभूतपदवाच्यचेतनस्य चाशये स्थितोऽहमन्तस्तथा सर्वेषामादिश्चेति पूर्वोक्तस्यअहमादिर्हि देवानां [10।2] इत्यस्य प्रपञ्चः। सर्वत्रात्मत्वेनाहं चिन्तनीय इति भावः। अत्रांशांशिनोरभेदाभिप्रायेण तथोक्तिरवसेया।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.20।।उनमें तू पहली विभूतिको ही सुन --, गुडाका -- निद्रा उसका स्वामी यानी निद्राजयी होनेके कारण अथवा घनकेश होनेके कारण अर्जुनका नाम गुडाकेश है। हे गुडाकेश समस्त भूतोंके आशयमें यानी आन्तरिक हृदयदेशमें स्थित सबका अन्तरात्मा मैं हूँ ( ऊँचे अधिकारियोंको तो ) मेरा ध्यान सदा इस प्रकार करना चाहिये। परंतु जो ऐसा ध्यान करनेमें असमर्थ हों उन्हें आगे कहे हुए भावोंमें मेरा चिन्तन करना चाहिये? अर्थात् उनके द्वारा ( इन अगले भावोंमें ) मेरा चिन्तन किया जा सकता है क्योंकि मैं ही सब भूतोंका आदि? मध्य और अन्त हूँ अर्थात् उनकी उत्पत्ति? स्थिति और प्रलयरूप मैं ही हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.20।। व्याख्या -- [भगवान्का चिन्तन दो तरहसे होता है -- (1) साधक अपना जो इष्ट मानता है? उसके सिवाय दूसरा कोई भी चिन्तन न हो। कभी हो भी जाय तो मनको वहाँसे हटाकर अपने इष्टदेवके चिन्तनमें ही लगा दे और (2) मनमें सांसारिक विशेषताको लेकर चिन्तन हो? तो उस विशेषताको भगवान्की ही विशेषता समझे। इस दूसरे चिन्तनके लिये ही यहाँ विभूतियोंका वर्णन है। तात्पर्य है कि किसी विशेषतोको लेकर जहाँकहीं वृत्ति जाय? वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये? उस वस्तुव्यक्तिका नहीं। इसीके लिये भगवान् विभूतियोंका वर्णन कर रहे हैं।]अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च (टिप्पणी प0 555) -- यहाँ भगवान्ने अपनी सम्पूर्ण विभूतियोंका सार कहा है कि सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। यह नियम है कि जो वस्तु उत्पत्तिविनाशशील होती है? उसके आरम्भ और अन्तमें जो तत्त्व रहता है? वही तत्त्व उसके मध्यमें भी रहता है (चाहे दीखे या न दीखे) अर्थात् जो वस्तु जिस तत्त्वसे उत्पन्न होती है और जिसमें लीन होती है? उस वस्तुके आदि? मध्य और अन्तमें (सब समयमें) वही तत्त्व रहता है। जैसे? सोनेसे बने गहने पहले सोनारूप होते हैं और अन्तमें (गहनोंके सोनेमें लीन होनेपर) सोनारूप ही रहते हैं तथा बीचमें भी सोनारूप ही रहते हैं। केवल नाम? आकृति? उपयोग? माप? तौल आदि अलगअलग होते हैं और इनके अलगअलग होते हुए भी गहने सोना ही रहते हैं। ऐसे ही सम्पूर्ण प्राणी आदिमें भी परमात्मस्वरूप थे और अन्तमें लीन होनेपर भी परमात्मस्वरूप रहेंगे तथा मध्यमें नाम? रूप? आकृति? क्रिया? स्वभाव आदि अलगअलग होनेपर भी तत्त्वतः परमात्मस्वरूप ही हैं -- यह बतानेके लिये ही यहाँ भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि? मध्य और अन्तमें कहा है।भगवान्ने विभूतियोंके इस प्रकरणमें आदि? मध्य और अन्तमें -- तीन जगह साररूपसे अपनी विभूतियोंका वर्णन किया है। पहले इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि? मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ बीचके बत्तीसवें श्लोकमें कहा कि सम्पूर्ण सर्गोंके आदि? मध्य और अन्तमें मैं ही हूँ और अन्तके उनतालीसवें श्लोकमें कहा कि सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है? वह मैं ही हूँ क्योंकि मेरे बिना कोई भी चरअचर प्राणी नहीं है। चिन्तन करनेके लिये यही विभूतियोंका सार है। तात्पर्य यह है कि किसी विशेषता आदिको लेकर जो विभूतियाँ कही गयी हैं? उन विभूतियोंके अतिरिक्त भी जो कुछ दिखायी दे? वह भी भगवान्की ही विभूति है -- यह बतानेके लिये भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण चराचर प्राणियोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें विद्यमान कहा है। तत्त्वसे सब कुछ परमात्मा ही है -- वासुदेवः सर्वम् -- इस लक्ष्यको बतानेके लिये ही विभूतियाँ कही गयी हैं।इस बीसवें श्लोकमें भगवान्ने प्राणियोंमें जो आत्मा है? जीवोंका जो स्वरूप है? उसको अपनी विभूति बताया है। फिर बत्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने सृष्टिरूपसे अपनी विभूति बतायी कि जो जडचेतन? स्थावरजङ्गम सृष्टि है? उसके आदिमें मैं एक ही बहुत रूपोंमें हो जाऊँ (बहु स्यां प्रजायेयेति छान्दोग्य0 6। 2। 3) -- ऐसा संकल्प करता हूँ और अन्तमें मैं ही शेष रहता हूँ -- शिष्यते शेषसंज्ञः (श्रीमद्भा0 10। 3। 25)। अतः बीचमें भी सब कुछ मैं ही हूँ -- वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19) सदसच्चाहमर्जुन (गीता 9। 19 ) क्योंकि जो तत्त्व आदि और अन्तमें होता है? वही तत्त्व बीचमें होता है। अन्तमें उन्तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने बीज(कारण) रूपसे अपनी विभूति बतायी कि मैं ही सबका बीज हूँ? मेरे बिना कोई भी प्राणी नहीं है। इस प्रकार इन तीन जगह -- तीन श्लोकोंमें मुख्य विभूतियाँ बतायी गयी हैं और अन्य श्लोकोंमें जो समुदायमें मुख्य हैं? जिनका समुदायपर आधिपत्य है? जिनमें कोई विशेषता है? उनको लेकर विभूतियाँ बतायी गयी हैं। परन्तु साधकको चाहिये कि वह इन विभूतियोंकी महत्ता? विशेषता? सुन्दरता? आधिपत्य आदिकी तरफ खयाल न करे? प्रत्युत ये सब विभूतियाँ भगवान्से ही प्रकट होती हैं? इनमें जो महत्ता आदि है? वह केवल भगवान्की है ये विभूतियाँ भगवत्स्वरूप ही हैं -- इस तरफ खयाल रखे। कारण कि अर्जुनका प्रश्न भगवान्के चिन्तनके विषयमें है (10। 17)? किसी वस्तु? व्यक्तिके चिन्तनके विषयमें नहीं।अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः -- साधक इन विभूतियोंका उपयोग कैसे करे इसे बताते हैं कि जब साधककी दृष्टि प्राणियोंकी तरफ चली जाय? तब वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें आत्मारूपसे भगवान् ही हैं -- इस तरह भगवान्का चिन्तन करे। जब किसी विचारक साधककी दृष्टि सृष्टिकी तरफ चली जाय? तब वह,उत्पत्तिविनाशशील और हरदम परिवर्तनशील सृष्टिके आदि? मध्य तथा अन्तमें एक भगवान् ही हैं इस तरह भगवान्का चिन्तन करे। कभी प्राणियोंके मूलकी तरफ उसकी दृष्टि चली जाय? तब वह बीजरूपसे भगवान् ही हैं? भगवान्के बिना कोई भी चरअचर प्राणी नहीं है और हो सकता भी नहीं -- इस तरह भगवान्का चिन्तन करे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.20।।विभूतिप्रदर्शने प्रस्तुते सत्यादावेव पारमार्थिकं पारमेश्वरं रूपं दर्शयितुं श्रोतुरर्जुनस्य मनःसमाधानार्थं यतते -- तत्रेति। सोपाधिकमपि काल्पनिकं परस्य रूपं पश्चाद्वक्ष्यमाणं श्रोतुं चित्तसमाधानं कर्तव्यमेवेत्याह -- तावदिति। आशेरतेऽस्मिन्विद्याकर्मपूर्वप्रज्ञा इत्याशयो हृदयं सर्वेषां भूतानां हृदयेऽन्तःस्थितो,यः प्रत्यगात्मा सोऽहमेवेति वाक्यार्थमाह -- सर्वेषामिति। यस्तु मन्दो मध्यमो वा परमात्मानमात्मत्वेन ध्यातुं नालं तं प्रत्याह -- तदशक्तेनेति। वक्ष्यमाणादित्यादिषु परस्य न ध्येयत्वमन्यदेव कारणं किंचित्तत्र तत्र ध्येयमित्याशङ्क्याह -- यस्मादिति। सर्वकारणत्वेन सर्वज्ञत्वेन सर्वेश्वरत्वेन च परस्य ध्येयत्वमत्रेप्सितं नान्यस्य कस्यचित्कारणस्यादित्यादिषु ध्येयतेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.20।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.20।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.20।। --,अहम् आत्मा प्रत्यगात्मा गुडाकेश? गुडाका निद्रा तस्याः ईशः गुडाकेशः? जितनिद्रः इत्यर्थः घनकेश इति वा। सर्वभूताशयस्थितः सर्वेषां भूतानाम् आशये अन्तर्हृदि स्थितः अहम् आत्मा प्रत्यगात्मा नित्यं ध्येयः। तदशक्तेन च उत्तरेषु भावेषु चिन्त्यः अहम् यस्मात् अहम् एव आदिः भूतानां कारणं तथा मध्यं च स्थितिः अन्तः प्रलयश्च।।एवं च ध्येयोऽहम् --,
───────────────────
【 Verse 10.21 】
▸ Sanskrit Sloka: आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंशुमान् | मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी ||
▸ Transliteration: ādityānāmahaṁ viṣṇur jyotiṣāṁ raviraṁśumān | marīcirmarutāmasmi nakṣatrāṇāmahaṁ śaśī ||
▸ Glossary: ādityānām: of the Ādityas; ahaṁ: I; viṣṇuḥ: Viṣṇu; jyotiṣāṁ: of the luminaries; raviḥ : the sun; aṁśumān: bright; marīciḥ: Marīcī; marutām: of the Maruts; asmi: am; nakṣatrāṇāṁ: of the Nakṣatras; ahaṁ: I; śaśī: the moon
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.21 Of the Ādityas, I am Viṣṇu. Of the luminaries, I am the bright sun. Of the Maruts, I am Marīcī. Of the Nakṣatras, I am the moon.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.21।।(टिप्पणी प0 556.1) मैं अदितिके पुत्रोंमें विष्णु (वामन) और प्रकाशमान वस्तुओंमें किरणोंवाला सूर्य हूँ। मैं मरुतोंका तेज और नक्षत्रोंका अधिपति चन्द्रमा हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.21।। मैं (बारह) आदित्यों में विष्णु और ज्योतियों में अंशुमान् सूर्य हूँ मैं (उनचास) मरुतों (वायु देवताओं) में मरीचि हूँ और नक्षत्रों में शशी (चन्द्रमा) हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.21 आदित्यानम् among the Adityas? अहम् I? विष्णुः Vishnu? ज्योतिषाम् among lights? रविः the sun? अंशुमान् radiant? मरीचिः Marichi? मरुताम् of the Maruts (winds)? अस्मि (I) am? नक्षत्राणाम् among the stars? अहम् I? शशी the moon.Commentary Of the twelve Adityas I am the Aditya known as Vishnu? Dhata? Mitra? Aryama? Rudra? Varuna? Bhaga? Surya? Vivasvan? Pusham? Savita? Tvashta and Vishnu are the twelve Adityas. The twelve months of the year are the Adityas.The Maruts are the gods controlling the winds. Some hold that there are seven of them while others say there are fortynine.The twelve Adityas? the luminaries like Agni? lightning? etc.? the Maruts? the stars? etc.? are the Samanya Vibhutis (ordinary manifestations) of the Lord. Vishnu? the sun? Marichi? and the moon are His Visesha Vibhutis (special manifestations) and hence they have greater splendour in them.You can superimpose the Lord on the sun and the moon? and meditate on them as forms of the Lord. You can practise the same kind of meditation on all forms mentioned in the following verses of this chapter.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.21. Of the sons of Aditi, I am Visnu; of the luminaries, the radiant Sun; of the Maruts, I am Marici; of the stars, I am the Moon.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.21 Of all the creative Powers I am the Creator, of luminaries the Sun; the Whirlwind among the winds, and the Moon among planets.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.21 Of Adityas I am Visnu, of luminous bodies I am the radiant sun. Of the Maruts I am Marici, and among the constellations I am the moon.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.21 Among the Adityas [viz Dhata, Mitra, aryama, Rudra, Varuna, Surya, Bhaga, Vivasvan, Pusa, Savita, Tvasta and Visnu.-Tr.] I am Visnu; among the luminaries, the radiant sun; among the (forty-nine) Maruts [The seven groups of Maruts are Avaha, Pravaha, Vivaha, Paravaha, Udvaha, Samvaha and parivaha.-Tr.] I am Marici; among the stars I am the moon.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.21 Among the (twelve) Adityas, I am Vishnu; among luminaries, the radiant sun; I am Marichi among the (seven or forty-nine) Maruts; among stars the moon am I.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.21 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.21 Of Adityas, who are twelve in number, I am the twelfth Aditya, called Visnu, who is paramount. Of luminuous bodies, namely, among luminaries in the world, I am the sun, the most brilliant luminary. Of Maruts I am the paramount Marici. Of constellations, I am the moon. The genitive case here is not to specify one out of many included in a group. Its use is the same as what is exemplifed in the statement 'I am the consciousness in all beings' (10.22). I am the moon who is the Lord of the constellations.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.21 Adityanam, among the twelve Adityas; aham, I; am the Aditya called Visnu. Jyotisam, among the luminaries; amsuman, the radiant; ravih, sun. Marutam, among the different gods called Maruts; asmi, I am; the one called Marici. Naksatranam, among the stars; I am sasi, the moon.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.21।। मैं आदित्यों में विष्णु हूँ वैदिक परम्परा में आदित्यों का संख्या कहीं पाँच तो कहीं छ बतायी गई है। ये अदिति के पुत्र थे। तत्पश्चात् पारम्परिक विश्वास के अनुसार इनकी संख्या बारह मानी गई? जो बारह मासों के सूचक हैं। विष्णु पुराण के अनुसार विष्णु नामक एक आदित्य है? जो अन्य आदित्यों की अपेक्षा श्रेष्ठ और महत्त्वपूर्ण है।मैं ज्योतियों में सूर्य हूँ आधुनिक भौतिक विज्ञान भी सूर्य को समस्त ऊर्जाओं के स्रोत के रूप में स्वीकार करता है। अत भगवान् के कथन का अभिप्राय स्वत स्पष्ट हो जाता है। जहाँ कहीं भी कोई ऊर्जा व्यक्त होती है? उसका स्रोत आत्मा ही है।मैं वायु देवताओं में मरीचि हूँ वायु के अधिष्ठाता देवता मरुत कहलाते हैं? जिनकी संख्या उनचास कही गई है। इन में मरीचि नामक मरुत मैं हूँ। मरुतगण रुद्र पुत्र माने गये हैं। ऋग्वेद के अनुसार मरीचि उनमें प्रमुख है। मैं नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ भारतीय खगोलशास्त्र में जिस अर्थ में नक्षत्र शब्द प्रयुक्त किया जाता है? वह चन्द्रमा के मार्ग के तीन तारों का सूचक है। इस दृष्टि से? विश्व में चन्द्रमा का यह मार्ग भगवान् की विभूति की ही एक अभिव्यक्ति है और चन्द्रमा उनमें सर्वश्रेष्ठ है? क्योंकि वह नियन्त्रक और नियामक है तथा तेज में भी अपूर्व है।परन्तु हम नक्षत्र शब्द से सामान्य प्रचलित अर्थ को भी स्वीकार कर सकते हैं? जिसके अनुसार रात्रि के समय आकाश में जड़े हुए छोटेछोटे चमकते हुए असंख्य तारे ही नक्षत्र हैं। कुछ व्याख्याकार एक पग आगे जाकर कहते हैं कि नक्षत्र शब्द रात्रि के समस्त प्रकाशों का सूचक है। चिन्तन के लिए उपयोगी होने से यह अर्थ भी स्वीकार्य हो सकता है। रात्रि के समय एक छोटी सी कुटिया से लेकर संसद भवन तक को चमकाने वाले चन्द्रमा का प्रकाश शीतल शान्तिप्रद और गौरवमय होता है। ठीक उसी प्रकार आत्मा का प्रकाश भी अतुलनीय है।यहाँ बाइस श्लोकों की इस मालिका में? भगवान् श्रीकृष्ण कुल पचहत्तर उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। उनका उद्देश्य ज्ञानयोग के मार्ग पर चलने वाले साधक की सहायता करना है। यहाँ उक्त उपासनाओं के द्वारा साधकगण अपने मनबुद्धि को सुगठित करके चित्त की एकाग्रता प्राप्त कर सकते हैं। ध्यान के लिए उपयोगी ये पचहत्तर अभ्यास हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.21।।एवमात्मनो योगमुक्त्वा तत्र तत्र ध्येया विभूतीराह। आदित्यानां विष्णुः शकोऽर्यमा धाता त्वष्टा पूषा विवस्वान् सविता मित्रो वरुणः अंशो भगश्चत्युक्तानां द्वादशानां विष्णुर्नामादित्योऽहम्। वामनावतारो वेति व्याख्यानस्यापि विष्णुर्नामदित्यो वामनावतारोऽहमित्यर्थावगमेनाचार्योक्तव्याख्यानान्तर्भूतत्वाद्वेत्युक्तिरपार्था। यद्वा अरुणः सूर्यो भानुस्तपनश्चन्द्रमा मित्रो हिरण्यवीर्यो रविरर्यमा गभस्तिर्दिवाकारो विष्णुरित्युक्तानामादित्यानां विष्णुरित्यभिप्रायोणाचार्यैरेवमुक्तमिति बोध्यम्। प्रकाशयितृ़णां जगद्य्वपी रश्मिवान्सूर्यः। मरुतां देवता भेदानां मरीचिनामास्मि। नक्षत्राणामधिपतिश्चन्द्रोऽहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.21।।एतदशक्तेन बाह्यानि ध्यानानि कार्याणीत्याह यावदध्यायसमाप्ति -- आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुर्विष्णुनामादित्योऽहं? वामनावतारो वा। ज्योतिषां प्रकाशकानां मध्येऽहं रविरंशुमान्विश्वव्यापी प्रकाशकः। मरुतां सप्तसप्तकानां मध्ये मरीचिनामाहम्। नक्षत्राणामधिपतिरहं शशी चन्द्रमाः। निर्धारणे षष्ठी। अत्र प्रायेण निर्धारणे षष्ठी। क्वचित्संबन्धेऽपि यथा भूतानामस्मि चेतनेत्यादौ। वामनरामादयश्चावताराः सर्वैश्वर्यशालिनोऽप्यनेन रूपेण ध्यानविवक्षया विभूतिषु पठ्यन्ते। वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मीति तेन रूपेण ध्यानविवक्षया स्वस्यापि स्वविभूतिमध्ये पाठवत्। अतः परं च प्रायेणायमध्यायः स्पष्टार्थ इति क्वचित्किंचिद्व्याख्यास्यामः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.21।।योगमुक्त्वा विभूतीराह -- आदित्यानामित्यादिना यावदध्यायसमाप्ति। आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुनामादित्योऽहं? वामनावतारो वा। ज्योतिषामग्न्यादीनां मध्ये रविः अंशुमान् अत्यन्तं प्रतपनशीलो निदाघमध्याह्ने तीव्रातपवान्रविरहमेवेत्यर्थः। मरुतां सप्तसप्तकानां मध्ये मरीचिरहम्। नक्षत्राणां ताराणाम्। अत्र प्रायेण निर्धारणे षष्ठी। भूतानामस्मि चेतनेत्यादौ संबन्धेऽपि। शशी चन्द्रमाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.21।।योगयुक्ता विभूतीः कथयति -- आदित्यानामित्यारभ्य यावदध्यायसमाप्ति। आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुः व्यापकधर्मात्मको
Chapter 10 (Part 10)
बिम्बप्रकाशकोऽहं ज्योतिषां बहिर्जगत्प्रकाशकानां मध्ये अंशुमान् सर्वप्रकाशकरश्मियुक्तो रविः सूर्योऽस्मीत्यर्थः। मरुतां वायूनां मध्ये मरीचिर्नाम कश्चन सर्वसुखोत्पादनरूपो वायुरस्मि। नक्षत्राणां मध्ये शशी चन्द्रोऽस्मि।शशी इति नाम्ना रोहिण्यासक्तिजलाञ्छनवत्त्वेन रसात्मकासक्तिधर्मरूपशृङ्गाररसात्मकत्वं व्यञ्जितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.21।।इदानीं विभूतीः कथयति -- आदित्यानामित्यादिना यावदध्यायसमाप्ति। आदित्यानां द्वादशानां मध्ये विष्णुर्वामनोऽहम्। ज्योतिषां प्रकाशानां मध्येंऽशुमान्विश्वव्यापकरश्मियुक्तो रविः सूर्योऽहम्। मरुतां देवविशेषाणां मध्ये मरीचिनामाहमस्मि। यद्वा सप्त मरुद्गणा वायवस्तेषां मध्य इति। ते च आवहः? प्रवहः? विवहः? परावहः? उद्वहः? संवहः? परिवह इति मरुद्गणाः। नक्षत्राणां मध्ये चन्द्रोऽहम्। अत्र चआदित्यानामहं विष्णुः इत्यादिषु प्रायशो निर्धारणे षष्ठी। क्वचिच्चभूतानामस्मि चेतना इत्यादिना संबन्धे षष्ठी। तच्च तत्र तत्रैव दर्शयिष्यामः। विष्णुरित्याद्यवतारोऽपि प्रभावातिशयमात्रविवक्षया विभूतित्वेन निर्दिश्यते। अतः परं चाध्यायस्य स्पष्टार्थत्वेऽपि क्वचित्किंचिद्व्याख्यास्यामः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.21।।इदानीं विभूतिमाह -- आदित्यानामित्यादिना। द्वादशानां मध्ये विष्णुनामाऽऽदित्योऽहम्। आदित्यानां देवानामेव वामन इति केचित्। ज्योतिषां प्रकाशभूतानां मध्येंऽशुमान् रविरहम्। मरुतां देवानामुत्कृष्टो यो मरीचिः सोऽहम्। नक्षत्राणामहं शशीति। अथ सर्वत्र प्रायेणेति निर्द्धारणे षष्ठी? क्वचित् निर्द्धारणे सम्बन्धे च षष्ठी विज्ञातव्या? यथाभूतानामस्पि चेतना [10।22] इत्यादौ।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.21।।तथा इस प्रकार भी मेरा ध्यान किया जा सकता है --, द्वादश आदित्योंमें मैं विष्णु नामक आदित्य हूँ। प्रकाश करनेवाली ज्योतियोंमें मैं किरणोंवाला सूर्य हूँ। वायुसम्बन्धी देवताओंके भेदोंमें मैं मरीचि नामक देवता हूँ और नक्षत्रोंमें मैं शशी -- चन्द्रमा हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.21।। व्याख्या -- आदित्यानामहं विष्णुः -- अदितिके धाता? मित्र आदि जितने पुत्र हैं? उनमें विष्णु अर्थात् वामन मुख्य हैं। भगवान्ने ही वामनरूपसे अवतार लेकर दैत्योंकी सम्पत्तिको दानरूपसे लिया और उसे अदितिके पुत्रों(देवताओँ) को दे दिया (टिप्पणी प0 556.2)।ज्योतिषां रविरंशुमान् -- चन्द्रमा? नक्षत्र? तारा? अग्नि आदि जितनी भी प्रकाशमान चीजें हैं? उनमें किरणोंवाला सूर्य मेरी विभूति है क्योंकि प्रकाश करनेमें सूर्यकी मुख्यता है। सूर्यके प्रकाशसे ही सभी प्रकाशमान होते हैं।मरीचिर्मरुतामस्मि -- सत्त्वज्योति? आदित्य? हरित आदि नामोंवाले जो उनचास मरुत हैं? उनका मुख्य तेज मैं हूँ। उस तेजके प्रभावसे ही इन्द्रके द्वारा दितिके गर्भके सात टुकड़े करनेपर और उन सातोंके फिर सातसात टुकड़े करनेपर भी वे मरे नहीं प्रत्युत एकसे उनचास हो गये।नक्षत्राणामहं शशी -- अश्विनी? भरणी? कृत्तिका आदि जो सत्ताईस नक्षत्र हैं? उन सबका अधिपति चन्द्रमा मैं हूँ।इन विभूतियोंमें जो विशेषता -- महत्ता है? वह वास्तवमें भगवान्की है।[इस प्रकरणमें जिन विभूतियोंका वर्णन आया है? उनको भगवान्ने विभूतिरूपसे ही कहा है? अवताररूपसे नहीं जैसे -- अदितिके पुत्रोंमें वामन मैं हूँ (10। 21)? शस्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ (10। 31)? वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव (कृष्ण) और पाण्डवोंमें धनञ्जय (अर्जुन) मैं हूँ (10। 37) इत्यादि। कारण कि यहाँ प्रसङ्ग विभूतियोंका है।]
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.21।।उक्तध्यानाशक्तेभ्यो व्यस्तं विभूतियोगमुपदिशति -- एवंचेति। तत्र तत्र प्रधानत्वेन परस्य ध्येयत्वम्। एवंशब्दार्थमेव दर्शयति -- आदित्यानामित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.21।।द्विविधं विभूतिरूपं प्रत्यक्षं तिरोहितं च अत्र विष्ण्वादिकं प्रत्यक्षमिति ज्ञापयितुं तच्छब्दान्व्याकुर्वन्आदित्यानामहं विष्णुः इति विष्णुशब्दं तावत्सप्रमाणकं व्याकरोति -- विष्णुरिति। सर्वेति? योग्यतया सम्बध्यते।आदिपदेन वक्ष्यमाणार्थसङ्ग्रहः। चशब्दो धात्वन्तरसमुच्च्यार्थः। गच्छन्त्यनेनेति गतिः। भूतानां पृथिव्यादीनां प्रजानां ब्रह्मादीनाम्।वी गतिव्याप्तिप्रजनकान्त्यसनखादनेषु [धा.पा.2।38] इत्यतो गत्यर्थात् क्स्नुप्रत्ययो धातोर्ह्रस्वश्च। मे मया? रोदसी द्यावापृथिव्यौ? व्याप्तौ व्याप्तेविष्लृ व्याप्तौ [धा.पा.3।13] इत्यतः क्नुः? कान्तिः कमनीयतावश कान्तौ [धा.पा.2।70] इत्यतो नुः धातोरकारस्येकारः? शकारस्य षकारः।वी गति इत्यतो वा,कान्तिकर्मणः क्स्नुः। अधिभूतं प्राग्व्याख्यातम्।विश प्रवेशने [धा.पा.6।143] इति? अतः क्नुः षत्वं च। तदिच्छुरधिभूतस्य जन्मादीच्छुः। कान्तिरिच्छा। अतो वयतेर्वष्टेश्च पूर्ववद्रूपम्। क्रमणात् त्रिविक्रमरूपेण पादविक्षेपात्। पूर्ववद्वयतेर्गत्यर्थात्कर्तरि प्रत्ययः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.21।।विष्णुः सर्वव्यापित्वप्रवेशित्वादेः।विष्लृ व्याप्तौ? विश् प्रवेशने इति पठन्ति।गतिश्च सर्वभूतानां प्रजानां चापि (प्रजनश्चास्मि) भारत व्याप्तौ मे रोदसी पार्थ कान्तिश्चाभ्यधिका मम। आधिभूतनिविष्टश्च तदिच्छुश्चा -- (तद्विश्वं चा)स्मि भारत। क्रमणाच्चाप्यहं पार्थ विष्णुरित्यभिसंज्ञितः [म.भा.12।341।42?43] इति मोक्षधर्मे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.21।। --,आदित्यानां द्वादशानां विष्णुः नाम आदित्यः अहम्। ज्योतिषां रविः प्रकाशयितृ़णाम् अंशुमान् रश्मिमान्। मरीचिः नाम मरुतां मरुद्देवताभेदानाम् अस्मि। नक्षत्राणाम् अहं शशी चन्द्रमाः।।
───────────────────
【 Verse 10.22 】
▸ Sanskrit Sloka: वेदानां सामवेदोऽस्मि देवानामस्मि वासव: | इन्द्रियाणां मनश्चास्मि भूतानामस्मि चेतना ||
▸ Transliteration: vedānāṁ sāmavedo’smi devānāmasmi vāsavaḥ | indriyāṇāṁ manaścāsmi bhūtānāmasmi cetanā ||
▸ Glossary: vedānāṁ: of the Vedas; sāmavedaḥ: Sāma Veda; asmi: I am; devānām: of the gods; asmi: I am; vāsavaḥ: Vasava; indriyāṇāṁ: of the senses; manaḥ: mind; ca: and; asmi: I am; bhūtānām: of living beings; asmi: I am; cetanā: consciousness
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.22 Of the Vedas, I am the Sāma Veda. Of the gods, I am Indra. Of the senses, I am the mind and in living beings, I am the consciousness.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.22।।मैं वेदोंमें सामवेद हूँ? देवताओंमें इन्द्र हूँ? इन्द्रियोंमें मन हूँ और प्राणियोंकी चेतना हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.22।। मैं वेदों में सामवेद हूँ? देवों में वासव (इन्द्र) हूँ मैं इन्द्रियों में मन और भूतप्राणियों में चेतना (ज्ञानशक्ति) हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.22 वेदानाम् among the Vedas? सामवेदः the Sama Veda? अस्मि (I) am? देवानाम् among the gods? अस्मि (I) am? वासवः Indra? इन्द्रियाणाम् among the senses? मनः mind? च and? अस्मि (I) am? भूतानाम् among living beings? अस्मि (I) am? चेतना intelligence.Commentary Vasava is Indra.Gods Such as Rudras? Adityas.Indriyas The five JnanaIndriyas or organs of knowledge? viz.? ear? skin? eye? tongue and nose and the five KarmaIndriyas or organs of action? viz.? speech? hands? feet? genitals and anus. The mind is regarded as the eleventh sense. As the senses cannot function without the help of the mind? the mind is regarded as the chief among the senses.Chetana Intelligence is that state of intellect which is manifest in the aggregate of the body and the senses.That which illumines all? from the intellect down to the grossest object? is called Chetana.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.22. Of the Vedas, I am the Samaveda; of the gods, I am Vasava (Indra); of the sense-organs, I am the mind; of the beings, I am the sentience.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.22 Of the Vedas I am the Hymns, I am the Electric Force in the Powers of Nature; of the senses I am the Mind; and I am the Intelligence in all that lives.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.22 Of the Vedas I am Samaveda. Of gods, I am Indra. Of sense-organs I am the Manas (mind), and of living beings I am consciousness.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.22 Among the Vedas I am Sama-veda; among the gods I am Indra. Among the organs I am the mind, and I am the intelligence in creatures.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.22 Among the Vedas I am the Sama-Veda; I am Vasava among the gods; among the senses I am the mind; and I am intelligence among living beings.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.22 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.22 Of the Vedas, namely, Of Rk, Yajus, Saman, Atharva, I am that Samaveda which is the paramount one. Of the gods, I am Indra. Of eleven sense-organs, I am the sense-organ called Manas which is most paramount. Of living beings, namely, of those with consciousness, I am that consciousness. Here too the genitive is not used for specifying.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.22 Vedanam, among the Vedas; I am the Sama-veda. Devanam, among the gods-such as Rudras, Adityas and others; I am vasavah, Indra. Indriyanam, among the eleven organs, viz eye etc.; I am the manah, mind. I am the mind which is of the nature of reflection and doubt. And I am the cetana, intelligence [It is the medium for the manifestation of Consciousness.], the function of the intellect ever manifest in the aggregate of body and organs; bhtanam, in creatures.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.22।। मैं वेदों में सामवेद हूँ ऋग्वेद का सार ही सामवेद है। चारों वेदों में ऋग्वेद का स्थान सबसे प्रमुख है। सामवेद को छान्दोग्योपनिषद् में सुन्दरता से गौरवान्वित किया गया है। सामवेद में संगीत का विशेष आनन्द भी जुड़ा हुआ है? क्योंकि साम मन्त्रों को सुन्दर राग? सुर और लय में गाया जाता है? जो इस बात के प्रमाण हैं कि संगीत की इस सुन्दर और शक्तिशाली कला को हमारे पूर्वजों ने इतना अधिक विकसित किया था। इस उपमा के सौन्दर्य के द्वारा हम कह सकते हैं कि श्रीकृष्ण संगीत की आत्मा हैं? जैसे ऋग्वेद का सार सामवेद है।मैं देवों में इन्द्र हूँ स्वर्ग के निवासी देवों का राजा वासव इन्द्र है। यह ध्यान देने योग्य बात है कि वैदिक सिद्धान्त के अनुसार यद्यपि रहनसहन का सर्वोच्च स्तर स्वर्ग में है? परन्तु वहाँ भी देवताओं के पदों में श्रेष्ठता और हीनता का तारतम्य होता है। स्वर्ग की प्राप्ति इह लोक में किये गये पुण्य कर्मों के फलस्वरूप होती है और इस कारण जिस पुरुष ने यहाँ अधिक पुण्य अर्जित किया होगा? उसे वहाँ श्रेष्ठतर भोगों की प्राप्ति होगी। इस नियम के अनुसार? उन सब देवों के जीवन की अपेक्षा इन्द्र का जीवन अधिक वैभव? एवं विलासपूर्ण तथा शक्तिशाली और समर्थ होना स्वाभाविक है। देवताओं में इन्द्र मैं हूँ जो अन्य देवों का शासक और नियन्ता है? जिससे कि उनका जीवन सुखी एवं समृद्धशाली होता है।मैं इन्द्रियों में मन हूँ आधिदैविक दृष्टि से जिसे इन्द्र कहते हैं? आध्यात्मिक दृष्टि से वही मन कहलाता है? क्योंकि देव शब्द का अर्थ इन्द्रिय होता है। जैसे इन्द्र देवताओं का राजा है? वैसे ही मन इन्द्रियों का राजा है। मन के बिना इन्द्रियाँ स्वतन्त्र रूप से अपना व्यापार नहीं कर सकती हैं। इसलिये यहाँ कहा गया है कि मैं इन्द्रियों में मन हूँ। जगत् की समस्त सृष्ट वस्तुओं में सर्वाधिक श्रेष्ठ और अद्भुत वस्तु है बुद्धिमत्ता। यह एक ऐसी रहस्यमयी शक्ति है? जिसके विषय में आधुनिक वैज्ञानिक एक अस्पष्ट और काल्पनिक धारणा बनाने के अतिरिक्त कुछ विशेष ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.22।।वासवः इन्द्रः। चेतना कार्यकरणसंघातेऽभिव्यक्ता बुद्धवृत्तिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.22।।चतुर्णां वेदानां मध्ये गानमाधुर्येणातिरमणीयः सामवेदोऽहमस्मि। वासव इन्द्रः सर्वदेवाधिपतिः इन्द्रियाणामेकादशानां प्रवर्तकं मनः। भूतानां सर्वप्राणिसंबन्धिनां परिणामानां मध्ये चिदभिव्यञ्जिका बुद्धेर्वृत्तिश्चेतनाहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.22।।सामवेदो गानेन रमणीयत्वात्। वासवो देवराजत्वात्। मन इन्द्रियान्तरप्रवर्तकत्वात्। चेतना धीवृत्तिः। चिदभिव्यक्तिहेतुत्वात्। एते वेदादीनां मध्ये श्रेष्ठाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.22।।वेदानां चतुर्णामपि मध्ये सामवेदोऽस्मि। गानात्मकमाधुर्यरसवत्त्वेनाऽधिक्यं तत्रेति भावः। देवानां मध्ये वासव इन्द्रोऽस्मि? शतमखत्वेन सर्वक्रियांशभोक्तृत्वेन राज्यभोक्तृत्वेन च। इन्द्रियाणां आधिदैविकेन्द्रियरूपोऽस्मि। च पुनः सर्वप्रेरकत्वान्मनोऽस्मि। भूतानां चेतनानां चेतना ज्ञानशक्तिरस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.22।।वेदानामिति। वासव इन्द्रः। भूतानां संबन्धिनी चेतना ज्ञानशक्तिरहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.22।।वेदानामिति। सामवेदोऽहं वेदानां मध्ये सामवेदोऽस्मि। देवानामहमिन्द्र इति यज्ञे गानमाधुर्येण भगवद्विभूतिराराध्या। इन्द्रियाणां एकादशानां मध्ये मनोऽहम्। नात्र निर्द्धारणे षष्ठी। प्रायःपदान्मनस्यपीद्रियत्वं निर्बाधम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.22।।मैं वेदोमें सामवेद हूँ? रुद्र? आदित्य आदि देवोंमें इन्द्र हूँ और चक्षु आदि एकादश इन्द्रियोंमें संकल्पविकल्पात्मक मन हूँ। सब प्राणियोंमें ( मैं ) चेतना हूँ। कार्यकरणके समुदायरूप शरीरमें सदा प्रकाशित रहनेवाली जो बुद्धिवृत्ति है? उसका नाम चेतना है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.22।। व्याख्या -- वेदानां सामवेदोऽस्मि -- वेदोंकी जो ऋचाएँ स्वरसहित गायी जाती हैं? उनका नाम सामवेद है। सामवेदमें इन्द्ररूपसे भगवान्की स्तुतिका वर्णन है। इसलिये सामवेद भगवान्की विभूति है।देवानामस्मि वासवः -- सूर्य? चन्द्रमा आदि जितने भी देवता हैं? उन सबमें इन्द्र मुख्य है और सबका अधिपति है। इसलिये भगवान्ने उसको अपनी विभूति बताया है।इन्द्रियाणां मनश्चास्मि -- नेत्र? कान आदि सब इन्द्रियोंमें मन मुख्य है। सब इन्द्रियाँ मनके साथ रहनेसे (मनको साथमें लेकर) ही काम करती हैं। मन साथमें न रहनेसे इन्द्रियाँ अपना काम नहीं करतीं। यदि मनका साथ न हो ते इन्द्रियोंके सामने विषय आनेपर भी विषयोंका ज्ञान नहीं होता। मनमें यह विशेषता भगवान्से ही आयी है। इसलिये भगवान्ने मनको अपनी विभूति बताया है।भूतानामस्मि चेतना -- सम्पूर्ण प्राणियोंकी जो चेतनाशक्ति? प्राणशक्ति है? जिससे मरे हुए आदमीकी अपेक्षा सोये हुए आदमीमें विलक्षणता दीखती है? उसे भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।इन विभूतियोंमें जो विशेषता है? वह भगवान्से ही आयी है। इनकी स्वतन्त्र विशेषता नहीं है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.22।।मन्त्रब्राह्मणसमुदायानामृगादीनां मध्ये सामवेदोऽस्मीति। ध्यानान्तरमुदाहरति -- वेदानामिति। संघाते जीवाधिष्ठिते यावत्पञ्चत्वं सर्वत्र व्यापिनी चैतन्याभिव्यञ्जिकेति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.22।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.22।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.22।। --,वेदानां मध्ये सामवेदः अस्मि। देवानां रुद्रादित्यादीनां वासवः इन्द्रः अस्मि। इन्द्रियाणाम् एकादशानां चक्षुरादीनां मनश्च अस्मि संकल्पविकल्पात्मकं मनश्चास्मि। भूतानाम् अस्मि चेतना कार्यकरणसंघाते नित्याभिव्यक्ता बुद्धिवृत्तिः चेतना।।
───────────────────
【 Verse 10.23 】
▸ Sanskrit Sloka: रुद्राणां शङ्करश्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् | वसूनां पावकश्चास्मि मेरु: शिखरिणामहम् ||
▸ Transliteration: rudrāṇāṁ śaṅkaraścāsmi vitteśo yakṣarakṣasām | vasūnāṁ pāvakaścāsmi meruḥ śikhariṇāmaham ||
▸ Glossary: rudrāṇāṁ: of the rudras; śaṅkaraḥ: Shankara; ca: and; asmi: I am; vitteśaḥ: god of wealth; yakṣa: demigods; rakṣasām: demons; vasūnāṁ: of the Vasus; pā- vakaḥ: fire; ca: and; asmi: I am; meruḥ: Meru; śikhariṇām: of the peaks; aham: I
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.23 Of the Rudras, I am Sankara and of the Yakṣas and Rākṣasas, I am Kubera, god of wealth. Of the Vasus, I am fire and of the peaks, I am Meru.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.23।।रुद्रोंमें शंकर और यक्षराक्षसोंमें कुबेर मैं हूँ? वसुओंमें पावक (अग्नि) और शिखरवाले पर्वतोंमें मेरु मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.23।। मैं (ग्यारह) रुद्रों में शंकर हूँ और यक्ष तथा राक्षसों में धनपति कुबेर (वित्तेश) हूँ (आठ) वसुओं में अग्नि हूँ तथा शिखर वाले पर्वतों में मेरु हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.23 रुद्राणाम् among the Rudras? शङ्करः Sankara? च and? अस्मि (I) am? वित्तेशः Kubera? यक्षरक्षसाम्,among celestial fairies and spirits? वसूनाम् among Vasus? पावकः Pavaka? च and? अस्मि (I) am? मेरुः Meru? शिखरिणाम् of mountains? अहम् I.Commentary Rudras are eleven in number. The ten vital airs (Pranas and the UpaPranas? which are five each) and the mind are the eleven Rudras. They are so called because they produce grief when they depart from the body. They have been symbolised in the Puranas as follows Virabhadra? Sankara? Girisa? Ajaikapati? Bhuvanadhisvara? Aherbhujya? Pinaki? Aparajita? Kapali? Sthanu and Bhaga. Among these Rudras? Sankara is regarded as the chief.Vasus are earth? water? fire? air? ether? sun? moon and stars. They are so called because they comprehend the whole universe within them. They have been symbolised in the Puranas as follows Apah? Dhruva? Soma? Dhara? Anila? Anala? Pratyusa and Prabhasa. Of these Anala or Pavaka (fire) is the chief.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.23. And of the Rudras, I am Sankara; of the Yaksas and the Raksas, [I am] the Lord-of-Wealth (Kubera); of the Vasus, I am the Fire-god; of the mountains, I am the Meru.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.23 Among Forces of Vitality I am the life, I am Mammon to the heathen and the godless; I am the Energy in fire, earth, wind, sky, heaven, sun, moon and planets; and among mountains am the Mount Meru.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.23 Of the Rudras I am Sankara. Of the Yaksas and Raksasas, I am the Lord of wealth (Kubera). Of the Vasus, I am Agni; of the mountains, I am Meru.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.23 Among the Rudras [Aja, Ekapada, Ahirbudhnya, Pinaki, Aparajita, Tryam-baka, Mahesvara, Vrsakapi, Sambhu, Harana and Isvara. Different Puranas give different lists of eleven names.-Tr,] I am Sankara, and among the Yaksas and goblins I am Kubera [God of wealth. Yaksas are a class of demigods who attend on him and guard his wealth.]. Among the Vasus [According to the V.P. they are: Apa, dhruva, Soma, Dharma, Anila, Anala (Fire), Pratyusa and Prabhasa. The Mbh. and the Bh. given a different list.-Tr.] I am Fire, and among the mountains I am Meru.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.23 And, among the Rudras I am Sankara; among the Yakshas and Rakshasas, the Lord of wealth (Kubera); among the Vasus I am Pavaka (fire); and among the (seven) mountains I am the Meru.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.23 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.23 Of eleven Rudras I am Sankara. Of Yaksas and Raksasas I am Kubera, son of Visravas. Among the eight Vasus I am Agni. Of mountains, namely, of those mountains which shine with peaks, I am Meru.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.23 Rudranam, among the eleven Rudras, I am Sankara; and yaksaraksasam, among the Yaksas and goblins; I am vittesah, Kubera. Vasunam, among the eight Vasus; I am pavakah, Fire; and sikharinam, among the peaked mountains, I am Meru.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.23।। मैं रुद्रों में शंकर हूँ जीवन का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को नाश के अधिष्ठाता देवता के रूप में रुद्र की कल्पना को भलीभाँति समझना चाहिये। प्रत्येक परवर्ती (आगामी) रचना के पूर्व नाश होना आवश्यक है। फल को स्थान देने के लिए फूल को नष्ट होना पड़ता है और बीज को प्राप्त करने के लिए फल का विनाश आवश्यक है। ये बीज पुन नष्ट होकर पौधे को जन्म देते हैं। इस प्रकार? प्रत्येक प्रगति और विकास के पूर्व रचनात्मक विनाश की एक अखण्ड शृंखला बनी रहती है। इस तथ्य को सूक्ष्मदर्शी तत्त्वचिन्तक ऋषियों ने पहचाना? और ज्ञान की परिपक्वता में निर्भय होकर उन्होंने रचनात्मक विनाश के सुखदायक देवता शंकर को सम्मान दिया और उनका पूजार्चन किया।मैं यक्ष और राक्षसों में कुबेर हूँ स्वर्ग के धन के कोषाध्यक्ष कुबेर कहे जाते हैं। कुबेर शब्द का अर्थ है कुत्सित शरीर वाला। पुराणों में इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है कुबेर अत्यन्त कुत्सित राक्षसी प्राणी है? स्थूल एवं ह्रस्व काय? (त्रिपाद) तीन पैरों वाले? विशाल उदर के? लघु मस्तक वाले और जिसके आठ दांत बाहर निकले हुये हैं। स्वर्ग के इस कोषाध्यक्ष की सहायता के लिए उसी के समान कुरूप? भोगवादी और क्रूरचिन्तक यक्ष और राक्षसों की नियुक्ति होती है? जो कोष रक्षा में कुबेर की सहायता करते हैं। यह उल्लेखनीय है कि भारतीय ऋषिगण पूँजीवाद के कितने विरोधी थे कि उन्होंने धनपति कुबेर को अत्यन्त हास्यास्पद और विकृत आकृति वाला इतना कुरूप चित्रित किया है कि हमें हँसी भी नहीं आ सकती।मैं वसुओं में अग्नि हूँ वेदों में आठ वसुओं का वर्णन किया गया है? जो ऋतुओं के अधिष्ठाता देवता हैं। छान्दोग्य उपनिषद् में कहा गया है कि इन वसुओं का मुख अग्नि है। वहाँ? मुख से तात्पर्य अनुभव और भोग के साधन से है। अत? आत्मा ही वह स्रोत है? जहाँ से हमें समस्त ऋतुओं के अनुभव प्राप्त होते हैं।बाह्य प्रकृति में छ ऋतुएँ हैं? तथा दो ऋतुएँ मन की हैं सुख और दुख। इस प्रकार यहाँ आठ ऋतुओं का निर्देश है। बसन्त ऋतु में यदि वियोग के कारण हम दुखी हों? तो उस ऋतु के फूल भी हमारे लिए अश्रुधार बहाते हुए प्रतीत होते हैं जबकि मन में सफलता का पूर्ण आनन्द उमड़ रहा हो तो शरद ऋतु के पर्णहीन वृक्ष भी हमें आनन्द का नृत्य करते प्रतीत होते हैं इस कारण ये दो आन्तरिक ऋतुएँ हैं। इन सबका अनुभव आत्मचैतन्य की उपस्थिति में ही हो सकता है? अन्यथा नहीं।मैं समस्त पर्वतों में मेरु पर्वत हूँ मेरु एक पौराणिक पर्वत है? जिसका प्राचीन हिन्दू भूगोल शास्त्र में विश्व के मध्य बिन्दु के रूप में वर्णन किया गया है। इस पर्वत के ऊपर देवता वास करते हैं और इसके नीचे सप्तद्वीप फैले हुए हैं? जिनसे यह जगत् बना है। मेरु पर्वत की ऊँचाई सात से आठ हजार मील मानी गई है? जिसके शिखर से गंगा सभी दिशाओं में बहती है। इस वर्णन से अनेक विद्वानों का यह मत बना कि यह हिमालय का वर्णन है? जो? निसन्देह ही? अस्वीकार्य नहीं हो सकता। परन्तु हम उसे वस्तुत गूढ़ सांकेतिक भाषा में किया गया तत्त्व का वर्णन मानेंगे। मेरु पर्वत ऐसे प्रभावी स्थान का सूचक है जिसका आधार जम्बू द्वीप में है। जिसके उच्च शिखर से अध्यात्म ज्ञान की गंगा समस्त द्वीपों का कल्याण करने के लिए प्रवाहित होती है।परिचित जगत् की वस्तुओं में आत्मा की प्रतिष्ठा को बताते हुए आगे कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.23।।रुद्राणां वीरभद्रशेभुगिरिशाजैकपादाहिर्बुन्धयपिनाकिभवानीशकपालिदिक्पतिस्थाणुरुद्रसंज्ञानामेकादशानां शं करोतीति शंकरः। शुंभुश्चास्मि शं भवत्यस्मादिति व्युत्पत्तेः। वित्तेशः कुबेरः। वसूनां ध्रुवाध्वरापसोभानलानिलप्रत्यूषप्रभाससंज्ञानामष्टानामग्मिरस्मि। शिखरवतामत्युच्छ्रितानां मेरुरहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.23।।रुद्राणामेकादशानां मध्ये शंकरः वित्तेशो धनाध्यक्षः कुबेरः। यक्षरक्षसां यक्षाणां राक्षसानां च। वसूनामष्टानां पावकोऽग्निः। मेरुः सुमेरुः शिखरिणां शिखरवतामत्युच्छ्रितानां पर्वतानां च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.23।।रुद्राणामेकादशानां? वसूनामष्टानां? शिखराणि रत्नविशेषास्तद्वतां मध्ये मेरुरहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.23।।रुद्राणां तामसानामेकादशानां च मध्ये शङ्करः सुखकरः सर्वेषां भक्तिज्ञानोपदेशकोऽस्मि। यक्षरक्षसां वित्तेशः कुबेरोऽस्मि। वसूनां मध्ये मुख्यतया द्रोणोऽस्मि। अतएवद्रोणो वसूनां प्रवरः इति श्रीभागवते [10।8।48] उक्तम्। च पुनः पावकः अग्निरस्मि। शिखरिणां शिखरवतामुच्चानां मध्ये मेरुरहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.23।।रुद्राणामिति। यक्षरक्षसामिति। राक्षसानामपि क्रूरत्वादिसाम्याद्यक्षैः सहैकीकृत्य निर्देशः। तेषां मध्ये वित्तेशः कुबेरोऽस्मि। पावकोऽग्निः। शिखरिणां शिखरवतामुच्छ्रितानां मध्ये मेरुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.23।।रुद्राणामिति। एकादशानां मध्ये वा मूलं शङ्करोऽस्मि वैषणवत्वेन माननीयः। वित्तेशो मम कोशाधिकारी। वसूनां मध्ये पावको भगवन्मुखभूतोऽग्निरहम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.23।।एकादश रुद्रोंमें मैं शंकर हूँ। यक्ष और राक्षसोंमें मैं धनेश्वर कुबेर हूँ। आठ वसुओंमें मैं पावक -- अग्नि हूँ। शिखरवालोंमें ( पर्वतोंमें ) मैं सुमेरु पर्वत हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.23।। व्याख्या -- रुद्राणां शंकरश्चास्मि -- हर? बहुरूप? त्र्यम्बक आदि ग्यारह रुद्रोंमें शम्भु अर्थात् शंकर सबके अधिपति हैं। ये कल्याण प्रदान करनेवाले और कल्याणस्वरूप हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।वित्तेशो यक्षरक्षसाम् -- कुबेर यक्ष तथा राक्षसोंके अधिपति हैं और इनको धानाध्यक्षके पदपर नियुक्त किया,गया है। सब यक्षराक्षसोंमें मुख्य होनेसे ये भगवान्की विभूति हैं।वसूनां पावकश्चास्मि -- धर? ध्रुव? सोम आदि आठ वसुओंमें अनल अर्थात् पावक (अग्नि) सबके अधिपति हैं। ये सब देवताओंको यज्ञकी हवि पहुँचानेवाले तथा भगवान्के मुख हैं। इसलिये इनको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।मेरुः शिखरिणामहम् -- सोने? चाँदी? ताँबे आदिके शिखरोंवाले जितने पर्वत हैं? उनमें सुमेरु पर्वत मुख्य है। यह सोने तथा रत्नोंका भण्डार है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।इस श्लोकमें जो चार विभूतियाँ कही हैं? उनमें जो कुछ विशेषता -- महत्ता दीखती है? वह विभूतियोंके मूलरूप परमात्मासे ही आयी है। अतः इन विभूतियोंमें परमात्माका ही चिन्तन होना चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.23।।मन्त्रब्राह्मणसमुदायानामृगादीनां मध्ये सामवेदोऽस्मीति। ध्यानान्तरमुदाहरति -- वेदानामिति। संघाते जीवाधिष्ठिते यावत्पञ्चत्वं सर्वत्र व्यापिनी चैतन्याभिव्यञ्जिकेति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.23।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.23।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.23।। --,रुद्राणाम् एकादशानां शंकरश्च अस्मि। वित्तेशः कुबेरः यक्षरक्षसां यक्षाणां रक्षसां च। वसूनाम् अष्टानां पावकश्च अस्मि अग्निः। मेरुः शिखरिणां शिखरवताम् अहम्।।
───────────────────
【 Verse 10.24 】
▸ Sanskrit Sloka: पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् | सेनानीनामहं स्कन्द: सरसामस्मि सागर: ||
▸ Transliteration: purodhasāṁ ca mukhyaṁ māṁ viddhi pārtha bṛhaspatim | senānīnāmahaṁ skandaḥ sarasāmasmi sāgaraḥ ||
▸ Glossary: purodhasāṁ: of the priests; ca: and; mukhyaṁ: main; māṁ: Me; viddhi: understand; pārtha: Pārtha; bṛhaspatim: Brihaspati; senānīnām: of the war- riors; ahaṁ: I am; skandaḥ: Skanda; sarasām: of the water bodies; asmi: I am; sāgaraḥ: the ocean
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.24 Of the priests, understand, O Pārtha, that I am the chief Brihaspati. Of the warriors, I am Skanda. Of the water bodies, I am the ocean.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.24।।हे पार्थ पुरोहितोंमें मुख्य बृहस्पतिको मेरा स्वरूप समझो। सेनापतियोंमें स्कन्द और जलाशयोंमें समुद्र मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.24।। हे पार्थ पुरोहितों में मुझे बृहस्पति जानो मैं सेनापतियों में स्कन्द और जलाशयों में समुद्र हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.24 पुरोधसाम् among the household priests? च and? मुख्यम् the chief? माम् Me? विद्धि know? पार्थ O Partha? बृहस्पतिम् Brihaspati? सेनानीनाम् among generals? अहम् I? स्कन्दः Skanda? सरसाम् among lakes? अस्मि (I) am? सागरः the ocean.Commentary Brihaspati is the chif priest of the gods. He is the househld priest of Indra.Skanda is Kartikeya or Lord Subramanya. He is the general of the hosts of the gods.Of things holding water -- natural reservoirs or lakes -- I am the ocean.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.24. Of the royal priests I am the chief viz., Brhaspati (the priest of gods), O son of Prtha, you should know that; of the army-generals, I am Skanda [the War-god]; of the water reservoirs, I am the ocean.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.24 Among the priests, know, O Arjuna, that I am the Apostle Brihaspati; of generals I am Skanda, the Commander-in-Chief, and of waters I am the Ocean.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.24 Among family Priests, O Arjuna, know Me to be the chief Brhaspati. Of generals, I am Skanda. Of reservoirs of water, I am the ocean.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.24 O son of Prtha, know me to be Brhaspati, the foremost among the priests of kings. Among comanders of armies I am Skanda; among large expanses of water I am the sea.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.24 And, among the household priests (of kings), O Arjuna, know Me to be the chief, Brihaspati; among the army generals I am Skana; among lakes I am the ocean. '
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.24 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.24 I am that Bhraspati who is paramount among family priests. Of generals, I am Skanda. Of reservoirs of waters, O am the ocean.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.24 O son of Prtha viddhi, know; mam, Me; to be Brahaspati, mukhyam, the foremost; purodhasam, among the priests of kings. Being as he is the priest of Indra, he should be the foremost. Senaninam, among ?ners of armies; I am Skanda, the ?nder of the armies of gods. Sarasam, among large expanses of water, among reservoirs dug by gods (i.e. among nature reservoirs); I am sagarah, the sea.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.24।। मैं पुरोहितों में बृहस्पति हूँ गुरु ग्रह के अधिष्ठाता बृहस्पति को ऋग्वेद में ब्रह्मणस्पति कहा गया है? जो स्वर्ग के अन्य देवों में उनके पद को स्वत स्पष्ट कर देता है। देवताओं के वे आध्यात्मिक गुरु माने जाते हैं।मैं सेनापतियों में स्कन्द हूँ स्कन्द को ही कार्तिक स्वामी के नाम से जाना जाता है? जो भगवान् शिव के पुत्र हैं। उनका वाहन मयूर है तथा हाथ में वे भाला (बरछा) धारण किये रहते हैं।मैं जलाशयों में सागर हूँ इन समस्त उदाहरणों में एक बात स्पष्ट होती है कि भगवान् न केवल स्वयं के समष्टि या सर्वातीत रूप को ही बता रहे हैं? वरन् अपने व्यष्टि या वस्तु व्यापक स्वरूप को भी। विशेषत? इस श्लोक में निर्दिष्ट उदाहरण देखिये। निसन्देह ही? गंगाजल का समुद्र के जल से कोई संबंध प्रतीत नहीं होता। यमुना? गोदावरी? नर्मदा? सिन्धु या कावेरी? नील? टेम्स या अमेजन जगत् के विभिन्न सरोवरों का जल? ग्रामों के तालाबों का जल और सिंचाई नहरों का जल? व्यक्तिगत रूप से? स्वतन्त्र हैं? जिनका उस समुद्र से कोई संबंध नहीं है? जो जगत् को आलिंगन बद्ध किये हुए हैं। और फिर भी? यह एक सुविदित तथ्य हैं कि इस विशाल समुद्र के बिना ये समस्त नदियाँ तथा जलाशय बहुत पहले ही सूख गये होते। इसी प्रकार चर प्राणी और अचर वस्तुओं का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व प्रतीत होता है? जिसका सत्य के असीम समुद्र से सतही दृष्टि से कोई संबंध प्रतीत न हो? किन्तु भगवान् सूचित करते हैं कि इस सत्य के बिना यह दृश्य जगत् बहुत पहले ही अपने अस्तित्व को मिटा चुका होता।इसी विचार का विस्तार करते हुए कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.24।।पुरोधसां राजपुरोहितानां इन्द्रपुरोहितत्वान्मुख्यं पुरोहितं बृहस्पतिं जानीहि। यता त्वं पार्थानां मुख्य इति सूचयन्नाह -- पार्थेति। सेनापतीनां कार्तिकेय देवसेनापतिः। सरसां देवखातजलाशयानां सागरोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.24।।इन्द्रस्य सर्वराजश्रेष्ठत्वात्तत्पुरोधसं बृहस्पतिं सर्वेषां पुरोधसां राजपुरोहितानां मध्ये मुख्यं श्रेष्ठं मामेव हे पार्थं? विद्धि जानीहि। सेनानीनां सेनापतीनां मध्ये देवसेनापतिः स्कन्दो गुहोऽहमस्मि। सरसां देवखातजलाशयानां मध्ये सागरः सगरपुत्रैः खातो जलाशयोऽहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.24।।पुरोधसां पुरोहितानां बृहस्पतिं देवराजपुरोहितत्वात्। सेनानीनां सेनापतीनां स्कन्दः कार्तिकेयः। सरसां जलाशयानाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.24।।हे पार्थ पुरोधसां च मध्ये मुख्यं बृहस्पतिं मां विद्धि। पार्थेति सम्बोधनेन पृथासम्बन्धेन त्वयि कृपां करोमि। तथा निन्दिते पौरोहित्येऽपि देवक्रियया तस्मिन् बुद्ध्यादिशक्तिरूपेण तिष्ठामि? तेन मत्स्वरूपं विद्धीति व्यञ्जितम्। सेनानीनां सेनामध्ये देवसेनापतित्वात् स्कन्दोऽस्मि। सरसां रसयुतानां स्थिरजलानां मध्ये सागरः समुद्रोऽस्मि? रत्नाकर इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.24।।पुरोधसामिति। पुरोधसां मध्ये देवपुरोहितत्वान्मुख्यं बृहस्पतिं मां विद्धि। सेनानीनां सेनापतीनां मध्ये देवसेनापतिः स्कन्दोऽहमस्मि। सरसां स्थिरजलाशयानां मध्ये समुद्रोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.24।।पुरोधसामिति। सरसां स्थिरजलाशयानां मध्ये सागरः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.24।।हे पार्थ पुरोहितोंमें यानी राजपुरोहितोंमें तू मुझे प्रधान पुरोहित बृहस्पति समझ क्योंकि वे ही इन्द्रके मुख्य पुरोहित हैं। सेनापतियोंमें मैं देवोंका सेनापति कार्तिकेय हूँ तथा सरोवरोंमें अर्थात् जो देवनिर्मित सरोवर हैं उनमें समुद्र हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.24।। व्याख्या -- पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् -- संसारके सम्पूर्ण पुरोहितोंमें और विद्याबुद्धिमें बृहस्पति श्रेष्ठ हैं। ये इन्द्रके गुरु तथा देवताओंके कुलपुरोहित हैं। इसलिये भगवान्ने अर्जुनसे बृहस्पतिको अपनी विभूति जानने(मानने) के लिये कहा है।सेनानीनामहं स्कन्दः -- स्कन्द (कार्तिकेय) शंकरजीके पुत्र हैं। इनके छः मुख और बारह हाथ हैं। ये देवताओंके सेनापति हैं और संसारके सम्पूर्ण सेनापतियोंमें श्रेष्ठ हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है। सरसामस्मि सागरः -- इस पृथ्वीपर जितने जलाशय हैं? उनमें समुद्र सबसे बड़ा है। समुद्र सम्पूर्ण जलाशयोंका अधिपति है और अपनी मर्यादामें रहनेवाला तथा गम्भीर है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।यहाँ इन विभूतियोंकी जो अलौकिकता दीखती है? यह उनकी खुदकी नहीं है? प्रत्युत भगवान्की है और भगवान्से ही आयी है। अतः इनको देखनेपर भगवान्की ही स्मृति होनी चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.24।।पुरोहितेषु बृहस्पतेर्मुख्यत्वे हेतुमाह -- स हीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.24।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.24।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.24।। --,पुरोधसां च राजपुरोहितानां च मुख्यं प्रधानं मां विद्धि हे पार्थ बृहस्पतिम्। स हि इन्द्रस्येति मुख्यः स्यात् पुरोधाः। सेनानीनां सेनापतीनाम् अहं स्कन्दः देवसेनापतिः। सरसां यानि देवखातानि सरांसि तेषां सरसां सागरः अस्मि भवामि।।
───────────────────
【 Verse 10.25 】
▸ Sanskrit Sloka: महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् | यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालय: ||
▸ Transliteration: maharṣīṇāṁ bhṛgurahaṁ girāmasmyekamakṣaram | yajñānāṁ japayajño’smi sthāvarāṇāṁ himālayaḥ ||
▸ Glossary: maharṣīṇāṁ: of the great sages; bhṛguḥ: Bhrigu; ahaṁ: I; girām: of the vibra- tions; asmi: I am; ekam akṣaram: single letter (Om); yajñānāṁ: of the yajnas (sacrifices); japayagñaḥ: chanting of holy names; asmi: I am; sthāvarāṇāṁ: of the immovables; himālayaḥ: Himalayas
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.25 Of the great sages, I am Bhrigu. Of the vibrations, I am the OM. Of the sacrifices, I am the chanting of holy names. Of the immovable objects, I am the Himālayas.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.25।।महर्षियोंमें भृगु और वाणियों(शब्दों) में एक अक्षर अर्थात् प्रणव मैं हूँ। सम्पूर्ण यज्ञोंमें जपयज्ञ और स्थिर रहनेवालोंमें हिमालय मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.25।। मैं महर्षियों में भृगु और वाणी (शब्दों) में एकाक्षर ओंकार हूँ। मैं यज्ञों में जपयज्ञ और स्थावरों (अचलों) में हिमालय हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.25 महर्षीणाम् among the great Rishis? भृगुः Bhrigu? अहम् I? गिराम् among words? अस्मि (I) am? ऐकम् the one? अक्षरम् syllable? यज्ञानाम् among sacrifices? जपयज्ञः the sacrifice of silent repetition? अस्मि (I) am? स्थावराणाम् among immovable things? हिमालयः Himalayas.Commentary Manu has said Whatever else the Brahmana may or may not do? he attains salvation by Japa (silent repetition of a Mantra) alone.Bhrigu is one of the mindborn of the Creator.Himalaya The highest mountain range in the world.Japayajna There is neither injury nor loss in this Yajna. Therefore? it is regarded as the best of all Yajnas.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.25. Of the great seers, I am Bhrgu; of the words, I am the Single-syllable (Om); of the sacrifices [performed with external objects], I am the sacrifice of muttering prayer; of the immovables, I am the Himalayan range.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.25 Of the great seers I am Bhrigu, of words I am Om, of offerings I am the silent prayer, among things immovable I am the Himalayas.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.25 Of the great seers, I am Bhrgu. Of words, I am the single-lettered word Om. Of sacrifices, I am the sacrifice of Japa. Of immovable things I am the Himalayas.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.25 Among the great sages I am Bhrgu; of words I am the single syllable (Om) [Om is the best because it is the name as well as the symbol of Brahman.]. Among rituals I am the ritual of Japa [Japa, muttering prayers-repeating passages from the Vedas, silently repeating names of deities, etc. Rituals often involve killing of animals. But Japa is free from such injury, and hence the best.] of the immovables, the Himalaya.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.25 Among the great sages I am Bhrigu; among words I am the one syllable (Om); among sacrifices I am the sacrifice of silent repetition; among the immovable things I am the Himalayas.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.25
Chapter 10 (Part 11)
See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.25 Of great seers like Marici etc., I am Bhrgu. Words are sounds that convey meaning. Of such words, I am the single-lettered word Pranava (Or Om). Of the sacrifices, I am the sacrifice of Japa (sacred formula silently repeated) which is the most prominent form of sacrificial offerings. Of immovables or mountains, I am the Himalaya.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.25 Maharsinam, among the great sages, I am Bhrgu, Giram, of words, of utterances, in the form of words; I am the ekam, single; aksaram, syllable Om. Yajnanam, among rituals; I am the japa-yajnah, rituals of Japa. Sthavaranam, of the immovables, I am the Himalaya.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.25।। मैं महर्षियों में भृगु हूँ इसी अध्याय में बताये हुए सप्तऋषियों में भृगु ऋषि प्रमुख हैं। भृगु मनु के पुत्र माने गये हैं जो मानव धर्मशास्त्र का वर्णन करते हैं।मैं शब्दों में एकाक्षर ओंकार हूँ शब्द अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए ध्वनि के संकेतक हैं। एक वक्ता अपने मन के भावों को शब्दों के द्वारा व्यक्त कर उन्हीं भावों को श्रोताओं के मन में उत्पन्न करता है। इस प्रकार? टमाटर शब्द एक पदार्थ का संकेतक है? जिसके उच्चारण से टमाटर से परिचित लोगों के मन में समान आकार की वृत्ति उत्पन्न होती है। यदि वक्ता यह पाता है कि इस शब्द के उच्चारण से श्रोताओं को अर्थ का बोध नहीं हुआ है? तो फिर वह अनेक वाक्यों के द्वारा उस वस्तु का वर्णन करके अर्थ बोध कराता है। जिस सीमा तक वह वक्ता? टमाटर के रूप? रंग? स्वाद और अन्य गुणों के संबंध में श्रोता के मन में चित्र को स्पष्ट करेगा? उस सीमा तक श्रोताओं को उसके प्रतिपाद्य विषय का ज्ञान होगा। इस प्रकार? सामान्यत कोई भी भाषा ऐसे शब्दों से पूर्ण होती है? जो हमारे अनुभवों और विचारों को व्यक्त कर सकती है और अन्यों को बोध कराने में सहायक होती है।यदि सामान्य शब्द किसी लौकिक परिच्छिन्न वस्तु को दर्शाता है? तो ऋषियों ने एक ऐसे शब्द की कल्पना की जो नित्य वस्तु का सूचक या वाचक हो। वह शब्द है ? जिसे ओंकार या प्रणव भी कहते हैं। वेदमन्त्रों में प्रणवमन्त्र महानतम है तथा आध्यात्मिक जगत् में आज तक साधकों के ध्यान के लिए आलम्बन के रूप में इस शब्द प्रतीक का उपयोग किया जाता है।मैं यज्ञों में जपयज्ञ हूँ जप एक सार्वभौमिक आध्यात्मिक साधना है। किसी एक मन्त्र के जप की सहायता से साधक अपने मन में एक इष्ट देवता की अखण्ड वृत्ति बनाये रखता है। कर्म भक्ति या ज्ञान के मार्ग में भी साधक का प्रयत्न यही होता है कि मन में एक सजातीय वृत्ति प्रवाह बना रहे चाहे वह कर्मकाण्ड की पूजा के द्वारा हो या ध्यान साधना से। इस प्रकार? सभी साधनाओं में? किसीनकिसी रूप में? सजातीय वृत्ति की पुनरावृत्ति का अभ्यास किया जाता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मन्त्र जप अपने आप में एक स्वतन्त्र साधना है? किन्तु किसीनकिसी रूप में वह अन्य साधन मार्गों का भी अन्तरतम केन्द्र है।इस प्रकार? यहाँ जपयज्ञ का प्रशंसा की गई है? क्योंकि वह सभी साधनों का केन्द्र होने के साथसाथ अपने आप में एक स्वतन्त्र साधन मार्ग भी है। अखण्ड आत्मस्मरण ही पूर्णत्व का अनुभव और बुद्धि की परम शान्तिसमाधि का क्षण है।मैं स्थावरों में हिमालय हूँ स्थावर का अर्थ है जड़? अचेतन वस्तु। पर्वत किसे कहते हैं मिट्टी और चट्टानें? पेड़ और पौधे? पशु और पक्षी जो प्रकृतिक शक्तियों के वैभव के साथ मिले होते है। जैसे सूंसूं आवाज करता हुआ तूफान? मेघों को चीर कर जाती हुई विद्युत्? शान्त घाटियों से गरजकर बहती जाती नदियाँ? शान्त झील और सरोवर? नील वर्ण आकाश व गिरि शिखरों को स्नेहपूर्वक अपने हृदयों में प्रतिबिम्बित करते निस्तब्ध जलाशय इन सबका संयुक्त रूप है पर्वत। भगवान् कहते हैं? समस्त पर्वतों में मैं हिमालय हूँ। निश्चय ही वह हिमालय को उसके विशेष गुण के कारण अधिक गौरव और दिव्य प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं। जग्ात् के सभी पर्वतों से सर्वथा विपरीत? भारत में? हिमालय के ऐसे गुप्त शिखर हैं? जहाँ बैठकर मनुष्य ने अपने विचारों की उड़ानों के द्वारा बुद्धि के परे तत्त्व का अनुभव करने के लिए अपने प्रयोग में वह सफलता पायी है? जो प्राणियों के इतिहास में उसके पूर्व किसी ने नहीं पायी थी।इससे भी सन्तुष्ट न होकर? भगवान् श्रीकृष्ण और अधिक उत्साह के साथ? अन्य सुन्दर उदाहरणों के द्वारा? अपने अनन्त वैभव को? सांसारिक बुद्धि के योद्धा मित्र अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.25।।गिरां वाक्यपदलक्षणानां एकमक्षरर्मोकारोऽस्मि। स्थावराणां स्थितिमताम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.25।।महर्षीणां सप्त ब्रह्मणां मध्ये भृगुरतितेजस्वित्वादहम्। गिरां वाचां पदलक्षणानां मध्ये एकमक्षरं पदमोंकारोऽहमस्मि। यज्ञानां मध्ये जपयज्ञो हिंसादिदोषशून्यत्वेनात्यन्तशोधकोऽहमस्मि। स्थावराणां स्थितिमतां मध्ये हिमालयोऽहम्। शिखरवतां मध्ये हि मेरुरहमित्युक्तमतः स्थावरत्वेन शिखरवत्त्वेन चार्थभेदाददोषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.25 -- 10.26।।एकमक्षरमोंकाराख्यम्। जपयज्ञो हिंसाशून्यत्वात्। स्थावराणां स्थितिमताम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.25।।महर्षीणां सर्ववेदात्मको भृगुरस्मि। गिरां पदात्मकानां मध्ये एकाक्षरम् कारात्मकमहमस्मि। यज्ञानां कर्मणां मध्ये जपयज्ञोऽस्मि। स्थावराणामचलानां हिमालयोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.25।। महर्षीणामिति। गिरां वाचां पदात्मिकानां मध्य एकमक्षरमोंकाराख्यं पदमस्मि। यज्ञानां श्रौतस्मार्तानां मध्ये जपरूपो यज्ञोऽहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.25।।महर्षीणामिति। भृगुरहं ब्रह्मानन्दजनको भक्तिनिर्द्धारकश्चेत्यतो मद्विभूतिः। अक्षरमेकं सर्वबीजं प्रणवरूपोऽस्मि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.25।।महर्षियोंमें मैं भृगु हूँ? वाणीसम्बन्धी भेदोंमें -- पदात्मक वाक्योंमें एक अक्षर -- ओंकार हूँ? यज्ञोंमें जपयज्ञ हूँ और स्थावरोंमें अर्थात् अचल पदार्थोंमें हिमालय नामक पर्वत हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.25।। व्याख्या -- महर्षीणां भृगुरहम् -- भृगु? अत्रि? मरीचि आदि महर्षियोंमें भृगुजी बड़े भक्त? ज्ञानी और तेजस्वी हैं। इन्होंने ही ब्रह्मा? विष्णु और महेश -- इन तीनोंकी परीक्षा करके भगवान् विष्णुको श्रेष्ठ सिद्ध किया था। भगवान् विष्णु भी अपने वक्षःस्थलपर इनके चरणचिह्नको भृगुलता नामसे धारण किये रहते हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।गिरामस्म्येकमक्षरम् -- सबसे पहले तीन मात्रावाला प्रणव प्रकट हुआ। फिर प्रणवसे त्रिपदा गायत्री? त्रिपदा गायत्रीसे वेद और वेदोंसे शास्त्र? पुराण आदि सम्पूर्ण वाङ्मय जगत् प्रकट हुआ। अतः इन सबका कारण होनेसे और इन सबमें श्रेष्ठ होनेसे भगवान्ने एक अक्षर -- प्रणवको अपनी विभूति बताया है। गीतामें और जगह भी इसका वर्णन आता है जैसे -- प्रणवः सर्ववेदेषु (7। 8) -- सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव मैं हूँ ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन्देहं स याति परमां गतिम्।। (8। 13) जो मनुष्य -- इस एक अक्षर प्रणवका उच्चारण करके और भगवान्का स्मरण करके शरीर छोड़कर जाता है? वह परमगतिको प्राप्त होता है तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः। प्रवर्तन्ते विधानोक्ताः सततं ब्रह्मवादिनाम् (17। 24) वैदिक लोगोंकी शास्त्रविहित यज्ञ? दान और तपरूप क्रियाएँ प्रणवका उच्चारण करके ही आरम्भ होती हैं। यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि -- मन्त्रोंसे जितने यज्ञ किये जाते हैं? उनमें अनेक वस्तुपदार्थोंकी? विधियोंकी,आवश्यकता पड़ती है और उनको करनेमें कुछनकुछ दोष आ ही जाता है। परन्तु जपयज्ञ अर्थात् भगवन्नामका जप करनेमें किसी पदार्थ या विधिकी आवश्यकता नहीं पड़ती। इसको करनेमें दोष आना तो दूर रहा? प्रत्युत सभी दोष नष्ट हो जाते हैं। इसको करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं। भिन्नभिन्न सम्प्रदायोंमें भगवान्के नामोंमें अन्तर तो होता है? पर नामजपसे कल्याण होता है -- इसको हिन्दू? मुसलमान? बौद्ध? जैन आदि सभी मानते हैं। इसलिये भगवान्ने जपयज्ञको अपनी विभूति बताया है।स्थावराणां हिमालयः -- स्थिर रहनेवाले जितने भी पर्वत हैं? उन सबमें हिमालय तपस्याका स्थल होनेसे महान् पवित्र है और सबका अधिपति है। गङ्गा? यमुना आदि जितनी तीर्थस्वरूप पवित्र नदियाँ हैं? वे सभी प्रायः हिमालयसे प्रकट होती हैं। भगवत्प्राप्तिमें हिमालयस्थल बहुत सहायक है। आज भी दीर्घ आयुवाले बड़ेबड़े योगी और सन्तजन हिमालयकी गुफाओंमें साधनभजन करते हैं। नरनारायण ऋषि भी हिमालयमें जगत्के कल्याणके लिये आज भी तपस्या कर रहे हैं। हिमालय भगवान् शंकरका ससुराल है और स्वयं शंकर भी इसीके एक शिखर -- कैलास पर्वतपर रहते हैं। इसीलिये भगवान्ने हिमालयको अपनी विभूति बताया है।संसारमें जो कुछ भी विशेषता दीखती है? उसको संसारकी माननेसे मनुष्य उसमें फँस जाता है? जिससे उसका पतन होता है। परन्तु भगवान् यहाँ बहुत ही सरल साधन बताते हैं कि तुम्हारा मन जहाँकहीं और जिसकिसी विशेषताको लेकर आकृष्ट होता है? वहाँ उस विशेषताको तुम मेरी समझो कि यह विशेषता भगवान्की है और भगवान्से ही आयी है? यह इस परिवर्तनशील नाशवान् संसारकी नहीं है। ऐसा समझोगे? मानोगे तो तुम्हारा वह आकर्षण मेरेमें ही होगा। तुम्हारे मनमें मेरी ही महत्ता हो जायगी। इससे संसारका चिन्तन छूटकर मेरा ही चिन्तन होगा? जिससे तुम्हारा मेरेमें प्रेम हो जायगा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन,व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.25।।एकमित्योंकारस्य ब्रह्मप्रतीकत्वेन तदभिधानत्वेन च प्रधानत्वमुच्यते। जपयज्ञस्य यज्ञान्तरेभ्यो हिंसादिराहित्येन प्राधान्यमुपेत्याह -- यज्ञानामिति। शिखरवतामुच्छ्रितानां पर्वतानां मध्ये मेरुरहमित्युक्तेऽपि स्थितिशीलानां तेषामेव हिमवान्पर्वतराजोऽस्मीत्यर्थभेदं गृहीत्वाह -- स्थितिमतामिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.25।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.25।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.25।। --,महर्षीणां भृगुः अहम्। गिरां वाचां पदलक्षणानाम् एकम् अक्षरम् ओंकारः अस्मि। यज्ञानां जपयज्ञः अस्मि? स्थावराणां स्थितिमतां हिमालयः।।
───────────────────
【 Verse 10.26 】
▸ Sanskrit Sloka: अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारद: | गन्धर्वाणां चित्ररथ: सिद्धानां कपिलो मुनि: ||
▸ Transliteration: aśvatthaḥ sarvavṛkṣāṇāṁ devarṣīṇāṁ ca nāradaḥ | gandharvāṇāṁ citrarathaḥ siddhānāṁ kapilo muniḥ ||
▸ Glossary: aśvatthaḥ: banyan tree; sarva: all; vṛkṣāṇāṁ: of the trees; devarṣīṇāṁ: of the sages of the gods; ca: and; nāradaḥ: Nārada; gandharvāṇāṁ: of the Gand- harvas; citrarathaḥ: Chitraratha; siddhānāṁ: of the Siddhas; kapilaḥ: Kapila; muniḥ: sage
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.26 Of all the trees, I am the Banyan tree and of all the sages of the gods, I am Nārada. Of the Gandharvas, I am Chitraratha. Of the realized souls, I am the sage Kapila.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.26।।सम्पूर्ण वृक्षोंमें पीपल? देवर्षियोंमें नारद? गन्धर्वोंमें चित्ररथ और सिद्धोंमें कपिल मुनि मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.26।। मैं समस्त वृक्षों में अश्वत्थ (पीपल) हूँ और देवर्षियों में नारद हूँ मैं गन्धर्वों में चित्ररथ और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.26 अश्वत्थः Asvattha? सर्ववृक्षाणाम् among all trees? देवर्षीणाम् among Divine Rishis? च and? नारदः Narada? गन्धर्वाणाम् among Gandharvas? चित्ररथः Chitraratha? सिद्धानाम् among the Siddhas or the perfected? कपिलः Kapila? मुनिः sage.Commentary Devarshis are gods and at the same time Rishis or seers of Mantras.Siddhas are the perfected ones those who at their very birth attained without any effort Dharma (virtue)? Jnana (knowledge of the Self)? Vairagya (dispassion) and Aisvarya (lordship).Muni is one who does Manana or reflection one who meditates.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.26. Of all trees, I am the Pipal-tree; and of the divine seers, Narada; of the Gandharvas (the celestial musicians), Citraratha; of the perfected ones, the sage Kapila.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.26 Of trees I am the sacred Fig-tree, of the Divine Seers Narada, of the heavenly singers I am Chitraratha, their Leader, and of sages I am Kapila.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.26 Of trees I am the Asvattha. Of celestial seers, I am Narada. Of the Gandharvas I am Citraratha. Of the perfected, I am Kapila.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.26 Among all trees (I am) the Asvatha (peepul), and Narada among the divine sages. Among the dandharvas [A class of demigods regarded as the musicians of gods.] (I am) Citraratha; among the perfected ones, the sage Kapila.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.26 Among all the trees ( I am) the Peepul; among the divine sages, I am Narada; among Gandharvas, Chitraratha; among the perfected, the sage Kapila.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.26 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.26 - 10.29 Of trees I am Asvattha which is worthy of worship. Of celestial seers I am Narada. Kamadhuk is the divine cow. I am Kandarpa, the cause of progeny. Sarpas are single-headed snakes while Nagas are many-headed snakes. Aatic creatures are known as Yadamsi. Of them I am Varuna. Of subdures, I am Yama, the son of the sun-god.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.26 Sarva-vrksanam, among all trees, (I am) the Asvatta; and Narada devarsinam, among the divine sages-those who were gods and became sages by virtue of visualizing Vedic mantras; among them I am Narada. Gandharvanam, among the gandharvas, I am the gandharva called Citraratha. Siddhanam, among the perfected ones, among those who, from their very birth, were endowed with an abundance of the wealth of virtue, knowledge and renunciation; (I am) munih, the sage Kapila.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.26।। मैं समस्त वृक्षों में अश्वत्थ वृक्ष हूँ परिमाण और आयुमर्यादा दोनों की दृष्टि से अश्वत्थ अर्थात् पीपलवृक्ष को सर्वव्यापक और नित्य माना जा सकता है? क्योंकि वह प्राय कई शताब्दियों तक जीवित रहता है। हिन्दू लोग उसकी पूजा करते हैं। उसके साथ दिव्यता और पवित्रता की भावना जुड़ी हुई है। वैदिक परम्परा से परिचित लोगों को अश्वत्थ शब्द उपनिषदों में वर्णित संसार वृक्ष के रूपक का स्मरण भी कराता है। गीता के भी आगे आने वाले एक अध्याय में अश्वत्थ वृक्ष का वर्णन मिलता है? जो इस दृश्यमान मिथ्या जगत् का प्रतीक रूप है।मैं देवर्षियों में नारद हूँ देवर्षि नारद हमारी पौराणिक कथाओं के एक प्रिय पात्र हैं। नारद का वर्णन हरिभक्त के रूप में किया गया है। वे न केवल देवर्षियों में महान् हैं? वरन् वे प्राय इस पृथ्वीलोक पर अवतरित होकर लोगों के मन में गर्व अभिमान दूर करने के लिए जानबूझकर उनकी आपस में कलह करवाते हैं और अन्त में सबको भक्ति का मार्ग दर्शाकर स्वर्ग सुख की प्राप्ति कराते हैं। सम्भवत? श्रीकृष्ण स्वयं धर्मोद्धारक और धर्मप्रचारक होने के नाते नारद जी के प्रति उनके प्रचार के उत्साह के कारण आदर भाव रखते हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार अनेक अधर्मियों को धर्म मार्ग में परिवर्तित कर नारद जी ने उन्हें मोक्ष दिलाया है। भगवान् श्रीकृष्ण और नारद दोनों की ही समान महत्वाकांक्षा होने से दोनों के मध्य स्नेह होना स्वाभाविक ही है।मैं गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ गन्धर्वगण स्वर्ग के गायक वृन्द हैं? जो कला और संगीत के द्वारा देवताओं का मनोरंजन करते हैं। स्वर्ग के मनोरंजन के वे सितारे हैं। उन गन्धर्वों में सर्वश्रेष्ठ हैं चित्ररथ।मैं सिद्धों में कपिल मुनि हूँ ये सिद्ध पुरुष जादूगर नहीं हैं। इस संस्कृत शब्द का अर्थ है जिस पुरुष ने अपने लक्ष्य (साध्य) को सिद्ध (प्राप्त) कर लिया है। अत आत्मानुभवी पुरुष ही सिद्ध कहलाता है। ऐसे सिद्ध पुरुषों में भगवान् कहते हैं कि? मैं कपिल मुनि हूँ। मुनि शब्द से उस पारम्परिक धारणा को बनाने की आवश्यकता नहीं है? जिसमें मुनि को एक बृद्ध? पक्व केश वाले? प्राय निर्वस्त्र और साधारणत अगम्य स्थानों में विचरण करने वाले पुरुष के रूप में अज्ञानी चित्रकारों के द्वारा चित्रित किया जाता है। उसके विषय में ऐसी धारणा प्रचलित हो गई है कि वह एक सामान्य नागरिक के समान न होकर जंगलों का कोई विचित्र प्राणी है? जो विचित्र्ा आहार पर जीता है। वस्तुत मुनि का अर्थ है मननशील अर्थात् तत्त्वचिन्तक पुरुष। वह शास्त्रीय कथनों के गूढ़ अभिप्रायों पर सूक्ष्म? गम्भीर मनन करता है। ऐसे विचारकों में मैं कपिल मुनि हूँ।सांख्य दर्शन के प्रणेता के रूप में कपिल मुनि सुविख्यात हैं? जिनका संकेत यहाँ किया गया है। अनेक सिद्धांतों पर गीता का सांख्य दर्शन के साथ मतैक्य है। अत भगवान् यहाँ कपिल मुनि को अपनी विभूति की सम्मानित प्रतिष्ठा प्रदान करते हैं।पुन?
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.26।।देवानामेव सतां मन्त्रदर्शित्वात् ऋषित्वं प्राप्तानां नारदोऽस्मिं। सिद्धानां जन्मनैव धर्मज्ञानादिनिरतिशयं प्राप्तानाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.26।।सर्वेषां वृक्षाणां वनस्पतीनामन्येषां च। देवा एव सन्तो ये मन्त्रदर्शित्वेन ऋषित्वं प्राप्तास्ते देवर्षयस्तेषां मध्ये नारदोऽहमस्मि। गन्धर्वाणां गानधर्मिणां देवगायकानां मध्ये चित्ररथोऽहमस्मि। सिद्धानां जन्मनैव विनाप्रयत्नं धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यातिशयं प्राप्तानामधिगतपरमार्थानां मध्ये कपिलो मुनिरहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.25 -- 10.26।।एकमक्षरमोंकाराख्यम्। जपयज्ञो हिंसाशून्यत्वात्। स्थावराणां स्थितिमताम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.26।।सर्ववृक्षाणां मध्ये अश्वत्थः पिप्पलोऽस्मि। देवर्षीणां देवमन्त्रद्रष्टृ़णां मध्ये मदिङ्गितोपदेशकत्वान्नारदोऽस्मि। गन्धर्वाणां गायकानां मध्ये चित्ररथोऽस्मि। सिद्धानां अघिगतपरमार्थानां मध्ये स्वतोऽधीतपरमार्थरूपः कपिलो मुनिरस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.26।।अश्वत्थ इति। देवा एव सन्तो मन्त्रदर्शनेन य ऋषित्वं प्राप्तास्तेषां मध्ये नारदोऽस्मि। सिद्धानामुत्पत्तित एवाधिगतपरमार्थतत्त्वानां मध्ये कपिलाख्यो मुनिरस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.26।।अश्वत्थ इति। वैष्णवोऽयं ध्येयः पूज्यश्च। देवर्षीणां नारदोऽहं महाभागवतो मर्यादापुष्टिरसिकः। गन्धर्वाणां मध्ये चित्ररथो गायको वैष्णवत्वाच्चिन्तनीयः। कपिलस्तु भगवदवतारःसाङ्ख्यतत्त्ववक्तापुष्टिसर्गप्रणेता भगवद्विभूतिः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.26।।समस्त वृक्षोंमें पीपलका वृक्ष और देवर्षियोंमें अर्थात् जो देव होकर मन्त्रोंके द्रष्टा होनेके कारण ऋषिभावको प्राप्त हुए हैं? उनमें मैं नारद हूँ। गन्धर्वोंमें मैं चित्ररथ नामक गन्धर्व हूँ? सिद्धोंमें अर्थात् जन्मसे ही अतिशय धर्म? ज्ञान? वैराग्य और ऐश्वर्यको प्राप्त हुए पुरुषोंमें मैं कपिलमुनि हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.26।। व्याख्या -- अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम् -- पीपल एक सौम्य वृक्ष है। इसके नीचे हरेक पेड़ लग जाता है? और यह पहाड़? मकानकी दीवार? छत आदि कठोर जगहपर भी पैदा हो जाता है। पीपल वृक्षके पूजनकी बड़ी महिमा है। आयुर्वेदमें बहुतसे रोगोंका नाश करनेकी शक्ति पीपल वृक्षमें बतायी गयी है। इन सब दृष्टियोंसे भगवान्ने पीपलको अपनी विभूति बताया है।देवर्षीणां च नारदः -- देवर्षि भी कई हैं और नारद भी कई हैं पर देवर्षि नारद एक ही हैं। ये भगवान्के मनके अनुसार चलते हैं और भगवान्को जैसी लीला करनी होती है? ये पहलेसे ही वैसी भूमिका तैयार कर देते हैं। इसलिये नारदजीको भगवान्का मन कहा गया है। ये सदा वीणा लेकर भगवान्के गुण गाते हुए घूमते रहते हैं। वाल्मीकि और व्यासजीको उपदेश देकर उनको रामायण और भागवतजैसे ग्रन्थोंके लेखनकार्यमें प्रवृत्त करानेवाले भी नारदजी ही हैं। नारदजीकी बातपर मनुष्य? देवता? असुर? नाग आदि सभी विश्वास करते हैं। सभी इनकी बात मानते हैं और इनसे सलाह लेते हैं। महाभारत आदि ग्रन्थोंमें इनके अनेक गुणोंका वर्णन किया गया है। यहाँ भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।गन्धर्वाणां चित्ररथः -- स्वर्गके गायकोंको गन्धर्व कहते हैं और उन सभी गन्धर्वोंमें चित्ररथ मुख्य हैं। अर्जुनके साथ इनकी मित्रता रही और इनसे ही अर्जुनने गानविद्या सीखी थी। गानविद्यामें अत्यन्त निपुण और गन्धर्वोंमें मुख्य होनेसे भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।सिद्धानां कपिलो मुनिः -- सिद्ध दो तरहके होते हैं -- एक तो साधन करके सिद्ध बनते हैं और दूसरे जन्मजात सिद्ध होते हैं। कपिलजी जन्मजात सिद्ध हैं और इनको आदिसिद्ध कहा जाता है। ये कर्दमजीके यहाँ देवहूतिके गर्भसे प्रकट हुए थे। ये सांख्यके आचार्य और सम्पूर्ण सिद्धोंके गणाधीश हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।इन सब विभूतियोंमें जो विलक्षणता प्रतीत होती है? वह मूलतः? तत्त्वतः भगवान्की ही है। अतः साधककी,दृष्टि भगवान्में ही रहनी चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.26।।सर्ववृक्षाणामित्यत्र सर्वशब्देन वनस्पतयो गृह्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.26 -- 10.27।।सिद्धानां कपिलो मुनिः इति कपिलशब्दं व्याचष्टे -- सुखेति। सुखरूप इति कः? पाल्यते जगदनेनेति पिः?पा रक्षणे [धा.पा.2।46] इत्यतः किः? लीयते जगदनेनेति लः।ली श्लेषणे [धा.पा.9।29] इत्यस्माड्डःला आदाने [धा.पा.2।48] इत्यतो वाकः। ततः कर्मधारयः। कशब्दस्य सुखवाचित्वेऽभिधानं प्रयोगं च पठति -- प्रीतिरिति। समग्रार्थे श्रुतिमाह -- ऋषिमिति। तं भगवन्तमृषिं कपिलं च पश्येत्। कथमृषिः सर्वज्ञत्वात्? इत्युच्यते। यः प्रसूतं पूर्वकल्पेषु जातं जायमानं वर्तमानं चैवमागामि च जगज्ज्ञानैर्बिभर्ति जानातीति यावत्। कथं कपिलः इत्यत उक्तं -- सुखादिति। यच्छब्दद्वयस्य तमित्यनेनान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.26 -- 10.27।।सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगदनेनेति कपिलः।प्रीतिः सुखं कमानन्दः इत्यभिधानात् प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म [छां.उ.4।10।5] इति च। ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति (ज्ञा) जायमानं च पश्येत् [श्वे.उ.5।2] सुखादनन्तात्पालनाल्लीयनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति इति (सामवेदे) बाभ्रव्यशाखायाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.26।। --,अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्? देवर्षीणां च नारदः देवाः एव सन्तः ऋषित्वं प्राप्ताः मन्त्रदर्शित्वात्ते देवर्षयः? तेषां नारदः अस्मि। गन्धर्वाणां चित्ररथः नाम गन्धर्वः अस्मि। सिद्धानां जन्मनैव धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यातिशयं प्राप्तानां कपिलो मुनिः।।
───────────────────
【 Verse 10.27 】
▸ Sanskrit Sloka: उच्चै:श्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् | ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् ||
▸ Transliteration: uccaiḥśravas amaśvānāṁ viddhi mām amṛtodbhavam | airāvataṁ gajendrāṇāṁ narāṇāṁ ca narādhipam ||
▸ Glossary: uccaiḥśravasaṁ: Ucchaishravas; aśvānāṁ: of the horses; viddhi: know; māṁ: Me; amṛtodbhavam: Born of nectar produced from the churning of the ocean; airāvataṁ: Airavata; gajendrāṇāṁ: of the elephants; narāṇāṁ: of men; ca: and; narādhipam: king
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.27 Of the horses, know me to be Ucchaiṣravas born of the nectar generated from the churning of the ocean; Of the elephants, Airāvata and of men, the king.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.27।।घोड़ोंमें अमृतके साथ समुद्रसे प्रकट होनेवाले उच्चैःश्रवा नामक घोड़ेको? श्रेष्ठ हाथियोंमें ऐरावत नामक हाथीको और मनुष्योंमें राजाको मेरी विभूति मानो।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.27।। अश्वों में अमृत से उत्पन्न हुए उच्चैश्रवा नामक अश्व? हाथियों में ऐरावत और मनुष्यों में राजा मुझे ही जानो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.27 उच्चैःश्रवसम् Ucchaisravas? अश्वानम् among horses? विद्धि know? माम् Me? अमृतोद्भवम् born of nectar?,ऐरावतम् Airavata? गजेन्द्राणाम् among lordly elephants? नराणाम् among men? च and? नराधिपम् the king.Commentary Nectar was obtained by the gods by churning the ocean of milk. Ucchaisravas is the name of the royal horse which was born in that ocean of milk when it was churned for the nectar.Airavatam The offspring of Iravati? the elephant of Indra born at the time when the ocean of milk was churned.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.27. Of the horses, you should know Me to be the nectar-born Uccaihsravas (Indra's horse); of the best elephants, the Airavata (Indra's elephant); and of the men, their king.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.27 Know that among horses I am Pegasus, the heaven-born; among the lordly elephants I am the White one, and I am the Ruler among men.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.27 Of horses know Me to be Uccaihsravas the nectar-born. Of lordly elephants, I am Airavata, and of men, I am the monarch.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.27 Among horses, know Me to be Uccaihsravas, born of nectar; Airavata among the lordly elephants; and among men, the Kind of men. [Uccaihsravas and Airavata are respectively the divine horse and elephant of Indra.]
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.27 Know Me as Ucchaisravas born of nectar, among horses; among lordly elephants (I am) the Airavata; and, among men, the king.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.27 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.26 - 10.29 Of trees I am Asvattha which is worthy of worship. Of celestial seers I am Narada. Kamadhuk is the divine cow. I am Kandarpa, the cause of progeny. Sarpas are single-headed snakes while Nagas are many-headed snakes. Aatic creatures are known as Yadamsi. Of them I am Varuna. Of subdures, I am Yama, the son of the sun-god.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.27 Asvanam, among horses; viddhi, know; mam, Me; to be the horse named Uccaihsravas; amrta-udbhavam, born of nectar-born when (the sea was) churned (by the gods) for nectar. Airavata, the son of Iravati, gajendranam, among the Lordly elephants; 'know Me to be so' remains understood. And naranam, among men; know Me as the naradhipam, King of men.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.27।। सुर और असुरों के द्वारा क्षीरसागर का मन्थन करके अमृत प्राप्त करने की पौराणिक कथा सुप्रसिद्ध है। इस मन्थन की प्रकिया के समय पंखयुक्त शक्तिशाली और समर्थ ऐसा एक अश्व प्रकट हुआ था? जिसका नाम उच्चैश्रवा था? तथा ऐरावत नाम का एक श्वेत गज भी प्रकट हुआ था। इन दोनों को देवताओं के राजा इन्द्र को उपहार के रूप में भेंट किया गया था। पौराणिक वर्णन के अनुसार इस प्रकार की कुल तेरह आकर्षक वस्तुएं उस मन्थन में प्रकट हुई थीं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.27।।अमृतोद्भवममृतथनोद्भवम्। इदं ऐरावतेऽपि संबन्धनीयम्। नराधिपं राजानम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.27।।अश्वानां मध्ये उच्चैःश्रवसममृतमथनोद्भवमश्वं मां विद्धि। ऐरावतं गजममृतमथनोद्भवं गजेन्द्राणां मध्ये मां विद्धि। नराणां च मध्ये नराधिपं राजानं मां विद्धीत्यनुषज्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.27।।अमृतोद्भवममृतमथनावसरे उद्भवो यस्य तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.27।।अश्वानां अमृतमथने अमृतसङ्गोत्पन्नमुच्चैश्श्रवसं मदंशं विद्धि। गजेन्द्राणां ऐरावतं विद्धि। नराणां मध्ये पालकं नरं राजानं विद्धि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.27।।उच्चैःश्रवसमिति। अमृतार्थं क्षीराब्धिमथनादुद्भूतमुच्चैःश्रवसं नामाश्वं मद्विभूतिं विद्धि। अमृतोद्भवमित्येतदैरावतेऽपि संबध्यते। नराधिपं राजानं मां विद्धि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.27।।उच्चैश्श्रवसमिति। सप्तमुखाग्निरूपमश्वम्? अमृतेन समुद्भवो यस्य। भगवत्सेवायां क्रीडोपयोगितया विभूतिः स चिन्तनीयः। तथैरावतोऽपि तदभिषेचनेन वा। भागवतेऽपि [स्कं.11अ.16] विभूतिनिरूपणे तदिदमुक्तम्। तारतम्यभेदस्त्वैच्छिकः एकवक्तृकत्वात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.27।।घोड़ोंमें? जो अमृतप्राप्तिके निमित्त किये हुए समुद्रमन्थनसे उत्पन्न उच्चैःश्रवा नामक घोड़ा है? उसको तू मेरा स्वरूप समझ। गजेन्द्रोंमें -- मुख्य हाथियोंमें -- इरावतीका पुत्र जो ऐरावत नामक हाथी है? उसको तू मेरा स्वरूप जान और मनुष्योंमें मुझे तू राजा समझ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.27।। व्याख्या -- उच्चैःश्रवसमश्वानां विद्धि माममृतोद्भवम् -- समुद्रमन्थनके समय प्रकट होनेवाले चौदह रत्नोंमें उच्चैःश्रवा घोड़ा भी एक रत्न है। यह इन्द्रका वाहन और सम्पूर्ण घोड़ोंका राजा है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।ऐरावतं गजेन्द्राणाम् -- हाथियोंके समुदायमें जो श्रेष्ठ होता है? उसको गजेन्द्र कहते हैं। ऐसे गजेन्द्रोंमें भी ऐरावत हाथी श्रेष्ठ है। उच्चैःश्रवा घोड़ेकी तरह ऐरावत हाथीकी उत्पत्ति भी समुद्रसे हुई है और यह भी इन्द्रका वाहन है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।नराणां च नराधिपम् -- सम्पूर्ण प्रजाका पालन? संरक्षण? शासन करनेवाला होनेसे राजा सम्पूर्ण मनुष्योंमें श्रेष्ठ है। साधारण मनुष्योंकी अपेक्षा राजामें भगवान्की ज्यादा शक्ति होती है। इसलिये भगवान्ने राजाको अपनी विभूति बताया है (टिप्पणी प0 559)।इन विभूतियोंमें जो बलवत्ता? सामर्थ्य है? वह भगवान्से ही आयी है? अतः उसको भगवान्की ही मानकर भगवान्का चिन्तन करना चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.27।।सर्ववृक्षाणामित्यत्र सर्वशब्देन वनस्पतयो गृह्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.26 -- 10.27।।सिद्धानां कपिलो मुनिः इति कपिलशब्दं व्याचष्टे -- सुखेति। सुखरूप इति कः? पाल्यते जगदनेनेति पिः?पा रक्षणे [धा.पा.2।46] इत्यतः किः? लीयते जगदनेनेति लः।ली श्लेषणे [धा.पा.9।29] इत्यस्माड्डःला आदाने [धा.पा.2।48] इत्यतो वाकः। ततः कर्मधारयः। कशब्दस्य सुखवाचित्वेऽभिधानं प्रयोगं च पठति -- प्रीतिरिति। समग्रार्थे श्रुतिमाह -- ऋषिमिति। तं भगवन्तमृषिं कपिलं च पश्येत्। कथमृषिः सर्वज्ञत्वात्? इत्युच्यते। यः प्रसूतं पूर्वकल्पेषु जातं जायमानं वर्तमानं चैवमागामि च जगज्ज्ञानैर्बिभर्ति जानातीति यावत्। कथं कपिलः इत्यत उक्तं -- सुखादिति। यच्छब्दद्वयस्य तमित्यनेनान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.26 -- 10.27।।सुखरूपः पाल्यते लीयते च जगदनेनेति कपिलः।प्रीतिः सुखं कमानन्दः इत्यभिधानात् प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म [छां.उ.4।10।5] इति च। ऋषिं प्रसूतं कपिलं यस्तमग्रे ज्ञानैर्बिभर्ति (ज्ञा) जायमानं च पश्येत् [श्वे.उ.5।2] सुखादनन्तात्पालनाल्लीयनाच्च यं वै देवं कपिलमुदाहरन्ति इति,(सामवेदे) बाभ्रव्यशाखायाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.27।। --,उच्चैःश्रवसम् अश्वानां उच्चैःश्रवाः नाम अश्वराजः तं मां विद्धि विजानीहि अमृतोद्भवम् अमृतनिमित्तमथनोद्भवम्। ऐरावतम् इरावत्याः अपत्यं गजेन्द्राणां हस्तीश्वराणाम्? तम् मां विद्धि इति अनुवर्तते। नराणां च मनुष्याणां नराधिपं राजानं मां विद्धि जानीहि।।
───────────────────
【 Verse 10.28 】
▸ Sanskrit Sloka: आयुधानामहं वज्रं धेनूनामस्मि कामधुक् | प्रजनश्चास्मि कन्दर्प: सर्पाणामस्मि वासुकि: ||
▸ Transliteration: āyudhānāmahaṁ vajraṁ dhenūnāmasmi kāmadhuk | prajanaścāsmi kandarpaḥ sarpāṇāmasmi vāsukiḥ ||
▸ Glossary: āyudhānām: of the weapons; ahaṁ: I am; vajraṁ: thunderbolt; dhenūnām: of the cows; asmi: I am; kāmadhuk: Kamadhenu; prajanaḥ: for begetting children; cā: and; asmi: I am; kandarpaḥ: god of love; sarpāṇāṁ: of the snakes; asmi: I am; vāsukiḥ: Vasuki
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.28 Of the weapons, I am the thunderbolt. Of the cows, I am Kamadhenu; For begetting children, I am the god of love. Of the snakes, I am Vasuki.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.28।।आयुधोंमें वज्र और धेनुओंमें कामधेनु मैं हूँ। सन्तानउत्पत्तिका हेतु कामदेव मैं हूँ और सर्पोंमें वासुकि मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.28।। मैं शस्त्रों में वज्र और धेनुओं (गायों) में कामधेनु हूँ? प्रजा उत्पत्ति का हेतु कन्दर्प (कामदेव) मैं हूँ और सर्पों में वासुकि हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.28 आयुधानम् among weapons? अहम् I? वज्रम् the thunderbolt? धेनूनाम् among cows? अस्मि (I) am? कामधुक् kamadhenu? the heavenly cow which yiedls all desires? प्रजनः the progenitro? च and? अस्मि (I) am? कन्दर्पः Kandarpa (Kamadeva)? सर्पाणाम् among serpents? अस्मि (I) am? वासुकिः Vasuki.Commentary Vajram the thunderbolt weapon made of the bones of Dadhichi an implement of warfare which can only be handled by Indra who has fininshed a hundred sacrifices.Kamadhuk The cow Kamadhenu of the great sage Vasishtha which yielded all the desired objects? also born of the ocean of milk.Kandarpa Cupid.Vasuki The Lord of hoodless or ordinary serpents.Sarpa (serpent) has only one head. Vasuki is yellowcoloured. Nagas have many heads. Ananta is firecoloured.Sridhara says that the Sarpa is poisonous and the Naga is nonpoisonous. Sri Ramanuja says that Sarpa has only one head and Naga has many heads.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.28. Of the weapons, I am the Vajra [of Indra]; of the cows, I am the Wish-fullfilling Cow [of the heaven]; of the progenitors, I am Kandarpa (the god-of-love); of the serpents, I am Vasuki.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.28 I am the Thunderbolt among weapons; of cows I am the Cow of Plenty, I am Passion in those who procreate, and I am the Cobra among serpents.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.28 Of weapons, I am Vajra (thnderbolt). Of cows, I am Kamadhuk. I am Kandarpa, the cause of progeny. Of serpents, I am Vasuki.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.28 Among weapons I am the thunderbolt; among cows I am kamadhenu. I am Kandarpa, the Progenitor, and among serpents I am Vasuki.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.28 Among weapons I am the thunderbolt; among cows I am the wish-fulfilling cow called Kamadhenu; I am the progenitor, the god of love; among serpents I am Vasuki.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.28 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.26 - 10.29 Of trees I am Asvattha which is worthy of worship. Of celestial seers I am Narada. Kamadhuk is the divine cow. I am Kandarpa, the cause of progeny. Sarpas are single-headed snakes while Nagas are many-headed snakes. Aatic creatures are known as Yadamsi. Of them I am Varuna. Of subdures, I am Yama, the son of the sun-god.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.28 Ayudhanam, among weapons; I am the vajram, thunderbolt, made of the bones of (the sage) Dadhici. Dhenunam, among milch cows; I am kama-dhuk, Kamadhenu, which was the yielder of all desires of (the sage) Vasistha; or it means a cow in general which gives milk at all times. I am Kandarpa, prajanah, the Progenitor, (the god) Kama (Cupid). Sarpanam, among serpents, among the various serpents, I am Vasuki, the kind of serpents.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.28।। मैं शस्त्रों में वज्र हूँ दिव्यास्त्रों में प्रमुख वज्रास्त्र अमोघ है। वृत्रासुर प्राय स्वर्ग पर आक्रमण करके वहाँ की शान्ति भंग करता था। अपनी प्रचण्ड शक्ति के कारण वह अवध्य बन गया था। उस समय दधीचि नामक एक महान् तपस्वी ऋषि ने उसके नाश हेतु एक दिव्य शस्त्र बनाने के लिए अपनी अस्थियों का दान किया था? जिससे इस अस्त्र का निर्माण करके वृत्रासुर की बध किया गया।मैं धेनुओं में कामधेनु हूँ कामधेनु की प्राप्ति भी अमृतमन्थन से हुई थी। ऐसा विश्वास किया जाता है कि यह एक ऐसी अनूठी गाय है? जिसके द्वारा हम अपनी समस्त इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं।प्रजोत्पत्ति के कारणों में मैं कामदेव हूँ भारतीय धारणा के अनुसार काम का देवता कन्दर्प (कामदेव? मदन) है? जो एक कुटिल हृष्टपुष्ट युवक के रूप में चित्रित किया गया है। यह कामदेव अपनी मन्दस्मिति के धनुष के द्वारा पाँच सुपुष्पित बाणों से मनुष्य की एकएक इन्द्रिय को आहत करता है यह जीव विज्ञान से सम्बन्धित एक सत्य है। प्रजोत्पत्ति माने केवल गर्भाधान की क्रिया या वनस्पति जगत् में होने वाली सेचन क्रिया ही नहीं समझी जानी चाहिए। भारतीय कामशास्त्र के अनुसार इसका अर्थ उन समस्त कामुक प्रवृत्तियों की शान्ति से है? जो सभी इन्द्रियों के माध्यम से व्यक्त होती हैं। एक दार्शनिक सच्चा वैज्ञानिक होता है और इस कारण उसमें वह मिथ्या लज्जा या संकोच नहीं होता? जो प्राय स्वभाव से अनैतिक किन्तु दिखावे के लिए कट्टर नैतिकतावादी व तिलकधारी पाखण्डी लोगों का होता है। वेदान्त के आचार्य कामवासना के संबंध में विश्लेषण करते समय इस प्रकार निर्मम होते हैं? जैसे चिकित्साशास्त्र के महाविद्यालय में कोई प्राध्यापक।भगवान् घोषणा करते हैं कि प्रजोत्पत्ति के सब कारणों में कन्दर्प मैं हूँ। वैषयिक भोग के क्षेत्र में कामदेव मनुष्य के शारीरिक? मानसिक और बौद्धिक व्यक्तित्व के पूर्ण सन्तोष का प्रतीक है।मैं सर्पों में वासुकि हूँ पुराणों में किये गये वर्णन के अनुसार वासुकि भगवान् शिव की अंगुली पर लिपटा रहता है। यद्यपि यह सर्प शिवजी की अंगूठी का आकार लेने योग्य छोटा है? परन्तु क्षीरसागर के मन्थन के लिए वह रज्जु (रस्सी) का कार्य करने को प्रयुक्त होता है। स्वाभाविक ही? वासुकि शब्द से उपनिषद् के उस कथन का स्मरण हो आता है जिसमें कहा गया है कि आत्मतत्त्व अणु से भी सूक्ष्म है और बृहत्तम वस्तु से भी अधिक बृहत् है। अत सर्पों में वासुकि को भगवान् की विभूति बताना उपयुक्त ही है। सर्प और नाग में भेद है। सर्प एक फण वाला होता है? जबकि नाग के अनेक फण होते हैं।गीता के दिव्य गायक अपने सुन्दर राग में अपनी गानपूर्ण विभूतियों को और भी बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.28।।वज्रं दधीच्यस्थिसंभवम्। प्रजनश्च पुत्रप्रजननहेतुः कामः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.28।।आयुधानामस्त्राणां मध्ये वज्रं दधीचेरस्थिसंभवमस्त्रमहमस्मि। धेनूनां दोग्ध्रीणां मध्ये कामं दोग्धीति कामधुक् समुद्रमथनोद्भवा वसिष्ठस्य कामधेनुरहमस्मि। कामानां मध्ये प्रजनः प्रजनयिता पुत्रोत्पत्त्यर्थो यः कन्दर्पः कामः सोऽहमस्मि। चकारस्त्वर्थो रतिमात्रहेतुकामव्यावृत्त्यर्थः। सर्पाश्च नागाश्च जातिभेदाद्भिद्यन्ते तत्र सर्पाणां मध्ये तेषां राजा वासुकिरहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.28।।प्रजनोऽपत्यजनयिता कंदर्पः कामो न तु वृथामैथुनरूपः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.28।।आयुधानां शस्त्राणां मध्ये वज्रं अस्मि। धेनूनां दोग्ध्रीणां कामधुक् कामधेनुरस्मि। प्रजनः प्रजोत्पादकः कन्दर्पश्च कामोऽस्मि। चकारेण केवलसम्भोगहेतुर्निवारितः। सर्पाणां विषधराणां गतिमतां वा वासुकिरस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.28।। आयुधानामिति। आयुधानां मध्ये वज्रम्। कामान्दोग्धीति कामधुक्। प्रजनः प्रजोत्पत्तिहेतुः कंदर्पः कामोऽस्मि। न केवलं संभोगप्रधानः कामो मद्विभूतिः अशास्त्रीयत्वात्। सर्पाणां सविषाणां राजा वासुकिरस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.28।।आयुधानामिति। धेनूनां मध्ये कामधुगहम्। भगवत्सेवोपयोगितया सा पूज्या वन्द्या च। प्रजनानां मध्ये भगवदीयप्रजोत्पत्तिहेतुर्नियमागतः कामोऽहं? बलवत्वाद्वा मुख्यः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.28।।शस्त्रोंमें मैं दधीचि ऋषिकी अस्थियोंसे बना हुआ वज्र हूँ। दूध देनेवाली गौओंमें कामधेनु -- वसिष्ठको सब कामनारूप दूध देनेवाली अथवा सामान्य भावसे जो भी कामधेनु है वह मैं हूँ। प्रजाको उत्पन्न करनेवाला कामदेव मैं हूँ और सर्पोंमें अर्थात् सर्पोके नाना भेदोंमें सर्पराज वासुकि मैं हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.28।। व्याख्या -- आयुधानामहं वज्रम् -- जिनसे युद्ध किया जाता है? उनको आयुध (अस्त्रशस्त्र) कहते हैं। उन आयुधोंमें इन्द्रका वज्र मुख्य है। यह दधीचि ऋषिकी हड्डियोंसे बना हुआ है और इसमें दधीचि ऋषिकी तपस्याका तेज है। इसलिये भगवान्ने वज्रको अपनी विभूति कहा है।धेनूनामस्मि कामधुक् -- नयी ब्यायी हुई गायको धेनु कहते हैं। सभी धेनुओँमें कामधेनु मुख्य है? जो समुद्रमन्थनसे प्रकट हुई थी। यह
Chapter 10 (Part 12)
सम्पूर्ण देवताओं और मनुष्योंकी कामनापूर्ति करनेवाली है। इसलिये यह भगवान्की विभूति है।प्रजनश्चास्मि कन्दर्पः -- संसारमात्रकी उत्पत्ति कामसे ही होती है। धर्मके अनुकूल केवल सन्तानकी उत्पत्तिके लिये सुखबुद्धिका त्याग करके जिस कामका उपयोग किया जाता है? वह काम भगवान्की विभूति है। सातवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने कामको अपनी विभूति बताया है -- धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ अर्थात् सब प्राणियोंमें धर्मके अनुकूल काम मैं हूँ।सर्पाणामस्मि वासुकिः -- वासुकि सम्पूर्ण सर्पोंके अधिपति और भगवान्के भक्त हैं। समुद्रमन्थनके समय इन्हींकी मन्थनडोरी बनायी गयी थी। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।इन विभूतियोंमें जो विलक्षणता दिखायी देती है? वह प्रतिक्षण परिवर्तनशील संसारकी हो ही कैसी सकती है वह तो परमात्माकी ही है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.28।।प्रजनयतीति व्युत्पत्तिमाश्रित्याह -- प्रजनयितेति। सर्पा नागाश्च जातिभेदाद्भिद्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.28।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.28।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.28।। --,आयुधानाम् अहं वज्रं दधीच्यस्थिसंभवम्। धेनूनां दोग्ध्रीणाम् अस्मि कामधुक् वसिष्ठस्य सर्वकामानां दोग्ध्री? सामान्या वा कामधुक्। प्रजनः प्रजनयिता अस्मि कंदर्पः कामः सर्पाणां सर्पभेदानाम् अस्मि वासुकिः सर्पराजः।।
───────────────────
【 Verse 10.29 】
▸ Sanskrit Sloka: अनन्तश्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् | पितृणामर्यमा चास्मि यम: संयमतामहम् ||
▸ Transliteration: anantaścāsmi nāgānāṁ varuṇo yādasām aham | pitṛṇāmaryamā cāsmi yamaḥ saṁyamatāmaham ||
▸ Glossary: anantaḥ: Ananta; ca: and; asmi: I am; nāgānāṁ: of the serpents; varuṇaḥ: Varuṇa; yādasām: of the water deities; aham: I am; pitṛṇām: of the ancestors; aryamā: Aryama; ca: and; asmi: I am; yamaḥ: Yama; saṁyamatām: of the ones who ensure discipline; aham: I
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.29 Of the serpents, I am Ananta. Of the water deities, I am Varuṇa. Of the ancestors, I am Aryama and of the ones who ensure discipline, I am Yama.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.29।।नागोंमें अनन्त (शेषनाग) और जलजन्तुओंका अधिपति वरुण मैं हूँ। पितरोंमें अर्यमा और,शासन करनेवालोंमें यमराज मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.29।। मैं नागों में अनन्त (शेषनाग) हूँ और जल देवताओं में वरुण हूँ मैं पितरों में अर्यमा हँ और नियमन करने वालों में यम हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.29 अनन्तः Ananta? च and? अस्मि (I) am? नागानाम् among Nagas? वरुणः Varuna? यादसाम् among watergods? अहम् I? पितृ़णाम् among the Pitris or ancestors? अर्यमा Aryaman? च and? अस्मि (I) am? यमः Yama? संयमताम् among governors? अहम् I.Commentary Ananta is the king of hooded serpents or cobras. He is firecoloured.Varuna is the king of the watergods.Waterdeities The gods connected with waters.Aryaman is the king of the manes.I am Yama? the witness of the acts of all living beings? who keeps account of the good and bad actions of the people.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.29. Of the snakes, I am Ananta; of the water-beings (water-deities), I am varuna; of the manes, I am Aryaman; of the controllers, I am Yama (the Death-god).
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.29 I am the King-python among snakes, I am the Aqueous Principle among those that live in water, I am the Father of fathers, and among rulers I am Death.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.29 Of snakes, I am Ananta. Of aatic-beings I am Varuna. Of manes, I am Aryama. Of subduers, I am Yama.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.29 Among snakes I am Ananta, and Varuna among gods of the waters. Among the manes I am Aryama, and among the maintainers of law and order I am Yama (King of death).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.29 I am Ananta among the Nagas; I am Varuna among water-deities; Aryaman among the Manes I am; I am Yama among the governors.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.29 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.26 - 10.29 Of trees I am Asvattha which is worthy of worship. Of celestial seers I am Narada. Kamadhuk is the divine cow. I am Kandarpa, the cause of progeny. Sarpas are single-headed snakes while Nagas are many-headed snakes. Aatic creatures are known as Yadamsi. Of them I am Varuna. Of subdures, I am Yama, the son of the sun-god.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.29 Naganam, among snakes, of a particular species of snakes; asmi, I am Ananta, the King of snakes. And Varuna, the King yadasam, of the gods of the waters. Pitrnam, among the manes; I am the King of the manes, named Aryama. And samyamatam, among the maintainers of law and order I am Yama.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.29।। मैं नागों में शेषनाग (अनन्त) हूँ अनेक फणों वाले सर्प नाग कहलाते हैं। उन नागों में सहस्र फनों वाले शेषनाग को भगवान् विष्णु की शय्या कहा गया है जिस पर वे अपनी योगनिद्रा में विश्राम या शयन करते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि? अनेक फणों वाले नागों में? वे सर्वाधिक शक्तिशाली और दिव्य नाग हैं? क्योंकि वे एकमात्र अधिष्ठान है जिस पर सृष्टकर्ता ब्रह्मा और पालनकर्ता विष्णु विश्राम और कार्य करते हैं।मैं जल देवताओं में वरुण हूँ पंच महाभूतों में चौथे तत्त्व जल का अधिष्ठाता देवता वरुण है। वैदिक काल में दृश्य जगत् की प्राकृतिक शक्तियों को दैवी आकृति प्रदान कर उनकी पूजा और उपासना की जाती थी। यह तो काफी समय पश्चात् हमने देवताओं के मानवीकरण की पौराणिक परम्परा प्रारम्भ की और फिर हम धार्मिक मतभेदों की कीचड़ और सांप्रदायिक पूर्वाग्रहों में फँस गये। जेरुसलम के मसीहा? वृन्दावन के गोपबाल और मक्का के पैगम्बर के अज्ञानी भक्त आपस में लड़ने लगे। वरुण का शरीर अर्धमत्स्य और अर्धमनुष्य का वर्णन किया गया है जो प्राय अरनाल्ड के मरमन (मत्स्यपुरुष) के समान है वरुण समुद्र का शासक और जल का अधिष्ठाता देवता है।मैं पितरों में अर्यमा हूँ हिन्दू धर्म में? मृत्यु भी? जीवन का ही एक अनुभव है। इसमें सूक्ष्म शरीर सदैव के लिए अपने वर्तमान निवास स्थान रूपी स्थूल देह को त्याग कर चला जाता है। इस सूक्ष्म शरीर (या जीव) का अपना अलग अस्तित्व बना रहता है? जिसे पितर कहते हैं।ये पितर (अथवा प्रेतात्माएं) एक साथ किसी लोक विशेष में रहते हैं? जिसे पितृलोक कहा जाता है। इसके पूर्व हम बारह आदित्यों के संबंध में वैदिक सिद्धांत को देख चुके हैं? जो बारह महीनों के अधिष्ठाता हैं। उनमें से एक अर्यमा नामक आदित्य को इस पितृलोक का शासक कहा गया है।मैं नियामकों में यम हूँ यमराज मृत्यु के देवता हैं। भारत में? हम भयंकरता उदासी और दुखान्त को भी पूजते हैं? क्योंकि हम जानते हैं कि ईश्वर शुभ और अशुभ आनन्दप्रद और दुखप्रद सभी वस्तुओं का अधिष्ठान है। हम समझौते के किसी ऐसे सिद्धांत से सन्तुष्ट नहीं होते? जिसमें हम ईश्वर का उन वस्तुओं से कोई संबंध स्वीकार नहीं करते? जो हमें अप्रिय हों।हमें प्रिय प्रतीत हो या न हो? मृत्यु तत्त्व ही हमारे जीवन का नियन्त्रक और नियामक है। मृत्यु ही? प्रत्येक क्षण? रचनात्मक विकास के लिए प्रगतिशील क्षेत्र तैयार करती है। युवावस्था की अभिव्यक्ति के लिए बाल्यावस्था का अन्त होना आवश्यक है। महाविद्यालय में प्रवेश पाने के लिए उच्चतर माध्यमिक विद्यालय को त्यागना पड़ता है। प्रगति अपने आप में जीवन का मात्र आंशिक चित्र और जीवन की सम्पूर्ण गति का एकांगी दर्शन है। प्रत्येक विकास के पूर्व नाश अवश्य होता है। इस प्रकार? नाश का रचनात्मक प्रगति में योगदान मृत्यु की सृजनात्मक कला कहलाती है।किसी भौतिक वस्तु की वर्तमान अवस्था का नाश किये बिना नवीन वस्तु की निर्मिति नहीं की जा सकती। भौतिक जगत् के इस नियम को समझने से ही हम इस युक्तिसंगत निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। निरीक्षित नियम यह है कि कोई दो वस्तुएँ एक ही समय एक ही स्थान पर साथसाथ नहीं रह सकती हैं। जब एक चित्रकार पट पर फूल का चित्र बना रहा होता है? तब वह न केवल विभिन्न रंगों का प्रयोग ही करता है? वरन् उसकी रचनात्मक कला निरन्तर उस पट के सतह की पूर्वावस्था को नष्ट भी करती जाती है। इस प्रकार? जब जीवन को उसकी सम्पूर्णता में देखा जाता है? तब ज्ञात होता है कि मृत्यु के देवता का भी उतना ही महत्व है? जितना कि सृष्टि के देवता का।सृष्टि के साथसाथ उसी गति से यदि मृत्यु बुद्धिमत्तापूर्वक कार्य नहीं कर रही होती? तो जगत् में वस्तुओं की असीम और अनियन्त्रित बाढ़ आ गई होती। उस स्थिति में मात्र वस्तुओं की संख्या एवं परिमाण के कारण ही जीवन असंभव हो गया होता। यदि मृत्यु नहीं होती? तो हमारे पूर्व के असंख्य पीढ़ियों के प्रपितामह आदि अभी भी हमारे दो कमरों वाले घरों में रह रहे होते जब कुछ ही मात्रा में जनसंख्या में वृद्धि होने पर प्रकृति का सन्तुलन और जगत् की राजनीतिक शान्ति अस्तव्यस्त हो जाती है? यदि सृष्टिकर्ता के समान मृत्यु देवता भी कार्य नहीं कर रहे होते? तो जगत् की क्या स्थिति होती निश्चय ही? सभी नियामकों में यमराज प्रमुख्ा हैं और यह दिया हुआ उदाहरण अत्यन्त उपयुक्त एवं अनन्य है।भगवान् आगे कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.29।।अनन्तः शेषः। यादसां जलदेवतानाम्। संयमतां सम्यङ्नियमनं कर्वेताम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.29।।नागानां जातिभेदानां मध्ये तेषां राजाऽनन्तश्च शेषाख्योऽहमस्मि। यादसां जलचराणां मध्ये तेषां राजा वरुणोऽहमस्मि। पितृ़णां मध्येऽर्यमा नाम पितृराजश्चाहमस्मि। संयमतां संयमं धर्माधर्मफलदानेनानुग्रहं निग्रहं च कुर्वतां मध्ये यमोऽहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.29।।नागानां सर्पावान्तरभेदानाम्। यादसां जलचराणाम्। संयमतां नियमनकर्तृ़णाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.29।।नागानां अविषाणां स्थिराणां मध्ये अनन्तस्तेषामधीशः शेषोऽस्मि। यादसां जलचराणां पतिर्वरुणोऽस्मि। पितृ़णां मुख्यः अर्यमा चास्मि। चकारेण सर्वेषां पितृरूपत्वमपि ज्ञापितम्। संयमतां नियमं कुर्वतां मुख्यो यमोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.29।। अनन्त इति। नागानां निर्विषाणां राजा अनन्तः शेषोऽस्मि। यादसां जलचराणां राजा वरुणोऽस्मि। पितृ़णां राजा अर्यमास्मि। संयमतां नियमनं कुर्वतां मध्ये यमोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.29।।अनन्त इति। शेषोऽहम्। वरुणोऽधिकृतो लोकपालः। पितृ़णां मुख्योऽर्यमाऽहम्। श्राद्धान्नभोजी भगवत्स्वरूपतया श्राद्धे तदादिः पितृगणो यजनीयश्चिन्तनीयो भगवदीयेनेति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.29।।नागोंके नाना भेदोंमें मैं अनन्त हूँ अर्थात् नागराज शेष हूँ और जलसम्बन्धी देवोंमें उनका राजा वरुण मैं हूँ। मैं पितरोंमें अर्यमा नामक पितृराज हूँ और शासन करनेवालोंमें यमराज हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.29।। व्याख्या -- अनन्तश्चास्मि नागानाम् -- शेषनाग सम्पूर्ण नागोंके राजा हैं (टिप्पणी प0 560)। इनके एक हजार फण हैं। ये क्षीरसागरमें सदा भगवान्की शय्या बनकर भगवान्को सुख पहुँचाते रहते हैं। ये अनेक बार भगवान्के साथ अवतार लेकर उनकी लीलामें शामिल हुए हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।वरुणो यादसामहम् -- वरुण सम्पूर्ण जलजन्तुओंके तथा जलदेवताओंके अधिपति हैं और भगवान्के भक्त हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।पितृ़णामर्यमा चास्मि -- कव्यवाह? अनल? सोम आदि सात पितृगण हैं। इन सबमें अर्यमा नामवाले पितर मुख्य हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।यमः संयमतामहम् -- प्राणियोंपर शासन करनेवाले राजा आदि जितने भी अधिकारी हैं? उनमें यमराज मुख्य हैं। ये प्राणियोंको उनके पापपुण्योंका फल भुगताकर शुद्ध करते हैं। इनका शासन न्याय और धर्मपूर्वक होता है। ये भगवान्के भक्त और लोकपाल भी हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।इन विभूतियोंमें जो विलक्षणता दीखती है? वह इनकी व्यक्तिगत नहीं है। वह तो भगवान्से ही आयी है और भगवान्की ही है। अतः इनमें भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.29।।प्रजनयतीति व्युत्पत्तिमाश्रित्याह -- प्रजनयितेति। सर्पा नागाश्च जातिभेदाद्भिद्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.29।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.29।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.29।। --,अनन्तश्च अस्मि नागानां नागविशेषाणां नागराजश्च अस्मि। वरुणो यादसाम् अहम् अब्देवतानां राजा अहम्। पितृ़णाम् अर्यमा नाम पितृराजश्च अस्मि। यमः संयमतां संयमनं कुर्वताम् अहम्।।
───────────────────
【 Verse 10.30 】
▸ Sanskrit Sloka: प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम् | मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम् ||
▸ Transliteration: prahlādaścāsmi daityānāṁ kālaḥ kalayatāmaham | mṛgāṇāṁ ca mṛgendro’haṁ vainateyaśca pakṣiṇām ||
▸ Glossary: prahlādaḥ: Prahlada; ca: and; asmi: I am; daityānāṁ: of the Daityas; kālaḥ: time; kalayatām: of the subduers; aham: I; mṛgāṇāṁ: of the animals; ca: and; mṛgendraḥ: king of animals; ahaṁ: I; vainateyaḥ: Garuda; ca: and; pakṣiṇām: of the bird
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.30 Of the Daitya (demons), I am Prahlad and of the reckoners, I am time. Of the animals, I am the king of animals (lion) and of the birds, I am Garuda.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.30।।दैत्योंमें प्रह्लाद और गणना करनेवालोंमें काल मैं हूँ। पशुओंमें सिंह और पक्षियोंमें गरुड मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.30।। मैं दैत्यों में प्रह्लाद और गणना करने वालों में काल हूँ? मैं पशुओं में सिंह (मृगेन्द्र) और पक्षियों में गरुड़ हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.30 प्रह्लादः Prahlada? च and? अस्मि (I) am? दैत्यानाम् among demons? कालः time? कलयताम् among reckoners? अहम् I? मृगाणाम् among beasts? च and? मृगेन्द्रः lion? अहम् I? वैनतेयः son of Vinata (Garuda)? च and? पक्षिणाम् among birds.Commentary Prahlada? though he was the son of a demon (Hiranyakasipu)? was a great devotee of the Lord.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.30. No such translation is available for this sloka.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.30 And I am the devotee Prahlad among the heathen; of Time I am the Eternal Present; I am the Lion among beasts and the Eagle among birds.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.30 Of Daityas, I am Prahlada. Of reckoners, I am Death. Of beasts, I am the lion, and of birds I am Garuda the son of Vinata.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.30 Among demons I am Prahlada, and I am Time among reckoners of time. And among animals I am the loin, and among birds I am Garuda.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.30 And, I am Prahlada among the demons, among the reckoners I am time; among beasts I am the lion, and Vainateya (Garuda) among birds.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.30 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.30 Of those who reckon with the desire to cause evil, I am the god of death - (here an emissary of his who records the time of death of creatures is meant).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.30 Daityanam, among demons, the descendants of Diti, I am the one called Prahlada. And I am kalah, Time; kalayatam, among reckoners of time, of those who calculate. And mrganam, among animals; I am mrgendrah, the loin, or the tiger. And paksinam, among birds; (I am) vainateyah, Garuda, the son of Vinata.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.30।। मैं दैत्यों में प्रह्लाद हूँ हिन्दुओं में बालक भक्त प्रह्लाद की कथा अत्यन्त प्रसिद्ध है। प्रह्लाद हिरण्यकश्यिपु नामक दैत्य राजा का पुत्र था? जिसे भगवान् हरि में अटूट श्रद्धा और दृढ़ भक्ति थी। इसके लिए उसे ईश्वरद्वेषी हिरण्यकश्यिपु ने अनेक प्रकार की यातनाएं दीं? जिन सबको प्रह्लाद ने सहन किया? परन्तु भक्ति को नहीं त्यागा।मैं गणना करने वालों में काल हूँ भारत के दार्शनिकों में नैय्यायिकों का अपना विशेष स्थान है। वे सृष्टि की विविधता को सत्य स्वीकार करते हुए ईश्वर के अस्तित्व का निषेध करते हैं। केवल बौद्धिक तर्कों के द्वारा वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि काल ही नित्य तत्त्व है। व्यष्टि मन और बुद्धि ही काल के विभाजक हैं? जो उसमें भूत? वर्तमान और भविष्य की कल्पनायें करते हैं। उनके मत के अनुसार मन का यह खेल ही काल का विभाजन इस प्रकार करता है कि मानो काल कोई खण्डित और परिच्छिन्न तत्त्व हो। सम्भवत? इसी सिद्धांत को ध्यान में रखकर? महर्षि व्यास ने बहुविध सृष्टि के अनन्त अधिष्ठान को दर्शाते के लिए इस उदाहरण को यहाँ दिया है।कुछ व्याख्याकार हैं? जो प्राय इसे एक सरल कथन के रूप में स्वीकार करते हैं उनके अनुसार? अनादि अनन्त काल ही इस जगत् की वस्तुओं की अन्तिम गति है।सिंह अपनी महानता? प्रतिष्ठा एवं पौरुषता के कारण मृगराज कहलाता है। गरुड़ को पक्षियों का राजपद मिलने का कारण है? उसकी सूक्ष्मदर्शिता एवं सर्वाधिक ऊँचाई तक उड़ान भरने की क्षमता। गरुड़ को भगवान् विष्णु का वाहन कहा गया है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.30।।पवतां पावजितृ़णाम्। रामः श्रीरामचन्द्रः। झषाणां मत्स्यादीनां मकरो नाम जातिविशेषः। स्त्रोतसां स्त्रवन्तीनां नदीनां जाह्नवी गङ्गा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.30।।दैत्यानां दितिवंश्यानां मध्ये प्रकर्षेण ह्लादयत्यानन्दयति परमसात्त्विकत्वेन सर्वानिति प्रह्लादश्चास्मि। कलयतां संख्यानं गणनं कुर्वतां मध्ये कालोऽहम्। भृगेन्द्रः सिंहः मृगाणां पशूनां मध्येऽहम्। वैनतेयश्च पक्षिणां विनतापुत्रो गरुडः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.30।।कलयतां गणनं कुर्वताम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.30।।दैत्यानां च असम्भावितत्वात् मध्ये दैत्यकुलोद्धारकः प्रह्लादोऽस्मि। कलयतां व्याकुर्वतां,कालोऽहमस्मि। मृगाणां मृगेन्द्रः सिंहः। पक्षिणां पक्षवतां मध्ये वैनतेयस्तेषां राजा गरुडोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.30।।प्रह्लाद इति। कलयतां वशीकुर्वतां गणयतां वा मध्ये कालोऽहम्। मृगेन्द्रः सिंहः। पक्षिणां मध्ये गरुडोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.30।।प्रह्लादश्चास्मीति महाभागवततया चिन्तनीयः। अनिमिषतया भूतानामायुगेणयतां संवत्सरादीनां मध्ये कालोऽहं भगवदुपयोगित्वाच्चिन्तनीयः। मृगाणामिति। मृगेन्द्रो नृसिंहो वराहश्चाहं मृगेन्द्रगरुडयोर्वाहनप्रतिकृतिरूपतया वा भगवत्सेवासने क्रीडोपयोगित्वेन चिन्तनंअनुकृत्य रूतैर्जन्तूंश्चेरतुः प्राकृतौ यथा [भाग.10।11।40] इत्युक्तेः भगवदनुकरणविषयत्वेन वा।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.30।।दैत्योंमें अर्थात् दितिके वंशजोंमें मैं प्रह्लाद नामक दैत्य हूँ और कलना -- गणना करनेवालोंमें मैं काल हूँ। पशुओंमें पशुओंका राजा सिंह या व्याघ्र और पक्षियोंमें विनतापुत्र -- गरुड़ मैं हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.30।। व्याख्या -- प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानाम् -- जो दितिसे उत्पन्न हुए हैं? उनको दैत्य कहते हैं। उन दैत्योंमें प्रह्लादजी मुख्य हैं और श्रेष्ठ हैं। ये भगवान्के परम विश्वासी और निष्काम प्रेमी भक्त हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।प्रह्लादजी तो बहुत पहले हो चुके थे? पर भगवान्ने दैत्योंमें प्रह्लाद मैं हूँ ऐसा वर्तमानका प्रयोग किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि भगवान्के भक्त नित्य रहते हैं और श्रद्धाभक्तिके अनुसार दर्शन भी दे सकते हैं। उनके भगवान्में लीन हो जानेके बाद अगर कोई उनको याद करता है और उनके दर्शन चाहता है? तो उनका रूप धारण करके भगवान् दर्शन देते हैं।कालः कलयतामहम् -- ज्योतिषशास्त्रमें काल(समय) से ही आयुकी गणना होती है। इसलिये क्षण? घड़ी? दिन? पक्ष? मास? वर्ष आदि गणना करनेसे साधनोंमें काल भगवान्की विभूति है।मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहम् -- बाघ? हाथी? चीता? रीछ आदि जितने भी पशु हैं? उन सबमें सिंह बलवान्? तेजस्वी? प्रभावशाली? शूरवीर और साहसी है। यह सब पशुओंका राजा है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।वैनतेयश्च पक्षिणाम् -- विनताके पुत्र गरुड़जी सम्पूर्ण पक्षियोंके राजा हैं और भगवान्के भक्त हैं। ये भगवान् विष्णुके वाहन हैं और जब ये उड़ते हैं? तब इनके पंखोंसे स्वतः सामवेदकी ऋचाएँ ध्वनित होती हैं। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।इन सब विभूतियोंमें अलगअलग रूपसे जो मुख्यता बतायी गयी है? वह तत्त्वतः भगवान्की ही है। इसलिये इनकी ओर दृष्टि जाते ही स्वतः भगवान्का चिन्तन होना चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.30।।प्रजनयतीति व्युत्पत्तिमाश्रित्याह -- प्रजनयितेति। सर्पा नागाश्च जातिभेदाद्भिद्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.30।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.30।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.30।। --,प्रह्लादो नाम च अस्मि दैत्याना दितिवंश्यानाम्। कालः कलयतां कलनं गणनं कुर्वताम् अहम्। मृगाणां च मृगेन्द्रः सिंहो व्याघ्रो वा अहम्। वैनतेयश्च गरुत्मान् विनतासुतः पक्षिणां पतत्रिणाम्।।
───────────────────
【 Verse 10.31 】
▸ Sanskrit Sloka: पवन: पवतामस्मि राम: शस्त्रभृतामहम् | झषाणां मकरश्चास्मि स्रोतसामस्मि जाह्नवी ||
▸ Transliteration: pavanaḥ pavatāmasmi rāmaḥ śastrabhṛtāmaham | jhaṣāṇāṁ makaraścāsmi srotasāmasmi jānhavī ||
▸ Glossary: pavanaḥ: wind; pavatāṁ: that which purifies; asmi: I am; rāmaḥ: Rama; śastrabhṛitām: wielders of weapons; ahaṁ: I; jhaṣāṇāṁ: of the water beings; makaraḥ : fish; cā: and; asmi: I am; srotasām: of the flowing rivers; asmi: I am; jānhavī: Jahnavi (Ganga)
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.31 Of the purifiers, I am the wind. Of the wielders of weapons, I am Rāma. Of the water beings, I am the shark and of the flowing rivers, I am Jahnavi (Gaṅgā).
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.31।।पवित्र करनेवालोंमें वायु और शास्त्रधारियोंमें राम मैं हूँ। जलजन्तुओंमें मगर मैं हूँ। बहनेवाले स्रोतोंमें गङ्गाजी मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.31।। मैं पवित्र करने वालों में वायु हूँ और शस्त्रधारियों में राम हूँ तथा मत्स्यों (जलचरों) में मैं मगरमच्छ और नदियों में मैं गंगा हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.31 पवनः the wind? पवताम् among purifiers or the speeders? अस्मि (I) am? रामः Rama? शस्त्रभृताम् among wielders of weapons (warriors)? अहम् I? झषाणाम् among fishes? मकरः Makara (shark)? च and? अस्मि (I) am? स्रोतसाम् among streams? अस्मि (I) am? जाह्नवी the Ganga.Commentary The holy river Ganga (spelt Ganges in English) was swallowed by Jahnu when she was being brought down by Bhagiratha from heaven. Hence the name Jahnavi for Ganga.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.31. Of the progenies of Diti (the demons), I am Prahlada; of the measuring ones, I am the shark; of rivers, I am the daughter of Jahnu (the Ganga).
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.31 I am the Wind among purifiers, the King Rama among warriors; I am the Crocodile among the fishes, and I am the Ganges among rivers.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.31 Of moving things, I am the wind. Of those who bear weapons, I am Rama. Of fishers, I am Makara, and of rivers, I am Ganga.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.31 Of the purifiers I am air; among the wielders of weapons I am Rama. Among fishes, too, I am the shark; I am Ganga among rivers.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.31 Among the purifiers (or the speeders) I am the wind; Rama among the warriors am I; among the fishes I am the shark; among the streams I am the Ganga.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.31 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.31 Of moving things, namely, of things whose nature is to move, I am the wind. Of those who bear weapons, I am Rama. Here the ality of bearing weapons is the Vibhuti, as no other sense is possible. Aditya etc., being individual selves, constitute attributes of the Lord, who is their Self as they constitute His body. Therefore they stand in the same position of the attribute as that of bearing weapons.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.31 Pavatam, of the purifiers; I am pavanah, air. Sastra-bhrtam, among weilders of weapons, I am Rama, son of Dasaratha. Jhasanam, among fishes etc; I am the particular species of fish called makarah shark. I am jahnavi, Ganga; srotasam, among rivers, among streams of water.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.31।। मैं पवित्र कर्त्ताओं में वायु हूँ किसी स्थान की स्वच्छता के लिए सूर्य और वायु के समान प्रभावशाली अन्य कोई स्वास्थयकर और अपूतिक (घाव को सड़ने से रोकने वाली औषधि) साधऩ उपलब्ध नहीं है। यदि यहाँ केवल वायु का ही उल्लेख किया गया है? तो उसका कारण यह है कि महर्षि व्यास जानते थे कि सूर्य की उष्णता में ही वायु की गति हो सकती है। जहाँ सदा वायु बहती है? वहाँ सूर्य का होना भी सिद्ध होता है। किसी गुफा में न सूर्य का प्रकाश होता है और न वायु का स्पन्दन।मैं शस्त्रधारियों में राम हूँ भारत के आदि कवि महर्षि बाल्मीकि ने एक सम्पूर्ण काव्य की छन्दबद्ध रचना के लिए रामायण के नायक मर्यादापुरुषोत्तम भगवान् श्री रामचन्द्र का चित्रण किया है। यह चित्रण अत्यन्त विस्तृत एवं विशुद्ध है? जिसमें श्री राम को जीवन के समस्त क्षेत्रों में एक पूर्ण पुरुष के रूप में चित्रित किया गया है। श्रीराम एक पूर्ण एवं आदर्श पुत्र? पति? भ्राता? मित्र? योद्धा? गुरु? शासक और पिता थे। सामान्य जनता के दोषों तथा अत्यन्त उत्तेजना और भ्रम उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों की पृष्ठभूमि में श्रीराम की सार्वपाक्षिक पूर्णता और भी अधिक चमक उठती है। ऐसे सर्वश्रेष्ठ आदर्श पुरुष के हाथ में ही वह योग्यता है? जो उस धनुष को धारण करे? जिसमें से सदैव अमोघ बाणों की ही वर्षा होती है।मैं मत्स्यों में मकर तथा नदियों में जाह्नवी हूँ जह्नु ऋषि की पुत्री जाह्नवी कहलाती है? जो गंगानदी का एक नाम हैं। आख्यायिका यह है कि एक बार जह्नु ऋषि ने सम्पूर्ण गंगा नदी का पान कर उसे सुखा दिया? और तत्पश्चात्? लोककल्याण के लिए उसे अपने कानों के द्वार से बाहर बहा दिया हम पहले भी देख चुके हैं कि गंगा नदी का यह रूप सांकेतिक है। हिन्दू लोग गंगा को अध्यात्म ज्ञान अथवा भारत की आध्यात्मिक संस्कृति का प्रतीक मानते हैं। अपने गुरु से प्राप्त ऋषियों की ज्ञान सम्पदा को? साधक शिष्य ध्यानाभ्यास के द्वारा आत्मसात् कर लेता है यही नदी का आचमन है। ज्ञान के झरने से पान कर ज्ञानपिपासा को शान्त करना आदि वाक्यों का प्रयोग प्राय सभी भाषाओं में होता है? जिनका मूल संस्कृत भाषा है।आख्यायिका में कहा गया है कि इस नदी का उद्गम ऋषि के कानों से हुआ। वास्तव में? यह अत्यन्त सुन्दर काव्यात्मक कल्पना है? जो कान का संबंध श्रुति से स्थापित करती है। उपनिषद् ही श्रुति हैं? जिसमें गुरु शिष्य के संवाद द्वारा आत्मज्ञान का बोध कराया गया है। भारत में? समयसमय पर आचार्यों का अवतरण होता है? जो अपने युग के सन्दर्भ से प्राचीन ज्ञान की पुर्नव्यवस्था करते हैं परन्तु यह प्रचार कार्य वे तभी प्रारम्भ करते हैं? जब उन्होंने स्वयं वैदिक सत्य का साक्षात् अनुभव कर लिया हो। इस स्वानुभूति के बिना कोई भी श्रेष्ठ आचार्य जगत् में आकर इस प्राचीन सत्य का नवीन भाषा में प्रचार करने का साहस नहीं करेगा।गंगा के अनेक पर्यायवाची नामों में से जाह्नवी का यहाँ उल्लेख उपर्युक्त विशेष अभिप्राय को दर्शाने के लिए ही किया गया है।समुद्री मत्स्यों में मकर सर्वाधिक भयंकर होने के कारण यहाँ भगवान् ने उसे अपनी विभूति कहा है।आगे कहते है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.31।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.31।।पवतां पावयितृ़णां वेगवतां वा मध्ये पवनो वायुरहमस्मि। शस्त्रभृतां शस्त्रधारिणां युद्धकुशलानां मध्ये रामो दाशरथिरखिलराक्षसकुलक्षयकरः परमवीरोऽहमस्मि। साक्षात्स्वरूपस्याप्यनेन रूपेण चिन्तनार्थं वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मीतिवदत्र पाठ इति प्रागुक्तम्। झषाणां मत्स्यानां मकरो नाम तज्जातिविशेषः। स्रोतसां वेगेन चलज्जलानां नदीनां मध्ये सर्वनदीश्रेष्ठा जाह्नवी गङ्गाहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.31।।पवतां पावयितृ़णां वेगवतां वा। रामो दाशरथिः। रामादीनां परमेश्वराणामपि विभूतिमध्ये गणनं ध्यानार्थम्। झषाणां मत्स्यादीनां मकरो जातिभेदः। स्रोतसां नदीनाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.31।।पवतां वेगवतां मध्ये पवनः वायुरस्मि। शस्त्रभृतां रामः दशरथात्मजोऽस्मि। झषाणां मध्ये मकरः मत्स्यजातिविशेषोऽस्मि। स्रोतसां प्रवहज्जलानां मध्ये जाह्नवी गङ्गाऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.31।। पवन इति। पवतां पावयितृ़णां वेगवतां वा मध्ये वायुरस्मि। शस्त्रभृतां वीराणां रामो दाशरथिः। यद्वा परशुरामः। झषाणां मत्स्यानां मकरो मत्स्यविशेषस्तिमिंगिलः। स्रोतसां प्रवाहोदकानां मध्ये भागीरथी।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.31।।पवन इति। त्रिविधगुणवान् भगवदुपयोगितया चिन्तनीयः। शस्त्रभृतां मध्ये रामो नाम्ना जामदग्न्योऽहंरामः शस्त्रभृतां वरः इति सर्वैः स्तुतत्वात्। दाशरथिस्तु न भगवतोंऽशः किन्तु पूर्णपुरुषोत्तम एवांशीति ब्रह्मशुकाचार्यचरणानामाशयः? अतो न विभूतित्वं तस्य युज्यते इति वयं ब्रूमः। झषाणां मध्ये मकरोऽहं बलवत्त्वान्मत्स्यरूपो वा कुण्डलगतत्वनिरूपणाद्वा चिन्तनीयः। गङ्गा भगवत्पदीति चिन्त्या।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.31।।पवित्र करनेवालोंमें वायु और शस्त्रधारियोंमें दशरथपुत्र राम मैं हूँ? मछली आदि जलचर प्राणियोंमें मकर नामक जलचरोंकी जातिविशेष मैं हूँ? स्रोतोंमें -- नदियोंमें मैं जाह्नवी -- गङ्गा हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.31।। व्याख्या -- पवनः पवतामस्मि -- वायुसे ही सब चीजें पवित्र होती हैं। वायुसे ही नीरोगता आती है। अतः भगवान्ने पवित्र करनेवालोंमें वायुको अपनी विभूति बताया है।रामः शस्त्रभृतामहम् -- ऐसे तो राम अवतार हैं? साक्षात् भगवान् हैं? पर जहाँ शस्त्रधारियोंकी गणना होती है? उन सबमें राम श्रेष्ठ हैं। इसलिये भगवान्ने रामको अपनी विभूति बताया है।झषाणां मकरश्चास्मि -- जलजन्तुओंमें मगर सबसे बलवान् है। इसलिये जलचरोंमें मगरको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।स्रोतसामस्मि जाह्नवी -- प्रवाहरूपसे बहनेवाले जितने भी नद? नदी? नाले? झरने हैं? उन सबमें गङ्गाजी श्रेष्ठ हैं। ये भगवान्की खास चरणोदक हैं। गङ्गाजी अपने दर्शन? स्पर्श आदिसे दुनियाका उद्धार करनेवाली हैं। मरे हुए मनुष्योंकी अस्थियाँ गङ्गाजीमें डालनेसे उनकी सद्गति हो जाती है। इसलिये भगवान्ने इनको अपनी विभूति बताया है।वास्तवमें इन विभूतियोंकी मुख्यता न मानकर भगवान्की ही मुख्यता माननी चाहिये। कारण कि इन सबमें जो विशेषता -- महत्ता देखनेमें आती है? वह भगवान्से ही आयी है।सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनके दो प्रश्न थे -- पहला? भगवान्को जाननेका (मैं आपको कैसे जानूँ) और दूसरा? जाननेके उपायका (किनकिन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ)। इन दोनोंमेंसे उपाय तो है -- विभूतियोंमें भगवान्का चिन्तन करना और उस चिन्तनका फल (परिणाम) होगा -- सब विभूतियोंके मूलमें भगवान्को तत्त्वसे जानना। जैसे? शस्त्रधारियोंमें श्रीरामको और वृष्णियोंमें वासुदेव(अपने) को भगवान्ने अपनी विभूति बताया। यह तो उस समुदायमें विभूतिरूपसे श्रीरामका और वासुदेवका चिन्तन करनेके लिये बताया और उनके चिन्तनका फल होगा -- श्रीरामको और वासुदेवको तत्त्वसे भगवान् जान जाना। यह चिन्तन करना और भगवान्को तत्त्वसे जानना सभी विभूतियोंके विषयमें समझना चाहिये।संसारमें जहाँकहीं भी जो कुछ विशेषता? विलक्षणता? सुन्दरता दीखती है? उसको वस्तुव्यक्तिकी माननेसे फँसावट होती है अर्थात् मनुष्य उस विशेषता आदिको संसारकी मानकर उसमें फँस जाता है। इसलिये भगवान्ने यहाँ मनुष्यमात्रके लिये यह बताया है कि तुमलोग उस विशेषता सुन्दरता आदिको वस्तुव्यक्तिकी मत मानो? प्रत्युत मेरी और मेरेसे ही आयी हुई मानो। ऐसा मानकर मेरा चिन्तन करोगे तो तुम्हारा संसारका चिन्तन तो छूट जायगा और उस जगह मैं आ जाऊँगा। इसका परिणाम यह होगा कि तुमलोग मेरेको तत्त्वसे जान जाओगे। मेरेको तत्त्वसे जाननेपर मेरेमें तुम्हारी दृढ़ भक्ति हो जायगी (गीता 10। 7),
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.31।।अहमादिश्चेत्यादावुक्तमेव पुनरिहोच्यते। तथाच न पुनरुक्तिरित्याशङ्क्याह -- भूतानामिति। सर्गशब्देन सृज्यन्त इति सर्वाणि कार्याणि गृह्यन्ते -- अध्यात्मविद्येति। आत्मन्यन्तःकरणपरिणतिरविद्यानिवर्तिका गृहीता। प्रवदतां संबन्धी वादो वीतरागकथा तत्त्वनिर्णयावसाना। यदा प्रवदतामिति लक्षणया कथाभेदोपादानं तदा निर्धारणे षष्ठीत्याह -- प्रवक्त्रिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.31।।रामः शस्त्रभृतामहं इति रामशब्दं व्याख्याति -- आनन्देति। आनन्दरूपत्वात्पूर्णत्वादित्येकोऽर्थः। रमत इति रः।रमु क्रीडायां [धा.पा.1।878] इत्यतो अमन्ताड्ड इति डः। न विद्यते मा प्रमा परिच्छेदोऽस्येत्यमः लोक इत्यपरोऽर्थः। रमतेर्घञ्। अत्र श्रुतिमाह -- आनन्देति। आद्येऽर्थे विग्रहं दर्शयति -- रश्चेति। रश्चासावमश्चेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.31।।आनन्दरूपत्वात्पूर्णत्वाल्लोकरमणत्वाच्च रामः। आनन्दरूपो निष्परिमाण एष लोकश्चैतस्माद्रमते तेन रामः इति शाण्डिल्यशाखायाम्। रश्च अमश्चेति व्युत्पत्तिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.31।। --,पवनः वायुः पवतां पावयितृ़णाम् अस्मि। रामः शस्त्रभृताम् अहं शस्त्राणां धारयितृ़णां दाशरथिः रामः अहम्। झषाणां मत्स्यादीनां मकरः नाम जातिविशेषः अहम्। स्रोतसां स्रवन्तीनाम् अस्मि जाह्नवी गङ्गा।।
───────────────────
【 Verse 10.32 】
▸ Sanskrit Sloka: सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन | अध्यात्मविद्या विद्यानां वाद: प्रवदतामहम् ||
▸ Transliteration: sargāṇāmādirantaśca madhyaṁ caivāhamarjuna | adhyātmavidyā vidyānāṁ vādaḥ pravadatāmaham ||
▸ Glossary: sargāṇāṁ: of all creations; ādiḥ: beginning; antaḥ: end; ca: and; madhyaṁ: middle; ca: and; eva: surely; aham: I; arjuna: Arjuna; adhyātmavidyā: spir- itual knowledge; vidyānāṁ: of all knowledge; vādaḥ: logic; pravadatām: of arguments; aham: I
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.32 Of all creations, I am surely the beginning and end and the middle, O Arjuna. Of all knowledge, I am the spiritual knowledge of the Self. Of all arguments, I am the logic.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.32।।हे अर्जुन सम्पूर्ण सर्गोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। विद्याओंमें अध्यात्मविद्या और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका (तत्त्वनिर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.32।। हे अर्जुन सृष्टियों का आदि? अन्त और मध्य भी मैं ही हूँ? मैं विद्याओं में अध्यात्मविद्या और विवाद करने वालों में (अर्थात् विवाद के प्रकारों में) मैं वाद हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.32 सर्गाणाम् among creations? आदिः the beginning? अन्तः the end? च and? मध्यम् the middle? च and? एव also? अहम् I? अर्जुन O Arjuna? अध्यात्मविद्या the science of the Self? विद्यानाम् among sciences? वादः logic? प्रवदताम् among controversialists? अहम् I.Commentary I am the metaphysics among all sciences. I am knowledge of the Self among all branches of knowledge. I am the argument of dators. I am the logic of disputants. I am the speech of orators.In verse 20 above the Lord says? I am the beginning? the middle and the end of the whole movable and immovable creation. Here the whole creation in general is referred to.As the knowledge of the Self leads to the attainment of the final beatitude of life or salvation? it is the chief among all branches of knowledge.Pravadatam By the word controversialists? we should here understand the various kinds of people using various kinds of argumentation in logic such as Vada? Jalpa and Vitanda. Yada is a way of arguing by which one gets at the truth of a certain estion. The aspirants who are free from RagaDvesha and jealousy raise amongst themselves estions and answers and enter into discussions on philosophical problems in order to ascertain and understand the nature of the Truth. They do not argue in order to gain victory over one another. This is Vada. Jalpa is wrangling in which one asserts his own opinion and refutes that of his opponent. Vitanda is idle carping at the arguments of ones opponents. No attempt is made to establish the other side of the estion. In Jalpa and Vitanda one tries to defeat another. There is desire for victory.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.32. Of the creations, I am the beginning, the end and also the middle, O Arjuna ! Of the sciences, [I am] the science of the Self; of arguers, I am the argument.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.32 I am the Beginning, the Middle and the End in creation; among sciences, I am the science of Spirituality; I am the Discussion among disputants.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.32 Of creatures, I am the beginning and the end, and also the middle, O Arjuna. Of sciences I am the science of self (of the individual and Universal Self). Of those who argue, I am the fair reasoning.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.32 O Arjuna, of creations I am the beginning and the end as also the middle, I am the knowledge of the Self among knowledge; of those who date I am vada.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.32 Among creations I am the beginning, the middle and also the end, O Arjuna; among the sciences I am the science of the Self; and I am the logic among controversialists.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.32 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.32 Those that undergo creation are 'creatures'. Their beginning is the cause. The meaning is that, of the creatures which are being created at all times, I am Myself the creator. Similarly, I am the end, namely the destroyer of everyone of those who are being destroyed at all times. Similarly I am the middle, namely, the sustentation. The meaning is, I am the sustainer of those who are being sustained at all times. Of those who indulge in Jalpa (argument) and Vitanda (perverse criticism) etc., I am the fair reasoning which determines the truth.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.32
Chapter 10 (Part 13)
O Arjuna sarganam, of creations; I am the adih, beginning; ca, and ; he antah, end; ca eva, as also; the madhyam, middle-I am the origin, continuance and dissolution. At the commencement (verse 20) origin, end, etc. only of things possessed of souls were spoken of, but here the mention is of all creations in general. This is the difference. Vidyanam, among knowledges; I am the adhyatma-vidya, knowledge of the Self, it being the foremost because of its leading to liberation. Pravadatam, of those who date; aham, I; am vadah, Vada, which is preeminent since it is a means to determining true purport. Hence I am that . By the word pravadatam are here meant the different kinds of date held by dators, viz Vada, Jalpa, and Vitanda. [Vada: discussion with open-mindedness, with a veiw to determining true purport; jalpa: pointless date; Vitanda: wrangling discussion. [Jalpa is that mode of date by which both parties establish their own viewpoint through direct and indirect proofs, and refute the view of the opponent through circumvention (Chala) and false generalization (Jati) and by pointing out unfitness (of the opponent) tobe argued with (Nigraha-sthana). But where one party establishes his viewpoint, and the other refutes it through circumvention, false generalization and showing the unfitness of the opponent to be argued with, without establishing his own views, that is termed Vitanda. Jalpa and Vitanda result only in a trial of streangth between the opponents, who are both desirous of victory, But the result of Vada is the ascertainment of truth between the teacher and the disciple or between others, both unbiased.-Gloss of Sridhara Swami on this verse.]-Tr.]
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.32।। मैं सृष्टियों का आदि? अन्त और मध्य भी हूँ अपनी विभूतियों का वर्णन प्रारम्भ करने के पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण का सामान्य कथन ही यहाँ प्रतिध्वनित होता है। वहाँ उन्होंने यह बताया है कि वे किस प्रकार प्रत्येक वस्तु और प्राणी की आत्मा हैं जबकि यहाँ वे सम्पूर्ण सृष्टि के अधिष्ठान के रूप में स्वयं का परिचय करा रहे हैं।कोई भी पदार्थ अपने मूल उपादानस्वरूप ऋ़ा त्याग करके नहीं रह सकता। स्वर्ण के बिना आभूषण? समुद्र के बिना तरंग और मिट्टी के बिना घट का अस्तित्व सिद्ध नहीं हो सकता। समस्त नाम और रूपों में उनके उपादान कारण का होना अपरिहार्य है। उपर्युक्त कथन के द्वारा भगवान् अपने सर्वभूतात्म भाव की दृष्टि से कहते हैं कि वे सृष्टियों के आदि? मध्य और अवसान हैं। विश्व की उत्पत्ति? स्थिति और लय ये सब उनमें ही होते हैं।जिस ज्ञानस्वरूप (चित्स्वरूप) के बिना अन्य वस्तुओं के ज्ञान कदापि संभव नहीं हो सकते? उस चैतन्यस्वरूप का ज्ञान सब ज्ञानों का राजा होना उपयुक्त ही है। सूर्यप्रकाश में ही समस्त वस्तुयें प्रकाशित होती हैं। वस्तुओं पर सूर्यप्रकाश के परावर्तित होने से ही वे दर्शन के योग्य बन जाती हैं। स्वाभाविक ही? भौतिक वस्तुओं के दर्शन में सूर्य सब नेत्रों का नेत्र है। उसी प्रकार? सब विद्याओं में अध्यात्मविद्या को राजविद्या या सर्वविद्याप्रतिष्ठा कहा गया है।मैं विवाद करने वालों में वाद हूँ श्रीशंकराचार्य के अनुसार? यहाँ प्रयुक्त प्रवदताम् (विवाद करने वालों में) शब्द से तात्पर्य विवाद के प्रकारों से है? व्यक्तियों से नहीं। जीवन के सभी क्षेत्रों में विवाद के तीन प्रकार हैं जल्प? वितण्डा और वाद। जल्प में? एक व्यक्ति प्रमाण और तर्क के द्वारा अपने पक्ष की स्थापना तथा विरोधी पक्ष का छल आदि प्रकारों से खण्डन करता है। जब कोई एक व्यक्ति अपने पक्ष को स्थापित करता है? और अन्य व्यक्ति छल आदि से केवल उसका खण्डन ही करता रहता है? परन्तु अपना कोई पक्ष स्थापित नहीं करता? तब उसे वितण्डा कहते हैं। गुरु शिष्य के मध्य अथवा अन्यों के मध्य तत्त्वनिर्णय के लिए जो युक्तियुक्त विवाद होता है उसे वाद कहते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि जल्प और वितण्डा में उभय पक्ष का लक्ष्य केवल जयपराजय अथवा शक्ति परीक्षा मात्र होता है? जब कि वाद का लक्ष्य तथा फल तत्त्व निर्णय है। अत? भगवान् कहते हैं कि? मैं विवादों के प्रकारों में वाद हूँ।आगे
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.32।।सर्गाणां सृष्टीनामुत्पत्तिस्थिति प्रलयानाम्। अहं एतादृशोऽपि परमार्थतः शुद्ध एवेति द्योतयन्नाह -- हे अर्जुनेति। एतज्ज्ञानं शुद्धात्मज्ञानसाधनमिति वा संबोधनाशयः।अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च इत्युपक्रमे भूतानां जीवविष्टानामहमाद्यादिरित्युक्तम्। इह तु सर्वस्यैव सर्गमात्रस्येति न पौनरुक्त्यम्। नन्वहमादिश्च मध्यं चेत्यत्र सृष्ट्यादिकर्तुत्वं परमैश्वर्यमुक्तं? अत्र तूत्प्तिप्रलयस्थितयो मद्विभूतित्वेन ध्येया इत्युत्यते इति विशेष इत्यनेन प्रकारेण विशेष आचार्यैः कुतो नोक्त इतिचेत् अद्यादिशब्दानामुभयत्रैकरुपत्वेन विशेषाश्रुतत्वात्। उपक्रमे पर्वार्धभूतशब्दानुरोधेन भूतशब्दस्य जीवाविष्टभूतबोधकत्वेन सृज्यमात्रबोधकसर्गशब्दे च विशेषस्य श्रुतत्वात् श्रुतहान्यश्रुतकल्पनाभयादिति गृहाण। विद्यानामध्यात्मविद्याहमस्मि मोक्षार्थत्कदध्यात्मविद्यायाः। प्रवतदामित्यनेन वादजल्पवितण्डानां ग्रहणम्। वादादिस्वरुपबोधकामि गौतमसूत्राणि। प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञचावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः। यथोक्तोपन्नः छलजातिनिग्रहस्थासाधनोपालम्भो जल्पः। सपक्षस्थापनहीना वितण्डेति। पक्षप्रतिपक्षौ विप्रतिपत्तिकोटी तयोः परिग्रहो वादः साधनोद्देश्यकोक्तिप्रत्युक्तिरुपवचनसंदर्भः। ननु तावन्मात्रं कथान्तरसाधारणमत आह -- प्रमाणेत्यादिना। प्रत्यपादूह इत्यन्वयः। उपालम्भः दूषणं प्रमाणतर्काभ्यां तद्रूपेण ज्ञाताभ्यां साधनोपालम्भौ यत्र स तथा। ज्ञानमत्रानाहार्यं विवक्षितं सिद्धान्तेनाविरुद्धः पञ्चावयवैरुपपन्न इत्येदाद्विशेषणद्वयं निग्रहस्थानविशेषनियमार्थम्। जल्पं लक्षयति -- यथेति। यथोक्तेषु यदुपपन्नं तेनोपपन्न इत्यर्थः। तथाच प्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रह इत्यस्य योग्यतया परामर्शः। प्रमाणतर्काभ्यां तद्रूपेण ज्ञाताब्यां नतु ज्ञानेऽनाहार्यत्वं विवक्षितम्। आरोपितप्रमाणभावेनापि जल्पस्य निर्वाहात्। छलदिभिः साधनस्य परकीयानुमानस्योपालम्भो यत्रेत्यर्थः। छलेत्यादिना विजगीषुकथात्वं बोध्यते। विजिगीषुर्हि छलादिकं करोति। तथा चोभयपक्षस्थापनवती विजगीषुकथा जल्प इत्यर्थः। वितण्डां लक्षयति -- सेति। स जल्पः स्थापनद्वयवत्त्वं विहाय जल्पैकदेशः। प्रतिपक्षोद्वितीयः पक्षस्थाच प्रतिपक्षस्थापनहीना विजिगीषुकथा वितण्डेति। तथाचार्थनिर्णयहेतुत्वाद्वादस्य श्रेष्ठत्वाद्वादोऽहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.32।।सर्गाणामचेतनसृष्टीनामादिरन्तश्च मध्यं चोत्पत्तिस्थितिलया अहमेव। हे अर्जुन? भूतानां जीवाविष्टानां चेतनत्वेन प्रसिद्धानामेवादिरन्तश्च मध्यं चेत्युक्तमुपक्रमे। इह त्वचेतनसर्गाणामिति न पौनरुक्त्यम्। विद्यानां मध्येऽध्यात्मविद्या मोक्षहेतुरात्मतत्त्वविद्याहम्। प्रवदतां प्रवदत्संबन्धिनां कथाभेदानां वादजल्पवितण्डात्मकानां मध्ये वादोऽहम्। भूतानामस्मि चेतनेत्यत्र यथा भूतशब्देन तत्संबन्धिनः परिणामा लक्षितास्तथेह प्रवदच्छब्देन तत्संबन्धिनः कथाभेदा लक्ष्यन्ते। अतो निर्धारणोपपत्तिः। यथाश्रुतेतूभयत्रापि संबन्धे षष्ठी। तत्र तत्त्वबुभुत्स्वोर्वीतरागयोः सब्रह्मचारिणोर्गुरुशिष्ययोर्वा प्रमाणेन तर्केण च साधनदूषणात्मा सपक्षप्रतिपक्षपरिग्रहस्तत्त्वनिर्णयपर्यन्तो वादः। तदुक्तंप्रमाणतर्कसाधनोपालम्भः सिद्धान्ताविरुद्धः पञ्चावयवोपपन्नः पक्षप्रतिपक्षपरिग्रहो वादः इति। वादफलस्य तत्त्वनिर्णयस्य दुर्दुरूढवादिनिराकरणेन संरक्षणार्थं विजिगीषुकथे जल्पवितण्डे जयपराजयमात्रपर्यन्ते। तदुक्तंतत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे बीजप्ररोहसंरक्षणार्थं कण्टकशाखाप्रावरणवत् इति छलजातिनिग्रहस्थानैः परपक्षो दूष्यत इति जल्पे वितण्डायां च समानम्। तत्र वितण्डायामेकेन स्वपक्षः स्थाप्यत एव। अन्येन च स दूष्यत एव। जल्पेतूभाभ्यामपि स्वपक्षः स्थाप्यत उभाभ्यामपि परपक्षो दूष्यत इति विशेषः। तदुक्तंयथोक्तोपपन्नछलजातिनिग्रहस्थानसाधनोपालम्भो जल्पः?स प्रतिपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा इति? अतो वितण्डाद्वयशरीरत्वाज्जल्पोनाम नैका कथा किंतु शक्त्यतिशयज्ञानार्थं समयबन्धमात्रेण प्रवर्तत इति खण्डनकाराः। तत्त्वाध्यवसायपर्यवसायित्वेन तु वादस्य श्रेष्ठत्वमुक्तमेव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.32।।सर्गाणां भौतिकानां भूतानामादिरन्त इति प्रागेवोक्तत्वात्। विद्यानां चतुर्दशसंख्यानां मध्ये अध्यात्मविद्या बन्धच्छेदहेतुत्वात्। प्रवदतां प्रवक्तृद्वारेण वदनभेदा एव वादजल्पवितण्डा इह गृह्यन्ते। तेषां मध्ये वादस्तत्त्वनिर्णयार्थत्वादहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.32।।सर्गाणामिति। सृज्यन्त इति सर्गा भूतादयश्च। स त्रिविधः कार्यसर्गः कारणसर्गः लीलात्मकश्च। तत्र कार्यसर्गो लौकिको बहिस्सृष्टिरूपः? स च जीवनाशरूपत्वात् प्रलयात्मकः। कारणसर्गस्तु मोक्षात्मकत्वादलौकिकः। तृतीयो भगवल्लीलात्मकः। तत्राऽप्यवान्तरभेदास्तत्त्वकालजीवादिरूपाः सन्ति तेषां सर्गाणां मध्ये आदिः कारणरूपोऽहम्। च पुनः। अन्तः रजोगुणात्मकब्रह्मकृतोऽन्तात्मकोऽप्यहम्। मध्यं लीलात्मसर्गोऽहमेव? च मत्स्वरूपमेवेत्यर्थः। हे अर्जुन मुक्त्यधिकारजातीय असताममुक्त्यर्थमेव सर्गत्रयं मद्रूपत्वेन चिन्तयेत्यर्थः।अध्यात्मेति। विद्यानां सर्वासां मध्ये अध्यात्मविद्याऽहमस्मि। प्रवदतां वादिनां वादः? वितण्डाजल्पपक्षत्रयमध्ये वादस्तत्त्वस्वरूपनिर्णयात्मकोऽहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.32।।सर्गाणामिति। सृज्यन्त इति सर्गा आकाशादयस्तेषामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहम्। अहमादिश्च मध्यं चेत्यत्र सृष्ट्यादिकर्तृत्वं पारमैश्वर्यमुक्तम्। अत्र तूत्पत्तिस्थितिलया मद्विभूतित्वेन ध्येया इत्युच्यत इति विशेषः। अध्यात्मविद्या आत्मविद्या प्रवदतां वादिनां संबन्धिन्यो वादजल्पवितण्डाख्यास्तिस्रः कथाः प्रसिद्धास्तासां मध्ये वादोऽहम्। यत्र द्वाभ्यामपि प्रमाणतस्तर्कतश्च स्वपक्षः स्थाप्यते? परपक्षश्छलजातिनिग्रहस्थानैर्दूष्यते स जल्पो नाम। यत्र त्वेकः स्वपक्षं स्थापयत्यन्यस्तु छलजातिनिग्रहस्थानैस्तत्पक्षं दूषयति नतु स्वपक्षं साधयति सा वितण्डा नाम कथा। तत्र जल्पवितण्डे विजिगीषमाणयोर्वादिनोः शक्तिपरीक्षामात्रफले? वादस्तु वीतरागयोः शिष्याचार्ययोरन्ययोर्वा तत्त्वनिर्णयफलश्च। अतोऽसौ श्रेष्ठत्वान्मद्विभूतिरित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.32।।सर्गाणां पुष्टिप्रवाहमर्यादारूपाणां चाहमादिः कारणं? उत्तमाङ्गकायरूपः पुष्टेः प्रवाहस्यान्तरमनोरूपः मर्यादायाः मध्यं हृदयं वेदरूपः कारणम्। स्पष्टमन्यत्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.32।।हे अर्जुन सृष्टियोंका आदि? अन्त और मध्य अर्थात् उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय मैं हूँ। आरम्भमें तो भगवान्ने अपनेको केवल चेतनाधिष्ठित प्राणियोंका ही आदि? मध्य और अन्त बतलाया है? परन्तु यहाँ समस्त जगत्मात्रका आदि? मध्य और अन्त बतलाते हैं? यह विशेषता है। समस्त विद्याओंमें जो कि मोक्ष देनेवाली होनेके कारण प्रधान है? वह अध्यात्मविद्या मैं हूँ। शंकासमाधान करनेके समय बोले जानेवाले वाक्योंमें जो अर्थनिर्णयका हेतु होनेसे प्रधान है वह वाद नामक वाक्य मैं हूँ। यहाँ प्रवदताम् इस पदसे वक्ताद्वारा बोले जानेवाले वाद? जल्प और वितण्डा -- इन तीन प्रकारके वचनभेदोंका ही ग्रहण है ( बोलनेवालोंका नहीं )।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.32।। व्याख्या -- सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहम् -- जितने सर्ग और महासर्ग होते हैं अर्थात् जितने प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है? उनके आदिमें भी मैं रहता हूँ? उनके मध्यमें भी मैं रहता हूँ और उनके अन्तमें (उनके लीन होनेपर) भी मैं रहता हूँ। तात्पर्य है कि सब कुछ वासुदेव ही है। अतः मात्र संसारको? प्राणियोंको देखते ही भगवान्की याद आनी चाहिये।अध्यात्मविद्या विद्यानाम् -- जिस विद्यासे मनुष्यका कल्याण हो जाता है? वह अध्यात्मविद्या कहलाती है (टिप्पणी प0 562)। दूसरी सांसारिक कितनी ही विद्याएँ पढ़ लेनेपर भी पढ़ना बाकी ही रहता है परन्तु इस अध्यात्मविद्याके प्राप्त होनेपर पढ़ना अर्थात् जानना बाकी नहीं रहता। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।वादः प्रवदतामहम् -- आपसमें जो शास्त्रार्थ किया जाता है? वह तीन प्रकारका होता है --,(1) जल्प -- युक्तिप्रयुक्तिसे अपने पक्षका मण्डन और दूसरे पक्षका खण्डन करके अपने पक्षकी जीत और दूसरे पक्षकी हार करनेकी भावनासे जो शास्त्रार्थ किया जाता है? उसको जल्प कहते हैं।(2) वितण्डा -- अपना कोई भी पक्ष न रखकर केवल दूसरे पक्षका खण्डनहीखण्डन करनेके लिये जो शास्त्रार्थ किया जाता है? उसको वितण्डा कहते हैं।(3) वाद -- बिना किसी पक्षपातके केवल तत्त्वनिर्णयके लिये आपसमें जो शास्त्रार्थ (विचारविनिमय) किया जाता है उसको वाद कहते हैं।उपर्युक्त तीनों प्रकारके शास्त्रार्थोंमें वाद श्रेष्ठ है। इसी वादको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि,न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.32।।अहमादिश्चेत्यादावुक्तमेव पुनरिहोच्यते। तथाच न पुनरुक्तिरित्याशङ्क्याह -- भूतानामिति। सर्गशब्देन सृज्यन्त इति सर्वाणि कार्याणि गृह्यन्ते -- अध्यात्मविद्येति। आत्मन्यन्तःकरणपरिणतिरविद्यानिवर्तिका गृहीता। प्रवदतां संबन्धी वादो वीतरागकथा तत्त्वनिर्णयावसाना। यदा प्रवदतामिति लक्षणया कथाभेदोपादानं तदा निर्धारणे षष्ठीत्याह -- प्रवक्त्रिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.32।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.32।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.32।। --,सर्गाणां सृष्टीनाम् आदिः अन्तश्च मध्यं चैव अहम् उत्पत्तिस्थितिलयाः अहम् अर्जुन। भूतानां जीवाधिष्ठितानामेव आदिः अन्तश्च इत्याद्युक्तम् उपक्रमे? इह तु सर्वस्यैव सर्गमात्रस्य इति विशेषः। अध्यात्मविद्या विद्यानां मोक्षार्थत्वात् प्रधानमस्मि। वादः अर्थनिर्णयहेतुत्वात् प्रवदतां प्रधानम्? अतः सः अहम् अस्मि। प्रवक्तृद्वारेण वदनभेदानामेव वादजल्पवितण्डानाम् इह ग्रहणं प्रवदताम् इति।।
───────────────────
【 Verse 10.33 】
▸ Sanskrit Sloka: अक्षराणामकारोऽस्मि द्वन्द्व: सामासिकस्य च | अहमेवाक्षय: कालो धाताहं विश्वतोमुख: ||
▸ Transliteration: akṣarāṇāmakāro’smi dvandvaḥ sāmāsikasya ca | ahaṁevākṣayaḥ kālo dhātāhaṁ viśvatomukhaḥ ||
▸ Glossary: akṣarāṇām: of the letters; akāraḥ: The letter A; asmi: I am; dvandvaḥ: of the dual words; sāmāsikasya: compounds; ca: and; ahaṁ: I; evā: surely; akṣayaḥ: never-ending; kālo: time; dhātā: creator; ahaṁ: I; viśvatomukhaḥ: faces facing the world (Brahma)
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.33 Of the letters, I am the ‘A’. Of the dual words, I am the compounds and surely I am the never-ending time. I am the Omniscient who sees everything.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.33।।अक्षरोंमें अकार और समासोंमें द्वन्द्व समास मैं हूँ। अक्षयकाल अर्थात् कालका भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला धाता भी मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.33।। मैं अक्षरों (वर्णमाला) में अकार और समासों में द्वन्द्व (नामक समास) हूँ मैं अक्षय काल और विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) धाता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.33 अक्षराणाम् among letters? अकारः the letter A? अस्मि (I) am? द्वन्द्वः the dual? सामासिकस्य among all compounds? च and? अहम् I? एव verily? अक्षयः the inexhaustible or everlasting? कालः time? धाता the dispenser? अहम् I? विश्वतोमुखः the Allfaced (or having faces in all directions).Commentary Among the alphabets I am the letter A. Among the various kinds of compounds used in Sanskrit language I am the Dvandva (union of the two)? the copulative.Time here refers to the moment? the ultimate element of time or to Paramesvara? the Supreme Lord Who is the time of even time? since He is beyond time.As the Supreme Being is allpervading it is said that He has faces in all directions.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.33. Of the syllables, I am A; of the compounds, the Dvandva; none but Me, is the immortal Time; I am the dispenser [of fruits actions] facing on all sides.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.33 Of letters I am A; I am the copulative in compound words; I am Time inexhaustible; and I am the all-pervading Preserver.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.33 Of letters, I am the alphabet 'a'. Of compound words, I am the Dvandva (copulative). I am Myself imperishable Time. I am the Creator, facing every side.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.33 Of the letters I am the letter a, and of the group of compund words I am (the compound called) Dvandva. [Dvandva: A compound of two or more words which, if not compounded, would stand in the same case and be connected by the conjunction 'and'.-Tr.] I Mayself am the infinite time; I am the Dispenser with faces everywhere.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.33 Among the letters of the alphabets, the letter 'A' I am and the dual among the compounds. I am verily the inexhaustible or everlasting time; I am the dispenser (of the fruits of actions) having faces in all directions.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.33 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.33 Of letters I am the alphabet 'a', which is the base of all letters as established in the Sruti: 'The letter 'a' itself is all speech' (Ai. Ai., 3.2.3). Samasika means collection of compound words. In it, I am the Dvandva compound; it is eminent because the meanings of both constituent terms are important. I am Myself imperishable Time composed of (divisions like) Kala, Muhurta etc. I am the four-faced Hiranyagarbha who is the creator of all.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.33 Aksaranam, of the letters; I am the akarah, letter a. Samasikasya, of the group of compound words, I am the compund (called) Dvandva. Besieds, aham eva, I Myself; am the aksayah, infinite, endless; kalah, time, well known as 'moment' etc.; or, I am the supreme God who is Kala (Time, the measurer) even of time. I am the dhata, Dispenser, the dispenser of the fruits of actions of the whole world; visvatomukhah, with faces everwhere.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.33।। मैं अक्षरों में अकार हूँ यह सर्वविदित तथ्य है कि भाषा में स्वरों की सहायता के बिना शब्दों का उच्चारण नहीं किया जा सकता। सभी भाषाओं में संस्कृत की विशेष मधुरता उसमें किये जाने वाले अकार के प्रयोग की प्रचुरता के कारण है। वस्तुत? प्रत्येक व्यंजन में अ जोड़कर ही उसका उच्चारण किया जाता है। यह अ मानो उसमें स्निग्ध पदार्थ का काम करता है? जिसके कारण नाद की कर्कशता दूर हो जाती है। इस अ के सहज प्रवाह के कारण शब्दों के मध्य एक राग और वाक्यों में एक प्रतिध्वनि सी आ जाती है। किसी सभागृह में संस्कृत मन्त्रों के दीर्घकालीन पाठ के उपरान्त? संवेदनशील लोगों के लिए एक ऐसे संगीतमय वातावरण का अनुभव होता है? जो मानव मन के समस्त विक्षेपों को शान्त कर सकता है।प्रत्येक अक्षर का सारतत्त्व अकार है वह शब्दों और वाक्यों की सीमाओं को लांघकर वातावरण में गूंजता है? और सभी भाषाओं की वर्णमालाओं में वह प्रथम स्थान पर प्रतिष्ठित है। अकार के इस महत्व को पहचान कर ही उपनिषदों में इसे समस्त वाणी का सार कहा गया है।मैं समासों में द्वन्द्व हूँ संस्कृत व्याकरण में दो या अधिक (पदों) को संयुक्त करने वाला विधान विशेष समास कहलाता है? जिसके अनेक प्रकार हैं। समास के दो पदों के संयोग का एक नया ही रूप होता है। द्वन्द्व समास में दोनों ही पदों का समान महत्व होता है? जबकि अन्य सभासों मे पूर्वपद अथवा उत्तरपद का। यहाँ भगवान श्रीकृष्ण द्वन्द्व समास को अपनी विभूति बनाते हैं क्योंकि इसमें उभय पदों का समान महत्व है और इसकी रचना भी सरल है। अध्यात्म ज्ञान के सन्दर्भ में यह कहा जा सकता है कि आत्मा और अनात्मा दोनों इस प्रकार मिले हैं कि हमें वे एक रूप में ही अनुभव में आते हैं और उनका भेद स्पष्ट ज्ञात नहीं होता? परन्तु विवेकी पुरुष के लिए वे दोनों उतने ही विलग होते हैं जितने कि एक वैय्याकरण के लिए द्वन्द्व समास के दो पद।मैं अक्षय काल हूँ पहले भी यह उल्लेख किया जा चुका है कि गणना करने वालों में मैं काल हूँ। वहाँ सापेक्षिक काल का निर्देश था ?जबकि यहाँ अनन्त पारमार्थिक काल को इंगित किया गया है। अक्षय काल को ही महाकाल कहते हैं। संक्षेपत दोनों कथनों का तात्पर्य यह है कि मन के द्वारा परिच्छिन्न रूप में अनुभव किया जाने वाला काल तथा अनन्त काल इन दोनों का अधिष्ठान आत्मा है। प्रत्येक क्षणिक काल के भान के बिना सम्पूर्ण काल का ज्ञान असंभव है। अत मैं प्रत्येक काल खण्ड में हूँ? तथा उसी प्रकार? सम्पूर्ण काल का भी अधिष्ठान हूँ।मैं धाता हूँ श्रीशंकराचार्य अपने भाष्य में इस शब्द की व्याख्या करते हुए लिखते हैं कि ईश्वर धाता अर्थात् कर्मफलविधाता है। संस्कारों के अनुसार मनुष्य कर्म करता है जिसका नियमानुसार उसे फल प्राप्त होता है।विश्वतोमुख इस शब्द की विस्तृत व्याख्या पहले भी की जा चुकी है? जहाँ यह कहा गया था कि आत्मा न केवल सब में एक है? किन्तु सबसे विलक्षण भी है? और वह प्रत्येक प्राणी में स्थित हुआ? सर्वत्र देखता है। इस सम्पूर्ण भाव को केवल एक शब्द विश्वतोमुख में व्यक्त किया गया है। सभी ऐन्द्रिक मानसिक और बौद्धिक ग्रहणों के लिए चैतन्य आत्मा की कृपा आवश्यक है? और इसलिए? यह शब्द अर्थाभिव्यंजक है।भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.33।।अक्षराणामकारोर्णोऽस्मिअकारो वै सर्वा वाक्?आकारो स्यात् इत्युक्तेः। सामासिकस्याव्ययीभावतत्पुरुषबहुब्रीहिद्वन्द्वसमाससमुदायस्य द्वन्द्वः समासोऽस्मि। तस्योभयपदप्रधानत्वेन श्रेष्ठत्वात्। ननु सममेकत्र आसनं समासो विदुषां वा गुरुशिष्याणां वा मन्त्रार्थ कतार्थं वा एकत्रावस्थानं तत्र विदितमर्थजातं सामासिकं चातुर्थिकष्ठक्।ठस्येकः इतीकादेशः।यस्येति च इत्यलोपः। तस्य मध्ये द्वन्द्वो रहस्योर्थोऽहंद्वन्द्वं रहस्य -- इति सूत्रे द्वन्दव्शब्दस्य रहस्यवाचित्वं शाब्दिकप्रसिद्धमिति भाष्कारैः कुतो न व्याख्यातमितिचेत् समासशब्दस्याव्यायीभावादौ द्वन्द्वशब्दस्य द्वन्द्वसमा्से च योगरुढेः केवलं योगापेक्षया प्रबलत्वात् प्रकृते द्वन्द्वशब्दस्य पंस्त्वेन निर्देशात्। अक्षराणाभकारोऽस्मीतिसमभिव्याहाराच्चेति गृहाण। अन्यथाक्षाराणांअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति?प्राणा वै सत्यम् इत्यादिनाऽक्षयत्वेन प्रतिपादितानां न करोतीत्यकारः कर्तृत्वादिवर्जितः परमात्माहं तस्य परमार्थसत्यत्वात्। यद्वाक्षराणां व्यापकानां करोतीति करः कर एव कारः स्वार्थकः प्रज्ञाद्यण्प्रत्ययः नकोरोऽकारः आकाशोऽहम्। एकत्र रणभूमौ आसनमासोऽवस्थानं तत्र भवं युद्धजातं सामासिकं तस्य मध्ये द्वन्द्वः द्वन्द्वयुद्धमहं इत्यादि आकाशोऽहम्। एकत्र रणभूमौ आसनमासोऽवस्थानं तत्र भवं युद्धजातं सामासिकं तस्य मध्ये द्वन्द्वः द्वन्द्वयुद्धमहं इत्यादि यत्किंचित्कल्पयितुं शक्यम्। तस्मादाचार्योक्तमेव सम्यक् इति दिक्। अक्षयः क्षयवर्जितः कालोऽहमेव। यद्वा कालस्यापि कालः परमेस्वरोऽहमेव। फलदातृृणां मध्ये सर्वस्य विश्वस्य कर्मफलस्य विधाता सर्वतोमुखोऽहमेवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.33।।अक्षराणां सर्वेषां वर्णानां मध्ये अकारोऽहमस्मि।अकारो वै सर्वा वाक् इति श्रुतेस्तस्य श्रेष्ठत्वं प्रसिद्धम्। द्वन्द्वः समास उभयपदार्थप्रधानः सामासिकस्य समाससमूहस्य मध्येऽहमस्मि। पूर्वपदार्थप्रधानोऽव्ययीभावः? उत्तरपदार्थप्रधानस्तत्पुरुषः? अन्यपदार्थप्रधानो बहुव्रीहिरिति तेषामुभयपदार्थसाम्याभावेनापकृष्टत्वात्। क्षयिकालाभिमानी अक्षयः परमेश्वराख्यः कालःज्ञः कालकालो गुणी सर्वविद्यः इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धोऽहमेव। कालः कलयतामहमित्यत्र तु क्षयी काल इति उक्तभेदः। कर्मफलविधातृ़णां मध्ये विश्वतोमुखः सर्वतोमुखो धाता सर्वकर्मफलदातेश्वरोऽहमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.33।।अक्षराणां मध्ये अकारः।अकारो वै सर्वा वाक् इति श्रुतेः। सामासिकस्य समाससमुदायस्य मध्येऽहं द्वन्द्वोऽस्मि। उभयपदार्थप्रधानत्वादिति प्राञ्चः। समं एकत्रासनं समासो विदुषां वा गुरुशिष्याणां वा मन्त्रार्थकथनार्थं वा एकत्रावस्थानं तत्र विदितमर्थजातं सामासिकम्। चातुरर्थिकष्ठक्ठस्येकः इतीकादेशः।यस्येति च इत्यलोपः। तस्य मध्ये द्वन्द्वो रहस्योऽर्थोऽहम्।द्वन्द्वं रहस्य -- इति सूत्रे द्वन्द्वशब्दस्य रहस्यवाचित्वं शाब्दिकप्रसिद्धम्। अक्षयः क्षयहीनः कालः क्षणादिः परो वा ईश्वरः कालस्यापि कालोऽस्मि। धाता कर्मफलप्रदः। विश्वतोमुखः। सर्वप्राणितृप्त्यातृप्यामीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।।10.33।।अक्षराणां वर्णानां मध्ये अकारोऽस्मि? सर्वाक्षरगतत्वात्। सामासिकस्य समाससमूहस्य मध्ये द्वन्द्वःगोपीमाधवौ इत्यादिरस्मि। अक्षयः लीलात्मकोऽलौकिकः कालोऽहमेवास्मि। एवकारेण तस्य साक्षात्स्वरूपात्मकत्वाद्विभूतित्वे किं वाच्यमिति ज्ञापितम्। विधातृ़णां मध्ये विश्वतोमुखः सर्वतोमुखश्चतुर्मुखो धाता अलौकिकसृष्टिकर्त्ताऽहमस्मीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.33।। अक्षरेति। अक्षराणां वर्णानां मध्येऽकारोऽस्मि? तस्य सर्ववाङ्मयत्वेन श्रेष्ठत्वात्। तथाच श्रुतिःअकारो हि सर्वा वाक्सैषा स्पर्शोष्मभिर्व्यज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति इति। सामासिकस्य समाससमूहस्य मध्ये द्वन्द्वः रामकृष्णावित्यादिसमासोऽस्मि? उभयपदप्रधानत्वेन श्रेष्ठत्वात्। अक्षयः प्रवाहरूपः कालोऽहमेव। कालः कलयतामित्यत्रायुर्गणनात्मकः संवत्सरशताद्यायुःस्वरूपकाल उक्तः स च तस्मिन्नायुषि क्षीणे सति क्षीयते? अत्र तु प्रवाहात्मकोऽक्षयः काल उच्यत इति विशेषः। कर्मफलविधातृ़णां मध्ये विश्वतोमुखो धाता। सर्वकर्मफलविधाताहमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.33।।अक्षराणामिति। अकारो वासुदेववाचकः।अकारो वै सर्वा वाक् [ऐ.पू.3।6] इति श्रुतेः। समासगणस्य मध्ये द्वन्द्वोऽहं उभयपदार्थप्रधानत्वान्मुख्यः? रामकृष्णावित्यादिसमासोऽस्मि इति स चिन्तनीयः। अहमेव कालः प्रवाहरूपः। धाता चाहम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.33।।अक्षरोंमें -- वर्णोंमें अकार -- अ वर्ण मैं हूँ। समास -- समूहमें द्वन्द्व नामक समास मैं हूँ तथा मैं ही अविनाशी काल -- जो क्षणघड़ी आदि नामोंसे प्रसिद्ध है वह समय? अथवा कालका भी काल परमेश्वर हूँ और मैं ही विधाता -- सब जगत्के कर्मफलका विधान करनेवाला तथा सब ओर मुखवाला परमात्मा हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.33।। व्याख्या -- अक्षराणामकारोऽस्मि -- वर्णमालामें सर्वप्रथम अकार आता है। स्वर और व्यञ्जन -- दोनोंमें अकार मुख्य है। अकारके बिना व्यञ्जनोंका उच्चारण नहीं होता। इसलिये अकारको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।द्वन्द्वः सामासिकस्य च -- जिससे दो या दोसे अधिक शब्दोंको मिलाकर एक शब्द बनता है? उसको समसा कहते हैं। समास कई तरहके होते हैं। उनमें अव्ययीभाव? तत्पुरुष? बहुब्रीहि और द्वन्द्व -- ये चार मुख्य हैं। दो शब्दोंके समासमें यदि पहला शब्द प्रधानता रखता है तो वह अव्ययीभाव समास होता है। यदि आगेका शब्द प्रधानता रखता है तो वह तत्पुरुष समास होता है। यदि दोनों शब्द अन्यके वाचक होते हैं तो वह बहुब्रीहि समास होता है। यदि दोनों शब्द प्रधानता रखते हैं तो वह द्वन्द्व समास होता है।द्वन्द्व समासमें दोनों शब्दोंका अर्थ मुख्य होनेसे भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।अहमेवाक्षयः कालः -- जिस कालका कभी क्षय नहीं होता अर्थात् जो कालातीत है और अनादिअनन्तरूप है? वह काल भगवान् ही हैं।सर्ग और प्रलयकी गणना तो सूर्यसे होती है? पर महाप्रलयमें जब सूर्य भी लीन हो जाता है? तब समयकी गणना परमात्मासे ही होती है (टिप्पणी प0 563)। इसलिये परमात्मा अक्षय काल है।तीसवें श्लोकके कालः कलयतामहम् पदोंमें आये कालमें और यहाँ आये अक्षय कालमें क्या अन्तर है वहाँका जो काल है? वह एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता? बदलता रहता है। वह काल ज्योतिषशास्त्रका आधार है और उसीसे संसारमात्रके समयकी गणना होती है। परन्तु यहाँका जो अक्षय काल है? वह परमात्मस्वरूप होनेसे कभी बदलता नहीं। वह अक्षय काल सबको खा जाता है और स्वयं ज्योंकात्यों ही रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई विकार नहीं होता। उसी अक्षय कालको यहाँ भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। आगे ग्यारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने कालोऽस्मि (11। 32) पदसे अक्षय कालको अपना स्वरूप बताया है।धाताहं विश्वतोमुखः -- सब ओर मुखवाले होनेसे भगवान्की दृष्टि सभी प्राणियोंपर रहती है। अतः सबका धारणपोषण करनेमें भगवान् बहुत सावधान रहते हैं। किस प्राणीको कौनसी वस्तु कब मिलनी चाहिये? इसका भगवान् खूब खयाल रखते हैं और समयपर उस वस्तुको पहुँचा देते हैं। इसलिये भगवान्ने अपना विभूतिरूपसे वर्णन किया है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.33।।सर्वहरशब्दस्य मुख्यमर्थान्तरमाह -- अथवेति। भाविकल्याणानामित्युक्तमेव स्पष्टयति -- उत्कर्षेति। कीर्तिर्धार्मिकत्वनिमित्ता ख्यातिः। श्रीर्लक्ष्मीः? कान्तिः शोभा? वाग्वाणी सर्वस्य प्रकाशिका? स्मृतिश्चिरानुभूतस्मरणशक्तिः? मेधा ग्रन्थधारणशक्तिः? धृतिर्धैर्यम्? क्षमा मानापमानयोरविकृतचित्तता। स्त्रीषु कीर्त्यादीनामुत्तमत्वमुपपादयति -- यासामिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.33।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.33।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.33।। --,अक्षराणां वर्णानाम् अकारः वर्णः अस्मि। द्वन्द्वः समासः अस्मि सामासिकस्य च समाससमूहस्य। किञ्च अहमेव अक्षयः अक्षीणः कालः प्रसिद्धः क्षणाद्याख्यः? अथवा परमेश्वरः कालस्यापि कालः अस्मि। धाता अहं कर्मफलस्य विधाता सर्वजगतः विश्वतोमुखः सर्वतोमुखः।।
───────────────────
【 Verse 10.34 】
▸ Sanskrit Sloka: मृत्यु: सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम् | कीर्ति: श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृति: क्षमा ||
▸ Transliteration: mṛtyuḥ sarva-haraś cāham udbhavaśca bhaviṣyatāï | kīrtiḥ śrīrvākca nāriṇāṁ smṛtirmedhā dhṛtiḥ kṣamā ||
▸ Glossary: mṛtyuḥ: death; sarvaharaḥ: all-devouring; ca: and; aham: I; udbhavaḥ: creation; ca: and; bhaviṣyatāï: of the future; kīrtiḥ: fame; śrīr vāk: wealth of words; ca: and; nāriṇāṁ: of the feminine; smṛtiḥ: memory; medhā: intelligence; dhṛtiḥ: faithfulness; kṣamā: patience
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.34 I am the all-devouring death and I am the creator of all things of the future. Of the feminine, I am fame, fortune, beautiful speech, memory, intelligence, faithfulness and patience.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.34।।सबका हरण करनेवाली मृत्यु और उत्पन्न होनेवालोंका उद्भव मैं हूँ तथा स्त्रीजातिमें कीर्ति? श्री? वाक्? स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.34।। मैं सर्वभक्षक मृत्यु और भविष्य में होने वालों की उत्पत्ति का कारण हूँ स्त्रियों में कीर्ति? श्री? वाक (वाणी)? स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.34 मृत्युः death? सर्वहरः alldevouring? च and? अहम् I? उद्भवः the prosperity? च and? भविष्यताम् of those who are to be prosperous? कीर्तिः frame? श्रीः prosperity? वाक् speech? च and? नारीणाम् of the feminine? स्मृतिः the memory? मेधा intelligence? धृतिः firmness? क्षमा forgiveness.Commentary I am also the allsnatching death that destroys everything. Death is of two kinds? viz.? he who seizes wealth and he who seizes life. Of them he who seizes life is the allseizer and,hence he is called Sarvaharah. I am he.Or? there is another interpretation. I am the Supreme Lord Who is the allseizer? because I destroy everything at the time of the cosmic dissolution.I am the origin of all the beings to be born in the future. I am the prosperity and the means of achieving it of those who are fit to attain it.Beauty is Sri. Lustre is Sri. I am fame? the best of the feminine alities. People who have attained slight fame think that they have achieved great success in life and that they have become very big or great men. I am speech which adorns the throne of justice. I am memory which recalls objects and pleasures of the past.The power of the mind which enables one to hold the teachings of the scriptures is Medha. Firmness or Dhriti is the power to keep the body and the senses steady even amidst various kinds of sufferings. The power to keep oneself unattached even while doing actions is Dhriti. It also means courage. Kshama also means endurance.Fame? prosperity? memory? intelligence and firmness are the daughters of Daksha. They had been given in marriage to Dhrama and so they are all called Dharmapatnis.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.34. I am the Death that carries away all and also the Birth of all that are to be born; of the wives of men, I am the Fame, Fortune, Speech, Memory, Wisdom, Constancy and Patience.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.34 I am all-devouring Death; I am the Origin of all that shall happen; I am Fame, Fortune, Speech, Memory, Intellect, Constancy and Forgiveness.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.34 I am also death which snatches all away. I am the origin of all that shall be born. Among women, I am fame, prosperity, speech, memory, intelligence, endurance and forgiveness.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.34 And I am Death, the destroyer of all; and the prosperity of those destined to be prosperous. Of the feminine [Narinam may mean 'of the feminine alities'. According to Sridhara Swami and S., the words fame etc. signify the goddesses of the respective alities. According to M.S. these seven goddesses are the wives of the god Dharma.-Tr.] (I am) fame, beauty, speech, memory, intelligence, fortitude and forbearance.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.34 And I am the all-devouring Death, and the prosperity of those who are to be prosperous; among the feminine alities (I am) fame, prosperity, speech, memory, intelligence, firmness and forgiveness.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.34 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.34 I am also death which snatches away the life of all. Of those that shall be born I am that called birth. Of women (i.e., of goddesses who are the powers of the Lord) I am prosperity (Sri); I am fame (Kirti); I am speech (Vak); I am memory (Smrti); I am intelligence (Medha); I am endurance (Dhrti); and I am forgiveness (Ksama).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.34 Death which is of two kinds-one destroying wealth, and the other destroying life-, [Here Ast. adds: tatra yah prana-harah sah (sarva-harah ucyate)-Among them, that which destroys life (is called sarva-harah).-Tr.] is called sarva-harah, the destroyer of all. I am that. This is the meaning. Or, the supreme God is the all-destroyer because He destroys everything during dissolution. I am He. And I am udbhavah, prosperity, eminence, and the means to it. Of whom? Bhavisyatam, of those destined to be prosperous, i.e. of those who are fit for attaining eminence. Narinam, of the feminine alities; I am kirtih, fame; srih, beauty; vak, speech; smrtih, memory; medha, intelligence dhrtih, fortitude; and ksama, forbearance. I am these excellent feminine ialities, by coming to possess even a trace of which one considers himself successful.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.34।। मैं सर्वभक्षक मृत्यु हूँ समानता की समर्थक मृत्यु? शासक के राजदण्ड और मुकुट को भी भिक्षु के भिक्षापात्र और दण्ड के स्तर तक ले आती है। प्रत्येक प्राणी केवल अपने जीवन काल में अनेक वस्तुओं और व्यक्तियों के संबंधों के द्वारा अपना एक भिन्न अस्तित्व बनाये रखता है। मृत्यु के पश्चात् विद्वान और मूढ़? पुण्यात्मा और पापात्मा? बलवान और दुर्बल? शासक और शासित ये सब धूलि में मिल जाते हैं? एक समानरूप बन जाते हैं जिनमें किसी प्रकार का भेद नहीं किया जा सकता।भविष्य में होने वालों का मैं उत्पत्ति कारण हूँ परमात्मा केवल सर्वभक्षक ही नहीं? सृष्टिकर्ता भी है। हम देख चुके हैं कि वस्तुत एक अवस्था के नाश के बिना अन्य अवस्था का जन्म नहीं हो सकता है। किसी पक्ष को ही देखना माने जीवन का एकांगी दर्शन करना ही हैं। वस्तु के नाश से शून्यता नहीं शेष रहती? वरन् अन्य वस्तु की उत्पत्ति होती है। समुद्र में उठती लहरों को अलगअलग देंखे ंतो सदा नाश ही होता दिखाई देगा? परन्तु एक के लय के साथ ही समुद्र में कितनी ही लहरें उत्पन्न होती रहती हैं? जिसका हमे ध्यान भी नहीं रहता है।इस सम्पूर्ण विवेचन का बल इसी पर है कि अनन्त परमात्मा अपने में ही रचना और संहार की क्रीड़ा निरन्तर कर रहा है जिस क्रीड़ा को हम विश्व कहते हैं।मैं स्त्रियों में कीर्ति? श्री? वाक्? स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा हूँ ये सात देवताओं की स्त्रियां और स्त्रीवाचक नाम गुण के रूप में भी प्रसिद्ध हंै? इसलिए दोनों प्रकार से ही ये भगवान् की विभूतियां है? दार्शनिक दृष्टिकोण से इस कथन का अर्थ सब आलोचनाओं के परे है। यहाँ यह नहीं कहा गया है कि इन गुणों से सम्पन्न पुरुष दिव्य है। तात्पर्य यह है कि जिस किसी पुरुष में जिसका भूतकाल का जीवन कैसा भी हो जब कभी इनमें से किसी गुण के दर्शन होते हैं? तब हम उसके माध्यम से ईश्वर की विभूति के स्पष्ट दर्शन कर सकते हैं। गुण के प्रत्यारोपण की भाषा में भगवान् कहते हैं? स्त्रियों में मैं कीर्ति? श्री आदि गुण हूँ।अपने परिचय को और अधिक स्पष्ट करने के लिए अगले श्लोक में भगवान् श्रीकृष्ण चार और दृष्टान्त देते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.34।।मृत्युः सर्वहरः प्राणहरस्तस्य सर्वहरत्वात्। धनादिहरस्तु न सर्वहरः। यद्वा प्रलयकाले सर्वहरः। यद्वा प्रलयकाले,सर्वहरः परमेश्वरुपो मृत्युहरम्। भविष्यतां भाविकल्याणानामुत्कर्षप्राप्तियोग्यानां मध्ये उत्कर्षाभ्युदयप्राप्तिहेतुरहम्। नारीणां कीर्त्यादयो नार्योऽहं यामामाभासमात्रेणापि लोकः कृतार्थमात्मानं मन्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.34।।संहारकारिणां मध्ये सर्वहरः सर्वसंहारकारी मृत्युरहम्। भविष्यतां भाविकल्याणानां य उद्भव उत्कर्षः स चाहमेव। नारीणां मध्ये कीर्तिः श्रीर्वाक् स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमेति च सप्त धर्मपत्न्योऽहमेव। तत्र कीर्तिर्धार्मिकत्वनिमित्ता प्रशस्तत्वेन नानादिग्देशीयलोकज्ञानविषयतारूपा ख्यातिः। श्रीर्धर्मार्थकामसंपत् शरीरशोभा वा कान्तिर्वा। वाक् सरस्वती सर्वस्यार्थस्य प्रकाशिका संस्कृता वाणी। चकारान्मूर्त्यादयोऽपि धर्मपत्न्यो गृह्यन्ते। स्मृतिश्चिरानुभूतार्थस्मरणशक्तिः। अनेकग्रन्थार्थधारणाशक्तिर्मेधा। धृतिरवसादेऽपि शरीरेन्द्रियसंघातोत्तम्भनशक्तिः। उच्छृङ्खलप्रवृत्तिकारणेन चापलप्राप्तौ तन्निवर्तनशक्तिर्वा। क्षमा हर्षविषादयोरविकृतचित्तता। यासामाभासमात्रसंबन्धेनापि जनः सर्वलोकादरणीयो भवति तासां,सर्वस्त्रीषूत्तमत्वमिति प्रसिद्धमेव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.34।।सर्वहरः प्रलयकालिको मृत्युरस्मि। भविष्यतां भाविकल्याणानामुद्भव ऐश्वर्योत्कर्षोऽहम्। कीर्त्यादिसप्तकमप्यहं यासां संश्रयमात्रेण मनुष्येषु कृतार्थताबुद्धिर्भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.34।।मृत्युरिति। संहारिणां मध्ये सर्वसंहारकोऽहम्। च पुनः मृत्युरपि। भविष्यतां निखिलानां प्राणिनां पदार्थानां उद्भवोऽभ्युदयः भाग्यरूपोऽहम्।कीर्तिरिति। कीर्तिः धर्मस्य स्त्री? श्रीः लक्ष्मीः? वाक् सरस्वती श्रीभागवतादिरूपा? स्मृतिर्भगवत्स्मरणात्मिका? मेधा बुद्धिः भगवद्गुणैकनिष्ठा? धृतिः आपत्सु धर्मैकनिष्ठता? क्षमा सर्वातिक्रमसहनरूपा? नारीणां मध्ये एता मद्विभूतिरूपाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.34।। मृत्युरिति। संहारकारिणां मध्ये सर्वहरो मृत्युरहम्। भविष्यतां भाविकल्याणानां प्राणिनामुद्भवोऽभ्युदयोऽहम्। नारीणां स्त्रीणां मध्ये कीर्त्याद्याः सप्त देवतारूपाः स्त्रियोऽहम्। यासामाभासमात्रयोगेन प्राणिनः श्लाघ्या भवन्ति ताः कीर्त्याद्याः स्त्रियो मद्विभूतयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.34।।मृत्युरिति स्पष्टम्। भगवदीयविरोधिजनान् सर्वान् संहरति तथाभूतो मृत्युर्मद्विभूतिः। एवमुद्भवोऽपि। नारीणां मध्ये कीर्त्यादयः सप्ताहम्। अथवा कीर्त्तिर्वृषभानुपत्नी मद्विभूतिः। तत्र श्रीश्चाहम्। वाक्सरस्वतीयमवताररूपा चाहं श्रीपरिचारिका वा निर्दिष्टा।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.34।।धनादिका नाश करनेवाला और प्राणोंका नाश करनेवाला ऐसे दो प्रकारका मृत्यु सर्वहर कहलाता है? वह सर्वहर मृत्यु मैं हूँ। अथवा परम ईश्वर प्रलयकालमें सबका नाश करनेवाला होनेसे सर्वहर है? वह मैं हूँ। भविष्यत्में जिनका कल्याण होनेवाला है अर्थात् जो उत्कर्षताप्राप्तिके योग्य हैं उनका उद्भव अर्थात् उत्कर्ष -- उन्नतिकी प्राप्तिका कारण मैं हूँ। स्त्रियोंमें जो कीर्ति? श्री? वाणी? स्मृति? बुद्धि? घृति और क्षमा ये उत्तम स्त्रियाँ हैं? जिनके आभासमात्र सम्बन्धसे भी लोग अपनेको कृतार्थ मानते हैं वे मैं हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.34।। व्याख्या -- मृत्युः सर्वहरश्चाहम् -- मृत्युमें हरण करनेकी ऐसी विलक्षण सामर्थ्य है कि मृत्युके बाद यहाँकी स्मृतितक नहीं रहती? सब कुछ अपहृत हो जाता है। वास्तवमें यह सामर्थ्य मृत्युकी नहीं है? प्रत्युत परमात्माकी है।अगर सम्पूर्णका हरण करनेकी? विस्मृत करनेकी भगवत्प्रदत्त सामर्थ्य मृत्युमें न होती तो अपनेपनके सम्बन्धको लेकर जैसी चिन्ता इस जन्ममें मनुष्यको होती है? वैसी ही चिन्ता पिछले जन्मके सम्बन्धको लेकर भी होती। मनुष्य न जाने कितने जन्म ले चुका है। अगर उन जन्मोंकी याद रहती तो मनुष्यकी चिन्ताओंका? उसके मोहका कभी अन्त आता ही नहीं। परन्तु मृत्युके द्वारा विस्मृति होनेसे पूर्वजन्मोंके
Chapter 10 (Part 14)
कुटुम्ब? सम्पत्ति आदिकी चिन्ता नहीं होती। इस तरह मृत्युमें जो चिन्ता? मोह मिटानेकी सामर्थ्य है? वह सब भगवान्की है।उद्भवश्च भविष्यताम् -- जैसे पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि सबका धारणपोषण करनेवाला मैं ही हूँ? वैसे ही यहाँ बताते हैं कि सब उत्पन्न होनेवालोंकी उत्पत्तिका हेतु भी मैं ही हूँ। तात्पर्य है कि संसारकी उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय करनेवाला मैं ही हूँ।कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा -- कीर्ति? श्री? वाक्? स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा -- ये सातों संसारभरकी स्त्रियोंमें श्रेष्ठ मानी गयी हैं। इनमेंसे कीर्ति? स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा -- ये पाँच प्रजापति दक्षकी कन्याएँ हैं? श्री महर्षि भृगुकी कन्या है और वाक् ब्रह्माजीकी कन्या है।कीर्ति? श्री? वाक्? स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा -- ये सातों स्त्रीवाचक नामवाले गुण भी संसारमें प्रसिद्ध हैं। सद्गुणोंको लेकर संसारमें जो प्रसिद्धि है? प्रतिष्ठा है? उसे कीर्ति कहते हैं।स्थावर और जङ्गम -- यह दो प्रकारका ऐश्वर्य होता है। जमीन? मकान? धन? सम्पत्ति आदि स्थावर ऐश्वर्य है और गाय? भैंस? घोड़ा? ऊँट? हाथी आदि जङ्गम ऐश्वर्य हैं। इन दोनों ऐश्वर्योंको श्री कहते हैं।जिस वाणीको धारण करनेसे संसारमें यशप्रतिष्ठा होती है और जिससे मनुष्य पण्डित? विद्वान् कहलाता है? उसे वाक् कहते हैं।पुरानी सुनीसमझी बातकी फिर याद आनेका नाम स्मृति है।बुद्धिकी जो स्थायीरूपसे धारण करनेकी शक्ति है अर्थात् जिस शक्तिसे विद्या ठीक तरहसे याद रहती है? उस शक्तिका नाम मेधा है।मनुष्यको अपने सिद्धान्त? मान्यता आदिपर डटे रखने तथा उनसे विचलित न होने देनेकी शक्तिका नाम धृति है।दूसरा कोई बिना कारण अपराध कर दे? तो अपनेमें दण्ड देनेकी शक्ति होनेपर भी उसे दण्ड न देना और उसे लोकपरलोकमें कहीं भी उस अपराधका दण्ड न मिले -- इस तरहका भाव रखते हुए उसे माफ कर देनेका नाम क्षमा है।कीर्ति? श्री और वाक् -- ये तीन प्राणियोंके बाहर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं तथा स्मृति? मेधा? धृति और क्षमा -- ये चार प्राणियोंके भीतर प्रकट होनेवाली विशेषताएँ हैं। इन सातों विशेषताओँको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।यहाँ जो विशेष गुणोंको विभूतिरूपसे कहा है? उसका तात्पर्य केवल भगवान्की तरफ लक्ष्य करानेमें है। किसी व्यक्तिमें ये गुण दिखायी दें तो उस व्यक्तिकी विशेषता न मानकर भगवान्की ही विशेषता माननी चाहिये और भगवान्की ही याद आनी चाहिये। यदि ये गुण अपनेमें दिखायी दें तो इनको भगवान्के ही मानने चाहिये? अपने नहीं। कारण कि यह दैवी(भगवान्की) सम्पत्ति है? जो भगवान्से ही प्रकट हुई है। इन गुणोंको अपना मान लेनेसे अभिमान पैदा होता है? जिससे पतन हो जाता है क्योंकि अभिमान सम्पूर्ण आसुरीसम्पत्तिका जनक है।साधकोंको जिसकिसीमें जो कुछ विशेषता? सामर्थ्य दीखे? उसे उस वस्तुव्यक्तिका न मानकर भगवान्की ही मानना चाहिये। जैसे? लोमश ऋषिके शापसे काकभुशुण्डि ब्राह्मणसे चाण्डाल पक्षी बन गये? पर उनको न भय हुआ? न किसी प्रकारकी दीनता आयी और न कोई विचार ही हुआ? प्रत्युत उनको प्रसन्नता ही हुई। कारण कि उन्होंने इसमें ऋषिका दोष न मानकर भगवान्की प्रेरणा ही मानी -- सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन। उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन।। (मानस 7। 113। 1)। ऐसे ही मनुष्य सब वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदिके मूलमें भगवान्को देखने लगे तो हर समय आनन्दहीआनन्द रहेगा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.34।।सर्वहरशब्दस्य मुख्यमर्थान्तरमाह -- अथवेति। भाविकल्याणानामित्युक्तमेव स्पष्टयति -- उत्कर्षेति। कीर्तिर्धार्मिकत्वनिमित्ता ख्यातिः। श्रीर्लक्ष्मीः? कान्तिः शोभा? वाग्वाणी सर्वस्य प्रकाशिका? स्मृतिश्चिरानुभूतस्मरणशक्तिः? मेधा ग्रन्थधारणशक्तिः? धृतिर्धैर्यम्? क्षमा मानापमानयोरविकृतचित्तता। स्त्रीषु कीर्त्यादीनामुत्तमत्वमुपपादयति -- यासामिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.34।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.34।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.34।। --,मृत्युः द्विविधः धनादिहरः प्राणहरश्च तत्र यः प्राणहरः? स सर्वहरः उच्यते सः अहम् इत्यर्थः। अथवा? परः ईश्वरः प्रलये सर्वहरणात् सर्वहरः? सः अहम्। उद्भवः उत्कर्षः अभ्युदयः तत्प्राप्तिहेतुश्च अहम्। केषाम् भविष्यतां भाविकल्याणानाम्? उत्कर्षप्राप्तियोग्यानाम् इत्यर्थः। कीर्तिः श्रीः वाक् च नारीणां स्मृतिः मेधा धृतिः क्षमा इत्येताः उत्तमाः स्त्रीणाम् अहम् अस्मि? यासाम् आभासमात्रसंबन्धेनापि लोकः कृतार्थमात्मानं मन्यते।।
───────────────────
【 Verse 10.35 】
▸ Sanskrit Sloka: बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् | मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकर: ||
▸ Transliteration: bṛhatsāma tathā sāmnāṁ gāyatrī chandasām aham | māsānāṁ mārgaśīrṣo’ham ṛtūnāṁ kusumākaraḥ ||
▸ Glossary: bṛhatsāma: Bṛhat Sāma; tathā: and; sāmnāṁ: of the Sāma Veda; gāyatrī: Gāyatrī; chandasām: of all poetry; aham: I; māsānāṁ: of the months; mārgaśīrṣaḥ: Mārgaśīrṣa; aham: I; ṛtūnāṁ: of the seasons; kusumākaraḥ: spring
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.35 Of the Sāma Veda hymns, I am the Bṛhat Sāma and of all poetry, I am the Gāyatrī. Of the months, I am Mārgaśīrṣa and of the seasons, I am Spring.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.35।।गायी जानेवाली श्रुतियोंमें बृहत्साम और वैदिक छन्दोंमें गायत्री छन्द मैं हूँ। बारह महीनोंमें मार्गशीर्ष और छः ऋतुओंमें वसन्त मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.35।। सामों (गेय मन्त्रों) में मैं बृहत्साम और छन्दों में गायत्री छन्द हूँ मैं मासों में मार्गशीर्ष (दिसम्बरजनवरी के भाग) और ऋतुओं में वसन्त हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.35 बृहत्साम Brihatsaman? तथा also? साम्नाम् among Sama hymns? गायत्री Gayatri? छन्दसाम् among metres? अहम् I? मासानाम् among months? मार्गशीर्षः Margasirsha? अहम् I? ऋतूनाम् among seasons? कुसुमाकरः the flowery season (spring).Commentary Brihatsaman is the chief of the hymns of the SamaVeda. Brihat means big.Margasirsha From the middle of December to the middle of January. This has a temperate climate. In olden days it was usual to start with this month in counting the months of the year. The first place was given to this month.Kusumakara The beautiful flowery season? the spring.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.35. Likewise, of the modes of singing [of the hymns], I am the Brhatsaman; of the metres, I am the Gayatri; of the months, I am the Margasirsa; of the seasons, I am the season abounding with flowers.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.35 Of hymns I am Brihatsama, of metres I am Garatri, among the months I am Margasheersha (December), and I am the Spring among seasons.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.35 Of Saman hymns, I am the Brhatsaman. Of meters, I am the Gayatri. Of months, I am Margasira (Nov-Dec). And of seasons I am the season of flowers.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.35 I am also the Brhat-sama of the Sama (-mantras); of the metres, Gayatri. Of the months I am Marga-sirsa, and of the seasons, spring.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.35 Among the hymns also I am the Brihatsaman; among metres Gayatri am I; among the montsh I am the Margasirsha; among the seasons (I am) the flowery season.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.35 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.35 Of Saman hymns, I am the Brhatsaman. Of meters, I am the Gayatri. Of seasons, I am the season of flowers (spring).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.35 I am tatha, also; the Brhat-sama, the foremost samnam, of the Sama-mantras. Chandasam, of the metres, of the Rk-mantras having the metres Gayatri etc.; I am the Rk called Gayatri. This is meaning. Masanam, of the months, I am Marga-sirsa (Agrahayana, November-December). Rtunam, of the seasons; kusumakarah, spring.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.35।। मैं सामों में बृहत्साम हूँ भगवान् ने पहले कहा था कि? वेदों में सामवेद मैं हूँ। अब यहाँ सामवेद में भी विशेषता बताते हैं कि मैं सामों में बृहत्साम हूँ। ऋग्वेद की जिन ऋचाओं को सामवेद में गाया जाता है? उन्हें साम कहते हैं। उनमें एक साम वह है? जिसमें इन्द्र की सर्वेश्वर के रूप में स्तुति की गई है? जिसे बृहत्साम कहते हैं? जिसका उल्लेख भगवान ने यहाँ किया है। साममन्त्रों का गायन विशिष्ट पद्धति का होने के कारण अत्यन्त कठिन है? जिन्हें सीखने के लिए वर्षों तक गुरु के पास रहकर साधना करनी पड़ती है।मैं छन्दों में गायत्री हूँ वेद मन्त्रों की रचना विविध छन्दों में की गई है। इन छन्दों में गायत्री छन्द मैं हूँ। जन्मत सभी मनुष्य संस्कारहीन होते हैं। हिन्दू धर्म में बालक का उपनयन संस्कार गायत्री मन्त्र के द्वारा ही होता है? जिसकी रचना गायत्री छन्द में है। अत इस छन्द को विशेष महत्व प्राप्त है। गायत्री में चौबीस अक्षर हैं और इस मन्त्र के द्वारा सविता देवता की उपासना की जाती है। ब्राह्मण लोग प्रातकाल और सांयकाल संध्यावन्दन के समय इस मन्त्रोच्चार के द्वारा सूर्य को अर्ध्य प्रदान करते हैं।विश्व के किसी भी धर्म में किसी एक मन्त्र का जप इतने अधिक भक्तों द्वारा निरन्तर इतने अधिक काल से नहीं किया गया है जितना कि गायत्री छन्द में बद्ध गायत्री मन्त्र का। यह मन्त्र अत्यन्त शक्तिशाली एवं प्रभावशाली माना जाता है।मैं मासों में मार्गशीर्ष हूँ अंग्रेजी महीनों के अनुसार दिसम्बर और जनवरी के भाग मार्गशीर्ष हैं। भारत में? इस मास को पवित्र माना गया है। जलवायु की दृष्टि से भी यह सुखप्रद होता है? क्योंकि इस मास में न वर्षा की आर्द्रता या सांद्रता होती है और न ग्रीष्म ऋतु की उष्णता।मैं ऋतुओं में बसन्त हूँ प्रकृति को सुस्मित करने वाली बसन्त ऋतु मैं हूँ। समस्त सृष्टि की दृश्यावलियों को अपने सतरंगी सन्देश और सुरभित संगीत से हर्ष विभोर करने वाला ऋतुराज पर्वत पुष्पों के परिधान पहनते हैं। भूमि हरितवसना होती है। सरोवर एवं जलाशय उत्फुल्ल कमलों की हंसी से खिलखिला उठते हैं। मैदानों में हरीतिमा के गलीचे बिछ जाते हैं। सभी हृदय किसी उत्सव की उमंग से परिपूर्ण हो जाते हैं। सृष्टि के हर्षातिरेक को राजतिलक करने के लिए चन्द्रिका स्वयं को और अधिक सावधानी से सँवारती है।मुझे न केवल भव्य और दिव्य में ही देखना है और न केवल सुन्दर और आकर्षक में? वरन् हीनतम से हीन में भी मुझे पहचानना है मैं हूँ? जो हूँ सुनो
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.35।।साम्नां गीतिविशेषाणआं वृहत्सामत्वामिद्धि हवामहे इत्यस्यामृचि गीतिविशेषे सर्वेश्वरत्वेनेन्द्रस्तुत्निरुपं अतिरात्रे पृष्ठस्तोत्रं श्रेष्ठत्वादहम्। नियताक्षरपादरुपच्छन्दोविशिष्ठानामृचां मध्ये द्विजत्वादिहेतुर्गायत्री ऋगहम्। मासानां मार्गशीर्षः सस्यादिसंपन्नत्वेन सुखजनकत्वात्। कुसुमाकरो वसन्तः पुषापकत्वेन शोभनत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.35।।वेदानां सामवेदोऽस्मीत्युक्तं तत्रायमन्यो विशेषः। साम्रामृगक्षरारूढानां गीतिविशेषाणां मध्येत्वामिद्धि हवामहे इत्यस्यामृचि गीतिविशेषो बृहत्साम। तच्चातिरात्रे पृष्ठस्तोत्रं सर्वेश्वरत्वेनेन्द्रस्तुतिरूपमन्यतः श्रेष्ठत्वादहम्। छन्दसां नियताक्षरपादत्वरूपच्छन्दोविशिष्टानामृचां मध्ये द्विजातेर्द्वितीयजन्महेतुत्वेन प्रातःसवनादिसवनत्रयव्यापित्वेन त्रिष्टुब्जगतीभ्यां सोमाहरणार्थं गताभ्यां सोमो न लब्धोऽक्षराणि च हारितानि जगत्या त्रीणि त्रिष्टुभैकमिति चत्वारि तैरक्षरैः सह सोमस्याहरणेन च सर्वश्रेष्ठा गायत्री ऋगहम्।चतुरक्षराणि हवा अग्रे छन्दांस्यासुस्ततो जगती सोममच्छापतत्सा त्रीण्यक्षराणि हित्वा जगाम ततस्त्रिष्टुप्सोममच्छापतत्सैकमक्षरं हित्वापतत्ततो गायत्रीसोममच्छापतत्सा तानि चाक्षराणि हरन्त्यागच्छत्सोमं च तस्मादष्टाक्षरा गायत्री त्युपक्रम्यतदाहुर्गायत्राणि वै सर्वाणि सवनानि गायत्री ह्येवैतदुपसृजामो नैतत् इति शतपथश्रुतेःगायत्री वा इदं सर्वं भूतम् इत्यादिछान्दोग्यश्रुतेश्च। मासानां द्वादशानां मध्येऽभिनवशालिवास्तूकशाकादिशाली शीतातपशून्यत्वेन च सुखहेतुर्मार्गशीर्षोऽहम्। ऋतूनां षण्णां मध्ये कुसुमाकरः सर्वसुगन्धिकुसुमानामाकरोऽतिरमणीयो वसन्तः।वसन्ते ब्राह्मण्यमुपनयीत?वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत?वसन्तेवसन्ते ज्योतिषा यजेत?तद्वै वसन्त एवाभ्यारभेत?वसन्तो वै ब्राह्मणस्यर्तुः इत्यादिशास्त्रप्रसिद्धोऽहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.35।।बृहत्सामत्वामिद्धि हवामहे इत्यस्यामृचि गीयमानं साम पृष्ठ्यस्तोत्रे विनियुक्तमिन्द्रदेवत्यं तत् साम्नां मध्येऽहमस्मि। छन्दसां मध्ये गायत्री द्विजत्वसंपादनात्सोमाहरणाच्च श्रेष्ठाहमस्मि। कुसुमाकरो वसन्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.35।।साम्नां सामऋचां मध्ये बृहत्साम मद्विभूतिरित्यर्थः। छन्दसां मध्ये गायत्री मद्विभूतिः। मासानां मध्ये मार्गशीर्षोऽहम्। ऋतूनां मध्ये कुसुमाकरो वसन्तोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.35।।बृहत्सामेति।त्वामिद्धि हवामहे इत्यस्यामृचि गीयमानं बृहत्साम तेन चेन्द्रः सर्वेश्वरत्वेन स्तूयत इति श्रैष्ठ्यं दर्शितम्। छन्दोविशिष्टानां मन्त्राणां मध्ये गायत्र्यहम्? द्विजत्वापादकत्वेन सोमाहरणेन च श्रेष्ठत्वात्। कुसुमाकरो वसन्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.35।।बृहत्सामेति। त्वामिद्धि हवामहे [ऋक्सं.4।7।21।1] इत्यस्यां ऋचि गीयमानं बृहत्साम तेन चेन्द्रः सर्वेश्वरत्वेन स्तूयत इति श्रैठ्यं दर्श्यते। छन्दसां वेदमन्त्राणां वा मध्ये गायत्री मे विभूतिः? मत्स्वरूपप्रतिपादकत्वाद्भगवत्सेवकैश्चिन्तनीया। मासानां मध्ये मार्गशीर्षोऽहं कुमारिकाकामपूरणकालत्वात् भोगयोग्यत्वाच्च मे विभूतिः। ऋतूनां मध्ये कुसुमाकरो वसन्तोऽहं वसन्तेऽग्नीनादधीत [ ] इति श्रुतौ प्राशस्त्यत्वाज्जडेष्वपि प्रमोदापादकत्वाद्वृन्दावनाविरतवृत्तित्वाच्च मे विभूतिः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.35।।तथा सामवेदके प्रकरणोंमें जो बृहत्साम नामक प्रधान प्रकरण है वह मैं हूँ। छन्दोंमें मैं गायत्री छन्द हूँ अर्थात् जो गायत्री आदि छन्दोबद्ध ऋचाएँ हैं उनमें गायत्री नामक ऋचा मैं हूँ। महीनोंमें मार्गशीर्ष नामक महीना और ऋतुओंमें बसन्त ऋतु मैं हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.35।। व्याख्या -- बृहत्साम तथा साम्नाम् -- सामवेदमें बृहत्साम नामक एक गीति है। इसके द्वारा इन्द्ररूप परमेश्वरकी स्तुति की गयी है। अतिरात्रयागमें यह एक पृष्ठस्तोत्र है। सामवेदमें सबसे श्रेष्ठ होनेसे इस बृहत्सामको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है (टिप्पणी प0 564)।गायत्री छन्दसामहम् -- वेदोंकी जितनी छन्दोबद्ध ऋचाएँ हैं? उनमें गायत्रीकी मुख्यता है। गायत्रीको वेदजननी कहते हैं क्योंकि इसीसे वेद प्रकट हुए हैं। स्मृतियों और शास्त्रोंमें गायत्रीकी बड़ी भारी महिमा गायी गयी है। गायत्रीमें स्वरूप? प्रार्थना और ध्यान -- तीनों परमात्माके ही होनेसे इससे परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। इसलिये भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।मासानां मार्गशीर्षोऽहम् -- जिस अन्नसे सम्पूर्ण प्रजा जीवित रहती है? उस (वर्षासे होनेवाले) अन्नकी उत्पत्ति मार्गशीर्ष महीनेमें होती है। इस महीनेमें नये अन्नसे यज्ञ भी किया जाता है। महाभारतकालमें नया वर्ष मार्गशीर्षसे ही आरम्भ होता था। इन विशेषताओंके कारण भगवान्ने मार्गशीर्षको अपनी विभूति बताया है।ऋतूनां कुसुमाकरः -- वसन्त ऋतुमें बिना वर्षाके ही वृक्ष? लता आदि पत्रपुष्पोंसे युक्त हो जाते हैं। इस ऋतुमें न अधिक गरमी रहती है और न अधिक सरदी। इसलिये भगवान्ने वसन्त ऋतुको अपनी विभूति कहा है।इन सब विभूतियोंमें जो महत्ता? विशेषता दीखती है? वह केवल भगवान्की ही है। अतः चिन्तन केवल भगवान्का ही होना चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N --,विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.35।।वेदानां सामवेदोऽस्मीत्युक्तं तत्रावान्तरविशेषमाह -- बृहदिति। छन्दसां मध्ये गायत्री नाम यच्छन्दस्तदहमित्ययुक्तं छन्दसामृग्भ्योऽतिरेकेण स्वरूपभावादित्याशङ्क्याह -- गायत्र्यादीति।,द्विजातेर्द्वितीयजन्मजननीत्वादित्यर्थः। मार्गशीर्षो मृगशीर्षेण युक्ता पौर्णमास्यस्मिन्निति मार्गशीर्षो मासः सोऽहं पक्वसस्याढ्यत्वादित्याह -- मासानामिति। वसन्तो रमणीयत्वादिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.35।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.35।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.35।। --,बृहत्साम तथा साम्नां प्रधानमस्मि। गायत्री च्छन्दसाम् अहं गायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टानामृचां गायत्री ऋक् अहम् अस्मि इत्यर्थः। मासानां मार्गशीर्षः अहम्? ऋतूनां कुसुमाकरः वसन्तः।।
───────────────────
【 Verse 10.36 】
▸ Sanskrit Sloka: द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् | जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्वं सत्ववतामहम् ||
▸ Transliteration: dyūtaṁ chalayatām asmi tejas tejasvinām aham | jayo’smi vyavasāyo’smi sattvaṁ sattvavatām aham ||
▸ Glossary: dyūtaṁ: gambling; chalayatām: of all cheating; asmi: I am; tejaḥ: effulgence; tejasvināṁ: of all the effulgent things; aham: I; jayaḥ: victory; asmi: I am; vyavasāyaḥ: of all adventure; asmi: I am; sattvaṁ: the satvic nature; sattvavatām: of those who are tranquil; aham: I
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.36 Of all the cheating, I am Gambling. Of the effulgent things, I am the Effulgence. I am Victory, I am Effort, I am the Goodness (sattva) of those who are with satva (good) quality.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.36।।छल करनेवालोंमें जूआ और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। जीतनेवालोंकी विजय? निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक मनुष्योंका सात्त्विक भाव मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.36।। मैं छल करने वालों में द्यूत हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ? मैं विजय हूँमैं व्यवसाय (उद्यमशीलता) हूँ और सात्विक पुरुषों का सात्विक भाव हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.36 द्यूतम् the gambling? छलयताम् of the fraudulent? अस्मि (I) am? तेजः splendour? तेजस्विनाम् of the splendid? अहम् I? जयः victory? अस्मि (I) am? व्यवसायः determination? अस्मि (I) am? सत्त्वम् the goodness? सत्त्ववताम् of the good? अहम् I.Commentary Of the methods of defrauding others I am gambling such as diceplay. Gambling is My manifestation. I am the power of the powerful. I am the victoyr of the victorious. I am the effort of those who make that effort.I am Sattva which assumes the forms of Dharma (virtue)? Jnana (knowledge)? Vairagya (dispassion)? and Aisvarya (wealth or lordship) in Sattvic persons.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.36. I am gambling of the fradulent; I am the brilliance of the brilliant; I am the victory; I am the resolution; I am the energy of the energetic.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.36 I am the Gambling of the cheat and the Splendour of the splendid; I am Victory; I am Effort; and I am the Purity of the pure.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.36 Of the fraudulent, I am gambling. I am the brilliance of the brilliant. I am victory, I am effort. I am the magnanimity of the magnanimous.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.36 Of the fraudulent I am the gambling; I am the irresistible ?nd of the mighty. I am excellene, I am effort, I am the sattva ality of those possessed of sattva.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.36 I am the gambling of the fraudulent; I am the splendour of the splendid; I am victory; I am determination (of those who are determined); I am the goodness of the good.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.36 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.36 Of those who practise fraud with a view to defeat each other, I am gambling such a dice-play etc., I am the victory of those who achieve victory. I am the effort of those who make effort. I am the magnanimity of those who possess magnanimity of mind.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.36 Chalayatam, of the fraudulent, of the deceitful; I am the dyutam, gambling, such as playing with dice. I am the tejah, irresistible ?nd; tejasvinam, of the mighty. [Some translate this as 'the splendour of the splendid'.-Tr.] I am the jayah, excellence of the excellent. [Some translate this as 'the victory of the victorious'.-Tr.] I am the vyavasayah, effort of the persevering. I am the sattvam, sattva ality; [The result of sattva, viz virtue, knowledge, detachment, etc.] sattvavatam, of those possessed of sattva.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.36।। मैं द्यूत हूँ गीता का उपदेश अपने समय के एक क्षत्रिय राजा योद्धा अर्जुन को दिया गया था। इसका उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने? धर्मप्रचारक के महान् उत्साह के साथ? अर्जुन को उसके अपने ही धर्म का बोध कराने के लिए किया था इसलिए गीता का प्रयत्न हिन्दुओं को ही हिन्दू बनाने का है? उन्हें स्वधर्म का पुनर्बोध कराने का है। यह पुनर्बोध का कार्य तब तक सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता जब तक हमारे धर्मशास्त्रों का मर्म सामान्य जनता को उसकी ही भाषा में समझाया नहीं जाता। यहाँ दिया हुआ उदाहरण अर्जुन को तत्क्षण ही समझ में आने जैसा है। कारण यह है कि उसका सम्पूर्ण जीवन दुखों की एक शृंखला थी? जिसे उसे सहन करना पड़ा था? केवल अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की द्यूत खेलने के व्यसन के कारण। कोई अन्य दृष्टान्त अर्जुन के लिए इतना सुबोध नहीं हो सकता था।आधुनिक पीढ़ी को सम्भवत यह उदाहरण इतना अधिक सुबोध न प्रतीत होता हो? क्योंकि अब द्यूत का खेल अधिक लोकप्रिय नहीं रहा है। किन्तु उसके स्थान पर अन्य उदाहरण सरलता से पहचाने जा सकते हैं।मैं तेजस्वियों का तेज हूँ विभूति के इस दृष्टान्त का उपयोग जो साधक ध्यानाभ्यास के लिए करना चाहेगा? उसे ज्ञात होगा कि यहाँ शास्त्र ने कुछ कहा ही नहीं है। तेजस्वी वस्तुओं का जो तेज है? उसमें उस वस्तु के गुण नहीं होते हैं। उस तेज में अपने स्वयं के गुण भी नहीं होते तेज केवल एक अनुभव है। इस अनुभव को सहज सुगम बनाने के लिए? मन उस वस्तु के परिमाण और वैभव को प्रकाशित करता है? परन्तु अनुभूति तेज में उस वस्तु के उपादान भूत पदार्थ के कुछ भी गुण नहीं होते। संक्षेप में जैसा कि श्रीरामकृष्ण परमहंस ने एक बार कहा था निसन्देह सत्य एक प्रकाश है? परन्तु वह गुणरहित प्रकाश है।मैं विजय हूँ उद्यमशीलता हूँ और मैं साधुओं की साधुता हूँ जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है? यहाँ भी ये गुण मन की उस स्थिति या दशा को बताते हैं? जो इस प्रकार के निरन्तर चिन्तन से निर्मित होती है। जब उद्यमशीलता और साधुता जैसे गुणों को बनाये रखा जाता है? तब मन अत्यन्त शान्त और स्थिर हो जाता है जिसमें चैतन्य आत्मा का प्रतिबिम्वित वैभव इतना स्पष्टऔर तेजस्वी होता है कि मानो वही स्वयं सत्य है। अत पूर्वकथित गुणों की प्रत्यारोपण की भाषा में भगवान् कहते हैं कि ये गुण ही मैं हूँ? जबकि वस्तुत ये अन्तकरण के धर्म हैं।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ अनेकता में एक परमात्मा की विद्यमानता दर्शाने के लिए जो 54 उदाहरण दिये गये हैं? वे सब एक निष्ठावान साधक को ध्यान के लिए बताये हुए अभ्यास हैं। यह कोई दृश्य पदार्थ का वर्णन नहीं समझना चाहिए। इन श्लोकों के तात्पर्यार्थ को जब तक साधक अपने निज के अनुभव से नहीं समझता? तब तक उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं कही जा सकती।भगवान् और भी दृष्टान्त देते हुए कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.36।।छलस्य परवञ्चनस्य कर्तृ़णां मध्ये द्यूतं अक्षदेवनादिरुपम्। जेतृ़णां जयस्य कर्तृ़णाम्। व्यवसायो निश्चयः फलहेतुरुद्यमो वा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.36।।छलयतां छलस्य परवञ्चनस्य कर्तृ़णां संबन्धि द्यूतमक्षदेवनादिलक्षणं सर्वस्वापहारकारणमहमस्मि। तेजस्विनामत्युग्रप्रभावानां संबन्धि तेजोऽप्रतिहताज्ञत्वमहमस्मि। जेतृ़णां पराजितापेक्षयोत्कर्षलक्षणो जयोऽस्मि। व्यवसायिनां व्यवसायः फलाव्यभिचार्युद्यमोऽहमस्मि। सत्त्ववतां सात्त्विकानां धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्यलक्षणं सत्त्वकार्यमेवात्र सत्त्वमहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.36।।व्यवसायो निश्चय उद्यमो वा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.36।।द्यूतमिति। छलयतां वञ्चकानां मध्ये द्यूतमस्मि? येन क्रीडाक्षात्त्रादिधर्मज्ञानेन मोहितो जानन्नपि वञ्चति। तेजस्विनां प्रभावतां मध्ये तेजः प्रभा अहमस्मि। जयतां मध्ये जयोऽस्मि। व्यवसायिनामुद्यमवतां निश्चयवतां वा व्यवसायः उद्यमः निश्चयो वाऽस्मि। सत्त्ववतां सात्त्विकानां मध्ये सत्त्वमहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.36।। द्यूतमिति। छलयतामन्योन्यवञ्चनपराणां संबन्धि द्यूतमस्मि। तेजस्विनां प्रभावतां तेजः प्रभावोऽस्मि। जेतृ़णां जयोऽस्मि। व्यवसायिनामुद्यमवतां व्यवसाय उद्यमोऽस्मि। सत्त्ववतां सात्त्विकानां सत्त्वमहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.36।।द्यूतमिति। छलयतां सम्बन्धि धर्मद्यूतं छलमहम् यथा युधिष्ठिरे भगवत्सेवोपयोगिक्रीडासाधनेष्वक्षलक्षणेषु द्यूतं वा भगवद्विभूतिः। तत्र च तेजस्विनां मध्येऽहङ्काररूपं तेजो मद्विभूतिः। दासोऽस्मीति वा भागवतं वा तत् तत्र जयोऽपि चाहं रुक्मीकालिङ्गप्रसङ्गेऽक्षगोष्ठ्यां [भाग.10] बलभद्रनिष्ठः सत्यवागुदितो जयो मे विभूतिः। अन्योऽपि तथा भावनीयः व्यवसाय इत्यादिः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.36।।छल करनेवालोंमें जो पासोंसे खेलना आदि द्यूत है वह मैं हूँ। तेजस्वियोंका मैं तेज हूँ। जीतनेवालोंका मैं विजय हूँ। निश्चय करनेवालोंका निश्चय ( अथवा उद्यमशीलोंका उद्यम ) हूँ और सत्त्वयुक्त पुरुषोंका अर्थात् सात्त्विक पुरुषोंका मैं सत्त्वगुण हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.36।। व्याख्या -- द्यूतं छलयतामस्मि -- छल करके दूसरोंके राज्य? वैभव? धन? सम्पत्ति आदिका (सर्वस्वका) अपहरण करनेकी विशेष सामर्थ्य रखनेवाली जो विद्या है? उसको जूआ कहते हैं। इस जूएको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। शङ्का -- यहाँ भगवान्ने छल करनेवालोंमें जूएको अपनी विभूति बताया है तो फिर इसके खेलनमें क्या दोष है अगर दोष नहीं है तो फिर शास्त्रोंने इसका निषेध क्यों किया है। समाधान -- ऐसा करो और ऐसा मत करो -- यह शास्त्रोंका विधिनिषेध कहलाता है। ऐसे विधिनिषेधका वर्णन यहाँ नहीं है। यहाँ तो विभूतियोंका वर्णन है। मैं आपका चिन्तन कहाँकहाँ करूँ -- अर्जुनके इस प्रश्नके अनुसार भगवान्ने विभूतियोंके रूपमें अपने चिन्तनकी बात ही बतायी है अर्थात् भगवान्का चिन्तन सुगमतासे हो जाय? इसका उपाय विभूतियोंके रूपमें बताया है। अतः जिस समुदायमें मनुष्य रहता है? उस समुदायमें जहाँ दृष्टि पड़े? वहाँ संसारको न देखकर भगवान्को ही देखे क्योंकि भगवान् कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरेसे व्याप्त है अर्थात् इस जगत्में मैं ही व्याप्त हूँ? परिपूर्ण हूँ (गीता 9। 4)।जैसे किसी साधकका पहले जूआ खेलनेका व्यसन रहा हो और अब वह भगवान्के भजनमें लगा है। उसको कभी जूआ याद आ जाय तो उस जूएका चिन्तन छोड़नेके लिये वह उसमें भगवान्का चिन्तन करे कि इस जूएके खेलमें हारजीतकी विशेषता है? वह भगवान्की ही है। इस प्रकार जूएमें भगवान्को देखनेसे जूएका चिन्तन तो छूट जायगा और भगवान्का चिन्तन होने लगेगा। ऐसे ही किसी दूसरेको जूआ खेलते देखा और उसमें हारजीतको देखा? तो हराने और जितानेकी शक्तिको जूएकी न मानकर भगवान्की ही माने। कारण कि खेल तो समाप्त हो रहा है और समाप्त हो जायगा? पर परमात्मा उसमें निरन्तर रहते हैं और रहेंगे। इस प्रकार जुआ आदिको विभूति कहनेका तात्पर्य भगवान्के चिन्तनमें है (टिप्पणी प0 565.1)।जीव स्वयं साक्षात् परमात्माका अंश है? पर इसने भूलसे असत् शरीरसंसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। अगर यह संसारमें दीखनेवाली महत्ता? विशेषता? शोभा आदिको परमात्माकी ही मानकर परमात्माका चिन्तन करेगा तो यह परमात्माकी तरफ जायगा अर्थात् इसका उद्धार हो जायगा (गीता 8। 14) और अगर महत्ता? विशेषता? शोभा आदिको संसारकी मानकर संसारका चिन्तन करेगा तो यह संसारकी तरफ जायगा अर्थात् इसका पतन हो जायगा (गीता 2। 62 63)। इसलिये परमात्माका चिन्तन करते हुए परमात्माको तत्त्वसे जाननेके उद्देश्यसे ही इन विभूतियोंका वर्णन किया गया है।तेजस्तेजस्विनामहम् (टिप्पणी प0 565.2) -- महापुरुषोंके उस दैवीसम्पत्तिवाले प्रभावका नाम तेज है? जिसके सामने पापी पुरुष भी पाप करनेमें हिचकते हैं। इस तेजको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।जयोऽस्मि -- विजय प्रत्येक प्राणीको प्रिय लगती है। विजयकी यह विशेषता भगवान्की है। इसलिये विजयको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।अपने मनके अनुसार अपनी विजय होनेसे जो सुख होता है? उसका उपभोग न करके उसमें भगवद्बुद्धि करनी चाहिये कि विजयरूपसे भगवान् आये हैं।व्यवसायोऽस्मि -- व्यवसाय नाम एक निश्चयका है। इस एक निश्चयकी भगवान्ने गीतामें बहुत महिमा गायी है जैसे -- कर्मयोगीकी निश्चयात्मिका बुद्धि एक होती है (2। 41) भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त पुरुषोंकी निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती (2। 44) अब तो मैं केवल भगवान्का भजन ही करूँगा -- इस एक निश्चयके बलपर दुराचारीसेदुराचारी मनुष्यको भी भगवान् साधु बताते हैं (9। 30)। इस प्रकार भगवान्की तरफ चलनेका जो निश्चय है? उसको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है।निश्चयको अपनी विभूति बतानेका तात्पर्य है कि साधकको ऐसा निश्चय तो रखना ही चाहिये? पर इसको अपना गुण नहीं मानना चाहिये? प्रत्युत ऐसा मानना चाहिये कि यह भगवान्की विभूति है और उन्हींकी कृपासे मुझे प्राप्त हुई है।सत्त्वं सत्त्ववतामहम् -- सात्त्विक मनुष्योंमें जो सत्त्व गुण है? जो सात्त्विक भाव और आचरण है? वह भी भगवान्की विभूति है। तात्पर्य है कि रजोगुण और तमोगुणको दबाकर जो सात्त्विक भाव बढ़ता है? उस सात्त्विक भावको साधक अपना गुण न मानकर भगवान्की विभूति माने।तेज? व्यवसाय? सात्त्विक भाव आदि अपनेमें अथवा दूसरोंमें देखनेमें आयें तो साधक इनको अपना अथवा किसी वस्तुव्यक्तिका गुण न माने? प्रत्युत भगवान्का ही गुण माने। उन गुणोंकी तरफ दृष्टि जानेपर उनमें तत्त्वतः भगवान्को देखकर भगवान्को ही याद करना चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.36।।द्यूतमुक्तलक्षणं सर्वस्वापहारकारणमन्यापदेशेन पराभिप्रेतं निघ्नतां स्वाभिप्रेतं वा संपादयतामित्याह -- छलस्येति। तेजोऽप्रतिहताज्ञा? उत्कर्षो जयः? व्यवसायः फलहेतुरुद्यमः? धर्मज्ञानवैराग्यादि सत्त्वकार्यं सत्त्वम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.36।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.36।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.36।। --,द्यूतम् अक्षदेवनादिलक्षणं छलयतां छलस्य कर्तृ़णाम् अस्मि। तेजस्विनां तेजः अहम्। जयः अस्मि जेतृ़णाम्? व्यवसायः अस्मि व्यवसायिनाम्? सत्त्वं सत्त्ववतां सात्त्विकानाम् अहम्।।
───────────────────
【 Verse 10.37 】
▸ Sanskrit Sloka: वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि पाण्डवानां धनञ्जय: | मुनीनामप्यहं व्यास: कवीनामुशना कवि: ||
▸ Transliteration: vṛṣṇīnāṁ vāsudevo’smi pāṇḍavānāṁ dhanañjayaḥ I munīnāmapyahaṁ vyāsaḥ kavīnāmuśanā kaviḥ ||
▸ Glossary: vṛṣṇīnāṁ: of the Vṛṣṇis; vāsudevaḥ: Vāsudeva; asmi: I am; pāṇḍavānāṁ: of the Pāṇḍavas; dhanañjayaḥ: Dhanañjaya; munīnām: of the sages; api: also; ahaṁ: I; vyāsaḥ: Vyāsa; kavīnām: of the thinkers; uśanā: Uśāna; kaviḥ: seer
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.37 Of the descendants of Vṛṣṇi, I am Vāsudeva Kṛṣṇa. Of the Pāṇḍavas, I am Arjuna. Of the sages, I am also Vyāsa and of the seer, I am Uśāna.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.37।।वृष्णिवंशियोंमें वासुदेव और पाण्डवोंमें धनञ्जय मैं हूँ। मुनियोंमें वेदव्यास और कवियोंमें शुक्राचार्य भी मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.37।। मैं वृष्णियों में वासुदेव हूँ और पाण्डवों में धनंजय? मैं मुनियों में व्यास और कवियों में उशना कवि हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.37 वृष्णीनाम among the Vrishnis? वासुदेवः Vaasudeva? अस्मि (I) am? पाण्डवानाम् among the Pandavas? धनञ्जयः Dhananjaya? मुनीनाम् among the sages? अपि also? अहम् I? व्यासः Vyasa? कवीनाम् among poets? उशनाः Usanas? कविः the poet.Commentary Vrishnis are Yadavas or the descendants of Yadu. I am the foremost among them.Usanas is Sukracharya? the preceptor of the demons.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.37. Of the Vrsnis (the members of the Vrsni clan), I am the son of Vasudeva; of the sons of Pandu, Dhananjaya (Arjuna) [I am]; of the sages too, I am Vyasa; of the seers, the seer Usanas.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.37 I am Shri Krishna among the Vishnu-clan and Arjuna among the Pandavas; of the saints I am Vyasa, and I am Shukracharya among the sages.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.37 Of Vrsnis I am Vasudeva. Of Pandavas, I am Arjuna. Of sages I am Vyasa and of seers, I am Usana (Sukra).
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.37 Of the vrsnis [The clan to which Sri krsna belonged, known otherwise as the Yadavas.] I am Vasudeva; of the Pandavas, Dhananjaya (Arjuna). And of the wise, I am Vyasa; of the omniscient, the omniscient Usanas.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.37 Among the Vrishnis I am Vaasudeva; among the Pandavas I am Arjuna; among the sages I am Vyasa; among the Poets I am Usanas, the poet.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.37 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.37 Here the Supreme Vibhuti (manifestation) is that of being the son of Vasudeva, because no other meaning is possible. Of sons of Pandu, I am Dhananjaya or Arjuna. Of sages who perceive truth by meditation, I am Vyasa. The seers are those who are wise.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.37 Vrsninam, of the Vrsnis, [Here Ast. adds yadavanam, of the Yadavas.-Tr.] I am Vasudeva- I who am this person, your friend. Pandavanam, of the Pandavas, (I am) Dhananjaya, you yourself. Api, and; muninam, of the wise, of the thoughtful, of those who know of all things, I am Vyasa. kavinam, of the omniscient (i.e. of the those who know the past, present and future), I am the omniscient Usanas (Sukracarya).
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.37।। मैं वृष्णियों में वासुदेव हूँ यादवों के पूर्वज यदु के वृष्णि नामक एक पुत्र था। इन वृष्णियों के वंश में वसुदेव का जन्म हुआ था। उनका विवाह मथुरा के क्रूर कंस ऋ़ी बहन देवकी के साथ सम्पन्न हुआ। इनके पुत्र थे श्रीकृष्ण। वसुदेव के पुत्र होने के कारण वे वासुदेव के नाम से विख्यात हुए।मैं पाण्डवों में धनंजय हूँ जिस प्रकार श्रीकृष्ण के पराक्रम से यादव कुल और वृष्णि वंश कृतार्थ और विख्यात होकर मनुष्य की स्मृति में बने रहे? उसी प्रकार पाण्डवों में धनंजय अर्जुन का स्थान था? जिसके बिना पाण्डवों को कुछ भी उपलब्धि नहीं हो सकती थी। धनंजय का वाच्यार्थ है धन को जीतने वाला। अर्जुन को अपने पराक्रम के कारण यह नाम उपाधि स्वरूप प्राप्त,हुआ था।मैं मुनियों में व्यास हूँ गीता के रचयिता स्वयं व्यास जी होने के कारण कोई इसे आत्मप्रशंसा का भाग नहीं समझे। व्यास एक उपाधि अथवा धारण किया हुआ नाम है। उस युग में दार्शनिक एवं धार्मिक लेखन के क्षेत्र में जो एक नयी शैली का अविष्कार तथा प्रारम्भ किया गया उसे व्यास नाम से ही जाना जाने लगा अर्थात् व्यास शब्द उस शैली का संकेतक बन गया। यह नवीन शैली क्रान्तिकारी सिद्ध हुई? क्योंकि उस काल तक दार्शनिक साहित्य सूत्र रूप मन्त्रों में लिखा हुआ था पुराणों की रचना के साथ एक नवीन पद्धति का आरम्भ और विकास हुआ? जिसमें सिद्धांतों को विस्तृत रूप से समझाने का उद्देश्य था। इसके साथ ही उसमें मूलभूत सिद्धांतों को बारम्बार दाेहरा कर उस पर विशेष बल दिया जाता था। इस पद्धति का प्रारम्भ और विकास कृष्ण द्वैपायन जी ने व्यास नाम धारण करके किया। व्यास शब्द का वाच्यार्थ है? विस्तार।इस प्रकार समस्त मुनियों में अपने को व्यास कहने में भगवान् का अभिप्राय यह है कि सभी मननशील पुरुषों में? भगवान् वे हैं जो पुराणों की अपूर्व और अतिविशाल रचना के रचयिता हैं।मैं कवियों में उशना कवि हूँ उशना शुक्र का नाम है। शुक्र वेदों में विख्यात हैं। कवि का अर्थ है क्रान्तिदर्शी अर्थात् सर्वज्ञ।उपनिषदों में कवि शब्द का अर्थ मन्त्रद्रष्टा भी है। आत्मानुभूति से अनुप्राणित हुए जो ज्ञानी पुरुष अहंकार के रंचमात्र भान के बिना? अपने स्वानुभवों को उद्घोषित करते थे? वे कवि कहलाते थे। कालान्तर में इस शब्द के मुख्यार्थ का शनैशनै लोप होकर वर्तमान में कविता के रचयिता को ही कवि कहा जाने लगा। ये कवि भी भव्य एवं आश्चर्यपूर्ण विश्व को देखकर लौकिक स्तर से ऊपर उठकर अपने उत्स्फूर्त तेजस्वी भावनाओं या विचारों के जगत् में प्रवेश कर जातें हैं? और अपने हृदय की अन्तरतम गहराई से काव्य का सस्वर गान करते हैं। यहाँ कवि शब्द उसके मुख्यार्थ में प्रयुक्त है।अपनी विभूतियों के विस्तार को बताते हुए भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.37।।मुनीनां मौनशीलानां सकलपदार्थविदां कवीनां क्रान्तदर्शिनां उशना शुक्रः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.37।।साक्षादीश्वरस्यापि विभूतिमध्ये पाठस्तेन रूपेण चिन्तनार्थ इति प्रागेवोक्तम्। वृष्णीनां मध्ये वासुदेवो वसुदेवपुत्रत्वेन प्रसिद्धस्त्वदुपदेष्टायमहम्। तथा पाण्डवानां मध्ये धनंजयस्त्वमेवाहम्। मुनीनां मननशीलानामपि मध्ये वेदव्यासोऽहम्। कवीनां क्रान्तदर्शिनां सूक्ष्मार्थविवेकिनां मध्ये उशना कविरिति ख्यातः शुक्रोऽहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.37।।वृष्णीनां यादवानाम्। उशना शुक्रः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.37।।वृष्णीनामिति। वृष्णीनां यादवानां सर्वेषां मध्ये हृदये वासुदेवः सर्वमोक्षदाता क्रीडार्थम् अंशैरस्मि? सर्वे यादवा मद्विभूतिरूपा इत्यर्थः। पाण्डवानां मध्ये धनञ्जयस्त्वमेवास्मि। मुनीनां ब्रह्ममननशीलानां मध्ये व्यासः कृष्णद्वैपायनोऽस्मि। कवीनां निर्दुष्टस्वरशब्दप्रदर्शिनां मध्ये उशना कविः शुक्रोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.37।। वृष्णीनामिति। वासुदेवो योऽहं त्वामुपदिशामि। धनंजयस्त्वमेव मद्विभूतिः। मुनीनां वेदार्थमननशीलानां वेदव्यासोऽहमस्मि। कवीनां काव्यदर्शिनां मध्ये उशनानाम कविः शुक्रः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.37।।यदुष्वपि स्वस्य विभूतिव्याप्तिमाह -- वृष्णीनामिति। यादवानां मध्ये वासुदेवत्वधर्ममयो भगवान् चिन्त्योऽहं (जातोऽहम्)। तेन वासुदेवो मे पुरुषोत्तमस्य विभूतिः। व्यवसायिनां फलाव्यभिचार्युद्यमविभूतिर्वसुदेवगृहे जातो धर्ममयोऽहमन्यत्र केवल इत्यभियुक्तपादाः। यद्वा वसुदेवसुतो यो बलभद्रः स मे विभूतिरिति सोऽहम्। पाण्डवानां पञ्चानां मध्ये त्वं त्वहमेव नरो हि नाम नारायणांशः प्रसिद्धः। मुनीनां मननशीलानां वेदार्थमननशीलानां मध्ये कृष्णद्वैपायनोऽहम्। उशना शुक्रः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.37।।वृष्णिवंशियोंमें यह तुम्हारा सखा वासुदेव मैं हूँ। पाण्डवोंमें धनंजय अर्थात् तू ही मैं हूँ। मुनियोंमें अर्थात् मनन करनेवालोंमें और सब पदार्थोंको जाननेवालोंमें भी मैं व्यास हूँ। कविवोंमें अर्थात्,त्रिकालदर्शियोंमें मैं शुक्राचार्य हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.37।। व्याख्या -- वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि -- यहाँ भगवान् श्रीकृष्णके अवतारका वर्णन नहीं है? प्रत्युत वृष्णिवंशियोंमें अपनी जो विशेषता है? उस विशेषताको लेकर भगवान्ने अपना विभूतिरूपसे वर्णन किया है।यहाँ भगवान्का अपनेको विभूतिरूपसे कहना तो संसारकी दृष्टिसे है? स्वरूपकी दृष्टिसे तो वे साक्षात् भगवान् ही हैं। इस अध्यायमें जितनी विभूतियाँ आयी हैं? वे सब संसारकी दृष्टिसे ही हैं। तत्त्वतः तो वे,परमात्मस्वरूप ही हैं।पाण्डवानां धनञ्जयः -- पाण्डवोंमें अर्जुनकी जो विशेषता है? वह विशेषता भगवान्की ही है। इसलिये भगवान्ने अर्जुनको अपनी विभूति बताया है।मुनीनामप्यहं व्यासः -- वेदका चार भागोंमें विभाग? पुराण? उपपुराण? महाभारत आदि जो कुछ संस्कृत वाङ्मय है? वह सबकासब व्यासजीकी कृपाका ही फल है। आज भी कोई नयी रचना करता है तो उसे भी व्यासजीका ही उच्छिष्ट माना जाता है। कहा भी है -- व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्। इस तरह सब मुनियोंमें व्यासजी मुख्य हैं। इसलिये भगवान्ने व्यासजीको अपनी विभूति बताया है। तात्पर्य है कि व्यासजीमें विशेषता दीखते ही भगवान्की याद आनी चाहिये कि यह सब विशेषता भगवान्की है और भगवान्से ही आयी है।कवीनामुशना कविः -- शास्त्रीय सिद्धान्तोंको ठीक तरहसे जाननेवाले जितने भी पण्डित हैं? वे सभी कवि कहलाते हैं। उन सब कवियोंमें शुक्राचार्यजी मुख्य हैं। शुक्राचार्यजी संजीवनी विद्याके ज्ञाता हैं। इनकी शुक्रनीति
Chapter 10 (Part 15)
प्रसिद्ध है। इस प्रकार अनेक गुणोंके कारण भगवान्ने इन्हें अपनी विभूति बताया है।इन विभूतियोंकी महत्ता देखकर कहीं भी बुद्धि अटके? तो उस महत्ताको भगवान्की माननी चाहिये क्योंकि वह महत्ता एक क्षण भी स्थायीरूपसे न टिकनेवाले संसारकी नहीं हो सकती।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.37।।उशना शुक्रः? कविशब्दोऽत्र यौगिको न रूढः पौनरुक्त्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.37।।वृष्णीनां वासुदेवोऽस्मि इति वासुदेवशब्दं व्याचिकीर्षुर्वासुशब्दार्थं तावदाह -- आच्छादयतीति।वस आच्छादने [धा.पा.2।13] इत्यत उण्। वासयति सर्वमिति वर्तते।वस निवासे [धा.पा.1।1030] इत्यतो ण्यन्तादुण्। वसति चेति केवलादुणेव वा। ततः किमायातं वासुदेवशब्दस्य इत्यत आह -- देवेति। तथाहि,देवशब्दार्थमित्यत्र ततः कर्मधारयः। विश्वं समस्तं भूत्वा प्राप्यभू प्राप्तावात्मनेपदी [धा.पा.10।311] इति वचनात् सर्वभूताधिवासश्चेति तत्पुरुषो बहुव्रीहिश्च। अत्रापि देवशब्दार्थो ग्राह्यः।मुनीनामप्यहं व्यासः इति व्यासशब्दं व्याचष्टे -- विशिष्ट इति। सर्वस्माद्विशिष्ट इति विशब्दार्थः। आ इत्यनुवादेन समन्तादिति व्याख्यानम्। स इत्यस्य एवेति।सृ गतौ [धा.पा.1।860]सृप्लृ गतौ [धा.पा.1।1008] इत्यतो वा डे रूपमेतत्? न तु तदः? व्यासमित्याद्यनुपपत्तेः। समन्ताद्गतः सर्वगत इत्यर्थः? स व्यासः। कुतः वीति हेतोः। कोऽर्थः तमपोऽर्थो हि विशब्दः उत्तरत उपरिष्टात् यच्च किञ्चिदिति भगवतः सर्वगतत्वे प्रमाणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.37।।आच्छादयति सर्वं वासयति वसति चेति सर्वत्र वासुदेवः। देवशब्दार्थ उक्तः पुरस्तात् -- छन्दयामि जगद्विश्वं भूत्वा सूर्य इवांशुभिः। सर्वभूताधिवासश्च वासुदेवस्ततोऽस्म्यहम् इति मोक्षधर्मे। विशिष्टः सर्वस्मादा समन्तात्स एवेति व्यासः। तथा चाग्निवेश्यशाखायाम् सव्यासो वीति तमप् वै विः सोऽधस्तात्स उत्तरतः स पश्चात्स पूर्वस्मात्स दक्षिणतः स उत्तरत इति इति यच्च किञ्चिज्जगत्सर्वं दृश्यते श्रूयतेऽपि वा। अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः इति च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.37।। --,वृष्णीनां यादवानां वासुदेवः अस्मि अयमेव अहं त्वत्सखा। पाण्डवानां धनंजयः त्वमेव। मुनीनां मननशीलानां सर्वपदार्थज्ञानिनाम् अपि अहं व्यासः? कवीनां क्रान्तदर्शिनाम् उशना कविः अस्मि।।
───────────────────
【 Verse 10.38 】
▸ Sanskrit Sloka: दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् | मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ||
▸ Transliteration: daṇḍo damayatām asmi nītirasmi jigīṣatām | maunaṁ caivāsmi guhyānāṁ jñānaṁ jñānavatāmaham ||
▸ Glossary: daṇḍaḥ: rod of punishment; damayatām: of all punishments; asmi: I am; nītiḥ: morality; asmi: I am; jigīṣatām: of the victorious; maunaṁ: silence; ca: and; evā: also; asmi: I am; guhyānāṁ: of the secrets; jñānaṁ: knowledge; jñānavatāṁ: of the wise; aham: I
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.38 Of rulers, I am their Sceptre. Of the victorious, I am Statesmanship. Of all secrets, I am also Silence. Of the wise, I am Wisdom.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.38।।दमन करनेवालोंमें दण्डनीति और विजय चाहनेवालोंमें नीति मैं हूँ। गोपनीय भावोंमें मौन और ज्ञानवानोंमें ज्ञान मैं हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.38।। मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ और विजयेच्छुओं की नीति हूँ मैं गुह्यों में मौन हूँ और ज्ञानवानों का ज्ञान हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.38 दण्डः the sceptre? दमयताम् among punishers? अस्मि (I) am? नीतिः statesmanship? अस्मि (I) am? जिगीषताम् among thoese who seek victory? मौनम् silence? च and? एव also? अस्मि (I) am? गुह्यानाम् among secrets? ज्ञानम् the knowledge? ज्ञानवताम् among the knowers? अहम् I.Commentary Niti Diplomacy? polity.Maunam The silence produced by constant meditation on Brahman or the Self.Jnanam Knowledge of the Self.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.38. I am the punishment [at the hands] of the punishers; I am the political wisdom of those who seek victory; I am also silence of the secret ones; I am the knowledge of the knowers.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.38 I am the Sceptre of rulers, the Strategy of the conquerors, the Silence of mystery, the Wisdom of the wise.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.38 Of those that punish, I am the principle of punishment. Of these that seek victory, I am policy. Of secrets, I am also silence. And of those who are wise, I am wisdom.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.38 Of the punishers I am the rod; I am the righteous policy of those who desire to coner. And of things secret, I am verily silence; I am knowledge of the men of knowledge৷৷
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.38 Of those who punish, I am the sceptre; among those who seek victory, I am statesmanship; and also among secrets, I am silence; knowledge among knowers I am.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.38 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.38 I am the power of punishment of those who punish, if law is transgressed. In regard to those who seek victory I am policy which is the means of getting victory. Of factors associated with secrecy. I am silence. I am the wisdon of those who are wise.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.38 Damayatam, of the punishers; I am dandah, the rod, which is the means of controlling the lawless. I am the nitih, righteous policy; jagisatam, of those who desire to coner. And guhyanam, of things secret; I am verily maunam, silence. I am jnanam, knowledge; jnanavatam, of the men of knowledge.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.38।। मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ शासक राजा और शासित प्रजा इन दोनों को ही अपने राज्य के विभिन्न जन समुदायों के रहनसहन के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए साथसाथ परिश्रम करना होता है। शासक को यह देखना चाहिए कि वह विधिनियमों को लागू करके उनके द्वारा शासन करे। इस प्रकार के शासन के कार्य में उन असामाजिक तत्त्वों को दण्डित करना भी आवश्यक होता हैं? जो अपने स्वार्थ के वश में समाज के विद्यमान नियमों की अवहेलना करते हैं। सामान्य प्रजा शासन के प्रति आदर और निष्ठा होने के कारण शासकों के नियमों और दण्ड के अधीन द्मरहती है। परन्तु प्रश्न यह है कि वह कौन है? जो दुराचारियों को दण्डित करने का अधिकार राजा अथवा राष्ट्रपति को प्रदान करता है आधुनिक शासन प्रणालियों में व्यक्तियों को अपने हाथों में कानून लेने का कोई अधिकार नहीं है।राजा राजदण्ड को धारण करता है? जो उसकी सत्ता और दमन के अधिकार का चिह्न है। प्रजातान्त्रीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री को यह अधिकार जनता का बहुमत प्राप्त होने से मिलता है। मार्ग में खड़े हुए आरक्षी (पुलिसमेन) का गणवेश अपराधियों को गिरफ्तार करने के उसके अधिकार का सूचक होता है। राजदण्ड से रहित राजा? जनमत के बिना राष्ट्रपति और एक निलम्बित आरक्षी अपने पूर्व के अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। अत यहाँ भगवान् कहते हैं कि मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ। समाज अनुमति सूचक चिह्न के बिना किसी भी एक व्यक्ति का समाज पर कोई अधिकार नहीं होता। क्योंकि? आखिर? राजा या राष्ट्रपति? पुलिस य्ाा न्यायाधीश ये सभी वस्तुत समाज के ही सदस्य होते हैं? परन्तु वे समाज के संरक्षक के रूप में जो कार्य करते हैं? वह विशेष अधिकार उन्हें अपने पद के कारण प्राप्त होता है।मैं विजयेच्छुओं की नीति हूँ यहाँ नीति शब्द का अर्थ राजनीति से है । इतिहास के ग्रन्थों में यह तथ्य बारम्बार दोहराया गया है कि केवल शारीरिक शक्ति से शत्रु पर प्राप्त की गई विजय वास्तविक विजय कदापि नहीं होती। वस्तुत किसी भी राष्ट्र? समाज? समुदाय या व्यक्ति को केवल इसलिए विजयी नहीं मानना चाहिए कि उसने अपनी सैनिक तथा शारीरिक शक्ति से शत्रुओं को परास्त कर दिया है। वास्तविक व पूर्ण विजय वही है जिसमें विजेता पक्ष बुद्धिमत्तापूर्वक लागू की गई शासन की नीतियों के द्वारा पराजित पक्ष को अपनी संस्कृति एवं विचारधारा में परिवर्तित कर देता है। यदि विजेता? पराजित लोगों का सांस्कृतिक परिवर्तन कराने में अथवा स्वयं उनकी संस्कृति को ग्रहण करने में समर्थ नहीं है? तो उसकी विजय कदापि पूर्ण नहीं कही जा सकती। इतिहास के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए यह एक खुला रहस्य है। सैनिक विजय के पश्चात् कुशल राजनीति के द्वारा ही पराजित पक्ष का वास्तविक धर्मान्तरण हो सकता है? और केवल तभी पराजित पक्ष पूर्णत विजेता के वश में हुआ कहा जा सकता है। अत यहाँ कहा गया है कि? विजयेच्छुओं की नीति मैं हूँ।मैं गोपनीय में मौन हूँ किसी तथ्य की गोपनीयता बनाये रखने का एकमात्र उपाय है मौन। किसी तथ्य के विषय में खुली चर्चा करने पर उसकी गोपनीयता ही समाप्त हो जाती है। इस प्रकार? किसी रहस्य का सारतत्त्व ही मौन है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अध्यात्मशास्त्र में आत्मज्ञान का वर्णन भी गुह्यतम अथवा राजगुह्य के रूप में किया गया है? क्योंकि सामान्यत यह ज्ञात नहीं है। इस महान् सत्य की अनुभूति की निरन्तरता बनाये रखने का उपाय भी आन्तरिक मौन ही है। सब गुह्यों में? भगवान् गहन गम्भीर और अखण्ड मौन हैंज्ञानवान का ज्ञान मैं हूँ बुद्धिमानों में बुद्धिमत्ता ही स्वयं बुद्धिमान् नहीं हैं? किन्तु वह उससे भिन्न भी नहीं है। आत्मा यह देह नहीं? परन्तु हम यह भी नहीं कह सकते हैं कि देह सर्वव्यापी आत्मा से कोई भिन्न वस्तु है। जड़ उपाधियां और उसके अनुभव ये सब विभूति की आभा हैं? जो आत्मा के आसपास आलोकवलय में चमकती रहती हैं। ज्ञाता का ज्ञान या बुद्धिमान् की बुद्धिमत्ता परमात्मा की विभूति की अभिव्यक्ति है? जो उन पुरुषों के संस्कारों का परिणाम है।अब तक विवेचन किये गये विषय का अत्यन्त सुन्दर उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.38।।दण्डोऽदान्तदमनकारणं दमयतां दमनकर्तृ़णाम्। जिगीषतां चेतुमिच्छतां जयहेतुर्नीतिरहम्। गुह्यानां गोप्यानां मौनं तूष्णींभावोऽहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.38।।दमयतामदान्तानुत्पथान्पथि प्रवर्तयतामुत्पथप्रवृत्तौ निग्रहहेतुर्दण्डोऽहमस्मि। जिगीषतां जेतुमिच्छतां नीतिर्न्यायो जयोपायस्य प्रकाशकोऽहमस्मि। गुह्यानां गोप्यानां गोपनहेतुर्मौनं वाचंयमत्वमहमस्मि। नहि तूष्णींस्थितस्याभिप्रायो ज्ञायते। गुह्यानां गोप्यानां मध्ये संन्यासश्रवणमननपूर्वकमात्मनो निदिध्यासनलक्षणं मौनं वाहमस्मि। ज्ञानवतां ज्ञानिनां यच्छ्रवणमनननिदिध्यासनपरिपाकप्रभवमद्वितीयात्मसाक्षात्काररूपं सर्वाज्ञानविरोधि ज्ञानं तदहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.38।।दमयतां राजादीनां दमनसाधनं दण्डोऽहमस्मि। जिगीषतां जेतुमिच्छतां जयसाधनं नीतिरस्मि। मौनं वाचोनिग्रहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.38।।दण्ड इति। दमयतां दमकारिणां मध्ये दण्डोऽस्मि? सर्वदोषहरत्वेनेति भावः। जिगीषतां जेतुमिच्छतां नीतिरस्मि। गुह्यानां गोप्यानां मध्ये मौनमवचनमस्मि। ज्ञानवतां ज्ञानिनां मध्ये ज्ञानमहमस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.38।। दण्ड इति। दमयतां दमनकर्तृ़णां संबन्धी दण्डोऽस्मि येनासंयता अपि संयता भवन्ति स दण्डो मद्विभूतिः। जेतुमिच्छतां संबन्धिनी सामाद्युपायरूपा नीतिरस्मि। गुह्यानां गोप्यानां गोपनहेतुर्मौनमवचनमहमस्मि? नहि तूष्णींस्थितस्याभिप्रायो ज्ञायते। ज्ञानवतां तत्त्वज्ञानिनां यज्ज्ञानं तदहम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.38।।दण्ड इति। कालीयेन्द्रादिषु कृतो दण्डो भगवद्रूप उक्तः। स्पष्टमन्यत्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.38।।दमन करनेवालोंका दण्ड अर्थात् उन्मार्गमें चलनेवालोंको दमन करनेकी शक्ति मैं हूँ। विजय चाहनेवालोंका न्याय मैं हूँ। गुप्त रखने योग्य भावोंमें मौन मैं हूँ। ज्ञानवानोंका ज्ञान मैं हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.38।। व्याख्या -- दण्डो दमयतामस्मि -- दुष्टोंको दुष्टतासे बचाकर सन्मार्गपर लानेके लिये दण्डनीति मुख्य है। इसलिये भगवान्ने इसको अपनी विभूति बताया है।नीतिरस्मि जिगीषताम् -- नीतिका आश्रय लेनेसे ही मनुष्य विजय प्राप्त करता है और नीतिसे ही विजय ठहरती है। इसलिये नीतिको भगवान्ने अपनी विभूति बताया है। मौनं चैवास्मि गुह्यानाम् -- गुप्त रखनेयोग्य जितने भाव हैं? उन सबमें मौन (वाणीका संयम अर्थात् चुप रहना) मुख्य है क्योंकि चुप रहनेवालेके भावोंको हरेक व्यक्ति नहीं जान सकता। इसलिये गोपनीय भावोंमें भगवान्ने मौनको अपनी विभूति बताया है।ज्ञानं ज्ञानवतामहम् -- संसारमें कलाकौशल आदिको जाननेवालोंमें जो ज्ञान (जानकारी) है? वह भगवान्की विभूति है। तात्पर्य है कि ऐसा ज्ञान अपनेमें और दूसरोंमें देखनेमें आये? तो इसे भगवान्की ही विभूति माने।इन सब विभूतियोंमें जो विलक्षणता है? वह इनकी व्यक्तिगत नहीं है? प्रत्युत परमात्माकी ही है। इसलिये परमात्माकी तरफ ही दृष्टि जानी चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.38।।अदान्तानुत्पथान्पथि प्रवर्तयतां दण्डोऽहमुत्पथप्रवृत्तौ निग्रहहेतुरित्यर्थः। नीतिर्न्यायो धर्मस्य जयोपायस्य प्रकाशकः। मौनं वाचंयमत्वमुत्तमा वा चतुर्थाश्रमप्रवृत्तिः। श्रवणादिद्वारा परिपक्वसमाधिजन्यं,सम्यग्ज्ञानं ज्ञानम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.38।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.38।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.38।। --,दण्डः दमयतां दमयितृ़णाम् अस्मि अदान्तानां दमनकारण्। नीतिः अस्मि जिगीषतां जेतुमिच्छताम्। मौनं चैव अस्मि गुह्यानां गोप्यानाम्। ज्ञानं ज्ञानवताम् अहम्।।
───────────────────
【 Verse 10.39 】
▸ Sanskrit Sloka: यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन | न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् ||
▸ Transliteration: yaccāpi sarvabhūtānāṁ bījaṁ tadahamarjuna | na tadasti vinā yat syān mayā bhūtaṁ carācaram ||
▸ Glossary: yat: what; cā: and; api: also; sarva: all; bhūtānāṁ: beings; bījaṁ: seed; tat: that; aham: I; arjuna: Arjuna; na: not; tat: that; asti: is; vinā: without; yat: that; syān: exists; mayā: by Me; bhūtaṁ: created; cara: moving; acaram: unmoving
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.39 Also, of whatever beings exist, I am the seed, O Arjuna. There is nothing that exists without Me in all creations, moving and unmoving.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.39।।(टिप्पणी प0 567.1) हे अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंका जो बीज है? वह बीज मैं ही हूँ क्योंकि मेरे बिना कोई भी चरअचर प्राणी नहीं है अर्थात् चरअचर सब कुछ मैं ही हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.39।। हे अर्जुन जो समस्त भूतों की उत्पत्ति का बीज (कारण) है? वह भी में ही हूँ? क्योंकि ऐसा कोई चर और अचर भूत नहीं है? जो मुझसे रहित है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.39 यत् which? च and? अपि also? सर्वभूतानाम् among all beings? बीजम् seed? तत् that? अहम् I? अर्जुन O Arjuna? न not? तत् that? अस्ति is? विना without? यत् which? स्यात् may be? मया by Me? भूतम् being? चराचरम् moving or unmoving.Commentary I am the primeval seed from which all creation has come into existence. I am the seed of everything. I am the Self of everything. Nothing can exist without Me. Everything is of My nature. I am the essence of everything. Without Me all things would be mere void. I am the soul of everything.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.39. Further, O Arjuna, I am that which is the seed of all beings; there is no being, whether moving or non-moving, that could exist without Me.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.39 I am the Seed of all being, O Arjuna! No creature moving or unmoving can live without Me.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.39 I am also that which is the seed of all beings, O Arjuna. Nothing that moves or does not move, exists without Me.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.39 Moreover, O Arjuna, whatsoever is the seed of all beings, that I am. There is no thing moving or non-moving which can exist without Me.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.39 And whatever is the seed of all beings, that also am I, O Arjuna; there is no being, whether moving or unmoving, that can exist without Me.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.39 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.39 Of all beings, in whatever condition they may exist, whether manifest or not, I alone am that state. Whatever host of beings are said to exist, they do not exist without Me as their Self. In the statement, 'Nothing that moves or does not move exists without Me', it is taught that the Lord exists as the Self, as said in the beginning: 'I am the Self, seated in the hearts of all beings' (10.20). The purport is that the entire host of beings in every state, is united with Me, their Self. By this He makes it clear that He, being the Self of all things, is the ground for His being denoted by everything in co-ordinate predication.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda:
10.39
Ca, moreover; O Arjuna, yat api, whatsoever; is the bijam, seed, the source of
growth ; sarva-bhutanam, of all beings; tat, that I am. As a conclusion of the topic the Lord states in brief His divine manifestations: Na tat asti bhutam, there is no thing; cara-acaram, moving or non-moving; yat, which; syat, can exist; vina maya, without Me. For whatever is rejected by Me, from whatever I withdraw Myself will have no substance, and will become a non-entity. Hence the meaning is that everything has Me as its essence.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.39।। मैं समस्त भूतों का बीज हूँ स्थूल विषयों तथा सूक्ष्म भावनाओं और विचारों के अनुभूयमान जगत में आत्मा के स्वरूप? स्थान एवं कार्य को दर्शाने वाले उपर्युक्त वर्णनात्मक वाक्यों तथा उपमाओं के द्वारा निरन्तर यह सूचित किया गया है कि आत्मा ही सम्पूर्ण सृष्टि का स्रोत है। भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से? महर्षि व्यास? इस सारभूत सत्य को बारम्बार विविध प्रकारों से प्रतिपादित कराते हैं? जिससे कि गीता का कोई मन्दबुद्धि विद्यार्थी भी इसकी उपेक्षा न कर सके।साधकों को मननचिन्तन करने के लिए बीज और वृक्ष का दृष्टान्त एक अक्षय विषय है। भूमि में बीजारोपण करने के पश्चात् अनुकूल परिस्थितियों में बीज में स्थित अव्यक्त जीवन तत्त्व स्वत व्यक्त हो सकता है। वह अंकुरित बीज शीघ्र ही विकसित होकर कल्पनातीत ऊँचाई का वृक्ष बन जाता है? और तत्पश्चात् ऐसा प्रतीत हो सकता है? मानो उस वृक्ष का अपने कारणभूत बीज से कोई संबंध ही न हो। निरन्तर होने वाले परिवर्तन रूपी घन के प्रहारों से शोकाकुल हुए? केवल अनित्य जगत् को देखने वाले पुरुषों को ही सम्भवत? इस संसार में सृष्टि के कारणभूत दिव्य? अनन्त आनन्दस्वरूप सत्य का स्मरण कराने वाली कोई वस्तु ही दिखाई नहीं देती है।विश्व की बीजावस्था? बीज में वृक्ष की अव्यक्त अवस्था के तुल्य है। अनुकूल परिस्थितियों को पाकर बीज से अंकुर फूटकर ऊपर की ओर तने का रूप ले लेता है? और उसी प्रकार भूमि के अन्दर उसका मूल उतनी गहराई तक पहुँचता है। नाम और रूपमय यह सम्पूर्ण विश्व जब अपनी अव्यक्त अवस्था में होता है? तब वह उपनिषदों के अनुसार? प्रलय की स्थिति कहलाती है। यह समष्टि प्रलय का सिद्धांत व्यष्टि की दृष्टि से विचार करने पर बुद्धिगम्य हो जाता है। हमारी सुषुप्ति अवस्था में? हमारे व्यक्तिगत स्वभाव? चरित्र? क्षमता? शिक्षा? संस्कृति? सद्व्यवहार आदि सब अव्यक्त स्थिति में विद्यमान रहते हैं। संक्षेप में? निद्रावस्था में हमारे व्यक्तित्व की विशेषताएं बीजाव्ास्था में रहती हैं। विश्राम काल के अन्तराल के बाद? जब ये वासनाएं स्वयं को व्यक्त करने के लिए अधीर हो उठती हैं? तब यदि अनुकूल परिस्थितियां प्राप्त हो जायें? तो वे पूर्णरूप से व्यक्त होती हैं।इसी प्रकार? समष्टि मन की विश्राम की अवस्था में सम्पूर्ण जीवों की वासनाओं के साथ यह विश्व बीजावस्था में विद्यमान रहता है। यह एक अत्यन्त सुन्दर एवं तत्त्वबोधक उदाहरण हमारे प्राचीन ऋषियों ने दिया है। गर्भावस्था से? कालान्तर में अनुकूल परिस्थितियों में? यह अव्यक्त सृष्टि व्यक्त होती है और उसकी इस प्रथम अभिव्यक्ति को ऋषियों ने सुन्दर नाम दिया है हिरण्यगर्भ। इस अपूर्व और अद्भुत शब्द का पाश्चात्य विद्वानों ने गोल्डन एग अर्थात् स्वर्णअण्ड कहकर अनुवाद करके अनजाने ही हमारे धर्मशास्त्र की निन्दा की है और? इस प्रकार? उसके सौन्दर्य को भी कलुषित कर दिया है। वस्तुत? इस शब्द का अर्थ है? चराचर जगत् का गर्भ।यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण समष्टि कारण शरीर अर्थात् समस्त प्राणियों की वासनाओं के साथ तादात्म्य करके? सर्वज्ञ ईश्वर के रूप में कहते हैं कि वे वह महान् बीज हैं? जिससे यह संसार वृक्ष फलीभूत हुआ है तथा भविष्य में भी असंख्य बार ऐसा ही होता रहेगा।लौकिक अनुभव यह है कि बीज से वृक्ष की उत्पत्ति होने की प्रक्रिया में स्वत बीज का नाश हो जाता है। अत? भगवान् के कथन से गीता का कोई विद्यार्थी यह न समझ ले कि इस विश्व की उत्पत्ति में स्वयं भगवान् नष्ट हो जाते हैं इस प्रकार की विपरीत धारणा की निवृत्ति के लिए? श्रीकृष्ण कहते हैं? ऐसा कोई चर या अचर भूत नहीं है? जो मेरे बिना रहता है।परमात्मा का बीजत्व ऐसे ही है? जैसे समुद्र तरंगों का बीज है। तरंगों की उत्पत्ति और विकास समुद्र से भिन्न स्थान पर नहीं होते। जहाँ समुद्र नहीं? वहाँ तरंगों का भी अस्तित्व नहीं हो सकता। उसी प्रकार? असंख्य तरंगों की उत्पत्ति में स्वयं समुद्र कभी नष्ट नहीं होता।यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड उस अविद्या से प्रकट होता है? जो मानों सत्य को आच्छादित कर देती है। इस अविद्या का अस्तित्व और उसकी भ्रमोत्पादक शक्ति ये दोनों ही प्रक्षेपित जगत् के स्रोतभूत ब्रह्म में ही स्थित होते हैं। यह आत्म अज्ञान ही सृष्टि का कारण है। चैतन्य आत्मा के बिना यह अविद्या और अविद्याजनित हमारे संसार के दुख प्रकाशित नहीं होते और हमें उनका भान तक नहीं होता।जैसे तरंगों का जनक? धारक और पोषक जल ही है? वैसे ही चैतन्य आत्मा इस संसार वृक्ष का जनक और पोषक है।यदि हमसे यह कहा जाता है कि कोई दस आभूषण स्वर्ण से बने हैं तथा स्वर्ण के बिना उनका अस्तित्व नहीं हो सकता है? तो स्पष्ट है कि वर्तमान में भी वे आभूषण स्वर्ण रूप ही हैं। इसी प्रकार? भगवान् यहाँ कहते हैं कि वे इस संसार बीज के वृक्ष हैं इस आंशिक कथन में वे इस बात को भी जोड़ते हैं कि मेरे बिना कोई भूतवस्तु नहीं रह सकती। इसलिए यह विश्व भगवत्स्वरूप ही है।अब तक किये गये सम्पूर्ण विवेचन का उपसंहार? भगवान् अगले तीन श्लोकों में करते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.39।।बीजं प्ररोहकारणम्। एतन्मद्विभूतिज्ञानमन्तःकरणशोधकमिति सचयन्नाह -- हे अर्जुनेति। प्रकृतपसंहरन्विभूतिसंक्षेपमाह -- नेति। स्थावरजंगमं भूतं मयाविना यद्भवेत् तन्नास्ति मया त्यक्तस्य निरात्मकस्य शून्यत्वापत्तेर्मदात्मकं सर्वमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.39।।यदपि च सर्वभूतानां प्ररोहकारणं बीजं तन्मायोपाधिकं चैतन्यमहमेव। हे अर्जुन? मया विना यत्स्याद्भवेच्चरमचरं वा भूतं वस्तु तन्नास्त्येव। यतः सर्वं मत्कार्यमेवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.39।।सर्वभूतानां बीजमित्यनेन सर्वभूतानि मद्विभूतिरिति दर्शितम्? तदेवोपपादयति -- न तदस्तीति। मया विना भूतां किमपि नास्ति। उपादेयस्योपादानमन्तरेण स्थित्यसंभवात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.39।।यदिति। यत्सर्वभूतानां बीजमुत्पत्तिकारणं तदपि अहमेव। अपिशब्देन योनिस्तद्रूपं चाऽहमेवेति व्यञ्जितम्। यत् चराचरं भूतं तज्जातं तन्मया विना किञ्चिन्नास्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.39।। यदिति। यदपि च सर्वभूतानां बीजं प्ररोहकारणं तदहम्। तत्र हेतुः मया विना यत्स्याद्भवेत् तच्चराचरं भूतं नास्त्येवेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.39।।यच्चापीति। अन्यत् किं वाच्यं मया विना किमपि नास्तीत्याह -- न तदस्ति विना मयेति। मत्प्रकृतिद्वयकार्यभूततया तथेति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.39।।हे अर्जुन सर्वभूतोंका जो बीज अर्थात् उत्पत्तिका कारण है? वह मैं हूँ। प्रकरणका उपसंहार करनेके लिये समस्त विभूतियोंका सार कहते हैं -- ऐसा वह चर या अचर कोई भी भूत प्राणी नहीं है जो मेरे बिना हो। क्योंकि जो मुझसे रहित होगा वह सत्तारहित -- शून्य होगा? अतः यह सिद्ध हुआ कि सब कुछ मेरा ही स्वरूप है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.39।। व्याख्या -- यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदमहर्जुन -- यहाँ भगवान् समस्त विभूतियोंका सार बताते हैं कि सबका बीज अर्थात् कारण मैं ही हूँ। बीज कहनेका तात्पर्य है कि इस संसारका निमित्त कारण भी मैं हूँ और उपादान कारण भी मैं हूँ अर्थात् संसारको बनानेवाला भी मैं हूँ और संसाररूपसे बननेवाला भी मैं हूँ।भगवान्ने सातवें अध्यायके दसवें श्लोकमें अपनेको सनातन बीज? नवें अध्यायके अठारहवें श्लोकमें,अव्यय बीज और यहाँ केवल बीज बताया है। इसका तात्पर्य है कि मैं ज्योंकात्यों रहता हुआ ही संसाररूपसे प्रकट हो जाता हूँ और संसाररूपसे प्रकट होनेपर भी मैं उसमें ज्योंकात्यों व्यापक रहता हूँ।न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् -- संसारमें जडचेतन? स्थावरजङ्गम? चरअचर आदि जो कुछ भी देखनेमें आता है? वह सब मेरे बिना नहीं हो सकता। सब मेरेसे ही होते हैं अर्थात् सब कुछ मैंहीमैं हूँ। इस वास्तविक मूल तत्त्वको जानकर साधककी इन्द्रियाँ? मन? बुद्धि जहाँकहीं जायँ अथवा मनबुद्धिमें संसारकी जो कुछ बात याद आये? उन सबको भगवान्का ही स्वरूप माने। ऐसा माननेसे साधकको भगवान्का ही चिन्तन होगा? दूसरेका नहीं क्योंकि तत्त्वसे भगवान्के सिवाय दूसरा कोई है ही नहीं।यहाँ भगवान्ने कहा है कि मेरे सिवाय चरअचर कुछ नहीं है अर्थात् सब कुछ मैं ही हूँ और अठारहवें अध्यायके चालीसवें श्लोकमें कहा है कि सत्त्व? रज और तम -- इन तीनों गुणोंके सिवाय कुछ नहीं है अर्थात् सब गुणोंका ही कार्य है। इस भेदका तात्पर्य है कि यहाँ भक्तियोगका प्रकरण है। इस प्रकरणमें अर्जुनने प्रश्न किया है कि मैं आपका कहाँकहाँ चिन्तन करूँ इसलिये उत्तरमें भगवान्ने कहा कि तेरे मनमें जिसजिसका चिन्तन होता है? वह सब मैं ही हूँ। परन्तु वहाँ (18। 40 में) सांख्ययोगका प्रकरण है। सांख्ययोगमें प्रकृति और पुरुष -- दोनोंके विवेककी तथा प्रकृतिमें सम्बन्धविच्छेद करनेकी प्रधानता है। प्रकृतिका कार्य होनेसे मात्र सृष्टि त्रिगुणमयी है (टिप्पणी प0 567.2)। इसलिये वहाँ तीनों गुणोंसे रहित कोई नहीं है -- ऐसा कहा गया है।विशेष बातभगवान्ने अहमात्मा गुडाकेश (10। 20) से लेकर बीजं तदहमर्जुन (10। 39) तक जो बयासी विभूतियाँ कही हैं? उनका तात्पर्य छोटाबड़ा? उत्तममध्यमअधम बतानेमें नहीं है? प्रत्युत यह बतानेमें है कि कोई भी वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति आदि सामने आये तो उसमें भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये (टिप्पणी प0 568.1)। कारण कि मूलमें अर्जुनका प्रश्न यही था कि आपका चिन्तन करता हुआ मैं आपको कैसे जानूँ और किनकिन भावोंमें मैं आपका चिन्तन करूँ (गीता 10। 17)। उस प्रश्नके उत्तरमें चिन्तन करनेके लिये ही भगवान्ने अपनी विभूतियोंका संक्षिप्त वर्णन किया है।जैसे यहाँ गीतामें भगवान्ने अर्जुनसे अपनी विभूतियाँ कही हैं? ऐसे ही श्रीमद्भागवतमें (ग्यारहवें स्कन्धके सोलहवें अध्यायमें) भगवान्ने उद्धवजीसे अपनी विभूतियाँ कही हैं। गीतामें कही कुछ विभूतियाँ भागवतमें नहीं आयी हैं और भागवतमें कही कुछ विभूतियाँ गीतामें नहीं आयी हैं। गीता और भागवतमें कही गयी कुछ विभूतियोंमें तो समानता है? पर कुछ विभूतियोंमें दोनों जगह अलगअलग बात आयी है जैसे -- गीतामें भगवान्ने पुरोहितोंमें बृहस्पतिको अपनी विभूति बताया है -- पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् (10। 24) और भागवतमें भगवान्ने पुरोहितोंमें वसिष्ठजीको अपनी विभूति बताया है -- पुरोधसां वसिष्ठोऽहम् (11। 16। 22)। अब शङ्का यह होती है कि गीता और भागवतकी विभूतियोंका वक्ता एक होनेपर भी दोनोंमें एक समान बात क्यों नहीं मिलती इसका समाधान यह है कि वास्तवमें विभूतियाँ कहनेमें भगवान्का तात्पर्य किसी वस्तु? व्यक्ति आदिकी महत्ता बतानेमें नहीं है? प्रत्युत अपना चिन्तन करानेमें है। अतः गीता और भागवत -- दोनों ही जगह कही हुई विभूतियोंमें भगवान्का चिन्तन करना ही मुख्य है। इस दृष्टिसे जहाँजहाँ विशेषता दिखायी दे? वहाँवहाँ वस्तु? व्यक्ति आदिकी विशेषता न देखकर केवल भगवान्की ही विशेषता देखनी चाहिये और भगवान्की ही तरफ वृत्ति जानी चाहिये। सम्बन्ध -- अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपनी दिव्य विभूतियोंके कथनका उपंसहार करते हैं।,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन --,विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.39।।जाड्यमात्रप्रतिबिम्बितं चैतन्यं बीजम्। किमिति स्थावरं जङ्गमं वा त्वदतिरेकेण न भवति तत्राह -- मयेति। तस्यापि स्वरूपेण सत्त्वमाशङ्क्योक्तं -- शून्यं हीति। आत्मनोऽपकर्षादित्यर्थः। मयैव सच्चिदानन्दस्वरूपेण सर्वस्य सिद्धेरित्यतःशब्दार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.39।।न तदस्ति विना इत्यत्र पदानां व्यवहितत्वादन्वयमाह -- मयेति। भगवतोऽनन्तै रूपैः सर्वपदार्थव्यापित्वे प्रमाणमाह -- विश्वेति। विश्वं रूपं प्रतिमा यस्यासौ विश्वरूपः। अनन्तानां गतिराश्रयोऽनन्तगतिः। अनन्ता भागा अवतारा यस्यासावनन्तभागः। अनन्तान्पदार्थान् गतः अनन्तगः। अनन्तः कालाद्यपरिच्छिन्नः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.39।।मया विना यद्भूतं स्यात् तन्नास्ति। विश्वरूप अनन्तगते अनन्तभाग अनन्तग अनन्त अनादे इत्यादि मोक्षधर्मे [म.भा.शां.अ.338]।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.39।। --,यच्चापि सर्वभूतानां बीजं प्ररोहकारणम्? तत् अहम् अर्जुन। प्रकरणोपसंहारार्थं विभूतिसंक्षेपमाह -- न तत् अस्ति भूतं चराचरं चरम् अचरं वा? मया विना यत् स्यात् भवेत्। मया अपकृष्टं परित्यक्तं निरात्मकं शून्यं हि तत् स्यात्। अतः मदात्मकं सर्वमित्यर्थः।।
───────────────────
【 Verse 10.40 】
▸ Sanskrit Sloka: नान्तोऽस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप | एष तूद्देशत: प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया ||
▸ Transliteration: nānto’sti mama divyānāṁ vibhūtīnāṁ parantapa | eṣa tūddeśataḥ prokto vibhūtervistaro mayā ||
▸ Glossary: na: not; antaḥ: end; asti: is; mama: My; divyānāṁ: divine; vibhūtīnāṁ: glories; parantapa: Supreme Lord; eṣa: all this; tu: that; uddeśataḥ: examples; proktaḥ: says; vibhūteḥ: glories; vistaraḥ: detailed; mayā: by Me
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.40 There is no end to My Divine glories, Oh Parantapa. What have been says by Me are examples of My detailed glories.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.40।।हे परंतप अर्जुन मेरी दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है। मैंने तुम्हारे सामने अपनी विभूतियोंका जो विस्तार कहा है? यह तो केवल संक्षेपसे कहा है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.40।। हे परन्तप मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है अपनी विभूतियों का यह विस्तार मैंने एक देश से अर्थात् संक्षेप में कहा है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.40 न not? अन्तः end? अस्ति is? मम My? दिव्यानाम् of divine? विभूतीनाम् glories? परंतप O scorcher of foes? एषः this? तु indeed? उद्देशतः briefly? प्रोक्तः has been stated? विभूतेः of glory? विस्तरः particulars? मया by Me.Commentary It is impossible for anyone to describe or know the exact extent of the divine gloreis of the Lord. There is no limit to His powers or glories. What could be expressed of Him is nothing when compared to His infinte glories.Parantapa Scorcher of foes -- he who burns the internal enemies? lust? anger? greed? deluion? etc.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.40. O scorcher of foes ! There is no end to My extraordinary manifesting Power. The above details of [My] manifesting power have been declared by Me only by way of examples.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.40 O Arjuna! The aspects of My divine life are endless. I have mentioned but a few by way of illustration.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.40 There is no limit to My divine mannifestations. Here the extent of such manifestations has been made in brief by Me.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.40 O destroyer of enemies, there is no limit to My divine manifestations. This description of (My) manifestations, however, has been stated by Me by way illustration.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.40 There is no end to My divine gloreis, O Arjuna, but this is a brief statement by Me of the particulars of My divine glories.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.40 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.40 There is no limit to the divine and auspicious manifestations of My will to rule. But it has been described to some extent by Me in brief by means of a few illustrations.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.40 Parantapa, O destroyer of enemies; asti, there is; na, no; antah, limit; to mama, My; divyanam, divine; vibhutinam, manifestations. Indeed, it is not possible for anyone to speak or know of the limit of the divine manifestations of the of the all-pervading God. Esah, this; vistarah, description; vibhuteh, of (My) manifestations; tu, however; prokatah, has been stated; maya, by Me; uddesatah, by way of illustration, partially.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.40।। मेरी दिव्य विभूतियों का अन्त नहीं है अपनी विभूतियों के वर्णन के प्रारम्भ में ही भगवान् श्रीकृष्ण ने इस विशाल कार्य को सम्पन्न करने में भाषा की असमर्थता प्रकट की था। किन्तु? फिर भी? शिष्य के लिए केवल स्नेहवश भगवान् श्रीकृष्ण ने इस असम्भव कार्य को यथासम्भव सम्पन्न करने के लिए अपने हाथों में लिया। कोई भी घटकार किसी भी जिज्ञासु व्यक्ति को समस्त घटों में व्याप्त उनके सारतत्त्व मिट्टी को नहीं दर्शा सकता और न अन्त में यह कहकर स्वयं का अभिनन्दन कर सकता है कि उसने समस्त भूत? वर्तमान और भविष्य के घटों को बता दिया है। ऐसा करना न सम्भव है और न आवश्यक ही। योग्य अधिकारी पुरुष को कुछ वस्तुएं दिखाकर उनके स्ाारतत्त्व का ज्ञान करा दिया जाये? तो वह पुरुष उसी तत्त्व की अन्य वस्तुओं को देखकर उस तत्त्व को पहचान सकता है।इस अध्याय में? भगवान् ने अर्जुन को तथा उसके निमित्त से समस्त भावी पीढ़ियों के जिज्ञासुओं के लिए? इन 54 विभूतियों के द्वारा? असंख्य उपाधियों के आवरण या परिधान में गुप्त वास कर रहे? अनन्त परमात्मा की क्रीड़ा को दर्शाया है। जो साधक इन विभूतियों का ध्यान करके अपने मन को पूर्णत प्रशिक्षित कर लेगा? वह इस बहुविध सृष्टि के पीछे स्थित एक अनन्त परमात्मा को सरलता से सर्वत्र पहचानेगा।दृश्य जगत् की अनन्त विभूतियों के विस्तार का वर्णन करने में अपनी असमर्थता को व्यक्त करते हुए भगवान् कहते हैं? सूर्यस्थानीय मुझ स्वयंप्रकाश? स्वस्वरूप की पूर्णता में स्थित परमात्मा की असंख्य रश्मिरूपी विभूतियों का कोई अन्त नहीं है।यदि भगवान् श्रीकृष्ण इस असमर्थता को पहले से जानते थे? तो क्यों उन्होंने एक गुरु होने के नाते? व्यर्थ ही अपने शिष्य को अपनी विभूतियों के द्वारा स्वयं का दर्शन कराने का आश्वासन दिया यह ऐसा छल भगवान् ने क्यों किया दीर्घ काल तक शिष्य को थकाकर अन्त में उसे निराश करना क्या उचित है क्या यह सभी धार्मिक गुरुओं? ऋषियों और मुनियों का सामान्य स्वभाव ही हैआध्यात्मिक साधनाओं पर लगाये जाने वाले इन सभी आरोपों का केवल एक ही उत्तर है कि इसके अतिरिक्त अन्य कोई मार्ग नहीं है। शल्य चिकित्सा के विद्यार्थियों को? सर्वप्रथम एक सप्ताह के मृत देह पर शल्यक्रिया करने को कहा जाता है यह कोई असत्य नहीं है यह सत्य है कि कितनी ही कुशलता से शल्यक्रिया करने पर भी वह मृत रोगी पुनर्जीवित होने वाला नहीं है? परन्तु इस प्रकार के अभ्यास का प्रयोजन विद्यार्थी को उस अनुभव को कराना है? जो अपना स्वतन्त्र व्यवसाय करने के लिए जीवन में आवश्यक होता है। इसी प्रकार? भगवान् यहाँ अर्जुन को दृश्य के द्वारा अदृश्य का दर्शन करने की कला को सिखाने के लिए अपनी कुछ विशेष विभूतियों का वर्णन करते हैं।उनका यह उद्देश्य उनकी इस स्वीकारोक्ति में स्पष्ट होता है? किन्तु मैंने अपनी विभूतियों का विस्तार संक्षेप से कहा है। भगवान् द्वारा किया गया वर्णन पूर्ण नहीं कहा जा सकता। साधकों को प्रशिक्षित करने के लिए उन्होंने कुछ विशेष उदाहरण ही चुन कर दिये हैं। जिन्होंने इन विभूतियों पर उत्साहपूर्वक ध्यान किया है? वे अनित्य रूपों में क्रीड़ा कर रहे स्वयं प्रकाश स्वरूप को सरलता से पहचान सकते हैं।संक्षेप में? भगवान् के कथन का सार यह है कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.40।।मम दिव्यानामन्तो नास्ति परमेश्वरविभूतीनामियत्तारहितानामियत्ता केनचिद्वक्तुं ज्ञातुं वा न शक्या। एष तद्देशत एकदेशेन विभूतीनां विस्तरो मया प्रोक्तः। उक्तविभूतिपरिचिन्तनेन परान् रागद्वेषादीन् शत्रून्तापयेति संबोधनाशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.40।।प्रकरणार्थमुपसंहरन् विभूतिं संक्षिपति -- हे परंतप परेषां शत्रूणां कामक्रोधलोभादीनां तापजनक? मम दिव्यानां विभूतीनामन्त इयत्ता नास्ति। अतः सर्वज्ञेनापि सा शक्यते ज्ञातुं वक्तुं वा। सन्मात्रविषयत्वात्सर्वज्ञतायाः। एष तु त्वां प्रत्युद्देशत एकदेशेन प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो विस्तारो मया।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.40।।नान्तोऽस्तीति। उद्देशत एकदेशेन विभूतेर्विस्तरो विस्तारो मया प्रोक्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.40।।एवं विभूतिमुक्त्वोपसंहरति -- नान्तोऽस्तीति। मम स्वच्छन्दचारिणो दिव्यानां क्रीडात्मिकानां विभूतीनामन्तो नास्ति। परन्तपेति सम्बोधनं विश्वासार्थम्। नन्वन्ताभावे कथमेता एवोक्ताः इत्याकाङ्क्षायामाह -- एष इति। एष तूद्देशतः सङ्क्षेपतो विभूतेर्विस्तरो मया प्रोक्तः। प्रोक्तत्वेनान्येषामेतावज्ज्ञानेऽप्यसामर्थ्यं,द्योतितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.40।।प्रकरणार्थमुपसंहरति -- नान्त इति। अनन्तत्वाद्विभूतीनां ताः साकल्येन वक्तुं न शक्यन्ते? एष तु विभूतेर्विस्तर उद्देशतः संक्षेपतः प्रोक्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.40।।प्रकरणार्थमुपसंहरति -- नान्तोऽस्तीति। एता दिव्या मे विभूतयः प्राधान्यतः उक्तास्ता अप्यनन्ता इति। एष तूद्देशतः प्रोक्तः -- नाममात्रेण वस्तुसङ्कीर्त्तनमुद्देशः -- तस्मात्सङ्क्षेपत इत्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.40।।हे परन्तप मेरी दिव्य विभूतियोंका अर्थात् विस्तारका अन्त नहीं है। क्योंकि सर्वात्मरूप ईश्वरकी दिव्य विभूतियाँ इतनी ही है इस प्रकार किसीके द्वारा भी जाना या कहा नहीं जा सकता। यह तो अपनी विभूतियोंका विस्तार मेरेद्वारा संक्षेपसे अर्थात् एक अंशसे ही कहा गया है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.40।। व्याख्या -- मम दिव्यानां (टिप्पणी प0 568.2) विभूतीनाम् -- दिव्य शब्द अलौकिकता? विलक्षणताका द्योतक है। साधकका मन जहाँ चला जाय? वहीं भगवान्का चिन्तन करनेसे यह दिव्यता वहीं प्रकट हो जायगी क्योंकि भगवान्के समान दिव्य कोई है ही नहीं। देवता जो दिव्य कहे जाते हैं? वे भी नित्य ही भगवान्के दर्शनकी इच्छा रखते हैं? -- नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः (गीता 11। 52)। इससे यही सिद्ध होता,है कि दिव्यातिदिव्य तो एक भगवान् ही हैं। इसलिये भगवान्की जितनी भी विभूतियाँ हैं? तत्त्वसे वे सभी दिव्य हैं। परन्तु साधकके सामने उन विभूतियोंकी दिव्यता तभी प्रकट होती है? जब उसका उद्देश्य केवल एक भगवत्प्राप्तिका ही होता है और भगवत्तत्त्व जाननेके लिये रागद्वेषसे रहित होकर उन विभूतियोंमें केवल भगवान्का ही चिन्तन करता है।नान्तोऽस्ति -- भगवान्की दिव्य विभूतियोंका अन्त नहीं है। कारण कि भगवान् अनन्त हैं तो उनकी विभूतियाँ? गुण? लीलाएँ आदि भी अनन्त हैं -- हरि अनंत हरि कथा अनंता (मानस 1। 140। 5)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंके उपक्रममें और उपसंहारमें -- दोनों ही जगह कहा है कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंके विषयमें कहा है कि मेरे द्वारा परमाणुओंकी संख्या समयसे गिनी जा सकती है? पर करोड़ों ब्रह्माण्डोंको रचनेवाली मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं पाया जा सकता (टिप्पणी प0 569)। भगवान् अनन्त? असीम और अगाध हैं। संख्याकी दृष्टिसे भगवान् अनन्त हैं अर्थात् उनकी गणना परार्द्धतक नहीं हो सकती। सीमाकी दृष्टिसे भगवान् असीम हैं। सीमा दो तरहकी होती है -- कालकृत और देशकृत। अमुक समय पैदा हुआ और अमुक समयतक रहेगा -- यह कालकृत सीमा हुई और यहाँसे लेकर वहाँतक -- यह देशकृत सीमा हुई। भगवान् ऐसे सीमामें बँधे हुए नहीं हैं। तलकी दृष्टिसे भगवान्,अगाध हैं। अगाध शब्दमें गाध नाम तल का है जैसे? जलमें नीचेका तल होता है। अगाधका अर्थ हुआ --
Chapter 10 (Part 16)
जिसका तल है ही नहीं? ऐसा अथाह गहरा।एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया -- अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि आप अपनी दिव्य विभूतियोंको विस्तारसे कहिये? तो उत्तरमें भगवान्ने कहा कि मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है। ऐसा कहकर भी भगवान्ने अर्जुनकी जिज्ञासाके कारण कृपापूर्वक अपनी विभूतियोंका विस्तारसे वर्णन किया। परन्तु यह विस्तार केवल लौकिक दृष्टिसे ही है। इसलिये भगवान् यहाँ कह रहे हैं कि मैंने यहाँ जो विभूतियोंका विस्तार किया है? वह विस्तार केवल तेरी दृष्टिसे ही है। मेरी दृष्टिसे तो यह विस्तार भी वास्तवमें बहुत ही संक्षेपसे (नाममात्रका) है क्योंकि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है।[इस अध्यायमें बतायी गयी सम्पूर्ण विभूतियाँ सबके काम नहीं आतीं? प्रत्युत ऐसी अनेक दूसरी विभूतियाँ भी काममें आती हैं? जिनका यहाँ वर्णन नहीं हुआ है। अतः साधकको चाहिये कि जहाँजहाँ किसी विशेषताको लेकर मन खिंचता है? वहाँवहाँ उस विशेषताको भगवान्की ही माने और भगवान्का ही चिन्तन करे चाहे वह विभूति यहाँ भगवान्द्वारा कही गयी हो अथवा न कही गयी हो।] सम्बन्ध -- अठारहवें श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से विभूति और योग बतानेकी प्रार्थना की। इसपर भगवान्ने पहले अपनी विभूतियोंको बताया और अब आगेके श्लोकमें योग बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.40।।दिव्यानां विभूतीनां परिमितत्वशङ्कां वारयति -- नेत्यादिना। तदेवोपपादयति -- नहीति। कथं तर्हि विभूतेर्विस्तरो दर्शितस्तत्राह -- एष त्विति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.40।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.40।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.40।। --,न अन्तः अस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां विस्तराणां परंतप। न हि ईश्वरस्य सर्वात्मनः दिव्यानां विभूतीनाम् इयत्ता शक्या वक्तुं ज्ञातुं वा केनचित्। एष तु उद्देशतः एकदेशेन प्रोक्तः विभूतेः विस्तरः मया।।
───────────────────
【 Verse 10.41 】
▸ Sanskrit Sloka: यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा | तत्देवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम् ||
▸ Transliteration: yad yad vibhūtimat sattvaṁ śrīmad ūrjitameva vā | tat tad evā’vagaccha tvaṁ mama tejoṁśa saṁbhavam ||
▸ Glossary: yad-yad: whatever; vibhūtimat: glorious; sattvaṁ: existence; śrīmad: beautiful; ūrjitam: glorious; eva: also; vā: or; tat-tad: all that; eva: surely; avagaccha: you should know; tvaṁ: you; mama: My; tejaḥ: splendour; aṁśa: part; saṁbha- vam: born of
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.41 You should know that whatever glories exist or whatever beautiful and glorious exists, all that surely is born of just a portion of My splendour.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.41।।जोजो ऐश्वर्ययुक्त शोभायुक्त और बलयुक्त वस्तु है? उसउसको तुम मेरे ही तेज(योग) के अंशसे उत्पन्न हुई समझो।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.41।। जो कोई भी विभूतियुक्त? कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त वस्तु (या प्राणी) है? उसको तुम मेरे तेज के अंश से ही उत्पन्न हुई जानो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.41 यत् यत् whatever? विभूतिमत् glorious? सत्त्वम् being? श्रीमत् prosperous? ऊर्जितम् powerful? एव also? वा or? तत् तत् that? एव only? अवगच्छ know? त्वम् thou? मम My? तेजोंऽशसंभवम् a manifestation of a part of My splendour.No Commentary.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.41. Whatsoever being exists with the manifesting power, and with beauty and vigour, be sure that it is born only of a bit of My illuminant.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.41 Whatever is glorious, excellent, beautiful and mighty, be assured that it comes from a fragment of My splendour.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.41 Whatever being is possessed of power, or of splendour, or of energy, know that as coming from a fragment of My power.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.41 Whatever object [All living beings] is verily endowed with majesty, possessed of prosperity, or is energetic, you know for certain each of them as having a part of My power as its source.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.41 Whatever being there is glorious, prosperous or powerful, that know thou to be a manifestation of a part of My splendour.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.41 See Comment under 10.42
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.41 Whatever host of beings has 'power', namely the capacity and means to rule over; has 'splendour', has beauty or prosperity in wealth, grains etc., has 'energy,' namely, is engaged in auspicious undertakings - know such manifestations as coming fro a fragment of My 'power'. Power (Tejas) is the capacity to overcome opposition. The meaning is, know them as arising from a fraction of My inconceivable power of subduing.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.41 Yat yat, whatever; sattvam, object in the world; is eva, verily; vibhutimat, endowed with majesty; srimad, possessed of prosperity; va, or; is urjitam, energetic, possessed of vigour; tvam, you; avagaccha, know; eva, for certain; tat tat, each of them; as mama tejomsa-sambhavam, having a part (amsa) of My (mama), of God's, power (teja) as its source (sambhavam).
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.41।। इस अध्याय में कथित उदाहरणों के द्वारा भगवान् की विभूतियों को दर्शाने का अल्पसा प्रयत्न किया गया है? परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सत्य को पूर्णतया परिभाषित किया है। हमें यह बताया गया है कि हम विवेक के द्वारा इसी अनित्य जगत् में नित्य और दिव्य तत्त्व को पहचान सकते हैं। उपर्युक्त दृष्टान्तों से यह स्पष्ट होता है कि जगत् की चराचर वस्तुओं में स्वयं भगवान् अपने को ऐश्वर्ययुक्त? कान्तियुक्त अथवा शक्तियुक्त रूप में अभिव्यक्त करते हैं। वे समस्त नाम और रूपों में विद्यमान हैं।यहाँ श्रीकृष्ण अत्यन्त स्पष्ट रूप से यह बताते हैं कि बहुविध जगत् में दिव्य उपस्थिति क्या है? तथा उसे पहचानने की परीक्षा क्या है। जहाँ कहीं भी महानता? कान्ति या शक्ति की अभिव्यक्ति है? वह परमात्मा के असीम तेज की एक रश्मि ही है। इस में कोई सन्देह नहीं कि उपर्युक्त विस्तृत विवेचन का यह सारांश अपूर्व है। इन समस्त उदाहरणों में भगवान् का या तो ऐश्वर्य झलकता है? या कान्ति या फिर शक्ति।सर्वत्र परमात्मदर्शन करने के लिए अर्जुन को दिये गये इस संकेतक का उपयोग गीता के सभी विद्यार्थियों के लिए समान रूप से लाभप्रद होगा।अब अन्त में भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.41।।इदं त्ववधेयमित्याह। यद्यत्सत्त्वं वस्तु विभूतिश्वर्यं तद्युक्तं? श्रीर्लक्ष्मीस्तया युक्तं? ऊर्जितमेव वा उत्साहयुक्तमेव वा तत्तन्मत्तेजसोंश एकदेशः संभवो यस्य तदवगच्छ त्वं विजानीहि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.41।।अनुक्ता अपि भगवतो विभूतीः संग्रहीतुमुपलक्षणमिदमुच्यते। यद्यत्सत्त्वं प्राणि विभूतिमदैश्वर्ययुक्तं तथा श्रीमत् श्रीर्लक्ष्मीः संपत् शोभा कान्तिर्वा तया युक्तं तथा ऊर्जितं बलाद्यतिशयेन युक्तं तत्तदेव मम तेजसः शक्तेरंशेन संभूतं त्वमवगच्छ जानीहि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.41।।सर्वभूतानां बीजमहमित्युक्त्या स्वस्य सार्वात्म्योक्तेः सर्वं स्वविभूतिरित्युक्तमेव तथापि तद्ग्रहणाशक्तं प्रति प्राह -- यद्यदिति। यद्यत्सत्त्वं प्राणि विभूतिमदैश्वर्ययुक्तम्। श्रीर्लक्ष्मीः शोभा वा तद्युक्तम्। ऊर्जितं बलाद्यतिशययुक्तम्। तत्तत्सर्वं मम तेजसश्चिच्छक्तेरंशसंभवमंशात्संभूतं त्वमवगच्छ जानीहि। लोके यदतिरमणीयं तद्भगवतो रूपमिति ध्यायेदित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.41।।ननु मया सर्वस्वरूपज्ञानेन सर्वत्र त्वच्चिन्तनार्थं विभूतिविस्तारः पृष्टः? तस्यान्ताभावोक्त्या मया कुत्र कथं चिन्तनीयः इत्याकाङ्कायामाह -- यद्यदिति। यत् यत् सत्त्वं वस्तुमात्रं विभूतिमत् ऐश्वर्ययुक्तं श्रीमत् सम्पत्तियुक्तं ऊर्जितमेव केनापि प्रकारेणोत्कृष्टतां प्राप्तं रमणीयतरं वा तत्तदेवं मम तेजोंशसम्भवं ममानुभावसम्भूतं अवगच्छ जानीहि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.41।। पुनश्चा साकाङ्क्षं प्रति कथंचित्साकल्येन कथयति -- यद्यदिति। विभूतिमदैश्वर्ययुक्तम् श्रीमत्संपत्तियुक्तम् ऊर्जितं केनचित्प्रभावबलादिना गुणेनातिशयितं यद्यत्सत्त्वं वस्तुमात्रं तत्तदेव मम तेजसः प्रभावस्यांशेन संभूतं जानीहि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.41।।पुनश्च साकाङंक्षप्रति कथञ्चित्साकल्येन कथयन्सर्वसङ्ग्रहार्थमाह -- यद्यदिति। सत्त्वं चेतनाचेतनवस्तुमात्रं श्रीमत् शोभादिमच्च ऊर्जितं अन्नसमृद्धिमत् अतिशयितं वा तन्मम तेजोंशसम्भवं जडजीवान्तर्यामिष्वेकैकांशप्राकट्यात् ममाचिन्त्ययोगशक्तेः सच्चिदानन्दैकदेशसम्भवं जानीहीत्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.41।।संसारमें जोजो भी पदार्थ विभूतिमान् -- विभूतियुक्त हैं तथा श्रीमान् और ऊर्जित ( शक्तिमान् ) अर्थात् श्री -- लक्ष्मी? उससे युक्त और उत्साहयुक्त हैं उनउनको तू मुझ ईश्वरके तेजोमय अंशसे उत्पन्न हुए ही जान। अर्थात् मेरे तेजका एक अंश -- भाग ही जिनकी उत्पत्तिका कारण है? इन सब वस्तुओंको ऐसी जान।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.41।। व्याख्या -- यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा -- संसारमात्रमें जिसकिसी सजीवनिर्जीव वस्तु? व्यक्ति? घटना? परिस्थिति? गुण? भाव? क्रिया आदिमें जो कुछ ऐश्वर्य दीखे? शोभा या सौन्दर्य दीखे? बलवत्ता दीखे? तथा जो कुछ भी विशेषता? विलक्षणता? योग्यता दीखे? उन सबको मेरे तेजके किसी एक अंशसे उत्पन्न हुई जानो। तात्पर्य है कि उनमें वह विलक्षणता मेरे योगसे? सामर्थ्यसे? प्रभावसे ही आयी है -- ऐसा तुम समझो -- तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसम्भवम्। मेरे बिना कहीं भी और कुछ भी विलक्षणता नहीं है।मनुष्यको जिसजिसमें विशेषता मालूम दे? उसउसमें भगवान्की ही विशेषता मानते हुए भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। अगर भगवान्को छोड़कर दूसरे वस्तु? व्यक्ति आदिकी विशेषता दीखती है? तो यह,पतनका कारण है। जैसे पतिव्रता स्त्री अपने मनमें यदि पतिके सिवाय दूसरे किसी पुरुषकी विशेषता रखती है? तो उसका पातिव्रत्य भंग हो जाता है? ऐसे ही भगवान्के सिवाय दूसरी किसी वस्तुकी विशेषताको लेकर मन खिंचता है? तो व्यभिचारदोष आ जाता है अर्थात् भगवान्के अनन्यभावका व्रत भंग हो जाता है।संसारमें छोटीसेछोटी और बड़ीसेबड़ी वस्तु? व्यक्ति? क्रिया आदिमें जो भी महत्ता? सुन्दरता? सुखरूपता दीखती है और जो कुछ लाभरूप? हितरूप दीखता है? वह वास्तवमें सांसारिक वस्तुका है ही नहीं। अगर उस वस्तुका होता तो वह सब समय रहता और सबको दीखता? पर वह न तो सब समय रहता है और न सबको दीखता है। इससे सिद्ध होता है कि वह उस वस्तुका नहीं है। तो फिर किसका है उस वस्तुका जो आधार है? उस परमात्माका है। उस परमात्माकी झलक ही उस वस्तुमें सुन्दरता? सुखरूपता आदि रूपोंसे दीखती है। परन्तु जब मनुष्यकी वृत्ति परमात्माकी महिमाकी तरफ न जाकर उस वस्तुकी तरफ ही जाती है? तब वह संसारमें फँस जाता है। संसारमें फँसनेपर उसको न तो कुछ मिलता है और न उसकी तृप्ति ही होती है। इसमें सुख नहीं है? इससे तृप्ति नहीं होती -- इतना अनुभव होनेपर भी मनुष्यका वस्तु आदिमें सुखरूपताका वहम मिटता नहीं। मनुष्यको सावधानीके साथ विचारपूर्वक देखना चाहिये कि प्रतिक्षण मिटनेवाली वस्तुमें जो सुख दीखता है? वह उसका कैसे हो सकता है वह वस्तु प्रतिक्षण नष्ट हो रही है तो उसमें दीखनेवाली महत्ता? सुन्दरता उस वस्तुकी कैसे हो सकती हैजैसे बिजलीके सम्बन्धसे रेडियो बोलता है तो मनुष्य राजी होता है कि देखो? इस यन्त्रसे कैसी आवाज आ रही है पर वास्तवमें उस रेडियोमें जो कुछ शक्ति है? वह सब बिजलीकी ही है। बिजलीसे सम्बन्ध न होनेपर केवल यन्त्रसे आवाज नहीं निकाली जा सकती। अनजान व्यक्ति तो उस शक्तिको यन्त्रकी ही मान लेता है? पर जानकार व्यक्ति उस शक्तिको बिजलीकी ही मानता है। ऐसे ही किसी वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ? क्रिया आदिमें जो कुछ विशेषता दीखती है? उसको अनजान मनुष्य तो उस वस्तु? व्यक्ति आदिकी ही मान लेता है? पर जानकार मनुष्य उस विशेषताको भगवान्की ही मानता है।इसी अध्यायमें आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि सब मेरेसे ही पैदा होते हैं और सबमें मेरी ही शक्ति है। इसमें भगवान्का तात्पर्य यही है कि तुम्हें जहाँकहीं और जिसकिसीमें विशेषता? महत्ता? सुन्दरता? बलवत्ता आदि दीखे? वह सब मेरी ही है? उनकी नहीं। एक वेश्या बड़े सुन्दर स्वरोंमें गाना गा रही थी? तो उसको सुनकर एक सन्त मस्त हो गये कि देखो ठाकुरजीने कैसा कण्ठ दिया है कितनी सुन्दर आवाज दी है तो सन्तकी दृष्टि वेश्यापर नहीं गयी? प्रत्युत भगवान्पर गयी कि इसके कण्ठमें जो आकर्षण है? मिठास है? वह भगवान्की है। ऐसे ही कोई फूल दीखे तो राजी हो जाय कि वाहवाह? भगवान्ने इसमें कैसी सुन्दरता भरी है कोई किसीको बढ़िया पढ़ा रहा है तो बढ़िया पढ़ानेकी शक्ति भगवान्की है? पढ़ानेवालेकी नहीं। देवताओंको बृहस्पति प्रिय लगते हैं? रघुवंशियोंको वसिष्ठजी प्रिय लगते हैं? किसीको सिंहमें विशेषता दीखती है? किसीको रुपये बहुत प्यारे लगते हैं? तो उनमें जिस शक्ति? महत्ता? विशेषता आदिको लेकर आकर्षण? प्रियता? खिंचाव हो रहा है? वह शक्ति? महत्ता आदि भगवान्की ही है? उनकी अपनी नहीं। इस तरह जिसकिसीमें जहाँकहीं विशेषता दीखे? वह भगवान्की ही दीखनी चाहिये। इसलिये भगवान्ने अनेक तरहकी विभूतियाँ बतायी हैं। इसका तात्पर्य है कि उन विभूतियोंमें श्रद्धा? रुचिके भेदसे आकर्षण हरेकका अलगअलग होगा? एक समान सबको विभूतियाँ अच्छी नहीं लगेंगी? पर उन सबमें शक्ति भगवान्की है।यद्यपि जिसकिसीमें जो भी विशेषता है? वह परमात्माकी है? तथापि जिनसे हमें लाभ हुआ है अथवा हो रहा है? उनके हम जरूर कृतज्ञ बनें? उनकी सेवा करें। परन्तु उनकी व्यक्तिगत विशेषता मानकर वहाँ फँस न जायँ -- यह सावधानी रखें।विशेष बातभगवान्ने बीसवें श्लोकसे लेकर उनतालीसवें श्लोकतक जितनी विभूतियाँ कही हैं? उनमें प्रायः अस्मि (मैं हूँ) पदका प्रयोग किया है। केवल तीन जगह -- चौबीसवें और सत्ताईसवें श्लोकमें विद्धि तथा यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें अवगच्छ पदका प्रयोग करके जानने की बात कही है।अस्मि (मैं हूँ) पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य विभूतियोंके मूल तत्त्वका लक्ष्य करानेमें है कि इन सब विभूतियोंके मूलमें मैं ही हूँ। कारण कि सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि मैं आपको कैसे जानूँ? तो भगवान्ने अस्मि का प्रयोग करके सब विभूतियोंमें अपनेको जाननेकी बात कही।दो जगह विद्धि पदका प्रयोग करनेका तात्पर्य मनुष्यको सावधान? सावचेत करानेमें है। मनुष्य दोके द्वारा सावचेत होता है -- ज्ञानके द्वारा और शासनके द्वारा। ज्ञान गुरुके द्वारा प्राप्त होता है और शासन स्वयं राजा करता है। अतः चौबीसवें श्लोकमें जहाँ गुरु बृहस्पतिका वर्णन आया है? वहाँ विद्धि कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग गुरुके द्वारा मेरी विभूतियोंके तत्त्वको ठीक तरहसे समझो। विभूतियोंके तत्त्वको समझनेका फल है -- मेरेमें दृढ़ भक्ति होना (गीता 10। 7)। सत्ताईसवें श्लोकमें जहाँ राजाका वर्णन आया है? वहाँ विद्धि कहनेका तात्पर्य है कि तुमलोग राजाके शासनद्वारा उन्मार्गसे बचकर सन्मार्गमें लगना अर्थात् अपना जीवन शुद्ध बनाना समझो। गुरु प्रेमसे समझाता है और राजा बलसे? भयसे समझाता है। गुरुके समझानेमें उद्धारकी बात मुख्य रहती है और राजाके समझानेमें लौकिक मर्यादाका पालन करनेकी बात मुख्य रहती है।सत्ताईसवें श्लोकमें जो उच्चैःश्रवा और ऐरावत का वर्णन आया है? वे दोनों राजाके वैभवके उपलक्षण हैं। कारण कि घोड़े? हाथी आदि राजाके ऐश्वर्य हैं और ऐश्वर्यवान् राजा ही शासन करता है। इसलिये उस श्लोकमें विद्धि पदका प्रयोग खास करके राजाके लिये ही किया हुआ मालूम देता है।यहाँ इकतालीसवें श्लोकमें जो अवगच्छ पद आया है? उसका अर्थ है -- वास्तविकतासे समझना कि जो कुछ भी विशेषता दीखती है? वह वस्तुतः भगवान्की ही है।इस प्रकार दो बार विद्धि और एक बार अवगच्छ पद देनेका तात्पर्य यह है कि गुरु और राजाके द्वारा समझानेपर भी जबतक मनुष्य स्वयं उनकी बातको वास्तविकतासे नहीं समझेगा? उनकी बातको नहीं मानेगा? तबतक गुरुका ज्ञान और राजाका शासन उसके काम नहीं आयेगा। अन्तमें तो स्वयंको ही मानना पड़ेगा और वही उसके काम आयेगा। सम्बन्ध -- यहाँतक अर्जुनके प्रश्नोंका उत्तर देकर अब भगवान् अपनी तरफसे खास बात बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.41।।अनुक्ता अपि परस्य विभूतीः संग्रहीतुं लक्षणमाह -- यद्यदिति। वस्तु प्राणिजातं? श्रीमत्समृद्धिमद्वा कान्तिमद्वा। सप्राणं बलवदूर्जितं तदाह -- उत्साहेति। संभवत्यस्मादिति संभवः। तेजसश्चैतन्यस्येश्वरशक्तेर्वांशस्तेजोंशः संभवोऽस्येति तेजोंशसंभवम्। तदाह -- तेजस इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.41।।एष तूद्देशतः [10।40] इत्येतच्छब्दोऽनुक्रान्तपरामर्शीति प्रतीतिनिरासार्थमाह -- यद्यदिति। वक्ष्यमाणं बुद्धिस्थमेतच्छब्देन परामृश्यते। शृङ्गग्राहिकयोक्तेरपि लक्षणोक्तेर्विस्तरत्वादिति भावः। विभूतिमदादिकं मम तेजोरूपेणांशेन सह भवतीत्युक्त्या विष्ण्वादीनामपि भगवदंशयुक्तत्वं प्रतीयते। तेषामप्येतल्लक्षणोपेतत्वात्तन्निवृत्त्यर्थमाह -- विष्ण्वादीनीति। तर्हि किंविषयमेतद्वाक्यं इत्यत आह -- अन्यानि त्विति। कुत एतत् इत्यत आह -- तथा चेति। विशेषकाः गरुडानन्तविरिञ्चाः। वैन्यः पृथुः। राजन्यग्रहणेन गृहीतस्यापि पुनरुक्तिः साक्षादवतारत्वविशेषोक्तिबोधनार्थम्। कृष्णो धर्मसूनुरपि। रामो भार्गवोऽपि। अंशयुक्तत्वेनोक्त्वाकला इत्यनेन कला इव कलाः? न स्वरूपत्वेन।एते स्वांशकलाः इत्यनेन स्वरूपांशरूपा एव कलाः? न तु पूर्ववदुपचारेणेति। नन्वत्रैते वराहाद्याः परमपुरुषस्यांशा एव? कृष्णस्त्वंशी भगवान् स्वयमिति प्रतीयते? तत्कथमुक्तव्याख्यानमन्यथा तुशब्दानुपपत्तेरित्यत आह -- तुशब्द इति। ततश्चायमर्थः -- एतेवराहाद्याः पुंसः स्वांशकलाः। कोऽर्थः कृष्णः परमपुरुषो भगवान् स्वयमेवैते इति। कुत एतत् इति चेत् उदाहृतश्रुतिसंवादात्। अर्थान्तरस्य संवादाभावाच्चेत्याह -- अन्यस्त्विति। वराहादयोऽप्यंशाः कृष्णोंऽशीत्येवंरूपः। इतोऽप्ययं विशेषो न युक्त इत्याह -- अंशत्वमिति। तत्रापि कृष्णेऽपि किञ्चास्मिन् व्याख्याने कृष्णस्यैकस्यैव प्रकृतत्वात्।इन्द्रारिव्याकुलं लोकं मृडयन्ति युगे युगे [भाग.1।3।28] इत्युत्तरवाक्ये बहुवचनं नोपपन्नमित्याह -- मृडयन्तीति। ननु बहुवचनं पूर्वोक्तैर्वराहादिभिः सम्बध्यते? न कृष्णेनेति चेत्? नकृष्णस्तु भगवान् स्वयं इति वाक्यार्थेन व्यवहितत्वात्? व्यवहितस्यापि पुनः सन्निधानाय परामर्शाभावात्। सति गत्यन्तरेऽध्याहारायोगात्। असन्निहितेनान्वयबोधस्य क्वाप्यदर्शनादिति भावेनाह -- न हीति। क्रियेति प्रकृतापेक्षयोक्तम्। ननु सन्निधेरपि योग्यता बलवतीति चेत्? सत्यम् सन्निधिमनतिक्रम्य योग्यान्वयस्तूक्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.41।।यद्यद्विभूतमदिति विस्तरः। विष्ण्वादीनि ततस्वरूपाण्येव। अन्यानि तु तेजोयुक्तानि। तथा च पैङ्गिखिलेषु -- विशेषका रुद्रवैन्येन्द्रदेवा राजन्याद्या अंशयुतान्यजीवाः। कृष्णव्यासौ रामकृष्णौ च रामकपिलयज्ञप्रमुखः स्वयं सः इति।स एवैको भार्गवदाशरथिकृष्णाद्यास्त्वंशयुतान्यजीवाः इति गौतमखिलेषु।ऋषयो मनवो देवा मनुपुत्रा महौजसः। कलाः सर्वे हरेरेव सप्रजापतयः स्मृताः। एते स्वांशकलाः (चांशकलाः) पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् इति भागवते [1।3।2728] ऋष्यादीनंशयुतत्वेनोक्त्वा वराहादीन्स्वरूपत्वेनाह। तुशब्द एवार्थे। अन्यस्तु विशेषो न कुत्राप्यवगतः। अंशत्वं तत्राप्यवगतम्उद्बबर्हात्मनः केशौ इति। मृडयन्तीति च बहुवचनं चायुक्तम्। न ह्यन्तराऽन्यदुक्त्वा पूर्वमपरामृश्य तत्क्रियोच्यमाना दृष्टा कुत्रचित्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.41।। --,यद्यत् लोके विभूतिमत् विभूतियुक्तं सत्त्वं वस्तु श्रीमत् ऊर्जितमेव वा श्रीर्लक्ष्मीः तया सहितम् उत्साहोपेतं वा? तत्तदेव अवगच्छ त्वं जानीहि मम ईश्वरस्य तेजोंऽशसंभवं तेजसः अंशः एकदेशः संभवः यस्य तत् तेजोंऽशसंभवमिति अवगच्छ त्वम्।।अथवा बहुना एतेन एवमादिना किं ज्ञातेन तव अर्जुन स्यात् सावशेषेण। अशेषतः त्वम् उच्यमानम् अर्थं श्रृणु -- विष्टभ्य विशेषतः स्तम्भनं दृढं कृत्वा इदं कृत्स्नं जगत् एकांशेन एकावयवेन एकपादेन? सर्वभूतस्वरूपेण इत्येतत् तथा च मन्त्रवर्णः -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि (तै0 आर0 3।12) इति स्थितः अहम् इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य,श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येदशमोऽध्यायः।।,प
───────────────────
【 Verse 10.42 】
▸ Sanskrit Sloka: अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन | विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ||
▸ Transliteration: athavā bahunaitena kiṁ jñātena tavārjuna | viṣṭabhyāhamidaṁ kṛtsnam ekāṁśena sthito jagat ||
▸ Glossary: athavā: or; bahunā: many; etena: of this kind; kiṁ: what; jñātena: know; tava: you; arjuna: Arjuna; viṣṭabhya: full; aham: I; idaṁ: this; kṛtsnam: of all man- ifestations; eka: one; amśena: part; sthito: situated; jagat: world
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 10.42 Of what use is to know about the many manifestations of this kind, O Arjuna? I pervade this entire world with just a part of Myself.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।10.42।।अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।10.42।। अथवा हे अर्जुन बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 10.42 अथवा or? बहुना (by) many? एतेन (by) this? किम् what? ज्ञातेन known? तव to thee? अर्जुन O Arjuna? विष्टभ्य supporting? अहम् I? इदम् this? कृत्स्नम् all? एकांशेन by one part? स्थितः exist? जगत् the world.Commentary The Lord concludes Having established or pervaded this whole world with one fragment of Myself? I remain.This verse is based on the declaration in the Purusha Sukta (RigVeda10.90.3) that One arter of Him is all the cosmos the three arters are the divine transcendent Reality.I exist supporting this whole world by one part? by one limit? or by one foot. One part of Myself constitutes all beings.All beings form His foot (Taittiriya Aranyaka 3.12). The whole world is one Pada or foot of the Lord. Amsa (part) or Pada (foot) is mere Kalpana or imagination or account of our own ignorance,or limiting adjunct. In reality Brahman is without any such parts or limbs and is formless.Arjuna has now a knowledge of the glories of the Lord. He is fit to behold the magnificent cosmic form of the Lord. Lord Krishna prepares Arjuna for this grand vision by giving him a description of His glories.Arjuna says O Lord? I now realise that the whole world is filled by Thee. I now wish to behold the whole universe in Thee with my eye of intuition.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the tenth discourse entitledThe Yoga of the Divine Glories.,
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 10.42. Or, O Arjuna ! Why this detailed statement ? I remain, pervading this entire universe with a single fraction [of Myself].
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 10.42 But what is the use of all these details to thee? O Arjuna! I sustain this universe with only small part of Myself."
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 10.42 But of what use to you is all this extensive knowledge O Arjuna? I stand sustaining this whole universe with a fragment of Mine (of My power).
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 10.42 Or, on the other hand, what is the need of your knowing this extensively, O Arjuna? I remain sustaning this whole creation in a special way with a part (of Myself).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 10.42 But, of what avail to thee is the knowledge of all these details, O Arjuna? I exist, supporting this whole world by one part of Myself.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 10.19-42 Hanta te etc. upto jagat sthitah. I am the Soul etc. (verse 20) : By this [the Bhagavat] wards off the exclusion [of any being as different form Him]. Otherwise the sentences like 'Of the immovable [I am] the the Himalayas' (verse 25) etc., would amount to the exclusive statement that the Himalayan range is the Bhagavat and not any other one. In that case, the indiscriminateness of the Brahman is not established and hence the realisation of the Brahman would be a partial (or conditioned) one. For, the [present] text of exposition is intended for that seeker whose mind cannot contemplate on the all-pervasiveness [of the Brahman], but who [at the same time] is desirous of realising that [all-pervasiveness]. Hence, while concluding, [the Bhagavat] teaches the theory of duality-cumunity by saying 'whatsoever being exists with the manifesting power' etc., and then concludes the topic with the theory of absolute unity, as 'Or what is the use of this elaboration;৷৷৷৷.I remain pervading this [universe] by a single fraction [of Myself] This has been declared indeed [in the scriptures] as :
'All beings constitute [only] His one-fourth; His [other] immortal three-forths are in the heaven.' (Rgveda, X, xc, 3).
Thus, all this and the prime cause of creatures, are nothing but the Bhagavat (Absolute). And hence, He Himself becomes the object of knowledge of all, but being comprehended with the different strange alities.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 10.42 What is the use to you of this detailed knowledge taught by Me? I sustain this universe with an infinitesimal fraction of My power - this universe consisting of sentient and non-sentient entities, whether in effect or causal condition, whether gross or subtle - in such a manner that it does not violate My will in preserving its proper form, existence and various activities. As said by Bhagavan Parasara: 'On an infinitesimal fraction of this energy, this universe rests' (V. P., 1.9.53).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 10.42 Athava, or, on the other hand; kim, what is the need; of tava jnatena, your knowing; etena bahuna, this extensively-but imcompletely-in the above manner, O Arjuna? You listen to this subject that is going to be stated in its fullness: Aham, I; sthitah, remain; vistabhya, sustaining, supporting, holding firmly, in a special way; idam, this; krtsnam, whole; jagat, creation; ekamsena, by a part, by a foot [The Universe is called a foot of His by virtue of His having the limiting adjunct of being its efficient and material cause.] (of Myself), i.e. as the Self of all things [As the material and the efficient cause of all things]. The Vedic text, 'All beings form a foot of His' (Rg., Pu. Su. 10.90.3; Tai. Ar. 3.12.3) support this. [A Form constituted by the whole of creation has been presented in this chapter for meditation. Thery the unalified transcendental Reality, implied by the word tat (in tattva-masi) and referred to by the latter portion of the Commentator's otation (viz tripadasyamrtam divi: The immortal three-footed One is established in His own effulgence), becomes established.]
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।10.42।। यद्यपि मित्रता और स्नेह के उत्स्फूर्त भावावेश में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी विभूति (समष्टि रूप) और योग ( व्यष्टि रूप) को वर्णन करने का वचन दिया था? परन्तु एकएक उदाहरण देते समय उन्होंने अपने को इस कार्य के लिए सर्वथा असमर्थ पाया। अनन्त तत्त्व के अनन्त विस्तार का वर्णन कैसे संभव हो सकता है असमर्थता के कारण उन्हें विषाद है किन्तु पुन अपने शिष्य के प्रति अत्यन्त प्रेम के कारण? भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण अध्याय का सार इस अन्तिम श्लोक में बताते हैं।इस बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है वास्तव मे देखा जाय? तो अनन्त तत्त्व को प्रत्येक परिच्छिन्न रूप में दर्शाने का प्रयत्न व्यर्थ ही है? क्योंकि वह असंभव है। मिट्टी को समस्त विद्यमान घटों में तथा जल को सम्पूर्ण तरंगों में एकएक करके दिखाना असंभव है। केवल इतना ही किया जा सकता है कि कुछ उदाहरणों के द्वारा विद्यार्थियों को तत्त्व का दर्शन करने की कला को सिखाया जाय। गणित के अध्यापन में इसी पद्धति का उपयोग किया जाता है।मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ वेदान्त में जगत् शब्द में वे समस्त अनुभव समाविष्ट है? जो हम अपनी इन्द्रियों? मन और बुद्धि के द्वारा प्राप्त करते हैं। संक्षेप में जिन वस्तुओं को हम दृश्य रूप में जानते हैं? वे सभी जगत् शब्द की परिभाषा में आते हैं। इसमें दृश्य पदार्थ? भावनाएं? विचार और उनको ग्रहण करने वाली इन्द्रियादि उपाधियाँ भी सम्मिलित हैं।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में भगवान् श्रीकृष्ण आत्मस्वरूप की दृष्टि से कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् उनके एक अंश मात्र में धारण किया हुआ है। इस कथन का एक और दार्शनिक अभिप्राय यह है कि सत्य का अधिकांश भाग इस जगत् तथा उसके विकारों से सर्वथा निर्लिप्त है यद्यपि सर्वत्र समान रूप से व्याप्त अखण्ड सत्य में इस प्रकार अंशों का भेद नहीं किया जा सकता? तथापि लौकिक परिच्छिन्न भाषा के शब्दों द्वारा पारमार्थिक सत्य को निर्देशित करने की यह एक औपनिषदीय पद्धति है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे,श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का विभूतियोग नामक दंसवा अध्याय समाप्त होता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।10.42।।एवं संक्षेपविस्तराभ्यां विभूतीरुक्त्वाऽशक्तं प्रत्याह -- अथवेति। एतेन बहुन ज्ञातेन तव किं चित्तशोधकस्यैतज्ज्ञानस्य शुद्धचित्ते शक्ते त्वयि प्रयोजनाभावादिति ध्वनयन्त्संबोधयति -- हे अर्जुनेति। तर्हि मया किं चिन्तनीयमित्यपेक्षायामाह। इदं सर्व जगत् एकांशेनावष्टभ्य स्तम्भनं कृत्वाहं स्थितः। तथाच श्रुतिःपादोऽस्य विश्वा भूतानीति। अथवाऽनेन श्लोकेनार्जनपृष्टो योग उक्तः। एवं दशमाध्यायेन ज्ञेयं ज्ञानोपायभूतं योगविभूतिमत् ध्येयज्ञानं प्रदर्शयता तत्पदार्थो निरुपितः।इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीबालस्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचित्तायां श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां दशमोऽध्यायः।।10।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।10.42।।एवमवयवशो विभूतिमुक्त्वा साकल्येन तामाह -- अथवेति पक्षान्तरे। बहुनैतेन सावशेषेण ज्ञातेन किं,तव स्यात् हे अर्जुन्? इदं कृत्स्नं सर्वं जगदेकांशेन एकदेशमात्रेण विष्टभ्य विधृत्य व्याप्य वाहमेव स्थितो न,मद्व्यतिरिक्तं किंचिदस्तिपादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि इति श्रुतेः। तस्मात्किमनेन परिच्छिन्नदर्शनेन सर्वत्र मद्दृष्टिमेव कुर्वित्यभिप्रायः।कुर्वन्ति केऽपि कृतिनः क्वचिदप्यनन्ते स्वान्तं विधाय विषयान्तरशान्तिमेव।त्वत्पादपद्मविगलन्मकरन्दबिन्दुमास्वाद्य माद्यति मुहुर्मधुभिन्मनो मे।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।10.42।।उत्तमाधिकारिणमुद्दिश्याह -- अथवेति। मूढान्प्रत्येतदुक्तं? त्वं तु एतावदेव विद्धि। एकांशेन एकदेशेनाहमिदं विष्टभ्य व्याप्य स्थितोऽस्मि।पादोऽस्य विश्वा भूतानि इति श्रुतेः। तस्मात्परिच्छिन्नं दर्शनं त्यक्त्वा सर्वत्र ब्रह्मबुद्धिमेव कुर्वित्याशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।10.42।।एवं विभूत्यादिमत्सु भगवदंशज्ञानेनान्यत्र हेयत्वादिबुद्धौ सर्वस्य भगवदात्मकत्वं भज्येतेत्यन्यं प्रकारमाह -- अथवेति। अथवा पक्षान्तरेण। हे अर्जुन तव बहुना नानाविधेन ज्ञातेन किं कार्यम् न किमपीत्यर्थः। यत एतेन नानाज्ञानेन न किञ्चित् कार्यम्? अतः कार्योपयोगिस्वरूपमाह -- इदं परिदृश्यमानं जगत् कृत्स्नं सम्पूर्णं एकांशेन क्रीडात्मकेन विष्टभ्य धृत्वा स्थितोऽस्म्यहमेवेत्यर्थः। अनेन सर्वं मत्क्रीडारूपमेव चिन्तयेति भावो बोधितः।प्रतीयते जगन्नानाविधं स्वाज्ञानभावतः।विभूतिरूपं श्रीकृष्णस्तन्नाशायाऽब्रवीन्नरम्।।10।।इति श्रीभगवद्गीतामृततरङ्गिण्यां दशमोऽध्यायः।।10।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।10.42।। अथवा किमनेन परिच्छिन्नज्ञानेन सर्वत्र समदृष्टिमेव कुर्वित्याह -- अथवेति। बहुना पृथग्ज्ञातेन किं तव कार्यं। यदिदं सर्वं जगदेकांशेनैकदेशमात्रेण विष्टभ्य धृत्वा व्याप्येति वाहमेव स्थितः न मद्व्यतिरिक्तं किंचिदस्तिपादोऽस्य विश्वा भूतानि इति श्रुतेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।10.42।।एवं विभूतिप्रक्रियां योगे निपात्योसंहरति -- अथवेति। अथवा बहुनैतेनोच्यमानेनेह ज्ञातेन विशेषेण तव किं अहं पुरुषोत्तमोऽधिदेव एकांशेनाक्षरमहिम्नाऽध्यात्मरूपेण कृत्स्नमिदं चेतनाचेतनात्मकं जगदधिभूतं कार्यशरीरावस्थं सूक्ष्मं च विष्टभ्य विधृत्य व्याप्य नियम्य च स्थितोऽस्मीति योगं ममैश्वर्यं जानीहि। एतेन स्वस्यैकांशेन जगद्विष्टम्भकथनात् कृत्स्नप्रसक्तिरपि वारिता। तेन माहात्म्यं सूचितम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।10.42।।अथवा हे अर्जुन इस उपर्युक्त प्रकारसे वर्णन किये हुए अधूरे विभूतिविस्तारके जाननेसे तेरा क्या ( प्रयोजन सिद्ध ) होगा? ( तू तो बस? ) यह सम्पूर्णतासे कहा जानेवाला अभिप्राय ही सुन ले -- मैं एक अंशसे अर्थात् सर्व भूतोंका आत्मरूप जो मेरा एक अवयव है उससे? इस सारे जगत्को विशेष रूपसे दृढ़तापूर्वक धारण करके स्थित हो रहा हूँ। ऐसा ही वेदमन्त्र भी कहते हैं कि समस्त भूत इस परमेश्वरका एक पाद है। इत्यादि।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।10.42।। व्याख्या -- अथवा -- यह अव्ययपद देकर भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि तुमने जो प्रश्न किया था? उसके अनुसार मैंने उत्तर दिया ही है अब मैं अपनी तरफसे तेरे लिये एक विशेष महत्त्वकी सार बात बताता हूँ।बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन -- भैया अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुत जाननेकी क्या जरूरत है मैं घोड़ोंकी लगाम और चाबुक पकड़े तेरे सामने बैठा हूँ। दीखनेमें तो मैं छोटासा दीखता हूँ? पर मेरे इस शरीरके किसी एक अंशमें अनन्त कोटि ब्रह्माण्ड महासर्ग और महाप्रलय -- दोनों अवस्थाओंमें मेरेमें स्थित हैं। उन सबको लेकर मैं तेरे सामने बैठा हूँ और तेरी आज्ञाका पालन करता हूँ इसलिये जब मैं स्वयं तेरे सामने हूँ? तब तेरे लिये बहुतसी बातें जाननेकी क्या जरूरत हैविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् -- मैं इस सम्पूर्ण जगत्को एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ -- यह कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्के किसी भी अंशमें अनन्त सृष्टियाँ विद्यमान हैं -- रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड (मानस 1। 201)। परन्तु उन सृष्टियोंसे भगवान्का कोई अंश? भाग रुका नहीं है अर्थात् भगवान्के किसी अंशमें उन सब सृष्टियोंके रहनेपर भी वहाँ खाली जगह पड़ी है। जैसे? प्रकृतिका बहुत क्षुद्र अंश हमारी बुद्धि है। बुद्धिमें कई भाषाओंका? कई लिपियोंका? कई कलाओंका ज्ञान होनेपर भी हम ऐसा नहीं कह सकते कि हमारी बुद्धि अनेक भाषाओं आदिके ज्ञानसे भर गयी है अतः अब दूसरी भाषा? लिपि आदि जाननेके लिये जगह नहीं रही। तात्पर्य है कि बुद्धिमें अनेक भाषाओं आदिका ज्ञान होनेपर भी बुद्धिमें जगह खाली ही रहती है और कितनी ही भाषाएँ आदि सीखनेपर भी बुद्धि भर नहीं सकती। इस प्रकार जब,प्रकृतिका छोटा अंश बुद्धि भी अनेक भाषाओं आदिके ज्ञानसे नहीं भरती? तो फिर प्रकृतिसे अतीत? अनन्त? असीम और अगाध भगवान्का कोई अंश अनन्त सृष्टियोंसे कैसे भर सकता है वह तो बुद्धिकी अपेक्षा भी विशेषरूपसे खाली रहता है।इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें विभूतियोग नामक दसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।10।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।10.19 -- 10.42।।हन्त ते कथयिष्यामीत्यादि जगत्स्थित इत्यन्तम्। अहमात्मा (श्लो. 20) इत्यनेन व्यवच्छेदं वारयति। अन्यथा स्थावराणां हिमालय इत्यादिवाक्येषु हिमालय एव भगवान् नान्य इति व्यवच्छेदेन? निर्विभागत्वाभावात् ब्रह्मदर्शनं खण्डितम् अभविष्यत्। यतो यस्याखण्डाकारा व्याप्तिस्तथा चेतसि न उपारोहति? तां च [यो] जिज्ञासति तस्यायमुपदेशग्रन्थः। तथाहि उपसंहारे ( उपसंहारेण) भेदाभेदवादं,यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वम् (श्लो -- 41) इत्यनेनाभिधाय? पश्चादभेदमेवोपसंहरति अथवा बहुनैतेन -- विष्टभ्याहमिदं -- एकांशेन जगत् स्थितः (श्लो -- 42) इति। उक्तं हि -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि।।इति -- RV? X? 90? 3प्रजानां सृष्टिहेतुः सर्वमिदं भगवत्तत्त्वमेव तैस्तेर्विचित्रै रूपैर्भाव्यमानं (S तत्त्वमेतैस्तैर्विचित्रैः रूपैः ? N -- विचित्ररूपै -- ) सकलस्य (S?N सकलमस्य) विषयतां यातीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।10.42।।सर्वेषां सुगमत्वायावयवशो विभूतिमुक्त्वा भक्तानुग्रहार्थं साकल्येन तामाह -- अथवेति। पक्षान्तरपरिग्रहार्थमथवेत्युक्तम्। बहुधा विस्तीर्णेनैतेन संज्ञातेन सावशेषेण तव शक्तस्य न किंचित्फलं स्यादित्याह -- बहुनेति। नहि विभूतिषूक्तासु ज्ञातासु सर्वं ज्ञायते कासांचिदेव विभूतीनामुक्तत्वादित्यर्थः। तर्हि केनोपदेशेनाल्पाक्षरेण सर्वोऽर्थो ज्ञातुं शक्यते तत्राह -- अशेषत इति। विशेषतः स्तंभनं विधरणं सर्वभूतस्वरूपेण सर्वप्रपञ्चोपादानशक्त्युपाधिकेनैकेन पादेन कृत्स्नं जगद्विधृत्य स्थितोऽस्मीति संबन्धः। तत्रैव श्रुतिं प्रमाणयति -- तथाचेति। तदनेन भगवतो नानाविधा विभूतीर्ध्येयत्वेन ज्ञेयत्वेन चोपदिश्यन्ते। सर्वप्रपञ्चात्मकं ध्येयं रूपं दर्शयित्वात्रिपादस्यामृतं दिवि इति प्रपञ्चाधिकं निरुपाधिकं तत्त्वमुपदिशता परिपूर्णसच्चिदानन्दैकतानस्तत्पदलक्ष्योऽर्थो निर्धारितः।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दगिरिकृतौ दशमोऽध्यायः।।10।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।10.42।।अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन इति पूर्वोक्तव्यस्तज्ञानाक्षेपात् तस्य निष्फलत्वमिति प्रतीतिनिरासार्थमाह -- किमिति। किमित्ययमाक्षेपो वक्ष्यमाणसर्वव्याप्तरूपज्ञानस्योक्तरविप्रभृतिपरिच्छिन्नवस्तुस्वरूपज्ञानापेक्षया प्राधान्यज्ञापनार्थमेव? न तूक्तविशेषज्ञानस्य निष्फलत्वज्ञापनार्थम्। निष्फलत्वे तदुक्तिवैयर्थ्यापत्तिरित्यर्थः। ननु व्याप्तिज्ञानेनैव मुक्तिसम्भवाद्विशेषज्ञानं व्यर्थमेव किं न स्यात् इत्यत आह -- अज्ञात्वेति।प्रियशिरस्त्वाद्यप्राप्तिः इत्यादिकं ध्यानापेक्षयोक्तं ज्ञानापेक्षया तु श्रुतिरित्यविरोधः? अथवा विशिष्टाधिकारिविषयेयं श्रुतिः। ननु व्याप्तज्ञानयोग्यानां विशेषज्ञानं निष्फलमेव?अन्यान्प्रति तु तदुक्तिः इति व्यवस्थाऽस्तु? तवेति विशेषणसामर्थ्यादित्यत आह -- त्वं त्विति। अतो न तव विशेषज्ञानमात्रेणालमिति ज्ञापयितुमिति शेषः। विशेषणस्यान्यथासिद्धत्वान्नोक्तव्यवस्थाकल्पकत्वमिति भावः। ननु किं ज्ञातेन न किमपीति शब्दादुक्तस्य नैष्फल्ये,प्रतीते तदुक्तिवैयर्थ्यप्रसङ्गात् बाधकान्निष्फलाल्पफलयोर्महाफलत्वाभावसादृश्याद्गौण्या वृत्त्योक्तस्याप्राधान्यप्रतीतावर्थाद्वक्ष्यमाणस्य प्राधान्यप्रतीतिरित्युक्तम्? तत्र गौणप्रयोगे प्रयोजनं वाच्यमिति चेत्? न रूढोपचारत्वादिति भावेनाह -- अन्येति। स्तुतिः प्रशस्तताज्ञापनम्। अर्थः प्रयोजनम्। स्यादिदं व्याख्यानं यदि परिच्छिन्नज्ञानाद्व्याप्तिज्ञानस्य प्राधान्यं प्रमितं स्यात्। तदेव कुतः इत्यत आह -- प्राधान्यं चेति।यो मां इति विशिष्टफलकथनात्। न्यायसिद्धोऽप्यर्थो वाक्यसम्मत्या दृढो भवतीत्येतदुक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।10.42।।किमिति वक्ष्यमाणप्राधान्यज्ञापनार्थं? न तूक्तनिष्फलत्वज्ञानाय। तथा सति नोच्येत। अज्ञात्वैनं सविशेषयुक्तं देवं वरं को विमुच्येत बन्धात् इत्यृग्वेदखिलेषु। त्वं तु बहुफलप्राप्तियोग्य इति तवेति विशेषणम्। अन्यस्तुत्यर्थत्वेन प्रसिद्धश्चैवात्र किंशब्दः।रागद्वेषौ यदि स्यातां तपसा किं प्रयोजनम्। तावुभौ यदि न स्यातां तपसा किं प्रयोजनम् इत्यादौ। प्राधान्यं च सिद्धमेकत्र दर्शनात्सर्वत्र भगवद्दर्शनस्य।यो मां पश्यति सर्वत्र [6।30] इत्यादौ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।10.42।। --,अथवा बहुना एतेन एवमादिना किं ज्ञातेन तव अर्जुन स्यात् सावशेषेण। अशेषतः त्वम् उच्यमानम् अर्थं श्रृणु -- विष्टभ्य विशेषतः स्तम्भनं दृढं कृत्वा इदं कृत्स्नं जगत् एकांशेन एकावयवेन एकपादेन? सर्वभूतस्वरूपेण इत्येतत् तथा च मन्त्रवर्णः -- पादोऽस्य विश्वा भूतानि (तै0 आर0 3।12) इति स्थितः अहम् इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य,श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येदशमोऽध्यायः।।,