11. Bhagavad Gita — Chapter 11
Chapter 11 (Part 1)
【 Verse 11.1 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसञ्ज्ञितम् | यत्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca | madanugrahāya paramaṁ guhyaṁ adhyātma-saṁjñitam | yat tvayoktaṁ vacas tena moho’yaṁ vigato mama ||
▸ Glossary: Arjuna uvāca: Arjuna says; madanugrahāya: out of compassion for me; para- maṁ: supreme; guhyaṁ: confidential; adhyātma: spiritual; saṁjñitam: in the matter of; yat: what; tvayā: by You; uktaṁ: says; vacaḥ: words; tena: by that; mohaḥ: delusion; ayaṁ: this; vigataḥ: removed; mama: my
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.1 Arjuna says: ‘O Lord! By listening to Your wisdom on the supreme secret of Existence and your glory, I feel that my delusion has disappeared.’
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.1।।(टिप्पणी प0 573.1) अर्जुन बोले -- केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मतत्त्व जाननेका वचन कहा? उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.1।। अर्जुन ने कहा -- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए जो परम गोपनीय? अध्यात्मविषयक वचन (उपदेश) आपके द्वारा कहा गया? उससे मेरा मोह दूर हो गया है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.1 मदनुग्रहाय for the sake of blessing me? परमम् the highest? गुह्यम् the secret? अध्यात्मसंज्ञितम् called Adhyatma? यत् which? त्वया by Thee? उक्तम् spoken? वचः word? तेन by that? मोहः delusion? अयम् this? विगतः gone? मम my.Commentary After hearing the glories of the Lord? Arjuna has an intense longing to have the wonderful vision of the Cosmic Form with his own eyes. His bewilderment and delusion have now vanished.Adhyatma That which treats of the discrimination between the Self and the notSelf metaphysics.I was worried about the sin involved in killing my relations and preceptors. I had the ideas? I am the agent in killing them they are to be killed by me.This delusion has vanished now after receiving Thy most profound and valuable instructions. Thou hast dispelled this delusion of ignorance from me.The vision of the Cosmic Form is not the ultimate goal. If that were so? the Gita would have ended with this chapter. The vision of the Cosmic Form is also one more in a series of graded experiences. It is a terrible experience too. That is the reason why Arjuna said to the Lord? stammering with fear What an awful form Thou hast I have seen that which none hath seen before. My heart is glad? yet faileth me on account of fear. Show me? O God? Thine other form again. O God of gods? support of all the worlds? let me see Thy form with the diadem? and with the mace and discus in Thy hands. Again I wish to see Thee as before assume Thy fourarmed form? O Lord of thousand arms and of forms innumerable.Arjuna heard the Lords statement? viz.? Having pervaded this whole universe with one fragment of Myself? I remain. This induced him to have the vision of the Lords Cosmic Form. He says? O Lord of compassion? Thou hast taught me the spiritual wisdom which can hardly be found in the Vedas. Thou hast saved me. My delusion has disappeared. Thou hast disclosed to me the nature of the Supreme Self? the secrets of Nature and Thy divine glories. My greatest ambition at the present moment is that I should behold with my own eyes Thy entire Cosmic Form.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.1. Arjuna said My delusion has completely gone thanks to the great and mysterious discourse which is termed as a science governing the Soul and which You have delivered by way of favouring me.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.1 "Arjuna said: My Lord! Thy words concerning the Supreme Secret of Self, given for my blessing, have dispelled the illusions which surrounded me.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.1 Arjuna said To show favour to Me, You have told me that most profound mystery concerning the self; by that, this delusion of mine is dispelled.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.1 Arjuna said This delusion of mine has departed as a result of that speech which is most secret and known as pertaining to the Self, and which was uttered by You for my benefit.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.1 Arjuna said By this word (explanation) of the highest secret concerning the Self which Thou hast spoken, for the sake of blessing me, my delusion is gone.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.1 Now Arjuna seeks to perceive, with his own sense-organ (11.eye), what has been taught in the last chapter. The subject matter, learnt through the [teacher's] instructions, becomes ite clear if it is grasped by the knowledge of perception. For that end only the following conversation is made -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.1 Arjuna said To show favour to me, who is deluded by the misconception that the body is the self, these words of supreme mystery concerned with the self, i.e., which is a proper description of the self, have been spoken by You in words beginning from 'There was never a time when I did not exist' (2.12) and ending with, 'Therefore, O Arjuna, become a Yogin' (6.46). By that this delusion of mine about the self is entirely removed.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.1 Ayam, this; mahah, delusion; mama, of mine; vigatah, has departed, i.e., my non-discriminating idea has been removed; tena, as a result of that; vacah, speech of Yours; which is paramam, most, supremely; guhyam, secret; and adhyatma-sanjnitam, known as pertaining to the Self-dealing with discrimination between the Self and the non-Self; and yat, which; was uktam, uttered; tvaya, by You; madanugrahaya, for my benefit, out of favour for me. Further,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.1।। पूर्व अध्याय में वर्णित भगवान् की विभूतियों को जानते से हुए अपने परम सन्तोष को? अर्जुन इस प्रारम्भिक श्लोक में व्यक्त करता है। अपने शिष्य पर केवल अनुग्रह करने और उसे मोहदशा से बाहर निकालने के लिए भगवान् ने जो इतना अधिक परिश्रम किया? अर्जुन उसकी भी प्रशंसा करता है। अनेकता में एकता का दर्शन करने का अर्थ संसार के दुख से सुरक्षित रहने के लिए रोग निरोधक टीका लगवाना है। अर्जुन की इस स्वीकारोक्ति से कि? मेरा मोह दूर हो गया है? व्यासजी? एक उत्तम विद्यार्थी पर पड़ने वाले पूर्व अध्याय के प्रभाव को बड़ी सुन्दरता से हमारे ध्यान में लाते हैं।मोह निवृत्ति? सत्य के ज्ञान का एक पक्ष है? न कि वह अपने आप में ज्ञान की प्राप्ति। अर्जुन अज्ञान के कारण नामरूपमय इस सृष्टि में अपना अलग और स्वतन्त्र अस्तित्व अनुभव कर रहा था। वह अब इस भेद के मोह से मुक्त हो चुका था। उसे वह दृष्टि मिल गयी? जिसके द्वारा वह इस भेदात्मक दृश्य जगत् में ही व्याप्त एक सत्ता को देख पाने में समर्थ हो जाता है। परन्तु फिर भी उसने अनेकता में एकता का प्रात्यक्षिक दर्शन नहीं किया था। यद्यपि सिद्धान्तत उसे इस एकत्व का ज्ञान स्वीकार्य था।राजपुत्र अर्जुन यह भलीभांति जानता है कि श्रीकृष्ण ने विभूतियोग का इतना विस्तृत वर्णन केवल उसके ऊपर अनुग्रह करने के लिए ही किया था। यह हमें इस बात का स्मरण कराता है कि किस प्रकार भगवान् अपने भक्तों के हृदय में स्थित उनके अज्ञानजनित अंधकार को नष्ट कर देते हैं।ये अध्यात्मविषयक वचन क्या थे अर्जुन कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.1।।एवं विभूतीर्निरतिशयैश्वर्य च श्रुत्वा साक्षात्कर्तुमिच्छन्नर्जुन उवाच मदनुग्रहार्थ परममुत्कृष्टं परमपुरुषार्थसाधनत्वात् गोप्यमध्यात्मसंक्षितं वजस्त्वंपदार्थप्रधानमशोच्यानित्यादि यत्त्वयोक्तं तेन ममायं मोहोऽहंममेतिप्रत्ययजनकः कर्तृत्वादिहहितात्मस्वरुपावरको विगतो विशेषेण निवृत्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.1।।न नेत्राकृतिर्यत्र यस्या न चान्तो न चादिश्च तैरन्यता नो विभूतेः।ममाभेदता येन दत्ताऽव्यवाया गुरुं काशिराजं भजेऽजं स्वराजम्।।पूर्वाध्याये नानाविभूतीरुक्त्वाविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति विश्वात्मकं पारमेश्वरं रूपं भगवतान्तेऽभिहितं श्रुत्वा परमोत्कण्ठितस्तत्साक्षात्कर्तुमिच्छन्पूर्वोक्तमभिनन्दन्नर्जुन उवाच -- मदनुग्रहायेति। ममानुग्रहाय शोकनिवृत्त्युपकाराय परमं निरतिशयपुरुषार्थपर्यवसायि गुह्यं गोप्यं यस्मैकस्मैचिद्वक्तुमनर्हमपि अध्यात्मसंज्ञितं अध्यात्ममिति शब्दितमात्मानात्मविवेकविषयमशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्यादिषष्ठाध्यायपर्यन्तं त्वंपदार्थप्रधानं यत्त्वया परमकारुणिकेन सर्वज्ञेनोक्तं वचो वाक्यं तेन वाक्येनाहमेषां हन्ता मयैते हन्यन्त इत्यादिविविधविपर्यासलक्षणो मोहोऽयमनुभवसाक्षिको विगतो विनष्टो मम। तत्रासकृदात्मनः सर्वविक्रियाशून्यत्वोक्तेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.1।।पूर्वस्मिन्नध्याये योगो विभूतिश्च व्याख्येयत्वेन प्रतिज्ञातौएतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति इति।आत्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन। भूयः कथय इतीतरेण च श्रोतव्यत्वेन प्रार्थितौ। तत्रअहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः इति संक्षेपेण योगो भगवता सर्वभूताधारत्वलक्षण उक्तः प्राग्विभूतिकथनात्। तदन्ते चविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति कुसूलेन धान्यमिव मयेदं जगद्विष्टब्धमित्युक्त्या स एव स्मारितस्तदेव भगवतः सर्वभूताधारत्वं साक्षात्कर्तुकामोऽर्जुन उवाच -- मदनुग्रहायेति। मयि अनुग्रहोऽनुकम्पा तदर्थं मदनुग्रहाय। परमं सद्यः शोकमोहनिवर्तकत्वेनोत्कृष्टं गुह्यं गोप्यं अध्यात्मसंज्ञितमात्मानात्मविवेकार्थं शास्त्रमध्यात्मं तत्संज्ञितं यत्त्वया वचःअशोच्यानन्वशोचः इत्यादिना षष्ठाध्यायपर्यन्तं त्वंपदार्थशुद्धिप्रधानंनायं हन्ति न हन्यते इत्यात्मनोऽकर्तृत्वाभोक्तृत्वप्रतिपादकं तेन मम मोहोऽविवेकोऽयं विशेषेण गतो नष्टः। अत्र प्रथमे पादेऽक्षराधिक्यमार्षम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.1।।कृष्णात्मत्वं हि जगतो विभूतिकथनान्नरः। अवगत्य च तद्रूपं द्रष्टुं हरिमथाऽब्रवीत्।।1।।पूर्वाध्यायान्तेविष्टम्याहं [10।42] इत्यनेन स्वक्रीडात्मकत्वेन विश्वस्य स्वात्मकत्वं प्रतिपादितम्? तद्रूपदर्शनेच्छुरर्जुनो भगवन्तं विज्ञापयति -- मदनुग्रहायेति चतुर्भिः। मदनुग्रहाय मम स्वीयत्वेन ग्रहणाय परमं परः पुरुषोत्तमो मीयते अनुमीयते यस्मात्तादृशम्। अतएव गुह्यं सर्वेषामनाख्येयम्। अध्यात्मसंज्ञितं आत्मानात्मविवेकविषयत्वेन सर्वात्मरूपं यत् त्वया वचोविष्टभ्याहं इत्युक्तं? तेन ममाऽयं रूपे मोहो विशेषेण गतो नष्ट इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.1।। विभूतिवैभवं प्रोच्य कृपया परया हरिः। दिदृक्षोरर्जुनस्याथ विश्वरूपमदर्शयत्।।1।।पूर्वाध्यायान्तेविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति विश्वात्मकं पारमेश्वरं रूपमुपक्षिप्तं तद्दिदृक्षुः पूर्वोक्तमभिनन्दन्नर्जुन उवाच -- मदनुग्रहायेति चतुर्भिः। ममानुग्रहाय शोकनिवृत्तये परमं परमार्थनिष्ठं गुह्यं गोप्यमप्यध्यात्ममितिसंज्ञितमात्मानात्मविवेकविषयं यत्त्वयोक्तं वचःअशोच्यानन्वशोचस्त्वम् इत्यादि षष्ठाध्यायपर्यन्तं यद्वाक्यं तेन ममायं मोहोऽहं हन्ता एते हन्यन्त इत्यादिलक्षणो भ्रमो विगतो विनष्टः? आत्मनः कर्तृत्वाद्यभावोक्तेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.1।।अथातोऽष्टभिरध्यायैर्गुणैराश्रयधर्मतः। पुष्ट्यात्मना भगवता मोचितः स इतीर्यते।।1।।स्वनिगमवचसा महिमज्ञाने भक्त्या स्वधर्ममर्यादा। कुण्डलावृतमुखभगवत्समाश्रयेणैव धर्मतः पुष्टिः।।2।।मर्यादावचने पुष्टिः स्वकार्यार्थप्रदर्शने। इति मर्यादया मिश्रं पुष्टिरूपं प्रदर्श्यते।।3।।पूर्वाध्यायान्ते परमासाधारणयोगः विभूतेरक्षरैश्वर्यस्य स्वस्य विष्टभ्याहमिति श्लोके योगाख्यमैश्वर्यमुदीरितं तद्विशिष्टरूपं दिदृक्षुः पूर्वोक्तमभिनन्दयन्नर्जुन उवाच मदनुग्रहायेति चतुर्भिः। गुह्यमध्यात्मसंज्ञितंअहं सर्वस्य प्रभवः [10।8] इति स्वमाहात्म्यनिरूपकं मर्यादारूपं यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मम गतो मोहः ऐश्वर्याज्ञानरूपः। माहात्म्यनिरूपकं वाक्यमेव ते श्रुतं? न तु तथा स्वरूपं दृष्टं तवेति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.1।।( पूर्वाध्यायमें जो ) भगवान्की विभूतियोंका वर्णन किया गया है उसमें भगवान्से कहे हुए मैं इस सारे जगत्को एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ इन वचनोंको सुनकर ईश्वरका जो जगदात्मक आदि स्वरूप है उसका प्रत्यक्ष दर्शन करनेकी इच्छासे अर्जुन बोला --, मुझपर अनुग्रह करनेके लिये आपने जो परम -- अत्यन्त श्रेष्ठ? गुह्य -- गोपनीय? अध्यात्य नामक अर्थात् आत्माअनात्माके विवेचनविषयक वाक्य कहे हैं? उन आपके वचनोंसे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है अर्थात् मेरी अविवेकबुद्धि नष्ट हो गयी है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.1।। व्याख्या -- मदनुग्रहाय -- मेरा भजन करनेवालोंपर कृपा करके मैं स्वयं उनके अज्ञानजन्य अन्धकारका नाश कर देता हूँ (गीता 10। 11) -- यह बात भगवान्ने केवल कृपापरवश होकर कही। इस बातका अर्जुनपर बड़ा प्रभाव प़ड़ा? जिससे अर्जुन भगवान्की स्तुति करने लगे (10। 12 -- 15)। ऐसी स्तुति उन्होंने पहले गीतामें कहीं नहीं की। उसीका लक्ष्य करके अर्जुन यहाँ कहते हैं कि केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने ऐसी बात कही है (टिप्पणी प0 573.2)। परमं गुह्यम् -- अपनी प्रधानप्रधान विभूतियोंको कहनेके बाद भगवान्ने दसवें अध्यायके अन्तमें अपनी ओरसे कहा कि मैं अपने किसी अंशसे सम्पूर्ण जगत्को? अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंको व्याप्त करके स्थित हूँ (10। 42) अर्थात् भगवान्ने खुद अपना परिचय दिया कि मैं कैसा हूँ। इसी बातको अर्जुन परम गोपनीय मानते हैंअध्यात्मसंज्ञितम् -- दसवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है अर्थात् सम्पूर्ण विभूतियोंके मूलमें भगवान् ही हैं और सम्पूर्ण विभूतियाँ भगवान्की सामर्थ्यसे ही प्रकट होती हैं तथा अन्तमें भगवान्में ही लीन हो जाती हैं -- ऐसा तत्त्वसे जानता है? वह अविचल भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इसी बातको अर्जुन अध्यात्मसंज्ञित मान रहे हैं (टिप्पणी प0 573.3)।,यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम -- सम्पूर्ण जगत् भगवान्के किसी एक अंशमें है -- इस बातपर पहले अर्जुनकी दृष्टि नहीं थी और वे स्वयं इस बातको जानते भी नहीं थे? यही उनका मोह था। परन्तु जब भगवान्ने कहा कि सम्पूर्ण जगत्को अपने एक अंशमें व्याप्त करके मैं तेरे सामने बैठा हूँ? तब अर्जुनकी इस तरफ दृष्टि गयी कि भगवान् कितने विलक्षण हैं उनके किसी एक अंशमें अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं? उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं? और वे वैसेकेवैसे रहते हैं इस मोहके नष्ट होते ही अर्जुनको यह खयाल आया कि पहले जो मैं इस बातको नहीं जानता था? वह मेरा मोह ही था (टिप्पणी प0 574)। इसलिये अर्जुन यहाँ अपनी दृष्टिसे कहते हैं कि भगवन् मेरा यह मोह सर्वथा चला गया है। परन्तु ऐसा कहनेपर भी भगवान्ने इसको (अर्जुनके मोहनाशको) स्वीकार नहीं किया क्योंकि आगे उनचासवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि तेरेको व्यथा और मूढभाव (मोह) नहीं होना चाहिये -- मा ते व्यथा मा च विमूढभावः। सम्बन्ध -- मोह कैसे नष्ट हो गया -- इसीको आगेके श्लोकमें विस्तारसे कहते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.1।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.1।।तेन तेनात्मना भगवदनुसंधानार्थमुक्ता विभूतीरनुवदति -- भगवत इति। परस्य सोपाधिकं निरुपाधिकं च चिद्रूपं ध्येयत्वेन ज्ञेयत्वेन चोक्तमित्यर्थः। सोपाधिकमैश्वरं रूपमशेषजगदात्मकं विश्वरूपाख्यमधिकृत्याध्यायन्तरमवतारयन्ननन्तरप्रश्नोपयोगित्वेन वृत्तं कीर्तयति -- तत्र चेति। यदेतदशेषप्रपञ्चात्मकमखिलस्यैतस्य जगतः कारणं सर्वज्ञं सर्वैश्वर्यवद्रूपमुक्तं तदिदं श्रुत्वा तस्य साक्षात्कारं यियाचिषुरादौ पृष्टवानित्याह -- श्रुत्वेति। मयि करुणां निमित्तीकृत्योपकारोऽनुग्रहस्तदर्थमिति वचसो विशेषणम्। निरतिशयत्वं परमपुरुषार्थसाधनत्वम्। अशोच्यानित्यादित्वंपदार्थप्रधानं वाक्यम्। मोहस्यायमित्यात्मसाक्षिकत्वं दर्शयति। अविवेकबुद्धिरज्ञानविपर्यासात्मिका।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.1।।एतदध्यायप्रतिपाद्यमर्थमाह -- यथेति। दशमान्ते [42]विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति व्याप्तोपासनं सङ्क्षेपेणोक्तम्। न च सङ्क्षेपोक्तस्य ध्यानं शक्यम्? बुद्धावनारोहात्। अतो यथाभूते व्याप्तरूपे विस्तरेण श्रुते ध्यानं शक्यं भवति? तथाभूतस्वरूपस्थितिरर्जुनाय प्रदर्शितस्यानुवादेन अनेनैकादशेनाध्यायेनोच्यते। स्वरूपग्रहणेन विश्वरूपस्य मायादिना तदैव निर्माय विसृष्टत्वं निवारयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.1।।म्। यथा श्रुते ध्यानं शक्यं तथा स्वरूपस्थितिरनेनाध्यायेनोच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.1।। --,मदनुग्रहाय ममानुग्रहार्थं परमं निरतिशयं गुह्यं गोप्यम् अध्यात्मसंज्ञितम् आत्मानात्मविवेकविषयं यत् त्वया उक्तं वचः वाक्यं तेन ते वचसा मोहः अयं विगतः मम? अविवेकबुद्धिः अपगता इत्यर्थः।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.2 】
▸ Sanskrit Sloka: भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया | त्वत्त: कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ||
▸ Transliteration: bhavāpyayau hi bhūtānāṁ śrutau vistaraśo mayā | tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyamapi cāvyayam ||
▸ Glossary: bhava: creation; apyayau: dissolution; hi: certainly; bhūtānāṁ: of all living entities; śrutau: have heard; vistaraśaḥ: detail; mayā: by me; tvattaḥ: from You; kamalapatrākṣa: O lotus-eyed one; māhātmyam: glories; api: also; cā: and; avyayam: inexhaustible
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.2 O Lotus-eyed Kṛṣṇa! I have listened from You in detail about the creation and destruction of all living beings, also Your inexhaustible greatness.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.2।।हे कमलनयन सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलय मैंने विस्तारपूर्वक आपसे ही सुना है और आपका अविनाशी माहात्म्य भी सुना है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.2।। हे कमलनयन मैंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय आपसे विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपका अव्यय माहात्म्य (प्रभाव) भी सुना है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.2 भवाप्ययौ the origin and the dissolution? हि indeed? भूतानाम् of beings? श्रुतौ hav been heard? विस्तरशः in detail? मया by me? त्वत्तः from Thee? कमलपत्राक्ष O lotuseyed? माहात्म्यम् greatness? अपि also? च and? अव्ययम् inexhaustible.Commentary Kamalapatraksha Lotuseyed or having eyes like lotuspetals. Kamalapatra also means knowledge of the Self. He who can be obtained by knowledge of the Self is Kamalapatraksha.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.2. The origin and the dissolution of beings have been listened to in detail by me from You, O Lotus-eyed One, and also to [Your] inexhaustible greatness.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.2 O Lord, whose eyes are like the lotus petal! Thou hast described in detail the origin and the dissolution of being, and Thine own Eternal Majesty.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.2 The origination and dissolution of all beings, O Krsna, (as issuing from You) have been heard verily by me at length as also Your immutable greatness.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.2 O you with eyes like lotus leaves, the origin and dissolution of beings have been heard by me in detail from You. ['From You have been heard the origin and dissolution of beings in You.'] And (Your) undecaying glory, too, (has been heard).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.2 The origin and the destruction of beings verily have been heard by me in detail from Thee, O lotus-eyed Lord, and also Thy inexhaustible greatness.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.2 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.2 Likewise, beginning from the seventh, and ending with the tenth discourse, the origination and dissolution of all beings other than You, as issuing from You, the Supreme Self, have been heard at length by me. Your unlimited greatness, immutable and eternal, Your principalship (Sesitva) over all sentient and non-sentient things, Your supreme greatness consisting of the host of auspicious attributes like knowledge, strength etc., Your being the supporter of all things and actuator of all activities like thinking, blinking etc., have also been heard. Here the term, 'hi' (verily) expresses the desire to have the vision which is going to be revealed.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.2 Kamala-partraksa, O You with eyes like lotus leaves; bhava-apyayau, the origin and dissolution- these two; bhutanam, of beings; srutau, have been heard; maya, by me; vistarasah, in detail-not in brief; tvattah, from You. Ca, and; (Your) avyayam, undecaying; mahatmyam, glory, too;-has been heard-(these last words) remain understood.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.2।। गुरु और शिष्य के संवाद में? यह स्वाभाविक है कि किसी कठिन विषय की समाप्ति पर शिष्य के मन में कुछ शंका या प्रश्न उठें। उस शंका की निवृत्ति के लिए वह गुरु के पास जा सकता है? परन्तु प्रश्न करने के पूर्व उसे यह सिद्ध करना होगा कि वह विवेचित विषय को स्पष्टत समझ चुका है। तत्पश्चात्? उसे अपनी नवीन शंका का समाधान कराने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस पारम्परिक पद्धति का अनुसरण करते हुए अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को यह बताने का प्रयत्न करता है कि वह पूर्व अध्याय का विषय समझ चुका है। उसने श्रवण के द्वारा भूतों की उत्पत्ति और प्रलय तथा भगवान् की असंख्य विभूतियों को समझ लिया है।फिर भी? एक संदेह रह ही जाता है? जिसका निवारण तभी होगा जब प्रात्यक्षिक दर्शन से उसकी बुद्धि को तत्त्व का निश्चयात्मक ज्ञान हो जायेगा। यह श्लोक विश्वरूप दर्शन की इच्छा को प्रगट करने की पूर्व तैयारी है। जब शिष्य अपनी योग्यता सिद्ध करने के पश्चात् कोई युक्तिसंगत प्रश्न पूछता है अथवा किसी संभावित विघ्न की निवृत्ति का उपाय जानना चाहता है?तो गुरु को उसकी सभी सम्भव सहायता करनी चाहिये। हम देखेंगे कि योगेश्वर श्रीकृष्ण यहाँ अपनी वरिष्ठता को भी त्याग कर केवल असीम अनुकम्पावशात् अर्जुन को अपना विराट् रूप दर्शाते हैं? केवल इसलिए कि उनके शिष्य ने उसे देखने का आग्रह किया था।अर्जुन अपनी इच्छा को अगले श्लोक में व्यक्त करता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.2।।किंचायं वासुदेवो मम मातुलेय इति त्वयि मनुष्यत्वप्रतीत्युत्पादकल्येश्वरस्वरुपावरकस्य मोहस्य निवर्तकमपि वचो मया श्रुतमित्याशयवानाह। भवाप्ययौ उत्पत्तिप्रलयौ भूतानां त्वत्तो भवति इति त्वत्तो मया श्रुतौ।अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते इत्यादिना तदपि न संक्षेपतोऽपि त्वसकृदित्याह -- विस्तरश इति। कमलपत्रे इव विशाले रक्तान्ते अक्षिणी यस्य सः कमपपत्राक्ष इत्यङ्गीकृतकमलपत्राक्षरुपात्त्वत्तएव भूतानां पालनमिति द्योतनाय तथा संबोधयनम्। महात्मो भावो माहात्म्यमपि त्वदीयमव्ययमपक्षयरहितमैश्वर्यं मया श्रुतमिति विपरिणोमेनानुषज्जाते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.2।।तथा सप्तमादारभ्य दशमपर्यन्तं तत्पदार्थनिर्णयप्रधानमपि भगवतो वचनं मया श्रुतमित्याह -- भूतानां भवाप्ययावुत्पत्तिप्रलयौ त्वत्त एव भवन्तौ त्वत्त एव विस्तरशो मया श्रुतौ नतु संक्षेपेणासकृदित्यर्थः। कमलस्य पत्रे इव दीर्घे रक्तान्ते परममनोरमे अक्षिणी यस्य तव स त्वं हे कमलपत्राक्ष। अतिसौन्दर्यातिशयोल्लेखोयं प्रेमातिशयात्। न केवलं भवाप्ययौ त्वत्तः श्रुतौ। महात्मनस्तव भावो माहात्म्यमनतिशयैश्वर्यं विश्वसृष्ट्यादिकर्तृत्वेऽप्यविकारित्वं शुभाशुभकर्मकारयितृत्वेऽप्यवैषम्यं बन्धमोक्षादिविचित्रफलदातृत्वेऽप्यसङ्गौदासीन्यमन्यदपि सर्वात्मत्वादि सोपाधिकं निरुपाधिकमपि चाव्ययमक्षयं मया श्रुतमिति परिणतमनुवर्तते चकारात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.2।।भवेति। तथा सप्तमाध्यायमारभ्य दशमपर्यन्तं त्वया भूतानां भवाप्ययावप्युक्तौअहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते इति तावपि मया विस्तरशरस्त्वत्तः श्रुतौ। हे कमलपत्राक्ष? अव्ययं माहात्म्यमपिन च मां तानि कर्माणि लिम्पन्ति इति विषमसृष्टिकर्तुरपि वैषम्यनैर्घृण्यदोषो नास्ति जगत्कर्तुरपि विकारगन्धो नास्ति इत्येवमादिरूपतत्पदार्थशुद्धिप्रधानं श्रुतमित्यनुषङ्गः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.2।।किञ्च -- भवाप्ययाविति। भूतानां भवाप्ययौ उत्पत्तिनाशौअहमादिश्च [10।20] इत्यादिना हे कमलपत्राक्ष दृष्ट्यैव तापनाशक त्वत्तो मया विस्तरशः श्रुतौ। अव्ययं स्थितिरूपं पालनरूपं माहात्म्यं महत्त्वं नाशानन्तरपालनरूपं चापि श्रुतं?तेन मोहो नष्टः इति पूर्वेणैवान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.2।। किंच -- भवाप्ययाविति। भूतानां भवाप्ययौ सृष्टिप्रलयौ त्वत्तः सकाशादेव भवत इति श्रुतौ मयाअहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा इत्यादौ विस्तरशः पुनः पुनः। कमलपत्रे इव सुप्रसन्ने विशाले अक्षिणी यस्य सः हे कमलपत्राक्ष? माहात्म्यमपि चाव्ययमक्षयं श्रुतम्। विश्वसृष्ट्यादिकर्तृत्वेऽपि शुभाशुभकर्मकारयितृत्वेऽपि बन्धमोक्षादिविचित्रफलदातृत्वेऽप्यविकारावैषम्यासङ्गौदासीन्यादिलक्षणमपरिमितं महत्त्वं श्रुतम्अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते?मया ततमिदं सर्वं?न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति?समोऽहं सर्वभूतेषु इत्यादिना। अतस्त्वत्परतन्त्रत्वादपि जीवानामहं कर्तेत्यादिर्मदीयो मोहो विगत इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.2।।भवाप्ययाविति। जगत्कारणत्वं तव मया श्रुतं? माहात्म्यमपि च सर्वं तदिदं विभूतिरूपं तव मयेति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.2।।तथा --, मैंने आपसे प्राणियोंके भव -- उत्पत्ति और अप्यय -- प्रलय? ये दोनों संक्षेपसे नहीं? विस्तारपूर्वक सुने हैं और हे कमलपत्राक्ष अर्थात् कमलपत्रके सदृश नेत्रोंवाले कृष्ण आपका अविनाशी -- अक्षय माहात्म्य भी मैं सुन चुका हूँ। श्रुतम् यह क्रियापद पूर्ववाक्यसे लिया गया है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.2।। व्याख्या -- भवाप्ययौ हि भूतानां त्वत्तः श्रुतौ विस्तरशो मया -- भगवान्ने पहले कहा था -- मैं सम्पूर्ण जगत्का प्रभव और प्रलय हूँ? मेरे सिवाय अन्य कोई कारण नहीं है (7। 6 7) सात्त्विक? राजस और तामस भाव मेरेसे ही होते हैं (7। 12) प्राणियोंके अलगअलग अनेक तरहके भाव मेरेसे ही होते हैं (10। 4 5) सम्पूर्ण प्राणी मेरेसे ही होते हैं और मेरेसे ही सब चेष्टा करते हैं (10। 8) प्राणियोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (10। 20) और सम्पूर्ण सृष्टियोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ (10। 32)। इसीको लेकर अर्जुन यहाँ कहते हैं कि मैंने आपसे प्राणियोंकी उत्पत्ति और प्रलयका वर्णन विस्तारसे सुना है। इसका तात्पर्य प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाश सुननेसे नहीं है? प्रत्युत इसका तात्पर्य यह सुननेसे है कि सभी प्राणी आपसे ही उत्पन्न होते हैं? आपमें ही रहते हैं और आपमें ही लीन हो जाते हैं अर्थात् सब कुछ आप ही हैं।माहात्म्यमपि चाव्ययम् -- आपने दसवें अध्यायके सातवें श्लोकमें बताया कि मेरी विभूति और योगको जो,तत्त्वसे जानता है? वह अविकम्प भक्तियोगसे युक्त हो जाता है। इस प्रकार आपकी विभूति और योगको तत्त्वसे जाननेका माहात्म्य भी मैंने सुना है।माहात्म्यको अव्यय कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्की विभूति और योगको तत्त्वसे जाननेपर भगवान्में जो भक्ति होती है? प्रेम होता है? भगवान्से अभिन्नता होती है? वह सब अव्यय है। कारण कि भगवान् अव्यय? नित्य हैं तो उनकी भक्ति? प्रेम भी अव्यय ही होगा। सम्बन्ध -- अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन विराट्रूपके दर्शनके लिये भगवान्से प्रार्थना करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.2।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.2।।सप्तमादारभ्य तत्पदार्थनिर्णयार्थमपि भगवदुक्तं वचो मया श्रुतमित्याह -- किञ्चेति। त्वत्तो भूतानामुत्पत्तिप्रलयौ त्वत्तः श्रुतावित्याभ्यां संबध्यते? महात्मनस्तव भावो माहात्म्यं पारमार्थिकं सोपाधिकं वा सर्वात्मत्वादिरूपं श्रुतमिति परिणम्यानुवृत्तिं द्योतयितुमपिचेत्युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.2।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.2।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.2।। --,भवः उत्पत्तिः अप्ययः प्रलयः तौ भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशः मया? न संक्षेपतः? त्वत्तः त्वत्सकाशात्? कमलपत्राक्ष कमलस्य पत्रं कमलपत्रं तद्वत् अक्षिणी यस्य तव स त्वं कमलपत्राक्षः हे कमलपत्राक्ष? महात्मनः भावः माहात्म्यमपि च अव्ययम् अक्षयम् श्रुतम् इति अनुवर्तते।।
───────────────────
【 Verse 11.3 】
▸ Sanskrit Sloka: एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर | द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ||
▸ Transliteration: evaṁetadyathāttha tvam ātmānaṁ parameśvara | draṣṭumicchāmi te rūpam aiśvaraṁ puruṣottama ||
▸ Glossary: evaṁ: thus; etat: this; yathā: as it is; āttha: have spoken; tvaṁ: You; ātmānaṁ: the soul; parameśvara: the Supreme Lord; draṣṭuṁ: to see; icchāmi: I wish; te: You; rūpaṁ: form; aiśvaraṁ: divine; puruṣottama: best of manifested forms
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11. O Parameśvara, Lord Supreme, though You are here before Me as You have declared Yourself, I wish to see the Divine Cosmic Form of Yours, Puruṣottama, Supreme Being.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.3।।हे पुरुषोत्तम आप अपनेआपको जैसा कहते हैं? यह वास्तवमें ऐसा ही है। हे परमेश्वर आपके ईश्वरसम्बन्धी रूपको मैं देखना चाहता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.3।। हे परमेश्वर आप अपने को जैसा कहते हो? यह ठीक ऐसा ही है। (परन्तु) हे पुरुषोत्तम मैं आपके ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.3 एवम् thus? एतत् this? यथा as? आत्थ hast declared? त्वम् Thou? आत्मानम् Thyself? परमेश्वर O Supreme Lord? द्रष्टुम् to see? इच्छामि (I) desire? ते Thy? रूपम् form? ऐश्वरम् sovereign? पुरुषोत्तम O Supreme Purusha.Commentary Some commentators take the two halves of this verse as two independent sentences and interpret it thusSo it is? O Supreme Lord? as Thou hast declared Thyself to be. (But still) I desire to see Thy form as Isvara? O Supreme Person.Rupamaisvaram Thy form as Isvara? that of Vishnu as possessed of infinite knowledge? sovereignty? power? strength? prowess and splendour.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.3. As You describe Yourself as the Supreme Lord [of all], it must be so. [Hence], O Supreme Self, I desire to perceive Your Lordly form.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.3 I believe all as Thou hast declared it. I long now to have a vision of thy Divine Form, O Thou Most High!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.3 O Supreme Lord, how You described Yourself, even so are You. I wish to see Your Lordly form, O Supreme Person.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.3 O supreme Lord, so it is, as You speak about Yourself. O supreme Person, I wish to see the divine form of Yours.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.3 (Now) O Supreme Lord, as Thou hast thus described Thyself, O Supreme Person, I wish to see Thy divine form.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.3 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.3 O Supreme Lord, it is certain that it is even as you have described Yourself. O Supreme Person, O ocean of compassion for your dependants! I, however, wish to see or wish to realise directly, Your Lordly form peculiar to you - the form as the sovereign, protector, creator, destroyer, supporter of all, the mine of auspicious attributes, supreme and distinct from all other entities.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.3 Parama-isvara, O supreme Lord; evam, so; etat, it is-not otherwise; yatha, as; tvam, You; attha, speak; atmanam, about Yourself. Still, purusottama, O supreme Person; iccahmi, I wish; drastum, to see; the aisvaram, divine; rupam, form; te, of Yours, of Visnu, endowed with Knowledge, Sovereignty, Power, Strength, Valour and Formidability.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.3।। संस्कृत से वाक्प्रचार एवमेतत् (यह ठीक ऐसा ही है) के द्वारा अर्जुन तत्त्वज्ञान के सैद्धान्तिक पक्ष को स्वीकार करता है। समस्त नाम और रूपों में ईश्वर की व्यापकता की सिद्धि बौद्धिक दृष्टि से संतोषजनक थी। फिर भी बुद्धि को अभी भी प्रत्यक्षीकरण की प्रतीक्षा थी। इसलिए अर्जुन कहता है कि? मैं आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ। हमारे शास्त्रों में ईश्वर का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि वह ज्ञान? ऐश्वर्य? शक्ति? बल? वीर्य और तेज इन छ गुणों से सम्पन्न है।इस अवसर पर भगवान् ने अर्जुन को यह दर्शाने का निश्चय किया कि वे न केवल समस्त व्यष्टि रूपों में व्याप्त हैं वरन् वे वह समष्टिरूपी पात्र हैं? जिसमें ही समस्त नाम और रूपों का अस्तित्व है। भगवान् सर्वव्यापक होने के साथहीसाथ सर्वातीत भी हैं।यद्यपि कट्टर बुद्धिवाद के अत्युत्साह में आकर अर्जुन ने विश्वरूप दर्शन की अपनी मांग भगवान् के समक्ष रखी? किन्तु उसे तत्काल यह भान हुआ कि उसकी यह धृष्टता है और उसने सद्व्यवहार की मर्यादा का उल्लंघन किया है।अगले श्लोक में वह अधिक नम्रता से कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.3।।त्वदुक्तं सर्वं यथार्थमित्यभिनन्दन् अभीष्टमाविष्करोति -- एवमिति। यथा येन प्रकारेणं त्वं कथयसि एतदेवमेव न ममासंभावनाविपरीतभावना वा परमेश्वरे त्वयि वक्तरि असंभावनादेरसंभवादिति सूचयन्संबोधयति -- हे परमेश्वररेति। यद्यप्येवं तथापि कृतार्थीबुभूषया ते रुपं द्रस्टुमिच्छामि। निरुपाधिकदर्शनासंभवमभिप्रेत्य रुपं विशिनष्टि। ऐश्वरं ऐश्वर्यशक्त्यादिसंपन्नम्। पुरुषोत्तमेतिसंबोधयन् वस्तुतः क्षराक्षरातीतस्य तव क्षराक्षरात्मकमैश्वरं रुपमत्यद्भुत्मिति तद्दर्शने ममोत्कण्ठा महती वर्तत इति ध्वनयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.3।।एवमेतदिति। हे परमेश्वर? यथा येन प्रकारेण सोपाधिकेन निरुपाधिकेन च निरतिशयैश्वर्येणात्मानं त्वमात्थ कथयसि त्वं एवमेतन्नान्यथा। त्वद्वचसि कुत्रापि ममाविश्वासशङ्का नास्त्येवेत्यर्थः। यद्यप्येवं तथापि कृतार्थीबुभूषया द्रष्टुमिच्छामि ते तव रूपमैश्वरं ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः संपन्नमद्भुतम्। हे पुरुषोत्तमेति संबोधनेन त्वद्वचस्यविश्वासो मम नास्ति दिदृक्षा च महती वर्तत इति सर्वज्ञत्वात्त्वं जानासि सर्वान्तर्यामित्वाच्चेति सूचयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.3।।एवमिति। यच्च त्वंविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् इति आत्मानं जगदाधारमात्थ तदपि इत्थमेव न ममात्रासंभावनास्ति। हे परमेश्वर? ते तव रूपं ऐश्वरमीश्वरस्येदं विश्वात्मकं मायामयमित्यर्थः। हे पुरुषोत्तम क्षराक्षरातीत? विश्वरूपं मायामयं? वास्तवं तु रूपं मायातीतमित्यैश्वरमिति पुरुषोत्तमेति च पदाभ्यां लभ्यते। तथाच वक्ष्यतिमाया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नैवं मां ज्ञातुमर्हसि इति। उक्तं च शुद्धं रूपमभिप्रेत्यअव्यक्तोऽयमिन्त्योऽयम् इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.3।।कथं ज्ञातव्यं मोहो नष्ट इति इत्याशङ्कृय नष्टमोहानां भगवद्वाक्ये विश्वासो नियत इति तदाह -- एवमिति। हे परमेश्वर सर्वाधीश यथा त्वमात्मानं स्वस्वरूपमात्थ वदसिन मे विदुः [10।2] इत्यनेन सर्वाज्ञातत्वं?विष्टभ्याहम् [10।42] इत्यनेन सर्वात्मत्वंददामि बुद्धियोगं तं [10।10] इत्यादिना स्वकृपयैव ज्ञातत्वम्? एवमेतत् यथार्थमेवेत्यर्थः। यथार्थत्वोक्त्या पूर्वमज्ञातस्वरूपोऽहम्? अधुना विभूतिनिरूपणेनविष्टभ्याहं इति कृपोक्त्या च तच्चिन्तनेन सर्वात्मत्वज्ञानयुक्तो जात इति स्वानुभवो व्यञ्जितः। अथातो ज्ञातस्वरूपस्तद्रूपं दर्शयेत्याह -- द्रष्टुमिति। हे पुरुषोत्तम ते तवैव तत्सम्बन्धिनामैश्वरं नानाविलासकं रूपं द्रष्टुमिच्छामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.3।। किंच -- एवमिति।भवाप्ययौ हि भूतानाम् इत्यादि मया श्रुतं यथा चेदानीमात्मानं त्वमात्थविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नम् इत्येवं कथयसि हे परमेश्वर? एवमेतत्। अत्राप्यविश्वासो मम नास्तीत्यर्थः। तथापि हे पुरुषोत्तम्? तवैश्वरं ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः संपन्नं त्वद्रूपं कौतूहलादहं द्रष्टुमिच्छामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.3।।एवमेतदिति। सत्यमेवैतत्? अत्राविश्वासो मम नास्तीति। परं तादृश्यैश्वर्यं योगाख्यं यत्र तत्तवैश्वरं रूपं द्रष्टुमिच्छामि। हे पुरुषोत्तम नहि मादृशस्त्वयि सति न सिद्धमनोरथो भवितुमर्हतीति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.3।।हे परमेश्वर आप अपनेको जिस प्रकारसे बतलाते हैं? आप ठीक वैसे ही हैं अन्यथा नहीं। तथापि हे पुरुषोत्तम ज्ञान? ऐश्वर्य? शक्ति? बल? वीर्य और तेजसे युक्त आपके ऐश्वर्यमय वैष्णवरूपको मैं देखना चाहता हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.3।। व्याख्या -- पुरुषोत्तम -- यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि हे भगवन् मेरी दृष्टिमें इस संसारमें आपके समान कोई उत्तम? श्रेष्ठ नहीं है अर्थात् आप ही सबसे उत्तम? श्रेष्ठ हैं। इस बातको आगे पन्द्रहवें अध्यायमें भगवान्ने भी कहा है कि मैं क्षरसे अतीत और अक्षरसे उत्तम हूँ अतः मैं शास्त्र और वेदमें पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्ध हूँ (15। 18)।एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानम् -- हे पुरुषोत्तम आपने (सातवें अध्यायसे दसवें अध्यायतक) मेरे प्रति अपने अलौकिक प्रभावका? सामर्थ्यका जो कुछ वर्णन किया? वह वास्तवमें ऐसा ही है।यह संसार मेरेसे ही उत्पन्न होता है और मेरेमें ही लीन हो जाता है (7। 6)? मेरे सिवाय इसका और कोई कारण नहीं है (7। 7)? सब कुछ वासुदेव ही है (7। 19)? ब्रह्म? अध्यात्म? कर्म? अधिभूत? अधिदैव और अधियज्ञरूपमें मैं ही हूँ (7। 29 30)? अनन्य भक्तिसे प्रापणीय परम तत्त्व मैं ही हूँ (8। 22)? मेरेसे ही यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है? पर मैं संसारमें और संसार मेरेमें नहीं है (9। 4 5)? सत् और असत्रूपसे सब कुछ मैं ही हूँ (9 19)? मैं ही संसारका मूल कारण हूँ और मेरेसे ही सारा संसार सत्तास्फूर्ति पाता है (10। 8)? यह सारा संसार मेरे ही किसी एक अंशमें स्थित है (10। 42) आदिआदि। अपनेआपको आपने जो कुछ कहा है? वह सबकासब यथार्थ ही है।परमेश्वर -- भगवान्के मुखसे अर्जुनने पहले सुना है कि मैं ही सम्पूर्ण प्राणियोंका और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर हूँ -- भूतानामीश्वरोऽपि (4। 6) सर्वलोकमहेश्वरम् (5। 29)। इसलिये अर्जुन यहाँ भगवान्के विलक्षण प्रभावसे प्रभावित होकर उनके लिये परमेश्वर सम्बोधन देते हैं? जिसका तात्पर्य है कि हे भगवन् वास्तवमें आप ही परम ईश्वर हैं? आप ही सम्पूर्ण ऐश्वर्यके मालिक हैं।द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरम् -- अर्जुन कहते हैं कि मैंने आपसे आपका माहात्म्यसहित प्रभाव सुन लिया है और इस विषयमें मेरे हृदयमें दृढ़ विश्वास भी हो गया है। सम्पूर्ण संसार मेरे शरीरके एक अंशमें है -- इसे सुनकर मेरे मनमें आपके उस रूपको देखनेकी उत्कट लालसा हो रही है।दूसरा भाव यह है कि आप इतने विलक्षण और महान् होते हुए भी मेरे साथ कितना स्नेह रखते हैं? कितनी आत्मीयता रखते हैं कि मैं जैसा कहता हूँ? वैसा ही आप करते हैं और जो कुछ पूछता हूँ? उसका आप उत्तर देते हैं। इस कारण आपसे कहनेका? पूछनेका किञ्चिन्मात्र भी संकोच न होनेसे मेरे मनमें आपका वह रूप देखनेकी बहुत इच्छा हो रही है? जिसके एक अंशमें सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।दसवें अध्यायके सोलहवें श्लोकमें अर्जुने कहा था कि आप अपनी पूरीकीपूरी विभूतियाँ कह दीजिये? बाकी मत रखिये -- वक्तुमर्हस्यशेषेण? तो भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन करते हुए उपक्रममें और उपसंहारमें कहा कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं है (10। 19? 40)। इसलिये भगवान्ने विभूतियोंका वर्णन संक्षेपसे ही किया। परन्तु यहाँ जब अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके एक रूपको देखना चाहता हूँ -- द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम्? तब भगवान् आगे कहेंगे कि तू मेरे सैकड़ोंहजारों रूपोंको देख (11। 5)। जैसे संसारमें कोई किसीसे लालचपूर्वक अधिक माँगता है? तो देनेवालेमें देनेका भाव कम हो जाता है और वह कम देता है। इसके विपरीत यदि कोई संकोचपूर्वक कम माँगता है? तो देनेवाला उदारतापूर्वक अधिक देता है। ऐसे ही वहाँ अर्जुनने स्पष्टरूपसे कह दिया कि आप सबकीसब विभूतियाँ कह दीजिये तो भगवान्ने कहा कि मैं अपनी विभूतियोंको संक्षेपसे कहूँगा। इस बातको लेकर अर्जुन सावधान हो जाते हैं कि अब मेरे कहनेमें ऐसी कोई अनुचित बात न आ जाय। इसलिये अर्जुन यहाँ संकोचपूर्वक कहते हैं कि अगर मेरे द्वारा आपका विराट्रूप देखा जा सकता है तो दिखा दीजिये। अर्जुनके इस संकोचको देखकर भगवान् बड़ी उदारतापूर्वक कहते हैं कि तू मेरे सैकड़ोंहजारों रूपोंको देख ले।दूसरा भाव यह है कि अर्जुनके रथमें एक जगह बैठे हुए भगवान्ने यह कहा कि तू जो मेरे इस शरीरको देख रहा है? इसके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् (जिसके अन्तर्गत अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं) व्याप्त है। तात्पर्य है कि भगवान्का छोटासाशरीर है और उस छोटेसे शरीरके किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् है। अतः उस एक अंशमें स्थित रूपको मैं देखना चाहता हूँ -- यही अर्जुनके रूपम् (एक रूप) कहनेका आशय मालूम देता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.3।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.3।।त्वदुक्तेऽर्थे विश्वासाभावान्न तस्य दिदृक्षा किंतु कृतार्थीबुभूषयेत्याह -- एवमेतदिति। येन प्रकारेण सोपाधिकेन निरुपाधिकेन चेत्यर्थः। यदि ममाप्तत्वं निश्चित्य मद्वाक्यं ते मानं तर्हि किमिति मदुक्तं दिदृक्षते कृतार्थीबुभूषयेत्युक्तं मत्वाह -- तथापीति। चतुर्भुजादिरूपनिवृत्त्यर्थमाह -- ऐश्वरमिति। तद्व्याचष्टे -- ज्ञानेत्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.3।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.3।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.3।। --,एवमेतत् नान्यथा यथा येन प्रकारेण आत्थ कथयसि त्वम् आत्मानं परमेश्वर। तथापि द्रष्टुमिच्छामि ते तव ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः संपन्नम् ऐश्वरं वैष्णवं रूपं पुरुषोत्तम।।
───────────────────
【 Verse 11.4 】
▸ Sanskrit Sloka: मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो | योगेश्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् ||
▸ Transliteration: manyase yadi tacchakyaṁ mayā draṣṭumiti prabho | yogeśvara tato me tvaṁ darśayātmānamavyayam ||
▸ Glossary: manyase: You think; yadi: if; tat: that; śakyaṁ: able; mayā: by me; draṣṭum: to see; iti: thus; prabho: O Lord; yogeśvara: O Lord of all mystic power; tataḥ: then; me: unto me; tvaṁ: You; darśaya: show; ātmānaṁ: Yourself; avyayaṁ: imperishable
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.4 O Prabhu, my Lord, if You think it is possible for me to see Your Cosmic Form, then please, O Yogeśvara, Lord of Yoga and all mystic power, kindly show me that Imperishable Universal Self.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.4।।हे प्रभो मेरे द्वारा आपका वह परम ऐश्वर रूप देखा जा सकता है -- ऐसा अगर आप मानते हैं तो हे योगेश्वर आप अपने उस अविनाशी स्वरूपको मुझे
Chapter 11 (Part 2)
दिखा दीजिये।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.4।। हे प्रभो यदि आप मानते हैं कि मेरे द्वारा वह आपका रूप देखा जाना संभव है? तो हे योगेश्वर आप अपने अव्यय रूप का दर्शन कराइये।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.4 मन्यसे Thou thinkest? यदि if? तत् that? शक्यम् possible? मया by me? द्रष्टुम् to see? इति thus? प्रभो O Lord? योगेश्वर O Lord of Yogins? ततः then? मे me? त्वम् Thou? दर्शय show? आत्मानम् (Thy) Self? अव्ययम् imperishable.Commentary Arjuna is very keen and eager to see the Cosmic Form of the Lord. He prays to Him to grant him the vision. This supreme vision can be obtained only through His grace.Yogesvara also means the Lord of Yoga. A Yogi is one who is endowed with the eight psychic powers (Siddhis). The Lord of the Yogins is Yogesvara. And? Yoga is identity of the individual soul with the Absolute. He who is able to bestow this realisation of identity on the deserving spiritual aspirant is Yogesvara.He Who is able to create? preserve? destroy? veil and graciously release is the Lord. (These five actions? Panchakriyas? are known respectively as Srishti? Sthiti? Samhara? Tirodhana and Anugraha.)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.4. O Master ! If you think that it is possible for me to see that form, then, O Lord of the Yogins, please show me Your Immortal Self.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.4 If Thou thinkest that it can be made possible for me to see it, show me, O Lord of Lords, Thine own Eternal Self.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.4 If you think, O Lord, that it can be seen by me, then, O Lord of Yoga, reveal Yourself to me completely.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.4 O Lord, if You think that it is possible to be seen by me, then, O Lord of Yoga, You show me Your eternal Self.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.4 If Thou, O Lord, thinkest it possible for me to see it, do Thou, then, O Lord of the Yogins, show me Thy imperishable Self.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.4 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.4 If You think that Your form as all-creator, as all-ruler and as all-supporter, can be seen by me, then, O Lord of Yoga - Yoga is the property of having knowledge and other auspicious attributes, for it will be said later on: 'Behold My Lordly Yoga' (11.8) - O treasure of knowledge, strength, sovereignty, valour, power and glory which are inconceivable in any one else! Reveal Yourself to me completely. 'Avyayam' (completely) is an adverb. The meaning is, 'Reveal everything about Yourself to me.'
Thus, prayed to by Arjuna, who was desirous to know, and whose voice was therefore choked with fervour, the Lord said as follows to him:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.4 Prabho, O Lord, Master; yadi, if; manyase, You think; iti, that; tat sakyam, it is possible; drastum, to be see; maya, by me, by Arjuna; tatah, then, since I am very eager to see, therefore; yogeswara, O Lord of Yoga, of yogis-Yoga stands for yogis; their Lord is yogeswara; tvam, You; darsaya, show; me, me, for my sake; atmanam avyayam, Your eternal Self. Being thus implored by Arjuna,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.4।। पूर्व श्लोक में व्यक्त की गई इच्छा को ही यहाँ पूर्ण नम्रता एवं सम्मान के साथ दोहराया गया है। अपने सामान्य व्यावहारिक जीवन में भी हम सम्मान पूर्वक प्रार्थना अथवा नम्र अनुरोध करते समय इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करते हैं? जैसे यदि मुझे कुछ कहने की अनुमति दी जाये? मुझ पर बड़ी कृपा होगी? मुझे प्रस्तुत करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है इत्यादि। पाण्डव राजपुत्र अर्जुन? मानो? पुनर्विचार के फलस्वरूप पूर्व प्रयुक्त अपनी सैनिकी भाषा को त्यागकर नम्रभाव से अनुरोध करता है कि? यदि आप मुझे योग्य समझें? तो अपने अव्यय रूप का मुझे दर्शन कराइये।यहाँ बतायी गयी नम्रता एवं सम्मान किसी निम्न स्तर की इच्छा को पूर्ण कराने के लिए झूठी भावनाओं का प्रदर्शन नहीं है। भगवान् को सम्बोधित किये गये विशेषणों से ही यह बात स्पष्ट हो जाती है। प्रथम पंक्ति में अर्जुन भगवान् को प्रभो कहकर और फिर? योगेश्वर के नाम से सम्बोधित करता है। यह इस बात का सूचक है कि अर्जुन को अब यह विश्वास होने लगा था कि श्रीकृष्ण केवल कोई मनुष्य नहीं हैं? जो अपने शिष्य को मात्र बौद्धिक सन्तोष अथवा आध्यात्मिक प्रवचन देने में ही समर्थ हों। वह समझ गया है कि श्रीकृष्ण तो स्वयं प्रभु अर्थात् परमात्मा और योगेश्वर हैं। इसलिए यदि वे यह समझते हैं कि उनका शिष्य अर्जुन विराट् के दर्शन से लाभान्वित हो? तो वे उसकी इच्छा को पूर्ण करने में सर्वथा समर्थ हैं।यदि कोई उत्तम अधिकारी शिष्य एक सच्चे गुरु से कोई नम्र अनुरोध करता है? तो वह कभी भी गुरु के द्वारा अनसुना नहीं किया जाता है अत
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.4।।यदि मया द्रष्टुं शक्यं त्वं मन्यसे चिन्तयसि ततो मे मह्यं मदर्थमात्मानमव्ययमपक्षयरहितं दर्शय दृष्टिगोचरं कुरु। नत्वाज्ञां करोमि किंतु प्रार्थयामि। ब्रह्मादिप्रभौ त्वय्याज्ञाया अयुक्तत्वादिति सूचयन्नाह -- हे प्रभो इति। मम दर्शनासामर्थ्येऽपि त्वं दर्शियितुं समर्थोऽसीति वा संबोधनाशयः। यतो योगानां मत्वर्थलक्षणया योगिनामैश्वरुपदर्शने समर्थानां त्वमीश्वरस्तस्मान्मामपि योगिनं विधायात्मानं दर्शयेति ध्वनयन्संबोधयति -- हे योगेश्वरेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.4।।द्रष्टुमयोग्ये कुतस्ते दिदृक्षेत्याशङ्क्याह -- मन्यस इति। प्रभवति सृष्टिस्थितिसंहारप्रवेशप्रशासनेष्विति प्रभुः हे प्रभो सर्वस्वामिन्? तत्तवैश्वरं रूपं मयार्जुनेन द्रष्टुं शक्यमिति यदि मन्यसे जानासीच्छसि वा हे योगेश्वर सर्वेषामणिमादिसिद्धिशालिनां योगानां योगिनामीश्वर? ततस्त्वदिच्छावशादेव मे मह्यमत्यर्थमर्थिने त्वं परमकारुणिको दर्शय चाक्षुषज्ञानविषयीकारय आत्मानमैश्वररूपविशिष्टमव्ययमक्षयम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.4।।मन्यस इति। हे योगेश्वर योगानां योगिनामीश्वर? तद्रूपं यदि मया द्रष्टुं शक्यमिति मन्यसे यदि मयि तद्दर्शनाधिकारं पश्यसि ततस्तर्हि मे मह्यमव्ययं मायामयमात्मानं दर्शय। मायामयत्वादेवास्याव्ययत्वम्। मायायां हि सर्वं सर्वात्मकं सर्वदास्तीति प्रसिद्धम्। यथोक्तं वसिष्ठेनवर्तमानमतीतं च भविष्यत्स्थूलमण्वपि। तथा दूरमदूरं च निमेषः कल्प इत्यपि। चिदात्मनि स्थितान्येव पश्य मायाविजृम्भितम् इति। नहि मरुमरीचिसरसी क्रमशः शुष्यति। अतो मायामयत्वादेवास्यैश्वरस्य रूपस्याप्यव्ययत्वम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.4।।स्वेच्छायां सत्यामपि भगवदिच्छाभावे च द्रष्टुमपि निर्बन्धेन न फलतीति विज्ञापयति -- मन्यस इति। हे प्रभो सर्वकरणसमर्थ यदि तद्रूपं मया द्रष्टुं शक्यं दर्शनानन्तरं फलरूपं भवति तथा चेन्मन्यसे फलरूपं भवत्विति? तदा योगेश्वर योगिनः स्वयोगबलेन सामर्थ्यं प्रकटयन्ति तेषां योग आगन्तुको धर्मः त्वं तु योगस्यापीश्वरस्तेन मम दर्शनसामर्थ्यमपि कृपया दत्त्वा दर्शय। एवं प्रार्थनायां प्रभुस्तद्रूपं दर्शयित्वा तत्रैव लीनं कुर्यात् तदा भक्तिरसानुभूतपुरुषोत्तमरूपानुभवो न भवेदतो विज्ञापयति -- तत इति। तत एतन्मनोरथपूर्त्यनन्तरम्। अव्ययमविनाशिनं आत्मानं पुरुषोत्तममानन्दमयं दर्शयेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.4।। न चाहं द्रष्टुमिच्छामीत्येतावतैव त्वया तद्रूपं दर्शयितव्यम्। किं तर्हि -- मन्यस इति। योगिन एव योगास्तेषामीश्वर? मयार्जुनेन तद्रूपं द्रष्टुं शक्यमिति यदि मन्यसे ततस्तर्हि तद्रूपवन्तमात्मानमव्ययं नित्यं मम दर्शय।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.4।।तत्रापि न मत्कृत्या लभ्यमिदं किन्तु त्वदिच्छयैवेत्याह -- मन्यसे यदीति। योगेश्वरेति साधारणो यो योगी भवति सोऽपि स्वमाहात्म्यं दर्शयति? त्वं तु योगेश्वरः सर्वसमर्थ इति दर्शय। अथवा ननु तव सारथ्ये निषण्णं वसुदेवसुतं मां किमित्येवं स्तौषीति चन्मैवं भ्रामयितव्यं? त्वदादिमुनिवाक्यविश्वासतः पुरुषोत्तमं परमेश्वरमेव त्वां जानन्नपीत्याशयेनाह योगेश्वरेति। न च तवैश्वर्यदर्शने कश्चित्प्रयासो योगेश्वरत्वादिति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.4।।हे स्वामिन् यदि मुझ अर्जुनद्वारा आप अपना वह रूप देखा जाना सम्भव समझते हैं? तो हे योगेश्वर अर्थात् योगियोंके ईश्वर मैं आपके उस रूपका दर्शन करनेकी उत्कट इच्छा करता हूँ? इसलिये आप मुझे अपना वह अविनाशी स्वरूप दिखलाइये।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.4।। व्याख्या -- प्रभो -- प्रभु नाम सर्वसमर्थका है? इसलिये इस सम्बोधनका भाव यह मालूम देता है कि यदि आप मेरेमें विराट्रूप देखनेकी सामर्थ्य मानते हैं? तब तो ठीक है नहीं तो आप मेरेको ऐसी सामर्थ्य दीजिये? जिससे मैं आपका वह ऐश्वर (ईश्वरसम्बन्धी) रूप देख सकूँ।मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति -- इसका तात्पर्य है कि अगर आप अपना वह रूप नहीं दिखायेंगे? तो भी मैं यही मानूँगा कि आपका रूप तो वैसा ही है? जैसा आप कहते हैं? पर मैं उसको देखनेका अधिकारी नहीं हूँ? योग्य नहीं हूँ? पात्र नहीं हूँ। इस प्रकार अर्जुनको भगवान्के वचनोमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं है? प्रत्युत दृढ़ विश्वास है। इसीलिये तो वे कहते हैं कि आप मेरेको अपना विराट्रूप दिखाइये।योगेश्वर -- योगेश्वर सम्बोधन देनेका यह भाव मालूम देता है कि भक्तियोग? ज्ञानयोग? कर्मयोग? ध्यानयोग? हठयोग? राजयोग? लययोग? मन्त्रयोग आदि जितने भी योग हो सकते हैं? उन सबके आप मालिक हैं? इसलिये आप अपनी अलौकिक योगशक्तिसे वह विराट्रूप भी दिखा दीजिये।अर्जुनने दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें भगवान्के लिये योगिन् सम्बोधन दिया था अर्थात् भगवान्को योगी बताया था परन्तु अब अर्जुनने भगवान्के लिये योगेश्वर सम्बोधन दिया है अर्थात् भगवान्को सम्पूर्ण योगोंका मालिक बताया है। कारण यह है कि दसवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनकी भगवान्के प्रति जो धारणा थी? उस धारणामें अब बहुत परिवर्तन हुआ है।ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् -- आपका वह स्वरूप तो अविनाशी ही है? जिससे अनन्त सृष्टियाँ उत्पन्न होती हैं? उसमें स्थित रहती हैं और उसीमें लीन हो जाती हैं। आप अपने ऐसे अविनाशी स्वरूपके दर्शन कराइये। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें अर्जुनकी नम्रतापूर्वक की हुई प्रार्थनाको सुनकर अब भगवान् अर्जुनको विश्वरूप देखनेके लिये आज्ञा देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.4।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.4।।द्रष्टुमयोग्ये कुतो दिदृक्षेत्याशङ्क्याह -- मन्यस इति। प्रभवति सृष्टिस्थितिसंहारप्रवेशप्रशासनेभ्य इति प्रभुः। लक्षणया योगशब्दार्थमाह -- योगिन इति। तत इत्यादि व्याचष्टे -- यस्मादिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.4।।मन्यसे यदि इत्यत्र प्रभुशब्दो न स्वामित्वमात्रार्थः किन्तु तवातिसामर्थ्यात् त्वत्सामर्थ्येनैवातीन्द्रियस्यापि दर्शनमिति भावेन प्रयुक्त इत्याशयेनाह -- प्रभुरिति। ईश्वरस्य निरतिशयसामर्थ्ये प्रमाणमाह -- नास्तीति। भूतं समर्थम्। प्रभुशब्दस्य समर्थार्थत्वेऽभिधानमाह -- प्रभुरिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.4।।प्रभुः समर्थःनास्ति तस्मात्परं भूतं पुरुषाद्वै सनातनात् इति मोक्षधर्मे ()प्रभुरीशः समर्थश्च इत्याद्यभिधानम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.4।। --,मन्यसे चिन्तयसि यदि मया अर्जुनेन तत् शक्यं द्रष्टुम् इति प्रभो? स्वामिन्? योगेश्वर योगिनो योगाः? तेषां ईश्वरः योगेश्वरः? हे योगेश्वर। यस्मात् अहम् अतीव अर्थी द्रष्टुम्? ततः तस्मात् मे मदर्थं दर्शय त्वम् आत्मानम् अव्ययम्।।एवं चोदितः अर्जुनेन श्री भगवान् उवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.5 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रश: | नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | paśya me pārtha rūpāṇi śataśo’tha sahasraśaḥ | nānāvidhāni divyāni nānāvarṇākṛtīni ca ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Kṛṣṇa says; paśya: behold; me: Mine; pārtha: arju- na; rūpāṇi: forms; śataśaḥ: hundreds; atha: also; sahasraśaḥ: thousands; nānāvidhāni: of different nature; divyāni: divine; nānā: various; varṇa: colors; ākṛtīni: shapes; ca: also
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.5 Bhagavān says: O My dear Pārtha, behold now My hundreds and thousands of forms, of infinite divine sorts, of infinite colors and shapes.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.5।।श्रीभगवान् बोले -- हे पृथानन्दन अब मेरे अनेक तरहके? अनेक वर्णों और आकृतियोंवाले सैकड़ोंहजारों दिव्यरूपोंको तू देख।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.5।। श्रीभगवान् ने कहा -- हे पार्थ मेरे सैकड़ों तथा सहस्रों नाना प्रकार के और नाना वर्ण तथा आकृति वाले दिव्य रूपों को देखो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.5 पश्य behold? मे My? पार्थ O Partha? रूपाणि forms? शतशः by hundreds? अथ and? सहस्रशः by thousands? नानाविधानि of different sorts? दिव्यानि divine? नानावर्णाकृतीनि of various colours and shapes? च and.Commentary Divyani Divine supernatural.Satasah? Sahasrasah By the hundreds and thousands -- countless.O Arjuna? I want you to behold the Cosmic Form. All beings and entities are there. The fat and the lean? the short and the tall? the red and the black? the active and the passive? the rich and the poor? the intelligent and the dull? the healthy and the sick? the noisy and the silent? those that are awake? those that are asleep? the beautiful and the ugly? and all grades of beings with their distinctive marks are all there. The blueness of the sky? the yellowness of the silk? the redness of the twilight? the blackness of the coal? the whiteness of the snow? and the greenness of the leaves will be seen by you. You will also behold the objects of various shapes.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.5. The Bhagavat said Behold, O son of Prtha, My divine forms in hundreds and in thousands and of varied nature and of varied colours and varied shapes.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.5 Lord Shri Krishna replied: Behold, O Arjuna! My celestial forms, by hundred and thousands, various in kind, in colour and in shape.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.5 The Lord said Behold My forms, O Arjuna, hundreds upon thousands, manifold, divine, varied in hue and shape.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.5 The Blessed Lord said O son of Prtha, behold My forms in (their) hundreds and in thousands, of different kinds, celestial, and of various colours and shapes.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.5 The Blessed Lord said Behold, O Arjuna, forms of Mine, by the hundreds and thousands, of different sorts, divine, and of various colours and shapes.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.5 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.5 The Lord said Behold My forms which are the foundation of all, hundreds upon thousands, varied and possessing manifold modes. They are divine, i.e., supernatural. They are multi-formed and multi-coloured like white, black etc. And they are of varied configurations. Behold that form!
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.5 O son of Prtha, pasya, behold; me, My; rupani, forms; satasah, in (their) hundreds; atha, and; sahasrasah, in thousands, i.e. in large numbers. And they are nana-vidhani, of different kinds; divyani, celestial, supernatural; and nana-varna-akrtini, of various colours and shapes-forms which have different (nana) colours (varna) such as blue, yellow, etc. as also (different) shapes (akrtayah), having their parts differently arranged.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.5।। यदि समस्त आभूषण का मूल तत्त्व स्वर्ण है? तो विश्व का प्रत्येक आभूषण समष्टि स्वर्ण में उपलब्ध होना चाहिए। आभूषण में स्वर्ण को देखना अपेक्षत सरल है? क्योंकि वह इन्द्रियों के द्वारा किया जाने वाला दर्शन? है अर्थात् वह इन्द्रियगोचर है। परन्तु नाना आकार प्रकार तथा वर्णों के समस्त आभूषणों को समष्टि स्वर्ण में देख पाना अधिक कठिन है? क्योंकि वह बुद्धि द्वारा दिया जाने वाला दर्शन है अर्थात बुद्धिगम्य दर्शन है।इस बात को ध्यान में रखकर भगवान् के कथन को पढ़ने पर उनका अभिप्राय स्वत स्पष्ट हो जाता है। मेरे शतश और सहस्रश नाना प्रकार आकार तथा वर्णों के अलौकिक रूपों को देखो। भगवान् श्रीकृष्ण को अपना विराट् स्वरूप धारण करने की आवश्यकता नहीं थी क्योंकि अर्जुन को केवल इतना ही करना था कि अपने समक्ष स्थित रूप को वह देखे। परन्तु दुर्भाग्य से? द्रष्टव्य रूप को देखने के लिए उपयुक्त दर्शन का उपकरण उसके पास नहीं था? और इसलिए? अर्जुन उन सबको नहीं देख सका? जो भगवान् श्रीकृष्ण में पहले से ही विद्यमान था।सुदूर स्थित कोई नक्षत्र या किसी अन्य वस्तु को देखने के लिए दूरदर्शी यन्त्र का उपयोग किया जाता है। परन्तु उस यन्त्र की अक्षरेखा पर होने मात्र से वह वस्तु दिखाई नहीं दे सकती। उसे देखने के लिये दूरदर्शी यन्त्र को समायोजित करना पड़ता है? जिससे कि वह वस्तु सूक्ष्म निरीक्षक के दृष्टिपथ में आ जाये। इसी प्रकार श्रीकृष्ण ने स्वयं को विराट् रूप में परिवर्तित नहीं किया? परन्तु अर्जुन को केवल आन्तरिक समायोजन करने में सहायता प्रदान की जिससे कि वह भगवान् श्रीकृष्ण में विद्यमान विश्वरूप का अवलोकन कर सके। इसीलिये? भगवान् कहतें हैं कि? देखो। वे इस श्लोक में उन दर्शनीय वस्तुओं को गिनाते हैं।वे दिव्य रूप कौनसे हैं अगले श्लोक में बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.5।।एवं प्रेरितो भगवानुवाच। पश्य मम शतशोऽथ सहस्त्रशः असंख्यातानि रुपाणि नानाविधानि अनेकप्रकारणि दिव्यानि अप्राकृतानि नाना नीलपीतादिप्रकारा वर्णस्तथा आकृतयोऽवयवसन्निवेशविशेषा येषां तानि यतस्त्वं पृथापुत्रः मम प्रेमास्पदः सखा अतः पश्येत द्योतयन् संबोधयति हे पार्थेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.5।।एवमत्यन्तभक्तेनार्जुनेन प्रार्थितः सन् श्रीभगवानुवाच -- पश्येति। अत्र क्रमेण श्लोकचतुष्टयेऽपि पश्येत्यावृत्त्यात्यद्भुतरूपाणि दर्शयिष्यामि त्वं सावधानो भवेत्यर्जुनमभिमुखीकरोति भगवान्। शतशोऽथ सहस्रश इत्यपरिमितानि। तानि च नानाविधान्यनेकप्रकाराणि दिव्यान्यत्यद्भुतानि नाना विलक्षणा वर्णा नीलपीतादिप्रकारास्तथा आकृतयश्चावयवसंस्थानविशेषा येषां तानि नानावर्णाकृतीनि च मम रूपाणि पश्य। अर्हे लोट्। द्रष्टुमर्हो भव हे पार्थ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.5।।एवं प्रार्थितः सन् भगवानुवाच -- पश्येति। शतश इत्यादिनानन्तानीत्युक्तम्। नानावर्णानि नानाकृतीनि च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.5।।एवं प्रार्थितः सन् तद्रूपं दर्शयिष्यन्नर्जुनं सावधानं करोति भगवान् -- पश्येत्यादिचतुर्भिः। हे पार्थ भक्तपुत्र कृपया दर्शयामीति सम्बोधनम्। अन्यथा पुरुषोत्तमदर्शनतोऽन्यदर्शनेच्छायामेतद्रसानुभवमपि न कारयेदिति भावः। मे मम शतशः सहस्रशः असङ्ख्यातानि? शतशः सहस्रशः यावदिच्छसि तावद्वा? नानाविधानि नानाफलकारकाणि रूपाणि यस्य नानाविधान्यपि दिव्यानि अलौकिकानि क्रीडात्मकानि? न तु प्रदर्शनार्थमेव कृतानि च पुनः तथैव नानावर्णाकृतीनि नाना अनेके वर्णाः शुक्ललोहितादयः आकृतयः अवयवादिविशेषाश्च येषां तानि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.5।। एवं प्रार्थितः सन्नत्यद्भुतं रूपं दर्शयिष्यन्सावधानो भवेत्येवमर्जुनमभिमुखीकरोति -- श्रीभगवानुवाच। पश्येति चतुर्भिः। रूपस्यैकत्वेऽपि नानाविधत्वाद्रूपाणीति बहुवचनम्। अपरिमितान्यनेकप्रकाराणि देव्यान्यलौकिकानि मम रूपाणि पश्य। वर्णाः शुक्लकृष्णादयः। आकृतयोऽवयवसन्निवेशविशेषाः। नाना अनेकवर्णा आकृतयश्च येषां तानि नानावर्णाकृतीनि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.5।।एवं प्रार्थितः सन्नद्भुतमक्षरस्वरूपं दर्शयिष्यन्सावधानो भव इत्येवं अर्जुनमभिमुखीकरोति पश्येतिचतुर्भिः।पश्य मे पार्थ रूपाणि इति कूटस्थत्वादक्षरे स्वरूपे बहूनि रूपाणि सन्तीति बहुवचनम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.5।।अर्जुन इस प्रकार प्रेरित हुए श्रीभगवान् बोले --, हे पार्थ तू मेरे सैकड़ोंहजारों अर्थात् अनेकों रूपोंको देख? जो कि नाना प्रकारके भेदवाले और दिव्य अर्थात् देवलोकमें होनेवाले -- अलौकिक हैं तथा नाना प्रकारके वर्ण और आकृतिवाले हैं अर्थात् जिनके नील? पीत आदि नाना प्रकारके वर्ण और अनेक आकारवाले अवयव हैं? ऐसे रूपोंको देख।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.5।। व्याख्या -- पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोऽथ सहस्रशः -- अर्जुनकी संकोचपूर्वक प्रार्थनाको सुनकर भगवान् अत्यधिक प्रसन्न हुए अतः अर्जुनके लिये पार्थ सम्बोधनका प्रयोग करते हुए कहते हैं कि तू मेरे रूपोंको देख। रूपोंमें भी तीनचार नहीं? प्रत्युत सैकड़ोंहजारों रूपोंको देख अर्थात् अनगिनत रूपोंको देख। भगवान्ने जैसे विभूतियोंके विषय कहा है कि मेरी विभूतियोंका अन्त नहीं आ सकता? ऐसे ही यहाँ भगवान्ने,अपने रूपोंकी अनन्तता बतायी है। नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च -- अब भगवान् उन रूपोंकी विशेषताओंका वर्णन करते हैं कि उनकी तरहतरहकी बनावट है। उनके रंग भी तरहतरहके हैं अर्थात् कोई किसी रंगका तो कोई किसी रंगका? कोई पीला तो कोई लाल आदिआदि। उनमें भी एकएक रूपमें कई तरहके रंग हैं। उन रूपोंकी आकृतियाँ भी तरहतरहकी हैं अर्थात् कोई छोटा तो कोई मोटा? कोई लम्बा तो कोई चौड़ा आदिआदि।,जैसे पृथ्वीका एक छोटासा कण भी पृथ्वी ही है? ऐसे ही भगवान्के अनन्त? अपार विश्वरूपका एक छोटासा अंश होनेके कारण यह संसार भी विश्वरूप ही है। परन्तु यह हरेकके सामने दिव्य विश्वरूपसे प्रकट नहीं है? प्रत्युत संसाररूपसे ही प्रकट है। कारण कि मनुष्यकी दृष्टि भगवान्की तरफ न होकर नाशवान् संसारकी तरफ ही रहती है। जैसे अवतार लेनेपर भगवान् सबके सामने भगवत्रूपसे प्रकट नहीं रहते (गीता 7। 25)? प्रत्युत मनुष्यरूपसे ही प्रकट रहते हैं? ऐसे ही विश्वरूप भगवान् सबके सामने संसाररूपसे ही प्रकट रहते हैं अर्थात् हरेकको यह विश्वरूप संसाररूपसे ही दीखता है। परन्तु यहाँ भगवान् अपने दिव्य अविनाशी विश्वरूपसे साक्षात् प्रकट होकर अर्जनको कह रहे हैं कि तू मेरे दिव्य रूपोंको देख।, सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अपने विश्वरूपमें तरहतरहके वर्णों और आकृतियोंको देखनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें देवताओंको देखनेकी बात कहते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.5।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.5।।अर्जुनमतिभक्तं सखायं प्रार्थितप्रतिश्रवणेनाश्वासयितुमाह -- एवमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.5।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.5।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.5।। --,पश्य मे पार्थ? रूपाणि शतशः अथ सहस्रशः? अनेकशः इत्यर्थः। तानि च नानाविधानि अनेकप्रकाराणि दिवि भवानि दिव्यानि अप्राकृतानि नानावर्णाकृतीनि च नाना विलक्षणाः नीलपीतादिप्रकाराः वर्णाः तथा आकृतयश्च अवयवसंस्थानविशेषाः येषां रूपाणां तानि नानावर्णाकृतीनि च।।
───────────────────
【 Verse 11.6 】
▸ Sanskrit Sloka: पश्यादित्यान्वसून् रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा | बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत ||
▸ Transliteration: paśyādityān vasūn rudrān aśvinau marutastathā | bahūny adṛṣṭa-pūrvāṇi paśyāścaryāṇi bhārata ||
▸ Glossary: paśya: see; adityān: the twelve sons of Aditi; vasūn: the eight Vasus; rudrān: the eleven forms of Rudra; aśvinau: the two Aśvinis; marutaḥ: the forty-nine Maruts (wind deities); tathā: also; bahūni: many; adṛṣṭa: that you have never seen; pūrvāṇi: before; paśya: see; āścaryāṇi: wonderful; bhārata: O best of the Bhāratas
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.6 O Bhārata, see here the different manifestations of the Ādityas, the Vasus, the Rudras, the Aśvins, the Māruts and all other gods. Behold the many wonderful forms which noone has ever seen before.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.6।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन तू बारह आदित्योंको? आठ वसुओंको? ग्यारह रुद्रोंको और दो अश्विनीकुमारोंको तथा उनचास मरुद्गणोंको देख। जिनको तूने पहले कभी देखा नहीं? ऐसे बहुतसे आश्चर्यजनक रूपोंको भी तू देख।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.6।। हे भारत (मुझमें) आदित्यों? वसुओं? रुद्रों तथा अश्विनीकुमारों और मरुद्गणों को देखो? तथा और भी अनेक इसके पूर्व कभी न देखे हुए आश्चर्यों को देखो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.6 पश्य behold? आदित्यान् the Adityas? वसून् the Vasus? रुद्रान् the Rudras? अश्िवनौ the (two) Asvins? मरुतः the Maruts? तथा also? बहूनि many? अदृष्टपूर्वाणि never seen before? पश्य see? आश्चर्याणि wonders? भारत O Bharata.Commentary Adityas? Vasus? Rudras and Maruts have already been described in the previous chapter.Not these alone Behold also many other wonders never seen before by you or anybody else in this world.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.6. Behold the Adityas, the Vasus, the Rudras, the twin Asvins, and the Maruts; O son of Pandu, behold also many wonders that had never been seen before.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.6 Behold thou the Powers of Nature: fire, earth, wind and sky; the sun, the heavens, the moon, the stars; all forces of vitality and of healing; and the roving winds. See the myriad wonders revealed to none but thee.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.6 Behold the Adityas, the Vasus, the Rudras, the two Asvins and the Maruts. Behold, O Arjuna, many marvels never seen before.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.6 See the Adiyas, the Vasus, the Rudras, the two Asvins and the Maruts. O scion of the Bharata dynasty, behold also the many wonders not seen before.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.6 Behold the Adityas, the Vasus, the Rudras, the two Asvins and also the Maruts; behold many wonders never seen before, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.6 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.6 Behold in My single form (i.e., the many forms in the one form revealed to Arjuna), the twelve Adityas, eight Vasus, eleven Rudras, the two Asvins and forty-nine Maruts. This is just illustrative. Behold all those things directly perceived in this world and those described in the Sastras, and also many marvels, not seen before in all the worlds and in all the Sastras.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.6 Pasya, see; adityan, the twelve Adityas; vasun, the eight Vasus; rudran, the eleven Rudras; asvinau, the two Asvins; and amarutah, the Maruts, who are divided into seven groups of seven each. Bharata, O scion of the Bharata dynasty; pasya, behold; tatha, also; bahuni, the many other; ascaryani, wonders; adrstapurvani, not seen before-by you or anyone else in the human world. Not only this much,-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.6।। द्रष्टव्य रुपों में भगवान् केवल महत्त्वपूर्ण देवताओं की ही गणना करते हैं। लौकिक जगत् में भी किसी जनसमुदाय का वर्णन करने में उसमें उपस्थित समाज के उन कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों का ही नाम निर्देश किया जाता है? जो उस समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं।यहाँ भी भगवान् के शब्दों में इस विश्वरूप का वर्णन करने में अपनी असमर्थता के प्रति कुछ निराशा छलकती है? जब वे कहते हैं कि? और भी अनेक अदृष्टपूर्व (पूर्व न देखे हों) आश्चर्यों को तुम देखो। यहाँ उल्लिखित अनेक नामों का वर्णन पूर्व अध्यायों में किया जा चुका है। यहाँ नवीन नाम केवल अश्विनी कुमारों का है। ये सूर्य के दो पुत्र माने गये हैं? जिनके मुख अश्व के हैं तथा ये अश्विनीकुमार के नाम से प्रसिद्ध दो बन्धु देवताओं के वैद्य कहे जाते हैं। किसी स्थान पर वे उषकाल और सन्ध्याकाल के प्रतीक माने गये हैं? तो किसी अन्य स्थल पर इन्हें इन दो समयों के तारों का प्रतीक कहा गया है।विराट् रूप में द्रष्टव्य रूपों का सारांश में निर्देश करके भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन की जिज्ञासा को और अधिक बढ़ा दिया। इसलिए वह जानना चाहता है कि इन रूपों को वह कहां देखे इस पर कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.6।।आदित्यान्द्वादश? त्रसूनष्ठौ? रूद्रानेकादश? अश्विनौ द्वौ? मरुत एकोनपञ्चाशत्। तथा बहून्यन्यानि मनुष्यलोके त्वया अन्येन वा पूर्वं न दृष्टानि। उत्तमवंशोद्भवत्वात्तव दर्शनेऽधिकार िति सूचयन्नाह -- भारतेति। यस्मिन् वंशे त्वमुत्पन्नः तत्रोत्पन्नैः कैश्चिदप्येतन्न दृष्टमिति वा संबोधनाशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.6।।दिव्यानि रूपाणि पश्येत्युक्त्वा तान्येव लेशतोऽनुक्रामति द्वाभ्याम् -- पश्यादित्यानित्यादिना। पश्यादित्यान्द्वादश वसूनष्टौ रुद्रानेकादश अश्िवनौ द्वौ मरुतः सप्तसप्तकानेकोनपञ्चाशत् तथान्यानपि देवानित्यर्थः। बहून्यन्यान्यदृष्टपूर्वाणि पूर्वमदृष्टानि मनुष्यलोके त्वया त्वत्तोऽन्येन वा केनचित्पश्याश्चर्याण्यद्भुतानि हे भारत? अत्र शतशोऽथसहस्रशः नानाविधानीत्यस्य विवरणं बहूनीति आदित्यानित्यादि च? अदृष्टपूर्वाणीति दिव्यानीत्यस्य? आश्चर्याणीति नानावर्णाकृतीनीत्यस्येति द्रष्टव्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.6।।दिव्यानि तावदाह -- पश्यादित्यानिति। अदृष्टपूर्वाण्याश्चर्याणि अद्भुतानि चतुर्मुखपञ्चमुखषण्मुखादीनि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.6।।तान्येव पश्येति नामभिर्विशेषेणाह -- पश्येति। आदित्यान् द्वादशात्मकान्? वसून् अष्टसङ्ख्याकान्? रुद्रानेकादशसङ्ख्यान्? अश्िवनौ अश्िवनीकुमारौ? मरुतः देवगणविशेषान् तथा बहून्यसङ्ख्येयानि अदृष्टपूर्वाणि सर्वैः? आश्चर्याणि अलौकिकानि हे भारत उत्तमवंशोद्भव योग्यत्वात् पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.6।।तान्येवाह -- पश्येति। आदित्यादीन्मम देहे पश्य। मरुत एकोनपञ्चाशद्देवविशेषान्। अदृष्टपूर्वाणि त्वया वान्येन वा पूर्वमदृष्टानि रूपाणि आश्चर्याण्यत्यद्भुतानि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.6।।किञ्चात्रैव पश्यादित्यानिति। आश्चर्याणि बहूनि पश्य एकत्रान्योन्यविरुद्धर्मसमावेशरूपाणि तत्राश्चर्याणि पश्य।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.6।।हे भारत तू द्वादश आदित्योंको? आठ वसुओंको ? एकादश रुद्रोंको? दोनों अश्विनीकुमारोंको और उनचास मरुद्गणोंको देख। तथा और भी जिन्हें मनुष्यलोकमें तूने अथवा और किसीने भी कभी नहीं देखा? ऐसे बहुतसे आश्चर्यमय -- अद्भुत दृश्य देख।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.6।। व्याख्या -- पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्विनौ मरुतस्तथा -- अदितिके पुत्र धाता? मित्र? अर्यमा? शुक्र? वरुण? अंश? भग? विवस्वान्? पूषा? सविता? त्वष्टा और विष्णु -- ये बारह आदित्य हैं (महा0 आदि0 65। 15 16)।धर? ध्रुव? सोम? अहः? अनिल? अनल? प्रत्यूष और प्रभास -- ये आठ वसु हैं (महा0 आदि0 66। 18)।हर? बहुरूप? त्रयम्बक? अपराजित? वृषाकपि? शम्भु? कपर्दी? रैवत? मृगव्याध? शर्व और कपाली -- ये ग्यारह रुद्र हैं (हरिवंश0 1। 3। 51 52)।अश्विनीकुमार दो हैं। ये दोनों भाई देवताओंके वैद्य हैं।सत्त्वज्योति? आदित्य? सत्यज्योति? तिर्यग्ज्योति? सज्योति? ज्योतिष्मान्? हरित? ऋतजित्? सत्यजित्? सुषेण? सेनजित्? सत्यमित्र? अभिमित्र? हरिमित्र? कृत? सत्य? ध्रुव? धर्ता? विधर्ता? विधारय? ध्वान्त? धुनि? उग्र? भीम? अभियु? साक्षिप? ईदृक्? अन्यादृक्? यादृक्? प्रतिकृत्? ऋक्? समिति? संरम्भ? ईदृक्ष? पुरुष? अन्यादृक्ष? चेतस? समिता? समिदृक्ष? प्रतिदृक्ष? मरुति? सरत? देव? दिश? यजुः? अनुदृक्? साम? मानुष और विश् -- ये उनचास मरुत हैं (वायुपुराण 67। 123 -- 130) -- इन सबको तू मेरे विराट्रूपमें देख।बारह आदित्य? आठ वसु? ग्यारह रुद्र और दो अश्विनीकुमार -- ये तैंतीस कोटि (तैंतीस प्रकारके) देवता सम्पूर्ण देवताओंमें मुख्य हैं। देवताओंमें मरुद्गणोंका नाम भी आता है? पर वे उनचास मरुद्गण इन तैंतीस प्रकारके देवताओंसे अलग माने जाते हैं क्योंकि वे सभी दैत्योंसे देवता बने हैं। इसलिये भगवान्ने भी तथा पद देकर मरुद्गणोंको अलग बताया है।बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्चर्याणि भारत -- तुमने इन रूपोंको पहले कभी आँखोंसे नहीं देखा है? कानोंसे नहीं सुना है? मनसे चिन्तन नहीं किया है? बुद्धिसे कल्पना नहीं की है। इन रूपोंकी तरफ तुम्हारी कभी वृत्ति ही नहीं गयी है। ऐसे बहुतसे अदृष्टपूर्व रूपोंको तू अब प्रत्यक्ष देख ले।इन रूपोंके देखते ही आश्चर्य होता है कि अहो ऐसे भी भगवान्के रूप हैं ऐसे अद्भुत रूपोंको तू देख। सम्बन्ध -- भगवान्द्वारा विश्वरूप देखनेकी आज्ञा देनेपर अर्जुनकी यह जिज्ञासा हो सकती है कि मैं इस रूपको कहाँ देखूँ अतः भगवान् कहते हैं --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.6।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.6।।दिव्यानि रूपाणि पश्येत्युक्तं तान्येव लेशतोऽनुक्रामति -- पश्यादित्यानिति। तान्मरुतस्तथा पश्येति संबन्धः। नानाविधानीत्युक्तं तदेव स्फुटयति -- बहूनीति। अदृष्टपूर्वाणि पूर्वमदृष्टानि। नानावर्णाकृतीनीत्युक्तं व्यनक्ति -- आश्चर्याणीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.6।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.6।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.6।। --,पश्य आदित्यान् द्वादश? वसून् अष्टौ? रुद्रान् एकादश? अश्विनौ द्वौ? मरुतः सप्त सप्त गणाः ये तान्। तथा च बहूनि अन्यान्यपि अदृष्टपूर्वाणि मनुष्यलोके त्वया?त्वत्तः अन्येन वा केनचित्? पश्य आश्चर्याणि अद्भुतानि भारत।।न केवलम् एतावदेव --,
───────────────────
【 Verse 11.7 】
▸ Sanskrit Sloka: इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् | मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि ||
▸ Transliteration: ihaikasthaṁ jagat kṛtsnaṁ paśyādya sacarācaram | mama dehe guḍākeśa yac cānyad draṣṭumicchasi ||
▸ Glossary: iha: in this; ekasthaṁ: situated in one; jagat: the universe; kṛtsnaṁ: whole; paśya: see; adya: now; sa: with; carā: moving; acaram: not moving; mama: My; dehe: in this body; guḍākeśa: O Arjuna; yat: that; ca: also; anyat: other; draṣṭum: to see; icchasi: you like
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.7 O Arjuna, see at once now in this body of Mine, the whole Universe completely in this one place, all the moving and the unmoving, and see everything else you desire to see also.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.7।।हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन मेरे इस शरीरके एक देशमें चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्को अभी देख ले। इसके सिवाय तू और भी जो कुछ देखना चाहता है? वह भी देख ले।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.7।। हे गुडाकेश आज (अब) इस मेरे शरीर में एक स्थान पर स्थित हुए चराचर सहित सम्पूर्ण जगत् को देखो तथा और भी जो कुछ तुम देखना चाहते हो? उसे भी देखो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.7 इह in this? एकस्थम् centred in one? जगत् the universe? कृत्स्नम् whole? पश्य behold? अद्य now? सचराचरम् with the moving and the unmoving? मम My? देहे in body? गुडाकेश O Gudakesa? यत् whatever? च and? अन्यत् other? द्रष्टुम् to see? इच्छसि (thou) desirest.Commentary Anyat Other whatever else. Your success or defeat in the war? about which you,have entertained a doubt. (Cf.II.6)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.7. Now, behold the entire universe, including the moving and the unmoving, and whatsoever else you desire to see-all established in one here, in My body, O Gudakesa (Arjuna) !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.7 Here in Me living as one, O Arjuna, behold the whole universe, movable and immovable, and anything else that thou wouldst see!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.7 Behold here, O Arjuna, the whole universe with its mobile and immobile things centred in My body and whatever else you desire to see.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.7 See now, O gudakesa, O Gudakesa (Arjuna), the entire Universe together with the moving and the non-moving, concentrated at the same place here in My body, as also whatever else you would like to see.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.7 Now behold, O Arjuna, in this, My body, the whole universe centred in one including the moving and the unmoving and whatever else thou desirest to see.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.7 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.7 'Here', in this one body of Mine, and even there, gathered together in a single spot, behold the universe with all mobile and immobile entities. Whatever else you desire to see (i.e., Arjuna's chances of victory), behold that also in one part of this single body.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.7 Pasya, see; adya, now; O Gudakesa, the krtsnam, entire; jagat, Universe; sa-cara-acaram, existing together with the moving and the non-moving; ekastham, concentrated at the same place; iha, here; mama dehe, in My body; ca, as also; yat anyat, whatever else-even those victory, defeat, etc. with regard to which you expressed doubt in, 'whether we shall win, or whether they shall coner us' (2.6); if icchasi, you would like; drastum, to see them.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.7।। प्रथम तो भगवान् उत्साही साधक के साहसी मन को इसके लिए प्रशिक्षित करते हैं कि उसमें जानने की उत्सुकता रूपी अक्षय धन का विकास हो। तत्पश्चात् उनका प्रयत्न है कि यह उत्सुकता तीव्र उत्कण्ठा या जिज्ञासा में परिवर्तित हो जाये। इसके लिए ही वे विश्वरूप में दर्शनीय रूपों का उल्लेख करते हैं। इस युक्ति से साधक का मन पूर्ण उत्कटता से एक ही स्थान पर केन्द्रित हो जाता है। यही इस श्लोक का प्रयोजन है। ध्यानपूर्वक इस श्लोक पर विचार करने से ज्ञात होगा कि यहाँ व्यासजी ने भक्तिशास्त्र में वर्णित भक्ति की रूपरेखा दी है।इहैकस्थम् का अर्थ है यहाँ इसी एक स्थान पर। इन शब्दों के द्वारा श्रीकृष्ण सम्पूर्ण चराचर (जड़ चेतन) जगत को अपने शरीर में दर्शाते हैं। श्रीकृष्ण स्वयं ही इह शब्द को स्पष्ट करते हुए कहते हैं? मेरे शरीर में। सम्पूर्ण चराचर सहित भौतिक जगत् को दबाकर श्रीकृष्ण की देहाकृति में स्थित हुआ दिखलाना था। जैसा कि हम इस अध्याय की प्रस्तावना में देख चुके हैं कि अर्जुन के मन से देश की कल्पना को सर्वथा मुक्त नहीं किया गया था? किन्तु केवल भगवान् श्रीकृष्ण के परिच्छिन्न देह के तुल्य समष्टि आकाश की कल्पना को उसके मन में शेष रखा था। इस मन के द्वारा जब अर्जुन बाहर देखता है? तो उसे भगवान् के शरीर में ही सम्पूर्ण विश्व अपने व्ाविध विस्तार को यथावत् रखते हुए लघु रूप में दिखाई देता है।यद्यपि चराचर शब्द का अर्थ इतना व्यापक है कि उसके उल्लेख से सम्पूर्ण विश्व का निर्देश हो जाता है? किन्तु फिर भी अर्जुन का उत्साह बढ़ाने के लिए वे कहते हैं? और भी जो कुछ तुम देखना चाहते हो? उसे भी देखो। मानव के विशिष्ट स्वभाव के अनुसार अर्जुन का मन अपनी तात्कालिक समस्याओं से चिन्तातुर था? अत स्वाभाविक ही है कि उसकी उत्सुकता भविष्य की घटनाओं को जानने की थी। प्रारम्भ मे उसका प्रयत्न समस्या के समाधान को देखने के लिए अधिक था और अनेकता में व्याप्त एकत्व का साक्षात्कार करने के लिए कम।विभूतियोग के अध्याय में एक परमात्मा को सब में दिखाया गया था? और यहाँ सब को एक परमात्मा में दिखाया जानेवाला है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.7।।न केवलमेतावदेवापितु इह मम देहे एकस्थं एकस्मिन्नवयवे स्थितं सर्वं जगत्स्थावरजंगमसहितमद्येदानीं पश्य। यच्चान्यज्जयपराजयादि द्रष्टुमिच्छति तदपि। यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुरिति संदेहापनुत्तये पश्य। यच्चान्यज्जगदाश्रय भूतं कारणस्वरुपं जगतश्चावस्थाविशेषादिकं अतीतमनागतं विप्रकृष्टं व्यवहितं स्थूलं सूक्ष्मं चेति आदिशब्दार्थः। हे गुडाकेशेति संबोधयन् द्रष्टुं सावधानो भवेति सूचयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.7।।न केवलमेतावदेव समस्तं जगदपि मद्देहस्थं द्रष्टुमर्हसीत्याह -- इहेति। इहास्मिन्मम देहे एकस्थं एकस्मिन्नेवावयवरूपेण स्थितं जगत् कृत्स्नं समस्तं सचराचरं जङ्गमस्थावरसहितं तत्र तत्र परिभ्रमता वर्षकोटिसहस्रेणापि द्रष्टुमशक्यं अद्याधुनैव पश्य। हे गुडाकेश? यच्चान्यज्जयपराजयादिकं द्रष्टुमिच्छसि तदपि संदेहोच्छेदाय पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.7।।हे गुडाकेश जितनिद्र? इह मम देहे एकस्थं एकस्मिन्नेवावयवे नखाग्रमात्रे स्थितं कृत्स्नं वर्तमानं जगत्पश्य। यच्चान्यत् अतीतमनागतं विप्रकृष्टं व्यवहितं स्थूलं सूक्ष्मं वा तत्सर्वमिह पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.7।।किञ्च -- इहेति। कोटिजन्मभिरपि सम्पूर्णं द्रष्टुमशक्यं कृत्स्नं समस्तं जगत् विरुद्धत्वेन परिदृश्यमानमपि मम देहे एकस्थमेकत्र स्थितं सचराचरं जडजीवसहितं इह अस्मिन्नेव जन्मनि। अद्य तत्कालमेव यच्च अन्यत् सर्वेषां विभूतित्वेन कथं मारयामीति विचारेण मरणमारणादिरूपं यत् द्रष्टुमिच्छसि तत्पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.7।। किंच -- इहेति। तत्र तत्र परिभ्रमता वर्षकोटिभिरपि द्रष्टुमशक्यं कृत्स्नमपि चराचरसहितं जगदिहास्मिन्मम देहेऽवयवरूपेणैकत्रैव स्थितमद्याधुनैव पश्य। यच्चान्यज्जगदाश्रयभूतं कारणस्वरूपम्। जगतश्चावस्थाविशेषादिकम्। जयपराजयादिकं च यदप्यन्यद्द्रष्टुमिच्छसि तत्सर्वं पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.7।।किञ्चेहास्मिन्नक्षरस्वरूपे कृत्स्नं जगदेकस्थं पश्येत्यनेनविष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् [10।42] इति समर्थितम्। मम स्वरूपभूतेऽक्षरे देहे जगत्कृत्स्नमित्युक्त्वा प्रत्यक्षजगद्दर्शनेनालीकत्वं च निरस्तम्। नहि तदो(दु) पदेष्टुर्भ्रमः कदाचिद्वक्तुं शक्यते? आनर्थक्यप्रसङ्गात् अतएव व्यास आह -- नाभाव उपलब्धेःवैधर्म्याच्च न स्वप्नादिवत् [ब्र.सू.2।2।28?29] इति।मम देहे इति स्वदेहभूतस्य भूतस्य प्रपञ्चाश्रयत्वमुक्तं यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि तत्सर्वं पश्य।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.7।।केवल इतना ही नहीं --, हे गुडाकेश अब तू मेरे इस शरीरमें एक ही स्थानमें स्थित चराचरसहित सारे जगत्को देख ले। तथा और भी जो कुछ जयपराजय आदि दृश्य जिसके लिये तू हम उनको जीतेंगे या वे हमको जीतेंगे इस प्रकार शङ्का करता था? वह सब या अन्य जो कुछ यदि देखना चाहता हो तो देख ले।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.7।। व्याख्या -- गुडाकेश -- निद्रापर अधिकार प्राप्त करनेसे अर्जुनको गुडाकेश कहते हैं। यहाँ यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तू निरालस्य होकर सावधानीसे मेरे विश्वरूपको देख।इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम्? मम देहे -- दसवें अध्यायके अन्तमें भगवान्ने कहा था कि मैं सम्पूर्ण जगत्को
Chapter 11 (Part 3)
एक अंशसे व्याप्त करके स्थित हूँ। इसीपर अर्जुनके मनमें विश्वरूप देखनेकी इच्छा हुई। अतः भगवान् कहते हैं कि हाथमें घोड़ोंकी लगाम और चाबुक लेकर तेरे सामने बैठे हुए मेरे इस शरीरके एक देश(अंश) में चरअचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख। एक देशमें देखनेका अर्थ है कि तू जहाँ दृष्टि डालेगा? वहीं तेरेको अनन्त ब्रह्माण्ड दीखेंगे। तू मनुष्य? देवता? यक्ष? राक्षस? भूत? पशु? पक्षी आदि चलनेफिरनेवाले जङ्गम और वृक्ष? लता घास? पौधा आदि स्थावर तथा पृथ्वी? पहाड़? रेत आदि जडसहित सम्पूर्ण जगत्को अद्य -- अभी? इसी क्षण देख ले? इसमें देरीका काम नहीं है।यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि -- भगवान्के शरीरमें सब बातें वर्तमान थीं अर्थात् जो बातें भूतकालमें बीत गयी हैं और जो भविष्यमें बीतनेवाली हैं? वे सब बातें भगवान्के शरीरमें वर्तमान थीं। इसलिये भगवान् कहते हैं कि तू और भी जो कुछ देखना चाहता है? वह भी देख ले। अर्जुन और क्या देखना चाहते थे अर्जुनके मनमें सन्देह था कि युद्धमें जीत हमारी होगी या कौरवोंकी (गीता 2। 6) इसलिये भगवान् कहते हैं कि वह भी तू मेरे इस शरीरके एक अंशमें देख ले।विशेष बातजैसे दसवें अध्यायमें भगवान्से जो मेरी विभूति और योगको तत्त्वसे जानता है? उसका मेरेमें दृढ़ भक्तियोग हो जाता है इस बातको सुनकर ही अर्जुनने भगवान्की स्तुतिप्रार्थना करके विभूतियाँ पूछी थीं? ऐसे ही भगवान्से मेरे एक अंशमें सारा संसार स्थित है इस बातको सुनकर अर्जुनने विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना की है। अगर भगवान् अथवा कहकर अपनी ही तरफसे मेरे किसी एक अंशमें सम्पूर्ण जगत् स्थित है यह बात न कहते? तो अर्जुन विश्वरूप देखनेकी इच्छा ही नहीं करते। जब इच्छा ही नहीं करते? तो फिर विश्वरूप दिखानेके लिये प्रार्थना कैसे करते और जब प्रार्थना ही नहीं करते? तो फिर भगवान् अपना विश्वरूप कैसे दिखाते इससे सिद्ध होता है कि भगवान् कृपापूर्वक अपनी ओरसे ही अर्जुनको अपना विश्वरूप दिखाना चाहते हैं।ऐसी बात गीताके आरम्भमें भी आयी है। जब अर्जुनने भगवान्से दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा करनेके लिये कहा? तब भगवान्ने रथको पितामह भीष्म और द्रोणाचार्यके सामने खड़ा किया और अर्जुनसे कहा -- इन कुरुवंशियोंको देखो -- कुरून् पश्य (1। 25)। इसका यही आशय मालूम देता है कि भगवान् कृपापूर्वक गीता प्रकट करना चाहते हैं। कारण कि यदि भगवान् ऐसा न कहते तो अर्जुनको शोक नहीं होता और गीताका उपदेश आरम्भ नहीं होता। तात्पर्य है कि भगवान्ने अपनी तरफसे कृपा करके ही गीताको प्रकट किया है। सम्बन्ध -- भगवान्ने तीन श्लोकोंमें चार बार पश्य पदसे अपना रूप देखनेके लिये आज्ञा दी। इसके अनुसार ही अर्जुन आँखें फाड़फाड़कर देखते हैं और देखना चाहते भी हैं परन्तु अर्जुनको कुछ भी नहीं दीखता। इसलिये अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनको न दीखनेका कारण बताते हुए उनको दिव्यचक्षु देकर विश्वरूप देखनेकी आज्ञा देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.7।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.7।।न केवलमादित्यवस्वाद्येव मद्रूपं त्वया द्रष्टुं शक्यं किंतु समस्तं जगदपि मद्देहस्थं द्रष्टुमर्हसीत्याह -- नेत्यादिना। सप्तमीद्वयं मिथः संबध्यते। समासान्तर्गतापि सप्तमी तत्रैवान्विता। यदीच्छसि तर्हीहैव पश्येति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.7।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.7।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.7।। -- इह एकस्थम् एकस्मिन्नेव स्थितं जगत् कृत्स्नं समस्तं पश्य अद्य इदानीं सचराचरं सह चरेण अचरेण च वर्तते मम देहे गुडाकेश। यच्च अन्यत् जयपराजयादि? यत् शङ्कसे? यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः (गीता 2।6) इति यत् अवोचः? तदपि द्रष्टुं यदि इच्छसि।।किन्तु --,
───────────────────
【 Verse 11.8 】
▸ Sanskrit Sloka: न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा | दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्वरम् ||
▸ Transliteration: na tu māṁ śakyase draṣṭum anenaiva svacakṣuṣā | divyaṁ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogamaiśvaram ||
▸ Glossary: na: never; tu: but; māṁ: Me; śakyase: able; draṣṭum: to see; anena: by this; eva: certainly; svacakṣuṣā: with your own eyes; divyaṁ: divine; dadāmi: I give; te: to you; cakṣuḥ: eyes; paśya: see; me: My; yogam aiśvaram: divine powers
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.8 But you cannot see Me with your own physical eyes. Let Me give you the Divine eye; Behold My Divine power and opulence!
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.8।।तू अपनी इस आँखसे अर्थात् चर्मचक्षुसे मेरेको देख ही नहीं सकता। इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ? जिससे तू मेरी ईश्वरसम्बन्धी सामर्थ्यको देख।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.8।। परन्तु तुम अपने इन्हीं (प्राकृत) नेत्रों के द्वारा मुझे देखने में समर्थ नहीं हो (इसलिए) मैं तुम्हें दिव्यचक्षु देता हूँ? जिससे तुम मेरे ईश्वरीय योग को देखो।।
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.8. But, you cannot see Me simply with this eye of yours [Hence], I give you the divine eye. [Now] behold the Lordly form of Mine.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.8 Yet since with mortal eyes thou canst not see Me, lo! I give thee the Divine Sight. See now the glory of My Sovereignty."
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.8 But you will not be able to see Me with your own eye. I give you a divine eye. Behold My Lordly Yoga!
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.8 But you are not able to see Me merely with this eye of yours. I grant you the supernatural eye; bhold My divine Yoga.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.8 But thou art not able to behold Me with these thine own eyes; I give thee the divine eye; behold My lordly Yoga.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.8 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.8 I shall reveal to you the whole universe in one part of my body. But, with your physical eye, which can see only limited and conditioned things, you cannot behold Me, such as I am, different in kind from everything else and illimitable. So I bestow on you, a divine, namely, supernatural, eye by which you may perceive Me. Behold My Lordly Yoga' (sovereign endowment)! Behold My unie Yoga (special power)! The meaning is, 'Behold My Yoga such as infinite knowledge and such other attributes and endless manifestations of lordly power!'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.8 Tu, but; na sakyase, you are not able; drastum, to see; mam, Me, who have assumed the Cosmic form; eva, merely; anena, with this natural; sva-caksusa, eye of yours. However, dadami, I grant; te, you; the divyam, supernatural; caksuh, eye, by which supernatural eye you shall be able to see Pasya, behold with that; me, My, God's aisvaram, divine; yogam, Yoga, i.e. the superabundance of the power of Yoga [The power of accomplishing the impossible.-M.S.].
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.8।। हम पहले ही वर्णन कर चुके हैं कि एक सारतत्व को उससे बनी विभिन्न वस्तुओं में देख पाना अपेक्षत सरल कार्य है? किन्तु इसके विपरीत अनेक को एक तत्त्व में देखने के लिए दर्शनशास्त्र के सम्यक् ज्ञान से सम्पन्न सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता होती है। किसी कविता को पढ़ने मात्र के लिए केवल वर्णमाला का ज्ञान होना आवश्यक है परन्तु उसके सूक्ष्म सौन्दर्य को समझने के लिए तथा उसी के समान अन्य कविताओं के साथ उसका तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए एक ऐसे प्रवीण मन की आवश्यकता होती है? जिसने सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं के रसास्वादन के आनन्द में अपने आप को डुबो दिया हो। इसी प्रकार? एक को अनेक में देखना श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय का कार्य है परन्तु अनेक को एक में अनुभव करने के लिए हृदय के अतिरिक्त ऐसी शिक्षित बुद्धि की आवश्यकता होती है? जिसे दार्शनिकों की युक्तियों को समझने की योग्यता प्राप्त हुई हो। जानने और अनुभव करने की क्षमता का विकास होने पर ही एक शिक्षित बुद्धि को असाधारण का दर्शन करने की विशिष्ट सार्मथ्य प्राप्त होती है।एक सर्वविदित प्रत्यक्ष तथ्य को बताते हुए भगवान् कहते हैं? तुम मुझे अपने इन्हीं नेत्रों के द्वारा नहीं देख सकते मैं तुम्हें दिव्यचक्षु देता हूँ। अनेक समालोचक या व्याख्याकार हैं? जो इस दिव्यचक्षु का वर्णन अनेक हास्यास्पद कल्पनाओं तथा असंभव सिद्धांतों के द्वारा करने का प्रयत्न करते हैं। इससे प्रतीत होता है कि इन व्याख्याकारों ने हिन्दू शास्त्रोंउपनिषदों की शैली का भलीभाँति अध्ययन नहीं किया है। सभी उपनिषदों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बारम्बार इस बात पर बल दिया गया है कि मनुष्य अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म वस्तुओं का अवलोकन नहीं कर सकता है। इन्द्रियां केवल बाह्य जगत् की स्थूल वस्तुओं को ही ग्रहण कर सकती हैं। सामान्य व्यवहार में जब हम कहते हैं? इस विचार को देखो तो यह देखना इन दो नेत्रों से नहीं होता है। वहाँ देखने से तात्पर्य बौद्धिक ग्रहण से है तथा ऐसे सूक्ष्म विषय का ग्रहण करने की बौद्धिक क्षमता को ही दिव्यचक्षु कहा गया है।अर्जुन को यह दिव्यचक्षु भगवान् के ईश्वरीय योग को देखने के लिए प्रदान किया गया है। इस योग के द्वारा सम्पूर्ण विश्व भगवान् के रूप में धारण किया गया है। इसके पूर्व भी इस योगशक्ति का उल्लेख प्राय समान शब्दों में दो विभिन्न स्थानों पर आ चुका है।अब दृश्य परिवर्तन होता है। हस्तिनापुर के राजमहल में बैठा संजय धृतराष्ट्र से कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.8।। एवमुक्ते स्वचक्षुषा द्रष्टुं प्रवृत्तं न किमपि दृष्टवन्तं अतो खिन्नमर्जुनमालक्ष्याह -- नेति। मां विश्वरुपधरं परमप्राकृतनेमैव प्राकृतेन स्वचक्षुषा द्रष्टुं नतु शक्यसे तर्हि किमर्थ पश्येति त्वयोक्तमिति तत्राह। दिव्यमप्राकृतं ऐश्वररुपदर्शनयोग्यं चक्षुस्तुभ्यं ददामि तेन चक्षुषा ममैश्वरं योगं शक्त्यतिशयं पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.8।।यत्तूक्तं मन्यसे यदि तच्छक्यं द्रष्टुमिति तत्र विशेषमाह -- नत्विति। अनेनैव प्राकृतेन स्वचक्षुषा स्वभावसिद्धेन चक्षुषा मां दिव्यरूपं द्रष्टुं नतु शक्यसे न शक्नोषि तु एव।शक्ष्यस इति पाठे शक्तो न भविष्यसीत्यर्थः। भौवादिकस्यापि शक्नोतेर्दैवादिकः श्यन् छान्दस इति वा दिवादौ पाठोवेत्येव सांप्रदायिकम्। तर्हि त्वां द्रष्टुं कथं शक्नुयामत आह -- दिव्यमिति। दिव्यमप्राकृतं मम दिव्यरूपदर्शनक्षमं ददामि ते तुभ्यं चक्षुस्तेन दिव्येन चक्षुषा पश्य मे योगमघटनघटनासामर्थ्यातिशयमैश्वरमीश्वरस्य ममासाधारणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.8।।यत्तूक्तंमन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुम् इति तत्राह -- नत्विति। शक्यसे शक्नोषि। पदविकरणव्यत्यय आर्षः। अनेन प्राकृतेन। दिव्यमप्राकृतम्। ऐश्वरं ईश्वरसंबन्धिनं योगं विश्वाश्रयत्वलक्षणं सामर्थ्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.8।।एवमुक्ते दर्शनोद्यतं प्रत्याह -- नत्विति। तु पुनः एवमेव द्रष्टुं न शक्यसे न शक्तोऽसि। अतस्ते दिव्यमलौकिकं चक्षुर्ददामि। तेन स्वचक्षुषा मत्कृपादृष्ट्या मां पुरुषोत्तमं पश्य। अतो दृष्टपुरुषोत्तमेन अनेनैव मे ऐश्वरं करणाकरणान्यथाकरणसामर्थ्यरूपं योगयुक्तं पश्य। पुरुषोत्तमस्वरूपज्ञानदर्शनाभावे सर्वस्वरूपदर्शनं न स्यात्? पुरुषोत्तमदर्शनं चासाधारणदृष्ट्या भवेदिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.8।।यदुक्तमर्जुनेनमन्यसे यदि तच्छक्यम् इति तत्राह -- नत्विति। अनेनैव तु स्वीयेन चर्मचक्षुषा मां द्रष्टुं न शक्यसे शक्तो न भविष्यसि। अतोऽहं दिव्यमलौकिकं ज्ञानात्मकं चक्षुस्तुभ्यं ददामि। ममैश्वरमसाधारणं योगं युक्तिमघटितघटनासामर्थ्यं पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.8।।यदुक्तमर्जुनेनमन्यसे यदि तच्छक्यं [11।4] इति तत्राह -- न तु मामिति। अनेनैव तु स्वीयेन नियमतः परिमितग्राहिणा प्राकृतेन चक्षुषा मामक्षरैश्वर्यरूपं द्रष्टुं न शक्यसे? अतोऽहं दिव्यमप्राकृतज्ञानात्मकदर्शनसाधनं चक्षुर्ददामि? तेन ममैश्वरं योगं मत्स्वरूपगतं सर्व विभिन्नधर्माश्रयणं पश्य साक्षात्कुरु।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.8।।किंतु --, तू मुझ विश्वरूपधारी परमेश्वरको अपने इन प्राकृत नेत्रोंसे नहीं देख सकेगा। जिन दिव्य नेत्रोंद्वारा तू मुझे देख सकेगा? वे दिव्य नेत्र ( मैं ) तुझे देता हूँ? उनके द्वारा तू मुझ ईश्वरके ऐश्वर्य और योगको अर्थात् अतिशय योगसामर्थ्यको देख।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.8।। व्याख्या -- न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा -- तुम्हारे जो चर्मचक्षु हैं? इनकी शक्ति बहुत अल्प और सीमित है। प्राकृत होनेके कारण ये चर्मचक्षु केवल प्रकृतिके तुच्छ कार्यको ही देख सकते हैं अर्थात् प्राकृत मनुष्य? पशु? पक्षी आदिके रूपोंको? उनके भेदोंको तथा धूपछाया आदिके रूपोंको ही देख सकते हैं। परन्तु वे मनबुद्धिइन्द्रियोंसे अतीत मेरे रूपको नहीं देख सकते।दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् -- मैं तुझे अतीन्द्रिय? अलौकिक रूपको देखनेकी सामर्थ्यवाले दिव्यचक्षु देता हूँ अर्थात् तेरे इन चर्मचक्षुओंमें ही दिव्य शक्ति प्रदान करता हूँ? जिससे तू अतीन्द्रिय? अलौकिक पदार्थ भी देख सके और साथसाथ उनकी दिव्यताको भी देश सके।यद्यपि दिव्यता देखना नेत्रका विषय नहीं है? प्रत्युत बुद्धिका विषय है? तथापि भगवान् कहते हैं मेरे दिये हुए दिव्यचक्षुओंसे तू दिव्यताको अर्थात् मेरे ईश्वरसम्बन्धी अलौकिक प्रभावको भी देख सकेगा। तात्पर्य है कि मेरा विराट्रूप देखनेके लिये दिव्यचक्षुओंकी आवश्यकता है।पश्य क्रियाके दो अर्थ होते हैं -- बुद्धि(विवेक) से देखना और नेत्रोंसे देखना। नवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने पश्य मे योगमैश्वरम् कहकर बुद्धिके द्वारा देखने(जानने) की बात कही थी। अब यहाँ पश्य मे योगमैश्वरम् कहकर नेत्रोंके द्वारा देखनेकी बात कहते हैं।विशेष बातजैसे किसी जगह श्रीमद्भगवद्गीता -- ऐसा लिखा हुआ है। जिनको वर्णमालाका बिलकुल ज्ञान नहीं है? उनको तो इसमें केवल कालीकाली लकीरें दीखती हैं और जिनको वर्णमालाका ज्ञान है? उनको इसमें अक्षर दीखते हैं। परन्तु जो पढ़ालिखा है और जिसको गीताका गहरा मनन है? उसको श्रीमद्भगवद्गीता -- ऐसा लिखा हुआ दीखते ही गीताके अध्यायोंकी? श्लोकोंकी? भावोंकी सब बातें दीखने लग जाती हैं। ऐसे ही अर्जुनको जब भगवान्ने दिव्यचक्षु दिये? तब उनको अलौकिक विश्वरूप तथा उसकी दिव्यता भी दीखने लगी? जो कि साधारण बुद्धिका विषय नहीं है। यह सब सामर्थ्य भगवत्प्रदत्त दिव्यचक्षुकी ही थी। अब यहाँ एक शङ्का होती है कि जब अर्जुनने चौथे श्लोकमें कहा कि अगर मैं आपके विश्वरूपको देख सकता हूँ तो आप अपने विश्वरूपको दिखा दीजिये? तब उसके उत्तरमें भगवान्को यह आठवाँ श्लोक कहना चाहिये था कि तू अपने इन चर्मचक्षुओंसे मेरे विश्वरूपको नहीं देख सकता? इसलिये मैं तेरेको दिव्यचक्षु देता हूँ। परन्तु भगवान्ने वहाँ ऐसा नहीं कहा? प्रत्युत दिव्यचक्षु देनेसे पहले ही पश्यपश्य कहकर बारबार देखनेकी आज्ञा दी। जब अर्जुनको दीखा नहीं? तब उनको न दीखनेका कारण बताया और फिर दिव्यचक्षु देकर उसका निराकरण किया। अतः इतनी झंझट भगवान्ने की ही क्योंसाधकपर भगवान्की कृपाका क्रमशः कैसे विस्तार होता है? यह बतानेके लिये ही भगवान्ने ऐसा किया है क्योंकि भगवान्का ऐसा ही स्वभाव है। भगवान् अत्यधिक कृपालु हैं। उन कृपासागरकी कृपाका कभी अन्त नहीं आता। भक्तोंपर कृपा करनेके उनके विचित्रविचित्र ढंग हैं। जैसे? पहले तो भगवान्ने अर्जुनको उपदेश दिया। उपदेशके द्वारा अर्जुनके भीतरके भावोंका परिवर्तन कराकर उनको अपनी विभूतियोंका ज्ञान कराया। उन विभूतियोंको जाननेसे अर्जुनमें एक विलक्षणता आ गयी? जिससे उन्होंने भगवान्से कहा कि आपके अमृतमय वचन सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं हो रही है। विभूतियोंका वर्णन करके अन्तमें भगवान्ने कहा कि ऐसे (तरहतरहकी विभूतियोंवाले) अनन्त ब्रह्माण्ड मेरे एक अंशमें पड़े हुए हैं। जिसके एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड,हैं? उस विराट्रूपको देखनेके लिये अर्जुनकी इच्छा हुई और इसके लिये उन्होंने प्रार्थना की। इसपर भगवान्ने अपना विराट्रूप दिखाया और उसको देखनेके लिये बारबार आज्ञा दी। परन्तु अर्जुनको विराट्रूप दीखा नहीं। तब उनको भगवान्ने दिव्यचक्षु प्रदान किये। सारांश यह हुआ कि भगवान्ने ही विराट्रूप देखनेकी जिज्ञासा प्रकट की। जिज्ञासा प्रकट करके विराट्रूप दिखानेकी इच्छा प्रकट की। इच्छा प्रकट करनेपर विराट्रूप दिखाया। अर्जुनको नहीं दीखा तो दिव्यचक्षु देकर इसकी पूर्ति की। तात्पर्य यह निकला कि भगवान्के शरण होनेपर शरणागतका सब काम करनेकी जिम्मेवारी भगवान् अपने ऊपर ले लेते हैं। सम्बन्ध -- दिव्यचक्षु प्राप्त करके अर्जुनने भगवान्का कैसा रूप देखा? यह बात सञ्जय धृतराष्ट्रसे आगेके श्लोकमें कहते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.8।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.8।।मन्यसे यदीत्युक्तमनुवदति -- किंत्विति। सप्रपञ्चमनवच्छिन्नं मां स्वचक्षुषा न शक्नोषि द्रष्टुमित्याह -- नत्विति। कथं तर्हि त्वां द्रष्टुं शक्नुयामित्याशङ्क्याह -- येनेति। दिव्यस्य चक्षुषो वक्ष्यमाणयोगशक्त्यतिशयदर्शने विनियोगं दर्शयति -- तेनेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.8।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.8।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.8।। --,न तु मां विश्वरूपधरं शक्यसे द्रष्टुम् अनेनैव प्राकृतेन स्वचक्षुषा स्वकीयेन चक्षुषा। येन तु शक्यसे द्रष्टुं दिव्येन? तत् दिव्यं ददामि ते तुभ्यं चक्षुः। तेन पश्य मे योगम् ऐश्वरम् ईश्वरस्य मम ऐश्वरं योगं योगशक्त्यतिशयम् इत्यर्थः।।संजय उवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.9 】
▸ Sanskrit Sloka: सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरि: | दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम् ||
▸ Transliteration: sañjaya uvāca | evamuktvā tato rājan mahāyogeśvaro hariḥ | darśayāmāsa pārthāya paramaṁ rūpamaiśvaram ||
▸ Glossary: Sañjaya uvāca: Sañjaya said; evam: thus; uktvā: having says; tataḥ: thereaf- ter; rājan: O King; mahāyogeśvaraḥ: the great Lord of Yoga; hariḥ: Kṛṣṇa; darśayāmāsa: showed; pārthāya: to Arjuna; paramaṁ: divine; rūpam: form; aiśvaram: opulences
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.9 Sañjaya said: O King, having spoken thus, the great Lord of Yoga, Mahā Yogeśvara Hari (Kṛṣṇa), showed to Arjuna His supreme Cosmic form.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.9।।सञ्जय बोले -- हे राजन् ऐसा कहकर फिर महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको परम ऐश्वररूप दिखाया। (टिप्पणी प0 580)
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.9।। संजय ने कहा -- हे राजन् महायोगेश्वर हरि ने इस प्रकार कहकर फिर अर्जुन के लिए परम ऐश्वर्ययुक्त रूप को दर्शाया।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.9 एवम् thus? उक्त्वा having spoken? ततः then? राजन् O king? महायोगेश्वरः the great Lord of Yoga? हरिः Hari? दर्शयामास showed? पार्थाय to Arjuna? परमम् Supreme? रूपम् form? ऐश्वरम् Sovereign.Commentary King This verse is addressed by Sanjaya to Dhritarashtra.Supreme Form The Cosmic Form.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.9. Sanjaya said O king ! Having thus stated, Hari (Krsna), the mighty Lord of the Yogins, showed to the son of Prtha [His own] Supreme Lordly form;
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.9 Sanjaya continued: "Having thus spoken, O King, the Lord Shri Krishna, the Almighty Prince of Wisdom, showed to Arjuna the Supreme Form of the Great God.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.9 Sanjaya said Having spoken, O King, Sri Krsna, the gread Lord of Yoga, then revealed to Arjuna the supreme Lordly Form.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.9 Sanjaya said O King, having spoken thus, thereafter, Hari [Hari: destroyer of ignorance along with its conseences.] (Krsna) the great Master of Yoga, showed to the son of Prtha the supreme divine form:
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.9 Sanjaya said Having thus spoken, O king, the great Lord of Yoga, hari (Krishna), showed to Arjuna His supreme form as the Lord.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.9 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.9 Sanjaya said Having thus spoken, Sri Krsna, who is the great Lord of Yoga, namely, the Lord of supremely wonderful attributes - Sri Krsna who is Narayana, the Supreme Brahman now incarnated as the son of Arjuna's maternal uncle and seated as a charioteer in his chariot - showed Arjuna, the son of Pritha His paternal aunt, that Lordly form uniely His own, which is the ground of the entire universe, which is manifold and wonderful, and which rules over everything.
And that form was like this:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.9 Rajan, O King, Dhrtarastra; uktva, having spoken evam, thus, in the manner stated above; tatah, thereafter; harih, Hari, Narayana; maha-yogeswarah, the great Master of Yoga-who is great (mahan) and also the master (isvara) of Yoga; darasyamasa showed; parthaya, to the son of Prtha; the paramam, supreme; aisvaram, divine; rupam, form, the Cosmic form:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.9।। बहुमुखी प्रतिभा के धनी महर्षि व्यासजी ने साहित्य के जिस किसी पक्ष को स्पर्श किया उसे पूर्णत्व के सर्वोत्कृष्ट शिखर तक उठाये बिना नहीं छोड़ा। व्यासजी की प्रतिभा का वर्णन कौन कर सकता है उनमें अतुलनीय काव्य रचना की कल्पनातीत क्षमता? अनुपम गध शैली? विशुद्ध वर्णन? कलात्मक साहित्यिक रचना? आकृति और विचार दोनों में ही मौलिक नव निर्माण की सार्मथ्य? ये सब गुण पूर्ण मात्रा में थे। तेजस्वी दार्शनिक? पूर्ण ज्ञानी और व्यावहारिक ज्ञान में कुशल व्यासजी कभी राजभवनों में तो कभी युद्धभूमि में दिखाई देते? कभी बद्रीनाथ में तो कभी पुन शान्त एकान्त हिमशिखरों का मार्ग तय करते विशाल मूर्ति महर्षि व्यास? हिन्दू परम्परा और आर्य संस्कृति में जो कुछ सर्वश्रेष्ठ है? उस सबके साक्षात् मूर्तरूप थे। ऐसा सर्वगुण सम्पन्न प्रतिभाशाली पुरुष विश्व के इतिहास में कभी किसी अन्य काल में नहीं जन्मा होगा? जिसने अपने जीवन काल में व्यासजी के समान इतनी अधिक उपलब्धियां प्राप्त की हों।भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संकेत किया कि विश्वरूप में वह क्या देखने की अपेक्षा रख सकता है तथा विराट् स्वरूप का यह दर्शन उसे कहां होगा। अब? व्यासजी एक अत्यन्त अल्प से प्रकरण का उल्लेख करते हैं? जिसमें संजय? दुष्ट कौरवों के अन्ध पिता धृतराष्ट्र के लिए युद्धभूमि के वृतान्त का वर्णन करता है।साहित्य की दृष्टि से इस श्लोक का प्रयोजन केवल यह बताना है कि श्रीकृष्ण ने अपने दिये हुए वचनों के अनुसार? वास्तव में? अर्जुन को अपना विश्वरूप दर्शाया। परन्तु इसके साथ ही? महाभारत के कुशल रचयिता व्यासजी? हमारे लिए? संजय के मन के भावों को तथा पाण्डवों के प्रति उसकी सहानुभूति का चित्रण भी करना चाहते हैं। हम पहले ही कह चुके हैं कि संजय हमारा विशेष संवाददाता है। स्पष्ट है कि उसकी सहानुभूति भगवान् के मित्र पांडवों के साथ है। उसकी यह प्रवृत्ति निसंशय रूप से यहाँ स्पष्ट झलकती है? जब वह धृतराष्ट्र को केवल राजन् शब्द से संबोधित करता है जब कि श्रीकृष्ण को महायोगेश्वर तथा हरि के नाम से। हरण करने वाला हरि कहलाता है?अर्थात् जो मिथ्या का नाश करके सत्य की स्थापना करने वाला है।संजय के इन शब्दों के साथ श्रोतृसमुदाय तथा गीता के अध्येतृ वर्ग का ध्यान युद्ध की भूमि से हटाकर राजप्रासाद की ओर आकर्षित किया जाता है। पाठकों को यह स्मरण कराने के लिए कि गीता के तत्त्वज्ञान का व्यावहारिक जीनव से घनिष्ठ संबंध है तथा उसकी जीवन में उपयोगिता भी है? सम्भवत ऐसे दृश्य परिवर्तन की आवश्यकता है। संजय धृतराष्ट्र को सूचना देता है कि महायोगेश्वर हरि ने अर्जुन को अपना ईश्वरीय रूप दिखाया। संजय के मन में अभी भी कहीं क्षीण आशा है कि यह सुनकर कि विश्वविधाता भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवों के साथ हैं? सम्भवत अन्धराजा अपने पुत्रों की भावी पराजय को देखें? और विवेक से काम लेकर? विनाशकारी युद्ध को रोक दें।अगले श्लोकों में संजय विश्वरूप में दर्शनीय वस्तुओं का वर्णन करने का प्रयत्न करता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.9।।एतादृशो भगवतो वासुदेवस्य महिमार्जुनपक्षपातश्चेति सूचयन् धृतराष्ट्रं प्रति संजय उवाच। एवं यथोक्तेन प्रकारेणोक्त्वा ततोऽनन्तरं महांश्चासौ योगेश्वरो हरिः पार्थाय परमप्रेमास्पदाय परममैश्वररुपं दर्शयामास। हरिरित्यनेन स्वभक्तानां पार्थानां दुःखहरण उद्यत इत्युक्तम्। महायोगेश्वर इत्यनेन विश्वरुपप्रदर्शनादिना येनकेनापि प्रकारेण तद्धरणेऽतिसमर्थ इति सूचितम्। एतादृशकृष्णानुगृहीतैः पाण्जवैस्त्वं संधिं न कृतवान् न करोष चातो चाजनीतिहीनो नाममात्रेण राजासीति हे राजन्निति संबोधनेन ध्वनितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.9।।भगवानर्जुनाय दिव्यं रूपं दर्शितवान् स च तद्दृष्ट्वा विस्मयाविष्टो भगवन्तं विज्ञापितवानितीमं वृत्तान्तमेवमुक्त्वेत्यादिभिः षड्भिः श्लोकैर्धृतराष्ट्रं प्रति संजय उवाच -- एवमिति। एवं नतु मां शक्यसे द्रष्टुमनेन चक्षुषाऽतो दिव्यं ददामि ते चक्षुरित्युक्त्वा ततो दिव्यचक्षुःप्रदानादनन्तरं हे राजन् धृतराष्ट्र? स्थिरो भव श्रवणाय। महान्सर्वोत्कृष्टश्चासौ योगेश्वरश्चेति महायोगेश्वरो हरिभक्तानां सर्वक्लेशापहारी भगवान् दर्शनायोग्यमपि दर्शयामास पार्थाय एकान्तभक्ताय परमं दिव्यं रूपमैश्वरम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.9।।एवमुक्त्वा भगवानर्जुनाय दिव्यं रूपं दर्शितवान्? सच दृष्ट्वा विस्मयाविष्टो भगवन्तं,विज्ञापितवानितीमं वृत्तान्तमेवमुक्त्वेत्यादिषड्भिः श्लोकैर्धृतराष्ट्रं प्रति संजय उवाच -- एवमुक्त्वेत्यादि। ततः दिव्यचक्षुःप्रदानानन्तरम्। राजन् हे धृतराष्ट्र? महांश्चासौ योगेश्वरश्चेति विग्रहः। महतो योगस्य वा ईश्वरः। परमं दिव्यं रूपं ऐश्वरं मायाविसंबन्धि नतु मायातीतं दर्शयामास।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.9।।एवमुक्त्वा अर्जुनाय स्वरूपं दर्शयामास भगवानिति धृतराष्ट्रं प्रति सञ्जय उवाच -- एवमिति। राजन्याभिमानेन दिव्यदृष्ट्यसुरावेशिभीष्मादिमारणेन सर्वदुःखनिराकरणार्थं महायोगेश्वरः सर्वकरणसमर्थः सर्वात्मकयोगबलेन एवमुक्त्वा अलौकिकीं दृष्टिं दत्त्वा पार्थाय स्वाङ्गीकृताय परमं रूपं पुरुषोत्तमरूपं दर्शयामास। ततस्तद्दर्शनानन्तरं ऐश्वरं रूपं दर्शयामास।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.9।। एवमुक्त्वा भगवानर्जुनाय रूपं दर्शितवान्। तच्च रूपं दृष्ट्वार्जुनः श्रीकृष्णं विज्ञापितवानितीममर्थं एवमुक्त्वेत्यादिभिः ष़ड्भिः श्लोकैर्धृतराष्ट्रं प्रति संजय उवाच -- एवमिति। हे राजन् धृतराष्ट्र? महांश्चासौ योगेश्वरश्च हरिः परममैश्वरं रूपं दर्शितवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.9।।एवं सञ्जय उवाच राजन्निति। एवमुक्त्वा महायोगेश्वरः सर्वसमर्थः परमं ऐश्वरं रूपं पार्थाय दर्शयामास।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.9।।संजय बोला -- हे राजा धृतराष्ठ्र इस प्रकार कहनेके अनन्तर महायोगेश्वर श्रीहरिने यानी जो अति महान् और योगेश्वर भी हैं उन नारायणने पृथापुत्र अर्जुनको अपना ईश्वरीय परम रूप -- विराट्स्वरूप दिखलाया।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.9।। व्याख्या -- एवमुक्त्वा ततो ৷৷. परमं रूपमैश्वरम् -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जो यह कहा था कि तू अपने चर्मचक्षुओंसे मुझे नहीं देख सकता? इसलिये मैं तेरेको दिव्यचक्षु देता हूँ? जिससे तू मेरे ईश्वरसम्बन्धी योगको देख? उसीका संकेत यहाँ सञ्जयने एवमुक्त्वा पदसे किया है।चौथे श्लोकमें अर्जुनने भगवान्को योगेश्वर कहा और यहाँ सञ्जय भगवान्को महायोगेश्वर कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान्ने अर्जुनकी प्रार्थनासे बहुत अधिक अपना विश्वरूप दिखाया। भक्तकी थोड़ीसी भी वास्तविक रुचि भगवान्की तरफ होनेपर भगवान् अपनी अपार शक्तिसे उसकी पूर्ति कर देते हैं।तीसरे श्लोकमें अर्जुनने जिस रूपके लिये रूपमैश्वरम् कहा? उसी रूपके लिये यहाँ सञ्जय परमं रूपमैश्वरम् कहते हैं। इसका तात्पर्य है कि भगवान्का विश्वरूप बहुत ही विलक्षण है। सम्पूर्ण योगोंके महान् ईश्वर भगवान् श्रीकृष्णने ऐसा विलक्षण? अलौकिक? अद्भुत विश्वरूप दिखाया? जिसको धैर्यशाली? जितेन्द्रिय? शूरवीर और भगवान्से प्राप्त दिव्यदृष्टिवाले अर्जुनको भी दुर्निरीक्ष्य कहना प़ड़ा (11। 17) और भयभीत होना पड़ा (11। 45)? तथा भगवान्को भी व्यपेतभीः कहकर अर्जुनको आश्वासन देना पड़ा (11। 49)। सम्बन्ध -- अब सञ्जय भगवान्के उस परम ऐश्वररूपका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.9।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.9।।इमं वृत्तान्तं धृतराष्ट्राय संजयो निवेदितवानित्याह -- संजय इति। मदीयं विश्वरूपाख्यं रूपं न प्राकृतेन चक्षुषा निरीक्षितुं क्षमं किंतु दिव्येनेत्यादि यथोक्तप्रकारः। अनन्तरं दिव्यचक्षुषः प्रदानादिति शेषः। हरत्यविद्यां सकार्यामिति हरिः। यदीश्वरस्य मायोपहितस्य परममुत्कृष्टं रूपं तद्दर्शयांबभूवेत्याह -- परममिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.9 -- 11.10।।महायोगेश्वरो हरिः इत्यत्र हरिशब्दस्य प्रकृतोपयुक्तमर्थमाह -- हरिरिति। गेहेषु इष्टिगृहेषु। हरतेरिकारप्रत्ययः। श्रेष्ठोऽप्राकृतः। अप्राकृतविग्रहस्य साकारस्यैवानन्तपूजास्थानेषु स्वरूपेणैव युगपत्सन्निधाने किं वक्तव्यं महायोगेश्वरत्वं इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.9 -- 11.10।।हरिः सर्वयज्ञभागहारित्वात्।इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम्। वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः इति हि मोक्षधर्मे ()।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.9।। --,एवं यथोक्तप्रकारेण उक्त्वा ततः अनन्तरं राजन् धृतराष्ट्र? महायोगेश्वरः महांश्च असौ योगेश्वरश्च हरिः नारायणः दर्शयामास दर्शितवान् पार्थाय पृथासुताय परमं रूपं विश्वरूपम् ऐश्वरम्।।
───────────────────
【 Verse 11.10 】
▸ Sanskrit Sloka: अनेकवक्त्रनयनमनेकाद्भुतदर्शनम् | अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् ||
▸ Transliteration: aneka-vaktra-nayanam anekādbhuta darśanam | aneka-divyābharaṇaṁ divyānekodyatāyudham ||
▸ Glossary: aneka: various; vaktra: mouths; nayanam: eyes; aneka: various; adbhuta: won- derful; darśanam: sights; aneka: many; divya: divine; ābharaṇaṁ: ornaments; divya: divine; aneka: various; udyata: uplifted; āyudham: weapons
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.10 Infinite mouths and eyes, with infinite wonderful sights, infinite divine ornaments, with numerous divine weapons uplifted.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.10।।जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं? अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं? अनेक दिव्य आभूषण हैं और हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं? जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं? जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन आदि लगा हुआ है? ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय? अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देव(अपने दिव्य स्वरूप) को भगवान्ने दिखाया।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.10।। उस अनेक मुख और नेत्रों से युक्त तथा अनेक अद्भुत दर्शनों वाले एवं बहुत से दिव्य भूषणों से युक्त और बहुत से दिव्य शस्त्रों को हाथों में उठाये हुये।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.10 अनेकवक्त्रनयनम् with numerous mouthsand eyes? अनेकाद्भुतदर्शनम् with numerous wonderful sights? अनेकदिव्याभरणम् with numerous divine ornaments? दिव्यानेकोद्यतायुधम् with numerous divine weapons uplifted.Commentary Countless faces appeared there. Arjuna looked at this Cosmic Form in all its magnificence. He saw the Lord everywhere and in everything. The whole manifestation appeared as one gigantic body of the Lord. He saw the Lord as the allinall.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.10. That has many mouths and eyes, many wondrous sights, many heavenly ornaments, and many heavenly weapons held ready;
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.10 There were countless eyes and mouths, and mystic forms innumerable, with shining ornaments and flaming celestial weapons.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.10 With innumerable mouths and eyes, many marvellous aspects, many divine ornaments and many divine weapons.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.10 Having many faces and eyes, possessing many wonderful sights, adorned with numerous celestial ornaments, holding many uplifted heavenly weapons;
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.10 With numerous mouths and eyes, with numerous wonderful sights, with numerous divine ornaments, with numerous divine weapons uplifted (such a form He showed).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.10 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.10 - 11.11 'Divyam' means resplendent. 'Anantam' (boundless) means that form is not limited by time and space because of its being the foundation of the entire universe in the past, present and future. 'Visvatomukham' means facing in all directions. This form is adorned with divine raiments, perfumes, garlands, ornaments and weapons appropriate to it.
He explains the same resplendence expressed by the term 'Divyam':
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.10 A form aneka-vaktra-nayanam, having many faces and eyes; aneka-adbhuta-darsanam, possessing many wonderful sights; as also aneka-divya-abharanam, adorned with numerous celestial ornaments; and divya-aneka-udyata-ayudham, holding many uplifted heavenly weapons. This whole portion is connected with the verb '(He) showed' in the earlier verse.
Moreover,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.10।। See commentary under 11.11
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.10।।परममैश्वरं रुपं विशिनष्टि। अनेकानि मुखानि नेत्राणि च यस्मिस्तत्। अनेकानि विस्मापकानि दर्शनानि यस्मिन्,तत्। तथानेकानि दिव्यान्यलौकिकानि भूषणान्यङ्गदादीनि यस्मिन्तत्। तथा दिव्यान्यनेकान्युद्यतान्यायुधानि दर्शनानि यस्मिन् तत्। तथानेकानि दिव्यान्यलौकिकानि भूषणान्यङ्गदादीनि यस्मिन्तत्। तथा दिव्यान्यनेकान्युद्यतान्यायुधानि यस्मिंतत्। दर्शयामासेति पूर्वेण संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.10।।तदेव रूपं विशिनष्टि -- अनकेति। अनेकानि वक्त्राणि नयनानि च यस्मिन्रूपे। अनेकानामद्भुतानां विस्मयहेतूनां दर्शनं यस्मिन्। अनेकानि दिव्यान्याभरणानि भूषणानि यस्मिन्। दिव्यान्यनेकान्यद्भुतान्यायुधानि अस्त्राणि यस्मिन् तत्तथा रूपम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.10।।तदेव रूपं विशिनष्टि द्वाभ्याम् -- अनेकेत्यादिना। अनेकान्यनन्तानि वक्त्राणि नयनानि च यस्मिंस्तदनेकवक्त्रनयनम्। अनेकान्यद्भुतानि दर्शनानि यस्मिंस्तदनेकाद्भुतदर्शनम्। अनेकानि दिव्यान्याभरणानि यस्मिन्। दिव्यान्यनेकानि चोद्यतान्यायुधानि चक्रादीनि यस्मिन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.10।।उभयोः स्वरूपमाह -- अनेकेति। अनेकानि वक्त्राणि नयनानि च यस्मिंस्तत्? निखिललीलात्मकरूपसहितम्। अनेकाद्भुतदर्शनं अनेकानि अलौकिकानि लीलामयानि दर्शनानि यस्मिंस्तत्। अनेकानि दिव्यानि अलौकिकानि आभरणानि यस्मिंस्तत्। दिव्यानि अलौकिकानि अनेकानि उद्यतानि सकलदुःखनिवारकाणि आयुधानि शङ्खगदादीनि यस्मिंस्तत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.10।।कथंभूतं तदित्यत आह -- अनेकेति। अनेकानि वक्राणि नयनानि च यस्मिंस्तत्? अनेकानामद्भुतानां दर्शनं यस्मिंस्तत्? अनेकानि दिव्याभरणानि यस्मिंस्तत्? दिव्यान्यनेकानि उद्यतान्यायुधानि च यस्मिंस्तत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.10 -- 11.11।।तच्च कीदृशमिति तच्छृणु -- अनेकवक्त्रनयनं इत्यारभ्यविश्वतोमुखं इत्यन्तं रूपविशेषणानि। इदं च महाकालपुरुषरूपवद्दर्शितं मर्यादामार्गपरैरुपास्यं सर्वतः पाणिपादं चालौकिकमेतत्समष्टिभूतपुरुषस्वरूपभूतं कूटस्थं सर्वकारणकारणं निर्गुणभूतमित्यवसेयम्। दिव्यमिति स्पष्टार्थः। अम्बरं छन्दोमायारूपं किरीटाद्याभरणानि च पारमेष्ठ्यादिरूपाणि? आयुधानि पञ्चभूततत्त्वस्वरूपाणि? इत्येवंविधं विश्वरूपं विश्वतोमुखं निरुपमतेजस्कं स्वं दर्शितम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.10।।जो अनेक मुख और नेत्रोंवाला है अर्थात् जिस रूपमें अनेक मुख और नेत्र हैं? तथा अनेक अद्भुत दृश्योंवाला है अर्थात् जिसमें आश्चर्य उत्पन्न करनेवाले अनेक दृश्य हैं? जो अनेक दिव्य भूषणोंसे युक्त है यानी जिसमें अनेक दिव्य आभूषण हैं और जो हाथमें उठाये हुए अनेक दिव्य शस्त्रोंसे युक्त है यानी जिस रूपके हाथोंमें अनेक दिव्य शस्त्र उठाये हुए हैं? ऐसा वह रूप भगवान्ने अर्जुनको दिखलाया। इस श्लोकका पूर्वश्लोकके दर्शयामास शब्दसे सम्बन्ध है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.10।। व्याख्या -- अनेकवक्त्रनयनम् -- विराट्रूपसे प्रकट हुए भगवान्के जितने मुख और नेत्र दीख रहे हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं। विराट्रूपमें जितने प्राणी दीख रहे हैं? उनके मुख? नेत्र? हाथ? पैर आदि सबकेसब अङ्ग विराट्रूप भगवान्के हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही विराट्रूपसे प्रकट हुए हैं।अनेकाद्भुतदर्शनम् -- भगवान्के विराट्रूपमें जितने रूप दीखते हैं? जितनी आकृतियाँ दीखती हैं? जितने रंग दीखते हैं? जितनी उनकी विचित्र रूपसे बनावट दीखती है? वह सबकीसब अद्भुत दीख रही है।अनेकदिव्याभरणम् -- विराट्रूपमें दीखनेवाले अनेक रूपोंके हाथोंमें? पैरोंमें? कानोंमें? नाकोंमें? और गलोंमें जितने गहने हैं? आभूषण हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही गहनोंके रूपमें प्रकट हुए हैं।दिव्यानेकोद्यतायुधम् -- विराट्रूप भगवान्ने अपने हाथोंमें चक्र? गदा? धनुष? बाण? परिघ आदि अनेक प्रकारके जो आयुध (अस्त्रशस्त्र) उठा रखे हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं।दिव्यमाल्याम्बरधरम् -- विराट्रूप भगवान्ने गलेमें फूलोंकी? सोनेकी? चाँदीकी? मोतियोंकी? रत्नोंकी? गुञ्जाओं,आदिकी अनेक प्रकारकी मालाएँ धारण कर रखी हैं। वे सभी दिव्य हैं। उन्होंने अपने शरीरोंपर लाल? पीले? हरे? सफेद? कपिश आदि अनेक रंगोंके वस्त्र पहन रखे हैं? जो सभी दिव्य हैं।दिव्यगन्धानुलेपनम् -- विराट्रूप भगवान्ने ललाटपर कस्तूरी? चन्दन? कुंकुम आदि गन्धके जितने तिलक किये हैं तथा शरीरपर जितने लेप किये हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं।सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् -- इस प्रकार देखते ही चकित कर देनेवाले? अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखहीमुखवाले अपने परम ऐश्वर्यमय रूपको भगवान्ने अर्जुनको दिखाया।जैसे? कोई व्यक्ति दूर बैठे ही अपने मनसे चिन्तन करता है कि मैं हरिद्वारमें हूँ तथा गङ्गाजीमें स्नान कर रहा हूँ? तो उस समय उसको गङ्गाजी? पुल? घाटपर खड़े स्त्रीपुरुष आदि दीखने लगते हैं तथा मैं गङ्गाजीमें स्नान कर रहा हूँ -- ऐसा भी दीखने लगता है। वास्तवमें वहाँ न हरिद्वार है और न गङ्गाजी हैं परन्तु उसका मन ही उन सब रूपोंमें बना हुआ उसको दीखता है। ऐसे ही एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें? उन रूपोंमें पहने हुए गहनोंके रूपमें? अनेक प्रकारके आयुधोंके रूपमें? अनेक प्रकारकी मालाओंके रूपमें? अनेक प्रकारके वस्त्रोंके रूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये भगवान्के विराट्रूपमें सब कुछ दिव्य है।श्रीमद्भागवतमें आता है कि जब ब्रह्माजी बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये? तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं? प्रत्युत उनके बेंत? सींग? बाँसुरी? वस्त्र? आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही बन गये (श्रीमद्भा0 10। 13। 19)। सम्बन्ध -- अब सञ्जय विश्वरूपके प्रकाशका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.10।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.10।।तदेव रूपं विशिनष्टि -- अनेकेति। दिव्यान्याभरणादीनि हारकेयूरादीनि भूषणानि उद्यतान्युच्छ्रितानि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.9 -- 11.10।।महायोगेश्वरो हरिः इत्यत्र हरिशब्दस्य प्रकृतोपयुक्तमर्थमाह -- हरिरिति। गेहेषु इष्टिगृहेषु। हरतेरिकारप्रत्ययः। श्रेष्ठोऽप्राकृतः। अप्राकृतविग्रहस्य साकारस्यैवानन्तपूजास्थानेषु स्वरूपेणैव युगपत्सन्निधाने किं वक्तव्यं महायोगेश्वरत्वं इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.9 -- 11.10।।हरिः सर्वयज्ञभागहारित्वात्।इडोपहूतं गेहेषु हरे भागं क्रतुष्वहम्। वर्णो मे हरितः श्रेष्ठस्तस्माद्धरिरिति स्मृतः इति हि मोक्षधर्मे ()।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.10।। --,अनेकवक्त्रनयनम् अनेकानि वक्त्राणि नयनानि च यस्मिन् रूपे तत् अनेकवक्त्रनयनम्? अनेकाद्भुतदर्शनम् अनेकानि अद्भुतानि विस्मापकानि दर्शनानि यस्मिन् रूपे तत् अनेकाद्भुतदर्शनं रूपम्? तथा अनेकदिव्याभरणम् अनेकानि दिव्यानि आभरणानि यस्मिन् तत् अनेकदिव्याभरणम्? तथा दिव्यानेकोद्यतायुधं दिव्यानि अनेकानि अस्यादीनि उद्यतानि आयुधानि यस्मिन् तत् दिव्यानेकोद्यतायुधम्? दर्शयामास इति पूर्वेण संबन्धः।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.11 】
▸ Sanskrit Sloka: दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् | सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् ||
▸ Transliteration: divya-mālyāmbara-dharaṁ divya-gandhānulepanam | sarvāścarya-mayaṁ devam anantaṁ viśvatomukham ||
▸ Glossary: divya: divine; mālya: garlands; ambaradharaṁ: covered with the dresses; divya: divine; gandha: fragrance; anulepanam: smeared; sarva: all; aścaryamayaṁ: wonderful; devaṁ: shining; anantaṁ: endless; viśvatomukham: with faces on all sides
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.11 Arjuna saw this Universal form wearing divine garlands and clothing, anointed with celestial fragrances, wonderful, resplendent, endless, with faces on all sides.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.11।।जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं? अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं? अनेक दिव्य आभूषण हैं और हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं? जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं? जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन आदि लगा हुआ है? ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय? अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देव(अपने दिव्य स्वरूप) को भगवान्ने दिखाया।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.11।। दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुये और दिव्य गन्ध का लेपन किये हुये एवं समस्त प्रकार के आश्चर्यों से युक्त अनन्त? विश्वतोमुख (विराट् स्वरूप) परम देव (को अर्जुन ने देखा)।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.11 दिव्यमाल्याम्बरधरम् wearing divine garlands (necklaces) and apparel? दिव्यगन्धानुलेपनम् anointed with divine unguents? सर्वाश्चर्यमयम् the allwonderful? देवम् resplendent? अनन्तम् endless? विश्वतोमुखम् with faces on all sides.Commentary Visvatomukham With faces on all sides? as He is the Self of all beings.Devam God. Also means resplendent.Anantam Endless. He Who is free from the three kinds of limitations? viz.? DesaKalaVastuPariccheda (limitations of space? time? and thing respectively) is Anantam. He is Brahman. This philosophical concept is explained below.The pot is here. This is spacelimitatio. The pot is now here. This is timelimitation. The pot is not a cloth. This is thing(material) limitation. There is saffron in Kashmir only. This is limitation of space and thing. You can have apples only in September. This is limitation of time and thing. But Brahman is everywhere? as It is allpervading. It exists
Chapter 11 (Part 4)
in the past? the present and the future. It dwells in all parts. Hence It is beyond these three limitations. It is therefore endless.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.11. That wears heavenly garlands and garments; has the unguent of heavenly sandal paste; it is all wonderful, shining (or godly), infinite; and it has faces in all directions.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.11 Crowned with heavenly garlands, clothed in shining garments, anointed with divine unctions, He showed Himself as the Resplendent One, Marvellous, Boundless, Omnipresent.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.11 Wearing celestial garlands and raiments, anointed with divine perfumes, full of all wonders, resplendent, boundless and facing all directions.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.11 Wearing heavenly garlands and apparel, anointed with heavenly scents, abounding in all kinds of wonder, resplendent, infinite, and with faces everywhere.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.11 Wearing divine garlands (necklaces) and apparel, anointed with divine unguents, the all-wonderful, resplendent (Being) endless with faces on all sides.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.11 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.10 - 11.11 'Divyam' means resplendent. 'Anantam' (boundless) means that form is not limited by time and space because of its being the foundation of the entire universe in the past, present and future. 'Visvatomukham' means facing in all directions. This form is adorned with divine raiments, perfumes, garlands, ornaments and weapons appropriate to it.
He explains the same resplendence expressed by the term 'Divyam':
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.11 Divya-malya-ambara-dharam, wearing heavenly garlands and apparel-the God wearing celestial flowers and clothings; divya-gandha-anulepanam, anointed with heavenly scents; sarva-ascaryamayam, abounding in all kinds of wonder; devam, resplendent; anantam, infinite, boundless; and visvato-mukham, with faces everywhere-He being the Self of all beings. 'He showed (to Arjuna)', or 'Arjuna saw', is to be supplied. An illustration is once more being given of the effulgence of the Cosmic form of the Lord:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.11।। जब कोई चित्रकार अपने कलात्मक विचार को रंगों के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयत्न करता है? तो वह प्रारम्भ में एक पट्ट पर अपने विषयवस्तु की अस्पष्ट रूपरेखा खींचता है। तत्पश्चात्? एकएक इंच में वह रंगों को भर कर चित्र को और अधिक स्पष्ट करता जाता है। अन्त में वह चित्र उस चित्रकार के सन्देश का गीत गाते हुये प्रतीत होता है। इसी प्रकार? साहित्य के कुशल चित्रकार व्यासजी के द्वारा चित्रित इस शब्दचित्र का यह श्लोक संजय के शब्दों में भगवान् के विश्वरूप की रूपरेखा खींचता है।संजय के समक्ष जो दृश्य प्रस्तुत हुआ है? वह सामान्य बुद्धि के पुरुष के द्वारा सरलता से ग्रहण करने योग्य कदापि नहीं कहा जा सकता। इस वैभवपूर्ण एवं शक्तिशाली दृश्य को देखकर सामान्य पुरुष तो भय और विस्मय से भौचक्का ही रह जायेगा। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कोई मन के द्वारा कल्पना किया जाने योग्य विषय नहीं है और न ही बुद्धि उसको ग्रहण कर सकती है। इसलिए? जब गीतोपदेश के मध्य यह दृश्य उपस्थित हो जाता है? तब संजय भी वर्णन करते हुए कुछ हकलाने लगता है।दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए? दिव्य गन्ध का लेपन किये हुए? सर्वाश्चर्यमय? विश्वतोमुख भगवान् इत्यादि शब्द चित्रकार के उन वक्र चिह्नों के प्रतीक हैं जिनके लगाने पर विराट् रूप का चित्र उसकी रूपरेखा में पूर्ण होता है।संजय आगे वर्णन करता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.11।।उक्तरुपवन्तं भगवन्तं विशिनष्टि। दिव्यानि पुष्पाणि वस्त्राणि ध्रियन्ते येन तं दिव्यगन्धस्यानुलेपनं यस्य तं सर्वाश्चर्यप्रायं देवमनन्तं सर्वभूतात्मकत्वात्सर्वतोमुखं दर्शयामासार्जुनो ददर्शेत्यध्याहाहो वा। अत्र यद्यप्येतानि रुपविशेषणानि प्रतिभान्ति तथापि देवशब्दस्येश्वरवाचकस्य विशेष्यत्वभिप्रेत्याचार्यैरित्थं व्याख्यातम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.11।।दिव्येति। दिव्यानि माल्यानि पुष्पमयानि रत्नमयानि च तथा दिव्यान्यम्बराणि वस्त्राणि च ध्रियन्ते येन तद्दिव्यमाल्याम्बरधरं। दिव्यो गन्धोऽस्येति दिव्यगन्धस्तदनुलेपनं यस्य तत्। सर्वाश्चर्यमयमनेकाद्भुतप्रचुरं देवं द्योतनात्मकं अनन्तमपरिच्छिन्नं विश्वतः सर्वतो मुखानि यस्मिन् तद्रूपं दर्शयामासेति पूर्वेण संबन्धः। अर्जुनो ददर्शेत्यध्याहारो वा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.11।।विश्वतोमुखमिति पूर्वोक्तस्यएकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् इत्यस्यायं परामर्शः। अनन्तं सर्वतः परिच्छेदरहितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.11।।दिव्यानि क्रीडोपयुक्तानि माल्यानि अम्बराणि बिभर्तीति तथा। दिव्यः क्रीडोद्भूतो गन्धो यस्य तादृशमनुलेपनं यस्य तत्। सर्वाश्चर्यमयं दुर्वितर्क्यं देवं सर्वपूज्यम्? अनन्तमपरिच्छन्नम् व्यापकम्। विश्वतोमुखं सर्वं पश्यन्तं सर्वसन्मुखम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.11।।किंच -- दिव्येति। दिव्यानि माल्याम्बराणि च धारयन्तीति तथा? दिव्यो गन्धो यस्य तादृशमनुलेपनं यस्य तत्? सर्वाश्चर्यमयमनेकाश्चर्यप्रायम्? देवं द्योतनात्मकम्? अनन्तमपरिच्छिन्नम्? विश्वतः सर्वतो मुखानि यस्मिंस्तत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.10 -- 11.11।।तच्च कीदृशमिति तच्छृणु -- अनेकवक्त्रनयनं इत्यारभ्यविश्वतोमुखं इत्यन्तं रूपविशेषणानि। इदं च महाकालपुरुषरूपवद्दर्शितं मर्यादामार्गपरैरुपास्यं सर्वतः पाणिपादं चालौकिकमेतत्समष्टिभूतपुरुषस्वरूपभूतं कूटस्थं सर्वकारणकारणं निर्गुणभूतमित्यवसेयम्। दिव्यमिति स्पष्टार्थः। अम्बरं छन्दोमायारूपं किरीटाद्याभरणानि च पारमेष्ठ्यादिरूपाणि? आयुधानि पञ्चभूततत्त्वस्वरूपाणि? इत्येवंविधं विश्वरूपं विश्वतोमुखं निरुपमतेजस्कं स्वं दर्शितम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.11।।तथा --, जिस ईश्वरने दिव्य पुष्पमालाओं और वस्त्रोंको धारण कर रक्खा है? जिसने दिव्य गन्धका अनुलेपन कर रक्खा है? जो समस्त आश्चर्यमय दृश्योंसे युक्त है? जो सब भूतोंका आत्मा होनेके कारण सब ओर मुखवाला है तथा जिसका अन्त नहीं है ऐसा अनन्त और दिव्य विराट्रूप भगवान्ने अर्जुनको दिखलाया? इस प्रकार पूर्वश्लोकसे अन्वय कर लेना चाहिये अथवा अर्जुनने ऐसा रूप देखा इस प्रकार अध्याहार कर लेना चाहिये।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.11।। व्याख्या -- अनेकवक्त्रनयनम् -- विराट्रूपसे प्रकट हुए भगवान्के जितने मुख और नेत्र दीख रहे हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं। विराट्रूपमें जितने प्राणी दीख रहे हैं? उनके मुख? नेत्र? हाथ? पैर आदि सबकेसब अङ्ग विराट्रूप भगवान्के हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही विराट्रूपसे प्रकट हुए हैं।अनेकाद्भुतदर्शनम् -- भगवान्के विराट्रूपमें जितने रूप दीखते हैं? जितनी आकृतियाँ दीखती हैं? जितने रंग दीखते हैं? जितनी उनकी विचित्र रूपसे बनावट दीखती है? वह सबकीसब अद्भुत दीख रही है।अनेकदिव्याभरणम् -- विराट्रूपमें दीखनेवाले अनेक रूपोंके हाथोंमें? पैरोंमें? कानोंमें? नाकोंमें? और गलोंमें जितने गहने हैं? आभूषण हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं। कारण कि भगवान् स्वयं ही गहनोंके रूपमें प्रकट हुए हैं।दिव्यानेकोद्यतायुधम् -- विराट्रूप भगवान्ने अपने हाथोंमें चक्र? गदा? धनुष? बाण? परिघ आदि अनेक प्रकारके जो आयुध (अस्त्रशस्त्र) उठा रखे हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं।दिव्यमाल्याम्बरधरम् -- विराट्रूप भगवान्ने गलेमें फूलोंकी? सोनेकी? चाँदीकी? मोतियोंकी? रत्नोंकी? गुञ्जाओं,आदिकी अनेक प्रकारकी मालाएँ धारण कर रखी हैं। वे सभी दिव्य हैं। उन्होंने अपने शरीरोंपर लाल? पीले? हरे? सफेद? कपिश आदि अनेक रंगोंके वस्त्र पहन रखे हैं? जो सभी दिव्य हैं।दिव्यगन्धानुलेपनम् -- विराट्रूप भगवान्ने ललाटपर कस्तूरी? चन्दन? कुंकुम आदि गन्धके जितने तिलक किये हैं तथा शरीरपर जितने लेप किये हैं? वे सबकेसब दिव्य हैं।सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम् -- इस प्रकार देखते ही चकित कर देनेवाले? अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखहीमुखवाले अपने परम ऐश्वर्यमय रूपको भगवान्ने अर्जुनको दिखाया।जैसे? कोई व्यक्ति दूर बैठे ही अपने मनसे चिन्तन करता है कि मैं हरिद्वारमें हूँ तथा गङ्गाजीमें स्नान कर रहा हूँ? तो उस समय उसको गङ्गाजी? पुल? घाटपर खड़े स्त्रीपुरुष आदि दीखने लगते हैं तथा मैं गङ्गाजीमें स्नान कर रहा हूँ -- ऐसा भी दीखने लगता है। वास्तवमें वहाँ न हरिद्वार है और न गङ्गाजी हैं परन्तु उसका मन ही उन सब रूपोंमें बना हुआ उसको दीखता है। ऐसे ही एक भगवान् ही अनेक रूपोंमें? उन रूपोंमें पहने हुए गहनोंके रूपमें? अनेक प्रकारके आयुधोंके रूपमें? अनेक प्रकारकी मालाओंके रूपमें? अनेक प्रकारके वस्त्रोंके रूपमें प्रकट हुए हैं। इसलिये भगवान्के विराट्रूपमें सब कुछ दिव्य है।श्रीमद्भागवतमें आता है कि जब ब्रह्माजी बछड़ों और ग्वालबालोंको चुराकर ले गये? तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं ही बछड़े और ग्वालबाल बन गये। बछड़े और ग्वालबाल ही नहीं? प्रत्युत उनके बेंत? सींग? बाँसुरी? वस्त्र? आभूषण आदि भी भगवान् स्वयं ही बन गये (श्रीमद्भा0 10। 13। 19)। सम्बन्ध -- अब सञ्जय विश्वरूपके प्रकाशका वर्णन करते हैं।,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.11।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.11।।उक्तरूपवन्तं भगवन्तं प्रकारान्तरेण विशिनष्टि -- किञ्चेति।अर्जुन इति अध्याहारेऽपि पदसंघटनासंभवात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.11।।सर्वाश्चर्यमयमिति केनचित्प्राचुर्यार्थो मयड्व्याख्यातः। तदसत्? सर्वशब्देन गतार्थत्वादिति भावेनाह -- सर्वेति। मयटस्तादात्म्यार्थत्वे प्रमाणमुक्तमेव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.11।।सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यात्मकम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.11।। --,दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यानि माल्यानि पुष्पाणि अम्बराणि वस्त्राणि च ध्रियन्ते येन ईश्वरेण तं दिव्यमाल्याम्बरधरम्? दिव्यगन्धानुलेपनं दिव्यं गन्धानुलेपनं यस्य तं दिव्यगन्धानुलेपनम्? सर्वाश्चर्यमयं सर्वाश्चर्यप्रायं देवम् अनन्तं न अस्य अन्तः अस्ति इति अनन्तः तम्? विश्वतोमुखं सर्वतोमुखं सर्वभूतात्मभूतत्वात्? तं दर्शयामास। अर्जुनः ददर्श इति वा अध्याह्रियते।।या पुनर्भगवतः विश्वरूपस्य भाः? तस्या उपमा उच्यते --,
───────────────────
【 Verse 11.12 】
▸ Sanskrit Sloka: दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता | यदि भा: सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मन: ||
▸ Transliteration: divi sūryasahasrasya bhaved yugapad utthitā | yadi bhāḥ sadṛśī sā syād bhāsastasya mahātmanaḥ ||
▸ Glossary: divi: in the sky; sūrya: sun; sahasrasya: of many thousands; bhaved: there were; yugapad: simultaneously; utthitā: present; yadi: if; bhāḥ: splendor; sadṛśī: like; sā: that; syād: may be; bhāsaḥ: effulgence; tasya: there is; mahātmanaḥ: of the great Lord
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.12 If the splendor of a thousand suns were to blaze all together in the sky, it would be like the splendor of that mighty Being.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.12।।अगर आकाशमें एक साथ हजारों सूर्य उदित हो जायँ? तो भी उन सबका प्रकाश मिलकर उस महात्मा(विराट्रूप परमात्मा) के प्रकाशके समान शायद ही हो।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.12।। आकाश में सहस्र सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश होगा? वह उस (विश्वरूप) परमात्मा के प्रकाश के सदृश होगा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.12 दिवि in the sky? सूर्यसहस्रस्य of a thousand suns? भवेत् were? युगपत् at once (simultaneously)? उत्थिता arisen? यदि if? भाः splendour? सदृशी like? सा that? स्यात् would be? भासः splendour? तस्य of that? महात्मनः of the mighty Being (great soul).Commentary Divi here means in the Antariksha or the sky.Mahatma here refers to the great Soul or the mighty Being? the Cosmic Form.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.12. If the splendour of a thousand suns were to burst forth at once in the sky, would that be eal to the splendour of that Mighty Self ?
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.12 Could a thousand suns blaze forth together it would be but a faint reflection of the radiance of the Lord God.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.12 If a thousand suns were to rise at once in the sky, the resulting splendour may be like the splendour of that mighty One.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.12 Should the effulgence of a thousand suns blaze forth simultaneously in the sky, that might be similar to the radiance of that exalted One.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.12 If the splendour of a thousand suns were to blaze out at once (simultaneously) in the sky, that would be the splendour of that mighty Being (great Soul).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.12 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.12 This is for illustrating that His splendour is infinite. The meaning is that it is of the nature of inexhaustible radiance.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.12 Should the bhah, effulgence; surya-sahasrasya, of a thousand suns; utthita bhavet, blaze forth; yugapat, simultaneously; divi, in the sky, or in heaven which is the third as counted (from this earth);sa, that; yadi syat, might be-or it might not be-; sadrsi, similar; to the bhasah, radiance; tasya, of that; mahat-manah, exalted One, the Cosmic Person Himself. The idea is that the brillinace of the Cosmic Person surely excels even this! Further,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.12।। अन्ध राजा धृतराष्ट्र को शीघ्रता में विश्वरूप की रूपरेखा का वर्णन करने के पश्चात्? अब संजय उस विराट् पुरुष की महिमा का वर्णन करता है। अपने विराट् रूप में भगवान् अपने ही दिव्य प्रकाश से चमक रहे थे और उनका यह तेजस्वी वैभव नेत्रों को चकाचौंध कर रहा था और सम्भवत? इस एक और कारण से संजय पूर्व के दो श्लोकों में अधिक विस्तृत जानकारी नहीं दे पाया। भगवान् के इस प्रकाश का वर्णन करने के लिए संजय? एक विचित्र किन्तु प्रभावशाली उपमा यहाँ देता है।विराट् पुरुष के उस गौरवमय पुरुष का तेज ऐसा था? मानो? आकाश में सहस्र सूर्य एक साथ प्रकाशित हो रहे हों। उपनिषदों में भी आत्मा का वर्णन कुछ इसी प्रकार किया गया है? परन्तु? यह स्वीकार करना पड़ेगा कि संजय के मुख से? और विशेषकर जब वह भगवान् श्रीकृष्ण के ईश्वरीय रूप का वर्णन कर रहा है? इस उपमा को विशेष ही आकर्षण और गौरव प्राप्त होता है।और अधिक विवरण देकर इस दृश्य को और अधिक सुन्दर बनाते हुए संजय कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.12।।तत्र दृष्टान्ताकाङ्क्षयामाह। दिवि अन्तरिक्षे स्वर्गे वा सूर्याणआं सहस्त्रस्य युगपदुत्थितस्य युगपदुत्थिता भा यदि भवेत् सा तस्य महात्मनो विश्वरुपस्य भासः दीप्तेः सदृशी तुल्या स्यात् यदि वा न स्यादिति विश्वरुपस्य भा अतिरित्यत इत्याशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.12।।देवमित्युक्तं विवृणोति -- दिवीति। दिवि अन्तरिक्षे सूर्याणां सहस्रस्य अपरिमितसूर्यसमूहस्य युगपदुदितस्य युगपदुत्थिता भाः प्रभा यदि भवेत् तदा सा तस्य महात्मनो विश्वरूपस्य भासो दीप्तेः सदृशी तुल्या यदि स्याद्यदि वा न स्यात् ततोपि नूनं विश्वरूपस्यैव भा अतिरिच्येतेत्यहं मन्ये। अन्या तूपमा नास्त्येवेत्यर्थः। अत्राविद्यमानाध्यवसायात्तदभावेनोपमाभावपरादभूतोपमारूपेयमतिशयोक्तिरुत्प्रेक्षां व्यञ्जती सर्वथा निरुपमत्वमेव व्यनक्ति।उभौ यदि व्योम्नि पृथक्प्रवाहौ इत्यादिवत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.12।।दिवि अन्तरिक्षे। भाः दीप्तिः। भासः दीप्तेः। अभूतोपमेयम्। निरुपमतामेव तस्य दीप्तेर्दर्शयतिउभौ यदि व्योम्नि पृथक्प्रवाहौ इत्यादिवत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.12।।तस्य स्वरूपस्याऽप्रमेयं तेजस्स्वरूपमाह -- दिवीति। दिवि स्वर्गे सूर्यसहस्रस्य युगपत् एकदैव उदितस्य युगपदेव उत्थिता भाः प्रभा यदि भवेत् सा तस्य महात्मनः पुरुषोत्तमस्य अनेकात्मरूपस्य भासः सदृशी स्यात्। किन्तु न स्यादेवेति काकूक्तिः। एतादृशं स्वरूपम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.12।। विश्वरूपदीप्तेर्निरुपमत्वमाह -- दिवीति। दिव्याकाशे सूर्यसहस्रस्य युगपदुत्थितस्य यदि युगपदुत्थिता भाः प्रभा भवेत् तर्हि सा तदा महात्मनो विश्वरूपस्य भासः प्रभायाः कथंचित्सृदशी स्यात्। नान्योपमास्तीत्यर्थः। तथाभूतं रूपं दर्शयामासेति पूर्वेणान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.12।।एवं सञ्जयो दर्शनं रूपं वर्णयित्वा तस्याऽलौकिकत्वमभूतोपमावर्णनेनाह -- दिवीत्यादि। एवमभूतोपमया लोकविलक्षणत्वमुक्तम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.12।।भगवान्के विराट्रूपकी जो प्रभा -- प्रकाश है? उसकी उपमा कहते हैं --, द्युलोकमें अर्थात् आकाशमें या तीसरे स्वर्गलोकमें एक साथ उदय हुए हजारों सूर्योंका जो एक साथ उत्पन्न हुआ प्रकाश हो? वह प्रकाश उस महात्मन् -- विश्वरूपके प्रकाशके सदृश कदाचित् हो तो हो? अथवा सम्भव है कि न भी हो अर्थात् उससे भी विश्वरूपका प्रकाश ही अधिक हो सकता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.12।। व्याख्या -- दिवि सूर्यसहस्रस्य ৷৷. तस्य महात्मनः -- जैसे आकाशमें हजारों तारे एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश एक चन्द्रमाके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता? और हजारों चन्द्रमाओंका मिला हुआ प्रकाश एक सूर्यके प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता? ऐसे ही आकाशमें हजारों सूर्य एक साथ उदित होनेपर भी उन सबका मिला हुआ प्रकाश विराट् भगवान्के प्रकाशके सदृश नहीं हो सकता। तात्पर्य यह हुआ कि हजारों सूर्योंका प्रकाश भी विराट् भगवान्के प्रकाशका उपमेय नहीं हो सकता। इस प्रकर जब हजारों सूर्योंके प्रकाशको उपमेय बनानेमें भी दिव्यदृष्टिवाले सञ्जयको संकोच होता है? तब वह प्रकाश विराट्रूप भगवान्के प्रकाशका उपमान हो ही कैसे सकता है कारण कि सूर्यका प्रकाश भौतिक है? जब कि विराट् भगवान्का प्रकाश दिव्य है। भौतिक प्रकाश कितना ही बड़ा क्यों न हो? दिव्य प्रकाशके सामने वह तुच्छ ही है। भौतिक प्रकाश और दिव्य प्रकाशकी जाति अलगअलग होनेसे उनकी आपसमें तुलना नहीं की जा सकती। हाँ? अङ्गुलिनिर्देशकी तरह भौतिक प्रकाशसे दिव्य प्रकाशका संकेत किया जा सकता है। यहाँ सञ्जय भी हजारों सूर्योंके भौतिक प्रकाशकी कल्पना करके विराट्रूप भगवान्के प्रकाश(तेज) का लक्ष्य कराते हैं। सम्बन्ध -- पीछेके श्लोकोंमें विश्वरूप भगवान्के दिव्यरूप? अवयव और तेजका वर्णन करके अब सञ्जय अर्जुनद्वारा विश्वरूपका दर्शन करनेकी बात कहते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.12।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.12।।ननु प्रकृष्टस्य भगवतो रूपस्य दीप्तिरस्ति न वा? न चेत्काष्ठादिसाम्यं? यद्यस्ति कीदृशी सेत्याशङ्क्याह -- या पुनरिति। सा यदि स्यात्तद्भासः सदृशी सेति योजना। असंभाविताभ्युपगमार्थो यदिशब्दः। स्याच्छब्दो निश्चयार्थः। सा कथंचित्सदृशी संभवति ननु भवत्येवेति विवक्षित्वाह -- यदि वेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.12।।दिवि सूर्यसहस्रस्य इति विश्वरूपस्य सहस्रसूर्योपमप्रभत्वमुच्यते तत्र सहस्रशब्दो दशशतवाचीति प्रतीतिनिरासार्थमाह -- सहस्रेति। अनन्तसूर्योपमप्रभत्वमपि भगवतो न वास्तवं? निरुपमत्वात् किं तर्हि इत्यत आह -- तदपीति। प्रत्यायनार्थं बुद्धिप्रवेशनार्थमेवोच्यते। यथा भगवतो दाशरथेः पाकशासनोपमपराक्रमत्वमित्यर्थः। सहस्रशब्दस्य प्रसिद्धार्थपरित्यागः कुतः इत्यत आह -- तथा हीति। ततस्ततः सूर्यादेरपि। विलक्षण इति शेषः। कुतः श्रुत्या गीतावाक्यस्य बाधः इति चेत्? शतं सहस्रमिति अपरिमितनामानीति? गीतावाक्यस्य सावकाशत्वेन दौर्बल्यात्? श्रुतेर्निरवकाशत्वेन प्राबल्यात् इतश्च श्रुतेः प्राबल्यमित्याह -- महातात्पर्याच्चेति। समस्तागमानां महाप्रयोजनाय यद्भगवति महातात्पर्यं श्रुतेस्तदानुकूल्यात्? गीतावाक्यस्य तत्प्रातिकूल्यादित्यर्थः। कथं गीतावाक्यस्य तत्प्रातिकूल्यं इति चेत्? किं भगवतः परिमितप्रभत्वमेव वस्तुतः उतापरिमितप्रभस्याप्यत्र सहस्रसूर्योपमप्रभत्वमुच्यते नाद्यः -- सकलश्रुतिस्मृतीतिहासपुराणविरोधात्। द्वितीये त्वपरिमितस्य परिमाणोक्त्या किञ्चिदपि प्रयोजनं न सिध्यति। कुतो महत् इत्याह -- न चेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.12।।सहस्रशब्दोऽनन्तवाची। तदपि पाकशासनविक्रम इत्यादिवत्प्रत्यायनार्थमेव। तथा हि ऋग्वेदखिलेषु -- अनन्तशक्तिः परमोऽनन्तवीर्यः सोऽनन्ततेजाश्च ततस्ततोऽपि इति महातात्पर्याच्च प्राबल्यं? न च परिमाणोक्त्या किञ्चित्प्रयोजनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.12।। --,दिवि अन्तरिक्षे तृतीयस्यां वा दिवि सूर्याणां सहस्रं सूर्यसहस्रं तस्य युगपदुत्थितस्य सूर्यसहस्रस्य या युगपदुत्थिता भाः? सा यदि? सदृशी स्यात् तस्य महात्मनः विश्वरूपस्यैव भासः। यदि वा न स्यात्? ततः विश्वरूपस्यैव भाः अतिरिच्यते इत्यभिप्रायः।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.13 】
▸ Sanskrit Sloka: तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा | अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा ||
▸ Transliteration: tatraikasthaṁ jagat kṛtsnaṁ pravibhaktamanekadhā | apaśyad devadevasya śarīre pāṇḍavastadā ||
▸ Glossary: tatra: there; ekasthaṁ: in one place; jagat: universe; kṛtsnaṁ: completely; pravibhaktam: divided in; anekadhā: many groups; apaśyat: saw; devadevasya: God of gods; śarīre: in the body; pāṇḍavaḥ: Arjuna; tadā: at that time
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.13 There, in the body of the God of gods, the Pāṇḍava then saw the whole universe resting in one, with all its infinite parts.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.13।।उस समय अर्जुनने देवोंके देव भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत्को देखा।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.13।। पाण्डुपुत्र अर्जुन ने उस समय अनेक प्रकार से विभक्त हुए सम्पूर्ण जगत् को देवों के देव श्रीकृष्ण के शरीर में एक स्थान पर स्थित देखा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.13 तत्र there? एकस्थम् resting in one? जगत् the universe? कृत्स्नम् the whole? प्रविभक्तम् divided? अनेकधा in many groups? अपश्यत् saw? देवदेवस्य of the God of gods? शरीरे in the body? पाण्डवः son of Pandu? तदा then.Commentary Tatra There -- in the Cosmic Form.Anekadha Many groups -- gods? manes? men and other species of beings.Arjuna beheld all forms as the forms of the Lord? all heads as His heads? all eyes as His eyes? all hands as His hands? all feet as His feet? every part of every body as the limb of the Lords divine form. Wherever he looked he beheld nothing but the Lord. He got mystic divine knowledge.Sanjaya has given a truly graphic description of the Cosmic Form. Yet? it would be futile to grasp it with the finite mind. It is a transcendental vision? beyond the reach of the mind and senses. It has to be realised in Samadhi.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.13. At that time the son of Pandu beheld there in the body of the God-of-gods, the entire universe, united in one and [yet] divided into many groups.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.13 In that vision Arjuna saw the universe, with its manifold shapes, all embraced in One, its Supreme Lord.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.13 There (in that form) Arjuna beheld the whole universe, with its manifold divisions gathered together in one single spot within the body of the God of gods.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.13 At that time, Pandava saw there, in the body of the God of gods, the whole diversely differentiated Universe united in the one (Cosmic form).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.13 There, in the body of the God of gods, Arjuna then saw the whole universe resting in one, with its many groups.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.13 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.13 'There', in that unie and divine body of the God of gods - infinite in length and breadth, with innumerable hands, stomachs, faces and eyes, of immeasurable splendour, eipped with innumerable divine weapons, adorned with innumerable divine ornaments appropriate to itself and with divine garlands and raiments, fragrant with celestial perfumes and full of wonders , there Arjuna beheld with the appropriate divine eyes granted by the grace of the Lord, the 'entire universe' consisting of Prakrti (material Nature) and the selves, all remaining in 'one single spot,' namely, at one single point. He beheld 'the whole universe' with all its sub-divisions, differentiated into varied and wonderful classes of experiencing beings like Brahma, gods, animals, men, immovables etc., and the places, objects and means of experiences such as earth, ether, Rasatala, Atala, Vitala, Sutala etc. He beheld thus the entire universe as depicted in such texts as those starting with 'I am the origin of all; from Me proceed everything' (10.8), 'Indeed I shall tell you, O Arjuna, My glorious self-manifestations' (10.9), 'I am the Self, O Arjuna, dwelling in the hearts of all beings' (10.20), and 'Of Adityas, I am Visnu' (10.21), and ending with 'Nothing that moves or does not move exists without Me' (10.39), and 'I remain, with a single fraction of Myself sustaining this whole universe' (10.42).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.13 Tada, at that time; pandavah, Pandava, Arjuna; apasyat, saw; tatra, there, in that Cosmic form; sarire, in the body; devadevasya, of the God of gods, of Hari; krtsnam, the whole; jagat, Universe; anekadha, deversely; pravibhaktam, differentiated-into groups of gods, manes, human beings, and others; ekastham, united in the one (Consmic form).
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.13।। अर्जुन ने भगवान के उस ईश्वरीय रूप में देखा कि किस प्रकार सम्पूर्ण जगत् अपनी विविधता के साथ लाकर एक स्थान पर स्थित कर दिया गया था। हम देख चुके हैं कि विराट् पुरुष की संकल्पना ऐसे मन के द्वारा देखा गया दृश्य है जो देश और काल के माध्यम में कार्य नहीं कर रहा है अर्थात् देश और काल की कल्पना लोप हो चुकी है।अनेक को एक में देखने का जो दृश्य है? वह उतना इन्द्रियगोचर नहीं है जितना कि बुद्धिग्राह्य है। यह नहीं कि सम्पूर्ण विश्व संकुचित होकर भगवान् श्रीकृष्ण के देह परिमाण का हो गया है। यदि अर्जुन को जगत् के एकत्व का अपेक्षित बोध हो और यदि वह उस ज्ञान की दृष्टि से विश्व को देख सके? तो यही पर्याप्त है।आधुनिक विज्ञान से भी इसके समान दृष्टांत उद्धृत किया जा सकता है। रसायनशास्त्र में द्रव्यों का वर्गीकरण करके उनका अध्ययन किया जाता है। जगत् की रसायन वस्तुओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि जगत् में लगभग एक सौ तीन तत्व है। और अधिक सूक्ष्म अध्ययन से वैज्ञानिक लोग परमाणु तक पहँचे? अब उसका भी विभाजन करके पाया गया कि परमाणु भी इलेक्ट्रॉन? प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से बना है। परमाणु के इस स्वरूप से सुपरिचित वैज्ञानिक जब बहुविध जगत् की ओर देखता है? तब उसे यह जानना सरल होता है कि ये सभी पदार्थ परमाणुओं से बने हैं। इसी प्रकार? यहाँ जब अर्जुन को श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपाप्रसाद से यह विशेष ज्ञान्ा प्राप्त हुआ? तब वह भगवान् के शरीर में ही सम्पूर्ण विश्व को देखने में समर्थ हो गया।इस दृश्य को देखकर अर्जुन के शरीर और मन पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को संजय ने ध्यानपूर्वक देखा और उनका विवरण सुनाते हुए वह कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.13।।न केवलं विश्वरुपधरं देवमर्जुनो दृष्टवानपि तु देवस्य देहे एकस्थं सर्वं जगद्देवपितृमनुष्यादिभेदैरनेकप्रकारेण प्रकर्षेण विभागयुक्तं पाण्डवोऽर्जुनो दृष्ठवान्। अहो भगवद्भक्तस्यार्जुनस्य पुतः पाण्डोर्भाग्यातिशयः ईश्वविमुख्स्य दुर्योधनस्य पितुस्तवाभाग्यातिशयश्चेति पाण्डवपदेन ध्वनितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.13।।इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरमिति भगवदाज्ञप्तमप्यनुभूतवानर्जुन इत्याह -- तत्रेति। एकस्थमेकत्र स्थितं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा देवपितृमनुष्यादिनानाप्रकारैः अपश्यद्देवदेवस्य भगवतः तत्र विश्वरूपे शरीरे पाण्डवोऽर्जुनस्तदा विश्वरूपाश्चर्यदर्शनदशायाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.13।।इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्येति यत्प्राक् भगवतोक्तं तदप्यपश्यदित्याह -- तत्रेति। अनेकधा प्रविभक्तमित्येतद्वर्षासूत्थिततिंतिणीबीजे सूक्ष्मरूपेण तरुर्दृश्यते तद्वन्माभूदिति दर्शयितुं सावकाशं अनेकधा विभागयुक्तं विविक्तमपश्यत्। एकस्थमेकावयवस्थम्। अयमर्थः -- यदा भगवतश्चतुर्भुजं रूपं चिन्त्यते तत्र च चेतसि लब्धपदे सति क्रमशस्तदीयावयवांस्त्यक्त्वा मुखे स्मिते वा पदनखे वा चित्तं ध्रियते। तत्रापि लब्धपदे तस्मिंस्तदपि त्यक्त्वा विश्वरूपमारोहति। दिव्यं चक्षुरपि एवं सूक्ष्मतामापादितं मन एव।मनोऽस्य दैवं चक्षुः स एतेन दैवेन चक्षुषा मनसैतान्कामान्पश्यन्रमते इति श्रुतेः। कामान्विषयान् एतान्हार्दाकाशाख्यसगुणब्रह्मगतानिति श्रुतिपदयोरर्थः। यथोक्तं श्रीभागवतेतत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्यैकत्र धारयेत्। नान्यानि चिन्तयेद्भूयः सुस्मितं भावयेन्मुखम्। तत्र लब्धपदं चित्तमाकृष्य व्योम्नि धारयेत्। तच्च त्यक्त्वा मदारोहो न किञ्चिदपि चिन्तयेत् इति। तत्र मूर्तौ एकत्र अङ्गे। व्योम्नि कारणे। मदारोहो निर्विकल्पे ब्रह्मण्यारूढः। तदिदमुक्तं देवदेवस्य शरीरे कृत्स्नं जगदेकस्थं पाण्डवोऽपश्यदिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.13।।तत्र तस्मिन्नेव रूपे? एकस्थमेकत्र स्थितं कृत्स्नं सम्पूर्णं जगत्? अनेकधा प्रविभक्तं नानाप्रकारविभागयुक्तं दर्शयामासेति पूर्वेणैवान्वयः। यदा दर्शितं तदा देवदेवस्य पूज्यानामपि पूज्यस्य शरीरे पूर्वप्रतीयमानसूक्ष्मरूप एव पाण्डवः अर्जुनः अपश्यत् दृष्टवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.13।।ततः किं वृत्तमित्यपेक्षायामाह संजयः -- तत्रेति। अनेकधा प्रविभक्तं नानाविभागेनावस्थितं कृत्स्नं जगद्देवदेवस्य शरीरे तदवयवत्वेनैकत्रैव स्थितं तदा पाण्डवोऽर्जुनोऽपश्यत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.13।।ततः किं वृत्तं इत्यपेक्षायामाह सञ्जयः -- तत्रेति। अनेकधा योनिबीजाशयेन्द्रियाकृतिभेदेन प्रविभक्तं चेतनाचेतनात्मकं चतुर्दशलोकसहितं सर्वं जगत् देवदेवस्याक्षरैश्वर्यस्य पुरुषोत्तमस्य शरीरभूते स्वरूपे मृत्स्नाभक्षणप्रसङ्गेश्रीयशोदावत्तदेकस्थं तदवयवैकदेशत्थं पाण्डवो ददर्श कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षत् [कठो.4।1] इति श्रुतेर्दर्शनं श्रुतिसिद्धम्। न हि माहात्म्यदर्शनं विना भक्त्या भगवदाश्रयणदार्ढ्यं भवतीति दर्शयामास हरिस्ततस्तदनुग्रहेणैव ददर्श पार्थ इत्यंशे पुष्टिः। श्रीयशोदायां तु दर्शितस्वैश्वर्यजन्यमाहात्म्यज्ञानस्य वैष्णव्या स्वशक्त्या तिरोधानमेव कृतं प्रेमभावदार्ढ्याय तत्र मोक्षाद्यनुपयोगाय चेति शुद्धपुष्टिमाहात्म्यम्। अत्र तु न तथा इति मर्यादापुष्ट्यधिकृताः पार्थाः इत्युक्तिः समञ्जसैव। विशेषस्तु भाष्ये द्रष्टव्यः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.13।। तथा --, उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने देव? पितृ और मनुष्यादि भेदसे अनेक प्रकार विभक्त हुए समस्त जगत्को उस विश्वरूप देवाधिदेव हरिके शरीरमें ही एकत्र स्थित देखा।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.13।। व्याख्या -- तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा -- अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त अर्थात् ये देवता हैं? ये मनुष्य हैं? ये पशुपक्षी हैं? यह पृथ्वी है? ये समुद्र हैं? यह आकाश है? ये नक्षत्र हैं? आदिआदि विभागोंके सहित (संकुचित नहीं? प्रत्युत विस्तारसहित) सम्पूर्ण चराचर जगत्को भगवान्के शरीरके भी एक देशमें अर्जुनने भगवान्के दिये हुए दिव्यचक्षुओंसे प्रत्यक्ष देखा। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् श्रीकृष्णके छोटेसे शरीरके भी एक अंशमें चरअचर? स्थावरजङ्गमसहित सम्पूर्ण संसार है। वह संसार भी अनेक ब्रह्माण्डोंके रूपमें? अनेक देवताओंके लोकोंके रूपमें? अनेक व्यक्तियों और पदार्थोंके रूपमें विभक्त और विस्तृत है -- इस प्रकार अर्जुनने स्पष्ट रूपसे देखा (टिप्पणी प0 582)। अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा -- तदा का तात्पर्य है कि जिस समय भगवान्ने दिव्यदृष्टि देकर अपना विराट्रूप दिखाया? उसी समय उसको अर्जुनने देखा। अपश्यत् का तात्पर्य है कि जैसा रूप भगवान्ने दिखाया? वैसा ही अर्जुनने देखा। सञ्जय पहले भगवान्के जैसे रूपका वर्णन करके आये हैं? वैसा ही रूप अर्जुनने भी देखा।जैसे मनुष्यलोकसे देवलोक बहुत विलक्षण है? ऐसे ही देवलोकसे भी भगवान् अनन्तगुना विलक्षण हैं क्योंकि देवलोक आदि सबकेसब लोक प्राकृत हैं और भगवान् प्रकृतिसे अतीत हैं। इसलिये भगवान् देवदेव अर्थात् देवताओंके भी देवता (मालिक) हैं। सम्बन्ध -- भगवान्के अलौकिक विराट्रूपको देखनेके बाद अर्जुनकी क्या दशा हुई -- इसका वर्णन सञ्जय आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.13।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.13।।न केवलमुक्तमेवार्जुनो दृष्टवान्किंतु तत्रैव विश्वरूपे सर्वं जगदेकस्मिन्नवस्थितमनुभूतवानित्याह -- किञ्चेति। तदा विश्वरूपस्य भगवद्रूपस्य दर्शनदशायामित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.13।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.13।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.13।। --,तत्र तस्मिन् विश्वरूपे एकस्मिन् स्थितम् एकस्थं जगत् कृत्स्नं प्रविभक्तम् अनेकधा देवपितृमनुष्यादिभेदैः अपश्यत् दृष्टवान् देवदेवस्य हरेः शरीरे पाण्डवः अर्जुनः तदा।।
───────────────────
【 Verse 11.14 】
▸ Sanskrit Sloka: तत: स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जय: | प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत ||
▸ Transliteration: tataḥ sa vismayāviṣṭo hṛṣṭaromā dhanañjayaḥ | praṇamya śirasā devaṁ kṛtāñjalirabhāṣata ||
▸ Glossary: tataḥ: thereafter; saḥ: he; vismayāviṣṭaḥ: being overwhelmed with wonder; hṛṣṭaromā: with his bodily hair standing on end; dhanañjayaḥ: Arjuna; praṇamya: offering obeisances; śirasā: with the head; devaṁ: to God; kṛtāñjaliḥ: with folded palms; abhāṣata: says
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.14 Dhanañjaya, filled with wonder, his hair standing on end, then bowed his head to the God and spoke with joined palms.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.14।।भगवान्के विश्वरूपको देखकर अर्जुन बहुत चकित हुए और आश्चर्यके कारण उनका शरीर रोमाञ्चित हो गया। वे हाथ जोड़कर विश्वरूप देवको मस्तकसे प्रणाम करके बोले।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.14।। उसके उपरान्त वह आश्चर्यचकित हुआ हर्षित रोमों वाला (जिसे रोमांच का अनुभव हो रहा हो) धनंजय अर्जुन विश्वरूप देव को (श्रद्धा भक्ति सहित) शिर से प्रणाम करके हाथ जोड़कर बोला।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.14 ततः then? सः he? विस्मयाविष्टः filled with wonder? हृष्टरोमा with hair standing on end? धनञ्जयः Arjuna? प्रणम्य having prostrated? शिरसा with (his) head? देवम् the God? कृताञ्जलिः with joined palms? अभाषत spoke.Commentary Tatah Then? having seen the Cosmic Form.Arjuna joined his palms in order to do prostration to the Cosmic Form. The great hero had attained true humility which the bowed head and joined palms represented? and which is the essential ingredient of devotion.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.14. Then, possessed by amazement and with his bodily hair thrilled, Dhananjaya (Arjuna) with his head bowed to the God and with folded palms spoke [to Him].
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.14 Thereupon Arjuna, dumb with awe, his hair on end, his head bowed, his hands clasped in salutation, addressed the Lord thus:
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.14 Then he, Arjuna, overcome with amazement, his hairs standing erect, bowed his head to the Lord, and with folded hands spoke.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.14 Then, filled with wonder, with hairs standing on end, he, Dhananjaya, (Arjuna), bowing down with his head to the Lord, said with folded hands:
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.14 Then, Arjuna, filled with wonder and with his hair standing on end, bowed down his head to the God and spoke with joined palms.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.14 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.14 Then Arjuna became overcome with amazement on seeing the Lord, at a point of whose being this wonderful universe in its entirely stands supported, who enables all things to act, and who is the possesor of a host of auspicious attributes like omniscience. With his hairs standing erect, he bowed down like a stick, and with folded hands, he spoke thus:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda:
11.14
Tatah, then, having seen Him; sah, he, Dhananjaya; became vismaya-avistah, filled with wonder; and hrsta-roma, had his hairs standing on end. Becoming filled with humility, pranamya, bowing down, bowing down fully; [With abundant respect and devotion.] sirasa, with his head; devam, to the Lord, who had assumed the Cosmic form; abhasata, he said; krta-anjalih, with folded hands, with palms joined in salutation:
How? 'I am seeing the Cosmic form that has been revealed by You'-thus expressing his own experience,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.14।। इस सर्वोत्कृष्ट भव्य दृश्य को देखकर अर्जुन के मन में विस्मय की भावना और शरीर पर हो रहे रोमांच स्पष्ट दिखाई दे रहे थे। यद्यपि संजय घटनास्थल से दूर है? फिर भी अपनी दिव्य दृष्टि से न केवल समस्त योद्धाओं के शरीर ही? वरन् उनकी मनस्थिति को भी जानने में सक्षम प्रतीत होता है। अर्जुन की विस्मय की भावना उसे उतनी ही स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रही है? जितने कि उसके रोमांच। शिर से प्रणाम करते हुये दोनों हाथ जोड़कर अर्जुन कुछ कहने के लिए अपना मुख खोलता है। अब तक अर्जुन कुछ नहीं बोला था? जो उसके कण्ठावरोध का स्पष्ट सूचक है। प्रथम बार जब उसने उस दृश्य को देखा? जो मधुरतापूर्वक साहस तोड़ने वाला प्रतीत होता था? तब भावावेश के कारण अर्जुन का कण्ठ अवरुद्ध हो गया था।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.14।।ततः किमकरोदित्यपेक्षायामाह। तत एकस्थकृत्स्त्रजगद्दर्शनानन्तरं सः प्रथितप्रभावो धनंजयोऽर्जुनो विस्मयाविष्टः। आश्यर्यबुद्धियुक्तः। तल्लिङ्गमाह। हृष्टानि पुलकितानि रोमाणि यस्य। पणभ्य प्रकर्षणोत्कटभक्त्या नमनं कृत्वा शिरसा देवं विश्वरुपधरं नमस्करार्थं संपुटीकृतहस्तः सन् उक्तवान्। विश्वरुपदर्शनात्पूर्वमपि खाण्डवदाहादिना प्रथितप्रभावो राजसूये गोग्रहे च राजभ्यो धनस्य भीष्मादिभ्यो गोधनस्य च हरणात् धनंजयोऽधुना पुनर्दृष्टविश्वरुप इति राज्याशां त्वं मा कुर्विति स धनंजय इति पदाभ्यां धनस्य भीष्मादिभ्यो गोधनस्य च हरणात् धनंजयोऽधुना पुनर्दृष्टविश्वरुप इति राज्याशां त्वं मा कुर्विति स धनंजय इति पदाभ्यां ध्वनितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.14।।एवमद्भुतदर्शनेऽप्यर्जुनो न बिभयांचकार? नापि नेत्रे संचचार? नापि संभ्रमात्कर्तव्यं विसस्मार? नापि तस्माद्देशादपससार? किंत्वतिधीरत्वात्तत्कालोचितमेव व्यवजहार महति चित्तक्षोभेपीत्याह -- तत इति। ततस्तद्दर्शनादनन्तरं विस्मयेनाद्भुतदर्शनप्रभवेनालौकिकचित्तचमत्कारविशेषेणाविष्टो व्याप्तः अतएव हृष्टरोमा पुलकितः सन् स प्रख्यातमहादेवसंग्रामादिप्रभावः धनंजयः युधिष्ठिरराजसूये उत्तरगोग्रहे च सर्वान्वीरान् जित्वा धनमाहृतवानिति प्रथितमहापराक्रमोऽतिवीरः साक्षादग्निरिति वा महातेजस्वित्वात् देवं तमेव विश्वरूपधरं नारायणं शिरसा भूमिलग्नेन प्रणम्य प्रकर्षेण भक्तिश्रद्धातिशयेन नत्वा नमस्कृत्य कृताञ्जलिः संपुटीकृतहस्तयुगः,सन्नभाषतोक्तवान्। अत्र विस्मयाख्यस्थायिभावस्यार्जुनगतस्यालम्बनविभावेन भगवता विश्वरूपेणोद्दीपनविभावेनासकृत्तद्दर्शनेनानुभावेन सात्त्विकरोमहर्षेण नमस्कारेणाञ्जलिकरणेन चाव्यभिचारिणा चानुभावाक्षिप्तेन वा धृतिमतिहर्षवितर्कादिना परिपोषात्सववासनानां श्रोतृ़णां तादृशश्चित्तचमत्कारोऽपि तद्भेदानध्यवसायात्परिपोषं गतः परमानन्दास्वादरूपेणाद्भुतरसो भवतीति सूचितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.14।।हृष्टरोमा रोमाञ्चितगात्रः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.14।।दर्शनानन्तरं किं कृतवानित्यत आह -- तत इति। ततस्तदनन्तरं स पूर्वोक्तः प्राप्तदिव्यदृष्टिः विस्मयाविष्टः। आश्चर्यरसनिमग्नः हृष्टरोमा उत्पुलकिताङ्गः अन्तरानन्दयुक्तः धनञ्जयः प्रादुर्भूतविभूतिरूपः शिरसा मस्तकेन देवं पूज्यं नमस्करणीयं प्रणम्य नमस्कृत्य कृताञ्जलिः विनीतः सन् अभाषत विज्ञप्तिं कृतवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.14।।एवं दृष्ट्वा किं कृतवानित्यत आह -- तत इति। ततो दर्शनानन्तरं विस्मयेनाविष्टो व्याप्तः सन्हृष्टान्युत्पुलकितानि रोमाणि यस्य स धनंजयो देवं तमेव शिरसा प्रणम्य कृताञ्जलिः संपुटीकृतहस्तो भूत्वाभाषत उक्तवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.14।।तत इति दर्शनानन्तरं धनञ्जयः अभाषत। स्पष्टमन्यत्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.14।।फिर? उसको देखकर वह धनंजय आश्चर्ययुक्त और प्रफुल्लित रोमवाला हो गया अर्थात् उसके रोंगटे खड़े हो गये? फिर वह विश्वरूपधारी परमात्मदेवको शिरसे प्रणाम करके अर्थात् नम्रतापूर्वक भली प्रकार नमस्कार करके पुनः नमस्कारके लिये हाथ जोड़कर बोला।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.14।। व्याख्या -- ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः -- अर्जुनने भगवान्के रूपके विषयमें जैसी कल्पना भी नहीं की थी? वैसा रूप देखकर उनको बड़ा आश्चर्य हुआ। भगवान्ने मेरेपर कृपा करके विलक्षण आध्यात्मिक बातें अपनी ओरसे बतायीं और अब कृपा करके मेरेको अपना विलक्षण रूप दिखा रहे हैं -- इस बातको लेकर अर्जुन प्रसन्नताके कारण रोमाञ्चित हो उठे।प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत -- भगवान्की विलक्षण कृपाको देखकर अर्जुनका ऐसा भाव उमड़ा कि मैं इसके बदलेमें क्या कृतज्ञता प्रकट करूँ मेरे पास कोई ऐसी वस्तु नहीं है? जो मैं इनके अर्पण करूँ। मैं तो केवल सिरसे प्रणाम ही कर सकता हूँ अर्थात् अपनेआपको अर्पित ही कर सकता हूँ। अतः अर्जुन हाथ जोड़कर और सिर झुकाकर प्रणाम करते हुए विश्वरूप भगवान्की स्तुति करने लगे। सम्बन्ध -- अर्जुन विराट्रूप भगवान्की जिस विलक्षणताको देखकर चकित हुए? उसका वर्णन आगेके तीन श्लोकोंमें करते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.14।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.14।।विश्वरूपधरस्य भगवतस्तस्मिन्नेकीभूतजगतश्चोक्तविशेषणस्य
Chapter 11 (Part 5)
दर्शनानन्तरं किमकरोदित्यपेक्षायामाह -- तत इति। आश्चर्यबुद्धिर्विस्मयः? रोम्णां हृष्टत्वं पुलकितत्वं? प्रकर्षो भक्तिश्रद्धयोरतिशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.14।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.14।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.14।। --,ततः तं दृष्ट्वा सः विस्मयेन आविष्टः विस्मयाविष्टः हृष्टानि रोमाणि यस्य सः अयं हृष्टरोमा च अभवत् धनंजयः। प्रणम्य प्रकर्षेण नमनं कृत्वा प्रह्वीभूतः सन् शिरसा देवं विश्वरूपधरं कृताञ्जलिः नमस्कारार्थं संपुटीकृतहस्तः सन् अभाषत उक्तवान्।।कथम् यत् त्वया दर्शितं विश्वरूपम्? तत् अहं पश्यामीति स्वानुभवमाविष्कुर्वन् अर्जुन उवाच --,अर्जुन उवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.15 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् | ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ- मृषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca paśyāmi devāṁstava deva dehe sarvāṁstathā bhūta-viśeṣa-saṅghān || brahmāṇam īśaṁ kamalāsana-sthaṁ ṛṣīṁś ca sarvān uragāṁśca divyān ||
▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna says; paśyāmi: I see; devān: all the gods; tava: Your; deva: O Lord; dehe: in the body; sarvān: all; tathā: also; bhūta: living entities; viśeṣa saṅghān: specifically assembled; brahmāṇam: Brahma; īśaṁ: Lord; ka- malāsanastham: sitting on the lotus flower; ṛṣīn: great sages; ca: also; sarvān: all; uragān: serpents; ca: also; divyān: divine
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.15 Arjuna says; O God, I see all the gods in Your body and many types of beings. Brahma, the Lord of creation seated on the lotus, all the sages and celestial serpents.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.15।।अर्जुन बोले -- हे देव मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण देवताओंको? प्राणियोंके विशेषविशेष समुदायोंको? कमलासनपर बैठे हुए ब्रह्माजीको? शङ्करजीको? सम्पूर्ण ऋषियोंको और सम्पूर्ण दिव्य सर्पोंको देख रहा हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.15।। अर्जुन ने कहा -- हे देव मैं आपके शरीर में समस्त देवों को तथा अनेक भूतविशेषों के समुदायों को और कमलासन पर स्थित सृष्टि के स्वामी ब्रह्माजी को? ऋषियों को और दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.15 पश्यामि (I) see? देवान् the gods? तव Thy? देव O God? देहे in the body? सर्वान् all? तथा also? भूतविशेषसङ्घान् hosts of various classes of beings? ब्रह्माणम् Brahma? ईशम् the Lord? कमलासनस्थम् seated on the lotus? ऋषीन् sages? च and? सर्वान् all? उरगान् serpents? च and? दिव्यान् divine.Commentary Arjuna describes his own experience of the Cosmic Form in this and the following verses? 15 to 31.Bhutaviseshasanghan Hosts of various classes of beings? both animate and inanimate. These numerous entities are in Thy Cosmic Form? like hairs on the human body.Brahma? the fourfaced? the Lord of all creatures? is seated in the centre of the earthlotus on the Meru which forms the thalamus as it were of the earthlotus.Sages? such as Vasishtha. Serpents? such as Vasuki.Moreover --
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.15. Arjuna said O God ! In Your body I behold all gods and also hosts of different kinds of beings-the Lord Brahma seated on the lotus-seat; and all the seers and all the glowing serpents.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.15 Arjuna said: O almighty God! I see in Thee the powers of Nature, the various creatures of the world, the Progenitor on his lotus throne, the Sages and the shining angels.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.15 Arjuna said I behold, O Lord, in Your body all the gods and all the diverse hosts of beings. Brahma, Siva (Isa) who is in Brahma, the seers and the lustrous snakes.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.15 Arjuna said O God, I see in Your body all the gods as also hosts of (various) classes of beings; Brahma the ruler, sitting on a lotus seat, and all the heavely sages and serpents.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.15 Arjuna said I see all the gods, O God, in Thy body, and (also) hosts of various classes of beings, Brahma, the Lord, seated on the lotus, all the sages and the celestial serpents.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.15 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.15 Arjuna said O Lord! I behold in Your body all gods and all classes of living beings as also Brahma, the four-faced ruler of the cosmic egg. So too Siva (Isa) who is seated in the lotus-seated Brahma, meaning that Siva abides by the directions of Brahma. So also all the seers of whom the divine seers are the foremost; and lustrous snakes like Vasuki, Taksaka etc.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.15 Deva, O God; pasyami, I see, perceive; tava dehe, in Your body; sarvan, all; the devan, gods; tatha, as also; bhuta-visesa-sanghan, hosts of (various) classes of beings, groups of moving and non-moving living things having different shapes; and besides, brahmanam, Brahma, with four faces; isam, the Ruler of creatures; kamalasana-stham, sitting on a lotus seat, i.e. sitting on Mount Meru which forms the pericarp of the lotus that is the earth; and sarvan, all; the divyan, heavenly; rsin, sages-Vasistha and others; and (the heavenly) uragan, serpents-Vasuki and others.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.15।। जब अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण को देव (प्रकाशस्वरूप) शब्द से सम्बोधित करता है? तब वह संजय की दी हुयी उपमा की ही पुष्टि करता है? जिसमें कहा गया था कि सहस्र सूर्यों के प्रकाश के समान विराट् पुरुष का तेज है। विश्वरूप में दृष्ट वस्तुओं को गिनाते हुये अर्जुन कहता है? मैं आपके शरीर में समस्त देवताओं और अनेक भूतविशेषों के समुदायों को देख रहा हूँ। इन सबका उल्लेख संजय भी पहले कर चुका है।दोनों के किये गये वर्णनों से ज्ञात होता है कि उस विराट् रूप में न केवल लौकिक वस्तुयें? वरन् अलौकिक दिव्य देवताओं को भी पहचाना जा सकता था। अर्जुन को उसमें ब्रह्मा? विष्णु महेश के भी दर्शन होते हैं। और इन सबके साथ अनेक ऋषिगण भी हैं।अर्जुन अनेक दिव्य सर्पों को भी देखता है। काव्य की यह एक शैली है कि प्राय श्रेष्ठ महान् कविजन सर्वोत्कृष्ठ का वर्णन करते समय अचानक किसी विद्रूप व उपहासास्पद के स्तर की वस्तुओं का वर्णन करने लगते हैं। इसका एकमात्र प्रयोजन यह होता है कि पाठकों को कुछ चौंकाकर उनका ध्यान विषय वस्तु की ओर आकर्षित किया जाय। इस विश्वरूप में ब्रह्माजी से लेकर सर्पों तक को प्रतिनिधित्व मिला है। वेदान्त का सिद्धान्त है कि जो पिण्ड में है? वही ब्रह्माण्ड में है? अथवा व्यष्टि ही समष्टि है। विश्व के महान् तत्त्वचिन्तकों ने इसी का वर्णन किया और अनुभव भी किया है। परन्तु इसके पूर्व किसी ने भी इस दार्शनिक सिद्धान्त का स्पष्ट एवं वस्तुनिष्ट प्रदर्शन नहीं किया था। इस कला के अग्रणी व्यासजी थे और अब तक इस कठिन कार्य में उनका अनुकरण करने का साहस किसी को नहीं हुआ है।अर्जुन? अब ऐसे रूप का वर्णन करता है जिसके विवरण से अत्यन्त साहसी पुरुष को भी अपना साहस खोते हुए अनुभव होगा
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.15।।स्वानुभवमाविष्कुर्वन्नर्जुन उवाच। हे देव? तव देहे देवानिन्द्रादीन्सर्वान्पश्यामि। तथा भूतविशेषाणां समूहान्पश्यामि। किंच ब्रह्माणं प्रजानां नियन्तरां पद्मासनस्थं ऋषींश्च वसिष्ठादीन् सर्वानुरगांश्च वासुकिप्रभृतीन् दिव्यान पश्यामीति सर्वत्र संबन्धनीयम्। देवादीनां भूतविशेषान्तत्वेऽपि तेषामुत्कर्षात्पृथगुपादानम्। ब्रह्मणो देवत्वेऽपि तज्जनकत्वात्पृथग्ग्रहणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.15।।यद्भगवता दर्शितं विश्वरूपं तद्भगवद्दत्तेन दिव्येन चक्षुषा सर्वलोकादृश्यमपि पश्याम्यहो मम भाग्यप्रकर्ष इति स्वानुभवमाविष्कुर्वन् अर्जुन उवाच -- पश्यामीति। पश्यामि चाक्षुषज्ञानविषयीकरोमि। हे देव? तव देहे विश्वरूपे देवान्वस्वादीन्सर्वान्। तथा भूतविशेषाणां स्थावराणां जङ्गमानां च नानासंस्थानानां संघान्समूहान्। तथा ब्रह्माणं चतुर्मुखमीशमीशितारं सर्वेषां कमलासनस्थं पृथिवीपद्ममध्ये मेरुकर्णिकासनस्थं? भगवन्नाभिकमलासनस्थमिति वा। तथा ऋषींश्च सर्वान्वसिष्ठादीन्ब्रह्मपुत्रान्। उरगांश्च दिव्यानप्राकृतान्वासुकिप्रभृतीन्पश्यामीति सर्वत्रान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.15।।देवानादित्यादीन्। भूतविशेषाश्चतुर्विधा जरायुजादयस्तेषां संघान्समूहान्। ब्रह्माणं चतुर्मुखम्। ईशमीशितारम्। कमलासनस्थमित्यनेन दूरदर्शनमुक्तम्। उरगान्पातालस्थाननन्तादीन्। दिव्यान्कैलासादौ स्थितान्वासुकिप्रमुखान्। एतेन व्यवहितदर्शनमुक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.15।।तद्वाक्यमेवाह -- पश्यामीति सप्तदशभिः। हे देव पूज्य तव देहे उपचितस्वरूपे देवान् इन्द्रादीन् क्री़डामयान्? तथा क्रीडात्मकानेव सर्वान् भूतविशेषाणां चतुर्विधानां सङ्घान् समूहान्। दिव्यान् क्रीडार्थप्रकटितान्? ऋषीन् नारदादीन्? पुनस्तामसान् उरगान् शेषादीन्? तन्मूलभूतं कमलासनस्थं नाभिपद्मस्थं? ब्रह्माणम्? ईशं महादेवम्? एवमेतान् सर्वान् पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.15।। भाषणमेवाह -- पश्यामीति सप्तदशभिः। हे देव? तव देहे? देवानादित्यादीन्पश्यामि। तथा सर्वान्भूतविशेषाणां जरायुजाण्डजादीनां सङ्घांश्च? तथा दिव्यानृषीन्वसिष्ठादीन्? उरगांश्च तक्षकादीन्? तथा देवानामीशं स्वामिनं ब्रह्माणं च। कथंभूतम्। कमलासनस्थं पृथ्वीपद्मकर्णिकायां मेरौ स्थितम्? यद्वा त्वन्नाभिपद्मासनस्थम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.15।।तदेवाह पश्यामीति सप्तदशभिः षोडशकलारूपैः एकेन प्रार्थनं च। हे देव श्रीकृष्णेन्दो तव देहे एतस्मिन्विश्वरूपे सर्वान्पश्यामि। भूतविशेषसङ्घान् जरायुजादिभेदविशेषान्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.15।।जो विश्वरूप आपने मुझे दिखलाया है उसे मैं किस प्रकार देख रहा हूँ -- ऐसा अपना अनुभव प्रकट करता हुआ अर्जुन बोला --, हे देव मैं आपके शरीरमें समस्त देवोंको तथा स्थावरजङ्गमरूप नाना प्रकारकी विभक्त आकृतिवाले समस्त भूतविशेषोंके समूहोंको एवं कमलासनपर विराजमान अर्थात् पृथ्वीरूप कमलमें सुमेरुरूप कर्णिकापर बैठे हुए प्रजाके शासनकर्ता चतुर्मुख ब्रह्माको? वसिष्ठादि ऋषियोंको और वासुकि प्रभृति समस्त दिव्य अर्थात् देवलोकमें होनेवाले सर्पोंको देख रहा हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.15।। व्याख्या -- पश्यामि देवांस्तव देव देहे सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् -- अर्जुनकी भगवत्प्रदत्त दिव्य दृष्टि इतनी विलक्षण है कि उनको देवलोक भी अपने सामने दीख रहे हैं। इतना ही नहीं? उनको सबकीसब त्रिलोकी दिख रही है। केवल त्रिलोकी ही नहीं? प्रत्युत त्रिलोकीके उत्पादक (ब्रह्मा)? पालक (विष्णु) और संहारक (महेश) भी प्रत्यक्ष दीख रहे हैं। अतः अर्जुन वर्णन करते हैं कि मैं सम्पूर्ण देवोंको? प्राणियोंके समुदायोंको और ब्रह्मा तथा शङ्करको देख रहा हूँ।ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थम् -- अर्जुन कहते हैं कि मैं कमलके ऊपर स्थित ब्रह्माजीको देखता हूँ -- इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन कमलके नालको और नालके उद्गमस्थान अर्थात् मूल आधार भगवान् विष्णुको (जो कि शेषशय्यापर सोये हुए हैं) भी देख रहे हैं। इसका सिवाय भगवान् शङ्करको? उनके कैलास पर्वतको और कैलास पर्वतपर स्थित उनके निवासस्थान वटवृक्षको भी अर्जुन देख रहे हैं।ऋषींश्च सर्वानुरगांश्च दिव्यान् -- पृथ्वीपर रहनेवाले जितने भी ऋषि हैं? उनको तथा पाताललोकमें रहनेवाले दिव्य सर्पोंको भी अर्जुन देख रहे हैं।इस श्लोकमें अर्जुनके कथनसे यह सिद्ध होता है कि उन्हें स्वर्ग? मृत्यु और पाताल -- यह त्रिलोकी अलगअलग नहीं दीख रही है किन्तु विभागसहित एक साथ एक जगह ही दीख रही है -- प्रविभक्तमनेकधा (गीता 11। 13)। उस त्रिलोकीसे जब अर्जुनकी दृष्टि हटती है? तब जिनको ब्रह्मलोक? कैलास और वैकुण्ठलोक कहते हैं? वे अधिकारियोंके अभीष्ट लोक तथा उनके मालिक (ब्रह्मा? शङ्क और विष्णु) भी अर्जुनको दीखते हैं। यह सब भगवत्प्रदत्त दिव्यदृष्टिका ही प्रभाव है।विशेष बातजब भगवान्ने कहा कि यह सम्पूर्ण जगत् मेरे किसी एक अंशमें है? तब अर्जुन उसे दिखानेकी प्रार्थना करते हैं। अर्जुनकी प्रार्थनापर भगवान् कहते हैं कि तू मेरे शरीरमें एक जगह स्थित चराचर जगत्को देख -- इह एकस्थं ৷৷. मम देहे (11। 7)। वेदव्यासजीद्वारा प्राप्त दिव्यदृष्टिवाले सञ्जय भी यही बात कहते हैं कि अर्जुनने भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित सम्पूर्ण जगत्को देखा -- तत्र एकस्थं ৷৷. देवदेवस्य शरीरे (11। 13)। यहाँ अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण भूतसमुदाय आदिको देखता हूँ -- तव देव देहे। इस प्रकार भगवान् और सञ्जयके वचनोंमें तो एकस्थम् (एक जगह स्थित) पद आया है? पर अर्जुनके वचनोंमें यह पद नहीं आया है। इसका कारण यह है कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के शरीरमें जिसकिसी एक स्थानपर गयी? वहीँ उनको भगवान्का विश्वरूप दिखायी देने लग गया। उस समय अर्जुनकी दृष्टि सारथिरूप भगवान्के शरीरकी तरफ गयी ही नहीं। अर्जुनकी दृष्टि जहाँ गयी? वहीँ अनन्त सृष्टियाँ दीखने लग गयीं अतः अर्जुनकी दृष्टि उधर ही बह गयी। इसलिये अर्जुन एकस्थम् नहीं कह सके। वे एकस्थम् तो तभी कह सकते हैं? जब विश्वरूप दीखनेके साथसाथ सारथिरूपसे भगवान्का शरीर भी दीखे। अर्जुनको केवल विश्वरूप ही दीख रहा है? इसलिये वे विश्वरूपका ही वर्णन कर रहे हैं। उनको विश्वरूप इतना अपार दीख रहा है? जिसकी देश या कालमें कोई सीमा नहीं दीखती। तात्पर्य यह हुआ कि जब अर्जुनकी दृष्टिमें विश्वरूपका ही अन्त नहीं आ रहा है? तब उनकी दृष्टि सारथिरूपसे बैठे भगवान्की तरफ जाय ही कैसेभगवान् तो अपने शरीरके एकदेशमें विश्वरूप दिखा रहे हैं? इसलिये उन्होंने एकस्थम् कहा है। सञ्जय सारथिरूपमें बैठ हुए भगवान्को और उनके शरीरके एक देशमें स्थित विश्वरूपको देख रहे हैं? इसलिये सञ्जयने एकस्थम् पद दिया है (टिप्पणी प0 583)।,अब प्रश्न यह होता है कि भगवान् और सञ्जयकी दृष्टिमें वह एक जगह कौनसी थी? जिसमें अर्जुन विश्वरूप देख रहे थे इसका उत्तर यह है कि भगवान्के शरीरमें अमुक जगह ही अर्जुनने विश्वरूप देखा था? इसका निर्णय नहीं किया जा सकता। कारण कि भगवान्के शरीरके एकएक रोमकूपमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं (टिप्पणी प0 584)। भगवान्ने भी यह कहा था कि मेरे शरीरके एक देशमें तू चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्को देख ले (गीता 11। 7)। इसलिये जहाँ अर्जुनकी दृष्टि एक बार पड़ी? वहीं उनको सम्पूर्ण विश्वरूप दीखने लग गया।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.15।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.15।।कथं भगवन्तं प्रत्यर्जुनो भाषितवानिति पृच्छति -- कथमिति। तत्प्रश्नमपेक्षितं पूरयन्नवतारयति -- यत्त्वयेति। भूतविशेषसङ्घेषु देवानामन्तर्भावेऽपि पृथक्करणमुत्कर्षात्। ब्रह्मणः सर्वदेवतात्मत्वेऽपि तेभ्यो भेदकथनं तदुत्पादकत्वादिति मत्वाह -- किञ्चेति। ऋषीणामुरगाणां च किंचिद्वैषम्यात्पृथक्त्वम्। दिव्यानित्युभयेषां विशेषणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.15।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.15।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.15।। --,पश्यामि उपलभे हे देव? तव देहे देवान् सर्वान्? तथा भूतविशेषसंघान् भूतविशेषाणां स्थावरजङ्गमानां नानासंस्थानविशेषाणां संघाः भूतविशेषसंघाः तान्? किञ्च -- ब्रह्माणं चतुर्मुखम् ईशम् ईशितारं प्रजानां कमलासनस्थं पृथिवीपद्ममध्ये मेरुकर्णिकासनस्थमित्यर्थः? ऋषींश्च वसिष्ठादीन् सर्वान्? उरगांश्च वासुकिप्रभृतीन् दिव्यान् दिवि भवान्।।
───────────────────
【 Verse 11.16 】
▸ Sanskrit Sloka: अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् | नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं पश्यामि विश्वेश्वर विश्वरूप ||
▸ Transliteration: aneka-bāhūdara-vaktranetraṁ paśyāmi tvām sarvato’nantarūpam | nāntaṁ na madhyaṁ na punastavādiṁ paśyāmi viśveśvara viśvarūpa ||
▸ Glossary: aneka: many; bāhu: arms; udara: bellies; vaktra: mouths; netraṁ: eyes; paśyāmi: I see; tvām: unto You; sarvataḥ: from all sides; anantarūpam: endless form; nā ‘ntaṁ: there is no end; na madhyaṁ: there is no middle; na punaḥ: nor again; tava: Your; ādiṁ: beginning; paśyāmi: I see; viśveśvara: O Lord of the universe; viśvarūpa: in the form of the universe
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.16 I see Your infinite form on every side, with many arms, stomachs, mouths and eyes; Neither the end, nor the middle nor the beginning do I see, O Lord of the Universe, O cosmic form.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.16।।हे विश्वरूप हे विश्वेश्वर आपको मैं अनेक हाथों? पेटों? मुखों और नेत्रोंवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपोंवाला देख रहा हूँ। मैं आपके न आदिको? न मध्यको और न अन्तको ही देख रहा हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.16।। हे विश्वेश्वर मैं आपकी अनेक बाहु? उदर? मुख और नेत्रों से युक्त तथा सब ओर से अनन्त रूपों वाला देखता हूँ। हे विश्वरूप मैं आपके न अन्त को देखता हूँ और न मध्य को और न आदि को।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.16 अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् with manifold arms? stomachs? mouths and eyes? पश्यामि (I) see? त्वाम् Thee? सर्वतः on every side? अनन्तरूपम् of boundless form? न not? अनत्म् end? न not? मध्यम् middle? न not? पुनः,again? तव Thy? आदिम् origin? पश्यामि (I) see? विश्वेश्वर O Lord of the universe? विश्वरूप O Cosmic Form.Commentary A thing that is limited by space and time has a begining? a middle and an end? but the Lord is omnipresent and eternal. He exists in the three periods of time -- past? present and future? but is not limited by time and space. Therefore He has neither a beginning nor middle nor end.Arjuna could have this divine vision only with the help of the divine eye bestowed upon him by the Lord. He who has supreme devotion to the Lord and on whom the Lord showers His grace can enjoy this wondrous vision.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.16. I behold You of many arms, bellies, mouths and eyes and of infinite forms on all sides; of You, I find neither the end, nor the centre, nor the beginnng too, O Lord of the universe, O Universal-formed One !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.16 I see Thee, infinite in form, with, as it were, faces, eyes and limbs everywhere; no beginning, no middle, no end; O Thou Lord of the Universe, Whose Form is universal!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.16 With manifold arms, stomachs, mouths and eyes, I behold Your infinite form on all sides. I see no end, no middle nor the beginning too of You, O Lord of the universe, O You of Universal Form.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.16 I see You as possessed of numerous arms, bellies, mouths and eyes; as having infinite forms all around. O Lord of the Universe, O Cosmic Person, I see not Your limit nor the middle, nor again the beginning!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.16 I see Thee of boundless form on every side with many arms, stomachs, mouths and eyes: neither the end nor the middle nor also the beginning do I see, O Lord of the universe, O Cosmic Form.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.16 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.16 I behold Your infinite form on all sides with many arms, stomachs, mouths and eyes. O Lord of the universe, namely, the controller of the universe, O Universal Form having the universe as Your body! As You are infinite, therefore, I see no end, no middle and no beginning for You.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.16 Pasyami, I see; tvam, You; aneka-bahu-udara-vaktra-netram, as possessed of numerous arms, bellies, mouths and eyes; ananta-rupam, having infinite forms; sarvatah, all around. Visveswara, O Lord of the Universe; visva-rupa, O Cosmic Person; na pasyami, I see not; ['I do not see-because of Your all-pervasiveness.'] tava, Your; antam, end; na madhyam, nor the middle-what lies between two extremities; na punah, nor again; the adim, beginning-I see not the limit (end) nor the middle, nor again the beginning, of You who are God! Furthermore,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.16।। विश्वरूप के अनन्त वैभव को एक ही दृष्टिक्षेप में देख पाने के लिए मानव की परिच्छिन्न बुद्धि उपयुक्त साधन नहीं है। इस रूप के परिमाण की विशालता और उसके गूढ़ अभिप्राय से ही मनुष्य की? बुद्धि निश्चय ही? लड़खड़ाकर रह जाती है। भगवान् ही वह एकमेव सत्य तत्त्व हैं जो सभी प्राणियों की कर्मेन्द्रियों के पीछे चैतन्य रूप से विद्यमान हैं। अर्जुन इसे इन शब्दों में सूचित करता है कि मैं आपको अनेक बाहु? उदर? मुख और नेत्रों से युक्त सर्वत्र अनन्तरूप में देखता हूँ। इसे सत्य का व्यंग्यचित्र नहीं समझ लेना चाहिये। सावधानी की सूचना उन शीघ्रता में काम आने वाले चित्रकारों के लिए आवश्यक है? जो इस विषयवस्तु से स्फूर्ति और प्रेरणा पाकर इस विराट् रूप को अपने रंगों और तूलिका के द्वारा चित्रित करना चाहते हैं और अपने प्रयत्न में अत्यन्त दयनीय रूप से असफल होते हैं।विश्व की एकता कोई दृष्टिगोचर वस्तु नहीं है यह साक्षात्कार के योग्य एक सत्य तथ्य है। इस तथ्य की पुष्टि अर्जुन के इन शब्दों से होती है कि मैं न आपके अन्त को देखता हूँ? और न मध्य को और न आदि को। विराट् पुरुष का वर्णन इससे और अधिक अच्छे प्रकार से नहीं किया जा सकता था।उपर्युक्त ये श्लोक सभी परिच्छिन्न वस्तुओं के और मरणशील प्राणियों में सूत्र रूप से व्याप्त उस एकत्व का दर्शन कराते हैं? जिसने उन्हें इस विश्वरूपी माला के रूप मे धारण किया हुआ हैअर्जुन आगे कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.16।।यस्य देहे सर्वं दृष्टं तं देहवन्तं विशिनष्टि। अनेकानि बाह्वदीनि यस्य तं त्वां? सर्वत्रानन्तानि रुपाण्यस्येति तं पश्यामि। तवादिमन्तं मध्यं पुनर्न पश्यामि विश्वदर्शनं तव देहे युक्तं विश्वरुपत्वात्तवेति सूचनार्थम्। हे विश्वरुपेतिसंबोधनम्। विश्वस्याद्यन्तमध्यवत्त्वेऽपि तव तद्वत्त्वं नास्ति विश्वरुपत्वेऽपि विश्वेश्वरत्वात्तवेति द्योतनार्थ विश्वेश्वरेति संबोधनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.16।।यत्र भगवद्देहे सर्वमिदं दृष्टवान् तमेव विशिनष्टि -- अनेकेति। बाहव उदराणि वक्त्राणि नेत्राणि चानेकानि यस्य तमनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं पश्यामि त्वां सर्वतः सर्वत्र। अनन्तानि रूपाणि यस्येति तम्। तव तु पुनर्नान्तमवसानं न मध्यं नाप्यादिं पश्यामि सर्वगतत्वात्। हे विश्वेश्वर हे विश्वरूप। संबोधनद्वयमतिसंभ्रमात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.16।।अनेके अनन्ता बाहव उदराणि वक्त्राणि नेत्राणि च यस्मिंस्तदनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्। सर्वतश्चतुर्दिक्षूपर्यधश्चानन्तमपरिच्छिन्नं रूपमस्य तम्। अनन्तत्वमेवाह -- नान्तमिति। दीर्घरज्ज्वा इव तवाद्यन्तौ दैशिकौ न स्त इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.16।।यस्य देहे न एतान् पश्यामि तादृशं त्वां च पश्यामीत्याह भ्रमाभावाय -- अनेकेति। अनेकानि बाह्वादीनि यस्य। सर्वतोऽनन्तानि रूपाणि यस्यैतादृशं त्वां पश्यामि। तादृशानेकरूपस्यापि तव अन्तं पूर्णभावं?,मध्यं स्थितिस्थानम्? आदिमुत्पत्तिस्थानं न पश्यामि। विश्वेश्वर विश्वपरिपालक किं बहुना विश्वरूपं पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.16।। किंच -- अनेकेति। अनेकानि बाह्वादीनि यस्य तादृशं पश्यामि। अनन्तानि रूपाणि यस्य तं त्वां सर्वतः पश्यामि। तव तु अन्तं मध्यमादिं च न पश्यामि सर्वगतत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.16।।अनेकेति। कूटस्थत्वात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.16।।मैं आपको अनेकों भुजा? उदर? मुख और नेत्रोंवाला अर्थात् आपके जिस स्वरूपमें अनेकों भुजा? उदर? मुख और नेत्र हैं ऐसे रूपवाला तथा सब ओरसे अनन्त रूपवाला अर्थात् जिसके सर्वत्र अनन्त रूप हैं ऐसा? देख रहा हूँ। हे विश्वेश्वर हे विश्वरूप मैं आपका न तो अन्त अर्थात् समाप्ति? न मध्य अर्थात् आदि और अन्तके बीचकी अवस्था और न आदि ही देखता हूँ? अभिप्राय यह कि मुझे आप परमात्मदेवका न अन्त दिखलायी देता है? न मध्य दीखता है और न आपका आदि ही दिखलायी देता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.16।। व्याख्या -- विश्वरूप? विश्वेश्वर -- इन दो सम्बोधनोंका तात्पर्य है कि मेरेको जो कुछ भी दीख रहा है? वह सब आप ही हैं और इस विश्वके मालिक भी आप ही हैं। सांसारिक मनुष्योंके शरीर तो जड होते हैं और उनमें शरीरी चेतन होता है परन्तु आपके विराट्रूपमें शरीर और शरीरी -- ये दो विभाग नहीं हैं। विराट्रूपमें शरीर और शरीरीरूपसे एक आप ही हैं। इसलिये विराट्रूपमें सब कुछ चिन्मयहीचिन्मय है। तात्पर्य यह हुआ कि अर्जुन विश्वरूप सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीर हैं और विश्वेश्वर सम्बोधन देकर यह कह रहे हैं कि आप ही शरीरी (शरीरके मालिक) हैं।अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् -- मैं आपके हाथोंकी तरफ देखता हूँ तो आपके हाथ भी अनेक हैं आपके पेटकी तरफ देखता हूँ तो पेट भी अनेक हैं आपके मुखकी तरफ देखता हूँ तो मुख भी अनेक हैं और आपके नेत्रोंकी तरफ देखता हूँ तो नेत्र भी अनेक हैं। तात्पर्य है कि आपके हाथों? पेटों? मुखों और नेत्रोंका कोई,अन्त नहीं है? सबकेसब अनन्त हैं।पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपम् -- आप देश? काल? वस्तु? व्यक्ति? पदार्थ आदिके रूपमें चारों तरफ अनन्तहीअनन्त दिखायी दे रहे हैं।नान्तं न मध्यं पुनस्तवादिम् -- आपका कहाँ अन्त है? इसका भी पता नहीं आपका कहाँ मध्य है? इसका भी पता नहीं और आपका कहाँ आदि है? इसका भी पता नहीं।सबसे पहले नान्तम् कहनेका तात्पर्य यह मालूम देता है कि जब कोई किसीको देखता है? तब सबसे पहले उसकी दृष्टि उस वस्तुकी सीमापर जाती है कि यह कहाँतक है। जैसे? किसी पुस्तकको देखनेपर सबसे पहले उसकी सीमापर दृष्टि जाती है कि पुस्तककी लम्बाईचौड़ाई कितनी है। ऐसे ही भगवान्के विराट्रूपको देखनेपर अर्जुनकी दृष्टि सबसे पहले उसकी सीमा(अन्त) की ओर गयी। जब अर्जुनको उसका अन्त नहीं देखा? तब उनकी दृष्टि मध्यभागपर गयी फिर आदि(आरम्भ) की तरफ दृष्टि गयी? पर कहीं भी विराट्स्वरूपका अन्त? मध्य और आदिका पता नहीं लगा। इसलिये इस श्लोकमें नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिम् -- यह क्रम रखा गया है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.16।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.16।।यत्र भगवद्देहे सर्वमिदं दृष्टं तमेव विशिनष्टि -- अनेकेति। आदिशब्देन मूलमुच्यते। नान्तं न मध्यमित्यत्रापि पश्यामीत्यस्य प्रत्येकं संबन्धं सूचयति -- नान्तं पश्यामीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.16।।अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं इत्यत्रानेकशब्दस्य द्व्यादौ पर्यवसानात् विवक्षितमर्थमाह -- अनेकेति। अनेनानेकवक्त्रनयनमित्यपि व्याख्यातम्। कुत एतत् इत्यत आह -- अनन्तेति।सर्वत इत्यस्यार्थस्तात्पर्यनिर्णयेऽवगन्तव्यः इत्यादि च वक्ष्यति। बाहुभ्यां प्रधानाभ्यां? पतत्त्रैः पतत्त्रसदृशैरितरबाहुभिः? सन्धमति अग्न्यादिभूतानि संयोजयतीति प्रत्येकमन्वयः। सन्नमतीत्यस्याप्ययमेवार्थः। एतयोर्मन्त्रयोः प्रकृतानुपयोगादयुक्तमुदाहरणमित्यत आह -- विश्वशब्दश्चेति। तथा च प्रथमार्थे तसिरित्युक्तं भवति। स्पष्टार्थो चात्र श्रुतिमाह -- अनन्तबाहुमिति। यदि भगवाननन्तबाह्वादिस्तद्य परममहत्परिमाणः स्यात्। अन्यथा तदयोगात्। न च तद्युक्तम्।रूपं महत्ते [11।23] इति महत्त्वमात्रोक्तेः। तथाबहुवक्त्रनेत्र [11।23] इति बहुत्वमात्रोक्तेरनन्तबाह्वादित्वोक्तिश्चानुपपन्नेत्यत आह -- महत्त्वादिति। स्यादयं विरोधो यदि भगवद्रूपस्य महत्त्वमात्रं तदवयवानां च बहुत्वमात्रमुच्येत्। न चैवम्? अवच्छेदकाश्रवणात्। महत्त्वबहुत्वोक्तिस्तु परममहत्त्वात्मकत्वेनानन्तावयत्वेन च सह सम्भवति। परममहति महत्त्वस्यानन्ते बहुत्वस्यान्तर्भावादित्यर्थः।अवच्छेदकानुक्तावप्यवान्तरमहत्त्वादिग्रहणे को दोषः इत्यत आह -- अन्यथेति। तत्र परममहत्त्वस्यानन्तावयवत्वस्य चोक्तेरिति भावः।पश्यामि त्वां सर्वतोऽनन्तरूपंत्वया ततं विश्वमनन्तरूप [11।38] इत्यनन्तशब्दद्वयस्य माहात्म्यातिशयसूचनायार्थभेदमाह -- एकत्र त्विति। अपरिमाणोऽपरिच्छिन्न इत्यनन्तरूप इति सम्बन्धः। स्यादिदं व्याख्यानं यदीदं द्वयं प्रामाणिकं स्यादित्यत आह -- उक्तं हीति। महान्तं महत्।महतो महान्तं इत्यनन्तमपरिच्छिन्नपरिमाणं रूपमस्येत्युक्तार्थे प्रमाणम्। एकं भिन्नमपि अनन्तरूपमित्यनन्तसङ्ख्यान्यस्य रूपाणीत्यत्र। ननुमहतो महान्तं इति महत्तत्त्वान्महत्त्वमेवोच्यते? न त्वन्तत्वम्। ततश्चयदेकमव्यक्तं इत्यव्यक्तव्यापित्ववचनात्तत्साम्यमेव सिध्यतीत्यत आह -- अव्यक्तस्येति। महतो महत्त्वेऽव्यक्तव्यापित्वे चेत्यपि ग्राह्यम्। अव्यक्तस्यानन्तत्वं कुतः इत्यत आह -- महान्तं चेति। अनन्तस्य विष्णोः प्रतिमाभूतस्य तस्यान्तः परिमाणं परिच्छेदः? कार्यतः सङ्ख्यानं सङ्ख्यापरिच्छेदोऽपि न विद्यते। प्रकारान्तरेणानन्तरूपशब्दद्वयस्यार्थभेदमाह -- तानि चेति। एकस्यानन्तरूपशब्दस्यानन्तसङ्ख्यारूपार्थत्वे स्थिते सत्येकत्रानन्तरूपशब्दे तानि चानन्तसङ्ख्यानि रूपाणि प्रत्येकमपरिच्छिन्नपरिमाणानीत्यर्थो भवतीत्यर्थः। अत्र प्रमाणमाह -- असङ्ख्याता इति। ज्ञानकाः ज्ञानानन्दात्मकाः। अयं बहिर्व्याप्त आकाशः परमात्मा यावान् यावत्परिमाणस्तावानेवैषोऽन्तर्हृदये स्थितः परमात्मेत्यर्थः। गर्भे जठरे जगद्यस्यासौ तथोक्तः। अवसन्नोऽवनतः। गर्भजगत्त्वेनापरिच्छिन्नपरिमाणत्वं लभ्यते। कृष्णादीनामप्यपरिच्छिन्नपरिमाणत्वं वदन्तो वक्तव्याः। तत्राल्पपरिमाणप्रतीतिर्या सा किं भ्रान्तिरुत प्रमितिः इति। आद्ये क्रियादेर्द्विभुजचतुर्भुजादेश्च मिथ्यात्वं स्यात्। न द्वितीयः? युगपदेकत्राल्पानल्पपरिमाणसमावेशस्यायुक्तत्वात्। अतोऽपरिच्छिन्नपरिमाणोक्तिरुपचारमात्रमिति चेत्? किमिदमनेकपरिमाणत्वस्यायुक्तत्वं किमन्यत्रादर्शनेनासम्भावितत्वम् उत नायमल्पानल्पपरिमाणोपेतो द्रव्यत्वात्। नायं परममहत्परिमाणः? अल्पपरिमाणत्वात् पटवदित्यादियुक्तिविरुद्धत्वम्।अथातिप्रसङ्गदुष्टत्वं किंवाऽप्रामाणिकत्वम् नाद्य इत्याह -- न चेति। अघटितघटनाशक्त्युपेते किं नामासम्भावितमिति भावः। न द्वितीयः? ईश्वरस्य युक्त्यगोचरत्वेन तदनवकाशादिति भावेनाह -- अचिन्त्या इति। एषा ब्रह्मविषया। अपनेया निराकार्या। अतिप्रसङ्गोऽपि किं यदीश्वरो विरुद्धपरिमाणद्वयोपेतः स्यात् तदा निर्दुःखो दुःखी स्यादितीश्वरमधिकृत्य स्यात् उत प्राणादयोऽपि तथा स्युः तथा चाणुश्चेत्यादिका तद्विषयवाक्यव्यवस्था नाङ्गीक्रियेतेत्यन्यदधिकृत्य स्यात्। आद्यं दूषयति -- अतिप्रसङ्गस्त्विति। अविशेषमाश्रित्य ह्ययमतिप्रसङ्गः? नचासावस्ति निर्दोषानन्तगुणत्वे हरेः श्रुतीनां महातात्पर्येण दुःखादेस्तद्विरोधात्? परिमाणद्वयस्य तु तदविरोधात्? दुःखादेरप्रामाणिकत्वात्? परिमाणद्वयस्य तूक्तवक्ष्यमाणवाक्यसिद्धत्वादिति भावः। विपर्ययापर्यवसायी चायं प्रसङ्ग इति भावेनाह -- न हीति। यदि घटः पृथुबुध्नोदराकारः स्यात्तर्हि पदार्थो न स्यात् तथाविधस्य पदार्थस्य कस्याप्यदृष्टत्वादिति प्रसङ्गो यथा न युक्तः? भवति च पदार्थस्तस्मात्पृथुबुध्नोदराकारः? न भवतीति विपर्ययस्य प्रमाणबाधितत्वेनापर्यवसानात्? तथात्वेन तस्य धर्मिग्राहकप्रमाणदृष्टत्वात्। तथा प्रकृतेऽपीति। एतेनानुमानानां कालात्ययापदिष्टत्वं चोक्तं भवति। प्राणादिकमधिकृत्यातिप्रसङ्ग इति द्वितीयं निराकरोति -- केषुचिदिति। अत्रापि सम्भावनाहेतुभावाभावाभ्यां विशेषादविशेषोऽसिद्ध इति भावः।चतुर्थं निरस्यति -- गुणा इति। श्रुता अश्रुता अपि सुविरुद्धा अन्यत्र सहादृष्टा अविरुद्धाश्च। तथा गुणा इव दोषाः श्रुता अश्रुताश्च नैव सन्ति? किन्त्वज्ञैर्मिथ्यादृष्टिभिर्हि तथा सन्तीति प्रतीताः। एवं परे ईश्वरे स्थितिः? ततोऽन्यत्र तु श्रुतानां प्रमाणान्तरसिद्धानां च गुणदोषाणां व्यवस्थावस्थानम्। तच्च क्रमादुत्तमेषु गुणबाहुल्यं दोषाल्पत्वं? मध्यमेषूभयसाम्यम्? अवरेषु दोषबाहुल्यं गुणाल्पत्वमिति। तदेवमसम्भावनाद्यभावान्न भगवति अपरिच्छिन्नपरिमाणत्वोक्तेरुपचरितत्वं कल्प्यम्। अर्जुनेनापि तन्निराकृतमिति भावेनाह -- उपचारत्वेति।नान्तं न पुनस्तवादिं पश्यामि इत्याद्यन्ताभावोक्तेरुपचरितत्वपरिहाराय न मध्यमित्युक्तम्। मध्यनिराकरणार्थमेव तत्किं न स्यात् इत्यत आह -- अन्यथेति। उपचारत्वपरिहारार्थत्वाभावे तद्वैयर्थ्यं स्यादिति शेषः। कुतः आद्यन्तसापेक्षत्वात् मध्यस्य तदभावोक्त्यैव तदभावसिद्धेः। विश्वं महदादिकं रूपं स्वरूपमस्येति प्रतीतिं सप्रमाणकं निवायरति -- विश्वरूप इति। एतच्चाभ्यासरूपमिति मन्तव्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.16।।अनेकशब्दोऽनन्तवाची?अनन्तबाहुं [11।19] इति स्वयं वक्ष्यतिसर्वतः पाणिपादं तत् इत्यादि च। विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्पात्। सं बाहुभ्यां धमति सं पतत्त्रैर्द्यावाभूमी जनयन् देव एकः [ऋक्सं.2।2।4।24म.ना.2।2श्वे.उ.3।3] इति ऋग्वेदखिलेषु। विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतोबाहुरुत विश्वतस्यात्। सं बाहुभ्यां नमति सं पतत्त्रद्यौर्वाभूमी जनयन्देव एकः इति यजुर्वेदे च। विश्वशब्दश्चानन्तवाची।सर्वं समस्तं विश्वं च अनन्तं पूर्ण(र्व)मेव च इत्यभिधानात्। अनन्तबाहुमनन्तपादमनन्तरूपं पुरुवक्त्रमेकम् इति च (सामवेदस्य) बाभ्रव्यशाखायाम्। महत्त्वाद्युक्तिस्तु तदात्मकत्वेनापि भवति।अन्यथाअनादिमत्परं ब्रह्म [13।12] इत्याद्ययुक्तं स्यात्। एकत्र त्वनन्तान्यस्य रूपाणीत्यनन्तरूपः। अन्यत्र त्वपरिमाण इति। उक्तं ह्युभयमपि -- परात्परं यन्महतो महान्तं यदेकमव्यक्तमनन्तरूपम् इति यजुर्वेदे। अव्यक्तस्यानन्तत्वादेव महतो महत्त्वे अपरिमितत्वं सिध्यति।महान्तं च समावृत्य प्रधानं समव(समुप)स्थितम्। अनन्तस्य न तस्यान्तस्सङ्ख्यानं चापि विद्यते इत्यादित्यपुराणे। तानि चैकैकानि रूपाण्यनन्तानीति चैकत्र भवति। असंख्याता ज्ञानकास्तस्य देहाः सर्वे परिमाणविवर्जिताश्च इत्यृग्वेदखिलेषु। यावान्वा अयमाकाशस्तावानेषोन्तर्हृदय आकाश उभे अस्मिन् द्यावापृथिवी अन्तरेव समाहिते। उभावग्निश्च वायुश्च सूर्याचन्द्रमसावुभौ [छा.उ.8।1।3] इति च।कृष्णस्य गर्भजगतोऽतिभरावसन्नं पार्ष्णिप्रहारपरिरुग्णफणातपत्रम्,[10।16।31] इति च भागवते।न चैतदयुक्तम्? अचिन्त्यशक्तित्वादीश्वरस्य।अचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् इति च श्रीविष्णुपुराणे [ ]। नैषा तर्केण मतिरापनेया [कठो.2।9] इति श्रुतिः। अतिप्रसङ्गस्तु महातात्पर्यवशात् वाक्यबलाच्चापनेयः। न हि घटवत्कश्चित्पदार्थो न दृष्ट इत्येतावता प्रमाणदृष्टः सन्निराक्रियते। केषुचित्पदार्थेषु वाक्यव्यवस्था अचिन्त्यशीकृत्वा भावादङ्गीक्रियते।गुणाः श्रुताः सुविरुद्धाश्च देवे सन्त्यश्रुता अपि नैवात्र शङ्का। चिन्त्या अचिन्त्याश्च तथैव दोषाः श्रुताश्च नाज्ञैर्हि तथा प्रतीताः। एवं परेऽन्यत्र श्रुताश्रुतानां गुणागुणानां च क्रमाद्व्यवस्था इति जाबालिखिले श्रुतेश्च। उपचारत्वपरिहाराय न मध्यमिति। अन्यथा आद्यन्तभावेनैव तत्सिद्धेः। विश्वरूपः पूर्णरूपः स विश्वरूपो अनूनरूपो अतोऽयं सोऽनन्तरूपो न हि नाशोऽस्ति तस्य इति शाण्डिल्यशाखायाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.16।। --,अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम् अनेके बाहवः उदराणि वक्त्राणि नेत्राणि च यस्य तव सः त्वम् अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रः तम् अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रम्। पश्यामि त्वा त्वां सर्वतः सर्वत्र अनन्तरूपम् अनन्तानि रूपाणि अस्य इति अनन्तरूपः तम् अनन्तरूपम्।,न अन्तम्? अन्तः अवसानम्? न मध्यम्? मध्यं नाम द्वयोः कोट्योः अन्तरम्? न पुनः तव आदिम् -- न देवस्य अन्तं पश्यामि? न मध्यं पश्यामि? न पुनः आदिं पश्यामि? हे विश्वेश्वर विश्वरूप।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.17 】
▸ Sanskrit Sloka: किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् | पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् ||
▸ Transliteration: kirīṭinaṁ gadinaṁ cakriṇaṁ ca tejorāśiṁ sarvato dīptimantam | paśyāmi tvāṁ durnirīkṣyaṁ samantād dīptānalārka-dyutim-aprameyam ||
▸ Glossary: kirīṭinaṁ: with helmets; gadinaṁ: with maces; cakriṇaṁ: with discs; ca: and; tejorāśiṁ: radiance; sarvataḥ: all sides; dīptimantam: glowing; paśyāmi: I see; tvāṁ: You; durnirīkṣyaṁ: difficult to see; samantāt: spreading; dīptānala: blazing fire; arka: sun; dyutiṁ: sunshine; aprameyam: immeasurable
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.17 I see You with crown, club and discus; a mass of radi- ance shining everywhere, difficult to look at, blazing all round like the burning fire and sun in infinite brilliance.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.17।।मैं आपको किरीट? गदा? चक्र? (तथा शङ्ख और पद्म) धारण किये हुए देख रहा हूँ। आपको तेजकी राशि? सब ओर प्रकाश करनेवाले? देदीप्यमान अग्नि तथा सूर्यके समान कान्तिवाले? नेत्रोंके द्वारा कठिनतासे देखे जानेयोग्य और सब तरफसे अप्रमेयस्वरूप देख रहा हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.17।। मैं आपका मुकुटयुक्त? गदायुक्त और चक्रधारण किये हुये तथा सब ओर से प्रकाशमान् तेज का पुंज? दीप्त अग्नि और सूर्य के समान ज्योतिर्मय? देखने में अति कठिन और अप्रमेयस्वरूप सब ओर से देखता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.17 किरीटिनम् one with diadem? गदिनम् with club? चक्रिणम् with discus? च and? तेजोराशिम् a mass of radiance? सर्वतः everywhere? दीप्तिमन्तम् shining? पश्यामि (I) see? त्वाम् Thee? दुर्निरीक्ष्यम् very hard to look at? समन्तात् all round? दीप्तानलार्कद्युतिम् blazing like burning fire and sun? अप्रमेयम् immeasurable.Commentary Kiritam is a special ornament for the head? the crown.Arjuna had worshipped the Lord as having a crown? club and discus and the Lord showed him the same form now. He is in all forms and He is beyond all forms as the transcendental Reality. Who can comprehend His GloryTejorasim A mass of splendour that cannot be perceived without the inner divine eye of intuition.Aprameyam Immeasurable? whose limits cannot be fixed.I infer from this vision of Thy power of Yoga that Thu art the Imperishable? etc.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.17. I behold You as having crowns, clubs and discs; as a mass of radiance, shining on all sides, hard to look at and on each side blazing like burning fire and the sun; and as an immeasurable one.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.17 I see thee with the crown, the sceptre and the discus; a blaze of splendour. Scarce can I gaze on thee, so radiant thou art, glowing like the blazing fire, brilliant as the sun, immeasurable.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.17 I behold You as a mass of light shining everywhere, with diadem, mace and discus, hard to behold, blazing like a burning fire and the sun, and immeasurable.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.17 I see You as wearing a diadem, wielding a mace, and holding a disc; a mass of brilliance glowing all around, difficult to look at from all sides, possessed of the radiance of the blazing fire and sun, and immeasurable.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.17 I see Thee with the diadem, the club and the discus, a mass of radiance shining everywhere, very hard to look at, blazing all round like burning fire and the sun, and immeasurable.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.17 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.17 I behold you a mass of light shining everywhere, hard to look at, blazing like a burning fire and the sun. You, who are identifiable with Your divine diadem, mace and discus, are indefinable and immeasurable.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.17 Pasyami, I see; tvam, You; as kiritinam, wearing a diadem-kirita is a kind of decoration for the head; one having it is kiriti; gadinam, wielding a mace; and also cakrinam, holding a disc; tejorasim, a mass of brilliance; sarvatah diptimantam, glowing all around; durniriksyam, difficult to look at; samantat, from all sides, at every point; as though dipta-analarka-dyutim, possessed of the radiance (dyuti) of the blazing (dipta) fire (anala) and sun (arka); and aprameyam, immeasurable, i.e. beyond limitation. 'For this reason also, i.e., by seeing Your power of Yoga, I infer' that-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.17।। विश्वरूप का और अधिक वर्णन करते हुये अर्जुन बताता है कि उस अचिन्त्य अग्राह्य दिव्य रूप में उसने क्या देखा। उसने वहाँ मुकुट धारण किए शंखचक्रगदाधारी भगवान् विष्णु को देखा। पुराणों में किये गये वर्णनों के अनुसार शंख? चक्र आदि भगवान् विष्णु के पदक या प्रतीत हैं।हिन्दू शास्त्रों में देवताओं को कूछ विशेष शस्त्रास्त्रयुक्त या चिह्नयुक्त बताया गया है जिनका विशेष अर्थ भी है। ये विशेष पदक जगत् पर उनके शासकत्व एवं प्रभुत्व को दर्शाने वाले हैं। जो व्यक्ति बाह्य परिस्थितियों का स्वामी तथा मन की स्वाभाविक प्रवृत्तियों का शासक है? वही वास्तव में? प्रभु या ईश्वर कहलाने योग्य होता है। जो व्यक्ति अपने मन का और बाह्य आकर्षणों का दास बना होता है? वह दुर्बल है यदि वह राजमुकुट भी धारण किये हुये है तब भी उसका राजत्व भी उतना ही अनित्य है जितना कि रंगमंच पर बनावटी मुकुट धारण कर राजा की भूमिका कर रहे अभिनेता का होता है। सत्तारूढ़ पुरुष को इन्द्रिय संयम और मनसंयम के बिना व्ाास्तविक अधिकार या प्रभावशीलता प्राप्त नहीं हो सकती। निम्न स्तर की कामुक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर अपने मन रूपी राज्य पर स्वयं ही स्वयं का राजतिलक किये बिना कोई भी व्यक्ति सुखी और शक्तिशाली जीवन नहीं जी सकता। संयमी पुरुष ही विष्णु है और वही राजमुकुट का अधिकारी है।चतुर्भुज विष्णु अपने हाथों में शंख? चक्र? गदा और पद्म (कमल) धारण किये रहते हैं। यह एक सांकेतिक रूपक है। भारत में कमल पुष्प शान्ति? आनन्द? शुभ और सुख का प्रतीक है। शंखनाद मनुष्य को अपने कर्तव्य के लिये आह्वान करता है। यदि मनुष्यों की कोई पीढ़ी अपने हृदय के इस उच्च आह्वान को नहीं सुनती है? तब सर्वत्र अशान्ति? युद्ध? महामारी? अकाल? तूफान और साम्प्रादायिक विद्वेष तथा सामाजिक दुर्व्यवस्था फैल जाती है। यही उस पीढ़ी पर गदा का आघात है जो उसे सुव्यवस्थित और अनुशासित करने के लिए उस पर किया जाता है। यदि कोई ऐसी पीढ़ी हो? जो इतना दण्ड पाकर भी उससे कोई पाठ नहीं सीखती है? तो फिर उसके लिए आता है चक्र कालचक्र जो सुधार के अयोग्य उस पीढ़ी को नष्ट कर देता है।अर्जुन द्वारा किये गये वर्णन से ज्ञात होता है कि एक ही परम सत्य ब्रह्मादि से पिपीलिका तक के लिए अधिष्ठान है। वह सत्य सदा? सर्वत्र एक ही है केवल उसकी अभिव्यक्ति ही विविध प्रकार की है। उसकी दिव्यता की अभिव्यक्ति में तारतम्य का कारण विभिन्न स्थूल और सूक्ष्म उपाधियां हैं जिनके माध्यम से वह सत्य व्यक्त होता है।यह विश्वरूप सब ओर से प्रकाशमान तेज का पुञ्ज? प्रदीप्त अग्नि और सूर्य के समान ज्योतिर्मय और देखने में अति कठिन है। इस श्लोक में किये गये वर्णन में यह पंक्ति सर्वाधिक अभिव्यंजक है जो हमें शुद्ध चैतन्यस्वरूप पुरुष का स्पष्ट बोध कराती है। इसे भौतिक प्रकाश नहीं समझना चाहिये। यद्यपि लौकिक भाषा से यह शब्द लिया गया है? तथापि उसका प्रयोग साभिप्राय है। चैतन्य ही वह प्रकाश है? जिसमें हम अपने मन की भावनाओं और बुद्धि के विचारों को स्पष्ट देखते हैं। यही चैतन्य? चक्षु और श्रोत्र के द्वारा क्रमश रूप वर्ण और शब्द को
Chapter 11 (Part 6)
प्रकाशित करता है। इसलिए स्वाभाविक ही है कि अनन्त चैतन्यस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण के विश्वरूप का वर्णन? अर्जुन को लड़खड़ाती भाषा में इसी प्रकार करना पड़ा कि वह विश्वरूप तेजपुञ्ज है? जो इन्द्रिय? मन और बुद्धि को अन्ध बना दे रहा है? अर्थात् ये उपाधियां उसका ग्रहण नहीं कर पा रहीं हैं।अप्रमेय (अज्ञेय) यद्यपि अब तक अर्जुन ने अपनी ओर से सर्वसंभव प्रयत्न करके विराट्स्वरूप का तथा उसके दर्शन से उत्पन्न हुई मन की भावनाओं का वर्णन किया है? परन्तु इन समस्त श्लोकों में निराशा की एक क्षीण धारा प्रवाहित हो रही प्रतीत होती है। अर्जुन यह अनुभव करता है कि वह विषयवस्तु की पूर्णता को भाषा की मर्यादा में व्यक्त नहीं कर पाया है। भाषा केवल उस वस्तु का वर्णन कर सकती है? जो इन्द्रियों द्वारा देखी गयी हो? या मन के द्वारा अनुभूत हो अथवा बुद्धि से समझी गयी हो। यहाँ अर्जुन के समक्ष ऐसा दृश्य उपस्थित है? जिसे वह अनुभव कर रहा है? देख रहा है और स्वयं बुद्धि से समझ पा रहा है और फिर भी? कैसा विचित्र अनुभव है कि जब वह उसे भाषा की बोतल में बन्द करने का प्रयत्न करता है? तो वह मानो वाष्परूप में उड़ जाता है अर्जुन? इन्द्रियगोचर वस्तुओं के अनुभव की तथा भावनाओं की भाषा में वर्णन करने का प्रयत्न करता है? किन्तु उस वर्णन से स्वयं ही सन्तुष्ट नहीं होता है।आश्चर्यचकित मानव उस वैभव का गान अपनी बुद्धि की भाषा में करने का प्रयत्न कर रहा है। परन्तु यहाँ भी केवल निराश होकर यही कह सकता है कि? हे प्रभो आप सर्वदा अप्रमेय हैं अज्ञेय है। यद्यपि कवि ने विराट् स्वरूप का चित्रण दृश्यरूप में किया है? तथापि वे हमें समझाना चाहते हैं कि सत्स्वरूप आत्मा? वास्तव में? द्रष्टा है? और वह बुद्धि का भी ज्ञेय विषय नहीं बन सकता है। आत्मा द्रष्टा और प्रमाता है? और न कि दृश्य और प्रमेय वस्तु।आपके इस ईश्वरीय योग के दर्शन से मैं अनुमान करता हूँ कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.17।।किंच किरीटिनं शिरोभूषणविशेषवन्तम्। गदास्यास्तीति गदी तम्। चक्रमस्यास्तीति चक्री तम्। अतएव समन्ततः सर्वत्र दीप्ताग्निसूर्ययोः कान्तिरिव कान्तिर्यस्य तम्। अतएव दुर्निरीक्ष्यं दुःखेन निरीक्ष्यं किरीटादिमत्त्वेऽप्यप्रेमयमशक्यपरिच्छेदं त्वां पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.17।।तमेव विश्वरूपं भगवन्तं प्रकारान्तरेण विशिनष्टि -- किरीटिनमिति। किरीटगदाचक्रधारिणं च सर्वतो दीप्तिमन्तं तेजोराशिं च अतएव दुर्निरीक्षं दिव्येन चक्षुषा विना निरीक्षितुमशक्यम्। सयकारपाठे दुःशब्दोऽपह्नववचनः। अनिरीक्ष्यमिति यावत्। दीप्तयोरनलार्कयोर्द्युतिरिव द्युतिर्यस्य तमप्रमेयमित्थमयमिति परिच्छेत्तुमशक्यं त्वां समन्तात्सर्वतः पश्यामि दिव्येन चक्षुषा। अतोऽधिकारिभेदाद्दुर्निरीक्ष्यं पश्यामीति न विरोधः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.17।।किरीटगदाचक्रधारिणम्। दीप्तिमत्त्वादेव दुर्निरीक्ष्यं द्रष्टुमशक्यम्। समन्तात्सर्वतो ये दीप्ता अनला अर्काश्च तद्वद्द्युतिर्यस्य तं? समन्ताद्दीप्तानर्लाकद्युतिमित्येकं पदम्। अतएवाप्रमेयं द्रष्टुमशक्यपरिच्छेदम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.17।।किञ्च किरीटिनं मुकुटालङ्कारयुक्तं रसात्मकम्। गदिनं सकलप्राणाधिदैविकधर्मधारिणम्। चक्रिणं तेजोरूपसुदर्शनधारिणम्। चकारेण तद्वत् मोक्षदानार्थमपि चक्रधारित्वं ज्ञापितम्। तेजोराशिं तेजःपुञ्जात्मकम्। सर्वतो दीप्तिमन्तं परित उद्दीपककिरणयुक्तम्। तेजोयुक्तत्वे दीप्तियुक्तत्वे च दृष्टान्तमाह -- दीप्तानलार्कद्युर्ति दीप्तौ यावनलार्कौ तयोर्द्युतिरिव द्युतिर्यस्य तादृशम्। अप्रमेयं प्रमातुमयोग्यं त्वां समन्तात् दुर्निरीक्ष्यं पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.17।। किंच -- किरीटिनमिति। किरीटिनं मुकुटवन्तं गदिनं गदावन्तं चक्रिणं चक्रवन्तं सर्वतो दीप्तिमन्तं तेजःपुञ्जरूपम्? तथा दुर्निरीक्ष्यं द्रष्टुमशक्यम्। तत्र हेतुःदीप्तयोरनलार्कयोर्द्युतिरिव द्युतिस्तेजो यस्य तम्। अत एवाप्रमेयमेवंभूत इति निश्चेतुमशक्यं त्वां समंततः पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.17।।किरीटिनमिति। अत्र बहव एव पारमेष्ठ्यपदभूताः किरीटादयो ज्ञेयाः? नैकाङ्गत्वात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.17।। तथा --, शिरके भूषणविशेषका नाम किरीट है? वह जिसके शिरपर हो उसे किरीटी कहते हैं। जिसके पास गदा हो वह गदी है। जिसके हाथमें चक्र हो वह चक्री है। इस प्रकार? मैं आपको किरीटी -- किरीटयुक्त? गदीगदायुक्त? चक्रीचक्रयुक्त? तेजोराशि -- तेजका समूह और सर्वतोदीप्तिमान् -- सब ओरसे दीप्तिशाली देख रहा हूँ। तथा आपको दुर्निरीक्ष्य -- जो कठिनतासे देखा जा सके ऐसा? एवं सब ओरसे प्रज्वलित अग्नि और सूर्यके समान प्रकाशमय और बुद्धि आदिसे जिसका ग्रहण न हो सके? ऐसा अप्रमेयस्वरूप देखता हूं? प्रदीप्त यानी प्रकाशित अग्नि और अर्क यानी सूर्य इन दोनोंके समान जिसका प्रकाश -- तेज हो उसका नाम दीप्तानलार्कद्युति है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.17।। व्याख्या -- किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च -- आपको मैं किरीट? गदा और चक्र धारण किये हुए देख रहा हूँ। यहाँ च पदसे शङ्क और पद्मको भी ले लेना चाहिये। इसका तात्पर्य ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनको विश्वरूपमें भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप भी दीख रहा है।तेजोराशिम् -- आप तेजकी राशि हैं? मानो तेजका समूहकासमूह (अनन्त तेज) इकट्ठा हो गया हो। इसका पहले सञ्जयने वर्णन किया है कि आकाशमें हजारों सूर्य एक साद उदित होनेपर भी भगवान्के तेजकी बराबरी नहीं कर सकते (11। 12)। ऐसे आप प्रकाशस्वरूप हैं।सर्वतो दीप्तिमन्तम् -- स्वयं प्रकाशस्वरूप होनेसे आप चारों तरफ प्रकाश कर रहे हैं।पश्यामि त्वं दुर्निरीक्ष्यं समन्ताद् दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् -- खूब देदीप्यमान अग्नि और सूर्यके समान आपकी कान्ति है। जैसे सूर्यके तेज प्रकाशके सामने आँखें चौंध जाती हैं? ऐसे ही आपको देखकर आँखें चौंध जाती हैं। अतः आप कठिनतासे देखे जानेयोग्य हैं। आपको ठीक तरहसे देख नहीं सकते।[यहाँ एक बड़े आश्चर्यकी बात है कि भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी थी? पर वे दिव्यदृष्टिवाले अर्जुन भी विश्वरूपको देखनेमें पूरे समर्थ नहीं हो रहे हैं ऐसा देदीप्यमान भगवान्का स्वरूप है]आप सब तरफसे अप्रमेय (अपरिमित) हैं अर्थात् आप प्रमा(माप) के विषय नहीं है। प्रत्यक्ष? अनुमान? उपमान? शब्द? अर्थापत्ति? अनुपलब्धि आदि कोई भी प्रमाण आपको बतानेमें काम नहीं करता क्योंकि प्रमाणोंमें शक्ति आपकी ही है। सम्बन्ध -- अब आगेके श्लोकमें अर्जुन भगवान्को निर्गुणनिराकार? सगुणनिराकार और सगुणसाकाररूपमें देखते हुए भगवान्की स्तुति करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.17।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.17।।विश्वरूपवन्तं भगवन्तमेव प्रकारान्तरेण प्रपञ्चयति -- किञ्चेति। परिच्छिन्नत्वं व्यावर्तयति -- सर्वत इति। दुर्निरीक्ष्यं पश्यामीत्यधिकारिभेदादविरुद्धम्। पुरतो वा पृष्ठतो वा पार्श्वतो वा नास्य दर्शनं किंतु सर्वत्रेत्याह -- समन्तत इति। दीप्तिमत्त्वं दृष्टान्तेन स्पष्टयति -- दीप्तेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.17।।नन्वनलार्कद्युतिमित्युक्तत्वात् सहस्रशब्दोऽनन्तवाचीत्याद्युक्तमयुक्तमिति चेत्? न एतदेवाशङ्क्य प्रत्यायनार्थमेवैतदुक्तम्? वस्तुतस्त्वपरिच्छिन्नद्युतिरेव भगवानिति स्वयमेवोक्तत्वादित्याह -- अनलेति। इत्युक्ते जातां द्युतेर्मित त्वशङ्काम्। एतच्च सविशेषणविशेषत्वात् द्युत्या सम्बध्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.17।।अनलार्कद्युतिमित्युक्ते मितत्वशङ्कामपाकरोति -- अप्रमेयमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.17।। --,किरीटिनं किरीटं नाम शिरोभूषणविशेषः तत् यस्य अस्ति सः किरीटी तं किरीटिनम्? तथा गदिनं गदा अस्य विद्यते इति गदी तं गदिनम्? तथा चक्रिणं चक्रम् अस्य अस्तीति चक्री तं चक्रिणं च? तेजोराशिं तेजःपुञ्जं सर्वतोदीप्तिमन्तं सर्वतोदीप्तिः अस्य अस्तीति सर्वतोदीप्तिमान्? तं सर्वतोदीप्तिमन्तं पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं दुःखेन निरीक्ष्यः दुर्निरीक्ष्यः तं दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् समन्ततः सर्वत्र दीप्तानलार्कद्युतिम् अनलश्च अर्कश्च अनलार्कौ दीप्तौ अनलार्कौ दीप्तानलार्कौ तयोः दीप्तानलार्कयोः द्युतिरिव द्युतिः तेजः यस्य तव स त्वं दीप्तानलार्कद्युतिः? तं त्वां दीप्तानलार्कद्युतिम् अप्रमेयं न प्रमेयम् अशक्यपरिच्छेदम् इत्येतत्।।इत एव ते योगशक्तिदर्शनात् अनुमिनोमि --,
───────────────────
【 Verse 11.18 】
▸ Sanskrit Sloka: त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | त्वमव्यय: शाश्वतधर्मगोप्ता सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे ||
▸ Transliteration: tvamakṣaraṁ paramaṁ veditavyaṁ tvamasya viśvasya paraṁ nidhānam | tvamavyayaḥ śāśvata-dharma-goptā sanātanastvaṁ puruṣo mato me ||
▸ Glossary: tvaṁ: You; akṣaraṁ: inexhaustible; paramaṁ: supreme; veditavyaṁ: to be understood; tvaṁ: You; asya: of this; viśvasya: of the universe; paraṁ: supreme; nidhānam: basis; tvaṁ: You are; avyayaḥ: inexhaustible; śāśvata dharma goptā: maintainer of the eternal religion; sanātanaḥ: eternal; tvaṁ: You; puruṣaḥ: supreme personality; mato me: is my opinion
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.18 You are the imperishable; the supreme being worthy to be known. You are the great treasure house of this Universe. You are the imperishable protector of the eternal order. I believe You are the eternal being.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.18।।आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं? आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं? आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं -- ऐसा मैं मानता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.18।। आप ही जानने योग्य (वेदितव्यम्) परम अक्षर हैं आप ही इस विश्व के परम आश्रय (निधान) हैं आप ही शाश्वत धर्म के रक्षक हैं और आप ही सनातन पुरुष हैं?ऐसा मेरा मत है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.18 त्वम् Thou? अक्षरम् imperishable? परमम् the Supreme Being? वेदितव्यम् worthy to be known? त्वम् Thou? अस्य (of) this? विश्वस्य of universe? परम् the great? निधानम् treasurehouse? त्वम् Thou? अव्ययः imperishable? शाश्वतधर्मगोप्ता Protector of the Eternal Dharma? सनातनः ancient? त्वम् Thou? पुरुषः Purusha? मतः thought? मे of me.Commentary VisvasyaNidhaanam Treasurehouse of this universe? also means abode or refuge or the substratum of this universe. It is because of this that all the beings in the universe are preserved and protected. He is the inexhaustibel source to Whom the devotee turns at all times. Deluded indeed are they that ignore this divine treasurehouse and runa fter the shadow of the objects of the senses which do not contain even an iota of pleasure.Veditavyam To be known by the aspirants or seekrs of liberation? through Sravana (hearing of the scriptures)? Manana (reflection) and Nididhyasana (meditation).Avyayah means inexhaustible? unchanging? undying.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.18. You are the imperishable, the Supreme Being to be known; You are the ultimate place of rest for this universe; You are changeless and the guardian of the pious act of the Satvatas; You are the everlasting Soul, I believe.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.18 Imperishable art Thou, the Sole One worthy to be known, the priceless Treasure-house of the universe, the immortal Guardian of the Life Eternal, the Spirit Everlasting.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.18 You are the Imperishable, Supreme One to be realised. You are the Supreme Substratum of this universe. You are immutable, the guardian of the eternal law, I know You are the Supreme Person who is everlasting.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.18 You are the Immutable, the supreme One to be known; You are the most perfect repository of this Universe. You are the Imperishable, the Protector of the ever-existing religion; You are the eternal Person. This is my belief.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.18 Thou art the Imperishable, the Supreme Being, worthy to be known. Thou art the great treasure-house of this universe; Thou art the imperishable protector of the eternal Dhrama; Thou art the Primal Person, I deem.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.18 Tvam aksaram etc. Guardian of the pious acts of the Satvatas. Satvatas are the same as the Satvatas i.e. those who are established in the Truth that does not take cognizance of any difference between the Action (11.Spanda) and the Consciousness; the Truth which is nothing but Existentiality and is in the form of Awarenes. Their pious act is that act [of meditation] of theirs which - on account of its being continously engaged in the process of undertaking and rejecting [things] - consists of the act of emanation and absorption, and is the most superior of all the paths [leading to salvation]. The Lord protects that pious act. This is the secret in this chapter and it has been made almost clear by me (11.Ag.) in my (11.Ag.'s) Vivrti (11.Commentary) on the Devistotra (11.Goddess-Hymn). That is self-evident to the learned readers, with critical accuman, and initiation. Hence, why to take recourse to the verbiage of explaining again and again what is already known very clearly.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.18 You alone are the Supreme 'Imperishable Person' indicated as that which ought to be realised in such Upanisadic passages as: 'Two sciences are to be known' (Mun. U., 1.1.4). You alone are the 'Supreme Substratum' of the universe, i.e., supreme support of this universe. You are 'immutable', namely, not liable to mutation. Whatever might be your attributes and divine manifestations, You remain unchanged in Your form. You alone are the guardian of 'the eternal law' - You who protect the eternal Dharma of the Veda by incarnations like this. I know you are the everlasting Person. I know You are the eternal Person, described in such passages as, 'I know this great Purusa' (Tai. A., 3.12.7) and 'Person who is higher than the high' (Mun. U., 3.2.8). You, who were till now known to me as the most distinguished of the race of Yadu, have been realised by me now through direct perception as of this nature, i.e., of a nature unknown to me before. Such is the meaning.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.18 Tvam, You; are the aksaram, Immutable; the paramam, supreme One, Brahman; veditavyam, to be known-by those aspiring for Liberation. You are the param, most perfect; nidhanam, repository-where things are deposited, i.e. the ultimate resort; asya visvasya, of this Universe, of the entire creation. Further. You are the avyayah, Imperishable-there is no decay in You; the sasvata-dharma-gopta, Protector (gopta) of the ever-existing (sasvata) religion (dharma). You are the sanatanah, eternal; transcendental purusah, Person. This is me, my; matah, belief-what is meant by me. Moreover,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.18।। सभी बुद्धिमान् पुरुष अपने प्रत्येक अनुभव से किसी निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं? जो उनका ज्ञान कहलाता है। अर्जुन को भी ऐसा ही एक अनुभव हो रहा था? जो अपनी सम्पूर्णता में बुद्धि से अग्राह्य और शब्दों से अनिर्वचनीय था। परन्तु उसने जो कुछ देखा? उससे वह कुछ निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करता है। इस अनुभव को समझकर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस विराट्स्वरूप के पीछे जो शक्ति या चैतन्य है? वही अविनाशी परम सत्य है।समुद्र में उत्पत्ति? स्थिति और लय को प्राप्त होने वाली समस्त तरंगांे का प्रभव या स्रोत समुद्र होता है। वही उन तरंगों का निधान है। निधान का अर्थ है जिसमें वस्तुएं निहित हों अर्थात् उनका आश्रय। इसी प्रकार अर्जुन भी इस बुद्धिमत्तापूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचता है कि विराट् पुरुष ही सम्पूर्ण विश्व का निधान अर्थात् अधिष्ठान है। विश्व शब्द से केवल यह दृष्ट भौतिक जगत् ही नहीं समझना चाहिये। वेदान्त के अनुसार जो वस्तु दृष्ट अनुभूत या ज्ञात है? वह विश्व शब्द की परिभाषा में आती है? इस परिभाषा के अनुसार विषय तथा उनके ग्राहक करण इन्द्रिय? मन आदि सब विश्व है और पुरुष उसका निधान है।विकारी वस्तुओं के विकारों अर्थात् परिवर्तनों के लिए एक अविकारी अधिष्ठान की आवश्यकता होती है। यह परिवर्तनशील जगत् सदैव देश और काल की धुन पर नृत्य करता रहता है। परन्तु? घटनाओं की निरंतरता का अनुभव कर उनका एक सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक नित्य अपरिवर्तनशील ज्ञाता का होना अत्यावश्यक है। वह ज्ञाता किसी भी प्रकार से स्वयं उन घटनाओं में लिप्त नहीं होता है। ऐसा यह अविकारी चेतन तत्त्व ही वह सत्य आत्मा है? जो इतने विशाल विश्वरूप को धारण कर सकता है। इन विचारों को ध्यान में रखकर अर्जुन यह घोषणा करता है कि वह चेतन तत्त्व? जिसने स्वयं को इस आश्चर्यमय रूप में परिवर्तित कर लिया है? वही एकमेव अविनाशी अपरिवर्तनशील सत्य है? जो इस विकारी जगत् में सर्वत्र व्याप्त है।हिन्दुओं के मत के अनुसार धर्म का रक्षक स्वयं परमेश्वर है? और न कि एक र्मत्य राजा या पुरोहित वर्ग। हिन्दू लोग किसी ऐसे आकस्मिक देवदूत के अनुयायी नहीं हैं? जिसका क्षणिक ऐतिहासिक अस्तित्त्व था और जिसके जीवन का कार्य तत्कालीन पीढ़ी की यथासंभव सेवा करना था। हिन्दुओं के लिए सनातन सत्य पुरुष ही लक्ष्य है? गुरु है और मार्ग भी है। धर्म की रक्षा के लिए हमें विषैली गैस अथवा अणुबम जैसी किसी लौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं है।आप ही सनातन पुरुष हैं? ऐसा मेरा मत है वेदान्त के एक रूपक के अनुसार स्थूल शरीर को एक राजनगरी के समान माना गया है और जिसके नौ द्वार हैं। प्रत्येक का नियंत्रण तथा रक्षण एकएक अधिष्ठातृ देवता के द्वारा किया जाता है। इस नवद्वार पुरी में निवास करने वाला चैतन्य तत्त्व पुरुष कहलाता है।इस श्लोक के संदर्भ में इसका अभिप्राय यह है कि हमारे जीवन की पहेली का समाधान इस सनातन पुरुष की प्राप्ति में ही है? न कि बाह्य जगत् के विषयों में। यह पुरुष ही विश्व का अधिष्ठान है? जो विश्वरूप को धारण कर सकता है? जिसको अर्जुन विस्मय भरी दृष्टि से देख रहा है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.18।।दृष्ट्वा चानुमिनोमि। त्वमक्षरं न क्षरतीत्यक्षरं परमं ब्रह्म श्रुवणादिना मुमुक्षुभिर्वेदितव्यं ज्ञातव्यं त्वमेव। यतोऽस्य विश्वस्य परं प्रकृष्टं निधानं निधीयतेऽस्मिन्निति निधानं परः आश्रयस्त्वमेव। किंच त्वमव्ययो विनाशरहितः पुनश्च शश्वदभवस्य नित्यस्य नित्यवेदबोधितस्य धर्मस्य गोप्ता रक्षकोऽतस्त्वं चिरंतनः पुरुषो ममाभिमतः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.18।।एवं तवातर्क्यनिरतिशयैश्वर्यदर्शनादनुमिनोमि -- त्वमिति। त्वमेवाक्षरं परमं ब्रह्म वेदितव्यं मुमुक्षुभिर्वेदान्तश्रवणादिना। त्वमेवास्य विश्वस्य परं प्रकृष्टं निधीयतेऽस्मिन्निति निधानमाश्रयः। अतएव त्वमव्ययो नित्यः शाश्वतस्य नित्यवेदप्रतिपाद्यतयाऽस्य धर्मस्य गोप्ता पालयिता। शाश्वतेति संबोधनं वा। तस्मिन्पक्षेऽव्ययो विनाशरहितः। अतएव सनातनश्चिरन्तनः पुरुषो यः परमात्मा स एव त्वं मे मतो विदितोसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.18।।एवं तव योगैश्वर्यदर्शनात्त्वामेवमवैमीति वदन्नप्रमेयत्वमेव विवृणोति -- त्वमिति। परममक्षरमस्थूलादिलक्षणम्।अक्षरं ब्रह्म परमम् इत्यत्र प्रागुक्तं निष्कलं ब्रह्म तदेव त्वमसि। एतेन सगुणरूपस्य निर्गुणज्ञापकत्वमुक्तम्। शाखाग्रस्येव चन्द्रज्ञापकत्वम्। अतएव वेदितव्यं वेदान्तप्रमाणेन ज्ञातुं योग्यं नतूपासनीयम्। सगुणं ब्रह्मापि त्वमेवेत्याह -- त्वमस्येति। निधानं लयस्थानम्। एतेन कारणत्वमुक्तम्। अव्ययः अमृतः देवत्वात्। शाश्वतस्य वैदिकस्य धर्मस्य गोप्तेत्यनेन कार्यब्रह्मभूतहिरण्यगर्भरूपत्वमुक्तम्।,सनातनश्चिरन्तनोऽनादिपुरुषो जीवात्मा सोऽपि त्वमेव मे मम मतः। एवं विश्वरूपदर्शने जीवब्रह्मणोरैक्यं शाखया चन्द्र इवाधिगम्यत इत्युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.18।।एवम्भूतस्वरूपदर्शनेन स्वज्ञानार्थं निवेदयति -- त्वमिति। अक्षरं अक्षरस्वरूपं त्वमेव परमं ब्रह्म। त्वं वेदितव्यं भक्तानां ज्ञानिनां ज्ञेयरूपस्त्वमेव। अक्षरत्वेन सर्वोत्पत्तिकारणता निरूपिता। लयस्वरूपमाह -- त्वमस्यविश्वस्य परमुत्कृष्टं मोक्षरूपं निधानं निधीयतेऽस्मिन्निति लयस्थानम्। पालकत्वमाह -- शाश्वतस्य नित्यस्य धर्मस्य गोप्ता पालको रक्षकस्त्वम्। एवमपि न गुणात्मकः? किन्तु अव्ययोऽविनाशी नित्यः। एवं सर्वधर्मानुक्त्वा मुख्यं स्वनिश्चिततामाह -- सनातनः पुरुषः पुरुषोत्तमो मे मम मतः सम्मत इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.18।। यस्मादेवं तवातर्क्यमैश्वर्यं तस्मात् -- त्वमिति। त्वमेवाक्षरं परमं ब्रह्म। कथंभूतम्। वेदितव्यं मुमुक्षुभिर्ज्ञातव्यम्। त्वमेवास्य विश्वस्य परं निधानं निधीयतेऽस्मिन्निति निधानं प्रकृष्टाश्रयः। अतएव त्वमव्ययो नित्यः शाश्वतस्य नित्यस्य धर्मंस्य गोप्ता पालकः सनातनश्चिरंतनः पुरुषो मे मतः संमतोऽसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.18।।यस्मादेवं तस्मात् -- त्वमक्षरमिति। ब्रह्मविशेषणतया व्याख्येयं ज्ञानिभिर्वेदितव्यं यदुक्तं तत्त्वमसि [छा.उ.6।8।715]सनातनः पुरुषः इति समष्टिभूतस्याप्यव्यक्तः कारणभूतः पुरुषलिङ्गकः। न तु स्त्रीलिङ्गाव्यक्ताप्रकृतिरेवम्भूता सर्वत्र निर्वक्तुं शक्या अव्यक्तस्याक्षरस्य पुरुषत्वेन निर्द्देशात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.18।।इसीलिये अर्थात् आपकी योगशक्तिको देखकर ही मैं अनुमान करता हूँ --, आप मुमुक्षु पुरुषोंद्वारा जाननेयोग्य परमअक्षर अर्थात् जिसका कभी नाश न हो ऐसे परमब्रह्म परमात्मा हैं। आप ही इस समस्त जगत्के परम उत्तम निधान हैं -- जिसमें कोई वस्तु रक्खी जाय उसे निधान कहते हैं? सो आप इस संसारके परम आश्रय हैं। इसके सिवा आप अविनाशी हैं अर्थात् आपका कभी नाश नहीं होता? इसलिये आप नाशरहित हैं और सनातनधर्मके रक्षक हैं अर्थात् जो सदासे है? ऐसे नित्यधर्मके आप रक्षक हैं और आप ही सनातन परमपुरुष हैं -- यह मेरा मत है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.18।। व्याख्या -- त्वमक्षरं परमं वेदितव्यम् -- वेदों? शास्त्रों? पुराणों? स्मृतियों? सन्तोंकी वाणियों और तत्त्वज्ञ जीवन्मुक्त महापुरुषोंद्वारा जाननेयोग्य जो परमानन्दस्वरूप अक्षरब्रह्म है? जिसको निर्गुणनिराकार कहते हैं? वे आप ही हैं।त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् -- देखने? सुनने और समझनेमें जो कुछ संसार आता है? उस संसारके परम आश्रय? आधार आप ही हैं। जब महाप्रलय होता है? तब सम्पूर्ण संसार कारणसहित आपमें ही लीन होता है और फिर महासर्गके आदिमें आपसे ही प्रकट होता है। इस तरह आप इस संसारके परम निधान हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुणनिराकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]त्वं शाश्वतधर्मगोप्ता -- जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है? तब आप ही अवतार लेकर अधर्मका नाश करके सनातनधर्मकी रक्षा करते हैं। [इन पदोंसे अर्जुन सगुणसाकारका वर्णन करते हुए स्तुति करते हैं।]अव्ययः सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे -- अव्यय अर्थात् अविनाशी? सनातन? आदिरहित? सदा रहनेवाले उत्तम पुरुष आप ही हैं? ऐसा मैं मानता हूँ। सम्बन्ध -- पंद्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक आश्चर्यचकित करनेवाले देवरूपका वर्णन करके अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन उस विश्वरूपकी उग्रता? प्रभाव? सामर्थ्यका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.18।।समनन्तरेणाध्यायेन य एवार्थ उक्तस्तमेव प्रत्यक्षीकर्तुमर्जुनः पृच्छति (S?N?K (n) add स एव चायमुद्यमः after पृच्छति)। यो ह्युपदेशक्रमेणार्थोऽवगतः स एव प्रत्यक्षसंविदोपारुह्यमाणः स्फुटीभवति। तदर्थमेवेमे उक्तिप्रत्युक्ती उच्येते -- त्वमक्षरमिति। सात्वतधर्मगोप्तेति। सत् सत्यं क्रियाज्ञानयोरुभयोरपि भेदाप्रतिभासात्मकं तथा,(S??N?K (n) add परमगुरौ महादेवेऽर्पणम् before तथा See Ag. XII? 11 and our note No. 13 thereon) सत्तात्मकं प्रकाशरूपं (S?K (n) प्रकाशशीलम्) तत्त्वं विद्यते येषां ते सात्वताः। तेषां धर्मः अनवरतग्रहणसंन्यासपरत्वात् सृष्टिसंहारविषयः सकलमार्गोत्तीर्णः? तं गोपायत्रे। एतदेवात्राध्याये रहस्यं प्रायशो देवीस्तोत्रविवृतौ मयप्रकाशितम्। तत् सहृदयैः सोपदेशैः स्वयमेवावगम्यते इति किं पुनः पुनः स्फुटतरप्रकाशनवाचालतया।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.18।।सप्रपञ्चे भगवद्रूपे प्रकृते प्रकरणविरुद्धं त्वमक्षरमित्यादिनिरुपाधिकवचनमित्याशङ्क्याह -- इतएवेति। योगशक्तिरैश्वर्यातिशयः। न क्षरतीति निष्प्रपञ्चत्वमुच्यते। परमपुरुषार्थत्वात्परमार्थत्वाच्च ज्ञातव्यत्वम्। यस्मिन्द्यौः पृथिवीत्यादौ प्रपञ्चायतनस्यैव ततो निकृष्टस्य ज्ञातव्यत्वश्रवणात्। कुतो ब्रह्मणो ज्ञातव्यत्वं तत्राह -- त्वमस्येति। निष्प्रपञ्चस्य ब्रह्मणो ज्ञेयत्वे हेत्वन्तरमाह -- किञ्चेति। अविनाशित्वात्तवैव ज्ञातव्यत्वादतिरिक्तस्य नाशित्वेन हेयत्वादित्यर्थः। ज्ञानकर्मात्मनो धर्मस्य नित्यत्वं वेदप्रमाणकत्वं धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामीत्युक्तत्वाद् गोप्ता रक्षिता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.18।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.18।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.18।। --,त्वम् अक्षरं न क्षरतीति? परमं ब्रह्म वेदितव्यं ज्ञातव्यं मुमुक्षुभिः। त्वम् अस्य विश्वस्य समस्तस्य जगतः परं प्रकृष्टं निधानं निधीयते अस्मिन्निति निधानं परः आश्रयः इत्यर्थः। किञ्च? त्वम् अव्ययः न तव व्ययो विद्यते इति अव्ययः? शाश्वतधर्मगोप्ता शश्वद्भवः शाश्वतः नित्यः धर्मः तस्य गोप्ता शाश्वतधर्मगोप्ता। सनातनः चिरंतनः त्वं पुरुषः परमः मतः अभिप्रेतः मे मम।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.19 】
▸ Sanskrit Sloka: अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य- मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् | पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं-
स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् ||
▸ Transliteration: anādi-madhyāntam ananta-vīryam ananta-bāhuṁ śaśisūrya netram | paśyāmi tvāṁ dīpta-hutāśavaktraṁ svatejasā viśvam idaṁ tapantam ||
▸ Glossary: anādi: without beginning; madhya: middle; antaṁ: end; ananta: unlimited; vīryaṁ: glorious; ananta: unlimited; bāhuṁ: arms; śaśi: moon; sūrya: sun; netram: eyes; paśyāmi: I see; tvāṁ: You; dīpta: blazing; hutāśa vaktraṁ: fire coming out of Your mouth; svatejasā: by Your; viśvam: this universe; idaṁ: this; tapantaṁ: scortching
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.19 I see you without a beginning, middle or end, infinite in power and many arms, The sun and the moon being Your eyes, the blazing fire your mouth, the whole universe scorched by Your radiance.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.19।।आपको मैं आदि? मध्य और अन्तसे रहित? अनन्त प्रभावशाली? अनन्त भुजाओंवाले? चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोंवाले? प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और अपने तेजसे संसारको संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.19।। मैं आपको आदि? अन्त और मध्य से रहित तथा अनंत सार्मथ्य से युक्त और अनंत बाहुओं वाला तथा चन्द्रसूर्यरूपी नेत्रों वाला और दीप्त अग्निरूपी मुख वाला तथा अपने तेज से इस विश्व को तपाते हुए देखता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.19 अनादिमध्यान्तम् without beginning? middle or end? अनन्तवीर्यम् infinite in power? अनन्तबाहुम् of endless arms? शशिसूर्यनेत्रम् Thy eyes as the sun and the moon? पश्यामि (I) see? त्वाम् Thee? दीप्तहुताशवक्त्रम् Thy mouth as the burning fire? स्वतेजसा with Thy radiance? विश्वम् the universe? इदम् this? तपन्तम् heating.Commentary Anantabahu Having endless arms. This denotes that the multiplicity of His limbs are endless.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.19. I observe You having to beginning, no middle and no end; having infinite creative power, and infinite arms; as havig the moon and the sun for Your eyes, and the blazing fire for Your mouth; [and] as acorching this universe with Your rediance.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.19 Without beginning, without middle and without end, infinite in power, Thine arms all-embracing, the sun and moon Thine eyes, Thy face beaming with the fire of sacrifice, flooding the whole universe with light.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.19 I behold You as without beginning, middle and end. Your might is infinite. You are endowed with an endless number of arms. The sun and moon are Your eyes. Your mouth is emitting burning fire. With Your own radiance You are warning the whole universe.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.19 I see You as without beginning, middle and end, possessed of infinite valour, having innumerable arms, having the sun and the moon as eyes, having a mouth like a blazing fire, and heating up this Universe by Your own brilliance.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.19 I see Thee without beginning, middle or end, infinite in power, of endless arms, the sun and the moon being Thy eyes, the burning fire Thy mouth, heating the whole universe with Thy radiance.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.19 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.19 I behold You as without beginning, middle and end. Your might is infinite, of unsurpassed excellence. Here the term 'might' is used for illustration. The meaning is that You are the sole repository of knowledge, strength, sovereignty, valour, power and glory, one whose excellence cannot be surpassed. Your arms are infinite, i.e., they are countless. This is also for illustration, implying that You have an infinite number of arms, stomachs, feet, mouths etc. The sun and moon are Your eyes; all Your eyes are like the moon and the sun, beaming with grace and power. The grace is directed towards the devotees like the gods who offer salutations etc., and power is directed against Asuras, Raksasas etc., who are opposed to these. For it will be said later on: 'The Raksasas flee on all sides in fear, and all the hosts of Siddhas bow down to You' (11.36). Your mouth is emitting fire, namely, the fire appropriate for destroying all things, as the Fire of Time consumes the world at the time of dissolution. With Your own radiance You are warming the universe. By radiance (Tejas) is meant the poweer to vanish others. I behold You warming (or governing) the universe with Your own radiance. The meaning is this: 'I directly realise You' as taught before as the Creator of all, as the supporter of everything, as the sovereign over everything, as the destroyer of everything, as the ocean of knowledge and other infinite attributes, as without beginning, middle and end, and as possessing a divine body of this nature. How, in one divine body, can there be many stomachs etc.? This is possible in the following way: From a hip of infinite extent, stomachs etc., as described, branc off upwards. The divine feet etc., branch off downwards. So there is no contradiction in attributing a pair of eyes for each face.
'On perceiving You to be thus, the gods etc., and myself, have become frightened - says Arjuna in the following words:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.19 Pasyami, I see; tvam, You; as anadi-madhya-antam, without beginning, middle and end; ananta-viryam, possessed of infinite valour; and also ananta-bahum, having innumerable arms; sasi-surya-netram, having the sun and the moon as the eyes; dipta-hutasavakram, having a mouth like a blazing fire; tapantam, heating up; idam, this; visvam, Universe; sva-tejasa, by Your own birlliance.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.19।। अर्जुन की सूक्ष्म दृष्टि ने जैसा देखा और बुद्धि ने जैसा समझा? उसे वह जगत् की वस्तुओं की भाषा में वर्णन करने का प्रयत्न करता है। मैं आपको आदि? अन्त और मध्य से रहित? अनन्त सार्मथ्य से युक्त? अनन्त बाहुओं वाला देखता हूँ। व्यास के प्रभावशाली काव्य द्वारा चित्रित यह शब्दचित्र ऐसा आभास निर्माण करता है कि मानों इस कविता की विषयवस्तु बाह्यजगत् की कोई दृश्य वस्तु हैं। अनेक चित्रकार उसे कागज पर रंगों के द्वारा चित्रित करना चाहते हैं। परन्तु वेदान्त के बुद्धिमान् विद्यार्थी को उनका अज्ञान स्पष्ट दिखाई देता है। आदि? मध्य और अन्त रहित ऐसी अनन्त वस्तु कभी सीमित फलक वाले चित्र की मर्यादा में व्यक्त नहीं की जा सकती। परन्तु? अनन्तबाहु इस शब्द को सुनकर प्रेरित हुए चित्रकार उसे तत्काल चित्रित करने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुत? कवि के इन्द्रियातीत अनुभव की दृष्टि के समक्ष जगत् की सभी दृश्यावलियों से सर्वथा भिन्न और अनुपम जो विराट् दृश्य उपस्थित है? वास्तव में उसे केवल गम्भीर अध्ययनकर्ता सूक्ष्मदर्शी विद्यार्थी ही समझ,सकते हैं।यहाँ अनन्तबाहु का अर्थ केवल यह है कि परमात्मा ही वह चेतन तत्त्व है? जो समस्त बाहुओं को कार्य करने और सफलता पाने की आवश्यक सार्मथ्य प्रदान करता है।जो प्रकाश तत्त्व बाह्य वस्तुओं को प्रकाशित करता है वही हमारे नेत्रों पर भी अनुग्रह करता हुआ उन्हें वस्तु के दर्शन करने की योग्यता प्रदान करता है। यहाँ किया गया वर्णन समष्टि की दृष्टि से है? क्योंकि जगत् में हम सूर्य या चन्द्रमा के प्रकाश में वस्तुओं को देखते हैं? उन्हें यहाँ वेदान्त की शास्त्रीय भाषा में विराटपुरुष के नेत्र कहा गया है। हुताशवक्त्रम् (दीप्त अग्निरूपी मुखवाला) हुताश का अर्थ है अग्नि। वाणी का अधिष्ठाता देवता अग्नि है। इसीलिए? सभी भाषाओं में इस प्रकार के वाक्प्रचार प्रसिद्ध हैं कि उनमें गरमागरम बहस हुई? उसके उस वाक्य ने चिनगारी का काम किया इत्यादि। मुख ही भक्षण का तथा वाणी का स्थान होने से यहाँ अग्नि को विराटपुरुष का मुख कहा गया है।अपने तेज से विश्व को तपाते हुए आत्मा चैतन्य स्वरूप ही हो सकता है? क्योंकि प्राणीमात्र के समस्त अनुभवों को सर्वदा चैतन्य ही प्रकाशित करता है। यह चैतन्य न केवल वस्तुओं को प्रकाशित करता है? वरन् सूर्य के द्वारा समस्त विश्व के जीवन के लिए आवश्यक उष्णता भी प्रदान करता है। इस कथन से यह सिद्ध हो जाता है कि बाह्य जगत् का निरीक्षण और अध्ययन करने के पश्चात् ही हिन्दू ऋषियों ने अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी बनाया था। ऐसा प्रतीत होता है कि वे यह जानते थे कि किसी एक विशेष तापमान पर ही पृथ्वी पर जीवन संभव है उससे न्यून या अधिक तापमान होने पर जीवन लुप्त हो जायेगा।सत्य का यह प्रकाश उसका स्वस्वरूप है? और न कि किसी अन्य स्रोत से प्राप्त किया हुआ है। स्वतेजसा शब्द से यह बात स्पष्ट की गई है। उसी से जीवन धारण किया हुआ है।अर्जुन आगे कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.19।।भगवतः परमरुपुषत्वं प्रकारान्तरेण निरुपयति -- अनादीति। आदिमध्यान्तवर्जितं अनन्ववीर्यं अपरिमितपराक्रमं यतोऽनन्ता बाहवो यस्य चन्द्रसूर्यौ नेत्रे दीप्तश्चासौ वह्निश्च वक्रं यस्य तम्। अतः स्वतेजसा इदं विश्वं संतापयन्तं त्वां पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.19।।किंच -- अनादीति। आदिरुत्पत्तिर्मध्यं स्थितिरन्तो विनाशस्तद्रहितं अनादिमध्यान्तं। अनन्तं वीर्यं प्रभावो यस्य तं। अनन्ता बाहवो यस्य तं। उपलक्षणमेतन्मुखादीनामपि। शशिसूर्यौ नेत्रे यस्य तं। दीप्तो हुताशो वक्त्रं यस्य? वक्त्रेषु यस्येति वा तं। स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तं संतापयन्तं त्वा त्वां पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.19।।एतदेवाह -- अनादीति। देशतः कालतश्चादिमध्यान्तहीनत्वादनादिमध्यान्तम्। दीप्तो हुताशो वक्त्रे यस्येति भास्वरदन्तत्वं व्यज्यते। स्वतेजसा चैतन्यज्योतिषा इदं विश्वं विश्वरूपं तपन्तं प्रकाशयन्तम्। अनादित्वादिसर्वविशेषणविशिष्टं विश्वं तपिकर्मीभूतं तापयन्तं त्वां परज्योतीरूपं पश्यामि जानामि। चित्रपटस्थानीयं विश्वरूपं सकलकारकात्मकधीवासनोपेतं येन ज्योतिषा प्रकाशते तदेव त्वमसीति जानामीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.19।।एवं पुरुषोत्तममुक्त्वा दृष्टं विश्वरूपमाह -- अनादीत्यादिना। अनादिमध्यान्तं न विद्यते आदिर्मध्यं अन्तश्च यस्य उत्पत्तिस्थितिप्रलयरहितम्? -- अनन्तं वीर्यं पराक्रमो यस्य तम्। अनन्तबाहुं अनन्ताः क्रियाशक्तयो यस्य? शशिसूर्यनेत्रं शशिसूर्यौ नेत्रे यस्य? दीप्तहुताशवक्त्रं दीप्तो धूमादिरहितो हुताशः अग्निर्वक्त्रेषु यस्य तम्? स्वतेजसा इदं परिदृश्यमानं विश्वं तपन्तं तेजोयुक्तं त्वां पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.19।। किंच -- अनादीति। अनादिमध्यान्तमुत्पत्तिस्थितिप्रलयरहितम्। अनन्तं वीर्यं प्रभावो यस्य तम्। अनन्तबाहुं अनन्ता बाहवो यस्य तम्। शशिसूर्यौ नेत्रे यस्य तम् तादृशं त्वां पश्यामि। तथा दीप्तो हुताशोऽग्निर्वक्त्रेषु यस्य तम् स्वतेजसा इदं विश्वं तपन्तं संतापयन्तं पश्यामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.19।।किञ्च अनादिमध्यान्तमिति। कालरूपमेतदाधिदैविकं तदाह -- शशिसूर्यनेत्रमिति। कालाभिमानिनौ शशिसूर्यौ नेत्रे यस्य। तथा सायङ्कालाभिमानी दीप्तो हुताशश्च वक्त्रेषु यस्य तं त्वां पश्यामि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.19।। तथा --, ( मैं ) आपको आदि? मध्य और अन्तसे रहित अर्थात् जिसका आदि? मध्य और अन्त नहीं है? ऐसे रूपवाला और अनन्तवीर्य -- अनन्त सामर्थ्यसे युक्त देखता हूँ? आपकी सामर्थ्यका अन्त नहीं है? इसलिये आप अनन्तवीर्य हैं तथा मैं आपको अनन्त भुजाओंसे युक्त? चन्द्रमा और सूर्यरूप नेत्रोंवाला? प्रज्वलित अग्निरूप मुखोंवाला और अपने तेजसे इस जगत्को तपायमान करते हुए देखता हूँ अर्थात् जिस रूपके अनन्त हाथ हों? चन्द्रमा और सूर्य ही जिसके नेत्र हों? प्रज्वलित अग्नि ही जिसका मुख हो और जो अपने तेजसे इस सारे विश्वको तपायमान करता हो? ऐसा रूप धारण किये आपको देख रहा हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.19।। व्याख्या -- अनादिमध्यान्तम् -- आप आदि? मध्य और अन्तसे रहित हैं अर्थात् आपकी कोई सीमा नहीं है।सोलहवें श्लोकमें भी अर्जुनने कहा है कि मैं आपके आदि? मध्य और अन्तको नहीं देखता हूँ। वहाँ तो,देशकृत अनन्तताका वर्णन हुआ है और यहाँ कालकृत अनन्तताका वर्णन हुआ है। तात्पर्य है कि देशकृत? कालकृत? वस्तुकृत आदि किसी तरहसे भी आपकी सीमा नहीं है। सम्पूर्ण देश? काल आदि आपके अन्तर्गत हैं? फिर आप देश? काल आदिके अन्तर्गत कैसे आ सकते हैं अर्थात् देश? काल आदि किसीके भी आधारपर आपको मापा नहीं जा सकता।अनन्तवीर्यम् -- आपमें अपार पराक्रम? सामर्थ्य? बल और तेज है। आप अनन्त? असीम? शक्तिशाली हैं।अनन्तबाहुम् (टिप्पणी प0 586.1) -- आपकी कितनी भुजाएँ हैं? इसकी कोई गिनती नहीं हो सकती। आप अनन्त भुजाओंवाले हैं।शशिसूर्यनेत्रम् -- संसारमात्रको प्रकाशित करनेवाले जो चन्द्र और सूर्य हैं? वे आपके नेत्र हैं। इसलिये संसारमात्रको आपसे ही प्रकाश मिलता है।दीप्तहुताशवक्त्रम् -- यज्ञ? होम आदिमें जो कुछ अग्निमें हवन किया जाता है? उन सबको ग्रहण करनेवाले देदीप्यमान अग्निरूप मुखवाले आप ही हैं।स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम् -- अपने तेजसे सम्पूर्ण विश्वको तपानेवाले आप ही हैं। तात्पर्य यह है कि जिनजिन व्यक्तियों? वस्तुओं? परिस्थितियों आदिसे प्रतिकूलता मिल रही है? उनउनसे ही सम्पूर्ण प्राणी संतप्त हो रहे हैं। संतप्त करनेवाले और संतप्त होनेवाले -- दोनों एक ही विराट्रूपके अङ्ग हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.19।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.19।।भगवतो विश्वरूपाख्यं रूपमेव पुनर्विवृणोति -- किञ्चेति। हुतमश्नातीति हुताशो वह्निः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.19।।शशिसूर्यनेत्रं इत्युक्तत्वात् कथं विश्वरूपशब्दस्यान्यथाव्याख्यानं इत्यत आह -- शशीति। इत्यादिवद्व्याख्येयम्। जन्यजनकभावेनाश्रयाश्रयिभावेन वाऽभेदोक्तिरित्यर्थः। कुत एतदित्यत आह -- तदङ्गजा इति। तदङ्गेत्यविभक्तिको निर्देशः सम्बुद्धिर्वा। अभेदे बाधकं चाह -- चन्द्रमा इति। चक्षोश्चक्षुषः। नन्वत्र चन्द्रमसो मनोजातत्वं तदाश्रयत्वं चोच्यते? गीतायां तु नेत्राश्रयत्वादि? तथाऽन्यत्रदंष्ट्राऽर्यमेन्दू इति? तत्कुतो न विरोधः इत्यत आह -- बह्विति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.19।।शशिसूर्यनेत्रं इत्यपिअहं क्रतुः [9।16] इत्यादिवत्। तदङ्गजाः सर्वसुरादयोऽपि तस्मात्तदङ्गेत्यृषिभिः स्तुतास्ते इत्यृग्वेदखिलेषु। चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत [ऋक्सं.8।4।19।3यजुस्सं.31।12] इति च। बहुरूपत्वाद्बह्वाश्रयत्वं तेषां युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.19।। --,अनादिमध्यान्तम् आदिश्च मध्यं च अन्तश्च न विद्यते यस्य सः अयम् अनादिमध्यान्तः तं त्वां अनादिमध्यान्तम्? अनन्तवीर्यं न तव वीर्यस्य अन्तः अस्ति इति अनन्तवीर्यः तं त्वाम् अनन्तवीर्यम्? तथा अनन्तबाहुम् अनन्ताः बाहवः यस्य तव सः त्वम्? अनन्तबाहुः तं त्वाम् अनन्तबाहुम्? शशिसूर्यनेत्रं शशिसूर्यौ नेत्रे यस्य तव सः त्वं शशिसूर्यनेत्रः तं त्वां शशिसूर्यनेत्रं चन्द्रादित्यनयनम्? पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं दीप्तश्च असौ हुताशश्च वक्त्रं यस्य तव सः त्वं दीप्तहुताशवक्त्रः तं त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्? स्वतेजसा विश्वम् इदं समस्तं तपन्तम्।।
───────────────────
【 Verse 11.20 】
▸ Sanskrit Sloka: द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वा: | दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् ||
▸ Transliteration: dyāvāpṛthivyor idam antaraṁ hi vyāptaṁ tvayaikena diśaśca sarvāḥ || dṛṣṭvādbhutaṁ rūpamugraṁ tavedaṁ lokatrayaṁ pravyathitaṁ mahātman ||
▸ Glossary: dyāvā: in outer space; pṛthivyoḥ: of the earth; idaṁ: this; antaraṁ: unlimited; hi: certainly; vyāptaṁ: pervaded; tvaya : by You; ekena: by one; diśaḥ: direc- tions; ca: and; sarvāḥ: all; dṛṣṭvā: by seeing; adbhutaṁ: wonderful; rūpaṁ: form; ugraṁ: terrible; tava: Your; idaṁ: this; loka: three world; trayaṁ: three; pravyathitaṁ: perturbed; mahātman: O great one
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.20 This space between earth and the heavens and every- thing is filled by You alone O great Being, having seen Your wonderful and terrible form, the three worlds tremble with fear.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.20।।हे महात्मन् यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अद्भुत और उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.20।। हे महात्मन् स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का यह आकाश तथा समस्त दिशाएं अकेले आप से ही व्याप्त हैं आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक अतिव्यथा (भय) को प्राप्त हो रहे हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.20 द्यावापृथिव्योः of heaven and earth? इदम् this? अन्तरम् interspace? हि indeed? व्याप्तम् is filled? त्वया by Thee? एकेन alone? दिशः arters? च and? सर्वाः all? दृष्ट्वा having seen? अद्भुतम् wonderful? रूपम् form? उग्रम् terrible? तव Thy? इदम् this? लोकत्रयम् the three worlds? प्रव्यथितम् are trembling with fear? महात्मन् O greatsouled Being.Commentary Thee In Thy Cosmic Form.The space and the arters This denotes that the Lord has filled the whole universe of animate and inanimate objects.In order to remove the doubt entertained by Arjuna as to his success (Cf.II.6) Lord Krishna makes him feel now that victoyr for the Pandavas is certain.
▸ English Translation By Dr.
Chapter 11 (Part 7)
S. Sankaranarayan: 11.20. This space in between the heaven and the earth as well as all the directions are pervaded singly by You; seeing this wondrous form of Yours as such, O Exalted Soul, the triple world is very much frightened.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.20 Alone thou fillest all the quarters of the sky, earth and heaven, and the regions between. O Almighty Lord! Seeing Thy marvellous and awe-inspiring Form, the spheres tremble with fear.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.20 You alone have pervaded the interspace between heaven and earth, and all the arters. Beholding Your marvellous and terrible form, O Mahatman, the three worlds are greatly overwhelmed with fear.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.20 Indeed, this intermediate space between heaven and earth as also all the directions are pervaded by You alone. O exalted One, the three worlds are struck with fear by seeing this strange, fearful form of Yours.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.20 This space between the earth and the heaven and all the arters are filled by Thee alone; having seen this, Thy wonderful and teriible form, the three worlds are trembling with fear, O great-souled Being.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.20 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.20 The terms, 'heaven and earth,' imply all the upper and lower worlds. The 'Antara', or that between heaven and earth, denotes the space between them in which are located all the worlds. You alone pervade all the space and all the arters. 'Beholding Your marvellous and teriible form,' beholding Your form of infinite length and extent, marvellous and terrible, the three worlds are trembling. Gods headed by Brahma, the Asuras, the manes, the Siddhas, the Gandharvas, the Yaksas, and Raksasas have come with a desire to see the battle. All the 'three worlds' consisting of these friendly, antagonistic and neutral beings are extremely frightened. 'Mahatman' means one, the dimension of whose mind has no limits. It has to be understood that like Arjuna, other beings also were granted by the Lord the divine eye capable of directly perceiving the Form which supports the universe. If it be asked why, the reply is that it was for demonstrating to Arjuna His sovereignty. Hence it is stated here: 'Beholding Your marvellous and terrible form, O Mahatman, the three worlds are greatly overwhelmed with fear.'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.20 Hi, indeed; idam, this; antaram, intermediate space; dyavaprthivyoh, between heaven and earth; ca, as also; sarvah, all; the disah, direction; vyaptam, are pervaded; tvaya, by You; ekena, alone, who have assumed the Cosmic form. Mahatman, O exalted One, who by nature are high-minded; the lokatrayam, three worlds; pravyathitam, are struck with fear, or are perturbed; drstva, by seeing; idam, this; abdhutam, strange, astonishing; ugram, fearful, terrible; rupam, form; tava, of Yours. Therefore, now, in order to clear that doubt which Arjuna earlier had-as in, 'whether we shall win, or whether they shall coner' (2.6)-, the Lord proceeds with the idea, 'I shall show the inevitable victory of the Pandavas.' Visualizing that, Arjuna said: 'Moreover-'.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.20।। विराट् पुरुष समस्त जगत् को व्याप्त किये हुए है? और देशकाल का भी अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वे भी इस सत्य पर ही आश्रित हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ वर्णित विषयवस्तु अनन्त है? सनातन है। इसीलिए यहाँ अर्जुन कहता है? अकेले आपके द्वारा स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का आकाश और समस्त दिशाएं व्याप्त हैं।विश्व की एकता को सरलता से ग्रहण नहीं किया जा सकता। जो जितना ही अधिक उसे समझता है? उसका वर्णन करने में उतना ही अधिक वह लड़खड़ाता है। इतने विशाल और भव्य सत्य को देखकर परिच्छिन्न बुद्धि का कम्पित हो जाना स्वाभाविक ही है।अर्जुन कहता है? इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक भय कम्पित हो रहे हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य जगत् को उसी रूप में देखता है जैसा कि वह स्वयं होता है। यथा दृष्टि तथा सृष्टि। विराट् का दर्शन करके अर्जुन भयभीत हुआ और उस मनस्थिति में जब वह जगत् को देखता है? तो तीनों लोक भी विस्मित और भय कम्पित दिखाई देते हैं। व्यासजी की यह विशेषता है कि विशाल और गम्भीर विषयवस्तु के वर्णन में व्यस्त होते हुए भी वे मनुष्य के मूलभूत आचरण को भूलते नहीं हैं और उनके ये सूक्ष्म निरीक्षण ही इस अतुलनीय सौन्दर्य और अपरिमेय गम्भीर चित्र को वास्तविकता की आभा प्रदान करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.20।।द्यावुृथिव्योरन्तमन्तरिक्षं त्वयैकेन विश्वरुपधरेण व्याप्तं दिशश्च सर्वाः त्वया व्याप्ताः। हि यस्मात्तस्मात्तवेदमुघ्रं,रुपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितं पीडितम्। अत इदमुपसंहर। महात्मनोऽक्षुद्रस्वभावस्य तव निर्दोषलोकपीडनं नोचितमित्याशयेनाह -- हे महात्मन्निति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.20।।प्रकृतस्य भगवद्रूपस्य व्याप्तिमाह -- द्यावेति। द्यावापृथिव्योरिदमन्तरिक्षं हि एव त्वयैवैकेन व्याप्तं। दिशश्च सर्वा व्याप्ताः। दृष्ट्वाद्भुतमत्यन्तविस्मयकरमिदमुग्रं दुरधिगमं महातेजस्वित्वात्तव रूपमुपलभ्य लोकत्रयं प्रव्यथितं अत्यन्तभीतं जातं। हे महात्मन्साधूनामभयदायक? इतः परमिदमुपसंहरेत्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.20।।एवं स्वयंकृतविश्वरूपदर्शनेन कृतकृत्यो भूत्वा तदुपसंहारमिच्छन्स्तौति -- द्यावापृथिव्योरिति। हे महात्मन्? हि प्रत्यक्षं त्वयैकेनेदं द्यावापृथिव्योरन्तरं मध्यं सर्वाः दिशश्च व्याप्ताः। अतस्तवेदमद्भुतमुग्रं रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रकर्षेण व्यथितम्। अतः परमिदमुपसंहरेत्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.20।।किञ्चद्यावापृथिव्योरिति। इदं द्यावापृथिव्योः अन्तरमन्तरिक्षं एकेन त्वया व्याप्तम्। च पुनः? दिशः सर्वास्त्वया व्याप्ताः पश्यामि। किञ्च हे महात्मन् इतोऽप्यधिकप्रकटनसमर्थ तव इदमद्भुतमलौकिकं उग्रं अदृष्टं रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितं प्रकर्षेण व्यथितं भीतं पश्यामीति पूर्वेणान्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.20।।किंच -- द्यावापृथिव्योरिति। द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि अन्तरिक्षं त्वयैकेन व्याप्तम्। दिशश्च सर्वा व्याप्ताः। अद्भुतमदृष्टपूर्वं त्वदीयमिदमुग्नं घोरं रूपं दृष्ट्वा लोकत्रयं प्रव्यथितमतिभीतं पश्यामीति पूर्वस्यैवानुषङ्गः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.20।।द्यावापृथिव्योः इत्यारभ्यचूर्णितैरुत्तमाङ्गैः [11।27] इत्यन्तं स्पष्टार्थम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.20।।एकमात्र आप विश्वरूपधारी परमेश्वरसे ही यह स्वर्ग और पृथिवीके बीचका सारा आकाश और समस्त दिशाएँ भी परिपूर्ण हो रही हैं। हे महात्मन् अर्थात् हे अक्षुद्र स्वभाववाले कृष्ण आपके इस अद्भुत -- आश्चर्यजनक? भयंकर -- क्रूर रूपको देखकर तीनों लोक व्यथित हो रहे हैं अर्थात् भयभीत या विचलित हो रहे हैं।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.20।। व्याख्या -- महात्मन् -- इस सम्बोधनका तात्पर्य है कि आपके स्वरूपके समान किसीका स्वरूप हुआ नहीं? है नहीं? होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। इसलिये आप महात्मा अर्थात् महान् स्वरूपवाले हैं।द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः -- स्वर्ग और पृथ्वीके बीचमें जितना अवकाश है? पोलाहट है? वह सब पोलाहट आपसे परिपूर्ण हो रही है।पूर्व? पश्चिम? उत्तर और दक्षिण पूर्वउत्तरके बीचमें ईशान? उत्तरपश्चिमके बीचमें वायव्य? पश्चिमदक्षिणके बीचमें नैऋर््त्य और दक्षिणपूर्वके बीचमें आग्नेय तथा ऊपर और नीचे -- ये दसों दिशाएँ आपसे व्याप्त हैं अर्थात् इन सबमें आपहीआप विराजमान हैं।दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं लोकत्रयं प्रव्यथितम् -- [उन्नीसवें श्लोकमें तथा बीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें उग्ररूपका वर्णन करके अब बीसवें श्लोकके उत्तरार्धसे बाईसवें श्लोकतक अर्जुन उग्ररूपके परिणामका वर्णन करते हैं -- ] आपके इस अद्भुत? विलक्षण? अलौकिक? आश्चर्यजनक? महान् देदीप्यमान और भयंकर उग्ररूपको देखकर स्वर्ग? मृत्यु और पाताललोकमें रहनेवाले सभी प्राणी व्यथित हो रहे हैं? भयभीत हो रहे हैं।यद्यपि इस श्लोकमें स्वर्ग और पृथ्वीकी ही बात आयी है (द्यावापृथिव्योः)? तथापि अर्जुनद्वारा लोकत्रयम् कहनेके अनुसार यहाँ पाताल भी ले सकते हैं। कारण कि अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के शरीरके किसी एक देशमें जा रही है और वहाँ अर्जुनको जो दीख रहा है? वह दृश्य कभी पातालका है? कभी मृत्युलोकका है और कभी स्वर्गका है। इस तरह अर्जुनकी दृष्टिके सामने सब दृश्य बिना क्रमके आ रहे हैं (टिप्पणी प0 586.2)।,यहाँपर एक शङ्का होती है कि अगर विराट्रूपको देखकर त्रिलोकी व्यथित हो रही है? तो दिव्यदृष्टिके बिना त्रिलोकीने विराट्रूपको कैसे देखा भगवान्ने तो केवल अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी थी। त्रिलोकीको विराट्रूप देखनेके लिये दिव्यदृष्टि किसने दी कारण कि प्राकृत चर्मचक्षुओंसे यह विराट्रूप नहीं देखा जा सकता? जबकि विश्वमिदं तपन्तम् (11। 19) और लोकत्रयं प्रव्यथितम् पदोंसे विराट्रूपको देखकर त्रिलोकीके संतप्त और व्यथित होनेकी बात अर्जुनने कही है।इसका समाधान यह है कि संतप्त और व्यथित होनेवाली त्रिलोकी भी उस विराट्रूपके अन्तर्गत ही है अर्थात् विराट्रूपका ही अङ्ग है। सञ्जयने और भगवान्ने विराट्रूपको एक देशमें देखनेकी बात (एकस्थम्) कही? पर अर्जुनने एक देशमें देखनेकी बात नहीं कही। कारण कि विराट्रूप देखते हुए भगवान्के शरीरकी तरफ अर्जुनका खयाल ही नहीं गया। उनकी दृष्टि केवल विराट्रूपकी तरफ ही बह गयी। जब सारथिरूप भगवान्के शरीरकी तरफ भी अर्जुनकी दृष्टि नहीं गयी? तब संतप्त और व्यथित होनेवाले इस लौकिक संसारकी तरफ अर्जुनकी दृष्टि कैसे जा सकती है इससे सिद्ध होता है कि संतप्त होनेवाला और संतप्त करनेवाला तथा व्यथित होनेवाला और व्यथित करनेवाला -- ये चारों उस विराट्रूपके ही अङ्ग हैं। अर्जुनको ऐसा दीख रहा है कि त्रिलोकी विराट्रूपको देखकर व्यथित? भयभीत हो रही है? पर वास्तवमें (विराट्रूपके अन्तर्गत) भयानक सिंह? व्याघ्र? साँप आदि जन्तुओंको और मृत्युको देखकर त्रिलोकी भयभीत हो रही है।मार्मिक बातदेखने? सुनने और समझनेमें आनेवाला सम्पूर्ण संसार भगवान्के दिव्य विराट्रूपका ही एक छोटासा अङ्ग है। संसारमें जो जडता? परिवर्तनशीलता? अदिव्यता दीखती है? वह वस्तुतः दिव्य विराट्रूपकी ही एक झलक है? एक लीला है। विराट्रूपकी जो दिव्यता है? उसकी तो स्वतन्त्र सत्ता है? पर संसारकी जो अदिव्यता है? उसकी स्ववतन्त्र सत्ता नहीं है। अर्जुनको तो दिव्यदृष्टिसे भगवान्का विराट्रूप दीखा? पर भक्तोंको भावदृष्टिसे यह संसार भगवत्स्वरूप दीखता है -- वासुदेवः सर्वम्। तात्पर्य है कि जैसे बचपनमें बालकका,कंकड़पत्थरोंमें जो भाव रहता है? वैसा भाव बड़े होनेपर नहीं रहता बड़े होनेपर कंकड़पत्थर उसे आकृष्ट नहीं करते? ऐसे ही भोगदृष्टि रहनेपर संसारमें जो भाव रहता है? वह भाव भोगदृष्टिके मिटनेपर नहीं रहता।जिनकी भोगदृष्टि होती है? उनको तो संसार सत्य दीखता है? पर जिनकी भोगदृष्टि नहीं है? ऐसे महापुरुषोंको संसार भगवत्स्वरूप ही दीखता है। जैसे एक ही स्त्री बालकको माँके रूपमें? पिताको पुत्रीके रूपमें? पतिको पत्नीके रूपमें और सिंहको भोजनके रूपमें दीखती है? ऐसे ही यह संसार चर्मदृष्टिसे सच्चा? विवेकदृष्टिसे परिवर्तनशील? भावदृष्टिसे भगवत्स्वरूप और दिव्यदृष्टिसे विराट्रूपका ही एक छोटासा अङ्ग दीखता है। सम्बन्ध -- अब अर्जुनकी दृष्टिके सामने (विराट्रूपमें) स्वर्गादि लोकोंका दृश्य आता है और वे उसका वर्णन आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.20।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.20।।प्रकृतभगवद्रूपस्य व्याप्तिं व्यनक्ति -- द्यावापृथिव्योरिति। तस्यैव भयंकरत्वमाचष्टे -- दृष्ट्वेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.20।।द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि इत्यत्रत्वया इत्यनेनैवैकत्वस्य सिद्धत्वात्एकेन इति व्यर्थमित्यतः प्रमाणपूर्वकं तदभिप्रायमाह -- मातापित्रोरिति। बहुत्वेऽपि स एकोऽभिन्नः अनेनदिशश्च सर्वाः रूपान्तरैरित्युक्तं भवति। तदयुक्तम्। विश्वरूपस्यद्रष्टुमिच्छामि ते रूपं [11।3] इत्यादिना एकत्वावगतेरित्यत आह पश्येति। ऐक्यापेक्षयैकवचनमिति भावः। मातापित्रोः इति श्रुतिः प्रकृतानुपयोगिनी कथमुदाहृताद्यावापृथिव्योः इत्यनभिधानादित्यत आह -- मातापितरौ चेति। माता पृथिवी? नोऽस्मान्दुर्मतौ माधात् न दध्यात्। नोऽस्माकं मधु सुखहेतुरस्तु।दृष्ट्वाऽद्भुतं इत्यादिना विश्वरूपदर्शनस्य भयहेतुत्वमुच्यते। तन्न सर्वेषां सर्वदा? किन्तु केषाञ्चित्कारणविशेषात्कदाचिदेवेति सप्रमाणकं तदभिप्रायमाह -- न त्विति। अभ्यसेऽभ्यासे सति सर्वेषां तृप्तिरानन्द एवेत्यर्थः। एवं तद्दर्शनस्य भयहेतुत्वनियमाभावमभिधाय लोकत्रयस्य दर्शनाभावं चाह -- न त्विति। किन्तु त्रिलोकेषु स्थितैर्भक्तैरित्युक्तप्रकारेण कैश्चिदेव। तदभिप्रायश्च लोकत्रयशब्द इति भावः। प्रकारान्तरेणलोकत्रयं इत्यस्याभिप्रायमाह -- अदृष्ट्वाऽपीति। विश्वरूपदर्शनार्थं यतमानानां लोकत्रयस्थानां पुंसां तददृष्ट्वाऽपि चेतसि निरूप्य स्थितानां भये जाते सति तद्द्रष्टुरर्जुनस्य तथाऽहमिवैतेऽपि दृष्ट्वा बिभ्यतीति प्रतिभातीत्यतःलोकत्रयं दृष्ट्वा प्रव्यथितं इत्याहेत्यर्थः। अत्र श्रुतिसम्मतिमाह -- दृष्ट्वेति। देवं विश्वरूपं दृष्ट्वा मोदमानास्त एतेऽर्जुनादयस्तद्ध्यायिनः पश्यन्ति। कथम्भूतान् अदृष्ट्वापि तन्निरूप्यैतद्भयाद्बिभ्यतो भयचिह्नवतस्तस्मिन्नेव विश्वरूपे मनसो गतत्वात्तन्न्यस्तचक्षुर्मुखांश्च दृष्टवत् दृष्टवन्त इवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.20।।मातापित्रोरन्तरङ्गः स एकः? रूपेण चान्यैः सर्वगतः स एकः इति वारुणश्रुतेरेकेनैव द्यावापृथिव्योरन्तरं व्याप्तो भवति।पश्य मे पार्थ रूपाणि [1।6।18] इति बहूनि रूपाणि प्रतिज्ञातानि मातापितरौ च पृथिवीद्यावौ। मा नो माता पृथिवी दुर्मतौ धात् मधु द्यौरस्तु नः पिता [ऋक्सं.बृ.उ.6।3।6] इत्यादिप्रयोगात्। न तु नियमतो भयप्रदं तत्स्वरूपम्। नारदस्य तदभावात्। केषाञ्चित्तथा दर्शयति भगवान् -- प्रियन्ति केचित्तस्य रूपस्य दृष्टौ बिभेति कश्चिदभ्यसे सर्वतृप्तिः इति वारुणशाखायाम्। न तु तं सर्वे पश्यन्ति। अदृष्ट्वाऽपि तान्निरूप्य भयेन द्रष्टुस्तथा प्रतिभाति। तथा च गौतमखिलेषु -- दृष्ट्वा देवं मोदमाना अदृष्ट्वाऽप्येतद्भयाद्बिभ्यतो दृष्टवत्ते। पश्यन्ति ते न्यस्तचक्षुर्मुखांस्तु तस्मिन्नेवैते मनसो गतत्वात् इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.20।। --,द्यावापृथिव्योः इदम् अन्तरं हि अन्तरिक्षं व्याप्तं त्वया एकेन विश्वरूपधरेण दिशश्च सर्वाः व्याप्ताः। दृष्ट्वा उपलभ्य अद्भुतं विस्मापकं रूपम् इदं तव उग्रं क्रूरं लोकानां त्रयं लोकत्रयं प्रव्यथितं भीतं प्रचलितं वा हे महात्मन् अक्षुद्रस्वभाव।।अथ अधुना पुरा यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः (गीता 2।6) इति अर्जुनस्य यः संशयः आसीत्? तन्निर्णयाय पाण्डवजयम् ऐकान्तिकं दर्शयामि इति प्रवृत्तो भगवान्। तं पश्यन् आह --,किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.21 】
▸ Sanskrit Sloka: अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति केचिद्भीता: प्राञ्जलयो गृणन्ति | स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा: स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभि: पुष्कलाभि: ||
▸ Transliteration: amī hi tvāṁ surasaṅghā viśanti kecidbhītāḥ prāñjalayo gṛṇanti || svastī tyuktvā maharṣisiddhasaṅghāḥ stuvanti tvāṁ stutibhiḥ puṣkalābhiḥ ||
▸ Glossary: amī: all those; hi: certainly; tvāṁ: unto You; surasaṁghā: groups of celestials; viśanti: entering; kecit: some of them; bhītāḥ: out of fear; prāñjalayaḥ: with folded hands; gṛṇanti: offering prayers unto; svastī: all peace; iti: thus; uktvā: speaking like that; maharṣi: great sages; siddhasaṁghāḥ: realized sages; stuvan- ti: singing hymns; tvāṁ: unto You; stutibhiḥ: with hymns; puṣkalābhiḥ: sublime
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.21 Many celestials enter into You; some praise You in fear with folded hands; many great masters and sages hail and adore you.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.21।।वे ही देवताओंके समुदाय आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय कल्याण हो मङ्गल हो ऐसा कहकर उत्तमउत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.21।। ये समस्त देवताओं के समूह आप में ही प्रवेश कर रहे हैं और कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आप की स्तुति करते हैं महर्षि और सिद्धों के समुदाय कल्याण होवे (स्वस्तिवाचन करते हुए) ऐसा कहकर? उत्तम (या सम्पूर्ण) स्रोतों द्वारा आपकी स्तुति करते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.21 अमी these? हि verily? त्वाम् Thee? सुरसङ्घाः hosts of gods? विशन्ति enter? केचित् some? भीताः in fear? प्राञ्जलयः with joined palms? गृणन्ति extol? स्वस्ति may it be well? इति thus? उक्त्वा having said? महर्षिसिद्धसङ्घाः bands of great Rishis and Siddhas? स्तुवन्ति paise? त्वाम् Thee? स्तुतिभिः with hymns? पुष्कलाभिः complete.Commentary Pushkalabhih means complete or wellworded praises or praises full of deep meanings.Great sages like Narada and perfected ones like Kapila praise Thee with inspiring hymns.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.21. These hosts of gods enter into You; some frightened ones recite [hymns] with folded palms; simply crying 'Hail !', the hosts of great seers praise You with the excellent praising hymns.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.21 The troops of celestial beings enter into Thee, some invoking Thee in fear, with folded palms; the Great Seers and Adepts sing hymns to Thy Glory, saying All Hail.'
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.21 Verily into You the hosts of Devas enter. Some in fear extol You with clasped hands. Crying 'Hail' the bands of great seers and Siddhas praise You with meaningful hymns.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.21 Those very groups of gods enter into You; struck with fear, some extol (You) with joined palms. Groups of great sages and perfected beings praise You with elaborate hymns,saying 'May it be well!'
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.21 Verily, into Thee enter these hosts of gods; some extol Thee in fear with joined palms; saying 'may it be well', bands of great sages and perfected ones praise Thee with hymns complete.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.21 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.21 These hosts of superior Devas beholding You as the foundation of the universe, rejoice and move towards You. Among them, some in fear, on seeing Your extremely terrible and wonderful form, 'extol,' namely pronounce sentences in the form of praise, according to their knowledge. Others, the bands of seers and Siddhas, knowers of the truth, higher and lower, saying 'Hail,' glorify You in hymns of abounding praise which are suitable to the Lord.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.21 Ami hi, those very; sura-sanghah, groups of gods, the soldiers engaged in battle-groups of gods such as the Vasus who have descended here in the form of human beings for eliminating the burden of the earth; visanti, enter-are seen to be entering; tvam, You. Bhitah, struck with fear, and unable to flee; kecit, some among them; grnanti, extol You; pranjalayah, with their palms joined. Maharsi-siddha [Siddha: A semi-divine being supposed to be of great purity and holiness, and said to be particularly characterized by eight supernatural faculties called siddhis.-V.S.A.]-sanghah, groups of great sages and perfected beings; seeing protents foroding evil, etc. as the battle became imminent; stuvanti, praise; tvam, You; puskalabhih, with elaborate, full; stutibhih, hymns; uktva, saying; 'svasti iti, May it be well!' And further,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.21।। अब तक अर्जुन ने विश्व रूप का जो वर्णन किया वह स्थिर था और एक साथ अद्भुत और उग्र भी था। यहाँ अर्जुन विश्वरूप में दिखाई दे रही गति और क्रिया का वर्णन करता है। ये सुरसंघ विराट् पुरुष में प्रवेश करके तिरोभूत हो रहे हैं।यदि सुधार के अयोग्य हुए कई लोग बलात् विश्वरूप की ओर खिंचे चले जाकर उसमें लुप्त हो जा रहे हों? और अन्य लोग प्रतीक्षा करते हुऐ इस प्रक्रिया को देख रहे हों? तो अवश्य ही वे भय से आतंकित हो जायेंगे। किसी निश्चित आपत्ति से आशंकित पुरुष? जब सुरक्षा का कोई उपाय नहीं देखता है? तब निराशा के उन क्षणों में वह सदा प्रार्थना की ओर प्रवृत्त होता है। इस मनोवैज्ञानिक सत्य को बड़ी ही सुन्दरता से यहाँ इन शब्दों में व्यक्त किया गया है कि कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति करते हैं।और यही सब कुछ नहीं है। महर्षियों और सिद्ध पुरुषों ऋ़े समूह? अपने ज्ञान की परिपक्वता से प्राप्त दैवी और आन्तरिक शान्ति के कारण? इस विराट् के दर्शन से अविचलित रहकर इस विविध रूपमय विराट् पुरुष का उत्तम (बहुल) स्तोत्रों के द्वारा स्तुतिगान करते हैं। वे सदा स्वस्तिवाचन अर्थात् सब के कल्याण की कामना करते हैं। अपने पूर्ण ज्ञान के कारण वे जानते हैं कि ईश्वर इस प्रकार का अति उग्र भयंकर रूप केवल उसी समय धारण करता है जब वह विश्व का सम्पूर्ण पुनर्निर्माण करना चाहता है। सिद्ध पुरुष यह भी जानते हैं कि विनाश के द्वारा निर्माण करने की इस योजना में किसी प्रकार की हानि नहीं होती है। इसलिए? वे इस विनाश की प्रक्रिया का स्वागत करते हुये जगत के लिये स्वर्णयुग की कामना करते हैं? जो इस सम्पूर्ण विनाश के पश्चात् निश्चय ही आयेगा।इस श्लोक में जगत् के प्राणियों का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया है उत्तम? मध्यम और अधम। अधम प्राणी ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं। वे मृत्यु की प्रक्रिया के सर्वप्रथम शिकार होते हैं और दुर्भाग्य से उन्हें इस क्रिया का भान तक नहीं होता कि वे उसका किसी प्रकार से विरोध कर सकें। मध्यम प्रकार के लोग विचारपूर्वक इस क्षय और नाश की प्रक्रिया को देखते हैं और उसके प्रति जागरूक भी होते हैं। वे अपने भाग्य के विषय में सोचकर आशंकित हो जाते हैं। वे यह नहीं जानते कि विनाश से वस्तुत कोई हानि नहीं होती? और समस्त प्राणियों के अपरिहार्य अन्त से भयकम्पित हो जाते हैं।परन्तु इनसे भिन्न उत्तम पुरुषों का एक वर्ग और भी है? जिन्हें समष्टि के स्वरूप एवं व्यवहार अर्थात् कार्यप्रणाली का पूर्ण ज्ञान होता है। उन्हें इस बात का भय कभी स्पर्श नहीं करता कि दैनिक जीवन में होने वाली घटनाएं उनके साथ भी घट सकती हैं। समुद्र के स्वरूप को पहचानने वालों को तरंगों के नाश से चिन्तित होने का कारण नहीं रहता है। इसी प्रकार? जब सिद्ध पुरुष उस महान विनाश को देखते हैं? जो एक मरणासन्न संस्कृति के पुनर्निमाण के पूर्व होता है? तब वे सत्य की इस महान शक्ति को पहचान कर ईश्वर निर्मित भावी जगत् के लिए शान्ति और कल्याण की कामना करते हैं। जिस किसी भी दृष्टि से हम इस काव्य का अध्ययन करते हैं? हम पाते हैं कि स्वयं व्यासजी कितने महान् मनोवैज्ञानिक हैं और उन्होंने कितनी सुन्दरता से यहाँ मानवीय व्यवहार के ज्ञान को एकत्र किया है? जिससे कि मनुष्य शीघ्र विकास करके अपने पूर्णत्व के लक्ष्य तक पहुँच सके।इस दर्शनीय दृश्य को देखकर स्वर्ग के देवताओं की क्या प्रतिक्रया हुई अर्जुन उसे बताते हुए कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.21।।इदानीं यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुरित्यर्जुनसंशयनिर्णयाय पाण्डवानां जयमैकान्तिकं दर्शयितुं प्रवृत्तं भूभारहरणार्थिनं भगवन्तं पश्यन्नाह। अमी हि यध्यमानाः भूभारहरणार्थं मनुष्यरुपेणावतीर्णा वस्वीदिदेवसङ्घास्त्वां प्रविशन्तीति त्वमिति पाठ आचार्यैर्व्याख्यात इति भाति। अन्यथा त्वा त्वामिति भाष्यपाठोऽपेक्षितः। असुरसङ्गा इति पदं च्छित्वा भूभारभूता दुर्योधनादयस्तवां विशन्तीत्यपि वक्तव्यमिति तट्टीकाकारोक्तिस्तु त्वेतिपाठे संगच्छत इति ज्ञेयम्। तत्र केचिद्भीताः पलायनेऽप्यशक्ताः सन्तः प्राञ्जलयः सन्तो गृणन्तः स्तुवन्ति। किंच युद्धदर्शनार्थमागता महर्षिसिद्धसङ्घा नारदातयो युद्धे प्रत्युपस्थिते तु जगत्क्षयहेतूत्पादादीनि उपलक्ष्य स्वस्तयस्तु जगत इत्युक्त्वा संपूर्णाभिः स्तुतिभूः स्तुवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.21।।अधुना भूभारसंहारकारित्वमात्मनः प्रकटयन्तं भगवन्तं पश्यन्नाह -- अमी इति। अमी हि सुरसङ्गा वस्वादिदेवगणा भूभारावतारार्थं मनुष्यरूपेणावतीर्णा युध्यमानाः सन्तस्त्वा त्वां विशन्ति प्रविशन्तो दृश्यन्ते। एवमसुरसङ्घा इति पदच्छेदेन भूभारभूता दुर्योधनादयस्त्वां विशन्तीत्यपि वक्तव्यम्। एवमुभयोरपि सेनयोः केचिद्भीताः पलायनेऽप्यशक्ताः सन्तः प्राञ्जलयो गृणन्ति स्तुवन्ति त्वाम्। एवं प्रत्युपस्थिते युद्धे उत्पातादिनिमित्तान्युपलक्ष्य स्वस्त्यस्तु सर्वस्य जगत इत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घा नारदप्रभृतयो युद्धदर्शनार्थमागता विश्वविनाशपरिहाराय स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिर्गुणोत्कर्षप्रतिपादिकाभिर्वाग्भिः पुष्कलाभिः परिपूर्णार्थाभिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.21।।व्यथामेवाह -- अमीति। हि यतः अमी त्वा त्वां असुरसङ्घा असुरांशा दुर्योधनादयस्त्वां पतङ्गाः पावकमिवादृष्टप्रेरिता विशन्ति मरणायेत्यर्थः। केचिद्भीताः प्राञ्जलयो बद्धाञ्जलयो गृणन्ति स्तुवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.21।।किञ्चअमी हीति। अमी सुरसङ्घाः देवसमूहाः त्वां त्वत्समीपे विशन्ति शरणमागच्छन्तीत्यर्थः। हीति युक्तमेव पुरुषोत्तमशरणागमनं देवानाम्। केचित् इतरे असुरा इत्यर्थः? भीताः सन्तः प्राञ्जलयो बद्धाञ्जलिपुटाः गृणन्ति? रक्षेति वदन्तीत्यर्थः। महर्षिसिद्धसङ्घाः महर्षीणां सिद्धानां च समूहाःस्वस्ति अस्माकमस्तु इत्युक्त्वा पुष्कलाभिः पूर्णाभिः स्तुतिभिस्त्वां स्तुवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.21।। किंच -- अमी हीति। अमी सुरसङ्घा भीताः सन्तः त्वां विशन्ति शरणं प्रविशन्ति। तेषां मध्ये केचिदतिभीताः दूरत एव स्थित्वा कृतसंपुटकरयुगुलाः सन्तो गृणन्ति जयजय रक्षरक्षेति प्रार्थयन्ते। स्पष्टमन्यत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.21।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.21।।अर्जुनके मनमें जो पहले ऐसा संशय था कि हम उनको जीतेंगे या वे हमको जीतेंगे उसका निर्णय करनेके लिये मैं पाण्डवोंकी निश्चित विजय दिखलाऊँगा इस भावसे प्रवृत्त हुए भगवान् अपना वैसा रूप दिखाने लगे? उस रूपको देखकर अर्जुन बोला --, यह युद्ध करनेवाले योद्धास्वरूप देवगण? यानी जो भूमिका भार उतारनेके लिये यहाँ अवतीर्ण हुए हैं? वे मनुष्योंकीसी आकृतिवाले वस्वादि देवसमुदाय आपमें ( दौड़दौड़कर ) प्रवेश कर रहे हैं अर्थात् प्रवेश करते हुए दिखलायी दे रहे है। उनमेंसे अन्य कोईकोई तो भागनेमें असमर्थ होनेके कारण भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपकी स्तुति कर रहे हैं। तथा महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय युद्ध आरम्भ होनेपर उत्पात आदि अशुभ चिह्नोंको देखकर संसारका कल्याण हो ऐसा कहकर अनेकों अर्थात् सम्पूर्ण स्तोत्रोंद्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.21।। व्याख्या -- अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति -- जब अर्जुन स्वर्गमें गये थे? उस समय उनका जिन देवताओंसे परिचय हुआ था? उन्हीं देवताओंके लिये यहाँ अर्जुन कह रहे हैं कि वे ही देवतालोग आपके स्वरूपमें प्रविष्ट होते हुए दीख रहे हैं। ये सभी देवता आपसे ही उत्पन्न होते हैं? आपमें ही स्थित रहते हैं और आपमें ही प्रविष्ट होते हैं।केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति -- परन्तु उन देवताओंमेंसे जिनकी आयु अभी ज्यादा शेष है? ऐसे आजान देवता (विराट्रूपके अन्तर्गत) नृसिंह आदि भयानक रूपोंको देखकर भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नाम? रूप? लीला गुण आदिका गान कर रहे हैं।यद्यपि देवतालोग नृसिंह आदि अवतारोंको देखकर और कालरूप मृत्युसे भयभीत होकर ही भगवान्का गुणगान कर रहे हैं (जो सभी विराट्रूपके ही अङ्ग हैं) परन्तु अर्जुनको ऐसा लग रहा है कि वे विराट्रूप भगवान्को देखकर ही भयभीत होकर स्तुति कर रहे हैं।स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः -- सप्तर्षियों? देवर्षियों? महर्षियों? सनकादिकों और देवताओंके द्वारा स्वस्तिवाचन (कल्याण हो मङ्गल हो) हो रहा है और बड़े उत्तमउत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुतियाँ हो रही हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.21।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.21।।अमी हीत्यादि समनन्तरग्रन्थस्य तात्पर्यमाह -- अथेति। तं भगवन्तं पाण्डवजयमैकान्तिकं दर्शयन्तं पश्यन्नर्जुनो ब्रवीतीत्याह -- तं पश्यन्निति। विश्वरूपस्यैव प्रपञ्चनार्थमनन्तरग्रन्थजातमिति दर्शयति -- किञ्चेति। असुरसङ्घा इति पदं छित्त्वा भूभारभूता दुर्योधनादयस्त्वां विशन्तीत्यपि च वक्तव्यम्। उभयोरपि,सेनयोरवस्थितेषु योद्धुकामेष्ववान्तरविशेषमाह -- तत्रेति। समरभूमौ समागतानां द्रष्टुकामानां नारदप्रभृतीनां विश्वविनाशमाशङ्कमानानां तं परिजिहीर्षतां स्तुतिपदेषु भगवद्विषयेषु प्रवृत्तिप्रकारं दर्शयति -- युद्ध इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.21।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.21।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.21।। --,अमी हि युध्यमाना योद्धारः त्वा त्वां सुरसंघाः ये अत्र भूभारावताराय अवतीर्णाः वस्वादिदेवसंघाः मनुष्यसंस्थानाः त्वां विशन्ति प्रविशन्तः दृश्यन्ते। तत्र केचित् भीताः प्राञ्जलयः सन्तो गृणन्ति स्तुवन्ति त्वाम् अन्ये पलायनेऽपि अशक्ताः सन्तः। युद्धे प्रत्युपस्थिते उत्पातादिनिमित्तानि उपलक्ष्य स्वस्ति अस्तु जगतः इति उक्त्त्वा महर्षिसिद्धसंघाः महर्षीणां सिद्धानां च संघाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः संपूर्णाभिः।।किं चान्यत् --,
───────────────────
【 Verse 11.22 】
▸ Sanskrit Sloka: रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च | गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे ||
▸ Transliteration: rudrādityā vasavo ye ca sādhyā viśve’śvinau marutaś coṣmapāśca | gandha-rvayakṣāsura siddhasaṅghā vīkṣante tvaṁ vismitāś caiva sarve ||
▸ Glossary: rudra: manifestations of Lord Śiva; ādityāḥ: the Āditya; vasavaḥ: the Vasu; ye: all those; ca: and; sādhyāḥ: the Sādhyā; viśve: the Visvedeva; aśvinau: the aśvini-kumāra; marutaḥ: the Marut; ca: and; ūṣmapāḥ: the forefathers; ca: and; gandharva: of the Gandharva; yakṣa: the Yakṣa; asura siddha: the demons and the perfected demigods; saṅghāḥ: assemblies; vīkṣante: are seeing; tvāṁ: You; vismitāḥ: in wonder; ca: also; eva: certainly; sarve: all
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.22 The Rudra, Āditya, Vasu, Sādhyā, Viśvedeva, aśvin, Marut, Ūṣmapa and a host of Gandharva, yakṣa, Asura and Sidhha are all looking at You in amazement.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.22।।जो ग्यारह रुद्र? बारह आदित्य? आठ वसु? बारह साध्यगण? दस विश्वेदेव और दो अश्विनीकुमार? उनचास मरुद्गण? सात पितृगण तथा गन्धर्व? यक्ष? असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं? वे सभी चकित होकर आपको देख रहे हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.22।। रुद्रगण? आदित्य? वसु और साध्यगण? विश्वेदेव तथा दो अश्विनीकुमार? मरुद्गण और उष्मपा? गन्धर्व? यक्ष? असुर और सिद्धगणों के समुदाय ये सब ही विस्मित होते हुए आपको देखते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.22 रुद्रादित्याः Rudras and Adityas? वसवः Vasus? ये these? च and? साध्याः Sadhyas? विश्वे Visvedevas? अश्िवनौ the two Asvins? मरुतः Maruts? च and? उष्मपाः Pitris? च and? गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः hosts of Gandharvas? Yakshas? Asuras and Siddhas? वीक्षन्ते are looking at? त्वाम् Thee? विस्मिताः astonished? च and? एव even? सर्वे all.Commentary Sadhyas are a class of gods of whom Brahma is the chief.Visvedevas are ten gods who in Vedic times were considered as protectors of human beings. They were called guardians of the world. They were givers of plenty to the human beings. Their names are Krata? Daksha? Vasu? Satya? Kama? Kala? Dhvani? Rochaka? Adrava and Pururava.The two Asvins? born of Prabha (light)? daughter of Tushta and the Sun? are the physicians of the gods.Rudras? Adityas? Vasus and Maruts -- see tenth chapter? verses 21 and 23.Ushmapa A class of manes. They accept the food offered in the Sraaddha (anniversary) ceremony or the obseies? while it is hot. Hence they are called Ushmapas. There are seven groups of manes.Gandharvas are celestial singers such as Haha and Huhu.Yakshas such as Kubera (the god of wealth) Asuras such as Virochana perfected ones such as Kapila.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.22. The Rudras, the Adityas, the Vasus, the Sadhyas, the Visvas (Visvadevas), the twin Asvins and the Maruts, and the Steam-drinkers (Manes) and the hosts of the Gandharvas, the Yoksas, the demons and the perfected ones - all gaze on You and are ite amazed.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.22 The Vital Forces, the Major stars, Fire, Earth, Air, Sky, Sun, Heaven, Moon and Planets; the Angels, the Guardians of the Universe, the divine Healers, the Winds, the Fathers, the Heavenly Singers; and hosts of Mammon-worshippers, demons as well as saints, are amazed.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.22 The Rudras, the Adityas, the Vasus, the Sadhyas, the Visvas, the Asvins, the Maruts and the manes, and the hosts of Gandharvas, Yaksas, Asuras, and Siddhas - all gaze upon You in amazement.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.22 Those who are the Rudras, the Adityas, the Vasus and the Sadhyas [sadhyas: A particular class of celestial beings.-V.S.A.], the Visve (-devas), the two Asvins, the Maruts and the Usmapas, and hosts of Gandharvas, Yaksas, demons and Siddhas-all of those very ones gaze at You, being indeed struck with wonder.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.22 The Rudras, Adityas, Vasus, Sadhyas, Visvedevas, the two Asvins, Maruts, the manes and the hosts of celestial singers, Yakshas, demons and the perfected ones, are all looking at Thee, in great amazement.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.22 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.22 Usmapa means manes, because the Sruti declares: 'Verily the manes receive the hot portions of the offerings' (Tai. Br., 1.3.10). All these, struck with amazement, behold You.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.22 Ye, those who are; the rudra-adityah, Rudras and Adityas; vasavah, the Vasus; and sadhyah, the Sadhyas-the groups of Rudras and other gods; the gods visve, Visve-devas; and asvinau, the two Asvins; marutah, the Maruts; and usmapah, the Usmapas, (a class of) manes; and gandharva-yaksa-asura-siddha-sanghah, hosts of Gandharvas-viz Haha, Huhu and others-, Yaksas-viz Kubera and others-, demons-Virocana and others-, and Siddhas-Kapila and others; sarve eva, all of those very ones; viksante, gaze; tva, (i.e.) tvam, at You; vismitah eva, being indeed struck with wonder. For,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.22।। अर्जुन और आगे वर्णन करते हुए कहता है कि इस ईश्वरीय रूप को देखने वालों में प्राकृतिक नियमों या शक्तियों के वे सब अधिष्ठातृ देवतागण भी सम्मिलित हैं? जिनकी वैदिककाल में पूजा और उपासना की जाती थी। वे सभी विस्मयचकित होकर इस रूप को देख रहे थे।इस श्लोक में उल्लिखित प्राय सभी देवताओं के विषय में हम पूर्व अध्याय में वर्णन कर चुके हैं। जिन नवीन नामों का यहाँ उल्लेख किया गया है? वे हैं साध्या ? विश्वेदेवा? और ऊष्मपा ।इन शब्दों के अर्थों से आज हम अनभिज्ञ होने के कारण? यह श्लोक सम्भवत हमें अर्थपूर्ण प्रतीत नहीं होगा। परन्तु? अर्जुन वैदिक युग का पुरुष तथा वेदों का अध्येता होने के कारण इन सबसे सुपरिचित था? अत उसकी भाषा भी यही हो सकती थी। हमें केवल यही देखना है कि इस विराट् पुरुष के दर्शन का अर्जुन पर क्या प्रभाव पड़ा और विभिन्न प्रकार के देवताओं? ऋषियों? आदि की प्रतिक्रिया क्या हुई। इस आकाररहित आकार के विशाल विश्वरूप को प्रत्येक ने अपनेअपने मन के अनुसार देखा और समझा।अधिकाधिक विवरण देकर अर्जुन श्रोताओं के मनपटल पर विराट् पुरुष के चित्र को स्पष्ट करने का प्रयत्न करता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.22।।किंचैद्रूपं दृष्ट्वा नाहमेव विस्मयाविष्टः? अपि तु रुद्रादयोऽपीत्याह -- रूद्रेति। ऊष्माणं पिबन्तीत्ययूष्मपाः पितरः।ऊष्मभागा हि पितरः।यावदुष्णं भवेदन्नं यावदश्चन्ति वाग्यताः। पितरस्तावदश्रन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः इति श्रुतिस्मृतभ्याम्। गन्धर्वा हाहाहूहूप्रभृतयः? यक्षाः कुबेरादयः? असुरा विरोचनादयः? सिद्धाः कपिलादयः? तेषां सङ्घाः समूहास्त्वां पश्यन्ति। सर्वे विस्मिता विस्मयं प्राप्ता एव च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.22।।रुद्रादित्या इति। किंचान्यत् रुद्राश्चादित्याश्च वसवो ये च साध्या नाम देवगणा,विश्वतुल्यविभक्तिकविश्वेदेवशब्दाभ्यामुच्यमाना देवगणा अश्िवनौ नासत्यदस्रौ मरुत एकोनपञ्चाशद्देवगणा ऊष्मपाश्च पितरो गन्धर्वाणां यक्षाणामसुराणां सिद्धानां च जातिभेदानां सङ्घाः समूहा वीक्षन्ते पश्यन्ति त्वा त्वां। तादृशाद्भुतदर्शनात्ते सर्व एव विस्मिताश्च। विस्मयलौकिकचमत्कारविशेषमापद्यन्ते च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.22।।किं च ये त्वदनुगृहीता रुद्रादयस्तेऽपि विस्मिताः सन्तः सर्वे त्वां वीक्षन्त इत्याह -- रुद्रादित्या इति। साध्याः विश्वे च देवगणविशेषौ रुद्रादित्यवज्ज्ञेयौ। उष्मपाः पितरः। गन्धर्वाणां यक्षाणामसुराणां सिद्धानां जातिभेदानां सङ्घाः समूहाः। शेषं स्पष्टम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.22।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.22।। किंच -- रुद्रेति। रुद्राश्चादित्याश्च वसवश्च ये च साध्यानाम देवाः? विश्वेदेवा अश्िवनौ देवौ? मरुतो मरुद्गणाः? ऊष्माणं पिबन्तीत्यूष्मपाः पितरः?ऊष्मभागा हि पितरः इत्यादिश्रुतेः। स्मृतिश्चयावदुष्णं भवेदन्नं यावदश्नन्ति वाग्यताः। पितरस्तावदश्नन्ति यावन्नोक्ता हविर्गुणाः।। इति। गन्धर्वाश्च यक्षाश्चासुराश्च विरोचनादयः? सिद्धानां सङ्घाश्च ते सर्व एव विस्मिताः सन्तः त्वां वीक्षन्त इत्यन्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.22।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.22।।तथा और भी --, जो रुद्र? आदित्य? वसु और साध्य आदि देवगण हैं? एवं जो विश्वेदेव? दोनों अश्विनीकुमार? वायुदेव और ऊष्मपा नामक पितृगण हैं तथा जो गन्धर्व? यक्ष? असुर और सिद्धोंके समुदाय हैं यानी हाहाहूहू आदि गन्धर्व? कुबेरादि यक्ष? विरोचनादि असुर और कपिलादि सिद्ध इन सबके समुदाय हैं? वे सभी आश्चर्ययुक्त हुए आपको देख रहे हैं।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.22।। व्याख्या -- रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या विश्वेऽश्विनौ मरुतश्चोष्मपाश्च -- ग्यारह रुद्र? बारह आदित्य? आठ वसु? दो अश्विनीकुमार और उनचास मरुद्गण -- इन सबके नाम इसी अध्यायके छठे श्लोककी व्याख्यामें दिये गये हैं? इसलिये वहाँ देख लेना चाहिये।मन? अनुमन्ता? प्राण? नर? यान? चित्ति? हय? नय? हंस? नारायण? प्रभव और विभु -- ये बारह साध्य हैं (वायुपुराण 66। 15 16)।क्रतु? दक्ष? श्रव? सत्य? काल? काम? धुनि? कुरुवान्? प्रभवान् और रोचमान -- ये दस विश्वेदेव हैं (वायुपुराण 66। 31 32)।कव्यवाह? अनल? सोम? यम? अर्यमा? अग्निष्वात्त और बर्हिषत् -- ये सात पितर हैं (शिवपुराण? धर्म0 63। 2)। ऊष्म अर्थात् गरम अन्न खानेके कारण पितरोंका नाम ऊष्मपा है।गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घाः -- कश्यपजीकी पत्नी मुनि और प्राधासे तथा अरिष्टासे गन्धर्वोंकी उत्पत्ति हुई है।,गन्धर्वलोग रागरागिनियोंकी विद्यामें बड़े चतुर हैं। ये स्वर्गलोकके गायक हैं।कश्यपजीकी पत्नी खसासे यक्षोंकी उत्पत्ति हुई है।देवताओंके विरोधी (टिप्पणी प0 588) दैत्यों? दानवों और राक्षसोंको असुर कहते हैं। कपिल आदिको सिद्ध कहते हैं।वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्चैव सर्वे -- उपर्युक्त सभी देवता? पितर? गन्धर्व? यक्ष आदि चकित होकर आपको देख रहे हैं। ये सभी देवता आदि विराट्रूपके ही अङ्ग हैं। सम्बन्ध -- अब अर्जुन आगेके तीन श्लोकोंमें विश्वरूपके महान् विकराल रूपका वर्णन करके उसका परिणाम बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.22।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.22।।दृश्यमानस्य भगवद्रूपस्य विस्मयकरत्वे हेत्वन्तरमाह -- किञ्चेति। त एवोक्ता रुद्रादयः सर्वे विस्मयमापन्नास्त्वां पश्यन्तीति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.22।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.22।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.22।। --,रुद्रादित्याः वसवो ये च साध्याः रुद्रादयः गणाः विश्वेदेवाः अश्विनौ च देवौ मरुतश्च ऊष्मपाश्च पितरः? गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः गन्धर्वाः हाहाहूहूप्रभृतयः यक्षाः कुबेरप्रभृतयः असुराः विरोचनप्रभृतयः सिद्धाः कपिलादयः तेषां संघाः गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसंघाः? ते वीक्षन्ते पश्यन्ति त्वा त्वां विस्मिताः विस्मयमापन्नाः सन्तः ते एव सर्वे।।यस्मात् --,
───────────────────
【 Verse 11.23 】
▸ Sanskrit Sloka: रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं महाबाहो बहुबाहूरुपादम् | बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोका: प्रव्यथितास्तथाहम् ||
▸ Transliteration: rūpaṁ mahatte bahuvaktranetraṁ mahābāho bahubāhūrupādam | bahūdaraṁ bahu-daṁṣṭrā-karālaṁ dṛṣṭvā lokāḥ pravyathitās tathāham ||
▸ Glossary: rūpaṁ: form; mahat: very great; te: of You; bahu: many; vaktra: faces; netraṁ: eyes; mahābāho: O mighty-armed one; bahu: many; bāhu: arms; ūru: thighs; pādam : legs; bahūdaraṁ: many bellies; bahu daṁṣṭrā: many teeth; karālaṁ: horrible; dṛṣṭvā: seeing; lokāḥ: all the world; pravyathitāḥ: perturbed; tathā: similarly; aham: I
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.23 Having seen Your immeasurable form with many mouths and eyes, with many arms, thighs and feet, with many stom- achs and frightening tusks, O mighty-armed, the worlds are terrified and so am I.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.23।।हे महाबाहो आपके बहुत मुखों और नेत्रोंवाले? बहुत भुजाओं? जंघाओं और चरणोंवाले? बहुत उदरोंवाले? बहुत विकराल दाढ़ोंवाले महान् रूपको देखकर सब प्राणी व्यथित हो रहे हैं तथा मैं भी व्यथित हो रहा हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.23।। हे महाबाहो आपके बहुत मुख तथा नेत्र वाले? बहुत बाहु? उरु (जंघा) तथा पैरों वाले? बहुत उदरों वाले तथा बहुतसी विकराल दाढ़ों वाले महान् रूप को देखकर सब लोग व्यथित हो रहे हैं और उसी प्रकार मैं भी (व्याकुल हो रहा हूँ)।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.23 रूपम्
Chapter 11 (Part 8)
form? महत् immeasurable? ते Thy? बहुवक्त्रनेत्रम् with many mouths and eyes? महाबाहो O,mightyarmed? बहुबाहूरुपादम् with many arms? thighs and feet? बहूदरम् with many stomachs. बहुदंष्ट्राकरालम् fearful with many teeth? दृष्ट्वा having seen? लोकाः the worlds? प्रव्यथिताः are terrified? तथा also? अहम् I.Commentary Lokah The worlds -- all living beings in the world. Here is the cause of my fear. Arjuna describes below the nature of the Cosmic Form which has caused terror in his heart.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.23. O Mighty-armed One ! Having seen Your mighty form that has many faces and eyes, many arms, thighs and feet, and many bellies, and is terrible with many tusks; the worlds are frightened and so also myself.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.23 Seeing Thy stupendous Form, O Most Mighty, with its myriad faces, its innumerable eyes and limbs and terrible jaws, I myself and all the worlds are overwhelmed with awe.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.23 Beholding Your great form with many mouths and eyes, with many arms, thights, and feet, witth many stomachs and terrible with many teeth, the worlds tremble, and I too ake, O mighty-armed.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.23 O mighty-armed One, seeing Your immense form with many mouths and eyes, having numerous arms, thighs and feet, with many bellies, and fearful with many teeth, the creatures are struck with terror, and so am I.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.23 Having seen Thy immeasurable form with many mouths and eyes, O mighty-armed, with many arms, thighs and feet, with many stomachs and fearful with many teeth the worlds are terrified and so am I.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.23 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.23 Beholding Your mighty form, as described earlier, which is an exceedingly terrifying figure because of the large teeth - all the worlds, described earlier and containing three kinds of beings, friendly, antagonistic and neutral, and I myself too have become panic-stricken.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.23 Mahabaho, O mighty-armed One; drstva, seeing; te, Your; mahat, immence, very vast; upam, form of this kind; bahu-vaktra-netram, with many mouths and eyes; bahu-bahu-uru-padam, having many arms, thighs and feet; and further, bahu-udaram, with many bellies; and bahu-damstra-karalam, fearful with many teeth; lokah, the creatures in the world; are pravya-thitah, struck with terror; tatha, and so also; am even aham, I. The reason of that is this:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.23।। See commentary under 11.24
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.23।।रूद्रादयः किमर्थ विस्मयापन्ना इति चेत् यस्मात्सर्वे लोकाः करालं तव रुपं दृष्ट्वा पीडिता इत्याह -- रुपमिति। तव रुपं महदतिप्रमाणम्। तदेवाह। बहूनि मुखानि चक्षूंषि च यस्मिन् तत्? बहूनि बाह्वदीनि प्रव्यथिता भयेन प्रचलिताः। ननु प्रव्यथितैर्लोकैः किं तव त्वं तु न व्यथि इत्यत आह। तथाहमपि व्यथितः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.23।।लोकत्रयं प्रव्यथितमित्युक्तमुपसंहरति -- रूपमिति। हे महाबाहो? ते तव रूपं दृष्ट्वा लोकाः सर्वेऽपि प्राणिनः प्रव्यथितास्तथाऽहं प्रव्यथितो भयेन। कीदृशं ते रूपम्। महत् अतिप्रमाणम्। बहूनि वक्त्राणि नेत्राणि च यस्मिंस्तत्। बहवो बाहवः ऊरवः पादाश्च यस्मिंस्तत्। बहून्युदराणि यस्मिंस्तत्। बहुभिर्दंष्ट्राभिः करालमतिभयानकम्। दृष्ट्वैव मत्सहिताः सर्वे लोका भयेन पीडिता इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.23।।पुनर्लोकानामात्मनश्च व्यथामाह -- रूपमिति। महत् आदिमध्यान्तहीनम्। हे महाबाहो? ते तव करालं महारूपं दृष्ट्वा लोका व्यथितास्तथाहं च व्यथित इति योजना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.23।।किञ्चरूपमिति। हे महाबाहो महत्कृपाशक्तियुक्त ते रूपं दृष्ट्वा लोकास्त्वत्स्वरूप एव स्थिताः प्रव्यथिताः? भीता इत्यर्थः। तथाऽहं च प्रव्यथितः। भयजनकत्वेन रूपं वर्णयति -- बह्वित्यादिविशेषणैः। बहूनि वक्त्राणि नेत्राणि च यस्मिन्। बहवः बाहव ऊरवः पादाश्च यस्मिन्। बहूनि उदराणि यस्मिन्। बह्वीभिर्द्रंष्ट्राभिः करालं भयानकम्। वक्त्रबाहुल्येन गिलनसामर्थ्यं? नेत्रबाहुल्येन सर्वतो दर्शनसामर्थ्यं? तेन निलायनाद्यशक्यत्वम्? क्रियाबाहुल्येन ग्रहणसामर्थ्यम्? ऊरुपादबाहुल्येन धावनसामर्थ्यं? तेन पलायनाद्यशक्तत्वम् उदरबाहुल्येन जारणसामर्थ्यम्? दंष्ट्राबाहुल्येन चर्वणसामर्थ्यं द्योतितम्। अत एवंविधं दृष्ट्वा त्वद्रूपस्थाश्चेल्लोकाः प्रव्यथितास्तदा मम कः सन्देह इति तथेति पदेन द्योतितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.23।।किंच -- रूपमिति। हे महाबाहो? महदत्यूर्जितं तव रूपं दृष्ट्वा लोकाः सर्वे प्रव्यथिता अतिभीताः? तथाहं प्रव्यथितोऽस्मि। कीदृशं रूपं दृष्ट्वा। बहूनि वक्त्राणि नेत्राणि च यस्मिंस्तत्? बहवो बाहव ऊरवः पादाश्च यस्मिंस्तत्? बहूनि उदराणि यस्मिंस्तत्? बहुभिर्दंष्ट्राभिः करालं विकृतं। रौद्रमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.23।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.23।।क्योंकि --, हे महाबाहो आपका यह रूप अति महान् -- बहुत लंबाचौड़ा? अनेकों मुख और नेत्रोंवाला -- जिसके अनेकों मुख और नेत्र हैं ऐसा? बहुतसी भुजाओं? जंघाओं और चरणोंवाला -- जिसके बहुतसी भुजाएँ? जंघाएँ और चरण हैं ऐसा? तथा बहुतसे पेटोंवाला -- जिसके बहुतसे पेट हैं ऐसा और बहुतसी दाढ़ोंसे अति विकराल आकृतिवाला है अर्थात् बहुतसी दाढ़ोंके कारण जिसकी आकृति अति भयंकर हो गयी है? ऐसा है। आपके ऐसे ( विकट ) रूपको देखकर संसारके समस्त प्राणी भयसे व्याकुल हो रहे हैं -- काँप रहे हैं? और मैं भी उन्हींकी भाँति भयभीत हो रहा हूँ।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.23।। व्याख्या -- [पन्द्रहवेंसे अठारहवें श्लोकतक विश्वरूपमें देवरूपका? उन्नीसवेंसे बाईसवें श्लोकतक उग्ररूपका और तेईसवेंसे तीसवें श्लोकतक अत्यन्त उग्ररूपका वर्णन हुआ है।]बहुवक्त्रनेत्रम् -- आपके मुख एकदूसरेसे नहीं मिलते। कई मुख सौम्य हैं और कई विकराल हैं। कई मुख छोटे हैं और कई मुख बड़े हैं। ऐसे ही आपके जो नेत्र हैं? वे भी सभी एक समान नहीं दीख रहे हैं। कई नेत्र सौम्य हैं और कई विकराल हैं। कई नेत्र छोटे हैं? कई बड़े हैं? कई लम्बे हैं? कई चौड़े हैं? कई गोल हैं? कई टेढ़े हैं? आदिआदि।बहुबाहूरुपादम् -- हाथोंकी बनावट? वर्ण? आकृति और उनके कार्य विलक्षणविलक्षण हैं। जंघाएँ विचित्रविचित्र हैं और चरण भी तरहतरहके हैं।बहूदरम् -- पेट भी एक समान नहीं हैं। कोई बड़ा? कोई छोटा? कोई भयंकर आदि कई तरहके पेट हैं।बहुदंष्ट्राकरालं दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् -- मुखोंमें बहुत प्रकारकी विकराल दाढ़ें हैं। ऐसे महान् भयंकर? विकराल रूपको देखकर सब प्राणी व्याकुल हो रहे हैं और मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।इस श्लोकसे पहले कहे हुए श्लोकोंमें भी अनेक मुखों? नेत्रों आदिकी और सब लोगोंके भयभीत होनेकी बात आयी है। अतः अर्जुन एक ही बात बारबार क्यों कह रहे हैं इसका कारण है कि -- (1) विराट्रूपमें अर्जुनकी दृष्टिके सामने जोजो रूप आता है? उसउसमें उनको नयीनयी विलक्षणता और दिव्यता दीख रही है।(2) विराट्रूपको देखकर अर्जुन इतने घबरा गये? चकित हो गये? चकरा गये? व्यथित हो गये कि उनको यह खयाल ही नहीं रहा कि मैंने क्या कहा है और मैं क्या कह रहा हूँ।(3) पहले तो अर्जुनने तीनों लोकोंके व्यथित होनेकी बात कही थी? पर यहाँ सब प्राणियोंके साथसाथ स्वयंके भी व्यथित होनेकी बात कहते हैं।(4) एक बातको बारबार कहना अर्जुनके भयभीत और आश्चर्यचकित होनेका चिह्न है। संसारमें देखा भी जाता है कि जिसको भय? हर्ष? शोक? आश्चर्य आदि होते हैं? उसके मुखसे स्वाभाविक ही किसी शब्द या वाक्यका बारबार उच्चारण हो जाता है जैसे -- कोई साँपको देखकर भयभीत होता है तो वह बारबार साँप साँप साँप ऐसा कहता है। कोई सज्जन पुरुष आता है तो हर्षमें भरकर कहते हैं -- आइये आइये आइये कोई प्रिय व्यक्ति मर जाता है तो शोकाकुल होकर कहते हैं -- मैं मारा गया मारा गया घरमें अँधेरा हो गया? अँधेरा हो गया अचानक कोई आफत आ जाती है तो मुखसे निकलता है -- मैं मरा मरा मरा ऐसे ही यहाँ विश्वरूपदर्शनमें अर्जुनके द्वारा भय और हर्षके कारण कुछ शब्दों और वाक्योंका बारबार उच्चारण हुआ है। अर्जुनने भय और हर्षको स्वीकार भी किया है -- अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे (11। 45)। तात्पर्य है कि भय? हर्ष? शोक आदिमें एक बातको बारबार कहना पुनरुक्तिदोष नहीं माना जाता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.23।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.23।।लोकत्रयं प्रव्यथितमित्युक्तमुपसंहरति -- यस्मादिति। ईदृशं यस्मात्ते रूपं तस्मात्तं दृष्ट्वेति योजना। भयेन लौकिकवदहमपि व्यथितो व्यथां पीडां देहेन्द्रियप्रचलनं प्राप्तोऽस्मीत्याह -- तथेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.23।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.23।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.23।। --,रूपं महत् अतिप्रमाणं ते तव बहुवक्त्रनेत्रं बहूनि वक्त्राणि मुखानि नेत्राणि चक्षूंषि च यस्मिन् तत् रूपं बहुवक्त्रनेत्रम्? हे महाबाहो? बहुबाहूरुपादं बहवो बाहवः ऊरवः पादाश्च यस्मिन् रूपे तत् बहुबाहूरुपादम्? किञ्च? बहूदरं बहूनि उदराणि यस्मिन्निति बहूदरम्? बहुदंष्ट्राकरालं बह्वीभिः दंष्ट्राभिः करालं विकृतं तत् बहुदंष्ट्राकरालम्? दृष्ट्वा रूपम् ईदृशं लोकाः लौकिकाः प्राणिनः प्रव्यथिताः प्रचलिताः भयेन तथा अहमपि।।तत्रेदं कारणम् --,
───────────────────
【 Verse 11.24 】
▸ Sanskrit Sloka: नभ:स्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् | दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो ||
▸ Transliteration: nabhaḥspṛśaṁ dīptamanekavarṇaṁ vyāttānanaṁ dīptaviśāla netram | dṛṣṭvā hi tvāṁ pravyathitāntarātmā dhṛtiṁ na vindāmi śamaṁ ca viṣṇo ||
▸ Glossary: nabhaḥ spṛśaṁ: touching the sky; dīptaṁ: glowing; aneka: many; varṇaṁ: color; vyāttā: open; ānanaṁ: mouth; dīpta: shining; viśāla: very great; netraṁ: eyes; dṛṣṭvā : by seeing; hi: certainly; tvāṁ: You; pravyathita: perturbed; an- tarātmā: soul; dhṛtiṁ: steadiness; na: no; vindāmi: find; śamaṁ: peace; ca: also; viṣṇo: O Lord Viṣṇu
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.24 Seeing You, Your form touching the sky, flaming in many colors, mouths wide open, large fiery eyes, O Viṣṇu, I find neither courage nor peace; I am frightened.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.24।।हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं? आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं? आपका मुख फैला हुआ है? आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। ऐसे आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और शान्तिको भी प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.24।। हे विष्णो आकाश के साथ स्पर्श किये हुए देदीप्यमान अनेक रूपों से युक्त तथा विस्तरित मुख और प्रकाशमान विशाल नेत्रों से युक्त आपको देखकर भयभीत हुआ मैं धैर्य और शान्ति को नहीं प्राप्त हो रहा हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.24 नभःस्पृशम् touching the sky? दीप्तम् shining? अनेकवर्णम् in many colours? व्यात्ताननम् with mouths wide open? दीप्तविशालनेत्रम् with larve fiery eyes? दृष्ट्वा having seen? हि verily? त्वाम् Thee? प्रव्यथितान्तरात्मा terrified at heart? धृतिम् courage? न not? विन्दामि (I) find? शमम् peace? च and? विष्णो O Vishnu.Commentary Dhriti also means patience and strength. Sama also means control.The vision of the Cosmic Form has frightened Arjuna considerably.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.24. As I observe You [with form] touching the sky; blazing; having many colours, mouths wide open, eyes blazing and large; I am terrified in my inner soul (mind); and I do not get courage and peace, O Visnu !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.24 When I see Thee, touching the Heavens, glowing with colour, with open mouth and wide open fiery eyes, I am terrified. O My Lord! My courage and peace of mind desert me.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.24 When I behold You touching the Supreme Heaven, shining, multicoloured, with yawning mouths and large resplendent eyes, my inner being trembles in fear. I am unable to find support or peace, O Visnu.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.24 O Visnu, verily, seeing Your form touching heaven, blazing, with many colours, open-mouthed, with fiery large eyes, I , becoming terrified in my mind, do not find steadiness and peace.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.24 On seeing Thee (the Cosmic Form) touching the sky, shining in many colours, with mouths wide open, with large fiery eyes, I am terrified at heart and find neither courage nor peace, O Vishnu.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.24 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.24 The term 'Nabhas' denotes the Supreme Heaven (Parama-Vyoman), which is beyond the Prakrti composed of the three Gunas as established by the Sruti passages such as: 'That is in the Imperishable Supreme Heaven' (Ma. Na. U., 1.2), 'Him, sun-coloured and beyond Tamas' (Sve., 3.8) 'The dweller beyond the Rajas' (Rg. S., 2.6.25.5) and 'He who is the president in the Supreme Heaven' (Rg. S., 8.9.17.7). This can be understood as implied in the statement that 'the form touches the Supreme Heaven.' It expresses the idea that it is the foundation of all - of the principle of the Prakrti with its conditions, and of the individual selves in all states. It has also been initially declared: 'For by You alone are pervaded the interspace of heaven and earth ৷৷.' (11.20). 'Beholding Your form shining, multicoloured, and with yawning mouths and large and resplendent eyes, my inner being trembles in fear. I am unable to find support, namely, I am unable to find support for the body. I am unable to get peace of mind and of the senses. O Visnu, namely, O Pervader, beholding You pervading everything, incomparable in magnitude, extremely wonderful and terrible, I find my limbs ivering and my senses agitated.' Such is the meaning.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.24 O Visnu, hi, verily; drstva, seeing; tvam, You; nabhah-sprsam, touching heaven; diptam, blazing; aneka-varnam, with many colours, (i.e.) possessed of many frightening forms; vyatta-ananam, open-mouthed; dipta-visala-netram, with firey large eyes; I, pravyathita-antara-atma, becoming terrified in my mind; na vindami, do not find; dhrtim, steadiness; ca, and; samam, peace, calmness of mind. Why?
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.24।। अर्जुन द्वारा अनुभव किया गया यह आसाधारण अद्भुत और उग्र दृश्य किसी एक स्थान पर केन्द्रित नहीं किया जा सकता था। वस्तुत? वह सर्वव्यापकता की सीमा तक फैला हुआ था। परन्तु? अर्जुन ने अपनी आन्तरिक दृष्टि में उसे एक परिच्छिन्न रूप और निश्चित आकार में देखा। अरूप गुणों (जैसे स्वतन्त्रता? प्रेम? राष्ट्रीयता इत्यादि) को जब भी हम बौद्धिक दृष्टि से समझते हैं? तब हम उसे एक निश्चित आकार प्रदान करते हैं? जो स्वयं के ज्ञान के लिए ही होता है? परन्तु कदापि इन्द्रियगोचर नहीं होता। इसी प्रकार? यद्यपि विराट् रूप तो विश्वव्यापी है? परन्तु अर्जुन को ऐसा अनुभव होता है? मानो? उसका कोई आकार विशेष है। किन्तु? पुन जब वह इस अनुभूत दृश्य का वर्णन करने का प्रयत्न करता है? तो उसके वचन उसकी ही भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते और उसका अपना प्रयोजन ही सिद्ध नहीं हो पाता है।अर्जुन देखता है कि समस्त लोक उस विराट् पुरुष को देखकर भयभीत हो रहे हैं? जिसमें? बहुत मुख? नेत्र? बहुत बाहु? उरु और पैरों वाले? बहुत उदरों वाले आदि रूप हैं और वह कहता है? मैं भी भयभीत हो रहा हूँ। यह भी सबने अनुभव किया होगा कि यदि हम किसी उत्तेजित जनसमुदाय के मध्य अथवा सत्संग में होते हैं? तब वहाँ के वातावरण का हमारे मन पर भी उसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है। सब लोक भयभीत हुये हैं? और अर्जुन स्वीकार करता है कि? मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।अपनी ही स्वीकारोक्ति के बाद उसे यह भय लगना एक क्षत्रिय पुरुष के लिए अपमानजनक और कायरता का लक्षण जान पड़ा। इसलिए? अपने भय को उचित सिद्ध करने के लिए वह उस भयंकर रूप को अनन्तरूप अर्थात् रूपविहीन बताते हुए कहता है कि विश्वरूप अपने में सबको समेटे हुए है। यह विराट् रूप आकाश को स्पर्श कर रहा है। असंख्य वर्णों से वह दीप्तमान हो रहा है। उसके विशाल आग्नेय नेत्र चमक रहे हैं। उसका मुख सबका भक्षण कर रहा है। यह सब सम्मिलित रूप में देवताओं के साहस को भी डगमगा देने वाला है। अर्जुन यह भी स्वीकार करता है कि इस रूप के दर्शन से मैं भयभीत हूँ मुझे न धैर्य प्राप्त हो रहा है और न शान्ति। यहाँ ध्यान देने की बात है कि इस प्रकार के संवेदनाशून्य भय की स्थिति में वह विश्वरूप को? हे विष्णो कहकर सम्बोधित करता है।जैसा कि मैनें प्रारम्भ में कहा है अर्जुन की अर्न्तदृष्टि में अत्यन्त स्पष्ट अनुभव हो रहा विराट् रूप? वस्तुत अनन्त परमात्मा का इस विश्व के नाम और रूपों के असीम विस्तार की दृष्टि से किया गया वर्णन है। गीता के विद्यार्थियों को इन सूक्ष्म विचारधाराओं का विस्मरण नहीं होने देना चाहिए जिन्हें व्यासजी ने परिश्रमी और लगनशील साधकों के लाभ के लिए गुप्त रख छोड़ा है अपने भय का कारण बताते हुए अर्जुन कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.24।।स्वव्यथायां कारणमाह -- नभ इति। नभःस्पृशं द्युस्पृशं? दीप्तं ज्वलितं? अनेके नाना भयंकरा वर्णा यस्मिन् तं? व्याक्तानि विवृतानि भयंकराणि मुखानि यस्मिन्तं प्रज्वलितानि विस्तीर्णानि नेत्राणि यस्मिन्तं? त्वां दृष्ट्वा प्रव्यथितश्चलितोऽन्तरात्मा मनो यस्य सोऽयं धैर्यं न लभे अतएव शमं मनस्तुष्टिं न लभे। व्यापनशीलता तव मया दृष्टाऽधुना द्रष्टुमसमर्थोऽस्मीति सूचयन्नाह हे विष्णो इति? व्यापनशीलस्त्वं मनोगतमपि जानासीति वा संबोधनाशयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.24।।भयानकत्वमेव प्रपञ्चयति -- नभःस्पृशमिति। न केवलं प्रव्यथित एवाहं त्वां दृष्ट्वा किंतु प्रव्यथितोऽन्तरात्मा मनो यस्य सोहं धृतिं धैर्यं देहेन्द्रियादिधारणसामर्थ्यं शमं च मनःप्रसादं न विन्दामि न लभे। हे विष्णो? त्वां कीदृशम्। नभःस्पृशमन्तरिक्षवव्यापिनं दीप्तं ज्वलितं अनेकवर्णं भयंकरनानासंस्थानयुक्तम् व्यात्ताननं विवृतमुखं दीप्तविशालनेत्रं प्रज्वलितविस्तीर्णचक्षुषं त्वां दृष्ट्वा हि एव प्रव्यथितान्तरात्माहं धृतिं शमं च न विन्दामीत्यन्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.24।।करालत्वप्रपञ्चनेन स्वव्यथामेवाह -- नभ इति। नभःस्पृशं व्योमव्यापिनम्। दीप्तमग्निवज्जाज्वल्यमानम्। व्यात्ताननं विस्तारितमुखम्। दीप्तविशालनेत्रं रक्तनेत्रमित्यर्थः। हि प्रत्यक्षं त्वा त्वां दृष्ट्वा प्रव्यथितान्तरात्मा प्रकर्षेण व्यथितचित्तो धृतिं धैर्यं न विन्दामि न लभे शमं च शान्तिं स्वास्थ्यं च न लभे हे विष्णो व्यापक? भयानकं त्वदाक्रान्तं देशं त्यक्त्वान्यत्र गन्तुमशक्यं तव व्यापकत्वादिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.24।।किञ्च केवलस्वाधिष्ठितदेहाध्यासेन जीवस्यैव न भयं? किन्तु त्वदंशस्यान्तरात्मनोऽपि भयं समुत्पन्नमित्याह -- नभस्स्पृशमिति। नभ आकाशं स्पृशति तदाकाशव्यापि ज्ञातुमशक्यम्। दीप्तं प्रज्वलत्तेजोराशिं ध्यानैकयोग्यम्। अनेकवर्णम् अनेके शुक्ललोहितादयो वर्णा यस्य तं निश्चययोग्यम्। व्यात्ताननं व्यात्तानि प्रसारितानि आननानि यस्य तं प्रार्थनायोग्यम्? दीप्तविशालनेत्रंदीप्तानि ज्वलद्रूपाणि विशालानि नेत्राणि यस्य तं दर्शनायोग्यम्। एतादृशं त्वां दृष्ट्वा प्रव्यथितः अतरात्मा यस्य तादृशो हि निश्चयेन धृतिं धैर्यं शमं च शान्तिं? न विन्दामि न प्राप्नोमीत्यर्थः। स्वरक्षणार्थं विष्णो इति सम्बोधनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.24।। न केवलं भीतोऽहमित्येतावदेव अपि तु -- नभःस्पृशमिति। नभः स्पृशतीति नभःस्पृक्तं। अन्तरिक्षव्यापिनमित्यर्थः। दीप्तं तेजोयुक्तम्। अनेके वर्णा यस्य तमनेकवर्णम्? व्यात्तानि विवृतान्याननानि यस्य तम्? दीप्तानि विशालानि नेत्राणि यस्य तम् एवंभूतं त्वां दृष्ट्वा प्रव्यथितोऽन्तरात्मा मनो यस्य सोऽहम् धृतिं धैर्यमुपशमं च न लभे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.24।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.24।।उसमें यह कारण है कि --, आपके आकाशका स्पर्श किये हुए यानी स्वर्गतक व्याप्त? प्रदीप्त -- प्रकाशमान और अनेक वर्णोंवाले अर्थात् अनेक भयंकर आकृतियोंसे युक्त देखकर तथा फैलाये हुए मुखोंवाले -- जिस शरीरमें फैलाये हुए बहुतसे मुख हैं ऐसे और दीप्त विशाल नेत्रोंवाले -- जिसके बड़ेबड़े नेत्र प्रज्वलित हो रहे हैं ऐसे? देखकर हे विष्णो प्रव्यथितअन्तरात्मा -- अत्यन्त भयभीत अन्तःकरणवाला मैं अर्थात् जिसका मन भयसे व्याकुल हो रहा है ऐसा? मैं धैर्य और उपशमको अर्थात् मनकी तृप्तिरूप शान्तिको नहीं पा रहा हूँ।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.24।। व्याख्या -- [बीसवें श्लोकमें तो अर्जुनने विराट्रूपकी लम्बाईचौड़ाईका वर्णन किया? अब यहाँ केवल लम्बाईका वर्णन करते हैं।]विष्णो -- आप साक्षात् सर्वव्यापक विष्णु हैं? जिन्होंने पृथ्वीका भार दूर करनेके लिये कृष्णरूपसे अवतार लिया है।दीप्तमनेकवर्णम् -- आपके काले? पीले? श्याम? गौर आदि अनेक वर्ण हैं? जो बड़े ही देदीप्यमान हैं।नभः स्पृशम् -- आपका स्वरूप इतना लम्बा है कि वह आकाशको स्पर्श कर रहा है।वायुका गुण होनेसे स्पर्श वायुका ही होता है? आकाशका नहीं। फिर यहाँ आकाशको स्पर्श करनेका तात्पर्य क्या है मनुष्यकी दृष्टि जहाँतक जाती है? वहाँतक तो उसको आकाश दीखता है? पर उसके आगे कालापन दिखायी देता है। कारण कि जब दृष्टि आगे नहीं जाती? थक जाती है? तब वह वहाँसे लौटती है? जिससे आगे कालापन दीखता है। यही दृष्टिका आकाशको स्पर्श करना है। ऐसे ही अर्जुनकी दृष्टि जहाँतक जाती है? वहाँतक उनको भगवान्का विराट्रूप दिखायी देता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्का विराट्रूप असीम है? जिसके सामने दिव्यदृष्टि भी सीमित ही है।व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् -- जैसे कोई भयानक जन्तु किसी जन्तुको खानेके लिये अपना मुख फैलाता है? ऐसे ही मात्र विश्वको चट करनेके लिये आपका मुख फैला हुआ दीख रहा है।आपके नेत्र बड़े ही देदीप्यमान और विशाल दीख रहे हैं।दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो -- इस तरह आपको देखकर मैं भीतरसे बहुत व्यथित हो रहा हूँ। मेरेको कहींसे भी धैर्य नहीं मिल रहा है और शान्ति भी नहीं मिल रही है।यहाँ एक शङ्का होती है कि अर्जुनमें एक तो खुदकी सामर्थ्य है और दूसरी? भगवत्प्रदत्त सामर्थ्य (दिव्यदृष्टि) है। फिर भी अर्जुन तो विश्वरूपको देखकर डर गये? पर सञ्जय नहीं डरे। इसमें क्या कारण है सन्तोंसे ऐसा सुना है कि भीष्म? विदुर? स़ञ्जय और कुन्ती -- ये चारों भगवान् श्रीकृष्णके तत्त्वको विशेषतासे जाननेवाले थे। इसलिये सञ्जय पहलेसे ही भगवान्के तत्त्वको? उनके प्रभावको जानते थे? जब कि अर्जुन भगवान्के तत्त्वको उतना नहीं जानते थे। अर्जुनका विमूढ़भाव (भाव) अभी सर्वथा दूर नहीं हुआ था (गीता 11। 49)। इस विमूढ़भावके कारण अर्जुन भयभीत हुए। परन्तु सञ्जय भगवान्के तत्त्वको जानते थे अर्थात् उनमें विमूढ़भाव नहीं था अतः वे भयभीत नहीं हुए।उपर्युक्त विवेचनसे एक बात सिद्ध होती है कि भगवान् और महापुरुषोंकी कृपा विशेषरूपसे अयोग्य मनुष्योंपर होती है? पर उस कृपाको विशेषरूपसे योग्य मनुष्य ही जानते हैं। जैसे छोटे बच्चेपर माँका अधिक स्नेह होता है? पर बड़ा लड़का माँको जितना जानता है? उतना छोटा बच्चा नहीं जानता। ऐसे ही भोलेभाले? सीधेसादे व्रजवासी? ग्वालबाल? गोपगोपी और गाय -- इनपर भगवान् जितना अधिक स्नेह करते हैं? उतना स्नेह जीवन्मुक्त महापुरुषोंपर नहीं करते। परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुष ग्वालबाल आदिकी अपेक्षा भगवान्को विशेषरूपसे जानते हैं। सञ्जयने विश्वरूपके लिये प्रार्थना भी नहीं की और विश्वरूपको देख लिया। परन्तु विश्वरूप देखनेके लिये अर्जुनको स्वयं भगवान्ने ही उत्कण्ठित किया और अपना विश्वरूप भी दिखाया क्योंकि सञ्जयकी अपेक्षा भगवान्के तत्त्वको जाननेमें अर्जुन छोटे थे और भगवान्के साथ सखाभाव रखते थे। इसलिये अर्जुनपर भगवान्की कृपा अधिक थी। इस कृपाके कारण अन्तमें अर्जुनका मोह नष्ट हो गया -- नष्टो मोहः ৷৷. त्वत्प्रसादात् (गीता 18। 73)। इससे सिद्ध होता है कि कृपापात्रका मोह अन्तमें नष्ट हो ही जाता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.24।।No commentary.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.24।।अर्जुनस्य विश्वरूपदर्शनेन व्यथितत्वे हेतुमाह -- तत्रेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.24।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.24।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.24।। --,नभःस्पृशं द्युस्पर्शम् इत्यर्थः? दीप्तं प्रज्वलितम्? अनेकवर्णम् अनेके वर्णाः भयंकराः नानासंस्थानाः यस्मिन् त्वयि तं त्वाम् अनेकवर्णम्? व्यात्ताननं व्यात्तानि विवृतानि आननानि मुखानि यस्मिन् त्वयि तं त्वां व्यात्ताननम्? दीप्तविशालनेत्रं दीप्तानि प्रज्वलितानि विशालानि विस्तीर्णानि नेत्राणि यस्मिन् त्वयि तं त्वां दीप्तविशालनेत्रं दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा प्रव्यथितः प्रभीतः अन्तरात्मा मनः यस्य मम सः अहं प्रव्यथितान्तरात्मा सन् धृतिं धैर्यं न विन्दामि न लभे शमं च उपशमनं मनस्तुष्टिं हे विष्णो।।कस्मात् --,
───────────────────
【 Verse 11.25 】
▸ Sanskrit Sloka: दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि | दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवास ||
▸ Transliteration: daṁṣṭrākarālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni | diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsa ||
▸ Glossary: daṁṣṭrā: teeth; karālāni: ferocious; ca: also; te: Your; mukhāni: faces; dṛṣṭvā: seeing; eva: thus; kālānala: the fire of death; sannibhāni: as if blazing; diśaḥ: directions; na jāne: do not know; na labhe: nor obtain; ca śarma: and grace; prasīda: be pleased; deveśa: O Lord of all lords; jagannivāsa: refuge of the worlds
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.25 Having seen your fearsome mouths with blazing tusks like the fire of the end of the universe, I know not the four directions nor do I find peace. O Lord of the Deva, O refuge of the Universe, be gracious.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.25।।आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.25।। आपके विकराल दाढ़ों वाले और प्रलयाग्नि के समान प्रज्वलित मुखों को देखकर? मैं न दिशाओं को जान पा रहा हूँ और न शान्ति को प्राप्त हो रहा हूँ इसलिए हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न हो जाइए।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.25 दंष्ट्राकरालानि fearful with teeth? च and? ते Thy? मुखानि mouths? दृष्ट्वा having seen? एव even? कालानलसन्निभानि blazing like Pralayafires? दिशः the four arters? न not? जाने know? न not? लभे do (I) obtain? च and? शर्म peace? प्रसीद have mercy? देवेश O Lord of the gods? जगन्निवास O abode of the universe.Commentary Jagannivasa The substratum of the universe.Kalanala The fires which consume the worlds during the final dissolution of the worlds (Pralaya). Time (Kala) is the consumer of all that is manifest.Diso no jane I do not know the four arters. I cannot distinguish the east from the west? nor the north from the south.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.25. By merely seeing Your faces that are frightening with tusks and are looking like the fire of destruction, I do not know the arters and get no peace. Have mercy, O Lord of gods ! O Abode of the Universe !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.25 When I see Thy mouths with their fearful jaws like glowing fires at the dissolution of creation, I lose all sense of place; I find no rest. Be merciful, O Lord in whom this universe abides!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.25 Viewing Your mouths, presenting awe-generating fangs and looking like the consuming fire of final destruction, I know not the arters of the globe nor do I find repose. Be gracious, O Lord of the Devas! O Abode of the universe!
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.25 Having merely seen Your mouths made terrible with (their) teeth and resembling the fire of Dissolution, I have lost the sense of direction and find no comfort. Be gracious, O Lord of gods, O Abode of the Universe.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.25 Having seen Thy mouths fearful with teeth (blazing) like the fires of cosmic dissolution, I know not the four arters, nor do I find peace. Have mercy, O Lord of the gods, O abode of the universe.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.25 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.25 Looking at Your mouths, extremely terrifying and like cosmic fire at the end of the universe, and operating for the destruction of everything, I have lost the sense of recognising the arters of the sky, nor do I feel happy and peaceful. O Abode of all the worlds, O Lord of all the Devas, namely, O Overlord of even gods like Brahma! Be gracious unto me. The meaning is: 'Do act in such a way that I may attain my natural condition.
Arjuna's charioteer (Parthasarathi), thus showing that all the worlds depend upon Him for their existence and activities, showed to the son of Prtha (Arjuna) that what He wanted to do, making Arjuna a mere instrument of His, was to lighten the burden of the earth through the destruction of all those who were of Asuric manifestations and who, in the guise of kings, were presenting themselves as the sons of Dhrtarastra and their followers. Many such embodiments of Asuras were present also in the ranks of Yudhisthira's followers. And Arjuna, after having realised with the divine eyes, received through His grace, the complete manifestation of the Lord as the Creator etc., witnessed also the slaughter of the followers of the sons of Dhrtarastra etc., in that Lord Himself, who is the Self of all, even though it (the slaughter) had not happened actually according to human calculations. Arjuna continues:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.25 Drstva eva, having merely seen; te, Your; mukhani, mouths; damstra-karalani, made terrible with (their) teeth; and kala-anala-sannibhani, resembling the fire of Dissolution is kalanala; similar to that; na jane, I have lost; the sense of disah, direction-I do not know the directions as to which is East or which is West; and hence, na labhe, find no; sarma, comfort. Therefore, prasida, be gracious; devesa, O Lord of gods; jagannivasa, O Abode of the Universe! 'The apprehension which was there of my getting defeated by those offers, that too has cleared away, since-'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.25।। जैसा कि श्लोक में वर्णन किया गया है? अर्जुन ऐसे भयंकर रूप को देखकर अपना धैर्य और सुख खो रहा है। सर्वभक्षी? सबको एक रूपकर देने वाले काल का यह चित्र है। जब दृष्टि के समक्ष ऐसा विशाल दृश्य उपस्थित हो जाता है? और वह भी इतने आकस्मिक रूप से? तो विशालता का उसका परिमाण ही विवेकशक्ति का मानो गला घोंट देता है और क्षणभर के लिए वह व्यक्ति संवेदनाशून्य हो जाता है। भ्रान्तिजन्य दुर्व्यवस्था की दशा को यहाँ इन शब्दों में व्यक्त किया गया है कि? मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ। बात यहीं पर नहीं समाप्त होती। मैं न धैर्य रख पा रहा हूँ और न शान्ति,को भी।आत्यन्तिक विस्मय की इस स्थिति में आश्चर्यचकित मानव यह अनुभव करता है कि उसकी शारीरिक शक्ति? मानसिक क्षमतायें और बुद्धि की सूक्ष्मदर्शिता अपने भिन्नभिन्न रूप में तथा सामूहिक रूप में भी वस्तुत महत्त्वशून्य साधन हैं। छोटा सा अहंकार अपने मिथ्या अभिमान के आवरण और मिथ्या शक्ति के कवच को त्यागकर पूर्ण विवस्त्र हुआ स्वयं को नम्र भाव से समष्टि की शक्ति के समक्ष समर्पित कर देता है। परम दिव्य? समष्टि शक्ति के सम्मुख जिस व्यक्ति ने पूर्णरूप से अपने खोखले अभिमानों की अर्थशून्यता समझ ली है? उसके लिए केवल एक आश्रय रह जाता है? और वह है प्रार्थना।इस श्लोक के अन्त में अर्जुन प्रार्थना करता है? हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न हो जाइये। इस प्रार्थना के द्वारा व्यासजी यह दर्शाते हैं कि मान और दम्भ से पूर्ण हृदय वाले व्यक्ति के द्वारा कभी भी वास्तविक प्रार्थना नहीं की जा सकती है। जब व्यक्ति इस विशाल समष्टि विश्व में अपनी तुच्छता समझता है? केवल तभी वह सच्चे हृदय से स्वत प्रार्थना करता है।अर्जुन इस युद्ध में अपनी विजय के प्रति सशंक था। 21वें श्लोक से प्रारम्भ किये गये इस प्रकरण का मुख्य उद्देश्य अर्जुन को भावी घटनाओं का कुछ बोध कराना है। उसे युद्ध के परिणाम के प्रति आश्वस्त करते हुए? अब भगवान् सीधे ही सेनाओं के योद्धाओं को काल के मुख में प्रवेश करते हुए दिखाते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.25।।दंष्ट्राभिः करानि विकृतानि प्रलयकालाग्निसदृशानि च दृष्टैव नतु प्राप्य दिशः पूर्वापरविवेकेन न जानामि। शर्म सुखं च न लभे अतो हे देवेश हे जगन्निवास? प्रसीद प्रसन्नो भव। तव देवेशत्वं जगन्निवासत्वं च प्रत्यक्षेण मयोपलब्धं यदर्थं मम प्रार्थना आसीदिति द्योतनार्थं संबोधनद्वयम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.25।।दंष्ट्रेति। दंष्ट्राभिः करालानि विकृतत्वेन भयंकराणि प्रलयकालानलसदृशानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव नतु तानि प्राप्य भयवशेन दिशः पूर्वापरादिविवेकेन न जाने। अतो न लभे च शर्म सुखं त्वद्रूपदर्शनेऽपि। अतो हे देवेश हे जगन्निवास? प्रसीद प्रसन्नो भव मां प्रति यथा भयाभावेन त्वद्दर्शनजं सुखं प्राप्नुयामिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.25।।कालानलः प्रलयाग्निस्तत्तुल्यानि। प्रसीद प्रसन्नः सुखदो भवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.25।।किञ्च भयाधिक्येन पुनर्विज्ञापयति -- दंष्ट्राकरालानीति। हे देवेश सर्वपूज्य ते मुखानि दंष्ट्राभिः करालानि भयोत्पादकानि। च पुनः कालानलसन्निभानि प्रलयाग्निसन्निभानि दृष्ट्वैव भयाद्दिशो न जाने गत्वा प्राप्यस्थानं न जानामि। शर्म त्वदवलोकनरूपं च सुखं न लभे। अतो हे जगन्निवास जगत्पालक जगतः सुखस्थितिरूप प्रसन्नो भव प्राप्यं स्थानं दर्शयेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.25।। किंच -- दंष्ट्रेति। भो देवेश? तव मुखानि दृष्ट्वा भयावेशेन दिशो न जानामि। शर्म च सुखं न लभे। भो जगन्निवास प्रसन्नो भव। कीदृशानि मुखानि। दंष्ट्राभिः करालानि कालानलः प्रलयाग्निस्तत्सदृशानि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.25।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.25।।क्योंकि --, दाढ़ोंसे युक्त भयंकर -- विकराल आकृतिवाले और कालाग्निके समान अर्थात् प्रलयकालमें लोकोंको भस्मीभूत करनेवाली जो कालाग्नि है? उसके समान आपके मुखोंको देखकर मैं इन दिशाओंको पूर्व और पश्चिमके विवेकपूर्वक नहीं जानता हूँ अर्थात् मुझे दिग्भ्रम हो गया है। इसीसे ( आपके स्वरूपका दर्शन करते हुए भी ) मुझे विश्राम -- सुख नहीं मिल रहा है? सो हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.25।। व्याख्या -- दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि -- महाप्रलयके समय सम्पूर्ण त्रिलोकीको भस्म करनेवाली जो अग्नि प्रकट होती है? उसे संवर्तक अथवा कालाग्नि कहते हैं। उस कालाग्निके समान आपके मुख है? जो भयंकरभयंकर दाढ़ोंके कारण बहुत विकराल हो रहे हैं। उनको देखनेमात्रसे ही बड़ा भय लग रहा है। अगर उनका कार्य देखा जाय तो उसके सामने किसीका टिकना ही मुश्किल है।दिशो न जाने न लभे च शर्म -- ऐसे विकराल मुखोंको देखकर मुझे दिशाओंका भी ज्ञान नहीं हो रहा है। इसका तात्पर्य है कि दिशाओंका ज्ञान होता है सूर्यके उदय और अस्त होनेसे। पर वह सूर्य तो आपके नेत्रोंकी जगह है अर्थात् वह तो आपके विराट्रूपके अन्तर्गत आ गया है। इसके सिवाय आपके चारों ओर महान् प्रज्वलित प्रकाशहीप्रकाश दीख रहा है (11। 12)? जिसका न उदय और न अस्त हो रहा है। इसलिये मेरेको दिशाओंका ज्ञान नहीं हो रहा है और विकराल मुखोंको देखकर भयके कारण मैं किसी तरहका सुख और शान्ति भी प्राप्त नहीं कर रहा हूँ।प्रसीद देवेश जगन्निवास -- आप सब देवताओंके मालिक हैं और सम्पूर्ण संसार आपमें ही निवास कर रहा है। अतः कोई भी देवता? मनुष्य भयभीत होनेपर आपको ही तो पुकारेगा आपके सिवाय और किसको पुकारेगा तथा और कौन सुनेगा इसलिये मैं भी आपको पुकारकर कह रहा हूँ कि हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।भगवान्के विकराल रूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् मानो बड़े क्रोधमें आये हुए हैं। इस भावनाको लेकर ही भयभीत अर्जुन भगवान्से प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना कर रहे हैं। सम्बन्ध -- अब अर्जुन आगेके दो श्लोकोंमें मुख्यमुख्य योद्धाओंका विराट्रूपमें प्रवेश होनेका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.25।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.25।।दृश्यमानेऽपि भगवद्देहे परितोषाद्यभावे कारणान्तरं प्रश्नपूर्वकमाह -- कस्मादिति। दृष्ट्वैवेत्येवकारेण प्राप्तिर्व्यावर्त्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.25।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.25।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.25।। --,दंष्ट्राकरालानि दंष्ट्राभिः करालानि विकृतानि ते तव मुखानि दृष्ट्वैव उपलभ्य कालानलसंनिभानि प्रलयकाले लोकानां दाहकः अग्निः कालानलः तत्सदृशानि कालानलसंनिभानि मुखानि दृष्ट्वेत्येतत्। दिशः पूर्वापरविवेकेन न जाने दिङ्मूढो जातः अस्मि। अतः न लभे च न उपलभे च शर्म सुखम्। अतः प्रसीद प्रसन्नो भव हे देवेश? जगन्निवास।।येभ्यो मम पराजयाशङ्का या आसीत् सा च अपगता।,यतः --,
───────────────────
【 Verse 11.26 】
▸ Sanskrit Sloka: अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा: सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै: | भीष्मो द्रोण: सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यै: ||
▸ Transliteration: amī ca tvāṁ dhṛtarāṣṭrasya putrāḥ sarve sahaivāvanipālasaṅghaiḥ | bhīṣmo droṇaḥ sūtaputrastathāsau sahāsmadīyairapi yodhamukhyaiḥ ||
▸ Glossary: amī: all those; ca: also; tvāṁ: You; dhṛtarāṣṭrasya: of Dhṛtarāṣṭra; putrāḥ: sons; sarve: all; sahaiva: along with; avanipāla: warrior kings; saṁghaiḥ: the groups; bhīṣm: Bhīṣma; droṇaḥ: Droṇācārya; sūtaputraḥ: Karṇa; tathā: also; asau: that; saha: with; asmadīyaiḥ: our; api: also; yodhamukhyaiḥ: chief among the warriors
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.26 All the sons of Dhṛtarāṣṭra with many kings of the earth, Bhīṣma, Droṇa, the son of the charioteer, Karṇa, with our warrior chieftains.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.26।।हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म? द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सबकेसब पुत्र आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कईएक तो चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.26।। और ये समस्त धृतराष्ट्र के पुत्र राजाओं के समुदाय सहित आप में प्रवेश करते हैं। भीष्म? द्रोण तथा कर्ण और हमारे पक्ष के भी प्रधान योद्धाओं के सहित.।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.26 अमी these? च and? त्वाम् Thee? धृतराष्ट्रस्य of Dhritarashtra? पुत्राः sons? सर्वे all? सह with? एव even? अवनिपालसङ्घैः hosts of kings? भीष्मः Bhishma? द्रोणः Drona? सूतपुत्रः Karana? तथा also? असौ this? सह with? अस्मदीयैः with (those) of ours? अपि also? योधमुख्यैः (with) warrior chiefs.Commentary Karna? though he was the son of Kunti? the mother of the Pandavas? was brought up by a charioteer and hence came to be regarded as his son.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.26. All these sons of Dhrtarastra along with the entire hosts of kings, this Bhisma, this Drona and this son of the charioteer (Karna), together with the chief warriors of ours too;
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.26 All these sons of Dhritarashtra, with the hosts of princes, Bheeshma, Drona and Karna, as well as the other warrior chiefs belonging to our side;
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.26 All these sons of Dhrtarastra together with the hosts of monarchs, Bhisma, Drona and Karna along with the leading warriors of our side,
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.26 And into You (enter) all those sons of Dhrtarastra along with multitudes of the rulers of the earth; (also) Bhisma, Drona and that son of a Suta (Karna), together with even our prominent warriors.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.26 All the sons of Dhritarashtra, with the hosts of kings of the earth, Bhishma, Drona and Karna, with the chief among our warriors.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.26 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.26 11.27 All these sons of Dhrtarastra like Duryodhana and others like Bhisma, Drona, and Suta's son Karna together with the hosts of monarchs on their side and also the leading warriors on our side, are hastening to their destruction; they enter Your fearful mouths with terrible fangs; some, caught between the teeth are seen with their heads crushed to powder.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.26 Ca, and; tvam, into You-this is to be connected with 'rapidly enter' in the next verse; sarve, all; ami, those; putrah, sons-Duryodhana and others; dhrtarastrasya, of Dhrtarastra; saha, along with; avanipala-sanghaih, multitudes of the rulers (pala) of the earth (avani); also
Chapter 11 (Part 9)
Bhisma, Drona, tatha, and; asau, that; suta-putrah, son of a Suta, Karna; saha, together with; api, even; asmadiyaih, our; yodha-mukhyaih, prominent warriors, the ?nders-Dhrstadyumna and others. Moreover,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.26।। च्ड्ढड्ढ क्दृथ्र्थ्र्ड्ढदद्यठ्ठद्धन्र् द्वदड्डड्ढद्ध 11.27
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.26।।पराजयाशङ्कापि मम निवृत्ता इत्याशयेनाह। अभी च त्वा त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा दुर्योधनादयस्त्वरमाणा विशन्तीति परेणान्वयः। सर्वे युयुत्सुव्यतिरिक्ता अवनिपालानां राज्ञां जयद्रथादीनां समूहैः सहैव। किंच येषु परेषां जयाशा तेऽपि भाष्मादयः सूतपुत्रः कर्णोऽसौ ममातीव शत्रुः अस्मदीयैरपि योधानां प्रधानैः शिखण्डिधृष्टद्युम्नदिभूः सहैव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.26।।अस्माकं जयं परेषां पराजयं च सर्वदा द्रष्टुमिष्टं पश्य। मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसीति भगवदादिष्टमधुना पश्यामीत्याह पञ्चभिः -- अमीचेत्यादिना। अमी च धृतराष्ट्रस्य पुत्रा दुर्योधनप्रभृतयः शतं सोदरा युयुत्सुं विना सर्वे त्वां त्वरमाणा विशन्तीत्यग्रेतनेनान्वयः। अतिभयसूचकत्वेन क्रियापदन्यूनत्वमत्र गुण एव। सहैवावनिपालानां शल्यादीनां राज्ञां सङ्घैस्त्वां विशन्ति। न केवलं दुर्योधनादय एव विशन्ति किंतु अजेयत्वेन सर्वैः संभावितोऽपि भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रः कर्णस्तथासौ सर्वदा मम विद्वेष्टा। सहास्मदीयैरपि परकीयैरिव धृष्टद्युम्नप्रभृतिर्योधमुख्यैस्त्वां विशन्तीत्यन्वयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.26।।अमी त्वां विशन्तीत्यग्रिमश्लोकादपकृष्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.26।।एवं भगवत्स्वरूपस्थं जगद्दृष्ट्वा विज्ञाप्ययच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि [11।7] इति भगवतोक्तं तदर्थं बाह्यस्थः स्वपरसैन्यस्वरूपज्ञानदर्शनेच्छया दृष्ट्वा विज्ञापयति -- अमी चेति पञ्चभिः। च पुनः। बाह्यस्थाः अमी परिदृश्यमानाः धृतराष्ट्रस्य पुत्रा आलोचनरहिताः सर्वे अवनिपालसङ्घैः जयद्रथादिसमूहैः सह? भीष्मो योद्धा च? द्रोणः शास्त्रविशारदः? सूतपुत्रः कर्णः अस्मदीयैरपि योधमुख्यैः घृष्टद्युम्नादिभिः सह।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.26।।यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसीत्यनेनास्मिन्संग्रामे भाविजयपराजयादिकं च मम देहे पश्येति यद्भगवतोक्तं तदिदानीं पश्यन्नाह -- अमी चेति पञ्चभिः। अमी धृतराष्ट्रस्य पुत्रा दुर्योधनादयः सर्वे अवनिपालानां जयद्रथादीनां राज्ञां सहैव तव वक्त्राणि विशन्तीत्युत्तरेणान्वयः। तथा भीष्मश्च द्रोणश्चासौ सूतपुत्रः कर्णश्च। न केवलं त एव विशन्ति अपितु प्रतियोद्वारो येऽस्मदीया योधमुख्याः शिखण्डिधृष्टद्युम्नादयः तैः सह।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.26।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.26।।जिन शूरवीरोंसे मुझे पहले पराजयकी आशङ्का थी? वह भी अब चली गयी क्योंकि --, ये दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रके समस्त पुत्र अवनिपालोंके दलोंसहित -- अवनि यानी पृथ्वीका जो पालन करें उनका नाम अवनिपाल है। उनके दलोंसहित इकट्ठे होकर बड़े वेगसे आपके मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं। यही नहीं? किंतु भीष्म? द्रोण और यह सूतपुत्र -- कर्ण एवं हमारी ओरके भी धृष्टद्युम्नादि प्रधान योद्धाओंके सहित ( सबसेसब )।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.26।। व्याख्या -- भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः -- हमारे पक्षके धृष्टद्युम्न? विराट्? द्रुपद आदि जो मुख्यमुख्य योद्धालोग हैं? वे सबकेसब धर्मके पक्षमें हैं और केवल अपना कर्तव्य समझकर युद्ध करनेके लिये आये हैं। हमारे इन सेनापतियोंके साथ पितामह भीष्म? आचार्य द्रोण और वह प्रसिद्ध सूतपुत्र कर्ण आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं।यहाँ भीष्म? द्रोण और कर्णका नाम लेनेका तात्पर्य है कि ये तीनों ही अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये युद्धमें आये थे (टिप्पणी प0 591)।अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः -- दुर्योधनके पक्षमें जितने राजालोग हैं? जो युद्धमें दुर्योधनका प्रिय करना चाहते हैं (गीता 1। 23) अर्थात् दुर्योधनको हितकी सलाह नहीं दे रहे हैं? उन सभी,राजाओंके समूहोंके साथ धृतराष्ट्रके दुर्योधन? दुःशासन आदि सौ पुत्र विकराल दाढ़ोंके कारण अत्यन्त भयानक आपके मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रवेश कर रहे हैं -- वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।विराट्रूपमें वे चाहे भगवान्में प्रवेश करें? चाहे भगवान्के मुखोंमें जायँ? वह एक ही लीला है। परन्तु भावोंके अनुसार उनकी गतियाँ अलगअलग प्रतीत हो रही हैं। इसलिये भगवान्में जायँ अथवा मुखोंमें जायँ? वे हैं तो विराट्रूपमें ही।केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः -- जैसे खाद्य पदार्थोंमें कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं? जो चबाते समय सीधे पेटमें चले जाते हैं? पर कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं? जो चबाते समय दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें फँस जाते हैं। ऐसे ही आपके मुखोंमें प्रविष्ट होनेवालोंमेंसे कईएक तो सीधे भीतर (पेटमें) चले जा रहे हैं? पर कईएक चूर्ण हुए मस्तकोंसहित आपके दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।यहाँ एक शङ्का होती है कि योद्धालोग तो अभी सामने युद्धक्षेत्रमें ख़ड़े हुए हैं? फिर वे अर्जुनको विराट्रूपके मुखोंमें जाते हुए कैसे दिखायी दिये इसका समाधान यह है कि भगवान् विराट्रूपमें अर्जुनको आसन्न भविष्यकी बात दिखा रहे हैं। भगवान्ने विराट्रूप दिखाते समय अर्जुनसे कहा था कि तू और भी जो कुछ देखना चाहता है? वह भी मेरे इस विराट्रूपमें देख ले (11। 7)। अर्जुनके मनमें सन्देह था कि युद्धमें हमारी जीत होगी या कौरवोंकी (2। 6) इसलिये उस सन्देहको दूर करनेके लिये भगवान् अर्जुनको आसन्न भविष्यका दृश्य दिखाकर मानो यह बताते हैं कि युद्धमें तुम्हारी ही जीत होगी। आगे अर्जुनके द्वारा प्रश्न करनेपर भी भगवान्ने यही बात कही है (11। 32 -- 34)। सम्बन्ध -- जो अपना कर्तव्य समझकर धर्मकी दृष्टिसे युद्धमें आये हैं और जो परमात्माकी प्राप्ति चाहनेवाले हैं -- ऐसे पुरुषोंका विराट्रूपमें नदियोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.26।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.26। अस्माकं जयं परेषां पराजयं च दिदृक्षन्तं [दिदृक्षुं] दिदृक्षुं त्वां पश्यामीत्याह -- येभ्य इति। तत्र हेतुत्वेन श्लोकमवतारयति -- यत इति। न केवलं दुर्योधनादीनामेव पराजयः किंतु भीष्मादीनामपीत्याह -- किञ्चेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.26।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.26।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.26।। --,अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः दुर्योधनप्रभृतयः -- त्वरमाणाः विशन्ति इति व्यवहितेन संबन्धः -- सर्वे सहैव सहिताः अवनिपालसंघैः अवनिं पृथ्वीं पालयन्तीति अवनिपालाः तेषां संघैः? किञ्च भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रः कर्णः तथा असौ सह अस्मदीयैरपि धृष्टद्युम्नप्रभृतिभिः योधमुख्यैः योधानां मुख्यैः प्रधानैः सह।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.27 】
▸ Sanskrit Sloka: वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि | केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गै: ||
▸ Transliteration: vaktrāṇi te tvaramāṇā viśanti daṁṣṭrā-karālāni bhayānakāni | kecidvilagnā daśanāntareṣu sandṛśyante cūrṇitair uttamāñgaiḥ ||
▸ Glossary: vaktrāṇi: mouths; te: Your; tvaramāṇḥ: hurrying; viśanti: entering; daṁṣṭrā: teeth; karālāni: terrible; bhayānakāni: very fearful; kecit: some of them; vila- gnā: being attacked; daśanāntareṣu: between the teeth; saṁdṛśyante: found; cūrṇitaiḥ: crushed; uttamāñgaiḥ: by the head
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.27 Into Your mouths with terrible tusks, fearful to behold, they enter. Some are seen caught in the gaps between the tusks and their heads crushed.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.27।।हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म? द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सबकेसब पुत्र आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कईएक तो चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.27।। तीव्र वेग से आपके विकराल दाढ़ों वाले भयानक मुखों में प्रवेश करते हैं और कई एक चूर्णित शिरों सहित आपके दांतों के बीच में फँसे हुए दिख रहे हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.27 वक्त्राणि mouths? ते Thy? त्वरमाणाः hurrying? विशन्ति enter? दंष्ट्राकरालानि terribletoothed? भयानकानि fearful to behold? केचित् some? विलग्नाः sticking? दशनान्तरेषु in the gaps between the teeth? संदृश्यन्ते are found? चूर्णितैः crushed to powder? उत्तमाङ्गैः with (their) heads.Commentary How do they enter into the mouth Arjuna continues
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.27. They enter, hastening, into Your terrible mouths, frightening with tusks; some [of them], sticking in between Your teeth, are clearly visible with their heads powered.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.27 1 see them all rushing headlong into Thy mouths, with terrible tusks, horrible to behold. Some are mangled between thy jaws, with their heads crushed to atoms.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.27 Hasten to enter Your fearful mouths with terrible fangs. Some, caught between the teeth are seen with their heads crushed to powder.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.27 They rapidly enter into Your terrible mouths with cruel teeths! Some are seen sticking in the gaps between the teeth, with their heads crushed!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.27 Some hurriedly enter Thy mouths with their terrible teeth, fearful to behold. Some are found sticking in the gaps between the teeth with their heads crushed to powder.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.27 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.26 11.27 All these sons of Dhrtarastra like Duryodhana and others like Bhisma, Drona, and Suta's son Karna together with the hosts of monarchs on their side and also the leading warriors on our side, are hastening to their destruction; they enter Your fearful mouths with terrible fangs; some, caught between the teeth are seen with their heads crushed to powder.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.27 Visanti, they enter; tvarmanah, rapidly, in great haste; into te, Your; vaktrani, mouths;-what kind of mouths?-bhayanakani, terrible; damstra-karalani, with cruel teeth. Besides, among these who have entered the mouths, kecit, some; samdrsyante, are see; vilagna, sticking, like meat eaten; dasanantaresu, in the gaps between the teeth; uttamangaih, with their heads; curnitaih, crushed. As to how they enter, he says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.27।। सत्य के अन्वेषण के अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ रहकर जो दर्शनशास्त्र? समष्टि को बिना किसी भय या पक्षपात के समझना चाहता है? वह प्रकृति के विनाशकारी पक्ष की उपेक्षा नहीं कर सकता। उपादान (कच्चे माल) के विनाश अर्थात् विकार के बिना किसी भी नवीन वस्तु का निर्माण नहीं हो सकता है। विश्व में जहाँ कहीं भी कोई अस्तित्व हैं वह परिवर्तन की पुनरावृत्ति मात्र है और इस परिवर्तन को निर्मित वस्तु की दृष्टि से देखने पर सृष्टि कहा जाता है और उपादान की दृष्टि से उसे ही विनाश कहते हैं।इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दू धर्म के साहसी आर्य ऋषियों ने परम सत्य के सौन्दर्य की स्तुति के समय? केवल उसे सर्वज्ञ सृष्टिकर्ता या सर्वशक्तिमान पालनकर्त्ता के रूप में ही नहीं देखा? वरन् समस्त नामरूपों के सर्व समर्थ संहारकर्त्ता के रूप में भी उसका दर्शन और स्तुतिगान किया है। जिन धार्मिक मतों में अभी तक जीवन का उसकी सम्पूर्णता में निरीक्षण और विश्लेषण नहीं किया गया है? उन्हें उपर्युक्त कथन भयंकर प्रतीत हो सकता है।अर्जुन के वचन अर्थपूर्ण हैं। वह विश्वरूप को समस्त नामरूपों को स्वाहा करते हुए नहीं देखता? बल्कि उन नामरूपों को शीघ्रता से विराट् पुरुष के मुख में प्रवेश करते हुए देखता है। समुद्र को यदि हम देखें तो ज्ञात होगा कि तरंगों को अपने में समा लेने के लिए समुद्र स्वस्थान से ऊपर नहीं उठता? किन्तु वे तरंगें ही क्षणभर की क्रीड़ा के पश्चात् स्वत ही शीघ्रता से समुद्र में लुप्त हो जाती हैं। इसी प्रकार सत्य से व्यक्त हुई यह विविधता की सृष्टि सत्य की सतह पर अपनी क्रीड़ा के पश्चात् अवश्य ही? अपने प्रभवस्थान पूर्ण पुरुष में शीघ्र गति से लीन हो जायेगी।अर्जुन? प्रकृति के विनाशकारी तत्त्व के जम्हाई लेते मुख में भीष्मद्रोणादि कौरवपक्षीय योद्धागणों तथा स्वपक्ष के भी प्रमुख योद्धाओं को वेग से प्रवेश करते हुये देखता है। यह दृश्य न केवल अर्जुन को उसके साहस को तोड़ते हुए भयभीत ही करता है? अपितु उसे भविष्य में झांककर देखने का आत्मविश्वास भी प्रदान करता है। यद्यपि सैनिक संख्या तथा शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति की दृष्टि से कौरव अधिक शक्तिशाली थे? किन्तु उनका विनाश देखकर अर्जुन को धैर्य प्राप्त होता है। यह भावी घटनाओं का संकेत ही था। जब भगवान् विश्वरूप में प्रकट होते हैं? तब उस एकत्व की संकल्पना में न केवल आकाश (देश) संकुचित हो जाता है? बल्कि काल भी हमारे निरीक्षण का विषय बन जाता है।इसलिए? यदि अर्जुन ने उस विराट् रूप में? भूतकाल को वर्तमान से मिलकर भविष्य की ओर अग्रसर होते हुए देखा हो? तो इसमें कोई आश्चर्य़ नहीं है। सम्पूर्ण गीता ग्रन्थ में से प्रथम दो पृष्ठ पढ़ना अथवा उन्हें छोड़कर तीसरा पृष्ठ पढ़ना मेरी इच्छा पर निर्भर करता है। इसी प्रकार? जब अर्जुन के समक्ष सम्पूर्ण विश्वरूप ही उपस्थित था? तो वह एक दृष्टि में यत्रतत्रसर्वत्र देख सकता था और भूतवर्तमानभविष्य को भी। आधुनिक वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि वस्तुत देश काल एक ही हैं? और वे परस्पर की दृष्टि से व्यक्त होते हैं।सत्यनिष्ठ एवं सत्य के साधक पुरुषों को इस बात का भय नहीं होता कि उनका सत्यान्वेषण उन्हें कौनसे सत्य तक पहुँचायेगा। यदि वह सत्य भयंकर है? तो वे उसे भी स्वीकार करते हैं। यह जगत् दो विरुद्ध धर्मियों का एक मिश्रण है। इसमें सुरूपता और कुरूपता? शुभ और अशुभ? कोमल और कठोर तथा मधुर और कटु सब कुछ विद्यमान है। इन समस्त रूपों में परमात्मा ही व्यक्त हो रहा है। अत? यदि हम अपनी रुचि के अनुसार परमात्मा के केवल सुन्दर? शुभ? कोमल और मधुर भावों को ही स्वीकार करते हैं? तो ईश्वर की यह पूजा अथवा सत्य का यह मूल्यांकन पूर्ण नहीं कहा जा सकता। पूर्वाग्रहरहित और अनासक्त व्यक्ति को ईश्वर के कुरूप? अशुभ? कठोर और कटु भावों को मान्यता देनी ही होगी। वह दर्शनशास्त्र ही पूर्ण है? जो यह बोध कराए कि यद्यपि परमात्मा ही इन सब नाम? रूप और गुणों में व्यक्त हो रहा है? तथापि वह अपने पारमार्थिक स्वरूप से? इन सब गुणों से सर्वथा अतीत है।इसलिए? शुद्ध वैज्ञानिक पद्धति से अर्जुन को विश्वरूप का विस्तृत विवरण देना पड़ता है? फिर वह विवरण कितना ही भयंकर और रक्त को जमाने वाला ही क्यों न हो। निसन्देह गीता में वास्तविकता का बोध है। काल के मुख को यहाँ भयानक और विकराल दाढ़ों वाला कहकर उसका यथार्थ चित्रण किया गया है।वे किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं अर्जुन कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.27।।किंच तव मुखानि दंष्ट्राकरालानि अतएव भयंकराणि त्वरायुक्ता विशन्ति। तत्र प्रविष्टनां मध्ये किंचिद्दन्तान्तरेषु चूर्णितैः शिरोभिर्विलग्ना भक्षितमांसमिव संदृश्यन्ते उपलभ्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.27।।वक्त्राणीति। अमी धृतराष्ट्रपुत्रप्रभृतयः सर्वेपि ते तव दंष्ट्राकरालानि भयानकानि वक्त्राणिव त्वरमाणा विशन्ति। तत्र च केचिच्चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः शिरोभिर्विशिष्टा दशनान्तरेषु विलग्ना विशेषेण संलग्ना दृश्यन्ते मया सम्यगसंदेहेन।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.27।।ते भीष्मादयः। उत्तमाङ्गैः शिरोभिः। अयं भावः -- धृतराष्ट्रस्य पुत्राः पापिष्ठाः भवन्तमेव त्रैलोक्यशरीरं विशन्ति। पापानुरूपं तस्य पायुस्थानस्थितान्नरकानेव गच्छन्तीति तत्र त्वां विशन्तीत्येवोक्तम्। भीष्मादयस्तु भक्ता यतोऽग्निर्ब्राह्मणा वेदाश्च प्रसूतास्तद्भगवतो मुखं प्रविशन्तीति वैषम्यगतिसूचनार्थं त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्रा विशन्ति भीष्मादयस्ते वक्त्राणि विशन्तीति विभागदर्शनं युक्तमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.27।।त्वरमाणा वेगवत्तराः दंष्ट्राकरालानि स्वतोऽपि भयानकानि वक्त्राणि विशन्ति प्रविशन्ति। प्रवेशानन्तरं दृष्टमाह। केचित् एके दशनान्तरेषु दन्तच्छिद्रेषु विलग्ना लम्बमानाः चूर्णितैः चूर्णीकृतैः उत्तमाङ्गैः सन्दृश्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.27।।वक्त्राणीति। एते सर्वे त्वरमाणा धावन्त इव दंष्ट्राभिः करालानि भयंकराणि वक्त्राणि विशन्ति। तेषां मध्ये केचिच्चूर्णीकृतैरुत्तमाङ्गैः शिरोभिरुपलक्षिता दन्तसंधिषु संश्लिष्टाः संदृश्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.27।।Sri Vallabhacharya did not comment on this sloka.
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.27।। तथा --, शीघ्रतासे -- बड़ी जल्दीके साथ आपके मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं। किस प्रकारके मुखोंमें दाढ़ोंवाले विकराल भयंकर मुखोंमें। तथा उन मुखोंमें प्रविष्ट हुए पुरुषोंमेंसे भी कितने ही विचूर्णित मस्तकोंसहित दाँतोंके बीचमें भक्षण किये हुए मांसकी भाँति चिपके हुए दीख रहे हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.27।। व्याख्या -- भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदीयैरपि योधमुख्यैः -- हमारे पक्षके धृष्टद्युम्न? विराट्? द्रुपद आदि जो मुख्यमुख्य योद्धालोग हैं? वे सबकेसब धर्मके पक्षमें हैं और केवल अपना कर्तव्य समझकर युद्ध करनेके लिये आये हैं। हमारे इन सेनापतियोंके साथ पितामह भीष्म? आचार्य द्रोण और वह प्रसिद्ध सूतपुत्र कर्ण आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं।यहाँ भीष्म? द्रोण और कर्णका नाम लेनेका तात्पर्य है कि ये तीनों ही अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये युद्धमें आये थे (टिप्पणी प0 591)।अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घैः -- दुर्योधनके पक्षमें जितने राजालोग हैं? जो युद्धमें दुर्योधनका प्रिय करना चाहते हैं (गीता 1। 23) अर्थात् दुर्योधनको हितकी सलाह नहीं दे रहे हैं? उन सभी,राजाओंके समूहोंके साथ धृतराष्ट्रके दुर्योधन? दुःशासन आदि सौ पुत्र विकराल दाढ़ोंके कारण अत्यन्त भयानक आपके मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रवेश कर रहे हैं -- वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि।विराट्रूपमें वे चाहे भगवान्में प्रवेश करें? चाहे भगवान्के मुखोंमें जायँ? वह एक ही लीला है। परन्तु भावोंके अनुसार उनकी गतियाँ अलगअलग प्रतीत हो रही हैं। इसलिये भगवान्में जायँ अथवा मुखोंमें जायँ? वे हैं तो विराट्रूपमें ही।केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः -- जैसे खाद्य पदार्थोंमें कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं? जो चबाते समय सीधे पेटमें चले जाते हैं? पर कुछ पदार्थ ऐसे होते हैं? जो चबाते समय दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें फँस जाते हैं। ऐसे ही आपके मुखोंमें प्रविष्ट होनेवालोंमेंसे कईएक तो सीधे भीतर (पेटमें) चले जा रहे हैं? पर कईएक चूर्ण हुए मस्तकोंसहित आपके दाँतों और दाढ़ोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।यहाँ एक शङ्का होती है कि योद्धालोग तो अभी सामने युद्धक्षेत्रमें ख़ड़े हुए हैं? फिर वे अर्जुनको विराट्रूपके मुखोंमें जाते हुए कैसे दिखायी दिये इसका समाधान यह है कि भगवान् विराट्रूपमें अर्जुनको आसन्न भविष्यकी बात दिखा रहे हैं। भगवान्ने विराट्रूप दिखाते समय अर्जुनसे कहा था कि तू और भी जो कुछ देखना चाहता है? वह भी मेरे इस विराट्रूपमें देख ले (11। 7)। अर्जुनके मनमें सन्देह था कि युद्धमें हमारी जीत होगी या कौरवोंकी (2। 6) इसलिये उस सन्देहको दूर करनेके लिये भगवान् अर्जुनको आसन्न भविष्यका दृश्य दिखाकर मानो यह बताते हैं कि युद्धमें तुम्हारी ही जीत होगी। आगे अर्जुनके द्वारा प्रश्न करनेपर भी भगवान्ने यही बात कही है (11। 32 -- 34)। सम्बन्ध -- जो अपना कर्तव्य समझकर धर्मकी दृष्टिसे युद्धमें आये हैं और जो परमात्माकी प्राप्ति चाहनेवाले हैं -- ऐसे पुरुषोंका विराट्रूपमें नदियोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.27।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.27।।भगवद्रूपस्योग्रत्वे हेत्वन्तरमाह -- किञ्चेति। प्रविष्टानां मध्ये केचिदिति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.27।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.27।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.27।। --,वक्त्राणि मुखानि ते तव त्वरमाणाः त्वरायुक्ताः सन्तः विशन्ति? किंविशिष्टानि मुखानि दंष्ट्राकरालानि भयानकानि भयंकराणि। किञ्च? केचित् मुखानि प्रविष्टानां मध्ये विलग्नाः दशनान्तरेषु मांसमिव भक्षितं संदृश्यन्ते उपलभ्यन्ते चूर्णितैः चूर्णीकृतैः उत्तमाङ्गैः शिरोभिः।।कथं प्रविशन्ति मुखानि इत्याह --,
───────────────────
【 Verse 11.28 】
▸ Sanskrit Sloka: यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगा: समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति | तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति ||
▸ Transliteration: yathā nadīnāṁ bahavo’mbuvegāḥ samudram evābhimukhā dravanti | tathā tavāmī naralokavīrā viśanti vaktrāṇy abhivijvalanti ||
▸ Glossary: yathā: as; nadīnāṁ: of the rivers; bahavaḥ: many; ambuvegāḥ: waves of the waters; samudram: ocean; eva: certainly; abhimukhāḥ: towards; dravanti: gliding; tathā: similarly; tava: Your; amī: all those; naralokavīrāḥ: the human kings; viśanti: entering; vaktrāṇi: into the mouths; abhivijvalanti: blazing
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.28 Even as many torrents of rivers flow towards the ocean, so too these warriors in the world of men enter Your flaming mouths.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.28।।जैसे नदियोंके बहुतसे जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं? ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.28।। जैसे नदियों के बहुत से जलप्रवाह समुद्र की ओर वेग से बहते हैं? वैसे ही मनुष्यलोक के ये वीर योद्धागण आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश करते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.28 यथा as? नदीनाम् of rivers? बहवः many? अम्बुवेगाः watercurrents? समुद्रम् to the ocean? एव verily? अभिमुखाः towards? द्रवन्ति flow? तथा so? तव Thy? अमी these? नरलोकवीराः heroes in the world of men? विशन्ति enter? वक्त्राणि mouths? अभिविज्वलन्ति flaming.Commentary Ami These warriors such as Bhishma. Arjuna is now seeing all these warriors,whom he did not wish to kill? rushing to death. His delusion has vanished. He thinks now This battle cannot be avoided. It has the sanction of the Supreme Lord. Why should I worry about the inevitable The Lord has already destroyed these warriors. I am only an instrument in His hands. No sin can touch me even if I kill them. This is a just cause also.Why and how do they enter Arjuna says --
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.28. Just as many water-rapids of the rivers race heading towards the ocean alone, in the same manner these heroes of the world of men do enter into Your mouths flaming all around.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.28 As rivers in flood surge furiously to the ocean, so these heroes, the greatest among men, fling themselves into Thy flaming mouths.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.28 As many torrents of rivers flow towards the ocean, so do these heroes of the world of men enter Your flaming mouths.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.28 As the numerous currents of the waters of rivers rush towards the sea alone so also do those heroes of the human world enter into Your blazing mouths.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.28 Verily, just as many torrents of rivers flow towards the ocean, even so these heroes in the world of men enter Thy flaming mouths.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.28 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.28 - 11.29 These innumerable kings rush to their destruction in Your flaming mouths, even as many torrents of rivers flow towards the ocean and moths rush into a blazing fire.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.28 Yatha, as; the bahavah, numerous; ambu-vegah, currents of the waters, particularly the swift ones; nadinam, of flowing rivers; dravanti abhimukhah, rush towards, enter into; the samudram, sea; eva, alone; tatha, so also; do ami, those; nara-loka-virah, heroes of the human world-Bhisma and others; visanti, enter into; tava, Your; abhi-vijvalanti, blazing, glowing; vaktrani, mouths. Why do they enter, and how? In answer Arjuna says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.28।। समुद्र से मिलन के लिए आतुर? उसकी ओर वेग से बहने वाली नदियों की उपमा इस श्लोक में दी गई है। जिस स्रोत से नदी का उद्गम होता है? वहीं से उसे अपना विशेष व्यक्तित्व प्राप्त हो जाता है। किसी भी एक बिन्दु पर वह नदी न रुकती है और न आगे बढ़ने से कतराती ही है। अल्पमति का पुरुष यह कह सकता है कि नदी की प्रत्येक बूँद समीप ही किसी स्थान विशेष की ओर बढ़ रही है। परन्तु यथार्थवादी पुरुष जानता है कि सभी नदियां समुद्र की ओर ही बहती जाती हैं? और वे जब तक समुद्र से मिल नहीं जाती तब तक मार्ग के मध्य न कहीं रुक सकती हैं और न रुकेंगी। समुद्र के साथ एकरूप हो जाने पर विभिन्न नदियों के समस्त भेद समाप्त हाे जाते हैं।नदी के जल की प्रत्येक बूंद समुद्र से ही आयी है। प्रथम मेघ के रूप में वह ऊपर पर्वतशिखरों तक पहुंची और वहाँ वर्षा के रूप में प्रकट हुईनदी तट के क्षेत्रों को जल प्रदान करके खेतों को जीवन और पोषण देकर वे बूंदें वेगयुक्त प्रवाह के साथ अपने उस प्रभव स्थान में मिल जाती हैं? जहाँ से उन्होंने यह करुणा की उड़ान भरी थी। इसी प्रकार अपने समाज की सेवा और संस्कृति का पोषण करने तथा विश्व के सौन्दर्य की वृद्धि में अपना योगदान देने के लिए समष्टि से ही सभी व्यष्टि जीव प्रकट हुए हैं? परन्तु उनमें से कोई भी व्यक्ति अपनी इस तीर्थयात्रा के मध्य नहीं रुक सकता है। सभी को अपने मूल स्रोत की ओर शीघ्रता से बढ़ना होगा। सम्ाुद्र को प्राप्त होने से नदी की कोई हानि नहीं होती है। यद्यपि मार्ग में उसे कुछ विशेष गुण प्राप्त होते हैं? जिनके कारण उसे एक विशेष नाम और आकार प्राप्त हो जाता है? तथपि उसका यह स्वरूप क्षणिक है। यह समुद्र के जल द्वारा शुष्क भूमि को बहुलता से समृद्ध करने के लिए लिया गया सुविधाजनक रूप है।इस श्लोक पर जितना अधिक हम विचार करेंगे उतना अधिक उसमें निहित आनन्द हमें प्राप्त होगा।किसलिये वे प्रवेश करते हैं अर्जुन बताता है कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.28।।तत्र दृष्टान्तमाह। यथा नदीनां स्त्रवन्तीनां बहवो जलानां वेगाः समुद्रमेवाभिमुखाः प्रतिमुखा द्रवन्ति विशन्ति तथामी नरलोकवीरास्तव मुखान्यभिविज्वन्ति प्रकाशभानानि विशन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.28।।राज्ञां भगवन्मुखप्रवेशने निदर्शनमाह -- यथेति। यथा नदीनामनेकमार्गप्रवृत्तानां बहवोऽम्बूनां जलानां वेगा वेगवन्तः प्रवाहाः समुद्राभिमुखाः सन्तः समुद्रमेव द्रवन्ति विशन्ति तथा ते तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभितः सर्वतो ज्वलन्ति।अभिविज्वलन्ति इति वा पाठः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.28।।इदमेव सदृष्टान्तमाह -- यथेति। तव वक्त्राणि विशन्तीति संबन्धः। अभिविज्वलन्ति सर्वतः जाज्वल्यमानानि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.28।।प्रवेशे दृष्टान्तमाह -- यथेति। यथा नदीनां बहुधा प्रसरन्तीनां बहवोऽम्बुवेगाः जलप्रवाहाः समुद्रमेव स्वलयस्थानमेव अभिमुखाः सन्मुखाः सन्तो द्रवन्ति प्रविशन्ति तथा अमी नरलोकवीराः अभिविज्वलन्ति परितो दीप्यमानानि तव वक्त्राणि विशन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.28।।प्रवेशमेव दृष्टान्तेनाह -- यथेति। नदीनामनेकमार्गप्रवृत्तानां बहवोऽम्बूनां वारीणां वेगाः प्रवाहाः समुद्राभिमुखाः सन्तो यथा समुद्रमेव द्रवन्ति प्रविशन्ति तथा अमी ये नरलोकवीरास्तेऽभिविज्वलन्ति सर्वतः प्रदीप्यमानानि वक्त्राणि प्रविशन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.28 -- 11.29।।यथा नदीनामिति। अम्बुवेगाः समुद्रमिव ते वक्त्राण्यभिमुखं तत्रैव चेमे नरलोकवीरा नाशाय विशन्ति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.28।।वे किस प्रकार मुखोंमें प्रवेश करते हैं? सो कहते हैं --, जैसे चलती हुई नदियोंके बहुतसे जलप्रवाह बड़े वेगसे समुद्रके सम्मुख हुए ही दौड़ते हैं -- समुद्रमें ही प्रवेश करते हैं? वैसे ही यह मनुष्यलोकके शूरवीर भीष्मादि आपके प्रज्वलित प्रकाशमान मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.28।। व्याख्या -- यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति -- मूलमें जलमात्र समुद्रका है। वही जल बादलोंके द्वारा वर्षारूपमें पृथ्वीपर बरसकर झरने? नाले आदिको लेकर नदियोंका रूप धारण करता है। उन नदियोंके जितने वेग हैं? प्रवाह हैं? वे सभी स्वाभाविक ही समुद्रकी तरफ दौड़ते हैं। कारण कि जलका उद्गम स्थान समुद्र ही है। वे सभी जलप्रवाह समुद्रमें जाकर अपने नाम और रूपको छोड़कर अर्थात् गङ्गा? यमुना? सरस्वती आदि नामोंको और प्रवाहके रूपको छोड़कर समुद्ररूप ही हो जाते हैं। फिर वे जलप्रवाह समुद्रके सिवाय अपना कोई अलग? स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रखते। वास्तवमें तो उनका स्वतन्त्र अस्तित्व पहले भी नहीं था? केवल नदियोंके प्रवाहरूपमें होनेके कारण वे अलग दीखते थे। तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति -- नदियोंकी तरह मात्र जीव नित्य सुखकी अभिलाषाको लेकर परमात्माके सम्मुख ही दौड़ते हैं। परन्तु भूलसे असत्? नाशवान् शरीरके साथ सम्बन्ध मान लेनेसे वे सांसारिक संग्रह और संयोगजन्य सुखमें लग जाते हैं तथा अपना अलग अस्तित्व मानने लगते हैं। उन जीवोंमें वे ही वास्तविक शूरवीर हैं? जो सांसारिक संग्रह और सुखभोगोंमें न लगकर? जिसके लिये शरीर मिला है? उस परमात्मप्राप्तिके मार्गमें ही तत्परतासे लगे हुए हैं। ऐसे युद्धमें आये हुए भीष्म? द्रोण आदि नरलोकवीर आपके प्रकाशमय (ज्ञानस्वरूप) मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।सामने दीखनेवाले लोगोंमें परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले लोग विलक्षण हैं और बहुत थोड़े हैं। अतः उनके लिये परोक्षवाचक अमी (वे) पद दिया गया है। सम्बन्ध -- जो राज्य और प्रशंसाके लोभसे युद्धमें आये हैं और जो सांसारिक संग्रह और भोगोंकी प्राप्तिमें लगे हुए हैं -- ऐसे पुरुषोंका विराट्रूपमें पंतगोंके दृष्टान्तसे प्रवेश करनेका वर्णन अर्जुन आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.28।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.28।।उभयोरपि सेनयोरवस्थितानां राज्ञां भगवन्मुखप्रवेशं निदर्शनेन विशदयति -- कथमित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.28।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.28।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.28।। --,यथा नदीनां स्रवन्तीनां बहवः अनेके अम्बूनां वेगाः अम्बुवेगाः त्वराविशेषाः समुद्रमेव अभिमुखाः प्रतिमुखाः द्रवन्ति प्रविशन्ति? तथा तद्वत? तव अमी भीष्मादयः नरलोकवीराः मनुष्यलोके शूराः विशन्ति वक्त्राणि अभिविज्वलन्ति प्रकाशमानानि।।ते किमर्थं प्रविशन्ति कथं च इत्याह --,
───────────────────
【 Verse 11.29 】
▸ Sanskrit Sloka: यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगा: | तथैव नाशाय विशन्ति लोका- स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगा: ||
▸ Transliteration: yathā pradīptaṁ jvalanaṁ pataṅgā viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ | tathaiva nāśāya viśanti lokās tavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥ ||
▸ Glossary: yathā: as; pradīptaṁ: blazing; jvalanaṁ: fire; pataṅgāḥ: moths; viśanti: enters; nāśāya: destruction; samṛddha: full; vegāḥ: speed; tathai ‘va: similarly; nāśāya: for destruction; viśanti: entering; lokāḥ: all people; tava: unto You; api: also; vaktrāṇi: in the mouths; samṛddhavegāḥ: with full speed
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.29 Just as moths hurriedly rush into the fire for their own destruction, So too these creatures rush hastily into Your mouths of destruction.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.29।।जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं? ऐसे ही ये सब लोग मोहवश अपना नाश करनेके लिये ही बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.29।। जैसे पतंगे अपने नाश के लिए प्रज्वलित अग्नि में अतिवेग से प्रवेश करते हैं? वैसे ही ये लोग भी अपने नाश के लिए आपके मुखों में अतिवेग से प्रवेश करते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.29 यथा as? प्रदीप्तम् blazing? ज्वलनम् fire? पतङ्गाः moths? विशन्ति enter? नाशाय to destruction? समृद्धवेगाः with ickened speed? तथा so? एव only? नाशाय to destruction? विशन्ति enter? लोकाः creatures? तव Thy? अपि also? वक्त्राणि mouths? समृद्धवेगाः with ickened speed.No Commentary.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.29. Just as with full speed, the moths enter into the flaming fire for their own destruction, in the same manner the worlds also do enter, for their own destruction with full speed, into the mouths of Yours.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.29 As moths fly impetuously to the flame only to be killed, so these men rush into Thy mouths to court their own destruction.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.29 As moths rush swiftly into a blazing fire to their destruction, so do these men swiftly rush into Your mouths to meet their destruction.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.29 As moths enter with increased haste into a glowing fire for destruction, in that very way do the creatures enter into Your mouths too, with increased hurry for destruction.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.29 As moths hurriedly rush into a blazing fire for (their own) destruction, so also these creatures hurriedly rush into Thy mouths for (their own) destruction.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.29 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.28 - 11.29 These innumerable kings rush to their destruction in Your flaming mouths, even as many torrents of rivers flow towards the ocean and moths rush into a blazing fire.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.29 Yatha, as; patangah, moths, flying insects; visanti, enter; samrddha-vegah, with increased haste; into a pradiptam, glowing; jvalanam, fire; nasaya, for destruction; tatha eva, in that very way; do the lokah, creatures; visanti, enter into; tava, Your; vaktrani, mouths; api, too; samrddha-vegah, with increased hurry; nasaya, for destruction. You, again-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.29।। अव्यक्त से व्यक्त हुई सृष्टि के बीच की एकता को? समुद्र से उत्पन्न हुई नदियों की उपमा के द्वारा अत्यन्त सुन्दर शैली द्वारा पूर्व श्लोक में दर्शाया गया है। समुद्र से उत्पन्न होकर समस्त नदियां पुन उसी में समा जाती हैं।कोई भी उपमा अपने आप में पूर्ण नहीं हो सकती है। नदियों के दृष्टान्त में एक अपूर्णता यह रह जाती है कि नदी को स्वयं की चेतना नहीं होने के कारण समुद्र मिलन में उसकी स्वेच्छा नहीं प्रदर्शित होती। कोई शंका कर सकता है कि सम्भवत चेतन प्राणी अपने स्वतन्त्र विवेक के कारण अचेतन जल के समान व्यवहार नहीं करेंगे। यहाँ यह दर्शाने के लिए कि जीवधारी प्राणी भी अपने स्वभाव से विवश हुए मृत्यु के मुख की ओर बरबस खिंचे चले जाते हैं? यह दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे पतंगें अत्यन्त वेग से स्वनाश के लिए प्रज्वलित अग्नि के मुख में प्रवेश करते हैं। व्यासजी को सम्पूर्ण प्रकृति ही धर्मशास्त्र की खुली पुस्तक प्रतीत होती है। वे अनेक घटनाओं एवं उदाहरणों के द्वारा इन्हीं मूलभूत तथ्यों को समझाते हैं कि अव्यक्त का व्यक्त अवस्था में प्रक्षेपण ही सृष्टि की प्रक्रिया है? और व्यक्त का अपने अव्यक्त स्वरूप में मिल जाना ही नाश या मृत्यु है। जब हम इस भयंकर या राक्षसी प्रतीत होने वाली मृत्यु को यथार्थ दृष्टिकोण से समझने का प्रयत्न करते हैं? तब वह छद्मवेष को त्यागकर अपने प्रसन्न और प्रफुल्ल मुख को प्रकट,करती है।अर्जुन के मानसिक तनाव का मुख्य कारण यह था कि उसने कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर होने वाले बहुत बड़े नाश का शीघ्रतावश त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन कर लिया था। उसके उपचार का एकमात्र उपाय यही था कि उसकी दृष्टि उस ऊँचाई तक उठाई जाये? जहाँ से वह? एक ही दृष्टिक्षेप में? मृत्यु की इस अपरिहार्य प्रकृतिक घटना को देख और समझ सके। श्रीकृष्ण ने उसका यही उपचार किया। किसी भी घटना का समीप से पूर्ण अध्ययन करने पर उसके भयानक फनों के विषदन्त दूर हो जाते हैं जब मनुष्य की विवेकशील बुद्धि अज्ञान से आवृत्त हो जाती है? केवल तभी उसके आसपास होने वाली घटनाएं उसका गला घोंटकर उसे धराशायी कर देती हैं। जैसे नदियां समुद्र में तथा पतंगे अग्नि के मुख में तेजी से प्रवेश करते हैं? वैसे ही सभी रूप अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं। मृत्यु की घटना को इस प्रकार समझ लेने पर मनुष्य उससे भयमुक्त होकर अपने जीवन का सामना कर सकता है? क्योंकि उसके लिए सम्पूर्ण जीवन का अर्थ परिवर्तनों की एक अखण्ड धारा हो जाती है।इसलिए? काल की क्रीड़ा के रूप में मृत्यु एक डंकरहित घटना बन जाती है। अगले श्लोक में इस मृत्यु को उसके सम्पूर्ण भयंकर सौन्दर्य के साथ गौरवान्वित किया गया है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.29।।अम्बुवेगाः समुद्रं विशन्ति नतु जलभावविनाशं प्राप्नुवन्ति। एते तु नाशाय प्रविशन्तीत्यतो दृष्टान्तान्तरमाह। यथा प्रदीप्तमग्निं पतङ्गाः क्षुद्रपक्षिविशेषाः समृद्धवेगा विनाशाय विशन्ति तथैव समृद्धवेगा लोकाः प्राणिनः तवापि मुखानि विनाशाय विशन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.29।।अबुद्धिपूर्वकप्रवेशे नदीवेगं दृष्टान्तमुक्त्वा बुद्धिपूर्वकप्रवेशे दृष्टान्तमाह -- यथा प्रदीप्तमिति। यथा पतङ्गाः शलभाः समृद्धवेगाः सन्तो बुद्धिपूर्वं प्रदीप्तं ज्वलनं विशन्ति नाशाय मरणायैव तथैव नाशाय विशन्ति लोका एते दुर्योधनप्रभृतयः सर्वेऽपि तव वक्त्राणि समृद्धवेगाः बुद्धिपूर्वमनायत्या।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.29।।बुद्धिपूर्वकमेव ते त्वद्वक्त्राणि प्रविशन्तीति सदृष्टान्तमाह -- यथा प्रदीप्तमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.29।।नदीदृष्टान्ते प्रकटतया नाशो न दृश्यत इति नाशार्थप्रवेशे दृष्टान्तान्तरमाह -- यथेति। यथा पतङ्गाः सूक्ष्मकीटाः शलभाः स्वपक्षवेगमदावलिप्ताः नाशाय मरणार्थं प्रदीप्यमानं ज्वलनमग्निं विशन्ति तथैव समृद्धवेगाः मदावलिप्ता एते लोकाः पूर्वोक्ता नाशाय मरणाय तवापि वक्त्राणि विशन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.29।। अवशत्वेन प्रवेशे नदीवेगो दृष्टान्त उक्तः। बुद्धिपूर्वकप्रवेशे दृष्टान्तमाह -- यथेति। प्रदीप्तं ज्वलनमग्निं पतङ्गाः सूक्ष्मपक्षिविशेषाः बुद्धिपूर्वकं समृद्धो वेगो येषां ते यथा नाशाय मरणायैव विशन्ति तथैव लोका एते जना अपि तव मुखानि प्रविशन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.28 -- 11.29।।यथा नदीनामिति। अम्बुवेगाः समुद्रमिव ते वक्त्राण्यभिमुखं तत्रैव चेमे नरलोकवीरा नाशाय विशन्ति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.29।।वे किसलिये और किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं? सो कहते हैं --, जैसे पतंग -- पक्षीगण अपने नाशके लिये दौड़दौड़कर अत्यन्त वेगसे प्रदीप्त अग्निमें प्रवेश करते हैं? वैसे ही ( ये सब ) प्राणी भी नष्ट होनेके लिये दौड़दौड़कर अत्यन्त वेगके साथ आपके मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं। जिनका वेग -- गति बढ़ी हुई हो? वे समृद्धवेग कहलाते हैं।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.29।। व्याख्या -- यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः -- जैसे हरीहरी घासमें रहनेवाले पतंगे चातुर्मासकी अँधेरी रात्रिमें कहींपर प्रज्वलित अग्नि देखते हैं? तो उसपर मुग्ध होकर (कि बहुत सुन्दर प्रकाश मिल गया? हम इससे लाभ ले लेंगे? हमारा अँधेरा मिट जायगा) उसकी तरफ बड़ी तेजीसे दौड़ते हैं। उनमेंसे कुछ तो प्रज्वलित अग्निमें स्वाहा हो जाते हैं कुछको अग्निकी थोड़ीसी लपट लग जाती है तो उनका उड़ना बंद हो जाता है और वे तड़पते रहते हैं। फिर भी उनकी लालसा उस अग्निकी तरफ ही रहती है यदि कोई पुरुष दया करके उस अग्निको बुझा देता है तो वे पंतगे बड़े दुःखी हो जाते हैं कि उसने हमारेको बड़े लाभसे वञ्चित कर दिया तथैव नाशाय विशन्ति लोकास्तवापि वक्त्राणि समुद्धवेगाः -- भोग भोगने और संग्रह करनेमें ही तत्परतापूर्वक लगे रहना और मनमें भोगों और संग्रहका ही चिन्तन होते रहना -- यह बढ़ा हुआ सांसारिक वेग है। ऐसे वेगवाले दुर्योधनादि राजालोग पंतगोंकी तरह बड़ी तेजीसे कालचक्ररूप आपके मुखोंमें जा रहे हैं अर्थात् पतनकी तरफ जा रहे हैं -- चौरासी लाख योनियों और नरकोंकी तरफ जा रहे हैं। तात्पर्य यह हुआ कि प्रायः मनुष्य सांसारिक भोग? सुख? आराम? मान? आदर आदिको प्राप्त करनेके लिये रातदिन दौड़ते हैं। उनको प्राप्त करनेमें उनका अपमान होता है? निन्दा होती है? घाटा लगता है? चिन्ता होती है? अन्तःकरणमें जलन होती है और जिस आयुके बलपर वे जी रहे हैं? वह आयु भी समाप्त होती जाती है? फिर भी वे नाशवान् भोग और संग्रहकी प्राप्तिके लिये भीतरसे लालायित रहते हैं (टिप्पणी प0 593)। सम्बन्ध -- पीछेके दो श्लोकोंमें दो दृष्टान्तोंसे दोनों समुदायोंका वर्णन करके अब सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए विश्वरूप भगवान्के भयानक रूपका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.29।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.29।।प्रवेशप्रयोजनं तत्प्रकारविशेषं चोदाहरणान्तरेण स्फोरयति -- ते किमर्थमित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.29।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.29।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.29।। --,यथा प्रदीप्तं ज्वलनम् अग्निं पतङ्गाः पक्षिणः विशन्ति नाशाय विनाशाय समृद्धवेगाः समृद्धः उद्भूतः वेगः गतिः येषां ते समृद्धवेगाः? तथैव नाशाय विशन्ति लोकाः प्राणिनः तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः।।त्वं पुनः --,
───────────────────
【 Verse 11.30 】
▸ Sanskrit Sloka: लेलिह्यसे ग्रसमान: समन्ता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भि: | तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्रा: प्रतपन्ति विष्णो ||
▸ Transliteration: lelihyase grasamānaḥ samantāl lokān samagrān vadanair jvaladbhiḥ | tejobhir āpūrya jagatsamagraṁ bhāsastavo’grāḥ pratapanti viṣṇo ||
▸ Glossary: lelihyase: licking; grasamānaḥ: devouring; samantāt: from all directions; lokān: people;
Chapter 11 (Part 10)
samagrān: completely; vadanaiḥ: by the mouth; jvaladbhiḥ: with blaz- ing; tejobhiḥ: by effulgence; āpūrya: covering; jagat: the universe; samagraṁ: all; bhāsas: illuminating; tava: Your; ugrāḥ: terrible; paratapanti: scorching; viṣṇo: O all pervading Lord
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.30 Swallowing all worlds on every side with your flaming mouths You lick in enjoyment. O Viṣṇu, Your fierce rays are burning, filling the whole world with radiance.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.30।।आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हों चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को परिपूर्ण करके सबको तपा रहा है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.30।। हे विष्णो आप प्रज्वलित मुखों के द्वारा इन समस्त लोकों का ग्रसन करते हुए आस्वाद ले रहे हैं आपका उग्र प्रकाश सम्पूर्ण जगत् को तेज के द्वारा परिपूर्ण करके तपा रहा है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.30 लेलिह्यसे (Thou) lickest? ग्रसमानः devouring? समन्तात् on every side? लोकान् the worlds? समग्रान् all? वदनैः with mouths? ज्वलद्भिः flaming? तेजोभिः with radiance? आपूर्य filling? जगत् the world? समग्रम् the whole? भासः rays? तव Thy? उग्राः fierce? प्रतपन्ति are burning? विष्णो O VishnuCommentary Vishnu means allpervading? Vyapanasila.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.30. Devouring, on all sides with Your blazing mouths, the entire worlds, You are licking up; Your terrible rays scroch the entire universe filling it with their radiance, O Visnu !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.30 Thou seemest to swallow up the worlds, to lap them in flame. Thy glory fills the universe. Thy fierce rays beat down upon it irresistibly.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.30 Devouring all the worlds on every side with your flaming mouths, You lick them up. Your fiery rays, filling the whole universe with their radiance, scorch it, O Visnu.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.30 You lick Your lips while devouring all the creatures from every side with flaming mouths which are completely filling the entire world with heat.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.30 Thou lickest up, devouring all the worlds on every side with Thy flaming mouths. Thy fierce rays, filling the whole world with radiance, are burning, O Vishnu!
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.30 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.30 Devouring all these kings with Your flaming mouths, You lick them up, namely, lick up again and again in great anger. Your lips etc., are wet with their blood. Your fiery rays scorch the universe by the brilliant flow of radiance filling the whole universe.
You have manifested Yourself in this terrible form for revealing Your limitless sovereignty as reested by me thus: 'Reveal Yourself to me completely'(11.4), so that I may realise Your limitless sovereignty.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.30 O Visnu, Your fierce rays are acorching. [M.S., S., and S.S. construe 'completely৷৷.heat' to alify 'fierce rays' in the second sentence. However, the use of kim ca (moreover) in the Comm. suggests the translation as above.-Tr.] Lelihyase, You lick Your lips, You taste; grasamanah, while devouring, while taking in; samagran, all; lokan, the creatures; samantat, from all sides; jvaladbhih, with flaming; vadanaih, mouths; which are apurya, completely filling; samagram, the whole- together (saha) with the foremost (agrena); jagat, world; tejobhih, with heat. Moreover, O Visnu, the all-pervading One, tava, Your; ugrah, fierce; bhasah, rays; are pratapanti, scorching. Since You are of such a terrible nature, therefore-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.30।। महाऊर्मि के कुछ श्लोकों की रचना के बाद व्यासजी पुन अपने पूर्व के विषय को प्रारम्भ करते हैं। जगत् के समस्त प्राणीवर्ग काल के मुख में प्रवेश करके नष्ट हुए जा रहे हैं। इस काल तत्त्व की क्षुधा कभी न शान्त होने वाली है। समस्त लोकों का ग्रसन करते हुए आप उनका आस्वाद ले रहे हैं।वस्तुत? यह श्लोक सृष्टि? स्थिति और संहार के तीन कर्ताओं के पीछे के सिद्धान्त को स्पष्ट करता है। यद्यपि हम इन तीनों की भिन्नभिन्न रूप से कल्पना करते हैं? किन्तु वास्तव में ये तीनों एक ही प्रक्रिया के तीन पहलू मात्र हैं। हम पहले भी विस्तार से देख चुके हैं कि सर्वत्र विद्यमान अस्तित्त्व का मूल रहस्य है रचनात्मक विध्वंस।चलचित्र गृह में विभिन्न चित्रों की एक रील को प्रकाशवृत्त के सामने चलाया जाता है। उसके सामने से दूर हुये चित्र को हम मृत कह सकते हैं और सम्मुख उपस्थित हुये को जन्मा हुआ मान सकते हैं। निरंतर हो रही जन्ममृत्यु की इस धारा के कारण सामने के परदे पर एक अखण्ड कथानक का आभास निर्माण होता है। देश और काल से अवच्छिन्न होकर वस्तुएं? प्राणी मात्र? घटनाएं और परिस्थितियाँ हमारे अनुभव में आकर चली जाती हैं और उनके इस आवागमन के सातत्य को हम अस्तित्त्व या जीवन कहते हैं।उपर्युक्त विचार को पारस्परिक त्रिमूर्ति ब्रह्मा? विष्णु और महेश की भाषा में पुराणों में व्यक्त किया गया है।इस ज्ञान की दृष्टि से जब अर्जुन उस प्रकाशस्वरूप देदीप्यमान समष्टि रूप को देखता है? तब वह उस विराट् के उग्र प्रकाश से प्राय अन्धवत् हो जाता है।क्योंकि आप उग्ररूप हैं? इसलिए
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.30।।सर्वे स्वनाशाय तव वक्राणि विशन्ति त्वं पुनः समन्ततः समग्रांल्लोकाञ्जवलद्भिर्वदनैर्ग्रसमानोऽन्तः प्रवेशयन् लेलिह्यसे आस्वादयसि। किंच तवोग्रा अतिक्रूरा भासो दीप्तयः सर्वं जगत्तेजोभिरापूर्य संव्याप्य प्रतपन्ति प्रतापं कुर्वन्ति। यतस्त्वं व्यापनशीलोऽतस्ता अपि तादृशा इति द्योतयन्संबोधयति -- हे विष्णो इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.30।।योद्धुकामानां राज्ञां भगवन्मुखप्रवेशप्रकारमुक्त्वा तदा भगवतस्तद्भासां च प्रवृत्तिप्रकारमाह -- लेलिह्यस इति। एवं वेगेन प्रविशतो लोकान्दुर्योधनादीन्समग्रान्सर्वान्ग्रसमानोऽन्तःप्रवेशयन्ज्वलद्भिर्वदनैः समन्तात्सर्वतस्त्वं लेलिह्यसे आस्वादयसि। तेजोभिर्भाभिरापूर्य जगत्समग्रं। यस्मात्त्वं भाभिर्जगदापूरयसि तस्मात्तवोग्रास्तीव्रा भासो दीप्तयः प्रज्वलतो ज्वलनस्येव प्रतपन्ति संतापं जनयन्ति। हे विष्णो व्यापनशील।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.30।।ये च पतन्तस्तांस्त्वं करुणावानपि न वारयसि प्रत्युत ग्रसितुमिच्छस्येवेत्याह -- लेलिह्यसे,भूयोभूयोऽतिशयेन वा आस्वादयसि। कीदृशस्त्वम्। समन्ताज्ज्वलद्भिर्वदनैर्लोकान्समग्रान्ग्रसमानः। एवं निर्घृणस्यापि तव तेजो न हीयते प्रत्युत वर्धत एवेत्याह -- तेजोभिरिति। हे विष्णो व्यापनशील? समग्रं जगत्तेजोभिरापूर्य तव उग्राः स्प्रष्टुमशक्या भासो दीप्तयः प्रतपन्तीति योजना। पदार्थः स्पष्टः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.30।।ननु भगवान् न नाशयेत्तदा किं तत्प्रवेशेन इत्यत आह -- लेलिह्यस इति। ग्रसमानः ग्रासं कुर्वन् समन्तात् सर्वतः समग्रान् लोकान् ज्वलद्भिः देदीप्यमानैर्वदनैः लेलिह्यसे भक्षयसि। तवापि तन्नाशेच्छैव दृश्यत इति भावः। भगवानेवं कथं कुर्यात् अत आह। हे विष्णो सर्वपालक सात्त्विकरक्षणार्थमेव। उग्राः प्रतपनसमर्थाः तव भासः किरणाः तेजोभिः स्फुरत्कान्तिभिः समग्रं जगदापूर्य प्रतपन्ति सन्तापयन्ति। अत्रायं भावः -- विष्णुः सात्त्विकाधिष्ठाता सात्त्विकरक्षणार्थमेव दुष्टनाशं करोत्यत उचितमेव तथाकरणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.30।। ततः किमत आह -- लेलिह्यस इति। ग्रसमानो गिलन् समग्रांल्लोकान्सर्वानेतान्वीरान् समन्तात्सर्वतो लेलिह्यसेऽतिशयेन भक्षयसि। कैः ज्वलद्भिर्वदनैः। किंच हे विष्णो? तव भासो दीप्तयस्तेजोभिर्विस्फुरणैः समस्तं जगद्व्याप्योग्रास्तीव्राः सत्यः प्रतपन्ति संतापयन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.30।।तान् लेलिह्यसे। हे विष्णो व्यापनशील अन्यत् स्पष्टम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.30।।और आप --, ( उन ) समस्त लोकोंको देदीप्यमान मुखोंद्वारा सब ओरसे निगलते हुए चाट रहे हैं अर्थात् उनका आस्वादन कर रहे हैं। तथा हे विष्णो -- व्यापनशील परमात्मन् आपकी उग्र -- कठोर प्रभाएँ समग्र जगत्को अर्थात् समस्त जगत्को अपने तेजसे व्याप्त करके तप रही हैं -- तेज फैला रही हैं।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.30।। व्याख्या -- लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ताल्लोकान् समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः -- आप सम्पूर्ण प्राणियोंका संहार कर रहे हैं और कोई इधरउधर न चला जाय? इसलिये बारबार जीभके लपेटेसे अपने प्रज्वलित मुखोंमें लेते हुए उनका ग्रसन कर रहे हैं। तात्पर्य है कि कालरूप भगवान्की जीभके लपेटसे कोई भी प्राणी बच नहीं सकता।तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो -- विराट्रूप भगवान्का तेज बड़ा उग्र है। वह उग्र तेज सम्पूर्ण जगत्में परिपूर्ण होकर सबको संतप्त कर रहा है? व्यथित कर रहा है। सम्बन्ध -- विराट्रूप भगवान् अपने विलक्षणविलक्षण रूपोंका दर्शन कराते ही चले गये। उनके भयंकर और अत्यन्त उग्ररूपके मुखोंमें सम्पूर्ण प्राणी और दोनों पक्षोंके योद्धा जाते देखकर अर्जुन बहुत घबरा गये। अतः अत्यन्त उग्ररूपधारी भगवान्का वास्तविक परिचय जाननेके लिये अर्जुन प्रश्न करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.30।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.30।।योद्धुकामानां राज्ञां भगवन्मुखप्रवेशप्रकारं प्रदर्श्य तस्यां दशायां भगवतस्तद्भासां च प्रवृत्तिप्रकारं प्रत्याययति -- त्वं पुनरिति। भगवत्प्रवृत्तिमेव प्रत्याय्य तदीयभासां प्रवृत्तिं प्रकटयतिं -- किञ्चेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.30।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.30।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.30।। --,लेलिह्यसे आस्वादयसि ग्रसमानः अन्तः प्रवेशयन् समन्तात् समन्ततः लोकान् समग्रान् समस्तान् वदनैः वक्त्रैः ज्वलद्भिः दीप्यमानैः तेजोभिः आपूर्य संव्याप्य जगत् समग्रं सह अग्रेण समस्तम् इत्येतत्। किञ्च? भासः दीप्तयः तव उग्राः क्रूराः प्रतपन्ति प्रतापं कुर्वन्ति हे विष्णो व्यापनशील।।यतः एवमुग्रस्वभावः? अतः --,
───────────────────
【 Verse 11.31 】
▸ Sanskrit Sloka: आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद | विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् ||
▸ Transliteration: ākhyāhi me ko bhavānugrarūpo namo’stu te devavara prasīda | vijñātum icchāmi bhavantam ādyaṁ na hi prajānāmi tava pravṛttim ||
▸ Glossary: ākhyāhi: please explain; me: unto me; kaḥ: who; bhavān: You; ugrarūpaḥ: fierce form; namaḥ astu: obeisances; te: unto You; devavara: the great one amongst the gods; prasīda: be gracious; vijñātum: just to know; icchāmi: I wish; bhavantaṁ: You; ādyaṁ: the original; na: never; hi: certainly; prajānāmi: do I know; tava: Your; pravṛttim: purpose
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.31 Tell me who You are, so fierce in form; salutations to You, O Supreme; have mercy. Indeed I know not Your purpose but I desire to know You, the Original Being.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.31।।मुझे यह बताइये कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइये। आदिरूप आपको मैं तत्त्वसे जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जानता।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.31।। (कृपया) मेरे प्रति कहिये? कि उग्ररूप वाले आप कौन हैं हे देवों में श्रेष्ठ आपको नमस्कार है? आप प्रसन्न होइये। आदि स्वरूप आपको मैं (तत्त्व से) जानना चाहता हूँ? क्योंकि आपकी प्रवृत्ति (अर्थात् प्रयोजन को) को मैं नहीं समझ पा रहा हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.31 आख्याहि tell? मे me? कः who (art)? भवान् Thou? उग्ररूपः fierce in form? नमः salutation? अस्तु be? ते to Thee? देववर O God Supreme? प्रसीद have mercy? विज्ञातुम् to know? इच्छामि (I) wish? भवन्तम् Thee? आद्यम् the original Being? न not? हि indeed? प्रजानामि (I) know? तव Thy? प्रवृत्तिम् doing.No Commentary.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.31. Please, tell me who You are with a terrible form; O the Best of gods ! Salutation to You, please be merciful. I am desirious of knowing You, the Primal One in detail; for I do not clearly comprehend Your behaviour.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.31 Tell me then who Thou art, that wearest this dreadful Form? I bow before Thee, O Mighty One! Have mercy, I pray, and let me see Thee as Thou wert at first. I do not know what Thou intendest.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.31 Tell me who You are with this terrible form? Salutation to You, O Supreme God. Be gracious. I desire to know You, the Primal One. I do not know Your activity.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.31 Tell me who You are, fierce in form. Salutation be to you, O supreme God; be gracious. I desire to fully know You who are the Prima One. For I do not understand Your actions!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.31 Tell me, who Thou art, so fierce of form. Salutations to Thee, O God Supreme: have mercy. I desire to know Thee, the original Being. I know not indeed Thy working.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.31 Akhyahi etc. I do not clearly comprehend Your behaviour : I.e. with what intention this terrific nature of this sort [has been assumed by You].
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.31 Who are You of this terrible form, what do You intend to do? I wish to know. For I do not know Your intended actions. Tell me this. Salutations to You, O Supreme God! Salutations to You, Lord of everything! Say with what object and for what purpose You have assumed this form of the destroyer. Assume a pleasing form.
The Lord, the charioteer of Arjuna, being estioned, 'What is Your intention in assuming a terrible form when revealing Your cosmic sovereignty out of overflowing love for Your proteges?' - He spoke to the following effect: The manifestation of a terrible form by Me is to point out that I Myself am operative for the annihilation of the entire world of kings headed by the sons of Dhrtarastra, without any effort on your (Arjuna's) part. Reminding Arjuna of this, is to goad him to fight:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.31 Akhyahi, tell; me; kah, who; bhavan, You are; ugrarupah, fierce in form. Namah, salutation; astu, be; te, to You; deva-vara, O supreme God, foremost among the gods. Prasida, be gracious. Icchami, I desire; vijnatum, to fully know; bhavantam, You; adyam, who are the Primal One, who exist in the beginning. Hi, for; na prajanami, I do not understand; tava, Your; pravrttim, actions!
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.31।। इस अवसर पर अर्जुन? भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति की पवित्रता एवं दिव्यता को समझ पाता है। उससे अनुप्रमाणित हुआ सम्मान के साथ नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम करता है? जिन्हें अब तक वह केवल वृन्दावन के गोपाल के रूप में ही पहचानता था। यद्यपि वह बुद्धिमान था? परन्तु उसके समक्ष उपस्थित हुआ यह दृश्य उसके लिए बहुत अधिक विशाल था। उसे पूर्णरूप से देखना और उसका विश्लेषण करके उसे आत्मसात् करना अत्यन्त कठिन था। अब केवल वह यही कर सकता है कि अपने आप को भगवान् के चरणों में समर्पित करके उन्हीं से विनती करे कि? आप मुझे बताइये कि आप कौन हैंअपनी जिज्ञासा को और अधिक ठोस आकार देकर अर्जुन सूचित करता है कि वह अपने प्रश्न का उत्तर शीघ्र ही चाहता है? मैं आपको जानना चाहता हूँ। यह सुविदित तथ्य है कि अध्यात्मशास्त्र के ग्रन्थों में सत्य के ज्ञान के लिए प्रखर जिज्ञासा को अत्यन्त महत्व का स्थान दिया गया है? क्योंकि वही वास्तव में साधकों की प्रेरणा होती है। परन्तु यहाँ अर्जुन का मन अपनी तात्कालिक समस्या या चुनौती के कारण व्याकुल था? इसलिये ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि वह? वास्तव में? इस दृश्य के वास्तविक दिव्य सत्य को जानना चाहता है। उसकी यह जिज्ञासा अपनी भावनाओं से अतिरंजित है और उसके साथ ही उसमें युद्ध परिणाम को जानने की व्याकुलता भी है। यह बात्ा उसके इन शब्दों में स्पष्ट होती है कि? मैं आपके प्रयोजन को नहीं जान पा रहा हूँ। उसकी जिज्ञासा का अभिप्राय यह है कि? इस भयंकर रूप को धारण करके अर्जुन को कौरवों का विनाश दिखाने में भगवान् का क्या उद्देश्य है जब वह किसी घटना के घटने की तीव्रता से कामना कर रहा है और उसके समक्ष ऐसे लक्षण उपस्थित होते हैं? जो युद्ध में उसकी निश्चित विजय की भविष्यवाणी कर रहे हैं?तो वह दूसरों से उसकी पुष्टि चाहता है। यहाँ अर्जुन उसी घटना को देख रहा है? जिसे वह घटित होते देखना चाहता है अत वह स्वयं भगवान् के मुख से ही उसकी पुष्टि चाहता है। इसलिये उसका यह प्रश्न है।सत्य की ही एक अभिव्यक्ति है विनाश। भगवान् उसी रूप में अपना परिचय कराते हुए घोषणा करते हैं कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.31।।यतएवमुग्रस्वभावोऽत आख्याहि कथय को भवान् शुद्धसत्त्वप्रधानः सौम्यस्वभावस्त्वं विष्णुर्मया पूर्वं ज्ञात इदानीं तमःप्रधान उग्रस्वभाववान क इत्यर्थः। नाहमाज्ञां करोमि अपितु नम्रीभूय पृच्छामीत्याशयवान्नमस्करोति। ते तुभ्यं नमोऽस्तु हे देववर दवानां मुख्य? प्रसीद प्रसादं कुरु। देववरस्य तवैव प्रसादो ममापेक्षितो नतु देवानामिति संबोधनाशयः। भवन्तमाद्यं आदिकारणं विशेषेण ज्ञातुमिच्छामि। ननु स्वयमेव जानीहि किमर्थं पृच्छसीति तत्राह। हि यस्मात्त्वदीयां चेष्टां न जानामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.31।।आख्याहीति। यस्मादेवं तस्मात् एवमुग्ररूपः क्रूराकारः को भवानित्याख्याहि कथय मे मह्यमत्यन्तानुग्राह्याय। अतएव नमोस्तु ते तुभ्यं सर्वगुरवे। हे देववर? प्रसीद प्रसादं क्रौर्यत्यागं कुरु। विज्ञातुं विशेषेण ज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं सर्वकारणम् न हि यस्मात्तव सखापि सन् प्रजानामि तव प्रवृत्तिं चेष्टाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.31।।एवं दीप्त्याकुलीभूतोऽर्जुनो भगवानयमिति विस्मृत्याह -- आख्याहीति। एवमुग्ररूपः क्रूरकर्मा भवान् कोऽसीत्याख्याहि अमुकोऽस्मीति कथय। प्रसीद शान्तो भव। त्वामहं विज्ञातुमिच्छामि। यतस्तव प्रवृत्तिं चेष्टां न जानामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.31।।एवं समग्रजगत्तापनेन ममाऽपि सन्तापो भवत्यतो मयि प्रसन्नो भवेत्याह -- आख्याहीति। भवान् पूर्वरूपेण परिदृश्यमानः कः उग्ररूपः कः एतत् मे मह्यं हि निश्चयेन आख्याहि वद। तवाख्याने किं साधनं इत्यत आह। हे देववर देवश्रेष्ठ देवाः पूजनेन तुष्यन्ति? त्वं तु तेषामपि श्रेष्ठः प्रभुरतस्ते नमोऽस्तु।किमासनं ते गरुडासनाय इत्यादिवाक्यैस्तव प्रसादे नमस्कार एव साधनमित्यर्थः। अतः प्रसीद प्रसन्नो भव। ननु प्रसादे स्वरूपाख्यानं किम्प्रयोजनकं इत्यत आह -- विज्ञातुमिति। आद्यं पुरुषोत्तमं मूलभूतं भवन्तं विज्ञातुं विशेषेण सलीलं ज्ञातुमिच्छामि वाञ्छामि। यतस्तव प्रवृत्तिं अत्र प्राकट्यरूपां चेष्टां लीलां हि निश्चयेन न प्रजानामि स्वरूपज्ञाने सति तज्ज्ञानमपि भविष्यतीत्यर्थः। एवं सलीलं त्वज्ज्ञानेन भजनं करिष्याम्यतो विज्ञातुमिच्छामीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.31।।यत एवं तस्मात् -- आख्याहीति। भवानुग्ररूपः क इत्याख्याहि कथय। तुभ्यं नमोऽस्तु। हे देववर? प्रसीद प्रसन्नो भव। भवन्तमाद्यं पुरुषं विशेषेण ज्ञातुमिच्छामि। यतस्तव प्रवृत्तिं चेष्टां किमर्थमेवं प्रवृत्तोऽसीति न जानामि। एवंभूतस्य तव प्रवृत्तिं वार्तामपि न जानामीति वा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.31।।अतस्त्वमाख्याहि। को भवानुग्ररूपो दृश्यसे हे देववर प्रसीदेति स्वस्य भीतत्वं सूचयति। एवं च त्वामाद्यं पुरुषं भयङ्कराकारेण वर्तमानं सर्वविलक्षणं विज्ञातुमिच्छामि यतस्तव प्रवृत्तिं च न जानामि ततो ब्रूहि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.31।।क्योंकि आप ऐसे उग्र स्वभाववाले हैं? इसलिये --, मुझे बतलाइये कि भयंकर आकारवाले आप कौन हैं हे देववर अर्थात् देवोंमें प्रधान आपको नमस्कार हो? आप कृपा करें। सृष्टिके आदिसे होनेवाले आप परमेश्वरको मैं भली प्रकार जानना चाहता हूँ? क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्ति अर्थात् चेष्टाको नहीं समझ रहा हूँ।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.31।। व्याख्या -- आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद -- आप देवरूपसे भी दीख रहे हैं और उग्ररूपसे भी दीख रहे हैं तो वास्तवमें ऐसे रूपोंको धारण करनेवाले आप कौन हैंअत्यन्त उग्र विराट्रूपको देखकर भयके कारण अर्जुन नमस्कारके सिवाय और करते भी क्या जब अर्जुन भगवान्के ऐसे विराट्रूपको समझनेमें सर्वथा असमर्थ हो गये? तब अन्तमें कहते हैं कि हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार है।भगवान् अपनी जीभसे सबको अपने मुखोंमें लेकर बारबार चाट रहे हैं? ऐसे भयंकर बर्तावको देखकर अर्जुन प्रार्थना करते हैं कि आप प्रसन्न हो जाइये।विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् -- भगवान्का पहला अवतार विराट्(संसार) रूपमें ही हुआ था। इसलिये अर्जुन कहते हैं कि आदिनारायण आपको मैं स्पष्टरूपसे नहीं जानता हूँ। मैं आपकी इस प्रवृत्तिको भी नहीं जानता हूँ कि आप यहाँ क्यों प्रकट हुए हैं और आपके मुखोंमें हमारे पक्षके तथा विपक्षके बहुतसे योद्धा प्रविष्ट होते जा रहे हैं? अतः वास्तवमें आप क्या करना चाहते हैं तात्पर्य यह हुआ कि आप कौन हैं और क्या करना चाहते हैं -- इस बातको मैं जानना चाहता हूँ और इसको आप ही स्पष्टरूपसे बताइये।एक प्रश्न होता है कि भगवान्का पहले अवतार विराट्(संसारके) रूपमें हुआ और अभी अर्जुन भगवान्के किसी एक देशमें विराट्रूप देख रहे हैं -- ये दोनों विराट्रूप एक ही हैं या अलगअलग इसका उत्तर यह है कि वास्तविक बात तो भगवान् ही जानें? पर विचार करनेसे ऐसा प्रतीत होता है कि अर्जुनने जो विराट्रूप देखा था? उसीके अन्तर्गत यह संसाररूपी विराट्रूप भी था। जैसे कहा जाता है कि भगवान् सर्वव्यापी हैं? तो इसका तात्पर्य केवल इतना ही नहीं है कि भगवान् केवल सम्पूर्ण संसारमें ही व्याप्त हैं? प्रत्युत भगवान् संसारसे बाहर भी व्याप्त हैं। संसार तो भगवान्के किसी अंशमें है तथा ऐसी अनन्त सृष्टियाँ भगवान्के किसी अंशमें हैं। ऐसे ही अर्जुन जिस विराट्रूपको देख रहे हैं? उसमें यह संसार भी है और इसके सिवाय और भी बहुत कुछ है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें अर्जुनने प्रार्थनापूर्वक जो प्रश्न किया था? उसका यथार्थ उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.31।।आख्याहि इति। तव प्रवृत्तिं न वेद्मि -- केनाशयेन ईदृशी इयमुग्रता इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.31।।भगवद्रूपस्यार्जुनेन दृष्टपूर्वत्वात्तस्य तस्मिन्न जिज्ञासेत्याशङ्क्याह -- यत इति। उपदेशं शुश्रूषमाणेनोपदेशकर्तुः प्रह्वीभवनं कर्तव्यमिति सूचयति -- नमोस्त्विति। क्रौर्यत्यागमर्थयते -- प्रसादमिति। त्वमेव मां जानीषे किमर्थमित्थमिदानीमर्थयसे मदीयां चेष्टां दृष्ट्वा तथैव प्रतिपद्यस्वेत्याशङ्क्याह -- न हीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.31।।स्वरूपमेवाज्ञात्वा तद्धर्मान्वाऽयं पृच्छतीत्यन्यथा प्रतीतिनिरासायार्थमाह -- धर्मान्तरेति। तर्हि किं धर्मान्तरो भवान् इति प्रश्नेन भाव्यम्।को भवान् इति तु न युज्यत इत्यत आह -- यथेति। अन्येषां व्यवहारान्नाम प्रत्यक्षेण रूपादिकं च जानन्नपि जातिज्ञानार्थं यथा कश्चित्कञ्चित्कस्त्वमित्येवं पृच्छति? तथाऽर्जुनो भगवन्तं तद्धर्मांश्च जानन्नपि धर्मान्तरज्ञानार्थंको भवान् इत्येव पृच्छतीत्यर्थः। प्रश्नव्याख्यानस्य वर्तमानत्वाद्वर्तमाननिर्देशः। उग्रं रूपं दृष्ट्वा रुद्रो वा यमो वाऽयमिति स्वरूप एव सन्दिहानस्य प्रश्नः किं न स्यात् इत्यत आह -- यदीति। तत्स्वरूपमेवेत्यर्थः।भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो [11।33] इति। तर्हि ननु धर्मविषयोऽयं प्रश्नोऽस्तु? ततश्चान्तरशब्दो न युक्त इत्यत आह -- त्वमिति। यदि भगवद्धर्मान्न जानीयात्तर्हित्वमक्षरं परमं [11।18] इत्यादिवर्णनं न स्यात्। अतो भगवन्तं तद्धर्मांश्चाक्षरत्वादीन् ज्ञात्वा तदन्यधर्मज्ञानार्थमेव प्रश्न इत्येवमुक्तमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.31।।धर्मान्तरज्ञानार्थमेव को भवानिति पृच्छति -- आख्याहीति। यथा कश्चित्कञ्चिन्नामादिकं जानन्नपि जातिज्ञानार्थं पृच्छति कस्त्वमिति। यदि त्वमेव न जानाति तर्हिविष्णो [11।30] इत्येव सम्बोधनं न स्यात्त्वमक्षरं [11।18] इत्यादि च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.31।। --,आख्याहि कथय मे मह्यं कः भवान् उग्ररूपः क्रूराकारः? नमः अस्तु ते तुभ्यं हे देववर देवानां प्रधान? प्रसीद प्रसादं कुरु। विज्ञातुं विशेषेण ज्ञातुम् इच्छामि भवन्तम् आद्यम् आदौ भवम् आद्यम्? न हि यस्मात् प्रजानामि तव त्वदीयां प्रवृत्तिं चेष्टाम्।।श्रीभगवानुवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.32 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्त: | ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा: ||
▸ Transliteration: śrī bhagavānuvāca | kālo’smi loka-kṣaya-kṛt pravṛddho lokān samāhartumiha pravṛttaḥ | ṛte’pi tvāṁ na bhaviṣyanti sarve ye’vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Kṛṣṇa says; kālaḥ: time; asmi: I am; loka: the worlds; kṣayakṛt: destroyer; pravṛddhaḥ: to engage; lokān: all people; samāhartuṁ: to destroy; iha: in this world; pravṛttaḥ: to engage; ṛte ‘pi: without even; tvāṁ: you; na: never; bhaviṣyanti: will be; sarve: all; ye: who; avasthitāḥ: situated; pratyanīkeṣu: on the opposite side; yodhāh: the soldiers
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.32 Śrī Bhagavān says: I am the mighty world-destroying Time, I am now destroying the worlds. Even without you, none of the warriors standing in the hostile armies shall live.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.32।।श्रीभगवान् बोले -- मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम्हारे प्रतिपक्षमें जो योद्धालोग खड़े हैं? वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.32।। श्रीभगवान् ने कहा -- मैं लोकों का नाश करने वाला प्रवृद्ध काल हूँ। इस समय? मैं इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हूँ। जो प्रतिपक्षियों की सेना में स्थित योद्धा हैं? वे सब तुम्हारे बिना भी नहीं रहेंगे।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.32 कालः time? अस्मि (I) am? लोकक्षयकृत् worlddestroying? प्रवृद्धः fullgrown? लोकान् the worlds? समाहर्तुम् to destroy? इह here? प्रवृत्तः engaged? ऋते without? अपि also? त्वाम् thee? न not? भविष्यन्ति shall live? सर्वे all? ये these? अवस्थिताः arrayed? प्रत्यनीकेषु in hostile armies? योधाः warriors.Commentary Even without thee Even if thou? O Arjuna? wouldst not fight? these warriors are doomed to die under My dispensation. I am the alldestroying Time. I have already slain them. You have seen them dying. Therefore thy instrumentality is not of much importance.Such being the case? therefore? stand up and obtain fame.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.32. The Bhagavat said I am the Time, the world-destroyer, engaged here in withdrawing the worlds that are overgrown; even without you (your fighting) all the warriors, standing in the rival armies, would cease to be.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.32 Lord Shri Krishna replied: I have shown myself to thee as the Destroyer who lays waste the world and whose purpose is destruction. In spite of thy efforts, all these warriors gathered for battle shall not escape death.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.32 The Lord said I am the world-destroying Time. Manifesting Myself fully, I have begun to destroy the worlds here. Even without You, none of the warriors arrayed in the hostile ranks shall survive.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.32 The Blessed Lord said I am the world-destroying Time, [Time: The supreme God with His limiting adjunct of the power of action.] grown in stature [Pravrddhah, mighty-according to S.-Tr.] and now engaged in annihilating the creatures. Even without you, all the warriors who are arrayed in the confronting armies will cease to exist!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.32 The Blessed Lord said I am the full-grown world-destroying Time, now engaged in destroying the worlds. Even without thee, none of the warriors arrayed in the hostile armies shall live.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.32 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.32 The Lord said Kala (Time) is the calculator which calculates (Kalayati). Calculating the end of the lives of all those under the leadership of Dhrtarastra's sons, I am causing their destruction. Fully manifesting Myself with this fierce form, I have begun to destroy the hosts of kings. Therefore, by My will, even without you, namely, even without your effort, all these hostile warriors under the leadership of Dhrtarastra's sons, shall cease to be, i.e., will be destroyed.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.32 Asmi, I am; the loka-ksaya-krt, world-destroying; kalah, Time; pravrddhah, grown in stature. Hear the purpose for which I have grown in stature: I am iha, now; pravrttah, engaged; samahartum, in annihilating; lokan, the creatures. Api, even; rte tva, without you; sarve, all-from whom your apprehension had arisen; the yodhah, warriors-Bhisma, Drona, Karna and others; ye, who are; avasthitah, arrayed; pratyanikesu, in the connfronting armies-in every unit of the army confronting the other; na bhavisyanti, will cease to exist. Since this is so-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.32।। किसी वस्तु की एक अवस्था का नाश किये बिना उसका नवनिर्मांण नहीं हो सकता। निरन्तर नाश की प्रक्रिया से ही जगत् का निर्माण होता है। बीते हुये काल के शवागर्त से ही वर्तमान आज की उत्पत्ति हुई है। इस रचनात्मक विनाश के पीछे जो शक्ति दृश्य रूप में कार्य कर रही है वही मूलभूत शक्ति है जो प्राणियों के जीवन के ऊपर शासन कर रही है। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं का परिचय लोक संहारक महाकाल के रूप में कराते हैं। इस रूप को धारण करने का उनका प्रयोजन उस पीढ़ी को नष्ट करना है? जो अपने जीवन लक्ष्य के सम्बन्ध में विपरीत धारणाएं तथा दोषपूर्ण जीवन मूल्यों को रखने के कारण जीर्णशीर्ण हो गई है।भगवान् का लोकसंहारकारी भाव उनके लोककल्याणकारी भाव का विरोधी नहीं है। कभीकभी विनाश करने में दया ही होती है। एक टूटे हुए पुल को या जीर्ण बांध को अथवा प्राचीन इमारत को तोड़ना उक्त बात के उदाहरण हैं। उन्हें तोड़कर गिराना दया का ही एक कार्य है? जो कोई भी विचारशील शासन समाज के लिए कर सकता है। यही सिद्धांत यहाँ पर लागू होता है।इस उग्र रूप को धारण करने में भगवान् का उद्देश्य उन समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश करना है जो राष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन को नष्ट करने पर तुली हुई हैं। भगवान् के इस कथन से अर्जुन के विजय की आशा विश्वास में परिवर्तित हो जाती है। परन्तु भगवान् इस बात को भी स्पष्ट कर देते हैं कि पुनर्निर्माण के इस कार्य को करने के लिए वे किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर आश्रित नहीं है। इस कार्य को करने में एक अकेला काल ही समर्थ है। वही समाज में इस पुनरुत्थान और पुनर्जीवन को लायेगा। सार्वभौमिक पुनर्वास के इस अतिविशाल कार्य में व्यष्टि जीवमात्र भाग्य के प्राणी हैं। उनके होने या नहीं होने पर भी काल की योजना निश्चित ही काय्ार्ान्वित होकर रहेगी। राष्ट्र के लिए यह पुनर्जीवन आवश्यक है मानव के पुनर्वास की मांग जगत् की है। भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि? तुम्हारे बिना भी इन भौतिकवादी योद्धाओं में से कोई भी इस निश्चित विनाश में जीवित नहीं रह पायेगा।महाभारत की कथा के सन्दर्भ में? भगवान् के कथन का यह तात्पर्य स्पष्ट होता है कि कौरव सेना तो काल के द्वारा पहले ही मारी जा चुकी है? और पुनरुत्थान की सेना के साथ सहयोग करके अर्जुन? निश्चित सफलता का केवल साथ ही दे रहा है।इसलिए सर्वकालीन मनुष्य के प्रतिनिधि अर्जुन को यह उपदेश दिया जाता है कि वह निर्भय होकर अपने जीवन में कर्तव्य का पालन करे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.32।।एवं पृष्टः श्रीभगवानुवाच। लोकक्षयं करोतीति लोकक्षयकृत्कालोऽस्मि। प्रवृद्धिं प्राप्तः। इहास्मिन्काले। नन्विहास्मिंल्लोके संग्रामे वेत्याचार्यैः कुतो न व्याख्यातमितिचेत् कालस्यैव प्रकृतत्वात् प्रधानत्वाच्च सर्वनाम्रश्च प्रधानपरामर्शित्वनियमात् लोकान्सहर्तुं प्रवृत्तः। किं सर्वे लोका न भविष्यन्तीत्यत आह। ये सैन्यं प्रत्यवस्थिता भीष्मद्रोणादयस्ते सर्वे न भविष्यन्ति। ननु मां युद्धकर्तारं विना कथं सर्वेषां नाश इतिचेत्तत्राह। ऋतेऽपि त्वां त्वां त्वयि त्यक्तयुद्धव्यापारे सत्यपि मया कालरुपेणावश्यं विनाशनीया इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.32।।एवमर्जुनेन प्रार्थितो य स्वयं यदर्था च स्वप्रवृत्तिस्तत्सर्वं त्रिभिः श्लोकैः श्रीभगवानुवाच -- कालोऽस्मीत्यादिना। कालः क्रियाशक्त्युपहितः सर्वस्य संहर्ता परमेश्वरोऽस्मि भवामीदानीं प्रवृद्धो वृद्धिं गतः। यदर्थं प्रवृत्तस्तच्छृणु। लोकान्दुर्योधनादीन्समाहर्तुं सम्यगाहर्तुं भक्षयितुं प्रवृत्तोऽहमिहास्मिन्काले। मत्प्रवृत्तिं विना कथमेवं स्यादिति चेन्नेत्याह -- ऋतेऽपीति। ऋतेऽपि त्वा त्वामर्जुनं योद्धारं विनापि त्वद्व्यापारं विनापि मद्व्यापारेणैव नभविष्यन्ति विनंक्ष्यन्ति। सर्वे भीष्मद्रोणकर्णप्रभृतयो योद्धुमनर्हत्वेन संभाविता अन्येऽपि येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु प्रतिपक्षसैन्येषु योधा योद्धारः सर्वेऽपि मया हतत्वादेव नभविष्यन्ति। तत्र तव व्यापारोऽकिंचित्कर इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.32।।एवमर्जुनेन प्रार्थितो भगवानुवाच -- काल इति। इहास्मिन्संग्रामे लोकान्समाहर्तुं भक्षितुं प्रवृत्तः प्रवृद्धो महान् लोकक्षयकृत् कालो नाम परमेश्वरोऽस्मि। यस्मादेवं तस्मात् ऋतेऽपि त्वा त्वां विनापि सर्वे न भविष्यन्ति मरिष्यन्ति। के ते सर्वे। ये प्रत्यनीकेषु शत्रुसैन्येषु योधाः शूरा भीष्मादयोऽवस्थितास्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.32।।एवं विज्ञप्तः सन् श्रीभगवान् उवाच -- कालोऽस्मीति त्रयेण। लोकक्षयकृत् लोकानां विनाशकः प्रवृद्धः ऊर्जितः? लोकान् प्राणिनः? इह बाह्यतः समाहर्तुं संहर्तुं स्वलीनान् कर्तुं प्रवृत्तः कालोऽस्मि। यद्दशनान्तरेषु योधास्त्वया दृष्टास्तत्कालात्मकं मत्स्वरूपमिति भावः। त्वां द्रष्टारं मत्कृपापात्रं ऋते विना प्रत्यनीकेषु अनीकानि प्रत्यवस्थिताः ये योधास्ते सर्वेऽपि न भविष्यन्ति न स्थास्यन्तीति। यतोऽहं कालरूपः सर्वसंहारार्थं प्रवृत्तोऽस्मि। त्वां ऋते सर्वे न भविष्यन्तीत्युक्त्या त्वदर्थमेवैते मारिता इति ज्ञापितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.32।।एवं प्रार्थितः सन् श्रीभगवानुवाच -- कालोऽस्मीति त्रिभिः। लोकानां क्षयकर्ता प्रवृद्धोऽत्युग्रः कालोऽस्मि। लोकान्प्राणिनः संहर्तुमिह लोके प्रवृत्तोऽस्मि। अतः। ऋतेऽपि त्वामिति। त्वां हन्तारं विनापि न भविष्यन्ति न जीविष्यन्ति। यद्यपि त्वया न हन्तव्या एते तथापि मया कालात्मना ग्रस्ताः सन्तो मरिष्यन्त्येव। के ते। प्रत्यनीकेषु अनीकान्यनीकानि प्रति भीष्मद्रोणादीनां सर्वासु सेनासु ये योद्धारोऽवस्थितास्ते सर्वेऽपि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.32।।एवं प्रार्थितः श्रीभगवानुवाच -- कालोऽस्मीति त्रिभिः। योऽधुनाऽऽविर्भूतः स कालोऽहम्। चतुर्धा ह्यहं अक्षरकालकर्मस्वभावभेदादित्यक्षरमपि लेलिहानत्वादिधर्मवत्त्वेन लिङ्गेन मां कालरूपमवेहि। यथोक्तं श्रीभागवते -- अन्तः पुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः। समन्वेत्येष सत्त्वेन (सत्त्वानां) भगवानात्ममायया। तथावीर्याणि तस्याखिलदेहभाजामन्तर्बहिः पूरुषकालरूपैः। प्रयच्छतो मृत्युमुतामृतं च मायामनुष्यस्य वदस्व विद्वन् [भाग.10।1।7] कालरूपतयाऽसुरावेशिनां मृत्युहेतुरित्याह -- लोकानसुरावेशिन इह समाहर्त्तुं प्रवृत्त इति। अयमेव सङ्कर्षणभावः प्रदर्श्यते भगवता। संहारको हि सङ्कर्षणव्यूहः तत्केशस्य भगवत्स्वरूपेऽवतरणं भूमौ भारहरणार्थमिति भारते निरूप्यते। तथा च भूभारभूतानामेव संहारकः कालः प्रवृत्तोऽस्मि।ऋतेऽपि त्वां इत्युपलक्षणं मदनुगृहीतान्विना सर्वान्समाहर्तुं प्रवृत्तोऽस्मीत्यर्थः। त्वा हनननिमित्तभूतं विना न जीविष्यन्तीति वा सम्बन्धः। हे पार्थ त्वया न हन्तव्याश्चेन्मया कालरूपेण तु ग्रस्ताः तिरोभावं यास्यन्तीत्यभिप्रायेणन भविष्यन्ति इति प्रत्युक्तम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.32।।श्रीभगवान् बोले -- मैं लोकोंका नाश करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ। मैं जिसलिये बढ़ा हूँ वह सुन? इस समय मैं लोकोंका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ? इससे तेरे बिना भी ( अर्थात् तेरे युद्ध न करनेपर भी ) ये सब भीष्म? द्रोण और कर्ण प्रभृति शूरवीर -- योद्धालोग जिनसे तुझे आशङ्का हो रही है एवं जो प्रतिपक्षियोंकी प्रत्येक सेनामें अलगअलग डटे हुए हैं -- नहीं रहेंगे।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.32।। व्याख्या -- [भगवान्का विश्वरूप विचार करनेपर बहुत विलक्षण मालूम देता है क्योंकि उसको देखनेमें अर्जुनकी दिव्यदृष्टि भी पूरी तरहसे काम नहीं कर रही है और वे विश्वरूपको कठिनतासे देखे जानेयोग्य बताते हैं -- दुर्निरीक्ष्यं समन्तात् (11। 17)। यहाँ भी वे भगवान्से पूछ बैठते हैं कि उग्र रूपवाले आप कौन हैं ऐसा मालूम देता है कि अगर अर्जुन भयभीत होकर ऐसा नहीं पूछते तो भगवान् और भी अधिक विलक्षणरूपसे प्रकट होते चले जाते। परन्तु अर्जुनके बीचमें ही पूछनेसे भगवान्ने और आगेका रूप दिखाना बन्द कर दिया और अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देने लगे।]कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धः -- पूर्वश्लोकमें अर्जुनने पूछा था कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं --,आख्याहि मे को भवानुग्ररूपः उसके उत्तरमें विराट्रूप भगवान् कहते हैं कि मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय (नाश) करनेवाला बड़े भयंकर रूपसे बढ़ा हुआ अक्षय काल हूँ।लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः -- अर्जुने पूछा था कि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जान रहा हूँ -- न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् अर्थात् आप यहाँ क्या करने आये हैं उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि मैं इस समय दोनों सेनाओंका संहार करनेके लिये ही यहाँ आया हूँ।ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः -- तुमने पहले यह कहा था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा -- न योत्स्ये (2। 9)? तो क्या तुम्हारे युद्ध किये बिना ये प्रतिपक्षी नहीं मरेंगे अर्थात् तुम्हारे युद्ध करने और न करनेसे कोई फरक नहीं पड़ेगा। कारण कि मैं सबका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। यह बात तुमने विराट्रूपमें भी देख ली है कि तुम्हारे पक्षकी और विपक्षकी दोनों सेनाएँ मेरे भयंकर मुखोंमें प्रविष्ट हो रही हैं।यहाँ एक शङ्का होती है कि अर्जुनने अपनी और कौरवपक्षकी सेनाके सभी लोगोंको भगवान्के मुखोंमें जाकर नष्ट होते हुए देखा था? तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल प्रतिपक्षकी ही बात क्यों कही कि तुम्हारे युद्ध,किये बिना भी ये प्रतिपक्षी नहीं रहेंगे इसका समाधान है कि अगर अर्जुन युद्ध करते तो केवल प्रतिपक्षियोंको ही मारते और युद्ध नहीं करते तो प्रतिपक्षियोंको नहीं मारते। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी नहीं बचेंगे क्योंकि मैं कालरूपसे सबको खा जाऊँगा। तात्पर्य यह है कि इन सबका संहार तो होनेवाला ही है? तुम केवल अपने युद्धरूप कर्तव्यका पालन करो।एक शङ्का यह भी होती है कि यहाँ भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि प्रतिपक्षके योद्धालोग तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे? फिर इस युद्धमें प्रतिपक्षके अश्वत्थामा आदि योद्धा कैसे बच गये इसका समाधान है कि यहाँ भगवान्ने उन्हीं योद्धाओंके मरनेकी बात कही है? जिसको अर्जुन मार सकते हैं और जिनको अर्जुन आगे मारेंगे। अतः भगवान्के कथनका तात्पर्य है कि जिन योद्धाओंको तुम मार सकते हो? वे सभी तुम्हारे मारे बिना ही मर जायँगे। जिनको तुम आगे मारोगे? वे मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं -- मयैवैते निहताः पूर्वमेव (11। 33)। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा था कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी योद्धा नहीं रहेंगे। ऐसी स्थितिमें अर्जुनको क्या करना चाहिये -- इसका उत्तर भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.32।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.32।।स्वयं यदर्था च स्वप्रवृत्तिः तत्सर्वं भगवानुक्तवानित्याह -- श्रीभगवानिति। कालः क्रियाशक्त्युपहितः परमेश्वरः? अस्मिन्निति वर्तमानयुद्धोपलक्षितत्वं कालस्य विवक्षितम्। लोकसंहारार्थं त्वत्प्रवृत्तावपि नासावर्थवती प्रतिपक्षाणां भीष्मादीनां मत्प्रवृत्तिं विना संहर्तुमशक्यत्वादित्याशङ्क्याह -- ऋतेऽपीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.32।।एवं तर्हिकालोऽस्मि इत्युत्तरमयुक्तं धर्मानुक्तेरित्यत आह -- कालेति। धर्मविशिष्टभगवद्वाचीत्यर्थः। कुत एतत् इत्यत आह -- कलेति। यथा कामधेनुः सर्वार्थान् ददाति तथाऽयमपि धातुः सर्वार्थवाचीत्यर्थः। तथा चास्मादण् कर्तरि घञ् वा। जगदिति योग्यतया सम्बध्यते। भवत्वयं बन्धनादिधर्मवद्वाची? भगवद्वाची तु कुतः अन्यत्र रूढत्वादित्यत आह -- प्रसिद्धश्चेति। बद्धं मां प्रति विकत्थसे आत्मानं तु श्लाघसे। कः कालः। अयं कथम् श्यामः प्रजा हरति। बद्ध्वा तिष्ठति रौद्रश्चेति। अत्र कथं विष्णुवाचित्वनिश्चयः इत्यत आह -- विष्णुनेति। कालनामाविग्रहो यस्यासौ तथोक्तः। प्रवृद्ध इति कादाचित्की वृद्धिः प्रतीयतेऽत आह -- प्रवृद्ध इति। वृद्धिर्धात्वर्थः। सा च प्रशब्देन देशतः कालतश्च सदातनी विवक्षितेति भावः। अनादिरिति नित्यत्वस्याप्युपलक्षणम्। भूताधिकारे विहितस्य क्तस्य कुतः सार्वकालिकत्वं प्रयोगदर्शनादिति भावेनाह -- ऋतं चेति। इद्धाद्भूतमितिवदित्यर्थः।अत्रापि सार्वकालिकत्वानिश्चय इत्यतो भगवतो दीप्तेः सत्तायाश्च सदातनत्वे श्रुतिसद्भावादित्याह -- प्रविष्णुरिति। विष्णुः -- तवसो देशकालपरिच्छिन्नात् सूर्यादेस्तेजसः स्तवीयान् अतिशयिततेजोरूपो भवति? अत एव ह्यस्य स्थविरस्यानादिकालीनस्य त्वेषमिति नाम असाधारण्येन हि व्यपदेशा भवन्तीत्यर्थः। अस्त्वेवं तथापि प्रागल्पः सन्निदानीं वृद्धिङ्गत इत्यत्रार्थः किं न स्यात् इत्यत आह -- नत्विति। तुशब्दो विशेषणार्थः। विक्रियारूपं वर्धन प्रवृद्धशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं न भवति। भगवति भावविकाराणां प्रतिषिद्धत्वात्। भगवतो विक्रियारूपवृद्ध्यभावेऽपि तद्रूपस्य भवत्विति तत्राह -- यस्येति। ननु न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् इति श्रुतौ कर्मनिमित्तवृद्धिप्रतिषेधनात् वृद्धिमात्रमस्तीति ज्ञायते? अन्यथा विशेषणवैयर्थ्यात्। तथा च सत्प्रतिपक्षमुक्तवाक्यमित्यत आह -- नेति।न कर्मणा इति विशेषनिषेधस्तु वृद्धिलक्षणविक्रियाकारणत्वेन सम्भावितेन कर्मणाऽपि यदा न वर्धते? तदा स्वयं कर्मण विना न वर्धत इति किमु वक्तव्यम् इति वृद्धिलक्षणविक्रियाकारणत्वमात्रनिषेधाय कैमुत्यप्रदर्शनार्थमित्यन्यथोपपन्नमित्यर्थः। ननु सर्वत्र भगवानेव लोकानां संहर्ता तस्मात्इह इति व्यर्थमित्यत आह -- लोकानिति। युगपद्बहून्प्रत्यक्षत एवेति विशेषेण युधिष्ठिरादीनामवशिष्टत्वात् कथंत्वामृते इत्येवोक्तं इत्यत आह -- भ्रात्रादींश्चेति।
Chapter 11 (Part 11)
अपिशब्दो द्योतयतीति शेषः। अस्मत्प्रतिकूलेष्वनीकेषु अवस्थिता योधा न भविष्यन्तीत्युक्ते का पाण्डवादीनां प्राप्तिर्येनऋतेऽपि त्वा इत्युच्यत इत्यत आह -- प्रत्यनीकत्वमिति। सेनाद्वयस्यापीति शेषः। कुत एवं व्याख्यानं इत्यत आह -- सर्वेऽपीति। सेनाद्वयगता अपीत्यर्थः। प्रत्यनीकेष्विति बहुवचनं कथं इत्यत आह -- अक्षौहिणीति। भेदेन बहुत्वेन।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.32।।कालशब्दो जगद्बन्धनच्छेदनज्ञानादिसर्वभगवद्धर्मवाची। कल बन्धने? कल च्छेदने? कल ज्ञाने?,कल कामधेनुरिति पठन्ति। प्रसिद्धश्च स शब्दो भगवति।नियतं कालपाशेन बद्धं शक्र विकत्थसे। अयं स पुरुषः श्यामो लोकस्य हरति प्रजाः। बद्ध्वा तिष्ठति मां रौद्रः पशुं रशनया यथा इति मोक्षधर्मे। विष्णुना बद्धो बलिर्वक्तिविष्णौ चाधीश्वरे (त्र्यधीश्वरे) चित्तं धारयन् (येत्) कालविग्रहे [11।15।15] इति भागवते। प्रवृद्धः परिपूर्णोऽनादिर्वा। ऋतं च सत्यं चाभीद्धात् [ऋक्सं.8।8।49।1म.ना.6।1] इति हि श्रुतिः। एतत् (इदं) महद्भूतम् [बृ.उ.2।4।12] इति च।प्र विष्णुरस्तु तवसः स्तवीयांस्त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम [ऋक्सं.5।6।25।3] इति च? न तु वर्धनम्।नासौ जजान न मरिष्यति नैधतेऽसौ इति हि भागवते।यस्य दिव्यं हि तद्रूपं हीयते वर्धते न च इति मोक्षधर्मे। न कर्मणा [बृ.उ.4।4।23] इति तु कर्मणाऽपि न? किमु स्वयं इति। लोकान्समाहर्तुमिह विशेषेण प्रवृत्तः। भ्रात्रादींश्च ऋते इत्यपिशब्दः। प्रत्यनीकत्वं तु परस्परतया। सर्वेऽपि न भविष्यन्ति? अक्षौहिण्यादिभेदेन बहुवचनं युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.32।। --,कालः अस्मि लोकक्षयकृत् लोकानां क्षयं करोतीति लोकक्षयकृत् प्रवृद्धः वृद्धिं गतः। यदर्थं प्रवृद्धः तत् श्रृणु -- लोकान् समाहर्तुं संहर्तुम् इह अस्मिन् काले प्रवृत्तः। ऋतेऽपि विनापि त्वा त्वां न भविष्यन्ति भीष्मद्रोणकर्णप्रभृतयः सर्वे? येभ्यः तव आशङ्का? ये अवस्थिताः प्रत्यनीकेषु अनीकमनीकं प्रति प्रत्यनीकेषु प्रतिपक्षभूतेषु अनीकेषु योधाः योद्धारः।।यस्मात् एवम् --,
───────────────────
【 Verse 11.33 】
▸ Sanskrit Sloka: तस्मात्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रून्भुङ् क्ष्व राज्यं समृद्धम् | मयैवैते निहता: पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ||
▸ Transliteration: tasmāt tvamuttiṣṭha yaśo labhasva jitvā śatrūn bhuṅkṣva rājyaṁ samṛddham | mayaivaite nihatāḥ pūrvameva nimittamātraṁ bhava savyasācin ||
▸ Glossary: tasmāt: therefore; tvaṁ: you; uttiṣṭha: get up; yaśaḥ: fame; labhasva: gain; jitvā: conquering; satrūn: enemies; bhuṅkṣva: enjoy; rājyaṁ: kingdom; samṛddham: flourishing; maya: by Me; eva: certainly; ete: all these; nihatāḥ: already killed; pūrvameva: by previous arrangement; nimittamātraṁ: just an instrument; bhava: become; savyasācin: O Arjuna (one who can use both the hands equally)
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.33 Get up and gain glory. Conquer the enemies and enjoy the prosperous kingdom. I have slain all these warriors; you are a mere instrument, Arjuna.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.33।।इसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो। ये सभी मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन् तुम निमित्तमात्र बन जाओ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.33।। इसलिए तुम उठ खड़े हो जाओ और यश को प्राप्त करो शत्रुओं को जीतकर समृद्ध राज्य को भोगो। ये सब पहले से ही मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। हे सव्यसाचिन् तुम केवल निमित्त ही बनो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.33 तस्मात् therefore? त्वम् thou? उत्तिष्ठ stand up? यशः fame? लभस्व obtain? जित्वा having conered? शत्रून् enemies? भुङ्क्ष्व enjoy? राज्यम् the kingdom? समृद्धम् the unrivalled? मया by Me? एव even? एते these? निहताः have been slain? पूर्वम् before? एव even? निमित्तमात्रम् a mere instrument? भव be? सव्यसाचिन् O ambidexterous one.Commentary Be thou merely an apparent or nominal cause. I have already killed them in advance. I have destroyed them long ago.Fame People will think that Bhishma? Drona and the other great warriors whom even the gods cannot kill have been defeated by you and so you will obtain great fame. Such fame is due to virtuous Karma only.Satrun Enemies such as Duryodhana.Savyasachi Arjuna who could shoot arrows even with the left hand.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.33. Therefore, stand up, win glory, and vanishing foes, enjoy the rich kingdom; these [foes] have already been killed by Myself; [hence] be a mere token cause [in their destruction], O ambidextrous archer !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.33 Then gird up thy loins and conquer. Subdue thy foes and enjoy the kingdom in prosperity. I have already doomed them. Be thou my instrument, Arjuna!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.33 Therefore airse, win glory. Conering your foes, enjoy a prosperous kingdom. By Me they have been slain already. You be merely an instrument, O Arjuna, you great bowman!
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.33 Therefore you rise up, (and) gain fame; and defeating the enemies, enjoy a prosperous kingdom. These have been killed verily by Me even earlier; be you merely an instrument, O Savyasacin (Arjuna).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.33 Therefore, stand up and obtain fame. Coner the enemies and enjoy the unrivalled kingdom. Verily by Me have they been already slain; be thou a mere instrument, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.33 See comment under 11.34.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.33 Therefore, arise for fighting against them. Conering your enemies, win glory and enjoy a prosperous and righteous kingdom. All those who have sinned have been already annihilated by Me. Be you merely an instrument (Nimitta) of Mine in destroying them - just like a weapon in my hand, O Savyasacin! The root 'Sac' means 'fastening'. A 'savyasacin' is one who is capable of fixing or fastening the arrow even with his left hand. The meaning is that he is so dexterous that he can fight with a bow in each hand.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.33 Tasmat, therefore; tvam, you; uttistha, rise up; (and) labhasva, gain; the yasah, fame, that Arjuna has conered the Atirathas [Atiratha-see note under 1.4.6.-Tr.], Bhisma, Drona and others, who are unconerable even by the gods. Such fame can be acired only by virtuous actions. Jitva, by defeating; satrun, the enemies, Duryodhana and others; bhunksva, enjoy; a rajyam, kingdom; that is samrddham, propersous, free from enemies and obstacles. Ete, these; nihatah, have been definitely killed, made lifeless; eva maya, verily by Me; eva purvam, even earlier. Bhava, be you; nimitta-matram, merely an instrument, O Savyasachin. Arjuna was called so because he could shoot arrows even with his left hand.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.33।। See commentary under 11.34
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.33।।यस्मात्त्वां विनाप्येते न भविष्यन्त्येव तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ स्थित्वा युध्यस्व। ननु मामृतेऽपि कार्यनिर्वाहे किमर्थं युद्धाय मां नियोजयसीतिचेत् त्वदीययशःप्रख्यापनोयेत्याशयेनाह। यशो लभस्व देवैरपि जेतुमशक्या भीष्मादयोऽतिरथा अर्जुनेन जिता इति यशः मदाराधनादिजन्यपुण्यजनितं लभस्व। शत्रून्दुर्योधनादीन् जित्वा समृद्धं असपत्नमकण्टकं राज्यं बुङ्क्ष्व। एतेषां विजये तव परिश्रमो नास्तीत्याशयेनाह। एते तव शत्रुवः पूर्वमेव मयैव निश्चयेन हताः। ननु कथं स्थिता इतिचेत्तव यशोदानाय त्वां निमित्तीकर्तुमित्याशयेनाह। निमित्तमात्रं त्वं भव। हे स्व्यासाचिन् सव्येन वामेन हस्तेनापि बाणन्सचित्तुं संधातुं शीलमस्येति तथा तं संबोधयन्। निमित्तमात्रं भूत्वा सव्यसाचित्वं सार्थकं कुर्विति सूचयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.33।।यस्मादेवं तस्मात्त्वद्व्यापारमन्तरेणापि यस्मादेते विनङ्क्ष्यन्त्येव तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ उद्युक्तो भव युद्धाय। देवैरपि दुर्जया भीष्मद्रोणादयोऽतिरथा झटित्येवार्जुनेन निर्जिता इत्येवंभूतं यशो लभस्व। महद्भिः पुण्यैरेव हि यशो लभ्यते। अत्यन्ततश्च जित्वा शत्रून्दुर्योधनादीन् भुङ्क्ष्व स्वोपसर्जनत्वेन भोग्यतां प्रापय समृद्धं राज्यमकण्टकम्। एते च तव शत्रवो मयैव कालात्मना निहताः संहतायुषः त्वदीययुद्धात्पूर्वमेव। केवलं तव यशोलाभाय रथान्न पातिताः। अतस्त्वं निमित्तमात्रं अर्जुनेनैते निर्जिता इति सार्वलौकिकव्यपदेशास्पदं भव। हे सव्यसाचिन् सव्येन वामेन हस्तेनापि शरान्सचितुं संधातुं शीलं यस्य तादृशस्य तव भीष्मद्रोणादिजयो नासंभावितस्तस्मात्त्वद्व्यापारानन्तरं मया रथात्पात्यमानेष्वेतेषु तवैव कर्तृत्वं लोकाः कल्पयिष्यन्तीत्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.33।।तस्मादिति। यस्मात्त्वां विनाप्येते मरिष्यन्ति तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ युद्धाय। शेषं स्पष्टम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.33।।अत एव त्वमनायासेन यशो गृहाणेत्याह -- तस्मादिति। हे सव्यसाचिन् सव्येन वामेन हस्तेन सचितुं सन्धातुं शीलं यस्य तादृशस्त्वमुत्तिष्ठ युद्धार्थं सज्जो भव। यशो लभस्व सव्यहस्तेनैव सर्वे मारिता इत्यादिरूपम्। शत्रून् दुर्योधनादीन् जित्वा समृद्धं राज्यं भुङ्क्ष्व। एते मया पूर्वमेव त्वन्मारणात् प्रथममेव निहताः मारिताः? अतो निमित्तमात्रं भव लोककथनार्थमर्जुनेन सर्वे मारिता इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.33।। तस्मादिति। यस्मादेवं तस्मात्त्वं युद्धायोत्तिष्ठ। देवैरपि दुर्जयाः भीष्मद्रोणादयोऽर्जुनेन निर्जिता इत्येवंभूतं यशो लभस्व प्राप्नुहि। अयत्नेन शत्रूञ्जित्वा समृद्धं राज्यं भुङ्क्ष्व। एते च तव शत्रवस्त्वदीययुद्धात्पूर्वमेव मयैव कालात्मना निहतप्रायास्तथापि त्वं निमित्तमात्रं भव। हे सव्यसाचिन् सव्येन वामहस्तेन सचितुं शरान्संधातुं शीलं यस्येति व्युत्पत्त्या वामेनापि बाणक्षेपात्सव्यसाचीत्युच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.33।।तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ निमित्तमात्रं तु भव।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.33।।क्योंकि ऐसा है --, इसलिये तू खड़ा हो और देवोंसे भी न जीते जानेवाले भीष्म? द्रोण आदि महारथियोंको अर्जुनने जीत लिया ऐसे निर्मल यशको लाभ कर। ऐसा यश पुण्योंसे ही मिलता है। दुर्योधनादि शत्रुओंको जीतकर समृद्धिसम्पन्न निष्कण्टक राज्य भोग। ये सब ( शूरवीर ) मेरेद्वारा निःसन्देह पहले ही मारे हुए हैं अर्थात् प्राणविहीन किये हुए हैं। हे सव्यसाचिन् तू केवल निमित्तमात्र बन जा। बायें हाथसे भी बाण चलानेका अभ्यास होनेके कारण अर्जुन सव्यसाची कहलाता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.33।। व्याख्या -- तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व -- हे अर्जुन जब तुमने यह देख ही लिया कि तुम्हारे मारे बिना भी ये प्रतिपक्षी बचेंगे नहीं? तो तुम कमर कसकर युद्धके लिये खड़े हो जाओ और मुफ्तमें ही यशको प्राप्त कर लो। इसका तात्पर्य है कि यह सब होनहार है? जो होकर ही रहेगी और इसको मैंने तुम्हें प्रत्यक्ष दिखा भी दिया है। अतः तुम युद्ध करोगे तो तुम्हें मुफ्तमें ही यश मिलेगा और लोग भी कहेंगे कि अर्जुनने विजय कर लीयशो लभस्व कहनेका यह अर्थ नहीं है कि यशकी प्राप्ति होनेपर तुम फूल जाओ कि वाह मैंने विजय प्राप्त कर ली? प्रत्युत तुम ऐसा समझो कि जैसे ये प्रतिपक्षी मेरे द्वारा मारे हुए ही मरेंगे? ऐसे ही यश भी जो होनेवाला है? वही होगा। अगर तुम यशको अपने पुरुषार्थसे प्राप्त मानकर राजी होओगे? तो तुम फलमें बँध जाओगे -- फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)। तात्पर्य यह हुआ कि लाभहानि? यशअपयश सब प्रभुके हाथमें है। अतः मनुष्य इनके साथ अपना सम्बन्ध न जो़ड़े क्योंकि ये तो होनहार हैं।जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् -- समृद्ध राज्यमें दो बातें होती हैं -- (1) राज्य निष्कण्टक हो अर्थात् उसमें बाधा देनेवाला कोई भी शत्रु या प्रतिपक्षी न रहे और (2) राज्य धनधान्यसे सम्पन्न हो अर्थात् प्रजाके पास खूब धनसम्पत्ति हो हाथी? घोड़े? गाय? जमीन? मकान? जलाशय आदि आवश्यक वस्तुएँ भरपूर हों प्रजाके खाने के लिये भरपूर अन्न हो। इन दोनों बातोंसे ही राज्यकी समृद्धता? पूर्णता होती है। भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि शत्रुओंको जीतकर तुम ऐसे निष्कण्टक और धनधान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो।यहाँ राज्यको भोगनेका अर्थ अनुकूलताका सुख भोगनेमें नहीं है? प्रत्युत यह अर्थ है कि साधारण लोग जिसे भोग मानते हैं? उस राज्यको भी तुम अनायास प्राप्त कर लो।मयैवैते निहताः पूर्वमेव -- तुम मुफ्तमें यश और राज्यको कैसे प्राप्त कर लोगे? इसका हेतु बताते हैं कि यहाँ जितने भी आये हुए हैं? उन सबकी आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् कालरूप मेरे द्वारा ये पहलेसे ही मारे जा चुके हैं।निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् -- बायें हाथसे बाण चलानेके कारण अर्थात् दायें और बायें -- दोनों हाथोंसे बाण चलानेके कारण अर्जुनका नाम सव्यसाची था (टिप्पणी प0 596)। इस नामसे सम्बोधित करके भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं कि तुम दोनों हाथोंसे बाण चलाओ अर्थात् युद्धमें अपनी पूरी शक्ति लगाओ? पर,बनना है निमित्तमात्र। निमित्तमात्र बननेका तात्पर्य अपने बल? बुद्धि? पराक्रम आदिको कम लगाना नहीं है? प्रत्युत इनको सावधानीपूर्वक पूराकापूरा लगाना है। परन्तु मैंने मार दिया? मैंने विजय प्राप्त कर ली -- यह अभिमान नहीं करना है क्योंकि ये सब मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। इसलिये तुम्हें केवल निमित्तमात्र बनना है? कोई नया काम नहीं करना है।निमित्तमात्र बनकर कार्य करनेमें अपनी ओरसे किसी भी अंशमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिये? प्रत्युत पूरीकीपूरी शक्ति लगाकर सावधानीपूर्वक कार्य करना चाहिये। कार्यकी सिद्धिमें अपने अभिमानका किञ्चिन्मात्र भी अंश नहीं रखना चाहिये। जैसे? भगवान् श्रीकृष्णने गोवर्धन पर्वत उठाया तो उन्होंने ग्वालबालोंसे कहा कि तुमलोग भी पर्वतके नीचे अपनीअपनी लाठियाँ लगाओ। सभी ग्वालबालोंने अपनीअपनी लाठियाँ लगायीं और वे ऐसा समझने लगे कि हम सबकी लाठियाँ लगनेसे ही पर्वत ऊपर ठहरा हुआ है। वास्तवमें पर्वत ठहरा हुआ था भगवान्के बायें हाथकी छोटी अंगुलीके नखपर ग्वालबालोंमें जब इस तरका अभिमान हुआ? तब भगवान्ने अपनी अंगुली थोड़ीसी नीचे कर ली। अंगुली नीचे करते ही पर्वत नीचे आने लगा तो ग्वालबालोंने पुकारकर भगवान्से कहा -- अरे दादा मरे मरे मरे भगवान्ने कहा कि जोरसे शक्ति लगाओ। पर वे सबकेसब एक साथ अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी पर्वतको ऊँचा नहीं कर सके। तब भगवान्ने पुनः अपनी अंगुलीसे पर्वतको ऊँचा कर दिया। ऐसे ही साधकको परमात्मप्राप्तिके लिये अपने बल? बुद्धि? योग्यता आदिको तो पूराकापूरा लगाना चाहिये? उसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी कमी नहीं रखनी चाहिये? पर परमात्माका अनुभव होनेमें बल? उद्योग? योग्यता? तत्परता? जितेन्द्रियता? परिश्रम आदिको कारण मानकर अभिमान नहीं करना चाहिये। उसमें तो केवल भगवान्की कृपाको ही कारण मानना चाहिये। भगवान्ने भी गीतामें कहा है कि शाश्वत अविनाशी पदकी प्राप्ति मेरी कृपासे होगी -- मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् (18। 56)? और सम्पूर्ण विघ्नोंको मेरी कृपासे तर जायगा -- म़च्चितः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि (18। 58)। इससे यह सिद्ध हुआ कि केवल निमित्तमात्र बननेसे साधकको परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।जब साधक अपना बल मानते हुए साधन करता है? तब अपना बल माननेके कारण उसको बारबार विफलताका अनुभव होता रहता है और तत्त्वकी प्राप्तिमें देरी लगती है। अगर साधक अपने बलका किञ्चिन्मात्र भी अभिमान न करे तो सिद्धि तत्काल हो जाती है। कारण कि परमात्मा तो नित्यप्राप्त हैं ही? केवल अपने पुरुषार्थके अभिमानके कारण ही उनका अनुभव नहीं हो रहा था। इस पुरुषार्थके अभिमानको दूर करनेमें ही निमित्तिमात्रं भव पदोंका तात्पर्य है।कर्मोंमें जो अपने करनेका अभिमान है कि मैं करता हूँ तो होता है? अगर मैं नहीं करूँ तो नहीं होगा? यह केवल अज्ञताके कारण ही अपनेमें आरोपित कर रखा है। अगर मनुष्य अभिमान और फलेच्छाका त्याग करके प्राप्त परिस्थितिके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाय? तो उसका उद्धार स्वतःसिद्ध है। कारण कि जो होनेवाला है? वह तो होगा ही? उसको कोई अपनी शक्तिसे रोक नहीं सकता और जो नहीं होनेवाला है? वह नहीं होगा? उसको कोई अपने बलबुद्धिसे कर नहीं सकता। अतः सिद्धिअसिद्धिमें सम रहते हुए कर्तव्यकर्मोंका पालन किया जाय तो मुक्ति स्वतःसिद्ध है। बन्धन? नरकोंकी प्राप्ति? चौरासी लाख योनियोंकी प्राप्ति -- ये सभी कृतिसाध्य हैं और मुक्ति? कल्याण? भगवत्प्राप्ति? भगवत्प्रेम आदि सभी स्वतःसिद्ध हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.33 -- 11.34।।तस्मादिति। द्रोणमिति। तदत्र भगवता (S तदनु भवता ? N तदत्रभवता) उत्तरं जगतो विद्याविद्यात्मनः शुद्धाशुद्धमिश्रसंविद्बलग्रासीकारात् अभिधीयते इति प्रायशः सूत्रितमत्राध्याये रहस्यम्। उट्टङ्कितमात्र (N -- मात्रं) -- संवित्तिसमर्थेभ्योऽस्तु कियत्पङ्क्ितलेखनायासदौःस्थित्यमालम्भेमहि (K आलम्भेमहि)।अत्र च यदुक्तं मया हतेषु त्वं निमित्तं यशस्वी भव इति भगवता तत् प्रत्युक्तं यदुक्तं प्रागर्जुनेन नैतद्विद्मः,(?N नचैतद्विद्मः) कतरन्नो वरीयः इत्यादि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.33।।तवौदासीन्येऽपि प्रतिकूलानीकस्था मत्प्रातिकूल्यादेव न भविष्यन्तीत्येवं यस्मान्निश्चितं तस्मात्त्वदौदासीन्यमकिंचित्करमित्याह -- यस्मादिति। उत्तिष्ठ युद्धायोन्मुखीभवेत्यर्थः। यशोलाभमभिनयति -- भीष्मेति। किं तेनापुमर्थेनेत्याशङ्क्याह -- पुण्यैरिति। राज्यभोगेऽपेक्षिते किमनपेक्षितेनेत्याशङ्क्याह -- जित्वेति। भीष्मादिष्वतिरथेषु सत्सु कुतो जयाशङ्केत्याशङ्क्याह -- मयैवैत इति। तर्हि मृतमारणार्थं न मे प्रवृत्तिस्तत्राह -- निमित्तेति। सव्यसाचीपदं विभजते -- वामेनेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.33।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.33।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.33।। --,तस्मात् त्वम् उत्तिष्ठ भीष्मप्रभृतयः अतिरथाः अजेयाः देवैरपि? अर्जुनेन जिताः इति यशः लभस्व केवलं पुण्यैः हि तत् प्राप्यते। जित्वा शत्रून् दुर्योधनप्रभृतीन् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम् असपत्नम् अकण्टकम्। मया एव एते निहताः निश्चयेन हताः प्राणैः वियोजिताः पूर्वमेव। निमित्तमात्रं भव त्वं हे सव्यसाचिन्? सव्येन वामेनापि हस्तेन शराणां क्षेप्ता सव्यसाची इति उच्यते अर्जुनः।।
───────────────────
【 Verse 11.34 】
▸ Sanskrit Sloka: द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् | मया हतांस्त्वं जहि मा व्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् ||
▸ Transliteration: droṇaṁ ca bhīṣmaṁ ca jayadrathaṁ ca karṇaṁ tathānyānapi yodhavīrān | mayā hatāṁstvaṁ jahi mā vyathiṣṭā yudhyasva jetāsi raṇe sapatnān ||
▸ Glossary: droṇaṁ ca: also Droṇa; bhīṣmaṁ ca: also Bhisma; jayadrathaṁ ca: also Jayadratha; karṇaṁ: also Karṇa; tathā: also; anyān: others; api: certainly; yodhavīrān: great warriors; mayā: by Me; hatān: already killed; tvaṁ: you; jahi: becomes victorious; mā: never; vyathiṣṭā: be disturbed; yudhyasva: just fight; jetāsi: just conquer; raṇe: in the fight; sapatnān: enemies
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.34 Droṇa, Bhīṣma, Jayadratha, Karṇa and other brave war- riors have already been slain by Me; destroy them. Do not be be afraid; fight and you shall conquer your enemies in battle.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.34।।द्रोण? भीष्म? जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य सभी मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मारो। तुम व्यथा मत करो और युद्ध करो। युद्धमें तुम निःसन्देह वैरियोंको जीतोगे।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.34।। द्रोण? भीष्म? जयद्रथ? कर्ण तथा और भी बहुत से मेरे द्वारा मारे गये वीर योद्धाओं को तुम मारो भय मत करो युद्ध करो तुम युद्ध में शत्रुओं को जीतोगे।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.34 द्रोणम् Drona? च and? भीष्मम् Bhishma? च and? जयद्रथम् Jayadratha? च and? कर्णम् Karna? तथा also? अन्यान् others? अपि also? योधवीरान् brave warriors? मया by Me? हतान् slain? त्वम् thou? जहि do kill? मा not? व्यथिष्ठाः be distressed with fear? युध्यस्व fight? जेतासि shall coner? रणे in the battle? सपत्नान् the enemies.Commentary Already slain by Me Therefore? O Arjuna? you need not be afraid of incurring sin by killing them.Drona had celestial weapons. He was Arjunas teacher in the science of archery. He was Arjunas beloved and greatest Guru. Bhishma also possessed celetial weapons. He could die only if and when he wanted to die. He once faught singlehanded with Lord Parasurama and was not defeated. So powerful was he.The father of Jayadratha performed penance with a resolve the head of the man who may cause the head of my son to fall on the ground? shall also fall. During the war? however? Arjunas arrow cuts the head and drops it on the lap of the father who? inadvertently? makes it fall on the ground he too dies at once. Karna? the son of the Sungod? had obtained an unerring missile from Indra.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.34. Slay Drona and Bhisma, and Jayadratha, and Karna as well as the other heroes of the world-all already slain by Me. Do not get distressed; fight; you shall vanish enemies in the battle.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.34 Drona and Bheeshma, Jayadratha and Karna, and other brave warriors - I have condemned them all. Destroy them; fight and fear not. Thy foes shall be crushed."
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.34 Slay Drona, Bhisma, Jayadratha, Karna as well as other mighty warriors, who have been doomed by Me. Do not feel distressed. Fight, You shall coner your rivals in the battle.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.34 You destroy Drona and Bhisma, and Jayadratha and Karna as also the other heroic warriors who have been killed by Me. Do not be afraid. Fight! You shall coner the enemies in battle.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.34 Drona, Bhishma, Jayadratha, Karna and other brave warriors these are already slain by Me: do thou kill; be not distressed with fear; fight and thou shalt coner thy enemies in battle.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.33-34 Tasmat etc. Drona etc. The world is of the nature of perfect and imperfect knowledge and it is swallowed (11.completely controlled) by the power of the perfect, imperfect and mixed Consciousness. Hence, here an answer is given accordingly by the Bhagavat. This secret is a almost indicated in this chapter. Yet for the benefit of those persons who are capable of understanding only what has been clearly marked, let us (11.Ag.) assume the misfortune of taking the trouble of writing a few lines.
What is declared by the Bhagavat - viz., 'As the foes have been slain [by Me], be a token cause and win glory', this is by way of answering to what Arjuna has said earlier viz., 'We do not know who, amongst both of us, is more powerful than the other etc. (11.II, 6)'.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.34 Say Drona, Bhisma, Karna, etc., who have ben chosen for destruction by me alone, as they have transgressed the law of righteousness. Be not distressed, considering, 'How can I slay these teachers, relations and others who are attached to enjoyments?' Do not be thus distressed by thinking about the right and wrong of it, or out of love and compassion for them. These persons are guilty of unrighteousness by siding with the evil-minded Duryodhana. They have been chosen by Me alone for destruction. Therefore fight without doubt. You shall conqer your enemies in battle. In slaying them, there is not the slighest trace of cruelty. The purport is that victory is the sure result.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.34 By saying, 'who have been killed by Me,' the Lord names Drona and those very warriors with regard to whom Arjuna had (his) doubts. Now then, uncertainty with regard to Drona and Bhisma is well-founded. Drona was the teacher of the science of archery, and was eipped with heavenly weapons; and particularly, he was his (Arjuna's) own teacher and most respected. Bhisma was destined to die at will, and possessed heavenly weapons. He fought a duel with Parasurama and remained unvanished. So also Jayadratha-whose father was performing an austerity with the idea that anyone who made his son's head fall on the ground would have even his own head fall. Since Karna also was eipped with an unerring spear given by Indra, and was a son of the Sun, born of a maiden (Kunti), therefore he is referred to by his own name itself. As a mere instrument, tvam, you; jahi, destory them; who have been hatan, killed; maya, by Me. Ma, do not; vyathisthah, be afraid of them. Yuddhyasva, fight. Jetasi, you shall coner; the sapatnan, enemies-Duryodhana and others; rane, in battle.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.34।। यहाँ भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को सीधे और स्पष्ट शब्दों में आश्वस्त करते हैं कि उसको उठ खड़े होकर काल के आश्रय से सफलता और वैभव को प्राप्त करना चाहिए। अधर्मियों की शक्ति और सार्मथ्य कितनी ही अधिक क्यों न हो? लोक क्षयकारी महाकाल की शक्ति ने पहले ही उन्हें मार दिया है। अर्जुन को केवल आगे बढ़कर एक वीर पुरुष की भूमिका निभाते हुए विजय के मुकुट को प्राप्त कर लेना है। हे सव्यसाचिन् मेरे द्वारा ये मारे ही हुए हैं? तुम केवल निमित्त बनो।वस्तुत? प्रत्येक विचारशील पुरुष को इस तथ्य का स्पष्ट ज्ञान होता है कि जीवन में वह ईश्वर के हाथों में केवल एक निमित्त ही है। परन्तु? सामान्यत हम इस तथ्य को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते? क्योंकि हमारा गर्वभरा अभिमान इतनी सरलता से निवृत्त नहीं होता कि हमारा शुद्ध दिव्य स्वरूप अपनी सर्वशक्ति से हमारे द्वारा कार्य कर सके। जीवन के सभी कार्य क्षेत्रों में प्राप्त की गयी उपलब्धियों पर यदि हम विचार करें? तो हमें ज्ञात होगा कि प्रत्येक उपलब्धि में प्रकृति के योगदान की तुलना में हमारा योगदान अत्यन्त क्षुद्र और नगण्य है। अधिकसेअधिक हम केवल उन वस्तुओं का संयोग या मिश्रण ही कर सकते हैं? जो पहले से ही विद्यमान हैं? और इस संयोग के फलस्वरूप उनमें पूर्व निहित गुणों को व्यक्त करा सकते हैं। फिर भी हमारा अभिमान यह होता है कि हमने उस फल को उत्पन्न किया हैरेडियो? वायुयान? इंजिन? जीवन संरक्षक औषधयां? संक्षेप में? यह सम्पूर्ण नवीन जगत्? और प्रगति में इसकी उपलब्धियां ये सब ईश्वर की गोद में बैठे बच्चों के खेल के अतिरिक्त और कुछ नहीं हैं। ईश्वर ने ही हमारे लिए विद्युत्? लोहा? आकाश? वायु इत्यादि उपलब्ध कराये और हमें उसका उपयोग करने के लिए स्वीकृति और स्वतन्त्रता प्रदान की। इन मूलभूत वस्तुओं के बिना कोई भी उपलब्धि संभव नहीं हो सकती और उपलब्धि का अर्थ है? ईश्वर प्रदत्त वस्तुओं का बुद्धिमत्तापूर्वक समायोजन करना।शरणागति तथा ईश्वर का अखण्ड स्मरण करते हुए जगत् की सेवा करने के सिद्धांतों को ऐसी व्यर्थ की कल्पनाएं नहीं समझना चाहिए जो जगत् की भौतिक सत्यता से पलायन करने के लिए विधान की गयी हों। जगत् में कुशलतापूर्वक कार्य करके सफलता पाने के लिए मनुष्य़ को अपनी योग्यता और स्वभाव को ऊँचा उठाना आवश्यक है। अखण्ड ईश्वर स्मरण वह साधन है? जिसके द्वारा हम अपने मन को सदा अथक उत्साह और आनन्दपूर्ण प्रेरणा के भाव में रख सकते हैं।अहंकारी के लिए यह जगत् एक बोझ या समस्या बना होता है। जिस सीमा तक अहंकार स्वयं को किसी महान् और श्रेष्ठ आदर्श के प्रति समर्पित कर देता है? उसी सीमा में यह जगत् और उसकी उपलब्धियां प्राप्त करना सरल और निश्चित सफलता का खेल बन जाता है। इसके पूर्व भी गीता में अनेक स्थलों पर स्पष्टत सूचित किया गया है कि अहंकार के समर्पण से हममें स्थित महानतर क्षमताओं को व्यक्त किया जा सकता है। उसी विचार को यहाँ दोहराया गया है। सम्पूर्ण सेना को यहाँ अपनी वीरता की भूमिका निभाने के लिए आमन्त्रित किया गया है। ईश्वर के हाथों में वे निमित्त बने और राजमुकुट तथा वैभव को वेतन के रूप में प्राप्त करें। अर्जुन को कौरव पक्ष के कुछ प्रधान और श्रेष्ठ पुरुषों से विशेष भय था। यहाँ भगवान् उनका नामोल्लेख करके बताते हैं कि ये वीर पुरुष भी सर्वभक्षक काल के द्वारा मारे जा चुके हैं।द्रोणाचार्य अर्जुन के गुरु थे? जिन्होंने उसे धनुर्विद्या सिखायी थी। उसके पास कुछ विशेष शस्त्रास्त्र थे और अर्जुन उनका विशेष रूप से आदर और सम्मान करता था। भीष्मपितामह को स्वेच्छा से मरण प्राप्ति का वरदान मिला हुआ था? तथा उनके पास भी अत्यन्त शक्तिशाली दिव्यास्त्र थे। एक बार उन्होंने वीर परशुराम तक को धूल चटा दी थी। जयद्रथ की अजेयता का कारण उसके पिता द्वारा किया जा रहा तप था। उन्होंने यह दृढ़ निश्चय किया था कि जो कोई भी व्यक्ति मेरे पुत्र जयद्रथ का शिर पृथ्वी पर गिरायेगा? उस व्यक्ति का शिर भी नीचे गिर पड़ेगा। कर्ण से भय का कारण यह था कि उसे भी इन्द्र से दिव्यास्त्र प्राप्त हुआ था। उपर्युक्त कारणों से स्पष्ट होता है कि भगवान् ने इन चारों पुरुषों का ही विशेषत उल्लेख क्यों किया है। ये महारथी लोग भी काल का ग्रास बन चुके थे? अत अर्जुन को चाहिए कि वह राजसिंहासन की ओर अग्रसर हो और सम्पूर्ण वैभव का स्वामी बन जाये।यह स्वाभाविक है कि जब मनुष्य की किसी तीव्र इच्छा को पूर्ण कर दिया जाता है? तो वह अकस्मात् अपने दयालु संरक्षक की स्तुति और प्रशंसा करने लगता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.34।।येषु येषु योधेष्वर्जुनस्याशङ्का तांस्तान्वयपदिशति। द्रोणं च धनुर्वेदाचार्यं दिव्यास्त्रसंपन्न आत्मनश्च विशेषतो गुरुं? भीष्मं च स्वच्छन्द मृत्युं दिव्यास्त्रसंपन्नं परशुरामेणापि द्वन्द्वयुद्धेऽपराजितं? जयद्रथं च यस्य पिता तपश्चरति मम पुत्रस्य शिरो भूमौ यः पातयिष्यति तस्यापि शिरः पतिष्यतीति तं? कर्णं च कल्यया कुन्त्या संतुष्टाद्दुर्वाससो लब्धेन मन्त्रेणाहूतात्सूर्यादुत्पादितं इन्द्रदत्तया शक्त्या त्वमोघया दिव्यास्त्रैश्च संपन्नं? तथान्यानपि योधमुख्यान्भगदत्तादीन्मया कालरुपेण हतान् निमित्तमात्रेण त्वं जहि। अतो मा व्यथिष्ठास्तेभ्यो भयं मा कार्षीः। भयं त्यक्त्वा च युध्यस्व। यतः सपत्नान्? शत्रून्दुर्योधनादीन् रणे युद्धे निःसंशयं जेतासि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.34।।ननु द्रोणो ब्राह्मणोत्तमो धनुर्वेदाचार्यो मम गुरुर्विशेषेण च दिव्यास्त्रसंपन्नः। तथा भीष्मः स्वच्छन्दमृत्युर्दिव्यास्त्रसंपन्नश्च परशुरामेण द्वन्द्वयुद्धमुपगम्यापि न पराजितः। तथा यस्य पिता वृद्धक्षत्रस्तपश्चरति मम पुत्रस्य शिरो यो भूमौ पातयिष्यति तस्यापि शिरस्तत्कालं भूमौ पतिष्यतीति स जयद्रथोऽपि जेतुमशक्यः स्वयमपि महादेवाराधनपरो दिव्यास्त्रसंपन्नश्च। तथा कर्णोऽपि स्वयं सूर्यसमस्तदाराधनेन दिव्यास्त्रसंपन्नश्च वासवदत्तया चैकपुरुषघातिन्या मोघीकर्तुमशक्यया शक्त्या विशिष्टः। तथा कृपाश्वत्थामभूरिश्रवःप्रभृतयो महानुभावाः सर्वथा दुर्जया एव एतेषु सत्सु कथं जित्वा शत्रून्राज्यं भोक्ष्ये कथं वा यशो लप्स्य इत्याशङ्कामर्जुनस्यापनेतुमाह तदाशङ्काविषयान्नामभिः कथयन् -- द्रोणं चेति। वीरान् द्रोणादींस्त्वदाशङ्काविषयीभूतान्सर्वानेव योधवीरान्कालात्मना मया हतानेवं त्वं जहि। हतानां हनने को वा परिश्रमः। अतो माव्यथिष्ठाः कथमेवं शक्ष्यामीति व्यथां भयनिमित्तां पीडां मागाः। भयं त्यक्त्वा युध्यस्व। जेतासि जेष्यस्यचिरेणैव रणे संग्रामे सपत्नान् सर्वानपि शत्रून्। अत्र द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं चेति चकारत्रयेण पूर्वोक्ताजेयत्वशङ्कानूद्यते। तथाशब्देन कर्णोऽपि अन्यानपि योधवीरानित्यत्रापिशब्देन तस्मात् कुतोपि स्वस्य पराजयं वधनिमित्तं पापं च माशङ्किष्ठा इत्यभिप्रायः।कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च मधुसूदन। इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हौ इत्यत्रेवात्रापि समुदायान्वयानन्तरं प्रत्येकान्वयो द्रष्टव्यः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.34।।मा व्यथिष्ठाः एते महान्तः कथं हन्तुं शक्या इत्याकुलीभावं मागा इत्यर्थः। जेतासि जेष्यसि सपत्नाञ्शत्रून्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.34।।द्रोणो ब्राह्मणत्वाद्भगवता कथं वध्यः तथा भीष्मो भक्तः? तथैव जयद्रथः शिवात्प्राप्तप्रसादः? कर्णः कुन्तीपुत्रः? एतेषाममारणे कथं जयो भवेत् अतस्तन्नाम्ना प्राह -- द्रोणं चेति। च पुनः। ब्राह्मणमपि द्रोणं? भीष्मं च भक्तमपि? जयद्रथं चकारेण प्राप्तवरमपि? कर्णं च कुन्तीपुत्रमपि तथाभूतानन्यानपि योधवीरान् युद्धविशारदान् मया हतांस्त्वं जहि मारय। स्वहतत्वोक्त्याइषुभिः कथं पूजार्हान् प्रति योत्स्यामि [2।4] इति यत् पूर्वमुक्तं स दोषोऽत्रानुकूल्यकरणेन निवारितः। यत एते मया हता अतो निश्शङ्कं युद्ध्यस्वः रणे सपत्नान् शत्रून् जेतासि जेष्यसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.34।। न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः इत्यादिर्या शङ्का सापि न कार्येत्याह -- द्रोणं चोति। येभ्यस्त्वं शङ्कसे तान्द्रोणादीन्मयैव हतांस्त्वं जहि घातय। मा व्यथिष्ठाः शोकं मा कार्षीः। सपत्नान् शत्रूत्रणे युद्धे निश्चितं जेतासि जेष्यसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.34।।पूर्वशङ्काऽधुना न कार्येत्याह -- द्रोणमिति। येभ्यस्त्वं पूर्वमशङ्किथास्तानेतान् मया हतप्रायान्कालदृष्ट्या प्रारब्धकर्मणा जीवितशेषान् जहि। एवं रणे सपत्नान् जेष्यसि। ततो युद्धधर्मं कुरु।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.34।।द्रोण आदि जिनजिन शूरवीरोंसे अर्जुनको आशङ्का थी ( जिनके कारण पराजय होनेका डर था ) उनउनका नाम लेकर भगवान् कहते हैं कि तू मुझसे मारे हुओंको मार इत्यादि। उनमेंसे द्रोण और भीष्मसे भय होनेका कारण प्रसिद्ध ही है क्योंकि द्रोण तो धनुर्वेदके आचार्य दिव्य अस्त्रोंसे युक्त और विशेषरूपसे अपने सर्वोत्तम गुरु हैं तथा भीष्म सबसे बड़े स्वेच्छामृत्यु और दिव्य अस्त्रोंसे सम्पन्न हैं जो कि परशुरामजीके साथ द्वन्द्व युद्ध करनेपर भी उनसे पराजित नहीं हुए। वैसा ही जयद्रथ भी है जिसका पिता इस उद्देश्यसे तप कर रहा है कि जो कोई मेरे पुत्रका शिर भूमिपर गिरावेगा? उसका भी शिर गिर जायगा। कर्ण भी ( बड़ा शूरवीर है ) क्योंकि वह इन्द्रद्वारा दी हुई अमोघ शक्ितसे युक्त है और कन्यासे जन्मा हुआ सूर्यका पुत्र है? इसलिये उसके नामका भी निर्देश किया गया है। ( अभिप्राय यह कि द्रोण? भीष्म? जयद्रथ और कर्ण? तथा अन्यान्य शूरवीर योद्धा ) जो कि मेरेद्वारा मारे हुए,हैं? उनको तू निमित्तमात्रसे मार? उनसे भय मत कर। युद्ध कर? तू संग्राममें दुर्योधनादि शत्रुओंको जीतेगा।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.34।। व्याख्या -- द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् मया हतांस्त्वं जहि -- तुम्हारी दृष्टिमें गुरु द्रोणाचार्य? पितामह भीष्म? जयद्रथ और कर्ण तथा अन्य जितने प्रतिपक्षके नामी शूरवीर हैं? जिनपर विजय करना बड़ा कठिन काम है (टिप्पणी प0 597)? उन सबकी आयु समाप्त हो चुकी है अर्थात् वे सब कालरूप मेरे द्वारा मारे जा चुके हैं। इसलिये हे अर्जुन मेरे द्वारा मारे हुए शूरवीरोंको तुम मार दो। भगवान्के द्वारा पूर्वश्लोकमें मयैवैते निहताः पूर्वमेव और यहाँ मया हतांस्त्वं जहि कहनेका तात्पर्य यह है कि तुम इनपर विजय करो? पर विजयका अभिमान मत करो क्योंकि ये सबकेसब मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं।मा व्यथिष्ठा युध्यस्व -- अर्जुन पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्यको मारनेमें पाप समझते थे? यही अर्जुनके मनमें व्यथा थी। अतः भगवान् कह रहे हैं कि वह व्यथा भी तुम मत करो अर्थात् भीष्म और द्रोण आदिको मारनेसे हिंसा आदि दोषोंका विचार करनेकी तुम्हें किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। तुम अपने क्षात्रधर्मका अनुष्ठान करो अर्थात् युद्ध करो। इसका त्याग मत करो।जेतासि रणे सपत्नान् -- इस युद्धमें तुम वैरियोंको जीतोगे। ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि पहले (गीता 2। 6 में) अर्जुनने कहा था कि हम उनको जीतेंगे या वे हमें जीतेंगे -- इसका हमें पता नहीं। इस प्रकार अर्जुनके मनमें सन्देह था। यहाँ ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें भगवान्ने अर्जुनको विश्वरूप देखनेकी आज्ञा दी? तो उसमें भगवान्ने कहा कि तुम और भी जो कुछ देखना चाहो? वह देख लो (11। 7) अर्थात् किसकी जय होगी और किसकी पराजय होगी -- यह भी तुम देख लो। फिर भगवान्ने विराट्रूपके अन्तर्गत भीष्म? द्रोण और कर्णके नाशकी बात दिखा दी और इस श्लोकमें वह बात स्पष्टरूपसे कह दी कि युद्धमें निःसन्देह तुम्हारी विजय होगी।विशेष बातसाधकको अपने साधनमें बाधकरूपसे नाशवान् पदार्थोंका? व्यक्तियोंका जो आकर्षण दीखता है? उससे वह घबरा जाता है कि मेरा उद्योग कुछ भी काम नहीं कर रहा है अतः यह आकर्षण कैसे मिटे भगवान्,मयैवैते निहताः पूर्वमेव और मया हतांस्त्वं जहि पदोंसे ढाढ़स बँधाते हुए मानो यह आश्वासन देते हैं कि तुम्हारेको अपने साधनमें जो वस्तुओँ आदिका आकर्षण दिखायी देता है और वृत्तियाँ खराब होती हुई दीखती हैं? ये सबकेसब विघ्न नाशवान् हैं और मेरे द्वारा नष्ट किये हुए हैं। इसलिये साधक इनको महत्त्व न दे।दुर्गुणदुराचार दूर नहीं हो रहे हैं? क्या करूँ -- ऐसी चिन्ता होनेमें तो साधकका अभिमान ही कारण है और ये दूर होने चाहिये और जल्दी होने चाहिये -- इसमें भगवान्के विश्वासकी? भरोसेकी? आश्रयकी कमी है। दुर्गुणदुराचार अच्छे नहीं लगते? सुहाते नहीं? इसमें दोष नहीं है। दोष है चिन्ता करनेमें। इसलिये साधकको कभी चिन्ता नहीं करनी चाहिये।मेरे द्वारा मारे हुएको तू मार -- इस कथनसे यह शङ्का होती है कि कालरूप भगवान्के द्वारा सबकेसब मारे हुए हैं तो संसारमें कोई किसीको मारता है तो वह भगवान्के द्वारा मारे हुएको ही मारता है। अतः मारनेवालेको पाप नहीं लगना चाहिये। इसका समाधान यह है कि किसीको मारनेका या दुःख देनेका अधिकार मनुष्यको नहीं है। उसका तो सबकी सेवा करनेका? सबको सुख पहुँचानेका ही अधिकार है। अगर मारनेका अधिकार मनुष्यको होता तो विधिनिषेध अर्थात् शुभ कर्म करो? अशुभ कर्म मत करो -- ऐसा शास्त्रोंका? गुरुजनों और सन्तोंका कहना ही व्यर्थ हो जायगा। वह विधिनिषेध किसपर लागू होगा अतः मनुष्य किसीको मारता है या दुःख देता है तो उसको पाप लगेगा ही क्योंकि यह उसकी रागद्वेषपूर्वक अनधिकार चेष्टा है। परन्तु क्षत्रियके लिये शास्त्रविहित युद्ध प्राप्त हो जाय? तो स्वार्थ और अहंकारका त्याग करके कर्तव्यपालन करनेसे पाप नहीं लगता? क्योंकि यह क्षत्रियका स्वधर्म है। सम्बन्ध -- विराट्रूप भगवान्के अत्यन्त उग्ररूपको देखकर अर्जुनने इकतीसवें श्लोकमें पूछा कि आप कौन हैं और यहाँ क्या करने आये हैं बत्तीसवें श्लोकमें भगवान्ने उसका उत्तर दिया कि मैं बढ़ा हुआ काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। फिर तैंतीसवेंचौंतीसवें श्लोकोंमें भगवान्ने अर्जुनको आश्वासन दिया कि मेरे द्वारा मारे हुएको ही तू मार दे? तेरी जीत होगी। इसके बाद अर्जुनने क्या किया -- इसको सञ्जय आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.33 -- 11.34।।तस्मादिति। द्रोणमिति। तदत्र भगवता (S तदनु भवता ? N तदत्रभवता) उत्तरं जगतो विद्याविद्यात्मनः शुद्धाशुद्धमिश्रसंविद्बलग्रासीकारात् अभिधीयते इति प्रायशः सूत्रितमत्राध्याये रहस्यम्। उट्टङ्कितमात्र (N -- मात्रं) -- संवित्तिसमर्थेभ्योऽस्तु कियत्पङ्क्ितलेखनायासदौःस्थित्यमालम्भेमहि (K आलम्भेमहि)।अत्र च यदुक्तं मया हतेषु त्वं निमित्तं यशस्वी भव इति भगवता तत् प्रत्युक्तं यदुक्तं प्रागर्जुनेन नैतद्विद्मः,(?N नचैतद्विद्मः) कतरन्नो वरीयः इत्यादि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.34।।मयैवेत्यादिनोक्तं प्रपञ्चयति -- द्रोणं चेति। किमिति कतिचिदेवात्र द्रोणादयो गण्यन्ते तत्राह -- येष्विति। द्रोणादिषु कुतः शङ्केत्याशङ्क्य द्वयोः शङ्कानिमित्तमाह -- तत्रेत्यादिना। जयद्रथेऽपि,शङ्कानिमित्तमाह -- तथेति। दिव्यास्त्रसंपन्न इति संबन्धः। तत्र शङ्कायां कारणान्तरमाह -- यस्येति। कर्णेऽपि तत्कारणत्वं कथयति -- कर्णोऽपीति। पूर्ववदेव संबन्धः। हेत्वन्तरमाह -- वासवेति। सा खल्वमोघा पुरुषमेकमत्यन्तसमर्थं घातयित्वैव निवर्तते। जन्मनापि तस्य शङ्कनीयत्वमाह -- सूर्येति। कुन्ती हि कन्यावस्थायांमन्त्रप्रभावं ज्ञातुमादित्यमाजुहाव ततस्तस्यामेवावस्थायामयमुद्बभूव तदाह -- कानीन इति। एतदेवाभिप्रेत्य कर्णग्रहणमित्याह -- यत इति। उक्तेष्वन्येषु च न त्वया शङ्कितव्यमित्याह -- मयेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.34।।यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः [2।6] इत्यस्य सन्देहेऽपि प्रवृत्तिर्युक्ता? पक्षद्वयेऽपि फललाभादितिहतो वा [2।37] इत्युत्तरमुक्तम्? इदानीं तव पराजयशङ्काऽपि नास्तीत्युच्यते -- द्रोणं चेति। तत्र द्रोणस्य धनुर्विद्याचार्यत्वेन? भीष्मस्य स्वच्छन्दमृत्युत्वेन चाशङ्काविषयत्वाद्युक्तं योधवीरसमुदायात् पृथक्कृत्य स्वशब्देन ग्रहणम्। जयद्रथस्य कर्णस्य च कुतः इत्यत आह -- योऽस्येति। अस्य जयद्रथस्य। तच्छिरस्तस्य पातयितुः शिरः। भेत्स्यति भेत्स्यते। तत्पितुर्जयद्रथपितुः। शक्तिरस्ति कर्णस्येति शेषः। कर्णो विशेषेणोक्त इति वर्तते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.34।।योऽस्य शिरश्छिन्नं भूमौ पातयति तच्छिरो भेत्स्यतीति तत्पितुर्वराज्जयद्रथोऽपि विशेषेणोक्तः।प्रवरा वासवी शक्तिः इति कर्णः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.34।। --,द्रोणं च? येषु येषु योधेषु अर्जुनस्य आशङ्का तांस्तान् व्यपदिशति भगवान्? मया हतानिति। तत्र द्रोणभीष्मयोः तावत् प्रसिद्धम् आशङ्काकारणम्। द्रोणस्तु धनुर्वेदाचार्यः दिव्यास्त्रसंपन्नः? आत्मनश्च विशेषतः गुरुः गरिष्ठः। भीष्मश्च स्वच्छन्दमृत्युः दिव्यास्त्रसंपन्नश्च परशुरामेण द्वन्द्वयुद्धम् अगमत्? न च पराजितः। तथा जयद्रथः? यस्य पिता तपः चरति मम पुत्रस्य शिरः भूमौ निपातयिष्यति यः? तस्यापि शिरः पतिष्यति इति। कर्णोऽपि वासवदत्तया शक्त्या त्वमोघया संपन्नः सूर्यपुत्रः कानीनः यतः? अतः तन्नाम्नैव निर्देशः। मया हतान् त्वं जहि निमित्तमात्रेण। मा व्यथिष्ठाः तेभ्यः भयं मा कार्षीः। युध्यस्व जेतासि दुर्योधनप्रभृतीन् रणे युद्धे सपत्नान् शत्रून्।।संजय उवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.35 】
▸ Sanskrit Sloka: सञ्जय उवाच | एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमान: किरीटी | नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीत: प्रणम्य ||
▸ Transliteration: sañjaya uvāca etacchrutvā vacanaṁ keśavasya kṛtāñjalirvepamānaḥ kirīṭī | namaskṛtvā bhūya evāha kṛṣṇaṁ sagadgadaṁ bhītabhītah praṇamya ||
▸ Glossary: sañjaya uvāca: Sañjaya said; etat: thus; śrutvā: hearing; vacanaṁ: speech; keśavasya: of Kṛṣṇa; kṛtāñjaliḥ: with folded hands; vepamānaḥ: trembling; kirīṭī: Arjuna; namaskṛtvā: offering obeisances; bhūya: again; eva: also; āha kṛṣṇaṁ: says unto Kṛṣṇa; sagadgadaṁ: faltering; bhītabhītaḥ: fearful; praṇamya: offering obeisances
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.35 Sañjaya said: Having heard this speech of Keśava, the crowned Arjuna with joined palms, trembling, prostrating himself, again addressed Kṛṣṇa, voice choking, bowing down, overwhelmed with fear.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.35।।सञ्जय बोले -- भगवान् केशवका यह वचन सुनकर भयसे कम्पित हुए किरीटी अर्जुन हाथ जोड़कर नमस्कार करके और अत्यन्त भयभीत होकर फिर प्रणाम करके सगद्गदं वाणीसे भगवान् कृष्णसे बोले।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.35।। संजय ने कहा -- केशव भगवान् के इस वचन को सुनकर मुकुटधारी अर्जुन हाथ जोड़े हुए? कांपता हुआ नमस्कार करके पुन भयभीत हुआ श्रीकृष्ण के प्रति गद्गद् वाणी से बोला।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.35 एतत् that? श्रुत्वा having heard? वचनम् speech? केशवस्य of Kesava? कृताञ्जलिः with joined palms? वेपमानः trembling? किरीटि Arjuna? नमस्कृत्वा prostrating (himself)? भूयः again? एव even? आह addressed? कृष्णम् to Krishna? सगद्गदम् in a choked
Chapter 11 (Part 12)
voice? भीतभीतः overwhelmed with fear? प्रणम्य having prostrated.Commentary When anyone is in a state of extreme terror or joy he sheds tears on account of pain or exhilaration of spirits. Then his throat is choked and he stammers or speaks indistinctly or in a dull? choked voice. Arjuna was extremely frightened when he saw the Cosmic Form and so he spoke in a stammering tone.There is great significane in Sanjayas words. He thought that Dhritarashtra might come to terms or make peace with the Pandavas when he knew that his sons would certainly be killed for want of proper support when Drona and Karna would be killed by Arjuna. He hoped that conseently there would be peace and happiness to both the parties. But Dhritarashtra was obstinate he did not listen to this suggestion on account of the force of destiny.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.35. Sanjaya said On hearing this speach of Kesava, the crowned-prince (Arjuna) had his palms folded; and trembling he protstrated himself to Krsna; and stammering, and being very much afraid and bowing down, he spoke to Him again.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.35 Sanjaya continued: "Having heard these words from the Lord Shri Krishna, the Prince Arjuna, with folded hands trembling, prostrated himself and with choking voice, bowing down again and again, and overwhelmed with awe, once more addressed the Lord.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.35 Sanjaya said Having heard this speech of Krsna, Arjuna did Him obeisance; and trembling with awe, he bowed down again, and with folded palms, and trembling, he spoke to Krsna in a choked voice.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.35 Sanjaya said Hearing this utterance of Kesava, Kiriti (Arjuna), with joined palms and trembling, protrating himself, said again to Krsna with a faltering voice, bowing down overcome by fits of fear:
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.35 Sanjaya said Having heard that speech of Lord Krishna, Arjuna, with joined palms, trembling, prostrating himself, again addressed Krishna, in a choked voice, bowing down, overwhelmed with fear.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.35 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.35 Sanjaya said Having heard the speech of Krsna, ocean of affection for the seekers of refuge in Him, Arjuna did obeisance to Him. Trembling with fear, he bowed again and again before Him. With folded palms, and trembling, Arjuna spoke in a choked voice with emotion.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.35 Srutva, hearing; etat, this, aforesaid; vacanam, utterance; kesavasya, of Kesava; Kiriti, krtanjalih, with joined palms; and vepamanah, trembling; nama-skrtva, prostrating himself; aha, said; bhuyah eva, again; krsnam, to Krsna; sa-gadgadam, with a faltering voice-. A person's throat becomes choked with phlegm and his eyes full of tears when, on being struck with fear, he is overcome by sorrow, and when, on being overwhelmed with affection, he is filled with joy. The indistinctness and feleness of sound in speech that follows as a result is what is called faltering (gadgada). A speech that is accompanied with (saha) this is sa-gadgadam. It is used adverbially to the act of utterance. Pranamya, bowing down with humility; bhita-bhitah, overcome by fits of fear, with his mind struck again and again with fear-this is to be connected with the remote word aha (said). At this juncture the words of Sanjaya have a purpose in view. How? It is thus: Thinking that the helpless Duryodhana will be as good as dead when the four unconerable ones, viz Drona and others, are killed, Dhrtarastra, losing hope of victory, would conclude a treaty. From that will follow peace on either side. Under the influence of fate, Dhrtarastra did not even listen to that!
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.35।। नाटककार के रूप में व्यासजी अपनी सहज स्वाभाविक कलाकुशलता से दृश्य को युद्धभूमि से शान्त और मौन राजप्रासाद में ले जाते हैं? जहाँ संजय अन्ध धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वृतान्त सुना रहा था। इसी अध्याय में तीन बार पाठक को कुरुक्षेत्र के भयोत्पादक वातावरण से दूर ले जाकर? व्यासजी न केवल इन दृश्यों की प्रभावी गति को बढ़ाते हैं? वरन् पाठकों के मन को आवश्यक विश्राम भी देते हैं? जो निरन्तर भयंकर सौन्दर्य के सूक्ष्म विषय में तनाव अनुभव करने लगता है।यह कदापि नहीं भूलना चाहिए कि गीता में संजय हमारा विशेष संवाददाता है जिसे पाण्डवों के न्यायपक्ष से पूर्ण सहानुभूति है। स्वाभाविक ही है कि जैसे ही वह भगवान् के शब्दों द्वारा भीष्म द्रोणादि के नाश का वृतान्त सुनाता है? वैसे ही वह उस अन्ध? वृद्ध व्यक्ति को आसन्न घोर विध्वंस के प्रति जागरूक कराना चाहता है। जैसा कि हम पहले भी देख चुके हैं कि केवल धृतराष्ट्र ही इस समय भी युद्ध को रोक सकता था? और संजय यह देखने को अत्यन्त उत्सुक है कि किसी प्रकार यह युद्ध रुक जाये। इस प्रकार? इस श्लोक में प्रयुक्त भाषा से ही संजय का मन्तव्य स्पष्ट हो जाता है।अकस्मात् यहाँ संजय अर्जुन को किरीटी अर्थात् मुकुटधारी कहता है। सम्भवत यह एक साहसपूर्ण भविष्यवाणी है? जिसके द्वारा संजय यह अपेक्षा करता है कि धृतराष्ट्र इस विनाशकारी युद्ध की निरर्थकता देखे। परन्तु एक अन्ध पुरुष कदापि देख नहीं सकता? और यदि उसकी बुद्धि पर भी मोह का आवरण पड़ा हो? तो देखने का प्रश्न ही नहीं उठता है।अत्यधिक पुत्रासक्ति के कारण यदि राजा धृतराष्ट्र की सद्बुद्धि को नहीं जगाया जा सकता है? तो संजय एक मनोवैज्ञानिक उपचार का प्रयोग करके देखना चाहता है। यदि इस बात का विस्तृत वर्णन किया जाये कि किसी दृश्य को देखकर सब लोग किस प्रकार भय से कांप रहे हैं? तो निश्चित ही सामान्यत साहसी पुरुषों के मन में भी आतंक फैल जाता है। यदि कृष्ण का घनिष्ठ मित्र अर्जुन भी भय़ से कांपता हुआ गद्गद् वाणी में भगवान् से कहता है? तो इस वर्णन से संजय यह अपेक्षा करता है कि कोई भी विवेकी पुरुष आसन्न युद्ध की भयानकता को तथा पराजित पक्ष के लोगों को प्राप्त होने वाले भयंकर परिणामों को भी पहचान सकेगा। परन्तु संजय के इन शब्दों का भी धृतराष्ट्र के मन पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा? जो अपने पुत्रों के प्रति मूढ़ प्रेम के अतिरिक्त अन्य सब के प्रति पूर्ण अन्ध हो गया था।अर्जुन विश्वरूप भगवान् को सम्बोधित करके कहता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.35।।भीष्मस्य पतनमुक्तमेव द्रोणादीनामपि ईश्वरेण निहतानां पतनं भविष्यत्येवेति श्रुत्वा द्रोणादिषु जयाशाविषयभूतेषु चतुर्षु अजेयेध्वपि अर्जुनेन निहतेषु दुर्योधनो निहत एवेति मत्वा धृतराष्ट्रः जयंप्रति निराशः सन् संधि करिष्यति ततः शान्तिरुभयेषां भविष्यतीत्याशयेन संजय उवाच -- एतदिति। एतत्पूर्वोक्तं केशवस्य वचनं श्रुत्वा वेपमानः कम्पमानः किरीटी अर्जुनः कृताञ्जलिः सन् नमस्कृत्वा भयाविष्टस्य दुःखेनाभिघातात्स्नेहा विष्टस्य हर्षोद्भवात् अश्रुपूर्णनेत्रत्वे सति श्लेष्मणा कण्ठावरोधात् गद्गदया मन्दया वाचा सह वर्तते इत सगद्गदं यथा स्यात्तथा भूय एव कृष्णमाह उक्तवान्। भीतभीतः पुनः पुनर्भयाविष्टचित्तः प्रणभ्य नम्रीभूयाहेति संबन्धः। यत्तु अत्राहेति पदच्छेदे पुनरर्जुन उवाचेति पुनरुक्तं स्यात् अतः प्रणम्यार्जुन उवाचेत्येव संबन्धः नतु प्रणम्याहेतु। का तर्हि आहेति क्रियायाः गतिः। नेयं क्रिया अहेति प्रसिद्य्धर्थमव्ययमित्यदोषः इत तत्प्रामादिकम्।ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनंजयः। प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत। अर्जुनउवाच इत्यादौ एवमेव शैलीदर्शनेन पुनरुक्त्यापादनस्य तत्समाधानस्य चाकिंचित्कत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.35।।द्रोणभीष्मजयद्रथकर्णेषु जयाशाविषयेषु हतेषु निराश्रयो दुर्योधनो हत एवेत्यनुसंधाय जयाशां परित्यज्य यदि धृतराष्ट्रः संधिं कुर्यात्तदा शान्तिरुभयेषां भवेदित्यभिप्रायवान् ततः किं वृत्तमित्यपेक्षायां संजय,उवाच -- एतदिति। एतत्पूर्वोक्तं केशवस्य वचनं श्रुत्वा कृताञ्जलिः किरीटी इन्द्रदत्तकिरीटः परमवीरत्वेन प्रसिद्धः वेपमानः परमाश्चर्यदर्शनजनितेन संभ्रमेण कम्पमानोऽर्जुनः कृष्णं भक्ताघकर्षणं भगवन्तं नमस्कृत्य भूयः पुनरप्याह उक्तवान्। सगद्गदं भयेन हर्षेण चाश्रुपूर्णनेत्रत्वे सति कफरुद्धकण्ठतया यो वाचो मन्दत्वसकम्पत्वादिर्विकारः सगद्गदस्तद्युक्तं यथा स्यात्। भीतभीतः अतिशयेन भीतः सन् पूर्वं नमस्कृत्य पुनरपि प्रणम्यात्यन्तनम्रो भूत्वाहेति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.35।।भगवतैवमुक्ते सति पश्चात्किंवृत्तमित्यपेक्षायां संजय उवाच। अत्र कृताञ्जलित्वादिना चिह्नेन भगवद्वाक्योल्लङ्घनं किरीटी न करिष्यतीति सूच्यते। सगद्गदं भयहर्षाद्यावेशेन गद्गदेन कण्ठकम्पनेन सह वर्तत इति सगद्गदं यथा भवति तथा आह उक्तवान्। भीतभीतोऽत्यन्तं भीतः सन्नाहेति संबन्धः। अत्राहेति पदच्छेदे पुनरर्जुन उवाचेति पुनरुक्तं स्यात्। अतः प्रणम्य अर्जुन उवाचेत्येव संबन्धो नतु प्रणम्य आहेति। का तर्हि आहेति क्रियाया गतिः। नेयं क्रिया किंतु अहेति प्रसिद्ध्यर्थमव्ययमित्यदोषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.35।।ततोऽर्जुनः किं कृतवान् इत्याकाङ्क्षायां सञ्जयो धृतराष्ट्रं प्रत्याह -- एतदिति। एतत् पूर्वोक्तं केशवस्य ब्रह्मशिवयोरपि मोक्षदातुः वचनं श्रुत्वा किरीटी अर्जुनः वेपमानः भगवता राजभोगे विनियुक्तस्तदयुक्तं मन्वानो मोक्षाभिलाषवत्त्वात् कम्पमानो जातः। ततो विज्ञापनार्थं कृताञ्जलिः भीतभीत इति भगवदाज्ञायां पुनर्विज्ञापने कदाचिदप्रसन्नो भवेदिति महाभीतः सन् प्रणम्य प्रकर्षेण मनसा नमस्कृत्य कृष्णं सदानन्दं सगद्गदं प्रेमोपरुद्धकण्ठं यथा तथा भूयः पुनः नमस्कृत्यैव अतीव दीनो भूत्वा आह विज्ञप्तिं कृतवानित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.35।। ततो यद्वृत्तं तद्धृतराष्ट्रं प्रति संजय उवाच -- एतदिति। एतत्पूर्वश्लोकत्रयात्मकं केशवस्य वचनं श्रुत्वा वेपमानः कम्पमानः किरीट्यर्जुनः कृताञ्जलिः संपुटीकृतहस्तः कुष्णं नमस्कृत्य पुनरप्याह उक्तवान्। कथमाह भयहर्षाद्यावेशवशाद्गद्गदेन कण्ठकम्पनेन सह वर्तत इति सगद्गदं यथा भवति तथा। किंच भीतादपि भीतः सन्प्रणम्यावनतो भूत्वा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.35।।ततो यत् जातं तदवसन्नाय धृतराष्ट्राय सञ्जय उवाच -- एतदिति। श्रुत्वा अर्जुन उवाचेति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.35।।संजय बोला -- केशवके इनउपर्युक्त वचनोंको सुनकर अर्जुन काँपता हुआ हाथ जोड़कर नमस्कार करके फिर श्रीकृष्णसे इस प्रकार गद्गद वाणीसे बोला। जब दुःख प्राप्त होनेके कारण भयभीत पुरुषके और हर्षोत्पत्तिके कारण स्नेहयुक्त पुरुषके नेत्र आँसुओंसे परिपूर्ण हो जाते हैं और कण्ठ कफसे रुक जाता है? उस समय जो वाणीमें अपटुता और शब्दमें मन्दता हो जाती है? उसका नाम गद्गद है? जो उससे युक्थ थे ऐसे सगद्गद वचन बोला। यहाँ सगद्गद शब्द बोलनारूप क्रियाका विशेषण है। इस प्रकार भयभीतभयसे बारंबार विह्वलचित्त हुआ प्रणाम करके अत्यन्त नम्र होकर बोला। यहाँपर संजयके वचन इस गूढ़ अभिप्रायसे भरे हुए हैं कि द्रोणादि चार अजेय शूरवीरोंका अर्जुनके द्वारा नाश हो जानेपर आश्रयरहित दुर्योधन तो मरा हुआ ही है? ऐसा मानकर विजयसे निराश हुआ धृतराष्ट्र सन्धि कर लेगा और उससे दोनों पक्षवालोंकी शान्ति हो जायगी। परंतु भावीके वशमें होकर धृतराष्ट्रने ऐसे वचन भी नहीं सुने।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.35।। व्याख्या -- एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी -- अर्जुन तो पहलेसे भयभीत थे ही? फिर भगवान्ने मैं काल हूँ? सबको खा जाऊँगा -- ऐसा कहकर मानो डरे हुएको और डरा दिया। तात्पर्य है कि कालोऽस्मि -- यहाँसे लेकर मया हतांस्त्वं जहि -- यहाँतक भगवान्ने नाशहीनाशकी बात बतायी। इसे सुनकर अर्जुन डरके मारे काँपने लगे और हाथ जोड़कर बारबार नमस्कार करने लगे।अर्जुनने इन्द्रकी सहायताके लिये जब काल? खञ्ज आदि राक्षसोंको मारा था? तब इन्द्रने प्रसन्न होकर अर्जुनको सूर्यके समान प्रकाशवाला एक दिव्य किरीट (मुकुट) दिया था। इसीसे अर्जुनका नाम किरीटी पड़ गया (टिप्पणी प0 598)। यहाँ किरीटी कहनेका तात्पर्य है कि जिन्होंने बड़ेबड़े राक्षसोंको मारकर इन्द्रकी सहायता की थी? वे अर्जुन भी भगवान्के विराट्रूपको देखकर कम्पित हो रहे हैं।नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं गद्गद भीतभीतः प्रणम्य -- काल सबका भक्षण करता है किसीको भी छोड़ता नहीं। कारण कि यह भगवान्की संहारशक्ति है? जो हरदम संहार करती ही रहती है। इधर अर्जुनने जब भगवान्के अत्युग्र विराट्रूपको देखा तो उनको लगा कि भगवान् कालके भी काल -- महाकाल हैं। उनके सिवाय दूसरा कोई भी कालसे बचानेवाला नहीं है। इसलिये अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बारबार प्रणाम करते हैं।भूयः कहनेका तात्पर्य है कि पहले पंद्रहवेंसे इकतीसवें श्लोकतक अर्जुनने भगवान्की स्तुति और नमस्कार किया? अब फिर भगवान्की स्तुति और नमस्कार करते हैं।हर्षसे भी वाणी गद्गद होती है और भयसे भी। यहाँ भयका विषय है। अगर अर्जुन बहुत ज्यादा भयभीत होते तो वे बोल ही न सकते। परन्तु अर्जुन गद्गद वाणीसे बोलते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वे इतने भयभीत नहीं हैं। सम्बन्ध -- अब आगेके श्लोकसे अर्जुन भगवान्की स्तुति करना आरम्भ करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.35।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.35।।पराजयभयात्करिष्यति सन्धिमिति बुद्ध्या संजयो राज्ञे वृत्तान्तमुक्तवानित्याह -- संजय इति। पूर्वोक्तवचनं कालोऽस्मीत्यादि। विश्वरूपदर्शनदशायामर्जुनस्य भगवता संवादवचनं किमिति संजयो राज्ञे व्यजिज्ञपदित्याशङ्क्य तदुक्तेस्तात्पर्यमाह -- अत्रेति। तमेवाभिप्रायं प्रश्नद्वारा विशदयति -- कथमित्यादिना। तर्हि संजयवचनं श्रुत्वा किमिति राजा संधिं न कारयामासेति तत्राह -- तदपीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.35।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.35।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.35।। --,एतत् श्रुत्वा वचनं केशवस्य पूर्वोक्तं कृताञ्जलिः सन् वेपमानः कम्पमानः किरीटी नमस्कृत्वा? भूयः पुनः एव आह उक्तवान् कृष्णं सगद्गदं भयाविष्टस्य दुःखाभिघातात् स्नेहाविष्टस्य च हर्षोद्भवात्? अश्रुपूर्णनेत्रत्वे सति श्लेष्मणा कण्ठावरोधः ततश्च वाचः अपाटवं मन्दशब्दत्वं यत् स गद्गदः तेन सह वर्तत इति सगद्गदं वचनम् आह इति वचनक्रियाविशेषणम् एतत्। भीतभीतः पुनः पुनः भयाविष्टचेताः सन् प्रणम्य प्रह्वः भूत्वा? आह इति व्यवहितेन संबन्धः।।अत्र अवसरे संजयवचनं साभिप्रायम्। कथम् द्रोणादिषु अर्जुनेन निहतेषु अजेयेषु चतुर्षु? निराश्रयः दुर्योधनः निहतः एव इति मत्वा धृतराष्ट्रः जयं प्रति निराशः सन् संधिं करिष्यति? ततः शान्तिः उभयेषां भविष्यति इति। तदपि न अश्रौषीत् धृतराष्ट्रः भवितव्यवशात्।।अर्जुन उवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.36 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च | रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घा: ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca sthāne hṛṣīkeśa tava prakīrtyā jagat prahṛṣy atyanurajyate ca | rakṣāṁsi bhītāni diśo dravanti sarve namasyanti ca siddhasaṅghāḥ ||
▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna says; sthāne: rightly; hṛṣīkeśa: O master of all senses; tava: Your; prakīrtyā: glories; jagat: the entire world; prahṛṣyati : rejoicing; anurajyate: becoming attached; ca: and; rakṣāṁsi: the demons; bhītāni: out of fear; diśaḥ: directions; dravanti: fleeing; sarve: all; namasyanti: offering respect; ca: also; siddhasaṅghāḥ: the perfect human beings
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.36 Arjuna says: O Hṛṣīkeśā, it is but right that the world delights and rejoices in Your praise. Rākṣasas fly in fear in all directions and all hosts of sages bow to You.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.36।।अर्जुन बोले -- हे अन्तर्यामी भगवन् आपके नाम? गुण? लीलाका कीर्तन करनेसे यह सम्पूर्ण जगत् हर्षित हो रहा है और अनुराग(प्रेम) को प्राप्त हो रहा है। आपके नाम? गुण आदिके कीर्तनसे भयभीत होकर राक्षसलोग दसों दिशाओंमें भागते हुए जा रहे हैं और सम्पूर्ण सिद्धगण आपको नमस्कार कर रहे हैं। यह सब होना उचित ही है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.36।। अर्जुन ने कहा -- यह योग्य ही है कि आपके कीर्तन से जगत् अति हर्षित होता है और अनुराग को भी प्राप्त होता है। भयभीत राक्षस लोग समस्त दिशाओं में भागते हैं और समस्त सिद्धगणों के समुदाय आपको नमस्कार करते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.36 स्थाने it is meet? हृषीकेश O Krishna? तव Thy? प्रकीर्त्या by praise? जगत् the world? प्रहृष्यति is delighted? अनुरज्यते rejoices? च and? रक्षांसि the demons? भीतानि in fear? दिशः to all arters? द्रवन्ति fly? सर्वे all? नमस्यन्ति bow (to Thee)? च and? सिद्धसङ्घाः the hosts of the perfected ones.Commentary Praise description of the glory of the Lord. The Lord is the object worthy of adortion? love and delight? because He is the Self and friend of all beings.The Lord is the object of adoration? love and delight for the following reason also. He is the primal cause even of Brahma? the Creator of the universe.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.36. Arjuna said O Lord of sense-organs (Krsna) ! It is appropriate that the universe rejoices and feels exceedingly delighted by the high glory of yours; that in fear the demons fly on all directions; and that the hosts of the perfected ones bow down [to You].
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.36 Arjuna said: My Lord! It is natural that the world revels and rejoices when it sings the praises of Thy glory; the demons fly in fear and the saints offer Thee their salutations.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.36 Arjuna said Rightly it is, O Krsna, that Your praise should move the world to joy and love. The Raksasas flee in fear on all sides, and all the hosts of Siddhas bow down to You.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.36 Arjuna said It is proper, O Hrsikesa, that the world becomes delighted and attracted by Your praise; that the Raksasas, stricken with fear, run in all directions; and that all the groups of the Siddhas bow down (toYou).
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.36 Arjuna said It is meet, O Krishna, that the world delights and rejoices in Thy praise; demons fly in fear to all arters and the hosts of the perfected ones bow to Thee.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.36 Sthane etc. By high glory : by highly singing the glory.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.36 Arjuna said: 'Sthane' means rightly or it is but proper. It is but proper that the whole world of gods, Gandharvas, Siddhas, Yaksas, Kinnaras, Kimpurusas, etc., who have foregathered with a desire to see the battle, should be delighted with You and love You after beholding You by Your grace.
You are the Lord of all. Rightly after beholding You, the Raksasas flee in fear on all sides, and rightly all the host of Siddhas, namely, the host of Siddhas who are favourable to You, pay their homage to You. The connection with what was said earlier is that all this is as it ought to be.
He further proceeds to explain how all this is right:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.36 Sthane, it is proper; -what is that?-that the jagat, world; prahrsyati, becomes delighted; tava prakirtya, by Your praise, by reciting Your greatness and hearing it. This is befitting. This is the idea. Or, the word sthane may be taken as alifying the word 'subject' (understood) : It is proper that the Lord is the subject of joy etc. since the Lord is the Self of all beings and the Friend of all. So also it (the world) anurajyate, becomes attracted, becomes drawn (by that praise). That also is with regard to a proper subject. This is how it is to be explained. Further, that the raksamsi, Raksasas; bhitani, stricken with fear; dravanti, run; disah, in all directions-that also is with regard to a proper subject. And that sarve, all; the siddha-sanghah, groups of the Siddhas-Kapila and others; namasyanti, bow down-that also is befitting. He points out the reason for the Lord's being the object of delight etc.:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.36।। कविता के भावव्यंजय आकर्षण के द्वारा? एक बार पुन? हमें सम्पत्ति और वैभव से सम्पन्न सुखद राजप्रासाद से उठाकर युद्धभूमि के कोलाहल और आश्चर्यमय विराटरूप की ओर ले जाया जाता है। दृश्य यह है कि अर्जुन दोनों हाथ जोड़े हुए? भयकम्पित और विस्मय से अवरुद्ध कण्ठ से भगवान् की स्तुति कर रहा है। यह चित्र अर्जुन की मनस्थिति का स्पष्ट परिचायक है। ग्यारह श्लोकों के स्तुतिगान का यह खण्ड हिन्दू धर्म में उपलब्ध सर्वोत्तम प्रार्थनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। वस्तुत सामान्य लोगों को यह विदित है कि संकल्पना? सुन्दरता? लय और अर्थ की गम्भीरता की दृष्टि से इससे अधिक श्रेष्ठ किसी सार्वभौमिक प्रार्थना की कल्पना नहीं की जा सकती है।इस खण्ड में? हम देखते हैं कि अर्जुन की तत्त्वदर्शन की क्षमता शनैशनै इस विराट रूप के पीछे दिव्य अनन्त सत्य को पहचान रही है। जब कोई व्यक्ति दर्पण में अपना प्रतिबिम्ब देख रहा होता है? तब सामान्यत उसे दर्पण की सतह का भान भी नहीं होता है? परन्तु यदि वह ध्यान उस सतह पर केन्द्रित करे तो उसके लिए वह प्रतिबिम्ब प्राय लुप्तसा ही हो जाता है। यहाँ भी? अर्जुन जब तक उस विश्वरूप के प्रत्येक रूप को ही देखने में व्यस्त रहा? तब तक इस विशाल रूप के सारतत्त्व अनन्त स्वरूप को वह नहीं पहचान सका। अब इस खण्ड से यह स्पष्ट होता है कि अर्जुन ने विराट रूप के वास्तविक सत्य और अर्थ को पहचानना प्रारम्भ कर दिया था।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.36।।हे हृषीकेश? तव माहात्म्यप्रकीर्तनेन यज्जगत् प्रहर्षं प्राप्नोत्यनुरागं चोपैति तत्स्थाने युक्तमित्यर्थः। यद्वा तव प्रकीर्त्या यज्जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च तत् स्थाने हर्षादिस्थितयोग्यविषये। यतस्त्वं हृषीकेशः सर्वेन्द्रियनियन्ता सर्वान्तर्यामी सर्वसुहृदिति सूचनार्थ संबोधनम्। किंच यद्रक्षांसि भयाविष्टानि दिशो द्रवन्ति पलाय गच्छन्ति यच्च सिद्धानां कपिलादीनां समुदायाः नमस्कुर्वन्ति तच्च स्थाने इति पूर्ववत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.36।।अर्जुन उवाच एकादशभिः -- स्थाने इत्यादिना। स्थाने इत्यव्ययं युक्तमित्यर्थे। हे हृषीकेश सर्वेन्द्रियप्रवर्तक? यतस्त्वमेवमत्यन्ताद्भुतप्रभावो भक्तवत्सलश्च ततस्तव प्रकीर्त्या प्रकृष्टया कीर्त्या निरतिशयप्राशस्त्यस्य कीर्तनेन श्रवणेन च न केवलमहमेव प्रहृष्यामि किंतु सर्वमेव जगच्चेतनमात्रं रक्षोविरोधि प्रहृष्यति प्रकृष्टं हर्षमाप्नोति इति यत्तत् स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः। तथा सर्वं जगदनुरज्यते च तद्विषयमनुरागमुपैतीति च यत्तदपि युक्तमेव। तथा रक्षांसि भीतानि। भयाविष्टानि सन्ति दिशो द्रवन्ति सर्वासु दिक्षु पलायन्त इति यत्तदपि युक्तमेव। तथा सर्वे सिद्धानां कपिलादीनां सङ्घा नमस्यन्ति चेति यत्तदपि युक्तमेव। सर्वत्र तव प्रकीर्त्येत्यस्यान्वयः स्थाने इत्यस्य च। अयं श्लोको रक्षोघ्नमन्त्रत्वेन मन्त्रशास्त्रे प्रसिद्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.36।।एकादशभिः श्लोकैरर्जुन उवाच -- स्थाने इति। हे हृषीकेश सर्वेन्द्रियप्रवर्तक अन्तर्यामिन्? तव प्रकीर्त्या नामसंकीर्तनेन जगत्प्रहृष्यति यत्तत् स्थाने युक्तम्। स्थाने इत्यव्ययं युक्तमित्यर्थे। यत्तव प्रकीर्त्या जगदनुरज्यते तदपि स्थाने युक्तम्। यत्तव प्रकीर्त्या रक्षांसि भीतानि सन्ति दिशो द्रवन्ति पलायन्ते तदपि स्थाने युक्तम्। यच्च त्वां सर्वे सिद्धसङ्घाः कपिलादीनां समुदायाः नमस्यन्ति तदपि स्थाने। अयं श्लोको रक्षोघ्नमन्त्रत्वेन मन्त्रशास्त्रे प्रसिद्धः। स च नारायणाष्टाक्षरसुदर्शनास्त्रमन्त्राभ्यां संपुटितो ज्ञेय इति रहस्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.36।।किमर्जुनो विज्ञापितवान् इत्याकाङ्क्षायामर्जुनवाक्यान्याह -- अर्जुन उवाचस्थाने इत्येकादशभिः। एकादशेन्द्रियैरपि शुद्धैर्विज्ञाप्यमित्येकादशभिर्विज्ञापयति। हे हृषीकेश यतस्त्वं सर्वेन्द्रियप्रेरकस्तस्मात् स्थाने स्थितौ तव प्रकीर्त्या तव गुणसङ्कीर्तनेन जगत् प्रहृष्यति हर्षमाप्नोति। च पुनः।अन्यत् कीर्तनश्रवणेन अनुरज्यते अनुरागयुक्तं भवति ननु बाधकेषु विद्यमानेषु कीर्तनं कर्तुं कथं शक्यं इत्याशङ्क्य कीर्तनेनैव बाधनाशो भवतीत्याह -- रक्षांसीति। तव कीर्तनेनैव भीतानि सन्ति रक्षांसि दिशः प्रति द्रवन्ति पलायन्ते। तथा सिद्धसङ्घाः सिद्धानां प्राप्तज्ञानानां समूहाः नमस्यन्ति प्रणमन्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.36।। स्थान इत्येकादशभिरर्जुनस्योक्तिः। स्थान इत्यव्ययं युक्तमित्यस्मिन्नर्थे। हे हृषीकेश? यत एवं त्वमद्भुतप्रभावो भक्तवत्सलश्च अतस्तव प्रकीर्त्या माहात्म्यसंकीर्तनेन न केवलमहमेव प्रहृष्यामि किंतु जगत्सर्वं प्रहृष्यति प्रकर्षेण हर्षं प्राप्नोति एतत्तु स्थाने युक्तमित्यर्थः। तथा जगदनुरज्यतेऽनुरागं चोपैति इति यत्? तथा रक्षांसि भीतानि सन्ति? दिशःप्रति द्रवन्ति पलायन्त इति यत्? सर्वे योगतपोमन्त्रादिसिद्धानां सङ्घा नमस्यन्ति प्रणमन्तीति यत्? एतच्च स्थाने युक्तमेव। न चित्रमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.36।।स्थाने इत्येकादशभिः प्रार्थयन्नाह फाल्गुनः। षड्भिर्गुणैस्त्रिभिर्युक्तं भगवन्तं गुणातिगम्।।स्थाने इत्यत्र प्रकीर्त्या युतं प्रार्थयति।स्थाने इत्यव्ययम्। युक्तमित्यर्थः। जगत्सर्वमनुरज्यते प्रहृष्यति च तव प्रकीर्त्या। अहं त्वधुना बिभेमीति द्योतयति। अयं श्लोको रक्षोघ्नमन्त्रशास्त्रे प्रसिद्धः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.36।।अर्जुन बोला -- यह उचित ही है। वह क्या कि हे हृषीकेश आपकी कीर्तिसे अर्थात् आपकी महिमाका कीर्तन और श्रवण करनेसे जो जगत् हर्षित हो रहा है सो उचित ही है। अथवा स्थाने यह शब्द विषयका विशेषण भी समझा जा सकता है। भगवान् हर्ष आदिके विषय हैं? यह मानना भी ठीक ही है? क्योंकि ईश्वर सबका आत्मा और सब भूतोंका सुहृद् है। यहाँ ऐसी व्याख्या करनी चाहिये कि जगत् जो भगवान्में अनुराग -- प्रेम करता है? यह उसका अनुराग करना उचित विषयमें ही है तथा राक्षसगण भयसे युक्त हुए सब दिशाओंमें भाग रहे हैं? यह भी ठीकठिकानेकी ही बात है। एवं समस्त कपिलादि सिद्धोंके समुदाय जो नमस्कार कर रहे हैं? यह भी उचित विषयमें ही है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.36।। व्याख्या -- [संसारमें यह देखा जाता है कि जो व्यक्ति अत्यन्त भयभीत हो जाता है? उससे बोला नहीं जाता। अर्जुन भगवान्का अत्युग्र रूप देखकर अत्यन्त भयभीत हो गये थे। फिर उन्होंने इस (छत्तीसवें) श्लोकसे लेकर छियालीसवें श्लोकतक भगवान्की स्तुति कैसे की इसका समाधान यह है कि यद्यपि अर्जुन भगवान्के अत्यन्त उग्र (भयानक) विश्वरूपको देखकर भयभीत हो रहे थे? तथापि वे भयभीत होनेके साथसाथ हर्षित भी हो रहे थे? जैसा कि अर्जुनने आगे कहा है -- अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे (11। 45)। इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन इतने भयभीत नहीं हुए थे? जिससे कि वे भगवान्की स्तुति भी न कर सकें।]हृषीकेश -- इन्द्रियोंका नाम हृषीक है? और उनके ईश अर्थात् मालिक भगवान् हैं। यहाँ इस सम्बोधनका तात्पर्य है कि आप सबके हृदयमें विराजमान रहकर इन्द्रियाँ? अन्तःकरण आदिको सत्तास्फूर्ति देनेवाले हैं।तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च -- संसारसे विमुख होकर आपको प्रसन्न करनेके लिये भक्तलोग आपके नामोंका? गुणोंका कीर्तन करते हैं? आपकी लीलाके पद गाते हैं? आपके चरित्रोंका कथन और श्रवण करते हैं? तो इससे सम्पूर्ण जगत् हर्षित होता है। तात्पर्य यह है कि संसारकी तरफ चलनेसे तो सबको जलन होती है?,परस्पर रागद्वेष पैदा होते हैं? पर जो आपके सम्मुख होकर आपका भजनकीर्तन करते हैं? उनके द्वारा मात्र जीवोंको शान्ति मिलती है? मात्र जीव प्रसन्न हो जाते हैं उन जीवोंको पता लगे चाहे न लगे? पर ऐसा होता है।जैसे भगवान् अवतार लेते हैं तो सम्पूर्ण स्थावरजङ्गम? जडचेतन जगत् हर्षित हो जाता है अर्थात् वृक्ष? लता आदि स्थावर देवता? मनुष्य? ऋषि? मुनि? किन्नर? गन्धर्व? पशु? पक्षी आदि जङ्गम नदी? सरोवर आदि जड -- सबकेसब प्रसन्न हो जाते हैं। ऐसे ही भगवान्के नाम? लीला? गुण आदिके कीर्तनका सभीपर असर पड़ता है और सभी हर्षित होते हैं।भगवान्के नामों और गुणोंका कीर्तन करनेसे जब मनुष्य हर्षित हो जाते हैं अर्थात् उनका मन भगवान्में तल्लीन हो जाता है? तब (भगवान्की तरफ वृत्ति होनेसे) उनका भगवान्में अनुराग? प्रेम हो जाता है।रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति -- जितने राक्षस हैं भूत? प्रेत? पिशाच हैं? वे सबकेसब आपके नामों और गुणोंका कीर्तन करनेसे? आपके चरित्रोंका पठनकथन करनेसे भयभीत होकर भाग जाते हैं (टिप्पणी प0 599)।राक्षस? भूत? प्रेत आदिके भयभीत होकर भाग जानेमें भगवान्के नाम? गुण आदि कारण नहीं हैं? प्रत्युत उनके अपने खुदके पाप ही कारण हैं। अपने पापोंके कारण ही वे पवित्रोंमें महान् पवित्र और मङ्गलोंमें महान् मङ्गलस्वरूप भगवान्के गुणगानको सह नहीं सकते और जहाँ गुणगान होता है? वहाँ वे टिक नहीं सकते। अगर उनमेंसे कोई टिक जाता है तो उसका सुधार हो जाता है? उसकी वह दुष्ट योनि छूट जाती है और उसका कल्याण हो जाता है।सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः -- सिद्धोंके? सन्तमहात्माओंके और भगवान्की तरफ चलनेवाले साधकोंके जितने समुदाय हैं? वे सबकेसब आपके नामों और गुणोंके कीर्तनको तथा आपकी लीलाओंको सुनकर आपको नमस्कार करते हैं।यह ध्यान रहे कि यह सबकासब दृश्य भगवान्के नित्य? दिव्य? अलौकिक विराट्रूपमें ही है। उसीमें एकएकसे विचित्र लीलाएँ हो रही हैं।स्थाने -- यह सब यथोचित ही है और ऐसा ही होना चाहिये तथा ऐसा ही हो रहा है। कारण कि आपकी तरफ चलनेसे शान्ति? आनन्द? प्रसन्नता होती है? विघ्नोंका नाश होता है? और आपसे विमुख होनेपर दुःखहीदुःख? अशान्तिहीअशान्ति होती है। तात्पर्य है कि आपका अंश जीव आपके सम्मुख होनेसे सुख पाता है? उसमें शान्ति? क्षमा? नम्रता आदि गुण प्रकट हो जाते हैं और आपके विमुख होनेसे दुःख पाता है -- यह सब उचित ही है।यह जीवात्मा परमात्मा और संसारके बीचका है। यह स्वरूपसे तो साक्षात् परमात्माका अंश है और प्रकृतिके अंशको इसने पकड़ा है। अब यह ज्योंज्यों प्रकृतिकी तरफ झुकता है? त्योंहीत्यों इसमें संग्रह और भोगोंकी इच्छा बढ़ती है। संग्रह और भोगोंकी प्राप्तिके लिये यह ज्योंज्यों उद्योग करता है? त्योंहीत्यों इसमें अभाव? अशान्ति? दुःख? जलन? सन्ताप आदि बढ़ते चले जाते हैं। परन्तु संसारसे विमुख होकर यह जीवात्मा ज्योंज्यों भगवान्के सम्मुख होता है? त्योंहीत्यों यह आनन्दित होता है और इसका दुःख मिटता चला जाता है। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें स्थाने पदसे जो औचित्य बताया है? उसकी आगेके चार श्लोकोंमें पुष्टि करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.36।।स्थाने इति। प्रकीर्त्यां (S प्रकीर्तिः प्रकीर्तनम्) ? प्रकीर्तनेन।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.36।।किं तदर्जुनो भगवन्तं प्रति सगद्गदं वचनमुक्तवानिति तदाह -- अर्जुन इति। विषयविशेषणत्वमेव व्यनक्ति -- युक्त इति। भगवतो हर्षादिविषयत्वं युक्तमित्यत्र हेतुमाह -- यत इति। तव प्रकीर्त्या हर्षवदनुरागं च गच्छति जगदित्याह -- तथेति। तच्चेत्यनुरागगमनम्। रक्षःसु जगदेकदेशभूतेषु प्रतिपक्षेषु कुतो जगतो भवति हर्षानुरागावित्याशङ्क्याह -- किञ्चेति। इतश्च जगतो भगवति हर्षादि युक्तमित्याह -- सर्व इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.36।।स्थाने इत्येतत्युक्तं इत्यर्थेऽव्ययं चास्ति? अस्ति च सप्तम्यन्तं पदं? तत्किमत्राभिप्रेतं कथं चास्यान्वयः इत्यत आह -- यदिति। स्थाने विषये एवेति वा? बहुमानस्थाने त्वयीति वा योजनायां साध्याहारत्वमिति भावः। हृषीकेशशब्दस्य प्रकृतोपयुक्तमपूर्वमर्थमाह -- अग्नीति। अत्राद्येनादिशब्देन सूर्यो गृह्यते? द्वितीयेन बोधनस्थापने अग्न्याद्यंशुभिः स्वकेशैरिति शेषः। जगद्धर्षणादेरिति बोधनस्थापनाभ्यां जगद्धर्षणादित्यर्थः। सूर्याद्यंशूनां कथं भगवत्केशत्वं इत्यत आह -- केशत्वं त्विति। तन्नियतत्वतज्जन्यत्वादिना तादात्म्योक्तिरित्यत्र किं प्रमाणं इत्यत आह -- प्रमाणं त्विति। इत्यत्रैतद्व्याख्यानावसरे। अनेन वक्ष्यमाणं वाक्यं विवृतं भवति। तथा चाग्न्याद्रिषु स्थित्वा स्वकेशनियतैस्तदंशुभिर्जगतो बोधनस्थापनाभ्यां हर्षणादित्युक्तं भवति। हृष्यतेः कीप्रत्ययः। हृष्यो हर्षहेतवः केशा अस्येति हृषीकेशः। नानेन प्रसिद्धोऽर्थस्त्यज्यत इति भावेन तमप्याह -- हृषीकाणामिति। ननु जगदीशस्य विशेषत इन्द्रियेशत्वं कथं इत्यत आह -- तेषामिति। पुरुषार्थोपयुक्तज्ञानक्रियाशक्तिप्रेरकत्वेनेति भावः। हृषीकशब्दस्येन्द्रियवाचित्वं कुतः इत्यत आह -- नेति। पूर्वेण समुचितस्यास्य व्याख्यानसमर्थनहेतुत्वाच्चशब्दः। आद्येऽर्थे प्रमाणमाह -- इतरोऽर्थ इति। अग्निश्च। जगद्बोधयन्तः स्थापयन्तश्च पृथक् स्वावसरे उत्पद्यन्ते उदयं गच्छन्ति सूर्यकृतैश्च। अत्रापि पूर्ववद्बोधनादेर्हेतुहेतुमद्भावो ज्ञातव्यः। ईशानत्वादावप्युक्तो हेतुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.36।।यदेतद्वक्ष्यमाणं तत्स्थाने युक्तमेवेत्यर्थः। अग्नीषोमाद्यन्तर्यामितया जगद्धर्षणादेर्हृषीकेशः? केशत्वं त्वंशूनां तन्नियतत्वादेः? प्रमाणं तुशशिसूर्यनेत्रं [11।19] इत्यत्रोक्तम्? हृषीकाणामिन्द्रियाणामीशत्वाच्च हृषीकेशः? तेषां विशेषतः ईशत्वं च यः प्राणे तिष्ठन् [बृ.उ.3।7।16] इत्यादौ प्रसिद्धम्।न मे हृषीकाणि पतन्त्यसत्पथे इत्यादिप्रयोगाच्च। इतरोऽर्थो मोक्षधर्मे सिद्धःसूर्याचन्द्रमसौ शश्वत्केशैर्मे अंशुसंज्ञितैः। बोधयन् स्थापयंश्चैव जगदुत्पद्यते पृथक्। बोधनात्स्थापनाच्चैव जगतो हर्षसम्भवात्। अग्नीषोमकृतैरेभिः कर्मभिः पाण्डुनन्दन। हृषीकेशो महेशानो वरदो लोकभावनः इति च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.36।। --,स्थाने युक्तम्। किं तत् तव प्रकीर्त्या त्वन्माहात्म्यकीर्तनेन श्रुतेन? हे हृषीकेश? यत् जगत् प्रहृष्यति प्रहर्षम् उपैति? तत् स्थाने युक्तम्? इत्यर्थः। अथवा विषयविशेषणं स्थाने इति। युक्तः हर्षादिविषयः भगवान्? यतः ईश्वरः सर्वात्मा सर्वभूतसुहृच्च इति। तथा अनुरज्यते अनुरागं च उपैति तच्च विषये इति व्याख्येयम्। किञ्च? रक्षांसि भीतानि भयाविष्टानि दिशः द्रवन्ति गच्छन्ति तच्च,स्थाने विषये। सर्वे नमस्यन्ति नमस्कुर्वन्ति च सिद्धसंघाः सिद्धानां समुदायाः कपिलादीनाम्? तच्च स्थाने।।भगवतो हर्षादिविषयत्वे हेतुं दर्शयति --,
───────────────────
【 Verse 11.37 】
▸ Sanskrit Sloka: कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे | अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसतत्परं यत् ||
▸ Transliteration: kasmācca te na nameran mahātman garīyase brahmaṇo’pyādikartre | ananta deveśa jagan-nivāsa tvam akṣaraṁ sad-asat tat paraṁ yat ||
▸ Glossary: kasmāt: why; ca: also; te: unto You; na: not; nameran: offer proper obeisances; mahātman: O great one; garīyase: You are better than; brahmaṇaḥ: Brahma; api: although; ādikartre: the supreme creator; ananta: unlimited; deveśa: God of the gods; jagannivāsa: O refuge of the universe; tvaṁ: You are; akṣaraṁ: imperishable; sadasat: cause and effect; tat paraṁ: transcendental; yat: because
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.37 And why should they not bow to Thee, O great soul, greater than all else, the Creator of even Brahma the Creator. O Lord of Lords, O infinite Being, O Abode of the Universe, You are the imperishable, that which is beyond both seen and the unseen.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.37।।हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये (वे सिद्धगण) नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास आप अक्षरस्वरूप हैं आप सत् भी हैं? असत् भी हैं,और सत्असत्से पर भी जो कुछ है? वह भी आप ही हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.37।। हे महात्मन् ब्रह्मा के भी आदि कर्ता और सबसे श्रेष्ठ आपके लिए वे कैसे नमस्कार नहीं करें (क्योंकि) हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास जो सत् असत् और इन दोनों से परे अक्षरतत्त्व है? वह आप ही हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.37 कस्मात् why? च and? ते they? न not? नमेरन् may prostrate? महात्मन् O greatsouled One? गरीयसे greater? ब्रह्मणः of Brahma? अपि also? आदिकर्त्रे the primal cause? अनन्त O Infinite Being? देवेश O Lord of the gods? जगन्निवास O Abode of the universe? त्वम् Thou? अक्षरम् Imperishable? सत् the Being? असत् nonbeing? तत् That? परम् the Supreme? यत् which.Commentary The Lord is Mahatma. He is greater than all else. He is the imperishable. So He is the proper object of worship? love and delight.That which exists in the three periods of time is Sat. Brahman is Sat. That which does not exist in the three periods of time is Asat. This world is Asat. This body is Asat.The words Sat and Asat mean here the manifested and the unmanifested which form the adjuncts of the Akshara (imperishable). In reality the Akshara transcends both these. The word Akshara is applied in the Gita sometimes to the Unmanifest (Nature) and sometimes to the Supreme Being.Ananta is He Who is free from the three kinds of limitations (of time? space and thing) which have already been explained.Arjuna again praises the Lord thus
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.37. O Mighty One ! Why should they not bow down to You, the Primal Creater, Who are greater than even Brahma (personal god) ? O Endless One, O Lord of gods, O Abode of the universe ! You are unalterable, existent, non-existent and also that which is beyond both.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.37 How should they do otherwise? O Thou Supremest Self, greater than the Powers of creation, the First Cause, Infinite, the Lord of Lords, the Home of the universe, Imperishable, Being and Not-Being, yet transcending both.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.37 (a) And why should they not, O Mahatman, bow down to You who are great, being the first Creator, even of Brahma?
(b) O Infinite, Lord of gods, O You who have the universe for Your abode! You are the imperishable individual self, the existent and the non-existent, and that which is beyond both.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.37 And why should they not bow down to You, O exalted [i.e. not narrow-minded.] One, who are greater (than all) and who are the first Creator even of Brahma! O infinite One, supreme God, Abode of the Universe, You are the Immutable,being and non-being, (and) that which is Transcendental.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.37 And why should they not, O great Soul, bow to Thee Who art greater (than all else), the primal cause even of the Creator (Brahma), O Infinite Being, O Lord of the gods, O Abode of the universe; Thou art the imperishable, the Being, the non-being and That which is the supreme (that which is beyond the Being and the non-being).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.37 Kasmat etc. Existent (11.Sat) : i.e. as a purport of words (11.or as material object). Non-existent (11.Asat) : Because, the Absolute does not become an object of perception. Or Asat signifies negation; [in fact] it is also well connected with the words which denote it directly, or indicate it indirectly by denoting what contains it; it also enjoys a form (11.becomes an object) of knowledge (11.of its own); and [hence] is has no separate existence other than the existence of the Absolute Brahman ? (11.It is) beyond both the existent and non-existent : For, It is realised when the knowledge of both of them disappears. (11.38)
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.37 O Mahatman, for what reason should Brahma and others not bow down to You, who are great and are the First Being and the Creator even of Brahma, namely, Hiranyagarbha?
O Infinite, O Lord of the gods, O You who have the universe for Your abode! You are the 'Aksara'. What does not perish, is the Aksara, here, the 'principle of individual self'; for the individual self does not perish as established in Sruti passages: 'The intelligent self is not born, nor dies' (Ka. U., 1.2.18). You alone are the 'existent and the non-existent,' the principle of Prakrti, in its condition as effect and in its condition as cause. This is denoted by the terms 'Sat' (existent) and 'Asat' (non-existent). You alone are the state of effect denoted by the term 'Sat', which is the state of diversification by names and forms, and also the state of cause, denoted by the tetm 'Asat', which is the state incapable of such divisions and diversities. 'What is beyond both' - what is beyond Prakrti and the individual self associated with the Prakrti, as also from the principle of liberated selves who are different from those associated with Prakrti, i.e., bound souls. You alone are that also.
Therefore:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.37 Ca, and; since You are the Primal Creator, the Cause, api, even; brahmanah, of Brahma, of Hiranyagarbha; therefore, kasmat, why, for what reason; should they na nameran, not bow down; te, to You; mahatman, O exalted One; gariyase, who are greater (than all)! Hence, why should these not bow down adi-karte, to the first Creator? Therefore You are fit for, i.e. the fit object of, delight etc. and salutation as well. Ananta, O infinite One; devesa, supreme God; jagannivasa, Abode of the Universe; tvam, You; are the aksaram, Immutable; tat param yat, that which is Transcendental, which is heard of in the Upanisads;-what is that?-sad-asat, being and nonbeing. Being is that which exists, and non-being is that with regard to which the idea of nonexistence arises. (You are) that Immutable of which these two-being and non-being-become the limiting adjuncts; which (Immutable), as a result, is metaphorically referred to as being and non-being. But in reality that Immutable is transcendental to being and non-being. 'That Immutable which the knowers of the Vedas declare' (8.11; cf. Ka. 1.2.15)-that is You Yourself, nothing else. This is the idea. He praises again:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.37।। वे सिद्ध संघ आपको नमस्कार कैसे नहीं करें क्योंकि आप तो सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के भी आदिकर्त्ता हैं। आदिकारण वह है जो सम्पूर्ण कार्यजगत् को व्याप्त करके समस्त नाम और रूपों को धारण करता है? जैसे घटों का कारण मिट्टी और आभूषणों का कारण स्वर्ण है। अनन्तस्वरूप परमात्मा न केवल यह विश्व है? बल्कि समस्त देवों का ईश्वर भी है? क्योंकि उसी सर्वशक्तिमान् परमात्मा से समस्त देवताओं को तथा प्राकृतिक शक्तियों को सार्मथ्य प्राप्त होती है।इस चराचर जगत् को दो भागों सत् और असत् में विभाजित किया जा
Chapter 11 (Part 13)
सकता है। यहाँ सत् शब्द से अर्थ उन वस्तुओं से है? जो इन्द्रिय? मन और बुद्धि के द्वारा जानी जा सकती हैं? अर्थात् जो स्थूल और सूक्ष्म रूप में व्यक्त हैं। स्थूल विषय? भावनाएं और विचार व्यक्त (सत्) कहलाते हैं। इस व्यक्त का जो कारण है? उसे असत् अर्थात् अव्यक्त कहते हैं। व्यक्ति की जीवन पद्धति को नियन्त्रित करने वाला यह अव्यक्त कारण उस व्यक्ति के संस्कार या वासनाएं ही हैं। यहाँ परमात्मा की दी हुई परिभाषा के अनुसार वह सत् और असत् दोनों ही है। और वह इन दोनों से परे भी है।आप इनसे परे भी हैं नाट्यगृह के रंगमंच पर हो रहा नाटक सुखान्त अथवा दुखान्त हो सकता है? परन्तु उन्हें प्रकाशित करने वाला प्रकाश उन दोनों से ही परे होता है। अंगूठी और कण्ठी ये दोनों? निसन्देह स्वर्ण के बने हैं? किन्तु स्वर्ण की परिभाषा यह नहीं दी जा सकती है कि वह अंगूठी या कण्ठी है। वह ये दोनों आभूषण तो हैं ही? परन्तु इन दोनों से परे भी है। इस दृष्टि से? समस्त नामरूपों का सारतत्त्व होने से परमात्मा व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही है और अपने स्वरूप की दृष्टि से इन दोनों से परे अक्षर स्वरूप है। वह? अक्षरतत्त्व चैतन्य स्वरूप है? जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों का ही प्रकाशक है। इसी अक्षर ने ही यह विराट्रूप धारण किया है? जिसकी स्तुति अर्जुन कर रहा है।प्रस्तुत खण्ड? विश्व के सभी धर्मों में उपलब्ध सार्वभौमिक प्रार्थनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी धर्म या जाति के लोगों को इसके प्रति कोई आक्षेप नहीं हो सकता? क्योंकि सनातन सत्य के विषय में जो कुछ भी प्रतिपादित सिद्धांत है? उसका ही सार यह खण्ड है। यह भक्त के हृदय को प्राय अप्रमेय की सीमा तक ऊँचा उठा सकता है। भक्त उसे साक्षात् अनुभव कर सकता है। अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए कहता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.37।।इदं भगवतो हर्षादिविषयत्वं युक्तमेवेत्याशयेनाह। कस्माच्च ते तुभ्यं न नमेरन् न नमस्कुर्युः। नमस्काराकरणे हेतुर्नास्तीत्यर्थः। नमस्करादिकरणे तु हेतुर्वर्तते इत्याशयेनाह। हे माहत्मन् परमात्मन्? महात्मत्वं लक्षयति। गहीयते गुरुतराय यतो ब्रह्मणो हिरण्यगर्भस्यादिकर्त्रे आदिकारणाय अभिन्ननिमित्तोपादानत्वद्योतनायादिपदं। भगवतो गुरुतरत्वं ब्रह्मण आदिकर्तुत्वं च प्रतिपादयन्नाह। हे अनन्त? यस्य देशकालवस्तुकृतः परिच्छेदो नास्ति तस्य तवैव गुरुतरत्वमुपपद्यत इत भावः।,हे देवेश देवानां ब्रह्मादिनामीश? जगन्निवास जगदधिष्ठान। तथाच सर्वनियन्ता सर्वाधिष्ठानं त्वमेवादिकर्तेत्याशयः। एवं तत्पदवाच्यं निरुप्य लक्ष्यं निरुपयति -- त्वमक्षरमिति। यद्वेदान्तप्रतिपाद्यं किं तत्। सदसत्। सद्यद्विद्यमानं विद्यत इत विधिमुखेन प्रतीयमानं व्यक्तं कार्यमिति यावत्। असच्च यन्नास्तीति बुद्धिः निषेधमुखेन प्रतीयमाना अव्यक्तविषया कारणबुद्धिरिति यावत्। सदसदुपाधिकत्वादक्षरत्वमपि सदसत्। तत्त्वतस्तु सदसद्यभां परं तत्वमेवातः ते कस्मान्न नमेरन्नित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.37।।भगवतो हर्षादिविषयत्वे हेतुमाह -- कस्मादिति। कस्माच्च हेतोस्ते तुभ्यं न नमेरन्न नमस्कुर्युः सिद्धसङ्घाः सर्वेऽपि। हे महात्मन्परमोदारचित्त? हे अनन्त सर्वपरिच्छेदशून्य? हे देवेश हिरण्यगर्भादीनामपि देवानां नियन्तः? हे जगन्निवास सर्वाश्रय तुभ्यं कीदृशाय। ब्रह्मणोऽपि गरीयसे गुरुतराय आदिकर्त्रे ब्रह्मणोऽपि जनकाय। नियन्तृत्वमुपदेष्टृत्वं जनकत्वमित्यादिरेकैकोऽपि हेतुर्नमस्कार्यताप्रयोजकः। किं पुनर्महात्मत्वानन्तत्वजगन्निवासत्वादिनानाकल्याणगुणसमुच्चित इत्यनाश्चर्यतासूचनार्थं नमस्कारस्य। कस्माच्चेति वाशब्दार्थश्चकारः। किंच सत् विधिमुखेन प्रतीयमानमस्तीति? असन्निषेधमुखेन प्रतीयमानं नास्तीति? अथवा सत् व्यक्तं असत् अव्यक्तं त्वमेव। तथा तत्परं ताभ्यां सदसद्भ्यां परं मूलकारणं यदक्षरं ब्रह्म तदपि त्वमेव। त्वद्भिन्नं किमपि नास्तीत्यर्थः। तत्परं यदित्यत्र यच्छब्दात्प्राक्चकारमपि केचित्पठन्ति। एतैर्हेतुभिस्त्वां सर्वे नमन्तीति न किमपि चित्रमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.37।।कुतो मां सिद्धसङ्घा नमस्यन्ति यतस्तेप्यहमिव ब्रह्माण्डशतानि स्रष्टुमर्हन्तीत्यत आह -- कस्मादिति। हे महात्मन् कस्माद्धेतोस्ते त्वां न नमेरन्नपितु नमेरन्नेव। तत्र हेतुः गरीयसे। तेऽपि गुरवस्त्वमपि गुरुस्तथापि त्वमतिशयितो गुरुरसीत्यर्थः। कुतो ममैवातिशयस्तेषां मम च समानेऽपि सत्यसंकल्पत्वादौ सत्यतश्चाह। ब्रह्मणो हिरण्यगर्भस्याप्यादिकर्त्रे पितामहाय पञ्चमहाभूतसृष्टिद्वारा ब्रह्माणं सृजत इत्यर्थः।जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च इतिन्यायेन नित्यसिद्धेश्वरस्य तवाज्ञया ते सर्वेऽप्यैश्वर्यभाजो भवन्ति नतु त्वत्समास्ते। अतएव हे अनन्त हे देवानां ईश जगन्निवास जगतामालयभूत? त्वं अक्षरं शुद्धं ब्रह्म। कीदृशमक्षरम्। यत् सदसत्तत्परं सच्च असच्च सदसती ताभ्यां परं च सदसत्तत्परम् कार्यं कारणं तदुभयातीतं चेति त्रिविधमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.37।।ननु सिद्धाः किमिति नमन्ति इत्यत आह -- कस्मादिति। हे महात्मन् महतामात्मस्वरूप यस्मांत्तषां भक्तानां स्वरूपं त्वमेवातस्ते तुभ्यं कस्मान्न नमेरन् न नमस्कुर्युः। कीदृशाय गरीयसे गुरवे। ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे जनकाय। किञ्च। हे अनन्तदेवेश अनन्तानां देवानामीश प्रभो हे जगन्निवास सकलाश्रय अक्षरं त्वमेव? सत् असच्च सर्वं त्वमेव? यत् परं पुरुषोत्तमाख्यं ब्रह्मतत्त्वम् अतो नमन्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.37।।तत्र हेतुमाह -- कस्मादिति। हे महात्मन्? हे अनन्त? हे देवेश? हे जगन्निवास। कस्माद्धेतोस्ते तुभ्यं न नमेरन्नमस्कारं न कुर्युः। कथंभूताय। ब्रह्मणोऽपि गरीयसे गुरुतराय आदिकर्त्रे च ब्रह्मणोऽपि जनकाय। किंच सत्। व्यक्तं असदव्यक्तं च ताभ्यां परं मूलकारणं यदक्षरं ब्रह्म तच्च त्वमेव। एतैर्नवभिर्हेतुभिस्त्वां सर्वे नमस्यन्तीति न चित्रमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.37।।कस्माच्चेति। ऐश्वर्यं वैराग्यं वा ब्रह्मणः समष्टिपुरुषजीवस्यादिकर्तृत्वेनालिप्तत्वात्सदसत्परमक्षरं इति नित्यत्वेन क्षरणाभावान्निरतिशयैश्वर्यं सर्वविभिन्नधर्माश्रयं त्वमेव ब्रह्मेत्याह। परं कारणम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.37।।भगवान् हर्षादि भावोंके योग्य स्थान किस प्रकार हैं इसमें कारण दिखाते हैं --, हे महात्मन् आप जो अतिशय गुरुतर हैं अर्थात् सबसे बड़े हैं? उनको ये सब किसलिये नमस्कार न करें क्योंकि आप हिरण्यगर्भके भी आदिकर्ता -- कारण हैं? अतः आप आदिकर्ताको कैसे नमस्कार न करें। अभिप्राय यह कि उपर्युक्त कारणसे आप हर्षादिके और नमस्कारके योग्य पात्र हैं। हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास वह परम अक्षर ( ब्रह्म ) आप ही हैं? जो वेदान्तोंमें सुना जाता है। वह क्या है सत् और असत् -- जो विद्यमान है वह सत् और जिसमें नहीं है ऐसी बुद्धि होती है वह असत् है। वे दोनों सत् और असत् जिस अक्षरकी उपाधि हैं? जिनके कारण वह ब्रह्म उपचारसे सत् और असत् कहा जाता है परंतु वास्तवमें जो सत् और असत् दोनोंसे परे है? जिसको वेदवेत्ता लोग अक्षर कहते हैं वह ब्रह्म भी आप ही हैं। अभिप्राय यह कि आपसे अतिरिक्त दूसरा कोई नहीं है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.37।। व्याख्या -- कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे -- आदिरूपसे प्रकट होनेवाले महान् स्वरूप आपको (पूर्वोक्त सिद्धगण) नमस्कार क्यों न करें नमस्कार दोको किया जाता है -- (1) जिनसे मनुष्यको शिक्षा मिलती है? प्रकाश मिलता है? ऐसे आचार्य? गुरुजन आदिको नमस्कार किया जाता है और (2) जिनसे हमारा जन्म हुआ है? उन मातापिताको तथा आयु? विद्या आदिमें अपनेसे बड़े पुरुषोंको नमस्कार किया जाता है। अर्जुन कहते हैं कि आप गुरुओंके भी गुरु हैं -- गरीयसे (टिप्पणी प0 600.1) और आप सृष्टिकी रचना करनेवाले पितामह ब्रह्माजीको भी उत्पन्न करनेवाले हैं -- ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे। अतः सिद्ध महापुरुष आपको नमस्कार करें? यह उचित ही है।अनन्त -- आपको देश? काल? वस्तु? व्यक्ति आदि किसीकी भी दृष्टिसे देखें? आपका अन्त नहीं आता। तात्पर्य है कि आपको देशकी दृष्टिसे देखें तो आपका कहाँसे आरम्भ हुआ है और कहाँ जाकर अन्त होगा -- ऐसा है ही नहीं। कालकी दृष्टिसे देखा जाय तो आप कबसे हैं और कबतक रहेंगे -- इसका कोई अन्त नहीं है। वस्तु? व्यक्ति आदिकी दृष्टिसे देखें तो आप वस्तु? व्यक्ति आदि कितने रूपोंमें हैं -- इसका कोई आदि और अन्त नहीं है। सब दृष्टियोंसे आप अनन्तहीअनन्त हैं। बुद्धि आदि कोई भी दृष्टि आपको देखने जाती है तो वह दृष्टि खत्म हो जाती है? पर आपका अन्त नहीं जाता। इसलिये सब तरफसे आप सीमारहित हैं? अपार है? अगाध हैं।देवेश -- इन्द्र? वरुण आदि अनेक देवता हैं? जिनका शास्त्रोंमें वर्णन आता है। उन सब देवताओंके आप मालिक हैं? नियन्ता हैं? शासक हैं। इसलिये आप देवेश हैं।जगन्निवास -- अनन्त सृष्टियाँ आपके किसी अंशमें विस्तृतरूपसे निवास कर रही हैं? तो भी आपका वह अंश पूरा नहीं होता? प्रत्युत खाली ही रहता है। ऐसे आप असीम जगन्निवास हैं।त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् -- आप अक्षरस्वरूप हैं (टिप्पणी प0 600.2)। जिसकी स्वतःसिद्ध स्वतन्त्र सत्ता है? वह सत् भी आप हैं और जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है? प्रत्युत सत्के आश्रित ही जिसकी सत्ता प्रतीत होती है? वह असत् भी आप ही हैं। जो सत् और असत् -- दोनोंसे विलक्षण है? जिसका किसी तरहसे निर्वचन नहीं हो सकता? मनबुद्धि? इन्द्रियाँ आदि किसीसे भी जिसकी कल्पना नहीं कर सकते अर्थात् जो सम्पूर्ण कल्पनाओंसे सर्वथा अतीत है? वह भी आप ही हैं।तात्पर्य यह हुआ कि आपसे बढ़कर दूसरा कोई है ही नहीं? हो सकता नहीं और होना सम्भव भी नहीं -- ऐसे आपको नमस्कार करना उचित ही है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.37।।कस्मादिति। सत् पदार्थत्वेन। अशत् उपलम्भं प्रत्यविषयत्वात्। अथ वा अभावोऽपि धियि निजनिजविशिष्टवाचकसंश्लेषितो (?N -- वाचकवचसंश्लेषितो) ज्ञानाकारमश्नुवानो न (S? omit न) परब्रह्मसत्ताव्यतिरिक्तः। सदसद्रूपाभ्यां च परम्? तदुभयबुद्धितिरोधाने तद्रूपोपलब्धेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.37।।उक्तेऽर्थे हेत्वर्थत्वेनोत्तरश्लोकमवतारयति -- भगवत इति। महात्मत्वमक्षुद्रचेतस्त्वम्। गुरुतरत्वान्नमस्कारादियोग्यत्वमाह -- गुरुतरायेति। तत्रैव हेत्वन्तरमाह -- यत इति। महात्मत्वादिहेतूनां मुक्तानां फलमाह -- अत इति। तत्रैव हेत्वन्तराणि सूचयति -- हे अनन्तेति। अनवच्छिन्नत्वं सर्वदेवनियन्तृत्वं सर्वजगदाश्रयत्वं च तव नमस्कारादियोग्यत्वे कारणमित्यर्थः। तत्रैव हेत्वन्तरमाह -- त्वमिति। तत्र मानमाह -- यदिति। कथमेकस्यैव सदसद्रूपत्वं तत्राह -- ते इति। कथं सतोऽसतश्चाक्षरं प्रत्युपाधित्वं तदाह -- यद्द्वारेणेति। तत्परं यदित्येतद्व्याचष्टे -- परमार्थतस्त्विति। अनन्तत्वादिना भगवतो नमस्कारादियोग्यत्वमुक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.37 -- 11.40।।सर्वे नमस्यन्ति [11।36] इत्येतद्युक्तमिति स्वयमेवोक्त्वाकस्माच्च ते न नमेरन् इति विरुद्धं कथं पृच्छति इत्यत आक्षेप एवायमिति ज्ञापयन् तन्निवर्त्याशङ्काप्रदर्शनपूर्वकमवतारयति -- कथमिति। इति शङ्कायामिति शेषः तत्तस्या उत्तरम्। महात्मन्नक्षुद्रचित्तेत्यल्पार्थप्रतीतिनिरासार्थमाह -- पूर्णश्चेति। आत्मा जीव इति प्रतीतिं वारयितुमाह -- आत्मेति। उक्तो निरुक्तः। यद्यस्मात्। आप्नोतेर्मन्। पकारस्य च तकारः। आङ्पूर्वाद्दाञः स एव प्रत्ययः आकारलोपस्तत्वम्। आङ्पूर्वाददो मन्। तत्वं च। इह देहे। सन्ततो भावो नित्या सत्ता। आङ्पूर्वात्तनोतेर्ङ्मन्। सदसद्भावात्मकं विश्वं त्वमेवेति सत्तादिप्रदत्वादेवोच्यते। नत्वन्यथा? तथा सति उत्तरवाक्यविरोधात्? इति भावेन तत्पठित्वा सप्रमाणकं व्याचष्टे -- तत्परमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.37 -- 11.40।।कथं स्थाने इति तदाह -- कस्मादित्यादिना। पूर्णश्चासावात्मा चेति महात्मा। आत्मशब्दश्चोक्तो भारते -- यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह। यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते इति। तत्परं सदसतः परम्।असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्। [म.भा.1।1।23] इति भारते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.37।। --,कस्माच्च हेतोः ते तुभ्यं न नमेरन् नमस्कुर्युः हे महात्मन्? गरीयसे गुरुतराय यतः ब्रह्मणः हिरण्यगर्भस्य अपि आदिकर्ता कारणम् अतः तस्मात् आदिकर्त्रे। कथम् एते न नमस्कुर्युः अतः हर्षादीनां नमस्कारस्य च स्थानं त्वं अर्हः विषयः इत्यर्थः। हे अनन्त देवेश हे जगन्निवास त्वम् अक्षरं तत् परम्? यत् वेदान्तेषु श्रूयते। किं तत् सदसत् इति। सत् विद्यमानम्? असत् च यत्र नास्ति इति बुद्धिः ते उपधानभूते सदसती यस्य अक्षरस्य? यद्द्वारेण सदसती इति उपचर्यते। परमार्थतस्तु सदसतोः परं तत् अक्षरं यत् अक्षरं वेदविदः वदन्ति। तत् त्वमेव? न अन्यत् इति अभिप्रायः।।पुनरपि स्तौति --,
───────────────────
【 Verse 11.38 】
▸ Sanskrit Sloka: त्वमादिदेव: पुरुष: पुराण- स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् | वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ||
▸ Transliteration: tvamādidevaḥ puruṣaḥ purāṇas tvamasya viśvasya paraṁ nidhānam | vettāsi vedyaṁ ca paraṁ ca dhāma tvayā tataṁ viśvam ananta rūpa ||
▸ Glossary: tvaṁ: You; ādidevaḥ: the original supreme God; puruṣaḥ: the supreme being; purāṇaḥ: old; tvaṁ: You; asya: this; viśvasya: universe; paraṁ: transcendental; nidhānam: refuge; vettā: knower; asi: You are; vedyaṁ ca: and the knowable; paraṁ ca: and transcendental; dhāma: refuge; tvayā: by You; tataṁ: pervaded; viśvaṁ: universe; anantarūpa: unlimited form
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.38 You are the primal God, the ancient Being, the supreme refuge of the universe. You are the knower and the One to be known. You are the supreme abode. O Being of infinite forms, by You alone is the universe pervaded.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.38।।आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसारके परम आश्रय हैं। आप ही सबको जाननेवाले? जाननेयोग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.38।। आप आदिदेव और पुराण (सनातन) पुरुष हैं। आप इस जगत् के परम आश्रय? ज्ञाता? ज्ञेय? (जानने योग्य) और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप आपसे ही यह विश्व व्याप्त है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.38 त्वम् Thou? आदिदेवः the primal God? पुरुषः Purusha? पुराणः the ancient? त्वम् Thou? अस्य of (this)? विश्वस्य of Universe? परम् the Supreme? निधानम् Refuge? वेत्ता Knower? असि (Thou) art? वेद्यम् to be known? च and? परम् the Supreme? च and? धाम abode? त्वया by Thee? ततम् is pervaded? विश्वम् the Universe? अनन्तरूप O Being of infinite forms.Commentary Primal God? because the Lord is the creator of the universe.Purusha? because the Lord lies in the body (Puri Sayanat).Nidhaanam That in which the world rests during the great deluge or cosmic dissolution.The pot comes out of the clay and gets merged in clay. Even so the world has come out of the Lord and gets dissolved or involved in the Lord. So the Lord is the material cause of the world. Therefore? He is the primal God and the supreme refuge also.Vetta Knower of the knowable things. As the Lord is omniscient? He knows all about the world? and He is the instrumental or the efficient cause of this world.Param Dhama Supreme Abode of Vishnu. Just as the rope (the substratum for the superimposed snake) pervades the snake? so also Brahman or Vishnu through His Nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute pervades the whole universe.Moreover --
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.38. You are the Primal God; You are the Ancient Soul; You are the transcending place of rest for this universe; You are the knower and the knowable; You are the Highest Abode; and the universe with its infinite forms is pervaded by You.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.38 Thou art the Primal God, the Ancient, the Supreme Abode of this universe, the Knower, the Knowledge and the Final Home. Thou fillest everything. Thy form is infinite.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.38 (a) You are the Primal God and the Ancient Person. You are the Supreme resting place of the universe৷৷.
(b)৷৷.You are the knower and that which must be known, and the Supreme abode. By You, O infinite of form, is this universe pervaded.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.38 You are the primal Deity, the ancient Person; You are the supreme Resort of this world. You are the knower as also the object of knowledge, and the supreme Abode. O You of infinite forms, the Universe is pervaded by You!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.38 Thou art the primal God, the ancient Purusha, the supreme refuge of this universe, the knower, the knowable and the supreme Abode. By Thee is the universe pervaded, O Being of infinite forms.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.38 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.38 You alone are all the knowers and all that must be known. You alone, abiding thus as the Self of all, are the 'Dhaman' (abode), namely, the goal to be attained. By You, O infinite of form, is the universe pervaded. By You the universe, composed of conscient beings and non-conscient matter, is 'Tatam', pervaded. You are the Primal God, the Ancient Person. You are the supreme resting place of the universe. The meaning is that You are the supreme foundation of the universe which constitutes Your body, as You are its Self. [It is to be noted how Ramanuja derives here the meaning of 'individual self' for the word Aksara, which helps him to explain 'Kutasth'oksara ucchyate' in 15.16]
Arjuna says: 'Therefore You alone are expressed by the terms Vayu etc.'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.38 You are the adi-devah, primal Deity, because of being the creator of the Universe; the puranah, ancient, eternal; purusah, Person-(derived) in the sense of 'staying in the town (pura) that is the body'. You verily are the param, suprem; nidhanam, Resort, in which this entire Universe comes to rest at the time of final dissolution etc. Besides, You are the vetta, knower of all things to be known. You are also the vedyam, object of knowledge-that which is fit to be known; and the param, supreme; dhama, Abode, the supreme State of Visnu. Anantarupa, O You of infinite forms, who have no limit to Your own forms; the entire visvam, Universe; tatam, is pervaded; tvaya, by You. Further,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.38।। आदिदेव आत्मा ही आदिकर्ता है। चैतन्यस्वरूप आत्मा से ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई है। समष्टि मन और बुद्धि से अविच्छिन्न (मर्यादित? सीमित) आत्मा ही ब्रह्माजी कहलाता है।विश्व के परम आश्रय सम्पूर्ण विश्व परमात्मा में निवास करता है? इसलिए उसे यहाँ विश्व का परम आश्रय कहा गया है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है? विश्व शब्द से केवल स्थूल जगत् ही नहीं समझना चाहिए? वरन् पूर्व श्लोक में वर्णित सत् और असत् (व्यक्त और अव्यक्त) का सम्मिलित रूप ही विश्व कहलाता है।विश्व शब्द को इस प्रकार समझ लेने पर वेदान्त के विद्यार्थियों को इस जीवन का सम्पूर्ण अर्थ समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। हम शरीर? मन और बुद्धि की जड़ उपाधियों के द्वारा जगत् का अनुभव करते हैं। ये स्वत जड़ होने के कारण उनमें अपना चैतन्य नहीं है। आत्म चैतन्य के सम्बन्ध से ही वे चेतनवत् व्यवहार करने में सक्षम होती हैं।वस्तुत? इन जड़ पदार्थों अथवा उपाधियों की उत्पत्ति आत्मा से नहीं हो सकती? क्योंकि आत्मा अविकारी है। हम यह भी नहीं कह सकते कि जड़ जगत् की उत्पत्ति किसी अन्य स्वतन्त्र कारण से हुई है? क्योंकि आत्मा ही सर्वव्यापी? एकमेव अद्वितीय सत्य है। इसलिए? वेदान्त में कहा गया है कि यह विश्व परम सत्य ब्रह्म पर अध्यस्त (अध्यारोपित) है? जैसे भ्रान्तिकाल में प्रेत स्तम्भ में अध्यस्त होता है। इस प्रकार की भ्रान्ति में? वह स्तम्भ ही प्रेत और उसकी गति का तथा उससे उत्पन्न हुई प्रतिक्रियायों का विधान कहलायेगा। वस्तुत? स्तम्भ के अतिरिक्त भूत का कोई अस्तित्व या सत्यत्व नहीं है। इसी प्रकार यहाँ अर्जुन परमात्मा का निर्देश अत्यन्त सुन्दर प्रकार से विश्व के विधान कहकर करता है।आप ज्ञाता और ज्ञेय हैं चैतन्य ही वह तत्त्व है? जो हमारे अनुभवों को सत्यत्व प्रदान करता है। चैतन्य से प्रकाशित हुए बिना इस जड़ जगत् का ज्ञान सम्भव नहीं होता? इसलिए यहाँ चैतन्यस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण को ज्ञाता कहा गया है। आत्म साक्षात्कार हेतु उपदिष्ट सभी साधनाओं की प्रक्रिया यह है कि इन्द्रियादि के द्वारा विचलित होने वाला मन का ध्यान बाह्य विषयों से निवृत्त कर उसे आत्मस्वरूप में स्थिर किया जाय। जब यह मन वृत्तिशून्य हो जाता है? तब शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा का साक्षात् अनुभवगम्य बोध होता है। इसलिए आत्मा को यहाँ वेद्य अर्थात् जानने योग्य तत्त्व कहा गया है।सम्पूर्ण विश्व आपके द्वारा व्याप्त है जैसे समस्त मिष्ठानों में मधुरता व्याप्त है या तरंगों में जल व्याप्त है? वैसे ही विश्व में परमात्मा व्याप्त है। अभी कहा गया था कि अधिष्ठान के अतिरिक्त अध्यस्त वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता। आत्मा ही वह अधिष्ठान है? जिस पर यह नानाविश्व सृष्टि की प्रतीति हो रही है। इसलिए यहाँ उचित ही कहा गया है कि आपके द्वारा यह विश्व व्याप्त है। यह केवल उपनिषद् प्रतिपादित उस सत्य की ही पुनरुक्ति है कि अनन्त ब्रह्म सबको व्याप्त करता है? परन्तु उसे कोई व्याप्त नहीं कर सकता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.38।।पुनरपि स्तौति। त्वमादिदेवः ब्रह्मादिजनकत्वात्। भगवतस्ताटस्थ्यं वारयति। पुरि शयनात्पुरुष इति। पुरि विनाशान्नाशाशङ्कां वारयति। पुराणः चिरंतनः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानं महाप्रलयादौ सर्वं जगन्निधीयतेऽस्मिन्निति परं प्रकृष्टं निधानं लयस्थानमतो न कर्तृमात्रमपि तु प्रकृतिरपीति भावः। किंच वेत्तासि ज्ञातासि। सर्वस्यैव वेद्यंजातस्य भेदं वारयति। वेद्यं च यच्च ज्ञातुं योग्यं वस्तु तच्चासि। प्राप्यमपि परं त्वमेवेत्याह। परं च धाम परमं वैष्णवपदं मोक्षाख्यं सच मोक्षाख्यस्त्वं न क्वचिन्मेरुपृष्ठदौ तिष्ठसि किंतु त्वया परमधाम्ना ततं व्यापतं समस्तं विश्वं यतस्त्व रुपाणां कैवल्यादीनामन्तः परिच्छेदो न विद्यते इति हेऽनन्तरुप।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.38।।भक्त्युद्रेकात्पुनरपि स्तौति -- त्वमिति। त्वमादिदेवो जगतः सर्गहेतुत्वात् पुरुषः पूरयिता पुराणोऽनादिः त्वमस्य विश्वस्य परं निधानं लयस्थानत्वात् निधीयते सर्वमस्मिन्निति। एवं सृष्टिप्रलयस्थानत्वेनोपादानत्वमुक्त्वा सर्वज्ञत्वेन प्रधानं व्यावर्तयन्निमित्ततामाह -- वेत्तेति। वेत्ता वेदिता। सर्वस्यापि द्वैतापत्तिं वारयति। यच्च वेद्यं तदपि त्वमेवासि। वेदनरूपे वेदितरि परमार्थसंबन्धाभावेन सर्वस्य वेद्यस्य कल्पितत्वात् अतएव परं च धाम यत्सच्चिदानन्दघनमविद्यातत्कार्यनिर्मुक्तं विष्णोः परमं पदं तदपि त्वमेवासि। त्वया सद्रूपेण स्फुरणरूपेण च कारणेन ततं व्याप्तमिदं स्वतः सत्तास्फूर्तिशून्यं विश्वं कार्यं मायिकसंबन्धेनैव स्थितिकाले। हे अनन्तरूप अपरिच्छिन्नस्वरूप।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.38।।पुनरपि स्तौति -- त्वमिति। आदिदेवो जगतः स्रष्टृत्वात्। पुरुषः सर्वशरीरशायी। पुराणः शरीरनाशादिनाप्यविनश्यन्। विश्वस्यास्य त्वं परं निधानं निधीयतेऽस्मिन्निति लयस्थानम्। सांख्यानां जडां प्रकृतिं वारयति। वेत्ता ज्ञाता। वेद्यं तद्दृश्यं च त्वमेव। परं वेत्तृवेद्याभ्यामन्यत् धाम चैतन्यम्। त्वया विश्वं ततं व्याप्तं स्वसत्तास्फूर्तिभ्याम्। हे अनन्तरूप त्रिविधपरिच्छेदशून्यस्वरूप।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.38।।किञ्च -- त्वमादिदेव इति। त्वं देवानामादिः तथा त्वं ब्रह्मणोऽप्यसीत्यत आह -- पुरुषः। तत् त्वमक्षरेऽपि वर्तस इत्यतः पुराणः पुरुषोत्तम इत्यर्थः। पुरुषोत्तमधर्मानेवाह -- त्वमस्य परिदृश्यमानस्य विश्वस्य परमुत्कृष्टं आधिदैविकरूपेण स्वस्मिन् स्थानं स्वरतीच्छारूपं निधानं लयस्थानं परं विश्वस्य क्रीडाप्रकटितस्वरूपज्ञानेन सर्वत्र रमणकर्ता त्वमसि विश्वस्य विश्वस्मिन् वा। वेद्यं ज्ञेयं त्वं च त्वमेवेत्यर्थः। च पुनः परं धाम वैकुण्ठाख्यं तेजोरूपं पुरुषोत्तमगृहात्मकं वा त्वम्। हे अनन्तरूप इदं विश्वं त्वया ततं व्याप्तं त्वद्रूपमेवेत्यर्थः।अनन्तरूपमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.38।।किंच -- त्वमिति। त्वमादिदेवो देवानामादिः। यतः पुराणोऽनादिः पुरुषवस्त्वम्। अतएव त्वमस्य विश्वस्य परं निधानं लयस्थानम्? तथा विश्वस्य वेत्ता वेदिता ज्ञाता च त्वम्? यच्च वेद्यं वस्तुजातं परं च धाम वैष्णवं पदं तदपि त्वमेवासि। अतएव हे अनन्तरूप? त्वयैव विश्वमिदं ततं व्याप्तम्। एतैश्च सप्तभिर्हेतुभिस्त्वमेव नमस्कार्य इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.38।।त्वमिति। ज्ञानं वेत्तासि वेद्यं चेति विरुद्धधर्माश्रयत्वमक्षरत्वं च पुनः स्फोटयति -- परं धामेति।तद्धाम परमं मम [8।2115।6] इत्यनेनैकार्थ्यमेति।त्वया ततं विश्वं इति व्याख्यानभूतंमया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना [9।4] इत्यादेः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.38।।अर्जुन फिर भी स्तुति करता है --, आप जगत्के रचयिता होनेके कारण आदिदेव हैं और शरीररूप पुरमें रहनेके कारण सनातन पुरुष हैं तथा आप ही इस विश्वके परम उत्तम स्थान हैं अर्थात् महाप्रलयादिमें समस्त जगत् जिसमें स्थित होता है वह ( जगत्का आश्रय ) आप ही हैं। तथा समस्त जाननेयोग्य वस्तुओंके आप जाननेवाले हैं और जो जाननेयोग्य हैं वह भी आप ही हैं। आप ही परम धाम -- परम वैष्णवपद हैं। हे अनन्तरूप समस्त विश्व आपसे परिपूर्ण है -- व्याप्त है। आपके रूपोंका अन्त नहीं है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.38।। व्याख्या -- त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः -- आप सम्पूर्ण देवताओंके आदिदेव हैं क्योंकि सबसे पहले आप ही प्रकट होते हैं। आप पुराणपुरुष हैं क्योंकि आप सदासे हैं और सदा ही रहनेवाले हैं।त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् -- देखने? सुनने? समझने और जाननेमें जो कुछ संसार आता है और संसारकी उत्पत्ति? स्थिति? प्रलय आदि जो कुछ होता है? उस सबके परम आधार आप हैं।वेत्तासि -- आप सम्पूर्ण संसारको जाननेवाले हैं अर्थात् भूत? भविष्य और वर्तमान काल तथा देश? वस्तु? व्यक्ति आदि जो कुछ है? उन सबको जाननेवाले (सर्वज्ञ) आप ही हैं।वेद्यम् -- वेदों? शास्त्रों? सन्तमहात्माओं आदिके द्वारा जाननेयोग्य केवल आप ही हैं।परं धाम -- जिसको मुक्ति? परमपद आदि नामोंसे कहते हैं? जिसमें जाकर फिर लौटकर नहीं आना पड़ता और जिसको प्राप्त करनेपर करना? जानना और पाना कुछ भी बाकी नहीं रहता? ऐसे परमधाम आप हैं।अनन्तरूप -- विराट्रूपसे प्रकट हुए आपके रूपोंका कोई पारावार नहीं है। सब तरफसे ही आपके अनन्त रूप हैं।त्वया ततं विश्वम् -- आपसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है अर्थात् संसारके कणकणमें आप ही व्याप्त हो रहे हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.38।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.38।।संप्रति जगत्स्रष्टृत्वादिनापि तद्योग्यत्वमस्तीति स्तुतिद्वारा दर्शयति -- पुनरपीति। जगतः स्रष्टा पुरुषो हिरण्यगर्भ इति पक्षं प्रत्याह -- पुराण इति। स्रष्टृत्वं निमित्तमेवेति तटस्थेश्वरवादिनस्तान्प्रत्युक्तं -- त्वमेवेति। महाप्रलयादावित्यादिपदमवान्तरप्रलयार्थम्। ईश्वरस्योभयथा कारणत्वं सर्वज्ञत्वेन साधयति -- किञ्चेति। वेद्यवेदितृभावेनाद्वैतानुपपत्तिमाशङक्याह -- यच्चेति। मुक्त्यालम्बनस्य ब्रह्मणोऽर्थान्तरत्वमाशङ्कित्वोक्तं -- परं चेति। यत्परमं पदं तदपि च त्वमेवेति संबन्धः। तस्य पूर्णत्वमाह -- त्वयेति। व्याप्यव्यापकत्वेन भेदं शङ्कित्वा कल्पितत्वात्तस्य मैवमित्याह -- अनन्तेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.37 -- 11.40।।सर्वे नमस्यन्ति [11।36] इत्येतद्युक्तमिति स्वयमेवोक्त्वाकस्माच्च ते न नमेरन् इति विरुद्धं कथं पृच्छति इत्यत आक्षेप एवायमिति ज्ञापयन् तन्निवर्त्याशङ्काप्रदर्शनपूर्वकमवतारयति -- कथमिति। इति शङ्कायामिति शेषः तत्तस्या उत्तरम्। महात्मन्नक्षुद्रचित्तेत्यल्पार्थप्रतीतिनिरासार्थमाह -- पूर्णश्चेति। आत्मा जीव इति प्रतीतिं वारयितुमाह -- आत्मेति। उक्तो निरुक्तः। यद्यस्मात्। आप्नोतेर्मन्। पकारस्य च तकारः। आङ्पूर्वाद्दाञः स एव प्रत्ययः आकारलोपस्तत्वम्। आङ्पूर्वाददो मन्। तत्वं च। इह देहे। सन्ततो भावो नित्या सत्ता। आङ्पूर्वात्तनोतेर्ङ्मन्। सदसद्भावात्मकं विश्वं त्वमेवेति सत्तादिप्रदत्वादेवोच्यते। नत्वन्यथा? तथा सति उत्तरवाक्यविरोधात्? इति भावेन तत्पठित्वा सप्रमाणकं व्याचष्टे -- तत्परमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.37 -- 11.40।।कथं स्थाने इति तदाह -- कस्मादित्यादिना। पूर्णश्चासावात्मा चेति महात्मा। आत्मशब्दश्चोक्तो भारते -- यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह। यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते इति। तत्परं सदसतः परम्।असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्। [म.भा.1।1।23] इति भारते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.38।। --,त्वम् आदिदेवः? जगतः स्रष्ट्टत्वात्। पुरुषः? पुरि शयनात् पुराणः चिरंतनः त्वम् एव अस्य विश्वस्य परं प्रकृष्टं निधानं निधीयते अस्मिन् जगत् सर्वं महाप्रलयादौ इति। किञ्च? वेत्ता असि? वेदिता असि सर्वस्यैव वेद्यजातस्य। यत् च वेद्यं वेदनार्हं तच्च असि परं च धाम परमं पदं वैष्णवम्। त्वया ततं व्याप्तं विश्वं समस्तम्? हे अनन्तरूप अन्तो न विद्यते तव रूपाणाम्।।किञ्च --,
───────────────────
【 Verse 11.39 】
▸ Sanskrit Sloka: वायुर्यमोऽग्निर्वरुण: शशाङ्क: प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च | नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्व: पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ||
▸ Transliteration: vāyur yamo’gnir varuṇaḥ śaśāṅkaḥ prajāpatis tvaṁ prapitāmahaś ca | namo namaste’stu sahasrakṛtvaḥ punaśca bhūyo’pi namo namaste ||
▸ Glossary: vāyuḥ: air; yamaḥ: controller; agniḥ: fire; varuṇaḥ: water; śaśāṅkaḥ: moon; prajāpatiḥ: Brahma; tvaṁ: You; prapitāmahaḥ: grandfather; ca: also; namaḥ: offering respects; namas te: again my respects unto You; astu : be; sahasrakṛt- vaḥ: a thousand times; punaḥ ca: and again; bhūyaḥ: again; api: also; namaḥ: offer my respects; namas te: offering my respects unto You
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.39 You are Vāyu, Yama, Agni, Varuṇa, the moon, Prājapati and the greatgrandfather of all. Salutations unto You a thousand times and again, salutations unto You!
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.39।।आप ही वायु? यमराज? अग्नि? वरुण? चन्द्रमा? दक्ष आदि प्रजापति और प्रपितामह (ब्रह्माजीके भी पिता) हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो नमस्कार हो और फिर भी आपको बारबार नमस्कार हो नमस्कार हो
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.39।। आप वायु? यम? अग्नि? वरुण? चन्द्रमा? प्रजापति (ब्रह्मा) और प्रपितामह (ब्रह्मा के भी कारण) हैं आपके लिए सहस्र बार नमस्कार? नमस्कार है? पुन आपको बारम्बार नमस्कार? नमस्कार है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.39 वायुः Vayu? यमः Yama? अग्निः Agni? वरुणः Varuna? शशाङ्कः moon? प्रजापतिः Prajapati? त्वम् Thou? प्रपितामहः greatgrandfather? च and? नमःनमः salutations? ते to Thee? अस्तु be? सहस्रकृत्वः thousand times? पुनः again? च and? भूयः again? अपि also ? नमःनमः salutations? ते to Thee.Commentary Prajapati Marichi and others were the seven mindborn sons of Brahma. Kasyapa descended from Marichi and from Kasyapa came all other progeny. Therefore? Marichi? Kasyapa and others are known as Prajapatis or the gods or progeny. The word Prajapati here is interpreted by some as Kasyapa and other Prajapatis. But as the word has been used here in the singular number it is appropriate to take Brahma as Prajapati. Brahma is the grandfather (Pitamaha) of Kasyapa. Brahma or the Hiranyagarbha is the Karya Brahman (effect). Isvara is the Karana Brahman (the cause for Brahma). Therefore? Isvara is the greatgrandfather. He is the father of,even Brahma.Isvara has Maya as the limiting adjunct. Maya is His causal body. Isvara has no plane. Maya is in an undifferentiated state. She is in a state where the alities of Nature (Gunas) are in eilibrium. When the eilibrium is disturbed through the will of Isvara? the three Gunas? Brahma? Vishnu and Siva manifest.Thou art the moon alludes to and includes the sun also.Punah? Bhuyah Again. Salutations a thousand times and again salutations. This indicates that Arjuna had intense faith in and boundless devotion for Lord Krishna. He was not satisfied even if he prostrated himself a thousand times.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.39. You are Vayu, Yama, Agni, Varuna, the Moon, Prajapati and the Great-paternal-grand-father; Salutation and salutation thousand times to You; and again also more salutation and salutation to You.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.39 Thou art the Wind, Thou art Death, Thou art the Fire, the Water, the Moon, the Father and the Grandfather. Honour and glory to Thee a thousand and a thousand times! Again and again, salutation be to Thee, O my Lord!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.39 (a) You are Yayu, Yama, Agini, Varuna, Sasanka, Prajapati and the great-grandsire৷৷.
(b) ৷৷. Hail, Hail unto You, a thousand times! Hail unto You again and yet again!
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.39 You are Air, Death, Fire, the god of the waters, the moon, the Lord of the creatures, and the Greater-grandfather. Salutations! Salutation be to You a thousand times; salutation to You again and again! Salutation!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.39 Thou art Vayu, Yama, Agni, Varuna, the moon, the Creator, and the great-grandfather. Salutations, salutations unto Thee, a thousand times, and again salutations, salutations unto Thee.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.39 See comment under 11.40.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.39 You alone are the great-grandsire of all and also grandfather etc. The Prajapatis are the fathers of all creatures. Hiranyagarbha (Brahma), the father of the Prajapatis, is the grandsire of all creatures. You, being the father of even Hiranyagarbha, are great grandfather of all creatures. You alone are denoted by the several terms by which these beings are known. Such is the meaning.
Beholding the Lord in a most marvellous form, Arjuna, bent with great awe, saluted Him from all sides with his eyes widely open from joy.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.39 You are vayuh, Air; yamah, Death; and agnih, Fire; varunah, the god of the waters; sasankah, the moon; prajapatih, the Lord of the creatures- Kasyapa and others [See note on p.2.-Tr.]; and pra-pitamahah, the Great-grandfather, i.e. the Father ever of Brahma (Hiranyagarbha). Namo, salutations; namah, salutation; astu, be; te, to You; sahasra-krtvah, a thousand times. Punah ca bhuyah api namo te, salutation to You again and again; namah, salutation! The suffix krtvasuc (after sahasra) indicates performance and repetition of the act of salutation a number of times. The words punah ca bhuyah api (again and again) indicate his own dissatisfaction [Dissatisfaction with only a few salutations.] owing to abundance of reverence and devotion. So also,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.39।। अब तक अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण के पर? अक्षर और निर्गुण स्वरूप का स्तुतिगान कर रहा था। एक उपासक के मन में यह प्रश्न आ सकता है कि इस सर्वातीत निर्गुण स्वरूप सत्य का उसके अपने इष्ट देवता (उपास्य) के साथ निश्चित रूप से क्या सम्बन्ध है। प्राचीनकाल में प्राय प्राकृतिक शक्तियों के अधिष्ठातृ देवताओं की श्रद्धापूर्वक आराधना? प्रार्थना और उपासना की जाती थी।वेदकालीन साधकगण अन्तकरण की शुद्धि तथा एकाग्रता के लिए जिन देवताओं की उपासना करते थे? उनमें प्रमुख वायु? यम? अग्नि? वरुण (जल का देवता)? शशांङ्क (चन्द्रमा) और सृष्टिकर्ता प्रजापति। इन देवताओं का आह्वान स्त्रोतगान? पूजा तथा यज्ञयागादि के द्वारा किया जाता था। उस काल के शिक्षित वर्ग के लोगों के मन को भी ईश्वर के यही रूप इष्ट थे। प्राय सर्वत्र? लोग साधन को ही साध्य (लक्ष्य) समझने की गलती करते हैं। परन्तु? यहाँ अर्जुन प्रामाणिक ज्ञान के आधार पर यह दर्शाता है कि वस्तुत अनन्त तत्त्व ही समस्त देवताओं का मूल स्वरूप है। तथापि उस अनन्त को अर्जुन भगवान् श्रीकृष्ण के रूप में देखता है।वेदान्त का यह सिद्धांत है कि एक ही परमात्मा विविध उपाधियों के द्वारा व्यक्त होकर इन देवताओं के रूप में प्राप्त होता है। वर्तमान काल में भी भक्तगण अपने इष्ट देवता के रूप में परमेश्वर का आह्वान कर अपने इष्ट को ही देवाधिदेव कहते हैं। इस देवेश को ही अर्जुन प्रणाम करता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.39।।किंच वाय्वादिस्त्वं शशाङ्कश्चन्द्रः प्रजापतिः कश्यादिर्हिरण्यगर्भान्तः पितामहस्य हिरण्यगर्भस्यापि पिता। तथाचइन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः इत्यादिमन्त्रब्राह्मणवादाः। यत एतादृशस्त्वं जगदुत्पत्त्यादिकर्ता सर्वेश्वरः सर्वज्ञः सर्वगम्यः सर्वात्माऽपरिच्छिन्नः सर्वनमस्कार्योऽपरिमितनमस्करोणापि मम तृप्तिर्नास्तीत्याशयेनाह -- नमोनमस्त इत्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.39।।वायुरिति। वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः। सूर्यादीनामप्युपलक्षणमेतत्। प्रजापतिर्विराट् हिरण्यगर्भश्च। प्रपितामहश्च पितामहस्य हिरण्यगर्भस्यापि पिता च त्वम्। यस्मादेवं सर्वदेवात्मकत्वात्त्वमेव सर्वैर्नमस्कार्योसि तस्मान्ममापि वराकस्य नमो नमस्ते तुभ्यमस्तु सहस्रकृत्वः। पुनश्च भूयोपि पुनरपि नमो नमस्ते। भक्तिश्रद्धातिशयेन नमस्कारेष्वलंप्रत्ययाभावोऽनया नमस्कारवृत्त्या सूच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.39।।सर्वदेवतात्मत्वेन स्तौति -- वायुरिति। प्रजापतिर्दक्षादिश्चतुर्मुखो वा। प्रपितामहश्चतुर्मुखपिता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.39।।वायुरिति। वायुः सर्वप्रेरकः सर्वप्राणरूपः? यमः सर्वनियमनः? अग्निः सर्वाधारः वरुणः जलाधिपः सर्वरसपूरकः? शशाङ्कः सर्वानन्दकरः? प्रजापतिः सर्वोत्पादकः। च पुनः प्रपितामहः ब्रह्मणोऽपि पिता अतः सर्वरूपस्त्वं तस्मात् पूर्वोक्ताः कथं तुभ्यं न नमस्कुर्युः। अतः सर्वरूपत्वादाधिदैविकत्वात् त्वमेव नमस्यः। अतोऽहमपि नमस्करोमि सहस्रकृत्वः सहस्रशः ते तुभ्यं नमो नमोऽस्तु। अस्त्वितिपदेन त्वमङ्गीकुर्विति ज्ञापितम्। पुनश्चाङ्गीकारानन्तरमपि भूयः वारंवारं ते नमो नमः करोमीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.39।।इतश्च त्वमेव सर्वैर्नमस्कार्यः सर्वदेवात्मकत्वादिति स्तुवन्स्वयमपि नमस्करोति -- वायुरिति। वाय्वादिरूपस्त्वमिति सर्वदेवतात्मकत्वोपलक्षणार्थमुक्तम्। प्रजापतिः पितामहस्तस्यापि जनकत्वात्प्रपितामहस्त्वम्। अतस्ते तुभ्यं सहस्रकृत्वः सहस्रशो नमोऽस्तु। भूयोपि पुनरपि सहस्रकृत्वो नमो नम इति भक्तिश्रद्धाभरातिरेकेण नमस्कारेषु तृप्तिमनधिगच्छन्बहुशः प्रणमति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.39।।वायुर्यम इति सर्वरूपत्वेऽप्येकस्याव्ययत्वमित्यैश्वर्यं वैराग्यं वा अतस्ते सहस्रकृत्वो नमो नम इति सभयं प्रणमति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.39।।तथा --, आप ही वायु? यम? अग्नि? जलके राजा वरुण? चन्द्रमा और कश्यपादि प्रजापति हैं और आप ही पितामहके भी पिता प्रपितामह हैं अर्थात् ब्रह्माके भी पिता हैं। आपको हजारों बार नमस्कार हो? नमस्कार हो फिर भी बारंबार आपको नमस्कार हो? नमस्कार हो। सहस्र शब्दसे कृत्वसुच् प्रत्यय कर देनेसे अनेकोंबार नमस्कार क्रियाके अभ्यास और आवृत्तिकी गणनाका प्रतिपादन हो जाता है परंतु फिर भी पुनश्च भूयोऽपि इन शब्दोंसे अर्जुन अतिशय श्रद्धा और भक्तिके कारण नमस्कार करताकरता मैं तृप्त नहीं हुआ हूँ ऐसा अपना भाव दिखलाता है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.39।। व्याख्या -- वायुः -- जिससे सबको प्राण मिल रहे हैं? मात्र प्राणी जी रहे हैं? सबको सामर्थ्य मिल रही है? वह वायु आप ही हैं।यमः -- जो संयमनीपुरीके अधिपति हैं और सम्पूर्ण संसारपर जिनका शासन चलता है? वे यम आप ही हैं।अग्निः -- जो सबमें व्याप्त रहकर शक्ति देता है? प्रकट होकर प्रकाश देता है और जठराग्निके रूपमें अन्नका पाचन करता है? वह अग्नि आप ही हैं।वरुणः -- जिसके द्वारा सबको जीवन मिल रहा है? उस जलके अधिपति वरुण आप ही हैं।शशाङ्क -- जिससे सम्पूर्ण ओषधियोंका? वनस्पतियोंका पोषण होता है? वह चन्द्रमा आप ही हैं।प्रजापतिः -- प्रजाको उत्पन्न करनेवाले दक्ष आदि प्रजापति आप ही हैं।प्रपितामहः -- पितामह ब्रह्माजीको भी प्रकट करनेवाले होनेसे आप प्रपितामह हैं।नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते -- इन्द्र आदि जितने भी देवता हैं? वे सबकेसब आप ही हैं। आप अनन्तस्वरूप हैं। आपकी मैं क्या स्तुति करूँ क्या महिमा गाऊँ मैं तो आपको हजारों बार नमस्कार ही कर सकता हूँ और कर ही क्या सकता हूँकुछ भी करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर तभीतक रहती है? जबतक अपनेमें करनेका बल अर्थात् अभिमान रहता है। जब अपनेमें कुछ भी करनेकी सामर्थ्य नहीं रहती? तब करनेकी जिम्मेवारी बिलकुल नहीं रहती। अब वह केवल नमस्कार ही करता है अर्थात् अपनेआपको सर्वथा भगवान्के समर्पित कर देता है। फिर करनेकरानेका सब काम शरण्य(भगवान्) का ही रहता है? शरणागतका नहीं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.39।।नमो नम इति। नमोनम इत्यनेन पौनःपुन्यं भक्त्यतिशयाविष्कारकम्। यदेव भगवता अतिक्रान्ताध्यायैरभ्यधायि स्वस्वरूपम्? तदेव अर्जुनः प्रत्यक्षोपलम्भविषयापन्नं स्तोत्रद्वारेण प्रकटयति इति तद्व्याख्यानं केवलं पौनरुक्त्यप्रसङ्गायेति विरम्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.39।।तस्य सर्वात्मत्वे हेत्वन्तरमाह -- किञ्चेति। कश्यपादिरित्यादिशब्देन विराड्दक्षादयो गृह्यन्ते। पितामहो ब्रह्मा तस्य पिता सूत्रात्मान्तर्यामी चेत्याह -- ब्रह्मणोऽपीति। सर्वदेवतास्त्वमेवेत्युक्ते फलितमाह -- नम इति। सहस्रकृत्व इति कृत्वसुचो विवक्षितमर्थमाह -- बहुश इति। पुनरुक्तितात्पर्यमाह -- पुनश्चेति। श्रद्धाभक्त्योरतिशयात्कृतेऽपि नमस्कारे परितोषाभावो बुद्धेरात्मनोऽलंप्रत्ययराहित्यं तद्दर्शनार्थं पुनरुक्तिरित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.37 -- 11.40।।सर्वे नमस्यन्ति [11।36] इत्येतद्युक्तमिति स्वयमेवोक्त्वाकस्माच्च ते न नमेरन् इति विरुद्धं कथं पृच्छति इत्यत आक्षेप एवायमिति ज्ञापयन् तन्निवर्त्याशङ्काप्रदर्शनपूर्वकमवतारयति -- कथमिति। इति शङ्कायामिति शेषः तत्तस्या उत्तरम्। महात्मन्नक्षुद्रचित्तेत्यल्पार्थप्रतीतिनिरासार्थमाह -- पूर्णश्चेति। आत्मा,जीव इति प्रतीतिं वारयितुमाह -- आत्मेति। उक्तो निरुक्तः। यद्यस्मात्। आप्नोतेर्मन्। पकारस्य च तकारः। आङ्पूर्वाद्दाञः स एव प्रत्ययः आकारलोपस्तत्वम्। आङ्पूर्वाददो मन्। तत्वं च। इह देहे। सन्ततो भावो नित्या सत्ता। आङ्पूर्वात्तनोतेर्ङ्मन्। सदसद्भावात्मकं विश्वं त्वमेवेति सत्तादिप्रदत्वादेवोच्यते। नत्वन्यथा? तथा सति उत्तरवाक्यविरोधात्? इति भावेन तत्पठित्वा सप्रमाणकं व्याचष्टे -- तत्परमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.37 -- 11.40।।कथं स्थाने इति तदाह -- कस्मादित्यादिना। पूर्णश्चासावात्मा चेति महात्मा। आत्मशब्दश्चोक्तो भारते -- यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह। यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते इति। तत्परं सदसतः परम्।असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्। [म.भा.1।1।23] इति भारते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.39।। --,वायुः त्वं यमश्च अग्निः वरुणः अपां पतिः शशाङ्कः चन्द्रमाः प्रजापतिः त्वं कश्यपादिः प्रपितामहश्च पितामहस्यापि पिता प्रपितामहः?
Chapter 11 (Part 14)
ब्रह्मणोऽपि पिता इत्यर्थः। नमो नमः ते तुभ्यम् अस्तु सहस्रकृत्वः। पुनश्च भूयोऽपि नमो नमः ते। बहुशो नमस्कारक्रियाभ्यासावृत्तिगणनं कृत्वसुचा उच्यते। पुनश्च भूयोऽपि इति श्रद्धाभक्त्यतिशयात् अपरितोषम् आत्मनः दर्शयति।।तथा --,
───────────────────
【 Verse 11.40 】
▸ Sanskrit Sloka: नम: पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व | अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व: ||
▸ Transliteration: namaḥ purastādatha pṛṣṭataste namo’stu te sarvata eva sarva | ananta-vīryāmita-vikramas tvaṁ sarvaṁ samāpnoṣi tato’si sarvaḥ ||
▸ Glossary: namaḥ: offering obeisances; purastāt: from the front; atha: also; pṛṣṭhataḥ: from behind; te: You; namo ‘stu: offer my respects; te: unto You; sarvata: from all sides; eva sarva: because You are everything; ananta vīrya: unlimited potency; amita vikramaḥ: unlimited force; tvaṁ: You; sarvaṁ: everything; samāpnoṣi: cover; tato ‘si: therefore You are; sarvaḥ : everything
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.40 Salutations to You, before and behind! Salutations to You on every side! O All! Infinite in power and Infinite in prowess, You are everything and everywhere.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.40।।हे सर्व आपको आगेसे नमस्कार हो पीछेसे नमस्कार हो सब ओरसे ही नमस्कार हो हे अनन्तवीर्य अमित विक्रमवाले आपने सबको समावृत कर रखा है अतः सब कुछ आप ही हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.40।। हे अनन्तसार्मथ्य वाले भगवन् आपके लिए अग्रत और पृष्ठत नमस्कार है? हे सर्वात्मन् आपको सब ओर से नमस्कार है। आप अमित विक्रमशाली हैं और आप सबको व्याप्त किये हुए हैं? इससे आप सर्वरूप हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.40 नमः salutation? पुरस्तात् (from) front? अथ also? पृष्ठतः (from) behind? ते to Thee? नमः salutation? अस्तु be? ते to Thee? सर्वतः on every side? एव even? सर्व O all? अनन्तवीर्य infinite power? अमितविक्रमः infinite in prowess? त्वम् Thou? सर्वम् all? समाप्नोषि pervadest? ततः wherefore? असि (Thou) art? सर्वः all.Commentary The words I prostrate myself before Thee? behind Thee and on every side indicate the allpervading nature of the Lord. How can the allpervading Self have front and back Finite objects only have front and back sides Arjuna imagined that there were front and back sides to the Lord and so prostrated himself in his extreme faith and devotion.O All Nothing exists without Thee. As the Self is allpervading? He is called the All. There is nothing except the Self.On every side? as Thou art present everywhere or in all arters.One may be powerful but may not possess the courage to kill the enemies or he may be endowed with a mild form of courge but the Lord is infinite in courage and infinite in power.Pervadest by Thy One Self.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.40. Salutation to You in the front and behind; salutation to You, just on all sides, O One Who are All ! You are of infinite might and of immeasurable powers; and You pervade all and hence You are all.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.40 Salutations to Thee in front and on every side, Thou who encompasseth me round about. Thy power is infinite; Thy majesty immeasurable; thou upholdest all things; yea,Thou Thyself art All.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.40 (a) Salutation to You from before and behind! Salutation to You from all sides, O All!৷৷.
(b) ৷৷. O You of infinite prowess and heroic action which are measureless! You pervade all beings and therefore are all.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.40 Salutation to You in the East and behind. Salutation be to You on all sides in deed, O All! You are possessed of infinite strength and infinite heroism. You pervade everything; hence You are all!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.40 Salutations to Thee, in front and behind! Salutations to Thee on every side! O All!! Thou infinite in power and prowess, pervadest all; wherefore Thou art all.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.39-40 Namo namah etc. Salutation and salutation : This repetition reveals the intensity of the devotion. What has been taught by the past chapters by the Bhagavat regarding His own intrinsic nature, Arjuna - witnessing the same by perception - declares it openly by way of devotional hymn. Hence, to comment on the hymn would symply amount to the repetition [of what has already been said by us]. Hence, let me (11.Ag.) abstain [from commenting on it].
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.40 You, of infinite prowess and measureless heroic action, pervade all beings as their very Self and therefore, are, in reality all of them. Terms, naming all other entities, are truly naming You; for they, both sentient as well as non-sentient, constitute Your body, and as such are just Your modes. Therefore You alone, having them all as Your modes, are signified by all terms standing for them. In the texts, 'O by You of infinite form, is the cosmos pervaded' (11.38) and 'You pervade all, and hence are all' (11.40), it is clearly stated that the pervasion as the Self is the only rationale for speaking of them as one with You, in the sense of co-ordinate predication as in the text, 'You are the imperishable and also being and non-being' (11.37) and 'You are Vayu, Yama and Agni' (11.39).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.40 Namah, salutation to You; purastat, in the East; atha, and; even prsthatah, behind. Salutation be sarvatah, on all sides; eva, indeed; te, to You who exist everywhere; sarva, O All! Tvam, You; are ananta-virya-amita-vikramah, possessed of infinite strength and infinite heroism. virya is strength, and vikramah is heroism. Someone though possessing strength for the use of weapons etc. [Ast. reads 'satru-vadha-visaye, in the matter of killing an enemy'.-Tr.] may lack heroism or have little heroism. But You are possessed of infinite strength and infinite heroism. Samapnosi, You pervade, interpenetrate; sarvam, everything, the whole Universe, by Your single Self. Tatah, hence; asi, You are; sarvah, All, i.e., no entity exists without You. 'Since I am guilty of not knowing Your greatness, therefore,'-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.40।। परमात्मा सर्वत्र व्याप्त है अन्तर्बाह्य? अधउर्ध्व? समस्त दिशाओं में व्याप्त है। उससे रिक्त कोई स्थान नहीं है। यह कोई अकेले अर्जुन का मौलिक विचार नहीं है। उपनिषद् के महान् ऋषिगण तो इस अनुभव में अखण्ड वास करते थे।जिस परमात्मा को अर्जुन अपने मन से सब दिशाओं में प्रणाम करता है? वह परमात्मा न केवल आकाश के समान सर्वव्यापक ही है? वरन् वह सम्पूर्ण सार्मथ्य एवं विक्रम का स्रोत भी है। जहाँ कहीं भी कार्य़ करने की प्रेरणा या सफलता पाने की क्षमता दृष्टिगोचर होती हैं? वह सब अनन्तवीर्य और अमितविक्रम परमात्मा की ही एक झलक है? किरण है। परमात्मा सत्स्वरूप से सर्वत्र समस्त वस्तुओं और प्राणियों में विद्यमान है क्योंकि सत् के बिना किसी भी वस्तु का अस्तित्व नहीं हो सकता? इसलिए? वस्तुत परमात्मा ही सर्वरूप है। जल ही सब तरंगें हैं और मिट्टी ही सब घट है।क्योंकि आपके महात्म्य के अज्ञान के कारण? पूर्व में मैंने आपके प्रति अपराध किया है? इसलिए
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.40।।पुरस्तात् पूर्वस्यां दिशि तत्तद्रूपेण स्थिताय ते तुभ्यम्। अथ पृष्ठस्ते तुभ्यं नमोस्तु। सर्वत एव सर्वासु दिक्षु स्थिताय। हे सर्व। यद्वा पुरस्तात्कर्मणमादौ पृष्ठस्तेषां समाप्तौ सर्वतः मध्येऽपि ते नमोस्ित्वति। अस्मिन्पक्षे कर्मणामित्यध्याहारदोषः सर्वत इत्यादि संकोचे मानाभावश्च बोध्यः। हे सर्वेत्युक्तं निरुपयति। अनन्तं सामर्थ्य यस्य? अमितः पराक्रमः शस्त्रादिविषये यस्य अनन्तवीर्यश्चासौ अमितविक्रमश्च सः त्वं हेऽनन्तवीर्येति व्यस्तपक्षस्त्वाचार्यैः गौरवात् विशेषाभावाच्च न प्रदर्शितः। सर्वमखिलं विश्वं सम्यगाप्नोषि व्याप्नोषि। यतस्ततोऽसि सर्वः। त्वया विना भूतं न किंचिदस्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.40।।तुभ्यं पुरस्तात् अग्रभागे नमोस्तु? तुभ्यं पुरो नमःस्तादिति वा। अथशब्दः समुच्चये। पृष्ठतोऽपि तुभ्यं नमःस्तात् नमोस्तु। ते तुभ्यं सर्वत एव सर्वासु दिक्षु स्थिताय। हे सर्व? वीर्यं शारीरबलं विक्रमः शिक्षा शस्त्रप्रयोगकौशलंएकं वीर्याधिकं मन्य उतैकं शिक्षयाधिकम् इत्युक्तेर्भीमदुर्योधनयोरन्येषु च एकैकं व्यवस्थितं। त्वं तु अनन्तवीर्यश्चामितविक्रमश्चेति समस्तमेकं पदं। अनन्तवीर्येति संबोधनं वा। सर्वं समस्तं जगत्समाप्नोषि सम्यगेकेन सद्रूपेणाप्नोषि सर्वात्मना व्याप्नोषि ततस्तस्मात्सर्वोऽसि। त्वदतिरिक्तं किमपि नास्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.40।।हे अनन्तवीर्य? यतः सर्वं समाप्नोषि एकीभावेनासमन्ताद्व्याप्नोषि ततो हेतोः सर्व इति तव नाम। पुरस्तात्कर्मणामादौ। पृष्ठतस्तेषां समाप्तौ। सर्वतो मध्येऽपि ते नमोऽस्तु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.40।।किञ्च -- नम इति। हे सर्व सर्वात्मन् पुरस्तात् पूर्वदिशि पृष्ठतः पश्चिमायां सर्वतः दक्षिणोत्तरकोणादिषु सर्वासु दिक्षु ते नमो नम एवाऽस्तु।किमासनं ते गरुडासनाय इत्यादिवाक्यैर्नान्यत्किञ्चिदपि कर्तुं शक्यमिति भावः। इदमेवैवकारेण व्यञ्जितम्। यद्वा पृष्ठतः पश्चात् सर्वतः दक्षिणोत्तरादिभागेषु नमः कृतो नमस्कारः ते पुरस्तादेव पूर्वभाग एव सन्मुख एवाऽस्त्विति वाऽर्थः। ननु पश्चाद्भागकृतो नमस्कारः कथं पूर्वभागीयः स्यादत् आह -- अनन्तेति। अनन्तं वीर्यं सामर्थ्यम्? अभितो बहुतरः पराक्रमो यस्य तादृशस्त्वं सर्वं जगत् समाप्नोषि तत्तद्रूपनामभेदेन सर्वरूपो भूत्वा वर्तसे? ततः सर्वः सर्वरूपस्त्वमसि? अतः पृष्ठतोऽपि नमस्कृतौ पूर्वभागो न बाध्यत इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.40।।किंच -- नम इति। हे सर्व सर्वात्मन्? सर्वास्वपि दिक्षु तुभ्यं नमोऽस्तु। सर्वात्मकत्वमुपपादयन्नाह। अनन्तं वीर्यं सामर्थ्यं यस्य? तथाप्यमितो विक्रमः पराक्रमो यस्य सः? एंवभूतस्त्वं सर्वं विश्वं सम्यगन्तर्बहिश्च सर्वात्मधापि समाप्नोषि व्याप्नोषि सुवर्णमिव कटककुण्डलादि स्वकार्यं व्याप्य वर्तसे सर्वरूपोऽसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.40।।सर्वरूपत्वेन वीर्यं तस्योपपादयति -- परं ब्रह्म तु कृष्णो हि सच्चिदानन्दकं बृहत्। द्विरूपं तद्धि सर्वं स्यादेकं तस्माद्विलक्षणम् इति वाक्यैरेकमपि तत्सर्वमित्याशयेनानन्तवीर्य हे सर्वेति सम्बोधयति। विश्वं व्याप्नोषि सर्वप्रपञ्चरूपस्त्वमेवेत्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.40।।तथा --, आपको आगसे अर्थात् पूर्वदिशामें और पीछेसे भी नमस्कार है। हे सर्वरूप आपको सब ओरसे नमस्कार है अर्थात् सर्वत्र स्थित हुए आपको सब दिशाओंमें नमस्कार है। आप अनन्तवीर्य और अपार पराक्रमवाले हैं। वीर्य सामर्थ्यको कहते हैं और विक्रम पराक्रमको। कोई व्यक्ति सामर्थ्यवान् होकर भी शस्त्रादि चलानेमें पराक्रम नहीं दिखा सकता? अथवा मन्दपराक्रमी होता है। परन्तु आप तो अनन्तवीर्य और अमित पराक्रमसे युक्त हैं। इसलिये आप अनन्तवीर्य और अमितपराक्रमी हैं। आप अपने एक स्वरूपसे सारे जगत्को व्याप्त किये हुए स्थित हैं? इसलिये आप सर्वरूप हैं? अर्थात् आपसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.40।। व्याख्या -- नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व -- अर्जुन भयभीत हैं। मैं क्या बोलूँ -- यह उनकी समझमें नहीं आ रहा है। इसलिये वे आगेसे? पीछेसे सब ओरसे अर्थात् दसों दिशाओंसे केवल नमस्कारहीनमस्कार कर रहे हैं।अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वम् -- अनन्तवीर्य कहनेका तात्पर्य है कि आप तेज? बल आदिसे भी अनन्त हैं और अमितविक्रम कहनेका तात्पर्य है कि आपके पराक्रमयुक्त संरक्षण आदि कार्य भी असीम हैं। इस तरह आपकी शक्ति भी अनन्त है और पराक्रम भी अनन्त है।सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः -- आपने सबको समावृत कर रखा है अर्थात् सम्पूर्ण संसार आपके अन्तर्गत है। संसारका कोई भी अंश ऐसा नहीं है? जो कि आपके अन्तर्गत न हो।अर्जुन एक बड़ी अलौकिक? विलक्षण बात देख रहे हैं कि भगवान् अनन्त सृष्टियोंमें परिपूर्ण? व्याप्त हो रहे हैं? और अनन्त सृष्टियाँ भगवान्के किसी अंशमें हैं। सम्बन्ध -- अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्से प्रार्थना करते हुए क्षमा माँगते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.40।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.40।।विधान्तरेण भगवन्तं स्तुत्या नमस्कुर्वन्नभिमुखीकरोति -- तथेति। यस्यां दिशि सवितोदेति सा पूर्वा दिगुच्यते। तस्यां व्यवस्थितं सर्वं त्वमेव तस्मै ते तुभ्यं ननोऽस्त्वित्याह -- नम इति। अथशब्दः समुच्चये। पश्चादपि स्थितं सर्वं त्वमेव तस्मै ते तुभ्यं नमोऽस्त्वित्याह -- अथेति। किं बहुना यावन्त्यो दिशस्तत्र सर्वत्र यद्वर्तते तदशेषं त्वमेव तस्मै तुभ्यं प्रह्वीभावः स्यादित्याह -- नमोऽस्त्विति। फलितं सर्वात्मत्वं सूचयति -- हे सर्वेति। वीर्यविक्रमयोर्न पौनरुक्त्यमित्याह -- वीर्यमित्यादिना। वीर्यवतो विक्रमाव्यभिचारादर्थपौनरुक्त्यमाशङ्क्याह -- वीर्यवानिति। भगवति लोकतो विशेषमाह -- त्वं त्विति। उक्तं सर्वात्मत्वं प्रपञ्चयति -- सर्वमिति। सप्रपञ्चत्वं वारयति -- त्वयेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.37 -- 11.40।।सर्वे नमस्यन्ति [11।36] इत्येतद्युक्तमिति स्वयमेवोक्त्वाकस्माच्च ते न नमेरन् इति विरुद्धं कथं पृच्छति इत्यत आक्षेप एवायमिति ज्ञापयन् तन्निवर्त्याशङ्काप्रदर्शनपूर्वकमवतारयति -- कथमिति। इति शङ्कायामिति शेषः तत्तस्या उत्तरम्। महात्मन्नक्षुद्रचित्तेत्यल्पार्थप्रतीतिनिरासार्थमाह -- पूर्णश्चेति। आत्मा जीव इति प्रतीतिं वारयितुमाह -- आत्मेति। उक्तो निरुक्तः। यद्यस्मात्। आप्नोतेर्मन्। पकारस्य च तकारः। आङ्पूर्वाद्दाञः स एव प्रत्ययः आकारलोपस्तत्वम्। आङ्पूर्वाददो मन्। तत्वं च। इह देहे। सन्ततो भावो नित्या सत्ता। आङ्पूर्वात्तनोतेर्ङ्मन्। सदसद्भावात्मकं विश्वं त्वमेवेति सत्तादिप्रदत्वादेवोच्यते। नत्वन्यथा? तथा सति उत्तरवाक्यविरोधात्? इति भावेन तत्पठित्वा सप्रमाणकं व्याचष्टे -- तत्परमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.37 -- 11.40।।कथं स्थाने इति तदाह -- कस्मादित्यादिना। पूर्णश्चासावात्मा चेति महात्मा। आत्मशब्दश्चोक्तो भारते -- यच्चाप्नोति यदादत्ते यच्चात्ति विषयानिह। यच्चास्य सन्ततो भावस्तस्मादात्मेति भण्यते इति। तत्परं सदसतः परम्।असच्च सच्चैव च यद्विश्वं सदसतः परम्। [म.भा.1।1।23] इति भारते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.40।। --,नमः पुरस्तात् पूर्वस्यां दिशि तुभ्यम्? अथ पृष्ठतः ते पृष्ठतः अपि च ते नमोऽस्तु? ते सर्वत एव सर्वासु दिक्षु सर्वत्र स्थिताय हे सर्व। अनन्तवीर्यामितविक्रमः अनन्तं वीर्यम् अस्य? अमितः विक्रमः अस्य। वीर्यं सामर्थ्यं विक्रमः पराक्रमः। वीर्यवानपि कश्चित् शत्रुवधादिविषये न पराक्रमते? मन्दपराक्रमो वा। त्वं तु अनन्तवीर्यः अमितविक्रमश्च इति अनन्तवीर्यामितविक्रमः। सर्वं समस्तं जगत् समाप्नोषि सम्यक् एकेन आत्मना व्याप्नोषि यतः? ततः तस्मात् असि भवसि सर्वः त्वम्? त्वया विनाभूतं न किञ्चित् अस्ति इति अभिप्रायः।।यतः अहं त्वन्माहात्म्यापरिज्ञानात् अपराद्धः? अतः --,
───────────────────
【 Verse 11.41 】
▸ Sanskrit Sloka: सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति | अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ||
▸ Transliteration: sakheti matvā prasabhaṁ yaduktaṁ he kṛṣṇa he yādava he sakheti | ajānatā mahimānaṁ tavedaṁ mayā pramādāt praṇayena vāpi ||
▸ Glossary: sakha: friend; iti: thus; matvā: thinking; prasabhaṁ: easy familiarity; yat: whatever; uktaṁ: says; he Kṛṣṇa: O Kṛṣṇa; he yādava: O Yadava; he sakhe ‘ti: O my dear friend; ajānatā: without knowing; mahimānaṁ: glories; tava: Your; idaṁ: this; mayā: by me; pramādāt: out of foolishness; praṇayena: out of love; vā ‘pi: either
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.41 Whatever I have rashly says from carelessness or love, addressing You as Kṛṣṇa, Yādava, my friend regarding You merely as a friend, unaware of this greatness of Yours.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.41।।आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक (बिना सोचेसमझे) हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ कहा है और हे अच्युत हँसीदिल्लगीमें? चलतेफिरते? सोतेजागते? उठतेबैठते? खातेपीते समयमें अकेले अथवा उन सखाओं? कुटुम्बियों आदिके सामने मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार किया गया है? वह सब अप्रमेयस्वरूप आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.41।। हे भगवन् आपको सखा मानकर आपकी इस महिमा को न जानते हुए मेरे द्वारा प्रमाद से अथवा प्रेम से भी हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ बलात् कहा गया है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.41 सखा friend? इति as? मत्वा regarding? प्रसभम् presumptuously? यत् whatever? उक्तम् said? हे कृष्ण O Krishna? हे यादव O Yadava? हे सखा O friend? इति thus? अजानता unknowing? महिमानम् greatness? तव Thy? इदम् this? मया by me? प्रमादात् from carelessness? प्रणयेन due to love? वा or? अपि even.No Commentary.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.41. Taking You for a [mere] companion, not knowing this greatness of Yours, and out of my carelessness or through even affection, whatever I have importunately called You as O Krsna, O Yadava, O Comrade; and,
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.41 Whatever I have said unto Thee in rashness, taking Thee only for a friend and addressing Thee as O Krishna! O Yadava! O Friend!' in thoughtless familiarity, no understanding Thy greatness;
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.41 Unaware of this majesty of Yours, and either from negligence or love, or considering You to be a friend, whatever I have rudely said as 'O Krsna, O Yadava, O Comrade.'
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.41 Without knowing this greatness of Yours, whatever was said by me (to You) rashly, through inadvertence or even out of intimacy, thinking (You to be) a friend, addressing (You) as 'O krsna,' 'O Yadava,' 'O friend,' etc.-.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.41 Whatever I have presumptuously said from carelessness or love, addressing Thee as O Krishna! O Yadava! O Friend! regarding Thee merely as a friend, unknowing of this, Thy greatness.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.41 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.41 - 11.42 Infinite power, boundless valour, being the Inner Self of everything, being the creator etc., these constitute Your majesty. Being ignorant of this, and considering You only as a friend, and out of conseent love, or negligence born of life-long familiarity, whatever has been said rudely, without showing courtesy, such as 'O Krsna, O Yadava, O Comrade'; and whatever disrespect has been shown to You in jest, while playing or resting, while sitting or eating, while alone or in the sight of others - for all these I beseech forgiveness of You who are in incomprehensible.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.41 Like a fool, ajanata, without knowing-. Not knowing what? In answer he says: idam, this; mahimanam, greatness-the Cosmic form; tava, of Yours, of God; yat, whatever; uktam, was said; maya, by me (to You); prasabham, rashly, slightingly; pramadat, through inadvertence, being in a distracted state of mind; va api, or even; pranayena, out of intimacy-itimacy is the familiarity arising out of love; whatever I have said because of that reason; erroneously matva, thinking (You); sakha iti, to be a friend, of the same age; iti, addressing You as, 'O Krsna,' 'O Yadava,' 'O friend,'-. In the clause, 'tava idam mahimanam, ajanata, without knowing this greatness of Yours,' idam (this) (in the neutor gender) is connected with mahimanam (greatness) (in masculine gender) by a change of gender. If the reading be tava imam, then both the words would be in the same gender.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.41।। See commentary under 11.42
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.41।।एवं स्तुत्वा स्वापराधमज्ञानकृतं क्षमापयते। सखा समानवया इति मत्वा ज्ञात्वा विपरीतबुद्य्धा प्रसभं प्रसह्यंभिभूय यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति। सखेति संधिरार्षः। तत्त्वां क्षामये इत्युत्तरेण संबन्धः। क्षमायोग्यतां सूचयन् अपराधस्याज्ञानपूर्वकत्वमाह। अजानता तव महिमानं माहात्म्यं तवेदमीश्वरस्य विश्वरुपजानता अज्ञानिना मूढेन। इममिति पाठे तु इमं महिमानमिति सामानधिकरण्यम्। आविर्भूतैश्वर्यस्याप्यज्ञाने हेतुमाह। प्रमादात् विक्षिप्तचित्ततया प्रणयेन स्नेहनिमित्तविश्रम्भेण वापि मया यदुक्तमिति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.41।।यतोऽहं त्वन्माहात्म्यापरिज्ञानादपराधानजस्रमकार्षं ततः परमकारुणिकं त्वां प्रणम्यापराधक्षमां कारयामीत्याह द्वाभ्यां -- सखेतीत्यादिना। त्वं मम सखा समानवया इति मत्वा प्रसभं,स्वोत्कर्षख्यापनरूपेणाभिभवेन यदुक्तं मया तदेवं विश्वरूपं। तथा महिमानमैश्वर्यातिशयमजानता। पुंलिङ्गपाठे इमं विश्वरूपात्मकं महिमानमजानता। प्रमादाच्चित्तविक्षेपात्प्रणयेन स्नेहेन वापि। किमुक्तमित्याह। हे कृष्ण हे यादव हे सखे इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.41।।एवं स्तुत्वा स्वापराधान्क्षमापयते -- सखेतीति। अयं मम सखा इति मत्वा प्रसभं स्वोत्कर्षाविष्करणपूर्वकं यत् मयोक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखे इति। इतिशब्देन संधिरार्षः। कुत उक्तम्। तव इदमेवंविधं महिमानं माहात्म्यमजानता कदाचित्प्रमादाच्चित्तविक्षेपात्कदाचित्प्रणयेन स्नेहेन च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.41।।एवं नमस्कृत्य पूर्वाज्ञानजापराधान् क्षमापयति -- सखेति द्वयेन। मया तव इदं पुरुषोत्तमत्वेन सर्वरूपात्मकरूपं महिमानमजानता प्रमादादनवधानतया प्रणयेन स्नेहेन वाऽपि प्रसभं बलात्कारेण अकार्येषु योजनार्थं हे कृष्ण इति नामत्वेन? न तु सदात्मकत्वेन हे यादव इति तत्कुलोद्भवत्वेन? न तु तदुद्धारार्थप्रकटत्वेन हे सखेति मित्रत्वेन लौकिकबुद्ध्या? न तु परमात्मत्वेन यदुक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.41।।इदानीं भगवन्तं क्षमापयति -- सखेति द्वाभ्याम्। त्वां प्राकृतः सखेति मत्वा प्रसभं हठेन तिरस्कारेण यदुक्तं तत्क्षामये त्वामित्युत्तरेणान्वयः। किं तत्। हे कृष्ण? हे यादव? हे सखेति। संधिरार्षः। प्रसभोक्तौ हेतुःतव महिमानमिदं च विश्वरूपमजानता मया प्रमादात्प्रणयेन स्नेहेनापि वा यदुक्तमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.41।।अक्षरैश्वर्यादिगुणमहिमानं परमं तं दृष्ट्वा क्षमापयति -- सखेति। तव महिमानं अलौकिकमाहात्म्यश्रियं अतिशयेनाजानता मया यदुक्तं हे यादव हे सखेति तत्क्षामये त्वामित्यग्रिमेणान्वयः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.41।।क्योंकि मैं आपकी महिमाको न जाननेका अपराधी रहा हूँ? इसलिये --, आपकी महिमाको अर्थात् आप ईश्वरके इस विश्वरूपको न जाननेवाले मुझ मूढ़द्वारा विपरीत बुद्धिसे आपको मित्रसमान अवस्थावाला समझकर जो अपमानपूर्वक हठसे हे कृष्ण हे यादव हे सखे इत्यादि वचन कहे गये हैं -- तव इदं महिमानम् अजानता इस पाठमें इदम् शब्द नपुंसक लिङ्ग है और महिमानम् शब्द पुंल्लिङ्ग है? अतः इनका आपसमें वैयधिकरण्यसे विशेष्यविशेषणभावसम्बन्ध है। यदि इदम् की जगह इमम् पाठ हो तो सामानाधिकरण्यसे सम्बन्ध हो सकता है। इसके सिवा प्रमादसे यानी विक्षिप्तचित्त होनेके कारण अथवा प्रणयसे भी -- स्नेहनिमित्तक विश्वासका नाम प्रणय है? उसके कारण भी मैंने जो कुछ कहा है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.41।। व्याख्या -- [जब अर्जुन विराट् भगवान्के अत्युग्र रूपको देखकर भयभीत होते हैं? तब वे भगवान्के कृष्णरूपको भूल जाते हैं और पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं परन्तु जब उनको भगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति आती है कि वे ये ही हैं? तब भगवान्के प्रभाव आदिको देखकर उनको सखाभावसे किये हुए पुराने व्यवहारकी याद आ जाती है और उसके लिये वे भगवान्से क्षमा माँगते हैं।]सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति -- जो बड़े आदमी होते हैं? श्रेष्ठ पुरुष होते हैं? उनको साक्षात् नामसे नहीं पुकारा जाता। उनके लिये तो आप? महाराज आदि शब्दोंका प्रयोग होता है। परन्तु मैंने आपको कभी हे कृष्ण कह दिया? कभी हे यादव कह दिया और कभी हे सखे कह दिया। इसका कारण क्या था अजानता महिमानं तवेदम् (टिप्पणी प0 603.1) इसका कारण यह था कि मैंने आपकी ऐसी महिमाको और स्वरूपको जाना नहीं कि आप ऐसे विलक्षण हैं। आपके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं -- ऐसा मैं पहले नहीं जानता था। आपके प्रभावकी तरफ मेरी दृष्टि ही नहीं गयी। मैंने कभी सोचासमझा ही नहीं कि आप कौन हैं और कैसे हैं।यद्यपि अर्जुन भगवान्के स्वरूपको? महिमाको? प्रभावको पहले भी जानते थे? तभी तो उन्होंने एक अक्षौहिणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्को स्वीकार किया था तथापि भगवान्के शरीरके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड यथावकाश स्थित हैं -- ऐसे प्रभावको? स्वरूपको? महिमाको अर्जुनने पहले नहीं जाना था। जब भगवान्ने कृपा करके विश्वरूप दिखाया? तब उसको देखकर ही अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के प्रभावकी तरफ गयी और वे भगवान्को कुछ जानने लगे। उनका यह विचित्र भाव हो गया कि कहाँ तो मैं और कहाँ ये देवोंके देव परन्तु मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक? बिना सोचेसमझे? जो मनमें आया? वह कह दिया -- मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।। बोलनेमें मैंने बिलकुल ही सावधानी नहीं बरती वास्तवमें भगवान्की महिमाको सर्वथा कोई जान ही नहीं सकता क्योंकि भगवान्की महिमा अनन्त है। अगर वह सर्वथा जाननेमें आ जायगी तो उसकी अनन्तता नहीं रहेगी? वह सीमित हो जायगी। जब भगवान्की सामर्थ्यसे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंका भी अन्त नहीं है? तब भगवान् और उनकी महिमाका अन्त आ ही कैसे सकता है अर्थात् आ ही नहीं सकता।यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु -- मैंने आपको बराबरीका साधारण मित्र समझकर हँसीदिल्लगी करते समय? रास्तेमें चलतेफिरते समय? शय्यापर सोतेजागते समय? आसनपर उठतेबैठते समय? भोजन करते समय जो कुछ अपमानके शब्द कहे? आपका असत्कार किया अथवा हे अच्युत आप अकेले थे? उस समय या उन सखाओं? कुटुम्बीजनों सभ्य व्यक्तियों आदिके सामने मैंने आपका जो कुछ तिरस्कार किया है? वह सब मैं आपसे क्षमा करवाता हूँ -- एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्। अर्जुन और भगवान्की मित्रताका ऐसा वर्णन आता है कि जैसे दो मित्र आपसमें खेलते हैं? ऐसे ही अर्जुन भगवान्के साथ खेलते थे। कभी स्नान करते तो अर्जुन हाथोंसे भगवान्के ऊपर जल फेंकते और भगवान् अर्जुनके ऊपर। कभी अर्जुन भगवान्के पीछे दौड़ते तो कभी भगवान् अर्जुनके पीछे दौड़ते। कभी दोनों आपसमें हँसतेहँसाते। कभी दोनों परस्पर अपनीअपनी विशेष कलाएँ दिखाते। कभी भगवान् सो जाते तो अर्जुन कहते -- तुम इतने फैलकर सो गये हो? क्या कोई दूसरा नहीं सोयेगा तुम अकेले ही हो क्या कभी भगवान् आसनपर बैठ जाते तो अर्जुन कहते -- आसनपर तुम अकेले ही बैठोगे क्या और किसीको बैठने दोगे कि नहीं अकेले ही आधिपत्य जमा लिया जरा एक तरफ तो खिसक जाओ। इस प्रकार अर्जुन भगवान्के साथ बहुत ही घनिष्ठताका व्यवहार करते थे (टिप्पणी प0 603.2)। अब अर्जुन उन बातोंको याद करके कहते हैं कि हे भगवन् मैंने आपके न जाने कितनेकितने तिरस्कार किये हैं। मेरेको तो सब याद भी नहीं हैं। यद्यपि आपने मेरे तिरस्कारोंकी तरफ खयाल नहीं किया? तथापि मेरे द्वारा आपके बहुतसे तिरस्कार हुए हैं? इसलिये मैं अप्रमेयस्वरूप आपसे सब तिरस्कार क्षमा करवाता हूँ। भगवान्को,अप्रमेय कहनेका तात्पर्य है कि दिव्यदृष्टि होनेपर भी आप दिव्यदृष्टिके अन्तर्गत नहीं आते हैं।, सम्बन्ध -- अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्की महत्ता और प्रभावका वर्णन करके पुनः क्षमा करनेके लिये प्रार्थना करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.41।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.41।।अज्ञाननिमित्तमपराधं क्षमापयति -- यत इति। इदं शब्दार्थमाह -- विश्वरूपमिति। नहीदमित्यस्य महिमानमित्यस्य च सामानाधिकरण्यं लिङ्गव्यत्ययादित्याह -- तवेति। पाठान्तरसंभावनायां सामानाधिकरण्योपपत्तिमाह -- तवेत्यादिना। यदुक्तवानस्मि तदहं क्षामये त्वामिति संबन्धः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.41।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.41।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.41।। --,सखा समानवयाः इति मत्वा ज्ञात्वा विपरीतबुद्ध्या प्रसभम् अभिभूय प्रसह्य यत् उक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति च अजानता अज्ञानिना मूढेन किम् अजानता इति आह -- महिमानं माहात्म्यं तव इदम् ईश्वरस्य विश्वरूपम्। तव इदं महिमानम् अजानता इति वैयधिकरण्येन संबन्धः। तवेमम् इति पाठः यदि अस्ति? तदा सामानाधिकरण्यमेव। मया प्रमादात् विक्षिप्तचित्ततया? प्रणयेन वापि? प्रणयो नाम स्नेहनिमित्तः विस्रम्भः? तेनापि कारणेन यत् उक्तवान् अस्मि।।
───────────────────
【 Verse 11.42 】
▸ Sanskrit Sloka: यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु | एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ||
▸ Transliteration: yac cāvahāsārtham asatkṛto’si vihāraśayyāsana bhojaneṣu | eko’tha va’py acyuta tat samakṣaṁ tat kṣāmaye tvām aham aprameyam ||
▸ Glossary: yat: whatever; ca: also; avahāsārthum: for joking; asatkṛtaḥ: dishonor; asi: have been done; vihāra: in relaxation; śayyā: while lying on the bed; āsana: in a sitting place; bhojaneṣu: or while eating together; ekaḥ: alone; athava: or; api: others; acyuta: O infallible one; tatsamakṣaṁ: in their presence; tat: all those; kṣāmaye: excuse; tvām: from You; aham: I; aprameyam: immeasurable
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.42 In whatever way I may have insulted You in fun, while at play, resting, sitting or at meals, when alone with You or in company, O Acyuta, O immeasurable One, I implore You to forgive me.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.42।।आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक (बिना सोचेसमझे) हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ कहा है और हे अच्युत हँसीदिल्लगीमें? चलतेफिरते? सोतेजागते? उठतेबैठते? खातेपीते समयमें अकेले अथवा उन सखाओं? कुटुम्बियों आदिके सामने मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार किया गया है? वह सब अप्रमेयस्वरूप आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.42।। और? हे अच्युत जो आप मेरे द्वारा हँसी के लिये बिहार? शय्या? आसन और भोजन के समय अकेले में अथवा अन्यों के समक्ष भी अपमानित किये गये हैं? उन सब के लिए अप्रमेय स्वरूप आप से मैं क्षमायाचना करता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.42 यत् whatever? च and? अवहासार्थम् for the sake of fun? असत्कृतः disrespected? असि (Thou) art? विहारशय्यासनभोजनेषु while at play? on bed? while sitting or at meals? एकः (when) one? अथवा or? अपि even? अच्युत O Krishna? तत् so? समक्षम् in company? तत् that? क्षामये implore to forgive? त्वाम् Thee? अहम् I? अप्रमेयम् immeasurable.Commentary Arjuna? beholding the Cosmic Form of Lord Krishna? seeks forgiveness for his past familiar conduct. He says? I have been stupid. I have treated Thee with familiarity? not knowing Thy greatness. I have taken Thee as my friend on account of misconception. I have behaved badly with Thee. Thou art the origin of this universe and yet I have joked with Thee. I have taken undue liberties with Thee. Kindly forgive me? O Lord.Tat All those offences.Achyuta He who is unchanging.In company In the presence of others.Aprameyam Immeasurable. He Who has unthinkable glory and splendour.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.42. Whatever disrespect was shown by me to You, to make fun of You in the course of play, or while on the bed, or on the seat, or at meals, either alone, or in the presence of repectable persons - for that I beg pardon of You, the Unconceivable One, O Acyuta !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.42 Whatever insult I have offered to Thee in jest, in sport or in repose, in conversation or at the banquet, alone or in a multitude, I ask Thy forgiveness for them all, O Thou Who art without an equal!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.42 And whatever disrespect has been shown to You in jest, while playing, resting, while sitting or eating, while alone or in the sight of others, O Acyuta - I implore You for forgiveness, You who are incomprehensible.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.42 And that You have been discourteously treated out of fun-while walking, while on a bed, while on a seat, while eating, in privacy, or, O Acyuta, even in public, for that I beg pardon of You, the incomprehensible One.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.42 In whatever way I may have insulted Thee for the sake of fun, while at play, reposing, sitting or at meals, when alone (with Thee), O Krishna, or in company that I implore Thee, immeasurable one, to forgive.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.42 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.41 - 11.42 Infinite power, boundless valour, being the Inner Self of everything, being the creator etc., these constitute Your majesty. Being ignorant of this, and considering You only as a friend, and out of conseent love, or negligence born of life-long familiarity, whatever has been said rudely, without showing courtesy, such as 'O Krsna, O Yadava, O Comrade'; and whatever disrespect has been shown to You in jest, while playing or resting, while sitting or eating, while alone or in the sight of others - for all these I beseech forgiveness of You who are in incomprehensible.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.42 And, yat, that; asi, You have been; asatkrtah, discourteously treated, slighted; avahasa-artham, out of fun, with a veiw to mocking;-where?-in these, Acyuta, viz vihara-sayya-asana-bhojanesu, while walking [Walking, i.e. sports or exercise], while on a bed, while on a seat, and while eating;-that You have been insulted ekah, in privacy, in the absence of others; adhava, or; that You have been insulted api, even; tat-samaksam, in public, in the very presence of others-(-tat being used as an adverb); tat, for that, for all those offences; O Acyuta, aham, I; ksamaye, beg pardon; tvam, of You; aprameyam, the incomprehensible One, who are beyond the means of knowledge. (I beg Your pardon) because,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.42।। जब कोई सामान्य व्यक्ति अकस्मात् ही परमात्मा के महात्म्य का परिचय पाता है? तब उसके मन में जिन भावनाओं का निश्चित रूप से उदय होता है? उन्हें इन दो सुन्दर श्लोकों के द्वारा नाटकीय यथार्थता के साथ सामने लाया गया है। अब तक अर्जुन? भगवान् श्रीकृष्ण को एक बुद्धिमान् गोपाल से अधिक कुछ नहीं समझता था? जिसे उसने बड़ी उदारता से अपनी राजमैत्री का आश्रय लाभ दिया था। परन्तु? अब श्रीकृष्ण के अनन्तस्वरूप का वास्तविक परिचय पाकर अर्जुन में स्थित जीवभाव उनके समक्ष दृढ़ निष्ठा एवं सम्मान के साथ प्रणिपात करके उनसे दया और क्षमा की याचना करता है।इन दो श्लोकों में अत्यन्त घनिष्ठता का स्पर्श है। यहाँ बौद्धिक दार्शनिक चिन्तन का घनिष्ठ परिचय के भावुक पक्ष के साथ सुन्दर संयोग हुआ है। गीता का प्रयोजन ही यह है कि वेद प्रतिपादित सत्यों की सुमधुर ध्वनि का व्यावहारिक जगत् की सुखद लय के साथ मिलन कराया जाये। घनिष्ठ परिचय के इन भावुक स्पर्शों के द्वारा व्यासजी की कुशल लेखनी? वेदान्त के विचारोत्तेजक महान् सत्यों को? अचानक? अपने घर की बैठक में होने वाले वार्तालाप के परिचित वातावरण में ले आती है। एक घनिष्ठ मित्र के रूप में प्रमाद या प्रेमवश अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा को न जानते हुए उन्हें प्रिय नामों से सम्बोधित किया होगा? जिसके लिए उनसे अब्ा वह क्षमायाचना करता है।क्योंकि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.42।।यच्चावहासार्थं परिहासप्रयोजनायासत्कृतोऽसि परिभूतोऽसि। विहरणं विहारः क्रीडा पादव्यायमो वा? शयनं शय्या? आसनमास्थायिका सिंहासनादि? भोजनमदनमित्येतेषु विहारदिषु असत्करणं चोत्कृष्टेन सह निकृष्टस्य समानतया प्रवृत्तिः। एक परोक्षः रहसि सन्नसत्कृतोऽसि। अथवा समक्षं प्रत्यक्षमपि यत् असत्कृतोसि परोक्षं वा प्रत्यक्षं वा तदसत्करणं यन्मया परिभूतोऽसि तत्सर्वमपराधजाते त्वामहं क्षामये क्षमां कारये। पूर्वं मातुलोयं स्वसमानं ज्ञात्वाऽसत्कृत्येदानीमप्रमेयं बुद्ध्वा क्षामय इत्याशयेनाह -- अप्रमेयमिति। असत्कृतोऽहं क्षमां न करोमीति न वाच्यम्। यतोऽसत्करणएन स्वपदात्सर्वोत्तमात् सदैवाप्रच्युत इति ध्वनयन् संबोधयति -- हेऽच्युतेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.42।।यच्चावहासार्थं परिहासार्थं विहारशय्यासनभोजनेषु विहारः क्रीडा व्यायामो वा? शय्या तूलिकाद्यास्तरणविशेषः? आसनं सिंहासनादि? भोजनं बहूनां पङ्क्तावशनं तेषु विषयभूतेषु असत्कृतोऽसि मया परिभूतोऽसि। एकः सखीन्विहाय रहसि स्थितो वा त्वं। अथवा तत्समक्षं तेषां सखीनां परिहसतां समक्षं वा। हे अच्युत सर्वदा निर्विकार? तत्सर्ववचनरूपमसत्करणरूपं चापराधजातं क्षामये क्षमयामि। त्वामप्रमेयं अचिन्त्यप्रभावं। अचिन्त्यप्रभावेन निर्विकारेण च परमकारुणिकेन भगवता त्वन्माहात्म्यानभिज्ञस्य ममापराधाः क्षन्तव्या इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.42।।तथा यच्च अवहासार्थं विहारादिष्वसत्कृतोऽसि परिभूतोऽसि। एको वा सखीनां वियोगकाले वा तत्समक्षं सखिजनसमक्षं वाऽसत्कृतोऽसि तत्क्षामये क्षमापये। यतस्त्वमप्रमेयोऽचिन्त्यस्वभावः करुणापरः। यतः शत्रुभ्योऽपि शिशुपालादिभ्य उत्तमां गतिं दत्तवानसीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.42।।च पुनः। सखेति मत्वा अवहासार्थं मिथ्यावादादिभिः एकः केवलो मां विहाय विहारादिकं करोषीत्यादिभिः। अथवा मत्समक्षं विहारे द्यूतमृगयादिषु स्वजनत्वमुद्भावयता? शय्यायां सहशयनेन? आसने सहोपवेशेन? भोजने सहभुञ्जता? इत्यादिषु यत् असत्कृतोऽसि अवमानितोऽसि हे अच्युत च्युतिरहित स्वाङ्गीकृतपरिपालक। अहं त्वामप्रमेयं प्रमातुमयोग्यं तत्सर्वं क्षामये क्षमां कारयामि अप्रमेयत्वेनाऽज्ञानजापराधनिवृत्तिः सूचिता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.42।।किंच -- यच्चेति। हे अच्युत? यच्च परिहासार्थं क्रीडादिषु तिरस्कृतोऽसि। एकः केवलः। सखीन्विना रहसि स्थित इत्यर्थः। अथवा तत्समक्षं तेषां परिहसतां सखीनां समक्षं पुरतोऽपि तत्सर्वमपराधजातं त्वामप्रमेयचिन्त्यप्रभावं क्षामये क्षमां कारयामि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.42।।किञ्च तामसकर्मसु मृगयाविहारादिषु स्थितं त्वां तमोगुणयुक्तं पूर्वं ज्ञात्वा मया यदसत्कृतोऽसि तदप्येकोऽहं त्वां साम्प्रतं क्षमां कारयामि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.42।।तथा जो हँसीके लिये भी आप मुझसे असत्कृत -- अपमानित हुए हैं कहाँ विहार? शय्या? आसन और भोजनादिमें। विचरनारूप पैरोंसे चलनेफिरनेकी क्रियाका नाम विहार है? शयनका नाम शय्या है? स्थित होनेबैठनेका नाम आसन है और भक्षण करनेका नाम भोजन है। इन सब क्रियाओंके करते समय ( मुझसे ) अकेलेमें -- आपके पीछे अथवा आपके सामने आपका जो कुछ अपमान -- तिरस्कार हुआ है हे अच्युत उस समस्त अपराधोंके समुदायको मैं आप अप्रमेयसे अर्थात् प्रमाणातीत परमेश्वरसे क्षमा कराता हूँ। समक्षम् शब्दके पहलेका तत् शब्द क्रियाविशेषण है।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.42।। व्याख्या -- [जब अर्जुन विराट् भगवान्के अत्युग्र रूपको देखकर भयभीत होते हैं? तब वे भगवान्के कृष्णरूपको भूल जाते हैं और पूछ बैठते हैं कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं परन्तु जब उनको भगवान् श्रीकृष्णकी स्मृति आती है कि वे ये ही हैं? तब भगवान्के प्रभाव आदिको देखकर उनको सखाभावसे किये हुए पुराने व्यवहारकी याद आ जाती है और उसके लिये वे भगवान्से क्षमा माँगते हैं।]सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति -- जो बड़े आदमी होते हैं? श्रेष्ठ पुरुष होते हैं? उनको साक्षात् नामसे नहीं पुकारा जाता। उनके लिये तो आप? महाराज आदि शब्दोंका प्रयोग होता है। परन्तु मैंने आपको कभी हे कृष्ण कह दिया? कभी हे यादव कह दिया और कभी हे सखे कह दिया। इसका कारण क्या था अजानता महिमानं तवेदम् (टिप्पणी प0 603.1) इसका कारण यह था कि मैंने आपकी ऐसी महिमाको और स्वरूपको जाना नहीं कि आप ऐसे विलक्षण हैं। आपके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं -- ऐसा मैं पहले नहीं जानता था। आपके प्रभावकी तरफ मेरी दृष्टि ही नहीं गयी। मैंने कभी सोचासमझा ही नहीं कि आप कौन हैं और कैसे हैं।यद्यपि अर्जुन भगवान्के स्वरूपको? महिमाको? प्रभावको पहले भी जानते थे? तभी तो उन्होंने एक अक्षौहिणी सेनाको छोड़कर निःशस्त्र भगवान्को स्वीकार किया था तथापि भगवान्के शरीरके किसी एक अंशमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड यथावकाश स्थित हैं -- ऐसे प्रभावको? स्वरूपको? महिमाको अर्जुनने पहले नहीं जाना था। जब भगवान्ने कृपा करके विश्वरूप दिखाया? तब उसको देखकर ही अर्जुनकी दृष्टि भगवान्के प्रभावकी तरफ गयी और वे भगवान्को कुछ जानने लगे। उनका यह विचित्र भाव हो गया कि कहाँ तो मैं और कहाँ ये देवोंके देव परन्तु मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक? बिना सोचेसमझे? जो मनमें आया? वह कह दिया -- मया प्रमादात्प्रणयेन वापि।। बोलनेमें मैंने बिलकुल ही सावधानी नहीं बरती वास्तवमें भगवान्की महिमाको सर्वथा कोई जान ही नहीं सकता क्योंकि भगवान्की महिमा अनन्त है। अगर वह सर्वथा जाननेमें आ जायगी तो उसकी अनन्तता नहीं रहेगी? वह सीमित हो जायगी। जब भगवान्की सामर्थ्यसे उत्पन्न होनेवाली विभूतियोंका भी अन्त नहीं है? तब भगवान् और उनकी महिमाका अन्त आ ही कैसे सकता है अर्थात् आ ही नहीं सकता।यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि विहारशय्यासनभोजनेषु -- मैंने आपको बराबरीका साधारण मित्र समझकर हँसीदिल्लगी करते समय? रास्तेमें चलतेफिरते समय? शय्यापर सोतेजागते समय? आसनपर उठतेबैठते समय? भोजन करते समय जो कुछ अपमानके शब्द कहे? आपका असत्कार किया अथवा हे अच्युत आप अकेले थे? उस समय या उन सखाओं? कुटुम्बीजनों सभ्य व्यक्तियों आदिके सामने मैंने आपका जो कुछ तिरस्कार किया है? वह सब मैं आपसे क्षमा करवाता हूँ -- एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्। अर्जुन और भगवान्की मित्रताका ऐसा वर्णन आता है कि जैसे दो मित्र आपसमें खेलते हैं? ऐसे ही अर्जुन भगवान्के साथ खेलते थे। कभी स्नान करते तो अर्जुन हाथोंसे भगवान्के ऊपर जल फेंकते और भगवान् अर्जुनके ऊपर। कभी अर्जुन भगवान्के पीछे दौड़ते तो कभी भगवान् अर्जुनके पीछे दौड़ते। कभी दोनों
Chapter 11 (Part 15)
आपसमें हँसतेहँसाते। कभी दोनों परस्पर अपनीअपनी विशेष कलाएँ दिखाते। कभी भगवान् सो जाते तो अर्जुन कहते -- तुम इतने फैलकर सो गये हो? क्या कोई दूसरा नहीं सोयेगा तुम अकेले ही हो क्या कभी भगवान् आसनपर बैठ जाते तो अर्जुन कहते -- आसनपर तुम अकेले ही बैठोगे क्या और किसीको बैठने दोगे कि नहीं अकेले ही आधिपत्य जमा लिया जरा एक तरफ तो खिसक जाओ। इस प्रकार अर्जुन भगवान्के साथ बहुत ही घनिष्ठताका व्यवहार करते थे (टिप्पणी प0 603.2)। अब अर्जुन उन बातोंको याद करके कहते हैं कि हे भगवन् मैंने आपके न जाने कितनेकितने तिरस्कार किये हैं। मेरेको तो सब याद भी नहीं हैं। यद्यपि आपने मेरे तिरस्कारोंकी तरफ खयाल नहीं किया? तथापि मेरे द्वारा आपके बहुतसे तिरस्कार हुए हैं? इसलिये मैं अप्रमेयस्वरूप आपसे सब तिरस्कार क्षमा करवाता हूँ। भगवान्को,अप्रमेय कहनेका तात्पर्य है कि दिव्यदृष्टि होनेपर भी आप दिव्यदृष्टिके अन्तर्गत नहीं आते हैं।, सम्बन्ध -- अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन भगवान्की महत्ता और प्रभावका वर्णन करके पुनः क्षमा करनेके लिये प्रार्थना करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.42।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.42।।यदयुक्तमुक्तं तत्क्षन्तव्यमित्येव न किंतु यत्परीहासार्थं क्रीडादिषु त्वयि तिरस्करणं कृतं तदपि सोढव्यमित्याह -- यच्चेति। विहरणं क्रीडा व्यायामो वा। शयनं तल्पादिकमासनमास्थायिका सिंहासनादेरुपलक्षणम्। एतेषु विषयभूतेष्विति यावत्। एकशब्दो रहसि स्थितमेकाकिनं कथयतीत्याह -- परोक्षः सन्निति। प्रत्यक्षं परोक्षं वा तदसत्करणं परिभवनं यथा स्यात्तथा यन्मया त्वमसत्कृतोऽसि तत्सर्वमिति योजनामङ्गीकृत्याह -- तच्छब्द इति। क्षमा कारयितव्येत्यत्रापरिमितत्वं हेतुमाह -- अप्रमेयमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.42।।एकः परोक्ष इति क्लिष्टं व्याख्यानमिति ज्ञापयितुं तदर्थमन्वयं च दर्शयति -- एक इति। आद्याक्षरग्रहणेन एशब्दः एकस्य द्योतकः। कशब्दः कारयितृत्वद्योतकः। अन्तर्णीतण्यर्थात्करोतेर्डः। अथापि एवमसत्कारानर्होऽप्यसत्कृतोऽसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.42।।एकस्त्वमेव कारयिता? नान्योऽस्त्यथापि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.42।। --,यच्च अवहासार्थं परिहासप्रयोजनाय असत्कृतः परिभूतः असि भवसि क्व विहारशय्यासनभोजनेषु? विहरणं विहारः पादव्यायामः? शयनं शय्या? आसनम् आस्थायिका? भोजनम् अदनम्? इति एतेषु विहारशय्यासनभोजनेषु? एकः परोक्षः सन् असत्कृतः असि परिभूतः असि अथवापि हे अच्युत? तत् समक्षम्? तच्छब्दः क्रियाविशेषणार्थः? प्रत्यक्षं वा असत्कृतः असि तत् सर्वम् अपराधजातं क्षामये क्षमां कारये त्वाम् अहम् अप्रमेयं प्रमाणातीतम्।।यतः त्वम् --,
───────────────────
【 Verse 11.43 】
▸ Sanskrit Sloka: पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान् | न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिक: कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव ||
▸ Transliteration: pitāsi lokasya carācarasya tvamasya pūjyaśca gururgarīyān | na tvatsamo’sty abhyadhikaḥ kuto’nyo lokatraye’py apratima-prabhāva ||
▸ Glossary: Pitā: father; asi: You are; lokasya: of all the world; cara: moving; acarasya: nonmoving; tvaṁ: You are; asya: of this; pūjyaḥ: worshipable; ca: also; guruḥ: master; garīyan: glorious; na: never; tvatsamaḥ: equal to You; asti: there is; abhyadhikaḥ: greater; kutaḥ: how is it possible; anyo: other; lokatraye: in three planetary systems; api: also; apratima: immeasurable; prabhāva: power
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.43 You are the father of this world, moving and unmoving. You are to be adored by this world. You are the greatest guru; there is none who exists equal to You. O Being of unequalled power, how then can there be another, superior to You in the three worlds?
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.43।।आप ही इस चराचर संसारके पिता हैं? आप ही पूजनीय हैं और आप ही गुरुओंके महान् गुरु हैं। हे अनन्त प्रभावशाली भगवन् इस त्रिलोकीमें आपके समान भी दूसरा कोई नहीं है? फिर अधिक तो हो ही कैसे सकता है
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.43।। आप इस चराचर जगत् के पिता? पूजनीय और सर्वश्रेष्ठ गुरु हैं। हे अप्रितम प्रभाव वाले भगवन् तीनों लोकों में आपके समान भी कोई नहीं हैं? तो फिर आपसे अधिक श्रेष्ठ कैसे होगा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.43 पिता Father? असि (Thou) art? लोकस्य of the world? चराचरस्य of the moving and unmoving? त्वम् Thou? अस्य of this? पूज्यः to be reserved? च and? गुरुः the Guru? गरीयान् weightier? न not? त्वत्समः eal to Thee? अस्ति is? अभ्यधिकः surpassing? कुतः whence? अन्यः other? लोकत्रये in the three worlds? अपि also? अप्रतिमप्रभाव O Being of unealled power.Commentary There exists none who is eal to Thee There cannot be two or more Isvaras. If there were? the world will not get on as it does now. All the Isvaras may not be of one mind? as they would all be independent of one another. What one wishes to create? another may wish to destroyWhen there does not exist one who is eal to Thee? how could there be one superior to TheeFather Creator. As the Lord is the creator of this world He is fit to be adored. He is the greatest Guru also. Therefore there is no one who is eal to the Lord.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.43. You are the father of the world of the moving and unmoving; You are the great preceptor of this universe; in the triad of worlds there is no one eal to You-How can there be anyone else superior ? - having greatness not comprehended.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.43 For Thou art the Father of all things movable and immovable, the Worshipful, the Master of Masters! In all the worlds there is none equal to Thee, how then superior, O Thou who standeth alone, Supreme.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.43 You are the father of this world, of all that moves and that does not move. You are its teacher and the one most worthy of reverence. There is none eal to You. How then could there be in the three worlds another greater than You, O Being of matchless greatness?
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.43 You are the Father of all beings moving and non-moving; to this (world) You are worthy of worship, the Teacher, and greater (than a teacher). There is none eal to You; how at all can there be anyone greater even in all the three worlds, O You or unrivalled power?
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.43 Thou art the Father of this world, moving and unmoving. Thou art to be adored by this world, Thou, the greatest Guru; (for) none there exists who is eal to Thee; how then could there be another superior to Thee in the three worlds, O Being of unealled power?
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.43 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.43 O Being of matchless greatness! You are the father of this world, of all that moves and does not move. You are the teacher of this world. Therefore You are the one most worthy of reverence in this world of mobile and immobile entities. There is none eal to You. How then could there be in the three worlds another greater than You? No other being is eal to You in point of any attribute like compassion etc. How could there be any one greater?
Inasmuch as You are the father of all, the most worthy of reverence, teacher and exalted over all by virtue of attributes like compassion etc.,
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.43 Asi, You are; pita, the Father, the Progenitor; lokasya, off all beings; cara-acarasya, moving and nonmoving. Not only are Yur are Father of this world, You are also pujyah, worthy of worship; since You are the guruh, Teacher; [He is the Teacher since He introduce the line of teachers of what is virtue and vice, and of the knowledge of the Self. And He is greater than a teacher because He is the teacher even of Hiranyagarbha and others.] gariyan, greater (than a teacher). How are You greater? In answer he says: Asti, there is; na, none other; tvat-samah, eal to You; for there is no possibility of two Gods. Because all dealings will come to naught if there be many Gods! When there is no possibility of another being eal toYou, kutah eva, how at all; can there be anyah, anyone; abhyadhikah, greater; api, even; loka-traye, in all the three worlds; apratima-prabhavah, O you of unrivalled power? That by which something is measured is pratima. You who have no measure for Your power (prabhava) are a pratima-prabhavah. Apratima-prabhava means 'O You of limitless power!' Since this is so,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.43।। हम यहाँ देखते हैं कि भावावेश के कारण अवरुद्ध कण्ठ से अर्जुन श्रीकृष्ण के प्रति अत्यादर के साथ कहता है कि आप इस चराचर जगत् के पिता हैं। निसन्देह ही? जाग्रत् स्वप्न? और सुषुप्ति अवस्थाओं के अनुभव लोक भी? आत्मतत्त्व की स्थूल? सूक्ष्म और कारण उपाधियों के द्वारा अभिव्यक्ति से ही विद्यमान प्रतीत होते हैं। उन सबका प्रकाशक आत्मचैतन्य सर्वत्र एक ही है।स्वाभाविक है कि अर्जुन के कथन के अनुसार भगवान् अप्रतिम प्रभाव से सम्पन्न हैं और उनके समान भी जब कोई नहीं है? तो उनसे अधिक श्रेष्ठ कौन हो सकता हैक्योंकि वास्तविकता ऐसी है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.43।।मयातीवानुचितमेव कुतं क्षमापनं च कर्तव्यमेव त्वया च क्षन्तव्यमेव। यतस्त्वं प्राणिनिकायस्य स्थावरजंगमस्य पिता जनकोऽसि पूज्यः पूजार्हश्चासि। यतो गुरुर्धर्मब्रह्मोपदेष्टा गरीयान् गुरुतरोसि। भगवतो गुरुतरत्वे हेतुमाह। न त्वत्समस्तुल्योऽस्ति द्वितीयस्येस्वरस्याभावात् ईश्वरसत्वे प्रत्येकमैकमत्ये कारणाभावात् नानामतित्वे चैकस्य संजिहीर्षायामपरस्य सिसृक्षासंभवात् अपरस्य पालनेच्छायामेकस्य संजिहीर्षासंभवात् व्यवहारलोपप्रसङ्गापत्त्यानेकेश्वरवादस्यायुक्तत्वादिति भावः। त्वत्तुल्य एवान्यो न संभवति। कुतएव लोकत्रयेऽपि सर्वस्मिन्लोकेऽन्योऽभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽपीति वा हेतुहेतुमद्भावः। भाष्यस्योपलक्षणार्थत्वादविरोधः। हेऽप्रतिप्रभाव? प्रतिमीयते यया सा प्रतिमा उपमा न विद्यते उपमा यस्य स चौसौ प्रभावो यस्य स तथा। असस्त्वमेव सर्वेषां पित्रादिरिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.43।।अचिन्त्यप्रभावतामेव प्रपञ्चयति -- पितासीति। अस्य चराचरस्य लोकस्य पिता जनकस्त्वमसि। पूज्यश्चासि सर्वेश्वरत्वात्। गुरुश्चासि शास्त्रोपदेष्टा। अतः सर्वैः प्रकारैर्गरीयान् गुरुतरोऽसि। अतएव न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽपि। हे अमितप्रभाव? यस्य समोऽपि नास्ति द्वितीयस्य परमेश्वरस्याभावात्तस्याधिकोऽन्यः कुतः स्यात्। सर्वथा न संभाव्यत एवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.43।।अप्रमेयत्वमेवाह -- पितासीति। यतस्त्वमस्माकं पितासि अतोऽस्माभिः शिशुभिः कृता अपराधास्त्वया क्षन्तव्या एवेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.43।।क्षमापने सन्बन्धस्यावश्यकत्वायाह -- पितेति। अस्य चराचरस्य स्थावरजङ्गमात्मकस्य ब्राह्मणक्षत्रिययोर्वापिता उत्पादकः? च पुनः गरीयान् पूज्यः देवोत्तमः तद्द्रष्टा गुरुः त्वमसि। तर्हि त्वत्समो भविष्यतीति नेत्याह। हे अप्रतिमप्रभाव उपमारहितानुभाव लोकत्रये अन्यस्त्वत्समोऽपि नास्ति कुतोऽभ्यधिको भवेत् येन त्वं तत्समः स्याः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.43।।अचिन्त्यप्रभावमेवाह -- पितेति। न विद्यते उपमा यस्य सोऽप्रतिमः तथाविधः प्रभावो यस्य तव हे अप्रतिमप्रभाव? त्वमस्य चराचरस्य लोकस्य पिता जनकोऽसि। अतएव पूज्यश्च गुरुश्च गुरोरपि गरीयान् गुरुतरः अतो लोकत्रयेऽपि त्वत्सम एव तावदन्यो नास्ति परमेश्वरस्यान्यस्याभावात्? त्वत्तोऽभ्यधिकः पुनः कुतः स्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.43।।पिताऽसीति। पूज्यो गुरुश्चेति सात्त्विकोऽश्वमेधे राजसूये च विदितस्त्वं सात्त्विकधर्माणां त्वयि निरूपितत्वात्तथाभूतं त्वां जानन् क्षमापयेऽहं प्राकृतः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.43।।क्योंकि आप --, इस स्थावरजंगमरूप समस्त जगत्के यानी प्राणिमात्रके उत्पन्न करनेवाले पिता हैं। केवल पिता ही नहीं? आप पूजनीय भी हैं? क्योंकि आप बड़ेसेबड़े गुरु हैं। आप कैसे गुरुतर हैं सो ( अर्जुन ) बतलाता है -- हे अप्रतिमप्रभाव सारी त्रिलोकीमें आपके समान दूसरा कोई नहीं है क्योंकि अनेक ईश्वर मान लेनेपर व्यवहार सिद्ध नहीं हो सकता। इसलिये ईश्वर दो नहीं हो सकते। जब कि सारे त्रिभुवनमें आपके समान ही दूसरा कोई नहीं है? फिर अधिक तो कोई हो ही कैसे सकता है जिससे किसी वस्तुकी समानता की जाय उसका नाम प्रतिमा है? जिन आपके प्रभावकी कोई प्रतिमा नहीं है? वह आप अप्रतिमप्रभाव हैं। इस प्रकार हे अप्रतिमप्रभाव अर्थात् हे निरतिशयप्रभाव ।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.43।। व्याख्या -- पितासी लोकस्य चराचरस्य -- अनन्त ब्रह्माण्डोंमें मनुष्य? शरीर? पशु? पक्षी आदि जितने जङ्गम प्राणी हैं? और वृक्ष? लता आदि जितने स्थावर प्राणी हैं? उन सबको उत्पन्न करनेवाले और उनका पालन करनेवाले पिता भी आप हैं? उनके पूजनीय भी आप हैं तथा उनको शिक्षा देनेवाले महान् गुरु भी आप ही हैं -- त्वमस्य पूज्यश्च गुरुर्गरीयान्। गुरुर्गरीयान् का तात्पर्य है कि मनुष्यमात्रको व्यवहार और परमार्थमें जहाँकहीं भी गुरुजनोंसे शिक्षा मिलती है? उन शिक्षा देनेवाले गुरुओंके भी महान् गुरु आप ही हैं अर्थात् मात्र शिक्षाका? मात्र ज्ञानका उद्गमस्थान आप ही हैं।न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यो लोकत्रयेऽप्यप्रतिमप्रभाव -- इस त्रिलोकीमें जब आपके समान भी कोई नहीं है? कोई होगा नहीं और कोई हो सकता ही नहीं? तब आपसे अधिक विलक्षण कोई हो ही कैसे सकता है इसलिये आपका प्रभाव अतुलनीय है? उसकी तुलना किसीसे भी नहीं की जा सकती।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.43।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.43।।वाचनिकं मदीयमपराधजातं त्वया क्षन्तव्यमित्युक्तमिदानीं मदीयोऽपराधो न त्वया गृहीतव्यो गृहतोऽपि सोढव्य इत्याह -- यत इति। गुणाधिक्यात्पूजार्हत्वं धर्मात्मज्ञानसंप्रदायप्रवर्तकत्वेन शिक्षयितृत्वाद्गुरुत्वं गुरूणामपि सूत्रादीनां गुरुत्वाद्गरीयस्त्वं तदेव प्रश्नद्वारा साधयति -- कस्मादिति। ईश्वरान्तरं तुल्यं भविष्यतीत्याशङ्क्याह -- नहीति। ईश्वरभेदे प्रत्येकं स्वातन्त्र्यात्तदैकमत्ये हेत्वभावान्नानामतित्वे चैकस्य सिसृक्षायामन्यस्य संजिहीर्षासंभवाद्व्यवहारलोपादयुक्तमीश्वरनानात्वमित्यर्थः। अभ्यधिकासत्त्वं कैमुतिकन्यायेन दर्शयति -- त्वत्सम इति। तत्र हेतुमवतार्य व्याकरोति -- अप्रतिमेत्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.43।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.43।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.43।। --,पिता असि जनयिता असि लोकस्य प्राणिजातस्य चराचरस्य स्थावरजङ्गमस्य। न केवलं त्वम् अस्य जगतः पिता? पूज्यश्च पूजार्हः? यतः गुरुः गरीयान् गुरुतरः। कस्मात् गुरुतरः त्वम् इति आह -- न त्वत्समः त्वत्तुल्यः अस्ति। न हि ईश्वरद्वयं संभवति? अनेकेश्वरत्वे व्यवहारानुपपत्तेः। त्वत्सम एव तावत् अन्यः न संभवति कुतः एव अन्यः अभ्यधिकः स्यात् लोकत्रयेऽपि सर्वस्मिन् अप्रतिमप्रभाव प्रतिमीयते यया सा प्रतिमा? न विद्यते प्रतिमा यस्य तव प्रभावस्य सः त्वम् अप्रतिमप्रभावः? हे अप्रतिमप्रभाव निरतिशयप्रभाव इत्यर्थः।।यतः एवम् --,
───────────────────
【 Verse 11.44 】
▸ Sanskrit Sloka: तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् | पितेव पुत्रस्य सखेव सख्यु: प्रिय: प्रियायार्हसि देव सोढुम् ||
▸ Transliteration: tasmātpraṇamya praṇidhāya kāyaṁ prasādaye tvāṁaham īśam īḍyam | pite’va putrasya sakhe’va sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhum ||
▸ Glossary: tasmāt: therefore; praṇamya: after offering obeisances; praṇidhāya: laying down; kāyaṁ: body; prasādaye: to beg mercy; tvāṁ: unto You; ahaṁ: I; īśaṁ: unto the Supreme Lord; īḍyam: who is worshipable; pite ‘va: like a father; putrasya: of a son; sakhe ‘va: like a friend; sakhyuḥ: of a friend; priyaḥ: lover; priyāya: of the dearmost; arhasi: You should; deva: my Lord; soḍhum: tolerate
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.44 Therefore, bowing down, I prostrate my body before You and crave Your forgiveness, adorable Lord. Even as a father forgives his son, a friend his friend, a lover his beloved, You should, O Deva, forgive me.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.44।।इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्रके? मित्र मित्रके और पति पत्नीके अपमानको सह लेता है? ऐसे ही हे देव आप मेरे द्वारा किया गया अपमान सहनेमें समर्थ हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.44।। इसलिये हे भगवन् मैं शरीर के द्वारा साष्टांग प्रणिपात करके स्तुति के योग्य आप ईश्वर को प्रसन्न होने के लिये प्रार्थना करता हूँ। हे देव जैसे पिता पुत्र के? मित्र अपने मित्र के और प्रिय अपनी प्रिया के(अपराध को क्षमा करता है)? वैसे ही आप भी मेरे अपराधों को क्षमा कीजिये।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.44 तस्मात् therefore? प्रणम्य saluting? प्रणिधाय having bent? कायम् body? प्रसादये crave forgiveness? त्वाम् Thee? अहम् I? ईशम् the Lord? ईड्यम् adorable? पिता father? प्रियः beloved? प्रियायाः to the beloved? अर्हसि (Thou) shouldst? देव O God? सोढुम् to bear.Commentary O Lord? take me to Thy bosom as a mother does her child. Forgive me for all tht I have hitherto spoken or done. Forgive my faults. Please overlook my past mistakes. I have done this through ignorance. Now I have come to Thee in submission. I beg Your pardon now.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.44. Hence, paying homage, and prostrating may body, I solicit grace of You, the Lord praisworthy. O God ! Be pleased to bear with me, just as a beloved father with his beloved son and just as a dear friend with his dear friend.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.44 Therefore I prostrate myself before Thee, O Lord! Most Adorable! I salute Thee, I ask Thy blessing. Only Thou canst be trusted to bear with me, as father to son, as friend to friend, as lover to his beloved.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.44 Therefore, bowing down, prostrating the body. I implore Your mercy, O adorable Lord. As a father hears with his son or a friend with his friend, it is meet, O Lord, that You, who are dear to me, should bear with me who am dear to You.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.44 Therefore, by bowing down and prostrating the body, I seek to propitate You who are God and are adorable. O Lord, You should [The elision of a (in arhasi of priyayarhasi) is a metrical licence.] forgive (my faults) as would a father (the faults) of a son, as a friend, of a friend, and as a lover of a beloved.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.44 Therefore, bowing down, prostrating my body, I crave Thy forgiveness, O adorable Lord. As a father forgives his son, a friend his (dear) friend, a lover his beloved, even so shouldst Thou forgive me, O God.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.44 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.44 Therefore, bowing down and prostrating, I implore You, O adorable Lord, for Your mercy. Just as, when entreated with salutation, a father will show mercy to his son, or a friend to a friend, even if he has been at fault, even so it is meet that You, most compassionate and dear to me, should bear with me, who is dear to You in all respects.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.44 Tasmat, therefore; pranamya, by bowing down; and pranidhaya kayam, prostrating, laying, the body completely down; prasadaye, I seek to propitiate; tvam, You; who are isam, God, the Lord; and are idyam, adorable. Deva, O God; You are Your part, arhasi, should; sodhum, bear with, i.e. forgive (my faults); iva, as would; a pita, father; forgive all the faults putrasya, of a son; and as a sakha, friend; the fautls sakhyuh, of a friend; or as a priyah, lover; forgives the faults priyayah, of a beloved.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.44।। अर्जुन स्वयं को सर्वशक्तिमान भगवान् के समक्ष पाकर अपने में वाक्कौशल और तर्क करने की सूक्ष्म क्षमता को व्यक्त हुआ पाता है। यद्यपि हिन्दुओं में पूजनीय व्यक्ति का चरणस्पर्श करके अभिवादन किया जाता है? जो कि शारीरिक कर्म है किन्तु उसका जो वास्तविक अभिप्राय है उसे हृदय के आन्तरिक भाव के रूप में प्राप्त करना होता है। अहंकार के समर्पण के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करना ही वास्तविक प्रणाम या साष्टांग प्रणिपात है। अनात्म जड़ उपाधियों के साथ तादात्म्य से उत्पन्न अहंकार और तत्केन्द्रित मिथ्या कल्पनाओं के कारण अपने ही हृदयस्थ आत्मा का हमें साक्षात् अनुभव नहीं हो पाता है। जिस मात्रा में ये मिथ्या धारणाएं नष्ट हो जाती हैं? उस्ाी मात्रा में निश्चित ही? हम आत्मा के शान्त सौन्दर्य का अनुभव कर सकते हैं जो हमारा शुद्ध स्वरूप ही है। वास्तव में देखा जाये? तो अहंकार के इस समर्पण में हम अपनी अशुद्ध पाशविक वासनाओं की उस गठरी को ही अर्पित कर रहे होते हैं? जो हमारी मूढ़ता और कामुकता के कारण दुर्गन्धित होती हैअत स्वाभाविक है कि? जब कोई भक्त? भक्ति और प्रपत्ति की भावना से भगवान् के चरणों के समीप पहुँचता है? तो अपनी अशुद्धियों के लिए क्षमा याचना करता है।यहाँ अर्जुन भगवान् से अनुरोध करता है कि वे उसके किए अपराधों को ऐसे ही सहन करे? जैसे पिता पुत्र के? मित्र अपने मित्र के? प्रिय अपने प्रिया के अपराधों को सहन करता है। इन तीन उदाहरणों में वे सब घृष्टतापूर्ण अपराध सम्मिलित हो जाते हैं? जो एक मनुष्य अज्ञानवश अपने प्रभु भगवान् के प्रति कर सकता है।अर्जुन भगवान् से सामान्य रूप धारण करने तथा इस सर्वातीत? सार्वभौमिक भयंकर रूप का त्याग करने के लिए प्रार्थना करता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.44।।यस्मादेवं तस्मात्कायं शरीरं प्रणिधाय प्रकर्षेण नीचैः कृत्वा दण्डबद्भूमौ पातयित्वा प्रणभ्य त्वामहं प्रसादये। प्रसादं कारये। इदमत्यावश्यकमित्यत्रान्मदपि हेतुद्वयमाह। ईशं ईशितारं सर्वनियतन्तारमीड्यं स्तोतुं योग्यं त्वं च पिता यता पुत्रस्यापराधं क्षमते यथाच सख्युः सखा यथाच प्रियायाः भार्यायाः प्रियः भर्तेति तद्वित्क्षन्तुं योग्येसि जगज्जनक्तवात् पितृत्वम्। सयुजौ सखायाविति मन्त्रवर्षात्सखित्वं निखिलप्रपञ्चपोषकत्वात् भर्तृत्वं च तवास्तीति पित्रादिवन्मुख्यपित्रादिस्त्वं अवश्यं सोढुमर्हसीति सूचयन्द्रष्टान्तत्रयोपादानाम्। प्रियायार्हसीति संधिरार्षः। किंच नरनाट्यात्मकक्रीडाविधानार्थं मम बद्य्धावर्णं त्वयैव कृतमिति ध्वनयन्संबोधयति -- हे देवेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.44।।तस्मादिति। यस्मादेवं तस्मात्प्रणम्य नमस्कृत्य त्वां प्रणिधाय प्रकर्षेण नोचैर्धृत्वा कायं। दण्डवद्भूमौ पतित्वेति यावत्। प्रसादये त्वामीशमीड्यं सर्वस्तुत्यमहमपराधी। अतो हे देव? पितेव पुत्रस्यापराधं सखेव सख्युरपराधं प्रियः पतिरिव प्रियायाः पतिव्रताया अपराधं ममापराधं त्वं सोढुं क्षन्तुमर्हसि। अनन्यशरणत्वान्मम प्रियायार्हसीत्यत्रेवशब्दलोपः सन्धिश्च छान्दसः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.44।।एतदेवाह -- तस्मादिति। यस्मात्त्वं पिता गुरुश्च तस्मात्कायं शरीरं प्रणिधाय भूमौ कृत्वा दण्डवत्प्रणम्य त्वां प्रसादये। ईड्यं स्तुत्यम्। स्पष्टमन्यत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.44।।यतः सर्वेषां पिता गुरुः पूज्यश्च त्वमेवाऽतो ममापि सर्वं त्वमेवेति मदपराधं क्षन्तुमर्हसीति विज्ञापयति -- तस्मादिति। तस्मात्कारणात् अहं त्वां ईशं प्रभुं ईड्यं स्तुत्यं कायं प्रणिधाय दण्डवत् पतित्वा प्रणम्य नत्वा प्रसादये प्रसादयामि। हे देव जगत्पूज्य त्वं पूर्वोक्तान् ममापराधान् सोढुम् अर्हसि। क इव पुत्रस्य पितेव सख्युर्मित्रस्य सखा इव? प्रियायाः प्रीतियोग्यायाः स्त्रियाः प्रिय इव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.44।।यस्मादेवं -- तस्मादिति। तस्मात्त्वामीशं जगतः स्वामिनमीड्यं स्तुत्यं प्रसादये प्रसादयामि। कथम्। कायं प्रणिधाय दण्डवन्निपात्य प्रणम्य प्रकर्षेण नत्वा। अतस्त्वं ममापराधं सोढुं क्षन्तुमर्हसि। कस्य क इव। पुत्रस्यापराधं कृपया पिता यथा सहते? सख्युर्मित्रस्यापराधं सखा निरुपाधिबन्धुर्यथा? प्रियश्च प्रियाया अपराधं तत्प्रियार्थं यथा तद्वत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.44।।यस्मादेवं? तस्मादिति। त्वामीशं सर्वेषां राजानं नियन्तारं रजोभावमाश्रितं भक्तवात्सल्येन सारथ्ये कर्मणि स्थितं प्रणम्य प्रसादये। त्वं च पितेव पुत्रस्य? सखेव सख्युः? प्रिय इव प्रियाय सर्वं सोढुमर्हसि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.44।।जब कि यह बात है --, इसीलिये मैं अपने शरीरको भली प्रकार नीचा करके अर्थात् आपके चरणोंमें रखकर प्रणाम करके स्तुति करनेयोग्य शासनकर्ता आप ईश्वरको प्रसन्न करता हूँ। अर्थात् आपसे अनुग्रह कराता हूँ। जैसे पुत्रका समस्त अपराध पिता क्षमा करता है तथा जैसे मित्रका अपराध मित्र अथवा प्रियाका अपराध प्रिय ( पति ) क्षमा करता है -- सहन करता है? वैसे ही हे देव आपको भी ( मेरे समस्त अपराधोंको सर्वथा ) सहन करना अर्थात् क्षमा करना उचित है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.44।। व्याख्या -- तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीषमीड्यम् -- आप अनन्त ब्रह्माण्डोंके ईश्वर हैं। इसलिये सबके द्वारा स्तुति करनेयोग्य आप ही हैं। आपके गुण? प्रभाव? महत्त्व आदि अनन्त हैं अतः ऋषि? महर्षि? देवता? महापुरुष आपकी नित्यनिरन्तर स्तुति करते रहें? तो भी पार नहीं पा सकते। ऐसे स्तुति करनेयोग्य आपकी मैं क्या स्तुति कर सकता हूँ मेरेमें आपकी स्तुति करनेका बल नहीं है? सामर्थ्य नहीं है। इसलिये मैं तो केवल आपके चरणोंमें लम्बा पड़कर दण्डवत् प्रणाम ही कर सकता हूँ और इसीसे आपको प्रसन्न करना चाहता हूँ।पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम् -- किसीका अपमान होता है तो उसमें मुख्य तीन कारण होते हैं -- (1) प्रमाद(असावधानी) से? (2) हँसी? दिल्लगी? विनोदमें खयाल न रहनेसे और (3) अपनेपनकी घनिष्ठता होनेपर अपने साथ रहनेवालेका महत्त्व न जाननेसे। जैसे? गोदीमें बैठा हुआ छोटा बच्चा अज्ञानवश पिताकी दाढ़ीमूँछ खींचता है? मुँहपर थप्पड़ लगाता है? कभी कहीं लात मार देता है तो बच्चेकी ऐसी चेष्टा देखकर पिता राजी ही होते हैं? प्रसन्न ही होते हैं। वे अपनेमें यह भाव लाते ही नहीं कि पुत्र मेरा अपमान कर रहा है। मित्र मित्रके साथ चलतेफिरते? उठतेबैठते आदि समय चाहे जैसा व्यवहार करता है? चाहे जैसा बोल देता है? जैसे -- तुम ब़ड़े सत्य बोलते हो जी तुम तो बड़े सत्यप्रतिज्ञ हो अब तो तुम बड़े आदमी हो गये हो तुम तो खूब अभिमान करने लग गये हो आज मानो तुम राजा ही बन गये हो आदि? पर उसका मित्र उसकी इन बातोंका खयाल नहीं करता। वह तो यही समझता है कि हम बराबरीके मित्र हैं? ऐसी हँसीदिल्लगी तो होती ही रहती है। पत्नीके द्वारा आपसके प्रेमके कारण उठनेबैठने? बातचीत करने आदिमें पतिकी जो कुछ अवहेलना होती है? उसे पति सह लेता है। जैसे? पति नीचे बैठा है तो,वह ऊँचे आसनपर बैठ जाती है? कभी किसी बातको लेकर अवहेलना भी कर देती है? पर पति उसे स्वाभाविक ही सह लेता है। अर्जुन कहते हैं कि जैसे पिता पुत्रके? मित्र मित्रके और पति पत्नीके अपमानको सह लेता है अर्थात् क्षमा कर देता है? ऐसे ही हे भगवन् आप मेरे अपमानको सहनेमें समर्थ हैं अर्थात् इसके लिये मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ।इकतालीसवेंबयालीसवें श्लोकोंमें अर्जुनने तीन बातें कही थीं -- प्रमादात् (प्रमादसे)? अवहासार्थम् (हँसीदिल्लगीसे) और प्रणयेन (प्रेमसे)। उन्हीं तीन बातोंका संकेत अर्जुनने यहाँ तीन दृष्टान्त देकर किया है अर्थात् प्रमादके लिये पितापुत्रका? हँसीदिल्लगीके लिये मित्रमित्रका और प्रेमके लिये पतिपत्नीका दृष्टान्त दिया है। सम्बन्ध -- अब आगेके दो श्लोकोंमें अर्जुन चतुर्भुजरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.44।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.44।।निरतिशयप्रभावं हेतूकृत्याप्रतिमेत्यादिना प्रसादये प्रणामपूर्वकं त्वामित्याह -- यत इति। प्रसादनानन्तरं भगवता कर्तव्यं प्रार्थयते -- त्वं पुनरिति। प्रिय इव प्रियाया इतीवकारोऽनुषज्यते। प्रियायार्हसीति छान्दसः सन्धिः। क्षन्तुं मदपराधजातमिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.44।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.44।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.44।। --,तस्मात् प्रणम्य नमस्कृत्य? प्रणिधाय प्रकर्षेण नीचैः धृत्वा कायं शरीरम्? प्रसादये प्रसादं कारये त्वाम् अहम् ईशम् ईशितारम्? ईड्यं स्तुत्यम्। त्वं पुनः पुत्रस्य अपराधं पिता यथा क्षमते? सर्वं सखा इव सख्युः अपराधम्? यथा वा प्रियः प्रियायाः अपराधं क्षमते? एवम् अर्हसि हे देव सोढुं प्रसहितुम् क्षन्तुम् इत्यर्थः।।
───────────────────
【 Verse 11.45 】
▸ Sanskrit Sloka: अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे | तदेव मे दर्शय देवरूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास ||
▸ Transliteration: adṛṣṭa-pūrvaṁ hṛṣito’smi dṛṣṭvā bhayena ca pravyathitaṁ mano me | tadeva me darśaya devarūpaṁ prasīda deveśa jagannivāsa ||
▸ Glossary: adṛṣṭapūrvaṁ: never seen before; hṛṣito: gladdened; asmi: I am; dṛṣṭvā: by seeing; bhayena: out of fear; ca: also; pravyathitaṁ: perturbed; mano: mind; me: my; tad: therefore; eva: certainly; me: unto me; darśaya: show; deva: O Lord; rūpaṁ: the form; prasīda: just be gracious; deveśa: O Lord of lords; jagannivāsa: the refuge of the universe
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.45 After seeing this form that I have never seen before, I am filled with gladness but at the same time I am disturbed by fear. Please bestow Your grace upon me and show me Your form as the supreme personality, O Lord of Lords, O refuge of the Universe.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.45।।मैंने ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा। इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और (साथहीसाथ) भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है। अतः आप मुझे अपने उसी देवरूपको (सौम्य विष्णुरूपको) दिखाइये। हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.45।। मैं आपके इस अदृष्टपूर्व रूप को देखकर हर्षित हो रहा हूँ और मेरा मन भय से अतिव्याकुल भी हो रहा हैं। इसलिए हे देव आप उस पूर्वकाल को ही मुझे दिखाइये। हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.45 अदृष्टपूर्वम् what was never seen before? हृषितः delighted? अस्मि (I) am? दृष्ट्वा having seen? भयेन with fear? च and? प्रव्यथितम् is distressed? मनः mind? मे my? तत् that? एव only? मे to me? दर्शय show? देव O God? रूपम् form? प्रसीद have mercy? देवेश O Lord of the gods? जगन्निवास O Aboe of the universe.Commentary For an ordinary man the Cosmic Form (Vision) is overwhelming and terrifying but for a Yogi it is encouraging? strengthening and soulelevating.Arjuna says The Cosmic Form was never before seen by me. Show me only that form which Thou wearest as my friend.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.45. I am thrilled by seeing what has not been seen earlier; and my mind is very much distressed with fear; show me the same (usual) form of Yours; kindly be appeased O God ! Lord of gods ! O Abode of the worlds !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.45 I rejoice that I have seen what never man saw before; yet, O Lord! I am overwhelmed with fear. Please take again the Form I know. Be merciful, O Lord! thou Who are the Home of the whole universe.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.45 Seeing what was never seen before, I am delighted. But my mind is also agog with awe. Show me, O Lord! Your other form. O Lord of the gods! Be gracious, O Abode of the universe!
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.45 I am delighted by seeing something not seen heretofore, and my mind is stricken with fear. O Lord, show me that very form; O supreme God, O Abode of the Universe, be gracious!
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.45 I am delighted, having seen what has never been seen before; and yet my mind is distressed with fear. Show me that (previous) form only, O God; have mercy, O God of gods, O Abode of the universe.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.45 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.45 Seeing Your form, never seen before, extremely marvellous and awe-inspiring, I am delighted, transported with love. But my mind is also troubled with awe. Hence reveal to me only Your most gracious form. Be gracious, O Lord of all gods! O Abode of the universe! Show me that form, O gracious Lord of all the gods headed by Brahma, and the foundation of the entire universe!
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.45 Asmi, I am; hrsitah, delighted; drstva, by seeing; adrsta-purvam, something not seen heretofore-by seeing this Cosmic form of Yours which has never been seen before by me or others. And me, my; manah, mind; is pravyathitam, stricken; bhayena, with fear. Therefore, deva, O Lord; darsaya, show; me, to me; tat eva, that very; rupam, form, which is of my friend. Devesa, O supreme God; jagan-nivasa, Abode of the Universe; prasida, be gracious!
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.45।। प्रत्येक भक्त अपने इष्ट देवता के रूप में भगवान् से प्रेम करता है। जब उस आकार के द्वारा वह भगवान् के अनन्त? परात्पर? निराकार स्वरूप का साक्षात्कार करता है? तब निसन्देह वह परमानन्द का अनुभव करता है? किन्तु उसी क्षण वह भय से भी अभिभूत हो जाता है। अध्यात्म साधना करने वाले साधकों का प्रारम्भिक अवस्था में यही अनुभव होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि? साधना के फलस्वरूप प्राप्त आन्तरिक शान्ति परमानन्द दायक होती है? परन्तु अचानक साधक के मन में विचित्र भय समा जाता है? जो उसे पुन देहभाव को प्राप्त कराकर मन के विक्षेपों का कारण बनता है।आत्मानुभव के उदय पर यह परिच्छिन्न जीव अपने बन्धनों से मुक्त होकर? अदृष्टपूर्व आनन्दलोक में प्रवेश करता है? जहाँ वह अपनी ही विशालता और प्रभाव का अनुभव कर प्रसन्न हो जाता है। इसी बात को अर्जुन दर्शाता है कि ऐसे रूप को देखकर? जो मैंने पूर्व कभी देखा नहीं था? मैं हर्षित हो रहा हूँ। परन्तु प्रारम्भिक प्रयत्नों में एक साधक में यह सार्मथ्य नहीं होती कि वह अपने मन को दीर्घकाल तक वृत्तिशून्य स्थिति में रख सके। ध्यान में निश्चल प्रतीत हो रहा उसका मन पुन जाग्रत होकर क्रियाशील हो जाता है। साधकों का यह अनुभव है कि ऐसे समय मन में सर्वप्रथम जो वृत्ति उठती है वह भय की ही होती है। निराकार अनुभव से भयभ्ाीत होकर मन पुन शरीर भाव में स्थित हो जाता है। ऐसे अवसरों पर भक्तजन प्रेम और भक्ति के साथ अपने साकार इष्टदेव को अपने चंचल मन्दस्मित के रूप में व्यक्त होने के लिए प्रार्थना करते हैं। वे अपने इष्टदेव को पुन सस्मित और कोमल तथा प्रेमपूर्ण दृष्टि और संगीतमय शब्दों के साथ देखना चाहते हैं।अर्जुन श्रीकृष्ण को जिस रूप में देखना चाहता था? उसका वर्णन अगले श्लोक में करता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.45।।एवमपराधक्षमां प्रार्थ्याभिलषितं प्रार्थयते -- अदृष्टेति द्वाभ्याम्। मयान्यैवी कदाचिदपि न दृष्टपूर्वं इदं तव विश्वरुपं दृष्ट्वा हृषितोस्मि हर्षं प्राप्तोस्मि। अदृष्टपूर्वत्वादेव भयेन च व्यथितं दुःखितं मे मनः। अतो यस्मिन्निदं विश्वरुपं त्वया प्रदर्शितं तदेव मुख्यरुपं मम प्रदर्शय। प्रदर्शनं चैतद्रूपाधिष्ठानत्वेन स्थितस्यैव प्रद्योतनमात्रं त्वया कर्तव्यमस्ति नतत्पाद्य प्रदर्शयितव्यमिति देवेति संबोधनस्य गूढाभिसंधिः। देवरुपं द्योतनात्मकं रुपमित्येकं वा पदं। तव देवेश त्वं जगन्निवास त्वं च मया प्रत्यक्षीकृतमतो मज्जिज्ञासासमाप्त्या मदर्थस्यैतद्रूपस्य तिरोधानमेवोचितमिति द्योतनार्थं संबोधनद्वयं हे देवेश हे जगन्निवासेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.45।।एवमपराधक्षमां प्रार्थ्य पुनः प्राग्रूपदर्शनं विश्वरूपोपसंहारेण प्रार्थयते द्वाभ्यां -- अदृष्टेत्यादिना। कदाप्यदृष्टपूर्वं पूर्वमदृष्टं विश्वरूपं दृष्ट्वा हृषितो हृष्टोऽस्मि। तद्विकृतरूपदर्शनजेन भयेन च प्रव्यथितं व्याकुलीकृतं मनो मे। अतस्तदेव प्राचीनमेव मम प्राणापेक्षयापि प्रियं रूपं मे दर्शय। हे देव हे देवेश? हे जगन्निवास? प्रसीद प्राग्रूपदर्शनरूपं प्रसादं मे कुरु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.45।।एवं स्तुत्वा स्वेष्टं प्रार्थयते -- अदृष्टपूर्वमिति। हे देव? कदाचिदपि पूर्वं न दृष्टं तादृशमदृष्टपूर्वं तव रूपं दृष्ट्वा हृषित उत्फुल्लोऽस्मि। तथा विकरालरूपदर्शनजेन भयेन च मे मम मनः प्रव्यथितम्। अतस्तदेव धारणाविषयभूतं रूपं मे मह्यं दर्शय।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.45।।एवं क्षमाप्य विज्ञापयति -- अदृष्टपूर्वमिति द्वयेन। अदृष्टपूर्वं तव रूपं विश्वात्मकं अनेकलीलायुतं दृष्ट्वा हृषितोऽस्मि हर्षं प्राप्तोऽस्मि। च पुनः मे मनः भयेन प्रव्यथितं प्रकर्षेण व्यथां प्राप्तम्। अयं भावः -- द्रष्टुकामस्य तादृशं रूपं दर्शयित्वा पुरुषोत्तमदर्शनवतोऽन्यरूपदर्शनाभिलाषापराधिनः पुनः पुरुषोत्तमरूपं दर्शयिष्यति न वेति भयमभूत्? अतः प्रसादं प्रार्थयित्वा तद्दर्शनं प्रार्थयति। देवेश देवानामपीन्द्रादीनामीश नियामक जगन्निवास प्रसीद प्रसन्नो भव। प्रसन्नो भूत्वा हे देव सेवनार्थं तदेव पुरुषोत्तमरूपं दर्शय।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.45।।एवं क्षमापयित्वा प्रार्थयते -- अदृष्टपूर्वमिति द्वाभ्याम्। हे देव? पूर्वमदृष्टं तव रूपं दृष्ट्वा हृषितो हृष्टोऽस्मि। तथा भयेन च मे मनः प्रव्यथितं प्रचलितं। तस्मान्मम व्यथानिवृत्तये तदेव रूपं दर्शय। हे देवेश? हे जगन्निवास? प्रसन्नो भव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.45।।एवं क्षमापयित्वा गुणातिगं प्रति प्रार्थयते -- अदृष्टेति। वस्तुतस्तु त्वं गुणातीत इति भक्ताय तदेव गुणातीतं रूपं प्रदर्शय। इदं चादृष्टपूर्वं ते रूपं दृष्ट्वा? पूर्वं दृष्टः पश्चाल्लोकान् ग्रसमानं ज्ञात्वा मनो मे प्रव्यथितं यतः? अतस्तदेव चतुर्भुजं वा दृष्टपूर्वं रूपं मे प्रदर्शय। अस्माकं तु चतुर्भुजं मर्यादामयं शुद्धसत्त्वात्मकं ते रूपं श्रेष्ठं शान्तत्वादित्याशयेनाह तद्दर्शने प्रसीदेति। अनेनाक्षरब्रह्मोपासकेभ्यः शुद्धसत्त्वमयचतुर्भुजोपासकामर्यादया गुणज्ञाः उत्तमा इति लभ्यते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.45।।आपके जिस विश्वरूपको मैंने या अन्य किसीने पहले कभी नहीं देखा? ऐसे पहले न देखे हुए इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ। तथा साथ ही मेरा मन भयसे व्याकुल भी हो रहा है। इसलिये हे देव मुझे अपना वही रूप दिखलाइये जो मेरा मित्ररूप है। हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये। जगत्के निवासस्थानका नाम जगन्निवास है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.45।। व्याख्या -- [जैसे विराट्रूप दिखानेके लिये मैंने भगवान्से प्रार्थना की तो भगवान्ने मुझे विराट्रूप दिखा दिया? ऐसे ही देवरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करनेपर भगवान् देवरूप दिखायेंगे ही -- ऐसी आशा होनेसे अर्जुन भगवान्से देवरूप दिखानेके लिये प्रार्थना करते हैं।]अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे -- आपका ऐसा अलौकिक आश्चर्यमय विशालरूप मैंने पहले कभी नहीं देखा। आपका ऐसा भी रूप है -- ऐसी मेरे मनमें सम्भावना भी नहीं थी। ऐसा रूप देखनेकी मेरेमें कोई योग्यता भी नहीं थी। यह तो केवल आपने अपनी तरफसे ही कृपा करके दिखाया है। इससे मैं अपनेआपको बड़ा सौभाग्यशाली मानकर हर्षित हो रहा हूँ? आपकी कृपाको देखकर गद्गद हो रहा हूँ। परन्तु साथहीसाथ आपके स्वरूपकी उग्रताको देखकर मेरा मन भयके कारण अत्यन्त व्यथित हो रहा है? व्याकुल हो रहा है? घबरा रहा है।तदेव मे दर्शय देवरूपम् -- तत् (वह) शब्द परोक्षवाची है अतः तदेव (तत् एव) कहनेसे ऐसा मालूम देता है कि अर्जुनने देवरूप (विष्णुरूप) पहले कभी देखा है? जो अभी सामने नहीं है। विश्वरूप देखनेपर जहाँ अर्जुनकी पहले दृष्टि पड़ी? वहाँ उन्होंने कमलासनपर विराजमान ब्रह्माजीको देखा -- पश्यामि देवांस्तव देव देहे ৷৷. ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थम् (11। 15)। इससे सिद्ध होता है कि वह कमल जिसकी नाभिसे निकला है? उस शेषशायी चतुर्भुज विष्णुरूपको भी अर्जुनने देखा है। फिर सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा है कि मैं आपको किरीट? गदा? चक्र (और च पदसे शङ्ख और पद्म) धारण किये हुए देख रहा हूँ -- किरीटनं गदिनं चक्रिणं च -- इन दोनों बातोंसे यही सिद्ध होता है कि अर्जुनने विश्वरूपके अन्तर्गत भगवान्के जिस विष्णुरूपको देखा था? उसीके लिये अर्जुन यहाँ वही देवरूप मेरेको दिखाइये ऐसा कह रहे हैं (टिप्पणी प0 606)।देवरूपम् कहनेका तात्पर्य है कि मैंने विराट्रूपमें आपके विष्णुरूपको भी देखा था? पर अब आप मेरेको केवल विष्णुरूप ही दिखाइये। दूसरी बात? पंद्रहवें श्लोकमें भी अर्जुनने भगवान्के लिये देव कहा है --,पश्यामि देवांस्तव देव देहे और यहाँ भी देवरूप दिखानेके लिये? कहते हैं इसका तात्पर्य है कि विराट्रूप भी नहीं और मनुष्यरूप भी नहीं? केवल देवरूप दिखाइये। आगेके (छियालीसवें) श्लोकमें भी तेनैव पदसे विराट्रूप और मनुष्यरूपका निषेध करके भगवान्से चतुर्भुज विष्णुरूप बन जानेके लिये प्रार्थना करते हैं।प्रसीद देवेश जगन्निवास -- यहाँ जगन्निवास सम्बोधन विश्वरूपका और देवेश सम्बोधन चतुर्भुजरूपका संकेत कर रहा है। अर्जुन ये दो सम्बोधन देकर मानो यह कह रहे हैं कि सम्पूर्ण संसारका निवास आपमें है -- ऐसा विश्वरूप तो मैंने देख लिया है और देख ही रहा हूँ। अब आप देवेश -- देवताओंके मालिक विष्णुरूपसे हो जाइये।विशेष बातभगवान्का विश्वरूप दिव्य है? अविनाशी है? अक्षय है। इस विश्वरूपमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं तथा उन ब्रह्माण्डोंकी उत्पत्ति? स्थिति और प्रलय करनेवाले ब्रह्मा? विष्णु और शिव भी अनन्त हैं। इस नित्य विश्वरूपसे अनन्त विश्व (ब्रह्माण्ड) उत्पन्न होहोकर उसमें लीन होते रहते हैं? पर यह विश्वरूप अव्यय होनेसे ज्योंकात्यों ही रहता है। यह विश्वरूप इतना दिव्य? अलौकिक है कि हजारों भौतिक सूर्योंका प्रकाश भी इसके प्रकाशका उपमेय नहीं हो सकता (11। 12)। इसलिये इस विश्वरूपको दिव्यचक्षुके बिना कोई भी देख नहीं सकता।,ज्ञानचक्षुके द्वारा संसारके मूलमें सत्तारूपमें जो परमात्मतत्त्व है? उसका बोध होता है और भावचक्षुसे संसार भगवत्स्वरूप दीखता है? पर इन दोनों ही चक्षुओंसे विश्वरूपका दर्शन नहीं होता। चर्मचक्षुसे न तो तत्त्वका बोध होता है? न संसार भगवत्स्वरूप दीखता है और न विश्वरूपका दर्शन ही होता है क्योंकि चर्मचक्षु प्रकृतिका कार्य
Chapter 11 (Part 16)
है। इसलिये चर्मचक्षुसे प्रकृतिके स्थूल कार्यको ही देखा जा सकता है।वास्तवमें भगवान्के द्विभुज? चतुर्भुज? सहस्रभुज आदि जितने भी रूप हैं? वे सबकेसब दिव्य और अव्यय हैं। इसी तरह भगवान्के सगुणनिराकार? निर्गुणनिराकार? सगुणसाकार आदि जितने रूप हैं? वे सबकेसब भी दिव्य और अव्यय हैं।माधुर्यलीलामें तो भगवान् द्विभुजरूप ही रहते हैं परन्तु जहाँ अपना कुछ ऐश्वर्य दिखलानेकी आवश्यकता होती है? वहाँ भगवान् पात्र? अधिकार? भाव आदिके भेदसे अपना विराट्रूप भी दिखा देते हैं। जैसे? भगवान्ने अर्जुनको मनुष्यरूपसे प्रकट हुए अपने द्विभुजरूप -- शरीरके किसी अंशमें विराट्रूप दिखाया है।भगवान्में अनन्तअसीम ऐश्वर्य? माधुर्य? सौन्दर्य? औदार्य आदि दिव्य गुण हैं। उन अनन्त दिव्य गुणोंके सहित भगवान्का विश्वरूप है। भगवान् जिसकिसीको ऐसा विश्वरूप दिखाते हैं? उसे पहले दिव्यदृष्टि देते हैं। दिव्यदृष्टि देनेपर भी वह जैसा पात्र होता है? जैसी योग्यता और रुचिवाला होता है? उसीके अनुसार भगवान् उसको अपने विश्वरूपके स्तरोंका दर्शन कराते हैं। यहाँ ग्यारहवें अध्यायके पंद्रहवेंसे तीसवें श्लोकतक भगवान् विश्वरूपसे अनेक स्तरोंसे प्रकट होते गये? जिसमें पहले देवरूपकी (11। 15 -- 18)? फिर उग्ररूपकी (11। 19 -- 22) और उसके बाद अत्युग्ररूपकी (11। 23 -- 30) प्रधानता रही। अत्युग्ररूपको देखकर जब अर्जुन भयभीत हो गये? तब भगवान्ने अपने दिव्यातिदिव्य विश्वरूपके स्तरोंको दिखाना बंद कर दिया अर्थात् अर्जुनके भयभीत होनेके कारण भगवान्ने अगले रूपोंके दर्शन नहीं कराये। तात्पर्य है कि भगवान्ने दिव्य विराट्रूपके अनन्त स्तरोंमेंसे उतने ही स्तर अर्जुनको दिखाये? जितने स्तरोंको दिखानेकी आवश्यकता थी और जितने स्तर देखनेकी अर्जुनमें योग्यता थी।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.45।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.45।।हेतूक्तिपूर्वकं विश्वरूपोपसंहारं प्रार्थयते -- अदृष्टेति। हृषितो हृष्टस्तुष्ट इति यावत्। भयेन तद्धेतुविकृतदर्शनेनेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.45।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.45।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.45।। --,अदृष्टपूर्वं न कदाचिदपि दृष्टपूर्वम् इदं विश्वरूपं तव मया अन्यैर्वा? तत् अहं दृष्ट्वा हृषितः अस्मि। भयेन च प्रव्यथितं मनः मे। अतः तदेव मे मम दर्शय हे देव रूपं यत् मत्सखम्। प्रसीद देवेश? जगन्निवास जगतो निवासो जगन्निवासः? हे जगन्निवास।।
───────────────────
【 Verse 11.46 】
▸ Sanskrit Sloka: किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव | तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ||
▸ Transliteration: kirīṭinaṁ gadinaṁ cakra-hastam icchāmi tvāṁ draṣṭumahaṁ tathaiva | tenaiva rūpeṇa caturbhujena sahasrabāho bhava viśvamūrte ||
▸ Glossary: kirīṭinaṁ: crowned; gadinaṁ: with club; cakrahastam: disc in hand; icchāmi: I wish; tvāṁ: You; draṣṭum: to see; ahaṁ: I; tathai’va: in that form; tenai ‘va: by that; rūpeṇa: with form; caturbhujena: four-handed; sahasrabāho: O thou- sand-handed one; bhava: just become; viśvamūrte: O universal form
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.46 O thousand armed Universal Form! I wish to see Your form with crown, fourarmed with mace, disc in Your hand. I yearn to see You in that form.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.46।।(टिप्पणी प0 607) मैं आपको वैसे ही किरीटधारी? गदाधारी और हाथमें चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ। इसलिये हे सहस्रबाहो विश्वमूर्ते आप उसी चतुर्भुजरूपसे हो जाइये।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.46।। मैं आपको उसी प्रकार मुकुटधारी? गदा और चक्र हाथ में लिए हुए देखना चाहता हूँ। हे विश्वमूर्ते हे सहस्रबाहो आप उस चतुर्भुजरूप के ही बन जाइए।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.46 किरीटिनम् wearing crown? गदिनम् bearing a mace? चक्रहस्तम् with a discus in the hand? इच्छामि (I) desire? त्वाम् Thee? द्रष्टुम् to see? अहम् I? तथैव as before? तेनैव that same? रूपेण of form? चतुर्भुजेन (by) fourarmed? सहस्रबाहो O thousandarmed? भव be? विश्वमूर्ते O Universal Form.Commentary Arjuna says O Lord in the Cosmic Form I do not know where to turn and to whom to address myself. I am frightened. I am longing to see Thee with conch? discus? mace and lotus. Withdraw Thy Cosmic Form. Assume that same fourarmed form as before.Spiritual aspirants are ofen impatient to have the highest spiritual experiences immediately they begin their Sadhana. This is wrong. They will not be able to withstand the great power that will,surge into them. Be patientO thousandarmed refers to the Cosmic Form.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.46. I desire to see You in the same manner, wearing crown, holding the club and the discuss in hand; please be with the same form having four hands, O Thousand-armed One ! O Universal Form !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.46 I long to see Thee as thou wert before, with the crown, the sceptre and the discus in Thy hands; in Thy other Form, with Thy four hands, O Thou Whose arms are countless and Whose forms are infinite.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.46 I wish to see You ever as before, with crown and with mace and discus in hand. Assume again that four-armed shape, O Thou the thosand armed, of Universal Form!
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.46 I want to see You just as before, wearing a crown, wielding a mace, and holding a disc in hand. O You with thousand arms, O You of Cosmic form, appear with that very form with four hands.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.46 I desire to see Thee as before, crowned, bearing a mace, with the discus in hand, in Thy former form only, having four arms, O thousand-armed, Cosmic Form (Being).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.46 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.46 I wish to see You thus, as before, with a crown, and with a mace and discus in hand. Hence assume again that four-armed shape, shown to me before, O thousand-armed one of Universal Form! Assume that shape in place of what You have now revealed with thousand arms and a cosmic body. Such is the meaning.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda:
11.46
Aham, I; icchami, want; drastum, to see; tvam, You; kiritinam, wearing a crown; as also gadinam, wielding a mace; and cakra-hastam, holding a disc in hand; i.e., tatha eva, just as before. Since this is so, therefore, sahasra-baho, O You with a thousand arms-in Your present Cosmic form; visva-murte, O you of Cosmic form; bhava, apeear; tena eva rupena, with that very form-with the form of the son of Vasudeva; caturbhujena, with four hands. The idea is: withdrawing the Cosmic form, appear in that very form as the son of Vasudeva.
Noticing Arjuna to have become afraid, and withdrawing the Cosmic form, reassuring him with sweet words-
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.46।। यहाँ अर्जुन अपनी इच्छा को स्पष्ट शब्दों में प्रदर्शित करता है कि? मैं आपको पूर्ववत् देखना चाहता हूँ। वह भगवान् के विराट् रूप को देखकर भयभीत हो गया है? जो उन्होंने सम्पूर्ण विश्व के साथ अपने एकत्व को दर्शाने के लिए धारण किया था।वेदान्त द्वारा प्रतिपादित निर्गुण? निराकार तत्त्व या समष्टि के सिद्धांत का जब प्रत्यक्ष अनुभव किया जाता है? तो विरले लोगों में ही वह बौद्धिक धारणाशक्ति होती है कि वे उस सत्य को उसकी पूर्णता में समझकर उसका ध्यान कर सकते हैं। यदि कभी बुद्धि उसे धारण कर भी पाती है? तो प्राय भक्त का हृदय उसके साथ अधिक काल तक तादात्म्य नहीं बनाये रख पाता है। मन के स्तर पर सत्य को केवल रूपकों के द्वारा ही समझकर उसका आनन्द अनुभव किया जा सकता है? सीधे ही उसके पूर्ण वैभव के द्वारा कभी नहीं।इस श्लोक में अर्जुन भगवान् वासुदेव के सौम्य रूप को बताता है? जो भागवत के भगवान् विष्णु का पारम्परिक रूप है। सब पुराणों में ईश्वर का वर्णन रूपक की भाषा में करते हुए उसे चतुर्भुज के रूप में चितित्र किया गया है। शरीर शास्त्र के विद्यार्थियों को यह कोई प्रकृति की आसाधारण निर्मिति ही प्रतीत हो सकती है। हम भूल जाते हैं कि वास्तव में यह सत्य का केवल एक सांकेतिक रूपक है।भगवान् की ये चार भुजाएं अन्तकरण चतुष्टय अर्थात् मन? बुद्धि? चित्त और अहंकार के प्रतीक हैं।पुराणों में ही चतुर्भुजधारी भगवान् का वर्ण नील कहा गया है तथा वे पीताम्बरधारी हैं अर्थात् वे पीत वस्त्र धरण किये हुए हैं। नीलवर्ण से अभिप्राय उनकी अनन्तता से है असीम वस्तु सदा नीलवर्ण प्रतीत होती है? जैसे ग्रीष्म ऋतु का निरभ्र आकाश अथवा गहरा सागर। पृथ्वी का वर्ण है पीत। इस प्रकार भगवान् विष्णु के रूप का अर्थ यह हुआ कि अनन्त परमात्मा परिच्छिन्नता को धारण कर अन्तकरण चतुष्टय के द्वारा जीवन का खेल खेलता है।यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि सभी धर्मों में ईश्वर का वर्णन एक ही प्रकार से किया गया है। वह परमेश्वर सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान् है। ईश्वर के बाहुबल से ही मनुष्य सफलता प्राप्त करता है? इसलिए सर्वशक्तिमान् भगवान् का निर्देश चतुर्भुजधारी के रूप में ही किया जा सकता है। भगवान् विष्णु शंखचक्रगदापद्मधारी हैं। शंखनाद के द्वारा भगवान् सब को अपने समीप आने का आह्वान करते हैं। यदि मनुष्य अपने हृदय के श्रेष्ठ भावनारूपी शंखनाद को अनसुना कर देता है? तो दुख के रूप में उस पर गदा का आघात होता है। इतने पर भी यदि मनुष्य अपने में सुधार नहीं लाता है? तो अन्तिम परिणाम है चक्र के द्वारा शिरच्छेद अर्थात् परमपुरुषार्थ की अप्राप्ति रूप नाश। इसके विपरीत? यदि कोई मनुष्य दिव्य जीवन का आह्वान सुनकर उसका पूर्ण अनुकरण करता है? तो उसे पद्म अर्थात् कमल की प्राप्ति होती है। हिन्दू धर्म में कमल पुष्प आध्यात्मिक पूर्णता एव शान्ति का प्रतीत है। भारतीय संस्कृति में यह सुखसमृद्धि का भी प्रतीक है। पाश्चात्य देशों में शान्ति का प्रतीक शुभ्र कपोत माना जाता है।संक्षेप में? अर्जुन चाहता है कि भगवान् अपने सौम्यरूप और शान्तभाव में प्रकट हों। वेदान्त के प्रारम्भिक और नवदीक्षित विद्यार्थियों के लिए सतत सूक्ष्म दार्शनिक विचारों की गति बनाये रख पाना कठिन होता है। बुद्धि की ऐसी थकान भरी अवस्था में? उत्साही साधकों के लिए ऐसे विश्वसनीय विश्रामस्थल की आवश्यकता होती है? जहाँ विश्राम करके वे पुन नवचैतन्य से युक्त हो सकते हों। यह शान्ति की शय्या है भगवान् का सगुण? साकार और सौम्यरूप।अर्जुन को भयभीत देखकर? भगवान् अपने विराट रूप का उपसंहार करके मधुर वचनों में उसे आश्वस्त करते हुए कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.46।।तदेवेत्युक्तं विशदयति। किरीटवन्तं तथा गदावन्तं चक्रं सुदर्शनं हस्ते यस्य तादृशं त्वामहं द्रष्टुमिच्छामि तस्मान्मदिच्छानुसारेणैव हे सहस्त्रबाहो? हे विस्वमूर्ते? मदिच्छापरिसमाप्त्या पुनरपि विश्वमूर्तित्वं तिरोधाय तेनैव रुपेण वसुदेवपुत्रमूर्तिरुपेण सहस्त्रबाहुत्वं तिरोधाय चतुर्भुजेन तथैव पूर्वरुपेण प्रकटीभवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.46।।तदेव रूपं विवृणोति -- किरीटिनमिति। किरीटवन्तं गदावन्तं चक्रहस्तं च त्वा त्वां द्रष्टुमिच्छाम्यहं। तथैव पूर्ववदेव। अतस्तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन वसुदेवात्मजत्वेन भव। हे इदानीं सहस्रबाहो? हे विश्वमूर्ते? उपसंहृत्य विश्वरूपं पूर्वरूपेणैव प्रकटो भवेत्यर्थः। एतेन सर्वदा चतुर्भुजादिरूपमर्जुनेन भगवतो दृश्यत इत्युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.46।।तदेव रुपमाह -- किरीटिनमिति। एतेनार्जुनस्य चक्रगदाकिरीटोपेतं चतुर्भुजं भगवतो रूपं धारणाविषय इति दर्शितम्। हे सहस्रबाहो हे विश्वमूर्ते सहस्रबाहुत्वादिकमुपसंहृत्य तेनैव रूपेण भव प्रकटो भव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.46।।रूपं विशिनष्टि -- किरीटिनमिति। किरीटवन्तं गदावन्तं चक्रहस्तं त्वामहं तथैव पूर्ववदेव द्रष्टुमिच्छामि। अतो हे सहस्रबाहो अगणितक्रियाशक्तिमन् विश्वमूर्ते तेनैव चतुर्भुजेन रूपेण भव प्रकटो भवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.46।। तदेव रूपं विशेषयन्नाह -- किरीटिनमिति। किरीटिनं गदावन्तं चक्रहस्तं च त्वां द्रष्टुमिच्छामि पूर्वं यथा दृष्टोऽस्मि तथैव। अतो हे सहस्रबाहो? विश्वमूर्ते? इदं विश्वरूपं संहृत्य तेनैव किरीटादियुक्तेन चतुर्भुजेन रूपेण भवाविर्भव। तदनेन श्रीकृष्णमर्जुनः पूर्वमपि किरीटादियुक्तमेव पश्यतीति गम्यते। यत्तु पूर्वमुक्तं विश्वरूपदर्शनेकिरीटिनं गदिनं चक्रिणं च पश्यामि इति तद्बहुकिरीटाद्यभिप्रायेण। यद्वा। एतावन्तं कालं यं त्वां किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च सुप्रसन्नमपश्यं तमेवेदानीं तेजोराशिं दुर्निरीक्ष्यं पश्यामीत्येवं तत्र बहुवचनव्यक्तिरित्यविरोधः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.46।।तदेव रूपं विशेषयन् भगवन्तं प्रार्थयते -- किरीटिनमिति। तदनेन श्रीकृष्णं अर्जुन एवमेव षड्गुणगणालङ्कृतं चतुर्भुजं पश्यति स्मेति गम्यते। द्विभुजं तु सदैवेति। न पुष्टिमिश्रमभक्तस्य जायते निर्भया रुचिः। स्वतः प्रवृत्तिजनिकाक्षरमात्रैकदर्शने। क्षराक्षरातीतहरे रसानन्दमहोदधेः। स्वरूपामृतमग्नानां नान्यत्र स्याद्रतिः क्वचित्। इत्यभिप्रायमाज्ञाय गोपानामिव तस्य च। आश्वासयन् भीतमेनमुवाच भगवान्पुनः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.46।।मैं आपको वैसे ही अर्थात् पहलेहीकी भाँति शिरपर मुकुट धारण किये? हाथोंमें गदा और चक्र लिये हुए देखना चाहता हूँ। जब कि यह बात है तो हे सहस्रबाहो हे विश्वमूर्ते अर्थात् वर्तमानविश्वरूपसे ( युक्त ) भगवन् आप उसी अपने वसुदेवपुत्ररूप चतुर्भुजस्वरूपसे युक्त होइये। अर्थात् इस विश्वरूपका उपसंहार करके आप वसुदेवपुत्र -- श्रीकृष्णके स्वरूपसे स्थित होइये।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.46।। व्याख्या -- किरीटनं गदिनं चक्रहस्तमिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव -- जिसमें आपने सिरपर दिव्य मुकुट तथा हाथोंमें गदा और चक्र धारण कर रखे हैं? उसी रूपको मैं देखना चाहता हूँ।तथैव कहनेका तात्पर्य है कि मेरे द्वारा द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम् (11। 3) ऐसी इच्छा प्रकट करनेसे आपने विराट्रूप दिखाया। अब मैं अपनी इच्छा बाकी क्यों रखूँ अतः मैंने आपके विराट्रूपमें जैसा सौम्य चतुर्भुजरूप देखा है? वैसाकावैसा ही रूप मैं अब देखना चाहता हूँ -- इच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव। तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते -- पंद्रहवें और सत्रहवें श्लोकमें जिस विराट्रूपमें चतुर्भुज विष्णुरूपको देखा था? उस विराट्रूपका निषेध करनेके लिये अर्जुन यहाँ एव पद देते हैं। तात्पर्य यह है कि तेन चतुर्भुजेन रूपेण -- ये पद तो चतुर्भुज रूप दिखानेके लिये आये हैं और एव पद विराट्रूपके साथ नहीं -- ऐसा निषेध करनेके लिये आया है तथा भव पद हो जाइये -- ऐसी प्रार्थनाके लिये आया है।पूर्वश्लोकमें तदेव तथा यहाँ तथैव और तेनैव -- तीनों पदोंका तात्पर्य है कि अर्जुन विश्वरूपसे बहुत डर गये थे। इसलिये तीन बार एव शब्दका प्रयोग करके भगवान्से कहते हैं कि मैं आपका केवल विष्णुरूप ही देखना चाहता हूँ विष्णुरूपके साथ विश्वरूप नहीं। अतः आप केवल चतुर्भुजरूपसे प्रकट हो जाइये।सहस्रबाहो सम्बोधनका यह भाव मालूम देता है कि हे हजारों हाथोंवाले भगवन् आप चार हाथोंवाले हो जाइये और विश्वमूर्ते सम्बोधनका यह भाव मालूम देता है कि हे अनेक रूपोंवाले भगवन् आप एक रूपवाले हो जाइये। तात्पर्य है कि आप विश्वरूपका उपसंहार करके चतुर्भुज विष्णुरूपसे हो जाइये। सम्बन्ध -- इकतीसवें श्लोकमें अर्जुनने पूछा कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं? तो भगवान्ने उत्तर दिया कि मैं काल हूँ और सबका संहार करनेके लिये प्रवृत्त हुआ हूँ। ऐसा सुनकर तथा अत्यन्त विकराल रूपको देखकर अर्जुनको ऐसा लगा कि भगवान् बड़े क्रोधमें हैं। इसलिये अर्जुन भगवान्से बारबार प्रसन्न होनेके लिये प्रार्थना करते हैं। अर्जुनकी इस भावनाको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.46।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.46।।तदेव दर्शयेत्युक्तं किं तदित्यपेक्षायामाह -- किरीटिनमिति। चक्रं हस्ते यस्य तमिति व्युत्पत्तिं गृहीत्वाह -- चक्रेति। मदीयेच्छा फलपर्यन्ता कर्तव्येत्याह -- यत इति। चतुर्भुजत्वे कथं सहस्रबाहुत्वं तत्राह -- वार्तमानिकेनेति। सति विश्वरूपे कथं पूर्वरूपभाक्त्वं तत्राह -- उपसंहृत्येति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.46।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.46।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.46।। --,किरीटिनं किरीटवन्तं तथा गदिनं गदावन्तं चक्रहस्तम् इच्छामि त्वां प्रार्थये त्वां द्रष्टुम् अहं तथैव? पूर्ववत् इत्यर्थः।।यतः एवम्? तस्मात् तेनैव रूपेण वसुदेवपुत्ररूपेण चतुर्भुजेन? सहस्रबाहो वार्तमानिकेन विश्वरूपेण? भव विश्वमूर्ते उपसंहृत्य विश्वरूपम्? तेनैव रूपेण भव इत्यर्थः।।अर्जुनं भीतम् उपलभ्य? उपसंहृत्य विश्वरूपम्? प्रियवचनेन आश्वासयन् श्रीभगवान् उवाच --,श्रीभगवानुवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.47 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् | तेजोमयं विश्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् ||
▸ Transliteration: śrī bhagavānuvāca | mayā prasannena tavārjunedaṁ rūpaṁ paraṁ darśitam ātma-yogāt | tejo-mayaṁ viśvamam anantamādyaṁ yanme tvad anyena na dṛṣṭa-pūrvam ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Śrī bhagavan says; mayā: by Me; prasannena: happily; tava: unto you; arjuna: O Arjuna; idam: this; rūpaṁ: form; paraṁ: transcen- dental; darśitaṁ: shown; ātmayogāt: by My internal power; tejomayaṁ: full of effulgence; viśvaṁ: the entire universe; anantaṁ: unlimited; ādyaṁ: original; yan me: that which is Mine; tvad anyena: besides you; na dṛṣṭapūrvam: no one has previously seen
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.47 Bhagavān says: Dear Arjuna, I happily show you this transcendental form within the material world of My internal power. No one before you has seen this unlimited, brilliant form.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.47।।श्रीभगवान् बोले -- हे अर्जुन मैंने प्रसन्न होकर अपनी सामर्थ्यसे यह अत्यन्त श्रेष्ठ? तेजोमय? सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दिखाया है? जिसको तुम्हारे सिवाय पहले किसीने नहीं देखा है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.47।। हे अर्जुन तुम पर प्रसन्न होकर मैंने अपनी योगशक्ति (आत्मयोगात्) के प्रभाव से यह अपना परम तेजोमय? सबका आदि और अनन्त विश्वरूप तुझे दर्शाया है? जिसे तुम्हारे पूर्व किसी ने नहीं देखा है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.47 मया by Me? प्रसन्नेन gracious? तव to thee? अर्जुन O Arjuna? इदम् this? रूपम् form? परम् supreme? दर्शितम् has been shown? आत्मयोगात् by My own Yogic power? तेजोमयम् full of splendour? विश्वम् universal? अनन्तम् endless? आद्यम् primeval? यत् which? मे of Me? त्वत् from thee? अन्येन by another? न not? दृष्टपूर्वम् seen before.Commentary Lord Krishna eulogises the Cosmic Form because Arjuna should be regarded to have achieved all his ends by seeing this Cosmic Form.It is also an inducement to all spiritual aspirants to strive to attain this sublime vision. What they should do is explained by the Lord in verse 53 to 55.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.47. The Bhagavat said Being gracious towards you, I have shown you, O Arjuna, this supreme form, as a result of [Your] concentration on the Self; this form of Mine full of splendour universal , unending and primal, has been never seen before by anybody other than your-self.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.47 Lord Shri Krishna replied: My beloved friend! It is only through My grace and power that thou hast been able to see this vision of splendour, the Universal, the Infinite, the Original. Never has it been seen by any but thee.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.47 The Lord said By My grace, O Arjuna this Supreme Form, luminous, universal, infinite, primal, never seen before by anyone but you, has been revealed to you through My own free will.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.47 The Blessed Lord said Out of grace, O Arjuna, this supreme, radiant, Cosmic, infinite, primeval form-which (form) of Mine has not been seen before by anyone other than you, has been shown to you by Me through the power of My own Yoga.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.47 The Blessed Lord said O Arjuna, this Cosmic Form has graciously been shown to thee by Me by My own Yogic power; full of splendour, primeval, and infinite, this Cosmic Form of Mine has never been seen before by anyone other than thyself.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.47 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.47 The Lord said The 'luminous' form of Mine is a mass of luminosity. It is 'universal' i.e., constitutes the Self of the universe. It is 'infinite', endless. This is illustrated by describing it as having no beginning, middle or end. It is 'primeval,' namely, it constitutes the foundation of all beings other than Myself. It has nevr been seen before by any one other than you. Such a form is now revealed to you, who are My devotee, by Me who am gracious, by My own Yoga, namely, by the power of willing the truth associated with Me.
Sri Krsna proceeds to say, 'It is not possible that I can be realised as I am, through any means except exclusive Bhakti.'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.47 Prasannena, out of grace-grace means the intention of favouring you; O Arjuna, idam, this; param, supreme; tejomayam, abundantly radiant; visvam, Cosmic, all-comprehensive; anantam, infinite, limitless; adyam, primeval-that which existed in the beginning; rupam, form, the Cosmic form; yat which form; me, of Mine; na drsta-purvam, has not been seen before; tvat-anyena, by anyone other than you; daristam, has been shown; tava, to you; maya, by Me-who am racious, being possessed of that (intention of favouring you); atma-yogat, through the power of My own Yoga, through the power of My own Godhood. 'You have certainly got all your ends accomplished by the vision of the form of Mine who am the Self [The word atmanah (who am the Self) does not occur in some editions.-Tr.] .' Saying so, He eulogizes that (vision):
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.47।। स्वयं भगवान् यहाँ स्वीकार करते हैं कि उनके विश्वरूप का दर्शन कर पाना कोई सभी भक्तों का विशेषाधिकार नहीं है। असीम कृपा के सागर भगवान् श्रीकृष्ण के विशेष अनुग्रह के रूप में अर्जुन इस विरले लाभ का आनन्द अनुभव कर सका है। वे यह भी विशेष रूप से कहते हैं कि? यह मेरा तेजोमय अनन्त विश्वरूप तुम्हारे पूर्व किसी ने नहीं देखा है।इसका अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि गीता के रचियता महर्षि व्यास? यहाँ किसी नये दर्शन की स्थापना और व्याख्या कर रहे हैं? जिसकी सत्यता वे भगवान् से प्रमाणित कराना चाहते है। इस कथन का अभिप्राय केवल इतना ही है कि सार्वभौमिक एकता का यह बौद्धिक परिचय या अनुभव किसी व्यक्ति को उन परिस्थितियों में नहीं हुआ? जैसे कि अर्जुन को युद्धभूमि पर हुआ था। बिखरा हुआ मन? थका हुआ शरीर और मानसिक रूप से पूर्णतया विचलित यह थी अर्जुन की विषादपूर्ण दयनीय दशा। विविध नामरूपमय सृष्टि की अनेकता में एकता को देख समझ सकने के लिए बुद्धि की एकाग्रता की जो अनुकूल स्थिति आवश्यक होती है? उससे अर्जुन मीलों दूर था। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण ने अलौकिक योगशक्ति के प्रभाव से उसे आवश्यक दिव्यचक्षु प्रदान करके? संयोग के एक शान्त क्षण में? उसे विश्वरूप का दर्शन करा दिया।भगवान् अपने अभिप्राय को अगले श्लोक में स्पष्ट करते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.47।।अर्जुनं भीतमुपलक्ष्य विश्वरुपं तिरोधाय प्रियवचसा आश्वसयन् श्रीभगवानुवाच -- मया प्रश्न्नेन त्वय्यनुग्रहबुद्धिमता इदं परं पारमेश्वरं रुपं तव दर्शितं। यतस्त्वं फलाभिसंधिरहितत्वात् शुद्धो मद्भक्त इति ध्वनयन्संबोधयति हेऽर्जुनेति। आत्मनो योगैश्वर्यस्य सामर्थ्योत्तेजोमयं तेजःप्रायं विश्वं समस्तं सर्वात्मकं अनन्तमन्तविधुरं आदिभवमाद्यं सर्वादौ सत् यन्मे विश्वरुपमिदं त्वदन्येन केनजित्पर्वं न दृष्टम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.47।।इतीति। एवमर्जुनेन प्रसादितो भयबाधितमर्जुनमुपलभ्योपसंहृत्य विश्वरूपमुचितेन वचनेन तमाश्वासयत् त्रिभिः -- मयेत्यादिना। हे अर्जुन? माभैषीः। यतो मया प्रसन्नेन त्वद्विषयकृपातिशयवता इदं विश्वरूपात्मकं परं श्रेष्ठं रूपं तव दर्शितमात्मयोगात् असाधारणान्निजसामर्थ्यात्। परत्वं विवृणोति। तेजोमयं तेजःप्रचुरं विश्वं समस्तमनन्तमाद्यं च यन्मम रूपं त्वदन्येन केनापि न दृष्टपूर्वं पूर्वं न दृष्टम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.47।।एवमर्जुनेन प्रार्थितस्तं स्तुवन्भगवानुवाच -- मयेति त्रिभिः। हे अर्जुन? प्रसन्नेन मया तव तुभ्यमिदं परं रूपं दर्शितम्। आत्मयोगात्स्वसामर्थ्यात्। करुणया नतु तद्दर्शनेऽधिकारोऽस्ति। तथाच प्रागुक्तम् कर्मण्येवाधिकारस्ते इति। तेजोमयं चिद्रूपं दिव्यं विश्वं विश्वात्मकं आद्यमनादि अनन्तं च यत् रूपं त्वदन्येन कदाचिदपि न पूर्वं दृष्टं दृष्टपूर्वम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.47।।एवं प्रार्थितोऽर्जुनमाश्वासयन् स्वरूपं दर्शयामास? तत्र पूर्वमाश्वासनमाह -- श्री भगवानुवाच मयेति। हे अर्जुन मया सर्वदा त्वयि प्रसन्नेन आत्मयोगात् स्वकीयत्वयोगाच्च तव परं इच्छया इदं रूपं दर्शितम्। कीदृशं तेजोमयं? विश्वं विश्वात्मकम्? अनन्तमन्तरहितम्? आद्यं सनातनं? यत् मे रूपं त्वदन्येन त्वां,विना केनाऽपि दृष्टपूर्वं न। तादृशं रूपं त्वदिच्छया दर्शितमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.47।।एवं प्रार्थितः सन् तमाश्वासयन् श्रीभगवानुवाच -- मयेति त्रिभिः। हे अर्चुन? किमिति बिमेषि। यतो मया प्रसन्नेन कृपया तवेदं परमुत्तमं रूपं दर्शितम्। आत्मनो मम योगाद्योगमायासामर्थ्यात्। परत्वमेवाह। तेजोमयं विश्वं विश्वात्मकनन्तमाद्यं च यन्मम रूपं त्वदन्येन त्वादृशाद्भक्तादन्येन न पूर्वं दृष्टं तत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.47।।श्रीभगवानुवाच -- मयेति त्रिभिः। मया सर्वमूलरूपेण स्वयं भगवतांऽशिना कृष्णेन स्वोपनिषत्प्रतिपाद्यस्वरूपेण द्विभुजेन लावण्यजलधिना महामनोरमेन गुणातीतेन सर्ववेदान्तवेद्यचरणेन परतत्त्वेन स्वाश्रितवात्सल्यकरुणावरुणालयेनाचिन्त्यैश्वरयोगेन प्रसन्नेन स्वात्मयोगबलात् परमुत्तमेततदक्षरं विश्वरूपं दर्शितम्। अनेन सदानन्दरूपे श्रीकृष्णे तस्मिन् द्विभुज एवेदं सामर्थ्यं यत्स्वरूपान्तरदर्शनमिति मूलरूपतयाऽवतारित्वादिति ज्ञापितम्। इत्थमेवोक्तभियुक्तैः -- नान्यावतारे सामर्थ्यं यत्कृष्णतनुदर्शनम्। श्रीकृष्ण एव सामर्थ्यं यद्रूपान्तरदर्शनम् इति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.47।।अर्जुनको भयभीत देखकर? विश्वरूपका उपसंहार करके प्रिय वचनोंसे धैर्य देते हुए श्रीभगवान् बोले --, हे अर्जुन प्रसन्न हुए मुझ परमात्माने -- तुझपर जो अनुग्रहबुद्धि है उसका नाम प्रसाद है उससे युक्त मुझ परमेश्वरने -- अपने ऐश्वर्यकी सामर्थ्यसे यह परम श्रेष्ठ तेजोमय -- तेजसे परिपूर्ण अनन्त -- अन्तरहित सबसे पहले होनेवाला अनादि विश्वरूप तुझे दिखाया है? जो मेरा रूप तेरे सिवा पहले और किसीसे भी नहीं देखा गया।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.47।। व्याख्या -- मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं दर्शितम् -- हे अर्जुन तू बारबार यह कह रहा है कि आप प्रसन्न हो जाओ (11। 25? 31? 45)? तो प्यारे भैया मैंने जो यह विराट्रूप तुझे दिखाया है? उसमें विकरालरूपको देखकर तू भयभीत हो गया है? पर यह विकरालरूप मैंने क्रोधमें आकर या तुझे भयभीत करनेके लिये नहीं दिखाया है। मैंने तो अपनी प्रसन्नतासे ही यह विराट्रूप तुझे दिखाया है। इसमें तेरी कोई योग्यता? पात्रता अथवा भक्ति कारण नहीं है। तुमने तो पहले केवल विभूति और योगको ही पूछा था। विभूति और योगका वर्णन करके मैंने अन्तमें कहा था कि तुझे जहाँकहीं जो कुछ विलक्षणता दीखे? वहाँवहाँ मेरी ही विभूति समझ। इस प्रकार तुम्हारे प्रश्नका उत्तर सम्यक् प्रकारसे मैंने दे ही दिया था। परन्तु वहाँ मैंने,(अथवा पदसे) अपनी ही तरफसे यह बात कही कि तुझे बहुत जाननेसे क्या मतलब देखने? सुनने? समझनेमें जो कुछ संसार आता है? उस सम्पूर्ण संसारको मैं अपने किसी अंशमें धारण करके स्थित हूँ। दूसरा भाव यह है कि तुझे मेरी विभूति और योगशक्तिको जाननेकी क्या जरूरत है क्योंकि सब विभूतियाँ मेरी योगशक्तिके आश्रित हैं और उस योगशक्तिका आश्रय मैं स्वयं तेरे सामने बैठा हूँ। यह बात तो मैंने विशेष कृपा करके ही कही थी। इस बातको लेकर ही तेरी विश्वरूपदर्शनकी इच्छा हुई और मैंने दिव्यचक्षु देकर तुझे विश्वरूप दिखाया। यह तो मेरी कोरी प्रसन्नताहीप्रसन्नता है। तात्पर्य है कि इस विश्वरूपको दिखानेमें मेरी कृपाके सिवाय दूसरा कोई हेतु नहीं है। तेरी देखनेकी इच्छा तो निमित्तमात्र है।आत्मयोगात् -- इस विराट्रूपको दिखानेमें मैंने किसीकी सहायता नहीं ली? प्रत्युत केवल अपनी सामर्थ्यसे ही तेरेको यह रूप दिखाया है।परम् -- मेरा यह विराट्रूप अत्यन्त श्रेष्ठ है।तेजोमयम् -- यह मेरा विश्वरूप अत्यन्त तेजोमय है। इसलिये दिव्यदृष्टि मिलनेपर भी तुमने इस रूपको दुर्निरीक्ष्य कहा है (11। 17)।विश्वम् -- इस रूपको तुमने स्वयं विश्वरूप? विश्वमूर्ते आदि नामोंसे सम्बोधित किया है। मेरा यह रूप सर्वव्यापी है।अनन्तमाद्यम् -- मेरे इस विश्वरूपका देश? काल आदिकी दृष्टिसे न तो आदि है और न अन्त ही है। यह सबका आदि है और स्वयं अनादि है।यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् -- तेरे सिवाय मेरे विश्वरूपको पहले किसीने भी नहीं देखा -- यह बात भगवान्ने कैसे कही क्योंकि रामावतारमें माता कौसल्याजीने और कृष्णावतारमें माता यशोदाजीने तथा कौरवसभामें भीष्म? द्रोण? सञ्जय? विदुर और ऋषिमुनियोंने भगवान्का विराट्रूप देखा ही था इसका उत्तर यह है कि भगवान्ने अपने विराट्रूपके लिये एवंरूपः (11। 48) पद देकर कहा है कि इस प्रकारके भयंकर विश्वरूपको? जिसके मुखोंमें बड़ेबड़े योद्धा? सेनापति आदि जा रहे हैं? पहले किसीने नहीं देखा है।दूसरी बात? अर्जुनके सामने युद्धका मौका होनेसे ऐसा भयंकर विश्वरूप दिखानेकी ही आवश्यकता थी और शूरवीर अर्जुन ही ऐसे रूपको देख सकते थे। परन्तु माता कौसल्या आदिके सामने ऐसा रूप दिखानेकी आवश्यकता भी नहीं थी और वे ऐसा रूप देख भी नहीं सकते थे अर्थात् उनमें ऐसा रूप देखनेकी सामर्थ्य भी नहीं थी।भगवान्ने यह तो कहा है कि इस विश्वरूपको पहले किसीने नहीं देखा? पर वर्तमानमें कोई नहीं देख रहा है -- ऐसा नहीं कहा है। कारण कि अर्जुनके साथसाथ सञ्जय भी भगवान्के विश्वरूपको देख रहे हैं। अगर सञ्जय न देखते तो वे गीताके अन्तमें यह कैसे कह सकते थे कि भगवान्के अति अद्भुत विराट्रूपका बारबार स्मरण करके मेरेको बड़ा भारी विस्मय हो रहा है और मैं बारबार हर्षित हो रहा हूँ (18। 77)।विशेष बातभगवान्के द्वारा मैंने अपनी प्रसन्नतासे? कृपासे ही तेरेको यह विश्वरूप दिखाया है -- ऐसा कहनेसे एक विलक्षण भाव निकलता है कि साधक अपनेपर भगवान्की जितनी कृपा मानता है? उससे कई गुना अधिक भगवान्की कृपा होती है। भगवान्की जितनी कृपा होती है? उसको माननेकी सामर्थ्य साधकमें नहीं है। कारण कि भगवान्की कृपा अपारअसीम है और उसको माननेकी सामर्थ्य सीमित है।साधक प्रायः अनुकूल वस्तु? व्यक्ति? परिस्थिति आदिमें ही भगवान्की कृपा मान लेता है अर्थात् सत्सङ्ग मिलता है? साधन ठीक चलता है? वृत्तियाँ ठीक हैं? मन भगवान्में ठीक लग रहा है आदिमें वह भगवान्की कृपा मान लेता है। इस प्रकार केवल अनुकूलतामें ही कृपा मानना कृपाको सीमामें बाँधना है? जिससे असीम कृपाका अनुभव नहीं होता। उस कृपामें ही राजी होना कृपाका भोग है। साधकको चाहिये कि वह न तो कृपाको सीमामें बाँधे और न कृपाका भोग ही करे।साधन ठीक चलनेमें जो सुख होता है? उस सुखमें सुखी होना? राजी होना भी भोग है? जिससे बन्धन होता है -- सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ (गीता 14। 6) सुख होना अथवा सुखका ज्ञान होना दोषी नहीं है? प्रत्युत उसके साथ सङ्ग करना? उससे सुखी होना? प्रसन्न होना ही दोषी है। इससे अर्थात् साधनजन्य सात्त्विक सुख भोगनेसे गुणातीत होनेमें बाधा लगती है। अतः साधकको बड़ी सावधानीसे इस सुखसे असङ्ग होना चाहिये। जो साधक इस सुखसे असङ्ग नहीं होता अर्थात् इसमें प्रसन्नतापूर्वक सुख लेता रहता है? वह भी यदि अपनी साधनामें तत्परतापूर्वक लगा रहे? तो समय पाकर उसकी उस सुखसे स्वतः अरुचि हो जायगी। परन्तु जो उस सुखसे सावधानीपूर्वक असङ्ग रहता है? उसे शीघ्र ही वास्तविक तत्त्वका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध -- विश्वरूपदर्शनके लिये भगवान्की कृपाके सिवाय दूसरा कोई साधन नहीं है -- इस बातका आगेके श्लोकमें विशेषतासे वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.47।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.47।।अर्जुनेन स्थाने हृषीकेशेत्यादिनोक्तस्य भगवतो वचनमवतारयति -- अर्जुनमिति। भगवत्प्रसादैकोपायलभ्यं तद्दर्शनमित्याशयेत्यानाह -- मयेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.47।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.47।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.47।। --,मया प्रसन्नेन? प्रसादो नाम त्वयि अनुग्रहबुद्धिः? तद्वता प्रसन्नेन मया तव हे अर्जुन? इदं परं रूपं विश्वरूपं दर्शितम् आत्मयोगात् आत्मनः ऐश्वर्यस्य सामर्थ्यात्। तेजोमयं तेजःप्रायं विश्वं समस्तम् अनन्तम् अन्तरहितं आदौ भवम् आद्यं यत् रूपं मे मम त्वदन्येन त्वत्तः अन्येन केनचित् न दृष्टपूर्वम्।।आत्मनः मम रूपदर्शनेन कृतार्थ एव त्वं संवृत्तः इति तत् स्तौति --,
───────────────────
【 Verse 11.48 】
▸ Sanskrit Sloka: न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: | एवंरूप: शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर ||
▸ Transliteration: na veda-yajñādhyayanairna dānaiḥ na ca kriyābhir na tapobhir ugraiḥ | evaṁ-rūpaḥ śakya ahaṁ nṛ-loke draṣṭuṁ tvadanyena kuru-pravīra ||
▸ Glossary: na: never; veda: by Vedic study; yajña: sacrifice; ādhyayanaiḥ: study; na dānaiḥ: not by charity; na: never; ca: also; kriyābhiḥ: by pious activities; na tapobhiḥ: by serious penances; ugraiḥ: severe; evaṁ: thus; rūpaḥ: form; śakyaḥ: can be seen; ahaṁ: I; nṛloke: in this material world; draṣṭuṁ: to see; tvad: you; anyena: by another; kurupravīra: O best among the Kuru warriors
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.48 O best among Kuru warriors, no one had ever before seen this Universal form of mine, for neither by studying the Vedas nor by performing sacrifices or charities, can this form be seen. Only you have seen this form.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.48।।हे कुरुप्रवीर मनुष्यलोकमें इस प्रकारके विश्वरूपवाला मैं न वेदोंके पढ़नेसे? न यज्ञोंके अनुष्ठानसे? न दानसे? न उग्र तपोंसे और न मात्र क्रियाओंसे तेरे (कृपापात्रके) सिवाय और किसीके द्वारा देखा जाना शक्य हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.48।। हे कुरुप्रवीर तुम्हारे अतिरिक्त इस मनुष्य लोक में किसी अन्य के द्वारा मैं इस रूप में? न वेदाध्ययन और न यज्ञ? न दान और न (धार्मिक) क्रियायों के द्वारा और न उग्र तपों के द्वारा ही देखा जा सकता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.48 न not? वेदयज्ञाध्ययनैः by the study of the Vedas and of Yajnas? न not? दानैः by gifts? न not? च and? क्रियाभिः by rituals? न not? तपोभिः by austerities? उग्रैः severe? एवंरूपः in such form? शक्यः (am) possible? अहम् I? नृलोके in the world of men? द्रष्टुम् to be seen? त्वत् than thee? अन्येन by another? कुरुप्रवीर O great hero of the Kurus.Commentary Mere cramming of the texts of the Vedas without knowing the meaning will not do. A study of the sacrifices also is necessary. One should know the meaning of these? also.Dana Charity such as a Tula Purusha (gift of gold eal in weight of a man) Kanyadana (gift of ones daughther in marriage)? gift of a cow? rice? etc.Kriya Rituals such as Agnihotra.Tapas Such as the Chandrayana Vrata. (This is a kind of Vrata or observance. The daily consumption of food is reduced by one mouthful every day for the dark half of the month beginning with the fullmoon. Then the food is increased by one mouthful every day during the bright fortnight during the increase of the moon. This Vrata (observance) is a great purifier of the mind. It destroys sins.)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.48. Not by the knowledge of the Vedas and sacrifices, nor by making gifts, nor by the rituals, nor by severe austerities, can I be seen in this form in the world of men, by anybody other than yourself, O the great hero of the Kurus !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.48 Not by study of the scriptures, not by sacrifice or gift, not by ritual or rigorous austerity, is it possible for man on earth to see what thou hast seen, O thou foremost hero of the Kuru-clan!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.48 Neither through the study of the Vedas, nor by sacrifices, nor by recitals of the scriptures, nor by gifts, nor by rituals, nor by strict austerities can I be realised in a form like this in the world of men by any one else but you. O Arjuna!
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.48 Not by the study of the Vedas and sacrifices, not by gifts, not even by rituals, not by severe austerities can I, in this form, be perceived in the human world by anyone ['By anyone who has not received My grace'. other than you, O most valiant among the Kurus.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.48 Neither by the study of the Vedas and sacrifices, nor by gifts nor by rituals nor by severe austerities can I be seen in this form in the world of men by any other than thyself, O great hero of the Kurus (Arjuna).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.48 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.48 In this form, which represents My real nature, I cannot be realised by such means as study of the Vedas, sacrifices etc., by anyone who is bereft of exclusive Bhakti towards Me or by any one other than yourself who has complete devotion towards Me.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.48 Na veda-yajna-adhyayanaih, not by the study of the Vedas and sacrifices, (i.e.) not by the methodical study of even the four Vedas and the study of the sacrifices-since the study of the sacrifices is achieved by the very study of the Vedas, the separate mention of the study of sacrifices is for suggesting detailed knowledge of sacrifices; [This separate mention of the study of sacrifices is necessary because the ancients understood the study of Vedas to mean learing them by rote.] so also, na danaih, not by gifts-in such forms as distributing wealth eal to the weight of the giver; na ca kriyabhih, not even by rituals-by Vedic and other rituals like Agnihotra etc.; nor even ugraih tapobhih, by severe austerities such a Candrayana [A religious observance or expiatory penance regulated by the moon's phases. In it the daily antity of food, which consists of fifteen mouthfuls at the full-moon, is curtailed by one mouthful during the dark fornight till it is reduced to nothing at the new moon; and it is increased in a like manner during the bright fortnight.-V.S.A.] etc. which are frightful; sakyah aham, can I; evam rupam, in this form-possessing the Cosmic form as was shown; drastum, be perceived; nrloke, in the human world; tvad-anyena, by anyone other than you; kuru-pravira, O most valiant among the Kurus.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.48।। यहाँ भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि किस कारण से अर्जुन इस असाधारण अनुभव को प्राप्त करने में विशेष अभिनन्दन का पात्र है। वे कहते हैं कि केवल वेदों का अध्ययन या यज्ञादि के अनुष्ठान से ही किसी में इस विश्वरूप को देख सकते की पात्रता नहीं आती। उसी प्रकार? दान धर्म या तप के आचरण से प्राप्त पुण्य भी इस दर्शन का अधिकार नहीं प्राप्त करता है। संक्षेप में? कठिन? साधनाओं के अभ्यास से भी जिसे पाना दुर्लभ है? उसे अर्जुन ने प्राप्त कर लिया? और इस कारण वह विशेष अभिनन्दन का पात्र है।भगवान् द्वारा यहाँ कहे गये वचनों का विपरीत अर्थ करके कोई यह नहीं समझे कि उन्होंने वेदाध्ययनादि की निन्दा की है अथवा ये समस्त साधन अनुपयोगी होने के कारण त्याज्य हैं। तात्पर्य यह है कि अध्ययन? यज्ञ? दान और तप ये सब अन्तकरण की शुद्धि तथा एकाग्रता प्राप्ति के साधन हैं? जो अनेकता में एकता के दर्शन करने के लिए अत्यावश्यक है। परन्तु कोई यह भी नहीं समझे कि यज्ञदानादि साधन अपने आप में ही पूर्ण हैं या वे ही साध्य हैं। केवल वेदाध्ययन आदि से ही एकत्व का बोध और साक्षात् अनुभव नहीं हो सकता। जब साधन सम्पन्न मन वृत्तिशून्य हो जाता है केवल तभी उसकी उस अन्तर्मुखी स्थिति में यह दर्शन सम्भव होता है। तात्पर्य यह है कि भोजन पाक सिद्धि अपने आप में क्षुधा शान्ति नहीं कर सकती? किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि पाकसिद्धि अनावश्यक है। इस दृष्टि से हमें इस श्लोक का अर्थ समझना चाहिए।भगवान् आगे कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.48।।मम विश्वरुपदर्शनेन कृतार्थ एव त्वं संपन्न इत्याशयेनाह -- नेति। न वेदानां चतुर्णामप्यध्ययनैः गुरुच्चारणानुच्चारणलक्षणैः। यज्ञाध्ययनैर्यज्ञविज्ञानस्य भीमांसाकल्पसूत्रादेरध्ययनैर्न दानैर्गोदानादिभिर्न च क्रियाभिः श्रौतस्मार्थक्रियाकलापैर्न तपोभिश्चान्द्रायणादिभिरुग्रैः घोरैर्देहशोषणैरेवं यथा प्रदर्शितं विश्वरुपं यस्य स एवंरुपाऽहं त्वदन्येन मदनुग्रहवर्जितेन द्रष्टुं शक्यः। अन्ये कुरवः केचित्कुरुवीराश्च। त्वं तु मे तद्रूपदर्शनलब्धप्रकर्षः कुरुप्रवीरः संपन्न इत सूचयन्नाह हे कुरुप्रवीर।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.48।।एतद्रूपदर्शनात्मकमतिदुर्लभं मत्प्रसादं लब्ध्वा कृतार्थ एवासि त्वमित्याह -- न वेदेति। वेदानां चतुर्णामपि अध्ययनैरक्षरग्रहणरूपैः? तथा मीमांसाकल्पसूत्रादिद्वारा यज्ञानां वेदबोधितकर्मणामध्ययनैरर्थविचाररूपैर्वेदयज्ञाध्ययनैः? दानैस्तुलापुरुषादिभिः? क्रियाभिरग्निहोत्रादिश्रौतकर्मभिः? तपोभिः कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिरुग्रैः कायेन्द्रियशोषकत्वेन दुष्करैः? एवंरूपोऽहं न शक्यः नृलोके मनुष्यलोके द्रष्टुं त्वदन्येन मदनुग्रहहीनेन। हे कुरुप्रवीर? शक्योहमिति वक्तव्ये विसर्गलोपश्छान्दसः। प्रत्येकं नकाराभ्यासो निषेधदार्ढ्याय। नच क्रियाभिरित्यत्र चकारादनुक्तसाधनान्तरसमुच्चयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.48।।योगैकगम्यमेतत्कर्मिणां दुष्प्रापमित्याह -- न वेदेति।
Chapter 11 (Part 17)
वेदानां यज्ञानां चाध्ययनैरधिगमैः नच दानैर्नच क्रियाभिः स्मृत्युक्ताभिरापूर्तादिभिर्वापीकूपारामादिभिस्तपोभिः कृच्छ्रचान्द्रयणाद्यैः। उग्रैर्मासोपवासाद्यैः। नृलोके एवंरूपोऽहं द्रष्टुं न शक्यः। रोरुत्वाभाव आर्षः। त्वदन्येन कुरुप्रवीर।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.48।।एवं त्वदिच्छयैवेदं रूपं दर्शितं? इदानीं च पूर्वतनमेव रूपं पश्य? दर्शनीयस्य रूपस्य दुर्लभत्वायाऽर्जुने कृपाधिक्यमाह -- न वेदेति। न वेदयज्ञाध्ययनैः वेदानां सार्थकशब्दात्मकानां यज्ञानामानुपूर्व्यादिसहितविद्याक्रियाणां अध्ययनैः? न दानैः तुलापुरुषादिभिः? न च क्रियाभिरग्निहोत्रादिरूपाभिः? न तपोभिरुग्रैः कृच्छ्रचान्द्रायणादिभिः नृलोके मनुष्यलोके एवंरूपः अहं पुरुषोत्तमः हे कुरुप्रवीर भक्तकुलश्रेष्ठ त्वदन्येन त्वामपहायान्येन द्रष्टुं पूर्वोक्तैः साधनैरपि न शक्यः न समर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.48।।एतद्दर्शनमतिदुर्लभं लब्ध्वा त्वं कृतार्थोऽसीत्याह -- नेति। वेदाध्ययनातिरेकेण यज्ञाध्ययनस्याभावात्। यज्ञशब्देन यज्ञविद्यायाः कल्पसूत्राद्या लक्ष्यन्ते। वेदानां यज्ञविद्यानां चाध्ययनैरित्यर्थः। नच दानैर्न च क्रियाभिरग्निहोत्रादिभिर्न चोग्रैस्तपोभिश्चान्द्रायणादिभिरेवंरूपोऽहं त्वदन्येन मनुष्यलोके द्रष्टुं शक्यः? अपितु त्वमेव केवलं मत्प्रसादेन दृष्ट्वा कृतार्थोऽसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.48।।मदनुग्रहैकलभ्यभक्तिव्यतिरिक्तैस्तु सर्वैरप्युपायैरेवमपि द्रष्टुमशक्य इत्याह -- न वेदेति। अहं पुरुषोत्तमः कृष्ण एवंरूपमैश्वरं यस्य स विशिष्टो नृलोके द्रष्टुमशक्यः केवलोऽक्षरादिस्तु स्वोपासकानां वेदप्रवचनादिसाधनैर्द्रष्टुं शक्योऽपि भवति? नाहं पुरुषोत्तमः अनन्यभक्तिलभ्यत्वात्भक्त्याऽहमेकया ग्राह्यः इति [11।14।21] भागवतवाक्यात्। तत्रापि त्वत्तो मदनुगृहीताद्भक्तादन्ये नैवमपि द्रष्टुं न शक्ताः एतद्दर्शनस्यापि मदनुग्रहलभ्यत्वात् त्वं तु केवलं मदनुग्रहात् दृष्टवानसि। इयमेव पुष्टिःपोषणं तदनुग्रहः इति [2।10।4] भागवतवाक्यात्।तद्रहितानामपि स्वप्रमेयबलेन स्वप्रापणं पुष्टिः इति भाष्यकारः। दैवस्य निग्रहणमनु सर्वसाधनकरणेनापि पुरुषोत्तमस्वरूपालाभे दैन्येनार्त्ततया च दृढतरबीजरूपासक्तिभावमनुग्रहणं भगवता यत्र भवति सोऽनुग्रहश्च पुष्टिरिति सङ्क्षेपः। तदिदं प्रमेयवर्त्म भागवतषष्ठस्कन्धे -- सध्रीचीनो ह्ययं पन्था लोके,क्षेमोऽकुतोऽभयः [अ.1।17] इति शुकेन धर्मविष्णुदूतसंवादोपाख्यानद्वारा स्पष्टमेव दर्शितमिति ततोऽवसेयम्। अत्रोपपत्तिर्भक्तिहेतुग्रन्थेऽनेकधा निरूपिता द्रष्टव्या।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.48।। मेरे रूपका दर्शन करके तू निःसंदेह कृतार्थ हो गया है। इस प्रकार उस रूपदर्शनकी स्तुति करते हैं --, न तो वेद और यज्ञोंके अध्ययनद्वारा अर्थात् न तो चारों वेदोंका यथावत् अध्ययन करनेसे और न यज्ञोंका अध्ययन करनेसे ही ( मैं दर्शन दे सकता हूँ )। वेदोंके अध्ययनसे ही यज्ञोंका अध्ययन सिद्ध हो सकता था? उसपर भी जो अलग यज्ञोंके अध्ययनका ग्रहण है? वह यज्ञविषयक विशेष विज्ञानके उपलक्षणके लिये है। वैसे ही न मनुष्यके बराबर तोलकर सुवर्णादि दान करनेसे? न श्रौतस्मार्तादि अग्निहोत्ररूप क्रियाओंसे और न चान्द्रायण आदि उग्र तपोंसे ही मैं अपने ऐसे रूपका दर्शन दे सकता हूँ। हे कुरुप्रवीर जैसा विश्वरूप तुझे दिखाया गया है वैसा मैं तेरे सिवा इस मनुष्यलोकमें और किसीके द्वारा नहीं देखा जा सकता।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.48।। व्याख्या -- कुरुप्रवीर -- यहाँ अर्जुनके लिये कुरुप्रवीर सम्बोधन देनेका अभिप्राय है कि सम्पूर्ण कुरुवंशियोंमें मेरेसे उपदेश सुननेकी? मेरे रूपको देखनेकी और जाननेकी तेरी जिज्ञासा हुई? तो यह,कुरुवंशियोंमें तुम्हारी श्रेष्ठता है। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान्को देखनेकी? जाननेकी इच्छा होना ही वास्तवमें मनुष्यकी श्रेष्ठता है।न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानैर्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः -- वेदोंका अध्ययन किया जाय? यज्ञोंका विधिविधानसे अनुष्ठान किया जाय? बड़ेबड़े दान किये जायँ? बड़ी उग्र (कठिनसेकठिन) तपस्याएँ की जायँ और तीर्थ? व्रत आदि शुभकर्म किये जायँ -- ये सबकेसब कर्म विश्वरूपदर्शनमें हेतु नहीं बन सकते। कारण कि जितने भी कर्म किये जाते हैं? उन सबका आरम्भ और समाप्ति होती है। अतः उन कर्मोंसे मिलनेवाला फल भी आदि और अन्तवाला ही होता है। अतः ऐसे कर्मोंसे भगवान्के अनन्त? असीम? अव्यय? दिव्य विश्वरूपके दर्शन कैसे हो सकते हैं उसके दर्शन तो केवल भगवान्की कृपासे ही होते हैं। कारण कि भगवान् नित्य हैं और उनकी कृपा भी नित्य है। अतः नित्य कृपासे ही अर्जुनको भगवान्के नित्य? अव्यय? दिव्य विश्वरूपके दर्शन हुए हैं। तात्पर्य यह हुआ कि उनमेंसे एकएकमें अथवा सभी साधनोंमें यह सामर्थ्य नहीं है कि वे विराट्रूपके दर्शन करा सकें। विराट्रूपके दर्शन तो केवल भगवान्की कृपासे? प्रसन्नतासे ही हो सकते हैं।गीतामें प्रायः यज्ञ? दान और तप -- इन तीनोंका ही वर्णन आता है। आठवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें और इसी अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें वेद? यज्ञ? दान और तप -- इन चारोंका वर्णन आया है और यहाँ वेद? यज्ञ? दान? तप और क्रिया -- इन पाँचोंका वर्णन आया है। आठवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें सप्तमी विभक्ति और बहुवचन तथा यहाँके श्लोकमें तृतीया विभक्ति और बहुवचनका प्रयोग हुआ है? जब कि दूसरी जगहः प्रायः प्रथमा विभक्ति और एकवचनका प्रयोग आता है।यहाँ तृतीया विभक्ति और बहुवचन देनेका तात्पर्य यह है कि इन वेद? यज्ञ? दान आदि साधनोंमेंसे एकएक साधन विशेषतासे बहुत बार किया जाय अथवा सभी साधन विशेषतासे बहुत बार किये जायँ? तो भी वे सबकेसब साधन विश्वरूपदर्शनके कारण नहीं बन सकते अर्थात् इनके द्वारा विश्वरूप नहीं देखा जा सकता। कारण कि विश्वरूपका दर्शन करना किसी कर्मका फल नहीं है।जैसे यहाँ वेद? यज्ञ आदि साधनोंसे विश्वरूप नहीं देखा जा सकता -- ऐसा कहकर विश्वरूपदर्शनकी दुर्लभता बतायी है? ऐसे ही आगे तिरपनवें श्लोकमें वेद? यज्ञ आदि साधनोंसे चतुर्भुजरूप नहीं देखा जा सकता -- ऐसा कहकर चतुर्भुजरूप -- दर्शनकी दुर्लभता बतायी है। चतुर्भुजरूपको देखनेमें अनन्यभक्तिको साधन बताया है। (11। 54) क्योंकि वह रूप ऐसा विलक्षण है कि उसका दर्शन देवता भी चाहते हैं। इसलिये उस रूपमें भक्ति हो सकती है। परन्तु विश्वरूपको देखकर तो भय लगता है अतः ऐसे रूपमें भक्ति कैसे होगी? प्रेम कैसे होगा इसलिये इसके दर्शनमें भक्तिको साधन नहीं बताया है। यह तो केवल भगवान्की प्रसन्नतासे? कृपासे ही देखा जा सकता है।एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन -- मनुष्यलोकमें इन साधनोंसे तुम्हारे सिवाय मेरा विश्वरूप कोई देख नहीं सकता -- इसका अर्थ यह नहीं है कि इन साधनोंसे तू देख सकता है। तुम्हारेको तो मैंने अपनी प्रसन्नतासे ही यह रूप दिखाया है।सञ्जयको भी जो विश्वरूपके दर्शन हो रहे थे? वह भी व्यासजीकी कृपासे प्राप्त दिव्यदृष्टिसे ही हो रहे थे? किसी दूसरे साधनसे नहीं। तात्पर्य है कि भगवान् और उनके भक्तों? सन्तोंकी कृपासे जो काम होता है? वह काम साधनोंसे नहीं होता। इनकी कृपा भी अहैतुकी होती है।कई लोग ठीक न समझनेके कारण ऐसा कहते हैं कि भगवान्ने अर्जुनको विश्वरूप दिखाया नहीं था? प्रत्युत यह समझा दिया था कि मेरे शरीरके किसी एक अंशमें अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। पर वास्तवमें यह बात है ही नहीं। स्वयं भगवान्ने कहा है कि मेरे इस शरीरमें एक जगह चराचरसहित सम्पूर्ण जगत्को अभी देख ले ( 11 । 7)। जब अर्जुनको दिखायी नहीं दिया? तब भगवान्ने कहा कि तू अपने इन चर्मचक्षुओंसे मेरे विश्वरूपको नहीं देख सकता? इसलिये मैं तुझे दिव्यचक्षु देता हूँ (11। 8)। फिर भगवान्ने अर्जुनको दिव्यचक्षु देकर साक्षात् अपना विश्वरूप दिखाया। सञ्जयने भी कहा है कि भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित विश्वरूपको अर्जुनने देखा (11। 13)। अर्जुनने भी विश्वरूपका दर्शन करते हुए कहा कि मैं आपके शरीरमें सम्पूर्ण प्राणियोंके समुदायोंको तथा ब्रह्मा? विष्णु? महेश आदि सबको देख रहा हूँ (11। 15) आदिआदि। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्ने अर्जुनको प्रत्यक्षमें अपने विश्वरूपके दर्शन कराये थे। दूसरी बात? समझानेके लिये तो ज्ञानचक्षु होते हैं (गीता 13। 34 15। 11)? पर दिव्यचक्षुसे साक्षात् दर्शन ही होते हैं। अतः भगवान्ने केवल कहकर समझा दिया हो? ऐसी बात नहीं है। सम्बन्ध -- अर्जुनका भय दूर करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उनको देवरूप देखनेकी आज्ञा देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.48।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.48।।तच्छब्देन प्रकृतं दर्शनं परामृश्यते। वेदाध्ययनात्पृथग्यज्ञाध्ययनग्रहणं पुनरुक्तेरयुक्तमित्याशङ्क्याह -- न वेदेति। नच वेदाध्ययनग्रहणादेव यज्ञविज्ञानमपि गृहीतमध्ययनस्यार्थावबोधान्तत्वादिति वाच्यं? तस्याक्षरग्रहणान्ततया वृद्धैः साधितत्वादिति भावः। श्लोकपूरणार्थमसंहितकरणं? त्वत्तोऽन्येन मदनुग्रहविहीनेनेति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.48।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.48।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.48।। --,न वेदयज्ञाध्ययनैः चतुर्णामपि वेदानाम् अध्ययनैः यथावत् यज्ञाध्ययनैश्च -- वेदाध्ययनैरेव यज्ञाध्ययनस्य सिद्धत्वात् पृथक् यज्ञाध्ययनग्रहणं यज्ञविज्ञानोपलक्षणार्थम् -- तथा न दानैः तुलापुरुषादिभिः? न च क्रियाभिः अग्निहोत्रादिभिः श्रौतादिभिः? न अपि तपोभिः उग्रैः चान्द्रायणादिभिः उग्रैः घोरैः? एवंरूपः यथादर्शितं विश्वरूपं यस्य सोऽहम् एवंरूपः न शक्यः अहं नृलोके मनुष्यलोके द्रष्टुं त्वदन्येन त्वत्तः अन्येन कुरुप्रवीर।।
───────────────────
【 Verse 11.49 】
▸ Sanskrit Sloka: मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् | व्यपेतभी: प्रीतमना: पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य ||
▸ Transliteration: mā te vyathā mā ca vimūḍhabhāvo dṛṣṭvā rūpaṁ ghoramīdṛṅmamedam | vyapetabhīḥ prītamanāḥ punastvaṁ tadeva me rūpamidaṁ prapaśya ||
▸ Glossary: mā: let it not be; te: unto you; vyathā: trouble; mā: let it not be; ca: also; vi- mūḍhabhāvaḥ: bewilderment; dṛṣṭvā: by seeing; rūpaṁ: form; ghoraṁ: terrible; īdṛk: like this; mama: My; idaṁ: as it is; vyapetabhīḥ: just become free from all fear; prītamanāḥ: be pleased in mind; punaḥ: again; tvaṁ: you; tat: that; eva: thus; me: My; rūpam: form; idaṁ: this; prapaśya: just see
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.49 Do not be disturbed any longer by seeing this terrible form of Mine. Dear devotee, be free from all disturbances. With a peaceful mind, you can now see the form you wish to see.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.49।।यह इस प्रकारका मेरा घोररूप देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये और मूढ़भाव भी नहीं होना चाहिये। अब निर्भय और प्रसन्न मनवाला होकर तू फिर उसी मेरे इस (चतुर्भुज) रूपको अच्छी तरह देख ले।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.49।। इस प्रकार मेरे इस घोर रूप को देखकर तुम व्यथा और मूढ़भाव को मत प्राप्त हो। निर्भय और प्रसन्नचित्त होकर तुम पुन मेरे उसी (पूर्व के) रूप को देखो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.49 मा not? ते thee? व्यथा fear? मा not? च and? विमूढभावः bewildered state? दृष्ट्वा having seen? रूपम् form? घोरम् terrible? ईदृक् such? मम My? इदम् this? व्यपेतभीः with (thy) fear dispelled? प्रीतमनाः with gladdened heart? पुनः again? त्वम् thou? तत् that? एव even? मे My? रूपम् form? इदम् this? प्रपश्य behold.Commentary Former form is the form with four hands with conch? discus? club or mace and lotus.The Lord was Arjuna in a state of terror. Therefore? He withdrew the Cosmic Form and assumed His usual gentle form. He consoled Arjuna and spoke sweet? loving words.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.49. Let there be no distress and no bewilderment in you by seeing this terrific and violent form of Mine; being free from fear, cheerful at heart, behold again this form of Mine which is the same [as before].
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.49 Be not afraid or bewildered by the terrible vision. Put away thy fear and, with joyful mind, see Me once again in My usual Form."
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.49 You need not fear any more, nor be perplexed, looking on this awesome form of Mine. Free from fear and with a gladdened heart, behold again that other form of Mine.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.49 May you have no fear, and may not there be bewilderment by seeing this form of Mine so terrible Becoming free from fear and gladdened in mind again, see this very earlier form of Mine.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.49 Be not afraid, nor bewildered on seeing such a teriible form of Mine as this; with thy fear dispelled and with a gladdened heart, now behold again this former form of Mine.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.49 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.49 Whatever fear and whatever perlexity have been caused to you by seeing My terrible form, may it cease now. I shall show you the benign form to which you were accustomed before. Behold now that form of Mine.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.49 Ma te vyatha, may you have no fear; and ma vimudha-bhavah, may not there be bewilderment of the mind; drstva, by seeing, perceiving; idam, this rupam, form; mama, of Mine; idrk ghoram, so terrible, as was revealed. Vyapetabhih, becoming free from fear; and becoming prita-manah, gladdened in mind; punah, again; prapasya, see; idam, this; eva, very; tat, earlier; rupam, form; me, of Mine, with four hands, holding a conch, a discus and a mace, which is dear to you.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.49।। जब कभी अवसर प्राप्त होता है? व्यासजी की नाट्यप्रतिभा अपनी पूर्णता को पाने में कभी विफल नहीं होती। यहाँ ऐसे ही एक कलात्मक चित्र का उदाहरण प्रस्तुत है? जो गीतारूपी पटल पर व्यासजी ने शब्दों के द्वारा चित्रित किया है। अर्जुन के मानसिक विक्षेपों को यहाँ नाटकीय ढंग से भगवान् के इन शब्दों में दर्शाते हैं कि? तुम मेरे इस घोर रूप को देखकर भय और मोह को मत प्राप्त हो।भगवान् अपने मधुर वचनों एवं व्यवहार से अर्जुन को सांत्वना देते हुए उसके मन को पुन शान्त और प्रसन्न करते हैं। भगवान् पुन अपने मूलरूप को धारण करते हैं? जिसकी सूचना देते हुए वे कहते हैं कि? पुन मेरे उसी रूप को देखो।यह खण्ड जो भगवान् का अपने पूर्व के सौम्य और शान्त रूप में पुनर्प्रवेश का वर्णन करता है? उससे वेदान्त के विद्यार्थियों को किसी एक महावाक्य का तो स्मरण होना ही चाहिए। समष्टि के घोर विश्वरूप तथा श्रीकृष्ण के सौम्य दिव्य व्यष्टि रूप का एकत्व इस वाक्य द्वारा कि मेरा वही यह रूप,हैअत्यन्त सुन्दर प्रकार से दर्शाया गया है। वस्तुत जो परम सत्य श्रीकृष्ण की व्यष्टि उपाधि में व्यक्त हो रहा है? वही सत्य विराटरूप में भी है? जहाँ वह समस्त नामरूपों के अधिष्ठान के रूप में स्थित है। तरंगों का अधिष्ठान समुद्र है। यदि समुद्र शक्तिशाली? भयंकर घोर और विशाल है तो स्वयं तरंग लज्जालु और सौम्य? प्रिय तथा आकर्षक होती है।एक बार फिर दृश्य है हस्तिनापुर का? जहाँ राजभवन में अन्ध वृद्ध धृतराष्ट्र को संजय बताता है कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.49।।तव प्रसन्नतायै प्रदर्शितेन विश्वरुपेण तव व्यथादिकं चेत्तर्हि तदेव मे रुपं पश्येत्याह -- मा त इति। ईदृक् घोरं ममेदं रुपं दृष्ट्वा तव व्यथा भयं माभूत। मा च विमूढभावो व्याकुलचित्तता। तथाच व्यपेतभीः व्यथारहितः प्रीतमनाश्च सन् तदेव स्वेष्टं चतुर्भुजं शङ्खचक्रगदापद्मधरं शयामघनं मम रुपमिदं मया प्रत्यक्षीकृतं प्रकर्षेण विश्वरुपदर्शनजनितव्यथादिनिवृत्त्यर्थं पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.49।।एवं त्वदनुग्रहार्थमाविर्भूतेन रूपेणानेन चेत्तवोद्वेगस्तर्हि -- मात इति। इदं घोरं ईदृक् अनेकबाह्वादियुक्तत्वेन भयंकरं मम रूपं दृष्ट्वा स्थितस्य ते तव या व्यथा भयनिमित्ता पीडा सा माभूत्। तथा,मद्रूपदर्शनेऽपि यो विमूढभावो व्याकुलचित्तत्वपरितोषः सोपि माभूत्। किंतु व्यपेतभीरपगतभयः प्रीतमनाश्च सन् पुनस्त्वं तदेव चतुर्भुजं वासुदेवत्वादिविशिष्टं त्वया सदा पूर्वदृष्टं रूपमिदं विश्वरूपोपसंहारेण प्रकटीक्रियमाणं,प्रपश्य प्रकर्षेण भयराहित्येन संतोषेण च पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.49।।इदमतिदुर्लभदर्शनं रूपं दृष्ट्वापि चेद् व्यथसे तर्ह्युपसंहरामीदमित्याशयेनाह -- मा ते इति। ममेदं ईदृक् घोरं रूपं दृष्ट्वा ते तव व्यथा माभूदिति शेषः। विमूढभावो मोहश्च ते माभूत्। व्यपेतभीर्निर्भयः प्रीतमनाश्च पुनस्त्वं भूत्वा तदेव यत्त्वया द्रष्टुं प्रार्थितं मे ममेदं रूपं प्रपश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.49।।यदन्येन न शक्यस्ततः पूर्वोक्तभयाशङ्कादिरहितस्तदेव रूपं पश्येत्याह -- मा त इति। ते व्यथा न दर्शयिष्यामीत्यादिरूपा माऽस्तु। च पुनः मम घोरं भयानकम्? ईदृक् सर्वग्रसनादिधर्मयुक्तम्? इदं परिदृश्यमानं दृष्ट्वा विमूढभावः मोहरूपो माऽस्तु। व्यपेतभीः विगतभयः प्रीतमनाः संस्तदेव पूर्वदृष्टमेव मे इदं रूपं प्रपश्य प्रकर्षेण यथाभिलाषं भक्तियुतः पश्येत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.49।। एवमपि चेत्तवेदं रूपं घोरं दृष्ट्वा व्यथा भवति तर्हि तदेव रूपं दर्शयामीत्याह -- मा त इति। ईदृगीदृशं मदीयं घोरं रूपं दृष्ट्वा ते व्यथा मास्तु। विमूढभावो विमूढत्वं च मास्तु। व्यपगतभयः प्रीतमनाश्च सन्पुनस्त्वं तदेवेदं मम रूपं प्रकर्षेण पश्य।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.49।।किञ्च मा ते व्यथादिर्भवतु। घोरमिदं रूपं? कालरूपत्वात्। तव पुष्टिमिश्रमर्यादाभक्तस्य भयावहमिति तदेव पूर्वं दृष्टभूतं ममेदं पश्य।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.49।।जैसा पहले दिखाया जा चुका है? वैसे मेरे इस घोर रूपको देखकर तुझे भय न होना चाहिये और विमूढभाव अर्थात् चित्तकी मूढावस्था भी नहीं होनी चाहिये। तू भयरहित और प्रसन्नमन हुआ वही अपना इष्ट यह शङ्खचक्रगदाधारी चतुर्भुजरूप फिर भी देख।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.49।। व्याख्या -- मा ते व्यथा मा च विमूढभावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् -- विकराल दाढ़ोंके कारण भयभीत करनेवाले मेरे मुखोंमें योद्धालोग बड़ी तेजीसे जा रहे हैं? उनमेंसे कई चूर्ण हुए सिरोंसहित दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं और मैं प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोगोंका ग्रसन करते हुए उनको चारों ओरसे चाट रहा हूँ -- इस प्रकारके मेरे घोर रूपको देखकर तेरेको व्यथा नहीं होनी चाहिये? प्रत्युत प्रसन्नता होनी चाहिये। तात्पर्य है कि पहले (11। 45 में) तू जो मेरी कृपाको देखकर हर्षित हुआ था? तो मेरी कृपाकी तरफ दृष्टि होनेसे तेरा हर्षित होना ठीक ही था? पर यह व्यथित होना ठीक नहीं है।अर्जुनने जो पहले कहा है -- प्रव्यथितास्तथाहम् (11। 23) और प्रव्यथितान्तरात्मा (11। 24)। उसीके उत्तरमें भगवान् यहाँ कहते हैं -- मा ते व्यथा।,मैं कृपा करके ही ऐसा रूप दिखा रहा हूँ। इसको देखकर तेरेको मोहित नहीं होना चाहिये -- मा च विमूढभावः। दूसरी बात? मैं तो प्रसन्न ही हूँ और अपनी प्रसन्नतासे ही तेरेको यह रूप दिखा रहा हूँ परन्तु तू जो बारबार यह कह रहा है कि प्रसन्न हो जाओ प्रसन्न हो जाओ? यही तेरा विमूढ़भाव है। तू इसको छोड़ दे। तीसरी बात? पहले तूने कहा था कि मेरा मोह चला गया (11। 1)? पर वास्तवमें तेरा मोह अभी नहीं गया है। तेरेको इस मोहको छोड़ देना चाहिये और निर्भय तथा प्रसन्न मनवाला होकर मेरा वह देवरूप देखना चाहिये।तेरा और मेरा जो संवाद है? यह तो प्रसन्नतासे? आनन्दरूपसे? लीलारूपसे होना चाहिये। इसमें भय और मोह बिलकुल नहीं होने चाहिये। मैं तेरे कहे अनुसार घोड़े हाँकता हूँ? बातें करता हूँ? विश्वरूप दिखाता हूँ आदि सब कुछ करनेपर भी तूने मेरेमें कोई विकृति देखी है क्या (टिप्पणी प0 611.1) मेरेमें कुछ अन्तर आया है क्या ऐसे ही मेरे विश्वरूपको देखकर तेरेमें भी कोई विकृति नहीं आनी चाहिये। हे अर्जुन तेरेको जो भय लग रहा है? वह शरीरमें अहंताममता (मैंमेरापन) होनेसे ही लग रहा है अर्थात् अहंताममतावाली चीज (शरीर) नष्ट न हो जाय? इसको लेकर तू भयभीत हो रहा है -- यह तेरी मूर्खता है? अनजानपना है। इसको तू छोड़ दे।आज भी जिसकिसीको जहाँकहीं जिसकिसीसे भी भय होता है? वह शरीरमें अहंताममता होनेसे ही होता है। शरीरमें अहंताममता होनेसे वह उत्पत्तिविनाशशील वस्तु(प्राणों) को रखना चाहता है। यही मनुष्यकी मूर्खता है और यही आसुरी सम्पत्तिका मूल है। परन्तु जो भगवान्की तरफ चलनेवाले हैं? उनका प्राणोंमें मोह नहीं रहता? प्रत्युत उनका सर्वत्र भगवद्भाव रहता है और एकमात्र भगवान्में प्रेम रहता है। इसलिये वे निर्भय,हो जाते हैं। उनका भगवान्की तरफ चलना दैवी सम्पत्तिका मूल है। नृसिंहभगवान्के भयंकर रूपको देखकर देवता आदि सभी डर गये? पर प्रह्लादजी नहीं डरे क्योंकि प्रह्लादजीकी सर्वत्र भगवद्बुद्धि थी। इसलिये वे नृसिंहभगवान्के पास जाकर उनके चरणोंमें गिर गये और भगवान्ने उनको उठाकर गोदमें ले लिया तथा उनको जीभसे चाटने लगेव्यपेतभीः प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य -- अर्जुनने पैंतालीसवें श्लोकमें कहा था -- भयेन च प्रव्यथितं मनो मे अतः भगवान्ने भयेन के लिये कहा है -- व्यपेतभीः अर्थात् तू भयभीत हो जा और प्रव्यथितं मनः के लिये कहा है -- प्रीतमनाः अर्थात् तू प्रसन्न मनवाला हो जा।भगवान्ने विराट्रूपमें अर्जुनको जो चतुर्भुजरूप दिखाया था? उसीके लिये भगवान् पुनः पद देकर कह रहे हैं कि वही मेरा यह रूप तू फिर अच्छी तरहसे देख ले।तदेव कहनेका तात्पर्य है कि तू देवरूप (विष्णुरूप) के साथ ब्रह्मा? शंकर आदि देवता और भयानक विश्वरूप नहीं देखना चाहता? केवल देवरूप ही देखना चाहता है इसलिये वही रूप तू अच्छी तरहसे देख ले।अर्जुनकी प्रार्थनाके अनुसार भगवान् अभी जो रूप दिखाना चाहते हैं? उसके लिये भगवान्ने यहाँ इदम् शब्दका प्रयोग किया है।सञ्जय और अर्जुनकी दिव्यदृष्टि कबतक रहीसञ्जयको वेदव्यासजीने युद्धके आरम्भमें दिव्यदृष्टि दी थी (टिप्पणी प0 611.2)? जिससे वे धृतराष्ट्रको युद्धके समाचार सुनाते रहे। परन्तु अन्तमें जब दुर्योधनकी मृत्युपर सञ्जय शोकसे व्याकुल हो गये? तब सञ्जयकी वह दिव्यदृष्टि चली गयी (टिप्पणी प0 611.3)।अर्जुनके द्वारा विश्वरूप दिखानेकी प्रार्थना करनेपर भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी -- दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम् (11। 8) और अर्जुन विराट्रूप भगवान्के देवरूप? उग्ररूप आदि रूपोंके दर्शन करने लगे। जब अर्जुनके सामने अत्युग्र रूप आया? तब वे डर गये और भगवान्की स्तुतिप्रार्थना करते हुए कहने लगे कि मेरा मन भयसे व्यथित हो रहा है? आप मेरेको वही चतुर्भुजरूप दिखाइये। तब भगवान्ने अपना चतुर्भुज दिखाया और फिर द्विभुजरूपसे हो गये। इससे सिद्ध होता है कि यहाँ (उनचासवें श्लोक) तक ही अर्जुनकी दिव्यदृष्टि रही। इक्यावनवें श्लोकमें स्वयं अर्जुनने कहा है कि मैं आपके सौम्य मनुष्यरूपको देखकर सचेत हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ।,यहाँ शङ्का होती है कि अर्जुन तो पहले भी व्यथित (व्याकुल) हुए थे -- दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् (11। 23)? दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा (11। 24) अतः वहीं उनकी दिव्यदृष्टि चली जानी चाहिये थी। इसका समाधान यह है कि वहाँ अर्जुन इतने भयभीत नहीं हुए थे? जितने यहाँ हुए हैं। यहाँ तो अर्जुन भयभीत होकर भगवान्को बारबार नमस्कार करते हैं और उनसे चतुर्भुजरूप दिखानेके लिये प्रार्थना भी करते हैं (11। 45)। इसलिये यहाँ अर्जुनकी दिव्यदृष्टि चली जाती है।दूसरा कारण यह भी माना जा सकता है कि पहले अर्जुनकी विश्वरूप देखनेकी विशेष रुचि (इच्छा) थी -- द्रष्टुमिच्छामि ते रूपम् ( 11। 3)? इसलिये भगवान्ने अर्जुनको दिव्यदृष्टि दी परन्तु यहाँ अर्जुनकी विश्वरूप देखनेकी रुचि नहीं रही और वे भयभीत होनेके कारण चतुर्भुजरूप देखनेकी इच्छा करते हैं? इसलिये (दिव्यदृष्टिकी आवश्यकता न रहनेसे) उनकी दिव्यदृष्टि चली जाती है।अगर सञ्जय और अर्जुन शोकसे? भयसे व्यथित (व्याकुल) न होते? तो उनकी दिव्यदृष्टि बहुत समयतक रहती और वे बहुत कुछ देख लेते। परन्तु शोक और भयसे व्यथित होनेके कारण उनकी दिव्यदृष्टि चली गयी। इसी तरहसे जब मनुष्य मोहसे संसारमें आसक्त हो जाता है? तब भगवान्की दी हुई विवेकदृष्टि काम नहीं करती। जैसे? मनुष्यका रुपयोंमें अधिक मोह होता है तो वह चोरी करने लग जाता है? फिर और मोह बढ़नेपर डकैती करने लग जाता है तथा अत्यधिक मोह बढ़ जानेपर वह रुपयोंके लिये दूसरेकी हत्यातक कर देता है। इस प्रकार ज्योंज्यों मोह बढ़ता है? त्योंहीत्यों उसका विवेक काम नहीं करता। अगर मनुष्य मोहमें न फँसकर अपनी विवेकदृष्टिको महत्त्व देता? तो वह अपना उद्धार करके संसारमात्रका उद्धार करनेवाला बन जाता सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको जिस रूपको देखनेके लिये आज्ञा दी? उसीके अनुसार भगवान् अपना विष्णुरूप दिखाते हैं -- इसका वर्णन सञ्जय आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.49।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.49।।विश्वरूपदर्शनमेवं स्तुत्वा यद्यस्माद्दृश्यमानाद्बिभेषि तर्हि तदुपसंहरामीत्याह -- मा ते व्यथेति। बहुविधमनुभूतत्वमभिप्रेत्येदृगित्युक्तमिदमिति प्रत्यक्षयोग्यत्वम्। तदेवेत्युक्तं इदमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.49।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.49।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.49।। --,मा ते व्यथा मा भूत् ते भयम्? मा च विमूढभावः विमूढचित्तता? दृष्ट्वा उपलभ्य रूपं घोरम् ईदृक् यथादर्शितं मम इदम्। व्यपेतभीः विगतभयः? प्रीतमनाश्च सन् पुनः भूयः त्वं तदेव चतुर्भुजं रूपं शङ्खचक्रगदाधरं तव इष्टं रूपम् इदं प्रपश्य।।संजय उवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.50 】
▸ Sanskrit Sloka: सञ्जय उवाच | इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूय: | आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुन: सौम्यवपुर्महात्मा ||
▸ Transliteration: sañjaya uvāca | ityarjunaṁ vāsudevastatho’ktvā svakaṁ rūpaṁ darśayāmāsa bhūyaḥ | āśvasayām āsa ca bhītam enaṁ bhūtvā punaḥ saumya-vapur-mahātmā ||
▸ Glossary: saṅjaya uvāca: Sañjaya said; iti: thus; arjunaṁ: unto Arjuna; vāsudevaḥ: Kṛṣṇa; tathā: that way; uktvā: saying; svakaṁ: His own; rūpaṁ: form; darśayāmāsa: showed; bhūyaḥ: again; āśvāsayāmāsa: also convinced him; ca: also; bhītam: fearful; enaṁ: him; bhūtvā punaḥ: becoming again; saumyavapuḥ: beautiful form; mahātmā: the great one
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.50 Sañjaya said: Kṛṣṇa, while speaking to Arjuna, revealed His form with four arms, Then assuming His human form He consoled the terrified Arjuna.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.50।।सञ्जय बोले -- वासुदेवभगवान्ने अर्जुनसे ऐसा कहकर फिर उसी प्रकारसे अपना रूप (देवरूप) दिखाया और महात्मा श्रीकृष्णने पुनः सौम्यवपु (द्विभुजरूप) होकर इस भयभीत अर्जुनको आश्वासन दिया।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.50।। संजय ने कहा -- भगवान् वासुदेव ने अर्जुन से इस प्रकार कहकर? पुन अपने (पूर्व) रूप को दर्शाया? और फिर? सौम्यरूप महात्मा श्रीकृष्ण ने इस भयभीत अर्जुन को आश्वस्त किया।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.50 इति thus? अर्जुनम् to Arjuna? वासुदेवः Vaasudeva? तथा so? उक्त्वा having spoken? स्वकम् His own? रूपम् form? दर्शयामास showed? भूयः again? आश्वासयामास consoled? च and? भीतम् who was terrified? एनम् him? भूत्वा having become? पुनः again? सौम्यवपुः of gentle form? महात्मा the greatsouled One.Commentary His own form His form as the son of Vasudeva.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.50. Having said to Arjuna as above, Vasudeva revealed His own tiny form; assuming His gentle body once again, the Mighty Soul (Krsna) consoled the frightened Arjuna.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.50 Sanjaya continued: "Having thus spoken to Arjuna, Lord Shri Krishna showed Himself again in His accustomed form; and the Mighty Lord, in gentle tones, softly consoled him who lately trembled with fear.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.50 Sanjaya said Having spoken thus to Arjuna, Sri Krsna revealed to him once more His own form. The Mahatman, assuming again a benign form, reassured him who had been struck with awe.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.50 Sanjaya said Thus, having spoken to Arjuna in that manner, Vasudeva showed His own form again. And He, the exalted One, reassured this terrified one by again becoming serene in form.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.50 Sanjaya said Having thus spoken to Arjuna, Krishna again showed His own form and the great Soul (Krishna), assuming His gentle form, consoled him (Arjuna) who was terrified.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.51 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.50 Sanjaya said Having spoken thus to Arjuna, the Lord, the son of Vasudeva, revealed His own four-armed form. And the Mahatman, i.e., one whose resolves are always treu, reassured him who was terror-stricken on seeing ann unfamiliar form, by resuming the familiar pleasant form. Possession of His own four-armed form alone is proper to this Lord of all, the Supreme Person, the Supreme Brahman, when he has assumed the human form for blessing this world as the son of Vasudeva. But in answer to the prayer of Vasudeva, who was terrified by Kamsa, the two extra arms were withdrawn till the destruction of Kamsa. These became manifest again. For He was prayed to thus: 'You are born, O Lord, O Lord of gods, withdraw this form bearing conch, discus and mace out of grace ৷৷. withdraw this form of four arms, O Self of all' (V. P., 5.3.10 and 13). Even to Sisupala, who hated Him, this form of four arms of Sri Krsna was the object of constant thought, as described in: 'Him who is of four long and robust arms, bearing the conch, discus and the mace' (V. P., 4.15.10). Hence Arjuna also exclaimed here; 'Assume again that four-armed shape' (11.46).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.50 Iti, thus; uktva, having spoken; arjunam, to Arjuna; tatha, in that manner, the words as stated above; Vasudeva darsayamasa, showed; svakam, His own; rupam, form, as was born in the house of Vasudeva; bhuyah, again. And the mahatma, exalted One; asvasayamasa, reassured; enam, this; bhitam, terrified one; bhutva, by becoming; punah, again; saumya-vapuh, serene in form, graceful in body.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.50।। यहाँ संजय अन्ध वृद्ध राजा से इस बात की पुष्टि करता है कि भगवान् ने अपने दिये हुए वचन के अनुसार पुन सौम्य रूप को धारण किया। वासुदेव शब्द से यह स्पष्ट करते हैं कि पूर्व का रूप कौन सा था वह रूप जिसमें श्रीकृष्ण ने वसुदेव के घर जन्म लिया था। भगवान् ने पुन? अर्जुन के परिचित मित्र और गोपियों के घनश्याम कृष्ण का सौम्य और प्रिय रूप धारण किया। भयभीत अर्जुन को वे मधुर वचनों से आश्वस्त करते हैं।यहाँ फिर एक बार हम संजय के शब्दों में उसकी व्याकुलता देखते हैं। वह चाहता है कि धृतराष्ट्र यह देखें कि श्रीकृष्ण ही विश्वेश्वर हैं और वे पाण्डवों के साथ हैं। किन्तु कैसे क्या कभी एक अन्धा व्यक्ति देख सकता हैफिर रणभूमि का दृश्य है। संजय अर्जुन के शब्दों में सूचित करता है कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.50।।एतद्वृत्तान्तं धृतराष्ट्राय संजयो निवेदितवानित्याह -- संजय उवाच। इत्येवमर्जुनं वासुदेवस्तथाभूतं वचनमुक्तवा। वासुदेव इत्यनेन स्वकमित्यस्य वसुदेवगृहे जातं स्वकीयं रुपमित्यर्थ सूचयति। दर्शयामास दर्शितवान् पुनःपुनराश्वसितवान्।,च पुनः सौम्यवपुः प्रसन्नदेहो भूत्वा। नन्वेवं क्षणिकचित्तेऽर्जुने क्षोभं कुतो न कृतवानित्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमाह। महात्मा कारुण्यादिगुणगणाकरस्तस्य भगवतो युक्तमेव पूर्वपरिचितसौम्यवपुःप्रदर्शनेनार्जुनाश्वासनमिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.50।।इतीति। वासुदेवोऽर्जुनमिति प्रागुक्तमुक्त्वा यथा पूर्वमासीत्तथा स्वकं रूपं किरीटमकरकुण्डलगदाचक्रादियुक्तं चतुर्भुजं श्रीवत्सकौस्तुभवनमालापीताम्बरादिशोभितं दर्शयामास भूयः पुनः आश्वासयामास च भीतमेनमर्जुनं भूत्वा पुनः पूर्ववत्सौम्यवपुरनुग्रशरीरः महात्मा परमकारुणिकः सर्वेश्वरः सर्वज्ञ इत्यादिकल्याणगुणाकरः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.50।।संजय उवाच -- इतीति। वासुदेवोऽर्जुनं प्रति इति पूर्वोक्तरीत्योक्त्वा यथा पूर्वमासीत्तथा स्वकं मानुषं रूपं भूयः पुनर्दर्शयामास। यदर्जुनेन प्रार्थितं चतुर्भुजं धारणाविषयं रूपं तदपि तिरोदधे इत्यर्थः। तथा महात्मा व्यापकोऽपि सन् सौम्यवपुरनुग्रदेहो भूत्वा भीतमेनमाश्वासयामास च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.50।।एवमुक्त्वा स्वरूपं दर्शयामासेति सञ्जय आह -- इतीति। अमुना प्रकारेण वासुदेवो मोक्षदाता परमकृपालुः अर्जुनं तथा पूर्वप्रकारेणोक्त्वा स्वकं स्वीयं पुरुषोत्तमरूपं भूयः पुनः दर्शयामास। एवं दर्शयित्वा सौम्यवपुर्भूत्वा च पुनः पूर्वरूपदर्शनभीतं एनं अर्जुनं पुनराश्वासयामास। नन्वेवं वारं वारं कथं कृतवान् इत्यत आह -- महात्मेति। महांश्चासौ आत्मा च तेन कृपया तथा कृतवानिति भावः। यद्वा महतां भक्तानां आत्मा अतो भक्तत्वात्तथा कृतवानित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.50।।एवमुक्त्वा प्राक्तनमेव रूपं दर्शितवानिति संजय उवाच -- इतीति। श्रीवासुदेवोऽर्जुनमेवमुक्त्वा यथा पूर्वमासीत्तथैव किरीटादियुक्तं चतुर्भुजं स्वीयं रूपं पुनर्दर्शयामास। एनमर्जुनं भीतमेव प्रसन्नवपुर्भूत्वा पुनरप्याश्वासितवान्। महात्मा विश्वरूपः कृपालुरिति वा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.50।।एवं सञ्जय उवाच -- इतीति। स्वकं पूर्वं प्रदर्शितरूपं चतुर्भुजं दर्शयामास। तथापि सख्यसारथ्यादिकमनुचितं मत्वा रथादुत्तीर्य स्तोतुकामं पार्थमवलोक्य पुनः सौम्यवपुर्द्विभुज एव लोके सम्मत -- (संभवत्) -- स्वरूप एव भक्तप्रार्थनया भूत्वा पुरुषोत्तमोऽचिन्त्ययोगेश्वरो विभुर्महात्मा भीतमेनं आश्वासयामास। अत्र सौम्यपदमेव सर्वापेक्षया भयाभावसूचकं द्विभुजरूपं प्रत्याययति। अन्यथाभूयः पुनश्च इति पौनरुक्त्यं स्यात्। वदति चाग्रेदृष्ट्वेदं मानुषं रूपं [11।51] इति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.50।। संजय बोला -- इस प्रकार भगवान् वासुदेवने पूर्वोक्त वचन कहकर अर्जुनको अपनावसुदेवके घरमें प्रकट हुआ रूप दिखलाया। फिर सौम्यमूर्ति होकर अर्थात् प्रसन्न देहसे युक्त होकर महात्मा कृष्णने इस भयभीत अर्जुनको पुनःपुनः धैर्य दिया।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.50।। व्याख्या -- इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः -- अर्जुनने जब भगवान्से चतुर्भुजरूप होनेके लिये प्रार्थना की? तब भगवान्ने कहा कि मेरे इस विश्वरूपको देखकर तू व्यथित और भयभीत मत हो। तू प्रसन्न मनवाला होकर मेरे इस रूपको देख (11। 49)। भगवान्के इसी कथनको सञ्जयने यहाँ इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा पदोंसे कहा है।तथा कहनेका तात्पर्य है कि जिस प्रकार कृपाके परवश होकर भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखाया था? उसी प्रकार कृपाके परवश होकर भगवान्ने अर्जुनको चतुर्भुजरूप दिखाया। इस चतुर्भुजरूपको देखनेमें अर्जुनकी कोई साधना हो? योग्यता हो -- यह बात नहीं है? प्रत्युत भगवान्की कृपाहीकृपा है।भूयः कहनेका तात्पर्य है? जिस देवरूप(चतुर्भुजरूप) को अर्जुनने विश्वरूपके अन्तर्गत देखा था (11। 15? 17) और जिसे दिखानेके लिये अर्जुनने प्रार्थना की थी (11। 45 46)? वही रूप भगवान्ने फिर दिखाया।आश्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा -- भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको पहले चतुर्भुजरूप दिखाया। फिर अर्जुनकी प्रसन्नताके लिये महात्मा भगवान् श्रीकृष्ण पुनः द्विभुजरूप(मनुष्यरूप) से प्रकट हो गये और उन्होंने विश्वरूपको देखनेसे भयभीत हुए अर्जुनको आश्वासन दिया।भगवान् श्रीकृष्ण द्विभुज थे या चतुर्भुज इसका उत्तर है कि भगवान् हरदम द्विभुजरूपसे ही रहते थे? पर समयसमयपर जहाँ उचित समझते थे? वहाँ चतुर्भुजरूप हो जाते थे।दसवें और ग्यारहवें अध्यायमें भगवान्ने अपनी विभूतियोंका वर्णन करनेमें भी अपनी महत्ता? प्रभाव सामर्थ्यको बताया है और अपने अत्यन्त विलक्षण विश्वरूपको दिखानेमें भी अपने प्रभावको बताया है। अगर मनुष्य भगवान्के ऐसे महान् प्रभावको जान ले अथवा मान ले? तो उसका संसारमें आकर्षण नहीं रहे। वह सदाके लिये संसारबन्धनसे छूट जाय।अर्जुनपर भगवान्की कितनी अद्भुत कृपा है कि भगवान्ने पहले विश्वरूप दिखाया? फिर देवरूप (चतुर्भुजरूप) दिखाया और फिर मानुषरूप (द्विभुजरूप) हो गये। इसके साथसाथ भगवान्ने हमलोगोंपर भी कितनी अलौकिक विलक्षण कृपा की है कि जहाँकहीं जिस किसी विशेषताको लेकर हमारा मन चला जाय? वहीं हम भगवान्का चिन्तन कर सकते हैं और भगवान्के विश्वरूपका पठनपाठन? चिन्तन कर सकते हैं। इस भयंकर समयमें हमें भगवान्की विभूतियों तथा विश्वरूपके चिन्तन आदिका जो मौका मिला है? इसमें हमारा उद्योग? योग्यता कारण नहीं है? प्रत्युत भगवान्की कृपा ही कारण है। भगवान्की इस कृपाको देखकर,हमें प्रसन्न हो जाना चाहिये। इन विभूतियोंको सुनने और विश्वरूपके चिन्तनस्मरणका मौका तो उस समय भी सञ्जय आदि बहुत थोड़े लोगोंको ही मिला था। वही मौका आज हमें प्राप्त हुआ है। अतः ऐसे मौकेको व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिये। सम्बन्ध -- भगवान्ने मनुष्यरूप होकर जब अर्जुनको आश्वासन दिया? तब अर्जुन बोले --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.50।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.50।।तदिदं वृत्तं राज्ञे सूतो निवेदितवानित्याह -- संजय इति। तथाभूतं वचनं मया प्रसन्नेनेत्यादिचतुर्भुजं रूपं। किं तस्य रूपस्य परिचितपूर्वस्य प्रदर्शनेन प्रसन्नदेहत्वेन चार्जुनं प्रत्याश्वासनं भगवतो युक्तमित्यत्र हेतुमाह -- महात्मेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.50।।स्वकं रूपं दर्शयामासेति कृष्णरूपत्वस्य स्वकत्वविशेषणात्। विश्वरूपं न स्वकमिति प्रतीतिः स्यादत आह -- स्वकमिति। कृष्णः स्वकं रूपं न विश्वरूपमिति भ्रान्तप्रतीत्यनुवादेनोच्यत इत्यर्थः। कुत एतत् इत्यत आह -- अन्यथेति। प्रमाणप्रतीत्येत्यर्थः। कानि तानि प्रमाणानि इत्यत आह -- प्रमाणानीति। द्वितीयान्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.50।।स्वकं रूपं तु भ्रान्तिप्रतीत्या। अन्यथा तदपि स्वकमेव। प्रमाणानि तूक्तानि पुरस्तात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.50।। --,इति एवम् अर्जुनं वासुदेवः तथाभूतं वचनम् उक्त्वा? स्वकं वसुदेवस्य गृहे जातं रूपं दर्शयामास दर्शितवान् भूयः पुनः। आश्वासयामास च आश्वासितवान् भीतम् एनम्? भूत्वा पुनः सौम्यवपुः प्रसन्नदेहः महात्मा।।अर्जुन उवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.51 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन | इदानीमस्मि संवृत्त: सचेता: प्रकृतिं गत: ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca | dṛṣṭvedaṁ mānuṣaṁ rūpaṁ tava saumyaṁ janārdana | idānīmasmi saṁvṛttaḥ sacetāh prakṛtiṁ gataḥ ||
▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna says; dṛṣṭvā: seeing; idaṁ: this; mānuṣaṁ: human being; rūpam: form; tava: Your; saumyaṁ: very beautiful; janārdana: O chastiser of the enemies; idānīm: just now; asmi: I am; saṁvṛttaḥ: settled; sacetāh: in my consciousness; prakṛtiṁ: my own; gataḥ: I
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.51 Arjuna says: Seeing this wonderful human form, My mind is now calm and I am restored to my original nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.51।।अर्जुन बोले -- हे जनार्दन आपके इस सौम्य मनुष्यरूपको देखकर मैं इस समय स्थिरचित्त हो गया हूँ और अपनी स्वाभाविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.51।। अर्जुन ने कहा -- हे जनार्दन आपके इस सौम्य मनुष्य रूप को देखकर अब मैं शांतचित्त हुआ अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.51 दृष्ट्वा having seen? इदम् this? मानुषम् human? रूपम् form? तव Thy? सौम्यम् gentle? जनार्दन O Krishna? इदानीम् now? अस्मि (I) am? संवृत्तः composed? सचेताः with mind? प्रकृतिम् to nature? गतः restored.Commentary Arjuna says to Lord Krishna O Lord? I now behold Thy human form. Now my thoughts are collected and I am serene. I can speak. My senses perform their proper functions. My fear has vanished. Thou hast treated me as a mother would treat her erring child whom she embraces and nurses. Just as the calf rejoices when it beholds its mother who was missing for some days? so also I rejoice now when I behold Thy gentle form. I have drunk the nectar. Now I am alive.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.51. Arjuna said On seeing this gentle human form of Yours, O Janardana, now I have regained my nature and have now collected my thinking faculty.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.51 Arjuna said: Seeing Thee in Thy gentle human form, my Lord, I am myself again, calm once more.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.51 Arjuna said Having behold the human and pleasing form of Yours, O Krsna, I have now become composed in mind and I am restored to my normal nature.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.51 Arjuna said O Janardana, having seen this serene human form of Yours, I have now become calm in mind and restored to my own nature.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.51 Arjuna said Having seen this Thy gentle human form, O Krishna, now I am composed and am restored to my own nature.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.51 Drstva etc. At the end of the act of withdrawing all, the Brahman assumes the highly tranil stage of the tattva. Hence at the stage of withdrawl, gentleness is in the Bhagavat.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.51 Arjuna said Having beheld this pleasing and unie form of Yours, human in configuration, endowed with grace, tenderness, beauty etc., the excellence of which is infinite, I have now become composed, and I am restored to my normal nature.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.51 O Janardana, drstva, having seen; idam, this; saumyam, serene; manusam, human; rupam, form; tava, of Yours-gracious, as of my friend; asmi, I have; idanim, now; samvrttah, become;-what?-sacetah, calm in mind; and gatah, restored; prakrtim, to my own nature.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.51।। देशकालातीत वस्तु को ग्रहण तथा अनुभव करने के लिए आवश्यक पूर्व तैयारी के अभाव के कारण अकस्मात् समष्टि के इतने विशाल विराट् रूप को देखकर स्वाभाविक है कि अर्जुन भय और मोह से ग्रस्त हो गया था। परन्तु यहाँ वह स्वीकार करता है कि भगवान् के शान्त? सौम्य मनुष्य रूप को देखकर वह शान्तचित्त होकर अपने स्वभाव को प्राप्त हो गया है।अब भगवान् स्वयं ही ईश्वर की भक्ति का वर्णन अगले श्लोक में करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.51।।स्वभिलषितं रुपं दृष्ट्वार्जुन उवाच। दृष्ट्वेदं प्रत्यक्षं मानुषं नराकारं मत्सखं सौभ्यं प्रसन्नं तव रुपं इदानीं सचेताः प्रसन्नमनाः प्रकृतिं स्वभावं गतः प्राप्तः संवृत्तः संजातोऽस्मि। जनार्दनेति संबोधयन् जनानसुरानर्दयति पीडयतीति जनार्दनस्तद्दर्शनजन्यं भियमिदानीं सौम्यरुपदर्शनेन निवृत्तामिति सूचयति।
▸
Chapter 11 (Part 18)
Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.51।।ततो निर्भयः सन् अर्जुन उवाच -- दृष्ट्वेति। इदानीं सचेताः भयकृतव्यामोहाभावेनाव्याकुलचित्तः संवृत्तोऽस्मि। तथा प्रकृतिं भयकृतव्यथाराहित्येन स्वास्थ्यं गतोस्मि स्पष्टमन्यत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.51।।ततो निर्भयः सन्नर्जुन उवाच -- दृष्ट्वेति। सचेता अव्याकुलः। प्रकृतिं गतः स्वास्थ्यं प्राप्तः। संवृत्तो जातोऽस्मि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.51।।दर्शितस्वरूपं दृष्ट्वाऽर्जुनो विज्ञापयति -- दृष्ट्वेति। हे जनार्दन अविद्यानाशक इदं पुरतो दृश्यमानं मानुषं मनुष्यैर्द्रष्टुं योग्यं सौम्यं दयापरीतं दयायुक्तं तव रूपं दृष्ट्वा इदानीमधुना सचेताः सावधानचित्तः संवृत्तः जातोऽस्मि। प्रकृतिं भक्तिरूपां गतः प्राप्तोऽस्मि (च)।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.51।।ततो निर्भयः सन्नर्जुन उवाच -- दृष्ट्वेति। सचेताः प्रसन्नचित्त इदानीं संवृत्तः जातोऽस्मि। प्रकृतिं स्वास्थ्यं च प्राप्तोऽस्मि। शेषं स्पष्टम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.51।।ततो यथावदवस्थितः सन् अर्जुन उवाच -- दृष्ट्वेदमिति। निरवधिकातिशयसौन्दर्यसौकुमार्यलावण्यसौशील्यादियुक्तं सदानन्दमात्रकरपादमुखोदरादिरूपं सौम्यं मानुषं मनुष्यत्वसंस्थानस्थितं दृष्ट्वा सचेताः जातोऽस्मि। तदा तु विचेताः अमनाः अपाणिपादं तदमूर्त्तमव्ययम् इति वाक्यात्। इदानीं तु प्रकृतिं स्वभावं प्राप्तोऽस्मि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.51।।अर्जुन बोला -- हे जनार्दन अब मैं अपने मित्रकी आकृतिमें आपके इस प्रसन्नमुख सौम्य मानुषरूपको देखकर सचेता यानी प्रसन्नचित्त हुआ हूँ और अपनी प्रकृतिको -- वास्तविक स्थितिको प्राप्त हुआ हूँ।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.51।। व्याख्या -- दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन -- आपके मनुष्यरूपमें प्रकट होकर लीला करनेवाले रूपको देखकर गायें? पशुपक्षी? वृक्ष? लताएँ आदि भी पुलकित हो जाती हैं (टिप्पणी प0 613)? ऐसे सौम्य द्विभुजरूपको देखकर मैं होशमें आ गया हूँ? मेरा चित्त स्थिर हो गया है -- इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः? विराट्रूपको देखकर जो मैं भयभीत हो गया था? वह सब भय अब मिट गया है? सब व्यथा चली गयी है और मैं अपनी वास्तविक स्थितिको प्राप्त हो गया हूँ -- प्रकृतिं गतः।यहाँ सचेताः कहनेका तात्पर्य है कि जब अर्जुनकी दृष्टि भगवान्की कृपाकी तरफ गयी? तब अर्जुनको होश आया और वे सोचने लगे कि कहाँ तो मैं और कहाँ भगवान्का विस्मयकारक विलक्षण विराट्रूप इसमें मेरी कोई योग्यता? अधिकारिता नहीं है। इसमें तो केवल भगवान्की कृपाहीकृपा है। सम्बन्ध -- अर्जुनकी कृतज्ञताका अनुमोदन करते हुए भगवान् कहते हैं --
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.51।।दृष्ट्वेति। सकलोपसंहारान्ते (S सकलः संहारान्ते) परमप्रशान्तरूपां ब्रह्म तत्त्वस्थितिं ददाति इत्युपसंहारे भगवतः सौम्यता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.51।।एवं भगवदाश्वासितः सन्नर्जुनस्तं प्रत्युक्तवानित्याह -- अर्जुन इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.51।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.51।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.51।। --,दृष्ट्वा इदं मानुषं रूपं मत्सखं प्रसन्नं तव सौम्यं जनार्दन? इदानीम्? अधुना अस्मि संवृत्तः संजातः। किम् सचेताः प्रसन्नचित्तः प्रकृतिं स्वभावं गतश्च अस्मि।।श्रीभगवानुवाच --,
───────────────────
【 Verse 11.52 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम | देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिण: ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | sudurdarśamidaṁ rūpaṁ dṛṣṭavānasi yanmama || devā apyasya rūpasya nityaṁ darśanakāṅkṣiṇaḥ ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Kṛṣṇa says; sudurdarśaṁ: very difficult to be seen; idaṁ: this; rūpaṁ: form; dṛṣṭavān asi: you have seen; yat: which; mama: of Mine; devāḥ: the celestials; apyasya: also this; rūpasya: form; nityaṁ: eternally; darśana kāṅkṣiṇaḥ: always aspire to see
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.52 Bhagavān says: The four-armed form that you have seen is rare to behold. Even the celestials are forever aspiring to see this form.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.52।।श्रीभगवान् बोले -- मेरा यह जो रूप तुमने देखा है? इसके दर्शन अत्यन्त ही दुर्लभ हैं। इस रूपको देखनेके लिये देवता भी नित्य लालायित रहते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.52।। श्रीभगवान् ने कहा -- मेरा यह रूप देखने को मिलना अति दुर्लभ है? जिसको कि तुमने देखा है। देवतागण भी सदा इस रूप के दर्शन के इच्छुक रहते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.52 सुदुर्दर्शम् very hard to see? इदम् this? रूपम् form? दृष्टवानसि thou hast seen? यत् which? मम My? देवाः gods? अपि also? अस्य (of) this? रूपस्य of form? नित्यम् ever? दर्शनकाङ्क्षिणः (are) desrious to behold.Commentary Lord Krishna says to Arjuna Though the gods long to behold the Cosmic Form yet they have not seen it as you have done. THey can never behold it.Just as the Chataka (a bird) longs for a drop of rain? eagerly turning its eyes towards the clouds? so also do gods yearn to behold the Cosmic Form but their wishes have not been gratified even in their dreams. Such is that marvellous vision which thou hast easily seen.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.52. The Bhagavat said This form of Mine, which you have just observed is extremely difficult to observe; even gods are always curious of observing this form.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.52 Lord Shri Krishna replied: It is hard to see this vision of Me that thou hast seen. Even the most powerful have longed for it in vain.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.52 The Lord said It it very hard to behold this form of Mine which you have seen. Even the gods ever long to behold this form.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.52 The Blessed Lord said This form of Mine which you have seen is very difficult to see; even the gods are ever desirous of a vision of this form.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.52 The Blessed Lord said Very hard indeed it is to see this form of Mine which thou hast seen. Even the gods are ever longing to behold it.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.52 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.52 The Lord said This form of Mine which you have seen, and which has the whole universe under control, which is the foundation of all and which forms the origin of all - this cannot be beheld by any one. Even the gods ever long to see this form; but they have not seen it.
Why? Sri Krsna says:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.52 Idam, this; rupam, form; mama, of Mine; yat, which; drstavan, asi, you have seen is; sudur-darsam, very difficult to see. Api, even; the devah, gods; are nityam, ever; darsana-kanksinah, desirous of a vision; asya, of this; rupasya, form of Mine. The idea is that though they want to see, they have not seen in the way you have, nor will they see! Why so?
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.52।। See Commentary under 11.53.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.52।।एवं श्रुत्वा स्वकृतस्यातिदर्लभस्यानुग्रहस्य वैयर्थ्यपरिहाराय श्रीभगवानुवाच। यन्मम रुपं मदनुग्रहेण त्वं दृष्टवानसि तदिदमन्येषां सुष्ठु दुःखेनात्यन्तकष्टेन दर्शनमस्येति सुदुर्द्सं यतोत्युत्तमाः सात्विकास्तिद्दर्शनार्थिनश्च देवा इन्द्रादयोऽपि न तत्त्वमिव दृष्टवन्तो न च द्रक्ष्यन्तीत्याशयेनाह -- देवा इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.52।।स्वकृतस्यानुग्रहस्यातिर्दुलभत्वं दर्शयन् चतुर्भिः श्रीभगवानुवाच -- सुदुर्दर्शमिति। मम यद्रूपमिदानीं त्वं दृष्टवानसि इदं विश्वरूपं सुदुर्दर्शं अत्यन्तं द्रष्टुमशक्यं। यतो देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं सर्वदा दर्शनकाङ्क्षिणो नतु त्वमिव पूर्वं दृष्टवन्तो न वाऽग्रे द्रक्ष्यन्तीत्यभिप्रायः। दर्शनाकाङ्क्षया नित्यत्वोक्तिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.52।।अस्य विश्वरूपदर्शनस्य दौर्लभ्यं दर्शयन् श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिति। दर्शनकाङ्क्षिणः दर्शनं काङ्क्षन्ते एव न तु लभन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.52।।स्वस्य रूपस्य स्वानुग्रहैकसाध्यत्वेन परमदुर्लभत्वमाह -- श्रीभगवानुवाच सुदुर्दर्शमिति। इदं परिदृश्यमानं मम रूपं सुदुर्दर्शं सुष्ठु दुःखेनाऽपि द्रष्टुमशक्यं यत् त्वं दृष्टवानसि। देवा अपि मत्क्रीडायोग्या मदंशा अपि अस्य नित्यं प्रत्यहं दर्शनकाङ्क्षिणः दर्शनेच्छवस्तिष्ठन्तीत्यर्थः।अत्रायं भावः -- ब्रह्मादयो देवाः श्रीदेवकीगृहे स्तुत्वा गतास्तदा गर्भ एव प्राकट्यं? न बहिः बहिः प्राकट्यानन्तरं तु मातृप्रार्थनया तिरोहितं कृत्वा ध्यानास्पदत्वेन स्थापितं देवादीनां तु तद्वृत्तान्ताज्ञानाद्वेदोक्तरीत्या भजनात्तादृक्स्वरूपदर्शनमेव भवति इदं च स्वरूपं भावात्मकं वेदाद्यगम्यं भक्तमुखात् श्रुतत्वाच्चाकाङ्क्षिणस्तिष्ठन्तीति तथा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.52।।स्वकृतस्यानुग्रहस्यातिदुर्लभत्वं दर्शयन् श्रीभगवानुवाच -- सुदुर्दर्शमिति। यन्मम विश्वरूपं त्वं दृष्टवानसि इदं सुदुर्दर्शमत्यन्तं द्रष्टुमशक्यम्। अतो देवा अप्यस्य रूपस्य सर्वदा दर्शनमिच्छन्ति न केवलं पुनरिदं पश्यन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.52।।ततः एवं स्थितौ स्वरूपस्य सुदुर्दर्शत्वं निरूपयन्प्रसङ्गादनुग्रहभक्त्यैकगम्यत्वं स्वस्य निगमयति त्रिभिः -- सुदुर्दर्शमिति। इदं मत्सम्बन्धि रूपमक्षरं विश्वरूपं यत्त्वं दृष्टवानसि? यतोऽहं सुदुर्दर्शस्तदा किं वाच्यं मत्सम्बन्धिरूपमिदमिति तदेवाह -- देवा अपीति। सात्विका अपि ते नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः? न तु दृष्टवन्तोऽपि अनुग्रहबीजभावाभावात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.52।।श्रीभगवान् बोले -- मेरे जिस रूपको तूने देखा है? वह बड़ा दुर्दर्श है अर्थात् जिसका दर्शन बड़ी कठिनतासे हो? ऐसा है। देवता लोग भी मेरे इस रूपका दर्शन करनेकी सदा इच्छा करते हैं। अभिप्राय यह है कि दर्शनकी इच्छा करते हुए भी उन्होंने तेरी भाँति ( मेरा रूप ) देखा नहीं है और देखेंगे भी नहीं।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.52।। व्याख्या -- सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम -- यहाँ सुदुर्दर्शम् पद चतुर्भुजरूपके लिये ही आया है? विराट्रूप या द्विभुजरूपके लिये नहीं। कारण कि विराट्रूपकी तो देवता भी कल्पना क्यों करने लगे और मनुष्यरूप जब मनुष्योंके लिये सुलभ था? तब देवताओंके लिये वह दुर्लभ कैसे होता इसलिये सुदुर्दर्शम् पदसे भगवान् विष्णुका चतुर्भुजरूप ही लेना चाहिये? जिसके लिये देवरूपम् (11। 45) और स्वकं रूपम् (11। 50) पद आये हैं।देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः -- भगवान्ने यहाँ कहा है कि मेरा यह जो चतुर्भुजरूप है इसके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं। आगे तिरपनवेंचौवनवें श्लोकोंमें कहा है कि इस चतुर्भुजरूपके दर्शन वेद? यज्ञ? तप? दान आदि साधनोंसे नहीं हो सकते प्रत्युत इसके दर्शन तो अनन्यभक्तिसे ही हो सकते हैं। अब यहाँ एक शङ्का होती है कि देवता भी इस रूपके दर्शनकी नित्य आकाङ्क्षा (लालसा) रखते हैं? फिर उनको दर्शन क्यों नहीं होते जब कि भगवान्के दर्शनकी नित्य लालसा रहना अनन्यभक्ति ही है। इसका समाधान यह है कि वास्तवमें देवताओँकी नित्य लालसा अनन्यभक्ति नहीं है।नित्य लालसा रखनेका तात्पर्य है कि नित्यनिरन्तर एक परमत्माकी ही लालसा लगी रहे और दूसरी कोई लालसा न रहे। ऐसी लालसावाला दुराचारीसेदुराचारी मनुष्य भी भगवान्का भक्त हो जाता है और उसे भगवत्प्राप्ति हो जाती है। परन्तु ऐसी अनन्य लालसा देवताओंकी नहीं होती क्योंकि वे प्रायः भोग भोगनेके लिये ही देवता बने हैं और उनका प्रायः भोग भोगनेका ही उद्देश्य होता है। तो फिर उनकी लालसा कैसी होती है जैसी लालसा (इच्छा) प्रायः सभी आस्तिक मनुष्योंमें रहती है कि हमें भगवान्के दर्शन हो जायँ? हमारा कल्याण हो जाय। उनकी ऐसी इच्छा तो रहती है? पर भोग और संग्रहकी रुचि ज्योंकीत्यों बनी रहती है। तात्पर्य है कि जैसे मार्गमें चलते हुए किसीको मणि मिल जाय? ऐसे ही (गौणतासे) हमारी मुक्ति हो जाय तो अच्छी बात है (टिप्पणी प0 614) -- इस प्रकार जैसे मनुष्योंमें मुक्तिकी इच्छा गौण होती है? ऐसे ही भगवान् दर्शन दें तो हम भी दर्शन कर लें -- इस प्रकार देवताओंमें दर्शनकी इच्छा गौण होती है।देवतालोग हम इतने ऊँचे पदपर हैं? हमारे लोक? शरीर और भोग दिव्य हैं? हम बड़े पुण्यशाली हैं अतः हमें भगवान्के दर्शन होने चाहिये -- ऐसी कोरी इच्छा ही करते हैं? इसलिये उनको कभी दर्शन होंगे नहीं। कारण कि उनमें देवत्व? पद आदिका अभिमान है। अभिमानसे? पद आदिके बलसे भगवान्के दर्शन नहीं हो सकते। इसलिये अर्जुनने दसवें अध्यायके चौदहवें श्लोकमें कहा है कि हे भगवन् आपके प्रकट होनेको देवता और दानव भी नहीं जानते। इस प्रकार अर्जुनने भगवान्को न जाननेमें देवताओं और दानवोंको एक श्रेणीमें लिया है। इसका तात्पर्य यही है कि जैसे देवताओंके पास वैभव है? ऐसे ही दानवोंके पास विचित्रविचित्र माया है? सिद्धियाँ हैं? पर उनके बलपर वे भगवान्को नहीं जान सकते। ऐसे ही देवता भगवान्के दर्शनकी लालसा भी रखें? तो भी उनको देवत्वशक्तिसे दर्शन नहीं हो सकते क्योंकि भगवान्के दर्शनमें देवत्व कारण नहीं है। तात्पर्य है कि भगवान्को न तो देवत्वशक्तिसे देखा जा सकता है और न यज्ञ? तप? दान आदि शुभकर्मोंसे ही देखा जा सकता है (11। 53)। उनको तो अनन्यभक्तिसे देवता और मनुष्य -- दोनों ही भगवान्को देख सकते हैं।देवा अपि कहनेका तात्पर्य है कि जिन पुण्योंके कारण देवताओंको ऊँचा पद मिला है? ऊँचे (दिव्य) भोग मिले हैं? उन पुण्योंके बलसे? पद आदिके बलसे वे भगवान्के दर्शन नहीं कर सकते। तात्पर्य है कि पुण्यकर्म ऊँचे लोक? ऊँचे भोग तो दे सकते हैं? पर भगवान्के दर्शन करानेकी उनमें सामर्थ्य नहीं है। भगवान्के दर्शनमें यह प्राकृत महत्त्व कुछ भी मूल्य नहीं रखता। सम्बन्ध -- पूर्वश्लोकमें कही हुई बातको ही भगवान् आगेके श्लोकमें पुष्ट करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.52।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.52।।उपास्यत्वाय विश्वरूपं स्तोतुं भगवदुक्तिमुत्थापयति -- भगवानिति। त्वद्व्यतिरिक्तानामिदं रूपं द्रष्टुमशक्यमित्येतद्विशदयति -- देवादय इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.52।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.52।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.52।। --,सुदुर्दर्शं सुष्ठु दुःखेन दर्शनम् अस्य इति सुदुर्दर्शम्? इदं रूपं दृष्टवान् असि यत् मम? देवाः अपि अस्य मम रूपस्य नित्यं सर्वदा दर्शनकाङ्क्षिणः दर्शनेप्सवोऽपि न त्वमिव दृष्टवन्तः? न द्रक्ष्यन्ति च इति अभिप्रायः।।कस्मात् --,
───────────────────
【 Verse 11.53 】
▸ Sanskrit Sloka: नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया | शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ||
▸ Transliteration: nāhaṁ vedairna tapasā na dānena na cejyayā | śakya evaṁvidho draṣṭuṁ dṛṣṭavānasi māṁ yathā ||
▸ Glossary: nā: never; ahaṁ: I; vedaiḥ: by study of the Vedas; na: never; tapasā: by serious penances; na: never; dānena: by charity; na: never; ca: also; ijyayā: by worship; śakyaḥ: it is possible; evaṁvidhaḥ: like this; draṣṭuṁ: to see; dṛṣṭavān: seeing; asi: you are; māṁ: Me; yathā: as.
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.53 The four armed form which you have seen with your transcendental eyes cannot be understood simply by study of the Vedas, nor by undergoing penances or charity or worship; one cannot see Me as I am by these means.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.53।।जिस प्रकार तुमने मुझे देखा है? इस प्रकारका (चतुर्भुजरूपवाला) मैं न तो वेदोंसे? न तपसे? न दानसे और न यज्ञसे ही देखा जा सकता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.53।। न वेदों से? न तप से? न दान से और न यज्ञ से ही मैं इस प्रकार देखा जा सकता हूँ? जैसा कि तुमने मुझे देखा है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.53 न not? अहम् I? वेदैः by the Vedas? न not? तपसा by austerity? न not? दानेन by gift? न not? च and? इज्यया by sacrifice? शक्यः (am) possible? एवंविधः like this? द्रष्टुम् to be seen? दृष्टवानसि (thou) hast seen? माम् Me? यथा as.Commentary This Cosmic Form which thou hast seen so easily cannot be obtained either by the study of the Vedas and the six modes of philosophy? nor by the practice of manifold austerities (penances)? nor by charity? nor by sacrifices of various kinds.Arjuna was indeed very fortunate in seeing the Cosmic Form.How can the Lord be seen Listen The heart must be overflowing with true devotion to Him. (Cf.XI.48)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.53. Neither by reciting Vedas, no by obseving austerity, nor by offering gifts, nor by performing sacrifice, can I be observed in this manner as you have see Me now.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.53 Not by study of the scriptures, or by austerities, not by gifts or sacrifices, is it possible to see Me as thou hast done.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.53 Sri Krsna says Not by the Vedas, nor by austerities, nor by gifts, nor by sacirifce, can I seen in such a form as You have seen Me.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.53 Not through the Vedas, not by austerity, not by gifts, nor even by sacrifice can I be seen in this form as you have seen Me.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.53 Neither by the Vedas nor by austerity, nor by gift, nor by sacrifice can I be seen in this form as thou hast seen Me (so easily).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.53 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.53 - 11.54 Sri Krsna says By Vedas, i.e., by mere study, teaching etc., of these sacred texts, it is not possible to know Me truly. It is also not possible through meditation, sacrifices, gifts and austerities, destitute of devotion towards Me. But by single-minded devotion i.e., by devotion characterised by extreme ardour and intensity, it is possible to know Me in reality through scriptures, to behold Me directly in reality, and enter into Me in reality. So describes a Sruti passage: 'This Self cannot be obtained by instruction, nor by intellect nor by much hearing. Whomsoever He chooses, by him alone is He obtained. To such a one He reveals His own form' (Ka. U., 2.2.23) and (Mun. U., 3.2.3).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.53 Na vedaih, not through the Vedas, not even through the four Vedas-Rk, Yajus, Sama and Atharvan; na tapasa, not by austerity, not by severe austerities like the Candrayana; not danena, by gifts, by gifts of cattle, land, gold, etc.; na ca, nor even; ijyaya, by sacrifices or worship; sakyah aham, can I; drastum, be seen evamvidhah, in this form, in the manner as was shown; yatha, as; drstavan asi, you have seen mam, Me. 'How again, can You be seen? This is being answered:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.53।। भगवान् के इस विश्वरूप का दर्शन मिलना किसी के लिए भी सुलभ नहीं है। दर्शन का यह अनुभव न वेदाध्ययन से और न तप से? न दान से और न यज्ञ से ही प्राप्त हो सकता है। यहाँ तक कि स्वर्ग के निवासी देवतागण भी अपनी विशाल बुद्धि? दीर्घ जीवन और कठिन साधना के द्वारा भी इस रूप को नहीं देख पाते और सदा उसके लिए लालायित रहते हैं। ऐसा होने पर भी भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने इस विराट् और आश्चर्यमय रूप को अपने मित्र अर्जुन को केवल अनुग्रह करके दर्शाया जैसा कि स्वयं उन्होंने ही स्वीकार किया था।हम इस बात पर आश्चर्य़ करेंगे कि किस कारण से भगवान् अपनी कृपा की वर्षा किसी एक व्यक्ति पर तो करते हैं और अन्य पर नहीं निश्चय ही यह एक सर्वशक्तिमान् द्वारा किया गया आकस्मिक वितरण नहीं हो सकता? जो स्वच्छन्दतापूर्वक? निरंकुश होकर बिना किसी नियम या कारण के कार्य करता रहता हो क्योंकि उस स्थिति में भगवान् पक्षपात तथा निरंकुशता के दोषी कहे जायेंगे? जो कि उपयुक्त नहीं है।श्लोक में इसका युक्तियुक्त स्पष्टीकरण किया गया है कि किस कारण से बाध्य होकर भगवान् अपनी विशेष कृपा की वर्षा कभी किसी व्यक्ति पर करते हैं? और सदा सब के ऊपर नहीं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.53।।तत्र हेत्वाकाङ्क्षायामाह -- नेति। यथा विश्वरुपं मां त्वं दृष्टवानसि। एवंविधोऽहं न वेदैः ऋगादिभिः न तपसोग्रेण चान्द्रायणादिना न दानेन गोदानादिना नचेज्यया जज्ञेन पूजया वाऽन्यैर्मदत्यन्तानुग्रहरहितैर्द्रष्टुं शक्यः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.53।।कस्माद्देवा एतद्रूपं न दृष्टवन्तो न वा द्रक्ष्यन्ति मद्भक्तिशून्यत्वादित्याह -- नाहमिति। न वेदयज्ञाध्ययनैरित्यादिना। गतार्थः श्लोकः परमदुर्लभत्वख्यापनायाभ्यस्तः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.53। नाहमिति। न वेदयज्ञाध्ययनैरित्यनेनोक्त एवार्थः पुनरुच्यते विश्वरूपदर्शनस्यातिदौर्लभ्यसूचनाय। स्पष्टार्थश्च श्लोकः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.53।।ननु ते वेदाद्युक्तसाधनैः कथं न पश्यन्ति इत्यत आह -- नाहमिति। यथा त्वं मां दृष्टवानसि एवंविधः पुरुषोत्तमोऽहं परिदृश्यमानवेदैः वेदोक्तसाधनैः वेदैरेव वा न अतएव यतो वाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्य मनसा सह [तै.उ.2।4।12।9।1] इत्युक्तम्। तपसा क्लेशात्मकेनाऽपि न? दानेन सर्वस्वदक्षिणात्मकेन न? इज्यया यागेन न द्रष्टुं शक्यः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.53।।तत्र हेतुः -- नाहमिति। स्पष्टार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.53।।एवं विश्वरूपस्य सुदुर्दर्शत्वं निरूप्य तदादिदृष्टस्य स्वस्यापि तदाह -- नाहं वेदैरिति। निरतिशयाक्षरैश्वर्योऽहमात्मा नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन। यमेवैष वृणुत (सः) तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा (वि) वृणुते तनूं स्वाम् [कठो.2।22मुंडको.3।2।2] इति वरणेतरसाधनैरशक्यः श्रुतोऽस्मि। एवंविधं मां त्वं यत् वरणेन सत्प्रकारेण स्वरूपयोग्यो दृष्टवानसि तथा च प्रवचनादिसाधनानां केवलात्मसाक्षात्कारपरतया जीवे स्वरूपयोग्यतासम्पादकत्वं? न साक्षात्पुरुषोत्तमनिरोधकत्वमिति सिद्धम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.53।।किस लिये --, जिस प्रकार मुझे तूने देखा है ऐसे पहले दिखलाये हुए रूपवाला मैं न तो ऋक्? यजु? साम और अथर्व आदि चारों वेदोंसे? न चान्द्रायण आदि उग्र तपोंसे? न गौ? भूमि तथा सुवर्ण आदिके दानसे और न यजनसे ही देखा जा सकता हूँ अर्थात् यज्ञ या पूजासे भी मैं ( इस प्रकार ) नहीं देखा जा सकता।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.53।। व्याख्या -- दृष्टवानसि मां यथा -- तुमने मेरा चतुर्भुजरूप मेरी कृपासे ही देखा है। तात्पर्य है कि मेरे दर्शन मेरी कृपासे ही हो सकते हैं? किसी योग्यतासे नहीं।नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया शक्य एवंविधो द्रष्टुम् -- यह एक सिद्धान्तकी बात है कि जो चीज किसी मूल्यसे खरीदी जाती है? वह चीज उस मूल्यसे कम मूल्यकी ही होती है। जैसे? कोई दूकानदार एक घड़ी सौ रुपयेमें बेचता है? तो उसने वह घड़ी कम मूल्यमें ली है? तभी तो वह सौ रुपयेमें देता है। इसी तरह अनेक वेदोंका अध्ययन करनेपर? बहुत बड़ी तपस्या करनेपर? बहुत बड़ा दान देनेपर तथा बहुत बड़ा यज्ञअनुष्ठान करनेपर भगवान् मिल जायँगे -- ऐसी बात नहीं है। कितनी ही महान् क्रिया क्यों न हो? कितनी ही योग्यता सम्पन्न क्यों न की जाय? उसके द्वारा भगवान् खरीदे नहीं जा सकते। वे सबकेसब मिलकर भी भगवत्प्राप्तिका मूल्य नहीं हो सकते। उनके द्वारा भगवान्पर अधिकार नहीं जमाया जा सकता। अर्जुनने इसी अध्यायके तैंतालीसवें श्लोकमें साफ कहा है कि त्रिलोकीमें आपके समान भी कोई नहीं है? फिर आपसे अधिक हो ही कैसे सकता है तात्पर्य है कि आपसे अधिक हुए बिना आपपर अधिकार नहीं किया जा सकता।सांसारिक चीजोंमें तो अधिक योग्यतावाला कम योग्यतावालेपर आधिपत्य कर सकता है? अधिक बुद्धिमान् कम बुद्धिवालोंपर अपना रोब जमा सकता है? अधिक धनवान् निर्धनोंपर अपनी अधिकता प्रकट कर सकता है परन्तु भगवान् किसी बल? बुद्धि? योग्यता? व्यक्ति? वस्तु आदिसे खरीदे नहीं जा सकते। कारण कि जिस भगवान्के संकल्पमात्रसे तत्काल अनन्त ब्रह्माण्डोंकी रचना हो जाती है? उसे एक ब्रह्माण्डके भी किसी अंशमें रहनेवाले किसी वस्तु? व्यक्ति आदिसे कैसे खरीदा जा सकता है तात्पर्य यह है कि भगवान्की प्राप्ति केवल भगवान्की कृपासे ही होती है। वह कृपा तब प्राप्त होती है? जब मनुष्य अपनी सामर्थ्य? समय? समझ? सामग्री आदिको भगवान्के सर्वथा अर्पण करके अपनेमें सर्वथा निर्बलता? अयोग्यताका अनुभव करता है अर्थात् अपने बल? योग्यता आदिका किञ्चिन्मात्र भी अभिमान नहीं करता। इस प्रकार जब वह सर्वथा निर्बल होकर अपनेआपको भगवान्के सर्वथा समर्पित करके अनन्यभावसे भगवान्को पुकारता है? तब भगवान् तत्काल प्रकट हो जाते हैं। कारण कि जबतक मनुष्यके अन्तःकरणमें प्राकृत वस्तु? योग्यता? बल? बुद्धि आदिका महत्त्व और सहारा रहता है? तबतक भगवान् अत्यन्त नजदीक होनेपर भी दूर दीखते हैं।इस श्लोकमें जो दुर्लभता बतायी गयी है? वह चतुर्भुजरूपके लिये ही बतायी गयी है? विश्वरूपके लिये नहीं। अगर इसको विश्वरूपके लिये ही मान लिया जाय तो पुनरुक्तिदोष आ जायगा क्योंकि पहले अड़तालीसवें श्लोकमें विश्वरूपकी दुर्लभता बतायी जा चुकी है। दूसरी बात? आगेके श्लोकमें भगवान्ने अनन्यभक्तिसे अपनेको देखा जाना शक्य बताया है। विश्वरूपमें अनन्यभक्ति हो ही नहीं सकती? क्योंकि अर्जुनजैसे शूरवीर पुरुष भगवान्से दिव्यदृष्टि प्राप्त करके भी विश्वरूपको देखकर भयभीत हो गये? तो उस रूपमें अनन्यभक्ति? अनन्यप्रेम? आकर्षण कैसे हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता। सम्बन्ध -- जब कोई किसी साधनसे? किसी योग्यतासे? किसी सामग्रीसे आपको प्राप्त नहीं कर सकता? तो फिर आप कैसे प्राप्त किये जाते हैं -- इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.53।।No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.53।।दर्शनोपायाभावाद्दुर्दर्शत्वमिति शङ्क्यते -- कस्मादिति। वेदादिषूपायेषु सत्स्वपि भगवानुक्तरूपो न शक्यो द्रष्टुमित्याह -- नाहमिति। तर्हि दर्शनायोग्यत्वाद्द्रष्टुमशक्यत्वमित्याशङ्क्याह -- दृष्टवानिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.53।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.53।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.53।। --,न अहं वेदैः ऋग्यजुःसामाथर्ववेदैः चतुर्भिरपि? न तपसा उग्रेण चान्द्रायणादिना? न दानेन गोभूहिरण्यादिना? न च इज्यया यज्ञेन पूजया वा शक्यः एवंविधः यथादर्शितप्रकारः द्रष्टुं दृष्टवान् असि मां यथा त्वम्।।कथं पुनः शक्यः इति उच्यते --,
───────────────────
【 Verse 11.54 】
▸ Sanskrit Sloka: भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन | ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ||
▸ Transliteration: bhaktyā tvananyayā śakya aham evaṁ vidho’rjuna | jñātuṁ draṣṭuṁ ca tattvena praveṣṭuṁ ca parantapa ||
▸ Glossary: bhaktyā: by devotional service; tu: but; ananyayā: without being mixed with fruitive activities or speculative knowledge; śakyaḥ: possible; aham: I; evaṁvidhaḥ: like this; arjuna: O Arjuna; jñātuṁ: to know; draṣṭuṁ: to see; ca: and; tattvena: in fact; praveṣṭuṁ: and to enter into; ca: also; paraṁtapa: O mighty-armed one
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.54 My dear Arjuna, only by undivided devotional service can you understand Me as I am, standing before you, be seen directly. Only in this way can you reach Me, O Parantapa.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.54।।परन्तु हे शत्रुतापन अर्जुन इस प्रकार (चतुर्भुजरूपवाला) मैं अनन्यभक्तिसे ही तत्त्वसे जाननेमें? सगुणरूपसे देखनेमें और प्राप्त करनेमें शक्य हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.54।। परन्तु हे परन्तप अर्जुन अनन्य भक्ति के द्वारा मैं तत्त्वत जानने? देखने और प्रवेश करने के लिए (एकी भाव से प्राप्त होने के लिए) भी? शक्य हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.54 भक्त्या by devotion? तु indeed? अनन्यया singleminded? शक्यः (am) possible? अहम् I? एवंविधः of this form? अर्जुन O Arjuna? ज्ञातुम् to know? दृष्टुम् to see? च and? तत्त्वेन in reality? प्रवेष्टुम् to enter into? च and? परंतप O Parantapa (O scorcher of the foes).Commentary Devotion is the sole means to the realisation of the Cosmic Form.AnanyaBhakti Singleminded devotion. Onepointed unbroken devotion the devotion which does not seek any other object but the Lord alone. In this type of devotion no object other than the Lord is experienced by any of the senses. Egoism and dualism totally vanish.Of this form refers to the Cosmic Form.By singleminded devotion it is possible not only to know Me as declared in the scriptures but also to realise Me? i.e.? to attain liberation. The devotee realises that the Lord is all this and He alone is the ultimate Reality. When he gets this experience of illumination he gets merged in Him. (Cf.VIII.22X.10)
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.54. But, through an undeviating devotion, it is possible to know, and to observe and also to enter into Me as such, O Arjuna ! O scorcher of foes !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.54 Only by tireless devotion can I be seen and known; only thus can a man become one with Me, O Arjuna!
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.54 But by single-minded devotion, O Arjuna, it is possible to truly know, to see and to enter into Me, who am of this form, O harasser of foes.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.54 But, O Arjuna, by single-minded devotion am I-in this form-able to be known and seen in reality, and also be entered into, O destroyer of foes.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.54 But by single-minded devotion can I, of this Form, be known and seen in reality and also entered into, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.54 See comment under 11.55
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.53 - 11.54 Sri Krsna says By Vedas, i.e., by mere study, teaching etc., of these sacred texts, it is not possible to know Me truly. It is also not possible through meditation, sacrifices, gifts and austerities, destitute of devotion towards Me. But by single-minded devotion i.e., by devotion characterised by extreme ardour and intensity, it is possible to know Me in reality through scriptures, to behold Me directly in reality, and enter into Me in reality. So describes a Sruti passage: 'This Self cannot be obtained by instruction, nor by intellect nor by much hearing. Whomsoever He chooses, by him alone is He obtained. To such a one He reveals His own form' (Ka. U., 2.2.23) and (Mun. U., 3.2.3).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.54 Tu, but, O Arjuna; bhaktya, by devotion-. Of what kind? To this the Lord says: Ananyaya, by (that devotion which is ) single-minded. That is called single-minded devotion which does not turn to anything else other than the Lord, and owing to which nothing else but Vasudeva is perceived by all the organs. With that devotion, aham sakyah, am I able; evamvidhah, in this form-in the aspect of the Cosmic form; jnatum, to to known-from the scriptures; not merely to be known from the scriptures, but also drastum, to be seen , to be realized directly; tattvena, in reality; and also pravestum, to be entered into-for attaining Liberation; parantapa, O destroyer of foes. Now the essential purport of the whole scripture, the Gita, which is meant for Liberation, is being stated by summing it up so that it may be practised:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.54।।,भक्ति के विषय में आचार्य शंकर कहते हैं कि? सभी मोक्ष साधनों में भक्ति ही श्रेष्ठ है और यह भक्ति स्वस्वरूप के अनुसंधान के द्वारा आत्मस्वरूप बन जाती है।प्रिय के साथ तादात्म्य ही प्रेम का वास्तविक मापदण्ड है। भक्त अपने व्यक्तिगत जीवभाव के अस्तित्व को विस्मृत कर? जब प्रेम में अपने प्रिय भगवान् के साथ तादात्म्य को प्राप्त हो जाता है? तब उस प्रेम की परिसमाप्ति पराभक्ति या अनन्य भक्ति कहलाती है। आत्मज्ञान का जिज्ञासु आध्यात्मिक विधान के अनुसार उपाधियों के साथ अपने निम्नस्तर को त्यागने के लिए बाध्य होता है। अनात्मा के तादात्म्य को त्यागने पर ही शुद्ध आत्मस्वरूप की पहचान हो सकती है।केवल वे साधकगण? जो इस जगत् को एक सूत्र में धारण करने वाले सत्य के साथ तादात्म्य कर सकते हैं? वे ही मुझे इस रूप में अर्थात् विराटरूप में अनुभव कर सकते हैं।जिन तीन क्रमिक सोपानों में सत्य का साक्षात्कार होता है? उसका निर्देश भगवान् इन तीन शब्दों से करते हैं जानना देखना और प्रवेश करना। सर्व प्रथम एक साधक को अपने साध्य तथा साधन का बौद्धिक ज्ञान आवश्यक होता है? जिसे यहां जानना शब्द से सूचित किया गया है और इसका साधन है श्रवण।इस प्रकार कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेने पर मन में सन्देह उत्पन्न होते हैं इन सन्देहों की निवृत्ति के लिए प्राप्त ज्ञान पर युक्तिपूर्वक मनन करना अत्यावश्यक होता है। सन्देहों की निवृत्ति होने पर तत्त्व का दर्शन (देखना) होता है। तत्पश्चात् निदिध्यासन के अभ्यास से मिथ्या उपाधियों के साथ तादात्म्य को सर्वथा त्यागकर आत्मस्वरूप के साथ एकरूप हो जाना ही उसमें प्रवेश करना है। आत्मा का यह अनुभव स्वयं से भिन्न किसी वस्तु का नहीं? वरन् अपने स्वस्वरूप का है। प्रवेश शब्द से साधक और साध्य के एकत्व का बोध कराया गया है। स्वप्नद्रष्टा के स्वाप्निक दुखों का तब अन्त हो जाता है? जब वह जाग्रत पुरुष में प्रवेश करके स्वयं जाग्रत पुरुष बन जाता है।स्वयं भगवान् ही अपनी प्राप्ति का उपाय बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.54।।उक्तसाधनैस्त्वं द्रष्टुमशक्यस्तर्हि केनोपायेन द्रष्टुं शक्य इत्यत आह। भक्त्या तु भक्तीतरसाधनव्यवच्छेदार्थस्तुशब्दः। किं भक्तिमात्रं त्वद्दर्शनहेतुरित्यतस्तां विशिनष्टि। अनन्यया भगवतो वासुदेवादन्यत्र पृथक्वदाचिदपि या न भवति तया ईश्वरे परानुरक्तिलक्षणया वासुदेवादन्यत्र सर्वकरणप्रवृत्तिनिवारकया अहमेवंविधो विश्वरुपधरः शास्त्रेणासंभावनादिनिवृत्तिपुरःसरं द्रष्टुं च त्वमिव साक्षात्कर्तुं च तत्त्वेन तत्त्वतः प्रवेष्टुं च। श्रवणादिना तत्त्वसाक्षात्कारेण मोक्षमेकीभावलक्षणं जीवन्मुक्तिं विदेहकैवल्याख्यं च गन्तुमित्यर्थः। ननुतमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्या साधनत्वेन बोधितानां वेदानुवचनादीनां का गतिरित्याशङ्क्य साङ्गैस्तैरेतज्जन्मनि जन्मान्तरे वा कृतैश्चित्तशुद्य्धामप्यनन्या मनआदिशत्रुतापनशमदमादिसंपन्ना भक्तिस्ततो मत्स्वरुपज्ञानादीति भक्तिद्वारा तेषां साधनत्वाददोष इत्याशयेन संर्बोधनाभ्यां समाधत्ते हेऽर्जुने हे परंतपेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.54।।यदि वेदतपोदानेज्यादिभिर्द्रष्टुमशक्यस्त्वं तर्हि केनोपायेन द्रष्टुं शक्योऽसीत्यत आह -- भक्त्येति। साधनान्तरव्यावृत्त्यर्थस्तुशब्दः। भक्त्यैवानन्यया मदेकनिष्ठया निरतिशयप्रीत्या एवंविधो दिव्यरूपधरोऽहं ज्ञातुं शक्यः शास्त्रतो हे अर्जुन? शक्य अहमिति छान्दसो विसर्गलोपः पूर्ववत्। न केवलं शास्त्रज्ञो ज्ञातुं शक्योऽनन्यया भक्त्या किंतु तत्त्वेन द्रष्टुं च स्वरूपेण साक्षात्कर्तुं च शक्यो वेदान्तवाक्यश्रवणमनननिदिध्यासनपरिपाकेण ततश्च स्वरूपसाक्षात्कारादविद्यातत्कार्यनिवृत्तौ तत्त्वेन प्रवेष्टुं च मद्रूपतयैवाप्तुं चाहं शक्यो हे परंतप? अज्ञानशत्रुदमनेऽतिप्रवेशयोग्यतां सूचयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.54।।कथं तर्हि द्रष्टुं शक्यस्त्वमत आह -- भक्त्येति। भक्त्या आराधनेन। अनन्ययाव्यभिचरितया। अखण्डयेत्यर्थः। अहमेवंविधो ज्ञातुं शक्यस्त्वंपदार्थशोधकशास्त्रतः। द्रष्टुं शक्यो ध्यानतः। तत्त्वेन याथात्म्येन प्रवेष्टुं शक्यस्तत्त्वमसिवाक्यार्थजज्ञानतः। हे परमज्ञानशत्रुं तापयतीति परंतप।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.54।।तदा कथं द्रष्टुं शक्यः इत्यत आह -- भक्त्येति। हे अर्जुन हे परन्तप इति स्नेहेन वीप्सया सम्बोधनम्। एवंविधोऽहं अनन्यया न विद्यते अन्यः पारलौकिकैएहिकयत्नो यस्यां तादृश्या भक्त्या तत्त्वेन याथार्थ्यस्वरूपेण ज्ञातुं च पुनरलौकिकभावदृष्ट्या द्रष्टुं च पुनः प्रवेष्टुं अलौकिकरूपेण लीलासु सेवनार्थं शक्यः? अस्मीति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.54।। केनोपायेन तर्हि द्रष्टुं शक्य इति तत्राह -- भक्त्येति। अनन्यया मदेकनिष्ठया भक्त्या त्वेवंभूतो विश्वरूपोऽहं तत्त्वेन परमार्थतो ज्ञातुं शक्यः शास्त्रतो द्रष्टुं प्रत्यक्षतः प्रवेष्टुं च तादात्म्येन शक्यः नान्यैरुपायैः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.54।।तादृशे जीवे स्वीयत्वेन वरणे सञ्जातया भक्त्याऽहं भगवान् ग्राह्य इति तदाह -- भक्त्येति। अथवा ननु तर्हि सर्वैः कथमेवं दृश्यसे इति चेत्तत्राह -- भक्त्येति। सर्वनिरोधार्थमवतीर्णस्यापि मम दर्शनं ज्ञानं च केषाञ्चिन्मानुषत्वेनांशत्वादिना च भवति? न तु तत्त्वेन यतोऽहं तत्त्वेन ज्ञातुं द्रष्टुं हृदि प्रवेष्टुं च भक्त्यैव शक्यः। किम्भूतया अनन्ययेति। वेदप्रवचनादिसाधननिरपेक्षया मदनुग्रहिसङ्गैकलभ्यया रागानुगयेति यावत्।केचित्केवलया भक्त्या इति वाक्यात् प्रमेयरूपया तथेति। यतोऽहमेवंविधः। भक्त्या ग्राह्यःअस्वतन्त्र इव द्विजः इति। अथवा विश्वरूपाद्यक्षरैश्वर्यादियोगयुक्त एवाक्लिष्टकर्मा प्रवाहमर्यादापुष्टिप्रणेताऽलौकिकगुणगणो महामनोरमवपुर्महाकरुणोऽहं पुरुषोत्तमोऽपि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.54।।तो फिर आपके दर्शन किस प्रकार हो सकते हैं इस पर कहते हैं --, भक्ितसे दर्शन हो सकते हैं? सो किस प्रकारकी भक्ितसे हो सकते हैं? यह बतलाते हैं --, हे अर्जुन अनन्य भक्ितसे अर्थात् जो भगवान्को छोड़कर अन्य किसी पृथक् वस्तुमें कभी भी नहीं होती वह अनन्य भक्ति है एवं जिस भक्तिके कारण ( भक्ितमान् पुरुषको ) समस्त इन्द्रियोंद्वारा एक वासुदेव परमात्माके अतिरिक्त अन्य किसीकी भी उपलब्धि नहीं होती? वह अनन्य भक्ित है। ऐसी अनन्य भक्ितद्वारा इस प्रकारके रूपवाला अर्थात् विश्वरूपवाला मैं परमेश्वर शास्त्रोंद्वारा जाना जा सकता हूँ। केवल शास्त्रोंद्वारा जाना जा सकता हूँ इतना ही नहीं? हे परन्तप तत्त्वसे देखा भी जा सकता हूँ अर्थात् साक्षात् भी किया जा सकता हूँ और प्राप्त भी किया जा सकता हूँ अर्थात् मोक्ष भी प्राप्त करा सकता हूँ।,
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.54।। व्याख्या -- भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन -- यहाँ तु पद पहले बताये हुए साधनोंसे विलक्षण साधन बतानेके लिये आया है। भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन तुमने मेरा जैसा शङ्खचक्रगदापद्मधारी चतुर्भुजरूप देखा है? वैसा रूपवाला मैं यज्ञ? दान? तप आदिके द्वारा नहीं देखा जा सकता? प्रत्युत अनन्यभक्तिके द्वारा ही देखा जा सकता हूँ।अनन्यभक्तिका अर्थ है -- केवल भगवान्का ही आश्रय हो? सहारा हो? आशा हो? विश्वास हो (टिप्पणी प0 616)। भगवान्के सिवाय किसी योग्यता? बल? बुद्धि आदिका किञ्चिन्मात्र भी सहारा न हो। इनका अन्तःकरणमें किञ्चिन्मात्र भी महत्त्व न हो। यह अनन्यभक्ति स्वयंसे ही होती है? मनबुद्धिइन्द्रियों आदिके द्वारा नहीं। तात्पर्य है कि केवल स्वयंकी व्याकुलता पूर्वक उत्कण्ठा हो? भगवान्के दर्शन बिना एक क्षण भी चैन न पड़े। ऐसी जो भीतरमें स्वयंकी बैचेनी है? वही भगवत्प्राप्तिमें खास कारण है। इस बेचैनीमें? व्याकुलतामें अनन्त जन्मोंके अनन्त पाप भस्म हो जाते हैं। ऐसी अनन्यभक्तिवालोंके लिये ही भगवान्ने कहा है -- जो अनन्यचित्तवाला भक्त नित्यनिरन्तर मेरा चिन्तन करता है? उसके लिये मैं सुलभ हूँ (गीता 8। 14) और जो अनन्यभक्त मेरा चिन्तन करते हुए उपासना करते हैं? उनका योगक्षेम मैं वहन करता हूँ (गीता 9। 22)।अनन्यभक्तिका दूसरा तात्पर्य यह है कि अपनेमें भजनस्मरण करनेका? साधन करनेका? उत्कण्ठापूर्वक पुकारनेका जो कुछ सहारा है? वह सहारा किञ्चिन्मात्र भी न हो। फिर साधन किसलिये करना है केवल अपना अभिमान मिटानेके लिये अर्थात् अपनेमें जो साधन करनेके बलका भान होता है? उसको मिटानेके लिये ही साधन करना है। तात्पर्य है कि भगवान्की प्राप्ति साधन करनेसे नहीं होती? प्रत्युत साधनका अभिमान गलनेसे होती है। साधनका अभिमान गल जानेसे साधकपर भगवान्की शुद्ध कृपा असर करती है अर्थात् उस कृपाके आनेमें कोई आड़ नहीं रहती और (उस कृपासे) भगवान्की प्राप्ति हो जाती है।ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुम् -- ऐसी अनन्यभक्तिसे ही मैं तत्त्वसे जाना जा सकता हूँ? अनन्यभक्तिसे ही मैं देखा जा सकता हूँ और अनन्यभक्तिसे ही मैं प्राप्त किया जा सकता हूँ।ज्ञानके द्वारा भी भगवान् तत्त्वसे जाने जा सकते हैं और प्राप्त किये जा सकते हैं (गीता 18। 55)? पर दर्शन देनेके लिये भगवान् बाध्य नहीं हैं।ज्ञातुम् कहनेका तात्पर्य है कि मैं जैसा हूँ? वैसाकावैसा जाननेमें आ जाता हूँ। जाननेमें आनेका यह अर्थ नहीं है कि मैं उसकी बुद्धिके अन्तर्गत आ जाता हूँ? प्रत्युत उसकी जाननेकी शक्ति मेरेसे परिपूर्ण हो जाती है। तात्पर्य है कि वह मेरेको वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19) और सदसच्चाहम् (गीता 9। 19) -- इस तरह वास्तविक तत्त्वसे जान लेता है।द्रष्टुम् कहनेका तात्पर्य है कि वह सगुणरूपसे अर्थात् विष्णु? राम? कृष्ण आदि जिस किसी भी रूपसे देखना चाहे? मेरेको देख सकता है।प्रवेष्टुम् कहनेका तात्पर्य है कि वह भगवान्के साथ अपनेआपकी अभिन्नताका अनुभव कर लेता है अथवा उसका भगवान्की नित्यलीलामें प्रवेश हो जाता है। नित्यलीलामें प्रवेश होनेमें भक्तकी इच्छा और भगवान्की मरजी ही मुख्य होती है। यद्यपि भगवान्के सर्वथा शरण होनेपर भक्तकी सब इच्छाएँ समाप्त हो जाती हैं? तथापि भगवान्की यह एक विलक्षणता है कि भक्तकी लीलामें प्रवेश होनेकी जो इच्छा रही है? उसको वे पूरी कर देते हैं। केवल पारमार्थिक इच्छाको ही पूरी करते हों? ऐसी बात नहीं किन्तु भक्तकी पहले जो सांसारिक यत्किञ्चित् इच्छा रही हो? उसको भी भगवान् पूरी कर देते हैं। जैसे भगवद्दर्शनसे पूर्वकी इच्छाके अनुसार ध्रुवजीको छत्तीस हजार वर्षका राज्य मिला और विभीषणको एक कल्पका। तात्पर्य यह हुआ कि भगवान् भक्तकी इच्छाको पूरी कर देते हैं और फिर अपनी मरजीके अनुसार उसे वास्तविक पूर्णताकी प्राप्ति करा देते हैं? जिससे भक्तके लिये कुछ भी करना? जानना और पाना शेष नहीं रहता।विशेष बातभक्तिकी खुदकी जो उत्कट अभिलाषा है? उस अभिलाषामें ऐसी ताकत है कि वह भगवान्में भी भक्तसे मिलनेकी उत्कण्ठा पैदा कर देती है। भगवान्की इस उत्कण्ठामें बाधा देनेकी किसीमें भी सामर्थ्य नहीं है। अनन्त सामर्थ्यशाली भगवान्की जब भक्तकी तरफ कृपा उमड़ती है? तब वह कृपा भक्तके सम्पूर्ण विघ्नोंको दूर करके? भक्तकी योग्यताअयोग्यताको किञ्चिन्मात्र भी न देखती हुई भगवान्को भी परवश कर देती है? जिससे भगवान् भक्तके सामने तत्काल प्रकट हो जाते हैं। सम्बन्ध -- अब भगवान् अनन्यभक्तिके साधनोंका वर्णन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri
Chapter 11 (Part 19)
Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.54 -- 11.55।।भक्त्येति। मत्कर्मेति। अविद्यमानान्यज्ञेयरमणीया येषां भक्तिः परिस्फुरति तेषां [ ज्ञानवान् ] मां प्रपद्यते (? N omit मां प्रपद्यते)। वासुदेवः सर्वम् (Gita VII? 19 ) इत्यादिपूर्वाभिहितोपदेशचमत्कारात् विश्वात्मकं वासुदेवतत्त्वम् अयत्नत एव बोधपदवीमवतरति इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.54।।केनोपायेन तर्हि द्रष्टुं शक्यो भगवानिति पृच्छति -- कथमिति। शास्त्रीयज्ञानद्वारा तद्दर्शनं सफलं सिध्यतीत्याह -- उच्यत इति। न भक्तिमात्रं तत्र हेतुरिति तुशब्दार्थं स्फुटयति -- किमित्यादिना। अन्यां। भक्तिमेव व्यनक्ति -- सर्वैरिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.54।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.54।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.54।। --,भक्त्या तु किंविशिष्टया इति आह -- अनन्यया अपृथग्भूतया? भगवतः अन्यत्र पृथक् न कदाचिदपि या भवति सा त्वनन्या भक्तिः। सर्वैरपि करणैः वासुदेवादन्यत् न उपलभ्यते यया? सा अनन्या भक्तिः? तया भक्त्या शक्यः अहम् एवंविधः विश्वरूपप्रकारः हे अर्जुन? ज्ञातुं शास्त्रतः। न केवलं ज्ञातुं शास्त्रतः? द्रष्टुं च साक्षात्कर्तुं तत्त्वेन तत्त्वतः? प्रवेष्टुं च मोक्षं च गन्तुं परंतप।।अधुना सर्वस्य गीताशास्त्रस्य सारभूतः अर्थः निःश्रेयसार्थः अनुष्ठेयत्वेन समुच्चित्य उच्यते --,
───────────────────
【 Verse 11.55 】
▸ Sanskrit Sloka: मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्त: सङ्गवर्जित: | निर्वैर: सर्वभूतेषु य: स मामेति पाण्डव ||
▸ Transliteration: mat-karma-kṛn mat-paramo mad-bhaktaḥ saṅgavarjitaḥ | nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava ||
▸ Glossary: matkarmakṛt: engaged in doing My work; matparamaḥ: considering Me the Supreme; madbhaktaḥ: engaged in My devotional service; saṅgavarjitaḥ: freed from the contamination of previous activities and mental speculation; nirvairaḥ: without an enemy; sarvabhūteṣu: to every living entity; yaḥ: one who; sa: he; mām: unto Me; eti: comes; pāṇḍava: O son of Pāṇḍu II11.56 II
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 11.55 My dear Arjuna, one who is engaged entirely in My devotional service, who surrenders to Me as the Supreme, free from attachment, full of love for every entity, surely comes to Me.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।11.55।।हे पाण्डव जो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला? मेरे ही परायण और मेरा ही भक्त है तथा सर्वथा आसक्तिरहित और प्राणिमात्रके साथ निर्वैर है? वह भक्त मेरेको प्राप्त हो जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।11.55।। हे पाण्डव जो पुरुष मेरे लिए ही कर्म करने वाला है? और मुझे ही परम लक्ष्य मानता है? जो मेरा भक्त है तथा संगरहित है? जो भूतमात्र के प्रति निर्वैर है? वह मुझे प्राप्त होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 11.55 मत्कर्मकृत् does actions for Me? मत्परमः looks on Me as the Supreme? मद्भक्तः is devoted to Me? सङ्गवर्जितः is freed from attachment? निर्वैरः without enmity? सर्वभूतेषु towards all creatures? यः who? सः he? माम् to Me? एति goes? पाण्डव O Arjuna.Commentary This is the essence of the whole teaching of the Gita. He who practises this teaching will attain Supreme Bliss and Immortality. This verse contains the summary of the entire philosophy of the Gita.He who performs actions (duties) for the sake of the Lord? who consecrates all his actions to Him? who serves the Lord with his heart and soul? who regards the Lord as his supreme goal? who lives for Him alone? who works for Him alone? who sees the Lord in everything? who sees the whole world as the Cosmic Form of the Lord and therefore cherishes no feeling of hatred or enmity towards any creature even when great injury has been done by others to him? who has no attachment or love to wealth? children? wife? friends and relatives? and who seeks nothing else but the Lord? realises Him and enters into His Being. He becomes one with Him.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the eleventh discourse entitledThe Yoga of the Vision of the Cosmic Form.,
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 11.55. He, who performs actions for [attaining] Me; who regards Me as his supreme goal; who is devoted to Me; who is free from attachment; and who is free from hatred towards all beings-he attains me, O son of Pandu !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 11.55 He whose every action is done for My sake, to whom I am the final goal, who loves Me only and hates no one - O My dearest son, only he can realize Me!"
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 11.55 Whosoever works for Me, looks upon Me as the highest and is devoted to Me, free from attached and without enmity towards any creature, he comes to Me, O Arjuna.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 11.55 O son of Pandu, he who works for Me, accepts Me as the supreme Goal, is devoted to Me, is devoid of attachment and free from enmity towards all beings-he attains Me.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 11.55 He who does all actions for Me, who looks upon Me as the Supreme, who is devoted to Me, who is free from attachment, who bears enmity towards no creature, he comes to Me, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 11.54-55 Bhaktya etc. Mat-karma etc. Those, whose devotion, charming by the absence of any other object in it, bursts forth-to the field of realisation of those persons descends the Vasudea - tattva, the Absolute being, without any effort (on their part) just on account of their appreciation of the advice given earlier as 'Having the realisation that Vasudeva is all, one takes refuge in Me. etc.'
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 11.55 Whosoever performs all acts like the study of the Vedas described above, considering them as several modes of worship, 'he works for Me.' He who 'looks upon Me as the highest,' namely, one to whom I alone am the highest purpose in all his enterprises, has Me as 'the highest end.' He who is 'devoted to me,' i.e., is greatly devoted to me and hence unable to sustain himself without reciting My names, praising Me, meditating upon Me, worshipping Me, saluting Me etc., he who performs these always considering Me as the supreme end - he is My devotee. He is 'free from attachments,' as he is attached to me alone, and is therefore unable to have attachment to any other entity. He who is without hatred towards any being, is one who fulfils all the following conditions: his nature is to feel pleasure or pain solely on account of his union or separation from Me; he considers his own sins to be the cause of his sufferings (and not the work of others); he is confirmed in his faith that all beings are dependent on the Parama-purusa. For all these reasons he has no hatred for any one.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 11.55 Pandava, O son of Pandu; yah, he who; mat-karma-krt, works for Me: work for Me is mat-karma; one who does it is mat-karma-krt-. Mat-paramah, who accepts Me as the supreme Goal: A servant does work for his master, but does not accept the master as his own supreme Goal to be attained after death; his one, however, who does work for Me, accepts Me alone as the supreme Goal. Thus he is matparamah-one to whom I am the supreme Goal-. So also he who is madbhaktah, devoted to me: He adores Me alone in all ways, with his whole being and full enthusiasm. Thus he is madbhaktah-.
Sanga-varjitah, who is devoid of attachment for wealth, sons, friends, wife and relatives, Sanga means fondness, love; devoid of them-. Nirvairah, who is free from enmity; sarva-bhutesu, towards all beings-berefit of the idea of enmity even towards those engaged in doing unmost harm to him-. Sah, he who is such a devotee of Mine; eti, attains; mam, Me. I alone am his supreme Goal; he does not attain any other goal. This is the advice for you, given by Me as desired by you.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।11.55।। अर्जुन ने यह सुना कि अनन्यभक्ति के द्वारा कोई भी भक्त? भगवान् के समष्टि वैभव को न केवल पहचान ही सकता है? वरन् स्वयं में ही उसका साक्षात् अनुभव भी कर सकता है। तब पाण्डव राजपुत्र के मुख पर उस अनुभव या पद को प्राप्त करने की उत्सुकता दिखाई दी। यद्यपि उसने स्पष्ट प्रश्न नहीं किया तथापि उसके मुख के भाव से ही उसे समझकर भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ वर्णन करते हैं कि कोई साधक जीवन में इस पूर्णत्व को कैसे प्राप्त कर सकता है।किसी जीव को ईश्वरत्व प्राप्त करने का श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट योजना के पांच अंग हैं। उन पांच अंगों या आवश्यक गुणों को इस श्लोक में बताया गया है। वे गुण हैं (1) जो ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करता है? (2) जिसका परम लक्ष्य ईश्वर ही है? (3) जो ईश्वर का भक्त है? (4) जो आसक्तियों से रहित है? तथा (5) जो भूतमात्र के प्रति वैरभाव से रहित है।इन पांच आवश्यक गुणों में आत्मसंयम की सम्पूर्ण साधना का सारांश दिया गया है। ईश्वर के अखण्ड स्मरण से ही समस्त उपाधियों के कर्मों में अनासक्ति का भाव दृढ़ होता है। किसी व्यक्ति के प्रति वैरभाव तभी होता है? जब हम उसे पराया समझते हैं। मेरे ही दोनों हाथों के मध्य कोई वैरभाव नहीं हो सकता। आत्मैकत्व के बोध से जब सर्वत्र एकता का दर्शन और अनुभव होता है? केवल तभी समस्त भूतों के प्रति पूर्ण निर्वैरभाव प्राप्त हो सकता है।मन और बुद्धि के स्तर पर सर्वथा अनासक्ति होना असंभव है। मन और बुद्धि किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आसक्ति के बिना नहीं रह सकते हैं। इसलिए एक साधक? सर्वप्रथम? ईश्वरार्पण की भावना के द्वारा विषयासक्ति को त्यागना सीखता है? और तत्पश्चात् अपने मन को भक्ति के साथ ईश्वर में स्थित कर देता है। इस अंग की पूर्णता के लिए पूर्व कथित गुण निश्चय ही सहायक होते हैं।इस प्रकार? सम्पूर्ण योजना का पुनरावलोकन करने पर ज्ञात होगा कि वह पूर्ण मनोवैज्ञानिक होने के कारण सर्वथा स्वीकार्य है। प्रत्येक उत्तर अंग अपने पूर्व अंग से पोषित होता है। इस श्लोक से यह भी स्पष्ट ज्ञात होता है कि अध्यात्म के साधक की महान् पवित्र तीर्थयात्रा ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करने से प्रारम्भ होती है। तत्पश्चात् स्वयं ईश्वर ही उसके जीवन का परम लक्ष्य बन जाता है। इसका परिणाम होगा ईश्वर के प्रति परम प्रेम। स्वाभाविक है कि जगत् की अनित्य? परिच्छिन्न वस्तुओं के साथ उसकी आसक्ति समाप्त हो जायेगी और वह आत्मा का दर्शन कर सकेगा। जब स्वयं आत्मस्वरूप ही बनकर वह स्वयं को सर्वत्र? सब भूतों में पहचानेगा? तब उसका किसी भी प्राणी से किसी प्रकार का वैर नहीं होगा।गीता के अनुसार साधना के द्वारा प्राप्त आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता की कसौटी है सबसे प्रेम और किसी से द्वेष नहीं होना।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का विश्वरूप दर्शनयोग नामक ग्यारहवां अध्याय समाप्त होता है।इस अध्याय का विश्वरूपदर्शनयोग यह नाम सार्थक है। वेदान्तशास्त्र की परिभाषिक शब्दावली के अनुसार यहाँ प्रयुक्त विश्वरूप शब्द का वास्तविक अर्थ विराट्रूप है। आत्मा एक व्यष्टि स्थूल देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर जाग्रत् अवस्था की घटनाओं का अनुभव करता है। इस अवस्था में स्थित आत्मा को वेदान्त में विश्व कहा जाता है। वही आत्मा समष्टि स्थूल देह अर्थात् ब्रह्माण्ड के साथ तादात्म्य प्राप्त कर विराट् कहलाता है। यद्यपि यहाँ भगवान् ने अपना विराट्रूप दिखाया है? तथापि इस अध्याय का नाम विश्वरूपदर्शनयोग है। इससे विश्व और विराट् के पारमार्थिक एकत्व का बोध होता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।11.55।।इदानीं शास्त्रसारभूतस्य गीताशास्त्रस्य सारभूतमर्थं निःश्रेयसप्रयोजनकं संगृह्यावश्यमुष्ठानायातिकारुणिको भगवानाह। मदर्थं मत्पीत्यर्थं वेदविहितं कर्म करोतीति मत्कर्मकृत्। यतोऽहमेव परमः प्रकृष्टः प्राप्यो यस्य नतु स्वर्गादिः स तथा मत्प्राप्तिसाधनेन सर्वात्मना सर्वप्रकारैः सर्वोत्साहेन मद्भजनेन युक्तः धनाद्यासक्त्या भगवद्भजनं न सिध्यत्यत आह। धनपुत्रमित्रकलत्रादिषु सङ्गवर्जित आसक्तिरहितः भूतेषु सवैरस्य मदनन्या भक्तिरतिदूरतरेत्याह। सर्वभूतेषु निर्वैरः साधारणेषु स्वस्यात्यन्तापकारकेषु अपि शत्रुभाववर्जितः य ईदृशो दम्भरहितो मद्भक्तः स मामेति। अभेदेन साक्षात्करोति। अहमेव तस्य परा गतिर्नान्येत्यर्थः। अयं सारसंग्रहो मया तवोपदिष्टः। यतो भवान् मत्पितृभामापत्यत्वादतिप्रेमास्पद इत्याशयेनाह -- पाण्डवेति।तदनेनैकादशाध्यायेन विश्वरुपप्रतिपादकेन सर्वेश्वरस्य सर्वात्मानः सर्वज्ञस्यानन्यता भक्त्या तत्स्वरुपज्ञानादिप्रदर्शकेन तत्पदवाच्योऽर्थो निरुपितः।।चिदानन्दे यत्रादितिजनरयक्षासुरयुतं विभातं त्रैलोक्यं सति भवति नाश्चर्यजनकम्।अनन्ताण्डाधारे तमजमजरात्मानममृतं शिवं कृष्णं वन्दे निखिलहृदिगं द्रष्टुमभयम्।।1।।इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीबालस्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचितायां श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां एकादशोऽध्यायः।।11।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।11.55।।अधुना सर्वस्य गीताशास्त्रस्य सारभूतोऽर्थो निःश्रेयसार्थिनामनुष्ठानाय पुञ्जीकृत्योच्यते -- मत्कर्मकृदिति। मदर्थं कर्म वेदविहितं करोतीति मत्कर्मकृत्। स्वर्गादिकामनायां सत्यां कथमेवमिति नेत्याह। मत्परमः अहमेव परमः प्राप्तव्यत्वेन निश्चितो नतु स्वर्गादिर्यस्य सः। अतएव मत्प्राप्त्याशया मद्भक्तः सर्वै प्रकारैर्मम भजनपरः। पुत्रादिषु स्नेहे सति कथमेवं स्यादिति नेत्याह -- सङ्गेति। सङ्गवर्जितः बाह्यवस्तुस्पृहाशून्यः। शत्रुषु द्वेषे सति कथमेवं स्यादिति नेत्याह -- निर्वैर इति। निर्वैरः सर्वभूतेषु अपकारिष्वपि द्वेषशून्यो यः स मामेत्यभेदेन। हे पाण्डव? अयमर्थस्त्वया ज्ञातुमिष्टो मयोपदिष्टो नातःपरं किंचित्कर्तव्यमस्तीत्यर्थः।दृशः कर्मभूतं हि यत्तच्च विश्वं स्वयं रूप्यते नान्यतस्तच्च रूपम्।जगद्यः स्वभासा निरस्यात्मरूपं ददावादरात्काशिराजं भजे तम्।।1।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।11.55।।शास्त्रसर्वस्वं संगृह्णाति -- मत्कर्मकृदिति। मदर्थमेव कर्माणि करोतीति मत्कर्मकृत्। अहमेव परमो निष्कलः प्राप्यो यस्येति स मत्परमः। एतेन कृत्स्नः कर्मयोगो ध्यानयोगश्च त्वंपदार्थशोधक उक्तः। मम भक्त आराधनकृदित्युपासनाकाण्डार्थसंग्रहः। सङ्गवर्जित इत्यनेन एकान्तभगवद्ध्याननिष्ठ इत्युक्तम्। निर्वैर इति विश्वं भगवदात्मना पश्येदित्युक्तम्। अन्यथा भेदबुद्धिमतो निर्वैरत्वासंभवात्। एवंभूतो यः स मां तत्पदलक्ष्यार्थभूतमखण्डानन्दैकघनमेति प्राप्नोति प्रत्यगभेदेन। हे पाण्डव विशुद्धवंशज। त्वमेवैतज्ज्ञातुं शक्नोषीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।11.55।।नन्वनन्यभक्तः कथं ज्ञेयः इत्याकाङ्क्षायामाह -- मत्कर्मकृदिति। मदर्थं स्वस्य सहजदासत्वेन? न तु कामनया? कर्म सेवादिरूपं करोति स तथा। मत्परमः अहमेव परमः सर्वस्वं यस्य। मद्भक्तः मद्भजनकृत् मदाश्रितो वा। सङ्गवर्जितः पुत्रादिलौकिकावैष्णवादिसङ्गवर्जितः। सर्वभूतेषु निर्वैरः द्वेषरहितः। हे पाण्डव,उत्पत्त्यैव भक्त एवंविधो यः स मामेति प्राप्नोति? सोऽनन्यो ज्ञातव्य इति भावः।प्रदर्श्य विश्वरूपं स्वं दृढीकृत्याऽर्जुनाय वै।श्रीकृष्णः साधनासाध्यं स्वस्वरूपमदर्शयत्।।1।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।11.55।। अतः सर्वशास्त्रसारं परमं रहस्यं शृण्वित्याह -- मत्कर्मकृदिति। मदर्थं कर्म करोतीति मत्कर्मकृत्? अहमेव परमः पुरुषार्थो यस्य सः? ममैव भक्तो मामेवाश्रितः? पुत्रादिषु सङ्गवर्जितो? निर्वैरश्च सर्वभूतेषु एवंभूतो यः स मां प्राप्नोति नान्य इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।11.55।।यद्यप्येवं तथापि त्वादृशस्य मन्निगममर्यादायामनुगृहीतत्वान्मदाज्ञया मद्भक्तिपूर्वकमेव स्वधर्मकरणे मत्प्राप्तिरित्याह -- मत्कर्मकृदिति। भगवदीयस्य भगवत्सेवापूर्वककर्मकरणं विहितंमम कर्मकरणे प्रभोरिच्छाऽस्तीति यो निर्द्धारयति स करोति? य एतद्विपरीतं स न करोति? यथा शुकजडादिः। एतन्निर्द्धारश्च भगवदधीनोऽतो भक्तेष्वपि तन्निर्द्धारणानियम इत्यतः कर्म कर्त्तव्यमेव अतन्निर्द्धारणे त्वाधुनिकानाम् एवं सतीच्छाज्ञानवता तत्सन्देहवता च कर्त्तव्यं इति।तन्निर्द्धारणानियमः पृथग्यः प्रतिबन्धः फलं इत्यादि सूत्रभाष्ये निर्णीतमवगन्तव्यम्। मत्परम इति अहमेव परम उद्देश्यो यस्य परमो मद्भक्तः स मामेति पुरुषोत्तमाप्तिस्तस्य फलं भवतीत्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।11.55।।अब समस्त गीताशास्त्रका सारभूत अर्थ संक्षेपमें कल्याणप्राप्तिके लिये कर्तव्यरूपसे बतलाया जाता है --, जो मुझ परमेश्वरके लिये कर्म करनेवाला है और मेरे ही परायण है -- सेवक स्वामीके लिये कर्म करता है परंतु मरनेके पश्चात् पानेयोग्य अपनी परमगति उसे नहीं मानता और यह तो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला,और मुझे ही अपनी परमगति समझनेवाला होता है? इस प्रकार परमगति मैं ही हूँ ऐसा जो मत्परायण है। तथा मेरा ही भक्त है अर्थात् जो सब प्रकारसे सब इन्द्रियोंद्वारा सम्पूर्ण उत्साहसे मेरा ही भजन करता है? ऐसा मेरा भक्त है। तथा जो धन? पुत्र? मित्र? स्त्री और बन्धुवर्गमें सङ्ग -- प्रीति -- स्नेहसे रहित है। तथा सब भूतोंमें वैरभावसे रहित है अर्थात् अपना अत्यन्त अनिष्ट करनेकी चेष्टा करनेवालोंमें भी जो शत्रुभावसे रहित है। ऐसा जो मेरा भक्त है? हे पाण्डव वह मुझे पाता है अर्थात् मैं ही उसकी परमगति हूँ? उसकी दूसरी कोई गति कभी नहीं होती। यह मैंने तुझे तेरे जाननेके लिये इष्ट उपदेश दिया है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।11.55।। व्याख्या -- [इस श्लोकमें पाँच बातें आयी हैं। इन पाँचोंको साधनपञ्चक भी कहते हैं। इन पाँचों बातोंके दो विभाग हैं। (1) भगवान्के साथ घनिष्ठता और (2) संसारके साथ सम्बन्धविच्छेद। पहले विभागमें मत्कर्मकृत्? मत्परमः और मद्भक्तः -- ये तीन बातें हैं और दूसरे विभागमें सङ्गवर्जितः औरनिर्वैरः सर्वभूतेषू -- ये दो बातें हैं।मत्कर्मकृत् -- जो जप? कीर्तन? ध्यान? सत्सङ्ग? स्वाध्याय आदि भगवत्सम्बन्धी कर्मोंको और वर्ण? आश्रम? देश? काल? परिस्थिति आदिके अनुसार प्राप्त लौकिक कर्मोंको केवल मेरे लिये ही अर्थात् मेरी प्रसन्नताके लिये ही करता है? वह मत्कर्मकृत् है।वास्तवमें देखा जाय तो कर्मके पारमार्थिक और लौकिक -- ये दो बाह्यरूप होते हैं? पर भीतरमें सब कर्म केवल भगवान्के लिये ही करने हैं -- ऐसा एक ही भाव रहता है? एक ही उद्देश्य रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि भक्त शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिसे जो कुछ भी कर्म करता है? वह सब भगवान्के लिये ही करता है। कारण कि उसके पास शरीर? मन? बुद्धि? इन्द्रियाँ? योग्यता? करनेकी सामर्थ्य? समझ आदि जो कुछ है? वह सबकीसब भगवान्की ही दी हुई है और भगवान्की ही है? तथा वह स्वयं भी भगवान्का ही है। वह तो केवल भगवान्की प्रसन्नताके लिये? भगवान्की आज्ञाके अनुसार? भगवान्की दी हुई शक्तिसे निमित्तमात्र बनकर कार्य करता है। यही उसका मत्कर्मकृत् होना है।मत्परमः -- जो मेरेको ही परमोत्कृष्ट समझकर केवल मेरे ही परायण रहता है अर्थात् जिसका परम प्रापणीय? परम ध्येय? परम आश्रय केवल मैं ही हूँ? ऐसा भक्त मत्परमः है।मद्भक्तः -- जो केवल मेरा ही भक्त है अर्थात् जिसने मेरे साथ अटल सम्बन्ध जोड़ लिया है कि मैं केवल भगवान्का ही हूँ और केवल भगवान् ही मेरे हैं? तथा मैं अन्य किसीका भी नहीं हूँ और अन्य कोई भी मेरा नहीं है। ऐसा होनेसे भगवान्में अतिशय प्रेम हो जाता है क्योंकि जो अपना होता है? वह स्वतः प्रिय लगता है। प्रेमकी जागृतिमें अपनापन ही मुख्य है।वह भक्त सब देशमें? सब कालमें? सम्पूर्ण वस्तुव्यक्तियोंमें और अपनेआपमें सदासर्वदा प्रभुको ही परिपूर्ण देखता है। इस दृष्टिसे प्रभु सब देशमें होनेसे यहाँ भी हैं? सब कालमें होनेसे अभी भी हैं? सम्पूर्ण वस्तुव्यक्तियोंमें होनेसे मेरेमें भी हैं और सबके होनेसे मेरे भी हैं -- ऐसा भाव रखनेवाला ही मद्भक्तः है।सङ्गवर्जितः निर्वैरः सर्वभूतेषु यः -- केवल भगवान्के लिये ही कर्म करनेसे? केवल भगवान्के ही परायण रहनेसे और केवल भगवान्का ही भक्त बननेसे क्या होता है इसका उपर्युक्त पदोंसे वर्णन करते हैं कि वह,सङ्गवर्जितः हो जाता है अर्थात् उसकी संसारमें आसक्ति? ममता और कामना नहीं रहती। आसक्ति? ममता और कामनासे ही संसारके साथ सम्बन्ध होता है। भगवान्में अनन्य प्रेम होते ही आसक्ति आदिका अत्यन्त अभाव हो जाता है।दूसरी बात? जब भक्तको मैं भगवान्का ही अंश हूँ -- इस वास्तविकताका अनुभव हो जाता है? तब उसका भगवान्में प्रेम जाग्रत् हो जाता है। प्रेम जाग्रत् होनेपर रागका अत्यन्त अभाव हो जाता है। रागका अत्यन्त अभाव होनेसे और सर्वत्र भगवद्भाव होनेसे उसके शरीरके साथ कोई कितना ही दुर्व्यवहार करे? उसको मारेपीटे? उसका अनिष्ट करे? तो भी उसके हृदयमें अनिष्ट करनेवालेके प्रति किञ्चिन्मात्र भी वैरभाव उत्पन्न नहीं होता। वह उसमें भगवान्की ही मरजी? कृपा मानता है। ऐसे भक्तको भगवान्ने निर्वैरः सर्वभूतेषु कहा है।सङ्गवर्जितः और निर्वैरः सर्वभूतेषु -- इन दोनोंका वर्णन करनेका तात्पर्य उसका संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है यह बतानेमें है। संसारसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर स्वतःसिद्ध परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है।स मामेति -- ऐसा वह मेरा भक्त मेरेको ही प्राप्त हो जाता है। स मामेति में तत्त्वसे जानना? दर्शन करना और प्राप्त होना -- ये तीनों ही बातें आ जाती हैं? जो कि पीछेके (चौवनवें) श्लोकमें बतायी गयी हैं। तात्पर्य है कि जिस उद्देश्यसे मनुष्यजन्म हुआ है? वह उद्देश्य सर्वथा पूर्ण हो जाता है।विशेष बातश्रीभगवान्ने नवें अध्यायके अन्तमें कहा था -- मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु।मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः।।(9। 34)। ऐसा कहनेपर भी भगवान्के मनमें यह बात रह गयी कि मैं अपने रहस्यकी सब बात किस तरहसे? किस रीतिसे समझाऊँ इसीको समझानेके लिये भगवान्ने दसवाँ और ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।जीवने उत्पत्तिविनाशशील और नित्य परिवर्तनशील प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरसंसारका सहारा ले रखा है? जिससे यह अविनाशी और नित्य अपरिवर्तनशील भगवान्से विमुख हो रहा है। इस विमुखताको मिटाकर जीवको भगवान्के सम्मुख करनेमें ही इन दोनों -- दसवें और ग्यारहवें अध्यायका तात्पर्य है।इस मनुष्यके पास दो शक्तियाँ हैं -- चिन्तन करनेकी और देखनेकी। इनमेंसे जो चिन्तन करनेकी शक्ति है? उसको भगवान्की विभूतियोंमें लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जिस किसी वस्तु? व्यक्ति आदिमें जो कुछ विशेषता? महत्ता? विलक्षणता? अलौकिकता दीखे और उसमें मन चला जाय? उस विशेषता आदिको भगवान्की ही मानकर वहाँ भगवान्का ही चिन्तन होना चाहिये। इसके लिये भगवान्ने दसवाँ अध्याय कहा है।दूसरी जो देखनेकी शक्ति है? उसको भगवान्में लगाना चाहिये। तात्पर्य है कि जैसे भगवान्के दिव्य अविनाशी विराट्रूपमें अनेक रूप हैं? अनेक आकृतियाँ हैं? अनेक तरहके दृश्य हैं? ऐसे ही यह संसार भी उस विराट्रूपका ही एक अङ्ग है और इसमें अनेक नाम? रूप? आकृति आदिके रूपमें परमात्माहीपरमात्मा परिपूर्ण हैं। इस दृष्टिसे सबको परमात्मस्वरूप देखे। इसके लिये भगवान्ने ग्यारहवाँ अध्याय कहा है।अर्जुनने भी इन दोनों दृष्टियोंके लिये दो बार प्रार्थना की है। दसवें अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें अर्जुनने कहा कि हे भगवन् मैं किनकिन भावोंमें आपका चिन्तन करूँ तो भगवान्ने चिन्तनशक्तिको लगानेके लिये अपनी विभूतियोंका वर्णन किया। ग्यारहवें अध्यायके आरम्भमें अर्जुनने कहा कि मैं आपके रूपको देखना चाहता हूँ तो भगवान्ने अपना विश्वरूप दिखाया और उसको देखनेके लिये अर्जुनको दिव्यचक्षु दिये।तात्पर्य यह हुआ कि साधकको अपनी चिन्तन और दर्शनशक्तिको भगवान्के सिवाय दूसरी किसी भी जगह खर्च नहीं करनी चाहिये अर्थात् साधक चिन्तन करे तो परमात्माका ही चिन्तन करे और जिस किसीको देखे तो उसको परमात्मस्वरूप ही देखे।इस प्रकार ? तत्? सत् -- इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें विश्वरूपदर्शनयोग नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।11।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।11.54 -- 11.55।।भक्त्येति। मत्कर्मेति। अविद्यमानान्यज्ञेयरमणीया येषां भक्तिः परिस्फुरति तेषां [ ज्ञानवान् ] मां प्रपद्यते (? N omit मां प्रपद्यते)। वासुदेवः सर्वम् (Gita VII? 19 ) इत्यादिपूर्वाभिहितोपदेशचमत्कारात् विश्वात्मकं वासुदेवतत्त्वम् अयत्नत एव बोधपदवीमवतरति इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।11.55।।भक्त्या त्विति विशेषणादन्येषामहेतुत्वमाशङ्क्याह -- अधुनेति। समुच्चित्य संक्षिप्य पुञ्जीकृत्येति यावत्। मत्कर्मकृदित्युक्ते मत्परमत्वमार्थिकमिति पुनरुक्तिरित्याशङ्क्याह -- करोतीति। भगवानेव परमा गतिरिति निश्चयवतस्तत्रैव निष्ठा सिध्यतीत्याह -- तथेति। न तत्रैव सर्वप्रकारैर्भजनं धनादिस्नेहाकृष्टत्वादित्याशङ्क्याह -- सङ्गेति। द्वेषपूर्वकानिष्टाचरणं वैरमनपकारिषु तदभावेऽपि भवत्येवापकारिष्विति शङ्कित्वाह -- आत्मन इति। एतच्च सर्वं संक्षिप्यानुष्ठानार्थमुक्तमेवमनुतिष्ठतो भगवत्प्राप्तिरवश्यंभाविनीत्युपसंहरति -- अयमिति। तदेवं भगवतो विश्वरूपस्य सर्वात्मनः सर्वज्ञस्य सर्वेश्वरस्य मत्कर्मकृदित्यादिन्यायेन क्रममुक्तिफलमभिध्यानमभिवदता तत्पदवाच्योऽर्थो व्यवस्थापितः।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छुद्धानन्दपूज्यपादशिष्यानन्दगिरिकृतौ एकादशोऽध्यायः।।11।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।11.55।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. ,
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।11.55।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।11.55।। --,मत्कर्मकृत् मदर्थं कर्म मत्कर्म? तत् करोतीति मत्कर्मकृत्। मत्परमः -- करोति भृत्यः स्वामिकर्म? न तु आत्मनः परमा प्रेत्य गन्तव्या गतिरिति स्वामिनं प्रतिपद्यते अयं तु मत्कर्मकृत् मामेव परमां गतिं प्रतिपद्यते इति मत्परमः? अहं परमः परा गतिः यस्य सोऽयं मत्परमः। तथा मद्भक्तः मामेव सर्वप्रकारैः सर्वात्मना सर्वोत्साहेन भजते इति मद्भक्तः। सङ्गवर्जितः धनपुत्रमित्रकलत्रबन्धुवर्गेषु सङ्गवर्जितः सङ्गः प्रीतिः स्नेहः तद्वर्जितः। निर्वैरः निर्गतवैरः सर्वभूतेषु शत्रुभावरहितः आत्मनः अत्यन्तापकारप्रवृत्तेष्वपि। यः ईदृशः मद्भक्तः सः माम् एति? अहमेव तस्य परा गतिः? न अन्या गतिः काचित् भवति। अयं तव उपदेशः इष्टः मया उपदिष्टः हे पाण्डव इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य,श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येएकादशोऽध्यायः।।