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2. Bhagavad Gita — Chapter 2

Chapter 2 (Part 1)

【 Verse 2.1 】

▸ Sanskrit Sloka: सञ्जय उवाच | तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् | विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदन: ||

▸ Transliteration: sañjaya uvāca | taṁ tathākṛpayāviṣṭamaśrupūrṇākulekṣaṇam I viṣīdantaṁidam vākyamuvāca madhusūdanaḥ ||

▸ Glossary: sañjaya uvāca: Sañjaya said; taṁ: to him; tathā: thus; kṛpayā: by pity; āviṣṭam: overcome; aśrupūrṇā: full of tears; ākula: agitated; īkṣaṇam: (one with) eyes; viṣīdantaṁ: sorrowing; idaṁ: this; vākyam: word; uvāca: said; madhu-sūdanaḥ: the killer of Madhu

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.1 Sañjaya said: As Arjuna’s eyes overflowed with tears of pity and despair, Madhusūdana (Kṛṣṇa) spoke to him thus.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.1।।सञ्जय बोले वैसी कायरतासे आविष्ट उन अर्जुनके प्रति जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओंके कारण जिनके नेत्रोंकी देखनेकी शक्ति अवरुद्ध हो रही है भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.1।। संजय ने कहा -- इस प्रकार करुणा और विषाद से अभिभूत? अश्रुपूरित नेत्रों वाले आकुल अर्जुन से मधुसूदन ने यह वाक्य कहा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.1 तम् to him? तथा thus? कृपया with pity? आविष्टम् overcome? अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् with eyes filled with tears and agitated? विषीदन्तम् despondent? इदम् this? वाक्यम् speech? उवाच spoke? मघुसूदनः Madhusudana.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.1. Sanjaya said To him (Arjuna) who was thus possessed by compassion, whose eyes were confused and filled with tears and who was sinking in despondency, Madhusudana told this [following] sentence.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.1 Sanjaya then told how the Lord Shri Krishna, seeing Arjuna overwhelmed with compassion, his eyes dimmed with flowing tears and full of despondency, consoled him:

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.1 Sanjaya said To him, who was thus overcome with pity, whose eyes were wet with tears, who was sorrow-stricken and who bore a bewildered look Sri Krsna spoke as follows:

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.1 Sanjaya said To him who had been thus filled with pity, whose eyes were filled with tears and showed distress, and who was sorrowing, Madhusudana uttered these words:

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.1 Sanjaya said To him who was thus overcome with pity and who was despondent, with eyes full of tears and agitated, Madhusudana (the destroyer of Madhu) or Krishna spoke these words.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.1 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.1 - 2.3 Sanjaya said - Lord said When Arjuna thus sat, the Lord, opposing his action, said: 'What is the reason for your misplaced grief? Arise for battle, abandoning this grief, which has arisen in a critical situation, which can come only in men of wrong understanding, which is an obstacle for reaching heaven, which does not confer fame on you, which is very mean, and which is caused by faint-heartedness.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.1 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.1।। द्वितीय अध्याय का प्रारम्भ संजय के कथन से होता है जिसमें वह चुने हुये शब्दों से अर्जुन की विषादमयी मानसिक स्थिति का स्पष्ट चित्रण करता है। अर्जुन का मन करुणा और विषाद से भर गया है। इस युक्ति से स्पष्ट होता है कि अर्जुन परिस्थितियों का स्वामी न होकर स्वयं उनका शिकार हो गया था। इस प्रकार एक दुर्बल व्यक्ति ही परिस्थितियों का शिकार बनकर जीवन संघर्ष के प्रत्येक अवसर पर असफल होता है। अर्जुन अपनी नैराश्यपूर्ण अवस्था में इस समय ऐसी ही बाह्य परिस्थितियों का शिकार हो गया था। अर्जुन की विषादावस्था का वर्णन करने के साथ ही संजय हमें यह भी संकेत करता है कि उसका आन्तरिक व्यक्तित्व भग्न हो गया था और उसके चरित्र में गहरी दरार पड़ गयी थी। अपने समय का सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी होकर भी वह किसी सामान्य युवती के समान रुदन कर रहा थाइस प्रकार करुणा और शोक से अभिभूत एवं अश्रुरहित रोदन करते हुये अर्जुन से मधुसूदन (मधु नामक असुर का वध करने वाले) भगवान् श्रीकृष्ण ने निम्नलिखित वाक्य कहा। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अश्रुरहित रोदन को आधुनिक मनोविज्ञान मानसिक उद्विग्नता की चरम स्थिति मानता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.1।।एवं रथोपस्थ उपविष्टमर्जुनं भगवान्किमुक्तवानित्याकाङ्क्षायां संजय उवाच  तमिति।  यत्त्वहिंसा परमो धर्मो भिक्षाशनं चेत्येवं लक्षणया बुद्य्धा युद्धवैमुख्यामर्जुनस्य श्रुत्वा स्वपुत्राणां राज्यमप्रचलितमित्यवधार्य स्वस्थहृदयस्य धृतराष्ट्रस्य हर्षनिमित्तां ततः किं वृत्तिमित्याकाङ्क्षमपनिनीषुः संजय उवाचेति तत्तु पूर्वग्रन्थविरोधादुपेक्ष्यम्। तमर्जुनं तथा पूर्वोक्तेन प्रकारेण कृपया स्नेहजन्ययाऽऽविष्टं व्याप्तम्। अश्रुभिः पूर्णे आकुले दर्शनाक्षमे ईक्षणे नेत्रे यस्य तम्। विषादं बन्धुवियोगाशङ्कानिमित्तं शोकं प्राप्नुवन्तमिदं वक्ष्यमाणं वाक्यं वक्तुं योग्यं वचनामुवाच नतूपेक्षितवानित्यर्थः। मध्वादिदुष्टसूदनो भीमादिद्वारा दुर्योधनादिदुष्टसूदनायोवाचेति सूचयन्नाह  मधुसूदन इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.1।।अहिंसा परमो धर्मो भिक्षाशनं चेत्येवंलक्षणया बुद्ध्या युद्धवैमुख्यमर्जनस्य श्रुत्वा स्वपुत्राणां राज्यमप्रचलितमवधार्य स्वस्थहृदयस्य धृतराष्ट्रस्य हर्षनिमित्तां ततः किंवृत्तमित्याकाङ्क्षामपनिनीषुः संजयस्तं प्रत्युक्तवानित्याह वैशम्पायनः। कृपा ममैत इति व्यामोहनिमित्तः स्नेहविशेषः। तया स्वभावसिद्धया आविष्टं व्याप्तम्। अर्जुनस्य कर्मत्वं कृपायाश्च कर्तृत्वं वदता तस्या आगन्तुकत्वं व्युदस्तम्। अतएव विषीदन्तं स्नेहविषयीभूतस्वजनविच्छेदाशङ्कानिमित्तः शोकापरपर्यायश्चित्तव्याकुलीभावो विषादस्तं प्राप्नुवन्तम्। अत्र विषादस्य कर्मत्वेनार्जुनस्य कर्तृत्वेन च तस्यागन्तुकत्वं सूचितम्। अतएव कृपाविषादवशादश्रुभिः पूर्णे आकुले दर्शनाक्षमे चेक्षणे यस्य तम्। एवमश्रुपातव्याकुलीभावाख्यकार्यद्वयजनकतया परिपोषं गताभ्यां कृपाविषादाभ्यामुद्विग्नं तमर्जुनमिदं सोपपत्तिकं वक्ष्यमाणं वाक्यमुवाच नतूपेक्षितवान्। मधुसूदन इति स्वयं दुष्टनिग्रहकर्ताऽर्जुनं प्रत्यपि तथैव वक्ष्यतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.1।।अर्जुने युद्धादुपरते मत्पुत्रा निष्कण्टकं राज्यं प्राप्स्यन्तीत्याशावन्तं राजानं प्रति संजय उवाच  तं तथेति।  तमर्जुनम्। तथास्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव इत्युक्तप्रकारेण कृपया स्नेहेन न तु दयया परदुःखप्रहाणेच्छारूपया। तस्याः परदौर्बल्यनिश्चयोत्तरभाविन्याः अर्जुनेयदि वा नो जयेयुः इति स्वपराजयमाशङ्कमाने दुर्भणत्वात्यानेव हत्वा न जिजीविषामः इति स्नेहातिशयसूचकवाक्यशेषविरोधाच्च। आविष्टं व्याप्तम्। विषीदन्तंसीदन्ति मम गात्राणि इत्यादिना उक्तरूपं विषादं प्राप्नुवन्तम्। इदं वक्ष्यमाणं वाक्यं वचनीयं उवाच। मधुसूदन इति दुष्टहन्तृत्वादेवार्जुनं निमित्तीकृत्य त्वत्पुत्रानपि हनिष्यत्येवेति त्वया जयाशा न कार्येति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.1।।श्रीकृष्णाय नमः।।शोकसागरसम्मग्नं पार्थं स्वीयत्वभावतः। कृष्णः स्वसाङ्ख्ययोगाभ्यामुज्जहार दयापरः।।पूर्वाध्याये शोकसंविग्नमानसोऽर्जुनः सशरं चापमुत्सृज्योपाविशदित्युक्तम् ततः किं जातमित्याकांक्षायां सञ्जय आह तथेति। तमर्जुनमाविष्टं स्वस्मिन् अश्रुभिः पूर्णे आकुले ईक्षणे यस्य तं तथा विषीदन्तं पूर्वोक्तप्रकारेण खिद्यन्तं मधुसूदनः सर्वमारणसमर्थः कृपया इदं वाक्यमग्रे उच्यमानमुवाच।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.1।।ततः किं वृत्तमित्यपेक्षायां संजय उवाच     तं तथेति।  अश्रुभिः पूर्णे आकुले ईक्षणे यस्य तम्। तथोक्तप्रकारेण विषीदन्तमर्जुनं प्रति मधुसूदन इदं वाक्यमुवाच।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.1।।वैराग्यं प्रथमेऽध्याये पार्थदुःखमुदीरितम्। अधिकारी त्वतः सिद्धः साङ्ख्ययोगनिरूपणे।।1।।तौ विद्यापर्वरूपत्त्वाद्धरिवेशानुकारिणौ। आत्मस्वरूपविज्ञानस्थिरबुद्धिप्रयोजनौ।।2।।ततोंऽशत्वपरिस्फूर्त्या भवेदाश्रयणादरः। तदाश्रयवतः कार्यं तदाज्ञाधर्मपालनम्।।3।।अतस्तदाज्ञारूपेण युद्धादिकरणं मतम्। न पुष्टिमिश्रभक्तो हि साङ्ख्यमात्ररुचिर्भवेत्।।4।।मध्ये स्वधर्मवचनं यदुक्तं साङ्ख्ययोगयोः। तेन तद्धृदि पुष्टिस्थः प्रकारः सम्भविष्यति।।5।।द्वितीये पूर्वमध्याये विषादः साङ्ख्यमुच्यते। तत्र स्वधर्मो योगान्ते स्थिरबुद्धिप्रयोजनः।।6।।ततः किं कृतमित्यपेक्षायां पुनः सञ्जय उवाच तं तथेति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.1।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.1।। व्याख्या    तं तथा कृपयाविष्टम्   अर्जुन रथमें सारथिरूपसे बैठे हुए भगवान्को यह आज्ञा देते हैं कि हे अच्युत मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये जिससे मैं यह देख लूँ कि इस युद्धमें मेरे साथ दो हाथ करनेवाले कौन हैं अर्थात् मेरेजैसे शूरवीरके साथ कौनकौनसे योद्धा साहस करके लड़ने आये हैं अपनी मौत सामने दीखते हुए भी मेरे साथ लड़नेकी उनकी हिम्मत कैसे हुई इस प्रकार जिस अर्जुनमें युद्धके लिये इतना उत्साह था वीरता थी वे ही अर्जुन दोनों सेनाओंमें अपने कुटुम्बियोंको देखकर उनके मरनेकी आशंकासे मोहग्रस्त होकर इतने शोकाकुल हो गये हैं कि उनका शरीर शिथिल हो रहा है मुख सूख रहा है शरीरमें कँपकँपी आ रही है रोंगटे खड़े हो रहे हैं हाथसे धनुष गिर रहा है त्वचा जल रही है खड़े रहनेकी भी शक्ति नहीं रही है और मन भी भ्रमित हो रहा है। कहाँ तो अर्जुनका यह स्वभाव कि  न दैन्यं न पलायनम्  और कहाँ अर्जुनका कायरताके दोषसे शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ जाना बड़े आश्चर्यके साथ सञ्जय यही भाव उपर्युक्त पदोंसे प्रकट कर रहे हैं।पहले अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें भी सञ्जयने अर्जुनके लिये  कृपया परयाविष्टः  पदोंका प्रयोग किया है। अश्रुपूर्णाकुलेक्षणम्   अर्जुनजैसे महान् शूरवीरके भीतर भी कौटुम्बिक मोह छा गया और नेत्रोंमें आँसू भर आये आँसू भी इतने ज्यादा भर आये कि नेत्रोंसे पूरी तरह देख भी नहीं सकते। विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः   इस प्रकार कायरताके कारण विषाद करते हुए अर्जुनसे भगवान् मधुसूदनने ये (आगे दूसरेतीसरे श्लोकोंमें कहे जानेवाले) वचन कहे।यहाँ  विषीदन्तमुवाच  कहनेसे ही काम चल सकता था  इदं वाक्यम्  कहनेकी जरूरत ही नहीं थी क्योंकि  उवाच  क्रियाके अन्तर्गत ही  वाक्यम्  पद आ जाता है। फिर भी  वाक्यम्  पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान्का यह वचन यह वाणी बड़ी विलक्षण है। अर्जुनमें धर्मका बाना पहनकर जो कर्तव्यत्यागरूप बुराई आ गयी थी उसपर यह भगवद्वाणी सीधा आघात पहुँचानेवाली है। अर्जुनका युद्धसे उपराम होनेका जो निर्णय था उसमें खलबली मचा देनेवाली है। अर्जुनको अपने दोषका ज्ञान कराकर अपने कल्याणकी जिज्ञासा जाग्रत् करा देनेवाली है। इस गम्भीर अर्थवाली वाणीके प्रभावसे ही अर्जुन भगवान्का शिष्यत्व ग्रहण करके उनके शरण हो जाते हैं (2। 7)।सञ्जयके द्वारा  मधुसूदनः  पद कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् श्रीकृष्ण मधु नामक दैत्यको मारनेवाले अर्थात् दुष्ट स्वभाववालोंका संहार करनेवाले हैं। इसलिये वे दुष्ट स्वभाववाले दुर्योधनादिका नाश करवाये बिना रहेंगे नहीं। सम्बन्ध   भगवान्ने अर्जुनके प्रति कौनसे वचन कहे इसे आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.1।।No commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.1।।अहिंसा परमो धर्मो भिक्षाशनं चेत्येवंलक्षणया बुद्ध्या युद्धवैमुख्यमर्जुनस्य श्रुत्वा स्वपुत्राणां राज्यैश्वर्यमप्रचलितमवधार्य स्वस्थहृदयं धृतराष्ट्रं दृष्ट्वा तस्य दुराशामपनेष्यामीति मनीषया संजयस्तं प्रत्युक्तवानित्याह  संजय इति।  परमेश्वरेण स्मार्यमाणोऽपि कृत्याकृत्ये सहसा नार्जुनः सस्मार विपर्ययप्रयुक्तस्य शोकस्य दृढतरमोहहेतुत्वात्तथापि तं भगवान्नोपेक्षितवानित्याह  तं तथेति।  तं प्रकृतं पार्थं तथा स्वजनमरणप्रसङ्गदर्शनेन कृपया करुणयाविष्टमधिष्ठितमश्रुभिः पूर्णे समाकुले चेक्षणे यस्य तमश्रुव्याप्ततरलाक्षं विषीदन्तं शोचन्तमिदं वक्ष्यमाणं वाक्यं सोपपत्तिकं वचनं मधुनामानमसुरं सूदितवानिति मधुसूदनो भोगवानुक्तवान्नतु यथोक्तमर्जुनमुपेक्षितवानित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.1।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.1।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.1।।संजय उवाच श्रीभगवानुवाच एवम् उपविष्टे पार्थे कुतः अयम् अस्थाने समुत्थितः शोक इति आक्षिप्य तम् इमं विषमस्थं शोकम् अविद्वत्सेवितं परलोकविरोधिनम् अकीर्तिकरम् अतिक्षुद्रं हृदयदौर्बल्यकृतं परित्यज्य युद्धाय उत्तिष्ठ इति श्रीभगवान् उवाच।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.1 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.2 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् | अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | kutastvā kaśmalamidaṁ viṣame samupasthitam I anārya-juṣṭam asvargyam akīrti-karam arjuna ||

▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Lord says; kutaḥ: why; tvā: upon you; kaśmalam: delusion; idaṁ: this; viṣame: in this critical time; samupasthitam: arrived; anārya juṣṭam: unworthy of a noble soul; asvargyam: not leading to heaven; akīrtikaram: disgraceful; arjuna: O Arjuna

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.2 Bhagavān Kṛṣṇa says: Where from has this impurity, dejection descended on you at this critical time, Arjuna! You behave unlike a noble man and this will keep you away from realization.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.2।।श्रीभगवान् बोले (टिप्पणी प0 38.1) हे अर्जुन इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.2।। श्री भगवान् ने कहा -- हे अर्जुन तुमको इस विषम स्थल में यह मोह कहाँ से उत्पन्न हुआ यह आर्य आचरण के विपरीत न तो स्वर्ग प्राप्ति का साधन ही है और न कीर्ति कराने वाला ही है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.2 कुतः whence? त्वा upon thee? कश्मलम् dejection? इदम् this? विषमे in perilous strait? समुपस्थितम् comes? अनार्यजुष्टम् unworthy (unaryanlike)? अस्वर्ग्यम् heavenexcluding? अकीर्तिकरम् disgraceful? अर्जुन O Arjuna.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.2. The Bhagavat said O Arjuna ! At a critical moment, whence did this sinful act come to you which is practised by men of ignoble (low) birth and which is leading to the hell and is inglorious ?

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.2 "The Lord said: My beloved friend! Why yield, just on the eve of battle, to this weakness which does no credit to those who call themselves Aryans, and only brings them infamy and bars against them the gates of heaven?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.2 The Lord said Whence comes on you this despondency, O Arjuna, in this crisis? It is unift for a noble person. It is disgraceful and it obstructs one's attainment of heaven.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.2 The Blessed Lord said O Arjuna, in this perilous place, whence has come to you this impurity entertained by unenlightened persons, which does not lead to heaven and which brings infamy?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.2 The Blessed Lord said Whence is this perilous strait come upon thee, this dejection which is unworthy of you, disgraceful, and which will close the gates of heaven upon you, O Arjuna?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.2 Kutah etc. To commence with, the Bhagavat exhorts Arjuna just by following the worldly (common) practice; but, in due course, He will impart knowledge. Hence He says 'practised by men of low birth'. Uttering words of ruke such as 'unmanliness' etc., the Bhagavat causes [Arjuna] to know that he misconceives demerit as meritorious :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.1 - 2.3 Sanjaya said - Lord said When Arjuna thus sat, the Lord, opposing his action, said: 'What is the reason for your misplaced grief? Arise for battle, abandoning this grief, which has arisen in a critical situation, which can come only in men of wrong understanding, which is an obstacle for reaching heaven, which does not confer fame on you, which is very mean, and which is caused by faint-heartedness.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.2 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.2।। अपने आप को आर्य कहलाने वाले एक राजा को युद्धभूमि में इस प्रकार हतबुद्धि देखकर भगवान् को आश्चर्य हो रहा था। एक सच्चे आर्य अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष का स्वभाव तो यह होता है कि जीवन में आने वाली किसी भी परिस्थिति में अपने मनसंयम से विचलित न होकर उन परिस्थितियों का कुशलता से सामना करता है और उनको अपने अनुकूल बना लेता है। समुचित शैली में जीवन यापन करके अत्यन्त प्रतिकूल और विषम परिस्थितियों को भी आनन्ददायक सफलता में परिवर्तित किया जा सकता है। यह सब मनुष्य की बुद्धिमत्ता पर निर्भर है कि वह अपने आप को जीवन के उत्थानपतन में सही दिशा में किस प्रकार ले जाता है। यहाँ भगवान् अर्जुन के आचरण को अनार्य कहते हैं। आर्य पुरुष जीवन के उच्च आदर्शों पवित्रता और गरिमा के आह्वान के प्रति सदैव जागरूक और प्रयत्नशील रहते हैं ।अर्जुन की इस शोकाकुल अवस्था को देखकर श्रीकृष्ण को आश्चर्य इसलिये हो रहा था कि वे दीर्घ काल से अच्छी प्रकार जानते थे और इस प्रकार का शोकमोह अर्जुन के स्वभाव के सर्वथा विपरीत था। इसीलिये वे यहाँ कहते हैं तुमको इस विषमस्थल में৷৷.आदि।हिन्दुओं का यह विश्वास है कि क्षत्रिय कुल में जन्मे हुये व्यक्ति का कर्तव्य है धर्म के लिये युद्ध करना और इस प्रकार यदि उसे रणभूमि में प्राण त्यागना पड़े तो उस वीर को स्वर्ग की प्राप्ति होती है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.2।।   किं तद्वाक्यमित्यत आह श्रीभगवानिति। कुतो हेतोः त्वा त्वां शूरशिरोमणिमिदं स्वधर्मभूताद्युद्धात्पराङभुखत्वं कश्मलं मलिनं विषमेऽसमये समुपस्थितं संप्राप्तम्। यतोऽनार्यैर्दुष्टैर्जुष्टं सेवितमतएव दृष्टादृष्टफलरहितमित्याह। अस्वर्ग्यमकीर्तिकरमिति विशेषणद्वयेन स्वर्गानर्हं प्रत्यवायजनकत्वात्। अकीर्तिकरमयशस्यं किं मोक्षेच्छातः किंवा स्वर्गेच्छातः अथवा कीर्तिच्छातः इति किंशब्देनाक्षिप्यते। हेतुत्रयमपि निषेधयति। त्रिभिर्विशेषणैरुत्तरार्धेन। आर्यैर्मुमुक्षुभिर्न जुष्टमसेवितमिति केचित् न आर्यैर्जुष्टम्। यत्त्वार्यैरजुष्टमिति विग्रहो दर्शितस्तत्त्वर्थैक्येऽपि पदव्युत्क्रमदोषादुपेक्ष्यमित्यन्ये स्वधर्मयुद्धं कुर्वन्मलात्मकं पापं न प्राप्स्यसीति द्योतयन्नाह  अर्जुनेति।  अर्जुननाम्ना प्रख्यातस्य तव नैतद्युक्तमित्येके। हे अर्जुन स्वच्छस्वभाव तव नैतद्युक्तमिति भाव इत्यन्ये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.2।।तदेव भगवतो वाक्यमवतारयति श्रीभगवानुवाचेति।ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। वैराग्यस्याथ मोक्षस्य षण्णां भग इतीङ्गना।। समग्रस्येति प्रत्येकं संबन्धः। मोक्षस्येति तत्साधनस्य ज्ञानस्य। इङ्गना संज्ञा। एतादृशं समग्रमैश्वर्यादिकं नित्यमप्रतिबन्धेन यत्र वर्तते स भगवान्। नित्ययोगे मतुप्। तथा उत्पत्तिं च विनाशं च भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति।। अत्र भूतानामिति प्रत्येकं संबध्यते। उत्पत्तिविनाशशब्दौ तत्कारणस्याप्युपलक्षकौ। आगतिगती आगामिन्यौ संपदापदौ। एतादृशो भगवच्छब्दार्थः श्रीवासुदेव एव पर्यवसित इति तथोच्यते इदं स्वधर्मात्पराङ्मुखत्वं कृपाव्यामोहाश्रुपातादिपुरःसरं कश्मलं शिष्टगर्हितत्वेन मलिनं विषमे सभये स्थाने त्वा त्वां सर्वक्षत्रियप्रवरं कुतो हेतोः समुपस्थितं प्राप्तं किं मोक्षेच्छातः किंवा स्वर्गेच्छातः अथवा कीर्तीच्छात इति किंशब्देनाक्षिप्यते। हेतुत्रयमपि निषेधति त्रिभिर्विशेषणैरुत्तरार्धेन। आर्यैर्मुमुक्षुभिर्न जुष्टमसेवितम्।स्वधर्मैराशयशुद्धिद्वारा मोक्षमिच्छद्भिरपक्वकषायैर्मुमुक्षुभिः कथं स्वधर्मस्त्याज्य इत्यर्थः। संन्यासाधिकारी तु पक्वकषायोऽग्रे वक्ष्यते। अस्वर्ग्यं स्वर्गहेतुधर्मविरोधित्वान्न स्वर्गेच्छया सेव्यम्। अकीर्तिकरं कीर्त्यभावकरमपकीर्तिकरं वा न कीर्तीच्छया सेव्यम्। तथाच मोक्षकामैः स्वर्गकामैः कीर्तिकामैश्च वर्जनीयम्। तत्काम एव त्वं सेवस इत्यहो अनुचितचेष्टितं तवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.2।।अर्जुनमुद्योजयन् श्रीभगवानुवाच  कुत इति।  कश्मलं वैक्लव्यम्। विषमे युद्धसंकटे। अनार्यैर्भीरुभिर्जुष्टं सेवितं न तु त्वादृशैः शूरैः न आर्यैर्जुष्टमिति वा। यत्तु आर्यैरजुष्टमिति विग्रहो दर्शितस्तदर्थैक्येऽपि पदव्युत्क्रमदोषादुपेक्ष्यम्। अतएवास्वर्ग्यमकीर्तिकरं च। हे अर्जुन स्वच्छस्वभाव तव नैतद्युक्तमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.2।।भगवद्वाक्यमेवाह कुतस्त्वोमिति। विषमे असमयेअयं युद्धोत्साहसमयः नतु दयायाः इत्यस्मिन्समये हे अर्जुन त्वामिदं कश्मलं कुतः समुपस्थितं अयं तव मोहः कुतः प्राप्तः। स्वेच्छाज्ञानादस्य कश्मलत्वमुक्त भगवता। कश्मलं विशिनष्टि विशेषणत्रयेण अनार्यजुष्टं न विद्यते आर्यत्वं येषु तैः सेवितम् अस्वर्ग्यं न विद्यते स्वर्गो यस्मात् तेन धर्मप्रतिपक्षतोक्ता। अकीर्त्तिकरं कीर्तिनाशकं तेन क्षात्त्रधर्मनाशकत्वेन कुलधर्मप्रतिपक्षकत्वमुक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.2।।   तदेव वाक्यमाह। श्रीभगवानुवाच  कुत इति।  कुतो हेतोः त्वा इति त्वाम्। विषमे संकटे इदं कश्मलं समुपस्थितमयं मोहः प्राप्तः। यत आर्यैरसेवितम्। अस्वर्ग्यमधर्म्यमयशस्करं च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.2 2.3।।मोहमधुहन्ता वाक्यं वक्ष्यमाणमुवाच कुतस्त्वेति। विषमे सङ्कटे हे अर्जुन शुद्धस्वरूप कुत इदं च कश्मलं समुपस्थितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.2।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.2।। व्याख्या    अर्जुन   यह सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि तुम स्वच्छ निर्मल अन्तःकरणवाले हो। अतः तुम्हारे स्वभावमें कालुष्य कायरताका आना बिलकुल विरुद्ध बात है। फिर यह तुम्हारेमें कैसे आ गयी कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्   भगवान् आश्चर्य प्रकट करते हुए अर्जुनसे कहते हैं कि ऐसे युद्धके मौकेपर तो तुम्हारेमें शूरवीरता उत्साह आना चाहिये था पर इस बेमौकेपर तुम्हारेमें यह कायरता कहाँसे आ गयी आश्चर्य दो तरहसे होता है अपने न जाननेके कारण और दूसरेको चेतानेके लिए। भगवान्का यहाँ जो आश्चर्यपूर्वक बोलना है वह केवल अर्जुनको चेतानेके लिये ही है जिससे अर्जुनका ध्यान अपने कर्तव्यपर चला जाय। कुतः  कहनेका तात्पर्य यह है कि मूलमें यह कायरतारूपी दोष तुम्हारेमें (स्वयंमें) नहीं है। यह तो आगन्तुक दोष है जो सदा रहनेवाला नहीं है। समुपस्थितम्  कहनेका तात्पर्य है कि यह कायरता केवल तुम्हारे भावोंमें और वचनोंमें ही नहीं आयी है किन्तु तुम्हारी क्रियाओंमें भी आ गयी है। यह तुम्हारेपर अच्छी तरहसे छा गयी है जिसके कारण तुम धनुषबाण छोड़कर रथके मध्यभागमें बैठ गये हो। अनार्यजुष्टम्   (टिप्पणी प0 38.2)   समझदार श्रेष्ठ मनुष्योंमें जो भाव पैदा होते हैं वे अपने कल्याणके उद्देश्यको लेकर ही होते हैं। इसलिये श्लोकके उत्तरार्धमें भगवान् सबसे पहले उपर्युक्त पद देकर कहते हैं कि तुम्हारेमें जो कायरता आयी है उस कायरताको श्रेष्ठ पुरुष स्वीकार नहीं करते। कारण कि तुम्हारी इस कायरतामें अपने कल्याणकी बात बिलकुल नहीं है। कल्याण चाहनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंमें अपने कल्याणका ही उद्देश्य रखते हैं। उनमें अपने कर्तव्यके प्रति कायरता उत्पन्न नहीं होती। परिस्थितिके अनुसार उनको जो कर्तव्य प्राप्त हो जाता है उसको वे कल्याणप्राप्तिके उद्देश्यसे उत्साह और तत्परतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग करते हैं। वे तुम्हारेजैसे कायर होकर युद्धसे या अन्य किसी कर्तव्यकर्मसे उपरत नहीं होते। अतः युद्धरूपसे प्राप्त कर्तव्यकर्मसे उपरत होना तुम्हारे लिये कल्याणकारक नहीं है। अस्वर्ग्यम्   कल्याणकी बात सामने न रखकर अगर सांसारिक दृष्टिसे भी देखा जाय तो संसारमें स्वर्गलोग ऊँचा है। परन्तु तुम्हारी यह कायरता स्वर्गको देनेवाली भी नहीं है अर्थात् कायरतापूर्वक युद्धसे निवृत्त होनेका फल स्वर्गकी प्राप्ति भी नहीं हो सकता। अकीर्तिकरम्   अगर स्वर्गप्राप्तिका भी लक्ष्य न हो तो अच्छा माना जानेवाला पुरुष वही काम करता है जिससे संसारमें कीर्ति हो। परन्तु तुम्हारी यह जो कायरता है यह इस लोकमें भी कीर्ति (यश) देनेवाली नहीं है प्रत्युत अपकीर्ति (अपयश) देनेवाली है। अतः तुम्हारेमें कायरताका आना सर्वथा ही अनुचित है।भगवान्ने यहाँ  अनार्यजुष्टम् अस्वर्ग्यम्  और  अकीर्तिकरम्   ऐसा क्रम देकर तीन प्रकारके मनुष्य बताये हैं (1) जो विचारशील मनुष्य होते हैं वे केवल अपना कल्याण ही चाहते हैं। उनका ध्येय उद्देश्य केवल कल्याणका ही होता है। (2) जो पुण्यात्मा मनुष्य होते हैं वे शुभकर्मोंके द्वारा स्वर्गकी प्राप्ति चाहते हैं। वे स्वर्गको ही श्रेष्ठ मानकर उसकी प्राप्तिका ही उद्देश्य रखते हैं। (3) जो साधारण मनुष्य होते हैं वे संसारको ही आदर देते हैं। इसलिये वे संसारमें अपनी कीर्ति चाहते हैं और उस कीर्तिको ही अपना ध्येय मानते हैं।उपर्युक्त तीनों पद देकर भगवान् अर्जुनको सावधान करते हैं कि तुम्हारा जो यह युद्ध न करनेका निश्चय है यह विचारशील और पुण्यात्मा मनुष्योंके ध्येय कल्याण और स्वर्गको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है तथा साधारण मनुष्योंके ध्येय कीर्तिको प्राप्त करानेवाला भी नहीं है। अतः मोहके कारण तुम्हारा युद्ध न करनेका निश्चय बहुत ही तुच्छ है जो कि तुम्हारा पतन करनेवाला तुम्हें नरकोंमें ले जानेवाला और तुम्हारी अपकीर्ति करनेवाला होगा। सम्बन्ध   कायरता आनेके बाद अब क्या करें इस जिज्ञासाको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.2।।कुत इति। आदो लोकव्यवहाराश्रयेणैव भगवान् अर्जुनं प्रतिबोधयति। क्रमात्तु ज्ञानं करिष्यति इत्यतः अनार्यजुष्टमित्याह।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.2।।किं तद्वाक्यमित्यपेक्षायामाह  श्रीभगवानिति।  कुतो हेतोस्त्वा त्वां सर्वक्षत्रियप्रवरं कश्मलं मलिनं शिष्टगर्हितं युद्धात्पराङ्मुखत्वं विषमे समयस्थाने समुपस्थितं प्राप्तं अनार्यैः शास्त्रार्थमविद्वद्भिर्जुष्टं सेवितमस्वर्ग्यं स्वर्गानर्हं प्रत्यवायकारणमिह चाकीर्तिकरमयशस्करमर्जुननाम्ना प्रख्यातस्य तव नैतद्युक्तमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.2।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.2।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.2।।संजय उवाच श्रीभगवानुवाच एवम् उपविष्टे पार्थे कुतः अयम् अस्थाने समुत्थितः शोक इति आक्षिप्य तम् इमं विषमस्थं शोकम् अविद्वत्सेवितं परलोकविरोधिनम् अकीर्तिकरम् अतिक्षुद्रं हृदयदौर्बल्यकृतं परित्यज्य युद्धाय उत्तिष्ठ इति श्रीभगवान् उवाच।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.2 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.3 】

▸ Sanskrit Sloka: क्लैब्यं मा स्म गम: पार्थ नैतत्तवय्युपपद्यते | क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ||

▸ Transliteration: klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitattvayyupapadyate I kṣudraṁ hṛdayadaurbalyaṁ tyaktvottiṣṭha parantapa ||

▸ Glossary: klaibyaṁ: impotence; mā: do not; sma gamaḥ: yield; pārtha: son of Pritā; na: not; etat: this; tvayi: in you; upapadyate: is fitting; kṣudraṁ: mean; hṛdaya daurbalyaṁ: weakness of heart; tyaktvaa: after abandoning; uttiṣṭha: get up; paraṁtapa: O destroyer of enemies

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.3 Do not yield to fear, Pārtha! It does not befit you. Drop this powerlessness of the heart and stand up, O Parantapa, destroyer of enemies!

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.3।।हे पृथानन्दन अर्जुन इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.3।। हे पार्थ क्लीव (कायर) मत बनो। यह तुम्हारे लिये अशोभनीय है? हे परंतप हृदय की क्षुद्र दुर्बलता को त्यागकर खड़े हो जाओ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.3 क्लैब्यम् impotence? मा स्म गमः do not get? पार्थ O Partha? न not? एतत् this? त्वयि in thee? उपपद्यते is fitting? क्षुद्रम् mean? हृदयदौर्बल्यम् weakness of the heart? त्यक्त्वा having abandoned? उत्तिष्ठ stand up? परन्तप O scorcher of the foes.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.3. Stoop not to unmanliness, O son of Kunti ! It does not befit you. Shirking off the petty weakness of heart, arise, O scorcher of the foes !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.3 O Arjuna! Why give way to unmanliness? O thou who art the terror of thine enemies! Shake off such shameful effeminacy, make ready to act!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.3 Yield not to unmanliness, O Arjuna, it does not become you. Shake off this base faint-heartedness and arise, O scorcher of foes!

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.3 O Partha, yield not to unmanliness. This does not befit you. O scorcher of foes, arise, giving up the petty weakness of the heart.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.3 Yield not to impotence, O Arjuna, son of Pritha. It does not befit thee. Cast off this mean weakness of the heart! Stand up, O scorcher of the foes!

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.3 Sri Abhinavagupta did not comment upon this sloka.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.1 - 2.3 Sanjaya said - Lord said When Arjuna thus sat, the Lord, opposing his action, said: 'What is the reason for your misplaced grief? Arise for battle, abandoning this grief, which has arisen in a critical situation, which can come only in men of wrong understanding, which is an obstacle for reaching heaven, which does not confer fame on you, which is very mean, and which is caused by faint-heartedness.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.3।। भगवान् श्रीकृष्ण जो अब तक मौन खड़े थे अब प्रभावशाली शब्दों द्वारा शोकाकुल अर्जुन की कटु र्भत्सना करते हैं। उनके प्रत्येक शब्द का आघात कृपाण के समान तीक्ष्ण है जो किसी भी व्यक्ति को परास्त करने के लिये पर्याप्त है। क्लैब्य का अर्थ है नपुंसकता। यहाँ इस शब्द से तात्पर्य मन की उस स्थिति से है जिसमें व्यक्ति न तो एक पुरुष के समान परिस्थिति का सामना करने का साहस अपने में कर पाता है और न ही एक कोमल भावों वाली लज्जालु स्त्री के समान निराश होकर बैठा रह सकता है। आजकल की भाषा में किसी व्यक्ति के इस प्रकार के व्यवहार में उसके मित्र आश्चर्य प्रकट करते हुए कहते हैं कि यह आदमी स्त्री है या पुरुष अर्जुन की भी स्थित राजदरबार के उन नपुंसक व्यक्तियों के समान हो रही थी जो देखने में पुरुष जैसे होकर स्त्री वेष धारण करते थे। पुरुष के समान बोलते लेकिन मन में स्त्री जैसे भावुक होते शरीर से समर्थ किन्तु मन से दुर्बल रहते थे।अब तक श्रीकृष्ण मौन थे उनका गम्भीर मौन अर्थपूर्ण था। अर्जुन मोहावस्था में युद्ध न करने का निर्णय लेकर अपने पक्ष में अनेक तर्क भी प्रस्तुत कर रहा था। श्रीकृष्ण जानते थे कि पहले ऐसी स्थिति में अर्जुन का विरोध करना व्यर्थ था। परन्तु अब उसके नेत्रों में अश्रु देखकर वे समझ गये कि उसका संभ्रम अपनी चरम सीमा पर पहुँच गया है।भक्ति परम्परा में यह सही ही विश्वास किया जाता है कि जब तक हम अपने को बुद्धिमान समझकर तर्क करते रहते हैं तब तक भगवान् पूर्णतया मौन धारण किये हुए अनसुना करते रहते हैं किन्तु ज्ञान के अहंकार को त्यागकर और भक्ति भाव से विह्वल होकर अश्रुपूरित नेत्रों से उनकी शरण में चले जाने पर करुणासागर भगवान् अपने भक्त को अज्ञान के अंधकार से निकालकर ज्ञान के प्रकाश की ओर मार्गदर्शन करने के लिये उसके पास बिना बुलाये तुरन्त पहुँचते हैं। इस भावनापूर्ण स्थिति में जीव को ईश्वर के मार्गदर्शन और सहायता की आवश्यकता होती है।ईश्वर की कृपा को प्राप्त कर भक्त का अन्तकरण निर्मल होकर आनन्द से परिपूर्ण हो जाता है जो स्वप्रकाशस्वरूप चैतन्य के साक्षात् अनुभव के लिये अत्यन्त आवश्यक है। इस स्वीकृत तथ्य के अनुसार तथा जो भक्तों का भी अनुभव है गीता में हम देखते हैं कि जैसे ही भगवान ने बोलना प्रारम्भ किया वैसे ही विद्युत के समान उनके प्रज्ज्वलित शब्द अर्जुन के मन पर पड़े जिससे वह अपनी गलत धारणाओं के कारण अत्यन्त लज्जित हुआ।सहानुभूति के कोमल शब्द अर्जुन के निराश मन को उत्साहित नहीं कर सकते थे। अत व्यंग्य के अम्ल में डुबोये हुये तीक्ष्ण बाण के समान वचनों से अर्जुन को उत्तेजित करते हुये अंत में भगवान् कहते हैं उठो और कर्म करो।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.3।।एवं श्रुत्वापि क्लैब्यमत्यजन्तमर्जुनं पुनराह क्लैब्यमिति। क्लैब्यंदृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्णं इत्यादिना प्रदर्शितमधैर्यं मा स्म गमः मा गाः। नैवाङ्गीकुर्वित्यर्थः। यत एतत्क्लैब्यं त्वयि प्रथितप्रभावेऽर्जुने नोपपद्यते उपपन्नं न भवति। तस्मात्क्षुद्रं क्षुद्रताया लधुतायाः संपादकं हृदयस्य दौर्बल्यं दुर्बलभावं निर्वीर्यत्वं त्यक्त्वोत्तिष्ठ युद्धायोद्युक्तो भव। मत्पितृष्वसृपृथातनये त्वयि मत्स्वभाव उचित इति ध्वनयन्नाह  हे पार्थेति।  पृथया देवप्रसादलब्धे तत्तनयमात्रे त्वयि वीर्यातिशयस्य प्रसिद्धत्वात्। पृथातनयत्वेन त्वं क्लैब्यायोग्य इति केचित्। शत्रूंस्तापय न स्वजनान्स्वहितकर्तृ़निति कथयितुं परंतपेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.3।।ननु बन्धुसेनावेक्षणजातेनाधैर्येण धनुरपि धारयितुमशक्नुवता मया किं कर्तुं शक्यमित्यत आह क्लैब्यं क्लीबभावमधैर्यमोजस्तेजआदिभङ्गरूपं मा स्म गमः मा गाः। हे पार्थ पृथातनय पृथया देवप्रसादलब्धे तत्तनयमात्रे वीर्यातिशयस्य प्रसिद्धत्वात्पृथातनयत्वेन क्लैब्यायोग्य इत्यर्थः। अर्जुनत्वेनापि तदयोग्यत्वमाह नैतदिति। त्वय्यर्जुने साक्षान्महेश्वरेणापि सह कृताहवे प्रख्यातमहाप्रभावे नोपपद्यते न युज्यते। एतत्क्लैब्यमित्यसाधारण्येन तदयोग्यत्वनिर्देशः। ननुनच शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः इति पूर्वमेव मयोक्तभित्याशङ्क्याह क्षुद्रमिति। हृदयदौर्बल्यं मनसो भ्रमणादिरूपमधैर्यं क्षुद्रत्वकारणत्वात्क्षुद्रं सुनिरसनं वा त्यक्त्वा विवेकेनापनीय उत्तिष्ठ युद्धाय सज्जो भव। हे परंतप परं शत्रुं तापयतीति तथा संबोध्यते। हेतुगर्भम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.3।।तदेवाह  क्लैब्यमिति।  क्लैब्यं निर्वीर्यत्वंन च शक्नोम्यवस्थातुम् इत्युक्तरूपं मा गाः। नैतत् त्वयि महादेवप्रतिभटे युक्तम्। अतः क्षुद्रं तुच्छं हृदयकृतमेव तव दौर्बल्यं न तु शक्तिसहायाद्यभावकृतं तत्त्यक्त्वा उत्तिष्ठ युद्धाय। परंतप शत्रुतापन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.3।।अयं धर्मस्तव नोचित इत्याह हे पार्थ क्षत्ित्रयकुलोद्भव क्लैब्यं नपुंसकधर्मकातर्यं मा स्म गमः मा प्राप्नुहि। एतत् त्वयि न उपपद्यते। क्षुद्रं तुच्छं अक्षुद्रे न स्यात्। हे परन्तप शत्रुतापन हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वा उत्तिष्ठ सावधानो भव युद्धायेति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.3।।तस्मात्  क्लैब्यमिति।  हे पार्थ क्लैब्यं कातर्यं मा स्म गमः न प्राप्नुहि। यतस्त्वय्येतन्नोपपद्यते योग्यं न भवति। क्षुद्रं तुच्छं हृदयदौर्बल्यं कातर्यं त्यक्त्वा युद्धायोत्तिष्ठ। हे परन्तप शत्रुतापन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.2 2.3।।मोहमधुहन्ता वाक्यं वक्ष्यमाणमुवाच कुतस्त्वेति। विषमे सङ्कटे हे अर्जुन शुद्धस्वरूप कुत इदं च कश्मलं समुपस्थितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.3।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.3।। व्याख्या    पार्थ   (टिप्पणी प0 39.1)  माता पृथा(कुन्ती) के सन्देशकी याद दिलाकर अर्जुनके अन्तःकरणमें क्षत्रियोचित वीरताका भाव जाग्रत् करनेके लिये भगवान् अर्जुनको  पार्थ  नामसे सम्बोधित करते हैं   (टिप्पणी प0 39.2) । तात्पर्य है कि अपनेमें कायरता लाकर तुम्हें माताकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये।  क्लैब्यं मा स्म गमः   अर्जुन कायरताके कारण युद्ध करनेमें अधर्म और युद्ध न करनेमें धर्म मान रहे थे। अतः अर्जुनको चेतानेके लिये भगवान् कहते हैं कि युद्ध न करना धर्मकी बात नहीं है यह तो नपुंसकता (हिजड़ापन) है। इसलिये तुम इस नपुंसकताको छोड़ दो। नैतत्त्वय्युपपद्यते   तुम्हारेमें यह हिजड़ापन नहीं आना चाहिये था क्योंकि तुम कुन्तीजैसी वीर क्षत्राणी माताके पुत्र हो और स्वयं भी शूरवीर हो। तात्पर्य है कि जन्मसे और अपनी प्रकृतिसे भी यह नपुंसकता तुम्हारेमें सर्वथा अनुचित है। परंतप   तुम स्वयं  परंतप  हो अर्थात् शत्रुओंको तपानेवाले भगानेवाले हो तो क्या तुम इस समय युद्धसे विमुख होकर अपने शत्रुओंको हर्षित करोगे क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ   यहाँ  क्षुद्रम्  पदके दो अर्थ होते हैं (1) यह हृदयकी दुर्बलता तुच्छताको प्राप्त करानेवाली है अर्थात् मुक्ति स्वर्ग अथवा कीर्तिको देनेवाली नहीं है। अगर तुम इस तुच्छताका त्याग नहीं करोगे तो स्वयं तुच्छ हो जाओगे और (2) यह हृदयकी दुर्बलता तुच्छ चीज है। तुम्हारेजैसे शूरवीरके लिये ऐसी तुच्छ चीजका त्याग करना कोई कठिन काम नहीं है।तुम जो ऐसा मानते हो कि मैं धर्मात्मा हूँ और युद्धरूपी पाप नहीं करना चाहता तो यह तुम्हारे हृदयकी दुर्बलता है कमजोरी है। इसका त्याग करके तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ अर्थात् अपने प्राप्त कर्तव्यका पालन करो।यहाँ अर्जुनके सामने युद्धरूप कर्तव्यकर्म है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि उठो खड़े हो जाओ और युद्धरूप कर्तव्यका पालन करो। भगवान्के मनमें अर्जुनके कर्तव्यके विषयमें जरासा भी सन्देह नहीं है। वे जानते हैं कि सभी दृष्टियोंसे अर्जुनके लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है। अतः अर्जुनकी थोथी युक्तियोंकी परवाह न करके उनको अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये चट आज्ञा देते हैं कि पूरी तैयारीके साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हो जाओ। सम्बन्ध   पहले अध्यायमें अर्जुनने युद्ध न करनेके विषयमें बहुतसी युक्तियाँ (दलीलें) दी थीं। उन युक्तियोंका कुछ भी आदर न करके भगवान्ने एकाएक अर्जुनको कायरतारूप दोषके लिये जोरसे फटकारा और युद्धके लिये खड़े हो जानेकी आज्ञा दे दी। इस बातको लेकर अर्जुन भी अपनी युक्तियोंका समाधान न पाकर एकाएक उत्तेजित होकर बोल उठे

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.3।।No commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.3।।पुनरपि भगवार्जुनं प्रत्याह  क्लैब्यमिति।  क्लैब्यं क्लीबभावमधैर्यं मा स्म गमः मा गाः। हे पार्थ पृथातनय नहि त्वयि महेश्वरेणापि कृताहवे प्रख्यातपौरुषे महामहिमन्येतदुपपद्यते। क्षुद्रं क्षुद्रत्वकारणं हृदयदौर्बल्यं मनसो दुर्बलत्वमधैर्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ युद्धायोपक्रमं कुरु। हे परंतप परं शत्रुं तापयतीति तथा संबोध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.3।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.3।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.3।।संजय उवाच श्रीभगवानुवाच एवम् उपविष्टे पार्थे कुतः अयम् अस्थाने समुत्थितः शोक इति आक्षिप्य तम् इमं विषमस्थं शोकम् अविद्वत्सेवितं परलोकविरोधिनम् अकीर्तिकरम् अतिक्षुद्रं हृदयदौर्बल्यकृतं परित्यज्य युद्धाय उत्तिष्ठ इति श्रीभगवान् उवाच।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.3 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.4 】

▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन | इषुभि: प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ||

▸ Transliteration: arjuna uvāca | katham bhīṣmamahaṁ saṅkhye droṇaṁ ca madhusūdana I iṣubhiḥ pratiyotsyāmi pūjārhāvarisūdana ||

▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna said; katham: how; bhīṣmam: Bhīṣma; ahaṁ: I; saṁkhye: in battle; droṇaṁ: Droṇa; ca: also; madhusūdana: O killer of Madhu; iṣubhiḥ: with arrows; pratiyotsyāmi: shall counterattack; pūjārhāu: the two worthy of worship; arisūdana: O killer of the enemies

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.4 Arjuna said: O Madhusūdana (killer of Madhu), how can I oppose, in battle, Bhīṣma and Droṇa who are worthy of my worship?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.4।।अर्जुन बोले हे मधुसूदन मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ क्योंकि हे अरिसूदन ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.4।। अर्जुन ने कहा -- हे मधुसूदन मैं रणभूमि में किस प्रकार भीष्म और द्रोण के साथ बाणों से युद्ध करूँगा। हे अरिसूदन? वे दोनों ही पूजनीय हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.4 कथम् how? भीष्मम् Bhishma? अहम् I? संख्ये in battle? द्रोणम् Drona? च and? मधुसूदन O Madhusudana? इषुभिः with arrows? प्रतियोत्स्यामि shall fight? पूजार्हौ worthy to be worshipped? अरिसूदन O destroyer of enemies.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.4. Arjuna said How shall I with arrows fight in battle against Bhisma and Drona, both being worthy of reverence ? O slayer of Mandhu, O slayer of foes !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.4 Arjuna argued: My Lord! How can I, when the battle rages, send an arrow through Bheeshma and Drona, who should receive my reverence?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.4 Arjuna said How can I, O slayer of foes, aim arrows in battle against Bhisma and Drona who are worthy of reverence?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.4 Arjuna said O Madhusudana, O destroyer of enemies, how can I fight with arrows in battle against Bhisma and Drona who are worthy of adoration?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.4 Arjuna said How, O Madhusudana, shall I fight in battle with arrows against Bhishma and Drona, who are fit to be worshipped, O destroyer of enemies?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.4 See Comment under 2.6

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.4 - 2.5 Arjuna said Again Arjuna, being moved by love, compassion and fear, mistaking unrighteousness for righteousness,

Chapter 2 (Part 2)

and not understanding, i.e., not knowing the beneficial words of Sri Krsna, said as follows: 'How can I slay Bhisma, Drona and others worthy or reverence? After slaying those elders, though they are intensely attached to enjoyments, how can I enjoy those very pleasures which are now being enjoyed by them? For, it will be mixed with their blood.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.4 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.4।। अर्जुन का लक्ष्य भ्रष्ट करने वाला कायरतापूर्ण तर्क किसी अविवेकी को ही उचित प्रतीत हो सकता है। अर्जुन के ये तर्क उस व्यक्ति के लिये अर्थशून्य हैं जो मन के संयम को न खोकर परिस्थिति को ठीक प्रकार से समझता है। उसके लिये ऐसी परिस्थितियाँ कोई समस्या नहीं उत्पन्न करतीं। वास्तव में देखा जाय तो यह युद्ध दो व्यक्तियों के मध्य वैयत्तिक वैमनस्य के कारण नहीं हो रहा है। इस समय पाण्डव सैन्य से पृथक् अर्जुन का कोई अस्तित्व नहीं है और न ही भीष्म और द्रोण पृथक् अस्तित्व रखते हैं। वे कौरवों की सेना के ही अंग हैं। किन्हीं सिद्धान्तों के कारण ही ये दोनों सेनायें परस्पर युद्ध के लिये खड़ी हुई हैं। कौरव अधर्म की नीति को अपनाकर युद्ध के लिये तत्पर हैं तो दूसरी ओर पाण्डव हिन्दूशास्त्रों में प्रतिपादित धर्म नीति के लिये युद्धेक्षु हैं।धर्म के श्रेष्ठ पक्ष होने तथा दोनों सेनाओं द्वारा लोकमत की अभिव्यक्ति के कारण अर्जुन को व्यक्तिगत आदर या अनादर अनुभव करने का कोई अधिकार नहीं था और न ही उसे यह अधिकार था कि अधर्म के पक्षधरों में से किसी व्यक्ति विशेष को सम्मान या असम्मान देने के लिये वह आग्रह करे। इस दृष्टिकोण से सम्पूर्ण परिस्थिति को न देखकर अर्जुन स्वयं को एक प्रथक् व्यक्ति समझता है और उसी अहंकारपूर्ण दृष्टिकोण से सम्पूर्ण परिस्थिति को देखता है। अर्जुन अपने आप को द्रोण के शिष्य और भीष्म के पौत्र के रूप में देखता है जबकि गुरु द्रोण और पितामह भीष्म भी अर्जुन को देख रहे थे परन्तु उनके मन में इस प्रकार का कोई भाव नहीं आता है क्याेंकि उन्हांेने अपने व्यक्तित्व को भूलकर अपना सम्पूर्ण तादात्म्य कौरव पक्ष के साथ स्थापित कर लिया था। संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि अर्जुन का अहंकार ही उसकी मिथ्या धारणाओं और संभ्रम का कारण था।गीता के इस भाग पर मैंने देश के कई प्रसिद्ध व्यक्तियों के साथ विचार विमर्श किया और यह पाया कि वे अर्जुन के तर्क को उचित और न्यायपूर्ण मानते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि यह अत्यन्त सूक्ष्म विषय है जिसका निर्णय होना परम आवश्यक है। संभवत व्यास जी ने यह विचार किया हो कि भावी पीढ़ियों के दिशा निर्देश के लिये इस गुत्थी को हिन्दू तत्त्वज्ञान के द्वारा सुलझाया जाये। जितना ही अधिक होगा तादात्म्य छोटेसे मैं परिच्छिन्न अहंकार के साथ हमारी उतनी ही अधिक समस्यायॆं और संभ्रम हमारे जीवन में आयेंगे। जब यह अहं व्यापक होकर किसी सेना आदर्श राष्ट्र अथवा युग के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तो नैतिक दुर्बलता आदि का क्षय होने लगता है। पूर्ण नैतिक जीवन केवल वही व्यक्ति जी सकता है जिसने अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को पहचान लिया है जो एकमेव अद्वितीय सर्वव्यापी एवं समस्त नाम रूपों में व्याप्त है। आगे हम देखेंगे कि भगवान् श्रीकृष्ण इस सत्य का उपदेश अर्जुन के मानसिक रोग के निवारणार्थ उपचार के रूप में करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.4।।   ननु शत्रवस्तापनीया नतु गुरव इत्याशयेनाह  कथमिति।  भीष्मं पितामहं द्रोणं च धनुर्विद्याचार्यं गुरुं संख्ये संग्रामभूमौ इषुभिः सह कथं प्रतियोत्स्यामि प्रतीपो भूत्वा कथं करिष्यामि। यतः पूजार्हो पूजायोग्यौ भीष्मद्रोणौ। पुष्पादिभिः पूजार्हयोस्तयोरिषुभिर्हननं मया कथं कर्तव्यमित्यर्थः। मधुसूदनारिसूदनेति संबोधयंस्त्वमपि दुष्टानेव तापयसीत्यतो गुरु अदुष्टौ च भीष्मद्रोणौ जहीति प्रेरयितुं नार्हसीति सूचयति। मधुसूदनारिसूदनेति संबोधनद्वयं शोकव्याकुलत्वेन पूर्वापरपरामर्शवैकल्यात्। अतो न मधुसूदनेत्यस्यार्थस्य पुनरुक्तत्वदोष इति केचित्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.4।।ननु नायं स्वधर्मस्य त्यागः शोकमोहादिवशात् किंतु धर्मत्वाभावादधर्मत्वाच्चास्य युद्धस्य त्यागो मया क्रियत इति भगवदभिप्रायमप्रतिपद्यमानस्यार्जुनस्याभिप्रायमवतारयति भीष्मं पितामहं द्रोणं चाचार्यं संख्ये रणे इषुभिः सायकैः प्रतियोत्स्यामि प्रहरिष्यामि कथम्। न कथंचिदपीत्यर्थः। यतस्तौ पूजार्हौ कुसुमादिभिरर्चनयोग्यौ। पूजार्हाभ्यां सह क्रीडास्थानेऽपि वाचापि हर्षफलकमपि लीलायुद्धमनुचितं किं पुनर्युद्धभूमौ शरैः प्राणत्यागफलकं प्रहरणमित्यर्थः। मधुसूदनारिसूदनेति संबोधनद्वयं शोकव्याकुलत्वेन पूर्वापरपरामर्शवैकल्यात्। अतो न मधुसूदनारिसूदनेत्यस्यार्थस्य पुनरुक्तत्वं दोषः। युद्धमात्रमपि यत्र नोचितं दूरे तत्र वध इति प्रतियोत्स्यामीत्यनेन सूचितम्। अथवा पूजार्हौ कथं प्रतियोत्स्यामि। पूजार्हयोरेव विवरणं भीष्मं द्रोणं चेति। द्वौ ब्राह्मणौ भोजय देवदत्तं यज्ञदत्तं चेतिवत्संबन्धः। अयं भावः दुर्योधनादयो नापुरस्कृत्य भीष्मद्रोणौ युद्धाय सज्जीभवन्ति। तत्र ताभ्यां सह युद्धं न तावद्धर्मः पूजादिवदविहितत्वात्। नचायमनिषिद्धत्वादधर्मोऽपि न भवतीति वाच्यम्।गुरुं हुंकृत्य त्वंकृत्य इत्यादिना शब्दमात्रेणापि गुरुद्रोहो यदानिष्टफलत्वप्रदर्शनेन निषिद्धस्तदा किं वाच्यं ताभ्यां सह संग्रामस्याधर्मत्वे निषिद्धत्वे चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.4।।ननु शत्रवो वा स्वभावदुष्टा वा तापनीयाः न तु बान्धवाः साधवश्चेत्यर्जुन उवाच  कथमिति।  मधुसूदनारिसूदनेति संबोधयन् तवापि दुष्टानपि शत्रूनेव तापयतः पूजार्हौ अदुष्टौ गुरू च भीष्मद्रोणौ जहीति वक्तुमयुक्तमिति सूचयति। समानार्थकमिदं संबोधनद्वयं वक्तुः शोकेन विक्लवत्वान्न पौनरुक्त्यदोषावहमित्यन्ये। इषुभिरिति ताभ्यां सह वाचापि योद्धुमशक्यं किमुत बाणैरिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.4।।एवमुत्तोलकभगवद्वाक्यं श्रुत्वाअहं कातर्येण युद्धान्नापक्रान्तः किन्तु धर्मबुद्ध्या इत्यर्जुनो भगवन्तं विज्ञापयामास कथमित्यादिषड्भिः। हे मधुसूदन मधुदैत्यमारणेन मथुरास्थापनेन भक्तपरिपालक अहं सङ्ख्ये सङ्ग्रामे भीष्मं द्रोणं च इषुभिः शरैः कथं प्रतियोत्स्यामि प्रतिकूलतया योत्स्यामीत्यर्थः। भीष्मस्य भक्तत्वान्मरणमनुचितं द्रोणस्यापि गुरुत्वात्तथेति द्रोणं चेत्यनेन ज्ञापितम्। भीष्मद्रोणौ च पूजार्हौ पूर्वोक्तप्रकारेण। हे अरिसूदन शत्रुमारक अनेन सम्बोधनेनैतौ भक्तद्विजौ नतु शत्रू ततः कथं मारणार्थं मां प्रवर्त्तयसीति ज्ञापितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.4।।नाहं कातर्येण शुद्धादुपरतोऽस्मि किंतु युद्धस्यान्याय्यत्वादित्यर्जुन उवाच  कथमिति।  भीष्मद्रोणौ पूजायामर्हौ योग्यौ तौ प्रति कथमहं योत्स्यामि। तत्रापीषुभिः। यत्र वाचापि योत्स्यामीति वक्तुमनुचितं तत्र बाणैः कथं योत्स्यामीत्यर्थः। हे अरिसूदन शत्रुसूदन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.4।।इति श्रुत्वाऽर्जुनः स्नेहकारुण्यधर्माकुलो भगवद्वाक्यं सम्यगजानन्नाह कथमिति। अरिसूदनेति शत्रुमारणे त्वयाऽपि क्वचिन्नैवं कृतमिति सम्बोधयति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.4।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.4।। व्याख्या    मधुसूदन  और  अरिसूदन   ये दो सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि आप दैत्योंको और शत्रुओंको मारनेवाले हैं अर्थात् जो दुष्ट स्वभाववाले अधर्ममय आचरण करनेवाले और दुनियाको कष्ट देनेवाले मधुकैटभ आदि दैत्य हैं उनको भी आपने मारा है और जो बिना कारण द्वेष रखते हैं अनिष्ट करते हैं ऐसे शत्रुओंको भी आपने मारा है। परन्तु मेरे सामने तो पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण खड़े हैं जो आचरणोंमें सर्वथा श्रेष्ठ हैं मेरेपर अत्यधिक स्नेह रखनेवाले हैं और प्यारपूर्वक मेरेको शिक्षा देनेवाले हैं। ऐसे मेरे परम हितैषी दादाजी और विद्यागुरुको मैं कैसे मारूँ  कथं (टिप्पणी प0 40)   भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च   मैं कायरताके कारण युद्धसे विमुख नहीं हो रहा हूँ प्रत्युत धर्मको देखकर युद्धसे विमुख हो रहा हूँ परन्तु आप कह रहे हैं कि यह कायरता यह नपुंसकता तुम्हारेमें कहाँसे आ गयी आप जरा सोचें कि मैं पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ महाराज यह मेरी कायरता नहीं है। कायरता तो तब कही जाय जब मैं मरनेसे डरूँ। मैं मरनेसे नहीं डर रहा हूँ प्रत्युत मारनेसे डर रहा हूँ।संसारमें दो ही तरहके सम्बन्ध मुख्य हैं जन्मसम्बन्ध और विद्यासम्बन्ध। जन्मके सम्बन्धसे तो पितामह भीष्म हमारे पूजनीय हैं। बचपनसे ही मैं उनकी गोदमें पला हूँ। बचपनमें जब मैं उनको पिताजीपिताजी कहता तब वे प्यारसे कहते कि मैं तो तेरे पिताका भी पिता हूँ इस तरह वे मेरेपर बड़ा ही प्यार स्नेह रखते आये हैं। विद्याके सम्बन्धसे आचार्य द्रोण हमारे पूजनीय हैं। वे मेरे विद्यागुरु हैं। उनका मेरेपर इतना स्नेह है कि उन्होंने खास अपने पुत्र अश्वत्थामाको भी मेरे समान नहीं पढ़ाया। उन्होंने ब्रह्मास्त्रको चलाना तो दोनोंको सिखाया पर ब्रह्मास्त्रका उपसंहार करना मेरेको ही सिखाया अपने पुत्रको नहीं। उन्होंने मेरेको यह वरदान भी दिया है कि मेरे शिष्योंमें अस्त्रशस्त्रकलामें तुम्हारेसे बढ़कर दूसरा कोई नहीं होगा। ऐसे पूजनीय पितामह भीष्म और आचार्य द्रोणके सामने तो वाणीसे रे तू ऐसा कहना भी उनकी हत्या करनेके समान पाप है फिर मारनेकी इच्छासे उनके साथ बाणोंसे युद्ध करना कितने भारी पापकी बात है इषुभिः प्रति योत्स्यामि पूजार्हौ   सम्बन्धमें बड़े होनेके नाते पितामह भीष्म और आचार्य द्रोण ये दोनों ही आदरणीय और पूजनीय हैं। इनका मेरेपर पूरा अधिकार है। अतः ये तो मेरेपर प्रहार कर सकते हैं पर मैं उनपर बाणोंसे कैसे प्रहार करूँ उनका प्रतिद्वन्द्वी होकर युद्ध करना तो मेरे लिये बड़े पापकी बात है क्योंकि ये दोनों ही मेरेद्वारा सेवा करनेयोग्य हैं और सेवासे भी बढ़कर पूजा करनेयोग्य हैं। ऐसे पूज्यजनोंको मैं बाणोंसे कैसे मारूँ सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें अर्जुनने उत्तेजित होकर भगवान्से अपना निर्णय कह दिया। अब भगवद्वाणीका असर होनेपर अर्जुन अपने और भगवान्के निर्णयका सन्तुलन करके कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.4 2.6।।क्लैव्यादिभिर्निर्भर्त्सनमभिदधत् अधर्मे तव धर्माभिमानोऽयम् (N K (n) omit अयम् S omits the entire sentence) इत्यादि दर्शयति कथमित्यादि। कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च इत्यादिना भुञ्जीय भोगान् इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानं फलविशेषानुसन्धानं च हेयतया पूर्वपक्षे ( N omit पूर्वपक्षे) सूचयति। नैतद्विद्मः इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानमाह। निरनुसन्धानं (S K निरभिसन्धानं) तावत् कर्म नोपपद्यते। न च पराजयमभिसन्धाय युद्धे प्रवर्तते। जयोऽपि नश्चायमनर्थ (S k omit नः) एव। तदाह अहत्वा गुरून् भैक्षमपि चर्तुं श्रेयः। एतच्च निश्चेतुमशक्यं किं जयं कांक्षामः किं वा पराजयम् जयेऽपि बन्धूनां विनाशात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.4।।एवं भगवता प्रतिबोध्यमानोऽपि शोकाभिभूतचेतस्त्वादप्रतिबुध्यमानः सन्नर्जुनः स्वाभिप्रायमेव प्रकृतं भगवन्तं प्रत्युक्तवान्  कथमित्यादिना।  भीष्मं पितामहं द्रोणं चाचार्यं संख्ये रणे हे मधुसूदन इषुभिर्यत्र वाचापि योत्स्यामीति वक्तुमनुचितं तत्र कथं बाणैर्योत्स्ये इति भावः। सायकैस्तौ कथं प्रतियोत्स्यामि प्रतियोत्स्ये तौ हि पूजार्हौ कुसुमादिभिरर्चनयोग्यौ हे अरिसूदन सर्वानेवारीनयत्नेन सूदितवानिति भगवानेवं संबोध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.4।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.4।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.4।।अर्जुन उवाच पुनरपि पार्थः स्नेहकारुण्यधर्माधर्मभयाकुलो भगवदुक्तं हिततमम् अजानन् इदम् उवाच। भीष्मद्रोणादिकान् बहुमन्तव्यान् गुरून् कथम् अहं हनिष्यामि कथन्तरां भोगेष्वतिमात्रसक्तान् तान् हत्वा तैः भुज्यमानान् तान् एव भोगान् तद्रुधिरेण उपसिच्य तेषु आसनेषु उपविश्य भुञ्जीय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.4 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.5 】

▸ Sanskrit Sloka: गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके | हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुञ्जीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान् ||

▸ Transliteration: gurūnahatvā hi mahānubhāvān śreyo bhoktuṁ bhaikṣyam apīha loke I hatvārtha-kāmāṁs tu gurūnihaiva bhuñjīya bhogān rudhira-pradigdhān ||

▸ Glossary: gurūn: the elders; ahatvā: not having killed; hi: indeed; mahānubhāvān: great souls; śreyah: it is better; bhoktuṁ: to enjoy life; bhaikṣyam: begging; api: even; iha: in this life; loke: in this world; hatvā: after killing; arthakāmān: wealth and enjoyment; tu: but; gurūn: elders; iha: in this world; eva: only; bhuñjīya: has to enjoy; bhogān: enjoyable things; rudhira: blood; pradigdhān: tainted with

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.5 I would rather beg for my food in this world than kill the most noble of teachers. If I kill them, all my enjoyment of wealth and desires will be stained with blood.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.5।।महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ। गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.5।। इन महानुभाव गुरुजनों को मारने से इस लोक में भिक्षा का अन्न भी ग्रहण करना अधिक कल्याण कारक है? क्योंकि गुरुजनों को मारकर मैं इस लोक में रक्तरंजित अर्थ और काम रूप भोगों को ही भोगूँगा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.5 गुरून् the Gurus (teachers)? अहत्वा instead of slaying? हि indeed? महानुभावान् most noble? श्रेयः better? भोक्तुम् to eat? भैक्ष्यम् alms? अपि even? इह here? लोके in the world? हत्वा having slain? अर्थकामान् desirous of wealth? तु indeed? गुरून् Gurus? इह here? एव also? भुञ्जीय enjoy? भोगान् enjoyments? रुधिरप्रदिग्धान् stained with blood.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.5. It is good indeed even to go about begging in this world without killing the elders of great dignity; but with greed for wealth, I would not enjoy, by killing my elders, the blood-stained objects of pleasures.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.5 Rather would I content myself with a beggar's crust that kill these teachers of mine, these precious noble souls! To slay these masters who are my benefactors would be to stain the sweetness of life's pleasures with their blood.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.5 It is better even to live on a beggar's fare in this world than to slay these most venerable teachers. If I should slay my teachers, though degraded they be by desire for wealth, I would be enjoying only blood-stained pleasures here.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.5 Rather than killing the noble-minded elders, it is better in this world to live even on alms. But by killing the elders we shall only be enjoying here the pleasures of wealth and desireable things drenched in blood.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.5 Better it is, indeed, in this world to accept alms than to slay the most noble teachers. But if I kill them, even in this world all my enjoyments of wealth and fulfilled desires will be stained with (their) blood.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.5 See Comment under 2.6

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.4 - 2.5 Arjuna said Again Arjuna, being moved by love, compassion and fear, mistaking unrighteousness for righteousness, and not understanding, i.e., not knowing the beneficial words of Sri Krsna, said as follows: 'How can I slay Bhisma, Drona and others worthy or reverence? After slaying those elders, though they are intensely attached to enjoyments, how can I enjoy those very pleasures which are now being enjoyed by them? For, it will be mixed with their blood.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.5 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.5।। अत्यन्त उच्च प्रतीत होने वाले परन्तु वास्तव में अर्थशून्य तर्क अर्जुन पुन प्रस्तुत करता है क्योंकि स्वयं को न समझने के कारण वह अपनी समस्या को भी नहीं समझ पाया है।यहाँ उसने अपने गुरुओं अर्थात् भीष्म और द्रोण को महानुभाव कहा है जिसका अर्थ है अपने युग के आदर्श पुरुष। अपनी संस्कृति में जो कुछ उच्च और श्रेष्ठ है उसके वे प्रतीक स्वरूप हैं जिन्होंने विशाल और उदार अन्तकरण से सनातन धर्म के लिये अनेक प्रकार के त्याग किये। अपनी संस्कृति के ऐसे श्रेष्ठ आदर्श युगपुरुषों का नाश केवल व्यक्तिगत शक्ति एवं पदलिप्सा के लिये करना किसी प्रकार उचित नहीं प्रतीत होता है। केवल वह युग विशेष ही नहीं बल्कि इन महापुरुषों के अमूल्य जीवनोच्छेद होने से भावी पीढ़ियाँ भी दरिद्र हो जायेंगी।अर्जुन कहता है कि संस्कृति के उपवन के सुन्दरतम् सुमनों को विनष्ट करने का विचार त्याग कर पाण्डवों के लिये भिक्षान्न पर जीवन यापन करना अधिक उचित होगा। इन गुरुजनों को मारकर प्राप्त किये गये राज्य का उपभोग भी वह नहीं कर सकेगा क्योंकि वे सब उनकी कटु स्मृतियों और मूल्यवान रक्त से सने होंगे जिनको विस्मृत कर पाना कठिन होगा।एक बार यदि हम परिस्थिति का त्रुटिपूर्ण आकलन कर लेते हैं तो भावनाओं के कारण हमारी बुद्धि पर आवरण पड़ जाता है और तब हम भी जीवन में अर्जुन के समान व्यवहार करने लगते हैं। इसका स्पष्ट संकेत व्यास जी द्वारा इस घटना में किये गये विस्तृत वर्णन में देखने को मिलता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.5।।एवं तर्हि राज्यालाभेन भोगाभावे भिक्षाटनं कर्तव्यं भविष्यतीत्याशङ्कामिष्टापत्त्या परिहरति  गुरुनिति।  गुरुन्भीष्मद्रोणादीन्महानुभावानहत्वाहिंसित्वा इहास्िमँल्लोके भैक्षमपि भिक्षया लब्धमन्नं क्षत्रियस्य निषिद्धमपि भोक्तुमशितुं श्रेयः प्रशस्यम्। गुरुहिंसावर्जनार्थस्य भिक्षाशनस्य प्रत्यवायाजनकत्वात्। गुर्वहननेन नरकाभावं महानतिप्रसिद्धोऽनुभावः प्रभावो येषामिति विशेषणेनापकीर्त्यभावं च गुणमुक्त्वा हनने दोषमाह  हत्वेति।  महानुभावानित्यस्यात्रापि संबन्धः। गुरुन्महानुभावान्हत्वा भोगानर्थकामानिहैव भुञ्जीय नतु परलोके इहापि रुधिरप्रदिग्धान्। अपकीर्तिव्याप्तत्वेनात्यन्तजुगुप्सितानित्यर्थः। अर्थकामानिति गुरुविशेषणम्। तथाचार्थतृष्णाकुलत्वेनैते तावद्युद्धान्न निवर्तेरन् तस्मादेतद्वधः प्रसज्येतैवेत्यर्थः। तथाचोक्तं भीष्मेणअर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।। इत्यपरे। केचित्तु ननुगुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधायते।। इति स्मृतेस्तेषां युद्धगर्वेणावलिप्तानामन्यायराज्यग्रहणेन शिष्यद्रोहेण च कार्याकार्यविवेकशून्यानामुत्पथनिष्ठानां च वधएव श्रेयानित्याशङ्क्याह  गुरुनिति।  महान् श्रुताध्ययनादिनिबन्धनः प्रभावो येषां तान्। तथाच कालकामादयोऽपि यैर्वशीकृतास्तेषां पुण्यातिशायिनां नावलिप्तत्वादिक्षुद्रपाप्मसंश्लेष इत्यर्थः। हिमहानुभावानित्येकं वा पदम्। हिमं जाड्यमपहन्तीति हिमहा आदित्योऽग्निर्वा तस्येवानुभावः सामर्थ्यं येषां तान्। तथाचातितेजस्वित्वात्तेषामवलिप्तत्वादिदोषो नास्त्येवधर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा।। इत्युक्तेरिति वर्णयन्ति तत्रैतदीयोत्थापनोक्तस्मृतौ अवलिप्तत्वादिदोषप्रयुक्तत्यागविधानेन वधानुत्त्या तच्छ्रेयस्त्वस्य दूरापास्तत्वमस्ति नवेति विद्वद्भिर्विचार्यम्। किंच यत्तु ननु पदार्थलुब्धाः सन्तो युद्धे प्रवृत्तास्तदैषां विक्रीतात्मनां कुतस्त्यं पूर्वोक्तं माहात्म्यम्। तथाचोक्तं भीष्मेण युधिष्ठिरं प्रतिअर्थस्य पुरुषो दासः इत्यादीत्याशङ्क्याहहत्वेतीत्युत्तरार्धं तैरवतारितं तत्राप्येतन्मूलकावलिप्तत्वादिदोषाणां तैरेव तदीयातिप्रसिद्धमहानुभावत्वातितेजस्वित्ववर्णनेन समाहितत्वात्पुनरीदृक्शङ्काया उत्थानमस्ति नवेति विचारणीयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.5।।ननु भीष्मद्रोणयोः पूजार्हत्वं गुरुत्वेनैव एवमन्येषामपि कृपादीनां। नच तेषां गुरुत्वेन स्वीकारः सांप्रतमुचितःगुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः। उत्पथप्रतिपन्नस्य परित्यागो विधीयते।। इति स्मृतेः। तस्मादेषां युद्धगर्वेणावलिप्तानामन्यायराज्यग्रहणेन शिष्यद्रोहेण च कार्याकार्यविवेकशून्यानामुत्पथनिष्ठानां वधएव श्रेयानित्याशङ्क्याह गुरूनहत्वा परलोकस्तावदस्त्येव अस्मिंस्तु लोके तैर्हृतराज्यानां नो नृपादीनां निषिद्धं भैक्षमपि भोक्तुं श्रेयः प्रशस्यतरमुचितं नतु तद्वधेन राज्यमपि श्रेय इति धर्मेऽपि युद्धे वृत्तिमात्रफलत्वं गृहीत्वा पापमारोप्य ब्रूते नत्ववलिप्तत्वादिना तेषां गुरुत्वाभाव उक्त इत्याशङ्क्याह महानुभावानिति। महाननुभावः श्रुताध्ययनतपआचारादिनिबन्धनः प्रभावो येषां तान्। तथाच कालकामादयोऽपि यैर्वशीकृतास्तेषां पुण्यातिशयशालिनां नावलिप्तत्वादिक्षुद्रपाप्मसंश्लेष इत्यर्थः। हिमहानुभावानित्येकं वा पदम्। हिमं जाड्यमप्नहन्तीति हिमहा आदित्योऽग्निर्वा तस्येवानुभावः सामर्थ्यं येषां तान्। तथाचातितेजस्वित्वात्तेषामवलिप्तत्वादिदोषो नास्त्येवधर्मव्यतिक्रमो दृष्ट ईश्वराणां च साहसम्। तेजीयसां न दोषाय वह्नेः सर्वभुजो यथा।। इत्युक्तेः। ननु यदार्थलुब्धाः सन्तो युद्धे प्रवृत्तास्तदैषां विक्रीतात्मनां कुतस्त्यं पूर्वोक्तं माहात्म्यम्। तथाचोक्तं भीष्मेण युधिष्ठिरंप्रतिअर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।। इत्याशड्क्याह हत्वेति। अर्थलुब्धा अपि ते मदपेक्षया गुरवो भवन्त्येवेति पुनर्गुरुग्रहणेनोक्तम्। तुशब्दोऽप्यर्थे। ईदृशानपि गुरून्हत्वा भोगानेव भुञ्जीय नतु मोक्षं लभेय। भुज्यन्त इति भोगा विषयाः। कर्मणि घञ्। ते च भोगा इहैव न परलोके। इहापि च रुधिरप्रदिग्धा इव अपयशोव्याप्तत्वेनात्यन्तजुगुप्सिता इत्यर्थः। यदेहाप्येवं तदा परलोकदुःखं कियद्वर्णनीयमिति भावः। अथवा गुरून्हत्वार्थकामात्मकान्भोगानेव भुञ्जीय नतु धर्ममोक्षावित्यर्थकामपदस्य भोगविशेषणतया व्याख्यानान्तरं द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.5।।ननु युद्धोद्यतानां गुरूणामपि वधः श्रेयानित्याशङ्क्याह  गुरूनिति।  यद्यपि त्वदुक्तं प्रशस्तमेव तथापि महानुभावान् गुरूनहत्वा भैक्षमेव भोक्तुं श्रेयः प्रशस्ततरम्। एवं तर्हि गुरूंस्त्यक्त्वा दुर्योधनादीनेव दुष्टान् जहीत्याशङ्क्याह  अर्थकामानिति।  धनार्थिनो गुरवोऽवश्यं दुर्योधनसाहाय्यं करिष्यन्ति तेन तद्वधोऽपि प्रसक्त एवेत्यर्थः। तुशब्दः पक्षान्तरोपन्यासार्थः। इहैव न तु परलोके। भुञ्जीयेति संप्रश्ने लिङ्। गुरूनहत्वा भैक्षं श्रेयः उत हत्वा भोगसंपादनं श्रेय इति संप्रश्ने स्वयमेवान्त्यपक्षे दूषणमाह  रुधिरप्रदिग्धानिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.5।।गुरूणां मारणा द्रि৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ क्षाटनं श्रेयः न तु तन्मारणेन राज्यभोग इत्याह गुरूनिति। गुरून्भीष्मद्रोणादीन् अहत्वा इह लोके भैक्षं भिक्षान्नमपि भोक्तुं श्रेयः श्रेयोरूपमित्यर्थः। यतस्ते महानुभावाः महतो भगवतोऽनुभावका इत्यर्थः। इह लोके तथा भोगेन परलोके सुखं स्यादितीह लोकपदेन ज्ञापितम्। एतेषां मारणेन तु परलोक एव दुःखं भविष्यतीति न किन्त्विह लोक एव नरकादिसमं दुःखं भविष्यतीत्याह हत्वेति। अर्थकामान् अर्थात्मकान् गुरून् हत्वा तु इहैव रुधिरप्रदिग्धान् रुधिरावलिप्तान् भोगान् भुञ्जीय अश्नीयाम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.5।।तर्हि तव देहयात्रापि न स्यादिति चेत्तत्राह  गुरूनिति।  गुरून्द्रोणादीनहत्वा परलोकविरुद्धो गुरुवधस्तमकृत्वा इह लोके भिक्षान्नमपि भोक्तुं श्रेयः उचितम्। विपक्षे तु न केवलं परत्र दुःखं इहैव तु नरकदुःखमनुभवेयमित्याह  हत्वेति।  गुरून्हत्वा इहैव तु रुधिरेण प्रदिग्धान्प्रकर्षेण लिप्तानर्थकामात्मकान्भोगानहं भुञ्जीय अश्नीयाम्। यद्वा अर्थकामानिति गुरूणां विशेषणम्। अर्थतृष्णाकुलत्वादेते तावद्युद्धान्न निवर्तेरन्। तस्मादेतद्वधः प्रसज्येतैवेत्यर्थः। तथाच युधिष्ठिरं प्रति भीष्मेणोक्तम्अर्थस्य पुरुषो दासो दासस्त्वर्थो न कस्यचित्। इति सत्यं महाराज बद्धोऽस्म्यर्थेन कौरवैः।। इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.5।।अतो गुर्वादिहननं लोकवेदविरुद्धमित्याह गुरूनिति। महानुभावान्गुरूनहत्वा भैक्ष्यं भिक्षालब्धमन्नं भोक्तुं सन्न्यासिनेव लोके श्रेष्ठम्। तान् रुधिरप्रदिग्धान्भोगानहं भुञ्जीयेति हि काकुः। नैतद्युक्तमिति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.5।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.5।। व्याख्या   इस श्लोकसे ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरेतीसरे श्लोकोंमें भगवान्के कहे हुए वचन अब अर्जुनके भीतर असर कर रहे हैं। इससे अर्जुनके मनमें यह विचार आ रहा है कि भीष्म द्रोण आदि गुरुजनोंको मारना धर्मयुक्त नहीं है ऐसा जानते हुए भी भगवान् मुझे बिना किसी सन्देहके युद्धके लिये आज्ञा दे रहे हैं तो कहींनकहीं मेरी समझमें ही गलती है इसलिये अर्जुन अब पूर्वश्लोककी तरह उत्तेजित होकर नहीं बोलते प्रत्युत कुछ ढिलाईसे बोलते हैं। गुरुनहत्वा ৷৷. भैक्ष्यमपीह लोके   अब अर्जुन पहले अपने पक्षको सामने रखते हुए कहते हैं कि अगर मैं भीष्म द्रोण आदि पूज्यजनोंके साथ युद्ध नहीं करूँगा तो दुर्योधन भी अकेला मेरे साथ युद्ध नहीं करेगा। इस तरह युद्ध न होनेसे मेरेको राज्य नहीं मिलेगा जिससे मेरेको दुःख पाना पड़ेगा। मेरा जीवननिर्वाह भी कठिनतासे होगा। यहाँतक कि क्षत्रियके लिये निषिद्ध जो भिक्षावृत्ति है उसको ही जीवननिर्वाहके लिये ग्रहण करना पड़ सकता है। परन्तु गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा मैं उस कष्टदायक भिक्षावृत्तिको भी ग्रहण करना श्रेष्ठ मानता हूँ। इह लोके  कहनेका तात्पर्य है कि यद्यपि भिक्षा माँगकर खानेसे इस संसारमें मेरा अपमानतिरस्कार होगा लोग मेरी निन्दा करेंगे तथापि गुरुजनोंको मारनेकी अपेक्षा भिक्षा माँगना श्रेष्ठ है। अपि  कहनेका तात्पर्य है कि मेरे लिये गुरुजनोंको मारना भी निषिद्ध है और भिक्षा माँगना भी निषिद्ध है परन्तु इन दोनोंमें भी गुरुजनोंको मारना मुझे अधिक निषिद्ध दीखता है। हत्वार्थकामांस्तु ৷৷. रुधिरप्रदिग्धान्   अब अर्जुन भगवान्के वचनोंकी तरफ दृष्टि करते हुए कहते हैं कि अगर मैं आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ तो युद्धमें गुरुजनोंकी हत्याके परिणाममें मैं उनके खूनसे सने हुए और जिनमें धन आदिकी कामना ही मुख्य है ऐसे भोगोंको ही तो भोगूँगा। मेरेको भोग ही तो मिलेंगे। उन भोगोंके मिलनेसे मुक्ति थोड़े ही होगी शान्ति थोड़े ही मिलेगीयहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि भीष्म द्रोण आदि गुरुजन धनके द्वारा ही कौरवोंसे बँधे थे अतः यहाँ  अर्थकामान्  पदको  गुरुन्  पदका विशेषण मान लिया जाय तो क्या आपत्ति है इसका उत्तर यह है कि अर्थकी कामनावाले गुरुजन ऐसा अर्थ करना उचित नहीं है। कारण कि पितामह भीष्म आचार्य द्रोण आदि गुरुजन धनकी कामनावाले नहीं थे। वे तो दुर्योधनके वृत्तिभोगी थे उन्होंने दुर्योधनका अन्न खाया था। अतः युद्धके समय दुर्योधनका साथ छो़ड़ना कर्तव्य न समझकर ही वे कौरवोंके पक्षमें खड़े हुए थे।दूसरी बात अर्जुनने भीष्म द्रोण आदिके लिये  महानुभावान्  पदका प्रयोग किया है। अतः ऐसे श्रेष्ठ भाववालोंको अर्थकी कामनावाले कैसे कहा जा सकता है तात्पर्य है कि जो महानुभाव हैं वे अर्थकी कामनावाले नहीं हो सकते और जो अर्थकी कामनावाले हैं वे महानुभाव नहीं हो सकते। अतः यहाँ  अर्थकामान्  पद  भोगान्  पदका ही विशेषण हो सकता है। विशेष बात भगवान्ने दूसरेतीसरे श्लोकोंमें अर्जुनके कल्याणकी दृष्टिसे ही उन्हें कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़ा होनेकी आज्ञा दी थी। परन्तु अर्जुन उलटा ही समझे अर्थात् वे समझे कि भगवान् राज्यका भोग करनेकी दृष्टिसे ही युद्धकी आज्ञा देते हैं।  (टिप्पणी प0 42)  पहले तो अर्जुनका युद्ध न करनेका एक ही पक्ष था जिससे वे धनुषबाण छोड़कर और शोकाविष्ट होकर रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (1। 47)। परंतु युद्ध करनेका पक्ष तो भगवान्के कहनेसे ही हुआ है। तात्पर्य है कि अर्जुनका भाव था कि हमलोग तो धर्मको जानते हैं पर दुर्योधन आदि धर्मको नहीं जानते इसलिये वे धन राज्य आदिके लोभसे युद्ध करनेके लिये तैयार खड़े हैं। अब वही बात अर्जुन यहाँ अपने लिये कहते हैं कि अगर मैं भी आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध करूँ तो परिणाममें गुरुजनोंके रक्तसे सने हुए धन राज्य आदिको ही तो प्राप्त करूँगा इस तरह अर्जुनको युद्ध करनेमें बुराईहीबुराई दिखायी दे रही है।जो बुराई बुराईके रूपमें आती है उसको मिटाना बड़ा सुगम होता है। परन्तु जो बुराई अच्छाईके रूपमें आती है उसको मिटाना बड़ा कठिन होता है जैसे सीताजीके सामने रावण और हनुमान्जीके सामने कालनेमि राक्षस आये तो उनको सीताजी और हनुमान्जी पहचान नहीं सके क्योंकि उन दोनोंका वेश साधुओंका था। अर्जुनकी मान्यतामें युद्धरूप कर्तव्यकर्म करना बुराई है और युद्ध न करना भलाई है अर्थात् अर्जुनके मनमें धर्म (हिंसात्याग) रूप भलाईके वेशमें कर्तव्यत्यागरूप बुराई आयी है। उनको कर्तव्यत्यागरूप बुराई बुराईके रूपमें नहीं दीख रही है क्योंकि उनके भीतर शरीरोंको लेकर मोह है। अतः इस बुराईको मिटानेमें भगवान्को भी बड़ा जोर पड़ रहा है और समय लग रहा है।आजकल समाजमें एकताके बहाने वर्णआश्रमकी मर्यादाको मिटानेकी कोशिश की जा रही है तो यह बुराई एकतारूप अच्छाईके वेशमें आनेसे बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। अतः वर्णआश्रमकी मर्यादा मिटनेसे परिणाममें लोगोंका कितना पतन होगा लोगोंमें कितना आसुरभाव आयेगा इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती। ऐसे ही धनके बहाने लोग झूठ कपट बेईमानी ठगी विश्वासघात आदिआदि दोषोंको भी दोषरूपसे नहीं जानते। यहाँ अर्जुनमें धर्मके रूपमें बुराई आयी है कि हम भीष्म द्रोण आदि महानुभावोंको कैसे मार सकते हैं क्योंकि हम धर्मको जाननेवाले हैं। तात्पर्य है कि अर्जुनने जिसको अच्छाई माना है वह वास्तवमें बुराई ही है परन्तु उसमें मान्यता अच्छाईकी होनेसे वह बुराईरूपसे नहीं दीख रही है। सम्बन्ध   भगवान्के वचनोंमें ऐसी विलक्षणता है कि वे अर्जुनके भीतर अपना प्रभाव डालते जा रहे हैं जिससे अर्जुनको अपने युद्ध न करनेके निर्णयमें अधिक सन्देह होता जा रहा है। ऐसी अवस्थाको प्राप्त हुए अर्जुन कहते हैं ।।2.3।। व्याख्या    पार्थ   (टिप्पणी प0 39.1)  माता पृथा(कुन्ती) के सन्देशकी याद दिलाकर अर्जुनके अन्तःकरणमें क्षत्रियोचित वीरताका भाव जाग्रत् करनेके लिये भगवान् अर्जुनको  पार्थ  नामसे सम्बोधित करते हैं   (टिप्पणी प0 39.2) । तात्पर्य है कि अपनेमें कायरता लाकर तुम्हें माताकी आज्ञाका उल्लंघन नहीं करना चाहिये।  क्लैब्यं मा स्म गमः   अर्जुन कायरताके कारण युद्ध करनेमें अधर्म और युद्ध न करनेमें धर्म मान रहे थे। अतः अर्जुनको चेतानेके लिये भगवान् कहते हैं कि युद्ध न करना धर्मकी बात नहीं है यह तो नपुंसकता (हिजड़ापन) है। इसलिये तुम इस नपुंसकताको छोड़ दो। नैतत्त्वय्युपपद्यते   तुम्हारेमें यह हिजड़ापन नहीं आना चाहिये था क्योंकि तुम कुन्तीजैसी वीर क्षत्राणी माताके पुत्र हो और स्वयं भी शूरवीर हो। तात्पर्य है कि जन्मसे और अपनी प्रकृतिसे भी यह नपुंसकता तुम्हारेमें सर्वथा अनुचित है। परंतप   तुम स्वयं  परंतप  हो अर्थात् शत्रुओंको तपानेवाले भगानेवाले हो तो क्या तुम इस समय युद्धसे विमुख होकर अपने शत्रुओंको हर्षित करोगे क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ   यहाँ  क्षुद्रम्  पदके दो अर्थ होते हैं (1) यह हृदयकी दुर्बलता तुच्छताको प्राप्त करानेवाली है अर्थात् मुक्ति स्वर्ग अथवा कीर्तिको देनेवाली नहीं है। अगर तुम इस तुच्छताका त्याग नहीं करोगे तो स्वयं तुच्छ हो जाओगे और (2) यह हृदयकी दुर्बलता तुच्छ चीज है। तुम्हारेजैसे शूरवीरके लिये ऐसी तुच्छ चीजका त्याग करना कोई कठिन काम नहीं है।तुम जो ऐसा मानते हो कि मैं धर्मात्मा हूँ और युद्धरूपी पाप नहीं करना चाहता तो यह तुम्हारे हृदयकी दुर्बलता है कमजोरी है। इसका त्याग करके तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ अर्थात् अपने प्राप्त कर्तव्यका पालन करो।यहाँ अर्जुनके सामने युद्धरूप कर्तव्यकर्म है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि उठो खड़े हो जाओ और युद्धरूप कर्तव्यका पालन करो। भगवान्के मनमें अर्जुनके कर्तव्यके विषयमें जरासा भी सन्देह नहीं है। वे जानते हैं कि सभी दृष्टियोंसे अर्जुनके लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है। अतः अर्जुनकी थोथी युक्तियोंकी परवाह न करके उनको अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये चट आज्ञा देते हैं कि पूरी तैयारीके साथ युद्ध करनेके लिये खड़े हो जाओ। सम्बन्ध   पहले अध्यायमें अर्जुनने युद्ध न करनेके विषयमें बहुतसी युक्तियाँ (दलीलें) दी थीं। उन युक्तियोंका कुछ भी आदर न करके भगवान्ने एकाएक अर्जुनको कायरतारूप दोषके लिये जोरसे फटकारा और युद्धके लिये खड़े हो जानेकी आज्ञा दे दी। इस बातको लेकर अर्जुन भी अपनी युक्तियोंका समाधान न पाकर एकाएक उत्तेजित होकर बोल उठे

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.4 2.6।।क्लैव्यादिभिर्निर्भर्त्सनमभिदधत् अधर्मे तव धर्माभिमानोऽयम् (N K (n) omit अयम् S omits the entire sentence) इत्यादि दर्शयति कथमित्यादि। कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च इत्यादिना भुञ्जीय भोगान् इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानं फलविशेषानुसन्धानं च हेयतया पूर्वपक्षे ( N omit पूर्वपक्षे) सूचयति। नैतद्विद्मः इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानमाह। निरनुसन्धानं (S K निरभिसन्धानं) तावत् कर्म नोपपद्यते। न च पराजयमभिसन्धाय युद्धे प्रवर्तते। जयोऽपि नश्चायमनर्थ (S k omit नः) एव। तदाह अहत्वा गुरून् भैक्षमपि चर्तुं श्रेयः। एतच्च निश्चेतुमशक्यं किं जयं कांक्षामः किं वा पराजयम् जयेऽपि बन्धूनां विनाशात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.5।।राज्ञां धर्मेऽपि युद्धे गुर्वादिवधे वृत्तिमात्रफलत्वं गृहीत्वा पापमारोप्य ब्रूते  गुरूनिति।  गुरून्भीष्मद्रोणादीन्भ्रात्रादींश्चात्र प्राप्तानहिंसित्वा महानुभावान्महामाहात्म्याञ्श्रुताध्ययनसंपन्नान् श्रेयः प्रशस्यतरं युक्तं भोक्तुमभ्यवहर्तुं भैक्षं भिक्षाणां समूहः भिक्षाशनं नृपादीनां निषिद्धमपीह लोके व्यवहारभूमौ। नहि गुर्वादिहिंसया राज्यभोगोऽपेक्ष्यते। किञ्च हत्वा गुर्वादीनर्थकामानेव भुञ्जीय न मोक्षमनुभवेयमिहैव भोगो न स्वर्गे। अर्थकामानेव विशिनष्टि  भोगानिति।  भुज्यन्त इति भोगास्तान्रुधिरप्रदिग्धांल्लोहितलिप्तानिवात्यन्तगर्हितान् अतोभोगान्गुरुवधादिसाध्यान्परित्यज्य भिक्षाशनमेव युक्तमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.5।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.5।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.5।।अर्जुन उवाच पुनरपि पार्थः स्नेहकारुण्यधर्माधर्मभयाकुलो भगवदुक्तं हिततमम् अजानन् इदम् उवाच। भीष्मद्रोणादिकान् बहुमन्तव्यान् गुरून् कथम् अहं हनिष्यामि कथन्तरां भोगेष्वतिमात्रसक्तान् तान् हत्वा तैः भुज्यमानान् तान् एव भोगान् तद्रुधिरेण उपसिच्य तेषु आसनेषु उपविश्य भुञ्जीय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.5 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.6 】

▸ Sanskrit Sloka: न चैतद्विद्म: कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयु: | यानेव हत्वा न जिजीविषाम स्तेऽवस्थिता: प्रमुखे धार्तराष्ट्रा: ||

▸ Transliteration: na caitadvidmaḥ kataranno garīyo yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ | yān eva hatvā na jijīviṣāmas te’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣṭrāḥ ||

▸ Glossary: na: nor; cha: also; etat: this; vidmaḥ: do know; katarat: which; naḥ: us; garīyah:

better; yat: what; vā: either; jayema: shall conquer; yadi: if; vā: or; naḥ: us; jay- eyuḥ: shall conquer; yān: those whom; eva: only; hatvā: after killing; na: never;

jijīviṣāmaḥ: want to live; te: all of them; avasthitāḥ: assembled; pramukhe: in front of; dhārtarāṣṭrāḥ: the sons of Dhṛtarāṣṭra

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.6 I cannot say which is better; their defeating us or us de- feating them. We do not wish to live after slaying the sons of

Dhṛtarāṣṭra who stand before us.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.6।।हम यह भी नहीं जानते कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना और न करना इन दोनोंमेंसे कौनसा अत्यन्त श्रेष्ठ है और हमें इसका भी पता नहीं है कि हम उन्हें जीतेंगे अथवा वे हमें जीतेंगे। जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.6।। हम नहीं जानते कि हमें क्या करना उचित है। हम यह भी नहीं जानते कि हम जीतेंगे? या वे हमको जीतेंगे? जिनको मारकर हम जीवित नहीं रहना चाहते वे ही धृतराष्ट्र के पुत्र हमारे सामने युद्ध के लिए खड़े हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.6 न not? च and? एतत् this? विद्मः (we) know? कतरत् which? नः for us? गरीयः better? यत् that? वा or? जयेम we should coner? यदि if? वा or? नः us? जयेयुः they should coner? यान् whom? एव even? हत्वा having slain? न not? जिजीविषामः we wish to live? ते those? अवस्थिताः (are) standing? प्रमुखे in face? धार्तराष्ट्राः sons of Dhritarashtra.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.6. Whether we should coner [in the battle], or they should coner us-we do not know this viz., 'which [of those two] is better for us'. [For], having killed whom, we would not wish to live at all, the same persons stand before us as Dhrtarastra's men.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.6 Nor can I say whether it were better that they conquer me or for me to conquer them, since would no longer care to live if I killed these sons of Dhritarashtra, now preparing for fight.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.6 We do not know, which of the two is better for us - whether our vanishing them, or their vanishing us. The very sons of Dhrtarastra, whom, if we slay, we should not wish to live, even they are standing in array against us.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.6 We do not know this as well as to which is the better for us, (and) whether we shall win, or whether they shall coner us. Those very sons of Dhrtarastra, by killing whom we do not wish to live, stand in confrontation.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.6 I can hardly tell which will be better, that we should coner them or that they should coner us. Even the sons of Dhritarashtra, after slaying whom we do not wish to live, stand facing us.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.4-6 Katham etc. upto Dhartarastrah. By the portion Bhisma and Drona in war' etc., and by the portion 'I would [not] enjoy the objects of pleasure', the Sage indicates that in Arjuna's objection, the intention for a particular act and the intention for a particular result are the points deserving rejection. By the portion 'We do not know this' etc., he speaks of the intention for a particular action. For, without intention no action is possible. Certainly one does not proceed on a war with an intention of getting defeated. '[In the present war] even our victory would be surely our misfortune.' This he says by the portion 'It is good even to go about begging without killing the elders'. It is also impossible to conclude 'Whether we desire victory or defeat'; for even in the case of our victory our relatives would perish totally.'

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.6 - 2.8 If you say, 'After beginning the war, if we withdraw from the battle, the sons of Dhrtarastra will slay us all forcibly', be it so. I think that even to be killed by them, who do not know the difference between righteousness and unrighteousness, is better for us than gaining unrighteous victory by killing them. After saying so, Arjuna surrendered himself at the feet of the Lord, overcome with dejection, saying. 'Teach me, your disciple, who has taken refuge in you, what is good for me.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.6 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.6।। इसके पूर्व के दो श्लोक निसन्देह अर्जुन के मन की व्याकुलता और भ्रमित स्थिति का संकेत करते हैं। इस श्लोक में बताया जा रहा है कि अर्जुन के मन के संभ्रम का प्रभाव उसकी विवेक बुद्धि पर भी पड़ा है। शत्रुओं की सेना को देखकर उसके मन में एक समस्या उत्पन्न हुई जिसके समाधान के लिये उसे बौद्धिक विवेक शक्ति के मार्गदर्शन की आवश्यकता थी परन्तु अहंकार और युद्ध के परिणाम के सम्बन्ध में अत्यधिक चिन्तातुर होने के कारण उसका मन बुद्धि से वियुक्त हो चुका था। इस कारण ही अर्जुन के मन और बुद्धि के बीच एक गहरी खाई उत्पन्न हो गयी थी।किसी कार्यालय के कुशल लिपिक की भांति हमारा मन ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों को ग्रहण कर उनको एक व्यवस्थित रूप में बुद्धि के समक्ष निर्णय के लिये प्रस्तुत करता है। बुद्धि अपने पूर्व अनुभवों के आधार पर निर्णय देती है जिसे मन कमेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत में व्यक्त करता है। हमारी जाग्रत अवस्था के प्रत्येक क्षण यह समस्त कार्यकलाप होता रहता है।जहाँ पर इन उपाधियों का कार्य सुचारु रूप से एक संगठित दल अथवा व्यक्तियों की भाँति नहीं होता वहाँ वह व्यक्ति अन्दर से अस्तव्यस्त हो जाता है और जीवन में आने वाली परिस्थितियों का सफलतापूर्वक सामना करने में सक्षम नहीं हो पाता। जब ज्ञान के द्वारा पुन मन और बुद्धि में संयोजन आ जाता है तब वही व्यक्ति कुशलतापूर्वक अपना कार्य करने में समर्थ हो जाता है।अर्जुन की निर्णयात्मिका शक्ति पर बाह्य परिस्थितियों का प्रभाव नहीं था बल्कि अपनी मानसिक विह्वलता के कारण वह अपने आप को कोई निर्णय देने में असमर्थ पा रहा था। वह यह नहीं निश्चय कर पा रहा था कि युद्ध में उसे विजयी होना चाहिये अथवा कौरवों को जिताना चाहिये। व्यास जी यहाँ दर्शाते हैं कि इस मोह का प्रभाव न केवल अर्जुन के मन पर बल्कि उसकी बुद्धि पर भी पड़ा था।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.6।।   नन्वहननस्य श्रेयस्त्वे निश्चिते किमर्थं शोचसीति चेत्तत्राह  नेति।  नोऽस्माकं किं भैक्ष्यं गरीयः श्रेष्ठं हिंसाशून्यत्वादुत युद्धं स्वधर्मत्वादित्येतन्न विद्मः। इदमेव श्रेय इति न जानीमः। ननु पक्षद्वययोरपि समबलत्वे युद्धमेव कुतो नाङ्गीकरोषीत्याशङक्य स्वबुद्य्धा तु तत्र दोषं पश्यामीत्याह  यद्वेति।  यद्वा वयं जयेम यदि वा नोऽस्मांस्ते जयेयुरिति न विद्मः जये सत्यपि दोष इत्याह  यानिति।  यानेव हत्वा हिंसित्वा न जिजीविषामो जीवितुं नेच्छामस्ते धार्तराष्ट्राः धृतराष्ट्रसंबन्धिनः प्रमुखे संमुखेऽवस्थितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.6।।ननु भिक्षाशनस्य क्षत्रियं प्रति निषिद्धत्वाद्युद्धस्य च विहितत्वात्स्वधर्मत्वेन युद्धमेव तव श्रेयस्करमित्याशङ्क्याह एतदपि न जानीमो भैक्षयुद्धयोर्मध्ये कतरन्नोऽस्माकं गरीयः श्रेष्ठं किं भैक्षं हिंसाशून्यत्वात् उत युद्धं स्वधर्मत्वादिति इदं च न विद्मः। आरब्धेऽपि युद्धे यद्वा वयं जयेमातिशयीमहि यदि वा नोऽस्माञ्जयेयुर्धार्तराष्ट्राः। उभयोः साम्यपक्षोऽप्यर्थाद्बोद्धव्यः। किंच जातोऽपि जयो नः फलतः पराजय एव यतो यान्बन्धून्हत्वा जीवितुमपि वयं नेच्छामः किं पुनर्विषयानुपभोक्तुं त एवावस्थिताः संमुखे धार्तराष्ट्राः धृतराष्ट्रसंबन्धिनो भीष्मद्रोणादयः सर्वेऽपि। तस्माद्भैक्षाद्युद्धस्य श्रेष्ठत्वं न सिद्धमित्यर्थः। तदेवं प्राक्तनेन ग्रन्थेन संसारदोषनिरूपणादधिकारिविशेषणान्युक्तानि। तत्रनच श्रेयोऽनु पश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे इत्यत्र रणे हतस्य परिव्राट्समानयोगक्षेमत्वोक्तेःअन्यच्छ्रेयोऽन्यदुतैव प्रेयः इत्यादिश्रुतिसिद्धं श्रेयो मोक्षाख्यमुपन्यस्तम्। अर्थाच्च तदितरदश्रेय इति नित्यानित्यवस्तुविवेको दर्शितःन काङ्क्षे विजयं कृष्ण इत्यत्रैहिकफलविरागःअपि त्रैलोक्यराजस्य हेतोः

Chapter 2 (Part 3)

इत्यत्र पारलौकिकफलविरागःनरके नियतं वासः इत्यत्र स्थूलदेहातिरिक्त आत्माकिं नो राज्येन इति व्याख्यातवर्त्मना शमःकिं भोगैः इति दमःयद्यप्येते न पश्यन्ति इत्यत्र निर्लोभतातन्मे क्षेमतरं भवेत् इत्यत्र तितिक्षा इति प्रथमाध्यायस्यार्थः स संन्याससाधनसूचनम् अस्मिंस्त्वध्यायेश्रेयो भोक्तुं भैक्षमपि इत्यत्र भिक्षाचर्योपलक्षितः सन्यासः प्रतिपादितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.6।।एवं तर्हि भैक्षमेव तव श्रेय इत्याशङ्क्याह  न चैतदिति।  यद्यप्यक्षत्रियस्य भैक्षमेवेष्टं तथापि नः अस्माकं क्षत्रियाणां भैक्षभोगयोर्मध्ये कतरत् गरीय इति वयं न विद्मः। ननूक्तं युद्धमेव गरीय इति तत्राह  यद्वेति।  यदि वा वयं जयेम शत्रून् यदि वा नोऽस्मान् शत्रव एव जयेयुः इदमपि न विद्मः। अन्त्यपक्षे पुनर्मरणमप्रार्थितं भैक्षमेव वापद्यत इति भावः। ननु मयि सहाये सति तव जय एव निश्चित इत्यत आह  यानेवेति।  इष्टनाशाज्जयोऽपि पराजयरूप एवेत्यर्थः। यत्तु निश्चितेऽपि भैक्षश्रेयस्त्वे पुनर्युद्धभैक्षयोः कतरत् श्रेय इति संशयो नोचितः अतो नः अस्माकं मध्ये कतरत् सैन्यं गरीय इति व्याख्येयमिति। तदसत्। धर्मसंमूढचेता इति वाक्यशेषादुक्तसंशयस्यैवोचितत्वात् सैन्यगरीयस्त्वसंशयेनैव जयसंशयेऽन्यथासिद्धेऽन्यतरसंशयस्य वैयर्थ्यात् विशेषाध्याहारदोषाच्च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.6।।किञ्च अधर्माङ्गीकारेणापि तथा कर्त्तव्यं यद्यस्मज्जय एवेत्यस्माकं हि तज्ज्ञानं निश्चितं स्यादित्याह न चैतदिति। वयमेतच्च न विद्मः यद्वयोर्मध्ये कतरत् नोऽस्माकं गरीयः श्रेष्ठमधिकं भवति यद्वयं तान् जयेम यदि वा एते नोऽस्मान् जयेयुः जेष्यन्ति। अस्मद्विचारेण त्वस्माकं जयादपि तेषामेव जयो गरीयस्त्वेन भातीत्याह यानेवेति। यान् हत्वा वयं न जिजीविषामो न तु जीवितुमिच्छामस्त एवैते धार्त्तराष्ट्राः पितृव्यजा भ्रातरः प्रमुखे युद्धार्थमवस्थिताः। अत एतान् हत्वा किं करिष्यामः इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.6।।किंच यद्यप्यधर्ममङ्गीकरिष्यामस्तथाऽपि किमस्माकं जयः पराजयो वा भवेदिति न ज्ञायत इत्याह  नचेति।  एतद्द्वयोर्मध्ये नोऽस्माकं कतरत् किं नाम गरीयोऽधिकतरं भविष्यतीति न विद्मः। तदेव द्वयं दर्शयति। यद्वा एतान्वयं जयेम जेष्यामः यदि वा नोऽस्मानेते जयेयुर्जेष्यन्तीति। किं चास्माकं वा जयोऽपि फलतः पराजय एवेत्याह। यानेव हत्वा जीवितुं नेच्छामस्त एवैते संमुखेऽवस्थिताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.6 2.8।।न चैतदिति प्रश्नस्त्रिभिः। स्पष्टार्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.6।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.6।। व्याख्या    न चैतद्विह्मः कतरन्नो गरीयः   मैं युद्ध करूँ अथवा न करूँ इन दोनों बातोंका निर्णय मैं नहीं कर पा रहा हूँ। कारण कि आपकी दृष्टिमें तो युद्ध करना ही श्रेष्ठ है पर मेरी दृष्टिमें गुरुजनोंको मारना पाप होनेके कारण युद्ध न करना ही श्रेष्ठ है। इन दोनों पक्षोंको सामने रखनेपर मेरे लिये कौनसा पक्ष अत्यन्त श्रेष्ठ है यह मैं नहीं जान पा रहा हूँ। इस प्रकार उपर्युक्त पदोंमें अर्जुनके भीतर भगवान्का पक्ष और अपना पक्ष दोनों समकक्ष हो गये हैं। यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः   अगर आपकी आज्ञाके अनुसार युद्ध भी किया जाय तो हम उनको जीतेंगे अथवा वे (दुर्योधनादि) हमारेको जीतेंगे इसका भी हमें पता नहीं है।यहाँ अर्जुनको अपने बलपर अविश्वास नहीं है प्रत्युत भविष्यपर अविश्वास है क्योंकि भविष्यमें क्या होनहार है इसका किसीको क्या पता यानेव हत्वा न जिजीविषामः   हम तो कुटुम्बियोंको मारकर जीनेकी भी इच्छा नहीं रखते भोग भोगनेकी राज्य प्राप्त करके हुक्म चलानेकी बात तो बहुत दूर रही कारण कि अगर हमारे कुटुम्बी मारे जायँगे तो हम जीकर क्या करेंगे अपने हाथोंसे कुटुम्बको नष्ट करके बैठेबैठे चिन्ताशोक ही तो करेंगे चिन्ताशोक करने और वियोगका दुःख भोगनेके लिये हम जीना नहीं चाहते। तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः   हम जिनको मारकर जीना भी नहीं चाहते वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं। धृतराष्ट्रके सभी सम्बन्धी हमारे कुटुम्बी ही तो हैं। उन कुटुम्बियोंको मारकर हमारे जीनेको धिक्कार है सम्बन्ध   अपने कर्तव्यका निर्णय करनेमें अपनेको असमर्थ पाकर अब अर्जुन व्याकुलतापूर्वक भगवान्से प्रार्थना करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.4 2.6।।क्लैव्यादिभिर्निर्भर्त्सनमभिदधत् अधर्मे तव धर्माभिमानोऽयम् (N K (n) omit अयम् S omits the entire sentence) इत्यादि दर्शयति कथमित्यादि। कथं भीष्ममहं संख्ये द्रोणं च इत्यादिना भुञ्जीय भोगान् इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानं फलविशेषानुसन्धानं च हेयतया पूर्वपक्षे ( N omit पूर्वपक्षे) सूचयति। नैतद्विद्मः इत्यनेन च कर्मविशेषानुसन्धानमाह। निरनुसन्धानं (S K निरभिसन्धानं) तावत् कर्म नोपपद्यते। न च पराजयमभिसन्धाय युद्धे प्रवर्तते। जयोऽपि नश्चायमनर्थ (S k omit नः) एव। तदाह अहत्वा गुरून् भैक्षमपि चर्तुं श्रेयः। एतच्च निश्चेतुमशक्यं किं जयं कांक्षामः किं वा पराजयम् जयेऽपि बन्धूनां विनाशात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.6।।क्षत्रियाणां स्वधर्मत्वाद्युद्धमेव श्रेयस्करमित्याशङ्क्याह  नचैतदिति।  एतदपि न जानीमो भैक्षयुद्धयोः कतरन्नोऽस्माकं गरीयः श्रेष्ठं कि भैक्षं हिंसाशून्यत्वादुत युद्धं स्ववृत्तित्वादिति। संदिग्धा च जयस्थितिः किं साम्यमेवोभयेषां यद्वा वयं जयेमातिशयीमहि यदि वा नोऽस्मान्धार्तराष्ट्रा दुर्योधनादयो जयेयुः। जातोऽपि जयो न फलवान्। यतो यान्बन्धून्हत्वा न जिजीविषामो जीवितुं नेच्छामस्ते एवावस्थिताः प्रमुखे संमुखे धार्तराष्ट्रा धृतराष्ट्रस्यापत्यानि। तस्माद्भैक्षाद्युद्धस्य श्रेष्ठत्वं न सिद्धमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.6।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.6।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.6।।एवं युद्धम् आरभ्य निवृत्तव्यापारान् भवतो धार्तराष्ट्राः प्रसह्य हन्युः इति चेत् अस्तु तद्वधलब्धविजयात् अधर्म्याद् अस्माकं धर्माधर्मौ अजानद्भिः तैः हननम् एव गरीयः इति मे प्रतिभाति इति उक्त्वा यत् मह्यं श्रेय इति निश्चितं तत् शरणागताय तव शिष्याय मे ब्रूहि इति अतिमात्रकृपणो भगवत्पादाम्बुजम् उपससार।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.6 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.7 】

▸ Sanskrit Sloka: कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव: पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेता: | यच्छ्रेय: स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ||

▸ Transliteration: kārpaṇya-doṣopahata-svabhāvaḥ pṛcchāmi tvāṁ dharma-saṁmūḍha-cetāḥ I yacchreyaḥ syānniścitaṁ brūhi tan me śiṣyaste’ham śādhi māṁ tvāṁ prapannam ||

▸ Glossary: kārpaṇya: miserly; doṣa: weakness; upahata: being inflicted by; svabhāvaḥ: characteristics; pṛcchāmi: I am asking; tvāṁ: you; dharma: religion; saṁmūḍha

cetāḥ: bewildered mind; yat: what; śreyaḥ: good; syāt: may be; niścitaṁ: decid- edly; brūhi: tell; tat: that; me: unto me; śiṣyaḥ: disciple; te: your; aham: I am;

śādhi: just instruct; māṁ: me; tvāṁ: you; prapannam: surrendered

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.7 My heart is overwhelmed with pity and my mind is con- fused about what my duty is. I beg of you, please tell me

what is best for me. I am your disciple. Instruct me as I seek refuge in you.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.7।।कायरताके दोषसे उपहत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित श्रेय हो वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मेरेको शिक्षा दीजिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.7।। करुणा के कलुष से अभिभूत और कर्तव्यपथ पर संभ्रमित हुआ मैं आपसे पूछता हूँ? कि मेरे लिये जो श्रेयष्कर हो? उसे आप निश्चय करके कहिये? क्योंकि मैं आपका शिष्य हूँ शरण में आये मुझको आप उपदेश दीजिये।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.7 कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः with nature overpowered by the taint of pity? पृच्छामि I ask? त्वाम् Thee? धर्मसंमूढचेताः with a mind in confusion about duty? यत् which? श्रेयः good? स्यात् may be? निश्चितम् decisively? ब्रूहि say? तत् that? मे for me? शिष्यः disciple? ते Thy? अहम् I? शाधि teach? माम् me? त्वाम् to Thee? प्रपन्नम् taken refuge.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.7. With my very nature, overpowered by the taint of pity, and with my mind, utterly confused as to the right action [at the present juncture], I ask you: Tell me definitely what would be good [to me]; I am your pupil; please teach me, who am taking refuge in You.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.7 My heart is oppressed with pity; and my mind confused as to what my duty is. Therefore, my Lord, tell me what is best for my spiritual welfare, for I am Thy disciple. Please direct me, I pray.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.7 With my heart stricken by the fault of weak compassion, with my mind perplexed about my duty, I reest you to say for certain what is good for me. I am your disciple. Teach me who have taken refuge in you.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.7 With my nature overpowered by weak commiseration, with a mind bewildered about duty, I supplicate You. Telll me for certain that which is better; I am Your disciple. Instruct me who have taken refuge in You.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.7 My heart is overpowered by the taint of pity; my mind is confused as to duty. I ask Thee: Tell me decisively what is good for me. I am Thy disciple. Instruct me who has taken refuge in Thee.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.7 See Comment under 2.10

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.6 - 2.8 If you say, 'After beginning the war, if we withdraw from the battle, the sons of Dhrtarastra will slay us all forcibly', be it so. I think that even to be killed by them, who do not know the difference between righteousness and unrighteousness, is better for us than gaining unrighteous victory by killing them. After saying so, Arjuna surrendered himself at the feet of the Lord, overcome with dejection, saying. 'Teach me, your disciple, who has taken refuge in you, what is good for me.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.7 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.7।। अपने आप को असहाय अवस्था तथा कोई निर्णय लेने से सर्वथा असमर्थ पाकर अर्जुन सम्पूर्ण रूप से स्वयं को भगवान् की शरण में समर्पित कर देता है। वह स्वीकार कर रहा है कि उसकी मानसिक स्थिति नष्टभ्रष्ट हो गयी है। वह स्वयं बताता है कि उसका मुख्य कारण करुणा की अत्यधिकता है। अज्ञान के कारण वह समझ नहीं पा रहा है कि उसकी वह करुणा निराधार है। वह स्वीकार करता है कि युद्ध करने या न करने के विषय में उसकी बुद्धि भ्रमाच्छादित होने के कारण वह धर्मअधर्म का निर्णय नहीं कर पा रहा है।हम पहले ही धर्म शब्द का अर्थ देख चुके हैं। किसी वस्तु का वह गुण जिसके कारण उस वस्तु का अस्तित्व सिद्ध होता है उस वस्तु का धर्म कहलाता है। हिन्दू दर्शन मानव धर्म पर बल देता है जिसका अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने शुद्ध दैवी स्वरूप के अनुरूप रहना चाहिये और उसका यह प्रयत्न होना चाहिये कि वह स्वस्वरूप की महत्ता बनाये रखे और पशुवत जीवन व्यतीत न करे।यहाँ अर्जुन शिष्यभाव से भगवान् की शरण में जाता है जो यह संकेत करता है कि अब वह उपदेश ग्रहण करने योग्य हो गया है और वह भगवान् के उपदेश का पालन करेगा। एक और बात का भी संकेत मिलता है कि यदि अज्ञानवश अर्जुन अनेक बार अपनी शंका प्रस्तुत करते हुए प्रश्न पूछता है तो उसका समाधान भगवान् को सहानुभूति और धैर्यपूर्वक करना होगा। सम्पूर्ण गीता में हम अनेक स्थानों पर अर्जुन को कृष्णोपदेश के मध्य शंकायें प्रकट करते हुये देखते हैं परन्तु कहीं पर भी श्रीकृष्ण को धैर्य खोते नहीं देखते। इतना ही नहीं अर्जुन द्वारा प्रत्येक प्रश्न पूछे जाने पर वे और अधिक उत्साहित होकर युद्धभूमि में उसका उत्तर देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.7।।   संसारासारतां ज्ञातवत इहामुत्रार्थे भोगेऽत्यन्तविरक्तस्य मुमुक्षोर्गुरुपसत्तिं सूचयन्नाह  कार्पण्येति।  अनात्मवित्त्वात्संबन्धिनां वियोगासहनं कार्पण्यम्।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः। तेन कार्पण्येन दैन्यरुपेण दोषेणोपहतो दूषितः स्वभावोऽन्तःकरणं यस्य सः। कार्पण्यदोषेणोपहतोऽभिभूतः स्वभावः शौर्यादिलक्षणो यस्य स इत्यपरे। स्वभावः क्षात्रो युद्धोद्योगलक्षण इति केचित्। यतो धर्मसंमूढचेताः धारयतीति धर्मः सर्वाधिष्ठानं परमात्मा तस्मिन्सम्यङ्मूढमविवेकितां प्राप्तं चेतो यस्य सोऽहं त्वा त्वां पृच्छामि। किमित्यत आह  यदिति।  यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणैर्यच्छ्रेयस्त्वेन नित्यनिरतिशयानन्दत्वेन निश्चितं स्यात्तन्मे ब्रूहि निश्चितमैकान्तिकमनपेक्षिकं श्रेयः स्यान्न रोगनिवृत्तिवदनैकान्तिकमनात्यन्तिकं स्वर्गवदापेक्षिकं चेत्येके। मे मह्यं ब्रूहि कथय। ननु नापुत्रशिष्यायेति निषेधान्न वक्तव्यमिति चेन्नाहमशिष्यः किंतु शिष्यस्तेऽमहतो मां शिष्यं शासनार्हं त्वां प्रपन्नं शरणागतं च शाधि शिक्षय। स्वबुद्य्धा भिक्षाशनं  प्रशस्यं  मन्यमानोऽपि कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः भिक्षाशनं धर्म उत युद्धमिति संशयापगमाभावात्। धर्मसंमूढचेता अहं त्वां पृच्छामि यद्भैक्षं युद्धं वा निश्चितमव्यभिचारि श्रेयः साधनं तन्मे ब्रूहीति धर्मतत्त्वविषयकोऽपि प्रश्नो बोध्यः। यत्तु केचित् धर्मविषये संमूढं किमतेषां वधो धर्मः किमेतत्परिपालनं धर्मः। तथा किं पृथ्वीपरिपालनं धर्मः किं वा यथावस्थितोऽरण्यनिवास एव धर्म इत्यादिसंशयैर्व्याप्तं चेतो यस्य स एवंविधोऽहं त्वामिदानीं पृच्छामि श्रेय इत्यनुषङ्गः। अतो यन्निश्चिमैकान्तिकमात्यन्तिकं च श्रेयः परमपुरुषार्थभूतं फलं स्यात्तन्मे ब्रूहि। साधनानन्तरमवश्यंभावित्वमैकान्तिकत्वम्। जातस्याविनाशित्वमात्यन्तिकत्वमिति वर्णयन्ति। तत्र धर्मविषयकसंदेहवान्परमपुमर्थभूतं फलं पृच्छाभ्यतस्तन्मे ब्रूहीत्यस्यान्यद्भुक्तमन्यद्वान्तमिति न्यायतुल्यस्य सामञ्जस्यमस्ति नवेति विद्वद्भिराकलनीयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.7।।गुरूपसदनमिदानीं प्रतिपाद्यते समधिगतसंसारदोषजातस्यातितरां निर्विण्णस्य विधिवद्गुरुमुपसन्नस्यैव विद्याग्रहणेऽधिकारात्। तदेवं भीष्मादिसंकटवशात्व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति इति श्रुतिसिद्धभिक्षाचर्येऽर्जुनस्याभिलाषं प्रदर्श्य विधिवदुपसत्तिमपि तत्संकटव्याजेनैव दर्शयति। यः स्वल्पामपि वित्तक्षतिं न क्षमते स कृपण इति लोके प्रसिद्धस्तद्विधत्वादखिलोऽनात्मविदप्राप्तपुरुषार्थतया कृपणो भवति।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः तस्य भावः कार्पण्यं अनात्माध्यासवत्त्वं तन्निमित्तोऽस्मिञ्जन्मन्येत एव मदीयास्तेषु हतेषु किं जीवितेनेत्यभिनिवेशरूपो ममतालक्षणो दोषस्तेनोपहतस्तिरस्कृतः स्वभावः क्षात्रो युद्धोद्योगलक्षणो यस्य सः। तथा धर्मविषये निर्णायकप्रमाणादर्शनात्संमूढं किमेतेषां वधो धर्मः किमेतत्परिपालनं धर्मः तथा किं पृथ्वीपरिपालनं धर्मः किंवा यथावस्थितोऽरण्यनिवासएव धर्मं इत्यादिसंशयैर्व्याप्तं चेतो यस्य स तथा।न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः इत्यत्र व्याख्यातमेतत्। एवंविधः सन्नहं त्वा त्वामिदानीं पृच्छामि। श्रेय इत्यनुषङ्गः। अतो यन्निश्चितमैकान्तिकमात्यन्तिकं च श्रेयः परमपुमर्थभूतं फलं स्यात्तन्मे मह्यं ब्रूहि। साधनानन्तरमवश्यंभावित्वमैकान्तिकत्वम् जातस्याविनाश आत्यन्तिकत्वम् यथा ह्यौषधे कृते कदाचिद्रोगानिवृत्तिर्न भवेदपि जातापि च रोगनिवृत्तिः पुनरपि रोगोत्पत्त्या विनाश्यते एवं कृतेऽपि यागे प्रतिबन्धवशात्स्वर्गो न भवेदपि जातोऽपि स्वर्गो दुःखाक्रान्तो नश्यति चेति नैकान्तिकत्वमात्यन्तिकत्वं वा तयोः। तदुक्तम्दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातके हेतौ। दृष्टे साऽपार्था चेन्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात्।। इतिदृष्टवदानुश्रविकः सह्यविंशुद्धिक्षयातिशययुक्तः। तद्विपरीतः श्रेयोन्व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात्।। इति च। ननु त्वं मम सखा नतु शिष्योऽत आह शिष्येस्तेऽमिति। त्वदनुशासनयोग्यत्वादहं तव शिष्य एव भवामि न सखा न्यूनज्ञानत्वात्। अतस्त्वां प्रपन्नं शरणागतं मां शाधि शिक्षय करुणया नत्वशिष्यत्वशङ्कयोपेक्षणीयोऽहमित्यर्थः। एतेनतद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठंभृगुर्वै वारुणिः। वरुणं पितरमुपससार। अधीहि भगवो ब्रह्मेति इत्यादिगुरूसत्तिप्रतिपादकः श्रुत्यर्थो दर्शितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.7।।उक्तसंशयवानेव पृच्छति  कार्पण्येति।  कार्पण्यं दीनत्वम्। स्वभावःशौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यम् इत्यादिना वक्ष्यमाणलक्षणः। शेषं स्पष्टम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.7।।एवं स्वविचारमुक्त्वा तस्य दोषरूपतां वदन् भगवदाज्ञां करिष्यमाण आह कार्पण्यदोषोपहतस्वभाव इति। कार्पण्यं बन्धुमारणानुचितज्ञानरूपं तद्रूपो यो दोषस्तेन उपहतः स्वभावः क्षात्त्रः शौर्यादिरूपो यस्य तादृशस्त्वां पृच्छामि। ननु उपहतस्वभावस्य विकलस्य किं प्रश्नेनेत्यत आह धर्मसम्मूढचेता इति। धर्म धर्मज्ञानार्थं सम्मूढं चेतो यस्य सः। एतन्मारणे त्वं प्रसन्नः किं वा अमारणे एतन्मध्येऽन्यद्वा यच्छ्रेयः श्रेयोरूपं त्वत्प्रसादरूपं स्यात्तन्मे निश्चितं ब्रूहि। अहं ते शिष्यः न तु मित्रं अतस्त्वां प्रपन्नं शरणागतं धर्मजिज्ञासया मां त्वं शाधि शिक्षय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.7।। कार्पण्येति।  तस्मात्कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः। एतान्हत्वा कथं जीविष्याम इति कार्पण्यं दोषश्च स्वकुलक्षयकृतः ताभ्यामुपहतोऽभिभूतः स्वभावः शौर्यादिलक्षणो यस्य सोऽहं त्वां पृच्छामि। तथा धर्मे संमूढं चेतो यस्य सः। युद्धं त्यक्त्वा भिक्षाटनमपि क्षत्रियस्य धर्मो वाऽधर्मो वेति संदिग्धचित्तः सन्नित्यर्थः। अतो मे यन्निश्चितं श्रेयो युक्तं स्यात्तद्ब्रूहि। किंच तेऽहं शिष्यः शासनार्हः। अतस्त्वां प्रपन्नं शरणागतं मां शाधि शिक्षय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.6 2.8।।न चैतदिति प्रश्नस्त्रिभिः। स्पष्टार्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.7।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.7।। व्याख्या    कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः पृच्छामि त्वां धर्मसम्मूढचेताः (टिप्पणी प0 43.1)   यद्यपि अर्जुन अपने मनमें युद्धसे सर्वथा निवृत्त होनेको सर्वश्रेष्ठ नहीं मानते थे तथापि पापसे बचनेके लिये उनको युद्धसे उपराम होनेके सिवाय दूसरा कोई उपाय भी नहीं दीखता था। इसलिये वे युद्धसे उपराम होना चाहते थे और उपराम होनेको गुण ही मानते थे कायरतारूप दोष नहीं। परन्तु भगवान्ने अर्जुनकी इस उपरतिको कायरता और हृदयकी तुच्छ दुर्बलता कहा तो भगवान्के उन निःसंदिग्ध वचनोंसे अर्जुनको ऐसा विचार हुआ कि युद्धसे निवृत्त होना मेरे लिये उचित नहीं है। यह तो एक तरहकी कायरता ही है जो मेरे स्वभावके बिलकुल विरुद्ध है क्योंकि मेरे क्षात्रस्वभावमें दीनता और पलायन (पीठ दिखाना) ये दोनों ही नहीं हैं  (टिप्पणी प0 43.2) । इस तरह भगवान्के द्वारा कथित कायरतारूप दोषको अपनेमें स्वीकार करते हुए अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि एक तो कायरतारूप दोषके कारण मेरा क्षात्रस्वभाव एक तरहसे दब गया है और दूसरी बात मैं अपनी बुद्धिसे धर्मके विषयमें कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ। मेरी बुद्धिमें ऐसी मूढ़ता छा गयी है कि धर्मके विषयमें मेरी बुद्धि कुछ भी काम नहीं कर रही हैतीसरे श्लोकमें तो भगवान्ने अर्जुनको स्पष्टरूपसे आज्ञा दे दी थी कि हृदयकी तुच्छ दुर्बलताको कायरताको छोड़कर युद्धके लिये खड़े हो जाओ। इससे अर्जुनको धर्म(कर्तव्य) के विषयमें कोई सन्देह नहीं रहना चाहिये था। फिर भी सन्देह रहनेका कारण यह है कि एक तरफ तो युद्धमें कुटुम्बका नाश करना पूज्यजनोंको मारना अधर्म (पाप) दीखता है और दूसरी तरफ युद्ध करना क्षत्रियका धर्म दीखता है। इस प्रकार कुटुम्बियोंको देखते हुए युद्ध नहीं करना चाहिये और क्षात्रधर्मकी दृष्टिसे युद्ध करना चाहिये इन दो बातोंको लेकर अर्जुन धर्मसंकटमें पड़ गये। उनकी बुद्धि धर्मका निर्णय करनेमें कुण्ठित हो गयी। ऐसा होनेपर अभी इस समय मेरे लिये खास कर्तव्य क्या है मेरा धर्म क्या है इसका निर्णय करानेके लिये वे भगवान्से पूछते हैं। यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे  इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि तू जो कायरताके कारण युद्धसे निवृत्त हो रहा है तेरा यह आचरण  अनार्यजुष्ट  है अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष ऐसा आचरण नहीं करते वे तो जिसमें अपना कल्याण हो वही आचरण करते हैं। यह बात सुनकर अर्जुनके मनमें आया कि मुझे भी वही करना चाहिये जो श्रेष्ठ पुरुष किया करते हैं। इस प्रकार अर्जुनके मनमें कल्याणकी इच्छा जाग्रत् हो गयी और उसीको लेकर वे भगवान्से अपने कल्याणकी बात पूछते हैं कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो जाय ऐसी बात मेरेसे कहिये।अर्जुनके हृदयमें हलचल (विषाद) होनेसे और अब यहाँ अपने कल्याणकी बात पूछनेसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य जिस स्थितिमें स्थित है उसी स्थितिमें वह संतोष करता रहता है तो उसके भीतर अपने असली उद्देश्यकी जागृति नहीं होती। वास्तविक उद्देश्य कल्याणकी जागृति तभी होती है जब मनुष्य अपनी वर्तमान स्थितिसे असन्तुष्ट हो जाय उस स्थितिमें रह न सके। शिष्यस्तेऽहम्   अपने कल्याणकी बात पूछनेपर अर्जुनके मनमें यह भाव पैदा हुआ कि कल्याणकी बात तो गुरुसे पूछी जाती है सारथिसे नहीं पूछी जाती। इस बातको लेकर अर्जुनके मनमें जो रथीपनका भाव था जिसके कारण वे भगवान्को यह आज्ञा दे रहे थे कि हे अच्युत मेरे रथको दोनों सेनाओंके बीचमें खड़ा कीजिये वह भाव मिट जाता है और अपने कल्याणकी बात पूछनेके लिये अर्जुन भगवान्के शिष्य हो जाते हैं और कहते हैं कि महाराज मैं आपका शिष्य हूँ शिक्षा लेनेका पात्र हूँ आप मेरे कल्याणकी बात कहिये। शाधि मां त्वां प्रपन्नम्   गुरु तो उपदेश दे देंगे जिस मार्गका ज्ञान नहीं है उसका ज्ञान करा देंगे पूरा प्रकाश दे देंगे पूरी बात बता देंगे पर मार्गपर तो स्वयं शिष्यको ही चलना पड़ेगा। अपना कल्याण तो शिष्यको ही करना पड़ेगा। मैं तो ऐसा नहीं चाहता कि भगवान् उपदेश दें और मैं उसका अनुष्ठान करूँ क्योंकि उससे मेरा काम नहीं चलेगा। अतः अपने कल्याणकी जिम्मेवारी मैं अपनेपर क्यों रखूँ गुरुपर ही क्यों न छोड़ दूँ जैसे केवल माँके दूधपर ही निर्भर रहनेवाला बालक बीमार हो जाय तो उसकी बीमारी दूर करनेके लिये ओषधि स्वयं माँको खानी पड़ती है बालकको नहीं। इसी तरह मैं भी सर्वथा गुरुके ही शरण हो जाऊँ गुरुपर ही निर्भर हो जाऊँ तो मेरे कल्याणका पूरा दायित्व गुरुपर ही आ जायगा स्वयं गुरुको ही मेरा कल्याण करना पड़ेगा इस भावसे अर्जुन कहते हैं कि मैं आपके शरण हूँ मेरेको शिक्षा दीजिये।यहाँ अर्जुन  त्वां प्रपन्नम्  पदोंसे भगवान्के शरण होनेकी बात तो कहते हैं पर वास्तवमें सर्वथा शरण हुए नहीं हैं। अगर वे सर्वथा शरण हो जाते तो फिर उनके द्वारा  शाधि माम्  मेरेको शिक्षा दीजिये यह कहना नहीं बनता क्योंकि सर्वथा शरण होनेपर शिष्यका अपना कोई कर्तव्य रहता ही नहीं। दूसरी बात आगे नवें श्लोकमें अर्जुन कहेंगे कि मैं युद्ध नहीं करूँगा  न योत्स्ये।  अर्जुनकी वह बात भी शरणागतिके विरुद्ध पड़ती है। कारण कि शरणागत होनेके बाद मैं युद्ध करूँगा या नहीं करूँगा क्या करूँगा और क्या नहीं करूँगा यह बात रहती ही नहीं। उसको यह पता ही नहीं रहता कि शरण्य क्या करायेंगे और क्या नहीं करायेंगे। उसका तो यही एक भाव रहता है कि अब शरण्य जो करायेंगे वही करूँगा। अर्जुनकी इस कमीको दूर करनेके लिये ही आगे चलकर भगवान्को  मामेकं शरणं व्रज  (18। 66) एक मेरी शरणमें आ जा ऐसा कहना पड़ा। फिर अर्जुनने भी  करिष्ये वचनं तव  (18। 73) आपकी आज्ञाका पालन करूँगा ऐसा कहकर पूर्ण शरणागतिको स्वीकार किया।इस श्लोकमें अर्जुनने चार बातें कहीं हैं  (1) कार्पण्यदोषो ৷৷. धर्मसम्मूढचेताः (2) यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे (3) शिष्यस्तेऽहम् (4) शाधि मां त्वां प्रपन्नम्।  इनमेंसे पहली बातमें अर्जुन धर्मके विषयमें पूछते हैं दूसरी बातमें अपने कल्याणके लिये प्रार्थना करते हैं तीसरी बातमें शिष्य बन जाते हैं और चौथी बातमें शरणागत हो जाते हैं। अब इन चारों बातोंपर विचार किया जाय तो पहली बातमें मनुष्य जिससे पूछता है वह कहनेमें अथवा न कहनेमें स्वतन्त्र होता है। दूसरीमें जिससे प्रार्थना करता है उसके लिये कहना कर्तव्य हो जाता है। तीसरीमें जिनका शिष्य बन जाता है उन गुरुपर शिष्यको कल्याणका मार्ग बतानेका विशेष दायित्व आ जाता है। चौथीमें जिसके शरणागत हो जाता है उस शरण्यको शरणागतका उद्धार करना ही पड़ता है अर्थात् उसके उद्धारका उद्योग स्वयं शरण्यको करना पड़ता है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें अर्जुन भगवान्के शरणागत तो हो जाते हैं पर उनके मनमें आता है कि भगवान्का तो युद्ध करानेका ही भाव है पर मैं युद्ध करना अपने लिये धर्मयुक्त नहीं मानता हूँ। उन्होंने जैसे पहले  उत्तिष्ठ  कहकर युद्धके लिये आज्ञा दी ऐसे ही वे अब भी युद्ध करनेकी आज्ञा दे देंगे। दूसरी बात शायद मैं अपने हृदयके भावोंको भगवान्के सामने पूरी तरह नहीं रख पाया हूँ। इन बातोंको लेकर अर्जुन आगेके श्लोकमें युद्ध न करनेके पक्षमें अपने हृदयकी अवस्थाका स्पष्टरूपसे वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.7 2.10।।कार्पण्येत्यादि। सेनयोरुभयोर्मध्ये इत्यादिनेदं सूचयति संशयाविष्टोऽर्जुनो नैकपक्षेण ( नोऽनेक ) युद्धान्निवृत्तः यत एवमाह स्म शाधि मा त्वां (S omits त्वाम्) प्रपन्नम् इति। अतः उभयोरपि ज्ञानाज्ञानयोर्मध्यगः श्रीभगवतानुशिष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.7।।समधिगतसंसारदोषजातस्यातितरां निर्विण्णस्य मुमुक्षोरुपसन्नस्यात्मोपदेशसंग्रहणेऽधिकारं सूचयति  कार्पण्येति।  योऽल्पां स्वल्पामपि स्वक्षतिं न क्षमते स कृपणस्तद्विधत्वादखिलोऽनात्मविदप्राप्तपरमपुरुषार्थतया कृपणो भवति।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः तस्य भावः कार्पण्यं दैन्यं तेन दोषेणोपहतो दूषितः स्वभावश्चित्तमस्येति विग्रहः। सोऽहं पृच्छाम्यनुयुञ्जे त्वा त्वां धर्मसंमूढचेताः धर्मो धारयतीति परं ब्रह्म तस्मिन्संमूढमविवेकतां गतं चेतो यस्य ममेति तथाहमुक्तः। किं पृच्छसि यन्निश्चितमैकान्तिकमनापेक्षिकं श्रेयः स्यान्न रोगनिवृत्तिवदनैकान्तिकमनात्यन्तिकं स्वर्गवदापेक्षिकं वा तन्निःश्रेयसं मे मह्यं ब्रूहिनापुत्रायाशिष्याय इति निषेधान्न प्रवक्तव्यमिति मा मंस्थाः। यतः शिष्यस्तेऽहं भवामि। शाध्यनुशाधि मां निःश्रेयसं। त्वामहं प्रपन्नोऽस्मि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.7।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.7।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.7।।एवं युद्धम् आरभ्य निवृत्तव्यापारान् भवतो धार्तराष्ट्राः प्रसह्य हन्युः इति चेत् अस्तु तद्वधलब्धविजयात् अधर्म्याद् अस्माकं धर्माधर्मौ अजानद्भिः तैः हननम् एव गरीयः इति मे प्रतिभाति इति उक्त्वा यत् मह्यं श्रेय इति निश्चितं तत् शरणागताय तव शिष्याय मे ब्रूहि इति अतिमात्रकृपणो भगवत्पादाम्बुजम् उपससार।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.7 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.8 】

▸ Sanskrit Sloka: न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद् यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम् | अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यं सुराणामपि चाधिपत्यम् ||

▸ Transliteration: na hi prapaśyāmi mamāpanudyād yac chokam ucchoṣaṇam indriyāṇām | avāpya bhūmāva-sapatnam-ṛddhaṁ rājyaṁ surāṇām api cādhipatyam ||

▸ Glossary: na: do not; hi: indeed; prapaśyāmi: I see; mama: my; apanudyāt: can drive away; yat: that; śokam: lamentation; ucchoṣaṇam: drying up; indriyāṇām: of the senses; avāpya: after achieving; bhūmau: on the earth; asapatnam: without rival; ṛddhaṁ: prosperous; rājyam: kingdom; surāṇām: of the demigods; api: even; ca: also; ādhipatyam: supremacy

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.8 Even if I were to attain unrivalled dominion and prosperity on earth or even lordship over the Gods, how would that remove this sorrow that burns my senses?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.8।।पृथ्वीपर धनधान्यसमृद्ध और निष्कण्टक राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है वह दूर हो जाय ऐसा मैं नहीं देखता हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.8।। पृथ्वी पर निष्कण्टक समृद्ध राज्य को और देवताओं के स्वामित्व को प्राप्त होकर भी मैं उस उपाय को नहीं देखता हूँ? जो मेरी इन्द्रियों को सुखाने वाले इस शोक को दूर कर सके।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.8 न हि not? प्रपश्यामि I see? मम my? अपनुद्यात् would remove? यत् that? शोकम् grief? उच्छोषणम् drying up? इन्द्रियाणाम् of my senses? अवाप्य having obtained? भूमौ on the earth? असपत्नम् unrivalled? ऋद्धम् prosperous? राज्यम् dominion? सुराणाम् over the gods? अपि even? च and? आधिपत्यम् lordship.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.8. I do not clearly see what would drive out my grief, the scorcher of my sense-organs, even after achieving, a prosperous and unrivalled kingship in this earth and also the overlordship of the gods [in the heaven].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.8 For should I attain the monarchy of the visible world, or over the invisible world, it would not drive away the anguish which is now paralysing my senses."

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.8 Even if I should win unchallenged sovereignty of a prosperous earth or even the kingdom on lordship over the Devas, I do not feel that it would dispel the grief than withers up my senses.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.8 Because, I do not see that which can, even after aciring on this earth a prosperous kingdom free from enemies and even sovereignty over the gods, remove my sorrow (which is) blasting the senses.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.8 I do not see that it would remove this sorrow that burns up my senses, even if I should attain prosperous and unrivalled dominion on earth or lordship over the gods.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.8 See Comment under 2.10

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.6 - 2.8 If you say, 'After beginning the war, if we withdraw from the battle, the sons of Dhrtarastra will slay us all forcibly', be it so. I think that even to be killed by them, who do not know the difference between righteousness and unrighteousness, is better for us than gaining unrighteous victory by killing them. After saying so, Arjuna surrendered himself at the feet of the Lord, overcome with dejection, saying. 'Teach me, your disciple, who has taken refuge in you, what is good for me.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.8 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.8।। यहाँ अर्जुन संकेत करता है कि उसे तत्काल ही मार्गदर्शन की आवश्यकता है जिसके अभाव में उसे आन्तरिक पीड़ा को सहन करना पड़ रहा है। वह पीड़ा के कारण को व्यक्त करने में असमर्थ अनुभव कर रहा है। यह शोक उसकी ज्ञानेन्द्रियों पर भी प्रभाव डाल रहा है। वह न ठीक से देख सकता है और न सुन सकता है।किसी भी विचारशील व्यक्ति के लिये यह स्वाभाविक है कि किसी समस्या के आने पर उसको हल करने के लिये अधीर हो उठेे। वह समस्या को शीघ्र हल करके शांति प्राप्त करना चाहता है। बेचारे अर्जुन ने अपनी बुद्धि द्वारा समस्या हल करने का बहुत प्रयत्न किया किन्तु वह सफल नहीं हो सका। जैसा कि उसके शब्दों से स्पष्ट है कि अब उसका दुख भौतिक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिये नहीं है क्योंकि वह स्वयं कहता है कि समस्त पृथ्वी अथवा स्वर्ग का राज्य प्राप्त करने से भी उसका दुख निवृत्त नहीं हो सकता है।अब अर्जुन की स्थिति एक तीव्र मुमुक्ष के समान है जो र्मत्य जीवन की समस्त सीमाओं और बन्धनों से मुक्त हो जाने के लिये अधीर हो उठा है। अब आवश्यकता है केवल एक प्रामाणिक विचार की जो स्वयं भगवान हृषीकेश उसे गीता के दिव्य काव्य में देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.8।।   ननु विजयिनो लब्धभूमिराज्यस्य हतस्य स्वधर्मबलादिन्द्रपुत्रत्वाद्वा प्राप्तदेवाधिपत्यस्य वा तवाज्ञाननि बन्धनशोकापनोदकोऽपि यः कश्चित्सुलभो भविष्यतीति चेतत्राह  नहीति।  यदित्यव्ययम्। भूमौ राज्यमसपत्नं न विद्यते सपन्नः शत्रुर्यस्य तत्। निष्कण्टकमित्यर्थः। ऋद्धं सस्यादिसंपन्नं सुराणामाधिपत्यं वा प्राप्यामि तन्नहि प्रपश्यामि यः शोकमिन्द्रियाणामुच्छोषण्मत्यन्तशोषकरं ममापनुद्यादपनयेदित्यन्वयः। अतस्त्वमेवेदानीमेव शोकमपाकुर्वित्यभिप्रायः। कुतो निःश्रेयसमेवेच्छसीति तत्राह  नहीति।  यस्मान्ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणां तन्न पश्यामि। ननु शत्रून्निहत्य राज्ये प्राप्ते शोकनिवृत्तिस्ते भविष्यति नेत्याह  अवाप्येति।  अविद्यमानः सपन्नः शत्रुर्यस्य तदृद्धं राज्यं राज्ञः कर्म प्रजारक्षणशासनादि तदिदमस्यां भूमाववाप्यापि शोकापनयनकारणं न पश्यामीत्यर्थः। तर्हि देवेन्द्रत्वादिप्राप्त्या शोकापनयस्ते भविष्यति नेत्याह  सुराणामपीति।  तेषामाधिपत्यमधिपतित्वं स्वाम्यमिन्द्रत्वं ब्रह्मत्वं वा तदवाप्यापि मम शोको नापगच्छतीत्यर्थ इत्येके।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.8।।ननु स्वयमेव त्वं श्रेयो विचारय श्रुतसंपन्नोऽसि किं परशिष्यत्वेनेत्यत आह यच्छ्रेयः प्राप्तं सत् कर्तृ मम शोकमपनुद्यादपनुदेन्निवारयेत्तन्न पश्यामि। हि यस्मात्तस्मान्मां शाधीतिसोऽहं भगवः शोचामि तं मा भगवाष्शोकस्य पारं तारयतु इति श्रुत्यर्थो दर्शितः। शोकानपनोदे को दोष इत्याशङ्क्य तद्विशेषणमाह इन्द्रियाणामुच्छोषणमिति। सर्वदा संतापकरमित्यर्थः। ननु युद्धे प्रयतमानस्य तव शोकनिवृत्तिर्भविष्यति जेष्यसि चेत्तदा राज्यप्राप्त्या इतरथा च स्वर्गप्राप्त्या।द्वावेतौ पुरुषौ लोके इत्यादिधर्मशास्त्रादित्याशङ्क्याह अवाप्येत्यादिना। शत्रुवर्जितं सस्यादिसंपन्नं च राज्यं तथा सुराणामाधिपत्यं हिरण्यगर्भत्वपर्यन्तमैश्वर्यमवाप्य स्थितस्यापि मम यच्छोकमपनुद्यात्तन्न पश्यामीत्यन्वयः।तद्यथेह कर्मचितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यचितो लोकः क्षीयते इति श्रुतेः।यत्कृतकं तदनित्यम् इत्यनुमानात् प्रत्यक्षेणाप्यैहिकानां विनाशदर्शनाच्च। नैहिक आमुत्रिको वा भोगः शोकनिर्तकः किंतु स्वसत्ताकालेऽपि भोगपारतन्त्र्यादिना विनाशकालेऽपि विच्छेदाच्छोकजनक एवेति न युद्धं शोकनिवृत्तयेऽनुष्ठेयमित्यर्थः। एतेनेहामुत्रभोगविरागोऽधिकारिविशेषणत्वेन दर्शितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.8 2.9।।ननु क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतपेति युद्धमेव श्रेय इत्युक्तं किं पुनः पृच्छसीत्यत आह  नहीति।  बन्धुनाशनिमित्तः शोको राज्यलाभेन स्वर्गाधिपत्यलाभेन वा न निवर्तयिष्यत इति युद्धादन्यं कंचित् निवृत्तिरूपं शमोपायं ब्रूहीत्याशयः। अत्रार्जुनविषादव्याजेन ब्रह्मविद्याधिकारिविशेषणं भैक्षचर्या इहामुत्रार्थफलभोगविरागश्च दर्शितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.8।।ननु मित्रत्वाच्छरणागतत्वाच्च यथेच्छा तव भवति तथैव मया कर्त्तव्यमिति चेत्तत्राह नहीति। भूमौ असपत्नमद्वितीयं शुद्धं सर्वविभूतिमद्राज्यमवाप्य प्राप्य अपरत्र सुराणामाधिपत्यमिन्द्रैश्वर्यमपि प्राप्य इन्द्रियाणां उच्छोषणमतिशोषणकरमभिलाषपूरकं किमपि नास्ति अतो यन्मच्छोकमपनुद्यादपनयेत् तदहं न प्रपश्यामि। अतः किं विज्ञापयामीति भावः। हीति युक्तश्चायमर्थः। यतो दुरापूराणीन्द्रियाणि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.8।।त्वमेव विचार्य यद्युक्तं तत्कुर्विति चेत्तत्राह  नहीति।  इन्द्रियाणामुच्छोषणमतिशोषणकरं मदीयं शोकं यत्कर्मापनुद्यादपनयेत्तदहं न प्रपश्यामि। यद्यपि भूमौ निष्कण्टकं समृद्धं राज्यं प्राप्स्यामि। तथा सुरेन्द्रत्वमपि यदि प्राप्स्यामि। एवमभीष्टं तत्सर्वमवाप्यापि शोकापनोदनोपायं न प्रपश्यामीत्यन्वयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.6 2.8।।न चैतदिति प्रश्नस्त्रिभिः। स्पष्टार्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.8।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.8।। व्याख्या   अर्जुन सोचते हैं कि भगवान् ऐसा समझते होंगे कि अर्जुन युद्ध करेगा तो उसकी विजय होगी और विजय होनेपर उसको राज्य मिल जायगा जिससे उसके चिन्ताशोक मिट जायँगे और संतोष हो जायगा। परन्तु शोकके कारण मेरी ऐसी दशा हो गयी है कि विजय होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय ऐसी बात मैं नहीं देखता। अवाप्य भूमावसपत्नमृद्धं राज्यम्   अगर मेरेको धनधान्यसे सम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय अर्थात् जिस राज्यमें प्रजा खूब सुखी हो प्रजाके पास खूब धनधान्य हो किसी चीजकी कमी न हो जाय तो भी मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। सुराणामपि चाधिपत्यम्   इस पृथ्वीके तुच्छ भोगोंवाले राज्यकी तो बात ही क्या इन्द्रका दिव्य भोगोंवाला राज्य भी मिल जाय तो भी मेरा शोक जलन चिन्ता दूर नहीं हो सकती।अर्जुनने पहले अध्यायमें यह बात कही थी कि मैं न विजय चाहता हूँ न राज्य चाहता हूँ और न सुख ही चाहता हूँ क्योंकि उस राज्यसे क्या होगा उन भोगोंसे क्या होगा और उस जीनेसे क्या होगा जिनके लिये हम राज्य भोग एवं सुख चाहते हैं वे ही मरनेके लिये सामने खड़े हैं (1। 3233)। यहाँ अर्जुन कहते हैं कि पृथ्वीका धनधान्यसम्पन्न और निष्कण्टक राज्य मिल जाय तथा देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी मेरा शोक दूर नहीं हो सकता मैं उनसे सुखी नहीं हो सकता। वहाँ (1। 3233 में) तो कौटुम्बिक ममताकी वृत्ति ज्यादा होनेसे अर्जुनकी युद्धसे उपरति हुई है पर यहाँ उनकी जो उपरति हो रही है वह अपने कल्याणकी वृत्ति पैदा होनेसे हो रही है। अतः वहाँकी उपरति और यहाँकी उपरतिमें बहुत अन्तर है। न हि प्रपश्यामि ममापनुद्याद्यच्छोकमुच्छोषणमिन्द्रियाणाम्   जब कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे ही मेरेको इतना शोक हो रहा है तब उनके मरनेपर मेरेको कितना शोक होगा अगर मेरेको राज्यके लिये ही शोक होता तो वह राज्यके मिलनेसे मिट जाता परन्तु कुटुम्बके नाशकी आशंकासे होनेवाला शोक राज्यके मिलनेसे कैसे मिटेगा शोकका मिटना तो दूर रहा प्रत्युत शोक और बढ़ेगा क्योंकि युद्धमें सब मारे जायँगे तो मिले हुए राज्यको कौन भोगेगा वह किसके काम आयेगा अतः पृथ्वीका राज्य और स्वर्गका आधिपत्य मिलनेपर भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा शोक दूर नहीं हो सकता। सम्बन्ध   प्राकृत पदार्थोंके प्राप्त होनेपर भी मेरा शोक दूर हो जाय यह मैं नहीं देखता हूँ ऐसा कहनेके बाद अर्जुनने क्या किया इसका वर्णन सञ्जय आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.7 2.10।।कार्पण्येत्यादि। सेनयोरुभयोर्मध्ये इत्यादिनेदं सूचयति संशयाविष्टोऽर्जुनो नैकपक्षेण ( नोऽनेक ) युद्धान्निवृत्तः यत एवमाह स्म शाधि मा त्वां (S omits त्वाम्) प्रपन्नम् इति। अतः उभयोरपि ज्ञानाज्ञानयोर्मध्यगः श्रीभगवतानुशिष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.8।।कुतो निःश्रेयसमेवेच्छसि तत्राह  नहीति।  यस्मान्न प्रपश्यामि। किं न पश्यसि। ममापनुद्यादपनयेद् यच्छोकमुच्छोषणं प्रतपनमिन्द्रियाणां तन्न पश्यामि। ननु शत्रून्निहत्य राज्ये प्राप्ते शोकनिवृत्तिस्ते भविष्यति नेत्याह  अवाप्येति।  अविद्यमानः सपत्नः शत्रुर्यस्य तद् दृढं राज्यं राज्ञः कर्म प्रजारक्षणप्रशासनादि तदिदमस्यां भूमाववाप्यापि शोकापनयकारणं न पश्यामीत्यर्थ। तर्हि देवेन्द्रत्वादिप्राप्त्या शोकापनयस्ते भविष्यति नेत्याह  सुराणामपीति।  तेषामाधिपत्यमधिपतित्वं स्वाम्यमिन्द्रत्वं ब्रह्मत्वं वा तदवाप्यापि मम शोको नापगच्छेदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.8।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.8।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.8।।एवं युद्धम् आरभ्य निवृत्तव्यापारान् भवतो धार्तराष्ट्राः प्रसह्य हन्युः इति चेत् अस्तु तद्वधलब्धविजयात् अधर्म्याद् अस्माकं धर्माधर्मौ अजानद्भिः तैः हननम् एव गरीयः इति मे प्रतिभाति इति उक्त्वा यत् मह्यं श्रेय इति निश्चितं तत् शरणागताय तव शिष्याय मे ब्रूहि इति अतिमात्रकृपणो भगवत्पादाम्बुजम् उपससार।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.8 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.9 】

▸ Sanskrit Sloka: सञ्जय उवाच | एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेश: परन्तप | न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह ||

▸ Transliteration: sañjaya uvāca | evamuktvā hṛṣīkeśaṁ guḍākeśaḥ parantapa | na yotsya iti govinda muktvā tūṣṇīṁ babhūva ha ||

▸ Glossary: sañjaya uvācha: Sañjaya said; evam: thus; uktvā: after speaking; hṛṣīkeśam: unto Kṛṣṇa, the master of the senses; guḍākeśaḥ: one who has won over sleep (Arjuna); parantapa: destroyer of the enemies; na yotsye: I shall not fight; iti: thus; govindam: unto Kṛṣṇa, the giver of pleasure; uktvā: having said; tūṣnīṁ: silent; babhūva: became; ha: clearly

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.9 Sañjaya said: Guḍākeśa (Arjuna) then said to Hṛṣīkeśa (Kṛṣṇa), ‘Govinda, I shall not fight,’ and fell silent.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.9।।सञ्जय बोले हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र ऐसा कहकर निद्राको जीतनेवाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्दसे मैं युद्ध नहीं करूँगा ऐसा स्पष्ट कहकर चुप हो गये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.9।। संजय ने कहा -- इस प्रकार गुडाकेश परंतप अर्जुन भगवान् हृषीकेश से यह कहकर कि हे गोविन्द मैं युद्ध नहीं करूँगा चुप हो गया।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.9 एवम् thus? उक्त्वा having spoken? हृषीकेशम् to Hrishikesha? गुडाकेशः Arjuna (the coneror of sleep)? परन्तप destroyer of foes? न योत्स्ये I will not fight? इति thus? गोविन्दम् to Govinda? उक्त्वा having said? तूष्णीम् silent? बभूव ह became.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.9. Sanjaya said O scorcher of foes (O Dhrtarastra) ! Having spoken to Hrsikesa (the master of sense-organs), Govinda (Krsna) in this manner, and having declared 'I will not fight', Gudakesa (Arjuna), became silent !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.9 Sanjaya continued: "Arjuna, the conqueror of all enemies, then told the Lord of All-Hearts that he would no fight, and became silent, O King!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.9 Sanjaya said Having spoken thus to Sri Krsna, Arjuna, the coneror of sleep and the scorcher of foes, said, 'I will not fight' and became silent.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.9 Sanjaya said Having spoken thus to Hrsikesa (Krsna), Gudakesa (Arjuna), the afflictor of foes, verily became silent, telling Govinda, 'I shall not fight.' fight.'

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.9 Sanjaya said Having spoken thus to Hrishikesha (the Lord of the senses), Arjuna (the coneror of sleep), the destroyer of foes, said to Krishna, "I will not fight" and became silent.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.9 See Comment under 2.10

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.9 - 2.10 Sanjaya said

Chapter 2 (Part 4)

Thus, the Lord, the Supreme Person, introduced the Sastra regarding the self for the sake of Arjuna - whose natural courage was lost due to love and compassion in a misplaced situation, who thought war to be unrighteous even though it was the highest duty for warriors (Ksatriyas), and who took refuge in Sri Krsna to know what his right duty was -, thinking that Arjuna's delusion would not come to an end except by the knowledge of the real nature of the self, and that war was an ordained duty here which, when freed from attachment to fruits, is a means for self-knowledge. Thus, has it been said by Sri Yamunacarya: 'The introduction to the Sastra was begun for the sake of Arjuna, whose mind was agitated by misplaced love and compassion and by the delusion that righteousness was unrighteousness, and who took refuge in Sri Krsna.'

The Supreme Person spoke these words as if smiling, and looking at Arjuna, who was thus overcome by grief resulting from ignorance about the real nature of the body and the self, but was nevertheless speaking about duty as if he had an understanding that the self is distinct from the body, and while he (Arjuna), torn between contradictory ideas, had suddenly become inactive standing between the two armies that were getting ready to fight. Sri Krsna said, as if in ridicule, to Arjuna the words beginning with, 'There never was a time when I did not exist' (II. 12), and ending with 'I will release you from all sins; grieve not!' (XVIII. 66) - which have for their contents the real nature of the self, of the Supreme Self, and of the paths of work (Karma), knowledge (Jnana) and devotion (Bhakti) which constitute the means for attaining the highest spiritual fulfilment.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.9 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.9।। संजय आगे वर्णन करते हुये कहता है कि भगवान् की शरण में जाकर गुडाकेशनिद्राजित एवं शत्रु प्रपीड़क अर्जुन ने यह कहा कि वह युद्ध नहीं करेगा और फिर वह मौन हो गया।केवल एक अंध धृतराष्ट्र को छोड़कर किसी भी व्यक्ति को यह अधिकार या सार्मथ्य नहीं थी कि वह युद्ध को इन क्षणों में भी रोक सके। अवश्यंभावी और अपरिहार्य युद्ध को धृतराष्ट्र द्वारा रोकने की क्षीण आशा संजय के हृदय में थी। शत्रुपीड़क अर्जुन अब तीनों जगत् को जीतने वाले (गोविन्द) भगवान् श्रीकृष्ण की शरण में पहुँच गया था इसलिये उसकी विजय अब निश्चित थी परन्तु जन्मान्ध धृतराष्ट्र ने किसी की भी श्रेष्ठ सलाह को अत्यधिक पुत्र प्रेम के कारण नहीं सुना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.9।।जिताज्ञाननिन्द्रोऽपि शत्रुतापनोऽपि हृषीकेशनियमितसर्वेन्द्रियोऽज्ञानं युद्धोपरतिं चाङ्गीकृत्य लोकोद्धारार्थ वेदार्थप्रकाशनाय वेदज्ञं परमात्मानं गोविन्दमेवमुक्त्वा तूष्णीं बभूवेति सूचयन्नाह  एवमिति।  एवं पूर्वोक्तप्रकारेण हृषीकेशं सर्वेन्द्रियनियन्तारमुक्त्वा गुडाकेशोऽर्जुनः परंतपः शत्रुतापनो न योत्स्ये युद्धं न करिष्यामीति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं वाग्व्यापारविनिर्मुक्तो बभूवेत्यर्थः। हेति वाक्यालंकारे। स्वभावतो जितालस्ये सर्वशत्रुतापने च तस्मिन्नागन्तुकमालस्यमतापकत्वं च नास्पदमध्यास्यतीति द्योतियितुं हशब्दः। गोविन्दहृषीकेशपदाभ्यां सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वसूचकाभ्यां भगवतस्तन्मोहापनोदनमनायाससाध्यमिति सूचितमिति केचित्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.9।।तदनन्तरमर्जुनः किं कृतवानिति धृतराष्ट्राकाङ्क्षायां गुडाकेशो जितालस्यः परंतपः शत्रुतापनोऽर्जुनः हृषीकेशं सर्वेन्द्रियप्रवर्तकत्वेनान्तर्यामिणं गोविन्दं गां वेदलक्षणां वाणीं विन्दतीति व्युत्पत्त्या सर्ववेदोपादानत्वेन सर्वज्ञम्। आदौ एवंकथं भीष्ममहं संख्ये इत्यादिना युद्धस्वरूपायोग्यतामुक्त्वा तदनन्दरंन योत्स्ये इति युद्धफलाभावं चोक्त्वा तूष्णीं बभूव। बाह्येन्द्रियव्यापारस्य युद्धार्थं पूर्वं कृतस्य निवृत्त्या निर्व्यापारो जात इत्यर्थः। स्वभावतो जितालस्ये सर्वशत्रुतापने च तस्मिन्नागन्तुकमालस्यमतापकत्वं च नास्पदमादधातीति द्योतयितुं हशब्दः। गोविन्दहृषीकेशपदाभ्यांसर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वसूचकाभ्यां भगवतस्तन्मोहापनोदनमनायाससाध्यमिति सूचितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.8 2.9।।ननु क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतपेति युद्धमेव श्रेय इत्युक्तं किं पुनः पृच्छसीत्यत आह  नहीति।  बन्धुनाशनिमित्तः शोको राज्यलाभेन स्वर्गाधिपत्यलाभेन वा न निवर्तयिष्यत इति युद्धादन्यं कंचित् निवृत्तिरूपं शमोपायं ब्रूहीत्याशयः। अत्रार्जुनविषादव्याजेन ब्रह्मविद्याधिकारिविशेषणं भैक्षचर्या इहामुत्रार्थफलभोगविरागश्च दर्शितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.9।।एवमुक्त्वाऽर्जुनः किं कृतवानित्यत आह एवमुक्त्वेति। गुडाकेशोऽर्जुनः हृषीकेशं तथेन्द्रियप्रेरकमेवमुक्त्वा पूर्वोक्तप्रकारमुक्त्वा गोविन्दं भक्तपरिपालकंन योत्स्ये इत्युक्त्वा तूष्णीं बभूव। ह इत्याश्चर्ये। भगवदुक्तोऽपि न राज्यस्य स्पृहालुर्जातः। परन्तप उत्कृष्टं तपो यस्येति सम्बोधनम् त्वदीयाः श्रीकृष्णसम्मुखे जीवितं त्यक्त्वा कृतार्था भविष्यन्ति इत्यभिप्रायेण। अत एवपार्थास्त्रपूताः पदमापुरस्य भाग.3।2।20 इति वचनं गीयते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.9।।एवमुक्त्वाऽर्जुनः किं कृतवानित्यपेक्षायां संजय उवाच। एवमिति स्पष्टार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.9।।एवमुक्त्वाऽर्जुनः किं कृतवानित्यपेक्षायां सञ्जय उवाच एवमिति। गुडाका निद्रा तस्या ईशः तन्द्रारहितोऽपि गुडाऽलको वा। सर्वेन्द्रियाध्यक्षं गोविन्दं शरणागतः व्रजेन्द्रमिति।न योत्स्ये इत्युक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.9।।No such translation is available. Translation starts from 2.10

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.9।। एवमुक्त्वा हृषीकेषम् ৷৷. बभूव ह   अर्जुनने अपना और भगवान्का दोनोंका पक्ष सामने रखकर उनपर विचार किया तो अन्तमें वे इसी निर्णयपर पहुँचे कि युद्ध करनेसे तो अधिकसेअधिक राज्य प्राप्त हो जायगा मान हो जायगा संसारमें यश हो जायगा परन्तु मेरे हृदयमें जो शोक है चिन्ता है दुःख है वे दूर नहीं होंगे। अतः अर्जुनको युद्ध न करना ही ठीक मालूम दिया।यद्यपि अर्जुन भगवान्की बातका आदर करते हैं और उसको मानना भी चाहते हैं परंतु उनके भीतर युद्ध करनेकी बात ठीकठीक जँच नहीं रही है। इसलिये अर्जुन अपने भीतर जँची हुई बातको ही यहाँ स्पष्टरूपसे साफसाफ कह देते हैं कि मैं युद्ध नहीं करूँगा। इस प्रकार जब अपनी बात अपना निर्णय भगवान्से साफसाफ कह दिया तब भगवान्से कहनेके लिये और कोई बात बाकी नहीं रही अतः वे चुप हो जाते हैं। सम्बन्ध   जब अर्जुनने युद्ध करनेके लिये साफ मना कर दिया तब उसके बाद क्या हुआ इसको सञ्जय आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.7 2.10।।कार्पण्येत्यादि। सेनयोरुभयोर्मध्ये इत्यादिनेदं सूचयति संशयाविष्टोऽर्जुनो नैकपक्षेण ( नोऽनेक ) युद्धान्निवृत्तः यत एवमाह स्म शाधि मा त्वां (S omits त्वाम्) प्रपन्नम् इति। अतः उभयोरपि ज्ञानाज्ञानयोर्मध्यगः श्रीभगवतानुशिष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.9।।एवमर्जुनेन स्वाभिप्रायं भगवन्तं प्रति प्रकाशितं संजयो राजानमावेदितवानित्याह  संजय इति।  एवं प्रागुक्तप्रकारेण भगवन्तं प्रत्युक्त्वा परंतपोऽर्जुनो न योत्स्ये न संप्रहरिष्येऽत्यन्तासह्यशोकप्रसङ्गादिति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीमब्रुवन्बभूव किलेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.9।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.9।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.9।।संजय उवाच एवं अस्थाने समुपस्थितस्नेहकारुण्याभ्याम् अप्रकृतिं गतं क्षत्रियाणां युद्धं परमं धर्मम् अपि अधर्मं मन्वानं धर्मबुभुत्सया च शरणागतं पार्थम् उद्दिश्य आत्मयाथात्म्यज्ञानेन युद्धस्य फलाभिसन्धिरहितस्य स्वधर्मस्य आत्मयाथार्थ्यप्राप्त्युपायताज्ञानेन च विना अस्य मोहो न शाम्यति इति मत्वा भगवता परमपुरुषेण अध्यात्मशास्त्रावतरणं कृतम्। तदुक्तम्अस्थाने स्नेहकारुण्यधर्माधर्मधियाकुलम्। पार्थं प्रपन्नमुद्दिश्य शास्त्रावतरणं कृतम्।। (गीतार्थसंग्रह 5) इति।।तम् एवं देहात्मनोः याथात्म्यज्ञाननिमित्तशोकाविष्टं देहातिरिक्तात्मज्ञाननिमित्तिं च धर्मं भाषमाणं परस्परं विरुद्धगुणान्वितम् उभयोः सेनयोः युद्धाय उद्युक्तयोः मध्ये अकस्मात् निरुद्योगं पार्थम् आलोक्य परमपुरुषः प्रहसन् इव इदम् उवाच। परिहासवाक्यं वदन् इव आत्मपरमात्मयाथात्म्यतत्प्राप्त्युपायभूतकर्मयोगज्ञानयोगभक्तियोगगोचरम्न त्वेवाहं जातु नासम् (गीता 2।12) इत्यारभ्यअहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः। (गीता 18।66) इत्येतदन्तम् उवाच इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: 2.9 Sri Sankaracharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.10.

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【 Verse 2.10 】

▸ Sanskrit Sloka: तमुवाच हृषीकेश: प्रहसन्निव भारत | सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वच: ||

▸ Transliteration: tam uvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata | senayor ubhayor madhye viṣīdantamidaṁ vacaḥ ||

▸ Glossary: tam: unto him; uvācha: said; hṛṣīkeśaḥ: the master of the senses, Kṛṣṇa; prahasan: smiling; iva: as if; bhārata: O Dhṛtarāṣṭra, descendant of Bhārata; senayoḥ: of the armies; ubhayoḥ: of both; madhye: between; viṣīdantam : unto the lamenting one; idaṁ: the following; vachaḥ: words

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.10 Kṛṣṇa, Hṛṣikeśa, smilingly spoke the following words to the grief-stricken Arjuna, as they were placed in the middle of both armies.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.10।।हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.10।। हे भारत (धृतराष्ट्र) दोनों सेनाओं के बीच में उस शोकमग्न अर्जुन को भगवान् हृषीकेश ने हँसते हुए से यह वचन कहे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.10 तम् to him? उवाच spoke? हृषीकेशः Hrishikesha? प्रहसन् smiling? इव as it were? भारत O Bharata? सेनयोः of the armies? उभयोः (of) both? मध्ये in the middle? विषीदन्तम् despondent? इदम् this? वचः word.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.10. O descendant of Bharata (O Dhrtarastra) ! Hrsikesa, as if [he was] smiling, spoke to him who was sinking in despondency in between two armies.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.10 Thereupon the Lord, with a gracious smile, addressed him who was so much depressed in the midst of the two armies.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.10 O King, to him who was thus sorrowing between the two armies, Sri Krsna spoke the following words, as if smiling (by way of ridicule).

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.10 O descendant of Bharata, to him who was sorrowing between the two armies, Hrsikesa, mocking as it were, said these words:

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.10 To him who was despondent in the midst of the two armies, Krishna, as if smiling, O Bharata, spoke these words.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.7-10 Karpanya-etc. upto vacah. By the portion 'in between the two armies' etc., [the Sage] indicates this : Beings possessed by doubt, Arjuna had not abstained from the war totally; for, he says thus : 'Please teach me, who am taking refuge in you'. Therefore while he still remains just in between both knowledge and ignorance, he is taught by the glorious Bhagavat.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.9 - 2.10 Sanjaya said Thus, the Lord, the Supreme Person, introduced the Sastra regarding the self for the sake of Arjuna - whose natural courage was lost due to love and compassion in a misplaced situation, who thought war to be unrighteous even though it was the highest duty for warriors (Ksatriyas), and who took refuge in Sri Krsna to know what his right duty was -, thinking that Arjuna's delusion would not come to an end except by the knowledge of the real nature of the self, and that war was an ordained duty here which, when freed from attachment to fruits, is a means for self-knowledge. Thus, has it been said by Sri Yamunacarya: 'The introduction to the Sastra was begun for the sake of Arjuna, whose mind was agitated by misplaced love and compassion and by the delusion that righteousness was unrighteousness, and who took refuge in Sri Krsna.'

The Supreme Person spoke these words as if smiling, and looking at Arjuna, who was thus overcome by grief resulting from ignorance about the real nature of the body and the self, but was nevertheless speaking about duty as if he had an understanding that the self is distinct from the body, and while he (Arjuna), torn between contradictory ideas, had suddenly become inactive standing between the two armies that were getting ready to fight. Sri Krsna said, as if in ridicule, to Arjuna the words beginning with, 'There never was a time when I did not exist' (II. 12), and ending with 'I will release you from all sins; grieve not!' (XVIII. 66) - which have for their contents the real nature of the self, of the Supreme Self, and of the paths of work (Karma), knowledge (Jnana) and devotion (Bhakti) which constitute the means for attaining the highest spiritual fulfilment.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.10 And here, the text commencing from 'But seeing the army of the Pandavas' (1.2) and ending with '(he) verily became silent, telling Him (Govinda), "I shall not fight"' is to be explained as revealing the cause of the origin of the defect in the from of sorrow, delusion, etc. [Delusion means want of discrimination. Etc. stands for the secondary manifestations of sorrow and delusion, as also ignorance which is the root cause of all these.] which are the sources of the cycles of births and deaths of creatures. Thus indeed, Ajuna's own sorrow and delusion, cuased by the ideas of affection, parting, etc., originating from the erroneous belief, 'I belong to these; they belong to me', with regard to kingdom [See note under verse 8.-Tr.], elders, sons, comrades, well-wishers (1.26), kinsmen (1.37), relatives (1.34) and friends, have been shown by him with the words, 'How can I (fight)৷৷.in battle (against) Bhisma' (4), etc. It is verily because his discriminating insight was overwhelmed by sorrow and delusion that, even though he had become engaged in battle out of his own accord as a duty of the Ksatriyas, he desisted from that war and chose to undertake other's duties like living on alms etc. It is thus that in the case of all creatures whose minds come under the sway of the defects of sorrow, delusion, etc. there verily follows, as a matter of course, abandoning their own duties and resorting to prohibited ones. Even when they engage in their own duties their actions with speech, mind, body, etc., are certainly motivated by hankering for rewards, and are accompanied by egoism. [Egoism consists in thinking that one is the agent of some work and the enjoyer of its reward.] Such being the case, the cycle of births and deaths characterized by passing through desireable and undesirable births, and meeting with happiness, sorrow, etc. [From virtuous deeds follow attainment of heaven and happiness. From unvirtuous, sinful deeds follow births as beasts and other lowly beings, and sorrow. From the performance of both virtuous and sinful deeds follows birth as a human being, with a mixture of happiness and sorrow.] from the accumulation of virtue and vice, continues unendingly. Thus, sorrow and delusion are therefore the sources of the cycles of births and deaths. And their cessation comes from nothing other than the knowledge of the Self which is preceded by the renunciation of all duties. Hence, wishing to impart that (knowledge of the Self) for favouring the whole world, Lord Vasudeva, making Arjuna the medium, said, 'You grieve for those who are not to be grieved for,' etc. As to that some (opponents) [According to A.G. the opponent is the Vrttikara who, in the opinion of A. Mahadeva Sastri, is none other than Bodhayana referred to in Sankaracarya's commentary on B.S. 1.1.11-19.-Tr.] say: Certainly, Liberation cannot be attained merely from continuance in the knowledge of the Self which is preceded by renunciation of all duties and is independent of any other factor. What then? The well-ascertained conclusion of the whole of the Gita is that Liberation is attained through Knowledge associated with rites and duties like Agnihotra etc. prescribed in the Vedas and the Smrtis. And as an indication of this point of view they ote (the verses): 'On the other hand, if you will not fight this righteous (battle)' (33); 'Your right is for action (rites and duties) alone' (47); 'Therefore you undertake action (rites and duties) itself' (4.15), etc. Even this objection should not be raised that Vedic rites and duties lead to sin since they involve injury etc.'. Objection: How? Opponent: The duties of the Ksatriyas, charaterized by war, do not lead to sin when undertaken as one's duty, even though they are extremely cruel since they involve violence against elders, brothers, sons and others. And from the Lord's declaration that when they are not performed, 'then, forsaking your own duty and fame, you will incur sin' (33), it stands out as (His) clearly stated foregone conclusion that one's own duties prescribed in such texts as, '(One shall perform Agnihotra) as long as one lives' etc., and actions which involve crutely to animals etc. are not sinful. Vedantin: That is wrong because of the assertion of the distinction between firm adherence (nistha) to Knowledge and to action, which are based on two (different) convictions (buddhi). The nature of the Self, the supreme Reality, determined by the Lord in the text beginning with 'Those who are not to be grieved for' (11) and running to the end of the verse, 'Even considering your own duty' (31), is called Sankhya. Sankhya-buddhi [Sankhya is that correct (samyak) knowledge of the Vedas which reveals (khyayate) the reality of the Self, the supreme Goal. The Reality under discussion, which is related to this sankhya by way of having been revealed by it, is Sankhya.] (Conviction about the Reality) is the conviction with regard to That (supreme Reality) arising from the ascertainment of the meaning of the context [Ascertainment৷৷.of the context, i.e., of the meaning of the verses starting from, 'Never is this One born, and never does It die,' etc. (20).] that the Self is not an agent because of the absence in It of the six kinds of changes, viz birth etc. [Birth, continuance, growth, transformation, decay and death.] Sankhyas are those men of Knowledge to whom that (conviction) becomes natural. Prior to the rise of this Conviction (Sankhya-buddhi), the ascertained [Ast. and A.G. omit this word 'ascertainment, nirupana'-Tr.] of the performance of the disciplines leading to Liberation which is based on a discrimination between virtue and vice, [And adoration of God]. and which presupposes the Self's difference from the body etc. and Its agentship and enjoyership is called Yoga. The conviction with regard to that (Yoga) is Yoga-buddhi. The performers of rites and duties, for whom this (conviction) is appropriate, are called yogis. Accordingly, the two distinct Convictions have been pointed out by the Lord in the verse, 'This wisdom (buddhi) has been imparted to you from the standpoint of Self-realization (Sankhya). But listen to this (wisdom) from the standpoint of (Karma-) yoga' (39). And of these two, the Lord will separately speak, with reference to the Sankhyas, of the firm adherence to the Yoga of Knowledge. [Here Yoga and Knowledge are identical. Yoga is that through which one gets connected, identified. with Brahman.] which is based on Sankya-buddhi, in, 'Two kinds of adherences were spoken of by Me in the form of the Vedas, in the days of yore.' [This portion is ascending to G1.Pr. and A.A.; Ast. omits this and otes exactly the first line of 3.3. By saying, 'in the form of the Vedas', the Lord indicates that the Vedas, which are really the knowledge inherent in God and issue out of Him, are identical with Himself.-Tr.] similarly, in, 'through the Yoga of Action for the yogis' (3.3), He will separately speak of the firm adherence to the Yoga [Here also Karma and Yoga are identical, and lead to Liberation by bringing about purity of heart which is followed by steadfastness in Knowledge.] of Karma which is based on Yoga-buddhi (Conviction about Yoga). Thus, the two kinds of steadfastness that based on the conviction about the nature of the Self, and that based on the conviction about rites and duties have been distinctly spoken of by the Lord Himself, who saw that the coexistence of Knowledge and rites and duties is not possible in the same person, they being based on the convictions of non-agentship and agentship, unity and diversity (respectively). As is this teaching about the distinction (of the two adherences), just so has it been revealed in the Satapatha Brahmana: 'Desiring this world (the Self) alone monks and Brahmanas renounce their homes' (cf. Br. 4.4.22). After thus enjoining renunciation of all rites and duties, it is said in continuation, 'What shall we acheive through childeren, we who have attained this Self, this world (result).' [The earlier otation implies an injuction (vidhi) for renunciation, and the second is an arthavada, or an emphasis on that injunction. Arthavada: A sentence which usually recommends a vidhi, or precept, by stating the good arising from its proper observance, and the evils arising from its omission; and also by adducing historical instances in its support.-V.S.A] Again, there itself it is said that, before accepting a wife a man is in his natural state [The state of ignorance owing to non-realization of Reality. Such a person is a Brahmacarin, who goes to a teacher for studying the Vedas]. And (then) after his eniries into rites and duties, [The Brahmacarin first studies the Vedas and then enires into their meaning. Leaving his teacher's house after completing his course, he becomes a house holder.] 'he' for the attainment of the three worlds [This world, the world of manes and heaven.-Tr.] 'desired' (see Br. 1.4.17) as their means a son and the two kinds of wealth consists of rites and duties that lead to the world of manes, and the divine wealth of acisition of vidya (meditation) which leads to heaven. In this way it is shown that rites and duties enjoined by the Vedas etc. are meant only for one who is unenlightened and is passessed of desire. And in the text, 'After renouncing they take to mendicancy' (see Br. 4.4.22), the injunction to renounce is only for one who desires the world that is the Self, and who is devoid of hankering (for anything else). Now, if the intention of the Lord were the combination of Knowledge with Vedic rites and duties, then this utterance (of the Lord) (3.3) about the distinction would have been illogical. Nor would Arjuna's estion, 'If it be Your opinion that wisdom (Knowledge) is superior to action (rites and duties)৷৷.,' etc. (3.1) be proper. If the Lord had not spoken earlier of the impossibility of the pursuit of Knowledge and rites and duties by the same person (at the same time), then how could Arjuna falsely impute to the Lord by saying, 'If it be your opinion that wisdom is superior to action৷৷৷৷' (of having spoken) what was not heard by him, viz the higher status of Knolwedge over rites and duties? Morevoer, if it be that the combination of Knowledge with rites and duties was spoken of for all, then it stands enjoined, ipso facto, on Arjuna as well. Therefore, if instruction had been given for practising both, then how could the estion about 'either of the two' arise as in, 'Tell me for certain one of these (action and renunciation) by which I may attain the highest Good' (3.2)? Indeed, when a physician tells a patient who has come for a cure of his biliousness that he should take things which are sweet and soothing, there can arise no such reest as, 'Tell me which one of these two is to be taken as a means to cure biliousness'! Again, if it be imagined that Arjuna put the estion because of his noncomprehension of the distinct meaning of what the Lord had said, even then the Lord ought to have answered in accordance with the estion: 'The combination of Knowledge with rites and duties was spoken of by Me. Why are you confused thus?' On the other hand, it was not proper to have answered, 'Two kinds of steadfastness were spoken of by Me it the days of yore,' in a way that was inconsistent and at variance with the estion. Nor even do all the statements about distinction etc. become logical if it were intended that Knowledge was to be combined with rites and duties enjoined by the Smrtis only. Besides, the accusation in the sentence, 'Why then do you urge me to horrible action' (3.1) becomes illogical on the part of Arjuna who knew that fighting was a Ksatriya's natural duty enjoined by the Smrtis. Therefore, it is not possible for anyone to show that in the scripture called the Gita there is any combination, even in the least, of Knowledge of the Self with rites and duties enjoined by the Srutis or the Smrtis. But in the case of a man who had engaged himself in rites and duties because of ignorance and defects like the attachment, and then got his mind purified through sacrifices, charities or austerities (see Br. 4.4.22), there arises the knowledge about the supreme Reality that all this is but One, and Brahman is not an agent (of any action). With regard to him, although there is a cessation of rites and duties as also of the need for them, yet, what may, appear as his diligent continuance, just as before, in those rites and duties for setting an example before people that is no action in which case it could have stood combined with Knowledge. Just as the actions of Lord Vasudeva, in the form of performance of the duty of a Ksatriya, do not get combined with Knowledge for the sake of achieving the human goal (Liberation), similar is the case with the man of Knowledge because of the absence of hankering for results and agentship. Indeed, a man who has realized the Truth does not thingk 'I am doing (this)' nor does he hanker after its result. Again, as for instance, person hankering after such desirable things as heaven etc. may light up a fire for performing such rites as Agnihotra etc. which are the mans to attain desirable things; [The Ast. reading is: Agnihotradi-karma-laksana-dharma-anusthanaya, for the performance of duties in the form of acts like Agnihotra etc.-Tr.] then, while he is still engaged in the performance of Agnihotra etc. as the means for the desirable things, the desire may get destroyed when the rite is half-done. He may nevertheless continue the performance of those very Agnihotra etc.; but those performance of those very Agnihotra etc.; but those Agnihotra etc. cannot be held to be for this personal gain. Accordingly does the Lord also show in various places that, 'even while perfroming actions,' he does not act, 'he does not become tainted' (5.7). As for the texts, '৷৷.as was performed earlier by the ancient ones' (4.15), 'For Janaka and others strove to attain Liberation through action itself' (3.20), they are to be understood analytically. Objection: How so? Vedantin: As to that, if Janaka and others of old remained engaged in activity even though they were knowers of Reality, they did so for preventing people from going astray, while remaining established in realization verily through the knowledge that 'the organs rest (act) on the objects of the organs' (3.28). The idea is this that, though the occasion for renunciation of activity did arise, they remained established in realization along with actions; they did not give up their rites and duties. On the other hand, if they were not knowers of Reality, then the explanation should be this; Through the discipline of dedicating rites and duties to God, Janaka and others remained established in perfection (samsiddhi) either in the form of purification of mind or rise of Knowledge. This very idea [The idea that rites and duties become the cause of Knowledge through the purification of the mind.] will be expressed by the Lord in, '(the yogis) undertake action for the purification of oneself (i.e. of the heart, or the mind)' (5.11). After having said, 'A human being achieves success by adoring Him through his own duties' [By performing one's own duty as enjoined by scriptures and dedicating their results to God, one's mind becomes purified. Then, through Gods grace one becomes fit for steadfastness in Knowledge. From that steadfatness follows Liberation. Therefore rites and duites do not directly lead to Liberation. (See Common. under 5.12) (18.46), He will again speak of the steadfastness in Knowledge of a person who has attained success, in the text, '(Understand৷৷.from Me৷৷.that process by which) one who has achieved success attains Brahman' (18.50). So, the definite conclusion in the Gita is that Liberation is attained only from the knowledge of Reality, and not from its combination with action. And by pointing out in the relevant contexts the (aforesaid) distinction, we shall show how this conclusion stands. That being so, Lord Vasudeva found that for Arjuna, whose mind was thus confused about what ought to be done [The ast. and A.A., have an additional word mithyajnanavatah, meaning 'who had false ignorance'.-Tr.] and who was sunk in a great ocean of sorrow, there could be no rescue other than through the knowledge of the Self. And desiring to rescue Arjuna from that, He said, '(You grieve for) those who are not to be grieved for,' etc. by way of introducing the knowledge of the Self. [In this Gita there are three distinct parts, each part consisting of six chapters. These three parts deal with the three words of the great Upanisadic saying, 'Tattvamasi, thou art That', with a view to finding out their real meanings. The first six chapters are concerned with the word tvam (thou); the following six chapters determine the meaning of the word tat (that); and the last six reveal the essential identity of tvam and tat. The disciplines necessary for realization this identity are stated in the relevant places.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.10।। इस प्रकार धर्म और अधर्म शुभ और अशुभ इन दो सेनाओं के संव्यूहन के मध्य अर्जुन (जीव) पूर्ण रूप से अपने सारथी भगवान् श्रीकृष्ण (सूक्ष्म विवेकवती बुद्धि) की शरण में आत्मसमर्पण करता है जो पाँच अश्वों (पंच ज्ञानेन्द्रियों) द्वारा चालित रथ (देह) अपने पूर्ण नियन्त्रण में रखते हैं।ऐसे दुखी और भ्रमित व्यक्ति जीव अर्जुन को श्रीकृष्ण सहास्य उसकी अन्तिम विजय का आश्वासन देने के साथ ही गीता के आत्ममुक्ति का आध्यात्मिक उपदेश भी करते हैं जिसके ज्ञान से सदैव के लिये मनुष्य के शोक मोह की निवृत्ति हो जाती है।उपनिषद् के रूपक को ध्यान में रखकर यदि हम संजय द्वारा चित्रित दृश्य का वर्णन उपर्युक्त प्रकार से करें तो इसमें हमें सनातन पारमार्थिक सत्य के दर्शन होंगे। जब जीव (अर्जुन) विषादयुक्त होकर शरीर में (देह) स्थित हो जाता है और सभी स्वार्थ पूर्ण कर्मों के साधनों (गाण्डीव) को त्यागकर इन्द्रियों को (श्वेत अश्व) मन की लगाम के द्वारा संयमित करता है तब सारथि (शुद्ध बुद्धि) जीव को धर्म शक्ति की सहायता से वह दैवी सार्मथ्य और मार्गदर्शन प्रदान करता है जिससे अधर्म की बलवान सेना को भी परास्त कर जीव सम्पूर्ण विजय को प्राप्त करता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.10।।   एतदनन्तरं भगवान्किं कृतवानित्यत आह  तमिति।  तं सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तं शोकमोहावङ्गीकुर्वन्तं अर्जुनं हृषीकेशो भगवान्वासुदेवः प्रहसन्निव मदाज्ञावशवर्तिनि त्वय्यहं प्रसन्नोऽस्मीति प्रकटयन्निवेदं वक्ष्यमाणं वचो वचनमुवाच। अनुचिताचरणप्रकाशनेन लज्जाम्बुधौ मज्जयन्निवेति केचित्। मूढोऽप्ययममूढवद्वदतीति प्रहसन्निवेत्यन्ये। त्वमपि भरतवंशोद्भवत्वाद्भगवद्वाक्यं सावधानतया श्रोतुमर्हसीति द्योतयन्संजयः प्रज्ञाचक्षुषं धृतराष्ट्रं संबोधयति भारतेति तदाश्वासार्थं भारतान्वयेत्येवं संबोध्य भगवांस्तमुवाचेत्येके।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.10।।एवं युद्धमुपेक्षितवत्यप्यर्जुने भगवान्नोपेक्षितवानिति धृतराष्ट्रदुराशानिरासायाह सेनयोरुभयोर्मध्ये युद्धोद्यमेनागत्य तद्धिरोधिनं विषादं मोहं प्राप्नुवन्तं तमर्जुनं प्रहसन्निव अनुचिताचरणप्रकाशनेन लज्जाम्बुधौ मज्जयन्निव हृषीकेशः सर्वान्तर्यामी भगवानिदं वक्ष्यमाणमशोच्यानित्यादि वचः परमगम्भीरार्थमनुचिताचरणप्रकाशकमुक्तवान्नतूपेक्षितवानित्यर्थः। अनुचिताचरणप्रकाशनेन लज्जोत्पादनं प्रहासः। लज्जा च दुःखात्मिकेति द्वेषविषय एव मुख्यः। अर्जुनस्य तु भगवत्कृपाविषयत्वादनुचिताचरणप्रकाशनस्य च विवेकोत्पत्तिहेतुत्वादेकदलाभावेन गौण एवायं प्रहास इति कथयितुमिवशब्दः। लज्जामुत्पादयितुमिव विवेकमुत्पादयितुमर्जुनस्यानुचिताचरणं भगवता प्रकाश्यते लज्जोत्पत्तिस्तु नान्तरीयकतयास्तु मास्तु वेति न विवक्षितेति भावः। यदि युद्धारम्भात्प्रागेव गृहे स्थितो युद्धमुपेक्षेत तदा नानुचितं कुर्यात् महता संरम्भेण तु युद्धभूमावागत्य तदुपेक्षणमतीवानुचितमिति कथयितुं सेनयोरित्यादिविशेषणम्। एतच्चाशोच्यानित्यादौ स्पष्टं भविष्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.10।। तमिति।  मूढोऽप्ययममूढवद्वदतीति प्रहसन्निव। इदं वक्ष्यमाणम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.10।।ततो भगवान् किमुत्तरितवानित्याकाङ्क्षायामाह तमुवाचेति। हृषीकेशः विषीदन्तमर्जुनं प्रहसन्निव उभयोः सेनयोर्मध्ये इदं वचोऽग्रे वक्ष्यमाणमुवाच। स्वोक्ताकारिष्वपि स्वीयेषु भगवान् पुनर्वदति विश्वासार्थं सम्बोधने भारतेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.10।।ततः किं वृत्तमित्यपेक्षायामाह  तमुवाचेति।  प्रहसन्निव प्रसन्नमुखः सन्नित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.10।।ततः किं जातमिति तमुवाचेति। अहो अस्यात्मतत्त्वाज्ञानतः क्लैव्यं कीदृक् इति प्रहसन् धर्मिष्ठत्वादस्यैतदप्युचितमिति भावेनेत्युक्तम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.10।।यहाँ दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम् इस श्लोकसे लेकर न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह इस श्लोकतकके ग्रन्थकी व्याख्या यों कर लेनी चाहिये कि यह प्रकरण प्राणियोंके शोक मोह आदि जो संसारके बीजभूत दोष है उनकी उत्पत्तिका कारण दिखलानेके लिये है। क्योंकि कथं भीष्ममहं संख्ये इत्यादि श्लोकोंद्वारा अर्जुनने इसी तरह राज्य गुरु पुत्र मित्र सुहृद स्वजन सम्बन्धी और बान्धवोंके विषयमें यह मेरे हैं मैं इनका हूँ इस प्रकार अज्ञानजनित स्नेहविच्छेद आदि कारणोंसे होनेवाले अपने शोक और मोह दिखाये हैं। यद्यपि ( वह अर्जुन ) स्वयं ही पहले क्षात्रधर्मरूप युद्धमें प्रवृत्त हुआ था तो भी शोकमोहके द्वारा विवेकविज्ञानके दब जानेपर ( वह ) उस युद्धसे रुक गया और भिक्षाद्वारा जीवननिर्वाह करना आदि दूसरोंके धर्मका आचरण करनेके लिये प्रवृत्त हो गया। इसी तरह शोकमोह आदि दोषोंसे जिनका चित्त घिरा हुआ हो ऐसे सभी प्राणियोंसे स्वधर्मका त्याग और निषिद्ध धर्मका सेवन स्वाभाविक ही होता है। यदि वे स्वधर्मपालनमें लगे हुए हों तो भी उनके मन वाणी और शरीरादिकी प्रवृत्ति फलाकांक्षापूर्वक और अहंकारसहित ही होती है। ऐसा होनेसे पुण्यपाप दोनों बढ़ते रहनेके कारण अच्छेबुरे जन्म और सुखदुःखोंकी प्राप्तिरूप संसार निवृत्त नहीं हो पाता अतः शोक और मोह यह दोनों संसारके बीजरूप हैं। इन दोनोंकी निवृत्ति सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक आत्मज्ञानके अतिरिक्त अन्य उपायसे नहीं हो सकती। अतः उसका ( आत्मज्ञानका ) उपदेश करने की इच्छावाले भगवान् वासुदेव सब लोगोंपर अनुग्रह करने के लिये अर्जुनको निमित्त बनाकर कहने लगे अशोच्यान् इत्यादि। इसपर कितने ही टीकाकार कहते हैं कि केवल सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक आत्मज्ञाननिष्ठामात्रसे ही कैवल्यकी ( मोक्षकी ) प्राप्ति नहीं हो सकती किंतु अग्निहोत्रादि श्रौतस्मार्तकर्मोंसहित ज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है यही सारी गीताका निश्चित अभिप्राय है। इस अर्थमें वे प्रमाण भी बतलाते हैं जैसे अथ चेत्त्वमिमं धम्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि कर्मण्येवाधिकारस्ते कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम् इत्यादि। ( वे यह भी कहते हैं कि ) हिंसा आदिसे युक्त होनेके कारण वैदिक कर्म अधर्मका कारण है ऐसी शंका भी नहीं करनी चाहिये क्योंकि गुरु भ्राता और पुत्रादिकी हिंसा ही जिसका स्वरूप है ऐसा अत्यन्त क्रूर युद्धरूप क्षात्रकर्म भी स्वधर्म माना जानेके कारण अधर्मका हेतु नहीं है ऐसा कहनेवाले तथा उसके न करनेमें ततः स्वधर्म कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि इस प्रकार दोष बतलानेवाले भगवान्का यह कथन तो पहले ही सुनिश्चित हो जाता है कि जीवनपर्यन्त कर्म करें इत्यादि श्रुतिवाक्योंद्वारा वर्णित पशु आदिकी हिंसारूप कर्मोंको करना अधर्म नहीं है। परंतु वह ( उन लोगोंका कहना ) ठीक नहीं है क्योंकि भिन्नभिन्न दो बुद्धियोंके आश्रित रहनेवाली ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठाका अलगअलग वर्णन है। अशोच्यान् इस श्लोकसे लेकर स्वधर्ममपि चावेक्ष्य इस श्लोकके पहलेके प्रकरणसे भगवान्ने जिस परमार्थआत्मतत्त्वका निरूपण किया है वह सांख्य है तद्विषयक जो बुद्धि है अर्थात् आत्मामें जन्मादि छहों विकारोंका अभाव होनेके कारण आत्मा अकर्ता है इस प्रकारका जो निश्चय उक्त प्रकरणके अर्थका विवेचन करनेसे उत्पन्न होता है वह सांख्यबुद्धि है वह जिन ज्ञानियोंके लिये उचित होती है ( जो उसके अधिकारी हैं ) वे सांख्ययोगी हैं। इस ( उपर्युक्त ) बुद्धिके उत्पन्न होनेसे पहलेपहले आत्माका देहादिसे पृथक्पन कर्तापन और भोक्तापन माननेकी अपेक्षा रखनेवाला जो धर्मअधर्मके विवेकसे युक्त मार्ग है मोक्षसाधनोंका अनुष्ठान करनेके लिये चेष्टा करना ही जिसका स्वरूप है उसका नाम योग है और तद्विषयक जो बुद्धि है वह योगबुद्धि है वह जिन कर्मियोंके लिये उचित होती है ( जो उसके अधिकारी हैं ) वे योगी हैं। इसी प्रकार भगवान्ने एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु इस श्लोकसे अलगअलग दो बुद्धियाँ दिखलायी हैं। उन दोनों बुद्धियोंमेंसे सांख्यबुद्धिके आश्रित रहनेवाली सांख्ययोगियोंकी ज्ञानयोगसे ( होनेवाली ) निष्ठाको पुरा वेदात्मना मया प्रोक्ता इत्यादि वचनोंसे अलग कहेंगे। तथा योगबुद्धिके आश्रित रहनेवाली कर्मयोगसे ( होनेवाली ) निष्ठाको कर्मयोगेन योगिनाम् इत्यादि वचनोंसे अलग कहेंगे। कर्तापनअकर्तापन और एकताअनेकताजैसी भिन्नभिन्न बुद्धिके आश्रित रहनेवाले जो ज्ञान और कर्म हैं उन दोनोंका एक पुरुषमें होना असम्भव माननेवाले भगवान्ने ही स्वयं उपर्युक्त प्रकारसे सांख्यबुद्धि और योगबुद्धिका आश्रय लेकर अलगअलग दो निष्टाएँ कही हैं। जिस प्रकार ( गीताशास्त्रमें ) इन दोनों निष्ठाओंका अलगअलग वर्णन है वैसे ही शतपथ ब्राह्मणमें भी दिखलाया गया है। ( वहाँ ) इस आत्मलोकको ही चाहनेवाले वैराग्यशील ब्राह्मण संन्यास लेते हैं इस प्रकार सर्वकर्मसंन्यासका विधान करके उसी वाक्यके शेष वाक्यसे कहा है कि जिन हमलोगोंका यह आत्मा ही लोक है ( वे हम ) सन्ततिसे क्या ( सिद्ध ) करेंगे। वहीं यह भी कहा है कि प्राकृत आत्मा अर्थात् अज्ञानी मनुष्य धर्मजिज्ञासाके बाद और विवाहसे पहले तीनों लोकोंकी प्राप्तिके साधनरूप पुत्रकी तथा दैव और मानुष ऐसे दो प्रकारके धनकी इच्छा करने लगा। इनमें पितृलोककी प्राप्तिका साधनरूप कर्म तो मानुष धन है और देवलोककी प्राप्तिका साधनरूप विद्या देवधन है। इस तरह ( उपर्युक्त श्रुतिमें ) अविद्या और कामनावाले पुरुषके लिये ही श्रौतादि सम्पूर्ण कर्म बताये गये हैं।उन सब ( कर्मों ) से निवृत्त होकर संन्यास ग्रहण करते हैं इस कथनसे केवल आत्मलोकको चाहनेवाले निष्कामी पुरुषके लिये संन्यासका ही विधान किया है। यदि ( इसपर भी यह बात मानी जायगी कि ) भगवान्को श्रौतकर्म और ज्ञानका समुच्चय इष्ट है तो यह उपर्युक्त विभक्त विवेचन अयोग्य ठहरेगा। तथा ( ऐसा मान लेनेसे ) ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते इत्यादि जो अर्जुन का प्रश्न है वह भी नहीं बन सकता। यदि ज्ञान और कर्मका एक पुरुषद्वारा एक साथ किया जाना असम्भव और कर्मकी अपेक्षा ज्ञानका श्रेष्ठत्व भगवान्ने पहले न कहा होता तो इस तरह अर्जुन बिना सुनी हुई बातका झूठे ही भगवान्में अध्यारोप कैसे करता कि ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः। यदि सभीके लिये ज्ञान और कर्मका समुच्चय कहा होता तो अर्जुनके लिये भी वह कहा ही गया था फिर दोनोंका समुचित उपदेश होते हुए यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् इस प्रकार दोनोंमेंसे एकके ही सम्बन्धमें प्रश्न कैसे होता क्योंकि पित्तकी शान्ति चाहनेवालेको वैद्यके द्वारा यह उपदेश दिया जानेपर कि मधुर और शीत पदार्थ सेवन करना चाहिये रोगोका यह प्रश्न नहीं बन सकता कि उन दोनोंमेंसे किसी एकको ही पित्तकी शान्तिका उपाय बतलाइये। यदि ऐसी कल्पना की जाय कि भगवान्द्वारा कहे हुए वचन न समझनेके कारण अर्जुनने प्रश्न किया है तो फिर भगवान्को प्रश्नके अनुरूप ही यह उत्तर देना चाहिये था कि मैंने तो ज्ञान और कर्मका समुच्चय बतलाया है तू ऐसा भ्रान्त क्यों हो रहा है परंतु प्रश्नसे विपरीत दूसरा ही उत्तर देना कि मैंने दो निष्ठाएँ पहले कही हैं (

Chapter 2 (Part 5)

उपर्युक्त कल्पनाके ) उपयुक्त नहीं है। इसके सिवा यदि केवल स्मार्तकर्मके साथ ही ज्ञानका समुच्चय माना जाय तो भी विभक्त वर्णन आदि सब उपयुक्त नहीं ठहरते। तथा ऐसा माननेसे युद्धरूप स्मार्तकर्म क्षत्रियका स्वधर्म है यह जाननेवाले अर्जुनका इस प्रकार उलाहना देना भी नहीं बन सकता कि तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि गीताशास्त्रमें किञ्चिन्मात्र भी श्रौत या स्मार्त किसी भी कर्मके साथ आत्मज्ञानका समुच्चय कोई भी नहीं दिखा सकता। अज्ञानसे या आसक्ित आदि दोषोंसे कर्ममें लगे हुए जिस पुरुषको यज्ञसे दानसे या तपसे अन्तःकरण शुद्ध होकर परमार्थतत्त्वविषयक ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि यह सब एक ब्रह्म ही है और वह अकर्ता है। उसके कर्ममें कर्म और फल दोनों ही यद्यपि निवृत्त हो चुकते हैं तो भी लोकसंग्रहके लिये पहलेकी भाँति यत्नपूर्वक कर्मोंमें लगे रहनेवाले पुरुषका जो प्रवृत्तिरूप कर्म दिखलायी देता है वह वास्तवमें कर्म नहीं है जिससे कि ज्ञानके साथ उसका समुच्चय हो सके। जैसे भगवान् वासुदेवद्वारा किये हुए क्षात्रकर्मोंका मोक्षकी सिद्धिके लिये ज्ञानके साथ समुच्चय नहीं होता वैसे ही फलेच्छा और अहंकारके अभावकी समानता होनेके कारण ज्ञानीके कर्मोंका भी ( ज्ञानके साथ समुच्चय नहीं होता )। क्योंकि आत्मज्ञानी न तो ऐसा ही मानता है कि मैं करता हूँ और न उन कर्मोंका फल ही चाहता है। इसके सिवा जैसे कामसाधनरूप अग्निहोत्रादि कर्मोंका अनुष्ठान करने के लिये सकाम अग्निहोत्रादिमें लगे हुए स्वर्गादिकी कामनावाले अग्निहोत्रीकी कामना यदि आधा कर्म कर चुकनेपर नष्ट हो जाय और फिर भी उसके द्वारा वही अग्निहोत्रादि कर्म होता रहे तो भी वह काम्यकर्म नहीं होता ( वैसे ही ज्ञानीके कर्म भी कर्म नहीं हैं )। कुर्वन्नपि न लिप्यते न करोति न लिप्यते इत्यादि वचनोंसे भगवान् भी जगहजगह यही बात दिखलाते हैं। इसके सिवा जो पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः इत्यादि वचन हैं उनको विभागपूर्वक समझना चाहिये। पू0 वह किस प्रकार समझें उ0 यदि वे पूर्वमें होनेवाले जनकादि तत्त्ववेत्ता होकर भी लोकसंग्रहके लिये कर्मोंमें प्रवृत्त थे तब तो यह अर्थ समझना चाहिये कि गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं इस ज्ञानसे ही वे परम सिद्धिको प्राप्त हुए अर्थात् कर्मसंन्यासकी योग्यता प्राप्त होनेपर भी कर्मोंका त्याग नहीं किया कर्म करतेकरते ही परम सिद्धिको प्राप्त हो गये। यदि वे जनकादि तत्त्वज्ञानी नहीं थे तो ऐसी व्याख्या करनी चाहिये कि वे ईश्वरके समर्पण किये हुए साधनरूप कर्मोंद्वारा चित्तशुद्धिरूप सिद्धिको अथवा ज्ञानोत्पत्तिरूप सिद्धिको प्राप्त हुए। यही बात भगवान् कहेंगे कि ( योगी ) अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। तथा स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ऐसा कहकर फिर उस सिद्धिप्राप्त पुरुषके लिये सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म इत्यादि वचनोंसे ज्ञाननिष्ठा कहेंगे। सुतरां गीताशास्त्रमें निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञानसे ही मुक्ित होती है कर्मसहित ज्ञानसे नहीं। जैसा यह भगवान्का अभिप्राय है वैसा ही प्रकरणके अनुसार विभागपूर्वक उनउन स्थानोंपर हम आगे दिखलायेंगे।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.10।। व्याख्या    तमुवाच हृषीकेषशः ৷৷. विषीदन्तमिदं वचः   अर्जुनने बड़ी शूरवीरता और उत्साहपूर्वक योद्धाओंको देखनेके लिये भगवान्से दोनों सेनाओंके बीचमें रथ खड़ा करनेके लिये कहा था। अब वहींपर अर्थात् दोनों सेनाओंके बीचमें अर्जुन विषादमग्न हो गये वास्तवमें होना यह चाहिये था कि वे जिस उद्देश्यसे आये थे उस उद्देश्यके अनुसार युद्धके लिये खड़े हो जाते। परन्तु उस उद्देश्यको छोड़कर अर्जुन चिन्ताशोकमें फँस गये। अतः अब दोनों सेनाओंके बीचमें ही भगवान् शोकमग्न अर्जुनको उपदेश देना आरम्भ करते हैं। प्रहसन्निव   (विशेषतासे हँसते हुएकी तरह) का तात्पर्य है कि अर्जुनके भाव बदलनेको देखकर अर्थात् पहले जो युद्ध करनेका भाव था वह अब विषादमें बदल गया इसको देखकर भगवान्को हँसी आ गयी। दूसरी बात अर्जुनने पहले (2। 7 में) कहा था कि मैं आपके शरण हूँ मेरेको शिक्षा दीजिये अर्थात् मैं युद्ध करूँ या न करूँ मेरेको क्या करना चाहिये इसकी शिक्षा दीजिये परन्तु यहाँ मेरे कुछ बोले बिना अपनी तरफसे ही निश्चय कर लिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा यह देखकर भगवान्को हँसी आ गयी। कारण कि शरणागत होनेपर मैं क्या करूँ और क्या नहीं करूँ आदि कुछ भी सोचनेका अधिकार नहीं रहता। उसको तो इतना ही अधिकार रहता है कि शरण्य जो काम कहता है वही काम करे। अर्जुन भगवान्के शरण होनेके बाद मैं युद्ध नहीं करूँगा ऐसा कहकर एक तरहसे शरणागत होनेसे हट गये। इस बातको लेकर भगवान्को हँसी आ गयी। इव का तात्पर्य है कि जोरसे हँसी आनेपर भी भगवान् मुस्कराते हुए ही बोले।जब अर्जुनने यह कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा तब भगवान्को यहीं कह देना चाहिये था कि जैसी तेरी मर्जी आये वैसा कर यथेच्छसि तथा कुरु (18। 63)। परन्तु भगवान्ने यही समझा कि मनुष्य जब चिन्ताशोकसे विकल हो जाता है तब वह अपने कर्तव्यका निर्णय न कर सकनेके कारण कभी कुछ तो कभी कुछ बोल उठता है। यही दशा अर्जुनकी हो रही है। अतः भगवान्के हृदयमें अर्जुनके प्रति अत्यधिक स्नेह होनेके कारण कृपालुता उमड़ पड़ी। कारण कि भगवान् साधकके वचनोंकी तरफ ध्यान न देकर उसके भावकी तरफ ही देखते हैं। इसलिये भगवान् अर्जुनके मैं युद्ध नहीं करूँगा इस वचनकी तरफ ध्यान न देकर (आगेके श्लोकसे) उपदेश आरम्भ कर देते हैं।जो वचनमात्रसे भी भगवान्के शरण हो जाता है भगवान् उसको स्वीकार कर लेते हैं। भगवान्के हृदयमें प्राणियोंके प्रति कितनी दयालुता है हृषीकेश  कहनेका तात्पर्य है कि भगवान् अन्तर्यामी हैं अर्थात् प्राणियोंके भीतरी भावोंको जाननेवाले हैं। भगवान् अर्जुनके भीतरी भावोंको जानते हैं कि अभी तो कौटुम्बिक मोहके वेगके कारण और राज्य मिलनेसे अपना शोक मिटता न दीखनेके कारण यह कह रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा परन्तु जब इसको स्वयं चेत होगा तब यह बात ठहरेगी नहीं और मैं जैसा कहूँगा वैसा ही यह करेगा। इदं वचः उवाच   पदोंमें केवल  उवाच  कहनेसे ही काम चल सकता था क्योंकि  उवाच  के अन्तर्गत ही  वचः  पदका अर्थ आ जाता है। अतः  वचः  पद देना पुनरूक्तिदोष दीखता है। परन्तु वास्तवमें यह पुनरुक्तिदोष नहीं है प्रत्युत इसमें एक विशेष भाव भरा हुआ है। अभी आगेके श्लोकसे भगवान् जिस रहस्यमय ज्ञानको प्रकट करके उसे सरलतासे सुबोध भाषामें समझाते हुए बोलेंगे उसकी तरफ लक्ष्य करनेके लिये यहाँ  वचः  दिया गया है। सम्बन्ध   शोकाविष्ट अर्जुनको शोकनिवृत्तिका उपदेश देनेके लिये भगवान् आगेका प्रकरण कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.7 2.10।।कार्पण्येत्यादि। सेनयोरुभयोर्मध्ये इत्यादिनेदं सूचयति संशयाविष्टोऽर्जुनो नैकपक्षेण ( नोऽनेक ) युद्धान्निवृत्तः यत एवमाह स्म शाधि मा त्वां (S omits त्वाम्) प्रपन्नम् इति। अतः उभयोरपि ज्ञानाज्ञानयोर्मध्यगः श्रीभगवतानुशिष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.10।।तमर्जुनं सेनयोर्वाहिन्योरुभयोर्मध्ये विषीदन्तं विषादं कुर्वन्तमतिदुःखितं शोकमोहाभ्यामभिभूतं स्वधर्मात्प्रच्युतप्रायं प्रतीत्य प्रहसन्निवोपहासं कुर्वन्निव तदाश्वासार्थं हे भारत भरतान्वय इत्येवं संबोध्य भगवानिदं प्रश्नोत्तरं निःश्रेयसाधिगमसाधनं वचनमूचिवानित्याह  तमुवाचेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.10।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.10।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka. The commentary starts from 2.11.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.10।।संजय उवाच एवं अस्थाने समुपस्थितस्नेहकारुण्याभ्याम् अप्रकृतिं गतं क्षत्रियाणां युद्धं परमं धर्मम् अपि अधर्मं मन्वानं धर्मबुभुत्सया च शरणागतं पार्थम् उद्दिश्य आत्मयाथात्म्यज्ञानेन युद्धस्य फलाभिसन्धिरहितस्य स्वधर्मस्य आत्मयाथार्थ्यप्राप्त्युपायताज्ञानेन च विना अस्य मोहो न शाम्यति इति मत्वा भगवता परमपुरुषेण अध्यात्मशास्त्रावतरणं कृतम्। तदुक्तम्अस्थाने स्नेहकारुण्यधर्माधर्मधियाकुलम्। पार्थं प्रपन्नमुद्दिश्य शास्त्रावतरणं कृतम्।। (गीतार्थसंग्रह 5) इति।।तम् एवं देहात्मनोः याथात्म्यज्ञाननिमित्तशोकाविष्टं देहातिरिक्तात्मज्ञाननिमित्तिं च धर्मं भाषमाणं परस्परं विरुद्धगुणान्वितम् उभयोः सेनयोः युद्धाय उद्युक्तयोः मध्ये अकस्मात् निरुद्योगं पार्थम् आलोक्य परमपुरुषः प्रहसन् इव इदम् उवाच। परिहासवाक्यं वदन् इव आत्मपरमात्मयाथात्म्यतत्प्राप्त्युपायभूतकर्मयोगज्ञानयोगभक्तियोगगोचरम्न त्वेवाहं जातु नासम् (गीता 2।12) इत्यारभ्यअहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः। (गीता 18।66) इत्येतदन्तम् उवाच इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.10।। अत्र दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम् (गीता 1.2) इत्यारभ्य यावत् न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह (गीता 2.9) इत्येतदन्तः प्राणिनां शोकमोहादिसंसारबीजभूतदोषोद्भवकारणप्रदर्शनार्थत्वेन व्याख्येयो ग्रन्थः। तथाहि अर्जुनेन राज्यगुरुपुत्रमित्रसुहृत्स्वजनसंबन्धिबान्धवेषु अहमेतेषाम् ममैते इत्येवंप्रत्ययनिमित्तस्नेहविच्छेदादिनिमित्तौ आत्मनः शोकमोहौ प्रदर्शितौ कथं भीष्ममहं संख्ये (गीता 2.4) इत्यादिना। शोकमोहाभ्यां ह्यभिभूतविवेकविज्ञानः स्वत एव क्षत्रधर्मे युद्धे प्रवृत्तोऽपि तस्माद्युद्धादुपरराम परधर्मं च भिक्षाजीवनादिकं कर्तुं प्रववृते। तथा च सर्वप्राणिनां शोकमोहादिदोषाविष्टचेतसां स्वभावत एव स्वधर्मपरित्यागः प्रतिषिद्धसेवा च स्यात्। स्वधर्मे प्रवृत्तानामपि तेषां वाङ्मनःकायादीनां प्रवृत्तिः फलाभिसंधिपूर्विकैव साहंकारा च भवति। तत्रैवं सति धर्माधर्मोपचयात् इष्टानिष्टजन्मसुखदुःखादिप्राप्तिलक्षणः संसारः अनुपरतो भवति। इत्यतः संसारबीजभूतौ शोकमोहौ। तयोश्च सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकादात्मज्ञानात् नान्यतो निवृत्तिरिति तदुपदिदिक्षुः सर्वलोकानुग्रहार्थम् अर्जुनं निमित्तीकृत्य आह भगवान्वासुदेवः अशोच्यान् (गीता 2.11) इत्यादि।।अत्र केचिदाहुः सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकादात्मज्ञाननिष्ठामात्रादेव केवलात् कैवल्यं न प्राप्यत एव। किं तर्हि अग्निहोत्रादिश्रौतस्मार्तकर्मसहितात् ज्ञानात् कैवल्यप्राप्तिरिति सर्वासु गीतासु निश्चितोऽर्थ इति। ज्ञापकं च आहुरस्यार्थस्य अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि (गीता 2.33) कर्मण्येवाधिकारस्ते (गीता 2.47) कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम् (गीता 4.15) इत्यादि। हिंसादियुक्तत्वात् वैदिकं कर्म अधर्माय इतीयमप्याशङ्का न कार्या। कथम् क्षात्रं कर्म युद्धलक्षणं गुरुभ्रातृपुत्रादिहिंसालक्षणमत्यन्तं क्रूरमपि स्वधर्म इति कृत्वा न अधर्माय तदकरणे च ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि (गीता 2.33) इति ब्रुवता यावज्जीवादिश्रुतिचोदितानां पश्वादिहिंसालक्षणानां च कर्मणां प्रागेव नाधर्मत्वमिति सुनिश्चितमुक्तं भवति इति।।तदसत् ज्ञानकर्मनिष्ठयोर्विभागवचनाद्बुद्धिद्वयाश्रययोः। अशोच्यान् (गीता 2.11) इत्यादिना भगवता यावत् स्वधर्ममपि चावेक्ष्य (गीता 2.31) इत्येतदन्तेन ग्रन्थेन यत्परमार्थात्मतत्त्वनिरूपणं कृतम् तत्सांख्यम्। तद्विषया बुद्धिः आत्मनो जन्मादिषड्विक्रियाभावादकर्ता आत्मेति प्रकरणार्थनिरूपणात् या जायते सा सांख्यबुद्धिः। सा येषां ज्ञानिनामुचिता भवति ते सांख्याः। एतस्या बुद्धेः जन्मनः प्राक् आत्मनो देहादिव्यतिरिक्तत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यपेक्षो धर्माधर्मविवेकपूर्वको मोक्षसाधनानुष्ठानलक्षणो योगः। तद्विषया बुद्धिः योगबुद्धिः। सा येषां कर्मिणामुचिता भवति ते योगिनः। तथा च भगवता विभक्ते द्वे बुद्धी निर्दिष्टे एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु (गीता 2.39) इति। तयोश्च सांख्यबुद्ध्याश्रयां ज्ञानयोगेन निष्ठां सांख्यानां विभक्तां वक्ष्यति पुरा वेदात्मना मया प्रोक्ता (गीता 3.3) इति। तथा च योगबुद्ध्याश्रयां कर्मयोगेन निष्ठां विभक्तां वक्ष्यति कर्मयोगेन योगिनाम् (गीता 3.3) इति। एवं सांख्यबुद्धिं योगबुद्धिं च आश्रित्य द्वे निष्ठे विभक्ते भगवतैव उक्ते ज्ञानकर्मणोः कर्तृत्वाकर्तृत्वैकत्वानेकत्वबुद्ध्याश्रययोः युगपदेकपुरुषाश्रयत्वासंभवं पश्यता। यथा एतद्विभागवचनम् तथैव दर्शितं शातपथीये ब्राह्मणे एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तो ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति (बृ0 4.4.22) इति सर्वकर्मसंन्यासं विधाय तच्छेषेण किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः (बृ0 4.4.22) इति। तत्र एव च प्राक् दारपरिग्रहात् पुरुषः आत्मा प्राकृतो धर्मजिज्ञासोत्तरकालं लोकत्रयसाधनम् पुत्रम् द्विप्रकारं च वित्तं मानुषं दैवं च तत्र मानुषं कर्मरूपं पितृलोकप्राप्तिसाधनं विद्यां च दैवं वित्तं देवलोकप्राप्तिसाधनम् सोऽकामयत (बृ0 1.4.17) इति अविद्याकामवत एव सर्वाणि कर्माणि श्रौतादीनि दर्शितानि। तेभ्यः व्युत्थाय प्रव्रजन्ति (बृ0 4.4.22) इति व्युत्थानमात्मानमेव लोकमिच्छतोऽकामस्य विहितम्। तदेतद्विभागवचनमनुपपन्नं स्याद्यदि श्रौतकर्मज्ञानयोः समुच्चयोऽभिप्रेतः स्याद्भगवतः।।न च अर्जुनस्य प्रश्न उपपन्नो भवति ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते (गीता 3.1) इत्यादिः। एकपुरुषानुष्ठेयत्वासंभवं बुद्धिकर्मणोः भगवता पूर्वमनुक्तं कथमर्जुनः अश्रुतं बुद्धेश्च कर्मणो ज्यायस्त्वं भगवत्यध्यारोपयेन्मृषैव ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः (गीता 3.1) इति।।किञ्च यदि बुद्धिकर्मणोः सर्वेषां समुच्चय उक्तः स्यात् अर्जुनस्यापि स उक्त एवेति यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् (गीता 5.1) इति कथमुभयोरुपदेशे सति अन्यतरविषय एव प्रश्नः स्यात् न हि पित्तप्रशमनार्थिनः वैद्येन मधुरं शीतलं च भोक्तव्यम् इत्युपदिष्टे तयोरन्यतत्पित्तप्रशमनकारणं ब्रूहि इति प्रश्नः संभवति।।अथ अर्जुनस्य भगवदुक्तवचनार्थविवेकानवधारणनिमित्तः प्रश्नः कल्प्येत तथापि भगवता प्रश्नानुरूपं प्रतिवचनं देयम् मया बुद्धिकर्मणोः समुच्चय उक्तः किमर्थमित्थं त्वं भ्रान्तोऽसि इति। न तु पुनः प्रतिवचनमननुरूपं पृष्टादन्यदेव द्वे निष्ठे मया पुरा प्रोक्ते इति वक्तुं युक्तम्।।नापि स्मार्तेनैव कर्मणा बुद्धेः समुच्चये अभिप्रेते विभागवचनादि सर्वमुपपन्नम्। किञ्च क्षत्रियस्य युद्धं स्मार्तं कर्म स्वधर्म इति जानतः तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि (गीता 3.1) इति उपालम्भोऽनुपपन्नः।।तस्माद्गीताशास्त्रे ईषन्मात्रेणापि श्रौतेन स्मार्तेन वा कर्मणा आत्मज्ञानस्य समुच्चयो न केनचिद्दर्शयितुं शक्यः। यस्य तु अज्ञानात् रागादिदोषतो वा कर्मणि प्रवृत्तस्य यज्ञेन दानेन तपसा वा विशुद्धसत्त्वस्य ज्ञानमुत्पन्नं परमार्थतत्त्वविषयम् एकमेवेदं सर्वं ब्रह्म अकर्तृ च इति तस्य कर्मणि कर्मप्रयोजने च निवृत्तेऽपि लोकसंग्रहार्थं यत्नपूर्वं यथा प्रवृत्तिः तथैव प्रवृत्तस्य यत्प्रवृत्तिरूपं दृश्यते न तत्कर्म येन बुद्धेः समुच्चयः स्यात् यथा भगवतो वासुदेवस्य क्षत्रधर्मचेष्टितं न ज्ञानेन समुच्चीयते पुरुषार्थसिद्धये तद्वत् तत्फलाभिसंध्यहंकाराभावस्य तुल्यत्वाद्विदुषः। तत्त्वविन्नाहं करोमीति मन्यते न च तत्फलमभिसंधत्ते। यथा च स्वर्गादिकामार्थिनः अग्निहोत्रादिकर्मलक्षणधर्मानुष्ठानाय आहिताग्नेः काम्ये एव अग्निहोत्रादौ प्रवृत्तस्य सामि कृते विनष्टेऽपि कामे तदेव अग्निहोत्राद्यनुतिष्ठतोऽपि न तत्काम्यमग्निहोत्रादि भवति। तथा च दर्शयति भगवान् कुर्वन्नपि न लिप्यते (गीता 5.1) न करोति न लिप्यते (गीता 13.31) इति तत्र तत्र।।यच्च पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् (गीता 4.15) कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः (गीता 3.20) इति तत्तु प्रविभज्य विज्ञेयम्। तत्कथम् यदि तावत् पूर्वे जनकादयः तत्त्वविदोऽपि प्रवृत्तकर्माणः स्युः ते लोकसंग्रहार्थम् गुणा गुणेषु वर्तन्ते (गीता 3.28) इति ज्ञानेनैव संसिद्धिमास्थिताः कर्मसंन्यासे प्राप्तेऽपि कर्मणा सहैव संसिद्धिमास्थिताः न कर्मसंन्यासं कृतवन्त इत्यर्थः। अथ न ते तत्त्वविदः ईश्वरसमर्पितेन कर्मणा साधनभूतेन संसिद्धिं सत्त्वशुद्धिम् ज्ञानोत्पत्तिलक्षणां वा संसिद्धिम् आस्थिता जनकादय इति व्याख्येयम्। एतमेवार्थं वक्ष्यति भगवान् सत्त्वशुद्धये कर्म कुर्वन्ति इति। (गीता 5.11) स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः (गीता (18.46) इत्युक्त्वा सिद्धिं प्राप्तस्य पुनर्ज्ञाननिष्ठां वक्ष्यति सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म (गीता 18.50) इत्यादिना।।तस्माद्गीताशास्त्रे केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः न कर्मसमुच्चितात् इति निश्चितोऽर्थः। यथा चायमर्थः तथा प्रकरणशो विभज्य तत्र तत्र दर्शयिष्यामः।।तत्रैव धर्मसंमूढचेतसो मिथ्याज्ञानवतो महति शोकसागरे निमग्नस्य अर्जुनस्य अन्यत्रात्मज्ञानादुद्धरणमपश्यन् भगवान्वासुदेवः ततः कृपया अर्जुनमुद्दिधारयिषुः आत्मज्ञानायावतारयन्नाह श्रीभगवानुवाच

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【 Verse 2.11 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे | गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिता: ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | aśocyān anvaśocas tvaṁ prajñāvādāṁś ca bhāṣase | gatāsūn agatāsūṁś ca nānuśocanti paṇḍitāḥ ||

▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: the Lord says; aśocyān: those not worthy of lamentation; anvaśocas: you are lamenting; tvaṁ: you; prajñāvādāṁ: learned talks; ca: also; bhāṣase: you are speaking; gatāsūn: lost life; agatāsūn: not past life; ca: also; na: never; anuśocanti: lament; paṇḍitāḥ: the learned

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.11 Bhagavān says: You grieve for those that should not be grieved for and yet, you speak words of wisdom. The wise grieve neither for the living nor for the dead.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.11।।श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये पण्डितलोग शोक नहीं करते।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.11।। श्री भगवान् ने कहा -- (अशोच्यान्) जिनके लिये शोक करना उचित नहीं है? उनके लिये तुम शोक करते हो और ज्ञानियों के से वचनों को कहते हो? परन्तु ज्ञानी पुरुष मृत (गतासून्) और जीवित (अगतासून्) दोनों के लिये शोक नहीं करते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.11 अशोच्यान् those who should not be grieved for? अन्वशोचः hast grieved? त्वम् thou? प्रज्ञावादान् words of wisdom? च and? भाषसे speakest? गतासून् the dead? अगतासून् the living? च and? न अनुशोचन्ति grieve not? पण्डिताः the wise.Commentary -- The philosophy of the Gita begins from this verse.Bhishma and Drona deserve no grief because they are eternal in their real nature and they are virtuous men who possess very good conduct. Though you speak words of wisdom? you are unwise because you grieve for those who are really eternal and who deserve no grief. They who are endowed with the knowledge of the Self are wise men. They will not grieve for the living or for the dead because they know well that the Self is immortal and that It is unborn. They also know that there is no such a thing as death? that it is a separation of the astral body from the physical? that death is nothing more than a disintegration of matter and that the five elements of which the body is composed return to their source. Arjuna had forgotten the eternal nature of the Soul and the changing nature of the body. Because of his ignorance? he began to act as if the temporary relations with kinsmen? teachers? etc.? were permanent. He forgot that his relations with this world in his present life were the results of past actions. These? when exhausted? end all relationship and new ones ones crop up when one takes on another body.The result of past actions is known as karm and that portion of the karma which gave rise to the present incarnation is known as prarabdha karma.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.11. While lamenting for those who cannot be lamented on and those who do not reire to be lamented on, you do not talk like a wise man ! The learned do not lament for those of departed life and those of non-departed life.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.11 Lord Shri Krishna said: Why grieve for those for whom no grief is due, and yet profess wisdom? The wise grieve neither for the dead nor the living.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.11 The Lord said You grieve for those who should not be grieved for; yet you speak words of wisdom. The wise grieve neither for the dead nor for the living.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.11 The Blessed Lord said You grieve for whose who are not to be grieved for; and you speak words of wisdom! The learned do not grieve for the departed and those who have not departed.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.11 The Blessed Lord said Thou hast grieved for those that should not be grieved for, yet thou speakest words of wisdom. The wise grieve neither for the living nor for the dead.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.11 Asocyan etc. You lament for the body that cannot be lamented over, because it is of incessantly perishing nature; and also for the Soul that does not reire to be lamented. No one, either of departed life, i.e., the dead, or of non-departed life, i.e., the living, is to be mourned for. As for instance, the Soul is ever non-perishing. What sort of lamentability can be for It, as It is plessantly travelling in different bodies ? Nor is it right to say that Its lamentability is due only to Its travel in another body. For, in that case, It should be lamented for, even when the stage of youth etc., is attained. In this manner, the two ideas [the Lord] relates :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.11 The Lord said You are grieving for those who do not deserve to be grieved for. You also speak words of wisdom about the nature of the body and the self as follows: 'The ancestors fall degraded, deprived of the ritual oblations of food and water' (I. 42). There is no reason for such grief for those who possess the knowledge of the nature of the body and the self. Those who know the exact truth will not grieve for those bodies from which life has departed and for those from whome the principle of life has not departed. They do not grieve for bodies or souls.

Hence, in you this contradiction is visible - your grief at the thought 'I shall slay them?' and at the same time your talk about righteousness and unrighteousness, as if it were the result of knowledge of the self as distinct from the body. Therefore you do not know the nature of the body nor of the self which is distinct from the body and is eternal. Nor do you know of duties like war etc., which (as duty) constitute the means for the attainment of the self, nor of the fact that this war (which forms a duty in the present context), if fought without any selfish desire for results, is a means for the attainment of the knowledge of the true nature of the self.

The implied meaning is this: This self, verily, is not dependent on the body for Its existence, nor is It subjected to destruction on the death of the body, as there is no birth or death for It. Therefore there is no cause for grief. But the body is insentient by nature, is subject to change, and its birth and death are natural; thus it (body) too is not to be grieved for.

First listen about the nature of the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.11 Bhisma, Drona and others are not to be grieved for, because they are of noble character and are eternal in their real nature. With regard to them, asocyan, who are not to be grieved for; tvam, you; anvasocah, grieve, (thinking) 'They die because of me; without them what shall I do with dominion and enjoyment?'; ca, and; bhasase, you speak; prajnavadan, words of wisdom, words used by men of wisdom, of intelligence. The idea is, 'Like one mad, you show in yourself this foolishness and learning which are contradictory.' Because, panditah, the learned, the knowers of the Self panda means wisdon about the Self; those indeed who have this are panditah, one the authority of the Upanisadic text, '৷৷.the knowers of Brahman, having known all about scholarship,৷৷.' (Br. 3.5.1) ['Therefore the knowers of Brahman, having known all about scholorship, should try to live upon that strength which comes of Knowledge; having known all about this strength as well as scholorship, he becomes meditative; having known all about both meditativeness and its opposite, he becomes a knower of Brahman.'] ; na anusocanti, do not grieve for; gatasun, the departed, whose life has become extinct; agatasun ca, and for those who have not departed, whose life has not left, the living. The ideas is, 'Your are sorrowing for those who are eternal in the real sense, and who are not to be grieved for. Hence your are a fool!.'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.11।। जब हम अर्जुन के विषाद को ठीक से समझने का प्रयत्न करते हैं तब यह पहचानना कठिन नहीं होगा कि यद्यपि उसका तात्कालिक कारण युद्ध की चुनौती है परन्तु वास्तव में मानसिक संताप के यह लक्षण किसी अन्य गम्भीर कारण से हैं। जैसा कि एक श्रेष्ठ चिकित्सक रोग के लक्षणों का ही उपचार न करके उस रोग के मूल कारण को दूर करने का प्रयत्न करता है उसी प्रकार यहाँ भी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन के शोक मोह के मूल कारण (आत्मअज्ञान) को ही दूर करने का प्रयत्न करते हैं।शुद्ध आत्मस्वरूप के अज्ञान के कारण अहंकार उत्पन्न होता है। यह अज्ञान न केवल दिव्य स्वरूप को आच्छादित करता है वरन् उसके उस सत्य पर भ्रान्ति भी उत्पन्न कर देता है। अर्जुन की यह अहंकार बुद्धिया जीव बुद्धि कि वह शरीर मन और बुद्धि की उपाधियों से परिच्छिन्न या सीमित है वास्तव में मोह का कारण है जिससे स्वजनों के साथ स्नेहासक्ति होने से उनके प्रति मन में यह विषाद और करुणा का भाव उत्पन्न हो रहा है। वह अपने को असमर्थ और असहाय अनुभव करता है। मोहग्रस्त व्यक्ति को आसक्ति का मूल्य दुख और शोक के रूप में चुकाना पड़ता है। इन शरीरादि उपाधियों के साथ मिथ्या तादात्म्य के कारण हमें दुख प्राप्त होते रहते हैं। हमें अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का ज्ञान होने से उनका अन्त हो जाता है।नित्य चैतन्यस्वरूप आत्मा स्थूल शरीर के साथ मिथ्या तादात्म्य के कारण अनेक वस्तुओं और व्यक्तियों के सम्बन्ध में अपने को बन्धन में अनुभव करती है। वही आत्मतत्त्व मन के साथ अनेक भावनाओं का अनुभव करता है मानो वह भावना जगत् उसी का है। फिर यही चैतन्य बुद्धिउपाधि से युक्त होकर आशा और इच्छा करता है महत्वाकांक्षा और आदर्श रखता है जिनके कारण उसे दुखी भी होना पड़ता है। इच्छा महत्वाकांक्षा आदि बुद्धि के ही धर्म हैं।इस प्रकार इन्द्रिय मन और बुद्धि से युक्त शुद्ध आत्मा जीवभाव को प्राप्त करके बाह्य विषयों भावनाओं और विचारों का दास और शिकार बन जाती है। जीवन के असंख्य दुख और क्षणिक सुख इस जीवभाव के कारण ही हैं। अर्जुन इसी जीवभाव के कारण पीड़ा का अनुभव कर रहा था। श्रीकृष्ण जानते थे कि शोकरूप भ्रांति या विक्षेप का मूल कारण आत्मस्वरूप का अज्ञान आवरण है और इसलिये अर्जुन के विषाद को जड़ से हटाने के लिये वे उसको उपनिषदों में प्रतिपादित आत्मज्ञान का उपदेश करते हैं।मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक विधि के द्वारा मन को पुन शिक्षित करने का ज्ञान भारत ने हजारों वर्ष पूर्व विश्व को दिया था। यहाँ श्रीकृष्ण का गीतोपदेश के द्वारा यही प्रयत्न है। आत्मज्ञान की पारम्परिक उपदेश विधि के अनुसार जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण सीधे ही आत्मतत्त्व का उपदेश करते हैं।भीष्म और द्रोण के अन्तकरण शुद्ध होने के कारण उनमें चैतन्य प्रकाश स्पष्ट दिखाई पड़ रहा था। वे दोनों ही महापुरुष अतुलनीय थे। इस युद्ध में मृत्यु हो जाने पर उनको अधोगति प्राप्त होगी यह विचार केवल एक अपरिपक्व बुद्धि वाला ही कर सकता है। इस श्लोक के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन का ध्यान जीव के उच्च स्वरूप की ओर आकर्षित करते हैं।हमारे व्यक्तित्व के अनेक पक्ष हैं और उनमें से प्रत्येक के साथ तादात्म्य कर उसी दृष्टिकोण से हम जीवन का अवलोकन करते हैं। शरीर के द्वारा हम बाह्य अथवा भौतिक जगत् को देखते हैं जो मन के द्वारा अनुभव किये भावनात्मक जगत् से भिन्न होता है और उसी प्रकार बुद्धि के साथ विचारात्मक जगत् का अनुभव हमें होता है।भौतिक दृष्टि से जिसे मैं केवल एक स्त्री समझता हूँ उसी को मन के द्वारा अपनी माँ के रूप में देखता हूँ। यदि बुद्धि से केवल वैज्ञानिक परीक्षण करें तो उसका शरीर जीव द्रव्य और केन्द्रक वाली अनेक कोशिकाओं आदि से बना हुआ एक पिण्ड विशेष ही है। भौतिक वस्तु के दोष अथवा अपूर्णता के कारण होने वाले दुखों को दूर किया जा सकता है यदि मेरी भावना उसके प्रति परिवर्तित हो जाये। इसी प्रकार भौतिक और भावनात्मक दृष्टि से जो वस्तु कुरूप और लज्जाजनक है उसी को यदि बुद्धि द्वारा तात्त्विक दृष्टि से देखें तो हमारे दृष्टिकोण में अन्तर आने से हमारा दुख दूर हो सकता है।इसी तथ्य को और आगे बढ़ाने पर ज्ञात होगा कि यदि मैं जीवन को आध्यात्मिक दृष्टि से देख सकूँ तो शारीरिक मानसिक और बौद्धिक दृष्टिकोणों के कारण उत्पन्न विषाद को आनन्द और प्रेरणादायक स्फूर्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। यहाँ भगवान् अर्जुन को यही शिक्षा देते हैं कि वह अपनी अज्ञान की दृष्टि का त्याग करके गुरुजन स्वजन युद्धभूमि इत्यादि को आध्यात्मिक दृष्टि से देखने और समझने का प्रयत्न करे।इस महान् पारमार्थिक सत्य का उपदेश यहाँ इतने अनपेक्षित ढंग से अचानक किया गया है कि अर्जुन की बुद्धि को एक आघातसा लगा। आगे के श्लोक पढ़ने पर हम समझेंगे कि भगवान् ने जो यह आघात अर्जुन की बुद्धि में पहुँचाया उसका कितना लाभकारी प्रभाव अर्जुन के मन पर पड़ा।इनके लिये शोक करना उचित क्यों नहीं है क्योंकि वे नित्य हैं। कैसे भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.11।।   तदेवमर्जुनः कथं भीष्ममहमित्यादिना प्रदर्शिताभ्यां गुर्वादिष्वहमेतेषां ममैत इति भ्रान्तिप्रत्ययनिमित्तस्त्रेहाविच्छेदादिनिमित्ताभ्यां शोकमोहाभ्यां स्वतएव क्षत्रधर्मे युद्धे प्रवृत्तोऽप्यभिभूतविवेकविज्ञानस्तस्माद्युद्धादुपरराम परधर्मं च भिक्षाशनादिकं कर्तुं प्रववृते तथाच सर्वप्राणिनां शोकमोहाविष्टचेतसां स्वभावत एव स्वधर्मपरित्यागः प्रतिषिद्धाश्रयणं च स्यात्। स्वधर्मे प्रवृत्तानामपि तेषां कायिकादित्रिविधं कर्म फलाभिसंधिपूर्वकमेव साहंकारं भवति तत्रैवंसति धर्माधर्मोपचयादिष्टानिष्टजन्ममरणादिसंप्राप्तिलक्षणः संसारो नोपशाम्यत्यतो धर्मसंमूढचेतसं महति शोकसागरे निमग्नं लोकमुद्दिधीर्षुः संसारबीचभूतयोस्तयोश्चित्तशुद्धिजनकनिष्कामकर्मणो लब्धात्तत्वज्ञानात्केवलादन्यतो निवृत्तिमपश्यन् उपयोपेयभूतं निष्ठाद्वयमुपदिदिक्षुरर्जुनं निमित्तीकृत्य भगवान्वासुदेव आह  अशोच्याजित्यादिना।  एतेन तत्रार्जुनस्य द्विविधो मोहो निराकरणीयः। तत्रात्मन्युपाधित्रयाविवेकेन मिथ्याभूतस्यापि संसारस्य सत्यत्वात्मधर्मत्वादिप्रतिभासरुपः सर्वप्राणिसाधारण एकः अपरस्तु स्वधर्मेऽधर्मत्वप्रतिभासरुपोऽर्जुनस्यैवासाधारण इति प्रत्युक्तम्। सर्व प्राणिसाधारण्योर्मोहयोर्लोक उपलभ्यमानत्वात्। तथाच सर्वप्राणिनामिति भाष्यकारैस्तथैवोक्तत्वात् अर्जुनं निमित्तीकृत्य लोकार्थमेव भगवतोपदेशः कृत इति भाष्यकृद्धिः स्वेन च स्थापितत्वात् अशुद्धान्तःकरणानां तु योगनिष्ठोक्तान्तःकरणशुद्धिद्वारा ज्ञानभूमिकारोहणार्थंधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादिनेति लोकेऽस्मिन्निति श्लोकस्थस्वग्रन्थविरोधाच्चेति दिक्। अशोच्यान्शोकानर्हान्सद्भूतत्वात्परमार्थरुपेण नित्यत्वाच्च शोचितवानसि। प्रज्ञावतां बुद्धिमतां वादान्किं नो राज्येनकथं भीष्ममहम् इत्यादीनि वचनानि च भाषसे तदेतदुभयमुन्मत्तचेष्टितमित्यभिप्रायः। यतः पण्डिता आत्मज्ञाः गतासून्मृतानगतासूनमृतांश्च नानुशोचन्ति। अहो कष्टमेते मृता एते मरिष्यन्तीति चिन्तां न कुर्वन्तीत्यर्थः। यत्तु प्रज्ञानां पण्डितानामवादान्वक्तुमयोग्यान्भाषस इति तदुपेक्ष्यम् अर्हार्थे घञो दुर्लभत्वात् विशेष्याध्याहारसापेक्षत्वाच्चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.11।।तत्रार्जुनस्य युद्धाख्ये स्वधर्मे स्वतो जातापि प्रवृत्तिर्द्विविधेन मोहेन तन्निमित्तेन च शोकेन प्रतिबद्धेति द्विविधो मोहस्तस्य निराकरणीयः। तत्रात्मनि स्वप्रकाशपरमानन्दरूपे सर्वसंसारधर्माऽसंसर्गिणि स्थूलसूक्ष्मशरीरद्वयतत्कारणाविद्याख्योपाधित्रयाविवेकेन मिथ्याभूतस्यापि संसारस्य सत्यत्वात्मधर्मत्वादिप्रतिभासरूप एकः सर्वप्राणिसाधारणः। अपरस्तु युद्धाख्ये स्वधर्मे हिंसादिबाहुल्येनाधर्मत्वप्रतिभासरूपोर्जुनस्यैव करुणादिदोषनिबन्धनोऽसाधारणः। एवमुपाधित्रयविवेकेन शुद्धात्मस्वरूपबोधः प्रथमस्य निवर्तकः सर्वसाधारणः द्वितीयस्य तु हिंसादिमत्त्वेऽपि युद्धस्य स्वधर्मत्वेनाधर्मत्वाभावबोधोऽसाधारणः शोकस्य तु कारणनिवृत्त्यैव निवृत्तेर्न पृथक् साधनान्तरापेक्षेत्यभिप्रेत्य क्रमेण भ्रमद्वयमनुवदन् श्रीभगवानुवाच अशोच्यान्शोचितुमयोग्यानेव भीष्मद्रोणादीनात्मसहितांस्त्वं पण्डितोऽपि सन् अन्वशोचोऽनुशोचितवानसि। ते म्रियन्ते मन्निमित्तमहं तैर्विनाभूतः किं करिष्यामि राज्यसुखादिनेत्येवमर्थकेनदृष्टेवमं स्वजनम् इत्यादिना। तथाचाशोच्ये शोच्यभ्रमः पश्वादिसाधारणस्तवात्यन्तपण्डितस्यानुचित इत्यर्थः। तथाकुतस्त्वा कश्मल मित्यादिना मद्वचनेनानुचित्तमिदमाचरितं मयेति विमर्शे प्राप्तेऽपि त्वं स्वयं प्रज्ञोऽपि सन् प्रज्ञानां अवादान्प्रज्ञैर्वक्तुमनुचिताञ्शब्दांश्चकथं भीष्ममहं संख्ये इत्यादीन्भाषसे वदसि नतु लज्जया तूष्णींभवसि। अतःपरं किमनुचितमस्तीति सूचयितुं चकारः। तथाचाधर्मे धर्मत्वभ्रान्तिधर्मे चाधर्मत्वभ्रान्तिरसाधारणी तवातिपण्डितस्य नोचितेति भावः। प्रज्ञावतां पण्डितानां वादान्भाषसे परं नतु बुध्यस इति वा भाषणापेक्षयानुशोचनस्य प्राक्कालत्वादतीतत्वनिर्देशः। भाषणस्य तु तदुत्तरकालत्वेनाव्यवहितत्वाद्वर्तमानत्वनिर्देशः। छान्दसेन तिङ्व्यत्ययेनानुशोचसीति वर्तमानत्वं व्याख्येयम्। ननु बन्धुविच्छेदे शोको नानुचितः वसिष्ठादिभिर्महाभागैरपि कृतत्वादित्याशङ्क्याह गतासूनिति। ये पण्डिताः विचारजन्यात्मतत्त्वज्ञानवन्तस्ते गतप्राणानगतप्राणांश्च बन्धुत्वेन कल्पितान्देहान्नानुशोचन्ति। एते मृताः सर्वोपकरणपरित्यागेन गताः किं कुर्वन्ति क्व तिष्ठन्ति एते च जीवन्तो बन्धुविच्छेदेन कथं जीविष्यन्तीति न व्यामुह्यन्ति। समाधिसमये तत्प्रतिभासाभावात् व्युत्थानसमये तत्प्रतिभासेऽपि मृषात्वेन निश्चयात्। नहि रज्जुतत्त्वसाक्षात्कारेण सर्पभ्रमेऽपनीते तन्निमित्तभयकम्पादि संभवति नवा पित्तोपहतेन्द्रियस्य कदाचिद्गुडे तिक्तताप्रतिभासेऽपि तिक्तार्थितया तत्र प्रवृत्तिः संभवति मधुरत्वनिश्चयस्य बलबत्त्वात् एवमात्मस्वरूपाज्ञाननिबन्धनत्वाच्छोच्यभ्रमस्य तत्स्वरूपज्ञानेन तदज्ञानेऽपनीते तत्कार्यभूतः शोच्यभ्रमः कथमवतिष्ठेतेति भावः। वसिष्ठादीनां प्रारब्धकर्मप्राबल्यात्तथा तथानुकरणं न शिष्टाचारतयान्येषामनुष्ठेयतामापादयति शिष्टैर्धर्मबुद्ध्यानुष्ठीयमानस्यालौकिकव्यवहारस्यैव तदाचारत्वात् अन्यथा निष्ठीवनादेरप्यनुष्ठानप्रसङ्गादिति दृष्टव्यम्। यस्मादेवं तस्मात्त्वमपि पण्डितो भूत्वा शोकं माकार्षीरित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.11।।अर्जुनस्य देहनाशे आत्मनाशधीः स्वधर्मे युद्धे चाधर्मधीरिति मोहद्वयम्। तत्राद्यं ब्रह्मविद्यासूत्रभूतैर्विंशत्या श्लोकैरुपनिनीषन् श्रीभगवानुवाच  अशोच्यानन्वशोचस्त्वमिति। जीवापेतं वाव किलेदं म्रियते न जीवो म्रियते इति श्रुतेर्देहाद्युपाधिनाशेऽप्याकाशवन्नाशरहितत्वेन अशोचनीयान् भीष्मादीनन्वशोचः कथमेते गुरवो मया हन्तव्याः कथं वा तैर्विनाहं जीविष्यामिति शोकं कृतवानसि। एवं मूढोऽपि त्वं प्रज्ञावादान् प्रज्ञावतां देहादन्यमात्मानं जानतां वादान् शब्दान्नरके नियतं वासःपतन्ति पितरो ह्येषाम् इत्यादीन् भाषसे परं न तु प्रज्ञावानसि। तत्र हेतुः  गतासूनिति।  गतासून् गतप्राणान्देहान्नानुशोचन्ति प्रत्युत निर्हरन्त्येव। एतेन प्राण एवेष्टो न तु देहः। तथा च श्रुतिःप्राणो ह पिता प्राणो माता प्राण आचार्यः इत्यादिः। अतएव सप्राणानेतान् अवगणयन्तं नरं पित्रादिहन्ता त्वमसि धिक्त्वामिति वदन्ति उत्क्रान्तप्राणान् दहन्तमपि नैवं वदन्तीति लोकवेदप्रसिद्धिः। तस्मात् आत्मा देहादन्यः चेतनत्वात् व्यतिरेकेण घटवत्। देहो न चेतनः दृश्यत्वात् घटवत्। यदि देहश्चेतनः स्यात् मृतेऽपि तत्र चैतन्यमुपलभ्येत तस्माद्देहनाशेनात्मनाशं मन्वानो मूर्ख एवासीत्यर्थः। यत्तुप्रज्ञानां पण्डितानां अवादान् वक्तुमयोग्यान् भाषसे इति तार्किकव्याख्यानं तत् अर्हार्थे घञो दुर्लभत्वात् विशेषाध्याहारसापेक्षत्वाच्चोपेक्ष्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.11।।पूर्वं शास्त्रार्थज्ञानेन स्थिरां बुद्धिं कृत्वा भक्त्युपदेशः कर्त्तव्य इति पूर्वं सर्वशास्त्रोक्तज्ञानमुक्त्वा भक्तिमुपदिशन्नात्मानात्मज्ञानार्थमात्मानात्मज्ञानमाह भगवान् अशोच्यानिति। त्वं अशोच्यान् शोकानर्हान् अन्वशोचः अनुशोचितवानसि यतस्तेऽसुरावेशिनो भूभारहरणार्थं मे मारणीया एव न तु ते  भक्ताः৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷. । किञ्च तेषां शोकं कृत्वा प्रज्ञावादान् प्रज्ञावतां पण्डितानां वादान् भाषसे वदसि। तेषां वादानेव वदसि न तु त्वं प्रज्ञावान्। यतस्ते प्रज्ञावन्तः पण्डिता मदिच्छयैव सर्वं भवतीति ज्ञानवन्तः अतः गतासून् गतप्राणान्परलोके तेषां का गतिर्भविष्यति अगतासून् जीवतःजीवतां तेषां कथं योगक्षेमो भविष्यति इति नानुशोचन्ति। अत एव श्रुतिरप्याह एष एव तं साधु कर्म कारयति यमुन्निनीषति एष एव तमसाधु कर्म कारयति यमधोनिनीषति (৷৷.ह्येवैन৷৷.तं यमन्वानुनेषति৷৷.तं यमेभ्यो लोकेभ्यो नुनुत्सत) कौ.उ.3।9 इति। अतो मत्कृतेऽर्थे कथं शोकः कर्त्तव्य इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.11।।देहात्मनोरविवेकादस्यैवं शोको भवतीति तद्विवेकप्रदर्शनार्थं श्रीभगवानुवाच  अशोच्यानिति।  शोकस्याविषयभूतानेव बन्धूंस्त्वमन्वशोचः अनुशोचितवानसिदृष्टवेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् इत्यादिना तत्रकुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् इत्यादिना मया बोधितोऽपि पुनश्च प्रज्ञावतां पण्डितानां वादान् शब्दान्कथं भीष्ममहं संख्ये इत्यादीन्केवलं भाषसे नतु पण्डितोऽसि। यतो गतासून्गतप्राणान्बन्धूनगतासूंश्च जीवतोऽपि बन्धुहीना एते कथं जीविष्यन्तीति नानुशोचन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.11।।अथ नरस्य मोहशोकनिवृत्त्यर्थं साङ्ख्यबुद्धिमाह तत्र साङ्ख्यं बहुविधमत्रैकं सत्प्रमाणकम्। अष्टाविंशतितत्त्वानां स्वरूपं यत्र वै हरिः।।1।।अन्ये सूत्रे निषिध्यन्ते योगोऽप्येकः सदादृतः। यस्मिन्ध्यानं भगवतो निर्बीजेऽप्यात्मबोधकः।।2।।वैराग्यज्ञानयोगैश्च प्रेम्णा च तपसा तथा। एकेनापि दृढेनेशं भजन् सिद्धिमवाप्नुयात्।।3।।अतः कुमतिनाशार्थं साङ्ख्ययोगौ प्रकीर्तितौ। त्यागात्यागविभागेन साङ्ख्ये त्यागः प्रकीर्त्त्यते।।4।।अहन्ताममतानाशे सर्वथा निरहङ्कृतौ। स्वरूपस्थो यदा जीवः कृतार्थौ हरिमाश्रितः।।5।।अत्यागे योगमार्गो हि त्यागोऽपि मनसैव हि। यमादयस्तु कर्तव्याः सिद्धे योगे कृतार्थता।।6।।ईश्वरालम्बनो योगो जनयित्वा तु तादृशम्। बहुजन्मविपाकेन भक्तिं जनयति ध्रुवम्।।7।।साङ्ख्येऽपि भगवच्चित्ते फलमेतन्न चान्यथा। समर्पणात्कर्मणां च भक्तिर्भवति नैष्ठिकी।।8।।अतः पूर्वं साङ्ख्यधिया धर्मनिष्ठा निरूप्यते।।9।।तथाहि हृषीकेशो भगवान् वासुदेवस्तदा स्वमार्गे न स्वीकुर्वन्नात्मनस्तत्त्वाविवेकादस्यैवं शोको भवतीति तन्निवारणार्थं साङ्ख्यबुद्धिं प्रदर्शयन्नाह अशोच्यानिति। उभयथाऽपि न शोचितुं योग्यास्तान्प्रति अन्वशोचस्त्वम्।पतन्ति पितरो ह्येषां 1।42 इत्यादिना देहात्मस्वभावप्रज्ञानिमित्तवादांश्च भाषसे देहात्मस्वभावज्ञानवतां शोके निमित्ताभावात्। गतासून्मृतिं प्राप्तान् अगतासून् जीवतः तत्कलत्रादीन्।मृतानां परलोके का गतिर्जीवतामिह का भविता इति न शोचन्ति। यद्वा गतासून् जडान् अनात्मनो देहान् अगतासून् चेतनान् जीवात्मनश्च पण्डिता विवक्षितलक्षणा न शोचन्ति। त्वं च कीदृक् पण्डितो यच्छोचसीति भावः। आत्मनो वक्ष्यमाणचिदक्षरपुरुषत्वादेकविधत्वं देहस्य चानात्मप्रकृतिकार्यत्वादनित्यत्वं प्रसिद्धमिति हृदयम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.11।।इस प्रकार धर्मके विषयमें जिसका चित्त मोहित हो रहा है और जो महान् शोकसागरमें डूब रहा है ऐसे अर्जुनका बिना आत्मज्ञानके उद्धार होना असम्भव समझकर उस शोकसमुद्रसे अर्जुनका उद्धार करनेकी इच्छावाले भगवान् वासुदेव आत्मज्ञानकी प्रस्तावना करते हुए बोले जो शोक करने योग्य नहीं होते उन्हें अशोच्य कहते हैं भीष्म द्रोण आदि सदाचारी और परमार्थरूपसे नित्य होनेके कारण अशोच्य हैं। उन न शोक करने योग्य भीष्मादिके निमित्त तू शोक करता है कि वे मेरे हाथों मारे जायँगे मैं उनसे रहित होकर राज्य और सुखादिका क्या करूँगा तथा तू प्रज्ञावानोंके अर्थात् बुद्धिमानोंके वचन भी बोलता है अभिप्राय यह है कि इस तरह तू उन्मतकी भाँति मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्परविरुद्ध भावोंको अपनेमें दिखलाता है। क्योंकि जिनके प्राण चले गये हैं जो मर गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये जो जीते हैं उनके लिये भी पण्डित आत्मज्ञानी शोक नहीं करते। पाण्डित्यको सम्पादन करके इस श्रुतिवाक्यानुसार आत्मविषयक बुद्धिका नाम पण्डा है और वह बुद्धि जिनमें हो वे पण्डित हैं। परंतु परमार्थदृष्टिसे नित्य और अशोचनीय भीष्म आदि श्रेष्ठ पुरुषोंके लिये तू शोक करता है अतः तू मढ है। यह अभिप्राय है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.11।। व्याख्या   मनुष्यको शोक तब होता है जब वह संसारके प्राणीपदार्थोंमें दो विभाग कर लेता है कि ये मेरे हैं और ये मेरे नहीं हैं ये मेरे निजी कुटुम्बी हैं और ये मेरे निजी कुटुम्बी नहीं हैं ये हमारे वर्णके हैं और ये हमारे वर्णके नहीं हैं ये हमारे आश्रमके हैं और ये हमारे आश्रमके नहीं हैं ये हमारे पक्षके हैं और ये हमारे पक्षके नहीं हैं। जो हमारे होते हैं उनमें ममता कामना प्रियता आसक्ति हो जाती है। इन ममता कामना आदिसे ही शोक चिन्ता भय उद्वेग हलचल संताप आदि दोष पैदा होते हैं। ऐसा कोई भी दोष अनर्थ नहीं है जो ममता कामना आदिसे पैदा न होता हो यह सिद्धान्त है।गीतामें सबसे पहले धृतराष्ट्रने कहा कि मेरे और पाण्डुके पुत्रोंने युद्धभूमिमें क्या किया यद्यपि पाण्डव धृतराष्ट्रको अपने पितासे भी अधिक आदरदृष्टिसे देखते थे तथापि धृतराष्ट्रके मनमें अपने पुत्रोंके प्रति ममता थी। अतः उनका अपने पुत्रोंमें और पाण्डवोंमें भेदभावपूर्वक पक्षपात था कि ये मेरे हैं और ये मेरे नहीं हैं।जो ममता धृतराष्ट्रमें थी वही ममता अर्जुनमें भी पैदा हुई। परन्तु अर्जुनकी वह ममता धृतराष्ट्रकी ममताके समान नहीं थी। अर्जुनमें धृतराष्ट्रकी तरह पक्षपात नहीं था अतः वे सभीको स्वजन कहते हैं  दृष्ट्वेमं स्वजनम्  (1। 28) और दुर्योधन आदिको भी स्वजन कहते हैं  स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव  (1। 37)। तात्पर्य है कि अर्जुनकी सम्पूर्ण कुरुवंशियोंमें ममता थी और उस ममताके कारण ही उनके मरनेकी आशंकासे अर्जुनको शोक हो रहा था। इस शोकको मिटानेके लिये भगवान्ने अर्जुनको गीताका उपदेश दिया है जो इस ग्यारहवें श्लोकसे आरम्भ होता है। इसके अन्तमें भगवान् इसी शोकको अनुचित बताते हुए कहेंगे कि तू केवल मेरा ही आश्रय ले और शोक मत कर  मा शुचः  (18। 66)। कारण कि संसारका आश्रय लेनेसे ही शोक होता है और अनन्यभावसे मेरा आश्रय लेनेसे तेरे शोक चिन्ता आदि सब मिट जायँगे। अशोच्यानन्वशोचस्त्वम्   संसारमात्रमें दो चीजें हैं सत् और असत् शरीरी और शरीर। इन दोनोंमें शरीरी तो अविनाशी है और शरीर विनाशी है। ये दोनों ही अशोच्य हैं। अविनाशीका कभी विनाश नहीं होता इसलिये उसके लिये शोक करना बनता ही नहीं और विनाशीका विनाश होता ही है वह एक क्षण भी स्थायीरूपसे नहीं रहता इसलिये उसके लिये भी शोक करना नहीं बनता। तात्पर्य हुआ कि शोक करना न तो शरीरीको लेकर बन सकता है और न शरीरोंको लेकर ही बन सकता है। शोकके होनेमें तो केवल अविवेक (मूर्खता) ही कारण है।मनुष्यके सामने जन्मनामरना लाभहानि आदिके रूपमें जो कुछ परिस्थिति आती है वह प्रारब्धका अर्थात् अपने किये हुए कर्मोंका ही फल है। उस अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको लेकर शोक करना सुखीदुःखी होना केवल मूर्खता ही है। कारण कि परिस्थिति चाहे अनुकूल आये चाहे प्रतिकूल आये उसका आरम्भ और अन्त होता है अर्थात् वह परिस्थिति पहले भी नहीं थी और अन्तमें भी नहीं रहेगी। जो परिस्थिति आदिमें और अन्तमें नहीं होती वह बीचमें एक क्षण भी स्थायी नहीं होती। अगर स्थायी होती तो मिटती कैसे और मिटती है तो स्थायी कैसे ऐसी प्रतिक्षण मिटनेवाली अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिको लेकर हर्षशोक करना सुखीदुःखी होना केवल मूर्खता है। प्रज्ञावादांश्च भाषसे   एक तरफ तो तू पण्डिताईकी बातें बघार रहा है और दूसरी तरफ शोक भी कर रहा है। अतः तू केवल बातें ही बनाता है। वास्तवमें तू पण्डित नहीं है क्योंकि जो पण्डित होते हैं वे किसीके लिये भी कभी शोक नहीं करते।कुलका नाश होनेसे कुलधर्म नष्ट हो जायगा। धर्मके नष्ट होनेसे

Chapter 2 (Part 6)

स्त्रियाँ दूषित हो जायँगी जिससे वर्णसंकर पैदा होगा। वह वर्णसंकर कुलघातियोंको और उनके कुलको नरकोंमें ले जानेवाला होगा। पिण्ड और पानी न मिलनेसे उनके पितरोंका भी पतन हो जायगा ऐसी तेरी पण्डिताईकी बातोंसे भी यही सिद्ध होता है कि शरीर नाशवान् है और शरीरी अविनाशी है। अगर शरीर स्वयं अविनाशी न होता तो कुलघाती और कुलके नरकोंमें जानेका भय नहीं होता पितरोंका पतन होनेकी चिन्ता नहीं होती। अगर तुझे कुलकी और पितरोंकी चिन्ता होती है उनका पतन होनेका भय होता है तो इससे सिद्ध होता है कि शरीर नाशवान् है और उसमें रहनेवाला शरीरी नित्य है। अतः शरीरोंके नाशको लेकर तेरा शोक करना अनुचित है। गतासूनगतासूंश्च   सबके पिण्डप्राणका वियोग अवश्यम्भावी है। उनमेंसे किसीके पिण्डप्राणका वियोग हो गया है और किसीका होनेवाला है। अतः उनके लिये शोक नहीं करना चाहिये। तुमने जो शोक किया है यह तुम्हारी गलती है।जो मर गये हैं उनके लिये शोक करना तो महान् गलती है। कारण कि मरे हुए प्राणियोंके लिये शोक करनेसे उन प्राणियोंको दुःख भोगना पड़ता है। जैसे मृतात्माके लिये जो पिण्ड और जल दिया जाता है वह उसको परलोकमें मिल जाता है ऐसे ही मृतात्माके लिये जो कफ और आँसू बहाते हैं वे मृतात्माको परवश होकर खानेपीने पड़ते हैं  (टिप्पणी प0 48) । जो अभी जी रहे हैं उनके लिये भी शोक नहीं करना चाहिये। उनका तो पालनपोषण करना चाहिये प्रबन्ध करना चाहिये। उनकी क्या दशा होगी उनका भरणपोषण कैसे होगा उनकी सहायता कौन करेगा आदि चिन्ताशोक कभी नहीं करने चाहिये क्योंकि चिन्ताशोक करनेसे कोई लाभ नहीं है।मेरे शरीरके अङ्ग शिथिल हो रहे हैं मुख सूख रहा है आदि विकारोंके पैदा होनेमें मूल कारण है शरीरके साथ एकता मानना। कारण कि शरीरके साथ एकता माननेसे ही शरीरका पालनपोषण करनेवालोंके साथ अपनापन हो जाता है और उस अपनेपनके कारण ही कुटुम्बियोंके मरने की आशंकासे अर्जुनके मनमें चिन्ताशोक हो रहे हैं तथा चिन्ताशोकसे ही अर्जुनके शरीरमें उपर्युक्त विकार प्रकट हो रहे हैं इसमें भगवान्ने  गतासून  और  अगतासून्  के शोकको ही हेतु बताया है। जिनके प्राण चले गये हैं वे  गतासून्  हैं और जिनके प्राण नहीं चले गये हैं वे  अगतासून्  हैं। पिण्ड और जल न मिलनेसे पितरोंका पतन हो जाता है (1। 42) यह अर्जुनकी  गतासून  की चिन्ता है। और जिनके लिये हम राज्य भोग और सुख चाहते हैं वे ही प्राणोंकी और धनकी आशा छोड़कर युद्धमें खड़े हैं (1। 33) यह अर्जुनकी  अगतासून्  की चिन्ता है। अतः ये दोनों चिन्ताएँ शरीरको लेकर ही हो रही है अतः ये दोनों चिन्ताएँ धातुरूपसे एक ही हैं। कारण कि  गतासून  और  अगतासून  दोनों ही नाशवान् हैं। गतासून्  और  अगतासून   इन दोनोंके लिये कर्तव्यकर्म करना चिन्ताकी बात नहीं है।  गतासून  के लिये पिण्डपानी देना श्राद्धतर्पण करना यह कर्तव्य है और  अगतासून  के लिये व्यवस्था कर देना निर्वाहका प्रबन्ध कर देना यह कर्तव्य है। कर्तव्य चिन्ताका विषय नहीं होता प्रत्युत विचारका विषय होता है। विचारसे कर्तव्यका बोध होता है और चिन्तासे विचारनष्ट होता है। नानुशोचन्ति पण्डिताः   सत्असत्विवेकवती बुद्धिका नाम पण्डा है। वह पण्डा जिनकी विकसित हो गयी है अर्थात् जिनको सत्असत्का स्पष्टतया विवेक हो गया है वे पण्डित हैं। ऐसे पण्डितोंमें सत्असत्को लेकर शोक नहीं होता क्योंकि सत्को सत् माननेसे भी शोक नहीं होता और असत्को असत् माननेसे भी शोक नहीं होता। स्वयं सत्स्वरूप है और बदलनेवाला शरीर असत्स्वरूप है। असत्को सत् मान लेनेसे ही शोक होता है अर्थात् ये शरीर आदि ऐसे ही बने रहें मरें नहीं इस बातको लेकर ही शोक होता है। सत्को लेकर कभी चिन्ताशोक होते ही नहीं। सम्बन्ध   सत्तत्त्वको लेकर शोक करना अनुचित क्यों है इस शंकाके समाधानके लिये आगेके दो श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.11।।No commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.11।।तदेव वचनमुदाहरति  श्रीभगवानिति।  अतीतसंदर्भस्येत्थमक्षरोत्थमर्थं विवक्षित्वा तस्मिन्नेव वाक्यविभागमवगमयति  दृष्ट्वा त्विति। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे इत्यादिराद्यश्लोकस्तावदेकं वाक्यम्। शास्त्रस्य कथासंबन्धपरत्वेन पर्यवसानात्। दृष्ट्वेत्यारभ्य यावत्तूष्णीं बभूव हेति तावच्चैकं वाक्यम्। इत आरभ्यइदं वचः इत्येतदन्तो ग्रन्थो भवत्यपरं वाक्यमिति विभागः। नन्वाद्यश्लोकस्य युक्तमेकवाक्यत्वं प्रकृतशास्त्रस्य महाभारतेऽवतारावद्योतित्वादन्तिमस्यापि संभवत्येकवाक्यत्वमर्जुनाश्वासार्थतया प्रवृत्तत्वात्तन्मध्यमस्य तु कथमेकवाक्यत्वमित्याशङ्क्यार्थैकत्वादित्याह  प्राणिनामिति।  शोको मानससंतापः मोहो विवेकाभावः। आदिशब्दस्तदवान्तरभेदार्थः स एव संसारस्य दुःखात्मनो बीजभूतो दोषस्तस्योद्भवे कारणमहंकारो ममकारस्तद्धेतुरविद्या च तत्प्रदर्शनार्थत्वेनेति योजना। संगृहीतमर्थं विवृणोति  तथाहीति।  राज्यं राज्ञः कर्म परिपालनादि। पूजार्हा गुरवो भीष्मद्रोणादयः। पुत्राः स्वयमुत्पादिताः सौभद्रादयः संबन्धान्तरमन्तरेण स्नेहगोचरा गुरुपुत्रप्रभृतयो मित्रशब्देनोच्यन्ते उपकारनिरपेक्षतया स्वयमुपकारिणो हृदयानुरागभाजो भगवत्प्रमुखाः सुहृदः स्वजना ज्ञातयो दुर्योधनादयः संबन्धिनः श्वशुरश्यालप्रभृतयो द्रुपदधृष्टद्युम्नादयः परंपरया पितृपितामहादिष्वनुरागभाजो राजानो बान्धवास्तेषु यथोक्तं प्रत्ययं निमित्तीकृत्य यः स्नेहो यश्च तैः सह विच्छेदो यच्चैतेषामुपघाते पातकं या च लोकगर्हा सर्वं तन्निमित्तं ययोरात्मनः शोकमोहयोस्तावेतौ संसारबीजभूतौ कथमित्यादिना दर्शितावित्यर्थः। कथं पुनरनयोः संसारबीजयोरर्जुने संभावनोपपद्यते नहि प्रथितमहामहिम्नो विवेकविज्ञानवतः स्वधर्मे प्रवृत्तस्य तस्य शोकमोहावनर्थहेतू संभावितावित्याशङ्क्य विवेकतिरस्कारेणतयोर्विहिताकरणप्रतिषिद्धाचरणकारणत्वादनर्थाधायकयोरस्ति तस्मिन्संभावनेत्याह  शोकमोहाभ्यामिति।  भिक्षया जीवनं प्राणधारणमादिशब्दादशेषकर्मन्यासलक्षणं पारिव्राज्यमात्माभिध्यानमित्यादि गृह्यते। किंचार्जुने दृश्यमानौ शोकमोहौ संसारबीजं शोकमोहत्वादस्मदादिनिष्ठशोकमोहवदित्युपलब्धौ शोकमोहौ प्रत्येकं पक्षीकृत्यानुमातव्यमित्याह  तथाचेति।  शोकमोहादीत्यादिशब्देन मिथ्याभिमानस्नेहगर्हादयो गृह्यन्ते स्वभावतश्चित्तदोषसामर्थ्यादित्यर्थः। अस्मदादीनामपि स्वधर्मे प्रवृत्तानां विहिताकरणत्वाद्यभावान्न शोकादेः संसारबीजतेति दृष्टान्तस्य साध्यविकलतेति चेत्तत्राह  स्वधर्म इति।  कायादीनामित्यादिशब्दादवशिष्टानीन्द्रियाण्यादीयन्ते। फलाभिसन्धिस्तद्विषयेऽभिलाषः कर्तृत्वभोक्तृत्वाभिमानोऽहंकारः। प्रागुक्तप्रकारेण वागादिव्यापारे सति किं सिध्यति तत्राह  तत्रेति।  शुभकर्मानुष्ठानेन धर्मोपचयादिष्टं देवादिजन्म ततः सुखप्राप्तिः अशुभकर्मानुष्ठानेनाधर्मोपचयादनिष्टं तिर्यगादिजन्म ततो दुःखप्राप्तिः व्यामिश्रकर्मानुष्ठानादुभाभ्यां धर्माधर्माभ्यां मनुष्यजन्म ततः सुखदुःखे भवतः एवमात्मकः संसारः संततो वर्तत इत्यर्थः। अर्जुनस्यान्येषां च शोकमोहयोः संसारबीजत्वमुपपादितमुपसंहरति  इत्यत इति।  तदेवं प्रथमाध्यायस्य द्वितीयाध्यायैकदेशसहितस्यात्माज्ञानोत्थनिवर्तनीयशोकमोहाख्यसंसारबीजप्रदर्शनपरत्वं दर्शयित्वा वक्ष्यमाणसंदर्भस्य सहेतुकसंसारनिवर्तकसम्यग्नोपदेशे तात्पर्यं दर्शयति   तयोश्चेति।  तद्यथोक्तं ज्ञानम्उपदिदिक्षुरुपदेष्टुमिच्छन् भगवानाहेति संबन्धः। सर्वलोकानुग्रहार्थं यथोक्तं ज्ञानं भगवानुपदिदिक्षतीत्ययुक्तमर्जुनं प्रत्येवोपदेशादित्याशङ्क्याह  अर्जुनमिति।  नहि तस्यामवस्थायामर्जुनस्य भगवता यथोक्तज्ञानमुपदेष्टुमिष्टं किंतु स्वधर्मानुष्ठानाद्बुद्धिशुद्ध्युत्तरकालमित्यभिप्रेत्योक्तंनिमित्तीकृत्येति। सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकादात्मज्ञानादेव केवलात्कैवल्यप्राप्तिरिति गीताशास्त्रार्थः स्वाभिप्रेतो व्याख्यातः। संप्रति वृत्तिकृतामभिप्रेतं निरसितुमनुवदति  तत्रेति।  निर्धारितः शास्त्रार्थः सतिसप्तम्या परामृश्यते। तेषामुक्तिमेव विवृण्वन्नादौ सैद्धान्तिकमभ्युपगमं प्रत्यादिशति  सर्वकर्मेति।  वैदिकेन कर्मणा समुच्चयं व्युदसितुं मात्रपदम्। स्मार्तेन कर्मणा समुच्चयं निरसितुमवधारणम्। अभ्याससंबन्धं धुनीते  केवलादिति।  नैवेत्येवकारः संबध्यते। केन तर्हि प्रकारेण ज्ञानं कैवल्यप्राप्तिकारणमित्याशङ्क्याह  किं तर्हीति।  किं तत्र प्रमापकमित्याशङ्क्येदमेव शास्त्रमित्याह  इति सर्वास्विति।  यथा प्रयाजानुयाजाद्युपकृतमेव दर्शपौर्णमासादि स्वर्गसाधनं तथा श्रौतस्मार्तकर्मोपकृतमेव ब्रह्मज्ञानं कैवल्यं साधयति। विमतं सेतिकर्तव्यताकमेव स्वफलसाधकं करणत्वाद्दर्शपौर्णमासादिवत्। तदेवं ज्ञानकर्मसमुच्चयपरं शास्त्रमित्यर्थः। इतिपदमाहुरित्यनेन पूर्वेण संबध्यते। पौर्वापर्यपर्यालोचनायां शास्त्रस्य समुच्चयपरत्वं न निर्धारितमित्याशङ्क्याह  ज्ञापकं चेति।  न केवलं ज्ञानं मुक्तिहेतुरपितु समुच्चितमित्यस्यार्थस्य स्वधर्माननुष्ठाने पापप्राप्तिवचनसामर्थ्यलक्षणं लिङ्गं गमकमित्यर्थः। शास्त्रस्य समुच्चयपरत्वे लिङ्गवद्वाक्यमपि प्रमाणमित्याह  कर्मण्येवेति।  तत्रैव वाक्यान्तरमुदाहरति   कुरु   कर्मेति।  ननुन हिंस्यात्सर्वा भूतानि इत्यादिना प्रतिषिद्धत्वेन हिंसादेरनर्थहेतुत्वावगमात्तदुपेतं वैदिकं कर्माधर्मायेति नानुष्ठातुं शक्यते तथाच तस्य मोक्षे ज्ञानेन समुच्चयो न सिध्यतीति सांख्यमतमाशङ्क्य परिहरति  हिंसादीति।  आदिशब्दादुच्छिष्टभक्षणं गृह्यते। यथोक्तशङ्का न कर्तव्येत्यत्राकाङ्क्षापूर्वकं हेतुमाह  कथमित्यादिना।  स्वशब्देन क्षत्रियो विवक्ष्यते। युद्धाकरणे क्षत्रियस्य प्रत्यवायश्रवणात्तस्य तं प्रति नित्यत्वेनावश्यकर्तव्यत्वप्रतीतेर्गुर्वादिहिंसायुक्तमतिक्रूरमपि कर्म नाधर्मायेति हेत्वन्तरमाह  तदकरणे चेति।  आचार्यादिहिंसायुक्तमतिक्रूरमपि युद्धं नाधर्मायेति ब्रुवता भगवता श्रौतानां हिंसादियुक्तानामपि कर्मणां दूरतो नाधर्मत्वमिति स्पष्टमुपदिष्टं भवति सामान्यशास्त्रस्य व्यर्थहिंसानिषेधार्थत्वात्क्रतुविषये चोदितहिंसायास्तदविषयत्वात्कुतो वैदिककर्मानुष्ठानानुपपत्तिरित्यर्थः। ज्ञानकर्मसमुच्चयात्कैवल्यसिद्धिरित्युपसंहर्तुमितिशब्दः। यत्तावद्ब्रह्मज्ञानं सेतिकर्तव्यताकं स्वफलसाधकं कारणत्वादित्यनुमानं तद्दूषयति  तदसदिति।  नहि शुक्तिकादिज्ञानमज्ञाननिवृत्तौ स्वफले सहकारि किंचिदपेक्षते तथाच व्यभिचारादसाधकं करणत्वमित्यर्थः। यत्तु गीताशास्त्रे समुच्चयस्यैव प्रतिपाद्यतेति प्रतिज्ञानं तदपि विभागवचनविरुद्धमित्याह  ज्ञानेति।  सांख्यबुद्धिर्योगबुद्धिश्चेति बुद्धिद्वयं तत्र सांख्यबुद्ध्याश्रयां ज्ञाननिष्ठां व्याख्यातुं सांख्यशब्दार्थमाह  अशोच्यानित्यादिनेति। अशोच्यानित्यादि स्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्येतदन्तं वाक्यं यावद्भविष्यति तावता ग्रन्थेन यत्परमार्थभूतमात्मतत्त्वं भगवता निरूपितं तद्यथा सम्यक्ख्यायते प्रकाश्यते सा वैदिकी सम्यग्बुद्धिः संख्या तया प्रकाश्यत्वेन संबन्धि प्रकृतं तत्त्वं सांख्यमित्यर्थः। सांख्यशब्दार्थमुक्त्वा तत्प्रकाशिकां बुद्धिं तद्वतश्च सांख्यान्व्याकरोति  तद्विषयेति।  तद्विषया बुद्धिःसांख्यबुद्धिरिति संबन्धः। तामेव प्रकटयति  आत्मन इति। न जायते म्रियते वा इत्यादिप्रकरणार्थनिरूपणद्वारेणात्मनः षड्भावविक्रियासंभवात्कूटस्थोऽसाविति या बुद्धिरुत्पद्यते सा सांख्यबुद्धिः तत्पराः संन्यासिनः सांख्या इत्यर्थः। संप्रति योगबुद्ध्याश्रयां कर्मनिष्ठां व्याख्यातुकामो योगशब्दार्थमाह  एतस्या इति।  यथोक्तबुद्ध्युत्पत्तौ विरोधादेवानुष्ठानायोगात्तस्यास्तन्निवर्तकत्वात्पूर्वमेव तदुत्पत्तेरात्मनो देहादिव्यतिरिक्तत्वाद्यपेक्षया धर्माधर्मं निष्कृष्य तेनेश्वराराधनरूपेण कर्मणा पुरुषो मोक्षाय युज्यते योग्यः संपद्यते तेन मोक्षसिद्धये परंपरया साधनीभूतप्रागुक्तधर्मानुष्ठानात्मको योग इत्यर्थः। अथ योगबुद्धिं विभजन्योगिनो विभजते  तद्विषयेति।  उक्ते बुद्धिद्वये भगवतोऽभिमतिं दर्शयति  तथाचेति।  सांख्यबुद्ध्याश्रया ज्ञाननिष्ठेत्येतदपि भगवतोऽभिमतमित्याह  तयोश्चेति।  ज्ञानमेव योगो ज्ञानयोगस्तेन हि ब्रह्मणा युज्यते तादात्म्यमापद्यते तेन संन्यासिनां निष्ठा निश्चयेन स्थितिस्तात्पर्येण परिसमाप्तिस्तां कर्मनिष्ठातो व्यतिरिक्तां निष्ठयोर्मध्ये निष्कृष्य भगवान्वक्ष्यतीति योजना।लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् इत्येतद्वाक्यमुक्तार्थविषयमर्थतोऽनुवदति  पुरेति।  योगबुद्ध्याश्रया कर्मनिष्ठेत्यत्रापि भगवदनुमतिमादर्शयति  तथाचेति।  कर्मैव योगः कर्मयोगस्तेन हि बुद्धिशुद्धिद्वारा मोक्षहेतुज्ञानाय पुमान्युज्यते तेन निष्ठां कर्मिणां ज्ञाननिष्ठातो विलक्षणां कर्मयोगेनेत्यादिना वक्ष्यति भगवानिति योजना। निष्ठाद्वयं बुद्धिद्वयाश्रयं भगवता विभज्योक्तमुपसंहरति  एवमिति।  कया पुनरनुपपत्त्या भगवता निष्ठाद्वयं विभज्योक्तमित्याशङ्क्याह  ज्ञानकर्मणोरिति।  कर्म हि कर्तृत्वाद्यनेकत्वबुद्ध्याश्रयं ज्ञानं पुनरकर्तृत्वैकत्वबुद्ध्याश्रयं तदुभयमित्थं विरुद्धसाधनसाध्यत्वान्नैकावस्थस्यैव पुरुषस्य संभवति अतो युक्तमेव तयोर्विभागवचनमित्यर्थः। भगवदुक्तविभागवचनस्य मूलत्वेन श्रुतिमुदाहरति  यथेति।  तत्र ज्ञाननिष्ठाविषयं वाक्यं पठति  एतमेवेति।  प्रकृतमात्मानं नित्यविज्ञप्तिस्वभावं वेदितुमिच्छन्तस्त्रिविधेऽपि कर्मफले वैतृष्ण्यभाजः सर्वाणि कर्माणि परित्यज्य ज्ञाननिष्ठा भवन्तीति पञ्चमलकारस्वीकारेण संन्यासविधिं विवक्षित्वा तस्यैव विधेः शेषेणार्थवादेन किं प्रजयेत्यादिना मोक्षफलं ज्ञानमुक्तमित्यर्थः। ननु फलभावात्प्रजाक्षेपो नोपपद्यते पुत्रेणैतल्लोकजयस्य वाक्यान्तरसिद्धत्वादित्याशङ्क्य विदुषां प्रजासाध्यमनुष्यलोकस्यात्मव्यतिरेकेणाभावादात्मनश्चासाध्यत्वादाक्षेपो युक्तिमानिति विवक्षित्वाह  येषामिति।  इति ज्ञानं दर्शितमिति शेषः। तस्मिन्नेव ब्राह्मणे कर्मनिष्ठाविषयं वाक्यं दर्शयति  तत्रैवेति।  प्राकृतत्वमतत्त्वदर्शित्वेनाज्ञत्वं स च ब्रह्मचारी सन्गुरुसमीपे यथाविधि वेदमधीत्यार्थज्ञानार्थं धर्मजिज्ञासां कृत्वा तदुत्तरकालं लोकत्रयप्राप्तिसाधनं पुत्रादित्रयंसोऽकामयत जाया मे स्यात् इत्यादिना कामितवानिति श्रुतमित्यर्थः। वित्तं विभजते  द्विप्रकारमिति।  तदेव प्रकारद्वैरूप्यमाह   मानुषमिति।  मानुषं वित्तं व्याचष्टे  कर्मरूपमिति।  तस्य फलपर्यवसायित्वमाह   पितृलोकेति।  दैवं वित्तं विभजते  विद्यां चेति।  तस्यापि फलनिष्ठत्वमाह  देवेति।  कर्मनिष्ठाविषयत्वेनोदाहृतश्रुतेस्तात्पर्यमाह अविद्येति। अज्ञस्य कामनाविशिष्टस्यैव कर्माणिसोऽकामयत इत्यादिना दर्शितानीत्यर्थः। ज्ञाननिष्ठाविषयत्वेन दर्शितश्रुतेरपि तात्पर्यं दर्शयति  तेभ्य इति।  कर्मसु विरक्तस्यैव संन्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठा प्रागुदाहृतश्रुत्या दर्शितेत्यर्थः। अवस्थाभेदेन ज्ञानकर्मणोर्भिन्नाधिकारत्वस्य श्रुतत्वात्तन्मूलेन भगवतो विभागवचनेन शास्त्रस्य समुच्चयपरत्वं प्रतिज्ञातमपबाधितमिति साधितम् किञ्च समुच्चयो ज्ञानस्य श्रौतेन स्मार्तेन वा कर्मणा विवक्ष्यते यदि प्रथमस्तत्राह  तदेतदिति।  समुच्चयेऽभिप्रेते प्रश्नानुपपत्तिं दोषान्तरमाह  नचेति।  तामेवानुपपत्तिं प्रकटयति  एकपुरुषेति।  यदि समुच्चयः शास्त्रार्थो भगवता विवक्षितस्तदा ज्ञानकर्मणोरेकेन पुरुषेणानुष्ठेयत्वमेव तेनोक्तमर्जुनेन च श्रुतं तत् कथं तदसंभवमनुक्तमश्रुतं च मिथ्यैव श्रोता भगवत्यारोपयेत्। न च तदारोपादृते किमिति मां कर्मण्येवातिक्रूरे युद्धलक्षणे नियोजयसीति प्रश्नोऽवकल्पते। तथाच प्रश्नालोचनया प्रष्टृप्रवक्त्रोः शास्त्रार्थतया समुच्चयोऽभिप्रेतो न भवतीति प्रतिभातीत्यर्थः। किञ्च समुच्चयपक्षे कर्मापेक्षया बुद्धेर्ज्यायस्त्वं भगवता पूर्वमनुक्तमर्जुनेन चाश्रुतं कथमसौ तस्मिन्नारोपयितुमर्हति ततश्चानुवादवचनं श्रोतुरनुचितमित्याह  बुद्धेश्चेति।  इतश्च समुच्चयः शास्त्रार्थो न संभवत्यन्यथा पञ्चमादावर्जुनस्य प्रश्नानुपपत्तेरित्याह  किञ्चेति।  ननु सर्वान्प्रत्युक्तेऽपि समुच्चयेनार्जुनं प्रत्युक्तोऽसाविति तदीयप्रश्नोपपत्तिरित्याशङ्क्याह  यदीति। एतयोः कर्मतत्त्यागयोरिति यावत्। ननु कर्मापेक्षया कर्मत्यागपूर्वकस्य ज्ञानस्य प्राधान्यात्तस्य श्रेयस्त्वात्तद्विषयप्रश्नोपपत्तिरिति चेन्नेत्याह  नहीति।  तथैव समुच्चये पुरुषार्थसाधने भगवता दर्शिते सत्यन्यतरगोचरो न प्रश्नो भवतीति शेषः। समुच्चये भगवतोक्तेऽपि तदज्ञानादर्जुनस्य प्रश्नोपपत्तिरिति शङ्कते  अथेति।  अज्ञाननिमित्तं प्रश्नमङ्गीकृत्यापि प्रत्याचष्टे  तथापीति।  भगवतो भ्रान्त्यभावेन पूर्वापरानुसन्धानसंभवादित्यर्थः। प्रश्नानुरूपत्वमेव प्रतिवचनस्य प्रकटयति  मयेति।  व्यावर्त्यमंशमादर्शयति  नत्विति।  प्रतिवचनस्य प्रश्नाननुरूपत्वमेव स्पष्टयति  पृष्टादिति।  श्रौतेन कर्मणा समुच्चयो ज्ञानस्येति पक्षं प्रतिक्षिप्य पक्षान्तरं प्रतिक्षिपति  नापीति।  श्रुतिस्मृत्योर्ज्ञानकर्मणोर्विभागवचनमादिशब्दगृहीतं बुद्धेर्ज्यायस्त्वं पञ्चमादौ प्रश्नो भगवत्प्रतिवचनं सर्वमिदं श्रौतेनेव स्मार्तेनापि कर्मणा बुद्धेः समुच्चये विरुद्धं स्यादित्यर्थः। द्वितीयपक्षासंभवे हेत्वन्तरमाह  किञ्चेति।  समुच्चयपक्षे प्रश्नप्रतिवचनयोरसंभवान्नेदं गीताशास्त्रं तत्परमित्युपसंहरति  तस्मादिति।  विशुद्धब्रह्मात्मज्ञानं स्वफलसिद्धौ न सहकारिसापेक्षमज्ञाननिवृत्तिफलत्वाद्रज्ज्वादितत्त्वज्ञानवत् अथवा बन्धः सहायानपेक्षेण ज्ञानेन निवर्त्यते अज्ञानात्मकत्वाद्रज्जुसर्पादिवदिति भावः। ननुकुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् इति वक्ष्यमाणत्वात् कथं गीताशास्त्रे समुच्चयो नास्ति तत्राह  यस्य त्विति।  चोदनासूत्रानुसारेण विधितोऽनुष्ठेयस्य कर्मणो धर्मत्वाद्व्यापारमात्रस्य तथात्वाभावात्तत्त्वविदश्च वर्णाश्रमाभिमानशून्यस्याधिकारप्रतिप्रत्त्यभावाद्यागादिप्रवृत्तीनामविद्यालेशतो जायमानानां कर्माभासत्वात् कुर्याद्विद्वानित्यादि वाक्यं न समुच्चयप्रापकमिति भावः। वा शब्दश्चार्थे द्वितीयस्तु विविदिषावाक्यस्थसाधनान्तरसंग्रहार्थः। सांसारिकं ज्ञानं व्यावर्तयति  परमार्थेति।  तदेवाभिनयति  एकमिति।  प्रवृत्तिरूपमिति रूपग्रहणमाभासत्वप्रदर्शनार्थं कर्माभाससमुच्चयस्तु यादृच्छिकत्वान्न मोक्षं फलयतीति शेषः। किञ्च ज्ञानिनो यागादिप्रवृत्तिर्न ज्ञानेन तत्फलेन समुच्चीयते फलाभिसन्धिविकलप्रवृत्तित्वादहंकारविधुरप्रवृत्तित्वाद्वा भगवत्प्रवृत्तिवदित्याह  यथेति।  हेतुद्वयस्यासिद्धिमाशङ्क्य परिहरति  तत्त्वविदिति।  कूटस्थं ब्रह्मैवाहमिति मन्वानो विद्वान् प्रवृत्तिं तत्फलं वा नैव स्वगतत्वेन पश्यति रूपादिवद् दृश्यस्य द्रष्टृधर्मत्वायोगात् किंतु कार्यकरणसंघातगतत्वेनैव प्रवृत्त्यादि प्रतिपद्यते ततस्तत्त्वविदो व्याख्यानभिक्षाटनादावहंकारस्य तृप्त्यादिफलाभिसन्धेश्चाभासत्वान्नासिद्धं हेतुद्वयमित्यर्थः। ननु ज्ञानोदयात्प्रागवस्थायामिवोत्तरकालेऽपि प्रतिनियतप्रवृत्त्यादिदर्शनान्न तत्त्वदर्शिनिष्ठप्रवृत्त्यादेराभासत्वमिति तत्राह  यथाचेति।  स्वर्गादिरेव काम्यमानत्वात्कामस्तदर्थिनः स्वर्गादिकामस्याग्निहोत्रादेरपेक्षितस्वर्गादिसाधनस्यानुष्ठानार्थमग्निमाधाय व्यवस्थितस्य तस्मिन्नेव काम्ये कर्मणि प्रवृत्तस्यार्धकृते केनापि हेतुना कामे विनष्टे तदेवाग्निहोत्रादि निर्वर्तयतो न तत् काम्यं भवति नित्यकाम्यविभागस्य स्वाभाविकत्वाभावात् कामोपबन्धानुपबन्धकृतत्वात् तथा विदुषोऽपि विध्यधिकाराभावाद्यागादिप्रवृत्तीनां कर्माभासतेत्यर्थः। विद्वत्प्रवृत्तीनां कर्माभासत्वमित्यत्र भगवदनुमतिमुपन्यस्यति  तथाचेति।  ननु विद्वद्व्यापारेऽपि कर्मशब्दप्रयोगदर्शनात् तद्व्यापारस्य कर्माभासत्वानुपपत्तेः समुच्चयसिद्धिरिति तत्राह  यच्चेति।  ज्ञानकर्मणोः समुच्चित्यैव संसिद्धिहेतुत्वे प्रतिपन्ने कुतो विभज्यार्थज्ञानमिति पृच्छति  तत्कथमिति।  तत्र किं जनकादयोऽपि तत्त्वविदः प्रवृत्तकर्माणः स्युराहोस्विदतत्त्वविद इति विकल्प्य प्रथमं प्रत्याह  यदिति।  तत्त्ववित्त्वे कथं न प्रवृत्तकर्मत्वं कर्मणामकिंचित्करत्वादित्याशङ्क्याह   ते लोकेति।  तेषामुक्तप्रयोजनार्थमपि न प्रवृत्तिर्युक्ता सर्वत्राप्युदासीनत्वादित्याशङ्क्याह  गुणा इति।  इन्द्रियाणां विषयेषु प्रवृत्तिद्वारा तत्त्वविदां प्रवृत्तकर्मत्वेऽपि ज्ञानेनैव तेषां मुक्तिरित्याह  ज्ञानेनेति।  उक्तमेवार्थं संक्षिप्य दर्शयति  कर्मेति।  कर्मणेत्यादौ बाधितानुवृत्त्या प्रवृत्त्याभासो गृह्यते। द्वितीयमनुवदति  अथेति।  तत्र वाक्यार्थं कथयति  ईश्वरेति।  विभज्य विज्ञेयत्वं वाक्यार्थस्योक्तमुपसंहरति  इति व्याख्येयमिति।  कर्मणां चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानहेतुत्वमित्युक्तेऽर्थे वाक्यशेषं प्रमाणयति  एतमेवेति। योगिनः कर्म कुर्वन्ति इत्यादिवाक्यमर्थतोऽनुवदति  सत्त्वेति।  स्वकर्मणेत्यादौ साक्षादेव मोक्षहेतुत्वं कर्मणां वक्ष्यतीत्याशङ्क्याह   स्वकर्मणेति।  स्वकर्मानुष्ठानादीश्वरप्रसादद्वारा ज्ञाननिष्ठायोग्यता लभ्यते ततो ज्ञाननिष्ठया मुक्तिस्तेन न साक्षात्कर्मणां मुक्तिहेतुतेत्यग्रे स्फुटीभविष्यतीत्यर्थः। तत्त्वज्ञानोत्तरकालं कर्मासंभवे फलितमुपसंहरति  तस्मादिति।  ननु यद्यपि गीताशास्त्रं तत्त्वज्ञानप्रधानमेकं वाक्यं तथापि तन्मध्ये श्रूयमाणं कर्म तदङ्गमङ्गीकर्तव्यं प्रकरणप्रामाण्यादिति समुच्चयसिद्धिस्तत्राह  यथाचेति।  अर्थशब्देनात्मज्ञानमेव केवलं कैवल्यहेतुरिति गृह्यते। वृत्तिकृतामभिप्रायं प्रत्याख्याय स्वाभिप्रेतः शास्त्रार्थः समर्थितः। संप्रत्यशोच्यानित्यस्मात्प्राक्तनग्रन्थसंदर्भस्य प्रागुक्तं तात्पर्यमनूद्याशोच्यानित्यादेः स्वधर्ममपि चावेक्ष्येत्येतदन्तस्य समुदायस्य तात्पर्यमाह  तत्रेति।  अत्र हि शास्त्रे त्रीणि काण्डानि अष्टादशसंख्याकानामध्यायानां षट्कत्रितयमुपादाय त्रैविध्यात् तत्र पूर्वषट्कात्मकं पूर्वकाण्डं त्वंपदार्थं विषयीकरोति मध्यमषट्करूपं मध्यमकाण्डं तत्पदार्थं गोचरयति अन्तिमषट्कलक्षणमन्तिमं काण्डंपदार्थयोरैक्यं वाक्यार्थमधिकरोति तज्ज्ञानसाधनानि तत्र तत्र प्रसङ्गादुपन्यस्यन्ते तज्ज्ञानस्य तदधीनत्वात् तत्त्वज्ञानमेव केवलं कैवल्यसाधनमिति च सर्वत्र विगीतम्। एवं पूर्वोक्तरीत्या गीताशास्त्रार्थे परिनिश्चिते सतीति यावत्। धर्मे संमूढं कर्तव्याकर्तव्यविवेकविकलं चेतो यस्य तस्य मिथ्याज्ञानवतोऽहंकारममकारवतः शोकाख्यसागरे दुरुत्तारे प्रविश्य क्लिश्यतो ब्रह्मात्मैक्यलक्षणवाक्यार्थज्ञानमात्मज्ञानं तदतिरेकेणोद्धरणासिद्धेस्तमतिभक्तमतिस्निग्धं शोकादुद्धर्तुमिच्छन्भगवान्यथोक्तज्ञानार्थं तमर्जुनमवतारयन् पदार्थपरिशोधने प्रवर्तयन्नादौ त्वंपदार्थं शोधयितुमशोच्यानित्यादिवाक्यमाहेति योजना। यस्याज्ञानं तस्य भ्रमो यस्य भ्रमस्तस्य पदार्थपरिशोधनपूर्वकं सम्यग्ज्ञानं वाक्यादुदेतीति ज्ञानाधिकारिणमभिप्रेत्याह  अशोच्यानित्यादीति।  यत्तु कैश्चित्आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः इत्याद्यात्मयाथात्म्यदर्शनविधिवाक्यार्थमनेन श्लोकेन व्याचष्टे स्वयं हरिरित्युक्तं तदयुक्तं कृतियोग्यतैकार्थसमवेतश्रेयःसाधनताया वा पराभिमतनियोगस्य वा विध्यर्थस्यात्राप्रतीयमानस्य कल्पनाहेत्वभावात्। न च दर्शने पुरुषतन्त्रत्वरहिते विधेययागादिविलक्षणे विधिरुपपद्यते कृत्यान्तर्भूतस्यार्हार्थत्वात् तव्यो न विधिमधिकरोतीत्यभिप्रेत्य व्याचष्टे  न शोच्या इति।  कथं तेषामशोच्यत्वमित्युक्ते भीष्मादिशब्दवाच्यानां वा शोच्यत्वं तत्पदलक्ष्याणां वेति विकल्प्याद्यं दूषयति  सद्वृत्तत्वादिति।  ये भीष्मादिशब्दैरुच्यन्ते ते श्रुतिस्मृत्युदीरिताविगीताचारवत्त्वान्न शोच्यतामश्नुवीरन्नित्यर्थः। द्वितीयं प्रत्याह  परमार्थेति।  अरजते रजतबुद्धिवदशोच्येषु शोच्यबुद्ध्या भ्रान्तोऽसीत्याह  तानिति।  अनुशोचनप्रकारमभिनयन्भ्रान्तिमेव प्रकटयति  ते म्रियन्त इति।  पुत्रभार्यादिप्रयुक्तं सुखमादिशब्देन गृह्यते। इत्यनुशोचितवानसीति संबन्धः। विरुद्धार्थाभिधायित्वेनापि भ्रान्तत्वमर्जुनस्य साधयति  त्वं प्रज्ञावतामिति। वचनानिउत्सन्नकुलधर्माणाम् इत्यादीनि। किमेतावता फलितमिति तदाह  तदेतदिति।  तन्मौढ्यमशोच्येषु शोच्यदृष्टित्वमेतत्पाण्डित्यं बुद्धिमतां वचनभाषित्वमिति यावत्। अर्जुनस्य पूर्वोक्तभ्रान्तिभाक्त्वे निमित्तमात्माज्ञानमित्याह  यस्मादिति।  ननु सूक्ष्मबुद्धिभाक्त्वमेव पाण्डित्यं न त्वात्मज्ञत्वं हेत्वभावादित्याशङ्क्याह  तेहीति।  पाण्डित्यं पण्डितभावमात्मज्ञानं निर्विद्य निश्चयेन लब्ध्वाबाल्ये न तिष्ठासेद् इति बृहदारण्यकश्रुतिमुक्तार्थामुदाहरति  पाण्डित्यमिति।  यथोक्तपाण्डित्यराहित्यं कथं ममावगतमित्याशङ्क्य कार्यदर्शनादित्याह  परमार्थतस्त्विति।  यस्मादित्यस्यापेक्षितं दर्शयति  अत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.11।।इदानीं गीताव्याख्यानावसरे प्राप्तेधर्मक्षेत्रे 1।1 इत्यारभ्यअशोच्यानन्वशोचस्त्वं इत्यतः प्राक्तनस्य ग्रन्थस्यातिरोहितार्थत्वात्तात्पर्यमाह  तत्रे ति। तत्र गीतिकायां कैश्चन श्लोकैरिदमुच्यत इति शेषः। नन्वत्र न धर्मो नापि तत्त्वं प्रतिपाद्यते तत्कुतोऽस्य गीतायामनुप्रवेशः मैवम् भगवतोऽर्जुनबोधने प्रसक्तिं दर्शयतोऽस्य ग्रन्थस्य तादर्थ्यात्तत्र प्रवेशोपपत्तेः। बान्धवादिविषयो मोहोममैते अहमेतेषां एते च मन्निमित्तं नङ्क्ष्यन्ति कथमेतैर्विनाऽहं भवेयम् पापं च मे भविष्यति जयश्च सन्दिग्धः इत्यादिरूपो मिथ्याप्रत्ययो बान्धवादिमोहः तेषु स्नेहो वा। सजालमिव तेन संवृतं तत एव विषीदन्तम्। विषादो नाम मोहनिमित्ताच्छोकाद्यन्मनोदौर्बल्यम् यस्मिन्सति सर्वव्यापारोपरमो भवति। नन्विदानीमेव कुतोऽर्जुनस्य मोहसमुत्पत्तिः न ह्येते बान्धवादय इति प्राङ्नाज्ञासीत् येन युद्धाय महान्तमुद्योगमकार्षीदित्यत आह  सेनयोरि ति। महापकारस्मरणेनानुवर्तमानोऽपि कोपो मृदुमनसां बान्धवादिष्वन्तकाले निवर्तते स्नेह श्चोत्पद्यते ततो मोह इति प्रसिद्धमेवेति भावः। अर्जुनस्य ज्ञानित्वान्मोहजालसवृतत्वमीषदेवेति मन्तव्यम्।प्रज्ञावादान् इत्येतत्प्रज्ञावतां बुद्धिमतां वादान् वचनानि इति कश्चिद्व्याख्यातवान् (शं.चा.) तदसत्। न हिदृष्ट्वेमं स्वजनं 1।28 इत्याद्यर्जुनवाक्येषु कश्चिद्बुद्धिमद्वादो दृश्यते। न हि बुद्धिमन्तो नारायणद्विट्तदनुबन्धिनिग्रहमधर्मं वदन्ति। न च धर्माधर्मविषयत्वमात्रेण बुद्धिमद्वादो भवति। बौद्धादेरपि तत्त्वप्रसङ्गादित्याशयेनान्यथा व्याचष्टे  प्रज्ञावादानि ति। स्वस्या एव मनीषाया उत्थितानि न तु शास्त्राचार्योपदेशप्राप्तानि। कथमेतल्लभ्यते उच्यते प्रज्ञायाः वादाः प्रज्ञावादाः। कार्यकारणभावे षष्ठी। न हि स वादोऽस्ति यः प्रज्ञापूर्वो न भवतीति। सामर्थ्यात्स्वेति लभ्यते। सावधारणं चैतत्अब्भक्ष इति यथा। अन्यथा पुनर्वैयर्थ्यादिति। कथमशोच्या इत्यत आहेति शेषः। गतासूनित्यतः परमितिशब्दः। आसन्नविनाशाः कथमशोच्या इत्यर्थः। ननु प्रागशो च्यत्वानुवादेनान्वशोच इत्येवोक्तम् न त्वशोच्यत्वम् तत्कथमेवमाक्षेपः मैवम् न हि यथाश्रुतैवाऽत्र वाक्यवृत्तिः।असिद्धस्यानुवादः सिद्धस्य बोधनं इत्यापत्तेः। किन्तु यानन्वशोचस्त्वं तेऽशोच्यास्तस्मात्तान् प्रति न शोकः कार्यः। यांश्च भाषसे ते प्रज्ञावादाः अतो न भाषणीया इति। तथा चाशोच्याः कुतोऽवगन्तव्याः इति प्रश्नो वा आक्षेपो वा युज्यत एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.11।।तत्र सेनयोर्मध्ये बान्धवादिमोहजालसंवृतं विषीदन्तमर्जुनं भगवानुवाच। प्रज्ञावादान् स्वमनीषोत्थवचनानि। कथमशोच्याः गतासून्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.11।।श्रीभगवानुवाच  अशोच्यान्  प्रति अनुशोचसिपतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः। (गीता 1।41) इत्यादिकान् देहात्मस्वभावप्रज्ञानिमित्तवादान्  च भाषसे।  देहात्मस्वभावज्ञानवतां न अत्र किञ्चित् शोकनिमित्तम् अस्ति।  गतासून्  देहान्  अगतासून्  आत्मनश्च प्रति तयोः स्वभावयाथात्म्यविदो  न शोचन्ति।  अतः त्वयि विप्रतिषिद्वम् इदम् उपलभ्यते यद्एतान् हनिष्यामि इति अनुशोचनं यच्च देहातिरिक्तात्मज्ञानकृतं धर्माधर्मभाषणम्। अतो देहस्वभावं च न जानासि तदतिरिक्तम् आत्मानं च नित्यम् तत्प्राप्त्युपायभूतं युद्धादिकं धर्मं च। इदं च युद्धं फलाभिसन्धिरहितम्। आत्मयाथात्म्यावाप्त्युपायभूतम्। आत्मा हि न जन्माधीनसद्भावो न मरणाधीनविनाशश्च तस्य जन्ममरणयोः अभावात् अतः स न शोकस्थानम्। देहः तु अचेतनः परिणामस्वभावः तस्य उत्पत्तिविनाशयोगः स्वाभाविकः इति सोऽपि न शोकस्थानम् इति अभिप्रायः।प्रथमं तावद् आत्मनां स्वभावं श्रृणु

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.11।।  अशोच्यान् इत्यादि । न शोच्या अशोच्याः भीष्मद्रोणादयः सद्वृत्तत्वात् परमार्थस्वरूपेण च नित्यत्वात् तान्  अशोच्यान् अन्वशोचः  अनुशोचितवानसि ते म्रियन्ते मन्निमित्तम् अहं तैर्विनाभूतः किं करिष्यामि राज्यसुखादिना इति।  त्वं प्रज्ञावादान्  प्रज्ञावतां बुद्धिमतां वादांश्च वचनानि च भाषसे। तदेतत् मौढ्यं पाण्डित्यं च विरुद्धम् आत्मनि दर्शयसि उन्मत्त इव इत्यभिप्रायः। यस्मात्  गतासून्  गतप्राणान् मृतान्  अगतासून्  अगतप्राणान् जीवतश्च  न अनुशोचन्ति पण्डिताः  आत्मज्ञाः। पण्डा आत्मविषया बुद्धिः येषां ते हि पण्डिताः पाण्डित्यं निर्विद्य इति श्रुतेः। परमार्थतस्तु तान् नित्यान् अशोच्यान् अनुशोचसि अतो मूढोऽसि इत्यभिप्रायः।।कुतस्ते अशोच्याः यतो नित्याः। कथम्

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【 Verse 2.12 】

▸ Sanskrit Sloka: न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपा | न चैव न भविष्याम: सर्वे वयमत: परम् ||

▸ Transliteration: na tvevāhaṁ jātu nāsaṁ na tvaṁ neme janādhipāḥ | na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayam ataḥ param ||

▸ Glossary: na: not; tu: but; eva: only; ahaṁ: I; jātu: at any time; na: not; āsaṁ: existed; na: it is not so; tvaṁ: yourself; na: not; ime: all these; janādhipāḥ: kings; na: never; ca: also; eva: only; na: not like that; bhaviṣyāmaḥ: shall exist; sarve: all of us; vayaṁ: we; ataḥ paraṁ: hereafter

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.12 It is not that at anytime in the past I did not exist. So did you and these rulers exist, and we shall not ever cease to be hereafter.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.12।।किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे यह बात भी नहीं है और इसके बाद मैं तू और राजलोग ये सभी नहीं रहेंगे यह बात भी नहीं है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.12।। वास्तव में न तो ऐसा ही है कि मैं किसी काल में नहीं था अथवा तुम नहीं थे अथवा ये राजालोग नहीं थे और न ऐसा ही है कि इससे आगे हम सब नहीं रहेंगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.12 न not? तु indeed? एव also? अहम् I? जातु at any time? न not? आसम् was? न not? त्वम् thou? न not? इमे these? जनाधिपाः rulers of men? न not? च and? एव also? न not? भविष्यामः shall be? सर्वे all? वयम् we? अतः from this time? परम् after.Commentary -- Lord Krishna speaks here of the immortality of the Soul or the imperishable nature of the Self (Atman). The Soul exists in the three periods of time (past? present and future). Man continues to exist even after the death of the physical body. There is life beyond.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.12. Never indeed at any time [in the past] did I not exist, nor you, nor these kings; and never shall we all not exist hereafter.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.12 There was never a time when I was not, nor thou, nor these princes were not; there will never be a time when we shall cease to be.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.12 There never was a time when I did not exist, nor you, nor any of these kings of men. Nor will there be any time in future when all of us shall cease to be.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.12 But certainly (it is) not (a fact) that I did not exist at any time; nor you, nor these rulers of men. And surely it is not that we all shall cease to exist after this.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.12 Nor at any time indeed was I not, nor thou, nor these rulers of men, nor verily shall we ever cease to be hereafter.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.12 See Comment under 2.13

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.12 Indeed, I, the Lord of all, who is eternal, was never non-existent, but existed always. It is not that these selves like you, who are subject to My Lordship, did not exist; you have always existed. It is not that 'all of us', I and you, shall cease to be 'in the future', i.e., beyond the present time; we shall always exist. Even as no doubt can be entertainted that I, the Supreme Self and Lord of all, am eternal, likewise, you (Arjuna and all others) who are embodied selves, also should be considered eternal.

The foregoing implies that the difference between the Lord, the sovereign over all, and the individual selves, as also the differences among the individual selves themselves, are real. This has been declared by the Lord Himself. For, different terms like 'I', 'you', 'these', 'all' and 'we' have been used by the Lord while explaining the truth of eternality in order to remove the misunderstanding of Arjuna who is deluded by ignorance.

[Now follows a refutation of the Upadhi theory of Bhaskara and the Ignorance theory of the Advaitins which deny any ultimate difference between the Lord and the Jivas.]

If we examine (Bhaskara's) theory of Upadhis (adjuncts), which states that the apparent differences among Jivas are due to adjuncts, it will have to be admitted that mention about differences is out of place when explaining the ultimate truth, because the theory holds that there are no such differences in reality. But that the differences mentioned by the Lord are natural, is taught by the Sruti also: 'Eternal among eternals, sentient among sentients, the one, who fulfils the desires of the many' (Sve. U. VI. 13, Ka. U. V. 13).

The meaning of the text is: Among the eternal sentient beings who are countless, He, who is the Supreme Spirit, fulfils the desires of all.'

As regards the theory of the Advaitins that the perception of difference is brought about by ignorance only and is not really real, the Supreme Being - whose vision must be true and who, therefore must have an immediate cognition of the differencelss and immutable and eternal consciousness as constituting the nature of the Atman in all authenticity, and who must thery be always free from all ignorance and its effects - cannot possibly perceive the so-called difference arising from ignornace. It is, therefore, unimaginable that He engages himself in activities such as teaching, which can proceed only from such a perception of differences arising from ignorance.

The argument that the Supreme Being, though possessed of the understanding of nom-duality, can still have the awareness of such difference persisting even after sublation, just as a piece of cloth may have been burnt up and yet continues to have the appearance of cloth, and that such a continuance of the subltated does not cause bondage - such an argument is invalid in the light of another analogy of a similar kind, namely, the perception of the mirage, which, when understood to be what it is, does not make one endeavour to fetch water therefrom. In the same way even if the impression of difference negated by the non-dualistic illumination persists, it cannot impel one to activities such as teaching; for the object to whom the instruction is to be imparted is discovered to be unreal. The idea is that just as the discovery of the non-existence of water in a mirage stops all effort to get water from it, so also when all duality is sublated by illumination, no activity like teaching disciples etc., can take place.

Nor can the Lord be conceived as having been previously ignorant and as attaining knowledge of unity through the scirptures, and as still being subject to the continuation of the stultified experiences. Such a position would stand in contradiction to the Sruti and the Smrti: 'He, who is all-comprehender' (Mun. U., 1. 1. 9); all knower and supreme and natural power of varied types are spoken of in Srutis, such as knowledge, strength and action' (Sve. U. 6. 8); 'I know, Arjuna, all beings of the past, present and future but no one knows Me,' etc. (Gita 7. 26).

And again, if the perception of difference and distinction are said to persist even after the unitary Self has been decisively understood, the estion will arise - to whom will the Lord and the succession of teachers of the tradition impart the knowledge in accordance with their understanding? The estion needs an answer. The idea is that knowledge of non-duality and perception of differences cannot co-exist. If it be replied by Advaitins holding the Bimba-Pratibimba (the original and reflections) theory that teachers give instructions to their own reflections in the form of disciples such as Arjuna, it would amount to an absurdity.

For, no one who is not out of his senses would undertake to give any instruction to his own reflections in mediums such as a precious stone, the blade of a sword or a mirror, knowing, as he does, that they are non-different from himself. The theory of the persistence of the sublated is thus impossible to maintain, as the knowledge of the unitary self destroys the beginningless ignorance in which differences falling outside the self are supposed to be rooted. 'The persistence of the sublated' does occur in cases such as the vision of the two moons, where the cause of the vision is the result of some real defect in eyesight, nor removable by the right understanding of the singleness of the moon. Even though the perception of the two moons may continue, the sublated cognition is rendered inconseential on the strength of strong contrary evidence. For, it will not lead to any activity appropriate for a real experience.

But in the present context (i.e. the Advaitic), the conception of difference, whose object and cause are admittedly unreal, is cancelled by the knowledge of reality. So the 'persistence of the sublated' can in no way happen. Thus, if the Supreme Lord and the present succession of preceptors have attained the understanding of (Non-dual) reality, their perception of difference and work such as teaching proceeding from that perception, are impossible. If, on the other hand, the perception of difference persists because of the continuance of ignorance and its cause, then these teachers are themselves ignorant of the truth, and they will be incapable of teaching the truth.

Further, as the preceptor has attained the knowledge of the unitary self and thery the ignorance concerning Brahman and all the effects of such ignorance are thus annihilated, there is no purpose in instructing the disciple. It it is held that the preceptor and his knowledge are just in the imagination of the disciple, the disciple and his knowledge are similarly the product of the imagination of the preceptor, and as such can not put an end to the ignorance in estion. If it is maintained that the disciple's knowledge destroys ignorance etc., because it contradicts the antecedent state of non-enlightenment, the same can be asserted of the preceptor's knowledge. The futility of such teachings is obvious. Enough of these unsound doctrines which have all been refuted.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.12 Why are they not to be grieved for? Because they are eternal. How? Na tu eva, but certainly it is not (a fact); that jatu, at any time; aham, I ; na asam, did not exist; on the contrary, I did exist. The idea is that when the bodies were born or died in the past, I existed eternally. [Here Ast. adds ghatadisu viyadiva, like Space in pot etc.-Tr.] Similarly, na tvam, nor is it that you did not exist; but you surely existed. Ca, and so also; na ime, nor is it that these ; jana-adhipah, rulers of men, did not exist. On the other hand, they did exist. And similarly, na eva, it is surely not that; vayam, we; sarve, all; na bhavisyamah, shall cease to exist; atah param, after this, even after the destruction of this body. On the contrary, we shall exist. The meaning is that even in all the three times (past, present and future) we are eternal in our nature as the Self. The plural number (in we) is used following the diversity of the bodies, but not in the sense of the multiplicity of the Self.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.12।। यहाँ भगवान् स्पष्ट घोषणा करते हैं कि देह को धारण करने वाली आत्मा एक महान तीर्थयात्रा के लिये निकल पड़ी है जो इस यात्रा के मध्य कुछ काल के लिये विभिन्न शरीरों को ग्रहण करते हुये उनके साथ तादात्म्य कर विशेष अनुभवों को प्राप्त करती है। श्रीकृष्ण अर्जुन और अन्य राजाओं का उन विशेष शरीरों में होना कोई आकस्मिक घटना नहीं थी। न वे शून्य से आये और न ही मृत्यु के बाद शून्य रूप हो जायेंगे। प्रामाणिक तात्त्विक विचार के द्वारा मनुष्य भूत वर्तमान और भविष्य की घटनाओं की सतत शृंखला समझ सकता है। आत्मा वहीं रहती हुई अनेक शरीरों को ग्रहण करके प्राप्त परिस्थितियों का अनुभव करती प्रतीत होती है।यही हिन्दू दर्शन का प्रसिद्ध पुनर्जन्म का सिद्धान्त है। इस सिद्धान्त के सबसे बड़े विरोधियों ने अपने स्वयं के धर्मग्रन्थ का ही ठीक से अध्ययन नहीं किया प्रतीत होता है। स्वयं ईसा मसीह ने यदि प्रत्यक्ष नहीं तो अप्रत्यक्ष रूप से इस सिद्धान्त को स्वीकार किया है। जब उन्होंने अपने शिष्यों से कहा था कि जान ही एलिजा था। ओरिजेन नामक विद्वान ईसाई पादरी ने स्पष्ट रूप से कहा है प्रत्येक मनुष्य को अपने पूर्व जन्म के पुण्यों के फलस्वरूप यह शरीर प्राप्त हुआ है।कोईभी ऐसा महान विचारक नहीं है जिसने पूर्व जन्म के सिद्धान्त को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार नहीं किया गया है। गौतम बुद्ध सदैव अपने पूर्व जन्मों का सन्दर्भ दिया करते थे। वर्जिल और ओविड दोनों ने इस सिद्धान्त को स्वत प्रमाणित स्वीकार किया है। जोसेफस ने कहा है कि उसके समय यहूदियों में पुनर्जन्म के सिद्धान्त पर पर्याप्त विश्वास था। सालोमन ने बुक आफ विज्डम में कहा है एक स्वस्थ शरीर में स्वस्थ अंगों के साथ जन्म लेना पूर्व जीवन में किये गये पुण्य कर्मों का फल है। और इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद के इस कथन को कौन नहीं जानता जिसमें उन्होंने कहा कि मैं पत्थर से मरकर पौधा बना पौधे से मरकर पशु बना पशु से मरकर मैं मनुष्य बना फिर मरने से मैं क्यों डरूँ मरने से मुझमें कमी कब आयी मनुष्य से मरकर मैं देवदूत बनूँगाइसके बाद के काल में जर्मनी के विद्वान दार्शनिक गोथे फिख्टे शेलिंग और लेसिंग ने भी इस सिद्धान्त को स्वीकार किया। बीसवीं शताब्दी के ही ह्यूम स्पेन्सर और मेक्समूलर जैसे दार्शनिकों ने इसे विवाद रहित सिद्धान्त माना है। पश्चिम के प्रसिद्ध कवियों को भी कल्पना के स्वच्छाकाश में विचरण करते हुये अन्त प्रेरणा से इसी सिद्धान्त का अनुभव हुआ जिनमें ब्राउनिंग रोसेटी टेनिसन वर्डस्वर्थ आदि प्रमुख नाम हैं।पुनर्जन्म का सिद्धान्त तत्त्वचिन्तकों की कोई कोरी कल्पना नहीं है। वह दिन दूर नहीं जब मनोविज्ञान के क्षेत्र में तेजी से हो रहे विकास के कारण जो तथ्य संग्रहीत किये जा रहें हैं उनके दबाव व प्रभाव से पश्चिमी राष्ट्रों को अपने धर्म ग्रन्थों का पुनर्लेखन करना पड़ेगा। बिना किसी दुराग्रह और दबाव के जीवन की यथार्थता को जो समझना चाहते हैं वे जगत् में दृष्टिगोचर विषमताओं के कारण चिन्तित होते हैं। इन सबको केवल संयोग कहकर टाला नहीं जा सकता। यदि हम तर्क को स्वीकार करते हैं तो देह से भिन्न जीव के अस्तित्व को मानना ही पड़ता है। मोझार्ट का एक दर्शनीय दृष्टान्त है। उसने 4 वर्ष की आयु में वाद्यवृन्द की रचना की और पांचवें वर्ष में लोगों के सामने कार्यक्रम प्रस्तुत किया और सात वर्ष की अवस्था में संगीत नाटक की रचना की। भारत के शंकराचार्य आदि का जीवन देखें तो ज्ञात होता है कि बाल्यावस्था में ही उनको कितना उच्च ज्ञान था। पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार न करने पर इन आश्चर्यजनक घटनाओं को संयोग मात्र कहकर कूड़ेदानी में फेंक देना पड़ेगापुनर्जन्म को सिद्ध करने वाली अनेक घटनायें देखी जाती हैं परन्तु उन्हें प्रमाण के रूप में संग्रहीत बहुत कम किया जाता है। जैसा कि मैंने कहा आधुनिक जगत् को इस महान स्वत प्रमाणित जीवन के नियम के सम्बन्ध में शोध करना अभी शेष है। अपरिपक्व विचार वाले व्यक्ति को प्रारम्भ में इस सिद्धान्त को स्वीकार करने में संदेह हो सकता है। जब भगवान् ने कहा कि उन सबका नाश होने वाला नहीं है तब उनके कथन को जगत् का एक सामान्य व्यक्ति होने के नाते अर्जुन ठीक से ग्रहण नहीं कर पाया। उसने प्रश्नार्थक मुद्रा में श्रीकृष्ण की ओर देखकर अधिक स्पष्टीकरण की मांग की।इनका शोक क्यों नहीं करना चाहिये क्योंकि स्वरूप से ये सब नित्य हैं। कैसे ৷৷.भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.12।।   तेषां नित्यत्वाच्छोकानर्हतामाह  नेति।  जातु कदाचिदहं नासमिति न

Chapter 2 (Part 7)

किंत्वासमेव। तथा त्वं नासीरिति न अपित्वासीरेव। तथेमे जनाधिपाः नासन्निति न किंत्वासन्नेव। तथा नच भविष्याम इति न किंतु भविष्याम एव। अतोऽस्माद्देहविनाशादुत्तरकालेऽपि त्रिष्वपि कालेषु नित्यः। आत्मस्वरुपेणेत्यर्थः। स्वस्य मध्ये गणनमात्मैक्याभिप्रायं बुहवचनं तु जीवमेदाभिप्रायेण देहभेदानुवृत्त्या तत्तद्देहाभिमानिनां जीवानामपि भेदान्नतु परमार्थत आत्मभेदाभिप्रायेणेति। तथाच शारीरकभाष्यंभेदस्तुपाधिनिमित्तकः मिथ्याज्ञानकल्पितो न पारमार्थिकः इति बोध्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.12।।नत्वेवेत्याद्येकोनविंशतिश्लोकैःअशोच्यानन्वशोचस्त्वम् इत्यस्य विवरणं क्रियतेस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्याद्यष्टभिः श्लोकैः।प्रज्ञावादांश्च भाषसे इत्यस्य मोहद्वयस्य पृथक्प्रयत्ननिराकर्तव्यत्वात्। तत्र स्थूलशरीरादात्मानं विवेक्तुं नित्यत्वं साधयति। तुशब्दो देहादिभ्यो व्यतिरेकं सूचयति। यथा अहमितः पूर्वं जातु कदाचिदपि नासमिति नैव अपितु आसमेव तथा त्वमप्यासीः इमे जनाधिपाश्चासन्नेव। एतेन प्रागभावाप्रतियोगित्वं दर्शितम्। तथा सर्वे वयं अहं त्वं इमे जनाधिपाश्चातःपरं नभविष्याम इति न अपितु भविष्याम एवेति ध्वंसाप्रतियोगित्वमुक्तम्। अतः कालत्रेयऽपि सत्तायोगित्वादात्मनो नित्यत्वेनानित्याद्देहाद्वैलक्षण्यं सिद्धमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.12।।ननु देहादन्योऽपि देहनाशेन नश्यतां कोशकार इव कोशनाशेनेति तत्राह  नत्वेवाहमिति।  त्वमहमिमे च सर्वे अनादयोऽनन्ताश्च स्म इत्यर्थः। जातु कदाचित् अहं न आसं इति न अपितु आसमेव। तथा त्वमपि नासीरिति न अपित्वासीरेव। इमे जनाधिपाः राजान इत्युपलक्षणं सर्वस्य जन्तुजातस्य। नासन्निति न अपित्वासन्नेवेति योजना। अनादित्वादनन्ताश्चेत्याह  न चेति।  न भविष्याम इति नैव किंतु सर्वे भविष्याम एव। ननु देहस्यानात्मत्वे कथं तत्पीडयायं पीड्यत इति चेद्यक्षवत्तदभिमानमात्रादिति ब्रूमः। यदा हि यक्षः परशरीरे विशति तदा तत्पीडया देहपतिर्न बाध्यते। तस्य तदानीं देहाभिमानाभावात्। यक्षस्तु बाध्यतेऽभिमानसत्वादिति लोके प्रसिद्धम्। किञ्च प्राचीनकर्मव्यतिरेकेण जीवनं नोपपद्यते। कृतहानाकृताभ्यागमप्रसङ्गात्। वृक्षादिष्वपि प्राक्कर्मास्तीत्यनुमेयम्। स्थावरजीविका प्राक्कर्मपूर्विका जीविकात्वात् पाकादिक्रियापूर्वकास्मदादिजीविकावत्। अपि च क्रियावैचित्र्यात्कार्यवैचित्र्यं दृष्टं घटशरावोदञ्चनादिषु तद्वदिहापि सुखदुःखादिवैचित्र्यं प्राक्कर्मवैचित्र्यादनुमेयम्। तथा सद्यो जातस्य गोवत्सस्य स्तनपानादौ प्रवृत्तिर्जन्तुमात्रस्य मरणात्त्रासश्च प्राग्भवीयानुभवजनितसंस्कारजन्यौ भोजनादिप्रवृत्तिश्चोच्छ्वासादिवदित्यतोऽस्ति प्राचीनं कर्म। अपि च कौलिकशास्त्रप्रसिद्धमेतत्। यथा देवदत्तः स्वशरीरे कण्टकवेधेन खिद्यते एवं शत्रुकृतायां देवदत्तप्रतिमायां कण्टकेन विद्धायां देवदत्तो व्यथते। तत्र व्यथाहेतुर्नान्तरं धातुवैषम्यं नापि बाह्यं कण्टकवेधादि किंतु केवलं प्राक्कर्ममात्रम्। एवंच बीजाङ्कुरन्यायेन कर्मतज्जन्यसंस्कारपरम्परयाऽनादिः संसार इति न देहनाशादात्मनाशोऽस्तीति न भीष्मादयः शोचनीयाः। अत्र पूर्वस्मिन् श्लोके आत्मनो देहादन्यत्वमुक्तं गतासून् देहानिति विशेषणेन। अत्र तु सूक्ष्मशरीरविशिष्टस्यात्मनो व्यवहारदृष्ट्या नित्यत्वं साधितमिति भेदः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.12।।अशोच्यत्वे अभक्तत्वं हेतुमुक्त्वा पुनरशोच्यत्वे हेत्वन्तरमाह नत्विति। अहमेतादृशो यादृशं त्वं द्रक्ष्यसि तादृशो जातु कदाचिदपि नासमिति न किन्त्वेवम्भूतः सर्वदैवाऽऽसम् अस्मीत्यर्थः। एतेन स्वस्य नित्यत्वमुक्तम्। ननु त्वन्नित्यत्वे कथमेते शोकानर्हाः इत्यत आह न त्वमासीः। न च इमे जनाधिपा आसन्निति न किन्तु सर्वं मल्लीलारूपत्वान्नित्यमेवेत्यर्थः। तेनासुराणां मरणमपि नित्यमेवेत्यर्थः। तस्मादेते माया एवेति शोकानर्हा इति भावः ()। नन्वहं युद्धे मरिष्ये चेत्तदा भवच्चरणवियोगो भविष्यत्यधर्माचरणाद्वा तथा भविष्यतीति शोचामीति चेत्तत्राह न चैवति। अतःपरं वर्त्तमानकालानन्तरं सर्वे वयं न भविष्याम इति न किन्तु भविष्याम एव। एवं सर्वस्य नित्यत्वात्सर्वेऽशोच्या इति त्वं शोकं कर्तुं नार्हसीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.12।।अशोच्यत्वे हेतुमाह  नत्वेवेति।  यथाऽहं परमेश्वरो जातु कदाचिल्लीलाविग्रहस्याविर्भावे तिरोभावेऽपि नासमिति नैव अपितु आसमेव अनादित्वात्। नच त्वं नासीः नाभूः अपित्वासीरेव। इमेच जनाधिपाः नृपाः नासन्निति न अपितु आसन्नेव मदंशत्वात् तथाऽतःपरं इतउपर्यपि नभविष्यामो न स्थास्याम इति च नैव अपितु स्थास्याम एव। जन्ममरणशून्यत्वादशोच्या इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.12।।कुत इत्यपेक्षायां शोच्यास्तु ते भवन्ति ये उत्पन्ना म्रियन्ते ते त्वात्मान इत्येषामुत्पत्तिरेव न सम्भवतीत्यात्मवादेनोत्पत्तिं निराकुर्वन्नशोच्यतामाह न त्वेवाहमिति।अहं यूयं सत्यवार्य इमे च द्वारकौकसः इतिवत्कालत्रयेऽपि देहस्येवात्मनो भवनं निवारयति भगवान्। नैव त्वमहं परमात्मोत्पन्नोऽस्मि जातु कदाचिन्नासं न तथाऽभूवं वा नोत्पन्नोऽसि वाऽभूश्च इमे पुरः स्थिता जनाधिपाश्च नोत्पन्नाः किन्तु सर्वदा नित्याः शुद्धाश्चेतना एवात्मान इत्यशोच्याः। नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम् कठो.5।13श्वे.उ.6।13 इत्यादिश्रुतेरात्मनामुत्पत्तिरूपो विकारो निराकृतः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.12।।वे भीष्मादि अशोच्य क्यों है इसलिये कि वे नित्य हैं। नित्य कैसे हैं किसी कालमें मैं नहीं था ऐसा नहीं किंतु अवश्य था अर्थात् भूतपूर्व शरीरोंकी उत्पत्ति और विनाश होते हुए भी मैं सदा ही था। वैसे ही तू नहीं था सो नहीं किंतु अवश्य था ये राजागण नहीं थे सो नहीं किंतु ये भी अवश्य थे। इसके बाद अर्थात् इन शरीरोंका नाश होनेके बाद भी हम सब नहीं रहेंगे सो नहीं किन्तु अवश्य रहेंगे। अभिप्राय यह है कि तीनों कालोंमें ही आत्मरूपसे सब नित्य हैं। यहाँ बहुवचनका प्रयोग देहभेदके विचारसे किया गया है आत्मभेदके अभिप्रायसे नहीं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.12।। व्याख्या   मात्र संसारमें दो ही वस्तुएँ हैं शरीरी (सत्) और शरीर (असत्)। ये दोनों ही अशोच्य हैं अर्थात् शोक न शरीरी (शरीरमें रहनेवाले) को लेकर हो सकता है और न शरीरको लेकर ही हो सकता है। कारण कि शरीरीका कभी अभाव होता ही नहीं और शरीर कभी रह सकता ही नहीं। इन दोनोंके लिये पूर्वश्लोकमें जोअशोच्यान् पद आया है उसकी व्याख्या अब शरीरीकी नित्यता और शरीरकी अनित्यताके रूपमें करते हैं। न त्वेहाहं जातु ৷৷. जनाधिपाः  लोगोंकी दृष्टिसे मैंने जबतक अवतार नहीं लिया था तबतक मैं इस रूपसे (कृष्णरूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं था और तेरा जबतक जन्म नहीं हुआ था तबतक तू भी इस रूपसे (अर्जुनरूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं था तथा इन राजाओंका भी जबतक जन्म नहीं हुआ था तबतक ये भी इस रूपसे (राजारूपसे) सबके सामने प्रकट नहीं थे। परन्तु मैं तू और ये राजालोग इस रूपसे प्रकट न होनेपर भी पहले नहीं थे ऐसी बात नहीं है।यहाँ मैं तू और ये राजालोग पहले थे ऐसा कहनेसे ही काम चल सकता था पर ऐसा न कहकर मैं तू और ये राजालोग पहले नहीं थे ऐसी बात नहीं ऐसा कहा गया है। इसका कारण यह है कि पहले नहीं थे ऐसी बात नहीं ऐसा कहनेसे पहले हम सब जरूर थे यह बात दृढ़ हो जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि नित्यतत्त्व सदा ही नित्य है। इसका कभी अभाव था ही नहीं।  जातु  कहनेका तात्पर्य है कि भूत भविष्य और वर्तमानकालमें तथा किसी भी देश परिस्थिति अवस्था घटना वस्तु आदिमें नित्यतत्त्वका किञ्चिन्मात्र भी अभाव नहीं हो सकता।यहाँ  अहम्  पद देकर भगवान्ने एक विलक्षण बात कही है। आगे चौथे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा है कि मेरे और तेरे बहुतसेजन्म हुए हैं पर उनको मैं जानता हूँ तू नहीं जानता। इस प्रकार भगवान्ने अपना ईश्वरपना प्रकट करके जीवोंसे अपनेको अलग बताया है। परन्तु यहाँ भगवान् जीवोंके साथ अपनी एकता बता रहे हैं। इसका तात्पर्य है कि वहाँ (4। 5 में) भगवान्का आशय अपनी महत्ता विशेषता प्रकट करनेमें है और यहाँ भगवान्का आशय तात्त्विक दृष्टिसे नित्यतत्त्वको जाननेमें है। न चैव ৷৷. वयमतः परम्   भविष्यमें शरीरोंकी ये अवस्थाएँ नहीं रहेंगी और एक दिन ये शरीर भी नहीं रहेंगे परन्तु ऐसी अवस्थामें भी हम सब नहीं रहेंगे यह बात नहीं है अर्थात् हम सब जरूर रहेंगे। कारण कि नित्यतत्त्वका कभी अभाव था नहीं और होगा भी नहीं।मैं तू और राजालोग हम सभी पहले नहीं थे यह बात भी नहीं है और आगे नहीं रहेंगे यह बात भी नहीं है इस प्रकार भूत और भविष्यकी बात तो भगवान्ने कह दी पर वर्तमानकी बात भगवान्ने नहीं कही। इसका कारण यह है कि शरीरोंकी दृष्टिसे तो हम सब वर्तमानमें प्रत्यक्ष ही हैं। इसमें कोई सन्देह नहीं है। इसलिये हम सब अभी नहीं हैं यह बात नहीं है ऐसा कहनेकी जरूरत नहीं है। अगर तात्त्विक दृष्टिसे देखा जाय तो हम सभी वर्तमानमें हैं और ये शरीर प्रतिक्षण बदल रहे हैं इस तरह शरीरोंसे अलगावका अनुभव हमें वर्तमानमें ही कर लेना चाहिये। तात्पर्य है कि जैसे भूत और भविष्यमें अपनी सत्ताका अभाव नहीं है ऐसे ही वर्तमानमें भी अपनी सत्ताका अभाव नहीं है इसका अनुभव करना चाहिये।जैसे प्रत्येक प्राणीको नींद खुलनेसे पहले भी यह अनुभव रहता है कि अभी हम हैं और नींद खुलनेपर भी यह अनुभव रहता है कि अभी हम हैं तो नींदकी अवस्थामें भी हम वैसेकेवैसे ही थे। केवल बाह्य जाननेकी सामग्रीका अभाव था हमारा अभाव नहीं था। ऐसे ही मैं तू और राजालोग हम सबके शरीर पहले भी नहीं थे और बादमें भी नहीं रहेंगे तथा अभी भी शरीर प्रतिक्षण नाशकी ओर जा रहे हैं परन्तु हमारी सत्ता पहले भी थी पीछे भी रहेगी और अभी भी वैसीकीवैसी ही है।हमारी सत्ता कालातीत तत्त्व है क्योंकि हम उस कालके भी ज्ञाता हैं अर्थात् भूत भविष्य और वर्तमान ये तीनों काल हमारे जाननेमें आते हैं। उस कालातीत तत्त्वको समझानेके लिये ही भगवान्ने यह श्लोक कहा है। विशेष बात  मैं तू और राजालोग पहले नहीं थे यह बात नहीं और आगे नहीं रहेंगे यह बात भी नहीं ऐसा कहनेका तात्पर्य है कि जब ये शरीर नहीं थे तब भी हम सब थे और जब ये शरीर नहीं रहेंगे तब भी हम रहेंगे अर्थात् ये सब शरीर तो हैं नाशवान् और हम सब हैं अविनाशी। ये शरीर पहले नहीं थे और आगे नहीं रहेंगे इससे शरीरोंकी अनित्यता सिद्ध हुई और हम सब पहले थे और आगे रहेंगे इससे सबके स्वरूपकी नित्यता सिद्ध हुई। इन दो बातोंसे यह एक सिद्धान्त सिद्ध होता है कि जो आदि और अन्तमें रहता है वह मध्यमें भी रहता है तथा जो आदि और अन्तमें नहीं रहता वह मध्यमें भी नहीं रहता।जो आदि और अन्तमें नहीं रहता वह मध्यमें कैसे नहीं रहता क्योंकि वह तो हमें दीखता है इसका उत्तर यह है कि जिस दृष्टिसे अर्थात् जिन मन बुद्धि और इन्द्रियोंसे दृश्यका अनुभव हो रहा है उन मनबुद्धइन्द्रियोंसहित वह दृश्य प्रतिक्षण बदल रहा है। वे एक क्षण भी स्थायी नहीं हैं। ऐसा होनेपर भी जब स्वयं दृश्यके साथ तादात्म्य कर लेता है तब वह द्रष्टा अर्थात् देखनेवाला बन जाता है। जब देखनेके साधन (मनबुद्धिइन्द्रियाँ) और दृश्य (मनबुद्धिइन्द्रियोंके विषय) ये सभी एक क्षण भी स्थायी नहीं हैं तो देखनेवाला स्थायी कैसे सिद्ध होगा तात्पर्य है कि देखनेवालेकी संज्ञा तो दृश्य और दर्शनके सम्बन्धसे ही है दृश्य और दर्शन से सम्बन्ध न हो तो देखनेवालेकी कोई संज्ञा नहीं होती प्रत्युत उसका आधाररूप जो नित्यतत्व है वही रहा जाता है। उस नित्यतत्त्वको हम सबकी उत्पत्ति स्थिति और प्रलयका आधार और सम्पूर्ण प्रतीतियोंका प्रकाशक कह सकते हैं। परन्तु ये आधार और प्रकाशक नाम भी आधेय और प्रकाश्यके सम्बन्धसे ही हैं। आधेय और प्रकाश्यके न रहनेपर भी उसकी सत्ता ज्योंकीत्यों ही है। उस सत्यतत्त्वकी तरफ जिसकी दृष्टि है उसको शोक कैसे हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता। इसी दृष्टिसे मैं तू और राजालोग स्वरूपसे अशोच्य हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.12।।अशोच्यानिति। शोचितुमशक्यं कलेबरं सदा नश्वरत्वात्। अशोचनार्हं च आत्मानं शोचसि। न कश्चित् गतासुः मृतः अगतासुः जीवन् वा शोच्योऽस्ति। तथाहि ( S omits हि) आत्मा तावदविनाशी। नानाशरीरेषु संचरतः का अस्य शोच्यता न च देहान्तरसंचारे एव शोच्यता। एवं हि (S omits हि) यौवनादावपि शोच्यता भवेत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.12।।नित्यत्वमशोच्यत्वे कारणमिति सूचितं विवेचयितुं प्रश्नपूर्वकं प्रतिजानीते  कुत इत्यादिना।  नित्यत्वमसिद्धं प्रमाणाभावादिति चोदयति  कथमिति।  आत्मा न जायते प्रागभावशून्यत्वान्नरविषाणवदिति परिहरति  नत्वेवेति।  किंचात्मा नित्यो भावत्वे सत्यजातत्वाद्व्यतिरेके घटवदित्यनुमानान्तरमाह  नचैवेति।  यत्तु कैश्चिदात्मयाथात्म्यं जिज्ञासितं भगवानुपदिशति नत्वित्यादिना श्लोकचतुष्टयेनेत्यादिष्टं तदसत् विशेषवचने हेत्वभावात् सर्वत्रैवात्मयाथात्म्यप्रतिपादनाविशेषादित्याशयेनपदच्छेदः पदार्थोक्तिर्विग्रहो वाक्ययोजना इति त्रितयमपि व्याख्यानाङ्गं प्रतिपादयति  नत्वित्यादिना।  नन्वात्मनो देहोत्पत्तिविनाशयोरुत्पत्तिर्विनाशप्रसिद्धेरुक्तमनुमानद्वयं प्रसिद्धिविरुद्धतया कालात्ययापदिष्टमिष्टमिति नेत्याह  अतीतेष्विति। चराचरव्यपाश्रयस्तु स्यात् इति न्यायेनात्मनो जन्मविनाशप्रसिद्धेरौपाधिकजन्माविनाशाविषयत्वान्निरुपाधिकस्य तस्य जन्मादिराहित्यमिति भावः। यद्यपि तवेश्वरस्य जन्मराहित्यं तथापि कथं ममेत्याशङ्क्याह  तथेति।  तथापि भीष्मादीनां कथं जन्माभावस्तत्राह  तथाच नेम इति।  द्वितीयमनुमानं प्रपञ्चयन्नुत्तरार्धं व्याचष्टे  तथेत्यादिना।  ननु देहोत्पत्तिविनाशयोरात्मनो जन्मनाशाभावेऽपि महास्वर्गमहाप्रलययोस्तस्याग्निविस्फुलिङ्गदृष्टान्तश्रुत्या जन्मविनाशावेष्टव्यावित्याशङ्क्यनात्मा श्रुतेः इति न्यायेन परिहरति  त्रिष्वपीति। यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् इति न्यायेन भिन्नत्वाद्विकारित्वमात्मनामनुमीयते भिन्नत्वं च बहुवचनप्रयोगप्रमितमित्याशङ्क्याह  देहेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.12।। किमिति  कस्मात्कारणात्पण्डिता अप्यगतासूनिव गतासूनासन्नविनाशान्नानुशोचन्तीति शेषः। अत्र नित्यत्वादित्युत्तरम्। कुतो नित्यत्वमित्यत आहेति वाक्यं चाध्याहार्थम्। न त्वेवाहमित्यतः परमिति शब्दश्च। अर्जुनं निमित्तीकृत्य प्राप्तलोकोपकारार्थं हि भगवतोपदेशः क्रियते। तत्र ये भगवतः कृष्णस्येश्वरत्वं नित्यत्वं च न जानन्ति तान् प्रति यथाश्रुतैव योजना। दृष्टान्तस्तूत्तरत्र भविष्यति। ये तु तज्ज्ञात्वा जीवनित्यत्वमेव न जानन्ति तान्प्रत्यन्यथा योज्यमित्याह  ईश्वरे ति। अप्रस्तुतत्वादनाशङ्कितत्वाद्दृष्टान्तत्वेनाह। जीवनित्यतायां साध्यायामीश्वरमिति शेषः। अत एव कृष्णेत्यनुक्त्वेश्वरेत्युक्तम्। नन्वीश्वरनित्यत्वं कुतः सिद्धं पूर्वार्द्धे वाक्यत्रयसद्भावात् कथञ्चिद्योजनासम्भवेऽपि उत्तरार्द्धस्यैकवाक्यत्वात्कथं योजना इत्यत आह  यथे ति। वेदान्ता उपनिषदः। सिद्धस्यार्थस्य साध्यत्वेन निर्देशो दोषायेति सामर्थ्याद्यथैवंशब्दाध्याहारेण वाक्यभेदेन च योज्यमिति भावः। ननु वेदान्तैरीश्वरनित्यत्वं जानन्तस्तत्रैवोक्तं जीवनित्यत्वं कथं न जानन्ति उच्यते नित्यो नित्यानां कठो.5।13श्वे.उ.6।13 इति निर्धारणसामर्थ्याज्जीवानां नित्यत्वमीश्वरस्य परमनित्यत्वमवगम्य मन्दाः प्रतिपद्यन्ते। नित्यत्वं हि विनाशाभावः। नचाभावस्तारतम्यवान्। अत ईश्वर एव नित्यः जीवेषु तूपचार इति। तान्प्रत्यनुमानेन जीवनित्यत्वं ईश्वरदृष्टान्तेन साध्यते। तत्रन त्वेवाहं जातु नासं इति दृष्टान्तेनानादित्वसाधनमनुवदति। न त्वमित्यादिना तस्य पक्षधर्मतामाह  नचैवे त्यादिना। दृष्टान्ते पक्षे च साध्याभिधानमिति। अत्र भगवता जीवानां परस्परमीश्वराच्च भेदे प्रतिपादितेऽपि बहुवचनं शरीरापेक्षया न त्वात्मापेक्षयेति वदतो शं.चा. भविष्यत्युत्तरम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.12।।किमिति। न त्वेवाहम्। ईश्वरनित्यत्वस्याप्रस्तुतत्वाद्दृष्टान्तत्वेनाह न त्वेवेति। यथाऽहं नित्यः सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धः एवं त्वमेते जनाधिपाश्च नित्याः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.12।। अहं  सर्वेश्वरः तावद् अतो वर्तमानात् पूर्वस्मिन् अनादौ काले  न नासम्  अपि तु आसम्। त्वन्मुखाः च एते ईशितव्याः क्षेत्रज्ञा न नासन् अपि त्वासन्। अहं च यूयं च  सर्वे वयमतः परम्  अस्माद् अनन्तरे काले  न चैव न भविष्यामः  अपि तु भविष्याम एव।यथा अहं सर्वेश्वरः परमात्मा नित्य इति न अत्र संशयः तथैव भवन्तः क्षेत्रज्ञा आत्मानः अपि नित्या एव इति मन्तव्याः।एवं भगवतः सर्वेश्वराद् आत्मनां परस्परं च भेदः पारमार्थिकः इति भगवता एव उक्तम् इति प्रतीयते। अज्ञानमोहितं प्रति तन्निवृत्तये पारमार्थिकनित्यत्वोपदेशसमयेअहम्त्वम्इमेसर्वेवयम् इति व्यपदेशात्।औपाधिकात्मभेदवादे हि आत्मभेदस्य अतात्त्विकत्वेन तत्त्वोपदेशसमये भेदनिर्देशो न संगच्छते।भगवदुक्तात्मभेदः स्वाभाविकः इति श्रुतिः अपि आह नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान्। (श्वेता0 6।13) इति। नित्यानां बहूनां चेतनानां य एकः चेतनो नित्यः स कामान् विदधाति इत्यर्थः। अज्ञानकृतभेददृष्टिवादे तु परमपुरुषस्य परमार्थदृष्टेः निर्विशेषकूटस्थनित्यचैतन्यात्मयाथात्म्यसाक्षात्कारात् निवृत्ताज्ञानतत्कार्यतया अज्ञानकृतभेददर्शनं तन्मूलोपदेशादिव्यवहाराः च न संगच्छन्ते।अथ परमपुरुषस्य अधिगताद्वैतज्ञानस्य बाधितानुवृत्तिरूपम् इदं भेदज्ञानं दग्धपटादिवत् न बन्धकम् इति उच्येत न एतद् उपपद्यते मरीचिकाजलज्ञानादिकं हि बाधितम् अनुवर्तमानम् अपि न जलाहरणादिप्रवृत्तिहेतुः। एवम् अत्र अपि अद्वैतज्ञानेन बाधितं भेदज्ञानम् अनुवर्तमानम् अपि मिथ्यार्थविषयत्वनिश्चयात् न उपदेशादिप्रवृत्तिहेतुः भवति। न च ईश्वरस्य पूर्वम् अज्ञस्य शास्त्राधिगततत्त्वज्ञानतया बाधितानुवृत्तिः शक्यते वक्तुम्यः सर्वज्ञः सर्ववित् (मु0 उ0 2।1।9) परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च। (श्वेता0 6।8)वेदाहं समतीतानि वर्तमानानि चार्जुन। भविष्याणि च भूतानि मां तु वेद न कश्चन।। (गीता 7।26) इति श्रुतिस्मृतिविरोधात्।किं च परमपुरुषश्च इदानीन्तनगुरुपरम्परा च अद्वितीयात्मस्वरूपनिश्चये सति अनुवर्तमाने अपि भेदज्ञाने स्वनिश्चयानुरूपम् अद्वितीयम् आत्मज्ञानं कस्मै उपदिशति इति वक्तव्यम्।प्रतिबिम्बवत्प्रतीयमानेभ्यः अर्जुनादिभ्यः इति चेत् न एतद् उपपद्यते न हि अनुन्मत्तः कोऽपि मणिकृपाणदर्पणादिषु प्रतीयमानेषु स्वात्मप्रतिबिम्बेषु तेषां स्वात्मनः अनन्यत्वं जानन् तेभ्यः कमपि अर्थम् उपदिशति।बाधितानुवृत्तिः अपि तैः न शक्यते वक्तुम् बाधकेन अद्वितीयात्मज्ञानेन आत्मव्यतिरिक्तभेदज्ञानकारणस्य अज्ञानादेः विनष्टत्वात्। द्विचन्द्रज्ञानादौ तु चन्द्रैकत्वज्ञानेन पारमार्थिकतिमिरादिदोषस्य द्विचन्द्रज्ञानहेतोः अविनष्टत्वाद् बाधितानुवृत्तिः युक्ता। अनुवर्तमानम् अपि प्रबलप्रमाणबाधितत्वेन अकिञ्चित्करम्। इह तु भेदज्ञानस्य सविषयस्य सकारणस्य अपारमार्थिकत्वेन वस्तुयाथात्म्यज्ञानविनष्टत्वात् न कथञ्चिद् अपि बाधितानुवुत्तिः संभवति। अतः सर्वेश्वरस्य इदानीन्तनगुरुपरम्परायाः च तत्त्वज्ञानम् अस्ति चेद् भेददर्शनतत्कार्योपदेशाद्यसंभवः। भेददर्शनमस्ति इति चेद् अज्ञानस्य तद्धेतोः स्थितत्वेन अज्ञत्वाद् एव सुतराम् उपदेशो न संभवति।किं च गुरोः अद्वितीयात्मविज्ञानाद् एव ब्रह्माज्ञानस्य सकार्यस्य विनष्टत्वात् शिष्यं प्रति उपदेशो निष्प्रयोजनः। गुरुः तज्ज्ञानं च कल्पितम् इति चेत् शिष्यतज्ज्ञानयोः अपि कल्पितत्वात् तदपि अनिवर्त्तकम्। कल्पितत्वेऽपि पूर्वविरोधित्वेन निवर्त्तकम् इति चेत् तदाचार्यज्ञानेऽपि समानम् इति तद् एव निवर्तकं भवति इति उपदेशानर्थक्यम् एव इति कृतम् असमीचीनवादैः निरस्तैः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.12।।

 न तु एव जातु  कदाचिद्  अहं नासम्  किं तु आसमेव। अतीतेषु देहोत्पत्तिविनाशेषु घटादिषु वियदिव नित्य एव अहमासमित्यभिप्रायः। तथा न त्वं न आसीः किं तु आसीरेव। तथा  न इमे जनाधिपाः  न आसन् किं तु आसन्नेव। तथा  न च एव न भविष्यामः  किं तु भविष्याम एव सर्वे वयम् अतः अस्मात् देहविनाशात्  परम्  उत्तरकाले अपि। त्रिष्वपि कालेषु नित्या आत्मस्वरूपेण इत्यर्थः। देहेभेदानुवृत्त्या बहुवचनं नात्मभेदाभिप्रायेण।। तत्र कथमिव नित्य आत्मेति दृष्टान्तमाह

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【 Verse 2.13 】

▸ Sanskrit Sloka: देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा | तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ||

▸ Transliteration: dehino’sminyathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā | tathā dehāntara prāptir dhīras tatra na muhyati ||

▸ Glossary: dehinaḥ: of the embodied soul; asmin: in this; yathā: as; dehe: in the body;

kaumāraṁ: boyhood; yauvanaṁ: youth; jarā: old age; tathā: similarly; dehān- tara: transference of the body; prāptiḥ: achievement; dhīraḥ: the brave; tatra:

thereupon; na: never; muhyati: is deluded

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.13 Just as the spirit in this body passes through childhood, youth and old age, so does it pass into another body; the man centered in himself does not fear this.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.13।।देहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन जवानी और वृद्धावस्था होती है ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.13।। जैसे इस देह में देही जीवात्मा की कुमार, युवा और वृद्धावस्था होती है, वैसे ही उसको अन्य शरीर की प्राप्ति होती है धीर पुरुष इसमें मोहित नहीं होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.13 देहिनः of the embodied (soul)? अस्मिन् in this? यथा as? देहे in body? कौमारम् childhood? यौवनम् youth? जरा old age? तथा so also? देहान्तरप्राप्तिः the attaining of another body? धीरः the firm? तत्र thereat? न not? मुह्यति grieves.Commentary -- Just as there is no interruption in the passing of childhood into youth and youth into old age in this body? so also there is no interruption by death in the continuity of the ego. The Self is not dead at the termination of the stage? viz.? childhood. It is certainly not born again at the beginning of the second stage? viz.? youth. Just as the Self passes unchanged from childhood to youth and from yourth to old age? so also the Self passes unchanged from one body into,another. Therefore? the wise man is not at all distressed about it.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.13. Just as the boyhood, youth and old age come to the embodied Soul in this body, in the same manner is the attaining of another body; the wise man is not deluded at that.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.13 As the soul experiences in this body infancy, youth and old age, so finally it passes into another. The wise have no delusion about this.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.13 Just as the self associated with a body passes through childhood, youth and old age (pertaining to that body), so too (at death) It passes into another body. A wise man is not deluded by that.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.13 As are boyhood, youth and decrepitude to an embodied being in this (present) body, similar is the acisition of another body. This being so, an intelligent person does not get deluded.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.13 Just as in this body the embodied (soul) passes into childhood, youth and old age, so also does it pass into another body; the firm man does not grieve thereat.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.12-13 Na hi etc. Dehinah etc Never indeed did I not exist, but I did exist [always]. Likewise are you and these kings. If there can be lamentability for one, on attaining change in physical form then why is one not lamented over when one attains the youth from the boyhood ? He, who is wise, does not lament. But, wisdom is easily attainable for him whose concern is not even for this [present] body. Therefore you must seek wisdom.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.13 As the self is eternal, one does not grieve, thinking that the self is lost, when an embodied self living in a body gives up the state of childhood and attains youth and other states. Similarly, the wise men, knowing that the self is eternal, do not grieve, when the self attains a body different from the present body. Hence the selves, being eternal, are not fit objects for grief.

This much has to be done here; the eternal selves because of Their being subject ot beginningless Karma become endowed with bodies suited to Their Karmas. To get rid of this bondage (of bodies), embodied beings perform duties like war appropriate to their stations in life with the help of the same bodies in an attitude of detachment from the fruits as prescribed by the scripture. Even to such aspirants, contacts with sense-objects give pleasure and pain, arising from cold, heat and such other things. But these experiences are to be endured till the acts enjoined in the scriptures come to an end.

The Lord explains the significance immediately afterwards:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.13 As to that, to show how the Self is eternal, the Lord cites an illustration by saying,'৷৷.of the embodied,' etc. Yatha, as are, the manner in which; kaumaram, boyhood; yauvanam, youth, middle age; and jara, decrepitude, advance of age; dehinah, to an embodied being, to one who possesses a body (deha), to the Self possessing a body; asmin, in this, present; dehe, body . These three states are mutually distinct. On these, when the first state gets destroyed the Self does not get destroyed; when the second state comes into being It is not born. What then? It is seen that the Self, which verily remains unchanged, acires the second and third states. Tatha, similar, indeed; is Its, the unchanging Self's dehantarapraptih, acisition of another body, a body different from the present one. This is the meaning. Tatra, this being so; dhirah, an intelligent person; na, does not; muhyati, get deluded.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.13।। स्मृति का यह नियम है कि अनुभवकर्त्ता तथा स्मरणकर्त्ता एक ही व्यक्ति होना चाहिये तभी किसी वस्तु का स्मरण करना संभव है। मैं आपके अनुभवों का स्मरण नहीं कर सकता और न आप मेरे अनुभवों का परन्तु हम दोनों अपनेअपने अनुभवों का स्मरण कर सकते हैं।वृद्धावस्था में हम अपने बाल्यकाल और यौवन काल का स्मरण कर सकते हैं। कौमार्य अवस्था के समाप्त होने पर युवावस्था आती है और तत्पश्चात् वृद्धावस्था। अब यह तो स्पष्ट है कि वृद्धावस्था में व्यक्ति के साथ कौमार्य और युवा दोनों ही अवस्थायें नहीं हैं फिर भी वह उन अवस्थाओं में प्राप्त अनुभवों को स्मरण कर सकता है। स्मृति के नियम से यह सिद्ध हो जाता है कि व्यक्ति में कुछ है जो तीनों अवस्थाओं में अपरिवर्तनशील है जो बालक और युवा शरीर द्वारा अनुभवों को प्राप्त करता है तथा उनका स्मरण भी करता है।इस प्रकार देखने पर यह ज्ञात होता है कि कौमार्य अवस्था की मृत्यु युवावस्था का जन्म है और युवावस्था की मृत्यु ही वृद्धावस्था का जन्म है। और फिर भी निरन्तर होने वाले इन परिवर्तनों से हमें किसी प्रकार का शोक नहीं होता बल्कि इन अवस्थाओं से गुजरते हुये असंख्य अनुभवों को प्राप्त कर हम प्रसन्न ही होते हैं।जगत् में प्रत्येक व्यक्ति के इस निजी अनुभव का दृष्टान्त के रूप में उपयोग करके श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते हैं कि बुद्धिमान पुरुष जीवात्मा के एक देह को छोड़कर अन्य शरीर में प्रवेश करने पर शोक नहीं करता।पुनर्जन्म के सिद्धान्त के पीछे छिपे इस सत्य को यह श्लोक और अधिक दृढ़ करता है। अत बुद्धिमान पुरुष के लिये मृत्यु का कोई भय नहीं रह जाता। बाल्यावस्था आदि की मृत्यु होने पर हम शोक नहीं करते क्योंकि हम जानते हैं कि हमारा अस्तित्व बना रहता है और हम पूर्व अवस्था से उच्च अवस्था को प्राप्त कर रहे हैं। उसी प्रकार एक देह विशेष को त्याग कर जीवात्मा अपनी पूर्व वासनाओं के अनुसार अन्य देह को धारण करता है। इस विषय में धीर पुरुष मोहित नहीं होता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.13।।   तत्र दृष्टान्तमाह  देहिन इति।  देहोऽस्यास्तीति देही आत्मा तस्य यथास्मिन्देहेऽवस्थात्रयमेकस्यैव तथा देहान्तरप्राप्तिः तत्रैवं सति धीमानात्मनित्यत्वज्ञानवान्न मुह्यति न मोहं प्राप्नोति। नन्वेतेषां श्लोकानां वादिमतान्याशङ्क्यानवतारणं भाष्यकाराणां न्यूनतेति चेन्न।नानुशोचन्ति पण्डिताःधीरस्तत्र न मुह्यतितांस्तितिक्षस्व भारतयं हि न व्यथयन्त्येते इतिवाक्यशेषाणां सत्त्वात् शोकनिवारणायात्मनित्यत्वव्याख्यानस्य शब्दार्थत्वादात्मानित्यत्ववादी मूर्ख इत्येवमादीनां तेषामश्रवणात् आत्मनो नित्यत्वादिवर्णनेन वादिमतनिराकरणस्यार्थसिद्धत्वात् शारीरकभाष्ये कुमतानां स्वेनैव खण्डितत्वाच्च तथाऽनवतारणे न्यूनताया अभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.13।।ननुदेहमात्रं चैतन्यविशिष्टमात्मा इति लोकायतिकाः। तथाच स्थूलोऽहं गौरोऽहं गच्छामि चेत्यादिप्रत्यक्षप्रतीतानां प्रामाण्यमनपोहितं भविष्यति यतः कथं देहादात्मनो व्यतिरेकः व्यतिरेकेऽपि कथं वा जन्मविनाशशून्यत्वं जातो देवदत्तो मृतो देवदत्त इति प्रतीतेर्देहजन्मनाशाभ्यां सहात्मनोऽपि जन्मविनाशोपपत्तेरित्याशङ्क्याह देहाः सर्वे भूतभविष्यवर्तमाना जगन्मण्डलवर्तिनोऽस्य सन्तीति देही। एकस्यैव विभुत्वेन सर्वदेहयोगित्वात्सर्वत्र चेष्टोपपत्तेर्न प्रतिदेहमात्मभेदे प्रमाणमस्तीति सूचयितुमेकवचनम्। सर्वे वयमिति बहुवचनं तु पूर्वत्रदेहभेदानुवृत्त्या न त्वात्मभेदाभिप्रायेणेति न दोषः। तस्य देहिन एकस्यैव सतोऽस्मिन्वर्तमाने देहे यथा कौमारं यौवनं जरेत्यवस्थात्रयं परस्परविरुद्धं भवति नतु तद्भेदेनात्मभेदः यएवाहं बाल्ये पितरावन्वभूवं सएवाहं वार्धके प्रणप्तृ़ननुभवामीति दृढतरप्रत्यभिज्ञानात् अन्यनिष्ठसंस्कारस्य चान्यत्रानुसन्धानाजनकत्वात् तथा तेनैव प्रकारेणाविकृतस्यैव सत आत्मनो देहान्तरप्राप्तिरेतस्माद्देहादत्यन्तविलक्षणदेहप्राप्तिः स्वप्ने योगैश्वर्ये च तद्देहभेदानुसन्धानेऽपि स एवाहमिति प्रत्यभिज्ञानात्। तथाच यदि देह एवात्मा भवेत्तदा कौमारादिभेदेन देहे भिद्यमाने प्रतिसन्धानं न स्यात् अथतु कौमाराद्यवस्थानामत्यन्तवैलक्षण्येऽप्यवस्थावतो देहस्ययावत्प्रत्यभिज्ञं वस्तुस्थितिः इति न्यायेनैक्यं ब्रूयात्तदापि स्वप्नयोगैश्वर्ययोर्देहधर्मभेदे प्रतिसन्धानं न स्यादित्युभयोदाहरणम्। अतो मरुमरीचिकादावुदकादिबुद्धेरिव स्थूलोऽहमित्यादिबुद्धेरपि भ्रमत्वमवश्यमभ्युपेयम् बाधस्योभयत्रापि तुल्यत्वात्। एतच्चन जायते इत्यादौ प्रपञ्चयिष्यते। एतेन देहाद्व्यतिरिक्तो देहेन सहोत्पद्यते विनश्यति चेति पक्षोऽपि प्रत्युक्तः। तत्रावस्थाभेदे प्रत्यभिज्ञोपपत्तावपि धर्मिणो देहस्य भेदे प्रत्यभिज्ञानुपपत्तेः। अथवा यथा कौमाराद्यवस्थाप्राप्तिरविकृतस्यात्मन एकस्यैव तथा देहान्तर प्राप्तिरेतस्माद्देहादुत्क्रान्तौ। तत्र स एवाहमिति प्रत्यभिज्ञानाभावेऽपि जातमात्रस्य हर्षशोकभयादिसंप्रतिपत्तेः पूर्वसंस्कारजन्याया दर्शनात्। अन्यथा स्तनपानादौ प्रवृत्तिर्न स्यात्। तस्या इष्टसाधनतादिज्ञानजन्यत्वस्यादृष्टमात्रजन्यत्वस्य चाभ्युपगमात्। तथाच पूर्वापरदेहयोरात्मैक्यसिद्धिः। अन्यथा कृतनाशाकृताभ्यागमप्रसङ्गादित्यन्यत्र विस्तरः। कृतयोः पुण्यपापयोर्भोगमन्तरेण नाशः कृतनाशः अकृतयोः पुण्यपापयोरकस्मात्फलदातृत्वमकृताभ्यागमः। अथवा देहिन एकस्यैव तव यथा क्रमेण देहावस्थोत्पत्तिविनाशयोर्न भेदः नित्यत्वात् तथा युगपत्सर्वदेहान्तरप्राप्तिरपि तवैकस्यैव विभुत्वात् मध्यमपरिमाणत्वे सावयवत्वेन नित्यत्वायोगात् अणुत्वे सकलदेहव्यापिसुखाद्यनुपलब्धिप्रसङ्गात् विभुत्वे निश्चिते सर्वत्र दृष्टकार्यत्वात्सर्वशरीरेष्वेक एवात्मा त्वमिति निश्चितोऽर्थः। तत्रैवंसति वध्यघातकभेदकल्पनया त्वमधीरत्वान्मुह्यसि धीरस्तु विद्वान्न मुह्यति अहमेषां हन्ता एते मम वध्या इति भेददर्शनाभावात्। तथाच विवादगोचरापन्नाः सर्वे देहा एकभोक्तृकाः देहत्वात्त्वद्देहवत् इति। श्रुतिरपिएको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा इत्यादि। एतेन यदाहुःदेहमात्रमात्मा इति चार्वाकाःइन्द्रियाणि मनः प्राणश्च इति तदेकदेशिनःक्षणिकं विज्ञानम् इति सौगताःदेहातिरिक्तः स्थिरो देहपरिमाणः इति दिगम्बराःमध्यमपरिमाणस्य नित्यत्वानुपपत्तेः नित्योऽणुः इत्येकदेशिनः तत्सर्वमपाकृतं भवति नित्यत्वविभुत्वस्थापनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.13।।यद्यप्येवं तथापीष्टदेहवियोगजः शोको भवत्येवेत्याशङ्क्याह  देहिन इति।  देहौ स्थूलसूक्ष्मौ विद्येते अस्य स देही चिदात्मा तस्य यथास्मिन् स्थूलशरीरे कौमाराद्यवस्थासु देहभेदेऽपि एक एवाहं बाल आसमिदानीं वृद्धोऽस्मीत्यभेदप्रत्यभिज्ञानादैक्यं बालादिशरीरेभ्योऽन्यत्वं च व्यावृत्तेभ्योऽनुवृत्तं भिन्नं कुसुमेभ्यः सूत्रमिवेति न्यायात्। एवं देहान्तरप्राप्तिरपि स्थूलाच्छरीरादन्येषां लिङ्गशरीराणां सूक्ष्माणां स्थूलशरीरानुकारिणां प्राप्तिः। अयमर्थः यथा एकमपि स्थूलं शरीरं कौमाराद्यवस्थाभेदादनेकरूपं एवं नित्यमपि लिङ्गशरीरं प्राणिकर्मभेदात्सुरनरतिर्यगाद्यवस्थाभेदादनेकं भवति। ततश्चोक्तन्यायेन स्थूलादिवत्सूक्ष्मादपि शरीरदात्मा विविक्त एव। एवं च शोकादिघर्मिणो लिङ्गादपि विभिन्नस्य तव इष्टवियोगजः शोकोऽपि न युक्तः। अतएव तत्र तस्मिन्विषये धीरो न मुह्यति। आभिमानिकौ शोकमोहौ देहद्वयाभिमानत्यागाद्धीरं न बाधेते। अतस्त्वमपि धीरो भवेति भावः। पूर्वश्लोकयोर्गतासूनिति वयमिति च बहुवचनं उपाधिभेदाभिप्रायम् अत्र तु देहिन इत्येकवचनमुपधेयचिदात्मैक्याभिप्रायमिति ज्ञेयम्। तथा च श्रुतिरेकस्यात्मन औपाधिकं भेदमाहयथा ह्ययं ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुगच्छन्। उपाधिना क्रियते भेदरूपो देवः क्षेत्रेष्वेवमजोऽयमात्मा इति। क्षेत्रेषु वक्ष्यमाणलक्षणेषु स्थूलसूक्ष्मदेहद्वयात्मकेषु।एको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा इति च। एकत्वाच्च विभुत्वमप्यस्य सिद्धम्। तेन देहादीनामनित्यानामविभूनां च पराभिमतमात्मत्वं प्रत्याख्यातं वेदितव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.13।।ननु वयमेकत्रैव भविष्याम इति सत्यं परन्तु पुनरलौकिको देह एतादृश एव भविष्यति न वेति सन्देहात् शोचामीत्याकाङ्क्षायामाह देहिन इति। देहिनो जीवस्य यथाऽस्मिन्देहे कौमारं यौवनं जरा अवस्थात्रयं भवति कालेन तथा भगवदिच्छया भगवदीयस्य देहान्तरप्राप्तिरलौकिकद्वितीयदेहप्राप्तिर्भवतीत्यर्थः। धीरो भक्तस्तत्र देहप्राप्त्यर्थं न मुह्यति मोहं न प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.13।।नन्वीश्वरस्य तव जन्मादिशून्यत्वं सत्यमेव जीवानां तु जन्ममरणे प्रसिद्धे तत्राह  देहिन इति।  देहिनो देहाभिमानिनो जीवस्य यथाऽस्मिन्स्थूलदेहे कौमाराद्यवस्था देहनिबन्धना एव नतु स्वतःपूर्वावस्थानाशेऽवस्थान्तरोत्पत्तावपि स एवाहमति प्रत्यभिज्ञानात्तथैवैतद्देहनाशे देहान्तरप्राप्तिरपि लिङ्गदेहनिबन्धना। नतु तावतात्मनो नाशः। जातमात्रस्य पूर्वसंस्कारेण स्तन्यपानादौ प्रवृत्तिदर्शनात्। अतो धीरः धीमांस्तत्र तयोर्देहनाशोत्पत्त्योर्न मुह्यति आत्मैव मृतो जातश्चेति न मन्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.13।।एवमात्मनामशोच्यतामनुत्पत्त्योपपाद्य देहात्मादीनामशोच्यतामाह देहिन इति। लौकिकनिदर्शनेन यथाऽस्मिन्स्थूलदेहे कौमाराद्यवस्थाप्राप्तिस्तथा देहान्तरप्राप्तिरात्मनां नियतेति धीरो न मुह्यति न तत्र शोचति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.13।।आत्मा किसके सदृश नित्य है इसपर दृष्टान्त कहते हैं जिसका देह है वह देही है उस देहीकी अर्थात् शरीरधारी आत्माकी इस वर्तमान शरीरमें जैसे कौमार बाल्यावस्था यौवनतरुणावस्था और जरा वृद्धावस्था ये परस्पर विलक्षण तीनों अवस्थाएँ होती हैं। इनमें पहली अवस्थाके नाशसे आत्मका नाश नहीं होता और दूसरी अवस्थाकी उत्पत्तिसे आत्माकी उत्पत्ति नहीं होती तो फिर क्या होता है कि निर्विकार आत्माको ही दूसरी और तीसरी अवस्थाकी प्राप्ति होती हुई देखी गयी है। वैसे ही निर्विकार आत्माको ही देहान्तरकी प्राप्ति अर्थात् इस शरीरसे दूसरे शरीरका नाम देहान्तर है उसकी प्राप्ति होती है ( होती हुईसी दीखती है )। ऐसा होनेसे अर्थात् आत्माको निर्विकार और नित्य समझ लेनेके कारण धीर बुद्धिमान् इस विषयमें मोहित नहीं होता मोहको प्राप्त नहीं होता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.13।।व्याख्या  देहिनोऽस्मिन्यथा देहे (टिप्पणी प0 50) कौमारं यौवनं जरा   शरीरधारीके इस शरीरमें पहले बाल्यावस्था आती है फिर युवावस्था आती है और फिर वृद्धावस्था आती है। तात्पर्य है कि शरीरमें कभी एक अवस्था नहीं रहती उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है।यहाँ शरीरधारीके इस शरीरमें ऐसा कहनेसे सिद्ध होता है शरीरी अलग है और शरीर अलग है। शरीरी द्रष्टा है और शरीर दृश्य है। अतः शरीरमें बालकपन आदि अवस्थाओंका जो परिवर्तन है वह परिवर्तन शरीरीमें नहीं है। तथा देहान्तरप्राप्तिः   जैसे शरीरकी कुमार युवा आदि अवस्थाएँ होती हैं ऐसे ही देहान्तरकी अर्थात् दूसरे शरीरकी प्राप्ति होती है। जैसे स्थूलशरीर बालकसे जवान एवं जवानसे बूढ़ा हो जाता है तो इन अवस्थाओंके परिवर्तनको लेकर कोई शोक नहीं होता ऐसे ही शरीरी एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है तो इस विषयमें भी शोक नहीं होना चाहिये। जैसे स्थूलशरीरके रहतेरहते कुमार युवा आदि अवस्थाएँ होती हैं ऐसे ही सूक्ष्म और कारणशरीरके रहतेरहते देहान्तरकी प्राप्ति होती है अर्थात् जैसे बालकपन जवानी आदि स्थूलशरीरकी अवस्थाएँ हैं ऐसे देहान्तरकी प्राप्ति (मृत्युके बाद दूसरा शरीर धारण करना) सूक्ष्म और कारणशरीरकी अवस्था है।स्थूलशरीरके रहतेरहते कुमार आदि अवस्थाओंका परिवर्तन होता है यह तो स्थूल दृष्टि है। सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो अवस्थाओंकी तरह स्थूलशरीरमें भी परिवर्तन होता रहता है। बाल्यावस्थामें जो शरीर था वह युवावस्थामें नहीं है। वास्तवमें ऐसा कोई भी क्षण नहीं है जिस क्षणमें स्थूलशरीरका परिवर्तन न होता हो। ऐसे ही सूक्ष्म और कारणशरीरमें भी प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है जो देहान्तररूपसे स्पष्ट देखनेमें आता है  (टिप्पणी प0 51.1) ।अब विचार यह करना है कि स्थूलशरीरका तो हमें ज्ञान होता है पर सूक्ष्म और कारणशरीरका हमें ज्ञान नहीं होता। अतः जब सूक्ष्म और कारणशरीरका ज्ञान भी नहीं होता तो उनके परिवर्तनका ज्ञान हमें कैसे हो सकता है इसका उत्तर है कि जैसे स्थूलशरीरका ज्ञान उसकी अवस्थाओंको लेकर होता है ऐसे ही सूक्ष्म और कारणशरीरका ज्ञान भी उसकी अवस्थाओंको लेकर होता है। स्थूलशरीरकी जाग्रत् सूक्ष्मशरीरकी स्वप्न और कारणशरीरकी सुषुप्ति अवस्था मानी जाती है। मनुष्य अपनी बाल्यावस्थामें अपनेको स्वप्नमें बालक देखता है युवावस्थामें स्वप्नमें युवा देखता है और वृद्धावस्थामें स्वप्नमें वृद्ध देखता है। इससे सिद्ध हो गया कि स्थूलशरीरके साथसाथ सूक्ष्मशरीरका भी परिवर्तन होता है। ऐसे ही सुषुप्तिअवस्था बाल्यावस्थामें ज्यादा होती है युवावस्थामें कम होती है और वृद्धावस्थामें वह बहुत कम हो जाती है अतः इससे कारणशरीरका परिवर्तन भी सिद्ध हो गया। दूसरी बात बाल्यावस्था और युवावस्थामें नींद लेनेपर शरीर और इन्द्रियोंमें जैसी ताजगी आती है वैसी ताजगी वृद्धावस्थामें नींद लेनेपर नहीं आती अर्थात् वृद्धावस्थामें बाल्य और युवाअवस्थाजैसा विश्राम नहीं मिलता। इस रीतिसे भी कारणशरीरका परिवर्तन सिद्ध होता है।जिसको दूसरा देवता पशु पक्षी आदिका शरीर मिलता है उसको उस शरीरमें (देहाध्यासके कारण) मैं यही हूँ ऐसा अनुभव होता है तो यह सूक्ष्मशरीरका परिवर्तन हो गया। ऐसे ही कारणशरीरमें स्वभाव (प्रकृति) रहता है जिसको स्थूल दृष्टिसे आदत कहते हैं। वह आदत देवताकी और होती है तथा पशुपक्षी आदिकी और होती है तो यह कारणशरीरका परिवर्तन हो गया।अगर शरीरी(देही) का परिवर्तन होता तो अवस्थाओंके बदलनेपर भी मैं वही हूँ  (टिप्पणी प0 51.2)  ऐसा ज्ञान नहीं होता। परन्तु अवस्थाओंके बदलनेपर भी जो पहले बालक था जवान था वही मैं अब हूँ ऐसा ज्ञान होता है। इससे सिद्ध होता है कि शरीरीमें अर्थात् स्वयंमें परिवर्तन नहीं हुआ है।यहाँ एक शंका हो सकती है कि स्थूलशरीरकी अवस्थाओंके बदलनेपर तो उनका ज्ञान होता है पर शरीरान्तरकी प्राप्ति होनेपर पहलेके शरीरका ज्ञान क्यों नहीं होता पूर्वशरीरका ज्ञान न होनेमें कारण यह है कि मृत्यु और जन्मके समय बहुत ज्यादा कष्ट होता है। उस कष्टके कारण बुद्धिमें पूर्वजन्मकी स्मृति नहीं रहती। जैसे लकवा मार जानेपर अधिक वृद्धावस्था होनेपर बुद्धिमें पहले जैसा ज्ञान नहीं रहता ऐसे ही मृत्युकालमें तथा जन्मकालमें बहुत बड़ा धक्का लगनेपर पूर्वजन्मका ज्ञान नहीं रहता।  (टिप्पणी प0 51.3)  परन्तु जिसकी मृत्युमें ऐसा कष्ट नहीं होता अर्थात् शरीरकी अवस्थान्तरकी प्राप्तकी तरह अनायास ही देहान्तरकी प्राप्ति हो जाती है उसकी बुद्धिमें पूर्वजन्मकी स्मृति रह सकती है  (टिप्पणी प0 51.4) ।अब विचार करें कि जैसा ज्ञान अवस्थान्तरकी प्राप्तिमें होता है वैसा ज्ञान देहान्तरकी प्राप्तिमें नहीं होता परन्तु मैं हूँ इस प्रकार अपनी सत्ताका ज्ञान तो सबको रहता है। जैसे सुषुप्ति(गाढ़निद्रा) में अपना कुछ भी ज्ञान नहीं रहता पर जगनेपर मनुष्य कहता है कि ऐसी गाढ़ नींद आयी कि मेरेको कुछ पता नहीं रहा तो कुछ पता नहीं रहा इसका ज्ञान तो है ही। सोनेसे पहले मैं जो था वही मैं जगनेके बाद हूँ तो सुषुप्तिके समय भी मैं वही था इस प्रकार अपनी सत्ताका ज्ञान अखण्डरूपसे निरन्तर रहता है। अपनी सत्ताके अभावका ज्ञान कभी किसीको नहीं होता। शरीरधारीकी सत्ताका सद्भाव अखण्डरूपसे रहता है तभी तो मुक्ति होती है और मुक्तअवस्थामें वह रहता है। हाँ जीवन्मुक्तअवस्थामें उसको शरीरान्तरोंका ज्ञान भले ही न हो पर मैं तीनों शरीरोंसे अलग हूँ ऐसा अनुभव तो होता ही है। धीरस्तत्र न मुह्यति  धीर वही है जिसको सत्असत्का बोध हो गया है। ऐसा धीर मनुष्य उस विषयमें कभी मोहित नहीं होता उसको कभी सन्देह नहीं होता। इसका अर्थ यह नहीं है कि उस धीर मनुष्यको देहान्तरकी प्राप्ति होती है। ऊँचनीच योनियोंमें जन्म होनेका कारण गुणोंका सङ्ग है और गुणोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर धीर मनुष्यको देहान्तरकी प्राप्ति हो ही नहीं सकती।यहाँ  तत्र  पदका अर्थ देहान्तरप्राप्तिके विषयमें नहीं है प्रत्युत देहदेहीके विषयमें है। तात्पर्य है कि देह क्या है देही क्या है परिवर्तनशील क्या है अपरिवर्तनशील क्या है अनित्य क्या है नित्य क्या है असत् क्या है सत् क्या है विकारी क्या है विकारी क्या है इस विषयमें वह मोहित नहीं होता। देह और देही सर्वथा अलग हैं इस विषयमें उसको कभी मोह नहीं होता। उसको अपनी असङ्गताका अखण्ड ज्ञान रहता है। सम्बन्ध   अनित्य वस्तु शरीर आदिको लेकर जो शोक होता है उसकी निवृत्तिके लिये कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.13 2.14।।एवमर्थद्वयमाह न हीत्यादि। अहं हि नैव नासम् अपि तु आसम् एवं त्वम् अमी च राजानः। आकारान्तरे च सति यदि शोच्यता तर्हि कौमारात् यौवनावाप्तौ किमिति न शोच्यते यो धीरः स न शोचति। धैर्यं च (N धैर्ये च) एतच्छरीरेऽपि यस्यास्था नास्ति तेन सुकरम्। अतस्त्वं धैर्यमन्विच्छ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.13।।ननु पूर्वं देहं विहायापूर्वं देहमुपाददानस्य विक्रियावत्त्वेनोत्पत्तिविनाशवत्त्वविभ्रमः समुद्भवेदिति शङ्कते  तत्रेति।  अशोच्यत्वप्रतिज्ञायां नित्यत्वे हेतौ कृते सतीति यावत्। अवस्थाभेदे सत्यपि वस्तुतो विक्रियाभावादात्मनो नित्यत्वमुपपन्नमित्युत्तरश्लोकेन दृष्टान्तावष्टम्भेन प्रतिपादयतीत्याह  दृष्टान्तमिति।  न केवलमागमादेवात्मनो नित्यत्वं किंत्ववस्थान्तरवज्जन्मान्तरे पूर्वसंस्कारानुवृत्तेश्चेत्याह  देहिन इति।  देहवत्त्वं तस्मिन्नहंममाभिमानभाक्त्वम्। तासामिति निर्धारणे षष्ठी। आत्मनः श्रुतिस्मृत्युपपत्तिभिर्नित्यत्वज्ञानम्। धीमानित्यत्र धीर्विवक्ष्यते। एवं सतीति। तत्त्वतो विक्रियाभावान्नित्यत्वे समधिगते सतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.13।।ननु चात्र किं परिदृश्यमानदेहपक्षीकारेणानुमीयते किंवा तदतिरिक्तदेहिपक्षीकारेण। नाद्यः देहोत्पत्तिनाशयोः प्रत्यक्षसिद्धत्वेन हेतोः स्वरूपासिद्धत्वात्कालात्ययापदिष्टत्वाच्चेति स्फुटत्वान्नोक्तम्। द्वितीये दोषमाह  देहिन  इति। देहिनो देहवतो देहातिरिक्तस्यात्मनो भावे सद्भावे एतन्नित्यत्वानुमानं सम्भवति देहपक्षोक्तदोषाभावात् किन्तु देहातिरिक्तात्मसत्त्वमेवासिद्धम् प्रमाणाभावात्। ततश्चाश्रयासिद्धिरिति। अस्तु वा देहातिरिक्तात्मसत्वं तथापि नानुमानं सम्भवतीत्याह  देहिन  इति। देहिन इत्येकवचनमतंत्रम्। पूर्वोत्तरदेहेष्वेक एवात्मेत्यस्यार्थस्य भावे एतदनुमानं सम्भवति स्वरूपसिद्ध्याद्यभावात्। किं नाम तत्पूर्वोत्तरदेहेष्वात्मैक्यमेवासिद्धं प्रमाणाभावात्। तथाच देहोत्पत्तावुत्पत्तिमतस्तद्विनाशे च विनाशवतः कथमनादित्वेन नित्यत्वं साध्यते इति। उभयस्यापि परिहारदर्शनादेवं योज्यम् अर्थद्वयानुगुण्यायैव बहुवचने प्रकृतेऽप्येकवचनम् तथा भाव इति पुँल्लिङ्गे प्रकृतेऽपि तदेवेति सामान्यग्रहणाय नपुंसकनिर्देशः। नेत्याहेति शेषः। देहिनोऽस्मिन्नित्यतःपरमितिशब्दश्च। आक्षेपद्वयपरिहाराय पादत्रयं व्याख्याति  यथे ति। अत्र देहीति तदीक्षिता सिद्ध इति देहातिरिक्तात्मसाधनं तदिति कौमारादिपरामर्शः। याजकादित्वात्समासः। द्वितीयान्तस्य तृन्नन्तेन वा समासः। अस्ति तावत्कौमारादिविषयमीक्षणम्। न चेक्षणमीक्षितारं विना

Chapter 2 (Part 8)

सम्भवति। स च वक्ष्यमाणात् परिशेषप्रमाणाद्देही देहातिरिक्तः सिद्ध इति। अत्र कौमारादिग्रहणमतन्त्रम् ज्ञानमात्रेण ज्ञातुः सिद्धेः। देहशब्दश्चेन्द्रियादिसहितशरीरवृत्तिः श्लोके च कौमारं यौवनं जरेति विषयेण विषयीक्षणमुपलक्ष्यते तद्देहिनो देहातिरिक्तस्येत्युक्तं भवति। यथेत्यादि समस्तं वाक्यं श्लोके च पादत्रयं देहभेदेऽप्यात्मैकत्वे साधनम्। कौमारादिमच्छरीरभेद इत्यर्थः। देही एक एवेत्यर्थः।  तदीक्षिते ति। योऽहं कुमारशरीरवानभूवं स इदानीं युवशरीरवान्वर्त इत्यादिप्रत्यभिज्ञातेत्यर्थः। देहान्तरप्राप्तावपीति अनेकदेहप्राप्तावपीत्यर्थः। एक एव देही सिद्ध इति वर्तते। ईक्षितृत्वादिति प्रत्यग्रजातस्य शिशोः आहाराद्यभिलाषेण पूर्वदेहानुसन्धानसिद्धेरित्याशयः। एवमात्मनो देहातिरिक्तत्वं देहभेदेप्येकत्वं च प्रसाध्यधीरस्तत्र न मुह्यति इत्युच्यते तस्य वैयर्थ्यमित्याशङ्क्य येऽस्मिन्विषयेऽन्येऽपि मोहास्ते धीरेण स्वयं निराकार्या इत्येवमर्थत्वान्न वैयर्थ्यमित्याशयवान् तत्प्रदर्शनार्थमुत्तरं प्रकरणमारभते। तत्रेक्षणेन कथं देहातिरिक्तात्मसिद्धिः ईक्षिता हि तेन सिध्यति। स च शरीरप्राणजठरानलेन्द्रियमनोविषयसन्निधौ ईक्षणदर्शनात्तेषामन्यतमः किं न स्यात् इत्यतः शरीरस्य तावदीक्षणं निषेधति  न हीति । अत्रापि कौमारादीत्यतन्त्रम्। शरीरस्यानुभवो न सम्भवतीति प्रतिज्ञा।  जडस्य शरीर स्येति हेतुद्वयम्। मृतस्यादर्शनादिति दृष्टान्तोक्तिः। जडत्वं च भौतिकत्वं विवक्षितमिति न साध्याविशिष्टता। अप्रयोजकत्वाभिप्रायेण शङ्कते  मृतस्ये ति। जीवच्छरीरमृतशरीरयोर्भौतिकत्वे शरीरत्वे च समानेऽपि मा भून्मृतशरीरस्येक्षणम् प्राणादिवायूनां जाठरानलस्येन्द्रियाणां चापगमात्। जीवतस्तु प्राणादिसन्निधानाद्भविष्यतीति। को विरोधः मा हि भूदेकधर्मोपपन्नानामवान्तरकारणवैचित्र्यात् वैचित्र्याभावः। न केवलमिदमाशङ्कते किन्तु अहं मनुष्य इत्याद्यनुभवादेतद्देहस्येक्षितृत्वं सिद्धं प्रमितं चेत्यर्थः। दूषयति  ने ति। न प्राणादिसन्निधानं शरीरस्येक्षितृत्वे प्रयोजकं वाच्यम् सुप्तिमूर्छयोः शरीरे प्राणाद्यपगमलक्षणरहिते सत्येव ज्ञानादीनां धर्माणामदर्शनात्। ज्ञानग्रहणमुपलक्षणम्। सुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नैरप्यात्मा साध्य इति सूचयितुमादिपदम्। मृतादौ ज्ञानाद्यभावश्च तत्कार्यादर्शनात्सिद्ध इति दर्शयितुं  ज्ञानादिविशेषे त्युक्तम्। ज्ञानादीनां विशेषः कार्यमिति। एतेन सङ्घातचैतन्यपक्षः प्राणादिचैतन्यपक्षश्च पराकृतो वेदितव्यः।मनस ईक्षितृत्वमतिदेशेन निराचष्टे  समश्चे ति। मनोविषय ईक्षितृत्वाभिमानश्च पूर्वेण समः सुप्त्यादौ सत्यपि मनसि ज्ञानादर्शनात्। एवं तर्ह्यात्मापि ज्ञाता न स्यादिति चेत् न तदा तस्य मनसा सन्निकर्षाभावात्। मनसोऽपि तथाऽस्त्विति चेत् सिद्धस्तावदात्मा। मनसो ज्ञातृत्वे दोषान्तरमाह  काष्ठादिवच्चे ति। मनो न ज्ञातृ ज्ञानकरणत्वात्। यद्यस्यां क्रियायां करणं न तत्तत्र कर्तृः यथा पाके काष्ठानि छिदायां कुठारो वा। न चासिद्धो हेतुः मनसा जानामीत्यनुभवात्। एतेनात्मसन्निकर्षेण मनो ज्ञात्रिति निरस्तम्। ननु जन्यज्ञानं मनोनिष्ठमिति सिद्धान्तः तत्कथमेतत् मैवम् मनोनिष्ठस्यापि ज्ञानस्य न मनः कर्तृ किन्तु आत्मैव यथाऽवयवविक्लेदलक्षणस्य पाकस्य न तण्डुलाः कर्तारः किन्तु देवदत्त इति। एतेनेन्द्रियचैतन्यपक्षोऽपि निरस्तः चक्षुषा पश्यामीत्यादौ तेषामपि करणत्वप्रतीतेरिति। अतीतादिज्ञानदर्शनाद्विषयचैतन्यपक्षः स्फुटदूषण इति न निराकृतः। एवं परिशेषप्रमाणेन देहातिरिक्तात्मा सिद्धः तस्य स्वभावादेवाहाराद्यभिलाषोपपत्तेः प्रत्यभिज्ञानमसिद्धमिति वदन्तं प्रति आत्मनित्यत्वे प्रमाणान्तरं चाह  श्रुतेश्चे ति। अस्माच्छरीरभेदादूर्ध्वमुत्क्रम्यामुष्मिन् स्वर्गे लोके ऐ.उ.4।6 इत्यादिश्रुतेश्च देहातिरिक्तो नित्य आत्मा सिद्धः। अत एव न स्वभाववादानवकाश इति। ननु बौद्धचार्वाकादीन् प्रति देहातिरिक्तनित्यात्मसाधनमिदम् न च ते श्रुतेः प्रामाण्यमङ्गीकुर्वते तत्कथं श्रुत्युदाहरणमित्यत आह  प्रामाण्यं   चे ति। बौद्धेन तावत्प्रत्यक्षानुमानयोश्चार्वाकेण च प्रत्यक्षस्य प्रामाण्यमङ्गीकृतम् तत्कुतः इति वक्तव्यम्। बोधकत्वेनेति चेत्तर्हि तद्वच्छ्रुतेरप्यङ्गीक्रियताम्। ननु वाक्यत्वे समेऽपि केषाञ्चिद्बौद्धादिवाक्यानामप्रामाण्यदर्शनाच्छ्रुतेरपि तदाशङ्क्यत इत्यत आह  नचे ति। बुद्धस्येदं बौद्धम् चार्वाको बौद्धमुदाहरति बौद्धस्त्वन्यदिति द्रष्टव्यम्। अप्रामाण्यं श्रुतेः शङ्कनीयमिति शेषः। तथा सति इन्द्रियलिङ्गयोरपि क्वचिदप्रामाण्यदर्शनात् सम्प्रतिपन्नयोरपि प्रत्यक्षानुमानयोस्तच्छङ्काप्रसङ्गादिति भावः। प्रसक्ताऽपि शङ्का तत्र निर्दोषत्वेनापनीयत इति चेत्समं प्रकृतेऽपीत्याह  अपौरुषेयत्वादि ति। अपौरुषेयत्वेऽपि दोषित्वं किं न स्यादित्यत आह  नही ति। सामान्योक्तित्वादपौरुषेये इति नपुंसकत्वोक्तिः। अन्यथा श्रुतेः प्रकृतत्वात्स्त्रीलिङ्गं स्यात्। शब्दे ह्यबोधकत्वादयो दोषाः ते च वक्तृपुरुषाश्रिताज्ञानादिमूलाः। यस्य तु वक्ता पुरुष एव नास्ति तत्र कथं वक्तृपुरुषाश्रिताज्ञानादयो दोषमूलत्वेन कल्पयितुं शक्याः व्याहतेरिति। अत्राज्ञानादीनां पौरुषेयत्वोक्तिरुपचारात् पुरुषशब्दात्तत्कृतवाक्यादिष्वेव ढञः स्मरणात्। ननु श्रुतेरपौरुषेयत्वमेव नास्ति वाक्यत्वात्। लौकिकवाक्यवदिति चेत् किमेवं वदतः किमपि वाक्यमपौरुषेयं नास्तीति मतम् उत किञ्चिदस्तीति। आद्ये दोषमाह   विने ति। कस्यचिद्वाक्यस्यापौरुषेयत्वाभावे धर्माधर्मयोरनिश्चयः प्रसज्येत निश्चायकप्रमाणाभावात्। नच तथाऽस्त्विति वक्तुं शक्यम् तत्सद्भावस्य सर्वैः समयिभिर्निश्चितत्वादिति।ननु प्रत्यक्षैकमप्रमाणवादी यश्चार्वाको धर्माधर्मौ नाङ्गीकुरुते तस्य नेदमनिष्टम् किमप्यपौरुषेयं वाक्यं अनङ्गीकृत्य वेदापौरुषेयत्वं प्रत्याचक्षाणान्सर्वान्प्रति चायं प्रसङ्ग इत्यतस्तेनापि धर्मादिकमङ्गीकार्यैतं प्रसङगं वक्ष्याम इत्याशयेनाह  यश्चे ति। तौ धर्माधर्मौ इति प्रसज्येत इति शेषः। धर्माद्यनङ्गीकारे कुतस्तच्छास्त्रस्याशास्त्रत्वप्रसङ्गो येनासौ शास्त्री न स्याक्ष्त्यित आह  अप्रयोजकत्वा दिति। प्रयुज्यते प्रवर्त्यते प्रणेता प्रणयने श्रोता च श्रवणे शास्त्रे याभ्यां ते प्रयोजके विषयप्रयोजने अविद्यमाने प्रयोजके यस्य शास्त्रस्य तत्तथा। अनन्यलभ्यं कमपि पुरुषार्थमधिकृत्य तत्साधनं तथाविधमर्थं प्रतिपादयन्वाक्यसमूहो हि शास्त्रम् अन्यथाऽतिप्रसङ्गात् न चातीन्द्रियस्याभावेऽन्यत्तथानुभूतं शक्यनिरूपणम्। अतः शास्त्रत्वसिद्धये विषयादित्वेन धर्मादिकं किमप्यङ्गीकार्यमिति भावः। शङ्कते  मा स्त्विति। मायं न माङ्। अस्त्वित्यव्ययम्। धर्म इत्युपलक्षणम् अनिरूप्यत्वात् तत्प्रमाणाभावेन प्रतिपादयितुमशक्यत्वात्। इदमुक्तं भवति विषयप्रयोजने हि ते भवतः ये प्रमाणेन प्रतिपादयितुं शक्येते वाङ्मात्रस्य श्रोतृभिरनादरणात्। नच धर्मादिकं प्रमाणेन प्रतिपादयितुं शक्यम् प्रत्यक्षागोचरत्वात् अनुमानादेश्च प्रामाण्याभावात्। अतो न शास्त्रस्य विषयत्वादिना धर्मादिकमङ्गीकर्तुमुचितम्। न चैतावता निर्विषयत्वाद्यापत्तिः यतो धर्माद्यभावो विषयो भविष्यति। प्रयोजनं च श्रोतृ़णां धर्माद्यनुष्ठानप्रसक्तक्लेशनिवृत्तिः धर्मादिसद्भावभ्रमोपरुद्धविषयसुखावाप्तिश्च प्रणेतुश्च लोकोपकारः उपकर्तारं च प्रत्युपकुर्वन्ति लोका इति निराकरोति  ने ति। एवं वदता धर्माद्यभावोऽपि न शास्त्रविषयत्वेन शक्यते वक्तुम् सर्वाभिमतस्य धर्मादेः प्रमाणं विना वाङ्मात्रेण निषेद्धुं नास्तीति प्रतिपादयितुमशक्यत्वात्। घटाद्यभाव इव प्रत्यक्षेणैव धर्माद्यभावो निश्चेष्यत इति चेत् स्यादेवम् यद्यत्र न काचिद्विप्रतिपत्तिः। यत्र त्वस्तित्वाभिमानस्तत्र पिशाचादाविव प्रत्यक्षानुपलम्भः सन्देहहेतुरेव भवति इति। तदिदमुक्तं  सर्वाभिमत स्येति। पुनः शङ्कते  नचे ति। मा भूद्धमार्द्यभावस्य विषयत्वं तत्साधकप्रमाणाभावात् तथापि धर्मादेर्विषयत्वादिकं न घटते अप्रामाणिकस्य प्रमित्यनुपपत्त्या साधयितुमशक्यत्वादिति निराकरोति  ने ति। अस्ति तावद्धर्मादिविषये सर्वेषामाविपालगोपालमस्तित्वाभिमानः। अभिमानो ज्ञानमेव। न च तस्य बाधकं किञ्चित् धर्माद्यभावप्रतिपादकप्रमाणाभावस्योक्तत्वात्। अतः सर्वाभिमतेरेव धर्मादौ प्रमाणत्वात् तत्करणस्य च प्रमाणत्वात् धर्मादेः प्रामाणिकत्वसिद्धौ किमनया व्यर्थचिन्तया। नच तत्र प्रमाणविशेषोऽशक्यनिरूपणः आगमस्य तत्सहकारिणोऽनुमानस्य च सत्वात्। अत एव नान्धपरम्पराऽपि। आगमादेः प्रामाण्यं नास्तीति उक्तमित्यत आह  अन्यथे ति। यदाऽऽगमस्यानुमानस्य च न प्रामाण्यं तदा सर्वस्य वाचा निर्वर्त्यस्य व्यवहारस्यासिद्धिः स्यात्। परप्रत्ययनार्थो हि वाग्व्यवहारः स यदि न परं प्रत्याययेत् व्यर्थो न क्रियेतैवेति। चशब्दः प्रमाणसामान्यसिद्ध्या तद्विशेषसिद्धेः समुच्चये।भवत्वागमप्रामाण्ये वाचनिकव्यवहारासिद्धिः अनुमानप्रामाण्ये तु कथमित्यत आह  नचे ति। त्वदीयं वाक्यं मया श्रूयते इति ज्ञात्वा मां प्रति त्वया वाग्व्यवहारः क्रियते अन्यथा वा। द्वितीये निष्फलो न कर्तव्यः स्यात्। नाद्यः परचित्तवृत्तीनां परस्याप्रत्यक्षत्वेन मया श्रुतमिति तव ज्ञातुमशक्यत्वात्। मदीयं प्रत्युत्तरमेव तज्ज्ञानोपाय इत्येव वक्तव्यमिति भावः। अस्त्वेवमित्यत आह  अन्यथा वे ति। वाशब्दोऽवधारणे। प्रत्युत्तरं हि लिङ्गतया ज्ञापकम् नच तव मतेऽनुमानं प्रमाणम्। अतः प्रत्युत्तरमन्यथैवाज्ञापकमेव स्यादिति। ननु लिङ्गशब्दयोः प्रामाण्मेव नाङ्गीक्रियते ज्ञापकत्वमात्रमङ्गीक्रियत एव। अतः कथं वाचनिकव्यवहारसिद्धिरित्यत आह  भ्रान्तिर्वे ति। ज्ञापकत्वमङ्गीकृत्य प्रामाण्यानङ्गीकारे शब्दलिङ्गाभ्यां जायमानः प्रत्ययस्तव मतेर्भ्रान्तिर्वा स्यात्संशयो वा गत्यन्तराभावात्। न च परस्य भ्रान्त्याद्यर्थं वचनप्रयोगः नापि प्रत्युत्तरेण भ्रान्तः सन्दिग्धो वा वाक्यं प्रयुङ्क्त इति युक्तम् अतो वाचनिकव्यवहारसिद्ध्यर्थमागमानुमानप्रामाण्यमङ्गीकार्यमिति। एवं चार्वाकशास्त्रस्य विषयं निराकृत्य प्रयोजनमपि निराकुर्वन श्रोतृप्रयोजनं तावन्निराचष्टे  सर्वे ति। यथा शास्त्रस्य सर्वेषां श्रोतृ़णां सुखकारणत्वम् यथा धर्माद्यभावज्ञाने सर्वमर्यादातिक्रमे परस्परहिंसादिना सर्वदुःखकारणत्वं च स्यात् तथा च समव्ययफलं निष्प्रयोजनमेवेति। इदानीं शास्त्रप्रणेतृप्रयोजनं निराकरोति  एको वे ति। धर्मादिज्ञानशून्याः पशुप्राया नोपकारिणमुपकुर्वन्ति अपितु सर्वेऽप्यपकर्तुमलम्। तदभावेऽप्येको वाऽन्यथाऽपकारकः स्यादिति भावः। तदेवं धर्माद्यनङ्गीकारे शास्त्रस्य विषयाद्यभावेनाशास्त्रत्वप्रसङ्गात्सर्वैर्धर्मादिकमङ्गीकार्यमिति। ननु स्वीकृतं धर्मादिकं पौरुषेयवाक्यात्तन्निंश्चय इत्यत आह  रचितत्वे  चेति। ततश्च न धर्मादिनिश्चय इति भावः। निर्दोषत्वेन प्रमितोऽसाविति चेत् तस्य निर्दोषत्वं किं तद्वाक्यात्सिद्धं प्रमाणान्तरेण वा। न द्वितीयः तदभावात्। आद्यं दूषयति  नचे ति अतिप्रसङ्गादिति भावः। न च प्रत्यक्षादिना धर्मादिसिद्धिः। अतः सर्वैः किमप्यपौरुषेयं वाक्यमङ्गीकार्यम्। अङ्गीकृतं च बौद्धादिभिः स्वसमयापौरुषेयत्वम् शौद्धोदनिप्रभृतयः सम्प्रदायप्रवर्तकाः इत्युक्तत्वात्। ततः किमिति चेद्वाक्यत्वहेतोस्तत्रानैकान्त्यमिति। अस्त्वेवमनुमानस्यान्यतरानैकान्त्याच्छ्रुतेरपौरुषेयत्वे बाधकाभावः। तत्साधकं तु किमिति चेत्कर्तुरप्रसिद्धिरपौरुषेयत्वप्रसिद्धिश्चेति ब्रूमः। एवं तर्हि गूढकर्तृकस्य कृतापौरुषेयत्वप्रसिद्धिकस्याप्यपौरुषेयत्वप्रसङ्ग इत्यत आह   न चे ति। केनचित्कृतमिति शेषः।  उक्तवाक्यसमं  वेदवदपौरुषेयमित्यर्थः। अनादिकाले यः परिग्रहः प्राक्तनमेवैतदिति ज्ञानं तेन विषयीकृतत्वाच्छ्रुतेः इतरस्य तदभावादपौरुषेयत्वप्रसिद्धिरेव तत्र भग्नेति भावः।अपौरुषेयत्वसिद्धौ सिद्धमर्थमुपसंहरति  अत  इति। एवं चतुर्थपादोपयुक्तं प्रमेयमुक्त्वा तमिदानीं निवेशयति  अत  इति। यत एवं नैरात्म्यवादिभिरुत्प्रेक्षिताः कुतर्काः अतस्तैः कुतर्कैर्धीरो धीमांस्तत्र देहातिरिक्तनित्यात्मसद्भावविषये न मोहमापद्यते।नरके नियतं वासः 1।44 इत्याद्यर्जुनवचनेन तस्य नित्यात्मप्रतिपत्तिसिद्धेः प्रथमपुरुषप्रयोगः। अनेकार्था गीतेति दर्शयितुं श्लोकद्वयं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे  अथ वेति। न जीवनाशमपेक्ष्य शोकः कार्य इति शेषः। नित्यत्वाज्जीवस्य। अनेन योजनापूर्ववदेवेति ज्ञापयति। नापीत्यत्रापि पूर्ववच्छेषः। अत्र पूर्वयोजना न सङ्गच्छते अतोऽन्यथापादत्रयं व्याख्याति  यथे ति। जरादिप्राप्तौ देहान्तरप्राप्ताविति निमित्तसप्तम्यौ ततश्चायमर्थः। कौमाराद्यवस्थाविशिष्टदेहहाने तावन्नास्ति शोक इति प्रसिद्धम् तत्कस्य हेतोः इति वाच्यम् जरादिविशिष्टदेहान्तरलाभात्। समानलाभेन हानिर्हि समाधीयत इति चेत् तर्हि मरणेऽपि शोको न कार्यः देहान्तरस्य लाभादेव। यदा तु जीर्णलाभेन समीचीनहानेः प्रतिविधानं तदा तु सुतरां समीचीनलाभेन जीर्णहानेरिति। तत्रावस्थामात्रहानिः अत्र त्ववस्थावतोऽपीत्येतदनुपयुक्तं वैषम्यं निष्कप्रदानेन पटग्रहणदर्शनादिति भावनोक्तं  धीर  इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.13।।देहिनो भावे एतद्भवति तदेवासिद्धमिति चेत् न देहिनोऽस्मिन्। यथा कौमारादिशरीरभेदेऽपि देही तदीक्षिता सिद्धः एवं देहान्तरप्राप्तावपि ईक्षितृत्वात्। न हि जडस्य शरीरस्य कौमाराद्यनुभवः सम्भवति मृतस्यादर्शनात्। मृतस्य वाय्वाद्यपगमादनुभवाभावः।अहं मनुष्यः इत्याद्यनुभवाच्चैतत्सिद्धमिति चेत् न सत्येवाविशेषे देहे सुप्त्यादौ ज्ञानादिविशेषादर्शनात्।समश्चाभिमानो मनसि काष्ठादिवच्च। श्रुतेश्च। प्रामाण्यं च प्रत्यक्षादिवत्। न च बौद्धादिवत् अपौरुषेयत्वात्। न ह्यपौरुषेये पौरुषेयाज्ञानादयः कल्पयितुं शक्याः। विना च कस्यचिद्वाक्यस्यापौरुषेयत्वं न सर्वसमयाभिमतधर्मादिसिद्धिः।यश्च तौ नाङ्गीकुरुते नासौ समयी अप्रयोजकत्वात्। मास्तु धर्मो निरूप्यत्वादिति चेत् न सर्वाभिमतस्य प्रमाणं विना निषेद्धुमशक्यत्वात्। न च सिद्धिरप्रमाणकस्येति चेत् न सर्वाभिमतेरेव प्रमाणत्वात् अन्यथा सर्ववाचनिकव्यवहारासिद्धेश्च।न च मया श्रुतमिति तव ज्ञातुं शक्यम् अन्यथा वा प्रत्युत्तरं स्यात् भ्रान्तिर्वा तव स्यात् सर्वदुःखकारणत्वं वा स्यात् एको वाऽन्यथा स्यात्। रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य कर्तुरज्ञानादिदोषशङ्का स्यात्। न चादोषत्वं स्ववाक्येनैव सिद्ध्यति। न च येनकेनचिदपौरुषेयमित्युक्तमुक्तवाक्यसमम् अनादिकालपरिग्रहसिद्धत्वात्।अतः प्रामाण्यं श्रुतेः। अतः कुतर्कैर्धीरस्तत्र न मुह्यति। अथवा जीवनाशं देहनाशं वा अपेक्ष्य शोकः। न जीवनाशं नित्यत्वादित्याह न त्वेवेति। नापि देहनाशमित्याहदेहिन इति। यथा कौमारादिदेहहानेन जरादिप्राप्तावशोकः एवं जीर्णादिदेहहानेन देहान्तरप्राप्तावपि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.13।।एकस्मिन् देहे वर्तमानस्य  देहिनः  कौमारावस्थां विहाय यौवनाद्यवस्थाप्राप्तौ आत्मन स्थिरबुद्ध्या  यथा  आत्मा नष्ट इति न शोचति देहाद्  देहान्तर प्राप्तौ अपि  तथा  एव स्थिर आत्मा इति बुद्धिमान् न शोचति। अत आत्मनां नित्यत्वाद् आत्मानो न शोकस्थानम्।एतावद् अत्र कर्तव्यम् आत्मनां नित्यानाम् एव अनादिकर्मवश्यतया तत्तत्कर्मोचितदेहसंस्पृष्टानां तैरेव देहैः बन्धनिवृत्तये शास्त्रीयं स्ववर्णोचितं युद्धादिकम् अनभिसंहितफलं कर्म कुर्वताम् अवर्जनीयतया इन्द्रियैः इन्द्रियार्थस्पर्शाः शीतोष्णादिप्रयुक्तसुखदुःखदा भवन्ति ते तु यावच्छास्त्रीयकर्मसमाप्ति क्षन्तव्या इति।इमम् अर्थम् अनन्तरम् एव आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.13।।

देहः अस्य अस्तीति देही तस्य  देहिनो  देहवतः आत्मनः  अस्मिन्  वर्तमाने देहे यथा येन प्रकारेण  कौमारं  कुमारभावो बाल्यावस्था  यौवनं  यूनो भावो मध्यमावस्था  जरा  वयोहानिः जीर्णावस्था इत्येताः तिस्रः अवस्थाः अन्योन्यविलक्षणाः। तासां प्रथमावस्थानाशे न नाशः द्वितीयावस्थोपजने न उपजननम् आत्मनः। किं तर्हि अविक्रियस्यैव द्वितीयतृतीयावस्थाप्राप्तिः आत्मनो दृष्टा।  तथा  तद्वदेव देहाद् अन्यो देहो देहान्तरं तस्य प्राप्तिः  देहान्तरप्राप्तिः  अविक्रियस्यैव आत्मन इत्यर्थः।  धीरो  धीमान्  तत्र  एवं सति  न मुह्यति  न मोहमापद्यते।। यद्यपि आत्मविनाशनिमित्तो मोहो न संभवति नित्य आत्मा इति विजानतः तथापि शीतोष्णसुखदुःखप्राप्तिनिमित्तो मोहो लौकिको दृश्यते सुखवियोगनिमित्तो मोहः दुःखसंयोगनिमित्तश्च शोकः। इत्येतदर्जुनस्य वचनमाशङ्क्य भगवानाह

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【 Verse 2.14 】

▸ Sanskrit Sloka: मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदु: खदा: | आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ||

▸ Transliteration: mātrā-sparśāśtu kaunteya śītoṣṇa-sukha-duḥka-dāḥ | āgamāpāyino’nityās tāṁs titikṣasva bhārata ||

▸ Glossary: mātrā: of the senses; spārśāḥ: contact; tu: only; kaunteya: O son of Kuntī; śīta: cold; uṣṇa: hot; sukha: pleasure; dukkha-dah: giving pain; āgama: appearing; apāyinaḥ: disappearing; anityāḥ: nonpermanent; tān: all of them; titikṣasva: tolerate; bhārata: O descendant of the Bhārata dynasty

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.14 O Kaunteya (son of Kuntī), contact with sense objects causes heat and cold, pleasure and pain, and these have a beginning and an end. O Bhārata, these are not permanent; endure them bravely.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.14।।हे कुन्तीनन्दन इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं वे तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं। वे आनेजानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन उनको तुम सहन करो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.14।। हे कुन्तीपुत्र शीत और उष्ण और सुख दुख को देने वाले इन्द्रिय और विषयों के संयोग का प्रारम्भ और अन्त होता है वे अनित्य हैं? इसलिए? हे भारत उनको तुम सहन करो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.14 मात्रास्पर्शाः contacts of senses with objects? तु indeed? कौन्तेय O Kaunteya (son of Kunti)? शीतोष्णसुखदुःखदाः producers of cold and heat? pleasure and pain? आगमापायिनः with beginning and end? अनित्याः impermanent? तान् them? तितिक्षस्व bear (thou)? भारत O Bharata.Commentary -- Cold is pleasant at one time and painful at another. Heat is pleasant in winter but painful in summer. The same object that gives pleasure at one time gives pain at another time. So the sensecontacts that give rise to the sensations of heat and cold? pleasure and pain come and go. Therefore? they are impermanent in nature. The objects come in contact with the senses or the Indriyas? viz.? skin? ear? eye? nose? etc.? and the sensations are carried by the nerves to the mind which has its seat in the brain. It is the mind that feels pleasure and pain. One should try to bear patiently heat and cold? pleasure and pain and develop a balanced state of mind. (Cf.V.22)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.14. O son of Kunti ! But the touches with the matras cause the [feelings of] cold and heat, pleasure and pain; they are of the nature of coming and going and are transient. Forbear them, O Descendent of Bharata !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.14 Those external relations which bring cold and heat, pain and happiness, they come and go; they are not permanent. Endure them bravely, O Prince!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.14 The contact of senses with their objects, O Arjuna, gives rise to feelings of cold and heat, pleasure and pain. They come and go, never lasing long. Endure them, O Arjuna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.14 But the contacts of the organs with the objects are the producers of cold and heat, happiness and sorrow. They have a beginning and an end, (and) are transient. Bear them, O descendant of Bharata.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.14 The contacts of the senses with the objects, O son of Kunti, which cause heat and cold, pleasure and pain, have a beginning and an end; they are impermanent; endure them bravely, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.14 Matra etc. But the unwise lament even over those passing situations of cold and heat, pleasure and pain that are created by those touches i.e., the contacts of the sense-objects-referable with the term matra - with the Soul through the door of the sense-organs; but the wise do not do so. Thus says [the Lord]. Or, the passage may be interpreted as : The touches (contacts) of these objects are with the matras, i.e., with the sense-organs, and not directly with the Supreme Self, Coming : birth. Going : destruction, Those situations that have these two you must forbear i.e., put up with.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.14 As sound, touch, form, taste and smell with their bases, are the effects of subtle elements (Tanmatras), they are called Matras. The contact with these through the ear and other senses gives rise to feelings of pleasure and pain, in the form of heat and cold, softness and hardness. The words 'cold and heat' illustrate other sensations too. Endure these with courage till you have discharged your duties as prescribed by the scriptures. The brave must endure them patiently, as they 'come and go'. They are transient. When the Karmas, which cause bondage, are destroyed, this 'coming and going' will end.

The Lord now explains the purpose of this endurance:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.14 'In the case of a man who knows that the Self is eternal, although there is no possibility of delusion concerning the destruction of the Self, still delusion, as of ordinary people, caused by the experience of cold, heat, happiness and sorrow is noticed in him. Delusion arises from being deprived of happiness, and sorrow arises from contact with pain etc.' apprehending this kind of a talk from Arjuna, the Lord said, 'But the contacts of the organs,' etc. Matra-sparsah, the contacts of the organs with objects; are sita-usna-sukha-duhkha-dah, producers of cold, heat, happiness and sorrow. Matrah means those by which are marked off (measured up) sounds etc., i.e. the organs of hearing etc. The sparsah, contacts, of the organs with sound etc. are matra-sparsah. Or, sparsah means those which are contacted, i.e. objects, viz sound etc. Matra-sparsah, the organs and objects, are the producers of cold, heat, happiness and sorrow. Cold sometimes produces pleasure, and sometimes pain. Similarly the nature of heat, too, is unpredictable. On the other hand, happiness and sorrow have definite natures since they do not change. Hence they are mentioned separately from cold and heat. Since they, the organs, the contacts, etc., agamapayinah, have a beginning and an end, are by nature subject to origination and destruction; therefore, they are anityah, transient. Hence, titiksasva, bear; tan, them cold, heart, etc., i.e. do not be happy or sorry with regard to them.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.14।। विषय ग्रहण की वेदान्त की प्रक्रिया के अनुसार बाह्य वस्तुओं का ज्ञान इन्द्रियों के द्वारा होता है। इन्द्रियाँ तो केवल उपकरण हैं जिनके द्वारा जीव विषय ग्रहण करता है उनको जानता है। जीव के बिना केवल इन्द्रियाँ विषयों का ज्ञान नहीं करा सकतीं।यह तो सर्वविदित है कि एक ही वस्तु दो भिन्न व्यक्तियों को भिन्न प्रकार का अनुभव दे सकती है। एक ही वस्तु के द्वारा जो दो भिन्न अनुभव होते हैं उसका कारण उन दो व्यक्तियों की मानसिक संरचना का अन्तर है।यह भी देखा गया है कि व्यक्ति को एक समय जो वस्तु अत्यन्त प्रिय थी वही जीवन की दूसरी अवस्था में अप्रिय हो जाती है क्योंकि जैसेजैसे समय व्यतीत होता जाता है उसके मन में भी परिवर्तन होता जाता है। संक्षेप में यह स्पष्ट है कि जब हमारा इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों के साथ सम्पर्क होता है तभी किसी प्रकार का अनुभव भी संभव है।जो पुरुष यह समझ लेता है कि जगत् की वस्तुयें नित्य परिवर्तनशील हैं उत्पन्न और नष्ट होती रहती हैं वह पुरुष इन वस्तुओं के कारण स्वयं को कभी विचलित नहीं होने देगा। काल के प्रवाह में भविष्य की घटनायें वर्तमान का रूप लेती हैं और हमें विभिन्न अनुभवों को प्रदान करके निरन्तर भूतकाल में समाविष्ट हो जाती हैं। जगत् की कोई भी वस्तु एक क्षण के लिये भी विकृत हुये बिना नहीं रह सकती । यहाँ परिवर्तन ही एक अपरिवर्तनशील नियम है।इस नियम को समझ कर आदि और अन्त से युक्त वस्तुओं के होने या नहीं होने से बुद्धिमान पुरुष को शोक का कोई कारण नहीं रह जाता। शीत और उष्ण सफलता और असफलता सुख और दुख कोई भी नित्य नहीं हैं। जब वस्तुस्थिति ऐसी है तो प्रत्येक परिवर्तित परिस्थिति के कारण क्षुब्ध या चिन्तित होना अज्ञान का ही लक्षण है। जीवन में आने वाले कष्टों को चिन्तित हुये बिना शान्तिपूर्वक सहन करना चाहिये। सभी प्रकार की अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों में विवेकी पुरुष इस तथ्य को सदा ध्यान में रखता है कि यह भी बीत जायेगा।जगत् की वस्तुयें परिच्छिन्न हैं क्योंकि उनका आदि है और अन्त है। भगवान् कहते हैं कि ये वस्तुयें स्वभाव से ही अनित्य हैं। अनित्य शब्द से तात्पर्य यह है कि एक ही वस्तु किसी एक व्यक्ति के लिये ही कभी सुखदायक तो कभी दुखदायक हो सकती है।शीतउष्ण आदि को समान भाव से सहने वाले व्यक्ति को क्या लाभ मिलेगा सुनिये

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.14।।नन्वात्मनो नित्यत्वात्तन्नाशनिमित्तशोकमोहाभावेऽपि सुखवियोगदुःखसंयोगशीतादिप्राप्तिनिमित्तौ तौ दुर्वारावितिचेत्तत्राह  मात्रास्पर्शा इति।  भीयन्ते आभिर्विषया इति मात्राः इन्द्रियाणि तेषां विषयैः स्पर्शाः संयोगाः। यद्वा स्पृश्यन्त इति स्पर्शा विषयाः मात्राश्च स्पर्शाश्च ते शीतोष्णसुखदुःखदाः। त्वगिन्द्रियतद्विषयसंबन्धस्य तयोर्वाऽनियतसुखदुःखशीतोष्णदातृत्वमप्यस्तीत्यभिप्रेत्य नियतरुपाभ्यां सुखदुःखाभ्यां अनियतसुखदुःखप्रदयोः शीतोष्णयो पृथग्ग्रहणम्। यत उत्पत्तिविनाशशीला अतएवानित्याः। अतएव तान् सहस्व। तेषु हर्षं विषादं च मा कार्षीत्यर्थः। स्त्रीस्वभाववतः सुखादिदानेतान् भरतादिपुरुषधौरेयस्वभावमाश्रित्य सोढुं योग्योऽसीति संबोधनाशयः। अत्र संबोधनद्वयेनोभयकुलशुद्धस्यैव विद्याधिकारित्वं सूचयतीत्येके। उत्तमवंश्यत्वेन धीरत्वमस्येत्यन्ये। उभयकुलविशुद्धस्य तवात्माज्ञानमनुचितमिति केचित्। अय पक्ष उभयकुलशुद्धिमात्रादेवात्मज्ञानं यदि स्यात्तर्हि सभ्यक्। अथवा प्रथमपक्षानुरोधेन व्याख्येयः। भाष्यकृद्भिस्तु सुगमत्वात्संबोधनाभिप्रायवर्णनं न सर्वत्र क्रियत इति बोध्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.14।।नन्वात्मनो नित्यत्वे विभुत्वे च न विवदामः प्रतिदेहमेकत्वं तु न सहामहे। तथाहि बुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाख्यनवविशेषगुणवन्तः प्रतिदेहं भिन्नाः एवं नित्या विभवश्चात्मानः इति वैशेषिका मन्यन्ते। इममेवच पक्षं तार्किकमीमांसकादयोऽपि प्रतिपन्नाः। सांख्यास्तु विप्रतिपद्यमाना अप्यात्मनो गुणवत्त्वे प्रतिदेहं भेदे न विप्रतिपद्यन्ते। अन्यथा सुखदुःखादिसंकरप्रसङ्गात्। तथाच भीष्मादिभिन्नस्य मम नित्यत्वे विभुत्वेऽपि सुखदुःखादियोगित्वाद्भीष्मादिबन्धुदेहविच्छेदे सुखवियोगो दुःखसंयोगश्च स्यादिति कथं शोकमोहौ नानुचितावित्यर्जुनाभिप्रायमाशङ्क्य लिङ्गशरीरविवेकायाह मीयन्ते आभिर्विषया इति मात्रा इन्द्रियाणि तासां स्पर्शा विषयैः संबन्धास्तत्तद्विषयाकारान्तःकरणपरिणामा वा ते आगमापायिन उत्पत्तिविनाशवतोऽन्तःकरणस्यैव शीतोष्णादिद्वारा सुखदुःखदाः नतु नित्यस्य विभोरात्मनः। तस्य निर्गुणात्वान्निर्विकारत्वाच्च। नहि नित्यस्यानित्यधर्माश्रयत्वं संभवति धर्मधर्मिणोरभेदात्संबन्धान्तरानुपपत्तेः। साक्ष्यस्य साक्षिधर्मत्वानुपपत्तेश्च। तदुक्तम् नर्ते स्याद्विक्रियां दुःखी साक्षिता का विकारिणः। धीविक्रियासहस्राणां साक्ष्यतोऽहमविक्रियः।। इति। तथाच सुखदुःखाद्याश्रयीभूतान्तःकरणभेदादेव सर्वव्यवस्थोपपत्तेर्न निर्विकारस्य सर्वभासकस्यात्मनो भेदे मानमस्ति सद्रूपेण स्फुरणरूपेण च सर्वत्रानुगमात्। अन्तःकरणस्य तावत्सुखदुःखादौ जनकत्वमुभयवादिसिद्धम्। तत्र समवायिकारणत्वस्यैवाभ्यर्हितत्वात्तदेव कल्पयितुमुचितं नतु समवायिकारणान्तरानुपस्थितौ निमित्तत्वमात्रम्। तथाचकामः संकल्पः इत्यादिश्रुतिःएतत्सर्वं मन एव इति कामादिसर्वविकारोपादानत्वमभेदनिर्देशान्मनस आह। आत्मनश्च स्वप्रकाशज्ञानानन्दरूपत्वस्य श्रुतिभिर्बोधनान्न कामाद्याश्रयत्वम् अतो वैशेषिकादयो भ्रान्त्यैवात्मनो विकारित्वं भेदं चाङ्गीकृतवन्त इत्यर्थः। अन्तःकरणस्यागमापायित्वात् दृश्यत्वाच्च नित्यदृग्रूपात्त्वत्तो भिन्नस्य सुखादिजनका ये मात्रास्पर्शास्तेऽप्यनित्या अनियतरूपाः एकदा सुखजनकस्यैव शीतोष्णादेरन्यदा दुःखजनकत्वदर्शनात्। एवं कदचिद्दुःखजनकस्याप्यन्यदा सुखजनकत्वदर्शनात्। शीतोष्णग्रहणमाध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकसुखदुःखोपलक्षणार्थम्। शीतमुष्णं च कदाचित्सुखं कदाचिद्दुःखं सुखदुःखे तु न कदापि विपर्ययेते इति पृथङ्निर्देशः। तथा चात्यन्तास्थिरान् त्वद्भिन्नस्य विकारिणः सुखदुःखादिप्रदान्भीष्मादिसंयोगवियोगरूपान्मात्रास्पर्शांस्त्वं तितिक्षस्व नैते मम किंचित्करा इति विवेकेनोपेक्षस्व। दुःखितादात्माध्यासेनात्मानं दुःखिनं मा ज्ञासीरित्यर्थः। कौन्तेय भारतेति संबोधनद्वयेनोभयकुलविशुद्धस्य तवाज्ञानमनुचितमिति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.14।।ननु आत्मनो लिङ्गशरीरादन्यत्वेऽप्यहं दुःखीत्याद्यनुभवाद्दुःखादिधर्माश्रयत्वं दुर्वारम्। ततश्च भीष्मादिबन्धुवर्गनाशे सति दुःखसंबन्धो भवत्येवेत्याशङ्क्याह  मात्रास्पर्शा इति।  मीयन्ते विषया आभिस्ता मात्रा इन्द्रियवृत्तयः। यद्वा दश प्रज्ञामात्राः वागादयः दश भूतमात्राः नामादयः कौषीतकिप्रसिद्धा इन्द्रियविषयरूपा ग्राह्याः। तासां स्पर्शाः परस्परं विषयविषयिभावेन संबन्धा इति व्याख्येयम्। यद्वा मात्रा प्रमात्रा सह स्पर्शाः विषयेन्द्रियसंबन्धाः। स्पर्शशब्दस्य तद्वाचित्वंस्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् इत्यत्र दृष्टम्। तत्र स्पर्शपदेन तद्वतोर्विषयेन्द्रिययोरपि लाभः। तेन प्रमातुः प्रमाणद्वारा प्रमेयेण सह संबन्धाः सर्वे शीतोष्णादिवदागमापायिन उत्पत्तिविनाशशीला अतएवानित्याश्च तद्वदेव सुखदुःखदाश्च। अतस्तान् तितिक्षस्व सहस्व। हे कौन्तेय भारतेत्युत्तमवंश्यत्वेन धीरत्वमस्य सूचयति। प्रमातृत्वादिरनर्थो हि सुप्तिसमाधिग्रहावेशादिष्वभावाज्जाग्रत्स्वप्नादौ भावाच्च कादाचित्कतया आत्मनि प्रतीयमानोऽपि रज्जूरगादिवन्मिथ्याभूतः सन्न तद्धर्मत्वं भजते। यद्धि यत्राभेदेन कदाचिद्भाति तत्तत्राध्यस्तं रज्ज्वामिव सर्पः। प्रमात्रादिश्च प्रतीचि प्रत्यगभेदेन कदाचिद्भाति अतो मिथ्येति निश्चितम्। तेन प्रतीचि प्रमातृसंबन्ध एव नास्ति। सत्यमिथ्यावस्तुनोर्वास्तवसंबन्धायोगात्। प्रमातृधर्माणां दुःखादीनां तु प्रतीचि संबन्धो दूरापेत एव। कथं तर्ह्यात्मनि दुःखित्वप्रत्ययः। तत्तदुपाधितादात्म्याध्यासादिति ब्रूमः। अतएव जाग्रति दृष्टं दुःखं स्वप्ने नानुवर्तते स्वप्नदृष्टं वा जाग्रति न दृश्यते। तथा च श्रुतिःस यत्तत्र पश्यति पुण्यं च पापं चानन्वागतस्तेन भवत्यसङ्गो ह्ययं पुरुषः इति।कामः संकल्पो विचिकित्सा इत्यादिश्रुतिरेतत्सर्वं मन एवेति अभेदनिर्देशात्मकामादिसर्वविकारोपादानत्वं मनस एवाह। तस्मात्स्वप्न इवात्मनि दुःखित्वप्रतीतिर्भ्रान्तिरेवेतीष्टवियोगजनितां तां तितिक्षस्वेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.14।।नन्वग्रे देहाप्तिरपि भविष्यति परं किञ्चित्कालं भवति () भोगदुःखासहिष्णुत्वाच्छोचामीति चेत्तत्राह मात्रास्पर्शा इति। हे कौन्तेय परमस्निग्ध मात्रास्पर्शा इन्द्रियवृत्तिविषयसम्बन्धाः शीतोष्णसुखदुःखदा भवन्ति।अत्रायमर्थः इन्द्रियवृत्तिस्पृष्टा जलातपादयो शीतोष्णदा भवन्ति। तथा मित्रसंयोगविप्रयोगादयश्च सुखदुःखदा भवन्ति। संयोगे स्वस्य सुखं भवति विप्रयोगे च दुःखम् तत्रस्थसुखदुःखादिकं न विचारणीयम्। किन्तु मित्रसुखविचारेण स्वस्य तत्सहनमेवोत्तममुचितं यतस्ते न स्थिरा इत्याह आगमापायिन इति। आगमापायिन आगच्छन्त्यपयान्ति च अत एव अनित्याः अतस्तान् तितिक्षस्व सहस्व।भारत इति सम्बोधनात्तवैतदुचितमिति ज्ञापितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.14।।ननु गतानागतानहं न शोचामि किंतु दद्वियोगादिदुःखभाजमात्मानमेवेति चेत्तत्राह  मात्रास्पर्शा इति।  मीयन्ते ज्ञायन्ते विषया आभिरिति मात्रा इन्द्रियवृत्तयः तासां स्पर्शाः विषयैः संबन्धाः ते शीतोष्णादिप्रदा भवन्ति ते त्वागमापायित्वादनित्या अस्थिराः अतस्तांस्तितिक्षस्व सहस्व। यथा जलातपादिसंपर्कास्तत्तत्कालकृताः स्वभावतः शीतोष्णादि प्रयच्छन्ति एवमिष्टसंयोगवियोगा अपि सुखदुःखादि प्रयच्छन्ति तेषां चास्थिरत्वात्सहनं तव धीरस्योचितं नतु तन्निमित्तहर्षविषादपारवश्यमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.14।।ननु धैर्यमेव तन्नायाति यतो न मूढः स्यामिति चेत्तत्प्राप्त्युपायमाह मात्रास्पर्शा इति। मात्रा रूपादयस्तासां स्पर्शा इन्द्रियाख्याः इन्द्रियैर्वा स्पर्शाः योगाः शीतादिद्वन्द्वाः तेचागमापायिनोऽनित्यास्तान्विशिष्टानेव सहस्व। सर्वसहनं हि साङ्ख्ये योगे चावश्यकं ततो धीरस्य न मोहः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.14।।यद्यपि आत्मा नित्य है ऐसे जाननेवाले ज्ञानीको आत्मविनाशनिमित्तक मोह होना तो सम्भव नहीं तथापि शीतउष्ण और सुखदुःखप्राप्तिजनित लौकिक मोह तथा सुखवियोगजनित और दुःखसंयोगजनित शोक भी होता हुआ देखा जाता है ऐसे अर्जुनके वचनोंकी आशंका करके भगवान् कहते हैं मात्रा अर्थात् शब्दादि विषयोंको जिनसे जाना जाय ऐसी श्रोत्रादि इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके स्पर्श अर्थात् शब्दादि विषयोंके साथ उनके संयोग वे सब शीतउष्ण और सुखदुःख देने वाले हैं अर्थात् शीतउष्ण और सुखदुःख देते हैं। अथवा जिनका स्पर्श किया जाता है वे स्पर्श अर्थात् शब्दादि विषय ( इस व्युत्पत्तिके अनुसार यह अर्थ होगा कि ) मात्रा और स्पर्श यानी श्रोत्रादि इन्द्रियाँ और शब्दादि विषय ( ये सब ) शीतउष्ण और सुखदुःख देनेवाले हैं। शीत कभी सुखरूप होता है कभी दुःखरूप इसी तरह उष्ण भी अनिश्चितरूप है परंतु सुख और दुःख निश्चितरूप हैं क्योंकि उनमें व्यभिचार ( फेरफार ) नहीं होता। इसलिये सुखदुःखसे अलग शीत और उष्णका ग्रहण किया गया है।जिससे कि वे मात्रास्पर्शादि ( इन्द्रियाँ उनके विषय और उनके संयोग ) उत्पत्तिविनाशशील हैं इससे अनित्य हैं अतः उन शीतोष्णादिको तू सहन कर अर्थात् उनमें हर्ष और विषाद मत कर।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.14।। व्याख्या   यहाँ एक शंका होती है कि इन चौदहवेंपंद्रहवें श्लोकोंसे पहले (11 से 13) और आगे (16 से 30 तक) देही और देह इन दोनोंका ही प्रकरण है। फिर बीचमें मात्रास्पर्श के ये दो श्लोक (प्रकरणसे अलग) कैसे आये इसका समाधान यह है कि जैसे बारहवें श्लोकमें भगवान्ने सम्पूर्ण जीवोंके नित्यस्वरूपको बतानेके लिये किसी कालमें मैं नहीं था ऐसी बात नहीं है ऐसा कहकर अपनेको उन्हींकी पंक्तिमें रख दिया ऐसे ही शरीर आदि मात्र प्राकृत पदार्थोंको अनित्य विनाशी परिवर्तनशील बतानेके लिये भगवान्ने यहाँ मात्रास्पर्श की बात कही है। तु   नित्यत्तत्त्वसे देहादि अनित्य वस्तुओंको अलग बतानेके लिये यहाँ  तु  पद आया है। मात्रास्पर्शाः   जिनसे मापतौल होता है अर्थात् जिनसे ज्ञान होता है उन (ज्ञानके साधन) इन्द्रियों और अन्तःकरणका नाम  मात्रा  है। मात्रासे अर्थात् इन्द्रियों और अन्तःकरणसे जिनका संयोग होता है उनका नाम  स्पर्श  है। अतः इन्द्रियों और अन्तःकरणसे जिनका ज्ञान होता है ऐसे सृष्टिके मात्र पदार्थ  मात्रास्पर्शाः  हैं।यहाँ  मात्रास्पर्शाः  पदसे केवल पदार्थ ही क्यों लिये जायँ पदार्थोंका सम्बन्ध क्यों न लिया जाय अगर हम यहाँ  मात्रास्पर्शाः  पदसे केवल पदार्थोंका सम्बन्ध ही लें तो उस सम्बन्धको  आगमापायिनः  (आनेजानेवाला) नहीं कह सकते क्योंकि सम्बन्धकी स्वीकृति केवल अन्तःकरणमें न होकर स्वयंमें (अहम्में) होती है। स्वयं नित्य है इसलिये उसमें जो स्वीकृति हो जाती है वह भी नित्यजैसी ही हो जाती है। स्वयं जबतक उस स्वीकृतिको नहीं छोड़ता तबतक वह स्वीकृति ज्योंकीत्यों बनी रहती है अर्थात् पदार्थोंका वियोग हो जानेपर भी पदार्थोंके न रहनेपर भी उन पदार्थोंका सम्बन्ध बना रहता है  (टिप्पणी प0 52) । जैसे कोई स्त्री विधवा हो गयी है अर्थात् उसका पतिसे सदाके लिये वियोग हो गया है पर पचास वर्षके बाद भी उसको कोई कहता है कि यह अमुककी स्त्री है तो उसके कान खड़े हो जाते हैं इससे सिद्ध हुआ कि सम्बन्धी(पति) के न रहनेपर भी उसके साथ माना हुआ सम्बन्ध सदा बना रहता है। इस दृष्टिसे उस सम्बन्धको आनेजानेवाला कहना बनता नहीं अतः यहाँ  मात्रास्पर्शाः  पदसे पदार्थोंका सम्बन्ध न लेकर मात्र पदार्थ लिये गये हैं। शीतोष्णसुखदुःखदाः   यहाँ शीत और उष्ण शब्द अनुकूलता और प्रतिकूलताके वाचक हैं। अगर इनका अर्थ सरदी और गरमी लिया जाय तो ये केवल त्वगिन्द्रिय(त्वचा)के विषय हो जायँगे जो कि एकदेशीय हैं। अतः शीतका अर्थ अनुकूलता और उष्णका अर्थ प्रतिकूलता लेना ही ठीक मालूम देता है।मात्र पदार्थ अनुकूलताप्रतिकूलताके द्वारा सुखदुःख देनेवाले हैं अर्थात् जिसको हम चाहते हैं ऐसी अनुकूल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना देश काल आदिके मिलनेसे सुख होता है और जिसको हम नहीं चाहते ऐसी प्रतिकूल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदिके मिलनेसे दुःख होता है। यहाँ अनुकूलताप्रतिकूलता कारण हैं और सुखदुःख कार्य हैं। वास्तवमें देखा जाय तो इन पदार्थोंमें सुखदुःख देनेकी सामर्थ्य नहीं है। मनुष्य इनके साथ सम्बन्ध जोड़कर इनमें अनुकूलताप्रतिकूलताकी भावना कर लेता है जिससे ये पदार्थ सुखदुःख देनेवाले दीखते हैं। अतः भगवान्ने यहाँ  सुखदुःखदाः  कहा है। आगमापायिनः   मात्र पदार्थ आदिअन्तवाले उत्पत्तिविनाशशील और आनेजानेवाले हैं। वे ठहरनेवाले नहीं है क्योंकि वे उत्पत्तिसे पहले नहीं थे और विनाशके बाद भी नहीं रहेंगे। इसलिये वे  आगमापायी  हैं। अनित्याः   अगर कोई कहे कि वे उत्पत्तिसे पहले और विनाशके बाद भले ही न हों पर मध्यमें तो रहते ही होंगे तो भगवान् कहते हैं कि अनित्य होनेसे वे मध्यमें भी नहीं रहते। वे प्रतिक्षण बदलते रहते हैं। इतनी तेजीसे बदलते हैं कि उनको उसी रूपमें दुबारा कोई देख ही नहीं सकता क्योंकि पहले क्षण वे जैसे थे दूसरे क्षण वे वैसे रहते ही नहीं। इसलिये भगवान्ने उनको  अनित्याः  कहा है।केवल वे पदार्थ ही अनित्य परिवर्तनशील नहीं हैं प्रत्युत जिनसे उन पदार्थोंका ज्ञान होता है वे इन्द्रियाँ और अन्तःकरण भी परिवर्तनशील हैं। उनके परिवर्तनको कैसे समझें जैसे दिनमें काम करतेकरते शामतक इन्द्रियों आदिमें थकावट आ जाती है और सबेरे तृप्तिपूर्वक नींद लेनेपर उनमें जो ताजगी आयी थी वह शामतक नहीं रहती। इसलिये पुनः नींद लेनी पड़ती है जिससे इन्द्रियोंकी थकावट मिटती है और ताजगीका अनुभव होता है। जैसे जाग्रत्अवस्थामें प्रतिक्षण थकावट आती रहती है ऐसे ही नींदमें प्रतिक्षण ताजगी आती रहती है। इससे सिद्ध हुआ कि इन्द्रियों आदिमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है।यहाँ मात्र पदार्थोंको स्थूलरूपसे  आगमापायिनः  और सूक्ष्मरूपसे  अनित्याः  कहा गया है। इनको अनित्यसे भी सूक्ष्म बतानेके लिये आगे सोलहवें श्लोकमें इनको  असत्  कहेंगे और पहले जिस नित्यतत्त्वका वर्णन हुआ है उसको  सत्  कहेंगे। तांस्तितिक्षस्व  ये जितने मात्रास्पर्श अर्थात् इन्द्रियोंके विषय हैं उनके सामने आनेपर यह अनुकूल है और यह प्रतिकूल है ऐसा ज्ञान होना दोषी नहीं है प्रत्युत उनको लेकर अन्तःकरणमें रागद्वेष हर्षशोक आदि विकार पैदा होना ही दोषी है। अतः अनुकूलताप्रतिकूलताका ज्ञान होनेपर भी रागद्वेषादि विकारोंको पैदा न होने देना अर्थात् मात्रास्पर्शोंमें निर्विकार रहना ही उनको सहना है। इस सहनेको ही भगवान्ने  तितिक्षस्व  कहा है।दूसरा भाव यह है कि शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदिकी क्रियाओँका अवस्थाओंका आरम्भ और अन्त होता है तथा उनका भाव और अभाव होता है। वे क्रियाएँ अवस्थाएँ तुम्हारेमें नहीं हैं क्योंकि तुम उनको जाननेवाले हो उनसे अलग हो। तुम स्वयं ज्योंकेत्यों रहते हो। अतः उन क्रियाओंमें अवस्थाओंमें तुम निर्विकार रहो। इनमें निर्विकार रहना ही तितिक्षा है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें मात्रास्पर्शोंकी तितिक्षाकी बात कही। अब ऐसी तितिक्षासे क्या होगा इसको आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.13 2.14।।एवमर्थद्वयमाह न हीत्यादि। अहं हि नैव नासम् अपि तु आसम् एवं त्वम् अमी च राजानः। आकारान्तरे च सति यदि शोच्यता तर्हि कौमारात् यौवनावाप्तौ किमिति न शोच्यते यो धीरः स न शोचति। धैर्यं च (N धैर्ये च) एतच्छरीरेऽपि यस्यास्था नास्ति तेन सुकरम्। अतस्त्वं धैर्यमन्विच्छ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.14।।आत्मनः श्रुत्यादिप्रमिते नित्यत्वे तदुत्पत्तिविनाशप्रयुक्तशोकमोहाभावेऽपि प्रकारान्तरेण शोकमोहौ स्यातामित्याशङ्कामनूद्योत्तरत्वेन श्लोकमवतारयति  यद्यपीत्यादिना।  शीतोष्णयोस्ताभ्यां सुखदुःखयोश्च प्राप्तिं निमित्तीकृत्य यो मोहादिर्दृश्यते तस्यान्वयव्यतिरेकाभ्यां दृश्यमानत्वमाश्रित्य लौकिकविशेषणम्। अशोच्यानित्यत्र यो विद्याधिकारी सूचितस्तस्यतितिक्षुः समाहितो भूत्वा इति श्रुतेस्तितिक्षुत्वं विशेषणमिहोपदिश्यते। व्याख्येयं पदमुपादाय करणव्युत्पत्त्या तस्येन्द्रियविषयत्वं दर्शयति  मात्रा इत्यादिना।  षष्ठीसमासं दर्शयन् भावव्युत्पत्त्या स्पर्शशब्दार्थमाह  मात्राणामिति।  तेषामर्थक्रियामादर्शयति  ते शीतेति।  संप्रति शब्दद्वयस्य कर्मव्युत्पत्त्या शब्दादिविषयपरत्वमुपेत्य समासान्तरं दर्शयन् विषयाणां कार्यं कथयति  अथवेति।  ननु शीतोष्णप्रदत्वे सुखदुःखप्रदत्वस्य सिद्धत्वात्किमिति शीतोष्णयोः सुखदुःखाभ्यां पृथक्ग्रहणमिति तत्राह  शीतमिति।  विषयेभ्यस्तु पृथक्कथनं तदन्तर्भूतयोरेव तयोः सुखदुःखहेत्वोरानुकूल्यप्रातिकूल्ययोरुपलक्षणार्थम्। अध्यात्मं हि शीतमुष्णं वा आनुकूल्यं प्रातिकूल्यं वा संपाद्य बाह्या विषयाः सुखादि जनयन्ति। ननु विषयेन्द्रियसंयोगस्यात्मनि सदा सत्त्वात्तत्प्रयुक्तशीतादेरपि तथात्वात्तन्निमित्तौ हर्षविषादौ तस्मिन्नापन्नावित्याशङ्क्योत्तरार्धं व्याचष्टे  यस्मादित्यादिना।  अत्र च कौन्तेय भारतेति संबोधनाभ्यामुभयकुलशुद्धस्यैव विद्याधिकारित्वमित्येतदेव द्योत्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.14।।प्रकारान्तरेण शोकं शङ्कते  तथापी ति। यद्यपि बान्धवादीनां हानिर्भविष्यतीति धिया न शोको युक्तः उक्तविधयात्महानेरभावात्। देहहानावपि प्रतिनिधिलाभात्। तथापि तन्मरणे ममैव सुखहानिदुःखावाप्तिश्च भविष्यतीति धिया मे शोकः समुत्पतितः। कथम्  तद्दर्शनाभावा दिना। तदिति बान्धवादिपरामर्शः। आदिपदेन विकृततद्दर्शनं च गृह्यते। प्रेमास्पदानां हि दर्शनस्पर्शनालापादिकं सुखहेतुः। तेषु मृतेषु तद्दर्शनाद्यभावात्सुखहानिः। तथा तेषां छेदभेदादिदर्शनेन दुःखावाप्तिश्चेति एतन्निषेधपूर्वकं श्लोकमवतारयति  नेति ।मीयन्ते विषया यैरिति मात्रा इन्द्रियाणि इति व्याख्यानमसत्। पुराणादौ मात्राशब्दस्य विषये रूढत्वादित्याशयवान् व्याचष्टे  मीयन्त  इति। ननु गन्धरसरूपस्पर्शशब्दा विषयाः। अतो भिन्नपदत्वे द्वन्द्वे वा स्पर्शानां विषयान्तर्गतानां पुनरुक्तिर्व्यर्थेत्यत आह  तेषा मिति विषयाणाम्। तथाप्यनुपपत्तिः। विषयाणां स्पर्शाभावांदित्यत आह  सम्बन्धा  इति। एवं तर्हि किं षष्ठीसमासपरिग्रहणेन भिन्नपदत्त्वादावपि दोषाभावादित्यतो वाक्यं योजयति  त एवे ति। तुशब्दार्थ एवेति। नहि विषयाणां सम्बन्धानां च पृथगेतत्कार्यं सम्भवतीति भावः। ननु शीतोष्णशब्दौ विषयविशेषवचनौ तत्कथं विषयसम्बन्धा विषयविशेषं दद्युः कथं च साक्षात्सुखदुःखे कश्च प्रतिसम्बन्धी कस्मै ददतीत्यत आह  देहे  इति। देहशब्देनात्रेन्द्रियाणि लक्ष्यन्ते। अनेन शीतोष्णशब्दौ सकलविषयोपलक्षकौ। विषयोक्त्या च तत्साक्षात्कारो लक्ष्यते इति लक्षितलक्षणेयम्। अनुभवद्वारैव सुखदुःखादानम्। प्रतिसम्बन्धी देहः। दानं च आत्मन इत्युक्तं भवति। एतेन लौकिकी प्रतीतिरर्जुनेन शङ्किताऽनूद्यते। तत्तद्विषयाणां तैस्तैरिन्द्रियैर्ये ये सन्निकर्षास्तैस्तस्तत्तद्विषयसाक्षात्कारा भवन्ति तत्रेष्टविषयसाक्षात्कारात्सुखं भवति अनिष्टविषयसाक्षात्कारात् दुःखं भवतीति।भवेदेवं ततः किं प्रकृतशङ्काया इत्यतस्तुशब्दात्परया काक्वा सिद्धमर्थमाह  न ही ति।  स्वत  इति। विषयेन्द्रियेनन्निकर्षमात्रेण।  दुःखादि रिति विषयसाक्षात्कारः सुखदुःखे च। अनेन मात्रास्पर्शा एव केवलाः किं शीतोष्णसुखदुःखदाः नहि किन्नामाभिमानसहिताः इत्युक्तं भवति। अभिमानो नामात्र विषयेषु शोभनत्वाध्यासनिमित्तस्नेहः। अरित्वादिभ्रमनिमित्तो द्वेषश्च शरीरेन्द्रियान्तःकरणेषु ममतातिशयहेतुकोऽविवेक इत्यादि। विषयेन्द्रियसन्निकर्षा एव ज्ञानस्य सुखदुःखयोश्च कारणं कुतो न स्युः येनाभिमानोऽधिकः कारणसामग्र्यां निवेश्यत इति शङ्कापूर्वकमुत्तरपादं व्याचष्टे  कुत  इति। ननु कथमिदं लभ्यते यत इत्यध्याहारादिति ब्रूमः प्रयोजनान्तराभावाद्धेत्वर्थगर्भत्वेन वा।सविशेषणे हि विधिनिषेधौ विशेषणमुपसङ्क्रामतः इति न्यायात्। शीतोष्णसुखदुःखदत्वविशिष्टानां मात्रास्पर्शानामिदं विशेषणं भवच्छीतोष्णसुखदुःखदत्वमुपसङ्क्रामति। मात्रास्पर्शानां शीतोष्णसुखदुःखदत्वं यत्तस्यागमापायित्वादित्यर्थः। अनेन कथमुक्तशङ्कापरिहार इत्यतोऽतिप्रसङ्गमुखेन व्याचष्टे  यदी ति। मात्रास्पर्शा यदि स्वतः स्वयमेवाभिमानमनपेक्ष्यात्मनः शीतोष्णसुखदुःखदाः स्युः तर्हि  सुप्तावपि स्युः । नहि कारणसामग्री कार्यं व्यभिचरतीत्यर्थः। नच वाच्यं सुप्तौ विषयेन्द्रियसम्बन्धा एव न सन्तीति स्पर्शत्वगिन्द्रियसम्बन्धस्यावर्जनीयत्वात्। अतएव शीतोष्णग्रहणं कृतम्। एतेनेन्द्रियमनस्सन्निकर्षाभावोऽपि प्रत्युक्तः। न चात्मनः सन्निकर्षाभावः मनसः कदाप्यात्मवियोगाभावस्य वक्ष्यमाणत्वात्। अतिप्रसङ्गस्य विपर्यये

Chapter 2 (Part 9)

पर्यवसानं वदन्साक्षादर्थं दर्शयति   अत  इति। अतो  मात्रास्पर्शा  नात्मनः स्वतः स्वयमेव केवलाः शीतोष्णसुखदुःखदा भवन्तीति सम्बन्धः।  अत  इत्युक्तस्य विवरणं  यतस्तन्निमित्ता  एवेति। तदित्यभिमानपरामर्शः। तेन निमित्तेन सहिता एव शीतोष्णसुखदुःखदा यत इत्यर्थः। तत्कुत इत्यत उक्तं  मात्रे ति। मात्रास्पर्शा जाग्रत्स्वप्नयोरभिमानवतोरेव ते तथाविधाः शीतोष्णसुखदुःखदाः सन्तः सम्भवन्ति। नान्यदा अभिमानरहिते सुप्त्यादाविति मात्रास्पर्शानां शीतोष्णसुखदुःखदत्वस्याभिमानान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वादित्यर्थः। न चाभिमानहीनेऽपि ज्ञानोत्पत्तिस्तृणादौ दृश्यते सत्यं सुखदुःखहेतुभूतज्ञानमत्राधिकृतमित्यदोष इति। इतश्चाभिमान एवात्मन उपप्लव इत्याह  आत्मनश्चे ति। अत्र तैरिति ज्ञानसुखदुःखपरामर्शः। आत्मनो ज्ञानादिभिः सम्बन्धो नास्ति तेषां मनोवृत्तित्वात्। तथा चान्यगतधर्माः कथमन्यस्य विक्रियाहेतवो विनाभिमानात्। प्रसिद्धं च स्वाभिमतगृहदाहो देवदत्तं दुःखीकरोतीति। ज्ञानादिभिरात्मनः सम्बन्धाभावे कथमुक्तं शीतोष्णाद्यनुभव आत्मन इत्यादीत्यत उक्तम्  विषये ति। मनोवृत्तिरूपाणि ज्ञानादीनि विषयभूतानि। आत्मा च विषयी साक्षिचैतन्यस्य तद्विषयत्वात्। एतमेव सम्बन्धमभिप्रेत्यात्मनो ज्ञानमित्यादिव्यवहारः। उपलक्षणं चैतत्। ईश्वराधीनं स्वामित्वमपि ग्राह्यं तादात्म्यसमवायिनिरासे तात्पर्यात्।नन्वभिमानसहितानामेव मात्रास्पर्शानां ज्ञानादिहेतुत्वं न केवलानामित्युपपादितमेतत् ततो नित्या इति व्यर्थमिति चेत् न आगमापायित्वस्यैवानेन व्याख्यानात् व्याख्यानेऽपि किं प्रयोजनमित्यत आह  नचे ति। आगमापायिशब्दो द्वयोः प्रयुज्यते यत्प्रवाहरूपेण नित्यं व्यक्तिरूपेणानित्यं यथा गङ्गोदकं तदेकमागमापायीत्युच्यते। यस्य तु प्रवाहोऽपि छिद्यते यथा किंशुककुसुमानां तदपरमिति। तत्रागमापायिशब्दादुभयप्रतीतौ आगमापायित्वेऽप्यागमापायिशब्दार्थोऽपि यत्प्रवाहरूपेण नित्यत्वं तदत्र विवक्षितं  नास्ति  न भवति। मात्रास्पर्शानां शीतोष्णसुखदुःखदत्वे सम्भवात् प्रकृतानुपयोगाच्च। किन्तु द्वितीयमेव सुप्त्यादावभावेन सम्भवादुक्तरीत्या प्रकृतोपयोगाच्च इत्येतदनित्या इत्यनेनाह भगवानित्यर्थः। प्रलयो मूर्छा। आदिपदेनासम्प्रज्ञातसमाधेर्ग्रहणम्। नन्वनित्यपदमनेकार्थमेव सत्यम् तथापि पुनः प्रयत्नाद्यालोचनादेतत्सिद्धिः। एतदपि विशेषणोपसङ्क्रान्तं विशेषणम्। आगामिव्याख्यानमपेक्ष्य भाष्यकृताऽयमर्थः प्रागुपन्यस्त इति ज्ञेयम्। उक्तमर्थं पिण्डीकृत्योपसंहरति  अत  इति। उक्तप्रकारेण देहादावात्मनो ममैत इत्यादिभ्रम एव भ्रमसहिता एव मात्रास्पर्शा इत्यर्थः। ततः किमित्यतश्चतुर्थपदं व्याख्यातुमुपोद्धातमाह  अत  इति। तद्विसुक्तस्य भ्रमविमुक्तस्य बन्धुमरणादिदुःखं यत्प्राक् शङ्कितं न हि सामग्रीकार्यमेकदेशेन भवतीति भावः। ततः किमित्यतश्चतुर्थपादं व्याख्यातिं  अत  इति। तितिक्षस्व विफलीकुर्विति भावः। ननु तानिति मात्रास्पर्शानां परामर्शो युक्तः तत्कथं शीतोष्णादीनित्युक्तम् मैवम्। शीतोष्णहेतूनां मात्रास्पर्शानामेव तच्छब्देनोपलक्षणात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.14।।तथापि तद्दर्शनाभाविदना शोक इति चेत् न इत्याह मात्रास्पर्शा इति। मीयन्त इति मात्रा विषयाः तेषां स्पर्शाः सम्बन्धाः त एव शीतोष्णसुखदुःखदाः। देहे शीतोष्णादिसम्बन्धाद्धि शीतोष्णाद्यनुभव आत्मनः। ततश्च सुखदुःखे।न ह्यात्मनः स्वतो दुःखादिः सम्भवति। कुतः आगमापायित्वात्। यद्यात्मनः स्वतः स्युः सुप्तावपि स्युः। अतो यतो ते मात्रास्पर्शा जाग्रदादावेव सन्ति नान्यदेति तदन्वव्यतिरेकित्वात्तन्निमित्ता एव नात्मनः स्वतः। आत्मनश्च तैर्विषयविषयीभावादन्यः सम्बन्धो नास्ति। न चागमापायित्वेऽपि प्रवाहरूपेणाऽपि नित्यत्वमस्ति सुप्तिप्रलयादावभावादित्याह अनित्या इति। अत आत्मनो देहाद्यात्प्रभ्रम एव दुःखकारणम्। अतस्तद्विमुक्तस्य बन्धुमरणादौ दुःखं न भवति। अतोऽभिमानं परित्यज्य तान् शीतोष्णादींस्तितिक्षस्व।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.14।।शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः साश्रयाः तन्मात्राकार्यत्वात्  मात्रा  इति उच्यन्ते। श्रोत्रादिभिः तेषां  स्पर्शाः   शीतोष्ण मृदुपरुषादिरूपसुखदुःखदा भवन्ति। शीतोष्णशब्दः प्रदर्शनार्थः  तान्  धैर्येण यावद्युद्धादिशास्त्रीयकर्मसमाप्ति  तितिक्षस्व।  ते च  आगमापायि त्वाद् धैर्यवतां क्षन्तुं योग्याः।  अनित्याः  च एते बन्धहेतुभूतकर्मनाशे सति आगमापायित्वेन अपि निवर्तन्ते इत्यर्थः।तत्क्षान्तिः किमर्था इत्यत आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.14।।  मात्रा  आभिः मीयन्ते शब्दादय इति श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि। मात्राणां  स्पर्शाः  शब्दादिभिः संयोगाः। ते  शीतोष्णसुखदुःखदाः  शीतम् उष्णं सुखं दुःखं च प्रयच्छन्तीति। अथवा स्पृश्यन्त इति स्पर्शाः विषयाः शब्दादयः। मात्राश्च स्पर्शाश्च शीतोष्णसुखदुःखदाः। शीतं कदाचित् सुखं कदाचित् दुःखम्। तथा उष्णमपि अनियतस्वरूपम्। सुखदुःखे पुनः नियतरूपे यतो न व्यभिचरतः। अतः ताभ्यां पृथक् शीतोष्णयोः ग्रहणम्। यस्मात् ते मात्रास्पर्शादयः  आगमापायिनः  आगमापायशीलाः तस्मात्  अनित्याः । अतः  तान्  शीतोष्णादीन् तितिक्षस्व प्रसहस्व। तेषु हर्षं विषादं वा मा कार्षीः इत्यर्थः।।शीतोष्णादीन् सहतः किं स्यादिति श्रृणु

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【 Verse 2.15 】

▸ Sanskrit Sloka: यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ | समदु:खसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ||

▸ Transliteration: yaṁ hi na vyathayanty ete puruṣam puruṣarṣabha I samaduḥkhasukhaṁ dhīraṁ so’mṛtatvāya kalpate ||

▸ Glossary: yaṁ: whom; hi: indeed; na: never; vyathayanti: are distressing; ete: all these; puruṣam: to a person; puruṣarṣabha: O best among men; sama: equal; duḥkha: sorrow; sukhaṁ: happiness; dhīraṁ: brave; saḥ: he; amṛtatvāya: for liberation; kalpate: is fit

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.15 O Puruṣarṣabha, chief among men, these surely do not afflict the brave person, who is centered and complete. Pleasure and pain are the same to him and he is certainly ready for immortality, amṛatvā.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.15।।हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन सुखदुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथा नहीं पहुँचाते वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.15।। हे पुरुषश्रेष्ठ दुख और सुख में समान भाव से रहने वाले जिस धीर पुरुष को ये व्यथित नहीं कर सकते हैं वह अमृतत्व (मोक्ष) का अधिकारी होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.15 यम् whom? हि surely? न व्यथयन्ति afflict not? एते these? पुरुषम् man? पुरुषर्षभ chief among men? समदुःखसुखम् same in pleasure and pain? धीरम् firm man? सः he? अमृतत्वाय for immortality? कल्पते is fit.Commentary -- Dehadhyasa or identification of the Self with the body is the cause of pleasure and pain. The more you are able to identify yourself with the immortal? allpervading Self? the less will you be affected by the pairs of opposites (Dvandvas? pleasure and pain? etc.)Titiksha or the power of endurance develops the willpower. Calm endurance in pleasure and pain? and heat and cold is one of the alifications of an aspirant on the path of Jnana Yoga. It is one of the Shatsampat or sixfold virtues. It is a condition of right knowledge. Titiksha by itself cannot give you Moksha or liberation? but still? when coupled with discrimination and dispassion? it becomes a means to the attainment of Immortality or knowledge of the Self. (Cf.XVII.53)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.15. O the best among persons ! That wise person becomes immortal whom these (situations) do not trouble and to whom the pleasure and pain are eal.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.15 The hero whose soul is unmoved by circumstance, who accepts pleasure and pain with equanimity, only he is fit for immortality.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.15 For, he whom these do not affect, O chief of men, and to whom pain and pleasure are the same - that steadfast man alone is worthy of immortality.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.15 O (Arjuna, who are) foremost among men, verily, the person whom these do not torment, the wise man to whom sorrow and happhiness are the same he is fit for Immortality.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.15 That firm man whom, surely, these afflict not, O chief among men, to whom pleasure and pain are the same, is fit for attaining immortality.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.15 But, because all these different situations are of the nature of coming and going, on that account itself are they not to be lamented on ? It is not so. As for instance : What is this which is termed 'coming' ? If it is 'birth', what is that 'birth' itself ? It is wrong to say that is the same as gaining the self by what is non-existent. For, to be of the nature of non-existence, is indeed to be devoid of every inherent nature and to be devoid of the very self. If a thing is devoid of the self and devoid of every nature, how is it possible to convert it into what has an intrinsic nature ? Surely, it is impossible to convert the non-blue into blue. For, it is faulty and undesirable to covert the non-blue into blue. For, it is faulty and undesirable to conclude that a thing with certain in nature changes to be of a different nature. Hence the scritpure goes - 'The intrinsic nature of beings would not cease to exist, e.g., the heat of the sun'. On the other hand, if the 'birth' signifies the gaining of self just by what [really] exists, even then, why the lamentability on its coming ? For, what has gained a self, could never be non-existent and conseently it would be eternal.

Likewise, is the act of 'going' also meant for the existent or the non-existent ? What is non-existent is just non-existent [for ever.] How can there be a non-existence-nature even in the case of that which is of the existence-nature ? If it is said that it is of the non-existence-nature in the second moment; [since its birth], then it should be so even in the first moment; and so nothing would be existent. For, the intrinsic nature [ever] remains unabandoned.

But is it not that the destruction of it (i.e., of a given thing, like a pot) is brought about by the stroke of a hammer etc.? Yet, if that destruction is altogether different [from the existent one i.e. the pot], then what does it matter for what is existent ? But, it is not be seen [at that time] ? Yet, what is actually existent (pot) may not be seen just as when it is covered with a cloth; but it has not turned to be altogether different. In fact, it has been said [in the scriptures] that this is not different [from the existent]. Summarising all these, [the Lord] says -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.15 That person endowed with courage, who considers pain as inevitable as pleasure, and who performs war and such other acts suited to his station in life without attachment to the results and only as a means of attaining immortality - one whom the impact of weapons in war etc., which involve soft or harsh contacts, do not trouble, that person only attains immortality, not a person like you, who cannnot bear grief. As the selves are immortal, what is to be done here, is this much only. This is the meaning.

Because of the immortality of the selves and the natural destructibility of the bodies, there is no cause for grief. It was told (previously): 'The wise grieve neither for the dead nor for the living' (2. 11). Now the Lord elucidates the same view.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.15 What will happen to one who bears cold and heat? Listen: Verily, the person৷৷.,'etc. (O Arjuna) hi, verily; yam purusam, the person whom; ete, these, cold and heat mentioned above; na, do not; vyathayanti, torment, do not perturb; dhiram, the wise man; sama-duhkha-sukham, to whom sorrow and happiness are the same, who is free from happiness and sorrow when subjected to pleasure and pain, because of his realization of the enternal Self; sah, he, who is established in the realization of the enternal Self, who forbears the opposites; kalpate, becomes fit; amrtattvaya, for Immortality, for the state of Immortality, i.e. for Liberation.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.15।। सुख और दुख को शान्त भाव से सहन करने का नाम तितिक्षा है जो उपनिषदों के अनुसार आत्मसाक्षात्कार के लिये एक आवश्यक गुण है। इसी को ध्यान में रखकर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि इस प्रकार की तितिक्षा से सम्पन्न व्यक्ति मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।यहाँ मोक्ष का तात्पर्य अमृतत्व शब्द से किया है। इस शब्द से स्थूल शरीर का मोक्ष नहीं समझना चाहिये। यहाँ इस शब्द का उपयोग उसके व्यापक अर्थ में किया गया है। शरीर मन और बुद्धि तथा इनके द्वारा प्राप्त सभी अनुभव र्मत्य और अनित्य ही हैं। इन उपाधियों के साथ हमारा तादात्म्य होने से इनके जन्ममरणादि धर्मों से हम प्रभावित होकर दुखी होते हैं। अमृतत्व का अर्थ है जो पुरुष अपने नित्य आत्मस्वरूप को पहचान लेता है वह इन सब अनुभवों को प्राप्त कर उनके मध्य रहता हुआ भी शोकमोह को प्राप्त नहीं होता। उसे अपने अमृतस्वरूप का विस्मरण नहीं होता।गीता के द्वारा महान् कवि व्यास जी भगवान् श्रीकृष्ण के माध्यम से हमें हमारे जीवन का लक्ष्य बताते हैं पूर्णत्व की प्राप्ति। अल्पकाल के लिये प्राप्त इस जीवन में हमको इस लक्ष्य प्राप्ति के लिये प्रयत्न करना चाहिये। चिन्तित हुये बिना प्रसन्नतापूर्वक जीवन में आने वाले सुखदुखादि कष्टों को सहन करने की सर्वोच्च साधना करने का इन परिस्थितियों में हमें अवसर मिलता है।तितिक्षा का अर्थ निराश उदास भाव से जो हो रहा है उसको सहन करना ऐसा नहीं है। यहाँ विशेष रूप से कहा है कि शीतोष्णादि द्वन्द्वों में जिसका मन समभाव में स्थित रहता है वह धीर पुरुष मोक्ष का अधिकारी होता है। यहाँ प्रयोजन निराश व्यक्ति की सहनशक्ति से नहीं बल्कि जगत् के परिर्वतनशील स्वभाव को अच्छी प्रकार समझ लेने से है। विवेकी पुरुष में यह सार्मथ्य आ जाती है कि सुख में उसे हर्षातिरेक नहीं होता और न दुख में अत्यन्त विषाद।जब तक देह के साथ हमारी अत्यन्त आसक्ति रहती है तब तक उसमें होने वाली पीड़ाओं से हम विलग नहीं हो सकते और हम व्यथित हो जाते हैं। हृदय में प्रेम अथवा घृणा के भाव के प्रादुर्भाव से यदि शारीरिक कष्ट सहने की आवश्यकता पड़ती है तो वह क्षमता हममें आ जाती है। पुत्र के प्रति प्रेम के कारण उसको शिक्षा आदि देने के लिए आवश्यकता पड़ने पर हम बड़ी प्रसन्नता से अपनी शारीरिक सुख सुविधाओं का त्याग करने के लिए तैयार हो जाते हैं। वह असुविधा हमें कष्ट नहीं पहुँचाती। इसी प्रकार बुद्धिनिष्ठ आदर्शों की प्राप्ति के लिए शरीर और मन के आरामों को भी हम त्याग देते हैं। विश्व के अनेक देशभक्त क्रान्तिकारियों ने अपने देश की स्वतन्त्र्ाता के आदर्शों को प्राप्त करने के लिए अनेक कष्ट सहन करके अपने प्राणों की आहुति दी है।निम्नलिखित कारणों से भी तुम्हारे लिए उचित है कि शोक और मोह को छोड़ कर तुम शान्तिपूर्वक शीतादि को सहन करो। क्योंकि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.15।।   तितिक्षायाः फलमाह  यमिति।  समे सुखदुःखे यस्य तं धीरं धीमन्तं नित्यात्मज्ञानवन्तं नित्यात्मज्ञानादेते शीतोष्णादयो न चालयन्ति यद्यप्येते मात्रास्पर्शा इति वक्तुमुचितं तथापि शीतादिकमदत्त्वा न व्यथयन्ति इत्यतो भाष्यकृद्भिरेतच्छब्देन शीतादीनामेव परामर्शः कृतः। स साधनचतुष्टसंपन्नो नित्यात्मदर्शननिष्ठोऽमृतत्वाय मोक्षाय समर्थो भवति। पुरुषं न व्यथयन्ति त्वं तु पुरुषर्षभ इति सूचयन्नाह  पुरुषर्षभेति।  अत्र केचिद्वर्णयन्ति। नन्वात्मनो नित्यत्वे विभुत्वे च न विवदामः। प्रतिदेहमेकत्वं तु न सहामहे। तथाहिबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नधर्माधर्मभावनाख्यनवविशेषगुणवन्तः प्रतिदेहं भिन्ना एव नित्या विभवश्चात्मानः इति वैशेषिका मन्यन्ते। इममेव पक्षं तार्किकमीमांसकादयोऽपि प्रतिपन्नाः। सांख्यास्तु विप्रतिपद्यमाना अप्यात्मनो गुणवत्त्वे प्रतिदेहं भेदे न विप्रतिपद्यन्ते। अन्यथा सुखदुःखादिसंकरप्रसङ्गात्। तथाच भीष्मादिभिन्नस्य मम नित्यत्वे विभुत्वेऽपि सुखदुःखादियोगि त्वात् भीष्मादिबन्धुदेहविच्छेदे सुखवियोगो दुःखसंयोगश्च स्यादिति कथं शोकमोहौ नानुचितावित्यर्जुनाभिप्रायमाशङ्क्य लिङ्गशरीरविवेकमाह  मात्रेति।  मात्रास्पर्शा उत्पत्तिविनाशवतोऽन्तःकरणस्यैव शीतादिद्वारा सुखदुःखदा नतु नित्यस्य विभोरात्मनः। तथाचान्तःकरणभेदान्न सांख्योक्तः संकरप्रसङ्गः। वैशेषिकादयश्च भ्रान्त्यैवात्मनो विकारित्वं भेदं चाङ्गीकृतवन्त इत्यर्थः। अन्तःकरणस्यानित्यत्वाद्दृश्यत्वाञ्च नित्यदृग्रूपत्वात्त्वत्तो भिन्नस्य सुखादिजनका ये मात्रास्पर्शास्तेऽप्यनित्यास्तांस्तितिक्षस्व नैते मम किंचित्करा इति विवेकेनोपेक्षस्व। दुःखितादात्म्येनात्मानं दुःखिनं मा ज्ञासीरित्यर्थः। नन्वन्तःकरणस्य सुखाद्याश्रयत्वे तस्यैव कर्तृत्वादिना चेतनत्वमभ्युपेयम्। तथाच तद्य्वतिरिक्ते तद्भासके भोक्तरि मानाभावान्नाममात्रे विवादः स्यात्तदभ्युपगमे च बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः अन्तःकरणस्य सुखाद्याश्रयत्वेन बद्धत्वात् आत्मनश्च तद्य्वतिरिक्तस्य मुक्तत्वादित्याशङ्कामर्जुनस्यापनेतुमाह  यमिति।  यं स्वप्रकाशत्वेन स्वतएव प्रसिद्धं पुरुषं पूर्णत्वेन पुरि शयानं समे सुखदुःखे अनात्मधर्मतया भास्यतया च यस्य तं धीरं धियं प्रेरयतीति व्युत्पत्त्या चिदाभासद्वारा धीतादात्म्याध्यासेन धीप्रेरकं धीसाक्षिणमित्यर्थः। एतेन बन्धप्रसक्तिर्दर्शिता। एते सुखदुःखदा मात्रास्पर्शा यस्मान्न व्यथयन्ति परमार्थतो न विकुर्वन्ति स पुरुषोऽमृतत्वाय मोक्षाय योग्यो भवतीत्यर्थः। अतः सर्वधर्मासंसर्गिणोऽप्यात्मन उपाधिवशात्तत्संसर्गित्वप्रतिभासो बन्धः स्वरुपज्ञानेन स्वरुपाज्ञानतत्कार्यबुद्य्धाद्युपाधिनिवृत्त्या तन्निमित्तनिखिलभ्रमनिवृत्तौ निर्मृष्टनिखिलभास्योपरागतया शुद्धस्य स्वप्रकाशपरमानन्दतया पूर्णस्यात्मनः स्वतएव कैवल्यं मोक्ष इति न बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः। अतएव नाममात्रे विवाद इत्यपास्तम्। भास्यभासकयोरेकत्वानुपपत्तेः। पुरुषर्षभेति संबोधयन्स्वप्रकाशचैतन्यरुपत्वेन पुरुषत्वं परमानन्दरुपत्वेनात्मन ऋषभत्वं सर्वद्वैतापेक्षया श्रेष्ठत्वमजानन्नेव शोचसि। अतः स्वरुपज्ञानादेव तव शोकनिवृत्तिः सुकरातरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेरिति सूचयतीति। अत्रेदमवधेयम् शोतोष्णद्वारा सुखदुःखदा इत्यसंगतम्। सर्वेषां मात्रास्पर्शानां सुखादिदातृत्वे शीतोष्णयोर्द्वारत्वाभावात्। शीतोष्णग्रहणं त्रिविधसुखदुःखोपलक्षणार्थं शीतमुष्णं च कदाचित्सुखं कदाचिद्दुःखं सुखदुःखे तु न कदाचिद्विपरीते इति तयोः पृथङ्निर्देश इति स्वपरग्रन्थविरोधाच्च। शीतोष्णद्वारा सुखदुःखदा इत्यस्य शीतोष्णद्वारा साक्षाच्च सुखदुःखदा इत्यर्थ इति यदि कश्चिद्ब्रूयात्तर्हि भाष्य एवास्यार्थस्यान्तर्भावः। तस्मात् शीतं चोष्णं च सुखं च दुखं च प्रयच्छन्तीति भाष्यकृध्वाख्यानमेवर्जु। एतेनागमापायिनोऽन्तःकरणस्येत्यपास्तम्। वाक्यार्थस्य सत्यपि सभ्यक्संभवे विशेष्याध्याहारानौचित्यात्। तितिक्षस्वेति वाक्यशेषस्य मुख्यार्थत्यागापत्तेश्च। एतेनोत्तरश्लोकव्याख्यानमप्यपास्तम्। यं पुरुषमित्येतावतैव निर्वाहे समे इत्यादिविशेषणद्वयस्यानर्थक्यापत्तेश्च। बन्धप्रसक्तिरपि पुरिषु तादात्म्याध्यासं कृत्वा शेत इत्यर्थकेन पुरुषशब्देनैव लभ्यते। एतेन सुखादेः क्षेत्रधर्मत्वस्य वक्ष्यमाणत्वाच्चास्य व्याख्यानस्याकरणे भाष्यकृतां न्यूनता न शङ्कनीया। एवमन्येषामपि मूलतद्भाष्यवहिर्भूताः कल्पनाः सभ्यग्विचार्य निराकर्तव्याः। अस्माभिस्तु विस्तरभयान्नोद्धाठ्य निराक्रियन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.15।।नन्वन्तःकरणस्य सुखदुःखाद्याश्रयत्वे तस्यैव कर्तृत्वेन भोक्तृत्वेन च चेतनत्वमभ्युपेयम् तथाच तद्व्यतिरिक्ते तद्भासके भोक्तरि मानाभावान्नाममात्रे विवादः स्यात् तदभ्युपगमे च बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः अन्तःकरणस्य सुखदुःखाश्रयत्वेन बद्धत्वात् आत्मनश्च तद्व्यतिरिक्तस्य मुक्तत्वादित्याशङ्कामर्जुनस्यापनेतुमाह भगवान् यं स्वप्रकाशत्वेन स्वतएव प्रसिद्धंअत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति इति श्रुतेः। पुरुषं पूर्णत्वेन पुरि शयानंस वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैतेन किंचनानावृतं नैतेन किंचनासंवृतम् इति श्रुतेः। समदुःखसुखं समे दुःखसुखे अनात्मधर्मतया भास्यतया च यस्य निर्विकारस्य स्वयंज्योतिषस्तम्। सुखदुःखग्रहणमशेषान्तःकरणपरिणामोपलक्षणार्थम्।एष नित्यो महिमा ब्राह्मणस्य न कर्मणा वर्धते नो कनीयान् इति श्रुत्या वृद्धिकनीयस्तारूपयोः सुखदुःखयोः प्रतिषेधात्। धीरं धियमीरयतीति व्युत्पत्त्या चिदाभासद्वारा धीतादात्म्याध्यासेन धीप्रेरकम्। धीसाक्षिणमित्यर्थः।स धीरः स्वप्नो भूत्वेमं लोकमतिक्रामति इति श्रुतेः। एतेन बन्धप्रसक्तिर्दर्शिता। तदुक्तम्यतो मानानि सिध्यन्ति जाग्रदादित्रयं तथा। भावाभावविभागश्च स ब्रह्मास्मीति बोध्यते इति। एते सुखदुःखदा मात्रास्पर्शाः हि यस्मान्न व्यथयन्ति परमार्थतो न विकुर्वन्ति सर्वविकारभासकत्वेन विकारायोग्यत्वात्सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः इति श्रुतेः। अतः स पुरुषः स्वस्वरूपभूतब्रह्मात्मैक्यज्ञानेन सर्वदुःखोपादानतदज्ञाननिवृत्त्युपलक्षिताय निखिलद्वैतानुपरक्तस्वप्रकाशपरमानन्दरूपाय अमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते। योग्यो भवतीत्यर्थः। यदि ह्यात्मा स्वाभाविकबन्धाश्रयः स्यात्तदा स्वाभाविकधर्माणां धर्मिनिवृत्तिमन्तरेणानिवृत्तेर्न कदापि मुच्येत। तथाचोक्तम्आत्मा कर्त्रादिरूपश्चेन्मा काङ्क्षीस्तर्हि मुक्तताम्। नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः।। इति। प्रागभावासहवृत्तेर्युगपत्सर्वविशेषगुणनिवृत्तेर्धर्मिनिवृत्तेर्नान्तरीयकत्वदर्शनात्। अथात्मनि बन्धो न स्वाभाविकः किंतु बुद्ध्याद्युपाधिकृतःआत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः इति श्रुतेः। तथाच धर्मिसद्भावेऽपि तन्निवृत्त्या मुक्त्युपपत्तिरितिचेत् हन्त तर्हि यः स्वधर्ममन्यनिष्ठतया भासयति स उपाधिरित्यभ्युपगमाद्बुद्ध्यादिरुपाधिः स्वधर्ममात्मनिष्ठतया भासयतीत्यायातम्। तथाचायातं मार्गे बन्धस्यासत्यत्वाभ्युपगमात् नहि स्फटिकमणौ जपाकुसुमोपधाननिमित्तो लोहितिमा सत्यः अतः सर्वसंसारधर्मासंसर्गिणोऽप्यात्मन उपाधिवशात्तत्संसर्गित्वप्रतिभासो बन्धः। स्वस्वरूपज्ञानेन तु स्वरूपाज्ञानतत्कार्यबुद्ध्याद्युपाधिनिवृत्त्या तन्निमित्तनिखिलभ्रमनिवृत्तौ निर्मृष्टनिखिलभास्योपरागतया शुद्धस्य स्वप्रकाशपरमानन्दतया पूर्णस्यात्मनः स्वत एव कैवल्यं मोक्ष इति न बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यापत्तिः। अतएवनाममात्रे विवादः इत्यपास्तम् भास्यभासकयोरेकत्वानुपपत्तेः।दुःखी स्वव्यतिरिक्तभास्यः भास्यत्वात् घटवत् इत्यनुमानात् भास्यस्य भासकत्वादर्शनात् एकस्यैव भास्यत्वे भासकत्वे च कर्तृकर्मविरोधादात्मनः कथमिति चेत्। न। तस्य भासकत्वमात्राभ्युपगमात्। अहं दुःखीत्यादिवृत्तिसहिताहंकारभासकत्वेन तस्य कदापि भास्यकोटावप्रवेशात्। अतएवदुःखी न स्वातिरिक्तभासकापेक्षः भासकत्वात् दीपवत् इत्यनुमानमपि न। भास्यत्वेन स्वातिरिक्तभासकसाधकेन प्रतिरोधात्। भासकत्वं च भानकरणत्वं स्वप्रकाशभानरूपत्वं वा। आद्ये दीपस्येव करणान्तरानपेक्षत्वेऽपि स्वातिरिक्तभानसापेक्षत्वं दुःखिनो न व्याहन्यते। अन्यथा दृष्टान्तस्य साध्यवैकल्यापत्तेः। द्वितीये त्वसिद्धो हेतुरित्यधिकबलतया भास्यत्वहेतुरेव विजयते बुद्धिवृत्त्यतिरिक्तभानानभ्युपगमात्। बुद्धिरेव भानरूपेतिचेत्। न। भानस्य सर्वदेशकालानुस्यूततया भेदकधर्मशून्यतया च विभोर्नित्यस्यैकस्य चानित्यपरिच्छिन्नानेकरूपबुद्धिपरिणामात्मकत्वानुपपत्तेः उत्पत्तिविनाशादिप्रतीतेश्चावश्यकल्प्यविषयसंबन्धविषयतयाप्युपपत्तेः। अन्यथा तत्तज्ज्ञानोत्पत्तिविनाशभेदादिकल्पनायामतिगौरवापत्तेरित्याद्यन्यत्र विस्तरः। तथाच श्रुतिःनहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात्आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःमहद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवतदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यभयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूः इत्याद्या विभुनित्यस्वप्रकाशज्ञानरूपतामात्मनो दर्शयति। एतेनाविद्यालक्षणादप्युपाधेर्व्यतिरेकः सिद्धः। अतोऽसत्योपाधिनिबन्धनबन्धभ्रमस्य सत्यात्मज्ञानान्निवृत्तौ मुक्तिरिति सर्वमवदातम्। पुरुषर्षभेति संबोधयन्स्वप्रकाशचैतन्यरूपत्वेन पुरुषत्वं परमानन्दरूपत्वेन चात्मन ऋषभत्वं सर्वद्वैतापेक्षया श्रेष्ठत्वमजानन्नेव शोचसि अतः स्वस्वरूपज्ञानादेव तव शोकनिवृत्तिः सुकरातरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेरिति सूचयति। अत्र पुरुषमित्येकवचनेन सांख्यपक्षो निराकृतः। तैः पुरुषबहुत्वाभ्युपगमात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.15।।तितिक्षाफलं प्रत्यक्षमेवेत्याह  यं हीति।  एते मात्रास्पर्शाः प्राग्व्याख्यातरीत्या त्रिविधा अपि यं जाग्रति स्वप्नेऽसंप्रज्ञातसमाधौ वा न व्यथयन्ति स्वास्थ्यान्न प्रच्यावयन्ति। पुरुषं पूर्षु अष्टासु वसतीति पुरुषस्तम्। पुरश्चकर्मेन्द्रियाणि खलु पञ्च तथा पराणि ज्ञानेन्द्रियाणि मन आदि चतुष्टयं च। प्राणादिपञ्चकमथो वियदादिकं च कामश्च कर्म च तमः पुनरष्टमी पूः। इति प्रसिद्धाः। यद्वा स्थूलसूक्ष्मोपाधिमध्ये एव इतरासामन्तर्भावादत्र पूरिति तम एव ग्राह्यम्। तेन कारणोपाधेरप्यात्मनो विविक्तत्वं दर्शितम्। पुरुषर्षभेति त्वमप्येतदनुभवितुं योग्योऽसि सर्वपुरुषश्रेष्ठत्वादिति सूचयति। उपाधित्रयत्यागादेव समे दुःखसुखे यस्य तम्। नहि समाधिस्थस्य सुखाय दुःखाय वा शीतोष्णस्पर्शौ भवत इति युक्तमस्य समदुःखसुखत्वम्। धीरं ध्यायिनं योगिनं न व्यथयन्ति। सोऽमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते योग्यो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.15।।नन्वेतेषां सहनं किंफलकमित्याकाङ्क्षायामाह यं हि न व्यथयन्त्येत इति। हे पुरुषर्षभ पुरुषश्रेष्ठ स्वतन्त्रमोक्षसाधनकारणसमर्थ यं पुरुषं समदुःखसुखं समे दुःखसुखे वियोगसंयोगौ यस्य एतादृशं धीरं तत्सहनसमर्थमेते मात्रास्पर्शाः न व्यथयन्ति न पराभवन्ति स पुरुषः अमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते। यद्वा मोक्षभावाय भक्त्यर्थं कल्पते योग्यो भवति। भक्तिप्राप्तियोग्यो भवतीत्यर्थः। समदुःखत्वेन तदिच्छया सर्वमानन्दरूपमेवाभाति इति व्यञ्जितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.15।।   तत्प्रतीकारप्रयत्नादपि तत्सहनमेवोचितं महाफलत्वादित्याह  यमिति।  एते मात्रास्पर्शाः यं पुरुषं न व्यथयन्ति नाभिभवन्ति। समे सुख दुःखे यस्य तम्। स तैरविक्षिप्यमाणो धर्मज्ञानद्वारा अमृतत्वाय मोक्षाय कल्पते योग्यो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.15।।सहनमेवाऽमृतत्वे हेतुरित्याह यं हीति। न व्यथयन्ति धीरं सोऽमृतत्वाय क्षमो भवति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.15।।शीतउष्णादि सहन करनेवालेको क्या ( लाभ ) होता है सो सुन सुखदुःखको समान समझनेवाले अर्थात् जिसकी दृष्टिमें सुखदुःख समान हैं सुखदुःखकी प्राप्तिमें जो हर्षविषादसे रहित रहता है ऐसे जिस धीर बुद्धिमान् पुरुषको ये उपर्युक्त शीतोष्णादि व्यथा नहीं पहँचा सकते अर्थात् नित्य आत्मदर्शनसे विचलित नहीं कर सकते। वह नित्य आत्मदर्शननिष्ठ और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेवाला पुरुष मृत्युसे अतीत हो जानेके लिये यानी मोक्षके लिये समर्थ होता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.15।। व्याख्या  पुरुषर्षभ   मनुष्य प्रायः परिस्थितियोंको बदलनेका ही विचार करता है  जो कभी बदली नहीं जा सकतीं और जिनको बदलना सम्भव ही नहीं। युद्धरूपी परिस्थितिके प्राप्त होनेपर अर्जुनने उसको बदलनेका विचार न करके अपने कल्याणका विचार कर लिया है। यह कल्याणका विचार करना ही मनुष्योंमें उनकी श्रेष्ठता है। समदुःखसुखं धीरम्   धीर मनुष्य सुखदुःखमें सम होता है। अन्तःकरणकी वृत्तिसे ही सुख और दुःख ये दोनों अलगअलग दीखते हैं। सुखदुःखके भोगनेमें पुरुष (चेतन) हेतु है और वह हेतु बनता है प्रकृतिमें स्थित होनेसे (गीता 13। 2021)। जब वह अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है तब सुखदुःखको भोगनेवाला कोई नहीं रहता। अतः अपनेआपमें स्थित होनेसे वह सुखदुःखमें स्वाभाविक ही सम हो जाता है। यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषम्   धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श अर्थात् प्रकृतिके मात्र पदार्थ व्यथा नहीं पहुँचाते। प्राकृत पदार्थोंके संयोगसे जो सुख होता है वह भी व्यथा है और उन पदार्थोंके वियोगसे जो दुःख होता है वह भी व्यथा है। परन्तु जिसकी दृष्टि समताकी तरफ है उसको ये प्राकृत पदार्थ सुखीदुःखी नहीं कर सकते। समताकी तरफ दृष्टि रहनेसे अनुकूलताको लेकर उस सुखका ज्ञान तो होता है पर उसका भोग न होनेसे अन्तःकरणमें उस सुखका स्थायी रूपसे संस्कार नहीं पड़ता। ऐसे ही प्रतिकूलता आनेपर उस दुःखका ज्ञान तो होता है पर उसका भोग न होनेसे अन्तःकरणमें उस दुःखका स्थायीरूपसे संस्कार नहीं पड़ता। इस प्रकार सुखदुःखके संस्कार न पड़नेसे वह व्यथित नहीं होता। तात्पर्य यह हुआ कि अन्तःकरणमें सुखदुःखका ज्ञान होनेसे वह स्वयं सुखीदुःखी नहीं होता। सोऽमृतत्वाय कल्पते   ऐसा धीर मनुष्य अमरताके योग्य हो जाता है अर्थात् उसमें अमरता प्राप्त करनेकी सामर्थ्य आ जाती है। सामर्थ्य योग्यता आनेपर वह अमर हो ही जाता है इसमें देरीका कोई काम नहीं। कारण कि उसकी अमरता तो स्वतःसिद्ध है। केवल पदार्थोंके संयोगवियोगसे जो अपनेमें विकार मानता था यही गलती थी।  विशेष बात यह मनुष्ययोनि सुखदुःख भोगनेके लिये नहीं मिली है प्रत्युत सुखदुःखसे ऊँचा उठकर महान् आनन्द परम शान्तिकी प्राप्तिके लिये मिली है जिस आनन्द सुखशान्तिके प्राप्त होनेके बाद और कुछ प्राप्त करना बाकी नहीं रहता (गीता 6। 22)। अगर अनुकूल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदिके होनेमें अथवा उनकी सम्भावनामें हम सुखी होंगे अर्थात् हमारे भीतर अनुकूल वस्तु व्यक्ति आदिको प्राप्त करनेकी कामना लोलुपता रहेगी तो हम अनुकूलताका सदुपयोग नहीं कर सकेंगे। अनुकूलताका सदुपयोग करनेकी सामर्थ्य शक्ति हमें प्राप्त नहीं हो सकेगी। कारण कि अनुकूलताका सदुपयोग करनेकी शक्ति अनुकूलताके भोगमें खर्च हो जायगी जिससे अनुकूलताका सदुपयोग नहीं होगा किन्तु भोग ही होगा। इसी रीतिसे प्रतिकूल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना क्रिया आदिके आनेपर अथवा उनकी आशंकासे हम दुःखी होंगे तो प्रतिकूलताका सदुपयोग नहीं होगा किन्तु भोग ही होगा। दुःखको सहनेकी सामर्थ्य हमारेमें नहीं रहेगी। अतः हम प्रतिकूलताके भोगमें ही फँसे रहेंगे और दुःखी होते रहेंगे।अगर अनुकूल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना आदिके प्राप्त होनेपर सुखसामग्रीका अपने सुख आराम सुविधाके लिये उपयोग करेंगे और उससे राजी होंगे तो यह अनुकूलताका भोग हुआ। परन्तु निर्वाहबुद्धिसे उपयोग करते हुए उस सुखसामग्रीको अभावग्रस्तोंकी सेवामें लगा दें तो यह अनुकूलताका सदुपयोग हुआ। अतः सुखसामग्री को दुःखियोंकी ही समझें। उसमें दुःखियोंका ही हक है। मान लो कि हम लखपति हैं तो हमें लखपति होनेका सुख होता है अभिमान होता है। परन्तु यह सब तब होता है जब हमारे सामने कोई लखपति न हो। अगर हमारे सामने हमारे देखनेसुननेमें जो आते हैं वे सबकेसब करोड़पति हों तो क्या हमें लखपति होनेका सुख मिलेगा बिलकुल नहीं मिलेगा। अतः हमें लखपति होनेका सुख तो अभावग्रस्तोंने दरिद्रोंने ही दिया है। अगर हम मिली हुई सुखसामग्रीसे अभावग्रस्तोंकी सेवा न करके स्वयं सुख भोगते हैं तो हम कृतघ्न होते हैं। इसीसे सब अनर्थ पैदा होते हैं। कारण कि हमारे पास जो सुखसामग्री है वह दुःखी आदमियोंकी ही दी हुई है। अतः उस सुखसामग्रीको दुःखियोंकी सेवामें लगा देना हमारा कर्तव्य होता है।अब विचार यह करना है कि प्रतिकूलताका सदुपयोग कैसे किया जाय दुःखका कारण सुखकी इच्छा आशा ही है। प्रतिकूल परिस्थिति दुःखदायी तभी होती है जब भीतर सुखकी इच्छा रहती है। अगर हम सावधानीके साथ अनुकूलताकी इच्छाका सुखकी आशाका त्याग कर दें तो फिर हमें प्रतिकूल परिस्थितिमें दुःख नहीं हो सकता अर्थात् हमें प्रतिकूल परिस्थिति दुःखी नहीं कर सकती। जैसे रोगीको कड़वीसेकड़वी दवाई लेनी पड़े तो भी उसे दुःख नहीं होता प्रत्युत इस बातको लेकर प्रसन्नता होती है कि इस दवाईसे मेरा रोग नष्ट हो रहा है। ऐसे ही पैरमें काँटा गहरा गड़ जाय और काँटा निकालनेवाला उसे निकालनेके लिये सुईसे गहरा घाव बनाये तो बड़ी पीड़ा होती है। उस पीड़ासे वह सिसकता है घबराता है पर वह काँटा निकालनेवालेको यह कभी नहीं कहता कि भाई तुम छोड़ दो काँटा मत निकालो। काँटा निकल जायगा सदाके लिये पीड़ा दूर हो जायगी इस बातको लेकर वह इस पीड़ाको प्रसन्नतापूर्वक सह लेता है। यह जो सुखकी इच्छाका त्याग करके दुःखको पीड़ाको प्रसन्नतापूर्वक सहना है यह प्रतिकूलताका सदुपयोग है। अगर वह कड़वी दवाई लेनेसे काँटा निकालनेकी पीड़ासे दुःखी हो जाता है तो यह प्रतिकूलताका भोग है जिससे उसको भयंकर दुःख पाना पड़ेगा।यदि हम सुखदुःखका उपभोग करते रहेंगे तो भविष्यमें हमें भोगयोनियोंमें अर्थात् स्वर्ग नरक आदिमें जाना ही पड़ेगा। कारण कि सुखदुःख भोगनेके स्थान ये स्वर्ग नरक आदि ही हैं। यदि हम सुखदुःखका भोग करते हैं सुखदुःखमें सम नहीं रहते सुखदुःखसे ऊँचे नहीं उठते तो हम मुक्तिके पात्र कैसे होंगे नहीं हो सकते।चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि ये सांसारिक पदार्थ आदि अनुकूलताप्रतिकूलताके द्वारा सुखदुःख देनेवाले और आनेजानेवाले हैं सदा रहनेवाले नहीं हैं क्योंकि ये अनित्य हैं क्षणभङ्गुर हैं। इनके प्राप्त होनेपर उसी क्षण इनका नष्ट होना शुरू हो जाता है। इनका संयोग होते ही इनसे वियोग होना शुरू हो जाता है। ये पहले नहीं थे पीछे नहीं रहेंगे और वर्तमानमें भी प्रतिक्षण अभावमें जा रहे हैं। इनको भोगकर हम केवल अपना स्वभाव बिगाड़ रहे हैं सुखदुःखके भोगी बनते जा रहे हैं। सुखदुःखके भोगी बनकर हम भोगयोनिके ही पात्र बनते जा रहे हैं फिर हमें मुक्ति कैसे मिलेगी हमें भुक्ति(भोग) की ही रुचि है तो फिर भगवान् हमें मुक्ति कैसे देंगे इस प्रकार यदि हम सुखदुःखका उपभोग न करके उनका सदुपयोग करेंगे तो हम सुखदुःखसे ऊँचे उठ जायेंगे और महान् आनन्दका अनुभव कर लेंगे। सम्बन्ध   अबतक देहदेहीका जो विवेचन हुआ है उसीको भगवान् दूसरे शब्दोंसे आगेके तीन श्लोकोंमें कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.15।।मात्रेति। अधीरास्तु मात्राशब्दवाच्यैरर्थैर्ये (S वाच्यैरर्था ये) कृताः स्पर्शा इन्द्रियद्वारेणात्मनः (K णात्मना) सम्बन्धाः तत्कृता याः शीतोष्णसुखदुःखाद्यवस्था अनित्याः तास्वपि शोचन्ति न त्वेवं धीरा इत्याह। अथवा मात्राभिरिन्द्रियैरेषां स्पर्शा न तु साक्षात् परमात्मना ( N परमात्मनः)। आगमः उत्पत्तिः अपायः विनाशः एतद्युक्तांस्तितिक्षस्व ( एतद्युक्तम्) सहस्व।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.15।।अधिकारिविशेषणं तितिक्षुत्वं नोपयुक्तं केवलस्य तस्य पुमर्थाहेतुत्वादिति शङ्कते  शीतेति।  विवेकवैराग्यादिसहितं तन्मोक्षहेतुज्ञानद्वारा तदर्थमिति परिहरति  श्रृण्विति।  तितिक्षमाणस्य विवक्षितं लाभमुपलम्भयति  यं हीति।  हर्षविषादरहितमित्यत्र शमादिसाधनसंपन्नत्वमुच्यते  धीमन्तमिति।  नित्यानित्यविवेकभागित्वमेतच्चोभयं वैराग्यादेरुपलक्षणम्। नित्यात्मदर्शनं त्वमर्थज्ञानं साधनचतुष्टयवन्तमधिकारिणमनूद्य त्वंपदार्थज्ञानवतस्तस्य मोक्षौपयिकवाक्यार्थज्ञानयोग्यतामाह  स नित्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.15।।अतो मात्रास्पर्शानां विफलीकरणतो भवत्प्रयोजनमाह  अत  इति। दुःखाभावस्य युद्धाकरणेनैव सम्भवात्किं तत्कृत्वा प्रसक्तदुःखाभावायाभिमानत्यागेनेत्येतदाशङ्कापरिहारायेति शेषः। पूर्वश्लोके तितिक्षस्वेतिपदं सहस्वेति कैश्चिद्व्याख्यातम् तदसत्। तदनुवादे विफलीकरणस्यैव प्रतीतेरिति भावेनाद्यपादं व्याख्याति  यमि ति। न व्यथयन्ति न चालयन्ति न शीतोष्णसुखदुःखलक्षणवैषम्यवन्तं कुर्वन्तीत्यर्थः। स्त्रीणामप्येवंविधानां मैत्रेयीप्रमुखानाममृतत्वश्रवणात्पुरुषमिति विशेषणमयुक्तमित्यतोऽन्यथा व्याचष्टे  पुरी ति शरीरसबन्धिनमेव सन्तं शरीरदर्शनवन्तमित्यर्थः। एतदपि किमर्थं विशेषणमित्यत आह  शरीरे ति। सुप्त्यादौ सर्वेषां प्राकृतानामप्यभिमानाभावेन व्यथाभावादमृतत्वप्रसक्तिरित्याशङ्कानिवृत्त्यर्थमित्यर्थः। ननु यस्य देहादावभिमानो नास्ति तस्य दुःखं सुखं च नास्तीत्युक्तं तस्य कथंसमदुःखसुखं धीरं इति विशेषणद्वयम् अस्य पूर्वकक्ष्यागतत्वादित्याशङ्क्य तदुपायप्रदर्शनार्थं पूर्वावस्थानुवादोऽयमिति क्रमेण पृच्छापूर्वकमाशयमाह  कथमि ति। येनाभिमानत्यागेन मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति स कथं केनोपायेन भवतीत्यर्थः। दुःखं यथानुपादेयमपुरुषार्थत्वात् तथा वैषयिकं सुखमप्यमृतत्वविरोधित्वादनुपादेयं यस्य स समदुःखसुखः। एवम्भावे च कथं सुखहेतुषु शोभनाध्यासलक्षणस्तद्विरोधिषु द्वेषलक्षणोऽभिमान स्यादिति भावः। तत्समदुःखसुखत्वमेव  कथं  केनोपायेन भवतीत्यर्थः  धैर्येणे ति सुखे दुःखे च प्राप्ते सति तत्कार्ययोरुत्सेकविषादयोः स्तम्भकेन प्रयत्नेनेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.15।।अतः प्रयोजनमाह यं हीति। यमेते मात्रास्पर्शा न व्यथयन्ति। पुरिशयमेव सन्तं शरीरसम्बधाभावे सर्वेषां व्यथाभावात्पुरुषमिति विशेषणम्। कथं न व्यथयन्ति समदुःखसुखत्वात् तत्कथं धैर्येण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.15।। यं पुरुषं  धैर्ययुक्तम् अवर्जनीयदुःखं सुखवन्मन्यमानम् अमृतत्वसाधनतया स्ववर्णोचितं युद्धादिकर्म अनभिसंहितफलं कुर्वाणं तदन्तर्गताः शस्त्रपातादिमृढुक्रूरस्पर्शा  न व्यथयन्ति  स एव अमृतत्वं साधयति न त्वादृशो दुःखासहिष्णुः इत्यर्थः। अतः आत्मनां नित्यत्वाद् एतावद् अत्र कर्तव्यम् इत्यर्थः।यत्तु आत्मनां नित्यत्वं देहानां स्वाभाविकं नाशित्वं च शोकानिमित्तिम् उक्तम्गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः (गीता 2।11) इति तद् उपपादयितुम् आरभते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.15।।

 यं हि पुरुषं  समे दुःखसुखे यस्य तं  समदुःखसुखं  सुखदुःखप्राप्तौ हर्षविषादरहितं धीरं धीमन्तं  न व्यथयन्ति  न चालयन्ति नित्यात्मदर्शनाद् एते यथोक्ताः शीतोष्णादयः  स  नित्यात्मस्वरूपदर्शननिष्ठो द्वन्द्वसहिष्णुः  अमृतत्वाय  अमृतभावाय मोक्षायेत्यर्थः  कल्पते  समर्थो भवति।। इतश्च शोकमोहौ अकृत्वा शीतोष्णादिसहनं युक्तं यस्मात्

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【 Verse 2.16 】

▸ Sanskrit Sloka: नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत: | उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्वदर्शिभि: ||

▸ Transliteration: nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ | ubhayorapi dṛṣṭontas tv anayos tattva-darśibhiḥ ||

▸ Glossary: na: never; asataḥ: of the nonexistent; vidyate: there is; bhāvaḥ: existence; na: never; abhāvaḥ: non existence; vidyate: there is; sataḥ: of the eternal; ubhayoḥ: of the two; api: verily; dṛṣṭaḥ: observed; antaḥ: essence; tu: but; anayoḥ: of them; tattvadarśibhiḥ: truth by the seers

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.16 The nonexistent (asat) has no being; that which exists (sat) never ceases to exist. This truth about both is perceived by the Seers of Truth.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.16।।(टिप्पणी प0 55) असत्का तो भाव (सत्ता) विद्यमान नहीं है और सत्का अभाव विद्यमान नहीं है तत्त्वदर्शी महापुरुषोंने इन दोनोंका ही अन्त अर्थात् तत्त्व देखा है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.16।। असत् वस्तु का तो अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। इस प्रकार इन दोनों का ही तत्त्व? तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुषों के द्वारा देखा गया है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.16 न not? असतः of the unreal? विद्यते is? भावः being? न not? अभावः nonbeing? विद्यते is? सतः of the real? उभयोः of the two? अपि also? दृष्टः (has been) seen? अन्तः the final truth? तु indeed? अनयोः of these? तत्त्वदर्शिभिः by the knowers of the Truth.Commentary -- The changeless? homogeneous Atman or the Self always exists. It is the only solid Reality. This phenomenal world of names and forms is ever changing. Hence it is unreal. The sage or the Jivanmukta is fully aware that the Self always exists and that this world is like a mirage. Through his Jnanachakshus or the eye of intuition? he directly cognises the Self. This world vanishes for him like the snake in the rope? after it has been seen that only the rope exists. He rejects the names and forms and takes the underlying Essence in all the names and forms? viz.? AstiBhatiPriya or Satchidananda or ExistenceKnowledgeBliss Absolute. Hence he is a Tattvadarshi or a knower of the Truth or the Essence.What is changing must be unreal. What is constant or permanent must be real.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.16. Birth (or existence) does not happen to what is non-existent, and destruction (or non-existence) to what is existent; the finality of these two has been seen by the seers of the reality.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.16 That which is not, shall never be; that which is, shall never cease to be. To the wise, these truths are self-evident.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.16 The unreal can never come into being, the real never ceases to be. The conclusion about these two is seen by the seers of truth.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.16 Of the unreal there is no being; the real has no nonexistence. But the nature of both these, indeed, has been realized by the seers of Truth.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.16 The unreal hath no being; there is non-being of the real; the truth about both has been seen by the knowers of the Truth (or the seers of the Essence).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.16 Nasatah etc. And then, also following the common worldly practice [the Lord] says this : There is no [real] existence for what is non-existent i.e., the body [etc.], that is continuously perishing; for it is changing incessantly by stages. Again, never there is destruction for the ever existing Supreme Self, because of Its unchanging nature. So says the Veda too :

'Lo ! This Soul is of unchanging nature and [hence] is destructions' (the Br. U, IV, v. 14).

Of These two : of what is existent and what is non-existent. Finality : the point of boundary where they come to an end.

But is this permanent or transient which is perceived by persons who are prone to see the truth ? Having raised this doubt, [the Lord] says :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.16 'The unreal,' that is, the body, can never come into being. 'The real,' that is, the self, can never cease to be. The finale about these, the body and the self, which can be experienced, has been realised correctly by the seers of the Truth. As analyis ends in conclusion, the term 'finale' is here used. The meaning is this: Non-existence (i.e., perishableness) is the real nature of the body which is in itself insentient. Existence (i.e., imperishableness) is the real nature of the self, which is sentient. [What follows is the justification of describing the body as 'unreal' and as having 'never come into being.']

Non-existence has, indeed, the nature of perishableness, and existence has the nature of imperishableness, as Bhagavan Parasara has said: 'O Brahmana, apart from conscious entity there does not exist any group of things anywhere and at any time. Thus have I taught you what is real existence - how conscious entity is real, and all else is unreal' (V. P., 2.12.43 - 45). 'The Supreme Reality is considered as imperishable by the wise. There is no doubt that what can be obtained from a perishable substance is also perishable' (Ibid., 2.14.24). 'That entity which even by a change in time cannot come to possess a difference through modification etc., is real. What is that entity, O King? (It is the self who retains Its knowledge)' (Ibid., 2.13.100).

It is said here also: 'These bodies ৷৷. are said to have an end' (2.18) and 'Know That (the Atman) to be indestructible' (2.17). It is seen from this that this (i.e., perishableness of the body and imperishableness of the self) is the reason for the designating the Atman as 'existence' (Sattva) and body as 'non-existence' (Asvattva). This verse has no

Chapter 2 (Part 10)

reference to the doctrine of Satkaryavada (i.e., the theory that effects are present in the cause), as such a theory has no relevance here. Arjuna is deluded about the true nature of the body and the self; so what ought to be taught to him in order to remove his delusion, is discrimination between these two - what is alified by perishablenss and what, by imperishableness. This (declaration) is introduced in the following way: 'For the dead, or for the living' (2.11).

Again this poin is made clear immediately (by the words), 'Know that to be indestructible ৷৷.' (2.17) and 'These bodies ৷৷. are said to have an end' (2.18).

How the imperishableness of the self is to be understood, Sri Krsna now teaches:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.16 Since 'the unreal has no being,' etc., for this reason also it is proper to bear cold, heat, etc. without becoming sorrowful or deluded. Asatah, of the unreal, of cold, heat, etc. together with their causes; na vidyate, there is no; bhavah, being, existence, reality; because heat, cold, etc. together with their causes are not substantially real when tested by means of proof. For they are changeful, and whatever is changeful is inconstant. As configurations like pot etc. are unreal since they are not perceived to be different from earth when tested by the eyes, so also are all changeful things unreal because they are not perceived to be different from their (material) causes, and also because they are not perceived before (their) origination and after destruction. Objection: If it be that [Here Ast. has the additional words 'karyasya ghatadeh, the effect, viz pot etc. (and)'.-Tr.] such (material) causes as earth etc. as also their causes are unreal since they are not perceived differently from their causes, in that case, may it not be urged that owing to the nonexistence of those (causes) there will arise the contingency of everything becoming unreal [An entity cannot be said to be unreal merely because it is non-different from its cause. Were it to be asserted as being unreal, then the cause also should be unreal, because there is no entity which is not subject to the law of cuase and effect.]? Vedantin: No, for in all cases there is the experience of two awarenesses, viz the awareness of reality, and the awareness of unreality. [In all cases of perception two awarenesses are involved: one is invariable, and the other is variable. Since the variable is imagined on the invariable, therefore it is proved that there is something which is the substratum of all imagination, and which is neither a cause nor an effect.] That in relation to which the awareness does not change is real; that in relation to which it changes is unreal. Thus, since the distinction between the real and the unreal is dependent on awareness, therefore in all cases (of empirical experiences) everyone has two kinds of awarenesses with regard to the same substratum: (As for instance, the experiences) 'The pot is real', 'The cloth is real', 'The elephant is real' (which experiences) are not like (that of) 'A blue lotus'. [In the empirical experience, 'A blue lotus', there are two awarenesses concerned with two entities, viz the substance (lotus) and the ality (blueness). In the case of the experience, 'The pot is real', etc. the awarenesses are not concerned with substratum and alities, but the awareness of pot,of cloth, etc. are superimposed on the awareness of 'reality', like that of 'water' in a mirage.] This is how it happens everywhere. [The coexistence of 'reality' and 'pot' etc. are valid only empirically according to the non-dualists; whereas the coexistence of 'blueness' and 'lotus' is real according to the dualists.] Of these two awareness, the awareness of pot etc. is inconstant; and thus has it been shown above. But the awareness of reality is not (inconstant). Therefore the object of the awareness of pot etc. is unreal because of inconstancy; but not so the object of the awareness of reality, because of its constancy. Objection: If it be argued that, since the awareness of pot also changes when the pot is destroyed, therefore the awareness of the pot's reality is also changeful? Vedantin: No, because in cloth etc. the awareness of reality is seen to persist. That awareness relates to the odjective (and not to the noun 'pot'). For this reason also it is not destroyed. [This last sentence has been cited in the f.n. of A.A.-Tr.] Objection: If it be argued that like the awareness of reality, the awareness of a pot also persists in other pots? Vedantin: No, because that (awareness of pot) is not present in (the awareness of) a cloth etc. Objection: May it not be that even the awareness of reality is not present in relation to a pot that has been destroyed? Vedantin: No, because the noun is absent (there). Since the awareness of reality corresponds to the adjective (i.e. it is used adjectivelly), therefore, when the noun is missing there is no possibility of its (that awareness) being an adjective. So, to what should it relate? But, again, the awareness of reality (does not cease) with the absence of an object৷৷ [Even when a pot is absent and the awareness of reality does not arise with regare to it, the awareness of reality persists in the region where the pot had existed. Some read nanu in place of na tu ('But, again'). In that case, the first portion (No,৷৷.since৷৷.adjective. So,৷৷.relate?) is a statement of the Vedantin, and the Objection starts from nanu punah sadbuddheh, etc. so, the next Objection will run thus: 'May it not be said that, when nouns like pot etc. are absent, the awareness of existence has no noun to alify, and therefore it becomes impossible for it (the awareness of existence) to exist in the same substratum?'-Tr.] Objection: May it not be said that, when nouns like pot etc. are absent, (the awareness of existence has no noun to alify and therefore) it becomes impossible for it to exist in the same substratum? [The relationship of an adjective and a noun is seen between two real entities. Therefore, if the relationship between 'pot' and 'reality' be the same as between a noun and an adjective, then both of them will be real entities. So, the coexistence of reality with a non-pot does not stand to reason.] Vedantin: No, because in such experiences as, 'This water exists', (which arises on seeing a mirage etc.) it is observed that there is a coexistence of two objects though one of them is non-existent. Therefore, asatah, of the unreal, viz body etc. and the dualities (heat, cold, etc.), together with their causes; na vidyate, there is no; bhavah, being. And similarly, satah, of the real, of the Self; na vidyate, there is no; abhavah, nonexistence, because It is constant everywhere. This is what we have said. Tu, but; antah, the nature, the conclusion (regarding the nature of the real and the unreal) that the Real is verily real, and the unreal is verily unreal; ubhayoh api, of both these indeed, of the Self and the non-Self, of the Real and the unreal, as explained above; drstah, has been realized thus; tattva-darsibhih, by the seers of Truth. Tat is a pronoun (Sarvanama, lit. name of all) which can be used with regard to all. And all is Brahman. And Its name is tat. The abstraction of tat is tattva, the true nature of Brahman. Those who are apt to realize this are tattva-darsinah, seers of Truth. Therefore, you too, by adopting the vision of the men of realization and giving up sorrow and delusion, forbear the dualities, heat, cold, etc. some of which are definite in their nature, and others inconstant , mentally being convinced that this (phenomenal world) is changeful, verily unreal and appears falsely like water in a mirage. This is the idea. What, again, is that reality which remains verily as the Real and surely for ever? This is being answered in, 'But know That', etc.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.16।। वेदान्त शास्त्र में सत् असत् का विवेक अत्यन्त वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है। हमारे दर्शनशास्त्र में इन दोनों की ही परिभाषायें दी हुई हैं। असत् वस्तु वह है जिसकी भूतकाल में सत्ता नहीं थी और भविष्य में भी वह नहीं होगी परन्तु वर्तमान में उसका अस्तित्व प्रतीतसा होता है। माण्डूक्य कारिका की भाषा में जिसका अस्तित्व प्रारम्भ और अन्त में नहीं है वह वर्तमान में भी असत् ही है हमें दिखाई देने वाली वस्तुयें मिथ्या होने पर भी उन्हें सत् माना जाता है।स्वाभाविक ही सत्य वस्तु वह है जो भूतवर्तमान भविष्य इन तीनों कालों में भी नित्य अविकारी रूप में रहती है। सामान्य व्यवहार में यदि कोई व्यक्ति किसी स्तम्भ को भूत समझ लेता है तो स्तम्भ की दृष्टि से भूत को असत् कहा जायेगा क्योंकि भूत अनित्य है और स्तम्भ का ज्ञान होने पर वहाँ रहता नहीं। इसी प्रकार स्वप्न से जागने पर स्वप्न के बच्चों के लिये हमें कोई चिन्ता नहीं होती क्योंकि जागने पर स्वप्न के मिथ्यात्व का हमें बोध होता है। प्रतीत होने पर भी स्वप्न मिथ्या है। अत तीनों काल में अबाधित वस्तु ही सत्य कहलाती है।शरीर मन और बुद्धि इन जड़ उपाधियों के साथ हमारा जीवन परिच्छिन्न है क्योंकि इनके द्वारा प्राप्त बाह्य विषय भावना और विचारों के अनुभव क्षणिक होते हैं। इन तीनों में ही नित्य परिवर्तन हो रहा है। एक अवस्था का नाश दूसरी अवस्था की उत्पत्ति है। परिभाषा के अनुसार ये सब असत् हैं।क्या इनके पीछे कोई सत्य वस्तु है इसमें कोई संदेह नहीं कि वस्तुओं में होने वाले परिवर्तनों के लिये किसी एक अविकारी अधिष्ठान आश्रय की आवश्यकता है। शरीर मन और बुद्धि के स्तर पर होने वाले असंख्य अनुभवों को एक सूत्र में धारण कर एक पूर्ण जीवन का अनुभव कराने के लिये निश्चय ही एक नित्य अपरिर्तनशील सत् वस्तु का अधिष्ठान आवश्यक है।मणियों को धारण करने वाले एक सूत्र के समान हममें कुछ है जो परिवर्तनों के मध्य रहते हुये विविध अनुभवों को एक साथ बांधकर रखता है। सूक्ष्म विचार करने पर यह ज्ञान होगा कि वह कुछ अपनी स्वयं की चैतन्य स्वरूप आत्मा है। असंख्य अनुभव जो प्रकाशित हुये उनमें से कोई अनुभव आत्मा नहीं है। जीवन जो कि अनुभवों की एक धारा है योग है इस चैतन्य के कारण ही सम्भव है। बाल्यावस्था युवावस्था और वृद्धावस्था में होने वाले अनुभवों को यह चैतन्य ही प्रकाशित करता है। अनुभव आते हैं और जाते हैं। जिस चैतन्य के कारण मैंने सबको जाना जिसके बिना मेरा कोई अस्तित्व नहीं है वह चैतन्य आत्मा जन्म और नाश से रहित नित्य सत्य वस्तु है।तत्त्वदर्शी पुरुष इन दोनों सत् और असत् आत्मा और अनात्मा के तत्त्व को पहचानते हैं। इन दोनों के रहस्यमय संयोग से यह विचित्र जगत् उत्पन्न होता है।फिर वह नित्य सद्वस्तु क्या है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.16।।शीतोष्णादेः प्रतीयमानत्वेऽपि बाध्यत्वेन मिथ्यात्वात् तद्विपर्ययेणात्मनः सत्यत्वाच्च शोकमोहावकृत्वा शीतोष्णादिसहनं युक्तमित्याह  नेति।  असतो विचारेण बाध्यत्वात्पूर्वमप्यविद्यमानस्य शीतादेः सकारणस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्निरुप्यमाणस्यापि भावः परमार्थसत्ता न विद्यते। एतेनासतः शून्यस्य नरविषाणतुल्यस्यास्तित्वप्रसङ्गभावादप्रसक्तप्रतिषेध इति प्रयुक्तम्। विमतं शीतादि अतात्त्विकमप्रामाणिकत्वात् शुक्तिरुप्यवत्। धर्मिग्राहकस्य प्रत्यक्षादेस्तात्त्विकप्रामाण्याबोधकत्वदर्शनात् तद्विषयस्य शीतादेरनिर्वाच्यस्यासतो भ्रान्तैर्लोकैः प्रत्यक्षादिभिरुपलभ्यमानत्वात् सत्त्वेन गृहीतस्य भावस्तात्त्विकत्वं नास्तीत्यर्थः। ननु क्वचित्प्रत्यक्षादेस्तात्त्विकप्रामाण्यावेदकत्वदर्शनात्तद्विषयस्य शीतादिद्वैतस्य दुर्निरुपर्त्वेनानिर्वचनीयत्वं न शक्यते वक्तुम्। वेदैकदेशस्य क्रियार्थत्वे ब्रह्मबोधकवेदस्यापि क्रियार्थत्वं यथा। यथावा श्रोत्रादीन्द्रियै रुपानुपलब्ध्या चक्षुषापि तन्नोपलभ्यत इतिचेन्न। शीतादिद्वैतस्य विकारस्यागमापायित्वेनासत्त्वनिर्धारणात्। तथाचायं प्रयोगः विमतमसत् आगमापायित्वाद्रज्जूरगवदिति। तथाचवाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् इत्यादिश्रुत्यापि विकारस्य मिथ्यात्वं बोधितम्। किंच कार्यं कारणान्न भिद्यते कुण्डलादिसंस्थानस्य चक्षुरादिनिरुप्यमाणस्य कनकादिव्यतिरेकेणानुपलब्धेः। ततश्चायं प्रयोगः विमतं न कारणाद्वस्तुतो भिन्नं कार्यत्वात् कुण्डलादिवदिति।आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा इति न्यायात् कार्यस्य जन्मप्रध्वंसाभ्यां प्रागूर्ध्वं चानुपलब्धेः कारणादव्यतिरेकाच्च। सर्वः शीतादिविकारोऽसत् कारणव्यतिरेकेणानुपलब्धेः कुण्डलादिवदिति सर्वस्यापि   कारणस्य स्वस्वकारणाध्वतिरेकेणानुपलभ्यमानस्य कार्यकारणपरम्पराभ्रमाधिष्ठाने कल्पितत्वं सिध्यति। ननु कार्यकारणविभागविहीनस्य वस्तुनोऽभावात्कार्यकारणपरम्पराया असत्त्वे सर्वाभावप्रसङ्ग इतिचेन्न। सर्वत्रानुवृत्तव्यावृत्तसदनद्वुद्धिद्वयोपलब्ध्यानुवृत्ते च व्यावृत्तानां कल्पित्वात् अकल्पितस्य सर्वभेदविकल्पाधिष्ठानस्याकार्यकारणस्य वस्तुनः सिद्धेः। तथाच यद्यद्य्वावृत्तेष्वनुवृत्तं तत्तत्परमार्थसत् यथा रजतादिधारास्वनुगतः शुक्त्यादेरिदमंशः विमतं सत् अव्यभिचारित्वादिदमंशवत् यद्य्वावृत्तं तन्मिथ्या यथा रजतादिधारा विमतं मिथ्या व्याभिचारित्वात् रजतादिधारावत् इत्यनुमानद्वयेन सतोऽकल्पितत्वमसतः कल्पितत्वं च सिद्धम्। ननु नेदमनुमानद्वयमुपपद्यते सर्वमिथ्यात्ववादिनो विभागाभावादनुमानादिव्यवहारानुपपत्तेरिति चेन्न सदसद्विभागस्य बुद्य्धायत्तत्वात् बुद्धिद्वयाधीने विभागे स्थिते सत्यनुमानादिव्यवहारोपपत्तेः। नन्वद्वैतवादिनस्तव बुद्धिद्वयाभावात्तदधीनः सदसद्विभागः कथं सेत्स्यतीति श्वेत् सर्वत्र व्यवहारदशायां कल्पितस्य सदसद्विभागस्य हेतुभूतबुद्धिद्वयस्य सर्वैरुपलभ्यमानत्वात्। नन्वेवमपि सतः सामान्यरुपतया विशेषाकाङ्क्षायां सामान्यविशेषरुपे द्वे वस्तुनी स्यातामितिचेन्न। सोऽयमित्यादि सामानाधिकरण्यवद्धटः सन्नित्यादिसामानाधिकरण्यस्यैकवस्तुनिष्ठत्वाद्वस्तुभेदे घटपटयोरिव तदयोगात्। ननूक्तसामानाधिकरण्यस्यैकवस्तुनिष्ठत्वं न वाच्यं नीलमुत्पलमितिवद्धर्मधर्मिविषयतया तस्य सुवचत्वादितिचेन्न। नीलोत्पलमिति सामानाधिकरण्यस्य धर्मधर्मिविषयस्य गौणत्वात्। तदपेक्षयानुवृत्ते व्यावृत्तं कल्पितमिति ऐक्यनिष्ठस्यैव मुख्यस्यौचित्यात्। तथाच सन् घटः सन् पटः सन्हस्ती सन्नश्चः सन् गोरित्येवं बुद्धिद्वयमुपलभ्यते ततोश्च बुद्य्धोर्घटादिबुद्धिर्व्यभिचरति घटादेर्विकारस्य व्यभिचारित्वं पूर्वं दर्शितं नतु सद्बुद्धिर्व्यभिचरति घटे नष्टेऽपि पटादौ तद्दर्शनात्। एतेन घटे नष्टे घटबुद्धौ व्यभिचरन्त्यां सद्बुद्धिरपि व्यभिचरतीति प्रत्युक्तम्। तस्माद्धटादिबुद्धिविषयोऽसत् व्यभिचारात् रज्जूरगवत् सद्बुद्धिविषयस्तु नासत् अव्यभिचारादिदमंशवत्। ननु यथा घटे विनष्टे सद्बुद्धिः पटादौ दृश्टते तथा घटबुद्धिरपि घटान्तर इतिचेन्न। घटबुद्धेः पटादावदर्शनात्। ननु नष्टे घटे सद्बुद्धिरपि तत्र न दृश्यत इति चेन्न। यतो घटादिनाशे व्यक्तिनाशे जातेरिव विशेष्यस्य विशेषणीभूतसत्ताभिव्यञ्जकस्याभावात् सद्बुद्धेरप्यदर्शनं नतु तस्या विषयस्य सत्ताया अभावाददर्शनम्। ननु द्वयोः सतोरेव नीलोत्पलयोर्विशेषविशेष्यत्वदर्शनात् सद्धटयोरपि विशेषणविशेष्यत्वाभ्युपगमे द्वयोः सत्त्वावश्यंभावाद्धटादिकल्पितत्वानुमानं सामानाधिकरण्यबुद्धिबाधितं घटादेः कल्पित्वाभ्युपगमे तस्याभावेन समानाधिकरणत्वस्यायुक्तत्वादिति चेन्न। यतः सामानाधिकरण्यबुद्धिः पदार्थद्वयभानमपेक्षते न द्वयोः सत्त्वम्। मरीच्यादावन्यतरस्याभावेऽपि सदिदमुदकमिति सामानाधिकरण्यदर्शनात्। तस्माद्देहादेः शीतोष्णादेर्द्वन्द्वस्य च सकारणस्य सत्त्वेन कल्पितस्य वस्तुतोऽसतो भावः परमार्थसत्ता न विद्यते। जन्मध्वंसाभ्यां प्रागूर्ध्वं च वस्त्वन्तरे देशान्तरे चानुपलब्धेः। तथा परमार्थसतः अविनाशिनोऽबाध्यस्यात्मनोऽतत्त्वविद्भिरज्ञातत्वादविद्यमानकल्पस्याभावोऽविद्यमानत्वं परमार्थतोऽसत्ता न संभवति सर्वत्राव्यभिचारात् त्रिविधपरिच्छेदशून्यत्वात्। इत्थं भाष्यकृद्भिः सदसतोः साध्यत्वं परिच्छिन्नापरिच्छिन्नत्वयोर्हेतुत्वं च बोधितम्। कैश्चित्तु परिच्छिन्नस्यासतः शीतादेः प्रपञ्चस्य भावः सत्ता पारमार्थिकत्वं स्वान्यूनसत्ताकतादृशपरिच्छेदशून्यत्वं न विद्यते सतः सर्वत्रानुस्यूतसन्मात्रस्याभावः परिच्छिन्नत्वं न विद्यते इति व्याख्यातम्। परिच्छिन्नत्वं च त्रिविधं तत्रात्यन्ताभावप्रतियोगित्वलक्षणं देशतः परिच्छिन्नत्वं ध्वंसप्रतियोगित्वलक्षणं कालतः परिच्छिन्नत्वं अन्योन्याभावप्रतियोगित्वलक्षणं वस्तुतः परिच्छिन्नत्वम्। नन्वात्मनोऽप्याकाशवत्क्वाप्यसमवेतत्वात्समवायसंबन्धेनात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं तस्मिन्नतिव्याप्तं आकाशादेश्च यावन्मूर्तसंयोगित्वनियमात्संयोगसंबन्धेन तस्मिन्नव्याप्तं च अमूर्तनिष्ठेतिविशेषणदाने त्वात्मन्यतिव्याप्तिस्तदवस्था सर्वसंबन्धित्वाभावविवक्षायां सर्वसंबन्धशून्ये परमात्मन्यतिव्याप्तिः। सर्वसंबन्धिन्यज्ञानेऽव्याप्तिश्च। ध्वंसप्रतियोगित्वमप्याकाशादावव्याप्तं तेषां परैर्नित्यत्वाभ्युपगमात् अन्योन्याभावप्रतियोगित्वं चात्मनि व्यभितारि तस्य जडनिष्ठान्योन्याभावप्रतियोगित्वादन्यथास्य जडत्वापत्तेरितिचेन्न। अत्यन्तभावेऽन्योन्याभावे च प्रतियोगिसमसत्ताकत्वविशेषणेनात्मन्यतिव्याप्तिवारणात् अज्ञानाकाशादौ स्वस्वसमानसत्ताकान्योन्याभावात्यन्ताभावप्रतियोगित्वसत्त्नेनाव्यप्त्यभवात्। अविद्याकाशादेर्व्यावहारिकस्य पारमार्थिकाभावपक्षे स्वान्यूनसत्ताकेतिविशेषणं देयम्। अतएव प्रातिभासिकरजतादेर्व्यावहारिकाभावप्रतियोगित्वेऽपि न साधनवैकल्यम्। ध्वंसप्रतियोगित्वं च नाकाशादावव्याप्तम्तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश संभूतः इति श्रुतिसिद्धत्वेन तस्यानुमतत्वात्।आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यः इत्यत्रात्मनिदर्शनत्वं तु स्वसमानकालीनसर्वगतत्वेनाभूतसंपल्वस्थायित्वेन चेति द्रष्टव्यम् इति तत्रोदाहृतव्याख्यासत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इति श्रुतौ ब्रह्मणोऽपरिच्छिन्नत्वबोधकस्यानन्तपदस्य पृथङ्निर्देशात् ब्रह्म सत्यमपरिच्छिन्नत्वात् जगदसत्यं परिच्छिन्नत्वादित्यनुमानद्वये हेतुत्वेनोभयोर्निर्देशादप्रसिद्धार्थकल्पनात्मकेन हेतुसाध्ययोरैक्यापत्तिरुपेण च दोषेण ग्रस्ता यदि भाष्यानुरोधेन योजयितुं शक्या तर्हि निर्दुष्टेति दिक्। ननु सर्वेषामेव कुतो न निर्णय इत्याशङ्क्य सर्वेषां तत्त्वदर्शित्वाभावात्तत्त्वदर्शिनां त्वस्त्येन निर्णय इत्याह  उभयोरिति।  उभयोरात्मानात्मनोः सदसतोरपि दृष्टोन्तः सत्सदैवासदसदेवेति निर्णयस्तत्त्व दर्शिभिर्ब्रह्मविद्भिः। तस्मात्त्वमपि तेषां दृष्टिमवलम्ब्य शोकमोहौ हित्वा शीतादींस्तितिक्षस्वेत्याशयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.16।।ननु भवतु पुरुषैकत्वं तथापि तस्य सत्यस्य जडद्रष्टृत्वरूपः सत्य एव संसारः। तथाच शीतोष्णादिसुखदुःखकारणे सति तद्भोगस्यावश्यकत्वात्सत्यस्य च ज्ञानाद्विनाशानुपपत्तेः कथं तितिक्षा कथं वा सोऽमृतत्वाय कल्पत इति चेत्। न। कृत्स्नस्यापि द्वैतप्रपञ्चस्यात्मनि कल्पितत्वेन तज्ज्ञानाद्विनाशोपपत्तेः। शुक्तौ कल्पितस्य रजतस्य शुक्तिज्ञानेन विनाशवत्। कथं पुनरात्मानात्मनोः प्रतीत्यविशेषे आत्मवदनात्मापि सत्यो न भवेत् अनात्मवदात्मापि मिथ्या न भवेत् उभयोस्तुल्ययोगक्षेमत्वादित्याशङ्क्य विशेषमाह भगवान्। यत्कालतो देशतो वस्तुतो वा परिच्छिन्नं तदसत् यथा घटादि जन्मविनाशशीलं प्राक्कालेन परकालेन च परिच्छिद्यते ध्वंसप्रागभावप्रतियोगित्वात् कादाचित्कं कालपरिच्छिन्नमित्युच्यते। एंव देशपरिच्छिन्नमपि तदेव मूर्तत्वेन सर्वदेशावृत्तित्वात्। कालपरिच्छिन्नस्य देशपरिच्छेदनियमेऽपि देशपरिच्छिन्नत्वेनाभ्युपगतस्य परमाण्वादेस्तार्किकैः कालपरिच्छेदानभ्युपगमाद्देशपरिच्छेदोऽपि पृथगुक्तः। सच किंचिद्देशवृत्तिरत्यन्ताभावः। एंव सजातीयभेदो विजातीयभेदः स्वगतभेदश्चेति त्रिविधो भेदो वस्तुपरिच्छेदः। तथा वृक्षस्य वृक्षान्तराच्छिलादेः पत्रपुष्पादेश्च भेदः। अथवा जीवेश्वरभेदो जीवजगद्भेदो जीवपरस्परभेद ईश्वरजगद्भेदो जगत्परस्परभेद इति पञ्चविधो वस्तुपरिच्छेदः। कालदेशापरिच्छिन्नस्याप्याकाशादेस्तार्किकैर्वस्तुपरिच्छेदाभ्युपगमात्पृथङ्निर्देशः। एवं सांख्यमतेऽपि योजनीयम्। एतादृशस्यासतः शीतोष्णादेः कृत्स्नस्यापि प्रपञ्चस्य भावः सत्ता पारमार्थिकत्वं स्वान्यूनसत्ताकतादृशपरिच्छेदशून्यत्वं न विद्यते न संभवति घटत्वाघटत्वयोरिव परिच्छिन्नत्वापरिच्छिन्नत्वयोरेकत्र विरोधात्। नहि दृश्यं किंचित्क्वचित्काले देशे वस्तुनि वा न निषिध्यते सर्वत्राननुगमात् नवा सद्वस्तु क्वचिद्देशे काले वस्तुनि वा निषिध्यते सर्वत्रानुगमात् तथाच सर्वत्रानुगते सद्वस्तुन्यननुगतं व्यभिचारि वस्तु कल्पितं रज्जुखण्ड इवानुगते व्यभिचारि सर्पधारादिकमिति भावः। ननु व्यभिचारिणः कल्पितत्वे सद्वस्त्वपि कल्पितं स्यात्तस्यापि तुच्छव्यावृत्तत्वेन व्यभिचारित्वादित्यत आह नाभावो विद्यते सत इति। सदधिकरणकभेदप्रतियोगित्वं हि वस्तुपरिच्छिन्नत्वं तच्च न तुच्छव्यावृत्तत्वेन। तुच्छे शशविषाणादौ सत्त्वायोगात्सदसद्भ्यामभावो निरूप्यते इति न्यायात्। एकस्यैव स्वप्रकाशस्य नित्यस्य विभोः सतः सर्वानुस्यूतत्वेन सद्व्यक्तिभेदानभ्युपगमात् घटः सन्नित्यादिप्रतीतेः सार्वंलौकिकत्वेन सतो घटाद्यधिकरणकभेदप्रतियोगित्वायोगात् अभावः परिच्छिन्नत्वं देशतः कालतो वस्तुतो वा सतः सर्वानुस्यूतसन्मात्रस्य न विद्यते न संभवति पूर्ववद्विरोधादित्यर्थः। ननु सन्नाम किमपि वस्तु नास्त्येव यस्य देशकालवस्तुपरिच्छेदः प्रतिषिध्यते। किं तर्हि सत्त्वं नाम परं सामान्यं यदाश्रयत्वेन द्रव्यगुणकर्मसु सद्व्यवहारः। तदेकाश्रयसंबन्धेन सामान्यविशेषसमवायेषु। तथाचासतः प्रागभावप्रतियोगिनो घटादेः सत्त्वं कारणव्यापारात् सतोऽपि तस्याभावः कारणनाशाद्भवत्येवेति कथमुक्तंनासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः इति एवं प्राप्ते परिहरति उभयोरपीत्यर्धेन। उभयोरपि सदसतोः सतश्चासतश्चान्तो मर्यादा नियतरूपत्वं यत्सत्तत्सदेव यदसत्तदसदेवेति दृष्टो निश्चितः श्रुतिस्मृतियुक्तिभिर्विचारपूर्वकम्। कैः तत्त्वदर्शिभिर्वस्तुयाथात्म्यदर्शनशीलैर्ब्रह्मविद्भिः नतु कुतार्किकैः। अतः कुतार्किकाणां न विपर्ययानुपपत्तिः। तुशब्दोऽवधारणे। एकान्तरूपो नियम एव दृष्टो नत्वनेकान्तरूपोऽन्यथाभाव इति तत्त्वदर्शिभिरेव दृष्टो नातत्त्वदर्शिभिरिति वा। तथाच श्रुतिःसदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम् इत्युपक्रम्यऐतदात्म्यमिदं सर्वं तत्सत्यं स आत्मा तत्त्वमसि श्वेतकेतो इत्युपसंहरन्ती सदेकं सजातीयविजातीयस्वगतभेदशून्यं सत्यं दर्शयतिवाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम् इत्यादिश्रुतिस्तु विकारमात्रस्य व्यभिचारिणो वाचारम्भणत्वेनानृतत्वं दर्शयतिअन्नेन सोम्य शुङ्गेनापोमूलमन्विच्छाद्भिः सोम्य शुङ्गेन तेजोमूलमन्विच्छ तेजसा सोम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ सन्मूलाः सोम्येमाः सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः इति श्रुतिः सर्वेषामपि विकाराणां सति कल्पितत्वं दर्शयति। सत्त्वं च न सामान्यं तत्र मानाभावात्। पदार्थमात्रसाधारण्यात्सत्सदिति प्रतीत्या द्रव्यगुणकर्ममात्रवृत्तिसत्त्वस्य स्वानुपपादकस्याकल्पनात् वैपरीत्यस्यापि सुवचत्वात् एकरूपप्रतीतेकरूपविषयनिर्वाह्यत्वेन संबन्धभेदस्य स्वरूपस्य च कल्पयितुमनुचितत्वात् विषयस्याननुगमेऽपि प्रतीत्यनुगमे जातिमात्रोच्छेदप्रसङ्गात्। तस्मादेकमेव सद्वस्तु स्वतः स्फुरणरूपं ज्ञाताज्ञातावस्थाभासकं स्वतादात्म्याध्यासेन सर्वत्र सद्व्यवहारोपपादकं सन्घट इति प्रतीत्या तावत्सद्ध्यक्तिमात्राभिन्नत्वं घटे विषयीकृतम् नतु सत्तासमवायित्वम्। अभेदप्रतीतेर्भेदघटितसंबन्धानिर्वाह्यत्वात्। एवं द्रव्यं सद्गुणः सन्नित्यादिप्रतीत्या सर्वाभिन्नत्वं सतः सिद्धम्। द्रव्यगुणभेदासिद्ध्या च न तेषु धर्मिषु सत्त्वं नाम धर्मः कल्प्यते किंतु सति धर्मिणि द्रव्याद्यभिन्नत्वं लाघवात् तच्च वास्तवं न संभवतीत्याध्यासिकमित्यन्यत्। तदुक्तं वार्तिककारैःसत्तातोऽपि न भेदः स्याद्द्रव्यत्वादेः कुतोऽन्यतः। एकाकारा हि संवित्तिः सद्द्रव्यं सद्गुणस्तथा।। इत्यादि। सत्तापि नासतो भेदिका तस्याप्रसिद्धेः। द्रव्यत्वादिकं तु सद्धर्मत्वान्न सतो भेदकमित्यर्थः। अतएव घटाद्भिन्नः पट इत्यादिप्रतीतिरपि न भेदसाधिका घटपटतद्भेदानां सद्भेदेनैक्यात्। एवं यत्रैव न भेदग्रहस्तत्रैव लब्धपदा सती सदभेदप्रतीतिर्विजयते तार्किकैः कालपदार्थस्य सर्वात्मकस्याभ्युपगमात्तेनैव सर्वव्यवहारोपपत्तौ तदतिरिक्तपदार्थकल्पने मानाभावात्तस्यैव सर्वानुस्यूतस्य सद्रूपेण स्फुरणरूपेण च सर्वतादात्म्येन प्रतीत्युपपत्तेः स्फुरणस्यापि सर्वानुस्यूतत्वेनैकत्वान्नित्यत्वं विस्तरेणाग्रिमश्लोके वक्ष्यते। तथाच यथा कस्मिंश्चिद्देशे काले वा घटस्य पटादेर्न देशान्तरे कालान्तरे वा घटत्वं एवं कस्मिंश्चिद्देशे काले वा घटस्यान्यत्राघटत्वं शक्रेणापि न शक्यते संपादयितुं पदार्थस्वभावभङ्गायोगात् एवं कस्मिंश्चिद्देशे काले वा सतो देशान्तरे कालान्तरे वा सत्त्वं कस्मिंश्चिद्देशे काले वा सतोऽन्यत्रासत्त्वं न शक्यते संपादयितुं युक्तिसामान्यात् अत उभयोर्नियतरूपत्वमेव द्रष्टव्यमित्यद्वैतसिद्धौ विस्तरः। अतः सदेव वस्तु मायाकल्पिताऽसन्निवृत्त्याऽमृतत्वाय कल्पते सन्मात्रदृष्ट्या च तितिक्षाप्युपपद्यत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.16।।ननु सुप्तिसमाध्यादौ त्यक्तोपाधेरात्मनः समदुःखसुखत्वेऽपि सोपाधिकदशायां तप्तायःपिण्डस्य दग्धृत्वमिव तस्य दुःखित्वं दुर्वारम्। उपाधिश्च मूलप्रकृतेर्व्यापिकाया मात्रारूप इति तत्सत्त्वे तु न निर्मूलोच्छेदमर्हत्यतः सोऽमृतत्वाय कल्पत इत्यनुपपन्नमित्याशङ्क्याह  नासत इति।  प्रमात्रादेरागमापायित्वेन कादाचित्कत्वात् रज्जूरगादिवत् असतः भावः सत्ता कालत्रयेऽपि नास्ति। अयमर्थः प्रमात्रादिर्मूलाज्ञानेन चिदात्मनि कल्पितः। मूलाज्ञानस्य चात्मज्ञानेन निवृत्तौ कारणाभावान्न पुनः प्रमात्राद्युद्भवोऽस्तीति निष्प्रत्यूहममृतत्वं ज्ञानात्सिध्यतीति। नन्वप्रतीतिमात्रात्प्रमात्रादेर्मिथ्यात्वोपगमे आत्मनोऽपि सुप्त्यादावप्रतीयमानत्वाविशेषान्मिथ्यात्वमस्तु। उभयोर्वा सत्यत्वमस्तु इत्याशङ्क्याह  नाभावो विद्यते सत इति।  सद्वस्तुनः अभावोऽसत्त्वं कदाचिदपि न विद्यते। सुषुप्त्यादावपि अनुभूतयोः सुखाज्ञानयोः सुखमहमस्वाप्सं न किञ्चिदवेदिषमिति उत्थाने परामर्शदर्शनात्। तदनुभवमन्तरेण तयोः परमार्शासंभवात्। अतः सतोऽसत्त्वं नास्ति। श्रुतिरपि सुप्तिकैवल्ययोः प्रमात्राद्यभावं दृशो नित्यत्वं चाह।यद्वै तन्न पश्यति पश्यन्वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वान्नतु तद्वितीयमस्ति ततोऽन्यद्विभक्तं यत्पश्येत् इति। यदि प्रमात्रादिः सत्यस्तर्हि सतोऽर्थस्य सुषुप्त्यादावदर्शनं सान्निध्याभावाद्वा द्रष्टुर्दृग्लोपाद्वा वक्तव्यम्। नाद्यः। आत्मनि दृष्टनष्टस्वभावस्यान्यत्र सद्भावकल्पनायोगात्। नान्त्यः। उदाहृतया श्रुत्यैव तन्निषेधात्। तस्मादुभयोरपि सत्यत्वेन मिथ्यात्वेन वा साम्यं दुर्वचम्। ननु सत आकाशादेः क्वचिदपि देशे काले चाभावो यद्यपि नास्ति तथापि सत एव परमाणोर्देशान्तरेऽभावोऽस्ति प्रागसतोऽपि घटादेर्भावश्च दृष्टः तत्कथमुच्यतेनासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत इत्याशङ्क्य विद्वदनुभवेन निरस्यति  उभयोरपीति।  अन्तो याथात्म्यम्। यथा स्वप्ने नभःकुम्भरज्जूरगादयो नित्यत्वानित्यत्वसत्यत्वासत्यत्वादिधर्मोपेततया निश्चिता अपि प्रबोधेन बाध्यन्ते तद्वज्जाग्रद्दृष्टा अपि ते तत्त्वज्ञानेन बाध्यन्ते। ननु जाग्रद्वासनावशात् स्वप्नगतनभ आदौ नित्यत्वादिनिश्चयो भ्रम इति चेत् अनादिकालप्रवृत्तप्राग्भवीयसंस्कारवशात् जाग्रन्नभ आदावपि स भ्रम एवेति तुल्यम्। ननु स्वरूपसदेव रजतादिकं शुक्त्यादावध्यस्यते नत्वसत् शशशृङ्गादिकम्। गगनादिकं तु त्वद्रीत्या स्वरूपेण असदपि कथमात्मन्यध्यस्यत इति चेन्न। अध्यासे हि पूर्वानुभवमात्रमपेक्षते नत्वनुभूतस्य स्वरूपेण सत्त्वमपि। दर्पणप्रतिबिम्बिते गगनेऽपि नैल्याध्यासदर्शनात्। न च गगने नैल्यं स्वरूपेण सत्यमस्ति अथचान्यत्राध्यस्यते। तस्मात् भ्रमपरम्परायाः संभवात्। स्वप्नद्रष्टृभिरिवास्माभिरदृष्टमपि सदसतोर्याथात्म्यं प्रबुद्धैर्द्रष्टुं शक्यमेव। तथा च श्रुतयःनेह नानास्ति किंचनअस्तीत्येवोपलब्धव्यःअतोऽन्यदार्तम् इत्याद्याः अनात्मनोऽसत्त्वं आत्मनश्च सत्त्वं प्रतिपादयन्ति। एवं सतो ज्ञानेनासतो बाधात्कैवल्यं सिध्यतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.16।।ननु दुःखादिसहनादेतद्देहनाश एव स्यात् देहनाशेन मोक्षस्तु नापेक्षित एव ततः किं दुःखसहनेनेत्याशङ्क्याह नासत इति। असतो लौकिकस्य भावोऽलौकिको न विद्यते सतः अलौकिकस्य भगवत्सत्तात्मकस्य नाभावो नाशो न विद्यते इत्यर्थः। अत्र निदर्शनं गोपिका एकास्त्वन्तर्गृहगताः द्वितीयास्तु भगवद्रासलीलागताः तदाहुः उभयोरपीति। तु शब्दः त्वद्दर्शननिवारणार्थः। अनयोरुभयोरपि तत्त्वदर्शिभिः भगवद्दर्शनयोग्यैर्भगवदीयैः अन्तो दृष्टः तत्फलं दृष्टमित्यर्थः। त्वमपि तथा चेदिच्छसि तदा सुखदुःखादि सहस्व नैतावता भगवद्योग्यदेहादिनाशो भविष्यतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.16।।ननु तथापि शीतोष्णादिकमतिदुःसहं कथं सोढव्यम् अत्यन्तं तत्सहने च कदाचिद्देहनाशस्यापि संभवादित्याशङ्क्य तत्त्वविचारतः सर्वं सोढुं शक्यमित्याशयेनाह  नेति।  असतः अनात्मधर्मत्वादविद्यमानस्य शीतोष्णादेरात्मनि भावः सत्ता न विद्यते। तथा सतः सत्स्वभावस्यात्मनोऽभावो विनाशो न विद्यते एवमुभयोः सदसतोरन्तो निर्णयो दृष्टः। कैः तत्त्वदर्शिभिर्वस्तुयाथात्म्यविद्भिः। एवंभूतविवेकेन सहस्वेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.16।।अस्तित्वरूपविकारं निराकुर्वन् अशोच्यतामाह नासत इति। उत्पत्यनन्तरभावित्वादस्तित्वविकारादिरिति भावः। यथा असद्वा इदमग्र आसीत्। ततो वै सदजायत तै.उ.2।7 इति श्रुतौ कथमसतः सज्जायेत छा.उ.6।2।2 इति तर्कविरोधादसद्वादो निराकृतस्तथाऽत्रापि भगवताऽसद्वादो निराक्रियते। असतः कालत्रयेऽप्यविद्यमानस्य खपुष्पादेर्भावः सत्ता न विद्यते। अथ च सतो विद्यमानस्य कालत्रयेऽपि सतोऽप्यात्मनः अभावो न। आत्मा नाऽभून्नास्ति न भविष्यतीत्यप्रतीतेः। असतो हि न सत्तेत्यतो देहादीनां सत्ताऽपि न वक्तुं शक्या विनाशित्वात्। असत्ताऽपि न वक्तुं शक्या उत्पत्तिमत्त्वात्। यतोऽसतो भावः उत्पत्तिर्नोपपद्यते इत्यतः सदसत्त्वं देहादिप्रपञ्चस्यास्य वाच्यं सदसद्भिन्नत्वे च सदसत्वानपायात्। अत एवोक्तम् छाया प्रत्याह्वयाभासा असन्तोऽप्यर्थकारिणः। एवं देहादयो भावा यच्छन्त्यामृत्युतो भयम् इति विनाशिस्वरूपत्वेऽपि अर्थकारित्वात्सत्वम्यथासतोदानयनाद्यभावात् इति भागवतवाक्यात्। सदसत्स्वरूपमप्रकृतिकार्यत्वादपि तथात्वमिति वयमवोचाम। इदमेवानित्यत्वं प्रागभावप्रतियोगित्वेन ध्वंसप्रतियोगित्वात्। नित्यत्वं चास्य प्रकृतिकारणभूतसच्चिदानन्दात्मकब्रह्मानन्यत्वदृशेत्यवधेयम्। यथोक्तं श्रीविष्णुपुराणे तदेतदक्षयं नित्यं जगन्मुनिवराखिलम् इत्यादिअक्षरात्मकमेतद्धि इति च। न च वेदस्तुतावसत्त्वमेवास्योपपादितमिति वाच्यम् ततो भेदेन सत्त्वनिराकरणात्। मीमांसकादिमतस्य निराकरणीयत्वेन कटाक्षितत्वमिति तत्रैवोक्तंव्यवहृतये विकल्प ईषित इत्यादि। यद्वा नासत इति। अत्रायं विचारः। सद्विविधं शुद्धमशुद्धं च शुद्धमात्मगतं अशुद्धमनात्मगतमिति। तथा च असत आत्मापेक्षया शुद्धसत्त्वरहितस्य जनस्य देहादेर्भावः शुद्धं सत्वमस्तित्वं न विद्यते किन्तु विकृतमस्थिरं च तथा सतः शुद्धास्तित्ववत आत्मनः अक्षरात्मैकाभिप्रायेणैकवचनम् तस्याभावोऽसत्वं शुद्धास्तित्वाभावो विकृतमस्तित्वं न विद्यते इति उभयोरनयोर्निर्णयस्तत्त्वदर्शिभिर्दृष्टः। एतेन वृद्धिविपरिणामावपि निराकृतौ।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.16।।इसलिये भी शोक और मोह न करके शीतोष्णादिको सहन करना उचित है जिससे कि वास्तवमें अविद्यमान शीतोष्णादिका और उनके कारणोंका भावहोनापन अर्थात् अस्तित्व है ही नहीं क्योंकि प्रमाणोंद्वारा निरूपण किये जानेपर शीतोष्णादि और उनके कारण कोई पदार्थ ही नहीं ठहरते क्योंकि वे शीतोष्णादि सब विकार हैं और विकार सदा बदलता रहता है। जैसे चक्षुद्वारा निरूपण किया जानेपर घटादिका आकार मिट्टीको छोड़कर और कुछ भी उपलब्ध नहीं होता इसलिये असत् है वैसे ही सभी विकार कारणके सिवा उपलब्ध न होनेसे असत् हैं। क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व और नाशके पश्चात् उन सबकी उपलब्धि नहीं है। पू0 मिट्टी आदि कारणकी और उसके भी कारणकी अपने कारणसे पृथक् उपलब्धि नहीं होनेसे उनका अभाव सिद्ध हुआ फिर इसी तरह उसका भी अभाव सिद्ध होनेसे सबके अभावका प्रसङ्ग आ जाता है। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि सर्वत्र सत्बुद्धि और असत्बुद्धि ऐसी दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। जिस पदार्थको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती नहीं वह पदार्थ सत् है और जिसको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती हो वह असत् है। इस प्रकार सत् और असत्का विभाग बुद्धिके अधीन है। सभी जगह समानाधिकरणमें ( एक ही अधिष्ठानमें ) सबको दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। नील कमलके सदृश नहीं किन्तु घड़ा है कपड़ा है हाथी है इस तरह सब जगह दोदो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं। उन दोनों बुद्धियोंसे घटादिको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती है यह पहले दिखलाया जा चुका है परंतु सत्बुद्धि बदलती नहीं। अतः घटादि बुद्धिका विषय ( घटादि ) असत् है क्योंकि उसमें व्यभिचार ( परिवर्तन ) होता है। परंतु सत्बुद्धिका विषय ( अस्तित्व ) असत् नहीं है क्योंकि उसमें व्यभिचार ( परिवर्तन ) नहीं होता। पू0 घटका नाश हो जानेपर घटविषयक बुद्धिके नष्ट होते ही सत् बुद्धि भी तो नष्ट हो जाती है। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि वस्त्रादि अन्य वस्तुओंमें भी सत्बुद्धि देखी जाती है। वह सत्बुद्धि केवल विशेषणको ही विषय करनेवाली है। पू0 सत्बुद्धिकी तरह घटबुद्धि भी तो दूसरे घटमें दीखती है। उ0 यह ठीक नहीं क्योंकि वस्त्रादिमें नहीं दीखती। पू0 घटका नाश हो जानेपर उसमें सत्बुद्धि भी तो नही दीखती। उ0 यह ठीक नहीं क्योंकि ( वहाँ ) घटरूप विशेष्यका अभाव है। सत्बुद्धि विशेषणको विषय करनेवाली है अतः जब घटरूप विशेष्यका अभाव हो गया तब बिना विशेष्यके विशेषणकी अनुपपत्ति होनसे वह ( सत्बुद्धि ) किसको विषय करे पर विषयका अभाव होनेसे सत्बुद्धिका अभाव नहीं होता। पू0 घटादि विशेष्यका अभाव होनेसे एकाधिकरणता ( दोनों बुद्धियोंका एक अधिष्ठानमें होना ) युक्तियुक्त नहीं होती। उ0 यह ठीक नहीं क्योंकि मृगतृष्णिकादिमें अधिष्ठानसे अतिरिक्त अन्य वस्तुका ( जलका ) अभाव है तो भी यह जल है ऐसी बुद्धि होनेसे समानाधिकरणता देखी जाती है। इसलिये असत् जो शरीरादि एवं शीतोष्णादि द्वन्द्व और उनके कारण हैं उनका किसीका भी भाव अस्तित्व नहीं है। वैसे ही सत् जो आत्मतत्व है उसका अभाव अर्थात् अविद्यमानता नहीं है क्योंकि वह सर्वत्र अटल है यह पहले कह आये हैं। इस प्रकार सत्आत्मा और असत्अनात्मा इन दोनोंका ही यह निर्णय तत्त्वदर्शियोंद्वारा देखा गया है अर्थात् प्रत्यक्ष किया जा चुका है कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है। तत् यह सर्वनाम है और सर्व ब्रह्म ही है। अतः उसका नाम तत् है उसके भावको अर्थात् ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपको तत्त्व कहते हैं उस तत्त्वको देखना जिनका स्वभाव है वै तत्त्वदर्शी हैं उनके द्वारा उपर्युक्त निर्णय देखा गया है। तू भी तत्त्वदर्शी पुरुषोंकी बुद्धिका आश्रय लेकर शोक और मोहको छोड़कर तथा नियत और अनियतरूप शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको इस प्रकार मनमें समझकर कि ये सब विकार है ये वास्तवमें न होते हुए ही मृगतृष्णाके जलकी भाँति मिथ्या प्रतीत हो रहे हैं ( इनको ) सहन कर। यह अभिप्राय है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.16।। व्याख्या    नासतो विद्यते भावः   शरीर उत्पत्तिके पहले भी नहीं था मरनेके बाद भी नहीं रहेगा और वर्तमानमें भी इसका क्षणप्रतिक्षण अभाव हो रहा है। तात्पर्य है कि यह शरीर भूत भविष्य और वर्तमान इन तीनों कालोंमें कभी भावरूपसे नहीं रहता। अतः यह असत् है। इसी तरहसे इस संसारका भी भाव नहीं है यह भी असत् है। यह शरीर तो संसारका एक छोटासानमूना है इसलिये शरीरके परिवर्तनसे संसारमात्रके परिवर्तनका अनुभव होता है कि इस संसारका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव होगा तथा वर्तमानमें भी अभाव हो रहा है।संसारमात्र कालरूपी अग्निमें लकड़ीकी तरह निरन्तर जल रहा है। लकड़ीके जलनेपर तो कोयला और राख बची रहती है पर संसारको कालरूपी अग्नि ऐसी विलक्षण रीतिसे जलाती है कि कोयला अथवा राख कुछ भी बाकी नहीं रहता। वह संसारका अभावहीअभाव कर देती है। इसलिये कहा गया है कि असत्की सत्ता नहीं है। नाभावो विद्यते सतः   जो सत् वस्तु है उसका अभाव नहीं होता अर्थात् जब देह उत्पन्न नहीं हुआ था तब भी देही था देह नष्ट होनेपर भी देही रहेगा और वर्तमानमें देहके परिवर्तनशील होनेपर भी देही उसमें ज्योंकात्यों ही रहता है। इसी रीतिसे जब संसार उत्पन्न नहीं हुआ था उस समय भी परमात्मतत्त्व था संसारका अभाव होनेपर भी परमात्मतत्त्व रहेगा और वर्तमानमें संसारके परिवर्तनशील होनेपर भी परमात्मतत्त्व उसमें ज्योंकात्यों ही है। मार्मिक बात  संसारको हम एक ही बार देख सकते हैं दूसरी बार नहीं। कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील है अतः एक क्षण पहले वस्तु जैसी थी दूसरे क्षणमें वह वैसी नहीं रहती जैसे सिनेमा देखते समय परदेपर दृश्य स्थिर दीखता है पर वास्तवमें उसमें प्रतिक्षण परिवर्तन होता रहता है। मशीनपर फिल्म तेजीसे घूमनेके कारण वह परिवर्तन इतनी तेजीसे होता है कि उसे हमारी आँखें नहीं पकड़ पातीं  (टिप्पणी प0 56.1) । इससे भी अधिक मार्मिक बात यह है कि वास्तवमें संसार एक बार भी नहीं दीखता। कारण कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि जिन करणोंसे हम संसारको देखते हैं अनुभव करते हैं वे करण भी संसारके ही हैं। अतः वास्तवमें संसारसे ही संसार दीखता है। जो शरीरसंसारसे सर्वथा सम्बन्धरहित है उस स्वरूपसे संसार कभी दीखता ही नहीं तात्पर्य यह है कि स्वरूपमें संसारकी प्रतीति नहीं है। संसारके सम्बन्धसे ही संसारकी प्रतीति होती है। इससे सिद्ध हुआ कि स्वरूपका संसारसे कोई सम्बन्ध है ही नहीं।दूसरी बात संसार (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि) की सहायताके बिना चेतनस्वरूप कुछ कर ही नहीं सकता। इससे सिद्ध हुआ कि मात्र क्रिया संसारमें ही है स्वरूपमें नहीं। स्वरूपका क्रियासे कोई सम्बन्ध है ही नहीं।संसारका स्वरूप है क्रिया और पदार्थ। जब स्वरूपका न तो क्रियासे और न पदार्थसे ही कोई सम्बन्ध है तब यह सिद्ध हो गया कि शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिसहित सम्पूर्ण संसारका अभाव है। केवल परमात्मतत्त्वका ही भाव (सत्ता) है जो निर्लिप्तरूपसे सबका प्रकाशक और आधार है। उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः   इन दोनोंके अर्थात् सत्असत् देहीदेहके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंने इनका तत्त्व देखा है इनका निचोड़ निकाला है कि केवल एक सत्तत्त्व ही विद्यमान है।असत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है और सत् वस्तुका तत्त्व भी सत् है अर्थात् दोनोंका तत्त्व एक सत् ही है दोनोंका तत्त्व भावरूपसे एक ही है। अतः सत् और असत् इन दोनोंके तत्त्वको जाननेवाले महापुरुषोंके द्वारा जाननेमें आनेवाला एक सत्तत्त्व ही है। असत्की जो सत्ता प्रतीत होती है वह सत्ता भी वास्तवमें सत्की ही है। सत्की सत्तासे ही असत् सत्तावान् प्रतीत होता है। इसी सत्को  परा प्रकृति  (गीता 7। 5)  क्षेत्रज्ञ  (गीता 13। 12)  पुरुष  (गीता 13। 19) और  अक्षर  (गीता 15। 16) कहा गया है तथा असत्को  अपरा प्रकृति क्षेत्र प्रकृति  और  क्षर  कहा गया है।अर्जुन भी शरीरोंको लेकर शोक कर रहे हैं कि युद्ध करनेसे ये सब मर जायँगे। इसपर भगवान् कहते हैं कि क्या युद्ध न करनेसे ये नहीं मरेंगे असत् तो मरेगा ही और निरन्तर मर ही रहा है। परन्तु इसमें जो सत्रूपसे है उसका कभी अभाव नहीं होगा। इसलिये शोक करना तुम्हारी बेसमझी ही है।ग्यारहवें श्लोकमें आया है कि जो मर गये हैं और जो जी रहे हैं उन दोनोंके लिये पण्डितजन शोक नहीं करते। बारहवेंतेरहवें श्लोकोंमें देहीकी नित्यताका वर्णन है उसमें  धीर  शब्द आया है। चौदहवेंपंद्रहवें श्लोकोंमें संसारकी अनित्यताका वर्णन आया है तो उसमें भी  धीर  शब्द आया है। ऐसे ही यहाँ (सोलहवें श्लोकमें) सत्असत्का विवेचन आया है तो इसमें  तत्त्वदर्शी   (टिप्पणी प0 56.2)  शब्द आया है। इन श्लोकोंमें  पण्डित धीर  और  तत्त्वदर्शी  पद देनेका तात्पर्य है कि जो विवेकी होते हैं समझदार होते हैं उनको शोक नहीं होता। अगर शोक होता है तो वे विवेकी नहीं हैं समझदार नहीं हैं। सम्बन्ध   सत् और असत् क्या है इसको आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.16।।ननु यत एवागमापायिनः सर्वे दशाविशेषास्तत एव शोच्यन्ते मैवम्। तथाहि कोऽयमागमो नाम उत्पत्तिरिति चेत् (S नामेति चेत्)। सापि का असत आत्मलाभः सा इति त्वसत्। असत्स्वभावता हि निःस्वभावता निरात्मता ( N omit निरात्मता) निरात्मा निःस्वभावः कथं सस्वभावीकर्तुं शक्यः अनीलं हि न नीलीकर्तुं शक्यम् स्वभावान्तरापत्तेर्दुष्टत्वात्। तथा च शास्त्रम् न हि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः इति।अथ सत एवात्मलाभ उत्पत्तिः तदा (S तदलब्ध जात्वप्यभावा ) लब्धात्मनोऽस्य जात्वप्यनभावान्नित्यतैव इति आगमे का शोच्यता एवमपायोऽति सतः असतो वा असत्तावदसदेव। सत्स्वभावस्यापि कथमसत्तास्वभावः द्वितीये क्षणेऽसौ असत्स्वभाव इति चेत् आद्येऽपि तथा स्यादिति न कश्चिद्भावः स्यात्। स्वभावस्यात्यागात्। अथ मुद्गरपातादिना (S K मुद्गरादिना) अस्य नाशः क्रियते। स यदि व्यतिरिक्तः भावस्य किं वृत्तम् न दृश्यते इति चेत्। मा नाम दर्शि भावः न त्वन्यथाभूतः पटावृत इव। अव्यतिरिक्तस्तु नासौ इत्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.16।।अधिकारिविशेषणे तितिक्षुत्वे हेत्वन्तरपरत्वेनोत्तरश्लोकमवतारयति  इतश्चेति।  इतःशब्दार्थमेव स्फुटयति  यस्मादिति।  यतः शीतादेः शोकादिहेतोरनात्मनो नास्ति वस्तुत्वं वस्तुनश्चात्मनो निर्विकारत्वेनैकरूपत्वमतो मुमुक्षोर्विशेषणं तितिक्षुत्वं युक्तमित्याह  नेत्यादिना।  कार्यस्यासत्त्वेऽपि कारणस्य सत्त्वे नात्यन्तासत्त्वासिद्धिरित्याशङ्क्य विशिनष्टि  सकारणस्येति।  नासत इत्युपादाय पुनर्नकारानुकर्षणमन्वयार्थम्। असतः शून्यस्यास्तित्वप्रसङ्गाभावादप्रसक्तप्रतिषेधप्रसक्तिरित्याशङ्क्याह  नहीति।  विमतमतात्त्विकमप्रामाणिकत्वाद्रज्जुसर्पवत् नहि धर्मिग्राहकस्य प्रत्यक्षादेस्तत्त्वावेदकं प्रामाण्यं कल्प्यते विषयस्य दुर्निरूपत्वादतोऽनिर्वाच्यं द्वैतमित्यर्थः। कथं पुनरध्यक्षादिविषयस्य शीतोष्णादिद्वैतस्य दुर्निरूपत्वेनानिर्वाच्यत्वं तत्राह  विकारो हीति।  ततश्च विमतं मिथ्या आगमापायित्वात्संप्रतिपन्नवदिति फलितमाह  विकारश्चेति।  वाचारम्भणश्रुतेर्द्वैतमिथ्यात्वेऽनुग्राहकत्वं दर्शयितुं चकारः। किञ्च कार्यं कारणाद्भिन्नमभिन्नं वेति विकल्प्याद्यं दूषयति  यथेति।  निरूप्यमाणमन्तर्बहिश्चेति शेषः। विमतं कारणान्न तत्त्वतो भिद्यते कार्यत्वाद्धटवदित्यर्थः। इतोऽपि कारणाद्भेदेन नास्ति कार्यम्आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा इति न्यायादित्याह  जन्मेति।  यदि कार्यं कारणादभिन्नं तदा तस्य भेदेनासत्त्वे पूर्वस्मादविषयः। तादात्म्येनावस्थानं तु न युक्तं तस्यापि कारणव्यतिरेकेणाभावात्। कार्यकारणविभागविधुरे वस्तुनि कार्यकारणपरम्पराया विभ्रमत्वादित्यभिप्रेत्याह  मृदादीति।  कार्यकारणविभागविहीनं वस्त्वेव नास्तीति मन्वानश्चोदयति  तदसत्त्व इति।  अनुवृत्तव्यावृत्तबुद्धिद्वयदर्शनादनुवृत्ते च व्यावृत्तानां कल्पितत्वादकल्पितं सर्वभेदकल्पनाधिष्ठानमकार्यकारणं वस्तु सिध्यतीति परिहरति  न सर्वत्रेति।  संप्रति सतो वस्तुत्वे प्रमाणमनुमानमुपन्यस्यति  यद्विषयेति।  यद्व्यावृत्तेष्वनुवृत्तं तत्सत् यथा सर्पधारादिष्वनुगतोरज्ज्वादेरिदमंशः। विमतं सत्यमव्यभिचारित्वात्संप्रतिपन्नवदित्यर्थः। व्यावृत्तस्य कल्पितत्वे प्रमाणमाह  यद्विषयेत्यादिना।  यद्व्यावृत्तं तन्मिथ्या यथा सर्पधारादि विमतं मिथ्या व्यभिचारित्वात्संप्रतिपन्नवदित्यर्थः इत्यनुमानद्वयमनुसृत्य सतोऽकल्पितत्वमसतश्च कल्पितत्वं स्थितमिति शेषः। ननु नेदमनुमानद्वयमुपपद्यते समस्तद्वैतवैतथ्यवादिनो विभागाभावादनुमानादिव्यवहारानुपपत्तेस्तत्राह  सदसदिति।  उक्ते विभागे बुद्धिद्वयाधीने स्थिते सत्यनुमानादिव्यवहारो निर्वहति प्रातिभासिकविभागेन वियोगात्परमार्थस्यैव तद्धेतुत्वे केवलव्यतिरेकाभावादित्यर्थः। कुतः सदसद्विभागस्य बुद्धिद्वयाधीनत्वं बुद्धिविभागस्यापि तत्राभावात्तत्राह  सर्वत्रेति।  व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। बुद्धिविभागस्यापि कल्पितस्यैव बोध्यविभागप्रतिभासहेतुतेति भावः। बुद्धिद्वयमनुरुध्य सदसद्विभागो सतः सामान्यरूपतया विशेषाकाङ्क्षायां सामान्यविशेषे द्वे वस्तुनी वस्तुभूते स्यातामिति चेत्तत्राह  समानाधिकरण इति।  पदयोः सामानाधिकरण्यं बुद्ध्योरुपचर्यते सोऽयमिति सामानाधिकरण्यवद्धटः सन्नित्यादि सामानाधिकरण्यमेकवस्तुनिष्ठं वस्तुभेदे घटपटयोरिव तदयोगादित्यर्थः। नीलमुत्पलमितिवद्धर्मधर्मिविषयतया सामानाधिकरण्यस्य सुवचत्वान्न वस्त्वैक्यविषयत्वमिति चेन्नेत्याह  न   नीलेति।  नहि सामान्यविशेषयोर्भेदेऽभेदे च तद्भावो भेदाभेदौ च विरुद्धावतो जातिव्यक्त्योः सामानाधिकरण्यं नीलोत्पलयोरिव न गौणं किंतु व्यावृत्तमनुवृत्ते कल्पितमित्येकनिष्ठमित्यर्थः। सामान्यविशेषयोरुक्तन्यायं गुणगुण्यादावतिदिशति  एवमिति।  तुल्यौ हि तत्रापि विकल्पदोषाविति भावः। सामानाधिकरण्यानुपपत्त्या द्वे

Chapter 2 (Part 11)

वस्तुनी सामान्यविशेषाविति पक्षं प्रतिक्षिप्य विशेषाएव वस्तूनीति पक्षं प्रतिक्षिपति  तयोरिति।  बुद्धिव्यभिचाराद्बोध्यव्यभिचारोऽपि कथं व्यावृत्तानां विशेषाणामवस्तुत्वमित्याशङ्क्याह  तथाचेति।  विकारो हि स इत्यादाविति शेषः। न चैकं वस्तु सामान्यविशेषात्मकमेकस्य द्वैरूप्यविरोधादित्यभिप्रेत्य सामान्यमेकमेव वस्तु तद्बुद्धेरव्यभिचाराद् बोधस्यापि सतस्तथात्वादित्याह  नत्विति।  व्यभिचरतीति पूर्वेण संबन्धः। विशेषाणां व्यभिचारित्वे सतश्चाव्यभिचारित्वे फलितमुपसंहरति  तस्मादिति।  असत्त्वं कल्पितत्वम्। तच्छब्दार्थमेव स्फोरयति  व्यभिचारादिति।  सद्बुद्धिविषयस्य सतोऽकल्पितत्वे तच्छब्दोपात्तमेव हेतुमाह  अव्यभिचारादिति।  सद्बुद्धिव्यभिचारद्वारा बोध्यस्यापि व्यभिचारात्तदव्यभिचारित्वहेतोरसिद्धिरिति शङ्कते  घटे विनष्ट इति।  सद्बुद्धेर्घटमात्रबुद्धिवद्धटविषयत्वाभावान्न घटनाशे व्यभिचारोऽस्तीति परिहरति  न   पटादाविति।  सद्बुद्धेरघटविषयत्वे निरालम्बनत्वायोगाद् विषयान्तरं वक्तव्यमित्याशङ्क्याह  विशेषणेति।  सतोऽकल्पितत्वहेतोरव्यभिचारित्वस्यासिद्धिमुद्धृत्य विशेषाणां कल्पितत्वहेतोर्व्यभिचारित्वस्यासिद्धिं शङ्कते  सदिति।  यथा सद्बुद्धिर्घटे नष्टे पटादौ दृष्टत्वादव्यभिचारिणी अव्यभिचारः सतो दर्शितस्तथा घटबुद्धिरपि घटे नष्टे घटान्तरे दृष्टेत्यव्यभिचाराद्धटे व्यभिचारासिद्धौ विशेषान्तरेष्वपि कल्पितत्वहेतोर्व्यभिचारो न सिध्यतीत्यर्थः। घटबुद्धेर्घटान्तरे दृष्टत्वेऽपि पटादावदृष्टत्वेन व्यभिचारात् पटादिविशेषेष्वपि व्यभिचारित्वसिद्धिरित्युत्तरमाह  पटादाविति।  विशेषाणामेवं व्यभिचारित्वे सतोऽपि तदुपपत्तेरव्यभिचारित्वहेतुसिद्धितादवस्थ्यमिति शङ्कते  सद्बुद्धिरिति।  घटादिनाशदेशे तदुपरक्ताकारेण सत्त्वाभानेऽपि नासत्त्वं घटाद्यभावाधिष्ठानतया भानादित्याह  न विशेष्येति।  यथा सर्वगता जातिरित्यत्र खण्डमुण्डादिव्यक्त्यभावदेशे गोत्वं व्यञ्जकाभावान्न व्यज्यते न गोत्वाभावात् तथा सत्त्वमपि घटादिनाशे व्यञ्जकाभावान्न भाति न स्वरूपाभावादित्युक्तमेव प्रपञ्चयति  सदित्यादिना।  सप्रतियोगिकविशेषणत्वव्यभिचारेऽपि स्वरूपाव्यभिचाराद्युक्तं सतः सत्त्वमिति भावः। द्वयोः सतोरेव विशेषणविशेष्यत्वदर्शनाद्धटसतोरपि विशेषणविशेष्यत्वे द्वयोः सत्त्वध्रौव्याद्धटादिविकल्पितत्वानुमानं सामानाधिकरण्यधीबाधितमिति चोदयति  एकेति।  अनुभवमनुसृत्य बाधितविषयत्वमुक्तानुमानस्य निरस्यति  नेत्यादिना।  घटादेः सति कल्पितत्वानुमानस्य दोषराहित्ये फलितमुपसंहरति  तस्मादिति।  प्रथमपादव्याख्यानपरिसमाप्तावितिशब्दः। ननु नेदं व्याख्यानं भाष्यकाराभिप्रेतं सर्वद्वैतशून्यत्वविवक्षायां शास्त्रतद्भाष्यविरोधात्केनापि पुनर्दुर्विदग्धेन स्वमनीषिकयोत्प्रेक्षितमेतदिति चेत् मैवम् किमिदं द्वैतप्रपञ्चस्य शून्यत्वं किं तुच्छत्वं किं सद्विलक्षणत्वं नाद्योऽनभ्युपगमात् द्वितीयानभ्युपगमे तु तवैव शास्त्रविरोधो भाष्यविरोधश्च सर्वं हि शास्त्रं तद्भाष्यं च द्वैतस्य सत्यत्वानधिकरणत्वसाधनेनाद्वैतसत्यत्वे पर्यवसितमिति त्रैविद्यवृद्धैस्तत्र तत्र प्रतिष्ठापितं तथा च प्रक्षेपाशङ्कासंप्रदायपरिचयाभावादिति द्रष्टव्यम्। अनात्मजातस्य कल्पितत्वेनावस्तुत्वप्रतिपादनपरतया प्रथमपादं व्याख्याय द्वितीयपादमात्मनः सर्वकल्पनाधिष्ठानस्याकल्पितत्वेन वस्तुत्वप्रसाधनपरतया व्याकरोति   तथेति।  नन्वात्मनः सदात्मनो विशेषेषु विनाशिषु तदुपरक्तस्य विनाशः स्यादित्याशङ्क्य विशिष्टनाशेऽपि स्वरूपानाशस्योक्तत्वान्मैवमित्याह  सर्वत्रेति।  ननु कदाचिदसदेव पुनः सत्त्वमापद्यते प्रागसतो घटस्य जन्मना सत्त्वाभ्युपगमात् स च कदाचिदसत्त्वं प्रतिपद्यते स्थितिकाले सतो घटस्य पुनर्नाशेनासत्त्वाङ्गीकारादेवं सदसतोरव्यवस्थितत्वाविशेषादुभयोरपि हेयत्वमुपादेयत्वं वा तुल्यं स्यादिति तत्राह  एवमिति।  तुशब्दो दृष्टशब्देन संबध्यमानो दृष्टिमवधारयति। नहि प्रागसतो घटस्य सत्त्वमसत्त्वे स्थिते सत्त्वप्राप्तिविरोधादसत्त्वनिवृत्तिश्च सत्त्वप्राप्त्या चेत्प्राप्तमितरेतराश्रयत्वमन्तरेणैव सत्त्वापत्तिमसत्त्वनिवृत्तावसत्त्वमनवकाशि भवेत्। एतेन सतोऽसत्त्वापत्तिरपि प्रतिनीतेति भावः। कथं तर्हि सतोऽसत्त्वमसतश्च सत्त्वं प्रतिभातीत्याशङ्क्य तत्त्वदर्शनाभावादित्याह  तत्त्वेति।  तस्य भावस्तत्त्वं नच तच्छब्देन परामर्शयोग्यं किंचिदस्ति। प्रकृतं प्रतिनियतमित्याशङ्क्य व्याचष्टे  तदित्यादिना।  ननु सदसतोरन्यथात्वं केचित्प्रतिपद्यन्ते केचित्तु तयोरुक्तनिर्णयमनुसृत्य तथात्वमेवाभिगच्छन्ति तत्र केषां मतमेषितव्यमिति तत्राह  त्वमपीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.16।।न त्वेवाहं 2।12 इत्यत्र भगवान् कृष्णोऽपि यं प्रति पक्षे निक्षिप्तः स आक्षेप्तुं प्रसक्तिं दर्शयति  नित्य  इति। उक्तमनादित्वेन हेतुनाऽनुमितम्। ततः किमित्यत आह  कि मिति। अनादिश्चेत्यपि ग्राह्यम्। आद्ये दृष्टान्ताभावेन व्याप्तिग्रहासम्भवः। द्वितीयस्त्वप्रामाणिकत्वादशक्योपन्यास इति पूर्वपक्ष्यभिप्रायः। विदिताभिप्रायः सिद्धान्ती किमृजावन्वये सम्भवति वक्रेण व्यतिरेकेणेति मन्यमानो द्वितीयपक्षमुपादत्ते  अन्यदपी ति। उक्ताभिप्रायेण पृच्छति  तदि ति। इति शङ्कायामिति शेषः। दुर्गमार्थत्वात्पूर्वार्धं व्याचष्टे  असत  इति। कारणस्य प्रकृतेः। अभावः प्रागभावः प्रध्वंसश्च। कुत एतदित्यतो भाष्यकारस्तावत्प्रमाणमाह  प्रकृतिरि ति। पुरुषः परमात्मा ब्रह्मशब्दोक्तः। अनादित्वेऽप्येवमागमो ज्ञेयः। ननु असतः सतश्चाभावो न विद्यत इत्येकेनैव वाक्येन द्वयोरभावप्रतिषेधे कर्तुं शक्ये किमेवं पृथक्प्रतिषेधेनेत्यत आह  पृथगि ति।  विद्यत  इति वाक्यद्वयग्रहणम् असतो भावो न विद्यते सतश्चाभावो न विद्यते इति द्वयोः पृथगभावप्रतिषेध आदरार्थ इति योज्यम्। आदरश्चानुमानव्याप्तिसद्भावे। अतएवानेकदृष्टान्तप्रदर्शनम्। ननु सतो ब्रह्मण इत्यस्तु असतः कारणस्येति तु कथमिति अत आह  असत  इति। असच्छब्दार्थस्य कारणत्वं च भागवते प्रसिद्धमित्यर्थः। असतोऽसच्छब्दस्य कारणत्वं कारणार्थत्वमिति वा। सदसद्रूपया कार्यकारणरूपया। असत इति श्रुतेरनेकार्थत्वादत्रोदाहरणम्। कारणस्याव्यक्तेश्च असच्छब्दार्थत्वम्। गत्यर्थस्य सदेः कर्मणि क्विबन्तस्य हि सदिति रूपम्।असदव्यक्तरूपत्वात्कारणं चापि शब्दितम् इति वचनात्। अत्रार्थे भगवता प्रमाणमुच्यते  उभयोरपी ति। तदसत्। अन्यदर्शनस्यान्यान्प्रत्यप्रत्यायकत्वात् इत्याशङ्क्य दर्शनमूलकः सम्प्रदायः उपदेशपरम्परारूपो लक्षणयाऽत्र प्रमाणत्वेनोच्यत इत्याह  सम्प्रदायतश्चे ति। चशब्दो भाष्यकारोदितप्रमाणसमुच्चये। आगमो ग्रन्थनिबद्धं वाक्यं सम्प्रदायस्तु उपदेशपरम्परामात्रमिति भेदः। एतत्प्रकृतिपुरुषयोरनादिनित्यत्वम्। केचिदपिशब्दस्य भिन्नक्रमत्वमङ्गीकृत्य तेन सूचितं प्रमाणं प्रागुदाहृतमिति वर्णयन्ति। नन्वन्तो विनाशादिः परिच्छेदो वाऽत्र तत्त्वदर्शिभिर्दृष्ट इत्युच्यते तत्कथं न विरोध इत्यत आह  अन्त  इति। निर्णयोऽनादिनित्यत्वावधारणम्। अपव्याख्यानं त्वन्यत्र निराकृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.16।।नित्य आत्मेत्युक्तम् किमात्मैव नित्य आहोस्विदन्यदपि अन्यदपि तत्किमिति आह नास इति नासतः कारणस्य सतो ब्रह्मणश्चाभावा न विद्यते प्रकृतिः पुरुपश्चैव नित्यां कालश्च सत्तम इति वचनाच्छीविष्णुपुराणं। पृथग्विद्यत इत्यादरार्थः। असतः कारणत्वं च सदसद्रूपया चासों गुणमय्याऽगुणो विभुः इति भागवते असतः सदजायत इति च अव्यक्तेश्च। सम्प्रदायश्चैतत्सिद्धमित्याह उभयोरपीति। अन्तो निर्णयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.16।। असतो  देहस्य सद् भावो न विद्यते सतः  च आत्मनो  न  असद् भावः।   उभयोः देहा त्मनोः उपलभ्यमानयोः यथोपलब्धि  तत्त्वदर्शिभिः अन्तो दृष्टः। निर्णयान्तत्वात् निरूपणस्य निर्णय इह अन्तशब्देन उच्यते। देहस्य अचिद्वस्तुनोः असत्त्वम् एव स्वरूपम् आत्मनः चेतनस्य सत्त्वम् एव स्वरूपम् इति निर्णयो दृष्टः इत्यर्थः।विनाशस्वभावो हि असत्त्वम् अविनाशस्वभावश्च सत्त्वम्। यथा उक्तं भगवता पराशरेणतस्मान्न विज्ञानमृतेऽस्ति किञ्चित् क्वचित्कदाचिद्द्विज वस्तुजातम्। (वि0 पु0 2।12।43)सद्भाव एवं भवतो मयोक्तो ज्ञानं यथा सत्यमसत्यमन्यत् (वि0 पु0 2।12।45)अनाशी परमार्थश्च प्राज्ञैरभ्युपगम्यते। तत्तु नाशि न संदेहो नाशिद्रव्योपपादितम्।। (वि0 पु0 2।14।24)यत्तु कालान्तरेणापि नान्यां संज्ञामुपैति वै। परिणामादिसंभूतां तद्वस्तु नृप तच्च किम्।। (वि0 पु0 2।13।100) इतिअत्रापिअन्तवन्त इमे देहाः (गीता 2।18)अविनाशि तु तद्विद्धि (गीता 2।17) इति उच्यते। तदेव सत्त्वासत्त्वव्यपदेशहेतुः इति गम्यते। अत्र तु सत्कार्यवादस्य असङ्गत्वात् न तत्परोऽयं श्लोकः। देहात्मस्वभावाज्ञानमोहितस्य तन्मोहशान्तये हि उभयोः नाशित्वानाशित्वरूपस्वभावविवेक एव वक्तव्यः।स एवगतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति (गीता 2।11) इति प्रस्तुतः। स एवअविनाशि तु तद्विद्धि (गीता 2।17)अन्तवन्त इमे देहाः (गीता 2।18) इत्यनन्तरम् उपपाद्यते अतो यथोक्त एव अर्थः।आत्मनः तु अविनाशित्वं कथम् उपपद्यते इति अत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.16।।  न असतः  अविद्यमानस्य शीतोष्णादेः सकारणस्य न  विद्यते  नास्ति  भावो  भवनम् अस्तिता।।न हि शीतोष्णादि सकारणं प्रमाणैर्निरूप्यमाणं वस्तु सम्भवति। विकारो हि सः विकारश्च व्यभिचरति। यथा घटादिसंस्थानं चक्षुषा निरूप्यमाणं मृद्वयतिरेकेणानुपलब्धेरसत् तथा सर्वो विकारः कारणव्यतिरेकेणानुपलब्धेरसन्। जन्मप्रध्वंसाभ्यां प्रागूर्ध्वं च अनुपलब्धेः कार्यस्य घटादेः मृदादिकारणस्य च तत्कारणव्यतिरेकेणानुपलब्धेरसत्त्वम्।।तदसत्त्वे सर्वाभावप्रसङ्ग इति चेत् न सर्वत्र बुद्धिद्वयोपलब्धेः सद्बुद्धिरसद्बुद्धिरिति। यद्विषया बुद्धिर्न व्यभिचरति तत् सत् यद्विषया व्यभिचरति तदसत् इति सदसद्विभागे बुद्धितन्त्रे स्थिते सर्वत्र द्वे बुद्धी सर्वैरुपलभ्येते समानाधिकरणे न नीलोत्पलवत् सन् घटः सन् पटः सन् हस्ती इति। एवं सर्वत्र। तयोर्बुद्धयोः घटादिबुद्धिः व्यभिचरति। तथा च दर्शितम्। न तु सद्बुद्धिः। तस्मात् घटादिबुद्धिविषयः असन् व्यभिचारात् न तु सद्बुद्धिविषयः अव्यभिचारात्।।घटे विनष्टे घटबुद्धौ व्यभिचरन्त्यां सद्बुद्धिरपि व्यभिचरतीति चेत् न पटादावपि सद्बुद्धिदर्शनात्। विशेषणविषयैव सा सद्बुद्धिः।।सद्बुद्धिवत् घटबुद्धिरपि घटान्तरे दृश्यत इति चेत् न पटादौ अदर्शनात्।।सद्बुद्धिरपि नष्टे घटे न दृश्यत इति चेत् न विशेष्याभावात्। सद्बुद्धिः विशेषणविषया सती विशेष्याभावे विशेषणानुपपत्तौ किंविषया स्यात् न तु पुनः सद्बुद्धेः विषयाभावात्।।एकाधिकरणत्वं घटादिविशेष्याभावे न युक्तमिति चेत् न इदमुदकम् इति मरीच्यादौ अन्यतराभावेऽपि सामानाधिकरण्यदर्शनात्।।तस्माद्देहादेः द्वन्द्वस्य च सकारणस्य असतो न विद्यते भाव इति। तथा  सत श्च आत्मनः  अभावः  अविद्यमानता न  विद्यते  सर्वत्र अव्यभिचारात् इति अवोचाम।।एवम् आत्मानात्मनोः सदसतोः  उभयोरपि दृष्टः  उपलब्धः  अन्तो  निर्णयः सत् सदेव असत् असदेवेति  तु अनयोः  यथोक्तयोः  तत्त्वदर्शिभिः।  तदिति सर्वनाम् सर्वं च ब्रह्म तस्य नाम तदिति तद्भावः तत्त्वम् ब्रह्मणो याथात्म्यम्। तत् द्रष्टुं शीलं येषां ते तत्त्वदर्शिनः तैः तत्त्वदर्शिभिः। त्वमपि तत्त्वदर्शिनां दृष्टिमाश्रित्य शोकं मोहं च हित्वा शीतोष्णादीनि नियतानियतरूपाणि द्वन्द्वानि विकारोऽयमसन्नेव मरीचिजलवन्मिथ्यावभासते इति मनसि निश्चित्य तितिक्षस्व इत्यभिप्रायः।।किं पुनस्तत् यत् सदेव सर्वदा इति उच्यते

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【 Verse 2.17 】

▸ Sanskrit Sloka: अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् | विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति ||

▸ Transliteration: avināśi tu tadviddhi yena sarvamidaṁ tatam | vināśamavyayasyāsya na kaścitkartumarhati ||

▸ Glossary: avināśi: imperishable; tu: but; tat: that; viddhi: know it; yena: by whom; sarvaṁ: all of the body; idaṁ: this; tataṁ: pervaded; vināśaṁ: destruction; avyayasya: of the imperishable; asya: of it; na kaścit: no one; kartuṁ: to do; arhati: is able

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.17 Know It to be indestructible by which all this body is pervaded. Nothing can destroy It, the Imperishable.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.17. And know That to be destructionsless, by Which all this (universe) is pervaded; no one is capable of causing destruction to this changeless One.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.17 The Spirit, which pervades all that we see, is imperishable. Nothing can destroy the Spirit.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.17 Know That to be indestructible by which all this is pervaded. None can cause the destruction of This Immutable.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.17 But know That to be indestructible by which all this is pervaded. None can bring about the destruction of this Immutable.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.17 Know that to be indestructible, by Which all this is pervaded. None can cause the destruction of That, the Imperishable.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.17 Avinasi etc [Here] tu is in the sense of ca 'and'. So, 'and' the Soul is not of perishing nature.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.17 Know that the self in its essential nature is imperishable. The whole of insentient matter, which is different (from the self), is pervaded by the self. Because of pervasiveness and extreme subtlety, the self cannot be destroyed; for every entity other than the self is capable of being pervaded by the self, and hence they are grosser than It. Destructive agents like weapons, water, wind, fire etc., pervade the substances to be destroyed and disintegrate them. Even hammers and such other instruments rouse wind through violent contact with the objects and thery destroy their objects. So, the essential nature of the self being subtler than anything else, It is imperishable.

(The Lord) now says that the bodies are perishable:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.17 Tu, but this word is used for distinguishing (reality) from unreality; tat viddhi, know That; to be avinasi, indestructible, by nature not subject to destruction; what? (that) yena, by which, by which Brahman called Reality; sarvam, all; idam, this, the Universe together with space; is tatam, pervaded, as pot etc. are pervaded by space. Na kascit, none; arhati, can; kartum, bring about; vinasam, the destruction, disappearance, nonexistence; asya, of this avyayasya, of the Immutable, that which does not undergo growth and depletion. By Its very nature this Brahman called Reality does not suffer mutation, because, unlike bodies etc., It has no limbs; nor (does It suffer mutation) by (loss of something) belonging to It, because It has nothing that is Its own. Brahman surely does not suffer loss like Devadatta suffering from loss of wealth. Therefore no one can bring about the destruction of this immutable Brahman. No one, not even God Himself, can destroy his own Self, because the Self is Brahman. Besides, action with regard to one's Self is self-contradictory. Which, again, is that 'unreal' that is said to change its own nature? This is being answered:

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: NA

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【 Verse 2.18 】

▸ Sanskrit Sloka: अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ता: शरीरिण: | अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ||

▸ Transliteration: antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ I anāśino ’prameyasya tasmād-yudhyasva bhārata ||

▸ Glossary: antavantaḥ: perishable; ime: all these; dehāḥ: bodies; nityasya: eternal in ex- istence; uktāḥ: it is so said; śarīriṇaḥ: of the embodied soul; anāśinaḥ: never to be destroyed; aprameyasya: immeasurable; tasmāt: therefore; yudhyasva: fight; bhārata: O descendant of Bhārata

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.18 These bodies of the material energy are perishable. The energy itself is eternal, incomprehensible and indestructible. Therefore, fight, O Bhārata.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.18।।अविनाशी अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरके ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन तुम युद्ध करो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.18।। इस नाशरहित अप्रमेय नित्य देही आत्मा के ये सब शरीर नाशवान् कहे गये हैं। इसलिये हे भारत तुम युद्ध करो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.18 अन्तवन्तः having an end? इमे these? देहाः bodies? नित्यस्य of the everlasting? उक्ताः are said? शरीरिणः of the embodied? अनाशिनः of the indestructible? अप्रमेयस्य of the immesaurable? तस्मात् therefore? युध्यस्व fight? भारत O Bharata.Commentary -- Lord Krishna explains to Arjuna the nature of the allpervading? immortal Self in a variety of ways and thus induces him to fight by removing his delusion? grief and despondency which are born of ignorance.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.18. These physical bodies that have an end and suffer the peculiar destruction, are declared to belong to the eternal embodied Soul, Which is destructionless and imcomprehensible. Therefore fight, O descendent of Bharata !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.18 The material bodies which this Eternal, Indestructible, Immeasurable Spirit inhabits are all finite. Therefore fight, O Valiant Man!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.18 These bodiesof the Jiva (the embodied self) are said to have an end while the Jiva itself is eternal, indestructible and incomprehensibel. Therefore, fight O Bharata (Arjuna).

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.18 These destructible bodies are said to belong to the everlasting, indestructible, indeterminable, embodied One. Therefore, O descendant of Bharata, join the battle.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.18 These bodies of the embodied Self, Which is eternal, indestructible and immeasurable, are said to have an end. Therefore fight, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.18 Antavantah etc. The bodies, at the time of their attaining the unobservable stage, meet their apparent destruction. This would be impossible if they do not suffer the peculiar destruction, that it to say they undergo changes every moment. For, it has been said-

'By observing the dilapidated condition of beings at their last moment, the loss of newness is very moment is inferred'

The same has been said by the Sage (Vyasa) also as-

'In every being, in every moment, there is mutual difference between its tiny parts that have different purposes. But on account of its subtlity, it is not cleary comprehended (MB, Santi., Moksa. Ch. 308, verse 121).

[In theabove passage] having different purposes amounts to say 'because they perform different acts having their own respective special purposes.;

Now, the bodies have thier end and are ever changing. On the other hand, the Self is destructionless, because It is incomprehensible. Changing nature belongs only to the insentient thing which is comprehensible, but not to what is non-insentient and is exclusively consciousness in nature. Because, it is not possible [for one] to gain an altogether different nature. Thus, the bodies meet permanently their end and hence they cannot be lamented for; the Self ever remains without destruction (or without changing) and hence need not be lamented for. Thus a single krtya-suffix has been employed on both the senses simultaneously by the sage in the expression asocyan.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.18 The root 'dih' means 'to grow.' Hence these bodies (Dehas) are characterised by complexity. They have an end - their nature is perishablity. For, jugs and such other things which are characterised by complexity are seen to have an end. The bodies of the embodied self, which are made of conglomerated elements, serve the purpose of experiencing the effects of Karmas, as stated in Brh. U. IV. 4.5, 'Auspicious embodiments are got through good actions.' Such bodies perish when Karmas are exhausted. Further the self is imperishable. Why? Because it is not measurable. Neither can It be conceived as the object of knowledge, but only as the subject (knower). It will be taught later on: 'He who knows It is called the knower of the Field by those who know this (13.1).

Besides, the self is not seen to be made up of many (elements). Because in the perception 'I am the knower' throughout the body, only something other than the body is understood as possessing an invariable form as the knower. Further, this knower cannot be dismembered and seen in different places as is the case with the body. Therefore the self is eternal, for (1) It is not a complex being of a single form; (2) It is the knowing subject; and (3) It pervades all. On the contrary, the body is perishable, because (1) it is complex; (2) it serves the purpose of experiencing the fruits of Karma by the embodied self; (3) it has a plurality of parts and (4) it can be pervaded. Therefore, as the body is by nature perishable and the self by nature is eternal, both are not objects fit for grief. Hence, bearing with courage the inevitable strike of weapons, sharp or hard, liable to be received by you and others, begin the action called war without being attached to the fruits but for the sake of attaining immortality.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.18 Ime, these; antavantah, destructible; dehah, bodies as the idea of reality which continues with regard to water in a mirage, etc. gets eliminated when examined with the means of knowledge, and that is its end, so are these bodies and they have an end like bodies etc. in dream and magic ; uktah, are said, by discriminating people; to belong nityasya, to the everlasting; anasinah, the indestructible; aprameyasya, the indeterminable; sarirnah, embodied One, the Self. This is the meaning. The two words 'everlasting' and 'indestructible' are not repetitive, because in common usage everlastingness and destructibility are of two kinds. As for instance, a body which is reduced to ashes and has disappeared is said to have been destoryed. (And) even while existing, when it becomes transfigured by being afflicted with diseases etc. it is said to be 'destroyed'. [Here the A.A. adds 'tatha dhana-nase-apyevam, similar is the case even with regard to loss of wealth.'-Tr.] That being so, by the two words 'everlasting' and 'indestructible' it is meant that It is not subject to both kinds of distruction. Otherwise, the everlastingness of the Self would be like that of the earth etc. Therefore, in order that this contingency may not arise, it is said, 'Of the everlasting, indestructible'. Aprameyasya, of the indeterminable, means 'of that which cannot be determined by such means of knowledge as direct perception etc.' Objection: Is it not that the Self is determined by the scriptures, and before that through direct perception etc.? Vedantin: No, because the Self is self-evident. For, (only) when the Self stands predetermined as the knower, there is a search for a means of knolwedge by the knower. Indeed, it is not that without first determining oneself as, 'I am such', one takes up the task of determining an object of knowledge. For what is called the 'self' does not remain unknown to anyone. But the scripture is the final authority [when the Vedic text establishes Brahman as the innermost Self, all the distinctions such as knower, known and the means of knowledge become sublated. Thus it is reasonable that the Vedic text should be the final authority. Besides, its authority is derived from its being faultless in as much as it has not originated from any human being.]: By way of merely negating superimposition of alities that do not belong to the Self, it attains authoritativeness with regard to the Self, but not by virtue of making some unknown thing known. There is an Upanisadic text in support of this: '৷৷.the Brahman that is immediate and direct, the Self that is within all' (Br. 3.4.1). Since the Self is thus eternal and unchanging, tasmat, therefore; yudhyasva, you join the battle, i.e. do not desist from the war. Here there is no injunction to take up war as a duty, because be (Arjuna), though he was determined for war, remains silent as a result of being overpowered by sorrow and delusion. Therefore, all that is being done by the Lord is the removal of the obstruction to his duty. 'Therefore, join the battle' is only an approval, not an injunction. The scripture Gita is intended for eradicating sorrow, delusion, etc. which are the cases of the cycle of births and deaths; it is not intended to enjoin action. As evidences of this idea the Lord cites two Vedic verses: [Ka. 1.2.19-20. There are slight verbal differences.-Tr.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.18।। आत्मा द्वारा धारण किये हुये भौतिक शरीर नाशवान् हैं जबकि आत्मा नित्य अविनाशी और अप्रमेय अर्थात् बुद्धि के द्वारा जानी नहीं जा सकती। यहाँ आत्मा नित्य और अविनाशी है ऐसा कहने का अभिप्राय यह है कि आत्मा का न पूर्णत नाश होता है और न अंशत।नित्य आत्मतत्त्व को अज्ञेय कहा है जिसका अर्थ यह नहीं कि वह अज्ञात है। इसका तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार हम इन्द्रियों के द्वारा विषयों को जानते हैं उस प्रकार इस आत्मा को नहीं जाना जा सकता। इसका कारण यह है कि इन्द्रियाँ मन और बुद्धि आदि हमारे ज्ञान प्राप्ति के साधन हैं वे स्वत जड़ हैं और चैतन्य आत्मा की उपस्थिति में ही वे अन्य वस्तुओं को प्रकाशित कर सकते हैं। अब जिस चैतन्य के कारण इन्द्रियाँ आदि उपकरण विषयों को ग्रहण करने में समर्थ होते हैं तब उसी चैतन्य को वे प्रत्यक्ष विषय के रूप में किस प्रकार जान सकते हैं यह सर्वथा असम्भव है और इसी दृष्टि से यहाँ आत्मा को अज्ञेय कहा गया है। आत्मा स्वत सिद्ध है।इसलिये हे भारत तुम युद्ध करो वास्तव में इस वाक्य के द्वारा सबको युद्ध करने का आदेश नहीं दिया गया है। जिस धर्म की आधारशिला क्षमा और उदार सहिष्णुता है उसी धर्म के शास्त्रीय ग्रन्थों में इस प्रकार का युद्ध का नारा संभव नहीं हो सकता। कोई टीकाकार यदि ऐसा अर्थ करता है तो वह अनुचित है और वह गीता को महाभारत के सन्दर्भ में नहीं पढ़ रहा है। हे भारत तुम युद्ध करो ये शब्द धर्म का आह्वान है प्रत्येक व्यक्ति के लिये जिससे वह पराजय की प्रवृत्ति को छोड़कर जीवन में आने वाली प्रत्येक परिस्थिति का निष्ठापूर्वक और साहस के साथ सामना करे। अधर्म का सक्रिय प्रतिकार यह गीता में श्रीकृष्ण का मुख्य संदेश है।अब आगे भगवान् उपनिषदों के दो मन्त्र सिद्ध करने के लिये उद्धृत करते हैं कि शास्त्र का मुख्य प्रयोजन संसार के मूल कारण मोह अविद्या की निवृत्ति करना है। भगवान् कहते हैं यह तुम्हारी मिथ्या धारणा है कि भीष्म और द्रोण मेरे द्वारा मारे जायेंगे और मैं उनका हत्यारा बनूँगा৷৷. कैसे

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.18।।किंपुनस्तदसदित्याकाङ्क्षायामाह  अन्तवन्त इति।  ननु स्फुरणरुपस्य सतः कथमविनाशित्वं तस्य देहधर्मत्वाद्देहस्य चानुक्षणविनाशित्वादिति भूतचैतन्यवादिनस्तान्निराकुर्वन्नासतो विद्यते भावः इत्येतद्विवृणोति इति तु नत्वेत्यादिना देहात्मविवेकस्योक्तत्वमभिप्रेत्याचार्यैर्नावतारितम्। अन्तस्तत्त्वज्ञाने बाधो येषां विद्यते तेऽन्तवन्तः। यथा शुत्त्यादिज्ञानेन शुक्तिरुप्यादयो बाध्यास्तथा इमे भ्रान्त्या प्रतीयमाना देहाः स्थूलादयो नित्यस्याबाध्यस्याध्यासिकसंबन्धेन कारणादिशरीरवतः देहा इति सकारणस्य शीतादेरप्युपलक्षणम्। देहानेकत्वाद्बहुवचनम्। पृथिव्यादिवद्य्वाव हारिकनित्यत्वमाशङ्क्याह  अनाशिन इति।  परमार्थनित्यस्य विद्वद्भिरुक्ताः अप्रमेयस्य रुपादिरहितत्वात् व्याप्तिग्रहाभावात् सदृशस्यान्यस्यानिरुपणात्प्रवृत्तिनिमित्ताभावात् तेन विनानुपपद्यमानस्याभावात् अभावत्वाभावात् प्रत्यक्षादिभिरपरिच्छेद्यस्य अथवाऽज्ञाते हि वस्तुनि प्रमाणान्वेषणा भवति ज्ञातश्चात्मा देहाद्भिन्नः सर्वैः प्राणिभिः योऽहं बाल्ये पितरावन्वभूवं स एव नप्तृ़ननुभवामीत्यनुसंधानदर्शनात्। स्वप्ने देवादिशरीरमास्थाय तदुचितान्भोगान्भुक्त्वा प्रबुद्धो मनुष्यदेहं प्राप्य मनुष्य एवाहं नतु देव इति देवशरीरे बाध्यमानेऽप्यहमास्पदस्यात्मनोऽबाध्यमानत्वाच्च योगमाहात्म्येन सिंहादिशरीरमेदेऽप्यात्मनोऽभेदेन ज्ञातत्वाच्च। तथा इन्द्रियेभ्योऽपि भिन्न आत्मा सर्वैर्ज्ञायते योऽहमद्राक्षं स एवेदानीं श्रृणोमीत्यहमालम्बनस्य प्रत्यभिज्ञानात्। बुद्धिमनोभ्यामपि भिन्नः तयोः करणत्वेन कर्तृत्वाश्रयत्वायोगात्। अहं कृश इत्यादिप्रत्ययस्तु प्रेमास्पदे पुत्रादौ विकलेऽहमेव विकल इत्यादिप्रत्ययवदुपपद्यते। तस्मादात्मनोऽज्ञातत्वान्न प्रमाणपरिच्छेद्यता। ननु कथं शास्त्रस्य प्रत्यगात्मनि प्रामाण्यम्। तस्य स्वतःसिद्धस्य ज्ञातत्वेनाविषयत्वादितिचेत्सत्यम्। तथापि शास्त्रस्यात्माध्यस्तसमूलकर्तृत्वाद्यनात्मधर्मनिरासकत्वेन प्रामाण्यमुपपद्यते। तथाच भाष्यम्नहि पूर्वमित्थमहमित्यात्मानं प्रमाय पश्चात्प्रमेयपरिच्छेदाय प्रवर्तते। नह्यात्मा नाम कस्यचित्तदप्रसिद्धो भवति। शास्त्रं त्वन्त्यं प्रमाणम्। अतद्धर्माध्यारोपणमात्रनिवर्तकत्वेन प्राणाण्यमात्मनः प्रतिपद्यते नत्वज्ञातार्थज्ञापकत्वेन। तथाच श्रुतिःयस्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्य य आत्मा इति। यस्मादात्मा नित्यः केनापि क्वचिदपि कदापि न नश्यति देहाश्चनित्यत्वान्नश्यन्त्येव तस्माद्धे भारत भरतवंशोद्भव त्वं युध्यस्व स्वधर्मं युद्धं मा त्याक्षीरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.18।।ननुस्फुरणरूपस्य सतः कथमविनाशित्वं तस्य देहधर्मत्वात् देहस्य चानुक्षणविनाशात् इति भूतचैतन्यवादिनस्तान्निराकुर्वन्नासतो विद्यते भावः इत्येतद्विवृणोति। अन्तवन्तो विनाशिनः इमे परोक्षा देहाः उपचितापचितरूपत्वाच्छरीराणि। बहुवचनात्स्थूलसूक्ष्मकारणरूपाः विराट्सूत्राव्याकृताख्याः समष्टिव्यष्ट्यात्मानः सर्वे नित्यस्याविनाशिन एव शरीरिण आध्यासिकसंबन्धेन शरीरवत एकस्य आत्मनः स्वप्रकाशस्फुरणरूपस्य संबन्धिनः दृश्यत्वेन भोग्यत्वेन चोक्ताः श्रुतिभिर्ब्रह्मवादिभिश्च। तथाच तैत्तिरीय केऽन्नमयाद्यानन्दमयान्तान्पञ्च कोशान्कल्पयित्वा तदधिष्ठानमकल्पितंब्रह्मपुच्छं प्रतिष्ठा इति दर्शितम्। तत्र पञ्चीकृतपञ्चमहाभूततत्कार्यात्मको विराट् मूर्तराशिरन्नमयकोशः स्थूलसमष्टिः तत्कारणीभूतोऽपञ्चीकृतपञ्चमहाभूततत्कार्यात्मको हिरण्यगर्भः सूत्रममूर्तराशिः सूक्ष्मसमष्टिः त्रयं वा इदं नामरूपं कर्म इति बृहदारण्यकोक्तत्र्यन्नात्मकः सकर्मात्मकत्वेन क्रियाशक्तिमात्रमादाय प्राणमयकोश उक्तः। नामात्मकत्वेन ज्ञानशक्तिमात्रमादाय मनोमयकोश उक्तः। रूपात्मकत्वेन तदुभयाश्रयतया कर्तृत्वमादाय विज्ञानमयकोश उक्तः। ततः प्राणमयमनोमयविज्ञानमयात्मैक एव हिरण्यगर्भाख्यो लिङ्गशरीरकोशः। तत्कारणीभूतस्तु मायोपहितचैतन्यात्मा सर्वसंस्कारशेषोऽव्याकृताख्य आनन्दमयकोशः। तेच सर्वे एकस्यैवात्मनः शरीराणीत्युक्तम्तस्यैष एव शरीर आत्मा यः पूर्वस्य इति। तस्य प्राणमयस्यैष एव शरीरे भवः शारीर आत्मा यः सत्यज्ञानादिलक्षणो गुहानिहितत्वेनोक्तः पूर्वस्यान्नभयस्य। एवं प्राणमयमनोमयविज्ञानमयानन्दमयेषु योज्यम्। अथवा इमे सर्वे देहास्त्रैलोक्यवर्तिसर्वप्राणिसंबन्धिन एकस्यैवात्मन उक्ता इति योजना। तथाच श्रुतिःएको देवः सर्वभूतेषु गूढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा। कर्माध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च।। इति सर्वशरीरसंबन्धिनमेकमात्मानं नित्यं विभुं दर्शयति। ननु नित्यत्वं यावत्कालस्थायित्वं तथाचाविद्यादिवत्कालेन सह नाशेऽपि तदुपपन्नमित्यत आह अनाशिन इति। देशतः कालतो वस्तुतश्च परिच्छिन्नस्याविद्यादेः कल्पितत्वेनानित्यत्वेऽपि यावत्कालस्थायित्वरूपमौपचारिकं नित्यत्वं व्यवह्नियते।यावद्विकारं तु विभागो लोकवत् इति न्यायात्। आत्मनस्तु परिच्छेदत्रयशून्यस्याकल्पितस्य विनाशहेत्वभावान्मुख्यमेव कूटस्थनित्यत्वं नतु परिणामिनित्यत्वं यावत्कालस्थायित्वं चेत्यभिप्रायः। नन्वेतादृशे देहिनि किंचित्प्रमाणमवश्यं वाच्यम् अन्यथा निष्प्रमाणस्य तस्यालीकत्वापत्तेः शास्त्रारम्भवैयर्थ्यापत्तेश्च। तथाच वस्तुपरिच्छेदो दुष्परिहरःशास्त्रयोनित्वात् इति न्यायाच्चात आह अप्रमेयस्येति।एकधैवानुद्रष्टव्यमेतदप्रमयं ध्रुवम्। अप्रमयमप्रमेयम्।न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः। तमेव भान्तमनु भाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति इति च श्रुतेः स्वप्रकाशचैतन्यरूप एवात्मा अतस्तस्य सर्वभासकस्य स्वभानार्थं न स्वभास्यापेक्षा किंतु कल्पिताज्ञानतत्कार्यनिवृत्त्यर्थं कल्पितवृत्तिविशेषापेक्षा। कल्पितस्यैव कल्पितविरोधित्वात्यक्षानुरूपो बलिः इति न्यायात्। तथाच सर्वकल्पितनिवर्तकवृत्तिविशेषोत्पत्त्यर्थं शास्त्रारम्भः तस्य तत्त्वमस्यादिवाक्यमात्राधीनत्वात्स्वतः सर्वदा भासमानत्वात्सर्वकल्पनाधिष्ठानत्वाद्दृश्यमात्रभासकत्वाच्च न तस्य तुच्छत्वापत्तिः। तथाचएकमेवाद्वितीयंसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्यादिशास्त्रमेव स्वप्रमेयानुरोधेन स्वस्यापि कल्पितत्वमापादयति। अन्यथा स्वप्रामाण्यानुपपत्तेः। कल्पितस्य चाकल्पितपरिच्छेदकत्वं नास्तीति प्राक् प्रतिपादितम्। आत्मनः स्वप्रकाशत्वं च युक्तितोऽपि भगवत्पूज्यपादैरुपपादितम्। तथाहि यत्र जिज्ञासोः संशयविपर्ययव्यतिरेकप्रमाणानामन्यतममपि नास्ति तत्र तद्विरोधि ज्ञानमिति सर्वत्र दृष्टम्। अन्यथा त्रितयान्यतरापत्तेः आत्मनि चाहं वा नाहं वेति न कस्यचित्संशयः नापि नाहमिति विपर्यये व्यतिरेकः प्रमा वेति तत्स्वरूपप्रमा सर्वदास्तीति वाच्यम्। तस्य सर्वसंशयविपर्ययधर्मित्वात्धर्म्यंशे सर्वमभ्रान्तं प्रकारे तु विपर्ययः इति न्यायात्। अतएवोक्तम् प्रमाणमप्रमाणं च प्रमाभासस्तथैव च। कुर्वन्त्येव प्रमां यत्र तदसंभावना कुतः।। इति। प्रमाभासः संशयः स्वप्रकाशे सद्रूपे धर्मिणि प्रमाणाप्रमाणयोर्विशेषो नास्तीत्यर्थः। आत्मनो भासमानत्वे च घटज्ञानं मयि जातं नवेत्यादिसंशयः स्यात्। नचान्तरपदार्थे विषयस्यैव संशयादिप्रतिबन्धकत्वस्वभावः कल्प्यः बाह्यपदार्थे क्लृप्तेन विरोधिज्ञानेनैव संशयादिप्रतिबन्धसंभवे आन्तरपदार्थे स्वभावभेदकल्पनाया अनौचित्यात्। अन्यथा सर्वविप्लबापत्तेः। आत्ममनोयोगमात्रं चात्मसाक्षात्कारे हेतुः। तस्य च ज्ञानमात्रे हेतुत्वाद् घटादिभानेऽप्यात्मभानं समूहालम्बनन्यायेन तार्किकाणां प्रवरेणापि दुर्निवारम्। नच चाक्षुषत्वमानसत्वादिसङ्करः लौकिकत्वालौकिकत्ववदंशभेदेनोपपत्तेः सङ्करस्यादोषत्वाच्चाक्षुषत्वादेर्जातित्वानभ्युपगमाद्वा। व्यवसायमात्र एवात्मभानसामग्र्या विद्यमानत्वादनुव्यवसायोऽप्यपास्तः। नच व्यवसायभानार्थं सः। तस्य दीपवत्स्वव्यवहारे सजातीयानपेक्षत्वात्। नहि घटतज्ज्ञानयोरिव व्यवसायानुव्यवसाययोरपि विषयत्वविषयित्वव्यवस्थापकं वैजात्यमस्ति व्यक्तिभेदातिरिक्तवैधर्म्यानभ्युपगमात् विषयत्वावच्छेदकरूपेणैव विषयित्वाभ्युपगमे घटयोरपि तद्भावापत्तिरविशेषात्। ननु यथा घटव्यवहारार्थं घटज्ञानमभ्युपेयते तथा घटज्ञानव्यवहारार्थं घटज्ञानविषयं ज्ञानमभ्युपेयं व्यवहारस्य व्यवहर्तव्यज्ञानासाध्यत्वादिति चेत् कानुपपत्तिरुद्भाविता देवानांप्रियेण स्वप्रकाशवादिनः। नहि व्यवहर्तव्यभिन्नत्वमपि ज्ञानविशेषणं व्यवहारहेतुतावच्छेदकं गौरवात्। तथाचेश्वरज्ञानवद्योगिज्ञानवत्प्रेयमिति ज्ञानवच्च स्वेनैव स्वव्यवहारोपपत्तौ न ज्ञानान्तरकल्पनावकाशः। अनुव्यवसायस्यापि घटज्ञानव्यवहारहेतुत्वं किं घटज्ञानज्ञानत्वेन किंवा घटज्ञानत्वेनैवेति विवेचनीयम् उभयस्यापि तत्र सत्त्वात्। तत्र घटव्यवहारे घटज्ञानत्वेनैव हेतुतायाः क्लृप्तत्वात्तेनैव रूपेण घटज्ञानव्यवहारेऽपि हेतुतोपपत्तौ न घटज्ञानज्ञानत्वं हेतुतावच्छेदकं गौरवान्मानाभावाच्च। तथाच नानुव्यवसायसिद्धिरेकस्यैव व्यवसायस्य व्यवसातरि व्यवसेये व्यवसाये च व्यवहारजनकत्वोपपत्तेरिति त्रिपुटीप्रत्यक्षवादिनः प्राभाकराः। औपनिषदास्तु मन्यन्ते स्वप्रकाशज्ञानरूप एवात्मा न स्वप्रकाशज्ञानाश्रयः कर्तृकर्मविरोधेन तद्भानानुपपत्तेः ज्ञानभिन्नत्वे घटादिवज्जडत्वेन कल्पितत्वापत्तेश्च स्वप्रकाशज्ञानमात्रस्वरूपोऽप्यात्माऽविद्योपहितः सन्साक्षीत्युच्यते वृत्तिमदन्तःकरणोपहितः प्रमातेत्युच्यते। तस्य चक्षुरादीनि करणानि स चक्षुरादिद्वारान्तःकरणपरिणामेन घटादीन्व्याप्य तदाकारो भवति। एकस्मिंश्चान्तःकरणपरिणामे घटावच्छिन्नचैतन्यं अन्तःकरणावच्छिन्नचैतन्यं चैकलोलीभावापन्नं भवति। ततो घटावच्छिन्नचैतन्यं प्रमात्रभेदात्स्वाज्ञानं नाशयदपरोक्षं भवति घटंच स्वावच्छेदकं स्वतादात्म्याध्यासाद्भासयति अन्तःकरणपरिणामश्च वृत्त्याख्योऽतिस्वच्छः स्वावच्छिन्नेनैव चैतन्येन भास्यत इत्यन्तःकरणतद्वृत्तिघटानामपरोक्षता। तदेतदाकारत्रयमहं जानामि घटमिति भासकचैतन्यस्यैकरूपत्वेऽपि घंटप्रति वृत्त्यपेक्षत्वात्प्रमातृता अन्तःकरणतद्वृत्तीःप्रति तु वृत्त्यनपेक्षत्वात्साक्षितेति विवेकः। अद्वैतसिद्धौ सिद्धान्तबिन्दौ च विस्तरः। यस्मादेवं प्रागुक्तन्यायेन नित्यो विभुरसंसारी सर्वदैकरूपश्चात्मा तस्मात्तन्नाशशङ्क्या स्वधर्मे युद्धे प्राक्प्रवृत्तस्य तव तस्मादुपरतिर्न युक्तेति युद्धाभ्यनुज्ञया भगवानाह तस्माद्युध्यस्व भारतेति। अर्जुनस्य स्वधर्मे युद्धे प्रवृत्तस्य तत उपरतिकारणं शोकमोहौ तौ च विचारजनितेन विज्ञानेन बाधितावितिअपवादापवादे उत्सर्गस्य स्थितिः इति न्यायेन युध्यस्वेत्यनुवादो न विधिः। यथाकर्तृकर्मणोः कृति इत्युत्सर्गःउभयप्राप्तौ कर्मणि इत्यपवादःअकाकारयोः स्त्रीप्रत्यययोः प्रयोगे नेति वक्तव्यम् इति तदपवादः। तथाच मुमुक्षोर्ब्रह्मणो जिज्ञासेत्यत्रापवादापवादे पुनरुत्सर्गस्थितेःकर्तृकर्मणोः कृति इन्यनेनैव षष्ठी। तथाचकर्मणिच इति निषेधाप्रसराद्बह्मजिज्ञासेति कर्मषष्ठीसमासः सिद्धो भवति। कश्चित्त्वेतस्मादेव विधेर्मोक्षे ज्ञानकर्मणोः समुच्चय इति प्रलपति। तन्न। युध्यस्वेत्यतो मोक्षस्य ज्ञानकर्मसमुच्चयसाध्यत्वाप्रतीतेः। विस्तरेण चैतदग्रे भगवद्गीतावचनविरोधेनैव निराकरिष्यामः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.18।।एवं सत आत्मनो नित्यत्वं असतो देहादेरनित्यत्वं चोक्तमुपसंहरन् एनं युद्धाभिमुखं करोति  अन्तवन्त इति।  यद्यपिनासतो विद्यते भावः इति असतां देहानां कालत्रयेऽपि सत्त्वं नास्तीति परमार्थदृष्ट्या उक्तं तथापि तां दृष्टिमप्रतिपद्यमानस्य नरकादिभयमनुरुध्यमानस्य व्यवहाराभिप्रायेण नित्यानित्यविभागमभिप्रेत्य देहानामन्तवत्त्वमुच्यत इति न दोषः नित्यत्वं कालापरिच्छेद्यत्वं तच्च व्यवहारे नभसोऽप्यस्तीत्यत उक्तं अनाशिन इति। नाशः अदर्शनं तद्वान् हि आकाशःनभ आत्मनि लीयते इति स्मृतेः। अयं तु न तथेत्यनाशी। सर्वदैव प्रकाशमान इत्यर्थः। एतदपि न घटादिवद्दृश्यत्वेनेत्याह  अप्रमेयस्येति।  तथा च श्रुतिरात्मनोऽप्रमेयत्वमाहएतदप्रमयं ध्रुवम् इति। अप्रमयमित्यस्याप्रमेयमित्यर्थः। एतच्चात्मनि प्रमाणाप्रसराज्ज्ञेयम्। तथा च श्रुतिःयेनेदं सर्वं विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयात् इति। प्रसिद्धिस्त्वस्य प्रत्यगात्मत्वादेव।यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः इति श्रुतेः। उक्तं चप्रमाणमप्रमाणं च प्रमाभासस्तथैव च। यत्प्रसादात्प्रसिध्यन्ति तदसंभावना कुतः। इति। तस्माद्युध्यस्व भारत। भीष्मादिदेहानां मिथ्यात्वादनित्यत्वाच्च स्वयमेव नष्टप्रायतया हननान्निवृत्त्या त्वया स्वधर्मो न नाशनीय इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.18।।ननु देहादिनाशः प्रत्यक्षमनुभूयमानः किंरूप इत्याशङ्क्यामाह अन्तवन्त इति। नित्यस्य जन्ममरणशून्यस्य शरीरिणो जीवस्य जीवभावनाभिलाषप्राप्तमायासम्बन्धिन इमे देहा लौकिकाः परिदृश्यमानाः भीष्मादीनां सर्वेषां चान्तवन्तः अन्तयुक्ता उक्ता इत्यर्थः। अनाशिनो विनाशहीनस्याप्रमेयस्योपायसहस्रैरपि प्रमातुमयोग्यस्य भगवतः सम्बन्धिनः शरीरिणो जीवस्य भगवदीयस्य देहास्तु नान्तवन्त इत्यर्थः। सर्वेषामेवान्तवत्त्वकथने तु पूर्वोक्तवचनैर्विरोधः स्यात्। अत एव तेषु भिन्नत्वज्ञानार्थमेवइमे इत्युक्तवान्प्रभुः। तस्मादेतेषां मारणेन पापसम्भावना नास्तीति युद्ध्यस्व युद्धं कुर्वित्यर्थः।भारतेति सम्बोधनमुक्तवचनविश्वासार्थं यतः सत्कुलोत्पन्नस्यैवम्भूतभगवद्वाक्ये विश्वासो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.18।।आगमापायधर्मकं संदर्शयति  अन्तवन्त इति।  अन्तो विनाशो विद्यते येषां तेऽन्तवन्तः। नित्यस्य सर्वदैकरुपस्य शरीरिणः शरीरवतः अतएव अनाशिनो विनाशरहितस्याप्रमेयस्यापरिच्छिन्नस्यात्मन इमे सुखदुःखादिधर्मका देहा उक्तास्तत्त्वदर्शिभिः। यस्मादेवमात्मनो न विनाशः नच सुखदुःखादिसंबन्धः तस्मान्मोहजं शोकं त्यक्त्वा युध्यस्व। स्वधर्मे मा त्याक्षीरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.18।।उक्तं सर्वं निगमयति अन्तवन्त इति। इमे देहा नित्यस्य शरीरिणोऽस्यान्तवन्तः अनित्याः कृतेऽप्यकृते शोकेऽस्थिरा उक्ताः। शास्त्रे अन्तश्चिदात्मा तु अविनाशी अप्रमेयत्वादग्राह्यत्वा देति युद्ध्यस्व।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.18।।तो फिर वह असत् पदार्थ क्या है जो अपनी सत्ताको छो़ड़ देता है ( जिसकी स्थिति बदल जाती है ) इसपर कहते हैं जिनका अन्त होता है विनाश होता है वे सब अन्तवाले हैं। जैसे मृगतृष्णादिमें रहनेवाली जलविषयक सत्बुद्धि प्रमाणद्वारा निरूपण की जानेके बाद विच्छिन्न हो जाती है वही उसका अन्त है वैसे ही ये सब शरीर अन्तवान् हैं तथा स्वप्न और मायाके शरीरादिकी भाँति भी ये सब शरीर अन्तवाले हैं। इसलिये इस अविनाशी अप्रमेय शरीरधारी नित्य आत्माके ये सब शरीर विवेकी पुरुषोंद्वारा अन्तवाले कहे गये हैं। यह अभिप्राय है। नित्य और अविनाशी यह कहना पुनरुक्ति नहीं है क्योंकि संसारमें नित्यत्वके और नाशके दोदो भेद प्रसिद्ध हैं। जैसे शरीर जलकर भस्मीभूत हुआ अदृश्य होकर भी नष्ट हो गया कहलाता है और रोगादिसे युक्त हुआ विपरीत परिणामको प्राप्त होकर विद्यमान रहता हुआ भी नष्ट हो गया कहलाता है। अतः अविनाशी और नित्य इन दो विशेषणोंका यह अभिप्राय है कि इस आत्माका दोनों प्रकारके ही नाशसे सम्बन्ध नहीं है। ऐसे नहीं कहा जाता तो आत्माका नित्यत्व भी पृथ्वी आदि भूतोंके सदृश होता। परंतु ऐसा नहीं होना चाहिये इसलिये इसको अविनाशी और नित्य कहा है। प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे जिसका स्वरूप निश्चित नहीं किया जा सके वह अप्रमेय है। पू0 जब कि शास्त्रद्वारा आत्माका स्वरूप निश्चित किया जाता है तब प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उसका जान लेना तो पहले ही सिद्ध हो चुका ( फिर वह अप्रमेय कैसे है ) । उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा स्वतः सिद्ध है। प्रमातारूप आत्माके सिद्ध होनेके बाद ही जिज्ञासुकी प्रमाणविषयक खोज ( शुरू ) होती है। क्योंकि मै अमुक हूँ इस प्रकार पहले अपनेको बिना जाने ही अन्य जाननेयोग्य पदार्थको जाननेके लिये कोई प्रवृत्त नहीं होता। तथा अपना आपा किसीसे भी अप्रत्यक्ष ( अज्ञात ) नहीं होता है। शास्त्र जो कि अन्तिम प्रमाण है वह आत्मामें किये हुए अनात्मपदार्थोंके अध्यारोपको दूर करनेमात्रसे ही आत्माके विषयमें प्रमाणरूप होता है अज्ञात वस्तुका ज्ञान करवानेके निमित्तसे नहीं। ऐसे ही श्रुति भी कहती है कि जो साक्षात् अपरोक्ष है वही ब्रह्म है जो आत्मा सबके हृदयमें व्याप्त है इत्यादि। जिससे कि आत्मा इस प्रकार नित्य और निर्विकार सिद्ध हो चुका है इसलिये तू युद्ध कर अर्थात् युद्धसे उपराम न हो। यहाँ ( उपर्युक्त कथनसे ) युद्धकी कर्तव्यताका विधान नहीं है क्योंकि युद्धमें प्रवृत्त हुआ ही वह ( अर्जुन ) शोकमोहसे प्रतिबद्ध होकर चुप हो गया था उसके कर्तव्यके प्रतिबन्धमात्रको भगवान् हटाते हैं। इसलिये युद्ध कर यह कहना अनुमोदनमात्र है विधि ( आज्ञा ) नहीं है। गीताशास्त्र संसारके कारणरूप शोकमोह आदिको निवृत्त करनेवाला है प्रवर्तक नहीं है। इस अर्थकी साक्षिभूत दो ऋचाओंको भगवान् उद्धृत करते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.18।। व्याख्या    अनाशिनः   किसी कालमें किसी कारणसे कभी किञ्चिन्मात्र भी जिसमें परिवर्तन नहीं होता जिसकी क्षति नहीं होती जिसका अभाव नहीं होता उसका नाम  अनाशी  अर्थात् अविनाशी है। अप्रमेयस्य   जो

Chapter 2 (Part 12)

प्रमा(प्रमाण)का विषय नहीं है अर्थात् जो अन्तःकरण और इन्द्रियोंका विषय नहीं है उसको अप्रमेय कहते हैं।जिसमें अन्तःकरण और इन्द्रियाँ प्रमाण नहीं होतीं उसमें शास्त्र और सन्तमहापुरुष ही प्रमाण होते हैं शास्त्र और सन्तमहापुरुष उन्हींके लिये प्रमाण होते हैं जो श्रद्धालु हैं। जिसकी जिस शास्त्र और सन्तमें श्रद्धा होती है वह उसी शास्त्र और सन्तके वचनोंको मानता है। इसलिये यह तत्त्व केवल श्रद्धाका विषय है  (टिप्पणी प0 58.1)  प्रमाणका विषय नहीं।शास्त्र और सन्त किसीको बाध्य नहीं करते कि तुम हमारेमें श्रद्धा करो। श्रद्धा करने अथवा न करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है। अगर वह शास्त्र और सन्तके वचनोंमें श्रद्धा करेगा तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय है और अगर वह श्रद्धा नहीं करेगा तो यह तत्त्व उसकी श्रद्धाका विषय नहीं है। नित्यस्य   यह नित्यनिरन्तर रहनेवाला है। किसी कालमें यह न रहता हो ऐसी बात नहीं है अर्थात् यह सब कालमें सदा ही रहता है। अन्तवन्त इमे देहा उक्ताः शरीरिणः   इस अविनाशी अप्रमेय और नित्य शरीरीके सम्पूर्ण संसारमें जितने भी शरीर हैं वे सभी अन्तवाले कहे गये हैं। अन्तवाले कहनेका तात्पर्य है कि इनका प्रतिक्षण अन्त हो रहा है। इनमें अन्तके सिवाय और कुछ है ही नहीं केवल अन्तहीअन्त है।उपर्युक्त पदोंमें शरीरीके लिये तो एकवचन दिया है और शरीरोंके लिये बहुवचन दिया है। इसका एक कारण तो यह है कि प्रत्येक प्राणीके स्थूल सूक्ष्म और कारण ये तीन शरीर होते हैं। दूसरा कारण यह है कि संसारके सम्पूर्ण शरीरोंमें एक ही शरीरी व्याप्त है। आगे चौबीसवें श्लोकमें भी इसको  सर्वगतः  पदसे सबमें व्यापक बतायेंगे। यह शरीरी तो अविनाशी है और इसके कहे जानेवाले सम्पूर्ण शरीर नाशवान् हैं। जैसे अविनाशीका कोई विनाश नहीं कर सकता ऐसे ही नाशवान्को कोई अविनाशी नहीं बना सकता। नाशवान्का तो विनाशीपना ही नित्य रहेगा अर्थात् उसका तो नाश ही होगा। विशेष बात यहाँ  अन्तवन्त इमे देहाः  कहनेका तात्पर्य है कि ये जो देह देखनेमें आते हैं ये सबकेसब नाशवान् हैं। पर ये देह किसके हैं  नित्यस्य अनाशिनः   ये देह नित्यके हैं अविनाशीके हैं। तात्पर्य है कि नित्यतत्त्वने जिसका कभी नाश नहीं होता इनको अपना मान रखा है। अपना माननेका अर्थ है कि अपनेको शरीरमें रख दिया और शरीरको अपनेमें रख लिया। अपनेको शरीरमें रखनेसे अहंता अर्थात् मैंपन पैदा हो गया और शरीरको अपनेमें रखनेसे ममता अर्थात् मेरापन पैदा हो गया।यह स्वयं जिनजिन चीजोंमें अपनेको रखता चला जाता है उनउन चीजोंमें मैंपन होता ही चला जाता है जैसे अपनेको धनमें रख दिया तो मैं धनी हूँ अपनेको राज्यमें रख दिया तो मैं राजा हूँ अपनेको विद्यामें रख दिया तो मैं विद्वान् हूँ अपनेको बुद्धिमें रख दिया तो मैं बुद्धिमान् हूँ अपनेको सिद्धियों में ख दिया तो मैं सिद्ध हूँ अपनेको शरीरमें रख दिया तो मैं शरीर हूँ आदिआदि।यह स्वयं जिनजिन चीजोंको अपनेमें रखता चला जाता है उनउन चीजोंमें मेरापन होता ही चला जाता है जैसे कुटुम्बको अपनेमें रख लिया तो कुटुम्ब मेरा है धनको अपनेमें रख लिया तो धन मेरा है बुद्धिको अपनेमें रख लिया तो बुद्धि मेरी है शरीरको अपनेमें रख लिया तो शरीर मेरा है आदिआदि।जडताके साथ मैं और मेरा पन होनेसे ही मात्र विकार पैदा होते हैं। तात्पर्य है कि शरीर और मैं (स्वयं) दोनों अलगअलग हैं इस विवेकको महत्त्व न देनेसे ही मात्र विकार पैदा होते हैं। परन्तु जो इस विवेकको आदर देते हैं महत्व देते हैं वे पण्डित होते हैं। ऐसे पण्डितलोग कभी शोक नहीं करते क्योंकि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है इसका उनको ठीक अनुभव हो जाता है। तस्मात् (टिप्पणी प0 58.2) युध्यस्व   भगवान् अर्जुनके लिये आज्ञा देते हैं कि सत्असत्को ठीक समझकर तुम युद्ध करो अर्थात् प्राप्त कर्तव्यका पालन करो। तात्पर्य है कि शरीर तो अन्तवाला है और शरीरी अविनाशी है। इन दोनों शरीरशरीरीकी दृष्टिसे शोक बन ही नहीं सकता। अतः शोकका त्याग करके युद्ध करो। विशेष बात यहाँ सत्रहवें और अठारहवें इन दोनों श्लोकोंमें विशेषतासे सत्तत्त्वका ही विवेचन हुआ है। कारण कि इस पूरे प्रकरणमें भगवान्का लक्ष्य सत्का बोध करानेमें ही है। सत्का बोध हो जानेसे असत्की निवृत्ति स्वतः हो जाती है। फिर किसी प्रकारका किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। इस प्रकार सत्का अनुभव करके निःसंदिग्ध होकर कर्तव्यका पालन करना चाहिये। इस विवेचनसे यह बात सिद्ध होती है कि सांख्ययोग एवं कर्मयोगमें किसी विशेष वर्ण और आश्रमकी आवश्यकता नहीं है। अपने कल्याणके लिये चाहे सांख्ययोगका अनुष्ठान करे चाहे कर्मयोगका अनुष्ठान करे इसमें मनुष्यकी पूर्ण स्वतन्त्रता है। परन्तु व्यावहारिक काम करनेमें वर्ण और आश्रमके अनुसार शास्त्रीय विधानकी परम आवश्यकता है तभी तो यहाँ सांख्ययोगके अनुसार सत्असत्का विवेचन करते हुए भगवान् युद्ध करनेकी अर्थात् कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।आगे तेरहवें अध्यायमें जहाँ ज्ञानके साधनोंका वर्णन किया गया है वहाँ भी  असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु  (13। 9) कहकर पुत्र स्त्री घर आदिकी आसक्तिका निषेध किया है। अगर संन्यासी ही सांख्ययोगके अधिकारी होते तो पुत्र स्त्री घर आदिमें आसक्तिरहित होनेके लिये कहनेकी आवश्यकता ही नहीं थी क्योंकि संन्यासीके पुत्रस्त्री आदि होते ही नहीं।इस तरह गीतापर विचार करनेसे सांख्ययोग एवं कर्मयोग दोनों परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन सिद्ध हो जाते हैं। ये किसी वर्ण और आश्रमपर किञ्चिन्मात्र भी अवलम्बित नहीं हैं। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकतक शरीरीको अविनाशी जाननेवालोंकी बात कही। अब उसी बातको अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे दृढ़ करनेके लिये जो शरीरीको अविनाशी नहीं जानते उनकी बात आगेके श्लोकमें कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.18।।यस्तत्त्वदर्शिभिर्दृष्टः स खलु नित्योऽनित्यो वा इत्याशङ्क्याह अविनाशि इति। तुश्चार्थे। आत्मा त्वविनाशी।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.18।।सदसतोरनन्तरप्रकृतयोः स्वरूपाव्यभिचारित्वेन परमार्थतया सन्निर्धारितम्। इदानीमसन्निर्दिधारयिषया पृच्छति  किं पुनरिति।  असदसदेवेति निर्धारितत्वात् प्रश्नस्य निरवकाशत्वमाशङ्क्य शून्यं व्यावर्त्य विवक्षितमसन्निर्धारयितुं तस्य सावकाशत्वमाह  यत्स्वात्मेति।  देहादेरनात्मवर्गस्य प्रकृतासच्छब्दविषयतेत्याह  उच्यत इति।  तेषां स्वातन्त्र्यं व्युदस्यति  नित्यस्येति।  आकाशादिव्यावृत्त्यर्थं विशिनष्टि  शरीरिण इति।  परिणामिनित्यत्वं व्यवच्छिनत्ति  अनाशिन इति।  तस्य प्रत्यक्षाद्यविषयत्वमाह  अप्रमेयस्येति।  देहादेरवस्तुत्वादात्मनश्चैकरूपत्वाद् युद्धे स्वधर्मे प्रवृत्तस्यापि तव न हिंसादिदोषसंभावनेत्याह  तस्मादिति।  ननु देहादिषु सद्बुद्धेरनुवृत्तेस्तस्या विच्छेदाभावात्कथमन्तवत्त्वं तेषामिष्यते तत्राह  यथेति।  तथेमे देहाः सद्बुद्धिभाजोऽपि प्रमाणतो निरूपणायामवसाने विच्छेदादन्तवन्तो भवन्तीति शेषः। देहत्वादिना च जाग्रद्देहादेरन्तवत्त्वं संप्रतिपन्नवदनुमातुं शक्यमित्याह   स्वप्नेति।  शरीरादेरन्तवत्त्वेऽपि प्रवाहरूपेणात्मनस्तत्संबन्धस्यानन्तवत्त्वमाशङ्क्याह  नित्यस्येति।  प्रवाहस्य प्रवाहिव्यतिरेकेणानिरूपणान्न तदात्मनः देहाद्यभावे संबन्धसिद्धिरित्यभिसंधायोक्तं  विवेकिभिरिति।  पदद्वयस्यैकार्थत्वमाशङ्क्य निरस्यति  नित्यस्येत्यादिना।  नित्यत्वस्य द्वैविध्यसिद्ध्यर्थं नाशद्वैविध्यं प्रतिज्ञातं प्रकटयति  यथेत्यादिना।  नाशस्य निरवशेषत्वेन सावशेषत्वेन च सिद्धे द्वैविध्ये फलितमाह  तत्रेति।  विशेषणाभ्यां कूटस्थनित्यत्वमात्मनोविवक्षितमित्यर्थः। अन्यतरविशेषणमात्रोपादाने परिणामिनित्यत्वमात्मनः शङ्क्येतेत्यनिष्टापत्तिमाशङ्क्याह  अन्यथेति।  औपनिषदत्वविशेषणमाश्रित्याप्रमेयत्वमाक्षिपति  नन्विति।  इतश्चात्मनो नाप्रमेयत्वमित्याह  प्रत्यक्षादिनेति।  तेन चागमप्रवृत्त्यपेक्षया पूर्वावस्थायामात्मैव परिच्छिद्यते तस्मिन्नेवाज्ञातत्वसंभवाद् अज्ञातज्ञापकं प्रमाणमिति च प्रमाणलक्षणादित्यर्थः। एतदप्रमेयमित्यादिश्रुतिमनुसृत्य परिहरति  नेत्यादिना।  कथं मानमनपेक्ष्यात्मनः सिद्धत्वमित्याशङ्क्योक्तं विवृणोति  सिद्धे हीति।  प्रमित्सोः प्रमेयमिति शेषः। तदेव व्यतिरेकमुखेन विशदयति  नहीति।  आत्मनः सर्वलोकप्रसिद्धत्वाच्च तस्मिन्न प्रमाणमन्वेषणीयमित्याह  नह्यात्मेति।  प्रत्यक्षादेरनात्मविषयत्वात्तत्र चाज्ञातताया व्यवहारे संभवात्तत्प्रामाण्यस्य च व्यावहारिकत्वाद्विशिष्टे तत्प्रवृत्तावपि केवले तदप्रवृत्तेः यद्यपि नात्मनि तत्प्रामाण्यं तथापि तद्धितश्रुत्या शास्त्रस्य तत्र प्रवृत्तिरवश्यंभाविनीत्याशङ्क्याह  शास्त्रं त्विति।  शास्त्रेण प्रत्यग्भूते ब्रह्मणि प्रतिपादिते प्रमात्रादिविभागस्यव्यावृत्तत्वाद्युक्तमस्यान्त्यत्वमपौरुषेयतया निर्दोषत्वाच्चास्य प्रामाण्यमित्यर्थः। तथापि कथमस्य प्रत्यगात्मनि प्रामाण्यं तस्य स्वतःसिद्धत्वेनाविषयत्वादज्ञातज्ञापनायोगादित्याशङक्य स्वतो भानेऽपि प्रतीचो मनुष्योऽहं कर्ताहमित्यादिना मनुष्यत्वकर्तृत्वादीनामतद्धर्माणामध्यारोपणेनात्मनि प्रतीयमानत्वात्तन्मात्रनिवर्तकत्वेनात्मनो विषयत्वमनापद्यैव शास्त्रं प्रामाण्यं प्रतिपद्यते सिद्धंतु निवर्तकत्वादिति न्यायादित्याह  अतद्धर्मेति।  घटादाविव स्फुरणातिशयजनकत्वेन किमित्यात्मनि शास्त्रप्रामाण्यं नेष्टमित्याशङ्क्य जडत्वाजडत्वाभ्यां विशेषादिति मत्वाह  नत्विति।  ब्रह्मात्मनो मानापेक्षामन्तरेण स्वतः स्फुरणे प्रमाणमाह  तथाचेति।  साक्षादन्यापेक्षामन्तरेणापरोक्षादपरोक्षस्फुरणात्मकं यद्ब्रह्म न च तस्यात्मनोऽर्थान्तरत्वं सर्वाभ्यन्तरत्वेन सर्ववस्तुसारत्वात्तमात्मानं व्याचक्ष्वेति योजना। अप्रमेयत्वेनाविनाशित्वं प्रतिपाद्य फलितं निगमयति  यस्मादिति।  स्वधर्मनिवृत्तिहेतुनिषेधे तात्पर्यं दर्शयति  युद्धादिति।  आत्मनो नित्यत्वादिस्वरूपमुपपाद्य युद्धकर्तव्यत्वविधानाज्ज्ञानकर्मसमुच्चयोऽत्र भातीत्याशङ्क्याह  नहीति।  युध्यस्वेति वचनात्तत्कर्तव्यत्वविधिरस्तीत्याशङ्क्याह  युद्ध इति।  कथं तर्हि कथं भीष्ममहमित्याद्यर्जुनस्य युद्धोपरमपरं वचनमिति तत्राह  शोकेति।  यदि स्वतो युद्धे प्रवृत्तिस्तर्हि भगवद्वचनस्य का गतिरित्याशङ्क्याह  तस्येति।  भगवद्वचनस्य प्रतिबन्धनिवर्तकत्वे सत्यर्जुनप्रवृत्तेः स्वाभाविकत्वे फलितमाह  तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.18।।देहानामन्तवत्त्वं प्रागुक्तं किमथमुच्यत इत्यत आह  भव त्विति। आत्मनित्यत्वानुमानस्य प्रतिपक्षं वक्तुं स्वाभिप्रेतस्य हेतोः सिद्धान्तिनाप्यभ्युपगतत्वं दृढीकुर्वता पूर्वपक्षिणा देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वं भवतु किमिति पृष्टे (सति) नेत्याहेत्यर्थः। सिद्धार्थतापरिहाराय  कस्यचि दित्युक्तम्। नन्वतिप्रसङ्गोऽयं कस्मान्न भवतिकस्यचिदिति विशेषणवैयर्थ्यप्रसङ्गात्। नित्यस्येत्यात्मनित्यत्वं पुनः कस्मादुच्यत इत्यत आह  अस्त्वि ति। एवं देहानित्यत्वं सिद्धान्तिनोऽपि सिद्धं कृत्वा तर्हि प्रतिबिम्बस्यात्मन उपाधेर्देहस्य नाशान्नाशोऽस्तु दर्पणनाशान्मुखप्रतिबिम्बस्येवेति पूर्वपक्षिणा प्रतिपक्षेऽभिहिते तत्प्रतिषेधायेदमाहेत्यर्थः। अनेन तथाऽप्यात्मा नित्य इति वाक्यवृत्तिः सूचिता। अनुवादे प्रयोजनाभावात् ये देहा अनित्या न तेषामुपाधित्वम् यस्योपाधित्वं नासावनित्य इति भावः। तदिदमुक्तं इमे इति। व्यक्तीकरिष्यते चैतत्। ननु शरीरिणो देहा इति व्यर्थम् अशरीरस्य देहाभावादित्यत आह  शरीरिण  इति। नित्यस्य देहा अन्तवन्त इत्युच्यमाने ईश्वरदेहस्याप्यन्तवत्त्वं प्रसज्यते तद्व्यावृत्त्यर्थं  शरीरिणः  इति विशेषणम्।जन्तुजन्युशरीरिणः अमरे 1।4।30 इत्यभिधानाच्छरीरिशब्दस्य जीवे प्रसिद्धेः। तथापिअनाशिनः इति पुनरुक्तिरिति। अत्र केचित्तत्परिहारायविनाशिनः इति पाठान्तरं कुर्वन्ति तदसत्अन्तवन्तः इत्यनेन पुनरुक्तितादवस्थ्यात्। कथञ्चित्समाधानेऽन्यत्रापि तत्समम्। किमन्यथापाठेनेत्याशयवानाह  नचे ति। उपाधिनाशेन नाशाभावेऽपि उपाधिबिम्बसन्निधिनाशान्निमित्तात्प्रतिबिम्बस्यात्मनो नाशो भविष्यति। न चासिद्धिः शङ्क्या। परिच्छिन्नस्यैव प्रतिबिम्बसम्भवेन सन्निधिनाशध्रौव्यादिति पुनः प्रतिपक्षिते तत्प्रतिषेधायेदमिति भावः। अप्रमेयस्येत्येतदसम्भवि विशेषणम्। व्यर्थं चेत्यतस्तन्निवर्त्यामाशङ्कां दर्शयित्वा व्याचष्टे   कुत  इति। न हि प्रतिपक्षो वाङ्मात्रेण निषेद्धुं शक्यत इति भावः। अप्रमेयेत्यनेन प्रतिपक्षहेतोरसिद्धिमाचष्टे। नायमात्मा घटादेः कस्यचित्प्रतिबिम्बः किन्त्वीश्वरस्य। स चाप्रमेयः सर्वगत इति कथं तस्योपाधिसन्निधिनाश इति। ननु कथमिदं लभ्यते अतद्भावे सामानाधिकरण्यं सारूप्यं गमयतीति प्रसिद्धमेव न च सर्वगतस्य प्रतिबिम्बासम्भवः तदधीनसारूप्यस्य प्रतिबिम्बत्वात् तदिदमुक्तं सरूपत्वादिति।ननु वक्तव्यं सर्वमुक्त्वोपसंहारः क्रियते तत्किमात्मनित्यत्वविषये सर्वशङ्कोद्धारो जातो येनतस्माद्युद्ध्यस्व इत्युपसंह्रियत इत्यतो जात इत्याह  नही ति। उपाधिबिम्बसन्निध्यनाशे प्रदर्शके आदर्शे उपाधौ बिम्बे चाविनष्टे सति प्रतिबिम्बनाशो न ह्यस्ति उपपादितश्चात्र त्रयस्यानाश इति भावः। ननु विनाशिनां देहानामप्यनुपाधिकत्वात्कोऽत्रोपाधिरित्यत आह  स्वयमि ति। उपाध्युपाधिमद्भावो विशेषबलेनेति भावः। लोकेऽदृष्टमिदं कथमङ्गीकार्यमित्यत आह  चित्त्वादि ति। जडेष्वयावद्वस्तुभावित्वात्सर्वत्र भेदाभेदौ। चित्स्वरूपे तु यावद्वस्तुभावित्वादभेद एवेति भावः। स्वस्यैवोपाधित्वे मुक्तावात्मनिवृत्तिः स्यात्। उपाधिनिवृत्तिलक्षणत्वान्मुक्तेरित्यत आह  नित्य  इति। द्विविध उपाधिरात्मनः नित्योऽनित्यश्च तत्र नित्यस्यावस्थानं अन्यस्य निवृत्तिर्मुक्ताविति कुत एतदित्यत आह  प्रतिपत्ता विति। प्राप्तौ सत्यां कुतस्तिष्ठतीति शेषः। ननूपाध्येति कथं किप्रत्ययान्तस्य पुल्लिङ्गतानियमात्। तर्हि इषुधिर्द्वयोः कथम्। प्रयोगदर्शनादपवादः। यथाहलिङ्गशेषविधिर्व्यापी विशेषैर्यद्यबाधितः इति। समं प्रकृतेऽपि। स्व आत्मा रूपं यस्याः सा स्वरूपा। चिद्रूपत्वात् स्वरूपत्वं स्वरूपत्वान्नित्यत्वम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.18।।भवतु देहस्यापि कस्यचिन्नित्यत्वमिति नेत्याह अन्तवन्त इति। अस्तु तर्हि दर्पणनाशात् प्रतिबिम्बनाशवदात्मनाश इत्यत आह नित्यस्य शरीरिण इति। ईश्वरव्यावृत्तये। न च नैमित्तिकनाश इत्याह अनाशिन इति। कुतः अप्रमेयेश्वरसरूपत्वात्। नह्युपाधिबिम्बसन्निध्यनासे प्रतिबिम्बनाशः सति च प्रदर्शके। स्वयमेवात्र प्रदर्शकः चित्त्वात् नित्यश्चोपाधिः कश्चिदस्ति।प्रतिपत्तौ विमोक्षस्य नित्योपाध्या स्वरूपया। चिद्रूपया युतो जीवः केशवप्रतिबिम्बकः इति भगवद्वचनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.18।।दिह उपचये इति उपचयरूपा  इमे देहा अन्तवन्तः  विनाशस्वभावाः उपचयात्माका हि घटादयः अन्वन्तो दृष्टाः।  नित्यस्य शरीरिणः  कर्मफलभोगार्थतया भूतसंघातरूपा देहाःपुण्यः पुण्येन (बृ0 उ0 4।4।5) इत्यादिशास्त्रैः  उक्ताः  कर्मावसानविनाशिनः। आत्मा तु अविनाशी कुतः अप्रमेयत्वात्। न हि आत्मा प्रमेयतया उपलभ्यते अपि तु प्रमातृतया। तथा च वक्ष्यते एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।। (गीता 13।1) इति।न च अनेकोपचयात्मक आत्मा उपलभ्यते। सर्वत्र देहेअहम् इदं जानामि इति देहाद् अन्यस्य प्रमातृतया एकरूपेण उपलब्धेः। न च देहादेः इव प्रदेशभेदे प्रमातुः आकारभेद उपलभ्यते अत एकरूपत्वेन अनुपचयात्मकत्वात् प्रमातृत्वाद् व्यापकत्वात् च आत्मा नित्यः। देहः तु उपचयात्मकत्वात् शरीरिणः कर्मफलभोगार्थत्वाद् अनेकरूपत्वाद् व्याप्यत्वात् च विनाशी।  तस्माद्  देहस्य विनाशस्वभावत्वाद् आत्मनो नित्यस्वभावत्वात् च उभौ अपि न शोकस्थानम् इति शस्त्रपातादिपरुषस्पर्शान् अवर्जनीयान् स्वगतान् अन्यगतांश्च धैर्येण सोढ्वा अमृतत्वप्राप्तये अनभिसंहितफलं युद्धाख्यं कर्म आरभस्व।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.18।। अन्तः विनाशः विद्यते येषां ते  अन्तवन्तः । यथा मृगतृष्णिकादौ सद्बुद्धिः अनुवृत्ता प्रमाणनिरूपणान्ते विच्छिद्यते स तस्य अन्तः तथा  इमे देहाः  स्वप्नमायादेहादिवच्च अन्तवन्तः  नित्यस्य शरीरिणः  शरीरवतः  अनाशिनः अप्रमेयस्य  आत्मनः अन्तवन्त इति  उक्ताः  विवेकिभिरित्यर्थः। नित्यस्य अनाशिनः इति न पुनरुक्तम् नित्यत्वस्य द्विविधत्वात् लोके नाशस्य च। यथा देहो भस्मीभूतः अदर्शनं गतो नष्ट उच्यते। विद्यमानोऽपि यथा अन्यथा परिणतो व्याध्यादियुक्तो जातो नष्ट उच्यते। तत्र नित्यस्य अनाशिनः इति द्विविधेनापि नाशेन असंबन्धः अस्येत्यर्थः। अन्यथा पृथिव्यादिवदपि नित्यत्वं स्यात् आत्मनः तत् मा भूदिति नित्यस्य अनाशिनः इत्याह। अप्रमेयस्य न प्रमेयस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणैः अपरिच्छेद्यस्येत्यर्थः।।ननु आगमेन आत्मा परिच्छिद्यते प्रत्यक्षादिना च पूर्वम्। न आत्मनः स्वतःसिद्धत्वात्। सिद्धे हि आत्मनि प्रमातरि प्रमित्सोः प्रमाणान्वेषणा भवति। न हि पूर्वम् इत्थमहम् इति आत्मानमप्रमाय पश्चात् प्रमेयपरिच्छेदाय प्रवर्तते। न हि आत्मा नाम कस्यचित् अप्रसिद्धो भवति। शास्त्रं तु अन्त्यं प्रमाणम् अतद्धर्माध्यारोपणमात्रनिवर्तकत्वेन प्रमाणत्वम् आत्मनः प्रतिपद्यते न तु अज्ञातार्थज्ञापकत्वेन। तथा च श्रुतिः यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः इति।।यस्मादेवं नित्यः अविक्रियश्च आत्मा तस्मात् युध्यस्व युद्धात् उपरमं मा कार्षीः इत्यर्थः।।न हि अत्र युद्धकर्तव्यता विधीयते युद्धे प्रवृत्त एव हि असौ शोकमोहप्रतिबद्धः तूष्णीमास्ते। अतः तस्य प्रतिबन्धापनयनमात्रं भगवता क्रियते। तस्मात् युध्यस्व इति अनुवादमात्रम् न विधिः।।शोकमोहादिसंसारकारणनिवृत्त्यर्थं गीताशास्त्रम् न प्रवर्तकम् इत्येतस्यार्थस्य साक्षिभूते ऋचौ आनिनाय भगवान्।यत्तु मन्यसे युद्धे भीष्मादयो मया हन्यन्ते अहमेव तेषां हन्ता इति एषा बुद्धिः मृषैव ते। कथम्

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【 Verse 2.19 】

▸ Sanskrit Sloka: य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम् | उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ||

▸ Transliteration: ya enaṁ vetti hantāraṁ yaścainaṁ manyate hatam | ubhau tau na vijānīto nāyaṁ hanti na hanyate ||

▸ Glossary: yaḥ: anyone; enaṁ: this; vetti: knows; hantāraṁ: the killer; yaḥ: anyone; ca: also; enaṁ: this; manyate: thinks; hatam: killed; ubhau: both of them; tau: they; na: not; vijānītaḥ: know; na: never; ayaṁ: this; hanti: kills; na: nor; hanyate: be killed

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.19 Neither understands; he who takes the Self to be the slayer nor he who thinks he is slain. He who knows the Truth understands that the Self does not slay, nor is It slain.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.19।।जो मनुष्य इस अविनाशी शरीरीको मारनेवाला मानता है और जो मनुष्य इसको मरा मानता है वे दोनों ही इसको नहीं जानते क्योंकि यह न मारता है और न मारा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.19।। जो इस आत्मा को मारने वाला समझता है और जो इसको मरा समझता है वे दोनों ही नहीं जानते हैं? क्योंकि यह आत्मा न मरता है और न मारा जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.19 यः he who? एनम् this (Self)? वेत्ति knows? हन्तारम् slayer? यः he who? च and? एनम् this? मन्यते thinks? हतम् slain? उभौ both? तौ those? न not? विजानीतः know? न not? अयम् this? हन्ति slays? न not? हन्यते is slain.Commentary -- The Self is nondoer (Akarta) and as It is immutable? It is neither the agent nor the object of the act of slaying. He who thinks I slay or I am slain with the body or the Ahamkara (ego)? he does not really comprehend the true nature of the Self. The Self is indestructible. It exists in the three periods of time. It is Sat (Existence). When the body is destroyed? the Self is not destroyed. The body has to undergo change in any case. It is inevitable. But the Self is not at all affected by it. Verses 19? 20? 21? 23 and 24 speak of the immortality of the Self or Atman. (Cf.XVIII.17)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.19. Whosoever views This to be the slayer and whosoever believes This to be the slain, both these do not understand : This does not slay, nor is This slain.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.19 He who thinks that the Spirit kills, and he who thinks of It as killed, are both ignorant. The Spirit kills not, nor is It killed.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.19 He who deems It (the self) a slayer, and he who thinks of It as slain - both are ignorant. For, the self neither slays nor is slain.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.19 He who thinks of this One as the killer, and he who thinks of this One as the killed both of them do not know. This One does not kill, nor is It killed.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.19 He who takes the Self to be the slayer and he who thinks It is slain, neither of them ï1knowsï1. It slays not, nor is It slain.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.19 Ya enam etc. Whosoever veiws This i.e., the Self and the body, to be the slayer and the slain, ignorance is in him. That is why he is in bondage. The same [point the Lord] clarifies -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.19 With regard to "This" viz., the self, whose nature has been described above, he who thinks of It as the slayer, i.e., as the cause of slaying, and he who thinks 'This' (self) as slain by some cause or other - both of them do not know. As this self is eternal for the reasons mentioned above, no possible cause of destruction can slay It and for the same reason, It cannot be slain. Though the root 'han' (to slay) has the self for its object, it signifies causing the separation of the body from the self and not destruction of the self. Scriptural texts like 'You shall not cause injury to beings' and 'The Brahmana shall not be killed'? (K. Sm. 8.2) indicate unsanctioned actions, causing separation of the body from the self. [In the above otes, slaughter in an ethical sense is referred to, while the text refers to killing or separating the self from the body in a metaphsyical sense. This is made explicit in the following verse].

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.19 But the ideas that you have, 'Bhisma and others are neing killed by me in war; I am surely their killer' this idea of yours is false. How? Yah, he who; vetti, thinks; of enam, this One, the embodied One under consideration; as hantaram, the killer, the agent of the act of killing; ca, and; yah, he who, the other who; manyate, thinks; of enam, this One; as hatam, the killed (who thinks) 'When the body is killed, I am myself killed; I become the object of the act of killing'; ubhau tau, both of them; owing to non-discrimination, na, do not; vijanitah, know the Self which is the subject of the consciousness of 'I'. The meaning is: On the killing of the body, he who thinks of the Self ( the content of the consciousness of 'I' ) [The Ast. omits this phrase from the precedig sentence and includes it in this place. The A.A. has this phrase in both the places.-Tr.] as 'I am the killer', and he who thinks, 'I have been killed', both of them are ignorant of the nature of the Self. For, ayam, this Self; owing to Its changelessness, na hanti, does not kill, does not become the agent of the act of killing; na hanyate, nor is It killed, i.e. It does not become the object (of the act of killing). The second verse is to show how the Self is changeless:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.19।। आत्मा नित्य अविकारी होने से न मारी जाती है और न ही वह किसी को मारती है । शरीर के नाश होने से जो आत्मा को मरी मानने हैं या जो उसको मारने वाली समझते हैं वे दोनों ही आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं जानते और व्यर्थ का विवाद करते हैं। जो मरता है वह शरीर है और मैं मारने वाला हूँ यह भाव अहंकारी जीव का है। शरीर और अहंकार को प्रकाशित करने वाली चैतन्य आत्मा दोनों से भिन्न है। संक्षेप में इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा न किसी क्रिया का कर्त्ता है और न किसी क्रिया का विषय अर्थात् उस पर किसी प्रकार की क्रिया नहीं की जा सकती।आत्मा किस प्रकार अविकारी है इसका उत्तर अगले श्लोक में दिया गया है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.19।।   अहमेतेषां हन्ता मयैते हन्यन्त इत्यर्जुनबुद्धेर्मृषात्वबोधनाय ऋचावुदाहरति  य इति।  युत्तु नन्वेवमशोच्यानित्यादिना बन्धुविच्छेदनिबन्धने शोकेऽपनीतेऽपि तद्वधकर्तृत्वनिबन्धनपापस्य नास्ति प्रतीकारः शोकाविषयेऽपि द्वेष्यब्राह्मणवधे पापस्य सत्त्वात्। अतः कर्तुर्मम प्रेरकस्य तव च हिंसानिमित्तपापापत्तेरयुक्तमिदं वचनं तस्मादित्यादीत्याशङ्कां काठकपठितयर्चा परिहरति य इति तद्विचार्यम्। ऋषि हन्त्रादेः पापं न जायते इति परिहारस्यानुक्तेः वधनिबन्धनबन्धुविच्छेदस्यात्मनित्यवप्रतिपादकपूर्वग्रन्थेन नाशाभावोक्त्या प्रतिषिद्धत्वेन तन्निबन्धनपापस्यापि निवारितत्वाच्छङ्काया अनुत्थानात्। यस्मादेवं प्रागुक्तन्यायेन नित्यो विभुरसंसारी सर्वदैकरुपश्चात्मा तस्मात्तन्नाशशङ्क्या स्वधर्मे युद्धे प्राक्प्रवृत्तस्य तव तस्मादुपरतिर्न युक्तेति स्वपूर्वोक्तिविरोधात् द्वेष्यब्राह्मणवधे शोकाभावे द्वेष्यत्वस्य हेतोः पापासाधकत्वेन दृष्टान्तस्य वैषम्यात् संघातवधनिबन्धनपापाभावस्याग्रिमग्रन्थेन क्षत्रधर्मबोधकेन वक्ष्यमाणत्वाच्च। नत्वेवाद्येकोनविंशतिश्लोकैरशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्यतस्य विवरणं क्रियतेस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यष्टभिः श्लोकैःप्रज्ञावादांश्च भाषस इत्यस्य मोहद्वयस्य पृथग्प्रयत्ननिराकर्तव्यत्वादिति स्वपूर्वग्रन्थविरोधाच्चेत्यास्तां तावत्। य एनमात्मानं हननक्रियायाः कर्तारं यश्च तस्याः कर्म जानाति तौ द्वौ देहात्मबुद्धिमत्त्वेन भ्रान्तौ न विजानीतः। यतोऽयमात्मा देहभिन्नोऽविक्रियत्वाद्धननक्रियायाः कर्ता ततएव कर्म च न भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.19।।नन्वेयंअशोच्यानन्वशोचस्त्वम् इत्यादिना भीष्मादिबन्धुविच्छेदनिबन्धने शोकेऽपनीतेऽपि तद्वधकर्तृत्वनिबन्धनस्य पापस्य नास्ति प्रतीकारः। नहि यत्र शोको नास्ति तत्र पापं नास्तीति नियमः द्वेष्यब्राह्मणवधे शोकाविषये पापाभावप्रसङ्गात्। अतोऽहं कर्ता त्वं प्रेरक इति द्वयोरपि हिंसानिमित्तपातकापत्तेरयुक्तमिदं वचनंतस्माद्युध्यस्व भारत इत्याशङ्क्य काठकपठितयर्चा परिहरति भगवान् एनं प्रकृतं देहिनमदृश्यत्वादिगुणकं यो हन्तारं हननक्रियायाः कर्तारं वेत्ति अहमस्य हन्तेति विजानाति यश्चान्य एनं मन्यते हतं हननक्रियायाः कर्मभूतं देहहननेन हतोऽहमिति विजानाति तावुभौ देहाभिमानित्वादेनमविकारिणमकारकस्वभावमात्मानं न विजानीतो न विवेकेन जानीतः शास्त्रात्। कस्मात्। यस्मान्नायं हन्ति न हन्यते। कर्ता कर्म च न भवतीत्यर्थः। अत्र य एनं वेत्ति हन्तारं हतं चेत्येतावति वक्तव्ये पदानामावृत्तिर्वाक्यालंकारार्था। अथवा य एनं वेत्ति हन्तारं तार्किकादिरात्मनः कर्तृत्वाभ्युपगमात् तथा यश्चैनं मन्यते हतं चार्वाकादिरात्मनो विनाशित्वाभ्युपगमात् तावुभौ न विजानीत इति योज्यम्। वादिभेदख्यापनाय पृथगुपन्यासः। अतिशूरातिकातरविषयतया वा पृथगुपदेशः।हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् इति पूर्वार्धे श्रौतः पाठः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.19।।ननुनासतो विद्यते भावः इति न्यायेनासतो मात्रादेर्मिथ्यात्वेन निःस्वरूपत्वात्कर्तृत्वं न संभवति। अतः सत एव कर्तृत्वं बन्धमोक्षभाक्त्वं च वाच्यम्। अन्यथाऽन्तःकरणे बन्ध आत्मनश्च मोक्ष इति तयोर्वैयधिकरण्यं स्यात्। तथा येन सर्वमिदं ततमिति सतो देहाद्युपादानत्वं चोक्तम्। तथा च हननक्रियां प्रत्येकस्यैव कर्तृत्वं कर्मत्वं चापतति तच्च विरुद्धम्। स्वात्मनि स्वव्यापारायोगात्। नहि वह्निर्वह्निं दहतीति युक्तमित्याशङ्क्याह  य एनमिति।  यश्च तार्किकादिरेनमात्मानं हन्तारं हननक्रियायाः कर्तारं मन्यते यश्च चार्वाकादिरेनं हतं हननक्रियायाः कर्मीभूतं मन्यते तावुभावपि न जानीतः। आत्मतत्त्वमिति शेषः। यस्मान्नायं हन्ति न हन्यते। नहि यः कर्ता स आत्मा नापि देह आत्मा तयोः प्रागेवानात्मत्वावधारणात्। अयं भावः यथायःपिण्डे वह्निसंबन्धादेव दग्धृत्वं न तु स्वतः एवं मात्राद्युदयसमनियतं कर्तृत्वं मात्रादिधर्म एव नात्मनः। आत्मनि तु कर्तृत्वप्रतीतिर्मात्रादिसंबन्धादेव। अतो मात्रादिविशिष्टस्यैव बन्धो न केवलस्य। मोक्षश्च मात्रादिवियोग एवेति न बन्धमोक्षयोर्वैयधिकरण्यम्। न च मात्रादेर्निःस्वरूपत्वमस्ति। सत्त्वासत्त्वाभ्यामनिर्वचनीयस्य व्यवहारयोग्यस्य ब्रह्मज्ञानैकबाध्यस्य स्वप्नमायागन्धर्वनगरादितुल्यस्य तत्स्वरूपस्याभ्युपगमात्। तस्मान्न कर्तृत्वमात्मधर्मः। यथोक्तम्आत्मा कर्त्रादिरूपश्चेन्मा काङ्क्षीस्तर्हि मुक्तताम्। नहि स्वभावो भावानां व्यावर्तेतौष्ण्यवद्रवेः। इति। किञ्च कर्तृत्वं रागद्वेषादिविकारवत् एव संभवति तद्वांश्च दुःखीत्यात्मनोऽनुभूयमानं साक्षित्वं बाध्येत। यथोक्तम्नर्ते स्याद्विक्रियां दुःखी साक्षिता का विकारिणः। धीविक्रियासहस्राणां साक्ष्यतोऽहमविक्रियः। इति। न च सतो देहाद्युपादानत्वेन हननक्रियाकर्मत्वं संभवति। विवर्तवादाभ्युपगमात्। नह्यध्यस्तस्य धर्मैरधिष्ठाने विकारो दृश्यते। यथोक्तं भाष्येयत्र यदध्यस्तं सत्तत्कृतेन गुणेन दोषेण वाऽणुमात्रेणापि न संबध्यते इति। विवृतं चैतद्वृद्धैःनहि भूमिरूषरवती मृगतृट्जलवाहिनीं सरितमुद्वहति। मृगवारिपूरपरिपूरवती न नदी तथोषरभुवं स्पृशति। इति। एतेन कर्तृत्वकर्मत्वयोरनात्मधर्मत्वादनात्मनश्चानेकरूपत्वादेकत्रात्मनि तदुभयविरोधोद्भावनमपि निरस्तं वेदितव्यम्। एवं चार्वाकतार्किकाभिमतौ देहात्मकर्त्रात्मवादौ।हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम्। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति च हन्यते। इति काठकोक्तेन मन्त्रेण पूर्वार्धे पाठभेदात्पठितेन परिहृतौ वेदितव्यौ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.19।।ननु तथापि जीवस्य भगवदंशत्वे कथं हननमत आह य एनमिति। य एनं हन्तारं वेत्ति यश्च एनं हतं मन्यते तावुभावपि न विजानीतः। अयं न हन्ति न वा हन्यते। मदिच्छयैव सर्वं भवतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.19।।तदेवं भीष्मादिमृत्युनिमित्तः शोको निवारितः। यच्चात्मनो हन्तृत्वनिमित्तं दुःखमुक्तंएतान्न हन्तुमिच्छामि इत्यादिना तदपि तद्वदेव निर्निमित्तमित्याह  य एनमिति।  एनमात्मानम्। आत्मनो हननक्रियायां कर्मत्वं कर्तृत्वमपि नास्तीत्यर्थः। तत्र हेतुर्नायमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.19।।आत्मनो हन्तिकर्तृकर्मत्वज्ञानिनं निन्दति। य एनमिति हन्तेः सावयवशरीरवियोगकरणवाचित्वान्नायमात्मा हन्ति न हन्यते।न हिंस्यात् सर्वाभूतानि इत्यादिरपि शरीरदृष्ट्यभिप्रायेणोपपद्यते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.19।।जो तू मानता है कि मेरेद्वारा युद्धमें भीष्मादि मारे जायँगे मैं ही उनका मारनेवाला हूँ यह तेरी बुद्धि ( भावना ) सर्वथा मिथ्या है। कैसे जिसका वर्णन ऊपरसे आ रहा है इस आत्माको जो मारनेवाला समझता है अर्थात् हननक्रियाका कर्ता मानता है और जो दूसरा ( कोई ) इस आत्माको देहके नाशसे मैं नष्ट हो गया ऐसे नष्ट हुआ मानता है अर्थात् हननक्रियाका कर्म मानता है। वे दोनों ही अहंप्रत्ययके विषयभूत आत्माको अविवेकके कारण नहीं जानते। अभिप्राय यह कि जो शरीरके मरनेसे आत्माको मैं मारनेवाला हूँ मैं मारा गया हूँ इस प्रकार जानते हैं वे दोनों ही आत्मस्वरूपसे अनभिज्ञ हैं। क्योंकि यह आत्मा विकाररहित होनेके कारण न तो किसीको मारता है और न मारा जाता है अर्थात् न तो हननक्रियाका कर्ता होता है और न कर्म होता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.19।। व्याख्या  य एनं (टिप्पणी प0 59) वेत्ति हन्तारम्   जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है  वह ठीक नहीं जानता। कारण कि शरीरीमें कर्तापन नहीं है। जैसे कोई भी कारीगर कैसा ही चतुर क्यों न हो पर किसी औजारके बिना वह कार्य नहीं कर सकता ऐसे ही यह शरीरी शरीरके बिना स्वयं कुछ भी नहीं कर सकता। अतः तेरहवें अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि सब प्रकारकी क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं ऐसा जो अनुभव करता है वह शरीरीके अकर्तापनका अनुभव करता है (13। 29)। तात्पर्य यह हुआ है कि शरीरमें कर्तापन नहीं है पर यह शरीरके साथ तादात्म्य करके सम्बन्ध जोड़कर शरीरसे होनेवाले क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मान लेता है। अगर यह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े तो यह किसी भी क्रियाका कर्ता नहीं है। यश्चैनं मन्यते हतम्   जो इसको मरा मानता है वह भी ठीक नहीं जानता। जैसे यह शरीरी मारनेवाला नहीं है ऐसे ही यह मरनेवाला भी नहीं है क्योंकि इसमें कभी कोई विकृति नहीं आती। जिसमें विकृति आती है परिवर्तन होता है अर्थात् जो उत्पत्तिविनाशशील होता है वही मर सकता है। उभौ तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते   वे दोनों ही नहीं जानते अर्थात् जो इस शरीरीको मारनेवाला मानता है वह भी ठीक नहीं जानता और जो इसको मरनेवाला मानता है वह भी ठीक नहीं जानता।यहाँ प्रश्न होता है कि जो इस शरीरीको मारनेवाला और मरनेवाला दोनों मानता है क्या वह ठीक जानता है इसका उत्तर है कि वह भी ठीक नहीं जानता। कारण कि यह शरीरी वास्तवमें ऐसा नहीं है। यह नाश करनेवाला भी नहीं है और नष्ट होनेवाला भी नहीं है। यह निर्विकाररूपसे नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहनेवाला है। अतः इस शरीरीको लेकर शोक नहीं करना चाहिये।अर्जुनके सामने युद्धका प्रसंग होनेसे ही यहाँ शरीरीको मरनेमारनेकी क्रियासे रहित बताया गया है। वास्तवमें यह सम्पूर्ण क्रियाओंसे रहित है। सम्बन्ध   यह शरीरी मरनेवाला क्यों नहीं है इसके उत्तरमें कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.19।।अन्तवन्त इति। देहाः निरुपाख्याताकले (S निरुपाख्यकाले) स्थूलविनाशयोगिनः तदन्यथानुपपत्तेरेव च विनाशिनः प्रतिक्षणमवस्थान्तरभागिनः। यदुक्तम् अन्ते पुराणतां (S पुराणं दृष्ट्वा) दृष्ट्वा प्रतिक्षणं नवत्वहानिरनुमीयते इति। मुनिनापि कलानां पृथगर्थानां प्रतिभेदः क्षणे क्षणे।वर्तते सर्वभावेषु सौक्ष्म्यात्तु न विभाव्यते।।(M Santi. Moksa. Ch. 308 verse 121 ) इति।पृथगर्थानामति पृथगर्थक्रियाकारित्वादिति यावत्। देहा अन्तवन्तः विनाशिनश्च। आत्मा तु नित्यः यतोऽप्रमेयः। प्रमेयस्य तु जडस्य परिणामित्वम् न तु अजडस्य चिदेकरूपस्य स्वभावान्तरायोगात्। एवं देहा नित्यमन्तवन्त इति शोचितुमशक्याः। आत्मा नित्यमविनाशी तेन न शोचनार्हः। तन्त्रेण अयमेकः कृत्यप्रत्ययो द्वयोरर्थयोर्मुनिना दर्शितः अशोच्यान् इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.19।।अविनाशि तु तद्विद्धि इत्यत्र पूर्वार्धेन तत्पदार्थसमर्थनमुत्तरार्धेन निरीश्वरवादस्य परिणामवादस्य वा निराकरणमात्मनि जन्मादिप्रतिभानस्यौपचारिकत्वप्रदर्शनार्थमन्तवन्त इत्यादि वचनमिति केचित्। अस्तु नामायमपि पन्थाः। पूर्वोक्तस्य गीताशास्त्रार्थस्योत्प्रेक्षामात्रमूलत्वं निराकर्तुं मन्त्रद्वयं भगवानानीतवानिति श्लोकद्वयस्य संगतिं दर्शयति  शोकमोहादीति।  तत्र प्रथममन्त्रस्य संगतिमाह  यत्त्विति।  प्रत्यक्षनिबन्धनत्वादमुष्या बुद्धेर्मृषात्वमयुक्तमित्याक्षिपति  कथमिति।  प्रत्यक्षस्याज्ञानप्रसूतत्वेनाभासत्वात्तत्कृता बुद्धिर्न प्रमेति परिहरति  य एनमिति। हन्ता चेन्मन्यते हन्तुम् इत्याद्यामृचमर्थतो दर्शयित्वा व्याचष्टे  य   एनमिति।  हन्तारं हतं वात्मानं मन्यमानस्य कथमज्ञानमित्याशङ्क्याह  हन्ताहमिति।  हन्तृत्वादिज्ञानमज्ञानमित्यत्र हेतुमाह  यस्मादिति।  आत्मनो हननं प्रति कर्तृत्वकर्मत्वयोरभावे हेतुं दर्शयति  अविक्रियत्वादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.19।। य एन मिति। पुनरात्मनित्यत्वं किमित्युच्यत इति अतो नास्य नित्यत्वप्रतिपादने तात्पर्यम् किन्तु निष्टङ्कितं चेदात्मनो नित्यत्वं तर्हि का गतिस्तद्धननव्यवहारस्येत्याशङ्क्य तस्य भ्रान्तत्वमनेनोच्यत इत्याह  व्यवहार स्त्विति। व्यवहारोऽत्र ज्ञानम्। तथापिनायं हन्ति न हन्यते इति पुनरुक्तिरेवेति चेत् न ज्ञानानां प्रामाण्यस्य बाधकैकापोद्यत्वात्। कुतो बाधकादस्य भ्रान्तत्वमित्याशङ्क्य स्वपक्षसाधकानामेवोक्तहेतूनामेतद्बाधनेऽपि व्यापारप्रदर्शनार्थत्वादस्येत्याह  कुत  इति। नन्वत्र हननमेकमेव तत्कथमुभाविति कथं चनायं हन्ति न हन्यते इति अथैकस्या अपि क्रियायाः कारकभेदादेव मुक्तिस्तर्हि करणाधिकरणोक्तिरपि प्रसज्यत इति उच्यते आत्मनो नित्यत्वमिवास्वातन्त्र्यमपि प्राक्प्रतिपादितम्। यथोक्तं  तात्पर्यनिर्णये  तत्र हननव्यवहारवत्स्वातन्त्र्यव्यवहारस्यापि भ्रान्तत्वमनेनोच्यते इति उभावित्याद्युपपद्यते। अतएव भाष्यकारो व्यवहारस्त्विति सामान्येनाह न तु हननव्यवहार इति निष्कृष्य। ननु नित्यत्वे बिम्बनित्यत्वादयो हेतव उक्ताः अस्वान्तत्र्ये तु न कोऽपि तत्कथमुक्तहेतुभ्य इत्युक्तं इति चेत् न प्रतिबिम्बत्वस्योक्तत्वात् तस्य कथमस्वातन्त्र्ये हेतुत्वमित्यत आह  नही ति। क्रियेति वदताहन्तारं हन्ति इति पदद्वयमुपलक्षणार्थमिति सूचितम्। ननु प्रतिबिम्बस्यापि लोके क्रिया दृश्यते जीवस्य च क्रियाभावेकर्ता शास्त्रार्थवत्त्वात् ब्र.सू.2।3।33 इत्यादिविरोध इत्यत आह   स ही ति। बिम्बक्रियया बिम्बाधीनक्रियया। तथा च पूर्वं स्वातन्त्र्याभावापेक्षया क्रियाप्रतिषेध इति ज्ञातव्यम्। ननूपाधिक्रिययापि प्रतिबिम्बे क्रिया भवति तत्कथमुच्यते बिम्बक्रिययैवेतिमैवम् स्वातन्त्र्यप्रतिषेधे तात्पर्यात् जीवस्य पृथगुपाध्यभावाच्च। जीवस्येश्वराधीनक्रियत्वे श्रुतिं चाह  ध्यायती वेति। ईश्वरो जीवं ध्यायतीत्यर्थः। इवशब्दोऽल्पार्थे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.19।।व्यवहारस्तु भ्रान्त इत्याह य एनमिति। कुतः उक्तहेतुभ्यो नायं हन्ति न हन्यते। न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया। स हि बिम्बक्रिययैव क्रियावान्। ध्यायतीव बृ.उ.4।3।7 इति श्रुतेश्च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.19।। एनम्  उक्तस्वभावम् आत्मानं प्रति हन्तारं  हननहेतुकम् अपि  यो  मन्यते  यः च एनं  केन अपि हेतुना  हतं मन्यते उभौ तौ न विजानीतः।  उक्तैः हेतुभिः अस्य नित्यत्वाद् एव  अयं  हननहेतुः न भवति अत एव च अयम् आत्मा  न हन्यते।  हन्तिधातुः अपि आत्मकर्मकःशरीरवियोगकरणवाची।न हिंस्यात् सर्वा भूतानिब्राह्मणो न हन्तव्यः (क0 स्मृ0 8।2) इत्यादीनि अपि शास्त्राणि अविहितशरीरवियोगकरणविषयाणि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.19।।  य एनं  प्रकृतं देहिनं  वेत्ति  विजानाति  हन्तारं  हननक्रियायाः कर्तारं  यश्च एनम्  अन्यो  मन्यते हतं  देहहननेन हतः अहम् इति हननक्रियायाः कर्मभूतम्  तौ उभौ न विजानीतः  न ज्ञातवन्तौ अविवेकेन आत्मानम्। हन्ता अहम् हतः अस्मि अहम् इति देहहननेन आत्मानमहंप्रत्ययविषयं यौ विजानीतः तौ आत्मस्वरूपानभिज्ञौ इत्यर्थः। यस्मात् न  अयम्  आत्मा  हन्ति  न हननक्रियायाः कर्ता भवति  न  च  हन्यते  न च कर्म भवतीत्यर्थः अविक्रियत्वात्।।कथमविक्रय आत्मेति द्वितीयो मन्त्रः

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【 Verse 2.20 】

▸ Sanskrit Sloka: न जायते म्रियते वा कदाचि नायं भूत्वा भविता वा न भूय: | अजो नित्य: शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ||

▸ Transliteration: na jāyate mriyate vā kadācit nāyaṁ bhūtvā bhavitā vā na bhūyaḥ | ajo nityaḥ śāśvato ’yaṁ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre ||

▸ Glossary: na: never; jāyate: takes birth; mriyate: dies; vā: either; kadācit: at any time (past, present or future); na: never; ayaṁ: this; bhūtvā: having come into being; bhavitā: will come to be; vā: or; na: not; bhūyaḥ: after; ajaḥ: unborn; nityaḥ: eternal; śāśvataḥ: permanent; ayaṁ: this; purāṇaḥ: the oldest; na: never; ha- nyate: is killed; hanyamāne śarīre: when the body is killed

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.20 The Self is neither born nor does It ever die. After having been, It never ceases not to be. It is unborn, eternal, changeless and ancient. It is not killed when the body is killed.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.20।।यह शरीरी न कभी जन्मता है और न मरता है। यह उत्पन्न होकर फिर होनेवाला नहीं है। यह जन्मरहित नित्यनिरन्तर रहनेवाला शाश्वत और पुराण (अनादि) है। शरीरके मारे जानेपर भी यह नहीं मारा जाता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.20।। यह आत्मा किसी काल में भी न जन्मता है और न मरता है और न यह एक बार होकर फिर अभावरूप होने वाला है। यह आत्मा अजन्मा? नित्य? शाश्वत और पुरातन है? शरीर के नाश होने पर भी इसका नाश नहीं होता।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.20 न not? जायते is born? म्रियते dies? वा or? कदाचित् at any time? न not? अयम् this (Self)? भूत्वा having been? भविता will be? वा or? न not? भूयः (any) more? अजः unborn? नित्यः eternal? शाश्वतः changeless? अयम् this? पुराणः ancient? न not? हन्यते is killed? हन्यमाने being killed? शरीरे in body.Commentary This Self (Atman) is destitute of the six types of transformation or BhavaVikaras such as birth? existence? growth? transformation? decline and death. As It is indivisible (Akhanda). It does not diminish in size. It neither grows nor does It decline. It is ever the same. Birth and death are for the physical body only. Birth and death cannot touch the immortal? allpervading Self.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.20. This is neither born; nor ever dies; nor, having not been at one time, will This come to be again. This is unborn, destructionless, eternal and ancient and is not slain [even] when the body is slain.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.20 It was not born; It will never die, nor once having been, can It cease to be. Unborn, Eternal, Ever-enduring, yet Most Ancient, the Spirit dies not when the body is dead.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.20 It (the self) is never born; It never dies; having come into being once, It never ceases to be. Unborn, eternal, abiding and primeval, It is not slain when the body is slain.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.20 Never is this One born, and never does It die; nor is it that having come to exist, It will again cease to be. This One is birthless, eternal, undecaying, ancient; It is not killed when the body is killed.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.20 It is not born, nor does It ever die; after having been, It again ceases not to be; unborn, eternal, changeless and ancient, It is not killed when the body is killed.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.20 Na jayate etc. Having not been at one time, This etc. : this Self will come to be, having not been at any time non-existent, but only having been existent. Therefore This is not born, This does not die too. For, having been [at one time], This will never be non-existent [at another time]; but certainly This will be [always] existent.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.20 As the self is eternal for the reasons mentioned (above), and hence free from modifications, it is said that all the attributes of the insentient (body) like birth, death etc., never touch the self. In this connection, as the statement, 'It is never born, It never dies' is in the present tense, it should be understood that the birth and death which are experienced by all in all bodies, do not touch the self. The statement 'Having come into being once, It never ceases to be' means that this self, having emerged at the beginning of a Kalpa (one aeon of manifestation) will not cease to be at the end of the Kalpa (i.e., will emerge again at the beginning of the next Kalpa unless It is liberated). This is the meaning - that birth at the beginning of a Kalpa in bodies such as those of Brahman and others, and death at the end of a Kalpa as stated in the scriptures, do not touch the self. Hence, the selves in all bodies, are unborn, and therefore eternal. It is abiding, not connected, like matter, with invisible modifications taking place. It is primeval; the meaning is that It existed from time immemorial; It is even new i.e., It is capable of being experienced always as fresh. Therefore, when the body is slain the self is not slain.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.20 Na kadacit, neverl; is ayam, this One; jayate, born i.e. the Self has no change in the form of being born to which matter is subject ; va, and ( va is used in the sense of and); na mriyate, It never dies. By this is denied the final change in the form of destruction. The word (na) kadacit), never, is connected with the denial of all kinds of changes thus never, is It born never does It die, and so on. Since ayam, this Self; bhutva, having come to exist, having experienced the process of origination;

Chapter 2 (Part 13)

na, will not; bhuyah, again; abhavita, cease to be thereafter, therefore It does not die. For, in common parlance, that which ceases to exist after coming into being is said to die. From the use of the word va, nor, and na, it is understood that, unlike the body, this Self does not again come into existence after having been non-existent. Therefore It is not born. For, the words, 'It is born', are used with regard to something which comes into existence after having been non-existent. The Self is not like this. Therfore It is not born. Since this is so, therefore It is ajah, birthless; and since It does not die, therefore It is nityah, eternal. Although all changes become negated by the denial of the first and the last kinds of changes, still changes occuring in the middle [For the six kinds of changes see note under verse 2.10.-Tr.] should be denied with their own respective terms by which they are implied. Therefore the text says sasvatah, undecaying,. so that all the changes, viz youth etc., which have not been mentioned may become negated. The change in the form of decay is denied by the word sasvata, that which lasts for ever. In Its own nature It does not decay because It is free from parts. And again, since it is without alities, there is no degeneration owing to the decay of any ality. Change in the form of growth, which is opposed to decay, is also denied by the word puranah, ancient. A thing that grows by the addition of some parts is said to increase and is also said to be new. But this Self was fresh even in the past due to Its partlessness. Thus It is puranah, i.e. It does not grow. So also, na hanyate, It is puranah, i.e. It does not grow. So also, na hanyate, It is not killed, It does not get transformed; even when sarire, the body; hanyamane, is killed, transformed. The verb 'to kill' has to be understood here in the sense of transformation, so that a tautology [This verse has already mentioned 'death' in the first line. If the verb han, to kill, is also taken in the sense of killing, then a tautology is unavoidable.-Tr.] may be avoided. In this mantra the six kinds of transformations, the material changes seen in the world, are denied in the Self. The meaning of the sentence is that the Self is devoid of all kinds of changes. Since this is so, therefore 'both of them do not know' this is how the present mantra is connected to the earlier mantra.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.20।। इस श्लोक में बताया गया है कि शरीर में होने वाले समस्त विकारों से आत्मा परे है। जन्म अस्तित्व वृद्धि विकार क्षय और नाश ये छ प्रकार के परिर्वतन शरीर में होते हैं जिनके कारण जीव को कष्ट भोगना पड़ता है। एक र्मत्य शरीर के लिये इन समस्त दुख के कारणों का आत्मा के लिये निषेध किया गया है अर्थात् आत्मा इन विकारों से सर्वथा मुक्त है।शरीर के समान आत्मा का जन्म नहीं होता क्योंकि वह तो सर्वदा ही विद्यमान है। तरंगों की उत्पत्ति होती है और उनका नाश होता है परन्तु उनके साथ न तो समुद्र की उत्पत्ति होती है और न ही नाश। जिसका आदि है उसी का अन्त भी होता है। उत्ताल तरंगे ही मृत्यु की अन्तिम श्वांस लेती हैं। सर्वदा विद्यमान आत्मा के जन्म और नाश का प्रश्न ही नहीं उठता। अत यहाँ कहा है कि आत्मा अज और नित्य है।आत्मा में क्रिया के कर्तृत्व और विषयत्व का निषेध तथा उसके बाद तर्क के द्वारा उसके अविकारत्व को सिद्ध करने के बाद भगवान् इस विषय का उपसंहार करते हुये कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.20।।जायतेऽस्ति वर्धते विपरिणमतेऽपक्षीयते विनश्यति इति यास्कोक्तान्षड्भावविकारानात्मनि निराकुर्वंस्तस्याविक्रियत्वं साधयति  नेति।  कदाचित्पदं सर्वविक्रियाप्रतिषेधैः पदैः संबन्धनीयम्। न कदाचिज्जायते यतोऽयमात्मा न भूत्वा भूयः पुनर्भविता न यस्माच्च भूत्वा भवनक्रियामनुभूय भूयोऽभविताऽभावं गन्ता वा न तस्मान्न कदाचिन्म्रियते च। वाशब्दश्चार्थे। यद्वा अयं ना पुरुषो भूत्वा पुनर्भविता न अस्ति विक्रिययोग्यो नच भवतीत्यर्थः। अस्मिन्पक्षे द्वितीयोऽपि वाशब्दश्चार्थे। उक्तरीत्या ना अयमिति च्छेते पूर्वनकारस्य म्रियते इत्यनेन संबन्धः। न अयमिति च्छेदे त्वस्येति बोध्यम्। भाष्यकृद्भिस्तु सुगमत्वादयमर्थस्त्यक्तः। यतो न जायतेऽतोऽजः यतो न म्रियतेऽतो नित्यः। ये त्वन्ये अस्तु तर्हि क्षणिकविज्ञानधारारुपः तस्य विज्ञानवादिभिरजत्वनित्यत्वाभ्युपगमादित्याशङ्क्याह  भूत्वा भविता वा न भूय इति।  अयमित्यनुवर्तते। अयं भूत्वा भूयो भविता न भूयोऽसकृद्भूत्वा भवितेति भवनक्रियाद्वयस्य क्त्वाप्रत्ययोक्तसमानकर्तृत्वधारैव साभिप्रायेण भूत्वैव भविता नतु भूत्वा स्थित्वा विनश्यति तार्किकाणां हि विज्ञानं उत्पत्तिस्थितिनाशक्षणव्यापित्वात् त्रिक्षणावस्थायिविज्ञानवादिनां तु पूर्वस्य नाशक्षण एवोत्तरस्योत्पत्तिक्षणः सएव तस्य स्थितिक्षण श्चेति क्षणिकत्वाद्विज्ञानानां भवनक्रियाद्वयस्याव्यवधानाद्भूत्वा भवितेत्युक्तम्। तादृशोऽप्ययं नेत्यादिवर्णयन्ति तैर्विकारनिषेधोपक्रमादिविरोधस्य परिहारः प्रदर्शनीयः। एतेनाज्ञत्वान्न जायते नित्यत्वान्न म्रियते इत्यपि प्रत्युक्तम्। नायं भूत्वेत्यादेर्हेतुत्वस्य भाष्यकारैः प्रदर्शितत्वेन न जायत इत्यादेरेव हेतुत्वौचित्यात्। एवं जन्मनाशास्तित्वरुपविकारत्रयं निराकृत्यावशिष्टान्विकारान्निराकरोति  शाश्वत इत्यादिना।  शश्वद्भवः शाश्वत इत्यनेनापक्षयस्य निरवयवत्वान्निर्गुणत्वात्। पुराप्यभिनवः पुराण इत्यनेन वृद्धिरुपस्य हन्यमाने विपरिणम्यमाने शरीरे न हन्यते न विपरिणभ्यत इत्यनेन विपरिणाभस्य विकारस्य प्रतिषेधः। तथाच भाष्यम्हन्तिरत्र विपरिणामार्थो द्रष्टव्योऽपुनरुक्तातायै। अस्मिन्श्लोके षट्भावविकारा लौकिकवस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते। सर्वप्रकारविक्रियारहित आत्मेति वाक्यार्थः। यस्मादेवं तस्मादुभौ तौ न विजानीत इति पूर्वेण संबन्ध इति। एतेनास्तित्वपरिणामौ जन्मविनाशान्तर्भूतत्वात्पृथङ्न निषिद्धौ यस्मादेतत्सर्वविकारशून्य आत्मा तस्माच्छरीरे हन्यमाने तत्संबद्धोऽपि केनाप्युपायेन न हन्यते न हन्तुं शक्यते इत्युपसंहार इति प्रत्युक्तम्। आद्यन्तविकारयोर्निषेधे मध्यतनानां निषेधे सिद्धेऽपि तेषामुपादानमवस्थान्तरक्रियान्तरोपलक्षणार्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.20।।कस्मादयमात्मा हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति अविक्रियत्वादित्याह द्वितीयेन मन्त्रेण जायतेऽस्ति वर्धते विपरिणमतेऽपक्षीयते विनश्यति इति षड्भावविकारा इति वार्ष्यायणिरिति नैरुक्ताः। तत्राद्यन्तयोर्निषेधः। क्रियते न जायते म्रियते वेति। वाशब्दः समुच्चयार्थः। न जायते न म्रियते चेत्यर्थः। कस्मादयमात्मा नोत्पद्यते यस्मादयमात्मा कदाचित्कस्मिन्नपि काले न भूत्वा अभूत्वा प्राक् भूयः पुनरपि भविता न। यो ह्यभूत्वा भवति स उत्पत्तिलक्षणां विक्रियामनुभवति। अयं तु प्रागपि सत्त्वाद्यतो नोत्पद्यतेऽतोऽजः। तथायमात्मा भूत्वा प्राक् कदाचित् भूयः पुनः न भविता। न वा शब्दाद्वाक्यविपरिवृत्तिः। यो हि प्राग्भूत्वोत्तरकाले न भवति स मृतिलक्षणां विक्रियामनुभवति अयं तूत्तरकालेऽपि सत्त्वाद्यतो न म्रियतेऽतो नित्यः। विनाशायोग्य इत्यर्थः। अत्र न भूत्वेत्यत्र समासाभावेऽपि नानुपपत्तिर्नानुयाजेष्वितिवत्। भगवता पणिनिना महाविभाषाधिकारे नञ्समासपाठात्। यत्तु कात्यायनेनोक्तंसमासनित्यताभिप्रायेण वा वचनानर्थक्यं तु स्वभावसिद्धत्वात् इति तत् भगवत्पाणिनिवचनविरोधादनादेयम्। तदुक्तमाचार्यशबरस्वामिनाअसद्वादी हि कात्यायनः इति। अत्र न जायते म्रियते वेति प्रतिज्ञा कदाचिन्नायं भूत्वा भविता वा न भूय इति तदुपपादनं अजो नित्य इति तदुपसंहार इति विभागः। आद्यन्तयोर्विकारयोर्निषेधेन मध्यवर्तिविकाराणां तद्व्याप्यानां निषेधे जातेऽपि गमनादिविकाराणामनुक्तानामप्युपलक्षणयापक्षयश्च वृद्धिश्च स्वशब्देनैव निराक्रियते। तत्र कूटस्थनित्यत्वादात्मनो निर्गुणत्वाच्च न स्वरूपतो गुणतो वापक्षयः संभवतीत्युक्तं शाश्वत इति। शश्वत्सर्वदा भवति नापक्षीयते नापचीयत इत्यर्थः। यदि नापक्षीयते तर्हि वर्धतामिति नेत्याह पुराण इति। पुरापि नव एकरूपो नत्वधुना नूतनां कांचिदवस्थामनुभवति। यो हि नूतनां कांचिदुपचयावस्थामनुभवति स वर्धत इत्युच्यते लोके। अयं तु सर्वदैकरूपत्वान्नापचीयते नोपचीयते चेत्यर्थः। अस्तित्वविपरिणामौ तु जन्मविनाशान्तर्भूतत्वात्पृथङ्निषिद्धौ। यस्मादेवं सर्वविकारशून्य आत्मा तस्माच्छरीरे हन्यमाने तत्संबद्धोऽपि केनाप्युपायेन न हन्यते न हन्तुं शक्यत इत्युपसंहारः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.20।।नायं हन्ति न हन्यत इत्युक्तं तत्र न हन्यत इत्येतदुपपादयति तत्रस्थेनैव द्वितीयेन मन्त्रेण  न जायत इति।  अयं आत्मा कदाचित् न जायते अभिनवो नोत्पद्यते। न वा म्रियते निरन्वयो न नश्यति। तार्किकाभिमतघटवत्। तत्र क्रमेण हेतुद्वयम्  अजो नित्य इति।  अजत्वान्न जायते। नित्यत्वाच्च न वा म्रियत इत्यर्थः। अस्तु तर्हि क्षणिकविज्ञानधारारूपः। तस्याविज्ञानवादिभिरजत्वनित्यत्वाभ्युपगमादित्याशङ्क्याह  भूत्वा भविता वा न भूय इति।  अयमित्यनुवर्तते। अयं भूत्वा भूयो भविता न। भूयोऽसकृत् भूत्वा भवितेति भवनक्रियाद्वयस्य क्त्वाप्रत्ययोक्तं समानकर्तृत्वं धारैक्याभिप्रायेण। भूत्वैव भविता न तु भूत्वा स्थित्वा विनश्यति। तार्किकाणां हि विज्ञानमुत्पत्तिस्थितिनाशक्षणव्यापित्वात्ित्रक्षणावस्थायि। विज्ञानवादिना तु पूर्वस्य नाशक्षण एवोत्तरस्योत्पत्तिक्षणः स एव तस्य स्थितिक्षणश्चेति क्षणिकत्वाद्विज्ञानानां भवनक्रियाद्वयस्याव्यवधानाद्भूत्वा भवितेत्युक्तम्। तादृशोऽप्ययं न यतः शाश्वतः शश्वदेकरूपः। योऽहं बाल्ये पितरावन्वभूवं सोऽहं स्थाविरे प्रणप्तृ़ननुभवामीति बाल्यस्थाविरयोरात्मैक्यप्रत्यभिज्ञानात्। न च सादृश्यात्प्रत्यभिज्ञानम्। सादृश्यग्रहीतुः स्थिरस्याभावात्। यद्वा जन्ममरणहीनोऽपि धर्मान्तरविशिष्टः पूर्वं भूत्वा पुनर्धर्मान्तरविशिष्टो भवति इत्यपि न। भूत्वैव भविता नत्वभूत्वेति योजना। अर्हता हि शरीरपरिमाणमात्मानमभ्युपगच्छन्तो नित्यस्यैवात्मनः क्रमेण व्युत्क्रमेण वा मशकमनुजमतंगजशरीरप्राप्तौ परिमाणभेदं मन्यमाना भूतस्यैवात्मनो विशेषणीभूतपरिमाणभवनादौपचारिकं भवनमभ्युपगच्छन्ति तदपि न। शाश्वतत्वादेव उपचयापचयवतो मध्यमपरिमाणस्य वस्तुनो नित्यत्वायोगात्। अनेनैव सुखदुःखादिधर्मान्तरोत्पत्त्यात्मनो भाक्तं भूत्वा भवनं प्रत्याख्येयम्। नहि दुःखादिधर्मिणः स्वनाशमन्तरेणात्यन्तिकदुःखोच्छेदः संभवति। घटादौ यावद्रूपनाशादर्शनात्। नन्वजत्वं नित्यत्वं शाश्वत्वं चाकाशेऽप्यस्ति अत आह  पुराण इति।  पुरा वियदादिसृष्टेः प्रागपि नव एव। एतेन अपक्षयादिधर्मराहित्यान्मुख्यमजत्वादिकं आत्मन एव वियदादेस्त्वमुख्यं तदिति दर्शितम्। अतएव शरीरे हन्यमाने न हन्यते। भाष्ये तु वाशब्दश्चार्थे। न जायते म्रियते चेत्यर्थः। तत्रोपपत्तिः अयं न भूत्वा अनुत्पद्य न भविता घटादिवदतो न जायते। अथवा नञः पूर्वान्वयित्वं न जायते न वा म्रियत इति। यतो भूत्वा अभविता घटवद्विनाशी न अतो न म्रियत इति। शाश्वतः पुराण इत्येताभ्यामुपचयापचयौ निषिध्येते इति न हन्यते न विपरिणम्यत इति च व्याख्यातम्। केचिदेवमाहुः। न जायते म्रियत इति प्रतिज्ञा। कदाचिदित्यादिना तस्या उपपादनम्। अज इत्यादिरुपसंहार इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.20।।मारणादिसम्भावना तु जन्मादिभावे सति भवति तदेव नास्तीत्याह न जायत इति। जन्माभावो निरूपितः।न वा कदाचिन्म्रियते अनेन मरणनिषेधो निरूपितः। अयं भूत्वा भूयः न भविता। अत्रायमर्थः मत्क्रीडनार्थं सृष्टौ येन भावेन पूर्वं यथा विभावितः तथा तेनैव भावेन पुनर्न भविष्यति। तस्माद्यदर्थं मयोत्पादितस्तदेव मत्प्रीत्यर्थं कुर्यादन्यथा जन्मवैयर्थ्यं स्यात्। भूत्वेत्युक्तत्वात् जन्मशङ्का स्यात्तदर्थमाह अजः न जायत इत्यर्थः मदंशत्वात्। एवम्भूत एवायमित्याह नित्य इति। किञ्च शाश्वतः। मयि स्थित एव निरन्तरमेकभावात्मकः। किञ्च पुराणः सर्वदैवमेव मत्सेवार्थं दासरूपः पुराणोऽपि नव एवेत्यर्थः। यदर्थमेतदुक्तं तदाह न हन्यत इति। हन्यमाने शरीरे गतोऽयं जीवस्तस्मिन्हते न हन्यते इत्यर्थः। अयमर्थः हन्यमाने अन्तयुक्ते लौकिके देहे प्रविष्ट इत्यर्थः।हन्यमाने इत्यनेन तदर्थसृष्टत्वं ज्ञापितम्। तस्माद्भगवदिच्छानुरूपकरणान्नातिभ्रमजन्योऽपि दोषः स्यादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.20।।   न हन्यत इत्येतदेव षड्भावविकारशून्यत्वेन द्रढयति  नेति।  न जायत इति जन्मप्रतिषेधः। न म्रियते चेति विनाशप्रतिषेधः। वाशब्दौ चार्थे। नचायं भूत्वा उत्पद्य भविता भवति अस्तित्वं भजते। किंतु प्रागेव स्वतः सद्रूप इति जन्मानन्तरास्तित्वलक्षणद्वितीयविकारप्रतिषेधः। तत्र हेतुः यस्मादजः। यो हि जायते स जन्मानन्तरमस्तित्वं भजते नतु यः स्वयमेवास्ति स भूयोऽप्यन्यदस्तित्वं भजत इत्यर्थः। नित्यः सर्वदैकरुप इति वृद्धिप्रतिषेधः। शाश्वतः शश्वद्भव इत्यपक्षयप्रतिषेधः। पुराण इति विपरिणामप्रतिषेधः। पुरापि नव एव नतु परिणामतो रुपान्तरं प्राप्य नवो भवतीत्यर्थः। यद्वा न भवितेत्यस्यानुषङ्गं कृत्वा भूयोऽधिकं यथा भवति तथा न भवतीति वृद्धिप्रतिषेधः। अजो नित्य इति चोभयवृद्ध्यभावे हेतुरित्यपौनरुक्त्यम्। तदेवंजायते अस्ति वर्धते विपरिणमते अपक्षीयते नश्यतीत्येवं यास्कादिभिर्वेदवादिभिरुक्ताः षड्भावविकारा निरस्ताः। यदर्थमेते विकारा निरस्तास्तं प्रस्तुतं विनाशाभावमुपसंहरति न हन्यते हन्यमाने शरीर इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.20।।उक्तेऽर्थे प्रमाणभूताः काटकश्रुतयो दर्शयन्ति।न जायते इत्यादिनोत्पत्त्यस्तित्वनाशरूपा विकारा अन्ये चात्मनिषिद्धाः। अज इत्यादिना निगमनम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.20।।आत्मा निर्विकार कैसे है इसपर दूसरा मन्त्र ( इस प्रकार है ) यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता अर्थात् उत्पत्तिरूप वस्तुविकार आत्मामें नहीं होता और यह मरता भी नहीं। वा शब्द यहाँ च के अर्थमें है। मरता भी नहीं इस कथनसे विनाशरूप अन्तिम विकारका प्रतिषेध किया जाता है। कदाचित् शब्द सभी विकारोंके प्रतिषेधके साथ सम्बन्ध रखता है। जैसे यह आत्मा न कभी जन्मता है न कभी मरता है इत्यादि। जिससे कि यह आत्मा उत्पन्न होकर अर्थात् उत्पत्तिरूप विकारका अनुभव करके फिर अभावको प्राप्त होनेवाला नहीं है इसलिये मरता नहीं क्योंकि जो उत्पन्न होकर फिर नहीं रहता वह मरता है इस प्रकार लोकमें कहा जाता है। वा शब्दसे और न शब्दसे यह भी पाया जाता है कि यह आत्मा शरीरकी भाँति पहले न होकर फिर होनेवाला नहीं है इसलिये यह जन्मता नहीं क्योंकि जो न होकर फिर होता है वहीं जन्मता है यह कहा जाता है। आत्मा ऐसा नहीं है इसलिये नहीं जन्मता। ऐसा होनेके कारण आत्मा अज है और मरता नहीं इसलिये नित्य है। यद्यपि आदि और अन्तके दो विकारोंके प्रतिषेधसे ( बीचके ) सभी विकारोंका प्रतिषेध हो जाता है तो भी बीचमें होनेवाले विकारोंका भी उनउन विकारोंके प्रतिषेधार्थक खासखास शब्दोंद्वारा प्रतिषेध करना उचित है। इसलिये ऊपर न कहे हुए जो यौवनादि सब विकार हैं उनका भी जिस प्रकार प्रतिषेध हो ऐसे भावको शाश्वत इत्यादि शब्दोंसे कहते हैं सदा रहनेवालेका नाम शाश्वत है शाश्वत शब्दसे अपक्षय ( क्षय होना ) रूप विकारका प्रतिषेध किया जाता है क्योंकि आत्मा अवयवरहित है इस कारण स्वरूपसे उसका क्षय नहीं होता और निर्गुण होनेके कारण गुणोंके क्षयसे भी उसका क्षय नहीं होता। पुराण इस शब्दसे अपक्षयके विपरीत जो वृद्धिरूप विकार है उसका भी प्रतिषेध किया जाता है। जो पदार्थ किसी अवयवकी उत्पत्तिसे पुष्ट होता है। वह बढ़ता है नया हुआ है ऐसे कहा जाता है परंतु यह आत्मा तो अवयवरहित होनेके कारण पहले भी नया था अतः पुराण है अर्थात् बढ़ता नहीं। तथा शरीरका नाश होनेपर यानी विपरीत परिणामको प्राप्त हो जानेपर भी आत्मा नष्ट नहीं होता अर्थात् दुर्बलतादि अवस्थाको प्राप्त नहीं होता। यहाँ हन्ति क्रियाका अर्थ पुनरुक्तिदोषसे बचनेके लिये विपरीत परिणाम समझना चाहिये इसलिये यह अर्थ हुआ कि आत्मा अपने स्वरूपसे बदलता नहीं। इस मन्त्रमें लौकिक वस्तुओंमें होनेवाले छः भावविकारोंका आत्मामें अभाव दिखलाया जाता है। आत्मा सब प्रकारके विकारोंसे रहित है यह इस मन्त्रका वाक्यार्थ है। ऐसा होनेके कारण वे दोनों ही ( आत्मस्वरूपको ) नहीं जानते। इस प्रकार पूर्व मन्त्रसे इसका सम्बन्ध है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.20।। व्याख्या   शरीरमें छः विकार होते हैं उत्पन्न होना सत्तावाला दीखना बदलना बढ़ना घटना और नष्ट होना  (टिप्पणी प0 60.1) । यह शरीरी इन छहों विकारोंसे रहित है यही बात भगवान् इस श्लोकमें बता रहे हैं  (टिप्पणी प0 60.2) । न जायते म्रियते वा कदाचिन्न   जैसे शरीर उत्पन्न होता है ऐसे यह शरीरी कभी भी किसी भी समयमें उत्पन्न नहीं होता। यह तो सदासे ही है। भगवान्ने इस शरीरीको अपना अंश बताते हुए इसको सनातन कहा है  ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः  (15। 7)।यह शरीरी कभी मरता भी नहीं। मरता वही है जो पैदा होता है और  म्रियते  का प्रयोग भी वहीं होता है जहाँ पिण्डप्राणका वियोग होता है। पिण्डप्राणका वियोग शरीरमें होता है। परन्तु शरीरीमें संयोगवियोग दोनों ही नहीं होते। यह ज्योंकात्यों ही रहता है। इसका मरना होता ही नहीं।सभी विकारोंमें जन्मना और मरना ये दो विकार ही मुख्य हैं अतः भगवान्ने इनका दो बार निषेध किया है जिसको पहले  न जायते  कहा उसीको दुबारा  अजः  कहा है और जिसको पहले  न म्रियते  कहा उसीको दुबारा  न हन्यते हन्यमाने शरीरे  कहा है। अयं भूत्वा भविता वा न भूयः   यह अविनाशी नित्यतत्त्व पैदा होकर फिर होनेवाला नहीं है अर्थात् यह स्वतःसिद्ध निर्विकार है। जैसे बच्चा पैदा होता है तो पैदा होनेके बाद उसकी सत्ता होती है। जबतक वह गर्भमें नहीं आता तबतक बच्चा है ऐसे उसकी सत्ता (होनापन) कोई भी नहीं कहता। तात्पर्य है कि बच्चेकी सत्ता पैदा होनेके बाद होती है क्योंकि उस विकारी सत्ताका आदि और अन्त होता है। परन्तु इस नित्यतत्त्वकी सत्ता स्वतःसिद्ध और निर्विकार है क्योंकि इस अविकारी सत्ताका आरम्भ और अन्त नहीं होता। अजः   इस शरीरीका कभी जन्म नहीं होता। इसलिये यह  अजः  अर्थात् जन्मरहित कहा गया है।  नित्यः   यह शरीरी नित्यनिरन्तर रहनेवाला है अतः इसका कभी अपक्षय नहीं होता। अपक्षय तो अनित्य वस्तुमें होता है जो कि निरन्तर रहनेवाली नहीं है। जैसे आधी उम्र बीतनेपर शरीर घटने लगता है बल क्षीण होने लगता है इन्द्रियोंकी शक्ति कम होने लगती है। इस प्रकार शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदिका तो अपक्षय होता है पर शरीरीका अपक्षय नहीं होता। इस नित्यतत्त्वमें कभी किञ्चन्मात्र भी कमी नहीं आती। शाश्वतः  यह नित्यतत्त्व निरन्तर एकरूप एकरस रहनेवाला है। इसमें अवस्थाका परिवर्तन नहीं होता अर्थात् यह कभी बदलता नहीं। इसमें बदलनेकी योग्यता है ही नहीं। पुराणः   यह अविनाशी तत्त्व पुराण (पुराना) अर्थात् अनादि है। यह इतना पुराना है कि यह कभी पैदा हुआ ही नहीं। उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें भी देखा जाता है कि जो वस्तु पुरानी हो जाती है वह फिर बढ़ती नहीं प्रत्युत नष्ट हो जाती है फिर यह तो अनुत्पन्न तत्त्व है इसमें बढ़नारूप विकार कैसे हो सकता है तात्पर्य है कि बढ़नारूप विकार तो उत्पन्न होनेवाली वस्तुओंमें ही होता है इस नित्यतत्त्वमें नहीं। न हन्यते हन्यमाने शरीरे   शरीरका नाश होनेपर भी इस अविनाशी शरीरीका नाश नहीं होता। यहाँ  शरीरे  पद देनेका तात्पर्य है कि यह शरीर नष्ट होनेवाला है। इस नष्ट होनेवाले शरीरमें ही छः विकार होते हैं शरीरीमें नहीं।इन पदोंमें भगवान्ने शरीर और शरीरीका जैसा स्पष्ट वर्णन किया है ऐसा स्पष्ट वर्णन गीतामें दूसरी जगह नहीं आया है।अर्जुन युद्धमें कुटुम्बियोंके मरनेकी आशंकासे विशेष शोक कर रहे थे। उस शोकको दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि शरीरके मरनेपर भी इस शरीरीका मरना नहीं होता अर्थात् इसका अभाव नहीं होता। इसलिये शोक करना अनुचित है। सम्बन्ध   उन्नीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया कि यह शरीरी न तो मारता है और न मरता ही है। इसमें मरनेका निषेध तो बीसवें श्लोकमें कर दिया अब मारनेका निषेध करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.20।।य एनमिति। एनमात्मानं देहं च यो हन्तारं हतं च वेत्ति तस्याज्ञानम्। अत एव स बद्धः ( S सम्बन्धः)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.20।।तदेव साधयितुं न जायते म्रियते वा विपश्चिदित्यादिमन्त्रान्तरमवतारयति  कथमिति।  सर्वविक्रियाराहित्यप्रदर्शनेन हेतुं विशदयन्मन्त्रमेव पठति  न जायत इति।  जन्ममरणविक्रियाद्वयप्रतिषेधं साधयति  नायमिति।  अयमात्मा भूत्वा नाभविता न वा भूत्वा भूयो भवितेति योजना। न केवलं विक्रियाद्वयमेवात्र निषिध्यते किंतु सर्वमेव विक्रियाजातमित्याह  अज इति।  वाच्यमर्थमुक्त्वा विवक्षितमर्थमाह  जनिलक्षणेति।  विकल्पार्थत्वं व्यावर्तयति  वेति।  निष्पन्नमर्थं निर्दिशति  नेत्यादिना।  संबन्धमेवाभिनयति  न   कदाचिदिति।  अन्त्यविक्रियाभावे हेतुत्वेन नायमित्यादि व्याचष्टे  यस्मादिति।  उक्तमेव व्यनक्ति  यो हीति।  आत्मनि तु भूत्वा पुनर्भवनाभावान्नास्ति मृत्युरित्यर्थः। आत्मनो जन्माभावेऽपि हेतुरिहैव विवक्षित इत्याह  वाशब्दादिति।  अभूत्वेति च्छेदः। देहवदिति व्यतिरेकोदाहरणम्। उक्तमेवार्थं साधयति  यो हीति।  जन्माभावे तत्पूर्विकास्तित्वविक्रियापि नात्मनोऽस्तीत्याह  यस्मादिति।  प्राणवियोगादात्मनो मृतेरभावे सावशेषनाशाभाववन्निरवशेषनाशाभावोऽपि सिध्यतीत्याह  यस्मादिति।  ननुजन्मनाशयोर्निषेधे तदन्तर्गतानां विक्रियान्तराणामपि निषेधसिद्धेस्तन्निषेधार्थं न पृथक्प्रयतितव्यमिति तत्राह  यद्यपीति।  स्वशब्दैः मध्यवर्तिविक्रियानिषेधवाचकैरिति यावत्। आर्थिकेऽपि निषेधे निषेधस्य सिद्धतया शाब्दो निषेधो न पृथगर्थवानित्याशङ्क्याह  अनुक्तानामिति।  नित्यशब्देन शाश्वतशब्दस्य पौनरुक्त्यं परिहरन्व्याकरोति  शाश्वत इत्यादिना।  अपक्षयो हि स्वरूपेण वा स्याद्गुणापचयतो वेति विकल्प्य क्रमेण दूषयति  नेत्यादिना।  पुराणपदस्यागतार्थत्वं कथयति  अपक्षयेति।  तदेव स्फुटयति  यो हीति।  न म्रियते वेत्यनेन चतुर्थपादस्य पौनरुक्त्यमाशङ्क्य व्याचष्टे  तथेत्यादिना।  ननु हिंसार्थो हन्तिः श्रूयते तत्कथं विपरिणामो निषिध्यते तत्राह  हन्तिरिति।  हिंसार्थत्वसंभवे किमित्यर्थान्तरं हन्तेरिष्यते तत्राह  अपुनरुक्तताया   इति।  हिंसार्थत्वे मृतिनिषेधेन पौनरुक्त्यं स्यात्तन्निषेधार्थं विपरिणामार्थत्वमेष्टव्यमित्यर्थः। पूर्वावस्थात्यागेनावस्थान्तरापत्तिर्विपरिणामस्तदर्थश्चेदत्र हन्तिरिष्यते तदा निष्पन्नमर्थमाह  नेति।  न जायत इत्यादिमन्त्रार्थमुपसंहरति  अस्मिन्निति।  षण्णां विकाराणामात्मनि प्रतिषेधे फलितमाह  सर्वेति।  आत्मनः सर्वविक्रियाराहित्येऽपि किमायातमित्याशङ्क्याह  यस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.20।।तथापिन जायते इति पुनरुक्तमित्याशङ्क्य नेदं भगवद्वाक्यं किन्तूक्तार्थे सम्मतित्वेन मन्त्रवर्णोऽयमुदाह्रियत इत्याह  अत्रे ति। ननु जीवः स्वरूपेण भूत्वा देहसम्बन्धेन भवितैव तत्कथमुच्यतेभूत्वा भविता न इतीत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे  न चे ति। जीवो न जायते चेत्तर्हि यथेश्वरज्ञानं वृद्धिह्रासादिवर्जितं भूत्वैव कयाचिदचिन्त्यया शक्त्या भूतमिति व्यवहारालम्बनं तथा जीवेऽपि किं जननव्यवहारस्तन्निमित्त इति पृच्छायां नेत्यनेनोच्यत इत्यर्थः। नन्वीश्वरज्ञानस्योक्तप्रकारं भूत्वा भवनं कुतः सिद्धम् येन जीवस्य तथाभावासम्भावनायोदाह्रियते इत्यत आह  तद्धी ति। तदीश्वरज्ञानस्योक्तप्रकारेण भूत्वा भवनं श्रुतिस्मृतिसिद्धं हीति सम्बन्धः। तदैक्षत छां.उ.6।2।3 इति भवनमुच्यते देवदत्तोऽपश्यदितिवत्।  देशत  इति वृद्धिह्रासादिराहित्यम्। नन्वीश्वरवदित्येव कस्मान्नोक्तम् नैवं शङ्क्यं लोकदर्शनस्याधिकस्य तत्रोत्पादात्अजो नित्यः इति पुनरुक्तमित्याशङ्क्य तन्निवर्त्यामाशङ्कामुक्त्वाऽन्यथा व्याचष्टे  कुत  इति।न जायते म्रियते इत्येतत्कस्मात्कारणादित्यर्थः। अजादीत्यनेन्अजो नित्यः शाश्वतः इति व्याख्यातम्। शाश्वत इत्येतन्नित्य इत्यनेन गतार्थमित्यन्यथा व्याचष्टे  शाश्वत  इति। तथा चाजो नित्य इत्याभ्यां बिम्बोत्पत्तिनाशनिमित्तौ शाश्वत इत्यनेनोपाधिबिम्बसन्निधिजनननाशनिमित्तौ जन्मनाशौ न स्त इत्युक्तं भवति। तथाप्यज इत्युक्तत्वात्पुराणं इति पुनरुक्तिरिति चेत् न भूत्वा भविता वा नेत्युक्तम्। तत्कुतः किंनिमित्तश्च तर्हि जननव्यवहारः इत्याशङ्क्य देहान्तरप्राप्तिरस्यास्तीत्यनेनोच्यत इत्याह   पुर मिति। एवमपि न हन्यत इति पुनरुक्तिरिति चेत् न यदि पुराणस्तर्हि उपाधिभूतदेहनाशाद्दर्पणनाशात्प्रतिबिम्बनाशवदात्मनाशः स्यादित्याशङ्काऽत्र पूर्वाभिप्रायेण परिह्रियत इति भावेनाह  तथापी ति पुराणत्वेऽपि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.20।।अत्र मन्त्रवर्णोऽप्यस्तीत्याह न जायत इति। नचेश्वरज्ञानवद्भूत्वा भविता। तद्धि तदैक्षत छां.उ.6।2।3देशतः कालतो योऽसाववस्थातः स्वतोऽन्यतः। अविलुप्तावबोधात्मा इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धम्। कुतः अजादिलक्षणेश्वरसरूपत्वात्। शाश्वतः सदेकरूपः। पुरं देहमणतीति पुराणः। तथापि न हन्यते हन्यमानेऽपि देहे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.20।।उक्तैः एव हेतुभिः नित्यत्वाद् अपरिणामित्वाद् आत्मनो जन्ममरणादयः सर्व एव अचेतनदेहधर्मा न सन्ति इति उच्यते।तत्र  न जायते म्रियत  इति वर्तमानतया सर्वेषु देहेषु सर्वैः अनुभूयमाने जन्ममरणे  कदाचिद्  अपि आत्मानं न स्पृशतः।  नायं भूत्वा भवति वा न भूयः  अयं कल्पादौ भूत्वा भूयः कल्पान्ते च न भविता इति न। केषुचित् प्रजापतिप्रभृतिदेहेषु आगमेन उपलभ्यमानं कल्पादौ जननं कल्पान्ते च मरणम् आत्मानं न स्पृशति इत्यर्थः।अतः सर्व देहगत आत्मा  अजः  अत एव  नित्यः   शाश्वतः  प्रकृतिवदविशदसततपरिणामैः अपि न अन्वीयते। अतः पुराणः पुरातनः अपि नवः सर्वदा अपूर्ववद् अनुभाव्य इत्यर्थः। अतः  शरीरे हन्यमाने  अपि  न हन्यते अयम्  आत्मा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.20।।  न जायते  न उत्पद्यते जनिलक्षणा वस्तुविक्रिया न आत्मनो विद्यते इत्यर्थः। तथा  न म्रियते वा । वाशब्दः चार्थे। न म्रियते च इति अन्त्या विनाशलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते।  कदाचिच्छ ब्दः सर्वविक्रियाप्रतिषेधैः संबध्यते न कदाचित् जायते न कदाचित् म्रियते इत्येवम्। यस्मात्  अयम्  आत्मा  भूत्वा  भवनक्रियामनुभूय पश्चात्  अभविता  अभावं गन्ता  न भूयः  पुनः तस्मात् न म्रियते। यो हि भूत्वा न भविता स म्रियत इत्युच्यते लोके। वाशब्दात् न शब्दाच्च अयमात्मा अभूत्वा वा भविता देहवत् न भूयः। तस्मात् न जायते। यो हि अभूत्वा भविता स जायत इत्युच्यते। नैवमात्मा। अतो न जायते। यस्मादेवं तस्मात्  अजः  यस्मात् न म्रियते तस्मात्  नित्य श्च। यद्यपि आद्यन्तयोर्विक्रिययोः प्रतिषेधे सर्वा विक्रियाः प्रतिषिद्धा भवन्ति तथापि मध्यभाविनीनां विक्रियाणां स्वशब्दैरेव प्रतिषेधः कर्तव्यः अनुक्तानामपि यौवनादिसमस्तविक्रियाणां प्रतिषेधो यथा स्यात् इत्याह  शाश्वत  इत्यादिना। शाश्वत इति अपक्षयलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते। शश्वद्भवः शाश्वतः। न अपक्षीयते स्वरूपेण निरवयवत्वात्। नापि गुणक्षयेण अपक्षयः निर्गुणत्वात्। अपक्षयविपरीतापि वृद्धिलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते पुराण इति। यो हि अवयवागमेन उपचीयते स वर्धते अभिनव इति च उच्यते।  अयं  तु आत्मा निरवयवत्वात् पुरापि नव एवेति  पुराणः  न वर्धते इत्यर्थः। तथा  न हन्यते । हन्तिः अत्र विपरिणामार्थे द्रष्टव्यः अपुनरुक्ततायै। न विपरिणम्यते इत्यर्थः। हन्यमाने  विपरिणम्यमानेऽपि  शरीरे । अस्मिन् मन्त्रे षड् भावविकारा लौकिकवस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते। सर्वप्रकारविक्रियारहित आत्मा इति वाक्यार्थः। यस्मादेवं तस्मात् उभौ तौ न विजानीतः इति पूर्वेण मन्त्रेण अस्य संबन्धः।।य एनं वेत्ति हन्तारम् इत्यनेन मन्त्रेण हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति इति प्रतिज्ञाय न जायते इत्यनेन अविक्रियत्वं हेतुमुक्त्वा प्रतिज्ञातार्थमुपसंहरति

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【 Verse 2.21 】

▸ Sanskrit Sloka: वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् | कथं स पुरुष: पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ||

▸ Transliteration: vedāvināśinaṁ nityaṁ ya enamajamavyayam I kathaṁ sa puruṣaḥ pārtha kaṁ ghātayati hanti kam ||

▸ Glossary: veda: knows; avināśinaṁ: indestructible; nityaṁ: permanent; yaḥ: one who; enaṁ: this (soul); ajam: unborn; avyayam: immutable; kathaṁ: how; saḥ: he; puruṣaḥ: person; pārtha: O Pārtha (Arjuna); kaṁ: whom; ghātayati: hurts; hanti: kills; kaṁ: whom

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.21 O Pārtha, how can man slay or cause others to be slain, when he knows It to be indestructible, eternal, unborn, and unchangeable?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.21।।हे पृथानन्दन जो मनुष्य इस शरीरीको अविनाशी नित्य जन्मरहित और अव्यय जानता है वह कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.21।। हे पार्थ जो पुरुष इस आत्मा को अविनाशी? नित्य और अव्ययस्वरूप जानता है? वह कैसे किसको मरवायेगा और कैसे किसको मारेगा

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.21 वेद knows? अविनाशिनम् indestructible? नित्यम् eternal? यः who? एनम् this (Self)? अजम् unborn? अव्ययम् inexhaustible? कथम् how? सः he (that)? पुरुषः man? पार्थ O Partha (son of Pritha)? कम् whom? घातयति causes to be slain? हन्ति kills? कम् whom.Commentary The enlightened sage who knows the immutable and indestructible Self through direct cognition or spiritual Anubhava (experience) cannot do the act of slaying. He cannot cause another to slay also.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.21. Whosever realises This to be changeless, destructionless, unborn and immutable, how can that person be slain; how can he either slay [any one] ? O son of Prtha !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.21 He who knows the Spirit as Indestructible, Immortal, Unborn, Always-the-Same, how should he kill or cause to be killed?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.21 He who knows this (self) to be indestructible, unborn, unchanging and hence eternal - how and whom, O Arjuna, does he cause to be killed, and whom he kill?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.21 O Partha, he who knows this One as indestructible, eternal, birthless and undecaying, how and whom does that person kill, or whom does he cause to be killed! [This is not a estion but only an emphatic denial.-Tr.]

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.21 Whosoever knows It to be indestructible, eternal, unborn and inexhaustible, how can that man slay, O Arjuna, or cause to be slain?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.21 Veda etc. Whosoever, because of his realisation, under-stands this Self as 'This neither slays [any one]. nor is This slain [by any one] - how could there be any bondage for him ?

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.21 He who knows the self to be eternal, as It is indestructible, unborn and changeless - how can that person be said to cause the death of the self, be it of the self existing in the bodies of gods or animals or immovables? Whom does he kill? The meaning is - how can he destroy any one or cause anyone to slay? How does he become an instrument for slaying? The meaning is this: the feeling of sorrow: 'I cause the slaying of these selves, I slay these,' has its basis solely in ignorance about the true nature of the self.

Let it be granted that what is done is only separation of the bodies from the eternal selves. Even then, when the bodies, which are instruments for the experience of agreeable pleasures, perish, there still exists reason for sorrow in their separation from the bodies. To this (Sri Krsna) replies:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.21 In the mantra, 'He who thinks of this One as the killer,' having declared that (the Self) does not become the agent or the object of the actof killing, and then in the mantra, 'Never is this One born,' etc., having stated the reasons for (Its) changelessness, the Lord sums up the purport of what was declared above: He who knows this One as indestructible, etc. Yah, he who; veda, knows yah is to be thus connected with Veda ; enam, this One, possessing the characteristics stated in the earlier mantra; as avinasinam, indestructible, devoid of the final change of state; nityam, eternal, devoid of transformation; ajam, birthless; and avyayam, undecaying; katham, how, in what way; (and kam, whom;) does sah, that man of realization; purusah, the person who is himself an authority [i.e. above all injunctions and prohibitions. See 18.16.17.-Tr.]; hanti, kill, undertake the act of killing; or how ghatayati, does he cause (others) to be killed, (how does he) instigate a killer! The intention is to deny both (the acts) by saying, 'In no way does he kill any one, nor does he cause anyone to be killed', because an interrogative sense is absurd (here). Since the implication of the reason [The reason for the denial of killing etc. is the changelessness of the Self, and this reason holds good with regard to all actions of the man of realization.-Tr.], viz the immutability of the Self, [The A.A. omits 'viz the immutability of the Self'.-Tr.] is common (with regard to all actions), therefore the negation of all kinds of actions in the case of a man of realization is what the Lord conveys as the only purport of this context. But the denial of (the act of) killing has been cited by way of an example. Objection: By noticing what special reason for the impossibility of actions in the case of the man of realization does the Lord deny all actions (in his case) by saying, 'How can that person,' etc.? Vedantin: Has not the immutability of the Self been already stated as the reason [Some readings omit this word.-Tr.] , the specific ground for the impossibility of all actions? Objection: It is true that it has been stated; but that is not a specific ground, for the man of realization is different from the immutable Self. Indeed, may it not be argued that action does not become impossible for one who has known as unchanging stump of a tree?! Vedantin: No, because of man of Knowledge is one with the Self. Enlightenment does not belong to the aggregate of body and senses. Therefore, as the last laternative, the knower is the Immutable and is the Self which is not a part of the aggregate. Thus, action being impossible for that man of Knowledge, the denial in, 'How can that person৷৷.,' etc. is reasonable. As on account of the lack of knowledge of the distinction between the Self and the modifications of the intellect, the Self, though verily immutable, is imagined through ignorance to be the perceiver of objects like sound etc. presented by the intellect etc., in this very way, the Self, which in reality is immutable, is said to be the 'knower' because of Its association with the knowledge of the distinction between the Self and non-Self, which (knowledge) is a modification of the intellect [By buddhi-vrtti, modification of the intellect, is meant the transformation of the internal organ into the form of an extension upto an object, along with its past impressions, the senses concerned, etc., like the extension of the light of a lamp illuminating an object. Consciousness reflected on this transformation and remaining indistinguishable from that transformation revealing the object, is called objective knowledge. Thery, due to ignorance, the Self is imagined to be the perceiver because of Its connection with the vrtti, modification. (-A.G.) The process is elsewhere described as follows: The vrtti goes out through the sense-organ concerned, like the flash of a torchlight, and along with it goes the reflection of Consciousness. Both of them envelop the object, a pot for instance. The vrtti destroys the ignorance about the pot; and the reflection of Consciousness, becoming unified with only that portion of it which has been delimited by the pot, reveals the pot. In the case of knowledge of Brahman, it is admitted that the vrtti in the form, 'I am Brahman', does reach Brahman and destroys ignorance about Brahman, but it is not admitted that Brahman is revealed like a 'pot', for Brahman is self-effulgent.-Tr.] and is unreal by nature. From the statement that action is impossible for man of realization it is understood that the conclusion of the Lord is that, actions enjoined by the scriptures are prescribed for the unenlightened. Objection: Is not elightenment too enjoined for the ignorant? For, the injunction about enlightenment to one who has already achieved realization is useless, like grinding something that has already been ground! This being so, the distinction that rites and duties are enjoined for the unenlightened, and not for the enlightened one, does not stand to reason. Vedantin: No. There can reasonable be a distinction between the existence or nonexistence of a thing to be performed. As after the knowledge of the meaning of the injunction for rites like Agnihotra etc. their performance becomes bligatory on the unenlightened one who thinks, 'Agnihotra etc. has to be performed by collecting various accessories; I am the agent, and this is my duty', unlike this, nothing remains later on to be performed as a duty after knowing the meaning of the injunction about the nature of the Self from such texts as, 'Never is this One born,' etc. But apart from the rise of knowledge regarding the unity of the Self, his non-agency, etc., in the form, 'I am not the agent, I am not the enjoyer', etc., no other idea arises. Thus, this distinction can be maintained. Again, for anyone who knows himself as, 'I am the agent', there will necessarily arise the idea, 'This is my duty.' In relation to that he becomes eligible. In this way duties are (enjoined) [Ast. adds 'sambhavanti, become possible'.-Tr.] for him. And according to the text, 'both of them do not know' (19), he is an unenlightened man. And the text, 'How can that person,' etc. concerns the enlightened person distinguished above, becuase of the negation of action (in this text). Therefore, the enlightened person distinguished above, who has realized the immutable Self, and the seeker of Liberation are alified only for renunciation of all rites and duties. Therefore, indeed, the Lord Narayana, making a distinction between the enlightened man of Knowledge and the unenlightened man of rites and duties, makes them take up the two kinds of adherences in the text, 'through the Yoga of Knowledge for the men of realization; through the Yoga of Action for the yogis' (3.3). Similarly also, Vyasa said to his son, 'Now, there are these two paths,' etc. ['Now, there are these two paths on which the Vedas are based. They are thought of as the dharma characterized by engagement in duties, and that by renunciation of them' (Mbh. Sa. 241.6).-Tr.] So also (there is a Vedic text meaning): 'The path of rites and duties, indeed, is the earlier, and renunciation comes after that.' [Ast. says that this is not a otation, but only gives the purport of Tai, Ar. 10.62.12.-Tr.] The Lord will show again and again this very division: 'The unenlightened man who is deluded by egoism thinks thus: "I am the doer"; but the one who is a knower of the facts (about the varieties of the gunas) thinks, "I do not act"' (cf. 3.27,28). So also there is the text, '(The embodied man of selfcontrol,) having given up all actions mentally, continues (happily in the town of nine gates)' (5.13) etc. With regard to this some wiseacres say: In no person does arise the idea, 'I am the changeless, actionless Self, which is One and devoid of the six kinds of changes beginning with birth to which all things are subject', on the occurrence of which (idea alone) can renunciation of all actions be enjoined. That is not correct, because it will lead to the needlessness of such scriptural instructions as, 'Never is this One born,' etc. (20). They should be asked: As on the authority of scripural instructions there arises the knowledge of the existence of virtue and vice and the knowledge regarding an agent who gets associated with successive bodies, similarly, why should not there arise from the scriptures the knowledge of unchangeability, non-agentship, oneness, etc. of that very Self? Objection: If it be said that this is due to Its being beyond the scope of any means (of knowledge)? Vedantin: No, because the Sruti says, 'It is to be realized through the mind alone, (following the instruction of the teacher)' (Br. 4.4.19). The mind that is purified by the instructions of the scriptures and the teacher, control of the body and organs, etc. becomes the instrument for realizing the Self. Again, since there exist inference and scriptures for Its realization, it is mere bravado to say that Knowledge does not arise. And it has to be granted that when knowledge arises, it surely eliminates ignorance, its opposite. And that ignorance has been shown in, 'I am the killer', 'I am killed', and 'both of them do not know' (see 2.19). And here also it is shown that the idea of the Self being an agent, the object of an action, or an indirect agent, is the result of ignorance. Also, the Self being changeless, the fact that such agentship etc. are cuased by ignorance is a common factor in all actions without exception, because only that agent who is subject to change instigates someone else who is different from himself and can be acted on, saying, 'Do this.' Thus, with a view to pointing out the absence of fitness for rites and duties in the case of an enlightened person, the Lord [Ast, adds vasudeva after 'Lord'.-Tr.] says, 'He who knows this One as indestructible,' 'how can that person,' etc. thery denying this direct and indirect agentship of an enlightened person in respect of all actions without exception. As regards the estion, 'For what, again, is the man of enlightenment alified?', the answer has already been give earlier in, 'through the Yoga of Knowledge for the men of realization' (3.3). Similarly, the Lord will also speak of renunication of all actions in, 'having given up all actions mentally,' etc.(5.13). Objection: May it not be argued that from the expression, 'mentally', (it follows that) oral and bodily actions are not to be renounced? Vedantin: No, because of the categoric expression, 'all actions'. Objection: May it not be argued that 'all actions' relates only to those of the mind? Vedantin: No, because all oral and bodily actions are preceded by those of the mind, for those actions are impossible in the absence of mental activity. Objection: May it not be said that one has to mentally renounce all other activities except the mental functions which are the causes of scriptural rites and duties performed through speech and body? Vedantin: No, because it has been specifically expressed: 'without doing or causing (others) to do anything at all' (5.13). Objection: May it not be that this renunciation of all actions, as stated by the Lord, is with regard to a dying man, not one living? Vedantin: No, because (in that case) the specific statement, 'The embodied man৷৷.continues happily in the town of nine gates' (ibid.) will become illogical since it is not possible

Chapter 2 (Part 14)

for a dead person, who neither acts nor makes others act, [The words 'akurvatah akarayatah, (of him) who neither acts nor makes others act', have been taken as a part of the Commentator's arguement. But A.G. points out that they can also form a part of the next Objection. In that, case, the translation of the Objection will be this: Can it not be that the construction of the sentence (under discussion) is Neither doing nor making others do, he rest by depositing (sannyasya, by renouncing) in the body', but not 'he rests in the body by renouncing৷৷.'?] to rest in that body after renouncing all actions.

Objection: Can it not be that the construction of the sentence (under discussion) is, '(he rests) by depositing (sannyasya, by renouncing) in the body', (but) not 'he rests in the body by renouncing৷৷.'? Vedantin: No, because everywhere it is categorically asserted that the Self is changeless. Besides, the action of 'resting' reires a location, whereas renunciation is independent of this. The word nyasa preceded by sam here means 'renunciation', not 'depositing'. Therefore, according to this Scripture, viz the Gita, the man of realization is eligible for renunciation, alone, not for rites and duties. This we shall show in the relevant texts later on in the cotext of the knowledge of the Self. And now we shall speak of the matter on hand: As to that, the indestructibility [Indestructibility suggests unchangeability as well.] of the Self, has been postulated. What is it like? That is being said in, 'As after rejecting wornout clothes,' etc.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.21।। आत्मा की वर्णनात्मक परिभाषा नहीं दी जा सकती परन्तु उसका संकेत नित्य अविनाशी आदि शब्दों के द्वारा किया जा सकता है। यहाँ इस श्लोक में प्रश्नार्थक वाक्य के द्वारा पूर्व श्लोकों में प्रतिपादित सिद्धान्त की ही पुष्टि करते हैं कि जो पुरुष अविनाशी आत्मा को जानता है वह कभी जीवन की वास्तविकताओं का सामना करने में शोकाकुल नहीं होता।आत्मा के अव्ययअविनाशी अजन्मा और शाश्वत स्वरूप को जान लेने पर कौन पुरुष स्वयं पर कर्तृत्व का आरोप कर लेगा भगवान् कहते हैं कि ऐसा पुरुष न किसी को मारता है और न किसी के मरने का कारण बनता है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि इस वाक्य का सम्बन्ध स्वयं भगवान् तथा अर्जुन दोनों से ही है। यदि अर्जुन इस तथ्य को स्वयं समझ लेता है तो उसे स्वयं को अजन्मा आत्मा का हत्यारा मानने का कोई प्रश्न नहीं रह जाता है।किस प्रकार आत्मा अविनाशी है अगले श्लोक में एक दृष्टांत के द्वारा इसे स्पष्ट करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.21।।   नायं हन्ति न हन्ति न हन्यते इति मन्त्रकृतां प्रतिज्ञां न जायत इति मन्त्रेणात्मनो विक्रियत्वकथनपरेणोपपाद्य स्वयमुपसंहरति  वेदेति।  एतेन न हन्ति न हन्यत इति प्रतिज्ञाय न हन्यत इत्युपपादितम्। इदानीं न हन्तीत्युपपादयतीति परास्तम्। कस्मादयमात्मा हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति अविक्रियत्वादित्याह द्वितीयेन मन्त्रेणेति स्वपूर्वग्रन्थविरोधादन्यथा मन्त्रे न्यूनतापत्तेश्च। एतेन नायं हन्ति न हन्यत इत्युक्तं तत्र न हन्यत इत्येतदुपपादयति न जायत इति न हन्तीत्येतदुपपादयति वेदेतीत्यपि परास्तम्। एनं पूर्वमन्त्रेणोक्तस्वरुपविनाशिनमन्त्यविकाररहितं नित्यमविपरिणामिनम्। अव्ययमपक्षयरहितं तत्र हेतुरजं जन्मरहितत्वात्सर्वविकारशून्यं यो वेद जानाति सोऽविक्रियः स्वात्मदर्शी विद्वान्कं कथं घातयति हन्तारं प्रयोजयति तथा कं हन्ति न कथंचित्कंचिदपीत्यर्थः। तथा त्वमपि विद्वान्भूत्वा स्वयं हननकर्ता शिखण्ड्यादिप्रयोजकश्चेति कर्तृत्वकारयितृत्वे स्वस्मिन्माऽध्यारोपयेत्याशयः। ननु न विनष्टुं शीलमस्य तमविनाशिनमन्त्यविकाररहितं तत्र हेतुरव्ययं न विद्यते व्ययोऽवयवापचयो गुणापचयो वा यस्य तमव्ययं अवयवापचयेन गुणापचयेन वा विनाशदर्शनात्तदुभयरहितस्य न विनाश संभवतीत्यर्थः। ननु जन्यत्वे विनाशित्वमनुमास्यामहे नेत्याह  अजमिति।  न जायत इत्यजमाद्यविकाररहितं तत्र हेतुर्नित्यं सर्वदा विद्यामानं प्रागविद्यमानस्य हि जन्म दृष्टं नतु सर्वदा रत इत्यभिप्रायः। अथवाऽविनाशिनमबाध्यं सत्यमिति यावत्। नित्यं सर्वव्यापकं तत्र हेतुरजमव्ययं जन्मविनाशशून्यं जायमानस्य विनश्यतश्च सर्वव्यापकत्वसत्यत्वयोरयोगात्। यद्वा विनष्टुमदर्शनं गन्तुं शीलमस्येति विनाशि रज्जूरगतुल्यमुपाधित्रयं स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराख्यं ततोऽन्यमविनाशिनम्। अतएव नित्यं नाशहीनं। तत्र हेतुः अजं। जन्मवान्हि अनित्यः अयं त्वजत्वान्नित्यश्चेत्यर्थः। ननु विनाशिनः स्वकार्यापेक्षयान्यत्वमजत्वं नित्यत्वं च सांख्याभिमते प्रधाने तार्किकाभिमते नभसि चास्त्यत उक्तमव्ययमिति। न व्येति पूर्वावस्थां न त्यजतीत्यव्ययम्। परिणामि प्रधानं तुचलं गुणवृत्तम् इति न्यायेन गुणसाभ्यावस्थायामपि परिणममानमेव सर्वदास्तीति तेषामभ्युपगमात्। आकाशस्यापितस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इत्युत्पत्तिश्रवणादन्तवत्त्वभावादेव नाव्ययत्वमित्येवमाचार्यैः कुतो न व्याख्यातमिति चेत् सर्वविक्रियाशून्यमेनं यो वेदेति प्रकृतानुसारिवाक्यार्थस्यर्जुमार्गेण सभ्यक्संभवे क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वमभिप्रत्येति गृहाण। तथाच एनं नित्यमविनाशिनं सदैव नाशरहितं नत्वाकाशादिवद्य्ववहारदशायां नाशरहितं अतएवाजं जन्मरहितं नित्यम्। अविनाशिनो जन्यत्वायोगात् एतएवाव्ययं सदैकरसं यो वेदेत्यर्थः। यद्वा एनं नित्यं तत्र हेतुविनाशिनम्। अविनाशित्वे हेतुरजमव्ययमपक्षयरहितम्। यद्वा एनमविनाशिनमजमव्ययं यो नित्यं सदैव वेदेत्यर्थः। अथवा वेद आ विनाशिनमिति छेदः। अज्ञानेंनावृतत्वादासमन्ताददर्शनं गतमेनं यो नित्यं सच्चिदानन्दात्मना सदैव सन्तं अज्ञानावृतत्वाद्रज्जुशकलवत्तस्यासत्त्वाभावात्। तथा ज्ञानेन जातः क्षीण इति प्रतीयमानमप्यजं अवययं यो वेदेत्यादि यत्किंचित्कल्पनस्य बालैप्यस्मदादिभिः सुकरत्वेन मार्गप्रदर्शकानां सर्वज्ञानां भाष्यकृतामुक्तकल्पनाकरणप्रयुक्ता न्यूनता न प्रदर्शनीयेति ध्येयम्। यत्त्वर्जुनो हि स्वस्मिन्कर्तृत्वं भगवति च कारयितृत्वमध्यस्य हिंसानिमित्तं दोषमुभयत्राप्याशशङ्के भगवानपि विदिताभिप्रायो हन्ति घातयतीति तदुभयमाचिक्षेप। आत्मनि कर्तृत्वं मयि च कारयितृत्वामारोप्य प्रत्यवायशङ्कां मा कार्षीरित्यभिप्राय इति कैश्चिदुक्तं तन्न। आत्मज्ञानरहितस्य हिंसानिबन्धनपापभयात् स्वधर्माद्युद्धान्निवृत्तस्यार्जुनस्यात्मस्वरुपतदुपायभूतधर्मबोधनपरेण गीताशास्त्रेण सर्वेणापि बोधनं भगवता क्रियत इति स्पष्टप्रतिपत्त्या आशशङ्के। शङ्का मा कार्षीरित्यस्य निरर्थकत्वात् य इति मन्त्रोत्थापकाया अस्याः शङ्काया असंभवस्य तत्रैवोक्तत्वाच्च। हननक्रियानिषेधः क्रियामात्रनिषेधस्योपलक्षणार्थः। असंहतस्यात्मस्वरुपस्य विदुषः कर्मासंभवात्प्रबलप्रारब्धवशाद्वाधितानुवृत्त्या। कर्मसंभवेऽपि तस्य कर्तृत्वाभिमानाभावेन कर्मणां फलाजनकत्वाद्वस्तुगत्या तेषासंभवस्य सुवचत्वात्। तस्मात्फलाभिसंधिकर्तृत्वाभिमानपूर्वको ज्ञस्य कर्मणि मुख्योऽधिकारः। ननु विद्यायामप्यविदुष एवाधिकारः। तथाच भाष्यंतमेतमविद्याख्यमात्मानात्मनोरितरेतराध्यासं पुरस्कृत्य सर्वे प्रमाणप्रेमयव्यवहारा लौकिका वैदिकाश्च प्रवृत्ताः सर्वाणि च शास्त्राणि विधिप्रतिषेधमोक्षपराणि कथं पुनरविद्यावद्विषयाणि प्रत्यक्षादीनि प्रमाणानि शास्त्राणि चेति। उच्यते देहेन्द्रियादिष्वहंममाभिमानहीनस्य प्रमातृत्वानुपपत्तौ प्रमाणप्रवृत्त्यनुपपत्तेरित्यादि। अयमर्थः प्रमातृत्वं हि प्रमां प्रति कर्तृत्वं तच्च स्वातन्त्रयं स्वातन्त्रयं च इतरकारकाप्रयोज्यस्य प्रमातुः समस्तकारकप्रयोक्तृत्वं तदनेन प्रमाणं प्रयोजनीयं नच स्वव्यापारमन्तरेण करणं प्रयोक्तुं शक्यते इति। नहि कूटस्थनित्यश्चिदात्मा परिणामी स्वतो व्यापारवान्भवितुमर्हति तस्माद्य्वा पारवद्वुद्य्धादितादात्म्याध्यासाद्य्वापारवत्तया प्रमाणमधिष्कतुमर्हितीति भवत्यविद्यावत्पुरुषविषयत्वमविद्यावत्पुरुषाश्रयत्वं प्रमाणानामिति चेत्सत्यम्। तथापि कर्मनियोगार्थबोधानन्तरमहं कर्ता ममेदं कर्तव्यमित्येवंप्रकारज्ञानवतोऽनेकसाधनोपसंहारपूर्वकं यथाकर्मानुष्ठेयं न तथा न जायत इत्यादावात्मस्वरुपविध्यर्थज्ञानान्तरं किंचिदनुष्ठेयं भवति किंतु नाहं कर्ता न भोक्तेत्यादिज्ञानद्वयात्मैकत्वाकर्तृत्वाभोक्तृत्वज्ञानादन्यत्किंचिदनुष्ठेयं भवतीत्येष विशेष इति स्पष्टं चेदं भाष्ये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.21।।नायं हन्ति न हन्यते इति प्रतिज्ञाय न हन्यत इत्युपपादितं इदानीं न हन्तीत्युपपादयन्नुपसंहरति न विनष्टुं शीलं यस्य तमविनाशिनमन्त्यविकाररहितम्। तत्र हेतुः अव्ययं न विद्यते व्ययोऽवयवापचयो गुणापचयो वा यस्य तमव्ययम्। अवयवापचयेन गुणापचयेन वा विनाशदर्शनात्तदुभयरहितस्य न विनाशः संभवतीत्यर्थः। ननु जन्यत्वेन विनाशित्वमनुमास्यामहे नेत्याह अजमिति। न जायत इत्यजमाद्यविकाररहितम्। तत्र हेतुः नित्यं सर्वदा विद्यमानम्। प्रागविद्यमानस्य हि जन्म दृष्टं नतु सर्वदा सत इत्यभिप्रायः। अथवा अविनाशिनमबाध्यं सत्यमिति यावत्। नित्यं सर्वव्यापकम्। तत्र हेतुः। अजमव्ययं जन्मविनाशशून्यं जायमानस्य विनश्यतश्च सर्वव्यापकत्वसत्यत्वयोरयोगात्। एवं सर्वविक्रियाशून्यं प्रकृतमेनं देहिनं स्वमात्मानं यो वेद विजानाति शास्त्राचार्योपदेशाभ्यां साक्षात्करोति अहं सर्वविक्रियाशून्यः सर्वभासकः सर्वद्वैतरहितः परमानन्दबोधरूप इति स एवं विद्वान्पुरुषः पूर्णरूपः कं हन्ति कथं हन्ति। किंशब्द आक्षेपे। न कमपि हन्ति न कथमपि हन्तीत्यर्थः। तथा कं घातयति। कथं घातयति। कमपि न घातयति कथमपि न घातयतीत्यर्थः। नहि सर्वविकारशून्यस्याकर्तुर्हननक्रियायां कर्तृत्वं संभवति। तथाच श्रुतिःआत्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः। किमिच्छन्कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् इति। शुद्धमात्मानं विदुषस्तदज्ञाननिबन्धनाध्यासनिवृत्तौ तन्मूलरागद्वेषाद्यभावात्कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यभावं दर्शयति। अयमत्राभिप्रायो भगवतः वस्तुगत्या कोऽपि न करोति न कारयति च किंचित् सर्वविक्रियाशून्यस्वभावत्वात् परंतु स्वप्न इवाविद्यया कर्तृत्वादिकमात्मन्यभिमन्यते मूढः। तदुक्तंउभौ तौ न विजानीतः इति। श्रुतिश्चध्यायतीव लेलायतीव इत्यादि। अतएव सर्वाणि शास्त्राण्यविद्वदधिकारिकाणि। विद्वांस्तु समूलाध्यासबाधान्नात्मनि कर्तृत्वादिकमभिमन्यते स्थाणुस्वरूपं विद्वानिव चोरत्वम्। अतो विक्रियारहितत्वादद्वितीयत्वाच्च विद्वान्न करोति कारयति चेत्युच्यते। तथाच श्रुतिःविद्वान्न बिभेति कुतश्चन इति। अर्जुनो हि स्वस्मिन्कर्तृत्वं भगवति च कारयितृत्वमध्यस्य हिंसानिमित्तं दोषमुभयत्राप्याशशंङ्के। भगवानपि विदिताभिप्रायो हन्ति घातयतीति तदुभयमाचिक्षेप। आत्मनि कर्तृव्यं मयि च कारयितृत्वमारोप्य प्रत्यवायशङ्कां मा कार्षीरित्यभिप्रायः। अविक्रियत्वप्रदर्शनेनात्मनः कर्तृत्वप्रतिषेधात्सर्वकर्माक्षेपे भगवदभिप्रेते हन्तिरुपलक्षणार्थः। पुरःस्फूर्तिकत्वात् प्रतिषेधहेतोस्तुल्यत्वात्कर्मान्तराभ्यनुज्ञानुपपत्तेः। तथाच वक्ष्यतितस्य कार्यं न विद्यते इति। अतोऽत्र हननमात्राक्षेपेण कर्मान्तर भगवताभ्यनुज्ञायत इति मूढजनजल्पितमपास्तम्। तस्माद्युध्यस्वेत्यत्र हननस्य भगवताभ्यनुज्ञानात् वास्तवकर्तृत्वाद्यभावस्य कर्ममात्रे समत्वादिति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.21।।नायं हन्तीत्येतदुपपादयति  वेदेति।  विनष्टुं अदर्शनं गन्तुं शीलमस्येति विनाशि रज्जूरगतुल्यमुपाधित्रयं स्थूलसूक्ष्मकारणशरीराख्यं ततोऽन्यं अविनाशिनम्। अतएव नित्यं नाशहीनम्। तत्र हेतुः अजम्। जन्मवान् हि अनित्यः अयं तु अजत्वान्नित्यश्चेत्यर्थः। ननु विनाशिनः स्वकार्यापेक्षया नित्यत्वं च सांख्याभिमते प्रधाने तार्किकाभिमते नभसि चास्त्यत उक्तं अव्ययमिति। न व्येति पूर्वावस्थां त्यजतीत्यव्ययमपरिणामि। प्रधानं तुचलं गुणवृत्तम् इति न्यायेन गुणसाम्यावस्थायामपि परिणममाणमेव सर्वदास्तीति तेषामभ्युपगमात्। आकाशस्यापितस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः इति उत्पत्तिश्रवणादजत्वाभावादेव नाव्ययत्वम्। तादृशं आत्मानं यो वेद अपरोक्षीकरोति स पुमान् कथं केन प्रकारेण कमन्यं घातयति हननक्रियायां प्रवर्तयति। कं वा हन्ति। न केनचित्प्रकारेण कमपि घातयति न वा हन्तीत्यर्थः। द्वैताभावात्। तथाहि श्रुतिर्विद्यावस्थायां सर्वकारकव्यापारं निषेधति।यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत् इत्यादि। अविद्यावस्थायामेव च सर्वकारकव्यवहारं दर्शयति।यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति इत्यादि। एतेन सर्वकारकोपमर्दिन्या विद्यायाः सर्वकारकसापेक्षैः कर्मभिः सह समुच्चयो निरस्तः। परस्परविरुद्धस्वभावत्वेन शीतोष्णयोरिव द्वयोरेककार्यकारित्वस्य रथाश्वन्यायेनासंभवादित्यन्यत्र विस्तरः। मादृशानां ज्ञानिनां व्युत्थानकाले अविद्यालेशानुवृत्त्या घातयितृत्वादेः प्रसक्तावपि विद्यया तस्य बाधितत्वादागामिकर्मणामश्लेषाच्च न दोषः। तथा च वक्ष्यतेहत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.21।।किञ्च अस्य मारणादिदोषबुद्धावज्ञानमेव कारणमित्याह वेदाविनाशिनमिति। अविनाशिनं विशेषविकाररहितं नित्यं सदैकरूपं अजं जन्मादिरहितं मयैव लीलार्थं तथाकृतम् अव्ययं नाशादिशून्यं य एवं वेद स पुरुषः कथं केन साधनेन कं स्वयं प्रेरको भूत्वाऽन्येन घातयति न कमपीत्यर्थः। स्वयं च कं हन्ति न कञ्चिदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.21।।अतएव हन्तृत्वाभावोऽपि पूर्वोक्तः प्रसिद्ध इत्याह  वेदेति।  नित्यं वृद्धिशून्यम् अव्ययमपक्षयशून्यम् अजमविनाशिनं च यो वेद स पुरुषः कं हन्ति कथं वा हन्ति। एवंभूतस्य वधे साधनाभावात्। तथा स्वयं प्रयोजको भूत्वाऽन्येन कं घातयति। न कंचिदपि कथंचिदपीत्यर्थः। अनेन मय्यपि प्रयोजकत्वाद्दोषदृष्टिं मा कार्षीरित्युक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.21।।निर्विकारात्मज्ञानोत्पन्नं फलमाह वेदाविनाशिनमिति। कथमिति प्रकारनिषेधः। कं हन्तीति कर्मकर्तृत्वम् घातयतीति प्रयोजकत्वं च निषिध्यते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.21।।य एनं वेत्ति हन्तारम् इस मन्त्रसे आत्मा हननक्रियाका कर्ता और कर्म नहीं है यह प्रतिज्ञा करके तथा न जायते इस मन्त्रसे आत्माकी निर्विकारताके हेतुको बतलाकर अब प्रतिज्ञापूर्वक कहे हुए अर्थका उपसंहार करते हैं पूर्व मन्त्रमें कहे हुए लक्षणोंसे युक्त इस आत्माको जो अविनाशी अन्तिम भावविकाररूप मरणसे रहित नित्य रोगादिजनित दुर्बलता क्षीणता आदि विकारोंसे रहित अज जन्मरहित और अव्यय अपक्षयरूप विकारसे रहित जानता है। वह आत्मतत्त्वका ज्ञाताअधिकारी पुरुष कैसे ( किसको ) मारता है और कैसे ( किसको ) मरवाता है अर्थात् वह कैसे तो हननरूप क्रिया कर सकता और कैसे किसी मारनेवालेको नियुक्त कर सकता है अभिप्राय यह कि वह न किसीको किसी प्रकार भी मारता है और न किसीको किसी प्रकार भी मरवाता है। इन दोनों बातोंमे किम् और कथम् शब्द आक्षेपके बोधक हैं क्योंकि प्रश्नके अर्थमें यहाँ इनका प्रयोग सम्भव नहीं। निर्विकारतारूप हेतुका तात्पर्य सभी कर्मोंका प्रतिषेध करनेमें समान है इससे इस प्रकरणका अर्थ भगवान्को यही इष्ट है कि आत्मवेत्ता किसी भी कर्मका करने करवानेवाला नहीं होता। अकेली हननक्रियाके विषयमें आक्षेप करना उदाहरणके रूपमें है। पू0 कर्म न हो सकनेमें कौनसे खास हेतुको देखकर ज्ञानीके लिये भगवान् कथं स पुरुषः इस कथनसे कर्मविषयक आक्षेप करते हैं उ0 पहले ही कह आये हैं कि आत्माकी निर्विकारता ही ( ज्ञानीकर्तृक ) सम्पूर्ण कर्मोंके न होनेका खास हेतु है। पू0 कहा है सही परंतु अविक्रिय आत्मासे उसको जाननेवाला भिन्न है इसलिये ( यह ऊपर बतलाया हुआ ) खास कारण उपयुक्त नहीं है क्योंकि स्थाणुको अविक्रिय जाननेवालेसे कर्म नहीं होते ऐसा नहीं ऐसी शङ्का करें तो उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मा स्वयं ही जाननेवाला है। देह आदि संघातमें ( जड होनेके कारण ) ज्ञातापन नहीं हो सकता इसलिये अन्तमें देहादि संघातसे भिन्न आत्मा ही अविक्रिय ठहरता है और वही जाननेवाला है। ऐसे उस ज्ञानीसे कर्म होना असम्भव है अतः कथं स पुरुष यह आक्षेप उचित ही है। जैसे ( वास्तवमें ) निर्विकार होनेपर भी आत्मा बुद्धिवृत्ति और आत्माका भेदज्ञान न रहनेके कारण अविद्याके सम्बन्धसे बुद्धि आदि इन्द्रियोंद्वारा ग्रहण किये हुए शब्दादि विषयोंका ग्रहण करनेवाला मान लिया जाता है। ऐसे ही आत्मअनात्मविषयक विवेकज्ञानरूप जो बुद्धिवृत्ति है जिसे विद्या कहते हैं वह यद्यपि असत्रूप है तो भी उसके सम्बन्धसे वास्तव में जो अविकारी है ऐसा आत्मा ही विद्वान् कहा जाता है। ज्ञानीके लिये सभी कर्म असम्भव बतलाये हैं इस कारण भगवान्का यह निश्चय समझा जाता है कि शास्त्रद्वारा जिन कर्मोंका विधान किया गया है वे सब अज्ञानियोंके लिये ही विहित हैं। पू0 विद्या भी अज्ञानीके लिये ही विहित है क्योंकि जिसने विद्याको जान लिया उसके लिये पिसेको पीसनेकी भाँति विद्याका विधान व्यर्थ है। अतः अज्ञानीके लिये कर्म कहे गये हैं ज्ञानीके लिये नहीं इस प्रकार विभाग करना नहीं बन सकता। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि कर्तव्यके भाव और अभावसे भिन्नता सिद्ध होती है अभिप्राय यह कि अग्निहोत्रादि कर्मोंका विधान करनेवाले विधिवाक्योंके अर्थको जान लेनेके बाद अनेक साधन और उपसंहारके सहित अमुक अग्निहोत्रादि कर्म अनुष्ठान करनेके योग्य है मैं कर्ता हूँ मेरा अमुक कर्तव्य है इस प्रकार जाननेवाले अज्ञानीके लिये जैसे कर्तव्य बना रहता है वैसे न जायते इत्यादि आत्मस्वरूपका विधान करनेवाले वाक्योंके अर्थको जान लेनेके बाद उस ज्ञानीके लिये कुछ कर्तव्य शेष नहीं रहता। क्योंकि ( ज्ञानीको ) मैं न कर्ता हूँ न भोक्ता हूँ इत्यादि जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्व आदिविषयक ज्ञान है इससे अतिरिक्त अन्य किसी प्रकारका भी ज्ञान नहीं होता। इस प्रकार यह ( ज्ञानी और अज्ञानीके कर्तव्यका ) विभाग सिद्ध होता है। जो अपनेको ऐसा समझता है कि मैं कर्ता हूँ उसकी यह बुद्धि अवश्य ही होगी कि मेरा अमुक कर्तव्य है उस बुद्धिकी अपेक्षासे वह कर्मोंका अधिकारी होता है इसीसे उसके लिये कर्म हैं। और उभौ तौ न विजानीतः इस वचनके अनुसार वही अज्ञानी है। क्योंकि पूर्वोक्त विशेषणोंद्वारा वर्णित ज्ञानीके लिये तो कथं स पुरुषः इस प्रकार कर्मोंका निषेध करनेवाले वचन हैं। सुतरां ( यह सिद्ध हुआ कि ) आत्माको निर्विकार जाननेवाले विशिष्ट विद्वान्का और मुमुक्षुका भी सर्वकर्मसंन्यासमें ही अधिकार है। इसीलिये भगवान् नारायण ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इस कथनसे सांख्ययोगी ज्ञानियों और कर्मी अज्ञानियोंका विभाग करके अलगअलग दो निष्ठा ग्रहण करवाते हैं। ऐसे ही अपने पुत्रसे भगवान् वेदव्यासजी कहते हैं कि ये दो मार्ग हैं इत्यादि तथा यह भी कहते हैं कि पहले क्रियामार्ग और पीछे संन्यास। इसी विभागको बारंबार भगवान् दिखलायेंगे। जैसे अहंकारसे मोहित हुआ अज्ञानी मैं कर्ता हूँ ऐसे मानता है तत्त्ववेत्ता मैं नहीं करता ऐसे मानता है तथा सब कर्मोंका मनसे त्यागकर रहता है इत्यादि। इस विषयमें कितने ही अपनेको पण्डित समझनेवाले कहते हैं कि जन्मादि छः भावविकारोंसे रहित निर्विकार अकर्ता एक आत्मा मैं ही हूँ ऐसा ज्ञान किसीको होता ही नहीं कि जिसके होनेसे सर्वकर्मोंके संन्यासका उपदेश किया जा सके। यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि ( ऐसा मान लेनेसे ) न जायते इत्यादि शास्त्रका उपदेश व्यर्थ होगा। उनसे यह पूछना चाहिये कि जैसे शास्त्रोपदेशकी सामर्थ्यसे कर्म करनेवाले मनुष्यको धर्मके अस्तित्वका ज्ञान और देहान्तरकी प्राप्तिका ज्ञान होता है उसी तरह उसी पुरुषको शास्त्रसे आत्माकी विर्विकारता अकर्तृत्व और एकत्व आदिका विज्ञान क्यों नहीं हो सकता यदि वे कहें कि ( मनबुद्धि आदि ) करणोंसे आत्मा अगोचर है इस कारण ( उसका ज्ञान नहीं हो सकता )। तो यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि मनके द्वारा उस आत्माको देखना चाहिये यह श्रुति है अतः शास्त्र और आचार्यके उपदेशद्वारा एवं शम दम आदि साधनोंद्वारा शुद्ध किया हुआ मन आत्मदर्शनमें करण ( साधन ) है। इस प्रकार उस ज्ञानप्राप्तिके विषयमें अनुमान और आगमप्रमाणोंके रहते हुए भी यह कहना कि ज्ञान नहीं होता साहसमात्र है। यह तो मान ही लेना चाहिये कि उत्पन्न हुआ ज्ञान अपनेसे विपरीत अज्ञानको अवश्य नष्ट कर देता है। वह अज्ञान मैं मारनेवाला हूँ मैं मारा गया हूँ ऐसे मारनेवाले दोनों नहीं जानते इन वचनोंद्वारा पहले दिखलाया ही था फिर यहाँ भी यह बात दिखायी गयी है कि आत्मामें हननक्रियाका कर्तृत्व कर्मत्व और हेतुकर्तृत्व अज्ञानजनति है। आत्मा निर्विकार होनेके कारण कर्तृत्व आदि भावोंका अविद्यामूलक होना सभी क्रियाओंमे समान है। क्योंकि विकारवान् ही ( स्वयं ) कर्ता ( बनकर ) अपने कर्मरूप दूसरेको कर्ममें नियुक्त करता है कि तू अमुक कर्म कर। सुतरां ज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है यह दिखानेके लिये भगवान् वेदाविनाशिनम् कथं स पुरुषः इत्यादि वाक्योंसे सभी क्रियाओंमें समान भावसे विद्वान्के कर्ता और प्रयोजक कर्ता होनेका प्रतिषेध करते हैं। ज्ञानीका अधिकार किसमें है यह तो ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् इत्यादि वचनोंद्वारा पहले ही बतलाया जा चुका है वैसे ही फिर भी सर्वकर्माणि मनसा इत्यादि वाक्योंसे सर्व कर्मोंका संन्यास ( भगवान् ) कहेंगे। पू0 ( उक्त श्लोकमें ) मनसा यह शब्द है इसलिये मानसिक कर्मोंका ही त्याग बतलाया है शरीर और वाणीसम्बन्धी कर्मोंका नहीं। उ0 यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि सर्व कर्मोंको छोड़कर इस प्रकार कर्मोंके साथ सर्व विशेषण है। पू0 यदि मनसम्बन्धी सर्व कर्मोंका त्याग मान लिया जाय तो उ0 ठीक नहीं। क्योंकि वाणी और शरीरकी क्रिया मनोव्यापारपूर्वक ही होती है। मनोव्यापारके अभावमें उनकी क्रिया बन नहीं सकती। पू0 शास्त्रविहित कायिकवाचिक कर्मोंके कारणरूप मानसिक कर्मोंके सिवा अन्य सब कर्मोंका मनसे संन्यास करना चाहिये यह मान लिया जाय तो उ0 ठीक नहीं। क्योंकि न करता हुआ और न करवाता हुआ यह विशेषण साथमें है ( इसलिये तीनों तरह कर्मोंका संन्यास सिद्ध होता है। ) पू0 यह भगवान्द्वारा कहा हुआ सर्व कर्मोंका संन्यास तो मुमूर्षु के लिये है जीते हुएके लिये नहीं यह माना जाय तो उ0 ठीक नहीं। क्योंकि ऐसा मान लेनेसे नौ द्वारवाले शरीररूप पुरमें आत्मा रहता है इस विशेषणकी उपयोगिता नहीं रहती। कारण जो सर्वकर्मसंन्यास करके मर चुका है उसका न करते हुए और न करवाते हुए उस शरीरमें रहना सम्भव नहीं। पू0 उक्त वाक्यमें शरीरमें कर्मोंको रखकर इस तरह सम्बन्ध है शरीरमें रहता है इस प्रकार सम्बन्ध नहीं है ऐसा मानें तो उ0 ठीक नहीं है। क्योंकि सभी जगह आत्माको निर्विकार माना गया है। तथा आसन क्रियाको आधारकी अपेक्षा है और संन्यास को उसकी अपेक्षा नहीं है एवं स पूर्वक न्यास शब्दका अर्थ यहाँ त्यागना। है निक्षेप ( रख देना ) नहीं। सुतरां गीताशास्त्रमें आत्मज्ञानीका संन्यासमें ही अधिकार है कर्मोंमें नहीं। यही बात आगे चलकर आत्मज्ञानके प्रकरणमें हम जगहजगह दिखलायेंगे।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.21।। व्याख्या   वेदाविनाशिनम् ৷৷. घातयति हन्ति कम्   इस शरीरीका कभी नाश नहीं होता  इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता इसका कभी जन्म नहीं होता और इसमें कभी किसी तरहकी कोई कमी नहीं आती ऐसा जो ठीक अनुभव कर लेता है वह पुरुष कैसे किसको मारे और कैसे किसको मरवाये अर्थात् दूसरोंको मारने और मरवानेमें उस पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। वह किसी क्रियाका न तो कर्ता बन सकता है और न कारयिता बन सकता है।यहाँ भगवान्ने शरीरीको अविनाशी नित्य अज और अव्यय कहकर उसमें छहों विकारोंका निषेध किया है जैसे  अविनाशी  कहकर मृत्युरूप विकारका  नित्य  कहकर अवस्थान्तर होना और बढ़नारूप विकारका  अज  कहकर जन्म होना और जन्मके बाद होनेवाली सत्तारूप विकारका तथा  अव्यय  कहकर क्षयरूप विकारका निषेध किया गया है। शरीरीमें किसी भी क्रियासे किञ्चिन्मात्र भी कोई विकार नहीं होता।अगर भगवान्को  न हन्यते हन्यमाने शरीरे  और  कं घातयति हन्ति कम्  इन पदोंमें शरीरीके कर्ता और कर्म बननेका ही निषेध करना था तो फिर यहाँ करनेनकरनेकी बात न कहकर मरनेमारनेकी बात क्यों कही इसका उत्तर है कि युद्धका प्रसङ्ग होनेसे यहाँ यह कहना जरूरी है कि शरीरी युद्धमें मारनेवाला नहीं बनता क्योंकि इसमें कर्तापन नहीं है। जब शरीरी मारनेवाला अर्थात् कर्ता नहीं बन सकता तब यह मरनेवाला अर्थात् क्रियाका विषय (कर्म) भी कैसे बन सकता है। तात्पर्य यह है कि यह शरीरी किसी भी क्रियाका कर्ता और कर्म नहीं बनता। अतः मरनेमारनेमें शोक नहीं करना चाहिये प्रत्युत शास्त्रकी आज्ञाके अनुसार प्राप्त कर्तव्यकर्मका पालन करना चाहिये। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकोंमें देहीकी निर्विकारताका जो वर्णन हुआ है आगेके श्लोकमें उसीका दृष्टान्तरूपसे वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.21।।एतदेव स्फुटयति न जायते इति। नायं भूत्वेति। अयमात्मा न न भूत्वा भाविता (S omits भविता) अपि तु भूत्वैव। अतो न जायते न च म्रियते यतो भूत्वा न न भविता अपि तु भवितैव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.21।।पूर्वश्लोकार्थस्यैवोत्तरत्रापि प्रतिभानात् पौनरुक्त्यमाशङक्य वृत्तानुवादपूर्वकमुत्तरश्लोकमवतारयति  य एनमित्यादिना।  कर्तृत्वाद्यभिमानविरोधादद्वैतकूटस्थात्मनिश्चयसामर्थ्यात्प्राप्तं विदुषः संन्यासं विद्यापरिपाकार्थमभ्यनुजानाति  वेदेति।  पदद्वयस्य पूर्वमेव पौनरुक्त्यपरिहारेऽपि प्रकारान्तरेणापौनरुक्त्यमाह  अविनाशिनमित्यादिना।  प्रश्नेऽपि संभवति किमिति नञुल्लेखेन व्याख्यायते तत्राह  उभयत्रेति।  उत्तरत्र प्रतिवचनादर्शनान्नात्र प्रश्नः संभवतीत्यर्थः। विवक्षितं प्रकरणार्थं निगमयति  हेत्वर्थस्येति।  अविक्रियत्वं हेत्वर्थस्तस्य विदुषः सर्वकर्मनिषेधे समानत्वादिति यावत्। यदि विदुषः सर्वकर्मनिषेधोऽभिमतस्तर्हि किमिति हन्त्यर्थ एवाक्षिप्यते तत्राह  हन्तेरिति।  उक्तं हेतुमाक्षेप्तुं पृच्छति  विदुष इति।  अभिप्रायमप्रतिपद्यमानो हेतुविशेषं पूर्वोक्तं स्मारयति  नन्विति।  उक्तमङ्गीकृत्याक्षिपति  सत्यमिति।  विदुषो विज्ञानात्मनो ब्रह्मणश्च वेद्यस्य विरुद्धधर्मत्वेन दहनतुहिनवद्भिन्नत्वाद्विदुषः सर्वकर्मत्यागेनासौ कारणविशेषः स्यादित्याह  अन्यत्वादिति।  अविक्रियत्वादिति च्छेदः। तथापि कूटस्थमविक्रियं ब्रह्म प्रतिपद्यमानस्य कुतो विक्रिया संभवेद्ब्रह्मप्रतिपत्तिविरोधादित्याशङ्क्याह  नहीति। अयमात्मा ब्रह्म इत्यादिश्रुत्या समाधत्ते  न विदुष   इति।  किञ्च विद्वत्ता विशिष्टस्य वा केवलस्य वा। नाद्यः। विशिष्टस्य विद्वत्तायां विशेषणस्यापि तत्प्रसङ्गान्न च विशेषणीभूतसंघातस्याचेतनत्वाद्विद्वत्ता युक्तेत्याह  न देहादीति।  द्वितीये तु जीवब्रह्मविभागासिद्धिरित्याह  असंहत इति।  किञ्च प्रामाणिकविरुद्धधर्मवत्त्वस्यासिद्धत्वात्प्रातिभासिकस्य च बिम्बप्रतिबिम्बयोरनैकान्त्याद्भेदानुमानायोगाज्जीवब्रह्मणोरभेदसिद्धिरित्यभिप्रेत्य फलितमाह  इति तस्येति।  नन्वविक्रियस्य ब्रह्मस्वरूपतया सर्वकर्मासंभवे विदुषो विद्वत्तापि कथं संभवति नहि ब्रह्मणोऽविक्रियस्य विद्यालक्षणा विक्रिया स्वक्रिया भवितुमर्हति तत्राह  यथेति।  अदृष्टेन्द्रियादिसहकृतमन्तःकरणं प्रदीपप्रभावद्विषयपर्यन्तं परिणतं बुद्धिवृत्तिरुच्यते। तत्र प्रतिबिम्बितं चैतन्यमभिव्यञ्जकबुद्धिवृत्त्यविवेकाद्विषयज्ञानमिति व्यवह्रियते। तेनात्मोपलब्धा कल्प्यते। तच्चाविद्याप्रयुक्तमिथ्यासंबन्धनिबन्धनं तथैवाध्यासिकसंबन्धेन ब्रह्मात्मैक्याभिव्यञ्जकवाक्योत्थबुद्धिवृत्तिद्वारा विद्वानात्मा व्यपदिश्यते नच मिथ्यासंबन्धेन पारमार्थिकाविक्रियत्वविहतिरस्तीत्यर्थः। अहं ब्रह्मेति बुद्धिवृत्तेर्मोक्षावस्थायामपि भावादात्मनः सविशेषत्वमाशङ्क्य तस्या यावदुपाधिसत्त्वमेवेत्याह  असत्येति।  ननु कूटस्थस्यात्मनो मिथ्याविद्यावत्त्वेऽपि तस्य कर्माधिकारनिवृत्तौ कस्य कर्माणि विधीयन्ते नहि निरधिकाराणां तेषां विधिरित्याशङ्क्याह  विदुष इति।  कर्माण्यविदुषो विहितानीति विशेषमाक्षिपति  नन्विति।  कर्मविधानमविदुषो विदुषश्च विद्याविधानमिति विभागे का हानिरित्याशङ्क्याह  विदितेति।  विद्याया विदितत्वं लब्धत्वम्। कर्मविधिरविदुषो विदुषो विद्याविधिरिति विभागासंभवे फलितमाह  तत्रेति।  धर्मज्ञानानन्तरमनुष्ठेयस्य भावात् ब्रह्मज्ञानोत्तरकालं च तदभावाद् ब्रह्मज्ञानहीनस्यैव कर्मविधिरिति समाधत्ते  नानुष्ठेयस्येति।  विशेषोपपत्तिमेव प्रपञ्चयति  अग्निहोत्रादीति।  ननु देहादिव्यतिरिक्तात्मज्ञानं विना पारलौकिकेषु कर्मसु प्रवृत्तेरनुपपत्तेस्तथाविधज्ञानवता कर्मानुष्ठेयमिति चेत्तत्राह  कर्ताहमिति।  आत्मनि कर्ता भोक्तेत्येवं विज्ञानवत्त्वेऽपि ब्रह्मज्ञानविहीनत्वेनाविदुषोऽनुष्ठेयं कर्मेत्यर्थः। देहादिव्यतिरेकज्ञानवद्ब्रह्मज्ञानमपि ज्ञानत्वाविशेषात् कर्मप्रवृत्तावुपकरिष्यतीत्याशङ्क्याह  नत्विति।  अनुष्ठेयविरोधित्वादविक्रियात्मज्ञानस्येति शेषः। ननु ब्रह्मात्मैकत्वज्ञानादुत्तरकालमपि कर्ताहमित्यादिज्ञानोत्पत्तौ कर्मविधिः सावकाशः स्यादिति नेत्याह  नाहमिति।  कारणाभावादिति शेषः। कर्तृत्वादिज्ञानमन्यदित्युक्तम्। अनुष्ठानाननुष्ठानयोरुक्तविशेषादविदुषोऽनुष्ठानं विदुषो नेत्युपसंहरति  इत्येष इति।  नन्वात्मविदो न चेदनुष्ठेयं किंचिदस्ति कथं तर्हि विद्वान्यजेतेत्यादिशास्त्रात्तं प्रति कर्माणि विधीयन्ते तत्राह  यः पुनरिति।  आत्मनि कर्तृत्वादिज्ञानापेक्षया कर्मस्वधिकृतत्वज्ञाने तथाविधं पुरुषं प्रति कर्माणि विधीयन्ते। स च प्राचीनवचनादविद्वानेवेति निश्चीयते। न खल्वकर्तृत्वादिज्ञानवतस्तद्विपरीतकर्तृत्वादिज्ञानद्वारा कर्मसु प्रवृत्तिरित्यर्थः। कर्मासंभवे ब्रह्मविदो हेत्वन्तरमाह  विशेषितस्येति। वेदाविनाशिनम् इत्यादिनेति शेषः। यद्यपि विदुषो नास्ति कर्म तथापि विविदिषोः स्यादित्याशङ्क्याह  तस्मादिति।  विद्यया विरुद्धत्वादिष्यमाणमोक्षप्रतिपक्षत्वाच्च कर्मणामित्यर्थः। यद्यपि मुमुक्षोराश्रमकर्माण्यपेक्षितानि तथापि विद्यातत्फलाभ्यामविरुद्धान्येव तान्यभ्युपगतान्यन्यथा विविदिषासंन्यासविधिविरोधादित्यभिप्रेत्योक्तेऽर्थे भगवतोऽनुमतिमाह  अतएवेति।  विदुषो विविदिषोश्च संन्यासेऽधिकारोऽविदुषस्तु कर्मणीति विभागस्येष्टत्वादित्यर्थः। अधिकारिभेदेन निष्ठाद्वयं भगवता वेदव्यासेनापि दर्शितमित्याह  तथाचेति।  अध्ययनविधिना स्वाध्यायपाठे त्रैवर्णिकस्य प्रवृत्त्यनन्तरं तत्र क्रियामार्गो ज्ञानमार्गश्चेति द्वौ मार्गावधिकारिभेदेनावेदितावित्यर्थः। आदिशब्दाद्यत्र वेदाः प्रतिष्ठिताः इत्यादि गृह्यते। उक्तयोर्मार्गयोस्तुल्यतां परिहर्तुमुदाहरणान्तरमाह  तथेति।  बुद्धिशुद्धिद्वारा कर्मतत्फलयोर्वैराग्योदयात्पूर्वं कर्ममार्गो विहितो विरक्तस्य पुनः संन्यासपूर्वको ज्ञानमार्गो दर्शितः। स चेतरस्मादतिशयशालीति श्रुतिमित्यर्थः। उक्ते विभागे पुनरपि वाक्यशेषानुकूल्यमादर्शयति  एवमेवेति।  अहंकारविमूढात्मेत्यस्य व्याख्यानं  अतत्त्वविदिति।  तत्त्ववित्त्विति श्लोकमवतार्य तात्पर्यार्थं संगृह्णाति  नाहमिति।  पूर्वेण क्रियापदेनेतिशब्दः संबध्यते। विरक्तमधिकृत्य वाक्यान्तरं पठति  तथाचेति।  आदिशब्दस्तस्यैव श्लोकस्य शेषसंग्रहार्थः। अविक्रियात्मज्ञानात्कर्मसंन्यासे दर्शिते मीमांसकमतमुत्थापयति  तत्रेति।  आत्मनो ज्ञानक्रियाशक्त्याधारत्वेनाविक्रियत्वाभावादविक्रियात्मज्ञानं संन्यासकारणीभूतं न संभवतीत्यर्थः। यथोक्तज्ञानाभावो विषयाभावाद्वा मानाभावाद्वेति विकल्प्याद्यं दूषयति  नेत्यादिना।  न तावदविक्रियात्माभावो न जायते म्रियते वेत्यादिशास्त्रस्याप्तवाक्यतया प्रमाणस्यान्तरेण कारणमानर्थक्यायोगादित्यर्थः। द्वितीयं प्रत्याह  यथाचेति।  पारलौकिककर्मविधिसामर्थ्यसिद्धं विज्ञानमुदाहरति  कर्तुश्चेति।  कर्मकाण्डादज्ञाते धर्मादौ विज्ञानोत्पत्तिवज्ज्ञानकाण्डादज्ञाते ब्रह्मात्मनि विज्ञानोत्पत्तिरविरुद्धा प्रमाणत्वाविशेषादित्यर्थः। ज्ञानस्य मनःसंयोगजन्यत्वादात्मनश्च श्रुत्या मनोगोचरत्वनिरासान्नात्मज्ञाने साधनमस्तीति शङ्कते  करणेति।  श्रुतिमाश्रित्य परिहरति  न। मनसेति।  तत्त्वमस्यादिवाक्योत्थमनोवृत्त्यैव शास्त्राचार्योपदेशमनुसृत्य द्रष्टव्यं तत्त्वमिति श्रूयते स्वरूपेण स्वप्रकाशमपि ब्रह्मात्मवस्तु वाक्योत्थबुद्धिवृत्त्यभिव्यक्तं सविकल्पकव्यवहारालम्बनं भवतीति मनोगोचरत्वोपचारादसिद्धं करणागोचरत्वमित्यर्थः। कथं तर्हि ब्रह्मात्मनो मनोविषयत्वनिषेधश्रुतिरित्याशङ्क्यासंस्कृतमनोवृत्त्यविषयत्वविषया सेति मन्वानः सन्नाह  शास्त्रेति।  सत्यपि श्रुत्यादौ   तदनुग्राहकाभावान्नास्माकमविक्रियात्मकज्ञानमुत्पत्तुमर्हतीत्याशङ्क्याह  तथेति।  तस्याविक्रियस्यात्मनोऽधिगत्यर्थं विमतो विकारो नात्मधर्मो विकारत्वादुभयाभिमतविकारवदित्यनुमाने पूर्वोक्तश्रुतिस्मृतिरूपागमे च सत्येव तस्मिन्नोत्पद्यते ज्ञानमिति वचः साहसमात्रं सत्येव माने मेयं न भातीतिवदित्यर्थः। ननु यथोक्तं ज्ञानमुत्पन्नमपि हानायोपादानाय वा न भवतीति कुतोऽस्य फलवत्त्वं तत्राह  ज्ञानं चेति।   अवश्यमिति।  प्रकाशप्रवृत्तेस्तमोनिवृत्तिव्यतिरेकेणानुपपत्तिवदात्माज्ञाननिवृत्तिमन्तरेणात्मज्ञानोत्पत्तेरनुपपत्तेरित्यर्थः। नन्वज्ञानस्य ज्ञानप्रागभावत्वात्तन्निवृत्तिरेव ज्ञानं नतु तन्निवर्तकमिति तत्राह  तच्चेति।  कथं पुनर्भगवतापि ज्ञानाभावातिरिक्तमज्ञानं दर्शितमित्याशङ्क्याह  अत्रचेति।  विमतं ज्ञानाभावो न भवत्युपादानत्वान्मृदादिवदिति भावः। ननु हननक्रियाया न हिंस्यादिति निषिद्धत्वात् तत्कर्तृत्वादेरज्ञानकृतत्वेऽपि विहितक्रियाकर्तृत्वादेर्न तथात्वमिति नेत्याह  तच्चेति।  न तावदात्मनि कर्तृत्वादि नित्यम् अमुक्तिप्रसङ्गान्न चानित्यमपि निरुपादानं भावकार्यस्योपादाननियमान्न चानात्मा तदुपादानमात्मनि तत्प्रतिभानान्न चात्मैव तदुपादानं कूटस्थस्य तस्याविद्यां विना तदयोगादित्याह  अविक्रियत्वादिति।  कर्तृत्वाभावेऽपि कारयितृत्वं स्यादित्याशङ्क्याह  विक्रियावानिति।  आत्मनि कर्तृत्वादिप्रतिभानस्यानाद्यनिर्वाच्यमज्ञानमुपादानं तन्निवृत्तिश्च तत्त्वज्ञानादित्युक्तम् इदानीं कर्तृत्वकारयितृत्वयोरविद्याकृतत्वे भगवतोऽनुमतिं दर्शयति  तदेतदिति।  विदुषो यदि कर्माधिकाराभावो भगवतोऽभिमतस्तर्हि कुत्र तस्य जीवतोऽधिकारः स्यादिति पृच्छति  क्व पुनरिति।  ज्ञाननिष्ठायामित्युक्तं स्मारयति  उक्तमिति।  तदङ्गभूते सर्वकर्मसंन्यासे च तस्याधिकारोऽस्तीत्याह  तथेति।  वक्ष्यमाणे वाक्ये सर्वकर्मसंन्यासो न प्रतिभाति मानसानामेव कर्मणां विशेषणवशात्त्यागावगमादिति शङ्कते  नन्विति।  विशेषणान्तरमाश्रित्य दूषयति  न सर्वेति।  मनसेतिविशेषणान्मानसेष्वेव कर्मसु सर्वशब्दः संकुचितः स्यादिति शङ्कते  मानसानामिति।  सर्वात्मना मनोव्यापारत्यागे व्यापारान्तराणामनुपपत्तेः सर्वकर्मसंन्यासः सिध्यतीति परिहरति  नेत्यादिना।  मानसेष्वपि कर्मसु संन्यासे संकोचान्न वागादिव्यापारानुपपत्तिरिति शङ्कते  शास्त्रीयाणामिति।   अन्यानीति।  अशास्त्रीयवाक्कायकर्मकारणान्यशास्त्रीयाणि मानसानि तानि च सर्वाणि कर्माणीत्यर्थः। वाक्यशेषमादाय दूषयति  न। नैवेति।  नहि विवेकबुद्ध्या सर्वाणि कर्माण्यशास्त्रीयाणि संन्यस्य तिष्ठतीति युक्तं नैव कुर्वन्नित्यादिविशेषणस्य विवेकबुद्धेश्च त्यागहेतोस्तुल्यत्वादित्यर्थः। भगवदभिमतसर्वकर्मसंन्यासस्यावस्थाविशेषे संकोचं दर्शयन्नाशङ्कते  मरिष्यत इति।  संन्यासो जीवदवस्थायामेवात्र विवक्षित इत्यत्र लिङ्गं दर्शयन्नुत्तरमाह  न। नवेति।  अनुपपत्तिमेव स्फोरयति  नहीति।  अन्वयविशेषान्वाख्यानेन लिङ्गासिद्धिं चोदयति  अकुर्वत इति।  विवेकवशादशेषाण्यपि धर्माणि देहे यथोक्ते निक्षिप्याकुर्वन्नकारयंश्च विद्वानवतिष्ठते। तथाच देहे कर्माणि संन्यस्याकुर्वतोऽकारयतश्च सुखमासनमिति संबन्धसंभवाद् विशेषणस्य सति देहे कर्मत्यागविषयत्वाभावाज्जीवतः सर्वकर्मत्यागो नास्तीत्यर्थः। अथवा कुर्वत इत्यादि पूर्वत्रैव संबन्धनीयम् लिङ्गासिद्धिचोद्यं तु देहे संन्यस्येत्यारभ्योन्नेयम्। आत्मनः सर्वत्राविक्रियत्वनिर्धारणाद्देहसंबन्धमन्तरेण कर्तृत्वकारयितृत्वाप्राप्तेरप्राप्तप्रतिषेधप्रसङ्गपरिहारार्थमस्मदुक्त एव संबन्धः साधीयानिति समाधत्ते  न सर्वत्रेति।  श्रुतिषु स्मृतिषु चेत्यर्थः। किञ्च संबन्धस्याकाङ्क्षासंनिधियोग्यताधीनत्वादाकाङ्क्षावशादस्मदभिमतसंबन्धसिद्धिरित्याह  आसनेति।  भवदिष्टस्तु संबन्धो न सिध्यत्याकाङ्क्षाभावादित्याह  तदनपेक्षत्वाच्चेति।  संन्यासशब्दस्य निक्षेपार्थत्वात्तस्य चाधिकरणसापेक्षत्वादस्मदिष्टसंबन्धसिद्धिरित्याशङ्क्याह  संपूर्वस्त्विति।  अन्यथोपसर्गवैयर्थ्यादित्यर्थः। मनसा विवेकविज्ञानेन सर्वकर्माणि परित्यज्यास्ते देहे विद्वानित्यस्यैव संबन्धस्य साधुत्वं मत्वोपसंहरति  तस्मादिति।  सर्वव्यापारोपरमात्मनः संन्यासस्याविक्रियात्मज्ञानाविरोधित्वात् प्रयोजकज्ञानवतो वैधे संन्यासेऽधिकारः सम्यग्ज्ञानवतस्त्ववैधे स्वाभाविके फलात्मनीति विभागमभ्युपेत्योक्तेऽर्थे वाक्यशेषानुगुण्यं दर्शयति  इति तत्र   तत्रेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.21।। वेदाविनाशिन मिति। पुनरात्मनोऽविनाशित्वादिकं किमर्थमुच्यते इत्यतोऽस्य तात्पर्यमाह  अत  इति। उक्तैः प्रमाणैरेवमविनाशित्वादिरूपं कं कथं घातयति हन्ति वेत्येवंभावं करोतीत्यर्थः। जीवस्यानित्यत्वादिकं मन्यमानो न जानातीत्युक्तम् इदानीं तु ज्ञानी नैवं मन्यत इत्युच्यत इति। अविनाशिनं नित्यमिति पुनरुक्तिमाशङ्क्य द्वेधार्थभेदमाह  अविनाशिन मिति।  नैमित्तिको  बिम्बनाशादिनिमित्तकः। स्वाभाविकः कालकृतः। दोषयोगरहितमित्यनेन मात्रास्पर्शा इत्यत्र यदुक्तमाभिमानिकमेवात्मनो दुःखादिकं न तु स्वगतमिति तस्यानुवादः क्रियते। एवं व्याख्यानप्रकारमन्यत्राप्यतिदिशति  इती ति। विवेकः शब्दार्थयोः। अविनाशिनं दोषयोगरहितमिति कुतो लभ्यमित्यत आह  दोषे ति। अनेकार्थत्वाद्धातूनामिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.21।।अतो य एवं वेद स कथं घातयति हन्ति वा अविनाशिनं नैमित्तिकविनाशरहितम्। नित्यं स्वाभाविकनाशरहितम्। अथवाऽविनाशिनं दोषयोगरहितम्। नित्यं सदाभाविनमिति सर्वत्र विवेकः दोषयुक्तपुरुषादिषु नष्टशब्दप्रयोगात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.21।।एवम् अविनाशित्वेन अजत्वेन व्ययानर्हत्वेन च  नित्यम् एनम्  आत्मानं  यः  पुरुषो  वेद स पुरुषो  देवमनुष्यतिर्यक्स्थावरशरीरावस्थितेषु आत्मसु  कम्  अपि आत्मानं  कथं घातयति   कं  वा कथं  हन्ति  कथं नाशयति कथं वा तत्प्रयोजको भवति इत्यर्थः। एतान् आत्मनो घातयामि हन्मि इति अनुशोचनम् आत्मस्वरूपयाथात्म्याज्ञानमूलम् एव इत्यभिप्रायः।यद्यपि नित्यानाम् आत्मनां शरीरविश्लेषमात्रं क्रियते तथापि रमणीयभोगसाधनेषु शरीरेषु नश्यत्सु तद्वियोगरूपं शोकनिमित्तिम् अस्ति एव इति अत आह।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.21।। वेद विजानाति अविनाशिनम् अन्त्यभावविकाररहितं नित्यं विपरिणामरहितं यो वेद इति संबन्धः। एनं पूर्वेण मन्त्रेणोक्तलक्षणम् अजं जन्मरहितम् अव्ययम् अपक्षयरहितं कथं केन प्रकारेण सः विद्वान् पुरुषः अधिकृतः हन्ति हननक्रिया करोति कथं वा घातयति हन्तारं प्रयोजयति। न कथञ्चित् कञ्चित् हन्ति न कथञ्चित् कञ्चित् घातयति इति उभयत्र आक्षेप एवार्थः प्रश्नार्थासंभवात्। हेत्वर्थस्य च अविक्रियत्वस्य तुल्यत्वात् विदुषः सर्वकर्मप्रतिषेध एव प्रकरणार्थः अभिप्रेतो भगवता। हन्तेस्तु आक्षेपः उदाहरणार्थत्वेन कथितः।।विदुषः कं कर्मासंभवहेतुविशेषं पश्यन् कर्माण्याक्षिपति भगवान् कथं स पुरुषः इति। ननु उक्त एवात्मनः अविक्रियत्वं सर्वकर्मासंभवकारणविशेषः। सत्यमुक्तः। न तु सः कारणविशेषः अन्यत्वात् विदुषः अविक्रियादात्मनः। न हि अविक्रियं स्थाणुं विदितवतः कर्म न संभवति इति चेत् न विदुषः आत्मत्वात्। न देहादिसंघातस्य विद्वत्ता। अतः पारिशेष्यात् असंहतः आत्मा विद्वान् अविक्रियः इति तस्य विदुषः कर्मासंभवात् आक्षेपो युक्तः कथं स पुरुषः इति। यथा बुद्ध्याद्याहृतस्य शब्दाद्यर्थस्य अविक्रिय एव सन् बुद्धिवृत्त्यविवेकविज्ञानेन अविद्यया उपलब्धा आत्मा कल्प्यते एवमेव आत्मानात्मविवेकज्ञानेन बुद्धिवृत्त्या विद्यया असत्यरूपयैव परमार्थतः अविक्रिय एव आत्मा विद्वानुच्यते। विदुषः कर्मासंभववचनात् यानि कर्माणि शास्त्रेण विधीयन्ते तानि अविदुषो विहितानि इति भगवतो निश्चयोऽवगम्यते।।ननु विद्यापि अविदुष एव विधीयते विदितविद्यस्य पिष्टपेषणवत् विद्याविधानानर्थक्यात्। तत्र अविदुषः कर्माणि विधीयन्ते न विदुषः इति विशेषो नोपपद्यते इति चेत् न अनुष्ठेयस्य भावाभावविशेषोपपत्तेः। अग्निहोत्रादिविध्यर्थज्ञानोत्तरकालम् अग्निहोत्रादिकर्म अनेकसाधनोपसंहारपूर्वकमनुष्ठेयम् कर्ता अहम् मम कर्तव्यम् इत्येवंप्रकारविज्ञानवतः अविदुषः यथा अनुष्ठेयं भवति न तु तथा न जायते इत्याद्यात्मस्वरूपविध्यर्थज्ञानोत्तरकालभावि किञ्चिदनुष्ठेयं भवति किं तु नाहं कर्ता नाहं भोक्ता इत्याद्यात्मैकत्वाकर्तृत्वादिविषयज्ञानात् नान्यदुत्पद्यते इति एष विशेष उपपद्यते। यः पुनः कर्ता अहम् इति वेत्ति आत्मानम् तस्य मम इदं कर्तव्यम् इति अवश्यंभाविनी बुद्धिः स्यात् तदपेक्षया सः अधिक्रियते इति तं प्रति कर्माणि संभवन्ति। स च अविद्वान् उभौ तौ न विजानीतः इति वचनात् विशेषितस्य च विदुषः कर्माक्षेपवचनाच्च कथं स पुरुषः इति। तस्मात् विशेषितस्य अविक्रियात्मदर्शिनः विदुषः मुमुक्षोश्च सर्वकर्मसंन्यासे एव अधिकारः। अत एव भगवान् नारायणः सांख्यान् विदुषः अविदुषश्च कर्मिणः प्रविभज्य द्वे निष्ठे ग्राहयति ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इति। तथा च पुत्राय आह भगवान् व्यासः द्वाविमावथ पन्थानौ इत्यादि। तथा च क्रियापथश्चैव पुरस्तात् पश्चात्संन्यासश्चेति। एतमेव विभागं पुनः पुनर्दर्शयिष्यति भगवान् अतत्त्ववित् अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते तत्त्ववित्तु नाहं करोमि इति। तथा च सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते इत्यादि।।तत्र केचित्पण्डितंमन्या वदन्ति जन्मादिषड्भावविक्रियारहितः अविक्रियः अकर्ता एकः अहमात्मा इति न कस्यचित् ज्ञानम् उत्पद्यते यस्मिन् सति सर्वकर्मसंन्यासः उपदिश्यते इति। तन्न न जायते इत्यादिशास्त्रोपदेशानर्थक्यप्रसङ्गात्। यथा च शास्त्रोपदेशसामर्थ्यात् धर्माधर्मास्तित्वविज्ञानं कर्तुश्च देहान्तरसंबन्धविज्ञानमुत्पद्यते तथा शास्त्रात् तस्यैव आत्मनः अविक्रियत्वाकर्तृत्वैकत्वादिविज्ञानं कस्मात् नोत्पद्यते इति प्रष्टव्याः ते। करणागोचरत्वात् इति चेत् न मनसैवानुद्रष्टव्यम् इति श्रुतेः। शास्त्राचार्योपदेशशमदमादिसंस्कृतं मनः आत्मदर्शने करणम्। तथा च तदधिगमाय अनुमाने आगमे च सति ज्ञानं नोत्पद्यत इति साहसमात्रमेतत्। ज्ञानं च उत्पद्यमानं तद्विपरीतमज्ञानम् अवश्यं बाधते इत्यभ्युपगन्तव्यम्। तच्च अज्ञानं दर्शितम् हन्ता अहम् हतः अस्मि इति उभौ तौ न विजानीतः इति। अत्र च आत्मनः हननक्रियायाः कर्तृत्वं कर्मत्वं हेतुकर्तृत्वं च अज्ञानकृतं दर्शितम्। तच्च सर्वक्रियास्वपि समानं कर्तृत्वादेः अविद्याकृतत्वम् अविक्रियत्वात् आत्मनः। विक्रियावान् हि कर्ता आत्मनः कर्मभूतमन्यं प्रयोजयति कुरु इति। तदेतत् अविशेषेण विदुषः सर्वक्रियासु कर्तृत्वं हेतुकर्तृत्वं च प्रतिषेधति भगवान्वासुदेवः विदुषः कर्माधिकाराभावप्रदर्शनार्थम् वेदाविनाशिनं৷৷. कथं स पुरुषः इत्यादिना। क्व पुनः विदुषः अधिकार इति एतदुक्तं पूर्वमेव ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् इति। तथा च सर्वकर्मसंन्यासं वक्ष्यति सर्वकर्माणि मनसा इत्यादिना।।ननु मनसा इति वचनात् न वाचिकानां कायिकाना च संन्यासः इति चेत् न सर्वकर्माणि इति विशेषितत्वात्। मानसानामेव सर्वकर्मणामिति चेत् न मनोव्यापारपूर्वकत्वाद्वाक्कायव्यापाराणां मनोव्यापाराभावे तदनुपपत्तेः। शास्त्रीयाणां वाक्कायकर्मणां कारणानि मानसानि कर्माणि वर्जयित्वा अन्यानि सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्येदिति चेत् न नैव कुर्वन्न कारयन् इति विशेषणात्। सर्वकर्मसंन्यासः अयं भगवता उक्तः मरिष्यतः न जीवतः इति चेत् न नवद्वारे पुरे देही आस्ते इति विशेणानुपपत्तेः। न हि सर्वकर्मसंन्यासेन मृतस्य तद्देहे आसनं संभवति। अकुर्वतः अकारयतश्च देहे संन्यस्य इति संबन्धः न देहे आस्ते इति चेत् न सर्वत्र आत्मनः अविक्रियत्वावधारणात् आसनक्रियायाश्च अधिकरणापेक्षत्वात् तदनपेक्षत्वाच्च संन्यासस्य। संपूर्वस्तु न्यासशब्दः अत्र त्यागार्थः न निक्षेपार्थः। तस्मात् गीताशास्त्रे आत्मज्ञानवतः संन्यासे एव अधिकारः न कर्मणि इति तत्र तत्र उपरिष्टात् आत्मज्ञानप्रकरणे दर्शयिष्यामः।।प्रकृतं तु वक्ष्यामः। तत्र आत्मनः अविनाशित्वं प्रतिज्ञातम्। तत्किमिवेति उच्यते

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【 Verse 2.22 】

▸ Sanskrit Sloka: वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि | तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यन्यानि संयाति नवानि देही ||

▸ Transliteration: vāsāṁsi jīrṇāni yathā vihāya navāni gṛhṇāti naro ’parāṇi | tathā śarīrāṇi vihāya jīrṇā nyanyāni saṁyāti navāni dehī ||

▸ Glossary: vāsāṁsi: garments; jīrṇāni: old and worn out; yathā: as; vihāya: after giving up; navāni: new garments; gṛhṇāti: does accept; naraḥ: a man; aparāṇi: others; tathā: in the same way; śarīrāṇi: bodies; vihāya: after giving up; jīrṇāni: old and useless; anyāni: different; saṁyāti: accepts; navāni: new sets; dehī: the embodied soul

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.22 Just as man casts off his worn out clothes and puts on new ones, the Self casts off worn out bodies and enters newer ones.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.22।।मनुष्य जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़े धारण कर लेता है ऐसे ही देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंमें चला जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.22।। जैसे मनुष्य जीर्ण वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नये वस्त्रों को धारण करता है? वैसे ही देही जीवात्मा पुराने शरीरों को त्याग कर दूसरे नए शरीरों को प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.22 वासांसि clothes? जीर्णानि worn out? यथा as? विहाय having cast away? नवानि new? गृह्णाति takes? नरः man? अपराणि others? तथा so? शरीराणि bodies? विहाय having cast away? जीर्णानि wornout? अन्यानि others? संयाति enters? नवानि new? देही the embodied (one).No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.22. Just as rejecting the tattered garments, a man takes other new ones, in the same way, rejecting the decayed bodies, the embodied (Self) rightly proceeds to other new ones.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.22 As a man discards his threadbare

Chapter 2 (Part 15)

robes and puts on new, so the Spirit throws off Its worn-out bodies and takes fresh ones.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.22 As a man casts off worn-out garments and puts on others that are new, so does the embodied self cast off Its worn-out bodies and enter into others that are new.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.22 As after rejecting wornout clothes a man takes up other new ones, likewise after rejecting wornout bodies the embodied one unites with other new ones.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.22 Just as a man casts off worn-out clothes and puts on new ones, so also the embodied Self casts off worn-out bodies and enters others which are new.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.22 Vasamsi etc. just as a well - dressed person, on the destruction of his garment, gets himself dressed in another more suitable garment, and he does not perish on that account, in the same way the Self, dressed with different bodies [behaves].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.22 That those who give up their bodies in a righteous war get more beauteous bodies than before, is known through the scriptures. Casting off worn-out garments and taking new and beautiful ones, can be only a cause of joy, as seen here in the world in the case of new garments.

Once again Sri Krsna emphasises for easy understanding the indestructibility of the self, taught before: 'Know that to be indestructible by which all this is pervaded' (II.17) and confirms it thus:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.22 Yatha, as in the world; vihaya, after rejecting jirnani, wornout; vasamsi, clothes; narah, a man grhnati, takes up; aparani, other; navani, new ones; tatha, likewise, in that very manner; vihaya, after rejecting; jirnani, wornout; sarirani, bodies; dehi, the embodied one, the Self which is surely unchanging like the man (in the example); samyati, unites with; anyani, other; navani, new ones. This is meaning.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.22।। गीता के प्राय उद्धृत किये जाने वाले अनेक प्रसिद्ध श्लोकों में यह एक श्लोक है जिसमें एक अत्यन्त व्यावहारिक दृष्टांत के द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि किस प्रकार जीवात्मा एक देह को छोड़कर अन्य देह के साथ तादात्म्य करके नई परिस्थितियों में नए अनुभव प्राप्त करता है। व्यास जी द्वारा प्रयुक्त यह दृष्टान्त अत्यन्त सुपरिचित है।जैसे मनुष्य व्यावहारिक जीवन में भिन्नभिन्न अवसरों पर समयोचित वस्त्रों को धारण करता है वैसे ही जीवात्मा एक देह को त्यागकर अन्य प्रकार के अनुभव प्राप्त करने के लिये किसी अन्य देह को धारण करता है। कोई भी व्यक्ति रात्रिपरिधान (नाईट गाउन) पहने अपने कार्यालय नहीं जाता और न ही कार्यालय के वस्त्र पहनकर टेनिस खेलता है। वह अवसर और कार्य के अनुकूल वस्त्र पहनता है। यही बात मृत्यु के विषय में भी है।यह दृष्टांत इतना सरल और बुद्धिग्राह्य है कि इसके द्वारा न केवल अर्जुन वरन् दीर्घ कालावधि के पश्चात भी गीता का कोई भी अध्येता या श्रोता देह त्याग के विषय को स्पष्ट रूप से समझ सकता है।अनुपयोगी वस्त्रों को बदलना किसी के लिये भी पीड़ा की बात नहीं होती और विशेषकर जब पुराने वस्त्र त्यागकर नए वस्त्र धारण करने हों तब तो कष्ट का कोई कारण ही नहीं होता। इसी प्रकार जब जीव यह पाता है कि उसका वर्तमान शरीर उसके लिये अब कोई प्रयोजन नहीं रखता तब वह उस जीर्ण शरीर का त्याग कर देता है। शरीर के इस जीर्णत्व का निश्चय इसको धारण करने वाला ही कर सकता है क्योंकि जीर्णत्व का सम्बन्ध न धारणकर्त्ता की आयु से है और न उसकी शारीरिक अवस्था से है।जीर्ण शब्द के तात्पर्य को न समझकर अनेक आलोचक इस श्लोक का विरोध करते हैं। उनकी मुख्य युक्ति यह है कि जगत् में अनेक बालक और युवक मरते देखे जाते हैं जिनका शरीर जीर्ण नहीं था। शारीरिक दृष्टि से यह कथन सही होने पर भी जीव की विकास की दृष्टि से देखें तो यदि जीव के लिये वह शरीर अनुपयोगी हुआ तो उस शरीर को जीर्ण ही माना जायेगा। कोई धनी व्यक्ति प्रतिवर्ष अपना भवन या वाहन बदलना चाहता है और हर बार उसे कोई न कोई क्रय करने वाला भी मिल जाता है। उस धनी व्यक्ति की दृष्टि से वह भवन या वाहन पुराना या अनुपयोगी हो चुका है परन्तु ग्राहक की दृष्टि से वही घर नये के समान उपयोगी है। इसी प्रकार शरीर जीर्ण हुआ या नहीं इसका निश्चय उसको धारण करने वाला जीव ही कर सकता है।यह श्लोक पुनर्जन्म के सिद्धान्त को दृढ़ करता है जिसकी विवेचना हम 12वें श्लोक में पहले ही कर चुके हैं।इस दृष्टांत के द्वारा अर्जुन को यह बात निश्चय ही समझ में आ गयी होगी कि मृत्यु केवल उन्हीं को भयभीत करती है जिन्हें उसका ज्ञान नहीं होता है। परन्तु मृत्यु के रहस्य एवं संकेतार्थ को समझने वाले व्यक्ति को कोई पीड़ा या शोक नहीं होता जैसे वस्त्र बदलने से शरीर को कोई कष्ट नहीं होता और न ही एक वस्त्र के त्याग के बाद हम सदैव विवस्त्र अवस्था में ही रहते हैं। इसी प्रकार विकास की दृष्टि से जीव का भी देह का त्याग होता है और वह नये अनुभवों की प्राप्ति के लिये उपयुक्त नवीन देह को धारण करता है। उसमें कोई कष्ट नहीं है। यह विकास और परिवर्तन जीव के लिये है न कि चैतन्य स्वरूप आत्मा के लिये। आत्मा सदा परिपूर्ण है उसे विकास की आवश्यकता नहीं।आत्मा अविकारी अपरिवर्तनशील क्यों है भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.22।।नन्वात्मनः पुरातनदेहत्यागे नवीनदेहोपादाने च सति विक्रियावत्त्वध्रौव्यादविक्रियत्वमसिद्धमित्याशङ्कां दृष्टान्तेन परिहरति  वासांसीति।  यथा लोके जीर्णानि दुर्बलतां गतानि वस्त्राणि नरः पुरुषः परित्यज्यापराण्यन्यानि नवान्युपादत्ते तद्वदेव देह्यात्मा जीर्णानि शरीराणि विहायान्यानि नवानि संगच्छति। जीर्णानीत्यादिविशेषणत्रयेण वस्त्राणां शरीराणां च जीर्णत्वादिमत्त्वेऽपि तदुपादानत्यागकर्त्रोः पुरुषदेहिनोस्तत्त्वाभावबोधकेन तयोरविक्रियत्वं कथितम्। तथाच पुरुषवदविक्रिय एवात्मेत्यर्थः। यत्तु केचित् नन्वेवमात्मनोऽविनाशित्वेऽपि देहानां विनाशित्वाद्युद्धस्य तन्नाशकत्वात्कथं भीष्मादिदेहानामनेकसुकृतसाधकानां मया युद्धेन विनाशः कार्य इत्याशङ्कायां उत्तरं वासांसीति। यथा निकृष्टानि वस्त्राणि विहाय नवान्युत्कृष्टानि जनो गृह्णाति तथा वयसा तपसा च कृशानि भीष्मादिशरीराणि विहायान्यानि देवादिशरीराणि सर्वोत्कृष्टानि संयाति देही प्रकृष्टधर्मानुष्ठाता देहवान्भीष्मादिरित्यर्थः। तथाचात्यन्तमुपकारके युद्धेऽपकारकत्वभ्रमं मा कार्षीरिति। तच्चिन्त्यम्। प्रकरणविरोधस्य विशेष्याध्याहारदोषस्य च स्पष्टत्वात् जीर्णानिति विशेषणात् नवीनादिसाधारणशरीरनाशनिमित्तस्य युद्धस्यात्यन्तोपकारकताया मूलादसिद्धेश्च उक्तरीत्या पराणीति पदस्य सार्थकत्वेन जीर्णानि विहाय नवानि गृह्णाति विक्रियाशून्य एव नरो यथेत्येतावतैव निर्वाहे अपराणीति विशेषणमुत्कर्षातिशयख्यापनार्थमिति वर्णनं त्वयुक्तमिति दिक्। अतएवानेन दृष्टान्तेनाविकृत्वप्रतिपादनमात्मनः क्रियत इति प्राचां व्याख्यानमतिस्पष्टमिति कटाक्षोऽपि परास्तः। आत्माविक्रियत्वप्रतिपादकपूर्वोत्तरप्रकरणानुसारिमूलादतिस्पष्टतया प्रतीयमानस्य भाष्योक्तव्याख्यानस्यैव सभ्यक्त्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.22।।नन्वेवमात्मनो विनाशित्वाभावेऽपि देहानां विनाशित्वाद्युद्धस्य च तन्नाशकत्वात्कथं भीष्मादिदेहानामनेकसुकृतसाधनानां मया युद्धेन विनाशः कार्य इत्याशङ्काया उत्तरं जीर्णानि विहाय वस्त्राणि नवानि गृह्णाति विक्रियाशून्य एव नरो यथेत्येतावतैव निर्वाहे अपराणीति विशेषणमुत्कर्षातिशयख्यापनार्थम्। तेन तथा निकृष्टानि वस्त्राणि विहायोत्कृष्टानि जनो गृह्णातीत्यौचित्यायातम्। तथा जीर्णानि वयसा तपसा च कृशानि भीष्मादिशरीराणि विहाय अन्यानि देवादिशरीराणि सर्वोत्कृष्टानि चिरोपार्जितधर्मफलभोगाय संयाति सम्यक् गर्भवासादिक्लेशव्यतिरेकेण प्राप्नोति। देही प्रकृष्टधर्मानुष्ठातृदेहवान्भीष्मादिरित्यर्थः।अन्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते पित्र्यं वा गान्धर्वं वा दैवं वा प्राजापत्यं वा ब्राह्मं वा इत्यादिश्रुतेः। एतदुक्तं भवति भीष्मादयो हि यावज्जीवं धर्मानुष्ठानक्लेशेनैव जर्जरशरीरा वर्तमानशरीरपातमन्तरेण तत्फलभोगायासमर्था यदि धर्मयुद्धेन स्वर्गप्रतिबन्धकानि जर्जरशरीराणि पातयित्वा दिव्यदेहसंपादनेन स्वर्गभोगयोग्याः क्रियन्ते त्वया तदात्यन्तमुपकृता एव ते। दुर्योधनादीनामपि स्वर्गभोगयोग्यदेहसंपादनान्महानुपकार एव। तथाचात्यन्तमुपकारके युद्धेऽपकारकत्वभ्रमं मा कार्षीरितिअपराणि अन्यानि संयाति इति पदत्रयवशाद्भगवदभिप्राय एवमभ्यूहितः। अनेन दृष्टान्तेनाविकृतत्वप्रतिपादनमात्मनः क्रियत इति तु प्राचां व्याख्यानमतिस्पष्टम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.22।।ननुब्राह्मणो यजेतजातपुत्रः कृष्णकेशोऽग्नीनादधीत इति आत्मानं वयोवर्णादिविशेषणवन्तमेवाधिकृत्य कर्मविधयः प्रवर्तन्ते तेन नीलादुत्पलमिव देहादन्य आत्मावधारयितुं न शक्यत इत्याशङ्क्याह  वासांसीति।  दण्डी प्रैषानन्वाहेति दण्डस्य विशेषणत्वेऽपि न प्रैषानुवक्तृस्वरूपान्तर्गतत्वम् एवं ब्राह्मणत्वादेरपि न स्वर्गकामस्वरूपान्तर्गतत्वमिति वस्त्रदेवदत्तयोरिव जडाजडयोर्देहात्मनोरत्यन्तविलक्षणत्वमस्तीति वस्त्रनाशेन देवदत्तनाशं मन्वानस्येव तव देहनाशादात्मनाशं मन्वानस्यात्यन्तमौढ्यं स्पष्टमिति भावः। स्पष्टार्थश्च श्लोकः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.22।।ननु भगवत्क्रीडार्थं सृष्टदेहादीनां मारणमपि दोषरूपं अतः शोचामीति चेत्तत्राह वासांसीति। यथा जीर्णानि कार्यानुपयुक्तानि वासांसि विहाय नवानि कार्योपयोगीनि अपराणि पूर्वविलक्षणानि नरो गृह्णाति तथा जीर्णानि मत्क्रीडानुपयुक्तानि शरीराणि विहाय नवानि अन्यानि मत्क्रीडार्थं विलक्षणरसोत्पादकानि देही संयाति मदिच्छया प्राप्नोती त्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.22।।   नन्वात्मनोऽविनाशित्वेऽपि तदीयशरीरनाशं पर्यालोच्य शोचामीति चेत्तत्राह  वासांसीति।  कर्मनिबन्धनभूतानां देहानामवश्यंभावित्वान्न जीर्णदेहनाशे शोकावकाश इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.22।।नन्वात्मनोऽविनाशेऽपि तदीयभोगसाधनदेहानां विनाशं पर्यालोच्य शोचामीति चेत्तत्राह वासांसीति। यथेति दृष्टान्तः। नरो जीर्णानि वासांसि विहायापराणि नवानि गृह्णाति तथा देही जीव आत्मा जीर्णानि शरीराणि त्यक्त्वाऽन्यानि नवानि प्राप्नोति। कर्मनिबन्धनानां नूतनानां देहानामवश्यम्भावात् न जीर्णदेहनाशे शोकावकाश इति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.22।।अब हम प्रकृत विषय वर्णन करेंगे। यहाँ ( प्रकरणमें ) आत्माके अविनाशित्वकी प्रतिज्ञा की गयी है वह किसके सदृश है सो कहा जाता है जैसे जगत्में मनुष्य पुरानेजीर्ण वस्त्रोंको त्याग कर अन्य नवीन वस्त्रोंको ग्रहण करते हैं वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरको छोड़कर अन्यान्य नवीन शरीरोंको प्राप्त करता है। अभिप्राय यह कि ( पुराने वस्त्रोंको छोड़कर नये धारण करनेवाले ) पुरुषकी भाँति जीवात्मा सदा निर्विकार ही रहता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.22।। व्याख्या    वासांसि जीर्णानि ৷৷. संयाति नवानि देही   इसी अध्यायके तेरहवें श्लोकमें सूत्ररूपसे कहा गया था कि देहान्तरकी प्राप्तिके विषयमें धीर पुरुष शोक नहीं करते। अब उसी बातको उदाहरण देकर स्पष्टरूपसे कह रहे हैं कि जैसे पुराने कपड़ोंके परिवर्तनपर मनुष्यको शोक नहीं होता ऐसे ही शरीरोंके परिवर्तनपर भी शोक नहीं होना चाहिये।कपड़े मनुष्य ही बदलते हैं पशुपक्षी नहीं अतः यहाँ कपड़े बदलनेके उदाहरणमें  नरः  पद दिया है। यह  नरः  पद मनुष्ययोनिका वाचक है और इसमें स्त्रीपुरुष बालकबालिकाएँ जवानबूढ़े आदि सभी आ जाते हैं।जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर दूसरे नये कपड़ोंको धारण करता है ऐसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर दूसरे नये शरीरोंको धारण करता है। पुराना शरीर छोड़नेको मरना कह देते हैं और नया शरीर धारण करनेको जन्मना कह देते हैं। जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है तबतक यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर कर्मोंके अनुसार या अन्तकालीन चिन्तनके अनुसार नयेनये शरीरोंको प्राप्त होता रहता है।यहाँ  शरीराणि  पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि जबतक शरीरीको अपने वास्तविक स्वरूपका यथार्थ बोध नहीं होता तबतक यह शरीरी अनन्तकालतक शरीर धारण करता ही रहता है। आजतक इसने कितने शरीर धारण किये हैं इसकी गिनती भी सम्भव नहीं है। इस बातको लक्ष्यमें रखकर  शरीराणि  पदमें बहुवचनका प्रयोग किया गया है तथा सम्पूर्ण जीवोंका लक्ष्य करानेके लिये यहाँ  देही  पद आया है।यहाँ श्लोकके पूर्वार्धमें तो जीर्ण कपड़ोंकी बात कही है और उत्तरार्धमें जीर्ण शरीरोंकी। जीर्ण कपड़ोंका दृष्टान्त शरीरोंमें कैसे लागू होगा कारण कि शरीर तो बच्चों और जवानोंके भी मर जाते हैं। केवल बूढ़ोंके जीर्ण शरीर मर जाते हों यह बात तो है नहीं इसका उत्तर यह है कि शरीर तो आयु समाप्त होनेपर ही मरता है और आयु समाप्त होना ही शरीरका जीर्ण होना है  (टिप्पणी प0 62) । शरीर चाहे बच्चोंका हो चाहे जवानोंका हो चाहे वृद्धोंका हो आयु समाप्त होनेपर वे सभी जीर्ण ही कहलायेंगे।इस श्लोकमें भगवान्ने  यथा  और  तथा  पद देकर कहा है कि जैसे मनुष्य पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपड़े धारण कर लेता है वैसे ही यह देही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चला जाता है। यहाँ एक शंका होती है। जैसे कुमार युवा और वृद्ध अवस्थाएँ अपनेआप होती हैं वैसे ही देहान्तरकी प्राप्ति अपनेआप होती है (2। 13) यहाँ तो  यथा  (जैसे) और  तथा  (वैसे) घट जाते हैं। परन्तु (इस श्लोकमें) पुराने कपड़ोंको छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो मनुष्यकी स्वतन्त्रता है पर पुराने शरीरोंको छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें देहीकी स्वतन्त्रता नहीं है। इसलिये यहाँ  यथा  और  तथा  कैसे घटेंगे इसका समाधान है कि यहाँ भगवान्का तात्पर्य स्वतन्त्रता परतन्त्रताकी बात कहनेमें नहीं हैं प्रत्युत शरीरके वियोगसे होनेवाले शोकको मिटानेमें है। जैसे पुराने कपड़ोंको छोड़कर नये कपडे धारण करनेपर भी धारण करनेवाला (मनुष्य) वही रहता है वैसे ही पुराने शरीरोंको छोड़कर नये शरीरोंमें चले जानेपर भी देही ज्योंकात्यों निर्लिप्तरूपसे रहता है अतः शोक करनेकी कोई बात है ही नहीं। इस दृष्टिसे यह दृष्टान्त ठीक ही है।दूसरी शंका यह होती है कि पुराने कपड़े छोड़नेमें और नये कपड़े धारण करनेमें तो सुख होता है पर पुराने शरीर छोड़नेमें और नये शरीर धारण करनेमें दुःख होता है। अतः यहाँ  यथा  और  तथा  कैसे घटेंगे इसका समाधान .यह है कि शरीरोंके मरनेका जो दुःख होता है वह मरनेसे नहीं होता प्रत्युत जीनेकी इच्छासे होता है। मैं जीता रहूँ ऐसी जीनेकी इच्छा भीतरमें रहती है और मरना पड़ता है तब दुःख होता है। तात्पर्य यह हुआ कि जब मनुष्य शरीरके साथ एकात्मता कर लेता है तब वह शरीरके मरनेसे अपना मरना मान लेता है और दुःखी होता है। परन्तु जो शरीरके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता उसको मरनेमें दुःख नहीं होता प्रत्युत आनन्द होता है जैसे मनुष्य कपड़ोंके साथ अपनी एकात्मता नहीं मानता तो कपड़ोंको बदलनेमें उसको दुःख नहीं होता। कारण कि वहाँ उसका यह विवेक स्पष्टतया जाग्रत् रहता है कि कपड़े अलग है और मैं अलग हूँ। परन्तु वही कपड़ोंका बदलना अगर छोटे बच्चेका किया जाय तो वह पुराने कपड़े उतारनेमें और नये कपड़े धारण करनेमें भी रोता है। उसका यह दुःख केवल मूर्खतासे नासमझीसे होता है। इस मूर्खताको मिटानेके लिये ही भगवान्ने यहाँ  यथा  और  तथा  पद देकर कपड़ोंका दृष्टान्त दिया है।यहाँ भगवान्ने कपड़ोंके धारण करनेमें तो  गृह्णाति  (धारण करता है) क्रिया दी पर शरीरोंके धारण करनेमें संयाति (जाता है) क्रिया दी ऐसा क्रियाभेद भगवान्ने क्यों किया लौकिक दृष्टिसे बेसमझीके कारण ऐसा दीखता है कि मनुष्य अपनी जगह रहता हुआ ही कपड़ोंको धारण करता है और देहान्तरकी प्राप्तिमें देहीको उनउन देहोंमें जाना पड़ता है। इस लौकिक दृष्टिको लेकर ही भगवान्ने क्रियाभेद किया है। विशेष बात गीतामें  येन सर्वमिदं ततम्  (2। 17)  नित्यः सर्वगतः स्थाणुः  (2। 24) आदि पदोंसे देहीको सर्वत्र व्याप्त नित्य सर्वगत और स्थिर स्वभाववाला बताया तथा  संयाति नवानि देही  (2। 22)  शरीरं यदवाप्नोति  (15। 8) आदि पदोंसे देहीको दूसरे शरीरोंमें जानेकी बात कही गयी है। अतः जो सर्वगत है सर्वत्र व्याप्त है उसका जानाआना कैसे क्योंकि जो जिस देशमें न हो उस देशमें चला जाय तो इसको जाना कहते हैं और जो दूसरे देशमें है वह इस देशमें आ जाय तो इसको आना कहते हैं। परन्तु देहीके विषयमें तो ये दोनों ही बातें नहीं घटतीं इसका समाधान यह है कि जैसे किसीकी बाल्यावस्थासे युवावस्था हो जाती है तो वह कहता है कि मैं जवान हो गया हूँ। परन्तु वास्तवमें वह स्वयं जवान नहीं हुआ है प्रत्युत उसका शरीर जवान हुआ है। इसलिये बाल्यावस्थामें जो वह था युवावस्थामें भी वह था युवावस्थामें भी वह वही है। परन्तु शरीरसे तादात्म्य माननेके कारण वह शरीरके परिवर्तनको अपनेमें आरोपित कर लेता है। ऐसे ही आनाजाना वास्तवमें शरीरका धर्म है पर शरीरके साथ तादात्म्य होनेसे वह अपनेमें आनाजाना मान लेता है। अतः वास्तवमें देहीका कहीं भी आनाजाना नहीं होता केवल शरीरोंके तादात्म्यके कारण उसका आनाजाना प्रतीत होता है।अब यह प्रश्न होता है कि अनादिकालसे जो जन्ममरण चला आ रहा है उसमें कारण क्या है कर्मोंकी दृष्टिसे तो शुभाशुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये जन्ममरण होता है ज्ञानकी दृष्टिसे अज्ञानके कारण जन्ममरण होता है और भक्तिकी दृष्टिसे भगवान्की विमुखताके कारण जन्ममरण होता है। इन तीनोंमें भी मुख्य कारण है कि भगवान्ने जीवको जो स्वतन्त्रता दी है उसका दुरुपयोग करनेसे ही जन्ममरण हो रहा है। अब वह जन्ममरण मिटे कैसे मिली हुई स्वतन्त्रताका सदुपयोग करनेसे जन्ममरण मिट जायगा। तात्पर्य है कि अपने स्वार्थके लिये कर्म करनेसे जन्ममरण हुआ है अतः अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे जन्ममरण मिट जायगा। अपनी जानकारीका अनादर करनेसे  (टिप्पणी प0 63)  जन्ममरण हुआ है अतः अपनी जानकारीका आदर करनेसे जन्ममरण मिट जायगा। भगवान्से विमुख होनेसे जन्ममरण हुआ है अतः भगवान्के सम्मुख होनेसे जन्ममरण मिट जायगा।  सम्बन्ध   पहले दृष्टान्तरूपसे शरीरीकी निर्विकारताका वर्णन करके अब आगेके तीन श्लोकोंमें उसीका प्रकारान्तरसे वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.22।।वेदेति। य एनमात्मानं प्रबुद्धत्वात् जानाति स न हन्ति न स हन्यते इति तस्य कथं बन्धः (N omits इति बन्धः)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.22।।आत्मनोऽविक्रियत्वेन कर्मासंभवं प्रतिपाद्याविक्रियत्वहेतुसमर्थनार्थमेवोत्तरग्रन्थमवतारयति   प्रकृतं   त्विति।  किं तत्प्रकृतमिति शङ्कमानं प्रत्याह  तत्रेति।  अविनाशित्वमित्युपलक्षणमविक्रियत्वमित्यर्थः। तदेव दृष्टान्तेन स्पष्टयितुमुत्तरश्लोकमुत्थापयति  तदित्यादिना।  आत्मनः स्वतो विक्रियाभावेऽपि पुरातनदेहत्यागे नूतनदेहोपादाने च विक्रियावत्त्वध्रौव्यादविक्रियत्वमसिद्धमिति चेत्तत्राह  वासांसीति।  शरीराणि जीर्णानि वयोहानिं गतानि वलीपलितादिसंगतानीत्यर्थः। वाससां पुरातनानां परित्यागे नवानां चोपादाने त्यागोपादानकर्तृभूतलौकिकपुरुषस्याप्यविकारित्वेनैकरूपत्ववदात्मनो देहत्यागोपादानयोरविरुद्धमविक्रियत्वमिति वाक्यार्थमाह  पुरुषवदिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.22।।देहानामुपगमापगमयोरप्येक एवायमात्मेत्येतत्देहिनोऽस्मिन् 2।13 इत्यत्रैव सदृष्टान्तमुक्तं अतोवासांसि इति व्यर्थोऽयं श्लोक इत्यत आह  देहे ति। कौमारादिदेहानामनतिभिन्नत्वान्न तेन देहात्मनो र्विवेको  विनाशित्वाविनाशित्वलक्षणः स्पष्टमनुभवारूढो भवतीति भावः।  दृष्टान्तं  पूर्वोक्ताद्विलक्षणमिति शेषः। दृष्टान्तमित्युपलक्षणं दार्ष्टान्तिकस्यापि कथितत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.22।।देहात्मविवेकानुभवार्थं दृष्टान्तमाह वासांसीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.22।।धर्मयुद्धे शरीरं त्यजतां त्यक्तशरीराद् अधिकतरकल्याणशरीरग्रहणं शास्त्राद् अवगम्यते इति।  जीर्णानि वासांसि विहाय नवानि  कल्याणानि वासांसि गृह्णताम् इव हर्षनिमित्तिम् एव अत्र उपलभ्यते।पुनरपिअविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्। (गीता 2।17) इति पूर्वोक्तम् अविनाशित्वं सुखग्रहणाय व्यञ्जयन् द्रढयति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.22।। वासांसि वस्त्राणि जीर्णानि दुर्बलतां गतानि यथा लोके विहाय परित्यज्य नवानि अभिनवानि गृह्णाति उपादत्ते नरः पुरुषः अपराणि अन्यानि तथा तद्वदेव शरीराणि विहाय जीर्णानि अन्यानि संयाति संगच्छति नवानि देही आत्मा पुरुषवत् अविक्रिय एवेत्यर्थः।।कस्मात् अविक्रिय एवेति आह

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【 Verse 2.23 】

▸ Sanskrit Sloka: नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: | न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत: ||

▸ Transliteration: nainaṁ chindanti śastrāṇi nainaṁ dahati pāvakaḥ | na cainaṁ kledayantyāpo na śoṣayati mārutaḥ ||

▸ Glossary: na: not; enaṁ: this (soul); chindanti: cut to pieces; śastrāṇi: weapons; na: not; enaṁ: this soul; dahati: burns; pāvakaḥ: fire; na: not; ca: also; enaṁ: this soul; kledayanti: moistens; āpaḥ: water; na: not; śoṣayati: dries; mārutaḥ: wind

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.23 Weapons do not cleave the Self, fire does not burn It, water does not moisten It and wind does not dry It.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.23।।शस्त्र इस शरीरीको काट नहीं सकते अग्नि इसको जला नहीं सकती जल इसको गीला नहीं कर सकता और वायु इसको सुखा नहीं सकती।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.23।। इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते और न अग्नि इसे जला सकती है जल इसे गीला नहीं कर सकता और वायु इसे सुखा नहीं सकती।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.23 न not? एनम् this (Self)? छिन्दन्ति cut? शस्त्राणि weapons? न not? एनम् this? दहति burns? पावकः fire? न not?,च and? एनम् this? क्लेदयन्ति wet? आपः waters? न not? शोषयति dries? मारुतः wind.Commentary The Self is indivisible. It has no parts. It is extremely subtle. It is infinite. Therefore? sword cannot cut It fire cannot burn It water cannot wet It wind cannot dry It.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.23. Weapons do not cut This; fire does not burn This; water does not (make) This wet; and the wind does not make This dry.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.23 Weapons cleave It not, fire burns It not, water drenches It not, and wind dries It not.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.23 Weapons do not cleave It (the self), fire does not burn It, waters do not wet It, and wind does not dry It.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.23 Weapons do not cut It, fire does not burn It, water does not moisten It, and air does not dry It.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.23 Weapons cut It not, fire burns It not, water wets It not, wind dries It not.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.23 See Comment under 2.25

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.23 - 2.24 Weapons, fire, water and air are incapable of cleaving, burning, wetting and drying the self; for, the nature of the self is to pervade all elements; It is present everywhere; for, It is subtler than all the elements; It is not capable of being pervaded by them; and cleaving, burning, wetting and drying are actions which can take place only by pervading a substance. Therefore the self is eternal. It is stable, immovable and primeval. The meaning is that It is unchanging, unshakable and ancient.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.23 Why does It verily remain unchanged? This is being answered in, 'Weapons do not cut It,' etc. Sastrani, weapons; na, do not; chindanti, cut; enam, It, the embodied one under discussion. It being partless, weapons like sword etc. do not cut off Its limbs. So also, even pavakah, fire; na dahati enam, does not burn, does not reduce It to ashes. Ca, and similarly; apah, water; na enam kledayanti, does not moisten It. For water has the power of disintegrating a substance that has parts, by the process of moistening it. That is not possible in the case of the partless Self. Similarly, air destroys an oil substance by drying up the oil. Even marutah, air; na sosayati, does not dry; (enam, It,) one's own Self. [Ast. reads 'enam tu atmanam, but this Self', in place of enam svatmanam.-Tr.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.23।। अदृष्ट वस्तु को सदैव दृष्ट वस्तुओं के द्वारा ही समझाया जा सकता है। परिभाषा मात्र से वह वस्तु अज्ञात ही रहेगी। यहाँ भी भगवान् श्रीकृष्ण अविकारी नित्य आत्मतत्त्व का वर्णन अर्जुन को और हमको परिचित विकारी नित्य परिवर्तनशील जगत् के द्वारा करते हैं। यह तो सर्वविदित है कि वस्तुओं का नाश शस्त्र आदि अथवा प्रकृति के नाश के साधनों अग्नि जल और वायु के द्वारा संभव है। इनमें से किसी भी साधन से आत्मा का नाश नहीं किया जा सकता।शस्त्र इसे काट नहीं सकते यह सर्वविदित है कि एक कुल्हाड़ी से वृक्ष आदि को काटा जा सकता है परन्तु उसके द्वारा जलअग्नि वायु या आकाश को किसी प्रकार की चोट नहीं पहुँचायी जा सकती। सिद्धांत यह है कि स्थूल साधन अपने से सूक्ष्म वस्तु का नाश नहीं कर सकता । इसलिये स्वाभाविक ही है कि आत्मा जो कि सूक्ष्मतम तत्त्व आकाश से भी सूक्ष्म है का नाश शस्त्रों से नहीं हो सकता।अग्नि जला नहीं सकती अग्नि अपने से भिन्न वस्तुओं को जला सकती है परन्तु वह स्वयं को ही कभी नहीं जला सकती। ज्वलन अग्नि का धर्म है और अपने धर्म का अपने सत्य स्वरूप का वह नाश नहीं कर सकती। विचारणीय बात यह है कि आकाश में रहती हुई अग्नि आकाश में स्थित वस्तुओं को तो जला पाती है परन्तु आकाश को कभी नहीं। फिर आकाश से सूक्ष्मतर आत्मा को जलाने में वह अपने आप को कितना निस्तेज पायेगी जल गीला नहीं कर सकता पूर्व वर्णित सिद्धांत के अनुसार ही हम यह भी समझ सकते हैं कि जल आत्मा को आर्द्र या गीला नहीं कर सकता और न उसे डुबो सकता है। ये दोनों ही किसी द्रव्य युक्त साकार वस्तु के लिये संभव हैं और न कि सर्वव्यापी निराकार आत्मतत्व के लिये।वायु सुखा नहीं सकती जो वस्तु गीली होती है उसी का शोषण करके उसे शुष्क बनाया जा सकता है। आजकल सब्जियाँ और खाद्य पदार्थों के जल सुखाकर सुरक्षित रखने के अनेक साधन उपलब्ध हैं। परन्तु आत्मतत्त्व में जल का कोई अंश ही नहीं है क्योंकि वह अद्वैत स्वरूप है तब वायु के द्वारा शोषित होकर उसके नाश की कोई संभावना नहीं रह जाती।इन शब्दों के सरल अर्थ के अलावा इस श्लोक का गम्भीर अर्थ भी है जिसे भगवान् श्रीकृष्ण अगले श्लोक में और अधिक स्पष्ट करते हैं कि आत्मतत्त्व क्यों और कैसे शाश्वत है।यह आत्मा सनातन किस प्रकार है इसे सनातन स्वरूप से क्यों और कैसे पहचाना जा सकता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.23।।तस्याविक्रियत्वं प्रकारान्तरेण पुनराह  नैनमित्यादिना।  नच क्लेदयन्ति विश्लिष्टावयवं न कुर्वन्ति। निरवयवत्वं हेतुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.23।।ननु देहनाशे तदभ्यन्तरवर्तिन आत्मनः कुतो न विनाशो गृहदाहे तदन्तर्वर्तिपुरुषवदित्यत आह शस्त्राण्यस्यादीन्यतितीक्ष्णान्यप्येनं प्रकृतमात्मानं न छिन्दन्ति अवयवविभागेन द्विधाकर्तुं न शक्नुवन्ति। तथा पावकोऽग्निरतिप्रज्वलितोऽपि नैनं भस्मीकर्तुं शक्नोति। नचैनमापोऽत्यन्तं वेगवत्योऽप्यार्द्रीकरणेन विश्लिष्टावयवं कर्तुं शक्नुवन्ति। मारुतो वायुरतिप्रबलोऽपि नैनं नीरसं कर्तु शक्नोति। सर्वनाशकाक्षेपे प्रकृते युद्धसमये शस्त्रादीनां प्रकृतत्वादवयुत्यानुवादेनोपन्यासः पृथिव्यप्तेजोवायूनामेव नाशकत्वप्रसिद्धेस्तेषामेवोपन्यासो नाकाशस्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.23।।कीदृशोऽसौ देहीत्यत आह  नैनमिति।  एनं शस्त्राणि न छिन्दन्ति न द्वेधा कुर्वन्ति। अस्थूलत्वात्। तर्हि पार्थिवपरमाणुवत्पाकजरूपाद्याश्रयो भविष्यतीत्याशङ्क्याह  नैनं दहति पावक इति।  अनणुत्वात्। आपश्चैनं न क्लेदयन्ति अस्पर्शत्वात्। स्पर्शवद्धि द्रव्यमद्भिरार्द्रीकर्तव्यं न त्वस्पर्शम्। न शोषयति मारुतः अस्नेहत्वात्। एतेनअदीर्घमस्थूलमनणुअशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् इति श्रुतिप्रसिद्धानामदीर्घत्वाशब्दत्वादीनामपि संग्रहो ज्ञेयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.23।।तस्मात्त्याज्यदेहस्य दूरीकरणेऽपि एनमविनाशादिधर्मयुक्तत्वात् शस्त्रादयो न च्छिन्दन्तीत्याह नैनं छिन्दन्तीति। एनं शस्त्राणि न च्छिन्दन्ति घनाभावात्। एनं पावकः न दहति शुष्कधर्माभावात्। आप एनं न क्लेदयन्ति मृदुत्वान्न शिथिलयन्ति काठिन्यादिराहित्यात्। मारुतः न शोषयति द्रवाभावादित्यर्थः। तस्मात् शस्त्रादिप्रक्षेपेऽप्यस्य न किमपि भविष्यति। इदमपि मत्क्री़डारूपमतो मत्सन्तोषार्थं युद्धादिकं कर्त्तव्यमिति भावः। एतेषां सर्वेषां तथाकरणे मदिच्छैव हेतुरिति भावः। यतो भगवदिच्छैव सर्वेषां स्वधर्मकरणे शक्तिः। अत एव श्रीभागवते 3।25।42 उक्तम् मद्भयाद्वाति वातोऽयम् इत्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.23।।कथं हन्तीत्यनेनोक्तं वधसाधनाभावं दर्शयन्नविनाशित्वमात्मनः स्फुटीकरोति नैनमिति। आपो नैनं क्लेदयन्ति मृदुकरणेन शिथिलं न कुर्वन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.23।।पुनरस्यात्मनोऽविनाशित्वमेव सुग्रहणाय श्रावयति सार्द्धाभ्यां नैनमित्यादिना। एतेन पृथिव्यप्तेजोवायुभिरविनाशित्वं निरूपितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.23।।आत्मा सदा निर्विकार किस कारणसे है सो कहते हैं इस उपर्युक्त आत्माको शस्त्र नहीं काटते अभिप्राय यह कि अवयवरहित होनेके कारण तलवार आदि शस्त्र इसके अङ्गोंके टुकड़े नहीं कर सकते। वैसे ही अग्नि इसको जला नहीं सकता अर्थात् अग्नि भी इसको भस्मीभूत नहीं कर सकता। जल इसको भिगो नहीं सकता क्योंकि सावयव वस्तुको ही भिगोकर उसके अङ्गोंको पृथक्पृथक् कर देनेमें जलकी सामर्थ्य है। निरवयव आत्मामें ऐसा होना सम्भव नहीं। उसी तरह वायु आर्द्र द्रव्यका गीलापन शोषण करके उसको नष्ट करता है अतः वह वायु भी इस स्वस्वरूप आत्माका शोषण नहीं कर सकता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.23।। व्याख्या    नैनं छिन्दन्ति शास्त्राणि   इस शरीरीको शस्त्र नहीं काट सकते क्योंकि ये प्राकृत शस्त्र वहाँतक पहुँच ही नहीं सकते।जितने भी शस्त्र हैं वे सभी पृथ्वीतत्त्वसे उत्पन्न होते हैं। यह पृथ्वीतत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहका कोई विकार नहीं पैदा कर सकता। इतना ही नहीं पृथ्वीतत्त्व इस शरीरीतक पहुँच ही नहीं सकता फिर विकृति करनेकी बात तो दूर ही रही  नैनं दहति पावकः   अग्नि इस शरीरीको जला नहीं सकती क्योंकि अग्नि वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती। जब वहाँतक पहुँच ही नहीं सकती तब उसके द्वारा जलाना कैसे सम्भव हो सकता है तात्पर्य है कि अग्नितत्त्व इस शरीरीमें कभी किसी तरहका विकार उत्पन्न कर ही नहीं सकता। न चैनं क्लेदयन्त्यापः   जल इसको गीला नहीं कर सकता क्योंकि जल वहाँतक पहुँच ही नहीं सकता। तात्पर्य है कि जलतत्त्व इस शरीरीमें किसी प्रकारका विकार पैदा नहीं कर सकता। न शोषयति मारुतः   वायु इसको सुखा नहीं सकती अर्थात वायुमें इस शरीरीको सुखानेकी सामर्थ्य नहीं है क्योंकि वायु वहाँतक पहुँचती ही नहीं। तात्पर्य है कि वायुतत्त्व इस शरीरीमें किसी तरहकी विकृति पैदा नहीं कर सकता।पृथ्वी जल तेज वायु और आकाश ये पाँच महाभूत कहलाते हैं। भगवान्ने इनमेंसे चार ही महाभूतोंकी बात कही है कि ये पृथ्वी जल तेज और वायु इस शरीरीमें किसी तरहकी विकृति नहीं कर सकते परन्तु पाँचवें महाभूत आकाशकी कोई चर्चा ही नहीं की है। इसका कारण यह है कि आकाशमें कोई भी क्रिया करनेकी शक्ति नहीं है। क्रिया (विकृति) करनेकी शक्ति तो इन चार महाभूतोंमें ही है। आकाश तो इन सबको अवकाशमात्र देता है।पृथ्वी जल तेज और वायु ये चारों तत्त्व आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं पर वे अपने कारणभूत आकाशमें भी किसी तरहका विकार पैदा नहीं कर सकते अर्थात् पृथ्वी आकाशका छेदन नहीं कर सकती जल गीला नहीं कर सकता अग्नि जला नहीं सकती और वायु सुखा नहीं सकती। जब ये चारों तत्त्व अपने कारणभूत आकाशको आकाशके कारणभूत महत्तत्त्वको और महत्तत्त्वके कारणभूत प्रकृतिको भी कोई क्षति नहीं पहुँचा सकते तब प्रकृतिसे सर्वथा अतीत शरीरीतक ये पहुँच ही कैसे सकते हैं इन गुणयुक्त पदार्थोंकी उस निर्गुणतत्त्वमें पहुँच ही कैसे हो सकती है नहीं हो सकती (गीता 13। 31)।शरीरी नित्यतत्त्व है। पृथ्वी आदि चारों तत्त्वोंको इसीसे सत्तास्फूर्ति मिलती है। अतः जिससे इन तत्त्वोंको सत्तास्फूर्ति मिलती है उसको ये कैसे विकृत कर सकते है यह शरीरी सर्वव्यापक है और पृथ्वी आदि चारों तत्त्व व्याप्य हैं अर्थात् शरीरीके अन्तर्गत हैं। अतः व्याप्य वस्तु व्यापकको कैसे नुकसान पहुँचा सकती है उसको नुकसान पहुँचाना सम्भव ही नहीं है।यहाँ युद्धका प्रसङ्ग है। ये सब सम्बन्धी मर जायँगे इस बातको लेकर अर्जुन शोक कर रहे हैं। अतः भगवान् कहते हैं कि ये कैसे मर जायँगे क्योंकि वहाँतक अस्त्रशस्त्रोंकी क्रिया पहुँचती ही नहीं अर्थात् शस्त्रके द्वारा शरीर कट जानेपर भी शरीरी नहीं कटता अग्न्यस्त्रके द्वारा शरीर जल जानेपर शरीरी नहीं जलता वरुणास्त्रके द्वारा शरीर गल जानेपर भी शरीरी नहीं गलता और वायव्यास्त्रके द्वारा शरीर सूख जानेपर भी शरीरी नहीं सूखता। तात्पर्य है कि अस्त्रशस्त्रोंके द्वारा शरीर मर जानेपर भी शरीरी नहीं मरता प्रत्युत ज्योंकात्यों निर्विकार रहता है। अतः इसको लेकर शोक करना तेरी बिलकुल ही बेसमझी है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.23।।वासांसि इति। यथा वस्त्राच्छादितः तद्वस्त्रनाशे समुचितवस्त्रान्तरावृतो न विनश्यति (N omits यथा न विनश्यति) एवमात्मा देहान्तरावृतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.23।।पृथिव्यादिभूतचतुष्टयप्रयुक्तविक्रियाभाक्त्वादात्मनोऽसिद्धमविक्रियत्वमिति शङ्कते  कस्मादिति।  यतो न भूतान्यात्मानं गोचरयितुमर्हन्त्यतो युक्तमाकाशवत्तस्याविक्रियत्वमित्याह  आहेत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.23।।नैमित्तिकनाशस्य प्राङ्निरस्तत्वात्किं नैनमिति श्लोकेनेत्यतस्तन्निवर्त्याशङ्काप्रदर्शनपूर्वकं तात्पर्यमाह  स्वत  इति। स्वतः कालतः। प्रायो बाहुल्येन शङ्क्यमाननिमित्तव्यावृत्त्यर्थमेतदव्ययम्। केनचिच्छस्त्रादिना स्याद्विनाश इति शेषः। असम्भावितशङ्क्या न पर्यवसानमित्यतो दृष्टान्तमाह  ककच्छेदादि वदिति। यथा दक्षस्य प्रजापतेः शिरश्छेदो न स्वतो जातः नापि वीरभद्रस्यायुधेन निमित्तेन किन्तु यज्ञपशुभावनाख्येन निमित्तविशेषेण तथेत्यर्थः। इत्यत एवं शङ्कितत्वात्। विशिष्यन्त इति विशेषाः। विशिष्टनिमित्तानि विनाशस्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.23।।स्वतः प्रायो निमित्तैश्चाविनाशिनोऽपि केनचिन्निमित्तविशेषेण स्यात् ककच्छेदादिवत् इत्यतो विशेषनिमित्तानि निषेधति नैनमिति।वर्तमाननिषेधात्स्यादुत्तरत्रेत्यत आह अच्छेद्य इति। वर्तमानादर्शनाद्युक्तयोग्यत्वमिति सूचयति वर्तमानापदेशेन। कुतोऽयोग्यता नित्यसर्वगतादिविशेषणेश्वरसरूपत्वत्।शाश्वत इत्येकरूपत्वमात्रमुक्तम्। स्थाणुशब्देन नैमित्तिकमप्यन्यथात्वं निवारयति। नित्यत्वं सर्वगतत्वविशेषणम् अन्यथा पुनरुक्तेः।ऐक्योक्तावप्यनुक्तविशेषणोपादानान्नेश्वरैक्ये पुनरुक्तिः। युक्ताश्च बिम्बधर्माः प्रतिबिम्बेऽविरोधे। तत्ता च रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव बृ.उ.2।5।19कठो.5।2।10आभास एव च इत्यादिश्रुतिस्मृतिसिद्धा। न चांशत्वविरोधः तस्यैवांशत्वात्। न चैकरूपतैवांशता। प्रमाणं चोभयविधवचनमेव। न चांशस्य प्रतिबिम्बत्वं कल्प्यम् गाध्यादिष्वंशबाहुरूप्यदृष्टेरितरत्रादृष्टेः।स्थाणुत्वेऽपि तदैक्षत इत्याद्यविरुद्धमीश्वरस्य उभयविधवाक्यात् अचिन्त्यशक्तेश्च। न च माययैकम्त्वयीश्वरे ब्रह्मणि नो विरुद्ध्यतेन योगित्वादीश्वरत्वात्चित्रं न चैतत् त्वयि कार्यकारणे इत्याद्यैश्वर्येणैव विरुद्धधर्माविरोधोक्तेः महातात्पर्याच्च। मोक्षो हि महापुरुषार्थः। तत्रापि मोक्ष एवार्थः।अन्तेषु रेमिरे धीरा न ते मध्येषु रेमिरे। अन्तप्राप्तिं सुखं प्राहुर्दुःखमन्तरमेतयोः शां.मो.ध.प.174।34 पुण्यचितो जितो लोकः क्षीयते छां.उ.8।1।6 इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः। स च विष्णुप्रसादादेव सिद्ध्यति।वासुदेवमनाराध्य को मोक्षं समवाप्नुयात्।तुष्टे तु तत्र किमलभ्यमनन्त ईशे (आद्ये) भाग.3।6।25तत्प्रसादादवाप्नोति परां सिद्धिं न संशयः।येषां स एव भगवान्दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रितपदो यदि निर्व्यलीकम्। ते वै विदन्त्यतितरन्ति च देवमायां नैषां समाहमिति धीः श्वशृगालभक्ष्ये भाग.2।7।42तस्मिन्प्रसन्ने किमिहात्स्त्यलभ्यं धम्र्मार्थकामैरलमल्पकास्तेऋते यदस्मिन्भव ईश जीवस्तापत्रयेणोपहता न शर्म आत्मँल्लभन्तेऋते भवत्प्रसादाद्धि कस्य मोक्षो भवेदिह तमेवं विद्वान् नृ.पू.उ.1।6 इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः। स चोत्कर्षज्ञानादेव भवति लोकप्रसिद्धेः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.23।।शस्त्राग्न्यम्बुवायवः छेदनदहनक्लेदनशोषणानि आत्मानं प्रति कर्तुं न शक्नुवन्ति। सर्वगतत्वाद् आत्मनः सर्वतत्त्वव्यापकस्वभावतया सर्वेभ्यः तत्त्वेभ्यः सूक्ष्मत्वात् अस्य तैः व्याप्त्यनर्हत्वाद् व्याप्यकर्तव्यत्वात् च छेदनदहनक्लेदनशोषणानाम्। अत आत्मा नित्यः स्थाणुः अचलः अयं सनातनः स्थिरस्वभावः अप्रकम्प्यः पुरातनः च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.23।। एनं प्रकृतं देहिनं न च्छिन्दन्ति शस्त्राणि निरवयवत्वात् न अवयवविभागं कुर्वन्ति। शस्त्राणि अस्यादीनि। तथा न एनं दहति पावकः अग्निरपि न भस्मीकरोति। तथा न च एनं क्लेदयन्ति आपः। अपां हि सावयवस्य वस्तुनः आर्द्रीभावकरणेन अवयवविश्लेषापादने सामर्थ्यम्। तत् न निरवयवे आत्मनि संभवति। तथा स्नेहवत् द्रव्यं स्नेहशोषणेन नाशयति वायुः। एनं तु आत्मानं न शोषयति मारुतोऽपि।।यतः एवं तस्मात्

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【 Verse 2.24 】

▸ Sanskrit Sloka: अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च | नित्य: सर्वगत: स्थाणुरचलोऽयं सनातन: ||

▸ Transliteration: acchedyo’yamadāhyo’yam akledyo’śoṣya eva ca | nityaḥ sarvagataḥ sthāṇur acalo’yaṁ sanātanaḥ ||

▸ Glossary: acchedyaḥ: incapable of being cut; ayaṁ: this soul; adāhyaḥ: cannot be burned; ayaṁ: this soul; akledyaḥ: insoluble; aśoṣyaḥ: cannot be dried; eva: certainly; ca: and; nityaḥ: everlasting; sarvagataḥ: all-pervading; sthāṇuḥ: unchangeable; acalaḥ: immovable; ayaṁ: this soul; sanātanaḥ: eternally the same

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.24 The Self cannot be broken nor burnt nor dissolved nor dried up. It is eternal, all-pervading, stable, immovable and ancient.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.24।।यह शरीरी काटा नहीं जा सकता यह जलाया नहीं जा सकता यह गीला नहीं किया जा सकता और यह सुखाया भी नहीं जा सकता। कारण कि यह नित्य रहनेवाला सबमें परिपूर्ण अचल स्थिर स्वभाववाला और अनादि है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.24।। क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य (काटी नहीं जा सकती)? अदाह्य (जलाई नहीं जा सकती)? अक्लेद्य (गीली नहीं हो सकती ) और अशोष्य (सुखाई नहीं जा सकती) है यह नित्य? सर्वगत? स्थाणु (स्थिर)? अचल और सनातन है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.24 अच्छेद्यः cannot be cut? अयम् this (Self)? अदाह्यः cannot be burnt? अयम् this? अक्लेद्यः cannot be wetted? अशोष्यः cannot be died? एव also? च and? नित्यः eternal? सर्वगतः allpervading? स्थाणुः stable? अचलः immovable? अयम् this? सनातनः ancient.Commentary The Self is very subtle. It is beyond the reach of speech and mind. It is very difficult to understand this subtle Self. So Lord Krishna explains the nature of the immortal Self in a variety of ways with various illustrations and examples? so that It can be grasped by the people.Sword cannot cut this Self. It is eternal. Because It is eternal? It is allpervading. Because It is allpervading? It is stable like a stature. Because It is stable? It is immovable. It is everlasting. Therefore? It is not produced out of any cause. It is not new. It is ancient.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.24. This is not to be cut; This is not to be burnt; (This is) not to be made wet and not to be dried too; This is eternal, all-pervading, stable, immobile and eternal.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.24 It is impenetrable; It can be neither drowned nor scorched nor dried. It is Eternal, All-pervading, Unchanging, Immovable and Most Ancient.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.24 It cannot be cleft; It cannot be burnt; It cannot be wetted and It cannot be dried, It is eternal, all-pervading, stable, immovable and primeval.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.24 It cannot be cut, It cannot be burnt, cannot be moistened, and surely cannot be dried up. It is eternal, omnipresent, stationary, unmoving and changeless.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.24 This Self cannot be cut, burnt, wetted, nor dried up. It is eternal, all-pervading, stable, immovable and ancient.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.24 See Comment under 2.25

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.23 - 2.24 Weapons, fire, water and air are incapable of cleaving, burning, wetting and drying the self; for, the nature of the self is to pervade all elements; It is present everywhere; for, It is subtler than all the elements; It is not capable of being pervaded by them; and cleaving, burning, wetting and drying are actions which can take place only by pervading a substance. Therefore the self is eternal. It is stable, immovable and primeval. The meaning is that It is unchanging, unshakable and ancient.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.24 Since this is so, therefore ayam, It; acchedyah, cannot be cut. Since the other elements which are the causes of destruction of one ano ther are not capable of destroying this Self, therefore It is nityah, eternal. Being eternal, It is sarva-gatah, omnipresent. Being omnipresent, It is sthanuh, stationary, i.e. fixed like a stump. Being fixed, ayam, this Self; is acalah, unmoving. Therefore It is sanatanah, changeless, i.e. It is not produced from any cause, as a new thing.

It is not to be argued that 'these verses are repetive since eternality and changelessness of the Self have been stated in a single verse itself, "Never is this One born, and never does It die," etc. (20). Whatever has been said there (in verse 19) about the Self does not go beyond the meaning of this verse. Something is repeated with those very words, and something ideologically.' Since the object, viz the Self, is inscrutable, therefore Lord Vasudeva raises the topic again and again, and explains that very object in other words so that, somehow, the unmanifest Self may come within the comprehension of the intellect of the transmigrating persons and bring about a cessation of their cycles of births and deaths.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.24।। यह तो स्पष्ट ही है कि जिस वस्तु का नाश प्रकृति की विनाशकारी शक्तियाँ अथवा मानव निर्मित साधनों एवं शस्त्रास्त्रों के द्वारा संभव नहीं है उसे नित्य होना चाहिये।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में आत्मा के अनेक विशेषण बताये गये हैं जो शीघ्रतावश चाहें जहां से उठाकर निष्प्रयोजन ही प्रयोग में नहीं लाये गये हैं। विचारों की एक शृंखला के रूप में प्रत्येक शब्द को चुनकर प्रयोग किया गया है। प्रथम पंक्ति में वर्णित जो अविनाशी तत्व हैं उसको नित्य होना चाहिये। जो नित्य वस्तु है वह निश्चित ही सर्वगत भी होगी।सर्वगत इस छोटे से शब्द का अर्थ व्यापक और तात्पर्य गम्भीर है। कोई भी वस्तु ऐसी शेष नहीं रह सकती जो सर्वगत तत्त्व के द्वारा व्याप्त न हो। नित्य आत्मा सर्वगत है तो उसका कोई आकार विशेष भी नहीं हो सकता क्योंकि आकार केवल परिच्छिन्न वस्तु का होता है जिसकी सीमा के बाहर उससे भिन्न अन्य कोई वस्तु रहती है। जैसे हाथ पैर इत्यादि अवयवों का आकार होता है क्योंकि इनके बाहर आसपास आकाश तत्त्व है। अत अपरिच्छिन्न सर्वगत आत्मा का कोई आकार नहीं है क्योंकि उसको परिच्छिन्न करने वाली कोई अन्य वस्तु है ही नहीं।इस प्रकार नित्य सर्वगत

Chapter 2 (Part 16)

वस्तु का स्थिर और अचल होना स्वाभाविक है। उसमें चलनादि क्रिया संभव नहीं। गति केवल उस वस्तु के लिये है जो किसी काल और देश विशेष में रहती हो तब उसका स्थानान्तरण किया जा सकता है। आत्मा का किसी काल अथवा देश में अभाव नहीं है तो उसमें गति होने का प्रश्न ही नहीं उठता। मैं अपने स्वयं में ही घूम फिर नहीं सकता।यहाँ स्थिर और अचल दोनों शब्दों का एक साथ प्रयोग व्यर्थ प्रतीत हो रहा है क्योंकि वे कुछ समानार्थी हैं। परन्तु स्थिर शब्द से अभिप्राय नीचे मूल की स्थिरता से है जैसे पेड़ एक जगह स्थिर होते हैं परन्तु उनकी वृद्धि ऊपर की ओर होती है। यहाँ अचल रहकर ऊर्ध्व गति का भी निषेध किया गया है। अनन्तस्वरूप आत्मा स्थिर और अचल है अर्थात् उसमें किसी भी प्रकार की चलन क्रिया नहीं है।प्राचीन पुरातन वस्तु को सनातन कहते हैं। इस सनातन शब्द के दो अर्थ हैं एक वाच्यार्थ (शाब्दिक) और दूसरा है लक्ष्यार्थ। उसका सरल वाच्यार्थ यह है कि आत्मा कोई नई बनी वस्तु नहीं है वह प्राचीन है। लक्ष्यार्थ के अनुसार इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा काल और देश से मर्यादित परिच्छिन्न नहीं है। किसी भी देश में किसी भी काल में कोई भी व्यक्ति आत्मसाक्षात्कार से पूर्णत्व प्राप्त करता है तो वह साक्षात्कार एक ही होगा भिन्नभिन्न नहीं।आगे भगवान कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.24।।   फलितमाह  अच्छेद्य इति।  एवकारस्य सर्वत्र संबन्धः। यस्मादन्योन्यनाशहेतूनि भूतान्यात्मानं नाशयितुं नोत्सहन्ते तस्मान्नित्यः परमाणुनित्यत्वे प्रमाणाभावान्न तन्नातिप्रसङ्गः। अतएव सर्वगतः तत एव सर्वगताकाशवत्स्थाणुरिव स्थिर इत्यर्थः। तत एवाचलः अतएवायमात्मा सनातनश्चिरंतनः न कुतश्चित्कारणान्निष्पन्न इतीदं भाष्यमुपलक्षणं यथेष्टहेतुहेतुमद्भावस्यापि। तथाचोत्पाद्याप्यविकार्यसंस्कार्यरुपाणां क्रियाफलामा क्रमेण नित्य इत्यादिविशेषचतुष्टयेन निराकरणं हेतुहेतुमद्भावविपर्ययश्च न कुतश्चित्कारणान्निष्पन्न इति भाष्यात् तस्योपलक्षणार्थत्वाच्च सिध्यत इति न कोऽपि विरोधः। यत्तु तथाच श्रुतयः आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःवृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तम् इत्याद्याः।यः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो योऽप्सु तिष्ठन्नद्य्भोन्तरो यस्तेजसि तिष्ठंस्तेजसोन्तरो यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरः इत्याद्याश्च श्रुतयः सर्वगतस्य सर्वान्तर्यामितया तदविषयत्वं दर्शयन्ति। यो हि शस्त्रादौ न तिष्ठति तं शस्त्रादयश्छिन्दन्ति अयंतु शस्त्रादीनां सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन तत्प्रेरकस्तदन्तर्यामी अतः कथमेनं शस्त्रादीनि स्वव्यापारविषयीकुर्युरित्यभिप्राय इति केचिद्वर्णयन्ति। तत्रेदं वक्तव्यम् त्वंपदशोधनप्रकरणे तत्पदवाच्यान्तर्यामिप्रतिपादकश्रुत्युदाहरणमयुक्तम्।गतासूनगतासून इत्युपक्रमःदेहिनोऽस्मिन्अन्तवन्त इमे देहावासांसि जीर्णानि इत्यादिर्मध्यनिर्देशःदेही नित्यम् इत्युपसंहारः इत्येवंरुपतात्पर्यलिङ्गैस्त्वंपदनिरुपणप्रतीतेः स्पष्टत्वात्। आद्यषट्कुं त्वंपदशोधनपरमिति सर्वैः स्वेन च तथैव स्थापितत्वाच्च। अभेदस्तु नियम्यनियामकभावाभावविनिर्मुक्तयोः शुद्धचैतन्ययोर्वास्तवः। औपाधिकस्तु भेद एव। तथाच भाष्यंअविद्याप्रत्युपस्थाषितकार्यकरणोपाधिनिमित्तोऽयं शारीरान्तर्यामिणोर्भेदव्यपदेशो न पारमार्थिकः इति। एवंच येन शुद्धेन शुद्धस्यास्याभेदः स्य नियामकत्वाभावात् नान्तर्यामिश्रुत्युदाहरणं प्रकृत उपयुक्तम्। तथाचौपापाधिकभेदप्रतिपादकनि भगवतो वादरायणस्य सूत्राणिअन्तर्याभ्यधिदैवादिषु तद्धर्मव्यपदेशात्नच स्मार्तमतद्धर्माभिलापात्शारीरश्चोभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते इतिय इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतान्यन्तरो यमयति इत्युपक्रम्य श्रुयतेयः पृथिव्यां तिष्टन्पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयति इत्यादि। अत्राधिदैवतमधिलोकमधिवेदमधियज्ञमधिभूतमध्यात्मं च कश्चिदन्तरवस्थितो यमयितान्तर्यामीति श्रुयते सोऽधिदैवाद्यभिमानी कश्चिद्देवतात्मा स्यात् प्राप्ताणिमार्यैश्वर्यः कश्चिद्योगी वा स्यात् अर्थान्तरं किंचिद्वा स्यादितिप्राप्ते राद्धान्तः। योऽन्तर्याभ्यधिदैवादिषु श्रुयते स परमात्मैव स्यान्नान्यः। कुतः। तद्धर्मव्यपदेशात्तस्य परमात्मनो धर्माणमस्यां श्रुतौ व्यपदेशात्। नच स्मार्तं प्रधानमन्तर्यामिशब्दप्रतिपाद्यं भवितुमर्हति। कस्मात् अतद्धर्माभिलापाद्रष्टत्वादीनामप्रधानधर्माणां कथनात्। ननु शारीरोऽस्त्वत्वत आह शारीर इति। पूर्वसूत्रान्नेत्यनुर्वर्तते। शारीरश्च नान्तर्यामी स्यात्। हि यस्मादुभयेऽपि काण्वा माध्यन्दिनाश्चान्तर्यामिणो भेदेनैनं शारीरं पृथिव्यादिवदधिष्ठाननत्वेन नियम्यत्वेन चाधीयते यो विज्ञाने तिष्ठन्नति काण्वाः आत्मनि तिष्ठन्निति माध्यन्दिनाः तस्माच्छारीरादन्य आत्मान्तर्यामीति सिद्धम्। यत्तुयो हि शस्त्रादौ तिष्ठति न तं शस्त्रादयश्िछन्दन्ति इति तदपि न शस्त्रादौ स्थितस्यापि लोहादेस्तैश्छेदस्योपलब्धेः। तस्मात्सर्वज्ञैर्भाष्यकारैरुक्तो निरवयवत्वहेतुरेव समीचीन इति दिक्। न जायत इति श्लोकेनोक्तस्याप्यात्मज्ञानस्य दृष्टफलस्य व्रीह्यवहननस्यावृत्तिवद्दृष्टफलत्वाद्दुर्बोधत्वाच्च पुनः पुनः प्रसङ्गमापाद्य शब्दान्तरेण तदेव वस्तु निरुप्यते भगवता करुणानिधीना श्रीकृष्णेन कथंचिदपि संसारनिमग्नानां मुमुक्षूणां बुद्धिगोचरतामापन्नं स्पष्टतत्त्वं सत् संसारनिवृत्तये स्यादित्यभिप्रायवता इति न पौनरुक्त्यम्। तथाच भगवतो व्यासस्य सूत्रंआवृत्तिरसकृदुपदेशात् इति। अस्यार्थःआत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यःतमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत ब्राह्णःसोऽन्वेष्टव्यः स विजज्ञासितव्यः इत्यादि श्रुयते तत्र संशयः किं सकृत्प्रत्ययः कर्तव्य आहोस्विदावृत्त्येति। किं तावत्प्राप्तं सकृत्प्रत्ययः स्यात्प्रयाजादिवत् तावता शास्त्रस्य कृतार्थत्वात् अश्रूयमाणायामप्यावृत्तौ क्रियमाणायामशास्त्राथः कृतो भवेत्। नन्वसकृदुपदेशा उदाहृताः श्रोतव्य इत्यादयः। एवमपि यावच्छब्दमावर्तयेत् सकृच्छ्रवणमित्यादिनातिरिक्तमित्येवं प्राप्ते ब्रूमः। प्रत्ययावृत्तिः कर्तव्या। कुतः असकृदुपदेशात्। श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्य इत्येवंजातीयको ह्यसकृदुपदेशः प्रत्ययावृत्तिं सूचयति। ननूक्तं यावच्छब्दमेवावर्तयेन्नाधिकमिति न। दर्शनपर्यवसानत्वादेतेषाम्। दर्शनपर्यवसानानि हि श्रवणादीन्यावर्त्यमानानि दृष्टार्थानिं भवन्ति यथावघातादीनि तन्दुलनिष्पत्तिपर्यवसानानि तद्वदिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.24।।शस्त्रादीनां तन्नाशकत्वासामर्थ्ये तस्य तज्जनितनाशानर्हत्वे हेतुमाह यतोऽच्छेद्योऽयमतो नैनंच्छिन्दन्ति शस्त्राणि अदाह्योऽयं यतोऽतो नैनं दहति पावकः यतोऽक्लेद्योऽयमतो नैनं क्लेदयन्त्यापः यतोऽशोष्योऽयमतो नैनं शोषयति मारुत इति क्रमेण योजनीयम्। एवकारः प्रत्येकं संबध्यमानोऽच्छेद्यत्वाद्यवधारणार्थः। चः समुच्चये हेतौ वा। छेदाद्यनर्हत्वे हेतुमाहोत्तरार्धेन। नित्योऽयं पूर्वोपरकोटिरहितोऽतोऽनुत्पाद्यः। असर्वगतत्वे ह्यनित्यत्वं स्यात्यावद्विकारं तु विभागः इति न्यायात्पराभ्युपगतपरमाण्वादीनामनभ्युपगमात्। अयं तु सर्वगतो विभुरतो नित्य एव। एतेन प्राप्यत्वं पराकृतम्। यदि चायं विकारी स्यात्तदा सर्वगतो न स्यात् अयं तु स्थाणुरविकारी अतः सर्वगत एव। एतेन विकार्यत्वमपाकृतम्। यदि वायं चलः क्रियावान्स्यात्तदा विकारी स्याद्धटादिवत् अयं त्वचलोऽतो न विकारी। एतेन संस्कार्यत्वं निराकृतम्। पूर्वावस्थापरित्यागेनावस्थान्तरापत्तिर्विक्रिया। अवस्थैक्येऽपि चलनमात्रं क्रियति विशेषः। यस्मादेव तस्मात् सनातनोऽयं सर्वदैकरूपः। न कस्या अपि क्रियायाः कर्मेत्यर्थः। उत्पत्त्याप्तिविकृतिसंस्कृत्यन्यतरक्रियाफलयोगे हि कर्मत्वं स्यात्। अयं तु नित्यत्वान्नोत्पाद्यः अनित्यस्यैव घटादेरुत्पाद्यत्वात्। सर्वगतत्वान्न प्राप्यः परिच्छिन्नस्यैव घटादेः प्राप्यत्वात्। स्थाणुत्वादविकार्यः विक्रियावतो घृतादेरेव विकार्यत्वात्। अचलत्वादसंस्कार्यः सक्रियस्यैव दर्पणादेः संस्कार्यत्वात्। तथाच श्रुतयःआकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःवृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तम् इत्यादयः।यः पृथिव्यां तिष्ठन्पृथिव्या अन्तरो योऽप्सु तिष्ठन्नद्भ्योऽन्तरो यस्तेजसि तिष्ठंस्तेजसोऽन्तरो यो वायौ तिष्ठन्वायोरन्तरः इत्याद्या च श्रुतिः सर्वगतस्य सर्वान्तर्यामितया तदविषयत्वं दर्शयति। यो हि शस्त्रादौ न तिष्ठति तं शस्त्रादयश्छिन्दन्ति अयंतु शस्त्रादीनां सत्तास्फूर्तिप्रदत्वेन तत्प्रेरकस्तदन्तर्यामी। अतः कथमेनं शस्त्रादीनि स्वव्यापारविषयीकुर्युरित्यभिप्रायः। अत्रयेन सूर्यस्तदपि तेजसेद्धः इत्यादिश्रुतयोऽनुसन्धेयाः। सप्तमाध्याये च प्रकटीकरिष्यति श्रीभगवानिति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.24।।कुतो हेतोरस्य शस्त्रादीनि छेदादीन्न कुर्वन्तीत्याशङ्क्य तस्य छेदाद्ययोग्यत्वादित्याह  अच्छेद्योऽयमिति।  अत्राच्छेद्यत्वादौ पूर्वोक्तान्येवास्थूलत्वादीनि कारणानि ज्ञेयानि। एवमच्छेद्यत्वादिना स्थूलादीनभावरूपान् गुणानुक्त्वा भावरूपानपि गुणानाह  नित्य इति।  सर्वैर्विशेषणैरखण्डैकरसस्यैव वस्तुनो लक्ष्यत्वात् नित्यत्वादिभिरुत्पाद्यत्वादिकं निराक्रियते। यतो नित्यः अतो घटवदनुत्पाद्यः। यतः सर्वगतः अतो ग्रामवदप्राप्यः। यतः स्थाणुः पूर्वरूपापरित्यागेन स्थिरस्वभावः अतः क्षीरादिवदविकार्यः। अचलः यथा दर्पणः स्वतः स्वाच्छयादप्रच्युतोऽपि मलरूपेणावरणेन स्वाच्छयात्प्रच्याव्यते एवं स्वयं स्थाणुरपि अन्यसंयोगाच्चाञ्चल्यमश्नुवीत। स च दोषापकर्षणलक्षणं संस्कारमपेक्षते। अयं तु अचलत्वान्न तथा एवं च उत्पत्त्याप्तिविकृतिसंस्कृतिरूपं चतुर्विधं क्रियाफलमात्मनि न संभवतीत्युक्तम्। तत्र हेतुः  सनातन इति।  सना इत्यव्ययं नैरन्तर्ये। तच्च देशतः कालतो वस्तुतश्च परिच्छेदराहित्यम्। परमते परमाणूनां कालतः परिच्छेदाभावेऽपि देशतः परिच्छेदोऽस्ति। आकाशस्य तदुभयाभावेऽपि वस्तुतः परिच्छेदोऽस्ति। सोऽपि त्रिविधः सजातीयविजातीयस्वगतभेदरूपः। यथावृक्षस्य स्वगतो भेदः पत्रपुष्पफलादितः। वृक्षान्तरात्सजातीयो विजातीयः शिलादितः। ततश्च सना नैरन्तर्येण त्रिविधपरिच्छेदराहित्येन भवति अस्तीति सनातनोऽखण्डैकरसो यस्मात्तस्मात् नोत्पत्त्याद्याश्रय इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.24।।एते च्छेदनादिधर्मयुक्ता अपि मदिच्छां विना तन्न कुर्वन्ति मदिच्छयैव च त्याज्यदेहादिषु तथा कुर्वन्त्यतस्त्त्वमप्येतेष्वच्छेद्यादिधर्मान् ज्ञात्वा प्रवृत्तो भवेत्युक्त्वाऽच्छेद्यत्वादिधर्मानाह अच्छेद्य इति। अच्छेद्यादिधर्मवानयमित्यर्थः। अच्छेद्यादिधर्मवत्त्वे कारणमाह नित्यः अविनाशी सर्वगतः व्यापकः स्थाणुः स्थिरस्वभावः अचलः सर्वदैकरूपः सनातनः अनादिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.24।।तत्र हेतूनाह  अच्छेद्य इति  सार्धेन। निरवयवत्वादच्छेद्योऽयमक्लेद्यश्च। अमूर्तत्वात् अदाह्यो द्रवत्वाभावादशोष्य इति भावः। अतश्च छेदादियोग्यो न भवति। यतो नित्यः अविनाशी सर्वत्रगतः स्थाणुः स्थिरस्वभावः रूपान्तरापत्तिशून्यः अचलः पूर्वरूपापरित्यागी सनातनोऽनादिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.24।।अच्छेद्य इत्यर्द्धेन निगमनम्। कार्यत्वव्यावृत्त्यर्थं नित्य इति। सर्वगत इति व्यापकत्वम्। ब्रह्मभावाभिप्रायेण जीवस्तु व्यापकः न स्वरूपेण किन्तु स्वचैतन्यगुणेन भगवद्धर्मभूतत्वात् तदग्रे वक्ष्यते। स्थाणुरिति स्थिरत्वम्। अचल इति निष्क्रियत्वम्। नन्वेवं भूतमाकाशं प्रसिद्धं तदेव इति चेत् न इत्याह सनातन इति। तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः सम्भूतः तै.उ.2।1 इति तत्सम्भवश्रवणादित्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.24।।ऐसा होनेके कारण ( यह आत्मा न कटनेवाला न जलनेवाला न गलनेवाला और न सूखनेवाला है )। आपसमें एक दूसरेका नाश कर देनेवाले पञ्चभूत इस आत्माका नाश करनेके लिये समर्थ नहीं है। इसलिये यह नित्य है। नित्य होनेसे सर्वगत है। सर्वव्यापी होनेसे स्थाणु है अर्थात् स्थाणु ( ठूँठ ) की भाँति स्थिर है। स्थिर होनेसे यह आत्मा अचल है और इसीलिये सनातन है अर्थात् किसी कारणसे नया उत्पन्न नहीं हुआ है। पुराना है। इन श्लोकोंमें पुनरुक्तिके दोषका आरोप नहीं करना चाहिये क्योकि न जायते म्रियते वा इस एक श्लोकके द्वारा ही आत्माकी नित्यता और निर्विकारता तो कही गयी फिर आत्माके विषयमें जो भी कुछ कहा जाय वह इस श्लोकके अर्थसे अतिरिक्त नहीं है। कोई शब्दसे पुनरुक्त है और कोई अर्थसे ( पुनरुक्त है )। परंतु आत्मतत्त्व बड़ा दुर्बोध है सहज ही समझमें आनेवाला नहीं है इसलिये बारंबार प्रसंग उपस्थित करके दूसरेदूसरे शब्दोंसे भगवान् वासुदेव उसी तत्त्वका निरूपण करते हैं यह सोचकर कि किसी भी तरह वह अव्यक्त तत्त्व इन संसारी पुरुषोंके बुद्धिगोचर होकर संसारकी निवृत्तिका कारण हो।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.24।। व्याख्या   शस्त्र आदि इस शरीरीमें विकार क्यों नहीं करते यह बात इस श्लोकमें कहते हैं। अच्छेद्योऽयम्   शस्त्र इस शरीरीका छेदन नहीं कर सकते। इसका मतलब यह नहीं है कि शस्त्रोंका अभाव है या शस्त्र चलानेवाला अयोग्य है प्रत्युत छेदनरूपी क्रिया शरीरीमें प्रविष्ट ही नहीं हो सकती यह छेदन होनेके योग्य ही नहीं है।शस्त्रके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी इस शरीरीका छेदन नहीं हो सकता। जैसे याज्ञवल्क्यके प्रश्नका उत्तर न दे सकनेके कारण उनके शापसे शाकल्यका मस्तक कटकर गिर गया (बृहदारण्यक0)। इस प्रकार देह तो मन्त्रोंसे वाणीसे कट सकता है पर देही सर्वथा अछेद्य है। अदाह्योऽयम्   यह शरीरी अदाह्य है क्योंकि इसमें जलनेकी योग्यता ही नहीं है। अग्निके सिवाय मन्त्र शाप आदिसे भी यह देही जल नहीं सकता। जैसे दमयन्तीके शाप देनेसे व्याध बिना अग्निके जलकर भस्म हो गया। इस प्रकार अग्नि शाप आदिसे वही जल सकता है जो जलनेयोग्य होता है। इस देहीमें तो दहनक्रियाका प्रवेश ही नहीं हो सकता।  अक्लेद्यः   यह देही गीला होनेयोग्य नहीं है अर्थात् इसमें गीला होनेकी योग्यता ही नहीं है। जलसे एवं मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह गीला नहीं हो सकता। जैसे सुननेमें आता है कि मालकोश रागके गाये जानेसे पत्थर भी गीला हो जाता है चन्द्रमाको देखनेसे चन्द्रकान्तमणि गीली हो जाती है। परन्तु यह देही रागरागिनी आदिसे गीली होनेवाली वस्तु नहीं है। अशोष्यः   यह देही अशोष्य है। वायुसे इसका शोषण हो जाय यह ऐसी वस्तु नहीं है क्योंकि इसमें शोषणक्रियाका प्रवेश ही नहीं होता। वायुसे तथा मन्त्र शाप ओषधि आदिसे यह देही सूख नहीं सकता। जैसे अगस्त्य ऋषि समुद्रका शोषण कर गये ऐसे इस देहीका कोई अपनी शक्तिसे शोषण नहीं कर सकता। एव च   अर्जुन नाशकी सम्भावनाको लेकर शोक कर रहे थे। इसलिये शरीरीको अच्छेद्य अदाह्य अक्लेद्य और अशोष्य कहकर भगवान्  एव च  पदोंसे विशेष जोर देकर कहते हैं कि यह शरीरी तो ऐसा ही है। इसमें किसी भी क्रियाका प्रवेश नहीं होता। अतः यह शरीरी शोक करनेयोग्य है ही नहीं। नित्यः   यह देही नित्यनिरन्तर रहनेवाला है। यह किसी कालमें नहीं था और किसी कालमें नहीं रहेगा ऐसी बात नहीं है किन्तु यह सब कालमें नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहनेवाला है। सर्वगतः  यह देही सब कालमें ज्योंकात्यों ही रहता है तो यह किसी देशमें रहता होगा इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही सम्पूर्ण व्यक्ति वस्तु शरीर आदिमें एकरूपसे विराजमान है। अचलः  यह सर्वगत है तो यह कहीं आताजाता भी होगा इसपर कहते हैं कि यह देही स्थिर स्वभाववाला है अर्थात् इसमें कभी यहाँ और कभी वहाँ इस प्रकार आनेजानेकी क्रिया नहीं है। स्थाणुः   यह स्थिर स्वभाववाला है कहीं आताजाता नहीं यह बात ठीक है पर इसमें कम्पन तो होता होगा जैसे वृक्ष एक जगह ही रहता है कहीं भी आताजाता नहीं पर वह एक जगह रहता हुआ ही हिलता है ऐसे ही इस देहीमें भी हिलनेकी क्रिया होती होगी इसके उत्तरमें कहते हैं कि यह देही स्थाणु है अर्थात् इसमें हिलनेकी क्रिया नहीं है। सनातनः   यह देही अचल है स्थाणु है यह बात तो ठीक है पर यह कभी पैदा भी होता होगा इसपर कहते हैं कि यह सनातन है अनादि है सदासे है। यह किसी समय नहीं था ऐसा सम्भव ही नहीं है। विशेष बात यह संसार अनित्य है एक क्षण भी स्थिर रहनेवाला नहीं है। परन्तु जो सदा रहनेवाला है जिसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता उस देहीकी तरफ लक्ष्य करानेमें  नित्यः  पदका तात्पर्य है।देखने सुनने पढ़ने समझनेमें जो कुछ प्राकृत संसार आता है उसमें जो सब जगह परिपूर्ण तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें  सर्वगतः  पदका तात्पर्य है।संसारमात्रमें जो कुछ वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदि हैं वे सबकेसब चलायमान हैं। उन चलायमान वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदिमें जो अपने स्वरूपसे कभी चलायमान (विचलित) नहीं होता उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें  अचलः  पदका तात्पर्य है।प्रकृति और प्रकृतिके कार्य संसारमें प्रतिक्षण क्रिया होती रहती है परिवर्तन होता रहता है। ऐसे परिवर्तनशील संसारमें जो क्रियारहित परिवर्तनरहित स्थायी स्वभाववाला तत्त्व है उसकी तरफ लक्ष्य करानेमें  स्थाणुः  पदका तात्पर्य है।मात्र प्राकृत पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा ये पहले भी नहीं थे और पीछे भी नहीं रहेंगे। परन्तु जो न उत्पन्न होता है और न नष्ट ही होता है तथा जो पहले भी था और पीछे भी हरदम रहेगा उस तत्त्व(देही)की तरफ लक्ष्य करानेमें  सनातनः  पदका तात्पर्य है।उपर्युक्त पाँचों विशेषणोंका तात्पर्य है कि शरीरसंसारके साथ तादात्म्य होनेपर भी और शरीरशरीरीभावका अलगअलग अनुभव न होनेपर भी शरीरी नित्यनिरन्तर एकरस एकरूप रहता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.24 2.26।।नैनमित्यादि। नास्य नाशकारणं शस्त्रादि किंचित्करम्। चिदेकस्वभावस्य अनाश्रितस्य ( N K add निरपेक्षस्य after अनाश्रितस्य) निरंशस्य (N omits निरंशस्य S adds निरवयवस्य after निरंशस्य) स्वतन्त्रस्य स्वभावान्तरापत्त्याश्रयविनाशावयवविभाग विरोधिप्रादुर्भावादिक्रमेण (S प्रक्रमेण) नाशयितुमशक्यत्वात्। न च देहान्तरगमनमस्य अपूर्वम् देहान्वितोऽपि (N अपूर्वदेहान्नित्योऽपि) सततं देहान्तरं गच्छति तेन संबध्यते इत्यर्थः। देहस्य क्षणमात्रमप्यनवस्थायित्वात्। एवंभूतं विदित्वा एनमात्मानं शोचितुं नार्हसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.24।।पृथिव्यादिभूतप्रयुक्तच्छेदनाद्यर्थक्रियाभावे योग्यताभावं कारणमाह  यत इति।  पूर्वार्धमुत्तरार्धे हेतुत्वेन योजयति  यस्मादिति।  नित्यत्वादीनामन्योन्यं हेतुहेतुमद्भावं सूचयति  नित्यत्वादित्यादिना।  नच नित्यत्वं परमाणुषु व्यभिचारादसाधकं सर्वगतत्वस्येति वाच्यम्। तेषामेवाप्रामाणिकत्वेन व्यभिचारानवतारात्। न च सर्वगतत्वेऽपि विक्रियाशक्तिमत्त्वमात्मनोऽस्तीति युक्तं विभुत्वेनाभिमते नभसि तदनुपलम्भात्। न च विक्रियाशक्तिमत्त्वे स्थैर्यमास्थातुं शक्यं तथाविधस्य मृदादेरस्थिरत्वदर्शनादित्याशयेनाह  स्थिरत्वादिति।  स्वतो नित्यत्वेऽपि कारणान्नाशसंभवादुत्पत्तिरपि संभावितेति कुतश्चिरंतनत्वमित्याशङ्क्याह  न कारणादिति।  आत्मनोऽविक्रियत्वस्य न जायते म्रियते वेत्यादिना साधितत्वात्तस्यैव पुनःपुनरभिधाने पुनरुक्तिरित्याशङ्क्याह  नैतेषामिति।  अनाशङ्कनीयस्य चोद्यस्य प्रसङ्गं दर्शयति  यत इति।  अतो वेदाविनाशिनमित्यादौ शङ्क्यते पौनरुक्त्यमिति विशेषः। कथं तत्र पौनरुक्त्याशङ्का समुन्मिषति तत्राह  तत्रेति।  वेदाविनाशिनमित्यादिश्लोकः सप्तम्या परामृश्यते श्लोकशब्देन न जायते म्रियते वेत्यादिरुच्यते। नन्विह श्लोके जन्ममरणाद्यभावोऽभिलक्ष्यते वेदेत्यादौ पुनरपक्षयाद्यभावो विवक्ष्यते तत्र कथमर्थातिरेकाभावमादाय पौनरुक्त्यं चोद्यते तत्राह  किञ्चिदिति।  कथं तर्हि पौनरुक्त्यं न चोदनीयमिति मन्यसे तत्राह  दुर्बोधत्वादिति।  पुनःपुनर्विधानभेदेन वस्तु निरूपयतो भगवतोऽभिप्रायमाह  कथं न्विति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.24।।तर्ह्यच्छेद्योऽयमित्यादिपुनरुक्तमित्यत आह  वर्तमाने ति। लटः प्रयोगेन वर्तमानस्यैव च्छेदादेर्निषेधादिदानीं दृश्यमानत्वेनात्मनः प्राग्विनाशाभावेऽप्युत्तरत्र शस्त्रादिना विनाशः स्यात् इति शङ्कायां च्छेदादियोग्यतैवात्मनो नास्तीति। प्रतिपादनायेदमुदितम्।अर्हे कृत्यतृचश्च अष्टा.3।3।169 इति कृत्यस्यार्हार्थत्वस्मरणादिति भावः। तर्हि तेनैवालं किमाद्येन श्लोकेन इत्यत आह  वर्तमाने ति।प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते 1।20 इति वचनात्प्रसक्तौ सत्यामपि वर्तमानस्य च्छेदादेरदर्शनाच्छेदाद्ययोग्यत्वमात्मनो युक्तमिति दर्शयति प्रथमश्लोकेन। एवं तर्ह्यौत्तराधैर्यप्रसङ्ग इति चेत् न उपोद्धाताभिप्रायेण भगवतोक्तेऽभिप्रायमजानानस्य शङ्कामनूद्यावतारस्य कृतत्वात्। स्वाभिप्रायेण तूपोद्धातमुक्त्वा साध्यमाहेत्यवतारः कर्तव्यः।नित्यः सर्वगतः इत्यादिकं जीवेऽसम्भावितमित्याशङ्क्य तन्निवर्त्याशङ्काप्रदर्शनपूर्वकं व्याचष्टे  कुत  इति। वर्तमानच्छेदाद्यदर्शनमात्मनः च्छेदाद्ययोग्यतायां किं निश्चययुक्तिः उत सम्भावनायुक्तिः। नाद्यः कदाचिददृष्टस्यापि पश्चाद्दर्शनात्। द्वितीये तु कुतो योग्यतानिश्चयः इति शङ्कार्थः। नित्यसर्वगतेति भावप्रधानो निर्देशः। ईश्वरस्य तावच्छेदाद्ययोग्यत्वं सिद्धम् नित्यसर्वगतत्वादिविशेषणवत्त्वात्। नह्येवम्भूतस्य छेदादिकं सम्भवति अतस्तत्प्रतिबिम्बस्यापि जीवस्य तदयोग्यत्वमिति भावः। मन्त्रवर्णे कठो.1।2।18 शाश्वतः इतीश्वरविशेषणमुक्तम्। अत्र स्थाणुरिति तयोर्भेदमाह   शाश्वत  इति। एकरूपत्वमात्रं सामान्येनान्यथात्वाभावः तस्य सामान्यप्रकरणत्वात्।स्थाणुः इत्यस्य नैमित्तिकनिषेधप्रकरणत्वात्। अस्यार्थभेदकथनस्योत्तरत्रोपयोगं वक्ष्यामः। नित्य इतीश्वरविशेषणं प्रतिभाति तदन्यथा व्याचष्टे   नित्यत्व मिति। भिन्नपदोक्तमपि विशिष्टस्य विशेषणं विशेषणमुपसंक्रामति। सन्निधानाच्च सर्वगतत्वमिति भावः। द्वयं पृथगीश्वरविशेषणं किं न स्यात् इत्यत आह   अन्यथे ति।अजो नित्यः 2।20 इति नित्यत्वमीश्वरस्य प्रागुक्तं अप्रमेयस्येति सर्वगतत्वं च। अतस्ताभ्यां पुनरुक्तेरित्यर्थः। अस्याप्युत्तरत्रोपयोगः।ननु जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वमत्र बहुवारमुक्तम् अतः पुनरुक्तिरित्यत आह  ऐक्योक्ता विति। जीवस्येश्वरैक्यविषये न पुनरुक्तिदोषः। कुतः ऐक्यमात्रस्य पुनःपुनरुक्तावपि पूर्वपूर्वानुक्तानां तत्र तत्रोपयुक्तानां ईश्वरविशेषणानां उत्तरत्रोपादानादिति। ऐक्यमत्र गौणं विवक्षितम्। विशेषणभेदाद्विशिष्टभेद इति भावः। ननु एतदपि नास्तिशाश्वतः 2।20 इत्युक्तस्यैव स्थाणुशब्देन ग्रहणादित्यादिशङ्कानिरासायशाश्वतः इत्येकरूपत्वमात्रमित्यादिकः प्राचीनो ग्रन्थः। ननु प्रतिबिम्बत्वं तत्तत्साध्यसिद्धये हेतुत्वेनोक्तम् न चैकस्यैव हेतोरनेकसाध्यसिद्ध्यर्थं पुनः पुनरुपन्यासे दोषोऽस्ति तत्कस्य हेतोः प्रमेयभेदात् अतः कथमियं शङ्केति उच्यते एकत्रोक्तमीश्वरप्रतिबिम्बत्वमन्यत्रापि हेतुत्वेन शिष्यैरेव ज्ञायतां किं स्वयं वचनेनेति शङ्कितुरभिप्रायः ईश्वरप्रतिबिम्बत्वमात्रस्य तत्तद्विशिष्टशङ्कानिरासासामर्थ्यात् तत्तदौपयिकविशेषणप्रदर्शनार्थं स्वयमुपादानमिति परिहाराभिप्रायः। नन्वीश्वरस्य नित्यसर्वगतत्वादिविशेषणवत्त्वात् अस्त्वच्छेद्यत्वादिकं जीवस्य तु कुतः तथाविधेश्वरप्रतिबिम्बत्वादिति चेत् नयो यत्प्रतिबिम्बः स तद्धर्मा इति नियमाभावादित्यत आह  युक्ता  इति। बिम्बधर्मा बिम्बसमानधर्माः। यो यत्प्रतिबिम्बः सोऽसति विरोधे तद्धर्मेति व्याप्तिरभिप्रेतेति भावः। स्यादिदं व्याख्यानं यदि जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बता स्यात् सैव कुतः सिद्धेत्यत आह  तत्ते ति। ननु जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वाङ्गीकारेअंशो नानाव्यपदेशात् ब्र.सू.2।3।43ममैवांशो जीवलोके 15।7 इत्यादिवाक्यसिद्धेन तदंशत्वेन विरोधः स्यात्। प्रतिबिम्बो हि बिम्बादत्यन्ताभिन्न इति केषाञ्चिन्मतं अत्यन्तभिन्न इत्यपरेषाम्। अंशस्तु तदेकदेशः तेन भिन्नाभिन्नः यथा पटांशस्तन्तुः पटेन। ततः पक्षद्वयेऽपि कथं न विरोध इत्यत आह  न चे ति। जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वाङ्गीकारेऽपि न तदंशत्वविरोधः। कुत इत्यत आह   तस्ये ति। प्रतिबिम्बत्वस्यैवांशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तत्वात्।  अयं भावः   अत्यन्तभिन्नस्य जीवस्य यदीश्वराधीनतत्सादृश्योपेतत्वं तत्प्रतिबिम्बत्वमुच्यते अभेदमतस्य निराकरिष्यमाणत्वात्। तदेव तदंशत्वमिति कुतो विरोधः इति। नन्वंशत्वं तदेकदेशत्वं तत्कथमुच्यते प्रतिबिम्बत्वमेवांशत्वं इति तत्राह  न चेति । अंशता अंशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तम्। न केवलमेकदेशत्वमंशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तम् अपितु प्रतिबिम्बताऽपीति भावः। अस्तु नामानेकार्थत्वमंशशब्दस्य तथापिअंशो नाना ब्र.सू.2।3।43 इत्यादौ प्रतिबिम्बत्वमेवांशत्वमित्यत्र किं प्रमाणं तदेकदेशत्वं किं न स्यात् इत्यत आह  प्रमाण मिति। जीवस्येश्वरप्रतिबिम्बत्वं तदंशत्वं च तावदुच्यते। नच परस्परविरुद्धः शास्त्रार्थो भवितुं युक्तः। तत्रानेकार्थस्यांशशब्दस्य विरुद्धार्थं परित्यज्यार्थान्तरं गृह्यत इत्यर्थापत्तिरेवात्र प्रमाणमिति भावः। स्यादेतत्। तथा प्रतिबिम्बत्वमेव तत्त्वं अंशशब्दस्यापि तदेव प्रवृत्तिनिमित्तमिति वचनद्वयविरोधशान्त्यर्थं कल्प्यते तथैकदेशत्वमेव तत्त्वं प्रतिबिम्बशब्दस्यापि तदेव प्रवृत्तिनिमित्तमिति कुतो न कल्प्यम् वचनद्वयविरोधस्यैवमपि शान्तेरित्यत आह   न चे ति। अंशस्यांशत्वस्यैकदेशत्वस्य प्रतिबिम्बत्वं प्रतिबिम्बशब्दप्रवृत्तिनिमित्तत्वं कुतो न कल्प्यम् कुत इत्यत आह   गाधी ति। गाध्यादिष्वंशशब्दाभिधेयेषु अंशत्वस्य बाहुरूप्यदृष्टेः। इतरत्र प्रतिबिम्बशब्दाभिधेयेषु सूर्यकादिषु प्रतिबिम्बत्वस्यानेकरूपत्वादृष्टेः। इदमुक्तं भवति इन्द्रांशो गाधीत्युच्यते। तत्र विशेष एवांशशब्दप्रवृत्तिनिमित्तं भेदाभेदादेः प्रमाणबाधितत्वात्।पटांशस्तन्तुः इत्यत्रैकदेशत्वंसूर्यांशश्चक्षुः इत्यत्रात्यन्तभिन्नस्य तदधीनसादृश्यम्। एवमंशशब्दोऽनेकार्थः प्रयोगेषु दृश्यते। तथा चोक्तं द्विरूपावंशकौ तस्य इत्यादि। नचैवं प्रतिबिम्बशब्दस्यानेकं प्रवृत्तिनिमित्तं दृश्यते। तथाच सावकाशस्यांशशब्दस्य निरवकाशेन प्रतिबिम्बशब्देन बाधो युक्तः न तु वैपरीत्यमिति।नन्वीश्वरस्य स्थाणुत्वं न युज्यते तदैक्षत छां.उ.6।2।3 सोऽकामयत बृ.उ.1।2।47 इत्यादिकर्तृत्वविरोधादित्यत आह  स्थाणुत्वे ऽपीति। कुतः इति चेत् किं द्वयोः परस्परपरिहारेण वृत्तिदर्शनाद्विरोधश्चोद्यते उत सहादर्शनात्। नाद्यः कर्तृत्वरहितस्य कस्याप्यदर्शनात्। न द्वितीय इत्याह  उभये ति। अन्यत्र सहादृष्टं स्थाणुत्वं कर्तृत्वं च कुतो भगवतीत्यत आह  अचिन्त्ये ति। मायावादी तु कर्तृत्वं स्थाणुत्वयोरेकं कर्तृत्वं मायामयं स्थाणुत्वं तु पारमार्थिकम् काल्पनिकपारमार्थिकयोश्च गगने नीलत्वनीरूपत्वयोरिव न विरोध इति विरोधसमाधानं मन्यते तदसदित्याह  न चे ति। कुत इत्यत आह  त्वयी ति।  ब्रह्मणि ईश्वर  इति सम्पूर्णैश्वर्ये न योगित्वात् किन्तु ईश्वरत्वात्।  कार्यकारणे  सकलकार्योत्पादनसामर्थ्योपेते।  इत्यादी ति क्रियाविशेषणम्। विरुद्धानामन्यत्र सहानवस्थितानां धर्माणां भगवत्यविरोधस्य सहावस्थानस्योक्तेः। तथा च बादरायणीयं मतमवलम्बमानस्यैवं विरोधसमाधानं असाम्प्रदायिकमिति भावः। इतश्च तदयुक्तमित्याह  महातात्पर्याच्चे ति। सकलवेदानां परमेश्वरगुणोत्कर्षेमहातात्पर्यम्। तत्रेक्षितृत्वादीनां मिथ्यात्वकल्पने तद्विरोधः स्यादित्यर्थः। समस्तवेदानां भगवद्गुणोत्कर्षे तात्पर्यमित्येतदेव कुत इति चेत् उच्यते यस्य हि शास्त्रस्य यत्प्रयोजनं तत् यस्य ज्ञानाद्भवति स तस्य विषय इति नियमः। अन्यथा विषयप्रयोजनयोः सम्बन्धो न स्यात्। तथा च तत्र प्रेक्षावतां प्रवृत्तिर्न भवेत्। वेदस्य च मोक्षः प्रयोजनम्। स च गुणोत्कर्षज्ञानादेव भवतीति तत्रैव तस्य महातात्पर्यं युक्तमिति प्रतिपादयिष्यन् सर्ववेदानां मोक्षः प्रयोजनमित्येवासिद्धं न स्वर्गादेः फलान्तरमिति कैश्चिदङ्गीकृतत्वादित्यतस्तत्तावत्साधयति  मोक्ष  इति। वेदो हि महच्छास्त्रंवेदशास्त्रात्परं नास्ति इति वचनात्। तस्य च महापुरुषार्थेनैव प्रयोजनेन भवितुं युक्तम्। मोक्षश्च महापुरुषार्थः। अतः स एव तस्य प्रयोजनमिति भावः। मोक्षस्य महापुरुषार्थत्वं कुतः इत्यत आह  तत्रापी ति। पुरुषार्थेष्वपि अत्र निर्धारणेन महत्त्वं गम्यते। अन्तेषु धर्ममोक्षेषु मध्येषु अर्थकामेषु अन्तयोरन्तरं मध्यम्। नैतावता धर्मो मोक्षसमः क्षयिफलत्वादित्याह  पुण्ये ति। चितः प्राप्तः। अस्त्वेव ततः किं इत्यत आह  स चे ति। मोक्षस्य भगवत्प्रसादसाध्यत्वं अन्यसाध्यत्वाभावश्चेति द्वे एते प्रमेये। तत्र यथायोगं वाक्यान्येतानि ज्ञातव्यानि। यदि निर्व्यलीकं छद्मना विना सर्वात्मना सर्वेण प्रकारेण आश्रितपदो भगवान्येषां दययेद्दयां कुर्यात् तर्हि येषां श्वश्रृगालभक्ष्ये देहेममाहं इति धीर्न भवति ते देवमायां देवस्य महिमानं विदन्ति अतितरन्ति च संसारमित्यर्थ। ऋते सत्ये। यद्यस्मात्। ईशेति सम्बुद्धिः। अतस्तवाङ्घ्रेश्छायां आश्रयेमेति सम्बन्धः। ज्ञानं प्रसादसाधनमित्यनुपदं वक्ष्यते। अतःतमेवं इत्याद्युदाहरणम् ततोऽपि किं इत्यत आह  स चे ति। विष्णुप्रसादश्च लोके सत्पुरुषप्रसादो गुणोत्कर्षज्ञानसाध्यः प्रसिद्धः। तद्दृष्टान्तेनानुमानादित्यर्थः।नन्वीश्वरस्यानुमानाविषयत्वात्कथं तत्र लोकप्रसिद्धमङ्गीकार्यम् अन्यथाऽज्ञानादिकमङ्गीकार्यं स्यादिति अत आह   लोके ति। अन्यथा मीमांसारम्भानुपपत्तिरिति भावः। नन्विन्द्रप्रसादकामोऽहल्यायै जारेति तन्निन्दामेव करोति। ततो भग्नव्याप्तिकमिदमनुमानमित्यत आह  अहल्ये ति। अहल्याजारत्वादिप्रतिपादकं वाक्यमप्युत्कर्षमेव वक्ति। कथं दोषकृतोऽपि ते यस्तत्फलं बहुतरो लेपः स नासीदित्यस्यार्थस्य अनेन व्यञ्जनादित्यर्थः। कुत एतत् अत्यन्तालौकिककल्पनादेवं कल्पनस्य ज्यायस्त्वात् तत्फलं बहुतरो लेप इत्येतत्कुतः इत्यत आह  बह्वि ति। असौ परनारीधर्षणदोषः। हीति सकलधर्मशास्त्रप्रसिद्धिं द्योतयति। स लेपस्तस्य नासीदित्येतत्कुतः इत्यत आह  तस्ये ति। अहल्याधर्षणेन तस्येन्द्रस्य लोमापि न क्षीयते इत्यर्थः। भगवत्प्रसादस्तद्गुणोत्कर्षज्ञानसाध्य इत्येतन्न केवलमनुमानात्सिद्धं किं तर्हि तद्वचनाच्चेत्याह   य  इति। अत्रस सर्ववित् 15।19 इत्यादिस्तुत्या प्रसादोऽवगम्यते। तदेवं भगवद्गुणोत्कर्षे महातात्पर्यं सर्वागमानामिति प्रमितम्। ननु ब्रह्मरुद्रादीनां सर्वोत्कृष्टत्वप्रसिद्धेर्विष्णोः सर्वोत्कर्ष एव नास्ति कुतस्तत्र सर्वागमानां महातात्पर्यं इति चेत् न तत्प्रसिद्धेर्भ्रान्तित्वात्। तत्कुत इत्यत आह  सत्यमि ति। सत्यं वक्ष्यमाणम्। तस्य लेशस्येति सर्वत्र सम्बध्यते। ननु पुराणविरोधाल्लौकिकी प्रसिद्धिरस्तु भ्रान्तिः पुराणेष्वेवान्येषां सर्वोत्कर्षो भगवदैक्यं च उच्यते तत्कथम् नहि पुराणस्य पुराणं बाधकम् साम्यादित्यत आह  अन्ये ति। अन्योत्कर्ष ऐक्यं च पुराणेषु प्रतीतमपि महाभारतविरुद्धम् अतो न ग्राह्यमित्यर्थः। अत्रैक्यं प्रसङ्गादुक्तम्। महाभारतस्य पुराणबाधकत्वं कुत इत्यत उक्तं  तथैवे ति। इत्यादिना ग्रन्थान्तरेण सिद्धः प्रमित उत्कर्षः सर्वशास्त्रोत्तमत्वं यस्य तत्तथोक्तम्। कथं महाभारतविरुद्धत्वमित्यत आह  तत्र  हीति। तत्र महाभारते इत्यादिषु वाक्येषु वक्ति भगवान्व्यासः इतोऽपि महाभारतस्य पुराणबोधकत्वं युक्तमित्युक्तं  साधारणे ति।कः सर्वोत्कृष्टः इत्यादिसाधारणप्रश्नरूपेऽवसरे विष्णुप्रशंसामनुपक्रम्य स्वरूपकथनावसर इति यावत्। पुराणेऽप्येवमेवान्योत्कर्षाद्युक्तौ साम्यमेवेत्यत आह  अन्यत्रे ति। अन्यत्र पुराणे यत्किंञ्चिदुक्तावप्यन्योत्कर्षाद्युक्तावप्यसाधारण एवावसरे तत्स्तुतिप्रसङ्गे तदुक्तमिति शेषः। असाधारणावसरोक्तमपि रुद्रादेरुत्कृष्टत्वादि कुतो दुर्बलं इत्यत आह  तद्धी ति। यत्स्तुतिप्रस्तावोक्तं सर्वोत्कृष्टत्वं वेदादावग्न्यादेरप्यस्ति तस्यापि ग्राह्यत्वं स्यादित्यर्थः। इतश्च न पुराणोक्तं रुद्रादेरुत्कृष्टत्वं ग्राह्यमित्याह  तद्ग्रन्थेति । तद्ग्रन्थः शैवपुराणम्।तत्कथमित्यत आह  तथा ही ति। तद्ग्रन्थेत्युक्तप्रदर्शनाय शैव इत्युक्तम्।ङ्यापोः संज्ञाछन्दसोर्बहुलम् अष्टा.6।3।63 इति जाह्नवीति ह्रस्वः। तत्रैव स्कान्द एव। शिवान्मुक्तिं निषिध्य। इतश्च न पुराणोक्तं शिवादेरुत्कृष्टत्वे ग्राह्यमित्याह   समेति । समं शैववैष्णवपक्षयोःनाहं न च शिवोऽन्ये च इत्यादितद्वचनम्। अस्तु लौकिकीप्रसिद्धिर्भ्रान्तिः पुराणं च विप्रलम्भमूलं व्यामोहनार्थम् तथापिविश्वाधिको रुद्रः इत्यादिवेदविरोध इत्यत आह  वेदश्चे ति। सङ्कुचिताद्यर्थो व्याख्यातव्यः कुत इत्यत आह  यदी ति। इतिहासाद्यननुरुध्य यथाश्रुतवेदव्याख्यानेऽनिष्टमाह   अनिर्णयाच्चे ति। न केवलं विश्वाधिक इत्यादिवेदो विष्णोः सर्वोत्कर्षस्याविरोधी किन्तु प्रत्युत तत्र वेदेऽस्मदिष्टस्य विष्णोः सर्वोत्कर्षस्य सिद्धिरपीत्याह  तत्रापी ति। कुत इत्यत आह  नामे ति। विष्णोर्नामभिर्वैशेष्याद्विशिष्टत्वाद्रुद्रादिसर्वनामवत्त्वादित्यर्थः।महातात्पर्याच्च इत्यादिनोक्तमर्थमुपसंहरति  अत  इति। अप्रामाणिकत्वात् प्रमाणविरुद्धत्वाच्चेत्यर्थः। अस्त्वेवं तथापि ईक्षितृत्वादेर्न मायामयत्वे तद्विरोधः। गुणोत्कर्षस्य सत्त्वे हि स स्यात्। नच वेदतात्पर्यविषयत्वमात्रेण सत्यता मोक्षापेक्षयेश्वरं प्रसादयितुमुक्तस्य राजाद्युत्कर्षस्येवासत्त्वसम्भवात्। संवादाभावेन सत्यत्वनिश्चयायोगादित्यत आह  तथापी ति। फलापेक्षया प्रसादयितुं प्रतिपादितत्वेऽपि स्वतः प्रामाण्यात् संवादमनपेक्ष्य ज्ञानग्राहकेणैव प्रामाण्यस्य निश्चितत्वात्। नहि प्रामाण्यनिश्चये विषयासत्त्वशङ्का सम्भवति। एवं सति बौद्धाद्यागमविषयस्यापि सत्त्वं स्यादिति चेत् न प्रसक्तस्यापि तत्प्रामाण्यग्रहणस्य बलवद्विरोधेनापोदितत्वात्। नच तथाप्रकृतेऽपीत्याह  अविरोधा दिति।नन्वन्यत्र पुरुषे सर्वोत्कर्षस्यादर्शनात्तद्दृष्टान्तेनेश्वरेऽपितदभावस्य साधयितुं शक्यत्वात् अनुमानविरोधोऽस्तीत्यत आह  नचे ति। कालातीतमनुमानमिति भावः। प्रमाणविरुद्धस्याप्यनुमानत्वेऽतिप्रसङ्गं सूचयति  धर्मे ति। धर्मैर्वैचित्र्यं धर्मवैचित्र्यम्। एवमनुमानेऽर्थानां धर्मवैचित्र्यं न स्यादिति भावः। यद्वाऽनेन ग्रन्थेनासम्भावनाविरोधं परिहर्तुं सम्भावनां दर्शयति। भवेदेवं यदि स्वत एव प्रामाण्यग्रहः स्यात् तदनङ्गीकारे किमुत्तरमित्यत आह  स्वत  इति। संवादाधीनः प्रामाण्यग्रह इत्यङ्गीकारे तु प्रामाण्यनिश्चयाय संवादकमानोक्तौ तस्याप्यदोषत्वं प्रामाण्यमन्यसंवादेन साधयेदित्यनवस्थालक्षणातिप्रसङ्ग इत्यर्थः। इतोऽपि न वेदतात्पर्यगोचरस्य भगवद्गुणोत्कर्षस्यासत्त्वं शङ्कनीयमित्याह  अनन्ये ति। प्रयोजनापेक्षया चेत्यर्थः। तर्हि तत्परत्वमेव न सिद्ध्येत्। प्रयोजनपर्यालोचनया हि तत्प्राक्साधितमित्यत आह  सिद्ध मिति। कथमित्यत आह  नारायणे ति। प्रयोजनापेक्षया भगवद्गुणोत्कर्षपरत्वपक्षे प्रयोजनेन तत्साधनं कृतम् प्रयोजनानपेक्षापक्षे त्वागमैरेव तत्सिद्धम्। पक्षद्वयं चसर्वे वेदास्तु देवार्थाः इत्यादिवक्ष्यमाणप्रमाणसिद्धम्। एकस्यैव वाक्यस्य प्रयोजनसापेक्षत्वमनपेक्षत्वं च विरुद्धमित्यत आह  नचे ति। प्रतिपत्तृभेदादिति भावः। ननु जडस्य वेदस्यैतान्प्रति एवं प्रतिपादयिष्याम्येतान्प्रत्येवमिति कथं चेतनवत्प्रवृत्तिरित्यत आह  ईश्व रेति। अनादिर्वेद इत्युक्तम् तत्र कथमीश्वरस्य नियमनमित्यत आह  अनादौ चे ति। अनादिपदार्थविषये नियामकत्वमन्यत्रादृष्टं कथमीश्वरस्येत्यत आह  प्रयोजकत्वं त्वि ति। अनादेर्नियोजकत्वमीश्वरस्याचिन्त्यशक्त्या युक्तम्। अनन्यापेक्षया चेत्यादिनोक्तमुपसंहरति  अत  इति तथा च पक्षद्वयेऽपि महातात्पर्यविरोधान्नेश्वरस्येक्षितृत्वादिकं मायामयमिति भावः। अप्रामाणिकं च तन्मायामयत्वम्। तथा हि किं स्थाणुत्वे ईक्षितृत्वान्यथानुपपत्त्यैतत्कल्प्यते उत प्रमाणान्तरात्। नाद्यः अन्यथैवोपपत्तेरुक्तत्वादित्याह  तच्चे ति। स्थाणोरपीक्षितृत्वम् अनन्यापेक्षा स्वतन्त्रा। न द्वितीयः तददर्शनादिति भावेनोपसंहरति  अत  इति।प्रकृतमनुसरन्अचलः इत्येतत्पदं यदन्यैः परिस्पन्दरहित इति व्याख्यातम् तदसदिति भावेनाह  अचलत्व मिति। इत्यादिवद्व्याख्येयमिति शेषः। सत्यज्ञानानन्दस्वरूपं ब्रह्म अभ्युपगच्छता यथैतानि वाक्यानि व्याख्यायन्ते लौकिकसत्तादिरहितमिति तथाचल इत्येतदपि लौकिकक्रियाप्रतिषेधपरं व्याख्येयम्। सर्वथा परिस्पन्दाभावार्थत्वेऽप्रहर्षमित्यादेरपि सर्वथाऽनानन्दत्वादिकमर्थः स्यात्। अविशेषादिति भावः। ननु विषमोऽयमुपन्यासः विज्ञानमानन्दं ब्रह्म बृ.उ.3।9।28 सत्यं ज्ञानं तै.उ.2।1 इत्यादिभिरानन्दरूपत्वादेः प्रमितत्वेन तथाव्याख्यानोपपत्तेरिति चेत् समं प्रकृतेऽपीत्याह  क्रिये ति। कुतः क्रियादृष्टिः इत्यत आह  तप  इति। तप आलोचनम्। विज्ञानमानन्दं इत्यादीनि निरवकाशानि क्रियावाक्यानि सावकाशानि सर्वस्य ब्रह्मधर्मस्य मायामयत्वात्। अतः पुनर्वैषम्यमित्यत आह  अतश्चे ति। अतएव महातात्पर्यविरोधादेव। इतश्च नेश्वरधर्माणां मायामयत्वमित्याह  ऐश्वर्यादी ति। सम्बोधनादीश्वरस्य अर्शआद्यजन्तोऽयं शब्द इत्येवकारेण व्यवच्छिनत्ति। नियामकाभावेनाश्रुतप्रत्ययकल्पनायोगात्। एवं सम्बोधने तत्स्वरूपत्वमेवैश्वर्यादीनां स्यात् नत्वमायामयत्वमित्यत आह  स्वरूपत्वा दिति। अनन्तत्वस्वाभाविकत्वादिवचनाच्च नेश्वरशक्त्यादीनां मायामयत्वम्। मायामयस्यानन्तत्वाद्यनुपपत्तेरित्याह   विज्ञाने ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.24।।लोकप्रसिद्धमविरुद्धमत्राप्यङ्गीकार्यम्। अहल्याजारत्वाद्यपि दोषकृतोऽपि ते न बहुतरो लेप आसीदित्युत्कर्षमेव वक्ति। बहुनरकफलो ह्यसौ। तस्य (मे तत्र) न लोम च (ना) मीयते कौ.उ.3।1 इति श्रुत्यन्तराच्च।यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् 15।19 इति तदुक्तेश्च।सत्यं सत्यं पुनः सत्यं शपथैश्चापि कोटिभिः। विष्णुमाहात्म्यलेशस्य विभक्तस्य च कोटिधा। पुनश्चानन्तधा तस्य पुनश्चापि ह्यनन्तधा। नैकांशसममाहात्म्याः श्रीशेषब्रह्मशङ्कराः। इति नारदीये। अन्योत्कर्ष ऐक्यं चतथैव सर्वशास्त्रेषु महाभारतमुत्तमम्। को ह्यन्यः पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद्भवेत् वि.पु.3।4।5 इत्यादिग्रन्थान्तरसिद्धोत्कर्षमहाभारतविरुद्धम्। तत्र हिनास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति। एतेन सत्यवाक्येन सर्वार्थान्साधयाम्यहम्यस्य प्रसादजो ब्रह्मा रुद्रश्च क्रोधसम्भवः। न त्वत्समोऽस्ति इत्यादिषु साधारणप्रश्नावसर एव महान्तमुत्कर्षं विष्णोर्वक्ति। अन्यत्र यत्किञ्चिदुक्तावप्यसाधारण एवावसरे। तद्ध्यग्न्यादेरपि वेदादावस्ति। त्वमग्न इन्द्रो ऋषभः सतामसि त्वं विष्णुरुरुगायो नमस्यः ऋक्सं.2।5।17।3 विश्वस्मादिन्द्र उत्तरः ऋक्सं.8।4।1।1 इत्यादिषु तद्ग्रन्थविरोधाच्च।तथाहि स्कान्दे शैवे यदन्तरं व्याघ्रहरीन्द्रयोर्वने यदन्तरं मेरुगिरीन्द्रविन्ध्ययोः। यदन्तरं सूर्यसुरेड्यबिम्बयोस्तदन्तरं रुद्रमहेन्द्रयोरपि। यदन्तरं सिंहगजेन्द्रयोर्वने यदन्तरं सूर्यशशाङ्कयोर्दिवि। यदन्तरं जाह्नविसूर्यकन्ययोस्तदन्तरं ब्रह्मगिरीशयोरपि। यदन्तरं प्रलयजवारिविप्रुषोर्यदन्तरं स्तम्बहिरण्यगर्भयोः। स्फुलिङ्गसंवर्त्तकयोर्यदन्तरं तदन्तरं विष्णुहिरण्यगर्भयोः। अनन्तत्वात्महाविष्णोस्तदन्तरमनन्तकम्। माहात्म्यसूचनार्थाय ह्युदाहरणमीरितम्। तत्समो ह्यधिको वापि नास्ति कश्चित्कदाचन। एतेन सत्यवाक्येन तमेव प्रविशाम्यहम् इत्याह। तत्रैव शिवं प्रति मार्कण्डेयवचनम् संसारार्णवनिर्मग्न इदानीं मुक्तिमेष्यसि इत्यादि। पाद्मे शैवे मार्कण्डेयकथाप्रबन्धे शिवान्निषिध्य विष्णोरेव मुक्तिमाह अहं भोगप्रदो वत्स मोक्षदस्तु जनार्दनः इत्यादि। समब्राह्मविरोधाच्च। वेदश्चेतिहासाद्यविरोधेन योज्यःयदि विद्यात् इति वचनात्। अनिर्णयाच्चेन्द्रादिशङ्कयाऽन्यथा तत्रापीष्टसिद्धिः नामवैशेष्यात्। अतो भगवदुत्कर्ष एव सर्वागमानां महातात्पर्यम्। तथापि स्वतः प्रामाण्यत्सन्नेवोच्यते अविरोधात्।नच प्रमाणसिद्धस्य अन्यत्रादृष्ट्यापह्नवो युक्तः धर्मवैचित्र्यादर्थानाम्। स्वतः प्रामाण्यानङ्गीकारे मानोक्तदावप्यदोषत्वं च साधयेदित्यतिप्रसङ्गः। अनन्यापेक्षया च तत्परत्वं सिद्धमागमानाम्।नारायणपरा वेदाः भाग.2।5।15 सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति कठो.1।2।15वासुदेवपरा वेदाः भाग.1।2।28 इति। न चैतद्विरुद्धम् ईश्वरनियमात्। अनादौ च तत्सिद्धम्द्रव्यं कर्म च कालश्च भाग.2।10।12 इत्यादौ। प्रयोजकत्वं तु पूर्वोक्तन्यायेन। अतः सिद्धमेतत्। तच्चानन्यापेक्षाचिन्त्यशक्तित्वादेव युक्तम्। अतो न मायामयमेकम्। अचलत्वं त्वप्रहर्षमनानन्दमदुःखमसुखमप्रज्ञमसद्वेत्यादिवत्। क्रियादृष्टेःतपो मे हृदयं साक्षात् ब्रह्मन् तनुर्विद्या क्रियाकृतिः भाग.6।4।46 इत्याद्युक्तम्। अतश्च न मायामयं सर्वम् ऐश्वर्यादिवाचिभगशब्देनैव सम्बोधनाच्च। तं त्वा भग ऋक्सं.5।4।8।5 इत्यादौ स्वरूपत्वान्न मायामयत्वं युक्तम्।विज्ञानशक्तिरहमासमननन्तशक्तेः भाग.3।9।24मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे भाग.6।4।48 पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च श्वे.उ.6।8 इत्यादिवचनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.24।।शस्त्राग्न्यम्बुवायवः छेदनदहनक्लेदनशोषणानि आत्मानं प्रति कर्तुं न शक्नुवन्ति। सर्वगतत्वाद् आत्मनः सर्वतत्त्वव्यापकस्वभावतया सर्वेभ्यः तत्त्वेभ्यः सूक्ष्मत्वात् अस्य तैः व्याप्त्यनर्हत्वाद् व्याप्यकर्तव्यत्वात् च छेदनदहनक्लेदनशोषणानाम्। अत आत्मा नित्यः स्थाणुः अचलः अयं सनातनः स्थिरस्वभावः अप्रकम्प्यः पुरातनः च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.24।। यस्मात् अन्योन्यनाशहेतुभूतानि एनमात्मानं नाशयितुं नोत्सहन्ते अस्यादीनि तस्मात् नित्यः। नित्यत्वात् सर्वगतः। सर्वगतत्वात् स्थाणुः इव स्थिर इत्येतत्। स्थिरत्वात् अचलः अयम् आत्मा। अतः सनातनः चिरंतनः न कारणात्कुतश्चित् निष्पन्नः अभिनव इत्यर्थः।।नैतेषां श्लोकानां पौनरुक्त्यं चोदनीयम् यतः एकेनैव श्लोकेन आत्मनः नित्यत्वमविक्रियत्वं चोक्तम् न जायते म्रियते वा इत्यादिना। तत्र यदेव आत्मविषयं किञ्चिदुच्यते तत् एतस्मात् श्लोकार्थात् न अतिरिच्यते किञ्चिच्छब्दतः पुनरुक्तम् किञ्चिदर्थतः इति। दुबोर्धत्वात् आत्मवस्तुनः पुनः पुनः प्रसङ्गमापाद्य शब्दान्तरेण तदेव वस्तु निरूपयति भगवान् वासुदेवः कथं नु नाम संसारिणामसंसारित्वबुद्धिगोचरतामापन्नं सत् अव्यक्तं तत्त्वं संसारनिवृत्तये स्यात् इति।।किञ्च

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【 Verse 2.25 】

▸ Sanskrit Sloka: अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते | तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ||

▸ Transliteration: avyakto’yamacintyo’y amavikāryo’yamucyate || tasmādevaṁ viditvainaṁ nānuśocitumarhasi ||

▸ Glossary: avyaktaḥ: unmanifest; ayaṁ: this; acintyaḥ: unthinkable; ayaṁ: this; avikāryaḥ: immutable; ayaṁ: this; ucyate: is spoken of; tasmāt: therefore; evaṁ: as such; viditvā: having known; enaṁ: this; na: not; anuśocituṁ arhasi: (you) should not grieve

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.5 The Self is said to be unmanifest, unthinkable and unchange- able and able. Knowing this to be such, you should not grieve.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.25।।यह देही प्रत्यक्ष नहीं दीखता यह चिन्तनका विषय नहीं है और इसमें कोई विकार नहीं है। अतः इस देहीको ऐसा जानकर शोक नहीं करना चाहिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.25।। यह आत्मा अव्यक्त? अचिन्त्य और अविकारी कहा जाता है इसलिए इसको इस प्रकार जानकर तुमको शोक करना उचित नहीं है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.25 अव्यक्तः unmanifested? अयम् this (Self)? अचिन्त्यः unthinkable? अयम् this? अविकार्यः unchangeable? अयम् this? उच्यते is said? तस्मात् therefore? एवम् thus? विदित्वा having known? एनम् this? न not? अनुशोचितुम् to grieve? अर्हसि (thou) oughtest.Commentary The Self is not an object of perception. It can hardly be seen by the physical eyes. Therefore? the Self is unmanifested. That which is seen by the eyes becomes an object of thought. As the Self cannot be perceived by the eyes? It is unthinkable. Milk when mixed with buttermilk changes its form. The Self cannot change Its form like milk. Hence? It is changeless and immutable. Therefore? thus understanding the Self? thou shouldst not mourn. Thou shouldst not think also that thou art their slayer and that they are killed by thee.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.25. This is declared to be non-evident, imponderable, and unchangeable. Therefore understanding This as such you should not lament.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.25 It is named the Unmanifest, the Unthinkable, the immutable. Wherefore, knowing the Spirit as such, thou hast no cause to grieve.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.25 This (self) is said to be unmanifest, inconceivable and unchanging. Therefore, knowing It thus, it does not befit you to grieve.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.25 It is said that This is unmanifest; This is inconceivable; This is unchangeable. Therefore, having known This thus, you ougth not to grieve.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.25 This (Self) is said to be unmanifested, unthinkable and unchangeable. Therefore, knowing This to be such, thou shouldst not grieve.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.23-25 Nainam etc. upto arhasi. The weapons etc., that cause destruction, haldly do anything to This. For, being, by nature, exclusively pure Consciousness, remaining without support, having no component parts and being independent, this cannot be destroyed through the process of either assumption of an altogether different nature, or the destruction of the support, or the mutual separation of the component parts, or the rise of an opponent, and so on. Nor the act to going to another body is a new thing for This. For, even when This is [apparently] with a single body, This travels always to different body; for the body does not remain the same even for a moment. By understanding this Self to be as such, you should not lament This.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.25 The self is not made manifest by those Pramanas (means of knowledge) by which objects susceptible of being cleft etc., are made manifest; hence It is unmanifest, being different in kind from objects susceptible to cleaving etc., It is inconceivable, being different in kind from all objects. As It does not possess the essential nature of any of them. It cannot even be conceived. Therefore, It is unchanging, incapable of modifications. So knowing this self to be possessed of the above mentioned alities, it does not become you to feel grief for Its sake.

▸ English

Chapter 2 (Part 17)

Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.25 Moreover, ucyate, it is said that; ayam, This, the Self; is avyaktah, unmanifest, since, being beyond the ken of all the organs, It cannot be objectified. For this very reason, ayam, This; is acintyah, inconceivable. For anything that comes within the purview of the organs becomes the object of thought. But this Self is inconceivable becuase It is not an object of the organs. Hence, indeed, It is avikaryah, unchangeable. This Self does not change as milk does when mixed with curd, a curdling medium, etc. And It is chnageless owing to partlessness, for it is not seen that any non-composite thing is changeful. Not being subject to transformation, It is said to be changeless. Tasmat, therefore; vidivata, having known; enam, this one, the Self; evam, thus, as described; na arhasi, you ought not; anusocitum, to grieve, thinking, 'I am the slayer of these; these are killed by me.'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.25।। आत्मा के स्वरूप को भगवान् यहाँ और अधिक स्पष्ट करते हैं। यहाँ प्रयुक्त शब्दों के द्वारा सत्य का निर्देश युक्तिपूर्वक किया गया है।अव्यक्त पंचमहाभूतों में जो सबसे अधिक स्थूल है जैसे पृथ्वी उसका ज्ञान पांचों ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा होता है। परन्तु जैसेजैसे सूक्ष्मतर तत्त्व तक हम पहुँचते हैं वैसे यह ज्ञात होता है कि उसका ज्ञान पांचों प्रकार से नहीं होता। जल में गंध नहीं है और अग्नि में रस नहीं है तो वायु में रूप भी नहीं है। इस प्रकार आकाश सूक्ष्मतम होने से दृष्टिगोचर नहीं होता। स्वभावत जो आकाश का भी कारण है उसका ज्ञान किसी भी इन्द्रिय के द्वारा नहीं हो सकता। अत हमें स्वीकार करना पड़ेगा कि वह अव्यक्त है।इन्द्रियगोचर वस्तु व्यक्त कही जाती है। अत जो इन्द्रियों से परे है वह अव्यक्त है। यद्यपि मैं किसी वृक्ष के बीज में वृक्ष को देखसुन नहीं सकता हूँ और न उसका स्वाद स्पर्श या गंध ज्ञात कर सकता हूँ तथापि मैं जानता हूँ कि यही बीज वृक्ष का कारण है। इस स्थिति में कहा जायेगा कि बीज में वृक्ष अव्यक्त अवस्था में है। इस प्रकार आत्मा को अव्यक्त कहने का तात्पर्य यह है कि वह इन्द्रियों के द्वारा जानने योग्य विषय नहीं है। उपनिषदों में विस्तारपूर्वक बताया गया है कि आत्मा सबकी द्रष्टा होने से दृश्य विषय नहीं बन सकती।अचिन्त्य आत्मा इन्द्रियों का विषय नहीं है उसी प्रकार यहाँ वह अचिन्त्य है कहकर यह दर्शाते हैं कि मन और बुद्धि के द्वारा हम आत्मा का मनन और चिन्तन नहीं कर सकते जैसे अन्य विषयों का विचार सम्भव है। इसका कारण यह है कि मन और बुद्धि दोनों स्वयं जड़ हैं। परन्तु इस चैतन्य आत्मा के प्रकाश से चेतन होकर वे अन्य विषयों को ग्रहण करते हैं। अब अपने ही मूलस्वरूप द्रष्टा को वे किस प्रकार विषय रूप में जान सकेंगे दूरदर्शीय यन्त्र से देखने वाला व्यक्ति स्वयं को नहीं देख सकता क्योंकि एक ही व्यक्ति स्वयं द्रष्टा और दृश्य दोनों नहीं हो सकता। यह अचिन्त्य शब्द का तात्पर्य है। अत अव्यक्त और अचिन्त्य शब्द से आत्मा को अभाव रूप नहीं समझ लेना चाहिए।अविकारी अवयवों से युक्त साकार पदार्थ परिच्छिन्न और विकारी होता है। निरवयव आत्मा में किसी प्रकार का विकार संभव नहीं है।इस प्रकार श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश करते हैं कि आत्मा को उसके शुद्ध रूप से पहचान कर शोक करना त्याग देना चाहिए। ज्ञानी पुरुष अपने को न मारने वाला समझता है और न ही मरने वाला मानता है।भौतिकवादी विचारकों के मत को स्वीकार करके यह मान भी लें कि आत्मा नित्य नहीं है तब भी भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.25।।किंच सर्वकरणागोचरत्वान्न व्यज्यत इत्यव्यक्तः। अयं प्रत्यक्षातीतः प्रत्यक्षागोचरत्वात् अचिन्त्योऽनुमानागम्यः कार्यलिङ्गकानुमानगम्योऽपि न भवतीत्याह। अविकार्यः विकारं न प्राप्नोतीत्यर्थः। एतेन देहत्रयातिरिक्तोऽप्यर्थाद्बोधित इति ज्ञेयम्। यत्त्वविकार्यःकर्मेन्द्रियाणामप्यगोचर इति तच्चिन्त्यम्। अव्यक्त इत्यनेनैव तस्य संग्रहात्। अन्यथा सामान्यतो दृष्टानुमानागोचरत्वालाभापत्तेश्च। उच्यतेनावेदविन्मनुते तं बृहन्तम्यतो वाच निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह इत्यादिश्रुतिभिः। तस्मादेवं यथोक्तप्रकारेण एनमात्मानं ज्ञात्वाऽहं हन्ता मयैवैते हन्यन्त इति शोचितुं नार्हसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.25।।छेद्यत्वादिग्राहकप्रमाणाभावादपि तदभाव इत्याह अव्यक्तोऽयमित्याद्यर्धेन। यो हीन्द्रियगोचरो भवति स प्रत्यक्षत्वाद्व्यक्त इत्युच्यते। अयं तु रूपादिहीनत्वान्न तथा। अतो न प्रत्यक्षं तत्र छेद्यत्वादिग्राहकमित्यर्थः। प्रत्यक्षाभावेऽप्यनुमानं स्यादित्यत आह अचिन्त्योऽयं चिन्त्योऽनुमेयस्तद्विलक्षणोऽयम् क्वचित्प्रत्यक्षो हि वह्न्यादिर्गृहीतव्याप्तिकस्य धूमादेर्दर्शनात्क्वचिदनुमेयो भवति अप्रत्यक्षे तु व्याप्तिग्रहणासंभवान्नानुमेयत्वमिति भावः। अप्रत्यक्षस्यापीन्द्रियादेः सामान्यतो दृष्टानुमानविषयत्वं दृष्टमत आह अविकार्योऽयं यद्विक्रियावच्चक्षुरादिकं तत्स्वकार्यान्यथानुपपत्त्या कल्प्यमानमर्थापत्तेः सामान्यतो दृष्टानुमानस्य च विषयो भवति। अयं तु न विकार्यो न विक्रियावानतो नार्थापत्तेः सामान्यतो दृष्टस्य वा विषय इत्यर्थः। लौकिकशब्दस्यापि प्रत्यक्षादिपूर्वकत्वात्तन्निषेधेनैव निषेधः। ननु वेदेनैव तत्र छेद्यत्वादि ग्रहीष्यत इत्यत आह उच्यते वेदेन सोपकरणेनाच्छेद्याव्यक्तादिरूप एवायमुच्यते तात्पर्येण प्रतिपाद्यते अतो न वेदस्य तत्प्रतिपादकस्यापि छेद्यत्वादिप्रतिपादकत्वमित्यर्थः। अत्रनैनं छिन्दन्ति इत्यत्र शस्त्रादीनां तन्नाशकसामर्थ्याभाव उक्त़ः।अच्छेद्योऽयम् इत्यादौ तस्य छेदादिकर्मत्वायोग्यत्वमुक्तम्। अव्यक्तोऽयम् इत्यत्र तच्छेदादिग्राहकमानाभाव उक्त इत्यपौनरुक्त्यं द्रष्टव्यम्। वेदाविनाशिनम् इत्यादिनां तु श्लोकानामर्थतः शब्दतश्च पौनरुक्त्यं भाष्यकृद्भिः परिहृतम्। दुर्बोधत्वादात्मवस्तुनः पुनः पुनः प्रसङ्गमापाद्य शब्दान्तरेण तदेव वस्तु निरूपयति भगवान्वासुदेवः। कथं नु नाम संसारिणां बुद्धिगोचरमापन्नं तत्त्वं संसारनिवृत्तये स्यादिति वदद्भिः। एंव पूर्वोक्तयुक्तिभिरात्मनो नित्यत्वे निर्विकारत्वे च सिद्धे तव शोको नोपपन्न इत्युपसंहरति तस्मादित्यर्धेन। एतादृशात्मस्वरूपवेदनस्य शोककारणनिवर्तकत्वात्तस्मिन्सति शोको नोचितः। कारणाभावे कार्याभावस्यावश्यकत्वात्। तेनात्मानमविदित्वा यदन्वशोचस्तद्युक्तमेव। आत्मानं विदित्वा तु नानुशोचितुमर्हसीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.25।।एवं ज्ञेयं वस्तूक्तं तच्च तत्राध्यस्तदेहत्रयनिरासेनापरोक्षीकर्तव्यमित्याह  अव्यक्तोऽयमिति।  व्यक्तं स्थूलशरीरं प्रत्यक्षगम्यं तदन्योयं प्रत्यगात्मा। तथा अचिन्त्योऽयं चिन्त्यं चिन्तायोग्यं रूपादि प्रकाशकार्येणानुमेयं चक्षुरादिसमुदायात्मकं लिङ्गशरीरं अप्रत्यक्षं ततोऽप्यन्योऽयम्। तथा अविकार्योऽयं विकारं स्थूलसूक्ष्मकार्यभावेनावस्थानमर्हतीति विकार्यं त्रिगुणात्मकं मूलाज्ञानं कारणशरीरं सुप्तोत्थितस्य न किंचिदवेदिषमिति परामर्शदर्शनादहं न जानामीत्यनुभवाच्च साक्ष्येकगम्यं ततोऽप्यन्योऽयम्। उच्यते व्यक्तादिनिषेधमुखेन नतु शृङ्गग्राहिकयाऽयमेवंविध इति विधिमुखेनोच्यते। यस्मादेवमयमुच्यते तस्मादेनं विदित्वा नानुशोचितुमर्हसि।तरति शोकमात्मवित् इति श्रुतेरात्मविद् भूत्वा बन्धुवियोगजं शोकं मा कार्षीरित्यर्थः। उक्तं चात्मनोऽवस्थात्रयातीतत्वम्स्वप्ननिद्रायुतावाद्यौ प्राज्ञस्त्वस्वप्ननिद्रया। न निद्रां नैव च स्वप्नं तुर्ये पश्यन्ति निश्चिताः। इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.25।।अव्यक्तो लौकिकेन्द्रियाग्राह्यः। अचिन्त्यो मनसोऽप्यगम्यः। अविकार्यो विकाररहितः कर्मभिर्वाऽविकार्यः। अयं सर्वत्र व्यापकत्वेन प्रत्यक्षतयोक्तः। उच्यते वेदैस्तद्रूपश्चेत्यर्थः। यदर्थमेतदुक्तं तदाह तस्मादिति। तस्मादेनं पूर्वोक्तधर्मवन्तं विदित्वा अनुशोचितुं नार्हसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.25।।किंच अव्यक्तश्चक्षुराद्यविषयः अचिन्त्यो मनसोऽप्यविषयः अविकार्यः कर्मेन्द्रियाणामप्यगोचर इत्यर्थः। उच्यत इति नित्यत्वादावभियुक्तोक्तिं प्रमाणयति। उपसंहरति  तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.25।।अव्यक्तोऽयमिति। अक्षरोऽयं वस्तुतोऽचिन्त्यश्च।प्रकृतिभ्यः परं यत्तु तदचिन्त्यस्य लक्षणम् इति वाक्यात्। नन्वेवम्भूतमव्यक्तं प्रधानं प्रसिद्धं तदेव किं निरूप्यत इति चेत्तत्राह अविकाऽर्योऽयमिति। प्रधानस्य विकार्यत्वादित्यर्थः। तस्मादेवम्भूतमेनमात्मानं ज्ञात्वा त्वं नानुशोचितमुर्हसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.25।।तथा यह आत्मा बुद्धि आदि सब करणोंका विषय नहीं होनेके कारण व्यक्त नहीं होता ( जाना नहीं जा सकता ) इसलिये अव्यक्त है। इसीलिये यह अचिन्त्य है क्योंकि जो पदार्थ इन्द्रियगोचर होता है वही चिन्तनका विषय होता है। यह आत्मा इन्द्रियगोचर न होनेसे अचिन्त्य है। यह आत्मा अविकारी है अर्थात् जैसे दहीके जावन आदिसे दूध विकारी हो जाता है वैसे यह नहीं होता। तथा अवयवरहित ( निराकार ) होनेके कारण भी आत्मा अविक्रिय है क्योंकि कोई भी अवयवरहित ( निराकार ) पदार्थ विकारवान् नहीं देखा गया। अतः विकाररहित होनेके कारण यह आत्मा अविकारी कहा जाता है। सुतरां इस आत्माको उपर्युक्त प्रकारसे समझकर तुझे यह शोक नहीं करना चाहिये कि मैं इनका मारनेवाला हूँ मुझसे ये मारे जाते हैं इत्यादि।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.25।। व्याख्या    अव्यक्तोऽयम्   जैसे शरीरसंसार स्थूलरूपसे देखनेमें आता है वैसे यह शरीरी स्थूलरूपसे देखनेमें आनेवाला नहीं है क्योंकि यह स्थूल सृष्टिसे रहित है। अचिन्त्योऽयम्   मन बुद्धि आदि देखनेमें तो नहीं आते पर चिन्तनमें आते ही हैं अर्थात् ये सभी चिन्तनके विषय हैं। परन्तु यह देही चिन्तनका भी विषय नहीं है क्योंकि यह सूक्ष्म सृष्टिसे रहित है। अविकार्योऽयमुच्यते   यह देही विकाररहितकहा जाता है अर्थात् इसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। सबका कारण प्रकृति है उस कारणभूत प्रकृतिमें भी विकृति होती है। परन्तु इस देहीमें किसी प्रकारकी विकृति नहीं होती क्योंकि यह कारण सृष्टिसे रहित है।यहाँ चौबीसवेंपचीसवें श्लोकोंमें अच्छेद्य अदाह्य अक्लेद्य अशोष्य अचल अव्यक्त अचिन्त्य और अविकार्य इन आठ विशेषणोंके द्वारा इस देहीका निषेधमुखसे और नित्य सर्वगत स्थाणु और सनातन इन चार विशेषणोंके द्वारा इस देहीका विधिमुखसे वर्णन किया गया है। परन्तु वास्तवमें इसका वर्णन हो नहीं सकता क्योंकि यह वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी आदि प्रकाशित होते हैं उस देहीको वे सब प्रकाशित कैसे कर सकते हैं अतः इस देहीका ऐसा अनुभव करना ही इसका वर्णन करना है। तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि   इसलिये इस देहीको अच्छेद्य अशोष्य नित्य सनातन अविकार्य आदि जान लें अर्थात् ऐसा अनुभव कर लें तो फिर शोक हो ही नहीं सकता। सम्बन्ध   अगर शरीरीको निर्विकार न मानकर विकारी मान लिया जाय (जो कि सिद्धान्तसे विरुद्ध है) तो भी शोक नहीं हो सकता यह बात आगेके दो श्लोकोंमें कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.24 2.26।।नैनमित्यादि। नास्य नाशकारणं शस्त्रादि किंचित्करम्। चिदेकस्वभावस्य अनाश्रितस्य ( N K add निरपेक्षस्य after अनाश्रितस्य) निरंशस्य (N omits निरंशस्य S adds निरवयवस्य after निरंशस्य) स्वतन्त्रस्य स्वभावान्तरापत्त्याश्रयविनाशावयवविभाग विरोधिप्रादुर्भावादिक्रमेण (S प्रक्रमेण) नाशयितुमशक्यत्वात्। न च देहान्तरगमनमस्य अपूर्वम् देहान्वितोऽपि (N अपूर्वदेहान्नित्योऽपि) सततं देहान्तरं गच्छति तेन संबध्यते इत्यर्थः। देहस्य क्षणमात्रमप्यनवस्थायित्वात्। एवंभूतं विदित्वा एनमात्मानं शोचितुं नार्हसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.25।।त्वंपदार्थपरिशोधनस्य प्रकृतत्वात्तत्रैव हेत्वन्तरमाह  किञ्चेति।  आत्मनो नित्यत्वादिलक्षणस्य तथैवं प्रथा किमिति न भवति तत्राह  अव्यक्त इति।  मा तर्हि प्रत्यक्षत्वं भूदनुमेयत्वं तु तस्य किं न स्यादित्याशङ्क्याह  अतएवेति।  तदेव प्रपञ्चयति  यद्धीति।  अतीन्द्रियत्वेऽपि सामान्यतो दृष्टविषयत्वं भविष्यतीत्याशङ्क्य कूटस्थेनात्मना व्याप्तिलिङ्गाभावान्मैवमित्याह  अविकार्य इति।  अविकार्यत्वे व्यतिरेकदृष्टान्तमाह  यथेति।  किं चात्मा न विक्रियते निरवयवद्रव्यत्वाद्धटादिवदिति व्यतिरेक्यनुमानमाह  निरवयवत्वाच्चेति।  निरवयवत्वेऽपि विक्रियावत्त्वे का क्षतिरित्याशङ्क्याह  नहीति।  सावयवस्यैव विक्रियावत्त्वदर्शनाद् विक्रियावत्त्वे निरवयवत्वानुपपत्तिरित्यर्थः। यद्धि सावयवं सक्रियं क्षीरादि तद्दध्यादिना विकारमापद्यते नचात्मनः श्रुतिप्रमितनिरवयवत्वस्य सावयवत्वमतोऽविक्रियत्वान्नायं विकार्यो भवितुमलमिति फलितमाह  अविक्रियत्वादिति।  आत्मयाथात्म्योपदेशमशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्युपक्रम्य व्याख्यातमुपसंहरति  तस्मादिति।  अव्यक्तत्वाचिन्त्यत्वाविकार्यत्वनित्यत्वसर्वगतत्वादिरूपो यस्मादात्मा निर्धारितस्तस्मात्तथैव ज्ञातुमुचितस्तज्ज्ञानस्य फलवत्त्वादित्यर्थः। प्रतिषेध्यमनुशोकमेवाभिनयति  हन्ताहमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.25।।ननु ज्ञानिभिर्भगवान् दृश्यते चिन्त्यते च तत्कथमुच्यतेऽव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमिति तत्राऽऽह  अतएवे ति। अचिन्त्यशक्तित्वादेव। यथोक्तं अतोऽनन्ते न तथाहि लिङ्गम् इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.25।।अत एवाव्यक्तादिरूपः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.25।।छेदनादियोग्यानि वस्तूनि यैः प्रमाणैः व्यज्यन्ते तैः  अयम्  आत्मा न व्यज्यते इति  अव्यक्तः।  अतः छेद्यादिविजातीयः।  अचिन्त्यः  च सर्ववस्तुविजातीयत्वेन तत्तत्स्वभावयुक्ततया चिन्तयितुम् अपि न अर्हः। अतः च  अविकार्यः  विकारानर्हः।  तस्माद्  उक्तलक्षणम्  एनम् आत्मानं विदित्वा  तत्कृते  न अनुशोचितुम् अर्हसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.25।। सर्वकरणाविषयत्वात् न व्यज्यत इति अव्यक्तः अयम् आत्मा। अत एव अचिन्त्यः अयम्। यद्धि इन्द्रियगोचरः तत् चिन्ताविषयत्वमापद्यते। अयं त्वात्मा अनिन्द्रियगोचरत्वात् अचिन्त्यः। अत एव अविकार्यः यथा क्षीरं दध्यातञ्चनादिना विकारि न तथा अयमात्मा। निरवयवत्वाच्च अविक्रियः। न हि निरवयवं किञ्चित् विक्रियात्मकं दृष्टम्। अविक्रियत्वात् अविकार्यः अयम् आत्मा उच्यते। तस्मात् एवं यथोक्तप्रकारेण एनम् आत्मानं विदित्वा त्वं न अनुशोचितुमर्हसि हन्ताहमेषाम् मयैते हन्यन्त इति।।आत्मनः अनित्यत्वमभ्युपगम्य इदमुच्यते

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【 Verse 2.26 】

▸ Sanskrit Sloka: अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् | तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ||

▸ Transliteration: atha cainaṁ nityajātaṁ nityaṁ vā manyase mṛtam | tathāpi tvaṁ mahābāho naivaṁ śocitum arhasi ||

▸ Glossary: atha: however; ca: also; enaṁ: this soul; nityajātaṁ: always born; nityaṁ: forever; vā: either; manyase: think; mṛtaṁ: dead; tathā api: still; tvaṁ: you; mahābāho: O mighty-armed one; na: not; enaṁ: like this ; śocituṁ arhasi: you lament

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.26 O mighty-armed, even if you should think of the soul as being constantly born and constantly dying, even then, you should not lament.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.26।।हे महाबाहो अगर तुम इस देहीको नित्य पैदा होनेवाला और नित्य मरनेवाला भी मानो तो भी तुम्हें इसका शोक नहीं करना चाहिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.26।। और यदि तुम आत्मा को नित्य जन्मने और नित्य मरने वाला मानो तो भी? हे महाबाहो इस प्रकार शोक करना तुम्हारे लिए उचित नहीं है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.26 अथ now? च and? एनम् this (Self)? नित्यजातम् constantly born? नित्यम् constantly? वा or? मन्यसे thinkest? मृतम् dead? तथापि even then? त्वम् thou? महाबाहो mightyarmed? न not? एवम् thus? शोचितुम् to grieve? अर्हसि (thou) oughtest.Commentary Lord Krishna here? for the sake of argument? takes up the popular supposition. Granting that the Self is again and again born whenever a body comes into being? and again and again dies whenever the body dies? O mightyarmed (O Arjuna of great valour and strength)? thou shouldst not grieve thus? because birth is inevitable to want is dead and death is inevitable to what is born. This is the inexorable or unrelenting Law of Nature.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.26. On the other hand, if you deem This as being born constantly or as dying constantly, even then, O mighty-armed one, you should not lament This.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.26 Even if thou thinkest of It as constantly being born, constantly dying, even then, O Mighty Man, thou still hast no cause to grieve.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.26 Or if you hold this self as being constantly born and as constantly dying, even then, O mighty-armed one, it does not become you to feel grief.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.26 On the other hand, if you think this One is born continually or dies constantly, even then, O mighty-armed one, you ought not to grieve thus.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.26 But even if thou thinkest of It as being constantly born and constantly dying, even then, O mighty-armed, thou shouldst not grieve.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.26 Atha va etc. On the other hand if you deam 'This' to be the body and to be born constantly,-because its stream does not stop-even then, there is no necessity to lament. Or, if, following the [Vainasika Buddhists' ?] doctrine of continuous decay of things, you deem This to be constantly dying, even then where is the need for lamenting ? If you, in the same manner, deem the Self to be constantly born or to be constantly dying on account of Its contacts and separations with bodies, even then it is unwarranted, on every account, on the part of the men of rational thinking, to lament. Otherwise this [division of] permanence and impermanence does not stand reasoning. For-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.26 Besides, if you consider this self as identical with the body, which is constantly born and constantly dies - which is nothing other than these characteristics of the body mentioned above -, even then it does not become you to feel grief; because, birth and death are inevitable for the body, whose nature is modification.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.26 This (verse), 'On the other hand,' etc., is uttered assuming that the Self is transient. Atha ca, on the other hand, if ( conveys the sense of assumption ); following ordinary experience, manyase, you think; enam, this One, the Self under discussion; is nityajatam, born continually, becomes born with the birth of each of the numerous bodies; va, or; nityam, constantly; mrtam, dies, along with the death of each of these (bodies); tatha api, even then, even if the Self be of that nature; tvam, you; maha-baho, O mighty-armed one; na arhasi, ought not; socitum, to grieve; evam, thus, since that which is subject to birth will die, and that which is subject to death will be born; these two are inevitable.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.26।। 26 और 27 इन दो श्लोकों में भगवान् श्रीकृष्ण ने भौतिकवादी विचारकों का दृष्टिकोण केवल तर्क के लिए प्रस्तुत किया है। इस मत के अनुसार केवल प्रत्यक्ष प्रमाण ही ज्ञान का साधन है अर्थात् इन्द्रियों को जो ज्ञात है केवल वही सत्य है। इस प्रकार मानने पर उन्हें यह स्वीकार करना पड़ता है कि जीवन असंख्य जन्म और मृत्युओं की एक धारा या प्रवाह है। वस्तुयें निरन्तर उत्पन्न और नष्ट होती हैं और उनके मत के अनुसार यही जीवन है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यदि जन्ममृत्यु का यह निरन्तर प्रवाह ही जीवन हो तब भी हे शक्तिशाली अर्जुन तुमको शोक नहीं करना चाहिये। क्योंकि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.26।।प्रौढ्या आत्मनो नित्यत्वं वेदबाह्यवादिसिद्धान्तमभ्युपेत्यापि शोकमपाकरोति  अथेति।  अथशब्दः पक्षान्तराभ्युपगमार्थः। एनं लोकदृष्ट्या प्रत्यनेकशरीरोत्पत्तिं जातो जात इति मन्यसे तथातद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे। उपलक्ष्णमेतद्भाष्यं नास्तिकोक्तपक्षान्तराणामपि। यद्वा इतरेषां मतानामत्रोपपादनमविवक्षितं प्रयोजनाभावात् अतस्थूलमताभ्युपगमेऽपि शोको न कार्यः किमुत वैदिकमताङ्गीकार इति फलितार्थस्य विवक्षित्वात्। महाबाहो इति संबोधयन् शोकमकृत्वा बाह्वोर्महत्त्वं सार्थकं कुर्विति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.26।।एवमात्मनो निर्विकारत्वेनाशोच्यत्वमुक्तम्। इदानीं विकारवत्त्वमभ्युपेत्यापि श्लोकद्वयेनाशोच्यत्वं प्रतिपादयति भगवान् तत्र आत्मा ज्ञानस्वरूपः प्रतिक्षणविनाशीत सौगताः देह एवात्मा स च स्थिरोऽप्यनुक्षणपरिणामी जायते नश्यति चेति प्रत्यक्षसिद्धमेवैतदिति लोकायतिकाः। देहातिरिक्तोऽपि देहेन सहैव जायते नश्यति चेत्यन्ये। सर्गाद्यकाल एवाकाशवज्जायते देहभेदेऽप्यनुवर्तमान एवाकल्पस्थायी नश्यति प्रलय इत्यपरे। नित्यएवात्मा जायते म्रियते चेति तार्किकाः। तथाहि प्रेत्यभावो जन्म सचापूर्वदेहेन्द्रियादिसंबन्धः। एवं मरणमपि पूर्वदेहेन्द्रियादिविच्छेदः। इदं चोभयं धर्माधर्मनिमित्तत्वात्तदाधारस्य नित्यस्यैव मुख्यम्। अनित्यस्य तु कृतहान्यकृताभ्यागमप्रसङ्गेन धर्माधर्माधारत्वानुपपत्तेर्न जन्ममरणे मुख्ये इति वदन्ति। नित्यस्याप्यात्मनः कर्णशष्कुलीजन्मनाप्याकाशस्येव देहजन्मना जन्म तन्नाशाच्च मरणं तदुभयमौपाधिकममुख्यमेवेत्यन्ये। तत्रानित्यत्वपक्षेऽपि शोच्यत्वमात्मनो निषेधति अथेति पक्षान्तरे। चोप्यर्थे। यदि दुर्बोधत्वादात्मवस्तुनोऽसकृच्छ्रवणेऽप्यवधारणासामर्थ्यान्मदुक्तपक्षानङ्गीकारेण पक्षान्तरमभ्युपैषि तत्राप्यनित्यत्वपक्षमेवाश्रित्य यद्येनमात्मानं नित्यजातं नित्यमृतं वा मन्यसे। वाशब्दाश्चार्थे। क्षणिकत्वपक्षे नित्यं प्रतिक्षणं पक्षान्तरे आवश्यकत्वान्नित्यं नियतं जातोऽयं मृतोऽयमिति लौकिकप्रत्ययवशेन यदि कल्पयसि तथापि हे महाबाहो पुरुषधौरेयेति सोपहासम्। कुमताभ्युपगमात्त्वय्येतादृशी कुदृष्टिर्न संभवतीति सानुकम्पं वा। एवंअहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् इत्यादि यथा शोचसि एवं प्रकारमनुशोकं कर्तुं स्वयमपि त्वं तादृश एव सन्नार्हसि योग्यो न भवसि क्षणिकत्वपक्षे देहात्मवादपक्षे देहेन सह जन्मविनाशपक्षे च जन्मान्तराभावेन पापभयासंभवात् पापभयेनैव खलु त्वमनुशोचसि तच्चैतादृशे दर्शने न संभवतीत्यर्थः। क्षणिकत्वपक्षे च दृष्टमपि दुःखं न संभवति बन्धुविनाशदर्शित्वाभावादित्यधिकम्। पक्षान्तरे दृष्टदुःखनिमित्तं शोकमभ्यनुज्ञातुमेवकारः। दृष्टदुःखनिमित्तशोकसंभवेऽप्यदृष्टदुःखनिमित्तः शोकः सर्वथा नोचित इत्यर्थः प्रथमश्लोकस्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.26।।एवं तत्त्वदृष्ट्या शोको नोचित इत्युक्तं इदानीं प्राकृतजनदृष्ट्यापि शोको नोचित इत्याह  अथचेति।  नित्यं नियमेन जातं नित्यजातमिति चार्वाकपक्षः। नित्यं सर्वदा जातमिति क्षणिकविज्ञानवादिपक्षः। नित्यश्चासौ अपूर्वदेहेन्द्रियसंबन्धाज्जातश्चेति तार्किकादिपक्षः। एवं नित्यं वा मन्यसे मृतमित्यपि योज्यम्। पक्षत्रयेऽपि शोको न युक्तः। महाबाहो इति युद्धार्थमुत्साहयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.26।।एवं विद्वत्सिद्धान्तमुक्त्वाऽविद्वत्सि द्वा৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ न्तेनापि शोकं कर्तुं नार्हसीत्याह अथ चेति। अथ च पक्षान्तरेण। एनं नित्यजातं तत्तद्देहेन सह जातं तस्मिन्मृते मृतं वा मन्यसे तथापि त्वं एनं शोचितुं नार्हसि। यतस्त्वं महाबाहुः।अत्रायमर्थः नित्यस्यास्य जन्ममरणज्ञानं तु देहाध्यासेनैव भवति। तथासति स्वबाहुबलादिनाशः क्व।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.26।।तदेवमात्मनो जन्मविनाशाभावान्न शोकः कार्य इत्युक्तम्। इदानीं देहेन सहात्मनो जन्म तद्विनाशेन च विनाशमङ्गीकृत्यापि शोको न कार्य इत्याह  अथ चेति।  अथ च यद्यप्येनमात्मानं नित्यं सर्वदा तत्तद्देहे जाते जातं मन्यसे तथा तद्देहे मृते मृतं मन्यसे पुण्यपापयोस्तत्फलभूतयोर्जन्ममरणयोरात्मगामित्वात् तथापि त्वं शोचितुं नार्हसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.26।।अथेति पक्षान्तरे। लौकायतिकमते स्थित्वाऽऽत्मानं नित्यं सदा जातं मृतं मन्यसे तथापि न शोचितुमर्हसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.26।।औपचारिक रूपसे आत्माकी अनित्यता स्वीकार करके यह कहते हैं अथ च ये दोनों अव्यय औपचारिक स्वीकृतिके बोधक हैं। यदि तू इस आत्माको सदा जन्मनेवाला अर्थात् लोकप्रसिद्धिके अनुसार अनेक शरीरोंकी प्रत्येक उत्पत्तिके साथसाथ उत्पन्न हुआ माने तथा उनके प्रत्येक विनाशके साथसाथ सदा नष्ट हुआ माने। तो भी अर्थात् ऐसे नित्य जन्मने और नित्य मरनेवाले आत्माके निमित्त भी हे महाबाहो तुझे इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है क्योंकि जन्मनेवालेका मरण और मरनेवालेका जन्म यह दोनों अवश्य ही होनेवाले हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.26।।  अथ चैनं ৷৷. शोचितुमर्हसि   भगवान् यहाँ पक्षान्तररमें  अथ च  और  मन्यसे  पद देकर कहते हैं कि यद्यपि सिद्धान्तकी और सच्ची बात यही है कि देही किसी भी कालमें जन्मनेमरनेवाला नहीं है (गीता 2। 20) तथापि अगर तुम सिद्धान्तसे बिलकुल विरुद्ध बात भी मान लो कि देही नित्य जन्मनेवाला और नित्य मरनेवाला है तो भी तुम्हें शोक नहीं होना चाहिये। कारण कि जो जन्मेगा वह मरेगा ही और जो मरेगा वह जन्मेगा ही इस नियमको कोई टाल नहीं सकता।अगर बीजको पृथ्वीमें बो दिया जाय तो वह फूलकर अङ्कुर दे देता है और वही अङ्कुर क्रमशः बढ़कर वृक्षरूप हो जाता है। इसमें सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय कि क्या वह बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहा पृथ्वीमें वह पहले अपने कठोररूपको छोड़कर कोमलरूपमें हो गया फिर कोमलरूपको छोड़कर अङ्कुररूपमें हो गया इसके बाद अङ्कुरूपको छोड़कर वृक्षरूपमें हो गया और अन्तमें आयु समाप्त होनेपर वह सूख गया। इस तरह बीज एक क्षण भी एकरूपसे नहीं रहा प्रत्युत प्रतिक्षण बदलता रहा। अगर बीज एक क्षण भी एकरूपसे रहता तो वृक्षके सूखनेतककी क्रिया कैसे होती उसने पहले रूपको छोड़ा यह उसका मरना हुआ और दूसरे रूपको धारण किया यह उसका जन्मना हुआ। इस तरह वह प्रतिक्षण ही जन्मतामरता रहा। बीजकी ही तरह यह शरीर है। बहुत सूक्ष्मरूपसे वीर्यका जन्तु रजके साथ मिला। वह बढ़तेबढ़ते बच्चेके रूपमें हो गया और फिर जन्म गया। जन्मके बाद वह बढ़ा फिर घटा और अन्तमें मर गया। इस तरह शरीर एक क्षण भी एकरूपसे न रहकर बदलता रहा अर्थात् प्रतिक्षण जन्मतामरता रहा। भगवान् कहते हैं कि अगर तुम शरीरकी तरह शरीरीको भी नित्य जन्मनेमरनेवाला मान लो तो भी यह शोकका विषय नहीं हो सकता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.24 2.26।।नैनमित्यादि। नास्य नाशकारणं शस्त्रादि किंचित्करम्। चिदेकस्वभावस्य अनाश्रितस्य ( N K add निरपेक्षस्य after अनाश्रितस्य) निरंशस्य (N omits निरंशस्य S adds निरवयवस्य after निरंशस्य) स्वतन्त्रस्य स्वभावान्तरापत्त्याश्रयविनाशावयवविभाग विरोधिप्रादुर्भावादिक्रमेण (S प्रक्रमेण) नाशयितुमशक्यत्वात्। न च देहान्तरगमनमस्य अपूर्वम् देहान्वितोऽपि (N अपूर्वदेहान्नित्योऽपि) सततं देहान्तरं गच्छति तेन संबध्यते इत्यर्थः। देहस्य क्षणमात्रमप्यनवस्थायित्वात्। एवंभूतं विदित्वा एनमात्मानं शोचितुं नार्हसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.26।।आत्मनो नित्यत्वस्य प्रागेव सिद्धत्वादुत्तरश्लोकानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह  आत्मन इति।  अनित्यत्वमिति च्छेदः शाक्यानां लोकायतानां वा मतमिदमा परामृश्यते। श्रोतुरर्जुनस्य पूर्वोक्तमात्मयाथात्म्यं श्रुत्वापि तस्मिन्निर्धारणासिद्धेर्द्वयोर्मतयोरन्यतरमताभ्युपगमः शङ्कितस्तदर्थो निपातद्वयप्रयोग इत्याह  अथ   चेति।  प्रकृतस्यात्मनो नित्यत्वादिलक्षणस्य पुनःपुनर्जातत्वाभिमानो मानाभावादसंभवीत्याह  लोकेति।  नित्यजातत्वाभिनिवेशे पौनःपुन्येन मृतत्वाभिनिवेशो व्याहतः स्यादित्याशङ्क्याह  तथेति।  परकीयमतमनुभाषितमभ्युपेत्यअहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् इत्यादेस्तदीयशोकस्य निरवकाशत्वमित्याह  तथापीति।  एवमर्जुनस्य दृश्यमानमनुशोकप्रकारं दर्शयित्वा तस्य कर्तुमयोग्यत्वे हेतुमाह  जन्मवत इति।  जन्मवतो नाशो नाशवतश्च जन्मेत्येताववश्यंभाविनौ मिथो व्याप्ताविति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.26।।ननु सर्वशङ्कोद्धारेणात्मनित्यत्वं प्रतिपाद्य तस्मादेवमित्युपसंहृतं तत्किंअथ च इति पुनरुच्यते इत्यतोऽङ्गीकृत्यात्मनित्यत्वं प्रकारान्तरेण शोकशङ्केयमित्याशयेनाह  अस्त्वेव मिति। युद्धे च मृतिर्नियता जनिमृतिनिमित्तं च दुःखं मदीयानां भविष्यतीति ममैव शोक इति शङ्काशेषः। अनेन पूर्वार्धोऽपि व्याख्यातः। अत एव  देह संयोगवियोगात्म कजनिमृती  इत्युक्तम्। अन्यथा देहसंयोगवियोगावित्येव वा जनिमृती इत्येव वा ब्रूयात्।स्त एव इत्यनेन नित्यशब्दोऽवधारणार्थ इत्युक्तं भवति। अस्त्वेवमात्मनो नित्यत्वमिति वदताआत्मनोऽनित्यत्वमभ्युपगम्येदमुच्यते इति मायावादिनो व्याख्यानं निरस्तं भवति।ध्रुवं जन्म मृतस्य च 2।27 इत्युत्तरवाक्यविरोधात्अव्यक्तादीनि 2।28 इत्यनेनापि विरोधात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.26।।अस्त्वेवमात्मनो नित्यत्वम् तथापि देहसंयोगवियोगात्मकजनिमृती स्त एवेत्यत आह अथ चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.26।। अथ नित्यजातं नित्यमृतं  देहम् एव  एनम्  आत्मानं  मनुषे  न देहातिरिक्तम् उक्तलक्षणं  तथापि  एवम् अतिमात्रं  शोचितुं न अर्हसि।  परिणामस्वभावस्य देहस्य उत्पत्तिविनाशयोः अवर्जनीयत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.26।। अथ च इति अभ्युपगमार्थः। एनं प्रकृतमात्मानं नित्यजातं लोकप्रसिद्ध्या प्रत्यनेकशरीरोत्पत्ति जातो जात इति मन्यसे तथा प्रतितत्तद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे मृतं मृतो मृत इति तथापि तथाभावेऽपि आत्मनि त्वं महाबाहो न एवं शोचितुमर्हसि जन्मवतो नाशो नाशवतो जन्मश्चेत्येताववश्यंभाविनाविति।।तथा च सति

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【 Verse 2.27 】

▸ Sanskrit Sloka: जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च | तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ||

▸ Transliteration: jātasya hi dhruvo mṛtyur dhruvaṁ janma mṛtasya ca | tasmādaparihārye’rthe na tvaṁ śocitumarhasi ||

▸ Glossary: jātasya: one who has taken his birth; hi: indeed; dhruvo: certain; mṛtyuḥ: death; dhruvaṁ: certain; janma: birth; mṛtasya: of the dead; ca: also; tasmāt: therefore; aparihārye: for that which is unavoidable; arthe: in the matter of; na: do not; tvaṁ: you; śocituṁ arhasi: you lament

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.27 Indeed, death is certain for the born and birth is certain for the dead. Therefore, you should not grieve over the inevitable.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.27।।क्योंकि पैदा हुएकी जरूर मृत्यु होगी और मरे हुएका जरूर जन्म होगा इस(जन्ममरणके प्रवाह) का परिहार अर्थात् निवारण नहीं हो सकता। अतः इस विषयमें तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.27।। जन्मने वाले की मृत्यु निश्चित है और मरने वाले का जन्म निश्चित है इसलिए जो अटल है अपरिहार्य है उसके विषय में तुमको शोक नहीं करना चाहिये।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.27 जातस्य of the born? हि for? ध्रुवः certain? मृत्युः death? ध्रुवम् certain? जन्म birth? मृतस्य of the dead? च and? तस्मात् therefore? अपरिहार्ये inevritable? अर्थे in matter? न not? त्वम् thou? शोचितुम् to grieve? अर्हसि (thou) oughtest.Commentary Birth is sure to happen to that which is dead death is sure to happen to what which is born. Birth and death are certainly unavoidable. Therefore? you should not grieve over an inevitable matter.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.27. Death is certain indeed for what is born; and birth is certain for what is dead. Therefore you should not lament over a thing that is unavoidable.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.27 For death is as sure for that which is born, as birth is for that which is dead. Therefore grieve not for what is inevitable.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.27 For, death is certain for the born, and re-birth is certain for the dead; therefore you should not feel grief for what is inevitable.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.27 For death of anyone born is certain, and of the dead (re-) birth is a certainly. Therefore you ought not to grieve over an inevitable fact.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.27 For certain is death for the born, and certain is birth for the dead; therefore, over the inevitable thou shouldst not grieve.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.27 Jatasya etc. Destruction comes after birth, and after the destruction comes birth. Thus, this series of birth-and-death is like a circle. Hence to what extent is this to be lamented for ? Furthermore-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.27 For what has originated, destruction is certain - it is seen to be inevitable. Similarly what has perished will inevitably originate. How should this be understood - that there is origination for that (entity)which has perished? It is seen that an existing entity only can originate and not a non-existent one. Origination, annihilation etc., are merely particular states of an existent entity.

Now thread etc., do really exist. When arranged in a particular way, they are called clothes etc. It is seen that even those who uphold the doctrine that the effect is a new entity (Asatkarya-vadins) will admit this much that no new entity over and above the particular arrangement of threads is seen. It is not tenable to hold that this is the coming into being of a new entity, since, by the process of manufacture there is only attainment of a new name and special functions. No new entity emerges.

Origination, annihilation etc., are thus particular stages of an existent entity. With regard to an entity which has entered into a stage known as origination, its entry into the opposite condition is called annihilation. Of an evolving entity, a seqence of evolutionary stages is inevitable. For instance, clay becomes a lump, jug, a potsherd, and (finally) powder. Here, what is called annihilation is the attainment of a succeeding stage by an entity which existed previously in a preceding stage. And this annihilation itself is called birth in that stage. Thus, the seence called birth and annihilation being inevitable for an evolving entity, it is not worthy of you to grieve.

Now Sri Krsna says that not even the slightest grief arising from seeing an entity passing from a previous existing stage to an opposite stage, is justifiable in regard to human beings etc.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.27 This being so, 'death of anyone born', etc. Hi, for; mrtyuh, death; jatasya, of anyone born; dhruvah, is certain; is without exception; ca, and mrtasya, of the dead; janmah, (re-) birth; is dhruvam, a certainly. Tasmat, therefore, this fact, viz birth and death, is inevitable. With regard to that (fact), apariharye, over an enevitable; arthe, fact; tvam, you; na arhasi, ought not; socitum, to grieve.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.27।। भौतिकवादी नास्तिक लोगों का मत है कि बिना किसी पूर्वापर कारण के वस्तुएँ उत्पन्न नहीं होती हैं। आस्तिक लोग देह से भिन्न जीव का अस्तित्व स्वीकार करते हुए कहते हैं कि एक ही जीव विकास की दृष्टि से अनेक शरीर धारण करता है जिससे वह इस दृश्य जगत् के पीछे जो परम सत्य है उनको पहचान सकें। दोनों ही प्रकार के विचारों में एक सामान्य बात यह है कि दोनों ही यह मानते हैं कि जीवन जीवनमृत्यु की एक शृंखला है।इस प्रकार जीवन के स्वरूप को समझ लेने पर निरन्तर होने वाले जन्म और मृत्यु पर किसी विवेकी पुरुष को शोक नहीं करना चाहिए। गर्मियों के दिनों में सूर्य के प्रखर ताप में बाहर खड़े होकर यदि कोई सूर्य के ताप और चमक की शिकायत करे तो वास्तव में यह मूढ़ता का लक्षण है। इसी प्रकार यदि जीवन को प्राप्त कर उसके परिवर्तनशील स्वभाव की कोई शिकायत करता है तो यह एक अक्षम्य मूढ़ता है।उपर्युक्त कारण से शोक करना अपने अज्ञान का ही परिचायक है। श्रीकृष्ण का जीवन तो आनन्द और उत्साह का संदेश देता है। उनका जीवनसंदेश है रुदन अज्ञान का लक्षण है और हँसना बुद्धिमत्ता का। हँसते रहो इन दो शब्दों में श्रीकृष्ण के उपदेश को बताया जा सकता है। इसी कारण जब वे अपने मित्र को शोकाकुल देखते है तो उसकी शोक और मोह से रक्षा करने के लिए और इस प्रकार उसके जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कराने के लिए वे तत्पर हो जाते हैं।अब आगे के दस श्लोक सामान्य मनुष्य का दृष्टिकोण बताते हैं। भगवान् शंकराचार्य अपने भाष्य में कहते हैं कार्यकारण के सम्बन्ध से युक्त वस्तुओं के लिए शोक करना उचित नहीं क्योंकि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.27।।अस्मिन्पक्षे शोकाभावं स्फुटयति  जातस्येति।  नन्वात्मन आभूतसंप्लवस्थायित्वपक्षेनित्यत्वपक्षे च दृष्टादृष्टदुःखसंभवात्तद्भयेन शोचामीत्यत आहेति तु यथाश्रुततमूलाननुगुणत्वादाचार्यैर्नावतरितं तस्मादपरिहार्येऽवश्यंभाविनि जन्ममरणलक्षणेऽर्थे यत्त्वेवं अदृष्टनिमित्तेऽपि शोके तस्मादपरिहार्येऽर्थे इत्येवोत्तरम्। युद्धाख्यं हि कर्मक्षत्रियस्यापरिहार्यमित्यादि तदुपेक्ष्यम् प्रकरणविरोधात् जन्ममरणलक्षणस्यार्थस्य ध्रुवताया एव पूर्वार्धे प्रस्तुतत्वात्। यत्तु अथवा आत्मनित्यत्वपक्ष एव श्लोकद्वयमर्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यमताभ्युपगमासंभवात्। अक्षरयोजना तु नित्यश्चासौ देहेन्द्रियसंबन्धवशाज्जातश्चेति नित्यजातस्तमेनमात्मानं नित्यमपि सन्तं जातं चेन्मन्यसे तथा नित्यमपि सन्तं मृतं चेन्मन्यसे तथापि त्वं नामुशोचितुमर्हसि इति प्रतिज्ञाय हेतुमाह जातस्य हीत्यादिना। मृत्युः शरीरादिविच्छेदः तत्संयोगो जन्म। भाष्यमप्यस्मिन्पक्षे योजनीयमिति तद्विचार्यम्। समासैकदेशस्य क्रियायामन्वयायोगात् प्रयोजनशून्यक्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वाच्च। ननूक्तमेवार्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यताभ्युपगमासंभवरुपं प्रयोजनमितिचेन्न। भगवतैवाभ्युपगभ्य कैमुत्यन्यायः प्रदर्शित इत्युक्तत्वात्। तथाच परमास्तिकं श्रीरामचन्द्रं प्रति भगवतो वसिष्ठस्य वचनंत्वं चेदबभूविथ पुरा तथेदानीं भविष्यसि। अद्य चेह स्थितोऽसीति ज्ञातवानसि निश्चयम् तदानन्तरगानन्यान्प्राणादीन्निकटस्थितान्। बन्धूनतीतान्सुबहून्कस्मात्त्वं नानुशोचसि पूर्वमन्यस्तथेदानीं बभूविथ भविष्यसि। यदि राम तथापि त्वं सद्रूपः किं विमुह्यसि पुरा भूत्वाथ भूत्वा च भूयश्चेन्न भविष्यसि। तथापि क्षीणसंसारः किमर्थमनुशोचसि तस्मान्न दुःखिता युक्ता प्राकृते जागते भ्रमे। तथैव मुदिता युक्ता युक्तं कार्यानुवर्तनम् इति। विवृतं चेदं टीकाकारैः। एवमात्मनोऽसङ्गत्वाद्वितीयत्वदर्शने शोकसंभव उक्तः। इदानीमस्त्वासङगी तथापि स किं नित्य उत क्षणिक उत प्रागभाववद्धटादिवद्वा कालान्तरेण नश्वरः। सर्वेष्वपि पक्षेषु बन्धुशोको न युक्त इति प्रौढ्या समाधित्सुराद्ये कल्पे तावदाह त्वं चेदिति। इति यदि निश्चयं ज्ञातवानसि बन्धून्प्राणादीनिवेत्यध्याहारः विनिगमनाविरहात्सर्वशोकाशक्तेः क्वापि शोको न युक्त इति भावः द्वितीयेऽप्याह पूर्वमिति। इदानीमन्यः अग्रेऽप्यन्यः क्षणिकमात्मानं यदि जानासि तथापि किं सद्रूपमालम्ब्य विमुह्यसि द्वितीयक्षणे शोच्यस्य शोचितुश्चासत्त्वेन शोकावसराभावादित्यर्थः तृतीयेऽप्याह पुरेति। तथाप्यात्मनाशादेव क्षीणसंसारः यदात्मनो जन्मादिसङ्गित्वेन शोको न युक्तस्तदा किंवाच्यमसङ्गोदासीनकूटस्थस्वप्रकाशपूर्णानन्दैकरसत्वे स न युक्त इत्याशयेनोपसंहरति तस्मादिति। मुदिता सहजसंतोषवृत्तिः इति। यत्तु भाष्यमपीत्यादि तदपि न। आत्मनो नित्यत्वमभ्युपगम्येदमुच्यत इति भाष्यस्यास्मिन्पक्षे योजनाया अशक्यत्वात् नित्यत्वच्छेदेऽभ्युपगम्येति न संगच्छते नित्यत्वस्य स्वसिद्धान्तत्वात्। देहादिसंबन्धेनानित्यत्वमिति शेषपूरणे तु जातत्वादिकमभ्युपगम्येति वक्तव्यं स्यात्। अथचेत्यभ्युपगमार्थः। एनं प्रकृतमात्मानं नित्यजातं लोकप्रसिद्य्धा प्रत्येनकशरीरोत्पत्तिं जातो जात इति वा मन्यसे तथा प्रतिताद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे मृतो मृत इति भाष्यस्य जातादौ नित्यशब्दान्वयप्रतिपादनपरस्योक्तपक्षे योजयितुमशक्यत्वाच्चेति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.27।।युद्ध्यस्य नन्वात्मन आभूतसंप्लवस्थायित्वपक्षे नित्यत्वपक्षे दृष्टादृष्टदुःखसंभवात्तद्भयेन शोचामीत्यत आह द्वितीयश्लोकेन हि यस्मात् जातस्य स्वकृतधर्माधर्मादिवशाल्लब्धशरीरेन्द्रियसंबन्धनस्य स्थिरस्यात्मनो ध्रुव आवश्यको मृत्युस्तच्छरीरादिविच्छेदस्तदारम्भककर्मक्षयनिमित्तः। संयोगस्य वियोगावसानत्वात्। तथा ध्रुवं जन्म मृतस्य च प्राग्देहकृतकर्मफलोपभोगार्थं सानुशयस्यैव प्रस्तुतत्वान्न जीवन्मुक्तेर्व्यभिचारः। तस्मादेवमपरिहार्ये परिहर्तुमशक्येऽस्मिञ्जन्ममरणलक्षणेऽर्थे विषये त्वमेवं विद्वान्न शोचितुमर्हसि। तथाच वक्ष्यतिऋतेऽपि त्वां नभविष्यन्ति सर्वे इति। यदि हि त्वया युद्धेनाहन्यमाना एते जीवेयुरेव तदा युद्धाय शोकस्तवोचितः स्यात् एते तु कर्मक्षयात्स्वयमेव म्रियन्त इति तत्परिहारासमर्थस्य तव दृष्टदुःखनिमित्तः शोको नोचित इति भावः। एवमदृष्टदुःखनिमित्तेपि शोकेतस्मादपरिहार्येऽर्थे इत्येवोत्तरम्। युद्धाख्यं हि कर्म क्षत्रियस्य नियतमग्निहोत्रादिवत्। तच्चयुध संप्रहारे इत्यस्माद्धातोर्निष्पन्नं शत्रुप्राणवियोगानुकूलशस्त्रप्रहाररूपं विहितत्वादग्नीषोमीयादिहिंसावन्न प्रत्यवायजनकम्। तथाच गौतमः स्मरतिन दोषो हिंसायामाहवेऽन्यत्र व्यश्वासारथ्यनायुधकृताञ्जलिप्रकीर्णकेशपराङ्भुखोपविष्टस्थलवृक्षारूढदूतगोब्राह्मणवादिभ्यः इति। ब्राह्मणग्रहणं चात्रायोद्धृब्राह्मणविषयम्। गवादिप्रायपाठादिति स्थितम्। एतच्च सर्वंस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यत्र स्पष्टीकरिष्यते। तथाच युद्धलक्षणेऽर्थेऽग्निहोत्रादिवद्विहितत्वादपरिहार्ये परिहर्तुमशक्ये तदकरणे प्रत्यवायप्रसङ्गात् त्वमदृष्टदुःखभयेन शोचितुं नार्हसीति पूर्ववत्। यदि तु युद्धाख्यं कर्म काम्यमेवय आहवेषु युध्यन्ते भूम्यर्थमपराङ्मुखाः। अकूटैरायुधैर्यान्ति ते स्वर्गं योगिनो यथा।। इति याज्ञवल्क्यवचनात्हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् इति भगवद्वचनाच्च तदापि प्रारब्धस्य काम्यस्याप्यवश्यपरिसमापनीयत्यवे नित्यतुल्यत्वात् त्वयाच युद्धस्य प्रारब्धत्वादपरिहार्यत्वं तुल्यमेव। अथवा आत्मनित्यत्वपक्ष एव श्लोकद्वयं अर्जुनस्य परमास्तिकस्य वेदबाह्यमताभ्युपगमासंभवात्। अक्षरयोजना तु नित्यश्चासौ देहेन्द्रियादिसंबन्धवशाज्जातश्चेति। नित्यजातस्तमेनमात्मानं नित्यमपि सन्तं जातं चेन्मन्यसे तथा नित्यमपि सन्तं मृतं चेन्मन्यसे तथापि त्वं नानुशोचितुमर्हसीति प्रतिज्ञाय हेतुमाह जातस्य हीत्यादिना। नित्यस्य जातत्वं मृतत्वं च प्राग्व्याख्यातम्। स्पष्टमन्यम्। भाष्यमप्यस्मिन्पक्षे योजनीयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.27।।शोचितुं नार्हसीत्युक्तं तत्र हेतुमाह  जातस्येति।  ध्रुवोऽपरिहार्यः मृत्युर्मरणम्। अपरिहार्ये अर्थे मरणाख्ये त्वदुद्योगं विनापि अवश्यंभाविनि विषये न त्वं शोचितुमर्हसि। वक्ष्यति चमयैवैते निहताः पूर्वमेव इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.27।।ननु स्वसमानाभावान्निर्बले तु शोकः कर्तव्य एवेति चेत्तत्राह जातस्येति। जातस्य देहस्य मृत्युर्ध्रुवः मृतस्य ध्रुवं जन्म भवतीत्यर्थः।अत्रायमर्थः जातस्य गृहीतजन्मनो येन मृत्युर्निर्मितस्तस्य तेनैव मृत्युर्ध्रुवो निश्चितस्तस्माद्येषां मृत्युस्त्वयैव निर्मितः स च तथैव भविष्यति। तस्माद्यद्यथा ईश्वरनिर्मितं तत्तथैव भविष्यतीत्यपरिहार्ये सर्वथा भाव्येऽर्थे त्वं न शोचितुं योग्योऽसीत्यर्थः। हीति युक्तोऽयमर्थः। ईश्वरकृतं कोऽन्यथा कर्तुं समर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.27।।कुत इत्यत आह  जातस्येति।  हि यस्माज्जातस्य स्वारम्भककर्मक्षये मृत्युर्धुवो निश्चितः। मृतस्य तत्तद्देहकृतेन कर्मणा जन्मापि ध्रुवमेव। तत्तस्मादेवमपरिहार्येऽर्थेऽवश्यंभाविनि जन्ममरणलक्षणेऽर्थे त्वं विद्वाञ्शोचितुं नार्हसि। योग्यो न भवसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.27।।कुत इत्यत आह। हि यतः। जातस्येति। मृत्युर्ध्रुवो मृतस्य च ध्रुवमवर्जनीयं जन्म। एवमवर्जनीयेऽर्थे न शोचितुमर्हसि।

Chapter 2 (Part 18)

Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.27।।ऐसा होनेसे जिसने जन्म लिया है उसका मरण ध्रुव निश्चित है और जो मर गया है उसका जन्म ध्रुव निश्चित है इसलिये यह जन्ममरणरूप भाव अपरिहार्य है अर्थात् किसी प्रकार भी इसका प्रतिकार नहीं किया जा सकता इस अपरिहार्य विषयके निमित्त तुझे शोक करना उचित नहीं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.27।। व्याख्या    जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुवं जन्म मृतस्य च   पूर्वश्लोकके अनुसार अगर शरीरीको नित्य जन्मने और मरनेवाला भी मान लिया जाय तो भी वह शोकका विषय नहीं हो सकता। कारण कि जिसका जन्म हो गया है वह जरूर मरेगा और जो मर गया है वह जरूर जन्मेगा। तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि   इसलिये कोई भी इस जन्ममृत्युरूप प्रवाहका परिहार (निवारण) नहीं कर सकता क्योंकि इसमें किसीका किञ्चिन्मात्र भी वश नहीं चलता। यह जन्ममृत्युरूप प्रवाह तो अनादिकालसे चला आ रहा है और अनन्तकालतक चलता रहेगा। इस दृष्टिसे तुम्हारे लिये शोक करना उचित नहीं है।ये धृतराष्ट्रके पुत्र जन्में हैं तो जरूर मरेंगे। तुम्हारे पास ऐसा कोई उपाय नहीं है जिससे तुम उनको बचा सको। जो मर जायेंगे वे जरूर जन्मेंगे। उनको भी तुम रोक नहीं सकते। फिर शोक किस बातका  शोक उसीका कीजिये जो अनहोनी होय। अनहोनी होती नहीं होनी है सो होय।।जैसे इस बातको सब जानते हैं कि सूर्यका उदय हुआ है तो उसका अस्त होगा ही और अस्त होगा तो उसका उदय होगा ही। इसलिये मनुष्य सूर्यका अस्त होनेपर शोकचिन्ता नहीं करते। ऐसे ही हे अर्जुन अगर तुम ऐसा मानते हो कि शरीरके साथ ये भीष्म द्रोण आदि सभी मर जायँगे तो फिर शरीरके साथ जन्म भी जायँगे। अतः इस दृष्टिसे भी शोक नहीं हो सकता।भगवान्ने इन दो (छब्बीसवेंसत्ताईसवें) श्लोकोंमें जो बात कही है वह भगवान्का कोई वास्तविक सिद्धान्त नहीं है। अतः  अथ च  पद देकर भगवान्ने दूसरे (शरीरशरीरीको एक माननेवाले) पक्षकी बात कही है कि ऐसा सिद्धान्त तो है नहीं पर अगर तू ऐसा भी मान ले तो भी शोक करना उचित नहीं है।इन दो श्लोकोंका तात्पर्य यह हुआ कि संसारकी मात्र चीजें प्रतिक्षण परिवर्तनशील होनेसे पहले रूपको छोड़कर दूसरे रूपको धारण करती रहती हैं। इसमें पहले रूपको छोड़ना यह मरना हो गया और दूसरे रूपको धारण करना यह जन्मना हो गया। इस प्रकार जो जन्मता है उसकी मृत्यु होती है और जिसकी मृत्यु होती है वह फिर जन्मता है यह प्रवाह तो हरदम चलता ही रहता है। इस दृष्टिसे भी क्या शोक करें सम्बन्ध   पीछेके दो श्लोकोंमें पक्षान्तरकी बात कहकर अब भगवान् आगेके श्लोकमें बिलकुल साधारण दृष्टिकी बात कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.27।।अथ वैनमिति। अथाप्येनं देहं मन्यसे नित्यजातं प्रवाहस्याविनाशात् तथापि न शोच्यता। क्षणिकप्रक्रियया वा नित्यविनाशिनम् तथापि का शोच्यता एवं यद्यात्मनः तत्तद्देहयोगवियोगाभ्यां (S K तद्देहयोग (K संयोग) नित्यजातत्वं नित्यमृतत्वं वा मन्यसे तथापि सर्वथा शोचनं प्रामाणिकानामयुक्तम् ( N प्राकरणि )।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.27।।तयोरवश्यंभावित्वे सत्यनु शोकस्याकर्तव्यत्वे हेत्वन्तरमाह  तथाचेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.27।।अनेनैव अभिप्रायेण एतदेकवाक्यतयोत्तरं श्लोकद्वयं क्रमेणावतारयति  कुत  इति। शङ्कामनूद्य तथापि न शोचितुमर्हसीत्युक्तम् तत्र को हेतुरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.27।।कुतोऽशोकः नियतत्वदित्याह जातस्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.27।।उत्पन्नस्य विनाशो  ध्रुवः  अवर्जनीय उपलभ्यते। तथा विनष्टस्य अपि  जन्म  अवर्जनीयम्।कथम् इदम् उपलभ्यते विनष्टस्य उत्पत्तिः इति।सत एव उत्पत्त्युपलब्धेः असतः च अनुपलब्धेः। उत्पत्तिविनाशादयः सतो द्रव्यस्य अवस्थाविशेषाः। तन्तुप्रभृतीनि द्रव्याणि सन्ति एव रचनाविशेषयुक्तानि पटादीनि उच्यन्ते।असत्कार्यवादिना अपि एतावद् एव उपलभ्यते। न हि तत्र तन्तुसंस्थानविशेषातिरेकेण द्रव्यान्तरं प्रतीयते।कारकव्यापारनामान्तरभजनव्यवहारविशेषाणाम् एतावता एव उपपत्तेः न च द्रव्यान्तरकल्पना युक्ता। अत उत्पत्तिविनाशादयः सतो द्रव्यस्य अवस्थाविशेषाः।उत्पत्त्याख्याम् अवस्थाम् उपयातस्य द्रव्यस्य तद्विरोध्यवस्थान्तरप्राप्तिः विनाश इति उच्यते।मृद्द्रव्यस्य पिण्डत्वघटत्वकपालत्वचूर्णत्वादिवत् परिणामिद्रव्यस्य परिणामपरम्परा अवर्जनीया। तत्र पूर्वावस्थस्य द्रव्यस्य उत्तरावस्थाप्राप्तिः विनाशः सा एव तदवस्थस्य उत्पत्तिः। एवम् उत्पत्तिविनाशाख्यपरिणामपरम्परा परिणामिनो द्रव्यस्य अपरिहार्या इति  न  तत्र  शोचितुम् अर्हसि।सतो द्रव्यस्य पूर्वावस्थाविरोध्यवस्थान्तरप्राप्तिदर्शनेन यः अल्पीयान् शोकः सोऽपि मनुष्यादिभूतेषु न संभवति इत्याह।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.27।। जातस्य हि लब्धजन्मनः ध्रुवः अव्यभिचारी मृत्युः मरणं ध्रुवं जन्म मृतस्य च। तस्मादपरिहार्योऽयं जन्ममरणलक्षणोऽर्थः। तस्मिन्नपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि।।कार्यकरणसंघातात्मकान्यपि भूतान्युद्दिश्य शोको न युक्तः कर्तुम् यतः

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【 Verse 2.28 】

▸ Sanskrit Sloka: अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत | अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ||

▸ Transliteration: avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata | avyakta-nidhanāny eva tatra kā paridevanā ||

▸ Glossary: avyaktādīni: unmanifest in the beginning; bhūtāni: living beings; vyakta: manifest; madhyāni: in the middle; bhārata: O descendant of Bhārata; avyakta nidhanāni: unmanifest after death; eva: like that; tatra: therefore; kā: what; paridevanā: lamentation

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.28 O Bhārata, all beings are unmanifest in their beginning, seemingly manifest in their middle, and unmanifest again in their end. So, what need then for greiving?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.28।।हे भारत सभी प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट थे और मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे केवल बीचमें प्रकट दीखते हैं अतः इसमें शोक करनेकी बात ही क्या है

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.28।। हे भारत समस्त प्राणी जन्म से पूर्व और मृत्यु के बाद अव्यक्त अवस्था में रहते हैं और बीच में व्यक्त होते हैं। फिर उसमें चिन्ता या शोक की क्या बात है

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.28 अव्यक्तादीनि unmanifested in the beginning? भूतानि beings? व्यक्तमध्यानि manifested in their middle state? भारत O Bharata? अव्यक्तनिधनानि unmanifested again in the end? एव also? तत्र there? का what? परिदेवना grief.Commentary The physical body is a combination of the five elements. It is seen by the physical eyes only after the five elements have entered into such combination. After death? the body disintegrates and the five elements go back to their source it cannot be seen. Therefore? the body can be seen only in the middle state. The relationship as son? friend? teacher? father? mother? wife? brother and sister is formed through the body on account of attachment and Moha (delusion). Just as planks unite and separate in a river? just as pilgrims unite and separate in a public inn? so also fathers? mothers? sons and brothers unite and separate in this world. This world is a very big public inn. People unite and separate.There is no pot in the beginning and in the end. Even if you see the pot in the middle? you should think and feel that it is illusory and does not really exist. So also there is no body in the beginning and in the end. That which does not exist in the beginning and in the end must be illusory in the middle also. You must think and feel that the body does not really exist in the middle as well.He who thus understands the nature of the body and all human relationships based on it? will not grieve.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.28. O descendant of Bharata ! The beings have an unmanifest beginning, manifest middle and certainly the unmanifest end. On that account why mourning?

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.28 The end and the beginning of beings are unknown. We see only the intervening formations. Then what cause is there for grief?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.28 O Arjuna, beings have an unknown beginning, a known middle and an unknown end. What is there to grieve over in all this?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.28 O descendant of Bharata, all beings remain unmanifest in the beginning;; they become manifest in the middle. After death they certainly become unmanifest. What lamentation can there be with regard to them?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.28 Beings are unmanifested in their beginning, manifested in their middle state, O Arjuna, and unmanifested again in their end. What is there to grieve about?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.28 Avyaktadini etc. Whether beings are permanent or impermanent, this much is certain : The person, who laments over a given object - as far as that person is concerned, that object is at the beginning unmanifest and at the end also it is unmanifest. Its manifestation in between is therefore a deviation from its natural state, Rather, there may be need to lament over the deviation from natural state and nor over the natural state [itself]. Further, whatever has been approved as its root cause, that itself permanently exhibits, within itself, a variety of different and endless creation, sustenance and absorption as its own manifold nature, in a set pattern. Hence what is the necessity for lamenting over the same nature of this (its effect) ? And enowed with the above mentioned nature-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.28 Human beings etc., (i.e., bodies) exist as entities; their previous stages are unknown, their middle stages in the form of man etc., are known, and their (final) and future stages are unknown. As they thus exist in their own natural stages, there is no cause for grief.

After thus saying that there is no cause for grief even according to the view which identifies the body with the self, Sri Krsna proceeds to say that it is hard to find one who can be said to have truly perceived the Atman or spoken about It or heard about It or gained a true conception of It by hearing. For the Atman, which is actually different from the body, is of a wonderful nature.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.28 It is not reasonable to grieve even for beings which are constituted by bodies and organs, since 'all beings remain unmanifest' etc. (Bharata, O descendant of Bharata;) bhutani, all beings, avyaktaduni, remain unmainfest in the beginning. Those beings, viz sons, friends, and others, constituted by bodies and organs, [Another reading is karya-karana-sanghata, aggregates formed by material elements acting as causes and effects.-Tr.] who before their origination have unmanifestedness (avyakta), invisibility, nonperception, as their beginning (adi) are avyaktaadini. Ca, and; after origination, before death, they become vyakta-madhyani, manifest in the middle. Again, they eva, certainly; become avyakta-nidhanani, unmanifest after death. Those which have unmanifestness (avyakta), invisibility, as their death (nidhana) are avyakta-nidhanani. The idea is that even after death they verily attain unmanifestedness. Accordingly has it been said: 'They emerged from invisibility, and have gone back to invisibility. They are not yours, nor are you theirs. What is this fruitless lamentation!' (Mbh. St. 2.13). Ka, what; paridevana, lamentation, or what prattle, can there be; tatra, with regard to them, i.e. with regard to beings which are objects of delusion, which are invisible, (become) visible, (and then) get destroyed!

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.28।। इस श्लोक से लेकर आगे के कुछ श्लोकों में संसार के सामान्य मनुष्य के दृष्टिकोण से समस्या को अर्जुन के समक्ष बड़ी सुन्दरता से प्रस्तुत किया गया है। इन दस श्लोकों में श्रीकृष्ण समस्या का स्पष्टीकरण सामान्य व्यक्ति की दृष्टि एवं बुद्धि के अनुसार प्रस्तुत करते हैं।इस भौतिक जगत् में कार्यकरण का नियम अबाधरूप से कार्य करते हुए अनुभव में आता है। कार्य की उत्पत्ति कारण से होती है। सामान्यत कार्य व्यक्त रूप में दिखाई देता है और कारण अव्यक्त रहता है। अत सृष्टिका अर्थ है वस्तुओं का अव्यक्त अवस्था से व्यक्त अवस्था में आ जाना। यही क्रम निरन्तर नियमपूर्वक चलता रहता है।इस प्रकार आज का व्यक्त इसके पूवर् कल अव्यक्त था वर्तमान में वह व्यक्त रूप में उपलब्ध है परन्तु भविष्य में फिर अव्यक्त अवस्था में विलीन हो जायेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि वर्तमान स्थिति अज्ञात से आयी और पुन अज्ञात में लीन हो जायेगी। ऐसा समझने पर दुख का कोई कारण नहीं रह जाता क्योंकि एक चक्र के आरे निरन्तर घूमते हुए नीचे भी आते हैं तो केवल बाद में ऊपर उठने के लिए ही।उदाहरणार्थ स्वप्न के पत्नी और शिशु पहले अव्यक्त थे और जागने पर फिर लुप्त हो जाते हैं तो एक ब्रह्मचारी को उस पत्नी और शिशु के लिए शोक करने का क्या कारण है जिसके साथ उसका विवाह कभी हुआ ही नहीं था और जिस शिशु का कभी जन्म ही नहीं हुआ था यदि जैसा कि भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा इस जगत् की उत्पत्ति और लय का चक्र निरन्तर एक पारमार्थिक नित्य अविकारी सत्य के रूप में ही चल रहा है तो क्या कारण है कि उस सत्य को बारम्बार बताने पर भी हम समझ नहीं पाते श्रीशंकराचार्य के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण यह विचार करते हैं कि इस सत्य को न समझने के लिए अर्जुन को दोष देना उचित नहीं है।श्री शंकराचार्य कहते हैं इस आत्मा का साक्षात् अनुभव करके उसे यथार्थ में जानना कठिन है। तुम्हें ही मैं दोष क्यों दूँ जबकि इसका कारण अज्ञान सबके लिए समान है कोई पूछ सकता है कि आत्मानुभव में इतनी कठिनाई क्या है भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.28।।नन्वात्मनो नित्यत्वेऽपि कार्यकरणसंघातात्मकानि भूतानि शोचमीति चेत्तत्राह  अव्यक्तादीनीति।  प्रागुत्पत्तेरव्यक्तमदर्शनमादिर्येषां पुत्रमित्रादिकार्यकरणसंघातानां भूतानां तानि अव्यक्तं निधनं मरणं येषां तानि तत्र का परिदेवना कः शोकः। नहि शुक्तिरुप्यमुद्दिश्य कश्चिच्छोचतीति भावः। तथाचोक्तंअदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः। नासौ तव न तस्य त्वं वृथा का परिदेवना।। इति। ननु अव्यक्तमव्याकृतं भूतान्याकाशादीनि नामरुपाभ्यां व्यज्यत इति व्यक्तमित्याकाशादिमहाभूताभिप्रायेणायं श्लोक आचार्यैः कुतो न व्याख्यात इति चेत् तत्र का परिदेवनेति वाक्यशेषविरोधात्। अदर्शनादापतित इत्यादिवचनेन तस्मात्सर्वाणि भूतानीत्युपसंहारस्थेन कार्यकरणसंघातबोधकभूतशब्देन चैकार्थत्वानापत्तेश्चेति गृहाण। यथा भरतादयोऽव्यक्ताद्भूत्वाऽव्यक्त एव लयं गतास्तथेति सूचयन्नाह भारतेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.28।।तदेवं सर्वप्रकारेणात्मनोऽशोच्यत्वमुपपादितम्। अथेदानीमात्मनोऽशोच्यत्वेऽपि भूतसङ्घातात्मकानि शरीराण्युद्दिश्य शोचामीत्यर्जुनाशङ्कामपनुदति भगवान्आदौ जन्मनः प्राक् अव्यक्तान्यनुपलब्धानि पृथिव्यादिभूतमयानि शरीराणि मध्ये जन्मानन्तरं मरणात्प्राक् व्यक्तान्युपलब्धानि सन्ति निधने पुनरव्यक्तान्येव भवन्ति यथा स्वप्नेन्द्रजालादौ प्रतिभासमात्रजीवनानि शुक्तिरूप्यादिवन्नतु ज्ञानात्प्रागूर्ध्वं वा स्थितानि दृष्टिसृष्ट्यभ्युपगमात्। तथाचआदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा इति न्यायेन मध्येऽपि न सन्त्येवैतानिनासतो विद्यते भावः इति प्रागुक्तेश्च। एवंसति तत्र तेषु मिथ्याभूतेष्वत्यन्ततुच्छेषु भूतेषु का परिदेवना को वा दुःखप्रलापः। न कोऽप्युचित इत्यर्थः। नहि स्वप्ने विविधान्बन्धूनुपलभ्य प्रतिबुद्धस्तद्विच्छेदेन शोचति पृथग्जनोऽपि। एतदेवोक्तं पुराणेअदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः। भूतसङ्ध इति शेषः। तथाच शरीराण्युद्दिश्य शोको नोचित इति भावः। आकाशादिमहाभूताभिप्रायेण वा श्लोको योज्यः। अव्यक्तमव्याकृतमविद्योपहितचैतन्यमादिः प्रागवस्था येषां तानि तथा व्यक्तं नामरूपाभ्यामेवाविद्यकाभ्यां प्रकटीभूतं नतु स्वेन परमार्थसदात्मना मध्यस्थित्यवस्था येषां तादृशानि भूतान्याकाशादीन्यव्यक्तनिधनान्येव अव्यक्ते स्वकारणे मृदीव घटादीनां निधनं प्रलयो येषां तेषु भूतेषु का परिदेवनेति पूर्ववत्। तथाच श्रुतिःतद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियत इत्यादिरव्यक्तोपादानतां सर्वस्य प्रपञ्चस्य दर्शयति। लयस्थानत्वं तु तस्यार्थसिद्धम्। कारण एव कार्यलयस्य दर्शनाद्ग्रन्थान्तरे तु विस्तरः। तथा चाज्ञानकल्पितत्वेन तुच्छान्याकाशादिभूतान्यप्युद्दिश्य शोको नोचितश्चेत्तत्कार्याण्युद्दिश्य नोचित इति किमु वक्तव्यमिति भावः। अथवा सर्वदा तेषामव्यक्तरूपेण विद्यमानत्वाद्विच्छेदाभावेन तन्निमित्तः प्रलापो नोचित इत्यर्थः। भारतेत्यनेन संबोधयन् शुद्धवंशोद्भवत्वेन शास्त्रीयमर्थं प्रतिपत्तुमर्होऽसि किमिति न प्रतिपद्यस इति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.28।।अस्त्वात्मनोऽशोच्यत्वं तथापि इष्टदेहविनाशजः शोको भवत्येवेत्याशङ्क्य सकारणस्य देहादेर्मिथ्यात्वं साधयति  अव्यक्तादीनीति।  भूतानि वियदादीनि तद्विकारभूतानि जरायुजादीनि च। न व्यक्तमव्यक्तमज्ञानं आदिर्येषां तथाविधानि। व्यक्तः स्पष्टः मध्यः उत्पत्तिमारभ्य मरणात्प्रागवस्था येषाम्। अव्यक्ते एव निधनं लयो येषामिति। अयमर्थः रज्जूरगादिकारणमज्ञानं न रज्जुवत् उरगवद्वा व्यक्तमस्ति। परीक्ष्यमाणं च न दृष्टिपथमवतरति। अतस्तदव्यक्तम्। तत उत्पन्नः सर्पस्तत्रैव लीयते न रज्ज्वाम्। एवं आत्मनि कल्पितानां भूतानां आदिरन्तश्चाव्यक्तमेव। तेनआदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा इति न्यायेन मध्ये भासमानान्यपि तानि रज्जुरगवत् असन्त्येव। एवंविधे तत्र तस्मिन्विषये का परिदेवना को वा विलापः। नहि मरुमरीचिकाह्रदो नष्ट इति कश्चित्तत्त्ववित् विलपति। अतएव भूतानां रज्जूरगादीनामिव प्रतीतिसमकालिकीं सृष्टिमभिप्रेत्य कौषीतकिब्राह्मणे स्वापप्रबोधयोर्जगल्लयोदयौ पठ्येते।स यदा स्वपिति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रबुध्यतेऽथैतस्मादात्मनः सर्वे प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः इति। प्राणाश्चक्षुरादीन्द्रियाणि। देवास्तदनुग्राहकाः सूर्यादयः। लोकाः रूपादयः। नन्विहान्यत्र च आत्मैव सर्वभूतानां लयोदयस्थानमित्युच्यते नान्यत्। तत्कथमेषामव्यक्तं लयोदयस्थानमित्युच्यते। सत्यम्। अज्ञानाश्रयत्वाद्ब्रह्मणि तथात्वव्यपदेशो न वस्तुगत्या। नहि अपरिणामिनः कूटस्थस्य मृद्वत्कार्यप्रविलयोदयस्थानत्वं भवति। यथोक्तम्अस्य द्वैतेन्द्रजालस्य यदुपादानकारणम्। अज्ञानं तदुपाश्रित्य ब्रह्मकारणमुच्यते। इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.28।।नन्वीश्वरोत्पादितानां देहानां स्वस्यनाशकरणमनुचितमित्याशङ्क्य देहानामुत्पत्तिस्थितिप्रलयविचारेणापि शोकाभावमाह अव्यक्तादीनीति। अव्यक्तं अक्षरमादिरुत्पत्तिर्येषां तानि अव्यक्तादीनि भूतानि शरीराणि। व्यक्तं जगत् तदेव मध्यं स्थितिरूपमुत्पत्तिलययोर्मध्यं येषां तानि। अव्यक्ते अक्षर एव निधनं लयो येषां तानि तथा। तत्र तेषु का परिदेवना का चिन्तेत्यर्थः।अत्रायमर्थः यत उत्पत्तिस्तत्रैव नाशे शोकः स्वस्याऽनुचित इत्यर्थः। स्वस्यापि तन्मारणानन्तरं न नरकादिसम्भावना यत उत्पत्तिस्थल एव स्वस्यापि नाशो भविष्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.28।।किंच देहादीनां च स्वभावं पर्यालोच्य तदुपाधिके आत्मनो जन्ममरणे च शोको न कार्य इत्याह  अव्यक्तादीनीति।  अव्यक्तं प्रधानं तदेवादिः पूर्वरूपं येषां तान्यव्यक्तादीनि भूतानि शरीराणि कारणात्मनापि स्थितानामेवोत्पत्तेः। तथा व्यक्तमभिव्यक्तं मध्यं जन्ममरणान्तरालस्थितिलक्षणं येषाम्। अव्यक्ते निधनं लयो येषां तानीमान्येवंभूतान्येव तत्र तेषु का परिदेवना कः शोकनिमित्तो विलापः। प्रतिबुद्धस्य स्वप्नदृष्टवस्तुष्विव शोको न युज्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.28।।पुनरपि साङ्ख्येनैवोपदिशति अव्यक्तादीनीति।भूतानि इत्यत्रैवं विवेचनीयम् भूतशब्देन यदि कार्यशरीराणि तदाऽव्यक्तं प्रधानं प्रकृतिस्तदादीनि तन्निधनान्येव। एतेन कारणात्मकत्वमुक्तम्। मध्ये व्यक्तता कार्यता तां दृष्ट्वा न शोकः कार्यः आद्यन्तयोरव्यक्तत्वात्। अन्यथा ध्वस्तघटादेरपि शोकः स्यात्। यदि वा भूतशब्देनात्मानः तदाऽव्यक्तस्याक्षरस्य महतो भूतस्य सकाशात् व्युच्चरितानि तन्निधनान्येवेति तदात्मकत्वं बोध्यम्। मध्ये व्यक्ततां देहात्मतां दृष्ट्वा न शोकः कार्यः आद्यन्तयोरव्यक्तस्य मध्येऽप्यक्ततैवाऽभ्युपगन्तव्या व्यक्तता तु दृश्यमाना मदिच्छया प्राकृतेति सिद्धान्तः। अतएव आराग्रमात्रो ह्यवरोऽपि दृष्टो बुद्धेर्गुणेनात्मगुणो न चैव श्वे.उ.5।8 इति श्रुतावात्मेच्छागुणकृतमणुत्वमात्मनां मायाबुद्धिगुणकृतमवरत्वं च व्यक्त्यभिमति सुखिदुःखित्वादीति निरूपितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.28।।कार्यकरणके संघातरूप ही प्राणियोंको माने तो उनके उद्देश्यसे भी शोक करना उचित नहीं है क्योंकि अव्यक्त यानी न दीखना उपलब्ध न होना ही जिनकी आदि है ऐसे ये कार्यकरणके संघातरूप पुत्र मित्र आदि समस्त भूत अव्यक्तादि हैं अर्थात् जन्मसे पहले ये सब अदृश्य थे। उत्पन्न होकर मरणसे पहलेपहल बीचमें व्यक्त हैं दृश्य हैं। और पुनः अव्यक्तनिधन हैं अदृश्य होना ही जिनका निधन यानी मरण है उनको अव्यक्तनिधन कहते हैं अभिप्राय यह कि मरनेके बाद भी ये सब अदृश्य हो ही जाते हैं। ऐसे ही कहा भी है कि यह भूतसंघात अदर्शनसे आया और पुनः अदृश्य हो गया। न वह तेरा है और न तू उसका है व्यर्थ ही शोक किस लिये सुतरां इनके विषयमें अर्थात् बिना हुए ही दीखने और नष्ट होनेवाले भ्रान्तिरूप भूतोंके विषयमें चिन्ता ही क्या है रोनापीटना भी किस लिये है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.28।। व्याख्या    अव्यक्तादीनि भूतानि   देखने सुनने और समझनेमें आनेवाले जितने भी प्राणी (शरीर आदि) हैं वे सबकेसब जन्मसे पहले अप्रकट थे अर्थात् दीखते नहीं थे। अव्यक्तनिधनान्येव   ये सभी प्राणी मरनेके बाद अप्रकट हो जायँगे अर्थात् इनका नाश होनेपर ये सभी नहीं में चले जायँगे दीखेंगे नहीं। व्यक्तमध्यानि   ये सभी प्राणी बीचमें अर्थात् जन्मके बाद और मृत्युके पहले प्रकट दिखायी देते हैं। जैसे सोनेसे पहले भी स्वप्न नहीं था और जगनेपर भी स्वप्न नहीं रहा ऐसे ही इन प्राणियोंके शरीरोंका पहले भी अभाव था और पीछे भी अभाव रहेगा। परन्तु बीचमें भावरूपसे दीखते हुए भी वास्तवमें इनका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। तत्र का परिदेवना   जो आदि और अन्तमें नहीं होता वह बीचमें भी नहीं होता है यह सिद्धान्त है  (टिप्पणी प0 68) । सभी प्राणियोंके शरीर पहले नहीं थे और पीछे नहीं रहेंगे अतः वास्तवमें वे बीचमें भी नहीं हैं। परन्तु यह शरीरी पहले भी था और पीछे भी रहेगा अतः वह बीच में भी रहेगा ही। निष्कर्ष यह निकला कि शरीरोंका सदा अभाव है और शरीरीका कभी भी अभाव नहीं है। इसलिये इन दोनोंके लिये शोक नहीं हो सकता। सम्बन्ध   अब भगवान् शरीरीकी अलौकिकताका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.28।।न चैतदन्यथा नित्यानित्यत्वमुपपत्तिमत् (NK नित्यत्वानित्यत्वम्)। यतः (S adds कुत इत्याह after यतः) जातस्येति। जन्मनः अनन्तरं नाशः नाशादनन्तरं जन्मेति चक्रवदयं जन्ममरणसन्तान इति किंपरिमाणं शोच्यताम् (N शोच्यतायाम) इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.28।।आत्मानमुद्दिश्यानुशोकस्य कर्तुमयोग्यत्वेऽपि भूतसंघातात्मकानि भूतान्युद्दिश्य तस्य कर्तव्यत्वमाशङ्क्याह  कार्येति।  समनन्तरश्लोकस्तत्र हेतुरित्याह  यत इति।  चाक्षुषदर्शनमात्रवृत्तिं व्यावर्तयति  अनुपलब्धिरिति।  नहि यथोक्तसंघातरूपाणि भूतानि पूर्वमुत्पत्तेरुपलभ्यन्ते तेन तानि तथा व्यपदेशभाञ्जि भवन्तीत्यर्थः। किं तन्मध्यं यदेषां व्यक्तमिष्यते तदाह  उत्पन्नानीति।  उत्पत्तेरूर्ध्वं मरणाच्च पूर्वं व्यावहारिकं सत्त्वं मध्यमेषां व्यक्तमिति तथोच्यते जन्मानुसारित्वं विलयस्य युक्तमिति मत्वा तात्पर्यार्थमाह  मरणादिति।  उक्तेऽर्थे पौराणिकसंमतिमाह  तथाचेति।  तत्रेत्यस्यार्थमाह  अदृष्टेति।  पूर्वमदृष्टानि सन्ति पुनर्दृष्टानि तान्येव पुनर्नष्टानि तदेवं भ्रान्तिविषयतया घटिकायन्त्रवच्चक्रीभूतेषु शोकनिमित्तस्य प्रलापस्य नावकाशोऽस्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.28।।स्पष्टनं न जन्ममरणस्वरूपनिरूपणेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.28।।तदेव स्पष्टयति अव्यक्तादीनीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.28।।मनुष्यादि भूतानि सन्ति एव द्रव्याणि अनुपलब्धपूर्वावस्थानि उपलब्धमनुष्यत्वादिमध्यमावस्थानि अनुपलब्धोत्तरावस्थानि स्वेषु स्वभावेषु वर्तन्ते इति न तत्र  परिदेवना निमित्तिम् अस्ति।एवं शरीरात्मवादे अपि नास्ति शोकनिमित्तम् इति उक्त्वा शरीरातिरिक्त आश्चर्यस्वरूप आत्मनि द्रष्टा वक्ता श्रोता श्रवणायत्तात्मनिश्चयः च दुर्लभ इत्याह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.28।। अव्यक्तादीनि अव्यक्तम् अदर्शनम् अनुपलब्धिः आदिः येषां भूतानां पुत्रमित्रादिकार्यकरणसंघातात्मकानां तानि अव्यक्तादीनि भूतानि प्रागुत्पत्तेः उत्पन्नानि च प्राङ्मरणात् व्यक्तमध्यानि। अव्यक्तनिधनान्येव पुनः अव्यक्तम् अदर्शनं निधनं मरणं येषां तानि अव्यक्तनिधनानि। मरणादूर्ध्वमप्यव्यक्ततामेव प्रतिपद्यन्ते इत्यर्थः। तथा चोक्तम् अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं गतः। नासौ तव न तस्य त्वं वृथा का परिदेवना इति। तत्र का परिदेवना को वा प्रलापः अदृष्टदृष्टप्रनष्टभ्रान्तिभूतेषु भूतेष्वित्यर्थः।।दुर्विज्ञेयोऽयं प्रकृत आत्मा किं त्वामेवैकमुपालभे साधारणे भ्रान्तिनिमित्ते। कथं दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा इत्यत आह

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【 Verse 2.29 】

▸ Sanskrit Sloka: आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य: | आश्चर्यवच्चैनमन्य: शृ्णोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ||

▸ Transliteration: āścaryavatpaśyati kaścidenam māścaryavadvadati tathaiva cānyaḥ | āścaryavaccainamanyaḥ śṛṇoti śṛutvāpyenaṁ veda na caiva kaścit ||

▸ Glossary: āścaryavat: amazingly; paśyati: see; kaścit: some one; enaṁ: this soul; āś- caryavac: amazingly; vadati: speaks; tathā: like that; eva: only; ca: also; anyaḥ: another; āścaryavat: amazingly; ca: also; enaṁ: this soul; anyaḥ: another; śṛṇoti: hear; śrutvā: having heard; api: even; enaṁ: this soul; veda: do know; na: not; ca: and; eva: only; kaścit: someone

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.29 One sees It as a wonder, another speaks of It as a won- der, another hears of It as a wonder. Yet, having heard, none

understands It at all.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.29।।कोई इस शरीरीको आश्चर्यकी तरह देखता है। वैसे ही अन्य कोई इसका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है तथा अन्य कोई इसको आश्चर्यकी तरह सुनता है और इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.29।। कोई इसे आश्चर्य के समान देखता है कोई इसके विषय में आश्चर्य के समान कहता है और कोई अन्य पुरुष इसे आश्चर्य के समान सुनता है और फिर कोई सुनकर भी नहीं जानता।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.29 आश्चर्यवत् as a wonder? पश्यति sees? कश्चित् sone one? एनम् this (Self)? आश्चर्यवत् as a wonder? वदति speaks of? तथा so? एव also? च and? अन्यः another? आश्चर्यवत् as a wonder? च and? एनम् this? अन्यः another? श्रृणोति hears? श्रुत्वा having heard? अपि even? एनम् this? वेद knows? न not? च and? एव also? कश्चित् any one.Commentary The verse may also be interpreted in this manner. He that sees? hears and speaks of the Self is a wonderful man. Such a man is very rare. He is one among many thousands. Thus the Self is very hard to understand.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.29. This someone observes as a wonder; similarly another speaks of This as a wonder; another hears This as a wonder; but even after hearing, not even one understands This.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.29 One hears of the Spirit with surprise, another thinks It marvellous, the third listens without comprehending. Thus, though many are told about It, scarcely is there one who knows It.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.29 One looks upon This (self) as a wonder; likewise another speaks of It as a wonder; still another hears of It as a wonder; and even after hearing of It, one knows It not.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.29 Someone visualizes It as a wonder; and similarly indeed, someone else talks of It as a wonder; and someone else hears of It as a wonder. And some one else, indeed, does not realize It even after hearing about It.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.29 One sees This (the Self) as a wonder; another speaks of It as a wonder; another hears of It as a wonder; yet having heard, none understands It at all.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.39 Ascaryavat etc. But, if this Self is, in this manner, changeless (or destructionless), why is This not observed just as such by all ? It is so because, as if by a rare chance, only some one observes [This]. Even after listening, not even one understands This i.e., realises This.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.29 Among innumerable beings, someone, who by great austerity has got rid of sins and has increased his merits, realises this self possessing the above mentioned nature, which is wonderful and distinct in kind from all things other than Itself. Such a one speaks of It to another. Thus, someone hears of It. And even after hearing of It, no one knows It exactly that It really exists. The term 'ca' (and) implies that even amongst the seers, the speakers and hearers, one with authentic percepetion, authentic speech and authentic hearing, is a rarity.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.29 'This Self under discussion is inscrutable. Why should I blame you alone regarding a thing that is a source of delusion to all!' How is this Self inscrutable? [It may be argued that the Self is the object of egoism. The answer is: Although the individualized Self is the object of egoism, the absolute Self is not.] This is being answered in, 'Someone visualizes It as a wonder,' etc. Kascit, someone; pasyati, visualizes; enam, It, the Self; ascaryavat, as a wonder, as though It were a wonder a wonder is something not seen before, something strange, something seen all on a sudden; what is comparable to that is ascarya-vat; ca, and; tatha, similarly; eva, indeed; kascit, someone; anyah, else; vadati, talks of It as a wonder. And someone else srnoti, hears of It as a wonder. And someone, indeed, na, does not; veda, realize It; api, even; srutva, after hearing, seeing and speaking about It. Or, (the meaning is) he who sees the Self is like a wonder. He who speaks of It and the who hears of It is indeed rare among many thousands. Therefore, the idea is that the Self is difficult to understand. Now, in the course of concluding the topic under discussion, [viz the needlessness of sorrow and delusion,from the point of view of the nature of things.] He says, 'O descendant of Bharata, this embodied Self', etc.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.29।। परमार्थ तत्त्व का वर्णन करते हुए कहा जाता है कि वह अनन्त सर्वज्ञ और आनन्दस्वरूप है जबकि हमारा अपने ही विषय में अनुभव यह है कि हम परिच्छिन्न अज्ञानी और दुखी हैं। इस प्रकार जो हमारा वास्तविक आत्मस्वरूप है उससे सर्वथा भिन्न हमारा प्रत्यक्ष अनुभव है। पारमार्थिक स्वरूप और प्रत्यक्ष अनुभव इन दोनों का अन्तर शीत और उष्ण प्रकाश और अंधकार के अन्तर के समान प्रतीत हो रहा है। क्या कारण है कि हम अपने शुद्ध आत्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव नहीं कर पाते हैं अज्ञान अवस्था में जब हम सत्य को जानना चाहते हैं तब हमारी यह धारणा होती है कि वह सत्य एक ऐसा लक्ष्य है जो कहीं दूर स्थान में स्थित है जिसकी प्राप्ति किसी काल विशेष में ही होगी। परन्तु यदि हम भगवान के उपदेश पर विश्वास करें तो यह ज्ञात होगा कि हम उस सत्य से कभी भी दूर नहीं हैं क्योंकि वह तो हमारा स्वरूप ही है। एक र्मत्य जीव अमरत्व से उतना ही दूर है जितना कि स्वप्नद्रष्टा जाग्रत पुरुष से।जो मनुष्य अपने आत्मस्वरूप के वैभव के प्रति जागरूक है वही ईश्वर है और स्वस्वरूप के वैभव से विस्मृत ईश्वर ही मोहित जीव हैप्रथम तो इस जीव को शरीर मन और बुद्धि के परे स्थित आत्मा के अस्तित्व के विचार को ही समझना कठिन होता है और जब वह आत्मविकास की साधना का अभ्यास करके अपने आनन्दस्वरूप को पहचानता है तब वह उस इन्द्रियातीत अनन्त आनन्दस्वरूप का अनुभव कर आश्चर्यचकित रह जाता है।आश्चर्य की भावना जब मन में उठती है तब उसमें यह सार्मथ्य होती है कि क्षण भर के लिए आश्चर्यचकित व्यक्ति को और कुछ सूझता ही नहीं और वह उस क्षण उस भावना के साथ तदाकार हो जाता है। प्रयोग के तौर पर आप किसी व्यक्ति को अचानक आश्चर्यचकित कर दें और फिर उसके मुख के भावों को देखें। मुँह खुला हुआ कुछ न देखती हुई बाहर निकली हुई आँखें प्रत्येक शिरा तनाव से खिंची हुई वह व्यक्ति पुतले के समान क्षण भर के लिए अपने ही स्थान पर किंकर्त्तव्य विमूढ़ खड़ा रह जाता है।इसी प्रकार आत्मानुभव का भी वह आनन्द है जब आत्मा ही आत्मा के साथ आत्मा में ही रमण कर रही होती है। और इसीलिए महान ऋषियों ने इस अनुभव को आश्चर्य शब्द से सूचित किया जब अहंकार जीव समाप्त होकर शुद्ध अनन्तस्वरूप मात्र रह जाता है।अज्ञानी पुरुष समझता है कि मैं शरीर हूँ जिसमें आत्मा का वास है परन्तु ज्ञानी पुरुष जानता है कि मैं आत्मा हूँ जिसने शरीर धारण किया है । जो साधक सम्यक् प्रकार से इस उपदेश का श्रवण करते हैं उनको आगे उसी पर मनन करने को उत्साहित किया जाता है और तत्पश्चात् जब तक यथार्थ में आत्मसाक्षात्कार नहीं हो जाता तब तक उसके लिए ध्यान करने का उपदेश किया गया है। इस श्लोक से अज्ञानी पुरुष को भी श्रवण मनन और निदिध्यासन के द्वारा इस विरले प्रकार के श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करने की प्रेरणा मिल सकती है। आत्मतत्त्व को विषय के रूप में नहीं जाना जा सकता। इसीलिए यहाँ कहा गया है कि इसको सुनकर कोई भी व्यक्ति इसे नहीं जानता।अगले श्लोक में इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.29।।   शुद्धात्मनो दुर्विज्ञेयत्वाद्रभान्तेश्च सर्वसाधारणत्वान्न त्वां प्रत्येवोपालम्भो युक्त इत्याह  आश्चर्यवदिति।  आश्चर्यमद्भुतभदृष्टपूर्वमकस्मादृष्यमानं तेन तुल्यमाश्चर्यवत्। कश्चिदेनमात्मानमाश्चर्यवत्पश्यति। तथैव चान्य एनमाश्चर्यवद्वदति। अन्यश्चैनमाश्चर्यवच्छ्रणोति। श्रुत्वोक्त्वा दृष्ट्वाप्येनं कश्चित्प्रतिबन्धवशान्न वेद साक्षान्न जानाति।ऐहिकमप्यप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् इति व्याससूत्रात् फलोन्मुखं विद्याविरुद्धफलत्वं कर्म प्रस्तुतं तेन प्रतिबन्धः प्रस्तुतप्रतिबन्ध तदभावेऐहिकभस्मिन्नेव जन्मनि विद्या जायते सति तु तस्मिञ्जन्मान्तरेऽपि सा जायते कुतः तद्दर्शनात् प्रतिबन्धतदभावभ्यामुभयविधविद्याजन्मनः श्रुतौ दर्शनात्गर्भस्थ एव वामदेवः प्रतिपेदे ब्रह्मभावम् इति वदन्ती श्रुतिः सति प्रतिबन्धे जन्मान्तरसंचितसाधनाज्जन्मान्तरे विद्योत्पत्तिं दर्शयतीति तदर्थः। यद्वा योऽयमात्मानं पश्यति स आश्चर्यतुल्य एवमग्रेऽपि यो वदति यश्च श्रृणोति सोऽनेकशतसहस्त्रेषु कश्चिदेव यश्चोक्त्वा श्रुत्वा पश्यति परोक्षज्ञानवान् भवति स ततोऽपि दुर्लभः यस्तु साक्षात्करोति स तु ततोऽपि दर्लभ इत्याह  श्रुत्वापीति।  अतो दुर्बोध आत्मेत्यभिप्रायः। तथाच प्रथमपक्षे प्रथमपादेनात्मविषयकपरोक्षदर्शनस्य तथैव द्वितीयेन वदनस्य तृतीयने श्रवणस्य चच दुर्लभत्वं चतुर्थेन साक्षात्कारस्य चात्यन्तदौर्लभ्यं च दर्शयता द्रष्टुर्वक्तुः श्रोतुः साक्षात्कर्तुर्विरलतोच्यते। तद्द्वारा चात्मनो दुर्विज्ञेयत्वं कथ्यते। द्वितीयपक्षे त्वात्मनि चतुर्णां दुर्लभत्वकथनेन तदीयं दुर्बोधत्वमुच्यत इति विवेकः। इत्थं च श्रुत्यैकार्थत्वमस्याः स्मृतेः सभ्यगुपपद्यते। तथाच श्रुतिःश्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः श्रृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युः। आश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः इति। विवृता चेयं भगवत्पादैः प्रायेण ह्येवंविधएव लोकः यस्तु श्रेयोर्थी सोऽनेकशतसहस्त्रेषु कश्चिदेवात्मविद्भवति त्वद्विधः यस्मादित्याह। श्रवणायापि श्रवणार्थं श्रोतुमपि यो न लभ्यः आत्मा बहुभिरनेकैः शृणवन्तो बहवोऽनेकेऽन्ये यमात्मानं न विद्युर्न विन्दन्ति अभागिनोऽसंस्कृतात्मानो न विजानीयुः। किंचास्य वक्ताप्याश्चर्योऽश्रुतव देवानेकेषु कश्चिदेव भवति। तथा श्रुत्वाप्यस्यात्मनः कुशलो निपुण एवानेकेषु लब्धा कश्चिदेव भवति। तस्मादाश्चर्यो ज्ञाता कश्चिदेव कुशलानुशिष्टः कुशलेन निपुणेनाचार्येणानुशिष्टः सन्नित्यर्थ इति। तथाच श्रवणायापीत्यादेरर्थः आश्चर्यवत्कश्चिदेनं श्रृणोतीति श्रृण्वन्तोऽपीत्यादेः श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चिदिति आश्चर्यो वक्तेत्यस्य आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य इति कुशलोऽस्येत्यादेराश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमिति आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्ट इत्येतत्तु कुशल इत्यादेर्व्याख्यानं तस्मादित्यादिभाष्यात्। यद्वा लब्धा परोक्षज्ञानवान् ज्ञाता साक्षात्कर्ता। आश्चर्यवत्पश्यतीत्यत्रापि द्विविधं दर्शनं वक्ष्यते श्रुत्येकवाक्यतार्थम्। अस्मिन्पक्षेपरोक्षेणापरोक्षेण वाऽस्य दर्शनं द्रष्टावात्यन्तदुर्लभः परोक्षेणास्य दर्शनं द्रष्टा वा कुतो दुर्लभ इत्यत आह  आश्चर्यवद्वदती त्यादि। तोऽस्य कथनं वक्ता वा श्रवणं श्रोता वा दुर्लभोऽत इत्यर्थः। अपरोक्षेणास्य दर्शनस्य द्रष्टुर्वात्यन्तदौर्लभ्ये हेतुमाह  श्रुत्वापीति।  श्रुत्वा उक्त्वा परोक्षेण दृष्ट्वाप्येनं कश्चिदभागी असंस्कृतात्मा लोको नचैव जानातीति। अतः साक्षादस्य दर्शनं द्रष्टा वात्यन्तदुर्लभ इत्यर्थः। एतेन यदि श्रुत्वाप्येनं न चैव कश्चिदित्येवं व्याख्यायेत तदाआश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः इति श्रुत्येकवाक्यता न स्यात्।यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः इति भगवद्वचनविरोधश्चेति प्रत्युक्तम्। य आत्मानं पश्यति स आश्चर्यतुल्यो यो वदति यश्च शृणोति सोऽनेकसहस्त्रेषु कश्चिदेवेति भाष्यात्स्मृतिविरोधानवकाशाच्च। अत्र केचिद्वर्णयन्ति। एनं प्रकृतं देहिनं आश्चर्येणाद्भुतेन तुल्यतया वर्तमानं आविद्यकनानाविरुद्धधर्मवत्तया सन्तमप्यसन्तमिव स्वप्रकाशचैतन्यरुपमपि जडमिवानन्दरुपमपि दुःखितमिवेत्याद्यसंभावितविचित्रानेकाकारप्रतीतिविषयं पश्यति शास्त्राचार्योपदेशाभ्यामाविद्यकसर्वद्वैतनिषेधेन परमात्मस्वरुपाकारायां वेदान्तमहावाक्यजन्यायां सर्वसुकृतफलभूतायामन्तःकरणवृत्तौ प्रतिफलितं समाधिपरिपाकेन साक्षात्करोति। कश्चिच्छमदमादिसाधनसंपन्नचरमशरीरः कश्चिदेव मर्त्यो नतु सर्वः। तथा कश्चिदेनं यत्पश्यति तदाश्चर्यवदिति क्रियाविशेषणम्। आविद्यकमपि दर्शनमविद्यां स्वात्मानं च निवर्तयतीति। तथा यः कश्चिदेनं पश्यति स आश्चर्यवदिति कर्तृविशेषणम्। यत एकएव विद्वान् समाधिव्युत्थानयोः परस्परविरुद्धमात्मनो ब्रह्मभावं जीवभावं च यावत्प्रारबधकर्मक्षयमनुभवतीति तदेतत्र्यमप्याश्चर्यमात्मा तज्ज्ञानं ज्ञाता चेति। एवमग्रेऽपि कर्मणि क्रियायां कर्तरि चाश्चर्यवदिति योज्यम्। सर्वशब्दावाच्यस्य शुद्धस्यात्मनो यद्वदनं तदाश्चर्यवत् श्रुत्वाप्येनं वेद श्रुत्वाचैनं मनननिदिध्यासनपरिपाकाद्वेदापि साक्षात्करोत्यपि आश्चर्यवत्। तथा चाश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनमित्यत्र व्याख्यातम्। ननु यः श्रवणादिकं करोति स आत्मानं वेदेति किमाश्चर्यमत आह नचैव कश्चिदिति। चकारः क्रियाकर्मपदयोरनुषङ्गार्थः। कश्चिदेनं नैव वेद श्रवणादिकं कुर्वन्नपि तदकुर्वन्न वेदेति किमु वक्तव्यम्। अथवा नचैव कश्चिदित्यस्य सर्वत्र संबन्धः। कश्चिदेनं न पश्यति न वदति न श्रृणोति श्रुत्वापि न वेदेति पञ्च प्रकारा उक्ताः। कश्चित्पश्यत्येव न वदति कश्चित्पश्यति वदति च कश्चित्तद्वचनं श्रृणोति तदर्थ जानाति च कश्चित् श्रुत्वापि न जानाति कश्चित्तु सर्वबहिर्भूत इति तत्रेदमवधेयम्। आश्चर्यमद्भुतभदृष्टमकस्माद्दृश्यमानं तेन तुल्यमाश्चर्यवत् यो वदति यश्च श्रृणोति स सहस्त्रेषु कश्चिदेवेत्यादिवदद्भिराचार्यैः कर्तृक्रिययोराश्चर्यवत्त्वं दुर्लभत्वं प्रदर्शितम्।श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यते इति श्रुत्यनुरोधात् आत्मनस्तु कर्तृक्रियाविरलत्वद्वारैव दुर्ज्ञेयत्वं नतु साक्षात् आश्चर्यवत्पदविशेष्यत्वेन श्रुतौ तथात्वासंभवात्तदेकवाक्यतानापत्तेः। तस्मादाश्चर्यवत्पदस्य विरुद्धधर्माश्चर्यपरत्वं कर्मविशेषणत्वं चावदतामाचार्याणां न्यूनता न शङ्कनीया। यदपि वेदेत्यस्य पृथक्करणादि तदपि क्लेशमात्रं तद्विनापि श्रुत्येकवाक्यतायां निरुपितत्वात् यदपि नचैव कश्चिदित्यस्य सर्वत्र संबन्ध इत्यादि तदपि न आश्चर्यवदित्याद्युक्त्या बहव एनं न पश्यन्ति इत्यादेरर्थस्य स्पष्टप्रतीतेः क्लिष्टकल्पनया पक्षान्तरप्रदर्शनस्य वैयर्थ्यात् कश्चिदेनं पश्यतीत्यादिनोपपादिते सर्वबहिर्भूते श्रुत्वापि न वेदेत्यस्योक्तत्वेन चतुर्थप्रकारानर्थक्याच्चेति दिक्। एतेन कश्चिदेनमात्मानं शास्त्राचार्योपदेशाभ्यां पश्यन्नाश्चर्यवत्पश्यति सर्वगतस्य नित्यज्ञानानन्दस्वभावस्यात्मनोऽलौकिकत्वादैन्द्रजालिकवदघटमानं पश्यन्निव विस्मयेन पश्यति असंभावनाभिभूतत्वादित्यादिभाष्यकृद्भि कुतो न व्याख्यातमिति प्रत्युक्तम्। अत्रापि मूलश्रुत्येकवाक्यत्वाभावापत्तेस्तुल्यत्वात्। अन्ये तु वज्रपञ्जरतुल्यस्य सर्वप्रमाणसिद्धस्य वियदादिप्रपञ्चस्य कथं रज्जूरगादिवदज्ञानप्रभवत्वेनात्यन्ततुच्छत्वमुच्यते कथंवा कर्मज्ञानकाण्डापेक्षितमात्मनो यज्ञादिकर्तृत्वं चापह्नूयत इत्याशङ्क्याह  आश्चर्यवदिति।  कश्चिज्ज्ञातात्मतत्त्व एनं अतीतानन्तरश्लोकोक्तं भूतग्राममाश्चर्यं अद्भुतं स्वप्नमायेन्द्रजालादिकं तेन तुल्यमाश्चर्यवत्तथाभूतं पश्यति। तथा कश्चिदेनमाश्चर्यवद्वदति सत्त्वेनासत्त्वेन वा निर्वक्तुमशक्यमप्यनिर्वचनीयत्वेनैव लोकाप्रसिद्धेन रुपेणोपपादयति। तथा एनं प्रपञ्चमन्य आश्चर्यबच्छृणोति।इमे लोका इमे देवा इमे वेदा इद्ँसर्वं यदयमात्मा इति। प्रत्यक्षेणानात्मतयोपलभ्यमानस्यापि प्रपञ्चस्य यत्प्रत्यगभिन्नत्वेन श्रवणं तदत्यन्तमाश्चर्यम्। तथा कश्चिदेनं प्रपञ्चं प्रत्यगनन्यत्वेन श्रुत्वापिशब्दादुक्त्वा दृष्ट्वापि तत्त्वतो न वेदेति वर्णयन्ति तदपि सर्वमुपेक्ष्यम्।देही नित्यम् इति श्लोकस्थभूतानीत्यनुरोधेनातीतानन्तरश्लोकस्थभूतानीत्यस्य कार्यकरणसंघातपरत्वेन व्याख्यातत्वात् प्रपञ्चस्यानुक्तेरेनदादेशानुपपत्तेः एनमित्यनेन बह्वभ्यस्तस्यात्मनस्त्यागेन प्रकरणविरोधात् बह्वध्याहारग्रस्तत्वादुपलभ्यमानमूलभूतश्रुतिविरोधात् एतद्य्वाख्यातृभिरप्यरुच्या यद्वेत्यादिपक्षान्तरस्वीकाराच्च पक्षान्तरं च केषांचिद्य्वाख्यानमनूदितमिति निर्मत्सरैर्विद्वद्भिराकलनीयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.29।।ननु विद्वांसोऽपि बहवः शोचन्ति तत्किं मामेव पुनः पुनरेवमुपालभसे अन्यच्च इति न्यायात्त्वद्वचनार्थाप्रतिपत्तिरपि मम न दोषः। तत्रान्येषामपि तवेवात्मापरिज्ञानादेव शोकः आत्मप्रतिपादकशास्त्रार्थाप्रतिपत्तिश्च तवाप्यन्येषामिव स्वाशयदोषादिति नोक्तदोषद्वयमित्यभिप्रेत्यात्मनो दुर्विज्ञेयतामाह एनं प्रकृतं देहिनमाश्चर्येणाद्भुतेन तुल्यतया वर्तमानं आविद्यकनानाविधविरुद्धधर्मवत्तया सन्तमप्यसन्तमिव स्वप्रकाशचैतन्यरूपमपि जडमिव आनन्दघनमपि दुःखितमिव निर्विकारमपि सविकारमिव नित्यमप्यनित्यमिव प्रकाशमानमप्यप्रकाशमानमिव ब्रह्माभिन्नमपि तद्भिन्नमिव मुक्तमपि बद्धमिव अद्वितीयमपि सद्वितीयमिव संभावितविचित्रानेकाकारप्रतीतिविषयं पश्यति। शास्त्राचार्योपदेशाभ्यामाविद्यकसर्वद्वैतनिषेधेन परमात्मस्वरूपमात्राकारायां वेदान्तमहावाक्यजन्यायां सर्वसुकृतफलभूतायामन्तःकरणवृत्तौ प्रतिफलितं समाधिपरिपाकेन साक्षात्करोति कश्चिच्छमदमादिसाधनसंपन्नचरमशरीरः कश्चिदेव नतु सर्वः। तथा कश्चिदेनं यत्पश्यति तदाश्चर्यवदिति क्रियाविशेषणम्। आत्मदर्शनमप्याश्चर्यवदेव यत्स्वरूपतो मिथ्याभूतमपि सत्यस्य व्यञ्जकं आविद्यकमप्यविद्याया विघातकं अविद्यामुपघ्नतत्कार्यतया

Chapter 2 (Part 19)

स्वात्मानमप्युपहन्तीति। यथा यः कश्चिदेनं पश्यति स आश्चर्यवदिति कर्तृविशेषणम्। यतोऽसौ निवृत्ताविद्यातत्कार्योऽपि प्रारब्धकर्मप्राबल्यात्तद्वानिव व्यवहरति सर्वदा समाधिनिष्ठोऽपि व्युत्तिष्ठति व्युत्थितोऽपि पुनः समाधिमनुभवतीति प्रारब्धकर्मवैचित्र्याद्विचित्रचरित्रः प्राप्तदुष्प्रापज्ञानत्वात्सकललोकस्पृहणीयोऽत आश्चर्यवदेव भवति। तदेतत्त्रयमाश्चर्यमात्मा तज्ज्ञानं तज्ज्ञाता चेति परमदुर्विज्ञेयमात्मानं त्वं कथमनायासेन जानीया इत्यभिप्रायः। एवमुपदेष्टुरभावादप्यात्मा दुर्विज्ञेयः। यो ह्यात्मानं जानाति स एव तमन्यस्मै ध्रुवं ब्रूयात् अज्ञस्योपदेष्टृत्वासंभवात्। जानंस्तु समाहितचित्तः प्रायेण कथं ब्रवीतु। व्युत्थितचित्तोऽपि परेण ज्ञातुमशक्यः। यथाकथंचिज्ज्ञातोऽपि लाभपूजाख्यात्यादिप्रयोजनानपेक्षत्वान्न ब्रवीत्येव कथंचित्कारुण्यमात्रेण ब्रुवंस्तु परमेश्वरवदत्यन्तदुर्लभएवेत्याह आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्य इति। यथा जानाति तथैव वदति। एनमित्यनुकर्षणार्थश्चकारः। स चान्यः सर्वज्ञजनविलक्षणो नतु यः पश्यति ततोऽन्य इति व्याघातात्। तत्रापि कर्मणि क्रियायां कर्तरि चाश्चर्यवदिति योज्यम्। तत्र कर्मणः कर्तुश्च प्रागाश्चर्यत्वं व्याख्यातं क्रियायास्तु व्याख्यायते। सर्वशब्दावाच्यस्य शुद्धस्यात्मनो यद्वचनं तदाश्चर्यवत्। तथाच श्रुतिःयतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह इति। केनापि शब्देनावाच्यस्य शुद्धस्यात्मनो विशिष्टशक्तेन पदेन जहदजहत्स्वार्थलक्षणया कल्पितसंबन्धेन लक्ष्यतावच्छेदकमन्तरेणैव प्रतिपादनं तदपि निर्विकल्पकसाक्षात्काररूपमत्याश्चर्यमित्यर्थः। अथवा विना शक्तिं विना लक्षणां विना संबन्धान्तरं सुषुप्तोत्थापकवाक्यवत्तत्त्वमस्यादिवाक्येन यदात्मतत्त्वप्रतिपादनं तदाश्चर्यवत्। शब्दशक्तेरचिन्त्यत्वात्। नच विना संबन्धं बोधनेऽतिप्रसङ्गः लक्षणापक्षेऽपि तुल्यत्वात् शक्यसंबन्धरूपानेकसाधारणत्वात्। तात्पर्यविशेषान्नियम इतिचेत् न। तस्यापि सर्वान्प्रत्यविशेषात्। कश्चिदेव तात्पर्यविशेषमवधारयति न सर्व इतिचेद्धन्त तर्हि पुरुषगत एव कश्चिद्विशेषो निर्दोषत्वरूपो नियामकः सचास्मिन्पक्षेऽपि न दण्डवारितः। तथाच यादृशस्य शुद्धान्तःकरणस्य तात्पर्यानुसन्धानपुरःसरं लक्षणया वाक्यार्थबोधो भवद्भिरङ्गीक्रियते तादृशस्यैव केवलः शब्दविशेषोऽखण्डसाक्षात्कारं विनापि संबन्धेन जनयतीति किमनुपपन्नम्। एतस्मिन्पक्षे शब्दवृत्त्याविषयत्वात्यतो वाचो निवर्तन्ते इति सुतरामुपपन्नम्। अयं च भगवदभिप्रायो वार्तिककारैः प्रपञ्चितःदुर्बलत्वादविद्याया आत्मत्वाद्बोधरूपिणः। शब्दशक्तेरचिन्त्यत्वाद्विद्मस्तं मोहहानतः।।अगृहीत्वैव संबन्धमभिधानाभिधेययोः। हित्वा निद्रां प्रबुध्यन्ते सुषुप्तेर्बोधिताः परैः।।जाग्रद्वन्न यतः शब्दं सुषुप्तौ वेत्ति कश्चन। ध्वस्तेऽतो ज्ञानतोऽज्ञाने ब्रह्मास्मीति भवेत्फलम्।।अविद्याघातिनः शब्दाद्याहं ब्रह्मेति धीर्भवेत्। नश्यत्यविद्यया सार्धं हत्वा रोगमिवौष धम्।। इत्यादिना ग्रन्थेन। तदेवं वचनविषयस्य वक्तुर्वचनक्रियायाश्चात्याश्चर्यरूपत्वादात्मनो दुर्विज्ञानत्वमुक्त्वा श्रोतुर्दुर्मिलत्वादपि तदाह आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेदेति। अन्यो द्रष्टुर्वक्तुश्च मुक्ताद्विलक्षणो मुमुक्षुर्वक्तारं ब्रह्मविदं विधिवदुपसृत्य एनं शृणोति श्रवणाख्यविचारविषयीकरोति। वेदान्तवाक्यतात्पर्यनिश्चयेनावधारयतीति यावत्। श्रुत्वा चैनं मनननिदिध्यासनपरिपाकाद्वेदापि साक्षात्करोत्यपि आश्चर्यवत्। तथाचआश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम् इति व्याख्यातम्। अत्रापि कर्तुराश्चर्यरूपत्वमनेकजन्मानुष्ठितसुकृतक्षालितमनोमलतयादिदुर्लभत्वात्। तथाच वक्ष्यतिमनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।। इति।श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विद्युःआश्चर्योऽस्य वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः इति श्रुतेश्च। एवं श्रवणश्रोतव्ययोराश्चर्यत्वं प्राग्वद्व्याख्येयम्। ननु यः श्रवणमननादिकं करोति स आत्मानं वेदेति किमाश्चर्यमत आह नचैव कश्चिदिति। चकारः क्रियाकर्मपदयोरनुषङ्गार्थः। कश्चिदेनं नैव वेद श्रवणादिकं कुर्वन्नपि तदकुर्वंस्तु न वेदेति किमु वक्तव्यम्।ऐहिकमप्रस्तुतप्रतिबन्धे तद्दर्शनात् इति न्यायात्। उक्तंच वार्तिककारैःकुतस्तज्ज्ञानमिति चेत्तद्धि बन्धपरिक्षयात्। असावपि च भूतो वा भावी वा वर्ततेऽथवा।। इति। श्रवणादिकुर्वतामपि प्रतिबन्धपरिक्षयादेव ज्ञानं जायते अन्यथा तु न। सच प्रतिबन्धपरिक्षयः कस्यचिद्भूत एव यथा हिरण्यगर्भस्य। कस्यचिद्भावी यथा वामदेवस्य। कस्यचिद्वर्तते यथा श्वेतकेतोः। तथा च प्रतिबन्धक्षयस्यातिदुर्लभत्वात्ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः इति स्मृतेश्च दुर्विज्ञेयोऽयमात्मेति निर्गलितोऽर्थः। यदि तुश्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् इत्येव व्याख्यायेत तदाआश्चर्यो ज्ञाता कुशलानुशिष्टः इति श्रुत्येकवाक्यता न स्यात्।यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः इति भगवद्वचनविरोधश्चेति विद्वद्भिरविनयः क्षन्तव्यः। अथवा न चैव कश्चिदित्यस्य सर्वत्र संबन्धः। कश्चिदेनं न पश्यति न वदति न शृणोति श्रुत्वापि न वेदेति पञ्चप्रकारा उक्ताः। कश्चित्पश्यत्येव न वदति कश्चित्पश्यति च वदति च कश्चित्तद्वचनं शृणोति च तदर्थं जानाति च कश्चिच्छ्रुत्वापि न जानाति च कश्चित्तु सर्वबहिर्भूत इति। अविद्वत्पक्षे त्वसंभावनाविपरीतभावनाभिभूतत्वादाश्चर्यतुल्यत्वं दर्शनवदनश्रवणेष्विति निगदव्याख्यातः श्लोकः। चतुर्थपादे तु दृष्ट्वोक्त्वा श्रुत्वापीति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.29।।ननु वज्रपञ्जरतुल्यस्य सर्वप्रमाणसिद्धस्य वियदादिप्रपञ्चस्य कथं रज्जूरगादिवदज्ञानप्रभवत्वेनात्यन्ततुच्छत्वमुच्यते कथं वा कर्मज्ञानकाण्डापेक्षितमात्मनो यज्ञादिकर्तृत्वं श्रवणादिकर्तृत्वं चापह्नूयत इत्याशङ्क्याह  आश्चर्यवदिति।  कश्चित् ज्ञातात्मतत्त्व एनमतीतानन्तरश्लोकोक्तं भूतग्राममाश्चर्यवत् आश्चर्यमद्भुतं स्वप्नमायेन्द्रजालादिकं तेन तुल्यमाश्चर्यवत् तथाभूतं पश्यति। तथा कश्चिदेनं आश्चर्यवद्वदति सत्त्वेन असत्त्वेन वा निर्वक्तुमशक्यमपि अनिर्वचनीयेनैव लोकाप्रसिद्धेन रूपेणोपपादयति। तथाहि रज्जूरगवत्प्रपञ्चः संश्चेत्नेह नानास्ति किंचन इति श्रुत्या न बाध्येत असंश्चेन्न प्रतीयेत तस्मादनिर्वचनीयोऽयमिति। तदिदं सर्वव्यवहारास्पदस्यापि प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वोपपादनमत्याश्चर्यमित्यर्थः। तथा एनं प्रपञ्चमन्य आश्चर्यवत् शृणोति।इमे लोका इमे देवा इमे वेदा इदं सर्वं यदयमात्मा इति प्रत्यक्षेणानात्मतया उपलभ्यमानस्यापि प्रपञ्चस्य यत् प्रत्यगभिन्नत्वेन श्रवणं तदत्यन्तमाश्चर्यम्। न हीयं श्रुतिःयजमानः प्रस्तरः इत्यादिवदुपचरितार्था। प्रपञ्चस्यात्मनः पृथक्त्वेआत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितं भवति इत्येकविज्ञानात्सर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपरोधापत्तेः। न च प्रतिज्ञाप्यौपचारिकी। प्रदेशान्तरे श्रुतस्ययथा सौम्यैकेन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात् इति दृष्टान्तस्योपरोधापत्तेः। तस्मात्प्रतिज्ञादृष्टान्तनिगमनानामेकवाक्यत्वात् न प्रपञ्चस्यात्मान्यत्वम्। तच्च भेदग्राहिप्रत्यक्षविरोधादाश्चर्यमिव श्रृणोति। तथा कश्चिदेनं प्रपञ्चं प्रत्यगनन्यत्वेन श्रुत्वा अपिशब्दात् उक्त्वा स्वप्नादिदृष्टान्तैरुपपाद्य दृष्ट्वा ध्यानेन च साक्षात्कृत्वापि तत्त्वतो न वेद न जानाति। तथाहि प्राप्तापि प्रज्ञा तीव्रविक्षेपवतः परिहीयत इति वक्ष्यति। तस्मादात्मैक्यात्संभवत्येव प्रपञ्चस्य रज्जूरगादितुल्यत्वेन तुच्छत्वम्। यद्वा एनं आत्मानं कर्तृत्वभोक्तृत्वदुःखित्वानित्यत्वजडत्वसङ्गित्वपरिच्छिन्नत्वादिधर्मवत्तया प्रसिद्धमपि तत्त्वमसीत्यागमोत्थया ब्रह्माकारान्तःकरणवृत्त्या ब्रह्मविद्याख्यया अकर्तारमभोक्तारमानन्दघनं सत्यचिद्रूपमसङ्गमनन्तमपरोक्षीकरोतीति महदाश्चर्यम्। यत् पश्यति तदाश्चर्यवदिति क्रियाविशेषणं वा। आविद्यकमपि दर्शनमविद्यां स्वात्मानं च कतकरजोवन्निवर्तयतीति। यद्वा यः पश्यति स आश्चर्यवदिति कर्तृविशेषणम्। यत एक एव विद्वान् समाधिव्युत्थानयोः परस्परविरुद्धमात्मनो ब्रह्मभावं जीवभावं च यावदारब्धकर्मक्षयमनुभवतीति तथा वाङ्मनसातीतमप्यात्मानं यद्वाचा वदति तदप्याश्चर्यम्। अगृहीतसंगतिकेनापिशब्देन यथा सुप्तः प्रबोध्यते तद्वत्। यथोक्तं वार्तिकेअगृहीत्वैव संबन्धमभिधानाभिधेययोः। हित्वा निद्रां प्रबुध्यन्ते सुषुप्ते बोधिताः परैः। जाग्रद्वन्न यतः शब्दं सुषुप्ते वेत्ति कश्चन। ध्वस्तेऽतो ज्ञानतोऽज्ञाने ब्रह्मास्मीति भवेत्फलम्। अविद्याघातिनः शब्दाद्याहं ब्रह्मेति धीर्भवेत्। नश्यत्यविद्यया सार्धं हत्वा रोगमिवौषधम्। इति। तथा यः शृणोति सोऽपि आश्चर्यवत् अतिदुर्लभ इत्यर्थः।श्रवणायापि बहुभिर्यो न लभ्यः इति श्रुतेः।शृण्वन्तोऽपि बहवो यं न विदुः इति श्रुतिद्वितीयपादार्थं संगृह्णाति  श्रुत्वाप्येनमिति। आश्चर्यो वक्ता कुशलोऽस्य लब्धा आश्चर्यो ज्ञाता कुशलेनानुशिष्टः इति उत्तरार्धस्तु श्लोकपूर्वार्धेन संगृहीत इति ज्ञेयम्। दुर्विज्ञेयोऽयमात्मा अतस्त्वं तज्ज्ञानार्थं यतस्वेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.29।।नन्वेवं चेत्तदा विद्वांसः पापकर्मणा नरकसम्भावनया कथं शोचन्तीत्याशङ्क्याह आश्चर्यवदिति। एनं कश्चिदाश्चर्यवत् पश्यति शास्त्रार्थज्ञानान्नित्यमव्यक्तादिरूपं जानन् जन्मादिभावदर्शनादाश्चर्यवन्मायाकृतैन्द्रजालवत्पश्यतीत्यर्थः। एतेषां जन्मादिभावास्तु मदिच्छया मत्क्रीडार्थका इति आश्चर्यवदित्युक्तम्। तथैव च मन्मायया मोहितः कश्चिदाश्चर्यवद्वदति अन्यान् बोधयतीत्यर्थः। अन्यश्च श्रोता स्वतो ज्ञानरहित आश्चर्यवत् शृणोति। श्रुत्वाऽप्येन यथार्थमिदमित्युक्त्वा न वेद। वै निश्चयेनैतत्ित्रतयेषु कोऽपि न वेद न ज्ञातवानतोऽज्ञानात्तेऽपि शोचन्तीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.29।।कुतस्तर्हि विद्वांसोऽपि लोके शोचन्ति आत्माज्ञानादेवेत्याशयेनात्मनो दुर्विज्ञेयतामाह  आश्चर्यवदिति।  कश्चिदेनमात्मानं शास्त्राचार्योपदेशाभ्यां पश्यन्नाश्चर्यवत्पश्यति। सर्वगतस्य नित्यज्ञानानन्दस्वभावस्यात्मनोऽलौकिकत्वादैन्द्रजालिकवदघटमानं पश्यन्निव विस्मयेन पश्यति असंभावनाभिभूतत्वात्। तथा आश्चर्यवदन्यो वदति च शृणोति च। अन्य कश्चित्पुनर्विपरीतभावनाभिभूतः श्रुत्वापि नैव वेद। चशब्दादुक्त्वापि न सम्यग्वेदेति द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.29।।सोऽयमात्माऽव्यक्तो यत आश्चर्यवदित्याह आश्चर्यवदिति। अवितर्क्यमिव पश्यतीत्यादि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.29।।जिसका प्रकरण चल रहा है यह आत्मतत्त्व दुर्विज्ञेय है। सर्वसाधारणको भ्रान्ति करा देनेवाले विषयमें केवल एक तुझे ही क्या उलाहना दूँ यह आत्मा दुर्विज्ञेय कैसे है सो कहते हैं पहले जो नहीं देखा गया हो अकस्माद् दृष्टिगोचर हुआ हो ऐसे अद्भुत पदार्थका नाम आश्चर्य है उसके सदृशका नाम आश्चर्यवत् है इस आत्माको कोई ( महापुरुष ) ही आश्चर्यमय वस्तुकी भाँति देखता है। वैसे ही दूसरा ( कोई एक ) इसको आश्चर्यवत् कहता है अन्य ( कोई ) इसको आश्चर्यवत् सुनता है एवं कोई इस आत्माको सुनकर देखकर और कहकर भी नहीं जानता। अथवा जो इस आत्माको देखता है वह आश्चर्यके तुल्य है जो कहता है और जो सुनता है वह भी ( आश्चर्यके तुल्य है )। अभिप्राय यह कि अनेक सहस्रोंमेंसे कोई एक ही ऐसा होता है। इसलिये आत्मा बड़ा दुर्बोध है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.29।। व्याख्या    आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्   इस देहीको कोई आश्चर्यकी तरह जानता है। तात्पर्य यह है कि जैसे दूसरी चीजें देखने सुनने पढ़ने और जाननेमें आती हैं वैसे इस देहीका जानना नहीं होता। कारण कि दूसरी वस्तुएँ इदंतासे ( यह करके) जानते हैं अर्थात् वे जाननेका विषय होती हैं पर यह देही इन्द्रिय मनबुद्धिका विषय नहीं है। इसको तो स्वयंसे अपनेआपसे ही जाना जाता है। अपनेआपसे जो जानना होता है वह जानना लौकिक ज्ञानकी तरह नहीं होता प्रत्युत बहुत विलक्षण होता है। पश्यति  पदके दो अर्थ होते हैं नेत्रोंसे देखना और स्वयंके द्वारा स्वयंको जानना। यहाँ  पश्यति  पद स्वयंके द्वारा स्वयंको जाननेके विषयमें आया है (गीता 2। 55 6। 20 आदि)।जहाँ नेत्र आदि करणोंसे देखना (जानना) होता है वहाँ द्रष्टा (देखनेवाला) दृश्य (दीखनेवाली वस्तु) और दर्शन (देखनेकी शक्ति) यह त्रिपुटी होती है। इस त्रिपुटीसे ही सांसारिक देखनाजानना होता है। परन्तु स्वयंके ज्ञानमें यह त्रिपुटी नहीं होती है अर्थात् स्वयंका ज्ञान करणसापेक्ष नहीं है। स्वयंका ज्ञान तो स्वयंके द्वारा ही होता है अर्थात् वह ज्ञान करणनिरपेक्ष है। जैसे मैं हूँ ऐसा जो अपने होनेपन ज्ञान है इसमें किसी प्रमाणकी या किसी करणकी आवश्यकता नहीं है। इस अपने होनेपनको इदंता से अर्थात् दृश्यरूपसे नहीं देख सकते। इसका ज्ञान अपनेआपको ही होता है। यह ज्ञान इन्द्रियजन्य या बुद्धिजन्य नहीं है। इसलिये स्वयंको (अपनेआपको) जानना आश्चर्यकी तरह होता है।जैसे अँधेरे कमरेमें हम किसी चीजको लाने जाते हैं तो हमारे साथ प्रकाश भी चाहिये और नेत्र भी चाहिये अर्थात् उस अँधेरे कमरेमें प्रकाशकी सहायतासे हम उस चीजको नेत्रोंसे देखेंगे तब उसको लायेंगे। परन्तु कहीं दीपक जल रहा है और हम उस दीपकको देखने जायँगे तो उस दीपकको देखनेके लिये हमें दूसरे दीपककी आवश्यकता नहीं पड़ेगी क्योंकि दीपक स्वयंप्रकाश है। वह अपनेआपको स्वयं ही प्रकाशित करता है। ऐसे ही अपने स्वरूपको देखनेके लिये किसी दूसरे प्रकाशकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि यह देही (स्वरूप) स्वयंप्रकाश है। अतः यह अपनेआपसे ही अपनेआपको जानता है।स्थूल सूक्ष्म और कारण ये तीन शरीर हैं। अन्नजलसे बना हुआ स्थूलशरीर है। यह स्थूलशरीर इन्द्रियोंका विषय है। इस स्थूलशरीरके भीतर पाँच ज्ञानेन्द्रियों पाँच कर्मेन्द्रियाँ पाँच प्राण मन और बुद्धि इन सत्रह तत्त्वोंसे बना हुआ सूक्ष्मशरीर है। यह सूक्ष्मशरीर इन्द्रियोंका विषय नहीं है प्रत्युत बुद्धिका विषय हैं। जो बुद्धिका भी विषय नहीं है जिसमें प्रकृति स्वभाव रहता है वह कारणशरीर है। इन तीनों शरीरोंपर विचार किया जाय तो यह स्थूलशरीर मेरा स्वरूप नहीं है क्योंकि यह प्रतिक्षण बदलता है और जाननेमें आता है। सूक्ष्मशरीर भी बदलता है और जाननेमें आता है अतः यह भी मेरा स्वरूप नहीं है। कारणशरीर प्रकृतिस्वरूप है पर देही (स्वरूप) प्रकृतिसे भी अतीत है अतः कारणशरीर भी मेरा स्वरूप नहीं है। यह देही जब प्रकृतिको छोड़कर अपने स्वरूपमें स्थित हो जाता है तब यह अपनेआपसे अपनेआपको जान लेता है। यह जानना सांसारिक वस्तुओंको जाननेकी अपेक्षा सर्वथा विलक्षण होता है इसलिये इसको  आश्चर्यवत् पश्यति  कहा गया है।यहाँ भगवान्ने कहा है कि अपनेआपका अनुभव करनेवाला कोई एक ही होता है  कश्चित्  और आगे सातवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भी यही बात कही है कि कोई एक मनुष्य ही मेरेको तत्त्वसे जानता है  कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः।  इन पदोंसे ऐसा मालूम होता है कि इस अविनाशी तत्त्वको जानना बड़ा कठिन है दुर्लभ है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। इस तत्त्वको जानना कठिन नहीं है दुर्लभ नहीं है प्रत्युत इस तत्त्वको सच्चे हृदयसे जाननेवालेकी इस तरफ लगनेवालेकी कमी है। यह कमी जाननेकी जिज्ञासा कम होनेके कारण ही है। आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः   ऐसे ही दूसरा पुरुष इस देहीका आश्चर्यकी तरह वर्णन करता है क्योंकि यह तत्त्व वाणीका विषय नहीं है। जिससे वाणी भी प्रकाशित होती है वह वाणी उसका वर्णन कैसे कर सकती है जो महापुरुष इस तत्त्वका वर्णन करता है वह तो शाखाचन्द्रन्यायकी तरह वाणीसे इसका केवल संकेत ही करता है जिससे सुननेवालेका इधर लक्ष्य हो जाय। अतः इसका वर्णन आश्चर्यकी तरह ही होता है।यहाँ जो  अन्यः  पद आया है उसका तात्पर्य यह नहीं है कि जो जाननेवाला है उससे यह कहनेवाला अन्य है क्योंकि जो स्वयं जानेगा ही नहीं वह वर्णन क्या करेगा अतः इस पदका तात्पर्य यह है कि जितने जाननेवाले हैं उनमें वर्णन करनेवाला कोई एक ही होता है। कारण कि सबकेसब अनुभवी तत्त्वज्ञ महापुरुष उस तत्त्वका विवेचन करके सुननेवालेको उस तत्त्वतक नहीं पहुँचा सकते। उसकी शंकाओंका तर्कोंका पूरी तरह समाधान करनेकी क्षमता नहीं रखते। अतः वर्णन करनेवालेकी विलक्षण क्षमताका द्योतन करनेके लिये ही यह अन्यः पद दिया गया है। आश्चर्यवच्चैनमन्यः श्रृणोति   दूसरा कोई इस देहीको आश्चर्यकी तरह सुनता है। तात्पर्य है कि सुननेवाला शास्त्रोंकी लोकलोकान्तरोंकी जितनी बातें सुनता आया है उन सब बातोंसे इस देहीकी बात विलक्षण मालूम देती है। कारण कि दूसरा जो कुछ सुना है वह सबकासब इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिका विषय है परन्तु यह देही इन्द्रियों आदिका विषय नहीं है प्रत्युत यह इन्द्रियों आदिके विषयको प्रकाशित करता है। अतः इस देहीकी विलक्षण बात वह आश्चर्यकी तरह सुनता है।यहाँ  अन्यः  पद देनेका तात्पर्य है कि जाननेवाला और कहनेवाला इन दोनोंसे सुननेवाला (तत्त्वका जिज्ञासु) अलग है। श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्   इसको सुन करके भी कोई नहीं जानता। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि उसने सुन लिया तो अब वह जानेगा ही नहीं। इसका तात्पर्य यह है कि केवल सुन करके (सुननेमात्रसे) इसको कोई भी नहीं जान सकता। सुननेके बाद जब वह स्वयं उसमें स्थित होगा तब वह अपनेआपसे ही अपनेआपको जानेगा  (टिप्पणी प0 69) ।यहाँ कोई कहे कि शास्त्रोँ और गुरुजनोंसे सुनकर ज्ञान तो होता ही है फिर यहाँ सुन करके भी कोई नहीं जानता ऐसा कैसे कहा गया है इस विषयपर थोड़ी गम्भीरतासे विचार करके देखें कि शास्त्रोंपर श्रद्धा स्वयं शास्त्र नहीं कराते और गुरुजनोंपर श्रद्धा स्वयं गुरुजन नहीं कराते किन्तु साधक स्वयं ही शास्त्र और गुरुपर श्रद्धाविश्वास करता है स्वयं ही उनके सम्मुख होता है। अगर स्वयंके सम्मुख हुए बिना ही ज्ञान हो जाता तो आजतक भगवान्के बहुत अवतार हुए हैं बड़ेबड़े जीवन्मुक्त महापुरुष हुए हैं उनके सामने कोई अज्ञानी रहना ही नहीं चाहिये था। अर्थात् सबको तत्त्वज्ञान हो जाना चाहिये था पर ऐसा देखनेमें नहीं आता। श्रद्धाविश्वासपूर्वक सुननेसे स्वरूपमें स्थित होनेमें सहायता तो जरूर मिलती है पर स्वरूपमें स्थित स्वयं ही होता है। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य तत्त्वज्ञानको असम्भव बतानेमें नहीं प्रत्युत उसे करणनिरपेक्ष बतानेमें है। मनुष्य किसी भी रीतिसे तत्त्वको जाननेका प्रयत्न क्यों न करे पर अन्तमें अपनेआपसे ही अपनेआपको जानेगा। श्रवण मनन आदि साधन तत्त्वके ज्ञानमें परम्परागत साधन माने जा सकते हैं पर वास्तविक बोध करणनिरपेक्ष (अपनेआपसे) ही होता है।अपनेआपसे अपनेआपको जानना क्या होता है एक होता है करना एक होता है देखना और एक होता है जानना। करनेमें कर्मेन्द्रियोंकी देखनेमें ज्ञानेन्द्रियोंकी और जाननेमें स्वयंकी मुख्यता होती है।ज्ञानेन्द्रियोंके द्वारा जानना नहीं होता प्रत्युत देखना होता है जो कि व्यवहारमें उपयोगी है। स्वयंके द्वारा जो जानना होता है वह दो तरहका होता है एक तो शरीरसंसारके साथ मेरी सदा भिन्नता है और दूसरा परमात्माके साथ मेरी सदा अभिन्नता है। दूसरे शब्दोंमें परिवर्तनशील नाशवान् पदार्थोंके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है और अपरिवर्तनशील अविनाशी परमात्माके साथ मेरा नित्य सम्बन्ध है। ऐसा जाननेके बाद फिर स्वतः अनुभव होता है। उस अनुभवका वाणीसे वर्णन नहीं हो सकता। वहाँ तो बुद्धि भी चुप हो जाती है। सम्बन्ध   अबतक देह और देहीका जो प्रकरण चल रहा था उसका आगेके श्लोकमें उपसंहार करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.29।।अपि च अव्यक्तादीनीति। नित्यः सन्तु अनित्या वा यस्तावदस्य शोचकस्तं प्रत्येष आदावव्यक्तः अन्ते चाव्यक्तः। मध्ये तस्य व्यक्तता विकारः ( N omit विकारः) इति। प्रत्युत विकारे शोचनीयं ( N शोचनीयस्वभावे) न स्वभावे। किं च यत् (N omits यत्) तन्मूलकारणं किञ्चिदभिमतं तदेव यथाक्रमं (S तथाक्रमविचित्र) विचित्रस्वभावतया स्वात्ममध्ये दर्शिततत्तदनन्तसृष्टिस्थितिसंहृतिवैचित्र्यं (S सृष्टिप्रतिसंहृति) नित्यमेव। तथास्वभावेऽपि कास्य (S स्वभावमिति कास्य) शोच्यता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.29।।अर्जुनं प्रत्युपालम्भं दर्शयित्वा प्रकृतस्यात्मनो दुर्विज्ञेयत्वात्तं प्रत्युपालम्भो न संभवतीति मन्वानः सन्नाह  दुर्विज्ञेय इति।  तथाचात्माज्ञाननिमित्तविप्रलम्भस्य साधारणत्वादसाधारणोपलम्भस्य निरवकाशतेत्याह  किं त्वामेवेति।  अहंप्रत्ययवेद्यत्वादात्मनो दुर्विज्ञेयत्वमसिद्धमिति शङ्कते  कथमिति।  विशिष्टस्यात्मनोऽहंप्रत्ययस्य दृष्टत्वेऽपि केवलस्य तदभावादस्ति दुर्विज्ञेयतेति श्लोकमवतारयति  आहेति।  आश्चर्यवदित्याद्येन पादेनात्मविषयदर्शनस्य दुर्लभत्वं दर्शयता द्रष्टुर्दौर्लभ्यमुच्यते द्वितीयेन च तद्विषयवेदनस्य दुर्लभत्वोक्तेस्तदुपदेष्टुस्तथात्वं कथ्यते तृतीयेन तदीयश्रवणस्य दुर्लभत्वद्वारा श्रोतुर्विरलता विवक्षिता श्रवणदर्शनोक्तीनां भावेऽपि तद्विषयसाक्षात्कारस्यात्यन्तायासलभ्यत्वं चतुर्थेनाभिप्रेतमिति विभागः। आत्मगोचरदर्शनादिदुर्लभत्वद्वारा दुर्बोधत्वमात्मनः साधयति  आश्चर्यवदिति।  संप्रत्यात्मनि दृष्टुर्वक्तुः श्रोतुः साक्षात्कर्तुश्च दुर्लभत्वाभिधानेन तदीयं दुर्बोधत्वं कथयति  अथवेति।  व्याख्यानद्वयेऽपि फलितमाह  अत   इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.29।।आश्चर्यवदिति श्लोकस्य न प्रकृतसङ्गतिर्दृश्यते तदुत्तरश्च पुनरुक्त इत्यत आह  देहयोगे ति। द्वन्द्वैकवद्भावोऽयम्। सर्वथेति बिम्बनाशाभावादिभिः सर्वैः प्रकारैरित्युपसंहर्तुमुत्तरेण श्लोकेन। ईश्वरसरूपत्वेऽपि कथमनाश इत्याशङ्कापरिहारहेतुत्वा दुपसंहर्तु मित्युक्तम्। अप्रमेयस्येस्यादिना प्रागुक्तत्वात्पुनरिति। एवं यः कश्चित्पश्यति स आश्चर्यवदित्याद्युक्त्वा चतुर्थपादेन तदुपपादनं क्रियते तं व्याचष्टे  दुर्लभत्वेने ति। दुर्लभत्वमाश्चर्यशब्दप्रवृत्तौ निमित्तमित्यर्थः। तत्कथमित्यत आह  तद्धी ति।आश्चर्यमनित्ये अष्टा.6।1।147 इत्यादिस्मतिं हिशब्देन सूचयति। सर्वेषामात्मद्रष्ट्वत्वात्कथमात्मद्रष्टा दुर्लभोऽपि येनाश्चर्यमुच्यते इत्यत आह  दुर्लभो ऽपीति। ईश्वरसरूपत्वादिनाऽऽत्मद्रष्टा दुर्लभ इति भावः। अनेन आश्चर्य एवाश्चर्यवदित्युच्त इत्युक्तं भवति। यत्प्रतिबिम्बस्य जीवस्य द्रष्टाऽपि दुर्लभः किं तत्सामर्थ्यं वर्णनीयम् इतीश्वरसामर्थ्यदर्शनम्। देहयोगवियोगस्येत्यादिनादेही नित्यं 2।30 इति (उत्तर) श्लोको (ऽपि) व्याख्यातः।स्वधर्मं 2।3138 इत्यादयः श्लोका अतिरोहितार्थत्वान्न व्याख्याताः। एवमुत्तरत्रापि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.29।।देहयोगवियोगस्य नियतत्वादात्मनश्चेश्वरसरूपत्वात् सर्वथानाशान्न शोकः कार्य इत्युपसंहर्तुमैश्वरं सामर्थ्यं पुनर्दर्शयति आश्चर्यवदिति। दुर्लभत्वेनेत्यर्थः। तद्ध्याश्चर्यं लोके। दुर्लभोऽपीश्वरसरूपत्वात्सूक्ष्मत्वाच्चात्मनस्तद्द्रष्टा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.29।।एवम् उक्तस्वभावं स्वेतरसमस्तवस्तुविसजातीयतया  आश्चर्यवद्  अवस्थितम् अनन्तेषु जन्तुषु महता तपसा क्षीणपाप उपचितपुण्यः  कश्चित् पश्यति  तथाविधः कश्चित् परस्मै  वदति  एवं कश्चिद् एव  श्रृणोति श्रुत्वा   अपि एनं  यथावद् अवस्थितं तत्त्वतो  न कश्चिद् वेद।  चकाराद् द्रष्टृवक्तृश्रोतृषु अपि तत्त्वतो दर्शनं तत्त्वतो वचनं तत्त्वतः श्रवणं दुर्लभम् इति उक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.29।। आश्चर्यवत् आश्चर्यम् अदृष्टपूर्वम् अद्भुतम् अकस्माद्दृश्यमानं तेन तुल्यं आश्चर्यवत् आश्चर्यमिव एनम् आत्मानं पश्यति कश्चित्। आश्चर्यवत् एनं वदति तथैव च अन्यः। आश्चर्यवच्च एनमन्यः श्रृणोति। श्रुत्वा दृष्ट्वा उक्त्वापि एनमात्मानं वेद न चैव कश्चित्। अथवा योऽयमात्मानं पश्यति स आश्चर्यतुल्यः यो वदति यश्च श्रृणोति सः अनेकसहस्रेषु कश्चिदेव भवति। अतो दुर्बोध आत्मा इत्यभिप्रायः।।अथेदानीं प्रकरणार्थमुपसंहरन्ब्रूते

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【 Verse 2.30 】

▸ Sanskrit Sloka: देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत | तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ||

▸ Transliteration: dehī nityamavadhyo ’yaṁ dehe sarvasya bhārata | tasmātsarvāni bhūtāni na tvaṁ śocitumarhasi ||

▸ Glossary: dehī: the soul; nityaṁ: eternally; avadhyaḥ: cannot be killed; ayaṁ: this soul; dehe: in the body; sarvasya: of everyone; bhārata: O descendant of Bhārata; tasmāt: therefore; sarvāṇi: all; bhūtāni: living entities (that are born); na: not; tvaṁ: yourself; śocituṁ arhasi: should grieve

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.30 O Bhārata, this that dwells in the body of everyone can never be destroyed; do not grieve for any creature.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.30।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन सबके देहमें यह देही नित्य ही अवध्य है। इसलिये सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.30।। हे भारत यह देही आत्मा सबके शरीर में सदा ही अवध्य है? इसलिए समस्त प्राणियों के लिए तुम्हें शोक करना उचित नहीं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.30 देही indweller? नित्यम् always? अवध्यः indestructible? अयम् this? देहे in the body? सर्वस्य of all? भारत O Bharata? तस्मात् therefore? सर्वाणि (for) all? भूतानि creatures? न not? त्वम् thou? शोचितुम् to grieve? अर्हसि (thou) shouldst.Commentary The body of any creature may be destroyed but the Self cannot be killed. Therefore you should not grieve regarding any creature whatever? Bhishma or anybody else.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.30. O descendant of Bharata ! This embodied One in the body of every one is for ever incapable of being slain. Therefore you should not lament over all beings.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.30 Be not anxious about these armies. The Spirit in man is imperishable.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.30 The self in the body, O Arjuna, is eternal and indestructible. This is so in the case of the selves in all bodies. Therefore, it is not fit for you to feet grief for any being.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.30 O descendant of Bharata, this embodied Self existing in everyone's body can never be killed. Therefore you ought not to grieve for all (these) beings.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.30 This, the Indweller in the body of everyone, is ever indestructible, O Arjuna; therefore, thou shouldst not grieve for any creature.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.30 Dehi etc. On these grounds, the permanent destruction-lessness of the Self [is established].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.30 The self within the body of everyone such as gods etc., must be considered to be eternally imperishable, though the body can be killed. Therefore, all beings from gods to immovable beings, even though they possess different forms, are all uniform and eternal in their nature as described above. The ineality and the perishableness pertain only to the bodies. Therefore, it is not fit for you to feel grief for any of the beings beginning from gods etc., and not merely for Bhisma and such others.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.30 Because of being partless and eternal, ayam, this dehi, embodied Self; nityam avadhyah, can never be killed, under any condition. That being so, although existing sarvasya dehe, in all bodies, in trees etc., this One cannot be killed on account of Its being allpervasive. Since the indewelling One cannot be killed although the body of everyone of the living beings be killed, tasmat, therefore; tvam, you; na arhasi, ought not; socitum, to grieve; for sarvani bhutani, all (these) beings, for Bhisma and others. Here [i.e. in the earlier verse.] it has been said that, from the standpoint of the supreme Reality, there is no occasion for sorrow or delusion. (This is so) not merely from the standpoint of the supreme Reality, but

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.30।। सबके शरीर में स्थित सूक्ष्म आत्मतत्त्व अवध्य है अर्थात् इसका वध नहीं किया जा सकता। केवल देह का ही नाश होता है। इसलिए अर्जुन को उपदेश किया जाता है कि इस महा समर में युद्ध करने और शत्रु संहार करने में किसी भी प्राणी के लिए शोक करना सर्वथा अनुचित है। युद्ध में वह शत्रुओं का सामना करे। यह उपदेश देने के पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण ने अत्यन्त युक्तियुक्त शैली में आत्मा की अनश्वरता और शरीरों के नश्वर स्वभाव को सिद्ध किया है। श्रीशंकराचार्य सही कहते हैं कि 11वें श्लोक से प्रारम्भ किये गये प्रकरण का यहाँ उपसंहार किया गया है।अब तक यह बताया गया कि पारमार्थिक सत्य की दृष्टि से शोक करने का कोई कारण नहीं है। न केवल पारमार्थिक दृष्टि से बल्कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.30।।   उपसंहरति  देहीति।  देही आत्मा देहे वध्यमानेऽपि सर्वाणि भूतानि भीष्मादीनि देहाश्च भरतादिदेहवदनित्या एवेति। तानुद्दिश्यापि शोचितुं नार्हसीति भारतेतिसंबोधनेन ध्वनितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.30।।इदानीं सर्वप्राणिसाधारणभ्रमनिवृत्तिसाधनमुक्तमुपसंहरति सर्वस्य प्राणिजातस्य देहे वध्यमानेऽप्ययं देही लिङ्गदेहोपाधिरात्मा वध्यो न भवतीति। नित्यं नियतम्। यस्मात्तस्मात्सर्वाणि भूतानि स्थूलानि सूक्ष्माणि च भीष्मादिभावापन्नान्युद्दिश्य त्वं न शोचितुमर्हसि स्थूलदेहस्याशोच्यत्वमपरिहार्यत्वात् लिङ्गदेहस्याशोच्यत्वमात्मवदेवावध्यत्वादिति न स्थूलदेहस्य त्वं न शोचितुमर्हसि स्थूलदेहस्याशोच्यत्वमपरिहार्यत्वात् लिङ्गदेहस्याशोच्यत्वमात्मवदेवावध्यत्वादिति न स्थूलदेहस्य लिङ्गदेहस्यात्मनो वा शोच्यत्वं युक्तिमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.30।।प्रकृतमर्थमुपसंहरति देहीति। सर्वाणि भूतानि कथमेते दीना अल्पबला बलवत्तरेण मया हन्तव्याः कथमेषां पुत्रादय एतैर्विना जीविष्यन्ति कथं वाहं भीष्मादिभिर्गुरुभिर्विना जीविष्यामीति शोचितुं नार्हसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.30।।पूर्वोक्तमुपसंहरन् शोकाभावमुपदिशति देहीति। देही सर्वस्य देहे अवध्यस्तस्मात्सर्वाणि भूतानि जातदेहानि नतु देही जायत इति त्वं शोचितुं ना र्ह৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ सि। भारतेति सम्बोधनात्तथाज्ञानभवत्वं बोध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.30।।तदेवं दुर्बोधमात्मतत्त्वं संक्षेपेणोपदिशन्नशोच्यत्वमुपसंहरति  देहीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.30।।यतो देही आत्मा जीवो नित्यमवध्यः सर्वस्यानेकविधस्य देहे तस्मात् सर्वाणि भूतानि न शोचितुमर्हसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.30।।अब यहाँ प्रकरणके विषयका उपसंहार करते हुए कहते हैं यह जीवात्मा सर्वव्यापी होनेके कारण सबके स्थावरजंगम आदि शरीरोंमें स्थित है तो भी अवयवरहित और नित्य होनेके कारण सदा सब अवस्थाओंमें अवश्य ही है। जिससे कि सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंका नाश किये जानेपर भी इस आत्माका नाश नहीं किया जा सकता इसलिये भीष्मादि सब प्राणियोंके उद्देश्यसे तुझे शोक करना उचित नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.30।। व्याख्या     देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत  मनुष्य देवता पशु पक्षी कीट पतंग आदि स्थावरजङ्गम् सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीरोंमें यह देही नित्य अवध्य अर्थात् अविनाशी है। अवध्यः  शब्दके दो अर्थ होते हैं (1) इसका वध नहीं करना चाहिये और (2) इसका वध हो ही नहीं सकता। जैसे गाय अवध्य है अर्थात् कभी किसी भी अवस्थामें गायको नहीं मारना चाहिये क्योंकि गायको मारनेमें बड़ा भारी दोष है पाप है। परन्तु देहीके विषयमें देहीका वध नहीं करना चाहिये ऐसी बात नहीं है प्रत्युत इस देहीका वध (नाश) कभी किसी भी तरहसे हो ही नहीं सकता और कोई कर भी नहीं सकता  विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति  (2। 17)। तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि   इसलिये तुम्हें किसी भी प्राणीके लिये शोक नहीं करना चाहिये क्योंकि इस देहीका विनाश कभी हो ही नहीं सकता और विनाशी देह क्षणमात्र भी स्थिर नहीं रहता।यहाँ  सर्वाणि भूतानि  पदोंमें बहुवचन देनेका आशय है कि कोई भी प्राणी बाकी न रहे अर्थात् किसी भी प्राणीके लिये शोक नहीं करना चाहिये।शरीर विनाशी ही है क्योंकि उसका स्वभाव ही नाशवान् है। वह प्रतिक्षण ही नष्ट हो रहा है। परन्तु जो अपना नित्यस्वरूप है उसका कभी नाश होता ही नहीं। अगर इस वास्तविकको जान लिया जाय तो फिर शोक होना सम्भव ही नहीं है। प्रकरण सम्बन्धी विशेष बात यहाँ ग्यारहवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतकका जो प्रकरण है यह विशेषरूपसे देही देह नित्यअनित्य सत्असत् अविनाशीविनाशी इन दोनोंके विवेकके लिये अर्थात् इन दोनोंको अलगअलग बतानेके लिये ही है। कारण कि जबतक देही अलग है और देह अलग है यह विवेक नहीं होगा तबतक कर्मयोग ज्ञानयोग भक्तियोग आदि कोईसा भी योग अनुष्ठानमें नहीं आयेगा। इतना ही नहीं स्वर्गादि लोकोंकी प्राप्तिके लिये भी देहीदेहके भेदको समझना आवश्यक है। कारण कि देहसे अलग देही न हो तो देहके मरनेपर स्वर्ग कौन जायगा अतः जितने भी आस्तिक दार्शनिक हैं वे चाहे अद्वैतवादी हों चाहे द्वैतवादी हों किसी भी मतके क्यो न हों सभी शरीरीशरीरके भेदको मानते ही हैं। यहाँ भगवान् इसी भेदको स्पष्ट करना चाहते हैं।इस प्रकरणमें भगवान्ने जो बात कही है वह प्रायः सम्पूर्ण मनुष्योंके अनुभवकी बात है। जैसे देह बदलता है और देही नहीं बदलता। अगर यह देही बदलता तो देहके बदलनेको कौन जानता पहले बाल्यावस्था थी फिर जवानी आयी कभी बीमारी आयी कभी बीमारी चली गयी इस तरह अवस्थाएँ तो बदलती रहती हैं पर इन सभी अवस्थाओंको जाननेवाला देही वही रहता है। अतः बदलनेवाला और न बदलनेवाला ये दोनों कभी एक नहीं हो सकते। इसका सबको प्रत्यक्ष अनुभव है। इसलिये भगवान्ने इस प्रकरणमें आत्माअनात्मा ब्रह्मजीव प्रकृतिपुरुष जडचेतन मायाअविद्या आदि दार्शनिक शब्दोंका प्रयोग नहीं किया है  (टिप्पणी प0 71.1) । कारण कि लोगोंने दार्शनिक बातें केवल सीखनेके लिये मान रखी हैं उन बातोंको केवल पढ़ाईका विषय मान रखा है। इसको दृष्टिमें रखकर भगवान्ने इस प्रकरणमें दार्शनिक शब्दोंका प्रयोग न करके देहदेही शरीरशरीरी असत्सत् विनाशीअविनाशी शब्दोंका ही प्रयोग किया है। जो इन दोनोंके भेदको ठीकठीक जान लेता है उसको कभी किञ्चिन्मात्र भी शोक नहीं हो सकता। जो केवल दार्शनिक बातें सीख लेते हैं उनका शोक दूर नहीं होता।एक छहों दर्शनोंकी पढ़ाई करना होता है और एक अनुभव करना होता है। ये दोनों बातें अलगअलग हैं और इनमें बड़ा भारी अन्तर है। पढ़ाईमें ब्रह्म ईश्वर जीव प्रकृति और संसार ये सभी ज्ञानके विषय होते हैं अर्थात् पढ़ाई करनेवाला तो ज्ञाता होता है और ब्रह्म ईश्वर आदि इन्द्रियों और अन्तःकरणके विषय होते हैं। पढ़ाई करनेवाला तो जानकारी बढ़ाना चाहता है विद्याका संग्रह करना चाहता है पर जो साधक मुमुक्षु जिज्ञासु और भक्त होता है वह अनुभव करना चाहता है अर्थात् प्रकृति और संसारसे सम्बन्धविच्छेद करके और अपनेआपको जानकर ब्रह्मके साथ अभिन्नताका अनुभव करना चाहता है ईश्वरके शरण होना चाहता है। सम्बन्ध   अर्जुनके मनमें कुटुम्बियोंके मरनेका शोक था और गुरुजनोंको मारनेके पापका भय था अर्थात् यहाँ कुटुम्बियोंका वियोग हो जायेगा तो उनके अभावमें दुःख पाना पड़ेगा यह शोक था और परलोकमें पापके कारण नरक आदिका दुःख भोगना पड़ेगा यह भय था। अतः भगवान्ने अर्जुनका शोक दूर करनेके लिये ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतकका प्रकरण कहा और अब अर्जुनका भय दूर करनेके लिये क्षात्रधर्मविषयक आगेका प्रकरण आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.30।।एवंविधं च आश्चर्यवदिति। ननु यद्येवमयमात्मा अविनाशी किमिति सर्वेण तथैव नोपलभ्यते यतः अद्भुतवत्कश्चिदेव पश्यति श्रुत्वापि एनं (N omit एनम्) न कश्चित् (S N न कश्चिदेव जा ( N कश्चिज्जा) नाति न वेत्ति) वेत्ति न (K omits न) जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.30।।श्लोकान्तरमुत्थापयति  अथेति।  आत्मनो दुर्ज्ञानत्वप्रदर्शनानन्तरमिति यावत्। वस्तुवृत्तापेक्षया शोकमोहयोरकर्तव्यत्वं प्रकरणार्थः। देहे वध्यमानेऽपि देहिनो वध्यत्वाभावे फलितमाह  यस्मादिति।  हेतुभागं विभजते  सर्वस्येति।  फलितप्रदर्शनपरं श्लोकार्धं व्याचष्टे  तस्माद्भीष्मादीनीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.30।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.30।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.30।। सर्वस्य  देवादिदेहिनो  देहे  वध्यमाने अपि  अयं देही नित्यम् अवध्य  इति मन्तव्यः। तस्मात्  सर्वाणि  देवादिस्थावरान्तानि  भूतानि  विषमाकाराणि अपि उक्तेन स्वभावेन स्वरूपतः समानानि नित्यानि च। देहगतं तु वैषम्यम् अनित्यत्वं च। ततो देवादीनि सर्वाणि भूतानि उद्दिश्य  न शोचितुम् अर्हसि  न केवलं भीष्मादीन् प्रति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.30।। देही शरीरी नित्यं सर्वदा सर्वावस्थासु अवध्यः निरवयवत्वान्नित्यत्वाच्च तत्र अवध्योऽयं देहे शरीरे सर्वस्य सर्वगतत्वात्स्थावरादिषु स्थितोऽपि सर्वस्य प्राणिजातस्य देहे वध्यमानेऽपि अयं देही न वध्यः यस्मात् तस्मात् भीष्मादीनि सर्वाणि भूतानि उद्दिश्य न त्वं शोचितुमर्हसि।।इह परमार्थतत्त्वापेक्षायां शोको मोहो वा न संभवतीत्युक्तम्। न केवलं परमार्थतत्त्वापेक्षायामेव। किं तु

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【 Verse 2.31 】

▸ Sanskrit Sloka: स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि | धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ||

▸ Transliteration: svadharmamapi cāvekṣya na vikampitumarhasi | dharmyāddhi yuddhācchreyo’nyat kṣatriyasya na vidyate ||

▸ Glossary: svadharmaṁ: one’s own responsibility; api: also; ca: and; avekṣya: considering; na: not; vikampitum: to hesitate; arhasi: you deserve; dharmyāt hi yuddhāt: from righteous war indeed; śreyaḥ: better; anyat: anything else; kṣatriyasya: of the kṣatriya; na: does not; vidyate: exist

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.31 You should look at your own responsibility [svadharma] as a kṣatriya. There is nothing higher for a kṣatriya than a righteous war. You ought not to hesitate.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.31।।अपने धर्मको देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्यकर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.31।। और स्वधर्म को भी देखकर तुमको विचलित होना उचित नहीं है? क्योंकि धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर दूसरा कोई कल्याणकारक कर्त्तव्य क्षत्रिय के लिये नहीं है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.31 स्वधर्मम् own duty? अपि also? च and? अवेक्ष्य looking at? न not? विकम्पितुम् to waver? अर्हसि (thou) oughtest? धर्म्यात् than righteous? हि indeed? युद्धात् than war? श्रेयः higher? अन्यत् other? क्षत्रियस्य of a Kshatriya? न not? विद्यते is.Commentary Lord Krishna now gives to Arjuna wordly reasons for fighting. Up to this time? He talked to Arjuna on the immortality of the Self and gave him philosophical reasons. Now He says to Arjuna? O Arjuna Fighting is a Kshatriyas own duty. You ought not to swerve from that duty. To a Kshatriyta (one born in the warrior or ruling class) nothing is more welcome than a righteous war. A warrior should fight.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.31. Further, considering your own duty, you should not waver. Indeed, for a Ksatriya there exists no duty superior to fighting a righteous war.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.31 Thou must look at thy duty. Nothing can be more welcome to a soldier than a righteous war. Therefore to waver in this resolve is unworthy, O Arjuna!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.31 Further, considering also your own duty, it does not befit you to waver. For, to a Ksatriya, there is no greater good than a righteous war.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.31 Even considering your own duty you should not waver, since there is nothing else better for a Ksatriya than a righteous battle.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.31 Further, having regard to thy duty, shouldst not waver, for there is nothing higher for a Kshatriya than a righteous war.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.31 Sva-Dharmam etc. Because one's duty cannot be avoided, wavering with regard to fighting the war is not proper [on the part of Arjuna].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.31 Further, even though there is killing of life in this war which has begun, it is not fit for you to waver, considering your own duty, as in the Agnisomiya and other sacrifices involving slaughter. To a Ksatriya, there is no greater good than a righteous war, begun for a just cause. It will be declared in the Gita: 'Valour, non-defeat (by the enemies), fortitude, adroitness and also not fleeing from battle, generosity, lordliness - these are the duties of the Ksatriya born of his very nature.' (18.43).

In Agnisomiya etc., no injury is caused to the animal to be immolated; for, according to the Vedic Text, the victim, a he-goat, after abandoning an inferior body, will attain heaven etc., with a beautiful body. The Text pertaining to immolation declares: 'O animal, by this (immolation) you will never die, you are not destroyed. You will pass through happy paths to the realm of the gods, where the virtuous only reach and not the sinful. May the god Savitr give you a proper place.' (Yaj. 4.6.9.46). Likewise the attainment of more beautiful bodies by those who die here in this war has been declared in the Gita, 'As a man casts off worn-out garments and takes others that are new ৷৷.' (2.22). Hence, just as lancing and such other operations of a surgeon are for curing a patient, the immolation of the sacrificial animal in the Agnisomiya etc., is only for its good.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.31 Api, even; aveksya, considering; svadharmam, your own duty, the duty of a Ksatriya, viz battle considering even that ; na arhasi, you ought not; vikampitum, to waver, to deviate from the natural duty of the Ksatriya, i.e. from what is natural to yourself. And hi, since that battle is not devoid of righteousness, (but) is supremely righteous it being conducive to virtue and meant for protection of subjects through conest of the earth ; therefore, na vidyate, there is nothing; anyat, else; sreyah, better; ksatriyasya, for a ksatriya; than that dharmyat, righteous; yuddhat, battle.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.31।। क्षत्रिय का कार्य समाज का राष्ट्र का नेतृत्व करना है और क्षत्रिय होने के नाते अर्जुन का कर्तव्य हो जाता है कि समाज पर आये अधर्म के संकट से उसकी रक्षा करे। उसका कर्तव्य है कि समाज के आह्वान पर युद्ध भूमि में विचलित न होकर शत्रुओं से युद्ध करके राष्ट्र की संस्कृति का रक्षण करे।क्षत्रियों के लिए इससे बढ़कर कोई और श्रेयष्कर कार्य नहीं हो सकता कि उनको धर्मयुक्त युद्ध में अपना शौर्य दिखाने का स्वर्ण अवसर मिले। यहाँ अधर्मियों ने ही पहले आक्रमण किया है। अत अर्जुन का युद्ध से विरत होना उचित नहीं। महाभारत के उद्योग पर्व में स्पष्ट कहा है निरपराध व्यक्ति की हत्या का पाप उतना ही बड़ा है जितना कि नाश करने योग्य व्यक्ति का नाश न करने का है।युद्ध का औचित्य सिद्ध करते हुए भगवान् अन्य कारण बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.31।।   इत्थमात्मतत्त्वापेक्षायां शोकमोहौ न संभवत् इत्युक्तम्। न केवलमात्मतत्त्वापेक्षायामेव किंतु स्वधर्ममपि चावेक्ष्येत्याह  स्वधर्ममपीति।  यत्तु कैश्चित्सर्वप्राणिसाधारणं भ्रमं निराकृत्यार्जुनस्यैवासाधारणं भ्रमं निराकरोतीत्युक्तं तत्पूर्वोक्तयुक्त्या निरसनीयम्। स्वधर्मं क्षत्रियस्य धर्मयुद्धं धर्मशास्त्रादवेक्ष्य विचार्य शोकमोहाभिभूतः स्वधर्माच्चालितुं नार्हसि। यस्मात्पृथिवीजयद्वारा युद्धस्य यज्ञादिधर्मार्थत्वेन ब्राह्मणादिप्रजारक्षणार्थत्वेन च धर्मादनपेताद्युद्धादन्यच्छ्रेयःसाधनं युद्धसदृशं क्षत्रियस्य न भवतीत्यर्थः। अतो मोक्षरुपश्रेयोर्थिनो ते युद्धेन स्वधर्मेणं जयं लब्ध्वा यज्ञाद्यनुष्ठानप्रजापालनादिभ्योऽन्यत्तत्साधनं न भवतीत्याशयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.31।।तदेवं स्थूलसूक्ष्मशरीरद्वयतत्कारणाविद्याख्योपाधित्रयाविवेकेन मिथ्याभूतस्यापि संसारस्य सत्यत्वात्मधर्मत्वादिप्रतिभासरूपं सर्वप्राणिसाधारणमर्जुनस्य भ्रमं निराकर्तुमुपाधित्रयविवेकेनात्मस्वरूपमभिहितवान्। संप्रति युद्धाख्ये स्वधर्मे

Chapter 2 (Part 20)

हिंसादिबाहुल्येनाधर्मत्वप्रतिभासरूपमर्जुनस्यैव करुणादिदोषनिबन्धनमसाधारणं भ्रमं निराकर्तुं हिंसादिमत्त्वेऽपि युद्धस्य स्वधर्मत्वेनाधर्मत्वाभावं बोधयति भगवान् न केवलं परमार्थतत्त्वमेवावेक्ष्य किंतु स्वधर्ममपि क्षत्रियधर्ममपि युद्धापराङगमुखत्वरूपमवेक्ष्य शास्त्रतः पर्यालोच्य विकम्पितुं विचलितुं धर्मादावधर्मत्वभ्रान्त्या निवर्तितुं नार्हसि। तत्रैवं सतियद्यप्येते न पश्यन्ति इत्यादिनानरके नियतं वासो भवति इत्यन्तेन युद्धस्य पापहेतुत्वं त्वया यदुक्तंकथं भीष्ममहं संख्ये इत्यादिना गुरुवधब्रह्मवधाद्यकरणं यदभिसंहितं तत्सर्वं धर्मशास्त्रापर्यालोचनादेवोक्तम्। कस्मात्। हि यस्मात् धर्म्यादपराङ्मुखत्वधर्मादनपेताद्युद्धादन्यत्क्षत्रियस्य श्रेयः श्रेयःसाधनं न विद्यते। युद्धमेव हि पृथिवीजयद्वारेण प्रजारक्षणब्राह्मणशुश्रूषादिक्षात्रधर्मनिर्वाहकमिति तदेव क्षत्रियस्य प्रशस्ततरमित्यभिप्रायः। तथाचोक्तं पराशरेण क्षत्रियो हि प्रजा रक्षञ्शस्त्रपाणिः प्रदण्डवान्। निर्जित्य परसैन्यानि क्षितिं धर्मेण पालयेत्।। मनुनापि समोत्तमाधमै राजा चाहूतः पालयन्प्रजाः। न निवर्तेत संग्रामात्क्षात्रं धर्ममनुस्मरन्।।संग्रामेष्वनिवर्तित्वं प्रजानां चैव पालनम्। शुश्रूषा ब्राह्मणानां च राज्ञः श्रेयस्करं परम्।। इत्यादिना। राजशब्दश्च क्षत्रियजातिमात्रवाचीति स्थितमवेष्ट्यधिकरणे। तेन भूमिपालस्यैवायं धर्म इति न भ्रमितव्यम्। उदाहृतवचनेऽपि क्षत्रियो हीति क्षात्रं धर्ममिति च स्पष्टं लिङ्गम्। तस्मात्क्षत्रियस्य युद्धं प्रशस्तो धर्म इति साधु भगवताभिहितम्अपशवोऽन्ये गोअश्वेभ्यः पशवो गोअश्वाः इतिवत्प्रशंसालक्षणया युद्धादन्यच्छ्रेयःसाधनं न विद्यत इत्युक्तमिति न दोषः। एतेन युद्धात्प्रशस्ततरं किंचिदनुष्ठातुं ततो निवृत्तिरुचितेति निरस्तम्न च श्रेयोऽनु पश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे इत्येतदपि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.31।।अर्जुनस्य अनात्मनि देहे आत्मधीरूपो मोहो निवारितः। इदानीं स्वधर्मे युद्धे अधर्मधीरूपं मोहं निवारयति  स्वधर्ममपीत्यादिना।  युद्धं क्षत्रियस्य स्वो धर्मः तमवेक्ष्यापि विकम्पितुं चलितुं नार्हसि। हि यस्मात् धर्म्यात् धर्मादनपेताद्युद्धादन्यत् क्षत्रियस्य श्रेयः प्रशस्ततरं नास्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.31।।एवमात्मस्वरूपज्ञानेन शोको न कर्त्तव्य इत्युक्त्वा स्वधर्मादपि मा शुच इत्याह स्वधर्ममपीति। स्वधर्म क्षात्त्रमवेक्ष्य विकम्पितुं नार्हसि यतः क्षत्ित्रयाणामयमेवोत्तमो धर्म इत्याह धर्म्यादिति। धर्म्याद्युद्धादन्यत् क्षत्ित्रयस्य श्रेयो न विद्यते। क्षत्ित्रयाणां परलोकादिकं त्वनेनैव भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.31।।यच्चोक्तमर्जुनेनवेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते इति तदप्ययुक्तमित्याह  स्वधर्ममिति।  आत्मनो नाशाभावादेवैतेषां हननेऽपि विकम्पितुं नार्हसि। किंच स्वधर्ममप्यवेक्ष्य विकम्पितुं नार्हसीति संबन्धः। यच्चोक्तंन च श्रेयोऽनु पश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे इत्यादि तत्राह  धर्म्यादिति।  धर्मादनपेतान्न्याय्याद्युद्धादन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.31।।किञ्च यदुक्तंवेपथुश्च शरीर मे 1।29 इत्यादिधर्मविरुद्धमात्मलक्षमं तदप्ययुक्तमित्याह स्वधर्ममिति। धर्मनिष्ठस्य नैतदुचितमित्याह धर्म्यादिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.31।।यहाँ यह कहा गया कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक या मोह करना नहीं बन सकता। केवल इतना ही नहीं कि परमार्थतत्त्वकी अपेक्षासे शोक और मोह नहीं बन सकते किंतु क्षत्रियके लिये जो युद्धरूप स्वधर्म है उसे देखकर भी तुझे कम्पित होना उचित नहीं है अभिप्राय यह कि अपने स्वाभाविक धर्मसे विचलित होना ( हटना ) भी तुझे उचित नहीं है। क्योंकि वह युद्ध पृथ्वीविजयद्वारा धर्मपालन और प्रजारक्षणके लिये किया जाता है इसलिये धर्मसे ओतप्रोत परम धर्म्य है अतः उस धर्ममय युद्धके सिवा दूसरा कुछ क्षत्रियके लिये कल्याणप्रद नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.31।। व्याख्या   पहले दो श्लोकोंमें युद्धसे होनेवाले लाभका वर्णन करते हैं। स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि   यह स्वयं परमात्माका अंश है। जब यह शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है तब यह स्व को अर्थात् अपनेआपको जो कुछ मानता है उसका कर्तव्य स्वधर्म कहलाता है। जैसे कोई अपनेआपको ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य अथवा शूद्र मानता है तो अपनेअपने वर्णोचित कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपने को शिक्षक या नौकर मानता है तो शिक्षक या नौकरके कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है। कोई अपनेको किसीका पिता या किसीका पुत्र मानता है तो पुत्र या पिताके प्रति किये जानेवाले कर्तव्योंका पालन करना उसका स्वधर्म है।यहाँ क्षत्रियके कर्तव्यकर्मको धर्म नामसे कहा गया है  (टिप्पणी प0 71.2) । क्षत्रियका खास कर्तव्यकर्म है युद्धसे विमुख न होना। अर्जुन क्षत्रिय हैं अतः युद्ध करना उनका स्वधर्म है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि अगर स्वधर्मको लेकर देखा जाय तो भी क्षात्रधर्मके अनुसार तुम्हारे लिये युद्ध करना ही कर्तव्य है। अपने कर्तव्यसे तुम्हें कभी विमुख नहीं होना चाहिये। धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते   धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है अर्थात् क्षत्रियके लिये क्षत्रियके कर्तव्यका अनुष्ठान करना ही खास काम है (गीता 18। 43)। ऐसे ही ब्राह्मण वैश्य और शूद्रके लिये भी अपनेअपने कर्तव्यका अनुष्ठान करनेके सिवाय दूसरा कोई कल्याणकारी कर्म नहीं है।अर्जुनने सातवें श्लोकमें प्रार्थना की थी कि आप मेरे लिये निश्चित श्रेयकी बात कहिये। उसके उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि श्रेय (कल्याण) तो अपने धर्मका पालन करनेसे ही होगा। किसी भी दृष्टिसे अपने धर्मका त्याग कल्याणकारक नहीं है। अतः तुम्हें अपने युद्धरूप धर्मसे विमुख नहीं होना चाहिये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.31।।देहीति। अतो नित्यमात्मनोऽविनाशित्वम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.31।।श्लोकान्तरमवतारयन्वृत्तं कीर्तयति  इहेति।  पूर्वश्लोकः सप्तम्यर्थः यत्पारमार्थिकं तत्त्वं तदपेक्षायामेव केवलं शोकमोहयोरसंभवो न भवति किंतु स्वधर्ममपि चावेक्ष्येति संबन्धः। स्वकीयं क्षात्रधर्ममनुसंधाय ततश्चलनं परिहर्तव्यमित्यर्थः। यद्धि क्षत्रियस्य धर्मादनपेतं श्रेयःसाधनं तदेव मयानुवर्तितव्यमित्याशङ्क्याह  धर्मादिति।  जातिप्रयुक्तं स्वाभाविकं स्वधर्ममेव विशिनष्टि   क्षत्रियस्येति।  पुनर्नकारोपादानमन्वयार्थम्। प्रचलितुमयोग्यत्वे प्रतियोगिनं दर्शयति  स्वाभाविकादिति।  स्वाभाविकत्वमशास्त्रीयत्वमिति शङ्कां वारयितुं तात्पर्यमाह  आत्मेति।  आत्मनः स्वस्यार्जुनस्य स्वाभाव्यं क्षत्रियस्वभावप्रयुक्तं वर्णाश्रमोचितं कर्म तस्मादित्यर्थः। धर्मार्थं प्रजापरिपालनार्थं च प्रयतमानस्य युद्धादुपरिरंसा श्रद्धातव्येत्याशङ्क्याह  तच्चेति।  ततोऽपि श्रेयस्करं किंचिदनुष्ठातुं युद्धादुपरतिरुचितेत्याशङ्क्याह  तस्मादिति।  तस्माद्युद्धात्प्रचलनमनुचितमिति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.31।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.31।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.31।।अपि च इदं प्रारब्धं युद्धं प्राणिमारणम् अपि अग्नीषोमीयादिवत्  स्वधर्मम् अवेक्ष्य न विकम्पितुम् अर्हसि धर्म्यात्  न्यायतः प्रवृत्तात्  युद्धाद् अन्यत् न हि क्षत्रियस्य श्रेयो विद्यते। शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।(गीता 18।43) इति हि वक्ष्यते।अग्नीषोमीयादिषु च न हिंसा पशोः निहीनतरच्छागादिदेहपरित्यागपूर्वककल्याणदेहस्वर्गादिप्रापकत्वश्रुतेः संज्ञपनस्य।न वा उ वेतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ इदेषि पथिभिः सुगेभिः। यत्र यान्ति सुकृतो नापि दुष्कृतस्तत्र त्वा देवः सविता दधातु (यजुर्वेद 4।6।9।43) इति हि श्रूयते।इह च युद्धे मृतानां कल्याणतरदेहादिप्राप्तिः उक्ता वासांसि जीर्णानि (गीता 2।22) इत्यादिना। अतः चिकित्सककर्म आतुरस्थ इव अस्य रक्षणम् एव अग्नीषोमीयादिषु संज्ञपनम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.31।। स्वधर्ममपि स्वो धर्मः क्षत्रियस्य युद्धं तमपि अवेक्ष्य त्वं न विकम्पितुं प्रचलितुम् नार्हसि क्षत्रियस्य स्वाभाविकाद्धर्मात् आत्मस्वाभाव्यादित्यभिप्रायः। तच्च युद्धं पृथिवीजयद्वारेण धर्मार्थं प्रजारक्षणार्थं चेति धर्मादनपेतं परं धर्म्यम्। तस्मात् धर्म्यात् युद्धात् श्रेयः अन्यत् क्षत्रियस्य न विद्यते हि यस्मात्।।कुतश्च तत् युद्धं कर्तव्यमिति उच्यते

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【 Verse 2.32 】

▸ Sanskrit Sloka: यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम् | सुखिन: क्षत्रिया: पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम् ||

▸ Transliteration: yadṛcchayā copapannaṁ svargadvāramapāvṛtam | sukhinaḥ kṣatriyāḥ pārtha labhante yuddhamīdṛśam ||

▸ Glossary: yadṛcchayā: by its own accord; ca: also; upapannaṁ: arrived; svargadvāraṁ: gate of heaven; apāvṛtaṁ: wide open; sukhinaḥ: happy; kṣatriyāḥ: the members of the royal order; pārtha: O son of Pritā; labhante: achieve; yuddhaṁ: war; īdṛśaṁ: like this

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.32 O Pārtha, happy indeed are the kṣatriyas who are called to fight in such a battle without seeking. This opens for them the door to heaven.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.1।।सञ्जय बोले वैसी कायरतासे आविष्ट उन अर्जुनके प्रति जो कि विषाद कर रहे हैं और आँसुओंके कारण जिनके नेत्रोंकी देखनेकी शक्ति अवरुद्ध हो रही है भगवान् मधुसूदन ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.32।। और हे पार्थ अपने आप प्राप्त हुए और स्वर्ग के लिए खुले हुए द्वाररूप इस प्रकार के युद्ध को भाग्यवान क्षत्रिय लोग ही पाते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.32 यदृच्छया of itself? च and? उपपन्नम् come? स्वर्गद्वारम् the gate of heaven? अपावृतम् opened? सुखिनः happy? क्षत्रियाः Kshatriyas? पार्थ O Partha? लभन्ते obtain? युद्धम् battle? ईदृशम् such.Commentary The scriptures declare that if a Kshatriya dies for a righteous cause on the battlefield? he at once goes to heaven.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.32. O son of Prtha ! By good fortune, Ksatriyas, desirous of happiness, get a war of this type [to fight], which has come on its own accord and which is an open door to the heaven.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.32 Blessed are the soldiers who find their opportunity. This opportunity has opened for thee the gates of heaven.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.32 Happy are the Ksatriyas, O Arjuna, to whom a war like this comes of its own accord; it opens the gate to heaven.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.32 O son of Partha, happy are the Ksatriyas who come across this kind of a battle, which presents itself unsought for and which is an open gate to heaven.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.32 Happy are the Kshatriyas, O Arjuna! who are called upon to fight in such a battle that comes of itself as an open door to heaven.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.32 Yadrcchaya etc. A war of this nature, because it is conducive to the heaven, should not be avoided even by other such Ksatriyas who are full of desires How much less [it is to be avoided] in the case of one to whom the science of knowledge of this nature has been taught ? This is what is intended to be conveyed [here] And the verse does not at all end with [determining how to attain] the heaven. The very thing (i.e. sin), fearing which you withdraw from the battle, will befall you branching off hundredfold. This [the Lord] says-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.32 Only the fortunate Ksatriyas, i.e., the meritorious ones, gian such a war as this, which has come unsought, which is the means for the attainment of immeasurable bliss, and which gives an unobstructed pathway to heaven.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.32 Why, again, does that battle become a duty? This is being answered (as follows) [A specific rule is more authoritative than a general rule. Non-violence is a general rule enjoined by the scriptures, but the duty of fighting is a specific rule for a Ksatriya.]: Partha, O son of Partha; are not those Ksatiryas sukhinah, happy [Happy in this world as also in the other.] who labhante, come across; a yuddham, battle; idrsam, of this kind; upapannam, which presents itself; yadrcchaya, unsought for; and which is an apavrtam, open; svarga-dvaram, gate to heaven? [Rites and duties like sacrifices etc. yield their results after the lapse of some time. But the Ksatriyas go to heaven immediatley after dying in battle, because, unlike the minds of others, their minds remaind fully engaged in their immediate duty.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.32।। क्षत्रिय शब्द का तात्पर्य यहाँ जन्म से निश्चित की हुई क्षत्रिय जाति से नहीं है। यह व्यक्ति के मन की कतिपय विशिष्ट वासनाओं की ओर संकेत करता है। क्षत्रिय प्रवृति का व्यक्ति वह है जिसमें सार्मथ्य और उत्साह का ऐसा उफान हो कि वह दुर्बल और दरिद्र लोगों की रक्षा के साथ संस्कृति के शत्रुओं से राष्ट्र का रक्षण कर सके। हिन्दू नीतिशास्त्र के अनुसार ऐसे नेतृत्व के गुणों से सम्पन्न व्यक्ति को स्वयं ही संस्कृति का विनाशक और आक्रमणकारी नहीं होना चाहिये। किन्तु अधर्म का प्रतिकार न करने की कायरतापूर्ण भावना भी हिन्दुओं की परम्परा नहीं है। जब भी कभी ऐसा सुअवसर प्राप्त हो तो क्षत्रियों का कर्तव्य है कि वे इसे स्वर्ण अवसर समझ कर राष्ट्र का रक्षण करें। इस प्रकार के धर्मयुद्ध स्वर्ग की प्राप्ति के लिए खुले हुए द्वार के समान होते हैं।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि भगवान् श्रीकृष्ण अपने तर्क प्रस्तुत करते हुए वेदान्त के सर्वोच्च सिद्धांत से उतर कर भौतिकवादियों के स्तर पर आये और उससे भी नीचे के स्तर पर आकर वे जगत् के एक सामान्य व्यक्ति के दृष्टिकोण से भी परिस्थिति का परीक्षण करते हैं। इन विभिन्न दृष्टिकोणों से वे अर्जुन को यह सिद्ध कर दिखाते हैं कि उसका युद्ध करना उचित है।निश्चय ही युद्ध करना तुम्हारा कर्तव्य है और अब यदि इसे छोड़कर तुम भागते हो तब

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.32।।   स्वधर्मत्वाद्युद्धं प्रयत्नेनापि क्षत्रियैः संपाद्यते तव तु भाग्यवशाद्भवत्प्रयन्त्रींविनैवोपपन्नं अतः कर्तव्यमेवेत्याह  यदृच्छयेति।  अप्रार्थिततयागतं सद्यःस्वर्गप्रदं यतः उद्धाटितं स्वर्गद्वारं ये ईदृशं युद्धं क्षत्रिया लभन्ते त एव सुखिनः राज्य स्वर्गादिसुखभाजः। पार्थेति संबोधयन्स्वोत्साहसदृशे उत्साहे प्रेरयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.32।।ननु युद्धस्य कर्तव्यत्वेऽपि न भीष्मद्रोणादिभिर्गुरुभिः सह तत्कर्तुमुचितमतिगर्हितत्वादित्याशङ्क्याह यदृच्छया स्वप्रयत्नव्यतिरेकेण। चोऽवधारणे। अप्रार्थनयैवोपस्थितमीदृशं भीष्मद्रोणादिवीरपुरुषप्रतियोगिकं कीर्तिराज्यलाभदृष्टफलसाधनं युद्धं ये क्षत्रियाः प्रतियोगिकत्वेन लभन्ते ते सुखभाज एव। जये सत्यनायासेनैव यशसो राज्यस्य च लाभात् पराजये वातिशीघ्रमेव स्वर्गस्य लाभादित्याह स्वर्गद्वारमपावृतमिति। अप्रतिबद्धं स्वर्गसाधनं युद्धमव्यवधानेनैव स्वर्गजनकम्। ज्योतिष्टोमादिकं तु चिरतरेण। देहपातस्य प्रतिबन्धाभावस्य चापेक्षणादित्यर्थः। स्वर्गद्वारमित्यनेन श्येनादिवत्प्रत्यवायशङ्का परिहृता। श्येनादयो हि विहिता अपि फलदोषेण दुष्टाः। तत्फलस्य शत्रुवधस्यन हिंस्यात्सर्वा भूतानिब्राह्मणं न हन्यात् इत्यादिशास्त्रनिषिद्धस्य प्रत्यवायजनकत्वात् फले विध्यभावाच्च नविधिस्पृष्टे निषेधानवकाशः इति न्यायावतारः। युद्धस्य हि फलं स्वर्गः स च न निषिद्धः। तथाच मनुःआहवेषु मिथोन्योन्यं जिघांसन्ते महीक्षितः। युध्यमानाः परं शक्त्या स्वर्गं यान्त्यपराङ्मुखाः।। इति। युद्धं तु अग्नीषोभीयाद्यालम्भवद्विहित्वान्न निषेधेन स्प्रष्टुं शक्यते षोडशिग्रहणादिवद्ग्रहणाग्रहणयोस्तुल्यबलतया विकल्पवत्सामान्यशास्त्रस्य विशेषशास्त्रेण संकोचसंभवात्। तथाचविधिस्पृष्टे निषेधानवकाशः इति न्यायाद्युद्धं न प्रत्यवायजनकम्। नापि भीष्मद्रोणादिगुरुब्राह्मणादिवधनिमित्तो दोषस्तेषामाततायित्वात्। तदुक्तं मनुनागुरुं वा बालवृद्धौ वा ब्राह्मणं वा बहुश्रुतम्। आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन्।।आततायिनमायान्तमपि वेदान्तपारगम्। जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत्।।नाततायिवधे दोषो हन्तुर्भवति कश्चन।। इत्यादि। ननुस्मृत्योर्विरोधे न्यायस्तु बलवान्व्यवहारतः। अर्थशास्त्रात्तु बलवद्धर्मशास्त्रमिति स्थितिः।। इति याज्ञवल्क्यवचनादाततायिब्राह्मणवधेऽपि प्रत्यवायोऽस्त्येव।ब्राह्मणं न हन्यात् इति हि दृष्टप्रयोजनानपेक्षत्वाद्धर्मशास्त्रम्जिघांसन्तं जिघांसीयान्न तेन ब्रह्महा भवेत् इति च स्वजीवनार्थत्वादर्थशास्त्रम्। अत्रोच्यतेब्रह्मणे ब्राह्मणमालभेत इतिवद्युद्धविधायकमपि धर्मशास्त्रमेव।सुखदुःखे समे कृत्वा इत्यत्र दृष्टप्रयोजनानपेक्षत्वस्य वक्ष्यमाणत्वात्। याज्ञवल्क्यवचनं तु दृष्टप्रयोजनोद्देश्यककूटयुद्धादिकृतवधविषयमित्यदोषः। मिताक्षराकारस्तु धर्मार्थसंनिपातेऽर्थग्राहिण एतदेवेति द्वादशवार्षिकप्रायश्चित्तस्यैतच्छब्दपरामृष्टस्यापस्तम्बेन विधानान्मित्रलब्ध्याद्यर्थशास्त्रानुसारेण चतुष्पाद्व्यवहारे शत्रोरपि जये धर्मशास्त्रातिक्रमो न कर्तव्य इत्येतत्परं वचनमेतत् इत्याह। भवत्वेवं न नो हानिः। तदेवं युद्धकरणे सुखोक्तेःस्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव इत्यर्जुनोक्तमपाकृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.32।।किञ्च यदृच्छया अप्रार्थितमप्युपपन्नमुपस्थितं स्वर्गद्वारं अपावृतमुद्धाटितं ये क्षत्रिया लभन्ते ते सुखिनो धन्या भवन्तीति संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.32।।तस्मादेतादृशं भाग्यवन्त एव लभन्ते इत्याह यदृच्छयेति। यदृच्छया भगवदिच्छया उपपन्नम्। अपावृतमुद्धाटितकपाटस्वर्गद्वारम्। ईदृशं युद्धं क्षत्ित्रयाः सुखिनो भाग्यवन्तो लभन्ते। प्राप्नुवन्ति एतादृशयुद्धाप्तौ भाग्यवत्त्वं भगवदिच्छयानुरूपत्वाद्भगवत्सन्निधित्वाच्चेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.32।।किंच महति श्रेयसि स्वयमेवोपगते सति कुतो विकम्पस इत्याह  यद्दच्छयेति।  यदृच्छयाऽप्रार्थितमेवोपपन्नं प्राप्तमीदृशं युद्धं सुखिनः सभाग्या एव लभन्ते। यतो निरावरणं स्वर्गद्वारमेवैतत्। यद्वा य एवंविधं युद्धं लभन्ते त एव सुखिन इत्यर्थः। एतेनस्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम इति यदुक्तं तन्निरस्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.32।।तदेतदुपपादयति यदृच्छयेति। सुखिनो भाग्यवन्तः युद्धं स्वर्गद्वारभूतम्।द्वौ सम्मताविह मृत्यू दुरापौ इति भागवतवाक्यात् 6।10।33।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.32।।और भी वह युद्ध किसलिये कर्तव्य है सो कहते हैं हे पार्थ अनिच्छासे प्राप्त बिना माँगे मिले हुए ऐसे खुले हुए स्वर्गद्वाररूप युद्धको जो क्षत्रिय पाते हैं क्या वे सुखी नहीं हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.32।। व्याख्या  यदृच्छया चोपपन्नं स्वर्गद्वारमपावृतम्   पाण्डवोंसे जूआ खेलनेमें दुर्योधनने यह शर्त रखी थी कि अगर इसमें आप हार जायँगे  तो आपको बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास भोगना होगा। तेरहवें वर्षके बाद आपको अपना राज्य मिल जायगा। परन्तु अज्ञातवासमें अगर हमलोग आपलोगोंको खोज लेंगे तो आपलोगोंको दुबारा बारह वर्षका वनवास भोगना पड़ेगा। जूएमें हार जानेपर शर्तके अनुसार पाण्डवोंने बारह वर्षका वनवास और एक वर्षका अज्ञातवास भोग लिया। उसके बाद जब उन्होंने अपना राज्य माँगा तब दुर्योधनने कहा कि मैं बिना युद्ध किये सुईकी तीखी नोकजितनी जमीन भी नहीं दूँगा। दुर्योधनके ऐसा कहनेपर भी पाण्डवोंकी ओरसे बारबार सन्धिका प्रस्ताव रखा गया पर दुर्योधनने पाण्डवोंसे सन्धि स्वीकार नहीं की। इसलिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि यह युद्ध तुमलोगोंको अपनेआप प्राप्त हुआ है। अपनेआप प्राप्त हुए धर्ममय युद्धमें जो क्षत्रिय शूरवीरतासे लड़ते हुए मरता है उसके लिये स्वर्गका दरवाजा खुला हुआ रहता है। सुखिनः क्षत्रियाः पार्थ लभन्ते युद्धमीदृशम्   ऐसा धर्ममय युद्ध जिनको प्राप्त हुआ है वे क्षत्रिय बड़े सुखी हैं। यहाँ सुखी कहनेका तात्पर्य है कि अपने कर्तव्यका पालन करनेमें जो सुख है वह सुख सांसारिक भोगोंको भोगनेमें नहीं है। सांसारिक भोगोंका सुख तो पशुपक्षियोंको भी होता है। अतः जिनको कर्तव्यपालनका अवसर प्राप्त हुआ है उनको बड़ा भाग्यशाली मानना चाहिये। सम्बन्ध   युद्ध न करनेसे क्या हानि होती है इसका आगेके चार श्लोकोंमें वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.32।।स्वधर्ममिति। स्वधर्मस्य च अनपहार्यत्वात् (S N अपरिहार्यत्त्वात्) युद्धविषयः कम्पो न युक्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.32।।युद्धस्य गुर्वाद्यनेकप्राणिहिंसात्मकस्याहिंसाशास्त्रविरोधान्नास्ति कर्तव्यतेति शङ्कते  कुतश्चेति।  अग्नीषोमीयहिंसादिवद्युद्धमपि क्षत्रियस्य विहितत्वादनुष्ठेयं सामान्यशास्त्रतो विशेषशास्त्रस्य बलीयस्त्वादित्याह  उच्यत इति।  तथापि युद्धे प्रवृत्तानामैहिकामुष्मिकस्यापि सुखाभावादुपरतिरेव ततो युक्ता प्रतिभातीत्याशङ्क्याह  यदृच्छयेति।  चिरेण चिरतरेण कालेन च यागाद्यनुष्ठायिनः स्वर्गादिभाजो भवन्ति युध्यमानास्तु क्षत्रिया बहिर्मुखताविहीनाः सहसैव स्वर्गादिसुखभोक्तारस्तेन तव कर्तव्यमेव युद्धमिति व्याख्यानेन स्फुटयति  यदृच्छयेत्यादिना।  इहामुत्र च भाविसुखवतामेव क्षत्रियाणां स्वधर्मभूतयुद्धसिद्धेस्तादर्थ्येनोत्थानं शोकमोहौ हित्वा कर्तव्यमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.32।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.32।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.32।।अयत्नोपनतम् इदं निरतिशयसुखोपायभूतं निर्विघ्नम्  ईदृशं युद्धं सुखिनः  पुण्यवन्तः  क्षत्रिया लभन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.32।। यदृच्छया च अप्रार्थिततया उपपन्नम् आगतं स्वर्गद्वारम् अपावृतम् उद्धाटितं ये एतत् ईदृशं युद्धं लभन्ते क्षत्रियाः हे पार्थ किं न सुखिनः तेएवं कर्तव्यताप्राप्तमपि

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【 Verse 2.33 】

▸ Sanskrit Sloka: अथ चेतत्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि | तत: स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ||

▸ Transliteration: atha cettvamimaṁ dharmyaṁ saṅgrāmaṁ na kariṣyasi | tataḥ svadharmaṁ kīrtiṁ ca hitvā pāpamavāpsyasi ||

▸ Glossary: atha: therefore; cet: if; tvaṁ: you; imaṁ: this; dharmyaṁ: righteous; saṅgrāmaṁ: war; na: do not; kariṣyasi: you will perform; tataḥ: then; svad- harmaṁ: your duty; kīrtiṁ: reputation; ca: also; hitvā: having lost; pāpaṁ: sin; avāpsyasi: do gain

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.33 If you will not fight this righteous war, then you will incur sin having abandoned your own responsibility [svadharma], and you will lose your reputation.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.2।।श्रीभगवान् बोले (टिप्पणी प0 38.1) हे अर्जुन इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.33।। और यदि तुम इस धर्मयुद्ध को स्वीकार नहीं करोगे? तो स्वधर्म और कीर्ति को खोकर पाप को प्राप्त करोगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.33 अथ चेत् but if? त्वम् thou? इमम् this? धर्म्यम् righteous? संग्रामम् warfare? न not? करिष्यसि will do? ततः,then? स्वधर्मम् own duty? कीर्तिम् fame? च and? हित्वा having abandoned? पापम् sin? अवाप्स्यसि shall incur.Commentary The Lord reminds Arjuna of the fame he had already earned and which he would now lose if he refused to fight. Arjuna had acired great fame by fighting with Lord Siva. Arjuna proceeded on a pilgrimage to the Himalayas. He fought with Siva Who appeared in the guise of a mountaineer (Kirata) and got from Him the Pasupatastra? a celestial weapon.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.33. On the other hand, if you will not fight this righteous war then you shall incur the sin by avoiding your own duty and fame.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.33 Refuse to fight in this righteous cause, and thou wilt be a traitor, lost to fame, incurring only sin.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.33 But if you do not fight this righteous war, you will be turning away from your duty and honoured position, and will be incurring sin.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.33 On the other hand, if you will not fight this righteous battle, then, forsaking your own duty and fame, you will incur sin.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.33 But if thou wilt not fight this righteous war, then having abandoned thine own duty and fame, thou shalt incur sin.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.33 See Comment under 2.37

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.33 If in delusion, you do not wage this war, which has started and which is the duty of a Ksatriya, then, owing to the non-performance of your immediate and incumbent duty, you will lose the immeasurable bliss which is the fruit of discharging your duty and the immeasurable fame which is the fruit of victory. In addition, you will incur extreme sin.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.33 Atha, on the other hand; cet, if; tvam, you; na karisyasi, will not fight; even imam, this; dharmyam, righteous; samgramam, battle, which has presented itself as a duty, which is not opposed to righteousness, and which is enjoined (by the scriptures); tatah, then, because of not undertaking that; hitva, forsaking; sva-dharmam, your own duty; ca, and; kritim, fame, earned from encountering Mahadeva (Lord Siva) and others; avapsyasi, you will incur; only papam, sin.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.33।। यदि तुम इस युद्ध से विरत हो जाओगे तो न केवल स्वधर्म और कीर्ति को ही खो दोगे वरन् निश्चय रूप से पाप के भागीदार भी बनोगे। अधर्मियों का प्रतिकार न करना निरपराध व्यक्ति की हत्या करने के समान ही घोर पाप है।धर्म शब्द का विवेचन पहले किया जा चुका है। प्रत्येक प्राणी पूर्वार्जित वासनाओं के साथ किसी देह विशेष में विशेष प्रयोजनार्थ इस जगत् में जन्म लेता है। वह विशेष प्रयोजन इन वासनाओं का क्षय करके स्वस्वरूप को पहचानना है। प्रत्येक व्यक्ति जिन वासनाओं के साथ जन्म लेता है वहीं उसका स्वधर्म स्वभाव कहलाता है। अर्जुन का स्वधर्म क्षत्रिय का है जिसका विशेष गुण आदर और यशपूर्ण शौर्य है।वासना क्षय के लिए जीवन में प्राप्त इन अवसरों को खो देना विकास के मार्ग में बाधा उत्पन्न करना है। यदि इनका क्षय न हुआ तो मनुष्य के मन पर वासनाओं का दबाव बढ़ता जाता है क्योंकि पूर्वार्जित वासनाओं के साथ नएनए संस्कार भी एकत्र होते जाते हैं। प्राप्त क्षण में भले ही अर्जुन युद्ध भूमि से भाग जाये परन्तु बाद में इस अवसर को खो देने का पश्चात्ताप ही उसको होगा क्योंकि इस प्रकार का पलायन उसके उस क्षत्रिय स्वभाव के सर्वदा विपरीत है जिसे युद्ध में ही चिर शान्ति प्राप्त हो सकती है। जिस बालक में कला के प्रति स्वभाविक रुचि और प्रवृत्ति है वह कभी सफल व्यापारी नहीं बन सकता। पुत्र प्रेम के कारण यदि मातापिता अपनी इच्छाओं काे अपने पुत्र पर थोप देते हैं तो यह देखा जाता है कि ऐसे बालक का व्यक्तित्व बिखरा हुआ रहता है।इस तरह के उदाहरण विश्व में प्रत्येक क्षेत्र में पाये जाते हैं और विशेषकर आध्यात्मिक क्षेत्र में। बहुत से व्यक्ति थोड़े से दुख और कष्ट के आघात से क्षणिक वैराग्य के कारण ईश्वर की खोज में गृह त्यागकर जंगलों में चले जाते हैं किन्तु वहाँ जीवन भर वे अशान्ति और दुख ही पाते हैं। मन में विषयोपयोग की वासनाएँ होती है जो पारिवारिक जीवन में पूर्ण की जा सकती हैं। परन्तु गृह त्यागकर हिमालय की कन्दराओं में बैठने से न तो वे इन वासनाओं को ही पूर्ण कर पाते हैं और न ईश्वर का ध्यान उनके लिए सम्भव होता है। स्वभाविक है कि उनके मन में विक्षेप बढ़ते जाते हैं जिन्हें पाप कहते हैं।हिन्दू धर्म के अनुसार अपने आत्मस्वरूप को भूलकर मनुष्य जो गलतियाँ करता है उन्हें पाप कहते हैं। विषयोपभोग के लिए मनुष्य के द्वारा सुख प्राप्ति के प्रयत्नों के कारण मन में विक्षेप उत्पन्न होना स्वाभाविक है और यही पाप है क्योंकि इसमें आनन्दस्वरूप आत्मा का विस्मरण है।इतना ही नहीं कि तुम कर्तव्य और कीर्ति को खो दोगे बल्कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.33।।   विपक्षे दोषमाह  अथेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.33।।ननु नाहं युद्धफलकामःन काङ्क्षे विजयं कृष्णअपि त्रैलोक्यराज्यस्य इत्युक्तत्वात्तत्कथं मया कर्तव्यमित्याशङ्क्याकरणे दोषमाह अथेति पक्षान्तरे। इमं भीष्मद्रोणादिवीरपुरुषप्रतियोगिकं धर्म्यं हिंसादिदोषेणादुष्टं सतां धर्मादनपेतमिति वा। सच मनुना दर्शितःन कूटैरायुधैर्हन्याद्युध्यमानो रणे रिपून। न कर्णिभिर्नापि दिग्धैर्नाग्निज्वलिततेजनैः।।न च हन्यात्स्थलारूढं न क्लीबं न कृताञ्जलिम्। न मुक्तकेशं नासीनं न तवास्मीतिवादिनम्।।न सुप्तं न विसन्नाहं न नग्नं न निरायुधम्। नायुध्यमानं पश्यन्तं न परेण समागतम्।।नायुधव्यसनप्राप्तं नार्तं नातिपरिक्षतम्। न भीतं न परावृत्तं सतां धर्ममनुस्मरन्।। इति। सतां धर्ममुल्लङ्घ्य युध्यमानो हि पापीयान्स्यात् त्वं तु परैराहूतोऽपि सद्धर्मोपेतमपि संग्रामं युद्धं न करिष्यसि धर्मतो लोकतो वा भीतः परावृत्तो भविष्यसि चेत् ततोनिर्जित्य परसैन्यानि क्षितिं धर्मेण पालयेत् इत्यादिशास्त्रविहितस्य युद्धस्याकरणात्स्वधर्मं हित्वाऽननुष्ठाय कीर्तिं च महादेवादिसमागमनिमित्तां हित्वान निवर्तेत संग्रामात् इत्यादिशास्त्रनिषिद्धसंग्रामनिवृत्त्याचरणजन्यं पापमेव केवलमवाप्स्यसि नतु धर्मं कीर्तिं चेत्यभिप्रायः। अथवाऽनेकजन्मार्जितं धर्मं त्यक्त्वा राजकृतं पापमेवाप्स्यसीत्यर्थः। यस्मात्त्वां परावृत्तमेते दुष्टा अवश्यं हनिष्यन्ति अतः परावृत्तहतः सन् चिरोपार्जितनिजसुकृतपरित्यागेन परोपार्जितदुष्कृतमात्रभाङ्माभूरित्यभिप्रायः। तथाच मनुःयस्तु भीतः परावृत्तः संग्रामे हन्यते परैः। भर्तुर्यद्दुष्कृतं किंचित्तत्सर्वं प्रतिपद्यते।।यच्चास्य सृकुतं किंचिदमुत्रार्थमुपार्जितम्। भर्ता तत्सर्वमादत्ते परावृत्तहतस्य तु।। इति। यावज्ञवल्क्योऽपिराजा सुकृतमादत्ते हतानां विपलायिनाम् इति। तेन यदुक्तम्पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनःएतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन इति तन्निराकृतं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.33।।युद्धत्यागे इष्टनाशोऽनिष्टप्राप्तिश्च भवतीत्याह  अथचेदिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.33।।एवं स्वधर्मावेक्षणेन मदुक्तसङ्ग्रामाकरणे तव बाधकं स्यादित्याह अथ चेदिति। अथ स्वधर्मावेक्षणानन्तरमपि इमं मदग्रे धर्म्यं मदाज्ञारूपं सङ्ग्रामं चेन्न करिष्यसि तदा स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.33।।विपक्षे दोषमाह  अथ चेत्त्वमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.33।।विपक्षे बाधकमाह अथ चेदिति। धर्म्यं धर्मादनपेतं युद्धं न करिष्यसि तर्हि लौकिकवैदिकहानिपूर्वकं प्रत्यवायमवाप्स्यसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.33।।इस प्रकार कर्तव्यरूपसे प्राप्त होनेपर भी यदि तू यह धर्मयुक्त धर्मसे ओतप्रोत युद्ध नहीं करेगा तो उस युद्धके न करनेके कारण अपने धर्मको और महादेव आदिके साथ युद्ध करनेसे प्राप्त हुई कीर्तिको नष्ट करके केवल पापको ही प्राप्त होगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.33।। व्याख्या अथ चेत्त्वमिमं ৷৷. पापमवाप्स्यसि   यहाँ  अथ  अव्यय पक्षान्तरमें आया है और  चेत्  अव्यय सम्भावनाके अर्थमें आया है। इनका तात्पर्य है कि यद्यपि तू युद्धके बिना रह नहीं सकेगा अपने क्षात्र स्वभावके परवश हुआ तू युद्ध करेगा ही (गीता 18। 60) तथापि अगर ऐसा मान लें कि तू युद्ध नहीं करेगा तो तेरे द्वारा क्षात्रधर्मका त्याग हो जायगा। क्षात्रधर्मका त्याग होनेसे तुझे पाप लगेगा और तेरी कीर्तिका भी नाश होगा।आपसेआप प्राप्त हुए धर्मरूप कर्तव्यका त्याग करके तू क्या करेगा अपने धर्मका त्याग करनेसे तुझे परधर्म स्वीकार करना पड़ेगा जिससे तुझे पाप लगेगा। युद्धका त्याग करनेसे दूसरे लोग ऐसा मानेंगे कि अर्जुनजैसा शूरवीर भी मरनेसे भयभीत हो गया इससे तेरी कीर्तिका नाश होगा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.33।।यदृच्छयेति। अन्येऽपि ये (N omits ये) काममयाः क्षत्रियाः तैरपीदृशं युद्धं स्वर्गहेतुत्वात् न त्याज्यम्। किं पुनर्यस्य ईदृशं ज्ञानमुपदिष्टम् इति तात्पर्यम्। न पुनः स्वर्गपर्यवसायी श्लोकः ( N omit न पुनः श्लोकः)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.33।।स्वधर्मस्य युद्धस्य श्रद्धया करणे स्वर्गादिमहाफलप्राप्तिं प्रदर्श्य तदकरणे प्रत्यवायप्राप्तिं प्रदर्शयन्नुत्तरश्लोकगताथशब्दार्थं कथयति   एवमिति।  विहितत्वं फलवत्त्वमित्यनेन प्रकारेणेत्यर्थः अन्वयार्थः पुनश्चेदित्यनूद्यते महादेवादीत्यादिशब्देन महेन्द्रादयो गृह्यन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.33।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.33।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.33।। अथ  क्षत्रियस्य स्वधर्मभूतम्  इमम्  आरब्धं  संग्रामं  मोहाद् अज्ञानात्  न करिष्यसि चेत् ततः  प्रारब्धस्यधर्मस्याकरणात् स्वधर्मफलं निरतिशयसुखं विजयेन निरतिशयां  कीर्तिं च हित्वा पापं  निरतिशयम्  अवाप्स्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.33।।  अथ चेत् त्वम् इमं धर्म्यं  धर्मादनपेतं विहितं  संग्रामं  युद्धं  न करिष्यसि  चेत्  ततः  तदकरणात्  स्वधर्मं कीर्तिं च  महादेवादिसमागमनिमित्तां  हित्वा  केवलं  पापम् अवाप्स्यसि।।न केवलं स्वधर्मकीर्तिपरित्यागः

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【 Verse 2.34 】

▸ Sanskrit Sloka: अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम् | सम्भावितस्य चाकीर्ति र्मरणादतिरिच्यते ||

▸ Transliteration: akīrtiṁ cāpi bhūtāni kathayiṣyanti te’vyayām | saṁbhāvitasya cākīrtir maraṇādatiricyate ||

▸ Glossary: akīrtiṁ: infamy; ca: also; api: also; bhūtāni: all people; kathayiṣyanti: will speak; te: of you; avyayāṁ: undying; saṁbhāvitasya: of a respectable man; ca: also; akīrtiḥ: ill-fame; maraṇāt: than death; atiricyate: becomes more than

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.34 People too will remember your everlasting dishonor and to one who has been honored, dishonor is worse than death.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.3।।हे पृथानन्दन अर्जुन इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.34।। और सब लोग तुम्हारी बहुत काल तक रहने वाली अपकीर्ति को भी कहते रहेंगे और सम्मानित पुरुष के लिए अपकीर्ति मरण से भी अधिक होती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.34 अकीर्तिम् dishonour? च and? अपि also? भूतानि beings? कथयिष्यन्ति will tell? ते thy? अव्ययाम् everlasting? संभावितस्य of the honoured? च and? अकीर्तिः dishonour? मरणात् than death? अतिरिच्यते exceeds.Commentary The world also will ever recount thy infamy which will survive thee for a long time. Death is really preferable to disgrace to one who has been honoured as a great hero and mighty warrior with noble alities.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.34. The creatures will speak of your endless ill-fame; and for the one who has been highly esteemed the illfame is worse than death.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.34 Men will talk forever of thy disgrace; and to the noble, dishonour is worse than death.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.34 Further, people will speak ill of you for all time, and for one accustomed to be honoured, dishonour is worse than death.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.34 People also will speak of your unending infamy. And to an honoured person infamy is worse than death.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.34 People, too, will recount thy everlasting dishonour; and to one who has been honoured, dishonour is worse than death.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.34 See Comment under 2.37

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.34 You will then incur not merely the loss of all happiness and honour but will be the object of disrespect by all people, the alifies and even the unalified, for all time. They will ridicule you saying, 'When the battle began, Arjuna ran away.' It it be asked, 'What if it be so?", the reply is: 'To one who is honoured by all for courage, prowess, valour, etc., this kind of dishonour arising from the reverse of these attributes, is worse than death? The meaning is that itself would be better for you than this kind of dishonour.

If it is said, 'How could dishonour accrue to me, who am a hero, but have withdrawn from the battle only out of love and compassion for my relatives?' the reply is as follows:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.34 Not only will there be the giving up of your duty and fame, but bhutani, people; ca api, also; kathayisyanti, will speak; te, of your; avyayam, unending, perpetual; akrtim, infamy. Ca, and; sambhavitasya, to an honoured person, to a person honoured with such epithets as 'virtuous', 'heroic', etc.; akirtih, infamy; atiricyate, is worse than; maranat, death. The meaning is that, to an honoured person death is perferable to infamy.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.34।। एक प्रसिद्ध सम्मानित वीर के लिए अपकीर्ति मरण से भी अधिक होती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को दुविधा त्याग कर युद्ध में प्रवृत्त करने के लिए एक और तर्क प्रस्तुत करते हैं। अर्जुन का पक्ष धर्म और न्याय का होने पर भी उसका युद्ध से पलायन कायरता का लक्षण है। भगवान् के शब्दों में अर्जुन के प्रति सहानुभूति अन्तर्निहित है क्योंकि वे जानते हैं कि भावावेग में शूरवीर अर्जुन भी मन से दुर्बल होकर हतोत्साहित हो सकता है। आगे

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.34।।किंच अकीर्तिमव्ययां दीर्घकालां धर्मात्मा शूर इत्येवमादिभिर्गुणैः संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते तस्याकीर्तेर्मरणं वरमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.34।।एवं कीर्तिधर्मयोरिष्टयोरप्राप्तिरनिष्टष्य च पापस्य प्राप्तिर्युद्धपरित्यागे दर्शिता। तत्र पापाख्यमनिष्टं व्यवधानेन दुःखफलमामुत्रिकत्वात् शिष्टगर्हालक्षणं त्वनिष्टमासन्नफलदमत्यसह्यमित्याह भूतानि देवर्षिमनुष्यादीनि ते तवाव्ययां दीर्घकालमकीर्तिं न धर्मात्मायं न शूरोऽयमित्येवंरूपां कथयिष्यन्त्यन्योन्यं कथाप्रसङगे। कीर्तिधर्मनाशसमुच्चयार्थौ निपातौ। न केवलं कीर्तिधर्मौ हित्वा पापं प्राप्स्यसि अपितु अकीर्तिं च प्राप्स्यसि। न केवलं त्वमेव तां प्राप्स्यसि अपितु भूतान्यपि कथयिष्यन्तीति वा निपातयोरर्थः। ननु युद्धे स्वमरणसंदेहात्तत्परिहारार्थमकीर्तिरपि सोढव्या आत्मरक्षणस्यात्यन्तापेक्षितत्वात्। तथाचोक्तं शान्तिपर्वणि साम्ना दानेन भेदेन समस्तैरुत वा पृथक्। विजेतुं प्रयतेतारीन्न युध्येत कदाचन।।अनित्यो विजयो यस्माद्दृश्यते युध्यमानयोः। पराजयश्च संग्रामे तस्माद्युद्धं विवर्जयेत्।।त्रयाणामप्युपायानां पूर्वोक्तानामसंभवे। तथा युध्येत संपत्तौ विजयेत रिपून्यथा।। इति। एवमेव मनुनाप्युक्तम्। तथाच मरणभीतस्य किमकीर्तिर्दुःखमिति शङ्कामपनुदति संभावितस्य धर्मात्मा शूर इत्येवमादिभिरनन्यलभ्यैर्गुणैर्बहुमतस्य जनस्याकीर्तिर्मरणादप्यतिरिच्यतेऽधिका भवति। चो हेतौ। एंव यस्मादतोऽकीर्तेर्मरणमेव वरं न्यूनत्वात्। त्वमप्यतिसंभावितोऽसि महादेवादिसमागमेन। अतो नाकीर्तिदुःखं सोढुं शक्ष्यसीत्यभिप्रायः। उदाहृतवचनं त्वर्थशास्त्रत्वात्न निवर्तेत संग्रामात् इत्यादिधर्मशास्त्राद्दुर्बलमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.34।।अव्ययां दीर्घकालम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.34।।किञ्च पापात्परलोकनाश एव भविष्यतीति न किन्त्विह लोकेऽप्यपकीर्तिर्भविष्यतीत्याह अकीर्तिं चापीति। भूतानि अपि ते अकी र्ति৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ मव्ययां सदानुवर्त्तमानां कथयिष्यन्ति। भूतानीति नपुंसकलिङ्गकथनेन तथा कथनायोग्या अपि कथयिष्यन्तीति व्यञ्जितम्। नन्वकीर्तिकथनेन किं स्यादित्यत आह सम्भावितस्येति। सम्भावितस्य युद्धादौ अकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते अधिका भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.34।।किंच  अकीर्तिमिति।  अव्ययां शाश्वतीम्। संभावितस्य बहुमानितस्याकीर्तिर्मरणादतिरिच्यतेऽधिकतरा भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.34।।किञ्च अकीर्तिमिति। भूतानि प्राणिजातानि। विजयीति सम्भावितस्य।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.34।।केवल स्वधर्म और कीर्तिका त्याग होगा इतना ही नहीं सब लोग तेरी बहुत दिनोंतक स्थायी रहनेवाली अपकीर्ति ( निन्दा ) भी किया करेंगे। धर्मात्मा शूरवीर इत्यादि गुणोंसे प्रतिष्ठा पाये हुए पुरुषके लिये अपकीर्ति मरणसे भी अधिक होती है। अभिप्राय यह है कि संभावित ( इज्जतदार ) पुरुषके लिये अपकीर्तिकी अपेक्षा मरना अच्छा है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.34।। व्याख्या अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्   मनुष्य देवता यक्ष राक्षस आदि जिन प्राणियोंका तेरे साथ कोई सम्बन्ध नहीं है अर्थात् जिनकी तेरे साथ न मित्रता है और न शत्रुता ऐसे साधारण प्राणी भी तेरी अपकीर्ति अपयशका कथन करेंगे कि देखो अर्जुन कैसा भीरू था जो कि अपने क्षात्रधर्मसे विमुख हो गया। वह कितना शूरवीर था पर युद्धके मौकेपर उसकी कायरता प्रकट हो गयी जिसका कि दूसरोंको पता ही नहीं था आदिआदि। ते  कहनेका भाव है कि स्वर्ग मृत्यु और पाताललोकमें भी जिसकी धाक जमी हुई है ऐसे तेरी अपकीर्ति होगी।  अव्ययाम्  कहनेका तात्पर्य है कि जो आदमी श्रेष्ठताको लेकर जितना अधिक प्रसिद्ध होता है उसकी कीर्ति और अपकीर्ति भी उतनी ही अधिक स्थायी रहनेवाली होती है। सम्भावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते   इस श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने साधारण प्राणियोंद्वारा अर्जुनकी निन्दा किये जानेकी बात बतायी। अब श्लोकके उत्तार्धमें सबके लिये लागू होनेवाली सामान्य बात बताते हैं।संसारकी दृष्टिमें जो श्रेष्ठ माना जाता है जिसको लोग बड़ी ऊँची दृष्टिसे देखते हैं ऐसे मनुष्यकी जब अपकीर्ति होती है तब वह अपकीर्ति उसके लिये मरणसे भी अधिक भयंकर दुःखदायी होती है। कारण कि मरनेमें तो आयु समाप्त हुई है उसने कोई अपराध तो किया नहीं है परन्तु अपकीर्ति होनेमें तो वह खुद धर्ममर्यादासे कर्तव्यसे च्युत हुआ है। तात्पर्य है कि लोगोंमें श्रेष्ठ माना जानेवाला मनुष्य अगर अपने कर्तव्यसे च्युत होता है तो उसका बड़ा भयंकर अपयश होता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.34 2.38।।यद्भयाच्च भवान् युद्धात् निवर्तते (K निवर्तेत) तदेव शतशाखमुपनिपतिष्यति भवत इत्याह अथ चेत्यादि। श्लोकपञ्चकमिदम् अभ्युपगम्यवादरूपमुच्यते ( N उपगम्य) यदि लौकिकेन व्यवहारेणास्ते भवान् तथाप्यवश्यानुष्ठेयमेतत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.34।।युद्धाकरणे क्षत्रियस्य प्रत्यवायमामुष्मिकमापाद्य शिष्टगर्हालक्षणं दीर्घकालभाविनमैहिकमपि प्रत्यवायं प्रतिलम्भयति  न

Chapter 2 (Part 21)

केवलमिति।  युद्धे स्वस्मरणसंदेहात्तत्परिहारार्थमकीर्तिरपि सोढव्या आत्मसंरक्षणस्य श्रेयस्करत्वादित्याशङ्क्याह   धर्मात्मेति।  मान्यानामकीर्तिर्भवति मरणादपि दुःसहेति तात्पर्यार्थमाह  संभावितस्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.34।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.34।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.34।।न केवलं निरतिशयसुखकीर्तिहानिमात्रं पार्थो युद्धे प्रारब्धे पलायित इति अव्ययां सर्व देशकालव्यापिनीम्  अकीर्तिं च  समर्थानि असमर्थानि सर्वाणि  भूतानि कथयिष्यन्ति  ततः किमिति चेत् शौर्यवीर्यपराक्रमादिभिः सर्व संभावितस्य  तद्विपर्ययजा हि  अकीर्तिः मरणाद् अतिरिच्यते।  एवंविधाया अकीर्तेः मरणम् एव तव श्रेयः इत्यर्थः।बन्धुस्नेहात् कारुण्याच्च युद्धात् निवृत्तस्य शूरस्य मम अकीर्तिः कथम् आगामिष्यति इति अत्राह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.34।।  अकीर्तिं चापि युद्धे भूतानि कथयिष्यन्ति ते  तव  अव्ययां  दीर्घकालाम्। धर्मात्मा शूर इत्येवमादिभिः गुणैः  संभावितस्य च अकीर्तिः मरणात् अतिरिच्यते  संभावितस्य च अकीर्तेः वरं मरणमित्यर्थः।।किञ्च

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【 Verse 2.35 】

▸ Sanskrit Sloka: भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथा: | येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ||

▸ Transliteration: bhayādraṇāduparataṁ maṁsyante tvāṁ mahārathāḥ | yeṣāṁ ca tvaṁ bahumato bhūtvā yāsyasi lāghavam ||

▸ Glossary: bhayāt: out of fear; raṇāt: from war; uparataṁ: retired; maṁsyante: will con- sider; tvāṁ: you; mahārathāḥ: the great generals; yeṣāṁ: of those who; ca: also; tvaṁ: you; bahumataḥ: in great estimation; bhūtvā: having become; yāsyasi: will get; lāghavaṁ: decreased in value

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.35 The great generals will think that you have withdrawn from the battle because you are a coward. You will be looked down upon by those who had thought much of you and your heroism in the past.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.4।।अर्जुन बोले हे मधुसूदन मैं रणभूमिमें भीष्म और द्रोणके साथ बाणोंसे युद्ध कैसे करूँ क्योंकि हे अरिसूदन ये दोनों ही पूजाके योग्य हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.35।। और जिनके लिए तुम बहुत माननीय हो उनके लिए अब तुम तुच्छता को प्राप्त होओगे? वे महारथी लोग तुम्हें भय के कारण युद्ध से निवृत्त हुआ मानेंगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.35 भयात् from fear? रणात् from the battle? उपरतम् withdrawn? मंस्यन्ते will think? त्वाम् thee? महारथाः the great carwarriors? येषाम् of whom? च and? त्वम् thou? बहुमतः much thought of? भूत्वा having been? यास्यसि will receive? लाघवम् lightness.Commentary Duryodhana and others will certainly think that you have fled from the battle from fear of Karna and others? but not through compassion and reverence for elders and teachers. Duryodhana and others who have shown great esteem to you on account of your chivalry? bravery and other noble alities? will think very lightly of you and treat you with contempt.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.35. The mighty charioteers will think of you as having withdrawn from the battle out of fear : having been highly regarded by these men, you shall be viewed lightly.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.35 Great generals will think that thou hast fled from the battlefield through cowardice; though once honoured thou wilt seem despicable.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.35 The great warriors will think that you have fled from battle in fear. These men who held you in high esteem will speak lightly of you now.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.35 The great chariot-riders will think of you as having desisted from the fight out of fear; and you will into disgrace before them to whom you had been estimable.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.35 The great car-warriors will think that thou hast withdrawn from the battle through fear; and thou wilt be lightly held by them who have thought much of thee.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.35 See Comment under 2.37

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.35 Great warriors like Karna, Duryodhana, etc., hitherto held you in high esteem as a heroic enemy. Now by refraining from battle when it has begun, you will appear to them as despicable and easily defeatable. These great warriors will think of you as withdrawing from battle out of fear. Because turning away from battle does not happen in the case of brave enemies through affection etc., for relatives. It can happen only through fear of enemies.

Moreover

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.35 Moreover, maharathah, the great chariot-riders, Duryodhana and others; mamsyante, will think; tvam, of you; as uparatam, having desisted; ranat, from the fight; not out of compassion, but bhayat, out of fear of Karna and others; ca, and ; yasyasi laghavam, you will again fall into disgrace before them, before Duryodhana and others; yesam, to whom; tvam, you; bahumato bhutva, had been estimable as endowed with many alities.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.35।। भावी इतिहास में तो तुम्हारी अपकीर्ति बनी रहेगी ही परन्तु वर्तमान में भी शत्रु पक्ष के ये महारथी तुम्हारा उपहास करेंगे। इस भ्रातृहन्ता युद्ध से तुम्हें जो दुख है उसे न समझकर वे तो यही मानेंगे कि तुमने भय और कायरता के कारण युद्ध से पलायन किया है। इस प्रकार का अनादरपूर्ण कायरता का आरोप कोई भी वीर पुरुष सहन नहीं कर सकता विशेषरूप से जब अपने ही तुल्य बल के शत्रुओं द्वारा वह किया गया हो। और

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.35।।न केवलमितरभूतान्येवाकीर्ति कथयिष्यन्ति किंतु महारथा अपीत्याह  भयादीति।  कर्णादिभयाद्युद्धान्निवृत्तं न कृपयेति चिन्तयिष्यन्ति। बहुमतो बहुभिर्गुणैर्मतो भूत्वा लघुतां यास्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.35।।ननूदासीना मां निन्दन्तु नाम भीष्मद्रोणादयस्तु महारथाः कारुणिकत्वेन स्तोष्यन्ति मामित्यत आह कर्णादिभ्यो भयाद्युद्धान्निवृत्तं न कृपयेति त्वां मंस्यन्ते भीष्मद्रोणदुर्योधनादयो महारथाः। ननु ते मां बहुमन्यमानाः कथं भीतं मंस्यन्त इत्यत आह येषामेव भीष्मादीनां त्वं बहुमतो बहुभिर्गुणैर्युक्तोऽयमर्जुन इत्येवं मतस्त एव त्वां महारथा भयादुपरतं मंस्यन्त इत्यन्वयः। अतो भूत्वा युद्धादुपरत इति शेषः। लाघवमनादरविषयत्वं यास्यसि प्राप्स्यसि। सर्वेषामिति शेषः। येषामेव त्वं प्राग्बहुमतोऽभूस्तेषामेव तादृशो भूत्वा लाघवं यास्यसीति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.35।।अकीर्तिमेवाह  भयादिति।  त्वं बहुमतो भूत्वा स्वत एव अतिश्लाघ्यवृत्तः सन् लाघवं लघुभावं कातर्याख्यं येषां पुरतो यास्यसि ते महारथास्त्वां भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्त इति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.35।।ननु पूर्वं ये दृष्टमत्पौरुषास्ते तु न तथा कथयिष्यन्ति किन्त्वज्ञा एव तेषां कथनेऽपि किं स्यादित्यत आह भयादिति। ये महारथास्ते त्वां रणाद्भयादुपरतं निवृत्तं मंस्यन्ते। ननु मम भयाभावात्तेषां माननेऽपि किं भविष्यतीत्यत आह येषां च त्वमिति सार्द्धेन। त्वं येषां बहुमतः सम्भावितगुण आसीस्तादृशो भूत्वा लाघवं यास्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.35।।किंच  भयादिति।  येषां बहुगुणत्वेन त्वं पूर्वं संमतोऽभूस्त एव भयेन संग्रामात्त्वां निवृत्तं मन्येरन् ततश्च पूर्वं बहुमतो भूत्वा लाघवं यास्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.35।।यद्यपि त्वं स्वबन्धुहिंसादोषभिया न युद्धमङ्गीकरोषि तथाप्येते तु नैवं जानन्तीत्याह भयात् रणादुपरतमिति। महारथा एते एवमजानन्तस्त्वां मरणभयाद्रणादुपरतं मंस्यते एवं च लाघवं प्राप्स्यसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.35।।तथा जिन दुर्योधनादिके मतमें तू पहले बहुमत अर्थात् बहुत गुणोंसे युक्त माना जाकर अब लघुताको प्राप्त होगा वे दुर्योधन आदि महारथीगण तुझे कर्णादिके भयसे ही युद्धसे निवृत्त हुआ मानेंगे दया करके हट गया है ऐसा नहीं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.35।। व्याख्या भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः   तू ऐसा समझता है कि मैं तो केवल अपना कल्याण करनेके लिये युद्धसे उपरत हुआ हूँ परन्तु अगर ऐसी ही बात होती और युद्धको तू पाप समझता तो पहले ही एकान्तमें रहकर भजनस्मरण करता और तेरी युद्धके लिये प्रवृत्ति भी नहीं होती। परन्तु तू एकान्तमें न रहकर युद्धमें प्रवृत्त हुआ है। अब अगर तू युद्धसे निवृत्त होगा तो बड़ेबड़े महारथीलोग ऐसा ही मानेंगे कि युद्धमें मारे जानेके भयसे ही अर्जुन युद्धसे निवृत्त हुआ है। अगर वह धर्मका विचार करता तो युद्धसे निवृत्त नहीं होता क्योंकि युद्ध करना क्षत्रियका धर्म है। अतः वह मरनेके भयसे ही युद्धसे निवृत्त हो रहा है। येषाँ च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम्   भीष्म द्रोणाचार्य कृपाचार्य शल्य आदि जो बड़ेबड़े महारथी है उनकी दृष्टिमें तू बहुमान्य हो चुका है अर्थात् उनके मनमें यह एक विश्वास है कि युद्ध करनेमें नामी शूरवीर तो अर्जुन ही है। वह युद्धमें अनेक दैत्यों देवताओं गन्धर्वों आदिको हरा चुका है। अगर अब तू युद्धसे निवृत्त हो जायगा तो उन महारथियोंके सामने तू लधुता(तुच्छता) को प्राप्त हो जायगा अर्थात् उनकी दृष्टिमें तू गिर जायगा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.34 2.38।।यद्भयाच्च भवान् युद्धात् निवर्तते (K निवर्तेत) तदेव शतशाखमुपनिपतिष्यति भवत इत्याह अथ चेत्यादि। श्लोकपञ्चकमिदम् अभ्युपगम्यवादरूपमुच्यते ( N उपगम्य) यदि लौकिकेन व्यवहारेणास्ते भवान् तथाप्यवश्यानुष्ठेयमेतत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.35।।इतश्च त्वचा युद्धं कर्तव्यमित्याह  किञ्चेति।  प्राणिषु कृपया नाहं युद्धं करिष्यामीत्याशङ्क्याह  भयादिति।  महारथानेव विशिनष्टि  येषां चेति।  दुर्योधनादिभिस्तवोपहास्यतानिरसनाय संग्रामे प्रवृत्तिरवश्यंभाविनीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.35।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.35।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.35।। येषां  कर्णदुर्योधनादीनां महारथानाम् इतः पूर्वं  त्वं  शूरो वैरी इति  बहुमतो भूत्वा  इदानीं युद्धे समुपस्थिते निवृत्तव्यापारतया  लाघवं  सुग्रहतां  यास्यसि।  ते  महारथाः त्वां भयाद्  युद्धाद्  उपरतं मंस्यन्ते।  शूराणां हि वैरिणां शत्रुभयाद् ऋते बन्धुस्नेहादिना युद्धाद् उपरतिः न उपपद्यते।किं च

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.35।।  भयात्  कर्णादिभ्यः  रणात्  युद्धात्  उपरतं  निवृत्तं  मंस्यन्ते  चिन्तयिष्यन्ति न कृपयेति  त्वां महारथाः  दुर्योधनप्रभृतयः।  येषां च त्वं  दुर्योधनादीनां  बहुमतो  बहुभिः गुणैः युक्तः इत्येवं मतः बहुमतः  भूत्वा  पुनः  यास्यसि लाघवं  लघुभावम्।।किञ्च

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【 Verse 2.36 】

▸ Sanskrit Sloka: अवाच्यवादांश्च बहून्वदिष्यन्ति तवाहिता: | निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दु:खतरं नु किम् ||

▸ Transliteration: avācyavādāṁśca bahūn vadiṣyanti tavāhitāḥ | nindantastava sāmarthyaṁ tato duḥkhataraṁ nu kim ||

▸ Glossary: avācyavādān: unspeakable words; ca: also; bahūn: many; vadiṣyanti: will say; tava : your; ahitāḥ: enemies; nindantaḥ: while vilifying; tava : your; sāmar-thyaṁ: ability; tataḥ: than that; duḥkhataraṁ: more painful; nu: of course; kiṁ: what

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.36 Many unspeakable words would be spoken by your ene- mies reviling your power. Can there be anything more painful

than this?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.5।।महानुभाव गुरुजनोंको न मारकर मैं भिक्षाका अन्न खाना भी श्रेष्ठ समझता हूँ। गुरुजनोंको मारकर यहाँ रक्तसे सने हुए तथा धनकी कामनाकी मुख्यतावाले भोगोंको ही तो भोगूँगा

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.36।। तुम्हारे शत्रु तुम्हारे सार्मथ्य की निन्दा करते हुए बहुत से अकथनीय वचनों को कहेंगे? फिर उससे अधिक दुख क्या होगा

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.36 अवाच्यवादान् words that are improper to be spoken? च and? बहून् many? वदिष्यन्ति will say? तव thy? अहिताः enemies? निन्दन्तः cavilling? तव thy? सामर्थ्यम् power? ततः than this? दुःखतरम् more painful? नु indeed? किम् what.Commentary There is really no pain more unbearable and tormenting that that of slander thus incurred.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.36. Slandering your ability, the enemies will talk of you many sayings that should not be talked of. Is there anything more painful than that ?

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.36 Thine enemies will spread scandal and mock at thy courage. Can anything be more humiliating?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.36 Your enemies, slandering your prowess, will use words which should never be uttered. What could be more painful than that?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.36 And your enemies will speak many indecent words while denigrating your might. What can be more painful than that?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.36 Thy enemies also, cavilling at thy power, will speak many abusive words. What is more painful than this?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.36 See Comment under 2.37

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.36 Moreover, your enemies, the sons of Dhrtarastra, will make many remarks unutterably slanderous and disparaging to heroes, saying, 'How can this Partha stand in the presence of us, who are heroes, even for a moment? His prowess is elsewhere than in our presence.' Can there be anything more painful to you than this? You yourself will understand that death is preferable to subjection to disparagement of this kind.

Sri Krsna now says that for a hero, enemies being slain by oneself and oneself being slain by enemies are both conducive to supreme bliss.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.36 Ca, and besieds; tava, your; ahitah, enemies; vadisyanti, will speak; bahun, many, various kinds of; avacya-vadan, indecent words, unutterable words; nindantah, while denigrating, scorning; tava, your; samarthyam, might earned from battles against Nivatakavaca and others. Therefore, kim nu, what can be; duhkhataram, more painful; tatah, than that, than the sorrow arising from being scorned? That is to say, there is no greater pain than it.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.36।। यह देखकर कि अर्जुन के मन में इन तर्कों का अनुकूल प्रभाव पड़ रहा है श्रीकृष्ण उसको युद्ध से पलायन करने में जो दोष हैं उन्हें और अधिक स्पष्ट करके दिखाते हैं। लोकनिन्दा युद्ध से पलायन का आरोप इतिहास में अपकीर्ति इनसे बढ़कर एक सम्मानित व्यक्ति के लिये और अधिक दुख क्या हो सकता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.36।।न केवलमेतावदेव मंस्यन्ते अपि तु षण्ढतिल इत्यादिरुपानवाच्यवादानपि वदिष्यन्ति यतोऽहितो इत्याह  अवाच्येति।  वक्तुमयोग्यान्वादान्वचनानि। अहिताः शत्रवः। ततो निन्दाप्राप्तेर्दुःखात्कष्टतरं दुःखं नास्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.36।।ननु भीष्मादयो महारथा न बहु मन्यन्तां दुर्योधनादयस्तु शत्रवो बहु मंस्यन्ते मां युद्धनिवृत्त्या तदुपकारित्वादित्यत आह तवासाधारणं यत्सामर्थ्यं लोकप्रसिद्धं तन्निन्दन्तस्तव शत्रवो दुर्योधनादयोऽवाच्यान्वादान्वचनानर्हान्षण्ढतिलादिरूपानेव शब्दान्बहूननेकप्रकारान्वदिष्यन्ति नतु बहु मंस्यन्त इत्यभिप्रायः। अथवा तव सामर्थ्यं स्तुतियोग्यत्वं तव निन्दन्तोऽहितो अवाच्यवादान्वदिष्यन्तीत्यन्वयः। ननु भीष्मद्रोणादिवधप्रयुक्तं कष्टतरं दुःखमसहमानो युद्धान्निवृतः शत्रुकृतसामर्थ्यनिन्दनादिदुःखं सोढुं शक्ष्यामीत्यत आह ततः तस्मान्निन्दाप्राप्तिदुःखात्किंनु दुःखतरम्। ततोऽधिकं किमपि दुःखं तास्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.36।।किञ्च अवाच्यवादान् वक्तुमयोग्यान् शब्दान्षण्ढतिलोऽर्जुन इत्यादीन्। सामर्थ्यं निन्दन्तः धिगस्य शौर्यं यो भीष्मादिभयात् पलायित इति। इदं वचनं मरणादप्यधिकं दुःखम्। इतोऽन्यद्दुःखतरमधिकं दुःखं किं। न किमपीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.36।।किञ्च। तव सामर्थ्यं निन्दन्तस्तवाऽहिताः शत्रवः बहून् अवाच्यवादान् कथनायायोग्यानि वाक्यानि वदिष्यन्ति। नु इति निश्चयेन। ततो दुःखतरं किम् न किमपीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.36।।किंच  अवाच्येति।  अवाच्यान्वादान्वचनानर्हाञ्शब्दांस्तवाहितास्त्वच्छत्रवो वदिष्यन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.36।।किञ्च अवाच्यवादानिति। स्पष्टम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.36।।तथा वे तेरे शत्रुगण निवातकवचादिके साथ युद्ध करनेमें दिखलाये हुए तेरे सामर्थ्यकी निन्दा करते हुए बहुतसे अनेक प्रकारके न कहने योग्य वाक्य भी तुझे कहेंगे। उस निन्दाजनित दुःखसे अधिक बड़ा दुःख क्या है अर्थात् उससे अधिक कष्टकर कोई भी दुःख नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.36।। व्याख्या  अवाच्यवादांश्च ৷৷. निन्दन्तस्तव सामर्थ्यम्   अहित नाम शत्रुका है  अहित करनेवालेका है। तेरे जो दुर्योधन दुःशासन कर्ण आदि शत्रु हैं तेरे वैर न रखनेपर भी वे स्वयं तेरे साथ वैर रखकर तेरा अहित करनेवाले हैं। वे तेरी सामर्थ्यको जानते हैं कि यह बड़ा भारी शूरवीर है। ऐसा जानते हुए भी वे तेरी सामर्थ्यकी निन्दा करेंगे कि यह तो हिजड़ा है। देखो यह युद्धके मौकेपर हो गया न अलग क्या यह हमारे सामने टिक सकता है क्या यह हमारे साथ युद्ध कर सकता है इस प्रकार तुझे दुःखी करनेके लिये तेरे भीतर जलन पैदा करनेके लिये न जाने कितने न कहनेलायक वचन कहेंगे। उनके वचनोंको तू कैसे सहेगा सम्बन्ध   पीछेके चार श्लोकोंमें युद्ध न करनेसे हानि बताकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें युद्ध करनेसे लाभ बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.34 2.38।।यद्भयाच्च भवान् युद्धात् निवर्तते (K निवर्तेत) तदेव शतशाखमुपनिपतिष्यति भवत इत्याह अथ चेत्यादि। श्लोकपञ्चकमिदम् अभ्युपगम्यवादरूपमुच्यते ( N उपगम्य) यदि लौकिकेन व्यवहारेणास्ते भवान् तथाप्यवश्यानुष्ठेयमेतत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.36।।इतश्च मा त्वं युद्धादुपरमं कार्षीरित्याह  किञ्चेति।  ननु भीष्मद्रोणादिवधप्रयुक्तं कष्टतरं दुःखमसहमानो युद्धान्निवृत्तः स्वसामर्थ्यनिन्दनादि शत्रुकृतं सोढुं शक्ष्यामीत्याशङ्क्याह  तत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.36।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.36।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.36।।शूराणाम् अस्माकं सन्निधौ कथम् अयं पार्थः क्षणम् अपि स्थातुं शक्नुयाद् अस्मत्संनिधानाद् अन्यत्र हि अस्य सामर्थ्यम् इति  तव सामर्थ्यं निन्दन्तः  शूराणाम् अग्रे  अवाच्यवादान् च बहून् वदिष्यन्ति  तव शत्रवो धार्तराष्ट्राः  ततः  अधिकतरं दुःखं  किं  तव एवंविधावाच्यश्रवणात् मरणम् एव श्रेयः इति त्वम् एव मन्यसे।अतः शूरस्य आत्मना परेषां हननम् आत्मनो वा परैः हननम् उभयम् अपि श्रेयसे भवति इति आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.36।।  अवाच्यवादान्  अवक्तव्यवादां श्च बहून्  अनेकप्रकारान्  वदिष्यन्ति तव अहिताः  शत्रवः  निन्दन्तः  कुत्सयन्तः  तव  त्वदीयं  सामर्थ्यं  निवातकवचादियुद्धनिमित्तम्। ततः तस्मात् निन्दाप्राप्तेर्दुःखात्  दुःखतरं नु किम्  ततः कष्टतरं दुःखं नास्तीत्यर्थः।।युद्धे पुनः क्रियमाणे कर्णादिभिः

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【 Verse 2.37 】

▸ Sanskrit Sloka: हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् | तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चय: ||

▸ Transliteration: hato vā prāpsyasi svargaṁ jitvā vā bhokṣyase mahīm | tasmāduttiṣṭha kaunteya yuddhāya kṛtaniścayaḥ ||

▸ Glossary: hataḥ: being killed; vā: either; prāpsyasi: you will gain; svargaṁ: heaven; jitvā: after conquering; vā: or; bhokṣyase: you will enjoy; mahīṁ: the world; tasmāt: therefore; uttiṣṭha: get up; kaunteya: O son of Kuntī; yuddhāya: for war; kṛta niścayaḥ: determined

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.37 Slain, you will achieve heaven; victorious, you will enjoy the earth. O Kaunteya (son of Kuntī), stand up determined to fight.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.6।।हम यह भी नहीं जानते कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना और न करना इन दोनोंमेंसे कौनसा अत्यन्त श्रेष्ठ है और हमें इसका भी पता नहीं है कि हम उन्हें जीतेंगे अथवा वे हमें जीतेंगे। जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.37।। युद्ध में मरकर तुम स्वर्ग प्राप्त करोगे या जीतकर पृथ्वी को भोगोगे इसलिये? हे कौन्तेय युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.37 हतः slain? वा or? प्राप्स्यसि (thou) wilt obtain? स्वर्गम् heaven? जित्वा having conered? वा or? भोक्ष्यसे (thou) wilt enjoy? महीम् the earth? तस्मात् therefore? उत्तिष्ठ stand up? कौन्तेय O son of Kunti? युद्धाय for fight? कृतनिश्चयः resolved.Commentary In either case you will be benefited. Therefore? stand up with the firm resolution I will coner the enemy or die.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.37. If you are slain you shall attain heaven; or if you coner, you shall enjoy the earth. Therefore, O son of Kunti ! stand up with resolution made in favour of [fighting] the battle.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.37 If killed, thou shalt attain Heaven; if victorious, enjoy the kingdom of earth. Therefore arise, O Son of Kunti, and fight!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.37 If slain, you shall win heaven; or if victorious, you shall enjoy the earth. Therefore, arise, O Arjuna, resolved to fight.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.37 Either by being killed you will attain heaven, or by winning you will enjoy the earth. Therefore, O Arjuna, rise up with determination for fighting.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.37 Slain, thou wilt obtain heaven; victorious, thou wilt enjoy the earth; therefore, stand up, O son of Kunti, resolved to fight.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.33-37 Atha ca etc., upto krta-niscavah. Accepting what the opponent has stated, this pentad of verses is narrated as an argument : 'If your goodself prefers to abide by the generally accepted practice, even then this [fighting] must be undertaken necessarily'.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.37 If you are slain in a righteous war by enemies, you shall thery attain supreme bliss. Or, slaying the enemies, you shall enjoy this kingdom without obstacles. As the duty called war, when done without attachment to the fruits, becomes the means for winning supreme bliss, you will attain that supreme bliss. Therefore, arise, assured that engagement in war (here the duty) is the means for attaining release, which is known as man's supreme goal. This alone is suitable for you, the son of Kunti. This is the purport.

Sri Krsna then explains to the aspirant for liberation how to conduct oneself in war.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.37 Again, by undertaking the fight with Karna and others, va, either; hatah, by being killed; prapsyasi, you will attain; svargam, heaven; or jitva, by winning over Karna and other heroes; bhoksyase, you will enjoy; mahim, the earth. The purport is that in either case you surely stand to gain. Since this is so, Kaunteya, O son of Kunti; tasmat, therefore; uttistha, rise up; krta-niscayah, with determination; yuddhaya, for fighting, i.e. with the determination, 'I shall either defeat the enemies or shall die.'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.37।। इस युद्ध में अर्जुन का पक्ष धर्म का होने से युद्ध करना उसके लिये सभी दृष्टियों से उचित था। युद्ध में मृत्यु होने पर उस वीर को स्वर्ग की प्राप्ति होगी और विजयी होने पर वह पृथ्वी का राज्य वैभव भोगेगा। मृत्योपरान्त धर्म के लिये युद्ध करने वाले पराक्रमी शूरवीर की भांति भी स्वर्ग का सुख भोगेगा। इसलिये अब तक जितने भी तर्क दिये गये हैं उन सबका निष्कर्ष इस वाक्य में है युद्ध का निश्चय कर तुम खड़े हो जाओ।जिस परिस्थिति विशेष में गीता का उपदेश दिया गया है उसके सन्दर्भ में युद्ध करने की सलाह न्यायोचित हैं परन्तु सामान्य परिस्थितियों में श्रीकृष्ण के इस दिव्य आह्वान का अर्थ होगा कि सभी प्रकार की मानसिक दुर्बलताओं को त्याग कर मनुष्य को अपने जीवन संघर्षों में आने वाली चुनौतियों का सामना साहस तथा दृढ़ता के साथ विजय के लिये करना चाहिये। इस प्रकार गीता का उपदेश किसी व्यक्ति विशेष के लिये न होकर सम्पूर्ण विश्व की मानव जाति के लिये उपयोगी और कल्याणकारी सिद्ध होगा।जिस भाव को हृदयस्थ करके युद्ध करना चाहिये उसे अब सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.37।।   विपक्षे दोषमुक्त्वा युद्धप्रवृत्तौ सर्वथा लाभ एवेत्याशयेनाह  हत इति।  हतः कर्णादिभिः जित्वा कर्णादीन् यत एवं तस्मात् शत्रूञ्जेष्यामि मरिष्यामिति निश्चयं कृत्वोत्तिष्ठ। कौन्तेयेति संबोधन्शत्रूञ्जित्वा राज्यलाभेनावश्यं त्वया कुन्तयै सुखं प्रदेयमिति द्योतयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.37।।ननु तर्हि युद्धे गुर्वादिवधवशान्मध्यस्थकृता निन्दा ततो निवृत्तौ तु शत्रुकृता निन्देत्युभयतःपाशा रज्जुरित्याशङ्क्य जये पराजये च लाभध्रौव्याद्युद्धार्थमेवोत्थानमावश्यकमित्याह। स्पष्टं पूर्वार्धम्। यस्मादुभयथापि ते लाभस्तस्माज्जेष्यामि शत्रून्मरिष्यामि वेति कृतनिश्चयः सन्युद्धायोत्तिष्ठ अन्यतरफलसंदेहेऽपि युद्धकर्तव्यताया निश्चितत्वात्। एतेनन चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः इत्यादि परिहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.37।।यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः इत्युक्तं तत्राह  हतो वेति।  रणे स्थितस्य स्वर्गो वा राज्यं वा सिद्धमस्तीति पक्षद्वयमपि हितावहमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.37।।ननु युद्धे मरणसम्भावनायां दुःखसम्भावनायां च किमपकीर्त्यादिनेति चेत्तत्राह हतो वेति। वा विकल्पेन हननसम्भावनाभावात्। कदाचिद्धतश्चेत्तदा स्वर्गं प्राप्स्यसि। जित्वा वा दुःखादिसम्भवेऽपि महीं भोक्ष्यसे। तदा दुःखनिवृत्तिर्भविष्यतीति भावः। तस्माद्युद्धाय कृतनिश्चयः सन्नुत्तिष्ठ उपस्थितो भवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.37।।यच्चोक्तंन चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः इति तत्राह  हतो वेति।  पक्षद्वयेऽपि तव लाभ एवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.37।।यच्चोक्तंन चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयः 2।6 इति तत्राह हतो वेति। स्वर्गं प्राप्स्यसि जित्वा वा महीं भोक्ष्यसे। पक्षद्वयेऽपि तव लाभ इति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.37।।पक्षान्तरमें कर्ण आदि शूरवीरोंके साथ युद्ध करने पर या तो उनके द्वारा मारा जाकर ( तू ) स्वर्गको प्राप्त करेगा अथवा कर्णादि शूरवीरोंको जीतकर पृथिवीका राज्य भोगेगा। अभिप्राय यह कि दोनों तरहसे तेरा लाभ ही है। जब कि यह बात है इसलिये हे कौन्तेय युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा अर्थात् मैं या तो शत्रुओंको जीतूँगा या मर ही जाऊँगा ऐसा निश्चय करके खड़ा हो जा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.37।। व्याख्या हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्   इसी अध्यायके छठे श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि हमलोगोंको इसका भी पता नहीं है कि युद्धमें हम उनको जीतेंगे यह वे हमको जीतेंगे। अर्जुनके इस सन्देहको लेकर भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि अगर युद्धमें तुम कर्ण आदिके द्वारा मारे भी जाओगे तो स्वर्गको चले जाओगे और अगर युद्धमें तुम्हारी जीत हो जायगी तो यहां पृथ्वीका राज्य भोगोगे। इस तरह तुम्हारे तो दोनों ही हाथोंमें लड्डू हैं। तात्पर्य है कि युद्ध करनेसे तो तुम्हारा दोनों तरफ से लाभहीलाभ है और युद्ध न करनेसे दोनों तरफसे हानिहीहानि है। अतः तुम्हें युद्धमें प्रवृत्त हो जाना चाहिये। स्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चियः   यहाँ  कौन्तेय  सम्बोधन देनेका तात्पर्य है कि जब मैं सन्धिका प्रस्ताव लेकर कौरवोंके पास गया था तब माता कुन्तीने तुम्हारे लिये यही संदेश भेजा था कि तुम युद्ध करो। अतः तुन्हें युद्धसे निवृत्त नहीं होना चाहिये प्रत्युत युद्धका निश्चय करके खड़े हो जाना चाहिये।अर्जुनका युद्ध न करनेका निश्चय था और भगवान्ने इसी अध्यायके तीसरे श्लोकमें युद्ध करनेकी आज्ञा दे दी। इससे अर्जुनके मनमें सन्देह हुआ कि युद्ध करना ठीक है या न करना ठीक है। अतः यहाँ भगवान् उस सन्देह को दूर करनेके लिये कहते हैं कि तुम युद्ध करनेका एक निश्चय कर लो उसमें सन्देह मत रखो।यहाँ भगवान्का तात्पर्य ऐसा मालूम देता है कि मनुष्यको किसी भी हालतमें प्राप्त कर्तव्यका त्याग नहीं करना चाहिये प्रत्युत उत्साह और तत्परतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। कर्तव्यका पालन करनेमें ही मनुष्यकी मनुष्यता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.34 2.38।।यद्भयाच्च भवान् युद्धात् निवर्तते (K निवर्तेत) तदेव शतशाखमुपनिपतिष्यति भवत इत्याह अथ चेत्यादि। श्लोकपञ्चकमिदम् अभ्युपगम्यवादरूपमुच्यते ( N उपगम्य) यदि लौकिकेन व्यवहारेणास्ते भवान् तथाप्यवश्यानुष्ठेयमेतत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.37।।तर्हि युद्धे गुर्वादिवधवशान्मध्यस्थनिन्दा ततो निवृत्तौ शत्रुनिन्देत्युभयतःपाशा रज्जुरित्याशङ्क्याह  युद्धे पुनरिति।  जये पराजये च लाभध्रौव्याद्युद्धार्थादुत्थानमावश्यकमित्याह  तस्मादिति।  नहि परिशुद्धकुलस्य श्रत्रियस्य युद्धायोद्युक्तस्य तस्मादुपरमः साधीयानित्याह  कौन्तेयेति।  जये पराजये चेत्येतदुभयथेत्युच्यते जयादिनियमाभावेऽपि लाभनियमे फलितमाह  यत इति।  कृतनिश्चयत्वमेव विशदयति  जेष्यामीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.37।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.37।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.37।।धर्मयुद्धे परैः हतः चेत् तत एव परमनिःश्रेयसं  प्राप्स्यसि  परान् वा हत्वा अकण्टकं राज्यं  भोक्ष्यसे।  अनभिसंहितफलस्य युद्धाख्यस्य धर्मस्य परमनिःश्रेयसोपायत्वात् तत् च परमनिःश्रेयसं प्राप्स्यसि।  तस्माद्   युद्धाय  उद्योगः परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनम् इति निश्चित्य तदर्थम्  उत्तिष्ठ।  कुन्तीपुत्रस्य तव एतद् एव युक्तम् इत्यभिप्रायः।मुमुक्षोः युद्धानुष्ठानप्रकारम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.37।।  हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम्  हतः सन् स्वर्गं प्राप्स्यसि।  जित्वा वा  कर्णादीन् शूरान्  भोक्ष्यसे महीम् । उभयथापि तव लाभ एवेत्यभिप्रायः। यत एवं  तस्मात् उत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः  जेष्यामि शत्रून् मरिष्यामि वा इति निश्चयं कृत्वेत्यर्थः।।तत्र युद्धं स्वधर्म इत्येवं युध्यमानस्योपदेशमिमं श्रृणु

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【 Verse 2.38 】

▸ Sanskrit Sloka: सुखदु:खे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ | ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ||

▸ Transliteration: sukhaduḥkhe same kṛtvā lābhālābhau jayājayau | tato yuddhāya yujyasva naivaṁ pāpamavāpsyasi ||

▸ Glossary: sukha duḥkhe: in happiness as well as in distress; same: equal; kṛtvā: doing so; lābhālābhau: gain and loss; jayājayau: victory and defeat; tataḥ: thereafter; yuddhāya: for war; yujyasva: get ready; na: not; evaṁ: in this way; pāpaṁ: sin; avāpsyasi: you will gain

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.38 Pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat–treat them all the same. Do battle for the sake of battle and you shall incur no sin.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.7।।कायरताके दोषसे उपहत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित श्रेय हो वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मेरेको शिक्षा दीजिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.38।। सुखदुख? लाभहानि और जयपराजय को समान करके युद्ध के लिये तैयार हो जाओ इस प्रकार तुमको पाप नहीं होगा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.38 सुखदुःखे pleasure and pain? समे same? कृत्वा having made? लाभालाभौ gain and loss? जयाजयौ victory and defeat? ततः then? युद्धाय for battle? युज्यस्व engage thou? न not? एवम् thus? पापम् sin? अवाप्स्यसि shalt incur.Commentary This is the Yoga of eanimity or the doctrine of poise in action. If anyone does any action with the above mental attitude or balanced state of mind he will not reap the fruits of his action. Such an action will lead to the purification of his heart and freedom from birth and death. One has to develop such a balanced state of mind through continous struggle and vigilant efforts.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.38. Viewing alike, pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat, you should get then ready for the battle. Thus you will not incur sin.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.38 Look upon pleasure and pain, victory and defeat, with an equal eye. Make ready for the combat, and thou shalt commit no sin.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.38 Holding pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat as alike, gird yourself up for the battle. Thus, you shall not incur any sin.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.38 Treating happiness and sorrow, gain and loss, and conest and defeat with eanimity, then engage in battle. Thus you will not incur sin.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.38 Having made pleasure and pain, gain and loss, victory and defeat the same, engage thou in battle for the sake of battle; thus thou shalt not incur sin.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.38 Sukha-duhkhe etc. For you, performing actions as your own duty, never there is any connection with sin.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.38 Thus, knowing the self to be eternal, different from the body and untouched by all corporeal alities, remaining unaffected by pleasure and pain resulting from the weapon-strokes etc., inevitable in a war, as also by gain and loss of wealth, victory and defeat, and keeping yourself free from attachment to heaven and such other frutis, begin the battle considering it merely as your own duty. Thus, you will incur no sin. Here sin means transmigratory existence which is misery. The purport is that you will be liberarted from the bondage of transmigratory existence.

Thus, after teaching the knowledge of the real nature of the self, Sri Krsna begins to expound the Yoga of work, which, when preceded by it (i.e., knowledge of the self), constitutes the means for liberation.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.38 As regards that, listen to this advice for you then you are engaged in battle considering it to be your duty: Krtva, treating; sukha-duhkhe, happiness and sorrow; same, with eanimity, i.e. without having likes and dislikes; so also treating labha-alabhau, gain and loss; jaya-ajayau, conest and defeat, as the same; tatah, then; yuddhaya yujyasva, engage in battle. Evam, thus by undertaking the fight; na avapsyasi, you will not incur; papam, sin. This advice is incidental. [The context here is that of the philosophy of the supreme Reality. If fighting is enjoined in that context, it will amount to accepting combination of Knowledge and actions. To avoid this contingency the Commentator says, 'incidental'. That is to say, although the context is of the supreme Reality, the advice to fight is incidental. It is not an injunction to combine Knowledge with actions, since fighting is here the natural duty of Arjuna as a Ksatriya.]. The generally accepted argument for the removal of sorrow and delusion has been stated in the verses beginning with, 'Even considering your own duty' (31), etc., but this has not been presented by accepting that as the real intention (of the Lord). The real context here (in 2.12 etc.), however, is of the realization of the supreme Reality. Now, in order to show the distinction between the (two) topics dealt with in this scripture, the Lord concludes that topic which has been presented above (in 2.20 etc.), by saying, 'This (wisdom) has been imparted,' etc. For, if the distinction between the topics of the scripute be shown here, then the instruction relating to the two kinds of adherences as stated later on in, 'through the Yoga of Knowledge for the men of realization; through the Yoga of Action for the yogis' (3.3) will proceed again smoothly, and the hearer also will easily comprehend it by keeping in view the distinction between the topics. Hence the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.38।। सम्पूर्ण गीता के साररूप इस द्वितीय अध्याय में सांख्ययोग के पश्चात् इस श्लोक में कर्मयोग का दिशा निर्देश है। इसी अध्याय में आगे भक्तियोग का भी संक्षेप में संकेत किया गया है।यह प्रथम अवसर है जब श्रीकृष्ण इस श्लोक में आत्मोन्नति की साधना का स्पष्टरूप से वर्णन करते हैं। इसलिये इसका सावधानीपूर्वक अध्ययन गीता के समस्त साधकों के लिये अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होगा।शरीर मन और बुद्धि इन तीन उपाधियों के माध्यम से ही हम जीवन में विभिन्न अनुभव प्राप्त कर सकते हैं। इन तीन स्तरों पर प्राप्त होने वाले सभी अनुभवों का समावेश इस श्लोक में कथित तीन प्रकार के द्वन्द्वों में किया गया है। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितियों को सुख और दुख के रूप में अनुभव करना बुद्धि की प्रतिक्रिया है लाभ और हानि ये मन की कल्पनायें हैं जिस कारण वस्तु की प्राप्ति पर हर्ष और वियोग पर शोक होना स्वाभाविक है भौतिक जगत् की उपलब्धियों को यहाँ जयपराजय शब्द से सूचित किया है। श्रीकृष्ण का उपदेश यह है कि मनुष्य को इस प्रकार की विषम परिस्थितियों में सदैव मन के सन्तुलन को बनाये रखना चाहये। इसके लिये सतत जागरूकता की आवश्यकता है।समुद्र स्नान के इच्छुक व्यक्ति को समुद्र स्नान करने की कला ज्ञात होनी चाहिये अन्यथा समुद्र की उत्तुंग तरंगे उस व्यक्ति को व्यथित कर देंगी और उसे जल समाधि में खींच ले जायेंगी किन्तु बड़ी लहरों के नीचे झुकने और छोटी लहरों पर सवार होने की कला जो व्यक्ति जानता है वही समुद्र स्नान का आनन्द उठा सकता है। यह आशा करना कि समुद्र की लहरें शान्त हो जायें अथवा स्नान के समय कष्ट न पहुँचायंे अपनी सुविधा के लिये समुद्र को उसके स्वरूप का त्याग करने के आदेश देने के समान है किन्तु अज्ञानी पुरुष जीवन में यही चाहता है कि किसी प्रकार की समस्यायें उसके सामने न आयें जो सर्वथा असम्भव है। जीवन के समुद्र में सुख दुख लाभहानि और जयपराजय की लहरें उठना अनिवार्य है अन्यथा पूर्ण गतिहीनता ही मृत्यु है।यदि जीवन का स्वरूप ही एक उफनते तूफानी समुद्र के समान है तो उसमें उठती उत्तुंग तरंगों के आघातों अथवा गहन गह्वरों से विचलित हुये बिना जीवन जीने की कला हमको सीखनी चाहिये। इन उठती हुई तरंगों में किसी एक के साथ भी तादात्म्य स्थापित कर लेना मानो समुद्र की सतह पर उसके साथ इधरउधर बहते जाना है और न कि उस प्रकाश के स्तम्भ के समान स्थिर रहना है जो वहीं विक्षुब्ध लहरों के बीच निश्चल खड़ा रहता है और जिसकी नींव समुद्र तल की चट्टान पर निर्मित होती है। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को युद्ध करने के लिये प्रेरित करते हैं किन्तु साथ में इस समत्व भाव का उपदेश भी देते हैं अन्यथा कर्म में प्रवृत्त हुआ व्यक्ति अनेक अवसरों पर अपनी ही नकारात्मक प्रवृत्तियों का शिकार बन जाता है। मन के इस समभाव के होने पर ही मनुष्य वास्तविक स्फूर्ति और प्रेरणा का जीवन जी सकता है और ऐसे व्यक्ति की उपलब्धियां ही सच्ची सफलता की आभा से युक्त होती हैं।यह सुविदित तथ्य है कि सभी कार्य क्षेत्रों में जो कर्म स्फूर्ति और प्रेरणा युक्त होते हैं उनकी अपनी ही दैवी चमक होती है जिनकी न प्रतिकृति हो सकती है और न ही उसे बारम्बार दोहराया जा सकता है। किसी भी कार्य क्षेत्र का व्यक्ति चाहे वह कवि हो या कलाकार चिकित्सक हो या वक्ता जब अपनी सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि या कृति प्रस्तुत करता है तब वह सर्वसम्मति से प्रेरणा का कार्य ही स्वीकार किया जाता है। इस प्रकार हम जब दैवी प्रेरणा के आनन्द से अविभूत कोई कार्य कर रहे होते हैं तब हमारी कल्पनायें विचार और कर्म अपनी एक निराली ही सुन्दरता से ओतप्रोत होते हैं जिन्हें एक यन्त्र के समान पुन दोहराया नहीं जा सकता।प्रसिद्ध चित्रकार दा विन्सी अपनी श्रेष्ठ कृति मन्द स्मितवदना मोनालिसा का चित्र दोबारा चित्रित नहीं कर सका महाकवि कीट्स की लेखनी उड़ते हुये बुलबुल के गान को दूसरी बार नहीं लिख पायी बीथोवेन पियानों पर फिर एक बार वही मधुर स्वर झंकृत नहीं कर सका भगवान् श्रीकृष्ण ने भी अर्जुन के प्रार्थना करने पर युद्ध के पश्चात् दोबारा गीता सुनाने में अपनी असमर्थता स्वीकार की पाश्चात्य विचारकों के लिये प्रेरणा संयोग की कोई रहस्यमय घटना है जिस पर मानव का कोई नियन्त्रण नहीं रहता जबकि भारतीय मनीषियों के अनुसार दैवी प्रेरणा का जीवन मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य है जिसे वह अपने आत्मस्वरूप के साथ पूर्णतया तादात्म्य स्थापित करके जी सकता है। समत्व भाव का वह जीवन जहाँ हम जीवन में आने वाली परिस्थितियों से अप्रभावित अपने मन और बुद्धि के साक्षी बनकर रहते हैं अहंकार की विस्मृति के क्षण हैं और तब हमारे कर्म उषकाल की जगमगाती आभा से समृद्ध होते हैं। सामान्य मनुष्य की धारणा होती है कि अहंकार के अभाव में हम कार्य करने में अकुशल या असमर्थ बन जायेंगे परन्तु यह मिथ्या धारणा है। प्रेरणा की आभा ही सामान्य सफलता को भी महान् उपलब्धि की ऊँचाई तक पहुँचाती है।प्राचीन हिन्दू योगियों ने एक साधना का आविष्कार किया जिसके अभ्यास से मन और बुद्धि की युक्तता एवं समता सम्पादित की जा सकती है। इस साधना को योग कहते हैं। वैदिक काल के लोगों को इसका ज्ञान था तथा इसका अभ्यास करके वे योगी का जीवन जीते थे। उन्होंने असाधारण उपलब्धियों को अर्जित करके राष्ट्र के लिये स्वर्णयुग का निर्माण किया।भारत जैसे देश में वैदिक काल में निश्चित ही आस्तिक दर्शन

Chapter 2 (Part 22)

प्रचलित होगा परन्तु उसकी उपयोगिता जीवन के सभी क्षेत्रों में समान रूप से है। यदि उसकी सार्वक्षेत्रीय उपयोगिता न हो तो वह वास्तविक अर्थ में दर्शन ही नहीं है। अधिक से अधिक उसे किसी श्रेष्ठ पुरुष का जीवन विषयक मत माना जा सकता है जिसका सीमित उपयोग हो किन्तु तत्त्वज्ञान के रूप में वह कभी स्वीकार नहीं हो सकता।अब तक के उपदेश में भगवान् ने वे सभी आवश्यक तर्क अर्जुन के समक्ष प्रस्तुत किये जिनको समझकर प्राप्त परिस्थितियों में स्वबुद्धि से उचित निर्णय लेने में वह समर्थ हो सके। सभी भौतिक परिस्थितियों के मूल्यांकन में केवल आध्यात्मिक दृष्टिकोण को ही अन्तिम प्रमाण नहीं माना जा सकता। जीवन की प्रत्येक परिस्थिति या चुनौती का मूल्यांकन आध्यात्मिक दृष्टि के साथसाथ बुद्धि के स्तर पर तर्क मन के स्तर पर नैतिकता और भौतिक स्तर पर परम्परा और सामाजिक रीति रिवाज की दृष्टि से भी करना आवश्यक है। इन सब के द्वारा बिना किसी विरोधाभास के यदि किसी एक सत्य का संकेत मिलता है तो निश्चय ही वह दिव्य मार्ग है जिस पर मनुष्य्ा को प्रत्येक मूल्य पर चलने का प्रयत्न करना चाहिये।केवल नैतिकता की भावना से युद्ध की ओर देखने से अर्जुन उस परिस्थिति को उचित रूप में समझ नहीं सका। शत्रुपक्ष में खड़े अपने ही बन्धुबान्धवों को विनष्ट करना नैतिकता के विरुद्ध था। किन्तु भावावेशजनित मन की भ्रमित अवस्था में उसने अन्य दृष्टिकोणों पर विचार नहीं किया जिससे वह पुन संयमित हो सकता था। ऐसे अवसर पर जो करने योग्य है वही करता हुआ अर्जुन भगवान् कृष्ण की शरण में जाता है। श्रीकृष्ण उसके मार्गदर्शन का उत्तरदायित्व अपने ऊपर लेकर जीवन के सभी दृष्टिकोणों को उसके सामने प्रस्तुत करते हैं। सम्पूर्ण गीता में श्रीकृष्ण मनुष्य को प्राप्त विवेकशील बुद्धि की भूमिका निभाते हैं जो कठोपनिषद् की भाषा में देहरूपी रथ का योग्य सारथि है।इस प्रकार आध्यात्मिक बौद्धिक नैतिक और पारम्परिक दृष्टियों से विचार करने के पश्चात् पूर्व के श्लोक में भगवान अर्जुन को युद्ध करने की सम्मति देते हैं। जिस भावना से कर्म करना चाहिये उसका विवेचन इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने किया है। शरीरादि अनात्म उपाधियों के साथ तादात्म्य करने से जो चिन्तायें विक्षेप व्याकुलतायें होती हैं उनसे ऊपर उठकर सभी विषम परिस्थितियों में समभाव में स्थित होकर कर्म करना चाहिये।मन के समत्व भाव में रहने से जीवन की वास्तविक सफलता निश्चित होती है। इसके पूर्व हम देख चुके हैं कि जीवन में किस प्रकार पूर्व संचित वासनायें क्षीण हो सकती हैं। जगत् में सभी जीव अपनीअपनी वासनाओं का क्षय करने के लिये ही विभिन्न शरीर धारण किये हुये हैं। इस प्रकार वृक्ष पशु अथवा मनुष्य सभी वासनाओं के भण्डार हैं।सब परिस्थितियों में समभाव में स्थित हुआ मन वासनाओं के निस्सारण का मार्ग बनता है। यह द्वार जब अहंकार और स्वार्थ से अवरुद्ध होता है तब वासनाक्षय के स्थान पर असंख्य नयी वासनाएँ उत्पन्न होती जाती हैं। द्वन्द्वों के कारण हुआ विक्षेप अहंकार के जन्म और वृद्धि के कारण है। कर्मयोग की भावना से कर्म करते हुये जीवन जीने पर अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त होती है। इस कर्मयोग का विस्तृत विवेचन गीता के तृतीय अध्याय में है।तत्त्वज्ञान और सामान्यजन की दृष्टि से विचार करने के पश्चात् भगवान् अर्जुन को कर्मयोग की भावना से युद्ध करने का उपदेश देते हैं। तत्त्वज्ञान को समझ कर उसे जीवन में जीना ही व्यावहारिक धर्म है।इसके पश्चात् इस अध्याय में वेदान्त ज्ञान का व्यवहार में उपयोग करने के उपायों एवं साधनों का निरूपण किया है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.38।।ननु गुर्वादिवधार्थं प्रवृत्तस्य पापावाप्त्या कुतः स्वर्गप्राप्तिः जित्वा वा कुतो भोगसुखं निन्दया व्याप्तवात्तेषामित्याशङ्क्य निष्कामस्य समदृष्टेः स्वधर्मबुद्य्धा प्रवृत्तस्य ते पापादिप्राप्तिर्नास्तीत्याशयेनाह  सुखेति।  सुखदुःखे समे कृत्वा सुखे रागं दुःखे द्वेषं चाकृत्वा तथा तत्साधनीभूतौ लाभालाभौ तत्साधनीभूतौ जयाजयौ च समौ कृत्वा ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि। तथाचाग्नीषोमीयहिंसाविधायकवचनवद्युद्धहिंसाविधायकमपि धर्मशास्त्रविशेषवचनंन हिंस्यात्सर्वा भूतानि इत्यस्य सामान्यशास्त्रस्य बाधकमतः पापावाप्तेरभावाद्युद्धप्रवृत्तौ सर्वथापि लाभ एवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.38।।नन्वेवं स्वर्गमुद्दिश्य युद्धकरणे तस्य नित्यत्वव्याघातः राज्यमुद्दिश्य युद्धकरणे त्वर्थशास्त्रत्वाद्धर्मशास्त्रापेक्षया दौर्बल्यं स्यात् ततश्च काम्यस्याकरणे कुतः पापं दृष्टार्थस्य गुरुब्राह्मणादिवधस्य कुतो धर्मत्वं तथाचअथ चेत् इति श्लोकार्थो व्याहत इति चेत्तत्राह समताकरणं रागद्वेषराहित्यं सुखे तत्कारणे लाभे तत्कारणे जये च रागमकृत्वा एवं दुःखे तद्धेतावलाभे तद्धेतावपजये च द्वेषमकृत्वा ततो युद्धाय युज्यस्व संनद्धो भव। एवं सुखकामनां दुःखनिवृत्तिकामनां वा विहाय स्वधर्मबुद्ध्या युध्यमानो गुरुब्राह्मणादिवधनिमित्तं नित्याकर्माकरणनिमित्तं च पापं न प्राप्स्यसि। यस्तु फलकामनया करोति स गुरुब्राह्मणादिवधनिमित्तं पापं प्राप्नोति। यो वा न करोति स नित्यकर्माकरणनिमित्तम्। अतः फलकामनामन्तरेण कुर्वन्नुभयविधमपि पापं न प्राप्नोतीति प्रागेव व्याख्यातोऽभिप्रायः।हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम् इति त्वानुषङ्गिफलकथनमिति न दोषः। तथाचापस्तम्बः स्मरतितद्याथाम्रे फलार्थं निमिते छायागन्धावनूत्पद्येते एवं धर्मंचर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते नो चेदनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति इति। अतो युद्धशास्त्रस्यार्थशास्त्रत्वाभावात्पापमेवाश्रयेदस्मान् इत्यादि निराकृतं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.38।।स्वधर्मस्य युद्धस्याकरणे धर्मकीर्त्योर्नाशः पापावाप्तिश्चअथ चेत् इति श्लोकेन भगवता यद्यप्युक्ता तथापि युद्धस्य अर्जुनाभिमते काम्यत्वपक्षेअहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्। यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः। इति तत्करणे पापप्रसक्तिरस्ति तां निवारयितुं सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वलक्षणं योगमाह  सुखदुःखे इति।  समे कृत्वा सुखदुःखयोस्तद्धेत्वोः राज्यलाभालाभयोस्तद्धेत्वोश्च जयाजययोः रागद्वेषावकृत्वेत्यर्थः। केवलं स्वधर्मोऽयमिति मत्वा युद्धाय युज्यस्व घटस्व। एवं कुर्वंस्त्वं पापं नावाप्स्यसि। यस्तु राज्यलोभेन सुहृद्वधं करोति तस्यास्त्येव पापमिति भावः। कथं तर्हि स्वधर्मत्वेनानुष्ठितेऽपि युद्धे हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गमित्यादिफलस्मरणमानुषङ्गिकमिति ब्रूमः। तथाचापस्तम्बःतद्यथाम्रे फलार्थं निर्मिते च्छाया गन्धावनूत्पद्येते एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते नो चेदनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति इत्याम्रनिदर्शनेन प्रतिपादयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.38।।मया पूर्वं पापसम्भावना कृता तन्न का गतिरित्याशङ्क्याह सुखदुःखे इति। सुखदुःखे देहस्य लाभालाभौ राज्यस्य जयाजयौ यशसः समौ कृत्वा हर्षविषादरहितः सन् ततस्तदनन्तरं मदाज्ञाविचारेण युद्धाय युज्यस्व युक्तो भव। एवंकृते पापं नावाप्स्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.38।।यदप्युक्तंपापमेवाश्रयेदस्मान् इति तत्राह  सुखदुःखे इति।  सुखदुःखे समे कृत्वा तथा तयोः कारणभूतौ यौ लाभालाभावपि तयोरपि कारणभूतौ जयाजयावपि समौ कृत्वा एतेषां समत्वे कारणं हर्षविषादराहित्यम्। युज्यस्व सन्नद्धो भव। सुखाद्यभिलाषं हित्वा स्वधर्मबुद्ध्या युध्यमानः पापं न प्राप्स्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.38।।यच्चोक्तंपापमेवाश्रयेदस्मान् हत्वा 1।36 इत्यादिना तत्रावधेहि सुखदुःखे समे कृत्वेति। योगमपि संस्मरन्नाह साङ्ख्यनैकीकृत्य। जगति फलभूते सुखदुःखे समे हेयोपादेयतया तुल्ये कृत्वा तत्साधनक्रियाभूतौ लाभालाभौ जयाजयौ च समौ कृत्वा युद्धाय युज्यस्व। एवं कृतेऽनुद्देशतस्त्वं पापं न प्राप्स्यसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.38।।युद्ध स्वधर्म है यह मानकर युद्ध करनेवालेके लिये यह उपदेश है सुन सुखदुःखको समान तुल्य समझकर अर्थात् ( उनमें ) रागद्वेष न करके तथा लाभहानिको और जयपराजयको समान समझकर उसके बाद तू युद्धके लिये चेष्टा कर इस तरह युद्ध करता हुआ तू पापको प्राप्त नहीं होगा। यह प्रासङ्गिक उपदेश है। स्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यादि श्लोकोंद्वारा शोक और मोहको दूर करनेके लिये लौकिक न्याय बतलाया गया है परंतु पारमार्थिक दृष्टिसे यह बात नहीं है। यहाँ प्रकरण परमार्थदर्शनका है जो कि पहले ( श्लोक 30 ) तक कहा गया है। अब शास्त्रके विषयका विभाग दिखलानेके लिये एषा तेऽभिहिता इस श्लोकद्वारा उस ( परमार्थदर्शन ) का उपसंहार करते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.38।। व्याख्या  अर्जुनको यह आशंका थी कि युद्धमें कुटुम्बियोंको मारनेसे हमारेको पाप लग जायगा पर भगवान् यहाँ कहते हैं कि पापका हेतु युद्ध नहीं है प्रत्युत अपनी कामना है। अतः कामनाका त्याग करके तू युद्धके लिये खड़ा हो जा। सुखदुःखे समे ৷৷. ततो युद्धाय युज्यस्व   युद्धमें सबसे पहले जय और पराजय होती है जयपराजयका परिणाम होता है लाभ और हानि तथा लाभहानिका परिणाम होता है सुख और दुःख। जयपराजयमें और लाभहानिमें सुखीदुःखी होना तेरा उद्देश्य नहीं है। तेरा उद्देश्य तो इन तीनोंमें सम होकर अपने कर्तव्यका पालन करना है।युद्धमें जयपराजय लाभहानि और सुखदुःख तो होंगे ही। अतः तू पहलेसे यह विचार कर ले कि मुझे तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है जयपराजय आदिसे कुछ भी मतलब नहीं रखना है। फिर युद्ध करनेसे पाप नहीं लगेगा अर्थात् संसारका बन्धन नहीं होगा।सकाम और निष्काम दोनों ही भावोंसे अपने कर्तव्यकर्मका पालन करना आवश्यक है। जिसका सकाम भाव है उसको तो कर्तव्यकर्मके करनेमें आलस्य प्रमाद बिलकुल नहीं करने चाहिये प्रत्युत तत्परतासे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये। जिसका निष्काम भाव है जो अपना कल्याण चाहता है उसको भी तत्परतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।सुख आता हुआ अच्छा लगता है और जाता हुआ बुरा लगता हौ तथा दुःख आता हुआ बुरा लगता है और जाता हुआ अच्छा लगता है। अतः इनमें कौन अच्छा है कौन बुरा अर्थात् दोनोंही समान हैं बराबर हैं। इस प्रकार सुखदुःखमें समबुद्धि रखते हुए तुझे अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।तेरी किसी भी कर्ममें सुखके लोभसे प्रवृत्ति न हो और दुःखके भयसे निवृत्ति न हो। कर्मोंमें तेरी प्रवृत्ति और निवृत्ति शास्त्रके अनुसार हो ही (गीता 16। 24)। नैवं पापमवाप्स्यसि   यहाँ पाप शब्द पाप और पुण्य दोनोंका वाचक है जिसका फल है स्वर्ग और नरककी प्राप्तिरूप बन्धन जिससे मनुष्य अपने कल्याणसे वञ्चित रह जाता है और बारबार जन्मतामरता रहता है। भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन समतामें स्थित होकर युद्धरूपी कर्तव्यकर्म करनेसे तुझे पाप और पुण्य दोनों ही नहीं बाँधेंगे। प्रकरण सम्बन्धी विशेष बात भगवान्ने इकतीसवें श्लोकसे अड़तीसवें श्लोकतकके आठ श्लोकोंमें कई विचित्र भाव प्रकट किये हैं जैसे (1) किसीको व्याख्यान देना हो और किसी विषयको समझाना हो तो भगवान् इन आठ श्लोकोंमें उसकी कला बताते हैं। जैसे कर्तव्यकर्म करना और अकर्तव्य न करना ऐसे विधिनिषेधका व्याख्यान देना हो तो उसमें पहले विधिका बीचमें निषेधका और अन्तमें फिर विधिका वर्णन करके व्याख्यान समाप्त करना चाहिये। भगवान्ने भी यहाँ पहले इकतीसवेंबत्तीसवें दो श्लोकोंमें कर्तव्यकर्म करनेसे लाभका वर्णन किया फिर बीचमें तैंतीसवेंसे छत्तीसवेंतकके चार श्लोकोंमें कर्तव्यकर्म न करनेसे हानिका वर्णन किया और अन्तमें सैंतीसवेंअड़तीसवें दो श्लोकोंमें कर्तव्यकर्म करनेसे लाभका वर्णन करके कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा दी।(2) पहले अध्यायमें अर्जुनने अपनी दृष्टिसे जो दलीलें दी थीं उनका भगवान्ने इन आठ श्लोकोंमें समाधान किया है जैसे अर्जुन कहते हैं मैं युद्ध करनेमें कल्याण नहीं देखता हूँ (1। 31) तो भगवान् कहते हैं क्षत्रियके लिये धर्ममय युद्धसे बढ़कर दूसरा कोई कल्याणका साधन नहीं है (2। 31)। अर्जुन कहते हैं युद्ध करके हम सुखी कैसे होंगे (1। 37) तो भगवान् कहते हैं जिन क्षत्रियोंको ऐसा युद्ध मिल जाता है वे ही क्षत्रिय सुखी है (2। 32)। अर्जुन कहते हैं युद्धके परिणाममें नरककी प्राप्ति होगी (1। 44) तो भगवान् कहते हैं युद्ध करनेसे स्वर्गकी प्राप्ति होगी (2। 32 37)। अर्जुन कहते हैं युद्ध करनेसे पाप लगेगा (1। 36) तो भगवान् कहते हैं युद्ध न करनेसे पाप लगेगा (2। 33)। अर्जुन कहते हैं युद्ध करनेसे परिणाममें धर्मका नाश होगा (1। 40) तो भगवान् कहते हैं युद्ध न करनसे धर्मका नाश होगा (2। 33)।(3) अर्जुनका यह आग्रह था कि युद्धरूपी घोर कर्मको छोड़कर भिक्षासे निर्वाह करना मेरे लिये श्रेयस्कर है (2। 5) तो उनको भगवान्ने युद्ध करनेकी आज्ञा दी (2। 38) और उद्धवजीके मनमें भगवान्के साथ रहनेकी इच्छा थी तो उनको भगवान्ने उत्तराखण्डमें जाकर तप करनेकी आज्ञा दी (श्रीमद्भा0 11। 29। 41)। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अपने मनका आग्रह छोड़े बिना कल्याण नहीं होता। वह आग्रह चाहे किसी रीतिका हो पर वह उद्धार नहीं होने देता।(4) भगवान्ने इस अध्यायके दूसरेतीसरे श्लोकोंमें जो बातें संक्षेपसे कही थीं उन्हींको यहाँ विस्तारसे कहा है जैसे वहाँ  अनार्यजुष्टम्  कहा तो यहाँ  धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्  कहा। वहाँ  अस्वर्ग्यम्  कहा तो यहाँ  स्वर्गद्वारमपावृतम्  कहा। वहाँ  अकीर्तिकरम्  कहा तो यहाँ  अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्  कहा। वहाँ युद्धके लिये आज्ञा दी  त्यक्त्वोत्तिष्ठ परंतप  तो वही आज्ञा यहाँ देते हैं  ततो युद्धाय युज्यस्व । सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने जिस समताकी बात कही है आगेके दो श्लोकोंमें उसीको सुननेके लिये आज्ञा देते हुए उसकी महिमाका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.34 2.38।।यद्भयाच्च भवान् युद्धात् निवर्तते (K निवर्तेत) तदेव शतशाखमुपनिपतिष्यति भवत इत्याह अथ चेत्यादि। श्लोकपञ्चकमिदम् अभ्युपगम्यवादरूपमुच्यते ( N उपगम्य) यदि लौकिकेन व्यवहारेणास्ते भवान् तथाप्यवश्यानुष्ठेयमेतत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.38।।पापभीरुतया युद्धाय निश्चयं कृत्वा नोत्थातुं शक्नोमीत्याशङ्क्याह  तत्रेति।  युद्धस्य स्वधर्मतया कर्तव्यत्वे सतीति यावत्। सुहृज्जीवनमरणादिनिमित्तयोः सुखदुःखयोः समताकरणं कथमिति तत्राह  रागद्वेषाविति।  लाभः शत्रुकोषादिप्राप्तिलाभस्तद्विपर्ययः न्याय्येन युद्धेनापरिभूतेन परस्य परिभवो जयस्तद्विपर्यस्त्वजयस्तयोर्लाभालाभयोर्जयाजययोश्च समताकरणं समानमेव रागद्वेषावकृत्वेत्येतद्दर्शयितुं तथेत्युक्तम् यथोक्तोपदेशवशात्परमार्थदर्शनप्रकरणे युद्धकर्तव्यतोक्तेः समुच्चयपरत्वं शास्त्रस्य प्राप्तमित्याशङ्क्याह  एष इति।  क्षत्रियस्य तव शर्मभूतयुद्धकर्तव्यतानुवादप्रसङ्गागतत्वादस्योपदेशस्य नानेन मिषेण समुच्चयः सिध्यतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.38।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka৷৷

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.38।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.38।।एवं देहातिरिक्तम् अस्पृष्टसमस्तदेहस्वभावं नित्यम् आत्मानं ज्ञात्वा युद्धे च अवर्जनीयशस्त्रपातादिनिमित्तसुखदुःखार्थलाभालाभजयपराजयेषु अविकृतबुद्धिःस्वर्गादिफलाभिसन्धिरहितः केवलकार्यबुद्ध्या युद्धम् आरभस्व।  एवं  कुर्वाणो  न पापम् अवाप्स्यसि  पापं दुःखरूपं संसारं न अवाप्स्यसि। संसारबन्धात् मोक्ष्यसे इत्यर्थः।एवम् आत्मयाथात्म्यज्ञानम् उपदिश्य तत्पूर्वकं मोक्षसाधनभूतं कर्मयोगं वक्तुम् आरभते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.38।।  सुखदुःखे समे  तुल्ये  कृत्वा  रागद्वेषावप्यकृत्वेत्येतत्। तथा लाभालाभौ जयाजयौ च समौ कृत्वा  ततो युद्धाय युज्यस्व  घटस्व।  न एवं  युद्धं कुर्वन्  पापम् अवाप्स्यसि । इत्येष उपदेशः प्रासङ्गिकः।।शोकमोहापनयनाय लौकिको न्यायः स्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्याद्यैः श्लोकैरुक्तः न तु तात्पर्येण। परमार्थदर्शनमिह प्रकृतम्। तच्चोक्तमुपसंह्रियते एषा तेऽभिहिता (गीता 2.39) इति शास्त्रविषयविभागप्रदर्शनाय। इह हि प्रदर्शिते पुनः शास्त्रविषयविभागे उपरिष्टात् ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इति निष्ठाद्वयविषयं शास्त्रं सुखं प्रवर्तिष्यते श्रोतारश्च विषयविभागेन सुखं ग्रहीष्यन्ति इत्यत आह

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【 Verse 2.39 】

▸ Sanskrit Sloka: एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु | बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि ||

▸ Transliteration: eṣā tebhihitā sānkhye buddhiryoge tvimāṁ śṛṇu | buddhyā yukto yayā pārtha karmabandhaṁ prahāsyasi ||

▸ Glossary: eṣā: all these; te: you; abhihitā: described; sāṁkhye: in the Sāṅkhya Yoga (yoga of knowledge); buddhiḥ: intelligence; yoge: in the Karma Yoga of selfless action; tu: but; imāṁ: this; śṛṇu: hear; buddhyā: by intelligence; yuktaḥ: equipped; yayā: by which; pārtha: O son of Pritā; karma bandhaṁ: bondage of action; prahāsyasi: you shall throw off

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.39 Thus far, what has been taught to you concerns the wisdom of Sāṅkhya. Now, listen to the wisdom of yoga [buddhiyoga]. Having known this, O Pārtha, you shall cast off the bonds of action.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.8।।पृथ्वीपर धनधान्यसमृद्ध और निष्कण्टक राज्य तथा स्वर्गमें देवताओंका आधिपत्य मिल जाय तो भी इन्द्रियोंको सुखानेवाला मेरा जो शोक है वह दूर हो जाय ऐसा मैं नहीं देखता हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.39।। हे पार्थ तुम्हें सांख्य विषयक ज्ञान कहा गया और अब इस (कर्म) योग से सम्बन्धित ज्ञान को सुनो जिस ज्ञान से युक्त होकर तुम कर्मबन्ध का नाश कर सकोगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.39 एषा this? ते to thee? अभिहिता (is) declared? सांख्ये in Sankhya? बुद्धिः wisdom? योगे in the Yoga? तु indeed? इमाम् this? श्रृणु hear? बुद्ध्या with wisdom? युक्तः endowed with? यया which? पार्थ O Partha? कर्मबन्धम् bondage of Karma? प्रहास्यसि (thou) shalt cast off.Commentary Lord Krishna taught Jnana (knowledge) to Arjuna till now. (Sankhya Yoga is the path of Vedanta or Jnana Yoga? which treats of the nature of the Atman or the Self and the methods to attain Selfrealisation. It is not the Sankhya philosophy of sage Kapila.) He is now giving to teach Arjuna the technie or secret of Karma Yoga endowed with which he (or anybody else) can break through the bonds of Karma. The Karma Yogi should perform work without expectation of fruits of his actions? without the idea of agency (or the notin I do this)? without attachment? after annihilating or going beyond all the pairs of opposites such as heat and cold? gain and loss? victoyr and defeat? etc. Dharma and Adharma? or merit and demerit will not touch that Karma Yogi who works without attachment and egoism. The Karma Yogi consecrates all his works and their fruits as offerings unto the Lord (Isvararpanam) and thus obtains the grace of the Lord (Isvaraprasada).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.39. Listen, how this knowledge, imparted [to you] for your sankhya, is [also] for the Yoga; endowed with which knowledge you shall cast off the bondage of action, O son of Prtha !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.39 I have told thee the philosophy of Knowledge. Now listen and I will explain the philosophy of Action, by means of which, O Arjuna, thou shalt break through the bondage of all action.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.39 This Buddhi concerning the self (Sankhya) has been imparted to you. Now listen to this with regard to Yoga, by following which you will get rid of the bondage of Karma.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.39 O Partha, this wisdom has been imparted to you from the standpoint of Self-realization. But listen to this (wisdom) from the standpoint of Yoga, endowed with which wisdom you will get rid of the bondage of action.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.39 This, which has been taught to thee, is wisdon concerning Sankhya. Now listen to wisdom concerning Yoga, endowed with which, O Arjuna, thou shalt cast off the bonds of action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.39 Esa te etc. And this knowledge in th form of determination has been declared [to you] for your sankhya, i.e., perfect knowledge. Now, how the self-same determinate knowledge is also taught for the Yoga i.e., dexerity in action - in that manner only you must listen to by means of which determinate knowledge you shall avoid the binding nature of the actions. Truely, the actions do not themselves bind as they are insentient. Hence, it is the Self which binds Itself by means of the actions in the form of mental impressions.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.39 'Sankhya' means 'intellect,' and the truth about the Atman, which is determinable by the intellect, is 'Sankhyam'. Concerning the nature of the self which has to be known, whatever Buddhi has to be taught, has been taught to you in the passage beginning with, 'It is not that I did not exist' (II.12) and ending with the words, 'Therefore, you shall not grieve for any being' (II.30). The disposition of mind (Buddhi) which is reired for the performance of works preceded by knowledge of the self and which thus constitutes the means of attaining release, that is here called by the term Yoga. It will be clearly told later on, 'Work done with desire for fruits is far inferior to work done with evennes of mind' (II. 49). What Buddhi or attitude of mind is reired for making your act deserve the name of Yoga, listen to it now. Endowed with that knowledge, you will be able to cast away the bondage of Karma. 'Karma-bandha' means the bondage due to Karma i.e., the bondage of Samsara.

Now Sri Krsna explains the glory of works associated with the Buddhi to be described hereafter:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.39 Partha, O son of Prtha (Arjuna); esa, this; buddhih, wisdom, the Knowledge which directly removes the defect (viz ignorance) that is responsible for sorrow, delusion, etc. [Mundane existence consists of attraction and repulsion, agentship and enjoyership, etc. These are the defects, and they arise from ignorance about one's Self. Enlightenment is the independent and sole cause that removes this ignorance.] constituting mundane existence; abhihita, has been imparted; te, to you; sankhye, from the standpoint of Self-realization, with regard to the discriminating knowledge of the supreme Reality. Tu, but; srnu, listen; imam, to this wisdom which will be imparted presently; yoge, from the spandpoint of Yoga, from the standpoint of the means of attaining it (Knowledge) i.e., in the context of Karma-yoga, the performance of rites and duties with detachment after destroying the pairs of opposites, for the sake of adoring God, as also in the context of the practice of spiritual absorption. As as inducement, He (the Lord) praises that wisdom: Yuktah, endowed; yaya, with which; buddhya, wisdom concerning Yoga; O Partha, prahasyasi, you will get rid of; karma-bandham, the bondage of action action is itself the bondage described as righteousness and unrighteousness; you will get rid of that bondage by the attainment of Knowledge through God's grace. This is the idea.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.39।। जिस प्रामाणिक विचार एवं युक्ति के द्वारा पारमार्थिक सत्य का ज्ञान होता है उसे सांख्य कहते हैं जिसका उपदेश भगवान् प्रारम्भ में ही कर चुके हैं। इस ज्ञान को प्राप्त करने से शोकमोह रूप संसार की पूर्ण निवृत्ति हो जाती है। अब श्रीकृष्ण कर्मयोग अथवा बुद्धियोग के विवेचन का आश्वासन अर्जुन को देते हैं।अनेक लोग कर्म के नियम को भूलवश भाग्यवाद समझ लेते हैं किन्तु कर्म का नियम हिन्दू धर्म का एक आधारभूत सिद्धान्त है और इसलिये हिन्दू जीवन पद्धति का अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों के लिये इस नियम का यथार्थ ज्ञान होना नितान्त आवश्यक है। यदि एक वर्ष पूर्व मद्रास में श्री रमण राव के किये अपराध के लिये आज मुझे दिल्ली में न्यायिक दण्ड मिलता है तो इसका अर्थ यह हुआ कि उस अपराधी रमण राव और आज के सन्त चिन्मय में कुछ समानता होनी चाहिये कानून के लम्बे हाथ यह पहचान कर कि अपराधी रमण राव ही चिन्मय है दिल्ली पहुँचकर मुझे दण्ड देते हैं इसी प्रकार प्रकृति का न्याय अकाट्य है पूर्ण है। इसलिये हिन्दू मनीषियों ने यह स्वीकार किया कि वर्तमान में हम जो कष्ट भोगते हैं उनका कारण भूतकाल में किसी देश विशेष और देहविशेष में किये हुए अपराध ही हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि पूर्वकाल का पापी और वर्तमान का कष्ट भोगने वाला कोई एक ही होना चाहिये। इसी को शास्त्र में जीव (मन और बुद्धि) कहा है।इच्छापूर्वक किया गया प्रत्येक कर्म कर्त्ता के मन पर अपना संस्कार छोड़ता जाता है जो कर्त्ता के उद्देश्य के अनुरूप ही होता है। इन संस्कारों को ही वासना कहते हैं जिनकी निवृत्ति के लिये प्रत्येक जीव विशिष्ट देश काल और परिस्थिति में जन्म लेता है। पूर्व संचित कर्मों के अनुसार सभी जीवों को दुख कष्ट आदि भोगने पड़ते हैं। मन पर पापों के चिहनांकन पश्चात्ताप पूरित क्षणों में अश्रुजल से ही प्रच्छालित किये जा सकते हैं। परिस्थितियाँ मनुष्य को रुलाती नहीं वरन् उसकी स्वयं की पापपूर्ण प्रवृत्तियाँ ही शोक का कारण होती हैं। शुद्धांन्तकरण वाले व्यक्ति के लिये फिर दुख का कोई निमित्त नहीं रह जाता।हमारे पास किसी संगीत का ध्वनिमुद्रित रेकार्ड होने मात्र से हम संगीत नहीं सुन सकते। जब रेकार्ड प्लेयर पर उसे रखकर सुई का स्पर्श होता है तभी संगीत सुनाई पड़ता है। इसी प्रकार मन में केवल वासनायें होने से ही दुख या सुख का अनुभव नहीं होता किन्तु अहंकार की सूई का स्पर्श पाकर बाह्य जगत् में जब वे कर्म के रूप में व्यक्त होती हैं तभी विविध प्रकार के फलों की प्राप्ति का अनुभव होता है।पूर्व श्लोक में वर्णित समभाव में स्थित हुआ पुरुष सुखदुख लाभहानि और जयपराजय रूपी द्वन्द्वों से ऊपर उठकर निजानन्द में रहता है। जिस मात्रा में शरीर मन और बुद्धि के साथ हमारा तादात्म्य निवृत्त होता जायेगा उसी मात्रा में यह कर्त्तृत्व का अहंकार भी नष्ट होता जायेगा और अन्त में अहंकार के अभाव में किसके लिये कर्मफल बाकी रहेंगे अर्थात् कर्म और कर्मफल सभी समाप्त हो जाते हैं।गीता में भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त कोई नया और मौलिक नहीं था। उन्होंने ईसा के जन्म के पाँच हजार वर्ष पूर्व प्राचीन सिद्धांत का केवल नवीनीकरण करके मृतप्राय धर्म को पुनर्जीवित किया जो सहस्रों वर्षों पूर्व आज भी हमारे लिये आनन्द का संदेश लिये खड़ा है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.39।।एष उपदेशः शोकमोहापनयसाधनस्यात्मतत्त्वज्ञानस्य प्रसङ्गे आगतः लौकिको न्यायः स्वधर्मविद्भिः कैश्चिल्लोकैर्यथा स्वधर्मप्रतिबन्धकौ शोकमोहावकृत्वा स्वधर्मोऽनुष्ठीयते तद्वत्त्वं स्वधर्ममपि चावेक्ष्य शोकमोहाभिभूतो विकम्पितुं नार्हसीति। अथ चैनमित्यादिवत्प्रासाङ्गिकः स्वधर्ममपीत्याद्यष्टभिः श्लोकैरुक्तो नतु समुच्चयतात्पर्येण परमार्थदर्शनस्येह प्रकृतत्वात्। तच्चोक्तं परमार्थदर्शनमुपसंहरन् तदुपायभूतां योगनिष्ठां चित्तशुद्धये वक्तुं प्रतिजानीते  एषेति।  एषा ते तुभ्यमभिहिता कथिता सांख्ये परमार्थवस्तुविवेकविषये बुद्धिर्ज्ञानं साक्षाच्छोकमोहादिसहेतुदोषनिवृत्तिकारणम्। योगे तु निःसङ्गतया द्वन्द्वप्रहाणपूर्वकं ईश्वराराधनार्थे कर्मयोगे कर्मानुष्ठाने समाधियोगे च तत्प्राप्युपाये इमामनन्तरोच्यमानां बुद्धिं श्रृणु। तां स्तौति  ययेति।  यया बुद्य्धा योगविषयया युक्तः कर्मबन्धं कर्मैव धर्माधर्माख्यं बन्धस्तं प्रहास्यसि प्रकर्षेण त्यजसि। ननु योगविषयया बुद्य्धा कर्मबन्धस्य कुतो निवृत्तिः नहि तत्त्वज्ञानमन्तरेण समूलं कर्म हातुं शक्यमिति चेत्सत्यम्। तथापीश्वरप्रसादनिमित्तज्ञानप्राप्तिद्वारेत्यभिप्रायः। द्वारकथनं तु तत्साधनस्तुत्यर्थम्। पार्थेति संबोधयन् एतद्बुद्धियुक्तस्य मातृगर्भाप्राप्तिं सूचयति। यत्तु कर्मनिमित्तं बन्धमाशयाशुद्धिलक्षणं ज्ञानप्रतिबन्धं प्रहास्यसि। अयंभावः कर्मनिमित्तो ज्ञानप्रतिबन्धः कर्मणैव धर्माख्येनापनेतुं शक्यते श्रवणादिलक्षणविचारस्तु कर्मात्मकप्रतिबन्धरहितस्यासंभावनादिप्रतिबन्धं दृष्टद्वारेणपनयतीति न कर्मबन्धनिराकरणायोपदेष्टुं शक्यत इति। तन्न। स्वर्गनरकादिसाधनपुण्यपापप्रतिपादककर्मपदसंकोचे बन्धशब्दस्य प्रतिबन्धपरत्वे च कारणाभावात्। ननु एतद्बुद्य्धा धर्माधर्माख्यबन्धप्रहाणस्यासंभव एव कारणमिति चेन्न। ज्ञानप्राप्तिद्वारा तत्संभवस्योक्तत्वात्।असंभावनादेरपि पापनिमित्तचित्ताशुद्धमूलकत्वात्। अतएव शुद्धचित्तस्य विद्याधरस्यासंभावनाद्यनुत्पत्तिर्वासिष्ठ उपाख्यायते असंभावनादिनिमित्तदुरितनिवृत्त्यर्थमेवादृष्टोत्पादको विवरणाचार्यैः श्रवणे विधिरङ्गीकृतः। अन्यथा प्राकृतप्रबन्धाद्यर्थेन दृष्टेनासंभावनादिनिरासः स्यात् तथाच वेदान्तश्रवणजेन पुण्येन पापनिवृत्त्या आत्मतत्त्वं सभ्यगवगम्यत इति सर्वसंमतमनर्थकं भवेत्। एतेन कर्मबन्धं संसारं ईश्वरप्रसादनिमित्तज्ञानप्राप्त्या प्रहास्यसीति प्राचां व्याख्याने त्वध्याहारदोषः कर्मपदवैयर्थ्यं च परिहर्तव्यमिति प्रत्युक्तम्। जन्मबन्धविनिर्मुक्ता इत्यत्र जन्मपदवत्कर्मपदस्यापि बन्धस्वरुपबोधनपरत्वेन सार्थक्यात् भाष्ये अभिप्राय इत्युक्त्या तस्याभिप्रायकथनपरत्वेनाध्यारदोषाभावात् स्वेनापिबुद्धियुक्तो जहातीह उमे सुकृतदुष्कृते इत्यत्र द्वारस्योक्तत्वाच्चेति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.39।।ननु भवतु स्वधर्मबुद्ध्या युध्यमानस्य पापाभावस्तथापि न मांप्रति युद्धकर्तव्यतोपदेशस्तवोचितःय एनं वेत्ति हन्तारं इत्यादिनाकथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् इत्यनेन विदुषः सर्वकर्मप्रतिक्षेपात्। नह्यकर्त्रभोक्तृशुद्धस्वरूपोऽहमस्मि युद्धं कृत्वा तत्फलं भोक्ष्य इति च ज्ञानं संभवति विरोधात् ज्ञानकर्मणोः समुच्चयासंभवात्प्रकाशतमसोरिव। अयं चार्जुनाभिप्रायोज्यायसी चेत् इत्यत्र व्यक्तो भविष्यति। तस्मादेकमेव मांप्रति ज्ञानस्य कर्मणश्चोपदेशो नोपपद्यते इति चेन्न विद्वदविद्वदवस्थाभेदेन ज्ञानकर्मोपदेशोपपत्तेरित्याह भगवान् एषानत्वेवाहम् इत्याद्येकविंशतिश्लोकैः ते तुभ्यमभिहिता। सांख्ये सम्यक्ख्यायते सर्वोपाधिशून्यतया प्रतिपाद्यते परमात्मतत्त्वमनयेति संख्योपनिषत्तयैव तात्पर्यपरिसमाप्त्या प्रतिपाद्यते यः स सांख्यः। औपनिषदः पुरुष इत्यर्थः। तस्मिन्बुद्धिस्तन्मात्रविषयं ज्ञानं सर्वानर्थनिवृत्तिकारणं त्वांप्रति मयोक्तम्। नैतादृशज्ञानवतः क्वचिदपि कर्मोच्यतेतस्य कार्यं न विद्यते इति वक्ष्यमाणत्वात्। यदि पुनरेवं मयोक्तेऽपि तवैषा बुद्धिर्नोदेति चित्तदोषात्तदा तदपनयेनात्मतत्त्वसाक्षात्काराय कर्मयोग एव त्वयानुष्ठेयः। तस्मिन्योगे कर्मयोगे तु करणीयामिमांसुखदुःखे समे कृत्वा इत्यत्रोक्तां फलाभिसन्धित्यागलक्षणां बुद्धिं विस्तरेण मया वक्ष्यमाणां शृणु। तुशब्दः पूर्वबुद्धेर्योगविषयत्वव्यतिरेकसूचनार्थः। तथाच शुद्धान्तःकरणंप्रति ज्ञानोपदेशोऽशुद्धान्तःकरणंप्रति कर्मोपदेश इति कुतः समुच्चयशङ्कया विरोधावकाश इत्यभिप्रायः। योगविषयां बुद्धिं फलकथनेन स्तौति। यया व्यवसायात्मिकया बुद्ध्या कर्मसु युक्तस्त्वं कर्मनिमित्तं बन्धमाशयाशुद्धिलक्षणं ज्ञानप्रतिबन्धं प्रकर्षेण पुनः प्रतिबन्धानुत्पत्तिरूपेण हास्यसि त्यक्ष्यसि। अयं भावः कर्मनिमित्तो ज्ञानप्रतिबन्धः कर्मणैव धर्माख्येनापनेतुं शक्यते।धर्मेण पापमपनुदति इति श्रुतेः। श्रवणादिलक्षणो विचारस्तु कर्मात्मकप्रतिबन्धरहितस्यासंभावनादिप्रतिबन्धं दृष्टद्वारेणापनयतीति न कर्मबन्धनिराकरणायोपदेष्टुं शक्यते। अतोऽत्यन्तमलिनान्तःकरणत्वाद्बहिरङ्गसाधनं कर्मैव त्वयानुष्ठेयं नाधुना श्रवणादियोग्यतापि तव जाता दूरे तु ज्ञानयोग्यतेति। तथाच वक्ष्यतिकर्मण्येवाधिकारस्ते इति। एतेन सांख्यबुद्धेरन्तरङ्गसाधनं श्रवणादि विहाय बहिरङ्गसाधनं कर्मैव भगवता किमित्यर्जुनायोपदिश्यत इति निरस्तम्। कर्मबन्धं संसारमीश्वरप्रसादनिमित्तज्ञानप्राप्त्या प्रहास्यसीति प्राचां व्याख्याने त्वध्याहारदोषः कर्मपदवैयर्थ्यं च परिहर्तव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.39।।एवमर्जुनस्य पूर्वोक्तौ द्वावपि मोहावपनीतौ तत्रकं घातयन्ति हन्ति कम् इति कर्तृत्वकारयितृत्वयोरात्मन्यसंभव उक्तःततो युद्धाय युज्यस्व इति नियोगश्चोक्तः नह्यकर्तुराकाशवत्सर्वगतस्य नियोज्यत्वं संभवतीति परस्परव्याहतमेतदितीमामाशङ्कां अधिकारिभेदेन उभयं व्यवस्थापयन् परिहरति  एषा ते इति।  एषा ते तुभ्यं अभिहिता अशोच्यानन्वशोचस्त्वमित्यादिना स्वधर्ममपि चावेक्ष्येत्यतः प्राक्तनेन संदर्भेणोक्ता। सांख्ये सम्यक् ख्यायते प्रकथ्यते वस्तुतत्त्वमनयेति संख्या उपनिषत् तत्र विदिते सांख्ये औपनिषदे ब्रह्मणि विषये बुद्धिर्ज्ञानं संसारनिवर्तकम्। एषा ते सांख्ये बुद्धिरभिहितेति संबन्धः। योगेसिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते इति वक्ष्यमाणलक्षणे विषये। तुशब्दः पूर्ववैलक्षण्यद्योतनार्थः। वक्ष्यति च ज्ञानकर्मनिष्ठयोर्विभिन्नाधिकारिकत्वंलोकेऽस्मिन् द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ। ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्। इति। एतेन ज्ञानकर्मणोः समुच्चयशङ्काप्यपास्ता। इमांस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यादिनाऽनन्तरग्रन्थेनोक्तामपि विस्तरेणाभिधीयमानां शृणु। इमामेव बुद्धिं स्तौति सार्धेन  बुद्ध्येत्यादिना।  ननु कर्मबन्धप्रहाणमात्मज्ञानेनैव श्रूयतेतपसैवात्मपदं विदित्वा न लिप्यते कर्मणा पापकेन इति श्रुतेः। कर्मयोगस्तु कर्मबन्धं दृढीकरिष्यत्येवेति कथमुच्यते कर्मबन्धं प्रहास्यसीति चेत्। श्रुतिबलादिति ब्रूमः। तथाहिईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंच जगत्यां जगत्। तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्। कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः। एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे। इति श्रुतिरीश्वरेणेदं सर्वं स्तम्भितमस्तीति न कश्चित्किंचित्स्वेच्छया कर्तुं प्रभवति अतः सर्वत्र ममताहीनः सन् भोक्तृत्वकर्तृत्वाभिमानत्यागेनैव भोगान् भुङ्क्ष्व कर्माणि च कुरु एवं कुर्वति त्वयि कर्मलेपो नास्ति इतोऽन्यदुपायान्तरं च नास्तीति वदति। तस्मात् कनककार्ष्णायसादिवत्केनचिद्विशेषरूपेणोपेतं कर्मैव सजातीयोच्छेदनिमित्तं भविष्यतीति युक्तमुक्तं कर्मयोगेनापि कर्मबन्धं प्रहास्यसीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.39।।एवं साङ्ख्यमात्मज्ञानात्मकमुपदिश्योपसंहरति एषेति। एषा पूर्वोक्ता ते तव साङ्ख्ये आत्मानात्मप्रकाशके बुद्धिः करणार्थमभिहिता। साङ्ख्यस्य भगवतो विप्रयोगरसात्मककुण्डलरूपत्वात्तत्र भगवदात्मकात्मज्ञानेन न स्वास्थ्यं भवति तस्मादात्मज्ञानबुद्धिरभिहिता उक्तेत्यर्थः। तज्ज्ञानार्थमेव एतच्छ्रवणेऽपि चेत्तव न ज्ञानं जातं तदा कर्मयोगेन मोहो निवर्तिष्यत इति कर्मयोगं शृण्वित्याह योग इति। योगे तु इमां बुद्धिं शृणु यया बुद्ध्या युक्तः सन् पार्थ मद्भक्तवर कर्मबन्धं कृतकर्मपापं प्रहास्यसि त्यक्ष्यसीत्यर्थः। त्यागे प्रकर्षः पुनस्तद्भावानुदयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.39।।उपदिष्टं ज्ञानयोगमुपसंहरंस्तत्साधनं कर्मयोगं प्रस्तौति  एषा त इति।  सम्यक् ख्यायते प्रकाश्यते वस्तुतत्त्वमनयेति संख्या सम्यग्ज्ञानं तस्मिन्प्रकाशमानमात्मतत्त्वं सांख्यं तस्मिन्करणीया बुद्धिरेषा तवाभिहिता। एवमभिहितायामपि सांख्यबुद्धौ तव चेदात्मतत्त्वमपरोक्षं न संभवति तर्ह्यन्तःकरणशुद्धिद्वाराऽत्मतत्त्वापरोक्षार्थं कर्मयोगे त्विमां बुद्धिं शृणु। यया बुद्ध्या युक्तः परमेश्वरार्पितकर्मयोगेन शुद्धान्तःकरणः सन् तत्प्रसादप्राप्तापरोक्षज्ञानेन कर्मात्मकं बन्धं प्रकर्षेण हास्यसि त्यक्ष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.39।।एवमशोकार्थमुपदिष्टेऽपि साङ्ख्येऽतन्मात्ररुचिं पार्थमालक्ष्य आत्मयोगोपदेशेन मनस्समाधानाय तं प्रस्तौति एषा ते इति। साङ्ख्यमात्मानात्मतत्त्वसङ्ख्यानं तत्राभिधेयेन त्वेवाहं 2।12 इत्यारभ्यतस्मात्सर्वाणि भूतानि 2।30 इत्यन्तमुपादेयतयोक्त्वा मध्ये स्वधर्मकरणमुपपाद्य पुनरप्यन्तेसुखदुःखे समे कृत्वा 2।38 इत्यादिना योगवत्साङ्ख्यशास्त्रबुद्धिर्मयोक्ता। योगे तु मनोनिरोधरूपे साम्यस्थितिप्रयोजनके ईश्वरालम्बने याऽभिधेया बुद्धिस्तामिमां स्वधर्माचरणाभिमतां शृणु। तुर्भेदार्थकः। यया बुद्ध्या युक्तस्त्वं क्रियमाणकर्मसुबन्धमुभयात्मकं पुण्यपापात्मकं प्रहास्यसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.39।।क्योंकि यहाँ शास्त्रके विषयका विभाग दिखलाया जानेसे यह होगा कि आगे चलकर ज्ञानयोगेन सांख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् इत्यादि जो दो निष्ठाओंको बतानेवाला शास्त्र है वह सुखपूर्वक समझाया जा सकेगा और श्रोतागण भी विषयविभागपूर्वक अनायास ही उसे ग्रहण कर सकेंगे। इसलिये कहते हैं मैंने तुझसे सांख्य अर्थात् परमार्थ वस्तुकी पहिचानके विषयमें यह बुद्धि यानी ज्ञान कह सुनाया। यह ज्ञान संसारके हेतु जो शोक मोह आदि दोष हैं उनकी निवृत्तिका साक्षात् कारण है। इसकी प्राप्तिके उपायरूप योगके विषयमें अर्थात् आसक्तिरहित होकर सुखदुःख आदि द्वन्द्वोंके त्यागपूर्वक ईश्वराराधनके लिये कर्म किये जानेवाले कर्मयोगके विषयमें और समाधियोगके विषयमें इस बुद्धिको जो कि अभी आगे कही जाती है सुन रुचि बढ़ानेके लिये उस बुद्धिकी स्तुति करते हैं हे अर्जुन जिस योगविषयक बुद्धिसे युक्त हुआ तू धर्माधर्म नामक कर्मरूप बन्धनको ईश्वरकृपासे होनेवाली ज्ञानप्राप्तिद्वारा नाश कर डालेगायह अभिप्राय है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.39।। व्याख्या एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु   यहाँ  तु  पद प्रकरणसम्बन्धविच्छेद करनेके लिये आया है अर्थात् पहले सांख्यका प्रकरण कह दिया अब योगका प्रकरण कहते हैं।यहाँ  एषा  पद पूर्वश्लोकमें वर्णित समबुद्धिके लिये आया है। इस समबुद्धिका वर्णन पहले सांख्ययोगमें (ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) अच्छी तरह किया गया है। देहदेहीका ठीकठीक विवेक होनेपर समतामें अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। कारण कि देहमें राग रहनेसे ही विषमता आती है। इस प्रकार सांख्ययोगमें तो समबुद्धिका वर्णन हो चुका है। अब इसी समबुद्धिको तू कर्मयोगके विषयमें सुन। इमाम्  कहनेका तात्पर्य है कि अभी इस समबुद्धिको कर्मयोगके विषयमें कहना है कि यह समबुद्धि कर्मयोगमें कैसे प्राप्त होती है इसका स्वरूप क्या है इसकी महिमा क्या है इन बातोंके लिये भगवान्ने इस बुद्धिको योगके विषयमें सुननेके लिये कहा है। बुद्ध्या युक्तो यया पार्थ कर्मबन्धं प्रहास्यसि   अर्जुनके मनमें युद्ध करनेसे पाप लगनेकी सम्भावना थी (1। 36 45)। परन्तु भगवान्के मतमें कर्मोंमें विषमबुद्धि (रागद्वेष) होनेसे ही पाप लगता है। समबुद्धि होनेसे पाप लगता ही नहीं। जैसे संसारमें पाप और पुण्यकी अनेक क्रियाएँ होती रहती हैं पर उनसे हमें पापपुण्य नहीं लगते क्योंकि उनमें हमारी समबुद्धि रहती है अर्थात् उनमें हमारा कोई पक्षपात आग्रह रागद्वेष नहीं रहते। ऐसे ही तू समबुद्धिसे युक्त रहेगा तो तेरेको भी ये कर्म बन्धनकारक नहीं होंगे।इसी अध्यायके सातवें श्लोकमें अर्जुनने अपने कल्याणकी बात पूछी थी। इसलिये भगवान् कल्याणके मुख्यमुख्य साधनोंका वर्णन करते हैं। पहले भगवान्ने सांख्ययोगका साधन बताकर कर्तव्यकर्म करनेपर बड़ा जोर दिया कि क्षत्रियके लिये धर्मरूप युद्धसे बढ़कर श्रेयका अन्य कोई साधन नहीं है (2। 31)। फिर कहा कि समबुद्धिसे युद्ध किया जाय तो पाप नहीं लगता (2। 38)। अब उसी समबुद्धिको कर्मयोगके विषयमें कहते हैं।कर्मयोगी लोकसंग्रहके लिये सब कर्म करता है  लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि  (गीता 3। 20)। लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेसे अर्थात् निःस्वार्थभावसे लोकमर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये लोगोंको उन्मार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगानेके लिये कर्म करनेसे समताकी प्राप्ति सुगमतासे हो जाती है। समताकी प्राप्ति होनेसे कर्मयोगी कर्मबन्धनसे सुगमतापूर्वक छूट जाता है।यह (उन्तालीसवाँ) श्लोक तीसवें श्लोकके बाद ही ठीक बैठता है और यह वहीं आना चाहिये था। कारण यह है कि इस श्लोकमें दो निष्ठाओंका वर्णन है। पहले ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक सांख्ययोगसे निष्ठा (समता) बतायी और अब कर्मयोगसे निष्ठा (समता) बताते हैं। अतः यहाँ इकतीससे अड़तीसतकके आठ श्लोकोंको देना असंगत मालूम देता है। फिर भी इन आठ श्लोकोंको यहाँ देनेका कारण यह है कि कर्मयोगमें समता कहनेसे पहले कर्तव्य क्या है और अकर्तव्य क्या है अर्जुनके लिये युद्ध करना कर्तव्य है और युद्ध न करना अकर्तव्य है इस विषयका वर्णन होना आवश्यक है। अतः भगवान्ने कर्तव्यअकर्तव्यका वर्णन करनेके लिये ही उपर्युक्त आठ श्लोक (2। 3138) कहे हैं और फिर समताकी बात कही है। तात्पर्य है कि पहले ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक सत्असत्के वर्णनसे समता बतायी कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है। इनमें कोई कुछ भी परिवर्तन नहीं कर सकता। फिर इकतीसवेंसे अड़तीसवें श्लोकतक कर्तव्यअकर्तव्यकी बात कहकर उन्तालीसवें श्लोकसे अकर्तव्यका त्याग और कर्तव्यका पालन करते हुए कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धि और फलकी प्राप्तिअप्राप्तिमें समताका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.39।।सुखदुःखे इति। तव तु स्वधर्मतयैव कर्माणि कुर्वतो न कदाचित् पापसंबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.39।।ननुस्वधर्ममपि चावेक्ष्य इत्यादिश्लोकैर्न्यायावष्टम्भेन शोकमोहापनयनस्य तात्पर्येणोक्तत्वात्तस्मिन्नुपसंहर्तव्ये किमिति परमार्थदर्शनमुपसंह्रियते तत्राह  शोकेति।  स्वधर्ममपीत्यादिभिरतीतैः श्लोकैः शोकमोहयोः स्वजनमरणगुर्वादिवधशङ्कानिमित्तयोः सम्यग्ज्ञानप्रतिबन्धकयोरपनयार्थं वर्णाश्रमकृतं धर्ममनुतिष्ठतः स्वर्गादि सिध्यति नान्यथेत्यन्वयव्यतिरेकात्मको लोकप्रसिद्धो न्यायो यद्यपि दर्शितस्तथापि नासौ तात्पर्येणोक्त इत्यर्थः। किं तर्हि तात्पर्येणोक्तं तदाह  परमार्थेति। न त्वेवाहं जातु नासं इत्यादि सप्तम्या  परामृश्यते।  उक्तम्न जायते म्रियते वा कदाचिन्न इत्यादिनोपपादितमित्यर्थः। उपसंहारप्रयोजनमाह  शास्त्रेति।  तस्य वस्तुद्वारा विषयो निष्ठाद्वयं तस्य विभक्तस्य तेनैव विभागेन प्रदर्शनार्थं परमार्थदर्शनोपसंहार इत्यर्थः। ननु किमित्यत्र शास्त्रस्य विषयविभावः प्रदर्श्यते उत्तरत्रैव तद्विभागप्रवृत्तिप्रतिपत्त्योः संभवादिति तत्राह  इह हीति।  शास्त्रप्रवृत्तेः श्रोतृप्रतिपत्तेश्च सौकर्यार्थमादौ विषयविभागसूचनमित्यर्थः। उपसंहारस्य फलवत्त्वमेवमुक्त्वा तमेवोपसंहारमवतारयति  अत आहेति।  परमार्थतत्त्वविषयां ज्ञाननिष्ठामुक्तामुपसंहृत्य वक्ष्यमाणां संगृह्णाति  योगे त्विति।  तामेव बुद्धिं विशिष्टफलवत्त्वेनाभिष्टौति  बुद्ध्येति।  तत्रोपसंहारभागं विभजते  एषेत्यादिना।  बुद्धिशब्दस्यान्तःकरणविषयत्वं व्यावर्तयति  ज्ञानमिति।  तस्य सहकारिनिरपेक्षस्य विशिष्टं फलवत्त्वमाचष्टे  साक्षादिति।  शोकमोहौ रागद्वेषौ कर्तृत्वं भोक्तृत्वमित्यादिरनर्थः संसारस्तस्य हेतुर्दोषः स्वाज्ञानं तस्य निवृत्तौ निरपेक्षं कारणं ज्ञानम्। अज्ञाननिवृत्तौ ज्ञानस्यान्वयव्यतिरेकसमधिगतसाधनत्वादित्यर्थः। योगे त्विमामित्यादि व्याकुर्वन्योगशब्दस्य प्रकृते चित्तवृत्तिनिरोधविषयत्वं व्यवच्छिनत्ति  तत्प्राप्तीति।  प्रकृतं मुक्त्युपयुक्तं ज्ञानं तत्पदेन परामृश्यते। ज्ञानोदयोपायमेव प्रकटयति  निःसङ्गतयेति।  फलाभिसन्धिवैधुर्यं निःसङ्गत्वम्। बुद्धिस्तुतिप्रयोजनमाह  प्ररोचनार्थमिति।  अभिष्टुता हि बुद्धिः श्रद्धातव्या सत्यनुष्ठातारमधिकरोति तेन स्तुतिरर्थवतीत्यर्थः। कर्मानुष्ठानविषयबुद्ध्या कर्मबन्धस्य कुतो निवृत्तिः नहि तत्त्वज्ञानमन्तरेण समूलं कर्म हातुं शक्यमित्याशङ्क्याह  ईश्वर इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.39।।पूर्वप्रकरणोपसंहारपूर्वकं तत्सङ्गतत्वेनोत्तरप्रकरणारम्भप्रतिज्ञार्थंएषा तेऽभिहिता इत्युक्तम् तत्र साङ्ख्ययोगशब्दौ कापिलपातञ्जलशास्त्रवचनाविति प्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे  साङ्ख्य मिति। प्रतीतार्थावेव कुतो न स्यातां इत्यत आह  नेतरा विति। इतरौ शास्त्रलक्षणौ। कुत्रचिदागमे एतौ तूपादेयौ।बुद्ध्या युक्तः इत्यादिवचनात्। अतो न तावत्र विवक्षिताविति वाक्यशेषः। प्रकृतिपुरुषविवेकादेस्तदुक्तस्योपादेयत्वात्कथमेतत् इत्यत उक्तं  सामस्त्येने ति। एकदेशस्योपादेयतया तदुपादेयत्वे सौगतादेरपि तत्प्रसङ्ग इति भावः। इतोऽपि न योगः पातञ्जलशास्त्रमित्याह  कर्मे ति अस्मिन्नेव योगे कर्मयोगो विशिष्यत इत्यादिप्रयोगाच्च। न हि शास्त्रे कर्मयोगशब्दोऽस्तीति। न केवलमुपादेयत्वाभावान्नेतरौ विवज्ञितौ किन्त्वित्यत आह  निन्दितत्वा दिति। कथं निन्दितत्वं इत्यत आह  भिन्ने ति।साङ्ख्य योगः पाशुपतं वेदारण्यकमेव च। ज्ञानान्येतानि भिन्नानि नात्र कार्या विचारणा म.भा.12।349।64 इति साङ्ख्यादीनां विरुद्धमतत्वमुक्त्वापञ्चरात्रस्य कृत्स्नस्य वक्ता नारायणः स्वयम्। ज्ञानेष्वेतेषु राजेन्द्र सर्वेष्वेतद्विशिष्यते म.भा.12।349।68 इति पञ्चरात्रस्तुत्या विरुद्धानामेकस्तुतिपरनिन्दां गमयतीति प्रसिद्धमेवेति भावः। एवं तर्हि वेदारण्यकस्यापि निन्दा स्यादित्यत आह  वेदानां  त्विति। एकार्थत्वात्पञ्चरात्रेण।ज्ञानान्वेतानि भिन्नानि इति पार्थक्योक्तेः कथमेकार्थत्वं इत्यत आह  पार्थक्यं

Chapter 2 (Part 23)

त्विति। युक्तमित्यनेन तेषामेव प्रकृतत्वादित्यभिप्रैति। तथा चाद्यवाक्ये वेदारण्यकपदेन पञ्चरात्रमुत्तरवाक्ये च पञ्चरात्रपदेन वेदारण्यकमुपलक्ष्यते इति भावः। वेदपञ्चरात्रयोरेकार्थत्वं कुत इति चेत् उदाहृतमोक्षधर्मवाक्यार्थान्यथानुपपत्त्या तावत्।अपरं प्रमाणमाह  तत्रैवे ति। मोक्षधर्मे एवये हि ते यतयः ख्याताः सत्यचित्रशिखण्डिनः। तैरेकमतिभिर्भूत्वा यत्प्रोक्तं शास्त्रमुत्तमम्। वेदैश्चतुर्भिः समितं कृतं मेरौ महागिरौ म.भा.12 इत्यादिना चित्रशिखण्डिशास्त्रस्य वेदैक्योक्तेश्च असङ्गतमेतदित्यत आह  पञ्चरात्रे ति। पञ्चरात्रमूलकस्येत्यर्थः। एतच्च वैखानससंहितोपक्रम एव प्रसिद्धम्। अत एतद्व्याख्यानंज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां 3।3साङ्ख्ययोगौ पृथग्बालाः 5।4 इत्यादावप्यतिदिशति  एवमेवे ति। शब्द इति जात्यभिप्रायमेकवचनम्। इतोऽप्यत्र साङ्ख्ययोगशब्दौ ज्ञानोपायवाचिनावित्याह  युक्तेश्चे ति। तामेव युक्तिं दर्शयति  ज्ञान मिति। अत्रोक्तवक्ष्यमाणयोरर्थयोः साङ्ख्ययोगशब्दौ प्रयुक्तावुक्तवक्ष्यमाणार्थौ ज्ञानोपायावेवेति तदर्थावेतौ युक्ताविति  जैवं ज्ञान मिति। जीवस्य तत्त्वमित्यर्थः। यद्यपीश्वरतत्त्वं चोक्तं तथापि तादर्थ्येनेत्यदोषः। ननु बुद्धिर्ज्ञानं तदुत्पाद्यत एव न त्वत्राभिहितं नापि श्राव्यते तत्कथमुच्यतेसाङ्ख्ये बुद्धिरभिहिता योगे त्विमां शृणु इति तत्राह  बुध्यत  इति। वागिति शेषः। ननु साङ्ख्यं न वाचोऽधिकरणं तत्कथं सप्तमी किमर्थं च प्रसिद्धवाक्छब्दपरित्यागेनाप्रसिद्धबुद्धिशब्दोपादानं इत्यत आह  साङ्ख्ये ति। साङ्ख्यं चासौ विषयश्च अनेन विषयसप्तमीयमित्याह। नाविशदं वाङ्मात्रमुक्तं किन्तु तव बोधो यथोत्पद्यते तथेत्यप्रसिद्धपदोपादानप्रयोजनमित्युक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.39।।साङ्ख्यं ज्ञानम्।शुद्धात्मतत्त्वविज्ञानं साङ्ख्यमित्यभिधीयते इति भगवद्वचनाद्व्यासस्मृतौ। योग उपायःदृष्टा योगाः प्रयुक्ताश्च पुंसां श्रेयःप्रसिद्धये इति प्रयोगादभागवते। नेतरौ साङ्ख्ययोगौ उपादेयत्वेन विवक्षितौ कुत्रचित्सामस्त्येन कर्मयोग इत्यादिप्रयोगाच्च। निन्दितत्वाच्चेतरयोर्मोक्षधर्मेषु भिन्नमतत्वमुक्त्वा पञ्चरात्रस्तुत्या वेदानां त्वेकार्यत्वान्न विरोधः। पार्थक्यं तु साङ्ख्याद्यपेक्षया युक्तम्। तत्रैव चित्रशिखण्डिशास्त्रे पञ्चरात्रमूले वेदैक्योक्तेश्च एवमेव सर्वत्र साङ्ख्ययोगशब्द उपादेयवाचको वर्णनीयः। युक्तेश्च ज्ञानं पूर्वं जैवमुक्तम्। उपायश्च वक्ष्यते। बुध्यतेऽनयेति बुद्धिः। साङ्ख्यविषयो यया वाचा बुध्यते सा वागभिहितेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.39।।संख्या बुद्धिः बुद्ध्यावधारणीयम् आत्मतत्त्वं सांख्यम्। ज्ञातव्ये आत्मतत्त्वे तज्ज्ञानाय या बुद्धिः अभिधेया न त्वेवाहम् (गीता 2।12) इत्यारभ्यतस्मात् सर्वाणि भूतानि (गीता 2।30) इत्यन्तेन सा  एषा अभिहिता। आत्मज्ञानपूर्वकमोक्षसाधनभूतकर्मानुष्ठाने यो बुद्धियोगो वक्तव्यः स इह योगशब्देन उच्यतेदूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगात् (गीता 2।49) इति हि वक्ष्यते। तत्र  योगे  या  बुद्धिः  वक्तव्या ताम् इमाम् अभिधीयमानां  श्रृणु यया  बुद्ध्या  युक्तः   कर्मबन्धं प्रहास्यसि।  कर्मणा बन्धः संसारबन्ध इत्यर्थः।वक्ष्यमाणबुद्धियुक्तस्य कर्मणो माहात्म्यम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.39।।  एषा ते  तुभ्यम्  अभिहिता  उक्ता  सांख्ये  परमार्थवस्तुविवेकविषये  बुद्धिः  ज्ञानं साक्षात् शोकमोहादिसंसारहेतुदोषनिवृत्तिकारणम्।  योगे तु  तत्प्राप्त्युपाये निःसङ्गतया द्वन्द्वप्रहाणपूर्वकम् ईश्वराराधनार्थे कर्मयोगे कर्मानुष्ठाने समाधियोगे च  इमाम्  अनन्तरमेवोच्यमानां बुद्धिं  शृणु । तां च बुद्धिं स्तौति प्ररोचनार्थम्  बुद्धया यया  योगविषयया  युक्तः  हे पार्थ  कर्मबन्धं  कर्मैव धर्माधर्माख्यो बन्धः कर्मबन्धः तं  प्रहास्यसि  ईश्वरप्रसादनिमित्तज्ञानप्राप्त्यैव इत्यभिप्रायः।।किञ्च अन्यत्

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【 Verse 2.40 】

▸ Sanskrit Sloka: नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते | स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ||

▸ Transliteration: nehābhikrama-nāśo ’sti pratyavāyo na vidyate | svalpamapyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt ||

▸ Glossary: na: there is not; iha: in this path of yoga (of selfless action); abhikramanāśaḥ: loss of effort; asti: there is; pratyavāyaḥ: contrary result; na: not; vidyate: there is; svalpaṁ: a little; api: also; asya: of this discipline; dharmasya: of this occu- pation; trāyate: releases; mahataḥ: of very great; bhayāt: from fear

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.40 There is no wasted effort or dangerous effect in this path of yoga. Even a little knowledge of this, even a little practice of this dharma, protects and releases one from very great fear.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.9।।सञ्जय बोले हे शत्रुतापन धृतराष्ट्र ऐसा कहकर निद्राको जीतनेवाले अर्जुन अन्तर्यामी भगवान् गोविन्दसे मैं युद्ध नहीं करूँगा ऐसा स्पष्ट कहकर चुप हो गये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.40।। इसमें क्रमनाश और प्रत्यवाय दोष नहीं है। इस धर्म (योग) का अल्प अभ्यास भी महान् भय से रक्षण करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.40 न not? इह in this? अभिक्रमनाशः loss of effort? अस्ति is? प्रत्यवायः production of contrary results? न not? विद्यते is? स्वल्पम् very little? अपि even? अस्य of this? धर्मस्य duty? त्रायते protects? महतः (from) great? भयात् fear.Commentary If a religious ceremony is left uncompleted? it is a wastage as the performer cannot realise the fruits. But it is not so in the case of Karma Yoga because every action causes immediate purification of the heart.In agriculture there is uncertainty. The farmer may till the land? plough and sow the seed but he may not get a crop if there is no rain. This is not so in Karma Yoga. There is no uncertainty at all. Further? there is no chance of any harm coming out of it. In the case of medical treatment great harm will result from the doctors injudicious treatment if he uses a wrong medicine. But it is not so in the case of Karma Yoga. Anything done? however little it may be? in this path of Yoga? the Yoga of action? saves one from great fear of being caught in the wheel of birth and death. Lord Krishna here extols Karma Yoga in order to create interest in Arjuna in this Yoga.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.40. Here there is no loss due to transgression, and there exists no contrary downward course (sin); even a little of this righteous thing saves [one] from great danger.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.40 On this Path, endeavour is never wasted, nor can it ever be repressed. Even a very little of its practice protects one from great danger.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.40 Here, there is no loss of effort, nor any accrual of evil. Even a little of this Dharma (called Karma Yoga) protects a man from the great fear.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.40 Here there is no waste of an attempt; nor is there (any) harm. Even a little of this righteousness saves (one) from great fear.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.40 In this there is no loss of effort, nor is there any harm (production of contrary results or transgression). Even a little of this knowledge (even a little practice of this Yoga) protects one from great fear.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.40 Neha etc. Here in this determinate knowledge there arises no loss through transgression, an offence due to negligence; because negligence is [itself] absent there. And just as a burning oil in the boiler get cooled soon, due to a limited antity of sandal (put in it), in the same way due to this knowledge of Yoga-eventhough it is very little-the great danger in the form of the cycle of birth-and-death perishes completely. And this knowledge is not introduced as a new thing. Then what ?

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.40 Here, in Karma Yoga, there is no loss of 'Abhikrama' or of effort that has been put in; 'loss' means the loss of efficacy to bring about the fruits. In Karma Yoga if work is begun and left unfinished, and the continuity is broken in the middle, it does not remain fruitless, as in the case of works undertaken for their fruits. No evil result is acired if the continuity of work is broken. Even a little of this Dharma known as Karma Yoga or Niskama Karma (unselfish action without desire for any reward) gives protection from the great fear, i.e., the fear of transmigratory existence.

The same purport is explained later thus: 'Neither in this world nor the next, O Arjuna, there is annihilation for him' (6.40). But in works, Vedic and secular, when there is interruption in the middle, not only do they not yield fruits, but also there is accrual of evil.

Now, Sri Krsna distinguishes the Buddhi or mental disposition concerned with those acts which constitute a means for attaining release from those which are concerned with the acts meant for gaining the desired objects:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.40 Moreover, iha, here, in the path to Liberation, viz the Yoga of Action (rites and duties); na, there is no; abhikrama-nasah, waste of an attempt, of a beginning, unlike as in agriculture etc. The meaning is that the result of any attempt in the case of Yoga is not uncertain. Besides, unlike as in medical care, na vidyate, nor is there, nor does there arises; any pratyavayah, harm. But, svalpam api, even a little; asya, of this; dharmasya, righteousness in the form of Yoga (of Action); when pracised, trayate, saves (one); mahato bhayat, from great fear, of mundance existence characterized by death, birth, etc.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.40।। क्रमनाश जिस प्रकार कृषि क्षेत्र में फसल पाने के लिये भूमि जोतना सींचना बीज बोना निराई सुरक्षा और कटाई आदि क्रम का पालन करना पड़ता है अन्यथा हानि उठानी पड़ती है उसी प्रकार वेदों के कर्मकाण्ड में वर्णित यज्ञयागादि के अनुष्ठान में भी क्रमानुसार क्रिया विधि न करने पर यज्ञ का फल नहीं मिलता। इतना ही नहीं यदि वेद प्रतिपादित कर्मों को न किया जाय तो वह प्रत्यवाय दोष कहलाता है जिसका अनिष्ट फल कर्त्ता (जीव)को भोगना पड़ता है। लौकिक फल प्राप्ति में यही बातें देखी जाती हैं। भौतिक जगत् में भी इसी प्रकार के अनेक उदाहरण हैं जैसे गलत औषधियों के प्रयोग से रोगी को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है।कर्म क्षेत्र में इन दोषों के होने से हमें इष्टफल नहीं मिल पाता। भगवान् श्रीकृष्ण यहां मानो इस ज्ञान का विज्ञापन करते हुये कर्मयोग का उपर्युक्त दोनों दोषों से सर्वथा मुक्त और सुरक्षित होने का आश्वासन देते हैं।अब इस ज्ञान का स्वरूप बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.40।।काभ्यादस्य महद्वैलक्षण्यमित्याशयेनाह  नेहेति।  इह निष्कामकर्मणि समाधियोगे च मोक्षमार्गे अभिक्रमस्य प्रारम्भस्य नाशो नास्ति। कृष्यादेरिव प्रत्यवायः पापोत्पत्तिरपि चिकित्सावन्न विद्यते। अस्य धर्मस्य त्वल्पमप्यनुष्ठितं महतो भयाज्जन्ममरणादिलक्षणसंसारभयाद्रक्षति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.40।।ननुतमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्या विविदिषां ज्ञानं चोद्दिश्य संयोगपृथक्त्वन्यायेन सर्वकर्मणां विनियोगात्तत्र चान्तःकरणशुद्धेर्द्वारत्वान्मांप्रति कर्मानुष्ठानं विधीयते। तत्रतद्यथेह कर्मजितो लोकः क्षीयत एवमेवामुत्र पुण्यजितो लोकः क्षीयते इति श्रुतिबोधितस्य फलनाशस्य संभवात् ज्ञानं विविदिषां चोद्दिश्य क्रियमाणस्य यज्ञादेः काम्यत्वात्सर्वाङ्गोपसंहारेणानुष्ठेयस्य यत्किंचिदङ्गासंपत्तावपि वैगुण्योपपत्तेर्यज्ञेनेत्यादिवाक्यविहितानां च सर्वेषां कर्मणामेकेन पुरुषायुषपर्यवसानेऽपि कर्तुमशक्यत्वात्कुतःकर्मबन्धं प्रहास्यसि इति फलं प्रत्याशेत्यत आह भगवान् अभिक्रम्यते कर्मणा प्रारभ्यते यत्फलं सोऽभिक्रमस्तस्य नाशस्तद्यथेहेत्यादिना प्रतिपादितः स इह निष्कामकर्मयोगे नास्ति एतत्फलस्य शुद्धेः पापक्षयरूपत्वेन लोकशब्दावाच्यभोग्यत्वाभावेन च क्षयासंभवात् वेदनपर्यन्ताया एव विविदिषायाः कर्मफलत्वाद्वेदनस्य चाव्यवधानेनाज्ञाननिवृत्तिफलजनकस्य फलमजनयित्वा नाशासंभवादिह फलनाशो नास्तीति साधूक्तम्। तदुक्तम् तद्यथेहेति या निन्दा सा फले न तु कर्मणि। फलेच्छां तु परित्यज्य कृतं कर्म विशुद्धिकृत्।। इति। तथा प्रत्यवायोऽङ्गवैगुण्यनिबन्धनं वैगुण्यमिह न विद्यते तमितिवाक्येन नित्यानामेवोपात्तदुरितक्षयद्वारेण विविदिषायां विनियोगात्। तत्रच सर्वाङ्गोपसंहारनियमाभावात् काम्यानामपि संयोगपृथक्त्वन्यायेन विनियोग इति पक्षेऽपि फलाभिसंधिरहितत्वेन तेषां नित्यतुल्यत्वात्। नहि काम्यनित्याग्निहोत्रयोः स्वतः कश्चिद्विशेषोऽस्ति। फलाभिसंधितदभावाभ्यामेव तु काम्यत्वनित्यत्वव्यपदेशः। इदंच पक्षद्वयमुक्तं वार्तिके वेदानुवचनादीनामैकात्म्यज्ञानजन्मने। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः।।यद्वा विविदिषार्थत्वं काम्यानामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः।। इति। तथाच फलाभिसंधिना क्रियमाण एव कर्मणि सर्वाङ्गोपसंहारनियमात्तद्विलक्षणे शुद्ध्यर्थे कर्मणि प्रतिनिध्यादिना समाप्तिसंभवान्नाङ्गवैगुण्यनिमित्तः प्रत्यवायोऽस्तीत्यर्थः। तथास्य शुद्ध्यर्थस्य धर्मस्यतमेतम् इत्यादिवाक्यविहितस्य मध्ये स्वल्पमपि संख्ययेतिकर्तव्यतया वा यथाशक्तिभगवदाराधनार्थं किंचिदप्यनुष्ठितं सन्महतः संसारभयात्त्रायते भगवत्प्रसादसंपादनेनानुष्ठातारं रक्षति।सर्वपापप्रसक्तोऽपि ध्यायन्निमिषमच्युतम्। भूयस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावनपावनः।। इत्यादिस्मृतेः।तमेतम् इति वाक्ये समुच्चयविधायकाभावाच्च अशुद्धितारतम्यादेवानुष्ठानतारतम्योपपत्तेर्युक्तमुक्तंकर्मबन्धं प्रहास्यसि इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.40।।एतदेवोपपादयति  नेहेति।  इह कर्मबन्धप्रहाणार्थे कर्मयोगेऽनुष्ठीयमाने। अभिक्रम्यते व्याप्यत इत्यभिक्रमः कर्मारम्भः कर्मैव वा तस्य नाशो नास्ति। अन्यत्तु फलं दत्त्वा नश्यति नत्विदम्। इष्टफलस्याजननात्। नन्वेतस्यापि काम्यान्तःपातितया नित्याकरणजनितः प्रत्यवाय उत्पद्येतैव। सकृदनुष्ठितस्य बन्धप्रहाणप्रत्यवायपरिहाराख्यफलद्वयहेतुत्वायोगादित्याशङ्क्याह  प्रत्यवायो न विद्यत इति। तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्या संयोगपृथक्त्वन्यायेनदध्नेन्द्रियकामस्य जुहुयात् इत्यनेन नित्यस्य दध्नो वीर्यार्थत्वमिव नित्यानामपि कर्मणां विविदिषार्थत्वं विनियोगबलात्सिध्यति। ततश्च काम्येनैव प्रयोगेण नित्यस्यापि सिद्धेर्न नित्याकरणनिमित्तो वा काम्यत्वात्सर्वाङ्गानुपसंहारनिमित्तो वा प्रत्यवायो विद्यते। नित्यानामेव विनियोगात्। नित्येषु च यथाशक्त्युपबन्धस्यानुज्ञानात्। वार्तिके तु काम्यानामप्यत्र विनियोगो दृष्टः। यथावेदानुवचनादीनामैकात्म्यज्ञानजन्मने। तमेतमिति वाक्येन नित्यानां वक्ष्यते विधिः। यद्वा विविदिषार्थत्वं काम्यानामपि कर्मणाम्। तमेतमिति वाक्येन संयोगस्य पृथक्त्वतः। इति। अस्मिन्पक्षे काम्यानामपि तुल्यफलत्वात् नित्यवद्यथाशक्त्युपबन्धो भविष्यतीति न सर्वाङ्गानुपसंहारजनितः प्रत्यवायो विद्यते। स्वल्पमपि अस्य योगधर्मस्यानुष्ठितं अनुपभुक्तबीजकल्पम्जन्मजन्मान्तराभ्यस्तं दानमध्ययनं तपः। तेनैवाभ्यासयोगेन तच्चैवाभ्यसते पुनः। इति स्मृतेरुत्तरोत्तरसंस्काराधानद्वारा स्वसजातीयवृद्धेर्निमित्तं सत्कामादिदोषक्षपणद्वारा महतो भयात्संसारात्त्रायते। तस्मात्सांख्यानधिकारिणा कर्मयोग एवानुष्ठेय इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.40।।ननु कर्मणा बाहुल्यात्कालादिसाध्यत्वाच्च कृतानां पूर्णत्वाभावाद्वैकल्यं प्रत्युत अङ्गवैगुण्यादिना प्रत्यवायादिसम्भावना भवेदिति कथं बन्धो न भविष्यतीति चेत् इत्याशङ्क्यार्जुनस्य भगवत्कुण्डलात्मकसंयोगरूपयोगस्वरूपाज्ञानात्तज्ज्ञानार्थं तत्स्वरूपमाह नेहाभिक्रमनाश इति। भगवन्मार्गे भगवदर्थं भगवदाज्ञारूपेण कर्त्तव्यत्वं कर्मणां न तु फलसाधकत्वेन तस्मान्न पूर्वोक्तदोषसम्भावनात्र। तदेवाह इह मदाज्ञात्वेन क्रियमाणस्य कर्मणोऽभिक्रमनाशः प्रारब्धकर्मनाशो नास्ति निष्फलत्वं न भवतीत्यर्थः। प्रत्यवायश्च न विद्यते। यतोऽस्य धर्मस्य स्वल्पमपि कृतं महतो भयात् त्रायते रक्षति। अत्रायं भावः अन्यत्र कृतकर्मसाफल्यार्थं साङ्गत्वाय च भगवत्स्मरणं बोध्यतेयस्य स्मृत्या वि.पु. इत्यादिना तत्र साक्षाद्भगवदर्थं कृतानां कर्मणां कथं वैफल्यं भवेत्

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.40।।ननु कृष्यादिवत्कर्मणां कदाचिद्विघ्नबाहुल्येन फले व्याभिचारान्मन्त्राद्यङ्गवैगुण्येन च प्रत्यवायसंभवात्कुतः कर्मयोगेन कर्मबन्धप्रहरणं तत्राह  नेहेति।  इह निष्कामकर्मयोगेऽभिक्रमस्य प्रारम्भस्य नाशो निष्फलत्वं नास्ति प्रत्यवायश्च न विद्यते ईश्वरोद्देशेनैव विघ्नवैगुण्याद्यसंभवात्। किंच अस्य धर्मस्य स्वल्पमप्युपक्रममात्रमपि कृतं महतो भयात्संसारान्त्रायते रक्षति नतु काम्यकर्मवत्किंचिदङ्गवैगुण्यादिना नैष्फल्यमस्येत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.40।।सर्वतो योगे सुगमतामाह नेहाभिक्रमनाश इति। इह योगबुद्धौ धर्मस्य योऽभिक्रमः प्रारम्भस्तस्य नाशो नास्ति।नह्यङ्गोपक्रमे ध्वंसो स्वधर्मस्योद्धवाण्वपि। मया व्यवसितः 11।29।20 इति भागवतवाक्यात्। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्याभिक्रमो महतो भयात्त्रायते। साङ्ख्ये तु सिद्धे धर्मकर्मणां त्यागः अत्र तु न तथा। उक्तं च यमादयस्तु कर्त्तव्याः सिद्धे योगे कृतार्थता इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.40।।इसके सिवा और भी सुन आरम्भका नाम अभिक्रम है इस कर्मयोगरूप मोक्षमार्गमें अभिक्रमका यानी प्रारम्भका कृषि आदिके सदृश नाश नहीं होता। अभिप्राय यह कि योगविषयक प्रारम्भका फल अनैकान्तिक ( संशययुक्त ) नहीं है। तथा चिकित्सादिकी तरह ( इसमें ) प्रत्यवाय ( विपरीत फल ) भी नहीं होता है। तो क्या होता है इस कर्मयोगरूप धर्मका थोड़ासा भी अनुष्ठान ( साधन ) जन्ममरणरूप महान् संसारभयसे रक्षा किया करता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.40।। व्याख्या   इस समबुद्धिकी महिमा भगवान्ने पूर्वश्लोकके उत्तरार्धमें और इस (चालीसवें) श्लोकमें चार प्रकारसे बतायी है (1) इसके द्वारा कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है (2) इसके उपक्रमका नाश नहीं होता (3) इसका उलटा फल नहीं होता और (4) इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान महान् भयसे रक्षा करनेवाला होता है। नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति   इस समबुद्धि (समता) का केवल आरम्भ ही हो जाय तो उस आरम्भका भी नाश नहीं होता। मनमें समता प्राप्त करनेकी जो लालसा उत्कण्ठा लगी है यही इस समताका आरम्भ होना है। इस आरम्भका कभी अभाव नहीं होता क्योंकि सत्य वस्तुकी लालसा भी सत्य ही होती है।यहाँ  इह  कहनेका तात्पर्य है कि इस मनुष्यलोकमें यह मनुष्य ही इस समबुद्धिको प्राप्त करनेका अधिकारी है। मनुष्यके सिवाय दूसरी सभी भोगयोनियाँ है। अतः उन योनियोंमें विषमता (रागद्वेष) का नाश करनेका अवसर नहीं है क्योंकि भोग रागद्वेषपूर्वक ही होते हैं। यदि रागद्वेष न हों तो भोग होगा ही नहीं प्रत्युत साधन ही होगा। प्रत्यवायो न विद्यते   सकामभावपूर्वक किये गये कर्मोंमें अगर मन्त्रउच्चारण यज्ञविधि आदिमें कोई कमी रह जाय तो उसका उलटा फल हो जाता है। जैसे कोई पुत्रप्राप्तिके लिये पुत्रेष्टि यज्ञ करता है तो उसमें विधिकी त्रुटि हो जानेसे पुत्रका होना तो दूर रहा घरमें किसीकी मृत्यु हो जाती है अथवा विधिकी कमी रहनेसे इतना उलटा फल न भी हो तो भी पुत्र पूर्ण अङ्गोंके साथ नहीं जन्मता परन्तु जो मनुष्य इस समबुद्धिको अपने अनुष्ठानमें लानेका प्रयत्न करता है उसके प्रयत्नका अनुष्ठानका कभी भी उलटा फल नहीं होता। कारण कि उसके अनुष्ठानमें फलकी इच्छा नहीं होती। जबतक फलेच्छा रहती है तबतक समता नहीं आती और समता आनेपर फलेच्छा नहीं रहती। अतः उसके अनुष्ठानका विपरीत फल होता ही नहीं होना सम्भव ही नहीं।विपरीत फल क्या है संसारसे विषमताका होना ही विपरीत फल है। सांसारिक किसी कार्यमें राग होना और किसी कार्यमें द्वेष होना ही विषमता है और इसी विषमतासे जन्ममरणरूप बन्धन होता है। परन्तु मनुष्यमें जब समता आती है तब रागद्वेष नहीं रहते और रागद्वेषके न रहनेसे विषमता नहीं रहती तो फिर उसका विपरीत फल होनेका कोई कारण ही नहीं है। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्   इस समबुद्धिरूप धर्मका थोड़ासा भी अनुष्ठान हो जाय थोड़ीसी भी समता जीवनमें आचरणमें आ जाय तो यह जन्ममरणरूप महान् भयसे रक्षा कर लेता है। जैसे सकाम कर्म फल देकर नष्ट हो जाता है ऐसे यह समता धनसम्पत्ति आदि कोई फल देकर नष्ट नहीं होती अर्थात् इसका फल नाशवान् धनसम्पत्ति आदिकी प्राप्ति नहीं होत। साधकके अन्तःकरणमें अनुकूलप्रतिकूल वस्तु व्यक्ति घटना परिस्थिति आदिमें जितनी समता आ जाती है उतनी समता अ़टल हो जाती है। इस समताका किसी भी कालमें नाश नहीं हो सकता। जैसे योगभ्रष्टकी साधनअवस्था में जितनी समता आ जाती है जितनी साधनसामग्री हो जाती है उसका स्वर्गादि ऊँचे लोकोंमें बहुत वर्षोंतक सुख भोगनेपर और मृत्युलोगमें श्रीमानोंके घरमें भोग भोगनेपर भी नाश नहीं होता (गीता 6। 41 44)। यह समता साधनसामग्री कभी किञ्चिन्मात्र भी खर्च नहीं होती प्रत्युत सदा ज्योंकीत्यों सुरक्षित रहती है क्योंकि यह सत् है सदा रहनेवाली है। धर्म  नाम दो बातोंका है (1) दान करना प्याऊ लगाना अन्नक्षेत्र खोलना आदि परोपकारके कार्य करना और (2) वर्णआश्रमके अनुसार शास्त्रविहित अपने कर्तव्यकर्मका तत्परतासे पालन करना। इन धर्मोंका निष्कामभावपूर्वक पालन करनेसे समतारूप धर्म स्वतः आ जाता है क्योंकि यह समतारूप धर्म स्वयंका धर्म अर्थात् स्वरूप है। इसी बातको लेकर यहाँ समबुद्धिको धर्म कहा गया है। समतासम्बन्धी विशेष बात लोगोंके भीतर प्रायः यह बात बैठी हुई है कि मन लगनेसे ही भजनस्मरण होता है मन नहीं लगा तो रामराम करनेसे क्या लाभ परन्तु गीताकी दृष्टिमें मन लगना कोई ऊँची चीज नहीं है। गीताकी दृष्टिमें ऊँची चीज हैसमता। दूसरे लक्षण आयें या न आयें जिसमें समता आ गयी उसको गीता सिद्ध कह देती है। जिसमें दूसरे सब लक्षण आ जायँ और समता न आये उसको गीता सिद्ध नहीं कहती।समता दो तरहकी होती है अन्तःकरणकी समता और स्वरूपकी समता। समरूप परमात्मा सब जगह परिपूर्ण है। उस समरूप परमात्मामें जो स्थित हो गया उसने संसारमात्रपर विजय प्राप्त कर ली वह जीवन्मुक्त हो गया। परन्तु इसकी पहचान अन्तःकरणकी समतासे होती है (गीता 5। 19)। अन्तःकरणकी समता है सिद्धिअसिद्धिमें सम रहना (गीता 2। 48)। प्रशंसा हो जाय या निन्दा हो जाय कार्य सफल हो जाय या असफल हो जाय लाखों रूपये आ जायँ या लाखों रूपये चले जायँ पर उससे अन्तःकरणमें कोई हलचल न हो सुखदुःख हर्षशोक आदि न हो (गीता 5। 20)। इस समताका कभी नाश नहीं होता। कल्याणके सिवाय इस समताका दूसरा कोई फल होता ही नहीं।मनुष्य तप दान तीर्थ व्रत आदि कोई भी पुण्यकर्म करे वह फल देकर नष्ट हो जाता है परन्तु साधन करतेकरते अन्तःकरणमें थोड़ी भी समता (निर्विकारता) आ जाय तो वह नष्ट नहीं होती प्रत्युत कल्याण कर देती है। इसलिये साधनमें समता जितनी ऊँची चीज है मनकी एकाग्रता उतनी ऊँची चीज नहीं है। मन एकाग्र होनेसे सिद्धियाँ तो प्राप्त हो जाती है पर कल्याण नहीं होता। परन्तु समता आनेसे मनुष्य संसारबन्धनसे सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है (गीता 5। 3)। सम्बन्ध   उन्तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने जिस समबुद्धिको योगमें सुननेके लिये कहा था उसी समबुद्धिको प्राप्त करनेका साधन आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.40।।एषा त इति। एषा च तव सांख्ये सम्यग्ज्ञाने बुद्धिर्निश्चयात्मिका उक्ता। एषैव च यथा योगे कर्मकौशलाय उच्यते (S K कौशले यो (S य) ज्यते) तथैव श्रृणु यया बुद्ध्या कर्मणां बन्धकत्वं त्यक्ष्यसि। न हि कर्माणि स्वयं बध्नन्ति जडत्वात्। अतः स्वयमात्मा कर्मभिः वासनात्मकैरात्मानं बध्नाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.40।।ननु कर्मानुष्ठानस्यानैकान्तिकफलत्वेनाकिंचित्करत्वादनेकानर्थकलुषितत्वेन दोषवत्त्वाच्च योगबुद्धिरपि न श्रद्धेयेति तत्राह  किञ्चेति।  अन्यच्च किंचिदुच्यते। कर्मानुष्ठानस्यावश्यकत्वे कारणमिति यावत्। कर्मणा सह समाधेरनुष्ठातुमशक्यत्वादनेकान्तरायसंभवात्तत्फलस्य च साक्षात्कारस्य दीर्घकालाभ्याससाध्यस्यैकस्मिञ्जन्मन्यसंभवादर्थाद्योगी भ्रश्येतानर्थे च निपतेदित्याशङ्क्याह   नेहेति।  प्रतीकत्वेनोपात्तस्य नकारस्य पुनरन्वयानुगुणत्वेन नास्तीत्यनुवादः। यत्तु कर्मानुष्ठानस्यानैकान्तिकफलत्वेनाकिंचित्करत्वमुक्तं तद्दूषयति  यथेति।  कृषिवाणिज्यादेरारम्भस्यानियतं फलं संभावनामात्रोपनीतत्वान्न तथा कर्मणि वैदिके प्रारम्भस्य फलमनियतं युज्यते शास्त्रविरोधादित्यर्थः। यत्तूक्तमनेकानर्थकलुषितत्वेन दोषवदनुष्ठानमिति तत्राह  किञ्चेति।  इतोऽपि कर्मानुष्ठानमावश्यकमिति प्रतिज्ञाय हेत्वन्तरमेव स्फुटयति  नापीति।  चिकित्सायां हि क्रियमाणायां व्याध्यतिरेको वा मरणं वा प्रत्यवायोऽपि संभाव्यते कर्मपरिपाकस्य दुर्विवेकत्वान्न तथा कर्मानुष्ठाने दोषोऽस्ति विहितत्वादित्यर्थः। संप्रति कर्मानुष्ठानस्य फलं पृच्छति  किंत्विति।  उत्तरार्धं व्याकुर्वन्विवक्षितं फलं कथयति  स्वल्पमपीति।  सम्यग्ज्ञानोत्पादनद्वारेण रक्षणं विवक्षितंसर्वपापप्रसक्तोऽपि ध्यायन्निमिषमच्युतम्। यतिस्तपस्वी भवति पङ्क्तिपावनपावनः।। इति स्मृतेरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.40।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.40।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.40।। इह  कर्मयोगे  न अभिक्रमनाशः अस्ति।  अभिक्रम आरम्भः नाशः फलसाधनभावनाशः। आरब्धस्य असमाप्तस्य विच्छिन्नस्य अपि न निष्फलत्वम्। आरब्धस्य विच्छेदे  प्रत्यवायः  अपि  न विद्यते।   अस्य  कर्मयोगाख्यस्य स्व धर्मस्य  स्वल्पांशः  अपि महतो भयात्  संसारभयात्  त्रायते।  अयम् अर्थः पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते। (गीता 6।40) इति उत्तरत्र प्रपञ्चयिष्यते।अन्यानि हि लौकिकानिवैदिकानि च साधनानि विच्छिन्नानि न हि फलप्रसवाय भवन्ति प्रत्यवायाय च भवन्ति।काम्यकर्मविषयाया बुद्धेः मोक्षसाधनभूतकर्मविषयां बुद्धिं विशिनष्टि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.40।।  न इह  मोक्षमार्गे कर्मयोगे  अभिक्रमनाशः  अभिक्रमणमभिक्रमः प्रारम्भः तस्य नाशः नास्ति यथा कृष्यादेः। योगविषये प्रारम्भस्य न अनैकान्तिकफलत्वमित्यर्थः। किञ्चनापि चिकित्सावत् प्रत्यवायः विद्यते भवति। किं तु  स्वल्पमपि अस्य धर्मस्य  योगधर्मस्य अनुष्ठितं  त्रायते  रक्षति  महतः भयात्  संसारभयात् जन्ममरणादिलक्षणात्।।येयं सांख्ये बुद्धिरुक्ता योगे च वक्ष्यमाणलक्षणा सा

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【 Verse 2.41 】

▸ Sanskrit Sloka: व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन | बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ||

▸ Transliteration: vyavasāyātmikā buddhir ekeha kurunandana | bahuśākhā hyanantāś ca buddhayovyavasāyinām ||

▸ Glossary: vyavasāyātmikā: fixed resolve; buddhiḥ: intelligence; ekā: only one; iha: in this (karma yoga); kuru nandana: O son of the Kurus; bahuśākhāḥ: various branches; hi: indeed; anantāḥ: unlimited; ca: also; buddhayaḥ: intelligence; avyavasāyināṁ: of the undecided (ignorant men moved by desires)

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.41 Joy of the Kurus, on this path (of yoga), the intelligence is resolute with a single-pointed determination. Thoughts of the irresolute are many, branched and endlsess.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.10।।हे भरतवंशोद्भव धृतराष्ट्र दोनों सेनाओंके मध्यभागमें विषाद करते हुए उस अर्जुनके प्रति हँसते हुएसे भगवान् हृषीकेश ये (आगे कहे जानेवाले) वचन बोले।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.41।। हे कुरुनन्दन इस (विषय) में निश्चयात्मक बुद्धि एक ही है? अज्ञानी पुरुषों की बुद्धियां (संकल्प) बहुत भेदों वाली और अनन्त होती हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.41 व्यवसायात्मिका onepointed? बुद्धिः determination? एका single? इह here? कुरुनन्दन O joy of the Kurus? बहुशाखाः manybranched? हि indeed? अनन्ताः endless? च and? बुद्धयः thoughts? अव्यवसायिनाम् of the irresoulte.Commentary Here? in this path to Bliss there is only one thought of a resolute nature there is singleminded determination. This single thought arises from the right source of knowledge. The student of Yoga collects all the dissipated rays of the mind. He gathers all of them through discrimination? dispassion and concentration. He is free from wavering or vacillation of the mind.The worldlyminded man who is suck in the mire of Samsara has no singleminded determination. He entertains countless thoughts. His mind is always unsteady and vacillating.If thoughts cease? Samsara also ceases. Mind generates endless thoughts and this world comes into being. Thoughts? and names and forms are inseparable. If the thoughts are controlled? the mind is controlled and the Yogi is liberated.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.41. O source of joy to the Kurus ! The knowledge in the form of determination is just one; [but] the knowledge (thoughts) of those who do not have determination, has many branches and has no end.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.41 By its means, the straying intellect becomes steadied in the contemplation of one object only; whereas the minds of the irresolute stray into bypaths innumerable.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.41 In this (Karma Yoga), O Arjuna, the resolute mind is one-pointed; the minds of the irresolute are many-branched and endless.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.41 O scion of the Kuru dynasty, in this there is a single, one-pointed conviction. The thoughts of the irresolute ones have many branches indeed, and are innumerable.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.41 Here, O joy of the Kurus, there is but a single one-pointed determination; many-branched and endless are the thoughts of the irresolute.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.41 Vyavasayatmika etc. The knowledge in the form of determination is just one and natural in the case of everyone; but it suffers manifoldedness according to the objects to be determined. Therefore -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.41 Here, i.e., in every ritual sanctioned by the scriptures, the Buddhi or disposition of mind marked by resolution, is single. The Buddhi marked by resolution is the Buddhi concerned with acts which must be performed by one desirous of release (and not any kind of work). The term 'Vyavasaya' menas unshakable conviction: this Buddhi (disposition of mind) comes out of prior determination about the true nature of the self. But the Buddhi concerning the performance of rituals of fulfill certain desires, is marked by irresolution; because here only this much knowledge of the self is sufficient - 'the self (as an entity) exists differently from the body.' Such a general understanding is sufficient to alify for performing acts giving fulfilment of certain desires. It does not reire any definite knowledge about the true nature of the self. For, even if there is no such knowledge, desires for heaven etc., can arise, the means for their attainment can be adopted, and the experience of those fruits can take place. For this reason there is no contradiction in the teaching of the scriptures. [The contradiction negated here is how can the same scriptural acts produce different results - fulfilment of desires and liberation. The difference in the disposition of the mind accouts of it.]

The Buddhi (mental disposition) marked by resolution has a single aim, because it relates to the attainment of a single fruit. For, as far as one desiring release is concerned, all acts are enjoined only for the accomplishment of that single fruit. Therefore, since the purpose of the scriptures here is one only (i.e., liberation), the Buddhi regarding all rituals taught in the scriptures too is only one, as far as liberation-seekers are concerned. For example, the set of six sacrifices, beginning with Agneya with all their subsidiary processes (though enjoined in different passages) forms the subject of a single injunction, as they are all for the attainment of a single fruit. Conseently the Buddhi concerning these is one only. The meaning of the verse under discussion must be construed in the same manner. But the Buddhi of the irresolute ones who are engaged in rituals for winning such fruits as heaven, sons, cattle, food etc., are endless, frutis being endless. In rituals like Darsapurnamasa (new moon and full moon sacrifice), even though attainment of a single fruit (heaven) is enjoined, there accrues to these the character of having many branches on account of the mention of many secondary fruits as evidenced by such passages as, 'He desires a long life.' Therefore the Buddhi of irresolute ones has many branches and are endless.

The purport is: In performing obligatory and occasional rituals, all fruits, primary and secondary, promised in the scriptures, should be abandoned, with the idea that release or salvation is the only purpose of all scripture-ordained rituals. These rituals should be performed without any thought of selfish gains. In addition, acts motivated by desires (Kamya-karmas) also should be performed according to one's own capacity, after abandoning all desire for fruits and with the conviction that they also, when performed in that way, form the means for attainment of release. They should be looked upon as eal to obligatory and occasional rites suited to one's own station and stage in life.

Sri Krsna condemns those who perform acts for the attainment of objects of desire:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.41 Kuru-nandana, O scion of the Kuru dynasty; iha, is this path to Liberation; there is only eka, a single; vyavasayatmika, one-pointed; buddhih, conviction, which has been spoken of in the Yoga of Knowledge and which has the characteristics going to be spoken of in (Karma-) yoga. It is resolute by nature and annuls the numerous branches of the other opposite thoughts, since it originates from the right source of knowledge. [The right source of knowledge, viz the Vedic texts, which are above criticism.] Those again, which are the other buddhayah, thoughts; they are bahu-sakhah, possessed of numerous branches, i.e. possessed of numerous variations. Owing to the influence of their many branches the worldly state becomes endless, limitless, unceasing, ever-growing and extensive. [Endless, because it does not cease till the rixe of full enlightenment; limitless, because the worldly state, which is an effect, springs from an unreal source.] But even the worldly state ceases with the cessation of the infinite branches of thoughts, under the influence of discriminating wisdom arising from the valid source of knowledge. (And those thoughts are) hi, indeed; anantah, innumerable under every branch. Whose thoughts? Avyavasayinam, of the irresolute ones, i.e. of those who are devoid of discriminating wisdom arising from the right source of knowledg.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.41।। कर्मयोग के साधन से आत्मसाक्षात्कार की सर्वोच्च उपलब्धि केवल इसलिये सम्भव है कि साधक दृढ़ निश्चय और एकाग्र चित्त से इसका अभ्यास करता है। जो लोग फल प्राप्ति की असंख्य इच्छाओं से प्रेरित हुये कर्म करते हैं उनका व्यक्तित्व विखरा हुआ रहता है और इस कारण एकाग्र चित्त होकर वे किसी भी क्षेत्र में सतत् कार्य नहीं कर सकते जिसका एक मात्र परिणाम उन्हें मिलता है विनाशकारी असफलता।इस श्लोक में संक्षेप में सफलता का रहस्य बताया गया है। निश्चयात्मक बुद्धि से कार्य करने पर किसी भी क्षेत्र में निश्चय ही सफलता मिलती है। परन्तु सामान्यत लोग असंख्य इच्छायें करते हैं जो अनेक बार परस्पर विरोधी होती हैं और स्वाभाविक ही उन्हें पूर्ण करने में मन की शक्ति को खोकर थक जाते हैं। इसे ही संकल्प विकल्प का खेल कहते हैं जो मनुष्य की सफलता के समस्त अवसरों को लूट ले जाता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.41।।   इह मोक्षमार्गे व्यवसायात्मिका निश्चयात्मिकोपायोपेयबुद्धिरेक सभ्यक्प्रमाणजनितत्वादितविपरीतबुद्धिशाखाभेदस्य बाधिका। येतु व्यवसायात्मिका परमेश्वरभक्त्यैव तरिष्यामिति निश्चयात्मिकेति वर्णयन्ति तद्बुद्धेः स्वरुपं निरुपितं प्रमाणजनितत्वादितिवदद्भिर्भाष्यकृद्भिः सा दृढेत्युक्तमिति न विरोधः। अव्यवसायिनां प्रमाणजनितविवेकबुद्धिरहितानां कामिनां बुद्धयो बहुशाखाः बह्व्योऽनुपरतसंसारप्रदाः शाखा यासां ताः प्रतिशाखाभेदेन ह्यनन्ताश्च कामनानामानन्त्यात्। यत्तु नन्वेवं सांख्ययोगयोर्महाभयात्राणहेतुत्वं तुल्यं चेत्कोऽनयोर्विशेष इत्याशङ्क्य सांख्यानां पातशङ्का नास्ति योगिनां तु यावद्विदेहकैवल्यं पातशङ्कास्तीत्याह व्यवसायात्मिकेति तच्चिन्त्यम्। योगस्तवनपरस्य ग्रन्थस्य तन्निन्दापरत्वेनोत्यापनस्यानुचितत्वात् कामात्मान इत्यादिना सकामस्य। निन्दाप्रतीतेः स्पष्टत्वाच्च। तव तूत्तमवंशोद्भवस्य व्यवसायात्मिकैव बुद्धिर्युक्तेति सूचयन्नाह कुरुनन्दनेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.41।।एतदुपपादनाय तमेतमितिवाक्यविहितानामेकार्थत्वमाह हे कुरुनन्दन इह श्रेयोमार्गेतमेतम् इतिवाक्ये वा व्यवसायात्मिका आत्मतत्त्वनिश्चयात्मिका बुद्धिरेकैव चतुर्णामाश्रमाणां साध्या विवक्षितावेदानुवचनेन इत्यादौ तृतीयाविभक्त्या प्रत्येकं निरपेक्षसाधनत्वबोधनात्। भिन्नार्थत्वे हि समुच्चयः स्यात्। एकार्थत्वेऽपि दर्शपूर्णमासाभ्यामितिवद्वन्द्वसमासेनयदग्नये च प्रजापतये च इतिवच्चशब्देन वा न तथात्र किंचित्प्रमाणमस्तीत्यर्थः। सांख्यविषया योगविषया च बुद्धिरेकफलत्वादेका व्यवसायात्मिका सर्वविपरीतबुद्धीनां बाधिका निर्दोषवेदवाक्यसमुत्थत्वादितरास्त्वव्यवसायिनां बुद्धयो बाध्या इत्यर्थ इति भाष्यकृतः। अन्ये तु परमेश्वराराधनेनैव संसारं तरिष्यामीति निश्चयात्मिका एकनिष्ठैव बुद्धिरिह कर्मयोगे भवतीत्यर्थमाहुः। सर्वथापि तु ज्ञानकाण्डानुसारेणस्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् इत्युपपन्नम् कर्मकाण्डे पुनर्बहुशाखा अनेकभेदाः कामानामनेकभेदत्वात् अनन्ताश्च कर्मफलगुणफलादिप्रकारोपशाखाभेदात् बुद्धयो भवन्त्यव्यवसायिनाम्। तत्फलकामानां बुद्धीनामानन्त्यप्रसिद्धिद्योतनार्थो हिशब्दः। अतः काम्यकर्मापेक्षया महद्वैलक्षण्यं शुद्ध्यर्थकर्मणामित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.41।।नन्वेवं सांख्ययोगयोर्महाभयात्त्राणहेतुत्वं तुल्यं चेत्कोऽनयोर्विशेष इत्याशङ्क्य सांख्यानां पातशङ्का नास्ति योगिनां तु यावद्विदेहकैवल्यं पातशङ्कास्तीत्याह  व्यवसायात्मिकेति।  व्यवसायस्तत्त्वनिश्चयस्तदात्मिका तदाकारा बुद्धिरन्तःकरणवृत्तिःअहं ब्रह्मास्मि इति वाक्यजन्या ब्रह्माकारान्तःकरणवृत्तिर्ब्रह्मविद्याभिधाना समस्तवृत्त्यन्तरबाधेन सम्यगभ्युदिता एका एकैव।सकृद्विभातो ह्येष ब्रह्मलोकः इति श्रुतेः। ब्रह्मैव लोको ब्रह्मलोक इह ब्रह्मैव। नहि सकृज्ज्ञाते    ब्रह्मणि ज्ञातव्यं कर्तव्यं वा किञ्चिदवशिष्यते कृतकृत्यत्वाद्ब्रह्मविदोऽतोऽस्य पातशङ्का नास्ति। अव्यवसायिनामज्ञानिनां तु बुद्धयोऽनन्ताः ताश्च प्रत्येकं बहुशाखा इति इदमेव मम श्रेय इति निश्चयस्य दुर्लभत्वात्कदाचिदश्रेयस्यपि श्रेयोबुद्धौ सत्यां पातशङ्कास्तीति महांस्तयोर्विशेषे इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.41।।किञ्च। फलार्थं कर्मकर्तृ़णामनेकत्र बुद्धिर्भवति मदाज्ञात्वेन कर्तृ़णां मन्निष्ठत्वेनैकैव बुद्धिरिति भ्रमान्न वैपरीत्यशङ्केत्याह व्यवसायात्मिकेति। हे कुरुनन्दन सत्कुलोत्पन्न इह भक्तिमार्गे व्यवसायात्मिका भगवदाज्ञयैव करिष्यामीति रूपैकैव भवति। अव्यवसायिनां बहिर्मुखानामनिश्चितहृदयानां बुद्धयोऽनन्ताश्च भवन्ति फलार्थं बहुशाखाश्च भवन्ति। तत्र साङ्गत्वाभावात् प्रत्यवायादिसम्भावना स्यादेव भक्तानां तु साङ्गत्वान्नैव वैफल्यप्रत्यवायादिसम्भावना। अत एव भगवद्वाक्यम् मत्कर्म कुर्वतां पुंसां काललोपो भवेद्यदि। तत्कर्म तस्य कुर्वन्ति तिस्रः कोट्यो महर्षयः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.41।।कुत इत्यपेक्षायामुभयोर्वैषम्यमाह  व्यवसायेति।  इहेश्वराराधनलक्षणे कर्मयोगे व्यवसायात्मिका परमेश्वरभक्त्यैव ध्रुवं तरिष्यामीति निश्चयात्मिका एकैवैकनिष्ठैव बुद्धिर्भवति। अव्यवसायिनां तु बहुर्मुखानां कामिनां कामानामानन्त्यादनन्ताः तत्रापि कर्मगुणफलादिभेदाद्बहुशाखाश्च बुद्धयो भवन्ति। ईश्वराराधनार्थं हि नित्यनैमित्तिकं कर्म किंचिदङ्गवैगुण्येनापि न नश्यति। यथा शक्नुयात्तथा कुर्यादिति हि तद्विधीयते। नच वैगुण्यम्। ईश्वरोद्देशेनैव वैगुण्योपरमात्। नतु तथा काम्यं कर्मअग्निहोत्रं जुहुयात्स्वर्गकामःदध्नेन्द्रियकामो जुहुयात् इति अतो महद्वैषम्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.41।।कुत इत्यपेक्षायामाह व्यवसायेति। इह योगे बुद्धिरेका व्यवसायात्मिका। अफलार्थं भगवदर्थं वा कर्म किञ्चित्कर्त्तव्यमिति निश्चयरूपा बुद्धिरेकविषयत्वादेका। साङ्ख्ये तु त्रिपुटिशून्या वृत्तिः। काम्यकर्मतोऽपि भेदमाह अव्यवसायिनां काम्यकर्माभिनिविष्टानां तु बुद्धयो बहुशाखा अनन्ताश्चेति हि प्रसिद्धम्। वक्ष्यति चासुरसम्पत्प्रसङ्गे यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्ये 16।15 इत्यादि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.41।।जो यह बुद्धि सांख्यके विषयमें कही गयी है और जो योगके विषयमें अब कही जानेवाली है वह हे कुरुनन्दन इस कल्याणमार्गमें व्यवसायात्मिका निश्चय स्वभाववाली बुद्धि एक ही है यानि यथार्थ प्रमाणजनित होनेके कारण अन्य विपरीत बुद्धियोंके शाखाभेदोंकी बाधक है। जो इतर ( दूसरी ) बुद्धियाँ हैं जिनके शाखाभेदके विस्तारसे संसार अनन्त अपार और अनुपरत होता है अर्थात् निरन्तर अत्यन्त विस्तृत होता है उन अनन्त भेदोंवाली बुद्धियोंका प्रमाणजनित विवेकबुद्धिके बलसे अन्त हो जानेपर संसारका भी अन्त हो जाता है। परंतु जो अव्यवसायी हैं जो प्रमाणजनित विवेकबुद्धिसे रहित हैं उनकी वे बुद्धियाँ बहुत शाखा अर्थात् बहुत भेदोंवाली और प्रतिशाखाभेदसे अनन्त होती हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.41।। व्याख्या    व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन   कर्मयोगी साधकका ध्येय (लक्ष्य) जिस समताको प्राप्त करना रहता है वह समता परमात्माका स्वरूप है। उस परमात्मस्वरूप समताकी प्राप्तिके लिये अन्तःकरणकी समता साधन है अन्तःकरणकी समतामें संसारका राग बाधक है। उस रागको हटानेका अथवा परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका जो एक निश्चय है उसका नाम है व्यवसायात्मिका बुद्धि। व्यवसायात्मिका बुद्धि एक क्यों होती है कारण कि इसमें सांसारिक वस्तु पदार्थ आदिकी कामनाका त्याग होता है। यह त्याग एक ही होता है चाहे धनकी कामनाका त्याग करें चाहे मानबड़ाईकी कामनाका त्याग करें। परन्तु ग्रहण करनेमें अनेक चीजें होती है क्योंकि एकएक चीज अनेक तरहकी होती है जैसे एक ही मिठाई अनेक तरहकी होती है। अतः इन चीजोँकी कामनाएं भी अनेक अनन्त होती हैं।गीतामें कर्मयोग (प्रस्तुत श्लोक) और भक्तियोग (9। 30) के प्रकरणमें तो व्यवसायात्मिका बुद्धिका वर्णन आया है पर ज्ञानयोगके प्रकरणमें व्यवसायात्मिका बुद्धिका वर्णन नहीं आया। इसका कारण यह है कि ज्ञानयोगमें पहले स्वरूपका बोध होता है फिर उसके परिणामस्वरूप बुद्धि स्वतः एक निश्चयवाली हो जाती है और कर्मयोग तथा भक्तियोगमें पहले बुद्धिका एक निश्चय होता है फिर स्वरूपका

Chapter 2 (Part 24)

बोध होता है। अतः ज्ञानयोगमें ज्ञानकी मुख्यता है और कर्मयोग तथा भक्तियोगमें एक निश्चयकी मुख्यता है। बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्   अव्यवसायी वे होते हैं जिनके भीतर सकामभाव होता है जो भोग और संग्रहमें आसक्त होते हैं। कामनाके कारण ऐसे मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त होती हैं और वे बुद्धियाँ भी अनन्त शाखाओंवाली होती हैं अर्थात् एकएक बुद्धिकी भी अनन्त शाखाएँ होती हैं। जैसे पुत्रप्राप्ति करनी है यह एक बुद्धि हुई और पुत्रप्राप्तिके लिये किसी औषधका सेवन करें किसी मन्त्रका जप करें कोई अनुष्ठान करें किसी सन्तका आशीर्वाद लें आदि उपाय उस बुद्धिकी अनन्त शाखाएँ हुईँ। ऐसे ही धनप्राप्ति करनी है यह एक बुद्धि हुई और धनप्राप्तिके लिये व्यापार करें नौकरी करें चोरी करें डाका डालें धोखा दें ठगाई करें आदि उस बुद्धिकी अनन्त शाखाएँ हुईँ। ऐसे मनुष्योंकी बुद्धिमें परमात्मप्राप्तिका निश्चय नहीं होता। सम्बन्ध   अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त क्यों होती है इसका हेतु आगेके तीन श्लोकोंमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.41।।नेहेति। इह (S K omit इह) अस्यां बुद्धौ अतिक्रमेण अपराधेन प्रमादेन नाशो न भवति प्रमादस्याभावात्। यथा च (S N तथा च) परिमितेन श्रीखण्डकणेन ज्वालायमानोऽपि तैलकटाहः सद्यः शीतीभवति (N शीतो भवति) एवं अनया स्वल्पयापि (S omits अपि) योगबुद्ध्या महाभयं संसाररूपं विनश्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.41।।ननु बुद्धिद्वयातिरिक्तानि बुद्ध्यन्तराण्यपि काणादादिशास्त्रप्रसिद्धानि विद्यन्ते। तथाच कथं बुद्धिद्वयमेव भगवतोपदिष्टमिति तत्राह  येयमिति।  सैवैका प्रमाणभूता बुद्धिरित्याह  व्यवसायात्मिकेति।  बुद्ध्यन्तराण्यविवेकमूलान्यप्रमाणानीत्याह  बहुशाखा हीति।  व्यवसायात्मिकाया बुद्धेः श्रेयोमार्गे प्रवृत्ताया विवक्षितं फलमाह  इतरेति।  प्रकृतबुद्धिद्वयापेक्षयेतरा विपरीताश्चाप्रमाणजनिताः स्वकपोलकल्पिता या बुद्धयस्तासां शाखाभेदो यः संसारहेतुस्तस्य बाधिकेति यावत्। तत्र हेतुः  सम्यगिति।  निर्दोषवेदवाक्यसमुत्थत्वादुक्तमुपायोपेयभूतं बुद्धिद्वयं साक्षात्पारम्पर्याभ्यां संसारहेतुबाधकमित्यर्थः। उत्तरार्धं व्याचष्टे  याः पुनरिति।  प्रकृतबुद्धिद्वयापेक्षयार्थान्तरत्वमितरत्वम्। तासामनर्थहेतुत्वं दर्शयति  यासामिति।  अप्रामाणिकबुद्धीनां प्रसक्तानुप्रसक्त्या जायमानानामतीव बुद्धिपरिणामविशेषाः शाखाभेदास्तेषां प्रचारः प्रवृत्तिस्तद्वशादित्येतत् अनन्तत्वं सम्यग्ज्ञानमन्तरेण निवृत्तिविरहितत्वम् अपरत्वं कार्यस्यैव सतो वस्तुभूतकारणविरहितत्वम्। अनुपरतत्वं स्फोरयति  नित्येति।  कथं तर्हि तन्निवृत्त्या पुरुषार्थपरिसमाप्तिस्तत्राह  प्रमाणेति।  अन्वयव्यतिरेकाख्येनानुमानेनागमेन च पदार्थपरिशोधनपरिनिष्पन्ना विवेकात्मिका या बुद्धिस्तां निमित्तीकृत्य समुत्पन्नसम्यग्बोधानुरोधात्प्रकृता विपरीतबुद्धयो व्यावर्तन्ते तास्वसंख्यातासु व्यावृत्तासु सतीषु निरालम्बनतया संसारोऽपि स्थातुमशक्नुवन्नुपरतो भवतीत्यर्थः। याः पुनरित्युपक्रान्तास्तत्त्वज्ञानापनोद्याः संसारास्पदीभूता विपरीतबुद्धीरनुक्रामति   ता बुद्धय इति।  बुद्धीनां वृक्षस्येव कुतो बहुशाखित्वं तत्राह  बहुभेदा इत्येतदिति।  एकैकां बुद्धिं प्रति शाखाभेदोऽवान्तरविशेषस्तेन बुद्धीनामसंख्यत्वं प्रख्यातमित्याह  प्रतिशाखेति।  बुद्धीनामानन्त्यप्रसिद्धिप्रद्योतनार्थो हिशब्दः। सम्यग्ज्ञानवतां यथोक्तबुद्धिभेदभाक्त्वमप्रसिद्धमित्याशङ्क्य प्रत्याह  केषामित्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.41।।ननुव्यवसायात्मिका इति श्लोकेन प्रतिज्ञातो योग उच्यते नापिबुद्ध्या युक्तः 2।39 इत्यादिवत्प्रशंसा तत्किमर्थोऽयं इत्यत आह  योग  इति। ज्ञानोपायविषयामिमां वक्ष्यमाणां वाचं शृणु श्रुत्वा तत्र निष्ठां कुर्वित्युक्तमित्यर्थः। श्रवणमात्रस्य विधिना विनाऽसम्भवात्। बह्व्यो हि बुद्धयो ज्ञानोपायविषया वाचः परस्परविरुद्धाः सन्ति। कथं मतभेदात् एकमतमवलम्बमानाः किञ्चिज्ज्ञानसाधनमाचक्षते अपरं मतमाश्रितास्तत्प्रतिषेधेनान्यदाहुः। तत्र चेदमेव तत्त्वं नेदमिति विनिगमकं नास्ति। तत्तस्मात्कथमेकत्र त्वदीयायामेव वाचि निष्ठां विश्वासं करोमि। ननु सर्वाण्यपि मतानि व्यवसायात्मकान्येव स्वे स्वेऽर्थे सर्वेषां सन्देहाभावात्। अतः कथमुच्यते व्यवसायात्मिका अव्यवसायिनां बुद्धय इति तत्राह  सम्य गिति। युक्तिरिति प्रमाणसामान्यमुच्यते। प्रमाणत्वेन निर्णीतत्वमेवात्र व्यवसायशब्दार्थः न निश्चयमात्रमित्यर्थः। प्रामाणिकमेव मतं ग्राह्यं तत्र न कदाचिद्विप्रतिपत्तिः यतस्तवैकत्र निष्ठाभावः अप्रामाणिकेषु विद्यमानाऽपि विप्रतिपत्तिः किं करिष्यति इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.41।।योग इमां बुद्धिं शृण्वित्युक्तम् बह्वयो हि बुद्धयो मतभेदात् तत्कथमेकत्र निष्ठां करोमि इत्यत आह व्यवसायात्मिकेति। सम्यग्युक्तिनिर्णीतानां मतानामैक्यमेवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.41।। इह  शास्त्रीये सर्वस्मिन् कर्मणि  व्यवसायात्मिका बुद्धिः एका।  मुमुक्षुणा अनुष्ठेये कर्मणि बुद्धिः व्यवसायात्मिका बुद्धिः। व्यवसायो निश्चयः सा हि बुद्धिः आत्मयाथात्म्यनिश्चयपूर्विका। काम्यकर्मविषया तु बुद्धिः अव्यवसायात्मिका। तत्र हि कामाधिकारे देहाद् अतिरिक्तात्मास्तित्वमात्रम् अपेक्षितम् न आत्मस्वरूपयाथात्म्यनिश्चयः स्वरूपयाथात्म्यानिश्चये अपि स्वर्गादिफलार्थित्वतत्साधनानुष्ठान तत्फलानुभवानां संभवाद् अविरोधाच्च।सा इयं व्यवसायात्मिका बुद्धिः एकफलसाधनविषयतया एका। एकस्मै मोक्षफलाय हि मुमुक्षोः सर्वाणि कर्माणि विधीयन्ते।अतः शास्त्रार्थस्य एकत्वात् सर्वकर्मविषया बुद्धिः एका एव। यथा एकफलसाधनतया आग्नेयादीनां षण्णां सेतिकर्तव्यताकानाम् एकशास्त्रार्थतया तद्विषया बुद्धिः एका तद्वद् इत्यर्थः। अव्यवसायिनां  तु स्वर्गपुत्रपश्वन्नादिफलसाधनकर्माधिकृतानां  बुद्धयः  फलानन्त्याद्  अनन्ताः  तत्रापि  बहुशाखाः।  एकस्मै फलाय चोदिते अपि दर्शपूर्णमासादौ कर्मणिआयुराशास्ते सुप्रजस्त्वमाशास्ते इत्याद्यवगतावान्तरफलभेदेन बहुशाखात्वं च विद्यते। अतः अव्यवसायिनां बुद्धयः अनन्ता बहुशाखाश्च।एतद् उक्तं भवति नित्येषु नैमित्तिकेषु कर्मसु प्रधानफलानि अवान्तरफलानि च यानि श्रूयमाणानि तानि सर्वाणि परित्यज्य मोक्षैकफलतया सर्वाणि कर्माणि एकशास्त्रार्थतया अनुष्ठेयानि। काम्यानि च स्ववर्णाश्रमोचितानि तत्तत्फलानि परित्यज्य मोक्षफलसाधनतया नित्यनैमित्तिकैः एकीकृत्य यथाबलम् अनुष्ठेयानि इति।अथ काम्यकर्माधिकृतान् निन्दति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.41।।  व्यवसायात्मिका  निश्चयस्वभावा  एका  एव  बुद्धिः  इतरविपरीतबुद्धिशाखाभेदस्य बाधिका सम्यक्प्रमाणजनितत्वात् इह श्रेयोमार्गे हे  कुरुनन्दन । याः पुनः इतरा विपरीतबुद्धयः यासां शाखाभेदप्रचारवशात् अनन्तः अपारः अनुपरतः संसारो नित्यप्रततो विस्तीर्णो भवति प्रमाणजनितविवेकबुद्धिनिमित्तवशाच्च उपरतास्वनन्तभेदबुद्धिषु संसारोऽप्युपरमते ता बुद्धयः  बहुशाखाः  बह्व्यः शाखाः यासां ताः बहुशाखाः बहुभेदा इत्येतत्। प्रतिशाखाभेदेन  हि अनन्ताश्च बुद्धयः । केषाम्  अव्यवसायिनां  प्रमाणजनितविवेकबुद्धिरहितानामित्यर्थः।।येषां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्नास्ति ते

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【 Verse 2.42 】

▸ Sanskrit Sloka: यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चित: | वेदवादरता: पार्थ नान्यदस्तीति वादिन: ||

▸ Transliteration: yāmimāṁ puṣpitāṁ vācaṁ pravadantyavipaścitaḥ | vedavādaratāḥ pārtha nānyadastīti vādinaḥ ||

▸ Glossary: yāṁ imāṁ: all these; puṣpitāṁ: flowery; vācaṁ: words; pravadanti: say; avipaścitaḥ: ignorant men; vedavādaratāḥ: devoted to the letter of the Veda; pārtha: O son of Pārtha; na: not; anyat: anything else; asti: there is; iti: thus; vādinaḥ: advocates

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.43 Men of little knowledge, who are very much attached toeulogizing the flowery words of the Vedas, O Pārtha, argue that, ‘there is nothing else’; these advocates of Vedas (vādīna) look upon and recommend various fruitful actions for elevation to heavenly planets, resulting in high birth, power, and so forth.Thus being desirous of sense gratification and opulent life, they say that there is nothing more than this to living.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.11।।श्रीभगवान् बोले तुमने शोक न करनेयोग्यका शोक किया है और पण्डिताईकी बातें कह रहे हो परन्तु जिनके प्राण चले गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये पण्डितलोग शोक नहीं करते।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.42।। हे पार्थ अविवेकी पुरुष वेदवाद में रमते हुये जो यह पुष्पिता (दिखावटी शोभा की) वाणी बोलते हैं? इससे (स्वर्ग से) बढ़कर और कुछ नहीं है।।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.42 याम which? इमाम् this? पुष्पिताम् flowery? वाचम् speech? प्रवदन्ति utter? अविपश्चितः the unwise? वेदवादरताः takign pleasure in the eulogising words of the Vedas? पार्थ O Partha? न not? अन्यत् other? अस्ति is? इति thus? वादिनः saying.Commentary Unwise people who are lacking in discrimination lay great stress upon the Karma Kanda or the ritualistic portion of the Vedas? which lays down specific rules for specific actions for,the attainment of specific fruits and ectol these actions and rewards unduly. They are highly enamoured of such Vedic passages which prescribe ways for the attainment of heavenly enjoyments. They say that there is nothing else beyond the sensual enjoyments in Svarga (heaven) which can be obtained by performing the rites of the Karma Kanda of the Vedas.There are two main divisions of the Vedas -- Karma Kanda (the section dealing with action) and Jnana Kanda (the section dealing with knowledge). The Karma Kanda comprises the Brahmanas and the Samhitas. This is the authority for the Purvamimamsa school founded by Jaimini. The followers of this school deal with rituals and prescribe many of them for attaining enjoyments and power here and happiness in heaven. They regard this as the ultimate object of human existence. Ordinary people are attracted by their panegyrics. The Jnana Kanda comprises the Aranyakas and the Upanishads which deal with the nature of Brahman or the Supreme Self.Life in heaven is also transitory. After the fruits of the good actions are exhausted? one has to come back to this earthplane. Liberatio or Moksha can only be attained by knowledge of the Self but not by performing a thousand and one sacrifices.Lord Krishna assigns a comparatively inferior position to the doctrine of the Mimamsakas of performing Vedic sacrifices for obtaining heaven? power and lordship in this world as they cannot give us final liberation.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.42. - 2.43. O son of Prtha ! Those, whose very nature is desire, whose goal is heaven, who esteem only the Vedic declaration [of fruits], who declare that there is nothing else, who proclaim this flowery speech about the paths to the lordship of the objects of enjoyment-[the paths] that are full of different actionsand who desire action alone as a fruit of their birth-they are men without insight.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.42 Only the ignorant speak in figurative language. It is they who extol the letter of the scriptures, saying, There is nothing deeper than this.'

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.42 - 2.44 O! Partha, the unwise, who rejoice in the letter of the Vedas, say, 'There is nothing else.' They are full only of wordly desires and they hanker for heaven. They speak flowery words which offer rirth as the fruit of work. They look upon the Vedas as consisting entirely of varied rites for the attainment of pleasure and power. Those who cling so to pleasure and power are attracted by that speech (offering heavenly rewards) and are unable to develop the resolute will of a concentrated mind.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.42-2.43 O son of Prtha, those undiscerning people who utter this flowery talk which promises birth as a result of rites and duties, and is full of various special rites meant for the attainment of enjoyment and affluence , they remain engrossed in the utterances of the Vedas and declare that nothing else exists; their minds are full of desires and they have heaven as the goal.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.42 Flowery speech is uttered by the unwise, taking pleasure in the eulogising words of the Vedas, O Arjuna, saying, "There is nothing else."

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.42 See Comment under 2.44

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.42 - 2.44 The ignorant, whose knowledge is little, and who have as their sole aim the attainment of enjoyment and power, speak the flowery language i.e., having its flowers (show) only as fruits, which look apparently beautiful at first sight. They rejoice in the letter of the Vedas i.e., they are attached to heaven and such other results (promised in the Karma-kanda of the Vedas). They say that there is nothing else, owing to their intense attachment to these results. They say that there is no fruit superior to heaven etc. They are full of worldly desires and their minds are highly attached to secular desires. They hanker for heaven, i.e. think of the enjoyment of the felicities of heaven, after which one can again have rirth which offers again the opportunity to perform varied rites devoid of true knowledge and leads towards the attainment of enjoyments and power once again.

With regard to those who cling to pleasure and power and whose understanding is contaminated by that flowery speech relating to pleasure and lordly powers, the aforesaid mental disposition characterised by resolution, will not arise in their Samadhi. Samadhi here means the mind. The knowledge of the self will not arise in such minds. In the minds of these persons, there cannot arise the mental disposition that looks on all Vedic rituals as means for liberation based on the determined conviction about the real form of the self. Hence, in an aspirant for liberation, there should be no attachment to rituals out of the conviction that they are meant for the acisition of objects of desire only.

It may be estioned why the Vedas, which have more of love for Jivas than thousands of parents, and which are endeavouring to save the Jivas, should prescribe in this way rites whose fruits are infinitesimal and which produce only new births. It can also be asked if it is proper to abandon what is given in the Vedas. Sri Krsna replies to these estions.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.42 Partha, O son of Prtha; those devoid of one-pointed conviction, who pravadanti, utter; imam, this; yam puspitam vacam, flowery talk, which is going to be stated, which is beautiful like a tree in bloom, pleasant to hear, and appears to be (meaningful) sentences [Sentences that can be called really meaningful are only those that reveal the self.-Tr.]; who are they? they are avipascitah, people who are undiscerning, of poor intellect, i.e. non-discriminating; veda-vada-ratah, who remain engrossed in the utterances of the Vedas, in the Vedic sentences which reveal many panegyrics, fruits of action and their means; and vadinah, who declare, are apt tosay; iti, that; na anyat, nothing else [God, Liberation, etc.]; asti, exists, apart from the rites and duties conducive to such results as attainment of heaven etc. And they are kamatmanah, have their minds full of desires, i.e. they are swayed by desires, they are, by nature, full of desires; (and) svarga-parah, have heaven as the goal. Those who accept heaven (svarga) as the supreme (para) human goal, to whom heaven is the highest, are svarga-parah. They utter that speech ( this is supplied to construct the sentence ) which janma-karma-phala-pradam, promises birth as a result of rites and duties. The result (phala) of rites and duties (karma) is karma-phala. Birth (janma) itself is the karma-phala. That (speech) which promises this is janma-karma-phala-prada. (This speech) is kriya-visesa-bahulam, full of various special rites; bhoga-aisvarya-gatim-prati, for the attainment of enjoyment and affluence. Special (visesa) rites (kriya) are kriya-visesah. The speech that is full (bahula) of these, the speech by which that is full (bahula) of these, the speech by which these, viz objects such as heaven, animals and sons, are revealed plentifully, is kriya-visesa-bahula. Bhoga, enjoyment, and aisvarya, affluence, are bhoga-aisvarya. Their attainment (gatih) is bhoga-aisvarya-gatih. (They utter a speech) that is full of the specialized rites, prati, meant for that (attainment). The fools who utter that speech move in the cycle of transmigration. This is the idea.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.42।। no commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.42।।   अव्यवसायिनां तु व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवति प्रतिबन्धबाहुल्यादित्याशयेनाह  यामिति  त्रिभिः। यामिमां वक्ष्यमाणां पुष्पितां फलाप्रदपुष्पितवृक्षवच्छोभमानां श्रवणमात्ररमणीयांअपाम सोमभमृता अभूम इत्यादिरुपां वाचं प्रवदन्ति अविपश्चितो बुद्धिरहिता वेदस्य वादेऽर्थवादेअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवंरुपे रताः प्रीतिमन्तोऽतएव नान्यन्मोक्षादिकं स्वर्गादन्यदस्तीति वादिनः। त्वया तु मम मतमेवाभ्युपेयमिति सूचयन्नाह  हे पार्थेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.42 2.44।।अव्यवसायिनामपि व्यवसायात्मिका बुद्धिः कुतो न भवति प्रमाणस्य तुल्यत्वादित्याशङ्क्य प्रतिबन्धकसद्भावान्न भवतीत्याह त्रिभिः यामिमां वाचं प्रवदन्ति तया वाचापहृतचेतसामविपश्चितां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवतीत्यन्वयः। इमामध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धां पुष्पितां पुष्पितपलाशवदापातरमणीयांसाध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्निरतिशयफलाभावाच्च। कुतो निरतिशयफलत्वाभावस्तत्राह जन्मकर्मफलप्रदां जन्म चापूर्वशरीरेन्द्रियादिसंबन्धलक्षणं तदधीनं च कर्म तत्तद्वर्णाश्रमाभिमाननिमित्तं तदधीनं च फलं पुत्रपशुस्वर्गादिलक्षणं विनश्वरं तानि प्रकर्षेण घटीयन्त्रवदविच्छेदेन ददातीति तथा ताम्। कुतएवमत आह भोगैश्वर्यगतिं प्रति क्रियाविशेषबहुलां अमृतपानोर्वशीविहारपारिजातपरिमलादिनिबन्धनो यो भोगस्तत्कारणं च यदैश्वर्यं देवादिस्वामित्वं तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषा अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादयस्तैर्बहुलां विस्तृताम्। अतिबाहुल्येन भोगैश्वर्यसाधनक्रियाकलापप्रतिपादिकामिति यावत्। कर्मकाण्डस्य हि ज्ञानकाण्डापेक्षया सर्वत्रातिविस्तृतत्वं प्रसिद्धम्। एतादृशीं कर्मकाण्डलक्षणां वाचं प्रवदन्ति प्रकृष्टां परमार्थस्वर्गादिफलामभ्युपगच्छन्ति। के। येऽविपश्चितो विचारजन्यतात्पर्यपरिज्ञानशून्याः। अतएव वेदवादरताः वेदे ये सन्ति वादा अर्थवादाःअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवमादयस्तेष्वेव रता वेदार्थसत्यत्वेनैवमेवैतदिति मिथ्याविश्वासेन संतुष्टाः। हे पार्थ अतएव नान्यदस्तीतिवादिनः कर्मकाण्डापेक्षया नास्त्यन्यज्ज्ञानकाण्डं सर्वस्यापि वेदस्य कार्यपरत्वात् कर्मफलापेक्षया च नास्त्यन्यन्निरतिशयं ज्ञानफलमिति वदनशीलाः। महता प्रबन्धेन ज्ञानकाण्डविरुद्धार्थभाषिण इत्यर्थः। कुतो मोक्षद्वेषिणस्ते। यतः कामात्मानः काम्यमानविषयशताकुलचित्तत्वेन काममयाः। एवंसति मोक्षमपि कुतो न कामयन्ते। यतः स्वर्गपराः स्वर्ग एवोर्वश्याद्युपेतत्वेन पर उत्कृष्टो येषां ते तथा। स्वर्गातिरिक्तः पुरुषार्थो नास्तीति भ्राम्यन्तो विवेकवैराग्याभावान्मोक्षकथामपि सोढुमक्षमा इति यावत्। तेषां च पूर्वोक्तभोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानां क्षयित्वादिदोषादर्शनेन निविष्टान्तःकरणानां तया क्रियाविशेषबहुलया वाचापहृतमाच्छादितं चेतो विवेकज्ञानं येषां तथाभूतानामर्थवादाः स्तुत्यर्थास्तात्पर्यविषये प्रमाणान्तराबाधिते वेदस्य प्रामाण्यमिति सुप्रसिद्धमपि ज्ञातुमशक्तानां समाधावन्तःकरणे व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयते। न भवतीत्यर्थः। समाधिविषया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तेषां न भवतीति वा। अधिकरणे विषये वा सप्तम्यास्तुल्यत्वात्। विधीयत इति कर्मकर्तरि लकारः। समाधीयतेऽस्मिन्सर्वमिति व्युत्पत्त्या समाधिरन्तःकरणं वा परमात्मा वेति नाप्रसिद्धार्थकल्पनम्। अहं ब्रह्मेत्यवस्थानं समाधिस्तन्निमित्तं व्यवसायात्मिका बुद्धिर्नोत्पद्यत इति व्याख्याने तु रूढिरेवादृता। अयंभावःयद्यति काम्यान्यग्निहोत्रादीनि शुद्ध्यर्थेभ्यो न विशिष्यन्ते तथापि फलाभिसंधिदोषान्नाशयशुद्धिं संपादयन्ति। भोगानुगुणा तु शुद्धिर्न ज्ञानोपयोगिनी। एतदेव दर्शयितुं भोगैश्वर्यप्रसक्तानामिति पुनरुपात्तम्। फलाभिसन्धिभन्तरेण तु कृतानि कर्माणि ज्ञानोपयोगिनीं शुद्धिमादधतीति सिद्धं विपश्चिदविपश्चितोः फलवैलक्षण्यम्। विस्तरेण चैतदग्रे प्रतिपादयिष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.42।।उत्तरार्धमेव विवृणोति  यामिमामित्यादिना।  यां पुष्पितां पुष्पितद्रुमवद्दूरतो रमणीयां वाचम्अक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवतिअपाम सोमममृता अभूम इत्येवंरूपां प्रवदन्ति। अविपश्चितः अव्यवसायिनो मूढाः। यतो वेदवादरताः वेदान्तर्गतेषु अर्थवादेषुयस्य पर्णमयी जुहूर्भवतिन पापँ् श्लोकँ् शृणोति इत्येवमादिषु रताः बद्धश्रद्धाः अतएव कर्मणोऽन्यत् आत्मज्ञानं तत्फलं मोक्षश्च नास्तीति वादिनो वदनशीलाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.42।।नन्वेवं फलोत्तमतां ज्ञात्वा सर्व एवमेव व्यवसायात्मिकां बुद्धिं कथं न कुर्वन्तीत्याशङ्क्याह यामिमामिति त्रयेण। ये इमां पुष्पितां यां वाचं फलादिरहितां कुत्सितपुष्पयुक्तलतावददूरदृष्टरम्यां प्रवदन्ति प्रकर्षेण फलरूपतया वन्दति तेषां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयते नोत्पद्यत इत्यर्थः। ननु तेऽपि शास्त्रोक्तज्ञानवन्तः कथं तथा वदन्ति इत्याकाङ्क्षायामाह अविपश्चित इति। मूर्खा अज्ञाना इत्यर्थः। तेषां मूढत्वं विशेषणैः प्रकटयति वेदवादरता इति वेदोक्तफलककर्मकरणमेवोचितं न तु निष्कामतया ते तथा अत एव नान्यदस्तीति वादिनः वेदोक्तव्यतिरिक्तं कर्मफलं नास्तीति वदनशीलाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.42।।ननु कामिनोऽपिकष्टान्कामान्विहाय व्यवसायात्मिकामेव बुद्धिं किं न कुर्वन्ति तत्राह  यामिति।  पुष्पितां विषलतावदापातरमणीयां प्रकृष्टां परमार्थफलपरामेव वदन्ति वाचं स्वर्गादिफलश्रुतिं ये तेषां तया वाचापहृतचेतसां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयत इति तृतीयेनान्वयः। किमिति तथा वदन्ति। यतोऽविपश्चितो मूढाः। तत्र हेतुः। वेदे ये वादा अर्थवादाःअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवतिअपाम सोमममृता अभूम इत्याद्यास्तेष्वेव रताः प्रीताः। अतएव अतः परमन्यदीश्वरतत्त्वं प्राप्यं नास्तीति वचनशीलाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.42।।अव्यवसायिनां बुद्धिभेदं निरूपयति यामिमामिति। जैमिनीया वेदवाचं सर्वकाण्डरूपां सर्वां पुष्पितां प्रकर्षेण कर्तृकर्मफलभावेन युक्तां वदन्ति। पुष्पस्थानीयेषु स्वर्गादिषु फलत्वबुद्ध्या रता भवन्तीत्यर्थः। यतो वेदवादेषु फलबोधककर्मवादेषु रताः। न च तत्सत्फलं वेदबोधितत्वादिति वाच्यम् अर्थान्तरेण वेदबोधितत्वात् तत्फलस्ययन्न दुःखेन सम्भिन्नं इत्यादिवाक्यात्. तथा चेयं वाक् पुष्पिता न फलिता। तेषु परं गन्धलोभितचेतस एव ते भ्रान्ता भवन्तीति हृदयम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.42।।जिनमें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं है वे इस आगे कही जानेवाली पुष्पित वृक्षोंजैसी शोभित सुननेमें ही रमणीय जिस वाणीको कहा करते हैँ। कौन कहा करते हैं अज्ञानी अर्थात् अल्पबुद्धिवाले अविवेकी जो कि बहुत अर्थवाद और फलसाधनोंको प्रकाश करनेवाले वेदवाक्योंमें रत हैं। तथा हे पार्थ जो ऐसे भी कहनेवाले हैं कि स्वर्गप्राप्ति आदि फलके साधनरूप कर्मोंसे अतिरिक्त अन्य कुछ है ही नहीं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.42।। व्याख्या    कामात्मानः   वे कामनाओंमें इतने रचेपचे रहते हैं कि वे कामनारूप ही बन जाते हैं। उनको अपनेमें और कामनामें भिन्नता ही नहीं दीखती। उनका तो यही भाव होता है कि कामनाके बिना आदमी जी नहीं सकता कामनाके बिना कोई भी काम नहीं हो सकता कामनाके बिना आदमी पत्थरकी जड हो जाता है उसको चेतना भी नहीं रहती। ऐसे भाववाले पुरुष  कामात्मानः  हैं।स्वयं तो नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहता है उसमें कभी घटबढ़ नहीं होती पर कामना आतीजाती रहती है और घटतीबढ़ती है। स्वयं परमात्माका अंश है और कामना संसारके अंशको लेकर है। अतः स्वयं और कामना ये दोनों सर्वथा अलगअलग हैं। परन्तु कामनामें रचेपचे लोगोंको अपने स्वरूपका अलग भान ही नहीं होता। स्वर्गपराः   स्वर्गमें बढ़ियासेबढ़िया दिव्य भोग मिलते हैं इसलिये उनके लक्ष्यमें स्वर्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है और वे उसकी प्राप्तिमें ही रातदिन लगे रहते हैं।यहाँ  स्वर्गपराः  पदसे उन मनुष्योंकी बात कही गयी है जो वेदोंमें शास्त्रोंमें वर्णित स्वर्गादि लोकोंमें आस्था रखनेवाले हैं। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः   वे वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं अर्थात् वेदोंका तात्पर्य वे केवल भोगोंमें और स्वर्गकी प्राप्तिमें मानते हैं इसलिये वे  वेदवादरताः  हैं। उनकी मान्यतामें यहाँके और स्वर्गके भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् उनकी दृष्टिमें भोगोंके सिवाय परमात्मा तत्त्वज्ञान मुक्ति भगवत्प्रेम आदि कोई चीज है ही नहीं। अतः वे भोगोंमें ही रचेपचे रहते हैं। भोग भोगना उनका मुख्य लक्ष्य रहता है। यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः   जिनमें सत्असत् नित्यअनित्य अविनाशीविनाशीका विवेक नहीं है ऐसे अविवेकी मनुष्य वेदोंकी जिस वाणीमें संसार और भोगोंका वर्णन है उस पुष्पित वाणीको कहा करते हैं।यहाँ  पुष्पिताम्  कहनेका तात्पर्य है कि भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाली वाणी केवल फूलपत्ती ही है फल नहीं है। तृप्ति फलसे ही होती है फूलपत्तीकी शोभासे नहीं। वह वाणी स्थायी फल देनेवाली नहीं है। उस वाणीका जो फल स्वर्गादिका भोग है वह केवल देखनेमें ही सुन्दर दीखता है उसमें स्थायीपना नहीं है। जन्मकर्मफलप्रदाम्   वह पुष्पित वाणी जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है क्योंकि उसमें सांसारिक भोगोंको ही महत्व दिया गया है। उन भोगोंका राग ही आगे जन्म होनेमें कारण है (गीता 13। 21)। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति   वह पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जिन सकाम अनुष्ठानोंका वर्णन करती है उनमें क्रियाओंकी बहुलता रहती है अर्थात् उन अनुष्ठानोंमें अनेक तरहकी विधियाँ होती हैं अनेक तरहकी क्रियाएँ करनी पड़ती हैं अनेक तरहके पदार्थोंकी जरूरत पड़ती है एवं शरीर आदिमें परिश्रम भी अधिक होता है (गीता 18। 24)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.42।।न चैषा बुद्धिरपूर्वानीयते। किं तर्हिव्यवसायात्मिकेति। व्यवसायात्मिका सर्वस्यैकैव (S सर्वस्यैव) सहजा (N omits सहजा) धीः निश्चेतव्यवशात् तु बहुत्वं गच्छति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.42।।यदि सांख्ययोगरूपैकैव प्रमाणभूता बुद्धिस्तर्हि सैव सर्वेषां चित्ते किमिति स्थिरा न भवति तत्राह  येषामिति।  ते यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्ति तयापहृतचेतसां कामिनाम्। कामवशान्निश्चयात्मिका बुद्धिर्न प्रायः स्थिरा भवतीत्याह  ते। यामिति।  इमामित्यध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धत्वं कर्मकाण्डरूपाया वाचो विवक्ष्यते। वक्ष्यमाणत्वं क्रियाविशेषबहुलामित्यादौ द्रष्टव्यम्। किंशुको हि पुष्पशाली शोभमानोऽनुभूयते न पुरुषभोग्यफलभागी लक्ष्यते तथेयमपि कर्मकाण्डात्मिका श्रूयमाणदशायां रमणीया वागुपलभ्यते साध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्न त्वेषा निरतिशयफलभागिनी भवति कर्मानुष्ठानफलस्यानित्यत्वादिति मत्वाह  पुष्पितामिति।  वाक्यत्वेन लक्ष्यतेऽर्थवत्त्वप्रतिभानाद्वस्तुतस्तु न वाक्यमर्थाभासत्वादित्याह  वाक्यलक्षणामिति।  प्रवक्तृ़णां वेदवाक्यतात्पर्यपरिज्ञानाभावं सूचयति  अविपश्चित इति।  वेदवादा वेदवाक्यानि तानि च बहूनामर्थवादानां फलानां साधनानां च विधिशेषाणां प्रकाशकानि तेषु रतिरासक्तिस्तन्निष्ठत्वं तद्वत्त्वमपि तेषां विशेषणमित्याह  वेदवादेति।  कर्मकाण्डनिष्ठत्वं फलं कथयति  नान्यदिति।  ईश्वरो वा मोक्षो वा नास्तीत्येवं वदन्तो नास्तिकाः सन्तः सम्यग्ज्ञानवन्तो न भवन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.42।।यामिमाम् इतिश्लोकस्य प्रकृतोपयोगादर्शनात्सङ्गतिमाह  स्यु रिति। न तु वैदिकान्यप्यव्यवसायात्मकानि। ततः किं प्रकृते इत्यत उक्तं  तेऽपी ति। व्यवसायात्मकं मतं वैदिकमतमवलम्बमाना अपि केचित् वैदिकानि सर्वाण्येव कर्माणि स्वर्गादिफलान्याहुः। भवांस्तु काम्यान्येव स्वर्गादिफलकानि निष्कामानीश्वरार्पणबुद्ध्याऽनुष्ठितानि तु ज्ञानार्थानीत्यभिप्रैति। तथाच त्वद्वचने निष्ठानुपपत्तिस्तदवस्थेति भावः।  आह  तेषां वैदिकाभासत्वप्रदर्शनाय निन्दामिति शेषः। भोगैश्वर्यगतेरपि प्रकृतत्वात्तयेति तत्परामर्शभ्रान्तिं वारयति  यामि ति। अन्यथा यच्छब्दः साकाङ्क्षोऽनन्वितः स्यादिति भावः। वाचः पुष्पितत्वं कथं इत्यत आह  मोक्षे ति। अत्यल्पत्वेनोपमा। वेदवादरता इत्येतत्कथं निन्दावचनं इत्यत आह  वेदे ति। कथमेतस्मात्पदाल्लभ्यते कथं चैषाऽपि निन्दा इत्यत आह  वेदै रिति। वादशब्दोऽत्रापाततः प्रतिपादने वर्तते। वक्ष्यते चात्राभिधानम्। आपाततः प्रतिपाद्यं च कर्मादि सावधारणं चैतत्। अब्भक्षो वायुभक्ष इति यथेत्यर्थः। सावधारणत्वं कुत इति चेत् उत्तरपदबलादिति तानि पठति  नान्यदि ति। आपाततः प्रतीतार्थादन्यस्य सद्भावे भवेदेषां निन्दा। कोऽसौ कुतश्च इत्यत आह  परोक्षे ति। क्वचित्प्रकटवचनादिवेत्युक्तम्। अतएव प्राय इत्याह  देवा  वेदाभिमानिनः। तत्प्रकारसूचनार्थं मां विधत्त इत्याद्युदाहृतम्। वदन्ति वेदाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.42।।स्युरवैदिकानि मतानि अव्यवसायात्मकानि न तु वैदिकानि। तेऽपि हि केचित्कर्माणि स्वर्गादिफलान्येवाहुरित्यत आह यामिमामिति। यामाहुस्तयेत्यन्वयः। मोक्षफलमपेक्ष्य स्वर्गादिपुष्पयुक्तां वाचं प्रवदन्ति। वेदवादरताः कर्मादिवाचकवेदवादरताः। वेदैर्यन्मुखत उच्यते तत्रैव रताः। नान्यदस्तीतिवादिनःपरोक्षविषया वेदाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ऐ.उ.1।14बृ.उ.4।2।2मां विधत्तेऽभिधत्ते माम् भाग.11।21।43 इत्यादिभिः पारोक्ष्येण प्रायो भगवन्तं वदन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.42।। याम् इमां पुष्पितां  पुष्पमात्रफलाम् आपातरमणीयां  वाचम् अविपश्चितः  अल्पज्ञा भोगैश्वर्यगतिं प्रति वर्तमानां प्रवदन्ति  वेदवादरताः  वेदेषु ये स्वर्गादिफलवादाः तेषु सक्ताः  न अन्यद् अस्ति इति   वादिनः  तत्सङ्गातिरेकेण स्वर्गा देः अधिकं फलं न अन्यद् अस्ति इति वदन्तः।  कामात्मानः  कामप्रवणमनसः  स्वर्गपराः  स्वर्गपरायणाः स्वर्गादिफलावसाने पुन र्जन्मकर्मा ख्य फलप्रदां क्रियाविशेषबहुलां  तत्त्वज्ञानरहिततया क्रियाविशेषप्रचुरां तेषां  भोगैश्वर्यगतिं प्रति  वर्तमानां याम् इमां वाचं ये प्रवदन्ति इति सम्बन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.42।।  याम् इमां  वक्ष्यमाणां  पुष्पितां  पुष्पित इव वृक्षः शोभमानां श्रूयमाणरमणीयां  वाचं  वाक्यलक्षणां  प्रवदन्ति । के  अविपश्चितः  अमेधसः अविवेकिन इत्यर्थः।  वेदवादरताः  बह्वर्थवादफलसाधनप्रकाशकेषु वेदवाक्येषु रताः हे  पार्थ  न  अन्यत्  स्वर्गपश्वादिफलसाधनेभ्यः कर्मभ्यः  अस्ति इति  एवं  वादिनः  वदनशीलाः।।ते च

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【 Verse 2.43 】

▸ Sanskrit Sloka: कामात्मान: स्वर्गपरा जन्मकर्मफलप्रदाम् | क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति ||

▸ Transliteration: kāmātmānaḥ svargaparā janmakarmaphalapradām | kriyā-viśeṣa-bahulāṁ bhogaiśvarya-gatiṁ prati ||

▸ Glossary: kāmātmānaḥ: desirous of sense gratification; svargaparāḥ: aiming at heaven as supreme goal; janma karma phala pradām: resulting in rebirth as the fruit; kriyā viśeṣa bahulāṁ: many rituals of various kinds; bhogaiśvarya: sense enjoyment opulence; gatiṁ: way; prati: towards

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.43 Men of little knowledge, who are very much attached toeulogizing the flowery words of the Vedas, O Pārtha, argue that, ‘there is nothing else’; these advocates of Vedas (vādīna) look upon and recommend various fruitful actions for elevation to heavenly planets, resulting in high birth, power, and so forth.Thus being desirous of sense gratification and opulent life, they say that there is nothing more than this to living.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.12।।किसी कालमें मैं नहीं था और तू नहीं था तथा ये राजालोग नहीं थे यह बात भी नहीं है और इसके बाद मैं तू और राजलोग ये सभी नहीं रहेंगे यह बात भी नहीं है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.43।। कामनाओं से युक्त? स्वर्ग को ही श्रेष्ठ मानने वाले लोग भोग और ऐश्वर्य को प्राप्त कराने वाली अनेक क्रियाओं को बताते हैं जो (वास्तव में) जन्मरूप कर्मफल को देने वाली होती हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.43 कामात्मानः full of desires? स्वर्गपराः with heaven as their highest goal? जन्मकर्मफलप्रदाम् leading to (new) births as the result of their works? क्रियाविशेषबहुलाम् exuberant with various specifi actions? भोगैश्वर्यगतिम् प्रति for the attainment of pleasure and lordship.No commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.42. - 2.43. O son of Prtha ! Those, whose very nature is desire, whose goal is heaven, who esteem only the Vedic declaration [of fruits], who declare that there is nothing else, who proclaim this flowery speech about the paths to the lordship of the objects of enjoyment-[the paths] that are full of different actionsand who desire action alone as a fruit of their birth-they are men without insight.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.43 Consulting only their own desires, they construct their own heaven, devising arduous and complex rites to secure their own pleasure and their own power; and the only result is rebirth.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.42 - 2.44 O! Partha, the unwise, who rejoice in the letter of the Vedas, say, 'There is nothing else.' They are full only of wordly desires and they hanker for heaven. They speak flowery words which offer rirth as the fruit of work. They look upon the Vedas as consisting entirely of varied rites for the attainment of pleasure and power. Those who cling so to pleasure and power are attracted by that speech (offering heavenly rewards) and are unable to develop the resolute will of a concentrated mind.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.42-2.43 O son of Prtha, those undiscerning people who utter this flowery talk which promises birth as a result of rites and duties, and is full of various special rites meant for the attainment of enjoyment and affluence , they remain engrossed in the utterances of the Vedas and declare that nothing else exists; their minds are full of desires and they have heaven as the goal.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.43 Full of desires, having heaven as their goal, (they utter speech which is directed to ends) leading to new births as the result of their works, and prescribe various methods abounding in specific actions, for the attainment of pleasure and power.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.43 See Comment under 2.44

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.42 - 2.44 The ignorant, whose knowledge is little, and who have as their sole aim the attainment of enjoyment and power, speak the flowery language i.e., having its flowers (show) only as fruits, which look apparently beautiful at first sight. They rejoice in the letter of the Vedas i.e., they are attached to heaven and such other results (promised in the Karma-kanda of the Vedas). They say that there is nothing else, owing to their intense attachment to these results. They say that there is no fruit superior to heaven etc. They are full of worldly desires and their minds are highly attached to secular desires. They hanker for heaven, i.e. think of the enjoyment of the felicities of heaven, after which one can again have rirth which offers again the opportunity to perform varied rites devoid of true knowledge and leads towards the attainment of enjoyments and power once again.

With regard to those who cling to pleasure and power and whose understanding is contaminated by that flowery speech relating to pleasure and lordly powers, the aforesaid mental disposition characterised by resolution, will not arise in their Samadhi. Samadhi here means the mind. The knowledge of the self will not arise in such minds. In the minds of these persons, there cannot arise the mental disposition that looks on all Vedic rituals as means for liberation based on the determined conviction about the real form of the self. Hence, in an aspirant for liberation, there should be no attachment to rituals out of the conviction that they are meant for the acisition of objects of desire only.

It may be estioned why the Vedas, which have more of love for Jivas than thousands of parents, and which are endeavouring to save the Jivas, should prescribe in this way rites whose fruits are infinitesimal and which produce only new births. It can also be asked if it is proper to abandon what is given in the Vedas. Sri Krsna replies to these estions.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.43 Partha, O son of Prtha; those devoid of one-pointed conviction, who pravadanti, utter; imam, this; yam puspitam vacam, flowery talk, which is going to be stated, which is beautiful like a tree in bloom, pleasant to hear, and appears to be (meaningful) sentences [Sentences that can be called really meaningful are only those that reveal the self.-Tr.]; who are they? they are avipascitah, people who are undiscerning, of poor intellect, i.e. non-discriminating; veda-vada-ratah, who remain engrossed in the utterances of the Vedas, in the Vedic sentences which reveal many panegyrics, fruits of action and their means; and vadinah, who declare, are apt tosay; iti, that; na anyat, nothing else [God, Liberation, etc.]; asti, exists, apart from the rites and duties conducive to such results as attainment of heaven etc. And they are kamatmanah, have their minds full of desires, i.e. they are swayed by desires, they are, by nature, full of desires; (and) svarga-parah, have heaven as the goal. Those who accept heaven (svarga) as the supreme (para) human goal, to whom heaven is the highest, are svarga-parah. They utter that speech ( this is supplied to construct the sentence ) which janma-karma-phala-pradam, promises birth as a result of rites and duties. The result (phala) of rites and duties (karma) is karma-phala. Birth (janma) itself is the karma-phala. That (speech) which promises this is janma-karma-phala-prada. (This speech) is kriya-visesa-bahulam, full of various special rites; bhoga-aisvarya-gatim-prati, for the attainment of enjoyment and affluence. Special (visesa) rites (kriya) are kriya-visesah. The speech that is full (bahula) of these, the speech by which that is full (bahula) of these, the speech by which these, viz objects such as heaven, animals and sons, are revealed plentifully, is kriya-visesa-bahula. Bhoga, enjoyment, and aisvarya, affluence, are bhoga-aisvarya. Their attainment (gatih) is bhoga-aisvarya-gatih. (They utter a speech) that is full of the specialized rites, prati, meant for that (attainment). The fools who utter that speech move in the cycle of transmigration. This is the idea.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.43।। no commentary.उससे (वाणी से) जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और ऐश्वर्य में आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण में निश्चयात्मक बुद्धि नहीं होती अर्थात् वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य नहीं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.43।।यतः कामे आत्मान्तःकरणं येषाम् अतएव स्वर्गएव परः पुरुषार्थो येषां ते कर्मणः फलं जन्मैव कर्मफलं प्रददातीति तथा तां वेदवाचा कर्मणि प्रवृत्तिः कर्मणा जन्मलाभः नतु वेदवाचः स्वतन्त्रं जन्मादिप्रदातृत्वमस्तीत्यभिप्रेत्याचार्यैर्जन्म च तत्र कर्मं च तत्फलं च प्रददातीति न व्याख्यातम्। यतो भोगश्चैश्वर्यं च तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति क्रियाणां विशेषा बहुला यस्यां तां वाचं प्रवदन्तीत्यनुषङ्गः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.42 2.44।।अव्यवसायिनामपि व्यवसायात्मिका बुद्धिः कुतो न भवति प्रमाणस्य तुल्यत्वादित्याशङ्क्य प्रतिबन्धकसद्भावान्न भवतीत्याह त्रिभिः यामिमां वाचं प्रवदन्ति तया वाचापहृतचेतसामविपश्चितां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवतीत्यन्वयः। इमामध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धां पुष्पितां पुष्पितपलाशवदापातरमणीयांसाध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्निरतिशयफलाभावाच्च। कुतो निरतिशयफलत्वाभावस्तत्राह जन्मकर्मफलप्रदां जन्म चापूर्वशरीरेन्द्रियादिसंबन्धलक्षणं तदधीनं च कर्म तत्तद्वर्णाश्रमाभिमाननिमित्तं तदधीनं च फलं पुत्रपशुस्वर्गादिलक्षणं विनश्वरं तानि प्रकर्षेण घटीयन्त्रवदविच्छेदेन ददातीति तथा ताम्। कुतएवमत आह भोगैश्वर्यगतिं प्रति क्रियाविशेषबहुलां अमृतपानोर्वशीविहारपारिजातपरिमलादिनिबन्धनो यो भोगस्तत्कारणं च यदैश्वर्यं देवादिस्वामित्वं तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषा अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादयस्तैर्बहुलां विस्तृताम्। अतिबाहुल्येन भोगैश्वर्यसाधनक्रियाकलापप्रतिपादिकामिति यावत्। कर्मकाण्डस्य हि ज्ञानकाण्डापेक्षया सर्वत्रातिविस्तृतत्वं प्रसिद्धम्। एतादृशीं कर्मकाण्डलक्षणां वाचं प्रवदन्ति प्रकृष्टां परमार्थस्वर्गादिफलामभ्युपगच्छन्ति। के। येऽविपश्चितो विचारजन्यतात्पर्यपरिज्ञानशून्याः। अतएव वेदवादरताः वेदे ये सन्ति वादा अर्थवादाःअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवमादयस्तेष्वेव रता वेदार्थसत्यत्वेनैवमेवैतदिति मिथ्याविश्वासेन संतुष्टाः। हे पार्थ अतएव नान्यदस्तीतिवादिनः कर्मकाण्डापेक्षया नास्त्यन्यज्ज्ञानकाण्डं सर्वस्यापि वेदस्य कार्यपरत्वात् कर्मफलापेक्षया च नास्त्यन्यन्निरतिशयं ज्ञानफलमिति वदनशीलाः। महता प्रबन्धेन ज्ञानकाण्डविरुद्धार्थभाषिण इत्यर्थः। कुतो मोक्षद्वेषिणस्ते। यतः कामात्मानः काम्यमानविषयशताकुलचित्तत्वेन काममयाः। एवंसति मोक्षमपि कुतो न कामयन्ते। यतः स्वर्गपराः स्वर्ग एवोर्वश्याद्युपेतत्वेन पर उत्कृष्टो येषां ते तथा। स्वर्गातिरिक्तः पुरुषार्थो नास्तीति भ्राम्यन्तो विवेकवैराग्याभावान्मोक्षकथामपि सोढुमक्षमा इति यावत्। तेषां च पूर्वोक्तभोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानां क्षयित्वादिदोषादर्शनेन निविष्टान्तःकरणानां तया क्रियाविशेषबहुलया वाचापहृतमाच्छादितं चेतो विवेकज्ञानं येषां तथाभूतानामर्थवादाः स्तुत्यर्थास्तात्पर्यविषये प्रमाणान्तराबाधिते वेदस्य प्रामाण्यमिति सुप्रसिद्धमपि ज्ञातुमशक्तानां समाधावन्तःकरणे व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयते। न भवतीत्यर्थः। समाधिविषया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तेषां न भवतीति वा। अधिकरणे विषये वा

Chapter 2 (Part 25)

सप्तम्यास्तुल्यत्वात्। विधीयत इति कर्मकर्तरि लकारः। समाधीयतेऽस्मिन्सर्वमिति व्युत्पत्त्या समाधिरन्तःकरणं वा परमात्मा वेति नाप्रसिद्धार्थकल्पनम्। अहं ब्रह्मेत्यवस्थानं समाधिस्तन्निमित्तं व्यवसायात्मिका बुद्धिर्नोत्पद्यत इति व्याख्याने तु रूढिरेवादृता। अयंभावःयद्यति काम्यान्यग्निहोत्रादीनि शुद्ध्यर्थेभ्यो न विशिष्यन्ते तथापि फलाभिसंधिदोषान्नाशयशुद्धिं संपादयन्ति। भोगानुगुणा तु शुद्धिर्न ज्ञानोपयोगिनी। एतदेव दर्शयितुं भोगैश्वर्यप्रसक्तानामिति पुनरुपात्तम्। फलाभिसन्धिभन्तरेण तु कृतानि कर्माणि ज्ञानोपयोगिनीं शुद्धिमादधतीति सिद्धं विपश्चिदविपश्चितोः फलवैलक्षण्यम्। विस्तरेण चैतदग्रे प्रतिपादयिष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.43।।तथा भोगश्च ऐश्वर्यं च तयोर्गतिः प्राप्तिस्तां प्रति तदर्थमित्यर्थः। कामात्मानः कामग्रस्तचित्ताः। अतएव स्वर्गपराः। कीदृशीं भोगैश्वर्यगतिम्। जन्मकर्मफलप्रदाम्। प्राप्तभोगैश्वर्यो हि पुरुषस्तद्वासनावासितः पुनर्भोगैश्वर्यप्राप्तये जन्म लभते तदर्थं कर्माणि च कुरुते फलं च ततो भोगादिकं प्राप्नोतीति चक्रमनिशमावर्तते। तेन निष्ठातश्च्युतो भवतीत्यर्थः। किञ्च क्रियाविशेषेण बहुलां यथा यथा वित्तव्ययायासाद्याधिक्यं तथा तथा भोगैश्वर्यप्राप्तेरप्याधिक्यमित्यर्थः। एतेनात्यन्तायाससाध्येष्वपि कर्मसु फललोभात्सज्जन्त इत्युक्तम्। भाष्ये भोगैश्वर्यगतिं प्रति साधनभूताः ये क्रियाविशेषा अग्निहोत्रादयः तद्बहुलां जन्मरूपं यत् कर्मफलं तत्प्रदां च वाचमेवेति व्याख्यातम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.43।।ननु तेषां तथाकथनं किं प्रयोजनकं इत्याकाङ्क्षायामाह कामात्मान इति कामनाव्याप्तरूपाः। ननु कथं कामनायां तुच्छफले प्रवर्त्तन्त इत्याशङ्क्याह स्वर्गपरा इति। स्वर्ग एव परो मोक्षरूपं येषां तेषाम्। स्वर्गस्य तथाज्ञानार्थं पूर्ववाचं विशिनष्टि जन्मकर्मफलप्रदाम्। जन्म उत्तमयोनौ तत्रोत्तमं कर्म तथोत्तमफलं च तानि प्रकर्षेण ददाति तां तथा भोगैश्वर्यगतिं भोगैश्वर्यप्राप्तिं प्रति क्रियाविशेषा बहुला यस्यां तां तथा फलरूपां वदन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.43।।अतएव  कामात्मान इति।  कामात्मानः कामाकुलचित्ताः। अतः स्वर्ग एव परः पुरुषार्थो येषां ते। जन्म च तत्र कर्माणि च तत्फलानि च प्रददातीति तथा ताम्। भोगैश्वर्ययोर्गतिं प्राप्तिं प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषास्ते बहुला यस्यां तां प्रवदन्तीत्यनुषङ्गः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.43।।किम्भूतास्तेऽविपश्चितः वेदवादतात्पर्यानभिज्ञाः। भोगैश्वर्यगतिं प्रति कामात्मानः कामयते आत्मा येषाम्। तथा स्वर्गलोक एव परः प्राप्यं फलं येषाम्। किम्भूतां वाचम् जन्मकर्मफलप्रदाम्। गतिविशेषणं वा। क्रियाविशेषबहुलां वाचं जन्मकर्मफलप्रदां वा प्रवदन्तीत्यन्वयः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.43।।तथा वे कामात्माजिन्होंने भोगकामनाको ही अपना स्वभाव बना लिया है ऐसे भोगपरायण और स्वर्गको प्रधान माननेवाले यानी स्वर्ग ही जिनका परम पुरुषार्थ है ऐसे पुरुष जन्मरूप कर्मफलको देनेवाली ही बातें किया करते हैं। कर्मके फलका नाम कर्मफल है जन्मरूप कर्मफल जन्मकर्मफल कहलाता है उसको देनेवाली वाणी जन्मकर्मफलप्रदा कही जाती है। ऐसी वाणी कहा करते हैं। इस प्रकार भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जो क्रियाओंके भेद हैं वे जिस वाणीमें बहुत हों अर्थात् स्वर्ग पशु पुत्र आदि अनेक पदार्थ जिस वाणीद्वारा अधिकतासे बतलाये जाते हों ऐसी बहुतसे क्रियाभेदोंको बतलानेवाली वाणीको बोलनेवाले वे मूढ़ बारंबार संसारचक्रमें भ्रमण करते हैं यह अभिप्राय है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.43।। व्याख्या    कामात्मानः   वे कामनाओंमें इतने रचेपचे रहते हैं कि वे कामनारूप ही बन जाते हैं। उनको अपनेमें और कामनामें भिन्नता ही नहीं दीखती। उनका तो यही भाव होता है कि कामनाके बिना आदमी जी नहीं सकता कामनाके बिना कोई भी काम नहीं हो सकता कामनाके बिना आदमी पत्थरकी जड हो जाता है उसको चेतना भी नहीं रहती। ऐसे भाववाले पुरुष  कामात्मानः  हैं।स्वयं तो नित्यनिरन्तर ज्योंकात्यों रहता है उसमें कभी घटबढ़ नहीं होती पर कामना आतीजाती रहती है और घटतीबढ़ती है। स्वयं परमात्माका अंश है और कामना संसारके अंशको लेकर है। अतः स्वयं और कामना ये दोनों सर्वथा अलगअलग हैं। परन्तु कामनामें रचेपचे लोगोंको अपने स्वरूपका अलग भान ही नहीं होता। स्वर्गपराः   स्वर्गमें बढ़ियासेबढ़िया दिव्य भोग मिलते हैं इसलिये उनके लक्ष्यमें स्वर्ग ही सर्वश्रेष्ठ होता है और वे उसकी प्राप्तिमें ही रातदिन लगे रहते हैं।यहाँ  स्वर्गपराः  पदसे उन मनुष्योंकी बात कही गयी है जो वेदोंमें शास्त्रोंमें वर्णित स्वर्गादि लोकोंमें आस्था रखनेवाले हैं। वेदवादरताः पार्थ नान्यदस्तीति वादिनः   वे वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंमें प्रीति रखनेवाले हैं अर्थात् वेदोंका तात्पर्य वे केवल भोगोंमें और स्वर्गकी प्राप्तिमें मानते हैं इसलिये वे  वेदवादरताः  हैं। उनकी मान्यतामें यहाँके और स्वर्गके भोगोंके सिवाय और कुछ है ही नहीं अर्थात् उनकी दृष्टिमें भोगोंके सिवाय परमात्मा तत्त्वज्ञान मुक्ति भगवत्प्रेम आदि कोई चीज है ही नहीं। अतः वे भोगोंमें ही रचेपचे रहते हैं। भोग भोगना उनका मुख्य लक्ष्य रहता है। यामिमां पुष्पितां वाचं प्रवदन्त्यविपश्चितः   जिनमें सत्असत् नित्यअनित्य अविनाशीविनाशीका विवेक नहीं है ऐसे अविवेकी मनुष्य वेदोंकी जिस वाणीमें संसार और भोगोंका वर्णन है उस पुष्पित वाणीको कहा करते हैं।यहाँ  पुष्पिताम्  कहनेका तात्पर्य है कि भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिका वर्णन करनेवाली वाणी केवल फूलपत्ती ही है फल नहीं है। तृप्ति फलसे ही होती है फूलपत्तीकी शोभासे नहीं। वह वाणी स्थायी फल देनेवाली नहीं है। उस वाणीका जो फल स्वर्गादिका भोग है वह केवल देखनेमें ही सुन्दर दीखता है उसमें स्थायीपना नहीं है। जन्मकर्मफलप्रदाम्   वह पुष्पित वाणी जन्मरूपी कर्मफलको देनेवाली है क्योंकि उसमें सांसारिक भोगोंको ही महत्व दिया गया है। उन भोगोंका राग ही आगे जन्म होनेमें कारण है (गीता 13। 21)। क्रियाविशेषबहुलां भोगैश्वर्यगतिं प्रति   वह पुष्पित अर्थात् दिखाऊ शोभायुक्त वाणी भोग और ऐश्वर्यकी प्राप्तिके लिये जिन सकाम अनुष्ठानोंका वर्णन करती है उनमें क्रियाओंकी बहुलता रहती है अर्थात् उन अनुष्ठानोंमें अनेक तरहकी विधियाँ होती हैं अनेक तरहकी क्रियाएँ करनी पड़ती हैं अनेक तरहके पदार्थोंकी जरूरत पड़ती है एवं शरीर आदिमें परिश्रम भी अधिक होता है (गीता 18। 24)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.43 2.45।।तथाच यामिमामित्यादि। ये कामाभिलाषिणः ते स्वयमेतां वाचं वेदात्मिकां पुष्पितां भविष्यत्स्वर्गफलेन ( N omit भविष्यत् S reads भविष्यता) व्याप्तां वदन्ति। अत एव जन्मनः कर्मैव फलमिच्छन्ति ते अविपश्चितः। ते च तयैव स्वयं कल्पितया वेदवाचा अपहृतचित्ताः व्यवसायबुद्धियुक्ता अपि न समाधियोग्याः तत्र फलनिश्चयत्वात्। इति श्लोकत्रयस्य तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.43।।प्रकृतान्प्रवक्तृ़नविवेकिनो व्यवसायात्मकबुद्धिभाक्त्वासंभवसिद्ध्यर्थं विधान्तरेण विशिनष्टि  ते   चेति।  तेषां संसारपरिवर्तनपरिदर्शनार्थं प्रस्तुतां वाचमेव विशिनष्टि  जन्मेति।  ननु पुंसां कामस्वभावत्वमयुक्तं चेतनस्येच्छावतस्तदात्मत्वानुपपत्तेरिति तत्राह  कामपरा इति।  तत्परत्वं तत्तत्फलार्थित्वेन तत्तदुपायेषु कर्मस्वेव प्रवृत्ततया कर्मसंन्यासपूर्वकाज्ज्ञानाद्बहिर्मुखत्वम्। ननु कर्मनिष्ठानामपि   परमपुरुषार्थापेक्षया मोक्षोपाये ज्ञाने भवत्याभिमुख्यमिति नेत्याह  स्वर्गेति।  तत्परत्वं तस्मिन्नेवासक्ततया तदतिरिक्तपुरुषार्थराहित्यनिश्चयवत्त्वम्। उच्चावचमध्यमदेहप्रभेदग्रहणं जन्मवाचो यथोक्तफलप्रदत्वमप्रामाणिकमित्याशङ्क्यानुष्ठानद्वारा तदुपपत्तिरित्याह  क्रियेति।  क्रियाणामनुष्ठानानां यागदानादीनां विशेषा देशकालाधिकारिप्रयुक्ताः सप्ताहानेकाहलक्षणास्ते खल्वस्यां वाचि प्राचुर्येण प्रतिभान्तीत्यर्थः। कथं यथोक्तायां वाचि क्रियाविशेषाणां बाहुल्येनावस्थानमित्याशङ्क्य प्रकाश्यत्वेनेत्येतद्विशदयति  स्वर्गेति।  तथापि तेषां मोक्षोपायत्वोपपत्तेस्तन्निष्ठानां मोक्षाभिमुख्यं भविष्यति नेत्याह  भोगेति।  यथोक्तां वाचमभिवदतां पर्यवसानं दर्शयति  तद्बहुलामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.43।।गतिशब्दस्यावगतिरप्यर्थः प्रतीयेतेत्यत आह  भोगे ति। अन्यथाऽसदनुवादप्रसङ्गादिति भावः। एषाऽपि कथं निन्दा इत्यत आह  तत्प्राप्ती ति। मोक्षं वेदफलं न मन्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.43।।भोगैश्वर्यमतिं तत्प्राप्तिं प्रति। तत्प्राप्तिफला एव वेदा इति वदन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.43।। याम् इमां पुष्पितां  पुष्पमात्रफलाम् आपातरमणीयां  वाचम् अविपश्चितः  अल्पज्ञा भोगैश्वर्यगतिं प्रति वर्तमानां प्रवदन्ति  वेदवादरताः  वेदेषु ये स्वर्गादिफलवादाः तेषु सक्ताः  न अन्यद् अस्ति इति   वादिनः  तत्सङ्गातिरेकेण स्वर्गा देः अधिकं फलं न अन्यद् अस्ति इति वदन्तः।  कामात्मानः  कामप्रवणमनसः  स्वर्गपराः  स्वर्गपरायणाः स्वर्गादिफलावसाने पुन र्जन्मकर्मा ख्य फलप्रदां क्रियाविशेषबहुलां  तत्त्वज्ञानरहिततया क्रियाविशेषप्रचुरां तेषां  भोगैश्वर्यगतिं प्रति  वर्तमानां याम् इमां वाचं ये प्रवदन्ति इति सम्बन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.43।।  कामात्मानः  कामस्वभावाः कामपरा इत्यर्थः।  स्वर्गपराः  स्वर्गः परः पुरुषार्थः येषां ते स्वर्गपराः स्वर्गप्रधानाः।  जन्मकर्मफलप्रदां  कर्मणः फलं कर्मफलं जन्मैव कर्मफलं जन्मकर्मफलं तत् प्रददातीति जन्मकर्मफलप्रदा तां वाचम्। प्रवदन्ति इत्यनुषज्यते।  क्रियाविशेषबहुलां  क्रियाणां विशेषाः क्रियाविशेषाः ते बहुला यस्यां वाचि तां स्वर्गपशुपुत्राद्यर्थाः यया वाचा बाहुल्येन प्रकाश्यन्ते।  भोगैश्वर्यगतिं   प्रति  भोगश्च ऐश्वर्यं च भोगैश्वर्ये तयोर्गतिः प्राप्तिः भोगैश्वर्यगतिः तां प्रति साधनभूताः ये क्रियाविशेषाः तद्बहुलां तां वाचं प्रवदन्तः मूढाः संसारे परिवर्तन्ते इत्यभिप्रायः।।तेषां च

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【 Verse 2.44 】

▸ Sanskrit Sloka: भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम् | व्यवसायात्मिका बुद्धि: समाधौ न विधीयते ||

▸ Transliteration: bhogaiśvarya-prasaktānāṁ tayāpahṛtacetasām | vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate ||

▸ Glossary: bhogaiśvarya: material enjoyment opulence; prasaktānāṁ: of those who are so attached; tayā: by such words; apahṛta cetasāṁ: bewildered in mind; vyavasāyātmikā: fixed determination; buddhiḥ: intellect; samādhau: in the supreme goal; na: not; vidhīyate: centers on

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.44 Those whose minds are attached to sense pleasures and lordship, who are diverted by such teachings, for them, the determination for steady meditation and samādhi, fixed intelligence does not happen.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.13।।देहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन जवानी और वृद्धावस्था होती है ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.44।।उससे जिनका चित्त हर लिया गया है ऐसे भोग और एश्र्वर्य‌ मॆ आसक्ति रखने वाले पुरुषों के अन्तकरण मे निश्चयात्मक् बुद्धि नही हॊती अर्थात वे ध्यान का अभ्यास करने योग्य‌ नही होते।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.44 भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम् of the people deeply attached to pleasure and lordship? तया by that? अपहृतचेतसाम् whose minds are drawn away? व्यवसायात्मिका determinate? बुद्धिः reason? समाधौ in Samadhi? न not? विधीयते is fixed.Commentary Those who cling to pleasure and power cannot have steadiness of mind. They cannot concentrate or meditate. They are ever busy in planning projects for the acisition of wealth and power. Their minds are ever restless. They have no poised understanding.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.44. Those, who are very much attached to the ownership of enjoyable objects and whose minds have been carried away by that (flowery speech)-their knowledge, in the form of determination is not prescribed for concentration.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.44 While their minds are absorbed with ideas of power and personal enjoyment, they cannot concentrate their discrimination on one point.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.42 - 2.44 O! Partha, the unwise, who rejoice in the letter of the Vedas, say, 'There is nothing else.' They are full only of wordly desires and they hanker for heaven. They speak flowery words which offer rirth as the fruit of work. They look upon the Vedas as consisting entirely of varied rites for the attainment of pleasure and power. Those who cling so to pleasure and power are attracted by that speech (offering heavenly rewards) and are unable to develop the resolute will of a concentrated mind.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.44 One-pointed conviction does not become established in the minds of those who delight in enjoyment and affluence, and whose intellects are carried away by that (speech).

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.44 For those who are attached to pleasure and power, whose minds are drawn away by such teaching, ï1thatï1 determinate reason is not formed which is steadily bent on meditation and Samadhi (superconscious state).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.42-44 Yam imam etc., upto na vidhiyate. Those, who crave for objects of desire, speak, on their own accord, of this flowery Vedic speech which is pervaded by the fruits i.e., the heaven in the future; and who, hence, desire the action itself as the fruit of their birth - these are men without insight. further, having their mind carried away by the same Vedic sentence imagined by themselves, these persons, eventhough they are endowed with the determinate knowledge, are not fit for concentration, because they do not decide this (concentration) as a fruit [of their action]. This is the purport of the traid of these verses.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.42 - 2.44 The ignorant, whose knowledge is little, and who have as their sole aim the attainment of enjoyment and power, speak the flowery language i.e., having its flowers (show) only as fruits, which look apparently beautiful at first sight. They rejoice in the letter of the Vedas i.e., they are attached to heaven and such other results (promised in the Karma-kanda of the Vedas). They say that there is nothing else, owing to their intense attachment to these results. They say that there is no fruit superior to heaven etc. They are full of worldly desires and their minds are highly attached to secular desires. They hanker for heaven, i.e. think of the enjoyment of the felicities of heaven, after which one can again have rirth which offers again the opportunity to perform varied rites devoid of true knowledge and leads towards the attainment of enjoyments and power once again.

With regard to those who cling to pleasure and power and whose understanding is contaminated by that flowery speech relating to pleasure and lordly powers, the aforesaid mental disposition characterised by resolution, will not arise in their Samadhi. Samadhi here means the mind. The knowledge of the self will not arise in such minds. In the minds of these persons, there cannot arise the mental disposition that looks on all Vedic rituals as means for liberation based on the determined conviction about the real form of the self. Hence, in an aspirant for liberation, there should be no attachment to rituals out of the conviction that they are meant for the acisition of objects of desire only.

It may be estioned why the Vedas, which have more of love for Jivas than thousands of parents, and which are endeavouring to save the Jivas, should prescribe in this way rites whose fruits are infinitesimal and which produce only new births. It can also be asked if it is proper to abandon what is given in the Vedas. Sri Krsna replies to these estions.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.44 And vyavasayatmika, one-pointed; buddhih, conviction, with regard to Knowledge or Yoga; na vidhiyate, does not become established, i.e. does not arise; samadhau, in the minds the word samadhi being derived in the sese of that into which everthing is gathered together for the enjoyment of a person ; bhoga-aisvarya-prasaktanam, of those who delight in enjoyment and wealth, of those who have the hankering that only enjoyment as also wealth is to be sought for, of those who identify themselves with these; and apahrta-cetasam, of those whose intellects are carried away, whose discriminating judgement becomes covered; taya, by that speech which is full of various special rites.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.44।। महर्षि व्यास ऐसे पहले साहसी क्रान्तिकारी थे जिन्होंने अपने काल में अत्यन्त शोचनीय पतन की स्थिति से हिन्दू संस्कृति का पुनरुत्थान किया। क्रान्ति का वह ग्रन्थ गीता है जिसकी रचना उन्होंने की। अपने काल की स्थितियों की उनके द्वारा की गयी तीव्र आलोचना भगवान् के इन शब्दों से स्पष्ट होती है जहां श्रीकृष्ण वेदों के कर्मकाण्ड को पुष्पिता वाणी कहते हैं। कर्मकाण्ड की तीव्र आलोचना करने में व्यास जी के साहस को समझने के लिये हमें उस काल के पुरोगामी पारम्परिक वातावरण की कल्पना करनी होगी हमें मानसिक रूप से उस काल में रहना होगा।वेदों का कर्मकाण्ड उन लोगों के लिए है जो विषयोपभोग और ऐश्वर्य में अत्यन्त आसक्त हैं कर्मफल पाने की इच्छा और चिन्ता के कारण जिनकी सदसद् विवेक की क्षमता खो गयी है। सर्वोच्च साध्य को भूलकर साधनभूत कर्मों में ही वे लिप्त रहते हैं।वेदोक्त कर्मों को अत्यन्त परिश्रमपूर्वक करना पड़ता है तब मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग के रूप में उनका फल प्राप्त होता है जहाँ अलौकिक विषयों का उपभोग किया जा सकता है। इन सब प्रयत्नों में कामनाओं और चिन्ताओं आदि के कारण व्यक्तित्व के विकास के लिये अवसर नहीं मिलता इसलिये व्यास जी का विचार है कि अध्यात्म की दृष्टि से ये सकाम कर्म निरर्थक हैं। कर्मकाण्ड में आसक्त पुरुष जीवन के परम साध्य को भूलकर साधन में ही फंसा रह जाता है।अनन्तस्वरूप परम सत्य के प्रतिपादक के रूप में श्रीकृष्ण उन लोगों की हँसी उड़ाते हैं जो साधन को ही साध्य मानने की त्रुटि करते हैं। कर्मकाण्ड में ही उपदिष्ट केवल कर्तव्य कर्म के पालन से चित्त शुद्धि एवं एकाग्रता प्राप्त होती है और इस प्रकार ध्यान का अभ्यास करने की योग्यता पाकर उपनिषदों में निरूपित निदिध्यासन के द्वारा आत्मा का अपरोक्ष अनुभव प्राप्त होता है जो जीवन का वास्तविक साध्य है। कर्म में ही रत पुरुषों को जीवन में कभी शान्ति नहीं मिलती।अविवेकी कामी पुरुषों को क्या फल मिलता है भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.44।।तेषां बोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानामतिरक्तचितानां यतस्तया वाचापहृतमाच्छादितं चेतो येषां तेषां व्यवसायात्मिका सांख्ये योगे वा या बुद्धिः सा समाधौ समाधीयते पुरुषोपभोगाय सर्वमस्मिन्नन्तःकरणं तस्मिन्न विधीयते न स्थिरीभवतीत्यर्थः। ननु अहं ब्रह्मास्मीत्यवस्थानं समाधिस्तन्निमित्तमिति चित्तैकाग्र्यं परमेश्वरैकाग्र्याभिमुखत्वं तस्मिन्वेति व्याख्यानद्वयमाचारर्यैः कुतो न प्रदर्शितमितिचेत् अहं ब्रह्मास्मीत्यवस्थानस्य परमेश्वरैकाग्र्याभिमुखत्वस्य च व्यवसायात्मिकसांख्ययोगबुद्धावन्तर्भावमभिप्रेत्येति गृहाण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.42 2.44।।अव्यवसायिनामपि व्यवसायात्मिका बुद्धिः कुतो न भवति प्रमाणस्य तुल्यत्वादित्याशङ्क्य प्रतिबन्धकसद्भावान्न भवतीत्याह त्रिभिः यामिमां वाचं प्रवदन्ति तया वाचापहृतचेतसामविपश्चितां व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवतीत्यन्वयः। इमामध्ययनविध्युपात्तत्वेन प्रसिद्धां पुष्पितां पुष्पितपलाशवदापातरमणीयांसाध्यसाधनसंबन्धप्रतिभानान्निरतिशयफलाभावाच्च। कुतो निरतिशयफलत्वाभावस्तत्राह जन्मकर्मफलप्रदां जन्म चापूर्वशरीरेन्द्रियादिसंबन्धलक्षणं तदधीनं च कर्म तत्तद्वर्णाश्रमाभिमाननिमित्तं तदधीनं च फलं पुत्रपशुस्वर्गादिलक्षणं विनश्वरं तानि प्रकर्षेण घटीयन्त्रवदविच्छेदेन ददातीति तथा ताम्। कुतएवमत आह भोगैश्वर्यगतिं प्रति क्रियाविशेषबहुलां अमृतपानोर्वशीविहारपारिजातपरिमलादिनिबन्धनो यो भोगस्तत्कारणं च यदैश्वर्यं देवादिस्वामित्वं तयोर्गतिं प्राप्तिं प्रति साधनभूता ये क्रियाविशेषा अग्निहोत्रदर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादयस्तैर्बहुलां विस्तृताम्। अतिबाहुल्येन भोगैश्वर्यसाधनक्रियाकलापप्रतिपादिकामिति यावत्। कर्मकाण्डस्य हि ज्ञानकाण्डापेक्षया सर्वत्रातिविस्तृतत्वं प्रसिद्धम्। एतादृशीं कर्मकाण्डलक्षणां वाचं प्रवदन्ति प्रकृष्टां परमार्थस्वर्गादिफलामभ्युपगच्छन्ति। के। येऽविपश्चितो विचारजन्यतात्पर्यपरिज्ञानशून्याः। अतएव वेदवादरताः वेदे ये सन्ति वादा अर्थवादाःअक्षय्यं ह वै चातुर्मास्ययाजिनः सुकृतं भवति इत्येवमादयस्तेष्वेव रता वेदार्थसत्यत्वेनैवमेवैतदिति मिथ्याविश्वासेन संतुष्टाः। हे पार्थ अतएव नान्यदस्तीतिवादिनः कर्मकाण्डापेक्षया नास्त्यन्यज्ज्ञानकाण्डं सर्वस्यापि वेदस्य कार्यपरत्वात् कर्मफलापेक्षया च नास्त्यन्यन्निरतिशयं ज्ञानफलमिति वदनशीलाः। महता प्रबन्धेन ज्ञानकाण्डविरुद्धार्थभाषिण इत्यर्थः। कुतो मोक्षद्वेषिणस्ते। यतः कामात्मानः काम्यमानविषयशताकुलचित्तत्वेन काममयाः। एवंसति मोक्षमपि कुतो न कामयन्ते। यतः स्वर्गपराः स्वर्ग एवोर्वश्याद्युपेतत्वेन पर उत्कृष्टो येषां ते तथा। स्वर्गातिरिक्तः पुरुषार्थो नास्तीति भ्राम्यन्तो विवेकवैराग्याभावान्मोक्षकथामपि सोढुमक्षमा इति यावत्। तेषां च पूर्वोक्तभोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानां क्षयित्वादिदोषादर्शनेन निविष्टान्तःकरणानां तया क्रियाविशेषबहुलया वाचापहृतमाच्छादितं चेतो विवेकज्ञानं येषां तथाभूतानामर्थवादाः स्तुत्यर्थास्तात्पर्यविषये प्रमाणान्तराबाधिते वेदस्य प्रामाण्यमिति सुप्रसिद्धमपि ज्ञातुमशक्तानां समाधावन्तःकरणे व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न विधीयते। न भवतीत्यर्थः। समाधिविषया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तेषां न भवतीति वा। अधिकरणे विषये वा सप्तम्यास्तुल्यत्वात्। विधीयत इति कर्मकर्तरि लकारः। समाधीयतेऽस्मिन्सर्वमिति व्युत्पत्त्या समाधिरन्तःकरणं वा परमात्मा वेति नाप्रसिद्धार्थकल्पनम्। अहं ब्रह्मेत्यवस्थानं समाधिस्तन्निमित्तं व्यवसायात्मिका बुद्धिर्नोत्पद्यत इति व्याख्याने तु रूढिरेवादृता। अयंभावःयद्यति काम्यान्यग्निहोत्रादीनि शुद्ध्यर्थेभ्यो न विशिष्यन्ते तथापि फलाभिसंधिदोषान्नाशयशुद्धिं संपादयन्ति। भोगानुगुणा तु शुद्धिर्न ज्ञानोपयोगिनी। एतदेव दर्शयितुं भोगैश्वर्यप्रसक्तानामिति पुनरुपात्तम्। फलाभिसन्धिभन्तरेण तु कृतानि कर्माणि ज्ञानोपयोगिनीं शुद्धिमादधतीति सिद्धं विपश्चिदविपश्चितोः फलवैलक्षण्यम्। विस्तरेण चैतदग्रे प्रतिपादयिष्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.44।। भोगेति।  तया पुष्पितया वाचा अपहृतचेतसां पुंसां बुद्धिः समाधौ समाध्यनुष्ठानकाले व्यवसायात्मिका व्यवसायो ज्ञानं तदात्मिका शुद्धचिन्मात्राकारा न विधीयते न भवति। कर्मकर्तरि लकारः। विरक्तस्य हि बुद्धिः समाधौ चिन्मात्राकारा भवति न तु भोगाद्यासक्तस्येति स्पष्टमेव। भाष्ये तु समाधौ अन्तःकरणे व्यवसायात्मिका बुद्धिर्न भवतीति व्याख्यातम्। यद्वा समाध्यनुष्ठानार्थमेव निश्चयात्मिका तेषां बुद्धिर्न भवतीति व्याख्येयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.44।।ततो भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तेषां तया वाचा अपहृतचित्तानां समाधौ वैयग्र्यभावेन भगवच्चिन्तने तथा बुद्धिर्न भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.44।।ततश्च  भोगैश्वर्यप्रसक्तानामिति।  भोगैश्वर्ययोः प्रसक्तानामभिनिविष्टानाम्। तया पुष्पितया वाचापहृतमाकृष्टं चेतो येषां तेषां समाधिः चित्तैकाग्र्यं पमेश्वरैकाग्र्याभिमुखत्वं तस्मिन्निश्चयात्मिका बुद्धिर्न विधीयते। कर्मकर्तरिप्रयोगः। नोत्पद्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.44।।तथाभूतानां तेषां तया वाचाऽपहृतचेतसां काम्यकर्मपराणां व्यवसायात्मिकैका बुद्धिः समाधिविषयिणी न विधीयते। विशेषेण न स्थाप्यते इति वा। तेषां समाधौ हृदीति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.44।।जो भोग और ऐश्वर्यमें आसक्त हैं अर्थात् भोग और ऐश्वर्य ही पुरषार्थ है ऐसे मानकर उनमें ही जिनका प्रेम हो गया है इस प्रकार जो तद्रूप हो रहे हैं तथा क्रियाभेदोंको विस्तारपूर्वक बतलानेवाली उस उपर्युक्त वाणीद्वारा जिनका चित्त हर लिया गया है अर्थात् ( जिनकी ) विवेकबुद्धि आच्छादित हो रही है उनकी समाधिमें सांख्यविषयक या योगविषयक निश्चयात्मिका बुद्धि ( नहीं ठहरती )। पुरुषके भोगके लिये जिसमें सब कुछ स्थापित किया जाता है उसका नाम समाधि है। इस व्युत्पत्तिके अनुसार समाधि अन्तःकरणका नाम है उसमें बुद्धि नहीं ठहरती अर्थात् उत्पन्न ही नहीं होती।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.44।। व्याख्या   तयापहृतचेतसाम्   पूर्वश्लोकोंमें जिस पुष्पित वाणीका वर्णन किया गया है  उस वाणीसे जिनका चित्त अपहृत हो गया है अर्थात् स्वर्गमें बड़ा भारी सुख है दिव्य नन्दनवन है अप्सराएँ हैं अमृत है ऐसी वाणीसे जिनका चित्त उन भोगोंकी तरफ खिंच गया है। भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्   शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध ये पाँच विषय शरीरका आराम मान और नामकी बड़ाई इनके द्वारा सुख लेनेका नाम भोग है। भोगोंके लिये पदार्थ रूपयेपैसे मकान आदिका जो संग्रह किया जाता है उसका नाम ऐश्वर्य है। इन भोग और ऐश्वर्यमें जिनकी आसक्ति है प्रियता है खिंचाव है अर्थात् इनमें जिनकी महत्त्वबुद्धि है उनको  भोगैश्वर्यप्रसक्तानाम्  कहा गया है।जो भोग और ऐश्वर्यमें ही लगे रहते हैं वे आसुरी सम्पत्तिवाले होते हैं। कारण कि असु नाम प्राणोंका है और उन प्राणोंको जो बनाये रखना चाहते हैं उन प्राणपोषणपरायण लोगोंका नाम असुर है। वे शरीरकी प्रधानताको लेकर यहाँके अथवा स्वर्गके भोग भोगना चाहते हैं  (टिप्पणी प0 80) ।  व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते   जो मनुष्यजन्मका असली ध्येय है जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला है उस परमात्माको ही प्राप्त करना है ऐसी व्यवसायात्मिका बुद्धि उन लोगोंमें नहीं होती। तात्पर्य यह है कि जो भोग भोगे जा चुके हैं जो भोग भोगे जा सकते हैं जिन भोगोंको सुन रखा है और जो भोग सुने जा सकते हैं उनके संस्कारोंके कारण बुद्धिमें जो मलिनता रहती है उस मलिनताके कारण संसारसे सर्वथा विरक्त होकर एक परमात्माकी तरफ चलना है ऐसा दृढ़ निश्चय नहीं होता। ऐसे ही संसारकी अनेक विद्याओं कलाओं आदिका जो संग्रह है उससे मैं विद्वान हूँ मैं जानकार हूँ ऐसा जो अभिमानजन्य सुखका भोग होता है उसमें आसक्त मनुष्योंका भी परमात्मप्राप्तिका एक निश्चय नहीं होता। विशेष बात परमदयालु प्रभुने कृपा करके इस मनुष्यशरीरमें एक ऐसी विलक्षण विवेकशक्ति दी है जिससे वह सुखदुःखसे ऊँचा उठ जाय अपना उद्धार कर ले सबकी सेवा करके भगवान्तकको अपने वशमें कर ले इसीमें मनुष्यशरीरकी सार्थकता है। परन्तु प्रभुप्रदत्त इस विवेकशक्तिका अनादर करके नाशवान् भोग और संग्रहमें आसक्त हो जाना पशुबुद्धि है। कारण कि पशुपक्षी भी भोगोंमें लगे रहते हैं ऐसे ही अगर मनुष्य भी भोगोंमें लगा रहे तो पशुपक्षियोंमें और मनुष्यमें अन्तर ही क्या रहापशुपक्षी तो भोगयोनि है अतः उनके सामने कर्तव्यका प्रश्न ही नहीं है। परन्तु मनुष्यजन्म तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करके अपना उद्धार करनेके लिये ही मिला है भोग भोगनेके लिये नहीं। इसलिये मनुष्यके सामने जो कुछ अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है वह सब साधनसामग्री है भोगसामग्री नहीं। जो उसको भोगसामग्री मान लेते हैं उनकी परमात्मामें व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती।वास्तवमें सांसारिक पदार्थ परमात्माकी तरफ चलनेमें बाधा नहीं देते प्रत्युत वर्तमानमें जो भोगोंका महत्व अन्तःकरणमें बैठा हुआ है वही बाधा देता है। भोग उतना नहीं अटकाते जितना भोगोंका महत्व अटकाता है। अटकानेमें अपनी रुचि नीयतकी प्रधानता है। भोग और संग्रहकी रुचिको रखते हुए कोई परमात्माको प्राप्त करना चाहे तो परमात्माकी प्राप्ति तो दूर रही उनकी प्राप्तिका एक निश्चय भी नहीं हो सकता। कारण कि जहाँ परमात्माकी तरफ चलनेकी रुचि है वहीं भोगोंकी रुचि भी है। जबतक भोग और संग्रहमें मानबड़ाईआराममें रुचि है तबतक कोई भी एक निश्चय करके परमात्मामें नहीं लग सकता क्योंकि उसका अन्तःकरण भोगोंकी रुचिद्वारा हर लिया गया उसकी जो शक्ति थी वह भोग और संग्रहमें लग गयी। सम्बन्ध   किसी बातको पुष्ट करना हो तो पहले उसके दोनों पक्ष सामने रखकर फिर उसको पुष्ट किया जाता है। यहाँ भगवान् निष्कामभावको पुष्ट करना चाहते हैं अतः पीछेके तीन श्लोकोंमें सकामभाववालोंका वर्णन करके अब आगेके श्लोकमें निष्काम होनेकी प्रेरणा करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.43 2.45।।तथाच यामिमामित्यादि। ये कामाभिलाषिणः ते स्वयमेतां वाचं वेदात्मिकां पुष्पितां भविष्यत्स्वर्गफलेन ( N omit भविष्यत् S reads भविष्यता) व्याप्तां वदन्ति। अत एव जन्मनः कर्मैव फलमिच्छन्ति ते अविपश्चितः। ते च तयैव स्वयं कल्पितया वेदवाचा अपहृतचित्ताः व्यवसायबुद्धियुक्ता अपि न समाधियोग्याः तत्र फलनिश्चयत्वात्। इति श्लोकत्रयस्य तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.44।।ननु कर्मकाण्डनिष्ठानां कर्मानुष्ठायिनामपि बुद्धिशुद्धिद्वारेणान्तःकरणे साध्यसाधनभूतबुद्धिद्वयसमुदायसंभवादतो मोक्षो भविष्यति नेत्याह  तेषां चेति।  तदात्मभूतानां तयोरेव भोगैश्वर्ययोरात्मकर्तव्यत्वेनारोपितयोरभिनिविष्टे चेतसि तादात्म्याध्यासवतां बहिर्मुखानामित्यर्थः। तथापि शास्त्रानुसारिण्या विवेकप्रज्ञया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तेषामुदेष्यतीत्याशङ्क्याह  तयेति।  ननु समाधिः संप्रज्ञातासंप्रज्ञातभेदेन द्विधोच्यते तत्र बुद्धिद्वयविधिरप्रसक्तः सन्कथं निषिध्यते तत्राह  समाधीयत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.44।।तयाऽपहृतेत्यादेरप्रतीतिनिरासायार्थमाह  तेषा मिति। तेषां बुद्धिर्मनोवृत्तिर्व्यवसायात्मिका सम्यग्युक्तिनिर्णयात्मिका न भवति। तत एवेश्वरे सम्यक्समाधानार्थं न विधीयत इत्यर्थः। सम्यग्युक्तिनिर्णयात्मकत्वाभावे कुतः समाध्यभावः इत्यत आह   सम्यगि ति। अनेन समाधिशब्दार्थोऽपि विवृतो भवति। किमीश्वरे मनस्समाधानेन येन तदभावे निन्दा स्यात् इत्यत आह  तद्धी ति। मोक्षाभावश्च महानिन्देति। वक्ष्यति। सम्यङ्निर्णीतार्थानामित्युक्तम्। न केवलमानुभाविकं किन्तु पुराणेप्युक्तमित्याह   उक्तं चे ति। वरीयसीः वरीयस्यः।सुपां सुलुक् अष्टा.7।1।39 इत्यादिना जसः पूर्वसवर्णः। वाचो वेदवाचः। स्वप्ने निरुक्त्या स्वप्नप्रतीतार्थदृष्टान्तेन हेयानुमितं हेयत्वेनानुमितम्। इदमेव हि सम्यङ्निर्णीतार्थत्वम्। यद्धेयोपादेयविवेकेन हेयहानमुपादेयोपादानं च तद्धि मोक्षसाधनमित्येतत्तु श्रुत्यादिप्रसिद्धमेव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.44।।तेषां सम्यण्युक्तिनिर्णयात्मिका बुद्धिः समाधौ समाध्यर्थे न विधीयते। सम्यङ्निर्णीतार्थानामीश्वरे मनस्समाधानं सम्यग्भवति। तद्धि मोक्षसाधनम्। उक्तं चैतदन्यत्र न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद्वरीयसीरपि वाचः समासन्। स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधिसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् भाग.5।11।3।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.44।।तेषां  भोगैश्वर्यप्रसक्तानां   तया  वाचा भोगैश्वर्यविषयया  अपहृता त्मज्ञानानां यथोदिता  व्यवसायात्मिका   बुद्धिः समाधौ  मनसि  न विधीयते  न उत्पद्यते। समाधीयते अस्मिन् आत्मज्ञानम् इति समाधिः मनः। तेषां मनसि आत्मयाथात्म्यनिश्चयज्ञानपूर्वकमोक्षसाधनभूतकर्मविषया बुद्धिः कदाचिद् अपि न उत्पद्यते इत्यर्थः। अतः काम्येषु कर्मसु मुमुक्षुणा न सङ्गः कर्तव्यः।एवम् अत्यन्ताल्पफलानि पुनर्जन्मप्रसवानि कर्माणि मातापितृसहस्रेभ्यः अपि वत्सलतरतया आत्मोपजीवने प्रवृत्ता वेदाः किमर्थं वदन्ति कथं वा वेदोदितानि त्याज्यतया उच्यन्ते इति अत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.44।।  भोगैश्वर्यप्रसक्तानां  भोगः कर्तव्यः ऐश्वर्यं च इति भोगैश्वर्ययोरेव प्रणयवतां तदात्मभूतानाम्। तया क्रियाविशेषबहुलया वाचा  अपहृतचेतसाम्  आच्छादितविवेकप्रज्ञानां  व्यवसायात्मिका  सांख्ये योगे वा  बुद्धिः समाधौ  समाधीयते अस्मिन् पुरुषोपभोगाय सर्वमिति समाधिः अन्तःकरणं बुद्धिः तस्मिन् समाधौ  न विधीयते  न भवति इत्यर्थः।।ये एवं विवेकबुद्धिरहिताः तेषां कामात्मनां यत् फलं तदाह

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【 Verse 2.45 】

▸ Sanskrit Sloka: त्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन | निर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान् ||

▸ Transliteration: traiguṇyaviṣayā vedā nistraiguṇyo bhavārjuna | nirdvandvo nityas-attva-stho niryogakṣema ātmavān ||

▸ Glossary: traiguṇya viṣayā: pertaining to the three modes of material nature and the means of achieving them; vedā: Vedic literature; nistraiguṇyaḥ: indifferent to the material enjoyments and their means; bhava: be; arjuna: O Arjuna; nirdvandvaḥ: free from the pairs of opposites; nitya sattvasthaḥ: ever remain- ing in satva (eternal existence); niryogakṣemaḥ: free from (the thought of) acquisition and preservation; ātmavān: established in the Self

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.45 O Arjuna! Be you above the three guṇas (attributes) that the Vedas deal in: free yourself from the pairs-of-opposites and be always in satva (goodness), free from all thoughts of acquisition (yoga) or preservation (kṣema), and be established in the Self.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.14।।हे कुन्तीनन्दन इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं वे तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं। वे आनेजानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन उनको तुम सहन करो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.45।। हे अर्जुन वेदों का विषय तीन गुणों से सम्बन्धित (संसार से) है तुम त्रिगुणातीत? निर्द्वन्द्व? नित्य सत्त्व (शुद्धता) में स्थित? योगक्षेम से रहित और आत्मवान् बनो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.45 त्रैगुण्यविषयाः deal with the three attributes? वेदाः the Vedas? निस्त्रैगुण्यः without these three attributes? भव be? अर्जुन O Arjuna निर्द्वन्द्वः free from the pairs of opposites? नित्यसत्त्वस्थः ever remaining in the Sattva (goodness)? निर्योगक्षेमः free from (the thought of) acisition and preservation? आत्मवान् established in the Self.Commentary Guna means attribute or ality. It is substance as well as ality. Nature (Prakriti) is made up of three Gunas? viz.? Sattva (purity? light or harmony)? Rajas (passion or motion) and Tamas (darkness or inertia). The pairs of opposites are heat and cold? pleasure and pain? gain and loss? victory and defeat? honour and dishonour? praise and censure. He who is anxious about new acuqisitions or about the preservation of his old possessions cannot have peace of mind. He is ever restless. He cannot concentrate or meditate on the Self. He cannot practise virtue. Therefore? Lord Krishna advises Arjuna that he should be free from the thought of acisition and preservation of things. (Cf.IX.20?21).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.45. The Vedas bind by means of the three Strands. [Hence] O Arjuna, you must be free from the three Strands, free from the pairs [of opposites]; be established in this eternal Being; be free from [the idea of] acisition and preservation; and be possessed of the Self.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.45 The Vedic Scriptures tell of the three constituents of life - the Qualities. Rise above all of them, O Arjuna, above all the pairs of opposing sensations; be steady in truth, free from worldly anxieties and centered in the Self.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.45 The Vedas have the three Gunas for their sphere, O Arjuna. You must be free from the three Gunas and be free from the pairs of opposites. Abide in pure Sattva; never care to acire things and to protect what has been acired, but be established in the self.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.45 O Arjuna, the Vedas [Meaning only the portion dealing with rites and duties (karma-kanda).] have the three alities as their object. You become free from worldliness, free from the pairs of duality, ever-poised in the ality of sattva, without (desire for) acisition and protection, and self-collected.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.45 The Vedas deal with the three attributes (of Nature); be thou above these three attributes. O Arjuna, free yourself from the pairs of opposites, and ever remain in the ality of Sattva (goodness), freed from (the thought of) acisition and preservation, and be established in the Self.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.45 Traigunya-etc. The Vedas bind very much [only] by means of the three Strands and they do not bind on their own accord. For, the rituals prescribed in the Vedas, create bondage if they are performed with an intention of pleasure, or of (avoiding) pain, or with an illlusion of attachment. Hence the traid of Strands in the form of desire (or in a pleasing form) must be abandoned.

If the present passage were intended to condemn the Vedas, then the act of fighting the battle in estion would be spoiled, because there is nothing other than the Vedas do not bind those, from whom the desire for fruit has completely gone. Because the Vedas alone are useful for proper knowledge in the case of those persons [free from the Strands] hence [the Lord] says-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.45 The word Traigunya means the three Gunas - Sattva, Rajas and Tamas. Here the term Traigunya denotes persons in whom Sattva, Rajas and Tamas are in abundance. The Vedas in prescribing desire-oriented rituals (Kamya-karmas) have such persons in view. Because of their great love, the Vedas teach what is good to those in whom Tamas, Rajas and Sattva preponderate. If the Vedas had not explained to these persons the means for the attainment of heaven etc., according to the Gunas, then those persons who are not interested in liberation owing to absence of Sattva and preponderance of Rajas and Tamas in them, would get completely lost amidst what should not be resorted to, without knowing the means for attaining the results they desire. Hence the Vedas are concerned with the Gunas. Be you free from the three Gunas. Try to acire Sattva in abundance; increase that alone. The purport is: do not nurse the preponderance of the three Gunas in their state of inter-mixture; do not cultivate such preponderance.

Be free from the pairs of opposites; be free from all the characteristics of worldly life. Abide in pure Sattva; be established in Sattva, in its state of purity without the admixture of the other two Gunas. If it is estioned how that is possible, the reply is as follows. Never care to acire things nor protect what has been acired. While abandoning the acisition of what is not reired for self-realisation, abandon also the conservation of such things already acired. You can thus be established in self-control and thery become an aspirant after the essentail nature of the self. 'Yoga' is acisition of what has not been acired; 'Ksema' is preservation of things already acired. Abandoning these is a must for an aspirant after the essential nature of the self. If you conduct yourself in this way, the preponderance of Rajas and Tamas will be annihilated, and pure Sattva will develop.

Besides, all that is taught in the Vedas is not fit to be utilised by all.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.45 To those who are thus devoid of discriminating wisdom, who indulge in pleasure, [Here Ast. adds 'yat phalam tad aha, what result accrues, that the Lord states:'-Tr.] O Arjuna, vedah, the Vedas; traigunya-visayah, have the three alities as their object, have the three gunas, [Traigunya means the collection of the three alities, viz sattva (purity), rajas (energy) and tamas (darkness); i.e. the collection of virtuous, vicious and mixed activities, as also their results. In this derivative sense traigunya means the worldly life.] i.e. the worldly life, as the object to be revealed. But you bhava, become; nistraigunyah, free from the three alities, i.e. be free from desires. [There is a seeming conflict between the advices to be free from the three alities and to be ever-poised in the ality of sattva. Hence, the Commentator takes the phrase nistraigunya to mean niskama, free from desires.] (Be) nirdvandvah, free from the pairs of duality by the word dvandva, duality, are meant the conflicting pairs [Of heat and cold, etc.] which are the causes of happiness and sorrow; you become free from them. [From heat, cold, etc. That is, forbear them.] You become nitya-sattvasthah, ever-poised in the ality of sattva; (and) so also niryoga-ksemah, without (desire for) acisition and protection. Yoga means acisition of what one has not, and ksema means the protection of what one has. For one who as 'acisition and protection' foremost in his mind, it is difficult to seek Liberation. Hence, you be free from acisition and protection. And also be atmavan, self-collected, vigilant. This is the advice given to you while you are engaged in your own duty. [And not from the point of view of seeking Liberation.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.45।। विभिन्न अनुपातों में सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों के संयोग से प्राणियों का निर्माण हुआ है। अन्तकरण (मन और बुद्धि) इन तीन गुणों का ही कार्य है। तीन गुणों के परे जाने का अर्थ है मन के परे जाना। तांबा जस्ता और टिन से निर्मित किसी मिश्र धातु का पात्र बना हो और यदि उसमें से इन तीनों धातुओं को विलग करने के लिये कहा जाय तो उसका अर्थ उस पात्र को ही नष्ट करना होगा। उपनिषद् साधक को मन के परे जाने का उपदेश देते हैं जिससे साधक को आत्मस्वरूप से ईश्वर का परिचय होगा। उपनिषदों के इस स्पष्ट उपदेश को यथार्थ में नहीं समझने के कारण अनेक हिन्दू लोग अपने धर्म से अलग हो गये और इसलिये गीता में पुनर्जागरण का आवाहन किया गया। औपनिषदिक अर्थ को ही यहां दूसरे शब्दों में कहा अर्जुन तुम त्रिगुणातीत बनो।यदि कोई चिकित्सक किसी रोगी के लिये ऐसी औषधि लिख देता है जो विश्व में कहीं भी उपलब्ध न हो तो उस चिकित्सक का लिखा हुआ उपचार व्यर्थ है। इसी प्रकार आत्मसाक्षात्कार के लिये त्रिगुणों के परे जाने का उपदेश भले ही श्रेष्ठ हो परन्तु कौन सी साधना के अभ्यास से उसे सम्पादित किया जाय इसका स्पष्टीकरण यदि नहीं किया गया है तो वह उपदेश निरर्थक है। ज्ञान क्रिया और निष्क्रियता ये क्रमश सत्त्व रज और तमोगुण के लक्षण हैं।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में त्रिगुणों के ऊपर उठकर असीम आनन्द में स्थित होने की साधना बतायी गयी है। पूर्व उपदिष्ट समत्व भाव का ही उपदेश यहाँ दूसरे शब्दों में किया गया है।परस्पर भिन्न एवं विपरीत लक्षणों वाले सुखदुख शीतउष्ण लाभहानि इत्यादि जीवन के द्वन्द्वात्मक अनुभव हैं। इन सब में समभाव में रहने का अर्थ ही निर्द्वन्द्व होना है इनसे मुक्त होना है। यही उपदेश श्रीकृष्ण अर्जुन को दे रहे हैं। नित्यसत्त्वस्थ तीनों गुणों में

Chapter 2 (Part 26)

सत्व गुण सूक्ष्मतम एवं स्वभाव से शुद्ध है तथापि शोकात्मक रजोगुण और मोहात्मक तमोगुण के सम्बन्ध से उसमें अशुद्धि भी आ जाती है। मोह का अर्थ है वस्तु को यथार्थ रूप में न पहचानना (आवरण)। जिसके कारण वस्तु का अनुभव किसी अन्य रूप मे ही होता है जिसे विक्षेप कहते हैं और जिसका परिणाम हैशोक। अत सत्वगुण में स्थित होने का अर्थ विवेकजनित शान्ति में स्थित होना है। सत्त्वस्थ बनने के लिए सतत् सजग प्रयत्न की अपेक्षा है। निर्योगक्षेमयहाँ योग का अर्थ है अप्राप्त वस्तु को प्राप्त करना और प्राप्त वस्तु के रक्षण का नाम हैक्षेम। मनुष्य के सभी प्रयत्न योग और क्षेम के लिये होते हैं। अत इन दो शब्दों में विश्व के सभी प्राणियों के कर्म समाविष्ट हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित कर्मों का निर्देश योग और क्षेम के द्वारा किया गया है। मनुष्य की चिन्ताओं और विक्षेपों का कारण भी ये दो ही हैं। निर्योगक्षेम बनने का अर्थ है इन दोनों को त्याग देना जिससे चिन्ताओं से मुक्ति तत्काल ही मिलती हैं।निर्द्वन्द और निर्योगक्षेम बनने का उपदेश देना सरल है किन्तु साधक के लिये तत्त्वज्ञान का उपयोग तभी है जब इस ज्ञान को जीवन में उतारने की व्यावहारिक विधि का भी उपदेश दिया गया हो। इस श्लोक में ऐसी विधि का निर्देश आत्मवान भव इन शब्दों में किया गया है। द्वन्द्वों तथा योगक्षेम के कारण उत्पन्न दुख और पीड़ा केवल तभी सताते हैं जब हमारा तादात्म्य शरीर मन और बुद्धि के साथ होकर अहंकार और स्वार्थ की अधिकता होती है।इन अनात्म उपाधियों के साथ विद्यमान तादात्म्य को छोड़कर इनसे भिन्न अपने शुद्ध चैतन्य स्वरूप के प्रति सतत जागरूक रहने का अभ्यास ही आत्मवान अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित होने का उपाय है। इसकी सिद्धि होने पर अहंकार नष्ट हो जाता है और वह साधक त्रिगुणों के परे आत्मा में स्थित हो जाता है। ऐसे सिद्ध पुरुष को वेदों का कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। वास्तव में ज्ञानी पुरुष के होने के कारण वेदवाक्यों का प्रामाण्य सिद्ध होता है।यदि वैदिक यज्ञों के फलों की कामना त्यागनी चाहिये तो उनका अनुष्ठान किस लिये करें इसका उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.45।।वेदवादरतानां वेदोक्तत्रिगुणात्मकसंसार एव फलमित्याशयेनाह  त्रैगुण्येति।  त्रैगुण्यं संसारो विषयः प्रतिपाद्यो येषां कर्मकाण्डपराणां वेदानां तर्हि मया कथं भाव्यमित्याकाङ्क्षयामाह निस्त्रैगुण्य इति। निस्त्रैगुण्यो निष्कामो भव। हे अर्जुनेति संबोधयन्स्वनाम सार्थक कर्तुमर्हसीति ध्वनयति। निस्त्रैगुण्यभवने उपायमाह  निर्द्वन्द्व इति।  सुखदुःखहेतु प्रतिपक्षपदार्थो द्वन्द्वशब्दावाच्यौ तस्माद्रहितो भव। तत्रोपायमाह  नित्येति।  नित्यं सत्त्वे स्थितो भव। तत्राप्युपायमाह निर्योगेति। अनुपात्तस्योपादानं योगः उपात्तस्य रक्षणं क्षेमः ताभ्यां निर्गतः रजोगुणरहितो भव। आत्मवानप्रमत्तः। तमोगुणाद्विनिर्गतो भवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.45।।ननु सकामानां माभूदाशयदोषाद्व्यवसायात्मिका बुद्धिः निष्कामानां तु व्यवसायात्मकबुद्ध्या कर्म कुर्वतां कर्मस्वाभाव्यात्स्वर्गादिफलप्राप्तौ ज्ञानप्रतिबन्धः समान इत्याशङ्क्याह त्रयाणां गुणानां कर्म त्रैगुण्यं काममूलः संसारः स एव प्रकाश्यत्वेन विषयो येषां तादृशा वेदाः कर्मकाण्डात्मकाः यो यत्फलकामस्तस्यैव तत्फलं बोधयन्तीत्यर्थः। नहि सर्वेभ्यः कोमेभ्यो दर्शपूर्णमासाविति विनियोगेऽपि सकृदनुष्ठानात्सर्वफलप्राप्तिर्भवति तत्तत्कामनाविरहात् यत्फलकामनयानुतिष्ठिति तदेव फलं तस्मिन्प्रयोग इति स्थितं योगसिद्ध्यधिकरणे। यस्मादेवं कामनाविरहे फलविरहः तस्मात्त्वं निस्त्रैगुण्यो निष्कामो भव हे अर्जुन। एतेन कर्मस्वाभाव्यात्संसारो निरस्तः। ननु शीतोष्णादिद्वन्द्वप्रतीकाराय वस्त्राद्यपेक्षणात्कुतो निष्कामत्वमत आह निर्द्वन्द्वः। सर्वत्र भवेति संबध्यते। मात्रास्पर्शास्त्वित्युक्तन्यायेन शीतोष्णादिद्वन्द्वसहिष्णुर्भव। असह्यं दुःखं कथं वा सोढव्यमित्यपेक्षायामाह नित्यसत्त्वस्थः नित्यमचञ्चलं यत्सत्त्वं धैर्यापरर्यायं तस्मिंस्तिष्ठतीति तथा। रजस्तमोभ्यामभिभूतसत्त्वो हि शोतोष्णादिपीडया मरिष्यामीति मन्वानो धर्माद्विमुखो भवति त्वं तु रजस्तमसी अभिभूय सत्त्वमात्रालम्बनो भव। ननु शीतोष्णादिसहनेऽपि क्षुत्पिपासादिप्रतीकारार्थं किंचिदनुपात्तमुपादेयमुपात्तं च रक्षणीयमिति तदर्थं यत्ने क्रियमाणे कुतः सत्त्वस्थत्वमित्यत आह निर्योगक्षेमः। अलब्धलाभो योगः लब्धपरिरक्षणं क्षेमस्तद्रहितो भव। चित्तविक्षेपकारिपरिग्रहरहितो भवेत्यर्थः। नचैवं चिन्ता कर्तव्या कथमेवं सति जीविष्यामिति। यतः सर्वान्तर्यामी परमेश्वर एव तव योगक्षेमादि निर्वाहयिष्यतीत्याह आत्मवान् आत्मा परमात्मा ध्येयत्वेन योगक्षेमादिनिर्वाहकत्वेन च वर्तते यस्य स आत्मवान्। सर्वकामनापरित्यागेन परमेश्वरमाराधयतो मम सएव देहयात्रामात्रमपेक्षितं संपादयिष्यतीति निश्चित्य निश्चिन्तो भवेत्यर्थः। आत्मवानप्रमत्तो भवेति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.45।।कस्य तर्हि समाधौ बुद्धिर्भवतीत्यत आह  त्रैगुण्येति।  त्रैगुण्यं गुणत्रयकार्यमूर्ध्वमध्याधोगतिरूपं संसरणं तदेव प्रकाश्यत्वेन विषयो येषां तादृशाः कर्मकाण्डपरा वेदाः। त्वं तु निस्त्रैगुण्यो भव। ऊर्ध्वगतावपि विरक्तो भवेत्यर्थः। वक्ष्यति च तत्तद्गुणप्रधानं गतित्रयंऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्वस्था इति। दिव्येभ्योऽपि विषयेभ्यो विरक्तः समाधावधिक्रियत इति भावः। किं लक्षणोऽसौ निस्त्रैगुण्य इत्यत आह  निर्द्वन्द्व इति।  सुखदुःखे मानापमानौ शत्रुमित्रे शीतोष्णे इत्यादीनि द्वन्द्वानि सप्रतिपक्षपदार्थरूपाणि तेभ्यो निर्गतो निर्द्वन्द्वः। सर्वत्र समबुद्धिरित्यर्थः। ननु बाधमानमुष्णादिकं कथं शीतादिवत्क्षन्तुं शक्यमत आह  नित्यसत्त्वस्थ इति।  नित्यं सर्वदा सत्त्वं धैर्यं सत्वगुणो वा तदाश्रितो भूत्वा। धीरो हि सर्वं सोढुं शक्तः सात्विको वा प्रारब्धकर्मोपस्थापितमिदं दुःखमपरिहार्यं किमु तप्ततयेति जानन् सर्वं सोढुं शक्नोत्येव। नन्वत्यन्तदुःसहं क्षुधादिदुःखं कथं निस्त्रैगुण्येन सर्वथा प्रवृत्तिशून्येन सोढुं शक्यमत आह  निर्योगक्षेम इति।  अप्राप्तस्य प्राप्तिर्योगः। प्राप्तस्य संरक्षणं क्षेमः। एतद्वयमपि प्रारब्धकर्माधीनमिति ततोऽपि निर्गत इत्यर्थः। तत्र हेतुः यत आत्मवाञ्जितचित्तः। सहि सर्वास्वप्यापत्स्वनाकुलो नित्यतृप्ततया निरुद्यमश्च भवतीति त्वमप्येतादृशो निस्त्रैगुण्यो भवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.45।।ननु ते त्वज्ञाः वेदोक्तविषये प्रवर्तन्ते परं स्वर्गादीनां फलाभावे वेदः कथं बोधयति इत्याशङ्क्याह त्रैगुण्यविषया वेदा इति। त्रैगुण्याः त्रिगुणसृष्टौ सृष्टा ये जीवास्तद्विषयास्तदर्थं स्वर्गादिफलककर्मबोधका वेदाः। न तु गुणातीतसाक्षाद्भगवत्क्रीडौपयिकभगवदीयसृष्ट्यन्तर्गतभगवद्भक्तविषया इत्यर्थः। भगवल्लीलासृष्टिस्तु निर्गुणा अत एवअन्यैव काचित्सा सृष्टिर्विधातुर्व्यतिरेकिणी इत्यादि श्रीवराहवचनम्। गुणातीतपुरुषोत्तमस्वरूपं तु वेदाद्यविषयमेव। अत एव श्रुतिराह नेति नेति बृ.उ.2।3।6 यतो वाचो निवर्त्तन्ते तै.उ.2।4।12।9।1 इत्यादि। यस्माद्वेदास्त्रिगुणविषयास्तस्मात् त्वं निस्त्रैगुण्यो भक्तो भवेत्यर्थः। निस्त्रिगुणस्य भावुको भवेति भावः। यद्वा वेदास्त्रैगुण्यविषयाः त्रिगुणात्मकस्वरूपफलप्रतिपादकाः न तु साक्षाद्भगवत्सम्बन्धप्रतिपादकाः। अतस्तथा बोधयन्तीत्यर्थः। ननु वेदास्त्रिगुणविषयाश्चेत्तदाऽस्माकमज्ञानानां का गतिरित्याशङ्क्याह निस्त्रैगुण्य इति। गुणातीतमद्धर्मैकपरो भवेति भावः। केन साधनेन तथात्वं भवेत् इत्याशङ्कायामाह निर्द्वन्द्व इति। निर्गतानि द्वन्द्वानि सुखदुःखाहम्ममेत्यादीनि तद्रहितो भव। सर्वं त्यक्त्वा भक्तिपरो भव। तथा त्वमपि कथं इत्याकाङ्क्षायामाह नित्यसत्त्वस्थ इति। नित्यं सत्त्वं यस्मात्तस्मिन् गुणातीते स्थितो भव। किञ्च निर्योगक्षेम इति। साधनासाध्यपरमाप्तवस्त्वभिलाषो योगः स्वेच्छाप्राप्तवस्तुन्याप्तज्ञानेन स्वीकारो क्षेमस्तद्रहित आत्मवान् आत्मज्ञानवान् भवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.45।।ननु च यदि स्वर्गादिकं परमं फलं न भवति तर्हि किमिति वेदैस्तत्साधनतया कर्माणि विधीयन्ते तत्राह  त्रैगुण्यविषया इति।  त्रिगुणात्मकाः सकामा येऽधिकारिणस्तद्विषयास्तेषां कर्मफलसंबन्धप्रतिपादका वेदाः। त्वं तु निस्त्रैगुण्यो निष्कामो भव। तत्रोपायमाह। निर्द्वन्द्वः सुखदुःखशीतोष्णादियुगुलानि द्वन्द्वानि तद्रहितो भव। तानि सहस्वेत्यर्थः। कथमित्यत्राह। नित्यसत्त्वस्थः सन्। धैर्यमवलम्ब्येत्यर्थः। तथा निर्योगक्षेमः। अप्राप्तस्वीकारो योगः प्राप्तपरिपालनं क्षेमं तद्रहितः। आत्मवानप्रमत्तः। नहि द्वन्द्वाकुलस्य योगक्षेमव्यापृतस्य च प्रमादिनस्त्रैगुण्यातिक्रमः संभवतीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.45।।स्वयमेव वेदतात्पर्यमाह भगवान् त्रैगुण्यविषया वेदा इति। यत एवं कामात्मनां त्रैगुण्याधिकारिणां त्रैगुण्यफलविषया वेदास्त्रिकाण्डविषया अपि अतस्त्वं वेदादिमूलानिस्त्रिगुणतत्त्वाश्रितो भव। त्रिगुणमाश्रितस्त्रैगुण्यस्तद्भिन्नो निस्त्रैगुण्यः। निस्त्रिगुणं मामाश्रितो भवेति गूढाभिप्रायः। तल्लिङ्गमाह निर्द्वन्द्व इत्यादि।त्रिदुःखसहनं धैर्यं इति नित्यं सत्वे धैर्ये स्थितःसत्त्वैकमनसो वृत्तिः इति वाक्यान्नित्यसत्त्वरूपभगवन्निष्ठो भवेति गूढाभिसन्धिः। स्वबलेन कृतमप्राप्तसम्पादनं योगः। प्राप्तपरिपालनं क्षेमः। योगश्च क्षेमश्च योगक्षेमौ तद्रहित इति योगानुरोधेनोक्तम्। वस्तुतस्तु सत्त्वैकमनसो भगवदीयस्य भक्तियोगानुसारेण भगवदधीनयोगक्षेमवत्त्वं सूच्यते निर्योगक्षेमशब्देन। एवमेवाग्रे वक्ष्यति। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् 9।22 इति। आत्मना मनो विद्यते यस्य वश इति तथा।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.45।।जो इस प्रकार विवेकबुद्धिसे रहित हैं उन कामपरायण पुरुषोंके वेद त्रैगुण्यविषयक हैं अर्थात् तीनों गुणोंके कार्यरूप संसारको ही प्रकाशित करनेवाले हैं। परंतु हे अर्जुन तू असंसारी हो निष्कामी हो। तथा निर्द्वन्द्व हो अर्थात् सुखदुःखके हेतु जो परस्पर विरोधी ( युग्म ) पदार्थ हैं उनका नाम द्वन्द्व है उनसे रहित हो और नित्य सत्त्वस्थ हो अर्थात् सदा सत्त्वगुणके आश्रित हो। तथा निर्योगक्षेम हो। अप्राप्त वस्तुको प्राप्त करनेका नाम योग है और प्राप्त वस्तुके रक्षणका नाम क्षेम है योगक्षेमको प्रधान माननेवालेकी कल्याणमार्गमें प्रवृत्ति होनी अत्यन्त कठिन है अतः तू योगक्षेमको न चाहनेवाला हो। तथा आत्मवान् हो अर्थात् ( आत्मविषयोंमें ) प्रमादरहित हो। तुझ स्वधर्मानुष्ठानमें लगे हुएके लिये यह उपदेश है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.45।। व्याख्या    त्रैगुण्यविषया वेदाः   यहाँ वेदोंसे तात्पर्य वेदोंके उस अंशसे है जिसमें तीनों गुणोंका और तीनों गुणोँके कार्य स्वर्गादि भोगभूमियोंका वर्णन है।यहाँ उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य वेदोंकी निन्दामें नहीं है प्रत्युत निष्कामभावकी महिमामें है। जैसे हीरेके वर्णनके साथसाथ काँचका वर्णन किया जाय तो उसका तात्पर्य काँचकी निन्दा करनेमें नहीं है प्रत्युत हीरेकी महिमा बतानेमें है। ऐसे ही यहाँ निष्कामभावकी महिमा बतानेके लिये ही वेदोंके सकामभावका वर्णन आया है निन्दाके लिये नहीं। वेद केवल तीनों गुणोंका कार्य संसारका ही वर्णन करनेवाले हैं ऐसी बात भी नहीं है। वेदोंमें परमात्मा और उनकी प्राप्तिके साधनोंका भी वर्णन हुआ है। निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन   हे अर्जुन तू तीनों गुणोंके कार्यरूप संसारकी इच्छाका त्याग करके असंसारी बन जा अर्थात् संसारसे ऊँचा उठ जा। निर्द्वन्द्वः  संसारसे ऊँचा उठनेके लिये रागद्वेष आदि द्वन्द्वोंसे रहित होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है क्योंकि ये ही वास्तवमें मनुष्यके शत्रु हैं अर्थात् उसको संसारमें फँसानेवाले हैं (गीता 3।34)  (टिप्पणी प0 81) । इसलिये तू सम्पूर्ण द्वन्द्वोंसे रहित हो जा।यहाँ भगवान् अर्जुनको निर्द्वन्द्व होनेकी आज्ञा क्यों दे रहे हैं कारण कि द्वन्द्वोंसे सम्मोह होता है संसारमें फँसावट होती है (गीता 7। 27)। जब साधक निर्द्वन्द्व होता है तभी वह दृढ़ होकर भजन कर सकता है (गीता 7। 28)। निर्द्वन्द्व होनेसे साधक सुखपूर्वक संसारबंधनसे मुक्त हो जाता है (गीता 5। 3)। निर्द्वन्द्व होनेसे मूढ़ता चली जाती है (गीता 15। 5)। निर्द्वन्द्व होनेसे साधक कर्म करता हुआ भी बँधता नहीं (गीता 4। 22)। तात्पर्य है कि साधककी साधना निर्द्वन्द्व होनेसे ही दृढ़ होती है। इसलिये भगवान् अर्जुनको निर्द्वन्द्व होनेकी आज्ञा देते हैं।दूसरी बात अगर संसारमें किसी भी वस्तु व्यक्ति आदिमें राग होगा तो दूसरी वस्तु व्यक्ति आदिमें द्वेष हो जायगा यह नियम है। ऐसा होनेपर भगवान्की उपेक्षा हो जायगी यह भी एक प्रकारका द्वेष है। परन्तु जब साधकका भगवान्में प्रेम हो जायगा तब संसारसे द्वेष नहीं होगा प्रत्युत संसारसे स्वाभाविक उपरति हो जायगी। उपरति होनेकी पहली अवस्था यह होगी कि साधकका प्रतिकूलतामें द्वेष नहीं होगा किन्तु उसकी उपेक्षा होगी। उपेक्षाके बाद उदासीनता होगी और उदासीनताके बाद उपरति होगी। उपरतिमें रागद्वेष सर्वथा मिट जाते हैं। इस क्रममें अगर सूक्ष्मतासे देखा जाय तो उपेक्षामें रागद्वेषके संस्कार रहते हैं उदासीनतामें रागद्वेषकी सत्ता रहती है और उपरतिमें रागद्वेषके न संस्कार रहते हैं न सत्ता रहती है किन्तु रागद्वेषका सर्वथा अभाव हो जाता है। नित्यसत्त्वस्थः   द्वन्द्वोंसे रहित होनेका उपाय यह है कि जो नित्यनिरन्तर रहनेवाला सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मा है तू उसीमें निरन्तर स्थित रह। निर्योगक्षेमः (टिप्पणी प0 82.1)   तू योग और क्षेमकी  (टिप्पणी प0 82.2)  इच्छा भी मत रख क्योंकि जो केवल मेरे परायण होते हैं उनके योगक्षेमका वहन मैं स्वयं करता हूँ (गीता 9। 22)। आत्मवान्   तू केवल परमात्माके परायण हो जा। एक परमात्मप्राप्तिका ही लक्ष्य रख। सम्बन्ध   तीनों गुणोंसे रहित निर्द्वन्द्व आदि हो जानेसे क्या होगा इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.43 2.45।।तथाच यामिमामित्यादि। ये कामाभिलाषिणः ते स्वयमेतां वाचं वेदात्मिकां पुष्पितां भविष्यत्स्वर्गफलेन ( N omit भविष्यत् S reads भविष्यता) व्याप्तां वदन्ति। अत एव जन्मनः कर्मैव फलमिच्छन्ति ते अविपश्चितः। ते च तयैव स्वयं कल्पितया वेदवाचा अपहृतचित्ताः व्यवसायबुद्धियुक्ता अपि न समाधियोग्याः तत्र फलनिश्चयत्वात्। इति श्लोकत्रयस्य तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.45।।अविवेकिनामपि वेदाभ्यासवतां विवेकबुद्धिरुदेष्यतीत्याशङ्क्याह  य एवमिति।  तर्हि वेदार्थतया कामात्मता प्रशस्तेत्याशङ्क्याह  निस्त्रैगुण्य इति।  भवेति पदं निर्द्वन्द्वादिविशेषणेष्वपि प्रत्येकं संबध्यते। त्रयाणां सत्त्वादीनां गुणानां पुण्यपापव्यामिश्रकर्मतत्फलसंबन्धलक्षणः समाहारस्त्रैगुण्यमित्यङ्गीकृत्य व्याचष्टे  संसार इति।  वेदशब्देनात्र कर्मकाण्डमेव गृह्यते तदभ्यासवतां तदर्थानुष्ठानद्वारा संसारध्रौव्यान्न विवेकावसरोऽस्तीत्यर्थः। तर्हि संसारपरिवर्जनार्थं विवेकसिद्धये किं कर्तव्यमित्याशङ्क्याह   त्वं त्विति।  कथं निस्त्रैगुण्यो भवेति गुणत्रयराहित्यं विधीयते नित्यसत्त्वस्थो भवेति वाक्यशेषविरोधादित्याशङ्क्याह  निष्काम   इति।  सप्रतिपक्षत्वं परस्परविरोधित्वं पदार्थौ शीतोष्णादिलक्षणौ। निष्कामत्वे द्वन्द्वान्निर्गतत्वं शीतोष्णादिसहिष्णुत्वं हेतुमुक्त्वा तत्रापि हेत्वपेक्षायां सदा सत्वगुणाश्रितत्वं हेतुमाह  नित्येति।  योगक्षेमव्यापृतचेतसो रजस्तमोभ्यामसंस्पृष्टे सत्त्वमात्रे समाश्रितत्वमशक्यमित्याशङ्क्याह  तथेति।  योगक्षेमयोर्जीवनहेतुतया पुरुषार्थसाधनत्वान्निर्योगक्षेमो भवेति कुतो विधिरित्याशङ्क्याह   योगेति।  योगक्षेमप्रधानत्वं सर्वस्य स्वारसिकमिति ततो निर्गमनमशक्यमित्याशङ्क्याह  आत्मवानिति।  अप्रमादो मनसो विषयपारवश्यशून्यत्वम्। अथ यथोक्तोपदेशस्य मुमुक्षुविषयत्वादर्जुनस्य मुमुक्षुत्वमिह विवक्षितमिति नेत्याह  एष इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.45।।यथैषा चतुश्श्लोकी न प्रतिज्ञातं योगमाह तथात्रैगुण्य इत्येतदपीतिप्रतीतिनिरासायाह  तामि ति प्रतिज्ञाताम्। आदिग्रहणेनाषष्ठसमाप्तेरिति सूचयति। सप्तमोपक्रमे पुनः प्रतिज्ञानात्। तर्हि प्रतिज्ञानन्तरमेव कुतो नावोचदिति मन्दाशङ्कानिरासायोक्तं  इतर दिति। स्वोक्तौ निष्ठाभावे कारणमेवमपोद्येदानीं प्रतिज्ञातमाह। अन्यथा तत्प्रबन्धेनास्यानवसरादिति भावः। अथवा वक्ष्यमाणानां वाक्यानां द्वेधावृत्तिमनेनाचष्टे। कैश्चिद्वाक्यैरितरद्योगविरुद्धमपोद्य कैश्चिद्योगमाहेति। यद्वाबहूनि मे व्यतीतानि 4।5 इत्यादि प्रासङ्गिकं विहायान्यद्योगविषयं ज्ञातव्यमित्यर्थः। तथा च वक्ष्यतिसाधनं प्राधान्येनोक्तम् इति। वेदास्त्रैगुण्यविषयाः त्वं तुनिस्त्रैगुण्यो भव इत्यनेन वेदपरित्यागो विधीयते इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे  वेदानामि ति। त्रिगुणसम्बन्धीत्यनेन तस्थेदमित्यर्थे तद्धितोऽयम्। विचित्रा हि तद्धितगतिरिति वचनादिति सूचयति। सम्बन्धि कार्यम्। प्रतीतितः आपाततः प्रतीतितः। अर्थः प्रतिपाद्यं प्रयोजनं च। वेदानां परोक्षार्थत्वं कुतः इत्यत आह  परोक्षे ति। यत एवं भवति अतः प्राप्तिसद्भावात्प्रसक्तां भ्रान्तिं माकार्षीः। कथमेतदनेन लभ्यते इत्यत आह  वाद  इति। वेदवादरता इत्यत्राप्येतदेव चाभिधानम्। प्रतीत एवार्थोऽस्तु इत्यत आह  नत्वि ति। पक्षः परमसिद्धान्तः। उत्तानार्थो वेदो निषिध्यत एव। योगविरोधित्वादित्यतः पक्ष इत्युक्तम्। कुत इत्यत आह   वेद  इति। धर्ममूलं धर्मज्ञप्तेः कारणम्। तद्विदां वेदविदां मन्वादीनां स्मृतिर्ग्रन्थः शीलं मनोगतिः आचारो धर्मबुद्ध्यानुष्ठानम् आत्मनो मनसो रुचिः। विकल्पविषये प्रणिहितो विहितः। तद्विपर्ययः प्रतिषिद्धः विवक्षितयोगविरोधे हि वेदे सिद्धान्तो निषेध्यः स्यात्। नचैवं प्रत्युत तदनुगुण एवेति भावः। धर्मशब्दोऽत्र निवृत्तिधर्मपरः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.45।।तां योगबुद्धिमाह त्रैगुण्यविषया इत्यादिना। इतरदपोद्य वेदानां परोक्षार्थत्वात्ित्रगुणसम्बन्धिस्वर्गादिप्रतीतितोऽर्थ इव भाति।परोक्षवादो वेदोऽयं इति ह्युक्तम्। अतः प्रातीतिकेऽर्थे भ्रान्तिं मा कुर्वित्यर्थः।वादो विषयकत्वं च मुखतोवचनं स्मृतम् इत्यभिधानात्। न तु वेदपक्षो निषिध्यते।वेदे रामायणे चैव पुराणे भारते तथा। आदावन्ते च मध्ये च विष्णुः सर्वत्र गीयते। सर्वे वेदा यत्पदम् कठो.2।15वेदोऽखिलो धर्ममूलं स्मृतिशीले च तद्विदाम्। आचारश्चैव साधूनामात्मनो रुचि(नस्तुष्टि) रेव च मनुः2।16वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः। भाग.6।1।40 इति वेदानां सर्वात्मना विष्णुपरत्वोक्तेस्तद्विहितस्य तद्विरुद्धस्य च धर्माधर्मोक्तेश्च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.45।।त्रयो गुणाः त्रैगुण्यं सत्त्वरजस्तमांसि सत्त्वरजस्तमःप्रचुराः पुरुषाः त्रैगुण्यशब्देन उच्यन्ते। तद्विषया वेदाः तमःप्रचुराणां रजःप्रचुराणां सत्त्वप्रचुराणां च वत्सलतरतया एव हितम् अवबोधयन्ति वेदाः।यदि एषां स्वगुणानुगुण्येन स्वर्गादिसाधनम् एव हितं न अवबोधयन्ति तदा एव ते रजस्तमःप्रचुरतया सात्त्विकफलमोक्षविमुखाः स्वापेक्षितफलसाधनम् अजानन्तः कामप्रावण्यविवशा अनुपायेषु उपायभ्रान्त्या प्रविष्टाः प्रणष्टा भवेयुः। अतः  त्रैगुण्यविषया वेदाः  त्वं तु  निस्त्रैगुण्यो  भव इदानीं सत्त्वप्रचुरः त्वं तदेव वर्धय नान्योन्यसंकीर्णगुणत्रयप्रचुरो भव। न तत्प्राचुर्यं वर्धय इत्यर्थः  निर्द्वन्द्वः  निर्गतसकलसांसारिकस्वभावः।  नित्यसत्त्वस्थः  गुणद्वयरहितनित्यप्रवृद्धसत्त्वस्थो भव।कथम् इति चेत्  निर्योगक्षेमः  आत्मस्वरूपतत्प्राप्त्युपायबहिर्भूतानाम् अर्थानां योगं प्राप्तानां च क्षेमं परिपालनं परित्यज्य  आत्मवान्  भव आत्मस्वरूपान्वेषणपरो भव। अप्राप्तस्य प्राप्तिः योगः प्राप्तस्य परिरक्षणं क्षेमः। एवं वर्तमानस्य ते रजस्तमः प्रचुरता नश्यति सत्त्वं च वर्धते।न च वेदोदितं सर्वं सर्वस्य उपादेयम्

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.45।।  त्रैगुण्यविषयाः  त्रैगुण्यं संसारो विषयः प्रकाशयितव्यः येषां ते  वेदाः  त्रैगुण्यविषयाः। त्वं तु  निस्त्रैगुण्यो भव अर्जुन  निष्कामो भव इत्यर्थः।  निर्द्वन्द्वः  सुखदुःखहेतू सप्रतिपक्षौ पदार्थौ द्वन्द्वशब्दवाच्यौ ततः निर्गतः निर्द्वन्द्वो भव।  नित्यसत्त्वस्थः  सदा सत्त्वगुणाश्रितो भव। तथा  निर्योगक्षेमः  अनुपात्तस्य उपादानं योगः उपात्तस्य रक्षणं क्षेमः योगक्षेमप्रधानस्य श्रेयसि प्रवृत्तिर्दुष्करा इत्यतः निर्योगक्षेमो भव।  आत्मवान्  अप्रमत्तश्च भव। एष तव उपदेशः स्वधर्ममनुतिष्ठतः।।सर्वेषु वेदोक्तेषु कर्मसु यान्युक्तान्यनन्तानि फलानि तानि नापेक्ष्यन्ते चेत् किमर्थं तानि ईश्वरायेत्यनुष्ठीयन्ते इत्युच्यते श्रृणु

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【 Verse 2.46 】

▸ Sanskrit Sloka: यावानर्थ उदपाने सर्वत: सम्प्लुतोदके | तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानत: ||

▸ Transliteration: yāvānartha udapāne sarvataḥ saṁplutodake | tāvānsarveṣu vedeṣu brāhmaṇasya vijānataḥ ||

▸ Glossary: yāvān: how much; arthaḥ: means; udapāne: in a well of water; sarvataḥ: on all sides; saṁplutodake: in a great reservoir of water; tāvān: that much; sarveṣu: in all; vedeṣu: in the Veda; brāhmaṇasya: of the man who knows the supreme Brahman; vijānataḥ: of one who has achieved enlightenment

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.46 The Brāhmaṇa (sage), who has known the Self, has little use for the vedic scriptures, as these are like a pool of water in a place that is already in flood, overflowing with a great water reservoir.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.15।।हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन सुखदुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथा नहीं पहुँचाते वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.46।। सब ओर से परिपूर्ण जलराशि के होने पर मनुष्य का छोटे जलाशय में जितना प्रयोजन रहता है? आत्मज्ञानी ब्राह्मण का सभी वेदों में उतना ही प्रयोजन रहता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.46 यावान् as much? अर्थः use? उदपाने in a reservoir? सर्वतः everywhere? संप्लुतोदके being flooded? तावान्,so much (use)? सर्वेषु in all? वेदेषु in the Vedas? ब्राह्मणस्य of the Brahmana? विजानतः of the knowing.Commentary Only for a sage who has realised the Self? the Vedas are of no use? because he is in possession of the infinite knowledge of the Self. This does not? however? mean that the Vedas are useless. They are useful for the neophytes or the aspirants who have just started on the spiritual path.All the transient pleasures derivable from the proper performance of all actions enjoined in the Vedas are comprehended in the infinite bliss of Selfknowledge.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.46. What portion in a reservoir, flooded with water everywhere, is useful [for a man in thirst], that much portion [alone] in all the Vedas is useful for an intelligent student of the Vedas.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.46 As a man can drink water from any side of a full tank, so the skilled theologian can wrest from any scripture that which will serve his purpose.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.46 What use a thirsty person has for a water reservoir when all sides of it are flooded - that much alone is the use of all the Vedas for a Brahmana who knows.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.46 A Brahmana with realization has that much utility in all the Vedas as a man has in a well when there is a flood all around.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.46 To the Brahmana who has known the Self, all the Vedas are of as much use as is a reservoir of water in a place where there is a flood.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.46 Yavan etc. He, according to whom the importance lies in his own duty alone or in the knowledge - for him the purpose is served even from a limited portion of the Vedic teaching Therefore-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.46 Whatever use, a thirsty person has for a reservoir, which is flooded with water on all sides and which has been constructed for all kinds of purposes like irrigation, only to that extent of it, i.e., enough to drink will be of use to the thirsty person and not all the water. Likewise, whatever in all the Vedas from the means for release to a knowing Brahmana, i.e., one who is established in the study of the Vedas and who aspires for release only to that extent is it to be accepted by him and not anything else.

Sri Krsna now says that this much alone is to be accepted by an aspirant, established in Sattva:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.46 If there be no need for the infinite results of all the rites and duties mentioned in the Vedas, then why should they be performed as a dedication to God? Listen to the answer being given: In the world, yavan, whatever; arthah, utility, use, like bathing, drinking, etc.; one has udapane, in a well, pond and other numerous limited reservoirs; all that, indeed, is achieved, i.e. all those needs are fulfilled to that very extent; sampluhtodake, when there is a flood; sarvatah, all arount. In a similar manner, whatever utility, result of action, there is sarvesu, in all; the vedesu, Vedas, i.e. in the rites and duties mentioned in the Vedas; all that utility is achieved, i.e. gets fulfilled; tavan, to that very extent; in that result of realization which comes brahmanasya, to a Brahmana, a sannyasin; vijanatah, who knows the Reality that is the supreme Goal that result being comparable to the flood all around. For there is the Upanisadic text, '৷৷.so all virtuous deeds performed by people get included in this one৷৷.who knows what he (Raikva) knows৷৷.' (Ch. 4.1.4). The Lord also will say, 'all actions in their totality culminate in Knowledge' (4.33). [The Commentators otation from the Ch. relates to meditation on the alified Brahman. Lest it be concluded that the present verse relates to knowledge of the alified Brahman only, he otes again from the Gita toshow that the conclusion holds good in the case of knowledge of the absolute Brahman as well.] Therefore, before one attains the fitness for steadfastness in Knowledge, rites and duties, even though they have (limited) utility as that of a well, pond, etc., have to be undertaken by one who is fit for rites and duties.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.46।। जलराशि का जो सुन्दर दृष्टान्त यहाँ दिया गया है वह सन्दर्भ को देखते हुये अत्यन्त समीचीन है। भीषण गर्मियों के दिनों में सरिताओं के सूख जाने पर समीप के किसी कुएँ से ही जल लेने लोगों को जाना पड़ता है। यद्यपि पैरों के नीचे पृथ्वी के गर्भ में जल स्रोत रहता है परन्तु वह उपयोग के लिये उपलब्ध नहीं होता। वर्षा ऋतु में सर्वत्र नदियों में बाढ़ आने पर छोटेछोटे जलाशय उसी में समा जाते हैं और तब उनका अलग से न अस्तित्व होता है और न प्रयोजन।उसी प्रकार जब तक मनुष्य अपने आनन्दस्वरूप को पहचानता नहीं तब तक मोहवश विषयों में ही वह सुख खोजा करता है। उस समय वेद अर्थात् कर्मकाण्ड उसे अत्यन्त उपयोगी प्रतीत होते हैं क्योंकि उसमें स्वर्गादि सुख पाने के अनेक साधन बताये गये हैं। परन्तु जब एक जिज्ञासु साधक उपनिषद् प्रतिपादित आनन्दस्वरूप आत्मा का अपरोक्ष रूप से ज्ञान प्राप्त कर लेता है तब उसे कर्मकान्ड में कोई प्रयोजन नहीं रह जाता। उपभोगजन्य सभी छोटेछोटे सुख उसके आनन्दस्वरूप में ही समाविष्ट होते हैं।इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि व्यास जी द्वारा यहाँ वेदों के कर्मकाण्ड की निन्दा की गयी है। जो अविवेकी लोग साधन को ही साध्य समझ लेते हैं और अनन्त की प्राप्ति की आशा अनित्य कर्मों के द्वारा करते हैं गोपाल कृष्ण उनको इस प्रकार से प्रताड़ित कर रहे हैं फलासक्ति न रखकर किये गये कर्मों से मनुष्य का व्यक्तित्व विकसित होता है और ऐसे शुद्ध अन्तकरण वाले मनुष्य को अनन्त असीम आत्मतत्त्व का अनुभव सहज सुलभ हो जाता है। तत्पश्चात् उसे अनित्य सुखों का कोई आकर्षण नहीं रह जाता।वेद हमें अपने ही शुद्ध चैतन्यस्वरूप का बोध कराते हैं। जब तक अविद्यायुक्त अहंकार का अस्तित्व है तब तक वेदाध्ययन की आवश्यकता अपरिहार्य है। आत्मबोध के होने पर उस ज्ञानी पुरुष के कारण वेदों का भी प्रामाण्य सिद्ध होता है। गणित की सर्वोच्च शिक्षा प्राप्त कर लेने पर उस व्यक्ति को पहाड़े रटने की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती क्योंकि उसके पूर्ण ज्ञान में इस प्रारम्भिक ज्ञान का समावेश रहता है। जहाँ तक तुम्हारा सम्बन्ध है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.46।।   ननु वेदोक्तकर्मफलाकाङ्क्षा नापेक्षिता चेदीश्वरार्थमपि कर्म किमर्थमनुष्ठेयमित्याशङ्क्य फलाकाङ्क्षया कर्मानुष्ठातुरनेकानर्थसंभावना फलाभिसंधिरहितस्य तस्य तु ज्ञानप्राप्त्या सर्वकर्मफलानां यस्मिन्ब्रह्मसुखेऽन्तर्भावः तत्प्राप्तिः समस्तानर्थनिवृत्तिश्च भवतीत्याशयेनाह  यावानिति।  यथा लोके उदपाने कूपाद्यनेकस्मिन्स्वल्पे क्वचिद्धस्तादिप्रक्षालनं क्वचित्स्नानं क्वचित्पानमित्यादिर्यावानर्थ यावत्परिमाणं प्रयोजनं स सर्वाथस्तावत्परिमाण एव सर्वतःसंप्लुतोदके परिपूर्णोदके भवति। तत्रान्तर्भव्रतीत्यर्थः। तथा यावनार्थः फलं वेदेषु वेदबोधितेषु कर्मसु तावानर्थो ब्राह्मणस्य परमार्थतत्त्वं विजानतः संभवति सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीये ज्ञानफले ब्रह्मणि सर्वेषां फलानामन्तर्भावात्।एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति श्रुतेः। ब्राह्मणग्रहणं ब्रह्मविद्यायां ब्राह्मणस्य मुख्याधिकारसूचनार्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.46।।न चैवं शङ्कनीयं सर्वकामनापरित्यागेन कर्म कुर्वन्नहं तैस्तैः कर्मजनितैरानन्दैर्वञ्चितः स्यामिति। यस्मात् उदपाने क्षुद्रजलाशये। जातावेकवचनम्। यावानर्थः यावत्स्नानपानादिप्रयोजनं भवति सर्वतःसंप्लुतोदके महति जलाशये तावानर्थो भवत्येव। यथाहि पर्वतनिर्झराः सर्वतः स्रवन्तः क्वचिदुपत्यकायामेकत्र मिलन्ति तत्र प्रत्येकं जायमानमुदकप्रयोजनं समुदिते सुतरां भवति सर्वेषां निर्झराणामेकत्रैव कासारेऽन्तर्भावात् एवं सर्वेषु वेदेषु वेदोक्तेषु काम्यकर्मसु यावानर्थो हैरण्यगर्भानन्दपर्यन्तस्तावान्विजानतो ब्रह्मतत्त्वं साक्षात्कृतवतो ब्राह्मणस्य ब्रह्मबुभूषोर्भवत्येव। क्षुद्रानन्दानां ब्रह्मानन्दांशत्वात्तत्र क्षुद्रानन्दानामन्तर्भावात्एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति श्रुतेः। एकस्याप्यानन्दस्याविद्याकल्पिततत्तदुपाधिपरिच्छेदमादायांशांशिवद्व्यपदेश आकाशस्येव घटाद्यवच्छेदकल्पनया। तथाच निष्कामकर्मभिः शुद्धान्तःकरणस्य तवात्मज्ञानोदये परब्रह्मानन्दप्राप्तिः स्यात्तयैव च सर्वानन्दप्राप्तौ न क्षुद्रानन्दप्राप्तिनिबन्धनवैय्यग्र्यावकाशः। अतः परमानन्दप्रापकाय तत्त्वज्ञानाय निष्कामकर्माणि कुर्वित्यभिप्रायः। अत्र यथातथाभवतीति पदत्रयाध्याहारो यावान्तावानिति पदद्वयानुषङ्गश्च दार्ष्टान्तिके द्रष्टव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.46।।नन्वात्मवत्त्वं चित्तशुद्धौ सत्यामेव भवति सा च सकलवेदोक्तकर्मानुष्ठानसाध्या अतो निस्त्रैगुण्यत्वं दुर्लभमित्याशङ्क्याह  यावानिति।  सर्वतः संप्लुतोदके महति उदपाने जलाशये पुरुषस्य यावान् अर्थो यावत्स्नानपानादिकं प्रयोजनं घटमात्रजलनिर्वर्त्यं भवति न कृत्स्नजलाशयव्ययनिर्वर्त्यं तावानेवार्थो विजानतो व्युत्पन्नचित्तस्य ब्राह्मणस्य ब्रह्मबुभूषोः सर्वेषु वेदेषु वेदैकदेशोपनिषच्छ्रवणमात्रनिर्वर्त्यो भवति न कृत्स्नवेदार्थानुष्ठानं स्वसिद्ध्यर्थमपेक्षते। एकेन जन्मना कृत्स्नवेदार्थानुष्ठानासंभवात्। ऐहिकेन जन्मान्तरीयेण वा जपादिना चित्तशुद्धौ सत्यामुपनिषच्छ्रवणान्निस्त्रैगुण्यता संभवतीति भावः। वृद्धास्तु सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीये आत्मज्ञाने पुरुषस्य तावानर्थः कृत्स्नोऽपि भवति यावाननेककूपरूपोदपानस्थानीयेषु सकलवेदोक्तकर्मस्वनुष्ठितेषु भवति ब्रह्मानन्दे क्षुद्रानन्दानामन्तर्भावात्। तथा च श्रुतिर्ज्ञाने सर्वकर्मफलान्तर्भावं दर्शयति।यथा कृतायविजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेवैनं सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद इति। वक्ष्यति चसर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते इति। गङ्गातुल्यज्ञानोदयात्प्रागेव कूपोपमानि कर्माणि कर्तव्यानीति भाव इति व्याचख्युः। अस्मिन्पक्षे पूर्वार्धे अनेकस्मिन् यथातथाभवतीति पदचतुष्टयाध्याहारः यावान्तावान्पदयोरनुषङ्गश्च दार्ष्टान्तिके द्रष्टव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.46।।नन्वेवं वेदोक्ताकरणे कथं फलसिद्धिः स्यात् इत्याशङ्कायामाह यावानिति। उदपाने उदकं पीयतेऽस्मिन्नित्युदपानं जलपात्रं तस्मिन् यावानर्थः। सर्वतः सम्प्लुतोदके तडागे च भवति परं तत्र जलाहरणपात्ररक्षणादिक्लेशोऽधिकः। तथा यावानर्थो वेदोक्तकर्मफलं वेदेषु भवति तावान् विजानतो ब्रह्मस्वरूपविदुषो ब्राह्मणस्य ब्रह्मैकनिष्ठस्य भवतीत्यर्थः। नैवं च श्रुतिविरोधः। अत एव श्रुतिराह आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान् तै.उ.2।4।1 तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति श्वे.उ.3।86।15।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.46।।ननु वेदोक्तनानाफलपरित्यागेन निष्कामतयेश्वराराधनविषया व्यवसायात्मिका बुद्धिस्तु कुबुद्धिरेवेत्याशङ्क्याह  यावानिति।  उदकं पीयतेऽस्मिन्नित्युदपानं वापीकूपतडागादि तस्मिन्स्वल्पोदके एकत्र कृत्स्नस्यार्थस्याभावात्तत्र परिभ्रमणेन विभागशो यावान्स्नानपानादिरर्थः प्रयोजनं भवति तावान्सर्वोऽप्यर्थः सर्वतःसंप्लुतोदके महाह्रदे एकत्रैव यथा भवति।।एवं यावान्सर्वेषु वेदेषु तत्तकर्मफलरूपोऽर्थस्तावान्सर्वोऽपि विजानतो व्यवसायात्मिकबुद्धियुक्तस्य ब्राह्मणस्य ब्रह्मनिष्ठस्य भवत्येव। ब्रह्मानन्दे क्षुद्रानन्दानामन्तर्भूतत्वात्एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति श्रुतेः। तस्मादियमेव बुद्धिः सुबुद्धिरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.46।।न चोक्तरूपं वेदोदितं सर्वं सगुणस्यागुणस्य सर्वस्योपादेयं युगपत् किन्तु यावदर्थमित्याह निदर्शनेन यावानर्थ इति। सर्वार्थपरिकल्पके सर्वतः सम्प्लुतोदके च निम्नजले उदपाने उदन्वति सरसि पिपासादिमतो यावानर्थः यावदेव प्रयोजनं तावदेव तेन तेनोपादीयते न सर्वं एवं सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य वेदाधिकृतस्य तदर्थं विवेकेन जानतो योगिनो यदेवात्मसंसिद्धिसाधनं तदेवोपादेयं न सर्वम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.46।।सम्पूर्ण वेदोक्त कर्मोंके जो अनन्त फल हैं उन फलोंको यदि कोई न चाहता हो तो वह उन कर्मोंका अनुष्ठान ईश्वरके लिये क्यों करे इसपर कहते हैं सुन जैसे जगत्में कूप तालाब आदि अनेक छोटेछोटे जलाशयोंमें जितना स्नानपान आदि प्रयोजन सिद्ध होता है वह सब प्रयोजन सब ओरसे परिपूर्ण महान् जलाशयमें उतने ही परिमाणमें ( अनायास ) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उनका अन्तर्भाव है। इसी तरह सम्पूर्ण वेदोंमें यानी वेदोक्त कर्मोंसे जो प्रयोजन सिद्ध होता है अर्थात् जो कुछ उन कर्मोंका फल मिलता है वह समस्त प्रयोजन परमार्थतत्त्वको जाननेवाले ब्राह्मणका यानी संन्यासीका जो सब ओरसे परिपूर्ण महान् जलाशयस्थानीय विज्ञान आनन्दरूप फल है उसमें उतने ही परिमाणमें ( अनायास ) सिद्ध हो जाता है। अर्थात् उसमें उसका अन्तर्भाव है। श्रुतिमें भी कहा है कि जिसको वह ( रैक्व ) जानता है उस ( परब्रह्म ) को जो भी कोई जानता है वह उन सबके फलको पा जाता है कि जो कुछ प्रजा अच्छा कार्य करती है। आगे गीतामें भी कहेंगे कि सम्पूर्ण कर्म ज्ञानमें समाप्त हो जाते हैं। इत्यादि। सुतरां यद्यपि कूप तालाब आदि छोटे जलाशयोंकी भाँति कर्म अल्प फल देनेवाले हैं तो भी ज्ञाननिष्ठाका अधिकार मिलनेसे पहलेपहले कर्माधिकारीको कर्म करना चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.46।। व्याख्या    यावनार्थ उदपाने सर्वतः सम्प्लुतोदके   जलसे सर्वथा परिपूर्ण स्वच्छ निर्मल महान् सरोवरके प्राप्त होनेपर मनुष्यको छोटेछोटे जलाशयोंकी कुछ भी आवश्यकता नहीं रहती। कारण कि छोटेसे जलाशयमें अगर हाथपैर धोये जायँ तो उसमें मिट्टी घुल जानेसे वह जल स्नानके लायक नहीं रहता और अगर उसमें स्नान किया जाय तो वह जल कपड़े धोनेके लायक नहीं रहता और यदि उसमें कपड़े धोये जायँ तो वह जल पीनेके लायक नहीं रहता। परन्तु महान् सरोवरके मिलनेपर उसमें सब कुछ करनेपर भी उसमें कुछ भी फरकनहीं पड़ता अर्थात् उसकी स्वच्छता निर्मलता पवित्रता वैसीकीवैसी ही बनी रहती है। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः   ऐसे ही जो महापुरुष परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो गये हैं उनके लिये वेदोंमें कहे हुए यज्ञ दान तप तीर्थ व्रत आदि जितने भी पुण्यकारी कार्य हैं उन सबसे उनका कोई मतलब नहीं रहता अर्थात् वे पुण्यकारी कार्य उनके लिये छोटेछोटे जलाशयोंकी तरह हो जाते हैं। ऐसा ही दृष्टान्त आगे सत्तरवें श्लोकमें दिया है कि वह ज्ञानी महात्मा समुद्रकी तरह गम्भीर होता है। उसके सामने कितने ही भोग आ जायँ पर वे उसमें कुछ भी विकृति पैदा नहीं कर सकते।जो परमात्मतत्त्वको जाननेवाला है और वेदों तथा शास्त्रोंके तत्त्वको भी जाननेवाला है उस महापुरुषको यहाँ  ब्राह्मणस्य विजानतः  पदोंसे कहा गया है। तावान्  कहनेका तात्पर्य है कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर वह तीनों गुणोंसे रहित हो जाता है। वह निर्द्वन्द्व हो जाता है अर्थात् उसमें रागद्वेष आदि नहीं रहते। वह नित्य तत्त्वमें स्थित हो जाता है। वह निर्योगक्षेम हो जाता है अर्थात् कोई वस्तु मिल जाय और मिली हुई वस्तुकी रक्षा होती रहे ऐसा उसमें भाव भी नहीं होता। वह सदा ही परमात्मपरायण रहता है। सम्बन्ध   भगवान्ने उन्तालीसवें श्लोकमें जिस समबुद्धि(समता) को सुननेके लिये अर्जुनको आज्ञा दी थी अब आगेके श्लोकमें उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.46।।अत एव च त्रैगुण्येति। वेदास्त्रैगुण्येन करणेन ( N कारणेन) विशेषेण सिन्वन्ति बध्नन्ति (N बध्नन्तीति) न ( N omit न तु) तु स्वयं बन्धका यस्मात् सुखदुःखमोहबुद्ध्या कर्माणि वैदिकानि क्रियमाणानि बन्धकानि अतः त्रैगुण्यं कामरूपं त्याज्यम्। यदि तु वेददूषणपरमेतदभविष्यत् प्रकृतं युद्धकरणं व्यघटिष्यत वेदादन्यस्य स्वधर्मनिश्चायकत्वाभावात्। येषां तु फलाभिलाषो विगलितः तेषां न वेदाः बन्धकाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.46।।ईश्वरार्पणधिया स्वधर्मानुष्ठानेऽपि फलकामनाभावाद्वैफल्यं योगमार्गस्येति मन्वानः शङ्कते  सर्वेष्विति।  कर्ममार्गस्य फलवत्त्वं प्रतिजानीते  उच्यत इति।  किं तत्फलमित्युक्ते तद्विषयं श्लोकमवतारयति  शृण्विति।  यथोपदाने कूपादौ परिच्छिन्नोदके स्नानाचमनादिर्योऽर्थो यावानुत्पद्यते स तावानपरिच्छिन्ने सर्वतः संप्लुतोदके समुद्रेऽन्तर्भवति परिच्छिन्नोदकानामपरिच्छिन्नोदकांशत्वात्। तथा सर्वेषु वेदोक्तेषु कर्मसु यावानर्थो विषयविशेषोपरक्तः सुखविशेषो जायते स तावानात्मविदः स्वरूपभूते सुखेऽन्तर्भवति परिच्छिन्नानन्दानामपरिच्छिन्नानन्दान्तर्भावाभ्युपगमात्एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति श्रुतेः। तथा चापरिच्छिन्नात्मानन्दप्राप्तिपर्यवसायिनो योगमार्गस्य नास्ति वैफल्यमित्याह  यावानिति।  उक्तमर्थमक्षरयोजनया प्रकटयति  यथेति।  उदकं पीयतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्या कूपादिपरिच्छिन्नोदकविषयत्वमुदपानशब्दस्य दर्शयति  कूपेति।  कूपादिगतस्याभिधेयस्य समुद्रेऽन्तर्भावासंभवात्कथमिदमित्याशङ्क्यार्थशब्दस्य प्रयोजनविषयत्वं व्युत्पादयति  फलमिति।  यत्फलत्वेन लीयते तत्फलमित्युच्यते तत्कथं तडागादिकृतं स्नानपानादि तथेत्याशङ्क्य तस्याल्पीयसो नाशोपपत्तेरित्याह  प्रयोजनमिति।  तडागादिप्रयुक्तप्रयोजनस्य समुद्रनिमित्तप्रयोजनमात्रत्वप्रयुक्तान्यस्यान्यात्मत्वानुपपत्तेरित्याशङ्क्याह  तत्रेति।  घटाकाशादेरिव महाकाशे परिच्छिन्नोदककार्यस्यापरिच्छिन्नोदककार्यान्तर्भावः संभवति तत्प्राप्तावितरापेक्षाभावादित्यर्थः। पूर्वार्धं दृष्टान्तभूतमेवं व्याख्याय दार्ष्टान्तिकमुत्तरार्धं व्याकरोति  एवमित्यादिना।  कर्मसु योऽर्थ इत्युक्तं व्यनक्ति  यत्कर्मफलमिति।  सोऽर्थो विजानतो ब्राह्मणस्य योऽर्थस्तावानेव संपद्यत इति संबन्धः। तदेव स्पष्टयति  विज्ञानेति।  तस्मिन्नन्तर्भवतीति शेषः। सर्वं कर्मफलं ज्ञानफलेऽन्तर्भवतीत्यत्र प्रमाणमाह  सर्वमिति।  यत्किमपि प्रजाः साधु कर्म कुर्वन्ति तत्सर्वं स पुरुषोऽभिसमेति प्राप्नोति यः पुरुषस्तद्वेद विजानाति यद्वस्तु स रैक्वो वेद तद्वेद्यमिति श्रुतेरर्थः। कर्मफलस्य सगुणज्ञानफलेऽन्तर्भावः संवर्गविद्यायां श्रूयते कथमेतावता निर्गुणज्ञानफले कर्मफलान्तर्भावः संभवतीत्याशङ्क्याह  सर्वमिति।  तर्हि ज्ञाननिष्ठैव कर्तव्या तावतैव कर्मफलस्य लब्धतया कर्मानुष्ठानानपेक्षणादित्याशङ्क्याह  तस्मादिति।  योगमार्गस्य निष्फलत्वाभावस्तच्छब्दार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.46।।योगोपदेशप्रसङ्गे ज्ञानफलकथनस्य क उपयोगः इत्यत आह  तथापी ति।यामिमाम् 2।43 इत्यत्र काम्यकर्मिणां निन्दा कृतानिस्त्रैगुण्यो भव 2।45 इति च तत्त्यागो विहितः। तत्र प्रष्टव्यम् किन्निमित्तमेतदिति। ननूक्तं काम्यकर्मिणां समाध्यभावेन ज्ञानाभावान्मोक्षो न भवतीति। अत्रेदमुच्यते यद्यपि ज्ञानफलं काम्यकर्मिणां न भवति तथापि तन्निन्दादिकं नोपपद्यते। कुतः काम्यकर्मिणां फलं स्वर्गादिकं ज्ञानिनां न भवति इति ज्ञानकर्मणोः साम्यमेवेति योगानुष्ठाननियमाक्षेपे सतीत्याहेत्यर्थः। केचिदस्य श्लोकस्य कर्ममात्रत्यागो तात्पर्यमाहुः अपरे तु यत्कर्मसमुच्चितं ज्ञानं मोक्षसाधनं तत्कर्मपर एव वेदभागोऽधिगन्तव्यः न तु समस्तवेदाभ्यासेनायुः समापनीयमिति तन्निरासाय व्याचष्टे  यथे ति। सामर्थ्याद्यथैवंशब्दयोरध्याहारः। यावांस्तावानित्येतयोरावृत्तिश्च  सर्वेषु वेदे ष्विति। तदुक्तकाम्यकर्मिणामित्यर्थः। ब्राह्मणस्येति न क्षत्ित्रयादिव्यावृत्तिः शङ्क्येति भावेनाह  ब्रह्मे ति। वर्णविपर्ययो निरुक्तत्वात्। एवं तर्हि ब्राह्मणशब्दो मुक्तवाचीति स्यात् न च मुक्तस्य फलमस्तीत्यत आह  अपरोक्षे ति। तदुपपादयति  स ही ति। तर्हि विजानत इति पुनरुक्तिरिति चेत् न तस्य परोक्षज्ञानिवाचित्वात्। उभयग्रहणमनुपपन्नमित्यत आह  विजानत  इति। तस्यापरोक्षज्ञानस्य परोक्षज्ञानफलत्वम्। एतच्च स्वरूपकथनम्। यद्यपि ज्ञानिनः कर्मिणश्चान्योन्यफलाभावः तथापि ज्ञानिनः फलं महासमुद्रोदकमिव महत्त्वात्। कर्मिणां फलं तु कूपोदकमिवात्यन्ताल्पम्। अतस्तयोर्न साम्यम्। तथा चाल्पास्थिरकर्मनिन्दया महानन्तफलज्ञानसाधने योगे प्रेरणं युक्तमेवेति भावः। अपव्याख्यानं तूक्तवक्ष्यमाणन्यायनिरस्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.46।।तथापि काम्यकर्मिणां फलं ज्ञानिनां न भवतीति साम्यमेवेत्यत आह यावानर्थ इति। यथा यावानर्थः प्रयोजनमुदपाने कूपे भवति तावान्सर्वतः सम्प्लुतोदकेऽन्तर्भवत्येव। एवं सर्वेषु वेदेषु यत्फलं तद्विजानतोऽपि ज्ञानिनो ब्राह्मणस्य फलेऽन्तर्भवति। ब्रह्म अणतीति ब्राह्मणोऽपरोक्षज्ञानी। स हि ब्रह्म गच्छति। विजानत इति ज्ञानफलत्वं तस्य दर्शयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.46।।यथा सर्वार्थपरिकल्पिते  सर्वतः संप्लुतोदके उदपाने  पिपासोः  यावान् अर्थः  यावद् एव प्रयोजनं पानीयम् तावद् एव तेन उपादीयते न सर्वम् एवम्  सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः  वैदिकस्य मुमुक्षोः यदेव मोक्षसाधनं तद् एव उपादेयम् न अन्यत्।अतः सत्त्वस्थस्य मुमुक्षोः एतावद् एव उपादेयम् इत्याह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.46।। यथा लोके कूपतडागाद्यनेकस्मिन्  उदपाने  परिच्छिन्नोदके  यावान्  यावत्परिमाणः स्नानपानादिः  अर्थः  फलं प्रयोजनं स सर्वः अर्थः  सर्वतःसंप्लुतोदके ऽपि यः अर्थः तावानेव संपद्यते तत्र अन्तर्भवतीत्यर्थः। एवं  तावान्  तावत्परिमाण एव संपद्यते  सर्वेषु वेदेषु  वेदोक्तेषु कर्मसु यः अर्थः यत्कर्मफलं सः अर्थः  ब्राह्मणस्य  संन्यासिनः परमार्थतत्त्वं  विजानतो  यः अर्थः यत् विज्ञानफलं सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीयं तस्मिन् तावानेव संपद्यते तत्रैवान्तर्भवतीत्यर्थः। यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं  सर्वं तदभिसमेति यत् किञ्चित् प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद  इति श्रुतेः।  सर्वं कर्माखिलम्  इति च वक्ष्यति। तस्मात् प्राक् ज्ञाननिष्ठाधिकारप्राप्तेः कर्मण्यधिकृतेन कूपतडागाद्यर्थस्थानीयमपि कर्म कर्तव्यम्।।तव च

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【 Verse 2.47 】

▸ Sanskrit Sloka: कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन | मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ||

▸ Transliteration: karmaṇyevādhikāraste mā phaleṣu kadācana | mā karmaphalaheturbhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi ||

▸ Glossary: karmaṇi: in the duties; eva: only; adhikāraḥ: right; te: of you; mā: never; phaleṣu: in the fruits; kadācana: at any time; mā: do not; karma phala: in the result of action; hetuḥ: cause; bhūḥ: let be; mā: never; te: of you; saṅgaḥ: attachment; astu: be there; akarmaṇi: in inaction

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.47 You have a right only to work, but never to the fruits (outcome) of action. Never let the fruit of action be your motive; and never let your attachment be to inaction.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.47।।कर्तव्यकर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका

Chapter 2 (Part 27)

हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.47।। कर्म करने मात्र में तुम्हारा अधिकार है? फल में कभी नहीं। तुम कर्मफल के हेतु वाले मत होना और अकर्म में भी तुम्हारी आसक्ति न हो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.47 कर्मणि in work? एव only? अधिकारः right? ते thy? मा not? फलेषु in the fruits? कदाचन at any time? मा not? कर्मफलहेतुः भूः let not the fruits of action be thy motive? मा not? ते thy? सङ्गः attachment? अस्तु let (there) be? अकर्मणि in inaction.Commentary When you perform actions have no desire for the fruits thereof under any circumstances. If you thirst for the fruits of your actions? you will have to take birth again and again to enjoy them. Action done with expectation of fruits (rewards) brings bondage. If you do not thirst for them? you get purification of heart and you will get knowledge of the Self through purity of heart and through the knowledge of the Self you will be freed from the round of births and deaths.Neither let thy attachment be towards inaction thinking what is the use of doing actions when I cannot get any reward for themIn a broad sense Karma means action. It also means duty which one has to perform according to his caste or station of life. According to the followers of the Karma Kanda of the Vedas (the Mimamsakas) Karma means the rituals and sacrifices prescribed in the Vedas. It has a deep meaning also. It signifies the destiny or the storehouse of tendencies of a man which give rise to his future birth.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.47. Let your claim lie on action alone and never on the fruits; you should never be a cause for the fruits of action; let not your attachment be to inaction.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.47 But thou hast only the right to work, but none to the fruit thereof. Let not then the fruit of thy action be thy motive; nor yet be thou enamored of inaction.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.47 To work alone you have the right, and not to the fruits. Do not be impelled by the fruits of work. Nor have attachment to inaction.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.47 Your right is for action alone, never for the results. Do not become the agent of the results of action. May you not have any inclination for inaction.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.47 Thy right is to work only, but never with its fruits; let not the fruits of action be thy motive, nor let thy attachment be to inaction.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.47 Karmani etc. You should be concerned in the action alone, but not in the fruits of actions. But, if an action has been performed, then will not its fruit just inevitably befall [to the performer] ? No. It is not so. For, in that case, if you are covered with the dirt of desire for fruits, then you become a cuase for the fruit of action. What is prayed for is known to be the fruit; and it does not befall him who does not desire it. Thus, what attachment a person entertains with regard to the negation of action, that alone is like a firm seizure, and is of the nature of false conception, and hence it must be abandoned. Then what ?-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.47 As for obligatory, occasional and desiderative acts taught in the Vedas and associated with some result or other, you, an aspirant established in Sattva, have the right only to perform them: You have no right to the fruits known to be derived from such acts. Acts done with a desire for fruit bring about bondage. But acts done without an eye on fruits form My worship and become a means for release. Do not become an agent of acts with the idea of being the reaper of their fruits. Even when you, who are established in pure Sattva and are desrious of release, perform acts, you should not look upon yourself as the agent. Likewise, it is necessary to contemplate yourself as not being the cause of even appeasing hunger and such other bodily necessities. Later on it will be said that both of these, agency of action and desire for fruits, should be considered as belonging to Gunas, or in the alternative to Me who am the Lord of all. Thinking thus, do work. With regard to inaction, i.e., abstaining from performance of duties, as when you said, 'I will not fight,' let there be no attachment to such inaction in you. The meaning is let your interest be only in the discharge of such obligatory duties like this war in the manner described above.

Sri Krsna makes this clear in the following verse:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.47 Te, your; adhikarah, right; is karmani eva, for action alone, not for steadfastness in Knowledge. Even there, when you are engaged in action, you have ma kadacana, never, i.e. under no condition whatever; a right phalesu, for the results of action may you not have a hankering for the results of action. Whenever you have a hankering for the fruits of action, you will become the agent of aciring the results of action. Ma, do not; thus bhuh, become; karma-phalahetuh, the agent of aciring the results of action. For when one engages in action by being impelled by thirst for the results of action, then he does become the cause for the production of the results of action. Ma, may you not; astu, have; sangah, an inclination; akarmani, for inaction, thinking, 'If the results of work be not desired, what is the need of work which involves pain?'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.47।। वेद प्रतिपादित सिद्धान्त के अनुसार ईश्वरार्पण बुद्धि और निष्काम भाव से किये गये कर्म अन्तकरण को शुद्ध करते हैं। आत्मबोध के पूर्व चित्तशुद्धि होना अनिवार्य है। गीता में इसी सिद्धान्त की पुष्टि करते हुये विशद विवरण में वैयक्तिक और सामाजिक सभी कर्मों का समावेश कर लिया गया है जबकि वेदों में कर्म से तात्पर्य यज्ञयागादि धार्मिक विधियों से ही था।अपरिपक्व बुद्धि से तत्त्वज्ञान जैसा गम्भीर विषय समझ में नहीं आ सकता। पर्याप्त विचार किये बिना उपर्युक्त श्लोक का अर्थ असंभव ही प्रतीत होगा। अधिकसेअधिक कोई यह मान लेगा कि उस काल में दरिद्र को दरिद्र ही रखने में और धनवान को उन पर अत्याचार करने की धार्मिक अनुमति इस श्लोक में दी गयी हैं। केवल बौद्धिक विचार करने वाले व्यक्ति को फलासक्ति न रखकर कर्म करने का आदर्श अव्यावहारिक और असंभव प्रतीत होगा। परन्तु वही व्यक्ति अध्ययन के पश्चात् अपने कर्म क्षेत्र में इसका पालन करके देखे तो उसे यह ज्ञात होगा कि जीवन में वास्तविक सफलताओं को प्राप्त करने की यही एक मात्र कुंजी है।इसके पूर्व प्रेरणा का जीवन जीने की कला जो कर्मयोग के रूप में बतायी गयी थी उसी की शिक्षा यहाँ श्रीकृष्ण पुन अर्जुन को दे रहे हैं। अनुचित संकल्पविकल्प जीवन के विष हैं। जीवन में सभी असफलताओं का मूल मनस्थिरता के अभाव में निहित है जो सामान्यत भविष्य में संभाव्य हानि के भय की कल्पना मात्र का परिणाम होता है। हममें से अधिकांश लोग असफलता के भय से महान् कार्य को अपने हाथों में लेना ही स्वीकार नहीं करते और जो कोई थोड़े लोग ऐसा साहस करते भी हैं तो अल्पकाल के बाद निरुत्साहित होकर उस कार्य को अपूर्ण ही छोड़ देते हैं। इसका कारण एक ही हैमन की शक्ति का अपव्यय। इस अपव्यय के परिहार का एक मात्र उपाय है किसी श्रेष्ठ आदर्श के प्रति सब कर्मों का समर्पण। प्रेरणायुक्त इन कर्मों की परिसमाप्ति गौरवमयी सफलता मेंं ही होती है। यह कर्म का सनातन नियम है।भविष्य का निर्माण सदैव वर्तमान में होता है। आगामी कल की फसल आज के जोतने और बीज बोने पर निर्भर है। किन्तु भविष्य में सम्भावित फसल की हानि की कल्पना करके ही यदि कोई कृषक भूमि जोतने और बीजारोपण के अवसरों को वर्तमान समय में खो देता है तो यह निश्चित है कि भविष्य में उसे कोई फसल मिलने वाली नहीं। उन्नत भविष्य के लिए वर्तमान समय का उपयोग बुद्धिमत्तापूर्वक करना चाहिये। भूतकाल तो मृत है और भविष्य अभी अनुत्पन्न। वर्तमान में अकुशलता से कार्य करने पर व्यक्ति को भविष्य में किसी बड़ी सफलता की आशा नहीं करनी चाहिये।इस सुविदित और बोधगम्य मूलभूत सत्य को गीता की भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं कि यदि तुम सफलता चाहते हो तो ऐसे मन से प्रयत्न कभी नहीं करो जो फल प्राप्ति की चिन्ता एवं भय से बिखरा हुआ हो। यहाँ कर्मफल से शास्त्र का क्या तात्पर्य है इसे सूक्ष्म विचार से समझना आवश्यक और लाभप्रद होगा। सम्यक् विचार करने से यह ज्ञात होगा कि वास्तव में कर्मफल स्वयं कर्म से कोई भिन्न वस्तु नहीं है। वर्तमान में किया गया कर्म ही भविष्य में फल के रूप में प्रकट होता है। वास्तविकता यह है कि कर्म की समाप्ति अथवा पूर्णता उसके फल में ही है जो उससे भिन्न नहीं है। अत कर्मफल की चिन्ता करके उसी में डूबे रहने का अर्थ है शक्तिशाली गतिशील वर्तमान से पलायन करना और अनुत्पन्न भविष्य की कल्पना में बने रहना संक्षेप में भगवान् का आह्वान है कि मनुष्य को व्यर्थ की चिन्ताओं में प्राप्त समय को नहीं खोना चाहिये वरन् बुद्धिमत्तापूर्वक उसका सदुपयोग करना चाहिये। भविष्य का निर्माण अपने आप होगा और कर्मयोगी को प्राप्त होगी श्रेष्ठ आध्यात्मिक उन्नति।निष्कर्ष यह निकलता है कि अर्जुन के लिये इस युद्ध का प्रयोजन धर्म पालन जैसा श्रेष्ठ आदर्श है यह समझकर उसे अपनी पूरी योग्यता से कर्म में प्रवृत्त होना चाहिये। प्रेरणायुक्त कर्मों का सुफल अवश्य मिलेगा और उसके साथ ही चित्त शुद्धि के रूप में आध्यात्मिक फल भी प्राप्त होगा।एक सच्चा कर्मयोगी बनने के लिये इस श्लोक में चार नियम बताये गये हैं। जो यह समझता है कि (क) कर्म करने मात्र में मेरा अधिकार है (ख) कर्मफल की चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है (ग) किसी कर्म विशेष के एक निश्चित फल का आग्रह या उद्देश्य मन में नहीं होना चाहिये और (घ) इन सबका निष्कर्ष यह नहीं कि अकर्म में प्रीति हो वही व्यक्ति वास्तव में कर्मयोगी है। संक्षेप में इस उपदेश का प्रयोजन मनुष्य को चिन्ता मुक्त बनाकर कर्म करते हुये दैवी आनन्द में निमग्न रहकर जीना सिखाना है। कर्म करना ही उसके लिये सबसे बड़ा पुरस्कार और उपहार है श्रेष्ठ कर्म करने के सन्तोष और आनन्द में वह अपने आपको भूल जाता है। कर्म है साधन और आत्मानुभूति है साध्य।ईश्वर का स्मरण करते हुये सभी बाह्य चुनौतियों का तत्परता से सामना करते हुये मनुष्य सरलतापूर्वक शान्ति और वासना क्षय द्वारा चित्त की शुद्धि प्राप्त कर सकता है। जितनी अधिक मात्रा में चित्त में शुद्धि होगी उतनी ही अधिक आत्मानुभूति उसे सुलभ होगी।यदि कर्मफल की आसक्ति रखकर कर्म न करें तो फिर उन्हें कैसे करना चाहिये इसका उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.47।।   मम तर्हि क्वाधिकार इत्याकाङ्क्षायामाह  कर्मणीति।  कर्मण्येव नतु ज्ञाननिष्ठायामन्तःकरणशुद्य्धभावात् तत्रापि चित्तशुद्धिहेतौ फलाभिसंधिरहिते कर्मणि नतु बन्धनिमित्ते काम्ये इत्याह  मेति।  कदाचन कस्यांचितवस्थायामपि कर्मफलतृष्णा ते मास्तु। फलतृष्णया काम्ये तेऽधिकारो मास्त्विति यावत्। ननु तृष्णाभावेऽपि भोजनात्तृप्तिरिव कर्मणः फलं स्यादेवेति तत्राह  मा   कर्मेति।  मा कर्मफले हेतुर्भूः फलतृष्णया तदुत्पादको माभूः। कामनया कृतस्य कर्मणः पश्वादिफलदातृत्वनियमात्चित्रया यजेत पशुकामः इति श्रुतेः। यत्तु कर्मफलं प्रवृत्तिहेतुर्यस्येति तन्न। बहुव्रीह्यपेक्षया तत्पुरुषस्य लघुत्वात् दुःखरुपेण निष्फलेन कर्मणा किमिति ते कर्माकरणे सङ्ग आसक्तिर्माभूत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.47।।ननु निष्कामकर्मभिरात्मज्ञानं संपाद्य परमानन्दप्राप्तिः क्रियते चेदात्मज्ञानमेव तर्हि संपाद्यं किं बह्वायासैः कर्मभिर्बहिरङ्गसाधनभूतैरित्याशङ्क्याह ते तवाशुद्धान्तःकरणस्य तात्त्विकज्ञानोत्पत्त्ययोग्यस्य कर्मण्येवान्तःकरणशोधकेऽधिकारो मयेदं कर्तव्यमिति बोधोऽस्तु न ज्ञाननिष्ठारुपे वेदान्तवाक्यविचारादौ। कर्म च कुर्वतस्तव तत्फलेषु स्वर्गादिषु कदाचन कस्यांचिदप्यवस्थायां कर्मानुष्ठानात्प्रागूर्ध्वं तत्काले वाधिकारो मयेदं भोक्तव्यमिति बोधो मास्तु। ननु मयेदं भोक्तव्यमिति बुद्ध्यभावेऽपि कर्म स्वसामर्थ्यादेव फलं जनयिष्यतीति चेन्नेत्याह मा कर्मफलहेतुर्भूः फलकामनया हि कर्म कुर्वन्फलस्य हेतुरुत्पादको भवति। त्वं तु निष्कामः सन्कर्मफलहेतुर्माभूः। नहि निष्कामेन भगवदर्पणबुद्ध्या कृतं कर्म फलाय कल्पत इत्युक्तम्। फलाभावे किं कर्मणेत्यत आह मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि। यदि फलं नेष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेणेत्यकरणे तव प्रीतिर्माभूत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.47।।ननु ममाप्यौपनिषदात्मज्ञानार्थिनः शम एवेष्टस्तत्कथं मां युध्यस्वेति प्रेरयसीत्याशङ्क्याह  कर्मण्येवेति।  कर्मण्येवाधिकारो न ज्ञाननिष्ठायाम्। मा फलेषु सङ्गोऽस्त्वित्यपकृष्यते। कर्मफलं स्वर्गपश्वादिहेतुः कर्मसु प्रवर्तकं यस्य तादृशो मा भूः। अकर्मणि कर्माकरणेऽपि तव सङ्गो मास्तु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.47।।नन्वेवं चेत्तर्हि किमिति कर्मकरणोपदेशः इत्याशङ्क्याह कर्मण्येवाधिकारस्त इति। ते तव स्वपराह न्मभ() ज्ञानयुक्तस्य कर्मण्येव अधिकारः। अस्तीति शेषः। अत्रायं भावः यावत्पर्यन्तं स्वपरेति ज्ञान तावन्न कर्मत्यागः। अत एवतावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत यावता इत्याद्युक्तं श्रीभागवते 11।20।9़ ननु तर्हि पूर्वोक्तबाध इति चेत्तत्राह मा फलेषु इति। फलेषु तदुक्तेषु अधिकारो मनसि कामो मास्तु।कदाचनेति साधनदशायामपि। ननु कृतं कर्म कामाभावे स्वफलं करिष्यत्येव अज्ञानादपि भक्षणे विषवन्मृत्युमित्यत आह मा कर्मफलहेतुरिति। त्वं कर्मफलहेतुः कर्मफलभोगभोग्यदेहयुक्तो मा भूः। न भविष्यसीत्यर्थः। मदाज्ञयेति भावः। किञ्च ते अकर्मणि सकामकर्त्तरि सङ्गः सम्बन्धो मास्तु। एवं वरमेव ददामीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.47।।तर्हि सर्वकर्मफलानि परमेश्वराराधनादेव भविष्यन्तीत्यभिसंधाय प्रवर्तेत किं कर्मणेत्याशङ्क्य तद्वारयन्नाह  कर्मण्येवेति।  ते तव तत्त्वज्ञानार्थिनः कर्मण्येवाधिकारः। तत्फलेषु बन्धहेतुष्वधिकारः कामो मास्तु। ननु कर्मणि कृते तत्फलं स्यादेव भोजने कृते तृप्तिवदित्याशङ्क्याह। मा कर्मफलहेतुर्भूः कर्मफलं प्रवृत्तिहेतुर्यस्य तथाभूतो मा भूः। कामितस्यैव स्वर्गादेर्नियोज्यविशेषणत्वेन फलत्वादकामितं फलं न स्यादिति भावः। अतएव फलं बन्धकं भविष्यतीति भयादकर्मणि कर्माकरणेऽपि तव सङ्गो निष्ठा मास्तु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.47।।एवं सति मम वेदोदन्वति किमुपादेयमित्याकाङ्क्षायामाह कर्मण्येवाधिकारस्ते इति। कर्मैवोपादेयं तत्रैव तत्राधिकार इति। परन्तु तत्फलेषु मा कदाचनाधिकारोऽस्तु। उपदेशमुद्रामाह मा कर्मफलहेतुर्भूरिति। अकर्मणि च निषिद्धे परधर्मे सङ्गो मा तेऽस्तु।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.47।।तेरा कर्ममें ही अधिकार है ज्ञाननिष्ठामें नहीं। वहाँ ( कर्ममार्गमें ) कर्म करते हुए तेरा फलमें कभी अधिकार न हो अर्थात् तुझे किसी भी अवस्थामें कर्मफलकी इच्छा नहीं होनी चाहिये। यदि कर्मफलमें तेरी तृष्णा होगी तो तू कर्मफलप्राप्तिका कारण होगा। अतः इस प्रकार कर्मफलप्राप्तिका कारण तू मत बन। क्योंकि जब मनुष्य कर्मफलकी कामनासे प्रेरित होकर कर्ममें प्रवृत्त होता है तब वह कर्मफलरूप पुनर्जन्मका हेतु बन ही जाता है। यदि कर्मफलकी इच्छा न करें तो दुःखरूप कर्म करनेकी क्या आवश्यकता है इस प्रकार कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्तिप्रीति नहीं होनी चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.47।। व्याख्या    कर्मण्येवाधिकारस्ते   प्राप्त कर्तव्य कर्मका पालन करनेमें ही तेरा अधिकार है। इसमें तू स्वतन्त्र है। कारण कि मनुष्य कर्मयोनि है। मनुष्यके सिवाय दूसरी कोई भी योनि नया कर्म करनेके लिये नहीं है। पशुपक्षी आदि जङ्गम और वृक्ष लता आदि स्थावर प्राणी नया कर्म नहीं कर सकते। देवता आदिमें नया कर्म करनेकी सामर्थ्य तो है पर वे केवल पहले किये गये यज्ञ दान आदि शुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये ही हैं। वे भगवान्के विधानके अनुसार मनुष्योंके लिये कर्म करनेकी सामग्री दे सकते हैं पर केवल सुखभोगमें ही लिप्त रहनेके कारण स्वयं नया कर्म नहीं कर सकते। नारकीय जीव भी भोगयोनि होनेके कारण अपने दुष्कर्मोंका फल भोगते हैं नया कर्म नहीं कर सकते। नया कर्म करनेमें तो केवलमनुष्यका ही अधिकार है। भगवान्ने सेवारूप नया कर्म करके केवल अपना उद्धार करनेके लिये यह अन्तिम मनुष्यजन्म दिया है। अगर यह कर्मोंको अपने लिये करेगा तो बन्धनमें पड़ जायगा और अगर कर्मोंको न करके आलस्यप्रमादमें पड़ा रहेगा तो बारबार जन्मतामरता रहेगा। अतः भगवान् कहते हैं कि तेरा केवल सेवारूप कर्तव्यकर्म करनेमें ही अधिकार है। कर्मणि  पदमें एकवचन देनेका तात्पर्य है कि मनुष्यके सामने देश काल घटना परिस्थिति आदिको लेकर शास्त्रविहित कर्म तो अलगअलग होंगे पर एक समयमें एक मनुष्य किसी एक कर्मको ही तत्परतापूर्वक कर सकता है। जैसे क्षत्रिय होनेके कारण अर्जुनके लिये युद्ध करना दान देना आदि कर्तव्यकर्मोंका विधान है पर वर्तमानमें युद्धके समय वह एक युद्धरूप कर्तव्यकर्म ही कर सकता है दान आदि कर्तव्यकर्म नहीं कर सकता। मार्मिक बात मनुष्यशरीरमें दो बातें हैं पुराने कर्मोंका फलभोग और नया पुरुषार्थ। दूसरी योनियोंमें केवल पुराने कर्मोंका फलभोग है अर्थात् कीटपतंग पशुपक्षी देवता ब्रह्मलोकतककी योनियाँ भोगयोनियाँ हैं। इसलिये उनके लिये ऐसा करो और ऐसा मत करो यह विधान नहीं है। पशुपक्षी कीटपतंग आदि जो कुछ भी कर्म करते हैं उनका वह कर्म भी फलभोगमें है। कारण कि उनके द्वारा किया जानेवाला कर्म उनके प्रारब्धके अनुसार पहलेसे ही रचा हुआ है। उनके जीवनमें अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिका जो कुछ भोग होता है वह भोग भी फलभोगमें ही है। परन्तु मनुष्यशरीर तो केवल नये पुरुषार्थके लिये ही मिला है जिससे यह अपना उद्धार कर ले।इस मनुष्यशरीरमें दो विभाग हैं एक तो इसके सामने पुराने कर्मोंके फलरूपमें अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है और दूसरा यह नया पुरुषार्थ (नये कर्म) करता है। नये कर्मोंके अनुसार ही इसके भविष्यका निर्माण होता है। इसलिये शास्त्र सन्तमहापुरुषोंका विधिनिषेध राज्य आदिका शासन केवल मनुष्योंके लिये ही होता है क्योंकि मनुष्यमें पुरुषार्थकी प्रघानता है नये कर्मोंको करनेकी स्वतन्त्रता है। परन्तु पिछले कर्मोंके फलस्वरूप मिलनेवाली अनुकूलप्रतिकूलरूप परिस्थितिको बदलनेमें यह परतन्त्र है। तात्पर्य है कि मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र और फलप्राप्तिमें परतन्त्र है। परन्तु अनुकूलप्रतिकूलरूपसे प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करके मनुष्य उसको अपने उद्धारकी साधन सामग्री बना सकता है क्योंकि यह मनुष्यशरीर अपने उद्धारके लिये ही मिला है। इसलिये इसमें नया पुरुषार्थ भी उद्धारके लिये है और पुराने कर्मोंके फल फलरूपसे प्राप्त परिस्थिति भी उद्धारके लिये ही है।इसमें एक विशेष समझनेकी बात है कि इस मनुष्यजीवनमें प्रारब्धके अनुसार जो भी शुभ या अशुभ परिस्थिति आती है उस परिस्थितिको मनुष्य सुखदायी या दुःखदायी तो मान सकता है पर वास्तवमें देखा जाय तो उस परिस्थितिसे सुखी या दुःखी होना कर्मोंका फल नहीं हैं प्रत्युत मूर्खताका फल है। कारण कि परिस्थिति तो बाहरसे बनती हैऔर सुखीदुःखी होता है यह स्वयं। उस परिस्थितिके साथ तादात्म्य करके ही यह सुखदुःखका भोक्ता बनता है। अगर मनुष्य उस परिस्थितिके साथ तादात्म्य न करके उसका सदुपयोग करे तो वही परिस्थिति उसका उद्धार करनेके लिये साधनसामग्री बन जायगी। सुखदायी परिस्थितिका सदुपयोग है दूसरोंकी सेवा करना और दुःखदायी परिस्थितिका सदुपयोग है सुखभोगकी इच्छाका त्याग करना।दुःखदायी परिस्थिति आनेपर मनुष्यको कभी भी घबराना नहीं चाहिये प्रत्युत यह विचार करना चाहिये कि हमने पहले सुखभोगकी इच्छासे ही पाप किये थे और वे ही पाप दुःखदायी परिस्थितिके रूपमें आकर नष्ट हो रहे हैं। इसमें एक लाभ यह है कि उन पापोंका प्रायश्चित्त हो रहा है। और हम शुद्ध हो रहे हैं। दूसरा लाभ यह है कि हमें इस बातकी चेतावनी मिलती है कि अब हम सुखभोगके लिये पाप करेंगे तो आगे भी इसी प्रकार दुःखदायी परिस्थिति आयेगी। इसलिये सुखभोगकी इच्छासे अब कोई काम करना ही नहीं है प्रत्युत प्राणिमात्रके हितके लिये ही काम करना है।तात्पर्य यह हुआ है पशुपक्षी कीटपतंग आदि योनियोंके लिये पुराने कर्मोंका फल और नया कर्म ये दोनों ही भोगरूपमें हैं और मनुष्यके लिये पुराने कर्मोंका फल और नया कर्म (पुरुषार्थ) ये दोनों ही उद्धारके साधन हैं। मा फलेषु कदाचन   फलमें तेरा किञ्चिन्मात्र भी अधिकार नहीं है अर्थात् फलकी प्राप्तिमें तेरी स्वतन्त्रता नहीं है क्योंकि फलका विधान तो मेरे अधीन है। अतः फलकी इच्छा न रखकर कर्तव्यकर्म कर। अगर तू फलकी इच्छा रखकर कर्म करेगा तो तू बँध जायेगा  फले सक्तो निबध्यते  (गीता 5। 12)। कारण कि फलेच्छा अर्थात् भोक्तृत्वपर ही कर्तव्य टिका हुआ है अर्थात् भोक्तृत्वसे ही कर्त्तृत्व आता है। फलेच्छा सर्वथा मिटनेसे कर्तृत्व मिट जाता है और कर्तृत्व मिटनेसे मनुष्य कर्म करता हुआ भी नहीं बँधता। भाव यह हुआ कि वास्तवमें मनुष्य कर्तृत्वमें उतना फँसा हुआ नहीं है जितना फलेच्छा अर्थात् भोक्तृत्वमें फँसा हुआ है  (टिप्पणी प0 84) । दूसरी बात जितने भी कर्म होते हैं वे सभी प्राकृत पदार्थों और व्यक्तियोंके संगठनसे ही होते हैं। पदार्थों और व्यक्तियोंके संगठनके बिना स्वयं कर्म कर ही नहीं सकता अतः इनके संगठनके द्वारा किये हुए कर्मका फल अपने लिये चाहना ईमानदारी नहीं है। अतः कर्मका फल चाहना मनुष्यके लिये हितकारक नहीं है।फलमें तेरा अधिकार नहीं है इससे यह बात सिद्ध हो जाती है कि फलके साथ सम्बन्ध जोड़नेमें अथवा न जोड़नेमें मात्र मनुष्य स्वतन्त्र हैं सबल हैं। इसमें वे पराधीन और निर्बल नहीं है। फलेषु  पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि मनुष्य कर्म तो एक करता है पर उस कर्मके फल अनेक चाहता है। जैसे मैं अमुक कर्म कर रहा हूँ तो इससे मेरेको पुण्य हो जाय संसारमें मेरी कीर्ति हो जाय लोग मेरेको अच्छा समझें मेरा आदरसत्कार करें मेरेको इतना धन प्राप्त हो जाय आदिआदि।निष्काम होनेके उपाय (1) कामना पैदा होनेसे अभाव होता है कामनाकी पूर्ति होनेसे परतन्त्रता और पूर्ति न होनेसे दुःख होता है तथा कामनापूर्तिका सुख लेनेसे नयी कामनाकी उत्पत्ति होती है और सकामभावपूर्वक नयेनये कर्म करनेकी रुचि बढ़ती चली जाती है ऐसा ठीकठीक समझ लेनेसे निष्कामता स्वतः आ जाती है।(2) कर्म नित्य नहीं है क्योंकि उनका आरम्भ और अन्त होता है तथा उन कर्मोंका फल भी नित्य नहीं है क्योंकि उनका भी संयोग और वियोग होता है। परन्तु स्वयं नित्य है। अनित्य कर्म और कर्मफलसे नित्य स्वरूपको कोई लाभ नहीं होता। ऐसा ठीक समझ लेनेसे निष्कामता आ जाती है। निष्काम होनेसे संसारका सम्बन्ध छूट जाता है और परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।कर्मोंमें निष्काम होनेके लिये साधकमें तेजीका विवेक भी होना चाहिये और सेवाभाव भी होना चाहिये क्योंकि इन दोनोंके होनेसे ही कर्मयोग ठीक तरहसे आचरणमें आयेगा नहीं तो कर्म हो जायँगे पर योग नहीं होगा। तात्पर्य है कि अपने सुखआरामका त्याग करनेमें तो विवेक की प्रधानता होना चाहिये और दूसरोंको सुखआराम पहुँचानेमें सेवाभाव की प्रधानता होना चाहिये। मा कर्मफलहेतुर्भूः   तू कर्मफलका हेतु भी मत बन। तात्पर्य है कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि कर्मसामग्रीके साथ अपनी किञ्चिन्मात्र भी ममता नहीं रखनी चाहिये क्योंकि इनमें ममता होनेसे मनुष्यकर्मफलका हेतु बन जाता है। आगे पाँचवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी भगवान्ने शरीर मन बुद्धि और इन्द्रियोंके साथ  केवलैः  पद देकर बताया है कि शरीर आदिके साथ किञ्चिन्मात्र भी ममता नहीं होनी चाहिये।शुभ क्रियाओंमें फलकी इच्छा न होनेपर भी मेरे द्वारा किसीका उपकार हो गया किसीका हित हो गया किसीको सुख पहुँचा ऐसा भाव हो जाता है तो यह कर्मफलका हेतु बनना है। कारण कि ऐसा भाव होनेसे शुभ कर्मके साथ और मन बुद्धि इन्द्रियों आदिके साथ सम्बन्ध हो जाता है जोकि असत्का सङ्ग है। वास्तवमें अन्तःकरण बहिःकरण और क्रियाओंके साथ हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। इनका सम्बन्ध समष्टि संसारके साथ है। जैसे दूसरे किसी व्यक्तिके द्वारा दूसरे किसीका हित होता है तो उसमें हम अपना सम्बन्ध नहीं मानते उसमें अपनेको निमित्त नहीं मानतो। ऐसे ही अपने कहलानेवाले शरीर आदिसे किसीका हित हो जाय तो उसमें अपनेको निमित्त न माने। जब अपनेको किसी भी क्रियामें निमित्त हेतु नहीं मानेंगे तो कर्मफलका हेतु भी नहीं बनेंगे। मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि   कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति नहीं होनी चाहिये। कारण कि कर्म न करनेमें आसक्ति होनेसे आलस्य प्रमाद आदि होंगे। कर्मफलमें आसक्ति रहनेसे जैसा बन्धन होता है वैसा ही बन्धन कर्म न करनेमें आलस्य प्रमाद आदि होनेसे होता है क्योंकि आलस्यप्रमादका भी एक भोग होता है अर्थात् उनका भी एक सुख होता है जो तमोगुण है  निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्  (गीता 18। 39) और जिसका फल अधोगति होता है  अधो गच्छन्ति तामसाः  (गीता 14। 18)। तात्पर्य यह हुआ है कि राग आसक्ति कहीं भी होगी तो वह बाँधनेवाली हो ही जायगी  कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु  (गीता 13। 21)।कर्मरहित होनेसे हमें लौकिक लाभ होगा संसारमें हमारी प्रसिद्धि होगी आदि कोई सासारिक प्रयोजन भी नहीं होना चाहिये और समाधि लग जानेसे आध्यात्मिक तत्त्वमें हमारी स्थिति होगी आदि कोई पारमार्थिक प्रयोजन भी नहीं होना चाहिये। तात्पर्य है कि कर्म न करनेसे सांसारिक और पारमार्थिक उन्नति होगी यह भी कर्म न करनेमें आसक्ति है क्योंकि वास्तविक तत्त्व कर्म करने और न करनेसे अतीत है।इस श्लोकमें भगवान्का यह तात्पर्य मालूम देता है कि परिवर्तनशील वस्तु व्यक्ति पदार्थ क्रिया घटना परिस्थिति अवस्था स्थूलसूक्ष्मकारण शरीर आदिके साथ साधककी सर्वथा निर्लिप्तता होनी चाहिये। इनकेसाथ किञ्चिन्मात्र भी किसी तरहका सम्बन्ध नहीं होना चाहिये।इस श्लोकके चार चरणोंमें चार बातें आयी हैं (1) कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है (2) फलमें कभी तेरा अधिकार नहीं है (3) तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और (4) कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति न हो। इनमेंसे पहले और चौथे चरणकी बात एक है तथा दूसरे और तीसरे चरणकी बात एक है। पहले चरणमें कर्म करनेमें अधिकार बताया है और चौथे चरणमें कर्म न करनेमें आसक्ति होनेका निषेध किया है। दूसरे चरणमें फलकी इच्छाका निषेध किया है और तीसरे चरणमें फलका हेतु बननेका निषेध किया है।तात्पर्य यह हुआ कि अकर्मण्यतामें रुचि होनेसे प्रमाद आलस्य आदि तामसी वृत्ति के साथ तेरा सम्बन्ध हो जायगा। कर्म एवं कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे तेरा राजसी वृत्ति के साथ सम्बन्ध हो जायगा। प्रमाद आलस्य कर्म कर्मफल आदिका सम्बन्ध न रहनेपर जो विवेकजन्य सुख होता है प्रकाश मिलता है ज्ञान मिलता है उसके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे सात्त्विकी वृत्ति के साथ सम्बन्ध हो जायगा। इनके साथ सम्बन्ध होना ही जन्ममरणका कारण है। अतः साधक कर्म कर्मफल और इनके त्यागका सुख इनमेंसे किसीके भी साथ अपना सम्बन्ध न जोड़े इनमें राग या आसक्ति न करे। कर्म करते हुए इनके साथ सम्बन्ध न रखना ही कर्मयोग है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें कर्म करनेकी आज्ञा देनेके बाद अब भगवान् कर्म करते हुए सम रहनेका प्रकार बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.47।।यतो वेदाः परं तेषां सम्यग्ज्ञानोपयोगिनः अत एवाह (K omits एव) यावानिति। यस्य स्वधर्ममात्रे (N omits स्व ) ज्ञाने वा प्राधान्यं तस्य परिमितादपि वेदभाषितात् कार्यं सम्पद्यते ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.47।।तर्हि परम्परया पुरुषार्थसाधनं योगमार्गं परित्यज्य साक्षादेव पुरुषार्थकारणमात्मज्ञानं तदर्थमुपदेष्टव्यं तस्मै हि स्पृहयति मनो मदीयमित्याशङ्क्याह  तव चेति।  तर्हि तत्फलाभिलाषोऽपि स्यादिति नेत्याह  मा   फलेष्विति।  पूर्वोक्तमेवार्थं प्रपञ्चयति  मा कर्मेति।  फलाभिसन्ध्यसंभवे कर्माकरणमेव श्रद्दधामीत्याशङ्क्याह  मा त इति।  ज्ञानानधिकारिणोऽपि कर्मत्यागप्रसक्तिं निवारयति  कर्मण्येवेति।  कर्मण्येवेत्येवकारार्थमाह   न  ज्ञानेति।  नहि तत्राब्राह्मणस्यापरिपक्वकषायस्य मुख्योऽधिकारः सिध्यतीत्यर्थः। फलैस्तर्हि संबन्धो दुर्वारः स्यादित्याशङ्क्याह  तत्रेति।  कर्मण्येवाधिकारे सतीति सप्तम्यर्थः। फलेष्वधिकाराभावं स्फोरयति  कर्मेति।  कर्मानुष्ठानात्प्रागूर्ध्वं तत्काले चेत्येतत्कदाचनेति विवक्षितमित्याह  कस्यांचिदिति।  फलाभिसंधाने दोषमाह  यदेति।  एवं कर्मफलतृष्णाद्वारेणेत्यर्थः। कर्मफलहेतुत्वं विवृणोति  यदा हीति।  तर्हि विफलं क्लेशात्मकं कर्म न कर्तव्यमिति शङ्कामनुभाष्य दूषयति  यदीत्यादिना।  अकर्मणि ते सङ्गो मा भूदित्युक्तमेव स्पष्टयति  अकरण इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.47।।ज्ञानिनः कर्माभावमुक्त्वा इदानीमज्ञानिनः कर्मोच्यत इत्यन्यथा व्याख्याननिरासायाह  कामात्मना मिति। येषां कर्मिणां सकामतया कर्म कुर्वतां या निन्दा कृतायामिमां 2।42 इत्यादिना सा न युक्तेत्यर्थः। कुतः स्वर्गकामो यजेत आप.श्रौ.10।1।2।1 इत्यादौ। यजनवत्स्वर्गकामस्यापि विहितत्वान्नहि विहितं कुर्वतां निन्द्यत्वम्। तथात्वे यजनस्यापि निन्द्यत्वप्रसङ्गादिति वदन्विशिष्टविधित्वं मन्यते पूर्वपक्षी।ते इत्येतदर्जुनमात्रविषयमित्यन्यथा प्रतीतिनिरासायाह   त  इति। सर्ववर्णाश्रमोपलक्षणमर्थः प्रयोजनमस्येति तथोक्तम्। वक्तर्यायत्ते शब्दप्रयोगे वाचकमेव प्रयुज्यतां किं लक्षणया इत्यत आह   तवे ति। फलकामः कर्तव्यो यस्यासौ तथोक्तस्तस्य भावस्तत्ता। फलकामस्य कर्तव्यता तव कर्तुरिति वा। कृतोऽपि फलकामो ज्ञानिनो नात्यन्तबाधकः। तत्प्रतिबन्धनीयस्य ज्ञानस्याप्तत्वात् मोक्षस्य च नियतत्वात्। तथापि मोक्षविलम्बहेतुत्वात्तस्यापि न कर्तव्यः किम्वन्येषामज्ञानिनाम् इति प्रदर्शनायोपलक्षकपदप्रयोग इति भावः। ननुकर्मण्येवाधिकारो৷৷.मा फलेषु इति द्वयमुक्तम् तत्कथं न फलकामकर्तव्यतेत्येकस्यैव ग्रहणम् उच्यते फलकामकर्तव्यतानिषेधस्यैवात्र प्राधान्यात्कर्मण्येवाधिकार इति तदर्थानुवादः। तथापि न फलकामाधिकार इति वक्तव्यम्। मैवम् अधिकाराभावाभावयोः कर्तव्यत्वाकर्तव्यत्वसमर्थनार्थमुक्तत्वेन साध्यस्यैवोपादानात्। तथा च वक्ष्यति। त इत्युपलक्षणार्थमित्युक्तस्य व्यावर्त्यमाह  न त्वि ति। केषाञ्चित्फलकामकर्तव्यताऽस्ति केवलं तेनास्तीत्यर्थस्तु नेत्यर्थः। कामान्यः कामयते मुं.उ.3।2।2 इत्यादौ सर्वेषां निषेधादिति भावः। नन्वर्जुनस्य ज्ञानित्वे स्यादिदं तदेव कुत इत्यत आह  स ही ति। हिशब्दसूचितां प्रमाणसिद्धिमेव दर्शयति  नरांश  इति। कथं तर्हियज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहं 4।35 इत्यर्जुनस्य मोह उच्यते कथं च प्रश्नकरणम् इत्यत आह  मोहादि रिति। बलवता प्रारब्धकर्मादिना ज्ञानस्याभिभवान्मोहः। विशेषज्ञानाद्यर्थः प्रश्न इत्यर्थः। नन्विन्द्रादीनामेव कुतो ज्ञानित्वं इत्यत आह  यदी ति। सत्त्वं हि ज्ञानकारणम्।सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं 14।17 इति वचनात् देवाश्च शुद्धसत्त्वाः अतः कारणसद्भावाद्युक्तं तेषां ज्ञानम्। अन्यथा न कस्यापि स्यात्। इतश्चेन्द्रादयो ज्ञानिन इत्यत आह  उपदेशे ति। एतदु हैवेंद्रो विश्वामित्राय प्रोवाच इत्यादिरुपदेशः। आदिपदेन प्रजापतौ ब्रह्मचर्यम्।अर्जुनस्य ज्ञानित्वे प्रमाणान्तरमाह  पार्थे ति। ज्ञानिषु गणनात्। एतेनापव्याख्यानमपि निरस्तम्। नन्वत्रमा फलेषु इति फलविषयो निषेधः कृतः तत्कथमुक्तं फलकामेति तत्राह  कामे ति। फलशब्देन तद्विषयं काममुपलक्ष्य तद्विषयो निषेधोऽत्र क्रियते न फलविषय इत्यर्थः। कुतो लक्षणाश्रयणं इत्यत आह  फलानी ति। यत्र हि पुरुषस्य कर्तुमकर्तुं वा स्वातन्त्र्यं तत्रैव निषेधः नान्यत्र प्रसक्तेरभावात्। न च फलेषु स्वातन्त्र्यमस्ति अतो मुख्ये बाधकाल्लक्षणाश्रयणमित्यर्थः। कथम स्वातंत्र्यमित्यतः करणे तावदाह  न ही ति। अकरणेपि तदाह  भवन्ति चे ति। चोऽवधारणे। अविरोधे ब्रह्मदर्शनादितत्तद्विरोध्यभावे। तदनेनते इतिफलेषु इति च पदद्वयं व्याख्यातम्। स्यादेतत्। स्वर्गकामो यजेत आप.श्रौ.10।1।2।1 इत्यादौ स्वर्गादिकामनाविशिष्टं यजनादिकं कर्म कार्यतयोच्यते अतो न कामात्मनां निन्दोचितेति शङ्कायां किमेतत्कर्मण्येवाधिकारः इत्याद्यसङ्गतमुच्यते यश्च कर्मवत्कामनाया अपि कार्यतां मन्यते कुतस्तस्य फलकामनायामधिकाराभावः सिद्धः फलेष्विति लाक्षणिकशब्दप्रयोगे च किं प्रयोजनं इत्याशङ्क्य पूर्वार्धं व्याचष्टे  अत  इति।अतः इत्यस्य वक्ष्यमाणेनभूत्वा इत्यतः परेणेत्यर्थ इत्यनेनान्वयः। अत उक्तन्यायेन पदद्वयस्य लाक्षणिकत्वे सतीत्यर्थः। श्लोकार्थः सम्पद्यते इति शेषः। तत्र तावत्कर्मण्येवाधिकारः सर्ववर्णाश्रमिणां न फलकामनायामित्युक्तेऽर्थद्वये हेतुद्वयमाह  कर्माकरण  इति। कुर्वन्नेवेह कर्माणि इत्युक्त्वा एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे ई.उ.2 इत्युक्तत्वात्। कर्माकरण एव प्रत्यवायोऽनिष्टप्राप्तीष्टानवाप्तिलक्षणः। न त्वकामनया प्रत्यवायः प्रमाणाभावात्। ननु कामाभावे तत्तत्फलानवाप्तेः कथं प्रत्यवायाभाव इत्यत उक्तम्  फलाप्राप्ता विति। काम्यकर्मफलाप्राप्तावपि न प्रत्यवाय इत्येतदुपपादनायोक्तं  ज्ञानादिना वे ति। वाशब्द उपमायाम्। यथा ज्ञानादिना साधनेन मोक्षं गच्छतः स्वर्गाद्यलाभो न खेदहेतुः महाफललाभेऽल्पफलहानेरकिञ्चित्करत्वात् तथाऽकामनया फलाप्राप्तावपि न खेदः निष्कामेण कर्मणा महाफलस्य ज्ञानादेर्लाभादिति भावः। ततः किमित्यत उक्तस्य हेतुद्वयस्य गीतोक्तं साध्यद्वयमाह  अत  इति। न तु फलकामनायामिति च वक्तव्यम्। यत एवं कर्माकरणे प्रत्यवायोऽतः कर्मण्येवाधिकारः। यतः कामाकरणे प्रत्यवायोऽतो न कामेऽधिकार इत्यर्थः। ततः किं प्रकृते इत्यतः परमसाध्यद्वयमाह  अत  इति। यतः कर्मण्येवाधिकारोऽतस्तदेव कार्यं विधिविषय इत्यर्थः। यतः कामेनाधिकारोऽतः कामेन फलप्राप्तिः फलप्राप्तये कामः इति यावत् न कार्यः। तत्र दृष्टान्तः।  ज्ञानादिनिषेधेन वे ति। अत्रापि वाशब्द उपमायाम्। यथा प्रेक्षावता ज्ञानादिकं परित्यज्य फलप्राप्तिर्न क्रियते तथेत्यर्थः।पूर्वोक्त एवाभिप्रायः। यदि कर्मैव विधिविषयो न कामः तर्हि स्वर्गकामो यजेत इत्यादिवाक्यानां किं तात्पर्यम् इत्यत आह  कामे ति। अनादिविषयवासनावासितान्तःकरणा न सहसा ज्ञानसाधने कर्मणि प्रवर्तितुं शक्यन्ते अतस्तेषां कर्मण्यभिरुचिजननार्थं स्वर्गकामः आ.श्रौ.10।1।2।1 इत्यादिश्रुतिः प्रवृत्ता कर्मणि प्रवृत्तांस्तु शनैः कामं त्याजयिष्यामीत्यभिप्रायवती। यथा फलेन प्रलोभ्य बालानां भैषज्यरोचनं क्रियते तथेत्यर्थः। अस्त्वेवं तात्पर्यं योजना तु कथं इत्यत आह  अत  इति। यत एवं न्यायेन कर्मण एव कार्यत्वं न कामस्येति प्राप्तम् अतः कामी यजेतेत्येव श्रुत्यर्थः। कामानुवादेन यजनं विधीयत इति यावत्। एवशब्दव्यावर्त्यमाह  नत्वि ति। कामविशिष्टयजनविधानं तु नेत्यर्थः। एतदुक्तं भवति विशिष्टविधानशङ्कायां नेदं विशिष्टविधानं किन्तु कामानुवादेन यजनस्यैवेति परमसाध्यमत्राध्याहार्यम्। तत्कुतः इत्यपेक्षायां कर्मण एव कार्यत्वात् कामस्य तदभावादिति वा हेतुवचनं चोपस्कर्तव्यम्। तदपि कुत इत्यपेक्षायां कर्मण्येवाधिकारः न फलकाम इति गीतोक्तयोर्हेत्वोरुपस्थानम्। तदपि कुतः इत्यपेक्षायां कर्मकामकरणाकरणयोः प्रत्यवायभावाभावयोर्हेत्वोरध्याहारः। एतदुपपादनाय लाक्षणिकफलशब्दोपादानमिति।  भास्करस् त्वाह नित्यनैमित्तिकान्येव कर्माणि मुमुक्षुणा निष्कामतया कर्तव्यानि न तु ज्योतिष्टोमादीनि कामाधिकारे विहितानि तेषां निष्कामतया करणे प्रमाणाभावात् अतोऽसदिदं व्याख्यानमिति तत्राह  निष्काम मिति। यज्ञादिकमेव प्रक्रम्य तस्य निष्कामतयाऽनुष्ठानवचनाद्युक्तमिदं व्याख्यानम्।एतान्यपि तु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा 18।6 इत्यादिवक्ष्यमाणवचनेभ्यश्च। न चैतानि नित्यनैमित्तिकविषयाणि तत्र कामप्रसक्त्यभावेन तत्प्रतिषेधानुपपत्तेः। किञ्च नित्यनैमित्तिकातिरिक्तस्य ज्योतिर्नामकयज्ञस्य फलकामनया विनाऽविधानाच्च। ज्योतिष्टोमस्यैवायं गुणविधानायानुवाद इति तु न सम्मतम्। आदिपदेन विश्वजिता यजेत इत्यादेर्ग्रहणम्। तत्रापि स्वर्गकामपदाध्याहारो निर्णीत इति चेत् सत्यम् कामिनां तु तथा स्ववनेनानुक्तौ कारणमिहोक्तमिति। ननु पूर्वार्धेनैव शङ्काया निरस्तत्वात्किमुत्तरार्धेन इत्यतः क्रमेण पादद्वयोपयोगमाह  अत  इति। फलकामस्याकर्तव्यत्वात् कर्मफलहेतुत्वमप्रसक्तं किमिति प्रतिषिध्यत इत्यत आह  कर्मे ति। शाकपार्थिवादित्वात्तत्कृतिपदलोपोऽत्रेति भावः। तर्ही ति। यदि फलं नाकाङ्क्ष्यमित्यर्थः। न करोमि स्वयं क्लेशरूपत्वादिति भावः। अकर्मपदस्य निषिद्धेऽपि प्रवृत्तेः सङ्गशब्दस्य चानेकार्थत्वात्प्रकृतोपयुक्ततया व्याचष्टे  कर्मे ति। सोपपत्तिकमाक्षिप्ते कथमिदमुत्तरं इत्यतो भगवदभिप्रायमाह  अन्ये ति। प्रसादशब्देन भक्तिज्ञानादिकमप्युपलक्ष्यते। एवं तर्हि भगवत्प्रसादादीच्छया कर्म कर्तव्यमित्युक्तं स्यात्। न च तद्युक्तम् कामस्य निन्दितत्वात्। अन्यथा स्वर्गादिकामनाया अपि प्रसङ्गात्। अतो नेदं भगवदभिप्रायवर्णनं युक्तमित्यत आह  इच्छा  चेति। ते तव परितोषणाय सकलं कर्म वृणीमह इति महदाचारेण भगवत्परितोषणस्य कर्तव्यतावगमात्। ननु तदकर्तव्यतायामपि कामनानिन्दावचनं प्रमाणमस्तीत्युक्तमित्यत आह  अनिन्दना दिति। यथा महदाचारो विशेषविषयो न तथा कामनिन्दावचनं किन्तु सामान्यविषयसेव। अतो महदाचारेण बाध्यत इति भावः। तर्हि तद्वत्स्वर्गादिकामनाऽपि कार्येति यदुक्तं तत्राह  विशेषत  इति। चशब्देन प्रमाणाभावं समुच्चिनोति। अस्त्वाचारो विशेषविषयः कामनिन्दावचनं तु सामान्यविषयम् तथापि कुतो बाध्यबाधकभाव इत्यत आह  सामान्य मिति। सामान्यविशेषशब्दौ तद्विषयप्रमाणपरौ। चशब्दाद्विरोधे सति। उक्तं च प्रमाणमुपसंहरन् प्रमाणान्तराण्यप्यत्राह   अत  इति। एकात्मतां सायुज्यम्। अस्यैव शेषो भक्तिमन्विच्छन्त इति। ननु न ब्रह्मजिज्ञासाशब्दो ज्ञानेच्छापरः किन्तु विचारस्योपलक्षकः सत्यम् तथापि तत्पूर्वको विचारो लक्ष्यते अन्यथा सम्बन्धाभावात् लोकसिद्धन्यायात् लोकसिद्धव्याप्तिकानुमानात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.47।।कामात्मनां निन्दा कृता। कथं एषां स्वर्गकामो यजेत आप.श्रौ.10।1।2।1 इत्यादौ कामस्यापि विहितत्वात् इत्यत आह कर्मण्येवेति। त इत्युपलक्षणार्थम्। तव ज्ञानिनोऽपि न फलकामकर्तव्यता किम्वन्येषाम्। नत्वस्ति केषाञ्चिन्न तेऽस्तीति। स हि ज्ञानी नरांश इन्द्रश्च मोहादिस्त्वभिभवादेः। यदि तेषां शुद्धसत्त्वानां न स्याज्ज्ञानं कान्येषाम्। उपदेशादेश्च सिद्धं ज्ञानं तेषाम्।पार्थार्ष्टिषेणेत्यादिज्ञानिगणनाच्च कामनिषेध एवात्र। फलानि ह्यस्वातन्त्र्येण भवन्ति। नहि कर्मफलानि कर्माभावे यत्नतो भवन्ति। भवन्ति च काम्यकर्मिणो विपर्ययप्रयत्नेऽप्यविरोधे। अतः कर्माकरण एव प्रत्यवायः न तु ज्ञानादिना वाऽकामनया फलाप्राप्तौ अतः कर्मण्येवाधिकारः। अतस्तदेव कार्यम्। न तु कामेन ज्ञानादिनिषेधेन वा फलप्राप्तिः।कामवचनानां तु तात्पर्यं भगवतैवोक्तम् रोचनार्थं फलश्रुतिः।यथा भैषज्यरोचनम् इति भागवते। 11।21।23 अत एव कामी यजेतेत्यर्थः। न तु कामी भूत्वेत्यर्थः।निष्कामं ज्ञानपूर्वं च इति वचनात् वक्ष्यमाणेभ्यश्च। वसन्ते वसन्ते ज्योतिषा यजेत इत्यादिभ्यश्च। अतो मा कर्मफलहेतुर्भूः। कर्मफलं तत्कृतौ हेतुर्यस्य स कर्मफलहेतुः स मा भूः।तर्हि न करोमीत्यत आह मा त इति। कर्माकरणे स्नेहो मास्त्वित्यर्थः। अन्यथा फलाभावेऽपि मत्प्रसादाख्यफलभावात्। इच्छा च तस्य युक्तावृणीमहे ते परितोषणाय इति महदाचारात्। अनिन्दनाद्विशेषत इतरनिन्दनाच्च। सामान्यं विशेषो बाधत इति च प्रसिद्धम्सर्घानानय नैकं मैत्रम् इत्यादौ। अतोनैकात्मतां मे स्पृद्दयन्ति केचित् भाग.3।25।34 भक्तिमन्विच्छन्तः।ब्रह्मजिज्ञासा ब्र.सू.1।1।1 विज्ञाय प्रज्ञां द्रष्टव्यः बृ.उ.2।4।5।5।6 इत्यादिववनेभ्यः। स्वार्थसेवकं प्रति न तथा स्नेहः। किं ददामीत्युक्ते सेवादि याचकंप्रति बहुतरस्नेह इति लोकप्रसिद्धन्यायाच्च भक्तिज्ञानादिकामना कार्येति सिद्धम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.47।।नित्ये नैमित्तिके काम्ये च केनचित् फलविशेषेण संबन्धितया श्रूयमाणे  कर्मणि  नित्यसत्त्वस्थस्य मुमुक्षोः ते कर्ममात्रे  अधिकारः।  तत्संबन्धितया अवगतेषु  फलेषु  न कदाचिद् अपि अधिकारः। सफलस्य बन्धरूपत्वात् फलरहितस्य केवलस्य मदाराधनरूपस्य मोक्षहेतुत्वाच्च। मा  च कर्मफलयोः  हेतुः भूः।  त्वया अनुष्ठीयमाने अपि कर्मणि नित्यसत्त्वस्थस्य मुमुक्षोः तवाकर्तृत्वम् अपि अनुसन्धेयम्। फलस्य अपि क्षुन्निवृत्त्यादेः न त्वं हेतुः इति अनुसन्धेयम्। तद् उभयं गुणेषु वा सर्वेश्वरे मयि वा अनुसन्धेयम् इति उत्तरत्र वक्ष्यते। एवम् अनुसन्धाय कर्म कुरु।  अकर्मणि  अननुष्ठाने न योत्स्यामि इति यत् त्वया अभिहितं न तत्र  ते सङ्गः अस्तु।  उक्तेन प्रकारेण युद्धादिकर्मणि एव सङ्गः अस्तु इत्यर्थः।एतद् एव स्पष्टीकरोति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.47।।  कर्मण्येव अधिकारः  न ज्ञाननिष्ठायां  ते  तव। तत्र च कर्म कुर्वतः  मा फलेषु  अधिकारः अस्तु कर्मफलतृष्णा मा भूत्  कदाचन  कस्याञ्चिदप्यवस्थायामित्यर्थः। यदा कर्मफले तृष्णा ते स्यात् तदा कर्मफलप्राप्तेः हेतुः स्याः एवं  मा कर्मफलहेतुः  भूः। यदा हि कर्मफलतृष्णाप्रयुक्तः कर्मणि प्रवर्तते तदा कर्मफलस्यैव जन्मनो हेतुर्भवेत्। यदि कर्मफलं नेष्यते किं कर्मणा दुःखरूपेण इति  मा ते  तव  सङ्गः अस्तु अकर्मणि  अकरणे प्रीतिर्मा भूत्।।यदि कर्मफलप्रयुक्तेन न कर्तव्यं कर्म कथं तर्हि कर्तव्यमिति उच्यते

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【 Verse 2.48 】

▸ Sanskrit Sloka: योगस्थ: कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय | सिद्ध्यसिद्ध्यो: समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ||

▸ Transliteration: yogasthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya | siddhyasiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga ucyate ||

▸ Glossary: yogasthaḥ: steadfast in yoga; kuru: perform; karmāṇi: duties; saṅgaṁ: attach- ment; tyaktvā: having abandoned; dhañajaya: O Dhanañjaya; siddhyasiddhyoḥ: success and failure; samaḥ: the same; bhūtvā: having become; samatvaṁ: evenness of mind; yoga: yoga; ucyate: is called

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.48 O Dhanañjaya! Do your actions dropping all attachment to the outcome, being centered and complete in Yoga. Be balanced in success and failure. Such evenness of mind is Yoga.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.48।।हे धनञ्जय तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.48।। हे धनंजय आसक्ति को त्याग कर तथा सिद्धि और असिद्धि में समभाव होकर योग में स्थित हुये तुम कर्म करो। यह समभाव ही योग कहलाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.48 योगस्थः steadfast in Yoga? कुरु perform? कर्माणि actions? सङ्गम् attachment? त्यक्त्वा having abandoned? धनञ्जय O Dhananjaya? सिद्ध्यसिद्ध्योः in success and failure? समः the smae? भूत्वा having become? समत्वम् evenness of mind? योगः Yoga? उच्यते is called.Commentary Dwelling in union with the Divine perform actions merely for Gods sake with a balanced mind in success and failure. Eilibrium is Yoga. The attainment of the knowledge of the Self through purity of heart obtained by doing actions without expectation of fruits is success (Siddhi). Failure is the nonattainment of knowledge by doing actions with expectation of fruit. (Cf.III.9IV.14IV.20).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.48. O Dhananjaya ! Established in the Yoga, perform actions, abandoning attachment, remaining even-minded in success and failure; for, the even-mindedness is said to be the Yoga.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.48 Perform all thy actions with mind concentrated on the Divine, renouncing attachment and looking upon success and failure with an equal eye. Spirituality implies equanimity.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.48 Abandoning attachment and established in Yoga, perfom works, viewing success and failure with an even mind. Evenness of mind is said to be Yoga.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.48 By being established in Yoga, O Dhananjaya (Arjuna), undertake actions, casting off attachment and remaining eipoised in success and failure. Eanimity is called Yoga.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.48 Perform action, O Arjuna, being steadfast in Yoga, abandoning attachment and balanced in success and failure. Evenness of mind is called Yoga.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.48 Yogasthah etc. Being established in Yoga you must perform actions. Evenness [of mind] is the Yoga.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.48 Abandoning the attachment to kingdom, relatives etc., and established in Yoga, engage in war and such other activities. Perform these with eanimity as regards success and failure resulting from victory etc., which are inherent in them. This eanimity with

Chapter 2 (Part 28)

regard to success and failure is called here by the term Yoga, in the expression 'established in Yoga.' Yoga is eanimity of mind which takes the form of evenness in success and failure.

Sri Krsna explains why this is repeatedly said:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.48 If action is not to be undertaken by one who is under the impulsion of the fruits of action, how then are they to be undertaken? This is being stated: Yogasthah, by becoming established in Yoga; O Dhanajaya, kuru, undertake; karmani, actions, for the sake of God alone; even there, tyaktva, casting off; sangam, attachment, in the form, 'God will be pleased with me.' ['Undertake work for pleasing God, but not for propitiating Him to become favourable towards yourself.'] Undertake actions bhutva, remaining; samah, eipoised; siddhi-asidhyoh, in success and failure even in the success characterized by the attainment of Knowledge that arises from the purification of the mind when one performs actions without hankering for the results, and in the failure that arises from its opposite. [Ignorance, arising from the impurity of the mind.] What is that Yoga with regard to being established in which it is said, 'undertake'? This indeed is that: the samatvam, eanimity in success and failure; ucyate, is called; yogah, Yoga.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.48।। यहाँ कर्मयोग का ही विशद् विवेचन किया गया है। इस श्लोकार्थ पर विचार करने से ज्ञात होगा कि अहंकार की पूर्ण निवृत्ति के बिना इस मार्ग में सफलता नहीं मिल सकती और इसकी निवृत्ति का उपाय है मन का समत्व भाव। इस श्लोक में प्रथम बार योग शब्द का प्रयोग किया गया है और यहीं पर उसकी परिभाषा भी दी है कि समत्व योग कहलाता है। इस योग में दृढ़ स्थित होने पर ही निष्काम कर्म किये जा सकते हैं।कर्मयोगी के लिये केवल इतना पर्याप्त नहीं कि सम भाव में रहकर वह कर्म करे परन्तु इस नित्य परिवर्तनशील जगत् में रहते हुये इस समभाव को दृढ़ करने का सतत प्रयत्न करे। इसके लिये उपाय है कर्मों के तात्कालिक फलों के प्रति संग (आसक्ति) का त्याग।कर्मों को कुशलतापूर्वक करने के लिए जिस संग को त्यागने के लिए यहाँ कहा गया है उसपर हम विचार करेंगे। इसके पूर्व के श्लोकों में श्रीकृष्ण ने जिन आसक्तियों का त्याग करने को कहा था वे सब संग शब्द से इंगित की गयी हैं अर्थात् विपरीत धारणायें झूठी आशायें दिवा स्वप्न कर्म फल की चिन्तायें और भविष्य में संभाव्य अनर्थों का भय इन सबका त्याग करना चाहिये। त्याज्य गुणों की इस सूची को देखकर किसी भी साधनरत सच्चे साधक को यह सब करना असम्भव ही प्रतीत होगा। परन्तु उपनिषदों के सिद्धांतों को ध्यान में रखकर और अधिक विचार करने पर हम सरलता से इस गुत्थी को सुलझा सकेंगे।उपर्युक्त सभी कष्टप्रद धारणायें एवं गुत्थियां भ्रांति जनित अहंकार की ही हैं। यह अहंकार क्या है भूतकाल की स्मृतियों और भविष्य की आशाओं की गठरी। अत अहंकारमय जीवन का अर्थ है मृत क्षणों की श्मशानभूमि अथवा काल के गर्भ में रहना जहाँ अनुत्पन्न भविष्य स्थित है। इनमें व्यस्त रहते हुये वर्तमान समय को हम खो देते हैं जो हमें कर्म करने और लक्ष्य पाने के लिये उपलब्ध होता है। वर्तमान में प्राप्त सुअवसररूपी धन का यह मूर्खतापूर्ण अपव्यय है जिसका संकेत व्यासजी इन शब्दों में करते है संग त्याग कर समत्व योग में स्थित हुये तुम कर्म करो।वर्तमान कीअग्नि में भूतभविष्य चिन्ता भय आशा इन सबको जलाकर कर्म करना स्फूर्ति और प्रेरणा का लक्षण है। इस प्रकार अहंकार के विस्मरण और कर्म करने में ही पूर्ण आनन्द है। ऐसे कर्म का फल सदैव महान् होता है।कलाकृति के निर्माण के क्षणों में अपने आप को कृति के आनन्द में निमग्न होकर कार्यरत कलाकार इस तथ्य का प्रमाण है। वैसे इसे समझने के लिए कोई महान कलाकार होने की आवश्यकता नहीं है। जीवन में किसी कार्य को पूरी लगन और उत्साह से जब हम कर रहे होते हैं उस समय यदि वहाँ कोई व्यक्ति आकर खड़ा हो जाये तब भी हमें उसका भान नहीं रहता। आनन्द की उस अनुभूति से नीचे अहंकार के स्तर पर उतर कर आगन्तुक को उत्तर देने में भी हमें कुछ समय लग जाता है।अहंकार को भूलकर जो कार्य किये जाते हैं उनमें कर्ता को यश अथवा अपयश की कोई चिन्ता नहीं रहती क्योंकि फल की चिन्ता का अर्थ है भविष्य की चिन्ता और भविष्य में रहने का अर्थ है वर्तमान को खोना। स्फूर्त जीवन का आनन्द वर्तमान के प्रत्येक क्षण में निहित होता है। कहा जाता है कि प्रत्येक क्षण का आनन्द स्वयं में परिपूर्ण है। अत भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को जीवन की सभी परिस्थितियों में समान रहते हुये कर्म करने का उपदेश देते हैं।योगस्थ होकर किये कर्मों की तुलना में अन्य कर्मों के विषय में भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.48।।   एतदेव विवृणोति  योगस्थ इति।  योगस्थः कर्माणि कुरु केवलमीश्वरार्थम्। ननु योगः परमेश्वरैकपरतेति योगशब्दार्थ आचार्यैः कुतो न प्रदर्शित इतिचेत् समत्वं योग उच्यते इत्यनेन तदर्थस्य मूल एवोक्तत्वात्। तत्रापीश्वरो मे तुष्यत्विति सङ्ग त्यक्त्वा। एतद्भाष्यमुपलक्षणं कर्तृत्वाद्यभिनिवेशस्यापि। चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानप्राप्तिरुपायां सिद्धौ तद्विपर्ययरुपायामसिद्धौ च समो हर्षविषादशून्यो भूत्वा। अयमेव योग इत्याह  समत्वमिति।  दिग्विजये महीपाञ्जित्वा धनमाहृत्य राजसूययज्ञे त्वया नियोजितं तथाधुनाप्येतान्सर्वाञ्जित्वा यज्ञादीन्संपादयितुर्मसीति द्योतयन्नाह हे धनंजयेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.48।।पूर्वोक्तमेव विवृणोति हे धनंजय त्वं योगस्थः सन् सङ्गं फलाभिलाषं कर्तृत्वाभिनिवेशं च त्यक्त्वा कर्माणि कुरु। अत्र बहुवचनात्कर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यत्र जातावेकवचनम्। सङ्गत्यागोपायमाह सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा फलसिद्धौ हर्षं फलासिद्धौ च विषादं त्यक्त्वा केवलमीश्वराराधनबुद्ध्या कर्माणि कुर्वित्यर्थः। ननु योगशब्देन प्राक्कर्मोक्तम्। अत्र तु योगस्थः कर्माणि कुर्वित्युच्यते अतः कथमेतबोद्वुं शक्यमित्यत आह समत्वं योग उच्यते। यदेतत्सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वं इदमेव योगस्थ इत्यत्र योगशब्देनोच्यते नतु कर्मेति न कोऽपि विरोध इत्यर्थः। अत्र पूर्वार्धस्योत्तरार्धेन व्याख्यानं क्रियत इत्यपौनरुक्त्यमिति भाष्यकारीयः पन्थाः। सुखदुःखे समे कृत्वेत्यत्र जयाजयसाम्येन युद्धमात्रकर्तव्यता प्रकृतत्वादुक्ता। इह तु दृष्टादृष्टसर्वफलपरित्यागेन सर्वकर्मकर्तव्यतेति विशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.48।।एतदेव विवृणोति  योगस्थ इति।  योगस्थः सन् सङ्गं फलतृष्णां कर्तृत्वाभिमानं च त्यक्त्वा कर्माणि ज्ञानार्थं कुरु। हे धनंजय सिद्ध्यसिद्ध्योः कर्मफलस्य विविदिषादेः सिद्धावसिद्धौ वा समो हर्षविषादशून्यो भूत्वा कर्माणि कुर्विति संबन्धः। इदमेव सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वं योग इत्युच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.48।।नन्वेवमेव चेत्तर्हि किं कर्मकरणेनेत्याशङ्ख्याह योगस्थ इति। योगस्थः भगवदेकपरचित्तो भूत्वा सङ्गं त्यक्त्वा पूर्वोक्तानां कर्माणि कुरु। मदाज्ञारूपाणि कुर्वित्यर्थः। सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा। सिद्धिस्तत्फलाप्तिः असिद्धिः फलविपरीतफलं तत्र समो भूत्वा। ननु समत्वे सति किं स्यात् अत आह समत्वं योग उच्यते इति। तत्र समत्वमेव योगः। भगवदाज्ञया कर्त्तव्यत्वेन तत्फलाफले समता स्यात् सा च भगवत्परत्वज्ञापिकेति योगरूपत्वम्। यद्वा योगस्थः भगवत्संयोगे स्थितः कर्माणि तत्रोपयुक्तानि कुरु सङ्गं त्यक्त्वा सर्वत्यागं कृत्वेति भावः।धनञ्जय इति सम्बोधनेन स्वविभूतिरूपत्वात्स्वसंयोगयोग्यता बोधिता किञ्च सिद्ध्यसिद्ध्योः सिद्धिः सर्वदा योगः असिद्धिर्विप्रयोगस्तत्र समो भूत्वा संयोगानन्तरभाविविप्रयोगानन्तरभाविपरमसुखज्ञानेच्छाजनितानन्द भ৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ रभगवद्दत्तविप्रयोगे वैमनस्यमविचार्य तथा कुरु। तत्र समत्वे योग उच्यते। तद्रसज्ञैरिति शेषः। मया वा भगवद्दत्तविप्रयोगस्यापि परमानन्दरूपत्वात्तद्दत्तत्वेन योगरूपतेति भावः। संयोगानन्तरजत्वात्तन्मध्यपातित्वादपि तथा तत्साधकत्वेनापि तथा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.48।।किं तर्हि  योगस्थ इति।  योगः परमेश्वरैकपरता तत्र स्थितः कर्माणि कुरु। तथा सङ्गं कर्तृत्वाभिनिवेशं त्यक्त्वा केवलमीश्वराश्रयेणैव कुरु। तत्फलस्य ज्ञानस्यापि सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा केवलमीश्वरार्पणेनैव कुरु। यत एवंभूतं समत्वमेव योग उच्यते सद्भिः। चित्तसमाधानरूपत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.48।।तर्हि कथं स्वकर्म करोमि इति चेत्तत्राह योगस्थ इति। फलस्वरूपो योगो मद्योगस्थ इत्यर्थः। फलेषु सङ्गं त्यक्त्वा। योगं व्याचष्टे समत्वं योग इति। तच्च मनोनिरोधे सम्भवति तथैव कुर्विति पूर्वोक्तं समर्थितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.48।।यदि कर्मफलसे प्रेरित होकर कर्म नहीं करने चाहिये तो फिर किस प्रकार करने चाहिये इसपर कहते हैं हे धनंजय योगमें स्थित होकर केवल ईश्वरके लिय कर्म कर। उनमें भी ईश्वर मुझपर प्रसन्न हों। इस आशारूप आसक्तिको भी छोड़कर कर। फलतृष्णारहित पुरुषद्वारा कर्म किये जानेपर अन्तःकरणकी शुद्धिसे उत्पन्न होनेवाली ज्ञानप्राप्ति तो सिद्धि है और उससे विपरीत ( ज्ञानप्राप्तिका न होना ) असिद्धि है ऐसी सिद्धि और असिद्धिमें भी सम होकर अर्थात् दोनोंको तुल्य समझकर कर्म कर। वह कौनसा योग है जिसमें स्थित होकर कर्म करनेके लिये कहा है यही जो सिद्धि और असिद्धिमें समत्व है इसीको योग कहते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.48।। व्याख्या    सङ्गं त्यक्त्वा   किसी भी कर्ममें किसी भी कर्मके फलमें किसी भी देश काल घटना परिस्थिति अन्तःकरण बहिःकरण आदि प्राकृत वस्तुमें तेरी आसक्ति न हो तभी तू निर्लिप्ततापूर्वक कर्म कर सकता है। अगर तू कर्म फल आदि किसीमें भी चिपक जायेगा तो निर्लिप्तता कैसे रहेगी और निर्लिप्तता रहे बिना वह कर्म मुक्तिदायक कैसे होगा सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा   आसक्तिके त्यागका परिणाम क्या होगा सिद्धि और असिद्धिमें समता हो जायगा।कर्मका पूरा होना अथवा न होना सांसारिक दृष्टिसे उसका फल अनुकूल होना अथवा प्रतिकूल होना उस कर्मको करनेसे आदरनिरादर प्रशंसानिन्दा होना अन्तःकरणकी शुद्धि होना अथवा न होना आदिआदि जो सिद्धि और असिद्धि है उसमें सम रहना चाहिये  (टिप्पणी प0 86) ।कर्मयोगीकी इतनी समता अर्थात् निष्कामभाव होना चाहिये कि कर्मोंकी पूर्ति हो चाहे न हो फलकी प्राप्ति हो चाहे न हो अपनी मुक्ति हो चाहे न हो मुझे तो केवल कर्तव्यकर्म करना है। साधकको असङ्गताका अनुभव न हुआ हो उसमें समता न आयी हो तो भी उसका उद्देश्य असङ्ग होनेका सम होनेका ही हो। जो बात उद्देश्यमें आ जाती है वही अन्तमें सिद्ध हो जाती है। अतः साधनरूप समतासे अर्थात् अन्तःकरणकी समतासे साध्यरूप समता स्वतः आ जाती है  तदा योगमवाप्स्यसि  (2। 53)। योगस्थः कुरु कर्माणि   सिद्धिअसिद्धिमें सम होनेके बाद उस समतामें निरन्तर अटल स्थित रहना ही योगस्थ होना है। जैसे किसी कार्यके आरम्भमें गणेशजीका पूजन करते हैं तो उस पूजनको कार्य करते समय हरदम साथमें नहीं रखते ऐसे ही कोई यह न समझ ले कि आरम्भमें एक बार सिद्धिअसिद्धिमें सम हो गये तो अब उस समताको हरदम साथमें नहीं रखना है रागद्वेष करते रहना है इसलिये भगवान् कहते हैं कि समतामें हरदम स्थित रहते हुए ही कर्तव्यकर्मको करना चाहिये। समत्वं योग उच्यते   समता ही योग है अर्थात् समता परमात्माका स्वरूप है। वह समता अन्तःकरणमें निरन्तर बनी रहनी चाहिये। आगे पाँचवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि जिनका मन समतामें स्थित हो गया है उन लोगोंने जीवित अवस्थामें ही संसारको जीत लिया है क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है अतः उनकी स्थिति ब्रह्ममें ही है। समताका नाम योग है यह योगकी परिभाषा है। इसीको आगे छठे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें कहेंगे कि दुःखोंके संयोगका जिसमें वियोग है उसका नाम योग है। ये दोनों परिमाषाएँ वास्तवमें एक ही हैं। जैसे दादकी बीमारीमें खुजलीका सुख होता है और जलनका दुःख होता है पर ये दोनोंही बीमारी होनेसे दुःखरूप है ऐसे ही संसारके सम्बन्धसे होनेवाला सुख और दुःख दोनों ही वास्तवमें दुःखरूप हैं। ऐसे संसारसे सम्बन्धविच्छेदका नाम ही दुःखसंयोगवियोग है। अतः चाहे दुःखोंके संयोगका वियोग अर्थात सुखदुःखसे रहित होना कहें चाहे सिद्धिअसिद्धिमें अर्थात् सुखदुःखमें सम होना कहें एक ही बात है।इस श्लोकका तात्पर्य यह हुआ कि स्थूल सूक्ष्म और कारणशरीरसे होनेवाली मात्र क्रियाओंको केवल संसारकी सेवारूपसे करना है अपने लिये नहीं। ऐसा करनेसे ही समता आयेगी। बुद्धि और समतासम्बन्धी विशेष बात बुद्धि दो तरहकी होती है अव्यवसायात्मिका और व्यवसायात्मिका। जिसमें सांसारिक सुख भोग आराम मानबड़ाई आदि प्राप्त करनेका ध्येय होता है वह बुद्धि अव्यवसायात्मिका होती है (गीता 2। 44)। जिसमें समताकी प्राप्ति करनेका अपना कल्याण करनेका ही उद्देश्य रहता है वह बुद्धि व्यवसायात्मिका होती है (गीता 2। 41)। अव्यसायात्मिका बुद्धि अनन्त होती है और व्यवसायात्मिका बुद्धि एक होती है। जिसकी बुद्धि अव्यवसायात्मिका होती है वह स्वयं अव्यवसायी (अव्यवसित) होता है  बुद्धयोऽव्यवसायिनाम्  (2। 41) तथा वह संसारी होता है। जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होती है वह स्वयं व्यवसायी (व्यवसित) होता है  व्यवसितो हि सः  (9। 30) तथा वह साधक होता है।समता भी दो तरहकी होती है साधनरूप समता और साध्यरूप समता। साधनरूप समता अन्तःकरणकी होती है और साध्यरूप समता परमात्मस्वरूपकी होती है। सिद्धिअसिद्धि अनुकूलताप्रतिकूलता आदिमें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें रागद्वेषका न होना साधनरूप समता है जिसका वर्णन गीतामें अधिक हुआ है। इस साधनरूप समतासे जिस स्वतःसिद्ध समताकी प्राप्ति होती है वह साध्यरूप समता है जिसका वर्णन इसी अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें  तदा योगमवाप्स्यसि  पदोंसे हुआ है।अब इन चारों भेदोंको यों समझें कि एक संसारी होता है और एक साधक होता है एक साधन होता है और एक साध्य होता है। भोग भोगना और संग्रह करना यही जिसका उद्देश्य होता है वह संसारी होता है। उसकी एक व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती प्रत्युत कामनारूपी शाखाओंवाली अनन्त बुद्धियाँ होती हैं।मेरेको तो समताकी प्राप्ति ही करनी है चाहे जो हो जाय ऐसा निश्चय करनेवालेकी व्यवसायात्मिका बुद्धि होती है। ऐसा साधक जब व्यवहारक्षेत्रमें आता है तब उसके सामने सिद्धिअसिद्धि लाभहानि अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आदि आनेपर वह उनमें सम रहता है रागद्वेष नहीं करता। इस साधनरूप समतासे वह संसारसे ऊँचा उठ जाता है  इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः  (गीता 5। 19 का पूर्वार्ध)। साधनरूप समतासे स्वतःसिद्ध समरूप परमात्माकी प्राप्ति हो जाती है  निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः  (गीता 5। 19 का उत्तरार्ध)। सम्बन्ध   उन्तालीसवेंसे अड़तालीसवें श्लोकतक जिस समबुद्धि वर्णन हुआ है सकामकर्मकी अपेक्षा उस समबुद्धिकी श्रेष्ठता आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.48।।अतश्च कर्मणीति। कर्ममात्रे त्वं व्यापृतो भव न तु कर्मफलेषु। ननु कर्मणि कृते ( omits कृते N substitutes जाते) नान्तरीयकतयैव फलमापततीति मैवम्। तत्र हि यदि त्वं फलकामनाकालुष्यव्याप्तो भवसि तदा कर्मणां फलं प्रति हेतुत्वम्। यत् अप्रार्थ्यमानं फलं तत् (S N omit तत्) ज्ञानं नानिच्छोस्तत् इति। कर्माभावेन यः संगः स एव गाढग्रहरूपो मिथ्याज्ञानस्वरूपः इति त्याज्य एव ( N इत्यत्याज्य एव)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.48।।आसक्तिरकरणे न युक्ता चेत्तर्हि क्लेशात्मकं कर्म किमुद्दिश्य कर्तव्यमित्याशङ्कामनूद्य श्लोकान्तरमवतारयति  यदीत्यादिना।  वक्ष्यमाणयोगमुद्दिश्य तन्निष्ठो भूत्वा कर्माणि क्लेशात्मकान्यपि विहितत्वादनुष्ठेयानीत्याह  योगस्थः सन्निति।  कर्मानुष्ठानस्योद्देश्यं दर्शयति  केवलमिति।  फलान्तरापेक्षामन्तरेणेश्वरार्थं तत्प्रसादनार्थमनुष्ठानमित्यर्थः। तर्हीश्वरसंतोषोऽभिलाषगोचरीभूतो भविष्यति नेत्याह  तत्रापीति।  ईश्वरप्रसादनार्थे कर्मानुष्ठाने स्थितेऽपीत्यर्थः। सङ्गं त्यक्त्वा कुर्विति पूर्वेण संबन्धः। आकाङ्क्षितं पूरयित्वा सिद्धिशब्दार्थमाह  फलेति।  तद्विपर्ययजा सत्त्वाशुद्धिजन्या। ज्ञानप्राप्तिलक्षणेति यावत्। कर्माननुतिष्ठतो योगमुद्दिश्य शेषतया प्रकृतमाकाङ्क्षापूर्वकं प्रकटयति  कोऽसावित्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.48।।कर्मण्येव इत्यनेनयोगस्थः इत्यस्य गतार्थतापरिहारार्थमाह  पूर्वे ति। निष्कामनादिविशिष्टानि कर्माण्येव योगः। अतोयोगस्थः इत्यनेनैव लब्धं पुनःकुरु कर्माणि इति किमर्थमुच्यते इत्यत आह  योगस्थ  इति। ज्ञानोपायमनुतिष्ठन्नित्यर्थः। कर्मसम्बन्धं त्यक्त्वा कर्माणि कुर्वित्येतद्व्याहतमित्यत आह  सङ्ग मिति।ईश्वरो मे प्रसीदंतु इत्यभिसन्धिमपि त्यक्त्वा इति व्याख्यानं पूर्वेणैव निरस्तम्। तत एवेति परामर्शसौकर्याय त्यक्त्वेत्यनुवादः कृतः।सङ्गं त्यक्त्वासिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा इति द्वयमुक्त्वासमत्वं योग उच्यते इति एकस्यैव ग्रहणमयुक्तम्। तथा सति सङ्गत्यागस्यायोगत्वप्रसङ्गादित्यत आह  तत  इति सङ्गत्यागादेव। एतयोः कार्यकारणभावात्कार्ये गृहीते कारणमर्थाद्गृहीतमिति भावः। ननु समत्वयोगयोर्भेदः केन शङ्कितः येनसमत्वं योग उच्यते इति तयोरैक्यमुच्यते इत्यत आह   स एवे ति।योगस्थः इत्युक्ते को योग इत्यपेक्षायां भगवतासङ्गं त्यक्त्वा ৷৷. सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा इति योगो व्याख्यातः। मन्दास्तु पृथगेवैते विशेषणे कल्पयिष्यन्तीति तदनुजिघृक्षया इदमुदितमिति भावः। स एव यत्समत्वमिति शेषः। योगैकदेशे योगशब्दः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.48।।पूर्वश्लोकं स्पष्टयति योगस्थ इति। योगस्थः उपायस्थः। सङ्गं फलस्नेहं त्यक्त्वा। तत एव सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा। स एव च मयोक्तो योगः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.48।।राज्यबन्धुप्रभृतिषु  सङ्गं त्यक्त्वा  युद्धादीनि  कर्माणि योगस्थः कुरु।  तदन्तर्भूतविजयादि सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा  कुरु। तद् इदं सिद्ध्यसिद्ध्योः  समत्वम्  योगस्थ इत्यत्र योगशब्देन  उच्यते। योगः  सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वरूपं चित्तसमाधानम्।किमर्थम् इदम् असकृद् उच्यते इत्यत आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.48।।  योगस्थः  सन्  कुरु कर्माणि  केवलमीश्वरार्थम् तत्रापि ईश्वरो मे तुष्यतु इति  सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।  फलतृष्णाशून्येन क्रियमाणे कर्मणि सत्त्वशुद्धिजा ज्ञानप्राप्तिलक्षणा सिद्धिः तद्विपर्ययजा असिद्धिः तयोः  सिद्ध्यसिद्ध्योः  अपि  समः  तुल्यः  भूत्वा  कुरु कर्माणि। कोऽसौ योगः यत्रस्थः कुरु इति उक्तम् इदमेव तत् सिद्ध्यसिद्ध्योः  समत्वं योगः उच्यते।।यत्पुनः समत्वबुद्धियुक्तमीश्वराराधनार्थं कर्मोक्तम् एतस्मात्कर्मणः

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【 Verse 2.49 】

▸ Sanskrit Sloka: दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनञ्जय | बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणा: फलहेतव: ||

▸ Transliteration: dūreṇa hyavaraṁ karma buddhiyogād dhanañjaya | buddhau śaraṇamanviccha kṛpaṇāḥ phalahetavaḥ ||

▸ Glossary: dūreṇa hi avaraṁ: far superior; karma: activities; buddhiyogāt: based on the yoga of knowledge; dhanañjaya: O conqueror of wealth; buddhau: in such wisdom; śaraṇam: full surrender; anviccha: desire; kṛpaṇāḥ: wretched; phala- hetavaḥ: those desiring fruit of action

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.49 O Dhanañjaya, beyond the action with selfish motive is Yoga (of action) in wisdom [buddhiyoga]. Wretched are those whose motive is the fruit (outcome); Surrender yourself fully to the wisdom of completion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.49।।बुद्धियोग(समता) की अपेक्षा सकामकर्म दूरसे (अत्यन्त) ही निकृष्ट है। अतः हे धनञ्जय तू बुद्धि (समता) का आश्रय ले क्योंकि फलके हेतु बननेवाले अत्यन्त दीन हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.49।। इस बुद्धियोग की तुलना में(सकाम) कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं? इसलिये हे धनंजय तुम बद्धि की शरण लो फल की इच्छा करनेवाले कृपण (दीन) हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.49 दूरेण by far? हि indeed? अवरम् inferior? कर्म action or work? बुद्धियोगात् than the Yoga of wisdom? धनञ्जय O Dhananjaya? बुद्धौ in wisdom? शरणम् refuge? अन्विच्छ seek? कृपणाः wretched? फलहेतवः seekers after fruits.Commentary Action done with evenness of mind is Yoga of wisdom. The yogi who is established in the Yoga of widdom is not affected by success or failure. He does not seek fruits of his actions. He has poised reason. His reason is rooted in the Self. Action performed by one who expects fruits for his actions? is far inferior to the Yoga of wisdom wherein the seeker does not seek fruits because the former leads to bondage and is the cause of birth and death. (Cf.VIII.18).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.49. O Dhananjaya ! The inferior action stays away at a distance due to Yoga of (one's contact with) determining faculty; in the determining faculty you must seek refuge; wretched are those who constitute the causes for the fruits of action.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.49 Physical action is far inferior to an intellect concentrated on the Divine. Have recourse then to Pure Intelligence. It is only the petty-minded who work for reward.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.49 Action with attachment is far inferior, O Arjuna, to action done with evenness of mind. Seek refuge in evenness of mind. Miserable are they who act with a motive for results.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.49 O Dhananjaya, indeed, action is ite inferior to the yoga of wisdom. Take resort to wisdom. Those who thirst for rewards are pitiable.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.49 Far lower than the Yoga of wisdon is action, O Arjuna. Seek thou refuge in wisdom; wretched are they whose motive is the fruit.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.49 Durena etc. Due to the contact (one has) with determining faculty [one's] inferior action i.e., the action that bears bad fruits and is empty, remains far away [from him]. Therefore seek i.e., pray for a refuge in the determining faculty of that nature, on account of which that determining faculty is gained.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.49 All other kinds of action are far inferior to those done with evenness of mind, which consists in the renunciation of the main result and with eanimity towards success or failure in respect of the secondary results. Between the two kinds of actions, the one with eanimity and the other with attachment, the former associated with eanimity removes all the sufferings of Samsara and leads to release which is the highest object of human existence. The latter type of actions, which is pursued with an eye on results, leads one to Samsara whose character is endless suffering. Thus when an act is being done, take refuge in Buddhi (evenness of mind). Refuge means abode. Live in that Buddhi, is the meaning. 'Miserable are they who act with a motive for results': it means, 'Those who act with attachment to the results, etc., are miserable, as they will continue in Samsara.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.49 Then again, O Dhananjaya, as against action performed with eanimity of mind for adoring God, karma, action undertaken by one longing for the results; is, hi, indeed; durena, ite, by far; avaram, inferior, very remote; buddhi-yogat, from the yoga of wisdom, from actions undertaken with eanimity of mind, because it (the former) is the cause of birth, death, etc. Since this is so, therefore, saranam anviccha, take resort to, seek shelter; buddhau, under wisdom, which relates to Yoga, or to the Conviction about Reality that arises from its (the former's) maturity and which is the cause of (achieving) fearlessness. The meaning is that you should resort to the knowledge of the supreme Goal, because those who under take inferior actions, phala-hetavah, who thirst for rewards, who are impelled by results; are krpanah, pitiable, according to the Sruti, 'He, O Gargi, who departs from this world without knowing this Immutable, is pitiable' (Br. 3.8.10). [See note under 2.7.-Tr.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.49।। कर्मफल की चिन्ताओं से मुक्त शान्त मन से किया हुआ कर्म निश्चित रूप से चिन्तित क्षुब्ध मन से किए गये कर्म से श्रेष्ठतर होता है। इस श्लोक में प्रयुक्त बुद्धियोग शब्द से कुछ व्याख्याकारों को एक और नया योग गीता में उपदेश किया गया ज्ञात होता है। परन्तु मेरे अपने विचार के अनुसार ऐसा अर्थ खींचतान कर किया हुआ प्रतीत होता है। उपनिषदों में अन्तकरण की निश्चयात्मक वृत्ति को बुद्धि तथा संकल्पात्मक वृत्ति को मन की संज्ञा दी गयी है। संदेह और विक्षेप की स्थिति में वृत्तियों को मन कहते हैं एकाग्रता निश्चय एवं शान्ति की स्थिति में अन्तकरण की वृत्ति को बुद्धि कहा जाता है। अत बुद्धियोग का अर्थ हुआ बुद्धि के निश्चित किये अर्थ में (कार्य में) दृढ़ता से स्थिर होना। निश्चय ही दृढ़ता मन का बुद्धि के अनुशासन में रहना तथा अन्तर्बाह्य परिस्थितियों का स्वामी होना बुद्धियोग के लक्षण हैं। जीवन के परम लक्ष्य को आँखों से ओझल किये बिना प्राप्त कर्तव्यों का पालन ही बुद्धियोग है।गीता की सामान्य प्रस्तावना जिसमें व्यक्तित्व का विघटन एवं वासनाक्षय के द्वारा उसके संगठन का विवेचन किया गया है के प्रकाश में बुद्धियोग का अर्थ यह हो सकता है साधक का जीवन में बुद्धि के अनुसार रहने का सतत् प्रयत्न मन को बुद्धि के अनुशासन में लाकर उसके निर्देशानुसार काम करने के प्रयत्न को बुद्धियोग कहते हैं। इस प्रकार पूर्वार्जित वासनाओं के क्षय द्वारा अहंकार का नाश होता है और उसके नाश का अर्थ है बुद्धियोग में स्थिति। अत यहाँ अर्जुन को बुद्धि की शरण में जाने का उपदेश दिया गया है।बुद्धियोग का आश्रय ग्रहण करने में एक प्रबल कारण है। यदि मन की प्रवृत्तियों के अनुसार ही कर्म करते रहे तो चित्त में असंख्य विक्षेप तो उत्पन्न होते ही हैं परन्तु साथ ही नयीनयी वासनाओं का संचय भी होता है जिनका सघन आवरण आत्मस्वरूप पर पड़ता है। भगवान् ऐसे लोगों को कृपण कहते हैं। वास्तव में वे ही दीन हैं । इसके विपरीत बुद्धियोग में स्थित साधक निस्वार्थ भाव से कर्म करता हुआ वासनाओं के आवरण को नष्ट कर निर्मल मन से आत्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव करता है।अब समभाव में रहकर कर्तव्य पालन करने वाले को क्या फल मिलता है वह जानो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.49।।   काम्यं त्वतिनिकृष्टमित्याह  दूरेणेति।  दूरेण विप्रकर्षेणावरमधमफलाभिसंधिनानुष्ठीयमानं कर्म बुद्धियोगात्समत्वबुद्धियुक्तादीश्वराराधनार्थात्कर्मणः जन्मादिहेतुत्वाद्बुद्धियोगात् आत्मबुद्धिसाधनभूतात्समत्वलक्षणाद्योगादिति वाऽर्थः। यतएवमतो बुद्धौ समत्वबुद्धिं सांख्यबुद्धिं वा शरणमाश्रयं अभयप्राप्तेः परम्परया साक्षाद्व कारणमन्विछ प्रार्थयस्व। शरणो भवेत्यर्थः। बुद्धौ शरणं त्रातारमीश्वरमित्यर्थस्त्वप्रक्रान्तार्थकल्पनया विशेष्याध्याहारेण च ग्रस्तोऽत आचार्यैर्न प्रदर्शितः। यतः कारणादवरं कर्म कुर्वाणा दीनाः यतः फलहेतवः फलतृष्णायुक्ताःयो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः धनं त्वया हृतं तेन युधिष्ठिरेण स्वाराज्यकामनया राजसूयकर्मानुष्ठितं तस्य फलं भवद्भिः पूर्वमनुभूतमधुना चोपस्थितमतः काम्यं कर्मात्यधममिति सूचयन्संबोधयति धनंजयेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.49।।ननु किं कर्मानुष्ठानमेव पुरुषार्थो येन निष्फलमेव सदा कर्तव्यमित्युच्यतेप्रयोजनमनुद्दिश्य न मन्दोऽपि प्रवर्तते इति न्यायात् तद्वरं फलकामनयैव कर्मानुष्ठानमिति चेन्नेत्याह बुद्धियोगात् आत्मबुद्धिसाधनभूतान्निष्कामकर्मयोगात् दूरेणातिविप्रकर्षेणावरमधमं कर्म फलाभिसंधिना क्रियमाणं जन्ममरणहेतुभूतं अथवा परमात्मबुद्धियोगाद्दूरेणावरं सर्वमपि कर्म। हि यस्मात् हे धनंजय तस्मात् बुद्धौ परमात्मबुद्धौ सर्वानर्थनिवर्तकायां शरणं प्रतिबन्धकपापक्षयेण रक्षकं निष्कामकर्मयोगम्। अन्विच्छ कर्तुमिच्छ। ये तु फलहेतवः फलकामा अवरं कर्म कुर्वन्ति ते कृपणाः सर्वदा जन्ममरणादिघटीयन्त्रभ्रमणेन परवशाः। अत्यन्तदीना इत्यर्थः।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः। तथाच त्वमपि कृपणो माभूः किंतु सर्वानर्थनिवर्तकात्मज्ञानोत्पादकं निष्कामकर्मयोगमेवानुतिष्ठेत्यभिप्रायः। यथाहि कृपणा जना अतिदुःखेन धनमर्जयन्तो यत्किंचिद्दृष्टसुखमात्रलोभेन दानादिजनितं महत्सुखमनुभवितुं न शक्नुवन्तीत्यात्मानमेव वञ्चयन्ति तथा महता दुःखेन कर्माणि कुर्वाणाः क्षुद्रफलमात्रलोभेन परमानन्दानुभवेन वञ्चिता इत्यहो दौर्भाग्यं मौढ्यं च तेषामिति कृपणपदेन ध्वनितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.49।।इदमेव बुद्धियोगं स्तौति  दूरेणेति।  कर्मफलकामेन क्रियमाणं बुद्धियोगात्पूर्वोक्तान्निष्कामात्कर्मणः दूरेण हि प्रसिद्धं अवरं अत्यन्तनिकृष्टं अतो बुद्धौ योगरूपायां तत्फलभूतायां सांख्यरूपायां वा तन्निमित्तं शरणं रक्षितारं आश्रयं वा ईश्वरमन्विच्छ प्रार्थयस्व। तत्प्रीत्यर्थं कर्माणि कुर्वित्यर्थः। यतः फलहेतवः फलमेव हेतुः प्रवर्तकं येषां तादृशाः फलतृष्णावन्तः कृपणा दीना भवन्ति।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.49।।नन्वेवं चेत्तदा कथं न तत्र सर्वप्रवृत्तिः इत्याशङ्क्याह दूरेणेति। धनञ्जय मद्विभूतिरूप तथा कर्मायोग्यबुद्धियोगात् दूरेण कृतं कर्म फलाद्यर्थकृतम् न तु मदाज्ञारूपत्वेन तदवरमपकृष्टमित्यर्थः। हीति युक्तोऽयमर्थः। भगवदाज्ञाव्यतिरिक्तत्वेन फलेच्छया कृतकर्मणो नीचत्वमेव। तस्मात्तदपकृष्टानां प्राकृतानामेव योग्यं नोत्कृष्टानां मदंशानामिति धनञ्जयसम्बोधनेन ज्ञापितम् तेनात्राधिकाराभावान्न सर्वेषां प्रवृत्तिरिति भावः। यस्मात्ते नीचाः सात्त्विकाधिकाररहितानां चाप्रवृत्तिः त्वं च मदंशत्वात् बुद्धियोगयोग्य इति बुद्धियोगाय यतस्वेत्याह बुद्धाविति। बुद्धौ बुद्धियोगनिमित्तमीश्वरं शरणमन्विच्छ अनुतिष्ठ। ननु सकामकर्त्तारोऽपीश्वरशरणमिच्छन्तीत्यत्र को विशेषः इत्याशङ्क्याह कृपणा इति। फलहेतवः सकामाः। कृपणा लुब्धा दीना इत्यर्थः। नहि लुब्धैरहं प्राप्तः। अत एव श्रुतौ ब्रह्मभूतस्यैव ब्रह्मप्राप्तिर्निरूपिता ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्नोति ब्रह्माप्येति बृ.उ.4।4।6।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.49।।काम्यं तु कर्मातिनिकृष्टमित्याह  दूरेणेति।  बुद्ध्या व्यवसायात्मिकया कृतः कर्मयोगो बुद्धियोगः। बुद्धिसाधनभूतो वा तस्मात्सकाशादन्यत्काम्यं कर्म दूरेणावरमत्यन्तमपकृष्टम्। हि यस्मादेवं तस्माद्बुद्धौ ज्ञाने शरणमाश्रयं कर्मयोगमन्विच्छानुतिष्ठ। यद्वा बुद्धौ शरणं त्रातारमीश्वरमाश्रयेत्यर्थः। फलहेतवस्तु सकामा नराः कृपणा दीनाः।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.49।।अयुक्तं कर्म व्यवसायबुद्धियोगादवरमपकृष्टं हि यतः अतो बुद्धौ बुद्धिनिमित्तं बुद्धिविषये वा शरणं कञ्चिदन्वेषय बुद्धावाश्रयं वाऽन्विच्छ गृहाणेत्यर्थः। कर्मणोऽवरत्वं दर्शयति तत्र फलहेतवः कृपणा इति फलमेव हेतुः प्रकृतिकारण येषां ते जनाः कृपणाः प्राप्तेऽपि फले पुनः सतृष्णाः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.49।।जो समत्वबुद्धिसे ईश्वराराधनार्थ किये जानेवाले कर्म हैं उनकी अपेक्षा ( सकाम कर्म निकृष्ट हैं यह दिखलाते हैं ) हे धनंजय बुद्धियोगकी अपेक्षा अर्थात् समत्वबुद्धिसे युक्त होकर किये जानेवाले कर्मोंकी अपेक्षा कर्मफल चाहनेवाले सकामी मनुष्योंद्वारा किये हुए कर्म जन्ममरण आदिके हेतु होनेके कारण अत्यन्त ही निकृष्ट हैं। इसलिये तू योगविषयक बुद्धिमें या उसके परिपाकसे उत्पन्न होनेवाली सांख्यबुद्धिमें शरण आश्रय अर्थात् अभयप्राप्तिके हेतुको पानेकी इच्छा कर। अभिप्राय यह कि परमार्थज्ञानकी शरणमें जा। क्योंकि फलतृष्णासे प्रेरित होकर सकाम कर्म करनेवाले कृपण हैं दीन हैं। श्रुतिमें भी कहा है हे गार्गी जो इस अक्षर ब्रह्मको न जानकर इस लोकसे जाता है वह कृपण है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.49।। व्याख्या  दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगात्   बुद्धियोग अर्थात् समताकी अपेक्षा सकामभावसे कर्म करना अत्यन्त ही निकृष्ट है। कारण कि कर्म भी उत्पन्न और नष्ट होते हैं तथा उन कर्मोंके फलका भी संयोग और वियोग होता है। परन्तु योग (समता) नित्य है  उसका कभी वियोग नहीं होता। उसमें कोई विकृति नहीं होती। अतः समताकी अपेक्षा सकामकर्म अत्यन्त ही निकृष्ट हैं।सम्पूर्ण कर्मोंमें समता ही श्रेष्ठ है। समताके बिना तो मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं तथा उन कर्मोंके परिणाममें जन्मतेमरते और दुःख भोगते रहते हैं। कारण कि समताके बिना कर्मोंमें उद्धार करनेकी ताकत नहीं है। कर्मोंमें समता ही कुशलता है। अगर कर्मोंमें समता नहीं होगी तो शरीरमें अहंताममता हो जायगी और शरीरमें अहंताममता होना ही पशुबुद्धि है। भागवतमें शुकदेवजीने राजा परीक्षित्से कहा है  त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि।  (12। 5। 2) अर्थात् हे राजन् अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा।  दूरेण  कहनेका तात्पर्य है कि जैसे प्रकाश और अन्धकार कभी समकक्ष नहीं हो सकते ऐसे ही बुद्धियोग और सकामकर्म भी कभी समकक्ष नहीं हो सकते। इन दोनोंमें दिनरातकी तरह महान् अन्तर है। कारण कि बुद्धियोग तो परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है और सकामकर्म जन्ममरण देनेवाला है। बुद्धौ शरणमन्विच्छ   तू बुद्धि (समता) की शरण ले। समतामें निरन्तर स्थित रहना ही उसकी शरण लेना है। समतामें स्थित रहनेसे ही तुझे स्वरूपमें अपनी स्थितिका अनुभव होगा। कृपणाः फलहेतवः   कर्मोंके फलका हेतु बनना अत्यन्त निकृष्ट है। कर्म कर्मफल कर्मसामग्री और शरीरादि करणोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेना ही कर्मफलका हेतु बनना है। अतः भगवान्ने सैंतालीसवें श्लोकमें  मा कर्मफलहेतुर्भूः  कहकर कर्मोंके फलका हेतु बननेमें निषेध किया है।कर्म ओर कर्मफलका विभाग अलग है तथा इन दोनोंसे रहित जो नित्य तत्त्व है उसका विभाग अलग है। वह नित्य तत्त्व अनित्य कर्मफलके आश्रित हो जाय इसके समान निकृष्टता और क्या होगी सम्बन्ध   पूर्व श्लोकमें जिस बुद्धिके आश्रयकी बात बतायी अब आगेके श्लोकमें उसी बुद्धिके आश्रयका फल बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.49।।किं तर्हि योगस्थ इति। योगे स्थित्वा कर्माणि कुरु। साम्यं च योगः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.49।।किमिति योगस्थेन तत्त्वज्ञानमुद्दिश्य कर्म कर्तव्यं फलाभिलाषेऽपि तदनुष्ठानस्य सुलभत्वादित्याशङ्क्य यथोक्तयोगयुक्तं कर्म स्तुवन्ननन्तरश्लोकमुत्थापयति  यत्पुनरिति।  अवरं कर्म बुद्धिसंबन्धविरुद्धमिति शेषः। बुद्धियुक्तस्य बुद्धियोगाधीनं प्रकर्षं सूचयति  बुद्धीति।  बुद्धिसंबन्धासंबन्धाभ्यां कर्मणि प्रकर्षनिकर्षयोर्भावे करणीयं नियच्छति  बुद्धाविति।  यत्तु फलेच्छयापि कर्मानुष्ठानं सुकरमिति तत्राह  कृपणेति।  निकृष्टं कर्मैव विशिनष्टि  फलार्थिनेति।  कस्मात्प्रतियोगिनः सकाशादिदं निकृष्टमित्याशङ्क्य प्रतीकमुपादाय व्याचष्टे  बुद्धीत्यादिना।  फलाभिलाषेण क्रियमाणस्य कर्मणो निकृष्टत्वे हेतुमाह  जन्मेति।  समत्वबुद्धियुक्तात्कर्मणस्तद्धीनस्य कर्मणो जन्मादिहेतुत्वेन निकृष्टत्वे फलितमाह  यत इति।  योगविषया बुद्धिः समत्वबुद्धिः। बुद्धिशब्दस्यार्थान्तरमाह  तत्परिपाकेति।  तच्छब्देन समत्वबुद्धिसमन्वितं कर्म गृह्यते। तस्य परिपाकस्तत्फलभूता बुद्धिशुद्धिः। शरणशब्दस्य पर्यायं गृहीत्वा विवक्षितमर्थमाह  अभयेति।  सप्तमीमविवक्षित्वा द्वितीयं पक्षं गृहीत्वा वाक्यार्थमाह  परमार्थेति।  तथाविधज्ञानशरणत्वे हेतुमाह  यत इति।  फलहेतुत्वं विवृणोति  फलेति।  तेन परमार्थज्ञानशरणतैव युक्तेति शेषः। परमार्थज्ञानबहिर्मुखानां कृपणत्वे श्रुतिं प्रमाणयति  यो वा इति।  अस्थूलादिविशेषणमेतदित्युच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.49।।ननु योगोपदेशमुपक्रम्य कर्मणो बुद्धियोगादवरत्वं किमर्थमुच्यते इत्यत आह  इतश्चे ति। युज्यस्व प्रयतस्व।यावानर्थः 2।46 इति कर्मफलस्य ज्ञानफलापेक्षयाऽल्पत्वाद्योगाय युज्यस्वेत्युक्तम्। अत्र तु तत्रैव हेत्वन्तरमुच्यते  बुद्धियोगा दिति षष्ठीसमासप्रतिनिरासायाह  बुद्धी ति। लक्षणशब्दः स्वरूपार्थः। पुरुषार्थसम्बन्धिना कर्मणा सह निर्देशे तथाभूतस्य ज्ञानस्यैव ग्रहणं युक्तमिति भावः। उपायात्पुरुषार्थस्य। दूरशब्दो विप्रकर्षवाची तस्यात्र कथमन्वयः इत्यत आह  दूरेणे ति। उक्तं कर्मणो ज्ञानादतीवावरत्वं इदानीमुपपादनीयं तद्विहाय किमिदं तृतीयपादेनोच्यते इत्यतः साध्यनिर्देशोऽयमिति सूचयन् व्याचष्टे  अत  इति। ज्ञाने स्थितिं तदुपाययोगानुष्ठानलक्षणाम्। फलहेतूनां कृपणत्ववर्णनमनुपयुक्तमित्यत आह  फल मिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.49।।इतश्च योगाय युज्यस्वेत्यत आह दूरेणेति। बुद्धियोगाज्ज्ञानलक्षणादुपायात्। दूरेणातीव। अतो बुद्धौ शरणं ज्ञाने स्थितिम्। फलं कर्म कृतौ हेतुर्येषां ते फलहेतवः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.49।।यः अयं प्रधानफलत्यागविषयः अवान्तरफलसिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वविषयश्च बुद्धियोगः तद्युक्तात् कर्मणः इतरत्  कर्मदूरेण अवरम्।  महद् एतद् द्वयोः उत्कर्षापकर्षरूपं वैरूप्यम् उक्तबुद्धियोगयुक्तं कर्म निखिलं सांसारिकं दुःखं विनिवर्त्य परमपुरुषार्थलक्षणं च मोक्षं प्रापयति इतरद् अपरिमितदुःखरूपं संसारम् इति अतः कर्मणि क्रियमाणे उक्तायां  बुद्धौ शरणम् अन्विच्छ।  शरणं वासस्थानम् तस्याम् एव बुद्धौ वर्तस्व इत्यर्थः।  कृपणाः फलहेतवः  फलसङ्गादिना कर्म कुर्वाणाः कृपणाः संसारिणो भवेयुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.49।।  दूरेण  अतिविप्रकर्षेण अत्यन्तमेव  हि अवरम्  अधमं निकृष्टं कर्म फलार्थिना क्रियमाणं  बुद्धियोगात्  समत्वबुद्धियुक्तात् कर्मणः जन्ममरणादिहेतुत्वात्। हे  धनञ्जय  यत एवं ततः योगविषयायां  बुद्धौ  तत्परिपाकजायां वा सांख्यबुद्धौ  शरणम्  आश्रयमभयप्राप्तिकारणम्  अन्विच्छ  प्रार्थयस्व परमार्थज्ञानशरणो भवेत्यर्थः। यतः अवरं कर्म कुर्वाणाः  कृपणाः  दीनाः  फलहेतवः  फलतृष्णाप्रयुक्ताः सन्तः यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्माल्लोकात्प्रैति स कृपणः इति श्रुतेः।।समत्वबुद्धियुक्तः सन् स्वधर्ममनुतिष्ठन् यत्फलं प्राप्नोति तच्छृणु

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【 Verse 2.50 】

▸ Sanskrit Sloka: बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते | तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम् ||

▸ Transliteration: buddhiyukto jahātīha ubhe sukṛtaduṣkṛte | tasmādyogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||

▸ Glossary: buddhiyuktaḥ: even minded person; jahāti: gives up; iha: in this life; ubhe: both; sukṛta duṣkṛte: good and bad results; tasmāt: therefore; yogāya: for the sake of yoga; yujyasva: be so engaged; yogaḥ: yoga; karmasu: in all activities; kauśalam: art (of freeing the Self from the bondage of action)

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.50 Endowed with the wisdom of evenness of mind, move away from both good and evil deeds in this life. Devote yourself to yoga. Authenticity in action is yoga.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.50।।बुद्धि(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग(समता) में लग जा क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.50।। समत्वबुद्धि युक्त पुरुष यहां (इस जीवन में) पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों को त्याग देता है? इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ। कर्मों में कुशलता योग है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.50 बुद्धियुक्तः endowed with wisdom? जहाति casts off? इह in this life? उभे both? सुकृतदुष्कृते good and evil deeds? तस्मात् therefore? योगाय to Yoga? युज्यस्व devote thyself? योगः Yoga? कर्मसु in actions? कौशलम् skill.Commentary Work performed with motive towards fruits only can bind a man. It will bring the fruits and the performer of the action will have to take birth again in this mortal world to enjoy them. If work is performed with evennes of mind (the Yoga of wisdom? i.e.? united to pure Buddhi? intelligence or reason) with the mind resting in the Lord? it will not bind him it will not bring any fruit it is no work at all. Actions which are of a binding nature lose that nature when performed with eanimity of mind? or poised reason. The Yogi of poised reason attributes all actions to the Divine Actor within (Isvara or God).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.50. Whosoever is endowed with determining faculty-he casts off both of these viz., the good action and the bad action. Therefore strive for Yoga; Yoga is proficiency is action.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.50 When a man attains to Pure Reason, he renounces in this world the results of good and evil alike. Cling thou to Right Action. Spirituality is the real art of living.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.50 A man with evenness of mind discards here and now good and evil. Therefore endeavour for Yoga. Yoga is skill in action.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.50 Possessed of wisdom, one rejects here both virtue and vice. Therefore devote yourself to (Karma-) yoga. Yoga is skilfulness in action.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.50 Endowed with wisdom (evenness of mind), one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote thyself to Yoga; Yoga is skill in action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.50 Buddhiyuktah etc. Both indicates the mutual exclusion [of the good and bad actions]. Therefore [strive] for Yoga etc. : Working in that manner alone constitutes the supreme proficiency, by [working] in which manner the good action and the bad action perish. This is the idea here.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.50 He, who is established in evenness of mind in the performance of actions, relinishes good and evil Karmas which have accumulated from time immemorial causing bondage endlessly. Therefore acire this aforesaid evenness of mind (Buddhi Yoga). Yoga is skill in action. That is, this evenness of mind when one is engaged in action, is possible through great skill, i.e., ability.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.50 Listen to the result that one possessed of the wisdom of eanimity attains by performing one's own duties: Buddhi-yuktah, possessed of wisdom, possessed of the wisdom of eanimity; since one jahati, rejects; iha, here, in this world; ubhe, both; sukrta-duskrte, virtue and vice (righteousness and unrighteousness), through the purification of the mind and acisition of Knowledge; tasmat, therefore; yujyasva, devote yourself; yogaya, to (Karma-) yoga, the wisdom of eanimity. For Yoga is kausalam, skilfulness; karmasu, in action. Skilfulness means the attitude of the skilful, the wisdom of eanimity with regard to one's success and failure while engaged in actions (karma) called one's own duties (sva-dharma) with the mind dedicated to God. That indeed is skilfulness which, through eanimity, makes actions that by their very nature bind give up their nature! Therefore, be you devoted to the wisdom of eanimity.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.50।। भावनाओं की दुर्बलताओं से ऊपर उठकर जो पुरुष समत्व बुद्धियुक्त हो जाता है वह पाप और पुण्य दोनों के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। पाप और पुण्य मन की धारणायें हैं और उनकी प्रतिक्रियाएँ मन पर वासनाओं के रूप में अंकित होती हैं। मनरूपी विक्षुब्ध समुद्र के साथ जो व्यक्ति तादात्म्य नहीं करता वह वासनाओं की ऊँचीऊँची तरंगों के द्वारा न तो ऊपर फेंका जायेगा और न नीचे ही डुबोया जायेगा। यहाँ वर्णित मन का बुद्धि के साथ युक्त होना ही बुद्धियुक्त शब्द का अर्थ है।इस सम्पूर्ण प्रकरण में गीता का मानव मात्र को आह्वान है कि वह केवल इन्द्रियों के विषय स्थूल देह और मन के स्तर

Chapter 2 (Part 29)

पर ही न रहे जो उसके व्यक्तित्व का बाह्यतम पक्ष है। इनसे सूक्ष्मतर बुद्धि का उपयोग कर उसको अपने वास्तविक पुरुषत्व को व्यक्त करना चाहिये। प्राणियों की सृष्टि में केवल बौद्धिक क्षमताओं के कारण ही मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। जब तक मनुष्य प्रकृति के इस विशिष्ट उपहार का सम्यक् प्रकार से उपयोग नहीं करता तब तक वह अपने मनुष्यत्व के अधिकार से वंचित ही रह जाता है।अर्जुन से मानसिक उन्माद त्यागकर वीर पुरुष के समान परिस्थितियों का स्वामी बनकर रहने के लिये भगवान् कहते हैं। उस समय अर्जुन इतना भावुक और दुर्बल हो गया था कि वह अपनी व अन्यों के शारीरिक सुरक्षा की चिन्ता करने लगा था। विकास की सीढ़ी पर मनुष्यत्व को प्राप्त कर जो अपनी विशेष क्षमताओं का पूर्ण उपयोग करता है वही व्यक्ति जन्म जन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं के बन्धन से मुक्त हो जाता है। इसलिये तुम योग से युक्त हो जाओ यह भगवान् श्रीकृष्ण का उपदेश है। इसके पूर्व समत्व को योग कहा गया था। अब इस सन्दर्भ में व्यासजी योग की और विशद परिभाषा देते हैं कि कर्म में कुशलता योग है।किसी भी विषय के शास्त्रीय ग्रन्थ में यदि भिन्नभिन्न अध्यायों में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें दी गई हों तो समझने में कठिनाई और भ्रांति होगी। फिर धर्म के इस शास्त्रीय ग्रन्थ में एक ही शब्द की विभिन्न परिभाषायें कैसे बताई हुई हैं उपर्युक्त परिभाषा को ठीक से समझने पर इस समस्या का स्वयं समाधान हो जायेगा। योग की पूर्वोक्त परिभाषा यहाँ भी संग्रहीत है अन्यथा मन के समभाव का अर्थ अकर्मण्यता एवं शिथिलता उत्पन्न करने वाली मन की समता को ही कोई समझ सकता है। इस श्लोक में ऐसी त्रुटिपूर्ण धारणा को दूर करते हुये कहा गया है कि समस्त प्रकार के द्वन्द्वों में मन के सन्तुलन को न खोकर कुशलतापूर्वक कर्म करना ही कम्र्ायोग है।इस श्लोक के स्पष्टीकरण से श्रीकृष्ण का उद्देश्य ज्ञात होता है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करने पर वासनाओं का क्षय होता है। वासनाओं के दबाव से ही मन में विक्षेप उठते हैं। किन्तु वासना क्षय के कारण मन स्थिर और शुद्ध होकर मनन निदिध्यासन और आत्मानुभूति के योग्य बन जाता है।योग शब्द का इस अथ मेंर् प्रयोग कर व्यास जी हमारे मन में उसके प्रति व्याप्त भ्राँति को दूर कर देते हैं।समत्व भाव एवं कर्म में कुशलता की क्या आवश्यकता है उत्तर में कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.50।।   काम्यकर्मणोऽवरत्वमुक्त्वा निष्काम कर्मणः श्रैष्ठ्यमाह समत्वबुद्धियुक्तः सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेणोभे पुण्यपापे त्यजति सांख्यबुद्धिर्युक्त इति वा तस्माद्योगाय समत्वलक्षणकर्मयागानुष्टानार्थ षटस्व ज्ञानयोगप्राप्त्यर्थमिति वा। यस्माद्योगः समत्वलक्षणः कर्मसु सर्वेषु कौशलं बन्धकानामपि तेषामीश्वरार्पितचेतस्तया मोक्षपरत्वसंपादनचातुर्यं ज्ञानयोग इति वा। अस्मिन्पक्षे कर्मसु ज्ञानप्रतिबन्धकेषु फलाभिसंधिं विहाय ज्ञानलाभचातुर्यमिति व्याख्येयम्। तस्मात्समत्वयुक्तो भवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.50।।एवं बुद्धियोगाभावे दोषमुक्त्वा तद्भावे गुणमाह इह कर्मसु बुद्धियुक्तः समत्वबुद्ध्या युक्तो जहाति परित्यजति उभे सुकृतदुष्कृते पुण्यपापे सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण। यस्मादेवं तस्मात्समत्वबुद्धियोगाय त्वं युज्यस्व घटस्य उद्युक्तो भव। यस्मादीदृशः समत्वबुद्धियोग ईश्वरार्पितचेतसः कर्मसु प्रवर्तमानस्य कौशलं कुशलभावः यद्बन्धहेतूनामपि कर्मणां तदभावो मोक्षपर्यवसायित्वं च तन्महत्कौशलम्। समत्वबुद्धियुक्तः कर्मयोगः कर्मात्मापि सन् दुष्कर्मक्षयं करोतीति महाकुशलः त्वं तु न कुशलो यतश्चेतनोऽपि सन्सजातीयदुष्टक्षयं न करोषीति व्यतिरेकोऽत्र ध्वनितः। अथवा इह समत्वबुद्धियुक्ते कर्मणि कृते सति सत्त्वशुद्धिद्वारेण बुद्धियुक्तः परमात्मसाक्षात्कारवान्सन् जहात्युभे सुकृतदुष्कृते तस्मात्समत्वबुद्धियुक्ताय कर्मयोगाय युज्यस्व। यस्मात्कर्मसु मध्ये समत्वबुद्धियुक्तः कर्मयोगः कौशलं कुशलः। दुष्टकर्मनिवारणचतुर इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.50।।किञ्च  बुद्धीति।  बुद्धियुक्तः समत्वबुद्धियुक्तः योगाय समत्वबुद्धियोगाय युज्यस्व घटस्व। योगः सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वबुद्धिः कर्मसु बन्धकेष्वपि कौशलं बन्धनिवर्तकत्वसंपादनम्। ननु बुद्धियुक्तः कर्मभिर्दुष्कृतं त्यजतुधर्मेण पापमपनुदति इति श्रुतेः सुकृतं तु सजातीयत्वात्तैर्दुष्परिहरमिति कथमुभे सुकृतदुष्कृते जहातीत्युच्यते सत्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तिद्वारेति प्राञ्चः। अर्वाञ्चस्तु दुष्कृतत्यागमुक्तरीत्याभ्युपेत्य फलत्यागात्सुकृतत्यागोऽपि कर्मयोगिनो भवति। दुष्कृतफलवन्मोक्षप्रतिबन्धकतत्फलस्यानुत्पादात्। यत्तु आपस्तम्बोक्ताम्रवृक्षनिदर्शनेन नान्तरीयकं सुकृतफलमुक्तं न तत्फलत्वेनोपपद्यते नान्तरीयकत्वादेव। तस्मात्फलद्वारा मोक्षप्रतिबन्धके क्रियमाणे एव सुकृतदुष्कृते कर्मयोगी जहाति ज्ञानी तु संचिते अपि ते जहातीति तयोर्विशेषे इत्याहुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.50।।नन्वेवं बुद्धौ किं स्यात् इत्याशङ्क्याह बुद्धियुक्त इति। बुद्ध्या युक्त इहैव उभे सुकृतदुष्कृते जहाति।अयमर्थः मयि बुद्ध्या युक्त इह अस्मिन्नेव जन्मनि सुकृतफलं स्वर्गादि दुष्कृतफलं नरकं तत्साधने सुकृतदुष्कृते त्यजति। सुकृतमुत्तमफलार्थं करोमि दुष्कृतं भ्रमाज्जातं तत्फलभोगो मम भविष्यतीति न विचारयति। किन्तु यथा ईश्वरः प्रेरयति तथा करोमीति करोति तेन भक्तसाधनत्वं भवतीत्यर्थः। यस्माद्बुद्ध्याऽहं प्रसन्नः सन् भक्तिं ददामि तस्मात्त्वं योगाय म इति शेषः युज्यस्व यत्नं कुरु। ननु योगोऽपि कृतिसाध्यत्वात् कर्म एवेति पूर्वोक्तमध्यपातित्वात् किं योगेन इत्यत आह योग इति। कर्मसु कौशलं चातुर्यम् योग इत्यर्थः। मन्निष्ठत्वान्मद्दर्शनार्थं मनःस्थिरीकरणसाधकत्वाच्चातुर्यम्। साक्षाद्भक्त्यधिकारफलानि वा। मदाज्ञया कर्मकरणं योगः। एतदेव कर्मसु चातुर्यं यत्कृत्वाऽपि भक्तिसाधने प्रवेशनीयं तादृशो योग उत्तम इति। इदानीं तदधिकाराभावात्तथोपदिशति। अन्यथाकर्मसु इति पदं व्यर्थं स्यात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.50।।बुद्धियोगयुक्तस्तु श्रेष्ठ इत्याह  बुद्धीति।  सुकृतं स्वर्गादिप्रापकम् दुष्कृतं निरयादिप्रापकम् ते उभे इहैव जन्मनि परमेश्वरप्रसादेन जहाति त्यजति। तस्माद्योगाय तदर्थाय कर्मयोगाय युज्यस्व घटस्व। यतः कर्मसु यत्कौशलं बन्धकानामपि तेषामीश्वराराधनेन मोक्षपरत्वसंपादनचातुर्यं स एव योगः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.50।।एतद्बुद्धियोगयुक्त एव निर्द्वन्द्वो भवतीत्याह बुद्धियुक्त इति। उभे पुण्यपापे स्वर्णलोहबन्धनतुल्ये इहैव जहाति। तस्माद्योगायोक्तस्वरूपाय युक्तो भव। योगो हि कर्मसु कौशलं निर्बन्धनतावृत्तिसाधनमिति। गुणाविष्करणम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.50।।समत्वबुद्धिसे युक्त होकर स्वधर्माचरण करनेवाला पुरुष जिस फलको पाता है वह सुन समत्वयोगविषयक बुद्धिसे युक्त हुआ पुरुष अन्तःकरणकी शुद्धिके और ज्ञानप्राप्तिके द्वारा सुकृतदुष्कृतको पुण्यपाप दोनोंको यहीं त्याग देता है इसी लोकमें कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। इसलिये तू समत्वबुद्धिरूप योगकी प्राप्तिके लिये यत्न कर चेष्टा कर। क्योंकि योग ही तो कर्मोंमें कुशलता है अर्थात् स्वधर्मरूप कर्ममें लगे हुए पुरुषका जो ईश्वरसमर्पित बुद्धिसे उत्पन्न हुआ सिद्धिअसिद्धिविषयक समत्वभाव है वही कुशलता है। यही इसमें कौशल है कि स्वभावसे ही बन्धन करनेवाले जो कर्म हैं वे भी समत्व बुद्धिके प्रभावसे अपने स्वभावको छोड़ देते हैं अतः तू समत्वबुद्धिसे युक्त हो।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.49।। व्याख्या   दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगात्   बुद्धियोग अर्थात् समताकी अपेक्षा सकामभावसे कर्म करना अत्यन्त ही निकृष्ट है। कारण कि कर्म भी उत्पन्न और नष्ट होते हैं तथा उन कर्मोंके फलका भी संयोग और वियोग होता है। परन्तु योग (समता) नित्य है  उसका कभी वियोग नहीं होता। उसमें कोई विकृति नहीं होती। अतः समताकी अपेक्षा सकामकर्म अत्यन्त ही निकृष्ट हैं।सम्पूर्ण कर्मोंमें समता ही श्रेष्ठ है। समताके बिना तो मात्र जीव कर्म करते ही रहते हैं तथा उन कर्मोंके परिणाममें जन्मतेमरते और दुःख भोगते रहते हैं। कारण कि समताके बिना कर्मोंमें उद्धार करनेकी ताकत नहीं है। कर्मोंमें समता ही कुशलता है। अगर कर्मोंमें समता नहीं होगी तो शरीरमें अहंताममता हो जायगी और शरीरमें अहंताममता होना ही पशुबुद्धि है। भागवतमें शुकदेवजीने राजा परीक्षित्से कहा है  त्वं तु राजन् मरिष्येति पशुबुद्धिमिमां जहि।  (12। 5। 2) अर्थात् हे राजन् अब तुम यह पशुबुद्धि छोड़ दो कि मैं मर जाऊँगा।  दूरेण  कहनेका तात्पर्य है कि जैसे प्रकाश और अन्धकार कभी समकक्ष नहीं हो सकते ऐसे ही बुद्धियोग और सकामकर्म भी कभी समकक्ष नहीं हो सकते। इन दोनोंमें दिनरातकी तरह महान् अन्तर है। कारण कि बुद्धियोग तो परमात्माकी प्राप्ति करानेवाला है और सकामकर्म जन्ममरण देनेवाला है। बुद्धौ शरणमन्विच्छ   तू बुद्धि (समता) की शरण ले। समतामें निरन्तर स्थित रहना ही उसकी शरण लेना है। समतामें स्थित रहनेसे ही तुझे स्वरूपमें अपनी स्थितिका अनुभव होगा। कृपणाः फलहेतवः   कर्मोंके फलका हेतु बनना अत्यन्त निकृष्ट है। कर्म कर्मफल कर्मसामग्री और शरीरादि करणोंके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेना ही कर्मफलका हेतु बनना है। अतः भगवान्ने सैंतालीसवें श्लोकमें  मा कर्मफलहेतुर्भूः  कहकर कर्मोंके फलका हेतु बननेमें निषेध किया है।कर्म ओर कर्मफलका विभाग अलग है तथा इन दोनोंसे रहित जो नित्य तत्त्व है उसका विभाग अलग है। वह नित्य तत्त्व अनित्य कर्मफलके आश्रित हो जाय इसके समान निकृष्टता और क्या होगी सम्बन्ध   पूर्व श्लोकमें जिस बुद्धिके आश्रयकी बात बतायी अब आगेके श्लोकमें उसी बुद्धिके आश्रयका फल बताते हैं।।।2.50।। व्याख्या बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते  समतायुक्त मनुष्य जीवित अवस्थामें ही पुण्यपापका त्याग कर देता है अर्थात् उसको पुण्यपाप नहीं लगते वह उनसे रहित हो जाता है। जैसे संसारमें पुण्यपाप होते ही रहते हैं पर सर्वव्यापी परमात्माको वे पुण्यपाप नहीं लगते ऐसे ही जो समतामें निरन्तर स्थित रहता है उसको पुण्यपाप नहीं लगते (गीता 2। 38)।समता एक ऐसी विद्या है जिससे मनुष्य संसारमें रहता हुआ ही संसारसे सर्वथा निर्लिप्त रह सकता है। जैसे कमलका पत्ता जलसे ही उत्पन्न होता है और जलमें ही रहता है पर वह जलसे लिप्त नहीं होता ऐसे ही समतायुक्त पुरुष संसारमें रहते हुए भी संसारसे निर्लिप्त रहता है। पुण्यपाप उसका स्पर्श नहीं करते अर्थात् वह पुण्यपापसे असङ्ग हो जाता है।वास्तवमें यह स्वयं (चेतनस्वरूप) पुण्यपापसे रहित ही। केवल असत् पदार्थों शरीरादिके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही पुण्यपाप लगते हैं। अगर यह असत् पदार्थोंके साथ सम्बन्ध न जोड़े तो यह आकाशकी तरह निर्लिप्त रहेगा इसको पुण्यपापनहीं लगेंगे। तस्माद्योगाय युज्यस्व   इसलिये तुम योगमें लग जाओ अर्थात् निरन्तर समतामें स्थित रहो। वास्तवमें समता तुम्हारा स्वरूप है। अतः तुम नित्यनिरन्तर समतामें ही स्थित रहते हो। केवल रागद्वेषके कारण तुम्हारेको उस समताका अनुभव नहीं हो रहा है। अगर तुम हरदम समतामें स्थित न रहते तो सुख और दुःखका ज्ञान तुम्हें कैसे होता क्योंकि ये दोनों ही अलगअलग हैं। जब इन दोनोंका तुम्हें ज्ञान होता है तो तुम इनके आनेजानेमें सदा समरूपसे रहते हो। इसी समताका तुम अनुभव करो। योगः कर्मसु कौशलम्   कर्मोंमें योग ही कुशलता है अर्थात् कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धिमें और उन कर्मोंके फलके प्राप्तिअप्राप्तिमें सम रहना ही कर्मोंमें कुशलता है। उत्पत्ति विनाशशील कर्मोंमें योगके सिवाय दूसरी कोई महत्त्वकी चीज नहीं है।इन पदोंमें भगवान्ने योगकी परिभाषा नहीं बतायी है प्रत्युत योगकी महिमा बतायी है। अगर इन पदोंका अर्थ कर्मोंमें कुशलता ही योग है ऐसा किया जाय तो क्या आपत्ति है अगर ऐसा अर्थ किया जायगा तो जो बड़ी कुशलतासे सावधानीपूर्वक चोरी करता है उसका वह चोरीरूप कर्म भी योग हो जायगा। अतः ऐसा अर्थ करना अनुचित है। कोई कह सकता है कि हम तो विहित कर्मोंको ही कुशलतापूर्वक करनेका नाम योग मानते हैं। परन्तु ऐसा माननेसे मनुष्य कुशलतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये गये कर्मोंके फलमें बँध जायगा जिससे उसकी स्थिति समतामें नहीं रहेगी। अतः यहाँ कर्मोंमें योग ही कुशलता है ऐसा अर्थ लेना ही उचित है। कारण कि कर्मोंको करते हुए भी जिसके अन्तःकरणमें समता रहती है वह कर्म और उनके फलमें बँधेगा नहीं। इसलिये उत्पत्तिविनाशशील कर्मोंको करते हुए सम रहना ही कुशलता है बुद्धिमानी है। दूसरी बात पीछेके दो श्लोकोंमें तथा इस श्लोकके पूर्वार्धमें भी योग (समता) का ही प्रसङ्ग है कुशलताका प्रसङ्ग ही नहीं है। इसलिये भी कर्मोंमें योग ही कुशलता है यह अर्थ लेना प्रसङ्गके अनुसार युक्तियुक्त है। सम्बन्ध   अब पीछेके श्लोकको पुष्ट करनेके लिये भगवान् आगेके श्लोकमें उदाहरण देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.50।।No commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.50।।पूर्वोक्तसमत्वबुद्धियुक्तस्य स्वधर्मानुष्ठाने प्रवृत्तस्य किं स्यादित्याशङ्क्याह  समत्वेति।  बुद्धियुक्तः स्वधर्माख्यं कर्मानुतिष्ठन्निति शेषः। बुद्धियोगस्य फलवत्त्वे फलितमाह  तस्मादिति।  पूर्वार्धं व्याचष्टे  बुद्धीत्यादिना।  ननु समत्वबुद्धिमात्रान्न पुण्यपापनिवृत्तिर्युक्ता परमार्थदर्शनवतस्तन्निवृत्तिप्रसिद्धेरिति तत्राह  सत्त्वेति।  उत्तरार्धं व्याचष्टे  तस्मादिति।  स्वधर्ममनुतिष्ठतो यथोक्तयोगार्थं किमर्थं मनो योजनीयमित्याशङ्क्याह  योगो हीति।  तर्हि यथोक्तयोगसामर्थ्यादेव दर्शितफलसिद्धेरनास्था स्वधर्मानुष्ठाने प्राप्तेत्याशङ्क्याह  स्वधर्माख्येष्विति।  ईश्वरार्पितचेतस्तया कर्मसु वर्तमानस्यानुष्ठाननिष्ठस्य या यथोक्ता बुद्धिस्तत्तेषु कौशलमिति योजना। कर्मणां बन्धस्वभावत्वात्तदनुष्ठाने बन्धानुबन्धः स्यादित्याशङ्क्य कौशलमेव विशदयति  तद्धीति।  समत्वबुद्धेरेवं फलत्वे स्थिते फलितमुपसंहरति  तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.50।।बुद्धियुक्तः प्रेक्षावान् काम्यं सुकृतं दुष्कृतं च जह्यादिति योगस्वरूपनिरूपणपरतां निराकर्तुमाह  ज्ञाने ति। कथं कर्मणो ज्ञानादतीवावरत्वमित्यतः काम्यकर्मिणः कृपणाः दीनाः इमं लोकं हीनतरं वा विशन्ति मुं.उ.1।2।10 इत्युक्तम् तथापि कथं दूरेणावरमित्यपेक्षायां कर्मफलाद्विलक्षणं ज्ञानफलमाहेत्यर्थः। प्रतीतेऽर्थेनुपपत्तिं तूत्तरत्र दर्शयिष्यति। अत्र दुष्कृतवत्सुकृतस्यापि सर्वात्मना हानं प्रतीयते तत्सङ्कोचेन व्याचष्टे  सुकृत मिति। अप्रियं सुकृतं कीदृशं इत्यत आह   मानुष्ये ति। व्यावर्त्यमाह  ने ति। बृहत् प्राङ्मुक्तेर्ज्ञानादिगुणवृद्धिलक्षणं तदनन्तरं चानन्दवृद्धिरूपं फलं यस्य तत् बृहत्फलं तथाभूतं सुकृतमेव नास्ति कारणाभावादित्यत आह  उपासने ति। आदिपदेन निवृत्तं कर्म। कुतः सङ्कोच इत्यत आह  न हास्ये ति। यजते ददाति तप्यतेऽनेनेति शेषः। अत्राविदित्वेति विशेषणाज्ज्ञानिनः सुकृताक्षयः प्रतीयते। उत्तरत्र वाऽस्याः श्रुतेरुपयोगः। ननु नास्त्यकृतः कृतेन मुं.उ.3।2।12 इत्यादिश्रवणात्सत्प्रतिपक्षा एताः श्रुतय इत्यत आह  अत  इति। विशेषश्रुतेर्बलवत्त्वादिति भावः। श्रुतिः श्रवणम्। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि मुं.उ.2।2।8 इति ज्ञानिनोऽपि कर्मक्षयः प्रतीयत इति चेत् न निरवकाशश्रुतिविरोधेनास्य दुष्कृतविषयत्वात्। तदा विद्वान्पुण्यपापे विधूय मुं.उ.3।1।2 इति ज्ञानिनोऽपि उभयक्षयश्रुतिरस्तीत्यत आह  उभये ति। उक्तैव युक्तिः। युक्तिविरुद्धं च ज्ञानिनः सर्वसुकृतहानम्। तथा हि उपासनादिजनितं सुकृतं ज्ञानिनः किमिष्टं उतानिष्टम्। आद्ये किं तदिच्छया क्षीयते उत ज्ञानस्वभावात् आद्यं दूषयति  नही ति। येन ज्ञानी तत्क्षयमिच्छेत् इति शेषः। द्वितीयं निराकरोति  न चे ति। ज्ञानस्यापुरुषार्थताप्रसङ्गादिति भावः नान्त्यः अनिष्टत्वे कारणाभावात्।निष्फलत्वादनिष्टमित्यत आह  इष्टा श्चेति। केचिदित्यलौकिकाः। मुक्तावलौकिका विषया इष्टा भवन्ति। तत्प्राप्तिः सुकृतफलमिति भावः। मुक्तो विषयानिच्छतीत्येतत्कुतः इत्यत आह   स यदी ति। यज्ञो यशस्वी। ब्राह्मणानां सकाशात्। मुक्तो यद्यत्कामयते तत्कर्मास्मात्परमात्मनः सृजते। इष्टविषयप्राप्तिः सुकृतफलमित्येतदपि अनया श्रुत्योच्यते। उपासनादिकमेव ज्ञानी करोति। कृतेन वा सुकृतं न जायते इत्येतदप्यनया निराकृतम्। ननु मुक्तः किमर्थं विषयानिच्छेत् न तावत्सुखार्थम् ज्ञानेनावरणरूपाविद्यानिवृत्तौ आत्मनः स्वरूपसुखस्य व्यक्तत्वात्। पृथक्सुखस्यानङ्गीकारात्। नापि दुःखनिवृत्त्यर्थम् अविद्यानिवृत्त्यैव तत्सिद्धेरिति। मैवम् नाविद्यैवात्मस्वरूपावरणम् किन्त्वीश्वरेच्छाऽपि। तथा च वक्ष्यति। तथा च ज्ञानेनाविद्यायां निवृत्तायामशेषानिष्टनिवृत्तिर्भवति। स्वरूपसुखं च बहुतरं व्यज्यते। न तु सर्वम्। ज्ञानोत्तरमनुष्ठितेन निवृत्तकर्मणा प्रसन्नः परमेश्वरो मुक्तौ विषयानुत्पाद्य तद्भोगेन ज्ञानानभिव्यक्तमपि स्वरूपसुखं व्यक्तीकरोति। अत्र च भाष्यकृतैव तत्र तत्र प्रमाणान्युक्तानि। अनेनैवाभिप्रायेण श्रुत्यादिषु मुक्तैर्ज्ञानमात्रसाध्यत्वं ज्ञानकर्मसमुच्चयसाध्यत्वं चोच्यते। ननु ज्ञानमात्रसाध्यं यत्स्वरूपसुखं तदेव बहुतरमस्ति अतः कर्मसाध्यविषयभोगाभिव्यङ्ग्यसुखाङ्गीकारः किमर्थं इत्यत आह  बहुत्वेऽपी ति। कर्मसुखेऽङ्गीकृत इति शेषः। शरीरेन्द्रियरहितस्य मुक्तस्य कथं विषयानुभवे शक्तिः इत्यत आह  अनुभवे ति। तदुक्तंब्राह्मेण जैमिनिः ब्र.सू.4।4।6 इति। किञ्च कामरूप्यनुसञ्चरन् तै.उ.3।10।5 इत्यादिलीलाविग्रहग्रहणश्रुतेश्च मुक्तस्य विषयानुभवो युज्यत इत्याह  श्रुतेश्चे ति।ननु यदेतदुदाहृतासु श्रुतिषु विषयेच्छादिकं श्रूयते तच्चरमशरीरपातात्पूर्वकालीनं किं न स्यात् इत्यत आह  न चे ति। अस्माच्छरीरादुत्थाय ৷৷. स तत्र पर्येति छा.उ.8।12।3 अस्माल्लोकात्प्रेत्य ৷৷. एतमानन्दमयमात्मानं तै.उ.3।10।5 इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात्। इत्यादीति क्रियाविशेषणम्। अद्वैतवादिनस्त्वाहुः ब्रह्मैकमेव तत्त्वम्। तदेवोपाधिभेदभिन्नं जीवभावं प्रतिपद्यते गगनमिव घटाद्युपाधिभिन्नं घटाकाशादित्वम्। तत्र यस्य जीवस्य ज्ञानं उत्पन्नं स ब्रह्मणैकीभवति घटनाशे इव महाकाशेनेति। तत्रैके जीवब्रह्मभेदस्योपाधेश्च मिथ्यात्वं मन्यन्ते। अन्ये च सत्यत्वम्। यदा च स ज्ञानी ब्रह्मणैकीभूतस्तदा सकलस्य क्रियाकारकलक्षणफलभेदस्य प्रविलयात्कुतो विषयभोगः यदर्थं सुकृतस्यावस्थानं इति तद्दूषयति  न चे ति। एवशब्देन भेदाभेदौ निराकरोति।परमात्मानमासाद्य तद्भूता यतयोऽमलाः। अमृतत्वाय कल्पन्ते न निवर्तन्ति वा विभो म.भा.12।301।78 इति भीष्मेण तस्मिन्भूतास्तद्भूता इत्यभिप्रायेणोक्ते मुक्तास्तद्ब्रह्मैव भूता इत्यर्थान्तरमाशङ्क्य युधिष्ठिरेणआजन्ममरणं वा ते स्मरन्त्युत वा वाऽनघ म.भा.12।301।80 इति विकल्प्य पृष्टम्। यदि ज्ञानिनो मुक्तौ ब्रह्मणैकीभवन्ति तदैवं वाच्यम् किं ते संसारानुभूतं दुःखं स्मरन्ति उत न इति। आद्यस्य दूषणमुक्तम् मोक्षे दोषो महानेषः प्राप्य सिद्धिं गतानृषीन्। यदि तत्रैव विज्ञाने वर्तन्ते यतयः परे। म.भा.12।301।82 पूर्वं सिद्धिं गतानृषीन्प्राप्य परेऽपि यतयो यदि तत्र मुक्त्तौ विज्ञाने विज्ञानेन प्रागनुभूतदुःखस्मरणेन युक्ता वर्तन्ते तर्हि मोक्षे महानेषः प्रसिद्धो दोष इति। दोषं च भाष्यकारः स्फुटीकरिष्यति। द्वितीयोऽपि दूषितः  मग्नस्ये ति। पूर्वानुभूतस्मरणाद्यभावे परेऽज्ञाने मग्नस्य चेतनस्य दुःखतरं दुःखातिशयो न भवेत्किं भवेदेव। तदेवं मोक्षधर्मेऽस्य पक्षस्य निन्दितत्वान्न ज्ञानी ब्रह्मणैकीभूत इत्यर्थः। ननु पूर्वपक्षस्थेन युधिष्ठिरेण निन्दितत्वेऽपि कथं भीष्माचार्येणोक्तमसत्स्यात् परिहारे तदुक्तदोषस्योद्धारसम्भवादित्यत आह  परिहार   इ ति। न मयैतदुक्तं किन्तु त्वमन्यथा गृहीत्वा दूषितवानसीत्याशयेन परिहारे भीष्मेण परमात्मनः पृथक्त्वेन मुक्तानां भोगाभिधानाच्च न ज्ञानी ब्रह्मणैकीभूत इत्यर्थः। तथा हि भीष्मवचनम् तथापि अत्रापि तत्त्वं परमं शृणु सम्यङ्मयेरितम्। ৷৷. इन्द्रियाणि च बुध्यन्ते स्वदेहं देहिनो नृप।।करणान्यात्मनस्तानि सूक्ष्मः पश्यति तैस्तु सः म.भा.12।301।8586 इति।।यद्यपीदं दुर्बोधं तथापि स्वः स्वरूपभूतो देहो यस्य तं स्वदेहं परमात्मानं मुक्तमन्यान्देहान्विषयांश्च मुक्तस्य इन्द्रियाणि बुध्यन्ते। किं तानि कर्तृ़णि नेत्याह  करणानी ति कस्तर्हि पूर्वार्धस्यार्थः इत्यत उक्तम्  सूक्ष्म इति । इतश्च न ज्ञानिनो ब्रह्मैक्यमित्याह  शुकादीना मिति। अनेन वाक्यत्रयेण मुक्तानां ब्रह्मभेदे क्रमेण प्रत्यक्षानुमानागमा उपन्यस्ताः। तत्र प्रत्यक्षं न बाधकम्। शुकादयो यद्यपि ज्ञानिनस्तथापीदानीमविनष्टोपाधित्वात्तन्निमित्तभेदवत्तया दृश्यन्ते। प्रारब्धकर्मक्षयादुपाधिनाशे ब्रह्मैव संवृता भूताः न पृथक् द्रक्ष्यन्त इत्यत आह  उपाधिनाशे   इ ति। जीवास्तावद्ब्रह्मणः प्रतिबिम्बा इति समर्थितम् तत्र यदि तदीयस्योपाधेर्नाशोऽङ्गीक्रियते तदा तेषां नाशः प्रसज्यते। दर्पणाद्युपाधिनाशे मुखादिप्रतिबिम्बस्य नाशदर्शनादित्यर्थः।यच्चोक्तं शुकादयोऽविनष्टोपाधित्वाद्ब्रह्मणः पृथक् दृश्यन्त इति तदसदित्याह  न चे ति। वस्तुत एकीभूतस्योपाधिनाऽपि पृथक्ज्ञाने न मानं पश्यामः। गगनादिदृष्टान्तस्यासम्मतत्वात् सत्योपाधिभेदमतस्य चेदं दूषणम्। किञ्चोपाधिक एव जीवब्रह्मणोर्भेदः वास्तवं त्वैक्यमिति वदन्प्रष्टव्यः किं ब्रह्म निर्दुःखं स्वरूपमेवानुसन्धत्ते न जीवगतं दुःखं तत्तु जीव एवानुसन्धत्त इति पक्षः उत तदपीति। आद्यं दूषयति  न चैकीभूतस्ये ति। हस्तपादाद्युपाधिभेदेऽपि भोक्तुरेकत्वदर्शनादिति भावः। द्वितीयं निराकरोति  आस मिति लङत्र सर्वकालोपलक्षणार्थः। जीवरूपेण दुःख्यासं स्वरूपेण तु नेति व्यवस्थयाऽनुसन्धानान्न विरोध इत्यत आह  अनेने ति। इति च युक्तमिति शेषः। कुतः इत्यत आह  भेदे ति। उपाधेरभेदकत्वस्योक्तत्वादिति भावः। अपरे तु ब्रह्मणैक्यमापन्नस्य मुक्तस्य पूर्वदुःखानुस्मरणमस्ति न वा नेतिपक्षेमग्नस्य हि इत्युक्तो दोषः। आद्ये किमसौ पृथक् स्मरति उत ब्रह्मात्मक एव। प्रथमस्य दूषणं  न चैकीभूतस्ये ति द्वितीयस्य  आसं  इत्यादीनि व्याचक्षते। अनेनमोक्षे दोषो महानेषः इत्युक्तो दोषः प्रदर्शितो भवति। ननुउपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य इति यदुक्तं तदसत् भेदे हि बिम्बप्रतिबिम्बयोरेतत्स्यात्न चैवं किन्तु बिम्बमेव प्रतिबिम्बं तदेवेदमिति प्रत्यभिज्ञानात्।नेक्षेतोद्यन्तमादित्यं नास्तं यान्तं कदाचन। नोपरक्तं न वारिस्थं न मध्यनभसो गतम् मनुः4।38 इति स्मृतावुद्यदादाविव वारिस्थ प्रतिबिम्बेऽपि आदित्यशब्दप्रयोगदर्शनात्। भेदस्तु दर्पणाद्युपाधिकृतः। तथाचोपाधिनाशे भेद एव नश्यति प्रतिबिम्बस्य कुतो नाशः एवं जीवस्यापीत्याशङ्क्य प्रत्यभिज्ञानं तावदसिद्धमित्याह  न चे ति। न पश्यामो न प्रत्यभिजानीमः प्रत्युत प्रत्यग्भावादिना तयोर्भेदमेव पश्याम इति चार्थः। यच्चोक्तंजीवब्रह्मणोर्बिम्बप्रतिबिम्बयोरौपाधिको भेदः इति तन्नास्माकमनिष्टम्। किन्तु परस्यैव। जीवोपाधिनाशे प्रमाणाभावेन नित्यत्वात्तन्निमित्तस्यापि भेदस्य मुक्तौ स्थितेरित्याशयवानाह  उपाधिनाश  इति। न पश्याम इत्यनुवर्तते। न केवलं उपाधिनाशे प्रमाणाभावः किन्तु तन्नाशाङ्गीकारे बाधकमस्तीत्याह  मग्नस्ये ति। उपाध्यभावे स्मरणादिविलोपात्। न केवलमेतावत् उपाधिनित्यत्वे प्रमाणं चास्तीत्याह  यावदि ति। अस्तु तर्हि उदाहृतस्मृतिवाक्यं बिम्बप्रतिबिम्बयोरैक्ये प्रमाणमित्यत आह  अत  इति प्रत्यक्षेण भेदस्य प्रतीयमानत्वात्। प्रतीयमानमपीत्यनेन प्रत्यभिज्ञायामिव वचनस्वरूपेऽपि न विवादोऽस्तीत्याह वारिस्थमिति। न परस्य मुख्यं सम्भवतीत्यनौपचारिकैः सह पाठेऽपि बाधकवशादौपचारिकतब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः इत्यादौ दृष्टमिति। एवंशुकादीनां इत्युक्तं प्रत्यक्षमुपपादितम्।अधुनाऽऽस्तां तावदुपपादनसापेक्षं प्रत्यक्षं तन्निरपेक्षं चास्तीत्याह  दृष्टा श्चेति। ते निवृत्तसकलकर्माणो मुक्ताः। एतच्च मोक्षधर्मे स्पष्टमुक्तम् प्राङ्मुक्तेश्वरभेदे स्मृतिरुदाहृता श्रुतिं चोदाहरति  प्रतिशाखमि ति। ननु भेद इवाभेदेऽपिपरेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति इत्यादिवाक्यानि सन्ति तत्कथं निर्णयः इत्यतः सामान्यन्यायं तावदाह  विरोधे  त्विति। बलवद्विरोधेन दुर्बलं बाध्यते इति भावः। ततः किं प्रकृते इत्यत आह  युक्तय  इति।  अत्र  भेदपक्षे उपलक्षणमेतत्। प्रत्यक्षानुकूल्यं च भेदवाक्यानां प्राबल्याय ग्राह्यम्। तर्ह्येकीभवन्तीत्यस्य का गतिः इत्यत आह  अत  इति। उभयत्रैकीभाववादेन तद्वादिवाक्यं गृह्यते। स्थानैक्यविषयमैक्यवाक्यमित्यर्थः। इयं च रूढलक्षणेति न प्रयोजनमन्वेषणीयमिति दृष्टान्तोक्तिः। न केवलमियं गतिर्न्यायप्राप्ता किन्तु श्रौती चेत्याह  उक्तं चे ति। उदकेऽप्यैक्यादसम्मतो दृष्टान्त इत्यत आह  तत्रापी ति। नास्त्येव समुद्रे वृद्धिरनुपलम्भादित्यत आह  अस्ती ति। समुद्रेऽपि वृद्धिरिति शेषः। अनुपलम्भस्यासिद्धिमाह  द्वारी ति। नदीनां द्वारि दृश्यते चेति शेषः। अन्यत्र कुतो न दृश्यते इत्यत आह  महत्त्वादि ति सामुद्रस्योदकस्य महत्त्वात्। न केवलं वृद्धिलिङ्गादनुमानादुदकभेदः सिद्धः किं तर्हि प्रत्यक्षादपीत्याह  ता  इति। या इन्द्रकमण्डलोरादाय स्वकमण्डलूदके क्षिप्तास्ता एवापस्तस्येन्द्रस्य ददौ वसिष्ठ इति महाकौर्मवचनात्समर्थानां वसिष्ठादीनां जले भेददर्शनाच्च। भेदादर्शने विभज्य कथं दद्यादिति। इतश्च मुक्तभेदवाक्यमेव प्रबलम् अभेदनिषेधात्मकत्वादित्याह  नैवे ति। कैवल्यं सर्वोत्तमत्वम्। इतोऽपि भेदपक्षो बलवानिति वक्तुमाह   से ति। पूर्वोत्तरपक्षबलाबलचिन्ता विचारः। निर्णयो जीवेशभेदावधारणम्।बहवः पुरुषा ब्रह्मन् इत्यादिनेति शेषः। न हि भिन्नयोर्मुक्तावभेदः सम्भवतीति भावः। ततः किमित्यत आह  बलवानि ति। निर्णयश्चेति सम्बन्धः। वाक्यमात्रादेकीभवन्तीत्यादेः।कथं तर्हि यत्रेत्यादिभूमलक्षणमुच्यते इत्यत आह  अत  इति सविचारनिर्णयविरोधादेव। विद्यमानस्याप्यन्यस्य भगवदधीनसत्तादित्ववाचि। इतश्चैवमित्याह  अन्यथे ति। यद्यन्यदेव न स्यात्तर्हि कथमीश्वरस्य सर्वेश्वरत्वसार्वज्ञादिकं श्रुत्यादिसिद्धं स्यात् मायामयमेव तच्छ्रुत्यादावुच्यते इत्यत आह  न चे ति। बाधकान्तरमाह  अन्यथे ति। यदि भूमाऽद्वितीयः स्यात् कथं तर्हि तज्ज्ञानान्याच्चय स एकधा छां.उ.7।26।2 इत्यादिभेदे श्रुतिर्ब्रूयात् न तद्भ्रूमज्ञानफलम् किन्तु सगुणविद्योपासनफलमित्यत उक्तम्  तत्रैवे ति भूमप्रकरण एव। ननु नारदेन श्वेतद्वीपे भगवतो भिन्ना दृष्टास्ते मुक्ता एव न भवन्ति सशरीरत्वात् सशरीराणामपि मुक्तत्वाङ्गीकारे न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति छां.उ.8।12।1 इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यत आह   न चे ति। कुतो नेत्यत आह   वैलक्षण्या दिति। किं तदस्मदादिशरीरेभ्यस्तेषां वैलक्षण्यं इत्यत आह  अभौतिकानी ति अजडानीत्यर्थः। तर्हि किमात्मकानि इत्यत आह  नित्योपा धीति। विकारित्वाद्विनाशः स्यादित्यत उक्तम्  ईश्वरशक्त्ये ति। कुत एतदित्यत आह  तथा चे ति। नित्योपाधिरेव षोडशी कला। एतदुक्तं भवति यच्छ्रुतौ सशरीरस्य दुःखानपहतिवचनं तत्कर्माधीनजडशरीराभिप्रायम् श्वेतद्वीपे नारदेन दृष्टानि तु शरीराणि चिन्मयानि जडान्यपि न कर्माधीनानि अतो न दुःखकारणानि। तथा च न तेषां सशरीराणामपि मुक्तत्वे श्रुतिविरोध इति।यदि मुक्ताः सशरीरास्तर्हि कथं तेषु अशरीरं वा व सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः छा.उ.8।12।1 इति शरीराभाववचनमित्यत आह  वदन्ति चे ति। लौकिकाद्वैलक्षण्ये सति तद्वदत्रापीति शेषः। इतश्चाशरीरत्वोक्तिर्युक्तेत्याह  निरुक्ती ति। निरुक्तिलभ्यार्थस्य तत्राभावादित्यर्थः। काऽसौ निरुक्तिरित्यतः प्रक्रियासम्पादनगौरवपरिहाराय श्रुतिमेव तत्परां दर्शयति  तथाही ति। अशारि शीर्णमभवदिति हेतोस्तच्छरीरशब्दमभवदित्यर्थः। कथं निरुक्तिलभ्योऽर्थस्तेषु नास्ति इत्यत आह  नही ति। एवं तर्हि कथं तेषुशरीरं जायते तेषां इति शरीरशब्दप्रयोगः इत्यत आह  साम्यादि ति। अस्मदादिशरीरैः करचरणादिमत्त्वसाम्याद्गौण इत्यर्थः। कुतोऽयमशरीरशब्दस्याभिप्रायः सर्वथा विग्रहराहित्यमेव किन्न स्यात् इत्यत आह  प्रयोगाच्चे ति। नारदादिभिर्दृष्टदेहेष्वेव मुक्तेष्वेतद्वाक्यद्वये देहाभावप्रयोगादन्यथाऽनुपपत्त्याऽयमर्थः सिद्धः। न केवलं सम्भवमात्रेणेति चार्थः। इत्यादीति क्रियाविशेषणम्। प्रयोगादित्यनेन सम्बध्यते। सन्तु नारदेन दृष्टाः श्वेतद्वीपवासिनो मुक्ताः तथापि नास्माकं प्रत्यक्षविरोधः यत एतेषां श्वेतद्वीपप्राप्तिरूपा निर्गुणमुक्तेरन्या गौणी मुक्तिः। निर्गुणायामेव मुक्तौ वयमैक्यं ब्रूम इत्यत आह  न चे ति। श्वेतद्वीपप्राप्तिव्यतिरिक्तमुक्तिनिषेधादियमेव मुक्तिरित्यर्थः।ननु शिशुपालादयः श्वेतद्वीपगमनेन विनैवात्र भगवन्तं प्रविश्य मुच्यन्ते तत्कथमेतत् इत्यत आह  ये त्वि ति। ते न तदा मुच्यन्ते इति शेषः। तर्हि कदेत्यत आह  तेऽपी ति। ततो मुच्यन्त इति शेषः। ननुकेचिदत्रैव मुच्यन्ते इत्याद्युक्त्वामहाज्ञाना गच्छन्ति क्षीरसागरम् इति महायोग्यतावतामेव श्वेतद्वीपगमनोक्तेः कथमयं नियमः इत्यत आह  योग्यत्व मिति। अत्र निवास इति शेषः। अस्ति सर्वेषां श्वेतद्वीपप्राप्तिः। महाज्ञानत्वलक्षणं योग्यत्वं त्वत्र निवासे विवक्षितमित्यर्थः। नन्विदं वाक्यं श्वेतद्वीपप्राप्तिं विना सगुणमुक्तिर्नास्तीत्येतत्परम् निर्गुणमुक्तिस्त्वन्याऽस्तीत्यत आह  युधिष्ठिरे ति। सायुज्यं तावत्प्रसिद्धम् सैव निर्गुणमुक्तिः तत्रात्मनो ब्रह्मणैकत्वमित्यत आह  सायुज्यं चे ति। यथा ग्रहस्य पुरुषान्तरं प्रविश्य भोगः तथा मुक्तस्येश्वरं प्रविश्य भोग एव सायुज्यं न त्वैक्यमित्यर्थः। कुत एतत् सायुज्यशब्दसामर्थ्यादागमवाक्याच्चेत्याह  तदुक्ते श्चेति। उत्तमायां मुक्तौ सायुज्यलक्षणायामीश्वरं प्रविश्येति शेषः। ईश्वरानन्दव्युदासाय   बाह्या निति। बाह्येष्वपि विभागो वचनान्तरादवसेयः। सुकृतमप्यप्रियमित्यादिनोक्तमर्थमुपसंहरति  अत  इति। यथा सुकृतत्यागे सङ्कोचस्तथाऽनिष्टत्यागेऽप्यस्ति किमिति जिज्ञासायामाह  स  इति। प्राचुर्याभिप्रायाण्येतानि वचनानि किं न स्युः इत्यत आह  विशेषे ति।सङ्कर्षणादयः समष्टिजीवास्तावन्मुक्ताः तेषां च बललक्ष्मणादिरूपेषु दुःखं दृश्यते तदेव विशेषप्रमाणमित्यत आह  येषा मिति। न सायुज्यं प्राप्ताः न मुक्ता इत्यर्थः। सायुज्ययोग्यानां तदभावे मुक्त्यभावात्। तेषां मुक्तत्वोक्तेस्तर्हि का गतिः इत्यत आह  सामीप्यादी ति। मुक्तत्वोक्तौ बीजमिति शेषः। कुतस्ते न मुक्ताः इत्यत आह  अत  इति। दुःखदर्शनात्तद्धेतुभूतप्रारब्धकर्मभावान्न मुक्ताः। कदा तर्हि मुच्यन्ते इत्यत आह  तदि ति। अत्रागमसम्मतिमाह  तच्चोक्त मिति। सोऽस्त्येवेत्याद्युक्तमुपसंहरति   अत  इति। तत्किमनिष्टनिवृत्तिमात्रं मुक्तिः इत्यतोऽनुमानागमाभ्यां परमसुखं चेत्याह  परब्रह्मत्व मिति। मुक्तत्वं ब्रह्मादिभिर्दुःखहीनैरपि मोक्षे सक्तिस्तुत्यर्थमेतदिति न ब्रह्मण एकान्तित्वविरोधः।समासान्तविधेरनित्यत्वाद्वाङ्मनोगोचरं इत्युक्तम्।महत् इत्येतत्सुखं इत्यनेन सम्बध्यते।  ब्रह्मादिपदादप्यधिकतममि ति। ब्रह्मणो ब्रह्मपदादप्यधिकं शेषस्य शेषपदादप्यधिकमित्यादि ज्ञेयम्।एवं ज्ञानफलप्रदर्शनत्वेन पूर्वार्धो व्याख्यातः। उक्तविधया योगस्वरूपनिरुपणपरः किं न स्यात् इत्यतोऽस्मदुक्तार्थे तृतीयपादसङ्गतेः अन्यथा तदसङ्गतेरित्यभिप्रेत्य तं पठति  अत  इति। न दूरस्थहेतुपरामर्शोऽयमिति ज्ञापयितुं तस्मादिति पठितव्येअतः इत्युक्तम्। ज्ञानस्य महाफलत्वात्  योगाय युज्यस्वे ति कथं हेतुहेतुमद्भाव इत्यतोयोगाय इत्येतद्व्याचष्टे  ज्ञाने ति। ननुसमत्वं योग उच्यते 2।48 इति योगो व्याख्यातःयोगः कर्मसु कौशलम् इति पुनर्व्याख्यायते इत्यतः स्तुतिरियं योगस्य क्रियत इति भावेनाह  तद्धी ति। तद्योग इति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.50।।ज्ञानफलमाह बुद्धियुक्त इति। सुकृतमप्यप्रियं मानुष्यादिफलं जहाति न बृहत्फलमुपासनादिनिमित्तम्। न हास्य कर्म क्षीयते बृ.उ.1।4।15 अविदित्वाऽस्िमँल्लोके जुहोति यजते तपस्तप्यते बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति बृ.उ.3।8।10 इत्यादिश्रुतिभ्यः। अतः कर्मक्षयश्रुतिरज्ञानिविषया सर्वत्र। उभयक्षयश्रुतिरप्यनिष्टविषया। नहीष्टपुण्यक्षये किञ्चित्प्रयोजनम्। न चेष्टनाशो ज्ञानिनो युक्तः।इष्टाश्च केचिद्विषयाः स यदि पितृलोककामो भवति सङ्कल्पादेवास्य पितरः समुत्तिष्ठन्ति छां.उ.8।2।1प्रजापतेः सभां वेश्म प्रपद्ये यशोऽहं भवामि ब्राह्मणानां छां.उ.8।14।1 स्त्रीभिर्वा यानैर्वा छां.उ.8।12।3 अस्माद्ध्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत्सृजते बृ.उ.1।4।15 कामान्नी कामरूप्यनुसञ्चरन् तै.उ.3।10।5 स एकधा भवति छां.उ.7।26।2 इत्यादिश्रुतिभ्यः। बहुत्वेऽप्यात्मसुखस्य पुनरिष्टत्वात्कर्मसुखेन विरोधः अनुभवशक्तिश्चेश्वरप्रसादात् श्रुतेश्च।न च शरीरपातात् पूर्वमेव। स तत्र पर्येति छां.उ.8।12।3 एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य तै.उ.3।10।5 इत्याद्युत्तरत्र श्रवणात्। न चैकीभूत एव ब्रह्मणा सः।मग्नस्य हि परेऽज्ञाने किं दुःखतरं भवेत् इत्यादिनिन्दनान्मोक्षधर्मे। परिहारे पृथग्भोगाभिधानाच्च शुकादीनां पृथग्दृष्टेश्चजगद्व्यापारवर्जं ब्र.सू.4।4।17 इत्यैश्वर्यमर्यादोक्तेश्चइदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः 14।3 इति च। उपाधिनाशे नाशाच्च प्रतिबिम्बस्य।न चैकीभूतस्य पृथग्ज्ञाने मानं पश्यामः। आसं दुःखी नासमिति ज्ञानविरोधाच्चेश्वरस्य। अनेन रूपेणेति च भेदाभावात्। न च प्रतिबिम्बस्य बिम्बैक्यं लोके पश्यामः। उपाधिनाशे मानं वा।मग्नस्य हि परेऽज्ञाने इति दुःखात्मकत्वोक्तेश्च।यावदात्मभावित्वात्৷৷. ब्र.सू.2।3।30 इत्युपाधिनित्यताभिधानाच्च। अतोऽनन्यवचनं प्रतीयमानमप्यौपचारिकम्।दृष्टाश्च ते भगवतो भिन्ना नारदेन। प्रतिशाखं च स एकधा छां.उ.7।26।2 इत्यादिषु भेदेन प्रतीयन्ते। विरोधे तु युक्तिमतामेव बलंवत्त्वम्। युक्तयश्चात्रोक्ताःमग्नस्य हि इत्यादयः। अतो जले जलैकीभाववदेकीभावः। उक्तं च यथोदकं शुद्धे शुद्धं कठो.4।15 यथा नद्यः मुं.उ.3।2।8 इत्यादौ। तत्राप्यन्योन्यात्मत्वे वृद्ध्यसम्भवः। अस्ति चेषत्समुद्रेऽपि द्वारि। महत्त्वादन्यत्रादृष्टिः।ता एवापो ददौ तस्य च ऋषिः शंसितव्रतः इति महाकौर्मे। समर्थानां भेदज्ञानाच्च।नैव तत्प्राप्नुवन्त्येते ब्रह्मेशानादयः सुराः। यत्ते पदं ते कैवल्यम् इति निषेधाच्च नारदीये। सविचारश्च निर्णयः कृतो मोक्षवर्मेषु। बलवांश्च सविचारो निर्णयो वाक्यमात्रात्।अतो यत्र नान्यत्पश्यति छां.7।24।1 इत्याद्यपि तदधीनसत्तादिवाचि। अन्यथा कथमैश्वर्यादि स्यात्। न च तन्मायामयमित्युक्तम्। अन्यथा कथं तत्रैव स एकधा इत्यादि ब्रूयात्। न चन ह वै सशरीरस्य छां.उ.8।12।1 इत्यादिविरोधः। वैलक्षण्यात्तच्छरीराणाम्। अभौतिकानि हि तानि नित्योपाधिविनिर्मितानि ईश्वरशक्त्या। तथा चोक्तम्शरीरं जायते तेषां षोडश्या कलयैव हि इति नारायणरामकल्पे। वदन्ति च लौकिकाद्वैलक्षण्येऽभावशब्दंअप्रहर्षमनानन्दंसुखदुःखबाह्यः इत्यादिषु। निरुक्त्यभावाच्च न तानि शरीराणि। तथा हि श्रुतिः अशारीति्ँहितच्छरीरमभवत्। नहि तानि शीर्णानि भवन्तिसर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथयन्ति च 14।2 इति वचनात्। साम्यात्प्रयोगः। प्रयोगाच्चअनिन्द्रिया अनाहारा अनिष्पन्दाः सुगन्धिनः।म.भा.12।337।29देहेन्द्रियासुहीनानां वैकुण्ठपुरवासिनाम् भाग.7।1।34 इत्यादिदृष्टदेहेष्वेव। न चैषाऽन्या गौणी मुक्तिःबहुनाऽत्र किमुक्तेन यावच्छ्वेतं न गच्छति। योगी तावन्न मुक्तः स्यादेष शास्त्रस्य निर्णयः इत्यादित्यपुराणे तदन्यमुक्तिनिषेधात्। ये त्वत्रैव भगवन्तं विशन्ति तेऽपि पश्चात्तत्रैव यान्ति। योग्यत्वं चात्र विवक्षितम्। युधिष्ठिरप्रश्ने इतरनिन्दनाच्च। सायुज्यं य ग्रहवत्। तदुक्तेश्चभुञ्जते पुरुषं प्राप्य यथा देवग्रहादयः। तथा मुक्तावुत्तमायां बाह्यान्भोगांस्तु भुञ्जते इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे। अतोऽनिष्टस्यैव वियोगः सोऽस्त्येव सर्वात्मना।अदुःखम्सर्वदुःखविवर्जिताः अशोकमहिम्। बृ.उ.5।10यत्र गत्वा न शोचन्ति इत्यादिभ्यः विशेषवचनाभावाच्च।येषां त्वीषद्दृश्यते न सायुज्यं प्राप्ताः। सामीप्याद्येव तेषाम्। अतः प्रारब्धकर्मशेषभावात्। तद्भुक्त्वा सायुज्यं गच्छन्ति। तच्चोक्तम्सङ्कर्षणादयः सर्वे स्वाधिकारादनन्तरम्। प्रविशन्ति परं देवं विष्णुं नास्त्यत्र संशयः इति व्यासयोगे। अतोऽनिष्टस्य सर्वात्मना वियोगः।परब्रह्मत्वमिच्छामि परब्रह्मञ्जनार्दन इत्यादिना ब्रह्मादिभिरपि प्रार्थितत्वात्।न मोक्षसदृशं किञ्चिदधिकं वा सुखं क्वचित्। ऋते वैष्णवमानन्दं वाङ्मनोगोचरं महत् इत्यादेश्च। ब्रह्मादिपदादप्यधिकतमं सुखं मोक्षं इति सिद्धम्। अतो योगाय युज्यस्व। ज्ञानोपायाय। तद्धि कर्मकौशलम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.50।।बुद्धियोगयुक्तः तु कर्म कुर्वाण उभे सुकृतदुष्कृते अनादिकालसञ्चिते अनन्ते बन्धेहेतुभूते जहाति। तस्माद् उक्ताय बुद्धियोगाय युज्यस्व। योगः कर्मसु कौशलं कर्मसु क्रियमाणेषु अयं बुद्धियोगः कौशलम् अतिसामर्थ्यम् अतिसामर्थ्यसाध्यः इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.50।।  बुद्धियुक्तः  कर्मसमत्वविषयया बुद्ध्या युक्तः बुद्धियुक्तः सः  जहाति  परित्यजति  इह  अस्मिन् लोके उभे  सुकृतदुष्कृते  पुण्यपापे सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण यतः  तस्मात्  समत्वबुद्धि योगाय युज्यस्व  घटस्व।  योगो  हि  कर्मसु कौशलम्  स्वधर्माख्येषु कर्मसु वर्तमानस्य या सिद्ध्यसिद्ध्योः समत्वबुद्धिः ईश्वरार्पितचेतस्तया तत् कौशलं कुशलभावः। तद्धि कौशलं यत् बन्धनस्वभावान्यपि कर्माणि समत्वबुद्ध्या स्वभावात् निवर्तन्ते। तस्मात्समत्वबुद्धियुक्तो भव त्वम्।।यस्मात्

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【 Verse 2.51 】

▸ Sanskrit Sloka: र्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिण: | जन्मबन्धविनिर्मुक्ता: पदं गच्छन्त्यनामयम् ||

▸ Transliteration: karmajaṁ buddhiyuktā hi phalaṁ tyaktvā manīṣiṇaḥ | janmabandhavinirmuktāḥ padaṁ gacchantyanāmayam ||

▸ Glossary: karmajaṁ: born of action; buddhiyuktā: even minded ones; hi: indeed; phalaṁ: results; tyaktvā: after giving up; manīṣiṇaḥ: sages; janma bandha vinirmuktāḥ: free from the bondage of birth; padaṁ: position; gacchanti: reach; anāmayaṁ: without ills

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.51 The wise, having abandoned the outcome of their actions and possessed of knowledge of completion, are freed from the cycle of birth and death. They go to the state that is beyond all sorrow.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.51।।समतायुक्त मनीषी साधक कर्मजन्य फलका त्याग करके जन्मरूप बन्धनसे मुक्त होकर निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.51।। बुद्धियोग युक्त मनीषी लोग कर्मजन्य फलों को त्यागकर जन्मरूप बन्धन से मुक्त हुये अनामय अर्थात् निर्दोष पद को प्राप्त होते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.51 कर्मजम् actionborn? बुद्धियुक्ताः possessed of knowledsge? हि indeed? फलम् the fruit? त्यक्त्वा having abandoned? मनीषिणः the wise? जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः freed from the fetters of birth? पदम् the abode? गच्छन्ति go? अनामयम् beyond evil.Commentary Clinging to the fruits of actions is the cause of rirth. Man takes a body to enjoy them. If anyone performs actions for the sake of God in fulfilment of His purpose without desire for the fruits? he is released from the bonds of birth and attains to the blissful state or the immortal abode.Sages who possess evenness of mind abandon the fruits of their actions and thus escape from good and bad actions.Buddhi referred to in the three verses 49? 50 and 51 may be the wisdom of the Sankhyas? i.e.? the knowledge of the Self or AtmaJnana which dawns when the mind is purified by Karma Yoga.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.51. By renouncing the fruit, born of action, the intelligent ones endowed with determining faculty and freed from the bond of birth, go to the place that is devoid of illness.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.51 The sages guided by Pure Intellect renounce the fruit of action; and, freed from the chains of rebirth, they reach the highest bliss.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.51 The wise who possess evenness of mind, relinishing the fruits born of action, are freed from the bondage of birth, and go to the region beyond all ills.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.51 Because, those who are devoted to wisdom, (they) becoming men of Enlightenment by giving up the fruits produced by actions, reach the state beyond evils by having become freed from the bondage of birth.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.51 The wise, possessed of knowledge, having abandoned the fruits of their actions, and being freed from the fetters of birth, go to the place which is beyond all evil.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.51 Karmajam etc. The persons who are endowed with the determining faculty with regard to the Yoga, renounce the birth-bondage, by renouncing the fruit of actions; and they attain the Brahman-existence.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.51 Those who possess this evenness of mind while performing actions and relinish their fruits, are freed from the bondage of rirth, and go to the region beyond all ills. 'Hi' means that this dictum or teaching is well known in all the Upanisads.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.51 The words 'phalam tyaktva, by giving up the fruits' are connected with the remote word 'karmajam, produced by actions'. Hi, because; [Because, when actions are performed with an attitude of eanimity, it leads to becoming freed from sin etc. Therefore, by stages, it becomes the cause of Liberation as well.] buddhi-yuktah, those who are devoted to wisdom, who are imbued with the wisdom of eanimity; (they) becoming manisinah, men of Enlightenment; tyaktva, by giving up; phalam, the fruit, the acisition of desirable and undesriable bodies; [Desirable: the bodies of gods and others; undesirable: the bodies of animals etc.] karmajam, produced by actions; gacchanti, reach; padam, the state, the supreme state of Visnu, called Liberation; anamayam, beyond evils, i.e. beyond all evils; by having become janma-bandha-vinirmuktah, freed from the bondage of birth birth (janma) itself is a bondage (bandha); becoming freed from that , even while living. Or: Since it (buddhi) has been mentioned as the direct cause of the elimination of righteousness and unrighteousness, and so on, therefore what has been presented (in the three verses) beginning with, 'O Dhananjaya,৷৷.to the yoga of wisdom' (49), is enlightenment itself, which consists in the realization of the supreme Goal, which is comparable to a flood all around, and which arises from the purification of the mind as a result of Karma-yoga. [In the first portion of the Commentary buddhi has been taken to mean samattva buddhi (wisdom of eanimity); the alternative meaning of buddhi has been taken as 'enlightenment'. So, action is to be performed by taking the help of the 'wisdom about the supreme Reality' which has been chosen as one's Goal.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.51।। योगयुक्त बनने के उपदेश को सुनकर अर्जुन के मन में प्रश्न उठा कि आखिर समभाव से उसको कर्म क्यों करने चाहिये। भगवान् इस प्रश्न का कुछ पूर्वानुमान कर इस श्लोक में उसका उत्तर देते हैं। बुद्धियुक्त मनीषी का अर्थ है वह पुरुष जो जीने की कला को जानता हुआ फल की चिन्ताओं से मुक्त होकर मन के पूर्ण सन्तुलन को बनाये हुये सभी कर्म करता है। दूसरे शब्दों में अहंकार और स्वार्थ से रहित व्यक्ति ही मनीषी कहलाता है।मन के साथ तादात्म्य से अहंकार उत्पन्न होता है और वह फलासक्ति के कारण बन्धनों में फँस जाता है। जीवन में उच्च लक्ष्य को रखने पर ही अहंकार और स्वार्थ का त्याग संभव है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.51।।   पुण्यपापत्यागमात्रस्य फलत्वाभावमाशङ्क्याह  कर्मजमिति।  कर्मजं फलमिष्टानिष्टदेहप्राप्तिलक्षणं त्यक्त्वा हि यस्मात्समत्वबुद्धियुक्ता मनीषिणो ज्ञानिनो भूत्वा जन्मैव बन्धस्तेन विनिर्मुक्ताः सर्वोपद्रवरहितं विष्णोः परमं मोक्षाख्यं पदं गच्छन्ति। जीवन्त एव स्वस्वरुपेण जानन्तीत्यर्थः। कर्मजं फलं त्यक्त्वा सांख्यबुद्धियुक्ताः शुद्धैकाग्रमनस इति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.51।।ननु दुष्कृतहानमपेक्षितं नतु सुकृतहानं पुरुषार्थभ्रंशापत्तेरित्याशङ्क्य तुच्छफलत्यागेन परमपुरुषार्थप्राप्तिं फलमाह समत्वबुद्धियुक्ता हि यस्मात्कर्मजं फलं त्यक्त्वा केवलमीश्वराराधनार्थं कर्माणि कुर्वाणाः सत्त्वशुद्धिद्वारेण मनीषिणस्तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यात्ममनीषावन्तो भवन्ति तादृशाश्च सन्तो जन्मात्मकेन बन्धेन विनिर्मुक्ताः विशेषेणात्यन्तिकत्वलक्षणेन निरवशेषं मुक्ताः पदं पदनीयमात्मतत्त्वमानन्दरूपं ब्रह्म अनामयमविद्यातत्कार्यात्मकरोगरहितमभयं मोक्षाख्यं पुरुषार्थं गच्छन्ति। अभेदेन प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। यस्मादेवं फलकामनां त्यक्त्वा समत्वबुद्ध्या कर्माण्यनुतिष्ठन्तस्तैः कृतान्तःकरणशुद्धयस्तत्त्वमस्यादिप्रमाणोत्पन्नात्मतत्त्वज्ञानविनष्टाज्ञानतत्कार्याः सन्तः सकलानर्थनिवृत्तिपरमानन्दप्राप्तिरूपं मोक्षाख्यं विष्णोः परमं पदं गच्छन्ति तस्मात्त्वमपियच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे इत्युक्तेः श्रेयोजिज्ञासुरेवंविधं कर्मयोगमनुतिष्ठेति भगवतोऽभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.51।।एतदेवाह  कर्मजमिति।  बुद्धियुक्ताः समत्वबुद्धियुक्ताः। क्रियमाणकर्मजं फलं त्यक्त्वा मनीषिणो मनोनिग्रहसमर्था भूत्वा जन्मरूपेण बन्धेन मुक्ताः सन्तोऽनामयं निरुपद्रवं पदं मोक्षाख्यं गच्छन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.51।।ननु कर्मणां स्वतन्त्रफलकत्वं भक्तेः कथं साधनता इत्याशङ्क्याह कर्मजमिति। मनीषिणः शास्त्रार्थज्ञातारः। बुद्धियुक्ता बुद्धिर्युक्ता येषां तादृशत्वं च

Chapter 2 (Part 30)

भक्तिप्रयत्नवत्त्वेन ते हि निश्चयेन कर्मजं फलं त्यक्त्वा जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः सन्तोऽनामयं पदं भक्तिरूपं गच्छन्तीत्यर्थः। अन्यत्र रोगादिकं भवति न तु भक्तौ भगवच्चरणरूपायाम्। अत एव श्रीभागवते 10।3।27 मृत्युभयाभावत्वं भगवच्चरणे निरूपितम्।मर्त्यःइत्यारभ्यमृत्युरस्मादपैति इत्यन्तेन श्लोकेन देवकीस्तुतौ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.51।।कर्मणां मोक्षसाधनत्वप्रकारमाह  कर्मेति।  कर्मजं फलं त्यक्त्वा केवलमीश्वराराधनार्थमेव कर्म कुर्वाणा मनीषिणो ज्ञानिनो भूत्वा जन्मरूपेण बन्धेन विनिर्मुक्ताः सन्तोऽनामयं सर्वोपद्रवरहितं विष्णोः पदं मोक्षाख्यं गच्छन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.51।।एवं योगेन व्यवसायिनां सिद्धिप्रकारं सदाचारेण दर्शयति कर्मजमिति। फलं त्यक्त्वा जन्मैव बन्धरूपं तेन विनिर्मुक्ता अनामयं पदं धाम अक्षराख्यं स्वरूपं गच्छन्ति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.51।।क्योंकि कर्मजम् इस पदका फलं त्यक्त्वा इस अगले पदसे सम्बन्ध है। कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली जो इष्टानिष्टदेहप्राप्ति है वही कर्मज फल कहलाता है समत्वबुद्धियुक्त पुरुष उस कर्मफलको छोड़कर मनीषी अर्थात् ज्ञानी होकर जीवित अवस्थामें ही जन्मबन्धनसे निर्मुक्त होकर अर्थात् जन्म नामके बन्धनसे छूटकर विष्णुके मोक्ष नामक अनामय सर्वोपद्रवरहित परमपदको पा लेते हैं। अथवा ( यों समझो कि ) बुद्धियोगाद्धनंजय इस श्लोकसे लेकर ( यहाँतक बुद्धि शब्दसे ) कर्मयोगजनित सत्त्वशुद्धिसे उत्पन्न हुई जो सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीय परमार्थज्ञानरूपा बुद्धि है वही दिखलायी गयी है क्योंकि ( यहाँ ) यह बुद्धि पुण्यपापके नाशमें साक्षात् हेतुरूपसे वर्णित है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.51।। व्याख्या  कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः   जो समतासे युक्त हैं  वे ही वास्तवमें मनीषी अर्थात् बुद्धिमान् हैं। अठारहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी कहा है कि जो मनुष्य अकुशल कर्मोंसे द्वेष नहीं करता और कुशल कर्मोंमें राग नहीं करता वह मेधावी (बुद्धिमान्) है।कर्म तो फलके रूपमें परिणत होता ही है। उसके फलका त्याग कोई कर ही नहीं सकता। जैसे कोई खेतीमें निष्कामभावसे बीज बोये तो क्य खेतीमें अनाज नहीं होगा बोया है तो पैदा अवश्य होगा। ऐसे ही कोई निष्कामभावपूर्वक कर्म करता है तो उसको कर्मका फल तो मिलेगा ही। अतः यहाँ कर्मजन्य फलका त्याग करनेका अर्थ है कर्मजन्य फलकी इच्छा कामना ममता वासनाका त्याग करना। इसका त्याग करनेमें सभी समर्थ हैं। जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः   समतायुक्त मनीषी साधक जन्मरूप बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं। कारण कि समतामें स्थित हो जानेसे उनमें रागद्वेष कामना वासना ममता आदि दोष किञ्चिन्मात्र भी नहीं रहते अतः उनके पुनर्जन्मका कारण ही नहीं रहता। वे जन्ममरणरूप बन्धनसे सदाके लिये मुक्त हो जाते हैं। पदं गच्छन्त्यनामयम्   आमय नाम रोगका है। रोग एक विकार है। जिसमें किञ्चिन्मात्र भी किसी प्रकारका विकार न हो उसको अनामय अर्थात् निर्विकार कहते हैं। समतायुक्त मनीषीलोग ऐसे निर्विकार पदको प्राप्त हो जाते हैं। इसी निर्विकार पदको पन्द्रहवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें अव्यय पद और अठारहवें अध्यायके छप्पनवें श्लोकमें शाश्वत अव्यय पद नामसे कहा गया है।यद्यपि गीतामें सत्त्वगुणको भी अनामय कहा गया है (14। 6) पर वास्तवमें अनामय (निर्विकार) तो अपना स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्व ही है क्योंकि वह गुणातीत तत्त्व है जिसको प्राप्त होकर फिर किसीको भी जन्ममरणके चक्करमें नहीं आना पड़ता। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें हेतु होनेसे भगवान्ने सत्त्वगुणको भी अनामय कह दिया है।अनामय पदको प्राप्त होना क्या है प्रकृति विकारशील है तो उसका कार्य शरीरसंसार भी विकारशील हैं। स्वयं निर्विकार होते हुए भी जब यह विकारी शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है तब यह अपनेको भी विकारी मान लेता है। परन्तु जब यह शरीरके साथ माने हुए सम्बन्धका त्याग कर देता है तब इसको अपने सहज निर्विकार स्वरूपका अनुभव हो जाता है। इस स्वाभाविक निर्विकारताका अनुभव होनेको ही यहाँ अनामय पदको प्राप्त होना कहा गया है।इस श्लोकमें  बुद्धियुक्ताः  और  मनीषिणः  पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य है कि जो भी समतामें स्थित हो जाते हैं वे सबकेसब अनामय पदको प्राप्त हो जाते हैं मुक्त हो जाते हैं। उनमेंसे कोई भी बाकी नहीं रहता। इस तरह समता अनामय पदकी प्राप्तिका अचूक उपाय है। इससे यह नियम सिद्ध होता है कि जब उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके साथ सम्बन्ध नहीं रहता तब स्वतः सिद्ध निर्विकारताका अनुभव हो जाता है। इसके लिये कुछ भी परिश्रम नहीं करना पड़ता क्योंकि उस निर्विकारताका निर्माण नहीं करना पड़ता वह तो स्वतः स्वाभाविक ही है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें बताये अनामय पदकी प्राप्तिका क्रम क्या है इसे आगेके दो श्लोकोंमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.51।।दूरेण हीति। बुद्धियोगात्किल हेतोः अवरं दुष्टफलयुक्तं (K omits युक्तं) रिक्तं ( omits रिक्तं) कर्म दूरीभवति। अतस्तादृश्यां बुद्धौ शरणमन्विच्छ प्रार्थयस्व येन सा बुद्धिः लभ्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.51।।समत्वबुद्धियुक्तस्य सुकृतदुष्कृततत्फलपरित्यागेऽपि कथं मोक्षः स्यादित्याशङ्क्याह  यस्मादिति।  समत्वबुद्ध्या यस्मात्कर्मानुष्ठीयमानं दुरितादि त्याजयति तस्मात्परम्परयासौ मुक्तिहेतुरित्यर्थः। मनीषिणो हि ज्ञानातिशयवन्तो बुद्धियुक्ताः सन्तः स्वधर्माख्यं कर्मानुतिष्ठन्तस्ततो जातं फलं देहप्रभेदं हित्वा जन्मलक्षणाद्बन्धाद्विनिर्मुक्ता वैष्णवं पदं सर्वसंसारसंस्पर्शशून्यं प्राप्नुवन्तीति श्लोकोक्तमर्थं श्लोकयोजनया दर्शयति  कर्मजमित्यादिना।  इष्टो देहो देवादिलक्षणोऽनिष्टो देहस्तिर्यगादिलक्षणस्तत्प्राप्तिरेव कर्मणो जातं फलं तद्यथोक्तबुद्धियुक्ता ज्ञानिनो भूत्वा तद्बलादेव परित्यज्य बन्धविनिर्मोकपूर्वकं जीवन्मुक्ताः सन्तो विदेहकैवल्यभाजो भवन्तीत्यर्थः। बुद्धियोगादित्यादौ बुद्धिशब्दस्य समत्वबुद्धिरर्थो व्याख्यातः संप्रति परम्परां परिहृत्य सुकृतदुष्कृतप्रहाणहेतुत्वस्य समत्वबुद्धावसिद्धेर्बुद्धिशब्दस्य योग्यमर्थान्तरं कथयति  अथवेति।  अनवच्छिन्नवस्तुगोचरत्वेनानवच्छिन्नत्वं तस्याः सूचयन्बुद्ध्यन्तराद्विशेषं दर्शयति सर्वत इति। असाधारणं निमित्तं तस्या निर्दिशति  कर्मेति।  यथोक्तबुद्धेर्बुद्धिशब्दार्थत्वे हेतुमाह  साक्षादिति।  जन्मबन्धविनिर्मोकादिरादिशब्दार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.51।।ननु कर्मजमिति श्लोकः पूर्वोक्तान्न विशिष्यत इत्यत आह  तदि ति। तस्य ज्ञानस्य उपायं योगं तज्ज्ञानमुपायो यस्य तं मोक्षं चाह विवृणोतीत्यर्थः। व्यवहितत्वादन्वयमाह कर्मजं फलं त्यक्त्वा। अप्राप्तस्य फलस्य कथं त्याग इत्यतो व्याचष्टे  अकामनये ति। प्रकृत्यादिभ्य उपसङ्ख्यानात्तृतीया। एतत्प्रागुक्तमित्यतः प्रकारान्तरेण व्याचष्टे  ईश्वराये ति।बुद्धियुक्ता मनीषिणः इति पौनरुक्त्यपरिहारायाऽऽह  बुद्धी ति। सम्यग्ज्ञानिन इतिशास्त्रजनिततत्त्वज्ञानिनः। अनेनमनीषिणः इत्यपरोक्षज्ञानिन इति सूचितम् प्रशंसायां मत्वर्थीयविधानात्। नन्विदमेकं वाक्यं कथं वाक्यार्थद्वयस्य विवरणम् मोक्षस्वरूपविवरणेऽपि योगो न सम्यक् विवृतः अङ्गिनः कर्मण एवानभिधानात् अङ्गानां च सङ्कल्पत्यागादीनामित्यत आह  स  इति। समस्ताङ्गसङ्ग्रहाय योगग्रहणम्। तज्ज्ञानं यद्यपि योजनावशादिदमेकं वाक्यं तथाप्यर्थद्वयवशाद्द्वे वेदितव्ये। योगश्चकर्मजं फलं त्यक्त्वा इत्यनेन समग्रो लक्षित इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.51।।   तदुपायमाह कर्मजमिति। कर्मजं फलं त्यक्त्वाऽकामनयेश्वराय समर्प्य बुद्धियुक्ताः। सम्यग्ज्ञानिनो भूत्वा पदं गच्छन्ति। स योगः कर्म ज्ञानसाधनम्। तन्मोक्षसाधनमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.51।।बुद्धियोगयुक्ताः  कर्मजं फलं त्यक्त्वा  कर्म कुर्वन्तः तस्माद्  जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः अनामयं पदं गच्छन्ति।  हि प्रसिद्धम् एतत् सर्वासु उपनिषत्सु इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.51।।  कर्मजं  फलं त्यक्त्वा इति व्यवहितेन संबन्धः। इष्टानिष्टदेहप्राप्तिः कर्मजं फलं कर्मभ्यो जातं  बुद्धियुक्ताः  समत्वबुद्धियुक्ताः सन्तः  हि  यस्मात्  फलं त्यक्त्वा  परित्यज्य  मनीषिणः  ज्ञानिनो भूत्वा  जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः  जन्मैव बन्धः जन्मबन्धः तेन विनिर्मुक्ताः जीवन्त एव जन्मबन्धात् विनिर्मुक्ताः सन्तः  पदं  परमं विष्णोः मोक्षाख्यं  गच्छन्ति   अनामयं  सर्वोपद्रवरहितमित्यर्थः। अथवा बुद्धियोगाद्धनञ्जय इत्यारभ्य परमार्थदर्शनलक्षणैव सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीया कर्मयोगजसत्त्वशुद्धिजनिता बुद्धिर्दर्शिता साक्षात्सुकृतदुष्कृतप्रहाणादिहेतुत्वश्रवणात्।।योगानुष्ठानजनितसत्त्वशुद्धजा बुद्धिः कदा प्राप्स्यते इत्युच्यते

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【 Verse 2.52 】

▸ Sanskrit Sloka: यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति | तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ||

▸ Transliteration: yadā te mohakalilaṁ buddhirvyatitariṣyati | tadā gantāsi nirvedaṁ śrotavyasya śrutasya ca ||

▸ Glossary: yadā: when; te : they; moha kalilaṁ: slough of delusion; buddhiḥ: understand- ing; vyatitariṣyati: will pass through; tadā: at that time; gantāsi: you shall attain; nirvedaṁ: cheerlessness; śrotavyasya: all that is to be heard; śrutasya: all that is already heard; ca: also

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.52 When your wisdom takes you beyond delusion, you shall be indifferent to what has been heard and what is yet to be heard.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.52।।जिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.52।। जब तुम्हारी बुद्धि मोहरूप दलदल (कलिल) को तर जायेगी तब तुम उन सब वस्तुओं से निर्वेद (वैराग्य) को प्राप्त हो जाओगे? जो सुनने योग्य और सुनी हुई हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.52 यदा when? ते thy? मोहकलिलम् mire of delusion? बुद्धिः intellect? व्यतितरिष्यति crosses beyond? तदा then? गन्तासि thou shalt attain? निर्वेदम् to indifference? श्रोतव्यस्य of what has to be heard? श्रुतस्य what has been heard? च and.Commentary The mire of delusion is the identification of the Self with the notself. The sense of discrimination between the Self and the notSelf is confounded by the mire of delusion and the mind runs towards the sensual objects and the body is takes as the pure Self. When you attain purity of mind? you will attain to indifference regarding things heard and yet to be heard. They will appear to you to be of no use. You will not care a bit for them. You will entertain disgust for them. (Cf.XVI.24).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.52. When your determining faculty goes beyond the impregnable thicket of delusion, at that time you will attain an attitude of futility regarding what has to be heard and what has been heard.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.52 When thy reason has crossed the entanglements of illusion, then shalt thou become indifferent both to the philosophies thou hast heard and to those thou mayest yet hear.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.52 When your intellect has passed beyond the tangle of delusion, you will yourself feel disgusted regarding what you shall hear and what you have already heard.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.52 When your mind will go beyond the turbidity of delusion, then you will acire dispassion for what has to be heard and what has been heard.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.52 When thy intellect crosses beyond the mire of delusion, then thou shalt attain to indifference as to what has been heard and what has yet to be heard.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.52 See Comment under 2.53

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.52 If you act in this manner and get freed from impurities, your intellect will pass beyond the tangle of delusion. The dense impurity of sin is the nature of that delusion which generates attachment to infinitesimal results, of which you have already heard much from us and will hear more later on. You will then immediately feel, of your own accord, renunciation or feeling of disgust for them all.

Sri Krsna now teaches the goal called self-realisation (Yoga) which results from the performance of duty as taught in the passage beginning with 'Now, listen to this with regard to Karma Yoga' (2.39) which is based on the knowledge of the real nature of the self gained through the refinement of the mind.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.52 When is attained that wisdom which arises from the purification of the mind brought about by the pursuit of (karma-) yoga? This is being stated: Yada, when, [Yada: when maturity of discrimination is attained.] at the time when; te, your; buddhih, mind; vyatitarisyati, will go beyond, cross over; moha-kalilam, the turbidity of delusion, the dirt in the form of delusion, in the form of non-discrimination, which, after confounding one's understanding about the distinction between the Self and the not-Self, impels the mind towards objects that is to say, when your mind will attain the state of purity; tada, then, [Tada: then, when the mind, becoming purified, leads to the rise of discrimination, which in turn matures into detachment.] at that time; gantasi, you will acire; nirvedam, despassion; for srotavyasya, what has to be heard; ca, and; srutasya, what has been heard. The idea implied is that, at that time what has to be heard and what has been heard [What has to be heard৷৷.has been heard, i.e. the scriptures other than those relating to Self-knowledge. When discrimination referred to above gets matured, then the fruitlessness of all things other than Self-knowledge becomes apparent.] becomes fruitless.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.52।। मोह निवृत्ति होने पर वैराग्य प्राप्ति का आश्वासन यहाँ अर्जुन को दिया गया है। श्रोतव्य शब्द से तात्पर्य उन सभी विषयोपभोगों से है जिनका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया गया है तथा श्रुत शब्द से सभी ज्ञान अनुभव सूचित किये गये हैं। यह स्वाभाविक है कि बुद्धि के शुद्ध होने पर विषयोपभोग में कोई राग नहीं रह जाता।स्वरूप से दिव्य होते हुये भी चैतन्य आत्मा मोहावरण में फँसी हुई प्रतीत होती है। इस मोह का कारण है एक अनिर्वचनीय शक्ति माया। अव्यक्त विद्युत के समान माया भी प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होती परन्तु विभिन्न रूपों में उसकी अभिव्यक्ति से उसका अस्तित्व सिद्ध होता है।सभी जीवों की संरचना में माया के कार्य के निरीक्षण एवं अध्ययन से वेदान्त के आचार्यों ने यह पाया कि मनुष्य के व्यक्तित्व के दो स्तरों पर माया की अभिव्यक्ति दो प्रकार से होती है। बुद्धि पर आत्मस्वरूप के अज्ञान के रूप में पड़े इस आवरण को वेदान्त में माया की आवरण शक्ति कहा गया है। बुद्धि पर पड़े इस अज्ञान आवरण के कारण मन अनात्म जगत् की कल्पना करता है और उस जगत् के विषय में उसकी दो धारणायें दृढ़ होती हैं कि (क) यह सत्य है और (ख) यह अनात्मा (देह आदि) ही में हूँ। मन के स्तर पर कार्य करने वाली माया की यह शक्ति विक्षेप शक्ति कहलाती है।इस श्लोक में कहा गया है कि कर्मयोग की भावना से कर्म करते रहने पर बुद्धि की शुद्धि होती है और तब उसके लिये सम्भव होता है कि आवरण को हटाकर आत्मस्वरूप का साक्षात्कार कर सके। इस प्रकार मोह निवृति का परिणाम है विषयोपभोग से वैराग्य परन्तु आत्मअज्ञान के होने पर मनुष्य विषयों से ही सुख पाने की आशा में दिनरात परिश्रम करता रहता है।शीत ऋतु में बादलों से सूर्य के आच्छादित होने पर मनुष्य अग्नि जलाकर उसके समीप बैठता है किन्तु धीरेधीरे बादलों के हट जाने पर सूर्य की उष्णता का अनुभव कर वह अग्नि के पास से उठकर धूप का आनन्द लेता है। वैसे ही आनन्दस्वरूप के अज्ञान के कारण विषयों को पाने के लिये चल रही मनुष्य की भागदौड़ स्वत समाप्त हो जाती है जब वह स्वस्वरूप को पहचान लेता है।यहाँ सम्पूर्ण जगत् का निर्देश श्रुत और श्रोतव्य इन दो शब्दों से किया गया है। इसमें सभी इन्द्रियों द्वारा ज्ञात होने वाले विषय समाविष्ट हैं। कर्मयोगी की बुद्धि न तो पूर्वानुभूत विषय सुखों का स्मरण करती है और न ही भविष्य में प्राप्त होनेवाले अनुभवों की आशा।भाष्यकार भगवान् शंकराचार्य अगले श्लोक की संगति बताते हैं कि यदि तुम्हारा प्रश्न हो कि मोहावरण भेदकर और विवेकजनित आत्मज्ञान को प्राप्त कर कर्मयोग के फल परमार्थयोग को तुम कब पाओगे तो सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.52 2.53।।   सांख्यं बुद्धिं सदा प्राप्स्यामि यदर्थं कर्मानुष्ठानं भवतोपदिश्यत इत्यत आह  यदेति।  यदा यस्यामवस्थायां तव बुद्धिर्मोहात्मकमविवेकरुपं कालुष्यं व्यतिक्रमिष्यति तदा तस्यामवस्थायां श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च वैराग्यं प्राप्तासि। पूर्वं श्रुतिभिरनेकसाध्यसाधनश्रवणैर्विप्रतिपन्ना विक्षिप्ता श्रुतश्रोतवययोर्निर्वेदं लब्ध्वा यदा समाधीयते चित्तमस्मिन्निति समाधिरात्मा तस्मिन्निश्चला विक्षेपरहिता स्थास्यति स्थिरीभूता भविष्यति तदा योगं सांख्ययोगमवाप्स्यसीति द्वयोरर्थः। यद्वा योगानुष्ठानजनितसत्त्वशुद्धिजा वैराग्यादीतरसाधनसहिता नित्यानित्यवस्तुविवेकरुपा ज्ञानाधिकारसंपादिका बुद्धिः कदा प्राप्यत इत्यत आह  यदेति।  यदा तव बुद्धिर्मोहात्मकमविवेकरुपं कालुष्यं चित्ताशुद्धिजं व्यतितरिष्यति तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च कर्मफलस्य निर्वेदं गन्तासि। चित्तशुद्धिद्वारा लब्धात्मविवेकबुद्धिः कर्मयोगजं फलं परमात्मयोगं कदाप्स्यसीति तच्छृणु  श्रुतीति।  प्राग्वद्य्वाख्यानद्वयमपि भाष्याल्लभ्यत इति बोधम।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.52।।एवं कर्माण्यनुतिष्ठतः कदा मे सत्त्वशुद्धिः स्यादित्यत आह न ह्येतावता कालेन सत्त्वशुद्धिर्भवतीति कालनियमोऽस्ति किंतु यदा यस्मिन्काले ते तव बुद्धिरन्तःकरणं मोहकलिलं व्यतितरिष्यति अविवेकात्मकं कालुष्यं अहमिदं ममेदमित्याद्यज्ञानविलसितमतिगहनं व्यतिकमिष्यति। रजस्तमोमलमपहाय शुद्धभावमापत्स्यत इति यावत्। तदा तस्मिन्काले श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च कर्मफलस्य निर्वेदं वैतृष्ण्यं गन्तासि प्राप्तासि प्राप्नोषि।परीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायात् इति श्रुतेः। निर्वेदेन फलेनान्तःकरणशुद्धिं ज्ञास्यसीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.52।।कदा मनीषिणो भवन्तीत्यत आह  यदेति।  ते तव मोहः इष्टानिष्टवियोगसंयोगजपरितापजन्यं वैचित्यं तदेव कलिलमिव कलिलं कालुष्यं बुद्धिगतं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति व्यतिक्रमिष्यति बुद्धिः प्रसन्ना भविष्यति तदा श्रोतव्यस्य शास्त्रभागस्य श्रुतस्य च निर्वेदं वैराग्यं गन्तासि। अयं भावः मलिनायां बुद्धावसकृद्गृहीतस्यापि शास्त्रार्थस्याफुरणाच्छ्रोतव्यं श्रुतं च वृथैव तद्वच्छुद्धायामपि बुद्धौ सद्यः शास्त्रार्थस्फुरणात्तयोर्वैयर्थ्यमित्युभयथापि तत्र निर्वेद उचितः। प्रसन्ना च बुद्धिर्निग्रहीतुं योग्या भवतीति श्रवणादिकं त्यक्त्वा ध्याननिष्ठ एव भवेदिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.52।।ननु तत्प्राप्तिः कदा स्यात् इत्यत आह यदा त इति। ते बुद्धिर्यदा मोहकलिलं मोहगहनं लौकिकेषु देहादिषु विशेषेणाऽतितरिष्यति तदा निर्वेदं मोक्षं गमिष्यसि। श्रोतव्यस्य अग्रे प्रोच्यमानस्य शास्त्रतो वा श्रुतस्य च निर्वेदं तदैव गन्तासि। यद्वा च पुनः। श्रुतस्य पूर्वोक्तसाङ्ख्यादेः। यदा ते बुद्धिर्मोहकलिलं विशेषेण अतितरिष्यति तदा श्रोतव्यस्य भक्तिमार्गस्य निर्वेदं गन्तासि। अत्रायं भावः यावत्पर्यन्तं कर्मादिमार्गेषु मोहस्तावद्भक्तिमार्गफलं न भवति तस्यानन्यसाध्यत्वात्। अत एवाग्रे तथैवोपदेष्टव्यः। अधुनाऽधिकाराभावान्नोपदिश्यते अधिकारसम्पत्त्यर्थं च सूचितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.52।।कदा तत्पदमहं प्राप्स्यामीत्यपेक्षायामाह  यदेति  द्वाभ्याम्। मोहो देहादिष्वात्मबुद्धि तदेव कलिलंकलिलं गहनं विदुः इत्यभिधानकोशस्मृतेः। ततश्चायमर्थः। एवं पमेश्वराराधने क्रियमाणे यदा तत्प्रसादेन तव बुद्धिर्देहाभिमानलक्षणं मोहमयं गहनं दुर्गं विशेषेणातितरिष्यति तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्यार्थस्य च निर्वेदं वैराग्यं गन्तासि प्राप्स्यसि। तयोरनुपादेयत्वेन जिज्ञासां न करिष्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.52 2.53।।कदा तत्पदमहं प्राप्स्यामि इत्यपेक्षायामाह यदेति द्वाभ्याम्। निश्चला विशोकधैर्यादिवती ते यदा बुद्धिर्व्यवसायात्मिकैव तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च त्रैगुण्यस्य कर्मफलस्य निर्वेदं वैराग्यं प्राप्स्यसि। तस्यात्रानुपादेयत्वेन जिज्ञासां न करिष्यसीत्यर्थः। तादृशी सती ते बुद्धिरचला यदा समाधीयते तदा योगं योगस्वरूपं यास्यसि ततश्च कार्यसिद्धिः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.52।।योगानुष्ठानजनित सत्त्वशुद्धिसे उत्पन्न हुई बुद्धि कब प्राप्त होती है इसपर कहते हैं जब तेरी बुद्धि मोहकलिलको अर्थात् जिसके द्वारा आत्मानात्मके विवेकविज्ञानको कलुषित करके अन्तःकरण विषयोंमें प्रवृत्त किया जाता है उस मोहात्मक अविवेककालिमाको उल्लङ्घन कर जायगी अर्थात् जब तेरी बुद्धि बिल्कुल शुद्ध हो जायगी। तब उस समय तू सुननेयोग्यसे और सुने हुएसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा। अर्थात् तब तेरे लिये सुननेयोग्य और सुने हुए ( सब विषय ) निष्फल हो जायँगे यह अभिप्राय है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.52।। व्याख्या यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति   शरीरमें अहंता और ममता करना तथा शरीरसम्बन्धी मातापिता भाईभौजाई स्त्रीपुत्र वस्तु पदार्थ आदिमें ममता करना मोह है। कारण कि इन शरीरादिमें अहंताममता है नहीं केवल अपनी मानी हुई है। अनुकूल पदार्थ वस्तु व्यक्ति घटना आदिके प्राप्त होनेपर प्रसन्न होना और प्रतिकूल पदार्थ वस्तु व्यक्ति आदिके प्राप्त होनेपर उद्विग्न होना संसारमें परिवारमें विषमता पक्षपात मात्सर्य आदि विकार होना यह सबकासब कलिल अर्थात् दलदल है। इस मोहरूपी दलदलमें जब बुद्धि फँस जाती है तब मनुष्य किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। फिर उसे कुछ सूझता नहीं।यह स्वयं चेतन होता हुआ भी शरीरादि जड पदार्थोंमें अहंताममता करके उनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। पर वास्तवमें यह जिनजिन चीजोंके साथ सम्बन्ध जोड़ता है वे चीजें इसके साथ सदा नहीं रह सकतीं और यह भी उनके साथ सदा नहीं रह सकता। परन्तु मोहके कारण इसकी इस तरफ दृष्टि ही नहीं जाती प्रत्युत यह अनेक प्रकारके नयेनये सम्बन्ध जोड़कर संसारमें अधिकसेअधिक फँसता चला जाता है। जैसे कोई राहगीर अपने गन्तव्य स्थानपर पहुँचनेसे पहले ही रास्तेमें अपने डेरा लगाकर खेलकूद हँसीदिल्लगी आदिमें अपना समय बिता दे ऐसे ही मनुष्य यहाँके नाशवान् पदार्थोंका संग्रह करनेमें और उनसे सुख लेनेमें तथा व्यक्ति परिवार आदिमें ममता करके उनसे सुख लेनेमें लग गया। यही इसकी बुद्धिका मोहरूपी कलिलमें फँसना है।हमें शरीरमें अहंताममता करके तथा परिवारमें ममता करके यहाँ थोड़े ही बैठे रहना है इनमें ही फँसे रहकर अपनी वास्तविक उन्नति(कल्याण) से वञ्चित थोड़े ही रहना है हमें तो इनमें न फँसकर अपना कल्याण करना है ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाना ही बुद्धिका मोहरूपी दलदलसे तरना है। कारण कि ऐसा दृढ़ विचार होनेपर बुद्धि संसारके सम्बन्धोंको लेकर अटकेगी नहीं संसारमें चिपकेगी नहीं।मोहरूपी कलिलसे तरनेके दो उपाय हैं विवेक और सेवा। विवेक (जिसका वर्णन 2। 11 30 में हुआ है) तेज होता है तो वह असत् विषयोंसे अरुचि करा देता है। मनमें दूसरोंकी सेवा करनेकी दूसरोंको सुख पहुँचानेकी धुन लग जाय तो अपने सुखआरामका त्याग करनेकी शक्ति आ जाती है। दूसरोंको सुख पहुँचानेका भाव जितना तेज होगा उतना ही अपने सुखकी इच्छाका त्याग होगा। जैसे शिष्यकी गुरुके लिये पुत्रकी मातापिताके लिये नौकरकी मालिकके लिये सुख पहुँचानेकी इच्छा हो जाती है तो उनकी अपने सुखआरामकी इच्छा स्वतः सुगमतासे मिट जाती है। ऐसे ही कर्मयोगीका संसारमात्रकी सेवा करनेका भाव हो जाता है तो उसकी अपने सुखभोगकी इच्छा स्वतः मिट जाती है।विवेकविचारके द्वारा अपनी भोगेच्छाको मिटानेमें थोड़ी कठिनता पड़ती है। कारण कि अगर विवेकविचार अत्यन्त दृढ़ न हो तो वह तभीतक काम देता है जबतक भोग सामने नहीं आते। जब भोग सामने आते हैं तब साधक प्रायः उनको देखकर विचलित हो जाता है। परन्तु जिसमें सेवाभाव होता है उसके सामने बढ़ियासेबढ़िया भोग आनेपर भी वह उस भोगको दूसरोंकी सेवामें लगा देता है। अतः उसकी अपने सुखआरामकी इच्छा सुगमतासे मिट जाती है। इसलिये भगवान्ने सांख्ययोगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ (5। 2) सुगम (5। 3) एवं जल्दी सिद्धि देनेवाला (5। 6) बताया है। तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च   मनुष्यने जितने भोगोंको सुन लिया है भोग लिया है अच्छी तरहसे अनुभव कर लिया है वे सब भोग यहाँ  श्रुतस्य  पदके अन्तर्गत हैं। स्वर्गलोक ब्रह्मलोक आदिके जितने भोग सुने जा सकते हैं वे सब भोग यहाँ  श्रोतव्यस्य (टिप्पणी प0 90)  पदके अन्तर्गत हैं। जब तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी तब इन  श्रुत   ऐहलौकिक और  श्रोतव्य   पारलौकिक भोगोंसे विषयोंसे तुझे वैराग्य हो जायगा। तात्पर्य है कि जब बुद्धि मोहकलिलको तर जाती है तब बुद्धिमें तेजीका विवेक जाग्रत् हो जाता है कि संसार प्रतिक्षण बदल रहा है और मैं वही रहता हूँ अतः इस संसारसे मेरेको शान्ति कैसे मिल सकती है मेरा अभाव कैसे मिट सकता है तब  श्रुत  और  श्रोतव्य  जितने विषय हैं उन सबसे स्वतः वैराग्य हो जाता है।यहाँ भगवान्को  श्रुत  के स्थानपर भुक्त और  श्रोतव्य  के स्थानपर भोक्तव्य कहना चाहिये था। परन्तु ऐसा न कहनेका तात्पर्य है कि संसारमें जो परोक्षअपरोक्ष विषयोंका आकर्षण होता है वह सुननेसे ही होता है। अतः इनमें सुनना ही मुख्य है। संसारसे विषयोंसे छूटनेके लिये जहाँ ज्ञानमार्ग और भक्तिमार्गका वर्णन किया गया है वहाँ भी श्रवण को मुख्य बताया गया है। तात्पर्य है कि संसारमें और परमात्मामें लगनेमें सुनना ही मुख्य है।यहाँ  यदा  और  तदा  कहनेका तात्पर्य है कि इन  श्रुत  और  श्रोतव्य  विषयोंसे इतने वर्षोंमें इतने महीनोंमें और इतने दिनोंमें वैराग्य होगा ऐसा कोई नियम नहीं है प्रत्युत जिस क्षण बुद्धि मोहकलिलको तर जायगी उसी क्षण  श्रुत  और  श्रोतव्य  विषयोंसे भोगोंसे वैराग्य हो जायगा। इसमें कोई देरीका काम नहीं है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.52।।बुद्धियुक्त इति। उभे इति परस्परव्यभिचारं दर्शयति। तस्माद्योगायेति। यथा हि सुकृतदुष्कृते नश्यतः (N दुष्कृते न नश्यतः) तथाकरणमेव परमं कौशलमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.52।।यस्मिन्कर्मणि क्रियमाणे परमार्थदर्शनलक्षणा बुद्धिरुद्देश्यतया युज्यते तस्मात्कर्मणः सकाशादितरत्कर्म तथाविधोद्देश्यभूतबुद्धिसंबन्धविधुरमतिशयेन निष्कृष्यते ततश्च परमार्थबुद्धिमुद्देश्यत्वेनाश्रित्य कर्मानुष्ठातव्यं परिच्छिन्नफलान्तरमुद्दिश्य तदनुष्ठाने कार्पण्यप्रसङ्गात् किञ्च परमार्थबुद्धिमुद्देश्यमाश्रित्य कर्मानुतिष्ठतः करणशुद्धिद्वारा परमार्थदर्शनसिद्धौ जीवत्येव देहे सुकृतादि हित्वा मोक्षमधिगच्छति। तथाच परमार्थदर्शनलक्षणयोगार्थं मनो धारयितव्यं योगशब्दितं हि परमार्थदर्शनमुद्देश्यतया कर्मस्वनुतिष्ठतो नैपुण्यमिष्यते यदि च परमार्थदर्शनमुद्दिश्य तद्युताः सन्तः समारभेरन्कर्माणि तदा तदनुष्ठानजनितबुद्धिशुद्ध्या ज्ञानिनो भूत्वा कर्मजं फलं परित्यज्य निर्मुक्तबन्धना मुक्तिभाजो भवन्तीत्येवमस्मिन्पक्षे श्लोकत्रयाक्षराणि व्याख्यातव्यानि। यथोक्तबुद्धिप्राप्तिकालं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति  योगेति।  श्रुतं श्रोतव्यं दृष्टं द्रष्टव्यमित्यादौ फलाभिलाषप्रतिबन्धान्नोक्ता बुद्धिरुदेष्यतीत्याशङ्क्याह  यदेति।  विवेकपरिपाकावस्था कालशब्देनोच्यते। कालुष्यस्य दोषपर्यवसायित्वं दर्शयन्विशिनष्टि  येनेति।  तदनर्थरूपं कालुष्यं तवेत्यन्वयार्थं पुनर्वचनम्। बुद्धिशुद्धिफलस्य विवेकस्य प्राप्त्या वैराग्यप्राप्तिं दर्शयति  तदेति।  अध्यात्मशास्त्रातिरिक्तं शास्त्रं श्रोतव्यादिशब्देन गृह्यते। उक्तं वैराग्यमेव स्फोरयति  श्रोतव्यमिति।  यथोक्तविवेकसिद्धौ सर्वस्मिन्ननात्मविषये नैष्फल्यं प्रतिभातीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.52।।यदा ते इति श्लोके योगसम्बन्धि न किमप्युच्यत इत्यतस्तत्सङ्गतिमाह  किय दिति। एवं फलकामनादिवर्जितानि ईश्वराराधनरूपाणीत्याकाङ्क्षायामाहेत्यर्थः। नन्वियमाकाङ्क्षैवानुपपन्ना योगो हि ज्ञानफलसाधनतयोपदिष्टः साधनं च साध्यप्राप्तिपर्यन्तमनुष्टेयमिति प्रसिद्धमेव।नियतपूर्वक्षणवृत्ति कारणं इति तल्लक्षणम्। उच्यते योगो हि न साक्षाज्ज्ञानसाधनम् किन्तु श्रवणादिकमेव प्रमितेः प्रमाणफलत्वात्। योगस्त्वदृष्टद्वारा सत्त्वशुद्धिमुत्पाद्य श्रवणादीनामुपकरोति उपकारस्य च द्वयी गतिर्दृष्टा अतो युक्तैवेयमाकाङ्क्षेति। तथापि जिज्ञासुनेति वक्तव्यम्। सत्यम् मोक्षसाधनज्ञानार्थिनेत्येतावतोऽर्थस्य ग्रहणाय मुमुक्षुणेत्युक्तम्। निर्वेदं वैराग्यमित्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह  निर्वेद मिति। ननु निरः पूर्वो विदिर्वैराग्ये रूढः तत्कुतो लाभार्थतेत्यत आह  प्रयोगादि ति। अस्यामपि श्रुतौ वैराग्यार्थता किं न स्यात् इत्यत आह   न ही ति। कुतो नोपपद्यत इत्यत आह  तथा सती ति।जुगुप्साविरामप्रमादार्थानामुपसङ्ख्यानम् इति कात्यायनवचनात्पाण्डित्यस्य विरामार्थधातुयोगबलेनापादानत्वप्राप्तौ अपादाने पञ्चमी स्यात् न द्वितीयेत्यर्थः। इदमत्राभिप्रेतम् निरुपसर्गः सत्तार्थस्यैव विदेरर्थं बाधित्वा तं वैराग्यार्थं व्यवस्थापयति निर्विद्यत इति कर्तरि प्रयोगदर्शनात्। लाभार्थस्य विदेरर्थं विशिनष्ट्येव केवलम्।निर्विन्दतिनिर्विन्दते इति वैराग्ये तत्प्रयोगादर्शनादिति। अथवाऽस्तु सर्वत्र निरो धात्वर्थबाधकत्वम् विशेषकत्वमपि क्वचित् किं न स्यात् व्याददातीत्यादावुभयदर्शनादिति।न केवलं गीतायां प्रयोगाल्लाभार्थता किन्तु वैराग्यार्थतानुपपत्तेश्चेत्याह  न चे ति। अनेनान्तःकरणस्य मोहकलिलातिक्रमो नाम ज्ञानप्राप्तिरिति सूचितं भवति। आदिपदेन तदुपयुक्तं गृह्यते कुतो न भवति इत्यत आह  आत्मारामा  इति। भक्तिं श्रवणादिलक्षणाम्।कस्य वा महतीमेतामात्मारामः समभ्यसत् इत्यस्योत्तरत्वात् अनुष्ठानाच्च श्रवणादेरिति शेषः। ननु शुक्रादीनां श्रवणाद्यनुष्ठानेऽपि फलं नास्ति तत्फलस्य ज्ञानस्य प्राप्तत्वात्। फलाभावानुसन्धानमेव चात्र वैराग्यशब्देनाभिप्रेतम्। यथाऽऽह मायावादीतदा श्रोतव्यं श्रुतं च निष्फलं प्रतिपद्यत इत्यभिप्रायः शां.भा. इति। अनुष्ठानं तु लोकसङ्ग्रहार्थं संस्काराद्वेत्यत आह  न चे ति। कुतो नेत्यत आह  तस्यैवे ति। तस्यैव श्रवणादेरेव स्थान्यादेशोक्तिव्यत्ययेन द्वन्द्वेऽल्पाच्तरस्य परनिपातेन चआन्महतः समानाधिकरणजातीययोः अष्टा.6।3।46 इत्यस्य विधेरनित्यत्वज्ञापनात्महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणात् भाग.3।5।29 इत्यादिप्रयोगदर्शनाच्च महत्सुखत्वादिति युक्तम्। तथापि श्रवणादिकमेव कथं सुखम् उत्तरक्षण एव महासुखोदयादैक्योषचार इत्यदोषः। तिष्ठतु तावत् कालान्तरभावि महत्फलमित्येवशब्दः। नन्वस्मदादीनां श्रवणोत्तरक्षणे सुखं नोत्पद्यत इत्यत आह  तेषा मिति रसिकानामित्यर्थः। न हि पितृजीवनादिवार्ताश्रवणेनान्येषामिव न पुत्रस्यापि सुखेनोत्पत्तव्यमिति। अस्तु सम्भावना निश्चयस्तु कुतः इत्यत आह  ये ति। भवतो भवज्जनानां च स्वमहिमन्याविर्भूतस्वरूपे आब्रह्मण्यल्पमुक्ते। न केवलं तात्कालिकं सुखं तत्फलम् किन्तु मुक्तावानन्दवृद्धिश्चेत्याह  तेषा मिति। ज्ञानिनामपि ज्ञानोत्तरस्याप्यनुष्ठानस्य यदि फलं स्यात्तर्ह्यनुष्ठानस्यैकविध्यनियमासम्भवात्। स्वर्गवदपवर्गेऽपि तारतम्यं प्रसज्येत। न च तद्युक्तम् अप्रमाणिकत्वात् प्रमाणविरुद्धत्वाच्चेत्यतो नेदमनिष्टमिति भावेनाह  तारतम्ये ति। प्रमाणविरोधाभावाच्चेति चार्थः।कुतः प्रमाणान्मुक्ततारतम्याधिगतिः इत्यतोऽर्थापत्तिं तावदाह  तथाही ति। यदि मुक्तानां तारतम्यं न स्यात् तदा मुक्तिमप्यनिच्छतामेकान्तिनां मोक्षमात्रफलं तं मोक्षमिच्छतामपि सुप्रतीकादीनां मोक्षो भवतीत्यङ्गीकार्य स्यात्। तथा च नात्यन्तिकमिति मोक्षमनिच्छतां स्तुतिः कथमुपपन्ना स्यात् निमित्ताभावात् अतः स्तुत्यन्यथानुपपत्त्येच्छतां मुक्तेरनिच्छतां मुक्तिरधिकेति गम्यते इत्यर्थः। आत्यन्तिकं मुक्तिहेतुम्। एकात्मतां सायुज्यम्। एकत्वमपि तदेव। आगमाच्च तारतम्याधिगतिरित्याह  वचनाच्चे ति। आविर्भूतस्वरूपिणामिति कर्मधारयादतिशयार्थे इनिः। अनेन जीवन्मुक्तावैश्वर्यतारतम्येनार्थापत्तेरन्यथोपपत्तिः परिहृतालिङ्गभेदने भिन्नलिङ्गानां इत्याद्युक्तेः। परमं साम्यमुपैति मुं.उ.3।1।3 इत्यादिवचनविरुद्धं मुक्ततारतम्यमित्यत आह  साम्ये ति। प्राचुर्यं पूर्णत्वम्। कुत एतत् उक्तप्रमाणविरोधात् विशेषवचनाच्चेत्याह  तथाचे ति। यद्यपि परानन्दोऽलम्बुद्धिगोचरत्वमात्रेण समः तथापि न च ज्ञानिनामित्यादिनोक्तमर्थमुपसंहरति  अत  इति। अस्तु तर्हि भगवन्महिमादिव्यतिरिक्तश्रुतादौ वैराग्यमत्र विवक्षितमित्यत आह  न चे ति। निर्वेदशब्दस्य वैराग्यार्थकत्वे निश्चिते तद्बलाच्छ्रोतव्यादिशब्दस्यार्थसङ्कोचः क्रियेतापि। इतरत्र नितरां लाभे तस्य प्रयोगे विद्यमाने निर्मूलं सङ्कोचकल्पनमित्यर्थः। ननु लाभार्थतायामपि असच्छास्त्रादिव्युदासाय सङ्कोचः कार्य एवेत्याह  महद्भि रिति। अयोग्यतयैव तन्निरासः प्रकरणाद्वेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.52।।कियत्पर्यन्तमवश्यं कर्तव्यानि मुमुक्षुणैवं कर्माणीत्याह यदेति। निर्वेदं नितरां लाभम्। प्रयोगात् तस्माद्ब्राह्मणः पाण्डित्यं निर्विद्य बृ.उ.3।5।1 इत्यादि। न हि तत्र वैराग्यमुपपद्यते तथा सति पाण्डित्यादिति स्यात्।न च ज्ञानिनां भगवन्महिमादिश्रवणेन विरक्तिर्भवति।आत्मारामा हि मुनयो निर्ग्राह्या (निर्ग्रन्था) अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः भाग.1।7।10 इति वचनात् अनुष्ठानाच्च शुकादीनाम्। न च तेषां फलं सुखं नास्ति तस्यैव महत्सुखत्वात्। तेषांया निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्मध्यानाद्भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात्। साब्रह्मणि स्वमहिमन्यपि नाथ मा भूत्किम्वन्तकासि लुलितात्पततां विमानात् भाग.4।9।10 इत्यादिवचनात्। तेषामप्युपासनादिफलस्य साधितत्वात् तारतम्याधिगतेश्च।तथाहि यदि तारतम्यं न स्यात्नात्यन्तिकं विगणयन्त्यपि ते प्रसादं भाग.3।15।48नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति केचित् भाग.2।25।34एकत्वमप्युत दीयमानं न गृह्णन्ति इति मुक्तिमप्यनिच्छतामपि मोक्ष एव फलम्। तमिच्छतामपि भवति सुप्रतीकादीनाम्। कथमनिच्छतां स्तुतिरुपपन्ना स्यात् वचनाच्च।यथा भक्तिविशेषोऽत्र दृश्यते पुरुषोत्तमे। तथा मुक्तिविशेषोऽपि ज्ञानिनां लिङ्गभेदने इति।योगिनां भिन्नलिङ्गानामाविर्भूतस्वरूपिणाम्। प्राप्तानां परमानन्दं तारतम्यं सदैव हि इति।न त्वामतिशयिष्यन्ति मुक्तावपि कदाचन। मद्भक्तियोगाज्ज्ञानाच्च सर्वानतिशयिष्यसि इति च। साम्यवचनं तु प्राचुर्यविषयम् दुःखाभावविषयं च। तथा चोक्तम् दुःखाभावः परानन्दो लिङ्गभेदः समो मतः। तथापि परमानन्दो ज्ञानभेदात्तु भिद्यते इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे। अतो न वैराग्यं श्रुतादावत्र विवक्षितम्। न च सङ्कोचे मानं किञ्चिद्विद्यमान इतरत्र प्रयोगे महद्भिः श्रवणीयस्य श्रुतस्य च वेदादेः फलं प्राप्स्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.52।।उक्तप्रकारेण कर्मणि वर्तमानस्य तया वृत्त्या निर्धूतकल्मषस्य  ते बुद्धिः यदा मोहकलिलम्  अत्यल्पफलसङ्गहेतुभूतं मोहरूपं कलुषं  व्यतितरिष्यति।  तदा अस्मत्त इतः पूर्वं त्याज्यतया श्रुतस्य फलादेः इतः पश्चात्  श्रोतव्यस्य  च कृते स्वयम् एव निर्वेदं गन्तासि गमिष्यसि।योगे त्विमां श्रृणु इत्यादिना उक्तस्य आत्मयाथात्म्यज्ञानपूर्वकस्य बुद्धिविशेषसंस्कृतकर्मानुष्ठानस्य लक्षणभूतं योगाख्यं फलम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.52।।  यदा  यस्मिन्काले  ते  तव  मोहकलिलं  मोहात्मकमविवेकरूपं कालुष्यं येन आत्मानात्मविवेकबोधं कलुषीकृत्य विषयं प्रत्यन्तःकरणं प्रवर्तते तत् तव  बुद्धिः व्यतितरिष्यति  व्यतिक्रमिष्यति अतिशुद्धभावमापत्स्यते इत्यर्थः।  तदा  तस्मिन् काले  गन्तासि  प्राप्स्यसि  निर्वेदं  वैराग्यं  श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च  तदा श्रोतव्यं श्रुतं च ते निष्फलं प्रतिभातीत्यभिप्रायः।।मोहकलिलात्ययद्वारेण लब्धात्मविवेकजप्रज्ञः कदा कर्मयोगजं फलं परमार्थयोगमवाप्स्यामीति चेत् तत् श्रृणु

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【 Verse 2.53 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला | समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ||

▸ Transliteration: śrutivipratipannā te yadā sthāsyati niścalā | samādhāvacalā buddhis tadā yogamavāpsyasi ||

▸ Glossary: śrutivipratipannā: confused by much hearing; te: this; yadā: when; sthāsyati: rests; niścalā: steady; samādhau: on God; acalā: unflinching; buddhiḥ: intellect; tadā: at that time; yogaṁ: self-realization; avāpsyasi: you will achieve

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.53 When you are not confused by what you have heard and your wisdom stands steady and unmoving in the Self, you shall attain Yoga, Self–realization.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.53।।जिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.53।। जब अनेक प्रकार के विषयों को सुनने से विचलित हुई तुम्हारी बुद्धि आत्मस्वरूप में अचल और स्थिर हो जायेगी तब तुम (परमार्थ) योग को प्राप्त करोगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.53 श्रुतिविप्रतिपन्ना perplexed by what hast heard? ते thy? यदा when? स्थास्यति shall stand? निश्चला immovable? समाधौ in the Self? अचला steady? बुद्धिः intellect? तदा then? योगम् Selfrealisation? अवाप्स्यसि (thou) shalt attain.Commentary When your intellect which is tossed about by the conflict of opinions regarding the Pravritti Marga (the path of action) and the Nivritti Marga (the path of retirement or renunciation) has become immovable without distraction and doubt and firmly established in the Self? then thou shalt attain Selfrealisation or knowledge of the Self (AtmaJnana).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.53. When your determining faculty, that had been [earlier] confused by your hearing [of scriptural declaration of fruits] shall stand stable in concentration, at that time you shall attain the Yoga.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.53 When the intellect, bewildered by the multiplicity of holy scripts, stands unperturbed in blissful contemplation of the Infinite, then hast thou attained Spirituality.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.53 When your intellect, well enlightened by hearing from Me and firmly placed, stands unshaken in a concentrated mind, then you will attain the vision of the self.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.53 When your mind that has become bewildered by hearing [S. takes the word sruti in the sense of the Vedas.-Tr.] will become unshakable and steadfast in the Self, then you will attain Yoga that arises from discrimination.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.53 When thy intellect, which is perplexed by the Veda text, which thou hast read, shall stand immovable and steady in the Self, then thou shalt attain Self-realisation.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.52-53 Yada te etc. Sruti-etc. At the time, when the determining facult with regard to the Yoga is attained, the clear sign of recognizing it, is this : An attitude of futility about the revealed literature that has to be listened to, that has been listened to and that is being declared. What has been declared by the above is this : 'This present view of yours about the ruination of your race is out of place and it is due to the influence of your deceptive notion, born of mental impressions created by your listening to the teachings of those scriptures that favour the observers who are fallen deep into the course of ignorance. But, that view shall vanish when the respect for such a teaching disappears.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.53 Here 'Sruti' means hearing (and not the Veda). When your intellect, which, by hearing from us, has become specially enlightened, having for its object the eternal, unsurpassed and subtle self - which belongs to a class different from all other entities -, then the intellect is firmly fixed, i.e., in a single psychosis and stands unshaken. In such a concentrated mind, purified by the performance of duties without attachment, will be generated true Yoga, which consists in the vision of the self. What is said is this: Karma Yoga, which presupposes the knowledge of the real nature of the self obtained from the scriptures, leads to a firm devotion to knowledge known as the state of firm wisdom; and the state of 'firm wisdom;' which is in the form of devotion to knowledge, generates the vision of the self; this vision is here called Yoga.

Arjuna, thus taught, estions about the nature of 'firm wisdom' which constitutes the means for the attainment of Yoga and which itself is attainable through Karma Yoga which consists in work with detachment, and also about the mode of behaviour of a man of 'firm wisdom.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.53 If it be asked, 'By becoming possessed of the wisdom arising from the discrimination about the Self after overcoming the turbidity of delusion, when shall I attain the yoga of the supreme Reality which is the fruit that results from Karma-yoga?', then listen to that; Yada, when at the time when; te, your; buddhih, mind; that has become sruti-vi-pratipanna, bewildered, tossed about, by hearing (the Vedas) that reveal the diverse ends, means, and (their) relationship, i.e. are filled with divergent ideas; sthasyati, will become; niscala, unshakable, free from the trubulence in the form of distractions; and acala, steadfast, that is to say, free from doubt even in that (unshakable) state; samadhau, in samadhi, that is to say, in the Self samadhi being derived in the sense of that in which the mind is fixed; tada, then, at that time; avapsyasi, you will attain; yogam, Yoga, the enlightenment, Self-absorption, that arises from discrimination. Having got an occasion for iniry, Arjuna, with a view to knowing the characteristics of one who has the realization of the Self, [By the word samadhi is meant the enlightenment arising from discrimination, which has been spoken of in the commentary on the previous verse. The steadfastness which the monks have in that enlightenment is called steadfastness in Knowledge. Or the phrase may mean, 'the enlightenment achieved through meditation on the Self', i.e. the realization of the supreme Goal.] asked:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.53।। जब पाँचो ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा विषयों को ग्रहण करने पर भी जिसकी बुद्धि अविचलित रहती है तब उसे योग में स्थित समझा जाता है। सामान्यत इन्द्रियों के विषय ग्रहण के कारण मन में अनेक विक्षेप उठते हैं। योगस्थ पुरुष का मन इन सबमें निश्चल रहता है। उसके विषय में आगे स्थितप्रज्ञ के लक्षण और अधिक विस्तार से बताते हैं।अनेक व्याख्याकार इसका अर्थ इस प्रकार करते हैं कि विभिन्न दार्शनिकों के परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले सिद्धान्तों को सुनकर जिसकी बुद्धि विचलित नहीं होती वह योग में स्थित हुआ समझा जाता है।अब तक के प्रस्तुत किये गये तर्कों से इस विषय में अर्जुन की रुचि बढ़ने लगती है और उन्माद का प्रभाव कम होने लगता है। अपने विषाद और दुख को भूलकर श्रीकृष्ण के प्रवचन में स्वयं रुचि लेते हुये ज्ञानी पुरुष के लक्षणों को जानने की अपनी उत्सुकता को वह नहीं रोक सका। उसके प्रश्न से स्पष्ट दिखाई देता है कि वह भगवान् के सिद्धान्त को ग्रहण कर रहा है फिर भी उसके मन में कुछ है जिसके कारण वह इसे पूर्णत स्वीकार नहीं कर पा रहा था।प्रश्न पूछने के लिए अवसर पाकर समत्व में स्थित बुद्धि वाले पुरुष के लक्षणों को जानने की उत्सुकता से अर्जुन प्रश्न करता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.52 2.53।।   सांख्यं बुद्धिं सदा

Chapter 2 (Part 31)

प्राप्स्यामि यदर्थं कर्मानुष्ठानं भवतोपदिश्यत इत्यत आह  यदेति।  यदा यस्यामवस्थायां तव बुद्धिर्मोहात्मकमविवेकरुपं कालुष्यं व्यतिक्रमिष्यति तदा तस्यामवस्थायां श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च वैराग्यं प्राप्तासि। पूर्वं श्रुतिभिरनेकसाध्यसाधनश्रवणैर्विप्रतिपन्ना विक्षिप्ता श्रुतश्रोतवययोर्निर्वेदं लब्ध्वा यदा समाधीयते चित्तमस्मिन्निति समाधिरात्मा तस्मिन्निश्चला विक्षेपरहिता स्थास्यति स्थिरीभूता भविष्यति तदा योगं सांख्ययोगमवाप्स्यसीति द्वयोरर्थः। यद्वा योगानुष्ठानजनितसत्त्वशुद्धिजा वैराग्यादीतरसाधनसहिता नित्यानित्यवस्तुविवेकरुपा ज्ञानाधिकारसंपादिका बुद्धिः कदा प्राप्यत इत्यत आह  यदेति।  यदा तव बुद्धिर्मोहात्मकमविवेकरुपं कालुष्यं चित्ताशुद्धिजं व्यतितरिष्यति तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च कर्मफलस्य निर्वेदं गन्तासि। चित्तशुद्धिद्वारा लब्धात्मविवेकबुद्धिः कर्मयोगजं फलं परमात्मयोगं कदाप्स्यसीति तच्छृणु  श्रुतीति।  प्राग्वद्य्वाख्यानद्वयमपि भाष्याल्लभ्यत इति बोधम।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.53।।अन्तःकरणशुद्ध्यधैवं जातनिर्वेदस्य कदा ज्ञानप्राप्तिरित्यपेक्षायामाह ते तव बुद्धिः श्रुतिभिर्नानाविधफलश्रवणैरविचारिततात्पर्यैर्विप्रतिपन्ना अनेकविधसंशयविपर्यासवत्त्वेन विक्षिप्ता प्राक् यदा यस्मिन्काले शुद्धिजविवेकजनितेन दोषदर्शनेन तं विक्षेपं परित्यज्य समाधौ परमात्मनि निश्चला जाग्रत्स्वप्नदर्शनलक्षणविक्षेपरहिता अचला सुषुप्तिमूर्च्छास्तब्धीभावादिरूपलयलक्षणचलनरहिता सती स्थास्यति। लयविक्षेपलक्षणौ दोषौ परित्यज्य समाहिता भविष्यतीति यावत्। अथवा निश्चलाऽसंभावनाविपरीतभावनारहिता अचला दीर्घकालादनैरन्तर्यसत्कारसेवनैर्विजातीयप्रत्ययादूषिता सती निर्वातप्रदीपवदात्मनि स्थास्यतीति योजना। तदा तस्मिन्काले योगं जीवपरमात्मैक्यलक्षणं तत्त्वमस्यादिवाक्यजन्यमखण्डसाक्षात्कारं सर्वयोगफलमवाप्स्यसि। तदा पुनः साध्यान्तराभावात्कृतकृत्यः स्थितप्रज्ञो भविष्यसीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.53।।ननु बुद्धिप्रसादोऽपि केन लिङ्गेन ज्ञेय इत्यत आह  श्रुतीति।  श्रुतिभिर्नानाविधशास्त्रश्रवणैर्विप्रतिपन्ना आत्मा नित्योऽनित्यो वा नित्योऽपि कर्ताऽकर्ता वा अकर्ताप्येकोऽनेको वेत्येवमादिसंशयग्रस्ता सती यदा असंभावनाविपरीतभावनानिरासपूर्वकं श्रुतितात्पर्यविषयीभूते ब्रह्माद्वैते निश्चला पुनः कुतर्कैरनास्कन्दनीया निर्विचिकित्सा परोक्षनिश्चयवती भूत्वा समाधौ निर्विकल्पके प्रत्यगात्मनि अचला लयविक्षेपशून्या स्थास्यति स्थिरा भविष्यति तदा योगं विवेकप्रज्ञां प्राप्स्यसि। निश्चलसमाधिलाभ एव बुद्धिप्रसादलिङ्गमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.53।।एतदेव द्रढयति श्रुतिविप्रतिपन्नेति। श्रुतिविप्रतिपन्ना नानाविधधर्मश्रवणेच्छारहिता निश्चला श्रुतैरपि तैर्धर्मैश्चालनायोग्या यदा ते बुद्धिर्भविष्यति समाधौ मच्चिन्तनसमये अचला स्वतो दृढा स्थास्यति तदा योगं मत्सान्निध्यरूपमवाप्स्यसि प्राप्स्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.53।।ततश्च      श्रुतीति।  श्रुतिभिर्नानालौकिकवैदिकार्थश्रवणैर्विप्रतिपन्ना इतः पूर्वं विक्षिप्ता सती तव बुद्धिर्यदा समाधौ स्थास्यतीति समाधीयते चित्तमस्मिन्निति समाधिः परमेश्वरः तस्मिन्निश्चला विक्षेपव्याप्तिविषयान्तरैरनाकृष्टात एवाचला अभ्यासपटुत्वेन तत्रैव स्थिरा लयव्याप्तिः सती तदा योगं योगफलं तत्त्वज्ञानमवाप्स्यपि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.52 2.53।।कदा तत्पदमहं प्राप्स्यामि इत्यपेक्षायामाह यदेति द्वाभ्याम्। निश्चला विशोकधैर्यादिवती ते यदा बुद्धिर्व्यवसायात्मिकैव तदा श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च त्रैगुण्यस्य कर्मफलस्य निर्वेदं वैराग्यं प्राप्स्यसि। तस्यात्रानुपादेयत्वेन जिज्ञासां न करिष्यसीत्यर्थः। तादृशी सती ते बुद्धिरचला यदा समाधीयते तदा योगं योगस्वरूपं यास्यसि ततश्च कार्यसिद्धिः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.53।।यदि तू पूछे कि मोहरूप मलिनतासे पार होकर आत्मविवेकजन्य बुद्धिको प्राप्त हुआ मैं कर्मयोगके फलरूप परमार्थयोगको ( ज्ञानको ) कब पाऊँगा तो सुन अनेक साध्य साधन और उनका सम्बन्ध बतलानेवाली श्रुतियोंसे विप्रतिपन्न अर्थात् नाना भावोंको प्राप्त हुई विक्षिप्त हुई तेरी बुद्धि जब समाधिमें यानी जिसमें चित्तका समाधान किया जाय वह समाधि है इस व्युत्पत्तिसे आत्माका नाम समाधि है उसमें अचल और दृढ़ स्थिर हो जायगी यानी विक्षेपरूप चलनसे और विकल्पसे रहित होकर स्थिर हो जायगी। तब तू योगको प्राप्त होगा अर्थात् विवेकजनित बुद्धिरूप समाधिनिष्ठाको पावेगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.53।। व्याख्या   लौकिक मोहरूपी दलदलको तरनेपर भी नाना प्रकारके शास्त्रीय मतभेदोंको लेकर जो मोह होता है उसको तरनेके लिये भगवान् इस श्लोकमें प्रेरण करते हैं। श्रुतिविप्रतिपन्ना ते ৷৷. तदा योगमवाप्स्यसि   अर्जुनके मनमें यह श्रुतिविप्रतिपत्ति है कि अपने गुरुजनोंका अपने कुटुम्बका नाश करना भी उचित नहीं है और अपने क्षात्रधर्म(युद्ध करने) का त्याग करना भी उचित नहीं है। एक तरफ तो कुटुम्बकी रक्षा हो और एक तरफ क्षात्रधर्मका पालन हो इसमें अगर कुटुम्बकी रक्षा करें तो युद्ध नहीं होगा और युद्ध करें तो कुटुम्बकी रक्षा नहीं होगी इन दोनों बातोंमें अर्जुनकी श्रुतिविप्रतिपत्ति है जिससे उनकी बुद्धि विचलित हो रही।  (टिप्पणी प0 91)  अतः भगवान् शास्त्रीय मतभेदोंमें बुद्धिको निश्चल और परमात्मप्राप्तिके विषयमें बुद्धिको अचल करनेकी प्रेरणा करते हैं।पहले तो साधकमें इस बातको लेकर सन्देह होता है कि सांसारिक व्यवहारको ठीक किया जाय या परमात्माकी प्राप्ति की जाय फिर उसका ऐसा निर्णय होता है कि मुझे तो केवल संसारकी सेवा करनी है और संसारसे लेना कुछ नहीं है। ऐसा निर्णय होते ही साधककी भोगोंसे उपरति होने लगती है वैराग्य होने लगता है। ऐसा होनेके बाद जब साधक परमात्माकी तरफ चलता है तब उसके सामने साध्य और साधनविषयक तरहतरहके शास्त्रीय मतभेद आते हैं। इससे मेरेको किस साध्यको स्वीकार करना चाहिये और किस साधनपद्धतिसे चलना चाहिये इसका निर्णय करना बड़ा कठिन हो जाता है। परन्तु जब साधक सत्सङ्गके द्वारा अपनी रुचि श्रद्धाविश्वास और योग्यताका निर्णय कर लेता है अथवा निर्णय न हो सकनेकी दशामें भगवान्के शरण होकर उनको पुकारता है तब भगवत्कृपासे उसकी बुद्धि निश्चल हो जाती है। दूसरी बात सम्पूर्ण शास्त्र सम्प्रदाय आदिमें जीव संसार और परमात्मा इन तीनोंका ही अलगअलग रूपोंसे वर्णन किया गया है। इसमें विचारपूर्वक देखा जाय तो जीवका स्वरूप चाहे जैसा हो पर जीव मैं हूँ इसमें सब एकमत हैं और संसारका स्वरूप चाहे जैसा हो पर संसारको छोड़ना है इसमें सब एकमत हैं और परमात्माका स्वरूप चाहे जैसा हो पर उसको प्राप्त करना है इसमें सब एकमत हैं। ऐसा निर्णय कर लेनेपर साधककी बुद्धि निश्चल हो जाती है। मेरेको केवल परमात्माको ही प्राप्त करना है ऐसा दृढ़ निश्चय होनेसे बुद्धि अचल हो जाती है। तब साधक सुगमतापूर्वक योग परमात्माके साथ नित्ययोगके प्राप्त हो जाता है।शास्त्रीय निर्णय करनेमें अथवा अपने कल्याणके निश्चयमें जितनी कमी रहती है उतनी ही देरी लगती है। परन्तु इन दोनोंमें जब बुद्धि निश्चल और अचल हो जाती है तब परमात्माके साथ नित्ययोगका अनुभव हो जाता है।संसारसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये बुद्धि निश्चल होनी चाहिये जिसको छठे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें  दुःखसंयोगवियोगम्  पदसे कहा गया है और परमात्मासे सम्बन्ध जोड़नेके लिये बुद्धि अचल होनी चाहिये जिसको दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें समत्वं योग उच्यते पदोंसे कहा गया है।यहाँ  तदा योगमवाप्स्यसि  पदोंसे जो योगकी प्राप्ति बतायी है वह योग ऐसा नहीं है कि पहले परमात्मासे वियोग था उस वियोगको मिटा दिया तो योग हो गया प्रत्युत असत् पदार्थोंके साथ भूलसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा वियोग हो जानेका नाम योग है अर्थात् मनुष्यकी सदासे जो वास्तविक स्थिति (परमात्मासे नित्ययोग) है उस स्थितिमें स्थित होना योग है। वह वास्तविक स्थिति ऐसी विलक्षण है कि उससे कभी वियोग होता ही नहीं होना सम्भव ही नहीं। उसमें संयोग वियोग योग यादि कोई भी शब्द लागू नहीं होता। केवल असत्से माने हुए सम्बन्धके त्यागको ही यहाँ योग संज्ञा दे दी है। वास्तवमें यह योग नित्ययोगका वाचक है। इस नित्ययोगकी अनुभूति कर्मोंके (सेवाके) द्वारा की जाय तो कर्मयोग विवेकविचारके द्वारा की जाय तो ज्ञानयोग प्रेमके द्वारा की जाय तो भक्तियोग संसारके लयचिन्तनके द्वारा की जाय तो लययोग प्राणायामके द्वारा की जाय तो हठयोग और यमनियमादि आठ अङ्गोंके द्वारा की जाय तो अष्टाङ्गयोग कहलाता है। सम्बन्ध   मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्ति दूर होनेपर योगको प्राप्त हुए स्थिर बुद्धिवाले पुरुषके विषयमें अर्जुन प्रश्न करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.53।।कर्मजमिति। योगबुद्धियुक्ताः कर्मणां फलं त्यक्त्वा जन्मबन्धं त्यजन्ति ब्रह्मसत्तामाप्नुवन्ति (S K अवाप्नुवन्ति)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.53।।बुद्धिशुद्धिविवेकवैराग्यासिद्धावपि पूर्वोक्तबुद्धिप्राप्तिकालो दर्शितो न भवतीति शङ्कते  मोहेति।  प्रागुक्तविवेकादियुक्तबुद्धेरात्मनि स्थैर्यावस्थायां प्रकृतबुद्धिसिद्धिरित्याह  तच्छृण्विति।  पृष्टं कालविशेषाख्यं वस्तु तच्छब्देन गृह्यते बुद्धेः श्रुतिविप्रतिपन्नत्वं विशदयति  अनेकेति।  नानाश्रुतिप्रतिपन्नत्वमेव संक्षिपति  विक्षिप्तेति।  उक्तं हेतुद्वयमनुरुध्य वैराग्यपरिपाकावस्था कालशब्दार्थः नैश्चल्यं विक्षेपराहित्यम् अचलत्वं विकल्पशून्यत्वं विक्षेपो विपर्ययः विकल्पः संशय इति विवेकः। विवेकद्वारा जाता प्रज्ञा प्रागुक्ता बुद्धिः समाधिस्तत्रैव निष्ठा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.53।।ननूत्तरश्लोकेऽपि योगानुष्ठानविधिरेवोच्यतेऽतः पुनरुक्तिदोष इत्यत आह  तदेवे ति। किं तन्मोहकलिलं कीदृशं च तदतितरणं इत्याकाङ्क्षायां पुंसां अधममध्यमोत्तमावस्थादिप्रदर्शनेन पूर्वश्लोकोक्तमेव योगानुष्ठानावधिमनेन स्पष्टं करोतीत्यर्थः। नन्वत्रश्रुतिविप्रतिपन्ना इति श्रवणादितो वैराग्यमुच्यते यथाह भास्करःवस्त्वन्तरश्रवणाद्विरक्तेति। ततः पूर्वत्रापि वैराग्यमर्थः स्यात्। निश्चलाऽचलेति च पुनरुक्तिश्च। योगावाप्तेरुत्तरा चेयमवस्था तत्कथमुच्यतेतदा योगमवाप्स्यसि इति शङ्कायां श्लोकं व्याचष्टे  पूर्व मिति। पूर्वावस्थायाः सामर्थ्यलब्धं वैलक्षण्यं दर्शयितुमुक्तंवेदार्थेति। चलनप्रसक्तिं दर्शयति   विपरीते ति। असच्छास्त्रैरित्यर्थः। अनेन परोक्षज्ञानकाष्ठा दर्शिता। परोक्षतत्त्वनिश्चयानुवृत्तिव्युदासायोक्तम्  ब्रह्मे ति। अत्रापि चलनप्रसक्तिमाह  भेरी ति। एतत्कथमित्यत आह  परमे ति। परमानन्दे उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः। एतेनापरोक्षज्ञानकाष्ठा दर्शिता। उपायेन सिद्धः प्राप्तफलः। योगशब्देन तत्फलमुपलक्ष्यत इति भावः। श्लोकद्वयेप्येतदवस्थाप्राप्तिर्योगानुष्ठानावधिरिति तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.53।।तदेव स्पष्टयति श्रुतिविप्रतिपन्नेति। पूर्वं श्रुतिभिर्वेदैर्विप्रतिपन्ना विरुद्धा सती यदा वेदार्थानुकूलेन तत्त्वनिश्चयेन विपरीतवाग्भिरपि निश्चला भवति ततश्च समाधावचला। ब्रह्मप्रत्यक्षदर्शनेन भेरीताडनादावपि परमानन्दमग्नत्वात्। तदा योगमवाप्स्यसि उपायसिद्धो भवसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.53।। श्रुतिः  श्रवणम् अस्मत्तः श्रवणेन  वि शेषतः  प्रतिपन्ना  सकलेतरविसजातीयनित्यनिरतिशयसूक्ष्मतत्त्वविषया स्वयम्  अचला  एकरूपा  बुद्धिः  असङ्गकर्मानुष्ठानेन विमलीकृते मनसि  यदा निश्चला स्थास्यति तदा योगम्  आत्मावलोकनम्  अवाप्स्यसि।  एतद् उक्तं भवति शास्त्रजन्यात्मज्ञानपूर्वककर्मयोगः स्थितप्रज्ञताख्यज्ञाननिष्ठाम् आपादयति ज्ञाननिष्ठारूपा स्थितप्रज्ञता तु योगाख्यम् आत्मावलोकनं साधयति इति।एवम् उक्तः पार्थो निःसङ्गकर्मानुष्ठानरूपकर्मयोगसाध्यस्थितप्रज्ञतया योगसाधनभूतायाः स्वरूपं स्थितप्रज्ञस्यानुष्ठानप्रकारं च पृच्छति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.53।।  श्रुतिविप्रतिपन्ना  अनेकसाध्यसाधनसंबन्धप्रकाशनश्रुतिभिः श्रवणैः प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणैः विप्रतिपन्ना नानाप्रतिपन्ना विक्षिप्ता सती ते तव बुद्धिः  यदा  यस्मिन् काले  स्थास्यति  स्थिरीभूता भविष्यति  निश्चला  विक्षेपचलनवर्जिता सती  समाधौ  समाधीयते चित्तमस्मिन्निति समाधिः आत्मा तस्मिन् आत्मनि इत्येतत्।  अचला  तत्रापि विकल्पवर्जिता इत्येतत्।  बुद्धिः  अन्तःकरणम्।  तदा  तस्मिन्काले  योगम् अवाप्स्यसि  विवेकप्रज्ञां समाधिं प्राप्स्यसि।।प्रश्नबीजं प्रतिलभ्य अर्जुन उवाच लब्धसमाधिप्रज्ञस्य लक्षणबुभुत्सया अर्जुन उवाच

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【 Verse 2.54 】

▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | स्थितप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव | स्थितधी: किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम् ||

▸ Transliteration: arjuna uvāca | sthitaprajñasya kā bhāṣā samādhisthasya keśava | sthitadhīḥ kiṁ prabhāṣeta kimāsīta vrajeta kim ||

▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna said; sthitaprajñasya: of one who is of secure mind; kā: what; bhāṣā: language; samādhisthasya: of one established in the tranquility of mind; keśava: O Kṛṣṇa; sthitadhīḥ: one with stable mind; kiṁ: how; prabhāṣeta: speak; kim: how; āsīta: sits; vrajeta: walks; kim: how

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.54 O Keśava! What is the description of one who stays in the space of completion in present moment and is merged in the restful awareness of truth and wisdom? How does one of steady wisdom speak, how does he sit, how does he walk?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.54।।अर्जुन बोले हे केशव परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यके क्या लक्षण होते हैं वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है कैसे बैठता है और कैसे चलता है

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.54।। अर्जुन ने कहा -- हे केशव समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि वाले पुरुष का क्या लक्षण है स्थिर बुद्धि पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है कैसे चलता है

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.54 स्थितप्रज्ञस्य of the (sage of) steady wisdom? का what? भाषा description? समाधिस्थस्य of the (man) merged in the superconscious state? केशव O Kesava? स्थितधीः the sage of steady wisdom? किम् what (how)? प्रभाषेत speaks? किम् what (how)? आसीत sits? व्रजेत walks? किम् what (how).Commentary Arjuna wants to know from Lord Krishna the characteristic marks of one who is established in the Self in Samadhi how he speaks? how he sits? how he moves about.The characteristic marks of the sage of steady wisdom and the means of attaining that steady knowledge of the Self are described in the verses from 55 to 72 of this chapter.Steady wisdom is settled knowledge of ones identity with Brahman attained by direct realisation. (Cf.XIV.21? 27).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.54. Arjuna said O Kesava ! What is the connotation of sthita-prajna (a man-of-stabilized-intellect), [applied] to a man fixed in concentration ? What would sthira-dhih (the fixed-minded) convey ? Where would the fixed-minded abide ? And what would be reach ?

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.54 Arjuna asked: My Lord! How can we recognise the saint who has attained Pure Intellect, who has reached this state of Bliss, and whose mind is steady? how does he talk, how does he live, and how does he act?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.54 Arjuna said What is the mode of speech of him who is of firm wisdom, who is established in the control of the mind? What will a man of firm wisdom speaks, O Krsna? How does he sit? How does he move?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.54 Arjuna said O kesava, what is the description of a man of steady wisdom who is Self-absorbed? How does the man of steady wisdom speak? How does he sit? How does he move about?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.54 Arjuna said What, O Krishna, is the description of him who has steady wisdom, and is merged in the superconscious state? How does one of steady wisdom speak, how does he sit, how does he walk?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.54 Sthita-prajnasya etc. By the statement 'When the determing faculty shall stand [firm in concentration, at that time you shall attain Yoga - above II, 55]' it has been [virtually] stated there that the appellation sthita-prajna (man-of-stabilized-intellect) is a nomenclature signifying man-of-Yoga who is fixed in concentration. Now, what is the connotation of it, i.e., what is the basis for the usage of this nomenclature ? For, [connotation is that] basing on which a particular meaning is connoted by words. Does the appellation sthita-prajna of the man-of-Yoga speak of him through its traditional (or conventional) force of the word or through its force of etymology ? This is the first estion. Of course, regarding the traditional force of the word there is no doubt at all. [For, it has no such force in it]. Yet, the present estion is to make the etymological meaning-though it is already available-clear by explaining the basis for definition of special nature.

The expression sthira-dhih has for its imports both the expression [itself] and its meaning 'the fixed-minded'. Of them, does the expression sthira-dhih denote that meaning alone which is indicated by the force of its components; or else does it denote the ascetic also ? This is the second estion.

Again, where would that firm-minded man-of-Yoga abide i.e., what would he practise; or what would his firmness depend on ? This is the third [estion].

And what world he achieve by practising ? This is the fourth [estion].

These four estions are decided one by one by the Bhagavat [in the seel].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.54 Arjuna said What is the speech of a man of firm wisdom who is abiding with the mind controlled? What words can describe his state? What is his nature? This is the meaning of 'How does a man of firm wisdom speak etc.?'

His specific conduct is now described as his nature can be inferred therefrom.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.54 O Kesava, ka, what; is the bhasa, description, the language (for the description) how is he described by others ; sthita-prajnasya, of a man of steady wisdom, of one whose realization, 'I am the supreme Brahman', remains steady; samadhi-sthasya, of one who is Self-absorbed? Or kim, how; does the sthitadhih, dhih, man of steady wisdom; himself probhaseta, speak? How does he asita, sit? How does he vrajeta, move about? That is to say, of what kind is his sitting or moving? Through this verse Arjuna asks for a description of the man of steady wisdom.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.54।। इसके पूर्व के दो श्लोकों में कर्मयोग पर विचार करते हुये सहज रूप से कर्म योगी के परम लक्ष्य की ओर भगवान् ने संकेत किया है। यह सिद्धान्त बुद्धि ग्राह्य एवं युक्तियुक्त था। भगवान् श्रीकृष्ण के मुख से सुनने पर उसके प्रामाण्य के विषय में भी कोई संदेह नहीं रह जाता। अर्जुन का स्वभाव ही ऐसा था कि उसे कर्मयोग ही ग्राह्य हो सकता था।प्रथम अध्याय का शोकाकुल अर्जुन अपने शोक को भूलकर संवाद में रुचि लेने लगा। कर्मशील स्वभाव के कारण उसे शंका थी कि बुद्धियोग के द्वारा जीवन के लक्ष्य को प्राप्त कर लेने पर इस जगत् में कर्ममय जीवन संभव होगा अथवा नहीं।समाधि आदि शब्दों के प्रचलित अर्थ से तो कोई यही समझेगा कि योगी पुरुष आत्मानुभूति में अपने ही एकान्त में रमा रहता है। प्रचलित वर्णनों के अनुसार नये जिज्ञासु साधक की कल्पना होती है कि ज्ञानी पुरुष इस व्यावहारिक जगत् के योग्य नहीं रह जाता। ऐसी धारणाओं वाले घृणा और कूटिनीति के युग में पला अर्जुन इस ज्ञान को स्वीकार करने के पूर्व ज्ञानी पुरुष के लक्षणों को जानना चाहता था।स्थितप्रज्ञ के लक्षणों को पूर्णत समझने की उसकी अत्यन्त उत्सुकता स्पष्ट झलकती है जब वह कुछ अनावश्यक सा यह प्रश्न पूछता है कि वह पुरुष कैसे बोलता है कैसे बैठता है आदि। उन्माद की अवस्था से बाहर आये अर्जुन का ऐसा प्रश्न उचित ही है। श्लोक की पहली पंक्ति में स्थितप्रज्ञ के आन्तरिक स्वभाव के विषय में प्रश्न है तो दूसरी पंक्ति में वाह्य जगत् में उसके व्यवहार को जानने की जिज्ञासा है।इस प्रकरण में स्थितप्रज्ञ का अर्थ है वह पुरुष जिसे आत्मा का अपरोक्ष अनुभव हुआ हो।अब भगवान् ज्ञानी पुरुष के उन लक्षणों का वर्णन करते हैं जो उसके लिये स्वाभाविक हैं और एक साधक के लिये साधन रूप हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.54।।   तत्त्वविल्लक्षणानि जिज्ञासुरर्जुन उवाच   स्थितेति।  स्थिता प्रतिष्ठताहंब्रह्मास्मीति प्रज्ञा यस्य स एव समाधिस्थः। नत्वात्मज्ञानशून्यस्य मुख्यसमाधिरस्तीति भावः। तस्य का भाषा कथमसौ लोकैर्भाष्यते। कैर्लक्षणैर्लक्षितः सन् लोकैः स्थितप्रज्ञ इत्युच्यत इत्यर्थः। यथा भवानपि केशिहननादिकर्मणा केशव इत्युच्यते तथेति सूचयन्नाह  हे केशवेति।  एतेनावस्थाद्वयवान्समाधिस्थो व्युत्थितचेताश्चेति अतो विशिनष्टि समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्येत्यादि प्रत्युक्तम्। योगिनोऽप्रक्रान्तत्वेन तस्य लक्षणप्रश्नानौचित्यात्। तत्त्वज्ञानरुपसमाधिस्थस्यैव प्रक्रान्तत्वात् उत्तरे प्राणनिरोधं यदा करोति तदा समाधिस्थ इत्यनुक्तत्वाच्च ज्ञानिनः प्राणायामानपेक्षसमाधेर्वासिष्ठे स्पष्टमुक्तत्वाच्च। तथाहि परिध उवाच। यद्यत्संसारजालेऽस्मिन्क्रियते कर्म भूमिप। तत्समाहितचित्तस्य सुखायान्यस्य नानघ।।1।।क्वचित्संकल्परहितं परं विश्रमणास्पदम्। परमोपशमं श्रेयः समाधिमनुतिष्ठसि।।2।।रघुरुवाच। एतन्मे ब्रूहि भगवन्त्सर्वसंकल्पवर्जितम्। परमोपशमं श्रेयः समाधिर्हि किमुच्यते।।1।।योऽज्ञो महात्मन्सततं तिष्ठन्व्यवहरंश्च वा। असमाहितचित्तोऽसो कदा भवति कः किल।।2।।नित्यप्रबुद्धचित्तास्तु कुर्वन्तोऽपि जगत्क्रियाः। आत्मैकतत्त्वसंनिष्ठाः सदैव सुसमाधयः।।3।।बद्धपद्मासनस्यापि कृतब्रह्माञ्जलेरपि। अविश्रान्तस्वभावस्य कः समाधिः कथं च वा।।4।।तत्त्वावबोधो भगवन्त्सर्वाशातृणपावकः। प्रोक्तः समाधिशब्देन नतु तूष्णीमवस्थितिः।।5।।समाहिता नित्यतृप्ता यथाभूतार्थदर्शिनी। साधो समाधिशब्देन परा प्रज्ञोच्यते बुधैः।।6।।अक्षुब्धा निरहंकारा द्वन्द्वेष्वननुपातिनी। प्रोक्ता समाधिशब्देन मेरोः स्थिरतराकृतिः।।7।।निश्चिताभिगताभीष्टा हेयोपादेयवर्जिता। प्रोक्ता समाधिशब्देन परिपूर्णा मनोगतिः।।8।।यतःप्रभृति बोधेन युक्तमात्यन्तिकं मनः। तदारभ्य समाधानमव्युच्छिन्नं महात्मनः।।9।। इत्यादि। स्थितधीः स्वयं वा किं प्रभाषेत। किं प्रभाषणमासनं ब्रजनं वा तस्य कथमित्यर्थः। आत्मनि स्थितस्य स्थितप्रज्ञस्य लक्षणं ब्रूहीति प्रश्नार्थः। तथाच भाष्यं। स्थितप्रज्ञस्य लक्षणमनेन श्लोकेन पृच्छ्यते। यो ह्यादित एव संन्यस्य कर्माणि ज्ञानयोगनिष्ठायां प्रवृत्तः यञ्च कर्मयोगेन तयोः स्थितप्रज्ञस्य प्रजहातीत्यारभ्याध्यायपरिसमाप्तिपर्यन्तं स्थितप्रज्ञलक्षणं साधनं चोपदिश्यते। सर्वत्र ह्यध्यात्मशास्त्रे कृतार्थलक्षणानि यानि तान्येव साधनान्युपदिश्यन्ते यत्नसाध्यत्वादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.54।।एवं लब्धावसरः स्थितप्रज्ञलक्षणं ज्ञातुमर्जुन उवाच यान्येव हि जीवन्मुक्तानां लक्षणानि तान्येव मुमुक्षूणां मोक्षोपायभूतानीति मन्वानः स्थिता निश्चलाहंब्रह्मास्मीति प्रज्ञा यस्य स स्थितप्रज्ञोऽवस्थाद्वयवान् समाधिस्थो व्युत्थितश्चेति। अतो विशिनष्टि समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा। कर्मणि षष्ठी। भाष्यतेऽनयेतिभाषा लक्षणम्। समाधिस्थः स्थितप्रज्ञः केन लक्षणेनान्यैर्व्यवह्रियत इत्यर्थः। सच व्युत्थितचित्तः स्थितधीः स्थितप्रज्ञः स्वयं किं प्रभाषेत स्तुतिनिन्दादावभिनन्दनद्वेषादिलक्षणं किं कथं प्रभाषेतेति सर्वत्र संभावनायां लिङ्। तथा किमासीत व्युत्थितचित्तनिग्रहाय कथं बहिरिन्द्रियाणां निग्रहं करोति तन्निग्रहाभावकाले च किं व्रजेत कथं विषयान्प्राप्नोति। तत्कर्तृकभाषणासनव्रजनानि मूढजनविलक्षणानि कीदृशानीत्यर्थः। तदेवं चत्वारः प्रश्नाः समाधिस्थे स्थितप्रज्ञे एकः व्युत्थिते स्थितप्रज्ञे त्रय इति। केशवेति संबोधयन्सर्वान्तर्यामितया त्वमेवैतादृशं रहस्यं वक्तुं समर्थोऽसीति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.54।।लब्धसमाधेः स्थितप्रज्ञापरनाम्नो लक्षणानि बुभुत्सुरर्जुन उवाच  स्थितप्रज्ञस्येति।  स्थिता प्रत्यगात्मनि प्रतिष्ठिता प्रज्ञा यस्य तस्य स्थितप्रज्ञस्य समाधिस्थस्य समाधौ स्थितस्य का भाषा भाषणं वचनं। कथमसौ परैर्भाष्यते इत्येकः प्रश्नः। स्थितधीः स्थितप्रज्ञः अर्थाद्व्युत्थितः सन् किं प्रभाषेत कथं वदति कथमास्ते कथं वा व्रजति विषयान्भुङ्क्ते इति प्रश्नत्रयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.54।।एतदुक्त्वा भगवांस्तूष्णीं स्थितस्तदाऽर्जुनस्तादृग्बुद्धिज्ञानाथ पृच्छति स्थितप्रज्ञस्येति। स्थितप्रज्ञस्य निश्चलबुद्धेः का भाषा का परिभाषेत्यर्थः। कथा परिभाषया स ज्ञेयः। हे केशव दुष्टगुणव्याप्तयोरपि मोक्षदायक मम मोक्षा र्थं৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷  याथातथ्येन कथयेति भावः। समाधिस्थस्य च का भाषा तदपि कथय। स्थितधीः किं प्रभाषेत। श्रोतव्यं चेन्न किञ्चित्तदा किं ब्रूयादित्यर्थः। स्वोच्चरितवाक्यम्यापि श्रवणसम्भवात्। किमासीत कथमुपतिष्ठेत् किं व्रजेत कथं गच्छेत् इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.54।।   पूर्वश्लोकोक्तस्यात्मतत्त्वज्ञस्य लक्षणं जिज्ञासुः अर्जुन उवाच  स्थितप्रज्ञस्येति।  स्वाभाविके समाधौ स्थितस्यातएव स्थिता निश्चला प्रज्ञा बुद्धिर्यस्य तस्य का भाषा। भाष्यतेऽनयेति भाषा लक्षणमिति यावत्। केन लक्षणेन स्थितप्रज्ञ उच्यत इत्यर्थः। तथा स्थितधीः किं कथं भाषणमासनं व्रजनं च कुर्यादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.54।।एवमुक्तेऽर्जुनः पूर्वश्लोकोक्तस्थिरप्रज्ञस्य स्वरूपमनुष्ठानप्रकारं च पृच्छति स्थितप्रज्ञस्येति। समाधिस्थस्येति पूर्वोक्तानुवादविशेषणम्। का भाषा कस्तद्वाचकः शब्दः कीदृशं तत्स्वरूपमिति प्रश्नः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.54।।प्रश्नके कारणको पाकर समाधिप्रज्ञाको प्राप्त हुए पुरुषके लक्षण जाननेकी इच्छासे अर्जुन बोला जिसकी बुद्धि इस प्रकार प्रतिष्ठित हो गयी है कि मैं परब्रह्म परमात्मा ही हूँ वह स्थितप्रज्ञ है। हे केशव ऐसे समाधिमें स्थित हुए स्थितप्रज्ञ पुरुषकी क्या भाषा होती है यानी वह अन्य पुरुषोंद्वारा किस प्रकार किन लक्षणोंसे बतलाया जाता है तथा वह स्थितप्रज्ञ पुरुष स्वयं किस तरह बोलता है कैसे बैठता है और कैसे चलता है अर्थात् उसका बैठना चलना किस तरहका होता है इस प्रकार इस श्लोकसे अर्जुन स्थितप्रज्ञ पुरुषके लक्षण पूछता है। जो पहलेसे ही कर्मोंको त्यागकर ज्ञाननिष्ठामें स्थित है और जो कर्मयोगसे ( ज्ञाननिष्ठाको प्राप्त हुआ है ) उन दोनों प्रकारके स्थितप्रज्ञोंके लक्षण और साधन प्रजहाति इत्यादि श्लोकसे लेकर अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त कहे जाते हैं। अध्यात्मशास्त्रमें सभी जगह कृतार्थ पुरुषके जो लक्षण होते हैं वे ही यत्नद्वारा साध्य होनेके कारण ( दूसरोंके लिये ) साधनरूपसे उपदेश किये जाते हैं। जो यत्नसाध्य साधन होते हैं वे ही ( सिद्ध पुरुषके स्वाभाविक ) लक्षण होते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.54।। व्याख्या   यहाँ अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें जो प्रश्न किये हैं इन प्रश्नोंके पहले अर्जुनके मनमें कर्म और बुद्धि (2। 47 50) को लेकर शङ्का पैदा हुई थी। परन्तु भगवान्ने बावनवेंतिरपनवें श्लोकोंमें कहा कि जब तेरी बुद्धि मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिको तर जायगी तब तू योगको प्राप्त हो जायगा यह सुनकर अर्जुनके मनमें शंङ्का हुई कि जब मैं योगको प्राप्त हो जाऊँगा स्थितप्रज्ञ हो जाऊँगा तब मेरे क्या लक्षण होंगे अतः अर्जुनने इस अपनी व्यक्तिगत शङ्काको पहले पूछ लिया और कर्म तथा बुद्धिको लेकर अर्थात् सिद्धान्तको लेकर जो दूसरी शङ्का थी उसको अर्जुनने स्थितप्रज्ञके लक्षणोंका वर्णन होनेके बाद (3। 12 में) पूछ लिया। अगर अर्जुन सिद्धान्तका प्रश्न यहाँ चौवनवें श्लोकमें ही कर लेते तो स्थितप्रज्ञके विषयमें प्रश्न करनेका अवसर बहुत दूर पड़ जाता। समाधिस्थस्य (टिप्पणी प0 92.1)  जो मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो चुका है उसके लिये यहाँ  समाधिस्थ  पद आया है। स्थितप्रज्ञस्य   यह पद साधक और सिद्ध दोनोंका वाचक है। जिसका विचार दृढ़ है जो साधनसे कभी विचलित नहीं होता ऐसा साधक भी स्थितप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिवाला) है और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे जिसकी बुद्धि स्थिर हो चुकी है ऐसा सिद्ध भी स्थितप्रज्ञ है। अतः यहाँ  स्थितप्रज्ञ  शब्दसे साधक और सिद्ध दोनों लिये गये हैं। पहले इकतालीसवेंसे पैंतालीसवें श्लोकतक और सैंतालीसवेंसे तिरपनवें श्लोकतक साधकोंका वर्णन हुआ हैं अतः आगेके श्लोकोंमें सिद्धके लक्षणोंमें साधकोंका भी वर्णन हुआ है।यहाँ शङ्का होती है कि अर्जुनने तो  समाधिस्थस्य  पदसे सिद्ध स्थितप्रज्ञकी बात ही पूछी थी पर भगवान्ने स्थितप्रज्ञके लक्षणोंमें साधकोंकी बातें क्यों कहीं इसका समाधान है कि ज्ञानयोगी साधककी तो प्रायः साधनअवस्थामें ही कर्मोंसे उपरति हो जाती है। सिद्धअवस्थामें वह कर्मोंसे विशेष उपराम हो जाता है। भक्तियोगी साधककी भी साधनअवस्थामें जप ध्यान सत्सङ्ग स्वाध्याय आदि भगवत्सम्बन्धी कर्म करनेकी रुचि होती है और इनकी बहुलता भी होती है। सिद्धअवस्थामें तो भगवत्सम्बन्धी कर्म विशेषतासे होते हैं। इस तरह ज्ञानयोगी और भक्तियोगी दोनोंकी साधन और सिद्धअवस्थामें अन्तर आ जाता है पर कर्मयोगीकी साधन और सिद्धअवस्थामें अन्तर नहीं आता। उसका दोनों अवस्थाओंमें कर्म करनेका प्रवाह ज्योंकात्यों चलता रहता है। कारण कि साधनअवस्थामें उसका कर्म करनेका प्रवाह रहा है और उसके योगपर आरूढ़ होनेमें भी कर्म ही खास कारण रहे हैं। अतः भगवान्ने सिद्धके लक्षणोंमें साधक जिस तरह सिद्ध हो सके उसके साधन भी बता दिये हैं और जो सिद्ध हो गये हैं उनके लक्षण भी बता दिये हैं। का भाषा (टिप्पणी प0 92.2)  परमात्मामें स्थित स्थिर बुद्धिवाले मनुष्यको किस वाणीसे कहा जाता है अर्थात् उसके क्या लक्षण होते हैं (इसका उत्तर भगवान्ने आगेके श्लोकमें दिया है।) स्थितधीः किं प्रभाषेत   वह स्थिर बुद्धिवाला मनुष्य कैसे बोलता है (इसका उत्तर भगवान्ने छप्पनवेंसत्तानवें श्लोकमें दिया है।) किमासीत   वह कैसे बैठता है अर्थात् संसारसे किस तरह उपराम होता है (इसका उत्तर भगवान्ने अट्ठावनवें श्लोकसे तिरसठवें श्लोकतक दिया है।) व्रजेत किम्   वह कैसे चलता है अर्थात् व्यवहार कैसे करता है (इसका उत्तर भगवान्ने चौंसठवेंसे इकहत्तरवें श्लोकतक दिया है।) सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके पहले प्रश्नका उत्तर देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.54 2.55।।यदा ते इति। श्रुतीति। तत्र च योगबुद्धिप्राप्त्यबसरे तव स्फुटमेवेदमभिज्ञानम् श्रोतव्यस्य (S omits श्रोतव्यस्य) श्रुतस्य अभिलष्यमाणस्य च (N वा instead of च) आगमस्य उभस्यापि निर्वेदभावत्वम् (SK भाक्त्वम्)। अनेन चेदमुक्तम् अविद्यापद ( N अविद्यमद) निपतितप्रमात्रनुग्राहकशास्त्रश्रवणसंस्कारविप्रलम्भमहिमा अयं यत् तवास्थाने कुलक्षयादिदोषदर्शनम्। तत्तु तथाशासनबहुमानविगलने विगलिष्यति इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.54।।संन्यासिनो ज्ञाननिष्ठातत्प्राप्तिवचनं प्रश्नबीजं पृच्छतोऽर्जुनस्याभिप्रायमाह  लब्धेति।  लब्धा समाधावात्मनि समाधानेन वा प्रज्ञा परमार्थदर्शनलक्षणा येन तस्येति यावत्। ननु तस्य भाषा तत्कार्यानुरोधिनी भविष्यति किमित्यसौ विजिज्ञास्यते तत्राह  कथमिति।  ज्ञाननिष्ठस्य लक्षणविवक्षया प्रश्नमवतार्य तन्निष्ठासाधनबुभुत्सया विशिनष्टि  समाधिस्थस्येति।  तस्यैवार्थक्रियां पृच्छति  स्थितधीरिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.54।।ज्ञानिनि प्रकृते लब्धावसरोऽर्जुनः पृच्छतीति प्रसङ्गतः स्पष्टं ह्यनुक्त्वा प्रज्ञाशब्दस्य बुद्धिमात्रार्थत्वप्रतीतिनिरासाय स्थितप्रज्ञशब्दार्थमाह  स्थिते ति। प्रतिष्ठां प्राप्ता। ज्ञानमपरोक्षम्।किं प्रभाषेत इत्यतः का भाषेत्यस्यार्थान्तरमाह  भाष्यत  इति। ज्ञानीति व्यवह्रियत इत्यर्थः।  भाषे ति। भाषाशब्दस्य स्त्रीलिङ्गत्वात्अनया इत्युक्तम्। व्यवहारकारणानामनेकत्वात्। कस्यायं प्रश्न इति न ज्ञायतेऽत आह  लक्षण मिति। सास्नादिमत्त्वं लक्षणं दृष्ट्वा हि गौरिति व्यवह्रियते। ज्ञानिमात्रव्युदासाय समाधिस्थस्येति विशेषणमिति प्रतीयते।  समाधिं कुर्वत  इति। यथाऽऽह  शङ्करः  लब्धसमाधिप्रज्ञस्य लक्षणत्वबुभुत्सया अर्जुन उवाच इति तदसदिति भावेनाह  उक्त मिति। ज्ञानिसामान्यलक्षणविषय एवायं प्रश्नः किमर्थं तर्हि समाधिस्थस्य इत्युक्तमिति चेत्समाधावचला बुद्धिः 2।53 इत्यनेनोक्तं ज्ञानिसामान्यलक्षणमनेनावदतीति ब्रूमः। न हीदं न लक्षणं ज्ञानिमात्रनिष्ठधर्मत्वात्। किमर्थोऽनुवादः इति चेत् तज्ज्ञातं ममेति ज्ञापनायेति। वदामः। एतज्ज्ञापने किं प्रयोजनं इति चेत् लक्षणान्तरं  पृच्छामी ति ज्ञापयितुम्। अन्यथा सिद्धप्रश्नोऽयमित्युपेक्ष्यः प्रसज्येतेति भावः। लक्षणान्तरप्रश्नस्य चेदं प्रयोजनम्। अयावल्लक्ष्यभावित्वान्न तत्सम्यग्व्यवहारोपयोगि यावल्लक्ष्यभावि तु सार्वत्रिकव्यवहारोपयोगि ज्ञास्यामीति। अत एव प्रसिद्धलक्षणपदपरित्यागेन अप्रसिद्धभाषापदोपादानमिति।कश्चाश्चेशश्च केशाः ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ते यस्यावयवभूताः स केशवः परमात्मा इति भास्करो निरुक्तवान्एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य 11।35 इत्यत्र तदसदिति भावेनाह  क मिति।कुत इयं निरुक्तिरित्यत आह  तथाही ति।को ब्रह्मेति समाख्यात ईशोऽहं सर्वदेहिषु। आवां तवाङ्गे सम्भूतौ ततः केशवनामवान् इति हरिवंशवचनं वचनान्तराच्चेयमेव निरुक्तिः स्वीकार्येत्याह  हिरण्यगर्भ  इति। अत इति लभ्यते। तेन एवशब्दस्यान्वयः। हिरण्यगर्भ एव न त्वन्यः प्रजापतिः। शङ्कर एव न त्वन्यः समर्थ इति वा। अनेन केशयोः कर्मणोरुपपदयोरन्तर्णीतण्यर्थात्वृतु वर्तने इत्यस्माद्धातोःडोऽन्यत्रापि दृश्यते इति डप्रत्यय इत्युक्तं भवति। आसेरकर्मकत्वात् कथं कर्मप्रश्न इत्यत आह  किमासी तेति। अध्याहृतप्रतियोगनिमित्तांत् द्वितीया न कर्मणीत्यर्थः। प्रश्नकरणादर्जुनस्याज्ञत्वं प्रतीतं तन्निवारयति  न चे ति। तल्लक्षणादिकं ज्ञानिलक्षणं तत्प्रवृत्त्यनुपपत्तिसमाधानं च। प्रश्नस्यान्यथोपपत्तेरिति भावः। कुत इत्यत आह  जानन्ती ति। समासान्तो विधिरनित्यः अतः पूर्वराजान इति साधु। देवर्षयश्च तथैव जानन्त्येव धर्मानित्युपलक्षणम्। वार्तायै गुरोरात्मनां च ख्यात्यै। लोकस्य गुह्यार्थवित्तये। एतेषां प्रश्नकरणं लोकानां कथं गुह्यार्थवित्तये भवतीत्यतो व्यतिरेकमुखेनोपपादयति  न त  इति।छन्दस्युभयथा अष्टा.3।4।117 इत्यतोऽल्पबुद्धीनामिति दीर्घत्वाभावः। गुह्यास्तेऽर्थाः पुराणादिषु प्रश्नोत्तरोपनिबन्धनेन विनोक्तिमात्रेणाल्पबुद्धीनां व्यक्तं न प्रकाशन्ते। न च प्रश्नाकरणे तदुपनिबन्धनं सम्भवतीति भावः। एतेनमोहादिस्त्वभिभवादेः इत्येतत्प्रपञ्चितं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.54।।स्थिता प्रज्ञा ज्ञानं यस्य स स्थितप्रज्ञः। भाष्यतेऽनयेति भाषा लक्षणमित्यर्थः। उक्तं लक्षणमनुवदति लक्षणानन्तरं पृच्छामीति ज्ञापयितुम्।समाधिस्थस्येति। कं ब्रह्माणं ईशं रुद्रं च वर्तयतीति केशवः। तथाहि निरुक्तिः कृता हरिवंशेषु रुद्रेण कैलासयात्रायाम् हिरण्यगर्भः कः प्रोक्त ईशः शङ्कर एव च। सृष्ट्यादिना वर्तयति तौ यतः केशवो भवान् इतिवचनान्तराच्च। किमासीत किं प्रत्यासीत। न चार्जुनो न जानाति तल्लक्षणादिकम्।जानन्ति पूर्वराजानो देवर्षयस्तथैव च। तथाहि धर्मान्पृच्छन्ति वार्तायै गुह्यवित्तये। न ते गुह्याः प्रतीयन्ते पुराणेष्वल्पबुद्धिनाम् इति वचनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.54।।अर्जुन उवाच  समाधिस्थस्य स्थितप्रज्ञस्य का भाषा  को वाचकः शब्दः तस्य स्वरूपं कीदृशम् इत्यर्थः। स्थितप्रज्ञः किं च भाषणादिकं करोति।वृत्तिविशेषकथनेन स्वरूपम् अपि उक्तं भवति इति वृत्तिविशेष उच्यते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.54।। स्थिता प्रतिष्ठिता अहमस्मि परं ब्रह्म इति प्रज्ञा यस्य सः स्थितप्रज्ञः तस्य  स्थितप्रज्ञस्य का भाषा  किं भाषणं वचनं कथमसौ परैर्भाष्यते  समाधिस्थस्य  समाधौ स्थितस्य हे  केशव। स्थितधीः  स्थितप्रज्ञः स्वयं वा  किं प्रभाषेत।   किम् आसीत व्रजेत किम्  आसनं व्रजनं वा तस्य कथमित्यर्थः। स्थितप्रज्ञस्य लक्षणमनेन श्लोकेन पृच्छ्यते।।यो ह्यादित एव संन्यस्य कर्माणि ज्ञानयोगनिष्ठायां प्रवृत्तः यश्च कर्मयोगेन तयोः प्रजहाति इत्यारभ्य आ अध्यायपरिसमाप्तेः स्थितप्रज्ञलक्षणं साधनं चोपदिश्यते। सर्वत्रैव हि अध्यात्मशास्त्रे कृतार्थलक्षणानि यानि तान्येव साधनानि उपदिश्यन्ते यत्नसाध्यत्वात्। यानि यत्नसाध्यानि साधनानि लक्षणानि च भवन्ति तानि श्रीभगवानुवाच श्रीभगवानुवाच

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【 Verse 2.55 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् | आत्मन्येवात्मना तुष्ट: स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | prajahāti yadā kāmān sarvānpārtha manogatān | ātmanyevātmanā tuṣṭaḥ sthitaprajñastadocyate ||

▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: The Lord says; prajahāti: gives up; yadā: when; kāmān: desires; sarvān: of all varieties; pārtha: O son of Pritā; manogatān: existing in mind; ātmani: in the soul; eva: only; ātmanā: by the self; tuṣṭaḥ: satisfied; sthitaprajñaḥ: one of secure understanding; tadā: at that time; ucyate: is said

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.55 Śrī Bhagavān says: O Pārtha, a man who casts off com- pletely all the desires of the mind and is satisfied in the Self

by the Self, He is said to be Sthhitaprajña, one of steady wisdom in completion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.55।।श्रीभगवान् बोले हे पृथानन्दन जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपनेआपसे अपनेआपमें ही सन्तुष्ट रहता है उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.55।। श्री भगवान् ने कहा -- हे पार्थ? जिस समय पुरुष मन में स्थित सब कामनाओं को त्याग देता है और आत्मा से ही आत्मा में सन्तुष्ट रहता है? उस समय वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.55 प्रजहाति casts off? यदा when? कामान् desires? सर्वान् all? पार्थ O Partha? मनोगतान् of the mind? आत्मनि in the Self? एव only? आत्मना by the Self? तुष्टः satisfied? स्थितप्रज्ञः of steady wisdom? तदा then? उच्यते (he) is called.Commentary In this verse Lord Krishna gives His answer to the first part of Arjunas estion.If anyone gets sugarcandy will he crave for blacksugar Certainly not. If anyone can attain the supreme bliss of the Self? will he thirst for the sensual pleasures No? not at all. The sumtotal of all the pleasures of the world will seem worthless for the sage of steady wisdom who is satisfied in the Self. (Cf.III.17VI.7?8).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.55. The Bhagavat said O son of Prtha ! When a man casts off all desires existing in his mind and remains content in the Self by the self (mind), then he is called 'a man-of-stabilized-intellect.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.55 Lord Shri Krishna replied: When a man has given up the desires of his heart and is satisfied with the Self alone, be sure that he has reached the highest state.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.55 The Lord said When a man renounces all the desires of the mind, O Arjuna, when he is satisfied in himself with himself, then he is said to be of firm wisdom.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.55 The Blessed said O Partha, when one fully renounces all the desires that have entered the mind, and remains satisfied in the Self alone by the Self, then he is called a man of steady wisdom.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.55 The Blessed Lord said When a man completely casts off, O Arjuna, all the desires of the mind and is satisfied in the Self by the Self, then is he said to be one of steady wisdom.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.55 Prajahati etc. [The expression 'a man-of-stabilized-intellect' denotes] a man whose intellect has stabilized, i.e., has grown roots. Growing roots is growing roots permanently on the Self. For, if that is achieved, the agitation in the form of desire born of the distraction by sense-objects comes to an end. Therefore, the nomenclature 'a man-of-stabilized-intellect' applied to a man-of-Yoga, has an etymological sense and it is appropriate in this way. In this manner one estion has been answered.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.55 The Lord said When a person is satisfied in himself with himself, i.e. when his mind depends on the self within himself; and being content with that, expels all the desires of the mind which are different from that state of mind - then he is said to be a man of firm wisdom. This is the highest form of devotion of knowledge.

Then, the lower state, not far below it, of one established in firm wisdom, is described:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.55 In the verses beginning from, 'When one fully renounces৷৷.', and ending with the completion the Chapter, instruction about the characteristics of the man of steady wisdom and the disciplines (he had to pass through) is being given both for the one who has, indeed, applied himself to steadfastness in the Yoga of Knowledge after having renounced rites and duties from the very beginning [Even while he is in the stage of celibacy.], and for the one who has (applied himself to this after having passed) through the path of Karma-yoga. For in all the scriptures without exception, dealing, with spirituality, whatever are the characteristics of the man of realization are themselves presented as the disciplines for an aspirant, because these (characteristics) are the result of effort. And those that are the disciplines reiring effort, they become the characteristics (of the man of realization). [There are two kinds of sannyasa vidvat (renunciation that naturally follows Realization), and vividisa, formal renunciation for undertaking the disciplines which lead to that Realization. According to A.G. the characteristics presented in this and the following verses describe not only the vidvat-sannyasin, but are also meant as disciplines for the vividisa-sannyasin.-Tr.] O Partha, yada, when, at the time when; prajahati, one fully renounces; sarvan, all; the kaman, desires, varieties of desires; manogatan, that have entered the mind, entered into the heart . If all desires are renounced while the need for maintaining the body persists, then, in the absence of anything to bring satisfaction, there may arise the possibility of one's behaving like lunatics or drunkards. [A lunatic is one who has lost his power of discrimination, and a drunkard is one who has that power but ignores it.] Hence it is said: Tustah, remains satisfied; atmani eva, in the Self alone, in the very nature of the inmost Self; atmana, by the Self which is his own indifferent to external gains, and satiated with everything else on account of having attained the nector of realization of the supreme Goal; tada, then; ucyate, he is called; sthita-prajnah, a man of steady wisdom, a man of realization, one whose wisdom, arising from the discrimination between the Self and the not-Self, is stable. The idea is that the man of steady wisdom is a monk, who has renounced the desire for progeny, wealth and the worlds, and who delights in the Self and disports in the Self.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.55।। आत्मानुभवी पुरुष के आन्तरिक और बाह्य जीवन का वर्णन कर भेड़ की खाल में छिपे भालुओं के समान पाखण्डी गुरुओं से भिन्न सच्चे गुरु को पहचानने में गीता हमारी

Chapter 2 (Part 32)

सहायता करती है। इसके अतिरिक्त यह प्रकरण साधकों के लिये विशेष महत्त्व का है क्योंकि इसमें आत्मानुभूति के लिये आवश्यक जीवन मूल्यों एवं विभिन्न परिस्थितियों में मन की स्थिति कैसी होनी चाहिये इसका विस्तार से वर्णन है।इस विषय के प्रारम्भिक श्लोक में ही ज्ञानी पुरुष की आन्तरिक मनस्थिति के वे समस्त लक्षण वर्णित हैं जिन्हे हमको जानना चाहिये। उपनिषद् रूपी उद्यान में खिले शब्द रूपी सुमनों की इस विशिष्ट सुगन्ध से सुपरिचित होने पर ही हमें इस श्लोक में प्रयुक्त शब्दोंें का सम्यक् ज्ञान हो सकता है। जिसने मन में स्थित सभी कामनाओं को त्याग दिया वह पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है। श्रीकृष्ण ने अब तक जो कहा उसके सन्दर्भ में इस श्लोक का अध्ययन करने पर हम वास्तव में व्यास जी के प्रेरणाप्रद शब्दों के द्वारा औपनिषदीय सुरभि का अनुभव कर सकते हैं।आत्मस्वरूप अज्ञान से दूषित बुद्धि कामनाओं के पल्लवित होने के लिये योग्य क्षेत्र बन जाती है। परन्तु जिस पुरुष का अज्ञान आत्मानुभव के सम्यक् ज्ञान से निवृत्त हो जाता है उसका निष्काम हो जाना स्वाभाविक है। यहाँ कार्य के निषेध से कारण का निषेध किया गया है। जहाँ कामनायें नहीं वहाँ अज्ञान नष्ट हो चुका है और ज्ञान तो वहाँ प्रकाशित हो ही रहा है।यदि सामान्य जनों से ज्ञानी को विशिष्टता प्रदान करने वाला यही एक मात्र लक्षण हो तो आज का कोई भी शिक्षित व्यक्ति हिन्दू महात्मा को पागल ही समझेगा क्योंकि आत्मानुभव के बाद उस ज्ञानी में इतनी भी सार्मथ्य नहीं रहेगी कि वह इच्छा कर सके इच्छा क्या है इच्छा मन की वह क्षमता है जो भविष्य में ऐसी वस्तु को पाने की योजना बनाये जिससे कि मनुष्य पहले से अधिक सुखी बन सके। ज्ञानी पुरुष इस सार्मथ्य को भी खो देगा यह है भौतिकवादियों द्वारा की जाने वाली आलोचना।उपर्युक्त प्रकार से इस श्लोक की आलोचना नहीं की जा सकती क्योंकि दूसरी पंक्ति में यह बताया गया है कि ज्ञानी पुरुष अपने आनन्दस्वरूप में सन्तुष्ट रहता है। केवल यह नहीं कहा कि वह सब कामनाओं को त्याग देता है वरन् निश्चित रूप से वह आत्मानन्द का अनुभव करता है।यह सर्वविदित तथ्य है कि बाल्यावस्था में जिन खिलौनों के साथ बालक रमता है उनको युवावस्था में वह छोड़ देता है। आगे वृद्ध होने पर उसकी इच्छायें परिवर्तित हो जाती हैं और युवावस्था में आकर्षक प्रतीत होने वाली वस्तुओं के प्रति उसके मन में कुछ राग नहीं रह जाता।अज्ञान दशा में मनुष्य स्वयं को परिच्छिन्न अहंकार के रूप में जानता है। इसलिये विषयोपभोग की स्पृहा अपनी भावनाओं एवं विचारों के साथ आसक्ति स्वाभाविक होती है। अज्ञान के नष्ट होने पर यह अहंकार अपने शुद्ध अनन्त स्वरूप में विलीन हो जाता है और स्थितप्रज्ञ पुरुष आत्मा द्वारा आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है। सब कामनायें समाप्त हो जाती हैं क्योंकि वह स्वयं आनन्दस्वरूप बनकर स्थित हो जाता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.55।।एवं पृष्टः श्रीभगवान्वासुदेवो मुमुक्षोर्यत्नसाध्यानि जीवन्मुक्तस्वभावभूतानि लक्षणानि वदन्प्रथमप्रश्नस्योत्तरमाह  प्रजहातीति  द्वाभ्याम्। यदा कामानिच्छाभेदान्मनोगतान्मनसि अतिष्ठितान्सर्वानशेषान्प्रजहाति प्रकर्षेण त्यजति। ननु सर्वान्कामान्परित्यज्यापि प्रारब्धकर्मवशाज्जीवतस्तस्योन्मत्तवत्प्रवृत्तिः प्राप्तेत्यत आह  आत्मन्येवेति।  आत्मन्येव प्रत्यगात्मस्वरुप एवात्मना स्वेनैव बाह्यविषयलाभनिरपेक्षः परमार्थदर्श नामृतरसलामेनान्यस्मात्प्राप्तालंप्रत्ययस्तुष्टस्तदा स्थितप्रज्ञः स्थिता प्रतिष्ठिता आत्मानात्मविवेकजा प्रज्ञा यस्य स विद्वान् तदोच्यते। आत्मानं जिज्ञासमानो वैराग्यद्वारा पुत्रवित्तलोकेषणात्यागात्मकं संन्यासमासाद्य श्रवणाद्यवृत्त्या तज्ज्ञानं प्राप्य तस्मिन्नेव आसक्त्या विषयवैमुख्येन तत्फलभूतां तुष्टिं तत्रैव प्रतिलभमानः स्थितप्रज्ञव्यपदेशभागित्यर्थः। एतेन समाधिस्थ इति शेष इति प्रत्युक्तम्। शेषस्योक्तयुक्त्या निरर्थकत्वात्। एतादृशसंबन्धलक्षणेन स्थितप्रज्ञ उच्यते। यथा पृथासंबन्धेन त्वं पार्थ इति सचयन्नाह  पार्थेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.55।।एतेषां चतुर्णां प्रश्नानां क्रमेणोत्तरं भगवानुवाच यावदध्यायसमाप्ति कामान् कामसंकल्पादीन्मनोवृत्तिविशेषान् प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतिभेदेन तन्त्रान्तरे पञ्चधा प्रपञ्चितान्सर्वान्निरवशेषान्प्रकर्षेण कारणबाधेन यदा जहाति परित्यजति सर्ववृत्तिशून्य एव यदा भवति स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते। समाधिस्थ इति शेषः। कामानामनात्मधर्मत्वेन परित्यागयोग्यतामाह मनोगतानिति। यदि ह्यात्मधर्माः स्युस्तदा न त्यक्तुं शक्येरन् वह्न्यौष्ण्यवत्स्वाभाविकत्वात्। मनसस्तु धर्मा एते। अतस्तत्परित्यागेन परित्यक्तुं शक्या एवेत्यर्थः। ननु स्थितप्रज्ञस्य मुखप्रसादलिङ्गगम्यः संतोषविशेषः प्रतीयते स कथं सर्वकामपरित्यागे स्यादित्यत आह आत्मन्येव परमानन्दरूपे नत्वनात्मनि तुच्छे आत्मना स्वप्रकाशचिद्रूपेण भासमाने नतु वृत्त्या तुष्टः परितृप्तः परमपुरुषार्थलाभात्। तथाच श्रुतिःयदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते इति। तथाच समाधिस्थः स्थितप्रज्ञ एवंविधैर्लक्षणवाचिभिः शब्दैर्भाष्यत इति प्रथमप्रश्नस्योत्तरम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.55।।एतेषां क्रमेणोत्तराण्याह भगवान्  प्रजहातीत्यादिना।  अत्र यान्येव कृतार्थलक्षणानि तानि ज्ञानसाधनानीति मत्वा उपदिश्यन्ते स्थितप्रज्ञलक्षणानि तेषामकृतार्थेषु यत्नसाध्यत्वात् कृतार्थेषु स्वाभाविकत्वात्। यथोक्तम्उत्पन्नात्मप्रबोधस्य ह्यद्वेष्टृत्वादयो गुणाः। भवन्त्ययत्नतस्तस्य न तु साधकरूपिणः। इति। यदायं योगी सर्वान्स्थूलसूक्ष्मकारणशरीरभोग्यान् कामान्काम्यमानान्विषयान्प्रकर्षेण समूलं जहाति त्यजति। कीदृशान्कामान्। मनोगतान्मनस्येव संकल्पविकल्पात्मके स्थितान्नतु बहिः। यथोक्तमक्षपादाचार्यैःदोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः संकल्पकृताः इति। तत्र स्थूलानां कामानां त्याग एकान्तसेवनमात्राद्भवतीति स स्थवीयानेव। विलीनकरणग्रामस्य समनस्कस्य जाग्रद्वासनामयाः स्वप्ने ये कामाः स्फुरन्ति तेषामपि त्यागो भगवद्ध्यानादिरूपसद्वासनाभ्यासबलेन भवति। येतूपसंहृतकरणस्य संप्रज्ञातसमाधिकाले दिव्याः कामाः संकल्पमात्रोपनता दहरविद्यादिषु प्रसिद्धास्तेषामपि त्यागोऽसंप्रज्ञातसमाध्यभ्यासबलेन भवति। एवं त्रिविधान्कामान्त्यक्त्वा आत्मन्येवाखण्डैकरसे आत्मना स्वेनैव स्वरूपानन्देन तुष्टो बाह्यविषयनिरपेक्षो यदा भवति तदायं स्थितप्रज्ञ इत्युच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.55।।भगवान् पृष्टस्य स्थितप्रज्ञस्य परिभाषामाह प्रजहातीति। हे पार्थ मद्वाक्यश्रवणयोग्य। पृथायाः स्वभक्तायाः पुत्रत्वात् स्ववाक्यश्रवणयोग्यत्वे तथा सम्बोधितवान्। यदा मनोगतान् स्वमनसि स्थितान् न तु भगवदिच्छया कृपया च प्राप्तव्यान्। भक्त्यादिरूपान् सर्वान् कामान् प्रजहाति प्रकर्षेण त्यजति। स्मरणाभावः प्रकर्षः। ननु कामत्यागे किं फलमित्याशङ्क्याह आत्मन्येवेति। आत्मन्येव स्वात्मस्वरूपभूते भवति। आत्मनः स्वस्यैव जीवात्मस्वरूपेण स्वयमेव तदैक्यस्फूर्त्त्या तुष्ट इत्यर्थः। अयं भावः कामाः स्वसन्तोषदा भवन्तीति तदर्थयत्नेन तत्पूर्त्या तोषः स च लौकिक एवातस्तत्त्यागे चात्मस्फूर्त्या लौकिकसन्तोषो भवत्यात्मगामीति फलम्। यदैतादृशः स्यात्तदा स्थितप्रज्ञो निश्चलबुद्धिः स उच्यते कथ्यत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.55।।अत्र च यानि साधकस्य ज्ञानसाधनानि तान्येव स्वाभाविकानि सिद्धस्य लक्षणानि। अतः सिद्धस्य लक्षणानि कथयन्नेवान्तरङ्गाणि ज्ञानसाधनान्याह यावदध्यायसमाप्ति। तत्र प्रथमप्रश्नोत्तरमाह  प्रजहातीति  द्वाभ्याम्। श्रीभगवानुवाच। मनसि स्थितान्कामान्यदा प्रकर्षेण जहाति। त्यागे हेतुः आत्मन्येव स्वस्मिन्नेव परमानन्दरूपे आत्मना स्वयमेव तुष्ट इति। आत्मारामः सन्यदा क्षुद्रविषयाभिलाषांस्त्यजति तदा तेन लक्षणेन मुनिः स्थितप्रज्ञ उच्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.55।।तत्रोत्तरम् प्रजहातीति। इदं तत्स्वरूपमुच्यत इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.55।।श्रीभगवान् बोले हे पार्थ जब मनुष्य मनमें स्थित हृदयमें प्रविष्ट सम्पूर्ण कामनाओंको सारे इच्छा भेदोंको भली प्रकार त्याग देता है छोड़ देता है। सारी कामनाओंका त्याग कर देनेपर तुष्टिके कारणोंका अभाव हो जाता है और शरीरधारणका हेतु जो प्रारब्ध है उसका अभाव होता नहीं अतः शरीरस्थितिके लिये उस मनुष्यकी उन्मत्तपूरे पागलके सदृश प्रवृत्ति होगी ऐसी शङ्का प्राप्त होनेपर कहते हैं तब वह अपने अन्तरात्मस्वरूपमें ही किसी बाह्य लाभकी अपेक्षा न रखकर अपनेआप संतुष्ट रहनेवाला अर्थात् परमार्थदर्शनरूप अमृतरसलाभसे तृप्त अन्य सब अनात्मपदार्थोंसे अलंबुद्धिवाला तृष्णारहित पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है अर्थात् जिसकी आत्मअनात्मके विवेकसे उत्पन्न हुई बुद्धि स्थित हो गयी है वह स्थितप्रज्ञ यानी ज्ञानी कहा जाता है। अभिप्राय यह कि पुत्र धन और लोककी समस्त तृष्णाओंको त्याग देनेवाला संन्यासी ही आत्माराम आत्मक्रीड और स्थितप्रज्ञ है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.55।। व्याख्या   गीताकी यह एक शैली है कि जो साधक जिस साधन (कर्मयोग भक्तियोग आदि) के द्वारा सिद्ध होता है उसी साधनसे उसकी पूर्णताका वर्णन किया जाता है। जैसे भक्तियोगमें साधक भगवान्के सिवाय और कुछ है ही नहीं ऐसे अनन्ययोगसे उपासना करता है (12। 6) अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित हो जाता है (12। 13)। ज्ञानयोगमें साधक स्वयंको गुणोंसे सर्वथा असम्बद्ध एवं निर्लिप्त देखता है (14। 19) अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण गुणोंसे सर्वथा अतीत हो जाता है (14। 22 25)। ऐसे ही कर्मयोगमें कामनाके त्यागकी बात मुख्य कही गयी है अतः सिद्धावस्थामें वह सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है यह बात इस श्लोकमें बताते हैं। प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्   इन पदोंका तात्पर्य यह हुआ कि कामना न तो स्वयंमें है और न मनमें ही है। कामना तो आनेजानेवाली है और स्वयं निरन्तर रहनेवाला है अतः स्वयंमें कामना कैसे हो सकती है मन एक करण है और उसमें भी कामना निरन्तर नहीं रहती प्रत्युत उसमें आती है  मनोगतान्  अतः मनमें भी कामना कैसे हो सकती है परन्तु शरीरइन्द्रयाँमनबुद्धिसे तादात्म्य होनेके कारण मनुष्य मनमें आनेवाली कामनाओंको अपनेमें मान लेता है। जहाति  क्रियाके साथ  प्र  उपसर्ग देनेका तात्पर्य है कि साधक कामनाओंका सर्वथा त्याग कर देता है किसी भी कामनाका कोई भी अंश किञ्चिन्मात्र भी नहीं रहता।अपने स्वरूपका कभी त्याग नहीं होता और जिससे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं है उसका भी त्याग नहीं होता। त्याग उसीका होता है जो अपना नहीं है पर उसको अपना मान लिया है। ऐसे ही कामना अपनेमें नहीं है पर उसको अपनेमें मान लिया है। इस मान्यताका त्याग करनेको ही यहाँ  प्रजहाति  पदसे कहा गया है।यहाँ  कामान्  शब्दमें बहुवचन होनेसे  सर्वान्  पद उसीके अन्तर्गत आ जाता है फिर भी  सर्वान्  पद देनेका तात्पर्य है कि कोई भी कामना न रहे और किसी भी कामनाका कोई भी अंश बाकी न रहे। आत्मन्येवात्मना तुष्टः   जिस कालमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है और अपनेआपसे अपनेआपमें ही सन्तुष्ट रहता है अर्थात् अपनेआपमें सहज स्वाभाविक सन्तोष होता है।सन्तोष दो तरहका होता है एक सन्तोष गुण है और एक सन्तोष स्वरूप है। अन्तःकरणमें किसी प्रकारकी कोई भी इच्छा न हो यह सन्तोष गुण है और स्वयंमें असन्तोषका अत्यन्ताभाव है यह सन्तोष स्वरूप है। यह स्वरुपभूत सन्तोष स्वतः सर्वदा रहता है। इसके लिये कोई अभ्यास या विचार नहीं करना पड़ता। स्वरूपभूत सन्तोषमें प्रज्ञा (बुद्धि) स्वतः स्थिर रहती है। स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते  स्वयं जब बहुशाखाओंवाली अनन्त कामनाओंको अपनेमें मानता था उस समय भी वास्तवमें कामनाएँ अपनेमें नहीं थीं और स्वयं स्थितप्रज्ञ ही था। परन्तु उस समय अपनेमें कामनाएँ माननेके कारण बुद्धि स्थिर न होनेसे वह स्थितप्रज्ञ नहीं कहा जाता था अर्थात उसको अपनी स्थितप्रज्ञताका अनुभव नहीं होता था। अब उसने अपनेमें से सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर दिया अर्थात् उनकी मान्यताको हटा दिया तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है अर्थात् उसको अपनी स्थितप्रज्ञताका अनुभव हो जाता है।साधक तो बुद्धिको स्थिर बनाता है। परन्तु कामनाओंका सर्वथा त्याग होनेपर बुद्धिको स्थिर बनाना नहीं पड़ता वह स्वतःस्वाभाविक स्थिर हो जाती है।कर्मयोगमें साधकका कर्मोंसे ज्यादा सम्बन्ध रहता है। उसके लिये योगमें आरूढ़ होनेमें भी कर्म कारण हैं  आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते  (गीता 6। 3)। इसलिये कर्मयोगीका कर्मोंके साथ सम्बन्ध साधकअवस्थामें भी रहता है और सिद्धावस्थामें भी। सिद्धावस्थामें कर्मयोगीके द्वारा मर्यादाके अनुसार कर्म होते रहते हैं जो दूसरोंके लिये आदर्श होते हैं (गीता 3। 21)। इसी बातको भगवान्ने चौथे अध्यायमें कहा है कि कर्मयोगी कर्म करते हुए निर्लिप्त रहता है और निर्लिप्त रहते हुए ही कर्म करता है  कर्मण्यकर्म यः पश्येदकर्मणि च कर्म यः  (4। 18)।भगवान्ने तिरपनवें श्लोकमें योगकी प्राप्तिमें बुद्धिकी दो बातें कही थीं संसारसे हटनेमें तो बुद्धि निश्चल हो और परमात्मामें लगनेमें बुद्धि अचल हो अर्थात् निश्चल कहकर संसारका त्याग बताया और अचल कहकर परमात्मामें स्थिति बतायी। उन्हीं दो बातोंको लेकर यहाँ  यदा  और  तदा  पदसे कहा गया है कि जब साधक कामनाओंसे सर्वथा रहित हो जाता है और अपने स्वरूपमें ही सन्तुष्ट रहता है तब वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है। तात्पर्य है कि जबतक कामनाका अंश रहता है तबतक वह साधक कहलाता है और जब कामनाओंका सर्वथा अभाव हो जाता है तब वह सिद्ध कहलाता है। इन्हीं दो बातोंका वर्णन भगवान्ने इस अध्यायकी समाप्तितक किया है जैसे यहाँ  प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्  पदोंसे संसारका त्याग बताया और फिर  आत्मन्येवात्मना तुष्टः  पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी।छप्पनवें श्लोकके पहले भागमें (तीन चरणोंमें) संसारका त्याग और  स्थितधीर्मुनिः  पदसे परमात्मामें स्थित बतायी। सत्तावनवें और अट्ठावनवें श्लोकमें पहले संसारका त्याग बताया और फिर  तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता  पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। उनसठवें श्लोकके पहले भागमें संसारका त्याग बताया और  परं दृष्ट्वा  पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। साठवें श्लोकसे इकसठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर  युक्त आसीत मत्परः  आदि पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। बासठवेंसे पैंसठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर  बुद्धिः पर्यवतिष्ठते  पदोंसे परमात्मानें स्थित बतायी। छाछठवेंसे अड़सठवें श्लोकतक पहले संसारका त्याग बताया और फिर  तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठता  पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। उन्हत्तरवें श्लोकमें  या निशा सर्वभूतानाम्  तथा  यस्यां जाग्रति भूतानि  पदोंसे संसारका त्याग बताया और  तस्यां जागर्ति संयमी  तथा  सा निशा पश्यतो मुनेः  पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। सत्तरवें और इकहत्तरवें श्लोकमें पहले संसारका त्याग बताया और फिर  स शान्तिमधिगच्छति  पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। बहत्तरवें श्लोकमें  नैनां प्राप्य विमुह्यति  पदोंसे संसारका त्याग बताया और  ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति  आदि पदोंसे परमात्मामें स्थिति बतायी। सम्बन्ध   अब आगेके दो श्लोकोंमें स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है इस दूसरे प्रश्नका उत्तर देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.54 2.55।।यदा ते इति। श्रुतीति। तत्र च योगबुद्धिप्राप्त्यबसरे तव स्फुटमेवेदमभिज्ञानम् श्रोतव्यस्य (S omits श्रोतव्यस्य) श्रुतस्य अभिलष्यमाणस्य च (N वा instead of च) आगमस्य उभस्यापि निर्वेदभावत्वम् (SK भाक्त्वम्)। अनेन चेदमुक्तम् अविद्यापद ( N अविद्यमद) निपतितप्रमात्रनुग्राहकशास्त्रश्रवणसंस्कारविप्रलम्भमहिमा अयं यत् तवास्थाने कुलक्षयादिदोषदर्शनम्। तत्तु तथाशासनबहुमानविगलने विगलिष्यति इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.55।।प्रतिवचनमवतारयितुं पातनिकां करोति  यो हीति।  हिशब्देन कर्मसंन्यासकारणीभूतविरागतासंपत्तिः सूच्यते। आदितो ब्रह्मचर्यावस्थायामिति यावत्। ज्ञानमेव योगो ब्रह्मात्मभावप्रापकत्वात्तस्मिन्निष्ठा परिसमाप्तिस्तस्यामित्यर्थः। कर्मैव योगस्तेन कर्माण्यसंन्यस्य तन्निष्ठायामेव प्रवृत्त इति शेषः। ननु तत्कथमेकेन वाक्येनार्थद्वयमुपदिश्यते द्वैयर्थो वाक्यभेदात् नच लक्षणमेव साधनं कृतार्थलक्षणस्य तत्स्वरूपत्वेन फलत्वे साधनत्वानुपपत्तेरिति तत्राह  सर्वत्रैवेति।  यद्यपि कृतार्थस्य ज्ञानिनो ज्ञानलक्षणं तद्रूपेण फलत्वान्न साधनत्वमधिगच्छति तथापि जिज्ञासोस्तदेव प्रयत्नसाध्यतया साधनं संपद्यते लक्षणं चात्र ज्ञानसामर्थ्यलब्धमनूद्यते न विधीयते विदुषो विधिनिषेधागोचरत्वात् तेन जिज्ञासोः साधनानुष्ठानाय लक्षणानुवादादेकस्मिन्नेव साधनानुष्ठाने तात्पर्यमित्यर्थः। उक्तेऽर्थे भगवद्वाक्यमुत्थापयति  यानीति।  लक्षणानि च ज्ञानसामर्थ्यलभ्यान्ययत्नसाध्यानीति शेषः। स्थितप्रज्ञस्य का भाषेति प्रथमप्रश्नस्योत्तरमाह  प्रजहातीति।  कामत्यागस्य प्रकर्षो वासनाराहित्यं कामानामात्मनिष्ठत्वं कैश्चिदिष्यते तदयुक्तं तेषां मनोनिष्ठत्वश्रुतेरित्याशयवानाह  मनोगतानिति।  आत्मन्येवात्मनेत्याद्युत्तरभागनिरस्यं चोद्यमनुवदति  सर्वकामेति।  तर्हि प्रवर्तकाभावाद्विदुषः सर्वप्रवृत्तेरुपशान्तिरिति नेत्याह  शरीरेति।  उन्मादवानुन्मत्तो विवेकविरहितबुद्धिभ्रमभागी प्रकर्षेण मदमनुभवन् विद्यमानमपि विवेकं निरस्यन्भ्रान्तवद्व्यवहरन्प्रमत्त इति विभागः। उत्तरार्धमवतार्य व्याकरोति  उच्यत इति।  आत्मन्येवेत्येवकारस्यात्मनेत्यत्रापि संबन्धं द्योतयति  स्वेनैवेति।  बाह्यलाभनिरपेक्षत्वेन तुष्टिमेव स्पष्टयति  परमार्थेति।  स्थितप्रज्ञपदं विभजते  स्थितेति।  प्रज्ञाप्रतिबन्धकसर्वकामविगमावस्था तदेति निर्दिश्यते। उक्तमेव प्रपञ्चयति  त्यक्तेति।  आत्मानं जिज्ञासमानो वैराग्यद्वारा सर्वैषणात्यागात्मकं संन्यासमासाद्य श्रवणाद्यावृत्त्या तज्ज्ञानं प्राप्य तस्मिन्नेवासक्त्या विषयवैमुख्येन तत्फलभूतां परितुष्टिं तत्रैव प्रतिलभमानः स्थितप्रज्ञव्यपदेशभागित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.55।।लक्षणप्रश्नस्यैवोत्तरं प्रतीयते न तुस्थितधीः इत्यादेरित्यतस्तदुत्तरस्थानं दर्शयन्ननन्तरप्रकरणार्थं दर्शयति  गमनादी ति। अभिसन्धिः प्रयोजनोद्देशः। ईषदभिसन्धिसूचनायातिशब्दः। प्रवृत्तिमात्रमिहाभिप्रेतं न भाषणादिकमेवेति ज्ञापनाय भाषणादीति नोक्तम्। व्यवहाराय लक्षणप्रश्नो घटते। प्रवृत्त्युद्देशप्रश्नस्तु व्यर्थ एव न च शक्यः प्रतिवक्तुम् अनेकेषां प्रवृत्त्युद्देश्यस्यैकरूपस्याभावादित्यभिप्रायेण भगवतोपेक्षितोऽसाविति किं न स्यात् किं तदुत्तरस्थानप्रदर्शनेन अन्यथाऽल्पमप्युद्देश्यं वक्तव्यमित्यत आह  एव मिति। एवं भेरीताडनादावपि अचलेत्युक्तप्रकारेण परमानन्दतृप्तश्चेत्किमर्थं प्रवृत्तिं करोति न कुर्यात् करोति च तस्मादुक्तमसदित्युक्ताक्षेप एव। अत्राभिप्रेतप्रश्नस्तु मुखत एव। अतो नोपेक्षामर्हतीति भावः। एतच्चार्जुनस्य प्रेक्षावत्त्वाद्गम्यते एवं चेद्गमनादिप्रवृत्तिरित्युक्तः परिहारो न पूर्णः प्रवृत्तिकारणानुक्तेरित्यत आह  प्रारब्धकर्मणे ति। ईषत्तिरोहितं ब्रह्म यस्यासौ तथोक्तः। परिहरति द्वितीयं प्रश्नम्या निशा इत्यादाविति शेषः। ननु सर्वकामप्रहाणं ज्ञानिलक्षणत्वेनोच्यते तत्कथमल्पाभिसन्ध्यङ्गीकारः इत्यत आह   प्राय  इति। कुतः सर्वशब्दसङ्कोच इत्यत आह  शुकादीना मिति। विरुद्धकामस्येति शेषः। तच्च प्रवृत्तिलिङ्गेनागमाच्च ज्ञातव्यम्। अनुकूलकामस्तु सर्वथाऽस्त्येवातोऽपि सङ्कोच इत्यत आह  त्वत्पादे ति। तां भक्तिम्। उपलक्षणमेतत्। प्रायेण विरुद्धकामत्यागो ज्ञानिनो लक्षणं चेदिन्द्रादीनां ज्ञानित्वं न स्यात् बहुतरविरुद्धकामदर्शनात्। तथाभूता अपि चेज्ज्ञानिनस्तर्हि देवदत्तादयोऽपि किं न स्युरित्यत आह  यदे ति। आग्रहो विरुद्धकामाभिनिवेशः। एतत्प्रमाणेन स्थापयति  तच्चोक्त मिति। आधिकारिका इति पुरुषविशेषसंज्ञाप्रजापाश्च तथा देवाः इत्यादिवचनात्। देवदत्तादिप्रतिबन्दीं मोचयति  अत एवे ति। एतदागमोक्तादेव। आदिपदेन विरुद्धक्रोधादिग्रहणम्। अनेन कामशब्दः क्रोधादीनामुपलक्षणार्थ इति सूचितं भवति।ननु समाधिं कुर्वतो ज्ञानिनो लक्षणमेतदिति व्याक्रियताम् तथा सति प्रश्नवाक्यस्थंसमाधिस्थस्य इति पदं समञ्जसं स्यात् सर्वशब्दश्चासङ्कुचितार्थः स्यात् इन्द्रादिविषयाक्षेपाप्रसक्तिश्चेत्यत आह  न चे ति। समाधिं कुर्वतः स्नेहनिषेधोऽनुगुण एवेत्यत आह  नही ति। नात्र स्नेहनिषेधमात्रमुच्यते किन्तुतत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् 2।57 इति शुभाशुभार्थप्राप्तिपूर्वकं न च तत्प्राप्तिः समाधिं कुर्वतो ज्ञानिनोऽस्ति कुतः इत्यत उक्तम्  असम्प्रज्ञाते ति। असम्प्रज्ञातः समाधिर्यस्यासौ तथोक्तः। बाह्यार्थानुसन्धानं यत्र नास्ति सोऽसम्प्रज्ञातसमाधिः इतरः सम्प्रज्ञातसमाधिरिति योगशास्त्रे प्रसिद्धिः। तथा च लक्षणमसम्भवि प्रसज्जेत्। सावकाशेभ्यो बहुभ्यो निरवकाशस्यैकस्य बलवत्त्वमिति भावः। एवं तर्हि सम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैतल्लक्षणमस्तु तत्रोक्तदोषाभावादित्यत आह  सम्प्रज्ञाते  त्विति। यद्यपि सम्प्रज्ञातसमाधौ शुभाशुभप्रतीतिसम्भवेनासम्भवित्वं नाम लक्षणविरोधो नास्ति तथापि कामादिहानं समाधिस्थ एव पुंसि इति नियमो नास्ति समाधिस्थेऽपि ज्ञानिनि विद्यमानत्वात् तथा चातिव्याप्तिः स्यादित्यर्थः। असमाधिस्थेऽपि ज्ञानिनि कामाद्यभावः कुतः इत्यत आह  कामादय  इति। तदर्थं सर्वथेति विशेषणप्रक्षेपेऽपि पुरुषविशेषेऽतिव्याप्तिपरिहारो दुर्घट एव। न चास्मन्मतेऽप्यव्याप्तिदोषः असम्प्रज्ञातसमाधिस्थ व्यतिरिक्तविषयत्वात्। सम्भवतस्तु तद्विषयत्वादिति। कामानां मनोगतत्वाद्व्यर्थं विशेषणमित्यतो नेदं विशेषणम् किन्तु सर्वकामत्यागस्यासम्भवित्वमाशङ्क्य तदुपपादनाय युक्तिरियमुक्तेत्याह  मनोगता  इति। तत्रैव मनस्येव। कामज्ञानयोर्विरोधः कुतः इत्यत आह   विरोधश्चे ति। रसो राग इति वक्ष्यति। ननु सर्वकामप्रहाणमस्मदादिषु न दृष्टम् तद्दृष्टान्तेन ज्ञानिष्वपि तदभावानुमानादसम्भवित्वं लक्षणस्येत्यत आह  न चे ति। कुतः उदाहृतप्रमाणविरोधात्। प्रमाणविरुद्धार्थानुमाने पण्डितमूर्खादिपुरुषवैचित्र्यापलापप्रसङ्गादित्याह  पुरुषे ति।  आत्मन्यात्मने ति पदद्वयेन जीव एवात्रोच्यत इति कश्चित् शं.चा. तृतीयान्तेन मन इत्यपरः रामानुजः तदुभयमसदिति भावेनाह  आत्मने ति। स्थितः सन्निति शेषोक्तिः। वाक्यार्थं वदन् स्वव्याख्यानानुपपत्तौ परव्याख्यानुपपत्तौ च युक्तिमाह  आत्माख्य  इति। तस्मिन् स्थितस्य तदेकाग्रचित्तस्य अत्र त्यक्तविषयस्यापि तुष्टिरुच्यते। सा च परमात्मपरिग्रहे सम्भवति नान्यथेत्यर्थः। कुतः इत्यत आह  विषया निति। ततः किम् इत्यत आह  अत  इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.55।।गमनादिप्रवृत्तिर्नात्यभिसन्धिपूर्विका मात्रादिप्रवृत्तिवदितिया निशा 2।69 इत्यादिना दर्शयिष्यँल्लक्षणं प्रथमत आह एवं परमानन्दतृप्तः किमर्थमेवं प्रवृत्तिं करोतीति प्रश्नाभिप्रायः। प्रारब्धकर्मणेषत्तिरोहितब्रह्मणो वासना प्रायोऽल्पाभिसन्धिप्रवृत्तिः सम्भवतीत्याशयवान् परिहरति। प्रायः सर्वान्कामान्प्रजहाति शुकादीनामपीषद्दर्शनात्।त्वत्पादभक्तिमिच्छन्ति ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः इत्युक्तेस्तामिच्छन्ति। यदा त्विन्द्रादीनामाग्रहो दृश्यते तदाऽभिभूतं तेषाम्। तच्चोक्तम्आधिकारिकपुंसां तु बृहत्कर्मत्वकारणात्। उद्भवाभिभवौ ज्ञाने ततोऽन्येभ्यो विलक्षणाः इति। अत एव वैलक्षण्यादनधिकारिणां आग्रहादि चेदस्ति न ते ज्ञानिन इत्यवगन्तव्यम्।न चात्र समाधिं कुर्वतो लक्षणमुच्यतेयः सर्वत्रानभिस्नेहः 2।57 इत्यादिस्नेहनिषेधात्। नहि समाधिं कुर्वतस्तस्य शुभाशुभप्राप्तिरस्ति असम्प्रज्ञातसमाधेः। सम्प्रज्ञाते त्वविरोधस्तथापि न तत्रैवेति नियमः।कामादयो न जायन्ते ह्यपि विक्षिप्तचेतसाम्। ज्ञानिनां ज्ञाननिर्धूतमलानां देवसंश्रयात् इति च स्मृतेः। मनोगता हि कामाः अतस्तत्रैव तद्विरुद्धज्ञानोत्पत्तौ युक्तं हानं तेषामिति दर्शयति मनोगतानिति। विरोधश्चोच्यतेरसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते 2।59 इति। न चैतददृष्ट्या अपलपनीयम् पुरुषवैशेष्यात्। आत्मना परमात्मना। परमात्मन्येव स्थितः सन्। आत्माख्ये तस्मिन्स्थितस्य तत्प्रसादादेव तुष्टिर्भवतिविषयांस्तु परित्यज्य रामे स्थितिमतस्ततः। देवाद्भवति वै तुष्टिर्नान्यथा तु कथञ्चन इति नारायणरामकल्पेः अतो नात्मा जीवः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.55।।श्री भगवानुवाच  आत्मनि एव आत्मना  मनसा आत्मैकावलम्बनेन  तुष्टः  तेन तोषेण तद्व्यतिरिक्तान्  सर्वान् मनोगतान्   कामान् यदा  प्रकर्षेण जहाति  तदा  अयं  स्थितप्रज्ञ  इति  उच्यते।  ज्ञाननिष्ठाकाष्ठा इयम्।अनन्तरं ज्ञाननिष्ठस्य ततः अर्वाचीना अदूरविप्रकृष्टावस्था उच्यते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.55।।  प्रजहाति  प्रकर्षेण जहाति परित्यजति  यदा  यस्मिन्काले  सर्वान्  समस्तान्  कामान्  इच्छाभेदान् हे  पार्थ   मनोगतान्  मनसि प्रविष्टान् हृदि प्रविष्टान्। सर्वकामपरित्यागे तुष्टिकारणाभावात् शरीरधारणनिमित्तशेषे च सति उन्मत्तप्रमत्तस्येव प्रवृत्तिः प्राप्ता इत्यत उच्यते  आत्मन्येव  प्रत्यगात्मस्वरूपे एव  आत्मना  स्वेनैव बाह्यलाभनिरपेक्षः तुष्टः परमार्थदर्शनामृतरसलाभेन अन्यस्मादलंप्रत्ययवान् स्थितप्रज्ञः स्थिता प्रतिष्ठिता आत्मानात्मविवेकजा प्रज्ञा यस्य सः  स्थितप्रज्ञः  विद्वान्  तदा उच्यते।  त्यक्तपुत्रवित्तलोकैषणः संन्यासी आत्माराम आत्मक्रीडः स्थितप्रज्ञ इत्यर्थः।।किञ्च

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【 Verse 2.56 】

▸ Sanskrit Sloka: दु:खेष्वनुद्विग्नमना: सुखेषु विगतस्पृह: | वीतरागभयक्रोध: स्थितधीर्मुनिरुच्यते ||

▸ Transliteration: duḥkheṣv anudvigna-manāḥ sukheṣu vigataspṛhaḥ | vītarāgabhayakrodhaḥ sthitadhīrmunirucyate ||

▸ Glossary: duḥkheṣu: in sorrow; anudvignamanāḥ: without being agitated in mind; sukheṣu: in happiness; vigataspṛhaḥ: without being interested; vīta: free from; rāga: passion; bhaya: fear; krodhaḥ: anger; sthitadhīḥ: one who is steady in mind; muniḥ: a sage; ucyate: is called

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.56 He whose mind is not disturbed by adversity and who, in prosperity, does not go after other pleasures, he who is free from attachment, fear or anger is called a sage of steady wisdom.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.56।।दुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.56।। दुख में जिसका मन उद्विग्न नहीं होता सुख में जिसकी स्पृहा निवृत्त हो गयी है? जिसके मन से राग? भय और क्रोध नष्ट हो गये हैं? वह मुनि स्थितप्रज्ञ कहलाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.56 दुःखेषु in adversity? अनुद्विग्नमनाः of unshaken mind? सुखेषु in pleasure? विगतस्पृहः withut hankering? वीतरागभयक्रोधः free from attachment? fear and anger? स्थितधीः of steady wisdom? मुनिः sage? उच्यते (he) is called.Commentary Lord Krishna gives His answer to the second part of Arjunas estion as to the conduct of a sage of steady wisdom in the 56th? 57th and 58th verses.The mind of a sage of steady wisdom is not distressed in calamities. He is not affected by the three afflictions (Taapas) -- Adhyatmika (arising from diseases or disorders in ones own body)? Adhidaivika (arising from thunder? lightning? storm? flood? etc.)? and Adhibhautika (arising from scorpions? cobras? tigers? etc.). When he is placed in an affluent condition he does not long for sensual pleasures. (Cf.IV.10).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.56. He, whose mind is undisturbed in the midst of sorrows; who is free from desire in the midst of pleasures; and from whom longing, fear and wrath have totally gone-he is said to be a firm-minded sage.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.56 The sage, whose mind is unruffled in suffering, whose desire is not roused by enjoyment, who is without attachment, anger or fear - take him to be one who stands at that lofty level.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.56 He whose mind is not perturbed in pain, who has no longing for pleasures, who is free from desire, fear and anger - he is called a sage of firm wisdom.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.56 That monk is called a man of steady wisdom when his mind is unperturbed in sorrow, he is free from longing for delights, and has gone beyond attachment, fear and anger.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.56 He whose mind is not shaken by adversity, who does not hanker after pleasures, and is free from attachment, fear and anger, is called a sage of steady wisdom.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.56 Dukkhesu etc. Only that sage whose mental attitude is free from desire and hatred in the midst of pleasure and pain, and not anyone else, is a man-of-stabilized-intellect. This is also proper. For-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.56 Even when there are reasons for grief like separation from beloved ones, his mind is not perturbed, i.e., he is not aggrieved. He has no longing to enjoy pleasures, i.e., even though the things which he likes are near him, he has no longing for them. He is free from desire and anger; desire is longing for objects not yet obtained; he is free from this. Fear is affliction produced from the knowledge of the factors which cause separation from the beloved or from meeting with that which is not desirable; he is free from this. Anger is a disturbed state of one's own mind which produces affliction and which is aimed at another sentient being who is the cause of separation from the beloved or of confrontation with what is not desirable. He is free from this.

A sage of this sort, who constantly meditates on the self, is said to be of firm wisdom.

Then, the next state below this is described:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.56 Moreover, that munih, monk [Sankaracarya identifies the monk with the man of realization.] ucyate, is then called; sthita-dhih, a man of steady wisdom; when anudvignamanah, his mind is unperturbed; duhkhesu, in sorrow when his mind remains unperturbed by the sorrows that may come on the physical or other planes [Fever, headache, etc. are physical (adhyatmika) sorrows; sorrows caused by tigers, snakes, etc. are environmental (adhibhautika) sorrows; those caused by cyclones, floods, etc. are super-natural (adhidaivika). Similarly, delights also may be experienced on the three planes.] ; so also, when he is vigata-sprhah, free from longing; sukhesu, for delights when he, unlike fire which flares up when fed with fuel etc., has no longing for delights when they come to him ; and vita-raga-bhaya-krodhah, has gone beyond attachment, fear and anger.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.56।। स्थितप्रज्ञ का मुख्य लक्षण है आत्मानन्द की अनुभूति द्वारा सब कामनाओं का त्याग। श्रीकृष्ण ज्ञानी की पहचान का दूसरा लक्षण बताते हैं सुख और दुख में मन का समत्व रहना। शरीर धारणा के कारण उसको होने वाले अनुभवों के भोक्ता के रूप में उसके व्यवहार को यहां बताया गया है।स्थितप्रज्ञ मुनि वह है जो राग भय और क्रोध से मुक्त है। यदि हम पूर्णत्व प्राप्त पुरुषों की जीवनियों का अध्ययन करें तो उनमें हमें सामान्य मनुष्य से सर्वथा विपरीत लक्षण देखने को मिलेंगे। सामान्य पुरुषों की सैकड़ों प्रकार की भावनायें और गुण ज्ञानी पुरुष में नहीं होते और इसलिये यहां केवल तीन गुणों के अभाव को बताने से हमें आश्चर्य होगा। तब एक शंका मन में उठती है क्या व्यास जी अन्य गुणों को भूल गये क्या यह वाक्य पूर्ण लक्षण बताता है परन्तु विचार करने पर ज्ञात होगा कि ये शंकायें निर्मूल हैं।पूर्व श्लोक में ज्ञानी के निष्कामत्व को बताया गया है और यहाँ उसके मन की स्थिरता को। जगत् में अनेक विषयों के अनुभव से हम जानते हैं कि उनके साथ राग या आसक्ति की वृद्धि होने से मन में भय भी उत्पन्न होने लगता है। विषय को प्राप्त करने की तीव्र इच्छा होने पर यह भय होता है कि वास्तव में वह वस्तु प्राप्त होगी अथवा नहीं। वस्तु के प्राप्त होने पर भी उसकी सुरक्षा के लिये चिन्ता और भय लगे ही रहते हैं।राग और भय से अभिभूत व्यक्ति के और उसकी इष्ट वस्तु के मध्य कोई विघ्न आता है तो उस विघ्न की ओर मन में जो भाव उठता है उसे कहते हैं क्रोध। क्रोध के आवेग की तीव्रता राग और भय की तीव्रता के समान अनुपात में होती है। अर्थ यह हुआ कि राग ही निमित्तवशात् क्रोध के रूप में व्यक्त होता है।श्री शंकराचार्य जी भाष्य में लिखते हैं कि ज्ञानी पुरुष त्रिविध तापों में स्थिरचित्त रहता है। वे त्रिविध दुख हैं (क) आध्यात्मिकशरीर में रोग आदि (ख) आधिभौतिकबाह्य वस्तुओं आदि से प्राप्त जैसे व्याघ्र चोर आदि (ग) आधिदैविकप्रकृति के प्रकोप जैसे भूकम्प तूफान आदि। ईंधन के डालने पर अग्नि प्रज्वलित होती है। परन्तु ज्ञानी पुरुष में अनेक विषय रूप ईंधन डालने पर भी इच्छा की अग्नि उग्ररूप धारण नहीं करती। ऐसे पुरुष को कहते हैं स्थितप्रज्ञ मुनि।और आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.56।।   किंचदुःखेष्विति। यत्तु पूर्वश्लोकेन प्रथमप्रश्नस्योत्तरमुक्तं इदानीं व्युत्थिचित्तस्य स्थितप्रज्ञस्य भाषणोपवेशनगमनानि मूढजनविलक्षणानि व्याख्येयानि। तत्र किंप्रभाषेतेत्यस्योत्तरमाहेति तच्चिन्त्यम्।स्थितधीर्मुनिरुच्यते इति वाक्यशेषेण प्रथमप्रश्नोत्तरप्रतीतेः स्पष्टत्वात्। दुःखेष्वाध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकेष्वनुद्विग्नमक्षुभितं मनो यस्य स तथा। त्रिविधसुखेषु विगता स्पृहाभिलाषो यस्य सः। अतएव वीता रागभयक्रोधा यस्मात्स स्थितधीः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.56।।इदानीं व्युत्थितस्य स्थितप्रज्ञस्य भाषणोपवेशनगमनानि मूढजनविलक्षणानि व्याख्येयानि। तत्र किं प्रभाषेतेत्यस्योत्तरमाह द्वाभ्याम् दुःखेष्विति। दुःखानि त्रिविधानि शोकमोहज्वरशिरोरोगादिनिमित्तान्याध्यात्मिकानि व्याघ्रसर्पादिप्रयुक्तान्याधिभौतिकानि अतिवातातिवृष्ट्यादिहेतुकान्याधिदैविकानि तेषु दुःखेषु रजःपरिणामसंतापात्मकचित्तवृत्तिविशेषेषु प्रारब्धपापकर्मप्रापितेषु नोद्विग्नं दुःखपरिहाराक्षमतया व्याकुलं न भवति मनो यस्य सोऽनुद्विग्नमनाः। अविवेकिनो हि दुःखप्राप्तौ सत्यामहो पापोऽहं धिङ्मां दुरात्मानमेतादृशदुःखभागिनं को मे दुःखमीदृशं निराकुर्यादित्यनुतापात्मको भ्रान्तिरूपस्तामसचित्तवृत्तिविशेष उद्वेगाख्यो जायते। यद्येवं पापानुष्ठानसमये स्यात्तदा तत्प्रवृत्तिप्रतिबन्धकत्वेन सफलः स्यात्। भोगकालेऽनुभवकारणे सति कार्यस्योच्छेत्तुमशक्यत्वान्निष्प्रयोजने दुःखकारणे सत्यपि किमति मम दुःखं जायत इत्यविवेकजभ्रमरूपत्वान्न विवेकिनः स्थितप्रज्ञस्य संभवति। दुःखमात्रं हि प्रारब्धकर्मणा प्राप्यते नतु तदुत्तरकालीनो भ्रमोऽपि। ननु दुःखान्तरकारणत्वात्सोऽपि प्रारब्धकर्मान्तरेण प्राप्यतामिति चेत्। न। स्थितप्रज्ञस्य भ्रमोपादानाज्ञाननाशेन भ्रमासंभवात्तज्जन्यदुःखप्रापकप्रारब्धाभावात् यथाकथंचिद्देहयात्रामात्रनिर्वाहकप्रारब्धकर्मफलस्य भ्रमाभावेऽपि बाधितानुवृत्त्योपपत्तेरिति विस्तरेणाग्रे वक्ष्यते। तथा सुखेषु सत्त्वपरिणामरूपप्रीत्यात्मकचित्तवृत्तिविशेषेषु त्रिविधेषु प्रारब्धपुण्यकर्मप्रापितेषु विगतस्पृहः आगामितज्जातीयसुखस्पृहारहितः। स्पृहाहि नाम सुखानुभववृत्तिकाले तज्जातीयसुखस्य कारणं धर्ममननुष्ठाय वृथैव तदाकाङ्क्षारूपा तामसी चित्तवृत्तिर्भ्रान्तिरेव सात्राविवेकिन एव जायते। नहि कारणाभावे कार्यं भवितुमर्हति। अतो यथाऽसतिकारणे कार्यं माभूदिति वृथाकाङ्क्षा उद्वेगो विवेकिनो न संभवति। तथैवासति कारणे कार्यं भूयादिति वृथाकाङ्क्षारूपा तृष्णात्मिका स्पृहापि नोपपद्यते। प्रारब्धकर्मणः सुखमात्रप्रापकत्वात्। हर्षात्मिका वा चित्तवृत्तिः स्पृहाशब्देनोक्ता सापि भ्रान्तिरेव। अहो धन्योऽहं यस्य ममेदृशं सुखमुपस्थितं को वा मया तुल्योऽस्ति भुवने केन वोपायेन ममेदृशं सुखं न विच्छिद्येतेत्येवमात्मिकोत्फुल्लतारूपा तामसी चित्तवृत्तिः। अतएवोक्तं भाष्येनाग्निरिवेन्धनाद्याधाने यः सुखान्यनुविवर्धते स विगतस्पृहः इति। वक्ष्यति चन प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् इति। सापि न विवेकिनः संभवति भ्रान्तित्वात्। तथा वीतरागभयक्रोधः। रागः शोभनाध्यासनिबन्धनो विषयेषु रञ्जनात्मकश्चित्तवृत्तिविशेषोऽत्यन्ताभिनिवेशरूपः। रागविषयस्य नाशके समुपस्थिते तन्निवारणासामर्थ्यमात्मनो मन्यमानस्य दैन्यात्मकश्चित्तवृत्तिविशेषो भयम्। एवं रागविषयविनाशके समुपस्थिते तन्निवारणसामर्थ्यमात्मनो मन्यमानस्याभिज्वलनात्मकश्चित्तवृत्तिविशेषः क्रोधः। ते सर्वे विपर्ययरूपत्वाद्विगता यस्मात्स तथा एतादृशो मुनिर्मननशीलः संन्यासी स्थितप्रज्ञ उच्यते। एवंलक्षणः स्थितधीः स्वानुभवप्रकटनेन शिष्यशिक्षार्थमनुद्वेगनिस्पृहत्वादिवाचः प्रभाषत इत्यन्वय उक्तः। एवंचान्योऽपि मुमुक्षुर्दुःखे नोद्विजेत् सुखे न प्रहृष्येत् रागभयक्रोधरहितश्च भवेदित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.56।।दुःखेषु शस्त्रपातादिषु दुःखसाधनेषु प्राप्तेष्वपि अनुद्विग्नमना अचञ्चलमनाः। वक्ष्यति चयस्मिन्स्थितो न दुःखेन गुरुणापि विचाल्यते इति। सुखेषु सुखसाधनेषु स्रक्चन्दनादिषु प्राप्तेष्वपि विगतस्पृहो निर्वृत्तिकत्वाद्भवति। अतएव वीताः रागभयक्रोधा यस्मात्स तथा। नहि तस्यामवस्थायां रागादयो दुःखादयो वा संभवन्ति। एवंविधः समाधिस्थः स्थितधीः स्थितप्रज्ञ उच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.56।।किञ्च। दुःखेषु अनुद्विग्नं मनो यस्य सुखेषु च विगता स्पृहा इच्छा यस्य तादृशो मुनिः मननधर्मयुक्तः स्थितधीः स्थितप्रज्ञ उच्यते। ननु दुःखानुद्वेगे सुखस्पृहाभावे च किं स्यात् अत आह वीतरागभयक्रोध इति। विगता रागभयक्रोधा यस्मात्तादृशः स्यात् एतदेव फलम्। इयं परिभाषा स्थितप्रज्ञस्येति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.56।।किंच  दुःखेष्विति।  दुःखेषु प्राप्तेष्वप्यनुद्विग्नमक्षुभितं मनो यस्य सः। सुखेषु विगता स्पृहा यस्य सः। तत्र हेतुः वीतापगता रागभयक्रोधा यस्मात्। तत्र रागः प्रीतिः। स मुनिः स्थितधीः स्थितप्रज्ञ इत्युच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.56।।यानि साधकस्य ज्ञानसाधनानि तानि तस्य स्वाभाविकान्यन्तरङ्गाणि चेत्याह दुःखेष्विति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.56।।तथा आध्यात्मिक आदि तीनों प्रकारके दुःखोंके प्राप्त होनेमें जिसका मन उद्विग्न नहीं होता अर्थात् क्षुभित नहीं होता उसे अनुद्विग्नमना कहते हैं। तथा सुखोंकी प्राप्तिमें जिसकी स्पृहातृष्णा नष्ट हो गयी है अर्थात् ईंधन डालनेसे जैसे अग्नि बढ़ती है वैसे ही सुखके साथसाथ जिसकी लालसा नहीं बढ़ती वह विगतस्पृह कहलाता है। एवं आसक्ति भय और क्रोध जिसके नष्ट हो गये हैं वह वीतरागभयक्रोध कहलाता है ऐसे गुणोंसे युक्त जब कोई हो जाता है तब वह स्थितधी यानी स्थितप्रज्ञ और मुनि यानी संन्यासी कहलाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.56।। व्याख्या   अर्जुनने तो स्थितप्रज्ञ कैसे बोलता है ऐसा क्रियाकी प्रधानताको लेकर प्रश्न किया था पर भगवान् भावकी प्रधानताको लेकर उत्तर देते हैं क्योंकि क्रियाओंमें भाव ही मुख्य है। क्रियामात्र भावपूर्वक ही होती है। भाव बदलनेसे क्रिया बदल जाती है अर्थात् बाहरसे क्रिया वैसी ही दीखनेपर भी वास्तवमें क्रिया वैसी नहीं रहती। उसी भावकी बात भगवान् यहाँ कह रहे हैं  (टिप्पणी प0   94) ।  दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः   दुखोंकी सम्भावना और उनकी प्राप्ति होनेपर भी जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता अर्थात् कर्तव्यकर्म करते समय कर्म करनेमें बाधा लग जाना निन्दाअपमान होना कर्मका फल प्रतिकूल होना आदिआदि प्रतिकूलताएँ आनेपर भी उसके मनमें उद्वेग नहीं होता।कर्मयोगीके मनमें उद्वेग हलचल न होनेका कारण यह है कि उसका मुख्य कर्तव्य होता है दूसरोंके हितके लिये कर्म करना कर्मोंको साङ्गोपाङ्ग करना कर्मोंके फलमें कहीं आसक्ति ममता कामना न हो जाय इस विषयमें सावधान रहना। ऐसा करनेसे उसके मनमें एक प्रसन्नता रहती है। उस प्रसन्नताके कारण कितनी ही प्रतिकूलता आनेपर भी उसके मनमें उद्वेग नहीं होता। सुखेषु विगतस्पृहः   सुखोंकी सम्भावना और उनकी प्राप्ति होनेपर भी जिसके भीतर स्पृहा नहीं होती अर्थात् वर्तमानमें कर्मोंका साङ्गोपाङ्ग हो जाना तात्कालिक आदर और प्रशंसा होना अनुकूल फल मिल जाना आदिआदि अनुकूलताएँ आनेपर भी उसके मनमें यह परिस्थिति ऐसी ही बनी रहे यह परिस्थिति सदा मिलती रहे ऐसी स्पृहा नहीं होती। उसके अन्तःकरणमें अनुकूलताका कुछ भी असर नहीं होता। वीतरागभयक्रोधः   संसारके पदार्थोंका मनपर जो रंग चढ़ जाता है उसको  राग  कहते हैं। पदार्थोंमें राग होनेपर अगर कोई सबल व्यक्ति उन पदार्थोंका नाश करता है उनसे सम्बन्धविच्छेद कराता है उनकी प्राप्तिमें विघ्न डालता है तो मनमें  भय  होता है। अगर वह व्यक्ति निर्बल होता है तो मनमें  क्रोध  होता है। परन्तु जिसके भीतर दूसरोंको सुख पहुँचानेका उनका हित करनेका उनकी सेवी करनेका भाव जाग्रत् हो जाता है उसका राग स्वाभाविक ही मिट जाता है। रागके मि़टनेसे भय और क्रोध भी नहीं रहते। अतः वह राग भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो जाता है।जबतक आंशिकरूपसे उद्वेग स्पृहा राग भय और क्रोध रहते हैं तबतक वह साधक होता है। इनसे सर्वथा रहित होनेपर वह सिद्ध हो जाता है।वासना कामना आदि सभी एक रागके ही स्वरूप हैं। केवल वासनाका तारतम्य होनेसे उसके अलगअलग नाम होते हैं जैसे अन्तःकरणमें जो छिपा हुआ राग रहता है उसका नाम  वासना  है। उस वासनाका ही दूसरा नाम  आसक्ति  और प्रियता है। मेरेको वस्तु मिल जाय ऐसी जो इच्छा होती है उसका नाम  कामना  है। कामना पूरी होनेकी जो सम्भावना है उसका नाम  आशा  है। कामना पूरी होनेपर भी पदार्थोंके बढ़नेकी तथा पदार्थोंके और मिलनेकी जो इच्छा होती है उसका नाम  लोभ  है। लोभकी मात्रा अधिक बढ़ जानेका नाम  तृष्णा  है। तात्पर्य है कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंमें जो खिंचाव है श्रेष्ठ और महत्त्वबुद्धि है उसीको वासना कामना आदि नामोंसे कहते हैं। स्थितधीर्मुनिरुच्यते   ऐसे मननशील कर्मयोगीकी बुद्धि स्थिर अटल हो जाती है।  मुनि  शब्द वाणीपर लागू होता है इसलिये भगवान्ने  किं प्रभाषेत  के उत्तरमें  मुनि  शब्द कह दिया है। परन्तु वास्तवमें  मुनि  शब्द केवल वाणीपर ही अवलम्बित नहीं है। इसीलिये भगवान्ने सत्रहवें अध्यायमें  मौन  शब्दका प्रयोग मानसिक तपमें किया है वाणीके तपमें नहीं (17। 16)।कर्मयोगका प्रकरण होनेसे यहाँ मननशील कर्मयोगीको मुनि कहा गया है। मननशीलताका तात्पर्य है सावधानीका मनन जिससे कि मनमें कोई कामना आसक्ति न आ जाय। निरन्तर अनासक्त रहना ही सिद्ध कर्मयोगीकी सावधानी है क्योंकि पहले साधकअवस्थामें उसकी ऐसी सावधानी रही है (गीता 3। 19) और इसीसे वह परमात्मतत्त्वको प्राप्त हुआ है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.56।।स्थितप्रज्ञस्येति। यदा स्थास्यति बुद्धिः इत्यनेन वचसा समाधिस्थस्य योगिनो यः स्थितप्रज्ञशब्दः (स्थित and स्थिर are found often interchanged in CA.) ( N omit शब्दः) तत्र वाचक उक्तस्तस्य का भाषा किं प्रवृत्तिनिमित्तम् भाष्यते येन निमित्तेन शब्दैरर्थ इति कृत्वा। योगिनः स्थितप्रज्ञशब्दः ( N omit शब्दः) किं रूढ्या वाचकः अन्वर्थतया वा (S omits वा) इत्येकः प्रश्नः। यद्यपि रूढौ शङ्कैव नास्ति तथापि अन्वर्थतां लब्धामपि स्वरूपलक्षणनिमित्तानिरूपणेन ( N त्तरूपेण) स्फुटीकर्तुमेष (S प्रस्फुटी) प्रश्नः। स्थिरधीरिति शब्दपदार्थकः अर्थपदार्थकश्च। तत्र ( N omit च तत्र) स्थिरधीशब्दः किं प्रयोगलक्षणमेवार्थमाह आहो तपस्विनमपि इति द्वितीयः प्रश्नः। स च स्थिरधीर्योगी किमासीत किमभ्यसेत् क्वास्य स्थैर्यं स्यात् इति तृतीयः। अभ्यस्यंश्च (N अभ्यसंश्च) किमाप्नुयात् इति चतुर्थः। एतदेव प्रश्नचतुष्टयं क्रमेण निर्णीयते भगवता (S इति प्रश्नचतुष्यम् अज्ञा (र्जु) नेन कृतं क्रमेण निर्णीयते श्रीभगवता)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.56।।लक्षणभेदानुवादद्वारा विविदिषोरेव कर्तव्यान्तरमुपदिशति  किञ्चेति।  ज्वरशिरोरोगादिकृतानि दुःखान्याध्यात्मिकानि आदिशब्देनाधिभौतिकानि व्याघ्रसर्पादिप्रयुक्तान्याधिदैविकानि चातिवातवर्षादिनिमित्तानि दुःखानि गृह्यन्ते तेषूपलब्धेष्वपि नोद्विग्नं मनो यस्य स तथेति संबन्धः। नोद्विग्नमित्येतद्व्याचष्टे   न   प्रक्षुभितमिति।  दुःखानां मुक्तानां प्राप्तौ परिहाराक्षमस्य तदनुभवपरिभावितं दुःखमुद्वेगस्तेन सहितं मनो यस्य न भवति स तथेत्याह  दुःखप्राप्ताविति।  मनो यस्य नोद्विग्नमिति पूर्वेण संबन्धः। सुखान्यपि दुःखवन्त्रिविधानीति मत्वा तथेत्युक्तम् तेषु प्राप्तेषु सत्सु तेभ्यो विगता स्पृहा तृष्णा यस्य स विगतस्पृह इति योजना। अज्ञस्य हि प्राप्तानि सुखान्यनुविवर्धते तृष्णा विदुषस्तु नैवमित्यत्र वैधर्म्यदृष्टान्तमाह  नाग्निरिवेति।  यथा हि दाह्यस्येन्धनादेरभ्याधाने वह्निर्विवर्धते तथाज्ञस्य सुखान्युपनतान्यनुविवर्धमानापि तृष्णा विदुषो न तान्यनुविवर्धते नहि वह्निरदाह्यमुपगतमपि दग्धुं विवृद्धिमधिगच्छति तेन जिज्ञासुना सुखदुःखयोस्तृष्णोद्वेगौ न कर्तव्यावित्यर्थः। रागादयश्य तेन कर्तव्या न भवन्तीत्याह  वीतेति।  अनुभूताभिनिवेशे विषयेषु रञ्जनात्मकस्तृष्णाभेदो रागः परेणापकृतस्य गात्रनेत्रादिविकारकारणं भयं क्रोधस्तु परवशीकृत्यात्मानं

Chapter 2 (Part 33)

स्वपरापकारप्रवृत्तिहेतुर्बुद्धिवृत्तिविशेषः मनुते इतिं मुनिरात्मविदित्यङ्गीकृत्याह  संन्यासीति।  सुखादिविषयतृष्णादे रागादेश्चाभावावस्था तदेत्युच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.56।।ननु लक्षणस्यैवानेनैवोक्तत्वात् किं दुःखेष्वित्यादिना इत्यत आह  तदेवे ति उक्तं लक्षणमेव। स्पष्टनं च कामशब्दोपलक्षितदोषान्तरत्यागकथनादिनेति ज्ञेयम्। ननु कामत्यागादीनि ज्ञानसाधनतयोच्यन्तेअमानित्वम् 13।7 इत्यादौ। ततां ज्ञानिलक्षणस्य जिज्ञासावतिव्याप्तिरित्यत आह  एतानी ति। उप समीपे आयः फललाभो येषां तान्युपायानि साधनानि। सत्यमेतत्। तथापि जिज्ञासौ प्रयत्नसाध्यानि ज्ञानिनि तु स्वभावसिद्धानीत्यदोष इति भावः। अत्र प्रमाणमाह  तच्चोक्त मिति। समुच्चयवादी त्वाह यानीह स्थितप्रज्ञलक्षणान्युच्यन्ते तान्येवापवर्गसाधनानीतितद्वै इत्यनेन दूषयति। ज्ञानसाधनान्येव नापवर्गसाधनानि। यथोक्तम्कामकारेण चैके ब्र.सू.3।4।15 इति। आनन्दवृद्ध्यर्थता त्वङ्गीकृतैव।योगे त्विमां शृणु 2।39 इत्युक्त्वा कथमिदं योगादन्यदुच्यत इत्यतो वा इदमुदितमिति।विगतस्पृहः इत्यनेनैववीतराग इत्येतद्गतार्थमित्यत आह  शोभने ति। अक्षोभनेषु विषयेषु शोभनत्वभ्रान्तिःरसो रागो रक्तिः इत्येतैः काम उच्यते तथा शोभनाध्यास उच्यते इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.56।।तदेव स्पष्टयत्युत्तरैस्त्रिभिः श्लोकैः। एतान्येव ज्ञानोपायानि तच्चोक्तम् तद्वै जिज्ञासुभिः साध्यं ज्ञानिनां यत्तु लक्षणम् इति। शोभनाध्यासो रागः।रसो रागस्तथा रक्तिः शोभनाध्यास इष्यते इत्यभिधानम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.56।।प्रियविश्लेषादि दुःखनिमित्तेषु उपस्थितेषु  अनुद्विग्नमनाः  न दुःखी भवति  सुखेषु विगतस्पृहः  प्रियेषु सन्निहितेषु अपि निःस्पृहः  वीतरागभयक्रोधः  अनागतेषु स्पृहा  रागस्तद्रवितः  प्रियविश्लेषाप्रियागमनहेतुदर्शननिमित्तिं दुःखं भयम् तद्रहितः प्रियविश्लेषाप्रियागमनहेतुभूतचेतनान्तरगतो दुःखहेतुः स्वमनोविकारः क्रोधः तद्रहितः एवंभूतो  मुनिः  आत्ममननशीलः  स्थितधीः  इति  उच्यते।ततः अर्वाचीनदशा प्रोच्यते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.56।।  दुःखेषु  आध्यात्मिकादिषु प्राप्तेषु न उद्विग्नं न प्रक्षुभितं दुःखप्राप्तौ मनो यस्य सोऽयम्  अनुद्विग्नमनाः।  तथा  सुखेषु  प्राप्तेषु विगता स्पृहा तृष्णा यस्य न अग्निरिव इन्धनाद्याधाने सुखान्यनु विवर्धते स  विगतस्पृहः। वीतरागभयक्रोधः  रागश्च भयं च क्रोधश्च वीता विगता यस्मात् स वीतरागभयक्रोधः।  स्थितधीः  स्थितप्रज्ञो  मुनिः  संन्यासी तदा  उच्यते।।किञ्च

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【 Verse 2.57 】

▸ Sanskrit Sloka: य: सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् | नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||

▸ Transliteration: yaḥ sarvatrānabhisnehas tat tat prāpya śubhāśubham | nābhinandati na dveṣṭi tasya prajñā pratiṣṭhitā ||

▸ Glossary: yaḥ: one who; sarvatra: everywhere; anabhisnehaḥ: without affection; tat: that; tat: that; prāpya: after achieving; śubhāśubhaṁ: good evil; na: not; abhinandati: rejoices; na: not; dveṣṭi: resents; tasya: his; prajñā: knowledge; pratiṣṭhitā: fixed

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.57 His wisdom is fixed who is everywhere without attach- ment, meeting with anything good or bad and who neither rejoices nor hates.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.57।।सब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य उसउस शुभअशुभको प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.57।। जो सर्वत्र अति स्नेह से रहित हुआ उन शुभ तथा अशुभ वस्तुओं को प्राप्त कर न प्रसन्न होता है और न द्वेष करता है? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित (स्थिर) है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.57 यः he who? सर्वत्र everywhere? अनभिस्नेहः without attachment? तत् that? तत् that? प्राप्य having obtained? शुभाशुभम् good and evil? न not? अभिनन्दति rejoices? न not? द्वेष्टि hates? तस्य of him? प्रज्ञा wisdom? प्रतिष्ठिता is fixed.Commentary The sage possesses poised understanding or evenness of mind. He does not rejoice in pleasure nor is he averse to pain that may befall him. He is ite indifferent as he is rooted in the Self. He has no attachment even for his life or body as he identifies himself with Brahman or the Supreme Self. He will not praise anybody when the latter does any good to him nor censure anyone when one does him any harm. This is the answer given by the Lord to Arjunas ery How does a sage of steady wisdom talk

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.57. He, who has no desire in anything; and who neither rejoices nor hates on getting this or that, good or bad-his intellect is properly stabilized.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.57 He who wherever he goes is attached to no person and to no place by ties of flesh; who accepts good and evil alike, neither welcoming the one nor shrinking from the other - take him to be one who is merged in the Infinite.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.57 He who has no love on any side, who when he finds good or evil, neither rejoices nor hates - his wisdom is firmly set.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.57 The wisdom of that person remains established who has not attachment for anything anywhere, who neither welcomes nor rejects anything whatever good or bad when he comes across it.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.57 He who is everywhere without attachment, on meeting with anything good or bad, who neither rejoices not hastes, his wisdom is fixed.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.57 Yah sarvatra etc. There is no joy or sorrow in him while meeting the good or the bad.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.57 He, who, has no love for all pleasing objects, i.e., who is indifferent to them, and who does not feel attraction or repulsion when he is united with or separated from attractive or repulsive objects respectively, who neither rejoices at the former, nor hates the latter - he also is of firm wisdom.

Sri Krsna now mentions the next lower state.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.57 Further, prajna, the wisdom; tasya, of that person, fo that sannyasin; pratisthita, remains established; yah, who; anabhi-snehah, has no attachment for; sarvatra, anything anywhere, even for body, life, etc.; who na abhinanadati, neither welcomes; na dvesti, nor rejects; tat tat, anything whatever; subha-asubham, good or bad; propya, when he comes across it, i.e. who does not rejoice on meeting with the good, nor reject the bad on meeting with it. Of such a person, who is thus free from elation or dejection, the wisdom arising from discrimination remains established.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.57।। स्फूर्ति और प्रेरणा से भरा एक कुशल चित्रकार अपनी कल्पनाओं को विभिन्न रंगों के माध्यम से एक फलक पर व्यक्त करते समय बारम्बार अपने स्थान से पीछे हट कर चित्र को देखता है और प्रत्येक बार अत्यन्त प्रेम से अपनी तूलिका से चित्र का सौन्दर्य वर्धन करता है। यहाँ भगवान् श्री कृष्ण ज्ञानी पुरुष के चित्र को अर्जुन के हृदय पटल पर चित्रित करते हुये चुने हुये शब्दों में ज्ञानी के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर और अधिक प्रकाश डालते हैं।यहाँ स्थितप्रज्ञ पुरुष की अनासक्ति का वर्णन है। इस श्लोक को भी प्रकरण के सन्दर्भ में उचित प्रकार से समझना चाहिये अन्यथा कोई भी उसका विपरीत अर्थ कर सकता है। जीवन से अनासक्ति मात्र विवेक का लक्षण नहीं हो सकता। अनेक मूढ़ उत्साही लोग जीवन में अपने कर्तव्यों को त्यागकर जंगलों में इस आशा से पलायन कर जाते हैं कि इस प्रकार के वैराग्य से उन्हें लक्ष्य की प्राप्ति हो जायेगी। अर्जुन भी पहले यही करना चाहता था। अर्जुन को इस अनर्थकारी निर्णय से विरत करने के लिये ही भगवान् ने उसे उपदेश देना प्रारम्भ किया।विषयों के साथ आत्मघातक संग और मूढ़ आसक्ति से स्वयं को इस प्रकार दूर कर लेने मात्र से ही उच्च दिव्य लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती। बाह्य विषयों से वैराग्य होने के साथसाथ सभी परिस्थितियों का सामना करने के लिए मन के आन्तरिक सन्तुलन की भी आवश्यकता होती है। शुभ प्राप्ति में हर्षातिरेक का और अशुभ प्राप्ति में द्वेष और विषाद का अभाव ये आत्मज्ञानी के लक्षण हैं।अनासक्ति अपने आप में श्रेष्ठ जीवन का मार्ग नहीं है क्योंकि वह तो जीवन से निरन्तर पलायन ही समझा जायेगा। उसी प्रकार जगत् में आसक्त होना परवशता का लक्षण है। ज्ञानी पुरुष में ये दोनों ही बातें नहीं होतीं वह तो जीवन में आने वाली सभी परिस्थितियों में समान भाव से रहता है। शीत ऋतु में घर के बाहर सूर्य की धूप सेंकना जहाँ आनन्द है वहीं उसकी चमक कष्ट का कारण भी है। सूर्य की चमक के प्रति असन्तोष प्रकट करना धूप के आनन्द को नष्ट करना है। बुद्धिमान पुरुष या तो उस चमक की ओर ध्यान नहीं देता अथवा चमक से अपने को सुरक्षित रखते हुये धूप का आनन्द उठाता है।हमारा जीवन भी शुभअशुभ का मिश्रण है। यह तो उसका स्वभाव ही है। अत सदैव अशुभ के प्रति असंतोष व्यक्त करते हुये उससे पलायन और शुभ की स्पृहा लगी रहना अविवेक के कारण ही सम्भव है। ज्ञानी पुरुष अपने नित्य स्वरूप में स्थित होने के कारण जीवन की उत्कृष्ट एवं निकृष्ट परिस्थितियों में पूर्ण वैराग्य के साथ रहता है।अर्जुन का प्रश्न था कि स्थित प्रज्ञ किस प्रकार बोलता है यह श्लोक उसके उत्तर स्वरूप है। शुभअशुभ हर्ष और विषाद के द्वन्द्वों से सर्वथा मुक्त ज्ञानी पुरुष के लिये सब सुन्दर ही है। अपनी कल्पनाओं का आरोप किये बिना वस्तुएँ जैसी हैं वह उनका वैसा ही अवलोकन करता है। ऐसा स्थितप्रज्ञ पुरुष पाश्चात्य मनोविज्ञान द्वारा ज्ञात व्यवहार के सभी नियमों से परे है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.57।।   द्वितीयप्रश्नस्योत्तरमाह  य इति।  यो मुनिः सर्वत्र देहजीवनादिष्वपि स्नेहवर्जितः तत्तत्प्राप्य शुभाशुभं शुभं लब्धवा नाभिनन्दति हर्षगर्भितं स्तुतिवचनं नाभिभाषते तथाऽशुभं लब्ध्वा न द्वेष्टि। द्वेषगर्भितं निन्दावाक्यं न वक्तीत्यर्थः। तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.57।।किंच यः सर्वत्रेति। सर्वदेहेषु जीवनादिष्वपि यो मुनिरनभिस्नेहः यस्मिन्सत्यन्यदीये हानिवृद्धी स्वस्मिन्नारोप्येते स तादृशोऽन्यविषयः प्रेमापरपर्यायस्तामसो वृत्तिविशेषः स्नेहः सर्वप्रकारेण तद्रहितोऽनभिस्नेहः भगवति परमात्मनि तु सर्वथाभिस्नेहवान्भवेदेव अनात्मस्नेहाभावस्य तदर्थत्वादिति द्रष्टव्यम्। तत्तत्प्रारब्धकर्मपरिप्रापितं शुभं सुखहेतुं विषयं प्राप्य नाभिनन्दति हर्षविशेषपुरःसरं न प्रशंसति। अशुभं दुःखहेतुं विषयं प्राप्य न द्वेष्टि अन्तरसूयापूर्वकं न निन्दति। अज्ञस्य हि सुखहेतुर्यः स्वकलत्रादिः स शुभो विषयस्तद्गुणकथनादिप्रवर्तिका धीवृत्तिर्भ्रान्तिरूपाभिनन्दः सच तामसः। तद्गुणकथनादेः परप्ररोचनार्थत्वाभावेन व्यर्थत्वात्। एवमसूयोत्पादनेन दुःखहेतुः परकीयविद्याप्रकर्षादिरेनं प्रत्यशुभो विषयस्तन्निन्दादिप्रवर्तिका भ्रान्तिरूपा धीवृत्तिर्द्वेषः। सोऽपि तामसः। तन्निन्दाया निवारणार्थत्वाभावेन व्यर्थत्वात् तावभिनन्दद्वेषौ भ्रान्तिरूपौ तामसौ कथमभ्रान्ते शुद्धसत्वे स्थितप्रज्ञे संभवेताम्। तस्माद्विचालकाभावात् तस्यानभिस्नेहस्य हर्षविषादरहितस्य मुनेः प्रज्ञा परमात्मतत्त्वविषया प्रतिष्ठिता फलपर्यवसायिनी। स स्थितप्रज्ञ इत्यर्थः। एवमन्योऽपि मुमुक्षुः सर्वत्रानभिस्नेहो भवेत्। शुभं प्राप्य न प्रशंसेत् अशुभं प्राप्य न निन्देदित्यभिप्रायः। अत्र च निन्दाप्रशंसादिरूपा वाचो न प्रभाषेत इति व्यतिरेक उक्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.57।।स्थितधीः किं प्रभाषेतेत्यस्योत्तरमाह  यः सर्वत्रेति।  सर्वेषु धनदारदेहजीवनादिषु अभिस्नेहः। अभिस्नेहवान्हि धनदारादिषु विकलेषु सकलेषु वाऽहमेव विकलः सकलोऽस्मीति दैन्यदर्पोपेतः पूर्वापरानुसंधानरहितो जल्पति अयं तु न तथेति भावः। तथा शुभं प्राप्य नाभिनन्दति संतुष्टो भूत्वा शुभप्रापयितारं न प्रशंसति। तथा अशुभं प्राप्य न द्वेष्टि दुःखी भूत्वा अशुभप्रापयितारं न निन्दति यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.57।।कथं भाषेत इत्यस्योत्तरमाह यः सर्वत्रेति। यः सर्वत्र संसारे अनभिस्नेहः स्नेहरहितस्तत्तच्छुभमशुभं च प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि शुभं लौकिकानुकूलं प्राप्य न प्रशंसति अशुभं तत्प्रतिकूलमवाप्य न द्वेष्टि न विपरीतं वदति तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता सर्वोत्तमेत्यर्थः।अयमर्थः यः सुहृदामनुकूलतयाऽभिनन्दनं करोति तस्य सर्वत्र भगवदीयत्वे वैषम्यं स्यात्। प्रतिकूलकर्तृषु तद्धर्मस्फूर्त्या तं निन्दति भगवत्कृतिर्विस्मृता स्यात्। अतः सर्वत्र भगवन्मयत्वं ज्ञात्वा शुभाशुभविवेकरहितः शुभमेव भाषते स उत्तम इत्यर्थ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.57।।कथं भाषेतेत्यस्योत्तरमाह  य इति।  यः सर्वत्र पुत्रादिष्वप्यनभिस्नेहः स्नेहशून्यः अतएव बाधितानुवृत्त्या तत्तच्छुभमनुकूलं प्राप्य नाभिनन्दति न प्रशंसति। अशुभं प्रतिकूलं प्राप्य न द्वेष्टि न निन्दति किंतु केवलमुदासीन एव भाषते तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठितेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.57।।किं प्रभोषेत इत्यस्योत्तरमाह यः सर्वत्रेति। इहामुत्र विरागवान् नाभिनन्दति। न द्वेष्टीति रागद्वेषवचनं न भाषत इत्यर्थः। तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिताऽवसेया।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.57।।तथा जो मुनि सर्वत्र अर्थात् शरीर जीवन आदितकमें भी स्नेहसे रहित हो चुका है तथा उनउन शुभ या अशुभको पाकर न प्रसन्न होता है और न द्वेष ही करता है अर्थात् शुभको पाकर प्रसन्न नहीं होता और अशुभको पाकर उसमें द्वेष नहीं करता। जो इस प्रकार हर्ष विषादसे रहित हो चुका है उसकी विवेकजनित बुद्धि प्रतिष्ठित होती है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.57।। व्याख्या   पूर्वश्लोकमें तो भगवान्ने कर्तव्यकर्म करते हुए निर्विकार रहनेकी बात बतायी। अब इस श्लोकमें कर्मोंके अनुसार प्राप्त होनेवाली अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंमें सम निर्विकार रहनेकी बात बताते हैं। यः सर्वत्रानभिस्नेहः  जो सब जगह स्नेहरहित है अर्थात् जिसकी अपने कहलानेवाले शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि एवं स्त्री पुत्र घर धन आदि किसीमें भी आसक्ति लगाव नहीं रहा है।वस्तु आदिके बने रहनेसे मैं बना रहा और उनके बिगड़ जानेसे मैं बिगड़ गया धनके आनेसे मैं बड़ा हो गया और धनके चले जानेसे मैं मारा गया यह जो वस्तु आदिमें एकात्मताकी तरह स्नेह है उसका नाम अभिस्नेह है। स्थितप्रज्ञ कर्मयोगीका किसी भी वस्तु आदिमें यह अभिस्नेह बिलकुल नहीं रहता। बाहरसे वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदिका संयोग रहते हुए भी वह भीतरसे सर्वथा निर्लिप्त रहता है। तत्तत्प्राप्य शुभाशुभं नाभिनन्दति न द्वेष्टि  जब उस मनुष्यके सामने प्रारब्धवशात् शुभअशुभ शोभनीयअशोभनीय अच्छीमन्दी अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति आती है तब वह अनुकूल परिस्थितिको लेकर अभिनन्दित नहीं होता और प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर द्वेष नहीं करता।अनुकूल परिस्थितिको लेकर मनमें जो प्रसन्नता आती है और वाणीसे भी प्रसन्नता प्रकट की जाती है तथा बाहरसे भी उत्सव मनाया जाता है यह उस परिस्थितिका अभिनन्दन करना है। ऐसे ही प्रतिकूल परिस्थितिको लेकर मनमें जो दुःख होता है खिन्नता होती है कि यह कैसे और क्यों हो गया यह नहीं होता तो अच्छा था अब यह जल्दी मिट जाय तो ठीक है यह उस परिस्थितिसे द्वेष करना है। सर्वत्र स्नेहरहित निर्लिप्त हुआ मनुष्य अनुकूलताको लेकर अभिनन्दन नहीं करता और प्रतिकूलताको लेकर द्वेष नहीं करता। तात्पर्य है कि उसको अनुकूलप्रतिकूल अच्छेमन्दे अवसर प्राप्त होते रहते हैं पर उसके भीतर सदा निर्लिप्तता बनी रहती है। तत् तत्  कहनेका तात्पर्य है कि जिनजिन अनुकूल और प्रतिकूल वस्तु व्यक्ति घटना परिस्थिति आदिसे विकार होनेकी सम्भावना रहती है और साधारण लोगोंमें विकार होते हैं उनउन अनुकूलप्रतिकूल वस्तु आदिके कहीं भी कभी भी और कैसे भी प्राप्त होनेपर उसको अभिनन्दन और द्वेष नहीं होता। तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता   उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है एकरस और एकरूप है। साधनावस्थामें उसकी जो व्यवसायात्मिका बुद्धि थी वह अब परमात्मामें अचलअटल हो गयी है। उसकी बुद्धिमें यह विवेक पूर्णरूपसे जाग्रत् हो गया है कि संसारमें अच्छेमन्देके साथ वास्तवमें मेरा कोई भी सम्बन्ध नहीं है। कारण कि ये अच्छेमन्दे अवसर तो बदलनेवाले हैं पर मेरा स्वरूप न बदलनेवाला है अतः बदलनेवालेके साथ न बदलनेवालेका सम्बन्ध कैसे हो सकता हैवास्तवमें देखा जाय तो फरक न तो स्वरूपमें पड़ता है और न शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिमें। कारण कि अपना जो स्वरूप है उसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी कोई परिवर्तन नहीं होता और प्रकृति तथा प्रकृतिके कार्य शरीरादि स्वाभाविक ही बदलते रहते हैं। तो फरक कहाँ पड़ता है शरीरसे तादात्म्य होनेके कारण बुद्धिमें फरक पड़ता है। जब यह तादात्म्य मिट जाता है तब बुद्धिमें जो फरक पड़ता था वह मिट जाता है और बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।दूसरा भाव यह है कि किसीकी बुद्धि कितनी ही तेज क्यों न हो और वह अपनी बुद्धिसे परमात्माके विषयमें कितना ही विचार क्यों न करता हो पर वह परमात्माको अपनी बुद्धिके अन्तर्गत नहीं ला सकता। कारण कि बुद्धि सीमित है और परमात्मा असीमअनन्त हैं। परन्तु उस असीम परमात्मामें जब बुद्धि लीन हो जाती है तब उस सीमित बुद्धिमें परमात्माके सिवाय दूसरी कोई सत्ता ही नहीं रहती यही बुद्धिका परमात्मामें प्रतिष्ठित होना है।कर्मयोगी क्रियाशील होता है। अतः भगवान्ने छप्पनवें श्लोकमें क्रियाकी सिद्धिअसिद्धिमें अस्पृहा और उद्वेगरहित होनेकी बात कही तथा इस श्लोकमें प्रारब्धके अनुसार अपनेआप अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिके प्राप्त होनेपर अभिनन्दन और द्वेषसे रहित होनेकी बात कहते हैं। सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके श्लोकसे स्थितप्रज्ञ कैसे बैठता है इस तीसरे प्रश्नका उत्तर आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.57।।प्रजहातीति। स्थिता रूढा प्रज्ञा यस्य। रूढिश्च नित्यमात्मरूढित्वे सति विषयविक्षेपकृतस्य कामरूपस्य (N omits कामरूपस्य) भ्रमस्य निवृत्तत्वात् योगिनो यः स्थितप्रज्ञशब्दः अन्वर्थः स च इत्थं (N omits इत्थं) युक्तः इत्येकः प्रश्नो निर्णीतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.57।।लक्षणभेदानुवादद्वारा विविदिषोरेव कर्तव्यान्तरमुपदिशति  किञ्चेति।  विवेकवतो विदुषो विवेकजन्या प्रज्ञा कथं प्रतिष्ठां प्रतिपद्यतामित्याशङ्क्याह  यः सर्वत्रेति।  ननु देहजीवनादौ स्पृहा शुभाशुभप्राप्तौ हर्षविषादौ विदुषो विविदिषोश्चावर्जनीयाविति प्रज्ञास्थैर्यासिद्धिस्तत्राह  यो मुनिरिति।  तत्तदिति शोभनवत्त्वेनाशोभनवत्त्वेन वा प्रसिद्धत्वं प्रतिनिर्दिश्यते। तदेव विभजते  शुभमिति।  विषयेष्वभिषङ्गाभावः शुभादिप्राप्तौ हर्षाद्यभावश्च प्रज्ञास्थैर्ये कारणमित्याह  तस्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.57।।वीतरागभयक्रोधः 2।56 इत्युक्तत्वान्न द्वेष्टीति पुनरुक्तिरित्यत आह   सर्वत्रे ति। सकारणकद्वेषवर्जितत्वमत्रोच्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.57 2.58।।सर्वत्रानभिस्नेहत्वाच्छुभाशुभं प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.57।। यः सर्वत्र  प्रियेषु  अनभिस्नेहः  उदासीनः प्रियसंश्लेषविश्लेषरूपं  शुभाशुभं प्राप्य  अभिनन्दनद्वेषरहितः सोऽपि स्थितप्रज्ञः।ततः अर्वाचीनदशा प्रोच्यते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.57।।  यः  मुनिः  सर्वत्र  देहजीवितादिष्वपि  अनभिस्नेहः  अभिस्नेहवर्जितः  तत्तत् प्राप्य शुभाशुभं  तत्तत् शुभं अशुभं वा लब्ध्वा  न अभिनन्दति न द्वेष्टि  शुभं प्राप्य न तुष्यति न हृष्यति अशुभं च प्राप्य न द्वेष्टि इत्यर्थः।  तस्य  एवं हर्षविषादवर्जितस्य विवेकजा  प्रज्ञा प्रतिष्ठिता  भवति।।किञ्च

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【 Verse 2.58 】

▸ Sanskrit Sloka: यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वश: | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||

▸ Transliteration: yadā saṁharate cāyaṁ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhit ||

▸ Glossary: yadā: when; saṁharate: withdraws; ca: also; ayaṁ: this; kūrmaḥ: tortoise; aṅgānī: limbs; iva: like; sarvaśaḥ : altogether; indriyāṇi : senses; indri- yārthebhyaḥ: from the sense objects; tasya: his; prajñā: consciousness; pratiṣṭhitā: fixed

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.58 As the tortoise withdraws its limbs from all sides, when a person withdraws his senses from the sense-objects, his wisdom becomes steady in completion.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.58।।जिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.58।। कछुवा अपने अंगों को जैसे समेट लेता है वैसे ही यह पुरुष जब सब ओर से अपनी इन्द्रियों को इन्द्रियों के विषयों से परावृत्त कर लेता है? तब उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.58 यदा when? संहरते withdraws? च and? अयम् this (Yogi)? कूर्मः tortoise? अङ्गानि limbs? इव like? सर्वशः everywhere? इन्द्रियाणि the senses? इन्द्रियार्थेभ्यः from the senseobjects? तस्य of him? प्रज्ञा wisdom प्रतिष्ठिता is steadied.Commentary Withdrawal of the senses is Pratyahara or abstraction. The mind has a natural,tendency to run towards external objects. The Yogi again and again withdraws the mind from the objects of the senses and fixes it on the Self. A Yogi who is endowed with the power of Pratyahara can enter into Samadhi even in a crowded place by withdrawing his senses within the twinkling of an eye. He is not disturbed by tumultuous sounds and noises of any description. Even on the battlefield he can rest in his centre? the Self? by withdrawing his senses. He who practises Pratyahara is dead to the world. He will not be affected by the outside vibrations. At any time by mere willing he can bring his senses under his perfect control. They are his obedient servants or instruments.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.58. When he withdraws all his sense-organs from sense-objects, just as a tortoise does all of its own limbs, then he is declared to be a man-of-stabilized-intellect.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.58 He who can withdraw his senses from the attraction of their objects, as the tortoise draws his limbs within its shell - take it that such a one has attained Perfection.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.58 When one is able to draw his senses from the objects of sense on every side, as a tortoise draws in its limbs, then his wisdom is firmly set.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.58 And when this one fully withdraws the senses from the objects of the senses, as a tortoise wholly (withdraws) the limbs, then his wisdom remains established.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.58 When, like the tortoise which withdraws on all sides its limbs, he withdraws his senses from the sense-objects, then his wisdom becomes steady.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.58 Yada samharate etc. the nomenclature is not an expression having a composite of both the forces of etymological and traditional meanings, like the word pankaja 'a lotus'. But it has only the etymological force like the word pacaka 'a cook'. Whenever he (the sage) withdraws just in his own self-just as a tortoise keeps its limbs in its bossom-from the sense-objects i.e., warding off from the sense-objects, then and then [only] he is man-of-stabilized-intellect.

Or [the passage may mean :] Whenever he withdraws, within his own Self, [all], beginning from the sense-objects upto sense-organs i.e., when he approprites in his own Self all in the form of sense-objects and sense-organs. But, how is it that the nomenclature 'a man-of-stabilized-intellect' does not hold good in the case of an ascetic ? It is answered-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.58 When one is able to draw the senses away from the sense-objects on every side when the senses try to contact the sense-objects, just as a tortoise draws in its limbs, and is capable of fixing his mind on the self - he too is of firm wisdom. Thus there are four stages of devotion to knowledge, each stage being perfected through the succeeding stage.

Now Sri Krsna speaks of the difficulty of the attainment of firm devotion to knowledge and the means of that attainment.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.58 And besides, yada, when; ayam, this one, the sannyasin practising steadfastness in Knowledge; samharate, fully withdraws; ['Fully' suggests absolute firmness in withdrawal, and 'withdraws' suggests full control over the organs] indriyani, the senses; indriya-arthhyah, from all the objects of the senses; iva, as; kurmah, a tortoise; sarvasah, wholly (withdraws); angani, its limbs, from all sides out of fear; when the man engaged in steadfastness to Knowledge withdraws thus, then tasya, his; prajna, wisdom; pratisthita, remains established (the meaning of this portion has already been explained). As to that, [That is , so far as the phenomenal world is concerned.] the organs of a sick person, too, cease to be active when the refrains from sense-objects; they get fully withdrawn like the limbs of a tortoise. but not so the hankering for those objects. How that (hankering) gets completely withdrawn is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.58।। ज्ञानी पुरुष के आत्मानन्द समत्व और अनासक्त भाव का वर्णन करने के पश्चात् इस श्लोक में इन्द्रियों पर उसके पूर्ण संयम का वर्णन किया गया है। अत्यन्त उपयुक्त उपमा के द्वारा उसके लक्षण को यहाँ स्पष्ट किया गया है। जैसे कछुवा किसी प्रकार के संकट का आभास पाकर अपने अंगों को समेट कर स्वयं को सुरक्षित कर लेता है वैसे ही ज्ञानी पुरुष में यह क्षमता होती है कि वह अपनी इच्छा से इन्द्रियों को विषयों से परावृत्त तथा उनमें प्रवृत्त भी कर सकता है।वेदान्त के प्रत्यक्ष ज्ञान की प्रक्रिया के अनुसार अन्तकरण की चैतन्य युक्त वृत्ति इन्द्रियों के माध्यम से बाह्य देश स्थित विषय का आकार ग्रहण करती हैं और तब उस विषय का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। इस प्रक्रिया को कठोपनिषद् में इस प्रकार कहा गया है कि मानों चैतन्य का प्रकाश मस्तकस्थ सात छिद्रों (दो नेत्र दो कान दो नासिका छिद्र और मुख) के द्वारा बाहर किरण रूप में निकलकर वस्तुओं को प्रकाशित करता है। इस प्रकार एक विशेष इन्द्रिय द्वारा एक विशिष्ट वस्तु प्रकाशित होती है जैसे आँख से रूप रंग और कान से शब्द। भौतिक जगत् में हम विद्युत का उदाहरण ले सकते हैं जो सामान्य बल्ब में प्रकाश के रूप में व्यक्त होकर वस्तुओं को प्रकाशित करती है और वही विद्युत क्षकिरण नलिका से गुजर कर स्थूल शरीर को भेदकर आंतरिक अंगों को भी प्रकाशित कर सकती है जो सामान्यत प्रत्यक्ष नहीं होते।इस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति पाँच ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से सम्पूर्ण बाह्य जगत् का ज्ञान प्राप्त करता है। इन्द्रियों द्वारा निरन्तर प्राप्त होने वाली विषय संवेदनाओं के कारण मन में अनेक विक्षेप उठते रहते हैं। नेत्रों के अभाव में रूप से उत्पन्न विक्षेप नहीं होते और बधिर पुरुष को अपनी आलोचना सुनाई नहीं पड़ती जिससे कि उस के मन में क्षोभ हो यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है। भगवान् कहते हैं कि ज्ञानी पुरुष में यह क्षमता होती है कि वह स्वेचछा से इन्द्रियों को विषयों से परावृत्त कर सकता है।इन्द्रिय संयम की इस क्षमता को योगशास्त्र में प्रत्याहार कहते हैं जिसे योगी प्राणायाम की सहायता से प्राप्त करता है। ईश्वर की रूप माधुरी में प्रीति होने के कारण भक्त के मन में विषयजन्य विक्षेपों का अभाव स्वाभाविक रूप से ही होता है वेदान्त में इसे उपरति कहते हैं जिसे जिज्ञासु साधक अपने विवेक के बल पर विषयों की परिच्छिन्नता और व्यर्थता एवं आत्मा के आनन्दस्वरूप को समझकर प्राप्त करता है।रोग अथवा किसी अन्य कारण से विषयोपभोग न करने वाले पुरुष से विषय तो दूर हो जाते हैं परन्तु उनका स्वाद नहीं। इस स्वाद की भी निवृत्ति किस प्रकार हो सकती है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.58।।   विचारादिनेन्द्रियनिग्रहार्थं स्थितप्रज्ञस्योपवेशनमिति तृतीयप्रश्नस्योत्तरं वक्तुं जितेन्द्रियत्वम्। तस्य लक्षणमाह  यदेति।  यथा कूर्मः कमठो भयादङ्गन्युपसंहरति तथा यदा ज्ञाननिष्ठो यतिः शब्दादिविषयेभ्यः इन्द्रियाण्युपसंहरति तदा तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.58।।इदानीं किमासीतेति प्रश्नस्योत्तरं वक्तुमारभते भगवान् षड्भिः श्लोकैः तत्र च प्रारब्धकर्मवशाद्व्युत्थानेन विक्षिप्तानीन्द्रियाणि पुनरुपसंहृत्य समाध्यर्थमेव स्थितप्रज्ञस्योपवेशनमिति दर्शयितुमाह अहं व्युत्थितः सर्वशः सर्वाणीन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः शब्दादिंभ्यः सर्वेभ्यः। च पुनरर्थे। यदा संहरते पुनरुपसंहरति संकोचयति। तत्र दृष्टान्तः कूर्मोऽङ्गानीव तदा तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठितेति स्पष्टम्। पूर्वश्लोकाभ्यां व्युत्थानदशायामपि सकलताभसवृत्त्यभाव उक्तः अधुना तु पुनः समाध्यवस्थायां सकलवृत्त्यभाव इति विशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.58।।किमासीतेत्यस्योत्तरमाह  यदेति।  इन्द्रियार्थेभ्यः शब्दादिविषयेभ्यः प्रारब्धकर्मवशेन व्युत्थितोऽपि योगी द्वैतदर्शनादुद्विग्नः सन् निरोधसंस्कारप्राबल्यात्प्रीत्या समाधिमनुतिष्ठन्नेवास्ते इत्यर्थः। शेषं स्पष्टम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.58।।कथं तिष्ठेत् इत्यत्रोत्तरमाह यदा संहरत इति। यदा अयं सर्वशः सर्वत्र इन्द्रियार्थेभ्य इन्द्रियभोग्येभ्य इन्द्रियाणि संहरते तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः। अत्र दृष्टान्तमाह कूर्मोऽङ्गानीवेति। यथा कूर्मः करचरणाद्यङ्गानि स्वभावादपकर्षति। कूर्मदृष्टान्तेन भोग्यदर्शनात् स्वत एवेन्द्रियनिवृत्तिः स्वभावतः स्यात् तथा संहरणं कर्त्तव्यं नित्यमिन्द्रियनियमं कु र्वं৷৷৷৷৷৷৷৷ स्तिष्ठेदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.58।।किंच  यदेति।  यदा चायं योगी इन्द्रियार्थेभ्यः सकाशादिन्द्रियाणि संहरते प्रत्याहरति। अनायासेन संहारे दृष्टान्तः। अङ्गानि करचरणादीनि कूर्मो यथा स्वभावेनैवाकर्षति तद्वत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.58।।किमासीत इत्यस्योत्तरमाह चतुर्भिः। यदेति विषयेभ्य इन्द्रियाणि संहरते प्रत्याहृत्यास्ते। अनायासेनैकत्र संहारे दृष्टान्तः अङ्गानि करचरणादिनि यथा स्वभावतः कूर्मः संहरते तद्वत्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.58।।तथा जब यह ज्ञाननिष्ठामें स्थित हुआ संन्यासी कछुएके अङ्गोंकी भाँति अर्थात् जैसे कछुआ भयके कारण सब ओरसे अपने अङ्गोंको संकुचित कर लेता है उसी तरह सम्पूर्ण विषयोंसे सब ओरसे इन्द्रियोंको खींच लेता है भलीभाँति रोक लेता है तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित होती है। इस वाक्यका अर्थ पहले कहा हुआ है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.58।। व्याख्या    यदा संहरते ৷৷. प्रज्ञा प्रतिष्ठिता   यहाँ कछुएका दृष्टान्त देनेका तात्पर्य है कि जैसे कछुआ चलता है तो उसके छः अङ्ग दीखते हैं चार पैर एक पूँछ और एक मस्तक। परन्तु जब वह अपने अङ्गोंको छिपा लेता है तब केवल उसकी पीठ ही दिखायी देती है। ऐसे ही स्थितप्रज्ञ पाँच इन्द्रियाँ और एक मन इन छहोंको अपनेअपने विषयसे हटा लेता है। अगर उसका इन्द्रियों आदिके साथ किञ्चिन्मात्र भी मानसिक सम्बन्ध बना रहता है तो वह स्थितप्रज्ञ नहीं होता।यहाँ  संहरते  क्रिया देनेका मतलब यह हुआ कि वह स्थितप्रज्ञ विषयोंसे इन्द्रियोंका उपसंहार कर लेता है अर्थात वह मनसे भी विषयोंका चिन्तन नहीं करता।इस श्लोकमें  यदा  पद तो दिया है पर  तदा  पद नहीं दिया है। यद्यपि  यत्तदोर्नित्यसम्बन्धः  के अनुसार जहाँ  यदा  आता है वहाँ  तदा  का अध्याहार लिया जाता है अर्थात्  यदा  पदके अन्तर्गत ही  तदा  पद आ जाता है तथापि यहाँ  तदा  पदका प्रयोग न करनेका एक गहरा तात्पर्य है कि इन्द्रियोंके अपनेअपने विषयोंसे सर्वथा हट जानेसे स्वतःसिद्ध तत्त्वका जो अनुभव होता है वह कालके अधीन कालकी सीमामें नहीं है। कारण कि वह अनुभव किसी क्रिया अथवा त्यागका फल नहीं है। वह अनुभव उत्पन्न होनेवाली वस्तु नहीं है। अतः यहाँ कालवाचक  तदा  पद देनेकी जरूरत नहीं है। इसकी जरूरत तो वहाँ होती है जहाँ कोई वस्तु किसी वस्तुके अधीन होती है। जैसे आकाशमें सूर्य रहनेपर भी आँखें बंद कर लेनेसे सूर्य नहीं दीखता और आँखें खोलते ही सूर्य दीख जाता है तो यहाँ सूर्य और आँखोंमें कार्यकारणका सम्बन्ध नहीं है अर्थात् आँखें खुलनेसे सूर्य पैदा नहीं हुआ है। सूर्य तो पहलसे ज्योंकात्यों ही है। आँखे बंद करनेसे पहले भी सूर्य वैसा ही है और आँखें बंद करनेपर भी सूर्य वैसा ही है। केवल आँखें बंद करनेसे हमें उसका अनुभव नहीं हुआ था। ऐसे ही यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेसे स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका जो अनुभव हुआ है वह अनुभव मनसहित इन्द्रियोंका विषय नहीं है। तात्पर्य है कि वह स्वतः सिद्ध तत्त्व भोगों(विषयों) के साथ सम्बन्ध रखते हुए और भोगोंको भोगते हुए भी वैसा ही है। परन्तु भोगोंके साथ सम्बन्धरूप परदा रहनसे उसका अनुभव नहीं होता और यह परदा हटते ही उसका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   केवल इन्द्रियोंका विषयोंसे हट जाना ही स्थितप्रज्ञका लक्षण नहीं है इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.58।।दुःखेष्विति। सुखदुःखयोर्यस्य रागद्वेषरहिता (S विरहिता) वृत्तिः स मुनिरेव स्थितप्रज्ञः नान्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.58।।जिज्ञासोरेव कर्तव्यान्तरं सूचयति  किञ्चेति।  इन्द्रियाणां विषयेभ्यो वैमुख्यस्य प्रज्ञास्थैर्ये कारणत्वादादौ जिज्ञासुना तदनुष्ठेयमित्याह  यदेति।  मुमुक्षुणा मोक्षहेतुं प्रज्ञां प्रार्थयमानेन सर्वेभ्यो विषयेभ्यः सर्वाणीन्द्रियाणि विमुखानि कर्तव्यानीति श्लोकव्याख्यानेन कथयति  यदेत्यादिना।  उपसंहारः स्ववशत्वापादनं तस्य च सम्यक्त्वमतिदृढत्वम्। अयमिति प्रकृतस्थितप्रज्ञग्रहणं व्यावर्तयति  ज्ञाननिष्ठायामिति।  इन्द्रियोपसंहारस्य प्रलयरूपत्वं व्यावर्त्य संकोचात्मकत्वं दृष्टान्तेन दर्शयति  कूर्म इति।  दृष्टान्तं व्याकरोति  यथेति।  दार्ष्टान्तिके योजयन्ज्ञाननिष्ठापदं तत्र प्रवर्तयति  एवमिति।  इन्द्रियाणां विषयेभ्यो वैमुख्यकरणं प्रज्ञास्थैर्यहेतुरित्युक्तमुपसंहरति  तस्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.58।। यदा संहरत  इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.57 2.58।।सर्वत्रानभिस्नेहत्वाच्छुभाशुभं प्राप्य नाभिनन्दति न द्वेष्टि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.58।। यदा इन्द्रियाणि  इन्द्रियार्थान् स्प्रष्टुम् उद्युक्तानि तदा एव कूर्मः  अङ्गानि इव इन्द्रियार्थेभ्यः सर्वशः  प्रतिसंहृत्य मन आत्मनि एव स्थापयति सोऽपि स्थितप्रज्ञः।एवं चतुर्विधा ज्ञाननिष्ठा पूर्वपूर्वोत्तरोत्तरनिष्पाद्या इति प्रतिपादितम्। इदानीं ज्ञाननिष्ठाया दुष्प्रापतां तत्प्राप्त्युपायं च आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.58।।  यदा संहरते  सम्यगुपसंहरते  च अयं  ज्ञाननिष्ठायां प्रवृत्तो यतिः  कूर्मः अङ्गानि  इव यथा कूर्मः भयात् स्वान्यङ्गानि उपसंहरति  सर्वशः  सर्वतः एवं ज्ञाननिष्ठः  इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः  सर्वविषयेभ्यः उपसंहरते।  तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता  इत्युक्तार्थं वाक्यम्।।तत्र विषयाननाहरतः आतुरस्यापि इन्द्रियाणि कूर्माङ्गानीव संह्रियन्ते न तु तद्विषयो रागः स कथं संह्रियते इति उच्यते

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【 Verse 2.59 】

▸ Sanskrit Sloka: विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिन: | रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ||

▸ Transliteration: viṣayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ | rasavarjaṁ raso’pyasya paraṁ dṛṣṭvā nivartate ||

▸ Glossary: viṣayāḥ: sense objects; vinivartante: turn away; nirāhārasya: of one who does not enjoy them with his senses; dehinaḥ: of the embodied; rasavarjaṁ: yearn- ing, persisting; rasaḥ: yearning; api: although there is; asya: his; paraṁ: the supreme; dṛṣṭvā: after seeing; nivartate: returns

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.59 From the body, the sense objects turn away, but the de- sires remain; his desires also leave him on seeing the Supreme.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.59।।निराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.59।। निराहारी देही पुरुष से विषय तो निवृत्त (दूर) हो जाते हैं? परन्तु (उनके प्रति) राग नहीं परम तत्व को देखने पर इस (पुरुष) का राग भी निवृत्त हो जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.59 विषयाः the objects of senses? विनिवर्तन्ते turn away? निराहारस्य abstinent? देहिनः of the man? रसवर्जम् leaving the longing? रसः loving (taste)? अपि even? अस्य of his? परम् the Supreme? दृष्ट्वा having seen? निवर्तते turns away.Commentary Knowledge of the Self alone can destroy in toto the subtle Vasanas (latent tendencies) and all the subtle desires? all subtle attachments and even the longing for objects. By practising severe austerities? by abandoning the sensual objects? the objects of the senses may turn away from the ascetic but the relish or taste or longing for the objects will still remain.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.59. Leaving their taste [behind], the sense-objects retreat from the embodied who abstain from food; his taste too disappears when he sees the Supreme.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.59 The objects of sense turn from him who is abstemious. Even the relish for them is lost in him who has seen the Truth.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.59 The objects of senses, excepting relish for the objects, turn away from the abstinent dweller in the body. Even the relish turns aswy from him when what is supreme over the senses i.e., the self, is seen.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.59 The objects recede from an abstinent man, with the exception of the taste (for them). Even the taste of this person falls away after realization the Absolute.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.59 The objects of the senses turn away from the abstinent man leaving the longing (behind); but his longing also turns away on seeing the Supreme.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.59 Visayah etc. Of course, in his (ascetic's) case there is no contact with sense-objects, colour and the rest that are enjoyable. Yet, the sense-obects retreat [from him] leaving a taste in the form of longing that exists in his internal organ. Hence he is not a man-of-stabilized-intellect. Some (commentators) say that 'taste' denotes the sweetness etc., of the objects of experience. But, in the case of a man of Yoga there exists no longing as he has seen the Supreme Lord. On the other hand, in the case of the other, i.e. an ascetic, this does not retreat (disappear).

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.59 The sense objects are the food of the senses. From the abstinent embodied being, i.e., from one who has withdrawn his senses from objects, these sense-objects, being rejected by him, turn away, but not the relish for them. Relish means hankering. The meaning is that the hankering for the sense-objects does not go away by abstinence alone. But even this hankering will go away, when one sees that the essential nature of the self is superior to the sense-objects and that the realisation of this self gives greater happiness than the enjoyment of sense-objects.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.59 Although visayah, the objects, (i.e.) the organs, figuratively implied and expressed by the word 'objects', or, the objects themselves; vinivartante, recede; niraharasya dehinah, from an abstinent man, from an embodied being, even from a fool who engages in painful austerity and abstains from objects; (still, they do so) rasavarjam, with the exception of the taste (for them), with the exception of the hankering that one has for objects. The word rasa is well known as referring to the sense of taste (hankering), as in such expressions as, 'sva-rasena pravrttah, induced by his own taste (i.e. willingly)', 'rasikah, a man of tastes', 'rasajnah, a connoisseur (of tastes)', etc. Api, even that; rasah, taste of the nature of subtle attachment; asya, of this person, of the sannyasin; nivartate, falls away, i.e. his objective perception becomes seedless; when drstva, after attaining; param, the Absolute, the Reality which is the supreme Goal, Brahman, he continues in life with the realization, 'I verily am That (Brahman).' In the absence of full realization there can be no eradication of the 'hankering'. The idea conveyed is that, one should therefore stabilize one's wisdom which is characterized by full realization. [If it be held that attachment cannot be eliminated without the knowledge of Brahman, and at the same time that the knowledge of Brahman cannot arise until attachment is eradicated, then we get involved in a vicious circle. In answer it is said that gross attachments are eliminated through discrimination which restrains the senses from being overpowered by objects. And the full Knowledge arising thereof eliminates the subtle inclinations as well. Hence there is no vicious circle involved.] Since the organs have to be first brought under his own control by one who desires to establish firmly the wisdom which is characterized by full realization, therefore the Lord speaks of the evil that arises from not keeping them under control:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.59।। प्रत्याहार या उपरति की क्षमता के बिना कभी कोई व्यक्ति किसी रोग के कारण या क्षणिक दुख के आवेग में अथवा व्रत आदि कारणों से विषय उपभोग को छोड़ देता है। उस समय ऐसा प्रतीत होता है कि विषयों से वैराग्य अथवा द्वेष हो गया है किन्तु उनके प्रति मन में स्थित राग केवल कुछ समय के लिये अव्यक्त अवस्था में रहता है। अर्जुन के मन में शंका उत्पन्न होती है कि संभवत योगी का इन्द्रिय संयम भी क्षणिक अनित्य ही हो जो अनुकूल या प्रलोभनपूर्ण परिस्थितियों में टूट जाता हो। उसकी इस शंका का निवारण यहाँ किया गया है।यदि आप दुकानों से ग्राहकों तक उपभोग के विषय की गति का अवलोकन करें तो इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप में समझ सकते हैं। उपभोग की वे वस्तुयें केवल उन्हीं लोगों के घर पहुँचती हैं जो उनकी तीव्र इच्छा किये हुये उन वस्तुओं को पाने के लिये प्रयत्न कर रहे होते हैं। मद का भण्डार तब खाली हो जाता है जब बोतलें चलकर मद्यपियों

Chapter 2 (Part 34)

की आलमारियों को भर देती हैं लुहार के बनाये हल केवल किसान के घर जाते हैं और न कि किसी कलाकार कवि चिकित्सक या वकील के घर में। इसी प्रकार उन विषयों के इच्छुक लोगों के पास ही वे विषय पहुँचते हैं। भोगों के त्यागी व्यक्ति से भोग की वस्तुयें दूर ही रहती हैं।निराहार रहने से विषय तो दूर हो जायेंगे परन्तु उनके प्रति मन में पूर्वानुभवजनित रस अर्थात् स्वाद या राग निवृत्त नहीं होता। भगवान् यहाँ आश्वासन देते हैं कि परम आत्मतत्त्व की अपरोक्षानुभूति होने पर यह राग भी समाप्त हो जाता है या भुने हुये बीजों के समान मनुष्य के मन में विषय प्रभावहीन हो जाते हैं।इस तथ्य को समझना कठिन नहीं क्योंकि हम जानते हैं कि अनुभव की एक अवस्था विशेष में प्राप्त अनिष्ट वस्तुयें और दुख दूसरी अवस्था में उसी प्रकार नहीं रहते। स्वप्नावस्था का राज्य मेरी जाग्रदवस्था के दारिद्र्य को दूर नहीं करता किन्तु जाग्रदवस्था का दारिद्र्य भी स्वप्न के राज्य का उपभोग करने से मुझे वंचित नहीं कर सकता जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था में रहते हुए अहंकार ने असंख्य विषय वासनायें अर्जित कर ली हैं। परन्तु अवस्थात्रय अतीत शुद्ध चैतन्य स्वरूप को पहचान कर अहंकार ही समाप्त हो जाता है तब ये वासनायें किस पर अपना प्रभाव दिखायेंगी।आत्मप्रज्ञा प्राप्त करने के इच्छुक साधक का सर्वप्रथम उसकी इन्द्रियों पर संयम होना आवश्यक है अन्यथा

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.59।।ननु निराहारस्य रोगिणो व्रतिनो वापि विषयेभ्य इन्द्रियाणि विनिवर्तन्तेऽत इदं लक्षणं मूढेष्वप्यागतमित्याशङ्क्य परिहरति  विषया इति।  विषया लक्षणयेन्द्रियाणि शब्दादयो वा रसवर्जं रसो रागस्तं वर्जयित्वा निराहारस्याहारविनिर्मुक्तस्यानाह्नियमाणविषयस्य कष्टेन तपसि स्थितस्य मूर्खस्यापि देहिनो देहवतो विनिवर्तन्ते। परं परमात्मानं दृष्ट्वाऽहं ब्रह्मास्मीति साक्षादुपलभ्य रसोऽपि रञ्जनात्मकः सूक्ष्मोऽप्यस्य यतेर्निवर्तते। निर्बीजं विषयज्ञानं संपद्यत इत्यर्थः। तस्माद्रसस्योच्छेदाय सभ्यग्दर्शनात्मिकायाः प्रज्ञायाः स्थैर्यं कर्तव्यमित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.59।।ननु मूढस्यापि रोगादिवशाद्विषयेभ्य इन्द्रियाणामुपसंहरणं भवति तत्कथं तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठितेत्युक्तमत आह विषया इति। निराहारस्य इन्द्रियैर्विषयाननाहरतो देहिनो देहाभिमानवतो मूढस्यापि रोगिणः काष्ठतपस्विनो वा विषयाः शब्दादयो विनिवर्तन्ते किंतु रसवर्जं रसस्तृष्णा तं वर्जयित्वा। अज्ञस्य विषया निवर्तन्ते। तद्विषयो रागस्तु न निवर्तत इत्यर्थः। अस्य तु स्थितप्रज्ञस्य परं पुरुषार्थं दृष्ट्वा तदेवाहमस्मीति साक्षात्कृत्य स्थितस्य रसोऽपि क्षुद्रसुखरागोऽपि निवर्तते। अपिशब्दाद्विषयाश्च। तथाचयावानर्थ इत्यादौ व्याख्यातम्। एवंच सरागविषयनिवृत्तिः स्थितप्रज्ञस्य लक्षणमिति न मूढे व्यभिचार इत्यर्थः। यस्मान्नासति परमात्मसम्यग्दर्शने सरागविषयोच्छेदस्तस्मात्सरागविषयोच्छेदिकायाः सम्यग्दर्शनात्मिकायाः प्रज्ञायाः स्थैर्यं महता यत्नेन संपादयेदित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.59।।ननु विषयेभ्य इन्द्रियाणां निवृत्तिश्चेत् स्थितप्रज्ञताहेतुस्तर्हि सुप्तिमूर्च्छालयग्रहावेशादावपि सास्तीति सर्वोऽपि स्थितप्रज्ञ एवेत्याशङ्क्याह  विषया इति।  सत्यं देहिनो देहाभिमानवतो मूढस्य सुप्त्यादौ निराहारस्य इन्द्रियैर्विषयाननाहरतोऽभुञ्जानस्य विषया विनिवर्तन्त एव तथापि रसवर्जं रसो रागस्तद्वर्जं निवर्तन्ते। तदापि सूक्ष्मरूपेण रागोऽस्ति रागमूलस्यात्माज्ञानस्यादाहान्नासौ स्थितप्रज्ञ इत्यर्थः। अस्यैव पुनः परं दृष्ट्वा आत्मानं साक्षात्कृत्य निराहारस्य शब्दादीनगृह्णतो रसोऽपि निवर्तते मूलाज्ञानदाहादित्यस्ति सुप्तादेः समाधिस्थस्य च महान्विशेष इति भावः। प्राञ्चस्तु रोगिणः काष्ठतपस्विनो वा मूढस्यापि विषयाननाहरतो रसवर्जं विषया विनिवर्तन्ते तस्यैव परं दृष्ट्वा स्थितस्य रसोऽपि निवर्तत इति व्याचख्युः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.59।।ननु इन्द्रियाणामन्नाद्यभावेने न्द्रि৷৷৷৷৷৷৷৷ यविषयेषु प्रवृत्तिः कथं कथं न तेषामपि स्थितप्रज्ञता इत्याशङ्क्याह विषया इति। निराहारस्य देहिनो विषया विनिवर्तन्ते तत्सत्यमित्यर्थः। परन्तु रसव र्जं৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷.  रसो नाम तदनुभवार्थाभिलाषस्तद्वर्जं तद्गृहीतमित्यर्थः।देहिनः इति पदेन तेषां देहाध्यासोऽपि न निवर्त्तत इति ज्ञापितम्। अस्य स्थितप्रज्ञस्य रसोऽपि तदभिलाषोऽपि परमुत्कृष्टं भगवदीयरसं दृष्ट्वा निवर्त्तते। एतावद्वैलक्षण्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.59।।ननु नेन्द्रियाणां विषयेष्वप्रवृत्तिः स्थितप्रज्ञस्य लक्षणं भवितुमर्हति। जडानामातुराणामुपवासपराणां च विषयेष्वप्रवृत्तेरविशेषात्तत्राह विषया इति। इन्द्रियैर्विषयाणामाहरणं ग्रहणमाहारः। निराहारस्येन्द्रियैर्विषयग्रहणमकुर्वतो देहिनो देहाभिमानिनोऽज्ञस्य विषया विनिवर्तन्ते। तदनुभवो निवर्तत इत्यर्थः। किंतु रसो रागोऽभिलाषस्तद्वर्जम्। अभिलाषस्तु न निवर्तत इत्यर्थः। रसोऽपि रागोऽपि परं परमात्मानं दृष्ट्वाऽस्य स्थितप्रज्ञस्य स्वतो निवर्तते। नश्यतीत्यर्थः। यद्वा निराहारस्योपवासपरस्य विषयाः प्रायशो विनिवर्तन्ते क्षुधासंतप्तस्य शब्दस्पर्शाद्यपेक्षाभावात्। परंतु रसवर्जम्। रसापेक्षा तु न निवर्तत इत्यर्थः। शेषं समानम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.59।।यतो निराहारस्य विषयेभ्यः प्रत्याहृतेन्द्रियस्य सतः विषया विनिवर्त्तन्ते नान्यस्य निराहारस्य रसवर्जं विषया वा निवर्त्तन्ते न तु रसस्तदिन्द्रियस्य सर्वबलवत्त्वात्साधकाकर्षकत्वाच्च। रसनिवृत्त्युपायमाह रसोऽपि अस्य सिद्धस्य स्थिरधियः परमात्मानमानन्दमनुभूय निवर्त्तते महानन्दाग्रेऽल्पानन्दवस्तुनि सर्वस्य प्रवृत्त्यसम्भवनियमात्। अग्रे चैतस्यासनभाषणमननव्रतान्यात्मनिष्ठायुक्तानि लक्षितानि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.59।।विषयोंका ग्रहण न करनेवाले रोगी मनुष्यकी भी इन्द्रियाँ तो विषयोंसे हट जाती हैं यानी कछुएके अङ्गोंकी भाँति संकुचित हो जाती हैं परन्तु विषयसम्बन्धी राग ( आसक्ति ) नष्ट नहीं होता। उसका नाश कैसे होता है सो कहते हैं यद्यपि विषयोंको ग्रहण न करनेवाले कष्टकर तपमें स्थित देहाभिमानी अज्ञानी पुरुषकी भी विषयशब्दवाच्य इन्द्रियाँ अथवा केवल शब्दादि विषय तो निवृत्त हो जाते हैं परंतु उन विषयोंमें रहनेवाला जो रस अर्थात् आसक्ति है उसको छोड़कर निवृत्त होते हैं अर्थात् उनमें रहनेवाली आसक्ति निवृत्त नहीं होती। रस शब्द राग ( आसक्ति ) का वाचक प्रसिद्ध है क्योंकि स्वरसेन प्रवृत्तो रसिको रसज्ञः इत्यादि वाक्य देखे जाते हैं। वह रागात्मक सूक्ष्म आसक्ति भी इस यतिकी परमार्थतत्त्वरूप ब्रह्मका प्रत्यक्ष दर्शन होनेपर निवृत्त हो जाती है अर्थात् मैं ही वह ब्रह्म हूँ इस प्रकारका भाव दृढ़ हो जानेपर उसका विषयविज्ञान निर्बीज हो जाता है। अभिप्राय यह कि यथार्थ ज्ञान हुए बिना रागका मूलोच्छेद नहीं होता अतः यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धिकी स्थिरता कर लेनी चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.59।। व्याख्या    विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः रसवर्जम्   मनुष्य निराहार दो तरहसे होता है (1) अपनी इच्छासे भोजनका त्याग कर देना अथवा बीमारी आनेसे भोजनका त्याग हो जाना और (2) सम्पूर्ण विषयोंका त्याग करके एकान्तमें बैठना अर्थात् इन्द्रियोंको विषयोंसे हटा लेना।यहाँ इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले साधकके लिये ही  निराहारस्य  पद आया है।रोगीके मनमें यह रहता है कि क्या करूँ शरीरमें पदार्थोंका सेवन करनेकी सामर्थ्य नहीं है इसमें मेरी परवश्ता है परन्तु जब मैं ठीक हो जाऊँगा शरीरमें शक्ति आ जायगी तब मैं पदार्थोंका सेवन करूँगा। इस तरह उसके भीतर रसबुद्धि रहती है। ऐसे ही इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेपर विषय तो निवृत्त हो जाते हैं पर साधकके भीतर विषयोंमें जो रसबुद्धि सुखबुद्धि है वह जल्दी निवृत्त नहीं होती।जिनका स्वाभाविक ही विषयोंमें राग नहीं है और जो तीव्र वैराग्यवान् हैं उन साधकोंकी रसबुद्धि साधनावस्थामें ही निवृत्त हो जाती है। परन्तु जो तीव्र वैराग्यके बिना ही विचारपूर्वक साधनमें लगे हुए हैं उन्हीं साधकोंके लिये यह कहा गया है कि विषयोंका त्याग कर देनेपर भी उनकी रसबुद्धि निवृत्त नहीं होती। रसोऽप्यस्य परं दृष्टा निवर्तते   इस स्थितप्रज्ञकी रसबुद्धि परमात्माका अनुभव हो जानेपर निवृत्त हो जाती है। रसबुद्धि निवृत्त होनेसे वह स्थितप्रज्ञ हो ही जाता है यह नियम नहीं है। परन्तु स्थितप्रज्ञ होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती यह नियम है। रसोऽप्यस्य  पदसे यह तात्पर्य निकलता है कि रसबुद्धि साधककी अहंतामें अर्थात् मैं पनमें रहती है। यही रसबुद्धि स्थूलरूपसे रागका रूप धारण कर लेती है। अतः साधकको चाहिये कि वह अपनी अहंतासे ही रसको निकाल दे कि मैं तो निष्काम हूँ राग करना कामना करना मेरा काम नहीं है। इस प्रकार निष्कामभाव आ जानसे अथवा निष्काम होनेका उद्देश्य होनेसे रसबुद्धि नहीं रहती और परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे रसकी सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। सम्बन्ध   रसकी निवृत्ति न हो क्या आपत्ति है इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.59।।युक्तं चैतत् यतः यः सर्वत्रेति। शुभाशुभप्राप्तौ तस्याह्लादतापौ न भवतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.59।।इन्द्रियाणां विषयेभ्यो वैमुख्येऽपि तद्विषयरागानुवृत्तौ कथं प्रज्ञालाभः स्यादिति शङ्कते  तत्रेति।  व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। विषयाननाहरतस्तदुपभोगविमुखस्येत्यर्थः। रागश्चेन्नोपसंह्रियते न तर्हि प्रज्ञालाभः संभवति रागस्य तत्परिपन्थित्वादिति मत्वाह  स कथमिति।  रागनिवृत्त्युपायमुपदिशन्नुत्तरमाह  उच्यत इति।  विषयोपभोगपराङ्मुखस्य कुतो विषयपरावृत्तिस्तत्परावृत्तिश्चाप्रस्तुतेत्याशङ्क्याह  यद्यपीति।  निराहारस्येत्यस्य व्याख्यानमनाह्रियमाणविषयस्येति। यो हि विषयप्रवणो न भवति तस्यात्यन्तिके तपसि क्लेशात्मके व्यवस्थितस्य विद्याहीनस्यापीन्द्रियाणि विषयेभ्यः सकाशाद्यद्यपि संह्रियन्ते तथापि रागोऽवशिष्यते स च तत्त्वज्ञानादुच्छिद्यत इत्यर्थः। रसशब्दस्य माधुर्यादिषड्विधरसविषयत्वं निषेधति  रसशब्द इति।  वृद्धप्रयोगमन्तरेण कथं प्रसिद्धिरित्याशङ्क्याह  स्वरसेनेति।  स्वेच्छयेति यावत्। रसिकः स्वेच्छावशवर्ती रसज्ञो विवक्षितापेक्षितज्ञातेत्यर्थः। कथं तर्हि तस्य निवृत्तिस्तत्राह  सोऽपीति।  दृष्टिमेवोपलब्धिपर्यायां स्पष्टयति  अहमेवेति।  रागापगमे सिद्धमर्थमाह  निर्बीजमिति।  ननु सम्यग्ज्ञानमन्तरेण रागो नापगच्छति चेत्तदपगमादृते रागवतः सम्यग्ज्ञानोदयायोगादितरेतराश्रयतेति नेत्याह  नासतीति।  इन्द्रियाणां विषयपारवश्ये विवेकद्वारा परिहृते स्थूलो रागो व्यावर्तते ततश्च सम्यग्ज्ञानोत्पत्त्या सूक्ष्मस्यापि रागस्य सर्वात्मना निवृत्त्युपपत्तेर्नेतरेतराश्रयतेत्यर्थः। प्रज्ञास्थैर्यस्य सफलत्वे स्थिते फलितमाह  तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.59।।विषया विनिवर्तन्ते इत्यादिश्लोकत्रयान्तेऽपितस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता 2।61 इत्युक्तत्वादिदमपि लक्षणविवरणमिति भ्रान्तिः स्यात्तन्निरासार्थमाह  न चे ति। एतल्लक्षणं यस्माद्भवति तदेतल्लक्षणम्। अयत्नतोऽल्पयत्नतःअनुदराकन्या इति यथा। यद्येवँल्लक्षणकं ज्ञानं तर्हि सर्वोऽपि जनः कस्मान्न तत्साधयति कामाद्युपद्रवपरिहारार्थम् किं दन्दह्यमानशिरा इव बम्भ्रमीति अतो नास्त्येवेदं ज्ञानिषु लक्षणमित्याशङ्कापरिहारार्थमिति शेषः। त्रिभिरित्यनुवर्तते ज्ञानस्याल्पप्रयत्नासाध्यत्वमत्र न प्रतीयत इत्याशङ्क्योपोद्धातप्रक्रिययेन्द्रियजयस्य तावन्महाप्रयत्नसाध्यत्वमाद्येन श्लोकेनोच्यत इति भावेन तं व्याचष्टे  निराहारत्वेने ति एतेनरसवर्जं इत्येतदन्तस्य वाक्यस्यार्थ उक्तः। एवशब्देनरसवर्जं इत्येतद्व्याचष्टे। तथा हि निराहारस्य देहिनः। तेन निराहारत्वेनेति यावत्। विषया रूपादयः। तद्भोगसामर्थ्यानीन्द्रियाण्यनेनोपलक्ष्यन्ते तानि विनिवर्तन्ते। रसवर्जं रसो रागः तं वर्जयित्वा विषयाभिलाषश्चैतसिको निराहारत्वेन न निवर्तत इति। अस्यैवार्थान्तरमाह  इतरे ति। आकाङ्क्षाशब्देन भोगशक्तयोऽपि लक्ष्यन्ते।रसवर्जं इत्यस्यार्थो रसाकाङ्क्षादिरिति। ततश्चेयं योजना निराहारत्वेन रसादितरे विषयाः तद्भोगशक्तयः तदाकाङ्क्षाश्चेति यावत् विनिवर्तन्ते। रसं वर्जयित्वा मनसो रसविषयाकाङ्क्षा रसनेन्द्रियस्य तद्भोगशक्तिश्च न निवर्तत इति। रसोऽपीत्यस्यार्थमाह  स त्वि ति। आद्येऽर्थे स रसः सर्वविषयविषयो रागः। द्वितीये स रसः तद्भोगशक्तिः तदाकाङ्क्षा च। उक्तमर्थं श्लोकारूढं करोति  इत्याहे ति। द्वितीयार्थे प्रमाणमाह  इन्द्रियाणी ति। जयन्ति भोगशक्तिक्षयेण च रागक्षयेण च। असौ रसना तु रस्ये विषये प्रकारद्वयेन च वर्धते। आद्यमर्थमुपपादयति  रसे ति। उक्तं युक्तमित्युभयत्र शेषः। रसशब्दस्य रागवाचित्वं उक्ताभिधानादवगन्तव्यम्। अचेतने चेतनवदुपचाराद्रसः परं दृष्ट्वा निवर्तते इति युक्तम्।अयमर्थसङ्ग्रहः यदा बाह्येन्द्रियाणि विषयैः सन्निकृष्यन्ते तदा तद्द्वारा मनस्तत्र प्रवर्तते प्रवृत्ते च मनसि रागो भवति तत आत्मनः क्षोभ इति। एवं इन्द्रियाणामविजयः। यो हि यं व्याकुलं करोति स तेन जित इत्युच्यते। यदा तु बाह्येन्द्रियाणि विषयसन्निधानेऽपि न तैः सन्निकृष्यन्ते सन्निष्टान्यपि न मनस्तदाभिमुखेनाहरन्ति आहृतेऽपि मनसि न विषयरागो जायते तदा नात्मनः क्षोभो भवतीत्येष इन्द्रियजयः। सोऽयं सङ्ग्रहेण द्वेधा बाह्येन्द्रियाणां शक्तिक्षयान्मनसो रागक्षयाच्च। एतत् द्वयं च पुरुषभेदेनोक्तप्रकारद्वयेन निराहारत्वब्रह्मसाक्षात्काराभ्यां भवतीत्येवमिन्द्रियजयस्य महाप्रयत्नसाध्यत्वमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.59।।न चैतल्लक्षणं ज्ञानमयत्नतो भवतीत्याहोत्तरश्लोकैः। निराहारत्वेन विषयभोगसामर्थ्याभाव एव भवति इतरविषयाकाङ्क्षाभावो वा रसाकाङ्क्षादिर्न निवर्तते स त्वपरोक्षज्ञानादेव निवर्तत इत्याह विषया इति।इन्द्रियाणि जयन्त्याशु निराहारा मनीषिणः। वर्जयित्वा तु रसनमसौ रस्ये हि वर्धते इति वचनाद्भागवते 11।8।20 रसशब्दस्य रागवाचिन्वाच्च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.59।।इन्द्रियाणाम् आहारो विषयाः  निराहारस्य  विषयेभ्यः प्रत्याहृतेन्द्रियस्य  देहिनो विषयाः  विनिवर्तमाना  रसवर्जं विनिवर्तन्ते। रसो  रागः विषयरागो न निवर्तते इत्यर्थः। रागः  अपि  आत्मस्वरूपं विषयेभ्यः  परं  सुखतरं  दृष्ट्वा  विनिवर्तते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.59।। यद्यपि  विषयाः  विषयोपलक्षितानि विषयशब्दवाच्यानि इन्द्रियाणि  निराहारस्य  अनाह्रियमाणविषयस्य कष्टे तपसि स्थितस्य मूर्खस्यापि  विनिवर्तन्ते देहिनो  देहवतः रसवर्जं रसो रागो विषयेषु यः तं वर्जयित्वा। रसशब्दो रागे प्रसिद्धः स्वरसेन प्रवृत्तः रसिकः रसज्ञः इत्यादिदर्शनात्।  सोऽपि रसो  रञ्जनारूपः सूक्ष्मः  अस्य  यतेः  परं  परमार्थतत्त्वं ब्रह्म  दृष्ट्वा  उपलभ्य अहमेव तत् इति वर्तमानस्य  निवर्तते  निर्बीजं विषयविज्ञानं संपद्यते इत्यर्थः। न असति सम्यग्दर्शने रसस्य उच्छेदः। तस्मात् सम्यग्दर्शनात्मिकायाः प्रज्ञायाः स्थैर्यं कर्तव्यमित्यभिप्रायः।।सम्यग्दर्शनलक्षणप्रज्ञास्थैर्यं चिकीर्षता आदौ इन्द्रियाणि स्ववशे स्थापयितव्यानि यस्मात्तदनवस्थापने दोषमाह

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【 Verse 2.60 】

▸ Sanskrit Sloka: यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चित: | इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मन: ||

▸ Transliteration: yatato hyapi kaunteya puruṣasya vipaścitaḥ | indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṁ manaḥ ||

▸ Glossary: yatataḥ: while endeavoring; hi: indeed; api: also; kaunteya: O son of Kuntī; puruṣasya: of the man; vipaścitaḥ: the wise; indriyāṇi: the senses; pramāthīni: turbulent; haranti: carry away; prasabhaṁ: by force; manaḥ: the mind

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.60 O Kaunteya (son of Kuntī), the turbulent senses carry away the mind of a wise man, though he is striving to be in control.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.60।।हे कुन्तीनन्दन (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.60।। हे कौन्तेय (संयम का) प्रयत्न करते हुए बुद्धिमान (विपश्चित) पुरुष के भी मन को ये इन्द्रियां बलपूर्वक हर लेती हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.60 यततः of the striving? हि indeed? अपि even? कौन्तेय O Kaunteya (son of Kunti)? पुरुषस्य of man? विपश्चितः (of the) wise? इन्द्रियाणि the senses? प्रमाथीनि turbulent? हरन्ति carry away? प्रसभम् violently? मनः the mind.Commentary The aspirant should first bring the senses under his control. The senses are like horses. If you keep the horses under your perfect control you can reach your destinaton safely. Turbulent horses will throw you down on the way. Even so the turbulent senses will hurl you down into the objects of the senses and you cannot reach your spiritual destination? viz.? Param Dhama (the supreme abode) or the abode of eternal peace and immortality or Moksha (final liberation). (Cf.III.33V.14).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.60. For, the turbulent sense-organs do carry away by force, the mind even of this person of discerning, O son of Kunti !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.60 O Arjuna! The mind of him, who is trying to conquer it, is forcibly carried away in spite of his efforts, by his tumultuous senses.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.60 The turbulent senses, O Arjuna, do carry away perforce the mind of even a wise man, though he is ever striving.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.60 For, O son of Kunti, the turbulent organs violently snatch away the mind of an intelligent person, even while he is striving diligently.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.60 The turbulent senses, O Arjuna, do violently carry away the mind of a wise man though he be striving (to control them).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.60 Yattasyapi etc. For, the mind of that ascetic too is carried away by the sense-organs. Or, the expression yattasya api denotes 'even of one who exerts'. [So], it is but the mind that is to be subdued by a man of Yoga. Thus the second [estion] is decided.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.60 Except by the experience of the self, the hankering for objects will not go away. When the hankering for the sense-objects does not go away, the senses of even a wise man, though he is ever striving to subdue them, become refractory, i.e., become violent and carry away perforce the mind. Thus, the subduing of the senses depends on the vision of the self, and the vision of the self depends on the subduing of the senses. Conseently, i.e., because of this mutual dependence, firm devotion to knowledge is difficult to achieve.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.60 Hi, for; kaunteya, O son of Kunti; pramathini, the turbulent; indriyani, organs; prasabham, violently; haranti, snatch away; manah, the mind; vipascitah, of an intelligent; purusasya, person; api, even; yatatah, while he is striving diligently [Repeatedly being mindful of the evils that arise from sense-objects.] (or,) the words purusasya vipascitah (of an intelligent person) are to be connected with the remote word api (even). [The Commentator says that api may be construed either with yatatah or with vipascitah purusasya.-Tr.] Indeed, the organs confound a person who is inclined towards objects, and after confounding him, violently carry away his mind endowed with discriminating knoweldge, even when he is aware of this. Since this is so, therefore,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.60।। अब तक के अपने प्रवचन में भगवान् श्रीकृष्ण ने ज्ञानी पुरुष के इन्द्रिय संयम की सार्मथ्य पर विशेष बल दिया है। भारत में दर्शनशास्त्र के सिद्धान्तों को अव्यावहारिक होने पर स्वीकारा नहीं जाता। अत गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को उन साधनों का भी उपदेश देते हैं जिनके अभ्यास से वह भी स्थितप्रज्ञ के पूर्णत्व को प्राप्त कर सकता है।सत्त्व (विवेकशीलता) रज (क्रियाशीलता ) और तम (निष्क्रियता) इन तीन गुणों का प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति के अन्तकरण पर पड़ता है। तमोगुण के आवरण तथा रजोगुण के विक्षेप के कारण जब सत्त्व गुण भी दूषित हो जाता है तब अनेक दुखों को हमें भोगना पड़ता है। यदि इन्द्रियों पर पूर्ण संयम न हो तो वे मन को विषयों की ओर बलपूर्वक खींच ले जायेंगी जिसका एक मात्र परिणाम होगा दुख। इस श्लोक में स्वीकार किया गया है कि ऐसी स्थिति किसी बुद्धिमान साधक की भी कभीकभी होती है। यह वाक्य भयभीत करने या किसी को निरुत्साहित करने के लिए नहीं समझना चाहिए। अर्जुन को केवल इस बात की सावधानी रखने को कहा गया है कि वह कभी अपने मन का बुद्धि पर आधिपत्य स्थापित न होने दे। सावधानी की यह सूचना अत्यन्त समयोचित है।अध्यात्म साधना का अभ्यास करने वाले अनेक साधकों के पतन का कारण एक ही है। कुछ वर्षों तक तो वे संयम के प्रति सजग रहते हैं जिसके फलस्वरूप उन्हें आनन्द भी मिलता है। तत्पश्चात् स्वयं पर अत्यधिक विश्वास के कारण तप के प्रति उनकी जागरूकता कम हो जाती है और तब स्वाभाविक ही इन्द्रियाँ बलपूर्वक मन को विषयों में खींच ले जाती हैं और साधक की शान्ति को नष्ट कर देती हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.60।।   सभ्यग्दर्शनं विना रसस्योच्छेदो नास्तीत्युक्तं तच्चाजितेन्द्रियस्य दुर्लभमिन्द्रियनिग्रहश्चातियत्नसाध्यः तस्मात्सम्यग्दर्शनलक्षणं प्रज्ञास्थैर्यं चिकीर्षता आदाविन्द्रियजयः कार्य इत्याशयेन तदकरणे दोषमाह  यतत इति।  हि यस्माद्विपश्चितो बुद्धिमतः प्रज्ञास्थैर्यार्थं यततो यतमानस्यापीन्द्रियाणि प्रमथनशीलानि पुरुषं विषयाभिमुखं कर्तुं समर्थानि तं व्याकुलीकृत्य प्रसभं बलात्कारेण विवेकयुक्तमपि मनो हरन्ति। कौन्तेयेति संबोधयन्निन्द्रियापेक्षया पुरुषस्य दौर्बल्यं सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.60।।तत्र प्रज्ञास्थैर्ये बाह्येन्द्रियनिग्रहो मनोनिग्रहश्चासाधारणं कारणं तदुभयाभावे प्रज्ञानादर्शनादिति वक्तुं बाह्येन्द्रियनिग्रहाभावे प्रथमं दोषमाह यतत इति। हे कौन्तेय यततः भूयोभूयो विषयदोषदर्शनात्मकं यत्नं कुर्वतोऽपि। चक्षिङो ङित्करणादनुदात्तेतोऽनावश्यकमात्मनेपदमिति ज्ञापनात्परस्मैपदमविरुद्धम्। विपश्चितोऽत्यन्तविवेकिनोऽपि पुरुषस्य मनः क्षणमात्रं निर्वकारं कृतमपीन्द्रियाणि हरन्ति विकारं प्रापयन्ति। ननु विरोधिनि विवेके सति कुतो विकारप्राप्तिस्तत्राह प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि अतिबलीयस्त्वाद्विवेकोपमर्दनक्षमाणि। अतः प्रसभं प्रसह्य बलात्कारेण पश्यत्येव। विपश्चिति स्वामिनि विवेके च रक्षके सति सर्वप्रमाथित्वादेवेन्द्रियाणि विवेकजप्रज्ञायां प्रविष्टं मनस्ततः प्रच्याव्य स्वविषयाविष्टत्वेन हरन्तीत्यर्थः। हिशब्दः प्रसिद्धिं द्योतयति। प्रसिद्धो ह्ययमर्थो लोके यथा प्रमाथिनो दस्यवः प्रसभमेव धनिनं धनरक्षकं चाभिभूय तयोः पश्यतोरेव धनं हरन्ति तथेन्द्रियाण्यपि विषयसंनिधाने मनो हरन्तीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.60।।किंच सुप्तादेरिन्द्रियाणि श्रान्त्या स्वयमेव लीयन्ते समाहितेन तु तानि कूर्मेणाङ्गानीव स्वेच्छया संह्रियन्ते एतच्चात्यन्तायाससाध्यमित्याह  यतत इति।  विपश्चितः शास्त्राचार्योपदेशवतो यततोऽपि समाधिसिद्ध्यर्थं यतमानस्यापि पुरुषस्य इन्द्रियाणि कर्तृ़णि मनः प्रतीचि स्थिरीक्रियमाणं कर्मीभूतं हरन्ति विषयप्रवणं कुर्वन्ति। यतः प्रमाथीनि यथा बहवश्चोरा वने एकं पुरुषं प्रमथ्य तस्य वित्तं हरन्ति एवमिन्द्रियाणि यततो मनो हरन्ति। यतः प्रसभमतिशयेन प्रमथनशीलानि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.60।।ननु इन्द्रियसंयमनं सर्वेषां कर्तुमुचितं स्थितप्रज्ञे को विशेषः इति चेत्तत्राह यतत इति द्वाभ्याम्। हे कौन्तेय विपश्चितः शास्त्रार्थविदः पुरुषस्य यततोऽपि यत्नं कुर्वाणस्यापि प्रमाथीनि प्रकर्षेण मथनशीलानि इन्द्रियाणि प्रसभं बलात्कारेण मनो हरन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.60।।इन्द्रियसंयमं विना तु स्थितप्रज्ञता न संभवति। अतः साधकावस्थायां तत्र महान्प्रयत्नः कर्तव्य इत्याह  यततो   ह्यपीति द्वाभ्याम्।  यततो मोक्षे प्रयतमानस्यापि विपश्चितो विवेकिनोऽपि मन इन्द्रियाणि प्रसभं बलाद्धरन्ति। यतः प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि प्रक्षोभकाणि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.60 2.61।।तेष्वेव प्रथममुपदेशे कर्त्तव्यतादृढनाय तस्यासनं सहेतुकं लक्षयति यततोऽपीति द्वाभ्याम्। यततोऽपि तत्तदिन्द्रियजयाभ्यास एव श्रेयान् मनःप्रमाथित्वादिद्रियाणां अतस्तानि सर्वाणि प्रथमं बुद्ध्या संयम्य युक्तो य आसीत मत्परः तस्यैव प्रतिष्ठिता प्रज्ञाऽवसेया।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.60।।यथार्थ ज्ञानरूप बुद्धिकी स्थिरता चाहनेवाले पुरुषोंको पहले इन्द्रियोंको अपने वशमें कर लेना चाहिये क्योंकि उनको वशमें न करनेसे दोष बतलाते हैं हे कौन्तेय जिससे की प्रयत्न करनेवाले विचारशील बुद्धिमान् पुरुषकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उस विषयाभिमुख हुए पुरुषको क्षुब्ध कर देती हैं व्याकुल कर देती हैं और व्याकुल करके ( उस ) केवल प्रकाशको ही देखनेवाले विद्वान्के विवेकविज्ञानयुक्त मनको ( भी ) बलात्कारसे विचलित कर देती हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.60।। व्याख्या    यततो ह्यपि ৷৷. प्रसभं मनः (टिप्पणी प0 98.1)   जो स्वयं यत्न करता है साधन करता है हरेक कामको विवेकपूर्वक करता है आसक्ति और फलेच्छाका त्याग करता है दूसरोंका हित हो दूसरोंको सुख पहुँचे दूसरोंका कल्याण हो ऐसा भाव रखता है और वैसी क्रिया भी करता है जो स्वयं कर्त्तव्यअकर्त्तव्य सारअसारको जानता है और कौनकौनसे कर्म करनेसे उनका क्याक्या परिणाम होता है इसको भी जाननेवाला है ऐसे विद्वान पुरुषके लिय यहाँ  यततो ह्यपि पुरुषस्य विपश्चितः  पद आये हैं। प्रयत्न करनेवाले ऐसे विद्वान् पुरुषकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं विषयोंकी तरफ खींच लेती हैं अर्थात् वह विषयोंकी तरफ खिंच जाता है आकृष्ट हो जाता है। इसका कारण यह है कि जबतक बुद्धि सर्वथा परमात्मतत्त्वमें प्रतिष्ठित (स्थित) नहीं होती बुद्धिमें संसारकी यत्किञ्चित् सत्ता रहती है विषयेन्द्रियसम्बन्धसे सुख होता है भोगे हुए भोगोंके संस्कार रहते हैं तबतक साधनपरायण बुद्धिमान् विवेकी पुरुषकी भी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें नहीं होतीं। इन्द्रियोंके विषय सामने आनेपर भोगे हुए भोगोंके संस्कारओंके कारण इन्द्रियाँ मनबुद्धिको जबर्दस्ती विषयोंकी तरफ खींच ले जाती हैं। ऐसे अनेक ऋषियोंके उदाहरण भी आते हैं जो विषयोंके सामने आनेपर विचलित हो गये। अतः साधकको अपनी इन्द्रियोंपर कभी भी मेरी इन्द्रियाँ वशमें है ऐसा विश्वास नहीं करना चाहिये  (टिप्पणी प0 98.2)  और कभी भी यह अभिमान नहीं करना चाहिये कि मैं जितेन्द्रिय हो गया हूँ।  सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें यह बताया कि रसबुद्धि रहनेसे यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी इन्द्रियाँ उसके मनको हर लेती हैं जिससे उसकी बुद्धि परमात्मामें प्रतिष्ठित नहीं होती। अतः रसबुद्धिको दूर कैसे किया जाय इसका उपाय आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.60।।यदा संहरते इति। न चास्य पाचकवद्योगरूढत्वम्। यदा यदा किलायमिन्द्रियाणि संहरते आत्मन्येव कूर्म इवाङ्गानि क्रोडीकरोति विषयेभ्यः विषयान्निवार्य (S विषयेभ्यः विषयार्थस्यैव विषयान्निवार्य) तदा तदा स्थिरप्रज्ञः। यद्वा इन्द्रियार्थेभ्यः प्रभृति इन्द्रियाणि आत्मनि संहरते विषयेन्द्रियात्मकं (K न्द्रियादिकम्) सर्वम् ( N आसन्नं instead सर्वम्) आत्मसात्कुरुते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.60।।श्लोकान्तरमवतारयति  सम्यग्दर्शनेति।  मनसः स्ववशत्वादेव प्रज्ञास्थैर्यसंभवे किमर्थमिन्द्रियाणां स्ववशत्वापादनमित्याशङ्क्याह  यस्मादिति।  ननु विवेकवतो विषयदोषदर्शिनो विषयेभ्यः स्वयमेवेन्द्रियाणि व्यावर्तन्ते किं तत्र प्रज्ञास्थैर्यं चिकीर्षता कर्तव्यमिति तत्राह  यततो हीति।  विषयेषु भूयो भूयो दोषदर्शनमेव प्रयत्नः। हिशब्दस्य यस्मादर्थस्य समाप्तौ संबन्धं वक्ष्यति। अपिशब्दस्य प्रयत्नं कुर्वतोऽपीति संबन्धं गृहीत्वा संबन्धान्तरमाह  पुरुषस्येति।  प्रमथनशीलत्वं प्रकटयति  विषयेति।  विक्षोभस्याकुलीकरणस्य फलमाह  आकुलीकृत्येति।  प्रकाशमेवेत्युक्तं विशदयति  पश्यत इति।  विपश्चितो विदुषोऽपि प्रकाशमेव प्रकाशशब्दितविवेकाख्यविज्ञानेन युक्तमेव मनो हरन्तीन्द्रियाणीति संबन्धः। हिशब्दार्थमनूद्य तस्मादिन्द्रियाणि स्ववशे स्थापयितव्यानीति पूर्वेण संबन्धमभिसन्धायाह  यतस्तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.60।।ननु यत्नज्ञानाभ्यामिन्द्रियजयमुक्त्वायततोऽपि इति तद्विरुद्धं कथमुच्यते इति चेत् न इन्द्रियजयार्थं किं निराहारत्वलक्षणेन महाप्रयत्नेन प्रत्याहारादिना साधारणेन प्रत्यनेन तत्सम्भवात् तथा किमपरोक्षज्ञानेन नित्यानित्यविवेकज्ञानेनापि तदुपपत्तेरित्याशङ्क्य तन्निषेधोऽत्र क्रियत इत्याशयवान् व्याचष्टे  अपरोक्षे ति। ज्ञानस्य प्राधान्यसूचनाय विपश्चितोऽपीत्येतत्पश्चादुक्तमपि अपरोक्षेत्यादौ व्याख्यातम्। यततोऽपीत्यस्यार्थः  साधारणे ति। हरन्ति विषयसन्निकृष्टानि तदभिमुखं कृत्वा तद्रागीकुर्वन्तीत्यर्थः। पुरुषस्येति व्यर्थं स्त्रीणामप्येवम्भावादित्यत आह  पुरुषस्ये ति। एतच्चोक्तोपपादनार्थम्।प्रमाथीनि इत्यस्य प्रयोजनं वक्तुमाह  को दोष  इति। एतावताऽऽत्मनस्तदविजयः कथं इत्याशयः। मनो हृतवन्ति पुरुषस्य क्षोभणशीलानि न तेन विजितानीति भावः।पुरुषस्य इत्यनेनोभयत्रास्यान्वयं दर्शयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.60।।अपरोक्षज्ञानरहितज्ञानिनोऽपि साधारणयत्नवतोऽपि मनो हरन्तीन्द्रियाणि। पुरुषस्य शरीराभिमानिनः। को दोषस्ततः प्रमाथीनि प्रमथनशीलानि पुरुषस्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.60।।आत्मदर्शनेन विना विषयरागो न निवर्तते अनिवृत्ते विषयरागे  विपश्चितो  यतमानस्य  अपि पुरुषस्य   इन्द्रियाणि प्रमाथीनि  बलवन्ति  मनः  प्रसह्य  हरन्ति।  एवम् इन्द्रियजय आत्मदर्शनाधीन आत्मदर्शनम् इन्द्रियजयाधीनम् इति ज्ञाननिष्ठा दुष्प्राप्या।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.60।।  यततः  प्रयत्नं कुर्वतः  अपि हि  यस्मात्  कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः  मेधाविनः अपि इति व्यवहितेन संबन्धः।  इन्द्रियाणि प्रमाथीनि  प्रमथनशीलानि विषयाभिमुखं हि पुरुषं विक्षोभयन्ति आकुलीकुर्वन्ति आकुलीकृत्य च  हरन्ति प्रसभं  प्रसह्य प्रकाशमेव पश्यतो विवेकविज्ञानयुक्तं  मनः ।।यतः तस्मात्

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【 Verse 2.61 】

▸ Sanskrit Sloka: तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्पर: | वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||

▸ Transliteration: tāni sarvāṇi saṁyamya yukta āsīta matparaḥ | vaśe hi yasyendriyāṇi tasya prajñāpratiṣṭhitā ||

▸ Glossary: tāni: those senses; sarvāṇi: all; saṁyamya: keeping under control; yuktaḥ: yogi; āsīta: sitting; matparaḥ: devoted to Me; vaśe: in full subjugation; hi: indeed; yasya: one whose; indriyāṇi: senses; tasya: his; prajñā; mind; pratiṣṭhitā: stable

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.61 Having restrained them all, he should sit steadfast, intent on Me. His mind is steady in the present whose senses are under control.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.61।।कर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण होकर बैठे क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.61।। उन सब इन्द्रियों को संयमित कर युक्त और मत्पर होवे। जिस पुरुष की इन्द्रियां वश में होती हैं? उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित होती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.61 तानि them? सर्वाणि all? संयम्य having restrained? युक्तः joined? आसीत should sit? मत्परः intent on Me? वशे under control? हि indeed? यस्य whose? इन्द्रियाणि senses? तस्य his? प्रज्ञा wisdom? प्रतिष्ठिता is settled.Commentary He should control the senses and sit focussed on Me as the Supreme? with a calm mind. The wisdom of the Yogi who thus seated has brought all his senses under subjugation is doubtless ite steady. He is established in the Self. Sri Sankaracharya explains Asita Matparah as He should sit contemplating I am no other than He. (Cf.II.64).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.61. Restraining them (the same-organs) by mind, the master of Yoga would sit making Me his goal; for, the intellect of that person is stabilized whose sense-organs are under control.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.61 Restraining them all, let him meditate steadfastly on Me; for who thus conquers his senses achieves perfection.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.61 Having controlled all the senses, let him remain in contemplation, regarding Me as supreme; for, his knowledge is firmly set whose senses are under control.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.61 Controlling all of them, one should remain concentrated on Me as the supreme. For, the wisdom of one whose organs are under control becomes steadfast.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.61 Having restrained them all he should sit steadfast, intent on Me; his wisdom is steady whose senses are under control.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.61 Tani etc. He, who restrains his sense-organs in this manner by means of his mind, but not by inactivity-he alone is a man-of-stabilized-intellect. He would remain viewing Me alone as his goal i.e., he would concentrate his attention on nothing but Me, the Supreme Lord, the Consciousness-Self.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.61 With a desire to overcome this mutual dependence between the subduing of the senses and vision of the self, one has to coner the senses which are difficult to subdue on account of their attachment to sense-objects. So, focussing the mind on Me who am the only auspicious object for meditation, let him remain steadfast. When the mind is focussed on Me as its object, then such a mind, purified by the burning away of all impurities and devoid of attachment to the senses, is able to control the senses. Then the mind with the senses under control will be able to experience the self. As said in Visnu Purana, 'As the leaping fire fanned by the wind burns away a forest of dry trees, so Visnu, who is in the hearts of all the Yogins, destroys all the sins.' Sri Krsna teaches the same here: 'He whose senses are under control, his knowledge is firmly set.'

Sri Krsna says: 'One who endeavours to subdue the senses, depending on one's own exertions, and does not focus the mind on Me in this way, becomes lost.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.61 Samyamya, controlling, having subdued; sarvani, all; tani, of them; asita, one should remain; yuktah, concentrated; mat-parah, on Me as the supreme he to whom I, Vasudeva, the inmost Self of all, am the supreme (parah) is mat-parah. The idea is, he should remain (concentrated) thinking, 'I am not different from Him.' Hi, for; the prajna, wisdom; tasya, of one, of the sannyasin remaining thus concentrated; yasya, whose; indriyani, organs; are vase, under control, by dint of practice; [The organs come under control either by constantly thinking of oneself as non-different from the Self, or by constantly being mindful of the evils that result from objects.] pratisthita, becomes steadfast. Now, then, is being stated this [This:what is described in the following two verses, and is also a matter of common experience.] root, cause of all the evils that beset one who is the verge of being overwhelmed:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.61।। अध्यात्म साम्राज्य के सम्राट आत्मा के पतन का मूल कारण ये इन्द्रियां ही हैं। अर्जुन को यहां सावधान किया गया है कि वह पूर्णत्व प्राप्ति के लिये इन्द्रियों और विषयों के अनियन्त्रित एवं उन्मुक्त विचरण के प्रति सतत सजग रहे। आधुनिक मनोविज्ञान गीता के इस उपदेश पर नाकभौं सिकोड़ेगा क्योंकि जर्मन मनोवैज्ञानिक सिगमण्ड फ्रायड के अनुसार वासनायें मनुष्य की स्वाभाविक मूल प्रवृत्ति हैं और उनके संयमित करने का अर्थ है उनका अप्राकृतिक दमन।पाश्चात्य देशों में संयम का अर्थ दमन समझा जाता है और मन के स्वास्थ्य की दृष्टि से दमन को कोई भी स्वीकार नहीं करेगा। परन्तु वैदिक दर्शन में कहीं भी दमन का उपदेश नहीं दिया गया। वहाँ तो बुद्धि की उस परिपक्वता पर बल दिया गया है जिससे मनुष्य का व्यक्तित्व खिल उठे और श्रेष्ठ वस्तुओं की प्राप्ति से निकृष्ट की इच्छा अपने आप ही छूट जाये। वहाँ इच्छाओं का दमन नहीं वरन् उनसे ऊपर उठने को कहा गया है।भगवान् श्रीकृष्ण इस वैदिक सिद्धांत को यहां अत्यन्त सुन्दर ढंग से स्पष्ट करते हैं। वे आत्म विकास की साधना के विधेयात्मक (जो करना चाहिये) और निषेधात्मक (जो त्यागना चाहिये) दोनों पक्षों पर प्रकाश डालते हैं। आत्मविकास के जो प्रतिकूल भोग और कर्म हैं उन्हें त्यागकर अनुकूल साधना का अभ्यास करना चाहिये। विधेयात्मक साधना में भगवान् शिष्य को मत्पर होने का उपदेश देते हैं। मत्पर का अर्थ हैजो मुझ परमात्मा को ही जीवन का परम लक्ष्य समझता है।युक्त आसीत मत्पर इस अर्ध पंक्ति में ही गीता द्वारा आत्मविकास की पूर्ण साधना बतायी गयी है। मनुष्य को पशु के स्तर पर ले जाने वाली अनैतिक एवं कामुक प्रवृत्तियां उसके असंख्य जन्मजन्मान्तरों में किये विषयोपभोग और उनसे अर्जित वासनाओं का ही परिणाम है। एक जीवन में ही उन सबको नष्ट करना अथवा उनके परे जाना मनुष्य के लिये कदापि संभव नहीं। नैतिकता के उन्नायकों आदर्श शिक्षकों और अध्यात्म के साधकों की निराशा का भी यही एक कारण है।इन वैषयिक प्रवृत्तियों को समाप्त करने का साधन प्राचीन ऋषियों ने स्वानुभव से खोज निकाला था। ध्यान के शान्त वातवरण में मन को अपने शुद्ध पूर्ण स्वरूप में स्थिर करने का प्रयत्न ही वह साधना है। इसके अभ्यास से जिसकी इन्द्रियां स्वत ही वश में आ गयी हैं वही स्थितप्रज्ञ पुरुष माना जाता है।इस श्लोक का गूढ़ार्थ अब स्पष्ट हो जाता है निराहारी का बलपूर्वक किया हुआ इन्द्रिय निग्रह क्षणिक है जिससे आध्यात्मिक सौन्दर्य के खिल उठने की कोई आशा नहीं करनी चाहिये। आत्मानुभाव में स्थित जिस पुरुष की इन्द्रियाँ स्वत वश में रहती हैं वह स्थितप्रज्ञ है। न तो वह इन्द्रियों को नष्ट करता है और न उनका उपयोग ही बन्द करता है। एवं पूर्णत्व प्राप्त ज्ञानी पुरुष वह है जिसकी इन्द्रियाँ और मन वश में होकर उसकी सेवा में सदैव तत्पर रहते हैं।अब भगवान् असफल व्यक्ति के पतन के कारण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.61।।   तस्मात्तानि सर्वाणि वशीकृत्य युक्तः समाहितः सन् मत्परोऽहं वासुदेवः सर्वप्रत्यगात्मा परो यस्य स मत्परो नान्यस्तस्मादहमित्यासीतेत्यर्थः। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.61।।एवं तर्हि तत्र कः प्रतीकार इत्यत आह तानीन्द्रियाणि सर्वाणि ज्ञानकर्मसाधनभूतानि संयम्य वशीकृत्य युक्तः समाहितो निगृहीतमनाः सन्नासीत निर्व्यापारस्तिष्ठेत्। प्रमाथिनां कथं स्ववशीकरणमिति चेत्तत्राह मत्पर इति। अहं सर्वात्मा वासुदेव एव पर उत्कृष्ट उपादेयो यस्य स मत्परः। एकान्तमद्भक्त इत्यर्थः। तथा चोक्तम्न वासुदेवभक्तानामशुभं विद्यते क्वचित् इति। यथा हि लोके बलवन्तं राजानमाश्रित्य दस्यवो निगृह्यन्ते राजाश्रितोऽयमिति ज्ञात्वा च ते स्वयमेव तद्वश्या भवन्ति तथैव भगवन्तं सर्वान्तर्यामिणमाश्रित्य तत्प्रभावेणैव दुष्टानीन्द्रियाणि निग्राह्याणि। पुनश्च भगवदाश्रितोऽयमिति मत्वा तानि तद्वश्यान्येव भवन्तीति भावः। यथाच भगवतद्भक्तेर्महाप्रभावत्वं तथा विस्तरेणाग्रे व्याख्यास्यामः। इन्द्रियवशीकारे फलमाह वशे हीति। स्पष्टम्। तदेतद्वशीकृतेन्द्रियः सन्नासीतेति किमासीतेति प्रश्नस्योत्तरमुक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.61।।यद्यप्येवं तथापि तानि नियन्तव्यान्येवान्यथास्थितप्रज्ञत्वस्यैवासिद्धेरित्याह  तानीति।  संयम्य वशीकृत्य युक्तः संनद्धो मत्परः अहमेव सर्वेषां प्रत्यगात्मा परः स्त्र्यादिभ्यो बाह्येभ्यो देहेन्द्रियादिभ्य आन्तरेभ्यश्च उत्कृष्टः प्रियतमो यस्य स मत्परः सन्नासीत। हि यस्मात् वशे आज्ञायाम्। शेषं स्पष्टम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.61।।अतस्तानि सर्वाणि संयम्य स्ववशगानि कृत्वा मत्परः अहमेव परो यस्य तादृशो युक्तः मयि युक्त आसीत। एवं यो मत्परस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता। यस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता तस्येन्द्रियाणि वशे भवन्ति नान्यस्येत्यर्थः। प्रमाथित्वादिति भावः। अत एव पूर्वार्द्धे विपश्चितामपि तदसामर्थ्यमुक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.61।।यस्मादेवं तस्मात्  तानीति।  युक्तो योगी तानीन्द्रियाणि संयम्य मत्परः सन्नासीत। यस्य वशे वशवर्तीनि। एतेन कथमासीतेति प्रश्नस्य वशीकृतेन्द्रियः सन्नासीतेत्युत्तरमुक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.60 2.61।।तेष्वेव प्रथममुपदेशे कर्त्तव्यतादृढनाय तस्यासनं सहेतुकं लक्षयति यततोऽपीति द्वाभ्याम्। यततोऽपि तत्तदिन्द्रियजयाभ्यास एव श्रेयान् मनःप्रमाथित्वादिद्रियाणां अतस्तानि सर्वाणि प्रथमं बुद्ध्या संयम्य युक्तो य आसीत मत्परः तस्यैव प्रतिष्ठिता प्रज्ञाऽवसेया।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.61।।जब कि यह बात है इसलिये उन सब इन्द्रियोंको रोककर यानी वशमें करके और युक्त समाहितचित्त हो मेरे परायण होकर बैठना चाहिये। अर्थात् सबका अन्तरात्मारूप मैं वासुदेव ही जिसका सबसे पर हूँ वह मत्पर है अर्थात् मैं उस परमात्मासे भिन्न नहीं हूँ। इस प्रकार मुझसे अपनेको अभिन्न माननेवाला होकर बैठना चाहिये। क्योंकि इस प्रकार बैठनेवाले जिस यतिकी इन्द्रियाँ अभ्यासबलसे ( उसके ) वशमें है उसकी प्रज्ञा प्रतिष्ठित है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.61।। व्याख्या    तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः   जो बलपूर्वक मनका हरण करनेवाली इन्द्रियाँ हैं उन सबको वशमें करके अर्थात् सजगतापूर्वक उनको कभी भी विषयोंमें विचलित न होने देकर स्वयं मेरे परायण हो जाय। तात्पर्य यह हुआ कि जब साधक इन्द्रियोंको वशमें करता है तब उसमें अपने बलका अभिमान रहता है कि मैंने इन्द्रियोंको अपने वशमें किया है। यह अभिमान साधकको उन्नत नहीं होने देता और उसे भगवान्से विमुख करा देता है। अतः साधक इन्द्रियोंका संयमन करनेमें कभी अपने बलका अभिमान न करे उसमें अपने उद्योगको कारण न माने प्रत्युत केवल भगवत्कृपाको ही कारण माने कि मेरेको इन्द्रियोंके संयमनमें जो सफलता मिली है वह केवल भगवान्की कृपासे ही मिली है। इस प्रकार केवल भगवान्के परायण होनेसे उसका साधन सिद्ध हो जाता है।यहाँ  मत्परः  कहनेका मतलब है कि मानवशरीरका मिलना साधनमें रुचि होना साधनमें लगना साधनका सिद्ध होना ये सभी भगवान्की कृपापर ही निर्भर हैं। परन्तु अभिमानके कारण मनुष्यका इस तरफ ध्यान कम जाता है। कर्मयोगीयोंमें तो कर्म करनेकी ही प्रधानता रहती है और उसमें वह अपना ही पुरुषार्थ मानता रहता है। अतः भगवान् विशेष कृपा करके कर्मयोगी साधकके लिये भी अपने परायण होनेकी बात कह रहे हैं।भगवान्के परायण होनेका तात्पर्य है केवल भगवान्में ही महत्त्वबुद्धि हो कि भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का हूँ संसार मेरा नहीं है और मैं संसारका नहीं हूँ। कारण कि भगवान् ही हरदम मेरे साथ रहते हैं संसार मेरे साथ रहता ही नहीं। इस प्रकार साधकका मैंपन केवल भगवान्में ही लगा रहे।कर्मयोगका प्रकरण होनेसे यहाँ भगवान्को कर्मयोगके अनुसार उपाय बताना चाहिये था। परन्तु गीताका अध्ययन करनेसे ऐसा मालूम देता है कि साधनकी सफलतामें केवल भगवत्परायणता ही कारण है। अतः गीतामें भगवत्परायणताकी बहुत महिमा गायी गयी है जैसे जितने भी योगी हैं उन सब योगियोंमें श्रद्धाप्रेमपूर्वक मेरे परायण होकर मेरा भजन करनेवाला श्रेष्ठ है (6। 47 ) आदिआदि। वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता   पहले उनसठवें श्लोकमें भगवान्ने यह कहा कि इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर भी स्थितप्रज्ञता नहीं होती और इस श्लोकमें कहते हैं कि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं वह स्थितप्रज्ञ है। इसका तात्पर्य यह है कि वहाँ (2। 59 में) इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर भी भीतरमें रसबुद्धि पड़ी है अतः इन्द्रियाँ वशमें नहीं है। परन्तु यहाँ

Chapter 2 (Part 35)

स्थितप्रज्ञ पुरुषकी इन्द्रियाँ वशमें हैं और उसकी रसबुद्धि निवृत्त हो गयी है। इसलिये यह नियम नहीं है कि इन्द्रियोंका विषयोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर वह स्थितप्रज्ञ हो ही जायगा क्योंकि उसमें रसबुद्धि रह सकती है। परन्तु यह नियम है स्थितप्रज्ञ होनेसे इन्द्रियाँ वशमें हो ही जायँगी। सम्बन्ध   भगवान्के परायण होनेसे तो इन्द्रियाँ वशमें होकर रसबुद्धि निवृत्त हो ही जायगी पर भगवान्के परायण न होनेसे क्या होता है इसपर आगेके दो श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.61।।ननु तपस्विनोऽपि कथं स्थितप्रज्ञशब्दो न प्रवर्तते उच्यते विषया इति। यद्यपि आह्ार्यैः रूपादिभिर्विषयैः संबन्धोऽस्य नास्ति तथापि तस्य विषया अन्तःकरणगतमुपरागलक्षणं रसं वर्जयित्वा एव निवर्तन्ते। अतो नासौ स्थिरप्रज्ञः। रसं केचिदास्वाद्यं मधुरादिकमाहुः (K omits this entire sentence )। योगिनस्तु परमेश्वरदर्शनात् उपरागो न (N omits न) भवति। अन्यस्य तु तपस्विनो नासौ निवर्तते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.61।।इन्द्रियाणां स्ववशत्वसंपादनानन्तरं कर्तव्यमर्थमाह  तानीति।  एवमासीनस्य किं स्यादिति तदाह  वशे हीति।  समाहितस्य विक्षेपविकलस्य कथमासनमित्यपेक्षायामाह  मत्पर इति।  परापरभेदशङ्कामपाकृत्यासनमेव स्फोरयति  नान्योऽहमिति।  उत्तरार्धं व्याकरोति  एवमिति।  हिशब्दार्थं स्फुटयति  अभ्यासेति।  परस्मादात्मनो नाहमन्योऽस्मीति प्रागुक्तानुसंधानस्यादरेण नैरन्तर्यदीर्घकालानुष्ठानसामर्थ्यादित्यर्थः। अथवा विषयेषु दोषदर्शनाभ्याससामर्थ्यादिन्द्रियाणि संयतानीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.61।।उपोद्धातस्य साध्ये वक्तव्ये तानि सर्वाणीति किमुच्यत इत्यतोऽन्तरापतितां शङ्कां निवर्तयितुमेतदिति भावेनाह  तर्ही ति। यदि साधारणविवेकज्ञानाभ्यां न जीयन्ते इत्यर्थः। अशक्यान्येव जेतुमिति शेषः। निराहारस्य देहावस्थानासम्भवात्। ब्रह्मापरोक्षज्ञानस्य चेन्द्रियजयसाध्यतयाऽभिप्रेतत्वेनेतरेतराश्रयप्रसङ्गादिति भावः। तथा च तज्जयस्य ज्ञानसाधनत्वं यद्विवक्षितं तन्न सम्भवतीति शङ्काशेषः। इन्द्रियसंयमोऽशक्य एवेति शङ्कायां तानि सर्वाणि संयम्यासीतेति किमेतदुच्यते इत्यत आह  बहुयत्ने ति। यत्नं बहुमिति शेषः। यद्यपि तज्जयेन परोक्तं साधनं अस्मदुक्तं वा शक्यं तथापि तत्प्रतिनिधिना महाप्रयत्नेन जय्यानीत्यर्थः। एतदप्युपोद्धातत्वेनैवोक्तमिति ज्ञातव्यम्। युक्त इति नैतद्युजिरो रूपम् येन प्रतिसम्बन्ध्याकाङ्क्षायां तदनुक्तिदोषः स्यात् किन्तु समाध्यर्थस्य युजेरिति भावेनाह  युक्त  इति। मत्पर इत्युत्तरत्र श्रवणात्मयि इत्युक्तम्। मत्पर इत्यद्वैतज्ञानं इत्यन्यैर्व्याख्यातं तन्नाक्षरानुसारीत्याशयवान्व्याचष्टे  अहमेवे ति। भगवानेव सर्वस्मादुत्कृष्ट इति ज्ञात्वा तस्मिन्नेव निरन्तरं मनसो योजनं इन्द्रियजये परं साधनमिति भावः। निराहारत्वादिकं तु वस्तुगतिप्रदर्शनार्थमेवोक्तमिति मन्तव्यम्। यदर्थमयमुपोद्धात उक्तस्तत्प्रदर्शन पर तयोत्तरार्धतात्पर्यमाह  फल मिति। यद्येवं ततः किमित्याशङ्कायां इन्द्रियजयस्य ज्ञानं फलमाहेत्यर्थः। यत एवं ज्ञानं महायाससाध्येन्द्रियजयफलं अतएवायासभीरुर्जनो न तत्साधयति न तु ज्ञानस्योक्तलक्षणत्वाभावादिति श्लोकत्रयतात्पर्यार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.61।।तर्ह्यशक्यान्येवेत्यत आह तानीति। बहुयत्नतः शक्यानि। अतो यत्नं कुर्यादित्याशयः। युक्तो मयि मनोयोगयुक्तः। अहमेव परः सर्वस्मादुत्कृष्टो यस्य स मत्परः। फलमाह वशे हीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.61।।सर्वस्य दोषस्य परिजिहीर्षया विषयानुरागयुक्ततया दुर्जयानि इन्द्रियाणि  संयम्य  चेतसः शुभाश्रय भूते मयि मनः अवस्थाप्य समाहितः आसीत। मनसि मद्विषये सति निर्दग्धाशेषकल्मषतया निर्मलीकृतं विषयानुरागरहितं मन इन्द्रियाणि स्ववशानि करोति। ततो वश्येन्द्रियं मन आत्मदर्शनाय प्रभवति। उक्तं च यथाग्निरुद्धतशिखः कक्षं दहति सानिलः। तथा चित्तस्थितो विष्णुर्योगिनां सर्वकिल्बिषम्।। (वि0 पु0 6।7।74) इति। तदाह वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता इति।एवं मयि अनिवेश्य मनः स्वयत्नगौरवेण इन्द्रियजये प्रवृत्तो विनष्टो भवति इत्याह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.61।।  तानि सर्वाणि संयम्य  संयमनं वशीकरणं कृत्वा  युक्तः  समाहितः सन्  आसीत मत्परः  अहं वासुदेवः सर्वप्रत्यगात्मा परो यस्य सः मत्परः न अन्योऽहं तस्मात् इति आसीत इत्यर्थः। एवमासीनस्य यतेः  वशे हि यस्य इन्द्रियाणि  वर्तन्ते अभ्यासबलात्  तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।अथेदानीं पराभविष्यतः सर्वानर्थमूलमिदमुच्यते

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【 Verse 2.62 】

▸ Sanskrit Sloka: ध्यायतो विषयान्पुंस: सङ्गस्तेषूपजायते | सङ्गात्सञ्जायते काम: कामात्क्रोधोऽभिजायते ||

▸ Transliteration: dhyāyato viṣayānpuṁsaḥ saṅgasteṣūpajāyate | saṅgātsañjāyate kāmaḥ kāmātkrodhobhijāyate ||

▸ Glossary: dhyāyataḥ: contemplating; viṣayān: sense objects; puṁsaḥ: of the person; saṅgaḥ: attachment; teṣu: in these sense objects; upajāyate: develops; saṅgāt: from attachment; saṁjāyate: develops; kāmaḥ: desire; kāmāt: from desire; krodhaḥ: anger; abhijāyate: ensues

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.62 When a man thinks of objects, it gives rise to attachment for them. From attachment, desire arises; from desire, anger is born.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.62 2.63।।विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.62।। विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उसमें आसक्ति हो जाती है? आसक्ति से इच्छा और इच्छा से क्रोध उत्पन्न होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.62 ध्यायतः thinking? विषयान् (on) objects of the senses? पुंसः of a man? सङ्गः attachment? तेषु in them? उपजायते arises? सङ्गात् from attachment? संजायते is born? कामः desire? कामात् from desire? क्रोधः anger? अभिजायते arises.Commentary When a man thinks of the beauty and the pleasant and alluring features of the senseobjects he becomes attached to them. He then regards them as something worthy of acisition and possession and hankers after them. He develops a strong desire to possess them. Then he endeavours his level best to obtain them. When his desire is frustrated by some cause or other? anger arises in his mind. If anybody puts any obstruction in his way of obtaining the objects he hates him? fights with him and develops hostility towards hi. (Cf.II.64).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.62. In a person, meditating on sense-objects, attachment or them is born in succession; from attachment springs passion; from passion arises wrath.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.62 When a man dwells on the objects of sense, he creates an attraction for them; attraction develops into desire, and desire breeds anger.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.62 To a man thinking about sense-objects, there arises attachment to them; form attachment arises desire, from desire arises anger;

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.62-2.63 In the case of a person who dwells on objects, there arises attachment for them. From attachment grows hankering, from hankering springs anger.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.62 When a man thinks of the objects, attachment for them arises; from attachment desire is born; from desire anger arises.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.62 See Comment under 2.63

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.62 Indeed, in respect of a person, whose attachment to sense-objects is expelled but whose mind is not focussed on Me, even though he controls the senses, contemplation on sense-objects is unavoidable on account of the impressions of sins from time immemorial. Again attachment increases fully in 'a man who thinks about sense-objects'. From attachment arises desire.' What is called 'desire' is the further stage of attachment. After reaching that stage, it is not possible for a man to stay without experiencing the sense-objects. 'From such desire arises anger.' When a desire exists without its object being nearby, anger arises against persons nearby under the following. 'Our desire is thwarted by these persons.'

'From anger there comes delusion'. Delusion is want of discrimination between what ought to be done and what ought not to be done. Not possessing that discrimination one does anything and everything. Then there follows the failure of memory, i.e., of the impressions of the earlier efforts of sense control, when one strives again to control the senses.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.62 Pumsah, in the case of a person; dhyayatah, who dwells on, thinks of; visayan, the objects, the specialities [Specialities: The charms imagined in them.] of the objects such as sound etc.; upajayate, there arises; sangah, attachment, fondness, love; tesu, for them, for those objects. Sangat, from attachment, from love; sanjayate, grows; kamah, hankering, thirst. When that is obstructed from any arter, kamat, from hankering; abhijayate, springs; krodhah, anger. Krodhat, from anger; bhavati, follows; sammohah, delusion, absence of discrimination with regard to what should or should not be done. For, an angry man, becoming deluded, abuses even a teacher. Sammohat, from delusion; (comes) smrti-vibhramah, failure of memory originating from the impressions acired from the instructions of the scriptures and teachers. When there is an occasion for memory to rise, it does not occur. Smrti-bhramsat, from that failure of memory; (results) buddhi-nasah, loss of understanding. The unfitness of the mind to discriminate between what should or should not be done is called loss of understanding. Buddhi-nasat, from the loss of understanding; pranasyati, he perishes. Indeed, a man continues tobe himself so long as his mind remains fit to distinguish between what he ought to and ought not do. When it becomes unfit, a man is verily ruined. Therefore, when his internal organ, his understanding, is destroyed, a man is ruined, i.e. he becomes unfit for the human Goal. Thinking of objects has been said to be the root of all evils. After that, this which is the cause of Liberation is being now stated: [If even the memory of objects be a source of evil, then their enjoyment is more so. Hence, a sannyasin seeking Liberation cannot avoid this evil, since he has to move about for food which is necessary for the maintenance of his body. The present verse is an answer to this apprehension.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.62।। no commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.62 2.63।।इन्द्रियस्य जयः प्रयत्नेन संपाद्य इत्युक्तं तत्र मनसा विषयाचिन्तनाभ्यास एवोपाय इत्याशयेन व्यतिरेके दोषमाह  ध्यायत इति।  विषयांश्चिन्तयतः पुरुषस्य तेषु प्रीतिरुपजायते सङ्गादभिलाषः संजायते कामात्कुतश्चित्प्रतिहतात्क्रोधोऽभिजायते क्रोधात्कर्तव्याकर्तव्यविषये विभ्रमो भवति क्रुद्धो हि संमूढो गुरुनप्याक्रोशति तस्मात् स्मृतेः शास्त्राचार्योपदेशाहितसंस्कारजनितायाः विभ्रंशः स्यात् स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तावनुत्पत्तिः ततः कार्याकार्यविवेकायोग्यता बुद्धेर्नाशः तस्मात्प्रणश्यति जीवन्नेव मृतः पुरुषार्थायोग्यो भवतीति द्वयोरर्थः। विषयध्यानमेव सर्वानर्थबीजमित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.62 2.63।।ननु मनसो बाह्येन्द्रियप्रवृत्तिद्वाराऽनर्थहेतुत्वं निगृहीतबाह्येन्द्रियस्य तूत्खातदंष्ट्रोरगवन्मनस्यनिगृहीतेऽपि न कापि क्षतिर्बाह्योद्योगाभावेनैव कृतकृत्यत्वादतो युक्त आसीतेति व्यर्थमुक्तमित्याशङ्का निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि युक्तत्वाभावे सर्वानर्थप्राप्तिमाह द्वाभ्याम् निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि शब्दादीन्विषयान्ध्यायतो मनसा पुनःपुनश्चिन्तयतः पुंसस्तेषु विषयेषु सङ्ग आसङ्गो ममात्यन्तं सुखहेतव एत इत्येवं शोभनाध्यासलक्षणः प्रीतिविशेष उपजायते। सङ्गात्सुखहेतुत्वज्ञानलक्षणात्संजायते कामो ममैते भवन्त्विति तृष्णाविशेषः। तस्मात्कामात्कुतश्चित्प्रतिहन्यमानात्तत्प्रतिघातकविषयः क्रोधोऽभिज्वलनात्माभिजायते। क्रोधाद्भवति संमोहः कार्याकार्यविवेकाभावरूपः। संमोहात्स्मृतिविभ्रमः स्मृतेः शास्त्राचार्योपदिष्टार्थानुसन्धानस्य विभ्रमो विचलनं विभ्रंशः। तस्माच्च स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धेरैकात्म्याकारमनोवृत्तेर्नाशो विपरीतभावनोपचयदोषेण प्रतिबन्धादनुत्पत्तिरनुत्पन्नायाश्च फलायोग्यत्वेन विलयः। बुद्धिनाशात्प्रणश्यति तस्याश्च फलभूताया बुद्धेर्विलोपात्प्रणश्यति सर्वपुरुषार्थायोग्यो भवति। यो हि पुरुषार्था योग्यो जातः स मृत एवेति लोके व्यवह्रियते। अतः प्रणश्यतीत्युक्तम्। यस्मादेवं मनसो निग्रहाभावे निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि परमानर्थप्राप्तिस्तस्मान्महता प्रयत्नेन मनो निगृह्णीयादित्यभिप्रायः। अतो युक्तमुक्तंतानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.62।।यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह। बुद्धिश्च न विचेष्टति तामाहुः परमां गतिम् इति श्रुतौ इन्द्रियमनोबुद्धीनां निग्रहे परमपदप्राप्तिरित्युक्तम्। तत्र उपसंहृतकरणस्य बाह्याञ्शब्दादीनगृह्णतो मनोमात्रेणावस्थितस्य योगिनो मनसोऽनिग्रहे किं स्यादित्याह  ध्यायत इति  द्वाभ्याम्। विषयाञ्शब्दादीन्ध्यायतश्चिन्तयतः पुंसः पुरुषस्य तेषु शब्दादिषु सङ्गः संबन्धो जायते। बाह्यार्थेभ्यो निगृहीतान्यपीन्द्रियाणि मनोदोषात्पुनर्बाह्यार्थान्गृह्णन्तीत्यर्थः। ततः सङ्गात्कामस्तस्मिन्विषयेऽभिलाषः संजायते। कामात्कुतश्चिद्धेतोः प्रतिहतादभिज्वलनात्मा क्रोधोऽभिजायते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.62।।अथकथं व्रजेत इत्यत्रोत्तरमाह ध्यायत इति। विषयान् ध्यायतः पुंसस्तेषु सङ्ग आसक्तिः स्यात्। आसक्त्या किं स्यात् इत्यत आह सङ्गादिति। सङ्गात्कामः सञ्जायते कामाच्च क्रोधोऽभिजायते। अभितः सर्वतः तदयोग्येष्वपीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.62।।बाह्येन्द्रियसंयमाभावे दोषमुक्त्वा मनःसंयमाभावे दोषमाह  ध्यायत इति  द्वाभ्याम्। गुणबुद्ध्या विषयान्ध्यायतः पुरुषस्य तेषु सङ्ग आसक्तिर्भवति। आसक्त्या त तेष्वधिकः कामो भवति। कामाच्च केनचित्प्रतिहतात्क्रोधो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.62 2.63।।एवं बाह्येन्द्रियसंयमाभावे दोष उक्तः इदानीं मनोनिरोधाभावे योगबुद्धिभ्रंशदोष इति कथयंस्तस्य स्थिरप्रज्ञतां दर्शयति चतुर्भिः। तत्र मनःसंयमाभावे दोषमाह द्वाभ्याम् ध्यायत इति विषयानिति। विचारयतश्चिन्तयत इति यावत् आसक्तिर्भवति ततः कामाभिलाषः। ततः प्रतिहतादेव क्रोधः। ततो विवेकाभावः। ततश्च शास्त्राचार्योपदिष्टार्थः स्मृतेर्विप्लवः। ततो व्यवसायात्मिकबुद्धेर्नाशः। ततः प्रणश्यति अत्यन्तविस्मृतिं प्राप्तः प्राकृत एव भवति अविशुद्धोऽपि च।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.62।।इतना कहनेके उपरान्त अब यह पतनाभिमुख पुरुषके समस्त अनर्थोंका कारण बतलाया जाता है विषयोंका ध्यान चिन्तन करनेवाले पुरुषकी अर्थात् शब्दादि विषयोंके भेदोंकी बारंबार आलोचना करनेवाले पुरुषकी उन विषयोंमें आसक्ति प्रीति उत्पन्न हो जाती है। आसक्तिसे कामना तृष्णा उत्पन्न होती है। कामसे अर्थात् किसी भी कारणवश विच्छिन्न हुई इच्छासे क्रोध उत्पन्न होता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.62।।  व्याख्या ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते   भगवान्के परायण न होनेसे भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा है और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करतेकरते मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति राग प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो चाहे शारीरिक हो उससे जो सुख होता है उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बारबार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन करे चाहे न करे पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है यह नियम है। सङ्गात्संजायते कामः   विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग वस्तुएँ मेरेको मिलें। कामात्क्रोधोऽभिजायते   कामनाके अनुकूल पदार्थोंके मिलते रहनेसे लोभ पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है पर उसमें कोई बाधा देता है तो उसपर क्रोध आ जाता है।कामना एक ऐसी चीज है जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण आश्रम गुण योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है उस अभिमानमें भी अपने आदर सम्मान आदिकी कामना रहती है उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है। कामना रजोगुणी वृत्ति है सम्मोह तमोगुणी वृत्ति है और क्रोध रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है।कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है तो उसके मूलमें कहींनकहीं राग अवश्य होता है। जैसे नीतिन्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है तो नीतिन्यायमें राग है। अपमानतिरस्कार करनेवालेपर क्रोध आता है तो मानसत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है आदिआदि। क्रोधाद्भवति सम्मोहः   क्रोधसे सम्मोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है जैसे (1) कामसे जो सम्मोह होता है उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है।(2) क्रोधसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटीसीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है।(3) लोभसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्यको सत्यअसत्य धर्मअधर्म आदिका विचार नहीं रहता और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है।(4) ममतासे जो सम्मोह होता है उसमें समभाव नहीं रहता प्रत्युत पक्षपात पैदा हो जाता है।अगर काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधका ही नाम क्यों लिया इसमें गहराईसे देखा जाय तो काम लोभ और ममता इनमें तो अपने सुखभोग और स्वार्थकी वृत्ति जाग्रत रहती है पर क्रोधमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी वृत्ति जाग्रत् रहती है। अतः क्रोधसे जो सम्मोह होता है वह काम लोभ और ममतासे पैदा हुए सम्मोहसे भी भयंकर होता है। इस दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधसे ही सम्मोह होना बताया है। सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः   मूढ़ता छा जानेसे स्मृति नष्ट हो जाती है अर्थात् शास्त्रोंसे सद्विचारोंसे जो निश्चय किया था कि अपनेको ऐसा काम करना है ऐसा साधन करना है अपना उद्धार करना है उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है उसकी याद नहीं रहती। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशः   स्मृति नष्ट होनेपर बुद्धिमें प्रकट होनेवाला विवेक लुप्त हो जाता है अर्थात् मनुष्यमें नया विचार करनेकी शक्ति नहीं रहती। बुद्धिनाशात्प्रणश्यति   विवेक लुप्त हो जानेसे मनुष्य अपनी स्थितिसे गिर जाता है। अतः इस पतनसे बचनेके लिये सभी साधकोंको भगवान्के परायण होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।यहाँ विषयोंका ध्यान करनेमात्रसे राग रागसे काम कामसे क्रोध क्रोधसे सम्मोह सम्मोहसे स्मृतिनाश स्मृतिनाशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन यह जो क्रम बताया है इसका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है पर इन सभी वृत्तियोंके पैदा होनेमें और उससे मनुष्यका पतन होनेमें देरी नहीं लगती। बिजलीके करेंटकी तरह ये सभी वृत्तियाँ तत्काल पैदा होकर मनुष्यका पतन करा देती हैं। सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके श्लोकमें स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है इस चौथे प्रश्नका उत्तर देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.62।।यत्तस्यापीति। यत् यस्मात् तस्यापि तपस्विनो मन इन्द्रियैः ह्रियते। अथवा यत्तस्य सयत्नस्यापि। योगिना च मन एव जेतव्यमिति द्वितीयो निर्णीतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.62।।समनन्तरश्लोकद्वयतात्पर्यमाह  अथेति।  पुरुषार्थोपायोपदेशानन्तर्यमथशब्दार्थः। तन्निष्ठत्वराहित्यावस्थां दर्शयति  इदानीमिति।  पराभविष्यतो महान्तमनर्थं गमिष्यतो विवेकविज्ञानविहीनस्येति यावत् सर्वानर्थमूलं विषयाभिध्यानं तस्य तथात्वमनुभवसिद्धमिति वक्तुमिदमित्युक्तन्। विषयेषु विशेषत्वमारोपितरमणीयत्वं प्रीतिरासक्तिरिति साधारणासक्तिमात्रं गृह्यते। तृष्णेत्युद्रिका शक्तिरुक्ता प्रतिबन्धेन प्रणाशेन वा प्रतिहतिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.62 2.63।।ध्यायतः इत्यादिना प्रकृतानुपयुक्तं किमेतदुच्यते इत्यत आह  रागादी ति। रागादिदोषस्य कारणं रागादिदोषकारणम्। तथा रागादिदोषः कारणं यस्य तद्रागादिदोषकारणम् परिहाराय रागादिदोषस्य। इदमुक्तं भवति मत्परो युक्त आसीत 2।61 इतीन्द्रियजयस्य परमसाधनमुक्तम्। रागद्वेषपरिहारोऽप्यपरं साधनमिति वक्ष्यति। तत्र स एव कथं स्यात् इत्या(शङ्कायां) काङ्क्षायां उपोद्धातप्रक्रिययेदमुच्यत इति। सम्मोहो मूर्छाऽत्र न सङ्गच्छत इत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे  सम्मोह  इति। अधर्मेच्छा अकार्येच्छा। कुतः इत्यत आह  तथा ही ति। संशब्दस्तु तस्यैव विशेषक इति भावः। अदृष्टरूपाधर्मविषयम्। तद्धेतुषु पापकर्मसु च नियतं कामनं मोहसंज्ञितमित्यर्थः। स्पष्टं चात्र प्रमाणमाह  तथा चे ति। यत्किञ्चिद्विषयस्य स्मृतिविभ्रमस्य प्रकृतानुपयोगात्सम्यग्व्याचष्टे  स्मृतिविभ्रम  इति। विभ्रमोऽनवस्थानं नाश इति यावत्। चेतनस्य कथं बुद्धिनाशः इत्यत आह  बुद्धिनाश  इति। स्मृतिविभ्रम एवायमित्यतः सर्वात्मनेत्युक्तम्। नित्य आत्मेत्युक्तम् तत्कथं विनश्यति इत्यत आह  विनश्यती ति। उक्तार्थे प्रमाणमाह  तथा ही ति। तदा दोषादृष्टेः। एतदुक्तं भवति रागद्वेषयोः परम्परयानरकाद्यनर्थप्राप्तिः कार्यमिति ज्ञानेन तत्परिजिहीर्षायां विषयध्यानपरम्परया तत्कारणमिति ज्ञानेन तदकारणात्तयोरनुत्पादो भवतीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.62 2.63।।रागादिदोषकारणमाह परिहाराय श्लोकद्वयेन। सम्मोहोऽधर्मेच्छा। तथा हि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासुमोहसंज्ञितम्। अधर्मलक्षणं च नियतं पापकर्मसु इति। तथाचान्यत्रसम्मोहोऽधर्मकामिता इति। स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिस्मृतिनाशः। बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः। विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति। तथा ह्युक्तम् अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा। दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.62।।अनिरस्तविषयानुरागस्य हि मयि अनिवेशतिमनस इन्द्रियाणि संयम्य अवस्थितस्य अपि अनादिपापवासनया विषयध्यानम् अवर्जनीयं स्यात्।  ध्यायतो विषयान् पुंसः  पुनरपि  सङ्गः  अतिप्रवृद्धो जायते।  सङ्गात् संजायते कामः।  कामो नाम सङ्गस्य विपाकदशा। पुरुषो यां दशाम् आपन्नो विषयान् अभुक्त्वा स्थातुं न शक्नोति स कामः।  कामात् क्रोधः अभिजायते।  कामे वर्तमाने विषये च असन्निहिते सन्निहितान् पुरुषान् प्रति एभिः अस्मदिष्टं विहतम् इति क्रोधो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.62।।  ध्यायतः  चिन्तयतः  विषयान्  शब्दादीन् विषयविशेषान् आलोचयतः  पुंसः  पुरुषस्य  सङ्गः  आसक्तिः प्रीतिः  तेषु  विषयेषु  उपजायते  उत्पद्यते।  सङ्गात्  प्रीतेः  संजायते  समुत्पद्यते  कामः  तृष्णा।  कामात्  कुतश्चित् प्रतिहतात्  क्रोधः अभिजायते।।

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【 Verse 2.63 】

▸ Sanskrit Sloka: क्रोधाद्भवति सम्मोह: सम्मोहात्स्मृतिविभ्रम: | स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ||

▸ Transliteration: krodhād bhavati saṁmohaḥ saṁmohāt smṛtivibhramaḥ | smṛtibhraṁśād buddhināśo buddhināśātpraṇaśyati ||

▸ Glossary: krodhāt: from anger; bhavati: takes place; saṁmohaḥ: illusion; saṁmohāt: from illusion; smṛti: of memory; vibhramaḥ: loss; smṛti bhraṁśāt: from loss of memory; buddhi nāśaḥ: loss of reason; buddhināśāt: from loss of reason; praṇaśyati: perishes

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.63 From anger arises delusion, from delusion, loss of memory, from loss of memory, the destruction of discrimination, from destruction of discrimination, he perishes.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.62 2.63।।विषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.63।। क्रोध से उत्पन्न होता है मोह और मोह से स्मृति विभ्रम। स्मृति के भ्रमित होने पर बुद्धि का नाश होता है और बुद्धि के नाश होने से वह मनुष्य नष्ट हो जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.63 क्रोधात् from anger? भवति comes? संमोहः delusion? संमोहात् from delusion? स्मृतिविभ्रमः loss of memory? स्मृतिभ्रंशात् from loss of memory? बुद्धिनाशः the destruction of discriminatio? बुद्धिनाशात् from the,destruction of discrimination? प्रणश्यति (he) perishes.Commentary From anger arises delusion. When a man becomes angry he loses his power of discrimination between right and wrong. He will speak and do anything he likes. He will be swept away by the impulse of passion and emotion and will act irrationally.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.63. From wrath delusion comes to be; from delusion is the loss of memory; from the loss of memory is the loss of capacity to decide; due to the loss of capacity to decide, he perishes outright.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.63 Anger induces delusion; delusion, loss of memory; through loss of memory, reason is shattered; and loss of reason leads to destruction.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.63 From anger there comes delusion; from delusion, the loss of memory; from the loss of memory, the destruction of discrimination; and with the destruction of discrimination, he is lost.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.63 From anger follows delusion; from delusion, failure of memory; from failure of memory, the loss of understanding; from the loss of understanding, he perishes.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.63 From anger comes delusion; from delusion loss of memory; from loss of memory the destruction of discrimination; from the destruction of discrimination he perishes.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.63 Dhyayatah etc. krodhat etc. In the case of an ascetic, the very act of abandoning sense-objects itself resutls in undertaking the sense-objects. For, they abandon indeed by meditating [on them], and at the very time of such a meditation, attachment etc., are born in regular succession. Hence the act of abandoning objects is harmless only in the case of a man-of-stabilized-intellect. (65)

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.63 'From the loss of memory there comes the destruction of discrimination.' The meaning is that there will be destruction of the effect of efforts made earlier to attain the knowledge of the self. From the destruction of discrimination, one becomes lost, i.e., is sunk in Samsara or worldliness.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.63 Pumsah, in the case of a person; dhyayatah, who dwells on, thinks of; visayan, the objects, the specialities [Specialities: The charms imagined in them.] of the objects such as sound etc.; upajayate, there arises; sangah, attachment, fondness, love; tesu, for them, for those objects. Sangat, from attachment, from love; sanjayate, grows; kamah, hankering, thirst. When that is obstructed from any arter, kamat, from hankering; abhijayate, springs; krodhah, anger. Krodhat, from anger; bhavati, follows; sammohah, delusion, absence of discrimination with regard to what should or should not be done. For, an angry man, becoming deluded, abuses even a teacher. Sammohat, from delusion; (comes) smrti-vibhramah, failure of memory originating from the impressions acired from the instructions of the scriptures and teachers. When there is an occasion for memory to rise, it does not occur. Smrti-bhramsat, from that failure of memory; (results) buddhi-nasah, loss of understanding. The unfitness of the mind to discriminate between what should or should not be done is called loss of understanding. Buddhi-nasat, from the loss of understanding; pranasyati, he perishes. Indeed, a man continues tobe himself so long as his mind remains fit to distinguish between what he ought to and ought not do. When it becomes unfit, a man is verily ruined. Therefore, when his internal organ, his understanding, is destroyed, a man is ruined, i.e. he becomes unfit for the human Goal. Thinking of objects has been said to be the root of all evils. After that, this which is the cause of Liberation is being now stated: [If even the memory of objects be a source of evil, then their enjoyment is more so. Hence, a sannyasin seeking Liberation cannot avoid this evil, since he has to move about for food which is necessary for the maintenance of his body. The present verse is an answer to this apprehension.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.63।। इस श्लोक के आगे पाँच सुन्दर श्लोकों में श्रीकृष्ण हिन्दू मनोविज्ञान के अनुसार देवत्व की स्थिति से मनुष्य के पतन का कारण बताते हैं। इसका एक मात्र प्रयोजन है महाबाहु अर्जुन को सभी ओर से इन्द्रियों को वश में रखने के महत्व को समझाना। इन्द्रियों पर स्वामित्व रखने वाला पुरष ही हिन्दू शास्त्रों के अनुसार स्थितप्रज्ञ कहलाता है।यह प्रकरण उन समस्त साधकों के आत्मचरित्र की रूपरेखा भी प्रस्तुत करता है जो दीर्घ काल तक साधनारत रहने के उपरान्त भी असफलता एवं निराशा की चट्टानों से टकराकर चूरचूर हो जाते हैं। वेदान्त के सच्चे साधक का पतन असम्भव है। असफल साधकों के उदाहरण कम नहीं हैं और उन सभी की असफलता का एक मात्र कारण विषयों के शिकार होना ही है। यह भी देखा गया है कि एक बार पतन होने पर वे फिर सम्हल नहीं पाते उनके लिये पतन का अर्थ है सम्पूर्ण नाश पतन की सीढ़ी का यह बहुत सुन्दर वर्णन है। स्वयं के नाश की सीढ़ी का वर्णन इतना विस्तारपूर्वक इसलिये किया गया है कि हमारे जैसे साधक यह समझ सकें कि पुन अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप को किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है।जैसे छोटे से बीज से बड़े वृक्ष की उत्पत्ति होती है वैसे ही हमारे नाश का बीज है असद् विचार और मिथ्या कल्पनायेंे। विचार में रचना शक्ति है यह हमारा निर्माण अथवा नाश कर सकती है। निर्माण और विनाश उस शक्ति के सदुपयोग और दुरुपयोग पर निर्भर करते हैं। जब मनुष्य किसी विषय को सुन्दर और सुख का साधन समझकर उसका निरन्तर चिन्तन करता है तब उससे उत्पन्न होती है उस विषय में आसक्ति। इस आसक्ति के और अधिक बढ़ने पर वह उसकी उत्कट इच्छा या कामना का रूप लेती है जिसको पूर्ण किये बिना मनुष्य शान्ति से नहीं बैठ सकता। यदि कामना पूर्ति के मार्ग में कोई विघ्न आता है तो उस विघ्न की ओर होने वाली प्रतिक्रिया को कहते हैं क्रोध।क्रोध का परिणाम यह होता है कि मनुष्य जहाँ जो वस्तु या गुण नहीं है उसे वहाँ देखने लग जाता है जिसे मोह नाम दिया गया है। मोह का अर्थ है अविवेक। मोह ही स्मृति के नाश का कारण है। क्रोध के आवेश में मनुष्य सभी सम्बन्ध भूलकर चाहें जैसा व्यवहार कर सकता है। श्रीशंकराचार्य लिखतें हैं कि क्रोधावेश में मनुष्य अपने पूज्य गुरु एवं मातापिता के ऋण को भूलकर उनका भी तिरस्कार करता है।इस प्रकार असद् विचारों से प्रारम्भ होकर आसक्ति (संग) इच्छा क्रोध मोह और स्मृति के नाश तक जब मनुष्य का पतन हुआ तो अगली सीढ़ी है बुद्धि का नाश। बुद्धि में विवेक की वह सार्मथ्य है जिससे हम अच्छेबुरे धर्मअधर्म का निर्णय कर सकते हैं। निषिद्ध कर्मों को करते समय बुद्धि हमें उससे परावृत्त करने का प्रयत्न भी करती है। यदि यह बुद्धि ही नष्ट हो जाय तो मनुष्य का मनुष्यत्व ही नष्ट हुआ समझना चाहिये। बुद्धिनाश के बाद तो वह पशु से भी हीन व्यवहार करता है और फिर कभी जीवन में श्रेष्ठ और उच्च ध्येय को न समझ सकता है और न प्राप्त कर सकता है। यहाँ मनुष्य के ऩाश से तात्पर्य यह है कि अपने शुद्ध स्वरूप को पहचान कर वह मनुष्य जीवन के परमपुरुषार्थ मोक्ष को प्राप्त करने योग्य नहीं रह जाता।विषयों के चिन्तन को यहाँ सभी अनर्थों का कारण बताया है। अब मोक्ष प्राप्ति का साधन बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.62 2.63।।इन्द्रियस्य जयः प्रयत्नेन संपाद्य इत्युक्तं तत्र मनसा विषयाचिन्तनाभ्यास एवोपाय इत्याशयेन व्यतिरेके दोषमाह  ध्यायत इति।  विषयांश्चिन्तयतः पुरुषस्य तेषु प्रीतिरुपजायते सङ्गादभिलाषः संजायते कामात्कुतश्चित्प्रतिहतात्क्रोधोऽभिजायते क्रोधात्कर्तव्याकर्तव्यविषये विभ्रमो भवति क्रुद्धो हि संमूढो गुरुनप्याक्रोशति तस्मात् स्मृतेः शास्त्राचार्योपदेशाहितसंस्कारजनितायाः विभ्रंशः स्यात् स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तावनुत्पत्तिः ततः कार्याकार्यविवेकायोग्यता बुद्धेर्नाशः तस्मात्प्रणश्यति जीवन्नेव मृतः पुरुषार्थायोग्यो भवतीति द्वयोरर्थः। विषयध्यानमेव सर्वानर्थबीजमित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.62 2.63।।ननु मनसो बाह्येन्द्रियप्रवृत्तिद्वाराऽनर्थहेतुत्वं निगृहीतबाह्येन्द्रियस्य तूत्खातदंष्ट्रोरगवन्मनस्यनिगृहीतेऽपि न कापि क्षतिर्बाह्योद्योगाभावेनैव कृतकृत्यत्वादतो युक्त आसीतेति व्यर्थमुक्तमित्याशङ्का निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि युक्तत्वाभावे सर्वानर्थप्राप्तिमाह द्वाभ्याम् निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि शब्दादीन्विषयान्ध्यायतो मनसा पुनःपुनश्चिन्तयतः पुंसस्तेषु विषयेषु सङ्ग आसङ्गो ममात्यन्तं सुखहेतव एत इत्येवं शोभनाध्यासलक्षणः प्रीतिविशेष उपजायते। सङ्गात्सुखहेतुत्वज्ञानलक्षणात्संजायते कामो ममैते भवन्त्विति तृष्णाविशेषः। तस्मात्कामात्कुतश्चित्प्रतिहन्यमानात्तत्प्रतिघातकविषयः क्रोधोऽभिज्वलनात्माभिजायते। क्रोधाद्भवति संमोहः कार्याकार्यविवेकाभावरूपः। संमोहात्स्मृतिविभ्रमः स्मृतेः शास्त्राचार्योपदिष्टार्थानुसन्धानस्य विभ्रमो विचलनं विभ्रंशः। तस्माच्च स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धेरैकात्म्याकारमनोवृत्तेर्नाशो विपरीतभावनोपचयदोषेण प्रतिबन्धादनुत्पत्तिरनुत्पन्नायाश्च फलायोग्यत्वेन विलयः। बुद्धिनाशात्प्रणश्यति तस्याश्च फलभूताया बुद्धेर्विलोपात्प्रणश्यति सर्वपुरुषार्थायोग्यो भवति। यो हि पुरुषार्था योग्यो जातः स मृत एवेति लोके व्यवह्रियते। अतः प्रणश्यतीत्युक्तम्। यस्मादेवं मनसो निग्रहाभावे निगृहीतबाह्येन्द्रियस्यापि परमानर्थप्राप्तिस्तस्मान्महता प्रयत्नेन मनो निगृह्णीयादित्यभिप्रायः। अतो युक्तमुक्तंतानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.63।।ततः क्रोधात्संमोहः कार्याकार्यविवेकाभावो भवति। ततः स्मृतिविभ्रमः शास्त्रार्थानुसंधानस्य विभ्रंशरूपं चलनं भवति। स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशः शास्त्रार्थस्य निश्चितस्यापि तिरोधानं भवति। तस्मिंश्च शास्त्रजे परोक्षज्ञानेऽपि नष्टे पुरुषो नश्यति पुरुषार्थायोग्यो भवति। यो हि तादृशः स नष्ट एवेति लोके वदन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.63।।क्रोधाच्च सम्मोहः। सम्य कं्৷৷৷৷৷৷৷৷. कारेण मोहो विवेकराहित्यम्। सम्मोहात्स्मृतेर्भगवत्स्मरणस्य विभ्रमः विशेषेण भ्रमः। भगवत्स्मरणानन्तरमनुस्मरणभ्रमे विशेषः। स्मृतिभ्रंशात्पूर्वोक्तबुद्धिनाशः स्यात्। बुद्धिनाशात्प्रणश्यति। पुनस्तत्साधनप्रवृत्तिराहित्यं नाशे प्रकर्षः। विषयध्यानसङ्गरहितो व्रजेति भावः ()।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.63।।किंच  क्रोधादिति।  क्रोधात्संमोहः कार्याकार्यविवेकाभावः। ततः शास्त्राचार्योपदिष्टार्थस्मृतेर्विभ्रमो विचलनम्। ततो बुद्धेश्चेतनाया विनाशो वृक्षादिष्विवाभिभवः। ततः प्रणश्यति मृततुल्यो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.62 2.63।।एवं बाह्येन्द्रियसंयमाभावे दोष उक्तः इदानीं मनोनिरोधाभावे योगबुद्धिभ्रंशदोष इति कथयंस्तस्य स्थिरप्रज्ञतां दर्शयति चतुर्भिः। तत्र मनःसंयमाभावे दोषमाह द्वाभ्याम् ध्यायत इति विषयानिति। विचारयतश्चिन्तयत इति यावत् आसक्तिर्भवति ततः कामाभिलाषः। ततः प्रतिहतादेव क्रोधः। ततो विवेकाभावः। ततश्च शास्त्राचार्योपदिष्टार्थः स्मृतेर्विप्लवः। ततो व्यवसायात्मिकबुद्धेर्नाशः। ततः प्रणश्यति अत्यन्तविस्मृतिं प्राप्तः प्राकृत एव भवति अविशुद्धोऽपि च।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.63।।क्रोधसे संमोह अर्थात् कर्तव्यअकर्तव्यविषयक अविवेक उत्पन्न होता है क्योंकि क्रोधी मनुष्य मोहित होकर गुरुको ( बड़ेको ) भी गोली दे दिया करता है। मोहसे स्मृतिका विभ्रम होता है अर्थात् शास्त्र और आचार्यद्वारा सुने हुए उपदेशके संस्कारोंसे जो स्मृति उत्पन्न होती है उसके प्रकट होनेका निमित्त प्राप्त होनेपर वह प्रकट नहीं होती। इस प्रकार स्मृतिविभ्रम होनेसे बुद्धिका नाश हो जाता है। अन्तःकरणमें कार्यअकार्यविषयक विवेचनकी योग्यताका न रहना बुद्धिका नाश कहा जाता है। बुद्धिका नाश होनेसे ( यह मनुष्य ) नष्ट हो जाता है क्योंकि वह तबतक ही मनुष्य है जबतक उसका अन्तःकरण कार्यअकार्यके विवेचनमें समर्थ है ऐसी योग्यता न रहनेपर मनुष्य नष्टप्राय ( मनुष्यतासे हीन ) हो जाता है। अतः उस अन्तःकरणकी ( विवेकशक्तिरूप ) बुद्धिका नाश होनेसे पुरुषका नाश हो जाता है। इस कथनका यह अभिप्राय है कि वह पुरुषार्थके अयोग्य हो जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.63।।  व्याख्या ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते   भगवान्के परायण न होनेसे भगवान्का चिन्तन न होनेसे विषयोंका ही चिन्तन होता है। कारण कि जीवके एक तरफ परमात्मा है और एक तरफ संसार है। जब वह परमात्माका आश्रय छोड़ देता है तब वह संसारका आश्रय लेकर संसारका ही चिन्तन करता है क्योंकि संसारके सिवाय चिन्तनका कोई दूसरा विषय रहता ही नहीं। इस तरह चिन्तन करतेकरते मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति राग प्रियता पैदा हो जाती है। आसक्ति पैदा होनेसे मनुष्य उन विषयोंका सेवन करता है। विषयोंका सेवन चाहे मानसिक हो चाहे शारीरिक हो उससे जो सुख होता है उससे विषयोंमें प्रियता पैदा होती है। प्रियतासे उस विषयका बारबार चिन्तन होने लगता है। अब उस विषयका सेवन करे चाहे न करे पर विषयोंमें राग पैदा हो ही जाता है यह नियम है। सङ्गात्संजायते कामः   विषयोंमें राग पैदा होनेपर उन विषयोंको (भोगोंको) प्राप्त करनेकी कामना पैदा हो जाती है कि वे भोग वस्तुएँ मेरेको मिलें। कामात्क्रोधोऽभिजायते   कामनाके अनुकूल पदार्थोंके मिलते रहनेसे लोभ पैदा हो जाता है और कामनापूर्तिकी सम्भावना हो रही है पर उसमें कोई बाधा देता है तो उसपर क्रोध आ जाता है।कामना एक ऐसी चीज है जिसमें बाधा पड़नेपर क्रोध पैदा हो ही जाता है। वर्ण आश्रम गुण योग्यता आदिको लेकर अपनेमें जो अच्छाईका अभिमान रहता है उस अभिमानमें भी अपने आदर सम्मान आदिकी कामना रहती है उस कामनामें किसी व्यक्तिके द्वारा बाधा पड़नेपर भी क्रोध पैदा हो जाता है। कामना रजोगुणी वृत्ति है सम्मोह तमोगुणी वृत्ति है और क्रोध रजोगुण तथा तमोगुणके बीचकी वृत्ति है।कहीं भी किसी भी बातको लेकर क्रोध आता है तो उसके मूलमें कहींनकहीं राग अवश्य होता है। जैसे नीतिन्यायसे विरुद्ध काम करनेवालेको देखकर क्रोध आता है तो नीतिन्यायमें राग है। अपमानतिरस्कार करनेवालेपर क्रोध आता है तो मानसत्कारमें राग है। निन्दा करनेवालेपर क्रोध आता है तो प्रशंसामें राग है। दोषारोपण करनेवालेपर क्रोध आता है तो निर्दोषताके अभिमानमें राग है आदिआदि। क्रोधाद्भवति सम्मोहः   क्रोधसे सम्मोह होता है अर्थात् मूढ़ता छा जाती है। वास्तवमें देखा जाय तो काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है जैसे (1) कामसे जो सम्मोह होता है उसमें विवेकशक्ति ढक जानेसे मनुष्य कामके वशीभूत होकर न करनेलायक कार्य भी कर बैठता है।(2) क्रोधसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्य अपने मित्रों तथा पूज्यजनोंको भी उलटीसीधी बातें कह बैठता है और न करनेलायक बर्ताव भी कर बैठता है।(3) लोभसे जो सम्मोह होता है उसमें मनुष्यको सत्यअसत्य धर्मअधर्म आदिका विचार नहीं रहता और वह कपट करके लोगोंको ठग लेता है।(4) ममतासे जो सम्मोह होता है उसमें समभाव नहीं रहता प्रत्युत पक्षपात पैदा हो जाता है।अगर काम क्रोध लोभ और ममता इन चारोंसे ही सम्मोह होता है तो फिर भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधका ही नाम क्यों लिया इसमें गहराईसे देखा जाय तो काम लोभ और ममता इनमें तो अपने सुखभोग और स्वार्थकी वृत्ति जाग्रत रहती है पर क्रोधमें दूसरोंका अनिष्ट करनेकी वृत्ति जाग्रत् रहती है। अतः क्रोधसे जो सम्मोह होता है वह काम लोभ और ममतासे पैदा हुए सम्मोहसे भी भयंकर होता है। इस दृष्टिसे भगवान्ने यहाँ केवल क्रोधसे ही सम्मोह होना बताया है। सम्मोहात्स्मृतिविभ्रमः   मूढ़ता छा जानेसे स्मृति नष्ट हो जाती है अर्थात् शास्त्रोंसे सद्विचारोंसे जो निश्चय किया था कि अपनेको ऐसा काम करना है ऐसा साधन करना है अपना उद्धार करना है उसकी स्मृति नष्ट हो जाती है उसकी याद नहीं रहती। स्मृतिभ्रंशाद्बुद्धिनाशः   स्मृति नष्ट होनेपर बुद्धिमें प्रकट होनेवाला विवेक लुप्त हो जाता है अर्थात् मनुष्यमें नया विचार करनेकी शक्ति नहीं रहती। बुद्धिनाशात्प्रणश्यति   विवेक लुप्त हो जानेसे मनुष्य अपनी स्थितिसे गिर जाता है। अतः इस पतनसे बचनेके लिये सभी साधकोंको भगवान्के परायण होनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।यहाँ विषयोंका ध्यान करनेमात्रसे राग रागसे काम कामसे क्रोध क्रोधसे सम्मोह सम्मोहसे स्मृतिनाश स्मृतिनाशसे बुद्धिनाश और बुद्धिनाशसे पतन यह जो क्रम बताया है इसका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है पर इन सभी वृत्तियोंके पैदा होनेमें और उससे मनुष्यका पतन होनेमें देरी नहीं लगती। बिजलीके करेंटकी तरह ये सभी वृत्तियाँ तत्काल पैदा होकर मनुष्यका पतन करा देती हैं। सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके श्लोकमें स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है इस चौथे प्रश्नका उत्तर देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.63।।तानीति। य एवं मनसा इन्द्रियाणि नियमयति न त्वप्रवृत्त्या स एव स्थिरप्रज्ञः। स च मत्पर आसीत मामेव चिदात्मानं परमेश्वरमभ्यस्येत् ( N अभ्यसेत्)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.63।।क्रोधस्य संमोहहेतुत्वमनुभवेन द्रढयति  क्रुद्धो हीति।  आक्रोशत्यधिक्षिपति तदयोग्यत्वमपेरर्थः। संमोहकार्यं कथयति  संमोहादिति।  स्मृतेर्निमित्तनिवेदनद्वारा स्वरूपं निरूपयति  शास्त्रेति।  क्षणिकत्वादेव तस्याः स्वतो नाशसंभवान्न संमोहाधीनत्वं तस्येत्याशङ्क्याह  स्मृतीति।  स्मृतिभ्रंशेऽपि कथं बुद्धिनाशः स्वरूपतः सिध्यति तत्राह  कार्येति।  ननु पुरुषस्य नित्यसिद्धस्य बुद्धिनाशेऽपि प्रणाशो न कल्पते तत्राह  तावदेवेति।  कार्याकार्यविवेचनयोग्यान्तःकरणाभावे सतोऽपि पुरुषस्य करणाभावादपगततत्त्वविवेकविवक्षया नष्टत्वव्यपदेशः तदेतदाह  पुरुषार्थेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.62 2.63।।ध्यायतः इत्यादिना प्रकृतानुपयुक्तं किमेतदुच्यते इत्यत आह  रागादी ति। रागादिदोषस्य कारणं रागादिदोषकारणम्। तथा रागादिदोषः कारणं यस्य तद्रागादिदोषकारणम् परिहाराय रागादिदोषस्य। इदमुक्तं भवति मत्परो युक्त आसीत 2।61 इतीन्द्रियजयस्य परमसाधनमुक्तम्। रागद्वेषपरिहारोऽप्यपरं साधनमिति वक्ष्यति। तत्र स एव कथं स्यात् इत्या(शङ्कायां) काङ्क्षायां उपोद्धातप्रक्रिययेदमुच्यत इति। सम्मोहो मूर्छाऽत्र न सङ्गच्छत इत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे  सम्मोह  इति। अधर्मेच्छा अकार्येच्छा। कुतः इत्यत आह  तथा ही ति। संशब्दस्तु तस्यैव विशेषक इति भावः।

Chapter 2 (Part 36)

अदृष्टरूपाधर्मविषयम्। तद्धेतुषु पापकर्मसु च नियतं कामनं मोहसंज्ञितमित्यर्थः। स्पष्टं चात्र प्रमाणमाह  तथा चे ति। यत्किञ्चिद्विषयस्य स्मृतिविभ्रमस्य प्रकृतानुपयोगात्सम्यग्व्याचष्टे  स्मृतिविभ्रम  इति। विभ्रमोऽनवस्थानं नाश इति यावत्। चेतनस्य कथं बुद्धिनाशः इत्यत आह  बुद्धिनाश  इति। स्मृतिविभ्रम एवायमित्यतः सर्वात्मनेत्युक्तम्। नित्य आत्मेत्युक्तम् तत्कथं विनश्यति इत्यत आह  विनश्यती ति। उक्तार्थे प्रमाणमाह  तथा ही ति। तदा दोषादृष्टेः। एतदुक्तं भवति रागद्वेषयोः परम्परयानरकाद्यनर्थप्राप्तिः कार्यमिति ज्ञानेन तत्परिजिहीर्षायां विषयध्यानपरम्परया तत्कारणमिति ज्ञानेन तदकारणात्तयोरनुत्पादो भवतीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.62 2.63।।रागादिदोषकारणमाह परिहाराय श्लोकद्वयेन। सम्मोहोऽधर्मेच्छा। तथा हि मोहशब्दार्थ उक्त उपगीतासुमोहसंज्ञितम्। अधर्मलक्षणं च नियतं पापकर्मसु इति। तथाचान्यत्रसम्मोहोऽधर्मकामिता इति। स्मृतिविभ्रमः प्रतिषेधादिस्मृतिनाशः। बुद्धिनाशः सर्वात्मना दोषबुद्धिनाशः। विनश्यति नरकाद्यनर्थं प्राप्नोति। तथा ह्युक्तम् अधर्मकामिनः शास्त्रे विस्मृतिर्जायते यदा। दोषादृष्टेस्तत्कृतेश्च नरकं प्रतिपद्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.63।। क्रोधाद् भवति संमोहः।  संमोहः कृत्याकृत्यविवेकशून्यता तया सर्वं करोति। ततश्च प्रारब्धे इन्द्रियजयादिके प्रयत्ने स्मृतिभ्रंशो भवति।  स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशः  आत्मज्ञाने यो व्यवसायः कृतः तस्य नाशः स्यात्।  बुद्धिनाशाद्  पुनरपि संसारे निमग्नो नष्टो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.63।।  क्रोधात् भवति संमोहः  अविवेकः कार्याकार्यविषयः। क्रुद्धो हि संमूढः सन् गुरुमप्याक्रोशति।  संमोहात् स्मृतिविभ्रमः  शास्त्राचार्योपदेशाहितसंस्कारजनितायाः स्मृतेः स्यात् विभ्रमो भ्रंशः स्मृत्युत्पत्तिनिमित्तप्राप्तौ अनुत्पत्तिः। ततः  स्मृतिभ्रंशात् बुद्धिनाशः  बुद्धेर्नाशः। कार्याकार्यविषयविवेकायोग्यता अन्तःकरणस्य बुद्धेर्नाश उच्यते।  बुद्धिनाशात् प्रणश्यति।  तावदेव हि पुरुषः यावदन्तःकरणं तदीयं कार्याकार्यविषयविवेकयोग्यम्। तदयोग्यत्वे नष्ट एव पुरुषो भवति। अतः तस्यान्तःकरणस्य बुद्धेर्नाशात् प्रणश्यति पुरुषार्थायोग्यो भवतीत्यर्थः।।सर्वानर्थस्य मूलमुक्तं विषयाभिध्यानम्। अथ इदानीं मोक्षकारणमिदमुच्यते

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【 Verse 2.64 】

▸ Sanskrit Sloka: रागद्वेषवियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् | आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ||

▸ Transliteration: rāgadveṣaviyuktaistu viṣayānindriyaiścaran | ātmavaśyairvidheyātmā prasādamadhigacchati ||

▸ Glossary: rāga dveṣa: likes and disklikes; viyuktaiḥ: by those free from such things; tu: but; viṣayān: sense objects; indriyaiḥ: by the senses; caran: enjoying; ātmavaśyaih: by the disciplined; vidheyātmā: self controlled; prasādaṁ: placidity of mind; adhigacchati: attains

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.64 The self-controlled man, moving among objects with his senses under control, free from both attraction and repulsion, attains peace.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.64 2.65।।वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी प्रसन्नताको प्राप्त हो जाता है। प्रसन्नता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे प्रसन्नचित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.64।। आत्मसंयमी (विधेयात्मा) पुरुष रागद्वेष से रहित अपने वश में की हुई (आत्मवश्यै) इन्द्रियों द्वारा विषयों को भोगता हुआ प्रसन्नता (प्रस्ेााद) प्राप्त करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.64 रागद्वेषवियुक्तैः free from attraction and repulsion? तु but? विषयान् objects? इन्द्रियैः with senses? चरन् moving (amongst)? आत्मवश्यैः selfrestrained? विधेयात्मा the selfcontrolled? प्रसादम् to peace? अधिगच्छति attains.Commentary The mind and the senses are naturally endowed with the two currents of attraction and repulsion. Therefore? the mind and the senses like certain objects and dislike certain other objects. But the disciplined man moves among senseobjects with the mind and the senses free from attraction and repulsion and mastered by the Self? attains to the peace of the Eternal. The senses and the mind obey his will? as the disciplined self has a very strong will. The disciplined self takes only those objects which are ite necessary for the maintenance of the body without any love or hatred. He never takes those objects which are forbidden by the scriptures.In this verse Lord Krishna gives the answer to Arjunas fourth estion? How does a sage of steady wisdom move about (Cf.III.7.19?25XVIII.9).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.64. On the contrary, one who moves about (consumes) the sense-objects by means of his senseorgans, that are freed from desire and hatred and are controlled in the Self-such one with a disciplined self (mind) attains serenity [of disposition].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.64 But the self-controlled soul, who moves amongst sense objects, free from either attachment or repulsion, he wins eternal Peace.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.64 But he who goes through the sense-objects with the senses free from love and hate, disciplined and controlled, attains serenity.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.64 But by perceiving objects with the organs that are free from attraction and repulsion, and are under his own control, the self-controlled man attains serenity.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.64 But the self-controlled man, moving among the objects with the senses under restraint and free from attraction and repulsion, attains to peace.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.64 See Comment under 2.68

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.64 Having focussed, in the way already described, the mind on Me - the Lord of all and the auspicious object of meditation, he who goes through, i.e., considers with contempt the sense-objects, with senses under control and free from hate and attraction by reason of all impurities of mind being burnt out - such a person has a disciplined self, i.e., disciplined mind. He attains serenity. The meaning is that his mind will be free of impurities.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.64 Certainly the functions of the organs are naturally preceded by attraction and repulsion. This being so, caran, by perceiving; visayan, objects, which are unavoidable; indriyaih, with the organs such as ears etc.; raga-dvesa-viyuktaih, that are free from those attraction and repulsion; and are atma-vasyaih, under his own control; vidheya-atma, [A.G. takes atma-vasyaih in the sense of '(with the organs) under the control of the mind'. He then argues that it the mind be not under control, there can be no real control, over the organs. Hence the text uses the second expression, 'vidheyatma, whose mind can be subdued at will'. Here atma is used in the sense of the mind, according to the Commentator himself.] the self-controlled man, whose mind can be subdued at will, a seeker after Liberation; adhigacchati, attains; prasadam, serenity, self-poise. What happens when there is serenity? This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.64।। जो पुरुष आत्मसंयम से युक्त होकर जीवन में अनेक विषयों को ग्रहण करता है परन्तु न किसी से राग रखता है और न द्वेष वह शांति और प्रसन्नता ही प्राप्त करता है। विषयों से दूर भागने से किसी को शांति नहीं मिलती क्योंकि अन्तकरण की अशान्ति बाह्य विषयों के होने या न होने पर निर्भर नहीं करती उसका प्रमुख कारण प्रिय वस्तु को पाने की लालसा अथवा अप्रिय को त्यागने की इच्छा है।किन्तु पूर्ण आत्मनियन्त्रक ज्ञानी पुरुष अशान्ति के इन कारणों से सर्वथा मुक्त हुआ विचरण करता है। जैसे हम जहाँ कहीं भी जायें प्रकाश की स्थिति के अनुसार हमारी छाया हमारे आसपास बनी रहती है परन्तु वह छाया स्वयं किसी प्रकार हमें न राग के द्वारा बाँध सकती है और न द्वेष के कारण नष्ट ही कर सकती है बाह्य विषय जगत् केवल उस व्यक्ति को कष्ट पहुँचाता है जो स्वयं उन विषयों को ऐसी शक्ति प्रदान करता है कि वे उसको ही चूरचूर कर देंयदि कोई पागल व्यक्ति हाथ में चाबुक लेकर अपने ही शरीर पर मारता हुआ पीड़ा से रोये तो उसके दुखों का अन्त तभी होगा जब वह चाबुक को छोड़ देगा अथवा यदि चाबुक को हाथ में रखे तब भी उसे अपने शरीर पर ही न घुमाये इसी प्रकार मन ही विषयों में सुन्दरता आदि का आरोप कर उनको पाने के लिये परिश्रम करता है और स्वयं ही दुखी होता है। उपदेश की दृष्टि से यहाँ कहा गया है कि आत्मसंयमी पुरुष राग और द्वेष न रखकर विषयों को अपनी ओर से शक्ति नहीं देता कि वे उसे ही पीड़ित करें।आत्मसंयम तथा रागद्वेष का अभाव इन दो गुणों के होने पर विषयों के आकर्षण से उत्पन्न होने वाले मन के विक्षेप स्वत कम होने लगते हैं। मन की विक्षेपरहित स्थिति को ही शान्ति अथवा प्रसाद कहते हैं।पूजन विधि के अन्त में प्रसाद वितरण की क्रिया इस सिद्धान्त की ही द्योतक है। पूजन अथवा यज्ञ करते समय मनुष्य को संयमित रहकर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये जिसके फलस्वरूप वह मन में अपूर्व शान्ति का अनुभव करता है। वास्तव में इसको ही ईश्वर प्रसाद कहा जाता है। वेदान्ती चित्तशुद्धि को प्रसाद समझते हैं। रागद्वेष के अभाव में विक्षेपों का अभाव स्वाभाविक है और यही है चित्तशुद्धि।प्रसाद को प्राप्त करने पर क्या होगा सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.64।।एवं विषयचिन्तनस्यानर्थोपायत्वमुक्त्वा अथेदानीं विषयध्यानरहितस्य स्वाधीनस्य चेतसः परमपुरुषार्थोपायत्वं वदन्किं व्रजेतेत्यस्योत्तरमाह  रागेति।  विधेयात्मा स्वाधीनचित्तोऽत एवात्मवश्यैः स्वाधीनैरतएव रागद्वेषाभ्यां स्वाभाविकेन्द्रिय प्रवृत्तिहेतुरुपाभ्यां वियुक्तैरिन्द्रियैः विषयान्जीवनहेतून्भोजनाच्छादनादींश्चरन्नुपलभमानः प्रसन्नतां स्वास्थ्यं प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.64।।मनसि निगृहीते तु बाह्येन्द्रियनिग्रहाभावेऽपि न दोष इति वदन् किं व्रजेतेत्यस्योत्तरमाहाष्टभिः योऽसमाहितचेताः स बाह्येन्द्रियाणि निगृह्यापि रागद्वेषदुष्टेन मनसा विषयांश्चिन्तयन्पुरुषार्थाद्भ्रष्टो भवति। विधेयात्मा तु। तुशब्दः पूर्वस्माद्व्यतिरेकार्थः। वशीकृतान्तःकरणस्तु आत्मवश्यैर्मनोधीनैः स्वाधीनैरिति वा रागद्वेषाभ्यां वियुक्तैर्विरहितैरिन्द्रियैः श्रोत्रादिभिर्विषयाञ्शब्दादीननिषिद्धांश्चरन्नुपलभमानः प्रसादं प्रसन्नतां चित्तस्य स्वच्छतां परमात्मसाक्षात्कारयोग्यतामधिगच्छति। रागद्वेषप्रयुक्तानीन्द्रियाणि दोषहेतुतां प्रतिपद्यन्ते। मनसि स्ववशे तु न रागद्वेषौ। तयोरभावे च न तदधीनेन्द्रियप्रवृत्तिः। अवर्जनीयतया तु विषयोपलम्भो न दोषमावहंतीति न शुद्धिव्याघात इति भावः। एतेन विषयाणां स्मरणमपि चेदनर्थकारणं सुतरां तर्हि भोगस्तेन जीवनार्थं विषयान्भुञ्जानः कथमनर्थं न प्रतिपद्येतेति शङ्का निरस्ता। स्वाधीनैरिन्द्रियैर्विषयान्प्राप्नोतीति च किं व्रजेतेति प्रश्नस्योत्तरमुक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.64।।ननु विषयानध्यायतोऽपि योगिनो व्युत्थाने प्रमाणस्वाभाव्यादिन्द्रियाणां विषयेषु सङ्गो दुष्परिहरस्ततश्चोक्तरीत्या तस्यापि नाशप्रसक्तिरित्याशङ्क्याह  रागद्वेषेति।  विधेयात्मा किंकरीकृतमनास्तु आत्मवश्यैर्मनोधीनैरिन्द्रियैः स्वामिनश्चित्तस्य किंकरीकृतस्य कामक्रोधहीनत्वात्स्वयमपि रागद्वेषवियुक्तैः विषयान्पथि पतिततृणादीनीवानास्थया चरन्पश्यन्नपि पुमान् तत्र कामाद्यनुदयात्प्रसादं संकल्पविकल्पपङ्कलेपप्रक्षालनेन मनसः स्वाच्छ्यमधिगच्छति। मनसः स्वाच्छ्यमेव प्रत्यगात्मनः स्वाच्छ्यं तस्य तद्गुणसारत्वात्। अजितमनस्कमिव जितमनस्कं विषयसङ्गो न बाधतेऽतो मनोजयोऽवश्यं कर्तव्य इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.64।।समाधिस्थस्योत्तरमाह रागद्वेषवियुक्तैरिति। तुशब्दः पूर्वनिरूपणं व्यावर्त्तयति। विधेयात्मा विधेयो वशवर्त्ती आत्मा भगवान् यस्य तादृशो रागद्वेषादियुक्तैरात्मवश्यैः स्ववशैर्भगवद्वश्यैवां इन्द्रियैः विषयान् भोगान् भगवदिच्छया प्राप्तान् उपयोगं कुर्वन् प्रसादं भगवत्प्रसादमधिगच्छति। अत्रायं भावः भगवदिच्छया रसज्ञानार्थं स्वस्वरूपरसदानेच्छया प्राप्तान् भोगान् आत्मवश्यैर्भगवद्रसाभिलाषिभिस्तद्रसदानार्थे तद्दत्तान् ज्ञात्वा यावत् कार्यसिद्धिं भुञ्जतो भगवान् प्रसादं करोति। अत एव श्रीभागवते 11।14।18बाध्यमानोऽपि इत्यारभ्यविषयैर्नाभिभूयते इत्यन्तेन तथैवोक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.64।।नन्विन्द्रियाणां विषयप्रवणस्वभावानां विरोद्धुमशक्यत्वादयं दोषो दुष्परिहर इति स्थितप्रज्ञत्वं कथं स्यादित्याशङ्क्याह  रागेति  द्वाभ्याम्। रागद्वेषरहितैर्विगतदर्पैरिन्द्रियैर्विषयांश्चरन्भुञ्जानोऽपि प्रसादं शान्तिं प्राप्नोति। रागद्वेषराहित्यमेवाह आत्मनो मनसो वश्यैर्विधेयो वशवर्ती आत्मा मनो यस्येति। अनेनैव कथं व्रजेत भुञ्जीतेत्यस्य चतुर्थप्रश्नस्य स्वाधीनैरिन्द्रियैर्विषयानधिगच्छतीत्युत्तरमुक्तं भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.64 2.65।।नन्विन्द्रियाणां विषयाभिमुखस्वभावानां निरोधस्याशक्यत्वाद्दोषो दुष्परिहर इति कथं प्रज्ञायाः प्रतिष्ठितत्वं इत्याशङ्क्याह द्वाभ्याम् रागेति। यो वश्यात्मा स्वेन्द्रियै रागद्वेषवियुक्तैर्विषयानुपभुञ्जानोऽपि प्रसादं प्रशान्तिमधिगच्छति तस्य प्रसन्नचेतसः प्रज्ञा प्रतिष्ठिताऽवसेया।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.64।।विषयोंके चिन्तनको सब अनर्थोंका मूल बतलाया गया। अब यह मोक्षका साधन बतलाया जाता है आसक्ति और द्वेषको रागद्वेष कहते हैं इन दोनोंको लेकर ही इन्द्रियोंकी स्वाभाविक प्रवृत्ति हुआ करती है। परंतु जो मुमुक्षु होता है वह स्वाधीन अन्तःकरणवाला अर्थात् जिसका अन्तःकरण इच्छानुसार वशमें है ऐसा पुरुष रोगद्वेषसे रहित और अपने वशमें की हुई श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा अनिवार्य विषयोंको ग्रहण करता हुआ प्रसादको प्राप्त होता है। प्रसन्नता और स्वास्थ्यको प्रसाद कहते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.64।। व्याख्या    तु   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयससे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ  तु  पद आया है। विधेयात्मा   साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है। आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः   जैसे  विधेयात्मा  पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है ऐसे ही  आत्मवश्यैः  पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका रागद्वेष रहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं। पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि जो साधक रागद्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है। विषयान् चरन्   जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है और जिसकी इन्द्रियाँ रागद्वेषसे रहित तथा अपने वशमें की हुई है ऐसा साधक इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन अर्थात् सब प्रकारका व्यवहार तो करता है पर विषयोंका भोग नहीं करता। भोगबुद्धिसे किया हुआ विषयसेवन ही पतनका कारण होता है। इस भोगबुद्धिका निषेध करनेके लिये ही यहाँ  विधेयात्मा आत्मवश्यैः  आदि पद आये हैं। प्रसादमधिगच्छति   रागद्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन करनेसे साधक अन्तःकरणकी प्रसन्नता(स्वच्छता) को प्राप्त होता है। यह प्रसन्नता मानसिक तप है (गीता 17। 16) जो शारीरिक और वाचिक तपसे ऊँचा है। अतः साधकको न तो रागपूर्वक विषयोंका सेवन करना चाहिये और न द्वेषपूर्वक विषयोंका त्याग करना चाहिये क्योंकि राग और द्वेष इन दोनोंसे ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है।रागद्वेषसे रहित इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन करनेसे जो प्रसन्नता होती है उसका अगर सङ्ग न किया जाय भोग न किया जाय तो वह प्रसन्नता परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते   चित्तकी प्रसन्नता (स्वच्छता) प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है अर्थात् कोई भी दुःख नहीं रहता। कारण कि राग होनेसे ही चित्तमें खिन्नता होती है। खिन्नता होते ही कामना पैदा हो जाती है और कामनासे ही सब दुःख पैदा होते हैं। परन्तु जब राग मिट जाता है तब चित्तमें प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नतासे सम्पूर्ण दुःख मिट जाते हैं।जितने भी दुःख हैं वे सबकेसब प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरसंसारके सम्बन्धसे ही होते हैं और शरीरसंसारसे सम्बन्ध होता है सुखकी लिप्सासे। सुखकी लिप्सा होती है खिन्नतासे। परन्तु जब प्रसन्नता होती है तब खिन्नता मिट जाती है। खिन्नता मिटनेपर सुखकी लिप्सा नहीं रहती। सुखकी लिप्सा न रहनेसे शरीरसंसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है  सर्वदुःखानां हानिः।  तात्पर्य है कि प्रसन्नतासे दो बातें होती हैं संसारसे सम्बन्धविच्छेद और परमात्मामें बुद्धिकी स्थिरता। यही बात भगवान्ने पहले तिरपनवें श्लोकमें निश्चला और अचला पदोंसे कही है कि उसकी बुद्धि संसारमें निश्चल और परमात्मामें अचल हो जाती है।यहाँ  सर्वदुःखानां हानिः  का तात्पर्य यह नहीं है कि उसके सामने दुःखदायी परिस्थिति आयेगी ही नहीं प्रत्युत इसका तात्पर्य यह है कि कर्मोंके अनुसार उसके सामने दुःखदायी घटना परिस्थिति आ सकती है परन्तु उसके अन्तःकरणमें दुःख सन्ताप हलचल आदि विकृति नहीं हो सकती। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते   प्रसन्न (स्वच्छ) चित्तवालेकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मानें स्थिर हो जाती है अर्थात् साधक स्वयं परमात्मामें स्थिर हो जाता है उसकी बुद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। मार्मिक बात भगवद्विषयक प्रसन्नता हो अथवा व्याकुलता हो इन दोनोंमेंसे कोई एक भी अगर अधिक बढ़ जाती है तो वह शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। जैसे भगवान्के पास जाती हुई गोपियोंको मातापिता भाई पति आदिने रोक दिया मकानमें बंद कर दिया तो उन गोपियोंमें भगवान्से मिलनेकी जो व्याकुलता हुई उससे उनके पाप नष्ट हो गये और भगवान्का चिन्तन करनेसे जो प्रसन्नता हुई उससे उनके पुण्य नष्ट हो गये। इस प्रकार पापपुण्यसे रहित होकर वे शरीरको वहीं छोड़कर सबसे पहले भगवान्से जा मिलीं  (टिप्पणी   प0 102) । परन्तु सांसारिक विषयोंको लेकर जो प्रसन्नता और खिन्नता होती है उन दोनोंमें ही भोगोंके संस्कार दृढ़ होते हैं अर्थात् संसारका बन्धन दृढ़ होता है। इसके उदाहरण संसारमात्रके सामान्य प्राणी हैं जो प्रसन्नता और खिन्नताको लेकर संसारमें फँसे हुए हैं।प्रसन्नता और व्याकुलता(खिन्नता) में अन्तःकरण द्रवित हो जाता है। जैसे द्रवित मोममें रंग डालनेसे मोममें वह रंग स्थायी हो जाता है ऐसे ही अन्तःकरण द्रवित होनेपर उसमें भगवत्सम्बन्धी अथवा सांसारिक जो भी भाव आते हैं वे स्थायी हो जाते हैं। स्थायी होनेपर वे भाव उत्थान अथवा पतन करनेवाले हो जाते हैं। अतः साधकके लिये उचित है कि संसारकी प्रियसेप्रिय वस्तु मिलनेपर भी प्रसन्न न हो और अप्रियसेअप्रिय वस्तु मिलनेपर भी उद्विग्न न हो। सम्बन्ध   पीछेके दो श्लोकोंमें जो बात कही है उसीको आगेके दो श्लोकोंमें व्यतिरेक रीतिसे पुष्ट करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.64 2.65।।ध्यायत इति। क्रोधादिति। तपस्विनो विषयत्याग एव विषयग्रहणे पर्यवस्यति। ध्यात्वा हि ते त्यजन्ते। ध्यानकाले एव च (S omits च) संगादयः उपजायन्ते इति अनपायो (K अनुपायो) विषयत्यागः स्थिरप्रज्ञस्य एव ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.64।।विषयाणां स्मरणमपि चेदनर्थकारणं सुतरां तर्हि भोगस्तेन जीवनार्थं भुञ्जानो विषयाननर्थं कथं न प्रतिपद्यत इत्याशङ्क्य वृत्तानुवादपूर्वकमुत्तरश्लोकतात्पर्यमाह  सर्वानर्थस्येति।  अनर्थमूलकथनानन्तर्यमथशब्दार्थः। परिहर्तव्ये निर्णीते तत्परिहारोपायजिज्ञासां दर्शयति  इदानीमिति।  रागद्वेषपूर्विका प्रवृत्तिरित्यत्रानुभवदर्शनार्थो हिशब्दः। शास्त्रीयप्रवृत्तिव्यासेधार्थं स्वाभाविकीत्युक्तं तत्रेत्यधिकृतानधिकृत्य प्रयोगः। अवर्जनीयानशनपानादीन् देहस्थितिहेतूनिति यावत्। इन्द्रियाणां विषयेषु प्रवृत्तिश्चेन्नियमानुपपत्त्या वर्जनीयेष्वपि सा स्यादित्याशङ्क्याह  आत्मेति।  अन्तःकरणाधीनत्वेऽपीन्द्रियाणां तदनियमात्तेषामपि नियमानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह  विधेयात्मेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.64।।रागद्वेषेति श्लोकद्वयस्य तात्पर्यमाह  इन्द्रिये ति। इन्द्रियजयश्च तत्फलं चेन्द्रियजयफलं इन्द्रियजयस्य फलमिन्द्रियजयफलम्। अस्त्वेवं रागद्वेषपरिहारः ततः किं इत्याकाङ्क्षायां रागद्वेषपरिहारस्येन्द्रियजयाख्यं फलमाह इन्द्रियजयेन किं भवतिवशे हि यस्येन्द्रियाणि 2।61 इति ज्ञानं भवती त्युक्तमिति चेत् सत्यम् तत्किं साक्षादिन्द्रियजयफलं उत व्यवहितं इत्याकाङ्क्षायां इन्द्रियजयस्य फलं ज्ञानं यथा भवति तथाऽऽहेत्यर्थः। रागद्वेषपरिहारवद्विषयाचरणस्यापि इन्द्रियजयसाधनत्वमुच्यत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह  विषयानि ति। निराहारत्वमिन्द्रियजये कारणं तच्चाशक्यमतः कथमिन्द्रियजयः इत्याशङ्क्य देहधारणामात्रोपयुक्तविषयानुभवो न दोषायेति तदभ्युपगममात्रमनेन क्रियत इति भावः। इन्द्रियजयवाचकं पदमत्र न श्रूयत इति अतस्तद्व्याचष्टे।  विधेय  इति। स विधेयात्मेति शेषः। किमनेनापि इत्यत आह   जितात्मे ति। अनेन पादत्रयेण रागद्वेषपरिहारस्येन्द्रियजयाख्यं फलमुक्तम्। यद्यप्यनुवादोऽयं प्रतीयते तथाप्यप्राप्तत्वादन्यथा वाक्यवृत्तिः। तथाहि य उक्तविधया त्यक्तरागद्वेषः स रागद्वेषवियुक्तैस्ताभ्यामप्रयुक्तैः केवलशरीरधारणार्थं विषयांश्चरति स विधेयात्मा भवति तत एव बाह्येन्द्रियाण्यपि तस्य वश्यानि भवन्तीति। अत एव क्रमेण वाक्यद्वयस्य पृथक् तात्पर्यं नोक्तम्। द्वितीयाकाङ्क्षोत्तरत्वेनेन्द्रियजयस्य ज्ञानं व्यवहितफलमिति दर्शयितुं साक्षात्फलमुक्तम्। विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छतीति। तत्र प्रसादो नामात्मधर्म इति प्रतीयते तन्निवृत्त्यर्थमाह  प्रसाद मिति। प्रसन्नचेतस इति वक्ष्यमाणत्वादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.64।।इन्द्रियजयफलमाहोत्तराभ्यां श्लोकाभ्याम् विषयाननुभवन्नपि विधेय आत्मा यस्य सः जितात्मेत्यर्थः। प्रसादं मनःप्रसादम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.64।।उक्तेन प्रकारेण मयि सर्वेश्वरे चेतसः शुभाश्रयभूते न्यस्तमना निर्दग्धाशेषकल्मषतया  रागद्वेषवियुक्तैः आत्मवश्यैः इन्द्रियैः विषयान् चरन्  विषयान् तिरस्कृत्य वर्तमानो  विधेयात्मा  विधेयमनाः  प्रसादम् अधिगच्छति।  निर्मलान्तःकरणो भवति इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.64।।  रागद्वेषवियुक्तैः  रागश्च द्वेषश्च रागद्वेषौ तत्पुरःसरा हि इन्द्रियाणां प्रवृत्तिः स्वाभाविकी तत्र यो मुमुक्षुः भवति सः ताभ्यां वियुक्तैः श्रोत्रादिभिः  इन्द्रियैः विषयान्  अवर्जनीयान्  चरन्  उपलभमानः  आत्मवश्यैः  आत्मनः वश्यानि वशीभूतानि इन्द्रियाणि तैः आत्मवश्यैः  विधेयात्मा  इच्छातः विधेयः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं  प्रसादम् अधिगच्छति । प्रसादः प्रसन्नता स्वास्थ्यम्।।प्रसादे सति किं स्यात् इत्युच्यते

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【 Verse 2.65 】

▸ Sanskrit Sloka: प्रसादे सर्वदु:खानां हानिरस्योपजायते | प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धि: पर्यवतिष्ठते ||

▸ Transliteration: prasāde sarvaduḥkhānāṁ hānirasyopajāyate | prasannacetaso hyāśu buddhiḥ paryavatiṣṭhate ||

▸ Glossary: prasāde: with achieving peace of mind; sarva: of all; duḥkhānāṁ: of miser- ies; hāniḥ: destruction; asya: his; upajāyate: takes place; prasannacetasaḥ: of the happy-minded; hi: indeed; āśu: very soon; buddhiḥ: intelligence; pa- ryavatiṣṭhate: firmly established

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.65 All pains are destroyed in that peace, for the intellect of the tranquil-minded soon becomes steady.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.64 2.65।।वशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी प्रसन्नताको प्राप्त हो जाता है। प्रसन्नता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे प्रसन्नचित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.65।। प्रसाद के होने पर सम्पूर्ण दुखों का अन्त हो जाता है और प्रसन्नचित्त पुरुष की बुद्धि ही शीघ्र ही स्थिर हो जाती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.65 प्रसादे in peace? सर्वदुःखानाम् (of) all pains? हानिः destruction? अस्य of him? उपजायते arises (or happens)? प्रसन्नचेतसः of the tranilminded? हि because? आशु soon? बुद्धिः intellect (or reason)? पर्यवतिष्ठते becomes steady.Commentary When the mental peace is attained? there is no hankering after senseobjects. The Yogi has perfect mastery over his reason. The intellect abides in the Self. It is ite steady. The miseries of the body and the mind come to an end.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.65. On attaining serenity, there arises in succession the extinction of all miseries; the capacity to decide gets stabilized soon indeed in the case of a serene-minded one.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.65 Having attained Peace, he becomes free from misery; for when the mind gains peace, right discrimination follows.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.65 In that serenity there is loss of all sorrow; for in the case of the person with a serene mind, the Buddhi soon becomes well established.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.65 When there is serenity, there follows eradication of all his sorrows, because the wisdom of one who has a serene mind soon becomes firmly established.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.65 In that peace all pains are destroyed; for the intellect of the tranil-minded soon becomes steady.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.65 See Comment under 2.68

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.65 When the mind of this person gets serene, he gets rid of all sorrows originating from contact with matter. For, in respect of the peson whose mind is serene, i.e., is free from the evil which is antagonistic to the vision of the self, the Buddhi, having the pure self for its object, becomes established immediately. Thus, when the mind is serene, the loss of all sorrow surely arises.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.65 Prasade, when there is serenity; upajayate, there follows; hanih, eradication; asya sarva-duhkhanam, of all his, the sannyasin's, sorrow on the physical and other planes. Moreover, (this is so) hi, because; buddhih, the wisdom; prasanna-cetasah, of one who has a serene mind, of one whose mind is poised in the Self; asu, soon; pari-avatisthate, becomes firmly established; remains steady (avatisthate) totally (pari), like the sky, i.e. it becomes unmoving in its very nature as the Self. The meaning of the sentence is this: Since a person with such a poised mind and well-established wisdom attains fulfilment, therefore a man of concentration [A man who is free whom slavery to objects of the senses.] ought to deal with the indispensable and scripturally non-forbidden objects through his senses that are free from love and hatred. That same serenity is being eulogized:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.65।। शान्ति के मिलने पर क्या होगा ऐसा प्रश्न मानव बुद्धि में उठना स्वाभाविक है। शान्ति प्राप्त होने पर सब दुखों का अन्त हो जाता है। इस वाक्य में सुख की परिभाषा मिलती है। विक्षेपों का होना दुख कहलाता है। अत विक्षेपों के अभाव रूप मन की शान्ति का अर्थ सुख ही होना चाहिये। शान्ति ही सुख है और सुख ही शान्ति है।यहाँ दुखों की हानि से तात्पर्य वासना निवृत्ति से समझना चाहिये। गीता की प्रस्तावना में हमने देखा है कि बुद्धि पर पड़े वासनाओं के आवरण के कारण मनुष्य शोकमोह को प्राप्त होता है जबकि ज्ञानी पुरुष पूर्ववर्णित बुद्धियोग के अभ्यास से वासनाओं का क्षय करके उनके परे आत्मतत्त्व को पहचान लेता है। सामान्यत वासनाओं से मुक्ति पाना मनुष्य के लिये कठिन प्रतीत होता है परन्तु आत्मसंयम एवं समत्त्वयोग के द्वारा यह कार्य सम्पादन किया जा सकता है।अगले श्लोक में भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.65।।  प्रसादे इति।  प्रसादे सति अस्य विवेकिनः सर्वदुःखानां त्रिविधतापानां हानिरुपजायते। कुत इत्यत आह  प्रसन्नेति।  हि यस्मात्प्रसन्नचेतस आशु शीघ्रं बुद्धिः आत्मस्वरुपेणैव निश्चलीभवतीत्यर्थः। एवं प्रसन्नचेतसः स्थिरबुद्धेः कृतकृत्यता यतः तस्माद्रागद्वेषवियुक्तैरिन्द्रियैः शास्त्राविरुद्धेष्वावश्यकेषु जीवनहेतुभूतेषु युक्तः समाचरेदिति वाक्यार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.65।।प्रसादमधिगच्छति इत्युक्तं तत्र प्रसादे सति किं स्यादित्युच्यते। चित्तस्य प्रसादे स्वच्छत्वरूपे सति सर्वदुःखानामाध्यात्मिकादीनामज्ञानविलसितानां हानिर्विनाशोऽस्य यतेरुपजायते। हि यस्मात्प्रसन्नचेतसो यतेराशु शीघ्रमेव बुद्धिर्ब्रह्मात्मैक्याकारा पर्यवतिष्ठते परि समन्तादवतिष्ठते स्थिरा भवति विपरीतभावनादिप्रतिबन्धाभावात्। ततश्च प्रसादे सति बुद्धिपर्यवस्थानं ततस्तद्विरोध्यज्ञाननिवृत्तिः ततस्तत्कार्यसकलदुःखहानिरिति क्रमेऽपि प्रसादे यत्नाधिक्याय सर्वदुःखहानिकरत्वकथनमिति न विरोधः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.65।।किंच चित्तस्य प्रसादे हि अस्य पुंसः सर्वदुःखानां काममूलकानां कामाभावाद्धानिः परिहारो जायते। कामानुदये हेतुमाह  प्रसन्नेति।  हि यस्मात्प्रसन्नचेतसः पुंसो बुद्धिर्ब्रह्मात्मैक्यनिश्चय आशु शीघ्रं पर्यवतिष्ठते सुदृढो भवति। तस्मिंश्च सति प्राप्याभावान्न कामोदय इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.65।।प्रसादे किं स्यात् इत्याशङ्क्याह प्रसाद इति। प्रसादे जाते सति अस्य तदनुगृहीतस्य सर्वदुःखानां हानिर्नाशः स्यात्। सर्वपदेनालौकिकविप्रयोगादीनामपि नाशो ज्ञापितस्तेन संयुक्त एव नित्यं तिष्ठेदिति भावो व्यञ्जितः। सर्वदुःखहानौ सत्यां किं स्यात् अत आह प्रसन्नचेतस इति। दुःखहानौ प्रसन्नं चेतो यस्य तादृशो भवति। ततस्तस्य अनु शीघ्रमेव बुद्धिः पर्यवतिष्ठते। मयीति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.65।।   प्रसादे सति किं स्यादित्यत्राह  प्रसाद इति।  प्रसादे सति सर्वदुःखनाशस्ततश्च प्रसन्नचेतसो बुद्धिः प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.64 2.65।।नन्विन्द्रियाणां विषयाभिमुखस्वभावानां निरोधस्याशक्यत्वाद्दोषो दुष्परिहर इति कथं प्रज्ञायाः प्रतिष्ठितत्वं इत्याशङ्क्याह द्वाभ्याम् रागेति। यो वश्यात्मा स्वेन्द्रियै रागद्वेषवियुक्तैर्विषयानुपभुञ्जानोऽपि प्रसादं प्रशान्तिमधिगच्छति तस्य प्रसन्नचेतसः प्रज्ञा प्रतिष्ठिताऽवसेया।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.65।।प्रसन्नता होनेसे क्या होता है सो कहते हैं प्रसन्नता प्राप्त होनेपर इस यतिके आध्यात्मिकादि तीनों प्रकारके समस्त दुःखोंका नाश हो जाता है। क्योंकि ( उस ) प्रसन्नचित्तवालेकी अर्थात् स्वस्थ अन्तःकरणवाले पुरुषकी बुद्धि शीघ्र ही सब ओरसे आकाशकी भाँति स्थिर हो जाती है केवल आत्मरूपसे निश्चल हो जाती है। इस वाक्यका अभिप्राय यह है कि इस प्रकार प्रसन्नचित्त और स्थिरबुद्धिवाले पुरुषको कृतकृत्यता मिलती है इसलिये साधक पुरुषको चाहिये कि रागद्वेषसे रहित की हुई इन्द्रियोंद्वारा शास्त्रके अविरोधी अनिवार्य विषयोंका सेवन करे।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.65।। व्याख्या    तु   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि आसक्ति रहते हुए विषयोंका चिन्तन करनेमात्रसे पतन हो जाता है और यहाँ कहते हैं कि आसक्ति न रहनेपर विषयोंका सेवन करनेसे उत्थान हो जाता है। वहाँ तो बुद्धिका नाश बताया और यहाँ बुद्धिका परमात्मामें स्थित होना बताया। इस प्रकार पहले कहे गये विषयससे यहाँके विषयका अन्तर बतानेके लिये यहाँ  तु  पद आया है। विधेयात्मा   साधकका अन्तःकरण अपने वशमें रहना चाहिये। अन्तःकरणको वशीभूत किये बिना कर्मयोगकी सिद्धि नहीं होती प्रत्युत कर्म करते हुए विषयोंमें राग होनेकी और पतन होनेकी सम्भावना रहती है। वास्तवमें देखा जाय तो अन्तःकरणको अपने वशमें रखना हरेक साधकके लिये आवश्यक है। कर्मयोगीके लिये तो इसकी विशेष आवश्यकता है। आत्मवश्यैः रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः   जैसे  विधेयात्मा  पद अन्तःकरणको वशमें करनेके अर्थमें आया है ऐसे ही  आत्मवश्यैः  पद इन्द्रियोंको वशमें करनेके अर्थमें आया है। तात्पर्य है कि व्यवहार करते समय इन्द्रियाँ अपने वशीभूत होनी चाहिये और इन्द्रियाँ वशीभूत होनेके लिये इन्द्रियोंका रागद्वेष रहित होना जरूरी है। अतः इन्द्रियोंसे किसी विषयका ग्रहण रागपूर्वक न हो और किसी विषयका त्याग द्वेषपूर्वक न हो। कारण कि विषयोंके ग्रहण और त्यागका इतना महत्त्व नहीं है जितना महत्त्व इन्द्रियोंमें राग और द्वेष न होने देनेका है। इसीलिये तीसरे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने साधकके लिये सावधानी बतायी है कि प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष रहते हैं। साधक इनके वशीभूत न हो क्योंकि ये दोनों ही साधकके शत्रु हैं। पाँचवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि जो साधक रागद्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हो जाता है वह सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है। विषयान् चरन्   जिसका अन्तःकरण अपने वशमें है और जिसकी इन्द्रियाँ रागद्वेषसे रहित तथा अपने वशमें की हुई है ऐसा साधक इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन अर्थात् सब प्रकारका व्यवहार तो करता है पर विषयोंका भोग नहीं करता। भोगबुद्धिसे किया हुआ विषयसेवन ही पतनका कारण होता है। इस भोगबुद्धिका निषेध करनेके लिये ही यहाँ  विधेयात्मा आत्मवश्यैः  आदि पद आये हैं। प्रसादमधिगच्छति   रागद्वेषरहित होकर विषयोंका सेवन करनेसे साधक अन्तःकरणकी प्रसन्नता(स्वच्छता) को प्राप्त होता है। यह प्रसन्नता मानसिक तप है (गीता 17। 16) जो शारीरिक और वाचिक तपसे ऊँचा है। अतः साधकको न तो रागपूर्वक विषयोंका सेवन करना चाहिये और न द्वेषपूर्वक विषयोंका त्याग करना चाहिये क्योंकि राग और द्वेष इन दोनोंसे ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ता है।रागद्वेषसे रहित इन्द्रियोंसे विषयोंका सेवन करनेसे जो प्रसन्नता होती है उसका अगर सङ्ग न किया जाय भोग न किया जाय तो वह प्रसन्नता परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते   चित्तकी प्रसन्नता (स्वच्छता) प्राप्त होनेपर सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है अर्थात् कोई भी दुःख नहीं रहता। कारण कि राग होनेसे ही चित्तमें खिन्नता होती है। खिन्नता होते ही कामना पैदा हो जाती है और कामनासे ही सब दुःख पैदा होते हैं। परन्तु जब राग मिट जाता है तब चित्तमें प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नतासे सम्पूर्ण दुःख मिट जाते हैं।जितने भी दुःख हैं वे सबकेसब प्रकृति और प्रकृतिके कार्य शरीरसंसारके सम्बन्धसे ही होते हैं और शरीरसंसारसे सम्बन्ध होता है सुखकी लिप्सासे। सुखकी लिप्सा होती है खिन्नतासे। परन्तु जब प्रसन्नता होती है तब खिन्नता मिट जाती है। खिन्नता मिटनेपर सुखकी लिप्सा नहीं रहती। सुखकी लिप्सा न रहनेसे शरीरसंसारके साथ सम्बन्ध नहीं रहता और सम्बन्ध न रहनेसे सम्पूर्ण दुःखोंका अभाव हो जाता है  सर्वदुःखानां हानिः।  तात्पर्य है कि प्रसन्नतासे दो बातें होती हैं संसारसे सम्बन्धविच्छेद और परमात्मामें बुद्धिकी स्थिरता। यही बात भगवान्ने पहले तिरपनवें श्लोकमें निश्चला और अचला पदोंसे कही है कि उसकी बुद्धि संसारमें निश्चल और परमात्मामें अचल हो जाती है।यहाँ  सर्वदुःखानां हानिः  का तात्पर्य यह नहीं है कि उसके सामने दुःखदायी परिस्थिति आयेगी ही नहीं प्रत्युत इसका तात्पर्य यह है कि कर्मोंके अनुसार उसके सामने दुःखदायी घटना परिस्थिति आ सकती है परन्तु उसके अन्तःकरणमें दुःख सन्ताप हलचल आदि विकृति नहीं हो सकती। प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते   प्रसन्न (स्वच्छ) चित्तवालेकी बुद्धि बहुत जल्दी परमात्मानें स्थिर हो जाती है अर्थात् साधक स्वयं परमात्मामें स्थिर हो जाता है उसकी बुद्धिमें किञ्चिन्मात्र भी सन्देह नहीं रहता। मार्मिक बात भगवद्विषयक प्रसन्नता हो अथवा व्याकुलता हो इन दोनोंमेंसे कोई एक भी अगर अधिक बढ़ जाती है तो वह शीघ्र ही परमात्माकी प्राप्ति करा देती है। जैसे भगवान्के पास जाती हुई गोपियोंको मातापिता भाई पति आदिने रोक दिया मकानमें बंद कर दिया तो उन गोपियोंमें भगवान्से मिलनेकी जो व्याकुलता हुई उससे उनके पाप नष्ट हो गये और भगवान्का चिन्तन करनेसे जो प्रसन्नता हुई उससे उनके पुण्य नष्ट हो गये। इस प्रकार पापपुण्यसे रहित होकर वे शरीरको वहीं छोड़कर सबसे पहले भगवान्से जा मिलीं  (टिप्पणी   प0 102) । परन्तु सांसारिक विषयोंको लेकर जो प्रसन्नता और खिन्नता होती है उन दोनोंमें ही भोगोंके संस्कार दृढ़ होते हैं अर्थात् संसारका बन्धन दृढ़ होता है। इसके उदाहरण संसारमात्रके सामान्य प्राणी हैं जो प्रसन्नता और खिन्नताको लेकर संसारमें फँसे हुए हैं।प्रसन्नता और व्याकुलता(खिन्नता) में अन्तःकरण द्रवित हो जाता है। जैसे द्रवित मोममें रंग डालनेसे मोममें वह रंग स्थायी हो जाता है ऐसे ही अन्तःकरण द्रवित होनेपर उसमें भगवत्सम्बन्धी अथवा सांसारिक जो भी भाव आते हैं वे स्थायी हो जाते हैं। स्थायी होनेपर वे भाव उत्थान अथवा पतन करनेवाले हो जाते हैं। अतः साधकके लिये उचित है कि संसारकी प्रियसेप्रिय वस्तु मिलनेपर भी प्रसन्न न हो और अप्रियसेअप्रिय वस्तु मिलनेपर भी उद्विग्न न हो। सम्बन्ध   पीछेके दो श्लोकोंमें जो बात कही है उसीको आगेके दो श्लोकोंमें व्यतिरेक रीतिसे पुष्ट करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.64 2.65।।ध्यायत इति। क्रोधादिति। तपस्विनो विषयत्याग एव विषयग्रहणे पर्यवस्यति। ध्यात्वा हि ते त्यजन्ते। ध्यानकाले एव च (S omits च) संगादयः उपजायन्ते इति अनपायो (K अनुपायो) विषयत्यागः स्थिरप्रज्ञस्य एव ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.65।।तथापि नानाविधदुःखाभिभूतत्वान्न स्वास्थ्यमास्थातुं शक्यमित्याशयेन पृच्छति  प्रसाद इति। श्लोकार्धेनोत्तरमाह  उच्यत इति।  सर्वदुःखहान्या बुद्धिस्वास्थ्येऽपि प्रकृतं प्रज्ञास्थैर्यं कथं सिद्धमित्याशङ्क्याह  प्रसन्नेति।  बुद्धिप्रसादस्यैव फलान्तरमाह  किञ्चेति।  तस्माद्बुद्धिप्रसादार्थं प्रयतितव्यमिति शेषः। श्लोकद्वयस्याक्षरोत्थमर्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमुपसंहरति  एवमिति।  युक्तः समाहितो विषयपारवश्यशून्यः सन्निति यावत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.65।।प्रसादे सति किं स्यात् इत्यत उक्तंप्रसाद इति तदाक्षिपति  कथ मिति। तरति शोकमात्मवित् छां.उ.7।1।3 इत्यादिविरोधादिति भावः। किञ्च प्रसादे सति ज्ञानं भवतीति वा व्यवधानान्तरं वा वक्तव्यं तत्रोक्तम्। सर्वदुःखहानिश्चावक्तव्यैवोक्तेति चाक्षेपशेषः। एतत्परिहारत्वेनोत्तरार्धं व्याख्याति  प्रसन्ने ति। एतेनप्रसादस्य फलद्वयमुच्यते इत्यपि प्रतीतिर्निरस्ता भवति। प्रसादे सति ब्रह्मापरोक्षज्ञानं भवति। तच्च व्यवधानेनेति भविष्यति। ततो भवति सर्वदुःखहानिः प्रसादफलतयोक्तेति न वक्तव्यानुक्तिः नाप्यवक्तव्योक्तिः।बुद्धियुक्तः 2।50 इति श्लोके सुकृतदुष्कृतहानं ज्ञानफलमित्युक्तम् तदयुक्तम् अपुरुषार्थत्वात् इत्याशङ्कां परिहर्तुं प्रसङ्गादिदमुक्तमिति। ननु यस्यानायासेनाभिलषितविषयोपनतिस्तस्य मनोऽव्याकुलं प्रसन्नमित्युच्यते। ततः कथं प्रसादस्येन्द्रियजयफलत्वं ज्ञानसाधनत्वं चोच्यते इत्यत आह   प्रसाद  इति। अत्र विवक्षितेति शेषः। स्वतोऽपि प्रयत्नं विनाऽपि विषयागतिर्विषयान्प्रत्यप्रवृत्तिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.65।।कथं प्रसादमात्रेण सर्वदुःखहानिः प्रसन्नचेतसो हि बुद्धिः पर्यवतिष्ठते ब्रह्मापरोक्ष्येण सम्यक्स्थितिं करोति। प्रसादो नाम स्वतः प्रायो विषयागतिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.65।।अस्य पुरुषस्य मनसः प्रसादे सति प्रकृतिसंसर्गप्रयुक्तसर्वदुःखानां हानिः उपजायते। प्रसन्नचेतसः आत्मावलोकनविरोधिदोषरहितमनसः तदानीम् एव हि विविक्तात्मविषया बुद्धिः मयि पर्यवतिष्ठते अतो मनःप्रसादे सर्वदुःखानां हानिः भवति एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.65।।  प्रसादे सर्वदुःखानाम्  आध्यात्मिकादीनां  हानिः  विनाशः  अस्य  यतेः  उपजायते । किञ्च  प्रसन्नचेतसः  स्वस्थान्तःकरणस्य  हि  यस्मात्  आशु  शीघ्रं  बुद्धिः पर्यवतिष्ठते  आकाशमिव परि समन्तात् अवतिष्ठते आत्मस्वरूपेणैव निश्चलीभवतीत्यर्थः।।एवं प्रसन्नचेतसः अवस्थितबुद्धेः कृतकृत्यता यतः तस्मात् रागद्वेषवियुक्तैः इन्द्रियैः शास्त्राविरुद्धेषु अवर्जनीयेषु युक्तः समाचरेत् इति वाक्यार्थः।।सेयं प्रसन्नता स्तूयते

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【 Verse 2.66 】

▸ Sanskrit Sloka: नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना | न चाभावयत: शान्तिरशान्तस्य कुत: सुखम् ||

▸ Transliteration: nāsti buddhirayuktasya na cāyuktasya bhāvanā | na cābhāvayataḥ śāntir aśāntasya kutaḥ sukham ||

▸ Glossary: na asti : there is not; buddhiḥ: wisdom; ayuktasya: of one who is not connected to Self; na: neither; ca: and; ayuktasya: of one devoid of Self awareness; bhāvanā: devotion; na: neither; ca: and; abhāvayataḥ: for the indisciplined; śāntiḥ: peace; aśāntasya: of the indisciplined; kutaḥ: how; sukhaṁ: happiness

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.66 A person not in self awareness cannot be wise or happy or peaceful. How can there be happiness to one without peace?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.66।।जिसके मनइन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती। व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.66।। (संयमरहित) अयुक्त पुरुष को (आत्म) ज्ञान नहीं होता और अयुक्त को भावना और ध्यान की क्षमता नहीं होती भावना रहित पुरुष को शान्ति नहीं मिलती अशान्त पुरुष को सुख कहाँ

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.66 न not? अस्ति is? बुद्धिः knowledge (of the Self)? अयुक्तस्य of the unsteady? न not? च and? अयुक्तस्य of the unsteady? भावना meditation? न not? च and? अभावयतः of the unmeditated? शान्तिः peace? अशान्तस्य of the peaceless? कुतः whence? सुखम् happiness.Commentary The man who cannot fix his mind in meditation cannot have knowledge of the Self. The unsteady man cannot practise meditation. He cannot have even intense devotion to Selfknowledge nor can he have burning longing for liberation or Moksha. He who does not practise meditation cannot possess peace of mind. How can the man who has no peace of mind enjoy happinessDesire or Trishna (thirsting for senseobjects) is the enemy of peace. There cannot be an iota or tinge of happiness for a man who is thirsting for sensual objects. The mind will be ever restless? and will be hankering for the objects. Only when this

Chapter 2 (Part 37)

thirsting dies? does man enjoy peace. Only then can he meditate and rest in the Self.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.66. The capacity to decide is not for one who is not a master of Yoga; and concentration of mind is not for one who is not a master of Yoga; and peace is not for one who does not concentrate; wherefrom could happiness come to one who has no peace ?

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.66 Right discrimination is not for him who cannot concentrate. Without concentration, there cannot be meditation; he who cannot meditate must not expect peace; and without peace, how can anyone expect happiness?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.66 There is no Buddhi for the unintegrated, nor for him is there contemplation of the self, and for him without contemplation of the self, there is no peace; and for one lacking peace, where is happiness?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.66 For the unsteady there is no wisdom, and there is no meditation for the unsteady man. And for an unmeditative man there is no peace. How can there be happiness for one without peace?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.66 There is no knowledge of the Self to the unsteady and to the unsteady no meditation is possible, and to the unmeditative there can be no peace, and to the man who has no peace, how can there be happiness?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.66 See Comment under 2.68

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.66 In him who does not focus his mind on Me but is engaged only in the control of senses by his own exertion, the Buddhi or the right disposition that is concerned with the pure self never arises. Therefore he fails in the practice of meditation on the self. In one who cannot think of the pure self, there arises the desire for sense objects; in him serenity does not arise. How can eternal and unsurpassed bliss be generated in him who is not serene but is attached to sense-objects? [The idea is that without the aid of devotion to God, the effort to control the senses by one's will power alone will end in failure.]

Sri Krsna speaks again of the calamity that befalls one who does not practise the control of the senses in the way prescribed above:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.66 Ayuktasya, for the unsteady, for one who does not have a concentrated mind; na asti, there is no, i.e. there does not arise; buddhih, wisdom, with regard to the nature of the Self; ca, and; there is no bhavana, meditation, earnest longing [Longing to have a continuous remembrance of the knowledge of Brahman which arises in the mind from hearing the great Upanisadic sayings (maha-vakyas).] for the knowledge of the Self; ayuktasya, for an unsteady man. And similarly, abhavayatah, for an unmeditative man, who does not ardently desire the knowledge of the Self; there is no santih, peace, restraint of the senses. Kutah, how can there be; sukham, happiness; asantasya, for one without peace? That indeed is happiness which consists in the freedom of the senses from the thirst for enjoyment of objects; not the thirst for objects that is misery to be sure. The implication is that, so long as thirst persists, there is no possibility of even an iota of happiness! It is being stated why a man without concentration does not possess wisdom:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.66।। शास्त्रों में मन की शान्ति पर बल देने का कारण यहाँ स्पष्ट किया गया है। मन शान्ति के अभाव के कारण बुद्धि में सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक विकास के लिये आवश्यक विचार करने की क्षमता नहीं होती। शान्ति के न होने पर जीवन की समस्याओं को समझने की बौद्धिक तत्परता का अभाव होता है और तब जीवन का सही मूल्यांकन कर आत्मज्ञान एवं ध्यान के लिए अवसर ही नहीं रहता। ध्रुव तारे के समान जीवन में महान लक्ष्य के न होने पर हमारा जीवन समुद्र में खोये जलपोत के समान भटकता हुआ अन्त में किसी विशाल चट्टान से टकराकर नष्ट हो जाता है।लक्ष्यहीन दिशाहीन पुरुष को कभी शान्ति नहीं मिलती और ऐसे अशान्त पुरुष को सुख कहाँ जीवन सिन्धु की शान्त अथवा विक्षुब्ध तरंगों में सुख या दुख के समय संयम से रहने के लिये परमार्थ का लक्ष्य हमारी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होना चाहिये। एक मृदंग वादक के बिना नर्तकी के पैर लय और गति को नियन्त्रित नहीं रख सकते।अयुक्त (संयमरहित) पुरुष को ज्ञान क्यों नहीं होता सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.66।।   ननु किं चित्तप्रसादस्यैव साक्षाद्बुद्धिप्रतिष्ठासाधनत्वमुत परम्परयेत्याकाङ्क्षायां निदिध्यासनद्वारेणेति वक्तुं चित्तप्रसादं विना तन्न जायत इति पूर्वोक्तेस्तात्पर्यं प्रसन्नतास्तुत्या स्फुटयति  नास्तीति।  यत्तु समनस्कानामिन्द्रियाणामनिग्रहे दोष उक्तः बुद्धेरपर्यवस्थाने को दोष इत्यत आहेति तच्चिन्त्यम्। अयुक्तस्य बुद्धिर्नास्तीत्युक्त्या चित्तप्रसादस्तुतेः स्पष्टप्रतीतेः तथोत्थापनानौचित्यात्। अयुक्तस्यासमाहितचेतसः। अप्रसन्नचित्तस्येति यावत्। बुद्धिरात्मस्वरुपज्ञानविषया ब्रह्मात्मैक्याकारा कुत आह  नचेति।  नचायुक्तस्य भावना पूजाप्रतिष्ठाद्यर्थ श्रवणमननयोः सत्त्वेऽपि भावनाऽभिनिवेशो निदिध्यासनं बुद्धिसाधनं नास्ति। नचाभावयतः विजातीयप्रत्ययस्य विषयानुसंधानस्य तिरस्कारमकुर्वतः शान्तिरुपशमः तृष्णाया इच्छापरपर्यायाया अभावो नास्ति। अशान्तस्य कुतः सुखं अविद्यानिवृत्त्या आविद्यकतृष्णाद्यभावकर्तुस्तत्त्वसाक्षात्कारस्याभावाद्ब्रह्मानन्दसुखं तु तस्य नास्त्येव विषयसुखमपि तस्य नास्तीति द्योतयितुं कुतःशब्दः। ननु विषयार्जनतद्विनाशयोः दुःखसाधनत्वेऽपि विषयोपभोगस्य सुखहेतुत्वं भविष्यतीति चेन्न। तस्मिन्कालेऽपि सर्वदुःखमूलभूतायास्तृष्णायाः सत्त्वेन सुखगन्धस्याप्यनुपपत्तेः। तृष्णायाः दुःखहेतुत्वमुक्तं वासिष्ठे यान्येतानि दुरन्तानि दुर्जराण्युन्नतानि च। तृष्णावल्लयाः फलानीह तानि दुःखानि राघव। इच्छोदयो यथा दुःखमिच्छाशान्तिर्यथा सुखम्। तथा न नरके नापि ब्रह्मलोकेऽनुभूयते।।यावतीयावती जन्तोरिच्छोदेति यथायथा। तावतीतावती दुःखबीजमुष्टिः प्ररोहति।। इत्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.66।।इममेवार्थं व्यतिरेकमुखेन द्रढयति अयुक्तस्याजितचित्तस्य बुद्धिरात्मविषया श्रवणमननाख्यवेदान्तविचारजन्या नास्ति नोत्पद्यते। तद्बुद्ध्यभावे न चायुक्तस्य भावना निदिध्यासनात्मिका विजातीयप्रत्ययानन्तरितसजातीयप्रत्ययप्रवाहरूपा। सर्वत्र नञोऽस्तीत्यने नान्वयः। नचाभावयत आत्मानं शान्तिः सकार्याविद्यानिवृतिरूपा वेदान्तवाक्यजन्या ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कृतिः। अशान्तस्यात्मसाक्षात्कारशून्यस्य कुतः सुखं मोक्षानन्द इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.66।।समनस्कानामिन्द्रियाणामनिग्रहे दोष उक्तः बुद्धेरपर्यवस्थाने को दोष इत्यत आह  नास्तीति।  अयुक्तस्य श्रवणमननयोरनासक्तस्य बुद्धिर्ब्रह्मात्मैक्यनिश्चयो नास्ति। प्रमाणविषयासंभावनायाः प्रमेयविषयासंभावनायाश्चानिरासात्। तथा अयुक्तस्यासमाहितमनसो भावना ब्रह्माकारान्तःकरणवृत्तिप्रवाहो नास्ति। मनसश्चाञ्चल्येन बुद्धेरपि चाञ्चल्यात् अभावयतो ध्यानमकुर्वतः शान्तिः सर्वदुःखोपरमश्च नास्ति। चेतसोऽनवस्थित्वेन दुःखावश्यंभावात्। अशान्तस्यानुपरतसर्वदुःखस्य सुखं प्रत्यगद्वयानन्दात्मकं कुतो न कुतश्चित्। दुःखित्वादेव आद्यमयुक्तस्येति पदंयुजिर् योगे इत्यस्य रूपम्। द्वितीयंयुज समाधौ इत्यस्य। तस्माद्बुद्धेः पर्यवस्थानमावश्यकम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.66।।ननु समाधिस्थस्यापि स्थितप्रज्ञतैवोक्ता तदा को विशेषः इत्यत आह नास्ति बुद्धिरिति। अयुक्तस्य मयि योगरहितस्य बुद्धिरेव नास्ति। अयमर्थः बुद्ध्यनन्तरं चेन्मयि योगो न जातस्तदा सा स्थितप्रज्ञैव न। तस्मात्समाधिस्थभगवत्संयोगाभावे स्थितप्रज्ञाप्यकिञ्चित्करीत्यर्थः। ननु समाधिस्थयोगेनापि किं फलं इत्याशङ्क्याह न चेति। अयुक्तस्य भगवत्सम्बन्धरहितस्य भावना भगवद्रसौपयिकदेहाभिलाषो न च भवति। ननु भावनामात्रेणापि किम् अत आह न चेति। अभावयतः भावनामकुर्वतः शान्तिर्भगवद्रसौपयिकदेहावाप्तिर्न च भवति। तादृग्देहिनः साक्षादानन्दानुभवो न भवतीत्याह अशान्तस्येति। अशान्तस्य तादृग्देहाप्त्या तापरहितस्य सुखं साक्षात्सम्बन्धात्मकभजनानन्दानुभवः कुतः स्यात् इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.66।।   इन्द्रियनिग्रहस्य स्थितप्रज्ञतासाधनत्वं व्यतिरेकमुखेनोपपादयति  नास्तीति।  अयुक्तस्यावशीकृतेन्द्रियस्य नास्ति बुद्धिः शास्त्राचार्योपदेशाभ्यामात्मविषया बुद्धिः प्रज्ञैव नोत्पद्यते कुतस्तस्य प्रतिष्ठा वार्ता वा कुत इत्यत आह। न चायुक्तस्य भावना ध्यानम्। भावनया हि बुद्धेरात्मनि प्रतिष्ठा भवति। सा चायुक्तस्य यतो नास्ति। न चाभावयत आत्मध्यानमकुर्वतः शान्तिरात्मनि चित्तोपरतिः। अशान्तस्य कुतः सुखं मोक्षानन्द इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.66।।मनोनिग्रहस्य स्थितप्रज्ञता साधनत्वं व्यतिरेकमुखेनोपपादयति नास्तीति। अयुक्तस्यासतो निरोधयोगरहितस्य बुद्धिरेका व्यवसायात्मिका न भवति। न च भावना तत्त्वचिन्तनम्। स्पष्टमन्यत्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.66।।उस प्रसन्नताकी स्तुति की जाती है अयुक्त पुरुषमें अर्थात् जिसका अन्तःकरण समाहित नहीं है ऐसे पुरुषमें आत्मस्वरूपविषयक बुद्धि नहीं होती अर्थात् नहीं रहती और उस अयुक्त पुरुषमें भावना अर्थात् आत्मज्ञानमें प्रगाढ प्रवेश अतिशय प्रीति भी नहीं होती। तथा भावना न करनेवालेको अर्थात् आत्मज्ञानके साधनमें प्रीतिपूर्वक संलग्न न होनेवालेको शान्ति अर्थात् उपशमता भी नहीं मिलती। शान्तिरहित पुरुषको भला सुख कहाँ क्योंकि विषयसेवनसम्बन्धी तृष्णासे जो इन्द्रियोंका निवृत्त होना है वही सुख है विषयसम्बन्धी तृष्णा कदापि सुख नहीं है वह तो दुःख ही है। अभिप्राय यह कि तृष्णाके रहते हुए तो सुखकी गन्धमात्र भी नहीं मिलती।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.66।। व्याख्या  यहाँ कर्मयोगका विषय है। कर्मयोगमें मन और इन्द्रयोंका संयम करना मुख्य होता है। विवेकपूर्वक संयम किये बिना कामना नष्ट नहीं होती। कामनाके नष्ट हुए बिना बुद्धिकी स्थिरता नहीं होती। अतः कर्मयोगी साधकको पहले मन और इन्द्रियोंका संयम करना चाहिये। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं है उसकी बात इस श्लोकमें कहते हैं। नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य   जिसका मन और इन्द्रियाँ संयमित नहीं है ऐसे अयुक्त (असंयमी) पुरुषकी मेरेको केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है ऐसी एक निश्चयवाली बुद्धि नहीं होती  (टिप्पणी प0   103.1) । कारण कि मन और इन्द्रियाँ संयमित न होनेसे वह उत्पत्ति विनाशशील सांसारिक भोगों और संग्रहमें ही लगा रहता है। वह कभी मान चाहता है कभी सुखआराम चाहता है कभी धन चाहता है कभी भोग चाहता है इस प्रकार उसके भीतर अनेक तरहकी कामनाएँ होती रहती हैं। इसलिये उसकी बुद्धि एक निश्चयवाली नहीं होती। न चायुक्तस्य भावना   जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका नहीं होती उसकी मेरेको तो केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और फलकी इच्छा कामना आसक्ति आदिका त्याग करना है ऐसी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेमें कारण है अपना ध्येय स्थिर न होना। न चाभावयतः शान्तिः   जो अपने कर्तव्यके परायण नहीं रहता उसको शान्ति नहीं मिल सकती। जैसे साधु शिक्षक ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र आदि यदि अपनेअपने कर्तव्यमें तत्पर नहीं रहते तो उनको शान्ति नहीं मिलती। कारण कि अपने कर्तव्यके पालनमें दृढ़ता न रहनेसे ही अशान्ति पैदा होती है। अशान्तस्य कुतः सुखम्  जो अशान्त है वह सुखी कैसे हो सकता है कारण कि उसके हृदयमें हरदम हलचल होती रहती है। बाहरसे उसको कितने ही अनुकूल भोग आदि मिल जायँ तो भी उसके हृदयकी हलचल नहीं मिट सकती अर्थात् वह सुखी नहीं हो सकता। सम्बन्ध   अयुक्त पुरुषकी बुद्धि एक निश्चयवाली क्यों नहीं होती इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.66 2.70।।रागद्वेषेत्यादि प्रतिष्ठितेत्यन्तम्। यस्तु मनसो नियामकः स विषयान् सेवमानोऽपि न क्रोधादिकल्लोलैरभिभूयते इति स एव स्थितप्रज्ञो योगीति तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.66।।किं पुनः सत्त्वशुद्ध्यैव यथोक्तबुद्धिः सिध्यति नेत्याह   सेयमिति।  असमाहितस्यापि बुद्धिमात्रमुत्पद्यमानं प्रतिभातीत्याशङ्क्य विशिनष्टि  आत्मस्वरूपेति।  नहि विक्षिप्तचित्तस्यात्मस्वरूपविषया बुद्धिरुदेतुमर्हतीत्यत्र हेतुमाह  नचेति।  आत्मज्ञाने शब्दादापाततो जाते स्मृतिसन्तानकरणं साक्षात्कारार्थमभिनिवेशो भावनेति चोच्यते। न चासौ विक्षिप्तबुद्धेः सिध्यतीति हेत्वर्थं विवक्षित्वाह  आत्मज्ञानेति।  भावनाद्वारा साक्षात्काराभावेऽपि का क्षतिरित्याशङ्क्याह  तथेति।  असमाहितस्य भावनाभाववदिति यावत्। आत्मन्यापाततो ज्ञाते श्रवणाद्यावृत्तिरूपां स्मृतिमनातन्वानस्यापरोक्षबुद्ध्यभावेनानर्थनिवृत्तिः सिध्यतीत्याह  उपशम इति।  अनिवृत्तानर्थस्य परमानन्दसागराद्विभक्तस्य संसारवारिधौ निमग्नस्य सुखाविर्भावो न संभवतीत्याह  अशान्तस्येति।  तस्यापि विषयसेवातो वैषयिकं सुखं संभवतीत्याशङ्क्याह  इन्द्रियाणां हीति।  तृष्णाक्षयस्य शास्त्रप्रसिद्धमानुभविकं च सुखत्वमिति वक्तुं हिशब्दः। विषयसेवातृष्णयापि विषयोपभोगद्वारा सुखमुपलब्धमित्याशङ्क्याह  दुःखमेवेति।  तत्रापि हिशब्दोऽनुभवद्योती। तदेव स्पष्टयति   नेत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.66।।वक्तव्यस्योक्तत्वान्नास्ति बुद्धिरित्यादिकं किमर्थं इत्यत आह  प्रसादे ति। श्रवणमननाभ्यामुपकृतेन ध्यानेनैव ब्रह्मापरोक्षज्ञानसिद्धेः किमनेन प्रसादेन यदर्थमिन्द्रियजयोऽपेक्षितः इत्याशङ्क्येति शेषः। नन्वत्र प्रसादाभाव इदं स्यादिति नोच्यते ततः कथमेतदुक्तं इत्यतः प्रकरणप्राप्तमध्याहरति  न ही ति। ननु प्रसादरहिता अनुमिमते इत्यत आह  चित्ते ति। एकाग्रतेत्यर्थः। एवमध्याहारे सतिनास्ति बुद्धिः इत्येतत्सम्बध्यत इति भावेनाह  अयुक्तस्ये ति। ज्ञानमात्रं प्रकृतानुपयुक्तमयुक्तं चेत्यत आह  सम्य गिति ब्रह्मापरोक्षज्ञानमित्यर्थः। एतावता प्रसादाभावे दोष उक्तस्तत्किमर्थं न चायुक्तस्य इत्येतदित्यत आह  तदेवे ति। ध्यानेनैव ज्ञानोत्पादात्कथं नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य इत्याशङ्क्येति शेषः। भावना ध्यानम्। अत एवन चाभावयतो ज्ञानम्।न चाज्ञानिनः शान्तिः इति योज्यम्। ननु शान्तिः प्रसादः तस्य ज्ञानसाधनत्वेनोक्तत्वात्कथं ज्ञानोत्तरत्वमुच्यते इत्यत आह   शान्ति रिति। एतच्च न केवलं मुक्तौ सर्वदुःखहानिः किन्तु संसारिभिरलभ्यं परमं सुखं चेति ज्ञापयितुं प्रसङ्गादुक्तम्। एतदेवावेक्ष्य भाष्यकृता ब्रह्मादिपदादित्याद्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.66।।प्रसादाभावे दोषमाहोत्तराभ्यां श्लोकाभ्याम् न हि प्रसादाभावे युक्तिश्चित्तनिरोधः। अयुक्तस्य च बुद्धिः सम्यग्ज्ञानं च नास्ति। तदेवोपपादयति न चायुक्तस्येति। शान्तिर्मुक्तिःशान्तिर्मोक्षोऽथ निर्वाणम् इत्यभिधानात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.66।।मयि संन्यस्तमनोरहितस्य खयत्नेन इन्द्रियदमने प्रवृत्तस्य कदाचिद् अपि विविक्तात्मविषया  बुद्धिः  न सेत्स्यति। अत एव तस्य तद्भावना  च न  संभवति। विविक्तात्मानम्  अभावयतो  विषयस्पृहा शान्तिः  न भवति।  अशान्तस्य  विषयस्पृहायुक्तस्य  कुतो  नित्यनिरतिशयसुखप्राप्तिः।पुनरपि उक्तेन प्रकारेण इन्द्रियनियमनम् अकुर्वतः अनर्थम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.66।।  नास्ति  न विद्यते न भवतीत्यर्थः  बुद्धिः  आत्मस्वरूपविषया  अयुक्तस्य  असमाहितान्तःकरणस्य।  न च  अस्ति  अयुक्तस्य   भावना  आत्मज्ञानाभिनिवेशः। तथा  न च  अस्ति  अभावयतः  आत्मज्ञानाभिनिवेशमकुर्वतः  शान्तिः  उपशमः।  अशान्तस्य कुतः सुखम्  इन्द्रियाणां हि विषयसेवातृष्णातः निवृत्तिर्या तत्सुखम् न विषयविषया तृष्णा। दुःखमेव हि सा। न तृष्णायां सत्यां सुखस्य गन्धमात्रमप्युपपद्यते इत्यर्थः।।अयुक्तस्य कस्माद्बुद्धिर्नास्ति इत्युच्यते

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【 Verse 2.67 】

▸ Sanskrit Sloka: इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते | तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ||

▸ Transliteration: indriyāṇāṁ hi caratāṁ yanmano ’nuvidhīyate | tadasya harati prajñāṁ vāyurnāvamivāmbhasi ||

▸ Glossary: indriyāṇāṁ: of the senses; hi: indeed; caratāṁ: moving among objects; yat: that; manaḥ: mind; anu: with; vidhīyate: joined; tat: that; asya: his; harati: takes away; prajñāṁ: discrimination; vāyuḥ: wind; nāvaṁ: a boat; iva: like; ambhasi: on the water

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.67 He loses his awareness of the present moment when his mind follows the wandering senses, just as the wind carries away a boat on the waters.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.67।।अपनेअपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह बुद्धिको हर लेता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.67।। जल में वायु जैसे नाव को हर लेता है वैसे ही विषयों में विरचती हुई इन्द्रियों के बीच में जिस इन्द्रिय का अनुकरण मन करता है? वह एक ही इन्द्रिय इसकी प्रज्ञा को हर लेती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.67 इन्द्रियाणाम् senses? हि for? चरताम् wandering? यत् which? मनः mind? अनुविधीयते follows? तत् that? अस्य his? हरति carries away? प्रज्ञाम् discrimination? वायुः the wind? नावम् boat? इव like? अम्भसि in the water.Commentary The mind which constantly dwells on the sensual objects and moves in company with the senses destroys altogether the discrimination of the man. Just as the wind carries away a boat from its course? so also the mind carries away the aspirant from his spiritual path and turns,him towards the objects of the senses.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.67. That mind, which is directed to follow the wandering (enjoying) sense-organs-that mind carries away his knowledge just as wind does a ship on waters.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.67 As a ship at sea is tossed by the tempest, so the reason is carried away by the mind when preyed upon by straying senses.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.67 For, when the mind follows the senses experiencing their objects, his understanding is carried away by them as the wind carries away a ship on the waters.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.67 For, the mind which follows in the wake of the wandering senses, that (mind) carries away his wisdom like the mind (diverting) a boat on the waters.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.67 For the mind, which follows in the wake of the wandering senses, carries away his discrimination, as the wind (carries away) a boat on the waters.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.67 See Comment under 2.68

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.67 That mind, which is allowed by a person to be submissive to, i.e., allowed to go after the senses which go on operating, i.e., experiencing sense-objects, such a mind loses its inclination towards the pure self. The meaning is that it gets inclined towards sense-objects. Just as a contrary wind forcibly carries away a ship moving on the waters, in the name manner wisdon also is carried away from such a mind. [The idea is that the pursuit of sense pleasures dulls one's spiritual inclination, and the mind ultimately succumbs to them unresisting.]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.67 Hi, for; yat manah, the mind which; anu-vidhiyate, follows in the wake of; caratam, the wandering; indriyani, senses that are tending towards their respective objects; tat, that, the mind engaged in thinking [Perceiving objects like sound etc. in their respective varieties.] of the objects of the senses; harati, carries away, destroys; asya, his, the sannyasin's; prajnam, wisdom born from the discrimination between the Self and the not-Self. How? Iva, like; vayuh, the wind; diverting a navam, boat; ambhasi, on the waters. As wind, by diverting a boat on the waters from its intended course, drives it along a wrong course, similarly the mind, by diverting the wisdom from the pursuit of the Self, makes it engage in objects. After having stated variously the reasons for the idea conveyed through the verse, 'For, O son of Kunti,' etc. (60), and having established that very idea, the Lord concludes thus:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.67।। नाव के नाविक की मृत्यु हो गयी हो और उसके पाल खुले हों तब वह नाव पूरी तरह उन्मत्त तूफानों और उद्दाम तरंगों की दया पर आश्रित होगी। विक्षुब्ध तरंगों के भयंकर थपेड़ों से इधरउधर भटकती हुई वह लक्ष्य को प्राप्त किये बिना बीच में ही नष्ट हो जायेगी। इसी प्रकार संयमरहित पुरुष की इन्द्रियाँ भी विषयों में विचरण करती हुई मन को वासनाओं की अंधीआंधी में भटकाकर विनष्ट कर देती हैं। अत यदि मनुष्य अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहता है तो उसे अपनी इन्द्रियों को अपने वश में रखने का सतत प्रयत्न करते रहना चाहिए।62वें श्लोक से प्रारम्भ किये मनुष्य के पतन के विषय का उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.67।।अयुक्तस्य बुद्धिर्नास्तीत्युक्तं तत्र हेतुमाह  इन्द्रियाणामिति।  यत्तु तदभावे दोषमाहेति तदयुक्तम्। पूर्वश्लोकऽपि दोषस्यैवोक्तत्वात्। इन्द्रियाणां स्वविषये प्रवर्तमानानां यन्मनोऽनुवर्तते तदिन्द्रियविषयविकल्पे प्रवृत्तमस्य पुरुषस्य विवेकिनः प्रज्ञामात्मानात्मविवेकजां हरति। अम्भसि नावं वायुरिव जले जिगमिषतां मार्गादुद्धृत्योन्मार्गे यथा वायुः प्रवर्तयति तद्वत्। यत्त्विन्द्रियाणां मध्ये यदेकमपीन्द्रियमनु लक्षीकृत्य विधीयते प्रेर्यते। प्रवर्तत इति यावत्। तदिन्द्रियमेकमपि मनसानुसृतं अस्य साधकस्य मनसो वा प्रज्ञां हरतीत्यादि तदयुक्तम्।नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य इत्यनुरोधेन इन्द्रियानुगतमनस एव बुद्धिहरणकर्तृत्वस्य विवक्षितत्वात्। श्रुतं मनःपदं त्यक्त्वाऽश्रुतस्यैकेन्द्रियस्य यत्तत्पदेनोपादानानौचित्यात्। मनस इत्यपि न। साधकस्यैव प्रकृतत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.67।।अयुक्तस्य कुतो नास्ति बुद्धिरित्यत आह चरतां स्वविषयेषु प्रवर्तमानानामवशीकृतानामिन्द्रियाणां मध्ये यदेकमपीन्द्रियमनुलक्षीकृत्य मनोऽनुविधीयते प्रेर्यते। प्रवर्तत इति यावत्। कर्मकर्तरि लकारः। तदिन्द्रियमेकमपि मनसानुसृतमस्य साधकस्य मनसो वा प्रज्ञामात्मविषयां शास्त्रीयां हरत्यपनयति मनसस्तद्विषयाविष्टत्वात्। यदैकमपीन्द्रियं प्रज्ञां हरति तदा सर्वाणि हरन्तीति किमु वक्तव्यमित्यर्थः। दृष्टान्तस्तु स्पष्टः। अम्भस्येव वायोर्नौकाहरणसामर्थ्यं न भुवीति सूचयितुमम्भसीत्युक्तम्। एवं दार्ष्टान्तिकेऽप्यम्भःस्थानीये मनश्चाञ्चल्ये सत्येव प्रज्ञाहरणसामर्थ्यमिन्द्रियस्य नतु भूस्थानीये मनःस्थैर्य इति सूचितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.67।।तदभावे दोषमाह  इन्द्रियाणां हीति।  हि यस्मादिन्द्रियाणां चरतां स्वस्वविषये प्रवर्तमानानाम्। कर्मणि षष्ठी। यत् रागादिकलुषितं मनः तान्यनुलक्षीकृत्य विधीयते प्रवर्त्यते। कर्मकर्तरि लकारः। प्रवर्तत इत्यर्थः। तत् इन्द्रियानुसारि मनोऽस्य साधकस्य प्रज्ञामात्मतत्त्वविषयां बुद्धिं हरति। तस्या मनोनुसारित्वात्। दृष्टान्तः स्पष्टार्थः। अन्ये तु इन्द्रियाणां मध्ये यदिन्द्रियमनुलक्षीकृत्य मनः प्रवर्तते तदिन्द्रियमस्य साधकस्य मनसो वा प्रज्ञां हरतीति योजयन्ति। आत्मविषयां प्रज्ञां हृत्वा मनोविषयविषयां करोतीति भाष्यमप्यालोचनीयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.67।।ननु भावनायामास्थितचेतसोऽपीन्द्रियनिग्रहः किमर्थं स तु साधनदशापन्नस्यैव सम्भवति भावनायुक्तस्य तु सिद्धत्वादेव न प्रयोजनं ज्ञानिन इवेत्याशङ्क्याह इन्द्रियाणामिति। चरतां लौकिकेषु स्वेच्छया विहरतामिन्द्रियाणां यस्येन्द्रियस्य सङ्गे मनः अनुविधीयते तत्सङ्गे गच्छति तत् तदेव इन्द्रियस्य पुरुषस्य प्रज्ञां भावनात्मिकां हरति। तत्र दृष्टान्तमाह वायुर्नावमिति। अम्भसि जले नावं तारणसाधिकां वायुरिव। यथा प्रबलो वायुरनवस्थितकर्णधारयुक्तां नावं मज्जयति तथेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.67।।नास्ति बुद्धिरयुक्तस्येत्यत्र हेतुमाह  इन्द्रियाणामिति।  इन्द्रियाणामवशीकृतानां स्वैरं विषयेषु चरतां मध्ये यदेवैकमिन्द्रियं मनोऽनुविधीयतेऽवशीकृतं सदिन्द्रियेण सह गच्छति तदेवैकमिन्द्रियमस्य मनसः पुरुषस्य वा प्रज्ञां हरति विषयविक्षिप्तां करोति किमुत वक्तव्यं बहूनि प्रज्ञां हरन्तीति। यथा प्रमत्तस्य कर्णधारस्य नावं वायुः समुद्रे सर्वतः परिभ्रामयति तद्वत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.67।।अत्र हेतुमाह इन्द्रियाणामिति। विषयेषु चरतामिन्द्रियाणां मध्ये यन्मनः कर्तृ प्रबलमेकमनुविधीयते अनेन चानुक्रियते तदस्य प्रज्ञां हरति। तत्र दृष्टान्तः वायुर्नावमिवाम्भसीति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.67।।अयुक्त पुरुषमें बुद्धि क्यों नहीं होती इसपर कहते हैं क्योंकि अपनेअपने विषयमें विचरनेवाली अर्थात् विषयोंमें प्रवृत्त हुई इन्द्रियोंमेंसे जिसके पीछेपीछे यह मन जाता है विषयोंमें प्रवृत्त होता है वह उस इन्द्रियके विषयको विभागपूर्वक ग्रहण करनेमें लगा हुआ मन इस साधककी आत्मअनात्मसम्बन्धी विवेकज्ञानसे उत्पन्न हुई बुद्धिको हर लेता है अर्थात् नष्ट कर देता है। कैसे जैसे जलमें नौकाको वायु हर लेता है वैसे ही अर्थात् जैसे जलमें चलनेकी इच्छावाले पुरुषोंकी नौकाको वायु गन्तव्य मार्गसे हटाकर उल्टे मार्गपर ले जाता है वैसे ही यह मन आत्मविषयक बुद्धिको विचलित करके विषयविषयक बना देता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.67।।  व्याख्या   मनुष्यका यह जन्म केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः मुझे तो केवल परमात्मप्राप्ति ही करनी है चाहे जो हो जाय ऐसा अपना ध्येय दृढ़ होना चाहिये। ध्येय दृढ़ होनेसे साधककी अहंतामेंसे भोगोंका महत्त्व हट जाता है। महत्त्व हट जानेसे व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ हो जाती है। परन्तु जबतक व्यवसायात्मिका बुद्धि दृढ़ नहीं होती तबतक उसकी क्या दशा होती है इसका वर्णन यहाँ कर रहे हैं।  इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते (टिप्पणी प0 103.2)   जब साधक कार्यक्षेत्रमें सब तरहका व्यवहार करता है तब इन्द्रियोंके सामने अपनेअपने विषय आ ही जाते हैं। उनमेंसे जिस इन्द्रियका अपने विषयमे राग हो जाता है वह इन्द्रिय मनको अपना अनुगामी बना लेती है मनको अपने साथ कर लेती है। अतः मन उस विषयका सुखभोग करने लग जाता है अर्थात् मनमें सुखबुद्धि भोगबुद्धि पैदा हो जाती है मनमें उस विषयका रंग चढ़ जाता है उसका महत्त्व बैठ जाता है। जैसे भोजन करते समय किसी पदार्थका स्वाद आता है तो रसनेन्द्रिय उसमें आसक्त हो जाती है। आसक्त होनेपर रसनेन्द्रिय मनको भी खीँच लेती है तो मन उस स्वादमें प्रसन्न हो जाता है राजी हो जाता है। तदस्य हरति प्रज्ञाम्   जब मनमें विषयका महत्त्व बैठ जाता है तब वह अकेला मन ही साधककी बुद्धिको हर लेता है अर्थात् साधकमें कर्तव्यपरायणता न रहकर भोगबुद्धि पैदा हो जाती है। वह भोगबुद्धि होनेसे साधकमें मुझे परमात्माकी ही प्राप्ति करनी है यह व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं रहती। इस तरहका विवेचन करनेमें तो देरी लगती है पर बुद्धि विचलित होनेमें देरी नहीं लगती अर्थात् जहाँ इन्द्रियने मनको अपना अनुगामी बनाया कि मनमें भोगबुद्धि पैदा हो जाती है और उसी समय बुद्धि मारी जाती है। वायुर्नावमिवाम्भसि   वह बुद्धि किस तरह हर ली जाती है इसको दृष्टान्तरूपसे समझाते हैं कि जलमें चलती हुई नौकाको वायु जैसे हर लेती है ऐसे ही मन बुद्धिको हर लेता है। जैसे कोई मनुष्य नौकाके द्वारा नदी या समुद्रको पार करते हुए अपने गन्तव्य स्थानको जा रहा है। यदि उस समय नौकाके विपरीत वायु चलती है तो वह वायु उस नौकाको गन्तव्य स्थानसे विपरीत ले जाती है। ऐसे ही साधक व्यवसायात्मिका बुद्धिरूप नौकापर आरूढ़ होकर संसारसागरको पार करता हुआ परमात्माकी तरफ चलता है तो एक इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बनाती है वह अकेला मन ही बुद्धिरूप नौकाको हर लेता है अर्थात् उसे संसारकी तरफ ले जाता है। इससे साधककी विषयोंमें सुख बुद्धि और उनके उपयोगी पदार्थोंमें महत्त्वबुद्धि हो जाती है।वायु नौकाको दो तरहसे विचलित करती है नौकाको पथभ्रष्ट कर देती है अथवा जलमें डुबा देती है। परन्तु कोई चतुर नाविक होता है तो वह वायुकी क्रियाको अपने अनुकूल बना लेता है जिससे वायु नौकाको अपने मार्गसे अलग नहीं ले जा सकती प्रत्युत उसको गन्तव्य स्थानतक पहुँचानेमें सहायता करती है ऐसे ही इन्द्रियोंके अनुगामी हुआ मन बुद्धिको दो तरहसे विचलित करता है परमात्मप्राप्तिके निश्चय को दबाकर भोगबुद्धि पैदा कर देता है अथवा निषिद्ध भोगोंमें लगाकर पतन करा देता है। परन्तु जिसका मन और इन्द्रियाँ वशमें होती हैं उसकी बुद्धिको मन विचलित नहीं करता प्रत्युत परमात्माके पास पहुँचानेमें सहायता करता है (2। 6465)। सम्बन्ध   अयुक्त पुरुषकी निश्चयात्मिका बुद्धि क्यों नहीं होती इसका हेतु तो पूर्वश्लोकमें बता दिया। अब जो युक्त होता है उसकी स्थितिका वर्णन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.66 2.70।।रागद्वेषेत्यादि प्रतिष्ठितेत्यन्तम्। यस्तु मनसो नियामकः स विषयान् सेवमानोऽपि न क्रोधादिकल्लोलैरभिभूयते इति स एव स्थितप्रज्ञो योगीति तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.67।।आकाङ्क्षाद्वारा श्लोकान्तरमुत्थापयति  अयुक्तस्येति।  विक्षिप्तचेतसो भावनाभावे साक्षात्कारलक्षणा बुद्धिर्न भवतीति हेत्वन्तरेण साधयति  इन्द्रियाणामिति।  यत्पदोपात्तं मनस्तत्पदेनापि गृह्यते। इन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां विषयाः शब्दादयस्तेषां विकल्पनं मिथो विभज्य ग्रहणं तेनेति यावत्। दृष्टान्तं व्याकरोति  उदक   इति।  करोति यस्मात्तस्मादयुक्तस्य नोत्पद्यते बुद्धिरिति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.67।।एकेनैव श्लोकेन प्रमेयस्य समुदितत्वात् श्लोकाभ्यामिति किमर्थमुक्तमत आह  कथ मिति। कृतश्रवणमननस्य ध्यानोपपत्तेरिति भावः। न भवतीत्याशङ्क्येति शेषः। अनुविधानं सदृशभवनं तदत्रासङ्गतं कर्ता चात्र जीव इति प्रतीयतेऽत आह  अनुविधीयत  इति। विपूर्वो दधातिः करोत्यर्थे वर्तते कर्ता चात्रेश्वर एवेत्यर्थः। अत्रानुः पृष्ठभावित्वार्थः न लक्षणाद्यर्थ इति कर्मप्रवचनीयो न भवति। नन्विति सम्प्रतिपत्तिरुक्ता सा कुतः इत्यत आह  बुद्धिरि ति। ग्रहणशक्तिः प्रज्ञा। तद्ग्रहणमत्रायुक्तमित्यत आह  प्रज्ञा मिति। परोक्षनिश्चयं यस्य प्रज्ञानं नोत्पन्नं तस्य युक्त्यभावः किं करिष्यति विद्यमानस्य हि हरणमत आह  उत्पत्स्यदि ति। तर्ह्युत्पन्नपरोक्षज्ञानस्य युक्त्यभावोऽकिञ्चित्करः इत्यत आह  उत्पन्नस्यापी ति। चित्तनिरोधरहितश्रवणमनने अपि न ध्यानोपयोगिनौ तत्त्वनिश्चयवेदार्थनियमौ कुरुत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.67।।कथमयुक्तस्य भावना न भवति इत्याह इन्द्रियाणामिति। अनुविधीयते क्रियते नन्वीश्वरेण इन्द्रियाणामनु बुद्धिर्ज्ञानमिति वक्ष्यमाणत्वात्। प्रज्ञां ज्ञानं उत्पत्स्यदपि निवारयतीत्यर्थः। उत्पन्नस्याप्यभिभवो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.67।।  इन्द्रियाणां  विषयेषु  चरतां  विषयेषु वर्तमानानां वर्तनम् अनु  यन्मनः अनु विधीयते  पुरुषेण अनुवर्त्यते  तत्  मनः  अस्य  विविक्तात्मप्रवणां  प्रज्ञां हरति  विषेयप्रवणतां करोति इत्यर्थः। यथा  अम्भसि  नीयमानां  नावं  प्रतिकूलो  वायुः  प्रसह्य हरति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.67।।  इन्द्रियाणां हि  यस्मात्  चरतां  स्वस्वविषयेषु प्रवर्तमानानां  यत् मनः अनुविधीयते  अनुप्रवर्तते  तत्  इन्द्रियविषयविकल्पनेन प्रवृत्तं मनः  अस्य  यतेः  हरति प्रज्ञाम्  आत्मानात्मविवेकजां नाशयति। कथम्  वायुः नावमिव अम्भसि  उदके जिगमिषतां मार्गादुद्धृत्य उन्मार्गे यथा वायुः नावं प्रवर्तयति एवमात्मविषयां प्रज्ञां हृत्वा मनो विषयविषयां करोति।।यततो हि इत्युपन्यस्तस्यार्थस्य अनेकधा उपपत्तिमुक्त्वा तं चार्थमुपपाद्य उपसंहरति

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【 Verse 2.68 】

▸ Sanskrit Sloka: तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वश: | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ||

▸ Transliteration: tasmādyasya mahābāho nigṛhītāni sarvaśaḥ | indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣṭhitā ||

▸ Glossary: tasmāt: therefore; yasya: of one’s; mahābāho: O mighty-armed one; nigṛhītāni: so curbed down; sarvaśaḥ: in all respects; indriyāṇi: the senses; indri- yārthebhyaḥ: from the sense objects; tasya: his; prajñā: intelligence; pratiṣṭhitā: fixed

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.68 O Mahābāho (mighty-armed one), his knowledge is therefore steady whose senses are completely detached from sense objects.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.68।।इसलिये हे महाबाहो जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत (वशमें की हुई) हैं उसकी बुद्धि स्थिर है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.68।। इसलिये? हे महाबाहो जिस पुरुष की इन्द्रियाँ सब प्रकार इन्द्रियों के विषयों के वश में की हुई होती हैं? उसकी बुद्धि स्थिर होती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.68 तस्मात् therefore? यस्य whose? महाबाहो O mightyarmed? निगृहीतानि restrained? सर्वशः completely? इन्द्रियाणि the senses? इन्द्रियार्थेभ्यः from the senseobjects? तस्य his? प्रज्ञा knowledge? प्रतिष्ठिता is steady.Commentary When the senses are completely controlled? the mind cannot wander wildly in the sensual grooves. It becomes steady like the lamp in a windless place. The Yogi is now established in the Self and his knowledge is steady. (Cf.III.7).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.68. Therefore, O mighty-armed one, the intellect of that person is stabilized, all of whose sense-organs, starting from sense-objects have been well restrained.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.68 Therefore, O Might-in-Arms, he who keeps his senses detached from their objects - take it that his reason is purified.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.68 Therefore, O mighty-armed, he whose senses are restrained from going after their objects on all sides, his wisdom is firmly set.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.68 Therefore, O mighty-armed one, this wisdom becomes established whose organs in all their varieties are withdrawn from their objects.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.68 Therefore, O mighty-armed Arjuna, his knowledge is steady whose senses are completely restrained from sense-objects.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.64-68 Raga-dvesa-etc. upto pratisthita. Here the purport is this : He, who controls his mind, is not tossed by the waves of wrath etc., even while he is enjoying the sense-objects; hence he alone is a man of Yoga, a man-of-stabilized-intellect.
Extraordinary is the man of Yoga, even while he is attending to the worldly business. While examining this point, the characteristics mark of his (man of Yoga), is briefly related by the Supreme Lord-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.68 Therefore, in the way described above, he whose mind is focussed on Me the auspicious object for meditation, and whose senses are thery restrained from sense-objects in everyway, in his mind alone wisdom is firmly set.

Sri Krsna now speaks of the state of attainment by one whose senses are subdued and whose mind is serene.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.68 Since the evils arising from the activities of the organs have been described, tasmat, therefore; mahabaho, O mighty-armed one; tasya, his, the sannyasin's; prajna, wisdom; pratisthita, becomes established; yasya, whose; indriyani, organs; sarvasah, in all their varieties, differentiated as mind etc.; nigrhitani, are withdrawn; indriya-arthhyah, from their objects such as sound etc. In the case of a man of steady wisdom in whom has arisen discriminating knowledge, those which are these ordinary and Vedic dealings cease on the eradication of ignorance, they being effects of ignorance. And ignorance ceases because it is opposed to Knowledge. For clarifying this idea, the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.68।। किसी सिद्धांत को समझाते समय पर्याप्त तर्क प्रस्तुत किये बिना हम अन्तिम निष्कर्ष को प्रकट नहीं करते चाहे वह निष्कर्ष कितना ही स्वीकार करने योग्य क्यों न हो। इसी को ध्यान में रखते हुए श्रीकृष्ण अर्जुन को आवश्यक तर्क देने के बाद इस श्लोक में इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि केवल अश्रु विलाप और शोक के अतिरिक्त किसी उच्चतर वस्तु की अपेक्षा यदि हम जीवन में करते हैं तो संयमपूर्ण जीवन ही जीने योग्य है। इन्द्रियों के विषयों से जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णत वश में होती हैं वही पुरुष वास्तव में स्थितप्रज्ञ है।इन्द्रियों को वश में रखने का अर्थ यह नहीं समझना चाहिए कि ज्ञानी पुरुष की इन्द्रियाँ निरुपयोगी हो जाती हैं जिससे वह किसी प्रकार विषय ग्रहण ही न कर सके इन्द्रियों की दुर्बलता ज्ञान का लक्षण नहीं। इसका अर्थ केवल यह है कि विषयों के ग्रहण करने से उसके मन की शान्ति में कोई विघ्न नहीं आ सकता उसे कोई विचलित नहीं कर सकता। अज्ञानी पुरुष इन्द्रियों का दास होता है जबकि स्थितप्रज्ञ पुरुष उनका स्वामी।ज्ञानी के लक्षण को स्पष्ट करते हुए भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.68।।   उपसंहरति  तस्मादिति।  महाबाहुभ्यां शत्रून्विजित्य यथा राज्यस्य प्रतिष्ठितत्वं शूरैः संपाद्यते एवं विवेकिभिरिन्द्रियशत्रून्जित्वा प्रज्ञाप्रतिष्ठितत्वमिति सूचयन्संबोधयति हे महाबाहो इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.68।।हि यस्मादेवं सर्वशः सर्वाणि समनस्कानि। हे महाबाहो इति संबोधयन् सर्वशत्रुनिवारणक्षमत्वादिन्द्रियशत्रुनिवारणेऽपि त्वं क्षमोऽसीति सूचयति। स्पष्टमन्यत्। तस्येति सिद्धस्य साधकस्य च परामर्शः। इन्द्रियसंयमयस्य स्थितप्रज्ञंप्रति लक्षणत्वस्य मुमुक्षुंप्रति प्रज्ञासाधनत्वस्य चोपसंहरणीयत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.68।।यततो ह्यपीत्यत्रोपक्रान्तमर्थं बहुधोपपाद्योपसंहरति  तस्मादिति।  यस्मादिन्द्रियाधीनं मनो मनोनुगा च प्रज्ञा तस्मात् हे महाबाहो यस्य यतेरिन्द्रियाणि सर्वशः सर्वप्रकारेण स्वकारणेन मनसा सहितानीति यावत्। इन्द्रियार्थेभ्यः शब्दादिभ्यो निगृहीतानि भवन्ति तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठितेति विद्धि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.68।।तस्मात् सर्वथेन्द्रियनिग्रहकर्तुरेव प्रज्ञा प्रतिष्ठिता भवतीत्याह तस्मादिति। यस्मादिन्द्रियनिग्रहाभावे प्रज्ञा नश्यति तस्मात् यस्य इन्द्रियार्थेभ्यो विषयेभ्य इन्द्रियाणि निगृहीतानि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः।महाबाहो इति सम्बोधनेन तथाकरणसामर्थ्यं ज्ञापितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.68।।इन्द्रियसंयमस्य स्थितप्रज्ञत्वसाधनत्वलक्षणत्वं प्रोक्तमुपसंहरति  यस्मादिति।  प्रतिष्ठिता भवतीत्यर्थः। लक्षणत्वोपसंहारे तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ज्ञातव्येत्यर्थः। महाबाहो इति संबोधनं वैरिनिग्रहसमर्थस्य तवात्रापि सामर्थ्यं भवेदिति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.68।।उक्तमुपसंहरति तस्मादिति। हे क्रियाशक्तियुक्त यस्येन्द्रियाणि सर्वशः इन्द्रियार्थेभ्यो विषयेभ्यो निगृहीतानि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिताऽवसेया। स तादृशो लक्ष्यत इत्यर्थः। सम्बोधनेन त्वमपि महाबाहुभ्यां इममिन्द्रियनिग्रहणं कुरुष्वेति सूचितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.68।।यततो ह्यपि इस श्लोकसे प्रतिपादित अर्थकी अनेक प्रकारसे उपपत्ति बतलाकर उस अभिप्रायको सिद्ध करके अब उसका उपसंहार करते हैं क्योंकि इन्द्रियोंकी प्रवृत्तिमें दोष सिद्ध किया जा चुका है इसलिये हे महाबाहो जिस साधककी इन्द्रियाँ अपनेअपने शब्दादि विषयोंसे सब प्रकारसे अर्थात् मानसिक आदि भेदोंसे निगृहीत की जा चुकी हैं ( वशमें की हुई हैं ) उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.68।। व्याख्या    तस्माद्यस्य ৷৷. प्रज्ञा प्रतिष्ठिता  साठवें श्लोकसे मन और इन्द्रियोंको वशमें करनेका जो विषय चला आ रहा है उसका उपसंहार करते हुए  तस्मात्  पदसे कहते हैं कि जिसके मन और इन्द्रियोंमें संसारका आकर्षण नहीं रहा है उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।  यहाँ  सर्वशः  पद देनेका तात्पर्य है कि संसारके साथ व्यवहार करते हुए अथवा एकान्तमें चिन्तन करते हुए किसी भी अवस्थामें उसकी इन्द्रियाँ भोगोंमें विषयोंमें प्रवृत्त नहीं होतीं। व्यवहारकालमें कितने ही विषय उसके सम्पर्कमें क्यों न आ जायँ पर वे विषय उसको विचलित नहीं कर सकते। उसका मन भी इन्द्रियके साथ मिलकर उसकी बुद्धिको विचलित नहीं कर सकता। जैसे पहाड़को कोई डिगा नहीं सकता ऐसे ही उसकी बुद्धिमें इतनी दृढ़ता आ जाती है कि उसको मन किसी भी अवस्थामें डिगा नहीं सकता। कारण कि उसके मनमें विषयोंका महत्व नहीं रहा। निगृहीतानि  का तात्पर्य है कि इन्द्रियाँ विषयोंसे पूरी तरहसे वशमें की हुई है अर्थात् विषयोंमें उनका लेशमात्र भी राग आसक्ति खिंचाव नहीं रहा है। जैसे साँपके दाँत निकाल दिये जायँ तो फिर उसमें जहर नहीं रहता। वह किसीको काट भी लेता है तो उसका कोई असर नहीं होता। ऐसे ही इन्द्रियोंको रागद्वेषसे रहित कर देना ही मानो उनके जहरीले दाँत निकाल देना है। फिर उन इन्द्रियोंमें यह ताकत नहीं रहती कि वे साधकको पतनके मार्गमें ले जायँ।इस श्लोकका तात्पर्य यह है कि साधकको दृढ़तासे यह निश्चय कर लेना चाहिये कि मेरा लक्ष्य परमात्माकी प्राप्ति करना है भोग भोगना और संग्रह करना मेरा लक्ष्य नहीं है। अगर ऐसी सावधानी साधकमें निरन्तर बनी रहे तो उसकी बुद्धि स्थिर हो जायगी। सम्बन्ध   जिसकी इन्द्रियाँ सर्वथा वशमें हैं उसमें और साधारण मनुष्योंमें क्या अन्तर है इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.66 2.70।।रागद्वेषेत्यादि प्रतिष्ठितेत्यन्तम्। यस्तु मनसो नियामकः स विषयान् सेवमानोऽपि न क्रोधादिकल्लोलैरभिभूयते इति स एव स्थितप्रज्ञो योगीति तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.68।।यततो हीत्यादिश्लोकाभ्यामुक्तस्यैवार्थस्य प्रकृतश्लोकाभ्यामपि कथ्यमानत्वादस्ति पुनरुक्तिरित्याशङ्क्य परिहरति  यततो हीत्यादिना।  ध्यायतो विषयानित्यादिनोपपत्तिवचनमुन्नेयम्। तच्छब्दापेक्षितार्थोक्तिद्वारा श्लोकमवतारयति  इन्द्रियाणामिति।  असमाहितेन मनसा यस्मादनुविधीयमानानीन्द्रियाणि प्रसह्य प्रज्ञामपहरन्ति तस्मादिति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.68।।अत्र परमं प्रमेयं ज्ञानिलक्षणं प्रकृतं तस्यासम्भवपरिहाराय ज्ञानस्य महाप्रयत्नसाध्येन्द्रियनिग्रहसाध्यत्वं च तत्र कस्यायमुपसंहार इति न ज्ञायतेऽत आह   तस्मादि ति। ज्ञानी जायत इति शेषः। यत एवं निगृहीतेन्द्रियस्यैव प्रसादः प्रसादवत एव युक्तिः युक्तिमत एव श्रवणमननाभ्यां तत्त्वज्ञानं तत्त्वज्ञानवत एवापरोक्षज्ञानसाधनं ध्यानं नान्यथा तस्मादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.68।।तस्मात्सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रिय एव ज्ञानीति निगमयति। तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.68।। तस्माद्  उक्तेन प्रकारेण शुभाश्रये मयि निविष्टमनसो  यस्य इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः सर्वशो निगृहीतानि तस्य  एव आत्मनि  प्रज्ञा प्रतिष्ठिता  भवति।एवं नियतेन्द्रियस्य प्रसन्नमनसः सिद्धिम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.68।। इन्द्रियाणां प्रवृत्तौ दोष उपपादितो यस्मात्  तस्मात् यस्य  यतेः हे  महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः

Chapter 2 (Part 38)

सर्वप्रकारैः मानसादिभेदैः  इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेभ्यः  शब्दादिभ्यः  तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता।।योऽयं लौकिको वैदिकश्च व्यवहारः स उत्पन्नविवेकज्ञानस्य स्थितप्रज्ञस्य अविद्याकार्यत्वात् अविद्यानिवृत्तौ निवर्तते अविद्यायाश्च विद्याविरोधात् निवृत्तिः इत्येतमर्थं स्फुटीकुर्वन् आह

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【 Verse 2.69 】

▸ Sanskrit Sloka: या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्ति संयमी | यस्यां जाग्रति भूतानि सा निशा पश्यतो मुने: ||

▸ Transliteration: yā niśā sarvabhūtānāṁ tasyāṁ jāgarti saṁyamī | yasyāṁ jāgrati bhūtāni sā niśā paśyato muneḥ ||

▸ Glossary: yā: what; niśā: is night; sarva: all; bhūtānāṁ: of living entities; tasyāṁ: in that; jāgarti: wakeful; saṁyamī: the self-controlled; yasyāṁ: in which; jāgrati: awake; bhūtāni: all beings; sā: that is; niśā: night; paśyataḥ: for the seer; muneḥ: for the sage

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.69 The self–controlled man lies awake in that which is night to all beings. That in which all beings are awake is the night for the sage who sees.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.69।।सम्पूर्ण मनुष्योंकी जो रात (परमात्मासे विमुखता) है उसमें संयमी मनुष्य जागता है और जिसमें साधारण मनुष्य जागते हैं (भोग और संग्रहमें लगे रहते हैं) वह तत्त्वको जाननेवाले मुनिकी दृष्टिमें रात है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.69।। सब प्रणियों के लिए जो रात्रि है? उसमें संयमी पुरुष जागता है और जहाँ सब प्राणी जागते हैं? वह (तत्त्व को) देखने वाले मुनि के लिए रात्रि है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.69 या which? निशा night? सर्वभूतानाम् of all beings? तस्याम् in that? जागर्ति wakes? संयमी the selfcontrolled? यस्याम् in which? जाग्रति wake? भूतानि all beings? सा that? निशा night? पश्यतः (of the) seeing? मुनेः of the Muni.Commentary That which is real for the wordlyminded people is illusion for the sage? and vice versa. The sage lives in the Self. This is day for him. He is unconscious of the wordly phenomena. They are night for him? as it were. The ordinary man is unconscious of his real nature. Life in the spirit is night for him. He is experiencing the objects of sensual enjoyment. This is day for him. The Self is a nonentity for him For a sage this world is a nonentity.The wordlyminded people are in utter darkness as they have no knowledge of the Self. What is darkness for them is all light for the sage. The Self? Atman or Brahman is night for the worldlyminded persons. But the sage is fully awake. He is directly cognising the supreme Reality? the Light of lights. He is full of illumination and AtmaJnana or knowledge of the Self.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.69. What is night for every [other] being, in that a man of self-restraint is awake; wherein [every other] being is awake, that is night for the sage who sees [the truth].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.69 The saint is awake when the world sleeps, and he ignores that for which the world lives.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.69 What is night for all beings, in it the controlled one is awake; when all beings are awake, that is the night to the sage who sees.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.69 The self-restrained man keeps awake during that which is night for all creatures. That during which creatures keep awake, it is night to the seeing sage.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.69 That which is night to all beings, in that the self-controlled man is awake; when all beings are awake, that is night for the Muni (sage) who sees.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.69 Ya nisa etc. Infatuating is the Illusion which is night for all beings. In that , the sage is awake (vigilant) with the thought 'How It could be avoided' The stage where the worldly men keep awake i.e., perform multifarious [worldly] activities, that stage is the night for the sage, as he is ignorant regarding the worldly activities.

It amounts to this statement : What is well-known as illusion, Its nature is indeed two-ford, viz., to delude and also to wear a deceptive appearance of spinning pleasure. Of them (the two natures), the worldly man, not considering Its former nautre, remains with a memory well teid to the second nature. On the other hand, the man of Yoga, who is contrary to the other, observes Its deluding nature in order to root It out. Thus the man of perfect knowledge, while seeing [properly], pays no attention to Its nature of spinning pleasure. His indifference to Its nature of spinning pleasure is due to the destruction of his false knowledge. That stage is night to him, even while he sees. Hence this is strange. The man of Yoga is awake (or understands) in the field of wisdom, where everyone else is unconscious (or totally perplexed); but in [the field] of ignorance he is not awake (or does not understand), where ordinary man is awake (or understands well). This is also strange. That is why-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.69 That Buddhi (understanding) which has the self for its object, is night to all beings, i.e., is obscure like night to all. But he, who has subdued the senses and is serene, is awake in respect of the self. The meaning is that he has the vision of the self. All beings are awake, i.e., are actively cognisant in respect of objects of the senses like sound. But such sense objects are like things enshrouded by night to the sage who is awake to the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.69 ya, that which; sarva-bhutanam, for all creatures; is nisa, night which being darkness (tamah) by nature, obliterates distinctions among all things; what is that? that is the Reality which is the supreme Goal, accessible to the man of steady wisdom. As that which verily appears as day to the nocturnal creatures is night for others, similarly the Reality wich is the supreme Goal appears to be night, as it were, to all unenlightened beings who are comparable to the nocturnal creatures, because It is beyond the range of vision of those who are devoid of that wisdom. Samyami, the self-restrained man, whose organs are under control, i.e. the yogi [The man of realization.] who has arisen from the sleep of ignorance; jagarti, keeps awake; tasyam, in that (night) characterized as the Reality, the supreme Goal. That night of ignorance, characterized by the distinctions of subjects and objects, yasyam in which; bhutani, the creatures, who are really asleep; are said to be jagrati, keeping awake, in which night they are like dreamers in sleep; sa nisa, it is night; pasyatah, to the seeing; muneh, sage, who perceives the Reality that is the supreme Goal, because that (night) is ignorance by nature. Therefore, rites and duties are enjoined only during the state of ignorance, not in the state of enlightenment. For, when Knowledge dawns, ignorance becomes eradicated like the darkness of night after sun-rise. [It may be argued that even after illumination the phenomenal world, though it is known to be false, will continue to be perceived because of the persistence of past impressions; therefore there is scope for the validity of the scriptural injunctions even in the case of an illumined soul. The answer is that there will be no scope for the injunctions, because the man of realization will then have no ardent leaning towards this differentiated phenomenal world which makes an injunction relevant.] Before the rise of Knowledge, ignorance, accepted as a valid means of knowledge and presenting itself in the different forms of actions, means and results, becomes the cause of all rites and duties. It cannot reasonably become the source of rites and duties (after Realization) when it is understood as an invalid means of knowledge. For an agent becomes engaged in actions when he has the idea, 'Actions have been enjoined as a duty for me by the Vedas, which are a valid means of knowledge'; but not when he understands that 'all this is mere ignorance, like the night'. Again, the man to whom has come the Knowledge that all these differences in their totality are mere ignorance like the night, to that man who has realized the Self, there is eligibility only for renouncing all actions, not for engaging in actions. In accordance with this the Lord will show in the verse, 'Those who have their intellect absorbed in That, whose Self is That' (5.17) etc., that he has competence only for steadfastness in Knowledge. Objection: May it not be argued that, there will be no reason for being engaged even in that (steadfastness in Knowledge) if there be no valid means of knowledge [Vedic injunctions.] to impel one to that. [Because, without an injunction nobody would engage in a duty, much less in steadfastness to Knowledge.] Answer: No, since 'knowledge of the Self' relates to one's own Self. Indeed, by the very fact that It is the Self, and since the validity of all the means of knowledge culminates in It, [The validity of all the means of knowledge holds good only so long as the knowledge of the Self has not arisen.] therefore the Self does not depend on an injunction to impel It towards Itself. [Does the injunction relate to the knowledge of the Self. or to the Self Itself? The first alternative is untenable because a valid means of knowledge reveals its objects even without an injunction. The second alternative also is untenable because the Self is self-revealing, whereas an injunction is possible in the case of something yet to be achieved. And one's own Self is not an object of that kind.] Surely, after the realization of the true nature of the Self, there is no scope again for any means to, or end of, knowledge. The last valid means of (Self-) knowledge eradicates the possibility of the Self's becoming a perceiver. And even as it eradicates, it loses its own authoritativeness, in the same way as the means of knowledge which is valid in dream becomes unauthoritative during the waking state. In the world, too, after the preception of an abject, the valid means of that perception is not seen to be a cause impelling the knower (to any action with regard to that object). Hence, it is established that, for an knower of the Self, there remains no eligibility for rites and duties. The attainment of Liberation is only for the sannyasin [Liberation is attained only by one who, after aciring an intellectual knowledge of the Self in a general way, is endowed with discrimination and detachment, has arisen above all desires, has become a monk in the primary sense, and has directly realized the Self by going through the process of sravana (understanding of Upanisadic texts about the Self), etc.], the man of enlightenment, who has renounced all desires and is a man of steady wisdom; but not for him who has not renounced and is desirious of the objects (of the senses). Such being the case, with a view to establishing this with the help of an illustration, the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.69।। ज्ञानी और अज्ञानी की दृष्टियों के बीच के भेद को स्पष्ट करना इस श्लोक का प्रयोजन है। शरीर और मन की उपाधियों के माध्यम से अनुभूत जगत् अध्यात्म के खुले वातायन से देखे गये हृदय से भिन्न होता है। यहाँ रूपक की भाषा में सिद्धांत को इतने पूर्ण रूप से कहा गया है कि अनेक शुष्क तर्क करने वाले लोग उसमें निहित काव्य के सौन्दर्य को देख नहीं पाते। काव्य और ज्ञान का समन्वय करना आर्य लोगों की विशेषता है और जब दार्शनिक कवि व्यास जी पूर्णत्व के आनन्द को व्यक्त करने के लिये अपनी लेखनी और भोजपत्र उठाते थे तब वे गीता में कविता से श्रेष्ठ अन्य कोई माध्यम प्रयुक्त नहीं कर सकते थे।अज्ञानी पुरुष जगत् को यथार्थ रूप में कभी नहीं देखता वह जगत् को अपने मन के रंग में रंगकर देखता है और फिर बाह्य वस्तुओं को ही दोषयुक्त समझता है। रंगीन चश्मे द्वारा जगत् को देखने पर वह रंगीन ही दिखाई देगा किन्तु जब कांच को हटा देते हैं तब वह जगत् जैसा है वैसा ही प्रतीत होता है।आज जब हम शरीर मन और बुद्धि के माध्यम से जगत् को देखते हैं तब वह स्वाभाविक ही परिच्छिन्न और दोषयुक्त अनुभव होता है किन्तु यह सब दोष उपाधियों का ही है। स्थितप्रज्ञ पुरुष अपनी ज्ञान की दृष्टि से जब देखता है तब उसे पूर्णत्व और आनन्द का ही अनुभव होता है।जब एक विद्युत अभियन्ता (इंजीनियर) किसी महानगर में पहुँचता है जहाँ संध्या के समय से ही सभी दिशाओं में विद्युत का प्रकाश जगमगाता है तब वह प्रश्न करता है कि यह ए.सी. है या डी. सी. जबकि उसी दृश्य को एक अनपढ़ ग्रामीण व्यक्ति आश्चर्य चकित होकर देखते हुए चिल्ला उठता है कि बिना तेल और बत्ती के प्रकाश को मैं देख रहा हूँ उस ग्रामीण की दृष्टि से वहां न विद्युत है और न ए. सी. डी. सी. की समस्या उस अभियन्ता की दृष्टि ग्रामीण को अज्ञात है और वह अभियन्ता भी उस ग्रामीण के आश्चर्य को समझ नहीं पाता।इस श्लोक में यह बताया गया है कि अज्ञानी र्मत्य जीव आत्मस्वरूप के प्रति सोया हुआ है जिसके प्रति ज्ञानी पुरुष पूर्णरूप से जागरूक है। जिन सांसारिक विषयों के प्रति अज्ञानी लोग सजग होकर व्यवहार करते हैं और दुख भोगते हैं स्थितप्रज्ञ पुरुष उसे रात्रि अर्थात् अज्ञान की अवस्था ही समझते हैं।जिसने समस्त कामनाओं का त्याग किया वही ज्ञानी भक्त मोक्ष प्राप्त करता है और कामी पुरुष कभी नहीं। इसे एक दृष्टान्त द्वारा भगवान् समझाते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.69।।   एवं स्थितप्रज्ञलक्षणवर्णनेन मुमुक्षुभिरतियत्नेन स्थितप्रज्ञत्वाय समनस्केन्द्रियनिग्रहः कर्तव्य इत्युक्तम्। उत्पन्नविवेकविज्ञानस्य स्थितप्रज्ञस्य तु स्वतःसिद्ध एव समनस्केन्द्रियसंयमः। अविद्याविरोधिन्या विद्यया समूलस्य सर्वव्यवहारस्य निवृत्तेरित्येतद्वक्तुकामोऽविद्यावस्थायामेव कर्माणि विधीयन्ते न विद्यावस्थायामिति द्योतयन्नाह  येति।  सर्वभूतानामुलूकस्थानीयानां या निशेव निशा रात्रिः परमार्थतत्त्वलक्षणा तस्यामज्ञाननिद्रातः प्रबुद्धः संयमी स्थितप्रज्ञो ज्ञानयोगी जागर्ति यस्यां ग्राह्यग्राहकलक्षणायामविद्यायां भूतानि जाग्रति सा पश्यतो मुनेर्निशेव निशेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.69।।तदेवं मुमुक्षुणा प्रज्ञास्थैर्याय प्रयत्नपूर्वकमिन्द्रियसंयमः कर्तव्य इत्युक्तं स्थितप्रज्ञस्य तु स्वतःसिद्ध एव सर्वेन्द्रियसंयम इत्याह। या वेदान्तवाक्यजनितसाक्षात्काररूपाऽहंब्रह्मास्मीति प्रज्ञा सर्वभूतानामज्ञानां निशेव निशा तां प्रत्यप्रकाशरूपत्वात्तस्यां ब्रह्मविद्यालक्षणायां सर्वभूतनिशायां जागर्ति अज्ञाननिद्रायाः प्रबुद्धः सन्सावधानो वर्तते। संयमी इन्द्रियसंयमवान् स्थितप्रज्ञ इत्यर्थः। यस्यां तु द्वैतदर्शनलक्षणायामविद्यानिद्रायां प्रसुप्तान्येव भूतानि जाग्रति स्वप्नवद्व्यवहरन्ति सा निशा न प्रकाशत आत्मतत्त्वं पश्यतोऽपरोक्षतया मुनेः स्थितप्रज्ञस्य। यावद्धि न प्रबुध्यते तावदेव स्वप्नदर्शनं बोधपर्यन्तत्वाद्भ्रमस्य। तत्त्वज्ञानकाले तु न भ्रमनिमित्तः कश्चिद्व्यवहारः। तदुक्तं वार्तिककारैःकारकव्यवहारे हि शुद्धं वस्तु न वीक्ष्यते। शुद्धे वस्तुनि सिद्धे च कारकव्यापृतिस्तथा।।काकोलूकनिशेवायं संसारो ज्ञात्मवेदिनोः। या निशा सर्वभूतानामित्यवोचत्स्वयं हरिः।। इति। तथाच यस्य विपरीतदर्शनं तस्य न वस्तुदर्शनं विपरीतदर्शनस्य वस्त्वदर्शनजन्यत्वात् यस्य च वस्तुदर्शनं तस्य न विपरीतदर्शनं विपरीतदर्शनकारणस्य वस्त्वदर्शनस्य वस्तुदर्शनेन बाधितत्वात्। तथाच श्रुतिःयत्र वा अन्यदिव स्यात् तत्रान्योऽन्यत्पश्येत्। यत्रत्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं पश्येत्।। इति विद्याविद्ययोर्व्यवस्थामाह। यथा काकस्य रात्र्यन्धस्य दिनमुलूकस्य दिवान्धस्य निशा रात्रौ पश्यतश्चोलूकस्य यद्दिनं रात्रिरेव सा काकस्येति महदाश्चर्यमेतत्। अतस्तत्त्वदर्शिनः कथमाविद्यकक्रियाकारकादिव्यवहारः स्यादिति स्वतःसिद्ध एव तस्येन्द्रियसंयम इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.69।।यदा पञ्चावतिष्ठन्ते इत्युदाहृतश्रुतेःतामाहुः परमां गतिम् इत्येतं चतुर्थं पादं व्याचष्टे  या निशेति।  सर्वेषां भूतानामज्ञानां या निशेव निशा यस्यां मध्यंदिने उलूका इवानन्धा अप्यन्धा एव सर्वे प्राणिनो भवन्ति तस्यां तस्मिन्प्रत्यग्ज्योतिषि संयमी इन्द्रियमनोबुद्धीनां निग्रहणशीलो योगी जागर्ति इन्द्रियादीनां दृक्शक्तिलोपेऽप्यनुपरतदृक्शक्तिरेवास्ते। तथा च श्रुतिःनहि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यतेऽविनाशित्वात् इति। यस्यामविद्याख्यायां निशायां क्रियाकारकादिद्वैतस्वप्नप्रवर्तिकायां सर्वाणि भूतानि जाग्रति निशीथे उलूका इव स्वस्वव्यापारे प्रवर्तन्ते सा अविद्या पश्यतो मुनेः आत्मदर्शनवतो योगिनः प्रारब्धकर्मणा विदेहकैवल्यप्रतिबन्धाल्लेशतोऽनुवर्तमाना व्युत्थानकाले व्यवहारतोऽस्य गाढान्धकारवती निशेव क्लेशकरी भवति। अतिसुकुमारा हि योगिनो बाह्यव्यवहारादुद्विजन्ते नरा इव गाढान्धकारे संचारात्। यथोक्तं योगभाष्येअक्षिमात्रकल्पो हि विद्वानत्यल्पदुःखलेशेनाप्युद्विजते इति। अत्र वार्तिकानिकारकव्यवहारे हि शुद्धं वस्तु न वीक्ष्यते। शुद्धे वस्तुनि सिद्धे च कारकव्यापृतिस्तथा। काकोलूकनिशेवायं संसारोऽज्ञात्मवेदिनोः। या निशा सर्वभूतानामित्यवोचत्स्वयं हरिः। इति।बुद्धतत्त्वस्य लोकोऽयं जडोन्मत्तपिशाचवत्। बुद्धतत्त्वोऽपि लोकस्य जडोन्मत्तपिशाचवत्। इति। तदेवं किमासीतेत्यस्योत्तरंयदा संहरते चायम् इत्यादिना एतदन्तेन ग्रन्थेन स्थितप्रज्ञः सदा समाधिमनुतिष्ठन्परमां गतिं प्राप्यास्त इत्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.69।।नन्वेतादृशेन्द्रियनिग्रहकृत् किल्लँक्षणः इत्यपेक्षायामाह या निशेति। सर्वभूतानां या निशा रात्रौ निद्रायामिव विषयसुखेषु सर्वेषां या निशा सुखावाप्तिः। नितरां शं सुखं यस्यामिति निशा। तस्यां संयमी इन्द्रियनिग्रहकर्त्ता जागर्ति न सुखमवाप्नोतीत्यर्थः। यस्यां निशाया भूतानि जाग्रति न सुखं प्राप्नुवन्ति सा भगवत्सुखं पश्यतो मननशीलस्य निशा सुखाप्तिः। तत्सुखस्य कथनायोग्यत्वान्मुनेरिति विशेषणमुक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.69।।ननु च कश्चिदपि प्रसुप्त इव दर्शनादिव्यापारशून्यः सर्वात्मना निगृहीतेन्द्रियो लोके न दृश्यते अतोऽसंभावितमिदं लक्षणमित्याशङ्क्याह  या निशेति।  सर्वेषां भूतानां या निशा निशेव निशा आत्मनिष्ठा आत्माज्ञानध्वान्तावृतमतीनां तस्यां दर्शनादिव्यवहाराभावात् तस्यामात्मनिष्ठायां संयमी निगृहीतेन्द्रियो जागर्ति प्रबुध्यते यस्यां तु विषयबुद्ध्या भूतानि जाग्रति प्रबुद्ध्यन्ते सा आत्मतत्त्वं पश्यतो मुनेर्निशा। तस्यां दर्शनादिव्यापारस्तस्य नास्तीत्यर्थः। एतदुक्तं भवति। यथा दिवान्धानामुलूकादीनां रात्रावेव दर्शनं न तु दिवसे एवं ब्रह्मज्ञस्योन्मीलिताक्षस्यापि ब्रह्मण्येव दृष्टिर्नतु विषयेषु। अतो नासंभावितमिदं लक्षणमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.69।।तस्यैवान्येभ्यो वैलक्षण्येन लक्षणमाह या निशेति। याऽऽत्मविषया बुद्धिः संसारिणां स्वपतामिव निशेवाऽप्रकाशिका अज्ञानतिमिरोपहतमतीनां आत्मदर्शनव्यवहारायोग्या तस्यां संयमी जागर्ति। यस्यां च शब्दादिविषयिण्याम्। एवं विलक्षणलक्षणो मुनिर्दर्शितः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.69।।यह जो लौकिक और वैदिक व्यवहार है वह सबकासब अविद्याका कार्य है अतः जिसको विवेकज्ञान प्राप्त हो गया है ऐसे स्थितप्रज्ञके लिये अविद्याकी निवृत्तिके साथहीसाथ ( यह व्यवहार भी ) निवृत्त हो जाता है और अविद्याका विद्याके साथ विरोध होनेके कारण उसकी भी निवृत्ति हो जाती है। इस अभिप्रायको स्पष्ट करते हुए कहते हैं तामस स्वभावके कारण सब पदार्थोंका अविवेक करानेवाली रात्रिका नाम निशा है। सब भूतोंकी जो निशा अर्थात् रात्रि है वह ( निशा ) क्या है ( उ0 ) परमार्थतत्त्व जो कि स्थितप्रज्ञका विषय है ( ज्ञेय है )। जैसे उल्लू आदि रजनीचरोंके लिये दूसरोंका दिन भी रात होती है वैसे ही निशाचरस्थानीय जो सम्पूर्ण अज्ञानी मनुष्य हैं जिनमें परमार्थतत्त्वविषयक बुद्धि नहीं है उन सब भूतोंके लिये अज्ञात होनेके कारण यह परमार्थतत्त्व रात्रिकी भाँति रात्रि है। उस परमार्थतत्त्वरूप रात्रिमें अज्ञाननिद्रासे जगा हुआ संयमी अर्थात् जितेन्द्रिय योगी जागता है। ग्राह्यग्राहकभेदरूप जिस अविद्यारात्रिमें सोते हुए भी सब प्राणी जागते हैं ऐसे कहा जाता है अर्थात् जिस रात्रिमें सब प्राणी सोते हुए स्वप्न देखनेवालोंके सदृश जागते हैं। वह ( सारा दृश्य ) अविद्यारूप होनेके कारण परमार्थतत्त्वको जाननेवाले मुनिके लिये रात्रि है। सुतरां ( यह सिद्ध हुआ कि ) अविद्याअवस्थामें ही ( मनुष्यके लिये ) कर्मोंका विधान किया जाता है विद्यावस्थामें नहीं क्योंकि जैसे सूर्यके उदय होनेपर रात्रिसम्बन्धी अन्धकार दूर हो जाता है उसी प्रकार ज्ञान उदय होनेपर अज्ञान नष्ट हो जाता है। ज्ञानोत्पत्तिसे पहलेपहले प्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई अविद्या ही क्रिया कारक और फल आदिके भेदोंमें परिणत होकर सब कर्म करवानेका हेतु बन सकती है अप्रमाणबुद्धिसे ग्रहण की हुई ( अविद्या ) कर्म करवानेका कारण नहीं बन सकती। क्योंकि प्रमाणस्वरूप वेदने मेरे लिये अमुक कर्तव्यकर्मोंका विधान किया है ऐसा मानकर ही कर्ता कर्ममें प्रवृत्त होता है यह सब रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र है इस तरह समझकर नहीं होता। जिसको ऐसा ज्ञान प्राप्त हो गया है कि यह सारा दृश्य रात्रिकी भाँति अविद्यामात्र ही है उस आत्मज्ञानीका तो सर्व कर्मोंके संन्यासमें ही अधिकार है प्रवृत्तिमें नहीं। इस प्रकार तद्बुद्धयस्तदात्मानः इत्यादि श्लोकोंसे उस ज्ञानीका अधिकार ज्ञाननिष्ठामें ही दिखलायेंगे। पू0 उस ज्ञाननिष्ठामें भी ( तत्त्ववेत्ताको ) प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणका ( विधिवाक्यका ) अभाव है इसलिये उसमें भी उसकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उ0 यह कहना ठीक नहीं क्योंकि आत्मज्ञान अपने स्वरूपको विषय करनेवाला है अतः अपने स्वरूपज्ञानके विषयमें प्रवृत्त करनेवाले प्रमाणकी अपेक्षा नहीं होती। वह आत्मज्ञान स्वयं आत्मा होनेके कारण स्वतःसिद्ध है और उसीमें सब प्रमाणोंके प्रमाणत्वका अन्त है अर्थात् आत्मज्ञान होनेतक ही प्रमाणोंका प्रमाणत्व है अतः आत्मस्वरूपका साक्षात् होनेके बाद प्रमाण और प्रमेयका व्यवहार नहीं बन सकता। ( आत्मज्ञानरूप ) अन्तिम प्रमाण आत्माके प्रमातापनको भी निवृत्त कर देता है। उसको निवृत्त करता हुआ वह स्वयं भी जागनेके बाद स्वप्नकालके प्रमाणकी भाँति अप्रमाणी हो जाता है अर्थात् लुप्त हो जाता है। क्योंकि व्यवहारमें भी वस्तु प्राप्त होनेके बाद कोई प्रमाण ( उस वस्तुकी प्राप्तिके लिये ) प्रवृत्तिका हेतु होता नहीं देखा जाता। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि आत्मज्ञानीका कर्मोंमें अधिकार नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.69।। व्याख्या    या निशा सर्वभूतानाम्   जिनकी इन्द्रियाँ और मन वशमें नहीं हैं जो भोगोंमें आसक्त है वे सब परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। परमात्मा क्या है तत्त्वज्ञान क्या है हम दुःख क्यों पा रहे हैं सन्तापजलन क्यों हो रही है हम जो कुछ कर रहे हैं उसका परिणाम क्या होगा इस तरफ बिलकुल न देखना ही उनकी रात है उनके लिये बिलकुल अँधेरा है।यहाँ  भूतानाम्  कहनेका तात्पर्य है कि जैसे पशुपक्षी आदि दिनभर खानेपीनेमें लगे रहते हैं ऐसे ही जो मनुष्य रातदिन खानेपीनेमें सुखआराममें भोगों और संग्रहमें धन कमानेमें ही लगे हुए हैं उन मनुष्योंकी गणना भी पशुपक्षी आदिमें ही है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे विमुख रहनेमें पशुपक्षी आदिमें और मनुष्योंमें कोई अन्तर नहीं है। दोनों ही परमात्मतत्त्वकी तरफसे सोये हुए हैं। हाँ अगर कोई अन्तर है तो वह इतना ही है कि पशुपक्षी आदिमें विवेकशक्ति जाग्रत् नहीं है इसिलिये वे खानेपीने आदिमें ही लगे रहते हैं और मनुष्योंमें भगवान्की कृपासे वह विवेकशक्ति जाग्रत है जिससे वह अपना कल्याण कर सकता है प्राणिमात्रकी सेवा कर सकता है परमात्माकी प्राप्ति कर सकता है। परन्तु उस विवेकशक्तिका दुरूपयोग करके मनुष्य पदार्थोंका संग्रह करनेमें एवं उनका भोग करनेमें लग जाते हैं जिससे वे संसारके लिये पशुओंसे भी अधिक दुःखदायी हो जाते हैं। कारण कि पशुपक्षी तो बेचारे जितनेसे पेट भर जाय उतना ही खाते हैं संग्रह नहीं करते परन्तु मनुष्यको कहीं भी जो कुछ पदार्थ आदि मिल जाता है वह उसके काममें आये चाहे न आये उसका तो वह संग्रह कर ही लेता है और दूसरोंके काममें आनेमें बाधा डाल देता है। तस्यां जागर्ति संयमी   मनुष्योंकी जो रात है अर्थात् परमात्माकी तरफसे अपने कल्याणकी तरफसे जो विमुखता है उसमें संयमी मनुष्य जागता है। जिसने इन्द्रियों और मनको वशमें किया है जो भोग और संग्रहमें आसक्त नहीं है जिसका ध्येय केवल परमात्मा है वह संयमी मनुष्य है। परमात्मतत्त्वको अपने स्वरूपको संसारको यथार्थरूपसे जानना ही उसका रातमें जागना है। यस्यां जाग्रति भूतानि  जो भोग और संग्रहमें बड़े सावधान रहते हैं एकएक पैसेका हिसाब रखते हैं जमीनके एकएक इंचका खयाल रखते है जितने रूपये अधिकारमें आ जायँ वे चाहे न्यायपूर्वक हों अथवा अन्यायपूर्वक उसमें वे बड़े खुश होते हैं कि इतनी पूँजी तो हमने ले ही ली है इतना लाभ तो हमें हो ही गया है इस तरह वे सांसारिक क्षणभङ्गुर भोगोंको बटोरनेमें और आदरसत्कार मानबड़ाई आदि प्राप्त करनेमें ही लगे रहते हैं उनमें बड़े सावधान रहते हैं यही उन लोगोंका जागना है। सा निशा पश्यतो मुनेः   जिन सांसारिक पदार्थोंका भोग और संग्रह करनेमें मनुष्य अपनेको बड़ा बुद्धिमान् चतुर मानते हैं और उसीमें राजी होते हैं संसार और परमात्मतत्त्वको जाननेवाले मननशील संयमी मनुष्यकी दृष्टिमें वह सब रातके समान है बिलकुल अँधेरा है।जैसे बच्चे खेलते हैं तो वे कंकड़पत्थर काँचके लालपीले टुकड़ोंको लेकर आपसमें लड़ते हैं। अगर वह मिल जाता है तो राजी होते हैं कि मैंने बहुत बड़ा लाभ उठा लिया और अगर वह नहीं मिलता तो दुःखी हो जाते हैं कि मेरी बड़ी भारी हानि हो गयी। परन्तु जिसके मनमें कंकड़पत्थर आदिका महत्त्व नहीं है ऐसा समझदार व्यक्ति समझता है कि इन कंकड़पत्थरोंके मिलनेसे क्या लाभ हुआ और न मिलनेसे क्या हानि हुई इन बच्चोंको अगर कंकड़पत्थर मिल भी जायँगे तो ये कबतक उनके साथ रहेंगे इसी तरह भोग और संग्रहमें लगे हुए मनुष्य भोगोंके लिये लड़ाईझगड़ा झूठकपट बेईमानी आदि करते हैं और उनको प्राप्त करके राजी होते हैं खुशी मनाते हैं कि हमने बहुत लाभ ले लिया। परन्तु संसारको और परमात्मतत्त्वको जाननेवाला मननशील संयमी मनुष्य साफ देखता है कि भोग मिल गये आदरसत्कार हो गया सुखआराम हो गया खापी लिया खूब श्रृंगार कर लिया तो क्या हो गया इसमें मनुष्योंको क्या मिला इनमेंसे इनके साथ क्या चलेगा ये कबतक इन भोगोंको साथमें रखेंगे इन भोगोंसे होनेवाली वृत्ति कितने दिनतक ठहरेगी इस तरह उसकी दृष्टिमें प्राणियोंका जागना रातके समान है।वह मननशील संयमी मनुष्य परमात्माको अपने स्वरूपको और संसारके परिणामको तो जानता ही है वह पदार्थोंको भी अच्छी तरहसे जानता है कि कौनसा पदार्थ किसके हितमें लग सकता है इससे दूसरोंको कितना लाभ होगा। वह पदार्थोंका अपनीअपनी जगह ठीक तरहसे सदुपयोग करता है। उनको दूसरोंकी सेवामें लगाता है।जैसे नेत्रोंमे दोष होनेपर जब हम आकाशको देखते हैं तब उसमें जालेसेदीखते हैं और आँखें मीच लेनेपर भी मोरपंखकी तरह वे जाले दीखते हैं परन्तु उनके दीखनेपर भी हमारी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि आकाशमें जाले नहीं है। ऐसे ही इन्द्रियों और अन्तःकरणके द्वारा संसार दीखनेपर भी मननशील संयमी मनुष्यकी बुद्धिमें यह अटल निश्चय रहता है कि वास्तवमें संसार नहीं है केवल प्रतीतिमात्र है। सम्बन्ध   मननशील संयमी मनुष्यको संसार रातकी तरह दीखता है। इसपर यह प्रश्न उठता है कि क्या वह सांसारिक पदार्थोंके सम्पर्कमें आता ही नहीं अगर नहीं आता तो उसका जीवननिर्वाह कैसे होता है और अगर आता है तो उसकी स्थिति कैसे रहती है इन बातोंका विवेचन करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.66 2.70।।रागद्वेषेत्यादि प्रतिष्ठितेत्यन्तम्। यस्तु मनसो नियामकः स विषयान् सेवमानोऽपि न क्रोधादिकल्लोलैरभिभूयते इति स एव स्थितप्रज्ञो योगीति तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.69।।आत्मविदः स्थितप्रज्ञस्य सर्वकर्मपरित्यागेऽधिकारस्तद्विपरीतस्याज्ञस्य कर्मणीत्येतस्मिन्नर्थे समनन्तरश्लोकमवतारयति  योऽयमिति।  अविद्यानिवृत्तौ सर्वकर्मनिवृत्तिश्चेत्तन्निवृत्तिरेव कथमित्याशङ्क्याह  अविद्यायाश्चेति।  स्फुटीकुर्वन् बाह्याभ्यन्तरकरणानां पराक्प्रत्यक्प्रवृत्तिवत्तथाविधे दर्शने च मिथो विरुध्येते पराग्दर्शनस्यानाद्यात्मावरणाविद्याकार्यत्वादात्मदर्शनस्य च तन्निवर्तकत्वात्ततश्चात्मदर्शनार्थमिन्द्रियाण्यर्थेभ्यो निगृह्णीयादित्याहेति योजना। सर्वप्राणिनां निशा पदार्थाविवेककरीत्यत्र हेतुमाह  तमःस्वभावत्वादिति।  सर्वप्राणिसाधारणीं प्रसिद्धां निशां दर्शयित्वा तामेव प्रकृतानुगुणत्वेन प्रश्नपूर्वकं विशदयति  किं तदित्यादिना।  स्थितप्रज्ञविषयस्य परमार्थतत्त्वस्य प्रकाशैकस्वभावस्य कथमज्ञानं प्रति निशात्वमित्याशङ्क्याह  यथेति।  तत्र हेतुमाह  अगोचरत्वादिति।  अतद्बुद्धीनां परमार्थतत्त्वातिरिक्ते द्वैतप्रपञ्चे प्रवृत्तबुद्धीनामप्रतिपन्नत्वात् परमार्थतत्त्वं निशेवाविदुषामित्यर्थः। तस्यामित्यादि व्याचष्टे  तस्यामिति।  निशावदुक्तायामवस्थायामिति यावत् योगीति ज्ञानी कथ्यते। द्वितीयार्धं विभजते  यस्यामिति।  प्रसुप्तानां जागरणं विरुद्धमित्याशङ्क्याह  प्रसुप्ता   इवेति।  परमार्थतत्त्वमनुभवतो निवृत्ताविद्यस्य संन्यासिनो द्वैतावस्था निशेत्यत्र हेतुमाह  अविद्यारूपत्वादिति।  परमार्थावस्था निशेत्यविदुषां विदुषां तु द्वैतावस्था तथेति स्थिते फलितमाह  अत इति।  अविद्यावस्थायामेव क्रियाकारकफलभेदप्रतिभानादित्यर्थः। विद्योदयेऽपि तत्प्रतिभानाविशेषात्पूर्वमिव कर्माणि विधीयेरन्नित्याशङ्क्याह  विद्यायामिति।  अविद्यानिवृत्तौ बाधितानुवृत्त्या विभागभानेऽपि नास्ति कर्मविधिर्विभागाभिनिवेशाभावादित्यर्थः। अविद्यावस्थायामेव कर्मणीत्युक्तं व्यक्तीकरोति  प्रागिति।  विद्योदयात्पूर्वं बाधकाभावादबाधिता विद्या क्रियादिभेदमापाद्य प्रमाणरूपया बुद्ध्या ग्राह्यतां प्राप्य कर्महेतुर्भवति क्रियादिभेदाभिमानस्य तद्धेतुत्वादित्यर्थः। न विद्यावस्थायामित्युक्तं प्रपञ्चयति  नाप्रमाणेति।  उत्पन्नायां च विद्यायामविद्याया निवृत्तत्वात् क्रियादिभेदभानमप्रमाणमिति बुद्धिरुत्पद्यते तथा गृह्यमाणा यथोक्तविभागभागिन्यप्यविद्या न कर्महेतुत्वं प्रतिपद्यते बाधितत्वेनाभासतया तद्धेतुत्वायोगादित्यर्थः। विद्याविद्याविभागेनोक्तमेव विशेषं विवृणोति  प्रमाणभूतेनेति।  यथोक्तेन वेदेन कामनाजीवनादिमतो मम कर्म विहितं तेन मया तत्कर्तव्यमिति मन्वानः सन् कर्मण्यज्ञोऽधिक्रियते तं प्रति साधनविशेषवादिनो वेदस्य प्रवर्तकत्वादित्यर्थः। सर्वमेवेदमविद्यामात्रं द्वैतं निषेवेतेति मन्वानस्तु न प्रवर्तते कर्मणीति व्यावर्त्यमाह  नाविद्येति।  विदुषो न कर्मण्यधिकारश्चेत्तस्याधिकारस्तर्हि कुत्रेत्याशङ्क्याह  यस्येति।  तस्यात्मज्ञस्य फलभूतसंन्यासाधिकारे वाक्यशेषं प्रमाणयति  तथाचेति।  प्रवर्तकं प्रमाणं विधिस्तदभावे कर्मस्विव विदुषो ज्ञाननिष्ठायामपि प्रवृत्तेरनुपपत्तेराश्रयणीयो ज्ञानवतोऽपि विधिरिति शङ्कते  तत्रापीति।  किमात्मज्ञानं विधिमपेक्षते किं वात्मा। नाद्यः। तस्य स्वरूपविषयस्य यथा प्रमाणप्रमेयमुत्पत्तेर्विध्यनपेक्षत्वादित्याह   न स्वात्मेति।  न द्वितीय इत्याह  नहीति।  प्रवर्तकप्रमाणशब्दितस्य विधेः साध्यविषयत्वादात्मनश्चासाध्यत्वादिति हेतुमाह  आत्मत्वादेवेति।  आत्मतज्ज्ञानयोर्विध्यनपेक्षत्वेऽपि ज्ञानिनो मानमेव व्यवहारं प्रति नियमार्थं विध्यपेक्षा स्यादित्याशङ्क्याह  तदन्तत्वाच्चेति।  सर्वेषां प्रमाणानां प्रामाण्यस्यात्मज्ञानोदयावसानत्वात्तस्मिन्नुत्पन्ने व्यवहारस्य निरवकाशत्वान्न तत्प्रति नियमाय ज्ञानिनो विधिरित्यर्थः। उक्तमेव व्यक्तीकरोति  नहीति।  धर्माधिगमवदात्माधिगमेऽपि किमिति यथोक्तो व्यवहारो न भवतीत्याशङ्क्याह  प्रमातृत्वंहीति।  तन्निवृत्तौ कथमद्वैतज्ञानस्य प्रामाण्यमित्याशङ्क्याह  निवर्तयदेवेति।  निवर्तयदद्वैतज्ञानं स्वयं निवृत्तेर्न प्रमाणमित्यत्र दृष्टान्तमाह  स्वप्नेति।  आत्मज्ञानस्य विध्यनपेक्षत्वे हेत्वन्तरमाह  लोके चेति।  व्यवहारभूमौ हि प्रमाणस्य वस्तुनिश्चयफलपर्यन्तत्वे सति प्रवर्तकविधिसापेक्षत्वानुपलम्भादद्वैतज्ञानमपि प्रमाणवान्न विधिमपेक्षते रज्ज्वादिज्ञानवदित्यर्थः। आत्मज्ञानवतस्तन्निष्ठाविधिमन्तरेण ज्ञानमाहात्म्येनैव सिद्धत्वात्तस्य कर्मसंन्यासेऽधिकारो न कर्मणीत्युपसंहरति  तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.69।।ज्ञानिनः सर्वकर्मत्यागप्रतिपादनार्थायया निशा इत्ययं श्लोक इति कश्चित्। तत्र तत्प्रतिपादकाक्षराश्रवणात् प्रमाणविरोधाच्चेत्याशयेन तत्प्रतिपाद्यमाह  उक्तलक्षण मिति चतुश्श्लोक्या विक्षिप्योक्तम्। नन्वत्रोक्तं किमपि न प्रतीयत इत्यत आह  ये ति। परमेश्वरस्वरूपस्य निशासाम्यमुपपादयति  यस्या मिति। विषयत्वमधिकरणत्वं चाविवक्षित्वा कारकत्वमात्रविवक्षया साम्यमिदमुक्तम्। संयमीत्यस्याक्षरार्थं  इन्द्रिये ति प्रकरणलभ्योऽर्थो  ज्ञानी ति। उत्तरार्धार्थमाह  यस्या मिति। अत्रापि पूर्ववत्साम्यम्। यदि न किञ्चित्पश्यति कथं तर्हि तस्य गमनादिप्रवृत्तिः इत्यत आह  मत्तादिव दिति। कुत एतत् इत्यत आह  तदुक्त मिति। मुनेरित्युक्तत्वाच्चतुर्थाश्रमिण एव ज्ञानमिति व्याख्यानमसदिति भावेनाह  मननयुक्त  इति। याज्ञवल्क्यादीनामयतीनामपि ज्ञानश्रवणादिति भावः। मननस्य प्राङ्निवृत्तत्वात्पश्यतो मुनेः इति कथं इत्यत आह  पश्यत  इति। दर्शनसाधनत्वेन मननमिहोक्तं न तु तत्समकालीनतयेत्यर्थः। एतच्च प्राङ्मननादेः स्पष्टदर्शनसाधनत्वानुक्तेः प्रसङ्गादिहोक्तम्। ननुस्थितधीः किं प्रभाषेत 2।54 इत्याद्यु(देरु)त्तरमयं श्लोक इति प्रागुक्तं तत्कथमिदानीं लक्षणपरतया व्याख्यातः अन्यपरादपि तल्लाभ इत्याशयेनेति ब्रूमः अन्यथाप्रभाषेत इत्यादेरुत्तरमाहेत्यत्रैवावेक्ष्यत् किं तत्र स्थानप्रदर्शनादिना इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.69।।उक्तं लक्षणं पिण्डीकृत्याह या निशेति। या सर्वभूतानां निशा परमेश्वरस्वरूपलक्षणा। यस्यां सुप्तानीव न किञ्चिज्जानन्ति तस्यामिन्द्रियसंयुक्तो ज्ञानी जागर्ति सम्यगापरोक्ष्येण पश्यति परमात्मानमित्यर्थः। यस्यां विषयलक्षणायां भूतानि जाग्रति तस्यां निशायामिव सुप्तः प्रायो न जानाति। मत्तादिवद्गमनादिप्रवृत्तिः। तदुक्तम्देहं (च तं न चरमः) तु तत्र चरमम् भाग.3।28।37देहोऽपि दैववशगः भाग.3।28।3811।13।37 इति श्लोकाभ्याम्। मननयुक्तो मुनिः। पश्यत इत्यस्य साधनमाह।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.69।। या  आत्मविषया बुद्धिः  सर्वभूतानां निशा  निशा इव अप्रकाशिका।  तस्याम्  आत्मविषयायां बुद्धौ इन्द्रिय संयमी  प्रसन्नमना  जागर्ति  आत्मानम् अवलोकयन्  आस्ते  इत्यर्थः।  यस्यां  शब्दादिविषयायां बुद्धौ सर्वाणि  भूतानि जाग्रति  प्रबुद्धानि भवन्ति  सा  शब्दादिविषया बुद्धिः आत्मानं  पश्यतो मुनेः निशा  इव अप्रकाशिका भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.69।।  या निशा  रात्रिः सर्वपदार्थानामविवेककरी तमःस्वभावत्वात्  सर्वभूतानां  सर्वेषां भूतानाम्। किं तत् परमार्थतत्त्वं स्थितप्रज्ञस्य विषयः। यथा नक्तञ्चराणाम् अहरेव सदन्येषां निशा भवति तद्वत् नक्तञ्चरस्थानीयानामज्ञानां सर्वभूतानां निशेव निशा परमार्थतत्त्वम् अगोचरत्वादतद्बुद्धीनाम्।  तस्यां  परमार्थतत्त्वलक्षणायामज्ञाननिद्रायाः प्रबुद्धो  जागर्ति   संयमी  संयमवान् जितेन्द्रियो योगीत्यर्थः।  यस्यां  ग्राह्यग्राहकभेदलक्षणायामविद्यानिशायां प्रसुप्तान्येव  भूतानि  जाग्रति  इति उच्यन्ते यस्यां निशायां प्रसुप्ता इव स्वप्नदृशः  सा निशा  अविद्यारूपत्वात् परमार्थतत्त्वं  पश्यतो मुनेः।।अतः कर्माणि अविद्यावस्थायामेव चोद्यन्ते न विद्यावस्थायाम्। विद्यायां हि सत्याम् उदिते सवितरि शार्वरमिव तमः प्रणाशमुपगच्छति अविद्या। प्राक् विद्योत्पत्तेः अविद्या प्रमाणबुद्ध्या गृह्यमाणा क्रियाकारकफलभेदरूपा सतीसर्वकर्महेतुत्वं प्रतिपद्यते। न अप्रमाणबुद्ध्या गृह्यमाणायाः कर्महेतुत्वोपपत्तिः प्रमाणभूतेन वेदेन मम चोदितं कर्तव्यं कर्म इति हि कर्मणि कर्ता प्रवर्तते न अविद्यामात्रमिदं सर्वं निशेव इति। यस्य पुनः निशेव अविद्यामात्रमिदं सर्वं भेदजातम् इति ज्ञानं तस्य आत्मज्ञस्य सर्वकर्मसंन्यासे एव अधिकारो न प्रवृत्तौ। तथा च दर्शयिष्यति तद्बुद्धयस्तदात्मानः इत्यादिना ज्ञाननिष्ठायामेव तस्य अधिकारम्।।तत्रापि प्रवर्तकप्रमाणाभावे प्रवृत्त्यनुपपत्तिः इति चेत् न स्वात्मविषयत्वादात्मविज्ञानस्य। न हि आत्मनः स्वात्मनि प्रवर्तकप्रमाणापेक्षता आत्मत्वादेव। तदन्तत्वाच्च सर्वप्रमाणानां प्रमाणत्वस्य। न हि आत्मस्वरूपाधिगमे सति पुनः प्रमाणप्रमेयव्यवहारः संभवति। प्रमातृत्वं हि आत्मनः निवर्तयति अन्त्यं प्रमाणम् निवर्तयदेव च अप्रमाणीभवति स्वप्नकालप्रमाणमिव प्रबोधे। लोके च वस्त्वधिगमे प्रवृत्तिहेतुत्वादर्शनात् प्रमाणस्य। तस्मात् न आत्मविदः कर्मण्यधिकार इति सिद्धम्।।विदुषः त्यक्तैषणस्य स्थितप्रज्ञस्य यतेरेव मोक्षप्राप्तिः न तु असंन्यासिनः कामकामिनः इत्येतमर्थं दृष्टान्तेन प्रतिपादयिष्यन् आह

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【 Verse 2.70 】

▸ Sanskrit Sloka: आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमाप: प्रविशन्ति यद्वत् | तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ||

▸ Transliteration: āpūryamāṇ amacala-pratiṣṭhaṁ samudramāpaḥ praviśanti yadvat | tadvatkāmā yaṁ praviśanti sarve sa śāntimāpnoti na kāmakāmī ||

▸ Glossary: āpūryamāṇaṁ: always filled; acalapratiṣṭhaṁ: steadily established; samudraṁ: the ocean; āpaḥ: water; praviśanti: enter; yadvat: as; tadvat: so; kāmāḥ: desires;yaṁ: one; praviśanti: enter; sarve: all; saḥ: that person; śāntiṁ: peace; āpnoti: achieves; na: not; kāmakāmī: one who cherishes longings

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.70 Just as all waters enter the ocean, he attains peace into whom all desires enter, which when filled from all sides, re- mains unmoved; not the desirer of desires.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.70।।जैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है। ऐसे ही सम्पूर्ण भोगपदार्थ जिस संयमी मनुष्यमें विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है भोगोंकी कामनावाला नहीं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.70।। जैसे सब ओर से परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठा वाले समुद्र में (अनेक नदियों के) जल (उसे विचलित किये बिना) समा जाते हैं? वैसे ही जिस पुरुष के प्रति कामनाओं के विषय उसमें (विकार उत्पन्न किये बिना) समा जाते हैं? वह पुरुष शान्ति प्राप्त करता है? न कि भोगों की कामना करने वाला पुरुष।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.70 आपूर्यमाणम् filled from all sides? अचलप्रतिष्ठम् based in stillness? समुद्रम् ocean? आपः water? प्रविशन्ति enter? यद्वत् as? तद्वत् so? कामाः desires? यम् whom? प्रविशन्ति enter? सर्वे all? सः he? शान्तिम् peace? आप्नोति attains? न not? कामकामी desirer of desires.Commentary Just as the ocean filled with waters from all sides remains unmoved? so also the sage who is resting in his own Svarupa or the Self is not a bit affected though desires of all sorts enter from all sides. The sage attains peace or liberation but not he who longs for objects of sensual enjoyment and entertains various desires. (Cf.XVIII.53?54).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.70. Just as waters enter into the ocean which is being filled continuously and which is [yet] firmly established, in the same way, he into whom all objects of desire enter-he attains peace; not he who longs for the objects of desire.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.70 He attains Peace, into whom desires flow as rivers into the ocean, which though brimming with water remains ever the same; not he whom desire carries away.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.70 He into whom all desires enter as the waters enter the full and undisturbed sea, attains to peace, and not he who longs after objects of desire.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.70 That man attains peace into whom all desires enter in the same way as the waters flow into a sea that remains unchanged (even) when being filled up from all sides. Not so one who is desirous of objects.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.70 He attains peace into whom all desires enter as waters enter the ocean which, filled from all sides, remains unmoved; but not the man who is full of desires.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.70 Apuryamanam etc. the man of Yoga does not run out for the sake of pleasure; but, rather just as the floods of the rivers enter into the sea, the objects of pleasure [themselves] continuously enter into him on account of their being peculiar attributes of the sense-organs; and they do not create in him waves [of agitation]. thus the third estion is decided.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.70 The river waters enter into the sea which is full by itself and is thus the same, i.e., unchanging in shape. The sea exhibits no special increase or decrease, whether the waters or rivers enter it or not. Even so do all objects of desire, i.e., objects of sense perception like sound etc., enter into a self-controlled one, i.e., they produce only sensorial impressions but no reaction from him. Such a person will attain peace. The meaning is that he alone attains to peace, who by reason of the contentment coming from the vision of the self, feels no disturbance when objects of sense like sound, etc., come within the ken of the senses or when they do not come. This is not the case with one who runs after desires. Whoever is agitated by sound and other objects, never attains to peace.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.70 Sah, that man; apnoti, attains; santim, peace Liberation; yam, into whom, into which person; sarve, all; kamah, desires, all forms of wishes; pravisanti, enter, from all directions, like waters entering into a sea, without overwhelming him even in the presence of objects; they vanish in the Self, they do not bring It under their own influence, tadvat, in the same way; yadvat, as; apah, waters, coming from all sides; pravisanti, flow into; samudram, a sea; that remains acala-pratistham, unchanged, that continues to be its own self, without any change; apuryamanam, (even) when filled up from all sides with water. Na, not so the other; who is kama-kami, desirous of objects. Kama means objects which are sought after. He who is given to desire them is kama-kami. The idea implied is that he never attains (peace). Since this is so, therefore.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.70।। यह सुविदित तथ्य है कि यद्यपि करोड़ों गैलन पानी अनेक सरिताओं द्वारा विभिन्न दिशाओं से आकर निरन्तर समुद्र में समाता रहता है तथापि समुद्र की मर्यादा किसी प्रकार भंग नहीं होती। इसी प्रकार ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से असंख्य विषय संवेदनाएँ ज्ञानी पुरुष के मन में पहुँचती रहती हैं फिर भी वे उसके अन्तकरण में किसी प्रकार का भी

Chapter 2 (Part 39)

विकार अथवा क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकतीं।विषयों के बीच रहता हुआ इन्द्रियों के द्वारा समस्त व्यवहार करता हुआ भी जो पुरुष स्वस्वरूप की स्थिति से विचलित नहीं होता वही ज्ञानी है सन्त है। भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि ऐसा पुरुष ही वास्तविक शान्ति और आनन्द प्राप्त करता है। इतना कहने मात्र से मानो उन्हें सन्तोष नहीं होता और आगे वे कहते हैं भोगों की कामना करने वाले पुरुषों को कभी शान्ति नहीं मिलती।उपर्युक्त विचार आधुनिक भौतिकवादी विचारधारा के सर्वथा विपरीत हैं। उनकी यह धारणा है कि अधिक इच्छाओं के होने से भौतिक उन्नति होगी और अधिक से अधिक इच्छाओं की पूर्ति से मनुष्य को सुखी बनाया जा सकता है। औद्योगीकरण और बड़ी मात्रा में उत्पादन के सिद्धांतों पर आधारित भौतिकवादी समाज का प्रयत्न मनुष्य में इच्छाओं की निरन्तर वृद्धि करने के लिए ही हो रहा है। परिणाम यह हुआ है कि आज के सामान्य मनुष्य की इच्छायें एक शताब्दी पूर्व अपने पूर्वजों की इच्छाओं से लाखगुना अधिक हैं। बड़ेबड़े व्यापारी और उद्योगपति विज्ञान की आधुनिक उपलब्धियों की सहायता से नईनई इच्छायें उत्पन्न करने और उन्हें पूर्ण करने का प्रयत्न करते रहते हैं। जिस मात्रा में मनुष्य की इच्छायें पूर्ण होती हैं उसे कहा जाता है कि अब वह पहले से कहीं अधिक सुखी है।इसके विपरीत भारत के प्राचीन महान् विचारकों ने स्वानुभव सूक्ष्म निरीक्षण एवं अध्ययन से यह पाया कि इच्छाओं की पूर्ति से प्राप्त सुख कभी पूर्ण नहीं हो सकता। सुख की मात्रा को गणित की भाषा में इस प्रकार बताया जा सकता है सुख की मात्रा पूर्ण हुई इच्छाओं की संख्यामन में स्थित इच्छाओं की संख्याभौतिकवादी धर्मनिरपेक्ष आधुनिक लोग भी इस सत्य को स्वीकार तो करते हैं परन्तु उनकी तथा ऋषियों की व्यावहारिक कार्यप्रणाली बहुत भिन्न दिखाई देती है।आज सर्वत्र अधिकसेअधिक इच्छाओं को पूर्ण करने का प्रयत्न सुख के लिए किया जाता है। प्राचीन ऋषिगण भी मानव समाज में ही रहते थे और तत्त्वज्ञान के द्वारा उनका लक्ष्य समाज को अधिक सुखी बनाना ही था। उन्होंने पहचाना कि इच्छाओं की संख्या कम किये बिना केवल अधिक से अधिक इच्छाओं की पूर्ति से न कोई वास्तविक आनन्द ही प्राप्त होता है और न ही उसमें कोई विशेष वृद्धि ही। परन्तु आज हम ऋषियों के विचार से सर्वथा भिन्न मार्ग अपना रहे हैं और इसीलिए समाज में आनन्द नहीं दिखाई देता।औपनिषदिक सिद्धांत का ही प्रतिपादन गीता में है जिसकी प्रशंसा भारतीय कवियों द्वारा मुक्त कण्ठ से की गई है। अनेक भोगों की कामना करने वाला पुरुष कभी शान्ति प्राप्त नहीं करता। बाह्य जगत् का त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन करने पर ही विषयों में हमें दुखी बनाने की सार्मथ्य आ जाती है अन्यथा वे स्वयं किसी प्रकार की हानि हमें नहीं पहुँचा सकते। आनन्दस्वरूप में स्थित ज्ञानी पुरुष इन सब विषयों से अविचलित रहता है।स्थितप्रज्ञ पुरुष के लक्षणों का प्रारम्भ करते हुए भगवान् ने उसकी आत्मसन्तुष्टि एवं निष्कामत्व को बताया था उसी को और अधिक विस्तार से इस श्लोक में बताया गया है।इसलिए

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.70।।   एतादृशस्यैव मोक्षप्राप्तिर्न कामिन इति सदृष्टान्तमाह  आपूर्यमाणमिति।  अद्भिरापूर्यंमाणमचलप्रतिष्ठमनतिक्रान्त मर्यादं अचलानां मैनाकादीनां प्रतिष्ठा यास्मिंस्तम्। एतेन गाम्भीर्यातिशय उक्त इत्यर्थस्तु भाष्यकृद्भिर्न कृतः। अनतिक्रान्तमर्यादत्वस्यैवात्र विवक्षितत्वात्। मैनाकादेरिन्द्रवज्रभयात्समुद्रे तिरोभूय स्थितस्य सपक्षत्वेन तस्मिन्नचलशब्दप्रवृत्तौ कारणाभावाच्च। समुद्रमापः काश्चित्सकण्टकाः काश्चित्सपुष्पाः सर्वतोगताः प्रविशन्ति स्वात्मस्थमविक्रियमेव सन्तं यद्वत्तद्वत्सर्वे कामाः लोकैः काम्यमाना विषयाः यं स्थितप्रज्ञं अचलाऽप्रकम्पा प्रतिष्ठा यस्य अचले ब्रह्मणि प्रतिष्ठा यस्येति वा प्रविशन्ति। सर्वे आत्मन्येव लीयन्ते। नह्यात्मवशं कुर्वन्ति सः शान्तिं मोक्षाभिधां प्राप्नोति। कामान्विषयान्कामयितुं शीलं यस्य स कामकामी नैव प्राप्नोतीत्यर्थः। यत्त्वन्ये प्रजहातीत्यादिग्रन्थेन कामादित्यागेन्द्रियनिग्रहकथनपरेण कामादीनां पृथक्त्वमुक्तम् अतो नाद्वैतसिद्धिरित्याशङ्क्य सदृष्टान्तं परिहरति। प्रविशन्तीभिरद्भिरापूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रं यद्वदापः प्रविशन्ति तद्वद्यं पुरुषं कामैरापूर्यमाणं हीयमानं वाचलप्रतिष्ठं निर्विकारं वृद्धिह्नासहीनत्वात्। आत्मप्रभवाः सर्वे कामाः प्रविशन्ति स शान्तिमाप्नोति। नतु कामकामी काम्यन्त इत कामा विषयास्तान्कामयितुं शीलं यस्य स कामकामी नैव प्राप्नोतीत्यर्थः। अयं भावः पूर्वग्रन्थेन कामादीनां पृथक्सत्त्वं न प्रतिपाद्यते किंतु पामरसिद्धं पृथक्सत्त्वमभिप्रेत्य प्रहाणादिकमुच्यते इत्यादि वर्णन्ति तदुपेक्ष्यम्। प्रकरणविरोधात् यत्पदेन पूर्वोत्तरं बह्वभ्यस्तस्यात्रापि यमिति श्रूयमाणस्य मोक्षाधिकारिणस्त्यागायोगात्स शान्तिमाप्नोति न कामकामी इति वाक्यशेषविरोधच्चेति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.70।।एतादृशस्य स्थितप्रज्ञस्य सर्वविक्षेपशान्तिरप्यर्थसिद्धेति सदृष्टान्तमाह सर्वाभिर्नदीभिरापूर्यमाणं सन्तं वृष्ट्यादिप्रभवा अपि सर्वा अपि नद्यः समुद्रं प्रविशन्ति। कीदृशम्। अचलप्रतिष्ठमनतिक्रान्तमर्यादं अचलानां मैनाकादीनां प्रतिष्ठा यस्मिन्निति वा गाम्भीर्यातिशय उक्तः। यद्वद्येन प्रकारेण निर्विकारत्वेन तद्वत्तेनैव निर्विकारत्वप्रकारेण यं स्थितप्रज्ञं निर्विकारमेव सन्तं कामा अज्ञैर्लोकैः काम्यमानाः शब्दाद्याः सर्वे विषया अवर्जनीयतया प्रारब्धकर्मवशात्प्रविशन्ति नतु तच्चित्तं विकर्तुं शक्नुवन्ति स महासमुद्रस्थानीयः स्थितप्रज्ञः शान्तिं सर्वलौकिकालौकिककर्मविक्षेणनिवृत्तिं बाधितानुवृत्ताविद्याकार्यनिवृत्तिं चाप्नोति ज्ञानबलेन। न कामकामी कामान्विषयान्कामयितुं शीलं यस्य स कामकाम्यज्ञः शान्तिं व्याख्यातां नाप्नोति अपितु सर्वदा लौकिकालौकिककर्मविक्षेपेण महति शोकार्णवे मग्नो भवतीति वीक्यार्थः। एतेन ज्ञानिन एव फलभूतो विद्वत्संन्यासस्तस्यैव च सर्वविक्षेपनिवृत्तिरूपा जीवन्मुक्तिर्दैवाधीनविषयभोगेऽपि निर्विकारतेत्यादिकमुक्तं वेदितव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.70।।ननुप्रजहाति यदा कामान्इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यो निगृहीतानि इत्यादिनाऽसकृद्विषयाणां प्रहाणं तेभ्यश्च इन्द्रियादीनां प्रत्याहरणमुक्तम्। तेन तेषामात्मनः पृथक्सत्त्वमस्तीति सिद्धम्। न चनेह नानास्ति किंचन इत्यादिश्रुत्या तेषां बाधान्न तदस्तीति वाच्यम्। इहेति प्रतीच्येव तन्निषेधात्। नहि इह भूतले घटो नास्तीत्युक्ते घटस्य स्वरूपं निषिध्यते किंतु तस्य भूतलसंबन्धमात्रम्। तस्मात्कामानां पृथक्सत्त्वमस्त्यतो नाद्वैतसिद्धिरित्याशङ्क्य सदृष्टान्तं परिहरति  आपूर्यमाणमिति।  प्रविशन्तीभिरद्भिरापूर्यमाणमपि अचलप्रतिष्ठम् अनुद्रिक्तम्। वृद्धिहीनत्वात्। एवं निर्गच्छन्तीभिरद्भिः रिच्यमानमप्यचलप्रतिष्ठमरिक्तं ह्रासहीनत्वादित्यपि बोध्यम्। एवंविधं समुद्रं यद्वत् आत्मप्रभवा आपः प्रविशन्ति तद्वत् यं पुरुषं कामैरापूर्यमाणं हीयमानं वा अचलप्रतिष्ठं निर्विकारं वृद्धिह्रासहीनत्वात् आत्मप्रभवाः सर्वे कामाः प्रविशन्ति स एव शान्तिं मोक्षं आत्यन्तिकं दुःखोपरमं प्राप्नोति न तु कामकामी विषयार्थी। अयं भावः कूटस्थादात्मनः सर्वस्योत्पत्तिस्तत्रैव च लय इति सर्वश्रुतिस्मृतिप्रसिद्धम्। तेन कामानां प्रहाणं तेभ्यश्चेन्द्रियाणां प्रत्याहरणं स्मर्यमाणं न तेषां परमार्थतः पृथक्सत्त्वं साधयति। बहुप्रमाणविरोधात् किंतु पामरप्रसिद्धं पृथक्सत्त्वमभिप्रेत्य प्रहाणादिकमुक्तं प्रविलापनं त्वेवमेव व्याख्येयम्। यथाअग्नये पथिकृतेऽष्टाकपालं निर्वपेत् इत्यादौ निर्वपतिना याग उच्यते नतु श्रौतार्थमात्रं तद्वदिहापि ज्ञेयम्।नेह नानास्ति इत्यपीह परिदृश्यमाने प्रपञ्चे आत्मातिरिक्तं नाना किमपि नास्तीत्येवंपरतया व्याख्येयम्। तथा चआत्मैवेदं सर्वंब्रह्मैवेदं सर्वंसर्वं खल्विंद ब्रह्म इत्यादयः श्रुतिवादाः संगच्छन्ते। आत्मनि कल्पितस्यास्य तत्रैव निषेधेनान्यत्र सत्त्वानुपपत्तेर्न कामानां पृथक्सत्त्वमस्तीति युक्त एव समुद्रदृष्टान्तः। यत्तु समुद्रात्पृथग्गङ्गायाः सत्त्वमस्तीति। तन्न। कार्ये कारणसत्तातिरिक्तसत्ताया अभावात्।वाचारम्भणं विकारो नामधेयम् इति कार्यस्य वागालम्बनमात्रत्वश्रवणादित्यन्यत्र विस्तरः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.70।।ननु लौकिकविषयाणां दर्शनाद्यभावात्कथं प्राप्तिः इत्यत आह आपूर्यमाणमिति। नानानदीभिः आपूर्यमाणमपि अचलप्रतिष्ठं वर्द्धनादिविकाररहितं समुद्रं यद्वदापः प्रविशन्ति तद्वदनेकस्त्रीभिः कामरसे प्रवर्त्यमानं यं भगवत्कामाः सर्वे स्वमनोरथाः स्वार्थं प्रविशन्तीति यो जानाति स शान्तिं कामानां शान्तिं परमसुखमाप्नोति। अत एव श्रीभागवते मनोरथान्तं श्रुतयो यथा ययुः 10।32।13 इत्युक्तम्। न कामकामी यस्तु लौकिककामभोगशीलः स न प्राप्नोतीत्यर्थः। यद्वा यं सर्वे कामाः पूर्वोक्तप्रकारेण प्रविशन्ति तम्। योऽदृष्ट्वापि कामयते तदर्थं वा स शान्तिं परमानन्दमाप्नोति न तु स्वार्थं कामाभिलाषीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.70।।ननु विषयेषु दृष्ट्यभावे कथमसौ तान्भुङ्क्त इत्यपेक्षायामाह  आपूर्यमाणमिति।  नानानदीभिरापूर्यमाणमपि अचलप्रतिष्ठमनतिक्रान्तमर्यादमेव समुद्रं पुनरप्यन्या आपो यथा प्रविशन्ति। तथा कामा विषया यं मुनिमन्तर्दृष्टिं भोगैरविक्रियमाणमेव प्रारब्धकर्मभिराक्षिप्ताः सन्तः प्रविशन्ति स शान्तिं कैवल्यं प्राप्नोति नतु कामकामी भोगकामनाशीलः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.70।।अन्यच्च। यथा समुद्रो न कं प्रतियाति किन्तु तं प्रत्येवापः सर्वा यान्ति तथा कामाः सर्वे तमेव विशन्ति तत आप्तकामः स शानतिमाप्नोति क्षुब्धोऽपि समुद्र इवाचलप्रतिष्ठो बाह्याद्युपाधिकृतकामतरङ्गानाकुलितस्वरूपो भवति। उपमीयत इति तथा विशेषणसमभिव्याहारः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.70।।जिसने तीनों एषणाओंका त्याग कर दिया है ऐसे स्थितप्रज्ञ विद्वान् संन्यासीको ही मोक्ष मिलता है भोगोंकी कामना करनेवाले असंन्यासीको नहीं। इस अभिप्रायको दृष्टान्तद्वारा प्रतिपादन करनेकी इच्छा करते हुए भगवान् कहते हैं जिस प्रकार जलसे परिपूर्ण अचल प्रतिष्ठावाले समुद्रमें अर्थात् अचल भावसे जिसकी प्रतिष्ठा स्थिति है ऐसे अपनी मर्यादामें स्थित समुद्रमें सब ओरसे गये हुए जल उसमें किसी प्रकारका विकार उत्पन्न किये बिना ही समा जाते हैं। उसीप्रकार विषयोंका सङ्ग होनेपर भी जिस पुरुषमें समस्त इच्छाएँ समुद्रमें जलकी भाँति कोई भी विकार उत्पन्न न करती हुई सब ओरसे प्रवेश कर जाती हैं अर्थात् जिसकी समस्त कामनाएँ आत्मामें लीन हो जाती हैं उसको अपने वशमें नहीं कर सकतीं उस पुरुषको शान्ति मोक्ष मिलता है दूसरेको अर्थात् भोगोंकी कामना करनेवालेको नहीं मिलता। अभिप्राय यह कि जिनको पानेके लिये इच्छा की जाती है उन भोगोंका नाम काम है उनको पानेकी इच्छा करना जिसका स्वभाव है वह कामकामी है वह उस शान्तिको कभी नहीं पाता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.70।। व्याख्या  आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्   वर्षाकालमें नदियों और नदोंका जल बहुत बढ़ जाता है कई नदियोंमें बाढ़ आ जाती है  परन्तु जब वह जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है तब समुद्र बढ़ता नहीं अपनी मर्यादामें ही रहता है। परन्तु जब गरमीके दिनोंमें नदियों और नदोंका जल जब बहुत कम हो जाता है तब समुद्र घटता नहीं। तात्पर्य है कि नदीनदोंका जल ज्यादा आनेसे अथवा कम आनेसे या न आनेसे तथा बड़वानल (जलमें पैदा होनेवाली अग्नि) और सूर्यके द्वारा जलका शोषण होनेसे समुद्रमें कोई फरक नहीं पड़ता वह बढ़ताघटता नहीं। उसको नदीनदोंके जलकी अपेक्षा नहीं रहती। वह तो सदासर्वदा ज्योंकात्यों ही परिपूर्ण रहता है और अपनी मर्यादाका कभी त्याग नहीं करता। तद्वत्कामा (टिप्पणी प0 106)   यं प्रविशन्ति सर्वे स शान्तिमाप्नोति   ऐसे ही संसारके सम्पूर्ण भोग उस परमात्मतत्त्वको जाननेवाले संयमी मनुष्यको प्राप्त होते हैं उसके सामने आते हैं पर वे उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणमें सुखदुःखरूप विकार पैदा नहीं कर सकते। अतः वह परमशान्तिको प्राप्त होता है। उसकी जो शान्ति है वह परमात्मतत्त्वके कारणसे है भोगपदार्थोंके कारणसे नहीं (गीता 2। 46)।यहाँ जो समुद्र और नदियोंके जलका दृष्टान्त दिया गया है वह स्थितप्रज्ञ संयमी मनुष्यके विषयमें पूरा नहीं घटता है। कारण कि समुद्र और नदियोंके जलमें तो सजातीयता है अर्थात् जो जल समुद्रमें भरा हुआ है उसी जातिका जल नदनदियोंसे आता है और नदनदियोंसे जो जल आता है उसी जातिका जल समुद्रमें भरा हुआ है। परन्तु स्थितप्रज्ञ और सांसारिक भोगपदार्थोंमें इतना फरक है कि इसको समझानेके लिये रातदिन आकाशपातालका दृष्टान्त भी नहीं बैठ सकता कारण कि स्थितप्रज्ञ मनुष्य जिस तत्त्वमें स्थित है वह तत्त्व चेतन है नित्य है सत्य है असीम है अनन्त है और सांसारिक भोगपदार्थ जड हैं अनित्य हैं असत् हैं सीमित हैं अन्तवाले हैं।दूसरा अन्तर यह है कि समुद्रमें तो नदियोंका जल पहुँचता है पर स्थितप्रज्ञ जिस तत्त्वमें स्थित है वहाँ ये सांसारिक भोगपदार्थ पहुँचते ही नहीं प्रत्युत केवल उसके कहे जानेवाले शरीर अन्तःकरणतक ही पहुँचते हैं।अतः समुद्रका दृष्टान्त केवल उसके कहे जानेवाले शरीर और अन्तःकरणकी स्थितिको बतानेके लिये ही दिया गया है। उसके वास्तविक स्वरूपको बतानेवाला कोई दृष्टान्त नहीं है। न कामकामी   जिनके मनमें भोगपदार्थोंकी कामना है जो पदार्थोंको ही महत्त्व देते हैं जिनकी दृष्टि पदार्थोंकी तरफ ही है उनको कितने ही सांसारिक भोगपदार्थ मिल जायँ तो भी उनकी तृप्ति नहीं हो सकती उनकी कामना जलन सन्ताप नहीं मिट सकते तो फिर उनको शान्ति कैसे मिल सकती है कारण कि चेतन स्वरूपकी तृप्ति जड पदार्थोंसे हो ही नहीं सकती। सम्बन्ध   अब आगेके श्लोकमें स्थितप्रज्ञ कैसे चलता है इस प्रश्नके उत्तरका उपसंहार करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.66 2.70।।रागद्वेषेत्यादि प्रतिष्ठितेत्यन्तम्। यस्तु मनसो नियामकः स विषयान् सेवमानोऽपि न क्रोधादिकल्लोलैरभिभूयते इति स एव स्थितप्रज्ञो योगीति तात्पर्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.70।।नन्वसंन्यासिनापि विद्यावतां विद्याफलस्य मोक्षस्य लब्धुं शक्यत्वात्किमिति विदुषः संन्यासो नियम्यते तत्राह   विदुष इति।  आपातज्ञानवतो विवेकवैराग्यादिविशिष्टस्यैषणाभ्यः सर्वाभ्योऽभ्युत्थितस्य श्रवणादिद्वारा समुत्पन्नसाक्षात्कारवतो मुख्यस्य संन्यासिनो मोक्षो नान्यस्य विषयतृष्णापरिभूतस्येत्येतद्दृष्टान्तेन प्रतिपादयितुमिच्छन्रागद्वेषवियुक्तैस्तु इति श्लोकोक्तमेवार्थं पुनराहेति योजना। अद्भिः समुद्रस्य समन्तात्पूर्यमाणत्वे वृद्धिह्रासवती तदीया स्थितिरापतेदित्याशङ्क्याह  अचलेति।  नहि समद्रस्योदकात्मकं प्रतिनियतं रूपं कदाचिद्विवर्धते ह्रसते वा तेन तदीया स्थितिरेकरूपैवेत्यर्थः। तत्तन्नादेयाश्चेदापः समुद्रान्तर्गच्छन्ति तर्हि तस्य विक्रियावत्त्वादप्रतिष्ठा स्यादित्याशङ्क्याह  स्वात्मस्थमिति।  इच्छाविशेषा विषयाणामसंनिधौ विदुषि निर्विकारे प्रविशन्तोऽपि संनिधाने तस्मिन्प्रविशन्तो विकारमापादयेयुरित्याशङ्क्याह  विषयेति।  प्रवेशं विशदयति  सर्वत इति।   योऽकाम इत्यादि।  श्रुतेर्विषयविमुखस्य निष्कामस्य मोक्षो न कामकामुकस्येत्याह  स शान्तिमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.70।।पृष्टस्य समस्तस्योत्तरमुक्तं तत्किंआपूर्यमाणं इत्यनेनेत्यत आह  तेने ति। क्रियमाणेत्युपस्कर्तव्यम्। नित्यसापेक्षत्वादसामर्थ्याभावः। बाह्यानुसन्धानरहितस्य युज्येतापि कथञ्चिद्गमनादिकं विषयानुभवस्तु दृश्यमानः कथं स्यात् तस्य नियतसाधनसाध्यस्यानुसन्धानेन विनाऽनुदयादित्याशङ्कापरिहारार्थमिति शेषः।तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति इति सङ्क्षेपेणोक्तं तद्विवृणोति  य  इति। कामशब्दस्यार्थो विषयैरिति। अन्यथाविहाय कामान् 2।71 इत्युत्तरविरोधात्। अचलप्रतिष्ठत्वस्यैव व्याख्यानं नोत्सेकमित्यादि। कुत एषोऽर्थः इत्यतः समुद्रदृष्टान्तोपादानसामर्थ्यादिति भावेनाह  न ही ति।स शान्तिमाप्नोति इत्यस्यार्थमाह  स  इति। ज्ञानिप्रशंसार्थमेतत्। एतद्दृष्ट्वा केचिज्ज्ञानिन एव मुक्तिरित्यनेनाहेत्याहुः तदसत् गतार्थत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.70।।तेन विषयानुभवप्रकारमाह आपूर्यमाणमिति। यो विषयैरापूर्यमाणोऽप्यचलप्रतिष्ठो भवति नोत्सेकं प्राप्नोति न च प्रयत्नं करोति न चाभावे शुष्यति। न हि समुद्रः सरित्प्रवेशाप्रवेशनिमित्तौ वृद्धिशोषौ बहुतरौ प्राप्नोति प्रयत्नं वा करोति। स मुक्तिं प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.70।।यथा आत्मना एव  आपूर्यमाणम्  एकरूपं  समुद्रं  नादेया  आपः प्रविशन्ति  आसाम् अपां प्रवेशे अपि अप्रवेशे वा समुद्रो न कञ्चन विशेषम् आपद्यते। एवं  सर्वे कामाः  शब्दादिविषया  यं  संयमिनं  प्रविशन्ति  इन्द्रियगोचरतां यान्ति  स शान्तिम् आप्नोति।  शब्दादिषु इन्द्रियगोचरताम् आपन्नेषु अनापन्नेषु च स्वात्मावलोकनतृप्त्या एव यो न विकारम् आप्नोति स एव शान्तिम् आप्नोति इत्यर्थः  न कामकामी  यः शब्दादिभिर्विक्रियते स कदाचिद् अपि न शान्तिम् आप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.70।।  आपूर्यमाणम्  अद्भिः  अचलप्रतिष्ठम्  अचलतया प्रतिष्ठा अवस्थितिः यस्य तम् अचलप्रतिष्ठं  समुद्रम् आपः  सर्वतो गताः  प्रविशन्ति  स्वात्मस्थमविक्रियमेव सन्तं  यद्वत् तद्वत् कामाः  विषयसंनिधावपि सर्वतः इच्छाविशेषाः  यं  पुरुषम् समुद्रमिव आपः अविकुर्वन्तः  प्रविशन्ति  सर्वे आत्मन्येव प्रलीयन्ते न स्वात्मवशं कुर्वन्ति  सः शान्तिं  मोक्षम्  आप्नो ति  न  इतरः  कामकामी  काम्यन्त इति कामाः विषयाः तान् कामयितुं शीलं यस्य सः कामकामी नैव प्राप्नोति इत्यर्थः।।यस्मादेवं तस्मात्

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【 Verse 2.71 】

▸ Sanskrit Sloka: विहाय कामान्य: सर्वान्पुमांश्चरति नि:स्पृह: | निर्ममो निरहङ्कार: स शान्तिमधिगच्छति ||

▸ Transliteration: vihāya kāmānyaḥ sarvān pumāṁścarati niḥspṛhaḥ | nirmamo nirahañkāraḥ sa śāntimadhigacchati ||

▸ Glossary: vihāya: after giving up; kāmān: desires for sense gratification; yaḥ: the person; sarvān: all; pumān: a person; carati: moves; niḥspṛhaḥ: desireless; nir mamaḥ: without a sense of proprietorship; nir ahaṁkāraḥ: without false ego; saḥ: he; śāntiṁ: peace; adhigacchati: attains

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.71 The man who moves about abandoning all desires, without longing, without the sense of I and mine, attains peace.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.71।।जो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके निर्मम निरहंकार और निःस्पृह होकर विचरता है वह शान्तिको प्राप्त होता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.71।। जो पुरुष सब कामनाओं को त्यागकर स्पृहारहित? ममभाव रहित और निरहंकार हुआ विचरण करता है? वह शान्ति प्राप्त करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.71 विहाय abandoning? कामान् desires? यः that? सर्वान् all? पुमान् man? चरति moves about? निःस्पृहः free from longing? निर्ममः devoid of mineness? निरहंकारः without egoism? सः he? शान्तिम् to peace? अधिगच्छति attains.Commentary That man who lives destitute of longing? abandoning all desires? without the senses of I and mine? who is satisfied with the bare necessities of life? who does not care even for those bare necessities of life? who has no attachment even for the bare necessities of life? attains Moksha or eternal peace. (Cf.II.55).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.71. That person, who, by abandoning all desires, consumes [objects] without longing, without a sense of possession and without egotism-he attains peace.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.71 He attains Peace who, giving up desire, moves through the world without aspiration, possessing nothing which he can call his own, and free from pride.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.71 The man who, abandoning all desires, abides without longing and possession and the sense of 'I' and 'mine', wins peace.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.71 That man attains peace who, after rejecting all desires, moves about free from hankering, without the idea of ('me' and) 'mine', and devoid of pride.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.71 That man attains peace who, abandoning all desires, moves about without longing, without the sense of mine and without egoism.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.71 Vihaya etc. Because he has renounced all desires, the man of Yoga, attains emancipation in the form of peace.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.71 What are desired, they are called the objects of desire. These are sound and other sense-objects. The person, who wants peace must abandon all sense-objects such as sound, touch etc. He should have no longing for them. He should be without the sense of 'mineness' regarding them, as that sense arises from the misconception that the body, which is really non-self, is the self. He who lives in this way attains to peace after seeing the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.71 Sah puman, that man who has become thus, the sannyasin, the man of steady wisdom, the knower of Brahman; adhi-gacchati, attains; santim, peace, called Nirvana, consisting in the cessation of all the sorrows of mundane existence, i.e. he becomes one with Brahman; yah, who; vihaya, after rejecting; sarvan, all; kaman, desires, without a trace, fully; carati, moves about, i.e. wanders about, making efforts only for maintaining the body; nihsprhah, free from hankering, becoming free from any longing even for the maintenance of the body; nirmamah, without the idea of ('me' and) 'mine', without the deeprooted idea of 'mine' even when accepting something needed merely for the upkeep of the body; and nir-ahankarah, devoid of pride, i.e. free from self esteem owing to learning etc. This steadfastness in Knowledge, which is such, is being praised:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.71।। कुछ व्याख्याकारों का मत है कि इन अन्तिम दो श्लोकों में संन्यास मार्ग की व्याख्या है। वास्तव में गीता में संन्यास की उपेक्षा नहीं की गई है। यह पहले ही बताया जा चुका है कि इस द्वितीय अध्याय में सम्पूर्ण गीता का सार सन्निहित है। इसलिए आगामी समस्त विषयों की रूपरेखा इस अध्याय में दी हुई है। संन्यास मार्ग का वर्णन भी हमें आगे के अध्यायों में विभिन्न संन्दर्भों और स्थानों पर मिलेगा।इसके पूर्व 38वें श्लोक में सभी द्वन्द्वोंें में समभाव से रहते हुए युद्ध करने का उपदेश अर्जुन को दिया गया था। अध्याय के अन्त में उसी उपदेश को यहाँ भगवान् दूसरे शब्दों में दोहरा रहे हैं।परम शान्ति को प्राप्त पुरुष के मन की स्थिति को प्रथम पंक्ति में बताया गया है कि वह पुरुष सब कामनाओं का तथा विषयों के प्रति स्पृहा लालसा आसक्ति का सर्वथा त्याग कर देता है। दूसरी पंक्ति में ऐसे पुरुष की बुद्धि के भावों को बताते हुए कहते हैं कि उस पुरुष में अहंकार और ममत्व का पूर्ण अभाव होता है। जहाँ अहंकार नहीं होता जैसे निद्रावस्था में वहाँ इच्छा आसक्ति आदि का अनुभव नहीं होता। इस प्रकार प्रथम पंक्ति में अज्ञान के कार्यरूप लक्षणों का निषेध किया गया है और दूसरी पंक्ति में उस कारण का ही निषेध किया गया है जिससे इच्छायें उत्पन्न होती हैं।प्रस्तावना में स्पष्ट किया गया है कि अर्जुन के व्यक्तित्व के विघटन का कारण अहंकार और ममभाव अथवा अहंकार से प्रेरित इच्छायें थीं जिन्होंने उसके मन और बुद्धि को विलग कर दिया था। भगवान् श्रीकृष्ण सब प्रकार की युक्तियाँ देने के बाद रोग के मुख्य कारण की ओर अर्जुन का ध्यान आकर्षित करते हैं।इस श्लोक का निष्कर्ष यह है कि जीवन में हमारे समस्त दुखों का कारण अहंकार और उससे उत्पन्न ममभाव स्वार्थ और असंख्य कामनायें हैं।संन्यास का अर्थ है त्याग अत अहंकार और स्वार्थ को पूर्णरूप से परित्याग करके वैराग्य का जीवन जीना वास्तविक संन्यास है जिससे वह साधक सतत अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप की अनुभूति में रह सकता है। जीवन से पलायन करने अथवा गेरुये वस्त्र धारण करने को संन्यास समझने की जो गलत धारणा समाज में फैल गई है उसनेे उपनिषदों के महान् तत्त्वज्ञान पर एक अमिटसा धब्बा लगा दिया है। वास्तव में हिन्दू धर्म केवल उसी को संन्यासी स्वीकार करता है जिसने विवेक द्वारा अहंकार और स्वार्थ को त्याग कर स्फूर्तिमय जीवन जीना सीखा है।एक सच्चे संन्यासी का अत्यन्त सुन्दर वर्णन श्री शंकराचार्य अपने भाष्य में इस प्रकार करते हैं वह पुरुष जो सब कामनाओं को त्यागकर जीवन में सन्तोषपूर्वक रहता हुआ शरीर धारणमात्र के उपयोग की वस्तुओं में भी ममत्व भाव नहीं रखता न ज्ञान का अभिमान करता है ऐसा ब्रह्मवित् स्थितप्रज्ञ पुरुष निर्वाण (शान्ति) को प्राप्त करता है जहाँ संसार के सब दुखों की आत्यन्तिक निवृत्ति होती है। संक्षेप में ब्रह्मवित् ज्ञानी पुरुष ब्रह्म ही बन जाता है।इस ज्ञाननिष्ठा की इस प्रकार स्तुति करते है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.71।।चतुर्थप्रश्रस्योत्तरमुपसंहरति  विहायेति।  यस्मादेवं तस्माद्विहाय कामान्सर्वान्यः स्थितप्रज्ञः शरीरजीवनमात्रेऽपि निःस्पृहः अतएव शरीरजीवमात्राक्षिप्तपरिग्रहेऽपि ममेदमित्यभिनिवेशरहितः निरहंकारः विद्यावत्त्वादिनिमित्तात्मसंभावनावर्जितः। ननु देहाभिमानरहित इत्याचार्यैः कुतो न व्याख्यातमिति चेदुक्ताहंभावेऽस्यान्तर्भावविवक्षयेत्यदोषः। चरति पर्यटति स शान्तिमविद्यातत्कार्योपरमरुपां निर्वाणाभिधामधिगच्छति प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.71।।यस्मादेवं तस्मात्प्राप्तानपि सर्वान्बाह्यन्गृहक्षेत्रादीन् आन्तरान्मनोराज्यरूपान्वासनामात्ररूपांश्च पथि गच्छतस्तृणस्पर्शरूपान्कामांस्त्रिविधान्विहायोपेक्ष्य शरीरजीवनमात्रेऽपि निःस्पृहः सन्। यतो निरहंकारः शरीरेन्द्रियादावयमहमित्यभिमानशून्यः विद्यावत्त्वादिनिमित्तात्मसंभावनारहित इति वा। अतो निर्ममः शरीरयात्रामात्रार्थेऽपि प्रारब्धकर्माक्षिप्ते कौपीनाच्छादनादौ ममेदमित्यभिमानवर्जितः सन् यः पुमांश्चरति प्रारब्धकर्मवशेन भोगान्भुङ्क्ते यादृच्छिकतया यत्र क्वापि गच्छतीति वा। स एवंभूतः स्थितप्रज्ञः शान्तिं सर्वसंसारदुःखोपरमलक्षणामविद्यातत्कार्यनिवृत्तिमधिगच्छति ज्ञानबलेन प्राप्नोति तदेतदीदृशं व्रजनं स्थितप्रज्ञस्येति चतुर्थप्रश्नस्योत्तरं परिसमाप्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.71।।प्रासङ्गिकीमाशङ्कां परिहृत्य व्रजेत किमित्यस्य प्रश्नस्योत्तरमाह  विहायेति।  पूर्वोक्तांस्त्रिविधान्कामान्विहाय यः चरति विषयान्भुङ्क्ते निस्पृहश्च। यतो निर्ममः। ममतावान्हि इदं मम भूयादित्यन्यधनाद्यर्थं स्पृहां करोति न निर्ममोऽपि। कुतः यतो निरहंकारः। नह्यहंकारशून्यस्य सुप्त्यादौ ममता दृष्टा। तस्मादहंकारप्रविलयाच्छान्तिं मोक्षं प्राप्नोति। अत्र यः सर्वत्रानभिस्नेह इति सर्वत्र यच्छब्ददर्शनात्साधनविधिपर एवायं ग्रन्थः। अन्यथा स्थितप्रज्ञस्य प्रकृतत्वात्तदनुवादार्थो यच्छब्दोऽनर्थकः प्राप्नोति। लोकेऽपि हि परस्वभावकथने स एवं करोतीति तच्छब्द एव प्रयुज्यते न तु यच्छब्दः। विधौ तु य एवं करोति स इदं प्राप्नोतीति द्वयोरपि प्रयोगो दृश्यते। लक्षणकथनार्थत्वेऽपि तत्र तात्पर्याभावाद्विधावेव पर्यवस्यतीति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.71।।यतो लौकिककामाभिलाषी न शान्तिं प्राप्नोत्यतस्तां त्यजेदित्याह विहायेति। यो दुर्लभः पुमान् भगवद्भावनैकयोग्यः सर्वान् कामान् विहाय निस्स्पृहः भगवदेकपरश्चरति सर्वत्र वैकल्येन परिभ्रमति निर्ममो देहादिषु निरहङ्कारो भवति स शान्तिमधिगच्छति प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.71।।यस्मादेवं तस्मात्  विहायेति।  प्राप्तान्कामान्विहाय त्यक्त्वोपेक्ष्य अप्राप्तेषु च निःस्पृहः यतो निरहंकारः अतएव तद्भोगसाधनेषु निर्ममः सन्नन्तर्दृष्टिर्भूत्वा यश्चरति प्रारब्धवशेन भोगान्भुङ्क्ते यत्र क्वापि गच्छति वा स शान्तिमाप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.71।।यस्मादेवं तस्मात् विहाय कामान्प्राकृतान् त्यक्त्वा स्वात्मारामत्वात् अन्यत्र निस्स्पृहःअहन्ताममतानाशे सर्वथा निरंहकृतौ। स्वरूपस्थो यदा जीवः कृतार्थः स निगद्यते इति। स शान्तिमधिगच्छतीत्यवसेयम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.71।।क्योंकि ऐसा है इसलिये जो संन्यासी पुरुष सम्पूर्ण कामनाओंको और भोगोंको अशेषतः त्यागकर अर्थात् केवल जीवनमात्रके निमित्त ही चेष्टा करनेवाला होकर विचरता है। तथा जो स्पृहासे रहित हुआ है अर्थात् शरीरजीवनमात्रमें भी जिसकी लालसा नहीं है। ममतासे रहित है अर्थात् शरीरजीवनमात्रके लिये आवश्यक पदार्थोंके संग्रहमें भी यह मेरा है ऐसे भावसे रहित है। तथा अहंकारसे रहित है अर्थात् विद्वत्ता आदिके सम्बन्धसे होनेवाले आत्माभिमानसे भी रहित है। वह ऐसा स्थितप्रज्ञ ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी संसारके सर्वदुःखोंकी निवृत्तिरूप मोक्ष नामक परम शान्तिको पाता है अर्थात् ब्रह्मरूप हो जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 2.71।। व्याख्या  विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः   अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम कामना   है। स्थितप्रज्ञ महापुरुष सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग कर देता है। कामनाओंका त्याग कर देने पर भी शरीरके निर्वाहमात्रके लिये देश काल वस्तु व्यक्ति पदार्थ आदिकी जो आवश्यकता दीखती है अर्थात् जीवननिर्वाहके लिये प्राप्त और अप्राप्त वस्तु आदिकी जो जरूरत दीखती है उसका नाम स्पृहा है। स्थितप्रज्ञ पुरुष इस स्पृहाका भी त्याग कर देता है। कारण कि जिसके लिये शरीर मिला था और जिसकी आवश्यकता थी उस तत्त्वकी प्राप्ति हो गयी वह आवश्यकता पूरी हो गयी। अब शरीर रहे चाहे न रहे शरीरनिर्वाह हो चाहे न हो इस तरफ वह बेपरवाह रहता है। यही उसका निःस्पृह होना है।निःस्पृह होनेका अर्थ यह नहीं है कि वह निर्वाहकी वस्तुओंका सेवन करता ही नहीं। वह निर्वाहकी वस्तुओंका सेवन भी करता है पथ्यकुपथ्यका भी ध्यान रखता है अर्थात् पहले साधनावस्थामें शरीर आदिके साथ जैसा व्यवहार करता था वैसा ही व्यवहार अब भी करता है परन्तु शरीर बना रहे तो अच्छा है जीवननिर्वाहकी वस्तुएँ मिलती रहें तो अच्छा है ऐसी उसके भीतर कोई परवाह नहीं होती।इसी अध्यायके पचपनवें श्लोकमें  प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्  पदोंसे कामनात्यागकी जो बात कही थी वही बात यहाँ  विहाय कामान्यः सर्वान्  पदोंसे कही है। इसका तात्पर्य है कि कर्मयोगमें सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग किये बिना कोई स्थितप्रज्ञ नहीं हो सकता क्योंकि कामनाओंके कारण ही संसारके साथ सम्बन्ध जुड़ा हुआ है। कामनाओंका सर्वथा त्याग करनेपर संसारके साथ सम्बन्ध रह ही नहीं सकता। निर्ममः   स्थितप्रज्ञ महापुरुष ममताका सर्वथा त्याग कर देता है। मनुष्य जिन वस्तुओंको अपनी मानता है वे वास्तवमें अपनी नहीं हैं प्रत्युत संसारसे मिली हुई हैं। मिली हुई वस्तुको अपनी मानना भूल है। यह भूल मिट जानेपर स्थितप्रज्ञ वस्तु व्यक्ति पदार्थ शरीर इन्द्रियाँ आदिमें ममतारहित हो जाता है। निरहङ्कारः   यह शरीर मैं ही हूँ इस तरह शरीरसे तादात्म्य मानना अहंकार है। स्थितप्रज्ञमें यह अहंकार नहीं रहता। शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि सभी किसी प्रकाशमें दीखते हैं और जो मैंपन है उसका भी किसी प्रकाशमें भान होता है। अतः प्रकाशकी दृष्टिसे शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि अहंता ( मैंपन) ये सभी दृश्य हैं। द्रष्टा दृश्यसे अलग होता है यह नियम है। ऐसा अनुभव हो जानेसे स्थितप्रज्ञ निरहंकार हो जाता है। स शान्तिमधिगच्छति   स्थितप्रज्ञ शान्तिको प्राप्त होता है। कामना स्पृहा ममता और अहंतासे रहित होनेपर शान्ति आकर प्राप्त होती है ऐसी बात नही है प्रत्युत शान्ति तो मनुष्यमात्रमें स्वतःसिद्ध है। केवल उत्पन्न एवं नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे सुख भोगनेकी कामना करनेसे उनसे ममताका सम्बन्ध रखनेसे ही अशान्ति होती है। जब संसारकी कामना स्पृहा ममता और अहंता सर्वथा छूट जाती है तब स्वतःसिद्ध शान्तिका अनुभव हो जाता है।इस श्लोकमें कामना स्पृहा ममता और अहंता इन चारोंमें अहंता ही मुख्य है। कारण कि एक अहंताके निषेधसे सबका निषेध हो जाता है अर्थात् यदि मैंपन ही नहीं रहेगा तो फिर मेरापन कैसे रहेगा और कामना भी कौन करेगा और किसलिये करेगा जब  निरहङ्कारः  कहनेमात्रसे कामना आदिका त्याग उसके अन्तर्गत आ जाता था तो फिर कामना आदिके त्यागका वर्णन क्यों किया इसका उत्तर यह है कि कामना स्पृहा ममता और अहंता इन चारोंमें कामना स्थूल है। कामनासे सूक्ष्म स्पृहा स्पृहासे सूक्ष्म ममता और ममतासे सूक्ष्म अहंता है। इसलिये संसारसे सम्बन्ध छोड़नेमें सबसे पहले कामनाका त्याग कर दिया जाय तो अन्य तीनका त्याग करना सुगम हो जाता है।कामना करनेसे कोई वस्तु नहीं मिलती। वस्तु तो जो मिलनेवाली है वही मिलेगी। अतः कामनाका त्याग कर देना चाहिये। कामनाका त्याग करनेके बाद भी स्पृहा रहती है। स्पृहा (शरीरनिर्वाहकी आवश्यकता) पूरी हो जाय यह भी हमारे हाथकी बात नहीं है अर्थात् स्पृहाकी पूर्तिमें भी हम स्वतन्त्र नहीं है। जो होना है वह तो होगा ही फिर स्पृहा रखनेसे क्या लाभ अतः शरीरके लिये अन्न जल वस्त्र आदिकी आशा छोड़नेसे स्पृहा छूट जाती है। अहंताममतासे रहित होनेका उपाय कर्मयोगकी दृष्टिसे मेरा कुछ नहीं है क्योंकि मेरा किसी वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना अवस्था आदिपर स्वतन्त्र अधिकार नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं है तो मेरेको कुछ नहीं चाहिये क्योंकि अगर शरीर मेरा है तो मेरेको अन्न जल वस्त्र आदिकी आवश्यकता है पर जब शरीर मेरा है ही नहीं तो मेरेको किसीकी कुछ भी आवश्यकता नहीं है। जब मेरा कुछ नहीं और मेरेको कुछ नहीं चाहिये तो फिर मैं क्या रहा क्योंकि मैं तो किसी वस्तु शरीर स्थिति आदिको पकड़नेसे ही होता है।मेरे कहलानेवाले शरीर आदिका मात्र संसारके साथ सर्वथा अभिन्न सम्बन्ध है। इसलिये अपने कहलानेवाले शरीर आदिसे जो कुछ करना है वह सब केवल संसारके हितके लिये ही करना है क्योंकि मेरेको कुछ चाहिये ही नहीं। ऐसा भाव होनेपर मैंका एकदेशीयपना आपसेआप मिट जाता है और कर्मयोगी अहंताममतासे रहित हो जाता है। सांख्ययोगकी दृष्टिसे   प्राणिमात्रको मैं हूँ इस प्रकार अपने स्वरूपकी स्वतःसिद्ध सत्ता(होनापन) का ज्ञान रहता है। इसमें मैं तो प्रकृतिका अंश है और हूँ सत्ता है। यह हूँ वास्तवमें मैं को लेकर है। अगर मैं न रहे तो हूँ नहीं रहेगा प्रत्युत है रहेगा। मैं हूँ तू है यह है और वह है ये चारों व्यक्ति और देशकालको लेकर हैं। अगर इन चारोंको अर्थात् व्यक्ति और देशकालको न पकड़ें तो केवल है ही रहेगा है में ही स्थिति रहेगी। है में स्थिति होनेसे सांख्ययोगी अहंताममतासे रहित हो जाता है। भक्तियोगकी दृष्टिसे   जिसको मैं और मेरा कहते हैं वह सब प्रभुका ही है। कारण कि मेरी कहलानेवाली वस्तुपर मेरा किञ्चिन्मात्र भी अधिकार नहीं है परन्तु प्रभुका उसपर पूरा अधिकार है। वे जिस तरह वस्तुको रखते हैं जैसा रखना चाहते हैं वैसा ही होता है। अतः यह सब कुछ प्रभुका ही है। इसको प्रभुकी ही सेवामें लगाना है। मेरे पास जो शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि है यह भी उन्हींकी है और मैं भी उन्हींका हूँ। ऐसा भाव होनेपर भक्तियोगी अहंताममतासे रहित हो जाता है। सम्बन्ध   कामना स्पृहा ममता और अहंतासे रहित होनेपर उसकी क्या स्थिति होती है इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हुए इस विषयका उपसंहार करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.71।।योगी च सर्वव्यवहारान् कुर्वाणोऽपि (S omits अपि) लोकोत्तर इति निरूपयता परमेश्वरेण संक्षिप्यास्य स्वरूपं कथ्यते या निशेति। या सर्वेषां भूतानां निशा मोहिनी (K मोहनी) माया तस्यां मुनिर्जागर्त्ति कथमियं हेया इति। यस्यां च दशायां लोको जगर्त्ति नानाविधां (S विविधां) चेष्टां कुरुते सा मुनेः रात्रिः यतोऽसौ व्यवहारं प्रत्यबुद्धः।एतदुक्तं भवति येयं माया खलु तस्या द्वे रूपे ( N omit द्वे रूपे) मोहकत्वं ( N मोहकत्वे) नाम रूपं सुखतन्त्र ( N तन्तु for तन्त्र hereinafter ) ताभासनं च। तत्र लोकः प्राच्यं स्वरूपमस्या अपरामृश्यैव द्वितीयस्मिन् रूपे निबद्धस्मृतिरास्ते। योगी तु तद्विपरीतस्तदीयं मोहकत्वं तदुन्मूलनाय पश्यति। सुखतन्त्रतां च नाद्रियते (N नाश्रीयते) पश्यन् सम्यग्ज्ञानी। मिथ्याज्ञानोपघाताच्च सुखतन्त्रतानादरः (S तन्त्रतायां नादरः)। एवं च पश्यत एव सा रात्रिरिति चित्रम्। विद्याया वा बुध्यते (S K यां चावधत्ते) योगी यत्र सर्वोऽपि (S N omit अपि) विमूढः अविद्यायां त्वबुद्धः यत्र जनः प्रबुद्ध इत्यपि चित्रम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.71।।यदि गृहस्थेनापि मनसा समस्ताभिमानं हित्वा कूटस्थं ब्रह्मात्मानं परिभावयता ब्रह्मनिर्वाणमाप्यते प्राप्तं तर्हि मौढ्यादिविडम्बनमेवेत्याशङ्क्याह  यस्मादिति।  शब्दादिविषयप्रवणस्य तत्तदिच्छाभेदमानिनो न मुक्तिरिति व्यतिरेकस्य सिद्धत्वात् पूर्वोक्तमन्वयं निगमयितुमनन्तरं वाक्यमित्यर्थः। अशेषविषयत्यागे जीवनमपि कथमित्याशङ्क्याह  जीवनेति।  संभवद्रागद्वेषादिके देशे निवासव्यावृत्त्यर्थं चरतीत्येतद्व्याचष्टे  पर्यटतीति।  विहाय कामानित्यनेन पुनरुक्तिं परिहरति  शरीरेति।  निःस्पृहत्वमुक्त्वा निर्ममत्वं पुनर्वदन् कथं पुनरुक्तिमार्थिकीं न पश्यसीत्याशङ्क्याह  शरीरजीवनेति।  सत्यहंकारे ममकारस्यावश्यकत्वान्निरहंकारत्वं व्याकरोति  विद्यावत्त्वादीति।  स शान्तिमाप्नोतीत्युक्तमुपसंहरति  स एवंभूत इति।  संन्यासिनो मोक्षमपेक्षमाणस्य सर्वकामपरित्यागादीनि श्लोकोक्तानि विशेषणानि यत्नसाध्यानि तत्संमतिफलं तु कैवल्यमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.71।।विहाय इत्यनेनाप्ययमेवार्थ उच्यतेऽतः पुनरुक्तिरित्यत आह  एतदेवे ति। यद्यत्र कामा इच्छाविशेषास्तर्हि निस्स्पृह इति पुनरुक्तिः यदि काम्यन्त इति विषयास्तदा चरतिर्यदि भक्षणार्थस्तदा व्याघातः अथ गत्यर्थस्तदा व्यर्थ इत्यतो व्याचष्टे  कामा निति।निर्ममो निरहङ्कारः इत्येतदसम्भवपरिहाराय व्याचष्टे  भक्षयामी ति। कर्तृत्वाभिमान एवाहङ्कारः स्वामित्वाभिमान एव ममता न त्वहम्प्रत्ययादिमात्रमिति भावः। स हि पुमान् अन्यः पशुरित्यर्थः। कुतः इत्यत आह  स एवे ति।स पुमान् इत्यनेनैवान्वयसमाप्तिं वदता ज्ञानिन एव मुक्तिरित्येषोऽर्थो नात्र प्रतिपाद्यत इति दर्शितम् स्त्रीव्यावृत्त्यभावश्च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.71।।एतदेव प्रपञ्चयति विहायेति। कामान् विषयान् निस्स्पृहतया विहाय यश्चरेति भक्षयति भक्षयामीत्यहङ्कारममकारवर्जितश्च स हि पुमान्। स एव च मुक्तिमधिगच्छतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.71।।काम्यन्ते इति कामाः शब्दादयो विषयाः।  यः पुमान्  शब्दादीन्  सर्वान्  विषयान्  विहाय  तत्र  निःस्पृहः  ममतारहितश्च अनात्मनि देहे आत्माभिमानरहितः  चरति स  आत्मानं दृष्ट्वा  शान्तिम् अधिगच्छति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.71।।  विहाय  परित्यज्य  कामान् यः  संन्यासी  पुमान् सर्वान्  अशेषतः कात्स्न्र्येन  चरति  जीवनमात्रचेष्टाशेषः पर्यटतीत्यर्थः।  निःस्पृहः  शरीरजीवनमात्रेऽपि निर्गता स्पृहा यस्य सः निःस्पृहः सन्  निर्ममः  शरीरजीवनमात्राक्षिप्तपरिग्रहेऽपि ममेदम् इत्यभिनिवेशवर्जितः  निरहंकारः  विद्यावत्त्वादिनिमित्तात्मसंभावनारहितः इत्येतत्।  सः  एवंभूतः स्थितप्रज्ञः ब्रह्मवित्  शान्तिं  सर्वसंसारदुःखोपरमलक्षणां निर्वाणाख्याम्  अधिगच्छति  प्राप्नोति ब्रह्मभूतो भवति इत्यर्थः।।सैषा ज्ञाननिष्ठा स्तूयते।।

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【 Verse 2.72 】

▸ Sanskrit Sloka: एषा ब्राह्मी स्थिति: पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति | स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ||

▸ Transliteration: eṣā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṁ prāpya vimuhyati | thitvāsyāmantakāle’pi brahmanirvāṇamṛcchati ||

▸ Glossary: eṣā: this; brāhmī: God-realised soul; sthitiḥ: situation; pārtha: O son of Pritā; na: not; enāṁ: this; prāpya: after achieving; vimuhyati: get deluded; sthitvā: being so situated; asyāṁ: in this state; antakāle: at the end of life; api: also; brahma nirvāṇaṁ: passing into one with the ultimate Reality; ṛcchati: attains

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 2.72 O Pārtha, this is the state of Brahman, Brāhmī-sthiti; none is deluded after attaining this. Even at the end of life, one attains Brahmanirvāṇa, oneness with Brahman when established in this state.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।2.72।।हे पृथानन्दन यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।2.72।। हे पार्थ यह ब्राह्मी स्थिति है। इसे प्राप्त कर पुरुष मोहित नहीं होता। अन्तकाल में भी इस निष्ठा में स्थित होकर ब्रह्मनिर्वाण (ब्रह्म के साथ एकत्व) को प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 2.72 एषा this? ब्राह्मी of Brahmic? स्थितिः state? पार्थ O Partha? न not? एनाम् this? प्राप्य having obtained? विमुह्यति is deluded? स्थित्वा being established? अस्याम् in this? अन्तकाले at the end of life? अपि even? ब्रह्मनिर्वाणम् oneness with Brahman? ऋच्छति attains.Commentary The state described in the previous verse -- to renounce everything and to live in Brahman -- is the Brahmic state or the state of Brahman. If one attains to this state one is never deluded. He attains Moksha if he stays in that state even at the hour of his death. It is needless to say that he who gets establised in Brahman throughout his life attains to the state of Brahman or,BrahmaNirvana (Cf.VIII.5?6).Maharshi Vidyaranya says in his Panchadasi that Antakala here means the moment at which Avidya or mutual superimposition of the Self and the notSelf ends.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the second discourse entitledThe Sankhya Yoga.,

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 2.72. O son of Prtha ! This is the Brahmanic state; having attained this, one never gets deluded [again]; and even by remaining in this [for a while] one attains at the time of death, the Brahman, the Tranil One.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 2.72 O Arjuna! This is the state of the Self, the Supreme Spirit, to which if a man once attain, it shall never be taken from him. Even at the time of leaving the body, he will remain firmly enthroned there, and will become one with the Eternal."

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 2.72 This is the Brahmi-state, O Arjuna. None attaining to this is deluded. By abiding in this state even at the hour of death, one wins the self.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 2.72 O Partha, this is the state of being established in Brahman. One does not become deluded after attaining this. One attains identification with Brahman by being established in this state even in the closing years of one's life.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 2.72 This is the Brahmic seat (eternal state), O son of Pritha. Attaining to this, none is deluded. Being established therein, even at the end of life, one attains to oneness with Brahman.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 2.72 Esa etc. This is the Brahman-existance by remaining, i.e., having dwalt in which, even for a moment, one attains the Supreme Brahman [after] one's body breaks. Thus [all the] four estions have been decided.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 2.72 This state of performing disinterested work which is preceded by the knowledge of the eternal self and which is characterised by firm wisdom, is the Brahmi-state, which secures the attainment of the Brahman (the self). After attaining such a state, he will not be deluded, i.e., he will not get again the mortal coil. Reaching this state even during the last years of life, he wins the blissful Brahman (the self) i.e., which is full of beatitude. The meaning is that he attains the self which is constituted of nothing but bliss.

Thus in the second chapter, the Lord wanted to remove the delusion of Arjuna, who did not know the real nature of the self and also did not realize that the activity named 'war' (here an ordained duty) is a means for attaining the nature of Sankhya or the self. Arjuna was under the delusion that the body is itself the self, and dominated by that delusion, had retreated from battle. He was therefore taught the knowledge called 'Sankhya' or the understanding of the self, and Yoga or what is called the path of practical work

Chapter 2 (Part 40)

without attachment. These together have as their objective the attainment of steady wisdom (Sthitaprajnata)

This has been explained in the following verse by Sri Yamunacarya: Sankhya and Yoga, which comprehend within their scope the understanding of the eternal self and the practical way of disinterested action respectively, were imparted in order to remove Arjuna's delusion.

Through them the state of firm wisdom can be reached.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 2.72 O Partha, esa, this, the aforesaid; is brahmisthitih, the state of being established in Brahman, i.e. continuing (in life) in indentification with Brahman, after renouncing all actions. Na vimuhyati, one does not become deluded; prapya, after attaining ; enam, this Rcchati, one attains; brahma-nirvanam, identification with Brahman, Liberation; sthitva, by being established; asyam, in this, in the state of Brahman-hood as described; api, even; anta-kale, in the closing years of one's life. What need it be said that, one who remains established only in Brahman during the whole life, after having espoused monasticism even from the stage of celibacy, attains indetification with Brahman!

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।2.72।। सब इच्छाओं के त्याग का अर्थ है अहंकार का त्याग। अहंकार रहित अवस्था निष्क्रिय अर्थहीन शून्य नहीं है। जहाँ भ्रान्तिजनित अहंकार समाप्त हुआ वहीं पर पूर्ण ज्ञानस्वरूप आत्मा प्रकाशित होता है। अपने हृदय में स्थित आत्मा को पहचानने का ही अर्थ है उसी समय सर्वत्र व्याप्त नित्य ब्रह्म को पहचानना। अहंकार के नष्ट होने पर नित्य चैतन्य आत्मा का अनुभव उससे भिन्न रहकर नहीं होता वरन् उसके साथ एकत्व का अनुभव ही होता है। अत इस साक्षात्कार को ब्राह्मी स्थिति कहा गया है।यहाँ एक शंका उठ सकती है कि क्या आत्मानुभव के पश्चात् भी हमें पुन मोहित होकर अहंकार से उत्पन्न दुखों का भोग हो सकता है ऐसे किसी पुनर्मोह का यहाँ निषेध करके भगवान् हमारे भय को दूर कर देते हैं और भी एक बात है कि आत्मसाक्षात्कार का युवावस्था में ही होना आवश्यक नहीं हैं। वृद्धावस्था अथवा जीवन के अन्तिम क्षणों में भी यदि मनुष्य अपने स्वयंसिद्ध नित्य स्वरूप को पहचान लेता है तब भी वह अनुभव ब्राह्मी स्थिति के लिए पर्याप्त है।मिथ्या का निषेध और सत्य का प्रतिपादन यही वह मार्ग है जिसका उपनिषदों में आत्मप्राप्ति के लिए उपदेश है। कर्मयोग उस ज्ञान का व्यावहारिक स्वरूप है जिसका निरूपण व्यासजी ने गीता में अपनी मौलिक शैली में किया है। अनासक्त भाव से सिद्धि और असिद्धि में समान रहते हुए कर्म करने का अर्थ है अहंकार के अधिकार को ही समाप्त करना और इस प्रकार अनजाने ही वहाँ उच्चतर सत्य की स्थापना करना। अस्तु वेदान्त के निदिध्यासन से गीता में वर्णित कर्मयोग की साधना भिन्न नहीं है। परन्तु अर्जुन भगवान् के केवल वाच्यार्थ को ही ग्रहण करता है और उसके मन में एक सन्देह उत्पन्न होता है जिसे वह तृतीय अध्याय के प्रारम्भ में व्यक्त करता है। अत अगले अध्याय में भगवान् श्रीकृष्ण कर्मयोग का विस्तारपूर्वक विवेचन करते हैं।conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायांयोगाशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे सांख्ययोगोनाम द्वितीयोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुन संवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय समाप्त होता है।कपिल मुनि जी के सांख्य दर्शन के अर्थ में इस अध्याय का नाम सांख्ययोग नहीं है। यहाँ सांख्य शब्द का प्रयोग उसकी व्युत्पत्ति के आधार पर किया गया है जिसके अनुसार सांख्य का अर्थ हैं किसी विषय का युक्तियुक्त वह विवेचन जिसमें अनेक तर्क प्रस्तुत करने के पश्चात् किसी विवेकपूर्ण निष्कर्ष पर हम पहुँचते हैं। इस अर्थ में तत्त्वज्ञान से पूर्ण इस अध्याय को संकल्प वाक्य में सांख्ययोग कहा गया है।यह सत्य है कि मूल महाभारत में गीता के अध्यायों के अन्त में यह संकल्प वाक्य नहीं मिलते। किसी एक व्यक्ति को इनकी रचना का श्रेय देने के विषय में व्याख्याकारों में मतभेद है। तथापि यह स्वीकार किया जाता है कि एक अथवा अनेक विद्वानों ने प्रत्येक अध्याय के विषय का अध्ययन कर उसका उचित नामकरण किया है। गीता के सभी विद्यार्थियों के लिए वास्तव में ये नाम उपयोगी हैं। श्री शंकराचार्य जी ने इस विषय पर भाष्य नहीं लिखा है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।2.72।।ज्ञाननिष्ठां स्तुवन्नुपसंहरति  एषेति।  एषा यथोक्ता ब्रह्मणि भवा स्थितिः। सर्वं परित्यज्य ब्रह्मरुपेणैवावस्थानमिति यावत्।ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति इति श्रुत्या ब्रह्मशब्देनात्र ब्रह्मविद्गृह्यत इति व्याख्यानं त्वाचार्यैर्न कृतं मुख्यार्थेन वाक्यार्थनिर्वाहेऽमुख्यार्थस्यानौचित्यात्। एनां स्थितिं लब्ध्वा न विमुह्यति मोहं न प्राप्नोति। अस्यां ब्राहृयां स्थितावन्तकाले वृद्धावस्थायामपि स्थित्वा ब्रह्मणि निर्वृतिं मोक्षमृच्छति गच्छति किं वक्तव्यं प्रथमावस्थात् आस्भ्य ब्रह्मण्येव योऽवतिष्ठते स ब्रह्मनिर्वाणमृच्छतीति। अन्तकाले मृत्युसमये इत्यर्थस्तु न तस्मिन्काले एतादृशस्थित्यसंभवात्। नतु तदा विवशस्य स्मरणोद्यमः संभवतीति। यंयं वापीति श्लोकस्थस्वोक्तिविरोधाच्च ब्रह्मणि निर्वाणमिति भाष्यस्योपलक्षणत्वेन ब्रह्मरुपं निर्वाणमित्यर्थोऽप्यविरुद्धः। निर्गतं वानं गमनं यस्मिन्नित्यर्थोऽपि तवाप्ययं शोकमोहाभिभूतत्वरुपः स्वभावो नोचितः किंतु जीवन्मुक्तस्वभाव एवेति सूचयन्नाह  पार्थेति।  यद्वा मत्संबन्धिनस्तव मयि ब्रह्मण्येवावस्थानं युक्तमिति सूचयन्नाह  पार्थेति।  तदनेन द्वितीयाध्यायेन तत्पदलक्ष्यं परमात्मानमेव त्वंपदलक्ष्यत्वेन प्रतिपादयता साक्षाच्छोकमोहनिवृत्तिहेतुभूतां ज्ञाननिष्ठां लक्षणसहितां प्राधान्येन तदुपायभूतां योगनिष्ठां च गुणभावेन प्रदर्शयता उपायोपेयभूतं निष्ठाद्वयं प्रकाशितम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यबालस्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचितायां गीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां द्वितीयोऽध्यायः।।2।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।2.72।।तदेवं चतुर्णां प्रश्नानामुत्तरव्याजेन सर्वाणि स्थितप्रज्ञलक्षणानि मुमुक्षुकर्तव्यतया कथितानि संप्रति कर्मयोगफलभूतां सांख्यनिष्ठां फलेन स्तुवन्नुपसंहरति एषा स्थितप्रज्ञलक्षणव्याजेन कथिताएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिः इति च प्रागुक्ता स्थितिर्निष्ठा सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकपरमात्मज्ञानलक्षणा ब्राह्मी ब्रह्मविषया। हे पार्थ एनां स्थितिं प्राप्य यः कश्चिदपि पुनर्न विमुह्यति। नहि ज्ञानबाधितस्याज्ञानस्य पुनः संभवोऽस्ति अनादित्वेनोत्पत्त्यसंभवात्। अस्यां स्थितावन्तकालेऽप्यन्त्येऽपि वयसि स्थित्वा ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मणि निर्वाणं निर्वृतिं ब्रह्मरूपं निर्वाणमिति वा ऋच्छति गच्छत्यभेदेन। किमु वक्तव्यं यो ब्रह्मचर्यादेव संन्यस्य यावज्जीवमस्यां ब्राह्म्यां स्थिताववतिष्ठते स ब्रह्मनिर्वाणमृच्छतीत्यपिशब्दार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।2.72।।प्रतिपादितां कर्मयोगप्राप्यां सांख्ययोगनिष्ठां फलेन स्तुवन्नुपसंहरति  एषेति।  एषा स्थितप्रज्ञलक्षणप्रसङ्गात्कथिता ब्राह्मी। ब्रह्मशब्देनात्र ब्रह्मविदुच्यते।ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। तस्येयं ब्राह्मी स्थितिर्निष्ठा एनां निष्ठां प्राप्य नरो न विमुह्यति पुनर्मोहं न प्राप्नोति। अस्यामन्तकालेऽपि स्थित्वेति सकृज्जातापीयं फलवती नतूपासनावच्चिराभ्याससापेक्षेत्युक्तम्। ब्रह्म ऋच्छति प्राप्नोति। किं लोकान्तरवद्गतिप्राप्यं ब्रह्म नेत्याह  निर्वाणमिति।  निर्गतं वानं गमनं यस्मिन्प्राप्ये ब्रह्मणि तन्निर्वाणम्। तथा च श्रुतिःन तस्य प्राणा उत्क्रामन्त्यत्रैव समवलीयन्ते ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति इति। गतिमन्तरेण प्राणरूपोपाधिप्रविलयमात्राद्धटाकाशस्य महाकाशत्वप्राप्तिवत् जीवस्य ब्रह्मप्राप्तिमाह। अन्तकालेऽपीत्यपिशब्दाद्यो ब्रह्मचर्यादारभ्यात्र तिष्ठति स ब्रह्मनिर्वाणं कैमुतिकन्यायेन प्राप्नोतीति गम्यते। अस्याध्यायस्यार्थः संगृहीतो मधूसूदनश्रीपादैःज्ञानं तत्साधनं कर्म सत्त्वशुद्धिश्च तत्फलम्। तत्फलं ज्ञाननिष्ठैवेत्यध्यायेऽस्मिन्प्रकीर्तितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।2.72।।उपसंहरति एषेति। एषा ब्राह्मी ब्रह्मनिष्ठस्य स्थितिः। एनां प्राप्य न विमुह्यति मोहं न प्राप्नोति। अन्तकाले क्षणमप्यस्यां स्थित्वा ब्रह्मनिर्वाणं पुरुषोत्तममुक्तिं प्राप्नोति। गीतायाश्चोपनिषद्रूपत्वादत्र ब्रह्मपदं पुरुषोत्तमवाचकमेव। आजन्मस्थितौ तु किं वक्तव्यम् इति भावः।इति श्रीमद्भगवद्गीताटीकायां गीतामृततरङ्गिण्यां द्वितीयोऽध्यायः।।2।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।2.72।।उक्तां ज्ञाननिष्ठां स्तुवन्नुपसंहरति  एषेति।  ब्राह्मीस्थितिर्ब्रह्मज्ञाननिष्ठा एषा एवंविधा। एनां परमेश्वराराधनेन शुद्धान्तःकरणः पुमान् प्राप्य न विमुह्यति पुनः संसारमोहं न प्राप्नोति। यतः अन्तकाले मृत्युसमयेऽप्यस्यां क्षणमात्रमपि स्थित्वा ब्रह्मणि निर्वाणं लयमृच्छति प्राप्नोति किं पुनर्वक्तव्यं बाल्यमारभ्य स्थित्वा प्राप्नोतीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।2.72।।उक्तां योगवन्निष्ठां स्तुवन्नुपसंहरति एषेति। ब्रह्म हि निर्दोषं समम् तस्यैवेति ब्राह्मी ब्रह्मसम्बन्धिनी वा स्थितिः स्थितधीलक्षणा। अस्यां स्थित्वा ब्रह्मसुखं प्राप्नोति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।2.72।।( अब ) उस उपर्युक्त ज्ञाननिष्ठाकी स्तुति की जाती है यह उपर्युक्त अवस्था ब्राह्मी यानी ब्रह्ममें होनेवाली स्थिति है अर्थात् सर्व कर्मोंका संन्यास करके केवल ब्रह्मरूपसे स्थित हो जाना है। हे पार्थ इस स्थितिको पाकर मनुष्य फिर मोहित नहीं होता अर्थात् मोहको प्राप्त नहीं होता। अन्तकालमें अन्तके वयमें भी इस उपर्युक्त ब्राह्मी स्थितिमें स्थित होकर मनुष्य ब्रह्ममें लीनतारूप मोक्षको लाभ करता है। फिर जो ब्रह्मचर्याश्रमसे ही संन्यास ग्रहण करके जीवनपर्यन्त ब्रह्ममें स्थित रहता है वह ब्रह्मनिर्वाणको प्राप्त होता है इसमें तो कहना ही क्या है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।2.72।। व्याख्या  एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ  यह ब्राह्मी स्थिति है अर्थात् ब्रह्मको प्राप्त हुए मनुष्यकी स्थिति है। अहंकाररहित होनेसे जब व्यक्तित्व मिट जाता है  तब उसकी स्थिति स्वतः ही ब्रह्ममें होती है। कारण कि संसारके साथ सम्बन्ध रखनेसे ही व्यक्तित्व था। उस सम्बन्धको सर्वथा छोड़ देनेसे योगीकी अपनी कोई व्यक्तिगत स्थिति नहीं रहती।अत्यन्त नजदीकका वाचक होनेसे यहाँ  एषा  पद पूर्वश्लोकमें आये  विहाय कामान्   निःस्पृहः निर्ममः  और  निरहङ्कारः  पदोंका लक्ष्य करता है।भगवान्के मुखसे तेरी बुद्धि जब मोहकलिल और श्रुतिविप्रतिपत्तिसे तर जायगी तब तू योगको प्राप्त हो जायगा ऐसा सुनकर अर्जुनके मनमें यह जिज्ञासा हुई कि वह स्थिति क्या होगी इसपर अर्जुनने स्थितप्रज्ञके विषयमें चार प्रश्न किये। उन चारों प्रश्नोंका उत्तर देकर भगवान्ने यहाँ वह स्थिति बतायी कि वह ब्राह्मी स्थिति है। तात्पर्य है कि वह व्यक्तिगत स्थिति नहीं है अर्थात् उसमें व्यक्तित्व नहीं रहता। वह नित्ययोगकी प्राप्ति है। उसमें एक ही तत्त्व रहता है। इस विषयकी तरफ लक्ष्य करानेके लिये ही यहाँ  पार्थ  सम्बोधन दिया गया है। नैनां प्राप्य विमुह्यति   जबतक शरीरमें अहंकार रहता है तभीतक मोहित होनेकी सम्भावना रहती है। परन्तु जब अहंकारका सर्वथा अभाव होकर ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव हो जाता है तब व्यक्तित्व टूटनेके कारण फिर कभी मोहित होनेकी सम्भावना नहीं रहती।सत् और असत्को ठीक तरहसे न जानना ही मोह है। तात्पर्य है कि स्वयं सत् होते हुए भी असत्के साथ अपनी एकता मानते रहना ही मोह है। जब साधक असत्को ठीक तरहसे जान लेता है तब असत्से उसका सम्बन्धविच्छेद हो जाता है  (टिप्पणी प0 109)  और सत्में अपनी वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। इस स्थितिका अनुभव होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता (गीता 4। 35)। स्थित्वास्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति   यह मनुष्यशरीर केवल परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। इसलिये भगवान् यह मौका देते हैं कि साधारणसेसाधारण और पापीसेपापी व्यक्ति ही क्यों न हो अगर वह अन्तकालमें भी अपनी स्थिति परमात्मामें कर ले अर्थात् जडतासे अपना सम्बन्धविच्छेद कर ले तो उसे भी निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जायगी वह जन्ममरणसे मुक्त हो जायगा। ऐसी ही बात भगवान्ने सातवें अध्यायके तीसवें श्लोकमें कही है कि अधिभूत अधिदैव और अधियज्ञ एक भगवान् ही हैं ऐसा प्रयाणकालमें भी मेरेको जो जान लेते हैं वे मेरेको यथार्थरूपसे जान लेते हैं अर्थात् मेरेको प्राप्त हो जाते हैं। आठवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा कि अन्तकालमें मेरा स्मरण करता हुआ कोई प्राण छोड़ता है वह मेरेको ही प्राप्त होता है इसमें सन्देह नहीं है। दूसरी बात उपर्युक्त पदोंसे भगवान् उस ब्राह्मी स्थितिकी महिमाका वर्णन करते हैं कि इसमें यदि अन्तकालमें भी कोई स्थित हो जाय तो वह शान्त ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है। जैसे समबुद्धिके विषयमें भगवान्ने कहा था कि इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान महान् भयसे रक्षा कर लेता है (2। 40) ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि अन्तकालमें भी ब्राह्मी स्थिति हो जाय जडतासे सम्बन्धविच्छेद हो जाय तो निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है। इस स्थितिका अनुभव होनेमें जडताका राग ही बाधक है। यह राग अन्तकालमें भी कोई छोड़ देता है तो उसको अपनी स्वतःसिद्ध वास्तविक स्थितिका अनुभव हो जाता है।यहाँ यह शंका हो सकती है कि जो अनुभव उम्रभरमें नहीं हुआ वह अन्तकालमें कैसे होगा अर्थात् स्वस्थ अवस्थामें तो साधककी बुद्धि स्वस्थ होगी विचारशक्ति होगी सावधानी होगी तो वह ब्राह्मी स्थितिका अनुभव कर लेगा परन्तु अन्तकालमें प्राण छूटते समय बुद्धि विकल हो जाती है सावधानी नहीं रहती ऐसी अवस्थामें ब्राह्मी स्थितिका अनूभव कैसे होगा इसका समाधान यह है कि मृत्युके समयमें जब प्राण छूटते हैं तब शरीर आदिसे स्वतः ही सम्बन्धविच्छेद होता है। यदि उस समय उस स्वतःसिद्ध तत्त्वकी तरफ लक्ष्य हो जाय तो उसका अनुभव सुगमतासे हो जाता है। कारण कि निर्विकल्प अवस्थाकी प्राप्तिमें तो बुद्धि विवेक आदिकी आवश्यकता है पर अवस्थातीत तत्त्वकी प्राप्तिमें केवल लक्ष्यकी आवश्यकता है  (टिप्पणी प0 110) । वह लक्ष्य चाहे पहलेके अभ्याससे हो जाय चाहे किसी शुभ संस्कारसे हो जाय चाहे भगवान् या सन्तकी अहैतुकी कृपासे हो जाय लक्ष्य होनेपर उसकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है।यहाँ  अपि  पदका तात्पर्य है कि अन्तकालसे पहले अर्थात् जीवितअवस्थामें यह स्थिति प्राप्ति कर ले तो वह जीवन्मुक्त हो जाता है परन्तु अगर अन्तकालमें भी यह स्थिति हो जाय अर्थात् निर्ममनिरहंकार हो जाय तो वह भी मुक्त हो जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि यह स्थिति तत्काल हो जाती है। स्थितिके लिये अभ्यास करने ध्यान करने समाधि लगानेकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है।भगवान्ने यहाँ कर्मयोगके प्रकरणमें  ब्रह्मनिर्वाणम्  पद दिया है। इसका तात्पर्य है कि जैसे सांख्ययोगीको निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है (गीता 5। 2426) ऐसे ही कर्मयोगीको भी निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होती है। इसी बातको पाँचवें अध्यायके पाँचवें श्लोकमें कहा है कि सांख्ययोगी द्वारा जो स्थान प्राप्त किया जाता है वही स्थान कर्मयोगीद्वारा भी प्राप्त किया जाता है। विशेष बात  जड और चेतन ये दो पदार्थ है। प्राणिमात्रका स्वरूप चेतन है पर उसने जडका सङ्ग किया हुआ है। जडकी तरफ आकर्षण होना पतनकी तरफ जाना है और चिन्मयतत्त्वकी तरफ आकर्षण होना उत्थानकी तरफ जाना है अपना कल्याण करना है। जडकी तरफ जानेमें मोह की मुख्यता होती है और परमात्मतत्त्वकी तरफ जानेमें विवेक की मुख्यता होती है।समझनेकी दृष्टिसे मोह और विवेकके दोदो विभाग कर सकते हैं (1) अहंताममातयुक्त मोह एवं कामनायुक्त मोह (2) सत्असत्का विवेक एवं कर्तव्यअकर्तव्यका विवेक।प्राप्त वस्तु शरीरादिमें अहंताममता करना यह अहंताममतायुक्त मोह है और अप्राप्त वस्तु घटना परिस्थिति आदिकी कामना करना यह कामनायुक्त मोह है। शरीरी (शरीरमें रहनेवाला) अलग है और शरीर अलग है शरीरी सत् है और शरीर असत् है शरीरी चेतन है और शरीर जड है इसको ठीक तरहसे अलगअलग जानना सत्असत्का विवेक है और कर्तव्य क्या है अकर्तव्य क्या है धर्म क्या है अधर्म क्या है इसको ठीक तरहसे समझकर उसके अनुसार कर्तव्य करना और अकर्तव्यका त्याग करना कर्तव्यअकर्तव्यका विवेक है।पहले अध्यायमें अर्जुनको भी दो प्रकारका मोह हो गया था जिसमें प्राणिमात्र फँसे हुए हैं। अहंताको लेकर हम दोषोंको जाननेवाले धर्मात्मा है और ममताको लेकर ये कुटुम्बी मर जायँगे यह अहंताममतायुक्त मोह हुआ। हमें पाप न लगे कुलके नाशका दोष न लगे मित्रद्रोहका पाप न लगे नरकोंमें न जाना पड़े हमारे पितरोंका पतन न हो यह कामनायुक्त मोह हुआ।उपर्युक्त दोनों प्रकारके मोहको दूर करनेके लिये भगवान्ने दूसरे अध्यायमें दो प्रकारका विवेक बताया है शरीरीशरीरका सत्असत्का विवेक (2। 11 30) और कर्तव्यअकर्तव्यका विवेक (2। 31 53)।शरीरीशरीरका विवेक बताते हुए भगवान्ने कहा कि मैं तू और ये राजा लोग पहले नहीं थे यह बात भी नहीं और आगे नहीं रहेंगे यह बात भी नहीं अर्थात् हम सभी पहले भी थे और आगे भी रहेंगे तथा ये शरीर पहले भी नहीं थे और आगे भी नहीं रहेंगे तथा बीचमें भी प्रतिक्षण बदल रहे हैं। जैसे शरीरमें कुमार युवा और वृद्धावस्था ये अवस्थाएँ बदलती हैं और जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रोंको छोड़कर नये वस्त्र धारण करता है ऐसे ही जीव पहले शरीरको छोड़कर दूसरा शरीर धारण करता है यह तो अकाट्य नियम है। इसमें चिन्ताकी शोककी बात ही क्या है कर्तव्यअकर्तव्यका विवेक बताते हुए भगवान्ने कहा कि क्षत्रियके लिये युद्धसे बढ़कर कोई धर्म नहीं है। अनायास प्राप्त हुआ युद्ध स्वर्गप्राप्तिका खुला दरवाजा है। तू युद्धरूप स्वधर्मका पालन नहीं करेगा तुझे पाप लगेगा। यदि तू जयपराजय लाभहानि और सुखदुःख को समान करके युद्ध करेगा तो तुझे पाप नहीं लगेगा। तेरा तो कर्तव्यकर्म करनेमें ही अधिकार है फलमें कभी नहीं। तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और कर्म न करनेमें भी तेरी आसक्ति न हो। इसलिये तू कर्मोंकी सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर और समतामें स्थित होकर कर्मोंको कर क्योंकि समता ही योग है। जो मनुष्य समबुद्धिसे युक्त होकर कर्म करता है वह जीवितअवस्थामें ही पुण्यपापसे रहित हो जाता है।जब तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको और श्रुतिविप्रतिपत्तिको पार कर जायगी तब तू योगको प्राप्त हो जायगा। इस प्रकार ँ़ तत् सत् इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या औ योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें सांख्ययोग नामक दूसरा अध्याय पूर्ण हुआ।।2।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।2.72।।अत एव आपूर्यमाणमिति। योगी न कामार्थ बहिर्धावति अपि तु इन्द्रियधर्मतया तं ( N omit तं and read विषयानुप्रविशन्तो नतरां यान्ति ( न तरंगयन्ति) विषया अनुप्रविशन्तो न तरङ्गयन्ति नदीवेगा इवोदधिम्। एवं तृतीयो निर्णीतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।2.72।।तत्र तत्र संक्षेपविस्तराभ्यां प्रदर्शितां ज्ञाननिष्ठामधिकारिप्रवृत्त्यर्थत्वेन स्तोतुमुत्तरश्लोकमवतारयति  सैषेति।  गृहस्थः संन्यासीत्युभावपि चेन्मुक्तिभोगिनौ किं तर्हि कष्टेन सर्वथैव संन्यासेनेत्याशङ्क्य संन्यासिव्यतिरिक्तानामन्तरायसंभवादपेक्षितः संन्यासो मुमुक्षोरित्याह  एषेति।  स्थितिमेव व्याचष्टे  सर्वमिति।  न विमुह्यतीति पुनर्नञोऽनुकर्षणमन्वयार्थं संन्यासिनो विमोहाभावेऽपि गृहस्थो धनहान्यादिनिमित्तं प्रायेण विमुह्यति। विक्षिप्तः सन्परमार्थविवेकरहितो भवतीत्यर्थः। यथोक्ता ब्राह्मी स्थितिः सर्वकर्मसंन्यासपूर्विका ब्रह्मनिष्ठा तस्यां स्थित्वा तामिमामायुषश्चतुर्थेऽपि भागे कृत्वेत्यर्थः। अपिशब्दसूचितं कैमुतिकन्यायमाह  किमु   वक्तव्यमिति।  तदेवं तत्त्वंपदार्थौ तदैक्यं वाक्यार्थस्तज्ज्ञानादेकाकिनो मुक्तिस्तदुपायश्चेत्येतेषामेकैकत्रश्लोके प्राधान्येन प्रदर्शितमिति निष्ठाद्वयमुपायोपेयभूतमध्यायेन सिद्धम्।इति परमहंस श्रीमदानन्दगिरिकृतटीकायां द्वितीयोऽध्यायः।।2।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।2.72।।ज्ञानी स्तूयतेएषा इत्यनेनेत्यसत् प्रथमवाक्ये तददर्शनादिति भावेनाह   उपसंहरती ति। प्रकरणं समापयतीत्यर्थः। ब्रह्मधर्मभूतेति प्रतीतिनिरासायाह  ब्राह्मी ति। स्थितिर्नोक्ता कथमेवमुच्यते इत्यत आह लक्षणमिति ब्रह्मविषयज्ञानवतो लक्षणमुक्तमित्यर्थः।किं प्रभाषेत 2।5 इत्यादिप्रश्नपरिहारस्यार्थादुक्तत्वादनुपसंहारः।अन्तकाले चरमे वयस्यपि यः परिव्रज्यास्यां स्थितौ तिष्ठति सोऽपि ब्रह्माप्नोतीति किमु ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रज्य इति (शां.) व्याख्यानमसत् अप्रकृतत्वात् इत्याशयवान्व्याचष्टे  अन्तकालेऽपी ति। ज्ञानिनो ब्रह्मप्राप्तिरुक्ता सा किं तद्देहपातान्तरमेव उतान्यथा इत्यपेक्षयामिदमुच्यते। कुतोऽस्यार्थस्य भगवदभिप्रेतत्वं इत्यत आह  यं यमि ति। ननु ज्ञानमेव मोक्षसाधनम् कारणपौष्कल्ये च कार्यं भवत्येव अतः कथं ज्ञानिनः शरीरान्तरप्राप्तिः इत्यत आह  ज्ञानिना मिति। प्रारब्धकर्म सामग्र्याः प्रतिबन्धकं तदेवान्तकाले ब्रह्मानुसन्धानं प्रतिबध्नातीति भावः। ननु ज्ञानादेव सर्वं कर्म क्षीणमित्यत आह  भोगेने ति। अस्तु प्रारब्धकर्मणो भोगेनैव क्षयः स च ज्ञानं यच्छरीरे जातं तत्रैवाभूत् अतः कथं शरीरान्तरारम्भ इत्यत आह  सन्ति ही ति। तानि कथमेकेनैव शरीरेण भुज्येरन्निति शेषः। सप्तजन्मनीति द्विगुः। इतश्चैवमित्याह  दृष्टेश्चे ति। बह्वित्यनेकोपलक्षणम्। कथं ज्ञानिनां बहुशरीरप्राप्तिर्दृश्यते इत्यत आह  तथाही ति।ननु ज्ञानिनोऽपि यदि शरीरान्तरप्राप्तिस्तर्हि गर्भवासादिभिर्दुःखैर्लुप्तशक्तिकं ज्ञानं न मोक्षाय पर्याप्तं स्यादित्यत आह  निश्चिते ति। तस्य ज्ञानिनस्तावदेव चिरं तावानेव विलम्बः यावन्न विमोक्ष्ये विमोक्ष्यते प्रारब्धकर्मणा अवसिते कर्मणि ब्रह्म सम्पत्स्यत इत्यर्थः अवसितकर्मणि ज्ञानिनि विषये यदि पुत्रादयः शव्यकर्म कुर्वन्ति यदु च न यदि वा न कुर्वन्ति। सर्वथाऽर्चिषमभिसम्भवति प्राप्नोत्येवेत्यर्थः। तदिदमुक्तंनैनां प्राप्य विमुह्यति इति। पाशुपतवैशेषिकादयस्त्वाहुः अनियतकालविपाकान्यपि कर्माणि ज्ञानी योगसामर्थ्यात्समाहृत्यानेकशरीरफलान्यपि कायव्यूहनिर्माणेन क्षपयित्वा प्रव्रज्यते तत्कुतोऽस्य देहान्तरमिति तत्राह  न चे ति। ज्ञानिनः कर्मक्षयार्थमिति शेषः। तथा हि अप्रारब्धकर्मक्षयार्थं वा सा स्यात् प्रारब्धकर्मक्षयार्थं वा नाद्यः तेषां ज्ञानेनैव क्षीणत्वात् इति भावेनाह  तद्यथे ति। द्वितीये तु यः कश्चिज्ज्ञानी तथा करोति सर्वो वा आद्ये सम्प्रतिपत्तिमुत्तरमाह  प्रारब्धे त्वि ति। द्वितीयासम्भवे हेतुमाह  प्रमाणे ति। चशब्दात्प्रागुदाहृतप्रमाणविरोधाच्च। पाशुपतादिशास्त्रेषु तथोक्तत्वात्कथं प्रमाणाभावः इत्यत आह  न चे ति। तच्छिष्या अपि तच्छब्देनोच्यन्ते इति बहुवचनम्।उमापतिः पशुपतिः श्रीकण्ठो ब्रह्मणः सुतः। उक्तवानिदमव्यग्रं ज्ञानं पाशुपतं शिवः इत्यादौ तत्स्तुतिरपि दृश्यते इत्यत आह  यत्रे ति। वैष्णवशास्त्रोक्तप्रकारेण शिवभक्तानां लक्षणयेति शेषः। सत्यत्वं तदुक्तार्थस्येति शेषः। उक्तनिन्दाविरोधादिति भावः। तर्हि शैवपुराणानि कायव्यूहनिर्माणनियमादौ प्रमाणानीत्यत आह  न ही ति। तेषामिति बुद्धिस्थशैवपुराणपरामर्शः इतरग्रन्था उदाहृतगारुडादयः। शैवपुराणानां गारुडादिवैष्णवग्रन्थानां च को विशेषो येन बाध्यबाधकभावः इत्याशङ्क्य दुर्जनव्यामोहार्थं प्रणीतपशुपतादिशास्त्राणां व्यामोहनार्थत्वे तावत्प्रमाणमाह  तथा ही ति। कारयेति स्वार्थे णिच्। अतथ्यानि सर्वथाऽप्यविद्यमानानि वितथ्यानि व्यधिकरणानि च तेषु दर्शयस्व। प्रकाशं प्रसिद्धम्। इदानीं तन्मूलत्वं शैवपुराणानां इतरेषां पञ्चरात्रादिमूलत्वमित्यत्र प्रमाणमाह  कुत्सितानी ति। तच्छास्त्रसमयेन तच्छास्त्रसिद्धान्तमनुसृत्य। वेदैरिति वेदानामापाततः प्रतीतिमनुसृत्य। भागवतं भगवद्विषयम्।उक्तमुपसंहरति  अत  इति। ज्ञानिनां मुक्तिर्भवतीत्येव न तु तद्देहपातानन्तरमिति नियम इत्युपसंहारार्थः। ननु भीष्मादयो ज्ञानिनोऽन्तकालेऽस्यां ब्राह्म्यां स्थितौ स्थिताश्च न मुक्ताश्च तत्कथमेतदुक्तं इत्यत आह  भीष्मादीना मिति। साक्षाद्देहत्यागक्षणे युक्त्या परमेश्वरे मनोयोगेन भाव्यमित्येतत्कुतः इत्यत आह  स्मरन्नि ति। ननु तत्क्षणे युक्त्या मुक्तिश्चेदज्ञानिनामपि तत्सम्भवेन मुक्तिरित्यत आह  न चे ति। भक्तिज्ञानेनेति द्वन्द्वैकवद्भावः। भक्तिसहितं ज्ञानं भक्तिज्ञानमिति वा।ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मस्वरूपानन्दं इति व्याख्यानं सर्वप्रमाणविरुद्धमित्याशयवान्निर्वाणमिति भिन्नं पदं व्याचष्टे  निर्वाण मिति। कथमेतत् इत्यत आह   काय  इति। कार्यब्रह्मव्यावृत्त्यर्थमेतत्। अनेन ब्रह्मणो निराकारत्वं प्राप्तं तत्प्रतिषेधार्थमाह  निर्वाणे ति। प्रतिपादनं व्याख्यानम्। इत्यादिवत् इत्यादेरिव प्राकृतादिविग्रहराहित्याथत्वेनेत्यर्थः। किमनेन व्याख्यानेन निराकारमेव ब्रह्म किं न भवेत् इत्यत आह  कथ मिति। भगवतो विष्णोः साकारत्वेऽपि ब्रह्मणो निराकारत्वमेव। न च भगवानेव ब्रह्म तस्य तदुत्तमत्वेन ततोऽन्यत्वात् अतो न पुराणादिविरोध इत्यत आह  न चे ति।महत् ब्रह्म इत्येतानि वाक्यानि भगवतो ब्रह्मत्वप्रतिपादकानि।यस्मात् इत्यादीनि तस्यैव सर्वोत्तमत्वेन तदुत्तमाभावप्रतिपादकानि। इन्द्रियग्राह्यमतिक्रान्तस्तदुत्तमः सर्वमेव योगीन्द्रियग्राह्यम्। उत्तमाधमभावेन ब्रह्मेश्वरयोर्भेदो माभूत् ब्रह्माशरीरं ईश्वरस्तु सविग्रह इत्यतो भेदोऽस्तु अभेदस्यापि सत्त्वाद्ब्रह्मशब्दोपपत्तिरित्यत आह  न चे ति। तस्य पराभिमतस्य एतद्भगवतोऽन्यत्वम्। कुत इत्यत आह  तस्यापी ति।दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन्यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं इत्यन्तं वाक्यं इह विवक्षितम्। इत्यादिषु ब्रह्मविद्यात्वेन सम्मतेष्विति शेषः।कथमत्र श्रवणं इत्यत आह  यदी ति। रूपं विग्रहः। विज्ञानमानन्दं ब्रह्म बृ.उ.3।9।28 इत्यानन्दशब्दस्य नपुंसकत्वदर्शनात्तथोपादानम्। ज्योतिश्शब्दो भास्वररूपस्य वाचकः अत उक्तं सुवर्णरूपत्वमिति। दहरत्वं दहरस्थत्वमविग्रहस्येति वर्तते। दहरस्थत्वं कथं अविग्रहस्यानुपपन्नं इत्यत आह  दहरस्थश्चे ति। एवमुपपत्तिसापेक्षाणि वाक्यान्युदाहृत्य स्पष्टान्युदाहरति  सहस्रशीर्षे ति। अवसीयते परमात्मा। प्राग्भवतोऽन्यस्योत्तमत्वं वाक्यविरुद्धमित्युक्तम् इदानीं व्याहृतं च तदिति भावेनाह  अतिपरिपूर्णतमे ति। अत्यादिशब्दैर्निरतिशयत्वं द्योत्यते। ऐश्वर्यं वशित्वम्। श्रीः कान्तिः। परमेश्वरे भगवच्छब्दस्यौपचारिकत्वपरिहारायैतेषां गुणानां सद्भावे प्रमाणान्याह  परे ति। आनन्दं ब्रह्मणः इत्यत्र यतो वाचः इति पूर्ववाक्यमभिप्रेतम्। अमितशब्दात्परश्चन्द्रशब्दोऽध्याहार्यः। द्रष्टृपुरुषभेदात्ित्रविधोक्तिः। ऐश्वर्याद्यनन्तगुणत्वे मयीति प्रमाणम्। सङ्ख्यापरिमाणाभ्यां गुणानामानन्त्ययनेनोच्यते। शक्तेः परत्वं प्रागुक्तं तदस्पष्टमित्यतो  विज्ञाने ति। ज्ञानस्यापरोक्षरूपताप्रतिपादनाय  तुर्य मिति। ईश्वरो नात्मानं वेत्ति कर्तृकर्मभावविरोधात् इत्येतन्निरासाय  आत्मान मिति। ईश्वरे भगवच्छब्दस्यौपचारिकत्वासम्भवं दर्शयितुं तदन्यस्य तच्छब्दार्थतानिरासाया न्यतम  इति। अन्य एवान्यतमः भगवच्छब्दस्यायमर्थ इत्यत्रैश्वर्येति प्रमाणम्। अत्र षण्णामित्युपलक्षणम्। षाड्गुण्ये सर्वगुणान्तर्भावो वा। तद्वान् भगवानिति सिद्धमेव। भगवत्त्वात्स एव सर्वोत्तम इति। समग्रार्थो वेति  अतीवे ति। यदन्येन करिष्यामीति स्मर्तुं बुद्धिस्थीकर्तुं वाऽयुक्तं तत्त्वं कर्तुं शक्तः। मतुपा ज्ञानादीनां भगवता भेदः प्रतीतः। षण्णामित्यादिना परस्परं च तथाऽऽकृतिर्भगवत इत्युक्त्या कृतेस्तन्निरासार्थमाह  तानी ति। तत्र प्रमाणान्याह  विज्ञान मिति।  तप  आलोचनक्रिया। ज्ञानमयं ज्ञानात्मकमिति। धर्माणां परस्परमभेदोक्तिः। प्राकृतेति ङीबभावश्छान्दसः। अणञ्भ्यामन्यो वा प्रत्ययः। मांसमेदोऽस्थिभिः सम्भवो यस्याः सा तथोक्ता। एतच्च न योगित्वात् किन्त्वीश्वरत्वात्। अत एव विभुः निर्दोषगुणात्मकविग्रहादच्युतः।ज्ञानज्ञानः इत्यादेरतिशयितज्ञानादित्यर्थः।  तेन  निर्दोषत्वादिना।भगवद्रूपस्यैवम्भावे कथं परिच्छिन्नत्वगर्भवासादिसंसारिधर्माश्च तत्र दृश्यन्ते इत्यत आह   तदेवे ति। किमर्थं इत्यत उक्तं  लीलये ति। मायया मोहकशक्त्या। अत्र प्रमाणमाह  न चे ति। देव्या देवक्याः। एवं गर्भवासादिप्रदर्शनेन मोघं दर्शनं यस्मिन्विषये स तथा। आत्मवतां भागवतानाम्। आत्मा निरुपाधिकप्रिय इति यावत्। मुनिसुतो रावणः। ब्रह्मवाक्यवत् रुद्रवाक्यमप्यतुलं प्रत्यस्तीत्यतःरुद्रवाक्यं इत्युक्तम्।करुणः करुणावान् अर्शआदित्वादच्।तदेवेत्याद्युक्तमुपसंहरति  न तत्रे ति। अत इत्युपस्कर्तव्यम्। यद्येवं तर्हि विश्वरूपं परं तदपेक्षया कृष्णादिरूपाण्यपराणीति कथं ग्रन्थेषूच्यते इत्यत आह  यत्र चे ति। यत्र ग्रन्थे। तत्र विश्वरूपमपेक्ष्यान्यत्र कृष्णादावपरत्वमज्ञबुद्धिमपेक्ष्योक्तं ज्ञातव्यमित्यर्थः। कुत एतदित्यत आह  तच्चे ति। अखिलरूपतोऽखिलधर्मैः विमोहनं कर्तुम्। नन्वयमुपचारो वा स्तुतिर्वा किं न स्यात् इत्यत आह  न चे ति। असम्भवे ह्येषा कल्पना। अचिन्त्यशक्त्या चैकस्यैवानेकपरिमाणत्वादिकं सम्भवति। अन्यत्रादर्शनेन त्वपलापेऽतिप्रसङ्ग इत्यर्थः। अत्रैव प्रमाणमाह  कृष्णे ति। विमोहसि विमोहयसि। श्लोकार्थमुपसंहरति  तस्मा दिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।2.72।।उपसंहरति एषेति। ब्राह्मी स्थितिः ब्रह्मविषया स्थितिः लक्षणम्। अन्तकालेऽप्यस्यां स्थित्वैव ब्रह्म गच्छति अन्यथा जन्मान्तरं प्राप्नोति।यं यं वाऽपि 8।6 इति वक्ष्यमाणत्वात्। ज्ञानिनामपि सति प्रारब्धकर्मणि शरीरान्तरं युक्तम्।भोगेन त्वितरे इति ह्युक्तम्। सन्ति हि बहुशरीरफलानि कर्माणि कानिचित्सप्तजन्मनि विप्रः स्यात् इत्यादेः दृष्टेश्च ज्ञानिनामपि बहुशरीरप्राप्तेः। तथा ह्युक्तम्स्थितप्रज्ञोऽपि यस्तूर्ध्वः प्राप्य रुद्रपदं गतः। साङ्कर्षणं ततो मुक्तिमगाद्विष्णुप्रसादतः इति गारुडे।महादेव परे जन्मनि तव मुक्तिर्निरूप्यते इति नारदीये।निश्चितफलं च ज्ञानं तस्य तावदेव चिरम् छां.उ.6।14।2़। यदु৷৷. च नार्चिषमेवाभिसम्भवन्ति छां.उ.4।15।5 इत्यादिश्रुतिभ्यः न च कायव्यूहापेक्षा तद्यथेषीकातूलम् छां.उ.5।24।3। तद्यथा पुष्करपलाशे छां.उ.4।14।3ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि 4।37 इत्यादिवचनेभ्यः। प्रारब्धे त्वविरोधः प्रमाणाभावाच्च। न च तच्छास्त्रं प्रमाणम्।अक्षपादकणादानां साङ्ख्ययोगजटाभृताम्। मतमालम्ब्य ये वेदं दूषयन्त्यल्पचेतसः इति निन्दावचनात्।यत्र तु स्तुतिस्तत्र शिवभक्तानां स्तुतिपरत्वमेव न सत्यत्वम्। न हि तेषामपीतरग्रन्थविरुद्धार्थे प्रामाण्यम्। तथाह्युक्तम्एष मोहं सृजाम्याशु यो जनान्मोहयिप्यति। त्वं च रुद्र महाबाहो मोहशास्त्राणि कारय। अतथ्यानि वितथ्यानि दर्शयस्व महाभुज। प्रकाशं कुरु चात्मानमप्रकाशं च मां कुरु इति वाराहे।कुत्सितानि च मिश्राणि रुद्रो विष्णुप्रचोदितः। चकार शास्त्राणि विभुः ऋषयस्तत्प्रचोदिताः। दधीचाद्याः पुराणानि तच्छास्त्रसमयेन तु। चक्रुर्वेदैश्च ब्राह्मणानि वैष्णवा विष्णुचोदिताः। पञ्चरात्रं भारतं च मूलरामायणं तथा। तथा पुराणं भागवतं विष्णुर्वेद इतीरितः। अतः शैवपुराणानि योज्यान्यन्याविरोधतः इति नारदीये।अतो ज्ञानिनां भवत्येव मुक्तिः। भीष्मादीनां तु तत्क्षणे मुक्त्यभावः। स्मरंस्त्यजतीति वर्तमानव्यपदेशो हि कृतः। तच्चोक्तम्ज्ञानिनां क्रमयुक्तानां कायत्यागक्षणो यदा। विष्णुमाया तदा तेषां मनो बाह्यं करोति हि इति गारुडे। न चान्येषां तदा स्मृतिर्भवति।बहुजन्मविपाकेन भक्तिज्ञानेन ये हरिम्। भजन्ति तत्स्मृतिं त्वन्ते देवो याति न चान्यथा इति ब्रह्मवैवर्ते। निर्वाणमशरीरम्।कायो बाणं शरीरं च इत्यभिधानात्।एतद्बाणमवष्टभ्य इति प्रयोगाच्च। निर्वाणशब्दप्रतिपादनंअनिन्द्रियाः म.भा.12।336।29 इत्यादिवत्। कथमन्यथा सर्वपुराणादिप्रसिद्धाऽऽकृतिर्भगवत उपपद्यते। न चान्यद्भगवत उत्तमं ब्रह्म।ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शद्ब्यते इति भागवते।भगवन्तं परं ब्रह्मपरं ब्रह्मञ्जनार्दन।परमं यो महद्ब्रह्म म.भा.13।149।9यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः। 15।18योऽप्तावतीन्द्रियग्राह्यः।नास्ति नारायणसमं न भूतं न भविष्यति।न त्वत्समोऽस्त्यभ्यधिकः कुतोऽन्यः 11।43 इत्यादिभ्यः। न च तस्य ब्रह्मणोऽशरीरत्वादेतत्कल्प्यम् तस्यापि शरीरश्रवणात् आनन्दरूपममृतम् मुं.उ.2।2।7 सुवर्णज्योतिः तै.उ.3।10।6 दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशः छां.उ.8।1।2 इत्यादिषु।यदि रूपं न स्यात् आनन्दमित्येव स्यात् न त्वानन्दरूपमिति। कथं सुवर्णरूपत्वं स्यादरूपस्य कथं दहरत्वम् दहरस्थश्च केचित्स्वदेहेत्यादौ रूपवानुच्यते सहस्रशीर्षा पुरुषः ऋक्सं.8।4।17।1य.सं.31।1 रुक्मवर्णं कर्तारं मुं.उ.3।1।3 आदित्यवर्णं तमसः परस्तात् य.सं.31।18 सर्वतः पाणिपादं तत् 13।13श्वे.उ.3।16 विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखः। ऋक्सं. 8।3।16।3य.सं.17।19 इत्यादिवचनात्। विश्वरूपाध्यायादेश्च रूपवानवसीयते। अतिपरिपूर्णतमज्ञानैश्वर्यवीर्यानन्दयशश्श्रीशक्त्यादिमांश्च भगवान्। पराऽस्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकीं ज्ञानबलक्रिया च। श्वे.उ.6।8 यः सर्वज्ञः मुं.उ.1।1।92।2।7 आनन्दं ब्रह्मणः तै.उ.2।4।12।9।1 एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति। बृ.उ.4।3।32अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्यसहस्रलक्षामितकान्तिकान्तम्।मय्यनन्तगुणेऽनन्ते गुणतोऽनन्तविग्रहे भाग.6।4।48विज्ञानशक्तिरहमासमन्तशक्तेः भाग.3।9।24तुर्यं तत्सर्वदृक् सदा। गौ.पा.का.1।12आत्मानमन्यं च स वेद विद्वान् भाग.11।11।7अन्यतमो मुकुन्दात्को नाम लोके भगवत्पदार्थः भाग.3।18।21ऐश्वर्यस्य समग्रस्य। वि.पु.6।5।74अतीव परिपूर्णं ते सुखं ज्ञानं च सौभगम्। यच्चात्ययुक्तं स्मर्तुं वा शक्तः कर्तुमतः परः इत्यादिभ्यः। तानि सर्वाण्यन्योन्यानन्यरूपाणि। विज्ञानमानन्दं ब्रह्म बृ.उ.3।9।28 आनन्दो ब्रह्मेति व्यजानात् तै.उ.3।6 सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म तै.उ.2।1 यस्य ज्ञानमयं तपः मुं.उ.।1।19 समा भग प्रविश स्वाहा तै.उ.1।4।3न तस्य प्राकृता मूर्तिर्मांसमेदोस्थिसम्भवा। न योगित्वादीश्वरत्वात्सत्यरूपोऽच्युतो विभुः। सद्देहःसुखगन्धश्च ज्ञानभाः सत्पराक्रमः। ज्ञानज्ञानः सुखसुखः स विष्णुः परमोऽक्षरः इति पैङ्गिखिले।देहोऽयं मे सदानन्दो नायं प्रकृतिनिर्मितः। परिपूर्णश्च सर्वत्र तेन नारायणोऽस्म्यहम्। इत्यादि ब्रह्मवैवर्ते।तदेव लीलया चासौ परिच्छिन्नादिरूपेण दर्शयति मायया।न च गर्भैऽवसद्देव्या न चापि वसुदेवतः। न चापि राघवाज्जातो न चापि जमदग्नितः। नित्यानन्दोऽव्ययोऽप्येवं क्रीडते मोघदर्शनः इति च पाद्मे।न वै स आत्माऽऽत्मव (तां सुहृत्तमाः सक्तस्त्रिलोक्यां) तामधीश्वरो भुङ्क्ते हि दुःखं भगवान्वासुदेवः भाग.5।19।6स्वर्गादेरीशिताञ्जः परमसुखनिधिर्बोधरूपोऽय बोधं लोकानां दर्शयन्यो मुनिसुतहृतात्मप्रियार्थे जगाम।स ब्रह्मवन्द्यचरणो जनमोहनाय स्त्रीसङ्गिनामिति रतिं प्रथयंश्चचार।पूर्तेरचिन्त्यवीर्यो यो यश्च दाशरथिः स्वयम्। रुद्रवाक्यमृतं कर्तुमजितो जितवत्स्थितः। योऽजितो विजितो भक्त्या गाङ्गेयं न जघान ह। न चाम्बां ग्राहयामास करुणः कोऽपरस्ततः इत्यादिभ्यश्च स्कान्दे।न तत्र संसारधर्मा निरूप्याः यत्र च परापरभेदोऽवगम्यते तत्राज्ञबुद्धिमपेक्ष्यावरत्वं विश्वरूपमपेक्ष्य अन्यत्र। तच्चोक्तम् परिपूर्णानि रूपाणि समान्यखिलरूपतः। तथाप्यपेक्ष्य मन्दानां दृष्टिं त्वामृषयोऽपि हि। परावरं वदन्त्येव ह्यभक्तानां विमोहनम् इति गारु़डे। न चात्र किञ्चिदुपचारादिति वाच्यम् अचिन्त्यशक्तेः पदार्थवैचित्र्याच्चेत्युक्तम्।रामकृष्णादिरूपाणि परिपूर्णानि सर्वदा। न चाणुमात्रं भिन्नानि तथाप्यस्प्तान्विमोहसि इत्यादेश्च नारदीये। तस्मात्सर्वदा सर्वरूपेष्वपरिगणितानन्तगुणगणं नित्यनिरस्ताशेषदोषं च नारायणाख्यं परं ब्रह्मापरोक्षज्ञान्यृच्छतीति च सिद्धम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।2.72।। एषा  नित्यात्मज्ञानपूर्विका असङ्गकर्मणि  स्थितिः  स्थितधीलक्षणा  ब्राह्मी  ब्रह्मप्रापिका। ईदृशीं कर्मस्थितिं  प्राप्य न विमुह्यति  न पुनः संसारम् आप्नोति।  अस्यां  स्थित्याम् अन्तिमे अपि वयसि  स्थित्वा ब्रह्म निर्वाणम् ऋच्छति  निर्वाणमयं ब्रह्म गच्छति सुखैकतानम् आत्मानम् आप्नोति इत्यर्थः।एवम् आत्मयाथात्म्यं युद्धाख्यस्य च कर्मणः तत्प्राप्तिसाधनताम् अजानतः शरीरात्मज्ञानेन मोहितस्य तेन च मोहेन युद्धात् निवृत्तस्य तन्मोहशान्तये नित्यात्मविषया सांख्यबुद्धिः तत्पूर्विका च असङ्गकर्मानुष्ठानरूपकर्मयोगविषया बुद्धिः स्थितप्रज्ञतायोगसाधनभूता द्वितीयेऽध्याये प्रोक्ता। तदुक्तम् नित्यात्मासङ्गकर्मेहागोचरा सांख्ययोगधीः। द्वितीये स्थितधीलक्ष्या प्रोक्ता तन्मोहशान्तये।। (गीतार्थसंग्रहे 6) इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।2.72।।  एषा  यथोक्ता  ब्राह्मी  ब्रह्मणि भवा इयं  स्थितिः  सर्वं कर्म संन्यस्य ब्रह्मरूपेणैव अवस्थानम् इत्येतत्। हे  पार्थ न एनां  स्थितिं  प्राप्य  लब्ध्वा न  विमुह्यति  न मोहं प्राप्नोति।  स्थित्वा अस्यां  स्थितौ ब्राह्म्यां यथोक्तायां  अन्तकालेऽपि  अन्त्ये वयस्यपि  ब्रह्मनिर्वाणं  ब्रह्मनिर्वृतिं मोक्षम्  ऋच्छति  गच्छति। किमु वक्तव्यं ब्रह्मचर्यादेव संन्यस्य यावज्जीवं यो ब्रह्मण्येव अवतिष्ठते स ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येद्वितीयोऽध्यायः।।