3. Bhagavad Gita — Chapter 3
Chapter 3 (Part 1)
【 Verse 3.1 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन | तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca | jyāyasī cetkarmaṇaste matā buddhirjanārdana | tatkiṁ karmaṇi ghore māṁ niyojayasi keśava ||
▸ Glossary: arjuna: Arjuna; uvāca: says; jyāyasī: speaking highly; cet: although; karmaṇaḥ: action; te: your; matā: opinion; buddhir: knowledge; janārdana: Janārdana; tat: therefore; kiṁ: why; karmaṇi: in action; ghore: terrible; māṁ: me; niyojayasi: engaging me; keśava: Keśava (slayer of the demon Keśi)
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.1 Arjuna says: O Janārdana, O Keśava, Why do You make me engage in this terrible war if You think that knowledge is superior to action?
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.1 3.2।।अर्जुन बोले हे जनार्दन अगर आप कर्मसे बुद्धि(ज्ञान) को श्रेष्ठ मानते हैं तो फिर हे केशव मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं आप अपने मिले हुए वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहितसी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके एक बात कहिये जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.1।। हे जनार्दन यदि आपको यह मान्य है कि कर्म से ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर हे केशव आप मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों प्रवृत्त करते हैं
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.1 ज्यायसी superior? चेत् if? कर्मणः than action? ते by Thee? मता thought? बुद्धिः knowledge? जनार्दन O Janardana? तत् then? किम् why? कर्मणि in action? घोरे terrible? माम् me? नियोजयसि Thou engagest? केशव O Kesava.Commentary In verses 49? 50 and 51 of chapter II? Lord Krsihna has spoken very highly about Buddhi Yoga. He again asks Arjuna to fight. That is the reason why Arjuna is perplexed now.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.1. Arjuna said O Janardana, if knowledg is held to be superior to action by You, then why do You engage me in action that is terrible, O Kesava ?
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.1 "Arjuna questioned: My Lord! If Wisdom is above action, why dost Thou advise me to engage in this terrible fight?
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.1 Arjuna said If, O Krsna, you consider that Buddhi (knowledge) is superior to works, why do you engage me in this terrible deed?
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.1 Arjuna said O Janardana (krsna), if it be Your opinion that wisdom is superior to action, why they do you urge me to horrible aciton, O Kesava ?
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.1 Arjuna said If Thou thinkest that knowledge is superior to action, O Krishna, why then, O Kesava, dost Thou ask me to engage in this terrible action?
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.1 See Comment under 3.2
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.1 'Arjuna said If you consider that knowledge is superior to works, why do you engage me in this terrible deed?' What is said here is this: If the firm adherence to knowledge is the only means to the vision of the self, then how can one accept the idea that devotion to works (Karma) leads to it? It was said before that this firm devotion to knowledge, which forms the means for the vision of the self, could arise by the cessation of the activities of all the senses and the mind in relation to their respective objects such as sound. If the vision of the self is to be attained, which arises by the cessation of the activities of the senses, I should be guided to engage myself solely to acire firm devotion to knowledge, which is preceded by the abandoning of all works. For what purpose, then, do you engage me in this terrible deed, which consists in the activities of all the senses, and is thus an obstacle for the vision of the self?
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.1 O Janardana, cet, if it be; te, Your; mata, opinion, intention; that buddhih, Wisdom; jyayasi, is superior; karmanah, to action-. If the combination of Wisdom and action be intended (by the Lord), then the means to Liberation is only one. [The path combining Wisdom and action.] In that case, Arjuna would have done something illogical in separating Wisdom from action by saying that Wisdom is superior to action. For, that (Wisdom or action, which is a constituent of the combination) cannot be greater than that (Combination, even) from the point of view of the result. [Since what is intended is a combination, therefore, the separation of Knowledge from action, from the point of view of the result, is not justifiable. When Knowledge and action are considered to form together a single means to Liberation, in that case each of them cannot be considered separately as producing its own distinct result. Arjuna's estion can be justified only if this separation were possible.] Similarly, what Arjuna said by way of censuring the Lord, as it were, in, 'It has been stated by the Lord that Wisdom is superior to action, and He exhorts me saying, "Undertake action," which is a source of evil! What may be the reason for this?', and also in, 'Tatkim, why then, O Kesava; niyojayasi, do You urge; mam, me; to ghore, horrible, cruel; karmani, action; involving injury?'-that (censure) also does not become reasonable. On the other hand, [If the opponent's view be that Knowledge is to be combined with rites and duties sanctioned by the Vedas and the Smrtis in the case of the householders only, whereas for others those sanctioned by the Smrtis alone are to be combined with Knowledge৷৷., then৷৷.] if it be supposed that the combination (of Knowledge) with action sanctioned only by the Smrtis has been enjoined for all by the Lord, and Arjuna also comprehended (accordingly), then, how can the statement, 'Why then do you urge me to horrible action', be rational? Besides,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.1।। अभी भी अर्जुन का यही विश्वास है कि गुरुजन पितामह आदि के साथ युद्ध करना भयानक कर्म है। लगता है अर्जुन या तो भगवान् के उपदेश को भूल गया है या वह उसे कभी समझ ही नहीं पाया था। श्रीकृष्ण ने यह बिल्कुल स्पष्ट किया था कि महाभारत के युद्ध में अर्जुन गुरुजनों को मारने वाला नहीं था क्योंकि यह युद्ध व्यक्तियों के बीच न होकर दो सिद्धांतों के मध्य था। पाण्डवों का पक्ष धर्म और नैतिकता का था। परन्तु दुर्भाग्यवश अर्जुन अपने अहंकार को भूलकर अपने पक्ष के साथ एकरूप नहीं हो पाया। जिस मात्रा में वह आदर्श के साथ तादात्म्य नहीं कर पाया उस मात्रा में उसका अहंकार बना रहा और युद्ध करने में उसे नैतिक दोष दिखाई दिया।इस श्लोक में अर्जुन का तात्पर्य यह है कि यद्यपि श्रीकृष्ण के तर्कसंन्यासमार्ग का ही अनुमोदन कर रहे थे परन्तु उसे भयंकर कर्म में प्रवृत्त किया जा रहा था।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.1।।पूर्वाध्याये उपायोपेयभूते कर्मनिष्ठा ज्ञाननिष्ठा चेति द्वे निष्ठे प्रोक्ते तत्र प्रजहातीत्यादिना एषा ब्राह्मीत्यन्तेन ज्ञाननिष्ठात्युत्तमेत्यभिहितं तदेव श्रुत्वार्जुनः फलभूतायां ज्ञाननिष्ठायामप्युत्कण्ठितः स्वस्यापि चित्तशुद्धिपुरःसरं ज्ञानाधिकारं मन्यमान उवाच ज्यायसीति। जनान्देवविपक्षभूतानर्दयति पीडयतीति जनार्दनः तं संबोधयन् ममासुरत्वाभावाद्वोरे कर्मणि प्रेरणेन पीडादातृत्वं तवानुचितमिति सूचयति। यदि निष्कामकर्मणः सकाशादपि बुद्धिर्ज्ञानं श्रेष्ठं तवाभिमतं तर्हि कस्माद्वारे हिंसाप्रधाने क्रूरे कर्मणि मां स्वभक्तं तस्माद्युध्यस्वेत्यादिना नियोजयसि प्रेरयसि। हे केशव कं ब्रह्मादिमनुकम्पार्थ गच्छतीति तथा संबोधयन्मामपि स्वभक्तं प्रति केशवो भव नतु जनार्दन इति द्योतयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.1।।एवं तावत्प्रथमेनाध्यायेनोपोद्धातितो द्वितीयेनाध्यायेन कृत्स्नः शास्त्रार्थः सूत्रितः। तथाहि आदौ निष्कामकर्मनिष्ठा ततोऽन्तःकरणशुद्धिः ततः शमदमादिसाधनपुरःसरः सर्वकर्मसंन्यासः ततो वेदान्तवाक्यविचारसहिता भगवद्भक्तिनिष्ठा ततस्तत्त्वज्ञाननिष्ठा तस्याः फलं च त्रिगुणात्मकाविद्यानिवृत्त्या जीवन्मुक्तिः प्रारब्धकर्मफलभोगपर्यन्तं तदन्ते च विदेहमुक्तिः। जीवन्मुक्तिदशायां च परमपुरुषार्थालम्बनेन परवैराग्यप्राप्तिर्दैवसंपदाख्या च शुभवासना तदुपकारिण्यादेया। आसुरसंपदाख्यात्वशुभवासना तद्विरोधिनी हेया। दैवसंपदोऽसाधारणं कारणं सात्विकी श्रद्धा। आसुरसंपदस्तु राजसी तामसी चेति हेयोपादेयविभागेन कृत्स्नशास्त्रार्थपरिसमाप्तिः। तत्रयोगस्थः कुरु कर्माणि इत्यादिना सूत्रिता सत्त्वशुद्धिसाधनभूता निष्कामकर्मनिष्ठा सामान्यविशेषरूपेण तृतीयचतुर्थाभ्यां प्रपञ्च्यते। ततः शुद्धान्तःकरणस्य शमदमादिसाधनसंपत्तिपुरःसराविहाय कामान्यः सर्वान् इत्यादिना सूत्रिता सर्वकर्मसंन्यासनिष्ठा संक्षेपविस्तररूपेण पञ्चमषष्ठाभ्याम्। एतावता च त्वंपदार्थोऽपि निरूपितः। ततो वेदान्तवाक्यविचारसहितायुक्त आसीत मत्परः इत्यादिना सूत्रितानेकप्रकारा भगवद्भक्तिनिष्ठाऽध्यायष्ट्केन प्रतिपाद्यते। तावता च तत्पदार्थोऽपि निरूपितः। प्रत्यध्यायं चावान्तरसङ्गतिमवान्तरप्रयोजनभेदं च तत्र तत्र प्रदर्शयिष्यामः। ततस्तत्त्वंपदार्थैक्यज्ञानरूपावेदाविनाशिनं नित्यम् इत्यादिना सूत्रिता तत्त्वज्ञाननिष्ठा त्रयोदशे प्रकृतिपुरुषविवेकद्वारा प्रपञ्चिता। ज्ञाननिष्ठायाश्च फलंत्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इत्यादिना सूत्रितम्। त्रैगुण्यनिवृत्तिश्चतुर्दशे सैव जीवन्मुक्तिरिति गुणातीतलक्षणकथनेन प्रपञ्चिता।तदा गन्तासि निर्वेदम् इत्यादिना सूत्रिता परवैराग्यनिष्ठा संसारवृक्षच्छेदद्वारा पञ्चदशे।दुःखेष्वनुद्विग्नमना इत्यादिना स्थितप्रज्ञलक्षणेन सूत्रिता परवैराग्योपकारिणी दैवी संपदादेया।यामिमां पुष्पितां वाचम् इत्यादिना सूत्रिता तद्विरोधिन्यासुरी संपच्च हेया षोडशे। दैवसंपदोऽसाधारणं कारणं च सात्विकी श्रद्धानिर्द्वन्द्वो नित्यसत्त्वस्थः इत्यादिना सूत्रिता तद्विरोधपरिहारेण सप्तदशे। एवं सफला ज्ञाननिष्ठा अध्यायपञ्चकेन प्रतिपादिता। अष्टादशेन च पूर्वोक्तसर्वोपसंहार इति कृत्स्नगीतार्थसङ्गतिः। तत्र पूर्वाध्याये सांख्यबुद्धिमाश्रित्य ज्ञाननिष्ठा भगवतोक्ताएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिः इति। तथा योगबुद्धिमाश्रित्य कर्मनिष्ठोक्तायोगे त्विमां शृणु इत्यारभ्यकर्मण्येवाधिकारस्ते৷৷.मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि इत्यन्तेन। न चानयोर्निष्ठयोरधिकारिभेदः स्पष्टमुपदिष्टो भगवता। नचैकाधिकारिकत्वमुभयोः समुच्चयस्य विवक्षितत्वादिति वाच्यम्।दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगाद्धनंजय इति कर्मनिष्ठायाः बुद्धिनिष्ठापेक्षया निकृष्टत्वाभिधानात्यावानर्थ उदपाने इत्यत्र च ज्ञानफले सर्वकर्मफलान्तर्भावस्य दर्शितत्वात्। स्थितप्रज्ञलक्षणमुक्त्वा चएषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ इति सप्रशंसं ज्ञानफलोपसंहारात्या निशा सर्वभूतानाम इत्यादौ ज्ञानिनौ द्वैतदर्शनाभावेन कर्मानुष्ठानासंभवस्य वोक्तत्वात् अविद्यानिवृत्तिलक्षणे मोक्षफले ज्ञानमात्रस्यैव लोकानुसारेण साधनत्वकल्पनात् तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति श्रुतेश्च। ननु तर्हि तेजस्तिमिरयोरिव विरोधिनोर्ज्ञानकर्मणोः समुच्चयासंभवाद्भिन्नाधिकारिकत्वमेवास्तु सत्यमेवं न संभवति एकमर्जुनंप्रति तूभयोपदेशो न युक्तः। नहि कर्माधिकारिणंप्रति ज्ञाननिष्ठोपदेष्टुमुचिता नवा ज्ञानाधिकारिणंप्रति कर्मनिष्ठा। एकमेव प्रति विकल्पेनोभयोपदेश इति चेन्न। उत्कृष्टनिकृष्टयोर्विकल्पानुपपत्तेः अविद्यानिवृत्त्युपलक्षितात्मस्वरूपे मोक्षे तारतम्यासंभवाच्च। तस्माज्ज्ञानकर्मनिष्ठयोर्भिन्नाधिकारिकत्वे एकं प्रत्युपदेशायोगादेकाधिकारिकत्वे च विरुद्धयोः समुच्चयासंभवात् कर्मापेक्षया ज्ञानप्राशस्त्यानुपपत्तेश्च विकल्पाभ्युपगमे चोत्कृष्टमनायाससाध्यं ज्ञानं विहाय निकृष्टमनेकायासबहुलं कर्मानुष्ठातुमयोग्यमिति मत्वा पर्याकुलमतिरर्जुन उवाच हे जनार्दन सवैर्जनैरर्द्यते याच्यते स्वाभिलषितसिद्धय इति त्वं तथाभूतो मयापि श्रेयोनिश्चयार्थं याच्यस इति नैवानुचितमिति संबोधनाभिप्रायः। कर्मणो निष्कामादपि बुद्धिरात्मतत्त्वविषया ज्यायसी प्रशस्ततरा चेद्यदि ते तव मता तत्तदा किं कर्मणि घोरे हिंसाद्यनेकायासबहुले मामतिभक्तं नियोजयसिकर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यादिना विशेषेण प्रेरयसि। हे केशव सर्वेश्वर सर्वेश्वरस्य सर्वेष्टदायिनस्तव मां भक्तंशिष्यस्तेऽहं शाधि माम् इत्यादिना त्वदेकशरणतयोपसन्नंप्रति प्रतारणा नोचितेत्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.1।।पूर्वस्मिन्नध्यायेएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु इति द्वे बुद्धी प्रदर्श्यव्यवसायात्मिका बुद्धिः इति श्लोकेन सांख्यनिष्ठावतां पातशङ्का नास्ति कर्मयोगनिष्ठावतां तु सास्तीत्युक्तायावानर्थ उदपाने इति सांख्यनिष्ठायां सर्वकर्मफलान्तर्भावश्रवणात्तामेव प्रशमात्मिकां स्वाशयानुकूलां मन्वानोऽर्जुन उवाच ज्यायसीति। हे जनार्दन कर्मणो निष्कामकर्मयोगापेक्षया बुद्धिः सांख्यनिष्ठालक्षणं ज्ञानं ज्यायसी प्रशस्ततरा चेत्ते तव मता तत्तर्हि मां भैक्ष्यवृत्त्यापि तुष्यन्तं घोरे बन्धुवधाख्ये कर्मणि किं कुतो हेतोर्नियोजयसि पुनः पुनर्युध्यस्वेति वदन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.1।।।।श्रीकृष्णाय नमः।।योगसाङ्ख्यब्रह्मभावकर्माद्याः प्रश्नवाक्यतः।ससंशयोऽब्रवीत् कृष्णं भक्तिप्राप्तीच्छुरर्जुनः।।एवं पूर्वाध्याये भगवता बुद्धियोगस्य कर्मण उत्तमत्वमुक्तमिति कर्मोपदेशः किमाशयः इति संशयाविष्टोऽर्जुन उवाच ज्यायसी चेदिति। हे जनार्दन सर्वाविद्यानाशक ते कर्मणः सकाशात् बुद्धिश्चेज्जायसी श्रेष्ठा मता सम्मता तदा मां घोरे अकरणप्रत्यवाये किञ्चिदपि कर्मलोपादिविफले कर्मणि किमिति नियोजयसि प्रवर्त्तयसि। केशवेतिसम्बोधनेन दुष्टगुणव्याप्तयोरपि मोक्षदातृत्वात्तथा कर्म कारयित्वाऽपि चेन्मोक्षं दातुमिच्छसि तदा कर्तव्यमेवेति भावो व्यञ्जितः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.1।।एवं तावत्अशोच्यानन्वशोचस्त्वम् इत्यादिना प्रथमं मोक्षसाधनत्वेन देहात्मविवेकबुद्धिरुक्ता। तदनन्तरंएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु इत्यादिना कर्म चोक्तम्। नच तयोर्गुणप्रधानभावः स्पष्टं दर्शितः। तत्र बुद्धियुक्तस्य स्थितप्रज्ञस्य निष्कामत्वनितयेन्द्रियत्वनिरहंकारत्वाद्यभिधानात्एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ इति सप्रशंसमुपसंहाराच्च बुद्धिकर्मणोर्मध्ये बुद्धेः श्रैष्ठ्यं भगवतोऽभिमतं मन्वानोऽर्जुन उवाच ज्यायसी चेदिति। कर्मणः सकाशान्मोक्षान्तरङ्गत्वेन बुद्धिर्ज्यायस्यधिकतरा श्रेष्ठा चेत्तव संमता तर्हि किमर्थं तद्युध्यस्वेति तस्मादुत्तिष्ठेति च वारंवारं वदन्घोरे हिंसात्मके कर्मणि मां नियोजयसि प्रवर्तयसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.1।।अथाष्टभिस्त्रयीधर्मो माहात्म्यज्ञानभक्तिकृत्। पार्थाय श्रीभगवता मर्यादा वचसोच्यते।।1।।साङ्ख्ययोगौ निरूप्यादौ तृतीये धर्मनिर्णयः। त्यागात्यागविभेदेन त्यागादत्याग उत्तमः।।2।।यावच्छरीरसम्बन्धं त्यागः कर्त्तुं न शक्यते। अतो भगवदाज्ञातस्तदर्थे कृतिरुत्तमा।।3।।योगे कर्मपथे त्यागं साङ्खबुद्ध्युपसंहृतम्। जानन्ननिश्चयात्तत्र फाल्गुनः परिपृच्छति।।4।।यद्यपि पूर्वं भगवताएषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु 2।39 इत्यादौ योगबुद्धिरुपक्रान्ता तत्र च योगे स्वकर्मोपदिष्टं तथाप्यन्ते स्थिरधीप्रसङ्गे पुनस्त्यागमतिरेवोपसंहृतेति निर्णयमजानन् पृच्छति अर्जुन उवाच ज्यायसी चेदिति। कर्मणः सकाशात् बुद्धिस्तथा ज्यायस चेत् ते मता तर्हि घोरे कर्मणि युद्धे नियोजयसि किम् इति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.1।।अर्जुन बोला हे जनार्दन यदि कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञानको आप श्रेष्ठ मानते हैं ( तो हे केशव मुझे इस हिंसारूप क्रूर कर्ममें क्यों लगाते हैं ) यदि ज्ञान और कर्म दोनोंका समुच्चय भगवान्को सम्मत होता तो फिर कल्याणका वह एक साधन कहिये कर्मोंसे ज्ञान श्रेष्ठ है इत्यादि वाक्योंद्वारा अर्जुनका ज्ञानसे कर्मोंको पृथक् करना अनुचित होता। क्योंकि ( समुच्चयपक्षमें ) कर्मकी अपेक्षा उस ( ज्ञान ) का फलके नाते श्रेष्ठ होना सम्भव नहीं। तथा भगवान्ने कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञानको कल्याणकारक बतलाया और मुझसे ऐसा कहते हैं कि तू अकल्याणकारक कर्म ही कर इसमें क्या कारण है यह सोचकर अर्जुनने भगवान्को उलहनासा देते हुए जो ऐसा कहा कि तो फिर हे केशव मुझे इस हिंसारूप घोर क्रूर कर्ममें क्यों लगाते हैं वह भी उचित नहीं होता। यदि भगवान्ने स्मार्तकर्मके साथ ही ज्ञानका समुच्चय सबके लिये कहा होता एवं अर्जुनने भी ऐसा ही समझा होता तो उसका यह कहना कि फिर हे केशव मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं कैसे युक्तियुक्त हो सकता।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.1।। व्याख्या जनार्दन इस पदसे अर्जुन मानो यह भाव प्रकट करते हैं कि हे श्री कृष्ण आप सभीकी याचना पूरी करनेवाले हैं अतः मेरी याचना तो अवश्य ही पूरी करेंगे।ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ৷৷. नियोजयसि केशव मनुष्यके अन्तःकरणमें एक कमजोरी रहती है कि वह प्रश्न करके उत्तरके रूपमें भी वक्तासे अपनी बात अथवा सिद्धान्तका ही समर्थन चाहता है। इसे कमजोरी इसलिये कहा गया है कि वक्ताके निर्देशका चाहे वह मनोऽनुकूल हो या सर्वथा प्रतिकूल पालन करनेका निश्चय ही शूरवीरता है शेष सब कमजोरी या कायरता ही कही जायगी। इस कमजोरीके कारण ही मनुष्यको प्रतिकूलता सहनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। जब वह प्रतिकूलताको सह नहीं सकता तब वह अच्छाईका चोला पहन लेता है अर्थात् तब भलाईकी वेशमें बुराई आती है। जो बुराई भलाईके वशमें आती है उसका त्याग करना बड़ा कठिन होता है। यहाँ अर्जुनमें भी हिंसात्यागरूप भलाईके वशेमें कर्तव्यत्यागरूप बुराई आयी है। अतः वे कर्तव्यकर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मान रहे हैं। इसी कारण वे यहाँ प्रश्न करते हैं कि यदि आप कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं तो फिर मुझे युद्धरूप घोर कर्ममें क्यों लगाते हैंभगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें बुद्धिर्योगे पदसे समबुद्धि(समता) की ही बात कही थी परन्तु अर्जुनने उसको ज्ञान समझ लिया। अतः वे भगवान्से कहते हैं कि हे जनार्दन आपने पहले कहा कि मैंने सांख्यमें यह बुद्धि कह दी इसीको तुम योगके विषयमें सुनो। इस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनको छोड़ देगा। परन्तु कर्मबन्धन तभी छूटेगा जब ज्ञान होगा। आपने यह भी कह दिया कि बुद्धियोग अर्थात् ज्ञानसे कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं (2। 49)। अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है उत्तम है तो फिर मेरेको शास्त्रविहित यज्ञ दान तप आदि शुभ कर्मोंमें भी नहीं लगाना चाहिये केवल ज्ञानमें ही लगाना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत आप मेरेको युद्धजैसे अत्यन्त क्रूर कर्ममें जिसमें दिनभर मनुष्योंकी हत्या करनी पड़े क्यों लगा रहे हैंपहले अर्जुनके मनमें युद्ध करनेका जोश आया हुआ था और उन्होंने उसी जोशमें भरकर भगवान्से कहा कि हे अच्युत दोनों सेनाओंके बीचमें मेरे रथको खड़ा कर दीजिये जिससे मैं यह देख लूँ कि यहाँ मेरे साथ दो हाथ करनेवाला कौन है। परन्तु भगवान्ने जब दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणके सामने तथा राजाओंके सामने रथ खड़ा करके कहा कि तू इन कुरुवंशियोंको देख तब अर्जुनका कौटुम्बिक मोह जाग्रत् हो गया। मोह जाग्रत् होनेसे उनकी वृत्ति युद्धसे कर्मसे उपरत होकर ज्ञानकी तरफ हो गयी क्योंकि ज्ञानमें युद्धजैसे घोर कर्म नहीं करने पड़ते। अतः अर्जुन कहते हैं कि आप मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैंयहाँ बुद्धिः पदका अर्थ ज्ञान लिया गया है। अगर यहाँ बुद्धिः पदका अर्थ समबुद्धि (समता) लिया जाय तो व्यामिश्र वचन सिद्ध नहीं होगा। कारण कि दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको योग(समता) में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा दी है। व्यामिश्र वचन तभी सिद्धि होगा जब अर्जुनकी मान्यतामें दो बातें हों और तभी यह प्रश्न बनेगा कि अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं दूसरी बात भगवान्ने आगे अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें दो निष्ठाएँ कही हैं ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे। इससे भी अर्जुनके प्रश्नोंमें बुद्धिः पदका अर्थ ज्ञान लेना युक्तिसंगत बैठता है।कोई भी साधक श्रद्धापूर्वक पूछनेपर ही अपने प्रश्नका सही उत्तर प्राप्त कर सकता है। आक्षेपपूर्वक शंका करनेसे सही उत्तर प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं। अर्जुनकी भगवान्पर पूर्ण श्रद्धा है अतः भगवान्के कहनेपर अर्जुन अपने कल्याणके लिये युद्धजैसे घोर कर्ममें भी प्रवृत्त हो सकते हैंऐसा भाव उपर्युक्त प्रश्नसे प्रकट होता है।व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे इन पदोंमें अर्जुनका भाव है कि कभी तो आप कहते हैं कि कर्म करे कुरु कर्माणि (2। 48) और कभी आप कहते हैं कि ज्ञानका आश्रय लो बुद्धौ शरणमन्विच्छ (2। 49)। आपके इन मिले हुए वचनोंसे मेरी बुद्धि मोहितसी हो रही है अर्थात् मैं यह स्पष्ट नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरेको कर्म करने चाहिये या ज्ञानकी शरण लेनी चाहिये।यहाँ दो बार इव पदके प्रयोगसे भगवान्पर अर्जुनकी श्रद्धाका द्योतन हो रहा है। श्रद्धाके कारण अर्जुन भगवान्के वचनोंको ठीक मान रहे हैं और यह भी समझ रहे हैं कि भगवान् मेरी बुद्धिको मोहित नहीं कर रहे हैं। परन्तु भगवान्के वचनोंको ठीकठीक न समझनेके कारण अर्जुनको भगवान्के वचन मिले हुएसे लग रहे हैं और उनको ऐसा दीख रहा है कि भगवान् अपने वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहतिसी कर रहे हैं। अगर भगवान् अर्जुनकी बुद्धिको मोहति करते तो फिर अर्जुनके मोहको दूर करता ही कौनतदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् मेरा कल्याण कर्म करनेसे होगा या ज्ञानसे होगा इनमेंसे आप निश्चय करके मेरे लिये एक बात कहिये जिससे मेरा कल्याण हो जाय। मैंने पहले भी कहा था कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो वह बात मेरे लिये कहिये यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे (2। 7) और अब भी मैं वही बात कर रहा हूँ। सम्बन्ध अब आगेके तीन (तीसरे चौथे और पाँचवें) श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके व्यामिश्रेणेव वाक्येन (मिले हुएसे वचनों) पदोंका उत्तर देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.1 3.2।।ज्यायसीति। व्यामिश्रेणेति। कर्म उक्तं ज्ञानं च। तत्र न द्वयोः प्राधान्यं युक्तम् अपि तु ज्ञानस्य। तद्बलेन क्षपणीयत्वं यदि कर्मणां बुद्धियुक्तो जहातीमे (II 52) इत्यादिनयेन मूलत एव तर्हि (K तत्) कर्मणां (S K कर्मणा) किं प्रयोजनमिति प्रश्नाभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.1।।पूर्वोत्तराध्याययोः संबन्धं वक्तुं पूर्वस्मिन्नध्याये वृत्तमर्थं संक्षिप्यानुवदति शास्त्रस्येति। गीताशास्त्रप्रारम्भापेक्षितं हेतुफलभूतं बुद्धिद्वयं भगवतोपदिष्टमित्यर्थः। प्रष्टुरर्जुनस्याभिप्रायं निर्देष्टुं प्रवृत्तमर्थान्तरमनुवदति तत्रेति। अध्यायो बुद्धिद्वयनिर्धारणं वा सप्तम्यर्थः पारमार्थिके तत्त्वे यज्ज्ञानं तन्निष्ठानामशेषकामत्यागिनां कामयुक्तानां कर्मिणामपि प्रतिपत्तिकर्मवत्त्यागं कर्तव्यत्वेन भगवानुक्तवानित्यर्थः। तथापि मोक्षसाधने विकल्पसमुच्चययोरन्यतरस्य विवक्षितत्वबुद्ध्या समनन्तरप्रश्नप्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह उक्तेति। अर्जुनस्य मनसि व्याकुलत्वं प्रश्नबीजं दर्शयितुमुक्तमर्थान्तरमनुभाषते अर्जुनाय चेति। सांख्यबुद्धिमाश्रित्य कर्मत्यागमुक्त्वा पुनस्तस्यैव कर्तव्यत्वं कथं मिथो विरुद्धं ब्रवीतीत्याशङ्क्याह योगेति। यथा सांख्यबुद्धिमाश्रितानां संन्यासद्वारा तन्निष्ठानां कृतार्थतोक्ता तथा योगबुद्धिमाश्रित्य कर्म कुर्वतोऽपि कृतार्थत्वमुक्तमित्याशङ्क्याह न तत एवेति। दूरेण ह्यवरं कर्म बुद्धियोगादिति दर्शनादिति शेषः। बुद्धिव्याकुलत्वं प्रश्नबीजं प्रतिलभ्य प्रश्नं करोतीत्याह तदेतदिति। साक्षादेव श्रेयःसाधनं ज्ञानमन्येभ्यो दर्शितं तदित्युच्यते तद्विपरीतं कर्म स्वस्यानुष्ठेयत्वेनोक्तमेतदिति निर्दिश्यते भगवदुक्तेऽर्थे संदिह्यमानस्य निर्णयाकाङ्क्षया प्रश्नप्रवृत्तेरस्ति पूर्वोत्तराध्याययोरुत्थाप्योत्थापकलक्षणा संगतिरित्यर्थः। अर्जुनस्य प्रश्ननिमित्तं पर्याकुलत्वं प्रपञ्चयति कथमित्यादिना। यद्धि साक्षादेव श्रेयःसाधनं सांख्यशब्दितपरमार्थतत्त्वविषयबुद्धौ निष्ठारूपं तदन्यस्मै श्रेयोर्थिने भक्ताय श्रावयित्वा मां पुनरभक्तमश्रेयोर्थिनमिव कर्मणि पूर्वोक्तविपरीते कथं भगवान्नियोक्तुमर्हतीत्यर्जुनस्य पर्याकुलीभावो युक्त इति संबन्धः ज्ञाननिष्ठातो वैपरीत्यं स्फोरयितुं कर्म विशिनष्टि दृष्टेति। युद्धे हि क्षत्रकर्मणि दृष्टोऽनेकोऽनर्थो गुरुभ्रातृहिंसादिस्तेन संबद्धे बुद्धिशुद्धिद्वारापि वर्तमाने जन्मन्येव फलमित्यनियते मम भक्तस्य श्रेयोर्थिनो नियोगो भगवता युक्तो न भवतीति शेषः। यथोक्तं निमित्तं प्रश्नस्य युक्तं तदनुगुणत्वात्तस्येति द्योतकमाह तदनुरूपश्चेति। ज्ञाननिष्ठानां कृतार्थता कर्मनिष्ठानां तु न तथेत्युक्तविभागभागि शास्त्रमित्यत्र लोकेऽस्मिन्नित्यादिवाक्यस्यापि द्योतकत्वं दर्शयति प्रश्नेति। साक्षादेव श्रेयःसाधनमन्येभ्यो भगवतोक्तं नतु मह्यमिति मत्वा व्याकुलीभूतः सन् पृच्छतीति स्वाभिप्रायेण संबन्धमुक्त्वा वृत्तिकाराभिप्रायं दूषयति केचित्त्विति। ज्ञानकर्मणोः समुच्चयमवधारयितुं प्रश्नाङ्गीकारे समुच्चयावधारणेनैव प्रतिवचनमुचितं नच तथा भगवता प्रतिवचनमुक्तं तथाच प्रश्नस्य समुच्चयविषयत्वोपगमात्प्रत्युक्तेश्चासमुच्चयविषयत्वात्तयोर्मिथो विरोधो वृत्तिकारमते स्यादित्यर्थः। किंच केवलं प्रश्नप्रतिवचनयोरेव परमते परस्परविरोधो न भवत्यपितुं परेषां स्वग्रन्थेऽपि पूर्वापरविरोधोऽस्तीत्याह यथाचेति। आत्मना वृत्तिकारैरिति यावत् संबन्धग्रन्थो गीताशास्त्रारम्भोपोद्धातः।इहेति। तृतीयाध्यायारम्भं परामृशति। तदेव विवृण्वन्नाकाङ्क्षामाह कथमिति। पूर्वापरविरोधं स्फोरयितुं संबन्धग्रन्थोक्तमनुवदति तत्रेति। परकीया वृत्तिः सप्तम्या समुल्लिख्यते संबन्धग्रन्थे तावदयमर्थ उक्त इति संबन्धः। तमेवार्थं विशदयति सर्वेषामिति। सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकज्ञानादेव केवलात्कैवल्यमित्यस्मिन्नर्थे शास्त्रस्य पर्यवसानान्न समुच्चयो विवक्षितस्तत्रेत्याशङ्क्याह पुनरिति। उक्तगीतार्थो वृत्तिकारैरेव कर्मत्यागायोगेन विशेषितत्वान्नाविवक्षितोऽलंभवितुमुत्सहते तथाच श्रौतानि कर्माणि त्यक्त्वा ज्ञानादेव केवलान्मुक्तिर्भवतीत्येतन्मतं नियमेनैव यावज्जीवश्रुतिभिर्विप्रतिषिद्धत्वान्नाभ्युपगन्तुमुचितमित्यर्थः। तथापि कथं मिथो विरोधधीरित्याशङ्क्याह इह त्विति। प्रथमतो हि संबन्धग्रन्थे समुच्चयो गीतार्थप्रतिपाद्यत्वेन वृत्तिकृता प्रतिज्ञातः। श्रौतकर्मपरित्यागश्च श्रुतिविरोधादेव न संभवतीत्युक्तं तृतीयाध्यायारम्भे पुनः संन्यासिनां ज्ञाननिष्ठा कर्मिणां कर्मनिष्ठेत्याश्रमविभागमभिदधता पूर्वप्रतिषिद्धकर्मत्यागाभ्युपगमान्मिथो विरोधो दर्शितः स्यादित्यर्थः। ननु यथा भगवता प्रतिपादितं तथैव वृत्तिकृता व्याख्यातमिति न तस्यापराधोऽस्तीत्याशङ्क्याह तत्कथमिति। नहीह भगवान्विरुद्धमर्थमभिधत्ते सर्वज्ञस्य परमाप्तस्य विरुद्धार्थवादित्वायोगात् किंतु तदभिप्रायापरिज्ञानादेव व्याख्यातुर्विरुद्धार्थवादितेत्यर्थः। भगवतो विरुद्धार्थवादित्वाभावेऽपि श्रोतुर्विरुद्धार्थप्रतिपत्तिं प्रतीत्य व्याचक्षाणो वृत्तिकारो नापराध्यतीत्याशङ्क्याह श्रोता वेति। अर्जुनो हि श्रोता। सोऽपि बुद्धिपूर्वकारीभगवदुक्तमेवावधारयन्न विरुद्धमर्थमवधारयितुमर्हति तथा च परस्यैव विरुद्धार्थवादितेत्यर्थः। विरोधं परिहरन्नाशङ्कते तत्रेति। संबन्धग्रन्थे हि वृत्तिकारस्यैतदभिप्रेतं गृहस्थानामेव सतां परिपक्वज्ञानमन्तरेण यावज्जीवश्रुतिचोदिताग्निहोत्रादित्यागेन केवलादेवापातिकादात्मज्ञानान्मोक्षमवेक्ष्यमाणानां यावज्जीवादिशास्त्रैरसौ निषिध्यते न तु स्वरूपेणैव कर्मत्यागो ज्ञानान्मोक्षो वा निषेद्धुमिष्यते। तृतीये पुनरध्याये कर्मत्यागिनां गृहस्थेभ्यो व्यतिरिक्तानामेव केवलादात्मज्ञानान्मोक्षो विवक्ष्यतेऽतो भिन्नविषयत्वान्निषेधाभ्यनुज्ञानयोर्न विरोधाशङ्केत्यर्थः। विधान्तरेण विरोधं दर्शयन्नुत्तरमाह एतदपीति। विरोधमेवाकाङ्क्षाद्वारा साधयति कथमित्यादिना। श्रौतं कर्म गृहस्थानामवश्यमनुष्ठेयमित्यनेनाभिप्रायेण तेषां केवलादात्मज्ञानान्मोक्षो निषिध्यते नतु गृहस्थानां ज्ञानमात्रायत्तं मोक्षं प्रतिषिध्यान्येषां केवलज्ञानाधीनो मोक्षो विवक्ष्यत आश्रमान्तराणामपि स्मार्तेन कर्मणा समुच्चयाभ्युपगमादिति चोदयति अथेति। एतत्परामृष्टं वचनमेवाभिनयति केवलादिति। ननु गृहस्थानां श्रौतकर्मराहित्येऽपि सति स्मार्ते कर्मणि कुतो ज्ञानस्य केवलत्वं लभ्यते येन निषेधोक्तिरर्थवती तत्राह तत्रेति। प्रकृतवचनमेव सप्तम्यर्थः प्रधानं हि श्रौतं कर्म तद्राहित्ये सति स्मार्तस्य कर्मणः सतोऽप्यसद्भावमभिप्रेत्य ज्ञानस्य केवलत्वमुक्तमिति युक्ता निषेधोक्तिरित्यर्थः। गृहस्थानामेव श्रौतकर्मसमुच्चयो नान्येषाम् अन्येषां तु स्मार्तेनेति पक्षपाते हेत्वभावं मन्वानः सन् परिहरति एतदपीति। तमेव हेत्वभावं प्रश्नद्वारा विवृणोति कथमित्यादिना। गृहस्थानां श्रौतस्मार्तकर्मसमुच्चितं ज्ञानं मुक्तिहेतुरित्यभ्युपगमात्केवलस्मार्तकर्मसमुच्चितात्ततो न मुक्तिरिति निषेधो युज्यते ऊर्ध्वरेतसां तु स्मार्तकर्ममात्रसमुच्चिताज्ज्ञानान्मुक्तिरिति विभागे नास्ति हेतुरित्यर्थः। पक्षपाते कारणं नास्तीत्युक्त्वा पक्षपातपरित्यागे कारणमस्तीत्याह किञ्चेति। गृहस्थानामपि ब्रह्मज्ञानं स्मार्तैरेव कर्मभिः समुच्चितं मोक्षसाधनं ब्रह्मज्ञानत्वादूर्ध्वरेतःसु व्यवस्थितब्रह्मज्ञानवदिति पक्षपातत्यागे हेतुं स्फुटयति यदीत्यादिना। यदि गृहस्थानां ब्रह्मज्ञानं स्मार्तैरेव कर्मभिः समुच्चितं मोक्षहेतुरिति विवक्षितं तदा तान्प्रति यावज्जीवश्रुतिर्विरुध्येत यदि स्मार्तैरपि कर्मभिः समुच्चितं तदीयं ज्ञानं मोक्षसाधनं विवक्ष्यते तदा सिद्धसाध्यतेति प्रागुक्तमभिप्रेत्य चोदयति अथेति। आश्रमान्तराणां तर्हि केवलादेव ज्ञानान्मुक्तिरिति प्रागुक्तविरोधतादवस्थ्यमित्याशङ्क्याह ऊर्ध्वरेतसां त्विति। यथोक्ते विभागे गार्हस्थ्यं क्लेशात्मकं कर्म बाहुल्यादनुपादेयमापद्येतेति दूषयति तत्रेति। साधनभूयस्त्वे फलभूयस्त्वमिति न्यायमाश्रित्य शङ्कते अथेति। क्लेशबाहुल्योपेतं श्रौतं स्मार्तं च बहु कर्म तस्यानुष्ठानाद्गृहस्थस्य मोक्षः स्यादेवेत्यर्थः। एवकारनिरस्यं दर्शयति नाश्रमान्तराणामिति। तेषां नास्ति मुक्तिरित्यत्र यावज्जीवादिश्रुतिविहितावश्यानुष्ठेयकर्मराहित्यं हेतुं सूचयति श्रौतेति। शास्त्रविरोधिन्यायस्य निरवकाशत्वमभिप्रेत्य दूषयति तदपीति। ऐकाश्रम्यस्मृत्या गार्हस्थ्यस्यैव प्राधान्यादनधिकृतान्धादिविषयं कर्मसंन्यासविधानमित्याशङ्क्याह ज्ञानाङ्गत्वेनेति। न खल्वनधिकृतानामन्धादीनां संन्यासः श्रवणाद्यावृत्तिद्वारा ज्ञानाङ्गं भवितुमलं तेषां श्रवणाद्यभ्याससामर्थ्यात्। अतः श्रुत्यादीनां विरोधे नास्ति गार्हस्थ्यस्य प्राधान्यमित्यर्थः। तस्य प्राधान्याभावे हेत्वन्तरमाह आश्रमेति।ब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद् गृहाद्वनी भूत्वा प्रव्रजेद्यदि वेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा इति श्रुतौ तस्याश्रमविकल्पमेके ब्रुवत इतियमिच्छेत्तमावसेत् इत्यादिस्मृतौ चाश्रमाणां समुच्चयेन विकल्पेन चाश्रमान्तरमिच्छन्तं प्रति विधानान्न गार्हस्थ्यस्य प्रधानत्वमित्यर्थः। यदि सर्वेषामाश्रमाणां श्रुतिस्मृतिमूलत्वं तर्हि तत्तदाश्रमविहितकर्मणां ज्ञानेन समुच्चयः सिध्यतीति शङ्कते सिद्धस्तर्हीति। यद्यपि ज्ञानोत्पत्तावाश्रमकर्मणां साधनत्वं तथापि ज्ञानमुत्पन्नं नैव फले सहकारित्वेन तान्यपेक्षतेऽन्यथा संन्यासविध्यनुपपत्तेरिति दूषयति न मुमुक्षोरिति। संन्यासविधानमेवानुक्रामति व्युत्थायेत्यादिना। एषणाभ्यो वैमुख्येनोत्थानं तत्परित्यागः। आश्रमसंपत्त्यनन्तरं तत्र विहितधर्मकलापानुष्ठानमपि कर्तव्यमित्याह अथेति। प्रागुक्तानां सत्यादीनामल्पफलत्वान्न्यासस्य च ज्ञानद्वारा मोक्षफलत्वादित्याह तस्मादिति। अतिरिक्तमतिशयवन्तं महाफलमिति यावत्। प्रकृतकर्मभ्यः सकाशान्न्यास एवातिशयवानासीदित्युक्तेऽर्थे वाक्यान्तरं पठति न्यास एवेति। लोकत्रयहेतुं साधनत्रयं परित्यज्य संसाराद्विरक्ताः संन्यासपूर्वकादात्मज्ञानादेव प्राप्तवन्तो मोक्षमित्याह न कर्मणेति। सति वैराग्ये नास्ति कर्मापेक्षा सत्यां सामग्र्यां कार्यापेक्षानुपपत्तेरित्याह ब्रह्मचर्यादेवेति। इत्याद्याः सर्वकर्मसंन्यासविधायिन्यः श्रुतयो भवन्तीति शेषः। आत्मानमेव लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्तीत्यादिवाक्यसंग्रहार्थमादिपदम्। तत्रैव स्मृतिमुदाहरति त्यजेति। धर्माधर्मयोः सत्यानृतयोश्च संसारारम्भकत्वान्मुमुक्षुणा तत्त्यागे प्रयतितव्यमित्यर्थः। त्यक्तस्वाभिमानस्यापि तत्त्वतः स्वरूपसंबन्धाभावात्त्याज्यत्वमविशिष्टमित्याह येनेति। अनुभवानुसारेणप्रमातृताप्रमुखस्य संसारस्य दुःखफलत्वमालक्ष्य मोक्षहेतुसम्यग्ज्ञानसिद्धये ब्रह्मचर्यादेव पारिव्राज्यमनुष्ठेयमित्युत्पत्तिविधिमुपन्यस्यति संसारमिति। तत्त्वज्ञानमुद्दिश्य ब्रह्मचर्यादेव कर्मसंन्याससामग्रीमभिदधानो विनियोगविधिं सूचयति परमिति। ज्ञानकर्मणोरसमुच्चयार्थे फलविभागं कथयति कर्मणेति। उक्तं फलविभागमनूद्य ज्ञाननिष्ठानां कर्मसंन्यासस्य कर्तव्यत्वमाह तस्मादिति। वाक्यशेषेऽपि सर्वकर्मसंन्यासो विवक्षितोऽस्तीत्याह इहापीति। ज्ञानार्थिनो मुमुक्षोः संन्यासविध्यनुपपत्तिबाधितं समुच्चयविधिवचनमित्युक्तमिदानीं मोक्षस्वभावालोचनयापि समुच्चयवचनमनुचितमित्याह मोक्षस्य चेति।अकुर्वन्विहितं कर्म निन्दितं च समाचरन्। प्रसंजंश्चेन्द्रियार्थेषु नरः पतनमृच्छति इति स्मृतेः। मुमुक्षुणापि प्रत्यवायनिवृत्तये कर्तव्यं नित्यकर्मेति शङ्कते नित्यानीति। यो यस्मिन्कर्मण्यधिकृतस्तस्य तदकरणात्प्रत्यवायो भवति नतु कर्मानधिकारिणः संन्यासिनस्तदकरणात्प्रत्यवायः संभवतीति दूषयति नासंन्यासीति। तदेव स्पष्टयति नहीति। समिद्धोमाध्ययनाद्यकरणात्प्रत्यवायः संन्यासिनो नास्तीत्यर्थः। तत्र व्यतिरेकोदाहरणमाह यथेति। अकरणात्प्रत्यवायोत्पत्तिमभ्युपेत्योक्तं संप्रति प्रतिषिद्धकरणादेव प्रत्यवायो न त्वकरणादभावाद्भावोत्पत्तेर्लोकवेदविरुद्धत्वादित्याह न तावदिति। ननु नित्यकर्मविधायी वेदस्तदकरणात्प्रत्यवायो भवतीति ब्रवीति तत्कथमकरणात्प्रत्यवायो न भवतीति श्रुतिमाश्रित्योच्यते श्रुत्यन्तरविरोधादिति तत्राह यदीति। विहितस्याकरणे सत्यनर्थप्राप्तेर्न नित्यकर्मविधायी वेदोऽनर्थकरत्वेनाप्रमाणमित्याशङ्क्याह विहितस्येति। न विहितस्य करणे पितृलोकप्राप्तिलक्षणं फलं भवतेष्यते धूमादिना नयनपीडादिदुःखं तु प्रत्यक्षमेवाकरणे च प्रत्यवायोत्पत्तिरुभयथापि पुरुषस्यानर्थकरो वेदोऽप्रमाणमेव स्यादित्यर्थः। नन्वभावस्यापि भावोत्पादनसामर्थ्यं वेदः संपादयिष्यति तथाच विहिताकरणप्रत्यवायपरिहारो विहितकरणे फलिष्यतीति नेत्याह तथाचेति। लोकप्रसिद्धपदार्थशक्त्याश्रयणेन शास्त्रप्रवृत्त्यङ्गीकारादपूर्वशक्त्याधानायोगाज्ज्ञापकमेव शास्त्रमित्यर्थः। कारकत्वे च तस्याप्रामाण्यमप्रत्यूहं स्यादित्याह कारकमिति। भवतु शास्त्रस्याप्रामाण्यमित्याशङ्क्यापौरुषेयतया शेषदोषानागन्धितत्वान्मैवमित्याह नचेति। अनिर्वाच्यानुपलम्भस्य संवेदनमभावज्ञाने कारणं समीहितसाधनज्ञानं तु चरणन्यासादि प्रवृत्तिकारणमित्यङ्गीकृत्योपसंहरति तस्मादिति। अकरणात्प्रत्यवायोत्पत्त्यसंभवस्तच्छब्दार्थः। संन्यासिनां ज्ञाननिष्ठानां कर्मसंन्यासित्वादेव कर्मासंभवे फलितमाह अत इति। समुच्चयानुपपत्तौ हेत्वन्तरमाह ज्यायसीति। प्रश्नानुपपत्तिमेव प्रपञ्चयति यदि हीति। समुच्चयोपदेशे प्रश्नैकदेशानुपपत्तेश्च न तदुपदेशोपपत्तिरित्याह अर्जुनायेति।कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन इत्यर्जुनं प्रत्युपदेशात्तं प्रति ज्यायसी बुद्धिर्नोक्तेति युक्तं तत्किमित्याद्युपालम्भवचनमित्याशङ्क्याह नचेति। येन कल्पनेन ज्यायसी चेदित्यारभ्य तत्किं कर्मणीत्युपालम्भात्मा प्रश्नः स्यात्तथा न युक्तं कल्पयितुम्।एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिः इति वचनविरोधादि तियोजना। कस्मिन्पक्षे तर्हि प्रश्नस्योपपत्तिरित्याशङ्क्याह यदीति। भगवदुक्तेऽर्थे प्रष्टुर्विवेकाभावात् प्रश्नः स्यादित्याशङ्क्य पूर्वोक्तमेवाधिकं विवक्षया स्मारयति अविवेकत इति। भगवतोऽपि प्रतिवचनमज्ञाननिमित्तं प्रश्नाननुरूपत्वादित्याशङ्क्याधिकं दर्शयति नचेति। भगवतः सर्वज्ञत्वप्रसिद्धिविरोधादज्ञानाधीनप्रतिवचनायोगादित्यर्थः। इतश्च समुच्चयः शास्त्रार्थो न भवतीत्याह अस्माच्चेति। कस्तर्हि शास्त्रार्थो विवक्षितस्तत्राह केवलादिति। ज्ञानकर्मणोः समुच्चयानुपपत्तौ कारणान्तरमाह ज्ञानेति। वाक्यशेषवशादपि समुच्चयस्याशास्त्रार्थतेत्याह कुरु कर्मैवेति। प्राथमिकेन संबन्धग्रन्थेन समस्तशास्त्रार्थसंग्राहकेण तद्विवरणात्मनोऽस्य संदर्भस्य नास्ति पौनरुक्त्यमिति मत्वा प्रतिपदं व्याख्यातुं प्रश्नैकदेशं समुत्थापयति ज्यायसी चेदिति। वेदाश्चेत्प्रमाणमितिवच्चेदित्यस्य निश्चयार्थत्वं व्यावर्तयति यदीति। बुद्धिशब्दस्यान्तःकरणविषयत्वं व्यवच्छिनत्ति ज्ञानमिति। पूर्वार्धस्याक्षरयोजनां कृत्वा समुच्चयाभावे तात्पर्यमाह यदीति। इष्टे भगवतेति शेषः। एकं ज्ञानं कर्म च समुच्चितमिति यावत्। ज्ञानकर्मणोरभीष्टे समुच्चये समुच्चितस्य श्रेयःसाधनस्यैकत्वात्कर्मणः सकाशाज्ज्ञानस्य पृथक्करणमयुक्तमित्यर्थः। एकमपि साधनं फलतोऽतिरिक्तं किं न स्यादित्याशङ्क्याह नहीति। नच केवलात्कर्मणो ज्ञानस्य केवलस्य फलतोऽतिरिक्तत्वं विवक्षित्वा पृथक्करणं समुच्चयपक्षे प्रत्येकं श्रेयःसाधनत्वानभ्युपगमादिति भावः। पूर्वार्धस्येवोत्तरार्धस्यापि समुच्चयपक्षे तुल्यानुपपत्तिरित्याह तथेति। दूरेण ह्यवरं कर्मेत्यत्र कर्मणः सकाशाद्बुद्धिः श्रेयस्करी भगवतोक्ता कर्म च बुद्धेः सकाशादश्रेयस्करमुक्तं तथापि तदेव कर्म कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेष्विति स्निग्धं भक्तं च मां प्रति कुर्विति भगवान् प्रतिपादयति तत्र कारणानुपलम्भादयुक्तमतिक्रूरे कर्मणि भगवतोमन्नियोजनमिति यदर्जुनो ब्रवीति तच्च समुच्चयपक्षेऽनुपपन्नं स्यादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.1।।श्रीव्यङ्कटेशाय नमः। पूर्वोत्तराध्यायेभ्योऽस्य भेदं स्वस्मिन्नेकतां च दर्शयन्नेतदध्यायप्रतिपाद्यमर्थं पूर्वाध्यायार्थसङ्गतत्वेन विवक्षुस्तत्प्रतिपाद्यं तावदाह आत्मेति। जीवेश्वरस्वरूपं साङ्ख्याख्यमित्यर्थः। ज्ञानसाधनमात्मज्ञानसाधनं योगाख्यम्। पूर्वत्र पूर्वस्मिन्नध्याये। न चैवं द्वितीयस्याध्यायस्यैक्यानुपपत्तिः साधनस्यैव प्राचुर्यात् प्रचुरेण च व्यपदेशात्। तथा च सप्तमादौ वक्ष्यतिसाधनं प्राधान्येनोक्तमतीतैरध्यायैः इति।आत्मस्वरूपं इत्यादि तु प्रकरणभेदप्रदर्शनायोक्तमिति। एतत्सङ्गतत्वेन तृतीयाध्यायार्थमाह ज्ञानेति। योगो द्विविधः कर्मसमाधिभेदात्। तत्र तावज्ज्ञानसाधनत्वेन कर्म विधीयते कर्तव्यमेवेति ज्ञाप्यते कैश्चन वाक्यैरकर्म कर्माकरणं विनिन्द्यास्मिन्नध्याये अकर्मनिन्दाऽपि कर्मविध्यर्थेत्येकार्थता। तथापि प्रकरणभेदार्थमेवमुक्तम्।ज्ञानसाधनत्वेन इति वदता मोक्षसाधनता निरस्ता। तेन प्रश्नप्रतिवचनापव्याख्यानमप्यपहस्तितम्। आनन्दवृद्ध्यर्थता त्वनुज्ञायत एव। बीजं प्रदर्शयन्प्रश्नवाक्यतात्पर्यमाह कर्मण इति। आदिपदेनकृपणाः फलहेतवः 2।49 इत्यादेर्ग्रहणम्। घोरे रागद्वेषाद्युपेते। अत्रोभयत्र कर्मशब्देन काम्यं कर्माभिप्रेतम्। निवृत्तधर्मान्निष्कामधर्मान् यत्याश्रमविहिताञ्च्छमदमादीन्। अत्र कर्मणि किमिति नियोजयसीत्येकः प्रश्नः घोर इति द्वितीय इत्यवधेयम्। इदमुक्तं भवति आश्रयमत्रयविहितानि यज्ञादीनि युद्धादीनि च कर्माणि काम्यान्येव सर्व एते पुण्यलोका भवन्ति छा.उ.2।23।2 इत्यादिफलश्रवणात्। तथाऽत्रापिहतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गम् 2।37 इत्यादि। चतुर्थाश्रमविहितानि शमादीन्यकाम्यानि फलाश्रवणात् शान्तो दान्तः इत्युपक्रम्य आत्मानं पश्यति बृ.उ.4।4।23 इति ज्ञानार्थत्वश्रवणाच्च। ज्ञानं च काम्यात्कर्मणोऽत्युत्तममित्यभिहितम्। ततश्च काम्ये कर्मणि युद्धेयुद्ध्यस्व भारत 2।18 इति नियोजनमयुक्तं किन्तु चतुर्थाश्रमं स्वीकृत्य तद्धर्मनिष्ठो भवेति नियोक्तव्यम्। ननु युद्धमपिकर्मबन्धं प्रहास्यसि 2।39 इत्युक्तत्वाज्ज्ञानार्थं भवतीति मतम् तदा व्यामिश्रेण वाक्येन बुद्धिमोहनमेव आपद्यते। अथैवं मतम् युद्धादीनि कर्माणि काम्यान्यकाम्यानि च। तत्र यः सकामस्तं प्रतिहतो वा 2।37 इत्याद्युक्तम्। यः पुनर्ज्ञानार्थी तमुद्दिश्यकर्मण्येवाधिकारः 2।47 इत्युक्तम् तत्र का व्यामिश्रता इति। तथापि शुद्धेषु निवृत्तिलक्षणेषु यत्याश्रमधर्मेषु सत्सु वैकल्पिकेषु नियोजनमयुक्तमेव। तत्र मनोविक्षेपाभावात् अत्र तद्भावादिति। किञ्च कामक्रोधादीनां नरकफलत्वमुक्तम्। युद्धे च कामादयोऽवर्जनीयाः। ततोऽपि तत्र नियोजनमयुक्तम्। नन्वस्योत्तरंसुखदुःखे समे कृत्वा 2।38 इत्युक्तम् सत्यं तथापि रागादिप्रसक्तिहीनेषु शक्यानुष्ठानेषु यतिधर्मेषु सत्स्वशक्यानुष्ठाने युद्धे नियोजनमयुक्तमेवेति प्रथमश्लोके पदानां व्यवहितत्वादन्वयं दर्शयन् किञ्चिद्व्याचष्टे कर्मण इति। षष्ठीभ्रान्तिनिरासाय सकाशादित्युक्तम्। बुद्धिरात्मज्ञानम्। ज्यायसी प्रशस्ततरा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.1।।आत्मस्वरूपं ज्ञानसाधनं चोक्तं पूर्वत्र। ज्ञानसाधनत्वेनाकर्म विनिन्द्य कर्म विधीयत उत्तराध्याये। कर्मणो ज्ञानमत्युत्तममित्यभिहितं भगवतादूरेण ह्यवरं कर्म 2।49 इत्यादौ। एवं चेत्किमिति कर्मणि घोरे युद्धाख्ये नियोजयसि निवृत्तधर्मान्विना इत्याह ज्यायसीति। कर्मणः सकाशाद्बुद्धिर्ज्यायसी चेत्ते तव मता तत्तर्हि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.1।।अर्जुन उवाच यदि कर्मणः बुद्धिः एव ज्यायसी इति ते मता किमर्थं तर्हि घोरे कर्मणि मां नियोजयसि एतदुक्तं भवतिज्ञाननिष्ठा एव आत्मावलोकनसाधनम् कर्मनिष्ठा तु तस्याः निष्पादिका आत्मावलोकनसाधनभूता च ज्ञाननिष्ठा सकलेन्द्रियमनसां शब्दादिविषयव्यापारोपरतिनिष्पाद्या इत्यभिहिता। इन्द्रियव्यापारोपरतिनिष्पाद्यम् आत्मावलोकनं चेद् सिषाधयिषितम् सकलकर्मनिवृत्तिपूर्वकज्ञाननिष्ठायाम् एव अहं नियोजयितव्यः किमर्थं घोरे कर्मणि सर्वेन्द्रियव्यापाररूपे आत्मावलोकनविरोधिनि कर्मणि मां नियोजयसि इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.1।। ज्यायसी श्रेयसी चेत् यदि कर्मणः सकाशात् ते तव मता अभिप्रेता बुद्धिः ज्ञानं हे जनार्दन। यदि बुद्धिकर्मणी समुच्चिते इष्टे तदा एकं श्रेयःसाधनमिति कर्मणो ज्यायसी बुद्धिः इति कर्मणः अतिरिक्तकरणं बुद्धेरनुपपन्नम् अर्जुनेन कृतं स्यात् न हि तदेव तस्मात् फलतोऽतिरिक्तं स्यात्। तथा च कर्मणः श्रेयस्करी भगवतोक्ता बुद्धिः अश्रेयस्करं च कर्म कुर्विति मां प्रतिपादयति तत् किं नु कारणमिति भगवत उपालम्भमिव कुर्वन् तत् किं कस्मात् कर्मणि घोरे क्रूरे हिंसालक्षणे मां नियोजयसि केशव इति च यदाह तच्च नोपपद्यते। अथ स्मार्तेनैव कर्मणा समुच्चयः सर्वेषां भगवता उक्तः अर्जुनेन च अवधारितश्चेत् तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि (गीता 3.1) इत्यादि कथं युक्तं वचनम्।।किञ्च
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【 Verse 3.2 】
▸ Sanskrit Sloka: व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे | तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ||
▸ Transliteration: vyāmiśreṇeva vākyena buddhiṁ mohayasīva me | tadekaṁ vada niścitya yena śreyohamāpnuyām ||
▸ Glossary: vyāmiśreṇa: by ambiguous; iva: as; vākyena: words; buddhiṁ: intelligence; mohayasi: confusing; iva: as; me: my; tat: therefore; ekaṁ: one; vada: tell; niśc- itya: for certain; yena: by which; śreyaḥ: benefit; ahaṁ: I; āpnuyāṁ: may have
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.2 My intelligence is confused by Your conflicting words. Tell me clearly what is best for me.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.1 3.2।।अर्जुन बोले हे जनार्दन अगर आप कर्मसे बुद्धि(ज्ञान) को श्रेष्ठ मानते हैं तो फिर हे केशव मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं आप अपने मिले हुए वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहितसी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके एक बात कहिये जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.2।। आप इस मिश्रित वाक्य से मेरी बुद्धि को मोहितसा करते हैं अत आप उस एक (मार्ग) को निश्चित रूप से कहिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.2 व्यामिश्रेण perplexing? इव as it were? वाक्येन with speech? बुद्धिम् understanding? मोहयसि (Thou) confusest? इव as it were? मे my? तत् that? एकम् one? वद tell? निश्चित्य for certain? येन by which? श्रेयः bliss (the good or the highest)? अहम् I? आप्नुयाम् may attain.Commentary Arjuna says to Lord Krishna? Tecah me one of the two? knowledge or action? by which I may attain to the highest good or bliss or Moksha. (Cf.V.I).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.2. You appear to perplex my intellect with Your speech that looks confusing. Hence tell me, with certainty, that particular thing by which I may attain the good (emancipation).
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.2 Thy language perplexes me and confuses my reason. Therefore please tell me the only way by which I may, without doubt, secure my spiritual welfare.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.2 You confuse my mind with statements that seem to contradict each other; tell me for certain that one way by which I could reach the highest good.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.2 You bewilder my understanding, as it were, by a seemingly conflicting statement! Tell me for certain one of these by which I may attain the highest Good.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.2 With this
Chapter 3 (Part 2)
apparently perplexing speech, Thou confusest, as it were, my understanding; therefore tell me that one way for certain by which I may attain bliss.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.1-2 Jyayasi etc. and Vyamisrena etc. Action has been taught and knowledge too. Now it is proper [to attach] importance not to both, but only to knowledge. Now if with the strenght of knowledge the action is to be destroyed from its very root, according to the instruction 'The man of wisdom casts off [both the good and the bad action]', then what is the autility of action ? This is idea of [Arjuna's] estion. But the Bhagavat gives the answer :
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.2 Conseently, it appears to me as if 'you confuse me with statements that seem to contradict each other.' For, firm devotion to knowledge which forms the means for the vision of the self and which is of the nature of stopping the operations of the senses on the one hand, and on the other exhortation to action which is of a nature opposite to it, i.e., knowledge, as a means to the same vision of that Atman - these statements are contradictory and confusing. Therefore tell me clearly the path following which I can take a determined course and win the Supreme Being.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.2 'Though the Lord speaks lucidly, still, to me who am of a dull understanding, the Lord's utterance appears to be conflicting.' 'Mohayasi, You bewilder; me, any; buddhim, understanding; iva, as it were; vyamisrena iva, by that seemingly conflicting; vakyena, statement! You have surely undertaken to dispel the confusion of my understanding; but why do You bewildered (it)? Hence I say, "You bewildered my understanding, as it were."' However, if You [In some readings, 'tvam tu, however, you', is substituted by 'tatra, as to that'.-Tr.] think that it is impossible for a single person to pursue both Knowledge and action, which can be undertaken (only) by different persons then, that being the case, vada, tell me; niscitya, for certain; tadekam, one of these, either Knowledge or action: "This indeed is fit for Arjuna, according to his understanding, strength and situation"; yena, by which, by one of either Knowledge or action; aham, I; apnuyam, may attain; sreyah, the highest Good.' Even if Knowledge had been spoken of at all by the Lord as being subsidiary to steadfastness in action, how then could there be the desire in Arjuna to know of only one of them, as expressed in 'Tell me one of these two?' Certainly the Lord did not say, 'I shall speak of only one among Knowledge and action, but surely not of both', owing to which, Arjuna, considering it impossible for himself to acire both, should have prayed for one only! The answer was in accordance witht the estion:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.2।। पहले से ही मोहितमन अर्जुन में सामान्य मनुष्य होने के नाते वह सूक्ष्म बुद्धि नहीं थी जिसके द्वारा विवेकपूर्वक भगवान् के सूक्ष्म तर्कों को समझ कर वह निश्चित कर सके कि परम श्रेय की प्राप्ति के लिए कर्म मार्ग सरल था अथवा ज्ञान मार्ग। इसलिए वह यहाँ भगवान् से नम्र निवेदन करता है आप उस मार्ग को निश्चित कर आदेश करिये जिससे मैं परम श्रेय को प्राप्त कर सकूँ।अर्जुन को इसमें संदेह नहीं था कि जीवन केवल धन के उपार्जन परिग्रह और व्यय के लिए नहीं है। वह जानता था कि उसका जीवन श्रेष्ठ सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए था जिसके लिए भौतिक उन्नति केवल साधन थी साध्य नहीं। अर्जुन मात्र यह जानना चाहता था कि वह उपलब्ध परिस्थितियों का जीवन की लक्ष्य प्राप्ति और भविष्य निर्माण में किस प्रकार सदुपयोग करे।प्रश्न के अनुरूप भगवान् उत्तर देते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.2।।ननु त्वया सैव ज्यायसी ममेति मद्वाक्यान्निश्चिता चेत्किमर्थमधुना पृच्छसी त्याशङ्क्याह व्यामिश्रेणेवेति।बुद्य्धा युक्तो यया इत्यादिना कर्मप्रशसां या निशा सर्वभूतानाम् इत्यादिना ज्ञानप्रशंसाकर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यादिना मम कर्मण्येवाधिकारबोधनंत्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इति ज्ञाननिष्ठाधिकारबोधनमित्येवं व्यामिश्रेण किं श्रेष्ठं किमश्रेष्ठं क्व ममाधिकारः क्व नेति संदेहोत्पादकेन वाक्येन। यद्यपि विविक्ताभिधायी भगवांस्तथापि मम मन्दबुद्धेर्व्यामिश्रमिव भगवद्वाक्यं प्रतिभातीतीवशब्दार्थः। मम बुद्धेर्मोहापनयार्थं हि प्रवृत्तस्त्वं कथं मोहयस्यतो ब्रवीमि बुद्धिं मोहयसीव म इति। भिन्नकर्तृकयोर्ज्ञानकर्मणोरेकपुरुषानुष्ठानासंभवं यदि त्वं मन्यसे तर्हि तयोर्मध्ये एकं ज्ञानं वा कर्म वा इदमेव तव योग्यमिति निश्चित्य वद येन ज्ञानकर्मान्यतरेण श्रेयो मोक्षमहं प्राप्नुयामित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.2 3.3।।ननु नाहं कंचिदपि प्रतारयामि कि पुनस्त्वामतिप्रियम्। त्वं तु किं मे प्रतारणाचिन्हं पश्यसीति चेत्तत्राह तव वचनं व्यामिश्रं न भवत्येव ममत्वेकाधिकारिकत्वभिन्नाधिकारिकत्वसंदेहाद्व्यामिश्रं संकीर्णार्थमिव ते यद्वाक्यं मांप्रति ज्ञानकर्मनिष्ठाद्वयप्रतिपादकं तेन वाक्येन त्वं मे मम मन्दबुद्धेर्वाक्यतात्पर्यापरिज्ञानाद्बुद्धिमन्तःकरणं मोहयसीव भ्रान्त्या योजयसीव। परमकारुणिकत्वात्त्वं न मोहयस्येव। मम तु स्वाशयदोषान्मोहो भवतीतीवशब्दार्थः। एकाधिकारित्वे विरुद्धयोः समुच्चयानुपपत्तेरेकार्थत्वाभावेन च विकल्पानुपपत्तेः प्रागुक्तेर्यद्यधिकारिभेदं मन्यसे तदैकं मांप्रति विरुद्धयोर्निष्ठयोरुपदेशायोगात्तज्ज्ञानं वा कर्म वैकमेवाधिकारं मे निश्चित्य वद। येनाधिकारनिश्चयपुरःसरमुक्तेन त्वया मया चानुष्ठितेन ज्ञानेन कर्मणा वैकेन श्रेयो मोक्षमहमाप्नुयां प्राप्तुं योग्यः स्याम्। एवं ज्ञानकर्मनिष्ठयोरेकाधिकारित्वे विकल्पसमुच्चययोरसंभवादधिकारिभेदज्ञानायार्जुनस्य प्रश्न इति स्थितम्।इहेतरेषां कुमतं समस्तंश्रुतिस्मृतिन्यायबलान्निरस्तम्। पुनः पुनर्भाष्यकृतातियत्नादतो न तत्कर्तुमहं प्रवृत्तः।।भाष्यकारमतसारदर्शिना ग्रन्थमात्रमिह योज्यते मया। आशयो भगवतः प्रकाश्यते केवलं स्ववचसो विशुद्धये।। एवमधिकारिभेदेऽर्जुनेन पृष्टे तदनुरुपं प्रतिवचनं श्रीभगवानुवाच अस्मिन्नधिकारित्वाभिमते लोके शुद्धाशुद्धान्तःकरणभेदेन द्विविधे जने द्विविधा द्विप्रकारा निष्ठा स्थितिर्ज्ञानपरता कर्मपरता च पुरा पूर्वाध्याये मया तवात्यन्तहितकारिणा प्रोक्ता प्रकर्षेण स्पष्टत्वलक्षणेनोक्ता। तथा चाधिकार्यैक्यशङ्कया माग्लासीरिति भावः। हे अनघ अपापेति संबोधयन्नुपदेशयोग्यतामर्जुनस्य सूचयति। एकैव निष्ठा साध्यसाधनावस्थाभेदेन द्विप्रकारा नतु द्वे एव स्वतन्त्रे निष्ठे इति कथयितुं निष्ठेत्येकवचनम्। तथाच वक्ष्यतिएकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति इति। तामेव निष्ठां द्वैविध्येन दर्शयति सांख्येति। संख्या सम्यगात्मबुद्धिस्तां प्राप्तवतां ब्रह्मचर्यादेव कृतसंन्यासानां वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थानां ज्ञानभूमिमारूढानां शुद्धान्तःकरणानां सांख्यानां ज्ञानयोगेन ज्ञानमेव युज्यते ब्रह्मणानेनेति व्युत्पत्त्या योगस्तेन निष्ठोक्तातानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः इत्यादिना। अशुद्धान्तःकरणानां तु ज्ञानभूमिमनारूढानां योगिनां कर्माधिकारयोगिनां कर्मयोगेन कर्मैव युज्यतेऽन्तःकरणशुद्ध्यानेनेति व्युत्पत्त्या योगस्तेन निष्ठोक्तान्तःकरणशुद्धिद्वारा ज्ञानभूमिकारोहणार्थंधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादिना। अतएव न ज्ञानकर्मणोः समुच्चयो विकल्पो वा किंतु निष्कामकर्मणा शुद्धान्तःकरणानां सर्वकर्मसंन्यासेनैव ज्ञानमिति चित्तशुद्ध्यशुद्धिरूपावस्थाभेदेनैकमेव त्वांप्रति द्विविधा निष्ठोक्ताएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु इति। अतो भूमिकाभेदेनैकमेव प्रत्युभयोपयोगान्नाधिकारभेदेऽप्युपदेशवैयर्थ्यमित्यभिप्रायः। एतदेव दर्शयितुमशुद्धचित्तस्य चित्तशुद्धिपर्यन्तं कर्मानुष्ठानंन कर्मणामनारम्भात् इत्यादिभिःमोघं पार्थ स जीवति इत्यन्तैस्त्रयोदशभिर्दर्शयति। शुद्धचित्तस्य तु ज्ञानिनो न किंचिदपि कर्मापेक्षितमिति दर्शयतियस्त्वात्मरतिरेव इति द्वाभ्याम्।तस्मादसक्तः इत्यारभ्य तु बन्धहेतोरपि कर्मणो मोक्षहेतुत्वं सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तिद्वारेण संभवति फलाभिसंधिराहित्यरूपकौशलेनेति दर्शयिष्यति। ततः परंतुअथ केन इति प्रश्नमुत्थाप्य कामदोषेणैव काम्यकर्मणः शुद्धिहेतुत्वं नास्ति। अतः कामराहित्येनैव कर्माणि कुर्वन्नन्तःकरणशुद्ध्य ज्ञानाधिकारी भविष्यसीति यावदध्यायसमाप्ति वदिष्यति भगवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.2।।ननु तव ज्ञाननिष्ठायामनधिकारात्मकर्मैव कुर्विति त्वां ब्रवीमीत्याशङ्क्याह व्यामिश्रेणेति। व्यामिश्रेणाविविक्तेन। इवशब्दो विविक्तेऽपि बुद्धिदोषादविविक्ततां गृह्णामीति सूचयति तेन वाक्येनत्रैगुण्यविषया वेदा निस्त्रैगुण्यो भवार्जुन इति क्वचिद्वेदनिष्ठां त्याजयसि।कर्मण्येवाधिकारस्ते इति तामेव च ग्राहयसि। तथानिर्द्वन्द्वो नित्यसत्वस्थो निर्योगक्षेम आत्मवान्भवेति निवृत्तिमार्गमुपदिशसि।धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इति प्रवृत्तिमप्युपदिशसि। नह्येकेन मया युगपदुभयं स्थितिगतिवदनुष्ठातुं शक्यम्। अतो मे मम बुद्धिं मोहयसीव वस्तुतस्तु मम मोहं नाशयितुं प्रवृत्तोऽसीतीवशब्देनोच्यते। तत्तयोर्मध्ये यदेकं प्रधानं मद्योग्यं तन्निश्चित्य वद येनानुष्ठितेनाहं श्रेयः कल्याणमाप्नुयाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.2।।किञ्च स्पष्टतया बोधाभावान्मे बुद्धिर्मोहमवाप्नोतीति यथाऽहं त्वां प्राप्नोमि तत्तथा स्पष्टमाज्ञापयेत्याह व्यामिश्रेणेवेति। व्यामिश्रेणेव वाक्येन क्वचित्कर्म प्रशंससि क्वचिज्ज्ञानमितिरूपसन्देहोत्पादकेन वाक्येन मे बुद्धिं मोहयसीव। भगवद्वाक्यं तु व्यामिश्रं न भवति परन्तु जीवैर्न बुध्यत इतिइव इत्यनेन ज्ञापितम्।मोहयसि इत्यत्रापि इवेतिपदेन भगवत्सन्निधौ मोहोऽनुचित इति ज्ञापितम् तस्मात्कारणाद्यथा मम बुद्धिमोहोऽपगच्छति तथा एकं श्रेयोरूपं कल्याणरूपं भक्तिप्रतिपादकं वाक्यं निश्चित्य मयि दानेच्छां कृत्वा वद येनाऽहं त्वामाप्नुयां प्राप्नोमीत्यर्थः। पूर्वोक्तव्यामिश्रवाक्यमध्ये नैकस्यापि श्रेयोरूपत्वं मोहकत्वात्। सर्वथा भगवत्प्रापकश्रेयोरूपत्वं भक्तेरेव। अत एव श्रीभागवते तस्मान्मद्भक्तियुक्तस्य इत्यारभ्यश्रेयो भवेदिह 11।20।31 इत्यन्तं सर्वेषां न श्रेयोरूपत्वमुक्तम्। अतः पूर्वोक्तमध्येएकं निश्चित्य वद इति व्याख्यानं न साधु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.2।। ननुधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादिना कर्मणोऽपि श्रेष्ठत्वमुक्तमेवेत्याशङ्क्याह व्यामिश्रेणेति। क्वचित्कर्मप्रशंसा क्वचिज्ज्ञानप्रशंसेत्येव व्यामिश्रं संदेहोत्पादकमिव यद्धाक्यं तेन मे बुद्धिं मतिमुभयत्र दोलायितां कुर्वन्मोहयसीव। परमकारुणिकस्य तव मोहकत्वं नास्त्येव तथापि भ्रान्त्या ममैवं भातीतीवशब्देनोक्तं अत उभयोर्मध्ये यद्भद्रं तदेकं निश्चित्य वदेति। यद्वा इदमेव श्रेयःसाधनमिति निश्चित्य येनानुष्ठितेन श्रेयो मोक्षमहमाप्नुयां प्राप्स्यामि तदेवैकं निश्चित्य वदेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.2।।ननुधर्म्याद्धि युद्धात् 2।31 इति कर्मणः श्रेयस्त्वत्तो नोदितमिति चेत्तत्राह व्यामिश्रेणेति। तर्हि तव वाक्यं व्यामिश्रं नैकान्तिकं सन्देहोत्पादकमिव क्वचित् कर्मप्रशंसा क्वचित् कर्मत्यागप्रशंसा। एकमिति। एतेन मे बुद्धिं मोहयसीव तदेकं निश्चित्य वद।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.2।।तथा यद्यपि भगवान् स्पष्ट कहनेवाले हैं तो भी मुझ मन्दबुद्धिको भगवान्के वाक्य मिले हुएसे प्रतीत होते हैं उन मिले हुएसे वचनोंसे आप मानो मेरी बुद्धिको मोहित कर रहे हैं। वास्तवमें आप तो मेरी बुद्धिका मोह दूर करनेके लिये प्रवृत्त हुए हैं फिर मुझे मोहित कैसे करते इसीलिये कहता हूँ कि आप मेरी बुद्धिको मोहितसी करते हैं। आप यदि अलगअलग अधिकारियोंद्वारा किये जाने योग्य ज्ञान और कर्मका अनुष्ठान एक पुरुषद्वारा किया जाना असम्भव मानते हैं तो उन दोनोंमेंसे ज्ञान या कर्म यही एक बुद्धि शक्ति और अवस्थाके अनुसार अर्जुनके लिये योग्य है ऐसा निश्चय करके मुझसे कहिये जिस ज्ञान या कर्म किसी एकसे में कल्याणको प्राप्त कर सकूँ। यदि कर्मनिष्ठामें गौणरूपसे भी ज्ञानको भगवान्ने कहा होता तो दोनोंमेंसे एक कहिये इस प्रकार एकहीको सुननेकी अर्जुनकी इच्छा कैसे होती क्योंकि ज्ञान और कर्म इन दोनोंमेंसे मैं तुझसे एक ही कहूँगा दोनों नहीं ऐसा भगवान्ने कहीं नहीं कहा कि जिससे अर्जुन अपने लिये दोनोंकी प्राप्ति असम्भव मानकर एकके लिये ही प्रार्थना करता।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.2।। व्याख्या जनार्दन इस पदसे अर्जुन मानो यह भाव प्रकट करते हैं कि हे श्री कृष्ण आप सभीकी याचना पूरी करनेवाले हैं अतः मेरी याचना तो अवश्य ही पूरी करेंगे।ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते ৷৷. नियोजयसि केशव मनुष्यके अन्तःकरणमें एक कमजोरी रहती है कि वह प्रश्न करके उत्तरके रूपमें भी वक्तासे अपनी बात अथवा सिद्धान्तका ही समर्थन चाहता है। इसे कमजोरी इसलिये कहा गया है कि वक्ताके निर्देशका चाहे वह मनोऽनुकूल हो या सर्वथा प्रतिकूल पालन करनेका निश्चय ही शूरवीरता है शेष सब कमजोरी या कायरता ही कही जायगी। इस कमजोरीके कारण ही मनुष्यको प्रतिकूलता सहनेमें कठिनाईका अनुभव होता है। जब वह प्रतिकूलताको सह नहीं सकता तब वह अच्छाईका चोला पहन लेता है अर्थात् तब भलाईकी वेशमें बुराई आती है। जो बुराई भलाईके वशमें आती है उसका त्याग करना बड़ा कठिन होता है। यहाँ अर्जुनमें भी हिंसात्यागरूप भलाईके वशेमें कर्तव्यत्यागरूप बुराई आयी है। अतः वे कर्तव्यकर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मान रहे हैं। इसी कारण वे यहाँ प्रश्न करते हैं कि यदि आप कर्मसे ज्ञानको श्रेष्ठ मानते हैं तो फिर मुझे युद्धरूप घोर कर्ममें क्यों लगाते हैंभगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें बुद्धिर्योगे पदसे समबुद्धि(समता) की ही बात कही थी परन्तु अर्जुनने उसको ज्ञान समझ लिया। अतः वे भगवान्से कहते हैं कि हे जनार्दन आपने पहले कहा कि मैंने सांख्यमें यह बुद्धि कह दी इसीको तुम योगके विषयमें सुनो। इस बुद्धिसे युक्त हुआ तू कर्मबन्धनको छोड़ देगा। परन्तु कर्मबन्धन तभी छूटेगा जब ज्ञान होगा। आपने यह भी कह दिया कि बुद्धियोग अर्थात् ज्ञानसे कर्म अत्यन्त निकृष्ट हैं (2। 49)। अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है उत्तम है तो फिर मेरेको शास्त्रविहित यज्ञ दान तप आदि शुभ कर्मोंमें भी नहीं लगाना चाहिये केवल ज्ञानमें ही लगाना चाहिये। परन्तु इसके विपरीत आप मेरेको युद्धजैसे अत्यन्त क्रूर कर्ममें जिसमें दिनभर मनुष्योंकी हत्या करनी पड़े क्यों लगा रहे हैंपहले अर्जुनके मनमें युद्ध करनेका जोश आया हुआ था और उन्होंने उसी जोशमें भरकर भगवान्से कहा कि हे अच्युत दोनों सेनाओंके बीचमें मेरे रथको खड़ा कर दीजिये जिससे मैं यह देख लूँ कि यहाँ मेरे साथ दो हाथ करनेवाला कौन है। परन्तु भगवान्ने जब दोनों सेनाओंके बीचमें भीष्म और द्रोणके सामने तथा राजाओंके सामने रथ खड़ा करके कहा कि तू इन कुरुवंशियोंको देख तब अर्जुनका कौटुम्बिक मोह जाग्रत् हो गया। मोह जाग्रत् होनेसे उनकी वृत्ति युद्धसे कर्मसे उपरत होकर ज्ञानकी तरफ हो गयी क्योंकि ज्ञानमें युद्धजैसे घोर कर्म नहीं करने पड़ते। अतः अर्जुन कहते हैं कि आप मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैंयहाँ बुद्धिः पदका अर्थ ज्ञान लिया गया है। अगर यहाँ बुद्धिः पदका अर्थ समबुद्धि (समता) लिया जाय तो व्यामिश्र वचन सिद्ध नहीं होगा। कारण कि दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको योग(समता) में स्थित होकर कर्म करनेकी आज्ञा दी है। व्यामिश्र वचन तभी सिद्धि होगा जब अर्जुनकी मान्यतामें दो बातें हों और तभी यह प्रश्न बनेगा कि अगर आपकी मान्यतामें कर्मसे ज्ञान श्रेष्ठ है तो फिर मेरेको घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं दूसरी बात भगवान्ने आगे अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें दो निष्ठाएँ कही हैं ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे। इससे भी अर्जुनके प्रश्नोंमें बुद्धिः पदका अर्थ ज्ञान लेना युक्तिसंगत बैठता है।कोई भी साधक श्रद्धापूर्वक पूछनेपर ही अपने प्रश्नका सही उत्तर प्राप्त कर सकता है। आक्षेपपूर्वक शंका करनेसे सही उत्तर प्राप्त कर पाना सम्भव नहीं। अर्जुनकी भगवान्पर पूर्ण श्रद्धा है अतः भगवान्के कहनेपर अर्जुन अपने कल्याणके लिये युद्धजैसे घोर कर्ममें भी प्रवृत्त हो सकते हैंऐसा भाव उपर्युक्त प्रश्नसे प्रकट होता है।व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे इन पदोंमें अर्जुनका भाव है कि कभी तो आप कहते हैं कि कर्म करे कुरु कर्माणि (2। 48) और कभी आप कहते हैं कि ज्ञानका आश्रय लो बुद्धौ शरणमन्विच्छ (2। 49)। आपके इन मिले हुए वचनोंसे मेरी बुद्धि मोहितसी हो रही है अर्थात् मैं यह स्पष्ट नहीं समझ पा रहा हूँ कि मेरेको कर्म करने चाहिये या ज्ञानकी शरण लेनी चाहिये।यहाँ दो बार इव पदके प्रयोगसे भगवान्पर अर्जुनकी श्रद्धाका द्योतन हो रहा है। श्रद्धाके कारण अर्जुन भगवान्के वचनोंको ठीक मान रहे हैं और यह भी समझ रहे हैं कि भगवान् मेरी बुद्धिको मोहित नहीं कर रहे हैं। परन्तु भगवान्के वचनोंको ठीकठीक न समझनेके कारण अर्जुनको भगवान्के वचन मिले हुएसे लग रहे हैं और उनको ऐसा दीख रहा है कि भगवान् अपने वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहतिसी कर रहे हैं। अगर भगवान् अर्जुनकी बुद्धिको मोहति करते तो फिर अर्जुनके मोहको दूर करता ही कौनतदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् मेरा कल्याण कर्म करनेसे होगा या ज्ञानसे होगा इनमेंसे आप निश्चय करके मेरे लिये एक बात कहिये जिससे मेरा कल्याण हो जाय। मैंने पहले भी कहा था कि जिससे मेरा निश्चित कल्याण हो वह बात मेरे लिये कहिये यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे (2। 7) और अब भी मैं वही बात कर रहा हूँ। सम्बन्ध अब आगेके तीन (तीसरे चौथे और पाँचवें) श्लोकोंमें भगवान् अर्जुनके व्यामिश्रेणेव वाक्येन (मिले हुएसे वचनों) पदोंका उत्तर देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.1 3.2।।ज्यायसीति। व्यामिश्रेणेति। कर्म उक्तं ज्ञानं च। तत्र न द्वयोः प्राधान्यं युक्तम् अपि तु ज्ञानस्य। तद्बलेन क्षपणीयत्वं यदि कर्मणां बुद्धियुक्तो जहातीमे (II 52) इत्यादिनयेन मूलत एव तर्हि (K तत्) कर्मणां (S K कर्मणा) किं प्रयोजनमिति प्रश्नाभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.2।।यत्तु वृत्तिकारैरुक्तं श्रौतेन स्मार्तेन च कर्मणा समुच्चयो गृहस्थानां श्रेयःसाधनमितरेषां स्मार्तेनैवेति भगवतोक्तमर्जुनेन च निर्वारितमिति तदेतदनुवदति अथेति। तत्रापि तत्किमित्याद्युपालम्भवचनमनुपपन्नं कर्ममात्रसमुच्चयवादिनो भगवतो नियोजनाभावादिति दूषयति तत्किमिति। इतश्च प्रश्नः समुच्चयानुसारी न भवतीत्याह किञ्चेति। भगवतो विविक्तार्थवादित्वादयुक्तं व्यामिश्रेणेत्यादिवचनमित्याशङ्क्याह यद्यपीति। यदि भगवद्वचनं संकीर्णमिव ते भाति तर्हि तेन त्वदीयबुद्धिव्यामोहनमेव तस्य विवक्षितमिति किमिति मोहयसीवेत्युच्यते तत्राह ममेति। ज्ञानकर्मणी मिथो विरोधाद्युगपदेकपुरुषाननुष्ठेयतया भिन्नकर्तृके कथ्येत तथाच तयोरन्यतरस्मिन्नेव त्वं नियुक्तो नतु ते बुद्धिव्यामोहनमभिमतमिति भगवतो मतमनुवदति त्वं त्विति। तदेकमित्यादिश्लोकार्थेनोत्तरमाह तत्रेति। उक्तं भागवतमतं सप्तम्या परामृश्यते। एकमित्युक्तप्रकारोक्तिः। एकमित्युक्तमेव स्फुटयति बुद्धिमिति। निश्चयप्रकारं प्रकटयति इदमिति। योग्यत्वं स्पष्टयति बुद्धीति। अस्य क्षत्रियस्य सतोऽन्तःकरणस्य देहशक्तेः समरसमारम्भावस्थायाश्चेदमेव ज्ञानं कर्म वानुगुणमिति निर्धार्य ब्रूहीत्यर्थः। निश्चित्यान्यतरोक्तौ तेन श्रोतुः श्रेयोवाप्तिं फलमाह येनेति। तदेकमित्यादिवाक्यस्याक्षरोत्थमर्थमुक्त्वा समुच्चयस्य शास्त्रार्थत्वाभावे तात्पर्यमाह यदि हीति। गुणभूतमपीत्यादिना प्रधानभूतमपि वेति विवक्षितं। नतूभयप्राप्त्यसंभवमात्मनो मन्यमानस्यार्जुनस्यान्यतरविषया शुश्रूषा भविष्यति नेत्याह नहीति। यथोक्तभगवद्वचनाभावे द्वयप्राप्त्यसंभवबुद्ध्या नान्यतरप्रार्थना संभवतीत्याह येनेति। नहि तथाविधं भगवद्वचनं भवतेष्टं भगवतः समुच्चयवादित्वाङ्गीकारादतस्तदभावादुक्तबुद्ध्या न युक्तान्यतरप्रार्थनेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.2।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.2।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.2।।अतो व्यामिश्रवाक्येन मां मोहयसि इव इति मे प्रतिभाति तथा हि आत्मावलोकनसाधनभूतायाः सर्वेन्द्रियव्यापारोपरतिरूपाया ज्ञाननिष्ठायाः तद्विपर्ययरूपं कर्म साधनं तद् एव कुरु इति वाक्यं विरुद्धं व्यामिश्रम् एव तस्माद् एकम् अमिश्ररूपं वाक्यं वद येन वाक्येन अहम् अनुष्ठेयरूपं निश्चित्य आत्मनः श्रेयः प्राप्नुयाम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.2।। व्यामिश्रेणेव यद्यपि विविक्ताभिधायी भगवान् तथापि मम मन्दबुद्धेः व्यामिश्रमिव भगवद्वाक्यं प्रतिभाति। तेन मम बुद्धिं मोहयसि इव मम बुद्धिव्यामोहापनयाय हि प्रवृत्तः त्वं तु कथं मोहयसि अतः ब्रवीमि बुद्धिं मोहयसि इव मे मम इति। त्वं तु भिन्नकर्तृकयोः ज्ञानकर्मणोः एकपुरुषानुष्ठानासंभवं यदि मन्यसे तत्रैवं सति तत् तयोः एकं बुद्धिं कर्म वा इदमेव अर्जुनस्य योग्यं बुद्धिशक्त्यवस्थानुरूपमिति निश्चित्य वद ब्रूहि येन ज्ञानेन कर्मणा वा अन्यतरेण श्रेयः अहम् आप्नुयां प्राप्नुयाम् इति यदुक्तं तदपि नोपपद्यते।।यदि हि कर्मनिष्ठायां गुणभूतमपि ज्ञानं भगवता उक्तं स्यात् तत् कथं तयोः एकं वद इति एकविषयैव अर्जुनस्य शुश्रूषा स्यात्। न हि भगवता पूर्वमुक्तम् अन्यतरदेव ज्ञानकर्मणोः वक्ष्यामि नैव द्वयम् इति येन उभयप्राप्त्यसंभवम् आत्मनो मन्यमानः एकमेव प्रार्थयेत्।।प्रश्नानुरूपमेव प्रतिवचनं श्रीभगवानुवाच
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【 Verse 3.3 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मयानघ | ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम् ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | loke’smindvividhā niṣṭhā purā proktā mayānagha | jñānayogena sāṁkhyānāṁ karmayogena yoginām ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: the Lord says; loke: in the world; asmin: this; dvividhā: two kinds of; niṣṭhā: faith; purā: before; proktā: were said; mayā: by Me; anagha: O sinless one; jñānayogena: by the yoga of knowledge; sāṁkhyānāṁ: of the Sāṅkhya; karmayogena: by the yoga of action; yoginām: of the yoga practitioners
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.3 The Lord says, ‘O sinless Arjuna, as I said before, in this world there are two paths; Self knowledge for the intellectual and the path of action of the knowing.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.3।।श्रीभगवान् बोले हे निष्पाप अर्जुन इस मनुष्यलोकमें दो प्रकारसे होनेवाली निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है। उनमें ज्ञानियोंकी निष्ठा ज्ञानयोगसे और योगियोंकी निष्ठा कर्मयोगसे होती है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.3।। श्री भगवान् ने कहा हे निष्पाप (अनघ) अर्जुन इस श्लोक में दो प्रकार की निष्ठा मेरे द्वारा पहले कही गयी है ज्ञानियों की (सांख्यानां) ज्ञानयोग से और योगियों की कर्मयोग से।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.3 लोके in world? अस्मिन् in this? द्विविधा twofold? निष्ठा path? पुरा previously? प्रोक्ता said? मया by Me? अनघ O sinless one? ज्ञानयोगेन by the path of knowledge? सांख्यानाम् of the Sankhyas? कर्मयोगेन by the path of action? योगिनाम् of the Yogins.Commentary The path of knowledge of the Sankhyas (Jnana Yoga) was described by Lord Krishna in chapter II? verses 11 to 38 the path of action (Karma Yoga) from 40 to 53.Pura Prokta may also mean In the beginning of creation the twofold path was given by Me to this world.Those who are endowed with the four means and who have sharp? subtle intellect and bold understanding are fit for Jnana Yoga. Those who have a tendency or inclination for wok are fit for Karma Yoga. (The four means are discrimination? dispassion? sixfold virutes? and longing for liberation. The sixfold virtues are control of the mind? control of the senses? fortitude (endurance)? turning away from the objects of the world? faith and tranillity.)It is not possible for a man to practise the two Yogas simultaneously. Karma Yoga is a means to an end. It purifies the heart and prepares the aspirant for the reception of knowledge. The Karma Yogi should take up Jnana Yoga as soon as his heart is purified. Jnana Yoga takes the aspirant directly to the goal without any extraneous help. (Cf.V.5).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.3. The Bhagavat said The two-fold path in this world-[the one] with Yoga of knowledge for men of reflection [and the other] with Yoga of action for men of Yoga-has been declared to be one by Me formerly, O sinless one !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.3 Lord Shri Krishna replied: In this world, as I have said, there is a twofold path, O Sinless One! There is the Path of Wisdom for those who meditate, and the Path of Action for those who work.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.3 The Lord said In this world a two-fold way was of yore laid down by Me, O sinless one: by Jnana Yoga for the Sankhyas and by Karma Yoga for the Yogins.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.3 The Blessed Lord said O unblemished one, two kinds of steadfastness in this world were spoken of by Me in the days of yore-through the Yoga of Knowledge for the men of realization; through the Yoga of Action for the yogis.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.3 The Blessed Lord said In this world there is a twofold path, as I said before, O sinless one; the path of knowledge of the Sankhyas and the path of action of the Yogins.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.3 Loke etc. In the world, this twofold path is well known. Knowledge is important for men of reflection and action for men of Yoga. But that path has been declared by Me to be only one. For, the Consciousness consists predominantly of knowledg and action. This is the idea here. For this [the Lord continues] -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.3 The Lord said You have not properly understood what I taught you before. In this world, full of people with varying degrees of alifications, I have taught in the days of yore two ways, that of knowledge (Jnana Yoga) and that of works, according to the alifications of aspirants. There is no contradiction in this. It is not possible for all people of the world in whom the desire for release has arisen, to become capable immediately for the practice of Jnana Yoga. But he who performs the worship of the Supreme Person without desire for fruits and thery gets completely rid of inner impurities and keeps his senses unagitated - he becomes competent for the path of knowledge.
That all activities are for performing the worship of the Supreme Person will be taught in the Gita verse, 'He from `whom the activities of all beings arise and by whom all this is pervaded - by worshipping Him with his duty man reaches perfection' (18.46). Earlier also performance of activities without any attachment to the fruits is enjoined by the verse beginning with. 'You have the right to work alone ৷৷.' (2.47). Next for those whose intellect has been redeemed by this kind of discipline, is enjoined Jnana Yoga by the words, 'When a man renounces all the desires ৷৷.' (2.55).
Conseently, firm devotion to Jnana Yoga is taught only to the Sankhyas, i.e., those persons who are competent to follow the discipline of the knowledge of the self, and Karma Yoga to Yogins, i.e., to those competent for the path of work. Sankhya means Buddhi and those who are endowed with the Buddhi (intellectual or mental disposition) having only the self for its object, are Sankhyans. Therefore those who are not fit for this are alified for Karma Yoga. Those who are possessed of Buddhi which is agitated by objects of the senses, are the persons alified for Karma Yoga, whereas those whose Buddhi is not thus agitated, are alified for Jnana Yoga. Therefore nothing contradictory and confusing is taught.
It is said in the next stanza that Jnana Yoga is difficult to practise all at once, even when the desire for release arises in any worldy person:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.3 Anagha, O unblemished one, O sinless one; [This word of address suggests that Arjuna is alified to receive the Lord's instruction.] dvividha, two kinds of ; nistha, steadfastness, persistence in what is undertaken; asmin loke, in this world, for the people of the three castes who are alified for following the scriptures; prokta, were spoken of; maya, by Me, the omniscient God, who had revealed for them the traditional teachings of the Vedas, which are the means of securing prosperity and the highest Goal; pura, in the days of yore, in the beginning the creation, after having brought into being the creatures. Now then, which is that steadfastness of two kinds? In answer the Lord says: The steadfastness jnanayogena, through the Yoga of Knowledge-Knowledge itself being the Yoga [Here jnana, Knowledge, refers to the knowledge of the supreme Reality, and Yoga is used in the derivative sense of 'that (Knowledge) through which one gets united with Brahman'.]-; had been stated sankhyanam, for the men of realization-those possessed of the Knowledge arising from the discrimination with regard to the Self and the not-Self, those who have espoused monasticism from the stage of Celibacy; itself, those to whom the entity presented by the Vedantic knowledge has become fully ascertained (see Mu. 3.2.6)-,the monks who are known as the parama-hamsas, those who are established in Brahman alone. And the steadfastness karma-yogena, through the Yoga of Action-action itself being the Yoga [Yoga here means 'that through which one gets united with, comes to have, prosperity', i.e. such actions as go by the name of righteousness and are prescribed by the scriptures.] had been stated yoginam, for the yogis, the men of action (rites and duties). This is the idea. Again, had it been intended or stated or if it will be stated in the Gita by the Lord-and if it has also been so stated in the Vedas-that Knowledge and action are to be practised in combination by one and the same person for attaining the same human Goal, why then should He here tell His dear supplicant Arjuna, that steadfastness in either Knowledge or action is to be practised only by different persons who are respectively alified? If, on the other hand, it be supposed that the Lord's idea is, 'After hearing about both Knowledge and action, Arjuna will himself practise them (in combination); but, to others, I shall speak of them as being meant to be pursued by different persons', then the Lord would be imagined to be unreliable, being possessed of likes and dislikes! And that is untenable. So, from no point of view whatsoever can there be a combination of Knowledge and action. And what has been said by Arjuna regarding superiority of Wisdom over action, that stands confirmed for not having been refuted; and (it also stands confirmed) that steadfastness in Knowledge is suitable for being practised by monks alone. And from the statement that they (Knowledge and action) are to be followed by different persons, it is understood that this has the Lord's approval. Noticing that Arjuna had become dejected under the impression, 'You are urging me to that very action which is a source of bondage', and was thinking thus, 'I shall not undertake action', the Lord said, 'Na karmanam anarambhat, not by abstaining from action,' etc. Or:-When steadfastness in Knowledge and steadfastness in action become incapable of being pursued simultaneously by one and the same person owing to mutual contradiction, then, since it may be concluded that they become the cause of attaining the human Goal independently of each other, therefore, in order to show-that the steadfastness in action is a means to the human Goal, not independently, but by virtue of being instrumental in securing steadfastness in Knowledge; and that, on the other hand, steadfastness in Knowledge, having come into being through the means of steadfastness in action, leads to the human Goal independently without anticipating anything else-,the Lord said:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.3।। कर्मयोग और ज्ञानयोग को परस्पर प्रतिद्वन्द्वी मानने का अर्थ है उनमें से किसी एक को भी नहीं समझना। परस्पर पूरक होने के कारण उनका क्रम से अर्थात् एक के पश्चात् दूसरे का आश्रय लेना पड़ता है। प्रथम निष्काम भाव से कर्म करने पर मन में स्थित अनेक वासनाएँ क्षीण हो जाती हैं। इस प्रकार मन के निर्मल होने पर उसमें एकाग्रता और स्थिरता आती है जिससे वह ध्यान में निमग्न होकर परमार्थ तत्त्व का साक्षात् अनुभव करता है।विदेशी संस्कृति के लोग हिन्दू धर्म को समझने में बड़ी कठिनाई का अनुभव करते हैं। साधनों की विविधता और परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाले उपदेशों को पढ़कर उनकी बुद्धि भ्रमित हो जाती है। परन्तु केवल इसी कारण से हिन्दू धर्म को अवैज्ञानिक कहने में उतनी ही बड़ी और हास्यास्पद त्रुटि होगी जितनी चिकित्साशास्त्र को विज्ञान न मानने में केवल इसीलिए कि एक ही चिकित्सक एक ही दिन में विभिन्न रोगियों को विभिन्न औषधियों द्वारा उपचार बताता है।अध्यात्म साधना करने के योग्य साधकों में दो प्रकार के लोग होते हैं क्रियाशील और मननशील। इन दोनों प्रकार के लोगों के स्वभाव में इतना अन्तर होता है कि दोनों के लिये एक ही साधना बताने का अर्थ होगा किसी एक विभाग के लोगों को निरुत्साहित करना और उनकी उपेक्षा करना। गीता केवल हिन्दुओं के लिये ही नहीं वरन् समस्त मानव जाति के कल्याणार्थ लिखा हुआ शास्त्र है। अत सभी के उपयोगार्थ उनकी मानसिक एवं बौद्धिक क्षमताओं के अनुरूप दोनों ही वर्गों के लिये साधनायें बताना आवश्यक है।अत भगवान् यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि क्रियाशील स्वभाव के मनुष्य के लिये कर्मयोग तथा मननशील साधकों के लिये ज्ञानयोग का उपदेश किया गया है। पुरा शब्द से वह यह इंगित करते है कि ये दो मार्ग सृष्टि के आदिकाल से ही जगत् में विद्यमान हैं।इस श्लोक में प्रथम बार भगवान् श्रीकृष्ण अपने वास्तविक परिचय की एक झलकमात्र दिखाते हैं। यदि गीतोपदेश देवकीपुत्र कृष्ण नामक किसी र्मत्य पुरुष का ही दिया होता तो अधिक से अधिक उसमें उस व्यक्ति की बुद्धि द्वारा समझे हुए सिद्धांत ही होते जिनका आधार जीवन के उसके स्वानुभव मात्र होते। जीवन में अनुभव किये तथ्यों में परिवर्तित होते रहने का विशेष गुण होता है और इसीलिये जब वे बदलते हैं तो हमारा पूर्व का निष्कर्ष भी परिवर्तित हो जाता है। परिवर्तित सामाजिक राजनैतिक आर्थिक परिस्थितियों एवं विज्ञान के क्षेत्र में हुई प्रगति के साथ समाजशास्त्र अर्थशास्त्र एवं विज्ञान के अगणित पूर्वप्रतिपादित सिद्धांत कालबाह्य हो चुके हैं। यदि गीता में कृष्ण नामक किसी मनुष्य की बुद्धि से पहुँचे हुए निष्कर्ष मात्र होते तो वह कालबाह्य होकर अब उसके अवशेष मात्र रह गए होते यहाँ श्रीकृष्ण स्पष्ट रूप से कहते हैं सृष्टि के आदि में (पुरा) ये दो मार्ग मेरे द्वारा कहे गये थे। इसका तात्पर्य यह है कि यहाँ भगवान् वृन्दावन के नीलवर्ण गोपाल गोपियों के प्रिय सखा अथवा अपने युग के महान् राजनीतिज्ञ के रूप में नहीं बोल रहे थे। किन्तु भारतीय इतिहास के एक स्वस्वरूप के ज्ञाता तत्त्वदर्शी उपदेशक सिद्ध पुरुष एवं ईश्वर के रूप में उपदेश दे रहे थे। उस क्षण न तो वे अर्जुन के सारथि के रूप में न एक सखा के रूप में और न ही पाण्डवों के शुभेच्छु के रूप में बात कर रहे थे। उन्हें अपने पारमार्थिक स्वरूप जगत् के अधिष्ठान कारण के रूप में पूर्ण भान था। काल और कारण के अतीत सत्यस्वरूप में स्थित हुए वे इन दो मार्गों के आदि उपदेशक के रूप में अपना परिचय देते हैं।कर्मयोग लक्ष्य प्राप्ति का क्रमिक साधन है साक्षात् नहीं। अर्थात् वह ज्ञान प्राप्ति की योग्यता प्रदान करता है जिससे ज्ञानयोग के द्वारा सीधे ही लक्ष्य की प्राप्ति होती है। इसे समझाने के लिए भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.3।। अर्जुनप्रश्नानुरुपमुत्तरं श्रीभगवानुवाच लोक इति। लोकेऽस्मिञ्शास्त्रोक्तानुष्ठानाधिकृते त्रैवर्णिके जने शुद्धाशुद्धान्तःकरणनया द्विविधे द्विविधा उपायोपेयभेदेन द्विप्रकारा निष्ठाऽनुष्ठेयतात्पर्यं पुरा सर्गादौ मया सर्वज्ञेनेश्वरेण प्रजाः सृष्ट्वा तासामभ्युदयनिःश्रेयससाधनवेदार्थ संप्रदायमाविष्कुर्वता प्रोक्ता। यत्तु पुरा पूर्वाध्याय इति भाष्यविरुद्धं वर्णयन्ति तन्न। प्रोक्तेत्येतावतैव निर्वाहे लोकेऽस्मिन्नित्यस्य पुरेत्यस्य च वैयर्थ्यप्रसङ्गात्।इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् इति वक्ष्यमाणेन भाष्योक्तार्थस्य स्पष्टप्रतिपादकेन मूलेन विरोधाच्च। हे अनघेति संबोधयन् भवच्चितशुद्य्धर्थमेव त्वां स्वधर्मे नियोजयामि न स्वार्थमिति ध्वनयति। निष्ठायाः प्रकारविभागमाह ज्ञानेति। युज्यते ब्रह्मणानेनेति योगः ज्ञानमेव योगः ज्ञानयोगः तेन सांख्यानां चित्तशुद्य्धात्मानात्मविषयविवेकज्ञानवतां निष्ठा स्थितिः प्रोक्ता। चित्तशुद्धिद्वारा युज्यतेऽनेन ज्ञानेनेति योगः कर्मैव योगः कर्मयोगः तेन योगिनामशुद्धान्तःकरणानां कर्मिणां मया निष्ठा प्रोक्तेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.2 3.3।।ननु नाहं कंचिदपि प्रतारयामि कि पुनस्त्वामतिप्रियम्। त्वं तु किं मे प्रतारणाचिन्हं पश्यसीति चेत्तत्राह तव वचनं व्यामिश्रं न भवत्येव ममत्वेकाधिकारिकत्वभिन्नाधिकारिकत्वसंदेहाद्व्यामिश्रं संकीर्णार्थमिव ते यद्वाक्यं मांप्रतिज्ञानकर्मनिष्ठाद्वयप्रतिपादकं तेन वाक्येन त्वं मे मम मन्दबुद्धेर्वाक्यतात्पर्यापरिज्ञानाद्बुद्धिमन्तःकरणं मोहयसीव भ्रान्त्या योजयसीव। परमकारुणिकत्वात्त्वं न मोहयस्येव। मम तु स्वाशयदोषान्मोहो भवतीतीवशब्दार्थः। एकाधिकारित्वे विरुद्धयोः समुच्चयानुपपत्तेरेकार्थत्वाभावेन च विकल्पानुपपत्तेः प्रागुक्तेर्यद्यधिकारिभेदं मन्यसे तदैकं मांप्रति विरुद्धयोर्निष्ठयोरुपदेशायोगात्तज्ज्ञानं वा कर्म वैकमेवाधिकारं मे निश्चित्य वद। येनाधिकारनिश्चयपुरःसरमुक्तेन त्वया मया चानुष्ठितेन ज्ञानेन कर्मणा वैकेन श्रेयो मोक्षमहमाप्नुयां प्राप्तुं योग्यः स्याम्। एवं ज्ञानकर्मनिष्ठयोरेकाधिकारित्वे विकल्पसमुच्चययोरसंभवादधिकारिभेदज्ञानायार्जुनस्य प्रश्न इति स्थितम्।इहेतरेषां कुमतं समस्तं श्रुतिस्मृतिन्यायबलान्निरस्तम्। पुनः पुनर्भाष्यकृतातियत्नादतो न तत्कर्तुमहं प्रवृत्तः।।भाष्यकारमतसारदर्शिना ग्रन्थमात्रमिह योज्यते मया। आशयो भगवतः प्रकाश्यते केवलं स्ववचसो विशुद्धये।। एवमधिकारिभेदेऽर्जुनेन पृष्टे तदनुरुपं प्रतिवचनं श्रीभगवानुवाच अस्मिन्नधिकारित्वाभिमते लोके शुद्धाशुद्धान्तःकरणभेदेन द्विविधे जने द्विविधा द्विप्रकारा निष्ठा स्थितिर्ज्ञानपरता कर्मपरता च पुरा पूर्वाध्याये मया तवात्यन्तहितकारिणा प्रोक्ता प्रकर्षेण स्पष्टत्वलक्षणेनोक्ता। तथा चाधिकार्यैक्यशङ्कया माग्लासीरिति भावः। हे अनघ अपापेति संबोधयन्नुपदेशयोग्यतामर्जुनस्य सूचयति। एकैव निष्ठा साध्यसाधनावस्थाभेदेन द्विप्रकारा नतु द्वे एव स्वतन्त्रे निष्ठे इति कथयितुं निष्ठेत्येकवचनम्। तथाच वक्ष्यतिएकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति इति। तामेव निष्ठां द्वैविध्येन दर्शयति सांख्येति। संख्या सम्यगात्मबुद्धिस्तां प्राप्तवतां ब्रह्मचर्यादेव कृतसंन्यासानां वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थानां ज्ञानभूमिमारूढानां शुद्धान्तःकरणानां सांख्यानां ज्ञानयोगेन ज्ञानमेव युज्यते ब्रह्मणानेनेति व्युत्पत्त्या योगस्तेन निष्ठोक्तातानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः इत्यादिना। अशुद्धान्तःकरणानां तु ज्ञानभूमिमनारूढानां योगिनां कर्माधिकारयोगिनां कर्मयोगेन कर्मैव युज्यतेऽन्तःकरणशुद्ध्यानेनेति व्युत्पत्त्या योगस्तेन निष्ठोक्तान्तःकरणशुद्धिद्वारा ज्ञानभूमिकारोहणार्थंधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादिना। अतएव न ज्ञानकर्मणोः समुच्चयो विकल्पो वा किंतु निष्कामकर्मणा शुद्धान्तःकरणानां सर्वकर्मसंन्यासेनैव ज्ञानमिति चित्तशुद्ध्यशुद्धिरूपावस्थाभेदेनैकमेव त्वांप्रति द्विविधा निष्ठोक्ताएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु इति। अतो भूमिकाभेदेनैकमेव प्रत्युभयोपयोगान्नाधिकारभेदेऽप्युपदेशवैयर्थ्यमित्यभिप्रायः। एतदेव दर्शयितुमशुद्धचित्तस्य चित्तशुद्धिपर्यन्तं कर्मानुष्ठानंन कर्मणामनारम्भात् इत्यादिभिःमोघं पार्थ स जीवति इत्यन्तैस्त्रयोदशभिर्दर्शयति। शुद्धचित्तस्य तु ज्ञानिनो न किंचिदपि कर्मापेक्षितमिति दर्शयतियस्त्वात्मरतिरेव इति द्वाभ्याम्।तस्मादसक्तः इत्यारभ्य तु बन्धहेतोरपि कर्मणो मोक्षहेतुत्वं सत्त्वशुद्धिज्ञानोत्पत्तिद्वारेण संभवति फलाभिसंधिराहित्यरूपकौशलेनेति दर्शयिष्यति। ततः परंतुअथ केन इति प्रश्नमुत्थाप्य कामदोषेणैव काम्यकर्मणः शुद्धिहेतुत्वं नास्ति। अतः कामराहित्येनैव कर्माणि कुर्वन्नन्तःकरणशुद्ध्य ज्ञानाधिकारी भविष्यसीति यावदध्यायसमाप्ति वदिष्यति भगवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.3।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्निति। पुरा पूर्वाध्याये मया निष्ठा एकैव प्रोक्ता परंतु सा द्विविधा द्विप्रकारा। एकस्या एव ब्रह्मनिष्ठायाः प्रकारद्वयमुक्तमधिकारिभेदेन न तु ब्रह्मप्राप्तये परस्परनिरपेक्षमार्गद्वयमुक्तमिति भावः। हेऽनघ विशुद्धान्तःकरण मद्वचनस्यार्थं सम्यगालोचयेत्यर्थः। तदेव प्रकारद्वयमाह ज्ञानयोगेनेति। सांख्यानां प्रकृतिपुरुषयोर्विविक्तत्वं जानतामात्मानात्मविवेकज्ञानवतां ज्ञानार्थं युज्यते इति ज्ञानयोगः ज्ञानोपायो वेदान्तश्रवणमनननिदिध्यासनात्मकस्तेन ज्ञानयोगेन ब्रह्मणि निष्ठां परिसमाप्तिं सांख्याः प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। योगिनांसिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते इत्युक्तलक्षणयोगवतां कर्मयोगेन संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानमिह कर्मयोगपदार्थः तेन योगिनो ब्रह्मनिष्ठां प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। अयं भावः इह जन्मनि जन्मान्तरे वा ईश्वरप्रीत्यर्थमनुष्ठितैः कर्मभिर्विशुद्धसत्वो विवेकवैराग्यशमादिषट्कोपेतो मुमुक्षुः प्रत्यक्प्रवणचित्तः श्रवणमननाभ्यामेव कृतकृत्यो भवति स चेच्छ्रवणादेः प्रागसमाहितचित्तस्तर्हि निदिध्यासनमस्यापेक्षितम् अतएवसहकार्यन्तरविधिः पक्षेण इति सूत्रकृता निदिध्यासनस्य पाक्षिकत्वमुक्तं सोऽयं सांख्यमार्गः। तथा सर्वाणि कर्माणि परमगुरावर्पयञ्श्रवणमननात्मकं विचारमन्तरेणैव केवलं श्रद्धामात्रात्प्रतीचो निर्विशेषब्रह्मरूपत्वं गुरुवाक्यतो निश्चित्यासंभावनादिदोषरहित आचार्यान्निर्गुणब्रह्मोपास्तिप्रकारमधिगम्य कर्मच्छिद्रेषु समाध्यभ्यासं कुर्वन्निष्कलं प्रत्यगात्मस्वरूपं साक्षात्करोति सोऽयं योगमार्गः तेन ऊहापोहकौशलं येषामस्ति ते सांख्याः येषां तन्नास्ति ते योगिन इति। अत इयं द्विप्रकारा निष्ठा न तु द्वे निष्ठे इति भ्रमितव्यम्। यथोक्तं वसिष्ठेनद्वौ क्रमौ चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव। योगो वृत्तिनिरोधो हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम्। असाध्यः कस्यचिद्योगः कस्यचित्तत्त्वनिश्चयः। प्रकारौ द्वौ ततो देवो जगाद परमः शिवः। इति। चित्तादर्शनोपलक्षितस्य ब्रह्मसाक्षात्कारस्य द्वौ क्रमौ। चित्तादेर्मिथ्यात्वपक्षे ज्ञानमेव यथा रज्जूरगादिसम्यगवेक्षणेनैव नश्यति तद्वत् तस्य सत्यत्वपक्षे योग एव। यथा सत्य उरगो मन्त्रादिना निरुद्धप्रचारः स्वयमेव नश्यति तद्वच्चित्तमपि योगेन निरुद्ध्यमानं नश्यति। तस्य निरन्वयोच्छेदस्तु प्रारब्धकर्मान्ते पक्षद्वयेऽपि तुल्य इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.3।।एवमर्जुनस्य मोहापगमार्थं प्रश्नोत्तरमाह कृष्णः लोकेऽस्मिन्निति। हे अनघ निष्पाप मद्वाक्यश्रवणयोग्य मया अस्िमँस्मल्लोके प्रवृत्तिनिष्ठे
Chapter 3 (Part 3)
द्विविधा निष्ठा पुरा पूर्वं तवाग्रे भक्त्यधिकारसिद्ध्यर्थं प्रोक्ता न तु त्वदर्थमिति भावः। द्विविधत्वमेव स्पष्टयति ज्ञानयोगेनेति। साङ्ख्यानां ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां सर्वत्र भगवदात्मज्ञानवतां ज्ञानयोगेन ब्रह्मनिष्ठोक्ता। योगिनां योगेन भगवदुपासकानां कर्मयोगेन ब्रह्मनिष्ठोक्ता। तयोः स्वरूपज्ञानार्थं निष्ठाद्वयमुक्तं न तु त्वदर्थमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.3।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्निति। अयमर्थः। यदि मया परस्परनिरपेक्षं मोक्षासाधनत्वेन कर्मज्ञानयोगरुपं निष्ठाद्वयमुक्तं स्यात्तर्हि द्वयोर्मध्ये यद्भद्रं तदेकं वदेति त्वदीयप्रश्नः संगच्छेत न तु मया तथोक्तं किंतु द्वाभ्यामेकैव ब्रह्मनिष्ठोक्ता। गुणप्रधानभूतयोस्तयोः स्वातन्त्रयानुपपत्तेः। एकस्या एव तु प्रकारभेदमात्रमधिकारभेदेनोक्तमिति। अस्मिन् शुद्धाशुद्धान्तःकरणतया द्विविधे लोकेऽधिकारिजाने द्वे विधे प्रकारौ यस्याः सा द्विविधा निष्ठा मोक्षपरता पुरा पूर्वोध्याये मया सर्वज्ञेन प्रोक्ता स्पष्टमेवोक्ता। प्रकारद्वयमेव निर्दिशति। सांख्यानां शुद्धान्तःकरणानां ज्ञानभूमिकामारुढानां ज्ञानपरिपाकार्थं ज्ञानयोगेन ध्यानादिना निष्ठा ब्रह्मपरतोक्तातानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः इत्यादिना। सांख्यभूमिकामारुरुक्षूणां त्वन्तःकरणशुद्धिद्वारा तदारोहार्थं तदुपायभूतकर्मयोगाधिकारिणां योगिनां कर्मंयोगेन निष्ठोक्ताधर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते इत्यादिना। अतएव चित्तशुद्ध्यशुद्धिरुपावस्थामेदेनैव द्विविधापि निष्ठोक्ताएषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.3।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच लोकेऽस्मिन्निति। पूर्वोक्तं त्वया सम्यक् नावधृतं यतः अस्मिन् लोके द्विविधा निष्ठा मया पुरा प्रोक्ता ये तु साङ्ख्यास्तेषां ज्ञानयोगेन सर्वत्यागरूपा स्थितिरुक्ता ये चोक्तयोगाधिकारिणस्तेषामुक्तविधकर्मयोगेनेति। स्वस्वाधिकारानुसारेणैव सर्वं योग्यमिति न बुद्धिव्यामोहः कार्यः। अधिकारभेदस्तु सर्वाभिमतोऽत एव क्वचिज्ज्ञानं क्वचिद्भक्तिरिति स्वतः पुरुषार्थहेतवः। एवं मोक्षोपायाःयोगो ज्ञानं च भक्तिश्च इत्युक्ताः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.3।।प्रश्नके अनुसार ही उत्तर देते हुए श्रीभगवान् बोले हे निष्पाप अर्जुन इस मनुष्यलोकमें शास्त्रोक्त कर्म और ज्ञानके जो अधिकारी हैं ऐसे तीनों वर्णवालोंके लिये ( अर्थात् ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्योंके लिये ) दो प्रकारकी निष्ठास्थिति अर्थात् कर्तव्य तत्परता पहलेसृष्टिके आदिकालमें प्रजाको रचकर उनकी लौकिक उन्नति और मोक्षकी प्राप्तिके साधनरूप वैदिक सम्प्रदायको आविष्कार करनेवाले मुझ सर्वज्ञ ईश्वरद्वारा कही गयी हैं। वह दो प्रकारकी निष्ठा कौनसी हैं सो कहते हैं जो आत्मअनात्मके विषयमें विवेकजन्य ज्ञानसे सम्पन्न हैं जिन्होंने ब्रह्मचर्यआश्रमसे ही संन्यास ग्रहण कर लिया है जिन्होंने वेदान्तके विज्ञानद्वारा आत्मतत्त्वका भलीभाँति निश्चय कर लिया है जो परमहंस संन्यासी हैं जो निरन्तर ब्रह्ममें स्थित हैं ऐसे सांख्ययोगियोंकी निष्ठा ज्ञानरूप योगसे कही है। तथा कर्मयोगसे कर्मयोगियोंकी अर्थात् कर्म करनेवालोंकी निष्ठा कही है। यदि एक पुरुषद्वारा एक ही प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ज्ञान और कर्म दोनों एक साथ अनुष्ठान करने योग्य हैं ऐसा अपना अभिप्राय भगवान्द्वारा गीतामें पहले कहीं कहा गया होता या आगे कहा जानेवाला होता अथवा वेदमें कहा गया होता तो शरणमें आये हुए प्रिय अर्जुनको यहाँ भगवान् यह कैसे कहते कि ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा अलगअलग भिन्नभिन्न अधिकारियोंद्वारा ही अनुष्ठान की जानेयोग्य हैं। यदि भगावन्का यह अभिप्राय मान लिया जाय कि ज्ञान और कर्म दोनोंको सुनकर अर्जुन स्वयं ही दोनोंका अनुष्ठान कर लेगा दोनोंको भिन्न भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य तो दूसरोंके लिये कहूँगा। तब तो भगवान्को रागद्वेषयुक्त और अप्रामाणिक मानना हुआ। ऐसा मानना सर्वथा अनुचित है। इसलिये किसी भी युक्तिसे ज्ञान और कर्मका समुच्चय नहीं माना जा सकता। कर्मोंकी अपेक्षा ज्ञानकी श्रेष्ठता जो अर्जुनने कही थी वह तो सिद्ध है ही क्योंकि भगवान्ने उसका निराकरण नहीं किया। उस ज्ञाननिष्ठाके अनुष्ठानका अधिकार संन्यासियोंका ही है क्योंकि दोनों निष्ठा भिन्नभिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य बतलायी गयी हैं। इस कारण भगवान्की यही सम्मति है। यह प्रतीत होता है। बन्धनके हेतुरूप कर्मोंमें ही भगवान् मुझे लगाते हैं ऐसा समझकर व्यथितचित्त हुए और मैं कर्म नहींकरूँगा ऐसा माननेवाले अर्जुनको देखकर भगवान् बोले न कर्मणामनारम्भात् इति। अथवा ज्ञाननिष्ठाका और कर्मनिष्ठाका परस्पर विरोध होनेके कारण एक पुरुषद्वारा एक कालमें दोनोंका अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। इससे एक दूसरेकी अपेक्षा न रखकर दोनों अलगअलग मोक्षमें हेतु हैं ऐसा शंका होनेपर
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.3।। व्याख्या अर्जुन युद्ध नहीं करना चाहते थे अतः उन्होंने समतावाचक बुद्धि शब्दका अर्थ ज्ञान समझ लिया। परन्तु भगवान्ने पहले बुद्धि और बुद्धियोग शब्दसे समताका वर्णन किया था (2। 39 49 आदि) अतः यहाँ भी भगवान् ज्ञानयोग और कर्मयोगदोनोंके द्वारा प्रापणीय समताका वर्णन कर रहे हैं।अनघ अर्जुनके द्वारा अपने श्रेय(कल्याण) की बात पूछी जानी ही उनकी निष्पापता है क्योंकि अपने कल्याणकी तीव्र इच्छा होनेपर साधकके पाप नष्ट हो जाते हैं।लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया यहाँ लोके पदका अर्थ मनुष्यशरीर समझना चाहिये क्योंकि ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनों प्रकारके साधनोंको करनेका अधिकार अथवा साधक बननेका अधिकार मनुष्यशरीरमें ही है।निष्ठा अर्थात् समभावमें स्थिति एक ही है जिसे दो प्रकारसे प्राप्त किया जा सकता है ज्ञानयोगसे और कर्मयोगसे। इन दोनों योगोंका अलगअलग विभाग करनेके लिये भगवान्ने दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकमें कहा है कि इस समबुद्धिको मैंने सांख्ययोगके विषयमें (ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक) कह दिया है अब इसे कर्मयोगके विषयमें (उन्तालीसवें तिरपनवें श्लोकतक) सुनो एषा तेऽभिहिता सांख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां श्रृणु।पुरा पदका अर्थ अनादिकाल भी होता है और अभीसे कुछ पहले भी होता है। यहाँ इस पदका अर्थ है अभीसे कुछ पहले अर्थात् पिछला अध्याय जिसपर अर्जुनकी शंका है। यद्यपि दोनों निष्ठाएँ पिछले अध्यायमें अलगअलग कही जा चुकी हैं तथापि किसी भी निष्ठामें कर्मत्यागकी बात नहीं कही गयी है।मार्मिक बातयहाँ भगवान्ने दो निष्ठाएँ बतायी हैं सांख्यनिष्ठा (ज्ञानयोग) और योगनिष्ठा (कर्मयोग)। जैसे लोकमें दो तरहकी निष्ठाएँ हैं लोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा ऐसे ही लोकमें दो तरहके पुरुष हैं द्वाविमौ पुरुषौ लोके (गीता 15। 16) वे हैं क्षर (नाशवान् संसार) और अक्षर (अविनाशी स्वरूप)। क्षरकी सिद्धिअसिद्धि प्राप्तिअप्राप्तिमें सम रहना कर्मयोग है और क्षरसे विमुख होकर अक्षरमें स्थित होना ज्ञानयोग है। परन्तु क्षर अक्षर दोनोंसे उत्तम पुरुष तो अन्य ही है जो परमात्मा नामसे कहा जाता है उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः (15। 17)। वह परमात्मा क्षरसे तो अतीत है और अक्षरसे उत्तम है अतः शास्त्र और वेदमें वह पुरुषोत्तम नामसे प्रसिद्धि है (15। 18)। ऐसे परमात्माके सर्वथा सर्वभावसे शरण हो जाना भगवन्निष्ठा (भक्तियोग) है। इसलिये क्षरकी प्रधानतासे कर्मयोग अक्षरकी प्रधानतासे ज्ञानयोग और परमात्माकी प्रधानतासे भक्तियोग चलता है (टिप्पणी प0 116)।सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा ये दोनों साधकोंकी अपनी निष्ठाएँ हैं परन्तु भगवन्निष्ठा साधकोंकी अपनी निष्ठा नहीं है। कारण कि सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठामें साधकको मैं हूँ और संसार है इसका अनुभव होता है अतः ज्ञानयोगी संसारसे सम्बन्धविच्छेद करके अपने स्वरूपमें स्थित होता है और कर्मयोगी संसारकी वस्तु(शरीरादि) को संसारकी ही सेवामें लगाकर संसारसे सम्बन्धविच्छेद करता है। परन्तु भगवन्निष्ठामें साधकको पहले भगवान् हैं इसका अनुभव नहीं होता पर उसका विश्वास होता है कि स्वरूप और संसार इन दोनोंसे भी विलक्षण कोई तत्त्व (भगवान्) है। अतः वह श्रद्धाविश्वासपूर्वक भगवान्को मानकर अपनेआपको भगवान्के समर्पित कर देता है। इसलिये सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठामें तो जानना (विवेक) मुख्य है और भगवन्निष्ठामें मानना (श्रद्धाविश्वास) मुख्य है।जानना और मानना दोनोंमें कोई फरक नहीं है। जैसे जानना सन्देहरहित (दृढ़) होता है ऐसे ही मानना भी सन्देहरहित होता है। मानी हुई बातमें विचारकी सम्भावना नहीं रहती। जैसे अमुक मेरी माँ है यह केवल माना हुआ है पर इस माने हुएमें कभी सन्देह नहीं होता कभी जिज्ञासा नहीं होती कभी विचार नहीं करना पड़ता। इसलिये गीतामें भक्तियोगके प्रकरणमें जहाँ जाननेकी बात आयी है उसको माननेके अर्थमें ही लेना चाहिये। इसी तरह ज्ञानयोग और कर्मयोगके प्रकरणमें जहाँ माननेकी बात आयी है उसको जाननेके अर्थमें ही लेना चाहिये।सांख्यनिष्ठा और योगनिष्ठा तो साधनसाध्य हैं और साधकपर निर्भर हैं पर भगवन्निष्ठा साधनसाध्य नहीं है। भगवन्निष्ठामें साधक भगवान् और उनकी कृपापर निर्भर रहता है।भगवन्निष्ठाका वर्णन गीतामें जगहजगह आया है जैसे इसी अध्यायमें पहले दो निष्ठाओंका वर्णन करके फिर तीसवें श्लोकमें मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य पदोंसे भक्तिका वर्णन किया गया है पाँचवें अध्यायमें भी दो निष्ठाओंका वर्णन करके दसवें श्लोकमें ब्रह्मण्याधाय कर्माणि और अन्तमें भोक्तारं यज्ञतपसाम् ৷৷. आदि पदोंसे भक्तिका वर्णन किया गया है इत्यादि।ज्ञानयोगेन सांख्यानाम् प्रकृतिसे उत्पन्न सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं सम्पूर्ण क्रियाएँ गुणोंमें इन्द्रियोंमें ही हो रही हैं (गीता 3। 28) और मेरा इनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ऐसा समझकर समस्त क्रियाओंमें कर्तापनके अभिमानका सर्वथा त्याग कर देना ज्ञानयोग है।गीतोपदेशके आरम्भमें ही भगवान्ने सांख्ययोग(ज्ञानयोग) का वर्णन करते हुए नाशवान् शरीर और अविनाशी शरीरीका विवेचन किया है जिसे (गीता 2। 16 में) असत् और सत्के नामसे भी कहा गया है।कर्मयोगेन योगिनाम् वर्ण आश्रम स्वभाव और परिस्थितिके अनुसार जो शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म सामनेआ जाय उसको (उस कर्म तथा उसके फलमें) कामना ममता और आसक्तिका सर्वथा त्याग करके करना तथा कर्मकी सिद्धि और असिद्धिमें सम रहनाकर्मयोग है।भगवान्ने कर्मयोगका वर्णन दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें और अड़तालीसवें श्लोकमें मुख्यरूपसे किया है। इनमें भी सैंतालीसवें श्लोकमें कर्मयोगका सिद्धान्त कहा गया है और अड़तालीसवें श्लोकमें कर्मयोगको अनुष्ठानमें लानेकी विधि कही गयी है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.3।।श्रीभगवांस्तूत्तरं ददाति लोकेऽस्मिन् इति। लोके एषा द्वयी गतिः प्रसिद्धा सांख्यानां ज्ञानं प्रधानम् योगिनां च कर्मेति। मया तु सा एकैव निष्ठा उक्ता ज्ञानक्रियामयत्वात् संवित्तत्त्वस्येति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.3।।समुच्चयविरोधितया प्रश्नं व्याख्याय तद्विरोधित्वेनैव प्रतिवचनमुत्थापयति प्रश्नेति। येयं व्यवहारभूमिरुपलभ्यते तत्र त्रैवर्णिका ज्ञानं कर्म वा शास्त्रीयमनुष्ठातुमधिक्रियन्ते। तेषां द्विधा स्थितिर्मया प्रोक्तेति पूर्वार्धं योजयति लोकेऽस्मिन्निति। स्थितिमेव व्याकरोति अनुष्ठेयेति। पूर्वं प्रवचनप्रसङ्गं प्रदर्शयन्प्रवक्तारं विशिनष्टि सर्गादाविति। प्रवचनस्यायथार्थत्वशङ्कां वारयति सर्वज्ञेनेति। अर्जुनस्य भगवदुपदेशयोग्यत्वं सूचयति अनघेति। निर्धारणार्थे तत्रेति सप्तमी। ज्ञानं परमार्थवस्तुविषयं तदेव योगशब्दितं युज्यतेऽनेन ब्रह्मणेति व्युत्पत्तेस्तेन। निष्ठेत्यनुवर्तते। उक्तज्ञानोपायमुपदिदिक्षुः सांख्यशब्दार्थमाह आत्मेति। तेषामेव कर्मनिष्ठत्वं व्यावर्तयति ब्रह्मचर्येति। तेषां जपादिपारवश्येन श्रवणादिपराङ्मुखत्वं पराकरोति वेदान्तेति। उक्तविशेषणवतां मुख्यसंन्यासित्वेन फलावस्थत्वं दर्शयति परमहंसेति। कर्म वर्णाश्रमविहितं धर्माख्यं तदेव युज्यते तेनाभ्युदयेनेति योगस्तेन निष्ठा कर्मिणां प्रोक्तेत्यनुषङ्गं दर्शयन्नाह कर्मैवेत्यादिना। एवं प्रतिवचनवाक्यस्थान्यक्षराणि व्याख्याय तस्यैव तात्पर्यार्थं कथयति यदि चेति। इष्टस्यापि दुर्बोधत्वमाशङ्क्याह उक्तमिति। ज्ञानस्यापि मूलविकलतया विभ्रमत्वमाशङ्क्याह वेदेष्विति। तस्याशिष्यत्वबुद्ध्यान्यथाकथनमित्याशङ्क्याह उपसन्नायेति। तथापि तस्मिन्नौदासीन्यादन्यथोक्तिरित्याशङ्क्याह प्रियायेति। ब्रवीति च भिन्नपुरुषकर्तृकं निष्ठाद्वयं तेन समुच्चयो भगवदभीष्टः शास्त्रार्थो न भवतीति शेषः। नन्वर्जुनस्य प्रेक्षापूर्वकारित्वाज्ज्ञानकर्मश्रवणानन्तरमुभयनिर्देशानुपपत्त्या समुच्चयानुष्ठानं संपत्स्यते तद्व्यतिरिक्तानां तु ज्ञानकर्मणोर्भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वं श्रुत्वा प्रत्येकं तदनुष्ठानं भविष्यतीति भगवतो मतं कल्प्यते तस्यार्जुनेऽनुरागातिरेकादितरेषु च तदभावादिति तत्राह यदि पुनरिति। अप्रमाणभूतत्वमनाप्तत्वम्। नच भगवतो रागादिमत्त्वेनानाप्तत्वं युक्तंसमं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तम् इत्यादिविरोधादित्याह तच्चेति। निष्ठाद्वयस्य भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वनिर्देशफलमुपसंहरति तस्मादिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.3।।एवं चेत्प्रश्नस्तर्हि कथं परिहारवाक्यं सङ्गच्छते तत्र निष्ठाद्वैविध्यकथनात् इत्यतस्तदभिप्रायं वदन् अवतारयति ज्यायस्त्वेऽपीति। बुद्धिः काम्यकर्मणो ज्यायसीति यदुक्तं तत्तथैव तथापि त्वां तत्र वैकल्पिके युद्धादिकर्मणि प्रेरयामि कुतः आधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यपि विक्षेपकारिण्यपि वैकल्पिकेऽधिकृत इति कृत्वा। अयमत्रोत्तरक्रमः आश्रमत्रयविहितानि यज्ञादीनि युद्धादीनि च न शुद्धकाम्यानि किन्तु कर्तुरिच्छया स्वर्गाद्यर्थानि ज्ञानाद्यर्थानि च भवन्ति अतो बुद्धेः काम्यकर्मणो जायस्त्वेऽपि युद्धस्य बुद्ध्यर्थत्वसम्भवात्तत्र नियोगो नानुपपन्नः। यतिधर्मान्विना किमेतेन नियोगेन इति चेत् अनधिकारिणामेव यत्याश्रमस्वीकाराधिकारः नाधिकारिकाणाम्। तैर्गृहस्थाद्याश्रममपरित्यज्यैव तद्विहितानि कर्माणि निष्कामतयाऽनुष्ठेयानीतीश्वरनियमात् तव चाधिकारिकत्वादिति।स्वराद्यन्तोपसृष्टाच्च इति कात्यायनवचनमनित्यम्। अत एव न पाणिनिरभाणीत्। अयमाशयःश्लोकात्कथं लभ्यते इत्यतो व्याचष्टे द्विविधा अपीति। निष्ठा द्विविधेति व्याख्याने क्रमेणैकस्यैव पुरुषस्य तत्सम्भवान्नोक्तोऽभिप्रायो लभ्यत इत्येवं व्याख्यातम्। न केवलमेकविधाः साङ्ख्या एवेत्यपेरर्थः। द्वैविद्ध्यमेव सोदाहरणमाह गृहस्थादीति। यत्याश्रमपरिग्रहेणेत्यपि ग्राह्यम्। ज्ञाननिष्ठाः यत्याश्रमविहितैरेव कर्मभिर्ज्ञानसाधनैर्युक्ताः सनकादिभिस्तुल्यं वर्तन्त इति सनकादिवत्। एवं जनकादिवदित्यपि। तत्स्था एव गृहस्थाद्याश्रमस्था एव तद्धर्मैर्युद्धादिभिर्ज्ञानसाधनैर्युक्ताः द्विविधा अपि जनाः सन्तीत्युक्ते कर्ममार्गस्था ज्ञानमार्गस्थाश्चेति द्वैविद्ध्यं प्रतीयते तन्निवृत्त्यर्थमाह मद्धर्मेति। ज्ञानमार्गस्था एव ततश्च मद्धर्मस्था एवजना द्विविधा अपि सन्तीत्यन्वयः। तत्कथमित्याकाङ्क्षायामुत्तरं वाक्यद्वयम्। साङ्ख्यानां योगिनामिति पदद्वयमन्यथाप्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे साङ्ख्यानामिति। सम्यक् ख्यातिर्ज्ञानं सङ्ख्या तत्र भवाः साङ्ख्याः तेषां ज्ञानिनां ज्ञाननिष्ठानामित्यर्थः। ननु जनकादयोऽपि ज्ञाननिष्ठास्तत्कथं योगिन इत्यत आह ज्ञाननिष्ठा अपीति। कर्मयोग्या गृहस्थादिकर्मयोग्याः। साङ्ख्ययोगशब्दौ प्रसिद्धार्थौ किं न स्यातामित्यतो मुक्तिवचनादिति भावेनाह निष्ठेति स्थितिः स्वरूपेणेति शेषः। अस्त्वेवं श्लोकार्थः तथाप्याधिकारिकत्वादित्यादिकं अत्र न श्रूयत इत्यतोऽध्याहृत्याह त्वं त्विति। सकर्मा गृहस्थादिकर्मवान्। भवेदिदं व्याख्यानं यदि ते जनाः प्रमिताः स्युर्येषां ज्ञाननिष्ठानामपि गृहस्थादिकर्मस्वेवाधिकारः न यत्याश्रमकर्मसु। जनकादयस्तु यत्याश्रमं नानुष्ठितवन्त इत्येव प्रमितम् न तु तत्रानधिकार इति तत्राह सन्ति हीति। विनिवेशितः कर्माधिकारो गृहस्थकर्माधिकारो यस्मिन्स तथोक्तः। प्रियव्रतो हि यत्याश्रमं स्वीचिकीर्षुराधिकारिकत्वयुक्त्या हिरण्यगर्भेण निवारित इत्यनेनोच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.3।।ज्यायस्त्वेऽपि बुद्धेराधिकारिकत्वात् त्वं कर्मण्यधिकृत इति तत्र नियोक्ष्यामीत्याशयवान्भगवानाह लोक इति। द्विविधा अपि जनाः सन्ति गृहस्थादिकर्मत्यागेन ज्ञाननिष्ठाः सनकादिवत् तत्स्था एव ज्ञाननिष्ठाश्च जनकादिवत् मद्धर्मस्था एवेत्यर्थः। साङ्ख्यानां ज्ञानिनां सनकादीनाम्। योगिनामुपायिनां जनकादीनाम्। ज्ञाननिष्ठा अप्याधिकारिकत्वादीश्वरेच्छया लोकसङ्ग्रहार्थत्वाच्च ये कर्मयोग्या भवन्ति तेऽपि योगिनः। निष्ठा स्थितिः। त्वं तु जनकादिवत् सकर्मैव ज्ञानयोग्यः न तु सनकादिवत्तत्त्यागेनेत्यर्थः। सन्ति हीश्वरेच्छयैव कर्मकृतः प्रियव्रतादयोऽपि ज्ञानिन एव। तथा ह्युक्तम् ईश्वरेच्छया विनिवेशितकर्माधिकारः भाग.5।1।23 इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.3।।श्रीभगवानुवाच पुरा उक्तं च सम्यग् अवधृतं त्वया पुरा अपि अस्मिन् लोके विचित्राधिकारिसंपूर्णे द्विविधा निष्ठा ज्ञानकर्मविषया यथाधिकारम् असंकीर्णा एव मया उक्ता। न हि सर्वो लौकिकः पुरुषः संजातमोक्षाभिलाषः तदानीम् एव ज्ञानयोगाधिकारे प्रभवति अपि तु अनभिसंहितफलेन केवलपरमपुरुषाराधनरूपेण अनुष्ठितेन कर्मणा विध्वस्तमनोमलः अव्याकुलेन्द्रियो ज्ञाननिष्ठायाम् अधिकरोति यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्। स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।(गीता 18।46)इति परमपुरुषाराधनैकवेषता कर्मणां वक्ष्यते।इहापिकर्मण्येवाधिकारस्ते (गीता 2।47) इत्यादिना अनभिसंहितफलं कर्म अनुष्ठेयं विधाय तेन विषयव्याकुलतारूपमोहाद् उत्तीर्णबुद्धेःप्रजहाति यदा कामान् (गीता 2।55) इत्यादिना ज्ञानयोग उदितः। अतः सांख्यानाम् एव ज्ञानयोगेन स्थितिः उक्ता योगिनां तु कर्मयोगेन।संख्या बुद्धिः तद्युक्ताः सांख्याः आत्मैकविषयया बुद्ध्या युक्ताः सांख्याः अतदर्हाः कर्मयोगाधिकारिणो योगिनः। विषयव्याकुलबुद्धियुक्तानां कर्मयोगे अधिकारः अव्याकुलबुद्धीनां तु ज्ञानयोगे अधिकार उक्तः सति न किञ्चिद् इह विरुद्धम् न अपि व्यामिश्रम् अभिहितम्।सर्वस्य लौकिकस्य पुरुषस्य मोक्षेच्छायां संजातायां सहसा एव ज्ञानयोगो दुष्कर इत्याह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.3।। लोके अस्मिन् शास्त्रार्थानुष्ठानाधिकृतानां त्रैवर्णिकानां द्विविधा द्विप्रकारा निष्ठा स्थितिः अनुष्ठेयतात्पर्यं पुरा पूर्वं सर्गादौ प्रजाः सृष्ट्वा तासाम् अभ्युदयनिःश्रेयसप्राप्तिसाधनं वेदार्थसंप्रदायमाविष्कुर्वता प्रोक्ता मया सर्वज्ञेन ईश्वरेण हे अनघ अपाप। तत्र का सा द्विविधा निष्ठा इत्याह तत्र ज्ञानयोगेन ज्ञानमेव योगः तेन सांख्यानाम् अत्मानात्मविषयविवेकविज्ञानवतां ब्रह्मचर्याश्रमादेव कृतसंन्यासानां वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थानां परमहंसपरिव्राजकानां ब्रह्मण्येव अवस्थितानां निष्ठा प्रोक्ता। कर्मयोगेन कर्मैव योगः कर्मयोगः तेन कर्मयोगेन योगिनां कर्मिणां निष्ठा प्रोक्ता इत्यर्थः। यदि च एकेन पुरुषेण एकस्मै पुरुषार्थाय ज्ञानं कर्म च समुच्चित्य अनुष्ठेयं भगवता इष्टम् उक्तं वक्ष्यमाणं वा गीतासु वेदेषु चोक्तम् कथमिह अर्जुनाय उपसन्नाय प्रियाय विशिष्टभिन्नपुरुषकर्तृके एव ज्ञानकर्मनिष्ठे ब्रूयात् यदि पुनः अर्जुनः ज्ञानं कर्म च द्वयं श्रुत्वा स्वयमेवानुष्ठास्यति अन्येषां तु भिन्नपुरुषानुष्ठेयतां वक्ष्यामि इति मतं भगवतः कल्प्येत तदा रागद्वेषवान् अप्रमाणभूतो भगवान् कल्पितः स्यात्। तच्चायुक्तम्। तस्मात् कयापि युक्त्या न समुच्चयो ज्ञानकर्मणोः।।यत् अर्जुनेन उक्तं कर्मणो ज्यायस्त्वं बुद्धेः तच्च स्थितम् अनिराकरणात्। तस्याश्च ज्ञाननिष्ठायाः संन्यासिनामेवानुष्ठेयत्वम् भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्ववचनात्। भगवतः एवमेव अनुमतमिति गम्यते।।मां च बन्धकारणे कर्मण्येव नियोजयसि इति विषण्णमनसमर्जुनम् कर्म नारभे इत्येवं मन्वानमालक्ष्य आह भगवान् न कर्मणामनारम्भात् इति। अथवा ज्ञानकर्मनिष्ठयोः परस्परविरोधात् एकेन पुरुषेण युगपत् अनुष्ठातुमशक्यत्वे सति इतरेतरानपेक्षयोरेव पुरुषार्थहेतुत्वे प्राप्ते कर्मनिष्ठाया ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिहेतुत्वेन पुरुषार्थहेतुत्वम् न स्वातन्त्र्येण ज्ञाननिष्ठा तु कर्मनिष्ठोपायलब्धात्मिका सती स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुः अन्यानपेक्षा इत्येतमर्थं प्रदर्शयिष्यन् आह भगवान्
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【 Verse 3.4 】
▸ Sanskrit Sloka: न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते | न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ||
▸ Transliteration: na karmaṇāmanārambhānnaiṣkarmyaṁ puruṣo’śnute | na ca sannyasanādeva siddhiṁ samadhigacchati ||
▸ Glossary: na: without; karmaṇām: of the actions; anārambhāt: abstaining; naiṣkarmyaṁ: freedom from action; puruṣaḥ: man; aśnute: achieve; na: not; ca: also; sanny- asanāt: by renunciation; eva: surely; siddhiṁ: success; samadhigacchati: attain
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.4 A person does not attain freedom from action by abstaining from work, nor does he attain fulfillment by giving up action.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.4।।मनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.4।। कर्मों के न करने से मनुष्य नैर्ष्कम्य को प्राप्त नहीं होता और न कर्मों के संन्यास से ही वह सिद्धि (पूर्णत्व) प्राप्त करता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.4 न not? कर्मणाम् of actions? अनारम्भात् from nonperformance? नैष्कर्म्यम् actionlessness? पुरुषः man? अश्नुते reaches? न not? च and? संन्यसनात् from renunciation? एव only? सिद्धिम् perfection? समधिगच्छति attains.Commentary Actionlessness (Naishkarmyam) and perfection (Siddhi) are synonymous. The sage who has attained to perfection or reached the state of actionlessness rests in his own essential nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute (Satchidananda Svarupa). He has neither necessity nor desire for action as a means to an end. He has perfect satisfaction in the Self.One attains to the state of actionlessness by gaining the knowledge of the Self. If a man simply sits iet by abandoning action you cannot say that he has attained to the state of actionlessness. His mind will be planning? scheming and speculating. Thought is real action. The sage who is free from affirmative thoughts? wishes? and likes and dislikes? who has the knowledge of the Self can be said to have attained to the state of actionlessness.No one can reach perfection or freedom from action or knowledge of the Self by mere renunciation or by simply giving up activities without possessing the knowledge of the Self. (Cf.XVIII.49).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.4. A person attains actionlessness not [just] by non-commencement of actions; and not just by renunciation, he attains success (emancipation).
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.4 No man can attain freedom from activity by refraining from action; nor can he reach perfection by merely refusing to act.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.4 No man experiences freedom from activity (Naiskarmya) by abstaining from works; and no man ever attains success by mere renunciation of works.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.4 A person does not attain freedom from action by abstaining from action; nor does he attain fulfilment merely through renunciation.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.4 Not by non-performance of actions does man reach actionlessness; nor by mere renunciation does he attain to perfection.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.4 See Comment under 3.5
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.4 Not by non-performance of the acts prescribed by the scriptures, does a person attain freedom from Karma, i.e., Jnana Yoga; nor by ceasing to perform such actions as are prescribed in the scriptures and are already begun by him. For, success is achieved by actions done without attachment to the fruits and by way of worshipping the Supreme Person. Hence devoid of it (Karma-nistha), one does not achieve Jnana-nistha. By those persons who have not worshipped Govinda by acts done without attachment to fruits and whose beginningless and endless accumulation of evil has not been annulled thery, constant contemplation on the self is not possible. It can be done only if it is preceded by the attainment of a state in which the operation of the senses have been freed from disturbance.
This view is put forward by the Lord:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.4 Purusah, a person; na does not; asnute, attain; naiskarmyam, freedom from action, the state of being free from action, steadfastness in the Yoga of Knowledge, i.e. the state of abiding in one's own Self which is free from action; anarambhat, by abstaining; karmanam, from actions-by the non-performance of actions such as sacrifices etc. which are or were performed in the present or past lives, which are the causes of the purification of the mind by way of attenuating the sins incurred, and which, by being the cause of that (purification), become the source of steadfastness in Knowledge through the generation of Knowledge, as stated in the Smrti (text), 'Knowledge arises in a person from the attenuation of sinful acts' [the whole verse is: Jnanam utpadyate pumsamksayatpapasya karmanah; Yathadarsatalaprakhye pasyatyatmanamatmani. 'Knowledge arises৷৷.acts. One sees the Self in oneself as does one (see oneself) in a cleaned surface of a mirror'.-Tr.] (Mbh. Sa. 204.8). This is the import. From the statement that one does not attain freedom from action by abstaining from actions, it may be concluded that one attains freedom from action by following the opposite course of performing actions. What, again, is the reason that one does not attain freedom from action by abstaining from actions? The answer is: Because performing actions is itself a means to freedom from action. Indeed, there can be no attainment of an end without (its) means. And Karma-yoga is the means to the Yoga of Knowledge characterized by freedom from action, because it has been so established in the Upanisads and here as well. As for the Upanisads, it has been shown in the texts, 'The Brahmanas seek to know It through the study of the Vedas, sacrifices, (charity, and austerity consisting in a dispassionate enjoyment of sense-objects)' (Br. 4.4.22), etc. whch deal with the means of realizing the goal of Knowledge under discussion, viz the Realm of the Self, that the Yoga of Karma is a means to the Yoga of Knowledge . And even here (in the Gita), the Lord will established that, 'But, O mighty-armed one, renunciation is hard to attain without (Karma-)yoga' (5.6); 'By giving up attachment, the yogis undertake work৷৷.for the purification of themselves' (5.11); 'Sacrifice, charity and austerity are verily the purifiers of the wise' (18.5), etc. Objection: Is it not that in such texts as-'Extending to all creatures immunity from fear' (Na. Par. 5.43), (one should take recourse to freedom from action)-, it is shown that attainment of freedom from action follows even from the renunciation of obligatory duties? And in the world, too, it is a better known fact that freedom from action follows abstention from actions. Hence also arises the estion, 'Why should one who desires freedom from action undertake action?' Reply: Therefore the Lord said: Na ca, nor; samadhi-gacchati, does he attain; siddhim, fulfilment steadfastness in the Yoga of Knowledge, characterized by freedom from action; sannyasanat eva, merely through renunciation-even from the mere renunciation of actions which is devoid of Knowledge. What, again, is the reason that by the mere giving up of actions which is not accompanied with Knowledge, a person does not attain fulfulment in the form of freedom from actions? To this ery seeking to know the cause, the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.4।। अपने आत्मस्वरूप की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति परिपूर्ण है। इस पूर्णत्व के अज्ञान के कारण हमारी बुद्धि में अनेक इच्छायें सुख को पाने के लिये उत्पन्न होती हैं। यह सब जानते हैं कि हम केवल उन्हीं वस्तुओं की इच्छा करते हैं जो पहले से हमारे पास पूर्ण रूप में अथवा पर्याप्त मात्रा में नहीं होतीं। जैसी इच्छायें वैसी ही विचार वृत्तियाँ मन में उठती हैं। मन में उठने वाली ये वृत्तियाँ विक्षेप कहलाती हैं। प्रत्येक क्षण इन वृत्तियों के गुणधर्म इच्छाओं के अनुरूप ही होते हैं। ये विचार ही शरीर के स्तर पर बाह्य जगत् में मनुष्य के कर्म के रूप में व्यक्त होते हैं। इस प्रकार अविद्या जनित इच्छा विक्षेप और कर्म की श्रृंंखला में हम बँधे पड़े हुए हैं।इस पर और अधिक गहराई से विचार करने पर ज्ञात होगा कि वास्तव में यह सब भिन्नभिन्न न होकर एक आत्म अज्ञान के ही अनेक रूप हैं। यह अज्ञान बुद्धि मन और शरीर के स्तर पर क्रमश इच्छा विचार और कर्म के रूप में व्यक्त होता है। अत स्वाभाविक है कि यदि परम तत्त्व की परिभाषा अज्ञान के परे का अनुभव है तो यह भी सत्य है कि इच्छा शून्य या विचार शून्य या कर्म शून्य स्थिति ही आत्मस्वरूप है। कर्मशून्यत्व को यहाँ नैर्ष्कम्य कहा है।इस प्रकार विचार करने से ज्ञात होता है कि नैर्ष्कम्य का वास्तविक अर्थ पूर्णत्व है। अत भगवान् कहते हैं कि कर्मों के संन्यास मात्र से नैर्ष्कम्य सिद्धि नहीं मिलती। जीवनसंघर्षों से पलायन व्यक्ति के विकास के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति का मार्ग नहीं है। अर्जुन का विचार रणभूमि से पलायन करने का था और इसीलिए उसे वैदिक संस्कृति के सम्यक् ज्ञान की पुन शिक्षा देना आवश्यक था। भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा दिव्य गीतोपदेश का यही प्रयोजन भी था।कर्मयोग से अन्तकरण शुद्धि और तत्पश्चात् ज्ञानयोग से आत्मानुभूति संक्षेप में यह है आत्मविकास की साधना जिसका संकेत इस श्लोक में किया गया है। इसलिए हिन्दू धर्म पर लिखने वाले सभी महान् लेखक इस श्लोक को प्राय उद्धृत करते हैं।ज्ञान के बिना केवल कर्मसंन्यास से ही नैर्ष्कम्य अथवा पूर्णत्व क्यों नहीं प्राप्त होता कारण यह है कि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.4।।तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव इत्युक्तवन्तं खिन्नचित्तमर्जुनं कर्म न कर्तव्यमित्येवंभन्वानमालक्ष्याह नेति। यद्वा निष्ठेत्येकवचनेन सूचितं कर्मनिष्ठायाः ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिहेतुत्वेन पुरुषार्थसाधनत्वं ज्ञाननिष्ठायाः कर्मनिष्ठोपायलब्धस्वरुपायास्तु स्वातन्त्र्येणैव पुरुषार्थहेतुत्वं च स्फुटं वक्तुमारभते नेत्यादिना। कर्मणांतमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्याज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः। यथादर्शतलप्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि इति स्मृत्यासर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरि ति न्यायेन च चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानोपायत्वेन विहितानामकरणात् नैष्कर्म्यं कर्मशून्यत्वं ज्ञानयोगेन निष्ठां पुरुषो नाश्रुते न प्राप्नोति किंतु तेषामारम्भात्प्राप्नोतीत्यर्थः। ननुअभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् इत्यादौ कर्तव्यकर्मसंन्यासादपि नैष्कर्म्यप्राप्तिः श्रुयतेऽतस्तदर्थिनः किं कर्मारम्भेणेति चेत्तत्राह नेति। नच संन्यसनात्कर्मत्यागमात्रात् ज्ञानशून्यात्सिद्धिं नैष्कर्म्यलक्षणां प्राप्नोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.4।।तत्र कारणाभावे कार्यानुपपत्तेः कर्मणा तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्यात्मज्ञाने विनियुक्तानामनारम्भादननुष्ठानाच्चित्तशुद्ध्यभावेन ज्ञानायोग्यो बहिर्मुखः नैष्कर्म्यं सर्वकर्मशून्यत्वं ज्ञानयोगेन निष्ठामिति यावत् नाश्नुते न प्राप्नोति। ननुएतमेव प्रवाजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति इति श्रुतेः सर्वकर्मसंन्यासादेव ज्ञाननिष्ठोपपत्तेः कृतं कर्मभिरित्यत आह नच संन्यसनादेव चित्तशुद्धिंविना कृतात्सिद्धिं ज्ञाननिष्ठालक्षणां सम्यक्फलपर्यवसायित्वेन नाधिगच्छति नैव प्राप्नोतीत्यर्थः। कर्मजन्यां चित्तशुद्धिमन्तरेण सन्यास एव न संभवति यथा कथंचिदौत्सुक्यमात्रेण कृतोऽपि न फलपर्यवसायीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.4।।अनयोः प्रकारयोरङ्गाङ्गिभावमाह न कर्मणामिति। कर्मणां यज्ञादीनामनारम्भादननुष्ठानान्नैष्कर्म्यं ज्ञाननिष्ठां नाश्नुते न प्राप्नोति।विविदिषन्ति यज्ञेन इति श्रुत्या यज्ञादीनां विद्याङ्गत्वेन विधानात्। ननु सन्प्रत्ययप्राधान्यात्कर्मणां विविदिषाङ्गत्वमत्र गम्यते। तेन विविदिषायां यज्ञादिना सिद्धायाम्एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्ति इति श्रुतेः प्रव्रज्यारूपमेव नैष्कर्म्यमिह ज्ञाननिष्ठासाधनं ग्राह्यम्। न ज्ञानं नैष्कर्म्यसिद्धिं परमामित्यादाविवात्र तद्ग्राहकस्य परमत्वविशेषणस्याभावात्। ननु कर्मयोगजनितचित्तशुद्ध्यभावे केवलात्संन्यासात्सिद्धिं समधिगच्छतीति योजनायां विप्रकृष्टयोर्ज्ञानकर्मणोः समुच्चयासंभवस्याभीष्टस्य सिद्धेः किमिति नैष्कर्म्यशब्देन निष्ठा गृह्यत इति चेत्सत्यम्। गुणैः कर्मकार्यत इति वाक्यशेषान्नैर्गुण्यहेतुकं मुख्यंज्ञानमेवेह नैष्कर्म्यपदार्थो नतु प्रव्रज्या। विविदिषन्ति यज्ञेनेत्यत्रापि जिगमिषत्यश्वेन जिघांसत्यसिनेत्यादाविव तृतीयान्तस्य धात्वर्थेनैवान्वयादश्वादीनां गमनादाविव यज्ञादीनां वेदन एवान्वयो ज्ञेयः। एतमेवेति श्रुतिस्तु विविदिषासंन्यासाभिप्रायेण प्रवृत्ता।एवं वैतमात्मानं विदित्वा ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणयाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति इति ज्ञानपरिपाकार्थस्य जीवन्मुक्तिसुखार्थस्य वा याज्ञवल्क्यादिभिरनुष्ठितस्य विद्वत्संन्यासस्यापि शास्त्रे दर्शनात्। असंन्यासिनो ज्ञानमेव नोत्पद्यत इति प्राचामाग्रहो विक्षेपककर्मत्यागरूपसंन्यासविषयो न तु काषायपरिधानमात्रविषयः। गार्गीव्याधवासिष्ठादीनामतथाविधानामपि ज्ञानोत्पत्त्यवगमादित्यास्तां तावत्। कर्मभिरशोधितचित्तस्य मन्दबुद्धेः रागद्वेषादिग्रस्तस्यात्मानात्मविवेकद्वारा चित्तरोधद्वारा वा नैष्कर्म्यप्राप्तिर्नस्तीति पूर्वार्धार्थः। ननुअभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् इति केवलात्कर्मसंन्यासादपि नैष्कर्म्यसिद्धिः स्मर्यते तत्कथमुच्यते न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यमस्तीति तत्राह नचेति। कर्मजचित्तशुद्ध्यभावे कृतादपि संन्यासान्न मोक्षसिद्धिः। उदाहृतस्मृतिस्तु चित्तशुद्धिपूर्वकसंन्यासाभिप्राया। नहि रागादिग्रस्तः सर्वभूतेभ्यः सर्वात्मानाऽभ्यं दातुमीष्टे अतो युक्तमुक्तं न च संन्यसनादेवेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.4।।न()न्वेवं चेत्तदा मां प्रति कर्मकरणं किमाशयेनाज्ञप्तं इत्यत आह न कर्मणामिति। कर्मणामनारम्भादकरणान्नैप्कर्म৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷৷ कर्मादिरहितभावं भक्तिरूपं नाश्नुते न प्राप्नोतीत्यर्थः। अत्रायं भावः कर्मस्वरूपज्ञानाभावे त्यागे न कोऽपि पुरुषार्थः सिद्ध्येत् तस्माद्धेयत्वज्ञानार्थं तत्करणम्। अत एवारम्भ एवोक्तः न त्वाद्यं तत्करणमुक्तम्। स्वरूपाज्ञाने केवलं न भवतीत्याह न चेति। सन्न्यसनादेव स्वरूपाज्ञानात् केवलत्यागेन सिद्धिं त्यागफलं न च समधिगच्छति सम्यक् न प्राप्नोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.4।।अतः सभ्यक् चित्तशुद्ध्यर्थं ज्ञानोत्पत्तिर्यन्तं वर्णाश्रमोचितानि कर्माणि कर्तव्यानि। अन्यथा चित्तशुद्ध्यभावेन ज्ञानानुत्पत्तेरित्याह न कर्मणामिति। कर्मणामनारम्भादननुष्ठानान्नैष्कर्म्यं ज्ञानं नाश्रुते नाप्नोति। ननु चएवमेव प्रव्राजिनो लोकमीप्सन्तः प्रव्रजन्ति इति संन्यासस्य मोक्षाङ्गत्वश्रुतेः संन्यासादेव मोक्षो भविष्यतीति किं कर्मभिरित्याशङ्क्योक्तम् नचेति। नच चित्तशुद्धिं विना कृतात्संन्यसनादेव ज्ञानाशून्यात्सिद्धिं मोक्षं समधिगच्छति प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.4।।योगेऽनःकरणशोधकत्वं कर्मादेः संयोगपृथक्त्वन्यायेनैव निर्णीतं अन्यथा त्रयाणां जिज्ञासा स्वतन्त्रा न कृता स्यात्योगेन संसिद्धिर्ज्ञानेन भक्त्या चेति पुरुषार्थसाधनं इति आप्तभाष्ये निर्णीतं तेनात्र कर्मणामारम्भान्नैष्कयमोक्षसिद्धिरिति योगमतं द्रढयति न कर्मणामनारम्भादिति। कर्माधिकारिणां त्वादृशानां कर्मसन्न्यसनासाङ्ख्यादपि च न सिद्धिरित्याह न चेति। जीवन्मुक्तिकैर्गुणैर्वा मुक्तेनापि देहवत्त्वेन कर्मकरणदर्शनात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.4।।यह बात स्पष्ट प्रकट करनेकी इच्छासे कि ज्ञाननिष्ठाकी प्राप्तिमें साधन होनेके कारण कर्मनिष्ठा मोक्षरूप पुरुषार्थमें हेतु है स्वतन्त्र नहीं है और कर्मनिष्ठारूप उपायसे सिद्ध होनेवाली ज्ञाननिष्ठा अन्यकी अपेक्षा न रखकर स्वतन्त्र ही मुक्तिमें हेतु है भगवान् बोले कर्मोंका आरम्भ किये बिना अर्थात् यज्ञादि कर्म जो कि इस जन्म या जन्मान्तरमें किये जाते हैं और सञ्चित पापोंका नाश करनेके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिमें कारण हैं एवं पापकर्मोंका नाश होनेपर मनुष्योंके ( अन्तःकरणमें ) ज्ञान प्रकट होता है इस स्मृतिके अनुसार जो अन्तःकरणकी शुद्धिमें कारण होनेसे ज्ञाननिष्ठाके भी हेतु हैं उन यज्ञादि कर्मोंका आरम्भ किये बिना मनुष्य निष्कर्मभावको कर्मशून्य स्थितिको अर्थात् जो निष्क्रिय आत्मस्वरूपमें स्थित होनारूप ज्ञानयोगसे प्राप्त होनेवाली निष्ठा है उसको नहीं पाता। पू0 कर्मोंका आरम्भ नहीं करनेसे निष्कर्मभावको प्राप्त नहीं होता इस कथनसे यह पाया जाता है कि इसके विपरीत करनेसे अर्थात् कर्मोंका आरम्भ करनेसे मनुष्य निष्कर्मभावको पाता है सो ( इसमें ) क्या कारण है कि कर्मोंका आरम्भ किये बिना मनुष्य निष्कर्मताको प्राप्त नहीं होता उ0 क्योंकि कर्मोंका आरम्भ ही निष्कर्मताकी प्राप्तिका उपाय है और उपायके बिना उपेयकी प्राप्ति हो नहीं सकती यह प्रसिद्ध ही है। निष्कर्मतारूप ज्ञानयोगका उपाय कर्मयोग है यह बात श्रुतिमें और यहाँ गीतामें भी प्रतिपादित है। श्रुतिमें प्रस्तुत ज्ञेयरूप आत्मलोकके जाननेका उपाय बतलाते हुए उस आत्माको बाह्मण वेदाध्ययन और यज्ञसे जाननेका इच्छा करते हैं इत्यादि वचनोंसे कर्मयोगको ज्ञानयोगका उपाय बतलाया है। तथा यहाँ ( गीताशास्त्रमें ) भी हे महाबाहो बिना कर्मयोगके संन्यास प्राप्त करना कठिन है योगी लोग आसक्ति छो़ड़कर अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म किया करते हैं यज्ञ दान और तप बुद्धिमानोंको पवित्र करनेवाले हैं इत्यादि वचनोंसे आगे प्रतिपादित करेंगे। यहाँ यह शंका होती है कि सब भूतोंको अभयदान देकर संन्यास ग्रहण करे इत्यादि वचनोंमें कर्तव्यकर्मोंके त्यागद्वारा भी निष्कर्मताकी प्राप्ति दिखलायी है और लोकमें भी कर्मोंका आरम्भ न करनेसे निष्कर्मताका प्राप्त होना अत्यन्त प्रसिद्ध है। फिर निष्कर्मता चाहनेवालेको कर्मोंके आरम्भसे क्या प्रयोजन इसपर कहते हैं केवल संन्याससे अर्थात् बिना ज्ञानके केवल कर्मपरित्यागमात्रसे मनुष्य निष्कर्मतारूप सिद्धिको अर्थात् ज्ञानयोगसे होनेंवाली स्थितको नहीं पाता।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.4।। व्याख्या न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते कर्मयोगमें कर्म करना अत्यन्त आवश्यक है। कारण कि निष्कामभावसे कर्म करनेपर ही कर्मयोगकी सिद्धि होती है (टिप्पणी प0 117)। यह सिद्धि मनुष्यको कर्म किये बिना नहीं मिल सकती।मनुष्यके अन्तःकरणमें कर्म करनेका जो वेग विद्यमान रहता है उसे शान्त करनेके लिये कामनाका त्याग करके कर्तव्यकर्म करना आवश्यक है। कामना रखकर कर्म करनेपर यह वेग मिटता नहीं प्रत्युत बढ़ता है।नैष्कर्म्यम् अश्नुते पदोंका आशय है कि कर्मयोगका आचरण करनेवाला मनुष्य कर्मोंको करते हुए ही निष्कर्मताको प्राप्त होता है। जिस स्थितिमें मनुष्यके कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते उस स्थितिकोनिष्कर्मता कहते हैं।कामनासे रहित होकर किये गये कर्मोंमें फल देनेकी शक्तिका उसी प्रकार सर्वथा अभाव हो जाता है जिस प्रकार बीजको भूनने या उबालनेपर उसमें पुनः अंकुर देनेकी शक्ति सर्वथा नष्ट हो जाती है। अतः निष्काम मनुष्यके कर्मोंमें पुनः जन्ममरणके चक्रमें घुमानेकी शक्ति नहीं रहती।कामनाका त्याग तभी हो सकता है जब सभी कर्म दूसरोंकी सेवाके लिये किये जायँ अपने लिये नहीं। कारण कि कर्ममात्रका सम्बन्ध संसारसे है और अपना (स्वरूपका) सम्बन्ध परमात्मासे है। अपने साथ कर्मका सम्बन्ध है ही नहीं। इसलिये जबतक अपने लिये कर्म करेंगे तबतक कामनाका त्याग नहीं होगा और जबतक कामनाका त्याग नहीं होगा तबतक निष्कर्मताकी प्राप्ति नहीं होगी।न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति इस श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने कर्मयोगकी दृष्टिसे कहा कि कर्मोंका आरम्भ किये बिना कर्मयोगीको निष्कर्मताकी प्राप्ति नहीं होती। अब श्लोकके उत्तरार्धमें सांख्ययोगकी दृष्टिसे कहते हैं कि केवल कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेसे सांख्ययोगीको सिद्धि अर्थात् निष्कर्मताकी प्राप्ति नहीं होती। सिद्धिकी प्राप्ति के लिये उसे कर्तापन(अहंता) का त्याग करना आवश्यक है। अतः सांख्ययोगीके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना मुख्य नहीं है प्रत्युत अहंताका त्याग ही मुख्य है।सांख्ययोगमें कर्म किये भी जा सकते हैं औ किसी सीमातक कर्मोंका त्याग भी किया जा सकता है परन्तु कर्मयोगमें सिद्धिप्राप्तिके लिये कर्म करना आवश्यक होता है (गीता 6। 3)।मार्मिक बातश्रीमद्भगवद्गीता मनुष्यको व्यवहारमें परमार्थसिद्धिकी कला सिखाती है। उसका आशय कर्तव्यकर्म करानेमें है छुड़ानेमें नहीं। इसलिये भगवान् कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों ही साधनोंमें कर्म करनेकी बात कहते हैं।यह एक स्वाभाविक बात है कि जब साधक अपना कल्याण चाहता है तब वह सांसारिक कर्मोंसे उकताने लगता है और उन्हें छोड़ना चाहता है। इसी कारण अर्जुन भी कर्मोंसे उकताकर भगवान्से पूछते हैं कि जब कर्मयोग और ज्ञानयोग दोनों प्रकारके साधनोंका तात्पर्य समतासे है तो फिर कर्म करनेकी बात आप क्यों कहते हैं मुझे युद्धजैसे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं परन्तु भगवान्ने दोनों ही प्रकारके साधनोंमें अर्जुनको कर्म करनेकी आज्ञा दी है जैसे कर्मयोगमें योगस्थः कुरु कर्माणि (गीता 2। 48) और सांख्ययोगमें तस्माद्युध्यस्व भारत (गीता 2। 18)। इससे सिद्ध होता है कि भगवान्का अभिप्राय कर्मोंको स्वरूपसे छुड़ानेमें नहीं प्रत्युत कर्म करानेमें है। हाँ भगवान् कर्मोंमें जो जहरीला अंश कामना ममता और आसक्ति है उसका त्याग करके ही कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी अपेक्षा साधकको उनसे अपना सम्बन्धविच्छेद करना चाहिये। कर्मयोगी निःस्वार्थभावसे कर्म करते हुए शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदिको संसारकी वस्तु मानकर संसारकी सेवामें लगाता है और कर्मों तथा पदार्थोंके साथ अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता (गीता 5। 11)। ज्ञानयोगमें सत्असत्के विवेककी प्रधानता रहती है। अतएव ज्ञानयोगी ऐसा मानता है कि गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं अर्थात् शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिसे ही कर्म हो रहे हैं। मेरा कर्मोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है (गीता 3। 28 5। 89)।प्रायः सभी साधकोंके अनुभवकी बात है कि कल्याणकी उत्कट अभिलाषा जाग्रत् होते ही कर्म पदार्थ और व्यक्ति(परिवार) से उनकी अरुचि होने लगती है। परन्तु वास्तवमें देहके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होनेसे यह आरामविश्रामकी इच्छा ही है जो साधककी उन्नतिमें बाधक है। साधकोंके मनमें ऐसा भाव रहता कि कर्म पदार्थ और व्यक्तिका स्वरूपसे त्याग करनेपर ही हम परमार्थमार्गमें आगे बढ़ सकते हैं। परन्तु वास्तवमें इनका स्वरूपसे त्याग न करके इनमें आसक्तिका त्याग करना ही आवश्यक है। सांख्ययोगमें उत्कट वैराग्यके बिना आसाक्तिका त्याग करना कठिन होता है। परन्तु कर्मयोगमें वैराग्यकी कमी होनेपर भी केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे आसक्तिका त्याग सुगमतापूर्वक हो जाता है।गीताने एकान्तमें रहकर साधन करनेका भी आदर किया है परन्तु एकान्तमें सात्त्विक पुरुष तो साधनभजनमें अपना समय बिताता है पर राजस पुरुष संकल्पविकल्पमें तामस पुरुष निद्राआलस्यप्रमादमें अपना समय बिताता है जो पतन करनेवाला है। इसलिये साधककी रुचि तो एकान्तकी ही रहनी चाहिये अर्थात् सांसारिक कर्मोंका त्याग करके पारमार्थिक कार्य करनेमें ही उसकी प्रवृत्ति रहनी चाहिये परन्तु कर्तव्यरूपसे जो कर्म सामने आ जाय उसको वह तत्परतापूर्वक करे। उस कर्ममें उसका राग नहीं होना चाहिये। राग न तो जनसमुदायमें होना चाहिये और न अकर्मण्यतामें ही। कहीं भी राग न रहनेसे साधका बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है। वास्तवमें शरीरको एकान्तमें ले जानेको ही एकान्त मान लेना भूल है क्योंकि शरीर संसारका ही एक अंश है। अतः शरीरसे सम्बन्धविच्छेद होना अर्थात् उसमें अहंताममता न रहना ही वास्तविक एकान्त है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.4 3.5।।तथा हि न कर्मणामिति। न हीति। ज्ञानं कर्मणा रहितं न भवति कर्म च कौशलोपेतं ज्ञानरहितं न भवति इत्येकमेव वस्तु ज्ञानकर्मणी। तथाचोक्तम्।न क्रियारहितं ज्ञानं न ज्ञानरहिता क्रिया।ज्ञानक्रियाविनिष्पन्न आचार्यः पशुपाशहा।। इति तस्मात् ज्ञानान्तर्वर्ति कर्म अपरिहार्यम्। यतः परवश एव कायवाङ्मनसां परिस्पन्दात्मकत्वात् अवश्यं किञ्चित्करोति।
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Chapter 3 (Part 4)
Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.4।।किमिति भगवता बुद्धेर्ज्यायस्त्वं ज्यायसी चेदित्यत्रोक्तमुपेक्षितमिति तत्राह यदर्जुनेनेति। किंच ज्ञाननिष्ठायां संन्यासिनामेवाधिकारो भगवतोऽभिप्रेतोऽन्यथा तदीयविभागवचनविरोधादिति विभागवचनसामर्थ्यसिद्धमर्थमाह तस्याश्चेति। तर्हि विभागवचनानुरोधादर्जुनस्यापि संन्यासपूर्विकायां ज्ञाननिष्ठायामेवाधिकारो भविष्यति नेत्याह मां चेति। बुद्धेर्ज्यायस्त्वमुपेत्यापीति चकारार्थः। अर्जुनमालक्ष्यभगवानाहेति संबन्धः। अन्तरेणापि कर्माणि श्रवणादिभिर्ज्ञानावाप्तिर्भविष्यतीति परबुद्धिमनुरुध्य विशिनष्टि कर्मेति। विभागवचनवशादसमुच्चयश्चेदुभयोरपि ज्ञानकर्मणोः स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुत्वमन्यथा कर्मवज्ज्ञानमपि न स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थं साधयेदित्याशङ्क्य संबन्धान्तरमाह अथवेति। तर्हि ज्ञाननिष्ठापि कर्मनिष्ठावन्निष्ठात्वाविशेषान्न स्वातन्त्र्येण पुरुषार्थहेतुरिति समुच्चयसिद्धिरित्याशङ्क्याह ज्ञाननिष्ठा त्विति। नहि रज्जुतत्त्वज्ञानमुत्पन्नं फलसिद्धौ सहकारिसापेक्षमालक्ष्यते। तथेदमपि चोत्पन्नं मोक्षाय नान्यदपेक्षते तदाह अन्येति।यस्य चैतत्कर्म इति श्रुताविव कर्मशब्दस्य क्रियमाणवस्तुविषयत्वमाशङ्क्य व्याचष्टे क्रियाणामिति। ताश्च नित्यनैमित्तिकत्वेन विभजते यज्ञादीनामिति। अस्मिन्नेव जन्मन्यनुष्ठितानां कर्मणां बुद्धिशुद्धिद्वारा ज्ञानकारणत्वे ब्रह्मचारिणां कुतो ज्ञानोत्पत्तिर्जन्मान्तरकृतानां कर्मणां वा तथात्वे गृहस्थादीनामैहिकानि कर्माणि न ज्ञानहेतवः स्युरित्याशङ्क्यानियमं दर्शयति इहेति। नेमानि सत्त्वशुद्धिकारणान्युपात्तदुरितप्रतिबन्धादित्याशङ्क्याह उपात्तेति। तर्हि तावतैव कृतार्थानां कुतो ज्ञाननिष्ठाहेतुत्वं तत्राह तत्कारणत्वेनेति। कर्मणां चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानहेतुत्वे मानमाह ज्ञानमिति। अनारम्भशब्दस्योपक्रमविपरीतविषयत्वं व्यावर्तयति अननुष्ठानादिति। निष्कर्मणः संन्यासिनः कर्मज्ञानं नैष्कर्म्यमिति व्याचष्टे निष्कर्मेति। कर्माभावावस्थां व्यवच्छिनत्ति ज्ञानयोगेनेति। तस्याः साधनपक्षपातित्वं व्यावर्तयति निष्क्रियेति। कर्मानुष्ठानोपायलब्धा ज्ञाननिष्ठा स्वतन्त्रा पुमर्थहेतुरिति प्रकृतार्थसमर्थनार्थं व्यतिरेकवचनस्यान्वये पर्यवसानं मत्वा व्याचष्टे कर्मणामिति। तद्विपर्ययमेव व्याचष्टे तेषामिति। उक्तेऽर्थे हेतुं पृच्छति कस्मादिति। जिज्ञासितं हेतुमाह उच्यत इति। उपायत्वेऽपि तदभावे कुतो नैष्कर्म्यासिद्धिरित्याशङ्क्याह नहीति। ज्ञानयोगं प्रति कर्मयोगस्योपायत्वे श्रुतिस्मृती प्रमाणयति कर्मयोगेति। श्रौतमुपायोपेयत्वप्रतिपादनं प्रकटयति श्रुताविति। यत्तु गीताशास्त्रे कर्मयोगस्य ज्ञानयोगं प्रत्युपायत्वोपपादनं तदिदानीमुदाहरति इहापि चेति। न कर्मणामित्यादिना पूर्वार्धं व्याख्यायोत्तरार्धं व्याख्यातुमाशङ्कयति नन्विति। आदिशब्देनशान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुःसंन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः इत्यादि गृह्यते। तत्रैव लोकप्रसिद्धिमनुकूलयति लोके चेति। प्रसिद्धतरंयतो यतो निवर्तते ततस्ततो विमुच्यते। निवर्तनाद्धि सर्वतो न वेत्ति दुःखमण्वपि इत्यादिदर्शनादिति शेषः। लौकिकवैदिकप्रसिद्धिभ्यां सिद्धमर्थमाह अतश्चेति। तत्रोत्तरत्वेनोत्तरार्धमवतार्य व्याकरोति अत आहेत्यादिना। एवकारार्थमाह केवलादिति। तदेव स्पष्टयति कर्मेति। उक्तमेव नञ्मनुकृष्य क्रियापदेन संगतिं दर्शयति न प्राप्नोतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.4।।न कर्मणामिति। मोक्षस्य कर्मसाध्यत्वमुच्यत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह इतश्चेति। स्ववर्णाश्रमोचिते युद्धादाविति शेषः। प्रागाधिकारिकत्वात्त्वया कर्म कर्तव्यमित्युक्तम् इदानीं कोऽपरो हेतुरुच्यते इत्यतो व्याचष्टे कर्मणामिति। अयमभिप्रायः कर्माणि न कार्याणीति वदन्प्रष्टव्यः किं ज्ञानं न मोक्षसाधनम् अपितु कर्माकरणमेवेति मत्वा कर्माणि त्यज्यन्ते उत ज्ञानं मोक्षसाधनं भवत्येव किन्तुकर्मणा बध्यते जन्तुः म.भा.12।241।7 इत्यादेः कर्माणि तत्प्रतिबन्धकानीति मत्वा। आद्येऽपि किं मोक्षस्य नैष्कर्म्यशब्दवाच्यत्वमात्रमाश्रित्येदमुच्यते अथवा क्रियाकारकफलरूपस्य संसारस्य कर्मैव बीजम्। अकरणे च बीजाभावात्संसारो न भविष्यतीति युक्तिमाश्रित्य आद्यस्येदं दूषणम्न कर्मणां इति। नैष्कर्म्यशब्दस्यान्यथापि व्याख्यानान्नाद्य इत्यर्थः। ततः किमित्यत आह ज्ञानमेवेति। उक्तमाक्षिप्य समाधत्ते कुत इति। नैष्कर्म्यशब्दस्यान्यार्थतामङ्गीकृत्य कर्माकरणस्य मोक्षसाधनत्वनिराकरणे को हेतुः इत्यर्थः। कथमस्य हेतुत्वं इत्यतो व्याचष्टे सर्वदेति। प्रलयेऽपि सम्भवार्थं स्थूलेन सूक्ष्मेण वेत्युक्तम्। तथापि कथं हेतुत्वमित्यत आह यदीति।स्यात् इत्यस्य पूर्वोत्तराभ्यां सम्बन्धः।स्थावराणां इत्यनधिकृतोपलक्षणम्। ततश्चानादौ संसारेऽनधिकृतदेहस्य सम्भवेन मुक्तिप्रसङ्गादधुनाऽपि दृश्यमानस्य पुरुषत्वं न स्यादिति भावः। द्वितीयनिरासेऽप्यस्यैवार्थस्य तात्पर्यमाह न चेति। कर्माभावात् संसारबीजाभावात्। अत्र नैष्कर्म्यमिति मुक्तिनामैव न तु परप्रमाणानुवादः। कुतो न भवतीत्यतोऽत्रापि पुरुषत्वादिति हेतुमभिप्रेत्याह प्रतीति। जन्मनिजन्मनि कृतानामित्यर्थः। पुरुषत्वेनानादौ संसारेऽधिकृतानन्तजन्मसम्भवात्। तत्र कृतानामनन्तकर्मणां भावात्। किमद्याकरणमात्रेण भवतीत्यर्थः।ननु पूर्वपूर्वशरीरकृतानि कर्माण्युत्तरोत्तरशरीरे भुक्तानि तत्कुतोऽनन्तकर्मणां भाव इत्यत आह न चेति। कुतो नेत्यत आह एकस्मिन्निति। हिशब्दो हेतौ। बहून्यपि भुज्यन्तां को दोष इत्यत आह तानि चेति तानि च कानिचिदिति सम्बन्धः एकैकानीति प्रत्येकमित्यर्थः। ननु तथाविधान्यप्यनधिकृतजन्मभिर्मुक्तानीत्यत आह तत्र चेति। तेषु कर्मसु भुञ्जन्भुञ्जानः। शेषेण कर्मशेषेण। मानुष्ये चाकरणमसम्भावितमित्याह ततश्चेति। असमाप्तिर्भोगेन कर्मणामिति शेषः। सम्भावनामात्रेणेदमुक्तं न तु प्रमितमित्यत आह तच्चोक्तमिति। चतुर्दशवर्षात्। अनूनो दशको यस्येति विग्रहः। ह्रस्वदीर्घव्यत्ययेन चतुर्दशोर्ध्वजीवीनीति स्त्रिया विशेषणम्। संसारश्चेति कर्मणामनन्तत्वोपपादनम्। अतो भोगेन क्षयासम्भवात्। अवित्वा अविदित्वा। पुरुषशब्देनानादिदेहसम्बन्ध उक्तः सोऽसिद्ध इत्यत आह यदीति। अतत्प्राप्तिराकस्मिकस्य संसारस्याप्राप्तिः स्यात् अतः पुरुषत्वं सिद्धमिति। ननु सन्तु प्राग्भवीयान्यनन्तकर्माणि तथापि बन्धकानि कथं प्रेक्षावता क्रियेरन् न ह्यनन्तानि पापानि प्राक्तनानि सन्तीत्येतावताऽद्य क्रियन्त इत्यत आह अबन्धकत्वं त्विति। कर्मणां बन्धाहेतुत्वं त्वकामनादिनैव भवति न त्वकरणेन प्रत्यवायस्यैव प्राप्तेरित्यर्थः। अकामेनाबन्धकत्वं भगवत्सम्मतमिति भावेनाह तच्चेति। शङ्करस्तुअकरणमसन्नसन्तं प्रत्यवायं जनयति कथमसतः सज्जायेत छा.उ.6।2।2 इति श्रुतेः इत्यवादीत्। तद्भास्करः प्रत्यषेधीत्। द्रव्यविषया श्रुतिः गुणस्त्वसतोऽपि जायते इति। उभावपि स्थूलदृश्वानौ न ह्यकरणमसत् तथा सति करणप्रसङ्गात्। किन्त्वभावः स च भाववत्तत्त्वमेवेति कथमकारणम्। गुणं प्रति कारणत्वे च द्रव्यकारणत्वं कुतो न भवेत्। ननुचात्रोपादानत्वस्य विवक्षितत्वादकारणस्य चाभावरूपतया सत्त्वेऽप्यत्र विवक्षितापादनत्वानुपपत्तेर्नप्रत्यवायजनकत्वमित्यभिप्राय इत्यत आह न हीति।न ह्यत्रोपादानत्वं विवक्षितं किन्तु निमित्तत्वमेवेत्युक्तम्।न च सन्न्यसनादेव इति पुनरुक्तम् अत्रापि कर्मसन्न्यसनस्य मोक्षसाधनत्वोक्तेरित्यत आह नन्विति।निष्कामं ज्ञानपूर्वं च इति मानवे वाक्ये तावन्निष्कामकर्मणा मोक्षः स्मृतः। स चोपपत्त्यन्तरादर्शनान्निष्कामकर्मणः फलाभावादित्येव तत्रोपपत्तिरङ्गीकार्या यत एवं फलाभावस्यैव प्राधान्यम् अतोऽकरणेऽपि फलाभावस्य साम्यान्मोक्षो भवत्येव। यत्प्राग्भवीयकर्मफलमुक्तं निष्कामकरणपक्षेऽपि तत्समानम्। न च विनिगमने कारणाभावः आयासाभावस्य सत्त्वात्। न च प्रत्यवायप्राप्तिः अमुमुक्षुविषयत्वसम्भवात्। अतो न कर्माणि करोमीति भावः। अनेन कथमस्य परिहारः इत्यत आह सन्न्यास इति। तेन च निष्कामकर्मकरणमुपलक्ष्यत इति भावः। निष्कामकर्मकरणान्मोक्षं न प्राप्नोतीति। अतो न तत् प्रतिबन्दीग्रहणं युक्तमित्यनेनोक्तम्। तथा च स्मृतिविरोध इत्यतः स्मृतेरभिप्रायमाह अकामेति। सकाशादिति शेषः पुंसामिति वा। अकामकर्मभिरन्तःकरणशुद्धिद्वारा ज्ञानं जायत इत्येतत्कुतः इत्यत आह तच्चोक्तमिति। नन्वत्र वैराग्यं जायत इत्युच्यते न तु ज्ञानमिति तत्राह विरक्तानामेवेति। प्रागपि वैराग्यद्वारेत्यभिमतमिति भावः। तथापि कथं विरोधपरिहारः गीतायामकामकर्मणां मोक्षसाधनत्वाभावावधारणात् इत्यतस्तदभिप्रायमाह न त्विति। फलाभावोपपत्तिकं कर्मणां मोक्षसाधनत्वं निषिद्ध्यते न तु सर्वथाऽपीत्यर्थः। प्रतिबन्दीं मोचयति कर्माभावादिति। अतः कर्माभावान्न मोक्ष इत्यर्थः। श्लोकतात्पर्यमुपसंहरति अत इति।ननु यत्याश्रमो मोक्षसाधनत्वेन श्रुत्यादिप्रसिद्धः तत्र चेयमेवोपपत्तिः। यत्तद्धर्माणां फलाभावः अतस्तत्साम्यादकरणेऽपि मोक्षो भवतीत्येतच्छङ्कानिरासार्थं चोक्तंन च सन्न्यसनादेव इति। एवं तर्हि श्रुत्यादिविरोध इत्यत आह यत्याश्रमस्त्विति। प्रायत्यं प्रयतत्वमीश्वरे मनस्समाधानम्। यतेर्द्वारद्वयेन मोक्षसाधनत्वं श्रुत्यादेरभिप्रेतम्। फलाभावोपपत्तिकं तु गीतायां निवारितं अतो न विरोध इति भावः। आश्रमान्तरेऽपि प्रायत्यसम्भवात्किं तदर्थं यत्याश्रमेण इत्यत आह अप्रयतत्वमेवेति। इतरकर्मसु यजनादिषु। प्रायत्यं कथं मोक्षसाधनं इत्यतो व्यतिरेकमुखेनोपपादयति अप्रयतानां चेति। प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् कठो.2।23 इति श्रुतिशेषः। अशान्तोऽभगवन्निष्ठः। असमाहितस्तत्र चित्तसमाधानरहितः। भगवत्तोषणस्याश्रमान्तरेऽपि सम्भवात्किं यत्याश्रमेण इत्यत आह महांश्चेति। तुरीयं परमहंसाख्यम्। वाक्यशेषेणान्वयः। यत्याश्रम एव चेत्प्रायत्यं महान्भगवतस्तोषश्च तर्हि तद्रहितानामाधिकारिकाणां तदुभयाभावप्रसङ्ग इत्यत आह आधिकारिकास्त्विति। तत्स्था अधिकारस्थाः। स एव अधिकार एव। तुष्यत्यनेनेति तोषः। समासान्तविधेरनित्यत्वादादिराज्ञामित्युक्तम्। यथोक्तं महाभाष्ये शुच्यांपि तटाकानि इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.4।।इतश्च नियोक्ष्यामीत्याह न कर्मणामिति। कर्मणां युद्धादीनामनारम्भेण नैष्कर्म्यं निष्कर्मतां काम्यकर्मपरित्यागेन प्राप्यत इति मोक्षं नाश्नुते। ज्ञानमेव तत्साधनं न तु कर्माकरणमित्यर्थः। कुतः पुरुषत्वात्। सर्वदा स्थूलेन सूक्ष्मेण वा पुरेण युक्तो ननु जीवः यदि कर्माकरणेन मुक्तिः स्यात् स्थावराणाम्। न चाकरणे कर्माभावान्मुक्तिर्भवति प्रतिजन्मकृतानामनन्तकर्मणां भावात्।न च सर्वाणि भुक्तानि एकस्मिञ्च्छरीरे बहूनि हि कर्माणि करोति। तानि चैकैकानि बहुजन्मफलानि कानिचित् तत्र चैकैकानि कर्माणि भुञ्जन्प्राप्नोत्येव शेषेण मानुष्यम्। ततश्च बहुशरीरफलकर्माणीत्यसमाप्तिः। तच्चोक्तंजीवंश्चतुर्दशादूर्ध्वं पुरुषो नियमेन तु। स्त्री वाप्यनूनदशकं देहं मानुषमार्जते। चतुर्दशोर्ध्वजीवीनि संसारश्चादिवर्जितः। अतोऽवित्वा परं देवं मोक्षाशा का महामुने इति ब्राह्मे। यदि सादिः स्यात्संसारः पूर्वकर्माभावादतत्प्राप्तिः। अबन्धकत्वं त्वकामेनैव भवति। तच्च वक्ष्यतेअनिष्टंमिष्टं 18।12 इति।ननु निष्कामकर्मणः फलाभावान्मोक्षः स्मृतः।निष्कामं ज्ञानपूर्वं तु निवृत्तमिह चोच्यते। निवृत्तं सेवमानस्तु ब्रह्माभ्येति सनातनम् इति मानवे। अतस्तत्साभ्यादकरणेऽपि भवतीत्यत आह न चेति। सन्न्यासः काम्यकर्मपरित्यागः। काम्यानां कर्मणां 18।2 इति वक्ष्यमाणत्वात्। अकामकर्मणामन्तःकरणशुद्ध्या ज्ञानान्मोक्षो भवति। तच्चोक्तंकर्मभिः शुद्धसत्त्वस्य वैराग्यं जायते हृदि इति भागवते । विरक्तानामेव च ज्ञानमुक्तम्न तस्य तत्त्वग्रहणाय साक्षाद्वरीयसीरपि वाचः समासन्। स्वप्ने निरुक्त्या गृहमेधसौख्यं न यस्य हेयानुमितं स्वयं स्यात् भाग.5।11।3 इति। न तु फलाभावात् कर्माभावात्। अतो न कर्मत्याग एव मोक्षसाधनम्।यत्याश्रमस्तु प्रायत्यार्थो भगवत्तोषणार्थश्च। अप्रयतत्वमेव हि प्रायो गृहस्थादीनाम् इतरकर्मोद्योगात्। अप्रयतानां च न ज्ञानम् तथा हि श्रुतिः नाशान्तो नासमाहितः कठो.2।23 इति। महांश्च यत्याश्रमे भगवतस्तोषः। तथा ह्याह यत्याश्रमं तुरीयं तु दीक्षां मम सुतोषिणीम् इति नारायणाष्टाक्षरकल्पे। आधिकारिकास्तु तथैव प्रायत्ये समर्थाः। स एव च महान्भगवतस्तोषः। तच्चोक्तम् देवादीनामादिराज्ञां महोद्योगोऽपि भोगिनः। विष्णोश्चलति तद्भोगोऽत्यतीव हरितोषणम् इति पाद्मे।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.4।।न शास्त्रीयाणां कर्मणाम् अनारम्भाद् एव पुरुषः नैष्कर्म्यं ज्ञाननिष्ठाम् आप्नोति सर्वेन्द्रियव्यापाराख्यकर्मोपरतिपूर्विकां ज्ञाननिष्ठां न प्राप्नोति इत्यर्थः। न च आरब्धस्य शास्त्रीयस्य कर्मणः त्यागात् यतः अनभिसंहितफलस्य परमपुरुषाराधनविषयस्य कर्मणः सिद्धिः आत्मनिष्ठा स्यात् अतः तेन विना तां न प्राप्नोति अनभिसंहितफलैः कर्मभिः अनाराधितगोविन्दैः अविनष्टानादिकालप्रवृत्तानन्तपापसंचयैः अव्याकुलेन्द्रियतापूर्विका आत्मनिष्ठा दुःसंपाद्या।एतद् एव उपपादयति
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.4।। न कर्मणां क्रियाणां यज्ञादीनाम् इह जन्मनि जन्मान्तरे वा अनुष्ठितानाम् उपात्तदुरितक्षयहेतुत्वेन सत्त्वशुद्धिकारणानां तत्कारणत्वेन च ज्ञानोत्पत्तिद्वारेण ज्ञाननिष्ठाहेतूनाम् ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः। यथादर्शतलप्रख्ये पश्यत्यात्मानमात्मनि (महा0 शान्ति0 204।8) इत्यादिस्मरणात् अनारम्भात् अननुष्ठानात् नैष्कर्म्यं निष्कर्मभावं कर्मशून्यतां ज्ञानयोगेन निष्ठां निष्क्रियात्मस्वरूपेणैव अवस्थानमिति यावत्। पुरुषः न अश्नुते न प्राप्नोतीत्यर्थः।।कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं नाश्नुते इति वचनात् तद्विपर्ययात् तेषामारम्भात् नैष्कर्म्यमश्नुते इति गम्यते। कस्मात् पुनः कारणात् कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं नाश्नुते इति उच्यते कर्मारम्भस्यैव नैष्कर्म्योपायत्वात्। न ह्युपायमन्तरेण उपेयप्राप्तिरस्ति। कर्मयोगोपायत्वं च नैष्कर्म्यलक्षणस्य ज्ञानयोगस्य श्रुतौ इह च प्रतिपादनात्। श्रुतौ तावत् प्रकृतस्य आत्मलोकस्य वेद्यस्य वेदनोपायत्वेन तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन (बृह0 उ0 4।4।22) इत्यादिना कर्मयोगस्य ज्ञानयोगोपायत्वं प्रतिपादितम्। इहापि च संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः (गीता 5।6) योगिनः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये (गीता 5।11) यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् (गीता 18।5) इत्यादि प्रतिपादयिष्यति।।ननु च अभयं सर्वभूतेभ्यो दत्त्वा नैष्कर्म्यमाचरेत् इत्यादौ कर्तव्यकर्मसंन्यासादपि नैष्कर्म्यप्राप्तिं दर्शयति। लोके च कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यमिति प्रसिद्धतरम्। अतश्च नैष्कर्म्यार्थिनः किं कर्मारम्भेण इति प्राप्तम्। अत आह न च संन्यसनादेवेति। नापि संन्यसनादेव केवलात् कर्मपरित्यागमात्रादेव ज्ञानरहितात् सिद्धिं नैष्कर्म्यलक्षणां ज्ञानयोगेन निष्ठां समधिगच्छति न प्राप्नोति।।कस्मात् पुनः कारणात् कर्मसंन्यासमात्रादेव केवलात् ज्ञानरहितात् सिद्धिं नैष्कर्म्यलक्षणां पुरुषो नाधिगच्छति इति हेत्वाकाङ्क्षायामाह
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【 Verse 3.5 】
▸ Sanskrit Sloka: न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् | कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व: प्रकृतिजैर्गुणै: ||
▸ Transliteration: na hi kaścitkṣaṇamapi jātu tiṣṭhatyakarmakṛt | kāryate hyavaśaḥ karma sarvaḥ prakṛtijairguṇaiḥ ||
▸ Glossary: na: not; hi: surely; kaścit: anyone; kṣaṇam: for a moment; api: also; jātu: even; tiṣṭhati: stands; akarmakṛt: without doing something; kāryate: forced to work; hi: surely; avaśaḥ: helplessly; karma: action; sarvaḥ: all; prakṛtijaih: of the modes of material nature; guṇaiḥ: by the attributes
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.5 Surely, not even for a moment can anyone stand without doing something. He is always in action, despite himself, as this is his very nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.5।।कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.5।। कोई भी पुरुष कभी क्षणमात्र भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता क्योंकि प्रकृति से उत्पन्न गुणों के द्वारा अवश हुए सब (पुरुषों) से कर्म करवा लिया जाता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.5 नहि not? कश्चित् anyone? क्षणम् a moment? अपि even? जातु verily? तिष्ठति remains? अकर्मकृत् without performing action? कार्यते is made to do? हि for? अवशः helpless? कर्म action? सर्वः all? प्रकृतिजैः born of Prakriti? गुणैः by the alities.Commentary The Gunas (alities of Nature) are three? viz.? Sattva? Rajas and Tamas. Sattva is harmony or light or purity Rajas is passion or motion Tamas is inertia or darkness. Sattvic actions help a man to attain to Moksha. Rajasic and Tamasic actions bind a man to Samsara.These alities cannot affect a man who has knowledge of the Self. He has crossed over these alities. He has become a Gunatita (one who has transcended the alities of Nature). The ignorant man who has no knowledge of the Self and who is swayed by Avidya or nescience is driven helplessly to action by the Gunas. (Cf.IV.16?XVIII.11).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.5. For, no one can ever remain, even for a moment, as a non-performer of action; because everyone, being not master of himself, is forced to perform action by the Strands born of the Prakrti (Material cause)
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.5 He cannot even for a moment remain really inactive, for the Qualities of Nature will compel him to act whether he will or no.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.5 No man can, even for a moment, rest without doing work; for everyone is caused to act, in spite of himself, by the Gunas born of Nature.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.5 Because, no one ever remains even for a moment without doing work. For all are made to work under compulsion by the gunas born of Nature.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.5 Verily none can ever remain for even a moment without performing action; for everyone is made to act helplessly indeed by the alities born of Nature.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.4-5 Na karmanam etc Na hi etc. Knowledge, deserted by action, does not exist; and the action, combined with dexterity does not exist, [if it is] deserted by knowledge. Therefore knowledge and action constitute one and the same thing. Hence it has been delclared :
'Knowledge is not deserted by action and action is
not deserted by knowledge. [Hence] a teacher who
is well accomplished in knowledge and action, is
the cutter of the fetters of the fettered'.
Therefore the action that is included within the knowledge cannot be avoided. For, the body, the organ of speech and the mind are, by nature, in a perpetual motion; and hence an individual, being simply under the control of other than himself, necessarily performs one action or the other. For, the body, the speech-organ and the mind are of the nature of throbing.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.5 In this world, no man can rest without doing work; for every person, even though he may have determined, 'I will not do anything,' is caused to act, i.e., is compelled to act according to the Gunas born of Prakrti. The Gunas are Sattva, Rajas and Tamas which increase in accordance with his old Karma. Conseently, Jnana Yoga can be attained only by means of a purified inner organ after annulling the old accumulation of sins by means of Karma Yoga of the aforesaid characteristics and bringing Sattva and other Gunas under control.
Otherwise, one who engages oneself in Jnana Yoga becomes a hypocrite:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.5 Hi, because; na kascit, no one; jatu, ever; tisthati, remains; api, even; for so much time as a ksanam, moment; akarma-krt, without doing work. Why? Hi, for; sarvah, all creatures; karyate karma, are made to work; verily avasah, under compulsion; gunaih, by the gunas-sattva (goodness); rajas (activity), and tamas (mental darkness); prakrti-jaih, born of Nature. The word 'unenlightened' has to be added to the sentence, since the men of realzation have been spoken of separately in, 'who is not distracted by the three gunas (alities)' (14.23). For Karma-yoga is meant only for the unenlightened, nor for the men of Knowledge. Karma-yoga, on the other hand, is not pertinent for the men of Knowledge who, because of their not moving away from their own Self, are not shaken by the gunas. This has been explained similarly in, 'he who has known this One as indestructible' (2.21). But, if one who is not a knower of the self does not perform prescribed action, then this is certainly bad. Hence the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.5।। प्रकृति के सत्त्व रज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में मनुष्य सदैव रहता है। क्षणमात्र भी पूर्णरूप से निष्क्रिय होकर वह नहीं रह सकता। निष्क्रियता जड़ पदार्थ का धर्म है। शरीर से कोई कर्म न करने पर भी हम मन और बुद्धि से क्रियाशील रहते ही हैं। विचार क्रिया केवल निद्रावस्था में लीन हो जाती है। जब तक हम इन गुणों के प्रभाव में रहते हैं तब तक कर्म करने के लिए हम विवश होते हैं।इसलिए कर्म का सर्वथा त्याग करना प्रकृति के नियम के विरुद्ध होने के कारण असम्भव है। शारीरिक कर्म न करने पर भी मनुष्य व्यर्थ के विचारों में मन की शक्ति को गँवाता है। अत गीता का उपदेश है कि मनुष्य शरीर से तो कर्म करे परन्तु समर्पण की भावना से इससे शक्ति के अपव्यय से बचाव होने के साथसाथ उसके व्यक्तित्व का भी विकास होता है।आत्मस्वरूप को नहीं जानने वाले पुरुष के लिए कर्तव्य का त्याग उचित नहीं है।भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.5।। तत्र हेतुवाकाङ्क्षायामाह नहीति। हि यस्मात्कश्चि दज्ञोऽशुद्धचित्तः क्षणमपि कालं जातु कदाचिदपि कस्यांचिदप्यवस्थायां अकर्मकृत्सन्न तिष्ठति। हि यस्मादस्वतन्त्र एव सर्वोऽज्ञलोकः प्रकृतितो जातैः सत्वरजस्तमोभिर्गुणैः कर्म कार्यते। एतेन कर्मणां च संन्यासस्तेष्वनासक्तिमात्रं नतु स्वरुपेणाशक्यत्वादित्याह नहीति। कश्चिदपि ज्ञानी वाऽज्ञो वेति परास्तम्। अस्य पक्षस्य युक्तिशतेन भगवत्पादैर्निराकृतत्वात्गुणैर्यो न विचाल्यते इति वक्ष्यमाणविरोधस्यात्रैवाचार्यैरुक्तत्वाच्च। अतोऽज्ञं कर्मत्यागिनं निन्दति कर्मेन्द्रियाणीति स्वपरग्रन्थविरोधाच्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.5।।ततः कर्मजन्यशुद्ध्यभावे बहिर्मुखः हि यस्मात्क्षणमपि कालं जातु कदाचित्कश्चिदप्यजितेन्द्रियोऽकर्मकृत्सन्न तिष्ठति अपितु लौकिकवैदिककर्मानुष्ठानव्यग्र एव तिष्ठति। तस्मादशुद्धचित्तस्य संन्यासो न संभवतीत्यर्थः। कस्मात्पुनरविद्वान्कर्माण्यकुर्वाणो न तिष्ठति। हि यस्मात्सर्वः प्राणी चित्तशुद्धिरहितोऽवशोऽस्वतन्त्रएव सन् प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैरभिव्यक्तैः कार्याकारेण सत्त्वरजस्तमोभिः स्वभावप्रभवैर्वा रागद्वेषादिभिर्गुणैः कर्म लौकिकं वैदिकं वा कार्यते। अतः कर्माण्यकुर्वाणो न कश्चिदपि तिष्ठतीत्यर्थः। यतः स्वाभाविका गुणाश्चालकाः अतः परवशतया सर्वदा कर्माणि कुर्वतोऽशुद्धबुद्धेः सर्वकर्मसंन्यासो न संभवतीति न संन्यासनिबन्धना ज्ञाननिष्ठा संभवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.5।।एतदेव प्रपञ्चयति नहीति। अवशः कर्मजशुद्ध्यभावादजितचित्तः कश्चिदपि जातु कदाचित्समाधिकालेऽपि क्षणमप्यकर्मकृत् कर्माणि दुर्मनोरथादीन्यकुर्वन् हि प्रसिद्धं न तिष्ठति। हि यस्मात्सर्वोऽपि लोकः प्रकृतिजैर्गुणैः सत्त्वरजस्तमोभिः स्वभावप्रभवैः रागद्वेषादिभिर्वा कर्म कायिकं वाचिकं मानसिकं वा कार्यतेऽवश्यं तत्र प्रवर्त्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.5।।अज्ञात्वा कर्मकरणे तत्त्यागोऽपि न भवति ज्ञात्वाऽज्ञात्वा वा कर्म तु करोत्येवेत्याह न हीति। कश्चित् जातु कदाचित् क्षणमपि अकर्मकृत् कर्माण्यकुर्वन् न तिष्ठति। कुतः इत्यत आह सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः सात्त्विकादिभिः कर्म कार्यते कर्मणि प्रवर्त्यते। तत्र कारणमाह ह्यवश इति। हीति निश्चयेन। अवशः न मद्वशो भक्त इत्यर्थः। अतस्तदारम्भात् स्वरूपज्ञानानन्तरं प्राकृतकार्यतां तेषु ज्ञात्वा मद्वशो भूत्वा त्यजेदिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.5।। कर्मणां च संन्यासस्तेष्वनासक्तिमात्रं न तु स्वरुपेणा शक्यत्वादित्याह नहीति। जातु कास्यांचिदवस्थायां क्षणमात्रमपि कश्चिदपि ज्ञानी वाऽज्ञो वा अकर्मकृत्कर्माण्यकुर्वाणो न तिष्ठति। तत्र हेतुः प्रकृतिजैः स्वाभावप्रभवै राग्द्वेषादिगुणैः सर्वोऽपि जनः कर्म कार्यते कर्मणि प्रवर्तते अवशोऽस्वतन्त्रः सन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.5।।अतोऽवशः सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैर्वा कर्म कार्यत एव।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.5।।बिना ज्ञानके केवल कर्मसंन्यासमात्रसे मनुष्य निष्कर्मतारूप सिद्धिको क्यों नहीं पाता इसका कारण जाननेकी इच्छा होनेपर कहते हैं कोई भी मनुष्य कभी क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता क्योंकि सभी प्राणी प्रकृतिसे उत्पन्न सत्त्व रज और तमइन तीन गुणोंद्वारा परवश हुए अवश्य ही कर्मोंमें प्रवृत्त कर दिये जाते हैं। यहाँ सभी प्राणीके साथ अज्ञानी ( शब्द ) और जोड़ना चाहिये ( अर्थात् सभी अज्ञानी प्राणी ऐसे पढ़ना चाहिये ) क्योंकि आगे जो गुणोंसे विचलित नहीं किया जा सकता इस कथनसे ज्ञानियोंको अलग किया है अतः अज्ञानियोंके लिये ही कर्मयोग है ज्ञानियोंके लिये नहीं। क्योंकि जो गुणोंद्वारा विचलित नहीं किये जा सकते उन ज्ञानियोंमें स्वतः क्रियाका अभाव होनेसे उनके लिये कर्मयोग सम्भव नहीं है। ऐसे ही वेदाविनाशिनम् इस श्लोककी व्याख्यामें विस्तारपूर्वक कहा गया है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.5।। व्याख्या न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग किसी भी मार्गमें साधक कर्म किये बिना नहीं रह सकता। यहाँ कश्चित् क्षणम् और जातु ये तीनों विलक्षण पद हैं। इनमें कश्चित् पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि कोई भी मनुष्य कर्म किये बिना नहीं रहता चाहे वह ज्ञानी हो या अज्ञानी। यद्यपि ज्ञानीका अपने कहलानेवाले शरीरके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता तथापि उसके कहलानेवाले शरीरसे भी हरदम क्रिया होती रहती है। क्षणम् पदका प्रयोग करके भगवान् यह कहते हैं कि यद्यपि मनुष्य मैं हरदम कर्म करता हूँ ऐसा नहीं मानता तथापि जबतक वह शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानता है तबतक वह एक क्षणके लिये भी कर्म किये बिना नहीं रहता। जातु पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि जाग्रत् स्वप्न् सुषुप्ति मूर्च्छा आदि किसी भी अवस्थामें मनुष्य कर्म किये बिना यह नहीं रह सकता। इसका कारण भगवान् इसी श्लोकके उत्तरार्धमें अवशः पदसे बताते हैं कि प्रकृतिके परवश होनेके कारण उसे कर्म करने ही पड़ते हैं। प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है। साधकको अपने लियेकुछ नहीं करना है। जो विहित कर्म सामने आ जाय उसे केवल दूसरोंके हितकी दृष्टिसे कर देना है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेसे साधक निषिद्धकर्म तो कर ही नहीं सकता।बहुतसे मनुष्य केवल स्थूलशरीरकी क्रियाओंको कर्म मानते हैं पर गीता मनकी क्रियाओंको भी कर्म मानती है। गीताने शारीरिक वाचिक और मानसिक रूपसे की गयी मात्र क्रियाओंको कर्म माना है शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः (गीता 18। 15)। जिस शारीरिक अथवा मानसिक क्रियाओंके साथ मनुष्य अपना सम्बन्ध मान लेता है वे ही सब क्रियाएँ कर्म बनकर उसे बाँधनेवाली होती हैं अन्य क्रियाएँ नहीं।मनुष्योंकी एक ऐसी धारणा बनी हुई है जिसके अनुसार वे बच्चोंका पालनपोषण तथा आजीविका व्यापार नौकरी अध्यापन आदिको ही कर्म मानते हैं और इनके अतिरिक्त खानापीना सोना बैठना चिन्तन करना आदिको कर्म नहीं मानते। इसी कारण कई मनुष्य व्यापार आदि कर्मोंको छोड़कर ऐसा मान लेते हैं कि मैं कर्म नहीं कर रहा हूँ। परन्तु यह उनकी भारी भूल है। शरीरनिर्वाहसम्बन्धी स्थूलशरीरकी क्रियाएँ नींद चिन्तन आदि सूक्ष्मशरीरकी क्रियाएँ और समाधि आदि कारणशरीरकी क्रियाएँ ये सब कर्म ही हैं। जबतक शरीरमें अहंताममता है तबतक शरीरसे होनेवाली मात्र क्रियाएँ कर्म हैं। कारण कि शरीर प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति कभी अक्रिय नहीं होती। अतः शरीरमें अहंताममता रहते हुए कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता चाहे वह अवस्था प्रवृत्तिकी हो या निवृत्तिकी।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः प्रकृतिजन्य गुण (प्रकृतिके) परवश हुए प्राणियोंसे कर्म कराते हैं। परवश होनेपर प्रकृतिके गुणोंद्वारा कर्म कराये जाते हैं क्योंकि प्रकृति एवं उसके गुण निरन्तर क्रियाशील हैं (गाता 3। 27 13। 29)। यद्यपि आत्मा स्वयं अक्रिय असंग अविनाशी निर्विकार तथा निर्लिप्त है तथापि जबतक वह प्रकृति एवं उसके कार्य स्थूल सूक्ष्म और कारणशरीरमें किसी भी शरीरके साथ अपना सम्बन्ध मानकर उससे सुख चाहता है तबतक वह प्रकृतिके परवश रहता है (गीता 14। 5)। इसी परवशताको यहाँ अवशः पदसे कहा गया है। नवें अध्यायके आठवें श्लोकमें और आठवें अध्यायके उन्नीसवेँ श्लोकमें भी प्रकृतिके साथ सम्बन्ध माननेसे परवश हुए जीवके द्वारा कर्म करनेकी बात कही गयी है।स्वभाव बनता है वृत्तियोंसे वृत्तियाँ बनती हैं गुणोंसे और गुण पैदा होते हैं प्रकृतिसे। अतः चाहे स्वभावके परवश कहो चाहे गुणोंके परवश कहो और चाहे प्रकृतिके परवश कहो एक ही बात है। वास्तवमें सबके मूलमें प्रकृतिजन्य पदार्थोंकी परवशता ही है। इसी परवशतासे सभी परवशताएँ पैदा होती हैं। अतः प्रकृतिजन्य पदार्थोंकी परवशताको ही कहीं कालकी कहीं स्वभावकी कहीं कर्मकी और कहीं गुणोंकी परवशता कह दिया है। तात्पर्य यह है कि यह जीव जबतक प्रकृति और उसके गुणोंसे अतीत नहीं होता परमात्माकी प्राप्ति नहीं कर लेता तबतक यह गुण काल स्वभाव आदिके अवश (परवश) ही रहता है अर्थात् यह जीव जबतक प्रकृतिके साथ अपना सम्बन्ध मानता है प्रकृतिमें स्थित रहता है तबतक यह कभी गुणोंके कभी कालके कभी भोगोंके और कभी स्वभावके परवश होता रहता है कभी स्ववश (स्वतन्त्र) नहीं रहता। इनके सिवाय यह परिस्थिति व्यक्ति स्त्री पुत्र धन मकान आदिके भी परवश होता रहता है। परन्तु जब यह गुणोंसे अतीत अपने स्वरूपका अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव कर लेता है तो फिर इसकी यह परवशता नहीं रहती और यह स्वतःसिद्ध स्वतन्त्रताको प्राप्त हो जाता है।विशेष बातप्रकृतिकी सक्रिय (स्थूल) और अक्रिय (सूक्ष्म) दो अवस्थाएँ होती हैं जैसे कार्य करना सक्रिय अवस्था है औरकार्य न करना (निद्रा आदि) अक्रिय अवस्था। वास्तवमें अक्रिय अवस्थामें भी प्रकृति अक्रिय नहीं रहती प्रत्युत उसमें सूक्ष्मरूपसे सक्रियता रहती है। जैसे किसी सोये हुए मनुष्यको जागनेके समयसे पूर्व ही जगा देनेपर वह कहता है कि मुझे कच्ची नींदमें जगा दिया। इससे यह सिद्ध हुआ कि नींदकी अक्रिय अवस्थामें भी नींदके पकनेकी क्रिया हो रही थी। जब पूरी नींद लेनेके बाद मनुष्य जागता है तब उपर्युक्त बात नहीं कहता क्योंकि नींदका पकना पूर्ण हो गया। इसी प्रकार समाधि प्रलय महाप्रलय आदिकी अवस्थाओंमें भी सूक्ष्मरूपसे क्रिया होती रहती है।वास्तवमें देखा जाय तो प्रकृतिकी कभी अक्रिय अवस्था होती ही नहीं क्योंकि वह प्रतिक्षण बदलनेवाली है। स्वयं आत्मामें कर्तापन नहीं है परन्तु प्रकृतिके कार्य शरीरादिके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे वह प्रकृतिके परवश हो जाता है। इसी परवशताके कारण स्वयं अकर्ता होते हुए भी वह अपनेको कर्ता मानता रहता है। वस्तुतः आत्मामें कोई भी परिवर्तनरूप क्रिया नहीं होती। जैसे प्रकृतिद्वारा समस्त सृष्टिकी क्रियाएँ स्वाभाविकरूपसे हो रही हैं ऐसे ही उसके द्वारा बालकपन जवानी आदि अवस्थाएँ और भोजनका पाचन श्वासोंका आवागमन आदि क्रियाएँ एवं इसी प्रकार देखना सुनना आदि क्रियाएँ भी स्वाभाविकरूपसे हो रही हैं। परन्तु जीवात्मा कुछ क्रियाओंमें अपनेको कर्ता मानकर बँध जाता है।प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है पर शुद्ध स्वरूपमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। वास्तवमें प्राकृतिक पदार्थोंकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। प्रतिक्षण बदलते हुए पुञ्जका नाम ही पदार्थ है। पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। अगर साधक ऐसा वास्तविक अनुभव कर ले कि सम्पूर्ण क्रियाएँ पदार्थोंमें ही हो रही हैं और पदार्थोके साथ मेरा किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है तो वह परवशतासे मुक्त हो सकता है। कर्मयोगी प्रतिक्षण परिवर्तनशील पदार्थोंकी कामना ममता और आसक्तिका त्याग करके इस परवशताको मिटा देता है।भगवान्ने इस श्लोकमें जो बात कही है वही बात उन्होंने अठारहवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी कही है कि प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध मानते हुए कोई भी मनुष्य कर्मोंका सम्पूर्णतासे त्याग नहीं कर सकता न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः। सम्बन्ध पीछेके श्लोकमें यह कहा गया है कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता। इसपर यह शंका हो सकती है कि मनुष्य इन्द्रियोंकी क्रियाओंको हठपूर्वक रोककर भी तो अपनेको अक्रिय मान सकता है। इसका समाधान करनेके लिये आगेका श्लोक कहते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.4 3.5।।तथा हि न कर्मणामिति। न हीति। ज्ञानं कर्मणा रहितं न भवति कर्म च कौशलोपेतं ज्ञानरहितं न भवति इत्येकमेव वस्तु ज्ञानकर्मणी। तथाचोक्तम्।न क्रियारहितं ज्ञानं न ज्ञानरहिता क्रिया।ज्ञानक्रियाविनिष्पन्न आचार्यः पशुपाशहा।। इति तस्मात् ज्ञानान्तर्वर्ति कर्म अपरिहार्यम्। यतः परवश एव कायवाङ्मनसां परिस्पन्दात्मकत्वात् अवश्यं किञ्चित्करोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.5।।उक्तेऽर्थे बुभुत्सितं हेतुं वक्तुमुत्तरश्लोकमुत्थापयति कस्मादिति। कस्मान्न कर्मसंन्यासादेव सिद्धिमधिगच्छतीति पूर्वेण संबन्धः। कदाचित्क्षणमात्रमपि न कश्चिदकर्मकृत्तिष्ठतीत्यत्र हेतुत्वेनोत्तरार्धं व्याचष्टे कस्मादिति। सर्वशब्दाञ्ज्ञानवानपि गुणैरवशः सन् कर्म कार्यते ततश्च ज्ञानवतः संन्यासवचनमनवकाशं स्यादित्याशङ्क्याह अज्ञ इतीति। तमेव वाक्यशेषं वाक्यशेषावष्टम्भेन स्पष्टयति यत इति। आत्मज्ञानवतो गुणैरविचाल्यतया गुणातीतत्ववचनादज्ञस्यैव सत्त्वादिगुणैरिच्छाभेदेन कार्यकरणसंघातं प्रवर्तयितुमशक्तस्याजितकार्यकरणसंघातस्य क्रियासु प्रवर्तमानत्वमित्यर्थः। ज्ञानयोगेनेत्यादिनोक्तन्यायाच्च वाक्यशेषोपपत्तिरित्याह सांख्यानामिति। ज्ञानिनां गुणप्रयुक्तचलनाभावेऽपि स्वाभाविकचलनबलात्कर्मयोगो भविष्यतीत्याशङ्क्याह ज्ञानिनां त्विति। प्रत्यगात्मनि स्वारसिकचलनासंभवे प्रागुक्तं न्यायं स्मारयति तथाचेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.5।।ज्ञानरहितात् कर्मत्यागरूपाद्यत्याश्रमात्सिद्धिं न समधिगच्छति 3।4 इति किल पूर्वमुक्तम् तत्रहेत्वाकाङ्क्षायां न हि कश्चिदित्युच्यते इति व्याख्यानमसदिति भावेन श्लोकतात्पर्यमाह न त्विति। न ह्यत्र ज्ञानस्यावश्यकत्वे किञ्चिदुच्यते। नापि यज्ञादिकर्माकरणस्यासम्भवोऽभिधीयते येन प्रकृतसङ्गतिः स्यात् किन्तु शरीरयात्राद्यर्थानां कर्मणामपरिहार्यत्वम्। अतो नेदं व्याख्यानं अपि तर्हिकर्मणा बध्यते जन्तुः म.भा.12।241।7 इति स्मृतिमाश्रित्य यस्तृतीयः पक्षस्तमाशङ्क्ययज्ञार्थात् 3।9 इति स्मृतेरर्थसङ्कोचं वक्ष्यति तत्र कुतः स्मृतेरर्थसङ्कोचः इत्याकाङ्क्षा स्यात् तामपाकर्तुमुपोद्धातन्यायेन कर्मशब्दस्तावदसङ्कुचितार्थः परेणाप्यङ्गीकर्तुमशक्य इति प्रतिपादयितुं कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं नैव शक्यानीत्यनेनाहेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.5।।न तु कर्माणि सर्वात्मना त्यक्तुं शक्यानीत्याह न हीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.5।।न हि अस्मिन् लोके वर्तमानः पुरुषः कश्चित् कदाचित् अपि कर्म अकुर्वाणः तिष्ठति।न किञ्चित्करोमि इति व्यवसितः अपि सर्वः पुरुषः प्रकृतिसमुद्भवैः सत्त्वरजस्तमोभिः प्राक्तनकर्मानुगुणं प्रवृद्धैः गुणैः स्वोचितं कर्म प्रति अवशः कार्यते प्रवर्त्यते। अत उक्तलक्षणेन कर्मयोगेन प्राचीनं पापसञ्चयं नाशयित्वा गुणांश्च सत्त्वादीन् वशे कृत्वा निर्मलान्तःकरणेन संपाद्यो ज्ञानयोगः।अन्यथा ज्ञानयोगाय प्रवृत्तः अपि मिथ्याचारो भवति इति आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.5।। न हि यस्मात् क्षणमपि कालं जातु कदाचित् कश्चित् तिष्ठति अकर्मकृत् सन्। कस्मात् कार्यते प्रवर्त्यते हि यस्मात् अवश एव अस्वतन्त्र एव कर्म सर्वः प्राणी प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैः सत्त्वरजस्तमोभिः गुणैः। अज्ञ इति वाक्यशेषः यतो वक्ष्यतिगुणैर्यो न विचाल्यते इति। सांख्यानां पृथक्करणात् अज्ञानामेव हि कर्मयोगः न ज्ञानिनाम्। ज्ञानिनां तु गुणैरचाल्यमानानां स्वतश्चलनाभावात् कर्मयोगो नोपपद्यते। तथा च व्याख्यातम् वेदाविनाशिनम् इत्यत्र।।यत्त्वनात्मज्ञः चोदितं कर्म नारभते इति तदसदेवेत्याह
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【 Verse 3.6 】
▸ Sanskrit Sloka: कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् | इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचार: स उच्यते ||
▸ Transliteration: karmendriyāṇi saṁyamya ya āste manasā smaran | indriyārthānvimūḍhātmā mithyācāraḥ sa ucyate ||
▸ Glossary: karmendriyāṇi: the five working sense organs; saṁyamya: restraining; ya: who; āste: remains; manasā: mentally; smaran: recollecting; indriyārthān: objects of the senses; vimūḍha: foolish; atma: soul; mithyācāraḥ: hypocrite; saḥ: he; ucyate: is called
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.6 He who restrains the sense organs, but who still thinks of the objects of the senses is deluded and is called a hypocrite.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.6।।जो कर्मेन्द्रियों(सम्पूर्ण इन्द्रियों) को हठपूर्वक रोककर मनसे इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है वह मूढ़ बुद्धिवाला मनुष्य मिथ्याचारी (मिथ्या आचरण करनेवाला) कहा जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.6।। जो मूढ बुद्धि पुरुष कर्मेन्द्रियों का निग्रह कर इन्द्रियों के भोगों का मन से स्मरण (चिन्तन) करता रहता है वह मिथ्याचारी (दम्भी) कहा जाता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.6 कर्मेन्द्रियाणि organs of action? संयम्य restraining? यः who? आस्ते sits? मनसा by the mind? स्मरन् remembering? इन्द्रियार्थान् senseobjects? विमूढात्मा of deluded understanding? मिथ्याचारः hypocrite? सः he? उच्यते is called.Commentary The five organs of action? Karma Indriyas? are Vak (organ of speech)? Pani (hands)? Padam (feet)? Upastha (genitals) and Guda (anus). They are born of the Rajasic portion of the five Tanmatras or subtle elements Vak from the Akasa Tanmatra (ether)? Pani from the Vayu Tanmatra (air)? Padam from the Agni Tanmatra (fire)? Upastha from the Apas Tanmatra (water)? and Guda from the Prithivi Tanmatra (earth). That man who? restraining the organs of action? sits revolving in his mind thoughts regarding the objects of the senses is a man of sinful conduct. He is selfdeluded. He is a veritable hypocrite.The organs of action must be controlled. The thoughts should also be controlled. The mind should be firmly fixed on the Lord. Only then will you become a true Yogi. Only then will you attain to Selfrealisation.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.6. Controlling organs of actions, whosoever sits with his mind, pondering over the sense objects-that person is a man of deluded soul and [he] is called a man of deluded action.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.6 He who remains motionless, refusing to act, but all the while brooding over sensuous object, that deluded soul is simply a hypocrite.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.6 He who, controlling the organs of action, lets his mind dwell on the objects of senses, is a deluded person and a hypocrite.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.6 One, who after withdrawing the organs of action, sits mentally recollecting the objects of the senses, that one, of deluded mind, is called a hypocrite.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.6 He who, restraining the organs of action, sits thinking of the sense-objects in mind, he of deluded understanding is called a hypocrite.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.6 Karmendriyani etc. If he does not act with his organs of action, then he necessarily acts with his mind. At the same time he is the man of deluded action; For, the mental actions can never be avoided totally.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.6 He whose inner and outer organs of senses are not conered because of his sins not being annulled but is none the less struggling for winning knowledge of the self, whose mind is forced to turn away from the self by reason of it being attached to sense objects, and who conseently lets his minds dwell on them - he is called a hypocrite, because his actions are at variance with his professions. The meaning is that by practising the knowledge of the self in this way, he becomes perverted and lost.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.6 Yah, one who; samyamya, after withdrawing; karma-indriyani, the organs of action-hands etc.; aste, sits; manasa, mentally; smaran, recollecting, thinking; indriya-arthan, the objects of the senses; sah, that one; vimudha-atma, of deluded mind; ucyate, is called; mithya-acarah, a hypocrite, a sinful person.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.6।। शरीर से निष्क्रिय होकर कहीं भी नहीं पहुँचा जा सकता फिर पूर्णत्व की स्थिति के विषय में क्या कहना। जिसने कर्मेन्द्रियों के निग्रह के साथ ही मन और बुद्धि को विषयों के चिन्तन से बुद्धिमत्तापूर्वक निवृत्त नहीं किया हो तो ऐसे साधक की आध्यात्मिक उन्नति निश्चय ही असुरक्षित और आनन्दरहित होगी।मनोविज्ञान की आधुनिक पुस्तकों मे उपर्युक्त वाक्य का सत्यत्व सिद्ध होता है। शरीर से अनैतिक और अपराध पूर्ण कर्म करने की अपेक्षा मन से उनका चिन्तन करते रहना अधिक हानिकारक है। मन का स्वभाव है एक विचार को बारंबार दोहराना। इस प्रकार एक ही विचार के निरन्तर चिन्तन से मन में उसका दृढ़ संस्कार (वासना) बन जाता है और फिर जो कोई विचार हमारे मन में उठता है उनका प्रवाह पूर्व निर्मित दिशा में ही होता है। विचारो की दिशा निश्चित हो जाने पर वही मनुष्य का स्वभाव बन जाता है जो उसके प्रत्येक कर्म में व्यक्त होता है। अत निरन्तर विषयचिन्तन से वैषयिक संस्कार मन में गहराई से उत्कीर्ण हो जाते हैं और फिर उनसे प्रेरित विवश मनुष्य संसार में इसी प्रकार के कर्म करते हुये देखने को मिलता है।जो व्यक्ति बाह्य रूप से नैतिक और आदर्शवादी होने का प्रदर्शन करते हुये मन में निम्न स्तर की वृत्तियों में रहता है वास्तव में वह अध्यात्म का सच्चा साधक नहीं वरन् जैसा कि यहाँ कहा गया है विमूढ और मिथ्याचारी है हम सब जानते हैं कि शारीरिक संयम होने पर भी मन की वैषयिक वृत्तियों को संयमित करना सामान्य पुरुष के लिये कठिन होता है।यह समझते हुये कि सामान्य पुरुष अपनी स्वाभाविक प्रवृत्तियों से स्वयं को सुरक्षित रखने का उपाय नहीं जान सकता इसलिये भगवान कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.6।। ननु हठात्कर्मेन्द्रियाणि संयम्याकर्मकृद्भविष्यतीत्याशङ्क्य यस्त्वनात्मज्ञोऽशुद्धान्तःकरणो हठात्कर्मेन्द्रियाणि संयम्य विहितं कर्म न करोति औत्सुक्यात्संन्यस्यति स तूभयतोभ्रष्ट इत्याह कर्मेति। कर्मेन्द्रियाणि यो विमूढात्मा रागद्वेषादिभिर्मलिनचित्तः हस्तादीनि संहृत्य इन्द्रियार्थाञ्शब्दादीन्मनसा स्मरन्नास्ते स मिथ्याचारोऽसदाचारः पापाचार उच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.6।।यथाकथंचिदौत्सुक्यमात्रेण कृतसंन्यासस्त्वशुद्धचित्तस्तत्फलभाङ न भवति। यतः यो विमूढात्मा रागद्वेषादिदूषितान्तःकरण औत्सुक्यमात्रेण कर्मेन्द्रियाणि वाक्पाण्यादीनि संयम्य निगृह्य बहिरिन्द्रियैः कर्माण्यकुर्वन्निति यावत्। मनसा रागादिप्रेरितेनेन्द्रियार्थाञ्शब्दादीन् नत्वात्मतत्त्वं स्मरन्नास्ते कृतसंन्यासोऽहमित्यभिमानेन कर्मशून्यस्तिष्ठति स मिथ्याचारः सत्त्वशुद्ध्यभावेन फलायोग्यत्वात्पापाचार उच्यतेत्वंपदार्थविवेकाय संन्यासः सर्वकर्मणाम्। श्रुत्येह विहितो यस्मात्तत्त्यागी पतितो भवेत्।। इत्यादिधर्मशास्त्रेण। अत उपपन्नं नच संन्यसनादेवाशुद्धान्तःकरणः सिद्धिं समधिगच्छतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.6।।ननु संन्यासपूर्वकं ध्यानेनैव चित्तशुद्धिमपि संपादयिष्यामि किं कर्मभिरित्याशङ्क्याह कर्मेन्द्रियाणीति। यो विमूढात्मा रागाद्याक्रान्तचित्तः कर्मेन्द्रियाणि वागादीनि संयम्य निगृह्य आस्ते एकान्ते
Chapter 3 (Part 5)
ध्यानापदेशेनोपविशति स मिथ्याचारः। तस्य तदासननियमनादिकमाचरणं मिथ्या अलीकमेव निष्फलत्वात्। तत्र हेतुः इंद्रियार्थान्मनसा स्मरन्निति। यतः इन्द्रियार्थाञ्शब्दादीञ्श्रोत्रादिभिर्गृह्णाति मनसा च स्मरति अतो मिथ्याचारः स विषयांश्चिन्तयन्योगनिष्ठामात्मनो लोकेऽभिव्यनक्त्यतः कपटीत्यर्थः। तस्मात्कर्मव्यतिरिक्तश्चित्तशुद्ध्युपायो नास्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.6।।अज्ञानात्कर्मत्यागी दाम्भिको न यागफलमाप्नोतीत्याह कर्मेन्द्रियाणीति। कर्मेन्द्रियाणिहस्तपादादीनि संयम्य निरुध्य मनसा इन्द्रियार्थान् विषयान् स्मरन् य आस्ते तिष्ठति भगवद्ध्यानदशापन्न इव लोकज्ञापनार्थं स विमूढात्मा मिथ्याचारः मिथ्याचरतीति दाम्भिक उच्यत इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.6।।अतोऽज्ञं कर्मत्यागिनं निन्दति कर्मेन्द्रियाणीति। वाक्पाण्यादीनि कर्मेन्द्रियाण्यपि संयम्य निगृह्य यो मनसा भगवद्ध्यानच्छलेनेन्द्रियार्थान् विषयान् स्मरन्नास्ते अविशुद्धतया मनसा आत्मनि स्थैर्यभावात् स मिथ्याचारः कपटाचारो दाम्भिक उच्यत इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.6।।यश्च कर्मेन्द्रियैः कर्माकरणे नैष्कर्म्यसम्भव उक्तः सोऽपि न साधुः मानसक्रियानिवर्त्यत्वेनोक्तस्वरूपत्वासम्भवादित्याह कर्मेन्द्रियाणीति।साङ्ख्ये प्रकीर्तितस्त्यागस्त्यागोऽपि मनसैव हि। अत्यागे योगमार्गो हि सिद्धे योगे कृतार्थता। तदर्थं प्रक्रिया काचित्पुराणेऽपि निरूपिता। ऋषिभिर्बहुधा प्रोक्ता फलमेकमबाह्यतः। कर्मत्यागेन सन्न्यासो मनसा तत्स्मृतेः पुनः। प्रत्यवायसमुद्भेदस्तस्मात्तत्करणं मतम्। अतो यः पुमान्स्वयं मनसा कर्मकर्त्ता मानसविषयव्यापारवान् स मूढात्मा व्यर्थाचार उच्यते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.6।।जो आत्मज्ञानी न होनेपर भी शास्त्रविहित कर्म नहीं करता उसका वह कर्म न करना बुरा है यह कहते हैं जो मनुष्य हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियोंको रोककर इन्द्रियोंके भोगोंको मनसे चिन्तन करता रहता है वह विमूढात्मा अर्थात् मोहित अन्तःकरणवाला मिथ्याचारी ढोंगी पापाचारी कहा जाता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.6।। व्याख्या कर्मेन्द्रियाणि संयम्य ৷৷. मिथ्याचारः स उच्यते यहाँ कर्मेन्द्रियाणि पदका अभिप्राय पाँच कर्मेन्द्रियों (वाक् हस्त पाद उपस्थ और गुदा) से ही नहीं है प्रत्युत इनके साथ पाँच ज्ञानेन्द्रियों (श्रोत्र त्वचा नेत्र रसना और घ्राण) से भी है क्योंकि ज्ञानेन्द्रियोंके बिना केवल कर्मेन्द्रियोंसे कर्म नहीं हो सकते। इसके सिवाय केवल हाथ पैर आदि कर्मेन्द्रियोंको रोकनेसे तथा आँख कान आदि ज्ञानेन्द्रियोंको न रोकनेसे पूरा मिथ्याचार भी सिद्ध नहीं होता।गीतामें कर्मेन्द्रियोंके अन्तर्गत ही ज्ञानेन्द्रियाँ मानी गयी हैं। इसलिये गीतामें कर्मेन्द्रिय शब्द तो आता है पर ज्ञानेन्द्रिय शब्द कहीं नहीं आता। पाँचवें अध्यायके आठवेंनवें श्लोकोंमें देखना सुनना स्पर्श करना आदि ज्ञानेन्द्रियोंकी क्रियाओंको भी कर्मेन्द्रियोंकी क्रियाओंके साथ सम्मिलित किया गया है जिससे सिद्ध होता है कि गीता ज्ञानेन्द्रियोंको भी कर्मेन्द्रियाँ ही मानती है। गीता मनकी क्रियाओंको भी कर्म मानती है शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः (18। 15)। तात्पर्य यह है कि मात्र प्रकृति क्रियाशील होनेसे प्रकृतिका कार्यमात्र क्रियाशील है।यद्यपि संयम्य पदका अर्थ होता है इन्द्रियोंका अच्छी तरहसे नियमन अर्थात् उन्हें वशमें करना तथापि यहाँ इस पदका अर्थ इन्द्रियोंको वशमें करना न होकर उन्हें हठपूर्वक बाहरसे रोकना ही है। कारण कि इन्द्रियोंके वशमें होनेपर उसे मिथ्याचार कहना नहीं बनता।मूढ़ बुद्धिवाला (सत्असत्के विवेकसे रहित) मनुष्य बाहरसे तो इन्द्रियोंकी क्रियाओंको हठपूर्वक रोक देता है पर मनसे उन इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है और ऐसी स्थितिको क्रियारहित मान लेता है। इसलिये वह मिथ्याचारी अर्थात् मिथ्या आचरण करनेवाला कहा जाता है।यद्यपि उसने इन्द्रियोंके विषयोंको बाहरसे त्याग दिया है और ऐसा समझता है कि मैं कर्म नहीं करता हूँ तथापि ऐसी अवस्थामें भी वह वस्तुतः कर्मरहित नहीं हुआ है। कारण कि बाहरसे क्रियारहित दीखनेपर भी अहंता ममता और कामनाके कारण रागपूर्वक विषयचिन्तनके रूपमें विषयभोगरूप कर्म तो हो ही रहा है।सांसारिक भोगोंको बाहरसे भी भोगा जा सकता है और मनसे भी। बाहरसे रागपूर्वक भोगोंको भोगनेसे अन्तःकरणमें भोगोंके जैसे संस्कार पड़ते हैं वैसे ही संस्कार मनसे भोगोंको भोगनेसे अर्थात् रागपूर्वक भोगोंका चिन्तन करनेसे भी पड़ते हैं। बाहरसे भोगोंका त्याग तो मनुष्य विचारसे लोकलिहाजसे और व्यवहारमें गड़बड़ी आनेके भयसे भी कर सकता है पर मनसे भोग भोगनेमें बाहरसे कोई बाधा नहीं आती। अतः वह मनसे भोगोंको भोगता रहता है और मिथ्या अभिमान करता है कि मैं भोगोंका त्यागी हूँ। मनसे भोग भोगनेसे विशेष हानि होती है क्योंकि इसके सेवनका विशेष अवसर मिलता है। अतः साधकको चाहिये कि जैसे वह बाहरके भोगोंसे अपनेको बचाता है उनका त्याग करता है ऐसे ही मनसे भोगोंके चिन्तनका भी विशेष सावधानीसे त्याग करे।अर्जुन भी कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करना चाहते हैं और भगवनान्से पूछते हैं कि आप मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं इसके उत्तरमें यहाँ भगवान् कहते हैं कि जो मनुष्य अहंता ममता आसक्ति कामना आदि रखते हुए केवल बाहरसे कर्मोंका त्याग करके अपनेको क्रियारहित मानता है उसका आचरण मिथ्या है। तात्पर्य यह है कि साधकको कर्मोंका स्वरूपसे त्याग न करके उन्हें कामनाआसक्तिसे रहित होकर तत्परतापूर्वक करते रहना चाहिये। सम्बन्ध चौथे श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोग और सांख्ययोग दोनोंकी दृष्टिसे कर्मोंका त्याग अनावश्यक बताया। फिर पाँचवें श्लोकमें कहा कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। छठे श्लोकमें हठपूर्वक इन्द्रियोंकी क्रियाओंको रोककर अपनेको क्रियारहित मान लेनेवालेका आचरण मिथ्या बताया। इससे सिद्ध हुआ कि कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देनेमात्रसे उनका वास्तविक त्याग नहीं होता। अतः आगेके श्लोकमें भगवान् वास्तविक त्यागकी पहचान बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.6।।कर्मेन्द्रियाणीति। कर्मेन्द्रियैश्चेन्न करोति अवश्यं तर्हि (S omits तर्हि) मनसा करोति प्रत्युत सः मूढाचारः (The expressions मूढाचारः and मिथ्याचारः are found hereinafter interchanged in the MSS. ) मानसानां कर्मणामत्यन्तमपरिहार्यत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.6।।आत्मज्ञवदनात्मज्ञस्यापि तर्हि कर्माकुर्वतो न प्रत्यवायः शरीरेन्द्रियसंघातं नियन्तुमसमर्थस्य मूर्खस्यापि संन्याससंभवादित्याशङ्क्याह यस्त्विति। तस्य चोदिताकरणं तच्छब्देन परामृश्यते तदसदिति। मिथ्याचारत्वादिति भावः। मिथ्याचारतामेव वर्णयति कर्मेन्द्रियाणीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.6 3.7।।तथापिकर्मेन्द्रियाणि इत्यसङ्गतम् तृतीयपक्षस्थेन मनसेन्द्रियार्थस्मरणस्यानुक्तत्वादित्यत आह तथापीति। यद्यपि शरीरयात्राद्यर्थानि कर्माणि त्यक्तुमशक्यानि तथापि शक्तितः शक्यत्वाद्यज्ञादिकर्मणां त्यागः कार्यः। एतदुक्तं भवति नाशक्यविषये शास्त्रप्रवृत्तिः इत्यतस्तदतिरिक्तकर्मार्थः स्मृतौ कर्मशब्दोभविष्यतीति।।एतच्छङ्कापरिहारः श्लोकेन दृश्यते। द्वितीयश्लोकश्च व्यर्थ इत्यत आह मन एवेति। मन एव बन्धमोक्षयोः प्रयोजकं न कर्मकरणाकरणे। अतस्तन्निग्रह एव कार्यः न कर्मत्याग इति ज्ञापयितुमित्यर्थः। अनिगृहीतत्वे मनसो बन्धापेक्षयाऽऽद्योऽन्वयः द्वितीयो व्यतिरेकः मोक्षापेक्षया तु व्यत्यास इति। एतेन स्मरणस्य मानसत्वव्यभिचारान्मनसेति व्यर्थमित्यपि परास्तम्।कर्मयोगेन योगिनां 3।3 इत्यत्र कर्मयोगशब्दस्य गृहस्थादिकर्मविषयत्वेन प्रकृतत्वादत्रापि तद्विषयत्वप्रतीतिः स्यात् तन्निरासार्थमाह कर्मयोगमिति। गृहस्थकर्मैव वनस्थकर्मैव ब्रह्मचारिकर्मैवेति नियमो न विवक्षित इत्यर्थः। सन्न्यासादित्यादिपदेन यो नियम्यते तद्व्यतिरिक्तग्रहणम् कर्मयोगशब्दस्य सामान्यवाचित्वाच्च। पूर्वंज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां 3।3 इति यत्याश्रमकर्मणः पृथगुक्तत्वात् सामान्यशब्दोऽपि विशेषो व्यवस्थापितः। न चात्र तथाविधं किञ्चिदस्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.6 3.7।।तथापि शक्तितः त्यागः कार्य इत्याह कर्मेन्द्रियाणीति। मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति। कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्। न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः सन्न्यासादिविधानात् सामान्यवचनाच्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.6।।अविनष्टपापतया अजितबाह्यान्तःकरण आत्मज्ञानाय प्रवृत्तो विषयप्रवणतया आत्मनि विमुखीकृतमनाः विषयान् एव स्मरन् य आस्ते अन्यथा संकल्प्य अन्यथा चरति इति स मिथ्याचारः उच्यते आत्मज्ञानाय उद्युक्तो विपरीतो विनष्टो भवति इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.6।। कर्मेन्द्रियाणि हस्तादीनि संयम्य संहृत्य यः आस्ते तिष्ठति मनसा स्मरन् चिन्तयन् इन्द्रियार्थान् विषयान् विमूढात्मा विमूढान्तःकरणः मिथ्याचारो मृषाचारः पापाचारः सः उच्यते।।
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【 Verse 3.7 】
▸ Sanskrit Sloka: यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन | कर्मेन्द्रियै: कर्मयोगमसक्त: स विशिष्यते ||
▸ Transliteration: yastvindriyāṇi manasā niyamyārabhate ’rjuna | karmendriyaiḥ karmayogamasaktaḥ sa viśiṣyate ||
▸ Glossary: yaḥ: who; tu : but; indriyāṇi : senses; manasā: by the mind; niyamya: con- trolling; ārabhate: begins; arjuna: O Arjuna; karmendriyaiḥ: by the active sense organs; karmayogam: work of devotion; asaktaḥ: without attachment; saḥ: he; viśiṣyate: superior
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.7 He who begins controlling the senses by the mind and performs selfless work through the sense organs is superior, O Arjuna.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.7।।हे अर्जुन जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर (निष्काम भावसे) समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आचरण करता है वही श्रेष्ठ है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.7।। परन्तु हे अर्जुन जो पुरुष मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त हुआ कर्मेंन्द्रियों से कर्मयोग का आचरण करता है वह श्रेष्ठ है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.7 यः whose? तु but? इन्द्रियाणि the senses? मनसा by the mind? नियम्य controlling? आरभते commences? अर्जुन O Arjuna? कर्मेन्द्रियैः by the organs of action? कर्मयोगम् Karma Yoga? असक्तः unattached? सः he? विशिष्यते excels.Commentary If anyone performs actions with his organs of action (viz.? hands? feet? organ of speech? etc.) controlling the organs of knowledge by the mind? and without expectation of the fruits of the actions and without egoism? he is certainly more worthy than the other who is a hypocrite or a man of false conduct. (Cf.II.64?68IV.21).The five organs of knowledge are the eyes? the ears? the nose? the skin and the sense of taste (tongue).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.7. But, controlling sense-organs by mind, whosoever undertakes the Yoga of action with the action-senses he, the detached one, is superior [to others], O Arjuna !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.7 But, O Arjuna! All honour to him whose mind controls his senses, for he is thereby beginning to practise Karma-Yoga, the Path of Right Action, keeping himself always unattached.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.7 But he who, subduing his senses by the mind, O Arjuna, begins to practise Karma Yoga through the organs of action and who is free from attachment - he excels.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.7 But, O Arjuna, one who engages in Karma-yoga with the organs of action, controlling the organs with the mind and becoming unattached-that one excels.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.7 But whosoever, controlling the senses by the mind, O Arjuna, engages himself in Karma Yoga with the organs of action, without attachment, he excels.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.7 Yas tu etc. When actions are being performed [by him], there is no loss of his knowledge. For, when the mind does not function, he does his work like a machine-man. Therefore -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.7 Conseently, he who, with aspiration to have the vision of the self, directs his senses to action according to the scriptures, such action being of the same class as those which he practised earlier, and who then begins to practise Karma Yoga, after renouncing attachment, with the senses which are naturally inclined to action - he, by reason of there being no chance of errors, excels a man following Jnana Yoga, because there is no fear of a fall in his case.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.7 Tu, but, on the other hand, O Arjuna; yah, one who is unenlightened and who is eligible for action; arabhate, engages in;-what does he engage in? the Lord says in answer-karma yogam, Karma-yoga; karma-indriyaih, with the organs of action, with speech, hands, etc.; niyamya, controlling; indriyani, the sense-organs; manasa, with the mind; and becoming asaktah unattached; [Here Ast; adds 'phalabhisandhi-varjitah, free from hankering for results'.-Tr.] sah, that one; visisyate, excels the other one, the hypocrite. This being so, therefore,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.7।। सरलसी प्रतीत होने वाली इन दो पंक्तियों में सही कर्म एवं जीवन जीने की कला का सम्पूर्ण ज्ञान सन्निहित है। आधुनिक जगत् को विचारों की सूत्ररूपता (अर्थात् कम शब्दों में अधिक अर्थ बताना) का ज्ञान नहीं है जबकि प्राचीन सूत्रकारों ने अपने विचारों से ऐसे भारत का निर्माण किया जहाँ आध्यात्मिक संस्कृति विकसित हुई और राष्ट्र ने स्वर्णयुग का अवलोकन किया।मन का अस्तित्व एवं पोषण पाँच ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ग्रहण की हुई बाह्य जगत् की विषय संवेदनाओं से होता है। मन की वृत्ति इन्द्रियों के माध्यम द्वारा विषयों तक पहुँच कर उनके आकार को ग्रहण करती है जिससे उस विषय का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। यदि मन इन्द्रियों के साथ युक्त न हो तो विषयों के बाह्य देश में स्थित होने पर भी उनका ज्ञान संभव नहीं होता। इसीलिये अनेक बार जब हम पुस्तक के अध्ययन में एकचित्त हो जाते हैं तब समीप से किसी के पुकारने पर भी उसकी आवाज हम नहीं सुन पाते। मन की एकाग्रता के ऐसे अनेक उदाहरण हैं।इस श्लोक में साधक को मन के द्वारा इन्द्रियों को संयमित करने की सम्मति दी गयी है। इसे सफलतापूर्वक तभी किया जा सकता है जब मन को एक श्रेष्ठ दिव्य लक्ष्य की ओर प्रेरित किया जाय। केवल हठपूर्वक मन के तीव्र वेग को रोकने का प्रयत्न करना जलप्लावित नदी का प्रवाह रोकने के प्रयत्न के समान है। इसका व्यर्थ होना निश्चित है। श्रीकृष्ण आत्मसंयम का उपाय आगे बतायेंगे।मन से इन्द्रियों का संयम करना साधना का निषेधात्मक पक्ष है। हम अपने सामान्य जीवन में अपनी अधिकांश शक्ति विषयों में ही व्यय करते हैं इसलिये संयम के द्वारा इस शक्ति का अपव्यय रोक कर उसे संग्रहित करने को कहा जाता है किन्तु यदि इस संग्रहित शक्ति का उपयोग तत्काल ही श्रेष्ठ वस्तु की प्राप्ति के लिये नहीं किया जाय तो संयम के बांध को तोड़कर वह वस्तु मनुष्य के सन्तुलित व्यक्तित्व को ही प्रवाह में बहाकर ले जायेगी। श्लोक की दूसरी पंक्ति में अपनी एकत्रित शक्ति का सदुपयोग करना सिखाया गया है।इस शक्ति का उपयोग कर्मेंन्द्रियों द्वारा कर्मक्षेत्र में समुचित रूप से कर्म करने में करना चाहिये। यहाँ भी एक महत्त्वपूर्ण सावधानी रखने के लिये श्रीकृष्ण कहते हैं। कर्मयोगी को सब कर्म अनासक्त होकर करने चाहिये।यदि किसी कैमरे में साधारण कागज रखकर किसी वस्तु का चित्र खींचने का प्रयत्न किया जाय तो कितनी ही देर प्रकाशित वस्तु के सामने रखने पर भी उस कागज पर कोई चित्रण नहीं हो सकता परन्तु कागज को कैमरे के उपयुक्त बनाने पर क्षणमात्र में चित्र खींचा जा सकता है। इसी प्रकार आसक्ति से भरे मन पर विषयों के सम्बन्ध से शीघ्र ही वासनायें अंकित हो जाती हैं। इसी कारण से भगवान् कहते हैं कि हमको अनासक्त होकर कर्म करना चाहिये जिससे नये संस्कार उत्पन्न नहीं होंगे। साथहीसाथ पूर्वार्जित वासनाओं का क्षय भी हो जायेगा।गीता में इस सिद्धांत का विवेचन इतनी युक्तियुक्त एवं वैज्ञानिक पद्धति से किया गया है कि उसका अध्ययन करने वाले किसी भी विद्यार्थी को उसमें दोष देखने अथवा संदेह करने का अवसर ही नहीं मिलता।इन्द्रिय संयम से शक्ति के अपव्यय को रोक कर अनासक्त भाव से कर्मेंद्रियों के द्वारा श्रेष्ठ कर्म करने में उसका सदुपयोग करने से चित्तशुद्धि होगी। इस प्रकार जो कर्मक्षेत्र हमारे बन्धन का कारण था उसी में गीता में वर्णित जीवन की शैली अपनाते हुये कर्म करने पर वही क्षेत्र मोक्ष का साधन बन जायेगा।इसलिये
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.7।। य इति। यस्त्वज्ञः कर्मण्यधिकृतः ज्ञानेन्द्रियाणि विवेकवैराग्ययुक्तेन मनसा नियम्य। मनसा सहेत्यर्थस्त्वरुचिग्रस्तः।अरुचिबीजं तु पूर्वश्लोकोक्तस्य मनसः करणत्वस्य त्यागः सहशब्दाध्याहारश्च। फलाभिसंधिरहितः कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमारभते स पूर्वस्माच्छ्रेष्ठो भवति ज्ञाननिष्ठोपाये स्थितो यतः। अर्जुनेति संबोधयन् एवमेव त्वमपि कुर्वन् त्वमपि कुर्वन् अन्वर्थसंज्ञो भविष्यसीति ध्वनयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.7।।औत्सुक्यमात्रेण सर्वकर्माण्यसंन्यस्य चित्तशुद्धये निष्कामकर्माण्येव यथाशास्त्रं कुर्यात्। यस्मात् तुशब्दोऽशुद्धान्तःकरणसंन्यासिव्यतिरेकार्थः। इन्द्रायाणि ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि मनसा सह नियम्य पापहेतुशब्दादिविषयासक्तेर्निवर्त्य मनसा विवेकयुक्तेन नियम्येति वा कर्मेन्द्रियैर्वाक्पाण्यादिभिः कर्मयोगं शुद्धिहेतुतया विहितं कर्मारभते करोत्यसक्तः फलाभिलाषशून्यः सन् यो विवेकी स इतरस्मान्मिथ्याचाराद्विशिष्यते। परिश्रमसाम्येऽपि फलातिशयभाक्त्वेन श्रेष्ठो भवति। हे अर्जुन आश्चर्यमिदं पश्य यदेकः कर्मेन्द्रियाणि निगृह्णञ्ज्ञानेन्द्रियाणि व्यापारयन्पुरुषार्थशून्यः अपरस्तु ज्ञानेन्द्रियाणि निगृह्य कर्मेन्द्रियाणि व्यापारयन्परमपुरुषार्थभाग्भवतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.7।।यस्तु पूर्वस्मान्मिथ्याचाराद्विलक्षणः पुरुषधौरेयः इन्द्रियाणि मनसा सह नियम्य रागद्वेषवियुक्तानि कृत्वा कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमारभते हे अर्जुन सः कर्मफले स्वर्गादावैहिके वा शब्दादौ असक्तोऽनासक्तोऽतो विशिष्यते। पूर्वस्मादधिको भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.7।।स्वरूपज्ञानेन त्यागी उत्तमः तत्त्यागस्वरूपं तस्योत्तमत्वमाह यस्त्विति। तुशब्दो लौकिकार्थनिग्रहपक्षं व्यावर्तयति। य इन्द्रियाणि मनसा नियम्य मनसा मदर्थं नियमे स्थापयित्वा कर्मेन्द्रियैर्वाक्चक्षुर्हस्तादिभिः कर्मणां कृतीनां योगं मया सह योगमसक्तः स्वसुखाभिलाषाभावेन मत्सुखार्थमेव आरभते स विशिष्यते विशिष्ठो भवति उत्तमो भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.7।।एतद्विपरीतः कर्मकर्ता श्रेष्ठ इत्याह यस्त्विति। यस्तु ज्ञानेन्द्रियाणि मनसा नियम्य ईश्वरप्रवणानि कृत्वा कर्मेन्द्रियैः कर्मरुपं उपायमारभतेऽनुतिष्ठति असक्तः फलाभिलाषरहितः सन् स विन्निष्यते विशिष्टो भवति। चित्तशुद्ध्या ज्ञानावान्भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.7।।यस्तु मनसा योगशुद्धेनेन्द्रियाणि दुष्टानि नियम्य कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः सन्नारभते स उत्तमः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.7।।परंतु हे अर्जुन जो कर्मोंका अधिकारी अज्ञानी ज्ञानेन्द्रियोंको मनसे रोककर वाणी हाथ इत्यादि कर्मेन्द्रियोंसे आचरण करता है। किसका आचरण करता है सो कहते हैं आसक्तिरहित होकर कर्मयोगका आचरण करता है वह ( कर्मयोगी ) दूसरेकी अपेक्षा अर्थात् मिथ्याचारियोंकी अपेक्षा श्रेष्ठ है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.7।। व्याख्या तु यहाँ अनासक्त होकर कर्म करनेवालेको मिथ्याचारीकी अपेक्षा ही नहीं प्रत्युत सांख्ययोगीकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ बतानेकी दृष्टिसे तु पद दिया गया है।अर्जुन अर्जुन शब्दका अर्थ होता है स्वच्छ। यहाँ भगवान्ने अर्जुन सम्बोधनका प्रयोग करके यह भाव दिखलाया है कि तुम निर्मल अन्तःकरणसे युक्त हो अतः तुम्हारे अन्तःकरणमें कर्तव्यकर्मविषयक यह सन्देह कैसे अर्थात् यह सन्देह तुम्हारेमें स्थिर नहीं रह सकता।यस्ित्वन्द्रियाणि मनसा नियम्य यहाँ मनसा पद सम्पूर्ण अन्तःकरण (मन बुद्धि चित्त और अहंकार) का वाचक है और इन्द्रियाणि पद छठे श्लोकमें आये कर्मेन्द्रियाणि पदकी तरह ही दसों इन्द्रियोंका वाचक है।मनसे इन्द्रियोंको वशमें करनेका तात्पर्य है कि विवेकवती बुद्धिके द्वारा मन और इन्द्रियोंसे स्वयंका कोई सम्बन्ध नहीं है ऐसा अनुभव करना। मनसे इन्द्रियोंका नियमन करनेपर इन्द्रियोंका अपना स्वतन्त्र आग्रह नहीं रहता अर्थात् उनको जहाँ लगाना चाहें वहीं वे लग जाती हैं और जहाँसे उनको हटाना चाहें वहाँसे वे हट जाती हैं।इन्द्रियाँ वशमें तभी होती हैं जब इनके साथ ममता (मेरापन) का सर्वथा अभाव हो जाता है। बारहवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी कर्मयोगीके लिये इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात आयी है सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान्। तात्पर्य यह है कि वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा ही कर्मयोगका आचरण होता है।पीछेके (छठे) श्लोकमें भगवान्ने संयम्य पदसे मिथ्याचारके विषयमें इन्द्रियोंको हठपूर्वक रोकनेकी बात कही थी किन्तु यहाँ नियम्य पदसे शास्त्रमर्यादाके अनुसार इन्द्रियोंका नियमन करने (निषिद्धसे हटाकर उन्हें शास्त्रविहित कर्तव्यकर्ममें लगाने) की बात कही है। नियमन करनेपर इन्द्रियोंका संयम स्वतः हो जाता है।असक्तः आसक्ति दो जगह होती है (1) कर्मोंमें और (2) उनके फलोंमें। समस्त दोष आसक्तिमें ही रहते हैं कर्मों तथा उनके फलोंमें नहीं। आसक्ति रहते हुए योग सिद्ध नहीं हो सकता। आसक्तिका त्याग करनेपर ही योग सिद्ध होता है। अतः साधकको कर्मोंका त्याग न करके उनमें आसक्तिका ही त्याग करना चाहिये। आसक्तिरहित होकर सावधानी एवं तत्परतापूर्वक कर्तव्यकर्मका आचरण किये बिना कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद नहीं हो सकता। साधक आसक्तिरहित तभी हो सकता है जब वह शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिको मेरी अथवा मेरे लिये न मानकर केवल संसारका और संसारके लिये ही मानकर संसारके हितके लिये तत्परतापूर्वक कर्तव्यकर्मका आचरण करनेमें लग जाय। जब वह अपने लिये कोई कर्म न करके केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्म करता है तब उसकी अपनी फलासक्ति स्वतः मिट जाती है।कर्मेन्द्रियोंसे होनेवाली साधारण क्रियाओंसे लेकर चिन्तन तथा समाधितककी समस्त क्रियाओंका हमारे स्वरूपके साथ कुछ भी सम्बन्ध नहीं है (गीता 5। 11)। परन्तु स्वरूपसे अनासक्त होते हुए भी यह जीवात्मा स्वयं आसक्ति करके संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है।कर्मयोगीकी वास्तविक महिमा आसक्तिरहित होनेमें ही है। कर्मोंसे प्राप्त होनेवाले किसी भी फलको न चाहना अर्थात् उससे सर्वथा असङ्ग हो जाना ही आसक्तिरहित होना है।साधारण मनुष्य तो अपनी कामनाकी सिद्धिके लिये ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है परन्तु साधक आसक्तिके त्यागका उद्देश्य लेकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त होता है। ऐसे साधकको ही यहाँ असक्तः कहा गया है।जब ज्ञानयोगी और कर्मयोगी दोनों ही फलेच्छा और आसक्तिका त्याग करते हैं तब ज्ञानयोगकी अपेक्षा कर्मयोग अधिक सुगम सिद्ध होता है। कारण कि कर्मयोगीको फिर किसी अन्य साधनकी आवश्यकता नहीं रहती जबकि ज्ञानयोगीको देहाभिमान और क्रियापदार्थकी आसक्ति मिटानेके लिये कर्मयोग (निष्कामभावसे कर्म करने) की आवश्यकता रहती है (5। 6 15। 11)। कर्मयोगमें आसक्तिका त्याग मुख्य है जिससे कर्मयोगीको समबुद्धिकी प्राप्ति हो जाती है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि कर्मोंका त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है प्रत्युत आसक्तिरहित होकर कर्म करनेकी ही आवश्यकता है।कर्मोंका त्याग करना चाहिये या नहीं यह देखना वस्तुतः गीताका सिद्धान्त ही नहीं है। गीताके अनुसार कर्मोंमें आसक्ति ही (दोष होनेके कारण) त्याज्य है। कर्मयोगमें कर्म सदा दूसरोंके हितके लिये होता है और योग अपने लिये होता है। अर्जुन कर्मको अपने लिये मानते हैं इसीलिये उन्हें युद्धरूप कर्तव्यकर्म घोर दीख रहा है। इसपर भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि आसक्ति ही घोर होती है कर्म नहीं।कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगम् आरभते जैसे इसी श्लोकके प्रथम चरणमें इन्द्रियाणि पदका तात्पर्य दसों इन्द्रियोंसे है ऐसे ही यहाँ कर्मेन्द्रियैः पदको दसों इन्द्रियोंका वाचक समझना चाहिये। अगर कर्मेन्द्रियैः पदसे हाथ पैर वाणी आदिको ही लिया जाय तो देखेसुने तथा मनसे विचार किये बिना कर्म कैसे होंगे अतः यहाँ सभी करणों अर्थात् अन्तःकरण और बहिःकरणको भी कर्मेन्द्रियाँ माना गया है क्योंकि इन सबसे कर्म होते हैं।जब कर्म अपने लिये न करके दूसरोंके हितके लिये किया जाता है तब वह कर्मयोग कहलाता है। अपने लिये कर्म करनेसे अपना सम्बन्ध कर्म तथा कर्मफलके साथ हो जाता है और अपने लिये कर्म न करके दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्म तथा कर्मफलका सम्बन्ध दूसरोंके साथ तथा परमात्माका सम्बन्ध अपने साथ हो जाता है जो कि सदासे है। इस प्रकार देश काल परिस्थिति आदिके अनुसार प्राप्त कर्तव्यकर्मको निःस्वार्थभावसे करना कर्मयोगका आरम्भ है। कर्मयोगी साधक दो तरहके होते हैं (1) जिसके भीतर कर्म करनेका वेग आसक्ति रुचि तो है पर अपना कल्याण करनेकी इच्छा मुख्य है ऐसे साधकके लिये नयेनये कर्म आरम्भ करनेकी जरूरत नहीं है। उसके लिये केवल प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करनेकी ही जरूरत है।(2) जिसके भीतर अपना कल्याण करनेकी इच्छा मुख्य नहीं है और संसारकी सेवा करनेमें उसे सुख पहुँचानेमें तथा समाजका सुधार करनेमें अधिक रुचि है जिससे उसके मनमें आता है कि अमुकअमुक काम किये जायँ तो बहुतोंकी सेवा हो सकती है समाजका सुधार हो सकता है आदि। ऐसा साधक अगर नयेनये कर्मोंका आरम्भ कर भी दे तो कोई हर्ज नहीं है। हाँ नये कर्मोंका आरम्भ केवल कर्म करनेकी आसक्ति मिटानेके लिये ही किया जाना चाहिये।गीतामें भगवान्ने अर्जुनके लिये प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करनेके लिये ही कहा है क्योंकि अर्जुनमें अपने कल्याणकी इच्छा मुख्य थी (गीता 2। 7 3। 2 5। 1)।स विशिष्यते जो अपने स्वार्थका फलकी आसक्तिका त्याग करके मात्र प्राणियोंके हितके लिये कर्म करता है वह श्रेष्ठ है। कारण कि उसकी मात्र क्रियाओंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जानेसे उसमें स्वतः असङ्गता आ जाती है।साधकका जब अपना कल्याण करनेका विचार होता है तब वह कर्मोंको साधनमें विघ्न समझकर उनसे उपराम होना चाहता है। परन्तु वास्तवमें कर्म करना दोषी नहीं है प्रत्युत कर्मोंमें सकामभाव ही दोषी है। अतः भगवान् कहते हैं कि बाहरसे इन्द्रियोंका संयम करके भीतरसे विषयोंका चिन्तन करनेवाले मिथ्याचारी पुरुषकी अपेक्षा आसक्तिरहित होकर दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेवाला श्रेष्ठ है। वास्तवमें मिथ्याचारी पुरुषकी अपेक्षा स्वर्गादिकी प्राप्तिके लिये सकामभावपूर्वक कर्म करनेवाला भी श्रेष्ठ है फिर दूसरोंके कल्याणके लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करनेवाला कर्मयोगी श्रेष्ठ है इसमें तो कहना ही क्या है पाँचवें अध्यायमें जब अर्जुनने प्रश्न किया कि संन्यास और योग दोनोंमें कौन श्रेष्ठ है तब भगवान्ने उत्तरमें दोनोंको ही कल्याण करनेवाला बताकर कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ कहा। यहाँ भी इसी आशयसे स्वार्थभावका त्याग करके दूसरोंके हितेके लिये कर्म करनेवाले कर्मयोगीको श्रेष्ठ बताया गया है। सम्बन्ध गीता अपनी शैलीके अनुसार पहले प्रस्तुत विषयका विवेचन करती है। फिर करनेसे लाभ और न करनेसे हानि बताती है। इसके बाद उसका अनुष्ठान करनेकी आज्ञा देती है। यहाँ भी भगवान् अर्जुनके प्रश्न (मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं) का उत्तर देते हुए पहले कर्मोंके सर्वथा त्यागको असम्भव बताते हैं। फिर कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके मनसे विषयचिन्तन करनेको मिथ्याचार बताते हुए निष्कामभावसे कर्म करनेवाले मनुष्यको श्रेष्ठ बताते हैं। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अर्जुनको उसीके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.7।।यस्त्विति। कर्मसु क्रियामणेषु न ज्ञानहानिः। मनसोऽव्यापारे यन्त्रपुरुषवत् कर्मणः क्रियमाणत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.7।।अनात्मज्ञस्य चोदितमकुर्वतो जाग्रतो विषयान्तरदर्शनध्रौव्यान्मिथ्याचारत्वेन प्रत्यवायित्वमुक्त्वा विहितमनुतिष्ठतस्तस्यैव फलाभिलाषविकलस्य सदाचारत्वेन वैशिष्ट्यमाचष्टे यस्त्विन्द्रियाणीति। विहितमनुतिष्ठतो मूर्खात् कर्म त्यजतो वैशिष्ट्यमक्षरयोजनया स्पष्टयति यस्तु पुनरिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.6 3.7।।तथापिकर्मेन्द्रियाणि इत्यसङ्गतम् तृतीयपक्षस्थेन मनसेन्द्रियार्थस्मरणस्यानुक्तत्वादित्यत आह तथापीति। यद्यपि शरीरयात्राद्यर्थानि कर्माणि त्यक्तुमशक्यानि तथापि शक्तितः शक्यत्वाद्यज्ञादिकर्मणां त्यागः कार्यः। एतदुक्तं भवति नाशक्यविषये शास्त्रप्रवृत्तिः इत्यतस्तदतिरिक्तकर्मार्थः स्मृतौ कर्मशब्दो भविष्यतीति।।एतच्छङ्कापरिहारः श्लोकेन दृश्यते। द्वितीयश्लोकश्च व्यर्थ इत्यत आह मन एवेति। मन एव बन्धमोक्षयोः प्रयोजकं न कर्मकरणाकरणे। अतस्तन्निग्रह एव कार्यः न कर्मत्याग इति ज्ञापयितुमित्यर्थः। अनिगृहीतत्वे मनसो बन्धापेक्षयाऽऽद्योऽन्वयः द्वितीयो व्यतिरेकः मोक्षापेक्षया तु व्यत्यास इति। एतेन स्मरणस्य मानसत्वव्यभिचारान्मनसेति व्यर्थमित्यपि परास्तम्।कर्मयोगेन योगिनां 3।3 इत्यत्र कर्मयोगशब्दस्य गृहस्थादिकर्मविषयत्वेन प्रकृतत्वादत्रापि तद्विषयत्वप्रतीतिः स्यात् तन्निरासार्थमाह कर्मयोगमिति। गृहस्थकर्मैव वनस्थकर्मैव ब्रह्मचारिकर्मैवेति नियमो न विवक्षित इत्यर्थः। सन्न्यासादित्यादिपदेन यो नियम्यते तद्व्यतिरिक्तग्रहणम् कर्मयोगशब्दस्य सामान्यवाचित्वाच्च। पूर्वंज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां 3।3 इति यत्याश्रमकर्मणः पृथगुक्तत्वात् सामान्यशब्दोऽपि विशेषो व्यवस्थापितः। न चात्र तथाविधं किञ्चिदस्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.6 3.7।।तथापि शक्तितः त्यागः कार्य इत्याह कर्मेन्द्रियाणीति। मन एव प्रयोजकमिति दर्शयितुमन्वयव्यतिरेकावाह मनसा स्मरन् मनसा नियम्येति। कर्मयोगं स्ववर्णाश्रमोचितम्। न तु गृहस्थकर्मैवेति नियमः सन्न्यासादिविधानात् सामान्यवचनाच्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.7।।अतः पूर्वाभ्यस्तविषयसजातीये शास्त्रीये कर्मणि इन्द्रियाणि आत्मावलोकनप्रवृत्तेन मनसा नियम्य तैः स्वत एव कर्मप्रवणैः इन्द्रियैः असङ्गपूर्वकं यः कर्मयोगम् आरभते सः असंभाव्यमानप्रमादत्वेन ज्ञाननिष्ठाद् अपि पुरुषाद् विशिष्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.7।। यस्तु पुनः कर्मण्यधिकृतः अज्ञः बुद्धीन्द्रियाणि मनसा नियम्य आरभते अर्जुन कर्मेन्द्रियैः वाक्पाण्यादिभिः। किमारभते इत्याह कर्मयोगम् असक्तः सन् फलाभिसंधिवर्जितः सः विशिष्यते इतरस्मात् मिथ्याचारात्।।यतः एवम् अतः
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【 Verse 3.8 】
▸ Sanskrit Sloka: नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मण: | शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मण: ||
▸ Transliteration: niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ | śarīrayātrāpi ca te na prasiddhyedakarmaṇaḥ ||
▸ Glossary: niyataṁ: prescribed; kuru: do; karma: work; tvaṁ: you; karma: work; jyāyaḥ: better; hi: than; akarmaṇaḥ: without work; śarīra: body; yātrā: maintenance; api: even; ca: also; te: your; na: never; prasiddhyet: possible; akarmaṇaḥ: without work
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.8 Do your prescribed work, as doing work is better than being idle. Even your own body cannot be maintained without work.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.8।।तू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्यकर्म कर क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीरनिर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.8।। तुम (अपने) नियत (कर्तव्य) कर्म करो क्योंकि अकर्म से श्रेष्ठ कर्म है। तुम्हारे अकर्म होने से (तुम्हारा) शरीर निर्वाह भी नहीं सिद्ध होगा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.8 नियतम् bounden (prescribed or obligatory)? कुरु perform? कर्म action? त्वम् thou? कर्म action? ज्यायः superior? हि for? अकर्मणः than inaction? शरीरयात्रा maintenance of the body? अपि even? च and? ते thy? न not? प्रसिद्ध्येत् would be possible? अकर्मणः by inaction.Commentary Niyatam Karma is an obligatory duty which one is bound to perform. Thenonperformance of the bounden duties causes demerit. The performance of the obligatory duties is not a means for the attainment of a specific result. The performance does not cause any merit.Living itself involves several natural and unavoidable actions which have to be performed by all. It is ignorance to say? I can live doing nothing.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.8. You must perform your action which has been enjoined. For, action is superior to inaction; and even the maintenance of your body could not be properly accomplished through inaction.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.8 Do thy duty as prescribed, for action for duty's sake is superior to inaction. Even the maintenance of the body would be impossible if man remained inactive.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.8 You must perform your obligatory action; for action is superior to non-action (Jnana Yoga). For a person following non-action not even the sustentation of the body is possible.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.8 You perform the obligatory duties, for action is superior to inaction. And, through inaction, even the maintenance of your body will not be possible.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.8 Do thou perform (thy) bounden duty, for action is superior to inaction and even the maintenance of the body would not be possible for thee by inaction.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.8 Niyatam etc. you must perform action which has been enjoined i.e., prescribed in the scriptures. For, even the just subsistence of body depends on action. Because -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.8 'Obligatory' (Niyatam) means 'concomitant' (Vyaptam); for action is concomitant with that which is conjoined with Prakrti or the body. The contact with Prakrti has arisen from beginingless subtle impressions (Vasanas). You must perform work, because the performance of action is easy and may not cause accidents by reason of its being obligatory. Action is superior to non-action, i.e., even to the devotee of Jnana. Because of the instruction at the beginning (of this context), 'No man experiences freedom from activity' (3.4), devotion to Jnana alone is indicated by the word, 'Non-action' (Akarma). Even in the case of one alified for devotion to Jnana, devotion to Karma indeed is better because Jnana-nistha is difficult to perform and liable to accidents, as it has not been practised previoulsy and as it does not come to one naturally. Subseently it will be described how, one with the knowledge of the true nature of the self can carry on actions along with that knowledge. Conseently, we should take the meaning here to be that, because knowledge of the self too is included in Karma Yoga, this kind of Yoga is superior.
This statement on the superiority of activity (Karma Yoga) over Jnana Yoga is valid even when there is competency for one to adopt Jnana Yoga. For, if you abandon all activities to alify yourself for Jnana Yoga, then, for you, who is thus inactive while following Jnana Yoga, even the nourishment of the body, which is necessary even for Jnana-nistha, will not be achieved. The body has to be necessarily sustained until the means are executed to the full. Performing 'great sacrifices' with the help of honestly earned wealth, the body should be sustained by consuming the remainders left after such sacrifices. This is made clear from scriptural texts like, 'When the food is pure, the Sattva (mind or inner organ) becomes pure; when the Sattva is pure, then the remembrance (meditation) will be steady' (Cha. U., 7.26.2). Sri Krsna himself will declare: 'The sinful ones who cook food for their own sake eat sin (3.13).
Conseently,even the sustenance of the body will not be possible in the case of one who practises Jnana-nistha, and does not act. In other ways also Karma Yoga is superior to Jnana Yoga even in respect of one who is alified for Jnana-nistha; for, obligatory and occasional rites like the 'great sacrifices' must be carried out by one who follows Jnana Yoga too, as he has to sustain the body until he attains perfection. Besides, the understanding of the true nature of the self is incorporated in Karma Yoga, as it involves the contemplation of the self as being a non-agent. It is also in line with the nature of life (Prakrti). Karma Yoga, is for these reasons easier and it is free from danger of downfall. Therefore, you must perform Karma Yoga only. This is the purport of the verse.
If it is contended that any action such as earning money implies 'I-ness', 'My-ness' etc., and will therefore be disturbing to the senses, and that such a person devoted often to works will be in bondage through subtle impressions of his acts, Sri Krsna says:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.8 Tvam, you, O Arjuna; kuru, perform; niyatam, the obligatory; karma, duties, those daily obligatory duties (nitya-karmas) or which one is competent (according to the scriptures), and which are not heard of [although no result of daily obligatory duties is mentioned in the scriptures, still Sankaracarya holds that it is either heaven or purification of the heart, because something done must have its conseence.-Tr.] as productive of any result; hi, for, from the point of view of result; karma, action; is jyayah, superior; akarmanah, to inaction, to non-performance (of duties). Why? Ca, and; akarmanah, through inaction; api, even; te sarira-yatra, the maintenance of your body; na prasiddhyet, will not be possible. Therefore, the distinction between action and in action is abvious in this world. 'And as regards your ideea that action should not be udnertaken because it leads to bondage-that too is wrong.' How?
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.8।। अपने व्यावहारिक जीवन में नियत कर्म से हमको वे सब कर्तव्य कर्म समझने चाहिये जो परिवार कार्यालय समाज एवं राष्ट्र के व्यक्ति होने के नाते हमें करने पड़ते हैं। इस दृष्टि से अकर्म का अर्थ होगा अपने इन कर्तव्यों को कुशलता से न करना। निष्क्रियता से तो शरीर निर्वाह भी असम्भव होता है। इस प्रकार के अकर्म से राष्ट्र समाज और परिवार का नाश होता है साथ ही वह व्यक्ति स्वयं अपनी अकर्मण्यता का शिकार होकर शारीरिक अक्षमता और बौद्धिक ह्रास से कष्ट पाता है।यह धारणा गलत है कि कर्म बन्धन का कारण होते हैं इसलिये उनको नहीं करना चाहिये। क्यों
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.8।। यतएवमतो नियतं स्ववर्णा श्रमोचितं नित्यं कर्म त्वं फलाभिसंधिरहितः कुरु। हि यस्मादकरणात् चित्तशोधकं कर्म श्रेष्ठं न केवलमकरणाच्चित्तशुद्य्धभाव एव किंतु शरीरयात्रापि शरीरस्थितिरपि च ते प्रकर्षेण स्वधर्मवृत्त्या न सिध्येदकर्मणः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.8।।यस्मादेवं तस्मान्मनसा ज्ञानेन्द्रियाणि निगृह्य कर्मेन्द्रियैः त्वं प्रागननुष्ठितशुद्धिहेतुकर्मा नियतं विध्युद्देशे फलसंबन्धशून्यता नियतनिमित्तेन कर्म श्रौतं स्मार्तं च नित्यमिति प्रसिद्धं कुरु। कुर्विति मध्यमपुरुषप्रयोगेणैव त्वमिति लब्धे त्वमिति पदमर्थान्तरे संक्रमितम्। कस्मादशुद्धान्तःकरणेन कर्मैव कर्तव्यम् हि यस्मात् अकर्मणोऽकरणात्कर्मैव ज्यायः प्रशस्यतरम्। न केवलं कर्माभावे तवान्तःकरणशुद्धिरेव न सिध्येत् किन्तु अकर्मणो युद्धादिकर्मरहितस्य ते तव शरीरयात्रा शरीरस्थितिरपि न प्रकर्षेण क्षात्रवृत्तिकृतत्वलक्षणेन सिध्येत्। तथाच प्रागुक्तम्। अपिचेत्यन्तःकरणशुद्धिसमुच्चयार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.8।।नियतमिति। यस्मादेवं तस्मात्त्वं नियतं संध्योपासनादिकर्मैव कुरु। यद्वा नियतं नियमेन त्वं कर्म नित्यकाम्यसाधारणं यत्पापनिवर्त्तकस्वभावं तत्तदेव कुरु। हि यस्मादकर्मणः सकलकर्मेन्द्रियनिग्रहेण तदकरणाच्चित्तजयशून्यात्कर्मैव ज्यायः प्रशस्ततरम्। अपि च ते तव क्षत्रियस्य अकर्मणः सत्यामपि चित्तशुद्धौ सर्वकर्मत्यागिनः शरीरयात्रा देहव्यवहारो न प्रसिध्येत्। भैक्ष्यचर्यायामनधिकारात्ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति इति संन्यासविधायके वाक्येराजा राजसूयेन स्वाराज्यकामो यजेत इत्यत्र राजपदवद्ब्राह्मणपदस्य विवक्षितस्वार्थत्वात्चत्वार आश्रमा ब्राह्मणस्य त्रयो राजन्यस्य द्वौ वैश्यस्य इति स्मृतेश्च। अन्यत्राप्युक्तं पारिव्राज्यं प्रकृत्यमुखजानामयं धर्मो वैष्णवं लिङ्गधारणम्। बाहुजातोरुजातानां नायं धर्मो विधीयते। इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.8।।यस्माल्लौकिकफलोत्पत्त्यर्थं कर्तुर्न फलमलौकिकं मदर्थं कर्मकर्तुरुत्तमं फलमतस्त्वं मदर्थं नियतं कर्म कुर्वित्याह नियतमिति। त्वं नियतं नित्यं मत्सेवादिरूपं कर्म कुरु। पूर्वोक्तन्यायेन मदर्थं वा यतोऽकर्मणः कर्मत्यागकर्तुर्ज्ञानवतः सकाशात् कर्म मत्सेवादिरूपं ज्याय अधिकतरम्। किञ्च ते मदर्थं मत्क्रीडार्थं गृहीतशरीरकार्यम्। अकर्मणः सेवादिरहितज्ञानमार्गे प्रपन्नस्य प्रकर्षण न सिद्ध्येत् न सेत्स्यतीत्यर्थः। ज्ञानमार्गेऽपि ज्ञानप्राप्तिपर्यन्तं शरीराऽपेक्षास्ति तदनन्तरं तु नापेक्षा भक्तिमार्गवत्अक्षण्वतां फलमिदं भाग.10।21।7 इति न्यायेन। तस्मात्सर्वात्मना सेन्द्रियशरीरकार्यसिद्धौ प्रकर्ष इति भावः। अत एव वियोगक्लेशादिरससिद्ध्यर्थं शरीरपदमुक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.8।।यस्मादेवं तस्मात् नियतमिति। नियतं नित्यं संध्योपासनादिकर्म कुरु। हि यस्मादकर्मणः कर्माकरणात्सकाशात्कर्म ज्यायोऽधिकतरम्। अन्यथा कर्मणः सर्वकर्मशून्यस्य तव शरीरनिर्वाहोऽपि न भवेत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.8।।यतस्त्वं कर्मयोगे कर्माधिकारी भवसीत्यतो नियतं कर्म कुरु। अकर्मणस्तज्ज्यायः। न हि कर्म विना किञ्चिच्छरीरयात्रादिकमपि सिद्ध्यतीत्यतः कर्मैव भगवदीयेनाऽसक्ततया कार्यम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.8।।ऐसा होनेके कारण हे अर्जुन जो कर्म श्रुतिमें किसी फलके लिये नहीं बताया गया है ऐसे जिस कर्मका जो अधिकारी है उसके लिये वह नियत कर्म है उस नियत अर्थात् नित्य कर्मका तू आचरण कर क्योंकि कर्मोंके न करनेकी अपेक्षा कर्म करना परिणाममें बहुत श्रेष्ठ है। क्योंकि कुछ भी न करनेसे तो तेरी शरीरयात्रा भी नहीं चलेगी अर्थात् तेरे शरीरका निर्वाह भी नहीं होगा। इसलिये कर्म करने और न करनेमें जो अन्तर है वह संसारमें प्रत्यक्ष है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.8।। व्याख्या नियतं कुरु कर्म त्वम् शास्त्रोंमें विहित तथा नियत दो प्रकारके कर्मोंको करनेकी आज्ञा दी गयी है। विहित कर्मका तात्पर्य है सामान्यरूपसे शास्त्रोंमें बताया हुआ आज्ञारूप कर्म जैसे व्रत उपवास उपासना आदि। इन विहित कर्मोंको सम्पूर्णरूपसे करना एक व्यक्तिके लिये कठिन है। परन्तु निषिद्ध कर्मोंका त्याग करना सुगम है। विहित कर्मको न कर सकनेमें उतना दोष नहीं है जितना निषिद्ध कर्मका त्याग करनेमें लाभ है जैसे झूठ न बोलना चोरी न करना हिंसा न करना इत्यादि। निषिद्ध कर्मोंका त्याग होनेसे विहित कर्म स्वतः होने लगते हैं। नियतकर्मका तात्पर्य है वर्ण आश्रम स्वभाव एवं परिस्थितिके अनुसार प्राप्त कर्तव्यकर्म जैसे भोजन करना व्यापार करना मकान बनवाना मार्ग भूले हुए व्यक्तिको मार्ग दिखाना आदि।कर्मयोगकी दृष्टिसे जो वर्णधर्मानुकूल शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म प्राप्त हो जाय वह चाहे घोर हो या सौम्य नियतकर्म ही है। यहाँ
Chapter 3 (Part 6)
नियतं कुरु कर्म पदोंसे भगवान् अर्जुनसे यह कहते हैं कि क्षत्रिय होनेके नाते अपने वर्णधर्मके अनुसार परिस्थितिसे प्राप्त युद्ध करना तेरा स्वाभाविक कर्म है (गीता 18। 43)। क्षत्रियके लिये युद्धरूप हिंसात्मक कर्म घोर दीखते हुए भी वस्तुतः घोर नहीं है प्रत्युत उसके लिये वह नियतकर्म ही है। दूसरे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि स्वधर्म की दृष्टिसे भी युद्ध करना तेरे लिये नियतकर्म है स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि (2। 31)। वास्तवमें तो स्वधर्म और नियतकर्म दोनों एक ही हैं। यद्यपि दुर्योधन आदिके लिये भी युद्ध वर्णधर्मके अनुसार प्राप्त कर्म है तथापि वह अन्याययुक्त होनेके कारण नियतकर्मसे अलग है क्योंकि वे युद्ध करके अन्यायपूर्वक राज्य छीनना चाहते हैं। अतः उनके लिये यह युद्ध नियत तथा धर्मयुक्त कर्म नहीं है।कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः इसी अध्यायके पहले श्लोकमें (अर्जुनके प्रश्नमें) आये हुए ज्यायसी पदका उत्तर भगवान् यहाँ ज्यायः पदसे ही दे रहे हैं। वहाँ अर्जुनका प्रश्न है कि यदि आपको कर्मकी अपेक्षा ज्ञान श्रेष्ठ मान्य है तो मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं इसके उत्तरमें यहाँ भगवान् कहते हैं कि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना ही मुझे श्रेष्ठ मान्य है। इस प्रकार अर्जुनका विचार युद्धरूप घोर कर्मसे निवृत्त होनेका है और भगवान्का विचार अर्जुनको युद्धरूप नियतकर्ममें प्रवृत्त करानेका है। इसीलिये आगे अठारहवें अध्यायमें भगवान् कहते हैं कि दोषयुक्त होनेपर भी सहज (नियत) कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् (18। 48)। कारण कि इसके त्यागसे दोष लगता है एवं कर्मोंके साथ अपना सम्बन्ध भी बना रहता है। अतः कर्मका त्याग करनेकी अपेक्षा नियतकर्म करना ही श्रेष्ठ है। फिर आसक्तिरहित होकर कर्म करना तो और भी श्रेष्ठ माना गया है क्योंकि इससे कर्मोंके साथ सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। अतः भगवान् इस श्लोकके पूर्वार्धमें अर्जुनको अनासक्तभावसे नियतकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं और उत्तरार्धमें कहते हैं कि कर्म किये बिना तेरा जीवननिर्वाह भी नहीं होगा।कर्मयोगमें कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः यह भगवान्का प्रधान सिद्धान्त है। इसीको भगवान्ने मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गीता 2। 47) पदोंसे स्पष्ट किया है कि अर्जुन तेरी कर्म न करनेमें आसक्ति न हो। कारण यह है कि कर्तव्यकर्मोंसे जी चुरानेवाला मनुष्य प्रमाद आलस्य और निद्रामें अपना अमूल्य समय नष्ट कर देगा अथवा शास्त्रनिषिद्ध कर्म करेगा जिससे उसका पतन होगा।स्वरूपसे कर्मोंका त्याग करनेकी अपेक्षा कर्म करते हुए ही कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करना श्रेष्ठ है। कारण कि कामना वासना फलासक्ति पक्षपात आदि ही कर्मोंसे सम्बध जोड़ देते हैं चाहे मनुष्य कर्म करे अथवा न करे। कामना आदिके त्यागका उद्देश्य रखकर कर्मयोगका आचरण करनेसे कामना आदिका त्याग बड़ी सुगमतासे हो जाता है।शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः अर्जुनके मनमें ऐसा भाव उत्पन्न हो गया था कि अगर कर्म ही न करें तो कर्मोंसे स्वतः सम्बन्धविच्छेद हो जायगा। इसलिये भगवान् नाना प्रकारकी युक्तियोंद्वारा उनको कर्म करनेके लिये प्रेरित करते हैं। उन्हीं युक्तियोंमेंसे एक इस युक्तिका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि अर्जुन तुम्हें कर्म तो करने ही पड़ेंगे। अन्यकी तो बात ही क्या है कर्म किये बिना तेरा शरीरनिर्वाह (खानापीना आदि) भी असम्भव हो जायगा।जैसे ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा संसारसे सम्बन्धविच्छेद होता है ऐसे ही कर्मयोगमें कर्तव्यकर्मका ठीकठीक अनुष्ठान करनेसे संसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। अतः ज्ञानयोगकी अपेक्षा कर्मयोगको किसी भी प्रकारसे कम नहीं मानना चाहिये। कर्मयोगी शरीरको संसारका ही मानकर उसको संसारकी ही सेवामें लगा देता है अर्थात् शरीरमें उसका कोई अपनापन नहीं रहता। वह स्थूल सूक्ष्म और कारणशरीरकी एकता क्रमशः स्थूल सूक्ष्म और कारणसंसारसे करता है जबकि ज्ञानयोगी अपनी एकता ब्रह्मसे करता है। इस प्रकार कर्मयोगी जडतत्त्वकी एकता करता है और ज्ञानयोगी चेतनतत्त्वकी एकता करता है। साधनसम्बन्धी मार्मिक बातअर्जुनकी कर्मोंसे अरुचि है अर्थात् उनके मनमें कर्म न करनेका आग्रह है। केवल अर्जुनकी ही बात नहीं है प्रत्युत पारमार्थिक मार्गके अन्य साधक भी प्रायः इस विषयमें ऐसी ही बड़ी भूल करते हैं। यद्यपि उनकी इच्छा साधन करनेकी रहती है और साधन करते भी हैं तथापि वे अपनी मनचाही परिस्थिति अनुकूलता और सुखबुद्धि भी साथमें रखते हैं जो उसके साधनमें महान् बाधक होती है।जो साधक तत्त्वप्राप्तिमें सुगमता ढूँढ़ता है और उसे शीघ्र प्राप्त करना चाहता है वह वास्तवमें सुखका रागी है न कि साधनका प्रेमी। जो सुगमतासे तत्त्वप्राप्ति चाहता है उसे कठिनता सहनी पड़ती है और जो शीघ्रतासे तत्त्वप्राप्ति चाहता है उसे विलम्ब सहना पड़ता है। कारण कि सुगमता और शीघ्रताकी इच्छा करनेसे साधककी दृष्टि साधनपर न रहकर फलपर चली जाती है जिससे साधनमें उकताहट प्रतीत होती है और साध्यकी प्राप्तिमें विलम्ब भी होता है। जिसका यह दृढ़ निश्चय या उद्देश्य है कि चाहे जैसे भी हो मुझे तत्त्वकी प्राप्ति होनी ही चाहिये उसकी दृष्टि सुगमता और शीघ्रतापर नहीं जाती। तत्परताके साथ कार्यमें लगा हुआ मनस्वी व्यक्ति जब अपने उद्देश्यकी पूर्तिके लिये कमर कसकर लग जाता है तब वह सुख और दुःखकी ओर नहीं देखता मनस्वी कार्यार्थी न गणयति दुःखं न च सुखम् (भर्तृहरिनीतिशतक)। साधककी तो बात ही क्या है एक साधारण लोभी मनुष्य ही दुःखकी ओर नहीं देखता। प्रायः देखा जाता है कि पसीना आ रहा है भूखप्यास लगी है अथवा शौच जानेकी आवश्यकता जान पड़ती है फिर भी यदि मालकी विशेष बिक्री हो रही है तथा पैसे आ रहे हैं तो वह लोभी व्यापारी सब कष्ट सह लेता है। ठीक लोभी व्यक्तिकी तरह साधककी साध्यमें निष्ठा होनी चाहिये। उसे साध्यकी प्राप्तिके बिना चैनसे न रहा जाय जीवन भारस्वरूप प्रतीत होने लगे खानापीना आराम आदि कुछ भी अच्छा न लगे और हृदयमें साधनका आदर और तत्परता रहे साध्यको प्राप्ति करनेकी उत्कण्ठा होनेपर देरी तो असह्य होती है पर वह जल्दी प्राप्त हो जाय यह इच्छा नहीं होती। उत्कण्ठा दूसरी बात है एवं शीघ्र मिलनेकी इच्छा दूसरी बात। आसक्तिपूर्वक साधन करनेवाला साधक साधनमें सुखभोग करता है और उसमें विलम्ब या बाधा लगनेसे उसे क्रोध आता है एवं वह साधनमें दोषदृष्टि करता है। परन्तु आदर और प्रेमपूर्वक साधन करनेवाला साधक साधनमें विलम्ब या बाधा लगनेपर आर्तभावसे रोने लगता है और उसकी उत्कण्ठा और तेजीसे बढ़ती है। यही शीघ्रता और उत्कण्ठामें अन्तर है। शीघ्रतामें साधकका सुखसुविधाका भाव रहता है कि तत्त्वप्राप्ति शीघ्र हो जाय तो पीछे आराम करेंगे इस प्रकार फलकी ओर दृष्टि रहनेसे साधनका आदर कम हो जाता है। परन्तु उत्कण्ठामें साधक अपनेसाधनमें ही आराम मानता है कि साधनके सिवाय और करना ही क्या है इससे बढ़िया और काम ही क्या है जिसे करें अतः यही काम (साधन) करना है चाहे सुगमतासे हो या कठिनतासे शीघ्रतासे हो या देरीसे। इसलिये उसकी पूरी शक्ति साधनमें लग जाती है जिससे उसको शीघ्रतासे तत्त्वप्राप्ति हो जाती है। परन्तु शीघ्रतासे सिद्धि चाहनेवाला साधक साध्यकी प्राप्तिमें देरी होनेपर निराश भी हो सकता है। अतः साधकको साध्यसे भी अधिक आदर साधनको देना चाहिये जैसा कि माता पार्वतीने कहा है जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।।तजउँ न नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू।। (मानस 1। 81। 5)माता पार्वतीके भावोंमें शीघ्रता नहीं है। इनमें तो साधनको साध्यसे भी अधिक आदर दिया गया है।प्रस्तुत श्लोकमें भगवान् अर्जुनको निमित्त बनाकर साधकोंको सावधान करते हैं कि उन्हें अपनी अनुकूलता तथा सुखबुद्धि (जो कि साधनमें मूल बाधा है) का त्याग करके कर्तव्यकर्मोंको करनेमें बड़ी तत्परतासे लग जाना चाहिये। सम्बन्ध पीछेके श्लोकमें भगवान्ने कर्म किये बिना शरीरनिर्वाह भी नहीं होनेकी बात कही। इससे सिद्ध होता है कि कर्म करना बहुत आवश्यक है। परन्तु कर्म करनेसे तो मनुष्य बँधता है कर्मणा बध्यते जन्तुः तो फिर मनुष्यको बन्धनसे छूटनेके लिये क्या करना चाहिये इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.8।।अतः नियतमिति। नियतं शास्त्रीयं कर्म कुरु। शरीरयात्रामात्रस्यापि कर्माधीनत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.8।।कर्मानुष्ठायिनो वैशिष्ट्यमुपदिष्टमनूद्य तदनुष्ठानमधिकृतेन कर्तव्यमिति निगमयति यत इति। उक्तमेव हेतुं भगवदनुमतिकथनेन स्फुटयति कर्मेति। इतश्च त्वया कर्तव्यं कर्मेत्याह शरीरेति। तन्नियतं तस्याधिकृतस्येति संबन्धः। स्वर्गादिफले दर्शपूर्णमासादावधिकृतस्य तस्य तदपि नित्यं स्यादित्याशङ्क्य विशिनष्टि फलायेति। नित्यं कर्मेति नियमेन कर्तव्यमित्यत्र हेतुमाह यत इति। हिशब्दोपात्तमुक्तमेव हेतुमनुवदति यस्मादिति। करणस्याकरणाज्ज्यायस्त्वं प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति कथमित्यादिना। सत्येव कर्मणि देहादिचेष्टाद्वारा शरीरं स्थातुं पारयति तदभावे जीवनमेव दुर्लभं भवेदिति फलितमाह अत इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.8।।उत्तरश्लोकपर्यालोचनया चैवमेवेति भावेन सङ्गतिं सूचयन् व्याचष्टे अत इति। अतश्शब्दपरामर्श्यं कर्म ज्याय इत्यादिनैवोच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.8।।अतो नियतं वर्णाश्रमोचितं कर्म कुरु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.8।। नियतं व्याप्तम् प्रकृतिसंसृष्टेन हि व्याप्तं कर्म प्रकृतिसंसृष्टत्वम् अनादिवासनया। नियतत्वेन सुशकत्वाद् असंभावितप्रमादत्वाच्च कर्मणः कर्म एव कुरु अकर्मणः ज्ञाननिष्ठाया अपि कर्म एव ज्यायः नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते (गीता 3।4) इति प्रक्रमात् अकर्मशब्देन ज्ञाननिष्ठा एव उच्यतेज्ञाननिष्ठाधिकारिणः अपि अनभ्यस्तपूर्वतया हि अनियतत्वेन दुःशकत्वात् सप्रमादत्वाच्च ज्ञाननिष्ठायाः कर्मनिष्ठा एव ज्यायसी।कर्मणि क्रियमाणे च आत्मयाथात्म्यज्ञानेन आत्मनः अकर्तृत्वानुसंधानम् अनन्तरम् एव वक्ष्यते अत आत्मज्ञानस्य अपि कर्मयोगान्तर्गतत्वात् स एव ज्यायान् इत्यर्थः।कर्मणो ज्ञाननिष्ठाया ज्यायस्त्ववचनं ज्ञाननिष्ठायाम् अधिकारे सति एव उपपद्यते। यदि सर्वं कर्म परित्यज्यकेवलं ज्ञाननिष्ठायाम् अधिकरोषि तर्हि अकर्मणः ते ज्ञाननिष्ठस्य ज्ञाननिष्ठोपकारिणी शरीरयात्रा अपि न सेत्स्यति।यावत्साधनसमाप्ति शरीरधारणं च अवश्यं कार्यम् न्यायार्जितधनेन महायज्ञादिकं कृत्वा तच्छिष्टाशनेन एव शरीरधारणं कार्यम्आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः। (छा0 उ0 7।26।2) इत्यादिश्रुतेः।भुञ्जते ते त्वघं पापाः (गीता 3।13) इति च वक्ष्यते। अतो ज्ञाननिष्ठस्य अपि कर्म अकुर्वतो देहयात्रा न सेत्स्यति।यतो ज्ञाननिष्ठस्य अपि ध्रियमाणशरीरस्य यावत्साधनसमाप्ति महायज्ञादिनित्यनैमित्तिकं कर्म अवश्यं कार्यम्। यतश्च कर्मयोगे अपि आत्मनः अकर्तृत्वभावनया आत्मयाथात्म्यानुसन्धानम् अन्तर्भूतम् यतश्च प्रकृतिसंसृष्टस्य कर्मयोगः सुशकः अप्रमादश्च अतो ज्ञाननिष्ठायोग्यस्य अपि ज्ञानयोगात् कर्मयोगो ज्यायान्। तस्मात् त्वं कर्मयोगम् एव कुरु इत्यभिप्रायः।एवं तर्हि द्रव्यार्जनादेः कर्मणः अहङ्कारममकारादिसर्वेन्द्रियव्याकुलतागर्भत्वेन अस्य पुरुषस्य कर्मवासनया बन्धनं भविष्यति इति अत्र आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.8।। नियतं नित्यं शास्त्रोपदिष्टम् यो यस्मिन् कर्मणि अधिकृतः फलाय च अश्रुतं तत् नियतं कर्म तत् कुरु त्वं हे अर्जुन यतः कर्म ज्यायः अधिकतरं फलतः हि यस्मात् अकर्मणः अकरणात् अनारम्भात्। कथम् शरीरयात्रा शरीरस्थितिः अपि च ते तव न प्रसिध्येत् प्रसिद्धिं न गच्छेत् अकर्मणः अकरणात्। अतः दृष्टः कर्माकर्मणोर्विशेषो लोके।।यच्च मन्यसे बन्धार्थत्वात् कर्म न कर्तव्यमिति तदप्यसत्। कथम्
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【 Verse 3.9 】
▸ Sanskrit Sloka: यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धन: | तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्ग: समाचर ||
▸ Transliteration: yajñārthātkarmaṇo’nyatra loko’yam karmabandhanaḥ | tadarthaṁ karma kaunteya mukta saṅgaḥ samācara ||
▸ Glossary: yajñārthāt: sacrifice for; karmaṇaḥ: work done; anyatra: other- wise; lokaḥ: world; ayaṁ: this; karma bandhanaḥ: bondage by work; tad: that; arthaṁ: for; karma: work; kaunteya: O son of Kuntī; mukta: liberated; saṅgaḥ: attachment; samācara: do perfectly
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.9 Work has to be performed selflessly; otherwise, work binds one to this world. O son of Kuntī, perform your work for Me and you will do it authentically, liberated and without attachment.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.9।।यज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्यसमुदाय कर्मोंसे बँधता है इसलिये हे कुन्तीनन्दन तू आसक्तिरहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्यकर्म कर।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.9।। यज्ञ के लिये किये हुए कर्म के अतिरिक्त अन्य कर्म में प्रवृत्त हुआ यह पुरुष कर्मों द्वारा बंधता है इसलिए हे कौन्तेय आसक्ति को त्यागकर यज्ञ के निमित्त ही कर्म का सम्यक् आचरण करो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.9 यज्ञार्थात् for the sake of sacrifice? कर्मणः of action? अन्यत्र otherwise? लोकः the world? अयम् this? कर्मबन्धनः bound by action? तदर्थम् for that sake? कर्म action? कौन्तेय O Kaunteya? मुक्तसंगः free from attachment? समाचार perform.Commentary Yajna means sacrifice or religious rite or any unselfish action done with a pure motive. It means also Isvara. The Taittiriya Samhita (of the Veda) says Yajna verily is Vishnu (174). If anyone does actions for the sake of the Lord? he is not bound. His heart is purified by performing actions for the sake of the Lord. Where this spirit of unselfishness does not govern the action? it will bind one to Samsara however good or glorious it may be. (Cf.II.48).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.9. The world is fettered by action which is other than the Yajnartha action; hence, O son of Kunti, being freed from attachment, you most properly perform Yajnartha action.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.9 In this world people are fettered by action, unless it is performed as a sacrifice. Therefore, O Arjuna, let thy acts be done without attachment, as sacrifice only.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.9 This world is held in the bondage of work only when work is not performed as sacrifice. O Arjuna, you must perform work to this end, free from attachment.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.9 This man becomes bound by actions other than that action meant for God. Without being attached, O son of Kunti, you perform actions for Him.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.9 The world is bound by actions other than those performed for the sake of sacrifice; do thou, therefore, O son of Kunti (Arjuna), perform action for that sake (for sacrifice alone), free from attachment.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.9 Yajnarthat etc. Binding are the actions which are different from the one that is Yajnartha, i.e., the one that is to be performed necessarily. The action, that is to be performed necessarily, does not yield any fruit, if it is performed with no attachment for the fruit.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.9 The world is imprisoned by the bond of work only when work is done for personal ends, but not when work is performed or money acired for the purpose of sacrifice etc. prescribed in the scriptures. So, for the purpose of sacrifice, you must perform acts like the acisition of money. In doing so, overcome attachments generated by the pursuit of personal ambitions, and then do your work in the spirit of Yajna. When a person free from attachment does the work for the sake of sacrifices etc., the Supreme Person, propitiated by sacrifices etc., grants him the calm vision of the self after destroying the subtle impressions of his Karmas, which have continued from time without beginning.
Sri Krsna stresses the need for sustenance of the body solely by the remnants of sacrifices in respect of those who are devoted to all ends of human life. He decries the sin of those who nourish the body by things other than the remnants of sacrifices:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.9 Ayam, this; lokah, man, the one who is eligible for action; karma-bandhanah, becomes bound by actions- the person who has karma as his bondage (bandhana) is karma-bandhanah-; anyatra, other than; that karmanah, action; yajnarthat, meant for Got not by that meant for God. According to the Vedic text, 'Sacrifice is verily Visnu' (Tai. Sam. 1.7.4), yajnah means God; whatever is done for Him is yajnartham. Therefore, mukta-sangah, without being attached, being free from attachment to the results of actions; O son of Kunti, samacara, you perform; karma, actions; tadartham, for Him, for God. An eligible person should engage in work for the following reason also:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.9।। प्रत्येक कर्म कर्त्ता के लिये बन्धन उत्पन्न नहीं करता। केवल अविवेकपूर्वक किये हुये कर्म ही मन में वासनाओं की वृद्धि करके परिच्छिन्न अहंकार और अपरिच्छिन्न आत्मस्वरूप के मध्य एक अभेद्य दीवार खड़ी कर देते हैं। वासनाओं से पूर्ण अन्तकरण वाले व्यक्ति में दिव्यत्व का कोई प्रकाश नहीं दिखाई देता। पारम्परिक अर्थानुसार यज्ञ के अतिरिक्त जो अन्य कर्म हैं वे वासनाओं को उत्पन्न कर व्यक्ति के विकास में अवरोधक बन जाते हैं।यहां यज्ञ शब्द का अर्थ है वे सब कर्म जिन्हें मनुष्य निस्वार्थ भाव एवं समर्पण की भावना से विश्व के कल्याण के लिये करता है। ऐसे कर्म व्यक्ति के पतन में नहीं वरन् उत्थान में ही सहायक होते हैं। यज्ञ शब्द का उपर्युक्त अर्थ समझ लेने पर आगे के श्लोक और अधिक स्पष्ट होंगे और उनमें उपदिष्ट ज्ञान सम्पूर्ण विश्व के उपयुक्त होगा।जब समाज के लोग आगे आकर परस्पर सहयोग एवं समर्पण की भावना से कर्म करेंगे केवल तभी वह समाज दारिद्रय और दुखों के बन्धनों से मुक्त हो सकता है यह एक ऐतिहासिक सत्य है। ऐसे कर्मों का सम्पादन अनासक्ति के होने से ही संभव होगा। अर्जुन में यह दोष आ गया था कि वह विरुद्ध पक्ष के व्यक्तियों के साथ अत्यन्त आसक्त हो गया और परिणामस्वरूप परिस्थिति को ठीक समझ नहीं पाया इसलिये समसामयिक कर्तव्य का त्याग कर कर्मक्षेत्र से पलायन करने की उसकी प्रवृत्ति हो गयी।कर्ममार्ग के अधिकारी व्यक्ति को निम्नलिखित कारणों से भी कर्म करना चाहिये
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.9।। ननुकर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया च विमुच्यते इति स्मृत्या यच्च मन्यसे बन्धार्थत्वात्कर्म न कर्तव्यमिति तदप्यसदित्याह यज्ञेति। यज्ञार्थादीश्वरार्थात्।यज्ञो वै विष्णुः इति श्रुतेः कर्मणोऽन्यत्रान्येन कर्मणाऽयं लोकः कर्म बन्धनं यस्य सः। ये त्वन्यत्र कर्मणि प्रवृत्तोऽयं लोकः कर्मणा बध्यत इति भाष्यविरुद्धं वर्णयन्ति तैः प्रवृत्तपदाध्याहारदोषः कर्मण्यनुशासनाभावाद्बहुलग्रहणस्यागतिकगतित्वात् ल्युडनुपपत्तिदोषो बहुव्रीह्यभावेन पुंलिङ्गानुपपत्तिदोषश्च परिहरणीयः। तस्मात्कर्मफलासंगवर्जितःसन् कर्म समाचर। कौन्तेयेति संबोधयन् स्वपक्षग्रहण उत्साहयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.9।।कर्मणा बध्यते जन्तुः इति स्मृतेः सर्वं कर्म बन्धात्मकत्वान्मुमुक्षुणा न कर्तव्यमिति मत्वा तस्योत्तरमाह यज्ञः परमेश्वरःयज्ञो वै विष्णुः इति श्रुतेः तदाराधनार्थं यत्कर्म क्रियते तद्यज्ञार्थं तस्मात्मर्कणोऽन्यत्र कर्मणि प्रवृत्तोऽयं लोकः कर्माधिकारी कर्मबन्धनः कर्मणा बध्यते नत्वीश्वराराधनार्थेन। अतस्तदर्थं यज्ञार्थं कर्म हे कौन्तेय त्वं कर्मण्यधिकृतो मुक्तसङ्गः सन्समाचर सम्यक् श्रद्धादिपुरःसरमाचर।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.9।।ननुकर्मणा बध्यते जन्तुः इति कर्मणां बन्धकत्वस्मृतेः कथं मुमुक्षुं मां तत्र नियोजयसीत्याशङ्क्याह यज्ञार्थादिति। यज्ञः परमेश्वराराधनंयज्ञ देवपूजायाम् इति धात्वर्थानुगमात्। तदर्थंयज्ञो वै विष्णुः इति श्रुतेर्विष्णुर्वा तदाराधनार्थं यत्कर्म ततोऽन्यत्र कर्मणि स्वर्गाद्यर्थे प्रवृत्तोऽयं लोकः कर्मबन्धनः कर्मणा बध्यते नत्वीश्वराराधनार्थेन। अतस्तदर्थं ईश्वराराधनार्थं कर्म वर्णाश्रमोचितं हे कौन्तेय मुक्तसङ्गः फलाभिलाषशून्यः सन् समाचर सम्यक्कुरु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.9।।नन्वेवं चेत्तदा कर्माकरणं पूर्वं कथ मुक्तं इत्याशङ्क्याह यज्ञार्थादिति। अन्यत्र मत्सेवातोऽन्यत्र कर्ममार्गे कर्मबन्धनः कर्मनिबन्धनोऽयं लोकः।कर्मणो यज्ञार्थात् इत्युक्त्वा कर्म कार्यमित्याहुस्ततस्तत्कर्म न मत्फलकमिति मया बन्धकत्वात्तत्त्याग उक्तः यतस्तत्कर्म बन्धकमतस्तत्त्यक्त्वा कर्म कुर्वित्याह तदर्थमिति। तदर्थं यज्ञार्थं मुक्तसङ्गः सन् कर्म मत्सेवारूपं समाचर सम्यक्प्रकारेण कुरु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.9।।सांख्यास्तु सर्वमपि कर्म बन्धकत्वान्न कार्यमित्याहुस्तन्निराकुर्वन्नाह यज्ञार्थादिति। यज्ञोऽत्र विष्णुः।यज्ञो वै विष्णुःइति श्रुतेः। तदाराधनार्थात्कर्मणोऽन्यत्र तदेकं विनाऽयं लोकः कर्मबन्धनः कर्मभिर्बध्यते न त्वीश्वराराधनार्थेन कर्मणा। अतस्तदर्थ विष्णुप्रीत्यर्थं मुक्तसङ्गो निष्कामः सन्कर्म सम्यगाचर।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.9।।साङ्ख्यास्त्वात्मातिरिक्तस्य बन्धकत्वमालोच्य कर्म न कार्यमिति वदन्ति तत्तदधिकृतविषयमपि न श्रौतमिति निर्णयमाह यज्ञार्थादिति। इज्यतेऽनेन सावयवो भगवानिति यज्ञस्तदर्थात्। वेदे हि मुख्यः कर्मयज्ञ एव भगवद्रूपत्वात्। ततोऽन्यत्र काम्ये परधर्मे वा बन्धनम्।यज्ञरूपो हरिः कर्मोपास्तिकाण्डे परे बृहत्। प्रेमभक्तौ तु स्वयं हीत्यानर्थक्यं न युज्यते।बुद्ध्वा चेत्कुरुते कर्म ततस्तद्बन्धकं न हि। अन्यथा करणे तस्य सर्वथाबन्धसम्भवः इत्यर्थो दर्शितः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.9।।जो तू ऐसा समझता है कि बन्धनकारक होनेसे कर्म नहीं करना चाहिये तो यह समझना भी भूल है। कैसे यज्ञ ही विष्णु है इस श्रुतिप्रमाणसे यज्ञ ईश्वर है और उसके लिये जो कर्म किया जाय वह यज्ञार्थ कर्म है उस ( ईश्वरार्थ ) कर्मको छोड़कर दूसरे कर्मोंसे कर्म करनेवाला अधिकारी मनुष्यसमुदाय कर्मबन्धनयुक्त हो जाता है पर ईश्वरार्थ किये जानेवाले कर्मसे नहीं। इसलिये हे कौन्तेय तू कर्मफल और आसक्तिसे रहित होकर ईश्वरार्थ कर्मोंका भली प्रकार आचरण कर।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.9।। व्याख्या यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र गीताके अनुसार कर्तव्यमात्रका नामयज्ञ है। यज्ञ शब्दके अन्तर्गत यज्ञ दान तप होम तीर्थसेवन व्रत वेदाध्ययन आदि समस्त शारीरिक व्यावहारिक और पारमार्थिक क्रियाएँ आ जाती हैं। कर्तव्य मानकर किये जानेवाले व्यापार नौकरी अध्ययन अध्यापन आदि सब शास्त्रविहित कर्मोंका नाम भी यज्ञ है। दूसरोंको सुख पहुँचाने तथा उनका हित करनेके लिये जो भी कर्म किये जाते हैं वे सभी यज्ञार्थ कर्म हैं। यज्ञार्थ कर्म करनेसे आसक्ति बहुत जल्दी मिट जाती है तथा कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्म नष्ट हो जाते हैं (गीता 4। 23) अर्थात् वे कर्म स्वयं तो बन्धनकारक होते नहीं प्रत्युत पूर्वसंचित कर्मसमूहको भी समाप्त कर देते हैं।वास्तवमें मनुष्यकी स्थिति उसके उद्दश्यके अनुसार होती है क्रियाके अनुसार नहीं। जैसे व्यापारीका प्रधान उद्देश्य धन कमाना रहता है अतः वास्तवमें उसकी स्थिति धनमें ही रहती है और दुकान बंद करते ही उसकी वृत्ति धनकी तरफ चली जाती है। ऐसे ही यज्ञार्थ कर्म करते समय कर्मयोगीकी स्थिति अपने उद्देश्य परमात्मामें ही रहती है और कर्म समाप्त करते ही उसकी वृत्ति परमात्माकी तरफ चली जाती है।सभी वर्णोंके लिये अलगअलग कर्म हैं। एक वर्णके लिये कोई कर्म स्वधर्म है तो वही दूसरे वर्णोंके लिये (विहित न होनेसे) परधर्म अर्थात् अन्यत्र कर्म हो जाता है जैसे भिक्षासे जीवननिर्वाह करना ब्राह्मणके लिये तो स्वधर्म है पर क्षत्रियके लिये परधर्म है। इसी प्रकार निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करना मनुष्यका स्वधर्म है और सकामभावसे कर्म करना परधर्म है। जितने भी सकाम और निषिद्ध कर्म हैं वे सबकेसबअन्यत्रकर्म की श्रेणीमें ही हैं। अपने सुख मान बड़ाई आराम आदिके लिये जितने कर्म किये जायँ वे सबकेसब भी अन्यत्रकर्म हैं (टिप्पणी प0 126)। अतः छोटासेछोटा तथा बड़ासे़बड़ा जो भी कर्म किया जाय उसमें साधकको सावधान रहना चाहिये कि कहीं किसी स्वार्थकी भावनासे तो कर्म नहीं हो रहा है साधक उसीको कहते हैं जो निरन्तर सावधान रहता है। इसलिये साधकको अपनी साधनाके प्रति सतर्क जागरूक रहना ही चाहिये। अन्यत्रकर्म के विषयमें दो गुप्त भाव (1) किसीके आनेपर यदि कोई मनुष्य उसके प्रति आइये बैठिये आदि आदरसूचक शब्दोंका प्रयोग करता है पर भीतरसे अपनेमें सज्जनताका आरोप करता है अथवा ऐसा कहनेसे आनेवाले व्यक्तिपर मेरा अच्छा असर पड़ेगा इस भावसे कहता है तो इसमें स्वार्थकी भावना छिपी रहनेसे यह अन्यत्रकर्म ही है यज्ञार्थ कर्म नहीं।(2) सत्सङ्ग सभा आदिमें कोई व्यक्ति मनमें इस भावको रखते हुए प्रश्न करता है कि वक्ता और श्रोतागण मुझे अच्छा जानकार समझेंगे तथा उनपर मेरा अच्छा असर पड़ेगा तो यह अन्यत्रकर्म ही है यज्ञार्थ कर्म नहीं।तात्पर्य यह है कि साधक कर्म तो करे पर उसमें स्वार्थ कामना आदिका भाव नहीं रहना चाहिये। कर्मका निषेध नहीं है प्रत्युत सकामभावका निषेध है।साधकको भोग और ऐश्वर्यबुद्धिसे कोई भी कर्म नहीं करना चाहिये क्योंकि ऐसी बुद्धिमें भोगसक्ति और कामना रहती है जिससे कर्मयोगका आचरण नहीं हो पाता। निर्वाहबुद्धिसे कर्म करनेपर भी जीनेकी कामना बनी रहती है। अतः निर्वाहबुद्धि भी त्याज्य है। साधकको केवल साधनबुद्धिसे ही प्रत्येक कर्म करना चाहिये। सबसे उत्तम साधक तो वह है जो अपनी मुक्तिके लिये भी कोई कर्म न करके केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है। कारण कि अपना हित दूसरोंके लिये कर्म करनेसे होता है अपने लिये कर्म करनेसे नहीं। दूसरोंके हितमें ही अपना हित है। दूसरोंके हितसे अपना हित अलग अलग मानना ही गलती है। इसलिये लौकिक तथा शास्त्रीय जो कर्म किये जायँ वे सबकेसब केवल लोकहितार्थ होने चाहिये। अपने सुखके लिये किया गया कर्म तो बन्धनकारक है ही अपने व्यक्तिगत हितके लिये किया गया कर्म भी बन्धनकारक है। केवल अपने हितकी तरफ दृष्टि रखनेसे व्यक्तित्व बना रहता है। इसलिये और तो क्या जप चिन्तन ध्यान समाधि भी केवल लोकहितके लिये ही करे। तात्पर्य यह कि स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे होनेवाली मात्र क्रिया संसारके लिये ही हो अपने लिये नहीं। कर्म संसारके लिय है और संसारसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर परमात्माके साथ योग अपने लिये है। इसीका नाम हैकर्मयोग।लोकोऽयं कर्मबन्धनः कर्तव्यकर्म (यज्ञ) करनेका अधिकार मुख्यरूपसे मनुष्यको ही है। इसका वर्णन भगवान्ने आगे सृष्टिचक्रके प्रसङ्ग (3। 14 16) में भी किया है। जिसका उद्देश्य प्राणिमात्रका हित करना उनको सुख पहुँचाना होता है उसीके द्वारा कर्तव्यकर्म हुआ करते हैं। जब मनुष्य दूसरोंके हितके लिये कर्म न करके केवल अपने सुखके लिये कर्म करता है तब वह बँध जाता है।आसक्ति और स्वार्थभावसे कर्म करना ही बन्धनका कारण है। आसक्ति और स्वार्थके न रहनेपर स्वतः सबके हितके लिये कर्म होते हैं। बन्धन भावसे होता है क्रियासे नहीं। मनुष्य कर्मोंसे नहीं बँधता प्रत्युत कर्मोंमें वह जो आसक्ति और स्वार्थभाव रखता है उनसे ही वह बँधता है।तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर यहाँ मुक्तसङ्गः पदसे भगवान्का यह तात्पर्य है कि कर्मोंमें पदार्थोंमें तथा जिनसे कर्म किये जाते हैं उन शरीर मन बुद्धि आदि सामग्रीमें ममताआसक्ति होनेसे ही बन्धन होता है। ममता आसक्ति रहनेसे कर्तव्यकर्म भी स्वाभाविक एवं भलीभाँति नहीं होते। ममताआसक्ति न रहनेसे परहितके लिये कर्तव्यकर्मका स्वतः आचरण होता है और यदि कर्तव्यकर्म प्राप्त न हो तो स्वतः निर्विकल्पतामें स्वरूपमें स्थिति होती है। परिणामस्वरूप साधन निरन्तर होता है ओर असाधन कभी होता ही नहीं।आलस्य और प्रमादके कारण नियत कर्मका त्याग करना तामस त्याग कहलाता है (गीता 18। 7) जिसका फल मूढ़ता अर्थात् मूढ़योनियोंकी प्राप्ति है अज्ञानं तमसः फलम् (गीता 14। 16)। कर्मोंको दुःखरूप समझकर उनका त्याग करनाराजस त्याग कहलाता है (गीता 18। 8) जिसका फल दुःखोंकी प्राप्ति है रजसस्तु फलं दुःखम् (गीता 14। 16)। इसलिये यहाँ भगवान् अर्जुनको कर्मोंका त्याग करनेके लिये नहीं कहते प्रत्युत स्वार्थ ममता फलासक्ति कामना वासना पक्षपात आदिसे रहित होकर शास्त्रविधिके अनुसार सुचारुरूपसे उत्साहपूर्वक कर्तव्यकर्मोंको करनेकी आज्ञा देते हैं जो सात्त्विक त्याग कहलाता है (गीता 18। 9)। स्वयं भगवान् भी आगे चलकर कहते हैं कि मेरे लिये कुछ भी करना शेष नहीं है फिर भी मैं सावधानीपूर्वक कर्म करता हूँ (3। 2223)।कर्तव्यकर्मोंका अच्छी तरह आचरण करनेमें दो कारणोंसे शिथिलता आती है (1) मनुष्यका स्वभाव है कि वह पहले फलकी कामना करके ही कर्ममें प्रवृत्त होता है। जब वह देखता है कि कर्मयोगके अनुसार फलकी कामना नहीं रखनी है तब वह विचार करता है कि कर्म ही क्यों करूँ (2) कर्म आरम्भ करनेके बाद जब अन्तमें उसे पता लग जाय कि इसका फल विपरीत होगा तब वह विचार करता है कि मैं कर्म तो अच्छासेअच्छा करूँ पर फल विपरीत मिले तो फिर कर्म करूँ ही क्योंकर्मयोगी न तो कोई कामना करता है और न कोई नाशवान् फल ही चाहता है वह तो मात्र संसारका हित सामने रखकर ही कर्तव्यकर्म करता है। अतः उपर्युक्त दोनों कारणोंसे उसके कर्तव्यकर्ममें शिथिलता नहीं आ सकती। मार्मिक बातमनुष्यका प्रायः ऐसा स्वभाव हो गया है कि जिसमें उसको अपना स्वार्थ दिखायी देता है उसी कर्मको वह बड़ी तत्परतासे करता है। परन्तु वही कर्म उसके लिये बन्धनकारक हो जाता है। अतः इस बन्धनसे छूटनेके लिये उसे कर्मयोगके अनुसार आचरण करनेकी बड़ी आवश्यकता है।कर्मयोगमें सभी कर्म केवल दूसरोंके लिये किये जाते हैं अपने लिये कदापि नहीं। दूसरे कौनकौन हैं इसे समझना भी बहुत जरूरी है। अपने शरीरके सिवाय दूसरे प्राणीपदार्थ तो दूसरे हैं ही पर ये अपने कहलानेवाले स्थूलशरीर सूक्ष्मशरीर (इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण) और कारणशरीर (जिसमें माना हुआ अहम् है) भी स्वयंसे दूसरे ही हैं (टिप्पणी प0 127)। कारण कि स्वयं (जीवात्मा) चेतन परमात्माका अंश है और ये शरीर आदि पदार्थ जड प्रकृतिके अंश है। समस्त क्रियाएँ जडमें और जडके लिये ही होती हैं। चेतनमें और चेतनके लिये कभी कोई क्रिया नहीं होती। अतः करना अपने लिये है ही नहीं कभी हुआ नहीं और हो सकता भी नहीं। हाँ संसारसे मिले हुए इन शरीर आदि जड पदार्थोंको चेतन जितने अंशमें मैं मेरा और मेरे लिये मान लेता है उतने अंशमें उसका स्वभाव अपने लिये करनेका हो जाता है। अतः दूसरोंके लिये कर्म करनेसे ममताआसक्ति सुगमतासे मिट जाती है।शरीरकी अवस्थाएँ (बचपन जवानी आदि) बदलनेपर भी मैं वही हूँ इस रूपमें अपनी एक निरन्तर रहनेवाली सत्ताका प्राणिमात्रको अनुभव होता है। इस अपरिवर्तनशील सत्ता (अपने होनेपन) की परमात्मतत्त्वके साथ स्वतः एकता है और परिवर्तनशील शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिकी संसारके साथ स्वतः एकता है। हमारे द्वारा जो भी क्रिया की जाती है वह शरीर इन्द्रियों आदिके द्वारा ही की जाती है क्योंकि क्रियामात्रका सम्बन्ध प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंके साथ है स्वयं (अपने स्वरूप) के साथ नहीं। इसलिये शरीरके सम्बन्धके बिना हम कोई भी क्रिया नहीं कर सकते। इससे यह बात निश्चितरूपसे सिद्ध होती है कि हमें अपने लिये कुछ भी नहीं करना है जो कुछ करना है संसारके लिये ही करना है। कारण कि करना उसीपर लागू होता है जो स्वयं कर सकता है। जो स्वयं कुछ कर ही नहीं सकता उसके लियेकरने का विधान है ही नहीं। जो कुछ किया जाता है संसारकी सहायतासे ही किया जाता है। अतः करना संसारके लिये ही है। अपने लिये करने से ही मनुष्य कर्मोंसे बँधता है यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्रलोकोऽयं कर्मबन्धनः।विनाशी और परिवर्तनशील शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिके साथ अपने अविनाशी और अपरिवर्तनशील स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है इसलिये अपना और अपने लिये कुछ भी नहीं है। शरीरादिकी सहायताके बिना हम कुछ नहीं कर सकते इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। अपने सत्स्वरूपमें कभी कोई कमी नहीं आती और कमी आये बिना कोई इच्छा नहीं होती इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये। इस प्रकार जब क्रिया और पदार्थसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है (जो वास्तवमें है) तब यदि ज्ञानके संस्कार हैं तो स्वरूपका साक्षात्कार हो जाता है और यदि भक्तिके संस्कार हैं तो भगवान्में प्रेम हो जाता है। सम्बन्ध पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि यज्ञ(कर्तव्यकर्म) के अतिरिक्त कर्म बन्धनकारक होते हैं। अतः इस बन्धनसे मुक्त होनेके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग न करके कर्तव्यबुद्धिसे कर्म करना आवश्यक है। अब कर्मोंकी अवश्यकर्तव्यताको पुष्ट करनेके लिये और भी हेतु बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.9।।यतः यज्ञार्थात् इति। यज्ञार्थात् अवश्यकरणीयात् अन्यानि कर्माणि बन्धकानि। अवश्यकर्तव्यं ( omits अवश्यकर्तव्यम्) मुक्तफलसंगतया क्रियमाणं न फलदम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.9।।कर्मणा बध्यते जन्तुः इति स्मृतेर्बन्धार्थं कर्म तन्न श्रेयोऽर्थिना कर्तव्यमित्याशङ्कामनमूद्य दूषयति यच्चेत्यादिना। कर्माधिकृतस्य तदकरणमयुक्तमिति प्रतिज्ञातं प्रश्नपूर्वकं विवृणोति कथमित्यादिना। फलाभिसन्धिमन्तरेण यज्ञार्थं कर्म कुर्वाणस्य बन्धाभावात्तादर्थ्येन कर्म कर्तव्यमित्याह तदर्थमिति। यज्ञार्थं कर्मेत्ययुक्तं नहि कर्मार्थमेव कर्मेत्याशङ्क्य व्याचष्टे यज्ञो वै विष्णुरिति। कथं तर्हि कर्मणा बध्यते जन्तुरिति स्मृतिस्तत्राह तस्मादिति। ईश्वरार्पणबुद्ध्या कृतस्य कर्मणो बन्धार्थत्वाभावे फलितमाह अत इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.9।।इदानीं तृतीयं पक्षमाशङ्क्य तत्परिहाराय श्लोकमवतारयति कर्मणेति। बन्धकं मोक्षस्य प्रतिबन्धकं अतो न करोमीति शेषः। तत्पुरुषत्वभ्रान्तिनिरासायाह कर्मेति। तत्पुरुषत्वेऽसङ्गतिः स्यादिति भावः। यज्ञशब्दस्य यागार्थत्वप्रतीतिमपाकर्तुमाह यज्ञ इति। अवैष्णवयागस्यापि बन्धकत्वादिति भावः। तदर्थमित्युत्तरवाक्यस्यासङ्गतिपरिहारायार्थात्सिद्धं पूर्ववाक्यार्थमाह यज्ञार्थमिति। सङ्गरहितमित्यनुक्तं कस्मादुक्तं इत्यत आह मुक्तेति। इष्टियाजुकः फलेच्छया यष्टा। ननुकर्मणा बध्यते जन्तुः इत्यपि विशेषवचनम् अविद्यादीनामनेकेषां बन्धकत्वेनाविद्यादिभिरिति सामान्यस्यानुपात्तत्वात् गीतावाक्यं कर्म न बन्धकमितीदमपि विशेषवचनं तत्कथं तत्परिहारायावतार्यं व्याख्यातं इत्यत आह विशेषेति। यद्युक्तविधया द्वयोर्विशेषवचनत्वं समं तथापि गीतावाक्येयज्ञार्थात् इत्यादिविशेषणमुच्यतेऽतस्तदपेक्षया तत्सामान्यवचनमेव अतो युक्तमेतद्व्याख्यानमिति भावः। अयमत्र प्रत्युत्तरक्रमःकर्मणा बध्यते इति वाक्यमाश्रित्य न युद्धादिकर्मत्यागः कार्यः तस्यावैष्णवकाम्यकर्मविषयत्वात्। कुतः सङ्कोचः इति चेत् परेणापि परिस्पन्दमात्रस्य त्यक्तुमशक्यत्वेनासङ्कुचितार्थतायाः स्वीकर्तुमशक्यत्वात्। तर्ह्यत एव बाधकाच्छरीरयात्रार्थकर्मव्यतिरिक्तविषयत्वं कल्प्यत इति चेत् न वैय्यर्थ्यात्। एवमपि मनोव्यापारस्याल्पकत्वेन प्रतिबन्धकाभावो न सिध्यति। तस्यैवान्वयव्यतिरेकाभ्यां प्रयोजकत्वावधारणात् बाधकात्सङ्कोचमङ्गीकुर्वतां चायमपि सङ्कोचोऽङ्गीकार्यः विधानसामर्थ्यात् युद्धादीनामपि तत्तद्वर्णाश्रमोचितत्वात्। न च विधानस्यामुमुक्षुविषयत्वम् कल्पकाभावात्। न चेदमेव वाक्यं कल्पकम् तस्यावैष्णवादिकर्मत्यागेन चरितार्थत्वात् धर्मिपरित्यागाद्धर्ममात्रपरित्यागस्य ज्यायस्त्वात्। अतो न कर्मस्वरूपं त्याज्यमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.9।।कर्मणा बध्यते जन्तुः म.भा.12।241।7 इति कर्म बन्धकं स्मृतमित्यत आह यज्ञार्थादिति। कर्म बन्धनं यस्य लोकस्य स कर्मबन्धनः। यज्ञो विष्णुः यज्ञार्थं सङ्गरहितं कर्म न बन्धकमित्यर्थः।मुक्तसङ्ग इति सङ्ग विशेषणात् कामान्यः कामयते मुं.उ.3।2।2 इति श्रुतेश्चअनिष्टमिष्टं 18।12 इति वक्ष्यमाणत्वाच्चएतान्यपि तु कर्माणि 18।6 इति च तस्मान्नेष्टियाजुकः स्यात् बृ.उ.1।5।2 इति च विशेषवचनत्वे समेऽपि विशेषणं परिशिष्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.9।।यज्ञादिशास्त्रीयकर्मशेषभूताद् द्रव्यार्जनादेः कर्मणः अन्यत्र आत्मीयप्रयोजनशेषभूते कर्मणि क्रियमाणे अयं लोकः कर्मबन्धनो भवति। अतः त्वं यज्ञाद्यर्थं द्रव्यार्जनादिकं कर्म समाचर तत्र आत्मप्रयोजनसाधनतया यः सङ्गः तस्मात् सङ्गात् मुक्तः सन् समाचर।एवं मुक्तसङ्गेन यज्ञाद्यर्थतया कर्मणि क्रियमाणे यज्ञादिभिः कर्मभिः आराधितः परमपुरुषः अस्य अनादिकालप्रवृत्तकर्मवासनां समुच्छिद्य अव्याकुलात्मावलोकनं ददाति इत्यर्थः।यज्ञशिष्टेन एव सर्वपुरुषार्थसाधननिष्ठानां शरीरधारणकर्तव्यताम् अयज्ञशिष्टेन शरीरधारणं कुर्वतां दोषं च आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.9।। यज्ञो वै विष्णुः (तै0 सं0 1.7.4) इति श्रुतेः यज्ञः ईश्वरः तदर्थं यत् क्रियते तत् यज्ञार्थं कर्म। तस्मात् कर्मणः अन्यत्र अन्येन कर्मणा लोकः अयम् अधिकृतः कर्मकृत् कर्मबन्धनः कर्म बन्धनं यस्य सोऽयं कर्मबन्धनः लोकः न तु यज्ञार्थात्। अतः तदर्थं यज्ञार्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः कर्मफलसङ्गवर्जितः सन् समाचर निर्वर्तय।।इतश्च अधिकृतेन कर्म कर्तव्यम्
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【 Verse 3.10 】
▸ Sanskrit Sloka: सहयज्ञा: प्रजा: सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापति: | अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ||
▸ Transliteration: sahayajñāḥ prajāḥ sṛṣṭvā puro’vāca prajāpatiḥ | anena prasaviṣyadhvameṣa vo’stviṣṭakāmadhuk ||
▸ Glossary: sah: along with; yajñāḥ: sacrifices; prajāḥ: people; sṛṣṭvā: creating; purā: before; uvāca: said; prajāpatiḥ: the lord of creation; anena: by this; prasaviṣyadhvaṁ: be more and more prosperous; eṣaḥ: certainly; vaḥ: your; astu: let it be; iṣṭa: desired; kāma dhuk: bestower of gifts
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.10 Brahma, the lord of creation before creating human kind as selfless sacrifice said, ‘By this selfless enriching, be more and more prosperous and let it bestow all the desired gifts.’
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.10 3.11।।प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजा(मनुष्य आदि) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्यकर्मरूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्यकर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एकदूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.10।। प्रजापति (सृष्टिकर्त्ता) ने (सृष्टि के) आदि में यज्ञ सहित प्रजा का निर्माण कर कहा इस यज्ञ द्वारा तुम वृद्धि को प्राप्त हो और यह यज्ञ तुम्हारे लिये इच्छित कामनाओं को पूर्ण करने वाला (इष्टकामधुक्) होवे।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.10 सहयज्ञाः together with sacrifice? प्रजाः mankind? सृष्ट्वा having created? पुरा in the beginning? उवाच said? प्रजापतिः Prajapati? अनेन by this? प्रसविष्यध्वम् shall ye propagate? एषः this? वः your? अस्तु let be? इष्टकामधुक् milch cow of desires.Commentary Prajapati is the Creator or Brahma. Kamadhuk is another name for the cow Kamadhenu. Kamadhenu is the cow of Indra from which everyone can milk whatever one desires. (Cf.VIII.4IX.2427X.25).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.10. Having created creatures formerly [at the time of creation] together with necessary action, the Lord of creatures declared : 'By means of this, you shalll propagate yourselves; and let this be your wish-fulfilling-cow.'
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.10 In the beginning, when God created all beings by the sacrifice of Himself, He said unto them: Through sacrifice you can procreate, and it shall satisfy all your desires.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.10 In the beginning the Lord of all beings, creating man along with the sacrifice, said: 'By this shall you prosper; this shall be the cow of plenty granting all your wants.'
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.10 In the days of yore, having created the beings together with the sacrifices, Prajapati said: 'By this you multiply. Let this be your yielder of coveted objects of desire.'
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.10 The Creator, having in the beginning (of creation) created mankind together with sacrifice, said, "By this shall ye propagate; let this be the milch cow of your desires (the cow which yields all the desired objects)."
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.10 Saha-etc. The lord of creatures, the Supreme Soul, created creatures, just together with actions. It has also been declared by Him that the procreation i.e., lineage of creatures is through actions alone; these alone would give them what is desired viz., either the cycle of birth-and-death or emancipation - the cycle of birth-and-death is due to attachment and emancipation, due to the freedom from attachment. The sense-objects deserve to be enjoyed only by those for whom emancipation is the most important. This is declared :
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.10 As there is the scriptural text beginning with 'The Lord of Universe' (Tai. Na., 11.3), it is justifiable to take the term Prajapati in its wider connotation and interpret it to mean Narayana who is the Lord of all beings, the creator of the universe and the Self of the universe. In the beginning, i.e., during the creation, He, the Lord of beings, saw all beings helpless by their conjunction with beginningless non-conscient matter, bereft of the distinctions of name and form, and submerged in Himself. They were incapable of attaining the major ends of human existence, being almost one with non-conscient matter. He, the supremely compassionate, with a desire to resuscitate them, created them together with sacrifice in order that they might perform sacrifices as His worship and said: 'By this sacrifice, shall you prosper,' i.e., multiply and prosper. May this sacrifice fulfil your supreme object of desire called release (Moksa) and also the other desires that are in conformity with it.
How, then, should this be done?
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.10 Pura, in the days of yore, in the beginning of creation; srstva, having created; prajah, the beings, the people of the three castes; saha-yajnah, together with the sacrifices; Prajapati, the creator of beings, uvaca, said; 'Anena, by this sacrifice; prasavisyadhvam, you multiply.' Prasava means origination, growth. 'You accomplish that. Esah astu, let this sacrifice be; vah, your; ista-kama-dhuk, yielder of coveted objects of desire.' That which yields (dhuk) coveted (ista) objects of desire (kama), particular results, is istakama-dhuk. How?
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.10।। स्वयं सृष्टिकर्त्ता प्रजापति पंचमहाभूतों की सृष्टि रचकर अन्य प्राणियों के साथ मनुष्य को भी कर्म करने और फल पाने के लिये उत्पन्न करते हैं। उस समय वे यज्ञ को भी बनाते हैं अर्थात् उसका उपदेश देते हैं। यज्ञ का अर्थ है समर्पण बुद्धि और सेवा भाव से किये हुये कर्म। प्रकृति में सर्वत्र यज्ञ की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। सूर्य प्रकाशित होता है और चन्द्रमा प्रगट होता है समुद्र स्पन्दित होता है पृथ्वी प्राणियों को धारण करती है ये सब मातृभाव से तथा यज्ञ की भावना से कर्म करते हैं जिनमें रंचमात्र भी आसक्ति नहीं होती।ब्रह्माण्ड की शक्तियाँ और प्राकृतिक घटना चक्र अपने आप सब की सेवा में संलग्न रहता है। जगत् में जीवन के प्रादुर्भाव के पूर्व ही प्रकृति ने उसके लिये उचित क्षेत्र निर्माण कर रखा था। जब विभिन्न स्तरों पर जीवन का विकास होता है तब भी हम प्रकृति में सर्वत्र चल रहा यज्ञ कर्म देख सकते हैं जिसके कारण सबका अस्तित्व बना रहता है और विकास होता रहता है।उपर्युक्त सिद्धांत को काव्यात्मकभाषा में यह अर्थ गर्भित श्लोक प्रस्तुत करता है। सृष्टिकर्त्ता ब्रह्मा जी ने सेवा की भावना तथा यज्ञ करने की क्षमता के साथ जगत् की रचना की। मानो उन्होंने घोषणा की इस यज्ञ में तुम वृद्धि को
Chapter 3 (Part 7)
प्राप्त हो यह तुम्हारे लिये कामधेनु सिद्ध हो। पौराणिक कथाओं के अनुसार कामधेनु नामक गाय वशिष्ट ऋषि के पास थी जो सभी इच्छाओं की पूर्ति करती थी। इसलिये इस शब्द का अर्थ इतना ही है कि यदि मनुष्य सहयोग और अनुशासन में रह कर अनासक्ति और त्याग की भावना से कर्म करने में तत्पर रहे तो उसके लिये कोई लक्ष्य अप्राप्य नहीं हो सकता।यज्ञ से इसका कैसे सम्पादन किया जा सकता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.10।।इतश्च हेतोरधिकृतेन कर्म कर्तव्यं प्रजापतिर्ब्रह्मा सर्गादौ यज्ञसहिताः त्रैवर्णिकाः प्रजाः सृष्ट्वोवाच। अनेन यज्ञेन कर्मणा प्रसविष्यध्वं वृद्धिं लभत्वं उत्पत्तिं कुरुध्वम्। वृद्य्धादिहेतुत्वमस्यास्तीत्याह। एष यज्ञो वो युष्माकमभिप्रेतभोगप्रदो भवतु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.10।।प्रजापतिवचनादप्यधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह सहयज्ञा इत्यादिचतुर्भिः। सह यज्ञेन विहितकर्मकलापेन वर्तन्ते इति सहयज्ञाः। कर्माधिकृता इति यावत्।वोपसर्जनस्य इति पक्षे सादेशाभावः। प्रजाः त्रीन्वर्णान् पुरा कल्पादौ सृष्ट्वोवाच प्रजानां पतिः स्रष्टा। किमुवाचेत्याह अनेने यज्ञेन स्वाश्रमोचितधर्मेण प्रसविष्यध्वं प्रसूयध्वम्। प्रसवो वृद्धिः। उत्तरोत्तरामभिवृद्धिं लभध्वमित्यर्थः। कथमनेन वृद्धिः स्यादत आह एष यज्ञाख्यो धर्मो वो युष्माकं इष्टकामधुक्इष्टानभिमतान्कामान्काम्यानि फलानि दोग्धि प्रापयतीति तथा। अभीष्टभोगप्रदोऽस्त्वित्यर्थः। अत्र यद्यपि यज्ञग्रहणमावश्यककर्मोपलक्षणार्थं अकरणे प्रत्यवायस्याग्रे कथनात्। काम्यकर्मणां च प्रकृते प्रस्तावो नास्त्येवमा कर्मफलहेतुर्भूः इत्यनेन निराकृतत्वात् तथापि नित्यकर्मणामप्यानुषङ्गिकफलसद्भावात्एष वोऽस्त्विष्टकामधुक् इत्युपपद्यते। तथाचापस्तम्बः स्मरति तद्यथाम्रे फलार्थे निमिते छायागन्धावनूत्पद्येते एवं धर्मं चर्यमाणमर्था अनूत्पद्यन्ते नोचेदनूत्पद्यन्ते न धर्महानिर्भवति इति। फलसद्भावेऽपि तदभिसंध्यनभिसंधिभ्यां काम्यनित्ययोर्विशेषः। अनभिसंहितस्यापि वस्तुस्वभावादुत्पत्तौ न विशेषः। विस्तरेण चाग्रे प्रतिपादयिष्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.10।।एतदेवार्थवादेन द्रढयति सहेति। यज्ञैः सहेति सहयज्ञाः।वोपसर्जनस्य इति पक्षे सादेशाभावः। कर्माधिकृता इति यावत्। प्रजास्त्रैवर्णिकाः। अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसवो वृद्धिस्तां लभध्वम्। एष यज्ञो वो युष्माकमिष्टकामधुगिष्टार्थपूरकोऽस्तु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.10।।ननु तादृशं कर्म त्याज्यमेव चेत्त्वन्मतं तदा केनोक्तं कथमाचरति लोकः इत्याशङ्क्यैतत्कर्म प्रवृत्तिपरं मदाज्ञया प्रवृत्तिप्रवर्त्तकब्रह्मणोक्तं लोकः समाचरतीत्याह सहयज्ञा इति। प्रजापतिर्ब्रह्मा सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा प्रवृत्तिधर्मसहिताः प्रजाः सृष्ट्वा पुरा मदवतारात् पूर्वमुवाच। मत्प्रादुर्भावानन्तरं तु मया भक्तिरेवोक्तेति ज्ञापनाय पुरेत्युक्तम्। तद्वाक्यमेवाह अनेनेति। अनेन यज्ञेन प्रसविष्वध्वं प्रकर्षेण वृद्धिं प्राप्स्यथ। किञ्च एष यज्ञः वो युष्माकं इष्टकामधुक् अभीष्टफलदोऽस्तु भगवदाज्ञया ब्रह्मवाक्यं न मृषा भवतीति वरमेव दत्तवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.10।। प्रजापतिवचनादपि कर्मकर्तैव श्रेष्ठ इत्याह सहयज्ञा इति चतुर्भिः। यज्ञेन सह वर्तन्ते इति सहयज्ञाः यज्ञाधिकृता ब्राह्मणाद्याः प्रजाः पुरा सर्गादौ सृष्ट्वा ब्रह्मेदमुवाच। अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसूयध्वम्। प्रसवो वृद्धिः। उत्तरोत्तरामभिवृद्धिं लभध्वमित्यर्थः। तत्र हेतुः। एष यज्ञो वो युष्माकमिष्टकामधुगिष्टान्काभान्दोग्धीति तथा। अभीष्टभोगप्रदोऽस्त्वित्यर्थः। अन्न च यज्ञग्रहणमावश्यककर्मोपलक्षणार्थम्। काम्यकर्म प्रशंसा तु प्रकरणेऽसंगतापि सामान्यतोऽकर्मणः कर्मश्रेष्ठमित्येतदर्थेत्यदोषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.10 3.11।।किञ्च श्रुतं च सर्गप्रकरणे यज्ञोपलक्षणकर्मसहितप्रजोत्पादनं ब्रह्मणेति कर्मणोऽवश्यकर्त्तव्यतामाह सहेति चतुर्भिः। यज्ञाधिकृताः ब्राह्मणाद्याः प्रजाः सहयज्ञाः सृष्ट्वोवाच एष यज्ञो व इष्टकामधुनिति। ज्ञानमोक्षादिहेतुत्वं प्रकारान्तरेण वरप्रदानं तदाह अस्त्विति। न चेयं काम्यकर्मप्रशंसा कामधुक्त्वेनेष्टमात्रसाधकत्वाद्यज्ञादेर्विहितस्य नियतकर्मणः अन्यथाऽक्रामितोऽपि मोक्षः स्यात् तेन सर्वपुरुषार्थहेतुत्वमुक्तं भवति तदेवाह देवानिति। अनेन यज्ञेन विष्ण्वादीन् देवान् भावयत्। तदा परं श्रेय आत्यन्तिकमवाप्स्यथेति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.10।।इस आगे बतलाये जानेवाले कारणसे भी अधिकारीको कर्म करना चाहिये सृष्टिके आदिकालमें यज्ञसहित प्रजाको अर्थात् ( ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य इन ) तीनों वर्णोंको रचकर जगत्के रचयिता प्रजापतिने कहा कि इस यज्ञसे तुमलोग प्रसवउत्पत्ति यानी वृद्धिलाभ करो। यह यज्ञतुमलोगोंको इष्ट कामनाओंका देनेवाला अर्थात् इच्छित फलरूप नाना भोगोंको देनेवाला हो।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.10।। व्याख्या सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ब्रह्माजी प्रजा (सृष्टि) के रचयिता एवं उसके स्वामी हैं अतः अपने कर्तव्यका पालन करनेके साथ वे प्रजाकी रक्षा तथा उसके कल्याणका विचार करते रहते हैं। कारण कि जो जिसे उत्पन्न करता है उसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य हो जाता है। ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करते उसकी रक्षामें तत्पर रहते तथा सदा उसके हितकी बात सोचते हैं। इसलिये वेप्रजापति कहलाते हैं।सृष्टि अर्थात् सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीने कर्तव्यकर्मोंकी योग्यता और विवेकसहित मनुष्योंकी रचना की है (टिप्पणी प0 128)। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग कल्याण करनेवाला है। इसलिये ब्रह्माजीने अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करनेका विवेक साथ देकर ही मनुष्योंकी रचना की है।सत्असत्का विचार करनेमें पशु पक्षी वृक्ष आदिके द्वारा स्वाभाविक परोपकार (कर्तव्यपालन) होता है किन्तु मनुष्यको तो भगवत्कृपासे विशेष विवेकशक्ति मिली हुई है। अतः यदि वह अपने विवेकको महत्त्व देकर अकर्तव्य न करे तो उसके द्वारा भी स्वाभाविक लोकहितार्थ कर्म हो सकते हैं।देवता ऋषि पितर मनुष्य तथा अन्य पशु पक्षी वृक्ष आदि सभी प्राणी प्रजा हैं। इनमें भी योग्यता अधिकार और साधनकी विशेषताके कारण मनुष्यपर अन्य सब प्राणियोंके पालनकी जिम्मेवारी है। अतः यहाँ प्रजाः पद विशेषरूपसे मनुष्योंके लिये ही प्रयुक्त हुआ है।कर्मयोग अनादिकालसे चला आ रहा है। चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें पुरातनः पदसे भी भगवान् कहते हैं कि यह कर्मयोग बहुत कालसे प्रायः लुप्त हो गया था जिसको मैंने तुम्हें फिरसे कहा है। उसी बातको यहाँ भी पुरा पदसे वे दूसरी रीतिसे कहते हैं किमैंने ही नहीं प्रत्युत ब्रह्माजीने भी सर्गके आदिकालमें कर्तव्यसहित प्रजाको रचकर उनको उसी कर्मयोगका आचरण करनेकी आज्ञा दी थी। तात्पर्य यह है कि कर्मयोग(निःस्वार्थभावसे कर्तव्यकर्म करने) की परम्परा अनादिकालसे ही चली आ रही है। यह कोई नयी बात नहीं है।चौथे अध्यायमें (चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक) परमात्मप्राप्तिके जितने साधन बताये गये हैं वे सभी यज्ञ के नामसे कहे गये हैं जैसे द्रव्ययज्ञ तपयज्ञ योगयज्ञ प्राणायाम आदि। प्रायः यज्ञ शब्दका अर्थ हवनसे सम्बन्ध रखनेवाली क्रियाके लिये ही प्रसिद्ध है परन्तु गीतामें यज्ञ शब्द शास्त्रविधिसे की जानेवाली सम्पूर्ण विहित क्रियाओंका वाचक भी है। अपने वर्ण आश्रम धर्म जाति स्वभाव देश काल आदिके अनुसार प्राप्त कर्तव्यकर्म यज्ञ के अन्तर्गत आते हैं। दूसरेके हितकी भावनासे किये जानेवालेसब कर्म भी यज्ञ ही हैं। ऐसे यज्ञ(कर्तव्य) का दायित्व मनुष्यपर पर ही है।अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् (टिप्पणी प0 129.1) ब्रह्माजी मनुष्योंसे कहते हैं कि तुमलोग अपनेअपने कर्तव्यपालनके द्वारा सबकी वृद्धि करो उन्नति करो ऐसा करनेसे तुमलोगोंको कर्तव्यकर्म करनेमें उपयोगी सामग्री प्राप्त होती रहे उसकी कभी कमी न रहे।अर्जुनकी कर्म न करनेमें जो रुचि थी उसे दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंसे भी तुम्हें कर्तव्यकर्म करनेकी शिक्षा लेनी चाहिये। दूसरोंके हितके लिये कर्तव्यकर्म करनेसे ही तुम्हारी लौकिक और पारलौकिक उन्नति हो सकती है।निष्कामभावसे केवल कर्तव्यपालनके विचारसे कर्म करनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है और सकामभावसे कर्म करनेपर मनुष्य बन्धनमें पड़ जाता है। प्रस्तुत प्रकरणमें निष्कामभावसे किये जानेवाले कर्तव्यकर्मका विवेचन चल रहा है। अतः यहाँ इष्टकाम पदका अर्थ इच्छित भोगसामग्री (जो सकामभावका सूचक है) लेना उचित प्रतीत नहीं होता। यहाँ इस पदका अर्थ है यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री (टिप्पणी प0 129.2)।कर्मयोगी दूसरोंकी सेवा अथवा हित करनेके लिये सदा ही तत्पर रहता है। इसलिये प्रजापति ब्रह्माजीके विधानके अनुसार दूसरोंकी सेवा करनेकी सामग्री सामर्थ्य और शरीरनिर्वाहकी आवश्यक वस्तुओंकी उसे कभी कमी नहीं रहती। उसको ये उपयोगी वस्तुएँ सुगमतापूर्वक मिलती रहती हैं। ब्रह्माजीके विधानके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेकी सामग्री जिसजिसको जोजो भी मिली हुई है वह कर्तव्यपालन करनेके लिये उसउसको पूरीकीपूरी प्राप्त है। कर्तव्यपालनकी सामग्री कभी किसीके पास अधूरी नहीं होती। ब्रह्माजीके विधानमें कभी फरक नहीं पड़ सकता क्योंकि जब उन्होंने कर्तव्यकर्म करनेका विधान निश्चित किया है तब जितनेसे कर्तव्यका पालन हो सके उतनी सामग्री देना भी उन्हींपर निर्भर है।वास्तवमें मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये है ही नहीं एहि तन कर फल बिषय न भाई (मानस 7। 44। 1)। इसीलिये सांसारिक सुखोंको भोगो ऐसी आज्ञा या विधान किसी भी सत्शास्त्रमें नहीं है। समाज भी स्वच्छन्द भोग भोगनेकी आज्ञा नहीं देता। इसके विपरीत दूसरोंको सुख पहुँचानेकी आज्ञा या विधान शास्त्र और समाज दोनों ही देते हैं। जैसे पिताके लिये यह विधान तो मिलता है कि वह पुत्रका पालनपोषण करे पर यह विधान कहीं भी नहीं मिलता कि पुत्रसे पिता सेवा ले ही। इसी प्रकार पुत्र पत्नी आदि अन्य सम्बन्धोंके लिये भी समझना चाहिये।कर्मयोगी सदा देनेका ही भाव रखता है लेनेका नहीं क्योंकि लेनेका भाव ही बाँधनेवाला है। लेनेका भाव रखनेसे कल्याणप्राप्तिमें बाधा लगनेके साथ ही सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिमें भी बाधा उपस्थित हो जाती है। प्रायः सभीका अनुभव है कि संसारमें लेनेका भाव रखनेवालेको कोई देना नहीं चाहता। इसलिये ब्रह्माजी कहते हैं कि बिना कुछ चाहे निःस्वार्थभावसे कर्तव्यकर्म करनेसे ही मनुष्य अपनी उन्नति (कल्याण) कर सकता है।देवान् भावयतानेन यहाँ देव शब्द उपलक्षक है अतः इस पदके अन्तर्गत मनुष्य देवता ऋषि पितर आदि समस्त प्राणियोंको समझना चाहिये। कारण कि कर्मयोगीका उद्देश्य अपने कर्तव्यकर्मोंसे प्राणिमात्रको सुख पहँचाना रहता है। इसलिये यहाँ ब्रह्माजी सम्पूर्ण प्राणियोंकी उन्नतिके लिये मनुष्योंको अपने कर्तव्यकर्मरूप यज्ञके पालनका आदेश देते हैं। अपनेअपने कर्तव्यका पालन करनेसे मनुष्यका स्वतः कल्याण हो जाता है (गीता 18। 45)। कर्तव्यकर्मका पालन करनेके उपदेशके पूर्ण अधिकारी मनुष्य ही हैं। मनुष्योंको ही कर्म करनेकी स्वतन्त्रता मिली हुई है अतः उन्हें इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करना चाहिये।ते देवा भावयन्तु वः जैसे वृक्ष लता आदिमें स्वाभाविक ही फूलफल लगते हैं परन्तु यदि उन्हें खाद और पानी दिया जाय तो उनमें फूलफल विशेषतासे लगते हैं। ऐसे ही यजनपूजनसे देवताओंकी पुष्टि होती है जिससे देवताओंके काम विशेष न्यायप्रद होते हैं। परन्तु जब मनुष्य अपने कर्तव्यकर्मोंके द्वारा देवाताओंका यजनपूजन नहीं करते तब देवताओंको पुष्टि नहीं मिलती जिससे उनमें अपने कर्तव्यका पालन करनेमें कमी आ जाती है। उनके कर्तव्यपालनमें कमी आनेसे ही संसारमें विप्लव अर्थात् अनावृष्टिअतिवृष्टि आदि होते हैं।परस्परं भावयन्तः इन पदोंका अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे तो हम उसकी सेवा करें प्रत्युत यह समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे या न करे हमें तो अपने कर्तव्यके द्वारा उसकी सेवा करनी ही है। दूसरा क्या करता है क्या नहीं करता हमें सुख देता या दुःख इन बातोंसे हमें कोई मतलब नहीं रखना चाहिये क्योंकि दूसरोंके कर्तव्यको देखनेवाला अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। दूसरोंसे कर्तव्यका पालन करवाना अपने अधिकारकी बात भी नहीं है। हमें सबका हित करनेके लिये केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और उसके द्वारा सबको सुख पहुँचाना है। सेवा करनेमें अपनी समझ सामर्थ्य समय और सामग्रीको अपने लिये थोड़ीसी भी बचाकर नहीं रखनी है। तभी जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होगा।हमारे जितने भी सांसारिक सम्बन्धी मातापिता स्त्रीपुत्र भाईभौजाई आदि हैं उन सबकी हमें सेवा करनी है। अपना सुख लेनेके लिये ये सम्बन्ध नहीं हैं। हमारा जिनसे जैसा सम्बन्ध है उसीके अनुसार उनकी सेवा करना मर्यादाके अनुसार उन्हें सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। उनसे कोई आशा रखना और उनपर अपना अधिकार मानना बहुत बड़ी भूल है। हम उनके ऋणी हैं और ऋण उतारनेके लिये उनके यहाँ हमारा जन्म हुआ है। अतः निःस्वार्थभावसे उन सम्बन्धियोंकी सेवा करके हम अपना ऋण चुका दें यह हमारा सर्वप्रथम आवश्यक कर्तव्य है। सेवा तो हमें सभीकी करनी है परन्तु जिनकी हमारेपर जिम्मेवारी है उन सम्बन्धियोंकी सेवा सबसे पहले करनी चाहिये।शरीर इन्द्रयाँ मन बुद्धि पदार्थ आदि अपने नहीं हैं और अपने लिये भी नहीं हैं यह सिद्धान्त है। अतः अपनेअपने कर्तव्यका पालन करनेसे स्वतः एक दूसरेकी उन्नति होती है। कर्तव्य और अधिकारसम्बन्धी मार्मिक बातकर्मयोग तभी होता है जब मनुष्य अपने कर्तव्यके पालनपूर्वक दूसरेके अधिकारकी रक्षा करता है। जैसे मातापिताकी सेवा करना पुत्रका कर्तव्य है और मातापिताका अधिकार है। जो दूसरेका अधिकार होता है वही हमारा कर्तव्य होता है। अतः प्रत्येक मनुष्यको अपने कर्तव्यपालनके द्वारा दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनी है तथा दूसरेका कर्तव्य नहीं देखना है। दूसरेका कर्तव्य देखनेसे मनुष्य स्वयं कर्तव्यच्युत हो जाता है क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना हमारा कर्तव्य नहीं है। तात्पर्य है कि दूसरेका हित करना है यह हमारा कर्तव्य है और दूसरेका अधिकार है। यद्यपि अधिकार कर्तव्यके ही अधीन है तथापि मनुष्यको अपना अधिकार देखना ही नहीं हैं प्रत्युत अपने अधिकारका त्याग करना है। केवल दूसरेके अधिकारकी रक्षाके लिये अपने कर्तव्यका पालन करना है। दूसरेका कर्तव्य देखना तथा अपना अधिकार जमाना लोक और परलोकमें महान् पतन करनेवाला है। वर्तमान समयमें घरोंमें समाजमें जो अशान्ति कलह संघर्ष देखनेमें आ रहा है उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते इसलिये ब्रह्माजी देवताओं और मनुष्योंको उपदेश देते हैं कि एकदूसरेका हित करना तुमलोगोंका कर्तव्य है।श्रेयः परमवाप्स्यथ प्रायः ऐसी धारणा बनी हुई है कि यहाँ परम कल्याणकी प्राप्तिका कथन अतिशयोक्ति है पर वास्तवमें ऐसा नहीं है। अगर इसमें किसीको सन्देह हो तो वह ऐसा करके खुद देख सकता है। जैसे धरोहर रखनेवालेकी धरोहर उसे वापस कर देनेसे धरोहर रखनेवालेसे तथा उस धरोहरसे हमारा किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रहता ऐसे ही संसारकी वस्तु संसारकी सेवामें लगा देनेसे संसार और संसारकी वस्तुसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहता। संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद होते ही चिन्मयताका अनुभव हो जाता है। अतः प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंमें अतिशयोक्तिकी कल्पना करना अनुचित है।यह सिद्धान्त है कि जबतक मनुष्य अपने लिये कर्म करता है तबतक उसके कर्मकी समाप्ति नहीं होती और वह कर्मोंसे बँधता ही जाता है। कृतकृत्य वही होता है जो अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। अपने लिये कुछ भी नहीं करनेसे पापका आचरण भी नहीं होता क्योंकि पापका आचरण कामनाके कारण ही होता है (3। 37)। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले साधकको चाहिये कि वह शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार फलकी इच्छा और आसक्तिका त्याग करके कर्तव्यकर्म करनेमें तत्पर हो जाय फिर कल्याण तो स्वतःसिद्ध है।अपनी कामनाका त्याग करनेसे संसारमात्रका हित होता है। जो अपनी कामनापूर्तिके लिये आसक्तिपूर्वक भोग भोगता है वह स्वयं तो अपनी हिंसा (पतन) करता ही है साथ ही जिनके पास भोगसामग्रीका अभाव है उनकी भी हिंसा करता है अर्थात् दुःख देता है। कारण कि भोगसामग्रीवाले मनुष्यको देखकर अभावग्रस्त मनुष्यको उस भोगसामग्रीके अभावका दुःख होना स्वाभाविक है। इस प्रकार स्वयं सुख भोगनेवाला व्यक्ति हिंसासे कभी बच नहीं सकता। ठीक इसके विपरीत पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले व्यक्तिको देखकर दूसरोंको स्वतः शान्ति मिलती है क्योंकि पारमार्थिक सम्पत्तिपर सबका समान अधिकार है। निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य कामनाआसक्तिका त्याग करके अपने कर्तव्यकर्मका पालन करता रहे तो ब्रह्माजीके कथनानुसार वह परम कल्याणको अवश्य ही प्राप्त हो जायग। इसमें कोई सन्देह नहीं है।यहाँ परम कल्याणकी प्राप्ति मुख्यतासे मनुष्योंके लिये ही बतायी है देवताओंके लिये नहीं। कारण कि देवयोनि अपना कल्याण करनेके लिये नहीं बनायी गयी है। मनुष्य जो कर्म करता है उन कर्मोंके अनुसार फल देने कर्म करनेकी सामग्री देने तथा अपनेअपने शुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये देवता बनाये गये हैं। वे निष्कामभावसे कर्म करनेकी सामग्री देते हों ऐसी बात नहीं है। परन्तु उन देवताओंमें भी अगर किसीमें अपने कल्याणकी इच्छा हो जाय तो उसका कल्याण होनेमें मना नहीं है अर्थात् अगर कोई अपना कल्याण करना चाहे तो कर सकता है। जब पापीसेपापी मनुष्यके लिये भी उद्धार करनेकी मनाही नहीं है तो फिर देवताओंके लिये (जो कि पुण्ययोनि है) अपना उद्धार करनेकी मनाही कैसे हो सकती है ऐसा होनेपर भी देवताओंका उद्देश्य भोग भोगनेका ही रहता है इसलिये उनमें प्रायः अपने कल्याणकी इच्छा नहीं होती।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.10।।सहेति। प्रजापतिः परमात्मा प्रजाः सहैव कर्मभिः ससर्ज। उक्तं च (N omits उक्तं च) तेन प्रजानां कर्मभ्य एव प्रसवः सन्तानः। एतान्येव च इष्टं संसारं मोक्षं वा दास्यन्ति संगात्संसारं मुक्तसंगत्वान्मोक्षम् इति ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.10।।नित्यस्य कर्मणो नैमित्तिकसहितस्याधिकृतेन कर्तव्यत्वे हेत्वन्तरपरत्वेनानन्तरश्लोकमवतारयति इतश्चेति। कथं पुनरनेन यज्ञेन वृद्धिरस्माभिः शक्या कर्तुमित्याशङ्क्याह एष इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.10 3.11।।सहयज्ञाः इत्यादेर्न प्रकृते सङ्गतिर्दृश्यते अत आह अत्रेति। वर्णाश्रमोचितस्य कर्मणः सर्वथा कर्तव्यत्वे स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्पोऽर्थवादः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.10 3.11।।अत्रार्थवादमाह सहयज्ञा इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.10।।पतिं विश्वरस्य आत्मेश्वरम् (तै0 ना0 11।3) इत्यादिश्रुतेः निरुपाधिकः प्रजापतिशब्दः सर्वेश्वरं विश्वस्रष्टारं विश्वात्मानं परायणं नारायणम् आह पुरा सर्गकाले स भगवान् प्रजापतिः अनादिकालप्रवृत्ताचित्संसर्गविवशा उपसंहृतनामरूपविभागाः स्वस्मिन् प्रलीनाः सकलपुरुषार्थनर्हाः चेतनेतरकल्पाः प्रजाः समीक्ष्य परमकारुणिकः तदुज्जिजीवविषया स्वाराधनभूतयज्ञनिर्वृत्तये यज्ञैः सह ताः सृष्ट्वा एवम् उवाच अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वम् आत्मनो वृद्धिं कुरुध्वम्। एष वो यज्ञः परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षाख्यस्य कामस्य तदनुगुणानां च कामानां प्रपूरयिता भवतु।कथम्
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.10।। सहयज्ञाः यज्ञसहिताः प्रजाः त्रयो वर्णाः ताः सृष्ट्वा उत्पाद्य पुरा पूर्वं सर्गादौ उवाच उक्तवान् प्रजापतिः प्रजानां स्रष्टा अनेन यज्ञेन प्रसविष्यध्वं प्रसवः वृद्धिः उत्पत्तिः तं कुरुध्वम्। एष यज्ञः वः युष्माकम् अस्तु भवतु इष्टकामधुक् इष्टान् अभिप्रेतान् कामान् फलविशेषान् दोग्धीति इष्टकामधुक्।।कथम्
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【 Verse 3.11 】
▸ Sanskrit Sloka: देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु व: | परस्परं भावयन्त: श्रेय: परमवाप्स्यथ ||
▸ Transliteration: devān bhāvayatā’nena te devā bhāvayantu vaḥ | parasparaṁ bhāvayantaḥ śreyaḥ paramavāpsyatha ||
▸ Glossary: devān: celestial beings; bhāvayata: having pleased; anena: by this sacrifice; te: those; devāḥ: demigods; bhāvayantu: will please; vaḥ: you; parasparaṁ: mu- tual; bhāvayantaḥ: pleasing one another; śreyaḥ: prosperity; paraṁ: supreme; avāpsyatha: achieve
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.11 The celestial beings, being pleased by this sacrifice, will also nourish you; with this mutual nourishing of one another, you will achieve supreme prosperity.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.10 3.11।।प्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्यकर्मोंके विधानसहित प्रजा(मनुष्य आदि) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्यकर्मरूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्यकर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एकदूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.11।। तुम लोग इस यज्ञ द्वारा देवताओं की उन्नति करो और वे देवतागण तुम्हारी उन्नति करें। इस प्रकार परस्पर उन्नति करते हुये परम श्रेय को तुम प्राप्त होगे।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.11 देवान् the gods? भावयत nourish (ye)? अनेन with this? ते those? देवाः gods? भावयन्तु may nourish? वः you? परस्परम् one another? भावयन्तः nourishing? श्रेयः good? परम् the highest? अवाप्स्यथ shall attain.Commentary Deva literally means the shining one. By this sacrifice you nourish the gods such as Indra. The gods shall nourish you with rain? etc. the highest good is the attainment of the knowledge of the Self which frees one from the round of births and deaths. The highest good may mean the attainment of heaven also. The fruit depends upon the motive of the aspirant.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.11. 'With this you must gratify the devas and let the devas gratify you; [thus] gratifying one another, you shall attain the highest good.'
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.11 Worship the Powers of Nature thereby, and let them nourish you in return; thus supporting each other, you shall attain your highest welfare.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.11 By this, please the gods, and the gods will support you. Thus nourishing one another, may you obtain the highest good.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.11 'You nourish the gods with this. Let those gods nourish you. Nourishing one another, you shall attain the supreme Good.'
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.11 With this do ye nourish the gods and may those gods nourish you; thus nourishing one another, ye shall attain to the highest good.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.11 Devan etc. Devas : Those that have a tendency of playing i.e., the deities who preside over the organs and who dwell in the senses (or who are nothing but the sensitive faculty of the senses) and who are well-known in the Rahasyasastra. 'You must gratify these deities by this action i.e., feed them compability with sense-objects. Then, being satisfied, let these deities gratify (cause) you to have emancipation suitable exclusively to the intrinsic nature of the Self. For, [then alone you attain] a capacity to remain in your own Self. Thus when the mutual gratification - you gratifying the [deities of the] senses, and they letting [you] be absorbed in the Self - in the uninterruped series of periods of being extrovert and of meditation, you shall soon undoubtedly attain the highest good i.e., the Supreme that is marked with the total disappearance of [all] mutual differences.' This path of the said nature is to be followed not merely for emancipation, but also for gaining all super - human powers (or success siddhi). This [the Lord] says -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.11 'By this,' i.e., by this sacrifice, you propitiate the gods who form My body and have Me as their Self. For Sri Krsna will say later on: 'For I am the only enjoyer and the only Lord of Sacrifices' (9.24). Worshipped by sacrifices, may these gods, who have Me as their Self, nourish you with food, drink etc., which are reired also for their worship. Thus, supporting each other, may you attain the highest good called Moksa (release).
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.11 'Bhavayata, you nourish; devan, the gods, Indra and others; anena, with this sarifice. Let te devah, those gods; bhavayantu, nourish; vah, you-make you contented with rainfall etc. Thus bhavayantah, nourishing; parasparam, one another; avapsyatha, you shall attain; the param, supreme; sreyah, Good, called Liberation, through the attainment of Knowledge;' or, 'you shall attain heaven-which is meant by param 'sreyah.' [The param sreyah (supreme Good) will either mean liberation or heaven in accordance with aspirant's hankering for Liberation or enjoyment.] Moreover,
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.11।। वैदिक सिद्धार्न्त के अनुसार सर्वशक्तिमान् ईश्वर एक है। उसकी यह सर्वशक्ति प्रकृति में अनेक प्रकार से व्यक्त होकर सदैव कार्य करती है। विभिन्न प्रकार से व्यक्त परिच्छिन्न शक्तियों के विभिन्न नियामक हैं उन्हें देवता कहते हैं। इन सबके नाम भी वेदों में बताये हैं जैसे अग्नि वायु इन्द्र आदि।इस श्लोक के सर्वमान्य और सर्वत्र उपयुक्त होने के लिये देव शब्द का अर्थ यह समझना चाहिये कि वे किसी भी कर्म क्षेत्र का वह अधिष्ठाता देवता जो कर्म करने वाले कर्मचारी या कर्त्ता को फल प्रदान करता हो। वह देवता और कोई नहीं उस कर्म क्षेत्र की उत्पादन क्षमता ही होगी। जब हम किसी क्षेत्र विशेष में पूर्ण मनोयोग से परिश्रम करते हैं तब उस क्षेत्र की उत्पादन क्षमता प्रगट होकर हमें फल प्रदान करती है। यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है यदि हम समझने का प्रयत्न करें कि अपने देश को भारतमाता कहने का हमारा क्या तात्पर्य है। राष्ट्र की शक्ति को एक रूप देने में हमारा तात्पर्य उस राष्ट्र के सभी प्रकार के कर्मक्षेत्रों की उत्पादन क्षमता से ही होता है।इसमें कोई सन्देह नहीं कि कहीं पर भी निर्माण की जो क्षमता अव्यक्त रूप में रहती है उसे व्यक्त करने के लिये आवश्यक है केवल मनुष्य का परिश्रम। इस अव्यक्त क्षमता को कहते हैं देव। इन देवों को यज्ञ कर्म से प्रसन्न कर उनका आह्वान किये जाने पर वे प्रगट होकर यज्ञकर्ता को फल प्रदान कर प्रसन्न करेंगे। इस प्रकार परस्पर उन्नति कर मनुष्य परम श्रेय को प्राप्त करेगा यह ब्रह्माजी का दिव्य उद्देश्य इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने बताया।इस सेवाधर्म का पालन प्रकृति में सर्वत्र होता दिखाई देता है। एक मात्र मनुष्य ही है जिसे स्वेच्छा से कर्म करने की स्वतन्त्रता दी गई है इस सार्वभौमिक सेवाधर्मयज्ञ भावना का पालन करने पर वह शुभफल प्राप्त करता है परन्तु जिस सीमा तक अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित हुआ वह कर्म करेगा उतना ही वह दुख पायेगा क्योंकि प्रकृति के सामंजस्य में वह विरोध उत्पन्न करता है।और
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.11।। कथमित्याकाङ्कक्षायामाह अनेनेति। अनेन यज्ञेन देवानिन्द्रादीन् वर्धयत्। ते वृत्त्यादिद्वाराऽन्नदानेन युष्मान् वर्धयन्तु। एवं परस्परं वर्धयन्तोऽभीष्टं परं परलोके स्वर्गादिकमवाप्स्यथ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.11।।कथमिष्टकामदोग्धृत्वं यज्ञस्येति तदाह अनेन यज्ञेन यूयं यजमाना देवानिन्द्रादीन्भावयत हविर्भागैः संवर्धयत। तर्पयतेत्यर्थः। ते देवा युष्माभिर्भाविताः सन्तो वो युष्मान्भावयन्तु वृष्ट्यादिनान्नोत्पत्तिद्वारेण संवर्धयन्तु। एवमन्योन्यं संवर्धयन्तो देवाश्च यूयं च परं श्रेयोऽभिमतमर्थं प्राप्स्यथ। देवास्तृप्तिं प्राप्स्यन्ति यूयं च स्वर्गाख्यं परं श्रेयः प्राप्स्यथेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.11।।इष्टार्थपूरकत्वमेवाह देवानिति। भावयत तर्पयत। अनेन देवतापूजात्मकेन यज्ञेन ते वो युष्मान्भावयन्तु वृष्ट्यादिदानेन। परस्परं भावयन्तो देवाश्च यूयं च श्रेयः परं प्राप्स्यथ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.11।।ननु कर्मणा जगतः कथमभीष्टम् इत्याशङ्क्याह देवानिति। अनेन यज्ञेन देवान् तत्तत्कर्माधिष्ठातृ़न् भावयत संवर्द्धयत। ते देवा वो युष्मान् भावयन्तु संवर्द्धयन्तु। अत्रायमर्थः हविर्भागैस्तेषु यूयं देवत्वं वर्द्धयन्तु ते च भवत्सु तत्कर्मसाधनानि वर्द्धयन्तु। एवं परस्परं भावयन्तः संवर्धयन्तो यूयं देवाश्च श्रेयः स्वाभीष्टमवाप्स्यथ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.11।।कथमिष्टकामदोग्धा यज्ञो भवेदित्यत्राह देवानिति। अनेन यज्ञेन युयं देवान्भावयत हविर्भागैः संवर्धयत। ते च देवा वो यष्मान्संवर्धयन्तु वृष्ट्यादिनान्नोत्पत्तद्वारेण। एवमन्योन्यं संवर्धयन्तो देवाश्च यूयं च परस्परं श्रेयोऽभीष्टमर्थं प्राप्स्यथ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.10 3.11।।किञ्च श्रुतं च सर्गप्रकरणे यज्ञोपलक्षणकर्मसहितप्रजोत्पादनं ब्रह्मणेति कर्मणोऽवश्यकर्त्तव्यतामाह सहेति चतुर्भिः। यज्ञाधिकृताः ब्राह्मणाद्याः प्रजाः सहयज्ञाः सृष्ट्वोवाच एष यज्ञो व इष्टकामधुनिति। ज्ञानमोक्षादिहेतुत्वं प्रकारान्तरेण वरप्रदानं तदाह अस्त्विति। न चेयं काम्यकर्मप्रशंसा कामधुक्त्वेनेष्टमात्रसाधकत्वाद्यज्ञादेर्विहितस्य नियतकर्मणः अन्यथाऽक्रामितोऽपि मोक्षः स्यात् तेन सर्वपुरुषार्थहेतुत्वमुक्तं भवति तदेवाह देवानिति। अनेन यज्ञेन विष्ण्वादीन् देवान् भावयत्। तदा परं श्रेय आत्यन्तिकमवाप्स्यथेति भावः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.11।।कैसे तुमलोग इस यज्ञद्वारा इन्द्रादि देवोंको बढ़ाओ अर्थात् उनकी उन्नति करो। वे देव वृष्टि आदिद्वारा तुमलोगोंको बढ़ावें अर्थात् उन्नत करें। इस प्रकार एक दूसरेको उन्नत करते हुए ( तुमलोग ) ज्ञानप्राप्तिद्वारा मोक्षरूप परमश्रेयको प्राप्त करोगे। अथवा स्वर्गरूप परमश्रेयको ही प्राप्त करोगे।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.11।। व्याख्या सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ब्रह्माजी प्रजा (सृष्टि) के रचयिता एवं उसके स्वामी हैं अतः अपने कर्तव्यका पालन करनेके साथ वे प्रजाकी रक्षा तथा उसके कल्याणका विचार करते रहते हैं। कारण कि जो जिसे उत्पन्न करता है उसकी रक्षा करना उसका कर्तव्य हो जाता है। ब्रह्माजी प्रजाकी रचना करते उसकी रक्षामें तत्पर रहते तथा सदा उसके हितकी बात सोचते हैं। इसलिये वेप्रजापति कहलाते हैं।सृष्टि अर्थात् सर्गके आरम्भमें ब्रह्माजीने कर्तव्यकर्मोंकी योग्यता और विवेकसहित मनुष्योंकी रचना की है (टिप्पणी प0 128)। अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग कल्याण करनेवाला है। इसलिये ब्रह्माजीने अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितिका सदुपयोग करनेका विवेक साथ देकर ही मनुष्योंकी रचना की है।सत्असत्का विचार करनेमें पशु पक्षी वृक्ष आदिके द्वारा स्वाभाविक परोपकार (कर्तव्यपालन) होता है किन्तु मनुष्यको तो भगवत्कृपासे विशेष विवेकशक्ति मिली हुई है। अतः यदि वह अपने विवेकको महत्त्व देकर अकर्तव्य न करे तो उसके द्वारा भी स्वाभाविक लोकहितार्थ कर्म हो सकते हैं।देवता ऋषि पितर मनुष्य तथा अन्य पशु पक्षी वृक्ष आदि सभी प्राणी प्रजा हैं। इनमें भी योग्यता अधिकार और साधनकी विशेषताके कारण मनुष्यपर अन्य सब प्राणियोंके पालनकी जिम्मेवारी है। अतः यहाँ प्रजाः पद विशेषरूपसे मनुष्योंके लिये ही प्रयुक्त हुआ है।कर्मयोग अनादिकालसे चला आ रहा है। चौथे अध्यायके तीसरे श्लोकमें पुरातनः पदसे भी भगवान् कहते हैं कि यह कर्मयोग बहुत कालसे प्रायः लुप्त हो गया था जिसको मैंने तुम्हें फिरसे कहा है। उसी बातको यहाँ भी पुरा पदसे वे दूसरी रीतिसे कहते हैं किमैंने ही नहीं प्रत्युत ब्रह्माजीने भी सर्गके आदिकालमें कर्तव्यसहित प्रजाको रचकर उनको उसी कर्मयोगका आचरण करनेकी आज्ञा दी थी। तात्पर्य यह है कि कर्मयोग(निःस्वार्थभावसे कर्तव्यकर्म करने) की परम्परा अनादिकालसे ही चली आ रही है। यह कोई नयी बात नहीं है।चौथे अध्यायमें (चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक) परमात्मप्राप्तिके जितने साधन बताये गये हैं वे सभी यज्ञ के नामसे कहे गये हैं जैसे द्रव्ययज्ञ तपयज्ञ योगयज्ञ प्राणायाम आदि। प्रायः यज्ञ शब्दका अर्थ हवनसे सम्बन्ध रखनेवाली क्रियाके लिये ही प्रसिद्ध है परन्तु गीतामें यज्ञ शब्द शास्त्रविधिसे की जानेवाली सम्पूर्ण विहित क्रियाओंका वाचक भी है। अपने वर्ण आश्रम धर्म जाति स्वभाव देश काल आदिके अनुसार प्राप्त कर्तव्यकर्म यज्ञ के अन्तर्गत आते हैं। दूसरेके हितकी भावनासे किये जानेवालेसब कर्म भी यज्ञ ही हैं। ऐसे यज्ञ(कर्तव्य) का दायित्व मनुष्यपर पर ही है।अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् (टिप्पणी प0 129.1) ब्रह्माजी मनुष्योंसे कहते हैं कि तुमलोग अपनेअपने कर्तव्यपालनके द्वारा सबकी वृद्धि करो उन्नति करो ऐसा करनेसे तुमलोगोंको कर्तव्यकर्म करनेमें उपयोगी सामग्री प्राप्त होती रहे उसकी कभी कमी न रहे।अर्जुनकी कर्म न करनेमें जो रुचि थी उसे दूर करनेके लिये भगवान् कहते हैं कि प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंसे भी तुम्हें कर्तव्यकर्म करनेकी शिक्षा लेनी चाहिये। दूसरोंके हितके लिये कर्तव्यकर्म करनेसे ही तुम्हारी लौकिक और पारलौकिक उन्नति हो सकती है।निष्कामभावसे केवल कर्तव्यपालनके विचारसे कर्म करनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है और सकामभावसे कर्म करनेपर मनुष्य बन्धनमें पड़ जाता है। प्रस्तुत प्रकरणमें निष्कामभावसे किये जानेवाले कर्तव्यकर्मका विवेचन चल रहा है। अतः यहाँ इष्टकाम पदका अर्थ इच्छित भोगसामग्री (जो सकामभावका सूचक है) लेना उचित प्रतीत नहीं होता। यहाँ इस पदका अर्थ है यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री (टिप्पणी प0 129.2)।कर्मयोगी दूसरोंकी सेवा अथवा हित करनेके लिये सदा ही तत्पर रहता है। इसलिये प्रजापति ब्रह्माजीके विधानके अनुसार दूसरोंकी सेवा करनेकी सामग्री सामर्थ्य और शरीरनिर्वाहकी आवश्यक वस्तुओंकी उसे कभी कमी नहीं रहती। उसको ये उपयोगी वस्तुएँ सुगमतापूर्वक मिलती रहती हैं। ब्रह्माजीके विधानके अनुसार कर्तव्यकर्म करनेकी सामग्री जिसजिसको जोजो भी मिली हुई है वह कर्तव्यपालन करनेके लिये उसउसको पूरीकीपूरी प्राप्त है। कर्तव्यपालनकी सामग्री कभी किसीके पास अधूरी नहीं होती। ब्रह्माजीके विधानमें कभी फरक नहीं पड़ सकता क्योंकि जब उन्होंने कर्तव्यकर्म करनेका विधान निश्चित किया है तब जितनेसे कर्तव्यका पालन हो सके उतनी सामग्री देना भी उन्हींपर निर्भर है।वास्तवमें मनुष्यशरीर भोग भोगनेके लिये है ही नहीं एहि तन कर फल बिषय न भाई (मानस 7। 44। 1)। इसीलिये सांसारिक सुखोंको भोगो ऐसी आज्ञा या विधान किसी भी सत्शास्त्रमें नहीं है। समाज भी स्वच्छन्द भोग भोगनेकी आज्ञा नहीं देता। इसके विपरीत दूसरोंको सुख पहुँचानेकी आज्ञा या विधान शास्त्र और समाज दोनों ही देते हैं। जैसे पिताके लिये यह विधान तो मिलता है कि वह पुत्रका पालनपोषण करे पर यह विधान कहीं भी नहीं मिलता कि पुत्रसे पिता सेवा ले ही। इसी प्रकार पुत्र पत्नी आदि अन्य सम्बन्धोंके लिये भी समझना चाहिये।कर्मयोगी सदा देनेका ही भाव रखता है लेनेका नहीं क्योंकि लेनेका भाव ही बाँधनेवाला है। लेनेका भाव रखनेसे कल्याणप्राप्तिमें बाधा लगनेके साथ ही सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिमें भी बाधा उपस्थित हो जाती है। प्रायः सभीका अनुभव है कि संसारमें लेनेका भाव रखनेवालेको कोई देना नहीं चाहता। इसलिये ब्रह्माजी कहते हैं कि बिना कुछ चाहे निःस्वार्थभावसे कर्तव्यकर्म करनेसे ही मनुष्य अपनी उन्नति (कल्याण) कर सकता है।देवान् भावयतानेन यहाँ देव शब्द उपलक्षक है अतः इस पदके अन्तर्गत मनुष्य देवता ऋषि पितर आदि समस्त प्राणियोंको समझना चाहिये। कारण कि कर्मयोगीका उद्देश्य अपने कर्तव्यकर्मोंसे प्राणिमात्रको सुख पहँचाना रहता है। इसलिये यहाँ ब्रह्माजी सम्पूर्ण प्राणियोंकी उन्नतिके लिये मनुष्योंको अपने कर्तव्यकर्मरूप यज्ञके पालनका आदेश देते हैं। अपनेअपने कर्तव्यका पालन करनेसे मनुष्यका स्वतः कल्याण हो जाता है (गीता 18। 45)। कर्तव्यकर्मका पालन करनेके उपदेशके पूर्ण अधिकारी मनुष्य ही हैं। मनुष्योंको ही कर्म करनेकी स्वतन्त्रता मिली हुई है अतः उन्हें इस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करना चाहिये।ते देवा भावयन्तु वः जैसे वृक्ष लता आदिमें स्वाभाविक ही फूलफल लगते हैं परन्तु यदि उन्हें खाद और पानी दिया जाय तो उनमें फूलफल विशेषतासे लगते हैं। ऐसे ही यजनपूजनसे देवताओंकी पुष्टि होती है जिससे देवताओंके काम विशेष न्यायप्रद होते हैं। परन्तु जब मनुष्य अपने कर्तव्यकर्मोंके द्वारा देवाताओंका यजनपूजन नहीं करते तब देवताओंको पुष्टि नहीं मिलती जिससे उनमें अपने कर्तव्यका पालन करनेमें कमी आ जाती है। उनके कर्तव्यपालनमें कमी आनेसे ही संसारमें विप्लव अर्थात् अनावृष्टिअतिवृष्टि आदि होते हैं।परस्परं भावयन्तः इन पदोंका अर्थ यह नहीं समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे तो हम उसकी सेवा करें प्रत्युत यह समझना चाहिये कि दूसरा हमारी सेवा करे या न करे हमें तो अपने कर्तव्यके द्वारा उसकी सेवा करनी ही है। दूसरा क्या करता है क्या नहीं करता हमें सुख देता या दुःख इन बातोंसे हमें कोई मतलब नहीं रखना चाहिये क्योंकि दूसरोंके कर्तव्यको देखनेवाला अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। दूसरोंसे कर्तव्यका पालन करवाना अपने अधिकारकी बात भी नहीं है। हमें सबका हित करनेके लिये केवल अपने कर्तव्यका पालन करना है और उसके द्वारा सबको सुख पहुँचाना है। सेवा करनेमें अपनी समझ सामर्थ्य समय और सामग्रीको अपने लिये थोड़ीसी भी बचाकर नहीं रखनी है। तभी जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होगा।हमारे जितने भी सांसारिक सम्बन्धी मातापिता स्त्रीपुत्र भाईभौजाई आदि हैं उन सबकी हमें सेवा करनी है। अपना सुख लेनेके लिये ये सम्बन्ध नहीं हैं। हमारा जिनसे जैसा सम्बन्ध है उसीके अनुसार उनकी सेवा करना मर्यादाके अनुसार उन्हें सुख पहुँचाना हमारा कर्तव्य है। उनसे कोई आशा रखना और उनपर अपना अधिकार मानना बहुत बड़ी भूल है। हम उनके ऋणी हैं और ऋण उतारनेके लिये उनके यहाँ हमारा जन्म हुआ है। अतः निःस्वार्थभावसे उन सम्बन्धियोंकी सेवा करके हम अपना ऋण चुका दें यह हमारा सर्वप्रथम आवश्यक कर्तव्य है। सेवा तो हमें सभीकी करनी है परन्तु जिनकी हमारेपर जिम्मेवारी है उन सम्बन्धियोंकी सेवा सबसे पहले करनी चाहिये।शरीर इन्द्रयाँ मन बुद्धि पदार्थ आदि अपने नहीं हैं और अपने लिये भी नहीं हैं यह सिद्धान्त है। अतः अपनेअपने कर्तव्यका पालन करनेसे स्वतः एक दूसरेकी उन्नति होती है। कर्तव्य और अधिकारसम्बन्धी मार्मिक बातकर्मयोग तभी होता है जब मनुष्य अपने कर्तव्यके पालनपूर्वक दूसरेके अधिकारकी रक्षा करता है। जैसे मातापिताकी सेवा करना पुत्रका कर्तव्य है और मातापिताका अधिकार है। जो दूसरेका अधिकार होता है वही हमारा कर्तव्य होता है। अतः प्रत्येक मनुष्यको अपने कर्तव्यपालनके द्वारा दूसरेके अधिकारकी रक्षा करनी है तथा दूसरेका कर्तव्य नहीं देखना है। दूसरेका कर्तव्य देखनेसे मनुष्य स्वयं कर्तव्यच्युत हो जाता है क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना हमारा कर्तव्य नहीं है। तात्पर्य है कि दूसरेका हित करना है यह हमारा कर्तव्य है और दूसरेका अधिकार है। यद्यपि अधिकार कर्तव्यके ही अधीन है तथापि मनुष्यको अपना अधिकार देखना ही नहीं हैं प्रत्युत अपने अधिकारका त्याग करना है। केवल दूसरेके अधिकारकी रक्षाके लिये अपने कर्तव्यका पालन करना है। दूसरेका कर्तव्य देखना तथा अपना अधिकार जमाना लोक और परलोकमें महान् पतन करनेवाला है। वर्तमान समयमें घरोंमें समाजमें जो अशान्ति कलह संघर्ष देखनेमें आ रहा है उसमें मूल कारण यही है कि लोग अपने अधिकारकी माँग तो करते हैं पर अपने कर्तव्यका पालन नहीं करते इसलिये ब्रह्माजी देवताओं और मनुष्योंको उपदेश देते हैं कि एकदूसरेका हित करना तुमलोगोंका कर्तव्य है।श्रेयः परमवाप्स्यथ प्रायः ऐसी धारणा बनी हुई है कि यहाँ परम कल्याणकी प्राप्तिका कथन अतिशयोक्ति है पर वास्तवमें ऐसा नहीं है। अगर इसमें किसीको सन्देह हो तो वह ऐसा करके खुद देख सकता है। जैसे धरोहर रखनेवालेकी धरोहर उसे वापस कर देनेसे धरोहर रखनेवालेसे तथा उस धरोहरसे हमारा किसी प्रकारका सम्बन्ध नहीं रहता ऐसे ही संसारकी वस्तु संसारकी सेवामें लगा देनेसे संसार और संसारकी वस्तुसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं रहता। संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद होते ही चिन्मयताका अनुभव हो जाता है। अतः प्रजापति ब्रह्माजीके वचनोंमें अतिशयोक्तिकी कल्पना करना अनुचित है।यह सिद्धान्त है कि जबतक मनुष्य अपने लिये कर्म करता है तबतक उसके कर्मकी समाप्ति नहीं होती और वह कर्मोंसे बँधता ही जाता है। कृतकृत्य वही होता है जो अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। अपने लिये कुछ भी नहीं करनेसे पापका आचरण भी नहीं होता क्योंकि पापका आचरण कामनाके कारण ही होता है (3। 37)। अतः अपना कल्याण चाहनेवाले साधकको चाहिये कि वह शास्त्रोंकी आज्ञाके अनुसार फलकी इच्छा और आसक्तिका त्याग करके कर्तव्यकर्म करनेमें तत्पर हो जाय फिर कल्याण तो स्वतःसिद्ध है।अपनी कामनाका त्याग करनेसे संसारमात्रका हित होता है। जो अपनी कामनापूर्तिके लिये आसक्तिपूर्वक भोग भोगता है वह स्वयं तो अपनी हिंसा (पतन) करता ही है साथ ही जिनके पास भोगसामग्रीका अभाव है उनकी भी हिंसा करता है अर्थात् दुःख देता है। कारण कि भोगसामग्रीवाले मनुष्यको देखकर अभावग्रस्त मनुष्यको उस भोगसामग्रीके अभावका दुःख होना स्वाभाविक है। इस प्रकार स्वयं सुख भोगनेवाला व्यक्ति हिंसासे कभी बच नहीं सकता। ठीक इसके विपरीत पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले व्यक्तिको देखकर दूसरोंको स्वतः शान्ति मिलती है क्योंकि पारमार्थिक सम्पत्तिपर सबका समान अधिकार है। निष्कर्ष यह निकला कि मनुष्य कामनाआसक्तिका त्याग करके अपने कर्तव्यकर्मका पालन करता रहे तो ब्रह्माजीके कथनानुसार वह परम कल्याणको अवश्य ही प्राप्त हो जायग। इसमें कोई सन्देह नहीं है।यहाँ परम कल्याणकी प्राप्ति मुख्यतासे मनुष्योंके लिये ही बतायी है देवताओंके लिये नहीं। कारण कि देवयोनि अपना कल्याण करनेके लिये नहीं बनायी गयी है। मनुष्य जो कर्म करता है उन कर्मोंके अनुसार फल देने कर्म करनेकी सामग्री देने तथा अपनेअपने शुभ कर्मोंका फल भोगनेके लिये देवता बनाये गये हैं। वे निष्कामभावसे कर्म करनेकी सामग्री देते हों ऐसी बात नहीं है। परन्तु उन देवताओंमें भी अगर किसीमें अपने कल्याणकी इच्छा हो जाय तो उसका कल्याण होनेमें मना नहीं है अर्थात् अगर कोई अपना कल्याण करना चाहे तो कर सकता है। जब पापीसेपापी मनुष्यके लिये भी उद्धार करनेकी मनाही नहीं है तो फिर देवताओंके लिये (जो कि पुण्ययोनि है) अपना उद्धार करनेकी मनाही कैसे हो सकती है ऐसा होनेपर भी देवताओंका उद्देश्य भोग भोगनेका ही रहता है इसलिये उनमें प्रायः अपने कल्याणकी इच्छा नहीं होती।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.11।।य(त)त्र येषां मोक्षप्राधान्यं तैरेव विषयाः सेव्या इत्युच्यते देवानिति। देवाः क्रीडाशीलाः (K क्रीडनशीलाः) इन्द्रियवृत्तयः करणेश्वर्यो देवता रहस्यशास्त्रप्रसिद्धाः ताः अनेन कर्मणा तर्पयत ययासंभवं विषयान् भक्षयतेत्यर्थः। तृप्ताश्च सत्यस्ता वो (S सत्यो वो) युष्मान् आत्मन एव स्वरूपमात्रोचितान् अपवर्गान् (S चितापवर्गान्) भावयन्तु स्वात्मस्थितियोगत्वात्। एवमनवरतं व्युत्थानसमाधिसमयपरम्परायाम् (S रतव्युत्थान ) इन्द्रियतर्पणदात्मासाद्भावलक्षणे ( सद्भाव ) परस्परभावने सति शीघ्रमेव परमं श्रेयः परस्परभेदविगलनलक्षणं ब्रह्म प्राप्स्यथ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.11।।कथं पुनरभीष्टफलविशेषहेतुत्वं यज्ञस्य विज्ञायते नहि देवताप्रसादादृते स्वर्गादिरभ्युदयो लभ्यते नापि सम्यग्दर्शनमन्तरेण निःश्रेयसं सेद्धुं पारयतीति शङ्कते कथमिति। तत्र श्लोकेनोत्तरमाह देवानिति। मुमुक्षुत्वबुभुक्षुत्वविभागेन श्रेयसि विकल्पः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.10 3.11।।सहयज्ञाः इत्यादेर्न प्रकृते सङ्गतिर्दृश्यते अत आह अत्रेति। वर्णाश्रमोचितस्य कर्मणः सर्वथा कर्तव्यत्वे स्तुतिर्निन्दा परकृतिः पुराकल्पोऽर्थवादः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.10 3.11।।अत्रार्थवादमाह सहयज्ञा इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.11।।अनेन देवताराधनभूतेन देवान् मच्छरीरभूतान् मदात्मकान् आराधयतअहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च (गीता 9।24) इति वक्ष्यते। यज्ञेन आराधिताः ते देवा मदात्मकाः स्वाराधनापेक्षितान्नपानाद्यैः युष्मान् पुष्णन्तु। एवं परस्परं भावयन्तः परं श्रेयो मोक्षाख्यम् अवाप्स्यथ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.11।। देवान् इन्द्रादीन् भावयत वर्धयत अनेन यज्ञेन। ते देवा भावयन्तु आप्याययन्तु वृष्ट्यादिना वः युष्मान्। एवं परस्परम् अन्योन्यं भावयन्तः श्रेयः परं मोक्षलक्षणं ज्ञानप्राप्तिक्रमेण अवाप्स्यथ। स्वर्गं वा परं श्रेयः अवाप्स्यथ।।किञ्च
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【 Verse 3.12 】
▸ Sanskrit Sloka: इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविता: | तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव स: ||
▸ Transliteration: iṣṭānbhogān hi vo devā dāsyante yajñabhāvitāḥ | tairdattānapradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ ||
▸ Glossary: iṣṭān: desired; bhogān: necessities of life; hi: certainly; vaḥ: to you; devāḥ: demigods; dāsyante: award; yajña:
Chapter 3 (Part 8)
sacrifice; bhāvitāḥ: satisfied; taiḥ: by them; dattān: things given; apradāya: without offering; ebhyaḥ: to the celestial beings; yaḥ: who; bhuṅkte: enjoys; stenaḥ: thief; eva: certainly; saḥ: he
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.12 Satisfied with the selfless enriching service, the celestial beings certainly award you the desired necessities of life. He who enjoys the things given by them without offering to the celestial beings is certainly a thief.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.12।।यज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्यपालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है वह चोर ही है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.12।। यज्ञ द्वारा पोषित देवतागण तुम्हें इष्ट भोग प्रदान करेंगे। उनके द्वारा दिये हुये भोगों को जो पुरुष उनको दिये बिना ही भोगता है वह निश्चय ही चोर है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.12 इष्टान् desired? भोगान् objects? हि so? वः to you? देवाः the gods? दास्यन्ते will give? यज्ञभाविताः nourished by sacrifice? तैः by them? दत्तान् give? अप्रदाय without offering? एभ्यः to them? यः who? भुङ्क्ते enjoys? स्तेनः thief? एव verily? सः he.Commentary When the gods are pleased with you sacrifices? they will bestow on you all the desired objects such as children? cattle? property? etc. He who enjoys what has been given to him by the gods? i.e.? he who gratifies the cravings of his own body and the senses without offering anything to the gods in return is a veritable thief. He is really a dacoit of the property of the gods.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.12. The devas, gratified with necessary action will grant you the things sacrificed. [Hence] whosoever enjoys their gifts without offering them to these devas-he is surely a thief.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.12 For, fed, on sacrifice, nature will give you all the enjoyment you can desire. But he who enjoys what she gives without returning is, indeed, a robber.'
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.12 The gods, pleased by the sacrifice, will bestow on you the enjoyments you desire. He who enjoys the bounty of the gods without giving them anything in return, is but a thief.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.12 'Being nourished by sacrifices, the gods will indeed give you the coveted enjoyments. He is certainly a theif who enjoys what have been given by them without offering (these) to them.'
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.12 The gods, nourished by the sacrifice, will give you the desired objects. So, he who enjoys the objects given by the gods without offering (in return) to them, is verily a thief.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.12 Istan etc. [The deities of] the senses, gratified by the necessry actions, bind [the aspirant's mind] to the state of remaining firm on some object of meditation. Therefore when they are at work, the things, i.e., the objects are granted [to him] by none but the [deities of the] senses, through recollection, resolution, meditation etc., of their objects. If these objects are not offered for the enjoyment of the deities, then it would amount to the status of a theif i.e., to an act of thief, because he is acting deceitfully. Indeed it has already been declared by the Bhagavat that 'He is called a man of deluded action'. Therefore the idea in the passage [under study] is this : Whosoever is desirous of attaining by easy means, the supernatural power [like anima etc.], or of attaining emancipation, he should enjoy the objects as and when they are brought, [and enjoy] just with the aim of simply alliviating the impatience of the [deities of the] senses.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.12 'Pleased by the sacrifice,' i.e., propitiated by the sacrifice, the gods, who have Me as their Self, will bestow on you the enjoyments you desire. Whatever objects are desired by persons keen on attaining release, the supreme end of human endeavour, all those will be granted by gods previously worshipped through many sacrifices. That is, whatever is solicited with more and more propitiation, all those enjoyments they will bestow on you. Whoever enjoys the objects of enjoyment granted by them for the purpose of worshipping them, without giving them their due share in return - he is verily a thief. What is called 'theft' is indeed taking what belongs to another as one's own and using it for oneself, when it is really designed for the purpose of another. The purport is that such a person becomes unfit not only for the supreme end of human endeavour, but also will go down towards purgatory (Naraka).
Sri Krsna expands the same:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.12 'Yajna-bhavitah, being nourished, i.e. being satisfied, by sacrifices; devah, the gods; dasyante hi, will indeed give, will distribute; among vah, you; the istan, coveted; bhogan, enjoyments, such as wife, childeren and cattle. Sah, he; is eva, certainly; a stenah, thief, a stealer of the wealth of gods and others; yah, who; bhunkte, enjoys, gratifies only his own body and organs; with dattan, what enjoyable things have been given; taih, by them, by the gods; apradaya, without offering (these); hyah, to them, i.e. without repaying the d [The three kinds of d -to the gods, to the rsis (sage), and to the manes-are repaid by satisfying them through sacrifices, celibacy (including study of the Vedas, etc.), and procreation, respectively. Unless one repays these d s, he incurs sin.] to them.'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.12।। देवताओं को सन्तुष्ट करने पर वे हमें सन्तुष्ट करते हैं कर्मकाण्ड के इस अबाध्य सिद्धान्त को श्रीकृष्ण दोहराते हैं। देव और यज्ञ इन दो शब्दों के पारम्परिक अर्थ के स्थान पर पूर्वश्लोकों के विवरण में बताये हुये अर्थ को हम यदि स्वीकार करें तभी इस श्लोक का अर्थ सत्य प्रमाणित होता है उत्पादनक्षमता (देव) का त्याग और अर्पण की भावना से आचरित कर्म (यज्ञ) के द्वारा पोषण करने पर वह हमें इष्ट फल प्रदान करेगा। यह जीवन का नियम है।जब हम सबको यज्ञ से फल प्राप्त होता है तब उसे आपस में बांटकर उपभोग करने का हमें पूर्ण अधिकार है। किसी भी प्राणी को सामूहिक प्रयत्न में सहयोग दिये बिना दूसरे के कर्मों का लाभ नहीं उठाना चाहिये। पूँजीवादी जीवन व्यवस्था में एक यह दुष्प्रवृत्ति दिखाई देती है कि लाखों कर्मचारियों के सामूहिक कर्मों का अधिक से अधिक लाभ अकेला व्यक्ति उठाना चाहता है। इस प्रकार की दुष्प्रवृत्ति अन्तत सभी कर्मक्षेत्रों में अव्यवस्था को जन्म देती है। परिणाम यह होता है कि जीवन के सामंजस्य में अव्यवस्था फैलाने से राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय शान्ति के लिये संकट उत्पन्न हो जाता है। इस श्लोक के दूसरी पंक्ति में कही हुई बात को आधुनिक अर्थशास्त्र की भाषा में इस प्रकार कहते हैं समाज का वह व्यक्ति जो उत्पादन किये बिना भोग करता है राष्ट्र के लिये भारस्वरूप है।यज्ञ (निस्वार्थ सेवा) किये बिना जो देवताओं से भोग प्राप्त करता है भगवान् श्रीकृष्ण उसे सामाजिक चोर की संज्ञा देते हैं। गीताकालीन सम्मानित नैतिक आदर्शों को देखते हुये चोर शब्द का प्रयोग कठोर किन्तु शक्तिशाली है जो भोगी एवं सामाजिक अपराधी व्यक्ति के भ्रष्ट एवं अनादर पूर्ण स्वभाव की ओर संकेत करता है।परन्तु
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.12।। किंच ते देवा यज्ञैर्वर्धिता वो युष्मभ्यं इष्टान् भोगान् स्त्रीपुत्रपशुस्वर्णादीन् वितरिष्यन्ति। यस्तु तैर्देवैर्दत्तान्भोगानेभ्यो देवेभ्योऽदत्त्वा आनृण्यमकृत्वा स्वदेहादीन्येव तर्पयति स तस्कर एव देवादिस्वापहारी।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.12।।न केवलं पारत्रिकमेव फलं यज्ञात् किंत्वेहिकमपीत्याह इष्टानभिलषितान्भोगान्पश्वन्नहिरण्यादीन् वो युष्मभयं देवा दास्यन्ते वितरिष्यन्ति। हि यस्मात् यज्ञैर्भावितास्तोषितास्ते। यस्मात्तेः ऋणवद्भवद्भ्योः दत्ता भोगास्तस्मात्तैर्देवैर्दत्तान्भोगानेभ्यो देवेभ्योऽप्रदाय यज्ञेषु देवोद्देशेनाहुतीरसंपाद्य यो भुङ्क्ते देहेन्द्रियाण्येव तर्पयति स्तेन एव तस्कर एव स देवस्वापहारी देवर्णानपाकरणात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.12।।किंच इष्टान्पुत्रपश्वादीन्वो युष्मभ्यम्। एभ्यो देवेभ्यस्तद्दत्तानेव व्रीहिपश्वाज्यादीनप्रदायादत्त्वा देवतोद्देशेन द्रव्यत्यागात्मकं यागं नित्यनैमित्तिकरूपं वैश्वदेवाग्निहोत्रजातेष्ट्यादिरूपमकृत्वेत्यर्थः। अदत्त्वा यो भुङ्क्ते स स्तेन एव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.12।।ननु श्रेयसोऽनेकरूपत्वात्िकँल्लक्षण श्रेयःप्राप्तिर्भविष्यतीत्याह इष्टानिति। वो युष्मभ्यं यज्ञभाविता देवा इष्टान् भोगान् वृष्ट्यादिकरणेनान्नाद्दीन् दास्यन्ते। यद्वा वो युष्मभ्यं इष्टान् यदेवेष्टं भवताम्। भगवत्सेवौपयिकबलाद्यर्थकान्नादिसम्पत्त्यर्थं वृष्ट्यादिकं करिष्यन्तीत्यर्थः। ननु तैरेवान्नं देयं चेत्तदा तेभ्यः किमस्य यागकरणेन इत्यत आह तैरिति। तैर्दत्तान् अन्नादीन् एभ्यस्तद्दातृभ्योऽप्रदाय अदत्त्वा यो भुङ्क्ते भोगं करोति स स्तेन एव चोर एवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.12।।एतदेव स्पष्टीकुर्वन्कर्माकरणे दोषमाह इष्टानिति। यज्ञैर्भाविताः सन्तो देवा वृष्ट्यादिद्वारेण वः युष्मभ्यं भोगान्दास्यन्ति हि। अतो देवैर्दत्तानन्नादीनेभ्यो देवेभ्यः पञ्चयज्ञादिभिरदत्त्वा यो भुङ्क्ते स तु चोर एव ज्ञेयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.12।।इष्टानिति। तैर्वृष्ट्यादिना दत्तानन्नादीन् अप्रदाय एभ्यो यो भुङ्क्ते स स्तेन एवेति जायमानो वै ब्राह्मणस्त्रिभिः ऋणवाञ्जायतेः () ब्रह्मचर्येणर्षिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः प्रजाभिः पितृभ्य एष वानृणः इति श्रुतेस्त्रयाणामृणी चायमित्यतस्तैः पूर्वमृणं प्रदत्तवांस्तेभ्यः पुनर्न प्रत्ययेच्चोर एवेति तदनिवेदने दोष उक्तः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.12।।दूसरी बात यह भी है कि यज्ञद्वारा बढ़ाये हुए संतुष्ट किये हुए देवता लोग तुमलोगोंको स्त्री पशु पुत्र आदि इच्छित भोग देंगे। उन देवोंद्वारा दिये हुए भोगोंको उन्हें न देकर अर्थात् उनका ऋण न चुकाकर जो खाता है केवल अपने शरीर और इन्द्रियोंको ही तृप्त करता है वह देवताओंके स्वत्वको हरण करनेवाला चोर ही है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.12।। व्याख्या इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः यहाँ भी इष्टभोग शब्दका अर्थ इच्छित पदार्थ नहीं हो सकता। कारण कि पीछेके (ग्यारहवें) श्लोकमें परम कल्याणको प्राप्त होनेकी बात आयी है और उसके हेतुके लिये वह (बारहवाँ) श्लोक है। भोगोंकी इच्छा रहते परम कल्याण कभी हो ही नहीं सकता। अतः यहाँ इष्ट शब्द यज् धातुसे निष्पन्न होनेसे तथा भोग (टिप्पणी प0 132.1) शब्दका अर्थ आवश्यक सामग्री होनेसे उपर्युक्त पदोंका अर्थ होगा वे देवता तुमलोगोंको यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करनेकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे।यहाँ यज्ञभाविताः देवाः पदोंका तात्पर्य है कि देवता तो अपना अधिकार समझकर मनुष्योंको आवश्यक सामग्री प्रदान करते ही हैं केवल मनुष्योंको ही अपना कर्तव्य निभाना है।तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते ब्रह्माजीने देवताओंके लिये ते देवाः पदोंका प्रयोग किया है क्योंकि उनके सामने मनुष्य थे देवता नहीं। परन्तु यहाँ एभ्यःपद (जो इदम् शब्दसे बनता है) का प्रयोग हुआ है जो समीपताका द्योतक है। भगवान्के लिये सभी समीप ही हैं (गीता 7। 26)। इससे सिद्ध होता है कि अब यहाँसे भगवान्के वचन आरम्भ होते हैं।यहाँ भुङ्क्ते (टिप्पणी प0 132.2) पदका तात्पर्य केवल भोजन करनेसे ही नहीं है प्रत्युत शरीरनिर्वाहकी समस्त आवश्यक सामग्री (भोजन वस्त्र धन मकान आदि) को अपने सुख के लिये काममें लानेसे है।यह शरीर मातापितासे मिला है और इसका पालनपोषण भी उन्हींके द्वारा हुआ है। विद्या गुरुजनोंसे मिली है। देवता सबको कर्तव्यकर्मकी सामग्री देते हैं। ऋषि सबको ज्ञान देते हैं। पितर मनुष्यकी सुखसुविधाके उपाय बताते हैं। पशुपक्षी वृक्ष लता आदि दूसरोंके सुखमें स्वयंको समर्पित कर देते हैं। (यद्यपि पशुपक्षी आदिको यह ज्ञान नहीं रहता कि हम परोपकार कर रहे हैं तथापि उनसे दूसरोंका उपकार स्वतः होता रहता है) इस प्रकार हमारे पास जो कुछ भी सामग्री बल योग्यता पद अधिकार धन सम्पत्ति आदि है वह सबकीसब हमें दूसरोंसे ही मिली है। इसलिये इनको दूसरोंकी ही सेवामें लगाना है।शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि सभी पदार्थ हमें संसारसे मिले हैं। ये कभी अपने नहीं हैं और अपने होंगे भी नहीं। अतः इनको अपना और अपने लिये मानकर इनसे सुख भोगना ही बन्धन है। इस बन्धन से छूटनेका यही सरल उपाय है कि जिनसे ये पदार्थ हमें मिले हैं इन्हें उन्हींका मानते हुए उन्हींकी सेवामें निष्कामभावपूर्वक लगा दें। यही हमारा परम कर्तव्य है।साधकोंके मनमें प्रायः ऐसी भावना पैदा हो जाती है कि अगर हम संसारकी सेवा करेंगे तो उसमें हमारी आसक्ति हो जायगी और हम संसारमें फँस जायँगे परन्तु भगवान्के वचनोंसे यह सिद्ध होता है कि फँसनेका कारण सेवा नहीं है प्रत्युत अपने लिये कुछ भी लेनेका भाव ही है। इसलिये लेनेका भाव छोड़कर देवताओंकी तरह दूसरोंको सुख पहुँचाना ही मनुष्यमात्रका परम कर्तव्य है।कर्मयोगके सिद्धान्तमें प्राप्त सामग्री सामर्थ्य समय तथा समझदारीका सदुपयोग करनेका ही विधान है। प्राप्त सामग्री आदिसे अधिककी (नयीनयी सामग्री आदिकी) कामना करना कर्मयोगके सिद्धान्तके विरुद्ध है। अतः प्राप्त सामग्री आदिको ही दूसरोंके हितमें लगाना है। अधिककी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। युक्तिसंगत बात है कि जिसमें जितनी शक्ति होती है उससे उतनी ही आशा की जाती है फिर भगवान् अथवा देवता उससे अधिककी आशा कैसे कर सकते हैंस्तेन एव सः यहाँ सः स्तेनः पदोंमें एकवचन देनेका तात्पर्य यह है कि अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाला मनुष्य सबको प्राप्त होनेवाली सामग्री (अन्न जल वस्त्र आदि) का भाग दूसरोंको दिये बिना ही अकेला स्वयं ले लेता है। अतः वह चोर ही है।जो मनुष्य दूसरोंको उनका भाग न देकर स्वयं अकेले ही भोग करता है वह तो चोर है ही पर जो मनुष्य किसी भी अंशमें अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहता है अर्थात् सामग्रीको सेवामें लगाकर बदलेमें मानबड़ाई आदि चाहता है वह भी उतने अंशमें चोर ही है। ऐसे मनुष्यका अन्तःकरण कभी शुद्ध और शान्त नहीं रह सकता।यह व्यष्टि शरीर किसी भी प्रकारसे समष्टि संसारसे अलग नहीं है और अलग हो सकता भी नहीं क्योंकि समष्टिका अंश ही व्यष्टि कहलाता है। इसलिये व्यष्टि(शरीर) को अपना मानना और समष्टि(संसार) को अपना न मानना ही रागद्वेष आदि द्वन्द्वोंका कारण है एवं यही अहंकार व्यक्तित्व अथवा विषमता है (टिप्पणी प0 133)। कर्मयोगके अनुष्ठानसे ये सब (रागद्वेष आदि) सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं। कारण कि कर्मयोगीका यह भाव रहता है कि मैं जो कुछ भी कर रहा हूँ वह सब अपने लिये नहीं प्रत्युत संसारमात्रकेलिये कर रहा हूँ। इसमें भी एक बड़ी मार्मिक बात यह है कि कर्मयोगी अपने कल्याणके लिये भी कोई कर्म न करके संसारमात्रके कल्याणके उद्देश्यसे ही सब कर्म करता है। कारण कि सबके कल्याणसे अपना कल्याण अलग मानना भी व्यक्तित्व और विषमताको जन्म देना है जो साधककी उन्नतिमें बाधक है। शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि जो कुछ भी हमारे पास है वह सबकासब हमें संसारसे मिला है। संसारसे मिली वस्तुको केवल अपनी स्वार्थसिद्धिमें लगाना ईमानदारी नहीं है। कर्तव्यसम्बन्धी विशेष बातहिन्दूसंस्कृतिका एकमात्र उद्देश्य मनुष्यका कल्याण करना है। इसी उद्देश्यसे ब्रह्माजी (सृष्टिके आदिमें) मनुष्यको निःस्वार्थभावसे अपनेअपने कर्तव्यके द्वारा एकदूसरेको सुख पहुँचानेकी आज्ञा देते हैं (गीता 3। 10)।परिवारमें भाई बहनें माताएँ आदि सबकेसब कर्म करते ही हैं परन्तु उनसे बड़ी भारी भूल यह होती है कि वे कामना ममता आसक्ति स्वार्थ आदिके वशीभूत होकर कर्म करते हैं। अतः लौकिक एवं पारलौकिक दोनों ही लाभ उन्हें नहीं होते प्रत्युत हानि ही होती है। स्वार्थके वशीभूत होकर अपने लिये कर्म करनेसे ही लोकमें लड़ाई खटपट ईर्ष्या आदि होते हैं और परलोकमें दुर्गति होती है। दूसरोंकी सेवा करके बदलेमें कुछ भी चाहनेसे वस्तुओं और व्यक्तियोंके साथ मनुष्यका सम्बन्ध जुड़ जाता है। किसी भी कर्मके साथ स्वार्थका सम्बन्ध जोड़ लेनेसे वह कर्म तुच्छ और बन्धनकारक हो जाता है। स्वार्थी मनुष्यको संसारमें कोई अच्छा नहीं कहता। चाहनेवालेको कोई अधिक देना नहीं चाहता। प्रायः ऐसा देखा जाता है कि घरमें भी रागी तथा भोगी व्यक्तिसे वस्तुएँ छिपायी जाती हैं। इसके विपरीत हमारे पास जितनी समझ समय सामर्थ्य और सामग्री है उतनेसे ही हम दूसरोंकी सेवा करें तो उससे कल्याण तो होता ही है इसके सिवाय वस्तु आराम मानबड़ाई आदरसत्कार आदि न चाहनेपर भी प्राप्त होने लगते हैं। परन्तु कर्मयोगीमें मानबड़ाई आदिकी इच्छा नहीं होती क्योंकि इनकी इच्छा और सुखभोग ही बन्धनकारक होता है। मुझे सुख कैसे मिले केवल इसी चाहनाके कारण मनुष्य कर्तव्यच्युत और पतित हो जाता है। अतः दूसरोंको सुख कैसे मिले ऐसा भाव कर्मयोगीको सदा ही रखना चाहिये। घरमें मातापिता भाईबहन स्त्रीपुत्र आदि जितने व्यक्ति हैं उन सभीको एकदूसरेके हितकी बात सोचनी चाहिये। प्रायः सेवा करनेवालेसे एक भूल हो जाती है कि वह मैं सेवा करता हूँ मैं वस्तुएँ देता हूँ ऐसा मानकर झूठा अभिमान कर बैठता है। वस्तुतः सेवा करनेवाला व्यक्ति सेव्यकी वस्तु ही सेव्यको देता है। जैसे माँका दूध उसके अपने लिये न होकर बच्चेके लिये ही है ऐसे ही मनुष्यके पास जितनी भी सामग्री है वह उसके अपने लिये न होकर दूसरोंके लिये ही है। अतः मनुष्यको प्राप्त सामग्रीमें ममता करने अर्थात् उसे अपनी और अपने लिये माननेका अधिकार नहीं है। ममता करनेपर भी प्राप्त सामग्री तो सदा रहेगी नहीं केवल ममतारूप बन्धन रह जायगा। इसी कारण भगवान् कहते हैं कि वस्तुओंको अपनी मानकर स्वयं उसका भोग करनेवाला मनुष्य चोर ही है।देवता ऋषि पितर पशुपक्षी वृक्षलता आदि सभीका स्वभाव ही परोपकार करनेका है। मनुष्य सदा इनसे सहयोग पानेके कारण इनका ऋणी है। इस ऋणसे मुक्त होनेके लिये ही पञ्चमहायज्ञ(ऋषियज्ञ देवयज्ञ भूतयज्ञ पितृयज्ञ और मनुष्ययज्ञ) का विधान है। मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो बुद्धिपूर्वक सभीको अपने कर्तव्यकर्मोंसे तृप्त कर सकता है। अतः सबसे ज्यादा जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। इसीको ऐसी स्वतन्त्रता मिली है जिसका सदुपयोग करके यह परम श्रेयकी प्राप्ति कर सकता है।देवता आदि तो अपने कर्तव्यका पालन करते ही हैं। यदि मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नही करता तो देवताओंमें ही नहीं प्रत्युत त्रिलोकीभरमें हलचल उत्पन्न हो जाती है और परिणामस्वरूप अतिवृष्टि अनावृष्टि भूकम्प दुर्भिक्ष आदि प्राकृतिक प्रकोप होने लगते हैं। भगवान् भी (गीता 3। 2324 में) कहते हैं कि यदि मैं सावधानीपूर्वक कर्तव्यका पालन न करूँ तो समस्त लोक नष्टभ्रष्ट हो जायँ। जिस तरह गतिशील बैलगाड़ीका कोई एक पहिया भी खण्डित हो जाय तो उससे पूरी बैलगाड़ीको झटका लगता है इसी तरह गतिशील सृष्टिचक्रमें यदि एक व्यक्ति भी कर्तव्यच्युत होता है तो उसका विपरीत प्रभाव सम्पूर्ण सृष्टिपर पड़ता है। इसके विपरीत जैसे शरीरका एक भी पीड़ित (रोगी) अङ्ग ठीक होनेपर सम्पूर्ण शरीरका स्वतः हित होता है ऐसे ही अपने कर्तव्यका ठीकठीक पालन करनेवाले मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण सृष्टिका स्वतः हित होता है।प्रजापति ब्रह्माजीने देवता और मनुष्य दोनोंको अपनेअपने कर्तव्यका पालन करनेकी आज्ञा दी है। देवता आदि सब मर्यादासे चलते हैं। केवल मनुष्य ही अपनी बेसमझीसे मर्यादाको भंग करता है। कारण कि उसे दूसरोंकी सेवा करनेके लिये जो सामग्री मिली है उसपर वह अपना अधिकार समझ बैठता है। अनन्त जन्मोंके कर्मबन्धनसे छुटकारा पानेके लिये मनुष्यको स्वतन्त्रता मिली है किन्तु वह उसका सदुपयोग करके कर्म और कर्मफलमें ममताआसक्ति कर बैठता है। फलस्वरूप नया बन्धन उत्पन्न करके वह स्वयं फँस जाता है और आगे अनेक जन्मोंतक दुःख पानेकी तैयारी कर लेता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि उसे जो कुछ सामग्री मिली है उससे वह त्रिलोकीकी सेवा करे अर्थात् उस सामग्रीको वह भगवान् देवता ऋषि पितर मनुष्य आदि समस्त प्राणियोंकी सेवामें लगा दे। शङ्का जो कुछ सामग्री प्राप्त हुई है वह सबकीसब दूसरोंकी सेवामें लगा देनेपर कर्मयोगीकी जीवननिर्वाह कैसे हो सकेगा समाधान वास्तवमें यह शंका शरीरके साथ अपनी एकता माननेसे अर्थात शरीरको ही अपना स्वरूप माननेसे पैदा होती है परन्तु कर्मयोगी शरीरसे अपना कोई सम्बन्ध मानता ही नहीं प्रत्युत उसे संसारका और संसारके लिये ही मानकर उसीकी सेवामें लगा देता है। उसकी दृष्टि अविनाशी स्वरूपपर रहती है नाशवान् शरीरपर नहीं। जिसकी दृष्टि शरीरपर रहती है वही ऐसी शंका कर सकता है कि कर्मयोगीका जीवननिर्वाह कैसे होगाजबतक भोगेच्छा रहती है तभीतक जीनेकी इच्छा तथा मरनेका भय रहता है। भोगेच्छा कर्मयोगीमें रहती ही नहीं क्योंकि उसके सम्पूर्ण कर्म अपने लिये न होकर दूसरोंकी सेवाके लिये ही होते हैं। अतः कर्मयोगी अपने जीनेकी परवाह नहीं करता। उसके मनमें यह प्रश्न ही नहीं उठता कि मेरा जीवननिर्वाह कैसे होगा वास्तवमें जिसके हृदयमें जगत्की आवश्यकता नहीं रहती उसकी आवश्यकता जगत्को रहती है। इसलिये जगत् उसके निर्वाहका स्वतः प्रबन्ध करता है।जिनका जीवन परोपकारके लिये ही समर्पित है ऐसे पशुपक्षी कीटपतंग वृक्षलता आदि सभी साधारण प्राणियोंके भी जीवननिर्वाहका जब प्रबन्ध है तब शरीरसहित मिली हुई सब सामग्रीको प्राणियोंके हितमें व्यय करनेवाले मनुष्यके जीवननिर्वाहका प्रबन्ध न हो यह कैसे सम्भव हैसबका पालन करनेवाले भगवान्की असीम कृपासे जीवननिर्वाहकी सामग्री समस्त प्राणियोंको समानरूपसे मिली हुई है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण सबके सामने है। माताके शरीरमें जहाँ रक्तहीरक्त रहता है वहाँ भी बच्चेके जीवननिर्वाहके लिये मीठा और पुष्टिकर दूध स्वतः पैदा हो जाता है। अतः चाहे प्रारब्धसे मानो चाहे भगवत्कृपासे मनुष्यके जीवननिर्वाहकी सामग्री उसको मिलती ही है। इसमें संदेह चिन्ता शोक एवं विचार होना ही नहीं चाहिये। भगवान्के राज्यमें जब पापीसेपापी एवं नास्तिकसेनास्तिक पुरुषका भी जीवननिर्वाह होता है तब कर्मयोगीके जीवननिर्वाहमें क्या बाधा आ सकती है अतः यह प्रश्न उठाना ही भूल है। सम्बन्ध नवें श्लोकमें भगवान्नेयज्ञके लिये किये जानेवाले कर्म बाँधनेवाले नहीं होते ऐसा बताकर यज्ञके लिये कर्म करनेकी आज्ञा दी। उस आज्ञाको ब्रह्माजीके वचनोंद्वारा पुष्ट करके नवें श्लोकमें कहे हुए अपने वचनोंसे एकवाक्यता करते हुए आगेके श्लोकमें यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करने और न करनेके फलका स्पष्ट विवेचन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.12।।न केवलमित्थमपवर्गे यावत्सिद्धिलाभेऽपि अयं मार्गः अभ्यसनीय इत्याह इष्टानिति। यज्ञतर्पितानि हि इन्द्रियाणि स्थितिं बध्नन्ति यत्रक्वापि ध्येयादौ इति। अत एव तद्व्यापारे सति तेषां विषयाणां स्मृतिसंकल्पध्यानादिना भावाः विषयाः इन्द्रियैरेव दत्ताः। यदि तेषामेवोपभोगाय विषया (S K omit विषयाः) न दीयन्ते तर्हि स्तेनत्वं चौर्यं स्यात् छद्मचारित्वात्। उक्तं हि पूर्वमेव भगवता मूढाचारः स उच्यते (II 6 ) इति। अतो़ऽयं वाक्यार्थः यः सुखोपायं सिद्धिम् अपवर्गं वा प्रेप्सति तेन इन्द्रियकौतुकनिवृत्तिमात्रफलतयैव भोगा यथोपनतमासेव्या इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.12।।इतश्चाधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह किञ्चेति। कथमस्माभिर्भाविताः सन्तो देवा भावयिष्यन्त्यस्मानिति तदाह इष्टानिति। यज्ञानुष्ठानेन पूर्वोक्तरीत्या स्वर्गापवर्गयोर्भावेऽपि कथं स्त्रीपशुपुत्रादिसिद्धिरित्याशङ्क्य पूर्वार्धं व्याकरोति इष्टानभिप्रेतानिति। पश्वादिभिश्च यज्ञानुष्ठानद्वारा भोगो निवर्तनीयोऽन्यथा प्रत्यवायप्रसङ्गादित्युत्तरार्धं व्याचष्टे तैरिति। आनृण्यमकृत्वेत्यर्थः। अथमर्थः देवानामृषीणां पितृ़णां च यज्ञेन ब्रह्मचर्येण प्रजया च संतोषमनापाद्य स्वकीयं कार्यकरणसंघातमेव पोष्टुं भुञ्जानस्तस्करो भवतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.12।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.12।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.12।।यज्ञभाविताः यज्ञेन आराधिताः मदात्मका देवा इष्टान् भोगान् वो दास्यन्ते परमपुरुषार्थलक्षणं मोक्षं साधयतां ये इष्टा भोगाः तान् पूर्वपूर्वयज्ञभाविता देवा दास्यन्ते। उत्तरोत्तराराधनापेक्षितान् सर्वान् भोगान् वो दास्यन्ति इत्यर्थः।स्वाराधनार्थता तैः दत्तान् भोगान् तेभ्यः अप्रदाय यो भुङ्क्ते चोर एव सः। चौर्यं हि नाम अन्यदीये तत्प्रयोजनाय एव परिक्लृप्ते वस्तुनि स्वकीयताबुद्धिं कृत्वा तेन स्वात्मपोषणम्। अतः अस्य न परमपुरुषार्थानर्हतामात्रम् अपि तु निरयगामित्वं च भविष्यति इत्यभिप्रायः।तद् एव विवृणोति
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.12।। इष्टान् अभिप्रेतान् भोगान् हि वः युष्मभ्यं देवाः दास्यन्ते वितरिष्यन्ति स्त्रीपशुपुत्रादीन् यज्ञभाविताः यज्ञैः वर्धिताः तोषिताः इत्यर्थः। तैः देवैः दत्तान् भोगान् अप्रदाय अदत्त्वा आनृण्यमकृत्वा इत्यर्थः एभ्यः देवेभ्यः यः भुङ्क्ते स्वदेहेन्द्रियाण्येव तर्पयति स्तेन एव तस्कर एव सः देवादिस्वापहारी।।ये पुनः
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【 Verse 3.13 】
▸ Sanskrit Sloka: यज्ञशिष्टाशिन: सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषै: | भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ||
▸ Transliteration: yajñaśiṣṭāśinaḥ santo mucyante sarvakilbiṣaiḥ | bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pacantyātmakāraṇāt ||
▸ Glossary: yajñaśiṣṭāśinaḥ: those who eat the food remnants of sacrifice; santaḥ: devo- tees; mucyante: get relief from; sarva: all; kilbiṣaiḥ: sins; bhuñjate: enjoy; te: they; tu: but; aghaṁ: grievous; pāpāḥ: sins; ye: those; pacanti: prepare food; ātmakāraṇāt: for sense enjoyment
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.13 Those who eat food after selfless enriching service are free of all sins. Those who prepare food for sense enjoyment do grievous sin.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.13।।यज्ञशेष(योग) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.13।। यज्ञ के अवशिष्ट अन्न को खाने वाले श्रेष्ठ पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाते हैं किन्तु जो लोग केवल स्वयं के लिये ही पकाते हैं वे तो पापों को ही खाते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.13 यज्ञशिष्टाशिनः who eat the remnants of the sacrifice? सन्तः the righteous? मुच्यन्ते are freed? सर्वकिल्बिषैः from all sins? भुञ्जते eat? ते those? तु indeed? अघम् sin? पापाः sinful ones? ये who? पचन्ति cook? आत्मकारणात् for their own sake.Commentary Those who? after performing the five great sacrifices? eat the remnants of the food are freed from all the sins committed by these five agents of insect slaughter? viz.? (1) the pestle and mortar? (2) the grinding stone? (3) the fireplace? (4) the place where the waterpot is kept? and (5) the broom. These are the five places where injury to life is daily committed. The sins are washed away by the performance of the five MahaYajnas or great sacrifices which every Dvija(twicorn or the people belonging to the first three castes in Hindu society? especially the Brahmin) ought to perform1. DevaYajna Offering sacrifices to the gods which will satisfy them?2. BrahmaYajna or RishiYajna Teaching and reciting the scriptures which will satisfy Brahman and the Rishis?3. PitriYajna Offering libations of water to ones ancestors which will satisfy the manes?4. NriYajna The feeding of the hungry and the guests? and?5. BhutaYajna The feeding of the subhuman species? such as animals? birds? etc.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.13. The righteous persons, who eat the remnants (objects enjoined) of the actions to be performed necessarily, are freed from all sins. But those who cook, intending their own selves, are sinners and eat sin.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.13 The sages who enjoy the food that remains after the sacrifice is made are freed from all sin; but the selfish who spread their feast only for themselves feed on sin only.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.13 Pious men who eat the remnants of sacrifices are freed from all sins. But the sinful ones who cook only for their own sake earn only sin.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.13 By becoming partakers of the remembers of sacrifices, they become freed from all sins. But the unholy persons who cook for themselves, they incur sin.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.13 The righteous who eat the remnants of the sacrifice are freed from all sins; but those sinful ones who cook food (only) for their own sake verily eat sin.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.13 Yajnasista-etc. Those who enjoy the pleasures of obects that have come to them on the authority of laws enjoining what is to be necessarily performed; and who enjoy them viewing [the enjoyment] only as a secondary (or intermediate) action and conseently as a subsidiary having no separate purpose; and again those who enjoy the remnant of the necessary action in the form of gratifying the group of the devas of the snese-organs-that residue of food marked with bliss in being firmly established in their own Self - that is to say, those who have mounted upon the Self and are desirous of enjoying objects only as a means to achieve this end - they are freed from all faults of good and bad. Those, who for their own selves etc. : On the other hand, those who believe, under the influence of ignorance, the sheer superficial enjoyment of objects as their final goal, and act with the notion 'We perform this [act] for the sake of ourselves' - those persons alone gain the sin in the form of good and bad.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.13 Those persons who acire food materials solely for propitiating the Supreme Person abiding as the Self of Indra and other deities, and who, after cooking them, propitiate, through them, the Supreme Person as He is, and then sustain themselves on the remnants of oblations (made for such propitiation), they alone will be free of impurities which have resulted from beginningless evil and which are inimical to the vision of the self. But they are evil-minded, who acire for selfish use the things which the Supreme Being, abiding as the Self of Indra and other deities, has granted them for worshipping Him with, and use it all on the other hand for feeding themselves - they eat only sin. Turning away from the vision of the self, they cook only for being led to Naraka (for the expiation of the sin incurred thery).
Sri Krsna says that, from the standpoint of the world as well as that of the scriptures, everything has its origin in sacrifice; and He speaks of the need for the performance of the sacrifices and of the blemish in not performing the same:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.13 Those again, who are yajna-sista-asinah, partakers of the remnants of sacrifices, who, after making offering to the gods and others, [The panca-maha-yajnas, five great offerings, which have to be made by every householder are offerings to gods, manes, humans, creatures and rsis (sages).] are habituated to eat the remnants (of those offerings), called nectar; they, santah, by being (so); mucyante, become freed; sarva-kilbisaih, from all sins-from those sins incurred through the five things [the five things are; oven, water-pot, cutting instruments, grinding machines and broom. A householder incurs sin by killing insects etc. with these things, knowingly or unknowingly. It is atoned by making the aforesaid five offerings.], viz oven etc., and also from those others incurred owing to injury etc. caused inadvertently. Tu, but; the papah, unholy persons, who are selfish; ye, who; pacanti, cook; atma-karanat, for themselves; te, they, being themselves sinful; bhunjate, incur; agham, sin. For the following reasons also actions should be undertaken by an eligible person. Action is definitely the cause of the movement of the wheel of the world. How? This is being answered:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.13।। उत्पादन किये बिना समाज के धन पर जीने वाले अपराधी व्यक्तियों स सर्वथा भिन्न लोगों के विषय में इस श्लोक में वर्णन है। श्रेष्ठ पुरुष यज्ञ भावना से कर्म करने के पश्चात् प्राप्त फल में अपने भाग को ही ग्रहण करते हैं और इस प्रकार सब पापों से मुक्त हो जाते हैं।पूर्व काल में किये गये पाप वर्तमान में पीड़ा के कारण हैं तो वर्तमान के पाप भविष्य में दुखों के कारण बनेंगे। अत समाज में दुखों को समाप्त करने का एक मात्र उपाय है समाज के जागरूक पुरुषों का यज्ञभावना से सामूहिक कर्म करके अवशिष्ट फल को ग्रहण कर सन्तुष्ट रहना।इसके विपरीत जो केवल अपने लिये ही पकाते हैं वे पाप को ही खाते हैं। इस श्लोक से प्रतीत होता है कि श्रीकृष्ण वैयक्तिक सम्पत्ति के सर्वथा विरुद्ध हैं परन्तु एक साम्यवादी व्यक्ति के अर्थ में नहीं। समाज के धन को अपना ही समझ कर उसके परिग्रह के सिद्धांत का भगवान् विरोध करते हैं। जो मनुष्य धन के लोभ से केवल अपने भोग के लिए समाज के दरिद्र और अभागे लोगों के कष्ट की ओर ध्यान दिये बिना धन संग्रह करता है उसे ही यहाँ पाप को खाने वाला कहा गया है।निम्नलिखित कारणों से भी मनुष्य को कर्म करने चाहिये क्योंकि कर्म से ही विश्वचक्र चलता है। कैसे इसका उत्तर है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.13।। ये पुनर्यज्ञान्ब्रह्मयज्ञो देवयज्ञः पितृयज्ञस्तथैवच। भूतयज्ञो नृयज्ञश्च पञ्चयज्ञाः प्रकीर्तिताः।। अध्यापनमध्ययनं चाद्यः होमो द्वितीयः तर्पणं श्राद्धं च तृतीयः भूतेभ्यो बलिप्रदानं चतुर्थः अतिथिपूजनं पञ्चमः इत्युक्तान्कृत्वा तच्छिष्टममृतमशितुं शीलं येषां ते सन्तः सर्वपापैःकण्डणी पेषणी चुल्ली उदकुम्भी च मार्जनी। पञ्चसूना गृहस्थस्य वर्तन्तेऽहरहः सदा इतिस्मृत्युक्तैः पञ्चसूनाकृतैरन्यैश्च मुच्यन्ते। ये त्वन्ये आत्मकारणात्स्वोदरपूरर्णार्थे नतु वैश्वदेवाद्यर्थं पाकं कुर्वन्ति ते तु पापं भुञ्जते। तुशब्दः पूर्वेभ्यो वैलक्षण्यार्थः। अवधारणां तुसर्वं वाक्यं सावधारणम् इति न्यायलब्धम्। एतेन तुशब्दोऽवधारण इत्याचार्यविरुद्धोक्तिः प्रत्युक्ता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.13।।ये तु वैश्वदेवादियज्ञावशिष्टममृतं येऽश्नन्ति ते सन्तः शिष्टा वेदोक्तकारित्वेन देवाद्यृणापाकरणात्। अतस्ते मुच्यन्ते। सर्वैर्विहिताकरणनिमित्तैः पूर्वकृतैश्च पञ्चसूनानिमित्तैः किल्बिषैः। भूतभाविपातकासंसर्गिणस्ते भवन्तीत्यर्थः। एवमन्वये भूतभाविपापाभावमुक्त्वा व्यतिरेके दोषमाह भुञ्जते इति। ते वैश्वदेवाद्यकारिणोऽघं पापमेव। तुशब्दोऽवधारणे। ये पापाः पञ्चसूनानिमित्तं प्रमादकृतहिंसानिमित्तं च कृतपापाः सन्तः आत्मकारणादेव पचन्ति नतु वैश्वदेवाद्यर्थम्। तथाच पञ्चसूनादिकृतपापे विद्यमानएव वैश्वदेवादिनित्यकर्माकरणनिमित्तमपरं पापमाप्नुवन्तीति भुञ्जते ते त्वघं पापा इत्युक्तम्। तथाच स्मृतिःकण्डणी पेषणी चुल्ली उदकुम्भी च मार्जनी। पञ्च सूना गृहस्थस्य ताभिः स्वर्गं न विन्दति इति।पञ्चसूनाकृतं पापं पञ्चयज्ञैर्व्यपोहति। इति च। श्रुतिश्चइदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते स य एतदुपास्ते न स पाप्मनो व्यावर्तते मिश्रं ह्येतत् इति। मन्त्रवर्णोऽपिमोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य। नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी इति। इदं चोपलक्षणं पञ्चमहायज्ञानां स्मार्तानां श्रौतानां च नित्यकर्मणाम्। अधिकृतेन नित्यानि कर्माण्यवश्यमनुष्ठेयानीति प्रजापतिवनार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.13।।ये तु यज्ञशिष्टाशिनः वैश्वदेवाविशेषान्नभोजनशीलाः सन्तः ऋणापाकरणात् ते मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः प्रमादकृतैर्विहिताकरणनिमित्तैः पञ्चसूनानिमित्तैर्वा। ये त्वात्मकारणात्स्वार्थमेव पचन्ति न तु पञ्चमहायज्ञार्थं ते पापाः स्वयं पापरूपा एव सन्तः पापमेव भुञ्जते। तथा च स्मृतिःकण्डनी पेषणी चुल्ली उदकुम्भी च मार्जनी। पञ्च सूना गृहस्थस्य ताभिः स्वर्गं न विन्दति। इतिपञ्चसूनाकृतं पापं पञ्चयज्ञैर्व्यपोहति इति च। श्रुतिश्चइदमेवास्य तत्साधारणमन्नं यदिदमद्यते स य एतदुपासते न स पाप्मनो व्यावर्तते मिश्रं ह्येतत् इति। मन्त्रवर्णोऽपिमोघमन्नं विन्दते अप्रचेताः सत्यं ब्रवीमि वध इत्स तस्य। नार्यमणं पुष्यति नो सखायं केवलाघो भवति केवलादी इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.13।।ननु पूर्वं यजनव्यतिरेकेण यथा दत्तं तथैवाऽग्रेऽपि दास्यन्त एव अतः किं यजनेन इत्यत आह यज्ञशिष्टाशिन इति। सन्तः पूर्वदत्तस्वरूपाभिज्ञाः यज्ञशिष्टाशिनो भूत्वा सर्वकिल्बिषैर्मुच्यन्ते। अत्रायं भावः वृष्ट्यादिना पूर्वमन्नादिरसोत्पत्तिस्तु भगवद्भोगार्थं तेन स्वभोगकरणं पापरूपम्। अतो ये सन्तो भक्तास्तदुत्पत्तिप्रयोजनज्ञातारो भगवदर्थं पाकादिकं कृत्वा भगवते तत्सर्वं समर्प्य तदुपभुक्तावशिष्टभोजिनस्तेसर्वपापैः सेवाप्रतिबन्धरूपैर्मुच्यन्ते। ये तु पापाः पापरूपा आत्मकारणात् पचन्ति पाकादिक्रियां कुर्वन्ति ते तु अघं पापमेव भुञ्जते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.13।।अतश्च यजन्त एव श्रेष्ठा नेतरा इत्याह यज्ञशिष्टाशिन इति। वैश्वदेवादियज्ञावशिष्टं येऽश्नन्ति ते पञ्चसूनाकृतैः सर्वैः किल्बिषैर्मुच्यन्ते। पञ्चसूनाश्च समृतावुक्ताः कण्डनी पेषणी चुल्ली उदकुम्भी च मार्जनी। पञ्चसूना गृहस्थस्य ताभिः स्वर्गं न विन्दति इति। ये त्वात्मनो भोजनार्थमेवान्नं पचन्ति न तु वैश्वदेवाद्यर्थ ते पापा दुराचारा अघमेव भुञ्जते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.13।।यज्ञशिष्टाशिन इति। पञ्चविधयज्ञो भगवत्स्वरूपस्तच्छिष्टाशिनः सर्वेऽपि मुच्यन्ते गृहिणः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.13।।परंतु जो यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवाले श्रेष्ठ पुरुष हैं अर्थात् देवयज्ञादि करके उससे बचे हुए अमृत नामक अन्नको भक्षण करना जिनका स्वभाव है वे सब पापोंसे अर्थात् गृहस्थमें होनेवाले चक्की चूल्हे आदिके पाँच पापोंसे और प्रमादसे होनेवाले हिंसादिजनित अन्य पापोंसे भी छूट जाते हैं। तथा जो उदरपरायण लोग केवल अपने लिये ही अन्न पकाते हैं वै स्वयं पापी हैं और पाप ही खाते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.13।। व्याख्या यज्ञशिष्टाशिनः सन्तः कर्तव्यकर्मोंका निष्कामभावसे विधिपूर्वक पालन करनेपर (यज्ञशेषके रूपमें) योग अथवा समता ही शेष रहती है। कर्मयोगमें यह खास बात है कि संसारसे प्राप्त सामग्रीके द्वारा ही कर्म होता है। अतः संसारकी सेवामें लगा देनेपर ही वह कर्म यज्ञ सिद्ध होता है। यज्ञकी सिद्धिके बाद स्वतः अवशिष्ट रहनेवाला योग अपने लिये होता है। यह योग (समता) ही यज्ञशेष है जिसको भगवान्ने चौथे अध्यायमें अमृत कहा है यज्ञशिष्टामृतभुजः (4। 31)।मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः यहाँ किल्बिषैः पद बहुवचनान्त है जिसका अर्थ है सम्पूर्ण पापोंसे अर्थात् बन्धनोंसे। परन्तु भगवान्ने इस पदके साथ सर्व पद भी दिया है जिसका विशेष तात्पर्य यह हो जाता है कि यज्ञशेषका अनुभव करनेपर मनुष्यमें किसी भी प्रकारका बन्धन नहीं रहता। उसके सम्पूर्ण (सञ्चित प्रारब्ध और क्रियमाण) कर्म विलीन हो जाते हैं (टिप्पणी प0 135) (गीता 4। 23)। सम्पूर्ण कर्मोंके विलीन हो जानेपर उसे सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 4। 31)।इसी अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने यज्ञार्थ कर्मसे अन्यत्र कर्मको बन्धनकारक बताया और चौथे अध्यायके तेईसवें श्लोकमें यज्ञार्थ कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन होनेकी बात कही। इन दोनों श्लोकों (3। 9 तथा 4। 23) में जो बात आयी है वही बात यहाँ सर्वकिल्बिषैः पदसे कही गयी है। तात्पर्य है कि यज्ञशेषका अनुभव करनेवाले मनुष्य सम्पूर्ण बन्धनरूप कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं। पापकर्म तो बन्धनकारक होते ही हैं सकामभावसे किये गये पुण्यकर्म भी (फलजनक होनेसे) बन्धनकारक होते हैं। यज्ञशेष(समता) का अनुभव करनेपर पाप और पुण्य दोनों ही नहीं रहते बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते (गीता 2। 50)।अब विचार करें कि बन्धनका वास्तविक कारण क्या है ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये इस कामनासे ही बन्धन होता है। यह कामना सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है (गीता 3। 37)। अतः कामनाका त्याग करना अत्यन्त आवश्यक है।वास्तवमें कामनाकी कोई स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। कामना अभावसे उत्पन्न होती है और स्वयं (सत्स्वरूप) में किसी प्रकारका अभाव है ही नहीं और हो सकता भी नहीं। इसलिये स्वयं में कामना है ही नहीं। केवल भूलसे शरीरादि असत् पदार्थोंके साथ अपनी एकता मानकर मनुष्य असत् पदार्थोंके अभावसे अपनेमें अभाव मानने लगता है और उस अभावकी पूर्तिके लिये असत् पदार्थोंकी कामना करने लगता है। साधकको इस बातकी तरफ खयाल करना चाहिये कि आरम्भ और समाप्त होनेवाली क्रियाओंसे उत्पन्न और नष्ट होनेवाले पदार्थ ही तो मिलेंगे। ऐसे उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंसे मनुष्यके अभावकी पूर्ति कभी हो ही नहीं सकती। जब इन पदार्थोंसे अभावकी पूर्ति होनेका प्रश्न ही नहीं है तो फिर इन पदार्थोंकी कामना करना भी भूल ही है। ऐसा ठीकठीक विचार करनेसे कामनाकी निवृत्ति सहज हो सकती है।हाँ अपने कहलानेवाले शरीरादि पदार्थोंको कभी भी अपना तथा अपने लिये न मानकर दूसरोंकी सेवामें लगानेसे इन पदार्थोंसे स्वतः सम्बन्धविच्छेद हो जाता है जिससे तत्काल अपने सत्स्वरूपका बोध हो जाता है। फिर कोई अभाव शेष नहीं रहता। जिसके मनमें किसी प्रकारके अभावकी मान्यता (कामना) नहीं रहती वह मनुष्य जीतेजी ही संसारसे मुक्त है।ये पचन्त्यात्मकारणात् अपने लिये कुछ भी चाहनेका भाव अर्थात् स्वार्थ कामना ममता आसक्ति एवं अपनेको अच्छा कहलानेका किञ्चित् भी भाव आत्मकारणात् पदके अन्तर्गत आ जाता है। मनुष्यमें स्वार्थबुद्धि जितनी ज्यादा होती है वह उतना ही ज्यादा पापी होता है।यहाँ पचन्ति पद उपलक्षक है जिसका अर्थ केवल पकाने से ही न होकर खाना पीना चलना बैठनाआदि समस्त सांसारिक क्रियाओंकी सिद्धिसे है।अपना स्वार्थ चाहनेवाला व्यक्ति अपने लिये पकाये (कार्य करे) अथवा दूसरेके लिये वास्तवमें वह अपने लिये ही पकाता है। इसके विपरीत अपने स्वार्थभावका त्याग करके कर्तव्यकर्म करनेवाला साधक अपने कहलानेवाले शरीरके लिये पकाये अथवा दूसरेके लिये वास्तवमें वह दूसरेके लिये ही पकाता है। संसारसे हमें जो भी सामग्री मिली है उसे संसारकी सेवामें न लगाकर अपने सुखभोगमें लगाना ही अपने लिये पकाना है। संसारके छोटेसेछोटे अंश शरीरको अपना और अपने लिये मानना महान् पाप है। परन्तु शरीरको अपना न मानकर इसको आवश्यकतानुसार अन्न जल वस्तु आदि देना और इसको आलसी प्रमादी भोगी नहीं होने देना इस शरीरकी सेवा है जिससे शरीरमें ममताआसक्ति नहीं रहती।मनुष्यको अपने कर्मोंका फल स्वयं भोगना पड़ता है परन्तु उसके द्वारा किये गये कर्मोंका प्रभाव सम्पूर्ण संसारपर पड़ता है। अपने लिये कर्म करनेवाला मनुष्य अपने कर्तव्यसे च्युत हो जाता है और अपने कर्तव्यसे च्युत होनेपर ही राष्ट्रमें अकाल महामारी मृत्यु आदि महान् कष्ट होते हैं। अतः मनुष्यके लिये उचित है कि वह अपने लिये कुछ भी न करे अपना कुछ भी न माने तथा अपने लिये कुछ भी न चाहे।कर्मफल (उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुमात्र) का आश्रय लेना अपने लिये पकाने के अन्तर्गत है। इसीलिये भगवान्ने छठे अध्यायके पहले श्लोकमें अनाश्रितः कर्मफलम् पदोंसे कर्मयोगीको कर्मफलका आश्रय न लेनेके लिये कहा है। सर्वथा अनाश्रित हो जानेपर ही मनुष्य अपने लिये कुछ नहीं करता जिससे वह योगमें स्थित हो जाता है।भुञ्जते ते त्वघं
Chapter 3 (Part 9)
पापाः इस पदोंमें भगवान्ने अपने लिये कर्म करनेवालोंकी सभ्य भाषामें निन्दा की है। अपने लिये किये गये कर्मोंसे वह इतना पापसंग्रह कर लेता है कि चौरासी लाख योनियों एवं नरकोंका दुःख भोगनेपर भी वह खत्म नहीं होता प्रत्युत सञ्चितके रूपमें बाकी रह जाता है। मनुष्ययोनि एक ऐसा अद्भुत खेत है जिसमें जो भी पाप या पुण्यका बीज बोया जाता है वह अनेक जन्मोंतक फल देता है (टिप्पणी प0 136.1)। अतः मनुष्यको तुरंत यह निश्चय कर लेना चाहिये कि अब मैं पाप (अपने लिये कर्म) नहीं करूँगा। इस निश्चयमें बड़ी भारी शक्ति है। सच तो यह है कि परमात्माकी तरफ चलनेका दृढ़ निश्चय होनेपर पाप होना स्वतः रुक जाता है। सम्बन्ध मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं अर्जुनके इस प्रश्नके उत्तरमें भगवान् अनेक हेतु देते हुए आगेके दो श्लोकोंमें सृष्टिचक्रकी सुरक्षाके लिये भी यज्ञ (कर्तव्यकर्म) करनेकी आवश्यकताका प्रतिपादन करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.13।।यज्ञशिष्टेति। अवश्यकर्तव्यतारूपशासनमहिमायातान् भोगान् येऽश्नन्ति अवान्तरव्यापारमात्रतया अत एव च पृथक्फलत्वाभावाङ्गतया अथ च इन्द्रियात्मकदेवगणतर्पणलक्षणयज्ञादवशिष्टम् अन्तःसारस्वात्मस्थित्यानन्दलक्षणविघसं येऽश्नन्ति तत्रारूढा ( तत्रामूढाः) भवन्ति तदुपादेयोपायतया(S तत्रोपादे ) तु विषयभोगं वाञ्छन्ति ते सर्वाकल्बिषैः शुभाशुभैः मुच्यन्ते। ये त्वात्मकारणादिति अविद्यावशात् स्थूलमेव विषयभोगं परत्वेन (S भोगपरत्वेन) मन्वानाः आत्मार्थमिदं वयं कुर्म इति कुर्वते त एवाघं शुभाशुभात्मकं लभन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.13।।देवादिभ्यः संविभागमकृत्वा भुञ्जानानां प्रत्यवायित्वमुक्त्वा तदन्येषां सर्वदोषराहित्यं दर्शयति ये पुनरिति। यज्ञशिष्टाशिनो ये पुनस्ते तादृशाः सन्तः सर्वकिल्बिषैर्मुच्यन्त इति योजना। तैर्दत्तानित्यादिनोक्तं निगमयति भुञ्जत इति। देवयज्ञादीनित्यादिशब्देन पितृयज्ञो मनुष्ययज्ञो भूतयज्ञो ब्रह्मयज्ञश्चेति चत्वारो यज्ञा गृह्यन्ते चुल्लीशब्देन पिठरधारणाद्यर्थक्रियां कुर्वन्तो विन्यासविशेषवन्तस्त्रयो ग्रावाणो विवक्ष्यन्ते। आदिशब्देन कण्डनी पेषणी मार्जन्युदककुम्भश्चेत्येते हिंसाहेतवो गृहीतास्तान्येतानि पञ्च प्राणिनां सूनास्थानानि हिंसाकारणानि तत्प्रयुक्तैः सर्वैरपि बुद्ध्यबुद्धिपूर्वकैर्दुरितैर्मुच्यन्त इति संबन्धः। प्रमादो विचारव्यतिरेकेणाबुद्धिपूर्वकमुपनतं पादपातादिकर्म तेन प्राणिनां हिंसा संभाव्यते। आदिशब्देनाशुचिसंस्पर्शादि गृहीतं तदुत्थैश्च पापैर्महायज्ञकारिणो मुच्यन्ते। उक्तंहिकण्डनं पेषणं चुल्ली उदकुम्भश्च मार्जनी। पञ्च सूना गृहस्थस्य पञ्चयज्ञात्प्रणश्यति इति।पञ्च सूना गृहस्थस्य चुल्ली पेषण्यवस्करः। कण्डनी चैव कुम्भश्च बध्यन्ते यांस्तु वाहयन् इति च। अस्यायमर्थः या यथोक्ताः पञ्चसंख्याका गृहस्थस्य सूनास्ता यो वाहयन्नापादयन् वर्तते तेन प्राणिनो बुद्धिपूर्वकमबुद्धिपूर्वकं च बध्यन्ते तत्प्रयुक्तं सर्वमपि पापं महायज्ञानुष्ठानात्प्रणश्यतीति महायज्ञानुष्ठानस्तुत्यर्थम्। तदनुष्ठानविमुखान्निन्दति ये त्विति। आत्मंभरित्वमेव स्फोरयति ये पचन्तीति। स्वदेहेन्द्रियपोषणार्थमेव पाकं कुर्वतां देवयज्ञादिपराङ्मुखानां पापभूयस्त्वं दर्शयति भुञ्जत इति। पाठक्रमस्त्वर्थक्रमादपबाधनीयः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.13।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.13।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.13।।इन्द्राद्यात्मना अवस्थितपरमपुरुषाराधनार्थतया एव द्रव्याणि उपादाय विपच्य तैः यथावस्थितं परमपुरुषम् आराध्य तच्छिष्टाशनेन ये शरीरयात्रां कुर्वते ते तु अनादिकालोपार्जि तैः किल्बिषैः आत्मयाथात्म्यावलोकनविरोधिभिः सर्वैः विमुच्यन्ते।ये तु परमपुरुषेण इन्द्राद्यात्मना स्वाराधनाय दत्तानाम् आत्मार्थतया उपादाय विपच्य अश्नन्ति ते पापात्मानः अघम् एव भुञ्जते। अघपरिणामित्वाद् अघम् इति उच्यते। आत्मावलोकनविमुखा नरकाय एव पच्यन्ते।पुनरपि लोकदृष्ट्या शास्त्रदृष्ट्या च सर्वस्य यज्ञमूलत्वं दर्शयित्वा यज्ञानुवर्तनस्य अवश्यकार्यताम् अननुवर्तने च दोषं च आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.13।। देवयज्ञादीन् निर्वर्त्य तच्छिष्टम् अशनम् अमृताख्यम् अशितुं शीलं येषां ते यज्ञशिष्टाशिनः सन्तः मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः सर्वपापैः चुल्ल्यादिपञ्चसूनाकृतैः प्रमादकृतहिंसादिजनितैश्च अन्यैः। ये तु आत्मंभरयः भुञ्जते ते तु अघं पापं स्वयमपि पापाः ये पचन्ति पाकं निर्वर्तयन्ति आत्मकारणात् आत्महेतोः।।इतश्च अधिकृतेन कर्म कर्तव्यम् जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुर्हि कर्म। कथमिति उच्यते
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【 Verse 3.14 】
▸ Sanskrit Sloka: अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भव: | यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञ: कर्मसमुद्भव: ||
▸ Transliteration: annādbhavanti bhūtāni parjanyādannasaṁbhavaḥ | yajñādbhavati parjanyo yajñaḥ karmasamudbhavaḥ ||
▸ Glossary: annāt: from grains; bhavanti: grow; bhūtāni: beings; parjanyāt: from rains; anna: food grains; saṁbhavaḥ: possible; yajñāt: from sacrifice; bhavati: becomes pos- sible; parjanyaḥ: rains; yajñaḥ: sacrifice; karma: work; samudbhavaḥ: born of
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.14 All beings grow from food grains, from rains the food grains become possible, the rains become possible from selfless sacrifice of enriching.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.14 3.15।।सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होता है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्यकर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.14।। समस्त प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं अन्न की उत्पत्ति पर्जन्य से। पर्जन्य की उत्पत्ति यज्ञ से और यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.14 अन्नात् from food? भवन्ति come forth? भूतानि beings? पर्जन्यात् from rain? अन्नसम्भवः production of food? यज्ञात् from sacrifice? भवति arises? पर्जन्यः rain? यज्ञः sacrifice? कर्मसमुद्भवः born of action.Commentary Here Yajna means Apurva or the subtle principle or the unseen form which a sacrifice assumes between the time of its performance and the time when its fruits manifest themselves.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.14. From food arise the things that are born; from the rain-cloud the food arises; from the sacrifice the rain-cloud arises; the sacrifices arises from action;
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.14 All creatures are the product of food, food is the product of rain, rain comes by sacrifice, and sacrifice is the noblest form of action.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.14 From food arise all beings (i.e., their bodies); from rain food is produced; from sacrifice comes rain; and sacrifice springs from activity.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.14 From food are born the creatures; the origin of food is from rainfall; rainfall originates from sacrifice; sacrifice has action as its origin.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.14 From food come forth beings; from rain food is produced; from sacrifice arises rain and sacrifice is born of action.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.14 See Comment under 3.15
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.14 From food arise all beings; from rain food is produced. These two facts are matters of common experience. 'From sacrifice comes rain' this is known from the scriptures such as, 'The oblations offered in fire reach the sun, and from the sun comes rain' (Manu, 6.76), and sacrifice is born out of activities in the form of collecting materials, etc., by the agent. And activity arises from 'Brahman', the body born of Prakrti.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.14 It is a matter of direct perception that annat, from food, which is eaten and is transformed into blood and semen; bhavanti, are born; bhutani, the creatures. Anna-sambhavah, the origin of food; is parjanyat, from rainfall. Parjanyah, rainfall; bhavati, originates; from yajnat, from sacrifice. This accords with the Smrti, 'The oblations properly poured into fire reaches the sun. From the sun comes rain, from rain comes food, and from the sun comes rain, from rain comes food, and from that the creatures' (Ma.Sm.3.76). (Here) sacrifice means its unie [Also termed as the unseen result (adrsta).-Tr.] result. And that sacrifice, i.e. the unie result, which arises (samudbhavah) from action (karma) undertaken by the priest and the sacrificer, is karma-samudbhavah; it has action for its origin.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.14।। No commentary.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.14।। जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादप्यधिकृतेन कर्म कर्तव्यमित्याह अन्नादिति। अन्नाद्भुक्ताद्रेतआदिरुपेण परिणतात् भूतानि प्राणिशरीराणि भवन्ति पर्जन्याद्वृष्टेरन्नस्य संभव उत्पत्तिः यज्ञादपूर्वात्पर्यन्यो भवति। तदुक्तंअग्नौ प्रास्ताहुतिः सभ्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः इति। यज्ञः कर्मणः ऋत्विग्यजमानव्यापारात्समुद्भवो यस्य सः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.14।।न केवलं प्रजापतिवचनादेव कर्म कर्तव्यमपि तु जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादपीत्याह अन्नादित्यादित्रिभिः। अन्नाद्भुक्ताद्रेतोलोहितरूपेण परिणताद्भूतानि प्राणिशरीराणि भवन्ति जायन्ते। अन्नस्य संभवो जन्म। अन्नमंभवः पर्जन्याद्वृष्टेः। प्रत्यक्षसिद्धमेवैतत्। अत्र कर्मोपयोगमाह यज्ञात्कारीर्यादेरग्निहोत्रादेश्चापूर्वाख्यात् धर्माद्भवति पर्जन्यः। यथा चाग्निहोत्राहुतेर्वृष्टिजनकत्वं तथा व्याख्यातमष्टाध्यायीकाण्डे जनकयाज्ञवल्क्यसंवादरूपायां षट्प्रश्नयाम्। मनुना चोक्तम्अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः।। इति। सच यज्ञो धर्माख्यः सूक्ष्मः कर्मसमुद्भवः ऋत्विग्यजमानव्यापारसाध्यः। यज्ञस्य हि अपूर्वस्य विहितं कर्म कारणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.14।।जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादपि कर्म कर्तव्यमित्याह अन्नादिति। अन्नाद्रेतोरूपेण परिणताद्भूतानि प्राणिशरीराणि भवन्ति। अन्नं च पर्जन्यात्। एतत्प्रसिद्धमेव। यज्ञाद्भवति पर्जन्यःअग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः। इति स्मृतेः। यज्ञो देवताराधनजो धर्मः कर्मभ्यो यागहोमदानादिभ्यः समुद्भवतीति कर्मसमुद्भवः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.14।।ननु रसरूपस्य भगवतोऽन्नादेव केवलात् कथं भोगः सेत्स्यति इत्यत आह अन्नादिति। अन्नाद्भूतानि सजीवशरीराणि भवन्ति तैर्भगवद्भोगः सम्यक् सिद्ध्यति। नन्वन्नादेव भूतोत्पत्तिश्चेत्तदा वृष्ट्यादेः किं प्रयोजनं इत्यत आह पर्जन्यादिति। पर्जन्यादन्नस्य सम्भव उत्पत्तिर्भवतीत्यर्थः। ननु पर्जन्यश्चेदन्नोत्पादकस्तदा किं यज्ञेन इत्यत आह यज्ञादिति। यज्ञाद्भगवदर्थात् पर्जन्यो भवति। ननु भगवदात्मकत्वमेव यज्ञस्य चेत्तदाऽन्यदेवाद्यर्थं कर्मकरणोपदेशः कथं इत्यत आह यज्ञ इति। यज्ञात्मकभगवद्रूपं कर्मणा सम्यगुपपद्यते। अयमर्थः भगवदंशत्वेन भगवद्विभूतित्वेन कर्मकरणाद्यज्ञात्मकभगवत्प्राकट्यमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.14।। जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुत्वादपि कर्म कर्तव्यमित्याह अन्नादिति त्रिभिः। अन्नाच्छुकशोणितरुपेण परिणताद्भूतान्युत्पद्यन्ते। अन्नस्य च संभवः पर्जन्यादृष्टेः। स च पर्जन्यो यज्ञाद्भवति। स च यज्ञः कर्मसमुद्भवः। कर्मणा यजमानादिव्यापारेण सम्यङ्निष्पद्यत इत्यर्थः।अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः इति स्मृतेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.14।।उत्पत्तिशिष्टत्वेन तत्रापि तदावश्यकतां दर्शयति द्वाभ्यां अन्नादिति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.14।।इसलिये भी अधिकारीको कर्म करना चाहिये क्योंकि कर्म जगत्चक्रकी प्रवृत्तिका कारण है। कैसे सो कहते हैं भक्षण किया हुआ अन्न रक्त और वीर्यके रूपमें परिणत होनेपर उससे प्रत्यक्षही प्राणी उत्पन्न होते है। पर्जन्यसे अर्थात् वृष्टिसे अन्नकी उत्पत्ति होती है और यज्ञसे वृष्टि होती है। अग्निमें विधिपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यमें स्थित होती है सूर्यसे वृष्टि होती है वृष्टिसे अन्न होता है और अन्नसे प्रजा उत्पन्न होती है इस स्मृतिवाक्यसे भी यही बात पायी जाती है। ऋत्विक् और यजमानके व्यापारका नाम कर्म है और उस कर्मसे जिसकी उत्पत्ति होती है वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसमुद्भव है अर्थात् वह अपूर्वरूप यज्ञ कर्मसे उत्पन्न होता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.14।। व्याख्या अन्नाद्भवन्ति भूतानि प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है वह अन्न (टिप्पणी प0 136.2) कहलाता है। जिस प्राणीका जो खाद्य है जिसे ग्रहण करनेसे उसके शरीरकी उत्पत्ति भरण और पुष्टि होती है उसे ही यहाँ अन्न नामसे कहा गया है जैसे मिट्टीका कीड़ा मिट्टी खाकर जीता है तो मिट्टी ही उसके लिये अन्न है।जरायुज (मनुष्य पशु आदि) उद्भिज्ज (वृक्षादि) अण्डज (पक्षी सर्प चींटी आदि) और स्वेदज (जूँ आदि) ये चारों प्रकारके प्राणी अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर अन्नसे ही जीवित रहते हैं (टिप्पणी प0 137.1)।पर्जन्यादन्नसम्भवः समस्त खाद्य पदार्थोंकी उत्पत्ति जलसे होती है। घासफूस अनाज आदि तो जलसे होते ही हैं मिट्टीके उत्पन्न होनेमें भी जल ही कारण है। अन्न जल वस्त्र मकान आदि शरीरनिर्वाहकीसभी सामग्री स्थूल या सूक्ष्मरूपसे जलसे सम्बन्ध रखती है और जलका आधार वर्षा है।यज्ञाद्भवति पर्जन्यः यज्ञ शब्द मुख्यरूपसे आहुति देनेकी क्रियाका वाचक है। परन्तु गीताके सिद्धान्त और कर्मयोगके प्रस्तुत प्रकरणके अनुसार यहाँ यज्ञ शब्द सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंका उपलक्षक है। यज्ञमें त्यागकी ही मुख्यता होती है। आहुति देनेमें अन्न घी आदि चीजोंका त्याग है दान करनेमें वस्तुका त्याग है तप करनेमें अपने सुखभोगका त्याग है कर्तव्यकर्म करनेमें अपने स्वार्थ आराम आदिका त्याग है। अतः यज्ञ शब्द यज्ञ (हवन) दान तप आदि सम्पूर्ण शास्त्रविहित क्रियाओंका उपलक्षक है।बृहदारण्यकउपनिषद्में एक कथा आती है। प्रजापति ब्रह्माजीने देवता मनुष्य और असुर इन तीनोंको रचकर उन्हें द इस अक्षरका उपदेश दिया। देवताओंके पास भोगसामग्रीकी अधिकता होनेके कारण उन्होंने द का अर्थ दमन करो समझा। मनुष्योंमें संग्रहकी प्रवृत्ति अधिक होनेके कारण उन्होंने द का अर्थ दान करो समझा। असुरोंमें हिंसा(दूसरोंको कष्ट देने) का भाव अधिक होनेके कारण उन्होंने द का अर्थ दया करो समझा। इस प्रकार देवता मनुष्य और असुर तीनोंको दिये गये उपदेशका तात्पर्य दूसरोंका हित करनेमें ही है। वर्षाके समय मेघ जोद द द की गर्जना करता है वह आज भी ब्रह्माजीके उपदेश (दमन करो दान करो दया करो) के रूपसे कर्तव्यकर्मोंकी याद दिलाता है (बृहदारण्यक0 5। 2। 13)।अपने कर्तव्यकर्मका पालन करनेसे वर्षा कैसे होगी वचनकी अपेक्षा अपने आचरणका असर दूसरोंपर स्वाभाविक अधिक पड़ता है यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः (गीता 3। 21)। मनुष्य अपनेअपने कर्तव्यकर्मका पालन करेंगे तो उसका असर देवताओंपर भी पड़ेगा जिससे वे भी अपने कर्तव्यका पलन करेंगे वर्षा करेंगे। (गीता 3। 11)। इस विषयमें एक कहानी है। चार किसानबालक थे। आषाढ़का महीना आनेपर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलानेका समय आ गया है वर्षा नहीं हुई तो न सही हम तो समयपर अपने कर्तव्यका पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेतमें जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरोंने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि बात क्या है वर्षा तो अभी हुई नहीं फिर ये हल क्यों चला रहे हैं जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्यका पालन करनेमें पीछे क्यों रहें ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लग गये। मोरोंकी आवाज सुनकर मेघोंने विचार किया कि आज हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं सारी बात पता लगनेपर उन्होंने सोचा कि हम अपने कर्तव्यसे क्यों हटें और उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। मेघोंकी गर्जना सुनकर इन्द्रने सोचा कि बात क्या है जब उसको मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं तब उसने सोचा कि अपने कर्तव्यका पालन करनेमें मैं पीछे क्यों रहूँ ऐसा सोचकर इन्द्रने भी मेघोंको वर्षा करनेकी आज्ञा दे दी। यज्ञः कर्मसमुद्भवः निष्कामभावपूर्वक किये जानेवाले लौकिक और शास्त्रीय सभी विहित कर्मोंका नाम यज्ञ है। ब्रह्मचारीके लिये अग्निहोत्र करना यज्ञ है। ऐसे ही स्त्रियोंके लिये रसोई बनाना यज्ञ है (टिप्पणी प0 137.2)। आयुर्वेदका ज्ञाता केवल लोगोंके हितके लिये वैद्यककर्म करे तो उसके लिये वही यज्ञ है। इसी तरह विद्यार्थी अपने अध्ययनको और व्यापारी अपने व्यापारको (यदि वह केवल दूसरोंके हितके लिये निष्कामभावसे किया जाय) यज्ञ मान सकते हैं। इस प्रकार वर्ण आश्रम देश कालकीमर्यादा रखकर निष्कामभावसे किये गये सभी शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म यज्ञ रूप होते हैं। यज्ञ किसी भी प्रकारका हो क्रियाजन्य ही होता है।संखिया भिलावा आदि विषोंको भी वैद्यलोग जब शुद्ध करके औषधरूपमें देते हैं तब वे विष भी अमृतकी तरह होकर बड़ेबड़े रोगोंको दूर करनेवाले बन जाते हैं। इसी प्रकार कामना ममता आसक्ति पक्षपात विषमता स्वार्थ अभिमान आदि ये सब कर्मोंमें विषके समान हैं। कर्मोंके इस विषैले भागको निकालदेनेपर वे कर्म अमृतमय होकर जन्ममरणरूप महान् रोगको दूर करनेवाले बन जाते हैं। ऐसे अमृतमय कर्म ही यज्ञ कहलाते हैं।कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि वेद कर्तव्यकर्मोंको करनेकी विधि बताते हैं (गीता 4। 32)। मनुष्यको कर्तव्यकर्म करनेकी विधिका ज्ञान वेदसे होनेके कारण ही कर्मोंको वेदसे उत्पन्न कहा गया है। वेद शब्दके अन्तर्गत ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेदके साथसाथ स्मृति पुराण इतिहास (रामायण महाभारत) एवं भिन्नभिन्न सम्प्रदायके आचार्योंके अनुभववचन आदि समस्त वेदानुकूल सत्शास्त्रोंको ग्रहण कर लेना चाहिये।ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् यहाँ ब्रह्म पद वेदका वाचक है। वेद सच्चिदानन्दघन परमात्मासे ही प्रकट हुए हैं (गीता 17।23)। इस प्रकार परमात्मा सबके मूल हुए।परमात्मासे वेद प्रकट होते हैं। वेद कर्तव्यपालनकी विधि बताते हैं। मनुष्य उस कर्तव्यका विधिपूर्वक पालन करते हैं। कर्तव्यकर्मोंके पालनसे यज्ञ होता है और यज्ञसे वर्षा होती है। वर्षासे अन्न होता है अन्नसे प्राणी होते हैं और उन्हीं प्राणियोंमेंसे मनुष्य कर्तव्यकर्मोंके पालनसे यज्ञ करते हैं (टिप्पणी प0 138)। इस तरह यह सृष्टिचक्र चल रहा है।तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् यहाँ ब्रह्म पद अक्षर(सगुणनिराकार परमात्मा) का वाचक है। अतः सर्वगत (सर्वव्यापी) परमात्मा हैं वेद नहीं।सर्वव्यापी होनेपर भी परमात्मा विशेषरूपसे यज्ञ (कर्तव्यकर्म) में सदा विद्यमान रहते हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ निष्कामभावसे कर्तव्यकर्मका पालन किया जाता है वहाँ परमात्मा रहते हैं। अतः परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले मनुष्य अपने कर्तव्यकर्मोंके द्वारा उन्हें सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः (गीता 18। 46)। शङ्का परमात्मा जब सर्वव्यापी हैं तब उन्हें केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा गया है क्या वे दूसरी जगह नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं समाधान परमात्मा तो सभी जगह समानरूपसे नित्य विद्यमान हैं। वे अनित्य और एकदेशीय नहीं हैं। इसीलिये उन्हें यहाँ सर्वगत कहा गया है। यज्ञ (कर्तव्यकर्म) में नित्य प्रतिष्ठित कहनेका तात्पर्य यह है कि यज्ञ उनका उपलब्धिस्थान है। जमीनमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कुएँ आदिसे ही उपलब्ध होता है सब जगहसे नहीं। पाइपमें सर्वत्र जल रहनेपर भी जल वहींसे प्राप्त होता है जहाँ टोंटी या छिद्र होता है। ऐसे ही सर्वगत होनेपर भी परमात्मा यज्ञसे ही प्राप्त होते हैं।अपने लिये कर्म करनेसे तथा जडता (शरीरादि) के साथ अपना सम्बन्ध माननेसे सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिमें बाधा (आड़) आ जाती है। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये अपने कर्तव्यका पालनकरनेसे यह बाधा हट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्माका स्वतः अनुभव हो जाता है। यही कारण है कि भगवान् अर्जुनको जो कि अपने कर्तव्यसे हटना चाहते थे अनेक युक्तियोंसे कर्तव्यका पालन करनेपर विशेष जोर दे रहे हैं। सम्बन्ध सृष्टिचक्रके अनुसार चलने अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। अतः जो मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता उसकी ताड़ना भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.14 3.15।।अन्नादिति। कर्मेति। अन्नात् अविभागभोग्यस्वभावात् कथंचित् मायाविद्याकालाद्यनेकापरपर्यायात् (S N विद्याप्रकृतिकाला ) भूतानि विचित्राणि भवन्ति। तच्च अन्नं पर्जन्यात् अविच्छिन्नसंवित्स्वभावात् आत्मनः भोक्तृतन्त्रात्मलाभत्वात् भोग्यतायाः। स च पर्जन्यो भोक्ता यज्ञात् भोगक्रियात्मनः भोगक्रियायत्तत्वात् भोक्तृत्वस्य। भोगक्रिया च कर्मणः क्रियाशक्तिस्वातन्त्र्यबलात्। तच्च स्वातन्त्र्यम् अविच्छिन्नमपि (S अविच्छन्नमपि अविच्छन्नस्यापि अनवच्छिन्नानन्त ) अनवच्छिन्नानन्तस्वातन्त्र्यपूर्णसमुच्चलन्महेश्वरभावपरमात्मब्रह्मणः संस्पर्शवशात् (S K ब्रह्मसंस्पर्श )। तच्च ( omits तच्च) उच्चलदच्छानाछादितैश्वर्यं ( N इच्छादितैश्वर्यम्) ब्रह्म अक्षरात् प्रशान्ताशेषैश्वर्यतरङ्गात् संविन्मात्रात्। इत्येवं सुव्यवस्थितो (S स्थितोऽयम् भोगक्रियायाम्) यज्ञः षडरं चक्रं वाहयन् तत्र (K omits तत्र S N substitute तत्तु) अरात्रयसंधानादपवर्गम् अरात्रयतन्त्रणात् व्यवहारमासूत्रयति इति विद्याविद्योल्लासतरंगसुभगं ब्रह्म ( तरङ्गं ब्रह्म) यज्ञे एव प्रतिष्ठितम्।अन्ये तु अन्नं तावद्वीर्यलोहितक्रमेण भूतकारणम् अन्नं च वृष्टिद्वारेण पर्जन्यात् सोऽपि अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यक् (S omits सम्यक् K omits the entire quotation ) इति आदित्यमेति। ततो वृष्टिर्यज्ञात् यज्ञः क्रियातः सा च ज्ञानपूर्विका ज्ञानमक्षरात् इति।अपरे तु अन्नं अद्यमानं विषयपञ्चकम् तत् आश्रित्य भूतानि इन्द्रियाणि विषयाश्चात्मनः स्फुरितरूपाः। अत आत्मैव विषयोपभोगेन पोष्यते। अतश्च सर्वगतं (S अतः सर्वगम्) ब्रह्म कर्मणि प्रतिष्ठितं तन्मयत्वात् तस्य इति ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.14।।देवयज्ञादिकं कर्माधिकृतेन कर्तव्यमित्यत्र हेत्वन्तरमितःशब्दोपात्तमेव दर्शयति जगदिति। ननु भुक्तमन्नं रेतोलोहितपरिणतिक्रमेण प्रजारूपेण जायते तच्चान्नं वृष्टिसंभवं प्रत्यक्षदृष्टं तत्कथं कर्मणो जगच्चक्रप्रवर्तकत्वमिति शङ्कते कथमिति। पारंपर्येण कर्मणस्तद्धेतुत्वं साधयति उच्यत इति। उक्तेऽर्थे स्मृत्यन्तरं संवादयति अग्नाविति। तत्र हि देवताभिध्यानपूर्वकं तदुद्देशेन प्रहिताहुतिरपूर्वतां गता रश्मिद्वारेणादित्यमारुह्य वृष्ट्यात्मना पृथिवीं प्राप्य व्रीहियवाद्यन्नभावमापद्य संस्कृतोपभुक्ता शुक्रशोणितरूपेण परिणता प्रजाभावं प्राप्नोतीत्यर्थः। यज्ञः कर्मसमुद्भव इत्ययुक्तं स्वस्यैव स्वोद्भवे कारणत्वायोगादित्याशङ्क्याह ऋत्विगिति। द्रव्यदेवतयोः संग्राहकश्चकारः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.14।।अन्नात् इत्यादेः सङ्गतिमाह हेत्वन्तरमिति।अत्र इत्यनुवर्तते अत्र पर्जन्यो मेघ आदित्यश्च विवक्षितौ तत्रादित्यस्य पूर्वसिद्धस्य कथंयज्ञाद्भवति पर्जन्यः इति यज्ञः कारणत्वेनोच्यते इत्यत आह यज्ञ इति। यद्यपि यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्याग इति वक्ष्यति तथाप्यत्र परित्यज्यमानं द्रव्यं गृह्यते तस्य पर्जन्यान्नत्वात्पर्जन्योपभोग्यत्वात् उपभुक्तेन च तस्य बलाद्युपचयाद्यज्ञस्तस्य पर्जन्यस्य कारणमुच्यते। ननु पर्जन्यो देवतात्मा यज्ञेन पर्जन्यत्वं प्राप्तः स यज्ञो विवक्षितोऽत्रास्तु तथा सति यज्ञात्पर्जन्योद्भवो मुख्य एव सम्पत्स्यत इति नेत्याह पूर्वेति तस्य पर्जन्यपदप्राप्तिहेतोः। यज्ञस्येति शेषः। ननु तदा चक्रं प्रवृत्तमेव अतः कथं पूर्वयज्ञस्य चक्राप्रवेशः इत्यत आह तद्धीति। तच्चक्रमापाद्यं ह्यत्र विवक्षितम् न तु प्रागापादितम् कुतः कर्मविधये ह्येतदुच्यते। यदि विहितं कर्म करिष्यसि तर्हि जगच्चक्रप्रवृत्तिर्भविष्यति अन्यथा तद्विघातः अतस्त्वया कर्म कर्तव्यमिति। कर्मविध्युपयोगिता चापाद्यस्यैव न त्वापादितस्य। आपाद्ये च यज्ञव्यक्तिविशेषस्य पर्जन्यपदप्राप्तिहेतोर्न प्रवेश इत्यर्थः। प्राक् पर्जन्येन कर्म कृतं तेन च यज्ञादिद्वारा चक्रं प्रवृत्तम् अतस्त्वयाऽपि कर्म कर्तव्यमित्येवं प्रागापादितचक्रोक्तिरपि कर्मविध्युपयोगिनी भवतीति चेत् मैवम्। अत इति कोऽर्थः त्वत्कर्मणाऽपि चक्रप्रवृत्तिसम्भवादितिवा कर्मत्वादिति वा। नाद्यः इदानीन्तनपुरुषकर्मजेन यज्ञेन पर्जन्योत्पत्त्यसम्भवेन चक्राप्रवृत्तेः। न हि सर्वेऽपि कर्मकारिणः पर्जन्यत्वं प्राप्नुवन्ति। द्वितीयं दूषयति न त्विति। फलरहितेन कर्मत्वसामान्येनेदानीं कर्म कार्यं न भवति स्वयं क्लेशरूपत्वादिति। प्रकारान्तरेणापियज्ञाद्भवति पर्जन्यः इत्येतद्दर्शयितुमाह मेघेति। चक्रं समूहः। ततः किम् इत्यत आह तच्चेति। मेघचक्रम्। कुतः इत्यत आह अग्नाविति। ननुस्वकीयमुदकं नद्यः इति समुद्राद्वृष्टिरुच्यते अत आदित्याद्वृष्ट्यङ्गीकारे तद्विरोधः स्यादित्यत आह उभयेति। वृष्ट्यङ्गीकारादिति शेषः। वार्षिका मेघा इह वृष्टिशब्देनोच्यन्ते। ततोऽपि किम् इत्यत आह अतश्चेति। प्राक् पर्जन्यस्य भवनं गौणमङ्गीकृत्य व्याख्यातम् इदानीं त्वभिमन्यमानगतस्य भवनस्याभिमानिनी लक्षणामाश्रित्येति भेदः। यद्वा अभिमानिगतस्य पर्जन्यशब्दस्य अभिमन्यमाने लक्षणामाश्रित्य द्वितीयं व्याख्यानम्। तात्पर्यनिर्णये तु मेघसन्ततौ पर्जन्यशब्दो यौगिकोऽङ्गीकृतः। ननु यज्ञः कर्मात्मकः तत्कथमुच्यतेयज्ञः कर्मसमुद्भवः इति तत्राह यज्ञ इति। इतरक्रिया यज्ञाङ्गभूता। अपूर्वाङ्गीकारे रूढित्यागेन लक्षणाश्रयणं स्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.14।।हेत्वन्तरमाह अन्नादिति। यज्ञः पर्जन्यत्वात्तत्कारणमुच्यते। पूर्वयज्ञविवक्षायां तस्य चक्रप्रवेशो न भवति तद्व्यापाद्यं कर्मविधये। न तु साम्यमात्रेणेदानीं कार्यम्। मेघचक्राभिमानी पर्जन्यः। तच्च यज्ञाद्भवति।अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठति। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः 3।76 इति (मनु) स्मृतेश्च। उभयवचनाच्चादित्यात्समुद्राच्चाविरोधः। अतश्च यज्ञात्पर्जन्योद्भवः सम्भवति। यज्ञो देवतामुद्दिश्य द्रव्यपरित्यागः। कर्म इतरक्रिया।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.14।।अन्नात् सर्वाणि भूतानि भवन्ति पर्जन्याद् अन्नसंभवः इति सर्वलोकसाक्षिकम्। यज्ञात् पर्जन्यो भवति इति च शास्त्रेण अवगम्यते अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः।। (मनु0 3।76) इत्यादिना। यज्ञः च द्रव्यार्जनादिकर्तृपुरुषव्यापाररूपकर्मसमुद्भवः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.14।। अन्नात् भुक्तात् लोहितरेतःपरिणतात् प्रत्यक्षं भवन्ति जायन्ते भूतानि। पर्जन्यात् वृष्टेः अन्नस्य संभवः अन्नसंभवः। यज्ञात् भवति पर्जन्यः अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यगादित्यमुपतिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः (मनु0 3.76) इति स्मृतेः। यज्ञः अपूर्वम्। स च यज्ञः कर्मसमुद्भवः ऋत्विग्यजमानयोश्च व्यापारः कर्म तत् समुद्भवः यस्य यज्ञस्य अपूर्वस्य स यज्ञः कर्मसमुद्भवः।।तञ्चैवंविधं कर्म कुतो जातमित्याह
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【 Verse 3.15 】
▸ Sanskrit Sloka: कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् | तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् ||
▸ Transliteration: karma brahmodbhavaṁ viddhi brahmākṣarasamudbhavam | tasmātsarvagataṁ brahma nityaṁ yajñe pratiṣṭhitam ||
▸ Glossary: karma: work; brahmodbhavaṁ: Creator born of; viddhi: know; brahma: Creator; akṣarasamudbhavaṁ: Supreme born of; tasmāt: therefore; sarvaga- taṁ: all-pervading; brahma: Supreme; nityaṁ: eternally; yajñe: in sacrifice; pratiṣṭhitaṁ: situated
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.15 Know that work is born of the Creator and He is born of the Supreme. The all-pervading Supreme is eternally situated in sacrifice of enriching.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.14 3.15।।सम्पूर्ण प्राणी अन्नसे उत्पन्न होते हैं। अन्न वर्षासे होता है। वर्षा यज्ञसे होती है। यज्ञ कर्मोंसे निष्पन्न होता है। कर्मोंको तू वेदसे उत्पन्न जान और वेदको अक्षरब्रह्मसे प्रकट हुआ जान। इसलिये वह सर्वव्यापी परमात्मा यज्ञ (कर्तव्यकर्म) में नित्य प्रतिष्ठित है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.15।। कर्म की उत्पत्ति ब्रह्माजी से होती है और ब्रह्माजी अक्षर तत्त्व से व्यक्त होते हैं। इसलिये सर्व व्यापी ब्रह्म सदा ही यज्ञ में प्रतिष्ठित है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.15 कर्म action? ब्रह्मोद्भवम् arisen from Brahma? विद्धि know? ब्रह्म Brahma? अक्षरसमुद्भवम् arisen from the Imperishable? तस्मात् therefore? सर्वगतम् allpervading? ब्रह्म Brahma? नित्यम् ever? यज्ञे in sacrifice? प्रतिष्ठितम् (is) established.Commentary Brahma may mean Veda. Just as the breath comes out of a man? so also the Veda is the breath of the Imperishable or the Omniscient. The Veda ever rests in the sacrifice? i.e.? it deals chiefly with sacrifices and the ways of their performance. (Cf.IV.24 to 32).Karma Action? Brahmodbhavam arisen from the injunctions of the Vedas.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.15. Action arises from the Brahman, you should know this; the Brhaman arises from what does not stream forth; therefore the all-pervading Brahman is permanently based on the sacrifice.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.15 All action originates in the Supreme Spirit, which is Imperishable, and in sacrificial action the all-pervading Spirit is consciously present.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.15 Know that activity springs from 'Brahman', i.e., the physical body, 'Brahman' arises from the imperishable (self); therefore the all-pervading 'Brahman' is ever established in sacrifice.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.15 Know that actin has the veda as its origin; the Vedas has the Immutable as its source. Hence, the all-pervading Veda is for ever based on sacrifice.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.15 Know thou that action comes from Brahma and Brahma comes from the Imperishable. Therefore, the all-pervading (Brahma) ever rests in sacrifice.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.14-15 Annat etc. Karma etc. The things, that are born and are of diversified nature, arise from the food viz , the one which is of the nature of being undifferentiated objct of enjoyment, and which is somehow called by different synonyms like maya, vidya, kala etc. The said food also [arises] from the 'rain-cloud' i.e., the Self, which is of the nature of uninterrupted Consciousness. For, the state of being an object of enjoyment gains its existence depending on the enjoyer. That 'rain-cloud' too viz., the enjoyer, [arises] from the sacrifice (yajna) i.e., the act of enjoying. For, the state of being an enjoyer depends on the act of enjoying. And the act of enjoying [arises] from action, i.e., from the strength of freedom of action-energy (freedom in assuming any and every from).
The said freedom also, though it is uninterrupted, [arises] due to the good touch of the Brahman Which is full of freedom and of forms that are conditioned and are many, (or which is full of freedom and of many forms and is not conditioned); and which is the Supreme Soul, Brahman assuming the beings (tattvas), viz., the mighty Isvara (or Mahesvara) [and the Sadasiva] skipping high on It (Brahman). That Brahman, having the rising Lord-ship (or might) that is pure and unvieled, arises from what does not stream forth viz., the pure Supreme Consciousness in which the entire waves of might and Lordship have totally calmed down. Thus, the sacrifice well established [as an exil] in this manner, causing a six spoked wheel to rotate , spins the [two-fold] yarns - the yarn of emancipation by employing that part fitted with three spokes, and the yarn of [birth-and-death] activity by looming with the part of the [other] three spokes. Thus, the Brahman Which is charming with rolling waves of wisdom and ignorance, is established on nothing but the sacrifice.
But certain other commentators [interpret the passage as ] : The food is indeed the cause of beings through its graded chages into semen verile and blood; the food arises from the rain-cloud through the rains; that rains too arises from the [Vedic] sacrifice according to the principle :
'The oblation offered into the [sacrificial] fire, pro-
perly reaches the sun etc. (Manu. III, 76).
The sacrifice [arises] from the action; the action follows the knowledge, and the knowledge is from the Imperishable.
Still others [explain] differently : The food that is being enjoyed is the pentad of sense-objects; depending on it, the bhutas (elements) i.e., the sense-organs, act; the objects are of the nature of the sparkles of the Self. Therefore, it is only the Self that is being nourished by enjoying sense-objects. Hence the all-pervading Brahman is established in action. For It is identical with that.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.15 Here ther term, 'Brahman' connotes the physical body consisting of modifications of the Prakrti; for the Prakrti is denoted here by the term 'Brahman', as in the scriptural text: 'From Him arises, this Brahman and this 'Brahman' becomes name, form and food' (Mun. U., 1.1.9). Here also it will be said by Sri Krsna: 'This great 'Brahman' is my womb' (14.3). Therefore, the words that 'Activity springs from 'Brahman' teaches that activity is produced by the physical body which is of the nature of the modification of Prakrti. The 'Brahman' arises from the imperishable self. Here the term, 'imperishable', indicates the individual self. The physical body, which is inhabited by the self who is satisfied by food and drink, is fit for action; hence the physical body which constitutes the instrument of activity is said to be from the imperishable. Therefore the 'all-pervading Brahman' means here the bodies of all persons of diverse kinds which are the products of Prakrti which comprises all material entities, and is hence all-pervading. They, the bodies, are established in sacrifice. The meanig is that the bodies have roots in sacrifice.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.15 Again, [a different reading in place of this is: 'Tat ca vividham karma kuto jatamityaha, From where did those various kinds of action originate? In reply the Lord says৷৷.' Still another reading is: 'Tat ca karma brahmodbhavam iti aha, And the Lord says: That action has the Vedas as its origin.'-vide A.A., 1936, p. 116). Astekar's reading is: Tat ca evam vidham karma kuto jatamityaha, And from where has this kind of aciton originated? The answers this.'-Tr.] viddhi, know; that karma, action; is brahmodbhavam, it has Brahma, the Veda, as its udbhavam, origin. [Here Ast. adds 'revealer'-Tr.] Further, Brahma, called the Veda, is aksara-samudbhavam, it has aksara, the Immutable, Brahman, the supreme Self, as its source. This is the meaning. Since the Veda came out, like the breath of a man, from the supreme Self Itself, called the Immutable, therefore the Veda, being the revealer of everything, is sarva-gatam, all pervading. Even though all-pervading, the Veda is nityam, for ever; pratisthitam, based; yajne, on sacrifice, because the injunctions about sacrifices predominate in it.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.15।। विश्व में चल रहे सामूहिक यज्ञ कर्म के चक्र का वेदों की परिचित भाषा में यहाँ वर्णन किया गया है। प्राणियों की उत्पत्ति एवं पोषण का कारण अन्न है। पृथ्वी में स्थित खनिज सम्पत्ति पोषक अन्न का रूप तभी लेती है जब जल वृष्टि होती है। वर्षा के बिना न तो वनस्पति जीवन की वृद्धि होगी और न पशुओं का जीवन ही सम्भव होगा। यज्ञ के फलस्वरूप वर्षा होती है तथा यज्ञ का सम्पादन मनुष्य के कर्मों द्वारा होता है।सूक्ष्म विचार के अभाव में यह श्लोक विचित्र ही प्रतीत होता है। आधुनिक शिक्षित व्यक्ति अन्न (पदार्थ) से प्राणियों की तथा वर्षा से पोषक अन्न की उत्पत्ति होने को तो समझ पाता है परन्तु उसे यह समझने में कठिनाई होती है कि यज्ञ से वर्षा की उत्पत्ति किस प्रकार होती है।भगवान् श्रीकृष्ण के शब्दों में हम यह मानने को बाध्य नहीं हैं कि वे अर्जुन को कर्मकाण्ड के अनुष्ठान का उपदेश दे रहे हैं। गीता में अनेक स्थानों पर वेद काल में प्रचलित और परिचित शब्दों को नये अर्थों में प्रयुक्त किया गया है। यहाँ भी पर्जन्य से केवल जलवृष्टि ही समझना उचित नहीं। पर्जन्य से तात्पर्य उस स्थिति से है जो पृथ्वी में स्थित तत्त्वों का भक्षण योग्य पोषक अन्न में रूपान्तर करने के लिए आवश्यक है। इसी प्रकार प्रत्येक कार्य क्षेत्र में उपभोग्य लाभ (अन्न) विद्यमान होता है जिसकी प्राप्ति तभी संभव है जब उसके अनुकूल परिस्थितियाँ निर्मित होती हैं। इस प्रकार की अनुकूल परिस्थिति (पर्जन्य) का निर्माण सब लोगों के निस्वार्थ सेवाभाव से किये गये कर्मोंे (यज्ञ) से ही संभव होकर समाज के उपभोग्य वस्तुओं (अन्न) की उत्पत्ति होती है।उदाहरणार्थ नदी के व्यर्थ ही बहते हुये पानी को रोक कर बांध के निर्माण से उसका उपयोग नदी के तट की उपजाऊ किन्तु अब तक नहीं जोती गई भूमि की सिंचाई के लिये किया जा सकता है। त्याग और परिश्रम से ही बांध का निर्माण संभव होगा। उसके पूर्ण होने पर नदी के दोनों किनारों की भूमि को जोतने के लिये अनुकूल परिस्थिति बन जायेगी। सींची हुई भूमि से अन्न प्राप्त करने के लिये निरन्तर परिश्रम की आवश्यकता है जैस भूमि जोतना बीजारोपण सिंचन और रक्षण आदि।यहाँ हमें बताया गया है कि इस कर्म चक्र का सम्बन्ध परम सत्य (ब्रह्म) से किस प्रकार है और कैसे वह ब्रह्म यज्ञ में प्रतिष्ठित है। सम्यक् कर्म का सिद्धांत (यज्ञ) तथा कर्म की क्षमता भी सृष्टिकर्त्ता ब्रह्माजी से ही सबको प्राप्त हुई और स्वयं ब्रह्माजी अक्षरअविनाशी परम तत्त्व ब्रह्म से ही प्रगट हुये हैं। नवजात शिशु में कर्म की क्षमता है और वह क्षमता सृष्टिकर्त्ता का दिया हुआ उपहार है इसलिये सर्वगत ब्रह्म सदैव व्यक्ति के अथवा समूह के उन कर्मों में (यज्ञ) प्रतिष्ठित है जो विश्व के कल्याण के लिये सेवाभाव से किये गये हों।इस कर्मचक्र का पालन करने वाला पुरुष प्रकृति के सामंजस्य में अपना योगदान देता है। इसका उल्लंघन करने वाले के विषय में भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.15।। कर्म ब्रह्म वेद उद्भवः कारणं यस्य तज्जानीहि ब्रह्म वेदाख्यमक्षरः परमात्मा समुद्भवः कारणं यस्य तत्अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङिगिरसः इत्यादिश्रुतेः। यस्मादेवं तस्मात्सर्वार्थप्रकाशकत्वात् सर्वगतमपि सद्वेदाख्यं ब्रह्म नित्यं सदा यज्ञविधिप्रधानत्वात् यज्ञे प्रतिष्ठितम्। यत्त्वक्षरं ब्रह्म सर्वदा यज्ञे प्रतिष्ठितं यज्ञेनोपायभूतेन प्राप्यत इत्यपरेषां व्याख्यानं तदरुचिग्रस्तम्। अरुचिबीजं तु पूर्वार्धस्थब्रह्मपदद्वयस्य वेदपरत्वेनात्रान्यपरत्वेवेदो वा प्रायदर्शनात् इतिन्यायविरोधादि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.15।।तच्चापूर्वोत्पादकम् ब्रह्मोद्भवं ब्रह्म वेदः स एवोद्भवः प्रमाणं यस्य तत्तथा। वेदविहितमेव कर्माऽपूर्वसाधनं जानीहि नत्वन्यत्पाखण्डप्रतिपादितमित्यर्थः। ननु पाखण्डशास्त्रापेक्षया वेदस्य किं वैलक्षण्यं यतो वेदप्रतिपादित एव धर्मो नान्य इत्यत आह ब्रह्म वेदाख्यमक्षरसमुद्भवं अक्षरात्परमात्मनो निर्दोषात्पुरुषनिःश्वासन्यायेनाबुद्धिपूर्वं समुद्भव आविर्भावो यस्य तदक्षरसमुद्भवम्। तथाचापौरुषेयत्वेन निरस्तसमस्तदोषाशङ्कं वेदवाक्यं प्रमितिजनकतया प्रमाणमतीन्द्रियेऽर्थे नतु भ्रमप्रमादकरणापाटवविप्रलिप्सादिदोषवत्प्रणीतं पाखण्डवाक्यं प्रमितिजनकमिति भावः। तथाच श्रुतिःअस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि इति। तस्मात्साक्षात्परमात्मसमुद्भवतया सर्वगतं सर्वप्रकाशकं नित्यमविनाशि च ब्रह्म वेदाख्यं यज्ञे धर्माख्येऽतीन्द्रिये प्रतिष्ठितं तात्पर्येण। अतः पाखण्डप्रतिपादितोपधर्मपरित्यागेन वेदबोधित एव धर्मोऽनुष्ठेय इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.15।।कर्म ब्रह्मोद्भवं वेदोद्भवम् वेद एव धर्मे प्रमाणं नतु पाखण्डादिप्रणीतागमः ब्रह्म वेदोप्यक्षरसमुद्भवम्।अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः इत्यादिश्रुतेः साक्षात्परमेश्वरादेवोत्पन्नः अतो न तत्र भ्रमविप्रलम्भकत्वादिदोषाक्रान्तपाखण्डादिवाक्यवदप्रामाण्यशङ्कास्तीति भावः। यस्मादेवं तस्मात्सर्वस्मिन्देशे काले च वर्तमानं ब्रह्म वेदः। एतेन वेदस्य नित्यत्वं शब्दस्य विभुत्वं च दर्शितम्। नित्यं नियमेन यज्ञे प्रतिष्ठितं तात्पर्येण पर्यवसन्नम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.15।।ननु देवानां विभूतिरूपत्वेऽपि साक्षात्पुरुषोत्तमभजनाभावादनुचितमेवेत्याशङ्क्याह कर्मेति। कर्म ब्रह्मोद्भवं ब्रह्मणः सकाशादुद्भवं प्रकटं जानीहि। अत्रायं भावः वेदात्कर्मोत्पत्तिः स च ब्रह्मनिश्श्वासस्तेन तथा। ब्रह्मणः पुरुषोत्तमत्वज्ञापनार्थं विशिनष्टि अक्षरसमुद्भवमिति। तद्ब्रह्म अक्षरसमुद्भवम् अक्षरस्य समुद्भवो यस्मात्तादृशम्। अक्षरस्य पुरुषोत्तमचरणात्मकत्वात्तथा। तस्मात्कारणात् सर्वगतं सर्वव्यापकं सर्वरूपं नित्यं यद्ब्रह्म तदेव यज्ञे प्रतिष्ठितम्। तेन न पूर्वोक्तदोषसम्भावनेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.15।। तथा कर्मब्रह्मोद्भवमिति। तच्च यजमानादिव्यापाररुपं कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्म वेदस्तस्मात्प्रवृत्तं जानीहि। तच्च ब्रह्म वेदाख्यमक्षरात्परब्रह्मणः समुद्भूतं विद्धि।अस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदः इति श्रुतेः। यत एवमक्षरादेव यज्ञप्रवृत्तेरत्यन्तं तस्याभिप्रेतो यज्ञः तस्मात्सर्वगतमप्यक्षरं ब्रह्म नित्यं सर्वदा यज्ञे प्रतिष्ठितम्। यज्ञेनोपायभूतेन प्राप्यत इति यज्ञे प्रतिष्ठितमुच्यते। उद्यमस्था सदा लक्ष्मीरितिवत्। यद्वा यस्माज्जगच्चक्रमूलं कर्मं तस्मात्सर्वगतं मन्त्रार्थवादैः सर्वेषु सिद्धार्थप्रतिपादकेषु भूतार्थाख्यानादिषु गतं स्थितमपि वेदाख्यं ब्रह्म सर्वदा यज्ञे च तात्पर्यरुपेण प्रतिष्ठितम्। अतो यज्ञादि कर्म कर्तव्यमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.15।।कर्म ब्रह्मोद्भवमिति। ब्रह्म वेदः प्रजापतिर्वा तस्यापि ब्रह्मतया निरूपणं ब्रह्मवादानुरोधात्। तदक्षरसमुद्भवं कूटस्थं प्रणवसम्भूतम्। यद्वा पुरुषोद्भूतम् ब्रह्मणः सर्वगतत्वात् सर्वं ब्रह्म इति वेदे निरूपणात्। ब्रह्मवाद एवाभिमत इत्याह। ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितमिति। पुरुष एवेदं सर्वं ऋक्सं.6।4।17।2य.सं.31।2 यज्ञो वै विष्णुः तै.सं.1।7।4 इति पुरुषावयवेषु यज्ञसम्भारकल्पनात्। ब्रह्मणोऽभिन्नो यज्ञः पूर्वं प्रजापतिना कृत्वोपदिष्ट इति यज्ञे ब्रह्म प्रतिष्ठितम्। एतच्च निबन्धे सुबोधिन्यां च विस्तृतम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.15।।और उस क्रियारूप कर्मको तू वेदरूप ब्रह्मसे उत्पन्न हुआ जान अर्थात् कर्मकी उत्पत्तिका कारण वेद है ऐसे जान और वेदरूप ब्रह्म अक्षरसे उत्पन्न हुआ है अर्थात् अविनाशी परब्रह्म परमात्मा वेदकी उत्पत्तिका कारण है।
Chapter 3 (Part 10)
वेदरूप ब्रह्म साक्षात् परमात्मा नामक अक्षरसे पुरुषके निःश्वासकी भाँति उत्पन्न हुआ है इसलिये वह सब अर्थोंको प्रकाशित करनेवाला होनेके कारण सर्वगत है। तथा यज्ञविधिमें वेदकी प्रधानता होनेके कारण वह सर्वगत होता हुआ ही सदा यज्ञमें प्रतिष्ठित है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.15।। व्याख्या अन्नाद्भवन्ति भूतानि प्राणोंको धारण करनेके लिये जो खाया जाता है वह अन्न (टिप्पणी प0 136.2) कहलाता है। जिस प्राणीका जो खाद्य है जिसे ग्रहण करनेसे उसके शरीरकी उत्पत्ति भरण और पुष्टि होती है उसे ही यहाँ अन्न नामसे कहा गया है जैसे मिट्टीका कीड़ा मिट्टी खाकर जीता है तो मिट्टी ही उसके लिये अन्न है।जरायुज (मनुष्य पशु आदि) उद्भिज्ज (वृक्षादि) अण्डज (पक्षी सर्प चींटी आदि) और स्वेदज (जूँ आदि) ये चारों प्रकारके प्राणी अन्नसे ही उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न होकर अन्नसे ही जीवित रहते हैं (टिप्पणी प0 137.1)।पर्जन्यादन्नसम्भवः समस्त खाद्य पदार्थोंकी उत्पत्ति जलसे होती है। घासफूस अनाज आदि तो जलसे होते ही हैं मिट्टीके उत्पन्न होनेमें भी जल ही कारण है। अन्न जल वस्त्र मकान आदि शरीरनिर्वाहकीसभी सामग्री स्थूल या सूक्ष्मरूपसे जलसे सम्बन्ध रखती है और जलका आधार वर्षा है।यज्ञाद्भवति पर्जन्यः यज्ञ शब्द मुख्यरूपसे आहुति देनेकी क्रियाका वाचक है। परन्तु गीताके सिद्धान्त और कर्मयोगके प्रस्तुत प्रकरणके अनुसार यहाँ यज्ञ शब्द सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंका उपलक्षक है। यज्ञमें त्यागकी ही मुख्यता होती है। आहुति देनेमें अन्न घी आदि चीजोंका त्याग है दान करनेमें वस्तुका त्याग है तप करनेमें अपने सुखभोगका त्याग है कर्तव्यकर्म करनेमें अपने स्वार्थ आराम आदिका त्याग है। अतः यज्ञ शब्द यज्ञ (हवन) दान तप आदि सम्पूर्ण शास्त्रविहित क्रियाओंका उपलक्षक है।बृहदारण्यकउपनिषद्में एक कथा आती है। प्रजापति ब्रह्माजीने देवता मनुष्य और असुर इन तीनोंको रचकर उन्हें द इस अक्षरका उपदेश दिया। देवताओंके पास भोगसामग्रीकी अधिकता होनेके कारण उन्होंने द का अर्थ दमन करो समझा। मनुष्योंमें संग्रहकी प्रवृत्ति अधिक होनेके कारण उन्होंने द का अर्थ दान करो समझा। असुरोंमें हिंसा(दूसरोंको कष्ट देने) का भाव अधिक होनेके कारण उन्होंने द का अर्थ दया करो समझा। इस प्रकार देवता मनुष्य और असुर तीनोंको दिये गये उपदेशका तात्पर्य दूसरोंका हित करनेमें ही है। वर्षाके समय मेघ जोद द द की गर्जना करता है वह आज भी ब्रह्माजीके उपदेश (दमन करो दान करो दया करो) के रूपसे कर्तव्यकर्मोंकी याद दिलाता है (बृहदारण्यक0 5। 2। 13)।अपने कर्तव्यकर्मका पालन करनेसे वर्षा कैसे होगी वचनकी अपेक्षा अपने आचरणका असर दूसरोंपर स्वाभाविक अधिक पड़ता है यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः (गीता 3। 21)। मनुष्य अपनेअपने कर्तव्यकर्मका पालन करेंगे तो उसका असर देवताओंपर भी पड़ेगा जिससे वे भी अपने कर्तव्यका पलन करेंगे वर्षा करेंगे। (गीता 3। 11)। इस विषयमें एक कहानी है। चार किसानबालक थे। आषाढ़का महीना आनेपर भी वर्षा नहीं हुई तो उन्होंने विचार किया कि हल चलानेका समय आ गया है वर्षा नहीं हुई तो न सही हम तो समयपर अपने कर्तव्यका पालन कर दें। ऐसा सोचकर उन्होंने खेतमें जाकर हल चलाना शुरू कर दिया। मोरोंने उनको हल चलाते देखा तो सोचा कि बात क्या है वर्षा तो अभी हुई नहीं फिर ये हल क्यों चला रहे हैं जब उनको पता लगा कि ये अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं तब उन्होंने विचार किया कि हम अपने कर्तव्यका पालन करनेमें पीछे क्यों रहें ऐसा सोचकर मोर भी बोलने लग गये। मोरोंकी आवाज सुनकर मेघोंने विचार किया कि आज हमारी गर्जना सुने बिना मोर कैसे बोल रहे हैं सारी बात पता लगनेपर उन्होंने सोचा कि हम अपने कर्तव्यसे क्यों हटें और उन्होंने भी गर्जना करनी शुरू कर दी। मेघोंकी गर्जना सुनकर इन्द्रने सोचा कि बात क्या है जब उसको मालूम हुआ कि वे अपने कर्तव्यका पालन कर रहे हैं तब उसने सोचा कि अपने कर्तव्यका पालन करनेमें मैं पीछे क्यों रहूँ ऐसा सोचकर इन्द्रने भी मेघोंको वर्षा करनेकी आज्ञा दे दी। यज्ञः कर्मसमुद्भवः निष्कामभावपूर्वक किये जानेवाले लौकिक और शास्त्रीय सभी विहित कर्मोंका नाम यज्ञ है। ब्रह्मचारीके लिये अग्निहोत्र करना यज्ञ है। ऐसे ही स्त्रियोंके लिये रसोई बनाना यज्ञ है (टिप्पणी प0 137.2)। आयुर्वेदका ज्ञाता केवल लोगोंके हितके लिये वैद्यककर्म करे तो उसके लिये वही यज्ञ है। इसी तरह विद्यार्थी अपने अध्ययनको और व्यापारी अपने व्यापारको (यदि वह केवल दूसरोंके हितके लिये निष्कामभावसे किया जाय) यज्ञ मान सकते हैं। इस प्रकार वर्ण आश्रम देश कालकीमर्यादा रखकर निष्कामभावसे किये गये सभी शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म यज्ञ रूप होते हैं। यज्ञ किसी भी प्रकारका हो क्रियाजन्य ही होता है।संखिया भिलावा आदि विषोंको भी वैद्यलोग जब शुद्ध करके औषधरूपमें देते हैं तब वे विष भी अमृतकी तरह होकर बड़ेबड़े रोगोंको दूर करनेवाले बन जाते हैं। इसी प्रकार कामना ममता आसक्ति पक्षपात विषमता स्वार्थ अभिमान आदि ये सब कर्मोंमें विषके समान हैं। कर्मोंके इस विषैले भागको निकालदेनेपर वे कर्म अमृतमय होकर जन्ममरणरूप महान् रोगको दूर करनेवाले बन जाते हैं। ऐसे अमृतमय कर्म ही यज्ञ कहलाते हैं।कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि वेद कर्तव्यकर्मोंको करनेकी विधि बताते हैं (गीता 4। 32)। मनुष्यको कर्तव्यकर्म करनेकी विधिका ज्ञान वेदसे होनेके कारण ही कर्मोंको वेदसे उत्पन्न कहा गया है। वेद शब्दके अन्तर्गत ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद और अथर्ववेदके साथसाथ स्मृति पुराण इतिहास (रामायण महाभारत) एवं भिन्नभिन्न सम्प्रदायके आचार्योंके अनुभववचन आदि समस्त वेदानुकूल सत्शास्त्रोंको ग्रहण कर लेना चाहिये।ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् यहाँ ब्रह्म पद वेदका वाचक है। वेद सच्चिदानन्दघन परमात्मासे ही प्रकट हुए हैं (गीता 17।23)। इस प्रकार परमात्मा सबके मूल हुए।परमात्मासे वेद प्रकट होते हैं। वेद कर्तव्यपालनकी विधि बताते हैं। मनुष्य उस कर्तव्यका विधिपूर्वक पालन करते हैं। कर्तव्यकर्मोंके पालनसे यज्ञ होता है और यज्ञसे वर्षा होती है। वर्षासे अन्न होता है अन्नसे प्राणी होते हैं और उन्हीं प्राणियोंमेंसे मनुष्य कर्तव्यकर्मोंके पालनसे यज्ञ करते हैं (टिप्पणी प0 138)। इस तरह यह सृष्टिचक्र चल रहा है।तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् यहाँ ब्रह्म पद अक्षर(सगुणनिराकार परमात्मा) का वाचक है। अतः सर्वगत (सर्वव्यापी) परमात्मा हैं वेद नहीं।सर्वव्यापी होनेपर भी परमात्मा विशेषरूपसे यज्ञ (कर्तव्यकर्म) में सदा विद्यमान रहते हैं। तात्पर्य यह है कि जहाँ निष्कामभावसे कर्तव्यकर्मका पालन किया जाता है वहाँ परमात्मा रहते हैं। अतः परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले मनुष्य अपने कर्तव्यकर्मोंके द्वारा उन्हें सुगमतापूर्वक प्राप्त कर सकते हैं स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः (गीता 18। 46)। शङ्का परमात्मा जब सर्वव्यापी हैं तब उन्हें केवल यज्ञमें नित्य प्रतिष्ठित क्यों कहा गया है क्या वे दूसरी जगह नित्य प्रतिष्ठित नहीं हैं समाधान परमात्मा तो सभी जगह समानरूपसे नित्य विद्यमान हैं। वे अनित्य और एकदेशीय नहीं हैं। इसीलिये उन्हें यहाँ सर्वगत कहा गया है। यज्ञ (कर्तव्यकर्म) में नित्य प्रतिष्ठित कहनेका तात्पर्य यह है कि यज्ञ उनका उपलब्धिस्थान है। जमीनमें सर्वत्र जल रहनेपर भी वह कुएँ आदिसे ही उपलब्ध होता है सब जगहसे नहीं। पाइपमें सर्वत्र जल रहनेपर भी जल वहींसे प्राप्त होता है जहाँ टोंटी या छिद्र होता है। ऐसे ही सर्वगत होनेपर भी परमात्मा यज्ञसे ही प्राप्त होते हैं।अपने लिये कर्म करनेसे तथा जडता (शरीरादि) के साथ अपना सम्बन्ध माननेसे सर्वव्यापी परमात्माकी प्राप्तिमें बाधा (आड़) आ जाती है। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये अपने कर्तव्यका पालनकरनेसे यह बाधा हट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्माका स्वतः अनुभव हो जाता है। यही कारण है कि भगवान् अर्जुनको जो कि अपने कर्तव्यसे हटना चाहते थे अनेक युक्तियोंसे कर्तव्यका पालन करनेपर विशेष जोर दे रहे हैं। सम्बन्ध सृष्टिचक्रके अनुसार चलने अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करनेकी जिम्मेवारी मनुष्यपर ही है। अतः जो मनुष्य अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता उसकी ताड़ना भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.14 3.15।।अन्नादिति। कर्मेति। अन्नात् अविभागभोग्यस्वभावात् कथंचित् मायाविद्याकालाद्यनेकापरपर्यायात् (S N विद्याप्रकृतिकाला ) भूतानि विचित्राणि भवन्ति। तच्च अन्नं पर्जन्यात् अविच्छिन्नसंवित्स्वभावात् आत्मनः भोक्तृतन्त्रात्मलाभत्वात् भोग्यतायाः। स च पर्जन्यो भोक्ता यज्ञात् भोगक्रियात्मनः भोगक्रियायत्तत्वात् भोक्तृत्वस्य। भोगक्रिया च कर्मणः क्रियाशक्तिस्वातन्त्र्यबलात्। तच्च स्वातन्त्र्यम् अविच्छिन्नमपि (S अविच्छन्नमपि अविच्छन्नस्यापि अनवच्छिन्नानन्त ) अनवच्छिन्नानन्तस्वातन्त्र्यपूर्णसमुच्चलन्महेश्वरभावपरमात्मब्रह्मणः संस्पर्शवशात् (S K ब्रह्मसंस्पर्श )। तच्च ( omits तच्च) उच्चलदच्छानाछादितैश्वर्यं ( N इच्छादितैश्वर्यम्) ब्रह्म अक्षरात् प्रशान्ताशेषैश्वर्यतरङ्गात् संविन्मात्रात्। इत्येवं सुव्यवस्थितो (S स्थितोऽयम् भोगक्रियायाम्) यज्ञः षडरं चक्रं वाहयन् तत्र (K omits तत्र S N substitute तत्तु) अरात्रयसंधानादपवर्गम् अरात्रयतन्त्रणात् व्यवहारमासूत्रयति इति विद्याविद्योल्लासतरंगसुभगं ब्रह्म ( तरङ्गं ब्रह्म) यज्ञे एव प्रतिष्ठितम्।अन्ये तु अन्नं तावद्वीर्यलोहितक्रमेण भूतकारणम् अन्नं च वृष्टिद्वारेण पर्जन्यात् सोऽपि अग्नौ प्रास्ताहुतिः सम्यक् (S omits सम्यक् K omits the entire quotation ) इति आदित्यमेति। ततो वृष्टिर्यज्ञात् यज्ञः क्रियातः सा च ज्ञानपूर्विका ज्ञानमक्षरात् इति।अपरे तु अन्नं अद्यमानं विषयपञ्चकम् तत् आश्रित्य भूतानि इन्द्रियाणि विषयाश्चात्मनः स्फुरितरूपाः। अत आत्मैव विषयोपभोगेन पोष्यते। अतश्च सर्वगतं (S अतः सर्वगम्) ब्रह्म कर्मणि प्रतिष्ठितं तन्मयत्वात् तस्य इति ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.15।।यदपूर्वहेतुत्वेन कर्मोक्तं तत्किं चैत्यवन्दनादि किं वाग्निहोत्रादीति संदिहानं प्रत्याह कर्मेति। किमिति कर्मणो ब्रह्मोद्भवत्वमुच्यते सर्वस्य तदुद्भवत्वाविशेषादित्याशङ्क्याह ब्रह्म वेद इति। ब्रह्म तर्हि वेदाख्यमनादिनिधनमिति तत्राह ब्रह्म पुनरिति। अक्षरात्मनो वेदस्य पुनरक्षरेभ्यः सकाशादेव समुद्भवो न संभवतीत्याशङ्क्याह अक्षरमिति। ब्रह्मेत्यक्षरमेवोक्तं तत्कथं तस्मादेवोद्भवतीत्याशङ्क्य ब्रह्मशब्दार्थमुक्तमेव स्मारयति ब्रह्म वेद इति। ननु ब्रह्मशब्दितस्य वेदस्यापि पौरुषेयत्वात्प्रामाण्यसंदेहात्कथं त्वदुक्तमग्निहोत्रादिकं कर्म निर्धारयितुं शक्यते तत्राह यस्मादिति। कथं तर्हि तस्य यज्ञे प्रतिष्ठितत्वं सर्वगतत्वे विशेषायोगादित्याशङ्क्याह सर्वगतमपीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.15।।कर्म ब्रह्मोद्भवं ब्रह्मणा वेदेन प्रकाश्यं इति परेषां व्याख्यानमसदिति भावेनाह कर्मेति। ब्रह्मणः परब्रह्मणः। कुतः इत्यत आह एष हीति। अपव्याख्यानं प्रत्याख्याति न चेति। उद्भवशब्दस्य मुख्येऽभिधेये जन्मनि सम्भाव्यमाने सत्यौपचारिकं प्रकाशनमर्थतया न कल्प्यम्। तथा ब्रह्मशब्दस्य मुख्येऽभिधेये परब्रह्मणि सम्भाव्यमाने सत्यौपचारिकममुख्यं वेदाख्यं ब्रह्मशब्दार्थतया न कल्प्यम्। किञ्चैवं व्याचक्षाणेनापि वेदस्य कर्मप्रकाशकत्वमन्तर्यामिद्वारा परम्परयाऽङ्गीकार्यम्। तथाचान्ततोऽपि परब्रह्मण्यङ्गीकार्ये शब्द एव प्राप्तस्य तस्य परित्यागोऽनुपपन्नः। ननु वेदः स्वयमेव कर्मप्रकाशक इति किं परब्रह्मणा अतो न परम्परेत्यत आह न चेति। न केवलं जडत्वाद्वेदस्यान्याधीनत्वम् किन्त्वागमाद्विष्ण्वधीनत्वं च प्रसिद्धमित्याह एतस्येति विष्णोरिति शेषः। ननु शब्दस्यार्थप्रकाशनं स्वभावः न त्वागन्तुको व्यापारः यथाऽग्नेरौष्ण्यम्। ततो जडत्वेऽपि न परापेक्षेत्यतः स्वभावस्यापि भगवदधीनत्वे प्रमाणमाह द्रव्यमिति। प्रमाणसिद्धमपि स्वभावनियमनं विष्णोरसम्भावितमित्यत आह अचिन्त्येति। यदि जडस्य न स्वतः प्रवृत्तिस्तर्हि अभिमानिदेवताद्वाराऽस्तु तथाच नान्ततोऽपि परब्रह्माङ्गीकार इत्यत आह जीवस्य चेति। ततश्चाधिक्येन परम्परेति भावः। न केवलं प्रतिबिम्बत्वाज्जीवस्य स्वतः प्रवृत्त्यभावः किन्त्वामाच्चेत्याह नेति।ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् इत्यत्रब्रह्म वेदः अक्षरात्परब्रह्मणो जायते। इति परेषां व्याख्यानमसदिति भावेनाह अक्षराणीति। प्रसिद्धान्यकारादीनि नियतानुपूर्वीविशिष्टानि वेद इति यावत्। ननु समुद्भवशब्दस्य मुख्यार्थाङ्गीकारे किं बाधकं येनाभिव्यज्यत इत्यमुख्योऽर्थः स्वीक्रियते किञ्च प्रमाणान्तरेणापि ब्रह्माभिव्यक्तिसम्भवात्तेभ्य इति किमर्थमुक्तं इत्यत आह अन्यथेति। व्यक्त्यर्थत्वानङ्गीकारेऽनादिनिधनं ब्रह्म कथं जायते इति शेषः। तथा वेदस्य तदभिव्यञ्जकत्वानङ्गीकारे परिपूर्णत्वादचिन्त्यं ब्रह्म को जानाति वाक्यार्थद्वयसमुच्चयेऽपिशब्दः। समुद्भवशब्दस्य मुख्यार्थताभावात्परोक्तोऽर्थः किं न स्यात् इत्यत आह न चेति। ब्रह्मशब्दो हि परब्रह्मणि रूढः वेदे तु बृहत्त्वयोगेन प्रवृत्तः। तथाऽक्षरशब्दो वर्णेषु रूढः परब्रह्मणि त्वक्षरणयोगेन प्रवृत्तः। तथाचान्यथा व्याकुर्वता रूढिं परित्यज्य योगोऽङ्गीकृतः स्यात् तच्च न्यायबाह्यमित्यर्थः। इतश्च ब्रह्मशब्दः परब्रह्मवाचीत्याह परामर्शाच्चेति। उत्तरवाक्ये ब्रह्मशब्देन परब्रह्मणः परामर्शाच्च पूर्ववाक्यस्थो ब्रह्मशब्दः परब्रह्मार्थो ज्ञायते। तथा चाक्षरशब्दोऽप्यर्थाद्वेदवचनो भविष्यतीति शेषः।प्रागक्षरशब्दोक्तं परं ब्रह्मेदानीं ब्रह्मशब्देन परामृश्यते अतः पूर्वोक्तो ब्रह्मशब्दो वेदार्थ एवेत्यत आह न हीति। एकस्मिन्नेव प्रकरण इति शेषः। अन्नात्पुरुषः। स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः तै.उ.2।1।1 इत्यादिव्यावृत्त्यर्थं भेदश्रुति विनेत्युक्तम्। श्रुतिशब्दश्च प्रमाणोपलक्षणार्थः। अत्रापि सर्वगतमिति विशेषणमस्तीति चेत् न वर्णानामपि सर्वगतत्वात्। विकारत्वान्नेति चेत् न अनन्तरमेव निराकरणात्। इदं च भास्करं प्रत्यभिहितम्। मायावादिना तु प्राग्ब्रह्मशब्दोक्तस्य वेदस्यैवायं परामर्श इत्यङ्गीकृतत्वात् यदप्यन्यथा व्याख्याने समुद्भवशब्दस्य मुख्यार्थतालाभ इत्यभिप्रेतं तदपि दुराशामात्रमित्याह तानि चेति। यान्यस्माभिः प्रसिद्धानि व्याख्यातानि अनेनाभिधानादिबलाद्ब्रह्माक्षरशब्दौ द्वावप्युभयत्र योगरूढाविति प्रत्यवस्थानमपि परास्तम्। परामर्शस्य वर्णनित्यत्वस्य चापरिहार्यत्वात् न केवलं श्रुत्यादिभ्यो वेदस्य नित्यत्वं किं तर्हि विपक्षे बाधकाच्चेत्याह दोषश्चेति।रचितत्वे च धर्मप्रमाणस्य मा.भा.2।13 इत्यत्र। ननु वेदाक्षराणि ब्रह्मणो बुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि अतो न विपर्ययादिमूलत्वशङ्केत्यत आह न चेति। निश्श्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः बृ.उ.2।4।10 इति श्रुतिर्वेदानां ब्रह्मणोऽबुद्धिपूर्वमुत्पन्नत्वे प्रमाणमिति चेत् किमयं निश्श्वसितशब्दोऽबुद्धिपूर्वमुत्पन्नत्वस्य वाचकः उत निश्श्वसितमिव निश्श्वसितं इवार्थश्चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नत्त्वमिति गौण्या वृत्त्या तदभिप्रायः नाद्यः प्रमाणाभावात्। द्वितीयं दूषयति निश्श्वसितेति। अक्लेशेन निस्सरणस्यापीवार्थस्य सम्भवेन निश्वसितशब्दस्य तदभिप्रायतोपपत्तौ नाबुद्धिपूर्वोत्पत्त्यभिप्रायत्वनिश्चय इत्यर्थः। न च परस्येवास्माकमपि निश्चयायोग इति भावेनाह स इति। सोऽकामयत ৷৷. (सः) इदं सर्वमसृजत बृ.उ.1।2।45 इति ब्रह्मणः सर्वस्य सृष्टेरिच्छापूर्वकत्वमुच्यते। इच्छा च बुद्ध्याऽविनाभूता। अतो न किञ्चिद्ब्रह्मणोऽबुद्धिपूर्वमुत्पन्नमिति। ननु निश्श्वसितमेतत् इति श्रुतिर्नामप्रपञ्चस्याबुद्धिपूर्वमुत्पत्तिं वक्ति सोऽकामयत इति च रूपप्रपञ्चस्येच्छापूर्वमित्यतो न विरोध इत्यत आह इष्टमिति। एवं सति निश्श्वसितं इति श्रुतौइष्टं हुतमाशितं पायितमयं च लोकः परश्च लोकः इति नामप्रपञ्चस्य रूपप्रपञ्चेन सहाभिधानात्। रूपप्रपञ्चस्यापि निश्वसितशब्देनाबुद्धिपूर्वोत्पन्नत्वप्राप्तौ सोऽकामयत इति श्रुतिर्निर्विंषयैवापद्येतेति भावः। इतोऽपि नाबुद्धिपूर्वा ब्रह्मणः सृष्टिरित्याह महातात्पर्येति। परब्रह्मणः सर्वोत्तमत्वे यत्सर्ववेदानां महातात्पर्यं तद्विरोधाच्चेत्यर्थः। तदेव कुतः इत्यत आह तच्चेति। उक्तं साधितम्।कथं तद्विरोधः इत्यत आह न हीति। प्राधान्यं सर्वोत्तमत्वम्। अस्वातन्त्र्येणोत्पत्तिकर्तृत्वस्य प्राधान्यविरोधित्वेऽपि अबुद्धिपूर्वमुत्पादकत्वस्य किमायातं इत्यत आह अस्वातन्त्र्यं चेति। कार्यस्य पुरुषमतिपूर्वकत्वाभावे तत्र तस्य पुरुषस्यास्वातन्त्र्यं भवति तत्र दृष्टान्तमाह यथेति रोगादीनां पुरुषजत्वेऽपि बुद्धिपूर्वकत्वाभावात् तत्र पुरुषस्यास्वातन्त्र्यं तथेत्यर्थः। ततश्चाबुद्धिपूर्वमुत्पादकत्वादस्वातन्त्र्यम् अस्वातन्त्र्याच्चाप्राधान्यं प्रसज्येतेति। तथा च महातात्पर्यविरोध इत्युक्तं भवति। साक्षात्प्रसङ्गसम्भवेऽपि व्युत्पादनार्थमेवमुक्तम्। ननु वेदनित्यत्ववत्तदुत्पत्तावपि ऋचः सामानि जज्ञिरे ऋक्सं.6।4।18।4य.सं.31।7 इत्यादिवचनानि सन्ति तत्कथं निर्णयः इत्यतो विपक्षे बाधकोपेतानां नित्यत्ववाक्यानां प्राबल्यादुत्पत्तिवचनान्यन्यथाव्याख्येयानीत्याह उत्पत्तीति। उत्पत्तिवाची शब्दोऽभिव्यक्तौ क्व दृष्टः इत्यत आह नित्येति। अनादिनिधनतया नित्या न तूपचारेणेति मुख्यं नित्यत्वमुक्त्वा पुनरुत्सृष्टेत्युच्यते तत्र गत्यन्तराभावाद्व्यक्तिरेव ग्राह्येत्यर्थः। अन्यत्रापि प्रयोगं दर्शयति अभिव्यञ्जक इति। शतपथाभिव्यञ्जकतयानिश्चिते याज्ञवल्क्ये कर्तृशब्दोऽस्तीत्यर्थः। याज्ञवल्क्यः शतपथस्य कर्तैव किं न स्यात् इत्यत आह कथमिति। प्रागादित्ये स्थिताः ततो याज्ञवल्क्येनाधीता इत्येतत्प्रमितमित्यर्थः। इतोऽपि नित्यत्वपक्ष एव बलवानित्याह वचनेति। ऋचः सामानि इत्यादिकं वचनमात्रम्अत एव च नित्यत्वं 1।3।29 इति शारीरकोक्तं वाक्यं निर्णयात्मकम् वचनं च वृत्त्यन्तरेणापि सम्भवतीति न तूपचारितो वाक्यार्थावधारणात्मको निर्णयः। अतस्तस्मादिदं बलवदित्यर्थः। ननु शारीरकेशास्त्रयोनित्वात् 1।1।3 इति ब्रह्मणो वेदकारणत्वमुच्यत इत्यत आह शास्त्रमिति।ननु तत्पुरुषं परित्यज्य कुतो बहुव्रीहिरङ्गीक्रियते तथात्वे च ब्रह्मणो वेदाज्जातत्वं प्रसज्येत इत्यत आह जन्मादीति। लक्षणप्रमाणाभ्यां हि वस्तुनिर्णयः। तत्रजन्माद्यस्य इति सूत्रेण लक्षणेऽभिहिते कुतः प्रमाणादेवं प्रतिपत्तव्यं इति ब्रह्मणो जगज्जन्मादिकारणत्वे प्रमाणाकाङ्क्षा स्यात् न तु तस्य वेदाज्जातत्वं वेदकारणत्वं वाऽऽकाङ्क्षितम् आकाङ्क्षादिवशाच्च वाक्यार्थोऽवसेयः। ततो योनिशब्दं प्रमाणवाचिनमङ्गीकृत्य बहुव्रीहिरेवायं प्रतिपत्तव्यः न तु तत्पुरुषः वेदकारणत्वं च जगत्कारणत्वे हेतुत्वेनात्रोच्यते अतो नानाकाङ्क्षिताभिधानमेतदित्यत आह नहीति। अन्वयाभावात् एकदेशकारणत्वेन समुदायकारणत्वानुमानेऽतिप्रसङ्गाच्चेति हेरर्थः। मा भूदयं निश्चयहेतुः तथाप्यशक्यसृष्टेर्वेदस्य कर्तुर्ब्रह्मणो जगत्सृष्टिकर्तृत्वं सम्भवतीति सम्भावनाहेतुरयं स्यादित्यत आह न हीति। सम्भावना ह्यधिकेनाल्पस्य भवति यथा सहस्रेण शतस्य। नच समुदायसृष्टेस्तदेकदेशसृष्टिरधिकेति भावः। सृज्यत्वे वेदस्य कार्यत्वपक्ष इत्यर्थः। जगत्कारणत्वोक्त्या ब्रह्मणः सर्वज्ञत्वं प्रतीतं तत्स्फुटीकर्तुं तंत्र वेदकारणत्वं हेतुरनेनोच्यते अतो नासङ्गतिरित्यत आह न चेति। वेदकारणत्वं हेतुरित्यनुवर्तते। अबुद्धिपूर्वमुत्पन्नत्वाङ्गीकारादिति भावः। किञ्च यदि जगदेकदेशस्य वेदस्य स्रष्टा परमेश्वरः सर्वज्ञः सिद्ध्येत् तर्ह्यन्तर्भावितवेदस्य जगतः स्रष्टा सुतरां सर्वज्ञः सिद्ध्येदेव तथाचार्थादपि जन्मादिसूत्रेणैव सार्वज्ञस्य स्फुटं प्रतीतत्वात् पुनर्हेत्वाकाङ्क्षाभावेनासङ्गतिस्तदवस्थेति भावेनाह यदीति। सूत्रार्थमुपसंहरति तस्मादिति। ब्रह्मण इति शेषः। तानि चेत्यादिनोक्तमुपसंहरति अत इति। तथा च न समुद्भवशब्दस्य मुख्यार्थत्वलाभाय ब्रह्माक्षरशब्दार्थव्यत्ययः कार्य इति। तस्मादिति परामर्शविषयाप्रतीतेस्तं दर्शयन्वाक्यं व्याख्याति। यत इति। प्रतिष्ठितमित्युच्यत इति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.15।।कर्म ब्रह्मणो जायते एष ह्येव (एनं) साधु कर्म कारयति कौ.उ.3।9बुद्धिर्ज्ञानम् 10।4 इत्यादिभ्यः। न च मुख्ये सम्भाव्यमाने पारम्पर्येणौपचारिकं कल्प्यम्। न च जडानां स्वतः प्रवृत्तिः सम्भवति एतस्य वा अक्षरस्य बृ.उ.3।8।9 इति सर्वनियमनश्रुतेश्चद्रव्यं कर्म च कालश्च इत्यादेश्च। अचिन्त्यशक्तिश्चोक्ता। जीवस्य च प्रतिबिम्बस्य बिम्बपूर्वैव चेष्टान कर्तृत्वम् 5।14 इत्यादिनिषेधाच्च। अक्षराणि प्रसिद्धानि तेभ्यो ह्यभिव्यज्यते परं ब्रह्म। अन्यथाऽनादिनिधनमचिन्त्यं परिपूर्णमपि ब्रह्म को जानाति। न च रूढिं विना योगाङ्गीकारो युक्तः परामर्शाच्च तस्मात्सर्वगतं ब्रह्मेति।न ह्येकशब्देन द्विरुक्तेन भेदश्रुतिं विना वस्तुद्वयं कुत्रचिदुच्यते। तानि चाक्षराणि नित्यानि वाचा विरूपनित्यया। वृष्णे चोदस्व सुष्टुतिम् ऋक्सं.6।5।25तै.सं.5।6।11अनादिनिधना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा म.भा.12।232।24अत एव च नित्यत्वम् ब्र.सू.1।3।29 इत्यादिश्रुतिस्मृतिभगवद्वचनेभ्यः। दोषश्चोक्तः सकंर्तृत्वे। मा.भा.2।13 न चाबुद्धिपूर्वमुत्पन्नानि तत्प्रमाणाभावात्। निश्श्वसितशब्दस्त्वक्लेशाभिप्रायः नाबुद्धिपूर्वाभिप्रायः। सोऽकामयत बृ.उ.1।2।45 इत्यादेश्चइष्टं हुतं इत्यादिरूपप्रपञ्चेन सहाभिधानाच्च महातात्पर्यविरोधाच्च तच्चोक्तं पुरस्तात्।न ह्यस्वातन्त्र्येण चोत्पत्तिकर्तुः प्राधान्यम्। अस्वातन्त्र्यं च तदमतिपूर्वकत्वेन भवति यथा रोगादीनां पुरुषस्य तज्जत्वेऽपि। उत्पत्तिवचनान्यभिव्यक्त्यर्थानि अभिमानिदेवताविषयाणि चनित्या उत्सृष्टा इति वचनात्।अभिव्यञ्जके कर्तृवचनं चास्तिकृत्स्नं शतपथं चक्रे इति। कथमादित्यस्था वेदास्तेनैव क्रियन्ते वचनमात्राच्च निर्णयात्मकशारीरकोक्तं बलवत् शास्त्रं योनिर्यस्य तत् शास्त्रयोनित्वम्।जन्माद्यस्य ब्रू.सू.1।1।2 इत्युक्ते प्रमाणं हि तत्रापेक्षितम् न तु तस्य जातत्वं वेदकारणत्वं वा न हि वेदकारणत्वं जगत्कारणत्व हेतुः। न हि विचित्रजगत्सृष्टेर्वेदसृष्टिरशक्या सृज्यत्वे। न च सर्वज्ञत्वे। यदि वेदस्रष्टा सर्वज्ञः किमिति न जगत्स्रष्टा सर्वज्ञः तस्माद्वेदप्रमामकत्वमेवात्र विवक्षितम् अतो नित्यान्यक्षराणि। यत एवं परम्परया यज्ञाभिव्यङ्ग्यं ब्रह्म तस्मात्तन्नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.15।।कर्म ब्रह्मोद्भवम्। अत्र च ब्रह्मशब्दनिर्दिष्टं प्रकृतिपरिणामरूपशरीरम्तस्मादेतद् ब्रह्म नाम रूपमन्नं च जायते (मु0 1।1।9) इति ब्रह्मशब्देन प्रकृतिः निर्दिष्टा। इहापिमम योनिर्महद्ब्रह्म (गीता 14।3) इति वक्ष्यते। अतः कर्म ब्रह्मोद्भवम् इति प्रकृतिपरिणामरूपशरीरोद्भवं कर्म इत्युक्तं भवति। ब्रह्म अक्षरसमुद्भवम् इत्यत्र अक्षरशब्दनिर्दिष्टो जीवात्मा अन्नपानादिना तृप्ताक्षराधिष्ठितं शरीरं कर्मणे प्रभवति इति कर्मसाधनभूतं शरीरम् अक्षरसमुद्भवम्। तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म सर्वाधिकारिगतं शरीरं नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् यज्ञमूलम् इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.15।। कर्म ब्रह्मोद्भवं ब्रह्म वेदः सः उद्भवः कारणं प्रकाशको यस्य तत् कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि विजानीहि। ब्रह्म पुनः वेदाख्यम् अक्षरसमुद्भवम् अक्षरं ब्रह्म परमात्मा समुद्भवो यस्य तत् अक्षरसमुद्भवम्। ब्रह्म वेद इत्यर्थः। यस्मात् साक्षात् परमात्माख्यात् अक्षरात् पुरुषनिःश्वासवत् समुद्भूतं ब्रह्म तस्मात् सर्वार्थप्रकाशकत्वात् सर्वगतम् सर्वगतमपि सत् नित्यं सदा यज्ञविधिप्रधानत्वात् यज्ञे प्रतिष्ठितम्।।
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【 Verse 3.16 】
▸ Sanskrit Sloka: एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह य: | अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ||
▸ Transliteration: evaṁ pravartitaṁ cakraṁ nānuvartayatīha yaḥ | aghāyurindriyārāmo moghaṁ pārtha sa jīvati ||
▸ Glossary: evaṁ: prescribed; pravartitaṁ: established; cakraṁ: cycle; na: not; anuvar- tayati: adopt; iha: in this; yaḥ: who; aghāyuḥ: life full of sins; indriyārāmaḥ: satisfied in sense gratification; moghaṁ: useless; pārtha: O son of Pritā; saḥ: he; jīvati: lives
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.16 O Pārtha, he who does not adopt the prescribed, established cycle lives a life full of sins. Rejoicing in sense gratification, he lives a useless life.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.16।।हे पार्थ जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.16।। जो पुरुष यहाँ इस प्रकार प्रवर्तित हुए चक्र का अनुवर्तन नहीं करता हे पार्थ इंन्द्रियों में रमने वाला वह पाप आयु पुरुष व्यर्थ ही जीता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.16 एवम् thus? प्रवर्तितम् set revolving? चक्रम् wheel? न not? अनुवर्तयति follows? इह here? यः who? अघायुः living in sin? इन्द्रियारामः rejoicing in the senses? मोघम् in vain? पार्थ O Partha? सः he? जीवति lives.Commentary This is the wheel of action set in motion by the Creator on the basis of the Veda and sacrifice.He who does not follow the wheel by studying the Vedas and performing the sacrifices prescribed therein but who indulges only in sensual pleasures lives in vain. He is wasting his life. He is leading a worthless life indeed.One who does not live in accordance with this law and who is selfish commits sin. He violates the law of the Creator and that is the worst sin.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.16. Whosoever does not roll forward the wheel, thus set in motion in this world, he is a man of sinful life rejoicing in the senses; and he lives in vain, O son of Prtha !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.16 Thus he who does not help the revolving wheel of sacrifice, but instead leads a sinful life, rejoicing in the gratification of his senses, O Arjuna, he breathes in vain.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.16 He who does not follow the wheel thus set in motion here, lives in sin, satisfying the senses, O Arjuna. He lives in vain.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.16 O Partha, he lives in vain who does not follow here the wheel thus set in motion, whose life is sinful, and who indulges in the senses.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.16 He who does not follow here the wheel thus set revolving, who is of sinful life, rejoicing in the senses, he lives in vain, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.16 Evam etc. On the other hand, he, who does not accept as stated above, is full of sins. For, he enjoys only in the sense-organs and not in the Self.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.16 Thus this wheel is set in motion by the Supreme Person: From food arise embodied selves which are denoted by the word 'beings': from rain food; from sacrifice rain; sacrifice from activities which constitute the exercise of an agent; and activity from the embodied self; and again the body endowed with life from food. In this manner there is a seence which revolves like a wheel through the mutual relations of cause and effect.
Hence, He who is engaged in spiritual practice - whether one is alified for Karma Yoga or Jnana Yoga - if he does not follow, i.e., does not keep in motion the wheel which revolves in a circle through mutual relation of cause and effect - that person by not maintaining his bodily subsistence by means of the 'remainder of sacrifice,' lives in sin. His life begins in sin or develops in sin, or is of both these kinds; he lives the life of sin. Thus he is a reveller in his senses and not in his self. The senses become the pleasure-gardens of one whose mind and body are not nourished by the 'remainders of sacrifices.' Rajas and Tamas preponderate in his body. Being thus turned away from the vision of the self, he rejoices only in the enjoyment of the senses. Therefore, even if he were to attempt for the vision of the self, it will be fruitless. So he lives in vain, O Arjuna.
Sri Krsna now says that there is no need for the performance of the 'great sacrifices' etc., according to his station and stage of life, only in respect of a liberated person whose vision of the self does not depend on any external means.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.16 O Partha, sah, he; jivati, lives; mogham, in vain; yah, who, though competent for action; na anuvartayati, does not follow; iha, here, in the world; cakram, the wheel of the world; evam, thus; pravartitam, set in motion, by God, on the basis of the Vedas and the sacrifices; aghayuh, whose life (ayuh) is sinful (agham), i.e. whose life is vile; and indriya-aramah, who indulges in the senses-who has his arama, sport, enjoyment, with objects, indriyaih, through the senses. Therefore, the gist of the topic under discussion is that action must be undertaken by one who is alified (for action) but is unenlightened. In the verses beginning from, '(A person does not attain freedom from action by adstaining from action' (4) and ending with, 'You perform the obligatory duties৷৷.And, through inaction, even the maintenance of your body will not be possible' (8), it has been proved that before one attains fitness for steadfastness in the knowledge of the Self, it is the bounden duty of a person who is alified for action, but is not enlightened, to undertake Karma-yoga for that purpose. And then, also in the verses commencing from '(This man becomes bound) by actions other than that action meant for God' (9) and ending with 'O Partha, he lives in vain,' many reasons [Such as, that it pleases God, secures the affection of the gods, and so on.] have been incidentally stated as to why a competent person has to undertake actions; and the evils arising from their non-performance have also been emphatically declared. Such being the conclusion, the estion arises whether the wheel thus set in motion should be followed by all, or only by one who is ignorant of the Self and has not attained to the steadfastness which is fit to be practised by the Sankhyas, the knowers of the Self, through the Yoga of Knowledge only, and which is acired by one ignorant of the Self through the means of the practice of Karma-yoga mentioned above? Either anticipating Arjuna's estion to this effect, or in order to make the meaning of the scripture (Gita) clearly understood, the Lord, revealing out of His own accord that the following substance of the Upanisads-Becoming freed from false knowledge by knowing this very Self, the Brahmanas renounce what is a compulsory duty for those having false knoweldge, viz, desire for sons, etc., and then lead a mendicant life just for the purpose of maintaining the body; they have no duty to perform other than steadfastness in the knowledge of the Self (cf. Br. 3.5.1)-has been presented here in the Gita, says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.16।। खनिज वनस्पति एवं पशु जगत् के समस्त सदस्य अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति से ही यज्ञ भावना का पालन करते हुए प्रकृति में प्रवर्तित कर्मचक्र के निर्विघ्न चलने में अपना योगदान देते हैं। केवल मनुष्य को ही यह स्वतन्त्रता है कि चाहे तो वह इसका पालन करे अथवा विरोध। जब तक किसी पीढ़ी के अधिकसेअधिक लोग सामंजस्यकेनियम के अनुसार जीवन जीते हैं तब तक उतनी ही अधिक मात्रा में वे सुख समृद्धि से सम्पन्न होकर रहते हैं। ऐसे काल को ही सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का स्वर्ण युग कहा जाता है।परन्तु सभी मनुष्यों के लिये सदैव यह सम्भव नहीं होता कि वे इस सनातन नियम का दृढ़तापूर्वक पालन कर सकें। इतिहास के किसीकिसी काल में मनुष्य इस नियम के विरुद्ध खड़ा हो जाता है और तब जीवन में शांति और विकास का राज्य विखरता हुआ अन्त में मात्र खण्डहर रह जाता है। ऐसे तिमिराच्छन्न युग निराशा और अशांति युद्ध और महामारी बाढ़ और अकाल से प्रताड़ित और त्रस्त युग होते हैं।स्वाभाविक ही मन में यह प्रश्न उठता है कि सुख शान्ति का उज्ज्वल दिवस अस्त होकर जगत् में निराशा और अविवेक की अन्धकारपूर्ण रात्रि आने का क्या कारण है इसका उत्तर गीता में दिया गया हुआ है।व्यक्तियों से समाज बनता है। किसी समाज की उपलब्धियों के कारण हम उसे कितना ही गौरवान्वित करें फिर भी समाज के निर्माता व्यक्तियों के व्यक्तिगत योगदान की अवहेलना नहीं की जा सकती। व्यक्तियों के योग्य होने पर समाज सरलता से आगे बढ़ता है। परन्तु इकाई रूप व्यक्तियों का त्रुटिपूर्णसंगठन होने पर सम्पूर्ण समाज रूपी महल ही ढह जाता है। मनुष्य का विनाशकारी जीवन प्रारम्भ होता है उसके अत्यधिक इन्द्रियों के विषय में रमने से देह को ही अपना स्वरूप समझकर उसके पोषण एवं सुखसुविधाओं का ध्यान रखने में ही वे व्यस्त हो जाते हैं। अत्यधिक देहासक्ति के कारण वे पशुवत विषयोपभोग के अतिरिक्त जीवन का अन्य श्रेष्ठ लक्ष्य ही नहीं जानते और इसलिये उच्च जीवन जीने के मार्ग के ज्ञान की भी उन्हे कोई आवश्यकता अनुभव नहीं होती।ऐसे युग में कोई भी व्यक्ति यज्ञ की भावना से कर्म करने में प्रवृत्त नहीं होता जिसके बिना उत्पादन के लिये अनुकूल परिस्थितियाँ (पर्जन्य) नहीं बनतीं जिससे कि उत्पादन क्षमता (देव) आनन्ददायक पोषक वस्तुओं (अन्न) के रूप में प्रगट हो सकें। विषयों के भोगियों को यहां इन्द्रिया रामा कहा गया जिनमें से प्रत्येक व्यक्ति केवल अपने ही भोग की चिन्ता करता है और अनजाने ही विश्व के कर्मचक्र में घर्षण उत्पन्न करता है। इन लोगों का जीवन पापपूर्ण माना गया है और गीता का कथन है वे व्यर्थ ही जीते हैं।अब एक प्रश्न है क्या इस प्रकार प्रवर्तित चक्र का पालन सबको अनिवार्य है अथवा केवल उसके लिये जिसे ज्ञानयोग में अभी निष्ठा प्राप्त नहीं हुई है उत्तर में भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.16।।फलितमाह। एवमीश्वरेण वेदयज्ञपूर्वकं जगच्चकं प्रवर्तितं य इहलोके कर्माधिकृतो नानुवर्तयति नानुतिष्ठति स अधायुरघं पापमायुर्जीवनं यस्य स इन्द्रियैरारमणं विषयसेवनं यस्य सः व्यर्थं जीवति। त्वया तु जगच्चक्रप्रवर्तकस्य ममानुसरणमवश्यं कर्तव्यमिति द्योतयन्नाह पार्थेति। तस्मादज्ञेनाधिकृतेन कर्म कर्तव्यमेवेति प्रकरणार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.16।।भवत्वेवं ततः किं फलितमित्याह आदौ परमेश्वरात्सर्वावभासकनित्यनिर्दोषवेदाविर्भावः ततः कर्मपरिज्ञानंततोऽनुष्ठानाद्धर्मोत्पादः ततः पर्जन्यस्ततोऽन्नं ततो भूतानि पुनस्तथैव भूतानां कर्मप्रवृत्तिरित्येवं परमेश्वरेण प्रवर्तितं चक्रं सर्वजगन्निर्वाहकं यो नानुवर्तयति नानुतिष्ठति सोऽघायुः पापजीवनो मोघं व्यर्थमेव जीवति। हे पार्थ तस्य जीवनान्मरणमेव वरम्। जन्मान्तरे धर्मानुष्ठानसंभवादित्यर्थः। तथाच श्रुतिःअथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निपृणाति यत्प्रजामिच्छते तेन पितृ़णामथ यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदा वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोकः इति। ब्रह्मविदं व्यावर्तयति इन्द्रियाराम इति। यत इन्द्रियैर्विषयेष्वारमति अतः कर्माधिकारी संस्तदकरणात्पापमेवाविचिन्वन्व्यर्थमेव जीवतीत्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.16।।भवत्वेवं ततः किं फलितमित्यत आह एवमिति। भूतानामादौ वेदाधिगमस्ततः कर्मानुष्ठानं ततो देवानां तृप्तिस्ततो वृष्टिस्ततोऽन्नं ततो भूतानि तेषां वेदाधिगम इत्येवंरूपं चक्रमिव चक्रं निरन्तरमावर्तमानं जगद्यात्रानिर्वाहक नानुवर्तयति नानुतिष्ठति सोऽघायुः पापजीवनः इन्द्रियारामो न तु धर्माराम आत्मारामो वा मोघं व्यर्थं दंशमशकादिवज्जीवति। यस्त्वेतदनुवर्तयति स जगदुपकारको धन्य इति भावः। तथा च श्रुतिःअथो अयं वा आत्मा सर्वेषां भूतानां लोकः स यज्जुहोति यद्यजते तेन देवानां लोकोऽथ यदनुब्रूते तेन ऋषीणामथ यत्पितृभ्यो निपृणाति यत्प्रजामिच्छति तेन पितृ़णामथ यन्मनुष्यान्वासयते यदेभ्योऽशनं ददाति तेन मनुष्याणामथ यत्पशुभ्यस्तृणोदकं विन्दति तेन पशूनां यदस्य गृहेषु श्वापदो वयांस्यापिपीलिकाभ्य उपजीवन्ति तेन तेषां लोकः इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.16।।एवं भगवदात्मकं कर्म यो न करोति तस्य व्यर्थं जीवनमित्याह एवमिति। एवं प्रकारेण प्रवर्तितं चक्रं स्वतःप्रवृत्तं मदिच्छया मत्क्रीडार्थं प्रवृत्तं यो नानुवर्तयति नानुतिष्ठति स अघायुः पापायुः पापमेवायुर्यस्य तादृशः। इन्द्रियारामः इन्द्रियेष्वेव इन्द्रियार्थं वा आरमति न तु मदर्थं मयि वा अतो मोघं व्यर्थं स जीवति। पार्थेति सम्बोधनात् स्वभक्तत्वात्तव तथा ज्ञानमनुचितमिति ज्ञापितम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.16।।यस्मादेवं परमेश्वरेणैव भूतानां पुरुषार्थसिद्धये कर्मादिचक्रं प्रवर्तितं तस्मात्तदुकुर्वतो वृथैव जीवितमित्याह एवमिति। परमेश्वरवाक्यभूताद्वेदाख्याद्ब्रह्मणः पुरुषाणां कर्मणि प्रवृत्तिः ततः कर्मनिष्पत्तिः ततः पर्जन्यः ततोऽन्नम् ततो भूतानि भूतानां च पुनस्तथैव कर्मणि प्रवृत्तिरित्येवं प्रवर्तितं चक्रं यो नानुवर्तयति नानुतिष्ठति सोऽघायुः अघं पापरुपमायुर्यस्य सः। यत इन्द्रियैर्विषयेष्वेव रमति न तु ईश्वराराधनार्थे कर्मणि। अतो मोघं व्यर्थ स जीवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.16।।यस्मादेवं प्रजापतिना कृतोपदेशेनैव भूतानां पुरुषार्थसिद्ध्यर्थं कर्माज्ञप्तं प्रवर्त्तितम् तस्मात्तदननुवर्त्तयतो वृथैव जीवितमित्याह एवं प्रवर्त्तित्तमिति। कर्मचक्रं कर्मणोऽनुशासनं वा यो नर इन्द्रियारामो नानुसरति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.16।।इस लोकमें जो मनुष्य कर्माधिकारी होकर इस प्रकार ईश्वरद्वारा वेद और यत्नपूर्वक चलाये हुए इस जगत्चक्रके अनुसार ( वेदाध्ययनयज्ञादि ) कर्म नहीं करता हे पार्थ वह पापायु अर्थात् पापमय जीवनवाला और इन्द्रियारामी अर्थात् इन्द्रियोंद्वारा विषयोंमें रमण करनेवाला व्यर्थ ही जीता है उस पापीका जीना व्यर्थ ही है। इसलिये इस प्रकरणका अर्थ यह हुआ कि अज्ञानी अधिकारीको कर्म अवश्य करना चाहिये। अनात्मज्ञ अधिकारी पुरुषको आत्मज्ञानकी योग्यता प्राप्त होनेके पहले ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान अवश्य करना चाहिये यह न कर्मणामनारम्भात् यहाँसे लेकर शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः इस श्लोकतकके वर्णनसे प्रतिपादन करके यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र से लेकर मोघं पार्थ स जीवति तकके ग्रन्थसे भी आत्मज्ञानसे रहित कर्माधिकारीके लिये कर्मोंके अनुष्ठान करनेमें बहुतसे प्रसङ्गानुकूल कारण कहे गये तथा उन कर्मोंके न करनेमें बहुतसे दोष भी बतलाये गये। यदि ऐसा है तो क्या इस प्रकार चलाये हुए इस सृष्टिचक्रके अनुसार सभीको चलना चाहिये अथवा पूर्वोक्त कर्मयोगानुष्ठानरूप उपायसे प्राप्त होनेवाली और आत्मज्ञानी सांख्ययोगियोंद्वारा सेवन किये जाने योग्य ज्ञानयोगसे ही सिद्ध होनेवाली निष्ठाको न प्राप्त हुए अनात्मज्ञको ही इसके अनुसार बर्तना चाहिये ( या तो ) इस प्रकार अर्जुनके प्रश्नकी आशङ्का करके ( भगवान् बोले )
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.16।। व्याख्या पार्थ नवें श्लोकमें प्रारम्भ किये हुए प्रकरणका उपसंहार करते हुए भगवान् यहाँ अर्जुनके लिये पार्थ सम्बोधन देकर मानो यह कह रहे हैं कि तुम उसी पृथा(कुन्ती) के पुत्र हो जिसने आजीवन कष्ट सहकर भी अपने कर्तव्यका पालन किया था। अतः तुम्हारेसे भी अपने कर्तव्यकी अवहेलना नहीं होनी चाहिये। जिस युद्धको तू घोर कर्म कह रहा है वह तेरे लिये घोर कर्म नहीं प्रत्युत यज्ञ (कर्तव्य) है। इसका पालन करना ही सृष्टिचक्रके अनुसार बरतना है और इसका पालन न करना सृष्टिचक्रके अनुसार न बरतना है।एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः जैसे रथके पहियेका छोटासा अंश भी टूट जानेपर रथके समस्त अङ्गोंको एवं उसपर बैठे रथी और सारथिको धक्का लगता है ऐसे ही जो मनुष्य चौदहवेंपन्द्रहवें श्लोकोंमें वर्णित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता वह समष्टि सृष्टिके संचालनमें बाधा डालता है।संसार और व्यक्ति दो (विजातीय) वस्तु नहीं हैं। जैसे शरीरका अङ्गोंके साथ और अङ्गोंका शरीरके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है ऐसे ही संसारका व्यक्तिके साथ और व्यक्तिका संसारके साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है। जब व्यक्ति कामना ममता आसक्ति और अहंताका त्याग करके अपने कर्तव्यका पालन करता है तब उससे सम्पूर्ण सृष्टिमें स्वतः सुख पहुँचता है।इन्द्रियारामः जो मनुष्य कामना ममता आसक्ति आदिसे युक्त होकर इन्द्रियोंके द्वारा भोग भोगता है उसे यहाँ भोगोंमें रमण करनेवाला कहा गया है। ऐसा मनुष्य पशुसे भी नीचा है क्योंकि पशु नये पाप नहीं करता प्रत्युत पहले किये गये पापोंका ही फल भोगकर निर्मलताकी ओर जाता है परन्तु इन्द्रियाराम मनुष्य नयेनये पाप करके पतनकी ओर जाता है और साथ ही सृष्टिचक्रमें बाधा उत्पन्न करके सम्पूर्ण सृष्टिको दुःख पहुँचाता है।अघायुः सृष्टिचक्रके अनुसार न चलनेवाले मनुष्यकी आयु उसका जीवन केवल पापमय है। कारण कि इन्द्रियोंके द्वारा भोगबुद्धिसे भोग भोगनेवाला मनुष्य हिंसारूप पापसे बच ही नहीं सकता। स्वार्थी अभिमानी और भोग तथा संग्रहको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा दूसरोंका अहित होता है अतः ऐसे मनुष्यका जीवन पापमय होता है। गोस्वामी श्रीतुलसीदासजी कहते हैं। पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद। ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद।। (मानस 7। 39)मोघं पार्थ स जीवति अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यकी सभ्य भाषामें निन्दा या ताड़ना करते हुए भगवान् कहते हैं कि ऐसा मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है अर्थात् वह मर जाय तो अच्छा है तात्पर्य यह है कि यदि वह अपने कर्तव्यका पालन करके सृष्टिको सुख नहीं पहुँचाता तो कमसेकम दुःख तो न पहुँचाये। जैसे भगवान् श्रीरामके वनवासके समय अयोध्यावासियोंके चित्रकूट आनेपर कोल किरात भील आदि जंगली लोगोंने उनसे कहा था कि हम आपके वस्त्र और बर्तन नहीं चुरा लेते यही हमारी बहुत बड़ी सेवा है यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहिं न बासन बसन चोराई।। (मानस 2।251।2) ऐसे ही अपनेकर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्य कमसेकम सृष्टिचक्रमें बाधा न डालें तो यह उनकी सेवा ही है।सृष्टिचक्रके अनुसार न चलनेवाले मनुष्यके लिये भगवान्ने पहले स्तेन एव सः (3। 12) वह चोर ही है और भुञ्जते ते त्वघम् (3। 13) वे तो पापको ही खाते हैं इस प्रकार कहा और अब इस श्लोकमें अघायुरिन्द्रियारामः वह पापायु और इन्द्रियाराम है ऐसा कहकर उसके जीनेको भी व्यर्थ बताते हैं।गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने भी कहा हैतेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा।।उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके।। (मानस 1। 4। 3)सम्बन्ध संसारसेसम्बन्धविच्छेद करनेके लिये जो अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता उस मनुष्यकी पूर्वश्लोकमें ताड़ना की गयी है। परन्तु जिसने अपने कर्तव्यका पालन करके संसारसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है उस महापुरुषकी स्थितिका वर्णन भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.16।।एवमिति। यस्तु एवं नाङ्गीकरोति स पापमयः। यतः (N अतः) स इन्द्रियेष्वेव रमते नात्मनि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.16।।अधिकृतेनाध्ययनादिद्वारा जगच्चक्रमनुवर्तनीयमन्यथेश्वराज्ञातिलङ्घिनस्तस्य प्रत्यवायः स्यादित्याह एवमिति।न कर्मणामनारम्भात् इत्यादिनोक्तमुपसंहरति तस्मादिति। जगच्चक्रस्य प्रागुक्तप्रकारेणानुवर्तने वृथा जीवनमघसाधनं यस्मात्तस्माज्जीवता नियतं कर्म कर्तव्यमित्यर्थः। यद्यधिकृतेन कर्तव्यमेव कर्म तर्हि किमित्यज्ञेनेति विशिष्यते ज्ञाननिष्ठेनापि तत्कर्तव्यमेवाधिकृतत्वाविशेषादित्याशङ्क्य पूर्वोक्तमनुवदति प्रागिति। नहि ज्ञानकर्मणोर्विरोधाज्ज्ञाननिष्ठेन कर्म कर्तुं शक्यते तथा चानात्मज्ञेनैव चित्तशुद्ध्यादिपरंपरया ज्ञानार्थं कर्मानुष्ठेयमिति प्रतिपादितमित्यर्थः। तर्हि यज्ञार्थादित्यादि। किमर्थं नहि तत्र ज्ञाननिष्ठा प्रतिपाद्यते कर्मनिष्ठा तु पूर्वमेवोक्तत्वान्नात्र वक्तव्येत्याशङ्क्य वृत्तमर्थान्तरमनुवदति प्रतिपाद्येति। प्रासङ्गिकमज्ञस्य कर्मकर्तव्यतोक्तिप्रसङ्गागतमिति यावद् बहुकारणमीश्वरप्रसादो देवताप्रीतिश्चेत्यादि दोषसंकीर्तनंतैर्दत्तानप्रदाय इत्यादि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.16।।नन्वत्र कार्यकारणपरम्परैवोक्ता न चक्रं तत्कथं उच्यतेएवं प्रवर्तितं चक्रम् इति तत्राह तानि चेति। तानि वेदाख्यानि। चक्राप्रवृत्तौ कथमघायुष्ट्वादिकं इत्यतो व्याचष्टे तदेतदिति। आयुषोऽघत्वाभावात् कथमघायुः इत्यत आह पापेति। तादर्थ्यात्ताच्छब्द्यमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.16।।तानि चाक्षराणि भूताभिव्यङ्ग्यानीति चक्रम्। तदेतज्जगच्चक्रं यो नानुवर्तयति स तद्विनाशकत्वादघायुः पापनिमित्तमेव यस्यायुः सोऽघायुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.16।।एवं परमपुरुषेण प्रवर्तितम् इदं चक्रम्अन्नाद् भवन्ति भूतानि इत्यत्र भूतशब्दनिर्दिष्टानि सजीवानि शरीराणि। पर्जन्यादन्नम् यज्ञात् पर्जन्यः यज्ञश्च कर्तृव्यापारानुरूपात् कर्मणः कर्म च सजीवात् शरीरात् सजीवं शरीरं च पुनरन्नाद् इति अन्योन्यकार्यकारणभावेन
Chapter 3 (Part 11)
चक्रवत् परिवर्तमानम् इह साधने वर्तमानो यः कर्मयोगाधिकारी ज्ञानयोगाधिकारी वा न अनुवर्तयति न प्रवर्तयति यज्ञशिष्टेन देहधारणम् अकुर्वन् सः अघायुः भवति अघारम्भाय एव अस्य आयुः अघपरिणतं वा उभयरूपं वा सः अघायुः।अत एव इन्द्रियारामो भवति न आत्मारामः इन्द्रियाणि एव अस्य उद्यानानि भवन्ति अयज्ञशिष्टवर्द्धितदेहमनस्त्वेन उद्रिक्तरजस्तमस्कः आत्मावलोकनविमुखतया विषयभोगैकरतिः भवति अतो ज्ञानयोगादौ यतमानः अति निष्फलप्रयत्नतया मोघं पार्थ स जीवति।असाधनायत्तात्मदर्शनस्य मुक्तस्य एव महायज्ञादिवर्णाश्रमोचितकर्मानारम्भ इत्याह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.16।। एवम् इत्थम् ईश्वरेण वेदयज्ञपूर्वक जगच्चक्रं प्रवर्तितं न अनुवर्तयति इह लोके यः कर्मणि अधिकृतः सन् अघायुः अघं पापम् आयुः जीवनं यस्य सः अघायुः पापजीवनः इति यावत्। इन्द्रियारामः इन्द्रियैः आरामः आरमणम् आक्रीडा विषयेषु यस्य सः इन्द्रियारामः मोघं वृथा हे पार्थ स जीवति।।तस्मात् अज्ञेन अधिकृतेन कर्तव्यमेव कर्मेति प्रकरणार्थः। प्राक् आत्मज्ञाननिष्ठायोग्यताप्राप्तेः तादर्थ्येन कर्मयोगानुष्ठानम् अधिकृतेन अनात्मज्ञेन कर्तव्यमेवेत्येतत् न कर्मणामनारम्भात् इत्यत आरभ्य शरीरयात्रापि च ते न प्रसिध्येदकर्मणः इत्येवमन्तेन प्रतिपाद्य यज्ञार्थात् कर्मणोऽन्यत्र इत्यादिना मोघं पार्थ स जीवति इत्येवमन्तेनापि ग्रन्थेन प्रासङ्गिकम् अधिकृतस्य अनात्मविदः कर्मानुष्ठाने बहु कारणमुक्तम्। तदकरणे च दोषसंकीर्तनं कृतम्।।एवं स्थिते किमेवं प्रवर्तितं चक्रं सर्वेणानुवर्तनीयम् आहोस्वित् पूर्वोक्तकर्मयोगानुष्ठानोपायप्राप्याम् अनात्मविदः ज्ञानयोगेनैव निष्ठाम् आत्मविद्भिः सांख्यैः अनुष्ठेयामप्राप्तेनैव इत्येवमर्थम् अर्जुनस्य प्रश्नमाशङ्क्य स्वयमेव वा शास्त्रार्थस्य विवेकप्रतिपत्त्यर्थम् एतं वै तमात्मानं विदित्वा निवृत्तमिथ्याज्ञानाः सन्तः ब्राह्मणाः मिथ्याज्ञानवद्भिः अवश्यं कर्तव्येभ्यः पुत्रैषणादिभ्यो व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं शरीरस्थितिमात्रप्रयुक्तं चरन्ति न तेषामात्मज्ञाननिष्ठाव्यतिरेकेण अन्यत् कार्यमस्ति इत्येवं श्रुत्यर्थमिह गीताशास्त्रे प्रतिपिपादयिषितमाविष्कुर्वन् आह भगवान्
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【 Verse 3.17 】
▸ Sanskrit Sloka: यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव: | आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ||
▸ Transliteration: yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ | ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṁ na vidyate ||
▸ Glossary: yaḥ: who; tu: but; ātmaratiḥ: takes pleasure; eva: certainly; syāt: remains; ātmatṛptaḥ: satisfied in self; ca: and; mānavaḥ: man; ātmani: in oneself; eva: certainly; ca: and; saṁtuṣṭaḥ: satiated; tasya: his; kāryaṁ: work; na: not; vidyate: exist
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.17 One who takes pleasure in the Self, who is satisfied in the Self and who is content in one’s Self, for him certainly, no work exists.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.17।।जो मनुष्य अपनेआपमें ही रमण करनेवाला और अपनेआपमें ही तृप्त तथा अपनेआपमें ही संतुष्ट है उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.17।। परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमने वाला आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं रहता।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.17 यः who? तु but? आत्मरतिः who rejoices in the Self? एव only? स्यात् may be? आत्मतृप्तः satisfied in the Self? च and? मानवः the man? आत्मनि in the Self? एव only? च and? सन्तुष्टः contented? तस्य his? कार्यम् work to be done? न not? विद्यते is.Commentary The sage does not depend on external objects for his happiness. He is ite satisfied with the Self. He finds his joy? bliss and contentment within his own Self. For such a sage who has knowledge of the Self? there is nothing to do. He has already done all actions. He has satisfied all his desires. He has complete satisfaction. (Cf.II.55).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.17. But the man, who simply rejoices in the Self; and who is satisfied in the Self; and who delights in the Self alone-there exists no action for him to be performed.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.17 On the other hand, the soul who meditates on the Self is content to serve the Self and rests satisfied within the Self; there remains nothing more for him to accomplish.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.17 But the man whose delight is only in the self, who is satisfied with the self, who rejoices in the self, for him nothing remains to be accomplished.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.17 But that man who rejoices only in theSelf and is satisfied with the Self, and is contented only in the Self-for him there is no duty to perform.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.17 But for that man who rejoices only in the Self, who is satisfied with the Self and who is content in the Self alone, verily there is nothing to do.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.17 See Comment under 3.19
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.17 But for him, who is not in need of the means of Jnana Yoga and Karma Yoga, who finds delight in the self on his own, i.e., who is established in the self, who is satisfied by the self alone and not by food, drink and other things which are other than the self, who rejoices in the self alone and not in pleasure gardens, garlands, sandalpaste, vocal and instrumental music etc., and for whom everything, his subsistence, nourishment and enjoyment, is the self alone - for him nothing remains to be performed for the vision of the self, because the essential nature of the self is perpetually in his unaided vision.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.17 Tu, but; that manavah, man, the sannyasin, the man of Knowledge, steadfast in the knowledge of the Self; yah, who; atmaratih eva syat, rejoices only in the Self-not in the sense objects; and atma-trptah, who is satisfied only with the Self-not with food and drink; and is santustah, contented; eva, only; atmani, in the Self; tasya, for him; na vidyate, there is no; karyam, duty [Duty with a view to securing Liberation.] to perform. [Rati, trpti and santosa, though synonymous, are used to indicate various types of pleasures. Or, rati means attachment to objects; trpti means happiness arising from contact with some particular object; and santosa means happiness in general, arising from the acisition of some coveted object only.] All people surely feel contened by aciring an external thing. But this one, without depending on it, remains contented only with the Self; thta is to say, he remains detached from everything. The idea it that, for a man who is such a knower of the Self, there is no duty to undertake.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.17।। कर्म के चक्र का पालन अधिकतर साधकों के लिए करणीय है क्योंकि यज्ञ भावना से कर्म के आचरण द्वारा उनका व्यक्तित्व संगठित होता है और उनमें जीवन के श्रेष्ठ कार्य ध्यान की योग्यता आती है। निस्वार्थ कर्म के द्वारा प्राप्त अन्तकरण की शुद्धि एवं एकाग्रता का उपयोग जब निदिध्यासन में किया जाता है तब साधक अहंकार के परे अपने शुद्ध आत्मस्वरूप की अनुभूति प्राप्त करता है। पूर्णत्व प्राप्त ऐसे सिद्ध पुरुष के लिये कर्म की चित्तशुद्धि के साधन के रूप में कोई आवश्यता नहीं रहती वरन् कर्म तो उसके ईश्वर साक्षात्कार की अभिव्यक्ति मात्र होते हैं।यह एक सुविदित तथ्य है कि तृप्ति एवं सन्तोष के लिये ही हम कर्म में प्रवृत्त रहते हैं। तृप्ति और सन्तोष मानो जीवनरथ के दो चक्र हैं। इन दोनों की प्राप्ति के लिये ही हम धन का अर्जन रक्षण परिग्रह और व्यय करने में व्यस्त रहते हैं। परन्तु आत्मानुभवी पुरुष अपने अनन्त आनन्द स्वरूप में उस तृप्ति और सन्तोष का अनुभव करता है कि उसे फिर बाह्य वस्तुओं की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती।जहाँ तृप्ति और सन्तोष है वहाँ सुख प्राप्ति की इच्छाओं की उत्पत्ति कहाँ इच्छाओं के अभाव में कर्म का अस्तित्व कहाँ इस प्रकार आत्म अज्ञान के कार्य इच्छा विक्षेप और कर्म का उसमें सर्वथा अभाव होता है। स्वाभाविक है ऐसे पुरुष के लिये कोई अनिवार्य कर्तव्य नहीं रह जाता। सभी कर्मों का प्रयोजन उसमें पूर्ण हो जाता है। अत जगत् के सामान्य नियमों में उसे बांधा नहीं जा सकता। वह ईश्वरीय पुरुष बनकर पृथ्वी पर विचरण करता है।और
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.17।।न कर्मणामित्यारभ्य शरीरयात्रापीत्यन्तेन ग्रन्थेनात्मज्ञाननिष्ठायोग्यताप्राप्त्यर्थं फलाभिसंधिरहितं कर्मानुष्ठेयमिति प्रतिपाद्य यज्ञार्थादित्यादिना मोघमित्यन्तेन प्रासाङ्गिकमनात्मविदोऽधिकृतस्य कर्मानुष्ठाने बहु कारणमुक्तं तदकरणे च दोषसंकीर्तनं कृतमेवंस्थिते किमेवं प्रवर्तितं चक्रं सर्वेणानुवर्तनीयमुतानात्मज्ञेनाशुद्धान्तःकरणेन ज्ञानप्राप्त्यर्थमित्यर्जुनसंशयमालक्ष्य स्वयमेव वा शास्त्रस्य विवेकप्रतिपत्त्यर्थं तत्त्वविदस्तन्निषेधति यस्त्विति। यस्तु मानव आत्मज्ञाननिष्ठ आत्मन्येव रतिर्न विषयेषु यस्य सः आत्मनैव नान्नरसादिना तृप्तश्च भवेत्। आत्मन्येव तुष्टो न बाह्येष्वर्थेषु विगततृष्ण इत्यर्थः। तस्य कर्तव्यं नास्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.17।।यस्त्विन्द्रियारामो न भवति परमार्थदर्शी स एवं जगच्चक्रप्रवृत्तिहेतुभूतं कर्माननुतिष्ठन्नपि न प्रत्यवैति कृतकृत्यत्वादित्याह द्वाभ्याम् इन्द्रियारामो हि स्रक्चन्दनवनितादिषु रतिमनुभवति मनोज्ञान्नपानादिषु तृप्तिम् पशुपुत्रहिरण्यादिलाभेन रोगाद्यभावेन च तुष्टिं उक्तविषयाभावे रागिणामरत्यतृप्त्यतुष्टिदर्शनात्। रतितृप्तितुष्टयो मनोवृत्तिविशेषाः साक्षिसिद्धाः। लब्धपरमात्मानन्दस्तु द्वैतदर्शनाभावादतिफल्गुत्वाच्च विषयसुखं न कामयत इत्युक्तंयावानर्थ उदपाने इत्यत्र। अतो नात्मविषयकरतितृप्तितुष्ट्यभावादात्मानं परमानन्दमद्वयं साक्षात्कुर्वन्नुपचारादेवमुच्यते आत्मरतिरात्मतृप्त आत्मसंतुष्ट इति। तथाच श्रुतिःआत्मक्रीड आत्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः इति। आत्मतृप्तश्चेति चकार एवकारानुकर्षणार्थः। मानव इति यः कश्चिदपि मनुष्य एवंभूतः स एव कृतकृत्यो नतु ब्राह्मणत्वादिप्रकर्षेणेति कथयितुम्। आत्मन्येव च संतुष्ट इत्यत्र चकारः समुच्चयार्थः। य एवंभूतस्तस्याधिकारहेत्वभावात्किमपि कार्यं वैदिकं लौकिकं वा न विद्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.17।।एवमीश्वरेण वेदयज्ञपूर्वकं जगच्चक्रं प्रवर्तितमज्ञैरधिकृतैरनुवर्तितव्यमित्युक्तम्। अस्यानुवर्तने च महान्प्रत्यवाय उक्तः। स ब्रह्मविदमपि स्पृशेदिति संभावितामाशङ्कां परिहरति यस्त्विति। आत्मन्येव रतिः प्रीतिर्यस्य नतु स्त्र्यादौ स तथा। नन्वात्मनि प्रीतिः प्राणिमात्रस्यानौपाधिक्यस्ति प्रत्युत तदर्थत्वेनैव स्त्र्यादिष्वपिप्रीतिर्भवतीत्यत उक्तम् आत्मतृप्त इति। आत्मनैव परमानन्दरूपेण तृप्तो न मिष्टान्नादिना। ननु मन्दाग्निरपि स्त्र्यादौ न रमते नापि मिष्टान्नेन तृप्यत्यत उक्तं आत्मन्नेव च संतुष्ट इति। मन्दाग्निर्हि धातुवृद्धिं जाठरोद्दीपनं च कामयमान औषधाद्यर्थमितस्ततो धावति नत्वात्मन्येव तुष्यति विद्वांस्तु रतितृप्तितुष्टीरात्मनैवानुभवति न स्त्र्यन्नधनादिभिरिति तस्य कार्यं कर्तव्यं किमपि नास्ति। क्रियाप्राप्यस्य कस्यचिदप्यर्थस्याभावात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.17।।नन्वेवं चेत्तदा सर्व एव त्वद्भक्ताः कथं न कुर्वन्ति इत्यत आह द्वयेन यस्त्वात्मरतिरेवेति। यस्तु आत्मरतिरेव आत्मनिमय्येव रतिर्यस्य तादृशः स्यात् यश्च आत्मतृप्तश्च भगवदानन्देन तृप्तः सुखितः आत्मन्येव भगवत्येव सन्तुष्टः स्वभोगापेक्षारहितः तस्य कार्यं कर्त्तव्यं न विद्यते नास्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.17।।तदेवंन कर्मणाभनारम्भान्नैष्कर्म्यं इत्यादिनाऽज्ञस्यान्तःकरणशुद्ध्यर्थ कर्मयोगमुक्त्वा ज्ञानिनः कर्मानुपयोगमाह यस्त्वति द्वाभ्याम्। आत्मन्येव रतिः प्रीतियस्य। ततश्चात्मन्येव तृप्तः स्वानन्दानुभवेन निर्वृतः। अतएवात्मन्येव संतुष्टो भोगापेक्षारहितो यस्तस्य कर्तव्यं नास्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.17।।तदेवंन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते 3।4 इति योगमार्गीयपुरुषार्थसिद्ध्यर्थं कर्म विहितं विधेयमित्युक्तम् साङ्क्यमार्गीयस्य तु ज्ञानमेव नानात्मभूतं कर्मोपयुक्तमित्याह द्वाभ्याम् यस्त्विति। तुः पूर्वं प्रकृतेभेदार्थकः। आत्मन्येवेति। तृप्तिर्तुष्टिर्यस्य नानात्मनि इत्यात्मैवकारलिङ्गेन साङ्ख्यमार्गीयो मुनिरुक्तः। तत्र हेतुमाह।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.17।।अथवा स्वयं ही भगवान् शास्त्रके अर्थको भलीभाँति समझानेके लिये यह जो प्रसिद्ध आत्मा है उसको जानकर जिनका मिथ्या ज्ञान निवृत्त हो चुका है ऐसे जो महात्मा ब्राह्मणगण अज्ञानियोंद्वारा अवश्य की जानेवाली पुत्रादिकी इच्छाओंसे रहित होकर केवल शरीरनिर्वाहके लिये भिक्षाका आचरण करते हैं उनका आत्मज्ञाननिष्ठासे अतिरिक्त अन्य कुछ भी कर्तव्य नहीं रहता ऐसा श्रुतिका तात्पर्य जो कि इस गीताशास्त्रमें प्रतिपादन करना उनको इष्ट है उस ( श्रुतिअर्थ ) को प्रकट करते हुए बोले परंतु जो आत्मज्ञाननिष्ठ सांख्ययोगी केवल आत्मामें ही रतिवाला है अर्थात् जिसका आत्मामें ही प्रेम है विषयोंमें नहीं और जो मनुष्य अर्थात् संन्यासी आत्मासे ही तृप्त है जिसकी तृप्ति अन्नरसादिके अधीन नहीं रह गयी है तथा जो आत्मामें ही संतुष्ट है बाह्य विषयोंके लाभसे तो सबको सन्तोष होता ही है पर उनकी अपेक्षा न करके जो आत्मामें ही सन्तुष्ट है अर्थात् सब ओरसे तृष्णारहित है। जो कोई ऐसा आत्मज्ञानी है उसके लिये कुछ भी कर्तव्य नहीं है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.17।। व्याख्या यस्त्वात्मरतिरेव ৷৷. च संतुष्टस्तस्य यहाँ तु पद पूर्वश्लोकमें वर्णित अपने कर्तव्यका पालन न करनेवाले मनुष्यसे कर्तव्यकर्मके द्वारा सिद्धिको प्राप्त महापुरुषकी विलक्षणता बतानेके लिये प्रयुक्त हुआ है।जबतक मनुष्य अपना सम्बन्ध संसारसे मानता है तबतक वह अपनी रति (प्रीति) इन्द्रियोंके भोगोंसे एवं स्त्री पुत्र परिवार आदिसे तृप्ति भोजन (अन्नजल) से तथा सन्तुष्टि धनसे मानता है। परन्तु इसमें उसकी प्रीति तृप्ति और सन्तुष्टि न तो कभी पूर्ण ही होती है और न निरन्तर ही रहती है। कारण कि संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील जड और नाशवान् है तथा स्वयं सदा एकरस रहनेवाला चेतन और अविनाशी है। तात्पर्य है कि स्वयं का संसारके साथ लेशमात्र भी सम्बन्ध नहीं है। अतः स्वयं की प्रीति तृप्ति और सन्तुष्टि संसारसे कैसे हो सकती हैकिसी भी मनुष्यकी प्रीति संसारमें सदा नहीं रहती यह सभीका अनुभव है। विवाहके समय स्त्री और पुरुषमें परस्पर जो प्रीति या आकर्षण प्रतीत होता है वह एकदो सन्तान होनेके बाद नहीं रहता। कहींकहीं तो स्त्रियाँ अपने वृद्ध पतिके लिये यहाँतक कह देती हैं कि बुड्ढा मर जाय तो अच्छा है भोजन करनेसे प्राप्त तृप्ति भी कुछ ही समयके लिये प्रतीत होती है मनुष्यको धनप्राप्तिमें जो सन्तुष्टि प्रतीत होती है वह भी क्षणिक होती है क्योंकि धनकी लालसा सदा उत्तरोत्तर बढ़ती ही रहती है। इसलिये कमी निरन्तर बनी रहती है। तात्पर्य यही है कि संसारमें प्रीति तृप्ति और संतुष्टि कभी स्थायी नहीं रह सकती।मनुष्यको सांसारिक वस्तुओंमें प्रीति तृप्ति और संतुष्टिकी केवल प्रतीति होती है वास्तवमें होती नहीं अगर होती तो पुनः अरति अतृप्ति एवं असन्तुष्टि नहीं होती। स्वरूपसे प्रीति तृप्ति और संतुष्टि स्वतःसिद्ध है। स्वरूप सत् है। सत्में कभी कोई अभाव नहीं होता नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16) और अभावके बिना कोई कामना पैदा नहीं होती। इसलिये स्वरूपमें निष्कामता स्वतःसिद्ध है। परन्तु जब जीव भूलसे संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है तब वह प्रीति तृप्ति और संतुष्टिको संसारमें ढूँढ़ने लगता है और इसके लिये सांसारिक वस्तुओंकी कामना करने लगता है। कामना करनेके बाद जब वह वस्तु (धनादि) मिलती है तब मनमें स्थित कामनाके निकलनेके बाद (दूसरी कामनाके पैदा होनेसे पहले) उसकी अवस्था निष्काम हो जाती है और उसी निष्कामताका उसे सुख होता है परन्तु उस सुखको मनुष्य भूलसे सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिसे उत्पन्न हुआ मान लेता है तथा उस सुखको ही प्रीति तृप्ति और संतुष्टिके नामसे कहता है। अगर वस्तुकी प्राप्तिसे वह सुख होता तो उसके मिलनेके बाद उस वस्तुके रहते हुए सदा सुख रहता दुःखकभी न होता और पुनः वस्तुकी कामना उत्पन्न न होती। परन्तु सांसारिक वस्तुओंसे कभी भी पूर्ण (सदाके लिये) प्रीति तृप्ति और संतुष्टि प्राप्त न हो सकनेके कारण तथा संसारसे ममताका सम्बन्ध बना रहनेके कारण वह पुनः नयीनयी कामनाएँ करने लगता है। कामना उत्पन्न होनेपर अपनेमें अभावका तथा काम्य वस्तुके मिलनेपर अपनेमें पराधीनताका अनुभव होता है। अतः कामनावाला मनुष्य सदा दुःखी रहता है।यहाँ यह बात ध्यान देनेकी है कि साधक तो उस सुखका मूल कारण निष्कामताको मानते हैं और दुःखोंका कारण कामनाको मानते हैं परन्तु संसारमें आसक्त मनुष्य वस्तुओंकी प्राप्तिसे सुख मानते हैं और वस्तुओंकी अप्राप्तिसे दुःख मानते हैं। यदि आसक्त मनुष्य भी साधकके समान ही यथार्थ दृष्टिसे देखे तो उसको शीघ्र ही स्वतःसिद्ध निष्कामताका अनुभव हो सकता है।सकाम मनुष्योंको कर्मयोगका अधिकारी कहा गया है कर्मयोगस्तु कामिनाम् (श्रीमद्भा0 11। 20। 7)। सकाम मनुष्योंकी प्रीति तृप्ति और संतुष्टि संसारमें होती है। अतः कर्मयोगद्वारा सिद्ध निष्काम महापुरुषोंकी स्थितिका वर्णन करते हुए भगवान् कहते हैं कि उनकी प्रीति तृप्ति और संतुष्टि सकाम मनुष्योंकी तरह संसारमें न होकर अपनेआप(स्वरूप) में ही हो जाती है (गीता 2। 55) जो स्वरूपतः पहलेसे ही है।वास्तवमें प्रीति तृप्ति और संतुष्टि तीनों अलगअलग न होते हुए भी संसारके सम्बन्धसे अलगअलग प्रतीत होती हैं। इसीलिये संसारसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर उस महापुरुषकी प्रीति तृप्ति और संतुष्टि तीनों एक ही तत्त्व(स्वरूप) में हो जाती है।भगवान्ने इस श्लोकमें दो बार तथा आगेके (अठारहवें) श्लोकमें एक बार एव और च पदोंका प्रयोग किया है। इससे यह भाव प्रकट होता है कि कर्मयोगीकी प्रीति तृप्ति और संतुष्टिमें किसी प्रकारकी कमी नहीं रहती एवं तत्त्वके अतिरिक्त अन्यकी आवश्यकता भी नहीं रहती (गीता 6। 22)।तस्य कार्यं न विद्यते मनुष्यके लिये जो भी कर्तव्यकर्मका विधान किया गया है उसका उद्देश्य परम कल्याणस्वरूप परमात्माको प्राप्ति करना ही है। किसी भी साधन(कर्मयोग ज्ञानयोग अथवा भक्तियोग) के द्वारा उद्देश्यकी सिद्धि हो जानेपर मनुष्यके लिये कुछ भी करना जानना अथवा पाना शेष नहीं रहता जो मनुष्यजीवनकी परम सफलता है।मनुष्यके वास्तविक स्वरूपमें किञ्चिन्मात्र अभाव न रहनेपर भी जबतक वह संसारके सम्बन्धके कारण अपनेमें अभाव समझकर और शरीरको मैं तथा मेरा मानकर अपने लिये कर्म करता है तबतक उसके लिये कर्तव्य शेष रहता ही है। परन्तु जब वह अपने लिये कुछ भी न करके दूसरोंके लिये अर्थात् शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राणोंके लिये माता पिता स्त्री पुत्र परिवारके लिये समाजके लिये देशके लिये और जगत्के लिये सम्पूर्ण कर्म करता है तब उसका संसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर उसका अपने लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं रहता। कारण कि स्वरूपमें कोई भी क्रिया नहीं होती। जो भी क्रिया होती है संसारके सम्बन्धसे ही होती है और सांसारिक वस्तुके द्वारा ही होती है। अतः जिनका संसारसे सम्बन्ध है उन्हींके लिये कर्तव्य है।कर्म तब होता है जब कुछनकुछ पानेकी कामना होती है और कामना पैदा होती है अभावसे। सिद्ध महापुरुषमें कोई अभाव होता ही नहीं फिर उनके लिये करना कैसाकर्मयोगके द्वारा सिद्ध महापुरुषकी रति तृप्ति और संतुष्टि जब अपनेआपमें ही हो जाती है तब कृतकृत्य ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जानेसे वह विधिनिषेधसे ऊँचा उठ जाता है। यद्यपि उसपर शास्त्रका शासन नहीं रहता तथापि उसकी समस्त क्रियाएँ स्वाभाविक ही शास्त्रानुकूल तथा दूसरोंके लिये आदर्शहोती हैं।यहाँ तस्य कार्यं न विद्यते पदोंका अभिप्राय यह नहीं है कि उस महापुरुषसे कोई क्रिया होती ही नहीं। कुछ भी करना शेष न रहनेपर भी उस महापुरुषके द्वारा लोकसंग्रहके लिये क्रियाएँ स्वतः होती हैं। जैसेपलकोंका गिरनाउठना श्वासोंका आनाजाना भोजनका पचना आदि क्रियाएँ स्वतः (प्रकृतिमें) होती हैं ऐसे ही उस महापुरुषके द्वारा सभी शास्त्रानुकूल आदर्शरूप क्रियाएँ भी (कर्तृत्वाभिमान न होनेके कारण) स्वतः होती हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.17 3.19।।यश्चेत्यादि पूरुष इत्यन्तम्। आत्मरतेस्तु कर्म इन्द्रियव्यापारतयैव कुर्वतः करणाकरणेषु समता। अत एव नासौ भूतेषु किंचिदात्मप्रयोजनमपेक्ष्य निग्रहानुग्रहौ करोति अपि तु करणीयमिदम् इत्येतावता। तस्मादसक्त एव करणीयं कर्म कुर्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.17।।वृत्तमर्थमेवं विभज्यानूद्यानन्तरश्लोकमाशङ्क्योत्तरत्वेनावतारयति एवमिति। अर्जुनस्य प्रश्नमित्येवमर्थमाशङ्क्याह भगवानिति संबन्धः। नन्वेषाशङ्का नावकाशमासादयत्यनात्मज्ञेन कर्तव्यं कर्मेति बहुशो विशेषितत्वादित्याशङ्क्याह स्वयमेवेति। किमर्थं श्रुत्यर्थं स्वयमेव भगवानत्र प्रतिपादयतीत्याशङ्क्याह शास्त्रार्थस्येति। गीताशास्त्रस्य ससंन्यासं ज्ञानमेव मुक्तिसाधनमर्थो नार्थान्तरमिति विवेकार्थमिह श्रुत्यर्थं कीर्तयतीत्यर्थः। तमेव श्रुत्यर्थं संक्षिपति एवमिति। सिद्धं चेदात्मवेदनमनर्थकं तर्हि व्युत्थानादीत्याशङ्क्यापातिकविज्ञानफलमाह निवृत्तेति। ब्राह्मणग्रहणं तेषामेव व्युत्थाने मुख्यमधिकारित्वमिति ज्ञापनार्थम्। क्लेशात्मकत्वादेषणानां ताभ्यो व्युत्थानं सर्वेषां स्वाभाविकत्वादविधित्सितमित्याशङ्क्याह मिथ्येति। भिक्षाचर्यं चरन्तीति वचनं व्युत्थानविरुद्धमित्याशङ्क्याह शरीरेति। तर्हि तद्वदेव तेषामग्निहोत्राद्यपि कर्तव्यमापद्येतेत्याशङ्क्य व्युत्थायिनामाश्रमधर्मवदग्निहोत्रादेरनुष्ठापकाभावान्मैवमित्याह न तेषामिति। यथोक्तं श्रुत्यर्थमस्मिन् गीताशास्त्रे पौर्वापर्येण पर्यालोच्यमाने प्रतिपादयितुमिष्टं प्रकटीकुर्वन्कर्तव्यमेव कर्म जीवतेति नियमेज्ञानयोगेन सांख्यानाम् इति कथमुक्तमिति परिचोद्य परिहारमुपदर्शयतीत्याह इत्येवमिति। आत्मनिष्ठस्य विषयसङ्गराहित्यं दृष्टं तदनात्मज्ञेन जिज्ञासुना कर्तव्यमिति मत्वाह यस्तु सांख्य इति। किंचात्मज्ञस्य ज्ञानेनात्मनैव परितृप्तत्वान्नान्नपानादिना साध्या तृप्तिरिष्टा तेन विद्यार्थिना संन्यासिनापि नान्नरसादावासक्तिर्युक्ता कर्तुमित्याह आत्मतृप्त इति। किंचात्मविदः सर्वतो वैतृष्ण्यं दृष्टं तदनात्मविदा विद्यार्थिना कर्तव्यमित्याह आत्मन्येवेति। रतितृप्तिसंतोषाणां मोदप्रमोदानन्दवदवान्तरभेदः अथवा रतिर्विषयासक्तिः तृप्तिर्विषयविशेषसंपर्कजं सुखं संतोषोऽभीष्टविषयमात्रलाभाधीनं सुखसामान्यमिति भेदः। नन्वात्मरतेरात्मतृप्तस्यात्मयेव संतुष्टस्यापि किंचित्कर्तव्यं मुक्तये भविष्यतीति नेत्याह य ईदृश इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.17।।एवमज्ञानिनः कर्म कर्तव्यमित्युक्तम् इदानीं ज्ञानिनः कर्तव्याभावमाहेति परव्याख्यानमसदिति भावेन सङ्गतिमाह तर्हीति यद्येवं कर्माकरणे हानिस्तत्करणे च लाभस्तर्हीत्यर्थः। परमेश्वरेऽतीव मनस्समाधानमसम्प्रज्ञातसमाधिरित्यर्थः। न कार्यं प्रसज्येतेति शब्दः। तत्र कर्मलोपस्यावश्यम्भावादिति भावः। अत्र रतितृप्तिसन्तोषशब्दांस्तावद्व्याचष्टे रमणमिति। परेति स्वरूपकथनं न शब्दार्थान्तर्भूतम्। तथा च पञ्चमेऽभिधानं वक्ष्यते। तथात्वे जीवनिराकरणं च व्यर्थं स्यात् यद्दर्शनादिनिमित्तं सुखं ततोऽन्यत्र। तज्जनकं तृप्तेर्जनकम्। तृप्तिकारणं सुखमिति शेषः। इदानीमात्मशब्दस्य जीवविषयत्वप्रतीतिनिरासार्थमात्मरतिरिति समस्तं पदं व्याख्याति परमात्मेति। प्राप्त आत्मरतिरिति शेषः। अनेनात्मनि रतिर्यस्येति विग्रहः सूचितः। आत्मनो रतिर्यस्येति वा। एवमुत्तरावप्यात्मशब्दौ परमात्मार्थौ ज्ञातव्यौ। न चैवं सति तृप्तशब्दस्य परमात्मनोऽन्यत्रालम्बुद्धिरर्थः स्यात्। ततश्चेदं न वक्तव्यम्। आत्मरतिरेवेत्यवधारणेनान्यरतिनिरासेन पौनरुक्त्यप्रसङ्गादित्यत आह अन्यत्रेति। अलम्बुद्धित्वं प्राप्तस्तृप्तशब्देनोक्त इति शेषः। अलम्बुद्धिरिति पाठे तृप्तशब्दार्थ इति शेषः। अवधारणेनैवान्यत्र रत्यभावे लब्धेऽपि सर्वात्मनाऽन्यत्रालम्बुद्धिं वक्तुं तृप्त इति पुनर्वचनम्। अवधारणस्यान्यत्रालम्बुद्धिमात्रद्योतनेन चरितार्थस्यसर्वात्मना इत्यत्राप्रवृत्तेरिति भावः। ननुसन्तुष्टः इत्यनेनालम्बुद्धिजनकं सुखं प्राप्त इत्युच्यत इत्युक्तम् तत्किं विषयजन्यम् उतात्मरत्याख्यम् नाद्यः विरोधात्। न द्वितीयः तस्यात्मरतिशब्देनोक्ततया पुनरुक्तिप्रसङ्गात्। कथं चतस्यान्यत्रालम्बुद्धिजनकत्वं इत्यत आह महच्चेति। चशब्दो हेतौ। तदात्मरत्याख्यं प्रागुक्तमेव सुखं पुनरन्यत्रालम्बुद्धिकारणत्वेनोच्यतेऽतो न दोषः तस्य च महत्त्वं संशब्देनोक्तमतस्तत्कारणत्वं चोपपन्नमित्यर्थः। आत्मरतिः सन्तोषशब्देन गृह्यते चेत् पुनरात्मनीति व्यर्थमित्यत आह तत्स्थ एवेति। सन्तोषाख्यात्मरतिः केनास्य जाता इत्यपेक्षायामसम्प्रज्ञातसमाधिलक्षणया परमात्मनि स्थित्येति ज्ञापयितुं आत्मनीत्युक्तमित्यर्थः। अवधारणस्य प्रयोजनमाह नान्यदिति। अन्यदसम्प्रज्ञातसमाधिरूपात्तत्स्थत्वात् एतेनात्मरतिरेवेत्यवधारणेनास्य पुनरुक्तता परिहृता। नन्वात्मतृप्त इति कोऽयं समासः इत्यत आह आत्मनेति न केवलमात्मरत्याख्येन सुखेनं किन्तु प्रसन्नेन परमात्मनैवेत्यर्थः। पञ्चमीसमासः कथं न स्यात् इति चेत् न असामर्थ्यात्।अन्यत्र इत्यनेन ह्यस्य सामर्थ्यं न तु तृप्तशब्दार्थेन तृप्तशब्दार्थ एवान्यत्रार्थान्तरभूतोऽस्तीति चेत् न तस्य प्रकरणलब्धस्य तदन्तर्भावाभावात्। अन्यथावयं तु न वितृप्यामः इत्यत्र ततोऽन्यत्रालम्बुद्धिं न प्राप्नुम इत्यर्थप्रसङ्गात्। अस्तु तर्हि सप्तमीसमास इति नेत्याह न हीति। पूर्वविशेषणविरोधात् प्रमाणान्तरविरोधाच्चेति भावः। स्यादयं दोषो यदि तृप्तशब्दस्यालम्बुद्धिवाचित्वं स्यात्। तदेव कुतः इत्यत आह तद्वाचित्वं चेति। नन्वत्र तृप्तिशब्दः प्रीत्यर्थः न चैवं सत्यर्थानुपपत्तिः उत्तमश्लोकविक्रमैः श्रूयमाणैर्निमित्तैरन्यत्र प्रीतिं न प्राप्नुम इत्यध्याहारेणोपपत्तेरित्यत आह अध्याहारस्त्विति। गत्यन्तररहितागमनिका। अध्याहारो ह्यश्रुतशब्दकल्पनम्। तच्च कल्पकसद्भावे न दोषः अन्यथा तु दोष एव। कल्पकं च गत्यन्तरराहित्यम्। अन्यथाऽनुपपत्तिरिति यावत्। अत्र त्वलम्बुद्ध्यर्थत्वे गृहीते विनाऽप्यध्याहारेण वाक्यार्थोपपत्तेरयुक्तोऽसाविति भावः। षष्ठीसमासस्तुपूरणगुणसुहितार्थ अष्टा.2।2।11 इति प्रतिषिद्धः। अपव्याख्यानं निराचष्टे आत्मरतिरेवेति। न ज्ञानिमात्रस्येत्येवार्थः।इतोऽपि न ज्ञानिमात्रस्य कार्याभाव इत्याह स्थितप्रज्ञस्यापीति। स्वधर्मः कार्य इति सम्बन्धः। आत्मरतिरेवेत्यवधारणेऽपि कुतो न ज्ञानिमात्रविषयमेतत् इत्यत आह अन्यदेति। अवधारणेन ह्यनात्मरतिर्व्यावर्त्यते। असम्प्रज्ञातसमाधिकालादन्यदा सर्वस्य ज्ञानिनोऽपीषदन्यरतिर्भवतीत्युपपादितम् अतोऽसम्प्रज्ञातसमाधिस्थव्यतिरिक्तानां ज्ञानिनामप्यवधारणेन व्यावर्तितत्वान्न तद्विषयमेतदिति भावः। ननु ज्ञानिनामन्यरतौ विद्यमानायामपि तत्रालम्बुद्धिरप्यस्तीत्यात्मरतिरेवेत्यवधारणमुपपद्यत इत्यत आह न चेति। तत्र श्लोके तत्र कार्याभावे प्रयोजकत्वेनात्मनोऽन्यत्रालम्बुद्धिमात्रमल्पालम्बुद्धिः रतिसहचरितालम्बुद्धिरिति यावत् नोक्ता किं तर्हि सर्वात्मनाऽलम्बुद्धिः कुतः इत्यत आह आत्मेति। अवधारणेनान्यत्रालम्बुद्धौ लब्धायामपि यत्पृथगात्मतृप्त इत्यभिधत्ते तेन सर्वात्मनाऽलम्बुद्धिरवधारणेनाभिप्रेतेति ज्ञायत इति प्रागुक्तम्। अतो ज्ञानिमात्रे नेदमुपपद्यत इत्यर्थः। यस्त्वात्मरतिरेवेत्येतदसम्प्रज्ञातसमाधिस्थ एव सम्भवि तथापि यत्पतति तद्गुर्वितिवत् य एवंविधः कदाचित्तस्य सर्वदा कार्यं न विद्यत इत्येवं व्याख्याने ज्ञानिमात्रस्य कार्याभावः सेत्स्यति। न ह्यत्र यदैवं तदेति कालावच्छेदकशब्दोऽस्ति। आत्मरतिरिति समासस्तु रतेः कर्तारमेवाचष्ट इत्यत आह कर्तृशब्द इति। अयं च यदा तदेति रहितोऽपीत्यर्थः। आदिग्रहणेन यो दारान् परिगृह्णाति स गृहीत्यादेः परिग्रहः। अयं भावः तस्य कार्यं न विद्यते इत्युक्तेऽतिप्रसक्तौ सत्यामन्यव्यावर्तकंयस्त्वात्मरतिरेव स्यात् इत्यनेनोक्तम्। व्यावर्तकं च द्विविधं भवति विशेषणमुपलक्षणं चेति। तत्र व्यवच्छेद्यसमानकालं विशेषणम् यथा सिद्धान्त्युदाहृतं भाजनम्। अन्यथा तूपलक्षणं यथा पूर्वपक्ष्युदाहृतं पतनम् तत्र विशेषणं मुख्य विशेषज्ञानहेतुत्वात्। अन्यदमुख्यं वैपरीत्यात्।मुख्यामुख्ययोश्च मुख्ये कार्यसम्प्रत्ययः। न चात्र विशेषणत्वग्रहणे बाधकमस्ति येनोपलक्षणमेतदिति प्रतीम इति। कर्तृशब्द इत्युक्तस्य फलमाह अत इति। एतत्कार्यराहित्यम्।समाधावेव इत्युक्त्या समानकालतां सूचयति।न चासम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्य कार्याभावे व्याख्यायमाने कदाचिदपरोक्षज्ञानरहितस्यापि असम्प्रज्ञातसमाधिसम्भवात् कार्याभावप्रसङ्ग इति चेत् न अपरोक्षज्ञानिन एव असम्प्रज्ञातसमाधिर्भवति नान्यस्येत्यस्यार्थस्यमानवं इति पदेन भगवतैव दर्शितत्वादित्याह मानव इति।मानवः इति कथं ज्ञानिनो वाचकं इत्यत आह मन्विति। धातोर्व्याख्यानादिति शेषः। अस्माद्धातोर्भावे उप्रत्ययः। ततो मनुरवबोधोऽस्यास्तीत्यस्मिन्नर्थे मनोरयमाश्रय इत्यर्थे वाऽण्प्रत्ययः। यद्वा धातोरेव वाण्प्रत्ययः। मनुष्य इतिव्याख्यायामृष्यादिव्यावृत्तिर्वैयर्थ्यं चापद्येत। आत्मशब्दस्याप्यन्यथाव्याख्यां निराकरोति परमात्मेति।चशब्दोऽवधारणे। न स्वात्मरतिरित्यर्थः।तस्यैव इत्यवधारणादिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.17।।तर्ह्यतीव मनस्समाधानमपि न कार्यमित्यत आह यस्त्विति। रमणं परदर्शनादिनिमित्तं सुखम्। तृप्तिरन्यत्रालम्बुद्धिः। सन्तोषस्तज्जनकं सुखम्।सन्तोषस्तृप्तिकारणम् इत्यभिधानात्। परमात्मदर्शनादिनिमित्तं सुखं प्राप्तः। अन्यत्र सर्वात्मनाऽलम्बुद्धिः। महच्च तत्सुखं च तेनैवान्यत्रालम्बुद्धिरिति दर्शयति आत्मन्येव च सन्तुष्ट इति। तत्स्थ एव सन्सन्तुष्ट इत्यर्थः। नान्यत्किमपि सन्तोषकारणमित्यवधारणम्। आत्मना तृप्तः। न ह्यात्मन्यलम्बुद्धिर्युक्ता। तद्वाचित्वं चवयं तु न वितृप्याम उत्तमश्लोकविक्रमैः भाग.1।1।19 इति प्रयोगात्सिद्धम्। अध्याहारस्त्वगतिका गतिः।आत्मरतिरैव इत्यवधारणादसम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव कार्यं न विद्यते।स्थितप्रज्ञस्यापि कार्यो देहादिर्दृश्यते। यद्वास्वधर्मो मम तुष्ट्यर्थः सा हि सर्वैरपेक्षिता इति वचनाच्च पञ्चरात्रे। अन्यदाऽन्यरतिरपीषत्सर्वस्य भवति। न च तत्रालम्बुद्धिमात्रमुक्तम् आत्मतृप्त इति पृथगभिधानात्। कर्तृशब्दः कालावच्छेदेऽपि चायं प्रसिद्धःयो भुङ्क्ते स तु न ब्रूयात् इत्यादौ अतोऽसम्प्रज्ञातसमाधावेवैतत्।मानव इति ज्ञानिन एवासम्प्रज्ञातसमाधिर्भवतीति दर्शयति मनु अवबोधन इति धातोः। परमात्मरतिश्चात्र विवक्षिता।विष्णावेव रतिर्यस्य क्रिया तस्यैव नास्ति हि इति वचनात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.17।।यः तु ज्ञानयोगकर्मयोगसाधननिरपेक्षः स्वत एव आत्मरतिः आत्माभिमुखः आत्मना एव तृप्तः न अन्नपानादिभिः आत्मव्यतिरिक्तैः आत्मनि एव च सन्तुष्टः न उद्यानस्रक्चन्दनगीतवादित्रनृत्यादौ धारणपोषणभोग्यादिकं सर्वम् आत्मा एव यस्य तस्य आत्मदर्शनाय कर्तव्यं न विद्यते स्वत एव सर्वदा दृष्टात्मस्वरूपत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.17।। यस्तु सांख्यः आत्मज्ञाननिष्ठः आत्मरतिः आत्मन्येव रतिः न विषयेषु यस्य सः आत्मरतिरेव स्यात् भवेत् आत्मतृप्तश्च आत्मनैव तृप्तः न अन्नरसादिना सः मानवः मनुष्यः संन्यासी आत्मन्येव च संतुष्टः। संतोषो हि बाह्यार्थलाभे सर्वस्य भवति तमनपेक्ष्य आत्मन्येव च संतुष्टः सर्वतो वीततृष्ण इत्येतत्। यः ईदृशः आत्मवित् तस्य कार्यं करणीयं न विद्यते नास्ति इत्यर्थः।।किञ्च
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【 Verse 3.18 】
▸ Sanskrit Sloka: नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन | न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रय: ||
▸ Transliteration: naiva tasya kṛtenārtho nākṛteneha kaścana | na cāsya sarvabhūteṣu kaścidarthavyapāśrayaḥ ||
▸ Glossary: na: never; eva: certainly; tasya: his; kṛtena: by doing duty; arthaḥ: purpose; na: not; akṛtena: without doing duty; iha: in this world; kaścana: whatever; na: never; ca: and; asya: of him; sarvabhūteṣu: all living beings; kaścit: any; artha: purpose; vyapāśrayaḥ: taking shelter of
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.18 Certainly, he never has any purpose for doing his duty or for not doing his duty in this world. He does not depend on any living being.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.18।।उस (कर्मयोगसे सिद्ध हुए) महापुरुषका इस संसारमें न तो कर्म करनेसे कोई प्रयोजन रहता है और न कर्म न करनेसे ही कोई प्रयोजन रहता है तथा सम्पूर्ण प्राणियोंमें (किसी भी प्राणीके साथ) इसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.18।। इस जगत् में उस पुरुष का कृत और अकृत से कोई प्रयोजन नहीं है और न वह किसी वस्तु के लिये भूतमात्र पर आश्रित होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.18 न not? एव even? तस्य of hi? कृतेन by action? अर्थः concern? न not? अकृतेन by actions not done? इह here? कश्चन् any? न not? च and? अस्य of this man? सर्वभूतेषु in all beings? कश्चित् any? अर्थव्यपाश्रयः depending for any object.Commentary The sage who is thus rejoicing in the Self does not gain anything by doing any action. For him really no purpose is served by an action. No evil (Pratyavaya Dosha) can touch him from inaction. He does not lose anything from inaction. He need not depend upon anybody to gain a particular object. He need not exert himself to get the favour of anybody.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.18. No purpose is served for him by what he has done or by what he has not done. For him there is hardly any dependenc on any purpose among all beings.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.18 He has nothing to gain by the performance or non-performance of action. His welfare depends not on any contribution that an earthly creature can make.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.18 He has no purpose to gain by work done or left undone, nor has he to rely on any end.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.18 For him there is no concern here at all with performing action; nor any (concern) with nonperformance. Moreover, for him there is no dependence on any object to serve any purpose.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.18 For him there is no interest whatever in what is done or what is not done; nor does he depend on any being for any object.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.18 See Comment under 3.19
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.18 Thus, for such a one there is no purpose, i.e., nothing to be gained from work done as a means for the vision of the self, nor is he subject to any evil or calamity from work left undone, because his vision of the self does not rest on any external means. To such a person who has turned by himself away from non-intelligent matter which is different from the self, there is nothing acceptable as a purpose to be gained from the constituents of Prakrti and their products; only if there were such a purpose, there would be the need for the means of retreat therefrom. For, the adoption of the means is only for effecting such a retreat. But he is verily liberated.
Non-pursuit of the means for vision of the self is only for that person whose vision of the self no longer depends on any means. But Karma Yoga is better in gaining the vision of the self for one who is in pursuit of the means for that vision, because it is easy to perfom, because it is secure from possible error, because the contemplation of the true nature of the self is included in it, and because even for a Jnana Yogin the performance of minimum activity is necessary. For these reasons, Karma Yoga is better as a means for the vision of the Atman.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.18 Moreover, tasya, for him, who rejoices in the supreme Self; na, there is no; artham, concern; eva, at all; krtena, with performing action. Objection: In that case, let there be some evil called sin owing to non-performance! Reply: Iha, here, in this world; na, nor is there; for him kascana, any (concern); akrtena, with nonperfromance. Certainly there is no evil in the form of incurring sin or in the form of self-destruction. Ca, moreover; asya, for him; na asti, there is no; kascit artha-vyapasrayah sarva-bhutesu, dependence on any object, from Brahma to an unmoving thing, to serve any purpose. Vyapasrayah is the same as vyapasrayanam, dependence, which is possible of being created by action promted by necessity. (For him) there is no end to gain by depending on any praticular object, due to which there can be some action for that purpose. 'You (Arjuna) are not established in this fullest realization which is comparable to a flood all around.'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.18।। सामान्य मनुष्य कर्म में दो कारणों से प्रवृत्त होता है (क) कर्म करने से (कृत) कुछ लाभ की आशा और (ख) कर्म न करने से (अकृत) किसी हानि का भय। परन्तु जिसने अपने परम पूर्ण आत्मस्वरूप को साक्षात् कर लिया ऐसे तृप्त और सन्तुष्ट पुरुष को कर्म करने अथवा न करने से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता क्योंकि उसे न अधिक लाभ की आशा होती है और न हानि का भय। आत्मानुभूति में स्थित वह पुरुष आनन्द के लिये किसी भी वस्तु या व्यक्ति पर आश्रित नहीं होता। परमार्थ दृष्टि से बाह्य विषय रूप जगत् आत्मस्वरूप से भिन्न नहीं है। वास्तव में आत्मा ही अविद्या वृत्ति से जगत् के रूप में प्रतीत होता है।चूँकि तुमने समुद्र के समान पूर्णत्व प्राप्त नहीं किया है इसलिए
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.18।। चतुर्थपादं विवृणोति नैवेति। तस्यात्मरतेः कृतेन कर्मणाभ्युदयार्थेन ज्ञानार्थेन मोक्षार्थेन वा प्रयोजनं नैवास्ति। स्वर्गस्य तुच्छरुपेण ज्ञातत्वात्। ज्ञानस्य जातत्वात्नास्त्यकृतः कृतेन इतिश्रुत्या मोक्षस्य कर्माकार्यत्वप्रतिपादनात्। अस्तु तर्ह्यकृतेन प्रत्यवायाख्योऽर्थ इत्यत आह नेति। इह लोके कश्चिदपि प्रत्यवायप्राप्तिरुपः स्वहानिलक्षणोऽर्थो नास्ति आत्मरतेः नित्यकरणेऽधिकृतत्वाभावात्। तस्मिन्काले प्रत्यवायजनकभावरुपविहितान्यकर्मणि तस्य व्यापृतत्वाभावाच्च। यतो यत्किंचिदपि कस्मादपि तस्य साध्यं नास्तीत्याह नचेति। अस्य सर्वभूतेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु कश्चिदर्थोऽर्थामाश्रयणीयः सेवनीयो नास्ति येन तदर्था क्रियानुष्ठेया स्यात्। अस्मिन्श्लोके भूमिकारुढस्येत्यादिशब्दस्याभावेनाप्रासङ्गिकं वासिष्ठोक्तभूमिकाप्रदर्शनं कैश्चित्कृतमिति बोध्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.18।।नन्वात्मविदोऽप्यभ्युदयार्थं निःश्रेयसार्थं प्रत्यवायपरिहारार्थं वा कर्म स्यादित्यतआह तस्यात्मरतेः कृतेन कर्मणाभ्युदयलक्षणो निःश्रेयसलक्षणो वाऽर्थः प्रयोजनं नैवास्ति। तस्य स्वर्गाद्यभ्युदयानर्थित्वात् निःश्रेयसस्य च कर्मासाध्यत्वात्। तथाचं श्रुतिःपरीक्ष्य लोकान्कर्मचितान्ब्राह्मणो निर्वेदमायान्नास्त्यकृतः कृतेन इति। अकृतो नित्यो मोक्षः कृतेन कर्मणा नास्तीत्यर्थः। ज्ञानसाध्यस्यापि व्यावृत्तिरेवकारेण सूचिता। आत्मरूपस्य हि निःश्रेयसस्य नित्यप्राप्तस्याज्ञानमात्रमप्राप्तिः। तच्च तत्वज्ञानमात्रापनोद्यम्। तस्मिंस्तत्त्वज्ञानेनापनुन्ने तस्यात्मविदो न किंचित्कर्मसाध्यं ज्ञानसाध्यं वा प्रयोजनमस्तीत्यर्थः। एवंभूतेनापि प्रत्यवायपरिहारार्थं कर्माण्यनुष्ठेयान्येवेत्यत आह नाकृतेनेति भावे निष्ठा। नित्यकर्माकरणेनेह लोके गर्हितत्वरूपः प्रत्यवायप्राप्तिरूपो वा कश्चनार्थो नास्ति। सर्वत्रोपपत्तिमाहोत्तरार्धेन। चो हेतौ। यस्मादस्यात्मविदः सर्वभूतेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु कोऽप्यर्थव्यपाश्रयः प्रयोजनसंबन्धो नास्ति कंचिद्भूतविशेषमाश्रित्य कोऽपि क्रियासाध्योऽर्थो नास्तीति वाक्यार्थः। अतोऽस्य कृताकृते निष्प्रयोजने।नैनं कृताकृते तपतः इति श्रुतेः।तस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशत आत्मा ह्येषां स भवति इति श्रुतेर्देवा अपि तस्य मोक्षाभवनाय न समर्था इत्युक्तेर्न विघ्नाभावार्थमपि देवाराधनरूपकर्मानुष्ठानमित्यभिप्रायः। एतादृशो ब्रह्मविद्भूमिकासप्तकभेदेन निरूपितो वसिष्ठेनज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा परिकीर्तिता। विचारणा द्वितीया स्यात्तृतीया तनुमानसा।।सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका। पदार्थाभावनी षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता इति। तत्र नित्यानित्यवस्तुविवेकादिपुरःसरा फलपर्यवसायिनी मोक्षेच्छा प्रथमा। ततो गुरुमुपसृत्य वेदान्तवाक्यविचारः श्रवणमननात्मको द्वितीया। ततो निदिध्यासनाभ्यासेन मनस एकाग्रतया सूक्ष्मवस्तुग्रहणयोग्यत्वं तृतीया। एतद्भूमिकात्रयं साधनरूपं जाग्रदवस्थोच्यते योगिभिः अभेदेन जगतो भानात्। तदुक्तम्भूमिकात्रितयं त्वेतद्राम जाग्रदिति स्थितम्। यथावद्भेदबुद्ध्येदं जगज्जाग्रति दृश्यते।। इति। ततो वेदान्तवाक्यान्निर्विकल्पको ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारश्चतुर्थी भूमिका फलरूपा सत्त्वापत्तिः स्वप्नावस्थोच्यते। सर्वस्यापि जगतो मिथ्यात्वेन स्फुरणात्। तदुक्तंअद्वैते स्थैर्यमायाते द्वैते प्रशममागते। पश्यन्ति स्वप्नवल्लोकं चतुर्थी भूमिकामिताः।। इति। सोऽयं चतुर्थभूमिं प्राप्तो योगी ब्रह्मिविदित्युच्यते। पञ्चमीषष्ठीसप्तम्यस्तुं भूमिका जीवन्मुक्तेरेवावान्तरभेदाः। तत्र सविकल्पकसमाध्यभ्यासेन निरुद्धे मनसि या निर्विकल्पकसमाध्यवस्था साऽसंसक्तिरिति सुषुप्तिरिति चोच्यते। ततः स्वयमेव व्युत्थानात्। सोऽयं योगी ब्रह्मविद्वरः। ततस्तदभ्यासपरिपाकेण या चिरकालावस्थायिनी सा पदार्थाभावनीति गाढसुषुप्तिरिति चोच्यते। ततः स्वयमनुत्थितस्य योगिनः परप्रयत्नेनैव व्युत्थानात् सोऽयं ब्रह्मविद्वरीयान्। उक्तंहिपञ्चमीं भूमिकामेत्य सुषुप्तिपदनामिकाम्। षष्ठीं गाढसुषुप्त्याख्यां क्रमात्पतति भूमिकाम्।। इति। यस्यास्तु समाध्यवस्थायाः न स्वतो न वा परतो व्युत्थितो भवति सर्वथा भेददर्शनाभावात् किंतु सर्वदा तन्मय एव स्वप्रयत्नमन्तरेणैव परमेश्वरप्रेरितप्राणवायुवशादन्यैर्निर्वाह्यमाणदैहिकव्यवहारः परिपूर्णपरमानन्दघन एव सर्वतस्तिष्ठति सा सप्तमी तुरीयावस्था। तां प्राप्तो ब्रह्मविद्वरिष्ठ इत्युच्यते। उक्तंहिषष्ठ्यां भूम्यामसौ स्थित्वा सप्तमीं भूमिमाप्नुयात्। किंचिदेवैष संपन्नस्त्वथवैष न किंचन।।विदेहमुक्तता तूक्ता सप्तमी योगमूमिका। अगम्या वचसां शान्ता सा सीमा योगभूमिषु।। इति। यामधिकृत्य श्रीमद्भागवते स्मर्यतेदेहं च नश्वरमवस्थिमुत्थितं वा सिद्धो न पश्यतियतोऽध्यगमत्स्वरूपम्। दैवादुपेतमथ दैववशादपेतं वासो यथा परिकृतं मदिरामदान्धः।।देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत्स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः। तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः।। इति। श्रुतिश्चतद्यथाऽहिनिर्ल्वयनी वल्मीके मृता प्रत्यस्ता शयीतैवमेवेदं शरीरं शेतेऽथायमशरीरो मृतः प्राणो ब्रह्मैव तेज एव इति। तत्रायं संग्रहः चतुर्थीभूमिकाज्ञानं तिस्रः स्युः साधनं पुरा। जीवन्मुक्तेरवस्थास्तु परास्तिस्रः प्रकीर्तिताः।। अत्र प्रथमभूमित्रयमारूढोऽज्ञोऽपि न कर्माधिकारी किं पुनस्तत्त्वज्ञानी तद्विशिष्टो जीवन्मुक्तो वेत्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.18।।एतदेवाह नैवेति। तस्यात्मरतेः कृतेन कर्मणार्थः प्रयोजनं नास्ति। स्वर्गादौ लिप्साभावात्। मोक्षस्य चाक्रियासाध्यत्वात्नास्त्यकृतः कृतेन इति श्रुतेः। अकृतो मोक्षः कृतेन कर्मणा नास्तीति श्रुत्यर्थः। अकृतेन विरुद्धकर्मणाप्यर्थो नरकादिरस्य नास्ति। अत्र कृताकृतशब्दौ मित्रामित्रपदवत्परस्परविरुद्धार्थवाचितया पुण्यपापवचनौ। ये तु अकृतेनेति भावे निष्ठा। नित्याकरणाद्गर्हितत्वरूपो वा प्रत्यवायप्राप्तिरूपो वा कश्चनार्थो विदुषो नास्तीति व्याचक्षते। तेषामप्यभावात् भावोत्पत्तेरनभ्युपगमान्नित्यानां काले यदन्यदविहितं क्रियते तत एव प्रत्यवायोत्पादो वक्तव्य इति घट्टकुट्यां प्रभातवृत्तान्त आपद्यते। अत्रोपपत्तिमाह न चेति। चो हेतौ। यस्मादात्मरतेः सर्वभूतेषु चेतनाचेतनेषूत्तममध्यमाधमेषु कश्चिदप्यर्थव्यपाश्रयः सुखभोगात्मकप्रयोजनाभिसंबन्धो नास्ति आत्मरतित्वादेव निष्कामत्वाद्विदुषः पुण्यपापफलसंबन्धो नास्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.18।।तस्य तादृशस्य भक्तस्य कृतेनापि कर्मणा अर्थः प्रयोजनं पुण्यादिरूपं नास्तीत्यर्थः। अकृतेन च कश्चन प्रत्यवायपापादिकं च नास्तीत्यर्थः। अस्य भक्तस्य सर्वभूतेषु देवादिषु अर्थार्थं मोक्षभक्त्याद्यर्थं च व्यपाश्रय आश्रयो नास्तीत्यर्थः।
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Chapter 3 (Part 12)
Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.18।।तत्र हेतुमाह नैव तस्येति। कृतेन कर्मणा तस्यार्थः पुण्यं नैवास्ति। न चाकृतेन कश्चन कोऽपि प्रत्यवायोऽस्ति। निरहंकारत्वेन विधिनिषेधातीतत्वात् तथापितस्मात्तदेषां न प्रियं यदेतन्मनुष्या विदुः इति श्रुतेर्मोक्षे देवकृतविघ्नसंभवात्तत्परिहारार्थ कर्मभिर्देवाः सेव्या इत्याशङ्क्योक्तम्। सर्वभूतेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु कश्चिदप्यर्थञ्यपाश्रयः आश्रय एव व्यपाश्रयः। अर्थे मोक्ष आश्रयणीयोऽस्य नास्तीत्यर्थः। विघ्नाभावस्य श्रुत्यैवोक्तत्वात्। तथाच श्रुतिःतस्य ह न देवाश्च नाभूत्या ईशते आत्मा ह्येषां स भवति इति। हनेत्यव्ययमप्यर्थे। देवा अपि तस्यात्मतत्त्वज्ञास्याभूत्यै ब्रह्मताप्रतिबन्धनायनेशते न शक्नुवन्तीति श्रुतेरर्थः। देवकृतास्तु विघ्नाः सभ्यग्ज्ञानोत्पत्तेः प्रागेवयदेतद्ब्रह्म मनुष्या विदुस्तदेषां देवानां न प्रियम् इति श्रुत्या ब्रह्मज्ञानस्यैवाप्रियत्वोक्त्या तत्रैव विघ्नकर्तृत्वस्य सूचितत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.18।।नैवेति। तस्य कृतेन निषिद्धेन चार्थः फलं सुखदुःखादि नास्ति। किञ्चार्थार्थमाश्रयः कश्चिन्नास्ति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.18।।क्योंकि उस परमात्मामें प्रीतिवाले पुरुषका इस लोकमें कर्म करनेसे कोई प्रयोजन ही नहीं रहता है। तो फिर कर्म न करनेसे उसको प्रत्यवायरूप अनर्थकी प्राप्ति होती होगी ( इसपर कहते हैं ) उसके न करनेसे भी उसे इस लोकमें कोई प्रत्यवायप्राप्तिरूप या आत्महानिरूप अनर्थकी प्राप्ति नहीं होती तथा ब्रह्मासे लेकर स्थावरतक सब प्राणियोंमें उसका कुछ भी अर्थव्यपाश्रय नहीं होता। किसी फलके लिये ( किसी प्राणिविशेषका ) जो क्रियासाध्य आश्रय है उसका नाम अर्थव्यपाश्रय है सो इस आत्मज्ञानीको किसी प्राणिविशेषका सहारा लेकर कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं करना है जिससे कि उसे तदर्थक किसी क्रियाका आरम्भ करना पड़े। परन्तु तू इस सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयस्थानीय यथार्थ ज्ञानमें स्थित नहीं है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.18।। व्याख्या नैव तस्य कृतेनार्थः प्रत्येक मनुष्यकी कुछनकुछ करनेकी प्रवृत्ति होती है। जबतक यह करनेकी प्रवृत्ति किसी सांसारिक वस्तुकी प्राप्तिके लिये होती है तबतक उसका अपने लिये करना शेष रहता ही है। अपने लियेकुछनकुछ पानेकी इच्छासे ही मनुष्य बँधता है। उस इच्छाकी निवृत्तिके लिये कर्तव्यकर्म करनेकी आवश्यकता है।कर्म दो प्रकारसे किये जाते हैं। कामनापूर्तिके लिये और कामनानिवृत्तिके लिये। साधारण मनुष्य तो कामनापूर्तिके लिये कर्म करते हैं पर कर्मयोगी कामनानिवृत्तिके लिये कर्म करता है। इसलिये कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषमें कोई भी कामना न रहनेके कारण उसका किसी भी कर्तव्यसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता। उसके द्वारा निःस्वार्थभावसे समस्त सृष्टिके हितके लिये स्वतः कर्तव्यकर्म होते हैं।कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषका कर्मोंसे अपने लिये (व्यक्तिगत सुखआरामके लिये) कोई सम्बन्ध नहीं रहता। इस महापुरुषका यह अनुभव होता है कि पदार्थ शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदि केवल संसारके हैं और संसारसे मिले हैं व्यक्तिगत नहीं हैं। अतः इनके द्वारा केवल संसारके लिये ही कर्म करना है अपने लिये नहीं। कारण यह है कि संसारकी सहायताके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता। इसके अलावा मिली हुई कर्मसामग्रीका सम्बन्ध भी समष्टि संसारके साथ ही है अपने साथ नहीं। इसलिये अपना कुछ नहीं है। व्यष्टिके लिये समष्टि हो ही नहीं सकती। मनुष्यकी यही गलती होती है कि वह अपने लिये समष्टिका उपयोग करना चाहता है इसीसे उसे अशान्ति होती है। अगर वह शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदिका समष्टिके लिये उपयोग करे तो उसे महान् शान्ति प्राप्त हो सकती है। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषमें यही विशेषता रहती है कि उसके कहलानेवाले शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदिका उपयोग मात्र संसारके लिये ही होता है। अतः उसका शरीरादिकी क्रियाओंसे अपना कोई प्रयोजन नहीं रहता। प्रयोजन न रहनेपर भी उस महापुरुषसे स्वाभाविक ही लोगोंके लिये आदर्शरूप उत्तम कर्म होते हैं। जिसका कर्म करनेसे प्रयोजन रहता है उससे आदर्श कर्म नहीं होते यह सिद्धान्त है।नाकृतेनेह कश्चन जो मनुष्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिसे अपना सम्बन्ध मानता है और आलस्य प्रमाद आदिमें रुचि रखता है वह कर्मोंको नहीं करना चाहता क्योंकि उसका प्रयोजन प्रमाद आलस्य आराम आदिसे उत्पन्न तामससुख रहता है (गीता 18।39)। परन्तु यह महापुरुष जो सात्त्विक सुखसे भी ऊँचा उठ चुका है तामस सुखमें प्रवृत्त हो ही कैसे सकता है क्योंकि इसका शरीरादिसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता फिर आलस्यआराम आदिमें रुचि रहनेका तो प्रश्न ही नहीं उठता। मार्मिक बात प्रायः साधक कर्मोंके न करनेको ही महत्त्व देते हैं। वे कर्मोंसे उपरत होकर समाधिमें स्थित होना चाहते हैं जिससे कोई भी चिन्तन बाकी न रहे। यह बात श्रेष्ठ और लाभप्रद तो है पर सिद्धान्त नहीं है। यद्यपि प्रवृत्ति(करना) की अपेक्षा निवृत्ति (न करना) श्रेष्ठ है तथापि यह तत्त्व नहीं है।प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना) दोनों ही प्रकृतिके राज्यमें हैं। निर्विकल्प समाधितक सब प्रकृतिका राज्य है क्योंकि निर्विकल्प समाधिसे भी व्युत्थान होता है। क्रियामात्र प्रकृतिमें ही होती है प्रकर्षेण करणं (भावे ल्युट्) इति प्रकृतिः और क्रिया हुए बिना व्युत्थानका होना सम्भव ही नहीं। इसलिये चलने बोलने देखने सुनने आदिकी तरह सोना बैठना खड़ा होना मौन होना मूर्च्छित होना और समाधिस्थ होना भी क्रिया है (टिप्पणी प0 142)। वास्तविक तत्त्व(चेतन स्वरूप) में प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही नहीं हैं। वह प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंका निर्लिप्त प्रकाशक है।शरीरसे तादात्म्य होनेपर ही (शरीरको लेकर) करना और न करना ये दो विभाग (द्वन्द्व) होते हैं। वास्तवमें करना और न करना दोनोंकी एक ही जाति है। शरीरसे सम्बन्ध रखकर न करना भी वास्तवमें करना ही है। जैसे गच्छति (जाता है) क्रिया है ऐसे ही तिष्ठति (खड़ा है) भी क्रिया ही है। यद्यपि स्थूल दृष्टिसे गच्छति में क्रिया स्पष्ट दिखायी देती है और तिष्ठति में क्रिया नहीं दिखायी देती है तथापि सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो जिस शरीरमें जाने की क्रिया थी उसीमें अब खड़े रहने की क्रिया है। इसी प्रकार किसी कामको करना और न करना इन दोनोंमें ही क्रिया है। अतः जिस प्रकार क्रियाओंका स्थूलरूपसे दिखायी देना (प्रवृत्ति) प्रकृतिमें ही है उसी प्रकार स्थूल दृष्टिसे क्रियाओंका दिखायी न देना (निवृत्ति) भी प्रकृतिमें ही है। जिसका प्रकृति एवं उसके कार्यसे भौतिक तथा आध्यात्मिक और लौकिक तथा पारलौकिक कोई प्रयोजन नहीं रहता उस महापुरुषका करने एवं न करनेसे कोई स्वार्थ नहीं रहता।जडताके साथ सम्बन्ध रहनेपर ही करने और न करनेका प्रश्न होता है क्योंकि जडताके सम्बन्धके बिना कोई क्रिया होती ही नहीं। इस महापुरुषका जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और प्रवृत्ति एवं निवृत्ति दोनोंसे अतीत सहजनिवृत्ततत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है। अतः साधकको जडता(शरीरमें अहंता और ममता) से सम्बन्धविच्छेद करनेकी ही आवश्यकता है। तत्त्व तो सदा ज्योंकात्यों विद्यमान है ही।न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः शरीर तथा संसारसे किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध न रहनेके कारण उस महापुरुषकी समस्त क्रियाएँ स्वतः दूसरोंके हितके लिये होती हैं। जैसे शरीरके सभी अङ्ग स्वतः शरीरके हितमें लगे रहते हैं ऐसे ही उस महापुरुषका अपना कहलानेवाला शरीर (जो संसारका एक छोटासा अङ्ग है) स्वतः संसारके हितमें लगा रहता है। उसका भाव और उसकी सम्पूर्ण चेष्टाएँ संसारके हितके लिये ही होती हैं। जैसे अपने हाथोंसे अपना ही मुख धोनेपर अपनेमें स्वार्थ प्रत्युपकार अथवा अभिमानका भाव नहीं आता ऐसे ही अपने कहलानेवाले शरीरके द्वारा संसारका हित होनेपर उस महापुरुषमें किञ्चित् भी स्वार्थ प्रत्युपकार अथवा अभिमानका भाव नहीं आता।पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सिद्ध महापुरुषके लिये कहा कि उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है तस्य कार्यं न विद्यते। उसका हेतु बताते हुए भगवान्ने इस श्लोकमें उस महापुरुषके लिये तीन बातें कही हैं (1) कर्म करनेसे उसका कोई प्रयोजन नहीं रहता (2) कर्म न करनेसे भी उसका कोई प्रयोजन नहीं रहता और (3) किसी भी प्राणी और पदार्थसे उसका किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् कुछ पानेसे भी उसका कोई प्रयोजन नहीं रहता।वस्तुतः स्वरूपमें करने अथवा न करनेका कोई प्रयोजन नहीं है और किसी व्यक्ति तथा वस्तुके साथ कोई सम्बन्ध भी नहीं है। कारण कि शुद्ध स्वरूपके द्वारा कोई क्रिया होती ही नहीं। जो भी क्रिया होती है वह प्रकृति और प्रकृतिजन्य पदार्थोंके सम्बन्धसे ही होती है। इसलिये अपने लिये कुछ करनेका विधान ही नहीं है।जबतक मनुष्यमें करनेका राग पानेकी इच्छा जीनेकी आशा और मरनेका भय रहता है तबतक उसपर कर्तव्यका दायित्व रहता है। परन्तु जिसमें किसी भी क्रियाको करने अथवा न करनेका कोई राग नहीं है संसारकी किसी भी वस्तु आदिको प्राप्त करनेकी इच्छा नहीं है जीवित रहनेकी कोई आशा नहीं है और मृत्युसे कोई भय नहीं है उसे कर्तव्य करना नहीं पड़ता प्रत्युत उससे स्वतः कर्तव्यकर्म होते रहते हैं।जहाँ अकर्तव्य होनेकी सम्भावना हो वहीं कर्तव्य पालनकी प्रेरणा रहती है।विशेष बात गीतामें भगवान्की ऐसी शैली रही है कि वे भिन्नभिन्न साधनोंसे परमात्माकी ओर चलनेवाले साधकोंके भिन्नभिन्न लक्षणोंके अनुसार ही परमात्माको प्राप्त सिद्ध महापुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन करते हैं। यहाँ सत्रहवेंअठारहवें श्लोकोंमें भी इसी शैलीका प्रयोग किया गया है।जो साधन जहाँसे प्रारम्भ होता है अन्तमें वहीं उसकी समाप्ति होती है। गीतामें कर्मयोगका प्रकरण यद्यपि दूसरे अध्यायके उन्तालीसवें श्लोकसे प्रारम्भ होता है तथापि कर्मयोगके मूल साधनका विवेचन दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें किया गया है। उस श्लोक (2। 47) के चार चरणोंमें बताया गया है(1) कर्मण्येवाधिकारस्ते (तेरा कर्म करनेमें ही अधिकार है)(2) मा फलेषु कदाचन (कर्मफलोंमें तेरा कभी भी अधिकार नहीं है)।(3) मा कर्मफलहेतुर्भूः (तू कर्मफलका हेतु मत बन)।(4) मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (तेरी कर्म न करनेमें आसक्ति न हो)।प्रस्तुत श्लोक (3। 18) में ठीक उपर्युक्त साधनाकी सिद्धिकी बात है। वहाँ (2। 47) में दूसरे और तीसरे चरणमें साधकके लिये जो बात कही गयी है वह प्रस्तुत श्लोकके उत्तरार्धमें सिद्ध महापुरुषके लिये कही गयी है कि उसका किसी प्राणी और पदार्थसे कोई स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता। वहाँ पहले और चौथे चरणमें साधकके लिये जो बात कही गयी है वह प्रस्तुत श्लोकके पूर्वार्धमें सिद्ध महापुरुषके लिये कही गयी है कि उसका कर्म करने अथवा न करने दोनोंसे ही कोई प्रयोजन नहीं रहता। इस प्रकार सत्रहवेंअठारहवें श्लोकोंमें कर्मयोग से सिद्ध हुए महापुरुषके लक्षणोंका ही वर्णन किया गया है।कर्मयोगके साधनकी दृष्टिसे वास्तवमें अठारहवाँ श्लोक पहले तथा सत्रहवाँ श्लोक बादमें आना चाहिये। कारण कि जब कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषका कर्म करने अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता तथा उसका किसी भी प्राणीपदार्थसे किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता। तब उसकी रति तृप्ति और संतुष्टि अपनेआपमें ही हो जाती है। परन्तु सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने मोघं पार्थ स जीवति पदोंसे कर्तव्यपालन न करनेवाले मनुष्यके जीनेको निरर्थक बतलाया था अतः सत्रहवें श्लोकमें यः तु पद देकर यह बतलाते हैं कि यदि सिद्ध महापुरुष कर्तव्यकर्म नहीं करता तो उसका जीना निरर्थक नहीं है प्रत्युत महान् सार्थक है। कारण कि उसने मनुष्यजन्मके उद्देश्यको पूरा कर लिया है। अतः उसके लिये अब कुछ भी करना शेष नहीं रहा।जिस स्थितिमें कोई भी कर्तव्य शेष नहीं रहता उस स्थितिको साधारणसेसाधारण मनुष्य भी प्रत्येक अवस्थामें तत्परता एवं लगनपूर्वक निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करनेपर प्राप्त कर सकता है क्योंकि उसकी प्राप्तिमें सभी स्वतन्त्र और अधिकारी हैं। कर्तव्यका सम्बन्ध प्रत्येक परिस्थितिसे जुड़ा हुआ है। इसलिये प्रत्येकपरिस्थितिमें कर्तव्य निहित रहता है। केवल सुखलोलुपतासे ही मनुष्य कर्तव्यको भूलता है। यदि वह निःस्वार्थभावसे दूसरोंकी सेवा करके अपनी सुखलोलुपता मिटा डाले तो जीवनके सभी दुःखोंसे छुटकारा पाकर परम शान्तिको प्राप्ति हो सकता है। इस परम शान्तिकी प्राप्तिमें सबका समान अधिकार है। संसारके सर्वोपरि पदार्थ पद आदि सबको समानरूपसे मिलने सम्भव नहीं हैं किन्तु परम शान्ति सबको समानरूपसेही मिलती है। सम्बन्ध पीछेके दो श्लोकोंमें वर्णित महापुरुषकी स्थितिको प्राप्त करनेके लिये साधकको क्या करना चाहिये इसपर भगवान् आगेके श्लोकमें साधन बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.17 3.19।।यश्चेत्यादि पूरुष इत्यन्तम्। आत्मरतेस्तु कर्म इन्द्रियव्यापारतयैव कुर्वतः करणाकरणेषु समता। अत एव नासौ भूतेषु किंचिदात्मप्रयोजनमपेक्ष्य निग्रहानुग्रहौ करोति अपि तु करणीयमिदम् इत्येतावता। तस्मादसक्त एव करणीयं कर्म कुर्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.18।।इतश्चात्मविदो न किंचित्कर्तव्यमित्याह किञ्चेति। अभ्युदयनिःश्रेयसयोरन्यतरत्प्रयोजनं कृतेन सुकृतेनात्मविदो भविष्यतीत्याशङ्क्याह नैवेति। प्रत्यवायनिवृत्तये स्वरूपप्रच्युतिप्रत्याख्यानाय वा कर्म स्यादित्याशङ्क्याह नेत्यादिना। ब्रह्मादिषु स्थावरान्तेषु भूतेषु कंचिद्भूतविशेषमाश्रित्य कश्चिदर्थो विदुषः साध्यो भविष्यति तदर्थं तेन कर्तव्यं कर्मेत्याशङ्क्याह नचेति। तत्राद्यं पादमादत्ते नैवेति। तं व्याचष्टे तस्येति। आत्मविदः स्वर्गाद्यभ्युदयानर्थित्वं निःश्रेयसस्य च प्राप्तत्वान्न कृतं कर्मार्थवदित्यर्थः। आत्मविदा चेत्कर्म न क्रियते तर्हि तेनाकृतेन तस्यानर्थो भविष्यतीति तत्प्रत्याख्यानार्थं तस्य कर्तव्यं कर्मेति शङ्कते तर्हीति। द्वितीयपादेनोत्तरमाह नेत्यादिना। अतो न तन्निवृत्त्यर्थं कृतमर्थवदिति शेषः। द्वितीयं भागं विभजते नचास्येति। व्यपाश्रयणमालम्बनं नेति संबन्धः। पदार्थमुक्त्वा वाक्यार्थमाह कंचिदिति। भूतविशेषस्याश्रितस्यापि क्रियाद्वारा प्रयोजनप्रसवहेतुत्वमिति मत्वाह येनेति। तर्हि मयापि यथोक्तं तत्त्वमाश्रित्य त्याज्यमेव कर्मेत्यर्जुनस्य मतमाशङ्क्याह न त्वमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.18।।यदीयं कार्याभावोक्तिर्न ज्ञानिमात्रस्य किन्त्वसम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यैव तर्हिनैव तस्य कृतेनार्थः इत्युत्तरं वाक्यं न सम्बध्यते असम्प्रज्ञातसमाधेः करणस्यैवाभावेन तत्प्रयोजनाभावकथनस्यैवायोगात् ज्ञानिनस्तु करणसम्भवेन तत्प्रयोजनप्रतिषेधोपपत्तिरिति चेत् न तर्ह्यतीव मनस्समाधानमपि न कार्यमित्याक्षेपस्यतस्य कार्यं न विद्यते 3।17 इत्युत्तरं कस्मादुक्तं कर्मकृतिकाले त्वयाऽहमुद्बोधनीय इति कञ्चित्प्रत्युक्त्वा समाहितस्तेन योगशास्त्रोदितोपायैरुद्बोधितः कर्म करोतीति कुतो नोक्तम् इत्याशङ्खानिरासायेदमेवमुच्यत इत्यभिप्रेत्य व्याचष्टे तस्येति। तस्यासम्प्रज्ञातसमाधिस्थस्यार्थो नास्तीति सम्बन्धः। उक्त्वोद्बुद्धस्येति शेषः। एवं तर्हि तस्यैव महत्सुखत्वादित्याद्युक्तिविरोध इत्यत उक्तम् आत्मेति। समो वाऽऽत्मरत्या। समप्रतिषेधः कैमुत्यार्थः। न तु समव्ययफलं कर्मानुष्ठीयते। नन्वत्र कश्चनेत्यस्य विशेष्याकाङ्क्षायां सन्निधानादर्थ इति सम्बध्यते। तथा चेदमयुक्तम्। न हि कर्माकरणेऽर्थप्राप्तिरस्ति येन प्रतिषेधः सङ्गच्छते। अर्थसन्निधानादपि योग्यताया बलवत्त्वात्कश्चन दोष इत्यध्याह्रियत। तथाप्यश्वमेधाद्यकृतौ प्रत्यवायाप्राप्तेः प्रतिषेधोऽसङ्गत एवेत्यतोनाकृतेन इत्येतत् व्याचष्टे न चेति। मा भूद्यज्ञादिकरणार्थमुत्थानं नित्यनैमित्तिकाकरणे प्रत्यवायप्राप्तेः तदर्थं तु स्यादित्याशङ्कानिरासार्थमेतत्। सन्ध्येति तत्कालेऽनुष्ठेयं कर्मोच्यते। मा भूदल्पस्य यज्ञादेरनुष्ठाने प्रयोजनाभावः सन्ध्याद्यकृतौ प्रत्यवायश्च तथापि गुरुदेवतादिपूजाकरणाकरणयोरर्थप्रत्यवायौ स्यातामेव। अतस्तत्सन्निधिप्राप्तावुत्थानमावश्यकमेवेत्याशङ्कानिरासार्थंन चास्य इत्युक्तं तदयुक्तम् उक्तविरोधादेवेत्यतो व्याचष्टे न चैतदिति। एतदसम्प्रज्ञातसमाधानं अपहायोत्थितस्येति शेषः।अपहाय इत्यनेन गुर्वादिपूजाया अपि आधिक्यं निषेधति आधिक्यस्यैव पूर्वत्यागोपयोगित्वात्। सर्वभूतेषु गुर्वादिषु। नन्वर्थव्यपाश्रयो नामार्थप्राप्तिः तथा च सर्वभूतेभ्य इति स्यादित्यत आह अर्थ इति। अनेनार्थस्य व्यपाश्रयः प्राप्तिर्येन दर्शनादिना व्यापारेण भवतीति व्यधिकरणो बहुव्रीहिरयमित्युक्तं भवति। तथा च दर्शनादेर्विषया गुर्वादय इति सप्तम्युपपत्तिः। अनेनानर्थव्यपाश्रयोऽप्युपलक्ष्यते। स्यादेतत् किमनेनायासेन ज्ञानिमात्रविषयमेतत्किं न स्यात् ज्ञानमात्रेण प्रत्यवायाभावात्तत्राप्यस्यार्थस्य सम्भवात्। अवधारणादेश्चोपचरितार्थत्वसम्भवादित्यत आह ज्ञानेति तज्ज्ञानमात्रम्। इतिशब्दो हेतौ। एतत्कार्याभाववचनं प्रत्युत विरोधि इति हृदयम्। प्रत्यवायो न भवतीत्यङ्गीकृत्योक्तम्। वस्तुतस्तु ज्ञानिनोऽप्यस्ति। प्रतिषिद्धकर्मकरणादिनाऽनिष्टप्राप्तिरित्याह ईषदिति। सूचिते च तदैव चित्तखेदः। उपलक्षणं चैतत्। मुक्तावानन्दह्रास इत्यपि द्रष्टव्यम्। (पुनश्च) मुक्तावानन्दह्रास इति श्रीनिवासतीर्थः। उपलक्षणमिति कृष्णाचार्यटिप्पणी। तथा विहितकरणे नानन्दवृद्धिरपीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.18।।तस्य कर्मकाले वक्तव्योऽहमिति कञ्चित्प्रत्युक्त्वा तत्कृतावात्मरत्यधिकः प्तमो वाऽर्थो नास्ति। न च सन्ध्याद्यकृतौ कश्चिद्दोषोऽस्ति। न चैतदपहाय सर्वभूतेषु कश्चित्प्रयोजनाश्रयः। अर्थो येन दर्शनादिना भवति सोऽर्थव्यपाश्रयः। ज्ञानमात्रेण यद्यपि प्रत्यवायो न भवति तदर्जुनस्यपि सममिति न तस्य कर्मोपदेशोपयोग्ये तद्भवति। ईषत्प्रारब्धानर्थसूचकं च तद्भवति। महच्चेद्वृत्रहत्यादिवत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.18।।अत एव तस्य आत्मदर्शनाय कृतेन तत्साधनेन न अर्थः न किञ्चित् प्रयोजनम् अकृतेन आत्मदर्शनसाधनेन न कश्चिद् अनर्थः असाधनायत्तात्मदर्शनत्वात्। स्वत एवात्मव्यतिरिक्तसकलाचिद्वस्तुविमुखस्य अस्य सर्वेषु प्रकृतिपरिणामविशेषेषु आकाशादिषु भूतेषु सकार्येषु न कश्चित् प्रयोजनतया साधनतया वा व्यपाश्रयः यतः तद्विमुखीकरणाय साधनारम्भः स हि मुक्त एव।यस्माद् असाधनायत्तात्मदर्शनस्य एव साधनाप्रवृत्तिः यस्मात् च साधने प्रवृत्तस्य अपि सुशकत्वाद् अप्रमादत्वात् तदन्तर्गतात्मयाथात्म्यानुसन्धानत्वाद् च ज्ञानयोगिनः अपि देहयात्रायाः कर्मानुवृत्त्यपेक्षत्वात् च कर्मयोग एव आत्मदर्शननिर्वृत्तौ श्रेयान्
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.18।। नैव तस्य परमात्मरतेः कृतेन कर्मणा अर्थः प्रयोजनमस्ति। अस्तु तर्हि अकृतेन अकरणेन प्रत्यवायाख्यः अनर्थः न अकृतेन इह लोके कश्चन कश्चिदपि प्रत्यवायप्राप्तिरूपः आत्महानिलक्षणो वा नैव अस्ति। न च अस्य सर्वभूतेषु ब्रह्मादिस्थावरान्तेषु भूतेषु कश्चित् अर्थव्यपाश्रयः प्रयोजननिमित्तक्रियासाध्यः व्यपाश्रयः व्यपाश्रयणम् आलम्बनं कञ्चित् भूतविशेषमाश्रित्य न साध्यः कश्चिदर्थः अस्ति येन तदर्था क्रिया अनुष्ठेया स्यात्। न त्वम् एतस्मिन् सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीये सम्यग्दर्शने वर्तसे।।यतः एवम्
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【 Verse 3.19 】
▸ Sanskrit Sloka: तस्मादसक्त: सततं कार्यं कर्म समाचर | असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुष: ||
▸ Transliteration: tasmādasaktaḥ satataṁ kāryaṁ karma samācara | asakto hyācaran karma paramāpnoti pūruṣaḥ ||
▸ Glossary: tasmāt: therefore, asaktaḥ: without attachment, satataṁ: always, kāryaṁ: work, karma: work, samācara: perform, asaktaḥ: not attached, hi: certainly, ācaran: performing, karma: work, paraṁ: supreme, āpnoti: achieves, pūruṣaḥ: man
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.19 Therefore, one should work always without attachment. Performing work without attachment, certainly, man achieves the Supreme.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.19।।इसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्मका भलीभाँति आचरण कर क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.19।। इसलिए तुम अनासक्त होकर सदैव कर्तव्य कर्म का सम्यक् आचरण करो क्योकि अनासक्त पुरुष कर्म करता हुआ परमात्मा को प्राप्त होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.19 तस्मात् therefore? असक्तः without attachment? सततम् always? कार्यम् which should be done? कर्म action? समाचर perform? असक्तः without attachment? हि because? आचरन् performing? कर्म action? परम् the Supreme? आप्नोति attains? पूरुषः man.Commentary If you perform actions without attachment? for the sake of the Lord? you will attain to Selfrealisation through purity of heart. (Cf.II.64IV.19?23XVIII.49).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.19. Therefore, unattached always, you should perform action that is to be performed; for, the person, performing action without attachment, attains the Supreme.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.19 Therefore do thy duty perfectly, without care for the results, for he who does his duty disinterestedly attains the Supreme.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.19 Therefore without attachment do your work which ought to be done. For, a man who works without attachment attains to the Supreme.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.19 Therefore, remaining unattached, always perform the obligatory duty, for, by performing (one's) duty without attachment, a person attains the Highest.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.19 Therefore without attachment, do thou always perform action which should be done; for by performing action without attachment man reaches the Supreme.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.17-19 Yas ca etc. upto purusah. However, for a person who rejoices in the Self and performs action simply as a [routine] business of organs of action, there is no difference between (his) action and nonaciton. That is why he inflicts punishment on, or does favour to, every being, not with desire for any gain for himself, but with a conviction that it a is thing that deserves to be performed. Therefore, just unattached, one should perform action that is to be performed.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.19 Therefore, considering that work has to be performed with detachment, you perform it, considering yourself a non-agent. This will be declared in the words 'with detachment' and 'which ought to be done,' meaning that one attains the Supreme by Karma Yoga itself.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.19 Since this is so, therefore, asaktah, remaining unattached; samacara, perform; satatam, always; karyam, the obligatory; daily karma, duty; hi, for; acaran, by performing; (one's) karma, duty; asaktah, without attachment, by doing work as a dedication to God; purusah, a person; apnoti, attains; param, the Highest, Liberation, through the purification of the mind. This is meaning. And (you should perform your duty) for the following reason also:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.19।। भगवान् श्रीकृष्ण उपदेश के समय यह मानकर चलते हैं कि अर्जुन इस विषय में पूर्णतया अनभिज्ञ है परन्तु साथ ही वे उस पर केवल अपने विचार को थोपना भी नहीं चाहते जिन्हें अन्धविश्वासपूर्वक वह स्वीकार कर ले। धर्म परिवर्तन कराना वेदान्त का कार्य नहीं। हिन्दू लोग इससे अनभिज्ञ हैं। कोई भी विधेयात्मक (ऐसा करो) उपदेश देने के पूर्व विस्तार से तर्क प्रस्तुत किये जाते हैं। कर्म के चक्र को पूर्णत बताने के बाद अब इस श्लोक में वे अन्तिम निर्णय पर पहुँच कर अर्जुन को कर्म करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।इसलिये समाज और राष्ट्र के एक योग्य नागरिक होने के नाते तुम सदैव करणीय कर्तव्यों को सम्यक् प्रकार से करो। यहाँ फिर एक बार सब कर्मों में अनासक्त रहने पर बल दिया गया है। आसक्ति अहंकार अहंकारमूलक इच्छा। अत अनासक्ति का अर्थ है अहंकार और स्वार्थ का परित्याग। इसके पूर्व आसक्ति से वासनाओं की उत्पत्ति के विषय में बताया जा चुका है।निम्नांकित कारण से भी तुमको कर्म करने चाहिये।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.19।। तव तु चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानार्थ कर्मण्यधिकारः। तस्मादसक्तः फलासक्तिवर्जितः कार्यमवश्यंकर्तव्यं नित्यं नैमित्तिकं च कर्म सर्वदा समाचार। हि यस्मात्पुरुषोऽसक्तः कर्म समाचरन् ईश्वरार्थ कर्म कुर्वन् सत्त्वशुद्धिद्वारा ज्ञानप्राप्त्या परं मोक्षं प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.19।।यस्मान्न त्वमेवंभूतो ज्ञानी किंतु कर्माधिकृत एव मुमुक्षुः। असक्तः फलकामनारहितः। सततं सर्वदा नतु कदाचित् कार्यमवश्यकर्तव्यं यावज्जीवादिश्रुतिचोदितम्तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुत्यज्ञाने विनियुक्तं कर्म नित्यनैमित्तिकलक्षणं सम्यगाचर यथाशास्त्रं निर्वर्तय। असक्तो हि यस्मादाचरन्नीश्वरार्थं कर्म कुर्वन्सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण परं मोक्षमाप्नोति पूरुषः पुरुषः स एव सत्पुरुषो नान्य इत्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.19।।यस्मान्निष्कामस्य कर्मलेपो नास्ति तस्मात्त्वमप्यसक्तः फलासक्तिशून्यः सततं सर्वदा कार्यमवश्यकर्तव्यं कर्म नित्यनैमित्तिकं समाचर। हि यस्मादसक्तः कर्माचरन् परं मोक्षं सत्त्वशुद्धिद्वारेणाप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.19।।यतो भक्तानां कर्मादिकरणे अकरणे वा न कोऽपि पुरुषार्थो हानिर्वाऽस्ति अतस्त्वमपि मदाज्ञारूपत्वेनावश्यकर्त्तव्यत्वात्कर्म कुर्वित्याह तस्मादिति। यस्माद्भगवद्भक्तानां कर्मकरणे न फलम् अकरणे च न प्रत्यवायः तस्मात्तेष्वसक्तोऽनासक्तः सन् सततं कार्यं नित्यकर्म समाचर कुरु। नन्वनासक्तेनापि कृतं कर्म बाधकं भवत्येवेति चेदत आह असक्त इति। पुरुषः पुरुषांशो भोक्ताधिकारी। हीति निश्चयेन असक्तः न तु कापट्येन कर्म आचरन् परं मोक्षं प्राप्नोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.19।। यस्मादेवंभूतस्य ज्ञानिन एव कर्मानुपयोगो नान्यस्य तस्मात्त्वं कर्म कुर्विल्याह तस्मादिति। असक्तः फलसङ्गरहितः सन्कार्यमवश्यकर्तव्यतया विहितं नित्यनैमित्तिकं कर्म सम्यगाचर। हि यस्मादसक्तः कर्माचरन्पुरुषः परं मोक्षं चित्तशुद्धिं ज्ञानद्वारा प्राप्नोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.19।।त्वं तु न साङ्ख्यज्ञानवान्। यतः तस्मादसक्तः कार्यं कर्म कुरु। त्वमिति साङ्ख्ययोगतत्त्वम्। यस्ययद्विहितं नित्यं नैमित्तिकं तदाचरन् असक्तः पुरुषो ब्रह्मविदाप्नोति परं पदम्। भगवदर्थमिति वाऽसङ्गपदार्थः। न हि कामव्यतिरेकेण कर्ममात्रं कश्चिद्देहाभिमानी करोति। नच अहरहः सन्ध्यामुपासीत इत्यादौ नित्ये कर्मणि कामफलाश्रवणान्नैवमिति वाच्यम् तत्रापि विधिप्रयोगेन कामफलकल्पनात् प्रत्यवायपरिहारस्यापि तत्त्वाच्च। ज्योतिष्टोमे स्वर्गकामवत्। अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तिः। अतो भगवत्कामनया कर्म कार्यमित्युक्तं भवति तदग्रे स्फुटीकरिष्यते।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.19।।जब कि ऐसी बात है इसलिये तू आसक्तिरहित होकर कर्तव्य नित्यकर्मोंका सदा भलीभाँति आचरण किया कर। क्योंकिअनासक्त होकर कर्म करनेवाला अर्थात् ईश्वरार्थ कर्म करता हुआ पुरुष अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा मोक्षरूप परमपद पा लेता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.19।। व्याख्या तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर पूर्वश्लोकोंसे इस श्लोकका सम्बन्ध बतानेके लिये यहाँ तस्मात् पद आया है। पूर्वश्लोकोंमें भगवान्ने कहा कि अपने लिये कर्म करनेकी कोई आवश्यकता न रहनेपर भी सिद्ध महापुरुषके द्वारा लोकसंग्रहार्थ क्रियाएँ हुआ करती हैं। इसलिये अर्जुनको भी उसी तरह (निष्कामभावसे) कर्तव्यकर्म करते हुए परमात्माको प्राप्त करनेकी आज्ञा देनेके लिये भगवान्ने तस्मात् पदका प्रयोग किया है। कारण कि अपने स्वरूप स्व के लिये कर्म करने और न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। कर्म सदैव पर(दूसरों) के लिये होता है स्व के लिये नहीं। अतः दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्म करनेका राग मिट जाता है और स्वरूपमें स्थिति हो जाती है।अपने स्वरूपसे विजातीय (जड) पदार्थोंके प्रति आकर्षणको आसक्ति कहते हैं। आसक्तिरहित होनेके लिये आसक्तिके कारणको जानना आवश्यक है। मैं शरीर हूँ और शरीर मेरा है ऐसा माननेसे शरीरादि नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व अन्तःकरणमें अङ्कित हो जाता है। इसी कारण उन पदार्थोंमें आसक्ति हो जाती है।आसक्ति ही पतन करनेवाली है कर्म नहीं। आसक्तिके कारण ही मनुष्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि जड पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मानकर अपने आराम सुखभोगके लिये तरहतरहके कर्म करता है। इस प्रकार जडतासे आसक्तिपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही मनुष्यके बारम्बार जन्ममरणका कारण होता है कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे जडतासे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है।आसक्तिवाला मनुष्य दूसरोंका हित नहीं कर सकता जबकि आसक्तिरहित मनुष्यसे स्वतःस्वाभाविक प्राणिमात्रका हित होता है। उसके सभी कर्म केवल दूसरोंके हितार्थ होते हैं।संसारसे प्राप्त सामग्री(शरीरादि) से हमने अभीतक अपने लिये ही कर्म किये हैं। उसको अपने ही सुखभोग और संग्रहमें लगाया है। इसलिये संसारका हमारेपर ऋण है जिसे उतारनेके लिये केवल संसारके हितके लिये कर्म करना आवश्यक है। अपने लिये (फलकी कामना रखकर) कर्म करनेसे पुराना ऋण तो समाप्त होता नहीं नया ऋण और उत्पन्न हो जाता है। ऋणसे मुक्त होनेके लिये बारबार संसारमें आना पड़ता है। केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करनेसे पुराना ऋण समाप्त हो जाता है और अपने लिये कुछ न करने तथा कुछ न चाहनेसे नया ऋण उत्पन्न नहीं होता। इस तरह जब पुराना ऋण समाप्त हो जाता है और नया ऋण उत्पन्न नहीं होता तब बन्धनका कोई कारण न रहनेसे मनुष्य स्वतः मुक्त हो जाता है।कोई भी कर्म निरन्तर नहीं रहता पर आसक्ति (अन्तःकरणमें) निरन्तर रहा करती है इसलिये भगवान् सततम् असक्तः पदोंसे निरन्तर आसक्तिरहित होनेके लिये कहते हैं। मेरेको कहीं भी आसक्त नहीं होना है ऐसी जागृति साधकको निरन्तर रखनी चाहिये। निरन्तर आसक्तिरहित रहते हुए जो विहितकर्म सामने आ जाय उसे कर्तव्यमात्र समझकर कर देना चाहिये ऐसा उपर्युक्त पदोंका भाव है।वास्तवमें देखा जाय तो किसीके भी अन्तःकरणमें आसक्ति निरन्तर नहीं रहती। जब संसार निरन्तर नहीं रहता प्रतिक्षण बदलता रहता है तब उसकी आसक्ति निरन्तर कैसे रह सकती है ऐसा होते हुए भी मानेहुए अहम् के साथ आसक्ति निरन्तर रहती हुई प्रतीत होती है।कार्यम् अर्थात् कर्तव्य उसे कहते हैं जिसको कर सकते हैं और जिसको अवश्य करना चाहिये। दूसरे शब्दोंमें कर्तव्यका अर्थ होता है अपने स्वार्थका त्याग करके दूसरोंका हित करना अर्थात् दूसरोंकी उस शास्त्रविहित न्याययुक्त माँगको पूरा करना जिसे पूरा करनेकी सामर्थ्य हमारेमें है। इस प्रकार कर्तव्यका सम्बन्ध परहितसे है।कर्तव्यका पालन करनेमें सब स्वतन्त्र और समर्थ हैं कोई पराधीन और असमर्थ नहीं है। हाँ प्रमाद और आलस्यके कारण अकर्तव्य करनेका बुरा अभ्यास (आदत) हो जानेसे तथा फलकी इच्छा रहनेसे ही वर्तमानमें कर्तव्यपालन कठिन मालूम देता है अन्यथा कर्तव्यपालनके समान सुगम कुछ नहीं है। कर्तव्यका सम्बन्ध परिस्थितिके अनुसार होता है। मनुष्य प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक कर्तव्यका पालन कर सकता है। कर्तव्यका पालन करनेसे ही आसक्ति मिटती है। अकर्तव्य करने तथा कर्तव्य न करनेसे आसक्ति और बढ़ती है। कर्तव्य अर्थात् दूसरोंके हितार्थ कर्म करनेसे वर्तमानकी आसक्ति और कुछ न चाहनेसे भविष्यकी आसक्ति मिट जाती है।समाचर पदका तात्पर्य है कि कर्तव्यकर्म बहुत सावधानी उत्साह तथा तत्परतासे विधिपूर्वक करने चाहिये। कर्तव्यकर्म करनेमें थोड़ी भी असावधानी होनेपर कर्मयोगकी सिद्धिमें बाधा लग सकती है।वर्ण आश्रम प्रकृति (स्वभाव) और परिस्थितिके अनुसार जिस मनुष्यके लिये जो शास्त्रविहित कर्तव्यकर्म बताया गया है अवसर प्राप्त होनेपर उसके लिये वही सहज कर्म है। सहज कर्ममें यदि कोई दोष दिखायी दे तो भी उसका त्याग नहीं करना चाहिये (गीता 18। 48) क्योंकि सहज कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता (गीता 18। 47) इसीलिये यहाँ भगवान् अर्जुनको मानो यह कह रहे हैं कि तू क्षत्रिय है अतः युद्ध करना (घोर दीखनेपर भी) तेरा सहज कर्म है घोर कर्म नहीं। अतः सामने आये हुए सहज कर्मको अनासक्त होकर कर देना चाहिये। अनासक्त होनेपर ही समता प्राप्त होती है।विशेष बातजब जीव मनुष्ययोनिमें लेता है तब उसको शरीर धन जमीन मकान आदि सब सामग्री मिलती है और जब वह यहाँसे जाता है तब सब सामग्री यहीं छूट जाती है। इस सीधीसादी बातसे यह सहज ही सिद्ध होता है कि शरीरादि सब सामग्री मिली हुई है अपनी नहीं है। जैसे मनुष्य काम करनेके लिये किसी कार्यालय (आफिस) में जाता है तो उसे कुर्सी मेज कागज आदि सब सामग्री कार्यालयका काम करनेके लिये ही मिलती है अपनी मानकर घर ले जानेके लिये नहीं। ऐसे ही मनुष्यको संसारमें शरीरादि सब सामग्री संसारका काम (सेवा) करनेके लिये ही मिली है अपनी माननेके लिये नहीं। मनुष्य तत्परता और उत्साहपूर्वक कार्यालयका काम करता है तो उस कामके बदलेमें उसे वेतन मिलता है। काम कार्यालयके लिये होता है और वेतन अपने लिये। इसी प्रकार संसारके लिये ही सब काम करनेसे संसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और योग (परमात्माके साथ अपने नित्य सम्बन्ध) का अनुभव हो जाता है। कर्म और योग दोनों मिलकर कर्मयोग कहलाता है। कर्म संसारके लिये होता है और योग अपने लिये। यह योग ही मानो वेतन है।संसार साधनका क्षेत्र है। यहाँ प्रत्येक सामग्री साधनके लिये मिलती है भोग और संग्रहके लिये कदापि नहीं। सांसारिक सामग्री अपनी और अपने लिये है ही नहीं। अपनी वस्तु परमात्मतत्त्व मिलनेपर फिर अन्य किसी वस्तुको पानेकी इच्छा नहीं रहती (गीता 6। 22)। परन्तु सांसारिक वस्तुएँ चाहे जितनी प्राप्त हो जायँ पर उन्हें पानेकी इच्छा कभी मिटती नहीं प्रत्युत और बढ़ती है।जब मनुष्य मिली हुई वस्तुको अपनी और अपने लिये मान लेता है तब वह अपनी इस भूलके कारण बँध जाता है। इस भूलको मिटानेके लिये कर्मयोगका अनुष्ठान ही सुगम और श्रेष्ठ उपाय है। कर्मयोगी किसी भी वस्तुको अपनी और अपने लिये न मानते हुए उसे दूसरोंकी सेवामें (उन्हींकी मानकर) लगाता है। अतः वह सुगमतापूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।कर्म तो सभी प्राणी किया करते हैं पर साधारण प्राणी और कर्मयोगीद्वारा किये गये कर्मोंमें बड़ा भारी अन्तर होता है। साधारण मनुष्य (कर्मी) आसक्ति ममता कामना आदिको साथ रखते हुए कर्म करता है और कर्मयोगी आसक्ति ममता कामना आदिको छोड़कर कर्म करता है। कर्मीके कर्मोंका प्रवाह अपनी तरफ होता है और कर्मयोगीके कर्मोंका प्रवाह संसारकी तरफ। इसलिये कर्मी बँधता है और कर्मयोगी मुक्त होता है।असक्तो ह्याचरन्कर्म मनुष्य ही आसक्तिपूर्वक संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ता है संसार नहीं। अतः मनुष्यका कर्तव्य है कि वह संसारके हितके लिये ही सब कर्म करे और बदलेमें उनका कोई फल न चाहे। इस प्रकार आसक्तिरहित होकर अर्थात् मुझे किसी से कुछ नहीं चाहिये इस भावसे संसारके लिये कर्म करनेसे संसारसे स्वतः सम्बन्धविच्छेद हो जाता है।कर्मयोगी संसारकी सेवा करनेसे वर्तमानकी वस्तुओंसे और कुछ न चाहनेसे भविष्यकी वस्तुओंसे सम्बन्धविच्छेद करता है।मेलेमें स्वयंसेवक अपना कर्तव्य समझकर दिनभर यात्रियोंकी सेवा करते हैं और बदलेमें किसीसे कुछ नहीं चाहते अतः रात्रिमें सोते समय उन्हें किसीकी याद नहीं आती। कारण कि सेवा करते समय उन्होंने किसीसे कुछ चाहा नहीं। इसी प्रकार जो सेवाभावसे दूसरोंके लिये ही सब कर्म करता है और किसीसे मान बड़ाई आदि कुछ नहीं चाहता उसे संसारकी याद नहीं आती। वह सुगमतापूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।कर्म तो सभी किया करते हैं पर कर्मयोग तभी होता है जब आसक्तिरहित होकर दूसरोंके लिये कर्म किये जाते हैं। आसक्ति शास्त्रहित कर्तव्यकर्म करनेसे ही मिट सकती है धर्म तें बिरति (मानस 3। 16। 1)। शास्त्रनिषिद्ध कर्म करनेसे आसक्ति कभी नहीं मिट सकती।परमाप्नोति पुरुषः जैसे तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने परम् पदसे सांख्ययोगीके परमात्माको प्राप्त होनेकी बात कही ऐसी ही यहाँ परम् पदसे कर्मयोगीके परमात्माको प्राप्त होनेकी बात कहते हैं। तात्पर्य यह है कि साधक (रुचि विश्वास और योग्यताके अनुसार) किसी भी मार्ग कर्मयोग ज्ञानयोग या भक्तियोगपर क्यों न चले उसके द्वारा प्राप्तव्य वस्तु एक परमात्मा ही हैं (गीता 5। 45)। प्राप्तव्य तत्त्व वही हो सकता है जिसकी प्राप्तिमें विकल्प सन्देह और निराशा न हो तथा जो सदा हो सब देशमें हो सब कालमें हो सभीके लिये हो सबका अपना हो और जिस तत्त्वसे कोई कभी किसी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी अलग न हो सके अर्थात् जो सबको सदा अभिन्नरूपसे स्वतः प्राप्त हो। शङ्का कर्म करते हुए कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान कैसे मिट सकता क्योंकि कर्तृत्वाभिमान मिटे बिना परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं हो सकता। समाधान साधारण मनुष्य सभी कर्म अपने लिये करता है। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्यमें कर्तृत्वाभिमान रहता है। कर्मयोगी कोई भी क्रिया अपने लिये नहीं करता। वह ऐसा मानता है कि संसारसे शरीर इन्द्रियाँमन बुद्धि पदार्थ रुपये आदि जो कुछ सामग्री मिली है वह सब संसारकी ही है अपनी नहीं। जब कभी अवसर मिलता है तभी वह सामग्री समय सामर्थ्य आदिको संसारकी सेवामें लगा देता है उनको संसारकी सेवामें लगाते हुए कर्मयोगी ऐसा मानता है कि संसारकी वस्तु ही संसारकी सेवामें लगा रहा हूँ अर्थात् सामग्री समय सामर्थ्य आदि उन्हींके हैं जिनकी सेवा हो रही है। ऐसा माननेसे कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता।कर्तृत्वमें कारण है भोक्तृत्व। कर्मयोगी भोगकी आशा रखकर कर्म करता ही नहीं। भोगकी आशावाला मनुष्य कर्मयोगी नहीं होता। जैसे अपने हाथोंसे अपना ही मुख धोनेपर यह भाव नहीं आता कि मैंने बड़ा उपकार किया है क्योंकि मनुष्य हाथ और मुख दोनोंको अपने ही अंग मानता है ऐसे ही कर्मयोगी भी शरीरको संसारका ही अङ्ग मानता है। अतः यदि अङ्गने अङ्गीकी ही सेवा की है तो उसमें कर्तृत्वाभिमान कैसायह नियम है कि मनुष्य जिस उद्देश्यको लेकर कर्ममें प्रवृत्त होता है कर्मके समाप्त होते ही वह उसी लक्ष्यमें तल्लीन हो जाता है। जैसे व्यापारी धनके उद्देश्यसे ही व्यापार करता है तो दूकान बंद करते ही उसका ध्यान स्वतः रुपयोंकी ओर जाता है और वह रुपये गिनने लगता है।उसका ध्यान इस और नहीं जाता कि आज कौनकौन ग्राहक आये किसकिस जातिके आये आदिआदि। कारण कि ग्राहकोंसे उसका कोई प्रयोजन नहीं। संसारका उद्देश्य रखकर कर्म करनेवाला मनुष्य संसारमें कितना ही तल्लीन क्यों न हो जाय पर उसकी संसारसे एकता नहीं हो सकती क्योंकि वास्तवमें संसारसे एकता है ही नहीं। संसार प्रतिक्षण परिवर्तनशील और जड है जबकि स्वयं (अपना स्वरूप) अचल और चेतन है। परन्तु परमात्माका उद्देश्य रखकर कर्म करनेवालेकी परमात्मासे एकता हो ही जाती है (चाहे साधकको इसका अनुभव हो या न हो) क्योंकि स्वयं की परमात्माके साथ स्वतःसिद्ध (तात्त्विक) एकता है। इस प्रकार जब कर्ता कर्तव्य बनकर अपने उद्देश्य(परमात्मतत्त्व) के साथ एक हो जाता है तब कर्तृत्वाभिमानका प्रश्न ही नहीं रहता।कर्मयोगी जिस उद्देश्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये सब कर्म करता है उस(परमात्मतत्त्व) में कर्तृत्वाभिमान अथवा कर्तृत्व (कर्तापन) नहीं है। अतः प्रत्येक क्रियाके आदि और अन्तमें उस उद्देश्यके साथ एकताका अनुभव होनेके कारण कर्मयोगीमें कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता।प्राणिमात्रके द्वारा किये हुए प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है। कोई भी कर्म निरन्तर नहीं रहता। अतः किसीका भी कर्तृत्व निरन्तर नहीं रहता प्रत्युत कर्मका अन्त होनेके साथ ही कर्तृत्वका भी अन्त हो जाता है। परन्तु मनुष्यसे भूल यह होती है कि जब वह कोई क्रिया करता है तब तो अपनेको उस क्रियाका कर्ता मानता ही है पर जब उस क्रियाको नहीं करता तब भी अपनेको वैसा ही कर्ता मानता रहता है। इस प्रकार अपनेको निरन्तर कर्ता मानते रहनेसे उसका कर्तृत्वाभिमान मिटता नहीं प्रत्युत दृढ़ होता है। जैसे कोई पुरुष व्याख्यान देते समय तो वक्ता (व्याख्यानदाता) होता है पर जब दूसरे समयमें भी वह अपनेको वक्ता मानता रहता है तब उसका कर्तृत्वाभिमान नहीं मिटता। अपनेको निरन्तर व्याख्यानदाता माननेसे ही उसके मनमें यह भाव आता है कि श्रोता मेरी सेवा करें मेरा आदर करें मेरी आवश्यकताओंकी पूर्ति करें और मैं इन साधारण आदमियोंके पास कैसे बैठ सकता हूँ मैं यह साधारण काम कैसे कर सकता हूँ आदि। इस प्रकार उसका व्याख्यानरूप कर्मके साथ निरन्तर सम्बन्ध बना रहता है। इसका कारण है व्याख्यानरूप कर्मसे धन मान बड़ाई आराम आदि कुछनकुछ पानेका भाव होना। यदि अपने लिये कुछ भी पानेका भाव न रहे तो कर्तापन केवल कर्म करनेतक ही सीमित रहता है और कर्म समाप्त होते ही कर्तापन अपने उद्देश्यमें लीन हो जाता है।जैसे मनुष्य भोजन करते समय ही अपनेको उसका भोक्ता अर्थात् भोजन करनेवाला मानता है भोजनकरनेके बाद नहीं ऐसे ही कर्मयोगी किसी क्रियाको करते समय ही अपनेको उस क्रियाका कर्ता मानता है अन्य समय नहीं। जैसे कर्मयोगी व्याख्यानदाता है और लोगोंमें उसकी बहुत प्रतिष्ठा है। परन्तु कभी व्याख्यान सुननेका काम पड़ जाय तो वह कहीं भी बैठकर सुगमतापूर्वक व्याख्यान सुन सकता है। उस समय उसे न आदरकी आवश्यकता है न ऊँचे आसनकी क्योंकि तब वह अपनेको श्रोता मानता है व्याख्यानदाता नहीं। कभी व्याख्यान देनेके बाद उसे कोई कमरा साफ करनेका काम प्राप्त हो जाय तो वह उस कामको वैसी ही तत्परतासे करता है जैसी तत्परतासे वह व्याख्यान देनेका कार्य करता है। उसके मनमें थोड़ा भी यह भाव नहीं आता कि इतना बड़ा व्याख्यानदाता होकर मैं यह कमरासफाईका तुच्छ काम कैसे कर सकता हूँ लोग क्या कहेंगे मेरी इज्जत धूलमें मिल जायगी इत्यादि। वह अपनेको व्याख्यान देते समय व्याख्यानदाता कथाश्रवणके समय श्रोता और कमरा साफ करते समय कमरा साफ करनेवाला मानता है। अतः उसका कर्तृत्वाभिमान निरन्तर नहीं रहता। जो वस्तु निरन्तर नहीं रहती अपितु बदलती रहती है वह वास्तवमें नहीं होती और उसका सम्बन्ध भी निरन्तर नहीं रहता यह सिद्धान्त है। इस सिद्धान्तपर दृष्टि जाते ही साधकको वास्तविका(कर्तृत्वाभिमानसे रहित स्वरूप) का अनुभव हो जाता है।कर्मयोगी सब क्रियाएँ उसी भावसे करता है जिस भावसे नाटकमें एक स्वाँगधारी पात्र करता है। जैसे नाटकमें हरिश्चन्द्रका स्वाँग नाटक(खेल) के लिये ही होता है और नाटक समाप्त होते ही हरिश्चन्द्ररूप स्वाँगका स्वाँगके साथ ही त्याग हो जाता है ऐसे ही कर्मयोगीका कर्तापन भी स्वाँगके समान केवल क्रिया करनेतक ही सीमित रहता है। जैसे नाटकमें हरिश्चन्द्र बना हुआ व्यक्ति हरिश्चन्द्रकी सब क्रियाएँ करते हुए भी वास्तवमें अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता (वास्तविक हरिश्चन्द्र) नहीं मानता ऐसे ही कर्मयोगी शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी वास्तवमें अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता नहीं मानता। कर्मयोगी शरीरादि सब पदार्थोंको स्वाँगकी तरह अपना और अपने लिये न मानकर उन्हें (संसारका मानते हुए) संसारकी ही सेवामें लगाता है। अतः किसी भी अवस्थामें कर्मयोगीमें किञ्चिन्मात्र भी कर्तृत्वाभिमान नहीं रह सकता।कर्मयोगी जैसे कर्तृत्वको अपनेमें निरन्तर नहीं मानता ऐसे ही मातापिता स्त्रीपुत्र भाईभौजाई आदिके साथ अपना सम्बन्ध भी निरन्तर नहीं मानता। केवल सेवा करते समय ही उसके साथ अपना सम्बन्ध (सेवा करनेके लिये ही) मानता है। जैसे यदि कोई पति है तो पत्नीके लिये पति है अर्थात् पत्नी कर्कशा हो कुरूपा हो कलह करनेवाली हो पर उसे पत्नीरूपमें स्वीकार कर लिया तो अपनी योग्यता सामर्थ्यके अनुसार उसका भरणपोषण करना पतिका कर्तव्य है। पतिके नाते उसके सुधारकी बात कह देनी है चाहे वह माने या न माने। हर समय अपनेको पति नहीं मानना है क्योंकि इस जन्मसे पहले वह पत्नी थी इसका क्या पता और मरनेके बाद भी वह पत्नी रहेगी इसका भी क्या निश्चय तथा वर्तमानमें भी वह किसीकी माँ है किसीकी पुत्री है किसीकी बहन है किसीकी भाभी है किसीकी ननद है आदिआदि। वह सदा पत्नी ही तो है नहीं। ऐसा माननेसे उससे सुख लेनेकी इच्छा स्वतः मिटती है और केवल भरणपोषण (सेवा) करनेके लिये ही पत्नी है यह मान्यता दृढ़ होती है। इस प्रकार कर्मयोगीको संसारमें पिता पुत्र पति भाई आदिके रूपमें जो स्वाँग मिला है उसे वह ठीकठीक निभाता है। दूसरा अपने कर्तव्यका पालन करता है या नहीं उसकी ओर वह नहीं देखता। अपनेमें कर्तृत्वाभिमान होनेसे ही दूसरोंके कर्तव्यपर दृष्टि जाती है और दूसरोंके कर्तव्यपर दृष्टि जाते ही मनुष्य अपने कर्तव्यसे गिर जाता है क्योंकि दूसरेका कर्तव्य देखना अपना कर्तव्य नहीं है।जिस प्रकार कर्मयोगी संसारके प्राणियोंके साथ अपना सम्बन्ध निरन्तर नहीं मानता उसी प्रकार वर्ण आश्रम जाति सम्प्रदाय घटना परिस्थिति आदिके साथ भी अपना सम्बन्ध निरन्तर नहीं मानता। जो वस्तु निरन्तर नहीं है उसका अभाव स्वतः है। अतः कर्मयोगीका कर्तृत्वाभिमान स्वतः मिट जाता है।मार्मिक बातजिसमें कर्तृत्व नहीं है उस परमात्माके साथ प्राणिमात्रकी स्वतःसिद्ध एकता है। साधकसे भूल यह होती है कि वह इस वास्तविकताकी तरफ ध्यान नहीं देता।जिस प्रकार झूला कितनी ही तेजीसे आगेपीछे क्यों न जाय हर बार वह समता (सम स्थिति) में आता ही है अर्थात् जहाँसे झूलेकी रस्सी बँधी है उसकी सीधमें (आगेपीछे जाते समय) एक बार आता ही है उसी प्रकार प्रत्येक क्रियाके बाद अक्रिय अवस्था (समता) आती ही है। दूसरे शब्दोंमें पहली क्रियाके अन्त तथा दूसरी क्रियाके आरम्भके बीच और प्रत्येग संकल्प तथा विकल्पके बीच समता रहती ही है।दूसरी बात यदि वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो झूला चलते हुए (विषम दीखनेपर) भी
Chapter 3 (Part 13)
निरन्तर समतामें ही रहता है अर्थात् झूला आगेपीछे जाते समय भी निरन्तर (जहाँसे झूलेकी रस्सी बँधी है उसकी) सीधमें ही रहता है। इसी प्रकार जीव भी प्रत्येक क्रियामें समतामें ही स्थित रहता है। परमात्मासे उसकी एकता निरन्तर रहती है। क्रिया करते समय समतामें स्थिति न दीखनेपर भी वास्तवमें समता रहती ही है जिसका कोई अनुभव करना चाहे तो क्रिया समाप्त होते ही (उस समताका) अनुभव हो जाता है। यदि साधक इस विषयमें निरन्तर सावधान रहे तो उसे निरन्तर रहनेवाली समता या परमात्मासे अपनी एकताका अनुभव हो जाता है जहाँ कर्तृत्व नहीं है।माने हुए कर्तृत्वाभिमानको मिटानेके लिये प्रतीति और प्राप्तका भेद समझ लेना आवश्यक है। जो दीखता है पर मिलता नहीं उसे प्रतीति कहते हैं और जो मिलता है पर दीखता नहीं उसे प्राप्त कहते हैं। देखनेसुनने आदिमें आनेवाला प्रतिक्षण परिवर्तनशील संसार प्रतीति है और सर्वत्र नित्य परिपूर्ण परमात्मतत्त्व प्राप्त है। परमात्मतत्त्व ब्रह्मासे चींटीपर्यन्त सबको समानरूपसे स्वतः प्राप्त है।इदंतासे दीखनेवाली प्रतीतिका प्रतिक्षण अभाव हो रहा है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदृश्यमें जा रहा है। जिनसे प्रतीति होती है वे इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि भी प्रतीति ही हैं। नित्य अचल रहनेवाले स्वयं को प्रतीतिकी प्राप्ति नहीं होती। सदा सबमें रहनेवाला परमात्मतत्त्व स्वयं को नित्यप्राप्त है। इसलिये प्रतीति अभावरूप और प्राप्त भावरूप है नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)।यावन्मात्र पदार्थ और क्रिया प्रतीति है। क्रियामात्र अक्रियतामें लीन होती है। प्रत्येक क्रियाके आदि और अन्तमें सहज (स्वतःसिद्ध) अक्रिय तत्त्व विद्यमान रहता है। जो आदि और अन्तमें होता है वही मध्यमें भी होता है यह सिद्धान्त है। अतः क्रियाके समय भी अखण्ड और सहज अक्रिय तत्त्व ज्योंकात्यों विद्यमान रहता है। वह सहज अक्रिय तत्त्व (चेतन स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्व) अक्रिय और सक्रियदोनों अवस्थाओंको प्रकाशित करनेवाला है अर्थात् वह प्रवृत्ति और निवृत्ति (करने और न करने) दोनोंसे परे है।प्रतीति(देश काल वस्तु व्यक्ति क्रिया आदि) से माने हुए सम्बन्ध अर्थात् आसक्तिके कारण ही नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं होता। आसक्तिका नाश होते ही नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। अतः आसक्तिरहित होकर प्रतीति (अपने कहलानेवाले शरीरादि पदार्थों) को प्रतीति(संसारमात्र) की सेवामें लगा देनेसे प्रतीति(शरीरादि पदार्थों) का प्रवाह प्रतीति(संसार) की तरफ ही हो जाता है और स्वतः प्राप्त परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है। सम्बन्ध आसक्तिरहित होकर कर्म करने अर्थात् अपने लिये कोई कर्म न करनेसे क्या कोई परमात्माको प्राप्त हो चुका है इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.17 3.19।।यश्चेत्यादि पूरुष इत्यन्तम्। आत्मरतेस्तु कर्म इन्द्रियव्यापारतयैव कुर्वतः करणाकरणेषु समता। अत एव नासौ भूतेषु किंचिदात्मप्रयोजनमपेक्ष्य निग्रहानुग्रहौ करोति अपि तु करणीयमिदम् इत्येतावता। तस्मादसक्त एव करणीयं कर्म कुर्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.19।।सम्यग्ज्ञाननिष्ठत्वाभावे कर्मानुष्ठानमावश्यकमित्याह यत इति। तस्मात् ज्ञाननिष्ठाराहित्यादिति यावत्। मोक्षमेवापेक्षमाणस्य कथं कर्मणि फलान्तरवति नियोगः स्यादित्याशङ्क्याह असक्तो हीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.19।।तस्मादसक्त इति परामर्शविषयो न प्रतीयतेऽतस्तं दर्शयन् व्याख्याति यत इति। त्वं चेदानीं असम्प्रज्ञातसमाधिर्न भवतीति शेषः। कर्मणोऽवश्यकर्तव्यत्वेऽसम्प्रज्ञातसमाधिविलोपप्रसङ्गान्नेदमवश्यं कर्तव्यमित्यतोऽहमपि न कुर्यामिति परिचोदनायामसम्प्रज्ञातसमाधिस्थविलोपप्रतिबन्दीं मोचयितुं तस्य वैलक्षण्यमुक्त्वा तत्फलमिदमुच्यत इति नासङ्गतिः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.19।।यतोऽसम्प्रज्ञातसमाधेरेव कार्याभावः तस्मात्कर्म समाचर।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.19।।तस्माद् असङ्गपूर्वकं कार्यम् इत्येव सततं यावदात्मप्राप्ति कर्म एव समाचर। असक्तः कार्यम् इति वक्ष्यमाणाकर्तृत्वानुसन्धानपूर्वकं च कर्म अनुचरन् पूरुषः कर्मयोगेन एव परम् आप्नोति आत्मानं प्राप्नोति इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.19।। तस्मात् असक्तः सङ्गवर्जितः सततं सर्वदा कार्यं कर्तव्यं नित्यं कर्म समाचर निर्वर्तय। असक्तो हि यस्मात् समाचरन् ईश्वरार्थंकर्म कुर्वन् परं मोक्षम् आप्नोति पूरुषः सत्त्वशुद्धिद्वारेण इत्यर्थः।।यस्माच्च
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【 Verse 3.20 】
▸ Sanskrit Sloka: कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय: | लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ||
▸ Transliteration: karmaṇaiva hi saṁsiddhimāsthitā janakādayaḥ | lokasaṁgrahamevāpi sampaśyankartumarhasi ||
▸ Glossary: karmaṇā: by work; eva: also; hi: certainly; saṁsiddhiṁ: perfection; āsthitāḥ: situated; janakādayaḥ: Janaka and other kings; lokasaṁgrahaṁ: educating people; eva: also; api: therefore; saṁpaśyan: considering; kartuṁ: act; arhasi: deserve
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.20 King Janaka and others attained perfection by selfless enriching. To guide others you too must act selflessly.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.20।।राजा जनकजैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.20।। जनकादि (ज्ञानी जन) भी कर्म द्वारा ही संसिद्धि को प्राप्त हुये लोक संग्रह (लोक रक्षण) को भी देखते हुये तुम कर्म करने योग्य हो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.20 कर्मणा by action? एव only? हि verily? संसिद्धिम् perfection? आस्थिताः attained? जनकादयः Janaka and others? लोकसंग्रहम् protection of the masses? एवापि only? संपश्यन् having in view? कर्तुम् to perform? अर्हसि thou shouldst.Commentary Samsiddhi is Moksha (perfection or liberation). Janaka? (Asvapati) and others had perfect knowledge of the Self? and yet they performed actions in order to set an example to the masses. They worked for the guidance of men.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.20. It was by action alone that Janaka and others had attained emancipation. Further, at least having regard to hold the world (the society) together you should act.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.20 King Janaka and others attained perfection through action alone. Even for the sake of enlightening the world, it is thy duty to act;
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.20 Indeed by Karma Yoga alone did Janaka and others reach perfection. Even recognising its necessity for the guidance of the world, you must perform action.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.20 For Janaka and others strove to attain Liberation through action itself. You ought to perform (your duties) keeping also in view the prevention of mankind from going astray.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.20 Janaka and others attained perfection verily by action only; even with a view to the protection of the masses thou shouldst perform action.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.20 Karman=aiva etc. Therefore, janaka and others are examples for the fact that emancipation is even for those who perform action.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.20 It is also declared that Karma Yoga alone Janaka and others reached perfection.
Because, Karma Yoga is the best means for securing the vision of the self even for a person who is alified for Jnana Yoga, royal sages like Janaka and others, who are foremost among the Jnanins, preferred Karma Yoga as the means for attaining perfection.
Thus, having first declared previously that Karma Yoga must be practised by an aspirant for release who is alified for Karma Yoga alone, as he is unfit for Jnana Yoga, it was next stated with reasons that, even for one who is alified for Jnana Yoga, Karma Yoga is better than Jnana Yoga Now it is going to be declared (in verses 20-26) that Karma Yoga must be performed in every way by one who is virtuous.
At least for the guidance of the world, you should do work even if there is no need of it for yourself.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.20 Hi, for; in the olden days, the leaned Ksatriyas, janakadayah, Janaka and others such as Asvapati; asthitah, strove to attain; samsiddim, Liberation; karmana eva, through action itself. If it be that they were possessed of the fullest realization, then the meaning is that they remained established in Liberation whlile continuing, because of past momentum, to be associated with action itself-without renouncing it-with a veiw to preventing mankind from going astray. Again, if (it be that) Janaka and others had not attained fullest realization, then, they gradually became established in Liberation through action which is a means for the purification of the mind. The verse is to be explained thus. On the other hand, if you think, 'Obligatory duty was performed even by Janaka and others of olden days who were surely unenlightened. [Ajanadbhih: This is also translated as, 'surely because they were unenlightened'.-Tr.] There by it does not follow that action has to be undertaken by somody else who has the fullest enlightenment and has reached his Goal', nevertheless, tvam, you, who are under the influence of past actions; arhasi, ought; kartum, to perform (your duties); sampasyan api, keeping also in view; loka-sangraham, [V.S.A gives the meanings of the phrase as 'the welfare of the world', and 'propitiation of mankind'.-Tr. ] the prevention of mankind from going astray; even that purpose. By whom, and how, is mankind to be prevented from going astray? That is being stated: [In Ast. this introductory sentence is as follows:loka-samgrahah kimartham kartavyam iti ucyate.-Tr.]
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.20।। प्राचीन काल में जनक और अश्वपति आदि ज्ञानी राजाओं ने भी कर्म द्वारा संसिद्धि प्राप्त की थी। कर्मयोग के द्वारा सम्यक् ज्ञानपूर्वक अनासक्ति और अर्पण की भावना से कर्म करते हुए वे बन्धनों से मुक्त हो गये। सेवा के पवित्र जीवन को जी कर जगत् के लिये उन्होंने एक आदर्श स्थापित किया।श्रीकृष्ण का कहना है कि अर्जुन पर भी जन्मजात राजकुमार होने के कारण प्रजा तथा धर्म के रक्षण का उत्तरदायित्व था जिसका निर्वाह करना उसका कर्तव्य था। प्रारब्धवशात् आसन्न युद्ध से पलायन न करके कर्तव्य का सम्मान करते हुए उसको कुशलतापूर्वक युद्ध करना चाहिए। उसकी बन्धनकारक वासनाओं के क्षय का एक मात्र यही उपाय था। राजपरिवार में जन्म लेने के कारण सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा अर्जुन पर समाज रक्षण का उत्तरदायित्व अधिक था। इसलिए उस समय उसे युद्ध रूप कर्तव्य का निर्वाह करना अत्यावश्यक था।मरुस्थल में लता उत्पन्न नहीं होती। प्रकृति के नियमानुसार प्रत्येक प्राणी अपने लिए अनुकूल वातावरण में ही स्वयं को उपयुक्त पाता है। इस दृष्टि से अर्जुन का जन्म क्षत्रिय राज परिवार में हुआ तो स्वाभाविक है वही उसके लिये अनुकूल रहा होगा। संकटों और शत्रुओं का साहसपूर्वक सामना करने और समाज में शांति और विकास के लिये प्रयत्न करने के जीवन के लिए वह योग्य था।लोक संग्रह क्यों करना चाहिये इसका उत्तर है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.20।। हि यस्माच्च जनकादयो जनकाश्चपतिप्रभृतयः पूर्वेणैव शुद्धसत्त्वाः सन्तः संसिद्धिं सम्यग्ज्ञानं प्राप्ता इत्यर्थः। यद्यपि त्वं सभ्यग्ज्ञानिनमेवात्मानं मन्यसे तथापि कर्माचरणं भद्रमेवेत्याह क्षत्रियाः कर्मणैव संसिद्धिं मोक्षं गन्तुमास्थिताः प्रवृत्ताः श्रवणादिसाध्यां ज्ञाननिष्ठां प्राप्ता इति वा। इदं व्याख्यानं परमाप्नोति पूरुष इति पूर्वोक्तानुगुणमत आचार्यैः परित्यक्तम्। यदि प्राप्तसम्यग्दर्शनास्तर्हि लोकसंग्रहार्थं प्रारब्धकर्मत्वात्कर्मणा सहैवासंन्यस्यैवाथाप्राप्तसम्यगदर्शनास्तदा कर्मणा चित्तशुद्धिसाधनभूतेन कर्मणेत्यर्थः। पूर्वैरप्यज्ञानद्भिरेव कर्तव्यं कर्मं कृतमतो नावश्यमन्येन तत्त्वज्ञेन कृतार्थेन कर्तव्यमिति चेत्तथापि प्रारब्धकर्माधीनस्त्वं लोकस्योन्मार्गप्रवृत्तिनिवारणं लोकसंग्रहस्तमेवापि प्रयोजनं संपश्यन कर्तुमर्हसीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.20।।ननु विविदिषोरपि ज्ञाननिष्ठाप्राप्त्यर्थं श्रवणमनननिदिध्यासनानुष्ठानाय सर्वकर्मत्यागलक्षणः संन्यासो विहितः। तथाच न केवलं ज्ञानिन एव कर्मानधिकारः किंतु ज्ञानार्थिनोऽपि विरक्तस्य। तथाच मयापि विरक्तेन ज्ञानार्थिना कर्माणि हेयान्येवेत्यर्जुनाशङ्कां क्षत्रियस्य संन्यासानधिकारप्रतिपादनेनापनुदति भगवान्। जनकादयो जनकाजातशत्रुप्रभृतयः श्रुतिस्मृतिपुराणप्रसिद्धाः क्षत्रिया विद्वांसोऽपि कर्मणैव सह नतु कर्मत्यागेन सह संसिद्धिं श्रवणादिसाध्यां ज्ञाननिष्ठामास्थिताः प्राप्ताः। हि यस्मादेवं तस्मात्त्वमपि क्षत्रियो विविदिषुर्विद्वान्वा कर्म कर्तुमर्हसीत्यनुषङ्गः।ब्राह्मणाः पुत्रैषणायाश्च वित्तैषणायाश्च लोकैषणायाश्च व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति इति संन्यासविधायके वाक्ये ब्राह्मणत्वस्य विवक्षितत्वात्स्वाराज्यकामो राजा राजसूयेन यजेत इत्यत्र क्षत्रियत्ववत्चत्वार आश्रमा ब्राह्मणस्य त्रयो राजन्यस्य द्वौ वैश्यस्य इति च स्मृतेः। पुराणेऽपिमुखजानामयं धर्मो यद्विष्णोर्लिङगधारणम्। बाहुजातोरुजातानां नायं धर्मः प्रशस्यते।। इति क्षत्रियवैश्ययोः संन्यासाभाव उक्तः। तस्माद्युक्तमेवोक्तं भगवताकर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादय इति।सर्वे राजाश्रिता धर्मा राजा धर्मस्य धारकः इत्यादिस्मृतेर्वर्णाश्रमधर्मप्रवर्तकत्वेनापि क्षत्रियोऽवश्यं कर्म कुर्यादित्याह लोकेति। लोकानां स्वे स्वे धर्मे प्रवर्तनमुन्मार्गान्निवर्तनं च लोकसंग्रहस्तं पश्यन्नपिशब्दाज्जनकादिशिष्टाचारमपि पश्यन्कर्म कर्तुमर्हस्येवेत्यन्वयः। क्षत्रियजन्मप्रापकेण कर्मणारब्धशरीरस्त्वं विद्वानपि जनकादिवत्प्रारब्धकर्मबलेन लोकसंग्रहार्थं कर्म कर्तुं योग्यो भवसि नतु त्युक्तं ब्राह्मणजन्मालाभादित्यभिप्रायः। एतादृशभगवदभिप्रायविदा भगवता भाष्यकृता ब्राह्मणस्यैव संन्यासो नान्यस्येति निर्णीतम्। वार्तिककृता तु प्रौढिवादमात्रेण क्षत्रियवैश्ययोरपि संन्यासोऽस्तीत्युक्तमिति द्रष्टव्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.20 3.21।।अत्र शिष्टाचारं प्रमाणयति कर्मणेति। कर्मणैव सह संसिद्धिं श्रवणादिसाध्यां ज्ञाननिष्ठां गन्तुमास्थिताः प्रवृत्ता जनकादयस्त्वादृशाः क्षत्रियाः न तु संन्यासेन। ननु शुद्धचित्तस्य मम नास्ति कर्मापेक्षेत्याशङ्क्याह लोकेति। लोकस्य संग्रहः स्वधर्मे प्रवर्तनम्। ननु स्वप्रयोजनाभावेऽपि केवलं लोकसंग्रहार्थं चेत्कर्म कर्तव्यं तदा विदुषां ब्राह्मणानामपि संन्यासो न स्यात्। यतीनेव संन्यासधर्मान्ग्राहयितुं तेषां संन्यास इति चेत् अर्जुनेऽपि न तद्दंडवारितमस्ति। ननु क्षत्रियस्य संन्यासेऽधिकारो नास्तीति चेत् लिङ्गधारणेऽधिकाराभावेऽपि भरतऋषभादिवद्विक्षेपकर्मत्यागमात्रेऽधिकारात्। वार्तिकेसर्वाधिकारविच्छेदि ज्ञानं चेदभ्युपेयते। कुतोऽधिकारनियमो व्युत्थाने क्रियते बलात्। इति विद्वत्संन्यासे क्षत्रियादेरप्यधिकारस्य साधितत्वात्। अतो लोकसंग्रहो न मुख्यं कर्मप्रयोजनमिति चेत्सत्यम्।न मे पार्थास्ति कर्तव्यम् इति स्वदृष्टान्तेनाधिकारिकत्वादर्जुन एवैवं नियोज्यते न क्षत्रियमात्रमिति तुष्यतु भवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.20।।एवमनासक्ताः कर्मकर्तारो मोक्षं प्राप्ताः इत्याह कर्मणैवेति। हीति निश्चयेन कर्मणा अनासक्तकर्मणा जनकादयः संसिद्धिं मुक्तिमास्थिताः प्राप्तवन्तः। जनकादयस्तु न साक्षात्त्वां प्रपन्ना इत्यनासक्त्यापि तेषां करणं युक्तम्। न तु मम त्वां प्रपन्नस्योचितमित्याशङ्क्याह लोकसङ्ग्रहमिति। लोकसङ्ग्रहमपि सम्पश्यन् कर्तुमेवार्हसि। अत्रायं भावः यद्यपि मद्भक्तस्य नावश्यकं तथापि मदाज्ञया लोकसङ्ग्राहार्थं कर्तुमेवार्हसि न तु तज्जनितसिद्ध्यर्थम्। अयमेवार्थ एवकारेण विविच्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.20।। अत्र सदाचारं प्रमाणयति कर्मणैवेति। कर्मलोकसंग्रहमिति। लोकस्य संग्रहः स्वधर्मे प्रवर्तनं मया कर्मणि कृते जनः सर्वोऽपि करिष्यति अन्यथा ज्ञानिदृष्टान्तेनाज्ञः कर्म त्यजेदित्येवं लोकरक्षणमपि तावत्प्रयोजनं पश्यन्कर्म कर्तुमेवार्हसि नतु त्यक्तुमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.20।।अत्र सदाचारं प्रमाणयति कर्मणैवेति। जनकादयः कर्मणैव जीवन्मुक्तदशामास्थिताः। संयोगपृथक्त्वन्यायेनोभयसाधकेन कर्मणा ज्ञानसंसिद्धिं वाऽऽस्थिता इति। तद्वत् सिद्धत्वाभिमानेऽपि तव कर्म कर्त्तंव्यमेवायाति। लोकसङ्ग्रहार्थमपि तं पश्यन् कर्त्तुंमर्हसि।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.20।।एक और भी कारण है क्योंकि पहले जनकअश्वपति प्रभृति विद्वान् क्षत्रिय लोग कर्मोंद्वारा ही मोक्षप्राप्तिके लिये प्रवृत्त हुए थे। यहाँ इस श्लोककी व्याख्या इस प्रकार करनी चाहिये कि यदि वे जनकादि यथार्थ ज्ञानको प्राप्त हो चुके थे तब तो वे प्रारब्धकर्मा होनेके कारण लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हुए ही अर्थात् संन्यास ग्रहण किये बिना ही परम सिद्धिको प्राप्त हुए और यदि वे जनकादि यथार्थ ज्ञानको प्राप्त नहीं थे तो वे अन्तःकरणकी शुद्धिके साधनरूप कर्मोंसे क्रमशः परम सिद्धिको प्राप्त हुए। यदि तू यह मानता हो कि आत्मतत्त्वको न जाननेवाले जनकादि पूर्वजोंद्वारा कर्तव्यकर्म किये गये हैं इससे यह नहीं हो सकता कि दूसरे आत्मज्ञानी कृतार्थ पुरुषोंको भी कर्म अवश्य करने चाहिये। तो भी तू प्रारब्धकर्मके अधीन है इसलिये तुझे लोकसंग्रहकी तरफ देखकर भी अर्थात् लोगोंकी उलटे मार्गमें जानेवाली प्रवृत्तिको निवारण करनारूप जो लोकसंग्रह है उस लोकसंग्रहरूप प्रयोजनको देखते हुए भी कर्म करना चाहिये।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.20।। व्याख्या कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः आदि पद प्रभृति (आरम्भ) तथा प्रकार दोनोंका वाचक माना जाता है। यदि यहाँ आये आदि पदको प्रभृति का वाचक माना जाय तो जनकादयः पदका अर्थ होगा जिनके आदि(आरम्भ) में राजा जनक हैं अर्थात् राजा जनक तथा उनके बादमें होनेवाले महापुरुष। परन्तु यहाँ ऐसा अर्थ मानना ठीक नहीं प्रतीत होता क्योंकि राजा जनकसे पहले भी अनेक महापुरुष कर्मोंके द्वारा परमसिद्धिको प्राप्त हो चुके थे जैसे सूर्य वैवस्वत मनु राजा इक्ष्वाकु आदि (गीता 4। 12)। इसलिये यहाँ आदि पदको प्रकार का वाचक मानना ही उचित है जिसके अनुसार जनकादयः पदका अर्थ है राजा जनकजैसे गृहस्थाश्रममें रहकर निष्कामभावसे सब कर्म करते हुए परमसिद्धिको प्राप्त हुए महापुरुष जो राजा जनकसे पहले तथा बादमें (आजतक) हो चुके हैं।कर्मयोग बहुत पुरातन योग है जिसके द्वारा राजा जनकजैसे अनेक महापुरुष परमात्माको प्राप्त हो चुके हैं। अतः वर्तमानमें तथा भविष्यमें भी यदि कोई कर्मयोगके द्वारा परमात्माको प्राप्त करना चाहे तो उसे चाहिये कि वह मिली हुई प्राकृत वस्तुओं(शरीरादि) को कभी अपनी और अपने लिये न माने। कारण कि वास्तवमें वे अपनी और अपने लिये हैं ही नहीं प्रत्युत संसारकी और संसारके लिये ही हैं। इस वास्तविकताको मानकर संसारसे मिली वस्तुओंको संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे सुगमतापूर्वक संसारसे सम्बन्धविच्छेद होकर परमात्मप्राप्ति हो जाती है। इसलिये कर्मयोग परमात्मप्राप्तिका सुगम श्रेष्ठ और स्वतन्त्र साधन है इसमें कोई सन्देह नहीं।यहाँ कर्मणा एव पदोंका सम्बन्ध पूर्वश्लोकके असक्तो ह्याचरन्कर्म पदोंसे अर्थात् आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे है क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त होता है केवल कर्म करनेसे नहीं। केवल कर्म करनेसे तो प्राणी बँधता है कर्मणा बध्यते जन्तुः (महा0 शान्ति0 241। 7)।गीताकी यह शैली है कि भगवान् पीछेके श्लोकमें वर्णित विषयकी मुख्य बातको (जो साधकोंके लिये विशेष उपयोगी होती है) संक्षेपसे आगेके श्लोकमें पुनः कह देते हैं जैसे पीछेके (उन्नीसवें) श्लोकमें आसक्तिरहित होकर कर्म करनेकी आज्ञा देकर इस बीसवें श्लोकमें उसी बातको संक्षेपसे कर्मणा एव पदोंसे कहते हैं। इसी प्रकार आगे बारहवें अध्यायके छठे श्लोकमें वर्णित विषयकी मुख्य बातको सातवें श्लोकमें संक्षेपसे मय्यावेशितचेतसाम् (मुझमें चित्त लगानेवाले भक्त) पदसे पुनः कहेंगे।यहाँ भगवान् कर्मणा एव के स्थानपर योगेन एव भी कह सकते थे। परन्तु अर्जुनका आग्रह कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेका होने तथा (आसक्तिरहित होकर किये जानेवाले) कर्मका ही प्रसङ्ग चलनेके कारण कर्मणा एव पदोंका प्रयोग किया गया है। अतः यहाँ इन पदोंका अभिप्राय (पूर्वश्लोकके अनुसार) आसक्तिरहित होकर किये गये कर्मयोगसे ही है।वास्तवमें चिन्मय परमात्माकी प्राप्ति जड कर्मोंसे नहीं होती। नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव होनेमें जो बाधाएँ हैं वे आसक्तिरहित होकर कर्म करनेसे दूर हो जाती हैं। फिर सर्वत्र परिपूर्ण स्वतःसिद्ध परमात्माका अनुभव हो जाता है। इस प्रकार परमात्मतत्त्वके अनुभवमें आनेवाली बाधाओंको दूर करनेके कारण यहाँ कर्मके द्वारा परमसिद्धि(परमात्मतत्त्व) की प्राप्तिकी बात कही गयी है।परमात्मप्राप्तिसम्बन्धी मार्मिक बातमनुष्य सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्तिकी तरह परमात्माकी प्राप्तिको भी कर्मजन्य मान लेते हैं। वे ऐसा विचार करते हैं कि जब किसी बड़े (उच्चपदाधिकारी) मनुष्यसे मिलनेमें भी इतना परिश्रम करना पड़ता है तबअनन्तकोटि ब्रह्माण्डनायक परमात्मासे मिलनेमें तो बहुत ही परिश्रम (तप व्रत आदि) करना पड़ेगा। वस्तुतः यही साधककी सबसे बड़ी भूल है।मनुष्ययोनिका कर्मोंका घनिष्ठ सम्बन्ध है। इसलिये मनुष्ययोनिको कर्मसङ्गी अर्थात् कर्मोंमें आसक्तिवाली कहा गया है रजसि प्रलयं गत्वा कर्मसङ्गिषु जायते (गीता 14। 15)। यही कारण है कि कर्मोंमें मनुष्यकी विशेष प्रवृत्ति रहती है और वह कर्मोंके द्वारा ही अभीष्ट वस्तुओंको प्राप्त करना चाहता है। प्रारब्धका साथ रहनेपर वह कर्मोंके द्वारा ही अभीष्ट सांसारिक वस्तुओंको प्राप्त भी कर लेता है जिससे उसकी यह धारणा पुष्ट हो जाती है कि प्रत्येक वस्तु कर्म करनेसे ही मिलती है और मिल सकती है। परमात्माके विषयमें भी उसका यही भाव रहता है और वह चेतन परमात्माको भी जड कर्मोंके ही द्वारा प्राप्त करनेकी चेष्टा करता है। परन्तु वास्तविकता यही है कि परमात्माकी प्राप्ति कर्मोंके द्वारा नहीं होती। इस विषयको बहुत गम्भीरतापूर्वक समझना चाहिये।कर्मोंसे नाशवान् वस्तु(संसार) की प्राप्ति होती है अविनाशी वस्तु(परमात्मा) की नहीं क्योंकि सम्पूर्ण कर्म नाशवान् (शरीर इन्द्रियाँ मन आदि) के सम्बन्धसे ही होते हैं जबकि परमात्माकी प्राप्ति नाशवान्से सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर होती है।प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है इसलिये कर्मके फलरूप प्राप्ति होनेवाली वस्तु भी उत्पन्न और नष्ट होनेवाली होती है। कर्मोंके द्वारा उसी वस्तुकी प्राप्ति होती है जो देशकाल आदिकी दृष्टिसे दूर (अप्राप्य) हो। सांसारिक वस्तु एक देश काल आदिमें रहनेवाली उत्पन्न और नष्ट होनेवाली एवं प्रतिक्षण बदलनेवाली है। अतः उसकी प्राप्ति कर्मसाध्य है। परन्तु परमात्मा सब देश काल वस्तु व्यक्ति आदिमें परिपूर्ण (नित्यप्राप्त) (टिप्पणी प0 150) एवं उत्पत्तिविनाश और परिवर्तनसे सर्वथा रहित हैं। अतः उनकी प्राप्ति स्वतःसिद्ध है कर्मसाध्य नहीं। यही कारण है कि सांसारिक पदार्थोंकी प्राप्ति चिन्तनसे नहीं होती जबकि परमात्माकी प्राप्तिमें चिन्तन मुख्य है। चिन्तनसे वही वस्तु प्राप्त हो सकती है जो समीपसेसमीप हो। वास्तवमें देखा जाय तो परमात्माकी प्राप्ति चिन्तनरूप क्रियासे भी नहीं होती। परमात्माका चिन्तन करनेकी सार्थकता दूसरे (संसारके) चिन्तनका त्याग करानेमें ही है। संसारका चिन्तन सर्वथा छूटते ही नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है।सर्वव्यापी परमात्माकी हमसे दूरी है ही नहीं और हो सकती भी नहीं। जिससे हम अपनी दूरी नहीं मानते उस मैंपनसे भी परमात्मा अत्यन्त समीप हैं। मैंपन तो परिच्छिन्न (एकदेशीय) है पर परमात्मा परिछिन्न नहीं हैं। ऐसे अत्यन्त समीपस्थ नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव करनेके लिये सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिके समान तर्क तथा युक्तियाँ लगाना अपनेआपको धोखा देना ही है।सांसारिक वस्तुकी प्राप्ति इच्छामात्रसे नहीं होती परन्तु परमात्माकी प्राप्ति उत्कट अभिलाषामात्रसे हो जाती है। इस उत्कट अभिलाषाके जाग्रत् होनेमें सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छा ही बाधक है दूसरा कोई बाधक है ही नहीं। यदि परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा अभी जाग्रत् हो जाय तो अभी ही परमात्माका अनुभव हो जाय।मनुष्यजीवनका उद्देश्य कर्म करना और उसका फल भोगना नहीं है। सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छाके त्यागपूर्वक परमात्मप्राप्तिकी उत्कट अभिलाषा तभी जाग्रत् हो सकती है जब साधकके जीवनभरका एक ही उद्देश्य परमात्मप्राप्ति करना हो जाय। परमात्माको प्राप्त करनेके अतिरिक्त अन्य किसी भी कार्यका कोई महत्त्व न रहे। वास्तवमें परमात्मप्राप्तिके अतिरिक्त मनुष्यजीवनका अन्य कोई प्रयोजन है ही नहीं। जरूरत केवल इस प्रयोजन या उद्देश्यको पहचान कर इसे पूरा करनेकी ही है।यहाँ उद्देश्य और फलेच्छा दोनोंमें भेद समझ लेना आवश्यक है। नित्य परमात्मतत्त्वको प्राप्त करनेका उद्देश्य होता है और अनित्य (उत्पत्तिविनाशशील) पदार्थोंको प्राप्त करनेकी फलेच्छा होती है। उद्देश्य तो पूरा होता है पर फलेच्छा मिटनेवाली होती है। स्वरूपबोध और भगवत्प्राप्ति ये दोनों उद्देश्य हैं फल नहीं। उद्देश्यकी प्राप्तिके लिये किया गया कर्म सकाम नहीं कहलाता। इसलिये निष्काम पुरुष(कर्मयोगी) केसभी कर्म उद्देश्यको लेकर होते हैं फलेच्छाको लेकर नहीं।कर्मयोगमें कर्मों(जडता) से सम्बन्धविच्छेदका उद्देश्य रखकर शास्त्रविहित शुभकर्म किये जाते हैं। सकाम पुरुष फलकी इच्छा रखकर अपने लिये कर्म करता है और कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके दूसरोंके लिये कर्म (सेवा) करता है। कर्म ही फलरूपसे परिणत होता है। अतः फलका सम्बन्ध कर्मसे होता है। उद्देश्यका सम्बन्ध कर्मसे नहीं होता। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे परमात्मा दूर है यह धारणा दूर हो जाती है।लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि लोक शब्दके तीन अर्थ होते हैं (1) मनुष्यलोक आदि लोक (2) उन लोकोंमें रहनेवाले प्राणी और (3) शास्त्र (वेदोंके अतिरिक्त सब शास्त्र)। मनुष्यलोककी उसमें रहनेवाले प्राणियोंकी और शास्त्रोंकी मर्यादाके अनुसार समस्त आचरणों (जीवनचर्यामात्र) का होना लोकसंग्रह है।लोकसंग्रहका तात्पर्य है लोकमर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये लोगोंको असत्से विमुख करके सत्के सम्मुख करनेके लिये निःस्वार्थभावपूर्वक कर्म करना। इसको गीतामें यज्ञार्थ कर्म के नामसे भी कहा गया है। अपने आचरणों एवं वचनोंसे लोगोंको असत्से विमुख करके सत्के सम्मुख कर देना बहुत बड़ी सेवा है क्योंकि सत्के सम्मुख होनेसे लोगोंका सुधार एवं उद्धार हो जाता है।लोगोंको दिखानेके लिये अपने कर्तव्यका पालन करना लोगसंग्रह नहीं है। कोई देखे या न देखे लोकमर्यादाके अनुसार अपनेअपने (वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिके अनुसार) कर्तव्यका पालन करनेसे लोकसंग्रह स्वतः होता है।कोई भी कर्तव्यकर्म छोटा या बड़ा नहीं होता। छोटासेछोटा और बड़ासेबड़ा कर्म कर्तव्यमात्र समझकर (सेवाभावसे) करनेपर समान ही है। देश काल परिस्थिति अवसर वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिके अनुसार जो कर्तव्यकर्म सामने आ जाय वही कर्म बड़ा होता है। कर्मके स्वरूप और फलकी दृष्टिसे ही कर्म छोटा या बड़ा घोर या सौम्य प्रतीत होता है। (टिप्पणी प0 151) फलेच्छाका त्याग करनेपर सभी कर्म उद्देश्यकी सिद्धि करनेवाले हो जाते हैं। अतः जडतासे सम्बन्धविच्छेद करनेमें छोटेबड़े सभी कर्म समान हैं।किसी भी मनुष्यका जीवन दूसरोंकी सहायताके बिना नहीं चल सकता। शरीर मातापितासे मिलता है और विद्या योग्यता शिक्षा आदि गुरुजनोंसे मिलती है। जो अन्न ग्रहण करते हैं वह दूसरोंके द्वारा उत्पन्न किया गया होता है जो वस्त्र पहनते हैं वे दूसरोंके द्वारा बनाये गये होते हैं जिस मकानमें रहते हैं उसका निर्माण दूसरोंके द्वारा किया गया होता है जिस सड़कपर चलते हैं वह दूसरोंके द्वारा बनायी गयी होती है आदिआदि। इस प्रकार प्रत्येक मनष्यका जीवननिर्वाह दूसरोंके आश्रित है। अतः हरेक मनुष्यपर दूसरोंका ऋण है जिसे उतारनेके लिये यथाशक्ति दूसरोंकी निःस्वार्थभावसे सेवा (हित) करना आवश्यक है। अपने कहलानेवाले शरीरादि सम्पूर्ण सांसारिक पदार्थोंको किञ्चिन्मात्र भी अपना और अपने लिये न माननेसे मनुष्य ऋणसे मुक्त हो जाता है।सम्बन्ध कर्म करनेसे लोकसंग्रह कैसे होता है इसका विवेचन भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.20।।कर्मणैवेति। तदत्र कर्म कुर्वतामपि सिद्धौ जनकादयो दृष्टान्ताः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.20।।यद्यपि जितेन्द्रियोऽपि विवेकी श्रवणादिभिरजस्रं ब्रह्मणि निष्ठातुं शक्नोति तथापि क्षत्रियेण त्वया विहितं कर्म न त्याज्यमित्याह यस्माच्चेति। तस्मात्त्वमपि कर्म कर्तुमर्हसीति संबन्धः। इतोऽपि त्वया विहितं कर्म कर्तव्यमित्याह लोकेति। पूर्वार्धं विभजते कर्मणैवेति। कथं जनकादीनां कर्मणा संसिद्धिप्राप्तिरुच्यते कर्मत्यजां हि सम्यग्दर्शनवतां प्रसिद्धा संसिद्धिरिति। तत्र किं जनकादयोऽपि प्राप्तसम्यग्दर्शनाः स्युरुताप्राप्तसम्यग्दर्शना भवेयुरिति विकल्प्य प्रथमं प्रत्याह यदीति। लोकसंग्रहार्थं कर्मणा सहैव संसिद्धिमास्थिता इति संबन्धः। कर्मणा सहैवेत्येतद्व्याकरोति असंन्यस्यैव कर्मेति। तत्र हेतुमाह प्रारब्धेति। जनकादीनां सत्यपि ज्ञानित्वे प्रारब्धकर्मवशात्कर्मापरित्यज्यैव लोकसंग्रहार्थं प्रवर्तमानानां ज्ञानमाहात्म्यादुपपन्ना संसिद्धिरित्यर्थः। द्वितीयमनूद्य पूर्वार्धेनैवोत्तरमाह अथेत्यादिना। द्वितीयार्धव्यावर्त्यामाशङ्कामुत्थापयति अथेति। अज्ञेनाकृतार्थेन कृतं कर्मेत्येतावता ज्ञानवता कृतकृत्येन न तत्कर्तव्यमित्युक्तमङ्गीकरोति तथापीति। तर्हि मयापि ज्ञानवता कृतार्थेन कर्म न कर्तव्यमित्याशङ्क्यार्जुनस्य कर्तव्यमेव कर्मेत्युत्तरार्धव्याख्यानेन कथयति प्रारब्धेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.20।।कर्मण एव मुक्तिसाधनत्वमुच्यत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासायकर्मणैव हि इत्यस्य तात्पर्यं तावदाह आचारोऽपीति। विहितस्य कर्मणः कर्तव्यतायां प्रमाणमिति शेषः। अपिः पूर्वोक्तहेतुसमुच्चये। कर्मण एव मोक्षकारणत्वं तृतीययोच्यत इतिप्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे कर्मणेति। नन्वेवं सहयोगे तृतीयायां व्याख्यायमानायां जनकादयः कर्मणा सहैव मुक्तिमास्थिता इति वाक्यार्थः स्यात्। न चायं युक्तःपुत्रेण सहैवागतः पिता इत्यत्र यथा पुत्रस्याप्यागमनान्वयः प्रतीयते तथा कर्मणोऽपि मुक्तिमास्थितत्वस्य प्रसङ्गादित्यत आह कर्मेति। यद्यपि श्रूयमाणक्रियायां सहयोगो नोपपद्यते तथाप्यध्याहृतावान्तरक्रियायामुपपद्यत एव। ततश्च यथासहैव दशभिः पुत्रैर्भारं वहति गर्दभी इत्यत्र दशभिः पुत्रैः सहैव वर्तमानाऽप्येकैव भारं वहतीत्यर्थः तथाऽत्रापि कर्मणा सहैव वर्तमानाः कर्म कुर्वन्त एवेत्यर्थ उपपद्यत इति भावः। द्विधाऽपि सहयोगमभिप्रेत्य समासविधौ पाणिनिरविशेषमभाणीत्तेन सहेति तुल्ययोगे अष्टा.2।2।28 इति। कर्मसाहित्यं च मुक्तावानन्दवृद्ध्यर्थमिति ज्ञातव्यम्।उपपदविभक्तेःकारकविभक्तिर्बलीयसी इति चेत् सत्यम् वक्ष्यमाणबाधात्तत्परिग्रहोपपत्तेः। अस्तु वा करणे तृतीया तथापिलाङ्गलेन वयं जीवामः इतिवत्पारम्पर्येण कर्मणो मुक्तौ कारणत्वमित्याह कर्मेति। सिद्धिमास्थिता इति वेत्यर्थः। सिद्धिशब्दो ज्ञानार्थः वेत्यस्याप्युपलक्षणमेतत्। यथाप्रतीतार्थः किं न स्यात् इत्यत आह न त्विति। ज्ञाने विना केवलेन कर्मणा जनकादयः सिद्धिं गता इत्यर्थस्तु नेत्यर्थः। प्रसिद्धं हीति। हिशब्दो हेतौ। अस्तु तेषां ज्ञानित्वं मुक्तौ तु कर्मैव कारणमित्यत आह तमेवमिति। अत्रापि गीतायामपिकर्मजं बुद्धियुक्ता हि 2।51 इत्यादावित्यर्थः।प्राग्ज्ञानात् ज्ञानसाधनं पश्चान्मुक्तिसाधनं इति समुच्चयवादिनां मतं न तु केवलकर्मवादिनाम्। न चात्र प्रमाणमप्यस्ति। ननु यथा मोक्षस्य ज्ञानसाध्यत्वे तमेवं नृ.पू.उ.1।6तै.आ.3।1।3 इत्याद्यागमाः सन्ति। तथा कर्मसाध्यत्वेऽपि अपामसोममृता अभूम् ऋक्सं.6।4।11अ.शिर.उ.3 इत्यादयो विद्यन्ते तत्कथं निर्णय इत्यतः सावकाशत्वनिरवकाशत्वबलादित्याह गत्यन्तरं चेति। ज्ञानद्वारेति व्याख्यानेऽपीत्यर्थः।ननु कर्मवाक्यान्यपि ब्रह्मज्ञानेन वेत्यादीनि निरवकाशानि सन्ति तत्र ब्रह्मज्ञानसमानकक्ष्यतया तीर्थस्नानादेरुक्तत्वेनोक्तव्याख्यानायोगात्। अतः पुनरनिर्णय एवेत्याशङ्क्य तेषामपि सावकाशत्वमाह यत्रेति। तीर्थादीति तत्स्नानादीत्यर्थः। पापादिमुक्तिर्मुक्तिशब्दार्थ इत्यर्थः। न च सर्वत्र मुक्तिशब्द एवास्ति संसारमुक्तिरित्यादेरपि सम्भवात् अतो गत्यन्तरमप्याह स्तुतीति। प्रशस्तत्वोपलक्षणेत्यर्थः प्रशस्तत्वसादृश्येन गौणी वा। दुष्टजनव्यामोहनार्थत्वस्याप्युपलक्षणमेतत्। कुत एतत्कल्प्यते इत्यत आह तत्रापीति। यत्र तीर्थस्नानादिकं मुक्तिसाधनमुच्यते तत्रैव प्रस्तावे साधनत्वं तीर्थस्नानादीनाम्। अन्यथा ज्ञानं विना या मुक्तिर्यन्मुक्तिसाधनत्वं वाक्यताविशेषाद्ब्रह्मज्ञानेन वेत्यादिभिरेव ब्रह्मज्ञानं विनेत्यादीनां बाधः किं न स्यात् इत्यत आह न चेति। असाधारणसाधारणप्रसङ्गोक्तत्वादिनेति भावः। अत्र दृष्टान्तमाह यथेति। इत्यादीनि नायं राजा किन्तु भृत्य एवेत्यादीनि तत्प्रस्तावेऽप्युक्तानि। न निघ्नन्तीति शेषः। आगमसिद्धा चेयं व्यवस्थेत्याह यथेति। मद्दृष्टेरित्येतदर्थप्रतिपत्त्यर्थं भगवानित्युक्तम्। तीर्थादिवाक्यानीति तीर्थस्नानक्षेत्रवासादीनां मोक्षसाधनत्ववाक्यानीत्यर्थः। कर्मेति यज्ञादेर्ग्रहणम्। आदिपदेन ध्यानादेः सङ्ग्रहः। पूर्ववदर्थः। अज्ञानां सम्यग्ज्ञानायोग्यानाम्। उपसंहरति अत इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.20।।आचारोऽप्यस्तीत्याह कर्मणैवेति। कर्मणा सह कर्म कुर्वन्त एवेत्यर्थः। कर्म कृत्वैव ततो ज्ञानं प्राप्य वा न तु ज्ञानं विना प्रसिद्धं हि तेषां ज्ञानित्वं भारतादिषु। तमेवं विद्वानमृत इह भवति नृ.पू.उ.1।6 इत्यादिश्रुतिभ्यश्च। अत्रापि कर्मणां ज्ञानसाधनत्वोक्तेश्च बुद्धियुक्ता इति। गत्यन्तरं च नान्यः पन्थाः श्वे.उ.3।8 इत्यस्त नास्ति इतरेषां ज्ञानद्वाराऽप्यविरोधः। यत्र च तीर्थाद्येव मुक्तिसाधनमुच्यतेब्रह्मज्ञानेन वा मुक्तिः प्रयागमरणेन वा। अथवा स्नानमात्रेण गोमत्यां कृष्णसन्निधौ इत्यादौ तत्र पापादिमुक्तिः स्तुतिपरता च। तत्रापि हि कुत्रचिद्ब्रह्मज्ञानसाधनत्वमेवोच्यते। अन्यथा मुक्तिं निषिध्यब्रह्मज्ञानं विना मुक्तिर्न कथञ्चिदपीष्यते। प्रयागादेस्तु या मुक्तिर्ज्ञानोपायत्वमेव हि इत्यादौ। न च तीर्थस्तुतिवाक्यानि तत्प्रस्तावेऽप्युक्तं ज्ञाननियमं घ्नन्ति। यथा कञ्चिद्दक्षं भृत्यं प्रत्युक्तानिअयमेव हि राजा किं राज्ञा इत्यादीनि। यथाऽऽह भगवान् यानि तीर्थादिवाक्यानि कर्मादिविषयाणि च। स्तावकान्येव तानि स्युरज्ञानां मोहकानि वा। भवेन्मोक्षस्तु मद्दृष्टेर्नान्यथा तु कथञ्चन इति नारदीये। अतोऽपरोक्षज्ञानादेव मोक्षः। कर्म तु तत्साधनमेव।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.20।।यतो ज्ञानयोगाधिकारिणः अपि कर्मयोग एव आत्मदर्शने श्रेयान् अत एव हि जनकादयो राजर्षयो ज्ञानिनाम् अग्रेसराः कर्मयोगेन एव संसिद्धिम् आस्थिताः आत्मानं प्राप्तवन्तः।एवं प्रथमं मुमुक्षोः ज्ञानयोगानर्हतया कर्मयोगाधिकारिणः कर्मयोग एव कार्यः इत्युक्त्वा ज्ञानयोगाधिकारिणः अपि ज्ञानयोगात् कर्मयोग एव श्रेयान् इति सहेतुकम् उक्तम्। इदानीं शिष्टतया व्यपदेश्यस्य सर्वथा कर्मयोग एव कार्य इति उच्यते लोकसंग्रहं पश्यन् अपि कर्म एव कर्तुम् अर्हसि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.20।। कर्मणैव हि यस्मात् पूर्वे क्षत्रियाः विद्वांसः संसिद्धिं मोक्षं गन्तुम् आस्थिताः प्रवृत्ताः। के जनकादयः जनकाश्वपतिप्रभृतयः। यदि ते प्राप्तसम्यग्दर्शनाः ततः लोकसंग्रहार्थं प्रारब्धकर्मत्वात् कर्मणा सहैव असंन्यस्यैव कर्म संसिद्धिमास्थिता इत्यर्थः। अथ अप्राप्तसम्यग्दर्शनाः जनकादयः तदा कर्मणा सत्त्वशुद्धिसाधनभूतेन क्रमेण संसिद्धिमास्थिता इति व्याख्येयः श्लोकः। अथ मन्यसे पूर्वैरपि जनकादिभिः अजानद्भिरेव कर्तव्यं कर्म कृतम् तावता नावश्यमन्येन कर्तव्यं सम्यग्दर्शनवता कृतार्थेनेति तथापि प्रारब्धकर्मायत्तः त्वं लोकसंग्रहम् एव अपि लोकस्य उन्मार्गप्रवृत्तिनिवारणं लोकसंग्रहः तमेवापि प्रयोजनं संपश्यन् कर्तुम् अर्हसि।।लोकसंग्रहः किमर्थं कर्तव्य इत्युच्यते
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【 Verse 3.21 】
▸ Sanskrit Sloka: यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन: | स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ||
▸ Transliteration: yad yad ācarati śreṣṭhas tat tad evetaro janaḥ | sa yatpramāṇaṁ kurute lokastadanuvartate ||
▸ Glossary: yad-yat: what; ācarati: act; śreṣṭhaḥ: great; tat-tat: that; eva: certainly; itaraḥ: common; janaḥ: persons; saḥ: he; yat: what; pramāṇaṁ: evidence; kurute: perform; lokaḥ: world; tat: that; anuvartate: follow in footsteps
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.21 Whatever action is performed by a great person, others follow. They follow the example set by him.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.21।।श्रेष्ठ मनुष्य जोजो आचरण करता है दूसरे मनुष्य वैसावैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.21।। श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं वह पुरुष जो कुछ प्रमाण कर देता है लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.21 यद्यत् whatsoever? आचरति does? श्रेष्ठः the best? तत्तत् that? एव only? इतरः the other? जनः people? सः he (that great man)? यत् what? प्रमाणम् standard (authority? demonstration)? कुरुते does? लोकः the world (people)? तत् that? अनुवर्तते follows.Commentary Man is a social animal. He is an imitating animal too. He takes his ideas of right and wrong from those whom he regards as his moral superior. Whatever a great man follows? the same is considered as an authority by his followers. They try to follow him. They endeavour to walk in his footsteps.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.21. Whatsoever a great man does, other commoners do the same; whatever standard he sets up, the world follows that.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.21 For whatever a great man does, others imitate. People conform to the standard which he has set.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.21 Whatever a great man does, other men also do. Whichever standard he sets, the world follows it.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.21 Whatever a superior person does, another person does that very thing! Whatever he upholds as authority, an ordinary person follows that.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.21 Whatsoever a great man does, that the other men also do; whatever he sets up as the standard, that the world (mankind) follows.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.21 See Comment under 3.22
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.21 Whatever 'an eminent man,' i.e., he, who is famous for his knowledge of all the scriptures and for his observance of the scriptural dictates, performs, others who have incomplete knowledge of the scriptures will also perform, following his example. With regard to any duty which is being performed with all its ancillaries by an eminent personage, the people with incomplete knowledge will do it with the same ancillaries. Therefore for the protection of the world, all acts that are appropriate to one's station and stage in life must always be performed by an eminent man who is distinguished for his wisdom. Otherwise, the evil generated from the ruin of the large masses of the world (who neglect their duties by following his example), will bring him down, even if he were a follower of pure Jnana Yoga.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.21 Yat yat, [This is according to the Ast. The G1. Pr. reads, yat yat yesu yesu.-Tr.] whatever action; a sresthah, superior person, a leader; acarati, does; itarah, another; janah, person, who follows him; does tat tat eva, that very action. Further, yat, whatever; sah, he, the superior person; kurute, upholds; as pramanam, authority, be it Vedic or secular; lokah, an ordinary person; anuvartate, follows; tat, that, i.e. he accepts that very thing as authoritative. 'If you have a doubt here with regard to the duty of preventing people from straying, then why do you not observe Me?'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.21।। मनुष्य मूलत अनुकरण करने वाला प्राणी है। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है। इतिहास के किसी काल में भी समाज का नैतिक पुनरुत्थान हुआ है तो उस केवल राष्ट्र के नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों के आदर्शों के कारण। शिक्षकों के सद्व्यवहार से ही विद्यार्थियों को अनुशासित किया जा सकता है यदि किसी राष्ट्र का शासक भ्रष्ट और अत्याचारी हो तो निम्न पदों के अधिकारी सत्य और ईमानदार नहीं हो सकते। छोटे बालकों का व्यवहार पूर्णत उनके मातापिता के आचरण एवं संस्कृति द्वारा निर्भर और नियन्त्रित होता है।इस तथ्य को ध्यान में रखते हुये भगवान् कर्माचरण के लिए अर्जुन के समक्ष एक और कारण प्रस्तुत करते हैं। यदि वह कर्म नहीं करता तो सम्भव है समाज के अधिकांश लोग भी स्वकर्तव्यपराङमुख हो जायेंगे और अन्त में परिणाम होगा जीवन में संस्कृति का ह्रास।अब आगे इस बात पर बल देने तथा अब तक दिये गये उपदेश का प्रभाव दृढ़ करने के लिए भगवान् स्वयं का ही उदाहरण देते हैं। यद्यपि भगवान् स्वयं नित्यमुक्त हैं तथापि तमोगुण और रजोगुण की बुराइयों में पड़ी तत्कालीन पीढ़ी को उसमें से बाहर निकालने के लिए वे स्वयं अनासक्त भाव से कुशलतापूर्वक कर्म करते हुये सभी के लिये एक आदर्श स्थापित करते हैं।अधर्म का सक्रिय प्रतिकार यह श्रीकृष्ण का सिद्धांत है। उनकी अहिंसा उस दिवास्वप्न देखने वाले कायर के समान नहीं थी जो अन्याय का प्रतिकार न करके संस्कृति का रक्षण करने में असमर्थ होता है। अब अर्जुन मन में कर्मयोग के विषय में कोई संदेह नहीं रह सकता था।यदि लोकसंग्रह के विषय में तुम्हें कोई शंका हो तो तुम मुझे क्यों नहीं देखते मेरे अनुसार तुम भी लोगों को अधर्म के मार्ग से निवृत्त कर उन्हें धर्म मार्ग में प्रवृत्त होने के लिये अपना आदर्श क्यों नहीं स्थापित करते
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.21।। मयि कर्मणि प्रवृत्ते कथं लोकसंग्रहो भविष्यतीत्यत आह यदिति। यद्यत्कर्म श्रेष्ठः प्रधान आचरति तत्तदेव कर्मेतरोऽन्यो जनस्तदनुगत आचरति। किंच स प्रधान यल्लौकिकं वैदिकं वा प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते। तदेव प्रमाणीकुरुते इत्यर्थः। यत्कर्म शास्त्रं वा निवृत्तिशास्त्रं वेत्याचार्यैः संकोचे मानाभावमभिप्रेत्य न व्याख्यातम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.21।।ननु मया कर्मणि क्रियमाणेऽपि लोकः किमिति तत्संगृह्णीयादित्याशङ्क्य श्रेष्ठाचारानुविधायित्वादित्याह यद्यदिति। श्रेष्ठः प्रधानभूतो राजादिर्यद्यत्कर्माचरति शुभमशुभं वा तत्तदेवाचरतीतरः प्राकृतस्तदनुगतो जनः नत्वन्यत्स्वातन्त्र्येणेत्यर्थः। ननु शास्त्रमवलोक्याशास्त्रीयं श्रेष्ठाचारं परित्यज्य शास्त्रीयमेव कुतो नाचरति लोक इत्याशङ्क्य आचारवत्प्रतिपत्तावपि श्रेष्ठानुसारितामितरस्य दर्शयति स यदिति। स श्रेष्ठो यल्लौकिकं वैदिकं वा प्रमाणं कुरुते प्रमाणत्वेन मन्यते तदेव लोकोऽप्यनुवर्तते प्रमाणं कुरुते नतु स्वातन्त्र्येण किंचिदित्यर्थः। तथाच प्रधानभूतेन त्वया राज्ञा लोकसंरक्षणार्थं कर्म कर्तव्यमेवप्रधानानुयायिनो जनव्यवहारा भवन्ति इति न्यायादित्यभिप्रायः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.20 3.21।।अत्र शिष्टाचारं प्रमाणयति कर्मणेति। कर्मणैव सह संसिद्धिं श्रवणादिसाध्यां ज्ञाननिष्ठां गन्तुमास्थिताः प्रवृत्ता जनकादयस्त्वादृशाः क्षत्रियाः न तु संन्यासेन। ननु शुद्धचित्तस्य मम नास्ति कर्मापेक्षेत्याशङ्क्याह लोकेति। लोकस्य संग्रहः स्वधर्मे प्रवर्तनम्। ननु स्वप्रयोजनाभावेऽपि केवलं लोकसंग्रहार्थं चेत्कर्म कर्तव्यं तदा विदुषां ब्राह्मणानामपि संन्यासो न स्यात्। यतीनेव संन्यासधर्मान्ग्राहयितुं तेषां संन्यास इति चेत् अर्जुनेऽपि न तद्दंडवारितमस्ति। ननु क्षत्रियस्य संन्यासेऽधिकारो नास्तीति चेत् लिङ्गधारणेऽधिकाराभावेऽपि भरतऋषभादिवद्विक्षेपकर्मत्यागमात्रेऽधिकारात्। वार्तिकेसर्वाधिकारविच्छेदि ज्ञानं चेदभ्युपेयते। कुतोऽधिकारनियमो
Chapter 3 (Part 14)
व्युत्थाने क्रियते बलात्। इति विद्वत्संन्यासे क्षत्रियादेरप्यधिकारस्य साधितत्वात्। अतो लोकसंग्रहो न मुख्यं कर्मप्रयोजनमिति चेत्सत्यम्।न मे पार्थास्ति कर्तव्यम् इति स्वदृष्टान्तेनाधिकारिकत्वादर्जुन एवैवं नियोज्यते न क्षत्रियमात्रमिति तुष्यतु भवान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.21।।ननु लोकसङ्ग्रहोऽपि भक्तानामनुचित एवेत्यत आह यद्यदिति। श्रेष्ठो मद्भक्तो यद्यदाचरतितदेवेतरो जन आचरति। स मद्भक्तो यदेव प्रमाणं कुरुते लोकस्तंदेवानुवर्तते प्रमाणत्वेनाङ्गीकुरुते। अयं भावः भक्तानां लोकसङ्ग्रहो मदाज्ञया कर्त्तव्यः यतस्तदाचरणं दृष्ट्वा लोकोऽपि तथैव कुर्यात् तत्स्वरूपाज्ञानेऽपि तदाऽनधिकारित्वात् फलं तु न स्यादेव फलदाने च मदिच्छा न। यतो भक्तिः परमकृपया कस्मैचिदेव दीयते न सर्वेभ्यः। सर्वेभ्यो दाने सृष्टिरेवोच्छिद्येत। अतस्तद्रोप()नेन सृष्टिप्रवृत्त्यर्थं बाह्यतः कापट्येन कर्म कर्तव्यमिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.21।।कर्मकरणे लोकसंग्रहो यथा स्यात्तथाह यदिति। इतरः प्राकृतो जनः तत्तदेवाचरति। स श्रेष्ठो जनः कर्मशास्त्रं निवृत्तिशास्त्रं वा यत्प्रमाणं मन्यते तदेव लोकोऽप्यनुसरति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.21।।यतः यद्यदिति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.21।।लोकसंग्रह किसको करना चाहिये और किसलिये करना चाहिये सो कहते हैं श्रेष्ठ पुरुष जोजो कर्म करता है अर्थात् प्रधान मनुष्य जिसजिस कर्ममें बर्तता है दूसरे लोग उसके अनुयायी होकर उसउस कर्मका ही आचरण किया करते हैं। तथा वह श्रेष्ठ पुरुष जिसजिस लौकिक या वैदिक प्रथाको प्रामाणिक मानता है लोग उसीके अनुसार चलते हैं अर्थात् उसीको प्रमाण मानते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.21।। व्याख्या यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः श्रेष्ठ पुरुष वही है जो संसार(शरीरादि पदार्थों) को और स्वयं(अपने स्वरूप) को तत्त्वसे जानता है। उसका यह स्वाभाविक अनुभव होता है कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि धन कुटुम्ब जमीन आदि पदार्थ संसारके हैं अपने नहीं। इतना ही नहीं वह श्रेष्ठ पुरुष त्याग वैराग्य प्रेम ज्ञान सद्गुण आदिको भी अपना नहीं मानता क्योंकि उन्हें भी अपना माननेसे व्यक्तित्व पुष्ट होता है जो तत्त्वप्राप्तिमें बाधक है। मैं त्यागी हूँ मैं वैरागी हूँ मैं सेवक हूँ मैं भक्त हूँ आदि भाव भी व्यक्तित्वको पुष्ट करनेवाले होनेके कारण तत्त्वप्राप्तिमें बाधक होते हैं। श्रेष्ठ पुरुषमें (जडताके सम्बन्धसे होनेवाला) व्यष्टि अहंकार तो होता ही नहीं और समष्टि अहंकार व्यवहारमात्रके लिये होता है जो संसारकी सेवामें लगा रहता है क्योंकि अहंकार भी संसारका ही है (गीता 7। 4 13। 5)।संसारसे मिले हुए शरीर धन परिवार पद योग्यता अधिकार आदि सब पदार्थ सदुपयोग करने अर्थात् दूसरोंकी सेवामें लगानेके लिये ही मिले हैं उपभोग करने अथवा अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं। जो इन्हें अपना और अपने लिये मानकर इनका उपभोग करता है उसको भगवान् चोर कहते हैं यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः (गीता 3। 12)। ये सब पदार्थ समष्टिके ही हैं व्यष्टिके कभी किसी प्रकार नहीं। वास्तवमें इन पदार्थोंसे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है। श्रेष्ठ पुरुषके अपने कहलानेवाले शरीरादि पदार्थ (संसारके होनेसे) स्वतःस्वाभाविक संसारकी सेवामें लगते हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। देने के भावसे समाजमें एकता प्रेम उत्पन्न होता है और लेने के भावसे संघर्ष उत्पन्न होता है। देने का भाव उद्धार करनेवाला और लेने का भाव पतन करनेवाला होता है। शरीरको मैं मेरा अथवा मेरे लिये माननेसे ही लेने का भाव उत्पन्न होता है। शरीरसे अपना कोई सम्बन्ध न माननेके कारण श्रेष्ठ पुरुषमें लेने का भाव किञ्चिन्मात्र भी नहीं होता। अतः उसकी प्रत्येक क्रिया दूसरोंका हित करनेवाली ही होती है। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषके दर्शन स्पर्श वार्तालाप चिन्तन आदिसे स्वतः लोगोंका हित होता है। इतना ही नहीं उसके शरीरको स्पर्श करके बहनेवाली वायुतकसे लोगोंका हित होता है।ऐसे श्रेष्ठ पुरुष दो प्रकारके होते हैं (1) अवधूत कोटिके ओर (2) आचार्य कोटिके। अवधूत कोटिके श्रेष्ठ पुरुष अवधूतोंके लिये ही आदर्श होते हैं साधारण जनताके लिये नहीं। परन्तु आचार्य कोटिके श्रेष्ठ पुरुष मनुष्यमात्रके लिये आदर्श होते हैं। यहाँ आचार्य कोटिके श्रेष्ठ पुरुषोंका वर्णन किया गया है जिनके आचरण सदा शास्त्रमर्यादाके अनुकूल ही होते हैं। कोई देखे या न देखे अहंताममता न रहनेके कारण उनके द्वारा स्वाभाविक ही कर्तव्यका पालन होता है। जैसे जंगलमें कोई पुष्प खिला और कुछ समयके बाद मुरझा गया और सूखकर गिर गया। उसे किसीने देखा नहीं फिर भी उसने (चारों ओर) अपनी सुगन्ध फैलाकर दुर्गन्धका नाश किया ही है। इसी तरह श्रेष्ठ पुरुषसे (परहितका असीम भाव होनेके कारण) संसारमात्रका स्वाभाविक ही बहुत उपकार हुआ करता है चाहे कोई समझे या न समझे। कारण यह है कि व्यक्तित्व (अहंताममता) मिट जानेके कारण भगवान्की उस पालनशक्तिके साथ उसकी एकता हो जाती है जिसके द्वारा संसारमात्रका हित हो रहा है।जैसे एक ही शरीरके सब अङ्ग भिन्नभिन्न होनेपर भी एक ही हैं (जैसे किसी भी अङ्गमें पीड़ा होनेपर मनुष्य उसे अपनी पीड़ा मानता है) ऐसे ही संसारके सब प्राणी भिन्नभिन्न होनेपर भी एक ही हैं। जैसे शरीरका कोई भी पीड़ित (रोगी) अङ्ग ठीक हो जानेपर सम्पूर्ण शरीरका हित होता है ऐसे ही मर्यादामें रहकर प्राप्त वस्तु समय परिस्थिति आदिके अनुसार अपने कर्तव्यका पालन करनेवाले मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण संसारका स्वतः हित होता है।श्रेष्ठ पुरुषके आचरणों और वचनोंका प्रभाव (स्थूलशरीरसे होनेके कारण) स्थूलरीतिसे पड़ता है जो सीमित होता है। परन्तु उसके भावोंका प्रभाव सूक्ष्मरीतिसे पड़ता है जो असीम होता है। कारण यह है कि क्रिया तो सीमित होती है पर भाव असीम होता है।श्रेष्ठ पुरुष जिन भावोंको अपने आचरणोंमें लाता है उन भावोंका दूसरे मनुष्योंपर बहुत प्रभाव पड़ता है। अपने वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिके आचरणोंका अच्छी तरहसे पालन करनेके कारण उसके द्वारा कहे हुए वचनोंका दूसरे वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिके लोगोंपर भी बहुत प्रभाव पड़ता है।यद्यपि श्रेष्ठ मनुष्य अपने लिये कोई आचरण नहीं करता और उसमें कर्तृत्वाभिमान भी नहीं होता तथापि लोगोंकी दृष्टिमें वह आचरण करता हुआ दीखनेके कारण यहाँ आचरति क्रियाका प्रयोग हुआ है। उसके द्वारा सबके उपकारके लिये स्वतःस्वाभाविक क्रियाएँ होती हैं। अपना कोई स्वार्थ न रहनेके कारण उसकी छोटीबड़ी प्रत्येक क्रिया लोगोंका स्वतः हित करनेवाली होती है। यद्यपि उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है तस्य कार्यं न विद्यते (गीता 3। 17) और उसमें करनेका अभिमान भी नहीं है निर्ममो निरहंकारः (गीता 2। 71) तथापि उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक सुचारुरूपसे कर्तव्यका पालन होता है। इस प्रकार उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक लोगसंग्रह होता है।विशेष बातप्रायः देखा जाता है कि जिस समाज सम्प्रदाय जाति वर्ण आश्रम आदिमें जो श्रेष्ठ मनुष्य कहलाते हैं और जिनको लोग श्रेष्ठ मानकर आदरकी दृष्टिसे देखते हैं वे जैसा आचरण करते हैं उस समाज सम्प्रदाय जाति आदिके लोग भी वैसा ही आचरण करने लग जाते हैं।अन्तःकरणमें धन और पदका महत्त्व एवं लोभ रहनेके कारण लोग अधिक धनवाले (लखपित करोड़पति) तथा ऊँचे पदवाले (नेता मन्त्री आदि) पुरुषोंको श्रेष्ठ मान लेते हैं और उन्हें बहुत आदरकी दृष्टिसे देखते हैं। जिनके अन्तःकरणमें जड वस्तुओं(धन पद आदि) का महत्त्व है वे मनुष्य वास्तवमें न तो स्वयं श्रेष्ठ होते हैं और न श्रेष्ठ व्यक्तिको समझ ही सकते हैं। जिसको वे श्रेष्ठ समझते हैं वह भी वास्तवमें श्रेष्ठ नहीं होता। यदि उनके हृदयमें धनका अधिक आदर है तो उनपर अधिक धनवालोंका ही प्रभाव पड़ता है जैसे चोरपर चोरोंके सरदारका ही प्रभाव पड़ता है। वास्तवमें श्रेष्ठ न होनेपर भी लोगोंके द्वारा श्रेष्ठ मान लिये जानेके कारण उन धनी तथा उच्च पदाधिकारी पुरुषोंके आचरणोंका समाजमें स्वतः प्रचार हो जाता है। जैसे धनके कारण जो श्रेष्ठ माने जाते हैं वे पुरुष जिनजिन उपायोंसे धन कमाते और जमा करते हैं उनउन उपायोंका लोगोंमें स्तवः प्रचार हो जाता है चाहे वे उपाय कितने ही गुप्त क्यों न हों यही कारण है कि वर्तमानमें झूठ कपट बेईमानी धोखा चोरी आदि बुराइयोंका समाजमें किसी पाठशालामें पढ़ाये बिना ही स्वतः प्रचार होता चला जा रहा है।यह दुःख और आश्चर्यकी बात है कि वर्तमानमें लोग लखपतिको श्रेष्ठ मान लेते हैं पर प्रतिदिन भगवन्नामका लाख जप करनेवालेको श्रेष्ठ नहीं मानते। वे यह विचार ही नहीं करते कि लखपतिके मरनेपर एक कौड़ी भी साथ नहीं जायगी जबकि भगवन्नामका जप करनेवालेके मरनेपर पूराकापूरा भगवन्नामरूप धन उसके साथ जायगा एक भी भगवान्नाम पीछे नहीं रहेगाअपनेअपने स्थान या क्षेत्रमें जो पुरुष मुख्य कहलाते हैं उन अध्यापक व्याख्यानदाता आचार्य गुरु नेता शासक महन्त कथावाचक पुजारी आदि सभीको अपने आचरणोंमें विशेष सावधानी रखनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है जिससे दूसरोंपर उनका अच्छा प्रभाव पड़े। इसी प्रकार परिवारके मुख्य व्यक्ति(मुखिया) को भी अपने आचरणोंमें पूरी सावधानी रखनेकी आवश्यकता है। कारण कि मुख्य व्यक्तिकी ओर सबकीदृष्टि रहती है। रेलगाड़ीके चालकके समान मुख्य व्यक्तिपर विशेष जिम्मेवारी रहती है। रेलगाड़ीमें बैठे अन्य व्यक्ति सोये भी रह सकते हैं पर चालकको सदा जाग्रत् रहना पड़ता है। उसकी थोड़ी भी असावधानीसे दुर्घटना हो जानेकी सम्भावना रहती है। इसलिये संसारमें अपनेअपने क्षेत्रमें श्रेष्ठ माने जानेवाले सभी पुरूषोंको अपने आचरणोंपर विशेष ध्यान रखनेकी बहुत आवश्यकता है।स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते जिसके अन्तःकरणमें कामना ममता आसक्ति स्वार्थ पक्षपात आदि दोष नहीं हैं और नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व या कुछ भी लेनेका भाव नहीं है ऐसे मनुष्यके द्वारा कहे हुएवचनोंका प्रभाव दूसरोंपर स्वतः पड़ता है और वे उसके वचनानुसार स्वयं आचरण करने भी लग जाते हैं।यहाँ यह शंका हो सकती है कि जब आचरणकी बात कह दी तब प्रमाणके कहनेकी क्या आवश्यकता है और प्रमाणकी बात कहनेपर आचरणके कहनेकी क्या आवश्यकता है इसका समाधान यह है कि यद्यपि आचरण मुख्य होता है तथापि एक ही मनुष्यके द्वारा सभी वर्णों आश्रमों सम्प्रदायों आदिके भावोंका आचरण करना सम्भव नहीं है। अतः श्रेष्ठ मनुष्य स्वयं जिस वर्ण आश्रम आदिमें है उसके अनुसार तो वह साङ्गोपाङ्ग आचरण करता ही है और अन्य वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिके लोगोंके लिये भी वह अपने वचनोंसे शास्त्र इतिहास आदिके प्रमाणसे यह शिक्षा देता है कि अपने लिये कुछ न करके सम्पूर्ण प्राणियोंके हितके भावसे अपनेअपने (वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदि के अनुसार) कर्तव्यका पालन करना कल्याणका सुगम और श्रेष्ठ साधन है (गीता 18। 45)। उसके वचनोंसे प्रभावित होकर दूसरे वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिके लोग उसके कहे अनुसार अपनेअपने कर्तव्योंका पालन करने लग जाते हैं। यद्यपि आचरणका क्षेत्र सीमित और प्रमाण(वचनों) का क्षेत्र विस्तृत होता है तथापि भगवान्के द्वारा श्रेष्ठ पुरुषके आचरणमें पाँच पद यत् यत् तत् तत् और (विशेषरूपसे) एव देनेका अभिप्राय है कि उसके आचरणका प्रभाव समाजपर पाँच गुना (अधिक) पड़ता है और प्रमाणमें दो पद यत् और तत् देनेका अभिप्राय है कि प्रमाणका प्रभाव समाजपर केवल दो गुना (अपेक्षाकृत कम) पड़ता है। इसीलिये भगवान्ने बीसवें श्लोकमें लोकसंग्रहके लिये अपने कर्तव्यकर्मोंका पालन करनेपर ही विशेषरूपसे जोर दिया है।.यदि श्रेष्ठ मनुष्य स्वयं अपने वर्ण आश्रम आदिके अनुसार आचरण न करके केवल प्रमाण दे तो उसका लोगोंपर विशेष प्रभाव नहीं पड़ेगा। उसमें लोगोंका ऐसा भाव हो सकता है कि ये बातें तो केवल कहनेसुननेकी हैं क्योंकि कहनेवाला स्वयं भी तो अपने कर्तव्यकर्मका पालन नहीं कर रहा है। ऐसा भाव होनेपर लोगोंमें अपने कर्तव्यके प्रति अश्रद्धा और अरुचि होनेकी सम्भावना रहती है। इसलिये श्रेष्ठ पुरुष स्वयं आचरण करके और प्रमाण देकर दोनों ही प्रकारसे लोगोंको अपनेअपने कर्तव्यपालनमें लगाकर उनका हित करता है।श्रेष्ठ पुरुषके आचरणोंका अनुवर्तन (अनुसरण) वे ही लोग करते हैं जो उसे श्रेष्ठ मानते हैं। अतः वास्तवमें श्रेष्ठ होनेपर भी अगर कोई मनुष्य उसे श्रेष्ठ नहीं मानता तो वह उस श्रेष्ठ पुरुषके आचरणों और वचनोंके अनुसार आचरण नहीं कर सकेगा।वर्तमानमें पारमार्थिक (भगवत्सम्बन्धी) भावोंका प्रचार करनवाले बहुतसे पुरुषोंके होनेपर भी लोगोंपर उन भावोंका प्रभाव बहुत कम दिखायी देता है। इसका कराण यही है कि प्रायः वक्ता जैसा कहता है वैसा स्वयं पूरा आचरण नहीं करता। स्वयं आचरण करके कही गयी बात गोलीसे भरी बन्दूकके समान है जो गोलीके छूटनेपर आवाजके साथसाथ मार भी करती है। इसके विपरीत आचरणमें लाये बिना कही गयी बात केवल बारूदसे भरी बन्दूकके समान है जो केवल आवाज करके ही शान्त हो जाती है। हाँ पारमार्थिक बातें ऐसे ही खत्म नहीं हो जातीं प्रत्युत कुछनकुछ प्रभाव डालती ही हैं। भगवत्त्चर्चा कथाकीर्तन आदिका कुछनकुछ प्रभाव सबपर पड़ता ही है। अगर सुननेवालोंमें श्रद्धा है और वे साधन करते हैं अथवा करना चाहते हैं तो उनपर (अपनी श्रद्धा और साधनकी रुचिके कारण) वचनोंका प्रभाव अधिक पड़ता है। सम्बन्ध अब भगवान् आगेके तीन श्लोकोंमें अपना उदाहरण देकर लोकसंग्रहकी पुष्टि करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.21 3.22।।यद्यदाचरतीति। न मे इति। प्राप्तप्रापणीयस्य परिपूर्णमनसोऽपि कर्मप्रवृत्तौ लोकानुग्रहः प्रयोजनमित्यत्र श्रीभगवान् आत्मानमेव दृष्टान्तीकरोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.21।।ज्ञानवता कृतार्थेन लोकसंग्रहार्थमपि न प्रवर्तितव्यमित्याशङ्कामुत्थाप्य परिहरति लोकेत्यादिना। श्रुताध्ययनसंपन्नत्वेनाभिमतो यद्यद्विहितं प्रतिषिद्धं वा कर्मानुतिष्ठति तत्तदेव प्राकृतो जनोऽनुवर्तते तेन विद्यावतापि लोकमर्यादास्थापनार्थं विहितं कर्तव्यमित्यर्थः। श्रेष्ठानुसारित्वमितरेषामाचारे दर्शयित्वा प्रतिपत्तावपि दर्शयति किञ्चेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.21।।स यत्प्रमाणं कुरुते इत्यत्र यच्छब्देन प्रमाणमप्रमाणं वा विवक्षितम् आद्ये प्रमाणं कुरुत इत्ययुक्तम् स्थितस्य करणाभावात्। द्वितीयेऽप्येवमेव अशक्यत्वादित्यत आह स इति। प्रमाणमेव सत् यद्वाक्यादिकं लोकेन प्रमाणतयाऽनवगतम् तत्प्रमाणतया ज्ञापयतीत्यर्थः। यद्वैकमेवेदं पदं यत्प्रमाणकं लौकिकं वैदिकं वा कर्म कुरुत इत्यनेनाभिप्रायेण तात्पर्यमाह यदुक्तेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.21।।स यद्वाक्यादिकं प्रमाणीकुरुते यदुक्तप्रकारेण तिष्ठतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.21।।श्रेष्ठः कृत्स्नशास्त्रज्ञातृतया अनुष्ठातृतया च प्रथितो यद् यद् आचरति तत् तद् एव अकृत्स्नविद् जनः अपि आचरति। अनुष्ठीयमानम् अपि कर्म श्रेष्ठो यत्प्रमाणं यदङ्गयुक्तम् अनुतिष्ठति तदङ्गयुक्तम् एव अकृत्स्नविद् लोकः अपि अनुतिष्ठति अतो लोकरक्षार्थं शिष्टतया प्रथितेन श्रेष्ठेन स्ववर्णाश्रमोचितं कर्म सकलं सर्वदा अनुष्ठेयम्। अन्यथा लोकनाशजनितं पापं ज्ञानयोगाद् अपि एनं प्रच्यावयेत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.21।। यद्यत् कर्म आचरति करोति श्रेष्ठः प्रधानः तत्तदेव कर्म आचरति इतरः अन्यः जनः तदनुगतः। किञ्च सः श्रेष्ठः यत् प्रमाणं कुरुते लौकिकं वैदिकं वा लोकः तत् अनुवर्तते तदेव प्रमाणीकरोति इत्यर्थः।।यदि अत्र ते लोकसंग्रहकर्तव्यतायां विप्रतिपत्तिः तर्हि मां किं न पश्यसि
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【 Verse 3.22 】
▸ Sanskrit Sloka: न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन | नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि || 3.22 ||
▸ Transliteration: na me pārthāsti kartavyaṁ triṣu lokeṣu kiñcana | nānavāptamavāptavyaṁ varta eva ca karmaṇi ||
▸ Glossary: na: not; me: mine; pārtha: O son of Pritā; asti: is; kartavyaṁ: duty; triṣu: in the three; lokeṣu: worlds; kiṁcana: anything; na: no; anavāptaṁ: in want; avāptavyaṁ: to be gained; varte: engaged; eva: only; ca: and; karmaṇi: work
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.22 O Pārtha, there is nothing that I must do in the three worlds. Neither am I in want of anything nor do I have anything to gain. Yet, I am always in action.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.22।।हे पार्थ मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है फिर भी मैं कर्तव्यकर्ममें ही लगा रहता हूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.22।। यद्यपि मुझे त्रैलोक्य में कुछ भी कर्तव्य नहीं हैं तथा किंचित भी प्राप्त होने योग्य (अवाप्तव्यम्) वस्तु अप्राप्त नहीं है तो भी मैं कर्म में ही बर्तता हूँ।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.22 न not? मे my? पार्थ O Partha? अस्ति is? कर्तव्यम् to be done (duty)? त्रिषु in the three? लोकेषु worlds? किञ्चन anything? न not? अनवाप्तम् unattained? अवाप्तव्यम् to be attained? वर्ते am? एव also? च and? कर्मणि in action.Commentary I am the Lord of the universe and therefore I have no personal grounds to engage. Myself in action. I have nothing to achieve as I have all divine wealth? as the wealth of the universe is Mine? and yet I engage Myself in action.Why do you not follow My example Why do you not endeavour to prevent the masses from following the wrong path by setting an example yourself If you set an example? people will follow you as you are a leader with noble alities.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.22. O son of Prtha ! For Me, in the three worlds there is nothing that must be done; nor is there any thing unattained [so far] to be attained; and yet I exert in action.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.22 There is nothing in this universe, O Arjuna, that I am compelled to do, nor anything for Me to attain; yet I am persistently active.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.22 For me, Arjuna, there is nothing in all the three worlds which ought to be done, nor is there anything unacired that ought to be acired. Yet I go on working.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.22 In all the three worlds, O Partha, there is no duty whatsoever for Me (to fulfil); nothing remains unachieved or to be achieved. [According to S. the translation of this portion is: There is nothing unattained that should be attained.-Tr.] (Still) do I continue in action.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.22 There is nothing in the three worlds, O Arjuna, that should be done by Me, nor is there anything unattained that should be attained; yet I engage Myself in action.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.21-22 Yad yad acarati etc. Na me etc. The Bhagavat cities Himself as an example to illustrate the idea that to favour the world is the [only] purpose for such a person to exert in action, eventhough he has already attained whatever is to be attained, and is fully satisfied in his mind.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.22 For Me, who is the Lord of all, who has all desires fulfilled, who is omniscient, whose will is always true, and who, at My own will, remains in the three worlds in the forms of gods, men and such other beings, there is nothing whatever to achieve. Therefore though there is for Me nothing 'unacired', i.e., nothing yet to be acired by work, I go on working for the protection of the world.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.22 O Partha, na asti, there is no; kartavyam, duty; kincana, whatsoever; me, for Me (to fulfill); even trisu lokesu, in all the three worlds. Why? There is na anavaptam, nothing (that remains) unachieved; or avaptavyam, to be achieved. Still varte eva, do I continue; karmani, in action.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.22।। पूर्णस्वरूप में स्थित योगेश्वर श्रीकृष्ण को तीनों लोकों में किसी वस्तु की इच्छा नहीं थी। यदि वे चाहते तो अपने स्वयं के लिये राज्य स्थापित कर उसमें सुख से रह सकते थे. परन्तु केवल कर्तव्य पालन का उत्तरदायित्व समझते हुए पाण्डवों के धर्म और न्याय संगत पक्ष का साथ देने के लिए ही वे युद्धभूमि में आये थे।बाल्यकाल से लेकर महाभारत युद्ध के क्षण तक उनका सम्पूर्ण जीवन अनासक्ति का ज्वलन्त उदाहरण हैं। यद्यपि उन्हें जीवन में प्राप्त करने योग्य वस्तु अप्राप्य नहीं थी तथापि वे सदैव कर्म में ही रत रहे मानो उनके लिए कर्म करना उत्साह और आनन्द से परिपूर्ण एक क्रीडा हो।इसी सन्दर्भ में भगवान कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.22।।अहमिव त्वमपि लोकसंग्रहं कुर्वत्याशयेनाह नेति। त्रिषु लोकेषु मम कर्तव्यं किंचिदपि न विद्यते यस्मादनवाप्तमप्राप्तमवाप्तव्यं प्रापणीयं त्रिषु लोकेषु किंचिदपि मे नास्ति यद्यप्येवं तथापि कर्मणि वर्त एव। कर्म करोभ्येवेत्यर्थः। त्वयापि मत्संबन्धित्वान्मत्पक्षपात एव कर्तव्य इति सूचयन्नाह पार्थेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.22।।अत्र चाहमेव दृष्टान्त इत्याह त्रिमिः हे पार्थ मे मम त्रिष्वपि लोकेषु किमपि कर्तव्यं नास्ति। यतोऽनवाप्तं फलं किंचिन्ममावाप्तव्यं नास्ति। तथापि वर्तएव कर्मण्यहम्। कर्म करोम्येवेत्यर्थः। पार्थेति संबोधयन् विशुद्धक्षत्रियवंशोद्भवस्त्वं शूरापत्यापत्यत्वेन चात्यन्तं मत्समोऽहमिव वर्तितुमर्हसीति दर्शयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.22।।कर्मणि वर्ते एव। अहं कर्म करोम्येवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.22।।मयापि तथैव क्रियत इत्याह न मेपार्थेति। हे पार्थ परमानुगृहीत मे त्रिषु लोकेषु किञ्चन कर्त्तव्यं नास्ति न वा अनवाप्तं अवाप्तव्यं प्राप्तव्यं तथापि लोकसङ्ग्रहार्थमहं कर्मणि वर्त्ते कर्म करोमीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.22।।अत्र चाहमेव दृष्टान्त इत्याह त्रिभिः न मे पार्थेति। हे पार्थ मे कर्तव्यं नास्ति। यतस्त्रिष्वपि लोकेष्वनवाप्तमप्राप्तं सदवाप्तव्यं प्राप्यं नास्ति तथापि कर्मण्यहं वर्ते। कर्म करोम्येवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.22।।अत्र चाहमेव निदर्शनमित्याह न म इति त्रिभिः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.22।।यदि इस लोकसंग्रहकी कर्तव्यतामें तुझे कुछ शंका हो तो तू मुझे क्यों नहीं देखता हे पार्थ तीनों लोकोंमें मेरा कुछ भी कर्तव्य नहीं है अर्थात् मुझे कुछ भी करना नहीं है क्योंकि मुझे कोई भी अप्राप्त वस्तु प्राप्त नहीं करनी है तो भी मैं कर्मोंमें बर्तता ही हूँ।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.22।। व्याख्या न मे पार्थास्ति ৷৷. नानवाप्तमवाप्तव्यम् भगवान् किसी एक लोकमें सीमित नहीं है। इसलिये वे तीनों लोकोंमें अपना कोई कर्तव्य न होनेकी बात कह रहे हैं।भगवान्के लिये त्रिलोकीमें कोई भी कर्तव्य शेष नहीं है क्योंकि उनके लिये कुछ भी पाना शेष नहीं है।कुछनकुछ पानेके लिये ही सब (मनुष्य पशु पक्षी आदि) कर्म करते हैं। भगवान् उपर्युक्त पदोंमें बहुत विलक्षण बात कह रहे हैं कि कुछ भी करना और पाना शेष न होनेपर भी मैं कर्म करता हूँअपने लिये कोई कर्तव्य न होनेपर भी भगवान् केवल दूसरोंके हितके लिये अवतार लेते हैं और साधु पुरुषोंका उद्धार पापी पुरुषोंका विनाश तथा धर्मकी संस्थापना करनेके लिये कर्म करते हैं (गीता 4। 8)। अवतारके सिवाय भगवान्की सृष्टिरचना भी जीवमात्रके उद्धारके लिये ही होती है। स्वर्गलोक पुण्यकर्मोंका फल भुगतानेके लिये है और चौरासी लाख योनियाँ एवं नरक पापकर्मोंका फल भुगतानेके लिये हैं। मनुष्ययोनि पुण्य और पाप दोनोंसे ऊँचे उठकर अपना कल्याण करनेके लिये है। ऐसा तभी सम्भव है जब मनुष्य अपने लिये कुछ न करे। वह सम्पूर्ण कर्म स्थूल शरीरसे होनेवाली क्रिया सूक्ष्म शरीरसे होनेवाला चिन्तन और कारण शरीरसे होनेवाली स्थिरता केवल दूसरोंके हितके लिये ही करे अपने लिये नहीं। कारण कि जिनसे सब कर्म किये जाते हैं वे स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों ही शरीर संसारके हैं अपने नहीं। इसलिये कर्मयोगी शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदि सम्पूर्ण सामग्रीको (जो वास्तवमें संसारकी ही है) संसारकी ही मानता है और उसे संसारकी सेवामें लगाता है। अगर मनुष्य संसारकी वस्तुको संसारकी सेवामें न लगाकर अपने सुखभोगमें लगाता है तो बड़ी भारी भूल करता है। संसारकी वस्तुको अपनी मान लेनेसे ही फलकी इच्छा होती है और फलप्राप्तिके लिये कर्म होता है। इस तरह जबतक मनुष्य कुछ पानेकी इच्छासे कर्म करता है तबतक उसके लिये कर्तव्य अर्थात् करना शेष रहता है।गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाय तो मालूम होता है कि मनुष्यमात्रका अपने लिये कोई कर्तव्य है ही नहीं। कारण कि प्रापणीय वस्तु (परमात्मतत्त्व) नित्यप्राप्त है और स्वयं (स्वरूप) भी नित्य है जबकि कर्म और कर्मफल अनित्य अर्थात् उत्पन्न एवं नष्ट होनेवाला है। अनित्य(कर्म और फल) का सम्बन्ध नित्य(स्वयं) के साथ हो ही कैसे सकता है कर्मका सम्बन्ध पर (शरीर और संसार) से है स्व से नहीं। कर्म सदैव पर के द्वारा और पर के लिये ही होता है। इसलिये अपने लिये कुछ करना है ही नहीं। जब मनुष्यमात्रके लिये कोई कर्तव्य नहीं है तब भगवान्के लिये कोई कर्तव्य हो ही कैसे सकता हैकर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषके लिये भगवान्ने इसी अध्यायके सत्रहवेंअठारहवें श्लोकोंमें कहा है कि उस महापुरुषके लिये कोई कर्तव्य नहीं है क्योंकि उसकी रति तृप्ति और संतुष्टि अपनेआपमें ही होती है। इसलिये उसे संसारमें करने अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता तथा उसका किसी भी प्राणीसे किञ्चिन्मात्र भी स्वार्थका सम्बन्ध नहीं रहता। ऐसा होनेपर भी वह महापुरुष लोकसंग्रहार्थ कर्म करता है। इसी प्रकार यहाँ भगवान् अपने लिये कहते हैं कि कोई भी कर्तव्य न होने तथा कुछ भी पाना बाकी न होनेपर भी मैं लोकसंग्रहार्थ कर्म करता हूँ। तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञ महापुरुषकी भगवान्के साथ एकता होती है मम साधर्म्यमागताः (गीता 14। 2)। जैसे भगवान् त्रिलोकीमें आदर्श पुरुष हैं (गीता 3। 23 4। 11) ऐसे ही संसारमें तत्त्वज्ञ पुरुष भी आदर्श हैं (गीता 3। 25)।वर्त एव च कर्मणि यहाँ एव पदसे भगवान्का तात्पर्य है कि मैं उत्साह एवं तत्परतासे आलस्यरहित होकर सावधानीपूर्वक साङ्गोपाङ्ग कर्तव्यकर्मोंको करता हूँ। कर्मोंका न त्याग करता हूँ न उपेक्षा।जैसे इंजनके पहियोंके चलनेसे इंजनसे जुड़े हुए डिब्बे भी चलते रहते हैं ऐसे ही भगवान् और सन्तमहापुरुष (जिनमें करने और पानेकी इच्छा नहीं है) इंजनके समान कर्तव्यकर्म करते हैं जिससे अन्यमनुष्य भी उन्हींका अनुसरण करते हैं। अन्य मनुष्योंमें करने और पानेकी इच्छा रहती है। ये इच्छाएँ निष्कामभावपूर्वक कर्तव्यकर्म करनेसे ही दूर होती हैं। यदि भगवान् और सन्तमहापुरुष कर्तव्यकर्म न करें तो दूसरे मनुष्य भी कर्तव्यकर्म नहीं करेंगे जिससे उनमें प्रमादआलस्य आ जायगा और वे अकर्तव्य करने लग जायँगे फिर उन मनुष्योंकी इच्छाएँ कैसे मिटेंगी इसलिये सम्पूर्ण मनुष्योंके हितके लिये भगवान् और सन्तमहापुरुषोंके द्वारा स्वाभाविक ही कर्तव्यकर्म होते हैं।भगवान् सदैव कर्तव्यपरायण रहते हैं कभी कर्तव्यच्युत नहीं होते। अतः भगवत्परायण साधकको भी कभी कर्तव्यच्युत नहीं होना चाहिये। कर्तव्यच्युत होनेसे ही वह भगवत्तत्त्वके अनुभवसे वञ्चित रहता है। नित्य कर्तव्यपरायण रहनेसे साधकको भगवत्तत्त्वका अनुभव सुगमतापूर्वक हो सकता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.21 3.22।।यद्यदाचरतीति। न मे इति। प्राप्तप्रापणीयस्य परिपूर्णमनसोऽपि कर्मप्रवृत्तौ लोकानुग्रहः प्रयोजनमित्यत्र श्रीभगवान् आत्मानमेव दृष्टान्तीकरोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.22।।कृतार्थस्यापि लोकसंग्रहार्थं विहितं कर्म कर्तव्यमित्युक्त्वा तत्रैव भगवन्तमुदाहरणत्वेनोपन्यस्यति यदीत्यादिना। अप्राप्तस्य प्राप्तये तवापि कर्तृत्वसंभवाद् न किंचिदपि विद्यते कर्तव्यमिति कथमुक्तमित्याशङ्क्याह नानवाप्तमिति। प्रतीकमुपादाय व्याख्यानद्वारा विद्यावतोऽपि कर्मप्रवृत्तिं संभावयति नेत्यादिना। अन्वयार्थं पुनर्नञोऽनुवादः। भगवतो नास्ति कर्तव्यमित्येतदाकाङ्क्षाद्वारा स्फोरयति कस्मादित्यादिना। प्रयोजनाभावे त्वयापि नानुष्ठेयं कर्मेत्याशङ्क्य लोकसंग्रहार्थं ममापि कर्मानुष्ठानमिति मत्वाह तथापीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.22।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.22।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.22।।न मे सर्वेश्वरस्य अवाप्तसमस्तकामस्य सर्वज्ञस्य सत्यसंकल्पस्य त्रिषु लोकेषु देवमनुष्यादिरूपेण स्वच्छन्दतो वर्तमानस्य किञ्चिद् अपि कर्तव्यम् अस्ति यतः अनवाप्तं कर्मणा अवाप्तव्यं न किञ्चिद् अपि अस्ति अथापि लोकरक्षायै कर्मणि एव वर्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.22।। न मे मम पार्थ न अस्ति न विद्यते कर्तव्यं त्रिषु अपि लोकेषु किञ्चन किञ्चिदपि। कस्मात् न अनवाप्तम् अप्राप्तम् अवाप्तव्यं प्रापणीयम् तथापि वर्ते एव च कर्मणि अहम्।।
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【 Verse 3.23 】
▸ Sanskrit Sloka: यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रित: | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ||
▸ Transliteration: yadi hyahaṁ na varteyaṁ jātu karmaṇyatandritaḥ | mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśaḥ ||
▸ Glossary: yadi: if; hi: certainly; ahaṁ: I; na: not; varteyaṁ: engage; jātu : ever; karmaṇi: work; atandritaḥ: with care; mama: My; vartma: path; anuvartante: follow; manuṣyāḥ: persons; pārtha: Pārtha; sarvaśaḥ: in all respects
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.23 If I did not engage in work with care, O Pārtha, certainly, people would follow My path in all respects.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.23 3.24।।हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्टभ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.23।। यदि मैं सावधान हुआ (अतन्द्रित) कदाचित कर्म में न लगा रहूँ तो हे पार्थ सब प्रकार से मनुष्य मेरे मार्ग (र्वत्म) का अनुसरण करेंगे।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.23 यदि if? हि surely? अहम् I? न not? वर्तेयम् engage Myself in action? जातु ever? कर्मणि in action? अतन्द्रितः unwearied? मम My? वर्त्म path? अनुवर्तन्ते follow? मनुष्याः men? पार्थ O Partha? सर्वशः in every way.Commentary If I remain inactive? people also will imitate Me and keep iet. They will all become Tamasic and pass into a state of inertia.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.23. For, if I were ever not at work unwearied, all men would follow My path, O son of Prtha !
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.23 For were I not to act without ceasing, O prince, people would be glad to do likewise.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.23 If I did not continue to work unwearied, O Arjuna, men would follow my path.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.23 For, O Partha, if at any time I do not continue [Ast. and A.A. read varteya instead of varteyam.-Tr.] vigilantly in action, men will follow My path in ever way.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.23 For, should I not ever engage Myself in action, unwearied, men would in every way follow My path, O Arjuna.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.23 See Comment under 3.25
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.23 If I, the Lord of all, whose will is always true, whose sport consists in creation, sustentation and dissolution of universe at My will, even though I am born at My pleasure as a man to help the world - if, I thus incarnating in the family of Vasudeva who is the foremost among virtuous men, did not contine to work unwearied at all times suitable to that family, then, these men with incomplete knowledge would follow My path, thinking that the way adopted by the son of virtuous Vasudeva alone is the real way. And in place of winning the self, they would go to Naraka because of their failure to do what ought to be done and also because of the sin arising from non-performance of duty.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.23 Again, O Partha, yadi, if; jatu, at any time; aham, I; an, do not; varteyam, continue; atandritah, vigilantly, untiringly; karmani, in action; manusyah, men: anuvartante, willl follow; mama, My; vartma, path; sarvasah, in every way, I being the Highest. And if that be so, what is the harm? In reply the Lord says: [Ast. omits this sentence completely.-Tr.]
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.23।। भगवान् को कर्म क्यों करने चाहिये उनके कर्म न करने से समाज को क्या हानि होगी यह वस्तुस्थिति है कि सामान्य जन सदैव अपने नेता का अनुकरण उसकी वेषभूषा नैतिक मूल्य कर्म और सभी क्षेत्रों में उसके व्यवहार के अनुसार करते हैं। नेताओं का जीवन उनके लिये आदर्श मापदण्ड होता है। अत भगवान् के कर्म न करने पर अन्य लोग भी निष्क्रिय होकर अनुत्पादक स्थिति में पड़े रहेंगे। जबकि प्रकृति में निरन्तर क्रियाशीलता दिखाई देती है। सम्पूर्ण विश्व की स्थिति कर्म पर ही आश्रित है।गीता में भगवान् मैं शब्द का प्रयोग देवकी पुत्र कृष्ण के अर्थ में नहीं करते वरन् शुद्ध आत्मस्वरूप की दृष्टि से आत्मानुभवी पुरुष के अर्थ में करते हैं। आत्मज्ञानी पुरुष अपने उस शुद्ध चैतन्यस्वरूप को जानता है जिस पर जड़ अनात्म पदार्थों का खेल हो रहा होता है जैसे जाग्रत पुरुष के मन पर आश्रित स्वप्न। यदि इस परम तत्त्व का नित्य आधार या अधिष्ठान न हो तो वर्तमान में अनुभूत जगत् का अस्तित्व ही बना नहीं रह सकता। यद्यपि लहरों की उत्पत्ति से समुद्र उत्पन्न नहीं होता तथापि समुद्र के बिना लहरों का नृत्य भी सम्भव नहीं है। इसी प्रकार भगवान् क्रियाशील रहकर जगत् में न रहें तो समाज का सांस्कृतिक जीवन ही गतिहीन होकर रह जाय्ोगा।यदि मैं कर्म न करूँ तो क्या हानि होगी भगवान् आगे कहते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.23।। यद्यमतन्द्रितोऽनलसः सन् कर्मणि कदाचिन्न वर्तेयं मम श्रेष्ठस्य वर्त्म भार्गमनुवर्तन्ते सर्वे मनुष्या अनुवर्तेरन्। इतरे जना अपि मम मार्गमनुवर्तन्ते त्वं संबन्धी नानुवर्तस इत्यत्याश्चर्यमिति द्योतयन्संबोधयति पार्थेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.23।।लोकसंग्रहोऽपि न ते कर्तव्यो विफलत्वादित्याशङ्क्याह यदि पुनरहमतन्द्रियतोऽनलसः सन् कर्मणि जातु कदाचिन्न वर्तेयं नानुतिष्ठेयं कर्माणि तदा मम श्रेष्ठस्य सतो वर्त्म मार्गं हे पार्थ मनुष्याः कर्माधिकारिणः सन्तोऽनुवर्तन्तेऽनुवर्तेरन्। सर्वशः सर्वप्रकारैः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.23।।यद्यहं कर्मणि न वर्तेयं तर्हि मनुष्याः ममैव वर्त्मानुवर्तन्ते अनुवर्तेरन्। कर्म न कुर्वीरन्नित्यर्थः। अतन्द्रितोऽनलसः। सर्वशः सर्वप्रकारैः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.23।।ननु त्वदकरणे किं स्यात् इत्यत आह यदीति। अहं जातु कदाचिदपि कर्मणि अतन्द्रितो निरालस्यः सन् न वर्तेय न प्रवृत्तो भवामि तदा मनुष्याः सर्वशः मम वर्त्म भक्तिमार्गमनुवर्त्तन्त इत्यर्थः। अतस्तेषां ततो निवृत्त्यर्थं कर्ममार्गप्रवृत्त्यर्थं कर्म करोमीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.23।। अकरणे लोकस्य नाशं दर्शयति यदीति। जातु कदाचिदतन्द्रितोऽनलसः सन्यदि कर्मणि न वर्तेयं कर्म नानुतिष्ठेयं तर्हि ममैव वर्त्म मार्गं मनुष्या अनुवर्तन्ते। अनुवर्तेरन्नित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.23।।तथापि कर्म करोमीत्यकरणे लोकनाशं दर्शयति द्वाभ्यां यदीति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.23।।यदि मैं कदाचित् आलस्यरहित सावधान होकर कर्मोंमें न बरतूँ तो हे पार्थ ये मनुष्य सब प्रकारसे मुझ श्रेष्ठके मार्गका अनुकरण कर रहे हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.23।। व्याख्या बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने अन्वयरीतिसे कर्तव्यपालनकी आवश्यकताका प्रतिपादन किया और इन श्लोकोंमें भगवान् व्यतिरेकरीतिसे कर्तव्यपालन न करनेसे होनेवाली हानिका प्रतिपादन करते हैं।यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः पूर्वश्लोकमें आये वर्त एव च कर्मणि पदोंकी पुष्टिके लिये यहाँ हि पद आया है।भगवान् कहते हैं कि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ ऐसा हो ही नहीं सकता परन्तु यदि ऐसा मान लें कि मैं कर्म न करूँ इस अर्थमें भगवान्ने यहाँ यदि जातु पदोंका प्रयोग किया है।अतन्द्रितः पदका तात्पर्य यह है कि कर्तव्यकर्म करनेमें आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये अपितु उन्हें बहुत सावधानी और तत्परतासे करना चाहिये। सावधानीपूर्वक कर्तव्यकर्म न करनेसे मनुष्य आलस्य और प्रमादके वशमें होकर अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर देता है।कर्मोंमें शिथिलता (आलस्यप्रमाद) न लाकर उन्हें सावधानी एवं तत्परतापूर्वक करनेसे ही कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद होता है। जैसे वृक्षकी कड़ी टहनी जल्दी टूट जाती है पर जो अधूरी टूटनेके कारण लटक रही है ऐसी शिथिल (ढीली) टहनी जल्दी नहीं टूटती ऐसे ही सावधानी एवं तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है पर आलस्यप्रमादपूर्वक (शिथिलतापूर्वक) कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद नहीं होता। इसीलिये भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें समाचर पदका तथा इस श्लोकमेंअतन्द्रितः पदका प्रयोग किया है।अगर किसी कर्मकी बारबार याद आती है तो यही समझना चाहिये कि कर्म करनेमें कोई त्रुटि (कामना आसक्ति अपूर्णता आलस्य प्रमाद उपेक्षा आदि) हुई है जिसके कारण उस कर्मसे सम्बन्धविच्छेद नहीं हुआ है। कर्मसे सम्बन्धविच्छेद न होनेके कारण ही किये गये कर्मकी याद आती है।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः इन पदोंसे भगवान् मानो यह कहते हैं कि मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले ही वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। जो मुझे आदर्श न मानकर आलस्यप्रमादवश कर्तव्यकर्म नहीं करते और अधिकार चाहते हैं वे आकृतिसे मनुष्य होनेपर भी वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य नहीं हैं।इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि श्रेष्ठ पुरुषके आचरण और प्रमाणके अनुसार सब मनुष्य उनका अनुसरण करते हैं और इस श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुसरण करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि श्रेष्ठ पुरुष तो एक ही लोक(मनुष्यलोक) में आदर्श पुरुष हैं पर मैं तीनों ही लोकोंमें आदर्श पुरुष हूँ।मनुष्यको संसारमें कैसे रहना चाहिये यह बतानेके लिये भगवान् मनुष्यलोकमें अवतरित होते हैं। संसारमें अपने लिये रहना ही नहीं है यही संसारमें रहनेकी विद्या है। संसार वस्तुतः एक विद्यालय है जहाँ हमें कामना ममता स्वार्थ आदिके त्यागपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करना सीखना है और उसके अनुसार कर्म करके अपना उद्धार करना है। संसारके सभी सम्बन्धी एकदूसरेकी सेवा (हित) करनेके लिये ही हैं।इसीलिये पिता पुत्र पति पत्नी भाई बहन आदि सबको चाहिये कि वे एकदूसरेके अधिकारकी रक्षा करते हुए अपनेअपने कर्तव्य पालन करें और एकदूसरेके कल्याणकी चेष्टा करें।उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् भगवान्ने तेईसवें श्लोकमें यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः पदोंसे कर्मोंमें सावधानी न रखनेसे होनेवाली हानिकी बात कही और अब इस (चौबीसवें) श्लोकमें उपर्युक्त पदोंसे कर्म न करनेसे होनेवाली हानिकी बात कहते हैं।यद्यपि ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैं कर्तव्यकर्म न करूँ तथापि यदि ऐसा मान लिया जाय इस अर्थमें भगवान्ने यहाँ चेत् पदका प्रयोग किया है।इन पदोंका तात्पर्य है कि मनुष्यकी कर्म न करनेमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गीता 2। 47)। इसीलिये भगवान् अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मेरे लिये कुछ भी प्राप्तव्य न होनेपर भी मैं कर्म करता हूँ। यदि मैं (जिस वर्ण आश्रम आदिमें मैंने अवतार लिया है उसके अनुसार) अपने कर्तव्यका पालन न करूँ तो सम्पूर्ण मनुष्य नष्टभ्रष्ट हो जायँ अर्थात् उनका पतन हो जाय। कारण कि अपने कर्तव्यका त्याग करनेसे मनुष्योंमें तामसभाव आ जाता है जिससे उनकी अधोगति होती है अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)।भगवान् त्रिलोकीमें आदर्श पुरुष हैं और सम्पूर्ण प्राणी उन्हींके मार्गका अनुसरण करते हैं। इसलिये यदि भगवान् कर्तव्यका पालन नहीं करेंगे तो त्रिलोकीमें भी कोई अपने कर्तव्यका पालन नहीं करेगा। अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे उनका अपनेआप पतन हो जायगा।संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः यदि मैं कर्तव्यकर्म न करूँ तो सब लोक नष्टभ्रष्ट हो जायँगे और उनके नष्ट होनेका कारण मैं ही बनूँगा जबकि ऐसा सम्भव नहीं है।परस्परविरुद्ध दो धर्म (भाव) एकमें मिल जायँ तो वह संकर कहलाता है।पहले अध्यायके चालीसवें और इकतालीसवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि यदि मैं युद्ध करूँगा तो कुलका नाश हो जायगा। कुलके नाशसे सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाता है धर्मके नष्ट होनेपर सम्पूर्ण कुलमें पाप फैल जाता है पापके अधिक बढ़नेपर कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती है और स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। इस प्रकार अर्जुनका भाव यह था कि युद्ध करनेसे वर्णसंकरता उत्पन्न होगी (टिप्पणी प0 157)। परन्तु यहाँ भगवान् उससे विपरीत बात कहते हैं कि युद्धरूप कर्तव्यकर्म न करनेसे वर्णसंकरता उत्पन्न होगी। इस विषयमें भगवान् अपना उदाहरण देते हैं कि यदि मैं कर्तव्यकर्म न करूँ तो कर्म धर्म उपासना वर्ण आश्रम जाति आदि सबमें स्वतः संकरता आ जायगी। तात्पर्य यह है कि कर्तव्यकर्म न करनेसे ही संकरता उत्पन्न होती है। इसलिये यहाँ भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि तू युद्धरूप कर्तव्यकर्म न करनेसे ही वर्णसंकर उत्पन्न करनेवाला बनेगा न कि युद्ध करनेसे (जैसा कि तू मानता है)।विशेष बातअर्जुनके मूल प्रश्न (मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं) का उत्तर भगवान् बाईसवें तेईसवें और चौबीसवें तीन श्लोकोंमें अपने उदाहरणसे देते हैं कि मैं तुम्हें ही कर्ममें लगाता हूँ ऐसी बात नहीं है प्रत्युत मैं स्वयं भी कर्ममें लगा रहता हूँ जबकि वास्तवमें मेरे लिये त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य एवं प्राप्तव्य नहीं है।भगवान् अर्जुनको इस बातका संकेत करते हैं कि अभी इस अवतारमें तुमने भी स्वीकार किया और मैंने भी स्वीकार किया कि तू रथी बने और मैं सारथि बनूँ तो देख क्षत्रिय होते हुए भी आज मैं तेरा सारथि बना हुआ हूँ और इस प्रकार स्वीकार किये हुए अपने कर्तव्यका सावधानी और तत्परतापूर्वक पालन कर रहा हूँ। मेरे इस कर्तव्यपालनका भी त्रिलोकीपर प्रभाव पड़ेगा क्योंकि मैं त्रिलोकीमें आदर्श पुरुष हूँ। समस्त प्राणी मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार तुम्हें भी अपने कर्तव्यकर्मकी उपेक्षा न करके मेरी तरह उसका सावधानी एवं तत्परतापूर्वक पालन करना चाहिये। सम्बन्ध पीछेके तीन श्लोकोंमें भगवान्ने जैसे अपने लिये कर्म करनेमें सावधानी रखनेका वर्णन किया ऐसे ही आगेके दो श्लोकोंमें ज्ञानी महापुरुषके लिये कर्म करनेमें सावधानी रखनेकी प्रेरणा करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.23 3.25।।यदीत्यादि लोकसंग्रहमित्यन्तम्। किं च विदितवेद्यः कर्म चेत् त्यजेत् तत् लोकानां दुर्भेद एव एकप्रसिद्धपक्षशिथिलितास्थाबन्धत्वेनाप्ररूढिलक्षणो जायेत (S K जायते)। यतः (S omits यतः) कर्मवासनां च न मोक्तुं शक्नुवन्ति ज्ञानधारां च नाश्रयितुम् अथ च शिथिलीभवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.23।।लोकसंग्रहोऽपि न ते कर्तव्यो विफलत्वादित्याशङ्क्याह यदि हीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.23।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.23।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.23।।अह सर्वेश्वरः सत्यसंकल्पः स्वसंकल्पकृतजगदुदयविभवलयलीलः स्वच्छन्दतो जगदुपकृतये मर्त्यो जातः अपि मनुष्येषु शिष्टजनाग्रेसरवसुदेवगृहे अवतीर्णः तत्कुलोचिते कर्मणि अतन्द्रितः सर्वदा यदि न वर्तेयम् मम शिष्टजनाग्रेसरवसुदेवसूनोः वर्त्म अकृत्स्नविदः शिष्टाः च सर्वप्रकारेणअयम् एव धर्मः इति अनुवर्तन्ते ते च स्वकर्तव्याननुष्ठानेन अकरणे प्रत्यवायेन च आत्मानम् अनुपलभ्य निरयगामिनो भवेयुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.23।। यदि हि पुनः अहं न वर्तेय जातु कदाचित् कर्मणि अतन्द्रितः अनलसः सन् मम श्रेष्ठस्य सतः वर्त्म मार्गम् अनुवर्तन्ते मनुष्याः हे पार्थ सर्वशः सर्वप्रकारैः।।
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【 Verse 3.24 】
▸ Sanskrit Sloka: उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् | सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमा: प्रजा: ||
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Chapter 3 (Part 15)
Transliteration: utsīdeyurime lokā na kuryāṁ karma cedaham | sakarasya ca kartā syāmupahanyāmimāḥ prajāḥ ||
▸ Glossary: utsīdeyuḥ: ruin; ime: these; lokāḥ: worlds; na: not; kuryāṁ: do; karma: work; cet: if; ahaṁ: I; sakarasya: confusion of species; ca: and; kartā: doer; syāṁ: shall be; upahanyāṁ: destroy; imāḥ: these; prajāḥ: beings
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.24 If I do not work, then these worlds would be ruined. I would be the cause of creating confusion and destruction.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.23 3.24।।हे पार्थ अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ (तो बड़ी हानि हो जाय क्योंकि) मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये सब मनुष्य नष्टभ्रष्ट हो जायँ और मैं संकरताको करनेवाला तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.24।। यदि मैं कर्म न करूँ तो ये समस्त लोक नष्ट हो जायेंगे और मैं वर्णसंकर का कर्ता तथा इस प्रजा का हनन करने वाला होऊँगा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.24 उत्सीदेयुः would perish? इमे these? लोकाः worlds? न not? कुर्याम् would do? कर्म action? चेत् if? अहम् I? सङ्करस्य of confusion of castes? च and? कर्ता author? स्याम् would be? उपहन्याम् would destroy? इमाःthese? प्रजाः beings.Commentary If I did not engage in action? people would also be inactive. They would not do their duties according to the Varnasrama Dharma (code of morals governing their own order and stage of life). Hence confusion of castes would arise. I would have to destroy these beings.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.24. These worlds would perish if I were not to perform action; and I would be a cause of confusion; I would destroy these people.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.24 And if I were to refrain from action, the human race would be ruined; I should lead the world to chaos, and destruction would follow.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.24 If I do not do work, these men would be lost; and I will be causing chaos in life and thery ruining all these people.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.24 These worlds will be ruined if I do not perform action. And I shall become the agent of intermingling (of castes), and shall be destroying these beings.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.24 These worlds would perish if I did not perform action; I should be the author of confusion of castes and destruction of these beings.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.24 See Comment under 3.25
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.24 If I do not do the work suitable to My station in life, likewise all the virtuous men also, neglecting their duties by following My example, would be destroyed on account of not performing their duties. That is, they will become lost. Thus I would be bringing about chaos among all virtuous men on account of My failure to conduct Myself as prescribed in the scriptures. Therefore I would be destroying all these people. Even so, if you, Arjuna, a son of Pandu and a brother of Yudhisthira and the foremost of the virtuous, claim to be alified for Jnana Yoga, then the virtuous aspirants, who do not know everything and who follow your way, without knowing their own competency, would give up practising Karma Yoga and will be lost. Therefore work should be done by one who is recognised as learned and worthy.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.24 Cet, if; aham, I; na kuryam, do not perform; karma, action; all ime, these; lokah, worlds; utsideyuh, will be ruined, owing to the obsence of work responsible for the maintenance of the worlds. Ca, and, futher; syam, I shall become; karta, the agent; sankarasya, of intermingling (of castes). Conseently, upahanyam, I shall be destroying; imah, these; prajah, beings. That is to say, I who am engaged in helping the creatures, shall be destroying them. This would be unbefitting of Me, who am God. 'On the other, if, like Me, you or some one else possesses the conviction of having attained Perfection and is a knower of the Self, it is a duty of such a one, too, to help others even if there be no obligation on his own part.'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.24।। ईश्वर के रूप में यदि मैं शासन न करूँ तो विश्व में उन्नति नहीं होगी और नियमबद्ध सृष्टि भी नष्ट हो जायेगी। विश्व कोई क्रमहीन रचना नहीं वरन् नियमबद्ध सृष्टि है। प्रकृति के नियम पालन में कहीं भी मर्यादा का उल्लंघन होता नहीं दिखाई देता।प्राकृतिक घटनायेंे ग्रहों की गति ऋतुओं का लयबद्ध नृत्य और सृष्टि का संगीत ये सब किसी महान् नियम के अनुसार चलते रहते हैं इसी को कहतेैं हैं प्रकृति और उसके नियामक ईश्वर की प्रबल शक्ति। इस ईश्वररूप में भगवान् के निष्क्रिय हो जाने पर ये लोक नष्ट हो जायेंगे। श्रीकृष्ण का यह कथन तर्क के विपरीत नहीं है जो केवल अन्धविश्वासी लोगों को ही स्वीकार होगा। विज्ञान की दृष्टि से विचार करने वाले लोग भी इसको अस्वीकार नहीं कर सकते।भगवान् केवल बाह्य जगत् के पदार्थों का संचालन करने वाले नियमों के ही नियामक नहीं बल्कि भावना एवं विचार के आन्तरिक जगत् के भी नियन्ता हैं। हिन्दू ऋषिमुनियों ने मानव समाज का चार वर्णों में जो वर्गीकरण किया उसका आधार मनुष्य का मानसिक स्वभाव एवं बौद्धिक क्षमता थी। यदि आन्तरिक जगत् में कोई नियम सुचारु रूप से काम न करें तो मनुष्य के व्यवहार और चरित्र में विचित्रता और अस्थिरता उत्पन्न होगी जिससे भ्रांति की वृद्धि होगी। वर्तमान में प्रचलित वर्णसंकर का अर्थ शास्त्र के विपरीत है जिसके कारण आज का शिक्षित व्यक्ति गीता की आलोचना करते हुये कह सकता है कि इसमें उच्च वर्ण की वर्चस्वता को ही भगवान की स्वीकृत है। वर्ण संकर के विषय में प्रथम अध्याय के 41वें श्लोक में विवेचन किया जा चुका है।आत्मज्ञान प्राप्त कर लेने पर स्वयं को कर्म से कोई प्रयोजन न होने पर भी ज्ञानी पुरुष को कर्म करना चाहिये। कैसे
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.24।। तथाच को दोष इत्यत आह उत्सीदेयुरिति। अहं चेत्कर्म न कुर्यां तर्हि इमें लोकाः उत्सीदेयुर्नश्येयुः लोकानुच्छित्तिनिमित्तकर्मणोऽभावात्। संकरस्य च कर्ता स्यां तेनेमाः प्रजाः उपहन्यामतः प्रजानामनुग्रहाय प्रवृत्तस्य ममेदं नानुरुपमित्यर्थः। युत्तु यद्यदाचरतीत्यादेरपरा योजना न केवलं लोकसंग्रहं पश्यन्कर्तुमर्हस्यपि तु श्रेष्ठाचारत्वादपीत्याह यद्यदिति। तथाच मम श्रेष्ठस्य यादृश आचारस्तादृश एव मदनुवर्तिना त्वयानुष्ठेयो न स्वातन्त्र्येणान्य इत्यर्थः। कीदृशस्तवाचारो मयानुवर्तनीय इत्याकाङ्क्षायां न मे पार्थत्यादिभिस्त्रिभिस्तत्प्रदर्शनमिति केषांचिद्य्वाख्यानं तद्भाष्यानुगुण्येन योजनीयम्। यद्वा लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसीति पूर्वोक्तानुरोधेन लोकसंग्रहं कः कर्तुमिच्छति कथंचेत्युच्यते। यद्यदित्यस्य भाष्योक्तोत्थापनविरुद्धं न केवलमित्याद्युपेक्ष्यम्। कर्मणैवेत्यादिना शिष्टाचारस्योक्तत्वात् सक्ता इत्यादिना विदुषो लोकसंग्रहाय कर्मणि प्रवृत्तिं दर्शयता यदि त्वमात्मानं विद्वांसं मन्यसे तर्हि लोकसंग्रहं संप्रति पश्यन्कर्मकर्तुमर्हसीत्येवं दृढीकृतं तस्मान्मध्येऽपि स्वस्य श्रेष्ठस्य कर्मणि प्रवृत्तिं प्रत्यक्षसिद्धां दर्शयंस्तदेव द्रढयति। योजनान्तरानीतार्थस्त्वर्थात्संबोधनाद्वापि सिध्यतीति न तदर्था भाष्यविरुद्दा क्लिष्टयोजना प्रदर्शनीयेति दिक्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.24।।श्रेष्ठस्य तव मार्गानुवर्तित्वं मनुष्याणामुचितमेव अनुवर्तित्वे को दोष इत्यत आह अहमीश्वश्चेद्यदि कर्म न कुर्यां तदा मदनुवर्तिनां मन्वादीनामपि कर्मानुपपत्तेर्लोकस्थितिहेतोः कर्मणो लोपेनेमे सर्वे लोका उत्सीदेयुर्विनश्येयुः। ततश्च वर्णसंकरस्य च कर्ताहमेव स्याम् तेन चेमाः सर्वाः प्रजा अहमेवोपहन्यां धर्मलोपेन विनाशयेयम्. कथंच प्रजानामनुग्रहार्थं प्रवृत्त ईश्वरोऽहं ताः सर्वा विनाशयेयमित्यभिप्रायः। यद्यदाचरतीत्यादेरपरा योजना न केवलं लोकसंग्रहं पश्यन्कर्तुमर्हस्यपितुश्रेष्ठाचारत्वादपीत्याह यद्यदिति। तथाच मम श्रेष्ठस्य यादृश आचारस्तादृश एव मदनुवर्तिना त्वयानुष्ठेयो न स्वातन्त्र्येणान्य इत्यर्थः। कीदृशस्तवाचारो यो मयानुवर्तनीय इत्याकाङ्क्षायां न मे पार्थेत्यादिभिस्त्रिभिः श्लोकैस्तत्प्रदर्शनमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.24।।ततश्च किमित्यत आह उत्सीदेयुरिति। यद्यदाचरतीत्यादेरपरा योजना। न केवलं लोकसंग्रहंपश्यन् कर्तुमर्हसि अपितु श्रेष्ठाचारत्वादपीत्याह यद्यदिति। तथा च मम श्रेष्ठस्य यादृश आचारस्तादृश एव मदनुवर्तिना त्वयानुष्ठेयः न स्वातन्त्र्येणान्य इत्यर्थः। कीदृशस्तवाचारो यो मयानुवर्तनीय इत्याकाङ्क्षायां न मे पार्थेत्यादिभिस्त्रिभिः श्लोकैस्तत्प्रदर्शनमिति मधुसूदनश्रीपादाः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.24।।ननु तथा तत्करणं किं प्रयोजनकं इत्यत आह उत्सीदेयुरिति। अहं चेत्कर्म न कुर्यां तदा इमे लोका उत्सीदेयुः। अत्रायं भावः सर्वेषां भक्तिप्रवृत्तौ सत्यां भगवत्साक्षात्कारो मुक्तिर्वा स्यात्तदा इमे मन्वादयो लोकाः सृष्ट्यभावादुच्छिन्ना भवेयुः। अत एव भगवता वृषभध्वजे आज्ञप्तं पाद्मे त्वं च रुद्र महाबाहो इत्यारभ्यसृष्टिरेषोत्तरोत्तरा इत्यन्तम्। च पुनरिमाः प्रजा उपहन्यां तदाऽहमेव सङ्करस्य नरकसाधनस्य कर्त्ता स्यां भवामि। अयमर्थः मदाज्ञया ब्रह्मादयः प्रजाः सृजन्ति ताश्चेदहमुपहन्यां तदननुकूलो भवामि तदा सङ्करस्य क्लिष्टस्य कर्त्ता स्यां प्रजानां च मदिच्छाव्यतिरेकेण भक्तिस्वरूपाज्ञाने सति प्रवृत्तौ सङ्करत्वं स्यात् फलाभावे भक्तिफलव्यभिचारोऽपि स्यात् तदापि तत्कर्त्ताऽहमेव स्याम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.24।।ततः किमत आह उत्सीदेयुरिति। उत्सीदेयुः कर्मलोपेन नश्येयुः। ततश्च वर्णसंकरो भवेत्तस्याप्यहमेव कर्ता स्यां भवेयम्। एवमहमेव प्रजा उपहन्यां मलिनीकुर्याम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.24।।उत्सीदेयुरिति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.24।।ऐसा होनेसे क्या दोष हो जायगा सो कहते हैं यदि मैं कर्म न करूँ तो लोकस्थितिके लिये किये जानेवाले कर्मोंका अभाव हो जानेसे यह सब लोक नष्ट हो जायँगे और मैं वर्णसंकरका कर्ता होऊँगा इसलिये इस प्रजाका नाश भी करूँगा अर्थात् प्रजापर अनुग्रह करनेमें लगा हुआ मैं इनका हनन करनेवाला बूनँगा। यह सब मुझ ईश्वरके अनुरूप नहीं होगा।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.24।। व्याख्या बाईसवें श्लोकमें भगवान्ने अन्वयरीतिसे कर्तव्यपालनकी आवश्यकताका प्रतिपादन किया और इन श्लोकोंमें भगवान् व्यतिरेकरीतिसे कर्तव्यपालन न करनेसे होनेवाली हानिका प्रतिपादन करते हैं।यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः पूर्वश्लोकमें आये वर्त एव च कर्मणि पदोंकी पुष्टिके लिये यहाँ हि पद आया है।भगवान् कहते हैं कि मैं सावधानीपूर्वक कर्म न करूँ ऐसा हो ही नहीं सकता परन्तु यदि ऐसा मान लें कि मैं कर्म न करूँ इस अर्थमें भगवान्ने यहाँ यदि जातु पदोंका प्रयोग किया है।अतन्द्रितः पदका तात्पर्य यह है कि कर्तव्यकर्म करनेमें आलस्य और प्रमाद नहीं करना चाहिये अपितु उन्हें बहुत सावधानी और तत्परतासे करना चाहिये। सावधानीपूर्वक कर्तव्यकर्म न करनेसे मनुष्य आलस्य और प्रमादके वशमें होकर अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर देता है।कर्मोंमें शिथिलता (आलस्यप्रमाद) न लाकर उन्हें सावधानी एवं तत्परतापूर्वक करनेसे ही कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद होता है। जैसे वृक्षकी कड़ी टहनी जल्दी टूट जाती है पर जो अधूरी टूटनेके कारण लटक रही है ऐसी शिथिल (ढीली) टहनी जल्दी नहीं टूटती ऐसे ही सावधानी एवं तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है पर आलस्यप्रमादपूर्वक (शिथिलतापूर्वक) कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद नहीं होता। इसीलिये भगवान्ने उन्नीसवें श्लोकमें समाचर पदका तथा इस श्लोकमेंअतन्द्रितः पदका प्रयोग किया है।अगर किसी कर्मकी बारबार याद आती है तो यही समझना चाहिये कि कर्म करनेमें कोई त्रुटि (कामना आसक्ति अपूर्णता आलस्य प्रमाद उपेक्षा आदि) हुई है जिसके कारण उस कर्मसे सम्बन्धविच्छेद नहीं हुआ है। कर्मसे सम्बन्धविच्छेद न होनेके कारण ही किये गये कर्मकी याद आती है।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः इन पदोंसे भगवान् मानो यह कहते हैं कि मेरे मार्गका अनुसरण करनेवाले ही वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य हैं। जो मुझे आदर्श न मानकर आलस्यप्रमादवश कर्तव्यकर्म नहीं करते और अधिकार चाहते हैं वे आकृतिसे मनुष्य होनेपर भी वास्तवमें मनुष्य कहलानेयोग्य नहीं हैं।इसी अध्यायके इक्कीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा था कि श्रेष्ठ पुरुषके आचरण और प्रमाणके अनुसार सब मनुष्य उनका अनुसरण करते हैं और इस श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुसरण करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि श्रेष्ठ पुरुष तो एक ही लोक(मनुष्यलोक) में आदर्श पुरुष हैं पर मैं तीनों ही लोकोंमें आदर्श पुरुष हूँ।मनुष्यको संसारमें कैसे रहना चाहिये यह बतानेके लिये भगवान् मनुष्यलोकमें अवतरित होते हैं। संसारमें अपने लिये रहना ही नहीं है यही संसारमें रहनेकी विद्या है। संसार वस्तुतः एक विद्यालय है जहाँ हमें कामना ममता स्वार्थ आदिके त्यागपूर्वक दूसरोंके हितके लिये कर्म करना सीखना है और उसके अनुसार कर्म करके अपना उद्धार करना है। संसारके सभी सम्बन्धी एकदूसरेकी सेवा (हित) करनेके लिये ही हैं।इसीलिये पिता पुत्र पति पत्नी भाई बहन आदि सबको चाहिये कि वे एकदूसरेके अधिकारकी रक्षा करते हुए अपनेअपने कर्तव्य पालन करें और एकदूसरेके कल्याणकी चेष्टा करें।उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् भगवान्ने तेईसवें श्लोकमें यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः पदोंसे कर्मोंमें सावधानी न रखनेसे होनेवाली हानिकी बात कही और अब इस (चौबीसवें) श्लोकमें उपर्युक्त पदोंसे कर्म न करनेसे होनेवाली हानिकी बात कहते हैं।यद्यपि ऐसा हो ही नहीं सकता कि मैं कर्तव्यकर्म न करूँ तथापि यदि ऐसा मान लिया जाय इस अर्थमें भगवान्ने यहाँ चेत् पदका प्रयोग किया है।इन पदोंका तात्पर्य है कि मनुष्यकी कर्म न करनेमें भी आसक्ति नहीं होनी चाहिये मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि (गीता 2। 47)। इसीलिये भगवान् अपना उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मेरे लिये कुछ भी प्राप्तव्य न होनेपर भी मैं कर्म करता हूँ। यदि मैं (जिस वर्ण आश्रम आदिमें मैंने अवतार लिया है उसके अनुसार) अपने कर्तव्यका पालन न करूँ तो सम्पूर्ण मनुष्य नष्टभ्रष्ट हो जायँ अर्थात् उनका पतन हो जाय। कारण कि अपने कर्तव्यका त्याग करनेसे मनुष्योंमें तामसभाव आ जाता है जिससे उनकी अधोगति होती है अधो गच्छन्ति तामसाः (गीता 14। 18)।भगवान् त्रिलोकीमें आदर्श पुरुष हैं और सम्पूर्ण प्राणी उन्हींके मार्गका अनुसरण करते हैं। इसलिये यदि भगवान् कर्तव्यका पालन नहीं करेंगे तो त्रिलोकीमें भी कोई अपने कर्तव्यका पालन नहीं करेगा। अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे उनका अपनेआप पतन हो जायगा।संकरस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः यदि मैं कर्तव्यकर्म न करूँ तो सब लोक नष्टभ्रष्ट हो जायँगे और उनके नष्ट होनेका कारण मैं ही बनूँगा जबकि ऐसा सम्भव नहीं है।परस्परविरुद्ध दो धर्म (भाव) एकमें मिल जायँ तो वह संकर कहलाता है।पहले अध्यायके चालीसवें और इकतालीसवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि यदि मैं युद्ध करूँगा तो कुलका नाश हो जायगा। कुलके नाशसे सनातन कुलधर्म नष्ट हो जाता है धर्मके नष्ट होनेपर सम्पूर्ण कुलमें पाप फैल जाता है पापके अधिक बढ़नेपर कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती है और स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। इस प्रकार अर्जुनका भाव यह था कि युद्ध करनेसे वर्णसंकरता उत्पन्न होगी (टिप्पणी प0 157)। परन्तु यहाँ भगवान् उससे विपरीत बात कहते हैं कि युद्धरूप कर्तव्यकर्म न करनेसे वर्णसंकरता उत्पन्न होगी। इस विषयमें भगवान् अपना उदाहरण देते हैं कि यदि मैं कर्तव्यकर्म न करूँ तो कर्म धर्म उपासना वर्ण आश्रम जाति आदि सबमें स्वतः संकरता आ जायगी। तात्पर्य यह है कि कर्तव्यकर्म न करनेसे ही संकरता उत्पन्न होती है। इसलिये यहाँ भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि तू युद्धरूप कर्तव्यकर्म न करनेसे ही वर्णसंकर उत्पन्न करनेवाला बनेगा न कि युद्ध करनेसे (जैसा कि तू मानता है)।विशेष बातअर्जुनके मूल प्रश्न (मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं) का उत्तर भगवान् बाईसवें तेईसवें और चौबीसवें तीन श्लोकोंमें अपने उदाहरणसे देते हैं कि मैं तुम्हें ही कर्ममें लगाता हूँ ऐसी बात नहीं है प्रत्युत मैं स्वयं भी कर्ममें लगा रहता हूँ जबकि वास्तवमें मेरे लिये त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य एवं प्राप्तव्य नहीं है।भगवान् अर्जुनको इस बातका संकेत करते हैं कि अभी इस अवतारमें तुमने भी स्वीकार किया और मैंने भी स्वीकार किया कि तू रथी बने और मैं सारथि बनूँ तो देख क्षत्रिय होते हुए भी आज मैं तेरा सारथि बना हुआ हूँ और इस प्रकार स्वीकार किये हुए अपने कर्तव्यका सावधानी और तत्परतापूर्वक पालन कर रहा हूँ। मेरे इस कर्तव्यपालनका भी त्रिलोकीपर प्रभाव पड़ेगा क्योंकि मैं त्रिलोकीमें आदर्श पुरुष हूँ। समस्त प्राणी मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार तुम्हें भी अपने कर्तव्यकर्मकी उपेक्षा न करके मेरी तरह उसका सावधानी एवं तत्परतापूर्वक पालन करना चाहिये। सम्बन्ध पीछेके तीन श्लोकोंमें भगवान्ने जैसे अपने लिये कर्म करनेमें सावधानी रखनेका वर्णन किया ऐसे ही आगेके दो श्लोकोंमें ज्ञानी महापुरुषके लिये कर्म करनेमें सावधानी रखनेकी प्रेरणा करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.23 3.25।।यदीत्यादि लोकसंग्रहमित्यन्तम्। किं च विदितवेद्यः कर्म चेत् त्यजेत् तत् लोकानां दुर्भेद एव एकप्रसिद्धपक्षशिथिलितास्थाबन्धत्वेनाप्ररूढिलक्षणो जायेत (S K जायते)। यतः (S omits यतः) कर्मवासनां च न मोक्तुं शक्नुवन्ति ज्ञानधारां च नाश्रयितुम् अथ च शिथिलीभवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.24।।श्रेष्ठस्य तव मार्गानुवर्तित्वं मनुष्याणामुचितमेवेत्याशङ्क्य दूषयति तथाचेत्यादिना। ईश्वरस्य कर्मण्यप्रवृत्तौ तदनुवर्तिनामपि कर्मानुपपत्तेरिति हेतुमाह लोकस्थितीति। इतश्चेश्वरेण कर्म कर्तव्यमित्याह किञ्चेति। यदि कर्म न कुर्यामिति शेषः। संकरकरणस्य कार्यं कथयति तेनेति। प्रजोपहतिः परिप्राप्यते चेत् किं तया तव स्यादिति तत्राह प्रजानामिति। त्वामनाचरन्तमनुवर्ततां सर्वेषां को दोषः स्यादित्यपेक्षायामीश्वरस्य कृतार्थतया कर्मानुष्ठानाभावे तदनुवर्तिनामपि तदभावादेव स्थितिहेत्वभावात्पृथिव्यादिभूतानां विनाशप्रसङ्गाद्वर्णाश्रमधर्मव्यवस्थानुपपत्तेश्चाधिकृतानां प्राणभृतां पापोपहतत्वप्रसङ्गात्परानुग्रहार्थं प्रवृत्तिरीश्वरस्येत्युक्तं संप्रति लोकसंग्रहाय कर्म कुर्वाणस्य कर्तृत्वाभिमानेन ज्ञानाभिभवे प्राप्ते प्रत्याह यदि पुनरिति। कृतार्थबुद्धित्वे हेतुमाह आत्मविदिति। यथावदात्मानमवगच्छत्कर्तृत्वाद्यभिमानाभावात्कृतार्थो भवत्येवेत्यर्थः। अर्जुनादन्यत्रापि ज्ञानवति कृतार्थबुद्धित्वं कर्तव्यत्वाद्यभिमानहीने तुल्यमित्याह अन्यो वेति। तस्य तर्हि कर्मानुष्ठानमफलत्वादनवकाशमित्याशङ्क्याह तस्यापीति। कर्तव्य इत्यात्मविदापि परानुग्रहाय कर्तव्यमेव कर्मेत्याहेति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.24।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.24।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.24।।अहं कुलोचितं कर्म न चेत् कुर्याम् एवम् एव सर्वे शिष्टलोका मदाचारायत्तधर्मनिश्चया अकरणाद् एव उत्सीदेयुः नष्टा भवेयुः शास्त्रीयाचाराणाम् अपालनात् सर्वेषां शिष्टकुलानां संकरस्य च कर्ता स्याम् अता एव इमाः प्रजा उपहन्याम्। एवम् एव त्वम् अपि शिष्टजनाग्रेसरपाण्डुतनयः युधिष्ठिरानुजः अर्जुनः सन् शिष्टतया यदि ज्ञाननिष्ठायाम् अधिकरोषि ततः त्वदाचारानुवर्तिनः अकृत्स्नविदः शिष्टाः च मुमुक्षवः स्वाधिकारम् अजानन्तः कर्मनिष्ठायाम् अनधिकुर्वन्तो विनश्येयुः अतो व्यपदेश्येन विदुषा कर्म एव कर्तव्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.24।। उत्सीदेयुः विनश्येयुः इमे सर्वे लोकाः लोकस्थितिनिमित्तस्य कर्मणः अभावात् न कुर्यां कर्म चेत् अहम्। किञ्च संकरस्य च कर्ता स्याम्। तेन कारणेन उपहन्याम् इमाः प्रजाः। प्रजानामनुग्रहाय प्रवृत्तः उपहतिम् उपहननं कुर्याम् इत्यर्थः। मम ईश्वरस्य अननुरूपमापद्येत।।यदि पुनः अहमिव त्वं कृतार्थबुद्धिः आत्मवित् अन्यो वा तस्यापि आत्मनः कर्तव्याभावेऽपि परानुग्रह एव कर्तव्य इत्याह
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【 Verse 3.25 】
▸ Sanskrit Sloka: सक्ता: कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत | कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ||
▸ Transliteration: saktāḥ karmaṇyavidvāṁso yathā kurvanti bhārata | kuryādvidvāṁstathāsaktaścikīrṣurlokasaṁgraham ||
▸ Glossary: saktāḥ: attached; karmaṇi: work; avidvāṁsaḥ: ignorant; yathā: as; kurvanti: do; bhārata: Bhārata; kuryāt: do; vidvān: wise; tathā: and; asaktaḥ: without attachment; cikīrṣuḥ: desiring; lokasaṁgrahaṁ: leading people
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.25 As the ignorant do their work with attachment to the results, O Bhārata, the wise do so without attachment, for the enrichment (welfare) of people.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.25 3.26।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.25।। हे भारत कर्म में आसक्त हुए अज्ञानीजन जैसे कर्म करते हैं वैसे ही विद्वान् पुरुष अनासक्त होकर लोकसंग्रह (लोक कल्याण) की इच्छा से कर्म करे।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.25 सक्ताः attached? कर्मणि to action? अविद्वांसः the ignorant? यथा as? कुर्वन्ति act? भारत O Bharata? कुर्यात् should act? विद्वान् the wise? तथा so? असक्तः unattached? चिकीर्षुः wishing? लोकसंग्रहम् the welfare of the world.Commentary The ignorant man works in expectation of fruits. He says? I will do such and such work and will get such and such fruit. But the wise man who knows the Self? serves not for his own end. He should so act that the world? following his example? would attain peace? harmony? purity of heart? divine light and knowledge. A wise man is one who knows the Self. (Cf.II.64III.19XVIII.49).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.25. [Therefore] just as the unwise persons, being attached to action, do, O son of Prtha, so the wise should perform, [But] being unattached and desiring to hold the world together.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.25 As the ignorant act, because of their fondness for action, so should the wise act without such attachment, fixing their eyes, O Arjuna, only on the welfare of the world.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.25 Just as the ignorant, attached to their work, act, O Arjuna, so too the learned should act without any attachment, and only for the welfare of the world.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.25 O scion of the Bharata dynasty, as the unelightened poeple act with attachment to work, so should the enlightened person act, without attachment, being desirous of the prevention of people from going astray.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.25 As the ignorant men act from attachment to action, O Bharata (Arjuna), so should the wise act without attachment, wishing the welfare of the world.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.23-25 Yadi etc. upto loka-sangraham. Further, if a well-in-formed person were to abandon action, that would create in the society, a split for bad in the form of being illrooted, becuase of the binding force - viz., the regard for a particular well-known theroy-being loosened. For, they are able neither to cast off their tendency of action nor to accupy the tradition (or stream) of wisdom. Conseently they become weak. Because these (common men) are not purified correct knowledge, therefore to break i.e., to shake their mind would be highly harmful for them. Hence, for their benefit, one should not disturb their mind. This [the Lord] says :
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.25 'The ignorant' are those people who do not know the entire truth about the self; 'attached to their work' means they are inseparably yoked to work. Because of their incomplete knowledge of the self, they are not alified for Jnana Yoga which is of the nature of practising knowledge of the self. They are alified for Karma Yoga only. As they should practise Karma Yoga for the vision of the self in the same manner Karma Yoga should be practised by one who is recognised as virtuous, who is unattached to work by reason of the vision of the self, and who wishes that his conduct should give guidance to others in virtuous conduct. In this way he should protect the world from chaos by his example. Such a person, even though alified for Jnana Yoga, should practice Karma Yoga.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.25 O scion of the Bharata dynasty, yatha, as; some avidvamsah, unenlightened poele; kurvanti, act. saktah, with attachment; karmani, to work, (thinking) 'The reward of this work will accrue to me'; tatha, so; should vidvan, the enlightened person, the knower of the Self; kuryat, act; asaktah, without attachment, remaining unattached. [Giving up the idea of agentship and the hankering for the rewards of actions to oneself.] Whay does he (the enlightened person) act like him (the former)? Listen to that: Cikirsuh, being desirous of achieving; lokasamgraham, prevention of people from going astray. 'Neither for Me who am a knower of the Self, nor for any other (knower of the Self) who wants thus prevent people from going astray, is there any duty apart from working for the welfare of the world. Hence, the following advice is being given to such a knower of the Self:'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.25।। हम सब अपनेअपने कार्यक्षेत्रों में जीवनपर्यन्त पूर्ण उत्साह एवं रुचि के साथ कर्म करते रहते हैं। एक सामान्य मनुष्य निरन्तर कर्म के दबाव अथवा तनाव में अपने आप को थकाकर क्षीण कर लेता है। शारीरिक स्वास्थ्य ऋतु परिवर्तन की पीड़ा तथा जीवन के अन्य सुखदुख की चिन्ता न करके वह निरन्तर अधिक से अधिक धनार्जन तथा उसके उपभोग के लिए प्रयत्नशील रहता है।श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मज्ञानी पुरुष भी अज्ञानी के समान उत्साहपूर्वक अथक कर्म करता है। दोनों के कार्यों में एकमात्र अन्तर यह है कि अज्ञानी पुरुष कर्म फलों में आसक्त हुआ कर्म करता है तो ज्ञानी पुरुष पूर्ण रूप से अनासक्त हुआ केवल विश्व के कल्याण के लिये कर्मरत होता है।यह संभव है कि सामान्य मनुष्य को ज्ञानी और अज्ञानी के कर्मों के मध्य सूक्ष्म भेद विशेष महत्त्व का प्रतीत न हो जब तक कि उसका ध्यान इस ज्ञान की सार्वभौमिक उपयोगिता की ओर आकर्षित नहीं किया जाय। कर्मफल के प्रति आसक्ति और चिन्ता ही वे छिद्र हैं जिनके माध्यम से कर्त्ता की शक्ति बिखर जाती है और जीवन में उसे केवल असफलता ही हाथ लगती है। ज्ञानी पुरुष भी शरीर मन और बुद्धि से ही समस्त कर्म करता है परन्तु वह मन की शक्ति को व्यर्थ में गंवाता नहीं।मन का यह स्वभाव है कि वह किसी न किसी वस्तु के साथ आसक्त होकर ही कार्य करता है। इस श्लोक में वर्णित अनासक्ति का अर्थ है मिथ्या विषयों के प्रति मन में आकर्षण का अभाव। इसे प्राप्त करने का उपाय है मन को उच्च और श्रेष्ठ लक्ष्य की ओर प्रवृत्त करना। अत श्रीकृष्ण जब अनासक्त होकर कर्म करने का उपदेश देते हैं तब उसका उपाय भी बताते हैं कि विद्वान् पुरुष को लोक कल्याण की इच्छा से कर्म करना चाहिए।अत्यधिक अहंकारकेन्द्रित होने पर ही आसक्ति कल्याण के मार्ग में बाधक बनती है। जिस सीमा तक हम अपनी दृष्टि को व्यापक करते हुए किसी बड़ी योजना अथवा समाज के लिये कार्य करते हैं उसी सीमा तक आसक्ति का दुखदायी विष समाप्त होकर युग को आनन्द विभोर करता है। अनेक प्रकार के विष मिश्रित रूप में जीवन रक्षक औषधि का काम करते हैं जब कि वही विष अपनें तीव्र रूप में तत्काल मृत्यु का कारण बन जाते हैं। अत्यधिक आत्मकेन्द्रित इच्छायें मनुष्य को हानि पहुंचाती हैं परन्तु अपने को ऊँचा उठाकर सम्पूर्ण जगत् के साथ तादात्म्य स्थापित होने पर उसी मनुष्य के कर्म दिव्यता की आभा से मंडित होकर उसके दुखों एवं दुर्बलताओं को दूर कर देते हैं।यहाँ अर्जुन को इस प्रकार की अनासक्ति के भाव द्वारा संस्कृति के उच्च मूल्यों की रक्षा के लिये शत्रुओं के साथ युद्ध करने का उपदेश दिया गया है।जगत् की सेवा में रत विद्वान् पुरुष को निम्नलिखित सम्मति दी गयी है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.25।।यथाहं कृतार्थो लोकसंग्रहार्थं कर्म करोमि तथा त्वमन्यो वा विद्वांस्तदर्थं कर्म कुर्यादित्याह सक्ता इति। यथा विद्वांसः कर्मणि सक्ताः कर्तृत्वाभिमानफलाभिसंधिभ्यामासक्ताः कर्म कुर्वन्ति तथाऽसक्तः सन् विद्वानात्मविल्लोकसंग्रहं कर्तुमिच्छुः कर्म कुर्यात्। तव तु भरतवंशोद्भवत्वादपि लोकसंग्रहोऽवश्यं संपाद्य इति सूचयन्नाह भारतेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.25।।ननु तवेश्वरस्य लोकसंग्रहार्थं कर्माणि कुर्वाणस्यापि कर्तृत्वाभिमानाभावान्न कापि क्षतिः। मम तु जीवस्य लोकसंग्रहार्थं कर्माणि कुर्वाणस्य कर्तृत्वाभिमानेन ज्ञानाभिभवः स्यादित्यत आह सक्ताः कर्तृत्वाभिमानेन फलाभिसन्धिना च कर्मण्यभिनिविष्टा अविद्वांसोऽज्ञा यथा कुर्वन्ति कर्म लोकसंग्रहं कर्तुमिच्छुर्विद्वानात्मविदपि तथैव कुर्यात्। किंतु असक्तः सन्। कर्तृत्वाभिमानं फलाभिसंधिं चाकुर्वन्नित्यर्थः। भारतेति भरतवंशोद्भवत्वेन भा ज्ञानं तस्यां रतत्वेन वा त्वं यथोक्तशास्त्रार्थबोधयोग्योऽसीति दर्शयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.25।।यदि मादृश एव त्वं कृतार्थोऽसि तथापि परानुग्रहार्थं कर्माणि कुर्वित्याह सक्ता इति। कर्मणि कर्मफले। कुर्वन्ति कर्माणीति शेषः। असक्त इति च्छेदः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.25।।अतस्तत्स्वरूपज्ञानेन लोकसङ्ग्रहार्थं कर्मस्वनासक्तं कर्म कुर्यादित्याह सक्ता इति। यथा अविद्वांसो मूर्खाः कर्मणि सक्तास्तत्फलाभिलाषिणो विषयादीन् न त्यक्तुं समर्थाः कर्म कुर्वन्ति तथा विद्वान् पण्डितो मत्स्वरूपज्ञः लोकसङ्ग्रहं चिकीर्षुः कर्तुमिच्छरसक्तस्तन्नासक्तिरहितो मदाज्ञया कुर्यादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.25।।तस्मादात्मविदापि लोकसंग्रहार्थं तत्कृपया कर्म कार्यमेवेत्युपसंहरति सक्ता इति। कर्मणि सक्ता अभिनिविष्टाः सन्तोऽज्ञाः यथा कर्म कुर्वन्ति तथैव असक्तः सन् विद्वानपि कुर्यात् लोकसंग्रहं कर्तुमिच्छुः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.25।।तस्माद्विदुषाऽपि लोकसङ्ग्रहार्थं तत्कृपया कर्म कर्त्तव्यमित्युपसंहरन्नाह सक्ता इति। उभयोः कर्माचरणे प्राप्ते प्रकारभेदं दर्शयति अविद्वांस आत्मानात्मतत्त्वमजानन्तः सक्ताः कुर्वन्ति न तथा विद्वान् यतो लोकसङ्ग्रहं चिकीर्षुरिति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.25।।यदि मेरी तरह तू या दूसरा कोई कृतार्थबुद्धि आत्मवेत्ता हो तो उसको भी अपने लिये कर्तव्यका अभाव होनेपर भी केवल दूसरोंपर अनुग्रह ( करनेके लिये कर्म ) करना चाहिये हे भारत इस कर्मका फल मुझे मिलेगा इस प्रकार कर्मोंमें आसक्त हुए कई अज्ञानी मनुष्य जैसे कर्म करते हैं आत्मवेत्ता विद्वान्को भी आसक्तिरहित होकर उसी तरह कर्म करना चाहिये। आत्मज्ञानी उसकी तरह कर्म क्यों करता है सो सुन वह लोकसंग्रह करनेकी इच्छावाला है ( इसलिये करता है )।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.25।। व्याख्या सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो तथा कुर्वन्ति भारत जिन मनुष्योंकी शास्त्र शास्त्रपद्धति और शास्त्रविहित शुभकर्मोंपर पूरी श्रद्धा है एवं शास्त्रविहित कर्मोंका फल अवश्य मिलता है इस बातपर पूरा विश्वास है जो न तो तत्त्वज्ञ हैं और न दुराचारी हैं किन्तु कर्मों भोगों एवं पदार्थोंमें आसक्त हैं ऐसे मनुष्योंके लिये यहाँ सक्ताः अविद्वांसः पद आये हैं। शास्त्रोंके ज्ञाता होनेपर भी केवल कामनाके कारण ऐसे मनुष्य अविद्वान् (अज्ञानी) कहे गये हैं। ऐसे पुरुष शास्त्रज्ञ तो हैं पर तत्त्वज्ञ नहीं। ये केवल अपने लिये कर्म करते हैं इसीलिये अज्ञानी कहलाते हैं।ऐसे अविद्वान् मनुष्य कर्मोंमें कभी प्रमाद आलस्य आदि न रखकर सावधानी और तत्परतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग विधिसे कर्म करते हैं क्योंकि उनकी ऐसी मान्यता रहती है कि कर्मोंको करनेमें कोई कमी आ जानेसे उनके फलमें भी कमी आ जायगी। भगवान् उनके इस प्रकार कर्म करनेकी रीतिको आदर्श मानकर सर्वथा आसक्तिरहित विद्वान्के लिये भी इसी विधिसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेकी प्रेरणा करते हैं।कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् जिसमें कामना ममता आसक्ति वासना पक्षपात स्वार्थ आदिका सर्वथा अभाव हो गया है और शरीरादि पदार्थोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी लगाव नहीं रहा ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषके लिये यहाँ असक्तः विद्वान् पद आये हैं (टिप्पणी प0 158)।बीसवें श्लोकमें लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कहकर फिर इक्कीसवें श्लोकमें जिसकी व्याख्या की गयी उसीको यहाँ लोकसंग्रहं चिकीर्षुः पदोंसे कहा गया है।श्रेष्ठ मनुष्य (आसक्तिरहित विद्वान्) के सभी आचरण स्वाभाविक ही यज्ञके लिये मर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये होते हैं। जैसे भोगी मनुष्यकी भोगोंमें मोही मनुष्यकी कुटुम्बमें और लोभी मनुष्यकी धनमें रति होती है ऐसे ही श्रेष्ठ मनुष्यकी प्राणिमात्रके हितमें रति होती है। उसके अन्तःकरणमें मैं लोकहित करता हूँ ऐसा भाव भी नहीं होता प्रत्युत उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक लोकहित होता है। प्राकृत पदार्थमात्रसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जानेके कारण उस ज्ञानी महापुरुषके कहलानेवाले शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि भी लोकसंग्रह पदमें आये लोक शब्दके अन्तर्गत आते हैं।दूसरे लोगोंको ऐसे ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहकी इच्छावाले दीखते हैं पर वास्तवमें उनमें लोकसंग्रहकी भी इच्छा नहीं होती। कारण कि वे संसारसे प्राप्त शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ पद अधिकार धनयोग्यता सामर्थ्य आदिको साधनावस्थासे ही कभी किञ्चिन्मात्र भी अपने और अपने लिये नहीं मानते प्रत्युत संसारके और संसारकी सेवाके लिये ही मानते हैं जो कि वास्तवमें है। वही प्रवाह रहनेके कारण सिद्धावस्थामें भी उनके कहलानेवाले शरीरादि पदार्थ स्वतःस्वाभाविक किसी प्रकारकी इच्छाके बिना संसारकी सेवामें लगे रहते हैं।इस श्लोकमें यथा और तथा पद कर्म करनेके प्रकारके अर्थमें आये हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अज्ञानी (सकाम) पुरुष अपने स्वार्थके लिये सावधानी और तत्परतापूर्वक कर्म करते हैं उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी लोकसंग्रह अर्थात् दूसरोंके हितके लिये कर्म करे। ज्ञानी पुरुषको प्राणिमात्रके हितका भाव रखकर सम्पूर्ण लौकिक और वैदिक कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते रहना चाहिये। सबका कल्याण कैसे हो इस भावसे कर्तव्यकर्म करनेपर लोकमें अच्छे भावोंका प्रचार स्वतः होता है।अज्ञानी पुरुष तो फलकी प्राप्तिके लिये सावधानी और तत्परतासे विधिपूर्वक कर्तव्यकर्म करता है पर ज्ञानी पुरुषकी फलमें आसक्ति नहीं होती और उसके लिये कोई कर्तव्य भी नहीं होता। अतः उसके द्वारा कर्मकी उपेक्षा होना सम्भव है। इसीलिये भगवान् कर्म करनेके विषयमें ज्ञानी पुरुषको भी अज्ञानी (सकाम) पुरुषकी ही तरह कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।इक्कीसवें श्लोकमें तो विद्वान्को आदर्श बताया गया था पर यहाँ उसे अनुयायी बताया है। तात्पर्य यह है कि विद्वान् चाहे आदर्श हो अथवा अनुयायी उसके द्वारा स्वतः लोगसंग्रह होता है। जैसे भगवान् श्रीराम प्रजाको उपदेश भी देते हैं और पिताजीकी आज्ञाका पालन करके वनवास भी जाते हैं। दोनों ही परिस्थितियोंमें उनके द्वारा लोकसंग्रह होता है क्योंकि उनका कर्मोंके करने अथवा न करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं था।जब विद्वान् आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्म करता है तब आसक्तियुक्त चित्तवाले पुरुषोंके अन्तःकरणपर भी विद्वान्के कर्मोंका स्वतः प्रभाव पड़ता है चाहे उन पुरुषोंको यह महापुरुष निष्कामभावसे कर्म कर रहा है ऐसा प्रत्यक्ष दीखे या न दीखे। मनुष्यके निष्कामभावोंका दूसरोंपर स्वाभाविक प्रभाव पड़ता है यह सिद्धान्त है। इसलिये आसक्तिरहित विद्वान्के भावों आचरणोंका प्रभाव मनुष्योंपर ही नहीं अपितु पशुपक्षी आदिपर भी पड़ता है।विशेष बातमनुष्य जबतक निष्कामभावपूर्वक विहितकर्म नहीं करता तबतक उसका जन्ममरण नहीं मिट सकता। वह जबतक अपने लिये कर्म करता है तबतक वह कृतकृत्य नहीं होता अर्थात् उसका करना समाप्त नहीं होता। कारण कि स्वयं नित्य रहनेवाला है और कर्म एवं उसका फल नष्ट होनेवाला है। अतः प्रत्येक मनुष्यके लिये स्वार्थत्यागपूर्वक (अपने लिये न करके केवल दूसरोंके हितके लिये) कर्तव्यकर्म करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।सांसारिक पदार्थोंको मूल्यवान् समझनेके कारण ही कर्मयोग(निष्कामभावपूर्वक कर्तव्यकर्म) के पालनमें कठिनाई प्रतीत होती है। हमें दूसरोंसे कुछ न चाहकर केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करने हैं इस बातको यदि स्वीकार कर लें तो आज ही कर्मयोगका पालन सुगम हो जाय।वास्तवमें महत्ता पदार्थकी नहीं प्रत्युत आचरण(उसके उपयोग) की ही होती है। आचरणकी महत्ता भी तब है जब अन्तःकरणमें पदार्थकी महत्ता न हो। कोई भी पदार्थ व्यक्तिगत नहीं है केवल उपयोगके लिये ही व्यक्तिगत है। पदार्थको व्यक्तिगत माननेसे ही परहितके लिये उसका त्याग कठिन प्रतीत होता है। कोई भीपदार्थ या क्रिया बन्धनकारक नहीं उनका सम्बन्ध ही बन्धनकारक है।विद्वान् पुरुषोंसे भी लोकसंग्रहके लिये सब कर्म होते हैं। परन्तु ऐसा होते हुए भी उनमें मैं लोगसंग्रह कर रहा हूँ यह अभिमान नहीं रहता। कारण यह है कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि विद्या योग्यता पद आदि सब संसारके हैं और संसारसे मिले हैं। संसारसे मिली सामग्रीको संसारकी ही सेवामें लगा देना ईमानदारी है। उस सामग्रीको बहुत सच्चाईसे ईमानदारीसे संसारके अर्पण कर देना है। यह अर्पण करनाकोई बड़ा काम नहीं है। जैसे किसीने हमारे पास धरोहररूपसे रुपये रखे और कुछ समय बाद उसके माँगनेपर हमने उसके रुपये उसे वापस कर दिये तो कौनसा बड़ा काम किया हाँ हमारा दायित्व समाप्त हो गया हम ऋणमुक्त हो गये। इसी प्रकार संसारकी वस्तु संसारके अर्पण कर देनेसे हमारा दायित्व समाप्त हो जाता है हम ऋणमुक्त हो जाते हैं जन्ममरणके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं। इसलिये सांसारिक पदार्थोंको संसारकी सेवामें लगाकर कोई दानपुण्य नहीं करना है प्रत्युत उन पदार्थोंसे अपना पिण्ड छुड़ाना है।न बुद्धिभेदं ৷৷. विद्वानयुक्तः समाचरन् पचीसवें श्लोकमें असक्तः विद्वान् पदोंसे जिसका वर्णन हुआ है उसी आसक्तिरहित विद्वान्को यहाँ युक्तः विद्वान् पदोंसे कहा गया है।जिसके अन्तःकरणमें स्वतःस्वाभाविक समता है जिसकी स्थिति निर्विकार है जिसकी समस्त इन्द्रियाँ अच्छी तरह जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी पत्थर और स्वर्ण समान हैं ऐसा तत्त्वज्ञ महापुरुष ही युक्तः विद्वान् कहलाता है (गीता 6। 8)।पीछेके (पचीसवें) श्लोकमें सक्ताः अविद्वांसः पदोंसे जिनका वर्णन हुआ है उन्हीं शास्त्रविहित शुभकर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी पुरुषोंको यहाँ कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानम् पदोंसे कहा गया है।शास्त्रविहित कर्मोंको अपने लिये (सुखभोग मान बड़ाई आदिकी प्राप्तिके लिये) करनेके कारण इन पुरुषोंको कर्मसङ्गी और अज्ञानी कहा गया है।श्रेष्ठ पुरुषपर विशेष जिम्मेवारी होती है क्योंकि दूसरे लोग स्वाभाविक ही उसका अनुसरण करते हैं। इसलिये भगवान् उपर्युक्त पदोंसे विद्वानको आज्ञा देते हैं कि उसे ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिये और ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिये जिसे अज्ञानी (कामनायुक्त) पुरुषोंका वर्तमान स्थितिसे पतन हो जाय। अज्ञानी पुरुष अभी जिस स्थितिमें हैं उस स्थितिसे उन्हें विचलित करना (नीचे गिराना) ही उनमें बुद्धिभेद उत्पन्न करना है। अतः विद्वान्को सबके हितका भाव रखते हुए अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुसार शास्त्रविहत शुभकर्मोंका आचरण करते रहना चाहिये जिससे दूसरे पुरुषोंको भी निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करनेकी प्रेरणा मिलती रहे। समाज एवं परिवारके मुख्य व्यक्तियोंपर भी यही बात लागू होती है। उनको भी सावधानीपूर्वक अपने कर्तव्यकर्मोंका अच्छी तरह आचरण करते रहना चाहिये जिससे समाज और परिवारपर अच्छा प्रभाव पड़े।बुद्धिभेद पैदा करनेके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं 1कर्मोंमें क्या रखा है कर्मोंसे जो जीव बँधता है कर्म निकृष्ट हैं कर्म छोड़कर ज्ञानमें लगना चाहिये आदि उपदेश देना अथवा इस प्रकारके अपने आचरणों और वचनोंसे दूसरोंमें कर्तव्यकर्मोंके प्रति अश्रद्धाअविश्वास उत्पन्न करना।2 जहाँ देखो वहीं स्वार्थ है स्वार्थके बिना कोई रह नहीं सकता सभी स्वार्थके लिये कर्म करते हैंमनुष्य कोई कर्म करे तो फलकी इच्छा रहती ही है फलकी इच्छा न रहे तो सभी कर्म करेगा ही क्यों आदि उपदेश देना।3 फलकी इच्छा रखकर (अपने लिये) कर्म करनेसे (फल भोगनेके लिये) बारबार जन्म लेना पड़ता है आदि उपदेश देना। इस प्रकारके उपदेशोंसे कामनावाले पुरुषोंका कर्मफलपर विश्वास नहीं रहता। फलस्वरूप उनकी (फलमें) आसक्ति तो छूटती नहीं शुभकर्म जरूर छूट जाते हैं। बन्धनका कारण आसक्तिही है कर्म नहीं। इस प्रकार लोगोंमें बुद्धिभेद उत्पन्न न करके तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुसार स्वयं कर्तव्यकर्म करे और दूसरोंसे भी वैसे ही करवाये। उसे चाहिये कि वह अपने आचरणों और वचनोंके द्वारा अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भ्रम पैदा न करते हुए उन्हें वर्तमान स्थितिसे क्रमशः ऊँचे उठाये। जिन शास्त्रविहित शुभकर्मोंको अज्ञानी पुरुष अभी कर रहे हैं उनकी वह विशेषरूपसे प्रशंसा करे और उनके कर्मोंमें होनेवाली त्रुटियोंसे उन्हें अवगत कराये जिससे वे उन त्रुटियोंको दूर करके साङ्गोपाङ्ग विधिसे कर्म कर सकें। इसके साथ ही ज्ञानी पुरुष उन्हें यह उपदेश दें कि यज्ञ दान पूजा पाठ आदि शुभकर्म करना तो बहुत अच्छा है पर उन कर्मोंमें फलकी इच्छा रखना उचित नहीं क्योंकि हीरेको कंकड़पत्थरोंके बदले बेचना बुद्धिमत्ता नहीं है। अतः सकामभावका त्याग करके शुभकर्म करनेसे बहुत जल्दी लाभ होता है। इस प्रकार सकामभावसे निष्कामभावकी ओर जाना बुद्धिभेद नहीं है प्रत्युत वास्तविकता है।इसी तरह उपासनाके विषयमें भी तत्त्वज्ञ पुरुषको बुद्धिभेद पैदा नहीं करना चाहिये। जैसे प्रायः लोग कह दिया करते हैं कि नामजप करते समय भगवान्में मन नहीं लगा तो नामजप करना व्यर्थ है। परन्तु तत्त्वज्ञ पुरुषको ऐसा न कहकर यह उपदेश देना चाहिये कि नामजप कभी व्यर्थ हो ही नहीं सकता क्योंकि भगवान्के प्रति कुछनकुछ भाव रहनेसे ही नामजप होता है। भावके बिना नामजपमें प्रवृत्ति ही नहीं होती। अतः नामजपका किसी भी अवस्थामें त्याग नहीं करना चाहिये। जो यह कहा गया है कि मनुवाँ तो चहुँ दिसि फिरै यह तो सुमिरन नाहिं इसका भी यही अर्थ है कि मन न लगनेसे यह सुमिरन (स्मरण) नहीं है जप तो है ही। हाँ मन लगाकर ध्यानपूर्वक नामजप करनेसे बहुत जल्दी लाभ होता है।कोई भी मनुष्य सर्वथा गुणरहित नहीं होता। उसमें कुछनकुछ गुण रहते ही हैं। इसलिये तत्त्वज्ञ महापुरुषको चाहिये कि अगर किसी व्यक्तिको (उसकी उन्नतिके लिये) कोई शिक्षा देनी हो कोई बात समझानी हो तो उस व्यक्तिकी निन्दा या अपमान न करके उसके गुणोंकी प्रशंसा करे। गुणोंकी प्रसंशा करते हुए आदरपूर्वक उसे जो शिक्षा दी जायगी उस शिक्षाका उसपर विशेष असर पड़ेगा। समाज और परिवारके मुख्य व्यक्तियोंको भी इसी रीतिसे दूसरोंको शिक्षा देनी चाहिये।समाचरन् और जोषयेत् पदोंसे भगवान् विद्वान्को दो आज्ञाएँ देते हैं (1) स्वयं सावधानीपूर्वक शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंको अच्छी तरह करे और (2) कर्मोंमें आसक्त अज्ञानी पुरुषोंसे भी वैसे ही कर्म करवाये। लोगोंको दिखानेके लिये कर्म करना दम्भ है जो पतन करनेवाली आसुरीसम्पत्तिका लक्षण है (गीता 16। 4)। अतः भगवान् लोगोंको दिखानेके लिये नहीं प्रत्युत लोकसंग्रहके लिये ही कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि कर्म करनेसे अपना कोई प्रयोजन न रहनेपर भी वह समस्त कर्तव्यकर्मोंको सुचारुरूसे करता रहे जिससे कर्मोंमें आसक्त पुरुषोंकी निष्कामकर्मोंके
Chapter 3 (Part 16)
प्रति महत्त्वबुद्धि जाग्रत् हो और वे भी निष्कामभावसे कर्म करने लगें। तात्पर्य यह है कि उस महापुरुषके आसक्तिरहित आचरणोंको देखकर अन्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करनेकी चेष्टा करने लगेंगे।इस प्रकार ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह कर्मोंमें आसक्त पुरुषोंको आदरपूर्वक समझाकर उनसेनिषिद्धकर्मोंका स्वरूपसे (सर्वथा) त्याग करवाये और विहितकर्मोंमेंसे सकामभावका त्याग करनेकी प्रेरणा करे। सम्बन्ध ज्ञानी और अज्ञानीमें क्या अन्तर है इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.23 3.25।।यदीत्यादि लोकसंग्रहमित्यन्तम्। किं च विदितवेद्यः कर्म चेत् त्यजेत् तत् लोकानां दुर्भेद एव एकप्रसिद्धपक्षशिथिलितास्थाबन्धत्वेनाप्ररूढिलक्षणो जायेत (S K जायते)। यतः (S omits यतः) कर्मवासनां च न मोक्तुं शक्नुवन्ति ज्ञानधारां च नाश्रयितुम् अथ च शिथिलीभवन्ति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.25।।दृष्टान्तदार्ष्टान्तिकरूपं श्लोकं व्याकरोति सक्ता इत्यादिना। असक्तः सन् कर्तृत्वाभिमानं फलाभिसन्धिं वा कुर्वन्निति यावत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.25।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.25।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.25।।अविद्वांसः आत्मनि अकृत्स्नविदः कर्मणि सक्ताः कर्मणि अवर्जनीयसंबन्धाः आत्मनि अकृत्स्नवित्तया तदभ्यासरूपज्ञानयोगे अनधिकृताः कर्मयोगाधिकारणिः कर्मयोगम् एव यथा आत्मदर्शनाय कुर्वते तथा आत्मनि कृत्स्नवित्तया कर्मणि असक्तः ज्ञानयोगाधिकारयोग्यः अपि व्यपदेश्यः शिष्टः लोकरक्षणार्थं स्वाचारेण शिष्टलोकानां धर्मनिश्चयं चिकीर्षुः कर्मयोगम् एव कुर्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.25।। सक्ताः कर्मणि अस्य कर्मणः फलं मम भविष्यति इति केचित् अविद्वांसः यथा कुर्वन्ति भारत कुर्यात् विद्वान् आत्मवित् तथा असक्तः सन्। तद्वत् किमर्थं करोति तत् श्रृणु चिकीर्षुः कर्तुमिच्छुः लोकसंग्रहम्।।एवं लोकसंग्रहं चिकीर्षोः न मम आत्मविदः कर्तव्यमस्ति अन्यस्य वा लोकसंग्रहं मुक्त्वा। ततः तस्य आत्मविदः इदमुपदिश्यते
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【 Verse 3.26 】
▸ Sanskrit Sloka: न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् | जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान्युक्त: समाचरन् ||
▸ Transliteration: na buddhi bhedaṁ janayedajñānāṁ karmasaginām | joṣayetsarvakarmāṇi vidvānyuktaḥ samācaran ||
▸ Glossary: na: not; buddhi: intelligence; bhedaṁ: disrupt; janayet: do; ajñānāṁ: ignorant; karma: work sagināṁ: attached; joṣayet: engaged; sarva: all; karmāṇi: work; vidvān: wise; yuktaḥ: balanced; samācaran: practising
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.26 Let not the wise disturb the minds of the ignorant who are attached to the results of work. They should encourage them to act without attachment.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.25 3.26।।हे भरतवंशोद्भव अर्जुन कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं आसक्तिरहित विद्वान् भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे। तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.26।। ज्ञानी पुरुष कर्मों में आसक्त अज्ञानियों की बुद्धि में भ्रम उत्पन्न न करे स्वयं (भक्ति से) युक्त होकर कर्मों का सम्यक् आचरण कर उनसे भी वैसा ही कराये।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.26 न not? बुद्धिभेदम् unsettlement in the mind? जनयेत् should produce? अज्ञानाम् of the ignorant? कर्मसङ्गिनाम् of the persons attached to actions? जोषयेत् should engage? सर्वकर्माणि all actions? विद्वान् the wise? युक्तः balanced? समाचरन् performing.Commentary An ignorant may says to himelf? I shall do this action and thery enjoy its fruit. A wise man should not unsettle his belief. On the contrary he himself should set an example by performing his duties diligently but without attachment. The wise man should also persuade the ignorant never to neglect their duties. If need be? he should place before them in vivid colours the happiness they would enjoy here and hereafter by discharging such duties. When their hearts get purified in course of time? the wise man could sow the seeds of Karma Yoga (selfless service without deire) in them.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.26. Let the wise master of Yoga fulfil (or destroy) all actions by performing them all, and let him not creat any disturbance in the mind of the ingnorant persons attached to action.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.26 But a wise man should not perturb the minds of the ignorant, who are attached to action; let him perform his own actions in the right spirit, with concentration on Me, thus inspiring all to do the same.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.26 He should not bewilder the minds of the ignorant who are attached to work; rather himself performing work with devotion, he should cause others to do so.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.26 The enlightened man should not create disturbance in the beliefs of the ignorant, who are attached to work. Working, while himself remaining deligen [Some translate yuktah as, 'in the right manner'. S. takes it in the sense of Yoga-yuktah, merged in yoga.-Tr.], he should make them do [Another reading is yojayet, meaning the same as josayet.-Tr.] all the duties.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.26 Let no wise man unsettle the mind of ignorant people who are attached to action; he should engage them in all actions, himself fulfilling them with devotion.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.26 Na buddhi-etc. Himself knowing in this way, let him perform actions and let him not disturb the minds of common men. [In the last verse] reference is made 'of the ignorant person'. [The Lord] now demonstrates their ignorance -
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.26 Do not bewilder the minds of ignorant aspirants by saying that there is, besides Karma Yoga, another way to the vision of the self. They cannot practise Jnana Yoga on account of their incomplete knowledge of the self, and attachment to action. They are alified for Karma Yoga because of their being fit only for activity on account of the subtle impressions of their beginningless Karma. What then follows from this? It is this: Even though one is alified for Jnana Yoga because of the complete knowledge of the self, one should do work, holding the view as said previously, that Karma Yoga by itself without Jnana Yoga is an independent means for the vision of the self. He should thus generate love for all types of activity among those who do not know the complete truth.
Sri Krsna declares (in the verses 27 to 30) the way in which the self is to be contemplated on as not being an agent as reired by Karma Yoga, after demonstrating the difference between the enlightened and unenlightened among those practising Karma Yoga.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.26 Vidvan the enlightened man; na janayet, should not create; buddhi-bhedam, disturbance in the beliefs-disturbance in the firm belief, 'This has to be done; and the result of this action is to be reaped by me'; ajnanam, of the ignorant, of the non-discriminating one; karma-sanginam, who are attached to work. But what should he do? Himself samacaran, working, performing those very activities of the ignorant; yuktah, while remaining diligent; josayet, he should make them do; sarva-karmani, all the duties. How does an anillumined, ignorant person be come attached to actions? In reply the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.26।। यह संभव है कि आत्मानुभूति के पश्चात् ज्ञानी पुरुष जब कार्य क्षेत्र में प्रवेश करे तो तत्त्वज्ञान का सर्वोच्च उपदेश देना प्रारम्भ कर दे जिसे समझने की योग्यता लोगों में न हो। उस पीढ़ी के लोग उस विद्वान पुरुष के कथन का विपरीत अर्थ लगाकर यह समझ सकते हैं कि कर्म का संन्यास सत्य की प्राप्ति का सीधा मार्ग है। ऐसे गुरुओं को यहाँ सावधान किया गया है क्यांेकि इससे लोगों का कर्म करने में उत्साह कम हो सकता है।जीवन गतिशील है। कोई भी निष्क्रिय होकर बैठ नहीं सकता। जीवन की निरन्तर अग्रगामी कर्मरूपी गतिशील धारा के प्रवाह के मध्य में यदि कोई मार्गदर्शक गुरु दोनों हाथ उठाकर अपनी पीढ़ी के लोगों को अकस्मात रुकने का आदेश दें तो उस प्रवाह में वे स्वयं ही छिन्नभिन्न होकर रह जायेंगे। अनेक धर्मोपदेशकों ने यह गलती की और उन्हें उसका मूल्य भी चुकाना पड़ा। यहाँ श्रीकृष्ण मार्गदर्शन करते हुये कहते हैं कि ऐसे धर्मोपदेशकों को चाहिये कि वे समय की गति को पहचान कर कार्य करें जीवनी शक्ति का विरोध करके नहीं।समाज के मार्गदर्शन की पद्धति इस श्लोक में बताई गई है जो समस्त नेतृत्व वर्ग के लिये उपयोगी है। वे सामाजिक राजनैतिक अथवा सांस्कृतिक किसी भी क्षेत्र में क्यों न कार्य कर रहे हों। यदि किसी काल में कोई समाज किसी विशेष दिशा में आगे बढ़ रहा हो तो नेता को अपनी पीढ़ी के साथ मिलकर स्वयं के उदाहरण के द्वारा धीरेधीरे लोगों को सही दिशा में ले जाने का प्रयत्न करना चाहिये।यदि कोई व्यक्ति हरिद्वार जाने के लिये कार को तेज गति से परन्तु विपरीत दिशा में चला रहा हो तो उसकी दिशा सुधारने का उपाय यह नहीं कि अचानक उसे रोक दें किन्तु उसकी दिशा मात्र को बदलें। कार के रुक जाने मात्र से वह किसी लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकेगा।इसी प्रकार मनुष्य को कर्म करते रहना चाहिये। यदि वह गलत दिशा में भी जा रहा हो तो केवल कर्म से ही वह सही दिशा में आगे बढ़ सकता है। विद्वान् पुरुष अज्ञानी को कर्म की प्रवृत्ति से विचलित न करे बल्कि स्वयं कुशलतापूर्वक कर्म का आचरण करे जिससे सामान्य जन उसका सरलता से अनुसरण कर सकें।किस प्रकार अज्ञानी पुरुष कर्म में आसक्त होता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.26।। लोकसंग्रह चिकीर्षोस्तत्त्वविद इदमुपदिश्यते नेति। अज्ञानामतएव कर्मसङ्गिनां फलार्थं कर्मण्यासक्तानां इदं कर्म भयावश्यं कर्तव्यं तत्फलं च भोक्तव्यमिति निश्चितरुपाया बुद्धेर्भेदनं चालनं न कर्मणेत्याद्युपदेशेन नोत्पादयेत्। किंतु विद्वान्युक्तः समाहितः सन्नविदुषां कर्म स्वयं समाचरन्सर्वकर्माणि जोषयेत्कारयेत्। अन्यथा कर्मसु तेषां श्रद्धापगमे चित्तशुद्य्धभावज्ज्ञानाप्राप्त्योभयभ्रष्टत्वं स्यादिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.26।।ननु कर्मानुष्ठानेनैव लोकसंग्रहः कर्तव्यो नतु तत्त्वज्ञानोपदेशेनेति को हेतुरत आह अज्ञानामविवेकिनां कर्तृत्वाभिमानेन फलाभिसंधिना च कर्मसङ्गिनां कर्मण्यभिनिविष्टानां या बुद्धिरहमेतत्कर्म करिष्ये एतत्फलं च भोक्ष्य इति तस्या भेदं विचालनं अकर्त्रात्मोपदेशेन न कुर्यात् किंतु युक्तोऽवहितः सन् विद्वान् लोकसंग्रहं चिकीर्षुः अविद्वदधिकारिकाणि सर्वकर्माणि समाचरन् तेषां श्रद्धामुत्पाद्य जोषयेत् प्रीत्या सेवयेत्। अनधिकारिणामुपदेशेनं बुद्धिविचालने कृते कर्मसु श्रद्धानिवृत्तेर्ज्ञानस्य चानुत्पत्तेरुभयभ्रष्टत्वं स्यात्। तथाचोक्तंअज्ञस्यार्धप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्। महानिरयजालेषु स तेन विनियोजितः।। इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.26।।विद्वान् अज्ञानां कर्मस्वासक्तानां बुद्धिभेदं बुद्धेश्चालनं न जनयेन्नोत्पादयेत् किंतु तान्सर्वाणि कर्माणि जोषयेत्सेवयेत्। कथम्। युक्त आदृतो भूत्वा समाचरन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.26।।ननु लोकसङ्ग्रहार्थमेव चेत्कर्म कर्त्तव्यं तदा यथाकथञ्चित्कर्त्तव्यम्। यथा तेऽज्ञानेन कुर्वन्ति तथा करणं किं प्रयोजनकं इत्याकाङ्क्षायामाह न बुद्धिभेदं जनयेदिति। कर्मसङ्गिनां बुद्धिभेदं न जनयेत्। तथाकरणे तेषां भ्रमो भवेत् भ्रमे सति कर्म न कुर्युरेव। ननु कर्मणा चित्तशुद्धौ सत्यां कथं भ्रम इत्यत आह अज्ञानामिति। न हि अज्ञाश्चित्तशुद्ध्यर्थं कर्म कुर्वन्ति किन्तु कर्मैवेश्वरं मन्यमानाः फलरूपेणान्यं पण्डितं कर्म कुर्वाणं वीक्ष्य कुर्वन्ति अत एव कर्मसङ्गिनामित्युक्तं न तु कर्मिणाम्। विद्वान् युक्तो मां हृदि स्थाप्य मद्युक्तः स्वयं समाचरन् सम्यगाचरन् मत्सेवादि कुर्वन् अन्येषां वृत्त्यर्थं सदा कर्माणि अन्यानज्ञान् जोषयेत् कर्म कारयेदित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.26।।ननु कृपया तत्त्वज्ञानमेवोपदेष्टुं युक्तं नेत्याह नेति। अज्ञानामतएव कर्मसङिगनां कर्मासक्तानामकर्तात्मोपदेशेन बुद्धेर्भेदमन्यथात्वं न जनयेत्कर्मणः सकाशाद्बुद्धिचालनं न कुर्यादपि तु जोषयेत्सेवयेत्।जुषी प्रीतिसेवनयोः अज्ञान्कर्माणि कारयेत्। कथम्। युक्तोऽवहितो भूत्वा स्वयं च समाचरन्। बुद्धिचालने कृते सति कर्मसु श्रद्धानिवृत्तेर्ज्ञानस्य चानुत्पत्तेस्तेषामुभयभ्रंशः स्यादिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.26।।नन्वज्ञेषु तु सक्ततया कर्मनिष्ठेषु कृपया साङ्ख्यप्रकारभेद उपदेष्टुं युक्तो विदुषा नहिनहीत्याह न बुद्धिभेदमिति। प्रकारभेदोपदेशे तेषां बुद्धिभेद एव भवति फलादिसङ्गितया ज्ञातत्वात्। अतो जोषयेत्प्रीणयेत्सेवयेच्च स्वयं कृत्वा परिसङ्खयातात्पर्येण शनैः शनैः शिक्षयेत्। अन्यथा बुद्धिभेदः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.26।।इस प्रकार लोकसंग्रह करनेकी इच्छावाले मुझ परमात्माका या दूसरे आत्मज्ञानीका लोकसंग्रहको छोड़कर दूसरा कोई कर्तव्य नहीं रह गया है। अतः उस आत्मवेत्ताके लिये यह उपदेश किया जाता है बुद्धिको विचलित करनेका नाम बुद्धिभेद है ( ज्ञानीको चाहिये कि ) कर्मोंमें आसक्तिवाले विवेकरहित अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भेद उत्पन्न न करे अर्थात् मेरा यह कर्तव्य है इस कर्मका फल मुझे भोगना है इस प्रकार जो उनकी निश्चितरूपा बुद्धि बनी हुई है उसको विचलित करना बुद्धिभेद करना है सो न करे। तो फिर क्या करे समाहितचित्त विद्वान् स्वयं अज्ञानियोंके ही ( सदृश ) उन कर्मोंका ( शास्त्रानुकूल ) आचरण करता हुआ उनसे सब कर्म करावे।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.26।। व्याख्या सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो तथा कुर्वन्ति भारत जिन मनुष्योंकी शास्त्र शास्त्रपद्धति और शास्त्रविहित शुभकर्मोंपर पूरी श्रद्धा है एवं शास्त्रविहित कर्मोंका फल अवश्य मिलता है इस बातपर पूरा विश्वास है जो न तो तत्त्वज्ञ हैं और न दुराचारी हैं किन्तु कर्मों भोगों एवं पदार्थोंमें आसक्त हैं ऐसे मनुष्योंके लिये यहाँ सक्ताः अविद्वांसः पद आये हैं। शास्त्रोंके ज्ञाता होनेपर भी केवल कामनाके कारण ऐसे मनुष्य अविद्वान् (अज्ञानी) कहे गये हैं। ऐसे पुरुष शास्त्रज्ञ तो हैं पर तत्त्वज्ञ नहीं। ये केवल अपने लिये कर्म करते हैं इसीलिये अज्ञानी कहलाते हैं।ऐसे अविद्वान् मनुष्य कर्मोंमें कभी प्रमाद आलस्य आदि न रखकर सावधानी और तत्परतापूर्वक साङ्गोपाङ्ग विधिसे कर्म करते हैं क्योंकि उनकी ऐसी मान्यता रहती है कि कर्मोंको करनेमें कोई कमी आ जानेसे उनके फलमें भी कमी आ जायगी। भगवान् उनके इस प्रकार कर्म करनेकी रीतिको आदर्श मानकर सर्वथा आसक्तिरहित विद्वान्के लिये भी इसी विधिसे लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेकी प्रेरणा करते हैं।कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् जिसमें कामना ममता आसक्ति वासना पक्षपात स्वार्थ आदिका सर्वथा अभाव हो गया है और शरीरादि पदार्थोंके साथ किञ्चिन्मात्र भी लगाव नहीं रहा ऐसे तत्त्वज्ञ महापुरुषके लिये यहाँ असक्तः विद्वान् पद आये हैं (टिप्पणी प0 158)।बीसवें श्लोकमें लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन् कहकर फिर इक्कीसवें श्लोकमें जिसकी व्याख्या की गयी उसीको यहाँ लोकसंग्रहं चिकीर्षुः पदोंसे कहा गया है।श्रेष्ठ मनुष्य (आसक्तिरहित विद्वान्) के सभी आचरण स्वाभाविक ही यज्ञके लिये मर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये होते हैं। जैसे भोगी मनुष्यकी भोगोंमें मोही मनुष्यकी कुटुम्बमें और लोभी मनुष्यकी धनमें रति होती है ऐसे ही श्रेष्ठ मनुष्यकी प्राणिमात्रके हितमें रति होती है। उसके अन्तःकरणमें मैं लोकहित करता हूँ ऐसा भाव भी नहीं होता प्रत्युत उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक लोकहित होता है। प्राकृत पदार्थमात्रसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जानेके कारण उस ज्ञानी महापुरुषके कहलानेवाले शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि भी लोकसंग्रह पदमें आये लोक शब्दके अन्तर्गत आते हैं।दूसरे लोगोंको ऐसे ज्ञानी महापुरुष लोकसंग्रहकी इच्छावाले दीखते हैं पर वास्तवमें उनमें लोकसंग्रहकी भी इच्छा नहीं होती। कारण कि वे संसारसे प्राप्त शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ पद अधिकार धनयोग्यता सामर्थ्य आदिको साधनावस्थासे ही कभी किञ्चिन्मात्र भी अपने और अपने लिये नहीं मानते प्रत्युत संसारके और संसारकी सेवाके लिये ही मानते हैं जो कि वास्तवमें है। वही प्रवाह रहनेके कारण सिद्धावस्थामें भी उनके कहलानेवाले शरीरादि पदार्थ स्वतःस्वाभाविक किसी प्रकारकी इच्छाके बिना संसारकी सेवामें लगे रहते हैं।इस श्लोकमें यथा और तथा पद कर्म करनेके प्रकारके अर्थमें आये हैं। तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार अज्ञानी (सकाम) पुरुष अपने स्वार्थके लिये सावधानी और तत्परतापूर्वक कर्म करते हैं उसी प्रकार ज्ञानी पुरुष भी लोकसंग्रह अर्थात् दूसरोंके हितके लिये कर्म करे। ज्ञानी पुरुषको प्राणिमात्रके हितका भाव रखकर सम्पूर्ण लौकिक और वैदिक कर्तव्यकर्मोंका आचरण करते रहना चाहिये। सबका कल्याण कैसे हो इस भावसे कर्तव्यकर्म करनेपर लोकमें अच्छे भावोंका प्रचार स्वतः होता है।अज्ञानी पुरुष तो फलकी प्राप्तिके लिये सावधानी और तत्परतासे विधिपूर्वक कर्तव्यकर्म करता है पर ज्ञानी पुरुषकी फलमें आसक्ति नहीं होती और उसके लिये कोई कर्तव्य भी नहीं होता। अतः उसके द्वारा कर्मकी उपेक्षा होना सम्भव है। इसीलिये भगवान् कर्म करनेके विषयमें ज्ञानी पुरुषको भी अज्ञानी (सकाम) पुरुषकी ही तरह कर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।इक्कीसवें श्लोकमें तो विद्वान्को आदर्श बताया गया था पर यहाँ उसे अनुयायी बताया है। तात्पर्य यह है कि विद्वान् चाहे आदर्श हो अथवा अनुयायी उसके द्वारा स्वतः लोगसंग्रह होता है। जैसे भगवान् श्रीराम प्रजाको उपदेश भी देते हैं और पिताजीकी आज्ञाका पालन करके वनवास भी जाते हैं। दोनों ही परिस्थितियोंमें उनके द्वारा लोकसंग्रह होता है क्योंकि उनका कर्मोंके करने अथवा न करनेसे अपना कोई प्रयोजन नहीं था।जब विद्वान् आसक्तिरहित होकर कर्तव्यकर्म करता है तब आसक्तियुक्त चित्तवाले पुरुषोंके अन्तःकरणपर भी विद्वान्के कर्मोंका स्वतः प्रभाव पड़ता है चाहे उन पुरुषोंको यह महापुरुष निष्कामभावसे कर्म कर रहा है ऐसा प्रत्यक्ष दीखे या न दीखे। मनुष्यके निष्कामभावोंका दूसरोंपर स्वाभाविक प्रभाव पड़ता है यह सिद्धान्त है। इसलिये आसक्तिरहित विद्वान्के भावों आचरणोंका प्रभाव मनुष्योंपर ही नहीं अपितु पशुपक्षी आदिपर भी पड़ता है।विशेष बातमनुष्य जबतक निष्कामभावपूर्वक विहितकर्म नहीं करता तबतक उसका जन्ममरण नहीं मिट सकता। वह जबतक अपने लिये कर्म करता है तबतक वह कृतकृत्य नहीं होता अर्थात् उसका करना समाप्त नहीं होता। कारण कि स्वयं नित्य रहनेवाला है और कर्म एवं उसका फल नष्ट होनेवाला है। अतः प्रत्येक मनुष्यके लिये स्वार्थत्यागपूर्वक (अपने लिये न करके केवल दूसरोंके हितके लिये) कर्तव्यकर्म करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है।सांसारिक पदार्थोंको मूल्यवान् समझनेके कारण ही कर्मयोग(निष्कामभावपूर्वक कर्तव्यकर्म) के पालनमें कठिनाई प्रतीत होती है। हमें दूसरोंसे कुछ न चाहकर केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करने हैं इस बातको यदि स्वीकार कर लें तो आज ही कर्मयोगका पालन सुगम हो जाय।वास्तवमें महत्ता पदार्थकी नहीं प्रत्युत आचरण(उसके उपयोग) की ही होती है। आचरणकी महत्ता भी तब है जब अन्तःकरणमें पदार्थकी महत्ता न हो। कोई भी पदार्थ व्यक्तिगत नहीं है केवल उपयोगके लिये ही व्यक्तिगत है। पदार्थको व्यक्तिगत माननेसे ही परहितके लिये उसका त्याग कठिन प्रतीत होता है। कोई भीपदार्थ या क्रिया बन्धनकारक नहीं उनका सम्बन्ध ही बन्धनकारक है।विद्वान् पुरुषोंसे भी लोकसंग्रहके लिये सब कर्म होते हैं। परन्तु ऐसा होते हुए भी उनमें मैं लोगसंग्रह कर रहा हूँ यह अभिमान नहीं रहता। कारण यह है कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि विद्या योग्यता पद आदि सब संसारके हैं और संसारसे मिले हैं। संसारसे मिली सामग्रीको संसारकी ही सेवामें लगा देना ईमानदारी है। उस सामग्रीको बहुत सच्चाईसे ईमानदारीसे संसारके अर्पण कर देना है। यह अर्पण करनाकोई बड़ा काम नहीं है। जैसे किसीने हमारे पास धरोहररूपसे रुपये रखे और कुछ समय बाद उसके माँगनेपर हमने उसके रुपये उसे वापस कर दिये तो कौनसा बड़ा काम किया हाँ हमारा दायित्व समाप्त हो गया हम ऋणमुक्त हो गये। इसी प्रकार संसारकी वस्तु संसारके अर्पण कर देनेसे हमारा दायित्व समाप्त हो जाता है हम ऋणमुक्त हो जाते हैं जन्ममरणके बन्धनसे सदाके लिये छूट जाते हैं। इसलिये सांसारिक पदार्थोंको संसारकी सेवामें लगाकर कोई दानपुण्य नहीं करना है प्रत्युत उन पदार्थोंसे अपना पिण्ड छुड़ाना है।न बुद्धिभेदं ৷৷. विद्वानयुक्तः समाचरन् पचीसवें श्लोकमें असक्तः विद्वान् पदोंसे जिसका वर्णन हुआ है उसी आसक्तिरहित विद्वान्को यहाँ युक्तः विद्वान् पदोंसे कहा गया है।जिसके अन्तःकरणमें स्वतःस्वाभाविक समता है जिसकी स्थिति निर्विकार है जिसकी समस्त इन्द्रियाँ अच्छी तरह जीती हुई हैं और जिसके लिये मिट्टी पत्थर और स्वर्ण समान हैं ऐसा तत्त्वज्ञ महापुरुष ही युक्तः विद्वान् कहलाता है (गीता 6। 8)।पीछेके (पचीसवें) श्लोकमें सक्ताः अविद्वांसः पदोंसे जिनका वर्णन हुआ है उन्हीं शास्त्रविहित शुभकर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी पुरुषोंको यहाँ कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानम् पदोंसे कहा गया है।शास्त्रविहित कर्मोंको अपने लिये (सुखभोग मान बड़ाई आदिकी प्राप्तिके लिये) करनेके कारण इन पुरुषोंको कर्मसङ्गी और अज्ञानी कहा गया है।श्रेष्ठ पुरुषपर विशेष जिम्मेवारी होती है क्योंकि दूसरे लोग स्वाभाविक ही उसका अनुसरण करते हैं। इसलिये भगवान् उपर्युक्त पदोंसे विद्वानको आज्ञा देते हैं कि उसे ऐसा कोई आचरण नहीं करना चाहिये और ऐसी कोई बात नहीं कहनी चाहिये जिसे अज्ञानी (कामनायुक्त) पुरुषोंका वर्तमान स्थितिसे पतन हो जाय। अज्ञानी पुरुष अभी जिस स्थितिमें हैं उस स्थितिसे उन्हें विचलित करना (नीचे गिराना) ही उनमें बुद्धिभेद उत्पन्न करना है। अतः विद्वान्को सबके हितका भाव रखते हुए अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुसार शास्त्रविहत शुभकर्मोंका आचरण करते रहना चाहिये जिससे दूसरे पुरुषोंको भी निष्कामभावसे कर्तव्यकर्म करनेकी प्रेरणा मिलती रहे। समाज एवं परिवारके मुख्य व्यक्तियोंपर भी यही बात लागू होती है। उनको भी सावधानीपूर्वक अपने कर्तव्यकर्मोंका अच्छी तरह आचरण करते रहना चाहिये जिससे समाज और परिवारपर अच्छा प्रभाव पड़े।बुद्धिभेद पैदा करनेके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं 1कर्मोंमें क्या रखा है कर्मोंसे जो जीव बँधता है कर्म निकृष्ट हैं कर्म छोड़कर ज्ञानमें लगना चाहिये आदि उपदेश देना अथवा इस प्रकारके अपने आचरणों और वचनोंसे दूसरोंमें कर्तव्यकर्मोंके प्रति अश्रद्धाअविश्वास उत्पन्न करना।2 जहाँ देखो वहीं स्वार्थ है स्वार्थके बिना कोई रह नहीं सकता सभी स्वार्थके लिये कर्म करते हैंमनुष्य कोई कर्म करे तो फलकी इच्छा रहती ही है फलकी इच्छा न रहे तो सभी कर्म करेगा ही क्यों आदि उपदेश देना।3 फलकी इच्छा रखकर (अपने लिये) कर्म करनेसे (फल भोगनेके लिये) बारबार जन्म लेना पड़ता है आदि उपदेश देना। इस प्रकारके उपदेशोंसे कामनावाले पुरुषोंका कर्मफलपर विश्वास नहीं रहता। फलस्वरूप उनकी (फलमें) आसक्ति तो छूटती नहीं शुभकर्म जरूर छूट जाते हैं। बन्धनका कारण आसक्तिही है कर्म नहीं। इस प्रकार लोगोंमें बुद्धिभेद उत्पन्न न करके तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि वह अपने वर्णाश्रमधर्मके अनुसार स्वयं कर्तव्यकर्म करे और दूसरोंसे भी वैसे ही करवाये। उसे चाहिये कि वह अपने आचरणों और वचनोंके द्वारा अज्ञानियोंकी बुद्धिमें भ्रम पैदा न करते हुए उन्हें वर्तमान स्थितिसे क्रमशः ऊँचे उठाये। जिन शास्त्रविहित शुभकर्मोंको अज्ञानी पुरुष अभी कर रहे हैं उनकी वह विशेषरूपसे प्रशंसा करे और उनके कर्मोंमें होनेवाली त्रुटियोंसे उन्हें अवगत कराये जिससे वे उन त्रुटियोंको दूर करके साङ्गोपाङ्ग विधिसे कर्म कर सकें। इसके साथ ही ज्ञानी पुरुष उन्हें यह उपदेश दें कि यज्ञ दान पूजा पाठ आदि शुभकर्म करना तो बहुत अच्छा है पर उन कर्मोंमें फलकी इच्छा रखना उचित नहीं क्योंकि हीरेको कंकड़पत्थरोंके बदले बेचना बुद्धिमत्ता नहीं है। अतः सकामभावका त्याग करके शुभकर्म करनेसे बहुत जल्दी लाभ होता है। इस प्रकार सकामभावसे निष्कामभावकी ओर जाना बुद्धिभेद नहीं है प्रत्युत वास्तविकता है।इसी तरह उपासनाके विषयमें भी तत्त्वज्ञ पुरुषको बुद्धिभेद पैदा नहीं करना चाहिये। जैसे प्रायः लोग कह दिया करते हैं कि नामजप करते समय भगवान्में मन नहीं लगा तो नामजप करना व्यर्थ है। परन्तु तत्त्वज्ञ पुरुषको ऐसा न कहकर यह उपदेश देना चाहिये कि नामजप कभी व्यर्थ हो ही नहीं सकता क्योंकि भगवान्के प्रति कुछनकुछ भाव रहनेसे ही नामजप होता है। भावके बिना नामजपमें प्रवृत्ति ही नहीं होती। अतः नामजपका किसी भी अवस्थामें त्याग नहीं करना चाहिये। जो यह कहा गया है कि मनुवाँ तो चहुँ दिसि फिरै यह तो सुमिरन नाहिं इसका भी यही अर्थ है कि मन न लगनेसे यह सुमिरन (स्मरण) नहीं है जप तो है ही। हाँ मन लगाकर ध्यानपूर्वक नामजप करनेसे बहुत जल्दी लाभ होता है।कोई भी मनुष्य सर्वथा गुणरहित नहीं होता। उसमें कुछनकुछ गुण रहते ही हैं। इसलिये तत्त्वज्ञ महापुरुषको चाहिये कि अगर किसी व्यक्तिको (उसकी उन्नतिके लिये) कोई शिक्षा देनी हो कोई बात समझानी हो तो उस व्यक्तिकी निन्दा या अपमान न करके उसके गुणोंकी प्रशंसा करे। गुणोंकी प्रसंशा करते हुए आदरपूर्वक उसे जो शिक्षा दी जायगी उस शिक्षाका उसपर विशेष असर पड़ेगा। समाज और परिवारके मुख्य व्यक्तियोंको भी इसी रीतिसे दूसरोंको शिक्षा देनी चाहिये।समाचरन् और जोषयेत् पदोंसे भगवान् विद्वान्को दो आज्ञाएँ देते हैं (1) स्वयं सावधानीपूर्वक शास्त्रविहित कर्तव्यकर्मोंको अच्छी तरह करे और (2) कर्मोंमें आसक्त अज्ञानी पुरुषोंसे भी वैसे ही कर्म करवाये। लोगोंको दिखानेके लिये कर्म करना दम्भ है जो पतन करनेवाली आसुरीसम्पत्तिका लक्षण है (गीता 16। 4)। अतः भगवान् लोगोंको दिखानेके लिये नहीं प्रत्युत लोकसंग्रहके लिये ही कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।तत्त्वज्ञ पुरुषको चाहिये कि कर्म करनेसे अपना कोई प्रयोजन न रहनेपर भी वह समस्त कर्तव्यकर्मोंको सुचारुरूसे करता रहे जिससे कर्मोंमें आसक्त पुरुषोंकी निष्कामकर्मोंके प्रति महत्त्वबुद्धि जाग्रत् हो और वे भी निष्कामभावसे कर्म करने लगें। तात्पर्य यह है कि उस महापुरुषके आसक्तिरहित आचरणोंको देखकर अन्य पुरुष भी वैसा ही आचरण करनेकी चेष्टा करने लगेंगे।इस प्रकार ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह कर्मोंमें आसक्त पुरुषोंको आदरपूर्वक समझाकर उनसेनिषिद्धकर्मोंका स्वरूपसे (सर्वथा) त्याग करवाये और विहितकर्मोंमेंसे सकामभावका त्याग करनेकी प्रेरणा करे। सम्बन्ध ज्ञानी और अज्ञानीमें क्या अन्तर है इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.26।।यतस्ते न (S स्ते सम्य ) सम्यग्ज्ञानेन पूताः अतो बुद्धेर्भेदनं विचालनं ( N विगलनम्) तेषां परमोऽयमनर्थ इत्यनुग्रहाय भेदयेन्न धियमेषाम् तदाह (S एतदाह) न बुद्धीति। स्वयं चैवं बुद्ध्यमानः कर्माणि कुर्यात् न च लोकानां बुद्धिं भिन्द्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.26।।वृत्तमनूद्योत्तरश्लोकमवतारयति एवमिति। कर्तव्यं कर्मेति शेषः। पूर्वार्धमेवं व्याख्यायोत्तरार्धं प्रश्नपूर्वकमवतार्य व्याचष्टे किंतु कुर्यादिति। सर्वकर्माणि कारयेत्तेषु प्रीतिं कुर्वन्निति शेषः। कथं कारयेदित्याकाङ्क्षायामाह तदेवेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.26।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.26।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.26।।अज्ञानाम् आत्मन्यकृत्स्नवित्तया ज्ञानयोगोपादानाशक्तानां मुमुक्षूणां कर्मसङ्गिनाम् अनादिकर्मवासनया कर्मणि एव नियतत्वेन कर्मयोगाधिकारिणांकर्मयोगाद् अन्यथात्मावलोकनम् अस्ति इति न बुद्धिभेदं जनयेत्। किं तर्हि आत्मनि कृत्स्नवित्तया ज्ञानयोगशक्तः अपि पूर्वोक्तरीत्याकर्मयोग एव ज्ञानयोगनिरपेक्ष आत्मावलोकनसाधनम् इति बुद्ध्या युक्तः कर्म एव आचरन् सर्वकर्मसु अकृत्स्नविदां प्रीतिं जनयेत्।अथ कर्मयोगम् अनुतिष्ठतो विदुषः अविदुषश्च विशेषं प्रदर्शयन् कर्मयोगापेक्षितम् आत्मनः अकर्तृत्वानुसन्धानप्रकारम् उपदिशति
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.26।। बुद्धेर्भेदः बुद्धिभेदः मया इदं कर्तव्यं भोक्तव्यं चास्य कर्मणः फलम् इति निश्चयरूपाया बुद्धेः भेदनं चालनं बुद्धिभेदः तं न जनयेत् न उत्पादयेत् अज्ञानाम् अविवेकिनां कर्मसङ्गिनां कर्मणि आसक्तानां आसङ्गवताम्। किं नु कुर्यात् जोषयेत् कारयेत् सर्वकर्माणि विद्वान् स्वयं तदेव अविदुषां कर्म युक्तः अभियुक्तः समाचरन्।।अविद्वानज्ञः कथं कर्मसु सज्जते इत्याह
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【 Verse 3.27 】
▸ Sanskrit Sloka: प्रकृते: क्रियमाणानि गुणै: कर्माणि सर्वश: | अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते ||
▸ Transliteration: prakṛteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśaḥ | ahakāravimūdhātmā kartāhamiti manyate ||
▸ Glossary: prakṛteḥ: of material nature; kriyamāṇāni: all being done; guṇaiḥ: by the at- tributes; karmāṇi: work; sarvaśaḥ : all kinds of; ahaṁkāra: ego; vimūdhātmā: confused being; kartā: doer; ahaṁ: I; iti: thus; manyate: thinks
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.27 People, confused by ego, think they are the doers of all kinds of work while it is being done by the energy of nature.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.27।।सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य मैं कर्ता हूँ ऐसा मानता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.27।। सम्पूर्ण कर्म प्रकृति के गुणों द्वारा किये जाते हैं अहंकार से मोहित हुआ पुरुष मैं कर्ता हूँ ऐसा मान लेता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.27 प्रकृतेः of nature? क्रियमाणानि are performed? गुणैः by the alities? कर्माणि actions? सर्वशः in all cases? अहङ्कारविमूढात्मा one whose mind is deluded by egosim? कर्ता doer? अहम् I? इति thus? मन्यते thinks.Commentary Prakriti or Pradhana or Nature is that state in which the three Gunas? viz.? Sattva? Rajas and Tamas exist in a state of eilibrium. When this eilibrium is disturbed? creation begins body? senses? mind? etc.? are formed. The man who is deluded by egoism identifies the Self with the body? mind? the life force and the senses and ascribes to the Self all the attributes of the body and the senses. He? therefore? thinks through ignorance? I am the doer. In reality the Gunas of Nature perform all actions. (Cf.III.29V.9IX.9?10XIII.21?24?30?32XVIII.13?14).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.27. The actions are performed part by part, by the Strands of the Prakrti; [yet] the person, having his self (mind) deluded with egoity, imagines 'I am [alone] the doer'.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.27 Action is the product of the Qualities inherent in Nature. It is only the ignorant man who, misled by personal egotism, says: I am the doer.'
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.27 Actions are being performed in every way by the Gunas of Prakrti. He whose nature is deluded by egoism, thinks, 'I am the doer.'
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.27 While actions are being done in every way by the gunas (alities) of Nature, one who is deluded by egoism thinks thus: 'I am the doer.'
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.27 All actions are wrought in all cases by the alities of Nature only. He whose mind is deluded by egoism thinks, "I am the doer."
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.27 Prakreh etc. Indeed the actions are performed by the Strands, Sattva etc., belonging to the Prakrti. But the fool unnecessarily binds himself by wrongly comprehending 'I' am the doer'.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.27 It is the Gunas of Prakrti like Sattva, Rajas etc., that perform all the activities appropriate to them. But the man, whose nature is deluded by his Ahankara, thinks, 'I am the doer of all these actions.' Ahankara is the mistaken conception of 'I' applied to the workings of Prakrti which is not the 'I'. The meaning is that it is because of this (Ahankara), that one who is ignorant of the real nature of the self, thinks, 'I am the doer' with regard to the activities that are really being done by the Gunas of Prakrti.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.27 Karmani kriyamanani, while actions, secular and scriptural, are being done; sarvasah, in ever way; gunaih, by the gunas, (i.e.) by the modifications in the form of body and organs; (born) prakrteh, of Nature-Nature, (otherwise known as) Pradhana [Pradhana, Maya, the Power of God.], being the state of eilibrium of the three alities of sattva, rajas and tamas; ahankara-vimudha-atma, one who is deluded by egoism; manyate, thinks; iti, thus; 'Aham karta, I am the doer.' Ahankara is self-identification with the aggregate of body and organs. He whose atma, mind, is vimudham, diluded in diverse ways, by that (ahankara) is ahankara-vimudha-atma. He who imagines the characteristics of the body and organs to be his own, who has self-identification with the body and the organs, and who, through ignorance, believes the activities to be his own-, he thinks, 'I am the doer of those diverse activities.'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.27।। भगवान् श्रीकृष्ण निरन्तर इस बात पर बल देते हैं कि अनासक्त अथवा निष्काम कर्म ही आदर्श है। यह कहना सरल परन्तु करना कठिन होता है। बुद्धि से यह बात समझ में आने पर भी उसे कार्यान्वित करना सरल काम नहीं। हम सबके साथ कठिनाई यह है कि हम जानते नहीं कि कर्म में आसक्ति को त्याग कर फिर कर्म भी किस प्रकार करते रहें। यहाँ भगवान् विवेक की वह पद्धति बता रहें हैं जिसके द्वारा इस अनासक्ति को हम प्राप्त कर सकते हैं।आत्म अज्ञान बुद्धि और मन के स्तर पर क्रमश इच्छा और विचार के रूप में व्यक्त होता है। ये विचार मन की सात्त्विक राजसिक एवं तामसिक प्रवृत्तियों के अनुरूप होकर शरीर के स्तर पर कर्म के रूप में व्यक्त होते हैं। इन तीनों गुणों में से जिस गुण का आधिक्य विचारों में होता है मनुष्य के कर्म भी ठीक उसी प्रकार के ही होते हैं। जैसे सत्त्व के कारण शुभ कर्म और रजोगुण तथा तमोगुण से क्रमश उत्पन्न होते हैं कामक्रोध से प्रेरित तथा क्रूर पाशविक कर्म। इस प्रकार हम देखते हैं कि इन वासनाओं का ही जगत् में व्यक्त होने वाला स्थूल रूप कर्म कहलाता है।जहाँ मन है वहाँ कर्म भी है। कर्म मन से ही उत्पन्न होते हैं और मन से ही शक्ति प्राप्तकर मन की सहायता से ही किये जाते हैं। परन्तु मन के साथ अविद्याजनित मिथ्या तादात्म्य के कारण मनुष्य स्वयं को ही कर्ता मानता है। कर्तृत्व की भावना होने पर फल की चिन्ता व्याकुलता एवं आसक्ति होना स्वाभाविक ही है।स्वप्न में अपने ही संस्कारों से एक जगत् उत्पन्न करके मनुष्य उसके साथ तादात्म्य स्थापित करता है उसे ही स्वप्नद्रष्टा कहते हैं। स्वप्न के दुख स्वप्नद्रष्टा के लिए होते हैं और किसी के लिए नहीं। स्वप्नजगत् के साथ तादात्म्य को त्यागने पर द्रष्टा के सब दुख समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार वासना इच्छा कर्म अथवा फल स्वयं किसी भी प्रकार की आसक्ति को जन्म नहीं देते किन्तु जब हमारा तादात्म्य मन के साथ हो जाता है तो कर्तृत्व और आसक्ति दोनों की ही उत्पत्ति होती है। जिस क्षण इस विवेक का उदय होता है आसक्ति का अस्तित्व वहाँ नहीं रह पाता। जीवन शान्तिमय हो जाता है।परन्तु ज्ञानी पुरुष आसक्त नहीं होते क्योंकि
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.27।।सक्ताः कर्मणीत्येतं श्लोकं व्याचष्टे प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृतेः प्रधानस्य मायाशक्तेर्गुणैर्विकारैः कार्यकारणरुपैः क्रियमाणानि कर्माणि सर्वाणि सर्वशः सर्वप्रकारैः कार्यकरणसंघातेऽहंप्रत्ययोऽहंकारस्तेन विमूढः स्वात्मस्वरुपविवेकासमर्थः आत्मान्तःकरणं यस्य सोऽविद्यया कर्मणाभहंकर्तेति मन्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.27।।विद्वदविदुषोः कर्मानुष्ठानसाम्येऽपि कर्तृत्वाभिमानतदभावाभ्यां विशेषं दर्शयन्सक्ताः कर्मणीति (25) श्लोकार्थं विवृणोति द्वाभ्याम् प्रकृतिर्माया सत्त्वरजस्तमोगुणमयी मिथ्याज्ञानात्मिका पारमेश्वरी शक्तिः।मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् इति श्रुतेः। तस्याः प्रकृतेर्गुणैर्विकारैः कार्यकारणरूपैः क्रियमाणानि लौकिकानि वैदिकानि च कर्माणि सर्वशः सर्वप्रकारैरहंकारेण कार्यकारणसंघातात्मप्रत्ययेन विमूढः स्वरूपविवेकासमर्थ आत्मान्तःकरणं यस्य सोऽहंकारविमूढात्माऽनात्मन्यात्माभिमानी तानि कर्माणि कर्ताहमिति करोम्यहमिति मन्यते कर्त्रध्यासेन। कर्ताहमिति तृन्प्रत्ययः। तेनन लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् इति षष्ठीप्रतिषेधः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.27।।अविद्वान्कथं कर्मसु सज्जत इत्यत आह प्रकृतेरिति। प्रकृतेः पारमेश्वर्याः सत्वरजस्तमोगुणात्मिकायाःदेवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् इति श्रुतिप्रसिद्धायाः शक्तेर्गुणैः कार्यकारणसंघातात्मकैः क्रियमाणानि कर्माणि अहंकारेण स्वस्मिन्नध्यस्तेन विमूढः तदीयान्कर्तृत्वादीनात्मधर्मत्वेन पश्यन् आत्मनश्चासङ्गानन्दसंविद्रूपतामपश्यन्नात्मा अहंकारेण विमूढश्चासावात्मा चेति विग्रहः। अहं कर्माणि करोमि कर्मणां कर्तेति मन्यते कर्त्रध्यासेन। कर्ताहमिति तृन्प्रत्ययस्तेननलोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् इति षष्ठीनिषेधः। अन्यथा तृच्प्रत्यये कर्मणां कर्ताहमिति षष्ठ्या भाव्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.27।।ननु विद्वानपि चेत्तथा कुर्यात्तदाऽविदुषः सकाशात् को भेदः तज्ज्ञानस्य च क्वोपयोगः सम्पूर्णे काले कर्मव्यावृत्त्यासेवाद्यनवसरादित्यतोऽविदुषो विदुषश्च भेदमाह प्रकृतेरिति। अहङ्कारेण विमूढात्मा अविद्वान् सर्वशः प्रकृतेर्गुणैरिन्द्रियैः क्रियमाणानि कर्माणिअहमेव कर्ता इति मन्यते न तु भगवदिच्छाम्। तानि च भगवाँल्लोकव्यामोहार्थं कारयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.27।।ननु विदुषापि चेत्कर्म कर्तव्यं तर्हि विद्वदविदुषोः को विशेष इत्याशङक्योभयोर्विशेषं दर्शयति प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृतेर्गुणैः प्रकृतिकार्यैरिन्द्रियैः सर्वप्रकारेण क्रियमाणानि यानि कर्माणि तान्यहमेव कर्ता करोमीति मन्यसे। तत्र हेतुः। अहंकारेणेन्द्रियादिष्वात्माध्यासेन विमूढ आत्मा बुद्धिर्यस्य सः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.27 3.28।।कर्म कुर्वतोर्विद्वदविदुषोर्विशेषं स्पष्टं सन्दर्शयति प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृते योगे साङ्खयरीत्या विशेषदर्शनमिति नाप्रकृतप्रसङ्गः। तथाहि ब्रह्मवादिसाङ्ख्ये जगतः कर्त्ता भोक्ता सर्वधर्माश्रयः पुरुषोत्तम एवांशतोऽक्षरः कालः प्रकृतिः पुरुष आत्मा भवति स (इममेव) आत्मानं द्वेधापातयत् (ततः) पतिश्च पत्नी चाभवत् बृ.उ.1।4।3 इति श्रुतेः। तत्र कर्त्री प्रकृतिस्तत्संसृष्टतया पुरुषश्च भोक्ता। वस्तुतः पुष्करपलाशवत्प्राकृतधर्मैरवशस्तथापि तद्गुणैः परिणतगुणैरिन्द्रियैरिन्द्रियनिष्ठैर्वा गुणैः क्रियमाणानि कर्मामि कर्त्ताऽहं पुरुष इति मन्यते विपरीतमतिः। गुणेः कर्माणि क्रियन्ते न केवलेनात्मनेति। विभागतत्त्ववित्तु न सज्जते। इन्द्रियनिष्ठा गुणा विषयगुणेषु वर्तन्ते इति मननात्साङ्ख्ययोगयोरेक एवार्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.27।।मूर्ख अज्ञानी मनुष्य कर्मोंमें किस प्रकार आसक्त होता है सो कहते हैं सत्त्व रजस् और तमस् इन तीनों गुणोंकी जो साम्यावस्था है उसका नाम प्रधान या प्रकृति है उस प्रकृतिके गुणोंसे अर्थात् कार्य और करणरूप समस्त विकारोंसे लौकिक और शास्त्रीय सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे किये जाते हैं। परंतु अहंकारविमूढात्मा कार्य और करणके संघातरूप शरीरमें आत्मभावकी प्रतीतिका नाम अहंकार है उस अहंकारसे जिसका अन्तःकरण अनेक प्रकारसे मोहित हो चुका है ऐसा देहेन्द्रियके धर्मको अपना धर्म माननेवाला देहाभिमानी पुरुष अविद्यावश प्रकृतिके कर्मोंको अपनेमें मानता हुआ उनउन कर्मोंका मैं कर्ता हूँ ऐसा मान बैठता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.27।। व्याख्या प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः जिस समष्टि शक्तिसे शरीर वृक्ष आदि पैदा होते और बढ़तेघटते हैं गङ्गा आदि नदियाँ प्रवाहित होती हैं मकान आदि पदार्थोंमें परिवर्तन होताहै उसी समष्टि शक्तिसे मनुष्यकी देखना सुनना खानापीना आदि सब क्रियाएँ होती हैं। परन्तु मनुष्य अहंकारसे मोहित होकर अज्ञानवश एक ही समष्टि शक्तिसे होनेवाली क्रियाओंके दो विभाग कर लेता है एक तो स्वतः होनेवाली क्रियाएँ जैसे शरीरका बनना भोजनका पचना इत्यादि और दूसरी ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाएँ जैसे देखना बोलना भोजन करना इत्यादि। ज्ञानपूर्वक होनेवाली क्रियाओंको मनुष्य अज्ञानवश अपनेद्वारा की जानेवाली मान लेता है।प्रकृतिसे उत्पन्न गुणों(सत्त्व रज और तम) का कार्य होनेसे बुद्धि अहंकार मन पञ्चमहाभूत दस इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके शब्दादि पाँच विषय ये भी प्रकृतिके गुण कहे जाते हैं। उपर्युक्त पदोंमें भगवान् स्पष्ट करते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ (चाहे समष्टिकी हों या व्यष्टिकी) प्रकृतिके गुणों द्वारा ही की जाती हैं स्वरूपके द्वारा नहीं।अहंकारविमूढात्मा अहंकार अन्तःकरणकी एक वृत्ति है। स्वयं (स्वरूप) उस वृत्तिका ज्ञाता है। परन्तु भूलसे स्वयं को उस वृत्तिसे मिलाने अर्थात् उस वृत्तिको ही अपना स्वरूप मान लेनेसे यह मनुष्य विमूढात्मा कहा जाता है।जैसे शरीर इदम् (यह) है ऐसे ही अहंकार भी इदम् (यह) है। इदम् (यह) कभी अहम् (मैं) नहीं हो सकता यह सिद्धान्त है। जब मनुष्य भूलसे इदम् को अहम् अर्थात् यह को मैं मान लेता है तब वह अहंकारविमूढात्मा कहलाता है। यह माना हुआ अहंकार उद्योग करनेसे नहीं मिटता क्योंकि उद्योग करनेमें भी अहंकार रहता है। माना हुआ अहंकार मिटता है अस्वीकृतिसे अर्थात् न मानने से।विशेष बातअहम् दो प्रकारका होता है (1) वास्तविक (आधाररूप) अहम् (टिप्पणी प0 161) जैसे मैं हूँ (अपनी सत्तामात्र)।(2) अवास्तविक (माना हुआ) अहम् जैसे मैं शरीर हूँ। वास्तविक अहम् स्वाभाविक एवं नित्य और अवास्तविक अहम् अस्वाभाविक एवं अनित्य होता है। अतः वास्तविक अहम् विस्मृत तो हो सकता है पर मिट नहीं सकता और अवास्तविक अहम् प्रतीत तो हो सकता है पर टिक नहीं सकता। मनुष्यसे भूल यह होती है कि वह वास्तविक अहम्(अपने स्वरूप) को विस्मृत करके अवास्तविक अहम्(मैं शरीर हूँ) को ही सत्य मान लेता है।कर्ताहमिति मन्यते यद्यपि सम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिजन्य गुणोंके द्वारा ही किये जाते हैं तथापि अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य कुछ कर्मोंका कर्ता अपनेको मान लेता है। कारण कि वह अहंकारको ही अपना स्वरूप मान बैठता है। अहंकारके कारण ही मनुष्य शरीर इन्द्रियाँ मन आदिमेंमैंपन कर लेता है और उन(शरीरादि) की क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है। यह विपरीत मान्यतामनुष्यने स्वयं की है इसलिये इसको मिटा भी वही सकता है। इसको मिटानेका उपाय है इसे विवेकविचारपूर्वक न मानना क्योंकि मान्यतासे ही मान्यता कटती है।एक करना होता है और एक न करना। जैसे करना क्रिया है ऐसे ही न करना भी क्रिया है। सोना जागना बैठना चलना समाधिस्थ होना आदि सब क्रियाएँ हैं। क्रियामात्र प्रकृतिमें होती है। स्वयं(चेतन स्वरूप) में करना और न करना दोनों ही नहीं हैं क्योंकि वह इन दोनोंसे परे है। वह अक्रिय और सबका प्रकाशक है। यदि स्वयं में भी क्रिया होती तो वह क्रिया (शरीरादिमें परिवर्तनरूपक्रियाओं) का ज्ञाता कैसे होता करना और न करना वहाँ होता है जहाँ अहम् (मैं) रहता है। अहम् न रहनेपर क्रियाके साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता। करना और न करना दोनों जिससे प्रकाशित होते हैं उस अक्रिय तत्त्व (अपने स्वरूप) में मनुष्यमात्रकी
Chapter 3 (Part 17)
स्वाभाविक स्थिति है। परन्तु अहम् के कारण मनुष्य प्रकृतिमें होनेवाली क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेता है। प्रकृति(जड) से माना हुआ सम्बन्ध ही अहम् कहलाता है।विशेष बातजिस प्रकार समुद्रका ही अंश होनेके कारण लहर और समुद्रमें जातीय एकता है अर्थात् जिस जातिकी लहर है उसी जातिका समुद्र है उसी प्रकार संसारका ही अंश होनेके कारण शरीरकी संसारसे जातीय एकता है। मनुष्य संसारको तो मैं नहीं मानता पर भूलसे शरीरको मैं मान लेता है।जिस प्रकार समुद्रके बिना लहरका अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है उसी प्रकार संसारके बिना शरीरका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला मनुष्य जब शरीरको मैं (अपना स्वरूप) मान लेता है तब उसमें अनेक प्रकारकी कामनाएँ उत्पन्न होने लगती हैं जैसे मुझे स्त्री पुत्र धन आदि पदार्थ मिल जायँ लोग मुझे अच्छा समझें मेरा आदरसम्मान करें मेरे अनुकूल चलें इत्यादि। उसका इस ओर ध्यान ही नहीं जाता कि शरीरको अपना स्वरूप मानकर मैं पहलेसे ही बँधा बैठा हूँ अब कामनाएँ करके और बन्धन बढ़ा रहा हूँ अपनेको और विपत्तिमें डाल रहा हूँ।साधनकालमें मैं (स्वयं) प्रकृतिजन्य गुणोंसे सर्वथा अतीत हूँ ऐसा अनुभव न होनेपर भी जब साधक ऐसा मान लेता है तब उसे वैसा ही अनुभव हो जाता है। इस प्रकार जैसे वह गलत मान्यता करके बँधा था ऐसे ही सही मान्यता करके मुक्त हो जाता है क्योंकि मानी हुई बात न माननेसे मिट जाती है यह सिद्धान्त है। इसी बातको भगवान्ने पाँचवें अध्यायके आठवें श्लोकमें नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् पदोंमें मन्येत पदसे प्रकट किया है कि मैं कर्ता हूँ इस अवास्तविक मान्यताको मिटानेके लिये मैं कुछ भी नहीं करता ऐसी वास्तविक मान्यता करना होगी। मैं शरीर हूँ मैं कर्ता हूँ आदि असत्य मान्यताएँ भी इतनी दृढ़ हो जाती हैं कि उन्हें छोड़ना कठिन मालूम देता है फिर मैं शरीर नहीं हूँ मैं अकर्ता हूँ आदि सत्य मान्यताएँ दृढ़ कैसे नहीं होंगी और एक बार दृढ़ हो जानेपर फिर कैसे छूटेंगी
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.27।।अज्ञानामित्युक्तम्। तदज्ञत्वं दर्शयति प्रकृतेरिति। प्रकृतिसंबन्धिभिः गुणैः सत्त्वाद्यैः किल कर्माणि क्रियन्ते। मूढश्च अहं कर्ता इत्यध्यवस्य(S omits अध्यवस्य) मिथ्यैव आत्मानं बध्नाति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.27।।अज्ञानां कर्मसङ्गिनामित्युक्तं तेनोत्तरश्लोकस्य संगतिमाह अविद्वानिति। कर्तृत्वमात्मनो वास्तवमित्यभ्युपगमाद्विद्वान्कथं कुर्वन्नेव तस्याभावं पश्यतीत्याशङ्क्याह प्रकृतेरिति। कर्मस्वविदुषः सक्तिप्रकारं प्रकटयन्व्याकरोति प्रकृतेरित्यादिना। प्रधानशब्देन मायाशक्तिरुच्यते अविद्ययेत्युभयतः संबध्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.27 3.28।।प्रकृतेः क्रियमाणानि इति श्लोकद्वयस्यास्फुटत्वात्तात्पर्यमाह विद्वदिति। यथायोगं सम्बन्धः न यथाक्रमम्। कर्मभेदं कर्मवैलक्षण्यं आह प्रपञ्चयतीत्यर्थः।सक्ताः कर्मणि 3।25 इत्यादिनोक्तत्वात्। व्यवहितत्वादन्वयं दर्शयन् गुणशब्दस्यानेकार्थत्वात् विवक्षितमर्थमाह प्रकृतेरिति। आदिपदेन शरीरमनसोर्ग्रहणम्। कथमिन्द्रियादीनां द्रव्याणां प्रकृतिगुणत्वमित्यत आह प्रकृतिमिति। गुणभूतान्यप्रधानानि। प्रकारान्तरेण व्याचष्टे तदिति। प्रकृतिकार्याणि चेत्यर्थः। गुणशब्दः कार्यार्थ इत्युक्तं भवति। ननु जीवस्यापि कर्तृत्वात्अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते इति कथमुच्यते इत्यत आह न हीति। स्वातन्त्र्येणेति शेषः।।गुणानां कर्मणां चान्योन्यं यो विभागस्तस्मिन्वक्तव्ये एकवचनेनालं कथं द्विवचनं केन वाऽस्यान्वयः इति शङ्काविभागशब्दस्यार्थं वदन्परिहरति कर्मेति।जीवेश्वरप्रकृतिलक्षणसम्बन्धिभेदात् कर्मणामिन्द्रियादीनां च भेदोऽत्र विवक्षितो ग्रन्थान्तरादवगन्तव्यः। गुणा गुणेष्विति पदद्वयस्य विवक्षितमर्थमाह गुणा इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.27।।विद्वदविदुषोः कर्मभेदमाह प्रकृतेरिति। प्रकृतेर्गुणैरिन्द्रियादिभिः। प्रकृतिमपेक्ष्य गुणभूतानि हि तानि तत्सम्बन्धीनि च। न हि प्रतिबिम्बस्य क्रिया।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.27।।प्रकृतेः गुणैः सत्त्वादिभिः स्वानुरूपं क्रियमाणानि कर्माणि प्रति अहंकारविमूढात्मा अहं कर्ता इति मन्यते। अहंकारेण विमूढ आत्मा यस्य असौ अहंकारविमूढात्मा अहंकारो नाम अनहमर्थे प्रकृतौ अहम् इति अभिमानः तेन अज्ञातात्मस्वरूपो गुणकर्मसु अहं कर्ता इति मन्यते इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.27।। प्रकृतेः प्रकृतिः प्रधानं सत्त्वरजस्तमसां गुणानां साम्यावस्था तस्याः प्रकृतेः गुणैः विकारैः कार्यकरणरूपैः क्रियमाणानि कर्माणिलौकिकानि शास्त्रीयाणि च सर्वशः सर्वप्रकारैः अहंकारविमूढात्मा कार्यकरणसंघातात्मप्रत्ययः अहंकारः तेन विविधं नानाविधं मूढः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयं कार्यकरणधर्मा कार्यकरणाभिमानी अविद्यया कर्माणि आत्मनि मन्यमानः तत्तत्कर्मणाम् अहं कर्ता इति मन्यते।।यः पुनर्विद्वान्
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【 Verse 3.28 】
▸ Sanskrit Sloka: तत्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयो: | गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ||
▸ Transliteration: tattvavittu mahābāho guṇakarmavibhāgayoḥ | guṇā guṇeṣu vartanta iti matvā na sajjate ||
▸ Glossary: tattvavit: one who knows the truth; tu: but; mahābāho: mighty-armed one; guṇa: attributes; karma: work; vibhāgayoḥ: differences; guṇāḥ: attributes; guṇeṣu: in sense gratification; vartante: engaged; iti: thus; matvā: thinking; na: never; sajjate: becomes attached
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.28 One who knows the Truth, O mighty-armed one, knows the differences between the attributes of nature and work. Knowing well about the attributes and sense gratification, he never becomes attached.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.28।।हे महाबाहो गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.28।। परन्तु हे महाबाहो गुण और कर्म के विभाग के सत्य (तत्त्व)को जानने वाला ज्ञानी पुरुष यह जानकर कि गुण गुणों में बर्तते हैं (कर्म में) आसक्त नहीं होता।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.28 तत्त्ववित् the knower of the Truth? तु but? महाबाहो O mightyarmed? गुणकर्मविभागयोः of the divisions of alities and functions? गुणाः the alities (in the shape of senses)? गुणेषु amidst the alities (in the shape of objects)? वर्तन्ते remain? इति thus? मत्वा knowing? न not? सज्जते is attached.Commentary He who knows the truth that the Self is entirely distinct from the three Gunas and actions does not become attached to the actions. He who knows the truth about the classification of the Gunas and their respective functions understands that the alities as senseorgans move amidst the alities as senseobjects. Therefore he is not attached to the actions. He knows? I am Akarta -- I am not the doer. (Cf.XIV.23).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.28. But, O mighty-armed one, the knower of the real nature of the divisions of the Strands and of their [respective] divisions of work, realises : 'The Strands are at their [respective] purposes' And hence he is not attached.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.28 But he, O Mighty One, who understands correctly the relation of the Qualities to action, is not attached to the act for he perceives that it is merely the action and reaction of the Qualities among themselves.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.28 But he who knows the truth about the division of the Gunas and works, O mighty-armed one, through his knowledge that 'Gunas operate on their products,' is not attached.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.28 But, O mighty-armed one, the one who is a knower of the facts about the varieties of the gunas (alities) and actions does not become attached, thinking thus: 'The organs rest (act) on the objects of the organs.'
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.28 But he who knows the Truth, O mighty-armed (Arjuna), about the divisions of the alities and (their) functions, knowing that the Gunas as senses move amidst the Gunas as the sense-objects, is not attached.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.28 Tattvavit tu etc. On the other hand, the knower of the real nature of divisions of the Strands and of their actions, sets himself free by viewing 'The Prakrti acts; what comes to men ?' The ignorant men have been described as being attached to action (above III, 26). That attachment [of theirs, the Lord] demonstrates :
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.28 But he who knows the truth about the divisions of the Gunas and their actions - namely, about the division among Sattva etc., on the one hand, and the divisions among their respective functionings on the other hand - it is he who, realising that Gunas, i.e., Sattva etc., are operating on their own products, is not attached to the actions of the Gunas, being convinced, 'I am not the doer.'
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.28 Tu, but, on the other hand; he who is a knower, tattva-vit, a knower of the facts;-knower of what kinds of facts?-guna-karma-vibhagayoh, about the varieties of the gunas and actions, i.e. a knower of the diversity of the gunas and the diversity of acitons; [Guna-vibhaga means the products of Prakrti which consists of the three gunas. They are the five subtle elements, mind, intellect, ego, five sensory organs, five motor organs and five objects (sound etc.) of the senses. Karma-vibhaga means the varieties of inter-actions among these.-Tr.] na sajjate, does not become attached; iti matva, thinking thus; 'Gunah, the gunas in the form of organs;-not the Self-vartante, rest (act); gunesu, on the gunus in the form of objects of the organs.'
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.28।। पूर्व श्लोक में अज्ञानी का जो लक्षण बताया गया है उसकी तुलना में ज्ञानी पुरुष की उससे ठीक विपरीत दृष्टि यहाँ श्रीकृष्ण बता रहे हैं। ज्ञानी के कर्मों में आसक्ति का कोई स्थान नहीं रहता क्योंकि वह जानता है कि मन ही बाह्यजगत् में कर्मरूप में व्यक्त होता है। यह विवेक उसमें सदा जागृत रहता हैं। एक बार इस सत्य को सम्यक् रूप से जान लेने पर ज्ञानी पुरुष यह समझ लेता है कि राग और द्वेष प्रवृत्ति या निवृत्ति सफलता और विफलता ये सब मन के लिए हैं। अत उसे फल में आसक्त होने का कोई प्रश्न ही नहीं रह जाता। इस प्रकार बन्धनों से मुक्त हुआ ज्ञानी पुरुष एक सच्चे खिलाड़ी के समान कार्य करता है जिसका आनन्द केवल खेल में ही हैं अंक जीतने में नहीं।इस स्थान पर श्रीकृष्ण का अर्जुन को महाबाहो कहकर सम्बोधित करना अर्थपूर्ण है। इस सम्बोधन से हमें धनुर्धारी के रूप में अर्जुन की अनेक उपलब्धियों का स्मरण होता है। यहाँ महाबाहो शब्द सूचित करता है कि सच्चा और वीर पुरुष वह नहीं जो किसी युद्ध में केवल कुछ शत्रुओं का ही वध करे बल्कि जो निरन्तर मन में चल रहे युद्ध का अथक सामना करते हुये आसक्तियों के ऊपर पूर्ण विजय प्राप्त करता है वही पुरुष वास्तविक वीर है। कर्म के युद्धक्षेत्र में परिस्थितियों पर आधिपत्य स्थापित करते हुये समस्त दिशाओं से आने वाले आसक्तियों के बाणों के समक्ष आत्मसमर्पण न करते हुये जोे कर्म करता है वही अपराजेय अमर वीर है। तत्पश्चात् वह निशस्त्र होकर र्मत्य वीरों के रथ में बैठकर प्रत्येक कुरुक्षेत्र में अनेक सेनाओं का मार्गदर्शन कर सकता है ऐसा ही पुरुष जो सत्य का ज्ञाता है तत्त्ववित कहलाता है।अब
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.28।।तत्त्ववित्तु। तुशब्दोऽज्ञाद्वैलक्षण्यद्योतनार्थः। कस्य तत्त्वविदित्यतआह। गुणकर्मविभागयोः गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्वविदित्यर्थ इति भाष्यम्। अस्यायमर्थः। नाहं कार्यकरणसंघातात्मेति गुणेभ्य आत्मनो विभागः न मे कर्माणीत्यात्मनस्तेभ्यो विभागः गुणकर्मभ्यां विभक्तात्मसाक्षात्कारवान्। तथाच नायमहंकारविमूढात्मा नापि कर्मण्यासक्तो येनाहंकर्तेति मन्येत। विभागपदाभावे त्वयमर्थो न लभ्यते। विग्रहस्तु विभागश्च विभागश्च विभागौ गुणकर्मभ्यो विभागौ गुणकर्मविभागौ तयोर्गुणकर्मविभागयोरिति बोध्यः। एतेन गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्वविदिति वा। अस्मिन्पक्षे गुणकर्मणोरित्येतावतैव निर्वाहे विभागपदस्य प्रयोजनं चिन्त्यमित्याक्षेपः प्रत्युक्तः। यत्त्वाक्षेप्त्रा स्वव्याख्यानं प्रदर्शितं गुणानि देहेन्द्रियान्तःकरणान्यहंकारास्पदानि कर्माणि च तेषां व्यापारभूतानि ममकारास्पदानीति। गुणकर्मेति द्वन्द्वैकवद्भावः। विभज्यते सर्वेषां जडानां विकारिणां भासकत्वेन यथा भवतीति विभागः स्वप्रकाशज्ञानरुपोऽसङ्ग आत्मा गुणकर्म च विभागश्चेति द्वन्द्वः तयोर्गुणकर्मविभागयोर्भास्यभासकयोर्जडचैतन्ययोर्विकारीनिर्विकारयोस्तत्त्वं याथात्म्यं यो वेत्तीति तच्चिन्त्यम्। गुणकर्मेत्यस्यैकपदत्वेऽल्पाच्त्वाद्भ्यर्हितत्वाच्च विभागपदस्य पूर्वनिपातापत्तेश्छान्दसत्वनिपातप्रकरणानित्यत्वयोराश्रयणस्य भाष्योक्तरीत्या सत्यां गतावनुचितत्वात्। विभागपदस्य प्रसिद्धमर्थं परित्यज्याप्रसिद्धार्थकल्पनायाः क्लिष्टकल्पनायाश्चान्याय्यत्वादितिदिक्। यदप्यन्ते यस्तत्त्ववित्सः गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा गुणविभागे कर्मविभागे च न सज्जत इति योजना। गुणानां सत्त्वरजस्तमसां विभागः बुद्य्धहंकारज्ञानेन्द्रियविषयरुपेण विभज्यावस्थानं तस्मिन्न सज्जते इदमहमिति न मन्यते। एतेन कर्मविभागोऽप्यावश्यकत्वेन व्याख्यातः। अन्यथा चिदात्मन्येवादानादिकर्तृव्यं दुःखादिमत्त्वं चापतति तथाचात्मानात्मनोर्याथात्म्यज्ञः व्यापृतेष्वहंकारादिषु तत्कर्मसु चाभिमानादिषु कुसुमेषु सूत्रमिवानुवर्तमानमात्मानं तेभ्यः पृथग्भूतं जानन् गुणा धीचक्षुरादयो गुणेषु दुःखरुपादिषु वर्तन्ते न त्वात्मेति मत्वा न सज्जतेऽहमेव हस्तादिसंघातरूपो ममैवेदमादानादिकं कर्मेति न सक्तो भवतीत्यर्थ इति तदपि विचार्यम्। गुणाकर्मणोर्न सज्जत इत्येतावतैव निर्वाहे विभागपदवैयर्थ्यापत्तेः तथाचेत्यादिग्रन्थस्य स्वव्याख्यानाननुरुपत्वाच्चेति दिक्। गुणाः करणात्मकाः गुणेषु विषयेषु प्रवर्तन्ते नात्मेति मत्वा न सज्जते सक्तिं कर्तृत्वाभिनिवेशं न करोति। महान्तौ बाहू शत्रुहनने प्रवर्तेते नाहमिति मत्वा त्वमपि कर्तृत्वाभिनिवेशं कर्तुं नार्हसीति ध्वनयन्नाह हे माहबाहो इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.28।।विद्वांस्तु तथा न मन्यत इत्याह तत्त्वं याथात्म्यं वेत्तीति तत्त्ववित्। तुशब्देन तस्याज्ञाद्वैशिष्ट्यमाह। कस्य तत्त्वमित्यतआह गुणकर्मविभागयोः गुणा देहेन्द्रियान्तःकरणान्यहंकारास्पदानि कर्माणि च तेषां व्यापारभूतानि ममकारास्पदानीति गुणकर्मेति द्वन्द्वैकद्भावः। विभज्यते सर्वेषां जडानां विकारिणां भासकत्वेन पृथग्भवतीति विभागः स्वप्रकाशज्ञानरूपोऽसङ्ग आत्मा। गुणकर्म च विभागश्चेति द्वन्द्वः। तयोर्गुणकर्मविभागयोर्भास्यभासकयोर्जडचैतन्ययोर्विकारिनिर्विकारयोस्तत्त्वं याथात्म्यं यो वेत्ति स गुणाः करणात्मका गुणेषु विषयेषु प्रवर्तन्ते विकारित्वान्नतु निर्विकार आत्मेति मत्वा न सज्जते सक्तिं कर्तृत्वाभिनिवेशमतत्त्वविदिव न करोति। हे महाबाहो इति संबोधयन्सामुद्रिकोक्तसत्पुरुषलक्षणयोगित्वान्न पृथग्जनसाधारण्येन त्वमविवेकी भवितुमर्हसीति सूचयति। गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्वविदिति वा। अस्मिन्पक्षे गुणकर्मणोरित्येतावतैव निर्वाहे विभागपदस्य प्रयोजनं चिन्त्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.28।।एवं सक्तस्य कर्माचरणं प्रदर्श्यासक्तस्य तत्प्रदर्शयति तत्त्वविदिति। गुणकर्मविभागयोः गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्वविदिति भाष्यम्। नाहं गुणात्मक इति गुणेभ्य आत्मनो विभागः नाहं कर्मात्मक इति कर्मभ्यश्चात्मनो विभागः तयोर्गुणकर्मविभागयोस्तत्त्वं वेत्तीति श्रीधरः। मधुसूदनस्तु गुणाः देहेन्द्रियान्तःकरणान्यहंकारास्पदानि। कर्माणि च तेषां व्यापारभूतानि ममकारास्पदानि। गुणकर्मेति द्वन्द्वैकवद्भावः। विभज्यते सर्वेषां जडानां भासकत्वेन पृथग्भवतीति विभागः स्वप्रकाशज्ञानरूपोऽसङ्ग आत्मा। गुणकर्म च विभागश्चेति द्वन्द्वः। तयोर्जडाजडयोस्तत्त्वं यो वेत्ति सः गुणाः करणात्मकाः गुणेषु विषयेषु वर्तन्ते इति मत्वा न सज्जते। कर्तृत्वाभिनिवेशं न करोतीत्यर्थः। गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्वविदिति पक्षे गुणकर्मणोरित्येव सिद्धे विभागपदं व्यर्थमिति। यद्वा यस्तत्त्ववित् स गुणाः गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा गुणविभागे कर्मविभागे च न सज्जते इति योजना। गुणानां सत्त्वरजस्तमसां विभागो बुद्ध्यहंकारज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियविषयरूपेण विभज्यावस्थानं तस्मिन्न सज्जते इदमहमिति न मन्यते। तथाहि शरीरे गौरेऽहं गौरोऽस्मि हस्ताभ्यामात्ते मयेदमात्तमिति चक्षुषा दृष्टे मयेदं दृष्टमित्यहंकारेणाभिमते ममेदमित्यभिमन्यते। बुद्धौ विक्रियमाणायामहं सुखीति च सर्वेषु बुद्ध्यादिषु विभज्य गृह्यमाणेष्वपि प्रत्येकं प्रत्यक्त्वमध्यस्याहमिदमिति ममेदं कर्मेति च मन्यते। एतेन कर्मविभागोऽप्यावश्यकत्वेन व्याख्यातः। अन्यथा चिदात्मन्येवादनादिकर्तृत्वं दुःखादिमत्त्वं चापतति। अयं च कर्मविभागः श्रुत्यापि दर्शितःअन्धो मणिमविन्दत्। तमनङ्गुलिरावयत्। अग्रीवः प्रत्यमुञ्चत्। तमजिह्वो असश्चत् इति। अन्धः स्वयं प्रकाशहीनोऽपि चक्षुरादिर्मणिं रूपादिकं विषयमविन्दत्प्रकाशयति। अनङ्गुलिः काष्ठलोष्ठादिवज्जडत्वात् स्वयं कर्म कर्तुमशक्तोऽपि पाण्यादिः आवयदासीव्यत् विषयमुपादत्ते। अग्रीवः छिन्नशिरस्कवन्निर्जीवोऽहंकारस्तं प्रत्यमुञ्चत् ग्रीवायां धारयति मयेदं लब्धमिति मन्यते। अजिह्वो धीधातुः जडत्वात्स्वयं स्वगतसुखदुःखयोः पट इव स्वगतरूपादेः प्रकाशनेऽसमर्थोऽप्यहं सुखी दुःखीति चानुभवति। तथाचात्मानात्मनोर्याथात्म्यज्ञो व्यावृत्तेष्वहंकारादिषु तत्कर्मसु चाभिमानादिषु कुसुमेषु सूत्रमिवानुवर्तमानमात्मानं तेभ्यः पृथग्भूतं जानन् गुणा धीचक्षुरादयो गुणेषु दुःखरूपादिषु वर्तन्ते न त्वात्मेति मत्वा न सज्जतेऽहमेव हस्तादिसंघातरूपो ममैवेदमादानादिकं कर्मेति न सक्तो भवतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.28।।एवमविदुषः स्वरूपमुक्त्वा विद्वत्स्वरूपमाह तत्त्वविदिति। हे महाबाहो ज्ञात्वा क्रियाकरणसमर्थ क्रियावान् गुणकर्मविभागयोस्तत्त्ववित्गुणा गुणेषु वर्तन्ते इति मत्वा कर्मसु न सज्जते। अत्रायं भावः गुणास्तु भगवता सात्त्विकादिभावभिन्नविचित्रस्वरसभोगार्थं प्रकटीकृताः। अत एव व्रजविलासिनीषु सात्त्विकादिगुणा निरूपिताः श्रीभागवते। कर्म तु लोकसङ्ग्राहार्थं कार्यते। तथा चैतद्विभागतत्त्ववित् गुणा जीवस्था गुणेषु भगवद्गु৷৷৷৷৷৷৷৷.णेषु वर्त्तन्ते प्रभुः स्वरसभोगार्थं गुणभावैस्तदुपयोगिकर्माणि कारयति। अन्यानिकर्माणि तु लोकार्थं कारयतीति मत्वा मूढवदेवाहमेव कर्ता तत्फलं मम भविष्यतीति न सज्जत इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.28।।विद्वांस्तु तथा न मन्यत इत्याह तत्त्वविदिति। नाहं गुणात्मक इति गुणेभ्य आत्मनो विभागः। न मे कर्माणीति कर्मभ्योऽप्यात्मनो विभागस्तयोर्गुणकर्मविभागयोर्यस्तत्त्वं वेत्ति स तु न सज्जते कर्तृत्वाभिनिवेशं न करोति। तत्र हेतुः। गुणा इन्द्रियाणि गुणेषु विषयेषु वर्तन्ते नाहमिति मत्वा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.27 3.28।।कर्म कुर्वतोर्विद्वदविदुषोर्विशेषं स्पष्टं सन्दर्शयति प्रकृतेरिति द्वाभ्याम्। प्रकृते योगे साङ्खयरीत्या विशेषदर्शनमिति नाप्रकृतप्रसङ्गः। तथाहि ब्रह्मवादिसाङ्ख्ये जगतः कर्त्ता भोक्ता सर्वधर्माश्रयः पुरुषोत्तम एवांशतोऽक्षरः कालः प्रकृतिः पुरुष आत्मा भवति स (इममेव) आत्मानं द्वेधापातयत् (ततः) पतिश्च पत्नी चाभवत् बृ.उ.1।4।3 इति श्रुतेः। तत्र कर्त्री प्रकृतिस्तत्संसृष्टतया पुरुषश्च भोक्ता। वस्तुतः पुष्करपलाशवत्प्राकृतधर्मैरवशस्तथापि तद्गुणैः परिणतगुणैरिन्द्रियैरिन्द्रियनिष्ठैर्वा गुणैः क्रियमाणानि कर्मामि कर्त्ताऽहं पुरुष इति मन्यते विपरीतमतिः। गुणेः कर्माणि क्रियन्ते न केवलेनात्मनेति। विभागतत्त्ववित्तु न सज्जते। इन्द्रियनिष्ठा गुणा विषयगुणेषु वर्तन्ते इति मननात्साङ्ख्ययोगयोरेक एवार्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.28।।परंतु जो ज्ञानी है हे महाबाहो वह तत्त्ववेत्ता किसका तत्त्ववेत्ता गुणकर्मविभागका अर्थात् गुणविभाग और कर्मविभागके तत्त्वको जाननेवाला ज्ञानी इन्द्रियादिरूप गुण ही विषयरूप गुणोंमें बर्त रहे हैं आत्मा नहीं बर्तता ऐसे मानकर आसक्त नहीं होता। उन कर्मोंमें प्रीति नहीं करता।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.28।। व्याख्या तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः पूर्वश्लोकमें वर्णित अहंकारविमूढात्मा (अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाले पुरुष) से तत्त्वज्ञ महापुरुषको सर्वथा भिन्न और विलक्षण बतानेके लिये यहाँ तु पदका प्रयोग हुआ है।सत्त्व रज और तम ये तीनों गुण प्रकृतिजन्य हैं। इन तीनों गुणोंका कार्य होनेसे सम्पूर्ण सृष्टि त्रिगुणात्मिका है। अतः शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राणी पदार्थ आदि सब गुणमय ही हैं। यहीगुणविभाग कहलाता है। इन (शरीरादि) से होनेवाली क्रिया कर्मविभाग कहलाती है।गुण और कर्म अर्थात् पदार्थ और क्रियाएँ निरन्तर परिवर्तनशील हैं। पदार्थ उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं तथा क्रियाएँ आरम्भ और समाप्त होनेवाली हैं। ऐसा ठीकठीक अनुभव करना ही गुण और कर्मविभागको तत्त्वसे जानना है। चेतन (स्वरूप) में कभी क्रिया नहीं होती। वह सदा निर्लिप्त निर्विकार रहता है अर्थात् उसका किसी भी प्राकृत पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध नहीं होता। ऐसा ठीकठीक अनुभव करना ही चेतनको तत्त्वसे जानना है।अज्ञानी पुरुष जब इन गुणविभाग और कर्मविभागसे अपना सम्बन्ध मान लेता है तब वह बँध जाता है। शास्त्रीय दृष्टिसे तो इस बन्धनका मुख्य कारण अज्ञान है पर साधककी दृष्टिसे राग ही मुख्य कारण है। राग अविवेक से होता है। विवेक जाग्रत् होनेपर राग नष्ट हो जाता है। यह विवेक मनुष्यमें विशेषरूपसे है। आवश्यकता केवल इस विवेकको महत्त्व देकर जाग्रत् करनेकी है। अतः साधकको (विवेक जाग्रत् करके) विशेषरूपसे रागको ही मिटाना चाहिये।तत्त्वको जाननेकी इच्छा रखनेवाला साधक भी अगर गुण (पदार्थ) और कर्म(क्रिया) से अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता तो वह भी गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जान लेता है। चाहे गुणविभाग और कर्मविभागको तत्त्वसे जाने चाहे स्वयं(चेतनस्वरूप) को तत्त्वसे जाने दोनोंका परिणाम एक ही होगा।गुणकर्मविभागको तत्त्वसे जाननेका उपाय1 शरीरमें रहते हुए भी चेतनतत्त्व (स्वरूप) सर्वथा अक्रिय और निर्लिप्त रहता है (गीता 13। 31)। प्रकृतिका कार्य (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि) इदम् (यह) कहा जाता है। इदम् (यह) कभी अहम् (मैं) नहीं होता। जब यह (शरीरादि) मैं नहीं है तब यह में होनेवाली क्रिया मेरी कैसे हुई तात्पर्य है कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं और स्वयं इनसे सर्वथा असम्बद्ध निर्लिप्त है। अतः इनमें होनेवाली क्रियाओंका कर्ता स्वयं कैसे हो सकता है इस प्रकार अपनेको पदार्थ एवं क्रियाओंसे अलग अनुभव करनेवाला बन्धनमें नहीं पड़ता। सब अवस्थाओंमें नैव किञ्चित्करोमीति (गीता 5। 8) मैं कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा अनुभव करना ही अपनेको क्रियाओंसे अलग जानना अर्थात् अनुभव करना है।2 देखनासुनना खानापीना आदि सब क्रियाएँ हैं और देखनेसुनने आदिके विषय खानेपीनेकी सामग्री आदि सब पदार्थ हैं। इन क्रियाओं और पदार्थोंको हम इन्द्रियों(आँख कान मुँह आदिसे) जानते हैं। इन्द्रियोंको मन से मनको बुद्धि से और बुद्धिको माने हुए अहम्(मैंपन) से जानते हैं। यह अहम् भी एक सामान्य प्रकाश(चेतन) से प्रकाशित होता है। वह सामान्य प्रकाश ही सबका ज्ञाता सबका प्रकाशक और सबका आधार है।अहम् से परे अपने स्वरूप(चेतन) को कैसे जानें गाढ़ निद्रामें यद्यपि बुद्धि अविद्यामें लीन हो जाती है फिर भी मनुष्य जागनेपर कहता है कि मैं बहुत सुखसे सोया। इस प्रकार जागनेके बाद मैं हूँ का अनुभव सबको होता है। इससे सिद्ध होता है कि सुषुप्तिकालमें भी अपनी सत्ता थी। यदि ऐसा न होता तो मैं बहुत सुखसे सोया मुझे कुछ भी पता नहीं था ऐसी स्मृति या ज्ञान नहीं होता। स्मृति अनुभवजन्य होती है (टिप्पणी प0 163.1)। अतएव सबको प्रत्येक अवस्थामें अपनी सत्ताका अखण्ड अनुभव होता है। किसी भी अवस्थामें अपने अभावका ( मैं नहीं हूँ इसका) अनुभव नहीं होता। जिन्होंने माने हुए अहम्(मैंपन) से भी सम्बन्धविच्छेद करके अपने स्वरूप(है) का बोध कर लिया है वे तत्त्ववित् कहलातेहैं।अपरिवर्तनशील परमात्मतत्त्वके साथ हमारा स्वतःसिद्ध नित्य सम्बन्ध है। परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ हमारा सम्बन्ध वस्तुतः है नहीं केवल माना हुआ है। प्रकृतिसे माने हुए सम्बन्धको यदि विचारके द्वारा मिटाते हैं तो उसे ज्ञानयोग कहते हैं और यदि वही सम्बन्ध परहितार्थ कर्म करते हुए मिटाते हैं तो उसे कर्मयोग कहते हैं। प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर ही योग (परमात्मासे नित्यसम्बन्धका अनुभव) होता है अन्यथा केवल ज्ञान और कर्म ही होता है। अतः प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेदपूर्वक परमात्मासे अपने नित्यसम्बन्धको पहचाननेवाला ही तत्त्ववित् है।गुणा गुणेषु वर्तन्ते प्रकृतिजन्य गुणोंसे उत्पन्न होनेके कारण शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि भी गुण ही कहलाते हैं और इन्हींसे सम्पूर्ण कर्म होते हैं। अविवेकके कारण अज्ञानी पुरुष इन गुणोंके साथ अपना सम्बन्ध मानकर इनसे होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको मान लेता है (टिप्पणी प0 163.2)। परन्तु स्वयं (सामान्य प्रकाश चेतन) में अपनी स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव होनेपर मैं कर्ता हूँ ऐसा भाव आ ही नहीं सकता।रेलगाड़ीका इंजन चलता है अर्थात् उसमें क्रिया होती है परन्तु खींचनेकी शक्ति इंजन और चालकके मिलनेसे आती है। वास्तवमें खींचनेकी शक्ति तो इंजनकी ही है पर चालकके द्वारा संचालन करनेपर ही वह गन्तव्य स्थानपर पहुँच पाता है। कारण कि इंजनमें इन्द्रियाँ मन बुद्धि नहीं हैं इसलिये उसे इन्द्रियाँमन बुद्धिवाले चालक(मनुष्य) की जरूरत पड़ती है। परन्तु मनुष्यके पास शरीररूप इंजन भी है और संचालनके लिये इन्द्रियाँ मन बुद्धि भी। शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि ये चारों एक सामान्य प्रकाश(चेतन) से सत्तास्फूर्ति पाकर भी कार्य करनेमें समर्थ होते हैं। सामान्य प्रकाश(ज्ञान) का प्रतिबिम्ब बुद्धिमें आता है बुद्धिके ज्ञानको मन ग्रहण करता है मनके ज्ञानको इन्द्रियाँ ग्रहण करती हैं और फिर शरीररूप इंजनका संचालन होता है। बुद्धि मन इन्द्रियाँ शरीर ये सबकेसब गुण हैं और इन्हें प्रकाशित करनेवाला अर्थात् इन्हें सत्तास्फूर्ति देनेवाला स्वयं इन गुणोंसे असम्बद्ध निर्लिप्त रहता है। अतः वास्तवमें सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं।श्रेष्ठ पुरुषके आचरणोंका सब लोग अनुसरण करते हैं। इसीलिये भगवान् ज्ञानी महापुरुषके द्वारा लोकसंग्रह कैसे होता है इसका वर्णन करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार वह महापुरुष सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा अनुभव करके उनमें आसक्त नहीं होता उसी प्रकार साधकको भी वैसा ही मानकर उनमें आसक्त नहीं होना चाहिये।प्रकृतिपुरुषसम्बन्धी मार्मिक बातआकर्षण सदा सजातीयतामें ही होता है जैसे कानोंका शब्दमें त्वचाका स्पर्शमें नेत्रोंका रूपमें जिह्वाका रसमें और नासिकाका गन्धमें आकर्षण होता है। इस प्रकार पाँचों इन्द्रियोंका अपनेअपने विषयोंमें ही आकर्षण होता है। एक इन्द्रियका दूसरी इन्द्रियके विषयमें कभी आकर्षण नहीं होता। तात्पर्य यह है कि एक वस्तुका दूसरी वस्तुके प्रति आकर्षण होनेमें मूल कारण उन दोनोंकी सजातीयता ही है।आकर्षण प्रवृत्ति एवं प्रवृत्तिकी सिद्धि सजातीयतामें ही होती है। विजातीय वस्तुओंमें न तो आकर्षण होता है न प्रवृत्ति होती है न प्रवृत्तिकी सिद्धि ही होती है इसलिये आकर्षण प्रवृत्ति और प्रवृत्तिकी सिद्धि सजातीयताके कारण प्रकृति में ही होती है परन्तु पुरुष(चेतन) में विजातीय प्रकृति(जड) का जो आकर्षण प्रतीत होता है उसमें भी वास्तवमें प्रकृतिका अंश ही प्रकृतिकी ओर आकर्षित होता है। करने और भोगनेकी क्रिया प्रकृतिमें ही है पुरुषमें नहीं। पुरुष तो सदा निर्विकार नित्य अचल तथा एकरस रहता है।तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि शरीरमें स्थित होनेपर भी पुरुष वस्तुतः न तो कुछ करता है और न लिप्त होता है शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते। पुरुष तो केवल प्रकृतिस्थ होने अर्थात् प्रकृतिसे तादात्म्य माननेके कारण सुखदुःखोंके भोक्तृत्वमें हेतु कहा जाता है पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते (गीता 13। 20) और पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् (गीता 13। 21)। तात्पर्य यह है कि यद्यपि सम्पूर्ण क्रियाएँ क्रियाओंकी सिद्धि और आकर्षण प्रकृतिमें ही होता है तथापि प्रकृतिसे तादात्म्यके कारण पुरुष मैं सुखी हूँ मैं दुःखी हूँ ऐसा मानकर भोक्तृत्वमें हेतु बन जाता है। कारण कि सुखीदुःखी होनेका अनुभव प्रकृति(जड) में हो ही नहीं सकताप्रकृति(जड) के बिना केवल पुरुष (चेतन) सुखदुःखका भोक्ता बन ही नहीं सकता।पुरुषमें प्रकृतिकी परिवर्तनरूप क्रिया या विकार नहीं है परन्तु उसमें सम्बन्ध मानने अथवा न माननेकी योग्यता तो है ही। वह पत्थरकी तरह जड नहीं प्रत्युत ज्ञानस्वरूप है। यदि पुरुषमें सम्बन्ध मानने अथवा न मानने की योग्यता नहीं होती तो वह प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध कैसे मानता प्रकृतिसे सम्बन्ध मानकर उसकी क्रियाको अपनेमें कैसे मानता और अपनेमें कर्तृत्वभोक्तृत्व कैसे स्वीकार करता सम्बन्धको मानना अथवा न मानना भाव है क्रिया नहीं।पुरुषमें सम्बन्ध जोड़ने अथवा न जोड़नेकी योग्यता तो है पर क्रिया करनेकी योग्यता उसमें नहीं है। क्रिया करनेकी योग्यता उसीमें होती है जिसमें परिवर्तन (विकार) होता है। पुरुषमें परिवर्तनका स्वभाव नहीं है जबकि प्रकृतिमें परिवर्तनका स्वभाव है अर्थात् प्रकृतिमें क्रियाशीलता स्वाभाविक है। इसलिये प्रकृतिसे सम्बन्ध जोड़नेपर ही पुरुष अपनेमें क्रिया मान लेता है कर्ताहमिति मन्यते (गीता 3। 27)।पुरुषमें कोई परिवर्तन नहीं होता यह (परिवर्तनका न होना) उसकी कोई अशक्तता या कमी नहीं है प्रत्युत उसकी महत्ता है। वह निरन्तर एकरस एकरूप रहनेवाला है। परिवर्तन होना उसका स्वभाव ही नहीं है जैसे बर्फमें गरम होनेका स्वभाव या योग्यता नहीं है। परिवर्तनरूप क्रिया होना प्रकृतिका स्वाभाव है पुरुषका नहीं। परन्तु प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध न माननेकी इसमें पूरी योग्यता सामर्थ्य स्वतन्त्रता है क्योंकि वास्तवमें प्रकृतिसे सम्बन्ध मूलमें नहीं है।प्रकृतिके अंश शरीरको पुरुष जब अपना स्वरूप मान लेता है तब प्रकृतिके उस अंशमें (सजातीय प्रकृतिका) आकर्षण क्रियाएँ और उनके फलकी प्राप्ति होती रहती है। इसीका संकेत यहाँ गुणाः गुणेषु वर्तन्ते पदोंसे किया गया है। गुणोंमें अपनी स्थिति मानकर पुरुष (चेतन) सुखीदुःखी होता रहता है। वास्तवमें सुखदुःखकी पृथक् सत्ता नहीं है। इसलिये भगवान् गुणोंसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद करनेके लिये विशेष जोर देते हैं।तात्त्विक दृष्टिसे देखा जाय तो सम्बन्धविच्छेद पहलेसे (सदासे) ही है। केवल भूलसे सम्बन्ध माना हुआ है। अतः माने हुए सम्बन्धको अस्वीकार करके केवल गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं इस वास्तविकताको पहचानना है।इति मत्वा न सज्जते यहाँ मत्वा पद जानने के अर्थमें आया है। तत्त्वज्ञ महापुरुष प्रकृति (जड) और पुरुष(चेतन) को स्वाभाविक ही अलगअलग जानता है। इसलिये वह प्रकृतिजन्य गुणोंमें आसक्त नहीं होता।भगवान् मत्वा पदका प्रयोग करके मानो साधकोंको यह आज्ञा देते हैं कि वे भी प्रकृतिजन्य गुणोंको अलग मानकर उनमें आसक्त न हों।विशेष बातकर्मयोगी और सांख्ययोगी दोनोंकी साधनाप्रणालीमें एकता नहीं होती। कर्मयोगी गुणों (शरीरादि) से मानी हुई एकताको मिटानेकी चेष्टा करता है इसलिये श्रीमद्भागवतमें कर्मयोगस्तु कामिनाम् (11। 20। 7) कहा गया है। भगवान्ने भी इसीलिये कर्मयोगीके लिये कर्म करनेकी आवश्यकतापर विशेष जोर दिया है जैसे कर्मोंका आरम्भ किये बिना मनुष्य निष्कर्मताको प्राप्त नहीं होता (गीता 3। 4) योगमें आरूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील पुरुषके लिये कर्म करना ही हेतु कहा जाता है (गीता 6। 3)। कर्मयोगीकर्मोंको तो करता है पर उनको अपने लिये नहीं प्रत्युत दूसरोंके हितके लिये ही करता है इसलिये वह उन कर्मोंका भोक्ता नहीं बनता। भोक्ता न बननेसे अर्थात् भोक्तृत्वका नाश होनेसे कर्तव्यका नाश स्वतः हो जाता है। तात्पर्य यह है कर्तृत्वमें जो कर्तापन है वह फलके लिये ही है। फलका उद्देश्य न रहनेपर कर्तृत्व नहीं रहता। इसलिये वास्तवमें कर्मयोगी भी कर्ता नहीं बनता। सांख्ययोगीमें विवेकविचारकी प्रधानता रहती है। वह प्रकृतिजन्य गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा जानकर अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता नहीं मानता। इसी बातको भगवान् आगे तेरहवें अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें कहेंगे कि जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मोंको सब प्रकारसे प्रकृतिके द्वारा ही किये जाते हुए देखता है और स्वयं(आत्मा) को अकर्ता देखता है वही यथार्थ देखता है। इस प्रकार सांख्ययोगी कर्तृत्वका नाश करता है। कर्तृत्वका नाश होनेपर भोक्तृत्वका नाश स्वतः हो जाता है।तीसरे अध्यायके आरम्भसे ही भगवान्ने कई उदाहरणों एवं दृष्टिकोणोंसे कर्म करनेपर ही जोर दिया है जैसे जनकादि महापुरुष भी निष्कामभावसे कर्म करके परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं (3। 20) मैं भी कर्म करता हूँ (3।22) ज्ञानी महापुरुष भी अज्ञानी पुरुषोंके समान लोकसंग्रहार्थ कर्म करता है (3। 2526)। इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक दृष्टिसे कर्म करना ही श्रेयस्कर है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.28।।तत्त्ववित्त्विति। गुणकर्मविभागवित्तु प्रकृतिः करोति मम किमायातम् इत्यात्मानं मोचयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.28।।अज्ञस्य कर्मसु शक्तिमुक्त्वा विदुषस्तदभावमभिदधाति यः पुनरिति। तत्त्वं याथार्थ्यं वेत्तीति व्युत्पत्त्या तत्त्वविदिति तुशब्देनाज्ञाद्विशिष्टे निर्दिष्टप्रश्नपूर्वकं द्वितीयपादमवतार्य व्याचष्टे कस्येत्यादिना। गुणानामेव गुणेषु वर्तमानत्वमयुक्तं निर्गुणत्वात्तेषामित्याशङ्क्य विभजते गुणा इति। कार्यकरणानामेव विषयेषु प्रवृत्तिरात्मनस्तु कूटस्थत्वान्मैवमिति ज्ञात्वा तत्त्ववित्कर्मसु दृढतरं कर्तव्याभिमानं न करोतीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.27 3.28।।प्रकृतेः क्रियमाणानि इति श्लोकद्वयस्यास्फुटत्वात्तात्पर्यमाह विद्वदिति। यथायोगं सम्बन्धः न यथाक्रमम्। कर्मभेदं कर्मवैलक्षण्यं आह प्रपञ्चयतीत्यर्थः।सक्ताः कर्मणि 3।25 इत्यादिनोक्तत्वात्। व्यवहितत्वादन्वयं दर्शयन् गुणशब्दस्यानेकार्थत्वात् विवक्षितमर्थमाह प्रकृतेरिति।आदिपदेन शरीरमनसोर्ग्रहणम्। कथमिन्द्रियादीनां द्रव्याणां प्रकृतिगुणत्वमित्यत आह प्रकृतिमिति। गुणभूतान्यप्रधानानि। प्रकारान्तरेण व्याचष्टे तदिति। प्रकृतिकार्याणि चेत्यर्थः। गुणशब्दः कार्यार्थ इत्युक्तं भवति। ननु जीवस्यापि कर्तृत्वात्अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते इति कथमुच्यते इत्यत आह न हीति। स्वातन्त्र्येणेति शेषः।।गुणानां कर्मणां चान्योन्यं यो विभागस्तस्मिन्वक्तव्ये एकवचनेनालं कथं द्विवचनं केन वाऽस्यान्वयः इति शङ्काविभागशब्दस्यार्थं वदन्परिहरति कर्मेति। जीवेश्वरप्रकृतिलक्षणसम्बन्धिभेदात् कर्मणामिन्द्रियादीनां च भेदोऽत्र विवक्षितो ग्रन्थान्तरादवगन्तव्यः। गुणा गुणेष्विति पदद्वयस्य विवक्षितमर्थमाह गुणा इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.28।।कर्मभेदस्य गुणभेदस्य च तत्त्ववित्। गुणा इन्द्रियादीनि गुणेषु विषयेषु।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.28।।गुणकर्मविभागयोः सत्त्वादिगुणविभागे तत्तत्कर्मविभागे च तत्त्ववित् गुणाः सत्त्वादयः स्वगुणेषु स्वेषु कार्येषु वर्तन्ते इति मत्वा गुणकर्मसु अहं कर्ता इति न सज्जते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.28।। तत्त्ववित् तु महाबाहो। कस्य तत्त्ववित् गुणकर्मविभागयोः गुणविभागस्य कर्मविभागस्य च तत्त्ववित् इत्यर्थः। गुणाः करणात्मकाः गुणेषु विषयात्मकेषु वर्तन्ते न आत्मा इति मत्वा न सज्जते सक्तिं न करोति।।ये पुनः
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【 Verse 3.29 】
▸ Sanskrit Sloka: प्रकृतेर्गुणसम्मूढा: सज्जन्ते गुणकर्मसु | तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ||
▸ Transliteration: prakṛterguṇasaṁmūḍhāḥ sajjante guṇa karmasu | tānakṛtsnavido mandānkṛtsnavinna vicālayet ||
▸ Glossary: prakṛteḥ: by the material nature; guṇa: attributes; saṁmūḍhāḥ: fooled; sajjante: become engaged; guṇa: attributes; karmasu: actions; tān: those; akṛtsnavidaḥ: persons with less wisdom; mandān: lazy; kṛtsnavit: who has wisdom; na: not; vicālayet: unsettle
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.29 Fooled by the attributes of nature, those people with less wisdom or who are lazy become engaged in actions driven by these attributes. But, the wise should not unsettle them.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.29।।प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.29।। प्रकृति के गुणों से मोहित हुए पुरुष गुण और कर्म में आसक्त होते हैं उन अपूर्ण ज्ञान वाले (अकृत्स्नविद) मंदबुद्धि पुरुषों को पूर्ण ज्ञान प्राप्त पुरुष विचलित न करे।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.29 प्रकृतेः of nature? गुणसंमूढाः persons deluded by the Gunas? सज्जन्ते are attached? गुणकर्मसु in the functions of the alities? तान् those? अकृत्स्नविदः of imperfect knowledge? मन्दान् the foolish (thedullwitted)? कृत्स्नवित् man of perfect knowledge? न not? विचालयेत् should unsettle.Commentary The ignorant people do action with the expectation of fruits. The wise people who have the knowledge of the Self should not distract the faith or conviction or belief of such ignorant persons. If they unsettle their minds they will give up actions and become victims of inertia. They will lead an idle life. They should be encouraged by the wise to do actions of the Sakama type (actions for the sake of their fruits) in the beginning. The wise ones should turn the minds of the ignorant by giving them gradual instructions on Karma Yoga (Yoga of selfless? desireless action) and its benefits? viz.? purification of the heart that leads to the attainment of Selfrealisation.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.29. Men, completely deluded by the Strands of the Prakrti, are attached to the actions of the Strands. Man, who know fully, should not confuse them, the dullard, who do not know fully.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.29 Those who do not understand the Qualities are interested in the act. Still, the wise man who knows the truth should not disturb the mind of him who does not.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.29 Those who are deluded by the Gunas of Prakrti are attached to the works of the Gunas. But he who knows the whole truth should not unsettle the ignorant who do not know the whole truth.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.29 Those who are wholly deluded by the gunas of Nature become attached to the activities of the gunas. The knower of the All should not disturb those of dull intellect, who do not know the All.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.29 Those deluded by the alities of Nature are attached to the functions of the alities. The man of perfect knowledge should not unsettle the foolish one who is of imperfect knowledge.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.29 Prakrteh etc. The deluded persons, under the influence of the Strands, Sattva etc., are attached to the actions performed by the Sattva etc., which are the Strands belonging to the Prakrti. In the same context (III, 26) it has been said : 'Therefore being a master of Yoga, let [the wise] fulfil actions'. How to do that ? [The Lord] clarifies :
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.29 Those who 'do not know the whole truth' are those persons who are trying for the vision of the self but are deluded about the nature of the self, not knowing, on account of their involvement in Prakrti, that actions proceed from the Gunas of Prakrti. They are therefore attached to the actions of the Gunas - i.e., only to actions forming part of Karma Yoga. They are alified only for Karma Yoga. One who knows the complete truth should not, by himself remaining a practitioner of Jnana Yoga, unsettle those persons who are ignorant and who do not know the complete truth. Those, the ignorant, who tend to follow the behaviour of a great man, when they see him transcend Karma Yoga, will have their minds shaken from Karma Yoga. Thus, the great man, should himself remain established in Karma Yoga, while having the full knowledge of the true nature of the self and contemplating on the self as not being the agent. Thus he should demonstrate that Karma Yoga by itself is an autonomous means for the vision of the self. He should create in those who do not know the complete truth the love of Karma Yoga.
The superiority of this Karma Yoga over Jnana Yoga even for those who are alified for Jnana Yoga has already been stated. Therefore one who is a respected person of note should follow this Karma Yoga alone for the good of the world. The method of performing actions after attributing agency to the Gunas by discerning the nature of the self as different from Prakrti, has been taught. The agency of the self is not produced by the inherent nature of the self, but by its contact with the Gunas. Hence by discriminating between what is obtained by contact and not obtained when there is no contact, it has to be understood that this agency is due to the Gunas or Prakrti.
Now it is said that the agency of works, first attributed to Gunas, ultimately go to the Supreme Person who is the Self of all. It is done by discerning that the nature of the individual self is one of subservience to the Supreme Person, as they constitute His body:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.29 Those again, guna-sammudhah, who are wholly deluded by the gunas; prakrteh, of Nature; sajjante, become attached; guna karmasu, to the activities of the gunas, thining, 'We do actions for results.' Krtsna-vit, the knower of the All, one who is himself a knower of the Self; na vicalayet, should not disturb; tan, those who are attached to actions; (who are) mandan, of dull intellect; akrtsnavidah, who do not know the All, who are all attention on the results of actions. Unsetting of beliefs is itself the disturbance. That he should not do. This is the idea. Again, in what manner should duties be under-taken by a seeker after Liberation who is not enlightened, who is alified for actions (rites and duties)? As to this, the answer is being stated:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.29।। यद्यपि अनेक लोग सामान्य रूप से यह जानते हैं कि मन में स्थित वासनायें ही स्वयं को पूर्ण करने के लिये जगत् में कर्म बनकर व्यक्त होती हैं परन्तु केवल ज्ञानी पुरुष ही इस सत्य से पूर्णतया परिचित सब कर्मों में शांत और अनासक्त रहता है। बहुसंख्यक लोग तो पूर्णरूप से मोहित हुये अपनी ही वासनाओं के शिकार बने रहते हैं। वासनाओं से तरंगायित कर्मरूप जीवन के प्रवाह में बाधा उत्पन्न करने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये। 26वें श्लोक में विद्वान् पुरुष को दी गयी सम्मति को ही यहाँ दूसरे शब्दों में उस पर बल देने के लिये दोहराया गया है।मन्दबुद्धि अज्ञानी एवं आसक्त पुरुषों को कर्म से विचलित न करके ज्ञानी को चाहिए कि उन्हें शनै शनै सही मार्ग पर लाने का प्रयत्न करे। इस प्रकार ज्ञानी पुरुष द्वारा सुनिर्दिष्ट प्रवाह संस्कृति के उद्यान को सींचता हुआ वैयत्तिक और सामाजिक उन्नति के स्वप्न को साकार कर सकेगा।कर्म में ही अधिकृत अज्ञानी पुरुष को अपने बन्धनों से मुक्त होने के लिये किस प्रकार कर्म करना चाहिए उत्तर है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.29।।विद्वत्स्वरुपमविद्वत्स्वरुपं च प्रकृतमुपपाद्य विद्वानविदुषो बुद्धिभेदनं न कुर्यादित्युपसंहरति
Chapter 3 (Part 18)
प्रकृतेरिति। प्रकृतेः प्रधानस्य मायाशक्तेर्गुणैर्विकारैः कार्यकरणरुपैः सम्यग्मूढाः स्वस्वरुपास्फुरणेन तानेवात्मतया मन्यमानास्तेषामेव गुणानां कर्मसु व्यापारेषु सज्जन्ते। वयं कुर्मः फलायेति दृढतस्वकीयबुद्धिं कुर्वन्ति ये तान्कर्मसङ्गिनोऽतएवाकृत्स्त्रविद आत्मज्ञानशून्यान् यतो मन्दप्रज्ञान् कृत्स्त्रविदात्मवित्आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् इतिश्रुत्यात्मविदः कृतस्त्रवित्त्वप्रतिपादनात् स्वयं न विचालयेत्। बुद्धिभेदं न कुर्यादित्यर्थः। प्रकृतेर्गुणैः सत्त्वादिभिरिति व्याख्यानं तु भाष्यविरुद्धम्। प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैरित्यत्रेन्द्रियैरिति स्वोत्त्यननुरुपं च। एतेन गुणेष्विन्द्रियेषु तत्कर्मसु च प्रकृतेः संबन्धिषु गुणेषु देहादिषु कर्मसु गमनादिषु चेति व्याख्यानद्वयमपि प्रत्युक्तम्। देहेन्द्रियाद्यासक्तेर्गुणसंमूढा इत्यनेनैवोक्तत्वात्। प्रकृतेरित्यस्य गुणकर्मस्वित्यनेन संबन्धस्य प्रयोजनशून्यत्वाच्च।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.29।।तदेवं विद्वदविदुषोः कर्मानुष्ठानसाम्येन विद्वानविदुषो बुद्धिभेदं न कुर्यादित्युक्तमुपसंहरति प्रकृतेः पूर्वोक्ताया मायाया गुणैः कार्यतया धर्मैर्देहादिभिर्विकारैः सम्यङ्मूढाः स्वरूपास्फुरणेन तानेवात्मत्वेन मन्यमानास्तेषामेव गुणानां देहेन्द्रियान्तःकरणानां कर्मसु व्यापारेषु सज्जन्ते सक्तिं वयं कर्म कुर्मस्तत्फलायेति दृढतरामात्मीयबुद्धिं कुर्वन्ति ये तान् कर्मसङ्गिनोरकृत्स्नविदोऽनात्माभिमानिनो मन्दानशुद्धचित्तत्वेन ज्ञानाधिकारमप्राप्तान् कृत्स्नवित् परिपूर्णात्मवित् स्वयं न विचालयेत्। कर्मश्रद्धातो न प्रच्यावयोदित्यर्थः। ये त्वमन्दाः शुद्धान्तःकरणास्ते स्वयमेव विवेकोदयेन विचलन्ति ज्ञानाधिकारं प्राप्ता इत्यभिप्रायः। कृत्स्नाकृत्स्नशब्दावात्मानात्मपरतया श्रुत्यर्थानुसारेण वार्तिककृद्भिर्व्याख्यातौ।सदेवेत्यादिवाक्येभ्यः कृत्स्नं वस्तु यतोऽद्वयम्। संभवस्तद्विरुद्धस्य कुतोऽकृतस्नस्य वस्तुतः। यस्मिन्दृष्टेऽप्यदृष्टोऽर्थः स तदन्यत्र शिष्यते। तथादृष्टेऽपि दृष्टः स्यादकृत्स्नस्तादृगुच्यते।। इति। अनात्मनः सावयवत्वादनेकधर्मवत्त्वाच्च केनचिद्धर्मेण केनचिदवयवेन वा विशिष्टे तस्मिन्नेकस्मिन्घटादौ ज्ञातेऽपि धर्मान्तरेणावयवान्तरेण वा विशिष्टः स एवाज्ञातोऽवशिष्यते तदन्यश्च पटादिरज्ञातोऽवशिष्यतएव तथा तस्मिन्घटादावज्ञातेऽपि पटादिर्ज्ञातः स्यादिति तज्ज्ञानेऽपि तस्यान्यस्य चाज्ञानात्तदज्ञानेऽप्यन्यज्ञानाच्च सोऽकृत्स्न उच्यते कृत्स्नस्त्वद्वय आत्मैव तज्ज्ञाने कस्यचिदवशेषस्याभावादिति श्लोकद्वयार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.29।।एवं सक्तासक्तयोः कर्माणि विभज्य सक्तकर्मानुवादपूर्वकं न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानामित्युपक्रान्तमुपसंहरति प्रकृतेरिति। गुणैरहंकारादिभिः स्वस्मिन्नध्यस्तैः संमूढाः एकीभावेनाभेदाध्यासेन मूढास्तु प्रकृतेः प्रकृतिसंबन्धिषु गुणेषु देहादिषु कर्मसु गमनादिषु च सज्जन्ते अहमयं ब्राह्मणो ममैवेदं यज्ञादिकं कर्मेति सज्जन्ते सक्ता भवन्ति तान् मूढत्वात् अकृत्स्नविदः आत्मज्ञानहीनान्आत्मविद्धि कृत्स्नवित्।आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् इति श्रुतेः। मन्दाञ्शास्त्रार्थग्रहणासमर्थान्। कृत्स्नविदात्मविन्न विचालयेत्कर्मनिष्ठातो न प्रच्यावयेत्। तेषामुभयभ्रष्टत्वापत्तेः प्रकृतेर्गुणैः संमूढाः गुणानां कर्मसु सज्जन्त इति प्राचां योजना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.29।।ननु ते अज्ञात्वा तथा कुर्वन्तीति तान् शिक्षयेत् न तु पुनस्तथैव प्रेरयेदित्यत आह प्रकृतेरिति। प्रकृतेर्गुणैः सम्मूढाः कर्मफलाभिलाषिणो गुणकर्मसु देहधर्मेषु फलार्थं सज्जन्ते आसक्ता भवन्ति। यतोऽकृत्स्नविदः भगवत्प्राप्तिरूपं अशेषफलरूपं न जानन्ति। कर्मफलं लौकिकसुखं फलरूपं जानन्तीत्यर्थः। यतस्ते तत्रासक्तास्तेन ततो न मनो भगवति संविशेदतस्तान् मन्दान् मूर्खान् भूयः फलासक्तचित्तान् कृत्स्नवित् भगवत्प्राप्तिरूपाशेषानन्दवित् न विचालयेत् भगवन्मार्गे न प्रेरयेत्। ततोऽपि वा न चालयेत्। दुष्टसङ्गात् स्वस्यान्यथाभावं नयेदिति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.29।।न बुद्धिभेदं जनयेदित्युक्तमुपसंहरति प्रकृतेरिति। यैः प्रकृतेर्गुणैः सत्त्वादिभिः संमूढाः सन्तो गुणेष्विन्द्रियेषु तत्कर्मसु च सज्जन्ते वयं कुर्म इति तानकृत्स्नविदो मन्दमतीन्कृत्स्नवित्सर्वज्ञो न विचालयेत्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.29।।न बुद्धिभेदं जनयेत् 3।26 इति दृढयति प्रकृतेरिति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.29।।परंतु जो प्रकृतिके गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए पुरुष हम अमुक फलके लिये यह कर्म करते हैं इस प्रकार गुणोंके कर्मोंमें आसक्त होते हैं। उन पूर्णरूपसे न समझनेवाले कर्मफलमात्रको ही देखनेवाले और कर्मोंमें आसक्त मन्दबुद्धि पुरुषोंको अच्छी प्रकार समस्त तत्त्वको समझनेवाला आत्मज्ञानी पुरुष स्वयं चलायमान न करे। अभिप्राय यह कि बुद्धिभेद करना ही उनको चलायमान करना है सो न करे।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.29।। व्याख्या प्रकृतेर्गुणसंमूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु सत्त्व रज और तम ये तीनों प्रकृतिजन्य गुण मनुष्यको बाँधनेवाले हैं। सत्त्वगुण सुख और ज्ञानकी आसक्तिसे रजोगुण कर्मकी आसक्तिसे और तमोगुण प्रमाद आलस्य तथा निद्रासे मनुष्यको बाँधता है (गीता 14। 6 8)। उपर्युक्त पदोंमें उन अज्ञानियोंका वर्णन है जो प्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित अर्थात् बँधे हुए हैं परन्तु जिनका शास्त्रोंमें शास्त्रविहित शुभकर्मोंमें तथा उन कर्मोंके फलोंमें श्रद्धाविश्वास है। इसी अध्यायके पचीसवेंछब्बीसवें श्लोकोंमें ऐसे अज्ञानी पुरुषोंका सक्ताः अविद्वांसः और कर्मसङ्गिनाम् अज्ञानाम् नामसे वर्णन हुआ है। लौकिक और पारलौकिक भोगोंकी कामनाके कारण ये पुरुष पदार्थों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। इस कराण इनसे ऊँचे उठनेकी बात समझ नहीं सकते। इसीलिये भगवान्ने इन्हें अज्ञानी कहा है।तानकृत्स्नविदो मन्दान् अज्ञानी मनुष्य शुभकर्म तो करते हैं पर करते हैं नित्यनिरन्तर न रहनेवाले नाशवान् पदार्थोंकी प्राप्तिके लिये। धनादि प्राप्त पदार्थोंमें वे ममता रखते हैं और अप्राप्त पदार्थोंकी कामना करते हैं। इस प्रकार ममता और कामनासे बँधे रहनेके कारण वे गुणों (पदार्थों) और कर्मोंके तत्त्वको पूर्णरूपसे नहीं जान सकते।अज्ञानी मनुष्य शास्त्रविहित कर्म और उनकी विधिको तो ठीक तरहसे जानते हैं पर गुणों और कर्मोंके तत्त्वको ठीक तरहसे न जाननेके कारण उन्हें अकृत्सनविदः (पूर्णतया न जाननेवाले) कहा गया है और सांसारिक भोग तथा संग्रहमें रुचि होनेके कारण उन्हें मन्दान् (मन्दबुद्धि) कहा गया है।कृत्स्नविन्न विचालयेत् गुण और कर्मविभागको पूर्णतया जाननेवाले तथा कामनाममतासे रहित ज्ञानी पुरुषको चाहिये कि वह पूर्ववर्णित (सकाम भावपूर्वक शुभकर्मोंमें लगे हुए) अज्ञानी पुरुषोंको शुभकर्मोंसेविचलित न करें जिससे वे मन्दबुद्धि पुरुष अपनी वर्तमान स्थितिसे नीचे न गिर जायँ। इसी अध्यायके पचीसवेंछब्बीसवें श्लोकोंमें ऐसे ज्ञानी पुरुषोंका असक्तः विद्वान् और युक्तः विद्वान् नामसे वर्णन हुआ है।भगवान्ने तत्त्वज्ञ महापुरुषको पचीसवें श्लोकमें कुर्यात् पदसे स्वयं कर्म करनेकी तथा छब्बीसवें श्लोकमें जोषयेत् पदसे अज्ञानी पुरुषोंसे भी वैसे ही कर्म करवानेकी आज्ञा दी थी। परन्तु यहाँ भगवान्ने न विचालयेत् पदोंसे वैसी आज्ञा न देकर मानो उसमें कुछ ढील दी है कि ज्ञानी पुरुष अधिक नहीं तो कमसेकम अपने संकेत वचन और क्रियासे अज्ञानी पुरुषोंको विचलित न करे। कारण कि जीवन्मुक्त महापुरुषपर भगवान् और शास्त्र अपना शासन नहीं रखते। उनके कहलानेवाले शरीरसे स्वतःस्वाभाविक लोकसंग्रहार्थ क्रियाएँ हुआ करती हैं (टिप्पणी प0 166)। तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मयोगी हो अथवा ज्ञानयोगी सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी उसका कर्मों और पदार्थोंके साथ किसी प्रकारका सम्बन्ध स्वतः नहीं रहता जो वस्तुतः था नहीं।अज्ञानी मनुष्य स्वर्गप्राप्तिके लिये शुभकर्म किया करते हैं। इसलिये भगवान्ने ऐसे मनुष्योंको विचलित न करनेकी आज्ञा दी है अर्थात् वे महापुरुष अपने संकेत वचन और क्रियासे ऐसी कोई बात प्रकट न करें जिससे उन सकाम पुरुषोंकी शास्त्रविहित शुभकर्मोंमें अश्रद्धा अविश्वास या अरुचि पैदा हो जाय और वे उन कर्मोंका त्याग कर दें क्योंकि ऐसा करनेसे उनका पतन हो सकता है। इसलिये ऐसे पुरुषोंको सकामभावसे विचलित करना है शास्त्रीय कर्मोंसे नहीं। जन्ममरणरूप बन्धनसे छुटकारा दिलानेके लिये उन्हें सकामभावसे विचलित करना उचित भी है और आवश्यक भी। सम्बन्ध जिससे मनुष्य कर्मोंमें फँस जाता है उस कर्म और कर्मफलकी आसक्तिसे छूटनेके लिये क्या करना चाहिये इसको भगवान् आगेके श्लोकमें बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.29।।कर्मसंगिनामित्युक्तम्। तत् ( N omit तत्) कर्मसंगित्वं (S omits कर्मसंगित्वम्) दर्शयति प्रकृतेरिति। प्रकृतिसंबन्धिभिर्गुणैः सत्त्वाद्यैः (S omit सत्त्वाद्यैः) कृतेषु कर्मसु मूढाः सज्जन्ति( मज्जन्ति) सत्त्वादिगुणमाहात्म्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.29।।विद्वानविद्वानित्युभावपि प्रकृत्य विद्वानविदुषो बुद्धिभेदं न कुर्यादित्युपसंहरति ये पुनरिति। प्रकृतेरुक्तगुणैर्देहादिभिर्विकारैः संमूढास्तानेवात्मत्वेन मन्यमाना ये ते गुणानां तेषामेव देहादीनां कर्मसु व्यापारेषु सज्जन्ते सक्तिं दृढतरामात्मीयबुद्धिं कुर्वन्तीत्याह प्रकृतेरित्यादिना। तेषामनात्मविदां स्वयमात्मविद् बुद्धिभेदं नापादयेदित्याह तानित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.29।।प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः इत्यत्र गुणशब्दस्य विवक्षितमर्थं वदन् विग्रहं दर्शयति प्रकृतेरिति। नित्यसापेक्षत्वाद्गुणशब्दस्य नासामर्थ्यमिति प्रदर्शनायप्रकृतेः इत्यनुवादः। देवदत्तस्य गुरुकुलमिति यथा। प्रकृतेर्गुणसम्मूढत्वात् सज्जन्ते गुणकर्मस्विति हेतुहेतुमद्भावोऽत्र विवक्षितः अन्यथा वैयर्थ्यापत्तेः तमुपपादयति इन्द्रियादीति। अभिमानो ममैवैतानि स्वातन्त्र्येण करणानीति भ्रमः। विषयादीत्युक्त्या गुणशब्दोऽत्र विषयार्थ इति दर्शयति। आदिशब्देन कर्मग्रहणम्। विषयेषु सङ्गः स्नेहादिः कर्मसु स्वातन्त्र्यभ्रमः।गुणानां कर्मसु इति केनचित् (शं.) व्याख्यातं तदसदिति भावेन द्वन्द्वोऽयमिति दर्शयति गुणेति द्वन्द्वपरिग्रहेऽधिकार्थलाभात्। अनेन विषयादीत्येतदपि समर्थितं भवति। गुणशब्दस्योक्तानेकार्थत्वं कुतः इत्यत आह शब्दाद्या इति। निरुच्यत इति निरुक्तिः शब्दार्थः निरुक्तिं गच्छन्त्यवगच्छन्तीति निरुक्तिगाः। अस्तु गुणशब्दस्यानेकेष्वर्थेषु शक्तिः तथापि विवक्षाऽत्रैकस्यैवार्थस्य युक्ता अन्यथा न ह्येकशब्देनेत्युक्तविरोधात्। शब्दो हि यमर्थमादौ स्मारितवान् स एवार्थो बुद्धौ सन्निहितः पुनरुच्चारितेन स्मारयितुं युक्तः तथा चात्र सर्वत्र सत्त्वादय एव ग्राह्याः। तद्ग्रहणे शब्दादीनामपि तदात्मकानां ग्रहणसम्भवादित्यत आह सत्त्वादीति। कर्तृत्वाधारत्वयोरेकत्र विरोधादिति भावः। तदात्मकानामिन्द्रियादीनामुपलक्षणे सति वृथा प्रयासः। अनयैवानुपपत्त्याऽनेकार्थग्रहणोपपत्तेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.29।।प्रकृतेर्गुणेषु इन्द्रियादिषु सम्मूढाः। इन्द्रियाद्यभिमानाद्धि विषयादिषु सङ्गः। गुणकर्मसु विषयेषु कर्मसु चशब्दाद्या इन्द्रियाद्याश्च सत्त्वाद्याश्च शुभानि च। अप्रधानानि च गुणा निगद्यन्ते निरुक्तिगैः इत्यभिधानात्। सत्त्वाद्यङ्गीकारेगुणा गुणेषु 3।28 इत्ययुक्तं स्यात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.29।।अकृत्स्नविदः तु आत्मदर्शनाय प्रवृत्ताः प्रकृतिसंसृष्टतया प्रकृतेः गुणैः यथावस्थितात्मनि संमूढाः गुणकर्मसु क्रियासु एव सज्जन्ते न तद्विविक्तात्मस्वरूपे अतः ते ज्ञानयोगाय न प्रभवन्ति इति कर्मयोगे एव तेषाम् अधिकारः। एवंभूतान् तान् मन्दान् अकृत्स्नविदः कृत्स्नवित् स्वयं ज्ञानयोगावस्थानेन न विचालयेत्। ते किल मन्दाः श्रेष्ठजनाचारानुवर्तिनः कर्मयोगाद् उत्थितम् एनं दृष्ट्वा कर्मयोगात् प्रचलितमनसो भवेयुः। अतः श्रेष्ठः स्वयम् अपि कर्मयोगे तिष्ठन् आत्मयाथात्म्यज्ञानेन आत्मनः अकर्तृत्वम् अनसन्दधानःकर्मयोग एव आत्मावलोकने निरपेक्षसाधनम् इति दर्शयित्वा तान् अकृत्स्नविदो मन्दान् जोषयेद् इत्यर्थः।ज्ञानयोगाधिकारिणः अपि ज्ञानयोगाद् अस्य एव कर्मयोगस्य ज्यायस्त्वं पूर्वम् एव उक्तम्। अतो व्यपदेश्यो लोकसंग्रहाय कर्म एव कुर्यात्। प्रकृतिविविक्तात्मस्वभावनिरूपणेन गुणेषु कर्तृत्वम् आरोप्य कर्मानुष्ठानप्रकार उक्तः। गुणेषु कर्तृत्वानुसन्धानं च इदम् एवआत्मनो न स्वरूपप्रयुक्तम् इदम् कर्तृत्वम् अपि तु गुणसम्बन्धकृतम् इति प्राप्ताप्राप्तविवेकेन गुणकृतम् इति अनुसन्धानम्।इदानीम् आत्मनां परमपुरुषशरीरतया तन्नियाम्यत्वस्वरूपनिरूपणेन भगवति पुरुषोत्तमे सर्वात्मभूते गुणकृतं च कर्तृत्वम् आरोप्य कर्मकर्तव्यतया उच्यते
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.29।। प्रकृतेः गुणैः सम्यक् मूढाः संमोहिताः सन्तः सज्जन्ते गुणानां कर्मसु गुणकर्मसु वयं कर्म कुर्मः फलाय इति। तान् कर्मसङ्गिनः अकृत्स्नविदः कर्मफलमात्रदर्शिनः मन्दान् मन्दप्रज्ञान् कृत्स्नवित् आत्मवित् स्वयं न विचालयेत् बुद्धिभेदकरणमेव चालनं तत् न कुर्यात् इत्यर्थः।।कथं पुनः कर्मण्यधिकृतेन अज्ञेन मुमुक्षुणा कर्म कर्तव्यमिति उच्यते
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【 Verse 3.30 】
▸ Sanskrit Sloka: मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा | निराशीर्निनर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वर: ||
▸ Transliteration: mayi sarvāṇi karmāṇi sannyasyādhyātmacetasā | nirāśīrnirmamo bhūtvā yudhyasva vigatajvaraḥ ||
▸ Glossary: mayi: to Me; sarvāṇi: all kinds of; karmāṇi: work; saṁnyasya: renouncing; adhyātma: spiritual knowledge; cetasā: consciousness; nirāśīḥ: without desire for gain; nir mamaḥ: without sense of ownership; bhūtvā: being; yudhyasva: fight; vigatajvaraḥ: without being lazy
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.30 Dedicating all actions to Me, with consciousness filled with spiritual knowledge of Self, without desire for gain and without sense of ownership, without being lazy, fight.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.30।।तू विवेकवती बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण करके कामना ममता और संतापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मको कर।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.30।। सम्पूर्ण कर्मों का मुझ में संन्यास करके आशा और ममता से रहित होकर संतापरहित हुए तुम युद्ध करो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.30 मयि in Me? सर्वाणि all? कर्माणि actions? संन्यस्य renouncing? अध्यात्मचेतसा with the mind centred in the Self? निराशीः free from hope? निर्ममः free from egoism? भूत्वा having become युध्यस्व fight (thou)? विगतज्वरः free from (mental) fever.Commentary Surrender all the actions to Me with the thought? I perform all actions for the sake of the Lord.Fever means grief? sorrow. (Cf.V.10XVIII.66).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.30. Renouncing all actions in Me, with mind that concentrates on the Self; being free from the act of reesting and from the sense of possession; and [conseently being free from [mental] fever; you should fight.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.30 Therefore, surrendering thy actions unto Me, thy thoughts concentrated on the Absolute, free from selfishness and without anticipation of reward, with mind devoid of excitement, begin thou to fight.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.30 Surrendering all your actions to Me with a mind focussed on the self, free from desire and selfishness, fight with the heat of excitement abated.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.30 Devoid of the fever of the soul, engage in battle by dedicating all actions to Me, with (your) mind intent on the Self, and becoming free from expectations and egoism.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.30 Renouncing all actions in Me, with the mind centred in the Self, free from hope and egoism, and from (mental) fever, do thou fight.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.30 Mayi etc. You should perform the worldly act of fighting a war, being desirous of doing favour for the world; renouncing all actions in Me with the thought 'I am not the doer [of any act]'; and being convinced 'None but the Sovereign Supreme Lord is the doer of all acts, and I am nobody'.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.30 Do all prescribed acts such as war etc., (here a duty) free from desire or selfishness and devoid of fear, with a mind focussed on the self. Surrender all acts to Me, the Lord of all, who constitutes the inner pervading Self of all beings. 'Adhyatma-cetas' is that mind which is focussed on the self by knowledge of the essential nature of the self as declared in hundreds of Vedic texts. That this individual self constitutes the body of the Supreme Self and is actuated by Him, is taught by Sruti texts like: 'He who has entered within, is the ruler of all beings and is the Self of all' (Tai. Ar., 3.11), 'Him who has entered inside and is the doer' (Ibid., 3.23), 'He who, dwelling in the self, is within the self, whom the Self does not know, whose body is the self, who controls the self from within - He is your internal ruler and Immortal Self' (Br. U., 3.7.22). Smrti texts also speak in the same manner: 'Him who is the ruler of all' (Manu, 12.122). Sri Krsna will say later on: 'And I am seated in the hearts of all; from Me are memory, knowledge and the faculty of reason' (15.15); 'The Lord, O Arjuna, lives in the heart of everything causing them to spin round and round by His power, as if set on a wheel' (18.61). Hence, dedicate to Me, the Supreme Person, all actions considering them as done by Me, by contemplating on the self as actuated by Me by reason of Its constituting My body. And do every thing, considering the actions as My worship only; becoming free from desire for fruits and therefore free from selfishness as regards actions, engage in acts like war etc., devoid of 'fever', i.e., the excitement caused by passions like anger.
Contemplate that the Supreme Person, Lord of all, Principal of all, gets done His own works only for the purpose of getting Himself worshipped with His own instruments, namely, the individual selves which belong to Him and are His agents. Become free from selfish attachment to action. Also be free from the feverish concern originating from such thoughts as 'What will become of me with an ancient, endless accumulation of evil arising from beginningless time?' Perform Karma Yoga with ease, for the Supreme Person Himself, worshipped by acts, will free you from bondage. His Lordship and Principalship over all are settled by Sruti texts like: 'Him who is the supreme and great Lord of lords, Him the Supreme Divinity of divinities' (Sve. U., 6.7), 'The Lord of the Universe' (Tai. Na., 11.3), 'The Supreme Ruler of rulers' (Sve. U., 6.6-7). Isvaratva is the same as Sesitva, which means controllership.
Sri Krsna declares that this alone is the essential meaning of the Upanisads:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.30 Vigata-jvarah, devoid of the fever of the soul, i.e. being free from repentance, without remorse; yuddhyasva, engage in battle; sannyasya, by dedicating; sarvani, all; karmani, actions; mayi, to Me, who am Vasudeva, the omniscient supreme Lord, the Self of all; adhyatma-cetasa, with (your) mind intent on the Self-with discriminating wisdom, with this idea, 'I am an agent, and I work for God as a servant'; and further, bhutva, becoming; nirasih, free from expectations ['Free from expectations of results for yourself']; and nirmamah, free from egoism. You from whom has vanished the idea, '(this is) mine', are nirmamah.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.30।। भगवान् का यह स्पष्ट मत था कि अर्जुन को युद्ध करना चाहिये। पाण्डव राजकुमार अर्जुन अभी उच्चस्तरीय ध्यान साधना के योग्य नहीं था। कर्म में वासना उत्पन्न करने की प्रवृत्ति होती है और फिर उस वासना से कर्म में वृद्धि होती है। श्रीकृष्ण के कर्मयोग के उपदेशानुसार कर्माचरण करने पर पुरानी वासनाओं का क्षय तो होता ही है परन्तु अन्य नयी वासनायें भी उत्पन्न नहीं होतीं। अहंकार और स्वार्थ से रहित कर्म के आचरण के उस सिद्धान्त को ही यहां दूसरे शब्दों में बताया गया है।समस्त कर्मों का संन्यास मुझमें करके जैसा कि हम देख चुके हैं यहाँ भी मुझ में शब्द से तात्पर्य शुद्ध परमात्मस्वरूप से है। श्रीकृष्ण का उपदेश है कि अर्जुन को भक्तिपूर्वक परमात्मा का स्मरण करते हुये (अध्यात्मचेतसा) समस्त कर्मों का संन्यास (अर्पण) परमात्मा में करना चाहिये। कर्मों के संन्यास का अर्थ अकर्मण्यता का जीवन नहीं समझना चाहिये। कर्मों से अहंकार और स्वार्थ का त्याग ही वास्तविक कर्मसंन्यास कहलाता है।सर्प की भयंकरता उसके विष में है। यदि उसके विषदन्त निकाल दिये जाँय तो वह भयानक सर्प किसी को हानि नहीं पहुँचा सकता। इसी प्रकार अहंकार और स्वार्थ के कारण ही कर्म बन्धन कारक होते हैं अन्यथा नहीं। यहाँ कर्मों के संन्यास से तात्पर्य उनके उत्प्रेरक दुष्प्रयोजनों के त्याग से है।आत्मस्वरूप ईश्वर के निरन्तर कीर्तिगान से उद्देश्यों की शुद्धता प्राप्त की जा सकती है। कीर्तिगान से हृदय दैवी भावनाओं से स्पन्दित हो उठता है। ऐसे व्यक्ति के कर्म सामान्य नहीं समझने चाहिये वरन् ईश्वर के संकल्प ही उस व्यक्ति के माध्यम से जगत् में व्यक्त होते हैं। परिच्छिन्न जीवभाव के स्थान पर पूर्णत्व का भाव दृढ़ होने पर वह व्यक्ति ईश्वरेच्छा को व्यक्त करने का सर्वोत्कृष्ट माध्यम बन जाता है।केवल निषिद्ध कर्मों का त्याग ही पर्याप्त नहीं है। हमको उन आन्तरिक सद्गुणों का भी विकास करना चाहिये जिससे ईश्वर के संकल्पों का प्रवाह निर्वाध रूप से हमारे द्वारा प्रवाहित हो सके। इस का संकेत यहाँ निराशी और निर्मम इन शब्दों से किया गया है।इस श्लोक के सतही अध्ययन से भ्रमित होकर कोई इस निष्कर्ष पर पहुँच सकता है कि हिन्दू धर्म गतिशील जीवन का त्याग कर निराशा का जीवन जीने की शिक्षा देता है। परन्तु सूक्ष्म अध्ययन करने पर स्पष्ट होगा कि इस श्लोक में श्रीकृष्ण जीवन के उच्चतर मनोवैज्ञानिक सत्य की ओर इंगित कर रहे हैं।निराशी आशा उस वस्तु या घटना की अपेक्षा है जो भविष्य काल में व्यक्त या प्राप्त होगी। आशा सदैव भविष्य के लिए होती है वर्तमान में नहीं।निर्मम अहंकार मूलक ममभाव और कुछ नहीं उन घटनाओं एवं उपलब्धियों की एक गठरी है जो भूतकाल में घटित हुई थीं। अत अहंकार भूतकाल की प्रतिच्छाया मात्र है और उसका अस्तित्त्व व्यतीत हुए काल के सन्दर्भ में ही है।आशा यदि अनुत्पन्न भविष्य का शिशु है तो अहंकार भूतकाल की हठीली स्मृति। आशा और अहंभाव में रहने का अर्थ है भविष्य और भूतकाल में ही जीना। दुख की बात यह है कि इन सबमें हम शक्तिशाली वर्तमान को खो देते हैं जबकि वर्तमान ही वह अवसर है जो कर्म करने आगे बढ़ने और लक्ष्य प्राप्त करने के लिये हमें प्राप्त हुआ है। श्रीकृष्ण अर्जुन को आशा और ममभाव से रहित होकर कर्म करने का उपदेश देते हैं। भूत और भविष्य के विचारों में शक्ति का अपव्यय किये बिना वर्तमान का सदुपयोग करने के सम्बन्ध में महत्त्वपूर्ण सूचना इस श्लोक में दी गयी है।विचाराधीन यह श्लोक सभी दृष्टियों से अपने आप में पूर्ण है जिसे पढ़कर आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी आश्चर्य चकित रह जायेगा। यद्यपि अब तक के विवेचन को समझने से भूत और भविष्य के विचारों में होने वाले शक्ति के अपव्यय को हम रोक सकते हैं परन्तु वर्तमान में कार्य करते हुये अपनी क्षमता के क्षरण की संभावना रह सकती है। इसका कारण अनावश्यक रूप से व्याकुल और उत्तेजित होने का हमारा स्वभाव है। इस उत्तेजना को यहाँ ज्वर कहा गया है। भगवान् श्रीकृष्ण उपदेश देते हैं कि समस्त कर्मों का संन्यास परमात्मा में करके आशा और ममता से रहित होकर तथा मानसिक उत्तेजना का त्याग कर अर्जुन को युद्ध करना चाहिये। गीता के इस्ा सिद्धांत की परिपूर्णता इसके समस्त अध्येताओं को स्पष्ट जाती है।यहाँ युद्ध करने से तात्पर्य जीवन संघर्षों में आने वाली समस्त परिस्थितियों का सामना करने से है। अत यह उपदेश केवल अर्जुन के लिये ही नहीं बल्कि उन सभी के लिये हैं जो बुद्धिमत्तापूर्वक पूर्ण रूप से अपना जीवन जीना चाहते हैं।कर्मयोग का सीमित अर्थ समझकर जिन्होंने वेदों का अध्ययन किया है उन्हें इस श्लोक में दिया उपदेश पारम्परिक प्रतीत होगा।अपनी पीढ़ी के द्वारा इस उपदेश के स्वीकृत होने पर उसके प्रचारार्थ भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.30।।ननु नाहं तत्त्ववित् किंत्वज्ञो मुमुक्षुर्मया कथं कर्म कर्तव्यमिति चेत्तत्राह मयीति। मयि परमेश्वरे सर्वाणि वैदिकानि लौकिकानि च कर्माणि अध्यात्मचेतसा विवेकबुद्य्धाऽहंकर्तेश्वराय भृत्यवत्करोमीत्यनया बुद्य्धा संन्यस्य समर्प्य निराशीः फलाभिसंधिरहितः ममत्वशून्यस्त्वं भूत्वा विगतज्वरो विगतशोकः सन् युध्यस्व। यत्त्वत्र भगवदर्पणं निष्कामत्वं च सर्वकर्मसाधारणं मुमुक्षोः निर्ममत्वं त्यक्तशोकत्वं च युद्धमात्रे प्रकृत इति द्रष्टव्यमन्यत्र ममताशोकयोप्रसक्तत्वादिति तच्चिन्त्यम्। सर्वस्मिन्कर्मणि ममेदमिति ममत्वस्य निष्फले कष्टसाध्ये वा कर्मणि ज्वरस्य च प्रसक्तत्वात्। शोकादेर्निवृत्त्यर्थमेव सिद्य्धसिद्य्धोः समो भूत्वेति भगवतोक्तत्वाच्चेति दिक्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.30।।एवं कर्मानुष्ठानसाम्येऽप्यज्ञविज्ञयोः कर्तृत्वाभिनिवेशतदभावाभ्यां विशेष उक्तः। इदानीमज्ञस्यापि मुमुक्षोरमुमुक्ष्वपेक्षया भगवदर्पणं फलाभिसंध्यभावं च विशेषं वदन्नज्ञतयार्जुनस्य कर्माधिकारं द्रढयति मयि भगवति वासुदेवे परमेश्वरे सर्वज्ञे सर्वनियन्तरि सर्वात्मनि सर्वाणि कर्माणि लौकिकानि वैदिकानि च सर्वप्रकाराणि अध्यात्मचेतसा अहं कर्तान्तर्याम्यधीनस्तस्मा एवेश्वराय राज्ञ इव भृत्यः कर्माणि करोमीत्यनया बुद्ध्या संन्यस्य समर्प्य निराशीर्निष्कामः निर्ममो देहपुत्रभ्रात्रादिषु स्वीयेषु ममताशून्यः विगतज्वरः संतापहेतुत्वाच्छोक एव ज्वरशब्देनोक्तः ऐहिकपारत्रिकदुर्यशोनरकपातादिनिमित्तशोकरहितश्च भूत्वा त्वं मुमुक्षुर्युध्यस्व विहितानि कर्माणि कुर्वित्यभिप्रायः। अत्र भगवदर्पणं निष्कामत्वं च सर्वकर्मसाधारणं मुमुक्षोः। निर्ममत्वं त्यक्तशोकत्वं च युद्धमात्रे प्रकृते इति द्रष्टव्यम्। अन्यत्र ममताशोकयोरप्रसक्तत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.30।।मयीति। त्वं तु अज्ञो मुमुक्षुश्च मयि सर्वान्तर्यामिणि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य समर्प्य अध्यात्मचेतसा आत्मानमधिकृत्य प्रवृत्तं शास्त्रमध्यात्मं तत्र प्रवणेन चेतसा। शाकपार्थिवादिवन्मध्यमपदलोपी समासः। आत्मानात्मविवेकवतेत्यर्थः। ईश्वरप्रेरितोऽहं करोमीत्यनया बुद्ध्या निराशीः फलमनिच्छन् निर्ममो लब्धे ममत्वाभिमानशून्यश्च भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरो विशोकः सन्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.30।।ननु तेषां कर्मकारणार्थं स्वस्य कर्मकरणे यावत्कालो गच्छति तावत्कालव्यर्थीभावापराधः स्वस्य स्यादित्यत आह मयि सर्वांणीति। मयि सन्न्यस्य आधिदैविकभावेन सर्वं त्यक्त्वाऽध्यात्मचेतसा अध्यात्मभावेन मदाज्ञारूपेण सर्वाणि कर्माणि कुर्वित्यर्थः। मदाज्ञया करणे कालव्यर्थता न भविष्यतीति भावः। सर्वपदेन लौकिकार्याण्यपि कुर्वित्यर्थः। लौकिककर्मकरणमेवाह निराशीरिति। निराशीः युद्धजस्वर्गादिफलानभीप्सुः निर्ममः राज्यादिप्राप्तभावरहितः स्वीयेषु परेषु च भ्रातृगुर्वादिबुद्धिरहितो विगतज्वरो लौकिकतापरहितो मदाज्ञया युद्ध्यस्व युद्धं कुर्वित्यर्थः। त्वामुद्दिश्य तु क्षात्त्रं कर्म युद्धरूपं मयोच्यते न तु पूर्वोक्तमन्यत्कर्म। अतो युद्धमेव कुर्वित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.30।।तदेवं तत्त्वविदापि कर्म कर्तव्यं त्वं तु नाद्यापि तत्त्ववित् अतः कर्मैव कुर्वित्याह मयीति। सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य समर्प्याध्यात्मचेतसान्तर्याम्यधीनोऽहं करोमीति दृष्ट्या निराशीर्निष्कामोऽतएव मत्फलसाधनं मदर्थमिदं कर्मेत्येवं ममताशून्यश्च भूत्वा विगतज्वरस्त्यक्तशोकश्च भूत्वा युध्यस्व।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.30।।स्वमतमुपदिशति मयीति। साङ्ख्यचेतसा सर्वकर्माणि मयि मुख्ये साक्षात्कर्त्तरि परदेवतायां सन्न्यस्य समर्प्यानुसन्धाय वा युद्ध्यस्व। कर्मत्यागे हि दण्डिपुरुषं त्यजेतिवत् विशेषणविषयक एव त्यागः न तु विशेष्यविषयक इति तदाह निराशीरिति। तत्फलविषयकस्त्यागः निर्मम इति ममताविषयकः विगतज्वर इति कर्तृत्वविषयक इति त्रिविधस्त्यागः कर्मणि प्रकीर्तितः। यथोक्तं निबन्धेसाङ्ख्येऽपि भगवच्चित्ते फलमेतन्न चान्यथा। समर्पणात्कर्मणां च सिद्धिर्भवति नान्यथा इति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.30।।तो फिर कर्माधिकारी अज्ञानी मुमुक्षुको किस प्रकार कर्म करना चाहिये सो कहते हैं मुझ सर्वात्मरूप सर्वज्ञ परमेश्वर वासुदेवमें विवेकबुद्धिसे सब कर्म छोड़कर अर्थात् मैं सब कर्म ईश्वरके लिये सेवककी तरह कर रहा हूँ इस बुद्धिसे सब कर्म मुझमें अर्पण करके तथा निराशी आशारहित और निर्मम यानी जिसका मेरापन सर्वथा नष्ट हो चुका हो उसे निर्मम कहते हैं ऐसा होकर तू शोकरहित हुआ युद्ध कर अर्थात् चिन्तासंतापसे रहित हुआ युद्ध कर।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.30।। व्याख्या मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा प्रायः साधकका यह विचार रहता है कि कर्मोंसे बन्धन होता है और कर्म किये बिना कोई रह सकता नहीं इसलिये कर्म करनेसे तो मैं बँध जाऊँगा अतः कर्म किस प्रकार करने चाहिये जिससे कर्म बन्धनकारक न हों प्रत्युत मुक्तिदायक हो जायँ इसके लिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू अध्यात्मचित्त(विवेकविचारयुक्त अन्तःकरण) से सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको मेरे अर्पण कर दे अर्थात् इनसे अपना कोई सम्बन्ध मत मान। कारण कि वास्तवमें संसारमात्रकी सम्पूर्ण क्रियाओंमें केवल मेरी शक्ति ही काम कर रही है। शरीर इन्द्रियाँ पदार्थ आदि भी मेरे हैं और शक्ति भी मेरी है। इसलिये सब कुछ भगवान्का है और भगवान् अपने हैं गम्भीरतापूर्वक ऐसा विचार करके जब तू कर्वव्यकर्म करेगा तब वे कर्म तेरेको बाँधनेवाले नहीं होंगे प्रत्युत उद्धार करनेवाले हो जायँगे।शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदिपर अपना कोई अधिकार नहीं चलता यह मनुष्यमात्रका अनुभव है। ये सब प्रकृतिके हैं प्रकृतिस्थानि और स्वयं परमात्माका है ममैवांशो जीवलोके (गीता 15। 7)। अतः शरीरादि पदार्थोंमें भूलसे माने हुए अपनेपनको हटाकर इनको भगवान्का ही मानना (जो कि वास्तवमें है) अर्पण कहलाता है। अतः अपने विवेकको महत्त्व देकर पदार्थों और कर्मोंसे मूर्खतावश माने हुए सम्बन्धका त्याग करना ही अर्पण करनेका तात्पर्य है।अध्यात्मचेतसा पदसे भगवान्का यह तात्पर्य है कि किसी भी मार्गका साधक हो उसका उद्देश्य आध्यात्मिक होना चाहिये लौकिक नहीं। वास्तवमें उद्देश्य या आवश्यकता सदैव नित्यतत्त्वकी (आध्यात्मिक) होती है और कामना सदैव अनित्यतत्त्व (उत्पत्ति विनाशशील वस्तु) की होती है। साधकमें उद्देश्य होना चाहिये कामना नहीं। उद्देश्यवाला अन्तःकरण विवेकविचारयुक्त ही रहता है।दार्शनिक अथवा वैज्ञानिक किसी भी दृष्टिसे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि शरीरादि भौतिक पदार्थ अपने हैं। वास्तवमें ये पदार्थ अपने और अपने लिये हैं ही नहीं प्रत्युत केवल सदुपयोग करनेके लिये मिले हुए हैं। अपने न होनेके कारण ही इनपर किसीका आधिपत्य नहीं चलता।संसारमात्र परमात्माका है परन्तु जीव भूलसे परमात्माकी वस्तुको अपनी मान लेता है और इसीलिये बन्धनमें पड़ जाता है। अतः विवेकविचारके द्वारा इस भूलको मिटाकर सम्पूर्ण पदार्थों और कर्मोंको अध्यात्मतत्त्व(परमात्मा) का स्वीकार कर लेना ही अध्यात्मचित्तके द्वारा उनका अर्पण करना है।इस श्लोकमें अध्यात्मचेतसा पद मुख्यरूपसे आया है। तात्पर्य यह है कि अविवेकसे ही उत्पत्तिविनाशशील शरीर (संसार) अपना दीखता है। यदि विवेकविचारपूर्वक देखा जाय तो शरीर या संसार अपना नहीं दीखेगा प्रत्युत एक अविनाशी परमात्मतत्त्व ही अपना दीखेगा। संसारको अपना देखना ही पतन है और अपना न देखना ही उत्थान हैद्वयक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्म शाश्वतम्।ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेति च शाश्वतम्।। (महा0 शान्ति0 13। 4 आश्वमेधिक0 51। 29) दो अक्षरोंका मम (यह मेरा है ऐसा भाव) मृत्यु है और तीन अक्षरोंका न मम (यह मेरा नहीं हैऐसा भाव) अमृतसनातन ब्रह्म है। अर्पणसम्बन्धी विशेष बातभगवान्ने मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य पदोंसे सम्पूर्ण कर्मोंको अर्पण करनेकी बात इसलिये कही है कि मनुष्यने करण (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण) उपकरण (कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री) तथा क्रियाओंको भूलसे अपनी और अपने लिये मान लिया जो कभी इसके थे नहीं हैं नहीं होंगे नहीं और हो सकते भी नहीं। उत्पत्तिविनाशवाली वस्तुओंसे अविनाशीका क्या सम्बन्ध अतः कर्मोंको चाहे संसारके अर्पण कर दे चाहे प्रकृतिके अर्पण कर दे और चाहे भगवान्के अर्पण कर दे तीनोंका एक ही नतीजा होगा क्योंकि संसार प्रकृतिका कार्य है और भगवान् प्रकृतिके स्वामी हैं। इस दृष्टिसे संसार और प्रकृति दोनों भगवान्के हैं। अतः मैं भगवान्का हूँ और मेरी कहलानेवाली मात्र वस्तुएँ भगवान्की हैं इस प्रकार सब कुछ भगवान्के अर्पण कर देना चाहिये अर्थात् अपनी ममता उठा देनी चाहिये। ऐसा करनेके बाद फिर साधकको संसार या भगवान्से कुछ भी चाहना नहीं पड़ता क्योंकि जो उसे चाहिये उसकी व्यवस्था भगवान् स्वतः करते हैं। अपर्ण करनेके बाद फिर शरीरादि पदार्थ अपने प्रतीत नहीं होने चाहिये। यदि अपने प्रतीत होते हैं तो वास्तवमें अर्पण हुआ ही नहीं। इसीलिये भगवान्ने विवेकविचारयुक्त चित्तसे अर्पण करनेके लिये कहा है जिससे यह वास्तविकता ठीक तरहसे समझमें आ जाय कि ये पदार्थ भगवान्के ही हैं अपने हैं ही नहीं।भगवान्के अर्पणकी बात ऐसी विलक्षण है कि किसी तरहसे (उकताकर भी) अर्पण किया जाय तो भी लाभहीलाभ है। कारण कि कर्म और वस्तुएँ अपनी हैं ही नहीं। कर्मोंको करनेके बाद भी उनका अर्पण किया जा सकता है पर वास्तविक अर्पण पदार्थों और कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर ही होता है। पदार्थों और कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद तभी होता है जब यह बात ठीकठीक अनुभवमें आ जाय कि करण (शरीरादि) उपकरण (सांसारिक पदार्थ) कर्म और स्वयं ये सब भगवान्के ही हैं। साधकसे प्रायः यह भूल होती है कि वह उपकरणोंको तो भगवान्का माननेकी चेष्टा करता है पर करण तथा स्वयं भीभगवान्के हैं इसपर ध्यान नहीं देता। इसीलिये उसका अर्पण अधूरा रह जाता है। अतः साधकको करण उपकरण क्रिया और स्वयं सभीको एकमात्र भगवान्का ही मान लेना चाहिये जो वास्तवमें उन्हींके हैं।कर्मों और पदार्थोंका स्वरूपसे त्याग करना अर्पण नहीं है। भगवान्की वस्तुको भगवान्की ही मानना वास्तविक अर्पण है। जो मनुष्य वस्तुओंको अपनी मानते हुए भगवान्के अर्पण करता है उसके बदलेमें भगवान् बहुत वस्तुएँ देते हैं जैसे पृथ्वीमें जितने बीज बोये जायँ उससे कई गुणा अधिक अन्न पृथ्वी देती है पर कई गुणा मिलनेपर भी वह सीमित ही मिलता है। परन्तु जो वस्तुको अपनी न मानकर (भगवान्की हीमानते हुए) भगवान्के अर्पण करता है भगवान् उसे अपनेआपको देते हैं और ऋणी भी हो जाते हैं। तात्पर्य है कि वस्तुको अपनी मानकर देनेसे (अन्तःकरणमें वस्तुका महत्त्व होनेसे) उस वस्तुका मूल्य वस्तुमें ही मिलता है और अपनी न मानकर देनेसे स्वयं भगवान् मिलते हैं।वास्तविक अर्पणसे भगवान् अत्यन्त प्रसन्न होते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि अर्पण करनेसे भगवान्को कोई सहायता मिलती है परन्तु अर्पण करनेवाला कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है और इसीमें भगवान्की प्रसन्नता है। जैसे छोटा बालक आँगनमें पड़ी हुई चाबी पिताजीका सौंप देता है तो पिताजी प्रसन्न हो जाते हैं जबकि छोटा बालक भी पिताजीका है आँगन भी पिताजीका है और चाबी भी पिताजीकी है पर वास्तवमें पिताजी चाबीके मिलनेसे नहीं प्रत्युत बालकका (देनेका) भाव देखकर प्रसन्न होते हैं और हाथ ऊँचा करके बालकसे कहते हैं कि तू इतना बड़ा हो जा अर्थात् उसे अपनेसे भी ऊँचा (बड़ा) बना लेते हैं। इसी प्रकार सम्पूर्ण पदार्थ शरीर तथा शरीरी (स्वयं) भगवान्के ही हैं अतः उनपरसे अपनापन हटाने और उन्हें भगवान्के अर्पण करनेका भाव देखकर ही वे (भगवान्) प्रसन्न हो जाते हैं और उसके ऋणी हो जाते हैं।कामनासम्बन्धी विशेष बातपरमात्माने मनुष्यशरीरकी रचना बड़े विचित्र ढंगसे की है। मनुष्यके जीवननिर्वाह और साधनके लिये जोजो आवश्यक सामग्री है वह उसे प्रचुर मात्रामें प्राप्त है। उसमें भगवत्प्रदत्त विवेक भी विद्यमान है। उस विवेकको महत्त्व न देकर जब मनुष्य प्राप्त वस्तुओंका ठीकठीक सदुपयोग नहीं करता प्रत्युत उन्हें अपना मानकर अपने लिये उनका उपयोग करता है एवं प्राप्त वस्तुओंमें ममता तथा अप्राप्त वस्तुओंकी कामना करने लगता है तब वह जन्ममरणके बन्धनमें बँध जाता है। वर्तमानमें जो वस्तु व्यक्ति परिस्थिति घटना योग्यता शक्ति शरीर इन्द्रियाँ मन प्राण बुद्धि आदि मिले हुए दीखते हैं वे पहले भी हमारे पास नहीं थे और बादमें भी सदा हमारे पास नहीं रहेंगे क्योंकि वे कभी एकरूप नहीं रहते प्रतिक्षण बदलते रहते हैं इस वास्तविकताको मनुष्य जानता है। यदि मनुष्य जैसा जानता है वैसा ही मान ले और वैसा ही आचरणमें ले आये तो उसका उद्धार होनेमें किञ्चिन्मात्र भी संदेह नहीं है। जैसा जानता है वैसा मान लेनेका तात्पर्य यह है कि शरीरादि पदार्थोंको अपना और अपने लिये न माने उनके आश्रित न रहे और उन्हें महत्त्व देकर उनकी पराधीनता स्वीकार न करे। पदार्थोंको महत्त्व देना महान् भूल है। उनकी प्राप्तिसे अपनेको कृतार्थ मानना महान् बन्धन है। नाशवान् पदार्थोंको महत्त्व देनेसे ही उनकी नयीनयी कामनाएँ उत्पन्न होती हैं। कामना सम्पूर्ण पापों तापों दुःखों अनर्थों नरकों आदिकी जड़ है। कामनासे पदार्थ मिलते नहीं और प्रारब्धवशात् मिल भी जायँ तो टिकते नहीं। कारण कि पदार्थ आनेजानेवाले हैं और स्वयं सदा रहनेवाला है। अतः कामनाका त्याग करके मनुष्यको कर्तव्यकर्मका पालन करना चाहिये।यहाँ शङ्का हो सकती है कि कामनाके बिना कर्मोंमें प्रवृत्ति कैसे होगी इसका समाधान यह है कि कामनाकी पूर्ति और निवृत्ति दोनोंके लिये कर्मोंमें प्रवृत्ति होती है। साधारण मनुष्य कामनाकी पूर्तिके लिये कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं और साधक आत्मशुद्धिहेतु कामनाकी निवृत्तिके लिये (गीता 5। 11)। वास्तवमें कर्मोंमें प्रवृत्ति कामनाकी निवृत्तिके लिये ही है कामनाकी पूर्तिके लिये नहीं।मनुष्यशरीर उद्देश्यकी पूर्ति के लिये ही मिला है। उद्देश्यकी पूर्ति होनेपर कुछ भी करना शेष नहीं रहता। कामनापूर्तिके लिये कर्मोंमें प्रवृत्ति उन्हीं मनुष्योंकी होती है जो अपने वास्तविक उद्देश्य (नित्यतत्त्व परमात्माकी प्राप्ति) को भूले हुए हैं। ऐसे मनुष्योंको भगवान्ने कृपण (दीन या दयाका पात्र) कहा है कृपणाः फलहेतवः (गीता 2। 49)। इसके विपरीत जो मनुष्य उद्देश्यको सामने रखकर (कामनाकी निवृत्तिके लिये) कर्मोंमें प्रवृत्त होते हैं उन्हें भगवान्ने मनीषी (बुद्धिमान् या ज्ञानी) कहा है फलं त्यक्त्वा मनीषिणः (गीता 2।51)। सेवा स्वरूपबोध और भगवत्प्राप्तिका भाव उद्देश्य है कामना नहीं। नाशवान् पदार्थोंकी प्राप्तिका भाव ही कामना है। अतः कामनाके बिना कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती ऐसा मानना भूल है। उद्देश्यकीपूर्तिके लिये भी कर्म सुचारुरूपसे होते हैं।अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर संसार(जडता) से अपना सम्बन्ध मान लेनेसे ही आवश्यकता और कामना दोनोंके उत्पत्ति होती है। संसारसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा त्याग होनेपर आवश्यकताकी पूर्ति और कामनाकी निवृत्ति हो जाती है।निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थों(कर्मसामग्री) को भगवदर्पण करनेके बाद भी कामना ममता और सन्तापका कुछ अंश शेष रह सकता है। उदाहरणार्थ हमने किसीको पुस्तक दी। उसे वह पुस्तक पढ़ते हुए देखकर हमारे मनमें ऐसा भाव आ जाता है कि वह मेरी पुस्तक पढ़ रहा है। यही आंशिक ममता है जो पुस्तक अर्पण करनेके बाद भी शेष है। इस अंशका त्याग करनेके लिये भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तू नयी वस्तुकी कामना मत कर प्राप्त वस्तुमें ममता मत कर और नष्ट वस्तुका संताप मत कर। सब कुछ मेरे अर्पण करनेकी कसौटी यह है कि कामना ममता और संतापका अंश भी न रहे।जिन साधकोंको सब कुछ भगवदर्पण करनेके बाद भी पूर्वसंस्कारवश शरीरादि पदार्थोंकी कामना ममता तथा संताप दीखते हैं उन्हें कभी निराश नहीं होना चाहिये। कारण कि जिसमें कामना दीखती है वही कामनारहित होता है जिसमें ममता दीखती है वही ममतारहित होता है और जिसमें संताप दीखता है वही संतापरहित होता है। इसी प्रकार जो देहको अहम् (मैं) मानता है वही विदेह (अहंतारहित) होता है। अतः मनुष्यमात्र कामना ममता और संतापरहित होनेका पूरा अधिकारी है।गीतामें ज्वर शब्द केवल यहीं आया है। युद्धमें कौटुम्बिक स्नेह आदिसे संताप होनेकी सम्भावना रहती है। अतः युद्धरूप कर्तव्यकर्म करते समय विशेष सावधान रहनेके लिये भगवान् विगतज्वरः पद देकर अर्जुनसे कहते हैं कि तू सन्तापरहित होकर युद्धरूप कर्तव्यकर्मको कर।अर्जुनके सामने युद्धके रूपमें कर्तव्यकर्म था इसलिये भगवान् युध्यस्व पदसे उन्हें युद्ध करनेकी आज्ञा देते हैं। इसमें भगवान्का तात्पर्य युद्ध करनेसे नहीं प्रत्युत कर्तव्यकर्म करनेसे है। इसलिये समयसमयपर जो कर्तव्यकर्म सामने आ जाय उसे साधकको निष्काम निर्मम तथा निःसंताप होकर भगवदर्पणबुद्धिसे करना चाहिये। उसके परिणाम (सिद्ध या असिद्धि) की तरफ नहीं देखना चाहिये। सिद्धिअसिद्धि अनुकूलताप्रतिकूलता आदिमें सम रहना विगतज्वर होना है क्योंकि अनुकूलतासे होनेवाली प्रसन्नता और प्रतिकूलतासे होनेवाली उद्विग्नता दोनों ही ज्वर (संताप) हैं। रागद्वेष हर्षशोक कामक्रोध आदि विकार भी ज्वर हैं। संक्षेपमें रागद्वेष चिन्ता उद्वेग हलचल आदि जितनी भी मानसिक विकृतियाँ (विकार) हैं वे सब ज्वर हैं और उनसे रहित होना ही विगतज्वरः पदका तात्पर्य है।विशेष बातजब साधकका एकमात्र उद्देश्य परमात्मप्राप्तिका हो जाता है तब उसके पास जो भी सामग्री (वस्तु परिस्थिति आदि) होती है वह सब साधनरूप (साधनसामग्री) हो जाती है। फिर उस सामग्रीमें बढ़िया और घटिया ये दो विभाग नहीं होते। इसीलिये सामग्री जो है और जैसी है वही और वैसी ही भगवान्के अर्पण करनी है। भगवान्ने जैसा दिया है वैसा ही उन्हें वापस करना है।सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्के अर्पण करनेके बाद भी अपनेमें जो कामना ममता और संताप प्रतीत होते हैं उन्हें भी भगवान्के अर्पण कर देना है। भगवान्के अर्पण करनेसे वह भगवन्निष्ठ हो जाता है। योगारूढ़ होनेमें कर्म करना ही हेतु कहा जाता है आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते (गीता 6। 3)। कारण कि कर्तव्यकर्म करनेसे ही साधकको पता लगता है कि मुझमें क्या और कहाँ कमी (कामना ममता आदि) है (टिप्पणी प0 170) इसीलिये बारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें ध्यानकी अपेक्षा कर्मफलत्याग(कर्मयोग) को श्रेष्ठ कहा गया है क्योंकि ध्यानमें साधककी दृष्टि विशेषरूपसे मनकी चञ्चलतापर ही रहती है और वह ध्येयमें मन लगनेमात्रसे ध्यानकी सफलता मान लेता है। परन्तु मनकी चञ्चलताके अतिरिक्त दूसरी कमियों(कामना ममता आदि) की ओर उसकी दृष्टि तभी जाती है तब वह कर्म करता है। इसलिये भगवान् प्रस्तुत श्लोकमें युध्यस्व पदसे कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।जैसे दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने सिद्धिअसिद्धिमें सम होकर कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा दी थी ऐसे ही यहाँ (तीसवें श्लोकमें) निष्काम निर्मम और निःसंताप होकर युद्ध अर्थात् कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं। जब युद्धजैसा घोर (क्रूर) कर्म भी समभावसे किया जा सकता है तब ऐसा कौनसा दूसरा कर्म है जो समभावसे न किया जा सकता हो समभाव तभी होता है जब शरीर मैं नहीं मेरा नहीं और मेरे लिये नहीं ऐसा भाव हो जाय जो कि वास्तवमें है।कर्तव्यकर्मका पालन तभी सम्भव है जब साधकका उद्देश्य संसारका न होकर एकमात्र परमात्माका हो जाय। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे साधक ज्योंज्यों कर्तव्यपरायण होता है त्योंहीत्यों कामना ममता आसक्ति आदि दोष स्वतः मिटते चले जाते हैं और समतामें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव होता जाता है। समतामें अपनी स्थितिका पूर्ण अनुभव होते ही कर्तापन सर्वथा मिट जाता है और उद्देश्यके साथ एकता हो जाती है। यह नियम है कि अपने लिये कुछ भी पाने या करनेकी इच्छा न रहनेपर अहम् (व्यक्तित्व) स्वतः नष्ट हो जाता है।अर्जुन श्रेय (कल्याण) तो चाहते हैं पर युद्धरूप कर्तव्यकर्मसे हटकर। इसलिये अर्जुनके द्वारा अपना श्रेय पूछनेपर भगवान् उन्हें युद्धरूप कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं क्योंकि भगवान्के मतानुसार कर्तव्यकर्म करनेसे अर्थात् कर्मयोगसे भी श्रेयकी प्राप्ति होती है और ज्ञानयोग एवं भक्तियोगसे भी होती है। सम्बन्ध पूर्वश्लोकमें अपना मत (सिद्धान्त) बताकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें अपने मतकी पुष्टि करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.30।।तस्माद्युक्तः सन् जुषेत कर्माणि इत्युक्तं तत्र तत् कथमिति स्फुटयति मयीति। मयि सर्वाणि (S मयि स्थित्वा सर्वाणि) कर्माणि नाहं कर्ता इति सन्यस्य सर्वतन्त्रः परमेश्वर एव सर्वकर्ता नाहं कश्चित् इति निश्चित्य लोकानुग्रहं
Chapter 3 (Part 19)
चिकीर्षुः लोकाचारं युद्धात्मकम् अनुतिष्ठ।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.30।।यद्यपि कर्मण्यज्ञोऽधिक्रियते तथापि मोक्ष्यमाणेन तेन कर्म त्यक्तव्यं मोक्षस्य कर्मासाध्यत्वान्नतु तेन कर्म कर्तुं शक्यं कर्मणः सापेक्षितविरोधित्वादिति शङ्कते कथमिति। श्लोकेनोत्तरमाह उच्यत इति। यथोक्ते परस्मिन्नात्मनि सर्वकर्मणां समर्पणे कारणमाह अध्यात्मेति। विवेकबुद्धिमेव व्याकरोति अहमिति। दर्शितरीत्या कर्मसु प्रवृत्तस्य कर्तव्यान्तरमाह किञ्चेति। त्यक्ताशीः फलप्रार्थनाहीनः सन्नित्यर्थः। निर्ममो भूत्वा पुत्रभ्रात्रादिष्विति शेषः। ननु युद्धे नियोगो नोपपद्यते पुत्रभ्रात्रादिहिंसात्मनस्तस्य संतापहेतोर्नियोगविषयत्वायोगादिति तत्राह विगतेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.30।।मयि सर्वाणि इत्यस्य सङ्गतिं दर्शयति अत इति यतो विद्वत्कर्मैवंविधं त्वं च विद्वानस्यतः। ननु सन्न्यासो विसर्गः स च स्वकीयस्य भवति न च जीवस्य कर्माणि सन्तीत्युक्तं तत्कथं तेषां विसर्गो विधीयत इत्यत आह भ्रान्त्येति। कर्मणां परमेश्वरे सन्न्यासो नाम तदात्मकत्वविज्ञानमिति कश्चित् तदसत् अशाब्दत्वात् प्रमाणविरुद्धत्वाच्चेति भावेन स्वपक्षे तदभिप्रायमाह भगवानिति। इति ज्ञात्वेति शेषः। प्रकारान्तरं चाह मदिति। इति समर्पणं च कर्मणां मयि सन्न्यास इति शेषः। कर्माणि परमेश्वरात्मकत्व प्रतिपद्यन्त तत्प्राप्तये कल्प्यन्त इत्यध्यात्मचेतसेति व्याख्यानमशाब्दमिति भावेन व्याचष्टे आत्मानमिति। अनेनाव्ययीभावगर्भः कर्मधारय इत्युक्तं भवति। अस्यनिराशीः इत्यनेनान्वयः। परमात्मलाभेन निराशीराशारहित इत्युक्तं भवति। ननु निर्ममत्वं न मम कर्माणि सन्तीति ज्ञानम्। तच्चमयि सर्वाणि कर्माणि सन्न्यस्य इत्यनेन गतार्थमतो द्वयोर्भेदमाह सन्न्यासस्त्विति। उभयत्रेतिशब्दात्परं ज्ञानमिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.30।।अतः सर्वाणि कर्माणि मय्येव सन्न्यस्य भ्रान्त्या जीवेऽध्यारोपितानि मय्येव विसृज्य भगवानेव सर्वाणि कर्माणि करोतीति मत्पूजेति च आत्मानं मामधिकृत्य यच्चेतस्तदध्यात्मचेतः। सन्न्यासस्तु भगवान्करोतीति। निर्ममत्वं नाहं करोमीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.30।।मयि सर्वेश्वरे सर्वभूतान्तरात्मभूते सर्वाणि कर्माणि अध्यात्मचेतसा संन्यस्य निराशीः निर्ममो विगतज्वरः युद्धादिकं सर्वं चोदितं कर्म कुरुष्व। आत्मनि यत् चेतः तद् अध्यात्मचेतः आत्मस्वरूपविषयेण श्रुतिशतसिद्धेन ज्ञानेन इत्यर्थः।अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा ৷৷. अन्तः प्रविष्टं कर्तारमेतम् (तै0 आ0 3।11)य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद। यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्मान्तर्याम्यमृतः (बृ0 5।7 मा0 दि0) इत्येवमाद्याः श्रुतयः परमपुरुषप्रवर्त्यं तच्छरीरभूतम् एनम् आत्मानं परमपुरुषं च प्रवर्तयितारम् आचक्षते। स्मृतयश्च प्रशासितारं सर्वेषाम् (मनु0 12।122) इत्याद्याःसर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः (गीता 15।15) ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।।(गीता 18।61) इति वक्ष्यते।अतो मच्छरीरतया मत्प्रवर्त्यात्मस्वरूपानुसन्धानेन सर्वाणि कर्माणि मया एव क्रियमाणानि इति मयि परमपुरुषे संन्यस्य तानि च केवलं मदाराधनानि इति कृत्वा तत्फले निराशीः तत एव तत्र कर्मणि ममतारहितो भूत्वाविगतज्वरो युद्धादिकं कुरुष्व।स्वकीयेन आत्मना कर्त्रा स्वकीयैः एव करणैः स्वाराधनैकप्रयोजनाय परमपुरुषः सर्वेश्वरः सर्वशेषी स्वयम् एव स्वकर्माणि कारयति इति अनुसन्धाय कर्मसु ममतारहितः प्राचीनेन अनादिकालप्रवृत्तानन्तपापसञ्चयेनकथम् अहं भविष्यामि इत्येवं भूतान्तर्ज्वरविनिर्मुक्तःपरमपुरुष एव कर्मभिः आराधितो बन्धात् मोचयिष्यति इति स्मरन् सुखेन कर्मयोगम् एव कुरुष्व इत्यर्थः।तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम्। (श्ेवता 3।7)पतिं विश्वस्य (म0 ना0 3।1)पतिं पतीनाम् (श्वेता 6।7) इत्यादिश्रुतिसिद्धं हि सर्वेश्वरत्वं सर्वशेषित्वं च। ईश्वरत्वं नियन्तृत्वम् शेषित्वं पतित्वम्।।अयम् एव साक्षादुपनिषत्सारभूतः अर्थ इत्याह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.30।। मयि वासुदेवे परमेश्वरे सर्वज्ञे सर्वात्मनि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य निक्षिप्य अध्यात्मचेतसा विवेकबुद्ध्या अहं कर्ता ईश्वराय भृत्यवत् करोमि इत्यनया बुद्ध्या। किञ्च निराशीः त्यक्ताशीः निर्ममः ममभावश्च निर्गतः यस्य तव स त्वं निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः विगतसंतापः विगतशोकः सन्नित्यर्थः।।यदेतन्मम मतं कर्म कर्तव्यम् इति सप्रमाणमुक्तं तत् तथा
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【 Verse 3.31 】
▸ Sanskrit Sloka: ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवा: | श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभि: ||
▸ Transliteration: ye me matamidaṁ nityamanutiṣṭhanti mānavāḥ | śraddhāvanto ’nasūyanto mucyante tepi karmabhiḥ ||
▸ Glossary: ye: who; me: My; matam: teaching; idaṁ: these; nityaṁ: always; anutiṣṭhanti: execute regularly; mānavāḥ: persons; śraddhāvantaḥ: with faith; anasūyantaḥ: without envy; mucyante: become free; te: all of them; api: even; karmabhiḥ: from the bondage of fruitive actions
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.31 Those persons who execute their duties according to My teaching and who follow these teachings faithfully with authenticity, without envy, become free from the bondage of fruitive actions.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.31।।जो मनुष्य दोषदृष्टिसे रहित होकर श्रद्धापूर्वक मेरे इस (पूर्वश्लोकमें वर्णित) मतका सदा अनुसरण करते हैं वे भी सम्पूर्ण कर्मोंके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.31।। जो मनुष्य दोष बुद्धि से रहित (अनसूयन्त) और श्रद्धा से युक्त हुए सदा मेरे इस मत (उपदेश) का अनुष्ठानपूर्वक पालन करते हैं वे कर्मों से (बन्धन से) मुक्त हो जाते हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.31 ये those who? मे My? मतम् teaching? इदम् this? नित्यम् constantly? अनुतिष्ठन्ति practise? मानवाः men? श्रद्धावन्तः full of faith? अनसूयन्तः not cavilling? मुच्यन्ते are freed? ते they? अपि also? कर्मभिः from actions.Commentary Sraddha is a mental attitude. It means faith. It is faith in ones own Self? in the scriptures and in the teachings of the spiritual preceptor. It is compund of the higher emotion of faith? reverence and humility.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.31. Those who constantly follow this doctrine of Mine-such men, with faith and without finding fault [in it], are freed from [the results of] all actions.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.31 Those who always act in accordance with My precepts, firm in faith and without cavilling, they too are freed from the bondage of action.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.31 Those men who, full of faith, ever practise this teaching of Mine and those who receive it without cavil - even they are released from Karma.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.31 Those men who ever follow this teaching of Mine with faith and without cavil, they also become freed from actions.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.31 Those men who constantly practise this teaching of Mine with faith and without cavilling, they too are freed from actions.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.31 See Comment under 3.32
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.31 There are those persons who are alified to understand the Sastras and decide for themselves what is My doctrine, and follow them accordingly; there are others who are full of faith in the meaning of the Sastras without however practising it. And there are still others who, even though devoid of faith, do not cavil at it, saying that the true meaning of the Sastras cannot be this, i.e., they do not find any blemish pertaining to the Sastras which possess great alities. All these persons are freed from Karmas which are there from beginningless time and which cause bondage. By the term, api (even) in 'te pi karmabhih' ('even they from Karmas'), these men are divided into three groups. The meaning is that those who, even if they do not act upon the meaning but still believe in this meaning of the Sastras and do not cavil at it, will be cleansed of their evil by their faith and freedom from fault-finding. For, if they have faith they will, before long, take to the practice of this very meaning of the Sastras and be freed.
Sri Krsna now speaks of the evil that will befall those who do not practice this instruction of the Upanisads, i.e., those who are faithless and who cavil at it.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.31 Ye, those; manavah, men; who (nityam, ever;) anutisthanti, follow accordingly; me matam, My teaching- this teaching of Mine, viz that 'duty must be performed', which has been stated with valid reasoning; sraddhavantah, with faith; and anasuyantah, without cavil, without detracing Me, Vasudeva, the Teacher [Here Ast. adds 'parama, supreme'-Tr.]; te api, they also, who are such; mucyante, become freed; karmabhih, from actions called the righteous and the unrighteous.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.31।। कर्मयोग के सिद्धान्त का मात्र ज्ञान होने से नहीं किन्तु उसके अनुसार आचरण करने पर ही वह हमारा कल्याण कर सकेगा। यह श्रीकृष्ण का मत है। अध्यात्म ज्ञान तो एक ही है परन्तु आचार्यों सम्प्रदाय संस्थापकों एवं भिन्नभिन्न धर्म प्रथाओं के मतों में अनेक भेद हैं जिसका कारण यह है कि वे सभी तत्कालीन परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अपनी पीढ़ी का मार्ग दर्शन करना चाहते थे जिससे सभी साधक परम पुरुषार्थ को प्राप्त कर सकें।बैलगाड़ी हांकने वाले चालक के चाबुक के नीचे काम करने वाले पशु के समान ही मनुष्य को बोझ उठाते हुये जीवन नहीं जीना चाहिये। परिश्रम केवल शरीर को सुदृढ़ बनाता है कर्म हमारे चरित्र की वक्रता को दूर कर आन्तरिक व्यक्तित्व को आभा प्रदान करते हैं। यदि हम अपने परिश्रमपूर्वक किये गये कर्मों में अपने मन और मस्तिष्क का भी पूर्ण उपयोग करें। असूया (गुणों में दोष दर्शन) का त्याग करके एवं श्रद्धापूर्वक कर्मयोग का पालन करने से ही यह संभव हो सकेगा।श्रद्धा संस्कृत में श्रद्धा का भाव गम्भीर है जिसे अंग्रेजी भाषा के किसी एक शब्द द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता।श्रीशंकराचार्य श्रद्धा को पारिभाषित करते हुए कहते हैं कि शास्त्र और गुरु के वाक्यों में वह विश्वास जिसके द्वारा सत्य का ज्ञान होता है श्रद्धा कहलाता है।यहाँ किसी प्रकार के अन्धविश्वास को श्रद्धा नहीं कहा गया है वरन् उसे बुद्धि की वह सार्मथ्य बताया गया है जिससे सत्य का ज्ञान होता है। बिना विश्वास के किसी कार्य में प्रवृत्ति नहीं होती तथा विचारों की परिपक्वता के बिना विश्वास में दृढ़ता नहीं आती है।अनसूयन्त (गुणों में दोष को नहीं देखने वाले) सामान्यत जगत् में हम जो कुछ ज्ञान प्राप्त करते हैं उसे समझने के लिये उसकी आलोचना भी की जाती है उसके विरुद्ध तर्क दिये जाते हैं। परन्तु यहाँ भगवान् अर्जुन को सावधान करते हैं कि केवल उग्र वादविवाद अथवा गहन अध्ययन मात्र में ही इस ज्ञान का उपयोग नहीं है। वास्तविक जीवन में उतारने से ही इस ज्ञान की सत्यता का अनुभव किया जा सकता है।वे भी कर्म से मुक्त होते हैं ऐसे वाक्यों को पढ़कर अनेक विद्यार्थी स्तब्ध रह जाते हैं। अब तक भगवान् कुशलतापूर्वक कर्म करने का उपदेश दे रहे थे और अब अचानक कहते हैं कि वे भी कर्म से मुक्त हो जाते हैं। स्वाभाविक है कि जो पुरुष शास्त्रीय शब्दों के अर्थों को नहीं जानता उसे इन वाक्यों में विरोधाभास दिखाई देता है।नैर्ष्कम्य शब्द के अर्थ को स्पष्ट करते समय हमने देखा कि आत्मअज्ञान ही इच्छा विचार और कर्म के रूप में व्यक्त होता है। अत आनन्दस्वरूप आत्मा को पहचानने पर अविद्याजनित इच्छायें और कर्मों का अभाव हो जाता है। इसलिये यहाँ बताई हुई कर्मों से मुक्ति का वास्तविक तात्पर्य है अज्ञान के परे स्थित आत्मस्वरूप की प्राप्ति।केवल कर्मों के द्वारा परमात्मस्वरूप में स्थिति नहीं प्राप्त की जा सकती। संसदमार्ग स्वयं संसद नहीं है किन्तु वहाँ तक पहुँचने पर संसद भवन दूर नहीं रह जाता। इसी प्रकार यहाँ कर्मयोग को ही परमार्थ प्राप्ति का मार्ग कहकर उसकी प्रशंसा की गई है क्योंकि उसके पालन से अन्तकरण शुद्ध होकर साधक नित्यमुक्त स्वरूप का ध्यान करने योग्य बन जाता है।परन्तु इसके विपरीत
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.31।।येऽन्येऽपि मानवाः मम परमेश्वरस्य मतं फलाभिसंधिराहित्येन चित्तशोधकं कर्मानुष्ठेयमित्येवंरुपं सप्रमाणमुक्तमीश्वरेण सर्वज्ञेनाप्ततमेनोक्तं यत्तत्तथ्यमेवेति निश्चयः श्रद्धा तद्युक्ता अतएवानुसूयन्तो मयि परम गुरौ वासुदेवेऽसूयादुःखात्मके कर्मण्यस्मान् प्रेरयतीति सुखसाधने तस्मिन्दोषारोपणमकुर्वन्तोऽनुतिष्ठन्ति अनुवर्तन्ते तेऽप्येवंभूताः सत्त्वशुद्धद्धिद्वारा ज्ञानप्राप्त्या धर्माधर्माख्यैः कर्मभिर्मुच्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.31।।फलाभिसंधिराहित्येन भगवदर्पणबुद्ध्या विहितकर्मानुष्ठानं सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण मुक्तिफलमित्याह। इदं फलाभिसंधिराहित्येन विहितकर्माचरणरूपं मम मतं नित्यं नित्यवेदबोधितत्वेनानादिपंरपरागतं आवश्यकमिति वा सर्वदेति वा मानवा मनुष्याः ये केचित् मनुष्याधिकारित्वात्कर्मणां श्रद्धावन्तः शास्त्राचार्योपदिष्टेर्थेऽननुभूतेऽप्येवमेवैतदिति विश्वासः श्रद्धा तद्वन्तः। अनसूयन्तः गुणेषु दोषाविष्करणसूया सा च दुःखात्मके कर्मणि मां प्रवर्तयन्नकारुणिकोऽयमित्येवंरूपा। प्रकृते प्रसक्तां तामसूंयामपि गुरौ वासुदेवे सर्वसुहृद्यकुर्वन्तो येऽनुतिष्ठन्ति तेऽपि सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण सम्यक् ज्ञानिवन्मुच्यन्ते कर्मभिर्धर्माधर्माख्यैः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.31।।ये म इति। येऽन्येऽपि त्वादृशाः मे मम मतमसक्त्या कर्मानुष्ठानं अनुतिष्ठन्त्यनुवर्तन्ते मानवाः श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः अत्र दोषमपश्यन्तः तेऽपि स्वकर्मभिर्धर्माधर्माख्यैर्मुच्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.31।।अर्जुनार्थं चेद्भगवतोक्तं स्यात्तदाऽर्जुनस्य तत्रैवासक्तिः स्यात्तदाऽग्रे पुष्टिरूपसर्वत्यागोपदेशोऽनुपपन्नः स्यात् अर्जुनस्याप्यन्यत्रानधिकाराद्भगवदुक्तेषु धर्मेष्वपि न प्रवृत्तिः स्वयोग्योपदेशार्थं पुनः पुनः प्रश्नानेव कृतवान्। ननु तदर्थं नोक्तं चेत्किमर्थम् तदर्जुनद्वारा सकलसन्मार्गप्रवृत्त्यर्थमुक्तम्। तदेवाह परं योऽन्योऽप्येवं कुर्यात्तस्यापि कर्मजो बन्धो न स्यादित्याहुः ये मे मतमिति। ये मानवाः सद्धर्मोत्पन्ना मे मतमिदं पूर्वोक्तं श्रद्धावन्तो मदुक्तत्वादनसूयन्तोऽसहिष्णुताहीना अनुतिष्ठन्ति तेऽपि कर्मभिस्तज्जन्यफलभोगैर्मुच्यन्ते। मदाज्ञया कृतत्वान्मदुक्तिविश्वासतोऽन्यकर्माण्यपि मोक्षसाधकान्येव भवन्तीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.31।।एवं कर्मानुष्ठाने गुणमाह ये मे मतमिति। मद्वाक्ये श्रद्धावन्तः अनसूयन्तः दुःखात्मके कर्मणि प्रवर्तयतीति दोषदृष्टिमकुर्वन्तश्च। ये मे मदीयमिदं मतमनुतिष्ठन्ति तेऽपि शनैः कर्मकुर्वाणाः सम्यग्ज्ञानिवत्कर्मभिर्मुच्यन्ते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.31।।एवं कर्मानुष्ठाने गुणमाह ये मे मतमिति। तेऽपि कर्मभिरेव कृत्वा कर्मतो वा मुक्तिं प्राप्नुवन्तीत्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.31।।कर्म करने चाहिये ऐसा जो यह मत प्रमाणसहित कहा गया वह यथार्थ है ( ऐसा मानकर ) जो श्रद्धायुक्त मनुष्य गुरुस्वरूप मुझ वासुदेवमें असूया न करते हुए ( मेरे गुणोंमें दोष न देखते हुए ) मेरे इस मतके अनुसार चलते हैं वे ऐसे मनुष्य भी पुण्यपापरूप कर्मोंसे मुक्त हो जाते हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.31।। व्याख्या ये मे मतमिदं ৷৷. श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय आदिका कोई भी मनुष्य यदि कर्मबन्धनसे मुक्त होना चाहता है तो उसे इस सिद्धान्तको मानकर इसका अनुसरण करना चाहिये। शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ कर्म आदि कुछ भी अपना नहीं है इस वास्तविकताको जान लेनेवाले सभी मनुष्य कर्मबन्धनसे छूट जाते हैं। भगवान् और उनके मतमें प्रत्यक्षकी तरह निःसन्देह दृढ़ विश्वास और पूज्यभावसे युक्त मनुष्यको श्रद्धावन्तः पदसे कहा गया है।शरीरादि जड पदार्थोंको अपने और अपने लिये न माननेसे मनुष्य मुक्त हो जाता है इस वास्तविकतापर श्रद्धा होनेसे जडताके माने हुए सम्बन्धका त्याग करना सुगम हो जाता है।श्रद्धावान् साधक ही सत्शास्त्र सत्चर्चा और सत्सङ्गकी बातें सुनता है और उनको आचरणोंमें लाता है।मनुष्यशरीर परमात्मप्राप्तिके लिये ही मिला है। अतः परमात्माको ही प्राप्त करनेकी एकमात्र उत्कट अभिलाषा होनेपर साधकमें श्रद्धा तत्परता संयतेन्द्रियता आदि स्वतः आ जाते हैं। अतः साधकको मुख्यरूपसेपरमात्मप्राप्तिकी अभिलाषा ही तीव्र बनाना चाहिये।पीछेके (तीसवें) श्लोकमें भगवान्ने अपना जो मत बताया है उसमें दोषदृष्टि न करनेके लिये यहाँ अनसूयन्तः पद दिया गया है। गुणोंमें दोष देखनेको असूया कहते हैं। असूया(दोषदृष्टि) से रहित मनुष्योंको यहाँ अनसूयन्तः कहा गया है।जहाँ श्रद्धा रहती है वहाँ भी किसी अंशमें दोषदृष्टि रह सकती है। इसलिये भगवान्ने श्रद्धावन्तः पदके साथ अनसूयन्तः पद भी देकर मनुष्यको दोषदृष्टिसे सर्वथा रहित (पूर्ण श्रद्धावान्) होनेके लिये कहा है। इसी प्रकार गीताश्रवणका माहात्म्य बताते हुए भी भगवान्ने श्रद्धावाननसूयश्च (गीता 18। 71) पद देकर श्रोताके लिये श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टिसे रहित होनेकी बात कही है। भगवान्का मत तो उत्तम है पर भगवान् कितनी आत्मश्लाघा अभिमानकी बात कहते हैं कि सब कुछ मेरे ही अर्पण कर दो अथवा यह मत तो अच्छा है पर कर्मोंके द्वारा भगवत्प्राप्ति कैसे हो सकती है कर्म तो जड और बाँधनेवाले होते हैं आदिआदि भाव आना ही भगवान्के मतमें दोषदृष्टि करना है। साधकको भगवान् और उनके मत दोनोंमें ही दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये।वास्तवमें सब कुछ भगवान्का ही है परन्तु मनुष्य भूलसे भगवान्की वस्तुओंको अपनी मानकर बँध जाता है और ममताकामनाके वशमें होकर दुःख पाता रहता है। अतः इस अपनेपनका त्याग करवाकर मनुष्यका उद्धार करनेके लिये (कि वह सदाके लिये सुखी हो जाय) भगवान् अपनी सहज करुणासे सब कुछ अपने अर्पण करनेकी बात करते हैं। अतः इस विषयमें दोषदृष्टि करना अनुचित है। यह तो भगवान्का परम सौहार्द कारुण्य वात्सल्य ही है कि अपनेमें कोई अपूर्णता (कमी) और आवश्यकता न होनेपर भी केवल मनुष्यके कल्याणार्थ वे समस्त कर्मोंको अपने अर्पण करनेके लिये कहते हैं।भगवान्का मत ही लोकमें सिद्धान्त कहलाता है। सर्वोपरि सिद्धान्तको ही यहाँ मतम् पदसे कहा गया है। भगवान्ने अपनी सहज सरलता एवं निरभिमानताके कारण सर्वोपरि सिद्धान्तको मत नामसे कहा है। यह मत या सिद्धान्त त्रिकालमें एकजैसा रहता है अर्थात् इसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता चाहे कोई श्रद्धा करे या न करे।यहाँ नित्यम् पद मतम् का विशेषण नहीं प्रत्यत अनुतिष्ठन्ति पदका ही विशेषण है। कारण कि भगवान् नित्य हैं अतः उनसे सम्बन्धित समस्त वस्तुएँ भी नित्य ही हैं। भगवान्का मत भी नित्य है। भगवान्का मत सर्वोपरि सिद्धान्त है और सिद्धान्त वही होता है जो कभी मिटता नहीं। अतः भगवान्का मत तो नित्य है ही उसका अनुष्ठान नित्य होना चाहिये। इसलिये यहाँ क्रियाविशेषण नित्यम् पद देनेका तात्पर्य है भगवान्के मतपर नित्यनिरन्तर (सदा) स्थित रहना तथा इसके अनुसार अनुष्ठान करना। प्रश्न भगवान्का मत क्या है और उसका सदा अनुष्ठान कैसे किया जाय उत्तर मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं है यह भगवान्का मत है। शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण धन सम्पत्ति पदार्थ आदि सब प्रकृतिके कार्य हैं और संसार भी प्रकृतिका कार्य है। इसलिये इन वस्तुओंकी संसारसे एकता है तथा परमात्माका अंश होनेसे स्वयं की परमात्मासे एकता है। अतः ये वस्तुएँ व्यक्तिगत (अपनी) नहीं हैं प्रत्युत इनके उपयोगका अधिकार व्यक्तिगत है। इसके सिवाय सद्गुण सदाचार त्याग वैराग्य दया क्षमा आदि भी व्यक्तिगत नहीं हैं प्रत्युत भगवान्के हैं। ये दैवी सम्पत्ति अर्थात् भगवत्प्राप्तिकी सम्पत्ति (पूँजी) होनेसे भगवान्के ही हैं। यदि ये सद्गुण सदाचार आदि अपने होते तो इनपर हमारा पूरा अधिकार होता और हमारी सम्मतिके बिना किसी दूसरेको इनकी प्राप्ति न होती। इनको अपना माननेसे तोअभिमान ही होता है जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है।जो वस्तु अपनी नहीं है उसे अपनी माननेसे और उसकी प्राप्तिके लिये कर्म करनेसे ही बन्धन होता है। शरीरादि वस्तुएँ अपनी तो हैं ही नहीं अपने लिये भी नहीं हैं। यदि ये अपने लिये होतीं तो इनकी प्राप्तिसे हमें पूर्ण तृप्ति या संतोष हो जाता पूर्णताका अनुभव हो जाता। परन्तु सांसारिक वस्तुएँ कितनी ही क्यों न मिल जायँ कभी तृप्ति नहीं होती। तृप्ति या पूर्णताका अनुभव उस वस्तु(भगवान्) के मिलनेपर होता है जो वास्तवमें अपनी है। अपनी वास्तविक वस्तुके मिलनेपर फिर स्वप्नमें भी कुछ पानेकी इच्छा नहीं रहती। जैसे संसारमें सभी पुत्रवती स्त्रियाँ माताएँ ही हैं पर बालकको उन सभी माताओंके मिलनेसे संतोष नहीं होता प्रत्युत अपनी माताके मिलनेसे ही संतोष होता है। इसी तरह जबतक और पानेकी इच्छा रहती है तबतक यही समझना चाहिये कि अपनी वस्तु मिली ही नहीं। मिली हुई वस्तुओंको भूलसे भले ही अपनी मान लें पर वास्तवमें वे अपनी हैं नहीं और इसलिये उनसे अपनी तृप्ति भी नहीं होती। अतः मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी और अपने लिये नहीं है।शरीरादि प्राप्त वस्तुओंको न तो हम अपने साथ लाये थे और न अपने साथ ले ही जा सकते हैं तथा वर्तमानमें भी ये हमारेसे प्रतिक्षण वियुक्त हो रही हैं। वर्तमानमें जो ये अपनी प्रतीत होती हैं वह भी सदुपयोग करने अर्थात् दूसरोंके हितमें लगानेके लिये न कि अपना अधिकार जमानेके लिये। अतः हमें प्राप्त वस्तुओंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है अपनी माननेका नहीं। भगवान्ने मनुष्यको ये वस्तुएँ इतनी उदारतापूर्वक और इस ढंगसे दी हैं कि मनुष्यको ये वस्तुएँ अपने ही दीखने लगती हैं। इन वस्तुओंको अपनी मान लेना भगवान्की उदारताका दुरुपयोग करना है। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं पर जिन्हें भूलसे अपनी मान लिया है उस भूलको मिटानेके लिये साधक अध्यात्मचित्तसे गहरा विचार करके उन्हें भगवान्के अर्पण कर दे अर्थात् भूलसे माना हुआ अपनापन हटा ले।जिसका एकमात्र उद्देश्य अध्यात्मतत्त्व(परमात्मा) की प्राप्तिका है ऐसा साधक यदि गम्भीरतापूर्वक विचार करे तो उसे स्पष्टरूपसे समझमें आ जायगा कि मिली हुई कोई भी वस्तु अपनी नहीं होती प्रत्युत बिछुड़नेवाली होती है। शरीर पद अधिकार शिक्षा योग्यता धन सम्पत्ति जमीन आदि जो कुछ मिला है संसारसे ही मिला है और संसारके लिये ही है। मिली हुई वस्तुओंको चाहे संसार(कार्य) का माने चाहे प्रकृति(कारण) का माने और चाहे भगवान्(स्वामी) का माने पर सार (मुख्य) बात यही है कि वे अपनी नहीं हैं। जो वस्तुएँ अपनी नहीं हैं वे अपने लिये कैसे हो सकती हैंसाधकको न तो कोई वस्तु अपनी माननी है और न कोई कर्म ही अपने लिये करना है। अपने लिये किये गये कर्म बाँधनेवाले होते हैं (गीता 3। 9) अर्थात् यज्ञ(निष्कामभावपूर्वक परहितके लिये किये जानेवाले कर्तव्यकर्म) के अतिरिक्त अन्य (अपने लिये किये गये) कर्म मनुष्यको बाँधनेवाले होते हैं। यज्ञके लिये कर्म करनेवाले साधकके सम्पूर्ण कर्म सञ्चितकर्म भी विलीन हो जाते हैं (गीता 4। 23)। भगवान् समस्त लोकोंके महान् ईश्वर (स्वामी) हैं सर्वलोकमहेश्वरम् (गीता 5। 29)। जब मनुष्य अपनेको वस्तुओंका स्वामी मान लेता है तब वह अपने वास्तविक स्वामीको भूल जाता है क्योंकि वह अपनेको जिनवस्तुओंका स्वामी मानता है उसे उन्हीं वस्तुओंका चिन्तन होता है। अतः भगवान्को ही विश्वका एकमात्र स्वामी मानते हुए साधकको संसारमें सेवककी तरह रहना चाहिये। सेवक अपने स्वामीके समस्त कार्य करते हुए भी अपनेको कभी स्वामी नहीं मानता। अतः साधकको शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदिको अपना न मानकर केवल भगवान्का मानते हुए अपने कर्तव्यका पालन कर देना चाहिये कर्म करनेमें निमित्तमात्र बन जाना चाहिये। अपनेमें स्वामीपनेका अभिमान नहीं करना चाहिये।सर्वस्व भगवदर्पण करनेके बाद लाभहानि मानअपमान सुखदुःख आदि जो कुछ आये उनको भी साधक भगवान्का ही माने और उनसे अपना कोई प्रयोजन न रखे। कर्तव्यमात्र प्राप्त परिस्थितिके अनुरूपहोता है। परिस्थितिके अनुरूप प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करता रहे। यही भगवान्के मतका सदा अनुसरण करना है।मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें तो सर्वस्व मेरे अर्पण करके कर्तव्यकर्म करनेकी स्पष्ट आज्ञा दे रहा हूँ अतः मेरी आज्ञाका पालन करनेसे तुम्हारे मुक्त होनेमें कोई सन्देह नहीं है परन्तु जिनको मैं इस प्रकार स्पष्ट आज्ञा नहीं देता हूँ वे भी अगर इस मत(मिले हुएको अपना न मानकर कर्तव्यकर्मका पालन करना) के अनुसार चलेंगे तो वे भी मुक्त हो जायेंगे। कारण कि यह मत ही ऐसा है कि चाहे मुझे माने या न माने केवल इस मतका पालन करनेसे ही मनुष्य मुक्त हो जाता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.31 3.32।।ये म इति। ये त्वेतदिति। एतच्च मतमाश्रित्य यः कश्चित् यत्किंचित् करोति तत्तस्य न बन्धकम्। एतस्मिंस्तु ज्ञाने ये न श्रद्धालवः ( श्रद्धालवाः) ते विनष्टाः अविरतं जन्ममरणादि ( S omitsआदि) भयभावितत्त्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.31।।प्रकृतं भगवतो मतमुक्तप्रकारमनुसृत्यैवानुतिष्ठतां क्रममुक्तिफलं कथयति यदेतदिति। शास्त्राचार्योपदिष्टेऽदृष्टार्थे विश्वासवत्त्वं श्रद्दधानत्वं गुणेषु दोषाविष्करणमसूया अपिर्यथोक्ताया मुक्तेरमुख्यत्वद्योतनार्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.31 3.32।।अन्यथाप्रतीतिं निराकर्तुं तावदुत्तरश्लोकद्वयप्रतिपाद्यमाह फलमिति। केचिद्विद्वांसः कुर्वन्तीत्येतावता मया कार्यं न वा इत्याशङ्क्य स्वोक्तकरणाकरणयोः फलमाहेत्यर्थः।मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः इत्यपिशब्देन ज्ञानमिव निवृत्तं कर्मापि मोक्षसाधनमुच्यते इत्यन्यथा प्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे ये त्विति। कैमुत्यद्योतनार्थोऽपिशब्दो न समुच्चयार्थ इत्यर्थः। प्रासङ्गिकं चैतत्। समुच्चये यद्यपिशब्दः स च द्वेधा ज्ञानमिव कर्मापि पृथक्साधनं ज्ञानकर्मसमुच्चय एवेति। तत्राद्यपक्षं निराकरोति न त्विति।निष्कामत्वादिनाऽनुष्ठितानि यज्ञादीनि निवृत्तानि। आदिपदेन नित्यनैमित्तिकानां ग्रहणम्। अपरोक्षा च सा ईशदृष्टिश्च तादर्थ्ये चतुर्थी। मुक्तौ मुक्तिसाधने किञ्चित्सहकारि कर्मापि मुक्तिसाधनमुच्यत इत्यत उक्तंसर्वमिति। तत्सर्वं निवृत्तादिकम्। अन्तरा मध्ये। ज्ञानमाधाय। मुक्तये मुक्तेः। अहल्यायै जारेति यथा। साक्षात् साधनत्वेन श्रुतमपि कर्म यथा व्यवहितं जातं किमपि ज्ञानं तथा नेत्युक्तम् न किञ्चिदिति। द्वितीयमपि प्रकारमतिदेशेन निराचष्टे अत एवेति।अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते इत्युक्तत्वादेवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.31 3.32।।फलमाह ये म इति। ये त्वेवं निवृत्तकर्मिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा किम्वपरोक्षज्ञानिनः न तु साधनान्तरमुच्यते।निवृत्तादीनि कर्माणि ह्यपरोक्षेशदृष्टये। अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते। सर्वं तदन्तराऽधाय मुक्तये साधनं भवेत्। न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् इति ह्युक्तं नारायणाष्टाक्षरकल्पे। अत एव समुच्चयनिमयो निराकृतः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.31।।ये मानवाः आत्मनिष्ठशास्त्राधिकारिणःअयम् एव शास्त्रार्थः इत्येतत् मे मतं निश्चित्य तथा अनुतिष्ठन्ति ये च अननुतिष्ठन्तः अपि अस्मिन् शास्त्रार्थे श्रद्दधाना भवन्ति ये च अश्रद्दधाना अपिएवं शास्त्रार्थो न संभवति इति न अभ्यसूयन्ति अस्मिन् महागुणे शास्त्रार्थे दोषदर्शिनो न भवन्ति इत्यर्थः ते सर्वे बन्धहेतुभिः अनादिकालप्रारब्धैः कर्मभिः मुच्यन्ते। ते अपि कर्मभिः इति अपिशब्दाद् एषां पृथक्करणम्। इदानीम् अननुतिष्ठन्तः अपि अस्मिन् शास्त्रार्थे श्रद्दधाना अनभ्यसूयवः च श्रद्धया च अनसूयया च क्षीणपापा अचिरेण इमम् एव शास्त्रार्थम् अनुष्ठाय मुच्यन्ते इत्यर्थः।भगवदभिमतम् औपनिषद्म् अर्थम् अननुतिष्ठताम् अश्रद्दधानानाम् अभ्यसूयतां च दोषम् आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.31।। ये मे मदीयम् इदं मतं नित्यम् अनुतिष्ठन्ति अनुवर्तन्ते मानवाः मनुष्याः श्रद्धावन्तः श्रद्दधानाः अनसूयन्तः असूयां च मयि परमगुरौ वासुदेवे अकुर्वन्तः मुच्यन्ते तेऽपि एवंभूताः कर्मभिः धर्माधर्माख्यैः।।
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【 Verse 3.32 】
▸ Sanskrit Sloka: ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् | सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतस: ||
▸ Transliteration: ye tvetad abhyasūyanto nānutiṣṭhanti me matam I sarvajñānavimūḍhāṁstānviddhi naṣṭānacetasaḥ ||
▸ Glossary: ye: those; tu: but; etat : this; abhyasūyantaḥ: out of envy; na: not; anutiṣṭhanti: regularly perform; me: My; mataṁ: teaching; sarvajñāna: all kinds of knowl- edge; vimūḍhān: fooled; tān: they; viddhi: know; naṣṭān: ruined; acetasaḥ: without Consciousness
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.32 But those who do not regularly perform their duty ac- cording to My teaching, are ignorant, senseless and ruined.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.32।।परन्तु जो मनुष्य मेरे इस मतमें दोषदृष्टि करते हुए इसका अनुष्ठान नहीं करते उन सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित और अविवेकी मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझो।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.32।। परन्तु जो दोष दृष्टि वाले मूढ़ लोग इस मेरे मत का पालन नहीं करते उन सब ज्ञानों में मोहित चित्तवालों को नष्ट हुये ही तुम समझो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.32 ये those who? तु but? एतत् this? अभ्यसूयन्तः carping at? न not? अनुतिष्ठन्ति practise? मे My? मतम् teaching? सर्वज्ञानविमूढान् deluded of all knowledge? तान् them? विद्धि know? नष्टान् ruined? अचेतसः devoid of discrimination.Commentary The pigheaded people who are obstinate? who find fault with the teachings of the Lord and who do not practise them are certainly doomed to destruction. They are incorrigible and senseless persons indeed.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.32. But those who, finding fault, do not follow this doctrine of Mine-be sure that these men to be highly deluded in all [branches of] knowledge and to be lost and brainless.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.32 But they who ridicule My word and do not keep it, are ignorant, devoid of wisdom and blind. They seek but their own destruction.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.32 But those who calumniate it, and those who do not practise this teaching of Mine - know them to be absolutely senseless and devoid of all knowledge, and therefore lost.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.32 But those who, decaying [Finding fault where there is none.] this, do not follow My teaching, know them-who are deluded about all knoweldge [Knowledge concerning the alified and the un-alified Brahman.] and who are devoid of discrimination-to have gone to ruin.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.32 But those who carp at My teaching and do not practise it, deluded of all knowledge, and devoid of discrimination, know them to be doomed to destruction.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.31-32 Ye Me etc. Ye tvetat etc. Taking shelter in this doctrine whosoever performs any action, it does not bind him. On the other hand those, who have no faith is this knowledge, are lost totally; for, they are constantly socked in the fear of birth, death etc.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.32 But those who do not follow this view of Mine, namely, that the self has Me for Its support, is subservient to Me and is actuated by Me only, i.e., those who do not perform all acts contemplating in this way as also those who have no faith in the meaning of the Sastras and calumniate them - know them to be extremely deluded and devoid of reasoning and knowledge and conseently completely lost. For, the function of the mind is the determination of the real nature of things, and in its absence, those mentioned above are devoid of reason, and therefore apostates in knowledge and extremely deluded in all ways.
For one united with the Prakrti (body), the sense of agency results from the preponderance of the Gunas of Prakrti. But this agency really rests with the Supreme Person. Contemplating thus, Karma Yoga alone should be practised by both - those who are competent for Karma Yoga only and those who are competent for Jnana Yoga. The implied superiority of Karma Yoga has the following justifications; it is easy to perform, free from liability to lapse, and independent of anything else; it comprises the knowledge of the self also within its scope. On the other hand Jnana Yoga is difficult to practise, is not free from the liability to lapse, leaves one dependent on actions for the sustenance of the body etc. And for a distinguished perosn, this (i.e., Karma Yoga) is especially what ought to be practised.
Next, till the end of this chapter, it is explained how Jnana Yoga, being difficult, is liable to lead to lapses.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.32 Tu, but; ye, those who are the opposite of them (the former); who abhyasuyantah, decrying; etat, this instruction of Mine; na, do not; anutisthanti, follow; me, My; matam, teaching, they are deluded in various ways with respect to all knowledge. Viddhi, know; tan, them; sarva-jnana-vimudhan, who are deluded about off knowledge; acetasah, who are devoid of discrimination; nastan, to have gone to ruin. 'For what reason, again, do they not follow your teachings, perform duties that are not theirs and not follow their own duties? How is it that by remaining opposed to You, they do not fear the evil which will arise from transgressing Your ?ndments? As to that, the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.32।। भगवान् के उपदेश में दोष देखकर उसका पालन न करने से मनुष्य और भी अधिक मोहित हुआ अपनी ही हानि कर लेगा।जीवन के मार्ग को भली प्रकार समझ लेने पर ही मनुष्य को कर्ममय जीवन जीने के लिये उत्साहित किया जा सकता है। यदि मनुष्य पहले से किसी सिद्धांत की ही निन्दा में प्रवृत्त हो जाता है तो उस सिद्धांत के अनुरूप जीवन यापन की कोई सम्भावना ही नहीं रह जाती। कर्मयोग जीवन यापन का एक मार्ग है और उसके कल्याणकारी फल को प्राप्त करने के लिये हमें तदनुसार ही जीवन जीना होगा।अहंकार और स्वार्थ को त्यागकर कर्म करना ही आदर्श जीवन है जिसके द्वारा मनुष्य को नित्य और महान् उपलब्धियां प्राप्त हो सकती हैं। ऐसे जीवन का त्याग करने का अर्थ है अविवेक को निमन्त्रण देना और अन्त में स्वयं का नाश कराना।बुद्धि के कारण ही मनुष्य को प्राणि जगत् में सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। बुद्धि में स्थित आत्मानात्मविवेक सत्य और मिथ्या का विवेक करने की क्षमता का सदुपयोग ही आत्मविकास का एकमात्र उपाय है। विवेक के नष्ट होने पर वह पशु के समान मन की प्रवृत्तियों के अनुसार व्यवहार करने लगता है तथा मनुष्य जीवन के परम पुरुषार्थ को प्राप्त नहीं कर पाता। यही उसका विनाश है।क्या कारण है कि लोग इस उपदेशानुसार कर्तव्य पालन नहीं करते भगवान् के उपदेश का उल्लंघन करने में उन्हें भय क्यों नहीं लगता इसका उत्तर है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.32।।येतु तद्विपरीताः श्रद्धाहीना एतन्मम मतमभ्यसूयन्तः गुणेऽपि दोषमारोप्य निन्दन्तः नानुतिष्ठन्ति तान् कर्मज्ञाने सगुणज्ञाने निर्गुणज्ञाने चेति सर्वेषु ज्ञानेषु विविधप्रमाणप्रमेयप्रयोजनविभागे मूढान् सर्वप्रकारेणायोग्यान् अचेतसोऽविवेकिनो दुष्टचेतसो नष्टान् सर्वपुरुषार्थेभ्यो भ्रष्टान् विद्धि। सर्वशब्द ईश्वरवाचीसर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः इति निर्वचनात्। तस्य ज्ञाने इति व्याख्यानं तुक्तव्याख्याने ईश्वरज्ञानस्यान्तर्भावात् व्यर्थमेव लोकप्रसिद्धित्याग इत्यत उपेक्ष्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.32।।एवमन्वये गुणमुक्त्वा व्यतिरेके दोषमाह तुशब्दः श्रद्धावद्वैधर्म्यमश्रद्धां सूचयति। तेन ये नास्तिक्यादश्रद्दधाना अभ्यसूयन्तो दोषमुद्भावयन्तः एतन्मम मतं नानुवर्तन्ते तानचेतसो दुष्टचित्तान् अतएव सर्वज्ञानविमूढान् सर्वत्र कर्मणि ब्रह्मणि सगुणे निर्गुणे च यज्ज्ञानं तत्र विविधं प्रमाणतः प्रमेयतः प्रयोजनतश्च मूढान् सर्वप्रकारेणायोग्यान्नष्टान् सर्वपुरुषार्थभ्रष्टान्विद्धि जानीहि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.32।।विपक्षे दोषमाह येत्विति। सर्वशब्द ईश्वरवाची।सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः इति निर्वचनात्। तस्य ज्ञाने विषये विशेषेण मूढान्पारोक्ष्येणापि ते ईश्वरमजानन्तो देहमात्रनिष्ठास्तान् नष्टान्स्वर्गापवर्गभ्रष्टान् अचेतसः विवेकशून्यान्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.32।।ये मदाज्ञारूपत्वं विहाय कर्मैव फलसाधकं फलरूपमिति ज्ञात्वा कुर्वन्ति ते नश्यन्तीत्याहुः ये त्वेतदिति। ये तु एतन्मम मतमभ्यसूयन्तः कौटिल्येन जानन्तो नानुतिष्ठन्ति तान् सर्वज्ञानविमूढान् अचेतसः शून्यहृदयान् नष्टान् नाशं प्राप्तान् विद्धि जानीहि। मदाज्ञातिरेकं कर्मकर्त्तारो नश्यन्तीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.32।।विपक्षे दोषमाह येत्विति। ये तु मे मतमीश्वरार्थं कर्म कर्तव्यमित्यनुशासनमभ्यसूयन्तो द्विषन्तो नानुतिष्ठन्ति तानचेतसो विवेकशून्यानतएव सर्वस्मिन्कर्मणि ब्रह्मविषये च यज्ज्ञानं तत्र विमूढान्नष्टान्विद्धि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.32।।विपक्षे दोषमाह ये त्विति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.32।।परंतु जो उनसे विपरीत हैं मेरे इस मतको निन्दा करते हुए इस मेरे मतके अनुसार आचरण नहीं करते वे समस्त ज्ञानोंमें अनेक प्रकारसे मूढ़ हैं। सब ज्ञानोंमें मोहित हुए उन अविवेकियोंको तो तू नाशको प्राप्त हुए ही जान।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.32।। व्याख्या ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् तीसवें श्लोकमें वर्णित सिद्धान्तके अनुसार चलनेवालोंके लाभका वर्णन इकतीसवें श्लोकमें करनेके बाद इस सिद्धान्तके अनुसार न चलनेवालोंकी पृथक्ता करनेहेतु यहाँ तु पदका प्रयोग हुआ है।जैसे संसारमें सभी स्वार्थी मनुष्य चाहते हैं कि हमें ही सब पदार्थ मिलें हमें ही लाभ हो ऐसे ही भगवान् भी चाहते हैं कि समस्त कर्मोंको मेरे ही अर्पण किया जाय मेरेको ही स्वामी माना जाय इस प्रकार मानना भगवान् पर दोषारोपण करना है।कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा ममताका सर्वथा त्याग तो हो ही नहीं सकता रागद्वेषादि विकारोंसे रहित होना असम्भव है इस प्रकार मानना भगवान्के मत पर दोषारोपण करना है।भोग और संग्रहकी इच्छावाले जो मनुष्य शरीरादि पदार्थोंको अपने और अपने लिये मानते हैं और समस्त कर्म अपने लिये ही करते हैं वे भगवान्के मतके अनुसार नहीं चलते।सर्वज्ञानविमूढान् तान् जो मनुष्य भगवान्के मतका अनुसरण नहीं करते वे सब प्रकारके सांसारिक ज्ञानों(विद्याओं कलाओं आदि) में मोहित रहते हैं। वे मोटर हवाई जहाज रेडियो टेलीविजन आदि आविष्कारोंमें उनके कलाकौशलको जाननेमें तथा नयेनये आविष्कार करनेमें ही रचेपचे रहते हैं। जलपर तैरने मकान आदि बनाने चित्रकारी करने आदि शिल्पकलाओंमें मन्त्र तन्त्र यन्त्र आदिकी जानकारी प्राप्त करनेमें तथा उनके द्वारा विलक्षणविलक्षण चमत्कार दिखानेमें देशविदेशकी भाषाओं लिपियों रीतिरिवाजों खानपान आदिकी जानकारी प्राप्त करनेमें ही वे लगे रहते हैं। जो कुछ है वह यही है ऐसा उनका निश्चय होता है (गीता 16। 11)। ऐसे लोगोंको यहाँ सम्पूर्ण ज्ञानोंमें मोहित कहा गया है।अचेतसः भगवान्के मतका अनुसरण न करनेवाले मनुष्योंमें सत्असत् सारअसार धर्मअधर्म बन्धनमोक्ष आदि पारमार्थिक बातोंका भी ज्ञान (विवेक) नहीं होता। उनमें चेतनता नहीं होती वे पशुकी तरह बेहोश रहते हैं। वे व्यर्थ आशा व्यर्थ कर्म और व्यर्थ ज्ञानवाले विक्षिप्तचित्त मूढ़ पुरुष होते हैं मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः (गीता 9। 12)।विद्धि नष्टान् मनुष्यशरीरको पाकर भी जो भगवान्के मतके अनुसार नहीं चलते उन मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझना चाहिये। तात्पर्य है कि वे मनुष्य जन्ममरणके चक्रमें ही पड़े रहेंगे।मनुष्यजीवनमें अन्तकालतक मुक्तिकी सम्भावना रहती है (गीता 8। 5)। अतः जो मनुष्य वर्तमानमें भगवान्के मतका अनुसरण नहीं करते वे भी भविष्यमें सत्संग आदिके प्रभावसे भगवान्के मतका अनुसरण कर सकते हैं जिससे उनकी मुक्ति हो सकती है। परन्तु यदि उन मनुष्योंका भाव जैसा वर्तमानमें है वैसा ही भविष्यमें भी बना रहा तो उन्हें (भगवत्प्राप्तिसे वञ्चित रह जानेके कारण) नष्ट हुए ही समझना चाहिये। इसी कारणभगवान्ने ऐसे मनुष्योंके लिये नष्टान् विद्धि पदोंका प्रयोग किया है।भगवान्के मतका अनुसरण न करनेवाला मनुष्य समस्त कर्म राग अथवा द्वेषपूर्वक करता है। राग और द्वेष दोनों ही मनुष्यके महान शत्रु हैं तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ (गीता 3। 34)। नाशवान् होनेके कारण पदार्थ और कर्म तो सदा साथ नहीं रहते पर रागद्वेषपूर्वक कर्म करनेसे मनुष्य तादात्म्य ममता और कामनासे आबद्ध होकर बारबार नीच योनियों और नरकोंको प्राप्त होता रहता है। इसीलिये भगवान्ने ऐसे मनुष्योंको नष्ट हुए ही समझनेकी बात कही है।इकतीसवें और बत्तीसवें दोनों श्लोकोंमें भगवान्ने कहा है कि मेरे सिद्धान्तके अनुसार चलनेवाले मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाते हैं और न चलनेवाले मनुष्योंका पतन हो जाता है। इससे यह तात्पर्य निकलता है कि मनुष्य भगवान्को माने या न माने इसमें भगवान्का कोई आग्रह नहीं है परन्तु उसे भगवान्के मत(सिद्धान्त) का पालन अवश्य करना चाहिये इसमें भगवान्की आज्ञा है। अगर वह ऐसा नहीं करेगा तो उसका पतन अवश्य हो जायगा। हाँ यदि साधक भगवान्को मानकर उनके मतका अनुष्ठान करे तो भगवान् उसे अपनेआपको दे देंगे। परन्तु यदि भगवान्को न मानकर केवल उनके मतका अनुष्ठान करे तो भगवान् उसका उद्धार कर देंगे। तात्पर्य यह है कि भगवान्को माननेवालेको प्रेमकी प्राप्ति और भगवान्का मत माननेवालेको मुक्तिकी प्राप्ति होती है। सम्बन्ध भगवान्के मतके अनुसार कर्म न करनेसे मनुष्यका पतन हो जाता है ऐसा क्यों है इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.31 3.32।।ये म इति। ये त्वेतदिति। एतच्च मतमाश्रित्य यः कश्चित् यत्किंचित् करोति तत्तस्य न बन्धकम्। एतस्मिंस्तु ज्ञाने ये न श्रद्धालवः ( श्रद्धालवाः) ते विनष्टाः अविरतं जन्ममरणादि ( S omitsआदि) भयभावितत्त्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.32।।भगवन्मताननुवर्तिनां प्रत्यवायित्वं प्रत्याययति ये त्विति। तद्विपरीतत्वं भगवन्मतानुवर्तिभ्यो वैपरीत्यंतदेव दर्शयति एतदित्यादिना। अभ्यसूयन्तस्तत्रासन्तमपि दोषमुद्भावयन्त इत्यर्थः। सर्वज्ञानानि सगुणनिर्गुणविषयाणि। प्रमाणप्रमेयप्रयोजनविभागतो विविधत्वम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.31 3.32।।अन्यथाप्रतीतिं निराकर्तुं तावदुत्तरश्लोकद्वयप्रतिपाद्यमाह फलमिति। केचिद्विद्वांसः कुर्वन्तीत्येतावता मया कार्यं न वा इत्याशङ्क्य स्वोक्तकरणाकरणयोः फलमाहेत्यर्थः।मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः इत्यपिशब्देन ज्ञानमिव निवृत्तं कर्मापि मोक्षसाधनमुच्यते इत्यन्यथा प्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे ये त्विति। कैमुत्यद्योतनार्थोऽपिशब्दो न समुच्चयार्थ इत्यर्थः। प्रासङ्गिकं चैतत्। समुच्चये यद्यपिशब्दः स च द्वेधा ज्ञानमिव कर्मापि पृथक्साधनं ज्ञानकर्मसमुच्चय एवेति। तत्राद्यपक्षं निराकरोति न त्विति। निष्कामत्वादिनाऽनुष्ठितानि यज्ञादीनि निवृत्तानि। आदिपदेन नित्यनैमित्तिकानां ग्रहणम्। अपरोक्षा च सा ईशदृष्टिश्च तादर्थ्ये चतुर्थी। मुक्तौ मुक्तिसाधने किञ्चित्सहकारि कर्मापि मुक्तिसाधनमुच्यत इत्यत उक्तंसर्वमिति। तत्सर्वं निवृत्तादिकम्। अन्तरा मध्ये। ज्ञानमाधाय। मुक्तये मुक्तेः। अहल्यायै जारेति यथा। साक्षात् साधनत्वेन श्रुतमपि कर्म यथा व्यवहितं जातं किमपि ज्ञानं तथा नेत्युक्तम् न किञ्चिदिति। द्वितीयमपि प्रकारमतिदेशेन निराचष्टे अत एवेति।अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते इत्युक्तत्वादेवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.31 3.32।।फलमाह ये म इति। ये त्वेवं निवृत्तकर्मिणस्तेऽपि मुच्यन्ते ज्ञानद्वारा किम्वपरोक्षज्ञानिनः न तु साधनान्तरमुच्यते।निवृत्तादीनि कर्माणि
Chapter 3 (Part 20)
ह्यपरोक्षेशदृष्टये। अपरोक्षेशदृष्टिस्तु मुक्तौ किञ्चिन्न मार्गते। सर्वं तदन्तराऽधाय मुक्तये साधनं भवेत्। न किञ्चिदन्तराधाय निर्वाणायापरोक्षदृक् इति ह्युक्तं नारायणाष्टाक्षरकल्पे। अत एव समुच्चयनिमयो निराकृतः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.32।।ये तु एतत् सर्वम् आत्मवस्तु मच्छरीरतया मदाधारं मच्छेषभूतं मदेकप्रवर्त्त्यम् इति मे मतं न अनुतिष्ठन्ति न एवम् अनुसन्धाय सर्वाणि कर्माणि कुर्वते ये च न श्रद्दधते ये च अभ्यसूयन्तो वर्तन्ते तान् सर्वेषु ज्ञानेषु विशेषेण मूढान् तत एव नष्टान् अचेतसो विद्धि। चेतःकार्यं हि वस्तुयाथात्म्यनिश्चयः तदभावाद् अचेतसः विपरीतज्ञानाः सर्वत्र विमूढाश्च।एवं प्रकृतिसंसर्गिणः तद्गुणोद्रेककृतं कर्तृत्वं तच्च परमपुरुषायत्तम् इति अनुसन्धाय कर्मयोगयोग्येन ज्ञानयोगयोग्येन च कर्मयोगस्य सुशकत्वाद् अप्रमादत्वाद् अन्तर्गतात्मज्ञानतया निरपेक्षत्वाद् इतरस्य दुःशकत्वात् सप्रमादत्वात् शरीरधारणाद्यर्थतया कर्मापेक्षत्वात् कर्मयोग एव कर्तव्यः। व्यपदेश्यस्य तु विशेषतः स एव कर्तव्य इति च उक्तम्। अतः परम् अध्यायशेषेण ज्ञानयोगस्य दुःशकतया सप्रमादता उच्यते
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.32।। ये तु तद्विपरीताः एतत् मम मतम् अभ्यसूयन्तः निन्दन्तः न अनुतिष्ठन्ति नानुवर्तन्ते मे मतम् सर्वेषु ज्ञानेषु विविधं मूढाः ते। सर्वज्ञानविमूढान् तान् विद्धि जानीहि नष्टान् नाशं गतान् अचेतसः अविवेकिनः।।कस्मात् पुनः कारणात् त्वदीयं मतं नानुतिष्ठन्ति परधर्मान् अनुतिष्ठन्ति स्वधर्मं च नानुवर्तन्ते त्वत्प्रतिकूलाः कथं न बिभ्यति त्वच्छासनातिक्रमदोषात् तत्राह
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【 Verse 3.33 】
▸ Sanskrit Sloka: सदृशं चेष्टते स्वस्या: प्रकृतेर्ज्ञानवानपि | प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रह: किं करिष्यति ||
▸ Transliteration: sadṛśaṁ ceṣṭate svasyāḥ prakṛterjñānavānapi | prakṛtiṁ yānti bhūtāni nigrahaḥ kiṁ kariṣyati ||
▸ Glossary: sadṛśaṁ: according to; ceṣṭate: tries; svasyāḥ: by one’s nature; prakṛteḥ: modes; jñānavān: wise; api: even; prakṛtiṁ: nature; yānti: goes through; bhūtāni: living beings; nigrahaḥ: suppression; kiṁ: what; kariṣyati: can do
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.33 Even the wise person tries to act according to the modes of his own nature, for all living beings go through their nature. What can restraint of the senses do?
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.33।।सम्पूर्ण प्राणी प्रकृतिको प्राप्त होते हैं। ज्ञानी महापुरुष भी अपनी प्रकृतिके अनुसार चेष्टा करता है। फिर इसमें किसीका हठ क्या करेगा
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.33।। ज्ञानवान् पुरुष भी अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। सभी प्राणी अपनी प्रकृति पर ही जाते हैं फिर इनमें (किसी का) निग्रह क्या करेगा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.33 सदृशम् in accordance? चेष्टते acts? स्वस्याः of his own? प्रकृतेः of nature? ज्ञानवान् a wise man? अपि even? प्रकृतिम् to nature? यान्ति follow? भूतानि beings? निग्रहः restraint? किम् what? करिष्यति will do.Commentary He who reads this verse will come to the conclusion that there is no scope for mans personal exertion. It is not so. Read the following verse. It clearly indicates that man can coner Nature if he rises above the sway of RagaDvesha (love and hatred).The passionate and ignorant man only comes under the sway of his natural propensities? and his lower nature. He cannot have any restraint over the senses and the two currents of likes and dislikes. The seeker after Truth who is endowed with the four means? and who is constantly practising meditation can easily control Nature. (Cf.II.60V.14XVIII.59).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.33. Even a man of knowledge acts in conformity to his own Prakrti, the elements go [back] to the Prakrti; [and] what will the restraint avail ?
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.33 Even the wise man acts in character with his nature; indeed, all creatures act according to their natures. What is the use of compulsion then?
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.33 Even the man of knowledge acts according to his nature; all beings follow their nature. What will repression do?
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.33 Even a man of wisdom behaves according to his own nature. Being follow (their) nature. What can restraint do?
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.33 Even a wise man acts in accordance with his own nature; beings will follow Nature; what can restraint do?
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.33 Sadrsam etc. There is hardly any difference in the wordly activities like eating etc., of him who is a man of wisdom. But he too acts only in conformity to the Sattva, etc., just knowing in this manner : 'Because the elements like the Earth etc. get absorbed into the prakrti; and the Self is also a non-doer and ever-freed; therefore the erradication of birth etc., are for whose sake ?' Then how can there be bondage at all [for a man of worldly life] ? That is as follows, it is said :
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.33 Such and such is the nature of the self, which is different from the Prakrti - this has to be always contemplated upon: thus declare the Sastras. Even a person who knows this, acts in relation to material objects only according to his own nature, i.e., guided by his old subtle impressions. How is this? 'All beings follow their nature.' Beings in conjunction with non-conscient matter, all follow only subtle impressions which have continued to come from time immemorial. What can the control enjoined by Sastras, do to these beings who follow their subtle impressions?
Sri Krsna expounds the way by which individuals are overpowered to follow their respective natures:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.33 Api, even; jnanavan, a man of wisdom-what to speak of a fool!; cestate, behaves; Sadrsam, according to;-what? svasyah, his own; prakrteh, nature. Nature means the impressions of virtue, vice, etc. [Also, knowledge, desires, and so on.] acired in the past (lives) and which become manifest at the commencement of the present life. All creatures (behave) according to that only. Therefore, bhutani, beings; yanti, follow; (their) prakrtim, nature. Nigrahah kim karisyati, what can restraint do, be it from Me or anybody else? If all beings behave only according to their own nature-and there is none without his nature-, then, since there arises the contingency of the scriptures becoming purposeless owing to the absence of any scope for personal effort, therefore the following is being stated:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.33।। जिस प्रकार के विचारों का चिन्तन हम करते हैं उनसे विचारों की दिशा निर्धारित होती है और वे स्थायी भाव का रूप लेते हैं इसको ही हमारा स्वभाव कहा जाता है। किसी समय मनुष्य का स्वभाव उसके मन में उठने वाले विचारों से निश्चित किया जाता है। यहाँ कहा गया है कि ज्ञानवान् पुरुष भी अपने स्वभाव के अनुसार ही कार्य करता है।यहाँ ज्ञानवान शब्द का अर्थ है वह पुरुष जिसने कर्मयोग के सिद्धान्त को भली भाँति समझ लिया है। यद्यपि वह सिद्धान्त को जानता है तथापि उसे कार्यान्वित करने में कठिनाई आती है क्योंकि उसका स्वभाव उसके कार्य में बाधा उत्पन्न करता है। पूर्वाजिर्त वासनाओं के कारण इस सरल से प्रतीत होने वाले सिद्धांत को मनुष्य अपने जीवन में नहीं उतार पाता। इसका एक मात्र कारण है प्राणिमात्र अपने स्वभाव का अनुसरण करते हैं। स्वभाव के शक्तिशाली होने पर किसी का निग्रह क्या करेगा यह अन्तिम वाक्य भगवान् के उपदेश में निराशा का उद्गार नहीं किन्तु उनकी परिपूर्ण दृष्टि का परिचायक है। वे वस्तु स्थिति से परिचित हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जीवन के उच्च मार्ग पर चलने की क्षमता नहीं रखता। विकास के सोपान की सबसे निचली सीढ़ी पर खड़े असंख्य मनुष्यों के लिये इस मार्ग का अनुसरण कदापि सम्भव नहीं क्योंकि विषयों में आसक्ति तथा पाशविक प्रवृत्तियों से वे इस प्रकार बंधे होते हैं कि उन सबका एकाएक त्याग करना उन सबके लिये सम्भव नहीं होता। जिस मनुष्य में कर्म के प्रति उत्साह तथा जीवन में कुछ पाने की महत्त्वाकांक्षा है केवल वही व्यक्ति इस कर्मयोग का आचरण करके स्वयं को कृतार्थ कर सकता है। भगवान् का यह कथन उनकी विशाल हृदयता एवं सहिष्णुता का परिचायक है।प्रत्येक व्यक्ति का अपना निजी स्वभाव है यदि उसी के अनुसार कर्म करने को वह विवश है तो फिर पुरुषार्थ के लिये कोई अवसर ही नहीं रह जाता। इस कारण यह उपदेश भी निष्प्रयोजन हो जाता है। इस पर भगवान् कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.33।।ननु कस्मात्त्वत्प्रतिकूलास्त्वच्छासनातिक्रमान्न बिभ्यति त्वदीयं मतं स्वधर्मं नानुतिष्ठन्ति परधर्मं चानुतिष्ठन्तीति चेत्तत्राह सदृशमिति। ज्ञानवानपिपश्वादिभिश्चाविशेषात् इति न्यायात् गुणदोषज्ञानवानपीति वा। स्वस्याः प्रकृतेः साच पूर्वकृतधर्माधर्मादिसंस्कारो वर्तमानजन्मादावभिव्यक्तः तस्याः सदृशमनुरुपं चेष्टां करोति किं पुनर्मुर्खः। तस्माद्भूतानि प्राणिनः प्रकृतिं यान्त्यनुगच्छन्ति। निग्रहो निषेधरुपः मम परमेश्वरस्यान्यस्य राज्ञो वा किं करिष्यति। प्रकृतेः प्राबल्यान्नास्मदादिशासनाद्विभ्यतीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.33।।ननु राज्ञ इव तव शासनातिक्रमे भयं पश्यन्तः कथमसूयन्तस्तव मतं नानुवर्तन्ते कथं वा सर्वपुरुषार्थसाधने प्रतिकूला भवन्तीत्यत आह प्रकृतिर्नाम प्राग्जन्मकृतधर्माधर्मज्ञानेच्छादिसंस्कारो वर्तमानजन्मन्यभिव्यक्तः सर्वतो बलवान्तं विद्याकर्मणी समन्वारभेते पूर्वप्रज्ञा च इति श्रुतिप्रमाणकः। तस्याः स्वकीयायाः प्रकृतेः सदृशमनुरूपमेव सर्वो जन्तुर्ज्ञानवान् ब्रह्मविदपिपश्वादिभिश्चाविशेषात् इतिन्यायात् गुणदोषज्ञानवान्वा चेष्टते किं पुनर्मूर्खः। तस्मात् भूतानि सर्वे प्राणिनः प्रकृतिं यान्ति अनुवर्तन्ते पुरुषार्थभ्रंशहेतुभूतामपि। तत्र मम वा राज्ञो वा निग्रहः किं करिष्यति। रागौत्कठ्येन दुरितान्निवर्तयितुं न शक्नोतीत्यर्थः। महानरकसाधनत्वं ज्ञात्वापि दुर्वासनाप्राबल्यात्पापेषु प्रवर्तमाना न मच्छासनातिक्रमदोषाद्बिभ्यतीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.33।।ननु ते चेत्तव मतं नानुतिष्ठन्ति तर्हि कथं तवान्तर्यामित्वमित्यत आह सदृशमिति। स्वस्याः प्रकृतेः स्वकीयस्य प्राग्भवीयधर्माधर्मसंस्कारस्य सदृशमनुरूपं ज्ञानवानपि चेष्टते किमु मूर्खः।पश्वादिभिश्चाविशेषात् इति न्यायात्। तस्मात्प्रकृतिं यान्त्यनुसरन्ति भूतानि प्राणिनस्तत्र मम वान्यस्य वा निग्रहः किं करिष्यति न किमपि। अहमपि पूर्वकर्मापेक्षयैव तान्प्रवर्तयामीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.33।।ननु त्वन्मतं विहाय नाशसाधने कथमनुवर्त्तन्ते इत्याशङ्क्याहुः सदृशमिति। ज्ञानवानपि नरः स्वस्याः प्रकृतेः सदृशं चेष्टते करोति। अत्रायं भावः प्रकृत्यंशो जीवो न भगवदुक्ते प्रवर्तते तदंशस्वात्। अत एव स्मर्यतेयो यदंशः स तं भजेत्। माया तु भगवद्दत्तसामर्थ्येन ज्ञानवतोऽपि मोहयति। अत एव मार्कण्डेयपुराणे दुर्गासप्तशत्यां1।55ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा। बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति इत्युक्तम्। ननु सत्सङ्गेन श्रीमद्वाक्येन वा कथं न ते यजन्ति तत्राहुः। भूतानि प्रकृतिं स्वाधिष्ठानमेव यान्ति। एतदर्थमेव नपुंसकत्वमुक्तम्। निग्रहः सत्सङ्गादीनां किं करिष्यति अकिञ्चित्करेष्वित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.33।।ननु तर्हि महाफलत्वादिन्द्रियाणि निगृह्य निष्कामाः सन्तः सर्वेऽपि स्वधर्ममेव किं नानुतिष्ठन्ति तत्राह सदृशमिति। प्रकृतिः प्राचीनकर्मसंस्काराधीनस्वभावः स्वस्याः स्वकीयायाः प्रकृतेः स्वभावस्य सदृशमनुरूपमेव गुणदोषज्ञानवानपि चेष्टते किं पुनर्वक्तव्यमज्ञश्चेष्टत इति। तस्माद्भूतानि सर्वेऽपि प्राणिनः प्रकृतिं यान्त्यनुवर्तन्ते। एवं सति इन्द्रियनिग्रहः किं करिष्यति प्रकृतेर्बलिष्ठत्वादित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.33।।ननु तर्हि सर्वे बुधा महाफलत्वात्त्वन्मतमेव किमिति नानुतिष्ठन्ति तत्राह सदृशमिति। कैमुत्येनाह ज्ञानवानिति। शास्त्रीयं ज्ञानं सात्विकं तद्वानपि स्वस्याः परिणतायाः प्रकृतेरनुरूपं चेष्टते। चेष्टायां प्रकृतिरेवानुगुणहेतुः। प्रकृतिमोहित एवाहमित्यभिज्ञ इति मनुते। न परोक्तमनुसन्धत्ते किं पुनर्वक्तव्यमज्ञ एवं भवतीति अतो भूतानि सर्वाणि सात्विकराजसतामसानि स्वभावमनुवर्त्तन्ते वायुं तृणवत्। तत्र निग्रहः शिक्षणं ऐन्द्रियो वा किं करिष्यति प्रकृतेः प्रबलत्वादित्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.33।।तो फिर वे ( लोग ) किस कारणसे आपके मतके अनुसार नहीं चलते दूसरेके धर्मका अनुष्ठान करते हैं और स्वधर्माचरण नहीं करते आपके प्रतिकूल होकर आपके शासनको उल्लङ्घन करनेके दोषसे क्यों नहीं डरते इसमें क्या कारण है इसपर कहते हैं सभी प्राणी एवं ज्ञानवान् भी अपनी प्रकृतिके अनुसार ही चेष्टा करते हैं अर्थात् जो पूर्वकृत पुण्यपाप आदिका संस्कार वर्तमान जन्मादिमें प्रकट होता है उसका नाम प्रकृति है उसके अनुसार ज्ञानवान् भी चेष्टा किया करता है। फिर मूर्खकी तो बात ही क्या है इसलिये सभी प्राणी ( अपनी ) प्रकृति अर्थात् स्वभावकी ओर जा रहे हैं इसमें मेरा या दूसरेका शासन क्या कर सकता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.33।। व्याख्या प्रकृतिं यान्ति भूतानि जितने भी कर्म किये जाते हैं वे स्वभाव अथवा सिद्धान्तको (टिप्पणी प0 174.1) सामने रखकर किये जाते हैं। स्वभाव दो प्रकारका होता है रागद्वेषरहित और रागद्वेषयुक्त। जैसे रास्तेमें चलते हुए कोई बोर्ड दिखायी दिया और उसपर लिखा हुआ पढ़ लिया तो यह पढ़ना न तो राग द्वेषसे हुआ और न किसी सिद्धान्तसे अपितु रागद्वेषरहित स्वभावसे स्वतः हुआ। किसी मित्रका पत्र आनेपर उसे रागपूर्वक पढ़ते हैं और शत्रुका पत्र आनेपर उसे द्वेषपूर्वक पढ़ते हैं तो यह पढ़ना रागद्वेषयुक्त स्वभावसे हुआ। गीता रामायण आदि सत्शास्त्रोंको पढ़ना सिद्धान्तसे पढ़ना हुआ। मनुष्यजन्म परमात्मप्राप्तिके लिये ही है अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे कर्म करना भी सिद्धान्तके अनुसार कर्म करना है।इस प्रकार देखना सुनना सूघँना स्पर्श करना आदि मात्र क्रियाएँ स्वभाव और सिद्धान्त दोनोंसे होती हैं। रागद्वेषरहित स्वभाव दोषी नहीं होता प्रत्युत रागद्वेषयुक्त स्वभाव दोषी होता है। रागद्वेषपूर्वक होनेवाली क्रियाएँ मनुष्यको बाँधती हैं क्योंकि इनसे स्वभाव अशुद्ध होता है और सिद्धान्तसे होनेवाली क्रियाएँ उद्धार करनेवाली होती हैं क्योंकि इनसे स्वभाव शुद्ध होता है। स्वभाव अशुद्ध होनेके कारण ही संसारसे माने हुए सम्बन्धका विच्छेद नहीं होता। स्वभाव शुद्ध होनेसे संसारसे माने हुए सम्बन्धकासुगमतापूर्वक विच्छेद हो जाता है।ज्ञानी महापुरुषके अपने कहलानेवाले शरीरद्वारा स्वतः क्रियाएँ हुआ करती हैं क्योंकि उसमें कर्तृत्वाभिमान नहीं होता। परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले साधककी क्रियाएँ सिद्धान्तके अनुसार होती है। जैसे लोभी पुरुष सदा सावधान रहता है कि कहीं कोई घाटा न लग जाय ऐसे ही साधक निरन्तर सावधान रहता है कि कहीं कोई क्रिया रागद्वेषपूर्वक न हो जाय। ऐसी सावधानी होनेपर साधकका स्वभाव शीघ्र शुद्ध हो जाता है और परिणामस्वरूप वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।यद्यपि क्रियामात्र स्वाभाविक ही प्रकृतिके द्वारा होती है तथापि अज्ञानी पुरुष क्रियाओंके साथ अपना सम्बन्ध मानकर अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता मान लेता है (गीता 3। 27)। पदार्थों और क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण ही रागद्वेष उत्पन्न होते हैं जिनसे जन्ममरणरूप बन्धन होता है। परन्तु प्रकृतिसे सम्बन्ध न माननेवाला साधक अपनेको सदा अकर्ता ही देखता है (गीता 13। 29)।स्वभावमें मुख्य दोष प्राकृत पदार्थोंका राग ही है। जबतक स्वभावमें राग रहता है तभीतक अशुद्ध कर्म होते हैं। अतः साधकके लिये राग ही बन्धनका मुख्य कारण है।राग माने हुए अहम् में रहता है और मन बुद्धि इन्द्रियों एवं इन्द्रियोंके विषयोंमें दिखायी देता है। अहम् दो प्रकारका है 1 चेतनद्वारा जडके साथ माने हुए सम्बन्धसे होनेवाला तादात्म्यरूप अहम्।2 जड प्रकृतिका धातुरूप अहम् महाभूतान्यहंकारः (गीता 13। 5)।जड प्रकृतिके धातुरूप अहम् में कोई दोष नहीं है क्योंकि यह अहम् मन बुद्धि इन्द्रियों आदिकी तरह एक करण ही है। इसलिये सम्पूर्ण दोष माने हुए अहम् में ही हैं। ज्ञानी महापुरुषमें तादात्म्यरूप अहम् का सर्वथा अभाव होता है अतः उसके कहलानेवाले शरीरके द्वारा होनेवाली समस्त क्रियाएँ प्रकृतिके धातुरूप अहम् से ही होती हैं। वास्तवमें समस्त प्राणियोंकी सब क्रियाएँ इस धातुरूप अहम् से ही होती हैं परन्तु जड शरीरको मैं और मेरा माननेवाला अज्ञानी पुरुष उन क्रियाओंको अपनी तथा अपने लिये मान लेता है और बँध जाता है। कारण कि क्रियाओंको अपनी और अपने लिये माननेसे ही राग उत्पन्न होता है (टिप्पणी प0 174.2)। सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि यद्यपि अन्तःकरणमें रागद्वेष न रहनेसे ज्ञानी महापुरुषकी प्रकृति निर्दोष होती है और वह प्रकृतिके वशीभूत नहीं होता तथापि वह चेष्टा तो अपनी प्रकृति(स्वाभाव) के अनुसार ही करता है। जैसे कोई ज्ञानी महापुरुष अंग्रेजी भाषा नहीं जानता और उससे अंग्रेजी बोलनेके लिये कहा जाय तो वह बोल नहीं सकेगा। वह जिस भाषाको जानता है उसी भाषामें बोलेगा।भगवान् भी अपनी प्रकृति(स्वभाव) को वशमें करके जिस योनिमें अवतार लेते हैं उसी योनिके स्वभावके अनुसार चेष्टा करते हैं जैसे भगवान् राम या कृष्णरूपसे मनुष्ययोनिमें अवतार लेते हैं तथा मत्स्य कच्छप वराह आदि योनियोंमें अवतार लेते हैं तो वहाँ उसउस योनिके अनुसार ही चेष्टा करते हैं। तात्पर्य है कि भगवान्के अवतारी शरीरोंमें भी वर्ण योनिके अनुसार स्वभावकी भिन्नता रहती है पर परवशता नहीं रहती। इसी तरह जिन महापुरुषोंका प्रकृति(जडता) से सम्बन्धविच्छेद हो गया है उनमें स्वभावकी भिन्नता तो रहती है पर परवशता नहीं रहती। परन्तु जिन मनुष्योंका प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद नहीं हुआ है उनमें स्वभावकी भिन्नता और परवशता दोनों रहती हैं।यहाँ स्वस्याः पदका तात्पर्य यह है कि ज्ञानी महापुरुषकी प्रकृति निर्दोष होती है। वह प्रकृतिके वशमें नहीं होता प्रत्युत प्रकृति उसके वशमें होती है। कर्मोंकी फलजनकताका मूल बीज कर्तृत्वाभिमान और स्वार्थबुद्धि है। ज्ञानी महापुरुषमें कर्तृत्वाभिमान और स्वार्थबुद्धि नहीं होती। उसके द्वारा चेष्टामात्र होती है। बन्धनकारक कर्म होता है चेष्टा या क्रिया नहीं। इसीलिये यहाँ चेष्टते पद आया है। उसका स्वभाव इतना शुद्ध होता है कि उसके द्वारा होनेवाली क्रियाएँ भी महान् शुद्ध एवं साधकोंके लिये आदर्श होती हैं।पीछेके और वर्तमान जन्मके संस्कार मातापिताके संस्कार वर्तमानका सङ्ग शिक्षा वातावरण अध्ययन उपासना चिन्तन क्रिया भाव आदिके अनुसार स्वभाव बनता है। यह स्वभाव सभी मनुष्योंमें भिन्नभिन्न होताहै और इसे निर्दोष बनानेमें सभी मनुष्य स्वतन्त्र हैं। व्यक्तिगत स्वभावकी भिन्नता ज्ञानी महापुरुषोंमें भी रहती है। चेतनमें भिन्नता होती ही नहीं और प्रकृति(स्वभाव) में स्वाभाविक भिन्नता रहती है। प्रकृति है ही विषम। जैसे एक जाति होनेपर भी आम आदिके वृक्षोंमें अवान्तर भेद रहता है ऐसे ही प्रकृति (स्वभाव) शुद्ध होनेपर भी ज्ञानी महापुरुषोंमें प्रकृतिका भेद रहता है।ज्ञानी महापुरुषका स्वभाव शुद्ध (रागद्वेषरहित) होता है अतः वह प्रकृतिके वशमें नहीं होता। इसके विपरीत अशुद्ध (रागद्वेषयुक्त) स्वभाववाले मनुष्य अपनी बनायी हुई परवशतासे बाध्य होकर कर्म करते हैं।निग्रहः किं करिष्यति जिनका स्वभाव महान् शुद्ध एवं श्रेष्ठ है उनकी क्रियाएँ भी अपनी प्रकृतिके अनुसार हुआ करती हैं फिर जिनका स्वभाव अशुद्ध (रागद्वेषयुक्त) है उन पुरुषोंकी क्रियाएँ तो प्रकृतिके अनुसार होंगी ही। इस विषयमें हठ उनके काम नहीं आयेगा। जिसका जैसा स्वभाव है उसे उसीके अनुसार कर्म करने पड़ेंगे। यदि स्वभाव अशुद्ध हो तो वह अशुद्ध कर्मोंमें और शुद्ध हो ते वह शुद्ध कर्मोंमें मनुष्यको लगा देगा।अर्जुन भी जब हठपूर्वक युद्धरूप कर्तव्यकर्मका त्याग करना चाहते हैं तब भगवान् उन्हें यही कहते हैं कि तेरा स्वभाव तुझे बलपूर्वक युद्धमें लगा देगा प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति (18। 59) क्योंकि तेरे स्वभावमें क्षात्रकर्म (युद्ध आदि) करनेका प्रवाह है। इसलिये स्वाभाविक कर्मोंसे बँधा हुआ तू परवश होकर युद्ध करेगा अर्थात् इसमें तेरा हठ काम नहीं आयेगा करिष्यस्यवशोऽपि तत् (18। 60)।जैसे सौ मील प्रति घंटेकी गतिसे चलनेवाली मोटर अपनी नियत क्षमतासे अधिक नहीं चलेगी ऐसे ही ज्ञानी महापुरुषके द्वारा भी अपनी शुद्ध प्रकृतिके विपरीत चेष्टा नहीं होगी। जिनकी प्रकृति अशुद्ध है उनकी प्रकृति बिगड़ी हुई मोटरके समान है। बिगड़ी हुई मोटरको सुधारनेके दो मुख्य उपाय हैं (1) मोटरको खुद ठीक करना और (2) मोटरको कारखानेमें पहुँचा देना। इसी प्रकार अशुद्ध प्रकृतिको सुधारनेके भी दो मुख्य उपाय हैं (1) रागद्वेषसे रहित होकर कर्म करना (गीता 3। 34) और (2) भगवान्के शरणमें चले जाना (गीता 18। 62)। यदि मोटर ठीक चलती है तो हम मोटरके वशमें नहीं हैं और यदि मोटर बिगड़ी हुई है तो हम हम मोटरके वशमें हैं। ऐसे ही ज्ञानी महापुरुष प्रकृतिके शुद्ध होनेके कारण प्रकृतिके वशमें नहीं होता और अज्ञानी पुरुष प्रकृतिके अशुद्ध होनेके कारण प्रकृतिके वशमें होता है।जिसकी बुद्धिमें जडता(सांसारिक भोग और संग्रह) का ही महत्त्व है ऐसा मनुष्य कितना ही विद्वान् क्यों न हो उसका पतन अवश्यम्भावी है। परन्तु जिसकी बुद्धिमें जडताका महत्त्व नहीं है और भगवत्प्राप्ति ही जिसका उद्देश्य है ऐसा मनुष्य विद्वान् न भी हो तो भी उसका उत्थान अवश्यम्भावी है। कारण कि जिसका उद्देश्य भोग और संग्रह न होकर केवल परमात्माको प्राप्त करना ही है उसके समस्त भाव विचार कर्म आदि उसकी उन्नतिमें सहायक हो जाते हैं। अतः साधकको सर्वप्रथम परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य बना लेना चाहिये फिर उस उद्देश्यकी सिद्धिके लिये रागद्वेषसे रहित होकर कर्तव्यकर्म करने चाहिये। रागद्वेषसेरहित होनेका सुगम उपाय है मिले हुए शरीरादि पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानते हुए दूसरोंकी सेवामें लगाना और बदलेमें दूसरोंसे कुछ भी न चाहना।प्रकृतिके वशमें होनेके लिये साधकको चाहिये कि वह किसी आदर्शको सामने रखकर कर्तव्यकर्म करे। आदर्श दो हो सकते हैं (1) भगवान्का मत (सिद्धान्त) और (2) श्रेष्ठ महापुरुषोंका आचरण। आदर्शको सामने रखकर कर्म करनेवाले मनुष्यकी प्रकृति शुद्ध हो जाती है और नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। इसके विपरीत आदर्शको सामने न रखकर कर्म करनेवाला मनुष्य रागद्वेषपूर्वक ही सब कर्म करता है जिससे रागद्वेष पुष्ट हो जाते हैं और उसका पतन हो जाता है नष्टान् विद्धि (गीता 3।32)।जैसे नदीके प्रवाहको हम रोक तो नहीं सकते पर नहर बनाकर मोड़ सकते हैं ऐसे ही कर्मोंके प्रवाहको रोक तो नहीं सकते पर उसका प्रवाह मोड़ सकते हैं। निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना ही कर्मोंके प्रवाहको मोड़ना है। अपने लिये किञ्चिन्मात्र भी कर्म करनेसे कर्मोंका प्रवाह मुड़ेगा नहीं। तात्पर्य यह कि केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारकी ओर हो जाता है और साधक कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।सम्बन्ध प्रत्येक मनुष्यका अपनी प्रकृतिको साथ लेकर ही जन्म होता है अतः उसे अपनी प्रकृतिके अनुसार कर्म करने ही पड़ते हैं। इसलिये अब भगवान् आगेके श्लोकमें प्रकृतिको शुद्ध करनेका उपाय बताते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.33।।सदृशमिति। योऽपि च ज्ञानी न तस्य व्यवहारे भोजनादौ विपर्यासः कश्चित्। अपि तु सोऽपि सत्त्वाद्युचितमेव चेष्टते एवमेव जानन्। यतः ( N अतः) भूतानां पृथिव्यादीनां प्रकृतौ विलयः आत्मा च अकर्ता नित्यमुक्त इति कस्य जन्मादिनिग्रहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.33।।भगवन्मतानुवर्तनमन्तरेण परधर्मानुष्ठाने स्वधर्माननुष्ठाने च कारणं पृच्छति कस्मादिति। भगवत्प्रतिकूलत्वमेव तत्र कारणमित्याशङ्क्याह तत्प्रतिकूला इति। राजानुशासनातिक्रमे दोषदर्शनाद्भगवदनुशासनातिक्रमेऽपि दोषसंभवात्प्रतिकूलत्वं भयकारणमित्यर्थः। उत्तरत्वेन श्लोकमवतारयति सदृशमिति। तत्राहेति। सर्वस्य प्राणिवर्गस्य प्रकृतिवशवर्तित्वे कैमुतिकन्यायं सूचयति ज्ञानवानपीति। सर्वाण्यपि भूतान्यनिच्छन्त्यपि प्रकृतिसदृशीं चेष्टां गच्छन्तीति निगमयति प्रकृतिमिति। भूतानां प्रकृत्यधीनत्वेऽपि प्रकृतिर्भगवता निग्राह्येत्याशङ्क्याह निग्रह इति। का पुनरियं प्रकृतिर्यदनुसारिणी भूतानां चेष्टेति पृच्छति प्रकृतिर्नामेति। भगवदभिप्रेतां प्रकृतिं प्रकटयति पूर्वेति। आदिशब्देन ज्ञानेच्छादि संगृह्यते। यथोक्तः संस्कारः स्वशक्त्या प्रवर्तकश्चेत्प्रलयेऽपि प्रवृत्तिः स्यादित्याशङ्क्य विशिनष्टि वर्तमानेति। सर्वो जन्तुरित्युक्तं विवेकिप्रवृत्तेरतथात्वादित्याशङ्क्यपश्वादिमिश्चाविशेषात् इति न्यायमनुसरन्नाह ज्ञानवानिति। ज्ञानवतामज्ञानवतां च प्रकृत्यधीनत्वाविशेषे फलितमाह तस्मादिति। प्रकृतिं यान्ति प्रकृतिसदृशीं चेष्टां गच्छन्त्यनिच्छन्त्यपि सर्वाणि भूतानीत्यर्थः। प्रकृतेर्भगवता तत्तुल्येन वा केनचिन्निग्रहमाशङ्क्यावतारितचतुर्थपादस्यार्थापेक्षितं पूरयति मम वेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.33।।सदृशं इति श्लोकस्य सङ्गतिर्न प्रतीयतेऽतस्तामाह एवं चेदिति। यदि त्वन्मतानुष्ठाने मोक्षः अन्यथा नाश इत्यर्थः। मूलप्रकृतेरेकत्वात्कथं स्वस्या इति प्रातिस्विकत्वमुच्यते इत्यत आह प्रकृतिरिति तत्कार्यौ रागद्वेषौ उपलक्ष्येते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.33।।एवं चेत्किमिति ते मतं नानुतिष्ठन्ति लोकाः इत्यत आह सदृशमिति। प्रकृतिः पूर्वसंस्कारः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.33।।प्रकृतिविविक्तम् ईदृशम् आत्मस्वरूपम् तदेव सर्वदानुसन्धेयम् इति च शास्त्राणि प्रतिपादयन्ति इति ज्ञानवान् अपि स्वस्याः प्रकृतेः प्राचीनवासनायाः सदृशं प्राकृतविषयेषु एव चेष्टते कुतः प्रकृतिं यान्ति भूतानि अचित्संसृष्टा जन्तवः अनादिकालप्रवृत्तवासनाम् एव यान्ति तानि वासनानुयायीनि भूतानि शास्त्रकृतो निग्रहः किं करिष्यति।प्रकृत्यनुयायित्वप्रकारम् आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.33।। सदृशम् अनुरूपं चेष्टते चेष्टां करोति। कस्य स्वस्याः स्वकीयायाः प्रकृतेः। प्रकृतिर्नाम पूर्वकृतधर्माधर्मादिसंस्कारः वर्तमानजन्मादौ अभिव्यक्तः सा प्रकृतिः। तस्याः सदृशमेव सर्वो जन्तुः ज्ञानवानपि चेष्टते किं पुनर्मूर्खः। तस्मात् प्रकृतिं यान्ति अनुगच्छन्ति भूतानि प्राणिनः। निग्रहः निषेधरूपः किं करिष्यति मम वा अन्यस्य वा।।यदि सर्वो जन्तुः आत्मनः प्रकृतिसदृशमेव चेष्टते न च प्रकृतिशून्यः कश्चित् अस्ति ततः पुरुषकारस्य विषयानुपपत्तेः शास्त्रानर्थक्यप्राप्तौ इदमुच्यते
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【 Verse 3.34 】
▸ Sanskrit Sloka: इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ | तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ||
▸ Transliteration: indriyasyendriyasyārthe rāgadveṣau vyavasthitau | tayorna vaśamāgacchet tau hyasya paripanthinau ||
▸ Glossary: indriyasya: of the senses; indriyasya arthe: for sense objects; rāga: attachment; dveṣau: repulsion; vyavasthitau: put under control; tayoḥ: of them; na: never; vaśaṁ: control; āgacchet: come; tau: those; hi: certainly; asya: his; paripan- thinau: stumbling blocks
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.34 Attachment and repulsion of the senses for sense objects should be put under control. One should never come under their control as they certainly are the stumbling blocks on the path of self-realization.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.34।।इन्द्रियइन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमे विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.34।। इन्द्रियइन्द्रिय (अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय) के विषय के प्रति (मन में) रागद्वेष रहते हैं मनुष्य को चाहिये कि वह उन दोनों के वश में न हो क्योंकि वे इसके (मनुष्य के) शत्रु हैं।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.34 इन्द्रियस्य इन्द्रियस्य of each sense? अर्थे in the object? रागद्वेषौ attachment and aversion? व्यवस्थितौ seated? तयोः of these two? न not? वशम् sway? आगच्छेत् should come under? तौ these two? हि verily? अस्य his? परिपन्थिनौ foes.Commentary Each sense has got attraction for a pleasant object and aversion for a disagreeable object. If one can control these two currents? viz.? attachment and aversion? he will not come under the sway of these two currents. Here lies the scope for personal exertion or Purushartha. Nature which contains the sum total of ones Samskaras or the latent selfproductive impressions of the past actions of merit and demerit draws a man to its course through the two currents? attachment and aversion. If one can control these two currents? if he can rise above the sway of love and hate through discrimination and Vichara or right eniry? he can coner Nature and attain immortality and eternal bliss. He willl no longer be subject to his own nature now. One should always exert to free himself from attachment and aversion to the objects of the senses.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.34. [For a man of worldly life] there are likes and dislikes clearly fixed with regard to the objects of each of his sense organs. These are the obstacles for him. [The wise] would not come under the control of these.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.34 The love and hate which are aroused by the objects of sense arise from Nature; do not yield to them. They only obstruct the path.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.34 Each sense has fixed attachment to, and aversion for, its corresponding object. But no one should come under their sway; for they are his foes.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.34 Attraction and repulsion are ordained with regard to the objects of all the organs. One should not come under the sway of these two, because they are his adversaries.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.34 Attachment and aversion for the objects of the senses abide in the senses; let none come under their sway; for, they are his foes.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.34 See Comment under 3.35
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.34 An unavoidable attraction has been fixed for organs of sense like ear towards the objects like sound, and for organs of action like that of tongue towards their objects like tasty food. This longing is in the form of desire to experience these objects, which is caused by old subtle impressions. When their experience is thwarted, an unavoidable aversion is experienced. Thus, these two, attachment and aversion, bring under their control one who aspires to follow Jnana Yoga, and forcibly engage him in actions appropriate to them, in spite of his having established some sort of control over the senses.
Such an aspirant fails to get the experience of the self, and therefore becomes completely lost. So no one practising Jnana Yoga should come under the sway of attachment and aversion, which are ruinous. These two, attachment and aversion, are indeed his unconerable foes that deter him from the practice of Jnana Yoga.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.34 Raga-dvesau, attraction and repulsion, in the following manner-attraction towards desirable things, and repulsion against undesirable things; (vyavasthitau, are ordained,) are sure to occur, arthe, with regard to objects such as sound etc.; indriyasya indriyasya, of all the organs, with regard to each of the organs. As to that, the scope of personal effort and scriptural purpose are being stated as follows: One who is engaged in the subject-matter of the scriptures should, in the very beginning, not come under the influence of love and hatred. For, that which is the nature of a person impels him to his actions, verily under the influence eof love and hatred. And then follow the rejection of one's own duty and the undertaking of somody else's duty. On the other hand, when a person controls love and hatred with the help of their opposites [Ignorance, the cause of love and hatred, has discrimination as its opposite.], then he becomes mindful only of the scriptural teachings; he ceases to be led by his nature. Therefore, na agacchet, one should not come; vasam, under the sway; tayoh, of these two, of love and hatred; hi because; tau, they; are asya, his, this person's pari-panthinau, adversaries, who, like robbers, put obstacles on his way to Liberation. This is the meaning. In this world, one impelled by love and hatred misinterprets even the teaching of the scriptures, and thinks that somody else's duty, too, has to be undertaken just because it is a duty! That is wrong:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.34।। पूर्व श्लोक में कहा गया था कि शास्त्राध्ययन करने वाला ज्ञानवान् पुरुष भी नैतिकता का उच्च जीवन जीने में अपने को असमर्थ पाता है क्योंकि उसकी कुछ निम्न स्तर की प्रवृत्तियाँ कभीकभी उससे अधिक शक्तिशाली सिद्ध होती हैं। सर्वत्र अनुपलब्ध औषधि का उपचार लिख देना रोग का निवारण करना नहीं कहलाता। दार्शनिक तत्त्ववेत्ता का यह कर्तव्य है कि वह केवल हमारे वर्तमान जीवन की दुर्बलताओं को ही नहीं दर्शाये बल्कि पूर्णत्व की स्थिति का ज्ञान कराकर उस साधन मार्ग को भी दिखाये जिससे हम दोषमुक्त होकर पूर्णस्वरूप में स्थित हो सकें। केवल ऐसा करके ही वह दार्शनिक तत्त्वविज्ञ पुरुष अपनी पीढ़ी को कृतार्थ कर सकता है।यह सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभावानुसार कार्य करता है परन्तु यह स्वभाव वह अपने कर्म एवं विचारों के द्वारा बनाता है और न कि किसी अन्य के कारण। अत यहाँ पुरुषार्थ के लिये अवसर है। उसी को यहाँ श्रीकृष्ण बता रहे हैं। प्रत्येक इन्द्रिय के विषय के प्रति प्रत्येक व्यक्ति के मन में राग अथवा द्वेष उत्पन्न होता है। शब्दस्पर्शादि इन्द्रियों के विषय स्वयं किसी भी प्रकार हमारे अन्तकरण में दुख या विक्षेप उत्पन्न नहीं कर सकते। विषयों के ग्रहण करके मन किसी के प्रति राग और किसी के प्रति द्वेष रखता है और मन के इन रागद्वेषों के कारण प्रिय या अप्रिय विषय के दर्शन अथवा प्राप्ति से मनुष्य को हर्ष या विषाद होता है। स्वयं रागद्वेष्ा को उत्पन्न करके मनुष्य का फिर प्रयत्न होता है प्रिय की प्राप्ति और अप्रिय का त्याग। विषयों के प्रति राग और द्वेष सदा परिवर्तित होते रहने के कारण वह सदा ही क्षुब्धचित्त बना रहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ये रागद्वेष ही लुटेरे हैं जो मन की शांति का हरण कर लेते हैं और जिनके कारण मनुष्य सच्चा जीवन नहीं जी पाता। वास्तव में यह दुख की बात है।वस्तुस्थिति को दर्शाकर भगवान् समस्त साधकों को उपदेश देते हैं कि मनुष्य को चाहिये कि वह इन दोनों के वश में न होवे।प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष किसी भी रूप में बाह्य जगत् से पलायन करने का उपदेश गीता में कहीं पर भी नहीं मिलता। भगवान् का उपदेश तो यहाँ और अभी जीवन की उपलब्ध परिस्थितियों में शरीर मन और बुद्धि के माध्यम से सब अनुभवों को प्राप्त करते हुये जीने के लिये है। आग्रह केवल इस बात का है कि सभी परिस्थितियों में मनुष्य को मन आदि उपाधियों का स्वामी बनकर रहना चाहिये और न कि उनका दास बनकर। इस प्रकार के स्वामित्व को प्राप्त करने का उपाय राग और द्वेष से मुक्त हो जाना है।रागद्वेष से मुक्ति पाने के लिये मिथ्या अहंकार तथा तज्जनित अन्य प्रवृत्तियों को समाप्त करना चाहिये क्योंकि राग और द्वेष अहंकार से सम्बन्धित हैं। इसलिए अहंकाररहित कर्म करने पर वासनाओं का क्षय हो जाता है। वासनाओं से उत्पन्न होता है मन और वहीं पर अहंकार का खेल होता है। जैसेजैसे वासनायें क्षीण होती जाती हैं वैसेवैसे मन भी नष्ट हो जाता है। मन के नष्ट होने पर शुद्ध आत्मा का प्रतिबिम्ब रूप अहंकार भी नष्ट हो जाता है।भगवान् वासना क्षय का उपाय निम्न श्लोक में बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.34।।ननु सर्वस्यापि प्राणिजातस्य प्रकृत्यायत्तत्वात्पुरुषकारस्य विषयालाभाद्विधिनिषेधशास्त्रानर्थक्यं प्राप्तमित्याशङक्याह इन्द्रियस्येति। सर्वेन्द्रियाणामर्थे शब्दादिविषये इष्टे रागोऽनिष्टे द्वेष इति प्रतिविषयं रागद्वेषाववश्यंभाविनौ तस्मात्तयोर्वशं नागच्छेत्तदधीनो न प्रवर्त्तेत। तत्रायमेव पुरुषप्रयत्नस्य शास्त्रस्य च विषय उच्यते। तथाहि इन्द्रियार्थसंनिकर्षे पदार्थ ज्ञानं ततो मिथ्याज्ञानवशात्तत्र रागादिः प्रकृतिश्च रागादिपुरःसरैव पुरुषं स्वकार्ये प्रवर्तयति तदा निषिद्धाचरणं विहितत्यागश्च संपद्यते। यदा पुनः शास्त्रदृष्ट्या पूर्वमेव यथावद्वस्तु प्रतिभाति तदा मिथ्याज्ञाननिवृत्त्या रागादिर्निवर्तते। सहकारीनिवृत्त्या च प्रकृतिः प्रवर्तयितुं न शक्नोति। तस्मात्प्रथममेव पुरुषकारेण रागद्वेषयोर्वशं नागच्छेत्। नच पुरुषकारे शास्त्रे च प्रवृत्तिरेव न सिध्यति प्रकृत्तेः प्रतिबन्धिकायाः सत्त्वादिति वाच्यम्। अदृष्टस्य दृष्टसामग्रींविना प्रतिबन्धकत्वाभावात्। ननु तुल्यन्यायेन दृष्टस्यापि शास्त्रादौ प्रवृत्तिरुपस्यादृष्टापेक्षतया प्रकृत्यधीनत्वमेव पुनरागतमिति चेत्तर्हि तदनुकूलसंस्कारोऽपि ब्राह्मणाद्यधिकारिजनेऽस्त्येवेति न काचिदनुपपत्तिः। नच ततएव सर्वं भविष्यति किं विधिनिषेधमोक्षपरैः शास्त्रैरिति वाच्यम्। अदृष्टस्य दृष्टसामग्र्यपेक्षाया आवश्यकत्वस्योक्तत्वात्। तथाच यथा लोके संस्काररुपेण स्थितस्य कामस्य कामिनीदर्शनमुद्बोधकं तथा शास्त्रमपि। ननु शास्त्रश्रवणे प्रवृत्तिजनकस्य तस्य किमुद्दीपकमितिचेत् यथा जनकस्य क्रीडार्थमुद्यानं गतस्याकस्मिकं सिद्धवाक्यश्रवणं यथावा कार्यान्तरवशाच्छ्रवणशालायामागतस्य तत्रत्यशब्दश्रवणं यथावा केनचिल्लौकिकेन निमित्तेन मित्रतां प्राप्तस्य कस्यचिच्छिष्टस्य वचनमिति गृहाणेत्यलं विस्तरेण। हि यस्मात्तौ रागद्वेषौ अस्य पुरुषस्य परिपन्थिनौ श्रेयोमार्गस्य विघ्नकरौ तस्कराविव पथि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.34।।ननु सर्वस्य प्राणिवर्गस्य प्रकृतिवशवर्तित्वे लौकिकवैदिकपुरुषकारविषयाभावाद्विधिनिषेधानर्थक्यं प्राप्तं नच प्रकृतिशून्यः कश्चिदस्ति यं प्रति तदर्थवत्त्वं स्यादित्यत आह इन्द्रिस्येन्द्रियस्येति वीप्सया सर्वेषामिन्द्रियाणामर्थे विषये शब्दे स्पर्शे रुपे रसे गन्धे च एवं कर्मेन्द्रिविषयेऽपि वचनादावनुकूले शास्त्रनिषिद्धेऽपि रागः प्रतिकूले शास्त्रविहितेऽपि द्वेष इत्येवं प्रतीन्द्रियार्थं रागद्वेषौ व्यवस्थितावानुकूल्यप्रातिकूल्यव्यवस्थया स्थितौ नत्वनियमेन सर्वत्र तौ भवतः। तत्र पुरुषकारस्य शास्त्रस्य चायं विषयो यत्तयोर्वशं नागच्छेदिति। कथं। या हि पुरुषस्य प्रकृतिः सा बलवदनिष्टानुबन्धित्वज्ञानाभावसहकृतेष्टसाधनत्वज्ञाननिबन्धनं रागं पुरस्कृत्यैव शास्त्रनिषिद्धे कलञ्जभक्षणादौ प्रवर्तयति तथा बलवदिष्टसाधनत्वज्ञानाभावसहकृतानिष्टसाधनत्वज्ञाननिबन्धनं द्वेषं पुरस्कृत्यैव शास्त्रविहितादपि सन्ध्यावन्दनादेर्निवर्तयति। तत्र शास्त्रेण प्रतिषिद्धस्य बलवदनिष्टानुबन्धित्वे ज्ञापिते सहकार्यभावात्केवलं दृष्टेष्टसाधनताज्ञानं मधुविषसंपृक्तान्नभोजनइव तत्र न रागं जनयितुं शक्नोति। एवं विहितस्य शास्त्रेण बलवदिष्टानुबन्धित्वे बोधिते सहकार्यभावात्केवलमनिष्टसाधनत्वज्ञानं भोजनादाविव तत्र न द्वेषं जनयितुं शक्नोति। ततश्चाप्रतिबद्धं शास्त्रं विहिते पुरुषं प्रवर्तयति निषिद्धाच्च निवर्तयतीति शास्त्रीयविवेकविज्ञानप्राबल्येन स्वाभाविकरागद्वेषयोः कारणोपमर्देनोपमर्दान्न प्रकृतिर्विपरीतमार्गे पुरुषं शास्त्रदृष्टिं प्रवर्तयितुं शक्नोतीति न शास्त्रस्य पुरुषकारस्य च वैयर्थ्यप्रसङ्गः। तयो रागद्वेषयोर्वशं नागच्छेत्तदधीनो न प्रवर्तेत निवर्तेत वा। किंतु शास्त्रीयतद्विपक्षज्ञानेन तत्कारणविघटनद्वारा तौ नाशयेत्। हि यस्मात् तौ रागद्वेषौ स्वाभाविकदोषप्रयुक्तौ अस्य पुरुषस्य श्रेयोर्थिनः परिपन्थिनौ शत्रू श्रेयोमार्गस्य विघ्नकर्तारौ दस्यूइव पथिकस्य। इदं चद्वये ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च ततः कानीयसा एव देवा ज्यायसा असुरास्त एषु लोकेष्वस्पर्धन्त इत्यादिश्रुतौ स्वाभाविकरागद्वेषनिमित्तशास्त्रविपरीतप्रवृत्तिमसुरत्वेन शास्त्रीयप्रवृत्तिं च देवत्वेन निरूप्य व्याख्यातमतिविस्तरेणेत्युपरम्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.34।।एवं तर्हि पुरुषस्य स्वातन्त्र्याभावाद्विधिनिषेधशास्त्रं व्यर्थमित्याशङ्क्याह इन्द्रियस्येति। इन्द्रियस्येन्द्रियस्येति द्विर्वचनं वीप्सायाम्। प्रतीन्द्रियं स्वे स्वेऽर्थे शब्दादौ वचनादौ च विषये रागद्वेषौ अनुकूले रागः प्रतिकूले द्वेषश्च व्यवस्थितौ नित्यसंबद्धौ तत्र तयोर्वशं नागच्छेदिति शास्त्रस्याभ्यनुज्ञा। पुरुषस्य च तदनुष्ठाने स्वातन्त्र्यमस्ति। हि यतः तौ रागद्वेषावेवास्य प्राणिनः परिपन्थिनौ विरोधिनौ दृष्टद्वारेण प्रवर्तकत्वात्। न तु प्रकृत्यनुसारी ईश्वरोऽस्य परिपन्थी। तस्य वैषम्यादिदोषापत्तेः। अयं भावः यथा ह्यस्तनेन स्वाज्ञोल्लङ्घनजेनापराधेन कुपितो राजाऽपराधिनं हि निगडादौ निग्रहीतुं स्वीयान्भटान्प्रवर्तयति स एवाद्यतनेन दानमानेन प्रसादित एनं तेषामेव भटानामाधिपत्ये नियुङ्क्ते। एवं पूर्वकर्मानुसारी ईश्वरो रागादिद्वारा पुरुषं बाधमानोऽपि विधिप्रतिषेधशास्त्रानुसारिणा तेनैव भक्ति ध्यानप्रणिधानेनावर्जितः एनं रागादिजये नियुङ्क्ते तस्माद्विधिप्रतिषेधशास्त्रस्य नानर्थक्यम्। पुरुषस्य स्वातन्त्र्यसत्त्वात्। नापीश्वरे वैषम्यादिकम्। प्राणिकर्मायत्तत्वादिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.34।।ननु प्रकृतेर्भगवद्दत्तसामर्थ्यान्निग्रहादीनामसाधकत्वे पुरुषसज्जीवानां कथं फलसिद्धिः इत्यत आहुः इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थ इति। इन्द्रियस्य इन्द्रियाणां जात्यभिप्रायेणैकवचनम् इन्द्रियस्यार्थे रूपादौ रागद्वेषौ व्यवस्थितौ नियतभाव्यौ। इष्टे रागोऽनिष्टे द्वेषः। अवश्यमेतौ भाविनौ। तयोरिष्टानिष्टयोः रागद्वेषयोर्वा वशं नागच्छेत्। यतस्तावस्य परिपन्थिनौ द्वेषिणौ मार्गविच्छेदकौ। अत्रायमर्थः मायायाः स्वीयान्तानां तत्सम्बन्धिनां च मोहनसामर्थ्यं भगवता दत्तमतः पुरुषांशो जीव इन्द्रियादिवशं नागच्छेत्तदा मोहो न भवेत्। मायायाः स्वसम्बन्धिमोहकसामर्थ्यज्ञापनायैव पूर्वं भूतानीति नपुंसकलिङ्गमुक्तम्। अत्रोपदेशे चास्येत्यनेन पुल्लिङ्गमुक्तं विषयादिसङ्गस्य मोहरूपत्वादेव श्रीभागवते 3।31।35 न तथाऽस्य भवेन्मोहो बन्धश्चात्मप्रसङ्गतः। योषित्सङ्गाद्यथा पुंसो यथा तत्सङ्गिसङ्गतः।। इत्युक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.34।।नन्वेवं प्रकृत्यधीनैव चेत्पुरुषस्य प्रवृत्तिः तर्हि विधिनिषेधवैयर्थ्यं प्राप्तमित्याशङ्क्याह इन्द्रियस्येन्द्रियस्येति। वीप्सया प्रत्येकं सर्वेषामिन्द्रियाणामित्युक्तम्। अर्थे स्वस्वविषयेऽनुकूले रागः प्रतिकूले द्वेषश्चेत्येवं रागद्वेषौ व्यवस्थिताववश्यंभाविनौ। ततश्च तदनुरूपा प्रवृत्तिरिति भूतानां प्रकृतिः तथापि तयोर्वशवर्ती न भवेदिति शास्त्रेण नियम्यते। हि यस्मादस्य मुमुक्षोस्तौ परिपन्थिनौ प्रतिपक्षौ। अयं भावः। विषयस्मरणादिना रागद्वेषावुत्पाद्यानवहितं पुरुषमनर्थेऽपि गम्भीरे स्रोतसीव प्रकृतिर्बलात्प्रवर्तयति शास्त्रं तु ततः प्रागेव विषयेषु रागद्वेषप्रतिबन्धके परमेश्वरभजनादौ प्रवर्तयति। गम्भीरस्रोतःपातात्पूर्वमेव नावमाश्रित इव नानर्थं प्राप्नोतीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.34।।नन्वेवं सति विधिनिषेधवैयर्थ्यं प्रकृत्यधीनत्वात्सर्वस्येत्याशङ्क्याह इन्द्रियस्येति। न हि विधिनिषेधौ तत्त्वज्ञात्यन्ताज्ञयोः प्रवर्त्तकौ अविषयत्वात्। किन्तु मध्यमस्येति इन्द्रियरसवानेवाधिकारीति तस्य प्रतीन्द्रियार्थं रागद्वेषावन्तरस्वकृतौ व्यवस्थितौ तदनधीनत्वमेव सिद्धिहेतुरिति अतस्तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ विवेकवित्तस्य कुपथप्रापकौ प्रसभं घातकावित्यर्थः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.34।।यदि सभी जीव अपनीअपनी प्रकृतिके
Chapter 3 (Part 21)
अनुरूप ही चेष्टा करते हैं प्रकृतिसे रहित कोई है ही नहीं तब तो पुरुषके प्रयत्नकी आवश्यकता न रहनेसे विधिनिषेध बतलानेवाला शास्त्र निरर्थक होगा इसपर यह कहते हैं इन्द्रिय इन्द्रियके अर्थमें अर्थात् सभी इन्द्रियोंके शब्दादि विषयोंमें राग और द्वेष स्थित हैं अर्थात् इष्टमें राग और अनिष्टमें द्वेष ऐसे प्रत्येक इन्द्रियके विषयमें राग और द्वेष दोनों अवश्य रहते हैं। वहाँ पुरुषप्रयत्नकी और शास्त्रकी आवश्यकताका विषय इस प्रकार बतलाते हैं शास्त्रानुसार बर्तनेमें लगे हुए मनुष्यको चाहिये कि वह पहलेसे ही रागद्वेषके वशमें न हो। अभिप्राय यह कि मनुष्यकी जो प्रकृति है वह रागद्वेषपूर्वक ही अपने कार्यमें मनुष्यको नियुक्त करती है। तब स्वाभाविक ही स्वधर्मका त्याग और परधर्मका अनुष्ठान होता है। परंतु जब यह जीव प्रतिपक्षभावनासे रागद्वेषका संयम कर लेता है तब केवल शास्त्रदृष्टिवाला हो जाता है फिर यह प्रकृतिके वशमें नहीं रहता। इसलिये ( कहते हैं कि ) मनुष्यको रागद्वेषके वशमें नहीं होना चाहिये क्योंकि वे ( रागद्वेष ) ही इस जीवके परिपन्थी हैं अर्थात् चोरकी भाँति कल्याणमार्गमें विघ्न करनेवाले हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.34।। व्याख्या इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें रागद्वेषको अलगअलग स्थित बतानेके लिये यहाँ इन्द्रियस्य पद दो बार प्रयुक्त हुआ है। तात्पर्य यह है कि प्रत्येक इन्द्रिय(श्रोत्र त्वचा नेत्र रसना और घ्राण) के प्रत्येक विषय(शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध) में अनुकूलताप्रतिकूलताकी मान्यतासे मनुष्यके रागद्वेष स्थित रहते हैं। इन्द्रियके विषयमें अनुकूलताका भाव होनेपर मनुष्यका उस विषयमें राग हो जाता है और प्रतिकूलताका भाव होनेपर उस विषयमें द्वेष हो जाता है।वास्तवमें देखा जाय तो रागद्वेष इन्द्रियोंके विषयोंमें नहीं रहते। यदि विषयोंमें रागद्वेष स्थित होते तो एक ही विषय सभीको समानरूपसे प्रिय अथवा अप्रिय लगता। परन्तु ऐसा होता नहीं जैसे वर्षा किसानको तो प्रिय लगती है पर कुम्हारको अप्रिय। एक मनुष्यको भी कोई विषय सदा प्रिय या अप्रिय नहीं लगता जैसे ठंडी हवा गरमीमें अच्छी लगती है पर सरदीमें बुरी। इस प्रकार सब विषय अपने अनुकूलता या प्रतिकूलताके भावसे ही प्रिय अथवा अप्रिय लगते हैं अर्थात् मनुष्य विषयोंमें अपना अनुकूल या प्रतिकूल भाव करके उनको अच्छा या बुरा मानकर रागद्वेष कर लेता है। इसलिये भगवान्ने रागद्वेषको प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें स्थित बताया है।वास्तवमें रागद्वेष माने हुए अहम्(मैंपन) में रहते हैं (टिप्पणी प0 176)। शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध हीअहम् कहलाता है। अतः जबतक शरीरसे माना हुआ सम्बन्ध रहता है तबतक उसमें रागद्वेष रहते हैं और वे ही रागद्वेष बुद्धि मन इन्द्रियों तथा इन्द्रियोंके विषयोंमें प्रतीत होते हैं। इसी अध्यायके सैंतीसवेंसे तैंतालीसवें श्लोकतक भगवान्ने इन्हीं रागद्वेषको काम और क्रोध के नामसे कहा है। राग और द्वेषके ही स्थूलरूप काम और क्रोध हैं। चालीसवें श्लोकमें बताया है कि यह काम इन्द्रियों मन और बुद्धिमें रहता है। विषयोंकी तरह इनमें (इन्द्रियों मन और बुद्धिमें) काम की प्रतीति होनेके कारण ही भगवान्ने इनको काम का निवासस्थान बताया है। जैसे विषयोंमें रागद्वेषकी प्रतीतिमात्र है ऐसे ही इन्द्रियों मन और बुद्धिमें भी रागद्वेषकी प्रतीतिमात्र है। ये इन्द्रियाँ मन और बुद्धि तो केवल कर्म करनेके करण (औजार) हैं। इनमें कामक्रोध अथवा रागद्वेष हैं ही कहाँ इसके सिवाय दूसरे अध्यायके उनसठवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं कि इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंको ग्रहण न करनेवाले पुरुषके विषय तो निवृत्त हो जाते हैं पर उनमें रहनेवाला उसका राग निवृत्त नहीं होता। यह राग परमात्माका साक्षात्कार होनेपर निवृत्त हो जाता है।तयोर्न वशमागच्छेत् इन पदोंसे भगवान् साधकको आश्वासन देते हैं कि रागद्वेषकी वृत्ति उत्पन्न होनेपर उसे साधन और साध्यसे कभी निराश नहीं होना चाहिये अपितु रागद्वेषकी वृत्तिके वशीभूत होकर उसे किसी कार्यमें प्रवृत्त अथवा निवृत्त नहीं होना चाहिये। कर्मोंमें प्रवृत्ति या निवृत्ति शास्त्रके अनुसार ही होनी चाहिये (गीता 16।24)। यदि रागद्वेषको लेकर ही साधककी कर्मोंमें प्रवृत्ति या निवृत्ति होती है तो इसका तात्पर्य यह होता है कि साधक रागद्वेषके वशमें हो गया। रागपूर्वक प्रवृत्ति या निवृत्ति होनेसे राग पुष्ट होता है और द्वेषपूर्वक प्रवृत्ति या निवृत्ति होनेसे द्वेष पुष्ट होता है। इस प्रकार रागद्वेष पुष्ट होनेके फलस्वरूप पतन ही होता है।जब साधक संसारका कार्य छोड़कर भजनमें लगता है तब संसारकी अनेक अच्छी और बुरी स्फुरणाएँ उत्पन्न होने लगती हैं जिनसे वह घबरा जाता है। यहाँ भगवान् साधकको मानो आश्वासन देते हैं कि उसे इन स्फुरणाओंसे घबराना नहीं चाहिये। इन स्फुरणाओंकी वास्तवमें सत्ता ही नहीं है क्योंकि ये उत्पन्न होती हैं और यह सिद्धान्त है कि उत्पन्न होनेवाली वस्तु नष्ट होनेवाली होती है। अतः विचारपूर्वक देखा जाय तो स्फुरणाएँ आ नहीं रही हैं प्रत्युत जा रही हैं। कारण यह है कि संसारका कार्य करते समय अवकाश न मिलनेसे स्फुरणाएँ दबी रहती हैं और संसारका कार्य छोड़ते ही अवकाश मिलनेसे पुराने संस्कार स्फुरणाओंके रूपमें बाहर निकलने लगते हैं। अतः साधकको इन अच्छी या बुरी स्फुरणाओंसे भी रागद्वेष नहीं करना चाहिये प्रत्युत सावधानीपूर्वक इनकी उपेक्षा करते हुए स्वयं तटस्थ रहना चाहिये। इसी प्रकारउसे पदार्थ व्यक्ति विषय आदिमें भी रागद्वेष नहीं करना चाहिये।रागद्वेषपर विजय पानेके उपायरागद्वेषके वशीभूत होकर कर्म करनेसे रागद्वेष पुष्ट (प्रबल) होते हैं और अशुद्ध प्रकृति(स्वभाव) का रूप धारण कर लेते हैं। प्रकृतिके अशुद्ध होनेपर प्रकृतिकी अधीनता रहती है। ऐसी अशुद्ध प्रकृतिकी अधीनतासे होनेवाले कर्म मनुष्यको बाँधते हैं। अतः रागद्वेषके वशमें होकर कोई प्रवृत्ति या निवृत्ति नहीं होनी चाहिये यह उपाय यहाँ बताया गया। इससे पहले भगवान् कह चुके हैं कि जो मेरे मतका अनुसरण करता है वह कर्मबन्धनसे छूट जाता है (गीता 3। 31)। इसलिये रागद्वेषकी वृत्तिके वशमें न होकर भगवान्के मतके अनुसार कर्म करनेसे रागद्वेष सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं। तात्पर्य यह कि साधक सम्पूर्ण कर्मोंको और अपनेको भी भलीभाँति भगवदर्पण कर दे और ऐसा मान ले कि कर्म मेरे लिये नहीं हैं प्रत्युत भगवान्के लिये ही हैं जिनसे कर्म होते हैं वे शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि भी भगवान्के ही हैं और मैं भी भगवान्का ही हूँ। फिर निष्काम निर्मम और निःसन्ताप होकर कर्तव्यकर्म करनेसे रागद्वेष मिट जाते हैं। इस प्रकार भगवान्के मत अर्थात् सिद्धान्तको सामने रखकर ही किसी कार्यमें प्रवृत्त या निवृत्त होना चाहिये।सम्पूर्ण सृष्टि प्रकृतिका कार्य है और शरीर सृष्टिका एक अंश है। जबतक शरीरके प्रति ममता रहती है तभीतक रागद्वेष होते हैं अर्थात् मनुष्य रुचि या अरुचिपूर्वक वस्तुओंका ग्रहण और त्याग करता है। यह रुचिअरुचि ही रागद्वेषका सूक्ष्म रूप है। रागद्वेषपूर्वक प्रवृत्ति या निवृत्ति होनेसे रागद्वेष पुष्ट होते हैं परन्तु शास्त्रको सामने रखकर किसी कर्ममें प्रवृत्त या निवृत्त होनेसे रागद्वेष मिट जाते हैं। कारण कि शास्त्रके अनुसार चलनेसे अपनी रुचि और अरुचिकी मुख्यता नहीं रहती। यदि कोई मनुष्य शास्त्रको नहीं जानता तो उसके लिये महर्षि वेदव्यासजीके वचन हैं श्रूयतां धर्मसर्वस्वं श्रुत्वा चैवावधार्यताम्।आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।। (पद्मपुराण सृष्टि0 19। 35556)C हे मनुष्यों तुमलोग धर्मका सार सुनो और सुनकर धारण करो कि जो हम अपने लिये नहीं चाहते उसको दूसरोंके प्रति न करें।जीवन्मुक्त महापुरुष भी शास्त्रमर्यादाको ही आदर देते हैं। इसीलिये श्राद्धमें पिण्डदान करते समय पिताजीका हाथ प्रत्यक्ष दिखायी देनेपर भी भीष्मपितामहने शास्त्रके आज्ञानुसार कुशोंपर ही पिण्डदान किया (महाभारत अनुशासन0 84। 1520)। अतः साधकको सम्पूर्ण कर्म शास्त्रके आज्ञानुसार ही करने चाहिये।रागद्वेष मिटानेके इच्छुक साधकोंके लिये तो कर्म करनेमें शास्त्रप्रमाणकी आवश्यकता रहती है पर रागद्वेषसे सर्वथा रहित महापुरुषका अन्तःकरण इतना शुद्ध निर्मल होता है कि उसमें स्वतः वेदोंका तात्पर्य प्रकट हो जाता है चाहे वह पढ़ालिखा हो या न हो। उसके अन्तःकरणमें जो बात आती है वह शास्त्रानुकूल ही होती है (टिप्पणी प0 178)। रागद्वेषका सर्वथा अभाव होनेके कारण उस महापुरुषके द्वारा शास्त्रनिषिद्ध क्रियाएँ कभी होती ही नहीं। उसका स्वभाव स्वतः शास्त्रके अनुसार बन जाता है। यही कारण है कि ऐसे महापुरुषके आचरण और वचन दूसरे मनुष्योंके लिये आदर्श होते हैं (गीता 3। 21)। अतः उस महापुरुषके आचरणों और वचनोंका अनुसरण करनेसे साधकके रागद्वेष भी मिट जाते हैं।कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि रागद्वेष अन्तःकरणके धर्म हैं अतः इनको मिटाया नहीं जा सकता। पर यह बात युक्तिसंगत नहीं दीखती। वास्तवमें रागद्वेष अन्तःकरणके आगन्तुक विकार हैं धर्म नहीं। यदि ये अन्तःकरणके धर्म होते तो जिस समय अन्तःकरण जाग्रत् रहता है उस समय रागद्वेष भी रहते अर्थात् इनकी सदा ही प्रतीति होती। परन्तु इनकी प्रतीति सदा न होकर कभीकभी ही होती है। साधन करनेपर रागद्वेष उत्तरोत्तर कम होते हैं यह साधकोंका अनुभव है। कम होनेवाली वस्तु मिटनेवाली होती है। इससे भी सिद्ध होता है कि रागद्वेष अन्तःकरणके धर्म नहीं हैं। भगवान्ने रागद्वेषकोमनोगत कहा है कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् (गीता 2। 55) अर्थात् ये मनमें आनेवाले हैं सदा रहनेवाले नहीं। इसके अतिरिक्त भगवान्ने रागद्वेषको विकार कहा है (गीता 13। 6) और प्रियअप्रियकी प्राप्तिमें चित्तके सदा सम रहनेको साधन कहा है (गीता 13। 9)। यदि रागद्वेष अन्तःकरणके धर्म होते तो यह समचित्ततारूप साधन बन ही नहीं सकता। धर्म स्थायी रहता है और विकार अस्थायी अर्थात् आनेजानेवाले होते हैं। रागद्वेष अन्तःकरणमें आनेजानेवाले हैं अतः इनको मिटाया जा सकता है।प्रकृति (जड) और पुरुष (चेतन) दोनों भिन्नभिन्न हैं। इन दोनोंका विवेक स्वतःसिद्ध है। पुरुष इस विवेकको महत्त्व न देकर प्रकृतिजन्य शरीरसे एकता कर लेता है और अपनेको एकदेशीय मान लेता है। यह जडचेतनका तादात्म्य ही अहम् (मैं) कहलाता है और इसीमें रागद्वेष रहते हैं। तात्पर्य यह है कि अहंता(मैंपन) में रागद्वेष रहते हैं और रागद्वेषसे अहंता पुष्ट होती है। यही रागद्वेष बुद्धिमें प्रतीत होते हैं जिससे बुद्धिमें सिद्धान्त आदिको लेकर अपनी मान्यता प्रिय और दूसरोंकी मान्यता अप्रिय लगती है। फिर ये रागद्वेष मनमें प्रतीत होते हैं जिससे मनके अनुकूल बातें प्रिय और प्रतिकूल बातें अप्रिय लगती हैं। फिर यही रागद्वेष इन्द्रियोंमें प्रतीत होते हैं जिससे इन्द्रियोंके अनुकूल विषय प्रिय और प्रतिकूल विषय अप्रिय लगते हैं। यही रागद्वेष इन्द्रियोंके विषयों(शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध) में अपनी अनुकूल और प्रतिकूल भावनाको लेकर प्रतीत होते हैं। अतः जडचेतनकी ग्रन्थिरूप अहंता(मैंपन) के मिटनेपर रागद्वेषका सर्वथा अभाव हो जाता है क्योंकि अहंतापर ही रागद्वेष टिके हुए हैं।मैं सेवक हूँ मैं जिज्ञासु हूँ मैं भक्त हूँ ये सेवक जिज्ञासु और भक्त जिस मैं में रहते हैं उसी मैं में रागद्वेष भी रहते हैं। रागद्वेष न तो केवल जडमें रहते हैं और न केवल चेतनमें ही रहते हैं प्रत्युत जडचेतनके माने हुए सम्बन्धमें रहते हैं। जडचेतनके माने हुए सम्बन्धमें रहते हुए भी ये रागद्वेष प्रधानतः जडमें रहते हैं। जडचेतनके तादात्म्यमें जडका आकर्षण जडअंशमें ही होता है पर तादात्म्यके कारण वह चेतनमें दीखता है। जडका आकर्षण ही राग है। अतः जब साधक शरीर(जड) को ही अपना स्वरूप मान लेता है तब उसे रागद्वेषको मिटानेमें कठिनाई प्रतीत होती है। परन्तु अपने चेतनस्वरूपकी ओर दृष्टि रहनेसे उसे रागद्वेषको मिटानेमें कठिनाई प्रतीत नहीं होती। कारण कि रागद्वेष स्वतःसिद्ध नहीं हैं प्रत्युत जड(असत्) के सम्बन्धसे उत्पन्न होनेवाले हैं।यदि सत्सङ्ग भजन ध्यान आदिमें राग होगा तो संसारसे द्वेष होगा परन्तु प्रेम होनेपर संसारसे द्वेष नहीं होगा प्रत्युत संसारकी उपेक्षा (विमुखता) होगी (टिप्पणी प0 179)। संसारके किसी एक विषयमें राग होनेसे दूसरे विषयमें द्वेष होता है पर भगवान्में प्रेम होनेसे संसारसे वैराग्य होता है। वैराग्य होनेपर संसारसे सुख लेनेकी भावना समाप्त हो जाती है और संसारकी स्वतः सेवा होती है। इससे शरीर इन्द्रियाँ मन औरबुद्धिके साथ अहम् भी स्वतः संसारकी सेवामें लग जाता है। परिणामस्वरूप शरीरादिके साथसाथ अहम् से भी सम्बन्धविच्छेद होनेपर उसमें रहनेवाले रागद्वेष सर्वथा नष्ट हो जाते हैं।मनुष्यकी क्रियाएँ स्वभाव अथवा सिद्धान्तको लेकर होती हैं। केवल आध्यात्मिक उन्नतिके लिये कर्म करना सिद्धान्तको लेकर कर्म करना है। स्वभाव दो प्रकारका होता है रागद्वेषरहित (शुद्ध) और रागद्वेषयुक्त (अशुद्ध)। स्वभावको मिटा तो नहीं सकते पर उसे शुद्ध अर्थात् रागद्वेषरहित अवश्य बना सकते हैं। जैसे गङ्गा गङ्गोत्रीसे निकलती है गङ्गोत्री जितनी ऊँचाईपर है अगर उतना अथवा उससे अधिक ऊँचा बाँध बनाया जाय तो गङ्गाके प्रवाहको रोका जा सकता है। परन्तु ऐसा करना सरल कार्य नहीं है। हाँ गङ्गामें नहरें निकालकर उसके प्रवाहको बदला जा सकता है। इसी प्रकार स्वाभाविक कर्मोंके प्रवाहको मिटा तो नहीं सकते पर उसको बदल सकते हैं अर्थात् उसको रागद्वेषरहित बना सकते हैं यह गीताका मार्मिक सिद्धान्त है। रागद्वेषको लेकर जो क्रियाएँ होती हैं उनमें प्रवृत्ति और निवृत्ति उतनी बाधक नहीं है जितने कि रागद्वेष बाधक हैं। इसीलिये भगवान्ने रागद्वेषका त्याग करनेवालेको ही सच्चा त्यागी कहा है (गीता 18। 10)। रागद्वेषकी ओर प्रायः साधकका ध्यान नहीं जाता इसलिये उसकी प्रवृत्ति और निवृत्ति रागद्वेषपूर्वक होती है। अतः रागद्वेषसे रहित होनेके लिये साधकको सिद्धान्त सामने रखकर ही समस्त क्रियाएँ करनी चाहिये। फिर उसका स्वभाव स्वतः सिद्धान्तके अनुरूप और शुद्ध बन जायगा।रागद्वेषयुक्त स्फुरणाके उत्पन्न होनेपर उसके अनुसार कर्म करनेसे रागद्वेष पुष्ट होते हैं और उसके अनुसार कर्म न करके सिद्धान्तके अनुसार कर्म करनेसे रागद्वेष मिट जाते हैं।मनकी शुभ और अशुभ स्फुरणाओंमें रागद्वेष नहीं होने चाहिये। साधकको चाहिये कि वह मनमें होनेवाली स्फुरणाओंको स्वयंमें न मानकर उनसे किसी भी प्रकार सम्बन्ध न जोड़े उनका न समर्थन करे न विरोध करे।यदि साधक रागद्वेषको दूर करनेमें अपनेको असमर्थ पाता है तो उसे सर्वसमर्थ परम सुहृद् प्रभुकी शरणमें चले जाना चाहिये। फिर प्रभुकी कृपासे उसके रागद्वेष दूर हो जाते हैं (गीता 7। 14) और परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है (गीता 18। 62)। माने हुए अहम्सहित शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण और सांसारिक पदार्थ सबकेसब भगवान्के ही हैं ऐसा मानना ही भगवान्के शरण होना है। फिर भगवान्की प्रसन्नताके लिये भगवान्की दी हुई सामग्रीसे भगवान्के ही जनोंकी केवल सेवा कर देनी है और बदलेमें अपने लिये कुछ नहीं चाहना है। बदलेमें कुछ भी चाहनेसे जडके साथ सम्बन्ध बना रहता है। निष्कामभावपूर्वक संसारकी सेवा करना रागद्वेषको मिटानेका अचूक उपाय है। अपने पास स्थूल सूक्ष्म और कारणशरीरसे लेकर माने हुए अहम् तक जो कुछ है उसे संसारकी ही सेवामें लगा देना है। कारण कि ये सब पदार्थ तत्त्वतः संसारसे अभिन्न हैं। इनको संसारसे भिन्न (अपना) मानना ही बन्धन है। स्थूलशरीरसे क्रियाओं और पदार्थोंका सुख सूक्ष्मशरीरसे चिन्तनका सुख और कारणशरीरसे स्थिरताका सुख नहीं लेना है। वास्तवमें मनुष्यशरीर अपने सुखके लिये है ही नहीं एहि तन कर फल बिषय न भाई। (मानस 7। 44। 1)दूसरी बात जिन शरीर इन्द्रियों मन बुद्धि पदार्थ आदिसे सेवा होती है वे सब संसारके ही अंश हैं। जब संसार ही अपना नहीं तो फिर उसका अंश अपना कैसे हो सकता है इन शरीरादि पदार्थोंको अपना माननेसे सच्ची सेवा हो ही नहीं सकती क्योंकि इससे ममता और स्वार्थभाव उत्पन्न हो जाता है। इसलिये इन पदार्थोंको उसीके मानने चाहिये जिसकी सेवा की जाय। जैसे भक्त पदार्थोंको भगवान्का ही मानकरभगवान्के अर्पण करता है त्वदीयं वस्तु गोविन्द तुभ्यमेव समर्पये ऐसे ही कर्मयोगी पदार्थोंको संसारका ही मानकर संसारके अर्पण करता है।सेवासम्बन्धी मार्मिक बातसेवा वही कर सकता है जो अपने लिये कभी कुछ नहीं चाहता। सेवा करनेके लिये धनादि पदार्थोंकी चाह तो कामना है ही सेवा करनेकी चाह भी कामना ही है क्योंकि सेवाकी चाह होनेसे ही धनादि पदार्थोंकी कामना होती है। इसलिये अवसर प्राप्त हो और योग्यता हो तो सेवा कर देनी चाहिये पर सेवाकी कामना नहीं करना चाहिये।दूसरेको सुख पहुँचाकर सुखी होना मेरे द्वारा लोगोंको सुख मिलता है ऐसा भाव रखना सेवाके बदलेमें किञ्चित् भी मानबड़ाई चाहना और मानबड़ाई मिलनेपर राजी होना वास्तवमें भोग है सेवा नहीं। कारण कि ऐसा करनेसे सेवा सुखभोगमें परिणत हो जाती है अर्थात् सेवा अपने सुखके लिये हो जाते है। अगर सेवा करनेमें थोड़ा भी सुख लिया जाय तो वह सुख धनादि पदार्थोंमें महत्त्वबुद्धि पैदा कर देता है जिससे क्रमशः ममता और कामनाकी उत्पत्ति होती है।मैं किसीको कुछ देता हूँ ऐसा जिसका भाव है उसे यह बात समझमें नहीं आती तथा कोई उसे आसानीसे समझा भी नहीं सकता कि सेवामें लगनेवाले पदार्थ उसीके हैं जिसकी सेवा की जाती है। उसीकी वस्तु उसे ही दे दी तो फिर बदलेमें कुछ चाहनेका हमें अधिकार ही क्या है उसीकी धरोहर उसीको देनेमें एहसान कैसा अपने हाथोंसे अपना मुख धोनेपर बदलमें क्या हम कुछ चाहते हैं शङ्का सेवा तो धनादि वस्तुओंके द्वारा ही होती है। वस्तुओंके बिना सेवा कैसे हो सकती है अतः सेवा करनेके लिये भी वस्तुओंकी चाह न करनेसे क्या तात्पर्य है समाधान स्थूल वस्तुओंसे सेवा करना तो बहुत स्थूल बात है। वास्तवमें सेवा भाव है कर्म नहीं। कर्मसे बन्धन और सेवासे मुक्ति होती है। सेवाका भाव होनेसे अपने पास जो वस्तुएँ हैं वे स्वतः सेवामें लगती हैं। भाव होनेसे अपने पास जितनी वस्तुएँ हैं उन्हींसे पूर्ण सेवा हो जाती है इसलिये और वस्तुओंको चाहनेकी आवश्यकता ही नहीं है।वास्तविक सेवा वस्तुओंमें महत्त्वबुद्धि न रहनेसे ही हो सकती है। स्थूल वस्तुओंसे भी वही सेवा कर सकता है जिसकी वस्तुओंमें महत्त्वबुद्धि नहीं है। वस्तुओंमें महत्त्वबुद्धि रखते हुए सेवा करनेसे सेवाका अभिमान आ जाता है। जबतक अन्तःकरणमें वस्तुओंका महत्त्व रहता है तबतक सेवकमें भोगबुद्धि रहती ही है चाहे कोई जाने या न जाने।वास्तवमें सेवा भावसे होती है वस्तुओंसे नहीं। वस्तुओंसे कर्म होते हैं सेवा नहीं। अतः वस्तुओंको दे देना ही सेवा नहीं है। वस्तुएँ तो दूकानदार भी देता है पर साथमें लेनेका भाव रहनेसे उससे पुण्य नहीं होता। ऐसे ही प्रजा राजाको कररूपसे धन देती है पर वह दान नहीं होता। किसीको जल पिलानेपरमैंने उसे जल पिलाया तभी वह सुखी हुआ ऐसे भावका रहना दूकानदारी ही है। हम मानबड़ाई नहीं चाहते पर जल पिलानेसे पुण्य होगा अथवा दान करनेसे पुण्य होगा ऐसा भाव रहनेपर भी फलके साथ सम्बन्ध होनेके कारण अन्तःकरणमें जल धन आदि वस्तुओंका महत्त्व अङ्कित हो जाता है। वस्तुओंका महत्त्व अङ्कित होनेपर फिर वास्तविक सेवा नहीं होती प्रत्युत लेनेका भाव रहनेसे असत्के साथ सम्बन्ध बना रहता है चाहे जानें या न जानें। इसलिये वस्तुओंको दूसरोंकी सेवामें लगाकर दानपुण्य नहीं करना है प्रत्युत उन वस्तुओंसे अपना सम्बन्ध तोड़ना है।हमारे द्वारा वस्तु उसीको मिल सकती है जिसका उस वस्तुपर अधिकार है अर्थात् वास्तवमें जिसकी वह वस्तु है। उसे वस्तु देनेसे हमारा ऋण उतरता है। यदि दूसरेको किसी वस्तुकी हमसे अधिक आवश्यकता (भूख) है तो उस वस्तुका वही अधिकारी है। दूसरा अपने अधिकार(हक) की ही वस्तु लेता है। हमारे अधिकारकी वस्तु दूसरा ले ही नहीं सकता।एक बात खास ध्यान देनेकी है कि सच्चे हृदयसे दूसरोंकी सेवा करनेसे जिसकी वह सेवा करता है उस(सेव्य) के हृदयमें भी सेवाभाव जाग्रत् होता है यह नियम है। सच्चे हृदयसे सेवा करनेवाला पुरुष स्थूलदृष्टिसे तो पदार्थोंको सेव्यकी सेवामें लगाता है पर सूक्ष्मदृष्टिसे देखा जाय तो वह सेव्यके हृदयमेंसेवाभाव जाग्रत् करता है। यदि सेव्यके हृदयमें सेवाभाव जाग्रत् न हो तो साधकको समझ लेना चाहिये कि सेवा करनेमें कोई त्रुटि (अपने लिये कुछ पाने या लेनेकी इच्छा) है। अतः साधकको इस विषयमें विशेष सावधानी रखते हुए ही दूसरोंकी सेवा करना चाहिये और अपनी त्रुटियोंको खोजकर निकाल देना चाहिये। दूसरे मुझे अच्छा कहें ऐसा भाव सेवामें बिलकुल नहीं रखना चाहिये। ऐसा भाव आते ही उसे तुरंत मिटा देना चाहिये क्योंकि यह भाव अभिमान बढ़ानेवाला है।प्रत्येक साधकके लिये संसार केवल कर्तव्यपालनका क्षेत्र है सुखीदुःखी होनेका क्षेत्र नहीं। संसार सेवाके लिये है। संसारमें साधकको सेवाहीसेवा करनी है। सेवा करनेमें सबसे पहले साधकका यह भाव होना चाहिये कि मेरे द्वारा किसीका किञ्चिन्मात्र भी अहित न हो। संसारमें कुछ प्राणी दुःखी रहते हैं और कुछ प्राणी सुखी रहते हैं। दुःखी प्राणीको देखकर दुःखी हो जाना और सुखी प्राणीको देखकर सुखी हो जाना भी सेवा है क्योंकि इससे दुःखी और सुखी दोनों व्यक्तियोंको सुखका अनुभव होता है और उन्हें बल मिलता है कि हमारा भी कोई साथी है दूसरा दुःखी है तो उसके साथ हम भी हृदय से दुःखी हो जायँ कि उसका दुःख कैसे मिटे उससे प्रेमपूर्वक बात करें और सुनें। उससे कहें कि प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर घबराना नहीं चाहिये ऐसी परिस्थिति तो भगवान् राम एवं राजा नल हरिश्चन्द्र आदि अनेक बड़ेबड़े पुरुषोंपर भी आयी है आजकल तो अनेक लोग तुम्हारेसे भी ज्यादा दुःखी हैं हमारे लायक कोई काम हो तो कहना आदि। ऐसी बातोंसे वह राजी हो जायगा। ऐसे ही सुखी व्यक्तिसे मिलकर हम भी हृदयसे सुखी हो जायँ कि बहुत अच्छा हुआ तो वह राजी हो जायगा। इस प्रकार हम दुःखी और सुखी दोनों व्यक्तियोंकी सेवा कर सकते हैं। दूसरेके दुःख और सुख दोनोंमें सहमत होकर हम दूसरोंको सुख पहुँचा सकते हैं। केवल दूसरोंके हितका भाव निरन्तर रहनेकी आवश्यकता है। जो दूसरोंके दुःखसे दुःखी और दूसरोंके सुखसे सुखी होते हैं वे सन्त होते हैं। गोस्वामी तुलसीदासजी महाराजने संतोंके लक्षणोंमें कहा है पर दुख दुख सुख सुख देखे पर (मानस 7। 38। 1)यहाँ शङ्का होती है कि यदि हम दूसरोंके दुःखसे दुःखी होने लगें तो फिर हमारा दुःख कभी मिटेगा ही नहीं क्योंकि संसारमें दुःखी तो मिलते ही रहेंगे इसका समाधान यह है कि जैसे हमारे ऊपर कोई दुःख आनेसे हम उसे दूर करनेकी चेष्टा करते हैं ऐसे ही दूसरेको दुःखी देखकर अपनी शक्तिके अनुसार उसका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होनी चाहिये। उसका दुःख दूर करनेकी सच्ची भावना होनी चाहिये। अतः दूसरेके दुःखसे दुःखी होनेका तात्पर्य उसके दुःखको दूर करनेका भाव तथा चेष्टा करनेमें है जिससे हमें प्रसन्नता ही होगी दुःख नहीं। दूसरेके दुःखसे दुःखी होनेपर हमारे पास शक्ति योग्यता पदार्थ आदि जो कुछ भी है वह सब स्वतः दूसरेका दुःख दूर करनेमें लग जायगा। दुःखी व्यक्तिको सुखी बना देना तो हमारे हाथकी बात नहीं है पर उसका दुःख दूर करनेके लिये अपनी सुखसामग्रीको उसकी सेवामें लगा देना हमारे हाथकी बात है। सुखसामग्रीके त्यागसे तत्काल शान्तिकी प्राप्ति होती है। सेवा करनेका अर्थ है सुख पहुँचाना। साधकका भाव मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत् (किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न हो) होनेसे वह सभीको सुख पहुँचाता है अर्थात् सभीकी सेवा करता है। साधक भले ही सबको सुखीन कर सके पर वह ऐसा भाव तो बना ही सकता है। भाव बनानेमें सब स्वतन्त्र हैं कोई पराधीन नहीं। इसलिये सेवाकरनेमें धनादि पदार्थोंकी आवश्यकता नहीं है प्रत्युत सेवाभावकी ही आवश्यकता है। क्रियाएँ और पदार्थ चाहे जितने हों सीमित ही होते हैं। सीमित क्रियाओं और पदार्थोंसे सेवा भी सीमित ही होती है फिर सीमित सेवासे असीम तत्त्व(परमात्मा) की प्राप्ति कैसे हो सकती है परन्तु भाव असीम होता है। असीमभावसे सेवा भी असीम होती है और असीम सेवासे असीम तत्त्वकी प्राप्ति होती है। इसलिये सेवाभाववाले व्यक्तिकी क्रियाएँ और पदार्थ कम होनेपर भी उसकी सेवा कम नहीं समझनी चाहिये क्योंकि उसका भाव असीम होता है।यद्यपि साधकके कर्तव्यपालनका क्षेत्र सीमित ही होता है तथापि उसमें जिनजिनसे उसका व्यवहार होताहै उनमें वह सुखीको देखकर सुखी एवं दुःखीको देखकर दुःखी होता है। पदार्थ शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिको जो अपना नहीं मानता वही दूसरोंके सुखमें सुखी एवं दुःखमें दुःखी हो सकता है। शरीर इन्द्रियाँ मन आदि अपने और अपने लिये हैं ही नहीं यह वास्तविकता है। देश काल वस्तु व्यक्ति योग्यता सामर्थ्य आदि कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है। इन पदार्थोंमें भूलसे माने हुए अपनेपनका त्याग प्रत्येक मनुष्य कर सकता है चाहे वह दरिद्रसेदरिद्र हो अथवा धनीसेधनी पढ़ालिखा हो अथवा अनपढ़। इस त्यागमें सबकेसब स्वाधीन तथा समर्थ हैं।सच्चे सेवककी वृत्ति नाशवान् वस्तुओंपर जाती ही नहीं क्योंकि उसके अन्तःकरणमें वस्तुओंका महत्त्व नहीं होता। अन्तःकरणमें वस्तुओंका महत्त्व होनेपर ही वस्तुएँ व्यक्तिगत (अपनी) प्रतीत होती हैं। साधकको चाहिये कि वह पहलेसे ही ऐसा मान ले कि वस्तुएँ मेरी नहीं हैं और मेरे लिये भी नहीं हैं। वस्तुओंको अपनी और अपने लिये माननेसे भोग ही होता है सेवा नहीं। इस प्रकार वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर सेव्यकी ही मानते हुए सेवामें लगा देनेसे रागद्वेष सुगमतापूर्वक मिट जाते हैं।तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ पारमार्थिक मार्गमें रागद्वेष ही साधककी साधनसम्पत्तिको लूटनेवाले मुख्य शत्रु हैं। परन्तु इस ओर प्रायः साधक ध्यान नहीं देता। यही कारण है कि साधन करनेपर भी साधककी जितनी आध्यात्मिक उन्नति होनी चाहिये उतनी होती नहीं। प्रायः साधकोंकी यह शिकायत रहती है कि मन नहीं लगता पर वास्तवमें मनका न लगना उतना बाधक नहीं है जितने बाधक रागद्वेष हैं। इसलिये साधक को चाहिये कि वह मनकी एकाग्रताको महत्त्व न दे और जहाँजहाँ रागद्वेष दिखायी दें वहाँवहाँसे उनको तत्काल हटा दे। रागद्वेष हटानेपर मन लगना भी सुगम हो जायगा।स्वाभाविक कर्मोंका त्याग करना तो हाथकी बात नहीं है पर उन कर्मोंको रागद्वेषपूर्वक करना या न करना बिलकुल हाथकी बात है। साधक जो कर सकता है वही करनेके लिये भगवान् आज्ञा देते हैं कि रागद्वेषयुक्त स्फुरणा उत्पन्न होनेपर भी उसके अनुसार कर्म मत करो क्योंकि वे दोनों ही पारमार्थिक मार्गके लुटेरे हैं। ऐसा करनेमें साधक स्वतन्त्र है। वास्तवमें रागद्वेष स्वतः नष्ट हो रहे हैं पर साधक उन रागद्वेषको अपनेमें मानकर उन्हें सत्ता दे देता है और उसके अनुसार कर्म करने लगता है। इसी कारण वे दूर नहीं होते। यदि साधक रागद्वेषको अपनेमें न मानकर उसके अनुसार कर्म न करे तो वे स्वतः नष्ट हो जायँगे। सम्बन्ध रागद्वेषके वशमें न होकर क्या करना चाहिये और क्या नहीं करना चाहिये इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.34 3.35।।कथं तर्हि बन्धः इत्थमित्युच्यते (N omits इत्थम् K omits इति)।इन्द्रियस्येति। श्रेयानिति। संसारी च प्रतिविषयं रागं द्वेषं च गृह्णाति यतः कर्माणि आत्मकर्तृकाण्येव विमूढत्वादभिमन्यते इति सममपि भोजनादिव्यवहारं कुर्वतोः ज्ञानिसंसारिणोरस्त्ययं विशेषः। अयं नः सिद्धान्तः सर्वथा मुक्तसंगस्य स्वधर्मचारिणो नास्ति कश्चित् पुण्यपापात्मको बन्धः। स्वधर्मो हि हृदयादनपायी स्वरसनिरूढ ( N K निगूढः) एव न तेन कश्चिदपि रिक्तो जन्तुर्जायते इत्यत्याज्यः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.34।।सर्वस्य भूतवर्गस्य प्रकृतिवशवर्तित्वे लौकिकवैदिकपुरुषकारविषयाभावाद्विधिनिषेधानर्थक्यमिति शङ्कते यदीति। ननु यस्य न प्रकृतिरस्ति तस्य पुरुषकारसंभवादर्थवत्त्वं तद्विषये विधिनिषेधयोर्भविष्यति नेत्याह नचेति। शङ्कितदोषं श्लोकेन परिहरति इदमित्यादिना। वीप्सायाः सर्वकरणागोचरत्वं दर्शयति सर्वेति। प्रत्यर्थं रागद्वेषयोरव्यवस्थायाः प्राप्तौ प्रत्यादिशति इष्ट इति। प्रतिविषयं विभागेन तयोरन्यतरस्यावश्यकत्वेऽपि पुरुषकारविषयाभावप्रयुक्त्या प्रागुक्तं दूषणं कथं समाधेयमित्याशङ्क्याह तत्रेति। तयोरित्याद्यवतारितं भागं विभजते शास्त्रार्थ इति। प्रकृतिवशत्वाज्जन्तोर्नैव नियोज्यत्वमित्याशङ्क्याह या हीति। रागद्वेषद्वारा प्रकृतिवशवर्तित्वे स्वधर्मत्यागादि दुर्वारमित्युक्तम् इदानीं विवेकविज्ञानेन रागादिनिवारणे शास्त्रीयदृष्ट्या प्रकृतिपारवश्यं परिहर्तुं शक्यमित्याह यदेति। मिथ्याज्ञाननिबन्धनौ हि रागद्वेषौ तत्प्रतिपक्षत्वं विवेकविज्ञानस्य मिथ्याज्ञानविरोधित्वादवधेयम्। रागद्वेषयोर्मूलनिवृत्त्या निवृत्तौ प्रतिबन्धध्वंसे कार्यसिद्धिमभिसंधायोक्तं तदेति। एवकारस्यान्ययोगव्यवच्छेदकत्वं दर्शयति नेति। पूर्वोक्तं नियोगमुपसंहरति तस्मादिति। तत्र हेतुमाह यत इति। हिशब्दोपात्तो हेतुर्यत इति प्रकटितः स च पूर्वेण तच्छब्देन संबन्धनीयः। पुरुषपरिपन्थित्वमेव तयोः सोदाहरणं स्फोरयति श्रेयोमार्गस्येति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.34।।इन्द्रियस्य इत्यस्य सङ्गतिमाह तथापीति। एवं तर्हिमयि सर्वाणि कर्माणि 3।30 इतिविधानं फलकथनं च व्यर्थमित्याशङ्क्येति भावः। यद्यपिप्रकृतिं यान्ति भूतानि 3।33 इति निग्रहोऽकिञ्चित्करस्तस्यापि व्याहतमेतदुच्यत इत्यत उक्तं निग्रहादिति। निग्रहादित्याद्याशयवांस्तथापीत्याद्याहेति योजना। अत्रागमसम्मतिमाह तथाहीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.34।।तथापि शक्तितो निग्रहः कार्यः। निग्रहात्सद्यः प्रयोजनाभावेऽपि भवत्येवातिप्रयत्नत इत्याशयवानाह इन्द्रियस्येति। तथा ह्युक्तम् संस्कारो बलवानेष ब्रह्माद्या अपि तद्वशाः। तथापि सोऽन्यथाकर्तुं शक्यतेऽतिप्रयत्नतः इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.34।।श्रोत्रदिज्ञानेन्द्रियस्य अर्थे शब्दादौ वागादिकर्मेन्द्रियस्य च अर्थे वचनादौ प्राचीनवासनाजनिततदनुबुभूषारूपो रागः अवर्जनीयो व्यवस्थितः तदनुभवे प्रतिहते च अवर्जनीयो द्वेषो व्यवस्थितः तौ एव ज्ञानयोगाय यतमानं नियमितसर्वेन्द्रियं स्ववशे कृत्वा प्रसह्य स्वकार्येषु नियोजयतः। ततः च अयम् आत्मस्वरूपानुभवविमुखो विनष्टो भवति। तयोः न वशम् आगच्छेत् ज्ञानयोगारम्भेण रागद्वेषवशम् आगम्य न विनश्येत्। तौ रागद्वेषौ हि अस्य दुर्जयौ शत्रू आत्मज्ञानाभ्यासं वारयतः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.34।। इन्द्रियस्येन्द्रियस्य अर्थे सर्वेन्द्रियाणामर्थे शब्दादिविषये इष्टे रागः अनिष्टे द्वेषः इत्येवं प्रतीन्द्रियार्थं रागद्वेषौ अवश्यंभाविनौ तत्र अयं पुरुषकारस्य शास्त्रार्थस्य च विषय उच्यते। शास्त्रार्थे प्रवृत्तः पूर्वमेव रागद्वेषयोर्वशं नागच्छेत्। या हि पुरुषस्य प्रकृतिः सा रागद्वेषपुरःसरैव स्वकार्ये पुरुषं प्रवर्तयति। तदा स्वधर्मपरित्यागः परधर्मानुष्ठानं च भवति। यदा पुनः रागद्वेषौ तत्प्रतिपक्षेण नियमयति तदा शास्त्रदृष्टिरेव पुरुषः भवति न प्रकृतिवशः। तस्मात् तयोः रागद्वेषयोः वशं न आगच्छेत् यतः तौ हि अस्य पुरुषस्य परिपन्थिनौ श्रेयोमार्गस्य विघ्नकर्तारौ तस्करौ इव पथीत्यर्थः।।तत्र रागद्वेषप्रयुक्तो मन्यते शास्त्रार्थमप्यन्यथा परधर्मोऽपि धर्मत्वात् अनुष्ठेय एव इति तदसत्
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【 Verse 3.35 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रेयान्स्वधर्मो विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात् | स्वधर्मे निधनं श्रेय: परधर्मो भयावह: ||
▸ Transliteration: śreyānsvadharmo viguṇahparadharmātsvanuṣṭhitāt | svadharme nidhanaṁ śreyaḥ paradharmo bhayāvahaḥ ||
▸ Glossary: śreyān: better; svadharmaḥ: own duty; viguṇaḥ: in a faulty manner; paradharmāt: other’s duty; svanuṣṭhitāt: perfectly done; svadharme: in one’s duty; nidhanaṁ: death; śreyaḥ: better; paradhamaḥ: other’s duty; bhayāvahaḥ: dangerous
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.35 Better it is to do one’s own responsibility, even if it is in a faultily, than to do someone else’s responsibility perfectly. Death in the course of performing one’s own responsibility is better than doing another’s responsibility, as this can be dangerous.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.35।।अच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.35।। सम्यक् प्रकार से अनुष्ठित परधर्म की अपेक्षा गुणरहित स्वधर्म का पालन श्रेयष्कर है स्वधर्म में मरण कल्याणकारक है (किन्तु) परधर्म भय को देने वाला है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.35 श्रेयान् better? स्वधर्मः ones own duty? विगुणः devoid of merit? परधर्मात् than the duty of another? स्वनुष्ठितात् than well discharged? स्वधर्मे in ones own duty? निधनम् death? श्रेयः better? परधर्मः anothers duty? भयावहः fraught with fear.Commentary It is indeed better for man to die discharging his own duty though destitute of merit than for him to live doing the duty of another though performed in a perfect manner. For the duty of another has its pitfalls. The duty of a Kshatriya is to fight in a righteous battle. Arjuna must fight. This is his duty. Even if he dies in the discharge of his own duty? it is better for him. He will go to heaven. He should not do the duty of another man. This will bring him peril. He should not stop from fighting and enter the path of renunciation. (Cf.XVIII.47).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.35. Better is one's own duty, [though] it lacks in merit, than the well-performed duty of another; better is the ruin in one's own duty than the good fortune from another's duty.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.35 It is better to do thine own duty, however lacking in merit, than to do that of another, even though efficiently. It is better to die doing one's own duty, for to do the duty of another is fraught with danger.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.35 Better is one's own duty, though ill-done, than the duty of another well-performed. Better is death in one's own duty; the duty of another is fraught with fear.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.35 One's own duty [Customary or scripturally ordained observances of different castes and sects.-Tr.], though defective, is superior to another's duty well-performed. Death is better while engaged in one's own duty; another's duty is fraught with fear.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.35 Better is one's own duty, though devoid of merit than the duty of another well discharged. Better is death in one's own duty; the duty of another is fraught with fear (is productive of danger).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.34-35 Indriyasya etc., Sreyan etc. A person living the worldly life does entertain likes or dislikes towards every sense-object. For, due to his total ignorance he imagines that actions are performed only by his Self. Thus there is this difference between a man of knowledge and a man of worldly life, eventhough they perform alike their [respective] worldly activities such as eating etc.
The established view of ours [in this regard] is this : For a person, who, freed from attachment in every way, Performs his own duty, there is hardly any bond of merit or demerit. Indeed one's own duty never disappears from one's heart and it is certainly rooted there deeply as a natural taste. Not a single creature is born without that. Hence it should not be given up.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.35 Therefore Karma Yoga is better than Jnana Yoga. For, it forms one's own duty, since it is natural to one and easy to perform, and though defective, is free from liability to interruption and fall. Jnana Yoga, on the other hand, though performed well for some time, constitutes the duty of another, as it is difficult to practise for one conjoined with Prakrti. It is therefore liable to interruption. For a person who lives practising Karma Yoga - which is his duty because he is alified for it - even death without success in one birth does not matter. For, in the next birth with the help of the experience already gained in the previous birth, it will be possible for him to perform Karma Yoga without any impediments. Jnana Yoga is fraught with fear because of the possibility of errors for anyone who is conjoined to Prakrti. It is another's duty, on account of it being not easily adoptable by him.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.35 Svadharmah, one's own duty; being practised even though vigunah, defective, deficient; is sreyan, superior to, more commendable than; para-dharmat, another's duty; though svanusthitat, well-performed, meritoriously performed. Even nidhanam, death; is sreyah, better; while engaged svadharme, in one's own duty, as compared with remaining alive while engaged in somody else's duty. Why? Paradharmah, another's duty; is bhayavahah, fraught with fear, since it invites dangers such as hell etc. Although the root cause of evil was stated in, 'In the case of a person who dwells on objects' (2.62) and '৷৷৷৷.because they (attraction and repulsion) are his adversaries' (34), that was presented desultorily and vaguely. Wishing to know it briefly and definitely as, 'This is thus, to be sure', Arjuna, with the idea, 'When this indeed becomes known, I shall make effort for its eradication', said:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.35।। धर्म शब्द अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है। धार्मिकता सद्व्यवहार कर्तव्य सद्गुण आदि विभिन्न अर्थों में इसका प्रयोग किया गया है। धर्म की परिभाषा हम देख चुके हैं कि जिसके कारण वस्तु का अस्तित्व सिद्ध होता है वह उस वस्तु का धर्म कहलाता है।एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति का भिन्नत्व उसके विचारों द्वारा निश्चित किया जाता है। इन विचारों का स्तर गुण दिशा आदि व्यक्ति की वासनाओं पर निर्भर करते हैं। यही है मनुष्य का स्वभाव अथवा धर्म। अत मनसंयम के इस प्रकरण में धर्म से तात्पर्य प्रत्येक व्यक्ति की वासनाओं से है।स्वधर्म और परधर्म यहाँ स्वधर्म का अर्थ किसी जाति विशेष में जन्म लेने पर प्राप्त होने वाले कर्तव्य से नहीं है। स्वधर्म का सही तात्पर्य है स्वयं की वासनायें। स्वयं की सहज और स्वाभाविक वासनाओं के अनुसार कार्य करने से ही जीवन में शांति और आनन्द सफलता और सन्तोष का अनुभव होता है। अत परधर्म का अर्थ है दूसरे के स्वभाव के अनुसार व्यवहार और कर्म करना जो भयावह होता है इसमें दो मत नहीं हो सकते।गीता में अर्जुन के स्वभाव को देखते हुये भगवान् उसे युद्ध करने का स्पष्ट उपदेश देते हैं। जन्मजात राजकुमार अर्जुन ने अपने विद्यार्थी जीवन में ही साहस और शूरवीरता का प्रदर्शन किया था और धनुर्विद्या में निपुणता भी प्राप्त की थी। अत युद्ध जैसा खतरनाक कर्म उसके स्वभाव के अनुकूल ही था। प्रथम अध्याय से यह स्पष्ट हो जाता है कि अर्जुन ने संभवत अपने प्रारम्भिक शिक्षणकाल में यह सुना और समझा था कि संन्यास और त्याग का अर्थात् ब्राह्मण का जीवन उसके जीवन से श्रेष्ठतर है। इसीलिये युद्धभूमि पलायन से गुफाओं में बैठकर ध्यानाभ्यास करने की उसकी इच्छा हो रही थी। श्रीकृष्ण उसे स्मरण दिलाते हैं कि स्वधर्म पालन में कुछ कमी रहने पर भी उसी का पालन उसके आत्मविकास के लिये श्रेयष्कर है। दूसरे व्यक्ति के श्रेष्ठ और दिव्य जीवन की अनुकृति मात्र से अर्जुन को लाभ नहीं होगा।यद्यपि समस्त अनर्थों का मूल कारण पहले बताया जा चुका है तथापि उसके और अधिक स्पष्टीकरण के लिए
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.35।।ननु शास्त्रीयमेव कर्म कर्तव्यं चेत्तर्हि परधर्मोऽपि सुकरो धर्मत्वात् कुतो नानुष्ठेय इति चेत्तत्राह श्रेयानिति। परधर्मात्साद्गुण्येन संपादितादपि स्वकीयो धर्मो विगतगुणोऽप्यनुष्ठीयमानः प्रशस्यतरः। स्वधर्मे स्थितस्य मरणमपि श्रेयः। इह लोके कीर्त्यावहममुत्र स्वर्गप्रापकम्। परधर्मस्तु तद्विपर्ययेण भयप्रदः। यद्वा तत्तदिन्द्रियविषये स्थितयो रागद्वेषयोरात्मप्रापक आत्मधर्मे विघ्नकर्तृत्वेऽपीन्द्रियधर्मे प्रावृत्तिके विषयसुखजनके तयोस्तत्त्वाभावादिन्द्रियधर्म एवानुष्ठेयः। किमात्मधर्मानुष्ठानेन विघ्नकर्तृयुक्तेनेतिचेत्तत्राह श्रेयानिति। परेषामिन्द्रियाणां धर्मात्प्रावृत्तिकात्स्वनुष्ठितात्सुगमत्वेनानुष्ठातुं शक्यादपि स्वधर्म आत्मधर्म अध्यात्मावगतिरुपः विगुणः प्राकृतगुणवियुक्तः मुक्तिहेतुत्वात्प्रशस्यतरः। तत्र निधनं श्रेयः अपुनर्भवत्वात्। परधर्मोभयावहः अविद्यारुपतया संसारपातहेतुत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.35।।ननु स्वाभाविकरागद्वेषप्रयुक्तपश्वादिसाधारणप्रवृत्तिप्रहाणेन शास्त्रीयमेव कर्म कर्तव्यं चेत्तर्हि यत्सुकरं भिक्षाशनादि तदेव क्रियतां किमतिदुःखावहेन युद्धेनेत्यतआह श्रेयानिति। श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वधर्मः यं वर्णमाश्रमं प्रति वा यो विहितः स तस्य स्वधर्मः विगुणोऽपि सर्वाङ्गोपसंहारमन्तरेण कृतोऽपि परधर्मात् स्वं प्रत्यविहितात् स्वनुष्ठितात् सर्वाङ्गोपसंहारेण संपादितादपि। नहि वेदातिरिक्तमानगम्यो धर्मः येन परधर्मोऽप्यनुष्ठेयः धर्मत्वात् स्वधर्मवदित्यनुमानं तत्र मानं स्यात्।चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः इतिन्यायात्। अतः स्वधर्मे किंचिदङ्गहीनेऽपि स्थितस्य निधनं मरणमपि श्रेयः प्रशस्यतरं परधर्मस्य जीवितादपि। स्वधर्मस्थस्य निधनं हीह लोके कीर्त्यावहं परलोके च स्वर्गादिप्रापकं। परधर्मस्तु इहाकीर्तिकरत्वेन परत्र नरकप्रदत्वेन च भयावहो यतः अतो रागद्वेषादिप्रयुक्तस्वाभाविकप्रवृत्तिवत्परधर्मोऽपि हेय एवेत्यर्थः। एवं तावद्भगवन्मताङ्गीकारिणां श्रेयःप्राप्तिस्तदनङ्गीकारिणां च श्रेयोमार्गभ्रष्टत्वमुक्तं। श्रेयोमार्गभ्रंशेन फलाभिसंधिपूर्वककाम्यकर्माचरणे च केवलपापमात्राचरणे च बहूनि कारणानि कथितानि ये त्वेतदभ्यसूयन्त इत्यादिना। तत्राकं संग्रहश्लोकःश्रद्धाहानिस्तथाऽसूया दुष्टचित्तत्वमूढते। प्रकृतेर्वशवर्तित्वं रागद्वेषौ च पुष्कलौ। परधर्मरुचित्वं चेत्युक्ता दुर्मार्गवाहकाः इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.35।।यस्मादेवं तस्माच्छ्रेयान्प्रशस्यतरः स्वधर्मः स्वस्य वर्णाश्रमानुरूप्येण ईश्वरेण विहितत्वात्। विगुणो हिंसादिमिश्रोऽपि किंचिदङ्गहीनोऽपि परधर्माद्धिंसादिदोषरहितपरधर्मापेक्षया स्वनुष्ठितात्सर्वाङ्गोपसंहारेण सम्यगनुष्ठितादपि स एव श्रेयान्। स्वधर्मे युद्धादौ निधनं मरणमपि श्रेयः। विहितत्वात्। परस्य धर्मो भैक्षचर्यादिर्भयावहः। क्षत्रियस्य तव निषिद्धत्वात्। तस्मात्स्वतन्त्रेण त्वया स्वधर्म एवानुष्ठेय इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.35।।ननु सर्वप्रकारेण भवदुक्तधर्मस्य कठिनत्वेन कथं सिद्धिः इत्याशङ्क्याहुः श्रेयानिति। स्वधर्मो भगवद्धर्मः विगुणः अङ्गादिभावरहितः परधर्मात् मोहकधर्मात् स्वनुष्ठितात् सुष्ठुप्रकारेणानुष्ठितात् सम्पादितात् श्रेयान् उत्तमः। यतः पूर्वं विगुणोऽपि भगवद्धर्मो मरणसमये भगवत्स्मारकत्वेनोपयुक्तो भवति तस्मात् स्वधर्मे सति निधनं मरणं श्रेयः मोक्षप्रापकमित्यर्थः। परधर्मो मरणसमये पूर्वानुष्ठितः स्वविषयस्मारको भवत्येव स तत्क्षणे यमदूतादिदर्शकत्वेनाऽग्रे च नरकादियातनायां तत्साधकत्वेन च भयावहः भयकर्तेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.35।।तदेवं स्वाभाविकीं पश्वादिसदृशीं प्रकृतिं त्यक्त्वा स्वधर्मे प्रवर्तितव्यमित्युक्तं तर्हि स्वधर्मस्य युद्धोदेर्दुःखरूपस्य यथावत्कर्तुमशक्यत्वात्परधर्मस्य चाहिंसादेः सुकरत्वाद्धर्मत्वाविशेषाच्च तत्र प्रवर्तितुमिच्छन्तं प्रत्याह श्रेयानिति। किंचिदङ्गहीनोऽपि स्वधर्मः श्रेयान्प्रशस्यतरः। स्वनुष्ठितात्सर्वाङ्गपूर्त्या कृतादपि परधर्मात्सकाशात्। तत्र हेतुः। स्वधर्मे युद्धादौ प्रवर्तमानस्य निधनं मरणमपि श्रेष्ठम्। स्वर्गादिप्रापकत्वात्। परधर्मस्तु स्वस्य भयावहः। निषिद्धत्वेन नरकप्रापकत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.35।।तदेवं रागद्वेषवशेन कस्यापि नोक्तधर्मे प्रवृत्तिः प्राकृतत्वादित्युक्तं ततस्तौ विहाय प्राकृतेनापि स्वधर्मस्तु न हेयः परधर्मोऽपि नोपादेयः इति बोधयन्नाह श्रेयानिति। विगुणोऽङ्गहीनोऽपि स्वनुष्ठितात्सङ्गात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.35।।रागद्वेषयुक्त मनुष्य तो शास्त्रके अर्थको भी उलटा मान लेता है और परधर्मको भी धर्म होनेके नाते अनुष्ठान करनेयोग्य मान बैठता है। परंतु उसका ऐसा मानना भूल है अच्छी प्रकार अनुष्ठान किये गये अर्थात् अंगप्रत्यंगोंसहित सम्पादन किये गये भी परधर्मकी अपेक्षा गुणरहित भी अनुष्ठान किया हुआ अपना धर्म कल्याणकर है अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है। परधर्ममें स्थित पुरुषके जीवनकी अपेक्षा स्वधर्ममें स्थित पुरुषका मरण भी श्रेष्ठ है क्योंकि दूसरेका धर्म भयदायक है नरक आदि रूप भयका देनेवाला है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.35।। व्याख्या श्रेयान् (टिप्पणी प0 182) स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् अन्य वर्ण आश्रम आदिका धर्म (कर्तव्य) बाहरसे देखनेमें गुणसम्पन्न हो उसके पालनमें भी सुगमता हो पालन करनेमें मन भी लगता हो धनवैभव सुखसुविधा मानबड़ाई आदि भी मिलती हो और जीवनभर सुखआरामसे भी रह सकते हों तो भी उस परधर्मका पालन अपने लिये विहित न होनेसे परिणाममें भय(दुःख) को देनेवाला है।इसके विपरीत अपने वर्ण आश्रम आदिका धर्म बाहरसे देखनेमें गुणोंकी कमीवाला हो उसके पालनमें भी कठिनाई हो पालन करनेमें मन भी न लगता हो धनवैभव सुखसुविधा मानबड़ाई आदि भी न मिलती हो और उसका पालन करनेमें जीवनभर कष्ट भी सहना पड़ता हो तो भी उस स्वधर्मका निष्कामभावसे पालन करना परिणाममें
Chapter 3 (Part 22)
कल्याण करनेवाला है। इसलिये मनुष्यको किसी भी स्थितिमें अपने धर्मका त्याग नहीं करना चाहिये प्रत्युत निष्काम निर्मम और अनासक्त होकर स्वधर्मका ही पालन करना चाहिये।मनुष्यके लिये स्वधर्मका पालन स्वाभाविक है सहज है। मनुष्यकाजन्म कर्मोंके अनुसार होता है और जन्मके अनुसार भगवान्नेकर्म नियत किये हैं (गीता 18। 41)। अतः अपनेअपने नियत कर्मोंका पालन करनेसे मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है अर्थात् उसका कल्याण हो जाता है (गीता 18। 45)। अतः दोषयुक्त दीखनेपर भी नियत कर्म अर्थात् स्वधर्मका त्याग नहीं करना चाहिये (गीता 18। 48)।अर्जुन युद्ध करनेकी अपेक्षा भिक्षाका अन्न खाकर जीवननिर्वाह करनेको श्रेष्ठ समझते हैं (गीता 2। 5)। परंतु यहाँ भगवान् अर्जुनको मानो यह समझाते हैं कि भिक्षाके अन्नसे जीवननिर्वाह करना भिक्षुकके लिये स्वधर्म होते हुए भी तेरे लिये परधर्म है क्योंकि तू गृहस्थ क्षत्रिय है भिक्षुक नहीं। पहले अध्यायमें भी जब अर्जुनने कहा कि युद्ध करनेसे पाप ही लगेगा पापमेवाश्रयेत् (1। 36) तब भी भगवान्ने कहा कि धर्ममय युद्ध न करनेसे तू स्वधर्म और कीर्तिको खोकर पापको प्राप्त होगा (2। 33)। फिर भगवान्ने बताया कि जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान समझकर युद्ध करनेसे अर्थात् रागद्वेषसे रहित होकर अपने कर्तव्य(स्वधर्म) का पालन करनेसे पाप नहीं लगता। (2। 38) आगे अठारहवें अध्यायमें भी भगवान्ने यही बात कही है कि स्वभावनियत स्वधर्मरूप कर्तव्यको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। (18। 47) तात्पर्य यह है कि स्वधर्मके पालनमें रागद्वेष रहनेसे ही पाप लगता है अन्यथा नहीं। रागद्वेषसे रहित होकर स्वधर्मका भलीभाँति आचरण करनेसेसमता(योग) का अनुभव होता है और समताका अनुभव होनेपर दुःखोंका नाश हो जाता है (गीता 6। 23)। इसलिये भगवान् बारबार अर्जुनको रागद्वेषसे रहित होकर युद्धरूप स्वधर्मका पालन करनेपर जोर देते हैं।भगवान् अर्जुनको मानो यह समझाते हैं कि क्षत्रियकुलमें जन्म होनेके कारण क्षात्रधर्मके नाते युद्ध करना तुम्हारा स्वधर्म (कर्तव्य) है अतः युद्धमें जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान देखना है और युद्धरूप क्रियाका सम्बन्ध अपने साथ नहीं है ऐसा समझकर केवल कर्मोंकी आसक्ति मिटानेके लिये कर्म करना है। शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदि अपने कर्तव्यका पालन करनेके लिये ही हैं।वर्ण आश्रम आदिके अनुसार अपनेअपने कर्तव्यका निःस्वार्थभावसे पालन करना ही स्वधर्म है। आस्तिकजन जिसेधर्म कहते हैं उसीका नाम कर्तव्य है। स्वधर्मका पालन करना अथवा अपने कर्तव्यका पालन करना एक ही बात है।कर्तव्य उसे कहते हैं जिसको सुगमतापूर्वक कर सकते हैं जो अवश्य करनेयोग्य है और जिसको करनेपर प्राप्तव्यकी प्राप्ति अवश्य होती है। धर्मका पालन करना सुगम होता है क्योंकि वह कर्तव्य होता है। यह नियम है कि केवल अपने धर्मका ठीकठीक पालन करनेसे मनुष्यको वैराग्य हो जाता है धर्म तें बिरति ৷৷. (मानस 3। 16। 1)। केवल कर्तव्यमात्र समझकर धर्मका पालन करनेसे कर्मोंका प्रवाह प्रकृतिमें चला जाता है और इस तरह अपने साथ कर्मोंका सम्बन्ध नहीं रहता।वर्ण आश्रम आदिके अनुसार सभी मनुष्योंका अपनाअपना कर्तव्य (स्वधर्म) कल्याणप्रद है। परन्तु दूसरे वर्ण आश्रम आदिका कर्तव्य देखनेसे अपना कर्तव्य अपेक्षाकृत कम गुणोंवाला दीखता है जैसे ब्राह्मणके कर्तव्य(शम दम तप क्षमा आदि) की अपेक्षा क्षत्रियके कर्तव्य(युद्ध करना आदि) में अहिंसादि गुणोंकी कमी दीखती है। इसलिये यहाँ विगुणः पद देनेका भाव यह है कि दूसरोंके कर्तव्यसे अपने कर्तव्यमें गुणोंकीकमी दीखनेपर भी अपना कर्तव्य ही कल्याण करनेवाला है। अतः किसी भी अवस्थामें अपने कर्तव्यका त्यगा नहीं करना चाहिये।वर्ण आश्रम आदिके अनुसार बाहरसे तो कर्म अलगअलग (घोर या सौम्य) प्रतीत होते हैं पर परमात्मप्राप्तिरूप उद्देश्य एक ही होता है। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य न रहनेसे तथा अन्तःकरणमें प्राकृत पदार्थोंका महत्त्व रहनेसे ही कर्म घोर या सौम्य प्रतीत होते हैं।स्वधर्मे निधनं श्रेयः स्वधर्मपालनमें यदि सदा सुखआराम धनसम्पत्ति मानबड़ाई आदरसत्कार आदि ही मिलते तो वर्तमानमें धर्मात्माओंकी टोलियाँ देखनेमें आतीं। परन्तु स्वधर्मका पालन सुख अथवा दुःखको देखकर नहीं किया जाता प्रत्युत भगवान् अथवा शास्त्रकी आज्ञाको देखकर निष्कामभावसे किया जाता है। इसलिये स्वधर्म अर्थात् अपने कर्तव्यका पालन करते हुए यदि कोई कष्ट आ जाय तो वह कष्ट भी उन्नति करनेवाला होता है। वास्तवमें वह कष्ट नहीं अपितु तप होता है। उस कष्टसे तपकी अपेक्षा भी बहुत जल्दी उन्नति होती है। कारण कि तप अपने लिये किया जाता है और कर्तव्य दूसरोंके लिये। जानकर किये गये तपसे उतना लाभ नहीं होता जितना लाभ स्वतः आये हुए कष्टरूप तपसे होता है। जिन्होंने स्वधर्मपालनमें कष्ट सहन किया और जो स्वधर्मका पालन करते हुए मर गये वे धर्मात्मा पुरुष अमर हो गये। लौकिक दृष्टिसे भी जो कष्ट आनेपर भी अपने धर्म(कर्तव्य) पर डटा रहता है उसकी बहुत प्रशंसा और महिमा होती है। जैसे देशको स्वतन्त्र बनानेके लिये जिन पुरुषोंने कष्ट सहे बारबार जेल गये और फाँसीपर लटकाये गये उनकी आज भी बहुत प्रशंसा और महिमा होती है। इसके विपरीत बुरे कर्म करके जेल जानेवालोंकी सब जगह निन्दा होती है। तात्पर्य यह निकला कि निष्कामभावपूर्वक अपने धर्मका पालन करते हुए कष्ट आ जाय अथवा मृत्युतक भी हो जाय तो भी उससे लोकमें प्रशंसा और परलोकमें कल्याण ही होता है।स्वधर्मका पालन करनेवाले मनुष्यकी दृष्टि धर्मपर रहती है। धर्मपर दृष्टि रहनेसे उसका धर्मके साथ सम्बन्ध रहता है। अतः धर्मपालन करते हुए यदि मृत्यु भी हो जाय तो उसका उद्धार हो जाता है। शङ्का स्वधर्मका पालन करते हुए मरनेसे कल्याण ही होता है इसे कैसे मानें समाधान गीता साक्षात् भगवान्की वाणी है अतः इसमें शङ्काकी सम्भावना ही नहीं है। दूसरे यह चर्मचक्षुओंका प्रत्यक्ष विषय नहीं है प्रत्युत श्रद्धाविश्वासका विषय है। फिर भी इस विषयमें कुछ बातें बतायी जाती है1 जिस विषयका हमें पता नहीं है उसका पता शास्त्रसे ही लगता है (टिप्पणी प0 184.1)। शास्त्रमें आया है कि जो धर्मकी रक्षा करता है उसकी रक्षा (कल्याण) धर्म करता है धर्मो रक्षति रक्षितः (मनुस्मृति 8। 15)। अतः जो धर्मका पालन करता है उसके कल्याणका भार धर्मपर और धर्मके उपदेष्टा भगवान् वेदों शास्त्रों ऋषियों मुनियों आदिपर होता है तथा उन्हींकी शक्तिसे उसका कल्याण होता है। जैसे हमारे शास्त्रोंमें आया है कि पातिव्रतधर्मका पालन करनेके स्त्रीका कल्याण हो जाता है तो वहाँ पातिव्रतधर्मकी आज्ञा देनेवाले भगवान् वेद शास्त्र आदिकी शक्तिसे ही कल्याण होता है पतिकी शक्तिसे नहीं। ऐसे ही धर्मका पालन करनेके लिये भगवान् वेद शास्त्रों ऋषिमुनियों और संतमहात्माओंकी आज्ञा है इसलिये धर्मपालन करते हुए मरनेपर उनकी शक्तिसे कल्याण हो जाता है इसमें किञ्चिन्मात्र भी संदेह नहीं है।2 पुराणों और इतिहासोंसे भी सिद्ध होता है कि अपने धर्मका पालन करनेवालेका कल्याण होता है। जैसे राजा हरिश्चन्द्र अनेक कष्ट निन्दा अपमान आदिके आनेपर भी अपनेसत्यधर्मसे विचलित नहीं हुए अतः इसके प्रभावसे वे समस्त प्रजाको साथ लेकर परमधाम गये (टिप्पणी प0 184.2) और आज भी उनकीबहुत प्रशंसा और महिमा है।3 वर्तमान समयमें पुनर्जन्मसम्बन्धी अनेक सत्य घटनाएँ देखने सुनने और पढ़नेमें आती है जिनसे मृत्युके बाद होनेवाली सद्गतिदुर्गतिका पता लगता है (टिप्पणी प0 184.3)।4 निःस्वार्थभावसे अपने कर्तव्यका ठीकठीक पालन करनेपर आस्तिककी तो बात ही क्या परलोकको न माननेवाले नास्तिकके भी चित्तमें सात्त्विक प्रसन्नता आ जाती है। यह प्रसन्नता कल्याणका द्योतक है क्योंकिकल्याणका वास्तविक स्वरूप परमशान्ति है। अतः अपने अनुभवसे भी सिद्ध होता है कि अकर्तव्यका सर्वथा त्याग करके कर्तव्यका पालन करनेसे कल्याण होता है।मार्मिक बातस्वयं परमात्माका अंश होनेसे वास्तवमें स्वधर्म है अपना कल्याण करना अपनेको भगवान्का मानना और भगवान्के सिवाय किसीको भी अपना न मानना अपनेको जिज्ञासु मानना अपनेको सेवक मानना। कारण कि ये सभी सही धर्म हैं खास स्वयंके धर्म हैं मनबुद्धिके धर्म नहीं हैं। बाकी वर्ण आश्रम शरीर आदिको लेकर जितने भी धर्म हैं वे अपने कर्तव्यपालनके लिये स्वधर्म होते हुए भी परधर्म ही हैं। कारण कि वे सभी धर्म माने हुए हैं और स्वयंके नहीं हैं। उन सभी धर्मोंमें दूसरोंके सहारेकी आवश्यकता होती है अर्थात् उनमें परतन्त्रता रहती है परन्तु जो अपना असली धर्म है उसमें किसीकी सहायताकी आवश्यकता नहीं होती अर्थात् उसमें स्वतन्त्रता रहती है। इसलिये प्रेमी होता है तो स्वयं होता है जिज्ञासु होता है तो स्वयं होता है और सेवक होता है तो स्वयं होता है। अतः प्रेमी प्रेम होकर प्रेमास्पदके साथ एक हो जाता है जिज्ञासु जिज्ञासा होकर ज्ञातव्यतत्त्वके साथ एक हो जाता है और सेवक सेवा होकर सेव्यके साथ एक हो जाता है। ऐसे ही साधकमात्र साधनासे एक होकर साध्यस्वरूप हो जाता है।परमात्मप्राप्ति चाहनेवाले साधकको धन मान बड़ाई आदर आराम आदि पानेकी इच्छा नहीं होती। इसलिये धनमानादिके न मिलनेपर उसे कोई चिन्ता नहीं होती और यदि प्रारब्धवश ये मिल जायँ तो उसे कोई प्रसन्नता नहीं होती। कारण कि उसका ध्येय केवल परमात्माको प्राप्त करना ही होता है धनमानादिको प्राप्त करना नहीं। इसलिये कर्तव्यरूपसे प्राप्त लौकिक कार्य भी उसके द्वारा सुचारुरूपसे और पवित्रतापूर्वक होते हैं। परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य होनेसे उसके सभी कर्म परमात्माके लिये ही होते हैं। जैसे धनप्राप्तिका ध्येय होनेपर व्यापारी आरामका त्याग करता है और कष्ट सहता है और जैसे डाक्टरद्वारा फोड़ेपर चीरा लगाते समयइसका परिणाम अच्छा होगा इस तरफ दृष्टि रहनेसे रोगीका अन्तःकरण प्रसन्न रहता है ऐसे ही परमात्मप्राप्तिका लक्ष्य रहनेसे संसारमें पराजय हानि कष्ट आदि प्राप्त होनेपर भी साधकके अन्तःकरणमें स्वाभाविक प्रसन्नता रहती है। अनुकूलप्रतिकूल आदि मात्र परिस्थितियाँ उसके लिये साधनसामग्री होती हैं।जब साधक अपना कल्याण करनेका ही दृढ़ निश्चय करके स्वधर्म(अपने स्वाभाविक कर्म) के पालनमें तत्परतापूर्वक लग जाता है तब कोई कष्ट दुःख कठिनाई आदि आनेपर भी वह स्वधर्मसे विचलित नहीं होता। इतना ही नहीं वह कष्ट दुःख आदि उसके लिये तपस्याके रूपमें तथा प्रसन्नताको देनेवाला होता है।शरीरकोमैं औरमेरा माननेसे ही संसारमें रागद्वेष होते हैं। रागद्वेषके रहनेपर मनुष्यको स्वधर्मपरधर्मका ज्ञान नहीं होता। अगर शरीरमैं (स्वरूप) होता तोमैं के रहते हुए शरीर भी रहता और शरीरके न रहनेपरमैं भी न रहता। अगर शरीरमेरा होता तो इसे पानेके बाद और कुछ पानेकी इच्छा न रहती। अगर इच्छा रहती है तो सिद्ध हुआ कि वास्तवमेंमेरी (अपनी) वस्तु अभी नहीं मिली और मिली हुई वस्तु (शरीरादि)मेरी नहीं है। शरीरको साथ लाये नहीं साथ ले जा सकते नहीं उसमें इच्छानुसार परिवर्तन कर सकते नहीं फिर वहमेरा कैसे इस प्रकारशरीर मैं नहीं और मेरा नहीं इसका ज्ञान (विवेक) सभी साधकोंमेंरहता है। परन्तु इस ज्ञानको महत्त्व न देनेसे उनके रागद्वेष नहीं मिटते। अगर शरीरमें कभी मैंपन और मेरापन दीख भी जाय तो भी साधकको उसे महत्त्व न देकर अपने विवेकको ही महत्त्व देना चाहिये अर्थात्शरीर मैं नहीं और मेरा नहीं इसी बातपर दृढ़ रहना चाहिये। अपने विवेकको महत्त्व देनेसे वास्तविक तत्त्वका बोध हो जाता है। बोध होनेपर रागद्वेष नहीं रहते। रागद्वेषके न रहनेपर अन्तःकरणमें स्वधर्मपरधर्मका ज्ञान स्वतः प्रकट होता है और उसके अनुसार स्वतः चेष्टा होती है।परधर्मो भयावहः यद्यपि परधर्मका पालन वर्तमानमें सुगम दीखता है तथापि परिणाममें वह सिद्धान्तसे भयावह है। यदि मनुष्यस्वार्थभाव का त्याग करके परहितके लिये स्वधर्मका पालन करे तो उसके लिये कहीं कोई भय नहीं है। शङ्का अठारहवें अध्यायके बयालीसवें तैंतालीसवें और चौवालीसवें श्लोकमें क्रमशः ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्रके स्वाभाविक कर्मोंका वर्णन करके भगवान्ने सैंतालीसवें श्लोकके पूर्वार्धमें भी यही बात (श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्) कही है। अतः जब यहाँ (प्रस्तुत श्लोकमें) दूसरेके स्वाभाविक कर्मको भयावह कहा गया है तब अठारहवें अध्यायके बयालीसवें श्लोकमें कहे ब्राह्मणकेस्वाभाविक कर्म भी दूसरों(क्षत्रियादि) के लिये भयावह होने चाहिये जब कि शास्त्रोंमें सभी मनुष्योंको उनका पालन करनेकी आज्ञा दी गयी है। समाधान मनका निग्रह इन्द्रियोंका दमन आदि तोसामान्य धर्म है (गीता 13। 711 16। 13) जिनका पालन सभीको करना चाहिये क्योंकि ये सभी के स्वधर्म हैं। ये सामान्य धर्म ब्राह्मणके लियेस्वाभाविक कर्म इसलिये हैं कि इनका पालन करनेमें उन्हें परिश्रम नहीं होता परन्तु दूसरे वर्णोंको इनका पालन करनेमें थोड़ा परिश्रम हो सकता है। स्वाभाविक कर्म और सामान्य धर्म दोनों हीस्वधर्म के अन्तर्गत आते हैं। सामान्य धर्मके सिवाय अपने स्वाभाविक कर्ममें पाप दीखते हुए भी वास्तवमें पाप नहीं होता जैसे केवल अपना कर्तव्य समझकर (स्वार्थ द्वेष आदिके बिना) शूरवीरतापूर्वक युद्ध करना क्षत्रियका स्वाभाविक कर्म होनेसे इसमें पाप दीखते हुए भी वास्तवमें पाप नहीं होता स्वाभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् (गीता 18। 47)।सामान्य धर्मके सिवाय दूसरेका स्वाभाविक कर्म (परधर्म) भयावह है क्योंकि उसका आचरण शास्त्रनिषिद्ध और दूसरेकी जीविकाको छीननेवाला है। दूसरेका धर्म भयावह इसलिये है कि उसका पालन करनेसे पाप लगता है और वह स्थानविशेष तथा योनिविशेष नरकरूप भयको देनेवाला होता है। इसलिये भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि भिक्षाके अन्नसे जीवननिर्वाह करना दूसरोंकी जीविकाका हरण करनेवाला तथा क्षत्रियके लिये निषिद्ध होनेके कारण तेरे लिये श्रेयस्कर नहीं है प्रत्युत तेरे लिये युद्धरूपसे स्वतः प्राप्त स्वाभाविक कर्मका पालन ही श्रेयस्कर है।स्वधर्म और परधर्मसम्बन्धी मार्मिक बातपरमात्मा और उनका अंश (जीवात्मा)स्वयं है तथा प्रकृति और उसका कार्य (शरीर और संसार)अन्य है। स्वयंका धर्मस्वधर्म और अन्यका धर्मपरधर्म कहलाता है। अतः सूक्ष्म दृष्टिसे देखा जाय तो निर्विकारता निर्दोषता अविनाशिता नित्यता निष्कामता निर्ममता आदि जितने स्वयंके धर्म हैं वे सबस्वधर्म हैं। उत्पन्न होना उत्पन्न होकर रहना बदलना बढ़ना क्षीण होना तथा नष्ट होना (टिप्पणी प0 186) एवं भोग और संग्रहकी इच्छा मानबड़ाईकी इच्छा आदि जितने शरीरके संसारके धर्म हैं वे सबपरधर्म हैं संसारधर्मैरविमुह्यमानः (श्रीमद्भा0 11। 2। 49) स्वयंमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता इसलिये उसका नाश नहीं होता परन्तु शरीरमें निरन्तर परिवर्तन होता है इसलिये उसका नाश होता है। इस दृष्टिसे स्वधर्म अविनाशी और परधर्म नाशवान् है।त्याग (कर्मयोग) बोध (ज्ञानयोग) और प्रेम (भक्तियोग) ये तीनों ही स्वतःसिद्ध होनेसे स्वधर्म हैं। स्वधर्ममें अभ्यासकी जरूरत नहीं है क्योंकि अभ्यास शरीरके सम्बन्धसे होता है और शरीरके सम्बन्धसे होनेवाला सब परधर्म है।योगी होना स्वधर्म है और भोगी होना परधर्म है। निर्लिप्त रहना स्वधर्म है और लिप्त होना परधर्म है। सेवा करना स्वधर्म है और कुछ भी चाहना परधर्म है। प्रेमी होना स्वधर्म है और रागी होना परधर्म है। निष्काम निर्मम और अनासक्त होना स्वधर्म है एवं कामना ममता और आसक्ति करना परधर्म है। तात्पर्य है कि प्रकृतिके सम्बन्धके बिना (स्वयंमें) होनेवाला सब कुछस्वधर्म है और प्रकृतिके सम्बन्धसे होनेवाला सब कुछपरधर्म है। स्वधर्म चिन्मयधर्म और परधर्म जडधर्म है।परमात्माका अंश (शरीरी)स्व है और प्रकृतिका अंश (शरीर)पर है।स्व के दो अर्थ होते हैं एक तोस्वयं और दूसरास्वकीय अर्थात् परमात्मा। इस दृष्टिसे अपने स्वरूपबोधकी इच्छा तथा स्वकीय परमात्माकी इच्छा दोनों हीस्वधर्म हैं।पुरुष(चेतन) का धर्म है स्वतःसिद्ध स्वभाविक स्थिति और प्रकृति(जड) का धर्म है स्वतःसिद्ध स्वभाविक परिवर्तनशीलता। पुरुषका धर्मस्वधर्म और प्रकृतिका धर्मपरधर्म है।मनुष्यमें दो प्रकारकी इच्छाएँ रहती हैं सांसारिक अर्थात् भोग एवं संग्रहकी इच्छा औरपारमार्थिक अर्थात् अपने कल्याणकी इच्छा। इसमें भोग और संग्रहकी इच्छापरधर्म अर्थात् शरीरका धर्म है क्योंकि असत् शरीरके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही भोग और संग्रहकी इच्छा होती है। अपने कल्याणकी इच्छास्वधर्म है क्योंकि परमात्माका ही अंश होनेसे स्वयंकी इच्छा परमात्माकी ही है संसारकी नहीं।स्वधर्मका पालन करनेमें मनुष्य स्वतन्त्र है क्योंकि अपना कल्याण करनेमें शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिकी आवश्यकता नहीं है प्रत्युत इनसे विमुख होनेकी आवश्यकता है। परंतु परधर्मका पालन करनेमें मनुष्य परतन्त्र है क्योंकि इसमें शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि देश काल वस्तु व्यक्ति आदिकी आवश्यकता है। शरीरादिकी सहायताके बिना परधर्मका पालन हो ही नहीं सकता।स्वयं परमात्माका अंश है और शरीर संसारका अंश है। जब मनुष्य परमात्माको अपना मान लेता है तब यह उसके लियेस्वधर्म हो जाता है और जब शरीरसंसारको अपना मान लेता है तब यह उसके लियेपरधर्म हो जाता है जो कि शरीरधर्म है। जब मनुष्य शरीरसे अपना सम्बन्ध न मानकर परमात्मप्राप्तिके लिये साधन करता है तब वह साधन उसकास्वधर्म होता है। नित्यप्राप्त परमात्माका अथवा अपने स्वरूपका अनुभव करानेवाले सब साधनस्वधर्म हैं और संसारकी ओर ले जानेवाले सब कर्मपरधर्म हैं। इस दृष्टिसे कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग तीनों ही योगमार्ग मनुष्यमात्रकेस्वधर्म हैं। इसके विपरीत शरीरसे अपना सम्बन्ध मानकर भोग और संग्रहमें लगना मनुष्यमात्रकापरधर्म है।स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे किये जानेवाले तीर्थ व्रत दान तप चिन्तन ध्यान समाधि आदि समस्त शुभकर्म सकामभावसे अर्थात् अपने लिये करनेपरपरधर्म हो जाते हैं और निष्कामभावसे अर्थात् दूसरोंके लिये करनेपरस्वधर्म हो जाते हैं। कारण कि स्वरूप निष्काम है और सकामभाव प्रकृतिके सम्बन्धसे आता है। इसलिये कामना होनेसे परधर्म होता है। स्वधर्म मुक्त करनेवाला और परधर्म बाँधनेवाला होता है।मनुष्यका खास काम है परधर्मसे विमुख होना और स्वधर्मके सम्मुख होना। ऐसा केवल मनुष्य ही करसकता है। स्वधर्मकी सिद्धिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है। परधर्म तो अन्य योनियोंमें तथा भोगप्रधान स्वर्गादि लोकोंमें भी है। स्वधर्ममें मनुष्यमात्र सबल पात्र और स्वाधीन है तथा परधर्ममें मनुष्यमात्र निर्बल अपात्र और पराधीन है। प्रकृतिजन्य वस्तुकी कामनासे अभावका दुःख होता है और वस्तुके मिलनेपर उस वस्तुकी पराधीनता होती है जो किपरधर्म है। परन्तु प्रकृतिजन्य वस्तुओंकी कामनाओंका नाश होनेपर अभाव है और पराधीनता सदाके लिये मिट जाती है जो किस्वधर्म है। इस स्वधर्ममें स्थित रहते हुएकितना ही कष्ट आ जाय यहाँतक कि शरीर भी छूट जाय तो भी वह कल्याण करनेवाला है। परन्तु परधर्मके सम्बन्धमें सुखसुविधा होनेपर भी वह भयावह अर्थात् बारम्बार जन्ममरणमें डालनेवाला है।संसारमें जितने भी दुःख शोक चिन्ता आदि हैं वे सब परधर्मका आश्रय लेनेसे ही हैं। परधर्मका आश्रय छोड़कर स्वधर्मका आश्रय लेनेसे सदैव सर्वथा सर्वदा रहनेवाले आनन्दकी प्राप्ति हो जाती है जो कि स्वतःसिद्ध है। सम्बन्ध स्वधर्म कल्याणकारक और परधर्म भयावह है ऐसा जानते हए भी मनुष्य स्वधर्ममें प्रवृत्त क्यों नहीं होता इसपर अर्जुन प्रश्न करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.34 3.35।।कथं तर्हि बन्धः इत्थमित्युच्यते (N omits इत्थम् K omits इति)।इन्द्रियस्येति। श्रेयानिति। संसारी च प्रतिविषयं रागं द्वेषं च गृह्णाति यतः कर्माणि आत्मकर्तृकाण्येव विमूढत्वादभिमन्यते इति सममपि भोजनादिव्यवहारं कुर्वतोः ज्ञानिसंसारिणोरस्त्ययं विशेषः। अयं नः सिद्धान्तः सर्वथा मुक्तसंगस्य स्वधर्मचारिणो नास्ति कश्चित् पुण्यपापात्मको बन्धः। स्वधर्मो हि हृदयादनपायी स्वरसनिरूढ ( N K निगूढः) एव न तेन कश्चिदपि रिक्तो जन्तुर्जायते इत्यत्याज्यः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.35।।रागद्वेषयोः श्रेयोमार्गप्रतिपक्षत्वं प्रकटयितुं परमतोपन्यासद्वारा समनन्तरश्लोकमवतारयति तत्रेत्यादिना। व्यवहारभूमिः सप्तम्यर्थः। शास्त्रार्थस्यान्यथा प्रतिपत्तिमेव प्रत्याययति परधर्मोऽपीति। स्वधर्मवदित्यपेरर्थः। अनुमानं दूषयन्नुत्तरत्वेन श्लोकमुत्थापयति सदसदिति। क्षत्रधर्माद् युद्धाद् दुरनुष्ठानात्परिव्राड्धर्मस्य भिक्षाशनादिलक्षणस्य स्वानुष्ठेयतयापि कर्तव्यत्वं प्राप्तमित्याशङ्क्य व्याचष्टे श्रेयानिति। उक्तेऽर्थे प्रश्नपूर्वकं हेतुमाह कस्मादित्यादिना। स्वधर्ममवधूय परधर्ममनुतिष्ठतः स्वधर्मातिक्रमकृतदोषस्य दुष्परिहरत्वान्न तत्त्यागः साधीयानित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.35।।श्रेयान् इत्यस्य सङ्गतिमाह तथापीति।ज्यायसी चेत् 3।1 इत्यत्र द्वावाक्षेपावर्जुनेन कृतौ तत्राद्यःलोकेऽस्मिन् 3।3 इत्यादिना परिहृतः इदानींयुद्ध्यस्व विगतज्वरः 3।30तयोर्न वशमागच्छेत् 3।34 इत्युक्त्या स्मारितं द्वितीयमाक्षेपमाशङ्क्य परिहरतीत्यर्थः। यद्यपि कर्म कर्तव्यं तथापि उग्रमवर्जनीयरागद्वेषं न कुर्यामिति शेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.35।।तथाप्युग्रं युद्धकर्मेत्यत आह श्रेयानिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.35।।अतः सुशकतया स्वधर्मभूतः कर्मयोगो विगुणः अपि अप्रमादगर्भः प्रकृतिसंसृष्टस्य दुःशकतयापरधर्मभूतात् ज्ञानयोगात् सगुणाद् अपि किञ्चित्कालम् अनुष्ठितात् सप्रमादात् श्रेयान्।स्वेन एव उपादातुं योग्यतया स्वधर्मभूते कर्मयोगे वर्तमानस्य एकस्मिन् जन्मनि अप्राप्तफलतया निधनम् अपि श्रेयः अनन्तरायहततया अनन्तरजन्मनि अपि अव्याकुलकर्मयोगारम्भसंभवात्। प्रकृतिसंसृष्टस्य स्वेन एव उपादातुम् अशक्यतया परधर्मभूतो ज्ञानयोगः प्रमादगर्भतया भयावहः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.35।। श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वो धर्मः स्वधर्मः विगुणः अपि विगतगुणोऽपि अनुष्ठीयमानः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् साद्गुण्येन संपादितादपि। स्वधर्मे स्थितस्य निधनं मरणमपि श्रेयः परधर्मे स्थितस्य जीवितात्। कस्मात् परधर्मः भयावहः नरकादिलक्षणं भयमावहति यतः।।यद्यपि अनर्थमूलम् ध्यायतो विषयान्पुंसः (गीता 2.62) इति रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ इति च उक्तम् विक्षिप्तम् अनवधारितं च तदुक्तम्। तत् संक्षिप्तं निश्चितं च इदमेवेति ज्ञातुमिच्छन् अर्जुनः उवाच ज्ञाते हि तस्मिन् तदुच्छेदाय यत्नं कुर्याम् इति अर्जुन उवाच
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【 Verse 3.36 】
▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुष: | अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजित: ||
▸ Transliteration: arjuna uvāca atha kena prayukto’yaṁ pāpaṁ carati pūruṣaḥ | anicchannapi vārṣṇeya balādiva niyojitaḥ ||
▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna said; atha: then; kena: by what; prayuktaḥ: forced; ayaṁ: this (person); pāpaṁ: sins; carati: acts; pūruṣaḥ: man; anicchan: without de- siring; api: though; vārṣṇeya: O descendant of Vrishni; balāt: by force; iva: as if; niyojitaḥ: engaged
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.36 Arjuna says, ‘O descendant of Vṛṣṇi, then, by what is man forced to sinful acts, even without desiring, as if impelled by force?’
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.36।।अर्जुन बोले हे वार्ष्णेय् फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुएकी तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.36।। अर्जुन ने कहा हे वार्ष्णेय फिर यह पुरुष बलपूर्वक बाध्य किये हुये के समान अनिच्छा होते हुये भी किसके द्वारा प्रेरित होकर पाप का आचरण करता है
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.36 अथ now? केन by which? प्रयुक्तः impelled? अयम् this? पापम् sin? चरति does? पूरुषः man? अनिच्छन् not wishing? अपि even? वार्ष्णेय O Varshneya? बलात् by force? इव as it were? नियोजितः constrained.Commentary Varshneya is one born in the family of the Vrishnis? a name of Krishna.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.36. Arjuna said Then, induced by what, does this person [of the world] commit sin-eventhough he does not desire it-as if instigated by a force, overpowering [him] ?
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.36 Arjuna asked: My Lord! Tell me, what is it that drives a man to sin, even against his will and as if by compulsion?
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.36 Arjuna said But, impelled by what, O Krsna, does one (practising Jnana Yoga), commit sin even against his own will, constrained as it were, by force?
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.36 Arjuna said Now then, O scion of the Vrsni dynasty (Krsna), impelled by what does this man commit sin even against his wish, being constrained by force, as it were?
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.36 Arjuna said But impelled by what does man commit sin, though against his wishes, O Varshneya (Krishna), constrained as it were, by force?
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.36 Atha etc. The estion is this : Eventhough a man knows a sin to be a sin, why does he proceed on it ? The idea in raising this estion is this : If one's own duty cannot be (or should not be) given up, because it does not vanish from one's own heart, then how to account for the sinful acts of these men [of the world] ? This amounts to say : What is one's own duty by which the creature is never deserted ? Eventhough one's own duty rests in one's heart, the confusion (or evil) is created by the interruption (or covering) of an intruder, and it is not created by the absence of that duty-with this purport in mind, an answer to the above estion-
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.36 Arjuna said Impelled by what does a man practising Jnana Yoga commit sin in the form of experiencing the objects of the senses, as if constrained by force, even against his own will not to experience the objects of the senses.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.36 Atha, now then; varsneya, O scion of the Vrsni dynasty; being prayuktah, impelled; kena, by what acting as the cause; as a servant is by a king, does ayam, this; purusah, man; carati, commit; papam, sin, a sinful act; api, even; anicchan, against his wish, though not himself willing; niyojitah, being constrained; balat, by force; iva, as it were-as if by a king, which illustration has already been given? The Lord (Bhaga-van) said: 'You hear about that enemy, the source of all evil, of which you ask-.' 'Bhaga is said to consist of all kinds of majesty, virtue, fame, beauty, detachment as well as Liberation [Liberation stands for its cause, Illumination.], (V.P.6.5.74). That Vasudeva, in whom reside for ever, unimpeded and in their fullness, the six alities of majesty etc. and who has the knowledge of such subjects as creation etc., is called Bhaga-van. 'He is spoken of as Bhaga-van who is aware of creation and dissolution, gain and loss, [Gain and loss stand for future prosperity and adversity.] ignorance and Illumination of all beings' (ibid. 78).
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.36।। धर्मशास्त्रों की परम्परा के अनुसार यहाँ अर्जुन विचाराधीन प्रकरण पर एक निश्चित प्रश्न पूछता है। इस प्रश्न से ही ज्ञात होता है कि अर्जुन अपनी प्रारम्भिक उन्माद् की स्थिति से बहुत कुछ बाहर आ गया था और अब उसने आत्मनिरीक्षण भी प्रारम्भ कर दिया था जिसके फलस्वरूप उसे अपने ही मन में कुछ ऐसे गुण अथवा शक्तियाँ कार्य कर रहीं अनुभव हुईं जो उसके उच्च गुणों की अभिव्यक्ति में बाधक बनकर उनके प्रभाव को ही नष्ट कर रहीं थीं। उसका प्रश्न ऐसे परिचित शब्दों में पूछा गया है कि लगता है मानो आज का कोई विद्यार्थी ही इस प्रश्न को पूछ रहा है।कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जिसे कुछ मात्रा में ही सही अच्छे और बुरे का पुण्य और पाप का ज्ञान न हो। बुद्धि से प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि पुण्य क्या है किन्तु जब कर्म करने का समय आता है तब पाप में ही उसकी प्रवृत्ति होती है। यह एक दुर्भाग्य पूर्ण विडम्बना है। स्वयं के आदर्श और वास्तविक आचरण में जो दूरी रहती है वह सभी आत्मनिरीक्षक विचारकों के लिये वास्तव में एक बड़ी समस्या बन जाती है।हमारे हृदय मे स्थित दैवी गुण व्यक्त होकर श्रेष्ठतर उपलब्धि प्राप्त करना चाहते हैं परन्तु पाशविक प्रवृत्तियां हमें प्रलोभित करके श्रेयमार्ग से दूर ले जाती हैं और हम निम्न स्तर के शारीरिक सुखों में ही रमण करते रहते हैं। अधिकांश समय यह सब हमारी अनिच्छा से ही होता रहता है। अर्जुन पूछता है मन में बैठे इस राक्षस का स्वरूप क्या है जो हममें स्थित दैवी गुणों को सुनियोजित ढंग से लूट ले जाता है वृष्णि वंश में जन्म होने से श्रीकृष्ण का नाम वार्ष्णेय था। इस प्रश्न का उत्तर देते हुए
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.36।।ध्यायतो विषयान् रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनाविति पूर्वग्रन्थेनि संसारपातहेतुभूतानि विस्तरेण भगवतोक्तानि तत्र संक्षिप्तं निश्चितमिदमेवेति ज्ञातुमिच्छन्नर्जुन उवाच। ज्ञाते हि तस्मिंस्तदुच्छेदाय प्रयत्नं कुर्यामित्यभिप्रायेण अथेति। केन हेतुभूतेन प्रयुक्तः प्रेरितः सन्ननिच्छन्नपि बलादिव नियोजितो राज्ञेव भृत्योऽयं पुरुषः पापमाचरति यथा त्वमजोऽपि केनचिदतिभक्तेन प्रार्थितः वृष्णिकुले जन्म लब्धवानसि तथेति सूचयन्नाह वार्ष्णेयेति। तं वैरिणं ब्रूहीत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.36।।तत्र काम्यप्रतिषिद्धकर्मप्रवृत्तिकारणमपनुद्य भगवन्मतमनुवर्तितं तत्कारणावधारणाय ध्यायतो विषयान्पुंस इत्यादिना पूर्वमनर्थमूलमुक्तम्। सांप्रतं च प्रकृतेर्गुणसंमूढा इत्यादिना बहुविस्तरं कथितम्। तत्र किं सर्वाण्यपि समप्राधान्येन कारणानि अथवैकमेव मुख्यं कारणमितराणि तु तत्सहकारीणि केवलम्। तत्राद्ये सर्वेषां पृथक्पृथङ्निवारणे महान्प्रयासः स्यात्। अन्त्ये त्वेकस्मिन्नेव निराकृते कृतकृत्यता स्यादित्यतो ब्रूहि मे केन हेतुना प्रयुक्तः प्रेरितोऽयं त्वन्मताननुवर्ती सर्वज्ञानविमूढः पुरुषः पापमनर्थानुबन्धि सर्वं फलाभिसंधिपुरःसरं काम्यं चित्रादि शत्रुवधसाधनं च श्येनादि प्रतिषिद्धं च कलञ्जभक्षणादि बहुविधं कर्माचरति स्वयं कर्तुमनिच्छन्नपि। नतु निवृत्तिलक्षणं परमपुरुषार्थानुबन्धि त्वदुपदिष्टं कर्मेच्छन्नपि करोति। नच पारतन्त्र्यं विनेत्थं संभवति। अतो येन बलादिव नियोजितो राज्ञेव भृत्यस्त्वन्मतविरुद्धं सर्वानर्थानुबन्धित्वं जानन्नपि तादृशं कर्माचरति तमनर्थमार्गप्रवर्तकं मां प्रति ब्रूहि ज्ञात्वा समुच्छेदायेत्यर्थः। हे वार्ष्णेय वृष्णिवंशे मन्मातामहकुले कृपयावतीर्णेतिसंबोधनेन वार्ष्णेयीसुतोऽहं त्वया नोपेक्षणीय इति सूचयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.36।।ईश्वरो धर्माधर्मौ रागद्वेषौ वा पुरुषस्य प्रवर्तकौ भवत इत्यात्मनोऽस्वातन्त्र्यं मन्वानोऽर्जुन उवाच अथ केनेति। केन ईश्वरादीनामन्यतमेनान्येन वा प्रयुक्तः प्रवर्तितः सन् अयं पुरुषः पापमनिष्टं चरति करोति। अनिच्छन्नित्यनेन रागद्वेषयोः प्रवर्तकत्वं निरस्तम्। सति हि रागे इच्छा भवति। अत इच्छाया अभावाद्रागाभावः। रागस्याप्रवर्तकत्वे तन्मूलभूतसंस्कारहेत्वोर्धर्माधर्मयोरप्रवर्तकत्वं ततश्च तत्सापेक्षस्य ईश्वरस्यापीति सर्वेषामाक्षेपः। तस्मान्मुख्यं प्रवर्तकं यत्तद्वाच्यमित्यर्थः। बलादिव नियोजितः विष्टिगृहीत इवेत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.36।।अथ पुरुषांशानामधिष्ठाता तु भगवान् स चैवमुपदिशति। माया केषाञ्चन मोहयितुं प्रोक्ता तदा केनचिन्नियुक्तः सन्नयं पापाचरणे प्रवर्तत इत्यर्जुनो जिज्ञासुर्विज्ञापयति।अर्जुन उवाच अथ केनेति। अथ पुरुषः पुरुषसम्बन्धित्वादनिच्छन्नपि हे वार्ष्णेय भक्तिधर्मप्रवृत्यर्थं सत्कुलाविर्भूत बलान्नियोजित इव अधिष्ठात्रा प्रेरित इव केन प्रयुक्तः पापं चरति पापगतियुक्तो भवति तत्फलभोगं च करोति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.36।। तयोर्न वशमागच्छेदित्युक्तं तदेतदशक्यं मन्वानोऽर्जुन उवाच अथ केनेति। वृष्णेर्वंशेऽवतीर्णो वार्ष्णेयः हे वार्ष्णेय अनर्थरूपं पापं कर्तुमनिच्छन्नपि केन प्रयुक्तः प्रेरितोऽयं पुरुषः पापं चरति। कामक्रोधौ विवेकबलेन निरुन्धतोऽपि पुरुषस्य पुनः पापे प्रवृत्तिदर्शनादन्योऽपि तयोर्मूलभूतः कश्चित्प्रवर्तको भवेदिति संभावनायां प्रश्नः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.36।।परधर्मकृतेः पापं पुण्यं च निजधर्मतः। इति ज्ञात्वा मतं पार्थः। सन्दिहानोऽथ पृच्छति अथ केनेति।तयोर्न वशमागच्छेत् 3।37 इत्यत्यशक्यं अस्वतन्त्रत्वात् रोगिवत्। परधर्मस्वधर्मानुष्ठाने वैपरीत्यमिति पापाचरणे तु केनचित्प्रवर्त्तकेन प्राकृतेनापि भाव्यमिति अतःकेन इति प्रश्नः।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.36।।अर्जुन बोला यद्यपि ध्यायतो विषयान् पुंसः रागद्वेषौ ह्यस्य परिपन्थिनौ इत्यादि प्रकरणोंमें अनर्थका मूल कारणबतलाया गया पर वह भिन्नभिन्न प्रकरणोंमें और अनिश्चितरूपसे कहा गया है। इसलिये वह अनर्थोंका कारण ठीक यही है। इस प्रकार निश्चयपूर्वक और संक्षेपसे जाननेमें आ जाय तो मैं उसके उच्छेदके लिये प्रयत्न करूँ इस विचारसे उसके जाननेकी इच्छा करता हुआ अर्जुन बोला हे वृष्णिकुलमें उत्पन्न हुए कृष्ण किस प्रधान कारणसे प्रयुक्त किया हुआ यह पुरुष स्वयं न चाहता हुआ भी राजासे प्रयुक्त किये हुए सेवककी तरह बलपूर्वक लगाया हुआसा पापकर्मका आचरण किया करता है। जिसको तू पूछता है सर्व अनर्थोंके कारणरूप उस वैरीके विषयमें सुन ( इस उद्देश्यसे ) भगवान् बोले आचार्य पहले भगवान् शब्दका अर्थ करते हैं। सम्पूर्ण ऐश्वर्य धर्म यश लक्ष्मी वैराग्य और मोक्ष इन छःका नाम भग है यह ऐश्वर्य आदि छहों गुण बिना प्रतिबन्धके सम्पूर्णतासे जिस वासुदेवमें सदा रहते हैं। तथा उत्पत्ति और प्रलयको भूतोंके आने और जानेको एवं विद्या और अविद्याको जो जानता है उसका नाम भगवान् है अतः उत्पत्ति आदि सब विषयोंको जो भलीभाँति जानते हैं वे वासुदेव भगवान् नामसे वाच्य हैं।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.36।। व्याख्या अथ केन प्रयुक्तोऽयं ৷৷. बलादिव नियोजितः यदुकुलमेंवृष्णि नामका एक वंश था। उसीवृष्णिवंशमें अवतार लेनेसे भगवान् श्रीकृष्णका एक नामवार्ष्णेय है। पूर्वश्लोकमें भगवान्ने स्वधर्मपालनकी प्रशंसा की है। धर्मवर्ण औरकुलका होता है अतः अर्जुन भी कुल(वंश) के नामसे भगवान्को सम्बोधित करके प्रश्न करते हैं।विचारवान् पुरुष पाप नहीं करना चाहता क्योंकि पापका परिणाम दुःख होता है और दुःखको कोई भी प्राणी नहीं चाहता।यहाँ अनिच्छन् पदका तात्पर्य भोग है संग्रहकी इच्छाका त्याग नहीं प्रत्युत पाप करनेकी इच्छाका त्याग है। कारण कि भोग और संग्रहकी इच्छा ही समस्त पापोंका मूल है जिसके न रहनेपर पाप होते ही नहीं।विचारशील मनुष्य पाप करना तो नहीं चाहता पर भीतर सांसारिक भोग और संग्रहकी इच्छा रहनेसे वह करनेयोग्य कर्तव्य कर्म नहीं कर पाता और न करनेयोग्य पापकर्म कर बैठता है।अनिच्छन् पदकी प्रबलताको बतानेके लिये अर्जुन बलादिव नियोजितः पदोंको कहते हैं। तात्पर्य यह है कि पापवृत्तिके उत्पन्न होनेपर विचारशील पुरुष उस पापको जानता हुआ उससे सर्वथा दूर रहना चाहता है फिर भी वह उस पापमें ऐसे लग जाता है जैसे कोई उसको जबर्दस्ती पापमें लगा रहा हो। इससे ऐसा मालूम होता है कि पापमें लगानेवाला कोई बलवान् कारण है।पापोंमें प्रवृत्तिका मूल कारण है काम अर्थात् सांसारिक सुखभोग और संग्रहकी कामना। परन्तु इस कारणकी ओर दृष्टि न रहनेसे मनुष्यको यह पता नहीं चलता कि पाप करानेवाला कौन है वह यह समझता है कि मैं तो पापको जानता हुआ उससे निवृत्त होना चाहता हूँ पर मेरेको कोई बलपूर्वक पापमें प्रवृत्त करता है जैसे दुर्योधनने कहा है जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्तिर्जानाम्यधर्मं न च मे निवृत्तिः।केनापि देवेन हृदि स्थितेन यथा नियुक्तोऽस्मि तथा करोमि।। (गर्गसंहिता अश्वमेध0 50। 36)मैं धर्मको जानता हूँ पर उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होती और अधर्मको भी जानता हूँ पर उससे मेरी निवृत्ति नहीं होती। मेरे हृदयमें स्थित कोई देव है जो मेरेसे जैसा करवाता है वैसा ही मैं करता हूँ।दुर्योधन द्वारा कहा गया यहदेव वस्तुतःकाम (भोग और संग्रहकी इच्छा) ही है जिससे मनुष्य विचारपूर्वक जानता हुआ भी धर्मका पालन और अधर्मका त्याग नहीं कर पाता।केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पदोंसे भी अनिच्छन् पदकी प्रबलता प्रतीत होती है। तात्पर्य यह है कि विचारवान् मनुष्य स्वयं पाप करना नहीं चाहता कोई दूसरा ही उसे जबर्दस्ती पापमें प्रवृत्त करा देता है। वह दूसरा कौन है यह अर्जुनका प्रश्न है।भगवान्ने अभीअभी चौंतीसवें श्लोकमें बताया है कि राग और द्वेष (जो काम और क्रोधके ही सूक्ष्म रूप हैं) साधकके महान शत्रु हैं अर्थात् ये दोनों पापके कारण हैं। परन्तु वह बात सामान्य रीतिसे कहनेके कारण अर्जुन उसे पकड़ नहीं सके। अतः वे प्रश्न करते हैं कि मनुष्य विचारपूर्वक पाप करना न चाहता हुआ भी किसीसे प्रेरित होकर पापका आचरण करता हैअर्जुनके प्रश्नका अभिप्राय यह है कि (इकतीसवेंसे लेकर पैंतीसवें श्लोकतक देखते हुए) अश्रद्धा असूया दुष्टचित्तता मूढ़ता प्रकृति(स्वभाव) की परवशता रागद्वेष स्वधर्ममें अरुचि और परधर्ममें रुचि इनमेंसे कौनसा कारण है जिससे मनुष्य विचारपूर्वक न चाहता हुआ भी पापमें प्रवृत्त होता है इसके अलावा ईश्वर प्रारब्ध युग परिस्थिति कर्म कुसङ्ग समाज रीतिरिवाज सरकारी कानून आदिमेंसे भी किस कारणसे मनुष्य पापमें प्रवृत्त होता है सम्बन्ध अब भगवान् आगेके श्लोकमें अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.36।।अथेति। पापं पापतया विदन्नपि जनः कथं तत्र प्रवर्तते इति प्रशनः। अस्य प्रश्नस्योत्थापने अयमाशयः। स्वधर्मो यदि स्वहृदयादनपायि (S हृदयानपायि ) त्वादत्याज्यः कथं तर्ह्यधर्माचरणमेषाम् (S omits तर्हि) इति कोऽयं स्वधर्मो नाम येनारिक्तो (S येन न रिक्तो N येनानतिरिक्तो) जन्तुः इत्युक्तं भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.36।।प्रागेवानर्थमूलस्योक्तत्वात्पुनस्तज्जिज्ञासया प्रश्नानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह यद्यपीति। विक्षिप्तं विविधेषु प्रदेशेषु क्षिप्तं दर्शितमिति यावत् अनवधारितमनेकत्रोक्तत्वादनेकधा विवेककामादिभिर्विकल्पितत्वादित्यर्थः। नन्वनर्थमूलं परिहर्तव्यं तत्किमिति ज्ञातुमिष्यते तत्राह ज्ञाते हीति। कुर्यामिति। तज्ज्ञानमर्थवदिति शेषः। वाक्यारम्भार्थत्वमथशब्दस्य गृहीत्वा प्रश्नवाक्यं व्याकरोति अथेत्यादिना। अनिच्छतोऽपि बलादेव दुश्चरितप्रेरितत्वे दृष्टान्तमाचष्टे राज्ञेवेति। विनियोज्यत्वस्येच्छासापेक्षत्वात्तदभावे तदसिद्धिमाशङ्क्य प्रागुक्तं स्मारयति राज्ञेवेत्युक्त इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.36।।अथ केन इत्युर्जनप्रश्नोऽनुपपन्नः।तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ 3।34 इति रागद्वेषयोः परिपन्थित्वस्योक्तत्वात् न हि पापप्रयोजकत्वात्। अन्यद्रागादेः पुरुषपरिपन्थित्वमित्यतः प्रश्नाभिप्रायमाह बहव इति। कारणशब्दः करोतेर्ण्यन्तात्करणे ल्युडंतः स च त्रिलिङ्गः। अयमनुमान इति भाष्ये प्रयोगात्। अथवा ण्यासश्रंथो युच् अष्टा.3।3।107 इति करणे युच्। अयं च स्त्रीलिङ्गः। बहव इत्यपि स्त्रीलिङ्ग एव।वोतो गुणवचनात् अष्टा.4।1।44 इति विकल्पविधानात्। कर्मेति पापं विवक्षितम् द्वयोरेवोक्तत्वात् कथं बहव इत्यनुवादः इत्यत आह क्रोधादय इति। पूर्वं भगवता द्वेषशब्देन मदमत्सरादयोऽप्युपलक्षिताः अरिषड्वर्गप्रसिद्धेः। तदेतद्विदित्वैवमनुवदतीति भावः। रागशब्देन कामः द्वेषशब्देन क्रोधादयश्च त्वयोक्ता इत्यर्थः। अस्य प्रश्नस्य प्रकृते क उपयोगः इत्यत आह अथेति। नास्य प्रकृतेन हेतुहेतुमद्भावादिलक्षणासङ्गतिरिति स्वयमेव सूचितमित्यर्थः। अथेति शब्देनार्थान्तरमेतदिति सूच्यते। तर्ह्यसङ्गतं न प्रष्टव्यमित्यतः सङ्गत्यन्तराभावेऽपि प्रासङ्गिकी सङ्गतिरस्तीत्याशयवान् प्रसङ्गं दर्शयति तयोरिति। अत्रापि यो बलवांस्तं प्रति महान्तं प्रयत्नं करिष्यामीति भावेन प्रश्नो युक्त एवेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.36।।बहवः कर्मकारणाः सन्ति क्रोधादयः कामश्च। तत्र को बलवानिति पृच्छति अथेति। अथेत्यर्थान्तरंतयोर्न वशमागच्छेत् 3।34 इति प्रश्नप्रापकम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.36।।अर्जुन उवाच अथ अयं ज्ञानयोगाय प्रवृत्तः पूरुषः स्वयं विषयान् अनुभवितुम् अनिच्छन् अपि केन प्रयुक्तो विषयानुभवरूपं पापं बलात् नियोजित इव चरति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.36।। अथ केन हेतुभूतेन प्रयुक्तः सन् राज्ञेव भृत्यः अयं पापं कर्म चरति आचरति पूरुषः पुरुषः स्वयम् अनिच्छन् अपि हे वार्ष्णेय वृष्णिकुलप्रसूत बलात् इव नियोजितः राज्ञेव इत्युक्तो दृष्टान्तः।।शृणु त्वं तं वैरिणं सर्वानर्थकरं यं त्वं पृच्छसि इति भगवान् उवाच
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【 Verse 3.37 】
▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भव: | महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ||
▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca kāma eṣa krodha eṣa rajoguṇasamudbhavaḥ | mahāśano mahāpāpmā viddhyenamiha vairiṇam ||
▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: the Lord said; kāma: lust; eṣa: these; krodha: anger; eṣa: these; rajoguṇa: attribute of passion; samudbhavaḥ: born of; mahāśanaḥ: all- devouring; mahāpāpmā: greatly sinful; viddhi: know; enaṁ: this; iha: in the world; vairiṇaṁ: greatest enemy
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.37 The Lord says, ‘It is lust and anger born of the attribute of passion, alldevouring and sinful, which is one’s greatest enemy in this world.’
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.37।।श्रीभगवान् बोले रजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.37।। श्रीभगवान् ने कहा रजोगुण में उत्पन्न हुई यह कामना है यही क्रोध है यह महाशना (जिसकी भूख बड़ी हो) और महापापी है इसे ही तुम यहाँ (इस जगत् में) शत्रु जानो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.37 कामः desire? एषः this? क्रोधः anger? एषः this? रजोगुणसमुद्भवः born of the Rajoguna? महाशनः alldevouring? महापाप्मा allsinful? विद्धि know? एनम् this? इह here? वैरिणम् the foe.Commentary Bhagavan Bhaga means the six attributes? viz.? Jnana (knowledge)? Vairagya (dispassion)? Kirti (fame)? Aishvarya (divine manifestations and excellences)? Sri (wealth)? and Bala (might). He who possesses these six attributes and who has a perfect knowledge of the origin and the end of the universe is Bhagavan or the Lord.The cause of all sin and wrong action in this world is desire. Anger is desire itself. When a desire is not gratified? the man becomes angry against those who stand as obstacles on the path of fulfilment.The desire is born of the ality of Rajas. When desire arises? it generates Rajas and urges the man to work in order to possess the object. Therefore? know that this desire is mans foe on this earth. (Cf.XVI.21).
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.37. The Bhagavat said This desire, this wrath, born of the Rajas-Strand, is a swallower of festival [and] a mighty bestower of sins. Know this to be the enemy here.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.37 Lord Shri Krishna: It is desire, it is aversion, born of passion. Desire consumes and corrupts everything. It is man's greatest enemy.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.37 The Lord said It is desire, it is wrath, born of the Guna of Rajas; it is a great devourer, an impeller to sin. Know this to be the foe here.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.37 The Blessed Lord said This desire, this anger, born of the ality of rajas, is a great devourer, a great sinner. Know this to be the enemy here.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.37 The Blessed Lord said It is desire, it is anger both of the ality of Rajas, all-devouring, all-sinful; know this as the foe here (in this world).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.37 Kama esah etc. A total absence of difference among these two (desire and wrath) is indicated by the word esah 'this' twice uttered. These desire and wrath are ever interrelated and remain in an inseparable mutual co-existence. Hence [the Lord] well describes them only as identical. This is a swallower i.e., a devouer of the morsel of festival i.e., the happiness. The wrath alone is a bestower of sins as it is the cause of great sins. This is man of intelligence should view to be an enemy.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.37 The Lord said The highly ravenous desire is born of the Guna Rajas originating from old subtle impressions. It has for its objects sound and other sense contacts. It is a foe to him who is practising Jnana Yoga, as he is joined with Prakrti constituted of the Gunas which rise and subside periodically. It attracts him towards the objects of the senses. It is this desire alone which, when hampered, develops into anger towards those persons who are the
Chapter 3 (Part 23)
cause of such hindrance. It is a powerful cause of sin. It incites the aspirant to do harm to others. Know this, which is born of the Guna called Rajas, as the natural enemy of Jnana Yogins.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.37 Esah, this; kamah, desire, is the enemy of the whole world, because of which the creatures incur all evil. This desire when obstructed in any way turns into anger. Therefore, krodhah, anger, is also identical with this (desire). It is rajoguna-samudbhavah, born of the ality of rajas; or, it is the origin of the ality of rajas. For, when desire comes into being, it instigates a person by arousing rajas. People who are engaged in service etc., which are effects of rajas, and who are stricken with sorrow are heard to lament, 'I have been led to act by desire indeed!' It is mahaasanah, a great devourer, whose food is enormous. And hence, indeed, it is maha-papma, a great sinner. For a being commits sin when goaded by desire. Therefore, viddhi, know; enam, this desire; to be vairinam, the enemy; iha, here in this world. With the help of examples the Lord explains how it is an enemy:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.37।। यह काम यह क्रोध काम अर्थात् इच्छा ही मनुष्य के ह्रदय में स्थित राक्षस है। आत्म अज्ञान ही बुद्धि में इच्छा रूप में व्यक्त होता है। इस श्लोक में काम और क्रोध इन दोनों को भिन्न नहीं समझना चाहिये। किसी परिस्थिति विशेष में काम ही क्रोध का रूप ले लेता है। मन का वह विक्षेप जो किसी वस्तु को प्राप्त करने की अत्यन्त अधीरता के रूप में व्यक्त होता है काम कहलाता है। सामान्यत इच्छा अपने से भिन्न किसी अप्राप्त वस्तु के लिये ही होती हैं। जगत् में असंख्य व्यक्तियों और परिस्थितियों के मध्य सदैव इच्छा का पूर्ण होना सम्भव नहीं होता और इस प्रकार हमारे और इच्छित वस्तु के बीच कोई विघ्न आता है तो प्रतिहत इच्छा ही क्रोध का रूप ले लेती है।इस प्रकार काम अथवा क्रोध ही वह राक्षस है जो हमें परिस्थितियों के साथ समझौता करने को विवश कर देता है। आदर्शों को भुलाकर हमें पापाचरण में प्रवृत्त करता है। हमारी निम्न कोटि की इच्छायें जितनी प्रबल होगी उतना ही पापपूर्णं हमारा जीवन होगा। कामनाएं हमारे विवेक को आच्छादित कर देती हैं। काम के उत्पन्न होने पर उससे ही असंख्य प्रकार की दुखदायक वृत्तियां उत्पन्न होती हैं। इन सब के वश में होना अज्ञान और उनके ऊपर शासन करना ज्ञान है।अब भगवान् दृष्टांतों के द्वारा समझाते हैं कि किस प्रकार हमारा शत्रु यह काम हमारे विवेक को आच्छादित करता है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.37।।एवं पृष्टः श्रीभगवान्ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीरणा इत्युक्तं समग्रमैश्वर्यादिषट्कं नित्यमप्रतिबन्धेन यस्मिन्वासुदेवे वर्ततेउत्पत्तिं निधनं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति। इत्युत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवो भगवानितिशब्दवाच्य उवाचोत्तरमुक्तवान् काम इति। यस्त्वया वैरी पृष्टः एष कामः शत्रुर्यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिर्लोकस्य। ननु क्रोधोऽप्यनर्थहेतुर्लोके दृश्यते इत्यत आह। स एव कामः कुतश्चिन्निमित्तात्प्रतिहितः क्रोधत्वेन परिणमतेऽहः क्रोधोऽप्येष एव शत्रोः पुत्रत्वादप्ययं शत्रुरित्याह। रजोगुणः समुद्भवो यस्य सः। यद्वा कथं शत्रुतां करोतीत्यह आह। रजोगुणस्य समुद्भवः कारणं कामो रजः प्रवर्तयन्पुरुषं प्रवर्तयति। ननु विषयभोगेन तृप्तिं नीतः शत्रुत्वं जिहास्यतीति चेत् तत्राह। महदशनमस्य सः। तदुक्तम् न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाभ्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।।यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् इति। ननु लोके यथा स्वेनापराधिनः कश्चिच्छत्रुत्वं भजति तथायमप्यतोऽपराधं तस्य न करिष्यामीतिचेत्तत्राह। महाशनत्वान्महापाप्माऽत्युग्रो विनैवापराधं स्वेनोपकृतश्च नाशयतीत्यर्थः। अतः काममेव परमं वैरिणं विद्धि। ज्ञात्वा च तत्परिहाराय यतस्वेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.37।।एवमर्जुनेनः पृष्टेअथो खल्वाहुः काममय एवायं पुरुषः इतिआत्मैवेदमग्र आसीदेक एव सोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीय इत्यादिश्रुतिसिद्धमुत्तरं श्रीभगवानुवाच। यस्त्वया पृष्टो हेतुर्बलादनर्थमार्गे प्रवर्तकः स एष कामएव महान् शत्रुः यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिः प्राणिनाम्। ननु क्रोधोऽप्यभिचारादौ प्रवर्तको दृष्ट इत्यत आह क्रोध एषः। काम एव केनचिद्धेतुना प्रतिहतः क्रोधत्वेन परिणमते अतः क्रोधोऽप्येष काम एव। एतस्मिन्नेव महावैरिणि निवारिते सर्वपुरुषार्थप्राप्तिनित्यर्थः। तन्निवारणोपायज्ञानाय तत्कारणमाह रजोगुणसमुद्भवः दुःखप्रवृत्तिबलात्मको रजोगुण एव समुद्भवः कारणं यस्य। अतः कारणानुविधायित्वात्कार्यस्य सोऽपि तथा। यद्यपि तमोगुणोऽपि तस्य कारणं तथापि दुःखे प्रवृत्तो च रजसएव प्राधान्यात्तस्यैव निर्देशः। एतेन सात्विक्या वृत्त्या रजसि क्षीणे सोऽपि क्षीयत इत्युक्तम्। अथवा तस्य कथमनर्थमार्गे प्रवर्तकत्वमित्यत आह रजोगुणस्य प्रवृत्त्यादिलक्षणस्य समुद्भवो यस्मात्। कामो हि विषयाभिलाषात्मकः स्वयमुद्भूतो रजः प्रवर्तयन्पुरुषं दुःखात्मके कर्मणि प्रवर्तयति तेनायमवश्यं हन्तव्य इत्यभिप्रायः। ननु सामदानभेदण्डाश्चत्वार उपायस्तत्र प्रथमत्रिकस्यासंभवे चतुर्थो दण्डः प्रयोक्तव्यो नतु हठादेवेत्याशङ्क्य त्रयाणामसंभवं वक्तुं विशिनष्टि महाशनो महापाप्मेति। महदशनमस्येति महाशनःयत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्।। इति स्मृतेः। अतो न दानेन संधातुं शक्यः। नापि सामभेदाभ्याम्। यतो महापाप्माऽत्युग्रः। तेन हि बलात्प्रेरितोऽनिष्टफलमपि जानन्पापं करोति। अतो विद्धि जानीहि एनं काममिह संसारे वैरिणम्। तदेतत्सर्वं विवृतं वार्तिककारैरात्मैवेदमग्र आसीदिति श्रुतिव्याख्यानेप्रवृत्तौ च निवृत्तौ च यथोक्तस्याधिकारिणः। स्वातन्त्र्ये सति संसारसृतौ कस्मात्प्रवर्तते।।नतु निःशेषविध्वस्तसंसारानर्थवर्त्मनि। निवृत्तिलक्षणे वाच्यं केनायं प्रेर्यतेऽवशः।।अनर्थपरिपाकत्वमपि जानन्प्रवर्तते। पारतन्त्र्यमृते दृष्टा प्रवृत्तिर्नेदृशी क्वचित्।।तस्माच्छ्रेयोर्थिनः पुंसः प्रेरकोऽनिष्टकर्मणि। वक्तव्यस्तन्निरासार्थमित्यर्था स्यात्परा श्रुतिः।।अनाप्तपुरुषार्थोऽयं निःशेषानर्थसंकुलः। इत्यकामयतानाप्तान्पुमर्थान्साधनैर्जडः। जिहासति तथानर्थानविद्वानात्मनि श्रितान्। अविद्योद्भूतकामः सन्नथो खल्विति च श्रुतिः। अकामतः क्रियाः काश्चिद्दृश्यन्ते नेह कस्यचित्। यद्यद्धि कुरुते जन्तुस्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्।।काम एष क्रोध एष इत्यादिवचनं स्मृतेः। प्रवर्तको नापरोऽतः कामादन्यः प्रतीयते इतिअकामतः इति मनुवचनम्। अन्यत्स्पष्टम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.37।।अत्रोत्तरंकाममय एवायं पुरुष इत्यादिश्रुतिसिद्धं भगवानुवाच काम एष इति। एष प्रसिद्धः कामःसोऽकामयत जाया मे स्यादथ प्रजायेयाथ वित्तं मे स्यादथ कर्म कुर्वीयेति श्रुतेरिदं मे भूयादिदं मे भूयात् इति तीव्राभिलाषहेतुभूतश्चेतसोऽनवस्थितत्वापादको वृत्तिविशेषः। स च चेतोरूप एव।कामः संकल्पः इत्युपक्रम्यएतत्सर्वं मनः इत्युपसंहारात् स एष कामः केनचिन्निमित्तेन प्रतिहतः क्रोधरूपेण परिणमतेऽतः क्रोधोऽभिज्वलनात्माप्येष एव तमेनमिह शरीरेऽन्तःस्थितं वैरिणं विद्धि। कुतो वैरी। यतः रजोगुणसमुद्भवः रजो रञ्जनात्मकः प्राकृतो गुणः तस्य गुणौ कार्यभूतौ तृष्णासङ्गौ तावेवोद्भवो यस्य सः। रजःकार्यत्वात् दुःखैकफलोऽयमतो वैरी। यद्वा रजोगुणस्य लोभप्रवृत्त्यादिलक्षणस्य समुद्भवो यस्मात्। ननु विषयाभिलाषात्मकः कामो विषयार्पणेन शाम्यति। विषयस्य दौर्लभ्यनिश्चये स्वत एव वा निवर्तते अन्ध इव रूपदर्शनाभिलाषादित्याशङ्क्याह महाशनो महापाप्मेति। महद्दातुमपारणीयमशनमस्य स तथा। यथोक्तंन जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते इति।यत्पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत् इति। तथा महापाप्मात्युग्रः। स हि सहस्रशः प्रबोधितोऽपि न निवर्तते तद्वदयमपि दुश्चिकित्स्यः। महाशनत्वान्नायं वैरी दानसाध्यः। नापि सामभेदसाध्यः। अत्युग्रत्वात्। अतो हन्तव्य एवेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.37।।एतत्प्रश्नोत्तरमाह भगवान् प्रपञ्चवैचित्र्यार्थप्रकटितत्रिगुणमध्यस्थविक्षिप्तकरणैकस्वभावरजोगुणात्मकभगवदंशमोहितस्तत्र प्रवर्त्तते तस्मात्तद्गुणकृतविक्षेपकर्माणि तत्स्वरूपज्ञानपूर्वकं त्यजेदित्याह काम एष इति। एष इति लौकिकः कामः। रजोगुणसमुद्भवः रजोगुणादुत्पत्तिर्यस्य सः। सर्वेषां द्वेषी शत्रुः। एष एव कामोऽवस्थान्तरापन्नः क्रोधो भवति सोऽपि रजोगुणसमुद्भवः। स महाशनो दुरापूरः। अत एव श्रीभागवते उक्तं 9।19।14 न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते।।किं पुनर्महापाप्मा महापापरूपो भगवद्भजनप्रतिबन्धकः। इह संसारे देहग्रहणानन्तरमेनं वैरिणं विद्धि।इह इतिपदादेतद्देहावसाने सति अलौकिकेऽयमेव कार्याय भविष्यतीति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.37।।अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच काम एष इति। यस्त्वया पृष्टो हेतुरेष काम एव। ननु क्रोधोऽपि पूर्वं त्वयोक्तःइन्द्रियस्येन्द्रियस्य इत्यत्र। सत्यम्। नासौ ततः पृथक् किंतु क्रोधोऽप्येष एव काम एव केनचित्प्रतिहतः क्रोधात्मना परिणमते। अतः पूर्वं पृथक्त्वेनोक्तोऽपि क्रोधः कामज एवेत्यभिप्रायेण कामेनैकीकृत्योच्यते। रजोगुणात्समुद्भवतीति तथा। अनेन सत्त्ववृद्ध्या रजसि क्षयं नीते सति कामोऽपि क्षीयत इति सूचितम्। एनं काममिह मोक्षमार्गे वैरिणं विद्धि। अयं च वक्ष्यमाणक्रमेण हन्तव्य एव। यतो नासौ दानेन संधातुं शक्य इत्याह। महाशनः महदशनं यस्य। दुष्पूर इत्यर्थः। न च साम्ना संधातुं शक्यः यतो महापाप्मा अत्युग्रः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.37।।तत्रोत्तरम् काम एष इति। रागपूर्वावतारः कामः तत्तदिच्छास्वरूप एवात्र हेतुः प्रवर्त्तकः द्वेषपूर्वावतारश्च तत्परिणामभूतः क्रोध एवाऽवसेयः। रजोगुणसमुद्भवः काम एव क्रोधस्तमोगुणसमुद्भव इति यद्यपि युक्तं वक्तुं तथापि परिणामे तमसो हेतुत्वादेवं नोक्तं अतएव कामानुज इत्युच्यते। कामश्च तदग्रजो बुद्धिनाशनो दुष्पूरो महापाप इति तेन बलादेव नियोजितः सर्वकर्मकारीति प्रायो राजसं तामसं रागं द्वेषं तद्धेतुकं पापं वैरिणमित्युत्तरपक्षार्थः। अत्र क्रोधस्याप्युपक्रमे यत्कामस्यैव वैरित्वकथनं तत्पार्थस्य युद्धोपस्थितौ तत्तद्बन्धुजीवनादिकामत्वाभिप्रायेणेति बोध्यम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.37।।यह काम जो सब लोगोंका शत्रु है जिसके निमित्तसे जीवोंको सब अनर्थोंकी प्राप्ति होती है वहीं यह काम किसी कारणसे बाधित होनेपर क्रोधके रूपमें बदल जाता है इसलिये क्रोध भी यही है। यह काम रजोगुणसे उत्पन्न हुआ है अथवा यों समझो कि रजोगुणका उत्पादक है क्योंकि उत्पन्न हुआ काम ही रजोगुणको प्रकट करके पुरुषको कर्ममें लगाया करता है। तथा रजोगुणके कार्य सेवा आदिमें लगे हुए दुःखित मनुष्योंका ही यह प्रलाप सुना जाता है कि तृष्णा ही हमसे अमुक काम करवाती है इत्यादि। तथा यह काम बहुत खानेवाला है। इसलिये महापापी भी है क्योंकि कामसे ही प्रेरित हुआ जीव पाप किया करता है। इसलिये इस कामको ही तू इस संसारमें वैरी जान।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.37।। व्याख्या रजोगुणसमुद्भवः आगे चौदहवें अध्यायके सातवें श्लोकमें भगवान् कहेंगे कि तृष्णा (कामना) और आसक्तिसे रजोगुण उत्पन्न होता है और यहाँ यह कहते हैं कि रजोगुणसे काम उत्पन्न होता है। इससे यह समझना चाहिये कि रागसे काम उत्पन्न होता है और कामसे राग बढ़ता है। तात्पर्य यह है कि सांसारिक पदार्थोंको सुखदायी माननेसे राग उत्पन्न होता है जिससे अन्तःकरणमें उनका महत्त्व दृढ़ हो जाता है। फिर उन्हीं पदार्थोंका संग्रह करने और उनसे सुख लेनेकी कामना उत्पन्न होती है। पुनः कामनासे पदार्थोंमें राग बढ़ता है। यह क्रम जबतक चलता है तबतक पापकर्मसे सर्वथा निवृत्ति नहीं होती।काम एष क्रोध एषः मेरी मनचाही हो यही काम है (टिप्पणी प0 188.1)। उत्पत्तिविनाशशील जडपदार्थोंके संग्रहकी इच्छा संयोगजन्य सुखकी इच्छा सुखकी आसक्ति ये सब कामके ही रूप हैं।पापकर्म कहीं तोकामके वशीभूत होकर और कहींक्रोध के वशीभूत होकर किया गया दीखता है। दोनोंसे अलगअलग पाप होते हैं। इसलिये दोनों पद दिये। वास्तवमें काम अर्थात् उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी कामना प्रियता आकर्षण ही समस्त पापोंका मूल है (टिप्पणी प0 188.2)। कामनामें बाधा लगनेपर काम ही क्रोधमें परिणत हो जाता है। इसलिये भगवान्ने एक कामनाको ही पापोंका मूल बतानेके लिये उपर्युक्त पदोंमें एकवचनका प्रयोग किया है।कामनाकी पूर्ति होनेपरलोभ उत्पन्न होता होता है (टिप्पणी प0 188.3) और कामनामें बाधा पहुँचानेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर)क्रोध उत्पन्न होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला अपनेसे अधिक बलवान् हो तो क्रोध उत्पन्न न होकरभय उत्पन्न होता है। इसलिये गीतामें कहींकहीं कामना और क्रोधके साथसाथ भयकी भी बात आयी है जैसे वीतरागभयक्रोधाः (4। 10) और विगतेच्छाभयक्रोधः (5। 28)।कामनासम्बन्धी विशेष बातकामना सम्पूर्ण पापों सन्तापों दुःखों आदिकी जड़ है। कामनावाले व्यक्तिको जाग्रत्में सुख मिलना तो दूर रहा स्वप्नमें भी कभी सुख नहीं मिलता काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं (मानस 7। 90। 1)। जोचाहते हैं वह न हो और जो नहीं चाहते वह हो जाय इसीको दुःख कहते हैं। यदिचाहते औरनहीं चाहते को छोड़ दें तो फिर दुःख है ही कहाँनाशवान् पदार्थोंकी इच्छा ही कामना कहलाती है। अविनाशी परमात्माकी इच्छा कामनाके समान प्रतीत होती हुई भी वास्तवमेंकामना नहीं है क्योंकि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी कामना कभी पूरी नहीं होती प्रत्युत बढ़ती ही रहती है पर परमात्माकी इच्छा (परमात्मप्राप्ति होनेपर) पूरी हो जाती है। दूसरी बात कामना अपनेसे भिन्न वस्तुकी होती है और परमात्मा अपनेसे अभिन्न हैं। इसी प्रकार सेवा (कर्मयोग) तत्त्वज्ञान (ज्ञानयोग) और भगवत्प्रेम(भक्तियोग) की इच्छा भीकामना नहीं है। परमात्मप्राप्तिकी इच्छा वास्तवमें जीवनकी वास्तविक आवश्यकता (भूख) है। जीवको आवश्यकता तो परमात्माकी है पर विवेकके दब जानेपर वह नाशवान् पदार्थोंकी कामना करने लगता है।एक शङ्का हो सकती है कि कामनाके बिना संसारका कार्य कैसे चलेगा इसका समाधान यह है कि संसारका कार्य वस्तुओंसे क्रियाओंसे चलता है मनकी कामनासे नहीं। वस्तुओंका सम्बन्ध कर्मोंसे होता है चाहे वे कर्म पूर्वके (प्रारब्ध) हों अथवा वर्तमानके (उद्योग)। कर्म बाहरके होते हैं और कामनाएँ भीतरकी। बाहरी कर्मोंका फल भी (वस्तु परिस्थिति आदिके रूपमें) बाहरी होता है।कामना सम्बन्ध फल(पदार्थ परिस्थिति आदि) की प्राप्तिके साथ है ही नहीं। जो वस्तु कर्मके अधीन है वह कामना करनेसे कैसे प्राप्त हो सकती है संसारमें देखते ही हैं कि धनकी कामना होनेपर भी लोगोंकी दरिद्रता नहीं मिटती। जीवन्मुक्त महापुरुषोंको छोड़कर शेष सभी व्यक्ति जीनेकी कामना रखते हुए ही मरते हैं। कामना करें या न करें जो फल मिलनेवाला है वह तो मिलेगा ही। तात्पर्य यह है कि जो होनेवाला है वह तो होकर ही रहेगा और जो नहीं होनेवाला है वह कभी नहीं होगा चाहे उसकी कामना करें या न करें। जैसे कामना न करनेपर भी प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है ऐसे ही कामना न करनेपर अनुकूल परिस्थिति भी आयेगी ही। रोगकी कामना किये बिना भी रोग आता है और कामना किये बिना भी नीरोगता रहती है। निन्दाअपमानकी कामना न करनेपर भी निन्दाअपमान होते हैं और कामना किये बिना भी प्रशंसासम्मान होते हैं। जैसे प्रतिकूल परिस्थिति कर्मोंका फल हैं ऐसे ही अनकूल परिस्थिति भी कर्मोंका ही फल है इसलिये वस्तु परिस्थिति आदिका प्राप्त होना अथवा न होना कर्मोंसे सम्बन्ध रखता है कामनासे नहीं।कामना तात्कालिक सुखकी भी होती है और भावी सुखकी भी। भोग और संग्रहकी इच्छा तात्कालिक सुखकी कामना है और कर्मफलप्राप्तिकी इच्छा भावी सुखकी कामना है। इन दोनों ही कामनाओंमें दुःखहीदुःख है। कारण कि कामना केवल वर्तमानमें ही दुःख नहीं देती प्रत्युत भावी जन्ममें कारणं होनेसे भविष्यमें भी दुःख देती है। इसलिये इन दोनों ही कामनाओंका त्याग करना चाहिये।कर्म और विकर्म (निषिद्धकर्म) दोनों ही कामनाके कारण होते हैं। कामनाके कारणकर्म होते हैं और कामनाके अधिक बढ़नेपरविकर्म होते हैं। कामनाके कारण ही असत्में आसक्ति दृढ़ होती है। कामना न रहनेसे असत्से सम्बन्धविच्छेद हो जाता है।कामना पूरी हो जोनेपर हम उसी अवस्थामें आ जाते हैं जिस अवस्थामें हम कामना उत्पन्न होनेसे पहले थे। जैसे किसीके मनमें कामना उत्पन्न हुई कि मेरेको सौ रुपये मिल जायँ। इसके पहले उसके मनमें सौ रुपयेपानेकी कामना नहीं थी अतः अनुभवसे सिद्ध हुआ कि कामना उत्पन्न होनेवाली है। जबतक सौ रुपयोंकी कामना उत्पन्न नहीं हुई थी तबतकनिष्कामताकी स्थिति थी। उद्योग करनेपर यदि प्रारब्धवशात् सौ रुपये मिल जायँ तो वहीनिष्कामताकी स्थिति पुनः आ जाती है। परन्तु सांसारिक सुखासक्तिके कारण वह स्थिति ठहरती नहीं और नयी कामना उत्पन्न हो जाती है कि मेरेको हजार रुपये मिल जायँ। इस प्रकार नतो कामना पूरी होती है और न पूरी तृप्ति ही होती है। कोरे परिश्रमके सिवा कुछ हाथ नहीं लगताकाम अर्थात् सांसारिक पदार्थोंकी कामनाका त्याग करना कठिन नहीं है। थोड़ा गहरा विचार करें कि वास्तवमें कामना छूटती ही नहीं अथवा टिकती ही नहीं पता लगेगा कि वास्तवमें कामना टिकती ही नहीं वह तो निरन्तर मिटती ही जाती है किन्तु मनुष्य नयीनयी कामनाएँ करके उसे बनाये रखता है। कामना उत्पन्न होती है और उत्पन्न होनेवाली वस्तुका मिटना अवश्यम्भावी है। इसलिये कामना स्वतः मिटती है। अगर मनुष्य नयी कामना न करे तो पुरानी कामना कभी पूरी होकर और कभी न पूरी होकर स्वतः मिट जाती है।कामनाकी पूर्ति सभीके और सदाके लिये नहीं है परन्तु कामनाका त्याग सभीके लिये और सदाके लिये है। कारण कि कामना अनित्य और त्याग नित्य है। निष्काम होनेमें कठिनाई क्या है हम निर्मम नहीं होते यही कठिनाई है। यदि हम निर्मम हो जायँ तो निष्काम होनेकी शक्ति आ जायगी और निष्काम होनेसे असङ्ग होनेकी शक्ति आ जायगी। जब निर्ममता निष्कामता और असङ्गता आ जाती है तब निर्विकारता शान्ति और स्वाधीनता स्वतः आ जाती है।एक मार्मिक बातपर ध्यान दें। हम कामनाओंका त्याग करना बड़ा कठिन मानते हैं। परन्तु विचार करें कि यदि कामनाओंका त्याग करना कठिन है तो क्या कामनाओंकी पूर्ति करना सुगम है सब कामनाओंकी पूर्ति संसारमें आजतक किसीको नहीं हुई। हमारी तो बात ही क्या भगवान्के बाप(दशरथजी) की भी कामना पूरी नहीं हुई अतः कामनाओंकी पूर्ति होना असम्भव है। पर कामनाओंका त्याग करना असम्भव नहीं है। यदि हम ऐसा मानते हैं कि कामनाओंका त्याग करना कठिन तो कठिन बात भी असम्भव बात(कामनाओकी पूर्ति) की अपेक्षा सुगम ही पड़ती है क्योंकि कामनाओंका त्याग तो हो सकता है पर कामनाओंकी पूर्ति हो ही नहीं सकती। इसलिये कामनाओंकी पूर्तिकी अपेक्षा कामनाओंका त्याग करना सुगम ही है। गलती यही होती है कि जो कार्य कर नहीं सकते उसके लिये उद्योग करते हैं और जो कार्य कर सकते हैं उसे करते ही नहीं। इसलिये साधकको कामनाओंका त्याग करना चाहिये जो कि वह कर सकता है।कामनाओंके चार भेद हैं (1) शरीरनिर्वाहमात्रकी आवश्यक कामनाको पूरा कर दे (टिप्पणी प0 190.1)।(2) जो कामना व्यक्तिगत एवं न्याययुक्त हो और जिसको पूरा करना हमारी सामर्थ्यसे बाहर हो उसको भगवान्के अर्पण करके मिटा दे (टिप्पणी प0 190.2)।(3) दूसरोंकी वह कामना पूरी कर दे जो न्याययुक्त और हितकारी हो तथा जिसको पूरी करनेकी सामर्थ्य हमारेमें हो। इस प्रकार दूसरोंकी कामना पूरी करनेपर हमारेमें कामनात्यागकी सामर्थ्य आती है।(4) उपर्युक्त तीनों प्रकारकी कामनाओंके अतिरिक्त दूसरी सब कामनाओंको विचारके द्वारा मिटा दे।महाशनो महापाप्मा कोई वैरी ऐसा होता है जो भेंटपूजा अथवा अनुनयविनयसे शान्त हो जाता है पर यहकाम ऐसा वैरी है जो किसीसे भी शान्त नहीं होता। इस कामकी कभी तृप्ति नहीं होती बुझै न काम अगिनि तुलसी कहुँ बिषयभोग बहु घी ते।। (विनयपत्रिका 198)जैसे धन मिलनेपर धनकी बढ़ती ही चली जाती है ऐसे ही ज्योंज्यों भोग मिलते हैं त्योंहीत्यों कामना बढ़ती ही चली जाती है। इसलिये कामनाको महाशनः कहा गया है।कामना ही सम्पूर्ण पापोंका कारण है। चोरी डकैती हिंसा आदि समस्त पाप कामनासे ही होते हैं। इसलिये कामनाको महापाप्मा कहा गया है।कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य अपने कर्तव्यसे अपने स्वरूपसे और अपने इष्ट(भगवान्) से विमुख हो जाता है और नाशवान् संसारके सम्मुख हो जाता है। नाशवान्के सम्मुख होनेसे पाप होते हैं और पापोंके फलस्वरूप नरकों तथा नीच योनियोंकी प्राप्ति होती है।संयोगजन्य सुखकी कामनासे ही संसार सत्य प्रतीत होता है और प्रतिक्षण बदलनेवाले शरीरादि पदार्थ स्थिर दिखायी देते हैं। सांसारिक पदार्थोंको स्थिर माननेसे ही मनुष्य उनसे सुख भोगता है और उनकी इच्छा करता है। सुखभोगके समय संसारकी क्षणभङ्गुरताकी ओर दृष्टि नहीं जाती और मनुष्य भोगको तथा अपनेको भी स्थिर देखता है। जो प्रतिक्षण मर रहा है नष्ट हो रहा है उस संसारसे सुख लेनेकी इच्छा कैसे हो सकती है परसंसार प्रतिक्षण मर रहा है इस जानकारीका तिरस्कार करनेसे ही सांसारिक सुखभोगकी इच्छा होती है। चलचित्र(सिनेमा) में पके हुए अंगूर देखनेपर भी उन्हें खानेकी इच्छा नहीं होती यदि होती है तो सिद्ध हुआ कि हमने उसे स्थिर माना है। परिवर्तनशील संसारको स्थिर माननेसे वास्तवमें जो स्थिर तत्त्व है उस परमात्मतत्त्व की तरफ अथवा अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि जाती ही नहीं। उधर दृष्टि न जानेसे मनुष्य उससे विमुख होकर नाशवान् सुखभोगमें फँस जाता है। इससे सिद्ध होता है कि वास्तविक तत्त्वसे विमुख हुए बिना कोई सांसारिक भोग भोगा ही नहीं जा सकता और रागपूर्वक सांसारिक भोग भोगनेसे मनुष्य परमात्मासे विमुख हो ही जाता है।भोगबुद्धिसे सांसारिक भोग भोगनेवाला मनुष्य हिंसारूप पापसे बच ही नहीं सकता। वह अपनी भी हिंसा (पतन) करता है और दूसरोंकी भी। जैसे कोई मनुष्य धनका संग्रह करके उससे भोगोंको भोगता है तो उसे देखकर निर्धनोंके हृदयमें धन और भोगोंके अभावका विशेष दुःख होता है यह उनकी हिंसा हुई। भोगोंको भोगकर वह स्वयं अपनी भी हिंसा (पतन) करता है क्योंकि स्वयं परमात्माका चेतन अंश होते हुए भी जड(धन) को महत्त्व देनेसे वह वस्तुतः जडका दास हो जाता है जिससे उसका पतन हो जाता है। संसारके सब भोगपदार्थ सीमित होते हैं अतः मनुष्य जितना भोग भोगता है उतना भोग दूसरोंके हिस्सेसे ही आता है। हाँ शरीरनिर्वाहमात्रके लिये पदार्थोंको स्वीकार करनेसे मनुष्यको पाप नहीं लगता। शरीरनिर्वाहमें भी शास्त्रोंमें केवल अपने लिये भोग भोगनेका निषेध है। अपने माता पिता गुरु बालक स्त्री वृद्ध आदिको शरीरनिर्वाहके पदार्थ पहले देकर फिर स्वयं लेने चाहिये।भोगबुद्धिसे भोग भोगनेवाला पुरुष अपना तो पतन करता है भोग्य वस्तुओंका दुरुपयोग करके उनका नाश करता है और अभावग्रस्त पुरुषोंकी हिंसा करता है परन्तु जीवन्मुक्त महापुरुषके विषयमें यह बात लागू नहीं होती। उसके द्वारा हिंसारूप पाप नहीं होता क्योंकि उसमें भोगबुद्धि नहीं होती और उसके द्वारा निष्कामभावसे निर्वाहमात्रके लिये शास्त्रविहित क्रियाएँ होती हैं (गीता 4। 21 18। 17)। उस महापुरुषके उपयोगमें आनेवाली वस्तुओंका विकास होता है नाश नहीं अर्थात् उसके पास आनेपर वस्तुओंका सदुपयोग होता है जिससे वे सार्थक हो जाती हैं। जबतक संसारमें उस महापुरुषका कहलानेवाला शरीर रहता है तबतक उसके द्वारा स्वतःस्वाभाविक प्राणियोंका उपकार होता रहता है। शरीरनिर्वाहमात्रकी आवश्यकता महाशनः और महापाप्मा नहीं है। कारण कि शरीरनिर्वाहमात्रकी आवश्यकताकामना नहीं है। आवश्यकताकी पूर्ति होती है जैसे भूख लगी और भोजन करनेसे तृप्ति होगयी। परन्तु कामनाकी वृद्धि होती है।विद्ध्येनमिह वैरिणम् यद्यपि वास्तवमें सांसारिक पदार्थोंकी कामनाका त्याग होनेपर ही सुखशान्तिका अनुभव होता है तथापि मनुष्य अज्ञानवश पदार्थोंसे सुखका होना मान लेता है। इस प्रकार मनुष्यने पदार्थोंकी कामनाको सुखका कारण मानकर उसे अपना मित्र और हितैषी मान रखा है। इस मान्यताके कारण कामना कभी मिटती नहीं। इसलिये भगवान् यहाँ कहते हैं कि इस कामनाको अपना मित्र नहीं प्रत्युत वैरी जानो। कामना मनुष्यकी वैरी इसलिये है कि यह मनुष्यके विवेकको ढककर उसे पापोंमें प्रवृत्त कर देती है।संसारके सम्पूर्ण पापों दुःखों नरकों आदिके मूलमें एक कामना ही है। इस लोक और परलोकमें जहाँ कहीं कोई दुःख पा रहा है उसमें असत्की कामना ही कारण है। कामनासे सब प्रकारके दुःख होते हैं और सुख कोईसा भी नहीं होता।विशेष बातकामको नष्ट करनेका मुख्य और सरल उपाय है दूसरोंकी सेवा करना उन्हें सुख पहुँचाना। अन्य शरीरधारी तो दूसरे हैं ही अपने कहलानेवाले शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि और प्राण भी दूसरे ही हैं। अतः इनका निर्वाह भी सेवाबुद्धिसे करना है भोगबुद्धिसे नहीं। इनसे सुख नहीं लेना है।कर्मयोगमें स्थूलशरीरसे होनेवालीक्रिया सूक्ष्मशरीरसे होनेवालाचिन्तन और कारणशरीरसे होनेवालीस्थिरता तीनों ही अपने लिये नहीं हैं प्रत्युत संसारके लिये ही हैं। कारण कि स्थूलशरीरकी स्थूलसंसारके साथ सूक्ष्मशरीरकी सूक्ष्मसंसारके साथ और कारणशरीरकी कारणसंसारके साथ एकता है। अतः शरीर पदार्थ और क्रियासे दूसरोंकी सेवा करना तो उचित है पर अपनेमें सेवकपनका अभिमान करना अनुचित है। सूक्ष्मशरीरसे परहितचिन्तन करना तो उचित है पर उससे सुख लेना अनुचित है। कारणशरीरसे स्थिर होना तो उचित है पर स्थिरताका सुख लेना अनुचित है (टिप्पणी प0 192)। इस प्रकार सुख न लेनेसे फलकी आसक्ति मिट जाती है फलकी आसक्ति मिटनेपर कर्मकी आसक्ति सुगमतापूर्वक मिट जाती है।मेरा आदेश चले अमुक व्यक्ति मेरी आज्ञामें चले अमुक वस्तु मेरे काम आ जाय मेरी बात रह जाय ये सब कामनाके ही स्वरूप हैं। उत्पत्तिविनाशशील (असत्) संसारसे कुछ लेनेकी कामना महान् अनर्थ करनेवाली है। दूसरोंकी न्याययुक्त कामना(जिसमें दूसरेका हित हो और जिसे पूर्ण करनेकी सामर्थ्य हमारेमें हो) को पूरी करनेसे अपनेमें कामनाके त्यागका बल आ जाता है। दूसरोंकी कामना पूरी न भी कर सकें तो भी हृदयमें पूरी करनेका भाव रहना ही चाहिये।तादात्म्य अहंता (अपनेको शरीर मानना) ममता (शरीरादि पदार्थोंको अपना मानना) और कामना (अमुक वस्तु मिल जाय ऐसा भाव) इन तीनोंसे ही जीव संसारमें बँधता है। तादात्म्यसे परिच्छिन्नता ममतासे विकार और कामनासे अशान्ति पैदा होती है। कामनाके त्यागसे ममता और ममताके त्यागसे तादात्म्य मिटता है। कर्मयोगी सिद्धान्तसे इनमें किसीके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता क्योंकि वह शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि अहम् पदार्थ आदि किसीको भी अपना और अपने लिये नहीं मानता वह इन शरीरादिको केवल संसारका और संसारकी सेवाके लिये ही मानता है जो कि वास्तवमें है।किसीको भी दुःख न देनेका भाव होनेपर सेवाका आरम्भ हो जाता है। अतः साधकके अन्तःकरणमेंकिसीको भी दुःख न हो यह भाव निरन्तर रहना चाहिये। भूलसे अपने कारण किसीको दुःख हो भीजाय तो उससे क्षमा माँग लेनी चाहिये। वह क्षमा न करे तो भी कोई डर नहीं। कारण कि सच्चे हृदयसे क्षमा माँगनेवालेकी क्षमा भगवान्की ओरसे स्वतः होती है। सेवा करनेमें साधक सदा सावधान रहे कि कहीं सेवाके बदलेमें कुछ लेनेका भाव उसमें न आ जाय। इस प्रकार सेवा करनेसेकामरूप वैरी सुगमतापूर्वक नष्ट हो जाता है। सम्बन्ध यह पाप है ऐसी जानकारी होनेपर भी मनुष्य पापमें प्रवृत्त हो जाता है अतः इस जानकारीका प्रभाव आचरणमें न आनेका क्या कारण है इसका विवेचन भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.37।।अत्र उत्तरं सत्यपि धर्मे हृदिस्थे आगन्तुकावरणकृतोऽयं (N काचरणकृ ) विप्लवो न तु तदभवकृतः (N तदभावप्लुतः) इत्याशयेन।काम एष इति। द्वाभ्यामेतच्छब्दाभ्यामनयोरत्यन्तावैषम्यं (S अत्यन्तवैषम्यम्) सूच्यते। एतौ च कामक्रोधौ नित्यसंबन्धिनौ अन्योन्याविनाभावेन वर्तेते इत्येकरुपतयैव व्याचष्टे। एष च महस्य सुखस्य अशनः ग्रासकारकः महतः पापस्य हेतुत्त्वाच्च क्रोध एव पापदायी। एनं च वैरिणं प्राज्ञो जानीयात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.37।।संप्रति प्रतिवचनं प्रस्तौति शृण्विति। तस्य वैरित्वं स्फोरयति सर्वेति। अप्रस्तुतं किमिति प्रस्तूयते तत्राह यं त्वमिति। भगवच्छब्दार्थं निर्धारयितुं पौराणिकं वचनमुदाहरति ऐश्वर्यस्येति। समग्रस्येत्येतत्प्रत्येकं विशेषणैः संबध्यते अथशब्दस्तथाशब्दपर्यायः समुच्चयार्थः। मोक्षशब्देन तदुपायो ज्ञानं विवक्ष्यते। उदाहृतवचसस्तात्पर्यमाह ऐश्वर्यादीति। स वाच्यो भगवानिति संबन्धः। तत्रैव पौराणिकं वाक्यान्तरं पठति उत्पत्तिमिति। भूतानामिति प्रत्येकमुत्पत्त्यादिभिः संबध्यते। कारणार्थौ चोत्पतिप्रलयशब्दौ क्रियामात्रस्य पुरुषान्तरगोचरत्वसंभवात्। आगतिर्गतिश्चेत्यागामिन्यौ संपदापदौ सूच्येते। वाक्यान्तरस्यापि तात्पर्यमाह उत्पत्त्यादीति। वेत्तीत्युक्तः साक्षात्कारो विज्ञानमित्युच्यते समग्रैश्वर्यादिसंपत्तिसमुच्चयार्थश्चकारः। उक्तलक्षणो भगवान्किमुक्तवानिति तदाह काम इति। कामस्य सर्वलोकशत्रुत्वं विशदयति यन्निमित्तेति। तथापि कथं तस्यैव क्रोधत्वं तदाह स एष इति। कामक्रोधयोरेव हेयत्वद्योतनार्थं कारणं कथयति रजोगुणेति। कारणद्वारा कामादेरेव हेयत्वमुक्त्वा कार्यद्वारापि तस्य हेयत्वं सूचयति रजोगुणस्येति। कामस्य पुरुषप्रवर्तकत्वमेव न रजोगुणजनकत्वमित्याशङ्क्याह कामो हीति। तत्रैवानुभवानुसारिणीं लोकप्रसिद्धिं प्रमाणयति तृष्णया हीति। तस्य योग्यायोग्यविभागमन्तरेण बहुविषयत्वं दर्शयति महाशन इति। बहुविषयत्वप्रयुक्तं कर्म निर्दिशति अत इति। सर्वविषयत्वेऽपि कुतोऽस्य पापत्वमित्याशङ्क्याह कामेनेति। कामस्योक्तविशेषणवत्त्वे फलितमाह अत इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.37।।बलवद्विषयश्चेत् प्रश्नः तर्हि परिहारो न सङ्गच्छत इत्यतः परिहारं व्याचष्टे यस्त्विति। प्रवर्तकः पापेषु पुरुषः त्वया पृष्ट इति शेषः। एवं योजनायां क्रोधस्यापि कामसाम्यं स्यात् तथा चोत्तरत्र कामस्यैवानुवृत्तिर्विरुद्ध्येतेत्यतःक्रोध एषः इत्येतदन्यथा व्याचष्टे क्रोधोऽपीति। किं काम एव मुख्यया वृत्त्यैवमुच्यते नेति ब्रूमः किन्तूपचारेण इति भावेनाह तदिति। तदेव कुतः इत्यत आह कामादिति। नायमस्ति नियमः यदा गुरुनिन्दादिश्रवणे निन्दकाय क्रुद्ध्यति तदा कामाभावेऽपि क्रोधोदयदर्शनात् इत्यत आह यत्रापीति। भक्तिनिमित्तश्चासावनिन्दाकामश्चेति विग्रहः।सङ्गात्सञ्जायते कामः 2।62 इत्येतद्दर्शयितुं भक्तिनिमित्तेत्युक्तम्।काम एव (एषः) केनचित् प्रतिहतः क्रोधत्वेन परिणमते इति परेषां (शङ्करादीनां) व्याख्यानं दूषयति ये त्विति। एकान्तःकरणोपादानत्वलक्षणादानन्तर्यलक्षणाच्च सङ्करात्सूक्ष्मं कामक्रोधयोरत्यन्तभेदम्। न हि गुणो गुणस्योपादानं किन्तु निमित्तमेव प्रागन्वये प्रमाणमुक्तं इदानीं व्यतिरेकेऽप्याह उक्तं चेति। महाशन इति कामे दुर्घटत्वाद्गौणमित्याह महाशन इति। भोग्यं विषयः। यस्मात्कामभोग्यं महत्तस्मादसौ महाशन इत्यर्थः।काम एषः इति पापकारणत्वेनोक्त्वा कथं महापाप्मेत्युच्यते इत्यतो न कर्मधारयोऽयम् किन्तु महान्पाप्मा यस्मादिति बहुव्रीहिरिति भावेनाह महाब्रह्मेति। महच्छब्दात्परतः पापशब्दोऽध्याहार्यः। वधादिकर्तृत्वाभावात्कथं वैरित्वं इत्यत आह सर्वेति सर्वः सम्पूर्णः पुरुषार्थो मोक्षः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.37।।यस्तु बलवान् प्रवर्तकः स एष कामः। क्रोधोऽप्येष एव तज्जन्यत्वात्।कामात्क्रोधोऽभिजायते 2।62 इति ह्युक्तम्। यत्रापि गुरुनिन्दादिनिमित्तः क्रोधः तत्रापि भक्तिनिमित्तानिन्दाकामनिमित्त एव। ये त्वन्यथा वदन्ति ते सङ्गरान्न सूक्ष्मं जानन्ति। उक्तं चऋते कामं न कोपाद्या जायन्ते च कथञ्चन इति। महाशनः महद्धि कामभोग्यम्। महाब्रह्महत्यादिकारणत्वात् महापाप्मा। सर्वपुरुषार्थविरोधित्वाद्वैरीं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.37।।श्रीभगवानुवाच अस्य उद्भवाभिभवरूपेण वर्तमानगुणमयप्रकृतिसंसृष्टस्य प्रारब्धज्ञानयोगस्य रजोगुणसमुद्भवः प्राचीनवासनाजनितः शब्दादिविषयः अयं कामो महाशनः शत्रुः सर्वविषयेषु एनम् आकर्षति। एष एव प्रतिहतगतिः प्रतिहननहेतुभूतचेतनान् प्रति क्रोधरूपेण परिणतो महापाप्मा परहिंसादिषु प्रवर्तयति एनं रजोगुणसमुद्भवं सहजं ज्ञानयोगविरोधिनं वैरिणं विद्धि।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.37।। ऐश्वर्यस्य समग्रस्य धर्मस्य यशसः श्रियः। वैराग्यस्याथ मोक्षस्य षण्णां भग इतीरणा (विष्णु पु0 6।5।74) ऐश्वर्यादिषट्कं यस्मिन् वासुदेवे नित्यमप्रतिबद्धत्वेन सामस्त्येन च वर्तते उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम्। वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति (विष्णु प0 6।5।78) उत्पत्त्यादिविषयं च विज्ञानं यस्य स वासुदेवः वाच्यः भगवान् इति।।काम एषः सर्वलोकशत्रुः यन्निमित्ता सर्वानर्थप्राप्तिः प्राणिनाम्। स एष कामः प्रतिहतः केनचित् क्रोधत्वेन परिणमते। अतः क्रोधः अपि एष एव रजोगुणसमुद्भवः रजश्च तत् गुणश्च रजोगुणः सः समुद्भवः यस्य सः कामः रजोगुणसमुद्भवः रजोगुणस्य वा समुद्भवः। कामो हि उद्भूतः रजः प्रवर्तयन् पुरुषं प्रवर्तयति तृष्णया हि अहं कारितः इति दुःखिनां रजःकार्ये सेवादौ प्रवृत्तानां प्रलापः श्रूयते। महाशनः महत् अशनं अस्येति महाशनः अत एव महापाप्मा कामेन हि प्रेरितः जन्तुः पापं करोति। अतः विद्धि एनं कामम् इह संसारे वैरिणम्।।कथं वैरी इति दृष्टान्तैः प्रत्याययति
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【 Verse 3.38 】
▸ Sanskrit Sloka: धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च | यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ||
▸ Transliteration: dhūmenāvriyate vanhiryathādarśo malena ca | yatholbenāvṛto garbhastathā tenedamāvṛtam ||
▸ Glossary: dhūmena: by smoke; āvriyate: covered; vahniḥ: fire; yathā: as; ādarśaḥ: mirror; malena: by dust; ca: also; yathā: as; ulbena: by the womb; āvṛtaḥ: covered; garbhaḥ: embryo; tathā: so; tena: by that; idaṁ: this; āvṛtaṁ: covered
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.38 As fire is covered by smoke, as a mirror is covered by dust, or as the e bryo is covered by the womb, so also, the living being is covered by lust.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.38।।जैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान (विवेक) ढका हुआ है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.38।। जैसे धुयें से अग्नि और धूलि से दर्पण ढक जाता है तथा जैसे भ्रूण गर्भाशय से ढका रहता है वैसे उस (काम) के द्वारा यह (ज्ञान) आवृत होता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.38 धूमेन by smoke? आव्रियते is enveloped? वह्निः fire? यथा as? आदर्शः a mirror? मलेन by dust? च and? यथा as? उल्बेन by the amnion? आवृतः enveloped? गर्भः embryo? तथा so? तेन by it? इदम् this? आवृतम् enveloped.Commentary This means the universe. This also means knowledge. That means desire.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.38. As the fire is concealed by smoke and a mirror by dirt, and as the embryo is concealed by membrance-cover, so He is concealed by this (foe).
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.38 As fire is shrouded in smoke, a mirror by dust and a child by the womb, so is the universe enveloped in desire.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.38 As a fire is enveloped by smoke, as a mirror is covered by dust, and as an embryo is encased in the membrane, so is this (worldA) enveloped by it (desire).
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.38 As fire is enveloped by smoke, as a mirror by dirt, and as a foetus remains enclosed in the womb, so in this shrouded by that.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.38 As fire is enveloped by smoke, as a mirror by dust, and as an embryo by the amnion, so is this enveloped by that.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.38 Dhumena etc. [The foe's tripple nature viz.] being a mischivous appendage, himself creating mischieves, and being an object of disgust, is explained by the triad of these similes. He : the Self.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.38 As a fire is enveloped by smoke, as a mirror by dust and as an embryo by the membrance, so are the embodied beings covered by this desire.
Sri Krsna teaches the mode of this envelopement:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.38 Yatha, as; vahnih, fire, which is naturally bright; avriyate, is enveloped; dhumena, by smoke, which is born concomitantly (with fire) and is naturally dark; or as adarsah, a mirror; is covered malena, by dirt; ca, and; garbhah, a foetus; is avrtah, enclosed; ulbena, in the womb by the amnion; tatha, so; is idam, this; avrtam, shrouded; tena, by that. Again, what is that which is indicated by the word idam (this), and which is covered by desire? The answer is:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.38।। यहाँ तीन दृष्टान्त यह समझाने के लिये दिये गये हैं कि किस प्रकार काम और क्रोध हमारे विचार की सार्मथ्य को आवृत कर देते हैं। शास्त्रों में इसे पुनरुक्ति दोष माना गया है। किन्तु गीता में यह दोष नहीं मिलता। भगवद्गीता में कहीं पर भी अनावश्यक या निरर्थक पुनरुक्ति नहीं है। इसे ध्यान में रखकर इस श्लोक को समझने का प्रयत्न करें तो ज्ञात होगा कि यहाँ दिये तीनों दृष्टान्तों में सूक्ष्म भेद है। वाच्यार्थ से कहीं अधिक अर्थ इस श्लोक में बताया गया है।जगत् की अनित्य वस्तुओं के साथ आसक्ति के कारण मनुष्य की विवेचन सार्मथ्य आच्छादित हो जाती है। हमारी आसक्तियाँ अथवा इच्छाएँ तीन भागों में विभाजित की जा सकती हैं। अत्यन्त निम्न स्तर की इच्छाएँ मुख्यत शारीरिक उपभोगों के लिये दूसरे हमारी महत्त्वाकांक्षाएँ हो सकती हैं सत्ता धन प्रसिद्धि और कीर्ति पाने के लिये। इनसे भिन्न तीसरी इच्छा हो सकती है आत्मविकास और आत्मसाक्षात्कार की। ये तीन प्रकार की इच्छाएँ गुणों के प्राधान्य से क्रमश तामसिक राजसिक और सात्त्विक कहलाती हैं। तीन दृष्टान्तों के द्वारा इन तीन प्रकार की इच्छाओं से उत्पन्न विभिन्न प्रकार के आवरणों को स्पष्ट किया गया है।जैसे धुयें से अग्नि अनेक बार धुयें से अग्नि की चमकती ज्वाला पूर्णत या अंशत आवृत हो जाती है। इसी प्रकार सात्त्विक इच्छाएँ भी अनन्त स्वरूप आत्मा के प्रकाश को आवृत सी कर लेती हैं।जैसे धूलि से दर्पण रजोगुण से उत्पन्न विक्षेपों के कारण बुद्धि पर पड़े आवरण को इस उदाहरण के द्वारा स्पष्ट किया गया है। धुएँ के आवरण की अपेक्षा दर्पण पर पड़े धूलि को दूर करने के लिये अधिक प्रयत्न की आवश्यकता होती है। बहते हुये वायु के एक हल्के से झोंके से ही धुआँ हट जाता है जबकि तूफान के द्वारा भी दर्पण स्वच्छ नहीं किया जा सकता। केवल एक स्वच्छ सूखे कपड़े से पोंछकर ही उसे स्वच्छ करना सम्भव है। धुँए के होने पर भी कुछ मात्रा में अग्नि दिखाई पड़ती है परन्तु धूलि की मोटी परत जमी हुई होने पर दर्पण में प्रतिबिम्ब बिल्कुल नहीं दिखाई पड़ता।जैसे गर्भाशय से भ्रूण तमोगुण जनित अत्यन्त निम्न पशु जैसी वैषयिक कामनाएँ दिव्य स्वरूप को पूर्णत आवृत कर देती हैं जिसे समझने के लिए यह भ्रूण का दृष्टांत दिया गया है। गर्भस्थ शिशु पूरी तरह आच्छादित रहता है और उसके जन्म के पूर्व उसे देखना संभव भी नहीं होता। यहाँ आवरण पूर्ण है और उसके दूर होने के लिये कुछ निश्चित काल की आवश्यकता होती है। इसी प्रकार तामसिक इच्छाओं से उत्पन्न बुद्धि पर के आवरण को हटाने के लिए जीव को विकास की सीढ़ी पर चढ़ते हुए दीर्घकाल तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है।इस प्रकार इन भिन्नभिन्न प्रकार की इच्छाओं से उत्पन्न विभिन्न तारतम्य में अनुभव में आने वाले आवरणों को स्पष्ट किया गया है।इस श्लोक में केवल सर्वनामों का उपयोग करके कहा गया है कि उसके द्वारा यह आवृत है। अब अगले श्लोक में इन दोनों सर्वनामों उसके द्वारा और यह को स्पष्ट किया गया है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.38।।तस्य शत्रुत्वं स्पष्टयति। यथा धूमेन सहजेनाप्रकाशात्मकेनाग्निः प्रकाशात्मको यथावाऽऽदर्शो मलेनाव्रियते यथोल्बेन गर्भवेष्टनेन जरायुणा गर्भ आच्छादितस्तथा तेन कामेनेदं ज्ञानमावृतम्। प्रथमदृष्टान्तेनात्मस्वरुपप्रकाशात्मकत्वं द्वितीयेन यथावद्विषयस्वरुपप्रतिभानात्मकत्वं तृतीयेनोहापोहात्मकत्वं ज्ञानस्यावृतिमिति बोध्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.38।।तस्य महापाप्मत्वेन वैरित्वमेव दृष्टान्तैः स्पष्टयति तत्र शरीरारम्भात्प्रागन्तःकरणस्यालब्धवृत्तिकत्वात्सूक्ष्मः कामः शरीरारम्भकेण कर्मणा स्थूलशरीरावच्छिन्ने लब्धवृत्तिकेऽन्तःकरणे कृताभिव्यक्तिः सन् स्थूलो भवति स एव विषयस्यचिन्त्यमानतावस्थायां पुनःपुनरुद्रिच्यमानः स्थूलतरो भवति स एव पुनर्विषयस्य भुज्यमानतावस्थायामत्यन्तोद्रेकं प्राप्तः स्थूलतमो भवति। तत्र प्रथमावस्थायां दृष्टान्तां यथा धूमेन सहजेनाप्रकाशात्मकेन प्रकाशात्मको वह्निराव्रियते। द्वितीयावस्थायां दृष्टान्तः यथादर्शो मलेनासहजेनादर्शोत्पत्त्यनन्तरमुद्रिक्तेन। चकारोऽवान्तरवैधर्म्यसूचनार्थः आव्रियत इति क्रियानुकर्षणार्थश्च। तृतीयावस्थायां दृष्टान्तः यथोल्बेन जरायुणा गर्भवेष्टनचर्मणातिस्थूलेन सर्वतो निरुध्यावृतः तथा प्रकारत्रयेणापि तेन कामेनेदमावृतम्। अत्र धूमेनावृतोऽपि बह्निर्दाहादिलक्षणं स्वकार्यं करोति। मलेनावृतस्त्वादर्शः प्रतिबिम्बग्रहणलक्षणं स्वकार्यं न करोति स्वच्छताधर्ममात्रतिरोधानात्। स्वरूपतस्तूपलभ्यतएव। उल्बेनावृतस्तु गर्भो न हस्तपादादिप्रसारणरूपं स्वकार्यं करोति न वा स्वरूपत उपलभ्यत इति विशेषः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.38।।अस्य वैरित्वमेव विवृणोति धूमेनेत्यादिना। उल्बेन गर्भवेष्टनेन जरायुणा। तेन कामेन इदं वक्ष्यमाणं ज्ञानमावृतम्। आवरणीयस्य त्रैविध्यात्तदनुगुणं दृष्टान्तत्रयं ज्ञेयम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.38।।यतोऽयं वैरी ततोऽस्य ज्ञानमावर्त्तयति तेन मोहो भवतीत्याह धूमेनेति त्रयेण। यथा धूमेन वह्निराव्रियते मलेन आदर्श आब्रियते उल्बेन गर्भावेष्टनेन गर्भ आवृतः तथा तेन कामेन इदं ज्ञानमावृतम्। अत्र दृष्टान्तेषु वह्न्यादित्रयनिरूपणस्यायं भावः पूर्वदृष्टान्तेन भगवत्तापात्मकं ज्ञानं व्यज्यते द्वितीयेन सेवायोग्यस्वस्वरूपप्राप्तिरूपं ज्ञानं व्यज्यते तृतीयेन बीजभावोत्पत्त्यात्मकज्ञानं व्यज्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.38।। कामस्य वैरित्वं दर्शयति धूमेनेति। यथा धूमेन सहजेन वह्निराव्रियत आच्छाद्यते यथा वाऽऽदर्शो मलेनागन्तुकेन यथा चोल्बेन गर्भवेष्टनचर्मणा गर्भः सर्वतो निरुध्यावृतः तथा प्रकारत्रयेणापि तेन कामेनावृतमिदम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.38।।कामस्य वैरित्वमाह धूमेनेति। आर्द्रेन्धनसंयोगजोपधिभूतेनैव सहजेन मलेनागन्तुकेन वा उल्बेन सर्वत आच्छादकेन गर्भवेष्टनचर्मणा गर्भ इवावृतं कामेन जगत्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.38।।यह काम किस प्रकार वैरी है सो दृष्टान्तोंसे समझाते हैं जैसे प्रकाशस्वरूप अग्नि अपने साथ उत्पन्न हुए अन्धकाररूप धूएँसे और दर्पण जैसे मलसे आच्छादित हो जाता है तथा जैसे गर्भ अपने आवरणरूप जेरसे आच्छादित होता है वैसे ही उस कामसे यह ( ज्ञान ) ढका हुआ है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.38।। व्याख्या धूमेनाव्रियते वह्निः जैसे धुएँसे अग्नि ढकी रहती है ऐसे ही कामनासे मनुष्यका विवेक ढका रहता है अर्थात् स्पष्ट प्रतीत नहीं होता।विवेक बुद्धिमें प्रकट होता है। बुद्धि तीन प्रकारकी होती है सात्त्विकी राजसी और तामसी। सात्त्विकी बुद्धिमें कर्तव्यअकर्तव्य ठीकठीक ज्ञान होता है राजसी बुद्धिमें कर्तव्यअकर्तव्यका ठीकठीक ज्ञान नहीं होता और तामसी बुद्धिमें सब वस्तुओंका विपरीत ज्ञान होता है (गीता 18। 30 32)। कामना उत्पन्न होनेपर सात्त्विकी बुद्धि भी धुएँसे अग्निके समान ढकी जाती है फिर राजसी और तामसी बुद्धिका तो कहना ही क्या हैसांसारिक इच्छा उत्पन्न होते ही पारमार्थिक मार्गमें धुआँ हो जाता है। अगर इस अवस्थामें सावधानी नहीं हुई तो कामना और अधिक बढ़ जाती है। कामना बढ़नेपर तो पारमार्थिक मार्गमें अँधेरा ही हो जाता है।उत्पत्ति विनाशशील जड वस्तुओंमें प्रियता महत्ता सुखरूपता सुन्दरता विशेषता आदि दीखनेके कारण ही उनकी कामना पैदा होती है। यह कामना ही मूलमें विवेकको ढकनेवाली है। अन्य शरीरोंकी अपेक्षा मनुष्यशरीरमें विवेक विशेषरूपसे प्रकट है किन्तु जड पदार्थोंकी कामनाके कारण वह विवेक काम नहीं करता। कामना उत्पन्न होते ही विवेक धुँधला हो जाता है। जैसे धुँएसे ढकी रहनेपर भी अग्नि काम कर सकती है ऐसे ही यदि साधक कामनाके पैदा होते ही सावधान हो जाय तो उसका विवेक काम कर सकता है।प्रथमावस्थामें ही कामनाको नष्ट करनेका सरल उपाय यह है कि कामना उत्पन्न होते ही साधक विचार करे कि हम जिस वस्तुकी कामना करते हैं वह वस्तु हमारे साथ सदा रहनेवाली नहीं है। वह वस्तु पहले भी हमारे साथ नहीं थी और बादमें भी हमारे साथ नहीं रहेगी तथा बीचमें भी उस वस्तुका हमारेसे निरन्तर वियोग हो रहा है। ऐसा विचार करनेसे कामना नहीं रहती।यथादर्शो मलेन च जैसे मैलसे ढक जानेपर दर्पणमें प्रतिबिम्ब दीखना बंद हो जाता है ऐसे ही कामनाका वेग बढ़नेपरमैं साधक हूँ मेरा यह कर्तव्य और यह अकर्तव्य है इसका ज्ञान नहीं रहता। अन्तःकरणमें नाशवान् वस्तुओंका महत्त्व ज्यादा हो जानेसे मनुष्य उन्हीं वस्तुओंके भोग और संग्रहकी कामना करने लगता है। यह कामना ज्योंज्यों बढ़ती है त्योंहीत्यों मनुष्यका पतन होता है।वास्तवमें महत्त्व वस्तुका नहीं प्रत्युत उसके उपयोगका
Chapter 3 (Part 24)
होता है। रुपये विद्या बल आदि स्वयं कोई महत्त्वकी वस्तुएँ नहीं हैं उनका सदुपयोग ही महत्त्वका है यह बात समझमें आ जानेपर फिर उनकी कामना नहीं रहती क्योंकि जितनी वस्तुएँ हमारे पासमें हैं उन्हींके सदुपयोगकी हमारेपर जिम्मेवारी है। उन वस्तुओंको भी सदुपयोगमें लगाना है फिर अधिककी कामनासे क्या होगा कारण कि कामनामात्रसे वस्तुएँ प्राप्त नहींहोतीं।सांसारिक वस्तुओंका महत्त्व ज्योंज्यों कम होगा त्योंहीत्यों परमात्माका महत्त्व साधकके अन्तःकरणमें बढ़ेगा। सांसारिक वस्तुओंका महत्त्व सर्वथा नष्ट होनेपर परमात्माका अनुभव हो जायगा और कामना सर्वथा नष्ट हो जायगी।यथोल्बेनावृतो गर्भः दर्पणपर मैल आनेसे उसमें अपना मुख तो नहीं दीखता परयह दर्पण है ऐसा ज्ञान तो रहता ही है। परन्तु जैसे जेरसे ढके गर्भका यह पता नहीं लगता कि लड़का है या लड़की ऐसी ही कामनाकी तृतीयावस्थामें कर्तव्यअकर्तव्यका पता नहीं लगता अर्थात् विवेक पूरी तरह ढक जाता है। विवेक ढक जानेसे कामनाका वेग बढ़ जाता है।कामनामें बाधा लगनेसे क्रोध उत्पन्न होता है। फिर उससे सम्मोह उत्पन्न होता है। सम्मोहसे बुद्धि नष्ट हो जाती है। बुद्धि नष्ट हो जानेपर मनुष्य करनेयोग्य कार्य नहीं करता और झूठ कपट बेईमानी अन्याय पाप अत्याचार आदि न करनेयोग्य कार्य करने लग जाता है। ऐसे लोगोंको भगवान्मनुष्य भी नहीं कहना चाहते। इसीलिये सोलहवें अध्यायमें जहाँ ऐसे लोगोंका वर्णन हुआ है वहाँ भगवान्ने (आठवेंसे अठारहवें श्लोकतक) मनुष्यवाचक कोई शब्द नहीं दिया। स्वर्गलोगकी कामनावाले लोगोंको भी भगवान्नेकामात्मानः (गीता 2। 43) कहा है क्योंकि ऐसे लोग कामनाके ही स्वरूप होते हैं। कामनामें ही तदाकार होनेसे उनका निश्चय होता है कि सांसारिक सुखसे बढ़कर और कुछ है ही नहीं (गीता 16। 11)।यद्यपि कामनाकी इस तृतीयावस्थामें मनुष्यकी दृष्टि अपने वास्तविक उद्देश्य (परमात्मप्राप्ति) की तरफ नहीं जाती तथापि किन्हीं पूर्वसंस्कारों से वर्तमानके किसी अच्छे सङ्गसे अथवा अन्य किसी कारणसे उसे अपने उद्देश्यकी जागृति हो जाय तो उसका कल्याण भी हो सकता है।तथा तेनेदमावृतम् इस श्लोकमें भगवान्ने एक कामके द्वारा विवेकको ढकनेके विषयमें तीन दृष्टान्त दिये हैं। अतः उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य यह है कि एक कामके द्वारा विवेक ढका जानेसे ही कामकी तीनों अवस्थाएँ प्रबुद्ध होती हैं।कामना उत्पन्न होनेपर उसकी ये तीन अवस्थाएँ सबके हृदयमें आती हैं। परन्तु जो मनुष्य कामनाको ही सुखका कारण मानकर उसका आश्रय लेते हैं और कामनाको त्याज्य नहीं मानते वे कामनाको पहचान ही नहीं पाते। परन्तु परमार्थमें रुचि रखनेवाले तथा साधन करनेवाले पुरुष इस कामनाको पहचान लेते हैं। जो कामनाको पहचान लेता है वही कामनाको नष्ट भी कर सकता है।भगवान्ने इस श्लोकमें कामनाकी तीन अवस्थाओंका वर्णन उसका नाश करनेके उद्देश्यसे ही किया है जिसकी आज्ञा उन्होंने आगे इकतालीसवें और तैंतालीसवें श्लोकमें दी है। वास्तवमें कामना उत्पन्न होनेके बाद उसके बढ़नेका क्रम इतनी तेजीसे होता है कि उसकी उपर्युक्त तीन अवस्थाओंको कहनेमें तो देर लगती है पर कामनाके बढ़नेमें कोई देर नहीं लगती। कामना बढ़नेपर तो अनर्थपरम्परा ही चल पड़ती है। सम्पूर्ण पाप सन्ताप दुःख आदि कामनाके कारण ही होते हैं। अतएव मनुष्यको चाहिये कि वह अपने विवेकको जाग्रत् रखकर कामनाको उत्पन्न ही न होने दे। यदि कामना उत्पन्न हो जाय तो भी उसे प्रथम या द्वितीयअवस्थामें ही नष्ट कर दे। उसे तृतीयावस्थामें तो कभी आने ही न दे।विशेष बात धुँआ दिखायी देनेसे यह सिद्ध हो जाता है कि वहाँ अग्नि है क्योंकि अगर वहाँ अग्नि न होती तो धुआँ कहाँ से आता अतः जिस प्रकार धुएँसे ढकी होनेपर भी अग्निके होनेका ज्ञान मैलसे ढका होनेपर भीदर्पणके होनेका ज्ञान और जेरसे ढका होनेपर भी गर्भके होनेका ज्ञान सभीमें रहता है उसी प्रकार कामसे ढका होनेपर भी विवेक (कर्तव्यअर्तव्यका ज्ञान) सभीमें रहता है पर कामनाके कारण वह उपयोगमें नहीं आता।शास्त्रोंके अनुसार परमात्माकी प्राप्तिमें तीन दोष बाधक हैं मल विक्षेप और आवरण। वे दोष असत् (संसार) के सम्बन्धसे उत्पन्न होते हैं। असत्का सम्बन्ध कामनासे होता है। अतः मूल दोष कामना ही है। कामनाका सर्वथा नाश होते ही असत्से सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। असत्से सम्बन्धविच्छेद होते ही सम्पूर्ण दोष मिट जाते हैं और विवेक प्रकट हो जाता है।परमात्मप्राप्तिमें मुख्य बाधा है सांसारिक पदार्थोंको नाशवान् मानते हुए उन्हें महत्त्व देना। जबतक अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका महत्त्व है और वे सत्य सुन्दर और सुखद प्रतीत होते हैं तभीतक मल विक्षेप और आवरण ये तीनों दोष रहते हैं। इन तीनोंमें भी मनदोषको अधिक बाधक माना जाता है। मलदोष(पाप) का मुख्य कारण कामना ही है क्योंकि कामनासे ही सब पाप होते हैं। जिस समय साधक यह दृढ़ निश्चय कर लेता है किमैं अब पाप नहीं करूँगा उसी समय सब दोषोंकी जड़ कट जाती है और मलदोष मिटने लग जाता है। सर्वथा निष्काम होनेपर मलदोष सर्वथा नष्ट हो जाता है।श्रीमद्भागवतमें भगवान्ने कामनावाले पुरुषोंके कल्याणका उपाय कर्मयोग (निष्कामकर्म) बताया है कर्मयोगस्तु कामिनाम् (11। 20। 7)। अतः कामनावाले पुरुषोंको अपने कल्याणके विषयमें निराश नहीं होना चाहिये क्योंकि जिसमें कामना आयी है वही निष्काम होगा। कर्मयोगके द्वारा कामनाओंका नाश सुगमतापूर्वक हो जाता है। छोटीसेछोटी अथवा बड़ीसेबड़ी प्रत्येक लौकिक या पारमार्थिक क्रिया करनेमेंमैं क्यों करता हूँ और कैसे करता हूँ ऐसी सावधानी हो जाय तो उद्देश्यकी जागृति हो जाती है। निरन्तर उद्देश्यपर दृष्टि रहनेसे अशुभकर्म तो होते नहीं और शुभकर्मोंको भी आसक्ति तथा फलेच्छाका त्याग करके करनेपर निष्कामताका अनुभव हो जाता है और मनुष्यका कल्याण हो जाता है।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.38।।धूमेनेति। दृष्टान्तत्रयेण दुरुपसर्गत्वम् (K दुरुपसर्पत्वम्) अकार्यकरत्वं जुगुप्सास्पदत्वं च उक्तम्। अयमिति आत्मा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.38।।उत्तरश्लोकमवतारयति कथमिति। अनेकदृष्टान्तोपादानं प्रतिपत्तिसौकर्यार्थम्। सहजस्य धूमस्य प्रकाशात्मकवह्निं प्रत्यावरकत्वसिद्ध्यर्थं विशिनष्टि अप्रकाशात्मकेनेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.38।।ननु प्रश्नस्योत्तरं जातं किमुत्तरेण इत्यतः श्लोकद्वयस्य सङ्गतिमाह कथमिति। स कामः कथं मोक्षस्य विरोधी इति जिज्ञासायामाह धूमेनेत्यादिनेति शेषः। विवक्षितार्थस्यास्फुटत्वात् व्याख्याति इदमिति। ईश्वरान्तःकरणजीवलक्षणं वस्तुत्रयम्। केन किमिव इत्याकाङ्क्षायामाद्यं पादत्रयं व्याचष्टे यथेति। परमात्मा कामेनावृतः स्वयं सर्वज्ञोऽप्यन्यैर्न ज्ञायत इति शेषः। अन्यस्य मुखादेः।परमात्मादेः इत्यादिपदेन जीवो गृह्यते। बन्धापेक्षयाऽऽवरणस्य समानकर्तृकत्वम्। बद्धः सङ्कुचितो व्यापाराक्षम इति यावत्। उल्बो गर्भवेष्टनम्। कामेनावृतो जीवो नेश्वरादिज्ञाने क्षम इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.38।।कथं विरोधी सः इदमनेनावृतम्। यथा धूमेनाग्निरावृतः प्रकाशरूपोऽप्यन्येषां न सम्यग्दर्शनाय तथा परमात्मा। यथाऽऽदर्शो मलेनावृतोऽन्याभिव्यक्तिहेतुर्न भवति तथाऽन्तःकरणं परमात्मादेर्व्यक्तिहेतुर्न भवति कामेनावृतम्। यथोल्बेनावृत्य बद्धो भवति गर्भः तथा कामेनावृतो जीवः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.38।।यथा धूमेन वह्निः आव्रियते यथा च आदर्शो मलेन यथा च उल्बेन आवृतो गर्भः तथा तेन कामेन इदं जन्तुजातम् आवृतम्।आवरणप्रकारम् आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.38।। धूमेन सहजेन आव्रियते वह्निः प्रकाशात्मकः अप्रकाशात्मकेन यथा वा आदर्शो मलेन च यथा उल्बेन च जरायुणा गर्भवेष्टनेन आवृतः आच्छादितः गर्भः तथा तेन इदम् आवृतम्।।किं पुनस्तत् इदंशब्दवाच्यं यत् कामेनावृतमित्युच्यते
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【 Verse 3.39 】
▸ Sanskrit Sloka: आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा | कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ||
▸ Transliteration: āvṛtaṁ jñānametena jñānino nityavairiṇā | kāmarūpeṇa kaunteya duṣpūreṇānalena ca ||
▸ Glossary: āvṛtaṁ: covered; jñānam: knowledge; etena: by this; jñāninaḥ: of the knower; nitya: eternal; vairiṇā: enemy; kāma: desire; rū peṇa: in the form of; kaunteya: O son of Kuntī; duṣpūreṇa: never satisfied; analena: by fire; ca: and
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.39 The knowledge of the knower is covered by this eternal enemy in the form of lust, which is never satisfied and burns like fire, O son of Kuntī
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.39।।और हे कुन्तीनन्दन इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकियोंके नित्य वैरी इस कामके द्वारा मनुष्यका विवेक ढका हुआ है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.39।। हे कौन्तेय अग्नि के समान जिसको तृप्त करना कठिन है ऐसे कामरूप ज्ञानी के इस नित्य शत्रु द्वारा ज्ञान आवृत है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.39 आवृतम् enveloped? ज्ञानम् wisdom? एतेन by this? ज्ञानिनः of the wise? नित्यवैरिणा by the constant enemy? कामरूपेण whose form is desire? कौन्तेय O Kaunteya? दुष्पूरेण unappeasable? अनलेन by fire? च and.Commentary Manu says? Desire can never be satiated or cooled down by the enjoyment ofobjects. But as fire blazes forth the more when fed with Ghee (melted butter) and wood? so it grows the more it feeds on the objects of enjoyment. If all the foodstuffs of the earth? all the precious metals? all the animals and all the beautiful women were to pass into the possession of one man endowed with desire? they would still fail to give him satisfaction.The ignorant man considers desire as his friend when he craves for objects. He welcomes desire for the gratification of the senses but the wise man knows from experience even before suffering the conseence that desire will bring only troubles and misery for him. So it is a constant enemy of the wise but not of the ignorant.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.39. O son of Kunti ! The knowledge of the wise is concealed by this eternal foe, which looks like a desired one, and which is the fire insatiable.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.39 It is the wise man's constant enemy; it tarnishes the face of wisdom. It is as insatiable as a flame of fire.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.39 The knowledge of the intelligent self is enveloped by this constant enemy, O Arjuna, which is of the nature of desire, and which is difficult to gratify and is insatiable.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.39 O son of Kunti, Knowledge is covered by this constant enemy of the wise in the form of desire, which is an insatiable fire.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.39 O Arjuna, wisdom is enveloped by this constant enemy of the wise in the form of desire, which is unappeasable as fire.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.39 Avrtam etc. Looks like a desired one : For it acts when there is desire. It is fire, because it is like fire impossible to satiate. For, it burns down both the visible and the invisible results [of rightious actions].
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.39 The knowledge, having the self for its subject, of this embodied person (the Jiva) whose nature is knowledge, is enveloped by this constant enemy in the shape of desire, which brings about attachment for sense-objects. This desire is difficult to satisfy, i.e., has for its object things unworthy of attainment and is insatiable, i.e., never attains satisfaction.
Now listen to what constitutes the instruments with which desire subdues the self. Sri Krsna goes on to expound this:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.39 Jnanam, Knowledge; is avrtam, covered; etena, by this; nityavairina, constant enemy; jnaninah, of the wise. For the wise person knows even earlier, 'I am being induced by this into evil.' And he always [Both at the time when desire arises in him, and also when he is forced to act by it.] feels distressed. Therefore, it is the constant enemy of the wise but not of a fool. For the fool looks upon desire as a friend so long as hankering lasts. When sorrow comes as a conseence, he realizes, 'I have been driven into sorrow because of longings', but certainly not earlier. Therefore it is the constant enemy of the wise alone. In what form? Kama-rupena, in the form of desire-tha which has wish itself as its expression is kama-rupa; in that form-; (and) duspurena, which is an insatiable; analena, fire. That which is difficult to satisfy is duspurah; and (derivatively) that which never has enough (alam) is analam. Again, having what as its abode does desire, in the form of a viel over Knowledge, become the enemy of all? Since when the abode of an enemy is known, it is possible to easily slay the enemy, therefore the Lord says:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.39।। यहाँ यह स्पष्ट किया गया है कि उस कामरूप शत्रु के द्वारा यह ज्ञान अर्थात् विवेक सार्मथ्य आच्छादित हो जाती है। आत्मानात्म नित्यानित्य और सत्यासत्य में जिस विवेक सार्मथ्य के कारण सब प्राणियों में मनुष्य को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है उसी बुद्धि की क्षमता को यह आवृत कर देता है। यह काम दुष्पूर अर्थात् इसका पूर्ण होना असम्भव ही होता है।अब भगवान् उस काम के निवास स्थान बताते हैं जिसके ज्ञान से शत्रु को नष्ट करना सरल होगा
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.39।।इदंशब्दवाच्यं दर्शयति आवृतमिति। एतेन कामेन ज्ञानं विवेकरुपमावृतं ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। ज्ञानी हि तदुत्पत्तिकालेऽपि जानात्यनेनाहमनर्थे नियोजित इति। तत आरभ्यैव दुःखी भवति। तेनासौ ज्ञानिनो नित्यवैरी नतु मूर्खस्य। स हि कामं तदुत्पत्तिकाले मित्रमिव पश्यन् तदानीमहमनेन दुःखे नियोजित इति न जानाति किंतु तत्कार्ये दुःखे प्राप्तेऽतस्तस्य नायं नित्यवैरी। केन रुपेण वैरीत्यत आह। कामः कामनेच्छैव रुपं यस्य तेन दुःखेन पूरणमस्य तेन। कुत इत्यत आह। नालं पर्याप्तिरस्य विद्यत इत्यनलः तेन। यो हि कदाचित्तृप्तिं गच्छति स पूरयितुं शक्यः अयं तु न तथेत्यर्थः। चकार उपमार्थः। अनलेन बह्निनेवेति व्याख्यानं तु सुगमत्वादाचार्यैरुपेक्षितम्। यत्तु ज्ञायतेनेनेति ज्ञानमन्तःकरणमिति तदुपेक्ष्यम्। ज्ञानविज्ञाननाशनमित्यनुरोधेनात्रापि विवेकज्ञानग्रहणस्यौचित्यात्। कौन्तेय इति संबोधयन् संबन्धिवियोगो मा भवत्वित्येवंरुपेण कामेनैवावृतज्ञानस्त्वमपि स्त्रीस्वभावे शोकमोहरुपे नियोजितोऽसीति ध्वनयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.39।।तथा तेनेदमावृतमिति संग्रहवाक्यं विवृणोति ज्ञायतेऽनेनेति ज्ञानमन्तःकरणं विवेकविज्ञानं वा इदंशब्दनिर्दिष्टमेतेन कामेनावृतं तथाप्यापाततः सुखहेतुत्वादुपादेयः स्यादित्यत आह ज्ञानिनो नित्यवैरिणा। अज्ञो हि विषयभोगकाले कामं मित्रमिव पश्यंस्तत्कार्ये दुःखे प्राप्ते वैरित्वं जानाति कामेनाहं दुःखित्वमापादित इति। ज्ञानी तु भोगकालेऽपि जानात्यनेनाहमनर्थे प्रवेशित इति अतोऽविवेकी दुःखी भवति भोगकाले च तत्परिणामे चानेनेति ज्ञानिनोऽसौ नित्यवैरीति सर्वथा तेन हन्तव्य एवेत्यर्थः। तर्हि किंस्वरूपोऽसावित्यत आह कामरूपेण काम इच्छा तृष्णा सैव रूपं यस्य तेन। हे कौन्तेयेति संबन्धाविष्कारेण प्रेमाणं सूचयति। ननु विवेकिना हातव्योऽप्यविवेकिनोपादेयः स्यादित्यत आह दुष्पूरेणानलेन च। चकार उपमार्थः। न विद्यतेऽलं पर्याप्तिर्यस्येत्यनलो वह्निः। स यथा हविषा पूरयितुमशक्यस्तथायमपि भोगेनेत्यर्थः। अतो निरन्तरं संतापहेतुत्वाद्विवेकिन इवाविवेकिनोऽपि हेय एवासौ। तथाच स्मृतिःन जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।। इति। अथवा इच्छाया विषयसिद्धिनिवर्त्यत्वादिच्छारूपः कामो विषयभोगेन स्वयमेव निवर्तिष्यते किं तत्रातिनिर्बन्धेनेत्यत उक्तं दुष्पूरेणानलेन चेति। विषयसिद्ध्या तत्कालमिच्छातिरोधानेऽपि पुनः प्रादुर्भावान्न विषयसिद्धिरिच्छानिवर्तिका किंतु विषयदोषदृष्टिरेव तथेति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.39।।आवृतमिति। ज्ञानमन्तःकरणसत्त्वम्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्सर्वं मन एव इति श्रुतेः। एतेन कामेन रजोगुणात्मकेनावृतम्। ज्ञानिनोऽन्तःकरणविशिष्टस्य प्रमातुः नित्यवैरिणा कामरूपेण दुष्पूरेण पूरयितुमयोग्येन। अयं हि पूर्यमाणोऽनर्थानेव प्रसवेत्। अनलेन अथापि पूर्यते चेत् अनलः नास्त्यलं पर्याप्तिर्यस्य स तथा तेनानलेन। न ह्यनलः काष्ठैस्तर्पयितुं शक्यः किंतु वर्धत एव तद्वदयमपीत्यर्थः। अयं भावः अन्तःकरणसत्वं हि वह्निवत्प्रकाशात्मकं तत्सहजेन कामेन वह्निरिव धूमेनावृतं चेत्प्रमातारमनर्थे पातयति। अन्यथा तदेव स्वभावशुद्धत्वाद्विवेकवैराग्योपगं भूत्वा तमुद्धरेत्। अतोऽयं कामो ज्ञानिनो नित्यवैरीति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.39।।हे कौन्तेय मूलतो भक्त मदुपदेशयोग्य ज्ञानिनो मदंशत्वेन स्वस्वरूपज्ञानवतो नित्यवैरिणा तेन कामेन ज्ञानमावृतं च पुनरनलेन रसपाचकेनोदरस्थेन तेनापि कामवृद्धिर्भवतीति कामरूपेण ज्ञानमावृतम्। कीदृशेनानलेन दुष्पूरेण दुःखेन पूरणं यस्य सः। अत एवजितं सर्वं जिते रसे इति वचनम्। कामस्यैव वा विशेषणम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.39।।इदंशब्दनिर्दिष्टं दर्शयन्वैरित्वं स्फुटयति आवृतमिति। इदं तु विवेकज्ञानमेतेनावृतम् अज्ञस्य खलु भोगसमये कामः सुखहेतुरेव परिणामे तु वैरितां प्रपद्यते। ज्ञानिनः पुनस्तत्कालमप्यनर्थानुसंधानाद्दुःखहेतुरेवेति नित्यवैरिणेत्युक्तम्। किंच विषयैः पूर्यमाणोऽपि दुःपूरोऽपूर्यमाणः शोकसंतापहेतुत्वादनलतुल्यः। अनेन सर्वान्प्रति नित्यवैरित्वमुक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.39।।एतच्छब्देन निर्दिष्टं दर्शयन् वैरित्वं स्फुटयति आवृतं ज्ञानमिति स्पष्टम्। अनलत्वं च शोकसन्तापहेतुत्वात्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.39।।जिसका ( उपर्युक्त श्लोकमें ) इदम् शब्दसे संकेत किया गया है जो कामसे आच्छादित है वह कौन है सो कहा जाता है ज्ञानीके ( विवेकीके ) इस कामरूप नित्य वैरीसे ज्ञान ढका हुआ है। ज्ञानी ही पहलेसे जानता है कि इसके द्वारा मैं अनर्थोंमें नियुक्त किया गया हूँ। इससे वह सदा दुखी भी होता है। इसलिये यह ज्ञानीका ही नित्य वैरी है मूर्खका नहीं क्योंकि वह मूर्ख तो तृष्णाके समय उसको मित्रके समान समझता है। फिर जब उसका परिणामरूप दुःख प्राप्त होता है तब समझता है कि तृष्णाके द्वारा मैं दुखी किया गया हूँ पहले नहीं जानता इसलिये यह काम ज्ञानीका ही नित्य वैरी है। कैसे कामके द्वारा ( ज्ञान आच्छादित है इसपर कहते हैं ) कामना इच्छा ही जिसका स्वरूप है जो अति कष्टसे पूर्ण होता है तथा जो अनल है भोगोंसे कभी भी तृप्त नहीं होता ऐसे कामनारूप वैरीद्वारा (ज्ञान आच्छादित है )।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.39।। व्याख्या एतेन सैंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने पाप करवानेमें मुख्य कारणकाम अर्थात् कामनाको बताया था। उसी कामनाके लिये यहाँ एतेन पद आया है।दुष्पूरेणानलेन च जैसे अग्निमें घीकी सुहातीसुहाती (अनुकूल) आहुति देते रहनेसे अग्नि कभी तृप्त नहीं होती प्रत्युत बढ़ती ही रहती है ऐसे ही कामनाके अनुकूल भोग भोगते रहनेसे कामना कभी तृप्त नहीं होती प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती ही रहती है (टिप्पणी प0 194)। जो भी वस्तु सामने आती रहती है कामना अग्निकी तरह उसे खाती रहती है।भोग और संग्रहकी कामना कभी पूरी होती ही नहीं। जितने ही भोगपदार्थ मिलते हैं उतनी ही उनकी भूख बढ़ती है। कारण कि कामना जडकी ही होती है इसलिये जडके सम्बन्धसे वह कभी मिटती नहीं प्रत्युत अधिकाधिक बढ़ती है। सुन्दरदासजी लिखते हैं जो दस बीस पचास सत होइ हजार तो लाख मँगैगी।कोटि अरब्ब खरब्ब असंख्य पृथ्वीपति होन की चाह जगैगी।।स्वर्ग पतालको राज करौ तृष्ना अघकी अति आग लगैगी।सुन्दर एक संतोष बिना सठ तेरी तो भूख कभी न भगैगी।।जैसे सौ रुपये मिलनेपर हजार रुपयोंकी भूख पैदा होती है तो इससे सिद्ध हुआ कि नौ सौ रुपयोंका घाटाहुआ है। हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे दस हजार रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है तो यह नौहजार रुपयोंका घाटा हुआ है। दस हजार रुपये मिलनेपर फिर सीधे एक लाख रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है तो यह नब्बे हजार रुपयोंका घाटा हुआ है। लाख रुपये मिलनेपर फिर दस लाख रुपयोंसे सन्तोष नहीं होता प्रत्युत सीधे करोड़ रुपयोंकी भूख पैदा हो जाती है तो सिद्ध हुआ कि निन्यानबे लाख रुपयोंका घाटा हुआ है। इस प्रकार वहम तो यह होता है कि लाभ बढ़ गया पर वास्तवमें घाटा ही बढ़ा है। जितना धन मिलता है उतनी ही दरिद्रता (धनकी भूख) बढ़ती है। वास्तवमें दरिद्रता उसकी मिटती है जिसे धनकी भूख नहीं है।चाह गयी चिन्ता मिटी मनुआँ बेपरवाह।जिनको कछू न चाहिये सो साहनपति साह।।वास्तवमें धन उतनी बाधक नहीं है जितनी बाधक उसकी कामना है। धनकी कामना चाहे धनीमें हो या निर्धनमें दोनोंको वह परमात्मप्राप्तिसे वञ्चित रखती है। कामना किसीकी भी कभी पूरी नहीं होती क्योंकि यह पूरी होनेवाली चीज ही नहीं है। कामनासे रहित तो कामनाके मिटनेपर ही हो सकते हैं।कामरूपेण जडके सम्बन्धसे होनेवाले सुखकी चाहकोकाम कहते हैं। नाशवान् संसारसे थोड़ी भी महत्त्वबुद्धिका होनाकाम है।अप्राप्तको प्राप्त करनेकी चाहकामना है। अन्तःकरणमें जो अनेक सूक्ष्म कामनाएँ दबी रहती हैं उनकोवासना कहते हैं। वस्तुओंकी आवश्यकता प्रतीत होनास्पृहा है। वस्तुमें उत्तमता और प्रियता दीखनाआसक्ति है। वस्तु मिलनेकी सम्भावना रखनाआशा है। और अधिक वस्तु मिल जाय यहलोभ यातृष्णा है। वस्तुकी इच्छा अधिक बढ़नेपरयाचना होती है। ये सभीकामके ही रूप हैं।ज्ञानिनो नित्यवैरिणा यहाँ ज्ञानिनः पद साधनमें लगे हुए विवेकशील साधकोंके लिये आया है। कारण कि विवेकशील साधक ही इस कामरूप वैरीको पहचानता है और उसका नाश करता है। साधन न करनेवाले दूसरे लोग तो उसे पहचानते ही नहीं प्रत्युत इसे सुखदायी समझते हैं।भगवान् कहते हैं कि यह काम विवेकशील साधकोंका नित्य वैरी है। कामना उत्पन्न होते ही विवेकशील साधकको विचार आता है कि अब कोईनकोई आफत आयेगी कामनामें संसारका महत्त्व और आश्रय रहता है जो पारमार्थिक मार्गमें महान् बाधक है। विवेकी साधकको कामना आरम्भसे ही चुभती रहती है। परिणाममें तो कामना सबको दुःख देती ही है। इसलिये यह साधककी नित्य (निरन्तर) वैरी है।भोगोंमें लगे हुए अज्ञानियोंको यह कामना मित्रके समान मालूम देती है क्योंकि कामनाके कारण ही भोगोंमें सुख प्रतीत होता है। कामना न हो तो भोगपदार्थ सुख नहीं दे सकते। परन्तु परिणाममें उन्हें दुःख सन्ताप कैद नरक आदि प्राप्ति होते ही हैं। इसलिये वास्तवमें यह कामना अज्ञानियोंकी भी नित्य वैरी है। परन्तु अज्ञानियोंको जागृति नहीं रहती जब कि विवेकशील साधकोंको जागृति रहती है।आवृतं ज्ञानम् विवेक प्राणिमात्रमें है। पशुपक्षी आदि मनुष्येतर योनियोंमें यह विवेक विकसित नहीं होता और केवल जीवननिर्वाहतक सीमित रहता है। परन्तु मनुष्यमें यदि कामना न हो तो यह विवेक विकसित हो सकता है क्योंकि कामनाके कारण ही मनुष्यका विवेक ढका रहता है। विवेक ढका रहनेसे मनुष्य अपने लक्ष्य परमात्मप्राप्तिकी ओर बढ़ नहीं सकता क्योंकि कामना उसे चिन्मयतत्त्वकी ओर नहीं जाने देती प्रत्युत जडतत्त्वमें ही लगाये रखती है।अपने प्रचि कोई अप्रिय एवं असत्य बोले तो वह बुरा लगता है और प्रिय एवं सत्य बोले तो अच्छा लगताहै। इसका अर्थ यह हुआ कि अच्छेबुरे सद्गुणदुर्गुण कर्तव्यअकर्तव्य आदिका ज्ञान अर्थात् विवेक सभी मनुष्योंमें रहता है। परन्तु ऐसा होनेपर भी वह अप्रिय और असत्य बोलता है अपने कर्तव्यका पालन नहीं करता तो इसका कारण यही है कि कामनाने उसका विवेक ढक दिया है।कामनाके कारण हीत्याग में सुख है यह ज्ञान काम नहीं करता। मनुष्यको प्रतीत तो ऐसा होता है कि अनुकूल भोगपदार्थके मिलनेसे सुख होता है पर वास्तवमें सुख उसके त्यागसे होता है। यह सभीका अनुभव है कि जाग्रत् और स्वप्नमें भोगपदार्थोंसे सम्बन्ध रहनेपर सुख और दुःख दोनों होते हैं पर सुषुप्ति(गाढ़ निद्रा) में भोगपदार्थोंकी किञ्चित् भी स्मृति न रहनेपर सुख ही होता है दुःख नहीं। इसलिये गाढ़ निद्रासे जागनेपर वह कहता है किमैं बड़े सुखसे सोया। इसके सिवाय जाग्रत् और स्वप्नसे थकावट आती है जब कि सुषुप्तिसे थकावट दूर होती है और ताजगी आती है। इससे सिद्ध होता है किभोगपदार्थोंके त्यागमें ही सुख है।धनकी कामना होते ही धन मनके द्वारा पकड़ा जाता है। जब बाहरसे धन प्राप्त हो जाता है तब मनसे पकड़े हुए धनका त्याग हो जाता है और सुखकी प्रतीति होती है। अतः वास्तवमें सुखकी प्रतीति बाहरसे धन मिलनेपर नहीं हुई प्रत्युत मनसे पकड़े हुए धनके त्यागसे ही हुई है है। यदि धनके मिलनेसे ही सुख होता तो उस धनके रहते हुए कभी दुःख नहीं आता परन्तु उस धनके रहते हुए भी दुःख आ जाता है।जब मनुष्य किसी वस्तुकी कामना करता है तब वह पराधीन हो जाता है। जैसे उसके मनमें घड़ीकी कामना पैदा हुई। कामना पैदा होते ही उसको घड़ीके अभावका दुःख होने लगता है तो यह घड़ीकी पराधीनता है। वह सोचता है कि यदि रुपये मिल जायँ तो अभी घड़ी खरीद लूँ अर्थात् रुपयोंके होनेसे अपनेको स्वाधीन और न होनेसे अपनेको पराधीन मानता है। यह मान्यता बिलकुल गलत है। वास्तवमें रुपये मिलनेपर घड़ीकी पराधीनता तो नहीं रही पर रुपयोंकी पराधीनता तो हो ही गयी क्योंकि रुपये भीपर हैंस्व नहीं। जैसे वस्तुकी कामना होनेसे वह वस्तुके पराधीन हुआ ऐसे ही रुपयोंकी कामना होनेसे रुपयोंके पराधीन हुआ। पराधीनता तो वैसीकीवैसी ही रही परन्तु कामनासे विवेक ढका जानेके कारण मनुष्यको वस्तुकी पराधीनताका तो अनुभव होता है पर रुपयोंकी पराधीनताका अनुभव नहीं होता प्रत्युत रुपयोंके कारण वह स्वाधीनताका अनुभव करता है। जो पराधीनता स्वाधीनताके रूपमें दिखायी देती है उस पराधीनतासे छूटना बड़ा कठिन होता है।संसारमात्र क्षणभङ्गुर है। शरीर धन जमीन मकान आदि जितनी भी सांसारिक वस्तुएँ हैं वे सबकेसब प्रतिक्षण विनाशकी ओर जा रही हैं और हमारेसे वियुक्त भी हो रही हैं। परन्तु भोग भोगते समय उनकी क्षणभङ्गुरताका ज्ञान नहीं रहता। पदार्थको नित्य और स्थिर माने बिना सुखभोग हो ही नहीं सकता। साधारण मनुष्योंकी बात ही क्या है साधक भी भोगोंको नित्य और स्थिर माननेपर ही उनमें फँसता है। इसका कारण कामनाद्वारा विवेक ढका जाना ही है।विशेष बात मनुष्यको सदाके लिये महान् बनानेके उद्देश्यसे भगवान् कामनाकोनित्यवैरी बताकर उससे बचनेके लिये सावधान करते हैं क्योंकि कामना ही सम्पूर्ण पापों और दुःखोंका कारण है। एक मनुष्य अपनी स्त्रीको ढूँढ रहा था। लोगोंने पूछा तुम्हारी स्त्रीका नाम क्या है उसने कहा फजीती। फिर पूछा कि तुम्हारा नाम क्या है उसने कहा बदमाश। लोगोंने कहा घबराओ मत बड़ी पतिव्रता स्त्री है अपनेआप आ जायगी कारण कि बदमाशको फजीती (बदनामी) अवश्य मिलती है। इसी प्रकार संसारके नाशवान् भोगोंकी कामना करनेवाले मनुष्यके पास दुःख अपनेआप आते हैं।मनुष्य दुःखोंसे तो बचना चाहता है पर दुःखोंके कारणकाम(कामना) को नहीं छोड़ता। कामनाके रहते हुए स्वप्नमें भी सुख नहीं मिलता काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं (मानस 7। 90। 1)। भगवान् अनलेन दुष्पूरेण पदोंसे यह बताते हैं कि भोगपदार्थोंसे कामना कभी पूरी नहीं होती। ज्योंज्यों भोगपदार्थ मिलते हैं त्योंहीत्यों उनकी कामना बढ़ती है और ज्योंज्यों कामना बढ़ती है त्योंहीत्यों अभावका अधिक अनुभव होता है एवं अभावको मिटानेके लिये मनुष्य पापकर्मोंमें प्रवृत्त होता है। जैसे धनकी कामना उत्पन्न होनेपर मनुष्य धनकी प्राप्तिमें न्यायअन्यायका विचार नहीं करता। फिर कामना बढ़नेपर (द्वितीयावस्थामें) वह चोरी डाके आदिमें भी लग जाता है। फिर और अधिक कामना बढ़नेपर (तृतीयावस्थामें) वह धनके लिये दूसरोंको जानेसे भी मार डालता है। इस प्रकार नाशवान् सुखकी कामना करनेवाला मनुष्य अपने लोक और परलोक दोनोंको महान् दुःखरूप बना लेता है। सम्बन्ध किसी शत्रुको नष्ट करनेके लिये उसके रहनेके स्थानोंकी जानकारी होनी आवश्यक है इसलिये भगवान् आगेके श्लोकमें ज्ञानियोंके नित्यवैरीकाम के रहनेके स्थान बताते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.39।।आवृतमिति। कामरूप इच्छायां यतश्चरति। अनलेन च अग्निनेव पूरयितुमशक्येन दृष्टादृष्टद्वयदाहकत्वात्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.39।।सामान्यतो निर्दिष्टं विशेषतो निर्देष्टुमाकाङ्क्षापूर्वकमनन्तरश्लोकमवतारयति किं पुनरिति। कामस्य ज्ञानं प्रत्यावरणसिद्ध्यर्थं ज्ञानिनो नित्यवैरिणेत्यादिविशेषणम्। प्रतीकमादाय व्याकरोति आवृतमित्यादिना। ज्ञानिनां प्रतिवैरित्वेऽपि नित्यवैरित्वं कामस्य कथमित्याशङ्क्याह ज्ञानी हीति। अनर्थप्राप्तिमन्तरेण कामस्य प्रसङ्गावस्था पूर्वमेवेत्युच्यते अतःशब्देन कामप्रसक्तिरेव परामृश्यते नित्यमेवेत्युत्पत्त्यवस्था कार्यावस्था च कामस्य कथ्यते। ननु सर्वस्यापि कामात्मता न प्रशस्तेति कामो नित्यवैरी भवति ततः कुतो ज्ञानिविशेषणमित्याशङ्क्याह नत्विति। अज्ञस्य नासौ नित्यवैरीत्येतदुपपादयति स हीति। कार्यप्राप्तिप्रागवस्था पूर्वमित्युक्ता अज्ञं प्रति वैरित्वे सत्यपि कामस्य नित्यवैरित्वाभावे फलितमाह अत इति। स्वरूपतो नित्यवैरित्वाविशेषेऽपि ज्ञानाज्ञानाभ्यामवान्तरभेदसिद्धिरित्यर्थः। आकाङ्क्षाद्वारा प्रकृतं वैरिणमेव स्फोरयति किंरूपेणेत्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.39।।एवं ज्ञेयज्ञानकरणज्ञातृप्रतिबन्धकत्वोक्त्या ज्ञानप्रतिबन्धकत्वमुक्तम्।आवृतं ज्ञानं इत्यनेन पुनः किमुच्यत इत्यत आह शास्त्रत इति। पूर्वं ज्ञानोत्पत्तिप्रतिबन्धकत्वमुक्तं इदानीं तु कथञ्चिज्जातमपि ज्ञानं न स्वकार्याय प्रभवतीत्युच्यते। अतो न पुनरुक्तिदोष इति भावः।कामकारेण चैके ब्र.सू.3।4।15 इति वचनात्। अपरोक्षज्ञानस्य मोक्षसाधने न केनापि प्रतिबन्ध इत्यत उक्तं शास्त्रत इति। परमात्मापारोक्ष्यायेति च। न प्रकाशते न प्रभवति। ज्ञानिन इति व्यर्थम्। ज्ञानस्य ज्ञानिसम्बन्धाव्यभिचारादित्यत आह ज्ञानिनोऽपीति शास्त्रजनितज्ञानवतोऽपि। अल्पज्ञानिनो गुरूपदेशमात्रजनितज्ञानवतः। अपरे तु ज्ञानिनो नित्यवैरिणा न मूर्खस्य। ज्ञानी हि विनाशयिष्यामि काममिति यतते मूर्खस्तु तमनुवर्तते इति वर्णयन्ति तदनेनैव निरस्तम्। अपकारित्वं खल्वत्र वैरित्वं विवक्षितं तच्च ज्ञान्यपेक्षया मूर्खेऽधिकं न हि मूर्खस्तं नानुसन्धत्त इत्येतावता तत्रास्ति।इच्छानुरूपं रूपं यस्यासौ कामरूपः इत्युच्यते। न चैतत्कामेऽन्तःकरणधर्मे सम्भवतीत्यत आह कामेति रूप्यतेऽनयेति रूपमाख्याऽत्र विवक्षितेत्यर्थः। तर्हि विशेषणपदमिदं जातं किमस्य विशेष्वं इत्यत आह नित्येति। यो न पूरयितुं शक्यः स दुष्पूरः। कामस्तु विषयसम्पादनेन पूरयितुं शक्यः। कथं दुष्पूरः इत्यतोऽन्यथा व्याचष्टे दुष्पूरेणेति। न नञर्थे दुःशब्दः किन्तु कृच्छ्रार्थ इत्यर्थः। तदुपपादयति न हीति। कामविषयोपलक्षणमेतत्। ननु प्रज्वलनात्मकत्वात्क्रोधोऽनलो युक्तः कामस्तु कथमनलः इत्यतः सोपपत्तिकमन्यथा व्याचष्टे यद्यपीति। इदमपि प्राप्तादधिकस्योपलक्षणम्। श्लोकद्वयार्थे प्रमाणसम्मतिमाह उक्तं चेति। कामकः कुत्सितकामो ज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमः। तथा बुद्धेरन्तःकरणस्यादर्शस्य मलम्। अथ जीवस्य गर्भस्योल्ब इति सर्वत्र गूढोपमाएतेनेदं इत्युक्तस्य विवरणं द्वितीयश्लोक इति व्याख्यानमपाकृतं भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.39।।शास्त्रतो जातमपि ज्ञानं परमात्मापारोक्ष्याय न प्रकाशते कामेनावृतं ज्ञानिनोऽपि किम्वल्पज्ञानिनः। कामरूपेण कामाख्येन नित्यवैरिणा दुष्पूरेण। दुःखेन हि कामः पूर्यते। न हीन्द्रादिपदं सुखेन लभ्यते। यद्यपीन्द्रादिपदं प्राप्तं पुनर्ब्रह्मादिपदमिच्छतीत्यलं बुद्धिर्नास्तीत्यनलः। उक्तं चज्ञानस्य ब्रह्मणश्चाग्नेर्धूमो बुद्धेर्मलं तथा। आदर्शस्याथ जीवस्य गर्भस्योल्बो हि कामकः इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.39।।अस्य जन्तोः ज्ञानिनो ज्ञानस्वभावस्य आत्मविषयं ज्ञानम् एतेन कामकारेण विषयव्यामोहजननेन नित्यवैरिणा आवृतं दुष्पूरेण पूर्त्यनर्हविषयेण अनलेन च पर्याप्तिरहितेन।कैः उपकरणैः अयं काम आत्मानम् अधितिष्ठति इति अत्र आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.39।। आवृतम् एतेन ज्ञानं ज्ञानिनः नित्यवैरिणा ज्ञानी हि जानाति अनेन अहमनर्थे प्रयुक्तः इति पूर्वमेव। दुःखी च भवति नित्यमेव। अतः असौ ज्ञानिनो नित्यवैरी न तु मूर्खस्य। स हि कामं तृष्णाकाले मित्रमिव पश्यन् तत्कार्ये दुःखे प्राप्ते जानाति तृष्णया अहं दुःखित्वमापादितः इति न पूर्वमेव। अतः ज्ञानिन एव नित्यवैरी। किंरूपेण कामरूपेण कामः इच्छैव रूपमस्य इति कामरूपः तेन दुष्पूरेण दुःखेन पूरणमस्य इति दुष्पूरः तेन अनलेन न अस्य अलं पर्याप्तिः विद्यते इत्यनलः तेन च।।किमधिष्ठानः पुनः कामः ज्ञानस्य आवरणत्वेन वैरी सर्वस्य लोकस्य इत्यपेक्षायामाह ज्ञाते हि शत्रोरधिष्ठाने सुखेन निबर्हणं कर्तुं शक्यत इति
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【 Verse 3.40 】
▸ Sanskrit Sloka: इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते | एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ||
▸ Transliteration: indriyāṇi mano buddhirasyādhiṣṭhānamucyate | etairvimohayatyeṣa jñānamāvṛtya dehinam ||
▸ Glossary: indriyāṇi: senses; manaḥ: mind; buddhiḥ: intelligence; asya: of; adhiṣṭhānaṁ: sitting place; ucyate: called; etaiḥ: by these; vimohayati: confuses; eṣaḥ: this; jñānaṁ: knowledge; āvṛtya: covering; dehinam: embodied being
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.40 The senses, the mind and the intelligence are the locations of this lust, which confuses the embodied being and covers the knowledge.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.40।।इन्द्रियाँ मन और बुद्धि इस कामके वासस्थान कहे गये हैं। यह काम इन(इन्द्रियाँ मन और बुद्धि) के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको मोहित करता है।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.40।। इन्द्रियाँ मन और बुद्धि इसके निवास स्थान कहे जाते हैं यह काम इनके द्वारा ही ज्ञान को आच्छादित करके देही पुरुष को मोहित करता है।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.40 इन्द्रियाणि the senses? मनः the mind? बुद्धिः the intellect? अस्य its? अधिष्ठानम् seat? उच्यते is called? एतैः by these? विमोहयति deludes? एषः this? ज्ञानम् wisdom? आवृत्य having enveloped? देहिनम् the embodied.Commentary If the abode of the enemy is known it is ite easy to kill him. So Lord Krishna like a wise army general points out to Arjuna the abode of desire so that he may be able to attack it and kill it ite readily.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.40. It basis is said to be the sense-organs, the mind and the intellect. With these it deludes the embodied by concealing knowledge.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.40 It works through the senses, the mind and the reason; and with their help destroys wisdom and confounds the soul.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.40 The senses, the mind and the intellect are said to be its instruments. By these it overpowers the embodied self after enveloping Its knowledge.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.40 The organs, mind, and the intellect are said to be its abode. This one diversely deludes the embodied being by veiling Knowledge with the help of these.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.40 The senses, the mind and the intellect are said to be its seat; through these it deludes the embodied by veiling his wisdom.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.40 Indriyani etc. In the beginning, it stands on the sense organs at work. For example, when an enemy is sighted with eyes, he generates wrath about himself at the very place of the perceiver's sense-organ, then in the mind i.e., fancy, then in the intellect, i.e., resolve; and producing delusion in this way, it destroys knowledge. [The Lord] speaks of the means for avoiding this foe as :
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.40 The senses, the mind and the intellect are the instruments of desire in so far as it overpowers the self through them. By means of these, viz., the senses, the mind and the intellect, which have been reduced to the position of servants through attachment to sense objects, desire deludes the embodied soul caught up in Prakrti by covering up Its knowledge. Here 'deluding' means making the self a victim of manifold illusions, by turning It away from the knowledge of Its true nature, and making It indulge in sensuous experiences.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.40 Indriyani, the organs; manah, mind; and buddhih, the intellect; ucyate, are said to be; asya, its, desire's; adhisthanam, abode. Esah, this one, desire; vimohayati, diversely deludes; dehinam, the embodied being; avrtya, by veiling; jnanam, Knowledg; etaih, with the help of these, with the organs etc. which are its abodes. [The activities of the organs etc. are the media for the expression of desire. Desire covers the Knoweldge of the Self by stimulating these.]
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.40।। मन की शान्ति और सन्तोष को लूट ले जाने वाले शत्रु काम के पहचाने जाने पर एक सैनिक के समान राजकुमार अर्जुन की अपने शत्रु के निवास स्थान के विषय में जानने की इच्छा थी। अध्यात्म के उपदेशक के रूप में भगवान् को यह बताना आवश्यक था कि यह काम कौन से स्थान पर रहकर अपनी अत्यन्त दुष्ट योजनाएँ बनाता है। कामना का निवास स्थान है इन्द्रियाँ मन और बुद्धि।बड़े विस्तृत क्षेत्र में अपराध करने वाले दस्यु दल के सरदार के एक से अधिक रहने के स्थान होते हैं जहाँ से वह पूरे दल का संचालन करता है। यहाँ भी कामनारूप शत्रु के स्थानों का स्पष्ट निर्देश किया गया है।बिना किसी नियन्त्रण एवं संयम के इन्द्रियां यदि विषयों में संचार करती हैं तो वे इच्छा के निवास के लिए प्रथम उपयुक्त स्थान हैं। इन्द्रियों के माध्यम से विषय की संवेदनाएँ मन में पहुंचने पर वह भी कामनाजन्य दुखों की उत्पत्ति के लिए उपयुक्त क्षेत्र का कार्य करता है। और अन्त में पूर्व विषयोपभोग की स्मृति से रंजित आसक्तियों से युक्त बुद्धि कामना का तीसरा सुरक्षित वासस्थान है।अविद्या से मोहित जीव शरीर के साथ तादात्म्य करके विषयोपभोग चाहता है। अविवेकपूर्वक मन और बुद्धि के साथ तादात्म्य करके भावनाओं एवं विचारों की सन्तुष्टि की वह इच्छा करता है।इन स्थानों पर इच्छा को खोजना माने शत्रु का सामना करना है। अन्त में शत्रु नाश कैसे करना है इसका वर्णन आगे के श्लोकों में किया गया है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.40।।सुखेन शत्रुं नाशयितुं तदधिष्ठानं किमित्यर्जुनाकाङ्क्षायामाह इन्द्रियाणीति। इन्द्रियादीन्यस्य कामस्याधिष्ठानमाश्रय उच्यते। एतैराश्रयैर्विवेकेज्ञानमावृत्य जीवं विधिधं मोहयति। यत्तु ज्ञानं चिदात्मकमिति तन्न उक्तयुक्तेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.40।।ज्ञाते हि शत्रोरधिष्ठाने सुखेन स जेतुं शक्यत इति तदधिष्ठानमाह इन्द्रियाणि शब्दस्पर्शरूपरसगन्धग्राहकाणि श्रोत्रादीनिं वचनादानगमनविसर्गानन्दजनकानि वागादीनि च मनः संकल्पात्मकं बुद्धिरध्यवसायात्मिका च अस्य कामस्याधिष्ठान्माश्रयं उच्यते। यत एत एतैरिन्द्रियादिभिः स्वस्वव्यापारवद्भिराश्रयैर्विमोहयति विविधं मोहयति। एष कामो ज्ञानं विवेकज्ञानमावृत्याच्छाद्य देहिनं देहाभिमानिनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.40।।किंच इन्द्रियाणीति। अयमर्थः इन्द्रियमनोबुद्धयो हि कामेनाधिष्ठिता बाह्यार्थप्रवणा भवन्ति। तैश्च तथाभूतैरयं कामो ज्ञानं चिदाकाशरूपमादर्शतलप्रख्यम्। यत्र योगिनो व्यवहितं विप्रकृष्टमतीतमनागतं वा पश्यन्ति। यथोक्तमाचार्यैःविश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतम्। पश्यन्त्यात्मनि इति निजान्तर्गतं शरीरान्तर्गतं आत्मनि हार्दाकाशाख्ये ब्रह्मणि तत् मलेनादर्शमिवावृत्य देहिनं देहाभिमानिनं विशेषेण मोहयति। विशब्दाद्देहाभिमानशून्यं योगिनमपि व्युत्थानावस्थायां किंचिन्मोहयतीति गम्यत इति। अक्षरयोजना स्पष्टा।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.40।।स कामः कुत्र तिष्ठतीति जिज्ञासार्थमाहुः इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि मनोऽन्तःकरणं बुद्धिर्ज्ञानमस्य कामस्याधिष्ठानं स्थानमुच्यते कथ्यते। एतैः करणभूतैर्ज्ञानमावृत्य एष कामो देहिनं विशेषेण मोहयति। स्वयं तु मोहयत्येव पुनरेतैः स्वाश्रयभूतैः सहितोऽधिकं मोहयतीत्युपसर्गेण व्यज्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.40।।इदानीं तस्याधिष्ठानं कथयञ्जयोपायमाह इन्द्रियाणीति द्वाभ्याम्। विषयदर्शनश्रवणादिभिः संकल्पेनाध्यवसायेन च कामस्याविर्भावादिन्द्रियाणि च मनश्च बुद्धिश्चास्याधिष्ठानमुच्यते। एतैरिन्द्रियादिभिर्दर्शनादिव्यापारवद्भिराश्रयभूतैर्विवेकज्ञानमावृत्य देहिनं विमोहयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.40 3.41।।अधुना तस्याधिष्ठानं वदन् जयोपायमाह इन्द्रियाणीति द्वाभ्याम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.40।।ज्ञानको आच्छादित करनेवाला होनेके कारण जो सबका वैरी है वह काम कहाँ रहनेवाला है अर्थात् उसका आश्रय क्या है क्योंकि शत्रुके रहनेका स्थान जान लेनेपर सहजमें ही उसका नाश किया जा सकता है। इसपर कहते हैं इन्द्रियाँ मन और बुद्धि यह सब इस कामके अधिष्ठान अर्थात् रहनेके स्थान बतलाये जाते हैं। यह काम इन आश्रयभूत इन्द्रियादिके द्वारा ज्ञानको आच्छादित करके इस जीवात्माको नाना प्रकारसे मोहित किया करता है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 3.40।। व्याख्या इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते काम पाँच स्थानोंमें दीखता है (1) पदार्थोंमें (गीता 3। 34) (2) इन्द्रियोंमें (3) मनमें (4) बुद्धिमें और (5) माने हुए अहम् (मैं) अर्थात् कर्तामें (गीता 2। 51)। इन पाँच स्थानोंमें दीखनेपर भी काम वास्तवमें माने हुएअहम् (चिज्जडग्रन्थि) में ही रहता है। परन्तु उपर्युक्त पाँच स्थानोंमें दिखायी देनेके कारण ही वे इस कामके वासस्थान कहे जाते हैं।समस्त क्रियाएँ शरीर इन्द्रियों मन और बुद्धिसे ही होती हैं। ये चारों कर्म करनेके साधन हैं। यदि इनमें काम रहता है तो वह परमार्थिक कर्म नहीं होने देता। इसलिये कर्मयोगी निष्काम निर्मम और अनासक्त होकर शरीर इन्द्रियों मन और बुद्धिके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करता है (गीता 5। 11)।वास्तवमें काम अहम्(जडचेतनके तादात्म्य) में ही रहता है। अहम् अर्थात्मैंपन केवल माना हुआ है। मैं अमुक वर्ण आश्रम सम्प्रदायवाला हूँ यह केवल मान्यता है। मान्यताके सिवाय इसका दूसरा कोई प्रमाण नहीं है। इस माने हुए सम्बन्धमें ही कामना रहती है। कामनासे ही सब पाप होते हैं। पाप तो फल भुगताकर नष्ट हो जाते हैं परअहम् से कामना दूर हुए बिना नयेनये पाप होते रहते हैं। इसलिये कामना ही जीवको बाँधनेवाली है। महाभारतमें कहा है कामबन्धनमेवैकं नान्यदस्तीह बन्धनम्।कामबन्धनमुक्तो हि ब्रह्मभूयाय कल्पते।। (शान्तिपर्व 251। 7)जगत्में कामना ही एकमात्र बन्धन है दूसरा कोई बन्धन नहीं है। जो कामनाके बन्धनसे छूट जाता है वह ब्रह्मभाव प्राप्त करनेमें समर्थ हो जाता है।एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् कामनाके कारण मनुष्यको जो करना चाहिये वह नहीं करता और जो नहीं करना चाहिये वह कर बैठता है। इस प्रकार कामना देहाभिमानी पुरुषको मोहित कर देती है।दूसरे अध्यायमें भगवान्ने कहा है कि कामनासे क्रोध उत्पन्न होता है कामात् क्रोधोऽभिजायते (2। 62) और क्रोधसे सम्मोह (अत्यन्त मूढ़भाव) उत्पन्न होता है क्रोधाद्भवति सम्मोहः (2। 63)। इससे यह समझना चाहिये कि कामनामें बाधा पहुँचनेपर तो क्रोध उत्पन्न होता है पर यदि कामनामें बाधा न पहुँचे तो कामनासे लोभ और लोभसे सम्मोह उत्पन्न होता है (टिप्पणी प0 197.1)। तात्पर्य यह कि कामनासे पदार्थन मिले तोक्रोध उत्पन्न होता है और पदार्थ मिले तोलोभ उत्पन्न होता है। उनसे फिरमोह उत्पन्न होता है। कामना रजोगुणका कार्य है और मोह तमोगुणका कार्य। रजोगुण और तमोगुण पासपास रहते हैं (टिप्पणी प0 197.2)। अतः काम क्रोध लोभ और मोह पासपास ही रहते हैं। काम इन्द्रियों मन और बुद्धिके द्वारा देहाभिमानी पुरुषको मोहित (बेहोश) कर देता है। इस प्रकारकाम रजोगुणका कार्य होते हुए भी तमोगुणका कार्यमोह हो जाता है।कामना उत्पन्न होनेपर मनुष्य पहले इन्द्रियोंसे भोग भोगनेकी कामना करता है। पहले तो भोगपदार्थ मिलते नहीं और मिल भी जायँ तो टिकते नहीं। इसलिये उन्हें किसी तरह प्राप्त करनेके लिये वह मनमें तरहतरहकी कामनाएँ करता है। बुद्धिमें उन्हें प्राप्त करनेके लिये तरहतरहके उपाय सोचता है। इस प्रकार कामना पहले इन्द्रियोंको संयोगजन्य सुखके प्रलोभनमें लगाती है। फिर इन्द्रियाँ मनको अपनी ओर खींचती हैं और उसके बाद इन्द्रियाँ और मन मिलकर बुद्धिको भी अपनी ओर खींच लेते हैं। इस तरह काम देहाभिमानीके ज्ञानको ढककर
Chapter 3 (Part 25)
इन्द्रियोँ मन और बुद्धिके द्वारा उसे मोहित कर देता है तथा उसे पतनके गड्ढेमें डाल देता है।यह सिद्धान्त है कि नौकर अच्छा हो पर मालिक तिरस्कारपूर्वक उसे निकाल दे तो फिर उसे अच्छा नौकर नहीं मिलेगा। ऐसे ही मालिक अच्छा हो पर नौकर उसका तिरस्कार कर दे तो फिर उसे अच्छा मालिक नहीं मिलेगा। इसी प्रकार मनुष्य परमात्मप्राप्ति किये बिना शरीरको सांसारिक भोग और संग्रहमें ही खो देता है तो फिर उसे मनुष्यशरीर नहीं मिलेगा। अच्छी वस्तुका तिरस्कार होता है अन्तःकरण अशुद्ध होनेसे और अन्तःकरण अशुद्ध होता है कामनासे। इसलिये सबसे पहले कामनाका नाश करना चाहिये।देहिनम् विमोहयति पदोंका तात्पर्य यह है कि यह काम देहाभिमानी पुरुषको ही मोहित करता है। शरीरकोमैं औरमेरा माननेवाला ही देहाभिमानी होता है। भगवान्ने अपने उपदेशके आरम्भमें ही देह (शरीर) और देही (शरीरी आत्मा) का विवेचन किया है (गीता 2। 11 30)। देह और देही दोनों अलगअलग हैं यह सबका अनुभव है। यह काम ज्ञानको ढककर देहाभिमानी(देहसे अपना सम्बन्ध माननेवाले) को बाँधता है देही(शुद्ध स्वरूप) को नहीं। जो देहके साथ अपना सम्बन्ध नहीं मानता उसे यह बाँध नहीं सकता। देहकोमैंमेरा औरमेरे लिये माननेसे ही मनुष्य उत्पत्तिविनाशशील जड वस्तुओंको महत्त्व देता है जिससे उसमें जडताका राग उत्पन्न हो जाता है। राग उत्पन्न होनेपर जडतासे सम्बन्ध हो जाता है। जडतासे सम्बन्ध होनेपर ही कामनाकी उत्पत्ति होती है। कामना उत्पन्न होनेपर जीव मोहित होकर संसारबन्धनमें बँध जाता है। सम्बन्ध अब आगेके तीन श्लोकोंमें भगवान् कामको मारनेका प्रकार बताते हुए उसे मारनेकी आज्ञा देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.40।।इन्द्रियाणीति। आदाविन्द्रियेषु व्यापृतेषु सत्सु तिष्ठति। यथा चक्षुषा शत्रुः दृष्टः इन्द्रियप्रदेशेएव क्रोधमात्मनो जनयति। ततो मनसि संकल्पे ततो बुद्धौ निश्चये एतद्द्वारेण मोहं जनयन् ज्ञानंनाशयति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.40।।कामस्य निराश्रयस्य कार्यकरकत्वाभावं मत्वा प्रश्नपूर्वकमाश्रयं दर्शयति किमधिष्ठान इति। कामस्य नित्यवैरित्वेन परिजिहीर्षितस्य किमित्यधिष्ठानं ज्ञाप्यते तत्राह ज्ञाते हीति। इन्द्रियादीनां कामाधिष्ठानत्वं प्रकटयति एतैरिति। नन्वेताभिरिति वक्तव्ये कथमेतैरित्युच्यते तत्राह इन्द्रियादिभिरिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.40 3.41।।इन्द्रियाणि इत्यादिकमपृष्टं किमर्थमुच्यत इत्यत आह वधार्थमिति। एतदर्थमेव ह्यर्जुनेन बलवान् पृष्टः क्रियाद्वयश्रवणात् किं प्रतीन्द्रियादीनां करणत्वमिति न प्रतीयते। सन्निधानाद्विमोहनं प्रतीत्यन्यथा च प्रतीयतेऽत आह एतैरिति। तदुपपादयति बुद्ध्यादिभिरिति। इन्द्रियादित्वेनोक्तानमपिबुद्ध्यादित्वेन ग्रहणं प्राधान्यज्ञापनार्थम्। तस्मात्त्वमितीन्द्रियाणां निग्रहः कामहननायोपदिश्यते। तदुपपादयति हृतेति। नश्यति नाशयितुं शक्यो भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.40 3.41।।वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह इन्द्रियाणीति। एतैर्ज्ञानमावृत्त्य बुद्ध्यादिभिर्हि विषयगैर्ज्ञानमावृतं भवति। हृताधिष्ठानो हि शत्रुर्नश्यति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.40।।अधितिष्ठति एभिः अयं कामः आत्मानम् इति इन्द्रियाणि मनो बुद्धिः अस्य अधिष्ठानम्। एतैः इन्द्रियमनोबुद्धिभिः कामाधिष्ठानभूतैः विषयप्रवणैः देहिनं प्रकृतिसंसृष्टं ज्ञानम् आवृत्य विमोहयति विविधं मोहयति आत्मज्ञानविमुखं विषयानुभवपरं करोति इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.40।। इन्द्रियाणि मनः बुद्धिश्च अस्य कामस्य अधिष्ठानम् आश्रयः उच्यते। एतैः इन्द्रियादिभिः आश्रयैः विमोहयति विविधं मोहयतिएष कामः ज्ञानम् आवृत्य आच्छाद्य देहिनं शरीरिणम्।।यतः एवम्
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【 Verse 3.41 】
▸ Sanskrit Sloka: तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ | पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ||
▸ Transliteration: tasmāttvamindriyāṇyādau niyamya bharatarṣabha | pāpmānaṁ prajahi hyenaṁ jñānavijñānanāśanam ||
▸ Glossary: tasmāt: therefore; tvam: you; indriyāṇi: senses; ādau: in the beginning; ni- yamya: by controlling; Bharata ṛṣabha: O chief amongst the descendants of Bhārata; pāpmānaṁ: symbol of sin; prajahi: curb; hi: certainly; enaṁ: this; jñāna: knowledge; vijñāna: consciousness; nāśanaṁ: destroyer
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.41 Therefore, O Bharataṛṣabha, chief amongst the descendants of Bhārata, in the very beginning, control the senses and curb
the symbol of sin, which is certainly the destroyer of knowl- edge and consciousness.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.41।।इसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.41।। इसलिये हे अर्जुन तुम पहले इन्द्रियों को वश में करके ज्ञान और विज्ञान के नाशक इस कामरूप पापी को नष्ट करो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.41 तस्मात् therefore? त्वम् you? इन्द्रियाणि the senses? आदौ in the beginning? नियम्य having controlled? भरतर्षभ O best of the Bharatas? पाप्मानम् the sinful? प्रजहि kill? हि surely? एनम् this? ज्ञानविज्ञाननाशनम् the destroyer of knowledge and realisation (wisdom).Commentary Jnana is knowledge obtained through the study of scriptures. This is indirect knowledge or Paroksha Jnana. Vijnana is direct knowledge or personal experience or Anubhava through Selfrealisation or Aparoksha Jnana. Control the senses first and then kill desire.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.41. Therefore, O best among the Bharatas, by controlling completely the sense-organs in the beginning [itself], you must avoid this sinful one, destroying the knowledge-action.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.41 Therefore, O Arjuna, first control thy senses and then slay desire, for it is full of sin, and is the destroyer of knowledge and of wisdom.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.41 Therefore, O Arjuna, controlling the senses in the very beginning, slay this sinful thing that destroys both knowledge and discrimination.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.41 Therefore, O scion of the Bharata dynasty, after first controlling the organs, renounce this one [A variant reading is, 'prajahi hi-enam, completely renounce this one'.-Tr.] which is sinful and a destroyer of learning and wisdom.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.41 Therefore, O best of the Bharatas (Arjuna), controlling the senses first, do thou kill this sinful thing, the destroyer of knowledge and realisation.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.41 Or the passage jnana-vijnana-nasana may be an adverb [modifying the verb 'must avoid'] meaning 'by destroying it i.e., by keeping it off by means of knowledge (thought) i.e., by means of the mind and by means of superior knowledge (superior thought) i.e., by means of the intellect.' The intention is this : One must not allow, in the fancy, [the wrath] risen in the sense-organs, and must not make any resolve about [the foe], fancied. The logic in this regard (in the above means) [ the Lords ] explains in a couple of verses:
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.41 For whatever reason a person engaged in Jnana Yoga, which is of the nature of abandoning the activities of all the senses, should control this enemy in the shape of desire which turns him away from the self through creating infatuation for objects of the senses - for the same reason, you, who are yoked to the activities of the senses by reason of being in conjunction with the Prakrti, should, in the beginning itself, i.e., at the very beginning of the practice of the means for release, control the senses by the practice of Karma Yoga, which provides for the regulation of the working of the senses. And then you must destroy, i.e., slay this sinful enemy, which is in the shape of desire and which destroys knowledge and discrimination, i.e., knowledge relating to the nature of the self and of the discriminative power, which is the means to gain this knowledge.
Sri Krsna speaks of that which is most important among the adversaries:
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.41 Since this is so, therefore, O scion of the Bharata dynasty, adau niyamya, after first controlling; indriyani, the organs; prajahihi, renounce; enam, this one, the enemy under consideration; which is papmanam, sinful-which is desire that is accustomed to sinning; and jnana-vijnana-nasanam, a destroyer of learning and wisdom, jnana, learning, means knowledge about the Self etc. from the scripures and a teacher. Vijnana, wisdom, means the full experience of that. Renounce, i.e. discard, from yourself the destroyer of those two-learning and wisdom, which are the means to the achievement Liberation. It has been said, 'After first controlling the organs, renounce desire the enemy'. As to that, by taking the support of what should one give up desire? This is being answered:
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.41।। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है श्रीकृष्ण बिना पर्याप्त तर्क दिये किसी सत्य का प्रतिपादन मात्र नहीं करते। अब वे यहाँ भी युक्तियुक्त विवेचन के पश्चात् इन्द्रियों को वश में करने का उपदेश देते हैं जिसके सम्पादन से अन्तकरण में स्थित कामना को नष्ट किया जा सकता है।इच्छा को यहाँ पापी कहने का कारण यह है कि वह अपने स्थूल रूप में हमें अत्यन्त निम्न स्तर के जीवन को जीने के लिए विवश कर देती है। धुएँ के समान सात्त्विक इच्छा होने पर भी हमारा शुद्ध अनन्तस्वरूप पूर्णरूप से प्रगट नहीं हो पाता। अत सभी प्रकार की इच्छाएँ कमअधिक मात्रा में पापयुक्त ही कही गयी हैं।चिकित्सक को किसी रोगी के लिए औषधि लिख देना सरल है परन्तु यदि वह औषधि आकाशपुष्प से बनायी जाती हो तो रोगी कभी स्वस्थ नहीं हो सकता इसी प्रकार गुरु का शिष्य को इन्द्रिय संयम का उपदेश देना तो सरल है परन्तु जब तक वे उसका कोई साधन नहीं बताते तब तक उनका उपदेश आकाश पुष्प से बनी औषधि के समान ही असम्भव समझा जायेगा।हम किस वस्तु का आश्रय लेकर इस इच्छा का त्याग करें इस प्रश्न का उत्तर है
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.41।।तस्मादिन्द्रिया दीनामाश्रयत्वात्त्वमिन्द्रियाणि पूर्वं कामनिरोधात्प्रागवस्थायां मोहनात्पूर्वमिति वा नियम्य वशीकृत्य पाप्मानं पापाचारं कामं प्रजहि आत्मनः सकाशात्परित्यज। कामस्य परित्याग एव मारणं नतु शस्त्रेण शिरश्छेदनम्। एवं जहि शत्रुमित्युपसंहारेऽपि परित्यजेत्येवार्थः। एतेन प्रजहि प्रकर्षेण जहि मारयेत भाष्यानुक्तं कैश्चिदुक्तं प्रत्युक्तम्। हि यस्माज्ज्ञानविज्ञाननाशनम्। अस्य विशेषणस्य हेतुगर्भस्य सूचयति हिशब्दः। तथाच यस्मादित्यस्याध्याहारोऽपि नापेक्षितः। एतेन हि प्रस्फुटमिति प्रत्युक्तम्। ज्ञानं शास्त्रत आचार्यतश्चात्मादीनामवबोधः विज्ञानं विशेषतः तदनुभवः तयोर्ज्ञानविज्ञानयोः श्रेयःप्राप्तिहेत्वोर्नाशनम्। येतु ज्ञानं आत्मविषयं विज्ञानं शास्त्रीयम्। यद्वा ज्ञानं शास्त्राचार्योपदेशजं विज्ञानं निदिध्यासनंविज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीति इति श्रुतेरिति वर्णयन्ति तेषां व्याख्याने प्रथमपक्षोऽरुचिग्रस्तः। अरूचिबीजं ज्ञानं विवेकज्ञानमिति पूर्वं स्वेन व्याख्यातम्। तच्चात्मविषयं शास्त्रीयमेवेति विज्ञानपदेन पौनरुक्त्यम्। द्वितीयस्तु विज्ञानं विशेषतस्तदनुभव इति भाष्यस्य निदिध्यासनपरत्वं व्याख्याय तदविरुद्धो बोध्यः। तेनेदमावृतं आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानमावृत्येत्यनुरोधेन नाशनमित्यस्यादर्शनसंपादकमित्यर्थः।णश अदर्शन इति स्मरणात्।ज्ञानविज्ञानयोरुत्पन्नयोरावरणात्मकाज्ञानबाधकत्वप्रसिद्य्धा विक्षेपात्मकाज्ञानेन कदाचित्प्रारब्धप्राबल्यादाभासरुपेणोत्पन्नस्य कामस्य तावत्कालज्ञानविज्ञाननाशनत्वमुपपद्यते। यद्वा मुमुक्षूणां मोक्षसाधनज्ञानविज्ञानप्राप्तये यतमानेनेन्द्रियाणि नियम्य ज्ञानविज्ञानावरकः कामो ह्यतव्य इति। तथाच नाशनमावरकमिति व्याख्यानेऽस्य सभ्यक्त्वेन घातकमित्यर्थभ्रान्त्या ज्ञानविज्ञाननाशासंभवशङ्कायास्तदुत्तरस्य चानव काशः। भरतैरप्ययं शत्रुः परित्यक्तः त्वं तु भरतर्षभ इति सूचयन्नाह भरतर्षभेति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.41।।यस्मादेवं तस्मात् यस्मादिन्द्रियाधिष्ठानः कामो देहिनं मोहयति तस्मात्त्व मादौमोहनात्पूर्वं कामनिरोधात्पूर्वमिति वा इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि नियम्य वशीकृत्य। तेषु हि वशीकृतेषु मनोबुद्ध्योरपि वशीकरणं सिध्यति। संकल्पाध्यवसाययोर्बाह्येन्द्रियप्रवृत्तिद्वारैवानर्थेहेतुत्वात्। अत इन्द्रियाणि मनोबुद्धिरिति पूर्वं पृथङ्निर्दिश्यापीहेन्द्रियाणीत्येतावदुक्तम्। इन्द्रियत्वेन तयोरपि संग्रहो वा। हे भरतर्षभ महावंशप्रसूतत्वेन समर्थोऽसि। पाप्मानं सर्वपापमूलभूतमेनं कामं वैरिणं प्रजहिहि परित्यज। हि स्फुटं प्रजहि प्रकर्षेण मारयेति वा। जहि शत्रुमित्युपसंहाराच्च ज्ञानं शास्त्राचार्योपदेशजं परोक्षं विज्ञानमपरोक्षं तत्फलं तयोर्ज्ञानविज्ञानयोः श्रेयःप्राप्तिहेत्वोर्नाशनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.41।।तस्मादिति। यस्मादिन्द्रियाण्यस्याधिष्ठानं सामान्तस्येव गिरिदुर्गादिकं तस्मात्तान्येव नियम्य वशीकृत्य एनं कामं हि निश्चयेन प्रजहि प्रकर्षेण नाशय। गिरिदुर्गादीन्स्वायत्तीकृत्येव तत्स्थं सामन्तं घ्नन्ति राजानस्तद्वत्। हन्तव्यत्वे हेतुः पाप्मानमत्युग्रम्। तत्रापि हेतुः ज्ञानविज्ञाननाशनमिति। ज्ञानस्य शास्त्राचार्योपदेशजस्य परोक्षस्य विज्ञानस्य निदिध्यासनपरिपाकजस्यापरोक्षस्य च नाशनम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.41।।एतैरङ्गभूतैः स मोहयति शत्रुस्तमेतन्निरोधेन जहिहीत्याह तस्मादिति। यस्मादिन्द्रियैरयं मोहयति तस्मादादौ त्वमिन्द्रियाणि तद्विषयेभ्यो नियम्य स्ववशे स्थापयित्वा हे भरतर्षभ एतन्नियमनसमर्थ ज्ञानविज्ञाननाशनं शास्त्रीयं भक्तिरूपं ज्ञानं विज्ञानं स्वरूपानुभवस्तयोर्नाशकर्त्तारं पाप्मानं पापरूपमेनमिदानीमपि मत्स्वरूपानुभवे विघ्नकर्त्तारं प्रजहिह्रि प्रकर्षेण जहिहि त्यज।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.41।। यस्मादेवं तस्मात्त्वमिति। आदौ विमोहात्पूर्वमेवेन्द्रियाणि मनो बुद्धिं च नियम्य पापरूपमेनं कामं हि स्फुटं प्रजहि घातय। यद्वा प्रजहिहि परित्यज। ज्ञानमात्मविषयम् विज्ञानं शास्त्रीयं तयोर्नाशकम्। यद्वा ज्ञानं शास्त्राचार्योपदेशजम् विज्ञानं निदिध्यासनजम्।तमेव धीरो विज्ञाय प्रज्ञां कुर्वीत इति श्रुतेः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.40 3.41।।अधुना तस्याधिष्ठानं वदन् जयोपायमाह इन्द्रियाणीति द्वाभ्याम्।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.41।।जब कि ऐसा है इसलिये हे भरतर्षभ तू पहले इन्द्रियोंको वशमें करके ज्ञान और विज्ञानके नाशक इस ऊपर बतलाये हुए वैरी पापाचारी कामका परित्याग कर। अभिप्राय यह कि शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे जो आत्माअनात्मा और विद्याअविद्या आदि पदार्थोंका बोध होता है उसका नाम ज्ञान है एवं उसका जो विशेषरूपसे अनुभव है उसका नाम विज्ञान है अपने कल्याणकी प्राप्तिके कारणरूप उन ज्ञान और विज्ञानको यह काम नष्ट करनेवाला है इसलिये इसका परित्याग कर।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.41।। व्याख्या तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ इन्द्रियोँको विषयोंमें भोगबुद्धिसे प्रवृत्त न होने देना अपितु केवल निर्वाहबुद्धिसे अथवा साधनबुद्धिसे प्रवृत्त होने देना ही उनको वशमें करना है। तात्पर्य है कि इन्द्रियोंकी विषयोंमें रागपूर्वक प्रवृत्ति न हो और द्वेषपूर्वक निवृत्ति न हो। (गीता 18। 10) रागपूर्वक प्रवृत्ति और द्वेषपूर्वक निवृत्ति होनेसे रागद्वेष पुष्ट हो जाते हैं और न चाहते हुए भी मनुष्यको पतनकी ओर ले जाते हैं। इसलिये प्रवृत्ति और निवृत्ति अथवा कर्तव्य और अकर्तव्यको जाननेके लिये शास्त्र ही प्रमाण है। (गीता 16। 24) शास्त्रके अनुसार कर्तव्यका पालन और अकर्तव्यका त्याग करनेसे इन्द्रियाँ वशमें हो जाती है।काम को मारनेके लिये सबसे पहले इन्द्रियोंका नियमन करनेके लिये कहनेका कारण यह है कि जबतक मनुष्य इन्द्रियोंके वशमें रहता है तबतक उसकी दृष्टि तत्त्वकी ओर नहीं जाती और तत्त्वकी ओर दृष्टि गये बिना अर्थात् तत्त्वका अनुभव हुए बिनाकाम का सर्वथा नाश नहीं होता।मनुष्यकी प्रवृत्ति इन्द्रियोंसे ही होती है। इसलिये वह सबसे पहले इन्द्रियोँके विषयोंमें ही फँसता है जिससे उसमें उन विषयोंकी कामना पैदा हो जाती है। कामनासहित कर्म करनेसे मनुष्य पूरी तरह इन्द्रियोंके वशमें हो जाता है और इससे उसका पतन हो जाता है। परन्तु जो मनुष्य इन्द्रियोँको वशमें करके निष्कामभावपूर्वक कर्तव्यकर्म करता है उनका शीघ्र ही उद्धार हो जाता है।एनम् ज्ञानविज्ञाननाशनम् ज्ञानपदका अर्थ शास्त्रीय ज्ञान भी लिया जाता है जैसे ब्राह्मणके स्वाभाविक कर्मोंके अन्तर्गत ज्ञानम् पद शास्त्रीय ज्ञानके लिये ही आया है। (गीता 18। 42)। परन्तु यहाँ प्रसङ्गके अनुसारज्ञान का अर्थ विवेक (कर्तव्यअकर्तव्यको अलगअलग जानना) लेना ही उचित प्रतीत होता है। विज्ञान पदका अर्थ विशेष ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान (अनुभवज्ञान असली ज्ञान या बोध) है।विवेक और तत्त्वज्ञान दोनों ही स्वतःसिद्ध हैं। तत्त्वज्ञानका अनुभव तो सबको नहीं है पर विवेकका अनुभव सभीको है। मनुष्यमें यह विवेक विशेषरूपसे है। अर्जुनके प्रश्न(मनुष्य न चाहता हुआ भी पाप क्यों करता है) में आये अनिच्छन्नपि पदसे भी यही सिद्ध होता है कि मनुष्यमें विवेक है और इस विवेकसे ही वह पाप और पुण्यदोनोंको जानता है और पाप नहीं करना चाहता। पाप न करनेकी इच्छा विवेकके बिना नहीं होती। परन्तु यहकाम उस विवेकको ढक देता है और उसको जाग्रत् नहीं होने देता।विवेक जाग्रत् होनेसे मनुष्य भविष्यपर अर्थात् परिणामपर दृष्टि रखकर ही सब कार्य करता है। परन्तु कामनासे विवेक ढक जानेके कारण परिणामकी ओर दृष्टि ही नहीं जाती। परिणामकी तरफ दृष्टि न जानेसे ही वह पाप करता है।इस प्रकार जिसका अनुभव सबको है उस विवेकको भी जब यहकाम जाग्रत् नहीं होने देता तब जिसका अनुभव सबको नहीं है उस तत्त्वज्ञानको तो जाग्रत् होने ही कैसे देगा इसलिये यहाँकाम को ज्ञान (विवेक) और विज्ञान (बोध) दोनोंका नाश करनेवाला बताया गया है।वास्तवमें यहकाम ज्ञान और विज्ञानका नाश (अभाव) नहीं करता प्रत्युत उन दोनोंको ढक देता है अर्थात् प्रकट नहीं होने देता। उन्हें ढक देनेको ही यहाँ उनका नाश करना कहा गया है। कारण कि ज्ञानविज्ञानका कभी नाश होता ही नहीं। नाश तो वास्तवमेंकाम का ही होता है। जिस प्रकार नेत्रोंके सामने बादल आनेपरबादलोंने सूर्यको ढक दिया ऐसा कहा जाता है पर वास्तवमें सूर्य नहीं ढका जाता प्रत्युत नेत्र ढके जाते हैं उसी प्रकारकामनाने ज्ञानविज्ञानको ढक दिया ऐसा कहा तो जाता है पर वास्तवमें ज्ञानविज्ञान ढके नहीं जाते प्रत्युत बुद्धि ढकी जाती है।पाप्मानं हि प्रजहि कामना सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है। इसलिये कामना उत्पन्न होनेसे पाप होनेकी सम्भावना रहती है। आगे चलकर कामना मनुष्यके विवेकको ढककर उसे अन्धा बना देती है जिससे उसे पापपुण्यका ज्ञान ही नहीं रहता और वह पापोंमें ही लग जाता है। इससे उसका महान् पतन हो जाता है। इसलिये भगवान् कामनाको महापापी बताकर उसे अवश्य ही मार डालनेकी आज्ञा देते हैं।गृहस्थजीवन ठीक नहीं साधु हो जायँ एकान्तमें चले जायँ ऐसा विचार करके मनुष्य कार्यको तो बदलना चाहता है पर कारणकामना को नहीं छोड़ता उसे छोड़नेका विचार ही नहीं करता। यदि वह कामनाको छोड़ दे तो उससे सब काम अपनेआप ठीक हो जायँ। जब मनुष्य जीनेकी कामना तथा अन्य कामनाओंको रखते हुए मरता है तब वे कामनाएँ उसके अगले जन्मका कारण बन जाती हैं। तात्पर्य यह है कि जबतक मनुष्यमें कामना रहती है तबतक वह जन्ममरणरूप बन्धनमें पड़ा रहता है। इस प्रकार बाँधनेके सिवाय कामना और कुछ काम नहीं आती।जब मनुष्यका जडपदार्थोंकी तरफ आकर्षण होता है तभी उनकी कामना उत्पन्न होती है। कामना उत्पन्न होते ही विवेकदृष्टि दब जाती है और इन्द्रियदृष्टिकी प्रधानता हो जाती है। इन्द्रियाँ मनुष्यको केवल शब्दादि विषयोंके सुखभोगमें ही लगाती हैं। पशुपक्षियोंकी भी प्रवृत्ति इन्द्रियोंसे मिलनेवाले सुखतक ही रहती है। परन्तु कामनासे विवेक ढक जानेके कारण मनुष्य इन्द्रियजन्य सुखके लिये पदार्थोंकी कामना करने लगता है और फिर पदार्थोंके लिये रुपयोंकी कामना करने लग जाता है। इतना ही नहीं उसकी दृष्टि रुपयोंसे भी हटकर रुपयोंकी गिनती(संग्रह) में हो जाती है। फिर वह रुपयोंकी गिनती बढ़ानेमें ही लग जाता है। निर्वाहमात्रके रुपयोंकी अपेक्षा उनका संग्रह अधिक पतन करनेवाला है और संग्रहकी अपेक्षा भी रुपयोंकी गिनती महान् पतन करनेवाली है। गिनती बढ़ानेके लिये वह झूठ कपट धोखा चोरी आदि पापकर्मोंको भी करने लग जाता है और गिनती बढ़नेपर उसमें अभिमान भी आ जाता है जो आसुरीसम्पत्तिका मूल है। इस प्रकार कामनाके कारण मनुष्य महान् पतनकी ओर चला जाता है। इसलिये भगवान् इस महान् पापी कामका अच्छी तरह नाश करनेकी आज्ञा देते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.41।।अस्य निवारणोपायमाह तस्मादिति। तस्मादादौ इन्द्रियाणि नियमयेत्। क्रोधादिकं इन्द्रियेषु प्रथमं न गृह्णीयात्। ज्ञानं ब्रह्मज्ञानं विज्ञानं च भगवन्मयीं क्रियां नाशयति यतः ( N K हि यतः) अतः (S omits अतः) पाप्मानं (S पापम्) क्रोधं त्यज। अथवा ज्ञानेन मनसा विज्ञानेन बुद्ध्या च नाशनं वारणं कृत्वा इति क्रियाविशेषणम्। इन्द्रियेषु उत्पन्नं संकल्पेन गृह्णीयात् संकल्पितं वा न निश्चिनुयात् इति तात्पर्यम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.41।।तेषां कामाश्रयत्वे सिद्धे साश्रयस्य तस्य परिहर्तव्यत्वमाह यत इति। तस्मादिन्द्रियादीनामाश्रयत्वादिति यावत् पूर्वं कामनिरोधात्प्रागवस्थायामित्यर्थः। तेषु नियमितेषु मनोबुद्ध्योर्नियमः सिध्यति तत्प्रवृत्तेरितरप्रवृत्तिव्यतिरेकेणाफलत्वादिति भावः। पापमूलतया कामस्य तच्छब्दवाच्यत्वमुन्नेयम्। कामस्य परित्याज्यत्वे वैरित्वं हेतुं साधयति ज्ञानेति। ज्ञानविज्ञानशब्दयोरर्थभेदमावेदयति ज्ञानमित्यादिना।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.40 3.41।।इन्द्रियाणि इत्यादिकमपृष्टं किमर्थमुच्यत इत्यत आह वधार्थमिति। एतदर्थमेव ह्यर्जुनेन बलवान् पृष्टः क्रियाद्वयश्रवणात् किं प्रतीन्द्रियादीनां करणत्वमिति न प्रतीयते। सन्निधानाद्विमोहनं प्रतीत्यन्यथा च प्रतीयतेऽत आह एतैरिति। तदुपपादयति बुद्ध्यादिभिरिति। इन्द्रियादित्वेनोक्तानमपि बुद्ध्यादित्वेन ग्रहणं प्राधान्यज्ञापनार्थम्। तस्मात्त्वमितीन्द्रियाणां निग्रहः कामहननायोपदिश्यते। तदुपपादयति हृतेति। नश्यति नाशयितुं शक्यो भवति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.40 3.41।।वधार्थं शत्रोरधिष्ठानमाह इन्द्रियाणीति। एतैर्ज्ञानमावृत्त्य बुद्ध्यादिभिर्हि विषयगैर्ज्ञानमावृतं भवति। हृताधिष्ठानो हि शत्रुर्नश्यति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.41।।यस्मात् सर्वेन्द्रियव्यापारोपरतिरूपे ज्ञानयोगे प्रवृत्तस्य अयं कामरूपः शत्रुः विषयाभिमुख्यकरणेन आत्मनि वैमुख्यं करोति तस्मात् प्रकृतिसंसृष्टतया इन्द्रियव्यापारप्रवृणः त्वम् आदौ मोक्षोपायारम्भसमये एव इन्द्रियव्यापाररूपे कर्मयोगे इन्द्रियाणि नियम्य एनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् आत्मस्वरूपविषयस्य ज्ञानस्य तद्विवेकविषयस्य च नाशनं पाप्मानं कामरूपं वैरिणं प्रजहि नाशय।ज्ञानविरोधिषु प्रधानम् आह
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.41।। तस्मात् त्वम् इन्द्रियाणि आदौ पूर्वमेव नियम्य वशीकृत्य भरतर्षभ पाप्मानं पापाचारं कामं प्रजहिहि परित्यज एनं प्रकृतं वैरिणं ज्ञानविज्ञाननाशनं ज्ञानं शास्त्रतः आचार्यतश्च आत्मादीनाम् अवबोधः विज्ञानं विशेषतः तदनुभवः तयोः ज्ञानविज्ञानयोः श्रेयःप्राप्तिहेत्वोः नाशनं नाशकरं प्रजहिहि आत्मनः परित्यजेत्यर्थः।।इन्द्रियाण्यादौ नियम्य कामं शत्रुं जहिहि इत्युक्तम् तत्र किमाश्रयः कामं जह्यात् इत्युच्यते
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【 Verse 3.42 】
▸ Sanskrit Sloka: इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्य: परं मन: | मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धे: परतस्तु स: ||
▸ Transliteration: indriyāṇi parāṇyāhurindriyebhyaḥ paraṁ manaḥ | manasastu parā buddhiryo buddheḥ paratastu saḥ ||
▸ Glossary: indriyāṇi: senses; parāṇi: superior; āhuḥ: is said; indriyebhyaḥ: more than the senses; paraṁ: superior; manaḥ: mind; manasaḥ: more than the mind; tu: also; parā: superior; buddhiḥ: intelligence; yaḥ: who; buddheḥ: more than intelligence; parataḥ: superior; tu: but; saḥ: he
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.42 It is said that the senses are superior to the body. The
mind is superior to the senses. The intelligence is still high- er than the mind and the consciousness is even higher than
intelligence.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.42 3.43।।इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर(काम) को जानकर अपने द्वारा अपनेआपको वशमें करके हे महाबाहो तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.42।। (शरीर से) परे (श्रेष्ठ) इन्द्रियाँ कही जाती हैं इन्द्रियों से परे मन है और मन से परे बुद्धि है और जो बुद्धि से भी परे है वह है आत्मा।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.42 इन्द्रियाणि the senses? पराणि superior? आहुः (they) say? इन्द्रियेभ्यः than the senses? परम् superior? मनः the mind? मनसः than the mind? तु but? परा superior? बुद्धिः intellect? यः who? बुद्धेः than the intellect? परतः greater? तु but? सः He.Commentary When compared with the physical body which is gross? external and limited? the senses are certainly superior as they are more subtle? internal and have a wider range of activity. The mind is superior to the senses? as the senses cannot do anything independently without the help of the mind. The mind can perform the functions of the five senses. The intellect is superior to the mind because it is endowed with the faculty of discrimination. When the mind is in a state of doubt? the intellect comes to its resuce. The Self? the Witness? is superior even to the intellect? as the intellect borrows its light from the Self.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.42. Different are the sense-organs [from their objects], they say; from the sense-organs different is the mind; from the mind too the intellect is different; what is different from the intellect is That (Self).
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.42 It is said that the senses are powerful. But beyond the senses is the mind, beyond the mind is the intellect, and beyond and greater than intellect is He.
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.42 The senses are high, they say: the mind is higher than the senses; the intellect is higher than the mind; but what is greater than intellect is that (desire).
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.42 They say that the organs are superior (to the gross body); the mind is superior to the organs; but the intellect is superior to the mind. However, the one who is superior to the intellect is He.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.42 They say that the senses are superior (to the body); superior to the senses is the mind; superior to the mind is the intellect; one who is superior even to the intellect is He (the Self).
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.42 See Comment under 3.43
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.42 The senses are called the important obstacles of knowledge, because when the senses keep operating on their objects, the knowledge of the self cannot arise. 'The mind is higher than the senses': even if the senses are withdrawn, if the Manas (mind) ruminates over sense objects, knowledge of the self cannot be had. 'The intellect (Buddhi) is greater than the mind', i.e., even if the mind is indifferent to sense objects, a perverted decision by the intellect can obstruct the dawn of the knowledge of the self. But even if all of them upto the intellect are ietened from their activity, still when desire, identified with will, originating from Rajas, is operating, it by itself obstructs the knowledge of the self by inducing the senses etc., to operate in their fields. Thus it is said here: 'But what is greater than intellect is that.' What is greater than the intellect - is desire. Such is the sense of the last sentence here.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.42 The learned ones ahuh, say; that indriyani, the five [Five sense-organs: of vision, hearning, taste, smell and touch; five motor-organs: hands, feet, speech, and for excretion and generation-these latter five are also understood in the present context.] organs-ear etc., are parani, superior, to the external, gross and limited body, from the point of view of subtlety, inner position, pervasiveness, etc. So also, manah, the mind, having the nature of thinking and doubting; [Sankalpa: will, volition, intention, thought, reflection, imangination, etc. vikalpa:doubt, uncertainly, indecision, suspicion, error, etc.-V.S.A.] is param, superior; indriyhyah, to the organs. Similarly, buddhih, the intellect, having the nature of determination; is para, superior; manasah, to the mind. And yah, the one who is innermost as compared with all the objects of perception ending with the intellect, and with regard to which Dweller in the body it has been said that desire, in association with its 'abodes' counting from the organs, deludes It by shrouding Knowledge; sah, that one; is tu, however; paratah, superior; buddheh, to the intellect- He, the supreme Self, is the witness of the intellect. [The portion, 'with regard to which Dweller৷৷.the supreme Self,' is translated from Ast. Which has the same reading here as the A.A. The G1. Pr. Makes the "abode'' counting from the organs' an adjective of 'the Dweller in the body', and omits the portion, 'is tu, however৷৷.buddheh, to the intellect'.-Tr.]
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.42।। तृतीय अध्याय के अन्तिम दो श्लोकों में व्यास जी ने उस परिपूर्ण साधना की ओर संकेत किया है जिसके अभ्यास से कोई भी साधक सफलतापूर्वक अपने शत्रु काम को खोजकर उसका नाश कर सकता है।यद्यपि भगवद्गीता के प्रारम्भ के अध्यायों में ही हम ध्यानविधि के विस्तृत विवेचन की अपेक्षा नहीं कर सकते फिर भी इन श्लोकों में भगवान् आत्मप्राप्ति के उपाय रूप ध्यानविधि की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं।बाह्य जगत् की वस्तुओं की तुलना में हमारे लिए अपनी इन्द्रियाँ अधिक महत्त्व की होती हैं। कर्मेन्द्रियों की अपेक्षा ज्ञानेन्द्रियाँ अधिक श्रेष्ठ और सूक्ष्म हैं। हमारा सबका अनुभव है कि मन ही इन्द्रियों को नियन्त्रित करता है अत यहाँ मन को इन्द्रियों से सूक्ष्म और परे कहा गया है।निसन्देह मन के विचरण का क्षेत्र पर्याप्त विस्तृत है फिर भी उसकी अपनी सीमाएँ हैं। एक ज्ञान के पश्चात् अन्य ज्ञान को प्राप्त कर हम अपने मन की सीमा बढ़ाते हैं और विजय के इस अभियान में बुद्धि ही सर्वप्रथम मन के वर्तमान ज्ञान की सीमा रेखा को पार करके उसके लिए ज्ञान के नये राज्यों को विजित करती है। इस दृष्टि से बुद्धि की व्यापकता और भी अधिक विस्तृत है इसलिए बुद्धि को मन से श्रेष्ठतर कहा गया है। जो बुद्धि के भी परे तत्त्व है उसे ही आत्मा कहते हैं।बुद्धिवृत्तियों को प्रकाशित करने वाला चैतन्य बुद्धि से भी सूक्ष्म होना ही चाहिये। उपनिषदों में कहा गया है कि इस चैतन्यस्वरूप आत्मा के परे और कुछ नहीं है। ध्यानसाधनामें शरीर मन और बुद्धि उपाधियों से अपने तादात्म्य को हटाकर आत्मस्वरूप में स्थित होने का सजग प्रयत्न किया जाता है। ये सभी प्रयत्न तब समाप्त हो जाते हैं जब सब मिथ्या वस्तुओं की ओर से अपना ध्यान हटाकर हम निर्विषय चैतन्यस्वरूप बनकर स्थित हो जाते हैं।भगवान् आगे कहते हैं
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.42।।इन्द्रियाण्यादौ नियम्य कामं वैरिणं जहिहीत्युक्तं तत्र किमाश्रयः कामं जह्यादित्यपेक्षायांरसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते इत्युक्तं स्मारयन्परं ज्ञापयति। इन्द्रियाणि श्रोत्रादिनि देहं स्थूलं बाह्यं परिच्छिन्नं चापेक्ष्य सौक्ष्भ्यान्तरस्थितत्वव्यापित्वाद्यपेक्षया पराणि पृकृष्टान्याहुः पण्डिता उक्तविवक्षया। नतु श्रुतयः साक्षादाहुःइन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था इति श्रुतावुक्तत्वात्। तथेन्द्रियेभ्यः परं मनः संकल्पविकल्पात्मकम्। मनसस्तु बुद्धिर्निश्चयात्मिका परा। बुद्धेः परतस्तु सः बुद्धेर्द्रष्टा परमात्माः यः सर्वदृश्येभ्यो बुद्य्घन्तेभ्यः आभ्यन्तरः यमिन्द्रियादिभिराश्रयैर्युक्तः कामो ज्ञानावरणद्वारा मोहयति। परतस्तु इत्युक्तिस्तुबुद्धेरात्मा महान्परः। महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः इति। श्रुत्यर्थसंग्रहार्था श्रुत्यनुसारेणेन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था इति वक्तव्येऽपि एवं भगवत उक्तिः सफला पूर्वपुरुषपरत्वप्रतिपादनायाः श्रुतेरफलार्थादिपरत्वाभिधाने तात्पर्याभावज्ञापनार्थेति मन्तव्यम्। तदुक्तंआध्यानाय प्रयोजनाभावात् आत्मशब्दाच्च इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.42।।ननु यथाकथंचिद्बाह्येन्द्रियनियमसंभवेप्यान्तरतृष्णात्यागोऽतिदुष्कर इति चेत्। न। रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तत इत्यत्र परदर्शनस्य रसाभिधानीयकतृष्णात्यागसाधनस्य प्रागुक्तेः। तर्हि कोऽसौ परो यद्दर्शनात्तृष्णानिवृत्तिरित्याशङ्क्य शुद्धमात्मानं परशब्दवाच्यं देहादिभ्यो विविच्य दर्शयति श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च स्थूलं जडं परिच्छिन्नं बाह्यं च देहमपेक्ष्य पराणि सूक्ष्मत्वात्प्रकाशकत्वाद्व्यापकत्वाह्यापकत्वादन्तःस्थत्वाच्च प्रकृष्टान्याहुः पण्डिताः श्रुतयो वा। तथेन्द्रियेभ्यः परं मनः संकल्पविकल्पात्मकं तत्प्रवर्तकत्वात्। तथा मनसस्तु परा बुद्धिरध्यवसायात्मिका। अध्यवसायो हि निश्चयस्तत्पूर्वकएव संकल्पादिर्मनोधर्मः। यस्तु बुद्धेः परतस्तद्भासकत्वेवनावस्थितः यं देहिनमिन्द्रियादिभिराश्रयैर्युक्तः कामो ज्ञानावरणद्वारा मोहयतीत्युक्तं स बुद्धेर्द्रष्टा पर आत्मास एष इह प्रविष्टः इतिवद्व्यवहितस्यापि देहिनस्तदा परामर्शः। अत्रार्थे श्रुतिःइन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थेभ्यश्च परं मनः। मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान्परः। महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः। पुरुषान्न परं किंचित्सा काष्ठा सा परा गतिः।। इति। अत्रात्मनः परत्वस्यैव वाक्यतात्पर्यविषयत्वादिन्द्रियादिपरत्वस्याविवक्षितत्वात्। इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था इति स्थानेऽर्थेभ्यः पराणीन्द्रियाणीति विवक्षाभेदेन भगवदुक्तं न विरुध्यते। बुद्धेरस्मदादिव्यष्टिबुद्धेः सकाशान्महानात्मा समष्टिबुद्धिरूपः परःमनो महान्मतिर्ब्रह्मा पूर्बूद्धिः ख्यातिरीश्वरः इति वायुपुराणवचनात्। महतो हैरण्यगर्भ्या बुद्धेः परमव्यक्तमव्याकृतं सर्वजगद्बीजं मायाख्यंमायां तु प्रकृतिं विद्यात् इति श्रुतेःतद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् इति च। अव्यक्तात्सकाशात्सकलजडवर्गप्रकाशकः पुरुषः पूर्ण आत्मापरः तस्मादपि कश्चिदन्यः परः स्यादित्यत आह पुरुषान्न परं किंचिदिति। कुत एवं। यस्मात् सा काष्ठा समाप्तिः। सर्वाधिष्ठानत्वात्सा परा गतिः।सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धा परा गतिरपि सैवेत्यर्थः। तदेतत्सर्वं यो बुद्धेः परतस्तु स इत्यनेनोक्तम्।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.42।।न केवलं बाह्येन्द्रियजयनैव कृतार्थत्वं किंतु मनोबुद्ध्योरपि जयः कर्तव्यः कामस्य समूलोच्छेदाय। त्रिप्राकारदुर्गस्थस्य सामन्तस्येवाभ्यन्तरप्राकारद्वयजयेन। अतो मनोबुद्ध्योर्जयार्थं योगं दर्शयति इन्द्रियाणीति। अत्र परत्वं सूक्ष्मत्वेन कारणत्वेन वा बोध्यम्। इन्द्रियाणि चक्षुरादीनि पराणि स्वविषयेभ्यः पृथिव्यादिस्वाश्रयसहितेभ्यो गन्धादिभ्यो वित्तपुत्रशरीरेभ्यश्च तेषां तत्कारणत्वात्। तथा च कौषीतकिनः समामनन्ति ब्राह्मणेप्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः इति। व्युच्चरन्तीत्यनुषज्ज्यते। प्राणेभ्य इन्द्रियेभ्यो देवास्तदधिष्ठात्र्यो देवता उत्पद्यन्ते देवेभ्यश्च लोका भूतभौतिका उत्पद्यन्त इति श्रुत्यर्थः।इन्द्रियेभ्यः परं मनःमनसा ह्येव पश्यति मनसा शृणोति इति श्रुतेरिन्द्रियाणां मनोविकारत्वात्। तेन बाह्यार्थेभ्य इन्द्रियाण्याकृष्य मनसि प्रविलापनीयानीति दर्शितम्। केवलं परत्वमात्रप्रतिपादने प्रयोजनाभावात्मनसस्तु परा बुद्धिःतस्माद्वाएतस्मान्मनोमयात् अन्योन्तर आत्मा विज्ञानमयः इति श्रुतेः। मनसः प्रविलापनं तत्कारणे बुद्धौ कर्तव्यमित्यर्थः। समष्टिबुद्धेरप्यत्रैवान्तर्भावः।यो बुद्धेः परतस्तु सः। यस्तु। तु शब्दो भास्यवर्गाद्बुद्ध्यादेर्भासकस्य ज्ञानस्य वैलक्षण्यं गमयति। यो बुद्धेरपि परतः स ज्ञानपदाभिधेयः कामेन उल्बेन गर्भ इव आवृत इति व्यवहितेन संबन्धः। तथा च श्रुतिःयच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञानमात्मनि। ज्ञानमात्मनि महति तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि इति। एतदुक्तं भवति वागादिबाह्येन्द्रियव्यापारमुत्सृज्य मनोमात्रेणावतिष्ठेत। मनोऽपि विषयविकल्पाभिमुखं ज्ञानात्मशब्दोदितायां बुद्धौ धारयेत्। तामपि महत्यात्मनि समष्टिबुद्धौ धारयेत्। ततं तं महान्तमात्मानं शान्ते निष्कले परस्मिञ्जयोतिषि प्रत्यगात्मनि धारयेदिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.42।।नन्विन्द्रियादीनां भगवत्स्वरूपादिविषयानुभावकानां नियमने किं फलं इत्यत आह इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणिअक्षण्वतां फलमिदं भाग.10।21।7 इति न्यायेन भगवत्स्वरूपदर्शनादिविषयानुभावकत्वेन पराण्युत्कृष्टान्याहुः। भक्ता इति शेषः। मनसोऽन्यत्र स्थितेन्द्रियैः संयुक्तंभगवत्स्वरूपं न फलरूपं मारणीयदैत्यादिभिरिवेतीन्द्रियेभ्यः परमुत्कृष्टं मन आहुः मनोऽपि कामनाद्यशुद्ध्या बुद्ध्या हतं सन्न फलं साधयत्यत आहुः मनसस्तु सकाशाद्बुद्धिः परा उत्कृष्टेत्यर्थः। अत्रायं भावः भगवान् लौकिकदेहेन्द्रियादिभिर्नानुभाव्यः। किन्त्वविकृतालौकिकभावात्मकात्मस्वरूपेण अतः स आत्मैवोत्तम इति भावः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.42।।अथात्र प्रसन्नतया चित्तप्रणिधानेनेन्द्रियाणि नियन्तुं शक्यन्ते तदात्मस्वरूपं देहादिभ्यो विविच्य दर्शयति इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणि देहादिभ्यो ग्राह्येभ्यः पराणि श्रेष्ठान्याहुः। सूक्ष्मत्वात्प्रकाशकत्वाच्च। अतएव तद्व्यतिरिक्तत्वमप्यर्थादुक्तं भवति। इन्द्रियेभ्यश्च संकल्पात्मकं मनः परम् तत्प्रवर्तकत्वात्। मनसस्तु बुद्धिर्निश्चयात्मिका परा निश्चयपूर्वकत्वात्संकल्पस्य। यस्तु बुद्धेः परः तत्साक्षित्वेनावस्थितः सर्वान्तरः स आत्मा विमोहयति देहिनमिति देहिशब्दोक्त आत्मा स इति परामृश्यते।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.42।।ज्ञानविरोधिषु प्रधानत्वेन निर्दिशन्नाह इन्द्रियाणीति। पराणीति अत्र परशब्दो बलवत्प्रतीपत्वसूचकः। यः कामो बुद्धेः परतः सर्वैरिति।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.42।।पहले इन्द्रियोंको वशमें करके कामरूप शत्रुका त्याग कर ऐसा कहा सो किसका आश्रय लेकर इसका त्याग करना चाहिये यह बतलाते हैं पण्डितजन बाह्य परिच्छिन्न और स्थूल देहकी अपेक्षा सूक्ष्म अन्तरस्थ और व्यापक आदि गुणोंसे युक्त होनेके कारण श्रोत्रादि पञ्च ज्ञानेन्द्रियोंको पर अर्थात् श्रेष्ठ कहते हैं। तथा इन्द्रियोंकी अपेक्षा संकल्पविकल्पात्मक मनको श्रेष्ठ कहते हैं और मनकी अपेक्षा निश्चयात्मिका बुद्धिको श्रेष्ठ बताते हैं। एवं जो बुद्धिपर्यन्त समस्त दृश्य पदार्थोंके अन्तरव्यापी है जिसके विषयमें कहा है कि उस आत्माको इन्द्रियादि आश्रयोंसे युक्त काम ज्ञानावरणद्वारा मोहित किया करता है वह बुद्धिका ( भी ) द्रष्टा परमात्मा ( सबसे श्रेष्ठ ) है।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.42।। व्याख्या इन्द्रियाणि पराण्याहुः शरीर अथवा विषयोंसे इन्द्रियाँ पर हैं। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका ज्ञान होता है पर विषयोंके द्वारा इन्द्रियोंका ज्ञान नहीं होता। इन्द्रियाँ विषयोंके बिना भी रहती हैं पर इन्द्रियोंके बिना विषयोंकी सत्ता सिद्ध नहीं होती। विषयोंमें यह सामर्थ्य नहीं कि वे इन्द्रियोंको प्रकाशित करें प्रत्युत इन्द्रियाँ विषयोंको प्रकाशित करती हैं। इन्द्रियाँ वही रहती हैं पर विषय बदलते रहते हैं। इन्द्रियाँ व्यापक हैं और विषय व्याप्य हैं अर्थात् विषय इन्द्रियोंके अन्तर्गत आते हैं पर इन्द्रियाँ विषयोंके अन्तर्गत नहीं आतीं। विषयोंकी अपेक्षा इन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं। इसलिये विषयोंकी अपेक्षा इन्द्रियाँ श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म हैं।इन्द्रियेभ्यः परं मनः इन्द्रियाँ मनको नहीं जानतीं पर मन सभी इन्द्रियोंको ही जानता है। इन्द्रियोंमें भी प्रत्येक इन्द्रिय अपनेअपने विषयको ही जानती है अन्य इन्द्रियोंके विषयोंको नहीं जैसे कान केवल शब्दको जानते हैं पर स्पर्श रूप रस और गंधको नहीं जानते त्वचा केवल स्पर्शको जानती है पर शब्द रूप रस और गन्धको नहीं जानती नेत्र केवल रूपको जानते हैं पर शब्द स्पर्श रस और गन्धको नहीं जानते रसना केवल रसको जानती है पर शब्द स्पर्श रूप और गन्धको नहीं जानती और नासिका केवल गन्धको जानती है पर शब्द स्पर्श रूप और रसको नहीं जानती परन्तु मन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा उनके विषयोंको जानता है। इसलिये मन इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म है।मनसस्तु परा बुद्धिः मन बुद्धिको नहीं जानता पर बुद्धि मनको जानती है। मन कैसा है शान्त है या व्याकुल ठीक है या बेठीक इत्यादि बातोंको बुद्धि जानती है। इन्द्रियाँ ठीक काम करती हैं या नहीं इसको भी बुद्धि जानती है तात्पर्य है कि बुद्धि मनको तथा उसके संकल्पोंको भी जानती है और इन्द्रियोँको तथा उनके विषयोंको भी जानती है। इसलिये इन्द्रियोँसे पर जो मन है उस मनसे भी बुद्धि पर (श्रेष्ठ बलवान् प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म) है।य बुद्धेः परतस्तु सः बुद्धिका स्वामीअहम् है इसलिये कहता है मेरी बुद्धि। बुद्धि करण है औरअहम् कर्ता है। करण परतन्त्र होता है पर कर्ता स्वतन्त्र होता है। उसअहम्में जो जडअंश है उसमेंकाम रहता है। जडअंशसे तादात्म्य होनेके कारण वह काम स्वरूप(चेतन) में रहता प्रतीत होता है।वास्तवमेंअहम्में हीकाम रहता है क्योंकि वही भोगोंकी इच्छा करता है और सुखदुःखका भोक्ता बनता है। भोक्ता भोग और भोग्य इन तीनोंमें सजातीयता (जातीय एकता) है। इनमें सजातीयता न हो तो भोक्तामें भोग्यकी कामना या आकर्षण हो ही नहीं सकता। भोक्तापनका जो प्रकाशक है जिसके प्रकाशमें भोक्ता भोग और भोग्य तीनोंकी सिद्धि होती है उस परम प्रकाशक(शुद्ध चेतन) मेंकाम नहीं है।अहम्तक सब प्रकृतिका अंश है। उसअहम् से भी आगे साक्षात् परमात्माका अंशस्वयं है जो शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि और अहम् इन सबका आश्रय आधार कारण और प्रेरक है तथा श्रेष्ठ बलवान् प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म है।जड(प्रकृति) का अंश ही सुखदुःखरूपमें परिणत होता है अर्थात् सुखदुःखरूप विकृति जडमें ही होती है। चेतनमें विकृति नहीं है प्रत्युत चेतन विकृतिका ज्ञाता है परन्तु जडसे तादात्म्य होनेसे सुखदुःखका भोक्ता चेतन ही बनता है अर्थात् चेतन ही सुखीदुःखी होता है। केवल जडमें सुखीदुःखी होना नहीं बनता। तात्पर्य यह है किअहम्में जो जडअंश है उसके साथ तादात्म्य कर लेनेसे चेतन भी अपनेकोमैं भोक्ता हूँ ऐसा मान लेता है। परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होते ही रसबुद्धि निवृत्त हो जाती है रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते (गीता 2। 51)। इसमें अस्य पद भोक्ता बने हुए अहम् का वाचक है और जो भोक्तापनसे निर्लिप्त तत्त्व है उस परमात्माका वाचक परम पद है। उसके ज्ञानसे रस अर्थात्काम निवृत्त हो जाता है। कारण कि सुखके लिये ही कामना होती है और स्वरूप सहजसुखराशि है। इसलिये परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसेकाम (संयोगजन्य सुखकी इच्छा) सर्वदा और सर्वथा मिट जाता है।मार्मिक बातस्थूलशरीरविषय है इन्द्रियाँबहिःकरण हैं और मनबुद्धिअन्तःकरण हैं। स्थूलशरीरसे इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म) हैं तथा इन्द्रियोंसे बुद्धि पर है। बुद्धिसे भी परअहम् है जो कर्ता है। उसअहम्(कर्ता) मेंकाम अर्थात् लौकिक इच्छा रहती है।अपनी
Chapter 3 (Part 26)
सत्ता (होनापन) अर्थात् अपना स्वरूप चेतन निर्विकार और सत्चित्आनन्दरूप है। जब वह जड(प्रकृतिजन्य शरीर) के साथ तादात्म्य कर लेता है तबअहम् उत्पन्न होता है और स्वरूपकर्ता बन जाता है। इस प्रकार कर्तामें एक जडअंश होता है और एक चेतनअंश। जडअंशकी मुख्यतासे संसारकी तरफ और चेतनअंशकी मुख्यतासे परमात्माकी तरफ आकर्षण होता है (टिप्पणी प0 201)। तात्पर्य यह है कि उसमें जडअंशकी प्रधानतासे लौकिक (संसारकी) इच्छाएँ रहती हैं और चेतनअंशकी प्रधानतासे पारमार्थिक (परमात्माकी) इच्छा रहती है। जडअंश मिटनेवाला है इसलिये लौकिक इच्छाएँ मिटनेवाली हैं और चेतनअंश सदा रहनेवाला है इसलिये पारमार्थिक इच्छा पूरी होनेवाली है। इसलिये लौकिक इच्छाओं(कामनाओं) की निवृत्ति और पारमार्थिक इच्छा(संसारसे छूटनेकी इच्छा स्वरूपबोधकी जिज्ञासा और भगवत्प्रेमकी अभिलाषा) की पूर्ति होती है लौकिक इच्छाएँ उत्पन्न हो सकती हैं पर टिक नहीं सकतीं। परन्तु पारमार्थिक इच्छा दब सकती है पर मिट नहीं सकती। कारण कि लौकिक इच्छाएँ अवास्तविक और पारमार्थिक इच्छा वास्तविक है। इसलिये साधकको न तो लौकिक इच्छाओँकी पूर्तिकी आशा रखनी चाहिये और न पारमार्थिक इच्छाकी पूर्तिसे निराश ही होना चाहिये।वस्तुतः मूलमें इच्छा एक ही है जो अपने अंशी परमात्माकी है। परन्तु जडके सम्बन्धसे इस इच्छाके दो भेद हो जाते हैं और मनुष्य अपनी वास्तविक इच्छाकी पूर्ति परिवर्तनशील जड(संसार) के द्वारा करनेके लिये जडपदार्थोंकी इच्छाएँ करने लगता है जो उसकी भूल है। कारण कि लौकिक इच्छाएँपरधर्म और पारमार्थिक इच्छास्वधर्म है। परन्तु साधकमें लौकिक और पारमार्थिक दोनों इच्छाएँ रहनेसे द्वन्द्व पैदा हो जाता है। द्वन्द्व होनेसे साधकमें भजन ध्यान सत्सङ्ग आदिके समय तो पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् रहती है पर अन्य समयमें उसकी पारमार्थिक इच्छा दब जाती है और लौकिक (भोग एवं संग्रहकी) इच्छाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। लौकिक इच्छाओंके रहते हुए साधकमें साधन करनेका एक निश्चय स्थिर नहीं रह सकता। पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् हुए बिना साधककी उन्नति नहीं होती। जब साधकका एकमात्र परमात्मप्राप्ति करनेका दृढ़ उद्देश्य हो जाता है तब यह द्वन्द्व मिट जाता है और साधकमें एक पारमार्थिक इच्छा ही प्रबल रह जाती है। एक ही पारमार्थिक इच्छा प्रबल रहनेसे साधक सुगमतापूर्वक परमात्मप्राप्ति कर लेता है (गीता 5। 3)। इसलिये लौकिक और पारमार्थिक इच्छाका द्वन्द्व मिटाना साधकके लिये बहुत आवश्यक है।शुद्ध स्वरूपमें अपने अंशी परमात्माकी ओर स्वतः एक आकर्षण या रुचि विद्यमान रहती है जिसकोप्रेम कहते हैं। जब वह संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है तब वहप्रेम दब जाता है औरकाम उत्पन्न हो जाता है। जबतककाम रहता है तबतकप्रेम जाग्रत् नहीं होता। जबतकप्रेम जाग्रत् नहीं होता तबतककाम का सर्वथा नाश नहीं होता। जडअंशकी मुख्यतासे जिसमें सांसारिक भोगोंकी इच्छा (काम) रहती है उसीमें चेतनअंशकी मुख्यतासे परमात्माकी इच्छा भी रहती है। अतः वास्तवमेंकाम का निवास जडअंशमें ही है पर वह भी चेतनके सम्बन्धसे ही है। चेतनका सम्बन्ध छूटते हीकाम का नाश हो जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि चेतनद्वारा जडसे सम्बन्धविच्छेद करते ही जडचेतनके तादात्म्यरूपअहम् का नाश हो जाता है औरअहम् का नाश होते हीकाम नष्ट हो जाता है।अहम् में जो जडअंश है उसमेंकाम रहता है इसकी प्रबल युक्ति यह है कि दृश्यरूपसे दीखनेवाला संसार उसे देखनेवाली इन्द्रियाँ तथा बुद्धि और उसे देखनेवाला स्वयं भोक्ता इन तीनोंमें जातीय (धातुगत) एकताके बिना भोक्ताका भोग्यकी ओर आकर्षण हो ही नहीं सकता। कारण कि आकर्षण सजातीयतामें ही होता है विजातीयतामें नहीं जैसे नेत्रोंका रूपके प्रति ही आकर्षण होता है शब्दके प्रति नहीं। यही बात सब इन्द्रियोंमें लागू होती है। बुद्धिका भी समझनेके विषय(विवेकविचार) में आकर्षण होता है शब्दादि विषयोंमें नहीं (यदि होता है तो इन्द्रियोंको साथमें लेनेसे ही होता है)। ऐसे ही स्वयं(चेतन) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है इसलियेस्वयंका परमात्माकी ओर आकर्षण होता है। यह तात्त्विक एकता जडअंशका सर्वथा त्याग करनेसे अर्थात् जडसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद करनेसे ही अनुभवमें आती है। अनुभवमें आते हीप्रेम जाग्रत् हो जाता है। प्रेममें जडता(असत्) का अंश भी शेष नहीं रहता अर्थात् जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है।प्रकृतिके कार्य महत्तत्त्व(समष्टि बुद्धि) का अत्यन्त सूक्ष्म अंशकारणशरीर हीअहम् का जडअंश है। इस कारणशरीरमें हीकाम रहता है। कारणशरीरके तादात्म्यसेकाम स्वयंमें दीखता है। तादात्म्य मिटनेपर जिसमेंकाम का लेश भी नहीं है ऐसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। स्वरूपका अनुभव हो जानेपरकाम सर्वथा निवृत्त हो जाता है।एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा पहले शरीरसे पर इन्द्रियाँ इन्द्रियोंसे पर मन मनसे पर बुद्धि और बुद्धिसे परकाम को बताया गया। अब उपर्युक्त पदोंमें बुद्धिसे परकाम को जाननेके लिये कहनेका अभिप्राय यह है कि यहकामअहममें रहता है। अपने वास्तविक स्वरूपमेंकाम नहीं है। यदि स्वरूपमेंकाम होता तो कभी मिटता नहीं। नाशवान् जडके साथ तादात्म्य कर लेनेसे हीकाम उत्पन्न होता है। तादात्म्यमें भीकाम रहता तो जडमें ही है पर दीखता है स्वरूपमें। इसलिये बुद्धिसे परे रहनेवाले इसकाम को जानकर उसका नाश कर देना चाहिये। संस्तभ्यात्मानमात्मना बुद्धिसे परेअहम् में रहनेवालेकामको मारनेका उपाय है अपने द्वारा अपनेआपको वशमें करना अर्थात् अपना सम्बन्ध केवल अपने शुद्ध स्वरूपके साथ अथवा अपने अंशी भगवान्के साथ रखना जो वास्तवमें है। छठे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें उद्धरेदात्मनात्मानम् पदसे और छठे श्लोकमें येनात्मैवात्मनाजितः पदोंसे भी यही बात कही गयी है।स्वरूप (स्वयं) साक्षात् परमात्माका अंश है और शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धि संसारके अंश हैं। जब स्वरूप अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर प्रकृति(संसार) के सम्मुख हो जाता है तब उसमें कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। कामनाएँ अभावसे उत्पन्न होती हैं और अभाव संसारके सम्बन्धसे होता है क्योंकि संसार अभावरूप ही है नासतो विद्यते भावः (गीता 2। 16)। संसारसे सम्बन्धविच्छेद होते ही कामनाओंका नाश हो जाता है क्योंकि स्वरूपमें अभाव नहीं है नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)।परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध माननेपर भी जीवकी वास्तविक इच्छा (आवश्यकता या भूख) अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी ही होती है।मैं सदा जीता रहूँ मैं सब कुछ जान जाऊँ मैं सदाके लिये सुखी हो जाऊँ इस रूपमें वह वास्तवमें सत्चित्आनन्दस्वरूप परमात्माकी ही इच्छा करता है पर संसारसे सम्बन्ध माननेके कारण वह भूलसे इन इच्छाओंको संसारसे ही पूरी करना चाहता है यहीकाम है। इसकामकी पूर्ति तो कभी हो ही नहीं सकती। इसलिये इसकामका नाश तो करना ही पड़ेगा।जिसने संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ा है वही उसे तोड़ भी सकता है। इसलिये भगवान्ने अपने द्वारा ही संसारसे अपना सम्बन्धविच्छेद करकेकाम को मारनेकी आज्ञा दी है।अपने द्वारा ही अपनेआपको वशमें करनेमें कोई अभ्यास नहीं है क्योंकि अभ्यास संसार(शरीर इन्द्रियाँ मन और बुद्धि) की सहायतासे ही होता है। इसलिये अभ्यासमें संसारके सम्बन्धकी सहायता लेनी पड़ती है। वास्तवमें अपने स्वरूपमें स्थिति अथवा परमात्माकी प्राप्ति संसारकी सहायतासे नहीं होती प्रत्युत संसारके त्याग(सम्बन्धविच्छेद) से अपनेआपसे होती है।मार्मिक बात जब चेतन अपना सम्बन्ध जडके साथ मान लेता है तब उसमें संसार(भोग) की भी इच्छा होती है और परमात्माकी भी। जडसे सम्बन्ध माननेपर जीवसे यही भूल होती है कि वह सत्चित्आनन्दस्वरूप परमात्माकी इच्छा अभिलाषाको संसारसे ही पूरी करनेके लिये सांसारिक पदार्थोंकी इच्छा करने लगता है। परिणामस्वरूप उसकी ये दोनों ही इच्छाएँ (स्वरूपबोधके बिना) कभी मिटती नहीं।संसारको जाननेके लिये अलग होना और परमात्माको जाननेके लिये परमात्मासे अभिन्न होना आवश्यक है क्योंकि वास्तवमेंस्वयं की संसारसे भिन्नता और परमात्मासे अभिन्नता है। परन्तु संसारकी इच्छा करनेसेस्वयं संसारसे अपनी अभिन्नता या समीपता मान लेता है जो कभी सम्भव नहीं और परमात्माकी इच्छा करनेसेस्वयं परमात्मासे अपनी भिन्नता या दूरी (विमुखता) मान लेता है पर इसकी सम्भावना ही नहीं। हाँ सांसारिक इच्छाओंको मिटानेके लिये पारमार्थिक इच्छा करना बहुत उपयोगी है। यदि पारमार्थिक इच्छा तीव्र हो जाय तो लौकिक इच्छाएँ स्वतः मिट जाती हैं। लौकिक इच्छाएँ सर्वथा मिटनेपर पारमार्थिक इच्छा पूरी हो जाती है अर्थात् नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है (टिप्पणी प0 203.1)। कारण कि वास्तवमें परमात्मा सदासर्वत्र विद्यमान है पर लौकिक इच्छाएँ रहनेसे उनका अनुभव नहीं होता।जहि शत्रुं महाबाहो कारूपँ दुरासदम् महाबाहो का अर्थ है बड़ी और बलवान् भुजाओंवाला अर्थात् शूरवीर। अर्जुनको महाबाहो अर्थात् शूरवीर कहकर भगवान् यह लक्ष्य कराते हैं कि तुम इसकामरूप शत्रुका दमन करनेमें समर्थ हो।संसारसे सम्बन्ध रखते हुएकाम का नाश करना बहुत कठिन है। यहकाम बड़ोंबड़ोंके भी विवेकको ढककर उन्हें कर्तव्यसे च्युत कर देता है जिससे उनका पतन हो जाता है। इसलिये भगवान्ने इसे दुर्जय शत्रु कहा है।काम को दुर्जय शत्रु कहनेका तात्पर्य इससे अधिक सावधान रहनेमें है इसे दुर्जय समझकर निराश होनेमें नहीं।किसी एक कामनाकी उत्पत्ति पूर्ति अपूर्ति और निवृत्ति होती है इसलिये मात्र कामनाएँ उत्पन्न और नष्ट होनेवाली हैं। परन्तुस्वयं निरन्तर रहता है और कामनाओंके उत्पन्न तथा नष्ट होनेको जानता है। अतः कामनाओंसे वह सुगमतापूर्वक सम्बन्धविच्छेद कर सकता है क्योंकि वास्तवमें सम्बन्ध है ही नहीं। इसलिये साधकको कामनाओंसे कभी घबराना नहीं चाहिये। यदि साधकका अपने कल्याणका पक्का उद्देश्य है (टिप्पणी प0 203.2) तो वहकामको सुगमतापूर्वक मार सकता है।कामनाओंके त्यागमें अथवा परमात्माके प्राप्तिमें सब स्वतन्त्र अधिकारी योग्य और समर्थ हैं। परन्तु कामनाओंकी पूर्तिमें कोई भी स्वतन्त्र अधिकारी योग्य और समर्थ नहीं है। कारण कि कामना पूरी होनेवाली है ही नहीं। परमात्माने मानवशरीर अपनी प्राप्तिके लिये ही दिया है। अतः कामनाका त्याग करना कठिन नहीं है। सांसारिक भोगपदार्थोंको महत्त्व देनेके कारण ही कामनाका त्याग कठिन मालूम देता है।सुख(अनुकूलता) की कामनाको मिटानेके लिये ही भगवान् समयसमयपर दुःख (प्रतिकूलता) भेजते हैं कि सुखकी कामना मत करो कामना करोगे तो दुःख पाना ही पड़ेगा। सांसारिक पदार्थोंकी कामनावाला मनुष्य दुःखसे कभी बच ही नहीं सकता यह नियम है क्योंकि संयोगजन्य भोग ही दुःखके हेतु हैं (गीता 5। 22)।स्वयं(स्वरूप) में अनन्त बल है। उसकी सत्ता ओर बलको पाकर ही बुद्धि मन और इन्द्रियाँ सत्तावान् एवं बलवान् होते हैं। परन्तु जडसे सम्बन्ध जोड़नेके कारण वह अपने बलको भूल रहा है और अपनेको बुद्धि मन और इन्द्रियोंके अधीन मान रहा है। अतएवकामरूप शत्रुको मारनेके लिये अपनेआपको जानना और अपने बलको पहचानना बड़ा आवश्यक है।काम जडके सम्बन्धसे और जडमें ही होता है। तादात्म्य होनेसे वह स्वयंमें प्रतीत होता है। जडका सम्बन्ध न रहे तोकाम है ही नहीं। इसलिये यहाँकाम को मारनेका तात्पर्य वस्तुतःकाम का सर्वथा अभाव बतानेमें ही है। इसके विपरीत यदिकाम अर्थात् कामनाकी सत्ताको मानकर उसे मिटानेकी चेष्टा करें तो कामनाका मिटना कठिन है। कारण कि वास्तवमें कामनाकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। कामना उत्पन्न होती है और उत्पन्न होनेवाली वस्तु नष्ट होगी ही यह नियम है। यही कामना न करें तो पहलेकी कामनाएँ अपनेआप नष्ट हो जायँगी। इसलिये कामनाको मिटानेका तात्पर्य है नयी कामना न करना।शरीरादि सांसारिक पदार्थोंकोमैंमेरा औरमेरे लिये माननेसे ही अपनेआपमें कमीका अनुभव होता है पर मनुष्य भूलसे उस कमीकी पूर्ति भी सांसारिक पदार्थोंसे ही करना चाहता है। इसलिये वह उन पदार्थोंकी कामना करता है। परन्तु वास्तवमें आजतक सांसारिक पदार्थोंसे किसीकी भी कमीकी पूर्ति हुई नहीं होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। कारण कि स्वयं अविनाशी है और पदार्थ नाशवान् हैं। स्वयं अविनाशी होकर भी नाशवान्की कामना करनेसे लाभ तो कोई होता नहीं और हानि कोईसी भी बाकी रहती नहीं। इसलिये भगवान् कामनाको शत्रु बताते हुए उसे मार डालनेकी आज्ञा देते हैं।कर्मयोगके द्वारा इस कामनाका नाश सुगमतासे हो जाता है। कारण कि कर्मयोगका साधक संसारकी छोटीसेछोटी अथवा बड़ीसेबड़ी प्रत्येक क्रिया परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर दूसरोंके लिये ही करता है कामनाकी पूर्तिके लिये नहीं। वह प्रत्येक क्रिया निष्कामभावसे एवं दूसरोंके हित और सुखके लिये ही करता है अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। उसके पास जो समय समझ सामग्री और सामर्थ्य है वह सब अपनी नहीं है प्रत्युत मिली हुई है और बिछुड़ जायगी। इसलिये वह उसे अपनी कभी न मानकर निःस्वार्थभावसे (संसारकी ही मानकर) संसारकी ही सेवामें लगा देता है। उसे पूरीकीपूरी संसारकी सेवामेंलगा देता है अपने पास बचाकर नहीं रखता। अपना न माननेसे ही वह पूरीकीपूरी सेवामें लगती हैअन्यथा नहीं।कर्मयोगी अपने लिये कुछ करता ही नहीं अपने लिये कुछ चाहता ही नहीं और अपना कुछ मानता ही नहीं। इसलिये उसमें कामनाओंका नाश सुगमतापूर्वक हो जाता है। कामनाओंका सर्वथा नाश होनेपर उसके उद्देश्यकी पूर्ति हो जाती है और वह अपनेआपमें ही अपनेआपको पाकर कृतकृत्य ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी करना जानना और पाना शेष नहीं रहता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.42 3.43।।अत्र युक्तिं श्लोकद्वयेनाह (S omits श्लोकद्वयेन) इन्द्रियाणीति। एवमिति। यत इन्द्रियाणि शत्रुलक्षणात् विषयात् अन्यानि तेभ्यश्चान्यत् मनः तस्मादपि बुद्धेर्व्यतिरेकः बुद्धेरपि यस्यान्यस्वभावत्वं स आत्मा। एवमिन्द्रियोत्पन्नेन क्रोधेन कथं मनसः बुद्धेरात्मनो वा क्षोभ इति पर्यालोचयेत् इत्यर्थः।रहस्यविदां त्वयमाशयः (N ह्ययमाशयः) बुद्धेः यः परत्र वर्तते परोऽहंकारः सर्वमहम् इत्यभेदात्मा स खलु परमोऽभेदः। अत एव च परिपूर्णस्य खण्डनाभावात् न क्रोधादय उत्पद्यन्ते (S N उदयन्ते)। अतः परमहंकारं परमोत्साहं संविदात्मकं (K परोत्साहसंवि ) गृहीत्वा क्रोधमविद्यत्मानं शत्रु जहि इति।।।शिवम्।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.42।।पूर्वोक्तमनूद्य कामत्यागस्य दुष्करत्वं मन्वानो रसोऽप्यस्येत्यत्रोक्तमेव स्पष्टीकर्तुं प्रश्नपूर्वकं श्लोकान्तरमवतारयति इन्द्रियाणीत्यादिना। पञ्चेति ज्ञानेन्द्रियवत्कर्मेन्द्रियाण्यपि वागादीनि गृह्यन्ते। किमपेक्षया तेषां परत्वं तत्राह देहमिति। तथापि केन प्रकारेण परत्वं तदाह सौक्ष्म्येति। आदिशब्देन कारणत्वादि गृह्यते। इन्द्रियापेक्षया सूक्ष्मत्वादिना मनसः स्वरूपोक्तिपूर्वकं परत्वं कथयति तथेति। मनसि दर्शितं न्यायं बुद्धावतिदिशति तथा मनसस्त्विति। यो बुद्धेरित्यादि व्याचष्टे तथेत्यादिना। आत्मनोयथोक्तविशेषणस्याप्रकृतत्वमाशङ्क्याह यं देहिनमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.42।।इन्द्रियाणि पराणि इत्यस्य पूर्वेण सङ्गतिर्न दृश्यते अत आह शत्रुहनन इति।एवं बुद्धेः परं 3।43 इत्यनेन वक्तुं ज्ञानस्यात्रायुधत्वे प्रमाणमाह असङ्गेति। असङ्गं वैराग्यसहितम्। तराति पारं पारमतितर छन्दसि परेऽपि अष्टा.1।4।81 इति वचनात्। परत्वस्यावधिसापेक्षत्वात्कस्मादिन्द्रियाणि पराणि इत्यत आह शरीरादिति। सन्निधानादिति भावः। किं परत्वमन्यत्वं नेत्याह उत्कृष्टानीतिं।यो बुद्धेः परतस्तु सः इति परमात्मोच्यते तस्य बुद्धेः परत्वे महताऽऽत्मना साम्यं स्यादत आह न केवलमिति। काऽसौ श्रुतिर्यद्बलादध्याहारः इत्यत आह अव्यक्तादिति। अस्तु भगवानव्यक्तादपि कामादिजयार्थं बुद्धेः परत्वेनैव ज्ञातेनालं किं प्रमाणान्तरसिद्धाध्याहारेण इत्यत आह न चेति। कामादिजयो हि मुक्तिद्वारं न च मुक्तिरेकदेशज्ञानमात्रेण भवति। कुतः इत्यत आह सार्वत्रिकेति। तस्यान्यथाव्याख्यानेऽपि स्पष्टं प्रमाणमाह तथा चेति। सर्वत्रैवेति सम्बन्धः। वेदाद्यनुक्ता अपि भगवत्सम्प्रदायागतास्तैः सह तैः सहितम्। न च तत्रेत्युक्तमुपसंहरति तस्मादिति। मायावादी तुयो बुद्धेः परतस्तु सः इत्यनेन जीव उच्यत इत्याह तन्निराकरोति न चेति। कुतः इति चेत्।एवं बुद्धेः परं इत्येतज्ज्ञानस्य कामविनाशसाधनत्वोक्तेः। तस्याश्च भगवत्परिग्रहे घटनादन्यथाऽघटनादिति भावेनोभयत्र प्रमाणमाह रसोऽपीति। न चात्रेत्युक्तमुपसंहरति अत इति। भास्करस्तु कामोऽत्रोच्यत इत्याह तदतीव मंदं कामः सङ्कल्पः बृ.उ.1।5।3 इत्यादिश्रुतेः तस्य मनोधर्मस्य तत्परत्वानुपपत्तेः। पक्षद्वयेऽपिइन्द्रियाणि पराणि इत्यादिना तारतम्योक्तेर्न प्रयोजनमस्तीति।संस्तभ्यात्मानमात्मना 3।43 इत्यस्य जीवात्मानं परमात्मनैकीकृत्येतिव्याख्यानं शब्दबाह्यमित्याशयवानात्मशब्दद्वयं व्याख्याति आत्मानमिति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.42।।शत्रुहनने आयुधरूपं ज्ञानं वक्तुं ज्ञेयमाह इन्द्रियाणीति।असङ्गज्ञानासिमादाय तरातिपारं इति ह्युक्तम्। शरीरादिन्द्रियाणि पराणि उत्कृष्टानि। न केवलं बुद्धेः परः श्रुत्युक्तप्रकारेणाव्यक्तादपि अव्यक्तात्पुरुषः परः कठो.3।11 इति हि श्रुतिः। न च तत्र तत्रोक्तैकदेशज्ञानमात्रेण भवति मुक्तिः। सार्वत्रिकगुणोपसंहारो हि भगवता गुणोपसंहारपादेऽभिहितःआनन्दादयः प्रधानस्य ब्र.सू.3।3।11 इत्यादिना। तथा चान्यत्रअपौरुषेयवेदेषु विष्णुवेदेषु चैव हि। सर्वत्र ये गुणाः प्रोक्ताः सम्प्रदायागताश्च ये। सर्वैस्तैः सह विज्ञाय ये पश्यन्ति परं हरिम्। तेषामेव भवेन्मुक्तिर्नान्यथा तु कथञ्चन इति गारुडे। तस्मादव्यक्तादपि परत्वेन ज्ञेयः। न चात्र जीव उच्यतेरसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते 2।59 इत्युक्तत्वात्।अविज्ञाय परं मत्तो जयः कामस्य वै कुतः इति च। अतः परमात्मज्ञानमेवात्र विवक्षितम्। आत्मानं मनः।आत्मना बुद्ध्या।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.42।।ज्ञानविरोधे प्रधानानि इन्द्रियाणि आहुः यत इन्द्रियेषु विषयव्यापृतेषु आत्मनि ज्ञानं न प्रवर्तते इन्द्रियेभ्यः परं मनः इन्द्रियेषु उपरतेषु अपि मनसि विषयप्रवणे आत्मज्ञानं न संभवति। मनसः तु परा बुद्धिः मनसि विषयान्तरविमुखे अपि विपरीताध्यवसायप्रवृत्तायां बुद्धौ न आत्मज्ञानं प्रवर्तते। सर्वेषु बुद्धिपर्यन्तेषु उपरतेषु अपि इच्छापर्यायः कामो रजःसमुद्भवो वर्तते चेत् स एव एतानि इन्द्रियादीनि अपि स्वविषयेषु वर्तयित्वा आत्मज्ञानं निरुणद्धि तदिदम् उच्यते यो बुद्धेः परतः तु सः इति बुद्धेः अपि यः परः स काम इत्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.42।। इन्द्रियाणि श्रोत्रादीनि पञ्च देहं स्थूलं बाह्यं परिच्छिन्नं च अपेक्ष्य सौक्ष्म्यान्तरत्वव्यापित्वाद्यपेक्षया पराणि प्रकृष्टानि आहुः पण्डिताः। तथा इन्द्रियेभ्यः परं मनः संकल्पविकल्पात्मकम्। तथा मनसः तु परा बुद्धिः निश्चयात्मिका। तथा यः सर्वदृश्येभ्यः बुद्ध्यन्तेभ्यः आभ्यन्तरः यं देहिनम् इन्द्रियादिभिः आश्रयैः युक्तः कामः ज्ञानावरणद्वारेण मोहयति इत्युक्तम्। बुद्धेः परतस्तु सः सः बुद्धेः द्रष्टा परमात्मा।।ततः किम्
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【 Verse 3.43 】
▸ Sanskrit Sloka: एवं बुद्धे: परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना | जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ||
▸ Transliteration: evaṁ buddheḥ paraṁ buddhvā saṁstabhyātmānamātmanā | jahi śatruṁ māhābāho kāmarūpaṁ durāsadam ||
▸ Glossary: evaṁ: and; buddheḥ: of intelligence; paraṁ: superior; buddhvā: knowing; saṁstabhya: by steadying; ātmānaṁ: of the mind; ātmanā: by intelligence; jahi: conquer; śatruṁ: enemy; māhābāho: O mighty-armed one; kāma: lust; rūpaṁ: in the form of; durāsadaṁ: insatiable
▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 3.43 Knowing the Self to be superior to mind and intelligence, by steadying the mind by intelligence, conquer the insatiable enemy in the form of lust, O Mahābāho, mighty-armed one.
▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।3.42 3.43।।इन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर(काम) को जानकर अपने द्वारा अपनेआपको वशमें करके हे महाबाहो तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।3.43।। इस प्रकार बुद्धि से परे (शुद्ध) आत्मा को जानकर आत्मा (बुद्धि) के द्वारा आत्मा (मन) को वश में करके हे महाबाहो तुम इस दुर्जेय (दुरासदम्) कामरूप शत्रु को मारो।।
▸ English Commentary By Swami Sivananda: 3.43 एवम् thus? बुद्धेः than the intellect? परम् superior? बुद्ध्वा having known? संस्तभ्य restraining? आत्मानम् the self? आत्मना by the Self? जहि slay thou? शत्रुम् the enemy? महाबाहो O mightyarmed? कामरूपम् of the form of desire? दुरासदम् hard to coner.Commentary Restrain the lower self by the higher Self. Subdue the lower mind by the higher mind. It is difficult to coner desire because it is of a highly complex and incomprehensible nature. But a man of discrimination and dispassion who does constant and intense Sadhana can coner it ite easily. Desire is the ality of Rajas. If you increase the Sattvic ality in you? you can coner desire. Rajas cannot stand before Sattva.Even though desire is hard to coner? it is not impossible. The simple and direct method is to appeal to the Indwelling Presence (God) through prayer and Japa.Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the third discourse entitledThe Yoga of Action.
▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 3.43. Thus being conscious : 'That is different from the intellect'; and steadying the self with the self; kill the foe that is of the form of desire and that is hard to approach.
▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 3.43 Thus, O Mighty-in-Arms, knowing Him to be beyond the intellect and, by His help, subduing thy personal egotism, kill thine enemy, Desire, extremely difficult though it be."
▸ English Translation By Swami Adidevananda: 3.43 Thus, knowing that which is higher than the intellect and fixing the mind with the help of the intellect in Karma Yoga, O Arjuna, slay this enemy which wears the form of desire, and which is difficult to overcome.
▸ English Translation By Swami Gambirananda: 3.43 [The Ast, introdcues this verse with, 'Tatah kim, what follows from that?'-Tr.] Understanding the Self thus [Understanding৷৷.thus:that desires can be conered through the knowledge of the Self.] as superior to the intellect, and completely establishing (the Self) is spiritual absorption with the (help of) the mind, O mighty-armed one, vanish the enemy in the form of desire, which is difficult to subdue.
▸ English Translation By Swami Sivananda: 3.43 Thus knowing Him Who is superior to the intellect and restraining the self by the Self, slay thou, O mighty-armed Arjuna, the enemy in the form of desire, hard to coner.
▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 3.42-43 Indriyani etc. Evam etc. 'Because the sense-organs are different from the sense-objects that indicate the foe [in estion]; from them the mind is different; from that too different is the intellect; what is instrinsically different from the intellect also is the Self; so due to wrath, risen at the sense-organs, how can there be a disturbance in the mind, in the intellect or in the Self ?' Let one contemplate in this manner. This is what is meant here.
This is intention of the experts of the Rahasya [literature] : The Supreme I-consciousness viz., the awareness 'All I am', which remains beyond the intellect, and the essence of which allows no difference-that is indeed the highest identity. Therefore no furstration (or cut) can be for That which is complete all around; hence wrath etc., do not rise [in It]. Therefore, taking hold of the Supreme Energy which in essence is Consciousness, you must slay the foe, the wrath which is ignorance in essence.
▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 3.43 Thus, understanding desire, which is higher than even the intellect, to be the fore antagonistic to Jnana Yoga, and establishing the mind by means of the intellect in Karma Yoga, slay, i.e., destroy this foe, in the shape of desire which is difficult to overcome.
▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 3.43 Buddhva, understanding; atmanam, the Self; evam, thus; as param, superior; buddheh, to the intellect; and samstabhya, completely establishing; atmana, with the mind, i.e. establishing (the Self) fully in spiritual absorption with the help of your own purified mind; O mighty-armed one, jahi, vanish; this satrum, enemy; kama-rupam, in the form of desire; which is durasadam, difficult to subdue-which can be got hold of with great difficulty, it being possessed of many inscrutable characteristics.
▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।3.43।। इस श्लोक के साथ न केवल यह अध्याय समाप्त होता है किन्तु अर्जुन द्वारा मांगी गयी निश्चित सलाह भी इसमें दी गई है। आत्मानुभव रूप ज्ञान के द्वारा ही हम आत्मअज्ञान को नष्ट कर सकते हैं। अज्ञान का ही परिणाम है इच्छा जिसके निवास स्थान हैं इन्द्रियाँ मन और बुद्धि। ध्यान के अभ्यास से जब हम अपना ध्यान बाह्य विषय शरीर मन और बुद्धि से विलग करके स्वस्वरूप में स्थिर करते हैं तब इच्छा की जननी बुद्धि ही समाप्त हो जाती है।शरीर मन आदि उपाधियों के साथ जब तक हमारा तादात्म्य बना रहता है तब तक हम अपने शुद्ध दिव्य स्वरूप को पहचान ही नहीं पाते। इतना ही नहीं बल्कि सदैव दुखी बद्ध परिच्छिन्न अहंकार को ही अपना स्वरूप समझते हैं। स्वस्वरूप के वैभव का साक्षात् अनुभव कर लेने पर हम अपने मन को पूर्णतया वश में रख सकेंगे। गौतम बुद्ध के समान ज्ञानी पुरुष का मन किसी भी प्रकार उसके अन्तकरण में क्षोभ उत्पन्न नहीं कर सकता क्योंकि वह मन ज्ञानी पुरुष के पूर्ण नियन्त्रण में रहता है।यहाँ ध्यान देने की बात है कि गीता में प्रतिपादित तत्त्वज्ञान जीवन की विधेयात्मक संरचना करने की शिक्षा देता है न कि जीवन की सम्भावनाओं की उपेक्षा अथवा उनका नाश। कामना एक पीड़ादायक घाव है जिसको ठीक करने के लिए ज्ञानरूपी लेप का उपचार यहाँ बताया गया है। इस ज्ञान के उपयोग से सभी अन्तरबाह्य परिस्थितियों के स्वामी बनकर हम रह सकते हैं। जो इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है वही साधक ईश्वरीय पुरुष ऋषि या पैगम्बर कहलाता हैconclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगाशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुन संवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णर्जुन संवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीभगवद्गीतोपनिषद् का कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय समाप्त होता है।इस अध्याय का नाम है कर्मयोग। योग शब्द का अर्थ है आत्मविकास की साधना द्वारा अपर निकृष्ट वस्तु को पर और उत्कृष्ट वस्तु के साथ संयुक्त करना। जिस किसी साधना के द्वारा यह लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है उसे ही योग कहते हैं।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।3.43।।ततः किमित्याशङ्क्येन्द्रियादिसमाधानपूर्वकादात्मज्ञानात्कामजयो भवतीत्युपसंहरति एवमिति। आत्मना संस्कृतमनसा बुद्य्धा वा आत्मानं मनः सभ्यक्स्तम्भनं कृत्वा समाधाय बुद्धेः साक्षिभूतं ज्ञात्वा साक्षात्कृत्वा मूलोच्छेदेन कामरुपं दुरासदं दुर्विज्ञेयानकविशेषं शत्रुं जहि परित्यज। महाबाहो इति संबोधयन्मदुक्तमुपायं विना महाद्भिर्बाहुभिः बाह्यशत्रुवदयमजेय इति सूचयति। तदनेन तृतीयाध्यायेन साधनभूता कर्मनिष्ठा तु प्राधान्येनोक्ता। साध्या तु ज्ञाननिष्ठा गुणत्वेनेति विवेक्तव्यम्।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यबलास्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचितायां गीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां तृतीयोऽध्यायः।।3।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।3.43।।फलितमाह रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तत इत्यत्र यः परशब्देनोक्तस्तमेवंभूतं पूर्णमात्मानं बुद्धेः परं बुद्ध्वा साक्षात्कृत्य संस्तभ्य स्थिरीकृत्यात्मानं मनः आत्मना एतादृशनिश्चयात्मिकया बुद्ध्या जहि मारय शत्रुं सर्वपुरुषार्थशातनम्। हे महाबाहो महाबाहोर्हि शत्रुमारणं सुकरमिति योग्यं संबोधनम्। कामरूपं तृष्णारूपं दुरासदं दुःखेनासादनीयं दुर्विज्ञेयानेकविशेषमिति यत्नाधिक्याय विशेषणम्।।3।।उपायः कर्मनिष्ठात्र प्राधान्येनोपसंहृता। उपेया ज्ञाननिष्ठा तु तद्गुणत्वेनं कीर्तिता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।3.43।।योगफलमाह एवमिति। आत्मानं मनः हार्दाकाशेऽपि तत्स्थान्नित्यान्कामान्कामयानम्। श्रूयते हि दहरविद्यायां हार्दाकाशं प्रकृत्ययच्चास्येहास्ति यच्च नास्ति सर्वं तदत्र गत्वा विन्दते इति तत्रत्यानां कामानां सत्त्वम्। तेषां च सत्यत्वंत इमे सत्याः कामाः इति श्रुतेः। आत्मानं मनः आत्मना मनसैव बुद्ध्यैव वा संस्तभ्य निर्वृत्तिकं कृत्वा बुद्धेः परं परमात्मानं बुद्ध्वा समूलघातं कामरूपं शत्रुं शातयितारं जहि नाशय। हे महाबाहो इति संबोधयंस्तन्नाशे तव सामर्थ्यमस्तीति दर्शयति। अयमर्थः यावत्काममूलस्याज्ञानस्योच्छेद आत्मतत्त्वज्ञानेन क्रियते तावत्पर्यन्तं कामस्य निर्मूलोच्छेदो न भवतीति बुद्धेः परं बुद्ध्वा कामो नाशनीयः। तस्मिंश्च नष्टे संसारानर्थोच्छेदो भवतीति। दुरासदं परबोधं विना दुःखेनापि नाशयितुमशक्यम्।उपायः कर्मनिष्ठात्र प्राधान्येनोपसंहृता। उपेया ज्ञाननिष्ठा तु तद्गुणत्वेन कीर्तिता।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।3.43।।यत आत्मा उत्तमस्तस्मात्तमुत्तमं ज्ञात्वा लौकिकं कामं त्यजेत् तेन फलसिद्धिरित्याहुः एवमिति। एवं मदुक्तप्रकारेण बुद्धेः परं आत्मानं परमुत्कृष्टं बुद्धा आत्मनाऽविकृतस्वरूपेणात्मानं अविकृतस्वरूपं मनः संस्तभ्य समाधाय स्ववशीकृत्य। हे महाबाहो तन्निराकरणसमर्थ कामरूपं शत्रुं एवम्भावनाशकं दुरासदं एवम्भूतात्मस्वरूपज्ञानातिरिक्तानाश्यं जहि त्यजेत्यर्थः।कृतानां कर्मणां योगो यथा सम्भवतीश्वरे।।श्रीकृष्णेन तथा चायं कर्मयोगो निरूपितः।।3।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।3.43।।उपसंहरति एवमिति। बुद्धेरेव विषयेन्द्रियादिजन्याः कामादिविक्रियाः आत्मा तु निर्विकारस्तत्साक्षीत्येवं बुद्धेः परमात्मानं बुद्ध्वा आत्मना एवंभूतनिश्चयात्मिकया बुद्ध्यात्मानं मनः संस्तभ्य निश्चलं कृत्वा कामरूपं शत्रुं जहि मारय। दुरासदं दुःखेनासादनीयम्। दुर्विज्ञेयगतिमित्यर्थः।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।3.43।।एवं बुद्धेः परमवशभूतं तं बुद्ध्वा आत्मना योगशुद्धेनात्मानं मनः बुद्धेः परं आत्मानं पुरुषं बुद्ध्वेति केचित्। महाबाहो कामरूपशत्रुं नाशय। एतेषां बुद्धिस्थितानां नाशने प्रतिबन्धकं पूर्वं कामरूपं वैरिणं मारयित्वा स्वधर्मं कुरु।बुद्धेर्विनाशकौ कामक्रोधौ निग्रहणं तयोः। उदितं तत्समस्तानामिन्द्रियाणां तथैव च।।तस्माद्धरीच्छया कर्मत्याग एव सुखावहः। त्यक्तव्यं च तदिच्छायामिति तद्धर्मबोधनम्।।स्वयं हि भगवान्यत्र कर्म कारयति स्वतः। क्व पुनस्तत्र बन्धः स्यादिति तत्करणं मतम्।।आत्मयोगे भक्तिमार्गे यत्प्रभोरिङ्गितं पुनः। तत्र कार्यो नो विचारस्तदीयैरिति बोद्ध्यते।।
▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।3.43।।इस प्रकार बुद्धिसे अति श्रेष्ठ आत्माको जानकर और आत्मासे ही आत्माको स्तम्भन करके अर्थात् शुद्ध मनसे अच्छी प्रकार आत्माको समाधिस्थ करके हे महाबाहो इस कामरूप दुर्जय शत्रुका त्याग कर अर्थात् जो दुःखसे वशमें किया जाता है उस अनेक दुर्विज्ञेय विशेषणोंसे युक्त कामका त्याग कर दे।
▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।3.43।। व्याख्या इन्द्रियाणि पराण्याहुः शरीर अथवा विषयोंसे इन्द्रियाँ पर हैं। तात्पर्य यह है कि इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका ज्ञान होता है पर विषयोंके द्वारा इन्द्रियोंका ज्ञान नहीं होता। इन्द्रियाँ विषयोंके बिना भी रहती हैं पर इन्द्रियोंके बिना विषयोंकी सत्ता सिद्ध नहीं होती। विषयोंमें यह सामर्थ्य नहीं कि वे इन्द्रियोंको प्रकाशित करें प्रत्युत इन्द्रियाँ विषयोंको प्रकाशित करती हैं। इन्द्रियाँ वही रहती हैं पर विषय बदलते रहते हैं। इन्द्रियाँ व्यापक हैं और विषय व्याप्य हैं अर्थात् विषय इन्द्रियोंके अन्तर्गत आते हैं पर इन्द्रियाँ विषयोंके अन्तर्गत नहीं आतीं। विषयोंकी अपेक्षा इन्द्रियाँ सूक्ष्म हैं। इसलिये विषयोंकी अपेक्षा इन्द्रियाँ श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म हैं।इन्द्रियेभ्यः परं मनः इन्द्रियाँ मनको नहीं जानतीं पर मन सभी इन्द्रियोंको ही जानता है। इन्द्रियोंमें भी प्रत्येक इन्द्रिय अपनेअपने विषयको ही जानती है अन्य इन्द्रियोंके विषयोंको नहीं जैसे कान केवल शब्दको जानते हैं पर स्पर्श रूप रस और गंधको नहीं जानते त्वचा केवल स्पर्शको जानती है पर शब्द रूप रस और गन्धको नहीं जानती नेत्र केवल रूपको जानते हैं पर शब्द स्पर्श रस और गन्धको नहीं जानते रसना केवल रसको जानती है पर शब्द स्पर्श रूप और गन्धको नहीं जानती और नासिका केवल गन्धको जानती है पर शब्द स्पर्श रूप और रसको नहीं जानती परन्तु मन पाँचों ज्ञानेन्द्रियोंको तथा उनके विषयोंको जानता है। इसलिये मन इन्द्रियोंसे श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म है।मनसस्तु परा बुद्धिः मन बुद्धिको नहीं जानता पर बुद्धि मनको जानती है। मन कैसा है शान्त है या व्याकुल ठीक है या बेठीक इत्यादि बातोंको बुद्धि जानती है। इन्द्रियाँ ठीक काम करती हैं या नहीं इसको भी बुद्धि जानती है तात्पर्य है कि बुद्धि मनको तथा उसके संकल्पोंको भी जानती है और इन्द्रियोँको तथा उनके विषयोंको भी जानती है। इसलिये इन्द्रियोँसे पर जो मन है उस मनसे भी बुद्धि पर (श्रेष्ठ बलवान् प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म) है।य बुद्धेः परतस्तु सः बुद्धिका स्वामीअहम् है इसलिये कहता है मेरी बुद्धि। बुद्धि करण है औरअहम् कर्ता है। करण परतन्त्र होता है पर कर्ता स्वतन्त्र होता है। उसअहम्में जो जडअंश है उसमेंकाम रहता है। जडअंशसे तादात्म्य होनेके कारण वह काम स्वरूप(चेतन) में रहता प्रतीत होता है।वास्तवमेंअहम्में हीकाम रहता है क्योंकि वही भोगोंकी इच्छा करता है और सुखदुःखका भोक्ता बनता है। भोक्ता भोग और भोग्य इन तीनोंमें सजातीयता (जातीय एकता) है। इनमें सजातीयता न हो तो भोक्तामें भोग्यकी कामना या आकर्षण हो ही नहीं सकता। भोक्तापनका जो प्रकाशक है जिसके प्रकाशमें भोक्ता भोग और भोग्य तीनोंकी सिद्धि होती है उस परम प्रकाशक(शुद्ध चेतन) मेंकाम नहीं है।अहम्तक सब प्रकृतिका अंश है। उसअहम् से भी आगे साक्षात् परमात्माका अंशस्वयं है जो शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि और अहम् इन सबका आश्रय आधार कारण और प्रेरक है तथा श्रेष्ठ बलवान् प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म है।जड(प्रकृति) का अंश ही सुखदुःखरूपमें परिणत होता है अर्थात् सुखदुःखरूप विकृति जडमें ही होती है। चेतनमें विकृति नहीं है प्रत्युत चेतन विकृतिका ज्ञाता है परन्तु जडसे तादात्म्य होनेसे सुखदुःखका भोक्ता चेतन ही बनता है अर्थात् चेतन ही सुखीदुःखी होता है। केवल जडमें सुखीदुःखी होना नहीं बनता। तात्पर्य यह है किअहम्में जो जडअंश है उसके साथ तादात्म्य कर लेनेसे चेतन भी अपनेकोमैं भोक्ता हूँ ऐसा मान लेता है। परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होते ही रसबुद्धि निवृत्त हो जाती है रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते (गीता 2। 51)। इसमें अस्य पद भोक्ता बने हुए अहम् का वाचक है और जो भोक्तापनसे निर्लिप्त तत्त्व है उस परमात्माका वाचक परम पद है। उसके ज्ञानसे रस अर्थात्काम निवृत्त हो जाता है। कारण कि सुखके लिये ही कामना होती है और स्वरूप सहजसुखराशि है। इसलिये परमात्मतत्त्वका साक्षात्कार होनेसेकाम (संयोगजन्य सुखकी इच्छा) सर्वदा और सर्वथा मिट जाता है।मार्मिक बातस्थूलशरीरविषय है इन्द्रियाँबहिःकरण हैं और मनबुद्धिअन्तःकरण हैं। स्थूलशरीरसे इन्द्रियाँ पर (श्रेष्ठ सबल प्रकाशक व्यापक और सूक्ष्म) हैं तथा इन्द्रियोंसे बुद्धि पर है। बुद्धिसे भी परअहम् है जो कर्ता है। उसअहम्(कर्ता) मेंकाम अर्थात् लौकिक इच्छा रहती है।अपनी सत्ता (होनापन) अर्थात् अपना स्वरूप चेतन निर्विकार और सत्चित्आनन्दरूप है। जब वह जड(प्रकृतिजन्य शरीर) के साथ तादात्म्य कर लेता है तबअहम् उत्पन्न होता है और स्वरूपकर्ता बन जाता है। इस प्रकार कर्तामें एक जडअंश होता है और एक चेतनअंश। जडअंशकी मुख्यतासे संसारकी तरफ और चेतनअंशकी मुख्यतासे परमात्माकी तरफ आकर्षण होता है (टिप्पणी प0 201)। तात्पर्य यह है कि उसमें जडअंशकी प्रधानतासे लौकिक (संसारकी) इच्छाएँ रहती हैं और चेतनअंशकी प्रधानतासे पारमार्थिक (परमात्माकी) इच्छा रहती है। जडअंश मिटनेवाला है इसलिये लौकिक इच्छाएँ मिटनेवाली हैं और चेतनअंश सदा रहनेवाला है इसलिये पारमार्थिक इच्छा पूरी होनेवाली है। इसलिये लौकिक इच्छाओं(कामनाओं) की निवृत्ति और पारमार्थिक इच्छा(संसारसे छूटनेकी इच्छा स्वरूपबोधकी जिज्ञासा और भगवत्प्रेमकी अभिलाषा) की पूर्ति होती है लौकिक इच्छाएँ उत्पन्न हो सकती हैं पर टिक नहीं सकतीं। परन्तु पारमार्थिक इच्छा दब सकती है पर मिट नहीं सकती। कारण कि लौकिक इच्छाएँ अवास्तविक और पारमार्थिक इच्छा वास्तविक है। इसलिये साधकको न तो लौकिक इच्छाओँकी पूर्तिकी आशा रखनी चाहिये और न पारमार्थिक इच्छाकी पूर्तिसे निराश ही होना चाहिये।वस्तुतः मूलमें इच्छा एक ही है जो अपने अंशी परमात्माकी है। परन्तु जडके सम्बन्धसे इस इच्छाके दो भेद हो जाते हैं और मनुष्य अपनी वास्तविक इच्छाकी पूर्ति परिवर्तनशील जड(संसार) के द्वारा करनेके लिये जडपदार्थोंकी इच्छाएँ करने लगता है जो उसकी भूल है। कारण कि लौकिक इच्छाएँपरधर्म और पारमार्थिक इच्छास्वधर्म है। परन्तु साधकमें लौकिक और पारमार्थिक दोनों इच्छाएँ रहनेसे द्वन्द्व पैदा हो जाता है। द्वन्द्व होनेसे साधकमें भजन ध्यान सत्सङ्ग आदिके समय तो पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् रहती है पर अन्य समयमें उसकी पारमार्थिक इच्छा दब जाती है और लौकिक (भोग एवं संग्रहकी) इच्छाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। लौकिक इच्छाओंके रहते हुए साधकमें साधन करनेका एक निश्चय स्थिर नहीं रह सकता। पारमार्थिक इच्छा जाग्रत् हुए बिना साधककी उन्नति नहीं होती। जब साधकका एकमात्र परमात्मप्राप्ति करनेका दृढ़ उद्देश्य हो जाता है तब यह द्वन्द्व मिट जाता है और साधकमें एक पारमार्थिक इच्छा ही प्रबल रह जाती है। एक ही पारमार्थिक इच्छा प्रबल रहनेसे साधक सुगमतापूर्वक परमात्मप्राप्ति कर लेता है (गीता 5। 3)। इसलिये लौकिक और पारमार्थिक इच्छाका द्वन्द्व मिटाना साधकके लिये बहुत आवश्यक है।शुद्ध स्वरूपमें अपने अंशी परमात्माकी ओर स्वतः एक आकर्षण या रुचि विद्यमान रहती है जिसकोप्रेम कहते हैं। जब वह संसारके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है तब वहप्रेम दब जाता है औरकाम उत्पन्न हो जाता है। जबतककाम रहता है तबतकप्रेम जाग्रत् नहीं होता। जबतकप्रेम जाग्रत् नहीं होता तबतककाम का सर्वथा नाश नहीं होता। जडअंशकी मुख्यतासे जिसमें सांसारिक भोगोंकी इच्छा (काम) रहती है उसीमें चेतनअंशकी मुख्यतासे परमात्माकी इच्छा भी रहती है। अतः वास्तवमेंकाम का निवास जडअंशमें ही है पर वह भी चेतनके सम्बन्धसे ही है। चेतनका सम्बन्ध छूटते हीकाम का नाश हो जाता है। तात्पर्य यह हुआ कि चेतनद्वारा जडसे सम्बन्धविच्छेद करते ही जडचेतनके तादात्म्यरूपअहम् का नाश हो जाता है औरअहम् का नाश होते हीकाम नष्ट हो जाता है।अहम् में जो जडअंश है उसमेंकाम रहता है इसकी प्रबल युक्ति यह है कि दृश्यरूपसे दीखनेवाला संसार उसे देखनेवाली इन्द्रियाँ तथा बुद्धि और उसे देखनेवाला स्वयं भोक्ता इन तीनोंमें जातीय (धातुगत) एकताके बिना भोक्ताका भोग्यकी ओर आकर्षण हो ही नहीं सकता। कारण कि आकर्षण सजातीयतामें ही होता है विजातीयतामें नहीं जैसे नेत्रोंका रूपके प्रति ही आकर्षण होता है शब्दके प्रति नहीं। यही बात सब इन्द्रियोंमें लागू होती है। बुद्धिका भी समझनेके विषय(विवेकविचार) में आकर्षण होता है शब्दादि विषयोंमें नहीं (यदि होता है तो इन्द्रियोंको साथमें लेनेसे ही होता है)। ऐसे ही स्वयं(चेतन) की परमात्मासे तात्त्विक एकता है इसलियेस्वयंका परमात्माकी ओर आकर्षण होता है। यह तात्त्विक एकता जडअंशका सर्वथा त्याग करनेसे अर्थात् जडसे माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद करनेसे ही अनुभवमें आती है। अनुभवमें आते हीप्रेम जाग्रत् हो जाता है। प्रेममें जडता(असत्) का अंश भी शेष नहीं रहता अर्थात् जडताका अत्यन्त अभाव हो जाता है।प्रकृतिके कार्य महत्तत्त्व(समष्टि बुद्धि) का अत्यन्त सूक्ष्म अंशकारणशरीर हीअहम् का जडअंश है। इस कारणशरीरमें हीकाम रहता है। कारणशरीरके तादात्म्यसेकाम स्वयंमें दीखता है। तादात्म्य मिटनेपर जिसमेंकाम का लेश भी नहीं है ऐसे अपने शुद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है। स्वरूपका अनुभव हो जानेपरकाम सर्वथा निवृत्त हो जाता है।एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा पहले शरीरसे पर इन्द्रियाँ इन्द्रियोंसे पर मन मनसे पर बुद्धि और बुद्धिसे परकाम को बताया गया। अब उपर्युक्त पदोंमें बुद्धिसे परकाम को जाननेके लिये कहनेका अभिप्राय यह है कि यहकामअहममें रहता है। अपने वास्तविक स्वरूपमेंकाम नहीं है। यदि स्वरूपमेंकाम होता तो कभी मिटता नहीं। नाशवान् जडके साथ तादात्म्य कर लेनेसे हीकाम उत्पन्न होता है। तादात्म्यमें भीकाम रहता तो जडमें ही है पर दीखता है स्वरूपमें। इसलिये बुद्धिसे परे रहनेवाले इसकाम को जानकर उसका नाश कर देना चाहिये। संस्तभ्यात्मानमात्मना बुद्धिसे परेअहम् में रहनेवालेकामको मारनेका उपाय है अपने द्वारा अपनेआपको वशमें करना अर्थात् अपना सम्बन्ध केवल अपने शुद्ध स्वरूपके साथ अथवा अपने अंशी भगवान्के साथ रखना जो वास्तवमें है। छठे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें उद्धरेदात्मनात्मानम् पदसे और छठे श्लोकमें येनात्मैवात्मनाजितः पदोंसे भी यही बात कही गयी है।स्वरूप (स्वयं) साक्षात् परमात्माका अंश है और शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धि संसारके अंश हैं। जब स्वरूप अपने अंशी परमात्मासे विमुख होकर प्रकृति(संसार) के सम्मुख हो जाता है तब उसमें कामनाएँ उत्पन्न हो जाती हैं। कामनाएँ अभावसे उत्पन्न होती हैं और अभाव संसारके सम्बन्धसे होता है क्योंकि संसार अभावरूप ही है नासतो विद्यते भावः (गीता 2। 16)। संसारसे सम्बन्धविच्छेद होते ही कामनाओंका नाश हो जाता है क्योंकि स्वरूपमें अभाव नहीं है नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)।परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध माननेपर भी जीवकी वास्तविक इच्छा (आवश्यकता या भूख) अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी ही होती है।मैं सदा जीता रहूँ मैं सब कुछ जान जाऊँ मैं सदाके लिये सुखी हो जाऊँ इस रूपमें वह वास्तवमें सत्चित्आनन्दस्वरूप परमात्माकी ही इच्छा करता है पर संसारसे सम्बन्ध माननेके कारण वह भूलसे इन इच्छाओंको संसारसे ही पूरी करना चाहता है यहीकाम है। इसकामकी पूर्ति तो कभी हो ही नहीं सकती। इसलिये इसकामका नाश तो करना ही पड़ेगा।जिसने संसारसे अपना सम्बन्ध जोड़ा है वही उसे तोड़ भी सकता है। इसलिये भगवान्ने अपने द्वारा ही संसारसे अपना सम्बन्धविच्छेद करकेकाम को मारनेकी आज्ञा दी है।अपने द्वारा ही अपनेआपको वशमें करनेमें कोई अभ्यास नहीं है क्योंकि अभ्यास संसार(शरीर इन्द्रियाँ मन और बुद्धि) की सहायतासे ही होता है। इसलिये अभ्यासमें संसारके सम्बन्धकी सहायता लेनी पड़ती है। वास्तवमें अपने स्वरूपमें स्थिति अथवा परमात्माकी प्राप्ति संसारकी सहायतासे नहीं होती प्रत्युत संसारके त्याग(सम्बन्धविच्छेद) से अपनेआपसे होती है।मार्मिक बात जब चेतन अपना सम्बन्ध जडके साथ मान लेता है तब उसमें संसार(भोग) की भी इच्छा होती है और परमात्माकी भी। जडसे सम्बन्ध माननेपर जीवसे यही भूल होती है कि वह सत्चित्आनन्दस्वरूप परमात्माकी इच्छा अभिलाषाको संसारसे ही पूरी करनेके लिये सांसारिक पदार्थोंकी इच्छा करने लगता है। परिणामस्वरूप उसकी ये दोनों ही इच्छाएँ (स्वरूपबोधके बिना) कभी मिटती नहीं।संसारको जाननेके लिये अलग होना और परमात्माको जाननेके लिये परमात्मासे अभिन्न होना आवश्यक है क्योंकि वास्तवमेंस्वयं की संसारसे भिन्नता और परमात्मासे अभिन्नता है। परन्तु संसारकी इच्छा करनेसेस्वयं संसारसे अपनी अभिन्नता या समीपता मान लेता है जो कभी सम्भव नहीं और परमात्माकी इच्छा करनेसेस्वयं परमात्मासे अपनी भिन्नता या दूरी (विमुखता) मान लेता है पर इसकी सम्भावना ही नहीं। हाँ सांसारिक इच्छाओंको मिटानेके लिये पारमार्थिक इच्छा करना बहुत उपयोगी है। यदि पारमार्थिक इच्छा तीव्र हो जाय तो लौकिक इच्छाएँ स्वतः मिट जाती हैं। लौकिक इच्छाएँ सर्वथा मिटनेपर पारमार्थिक इच्छा पूरी हो जाती है अर्थात् नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है (टिप्पणी प0 203.1)। कारण कि वास्तवमें परमात्मा सदासर्वत्र विद्यमान है पर लौकिक इच्छाएँ रहनेसे उनका अनुभव नहीं होता।जहि शत्रुं महाबाहो कारूपँ दुरासदम् महाबाहो का अर्थ है बड़ी और बलवान् भुजाओंवाला अर्थात् शूरवीर। अर्जुनको महाबाहो अर्थात् शूरवीर कहकर भगवान् यह लक्ष्य कराते हैं कि तुम इसकामरूप शत्रुका दमन करनेमें समर्थ हो।संसारसे सम्बन्ध रखते हुएकाम का नाश करना बहुत कठिन है। यहकाम बड़ोंबड़ोंके भी विवेकको ढककर उन्हें कर्तव्यसे च्युत कर देता है जिससे उनका पतन हो जाता है। इसलिये भगवान्ने इसे दुर्जय शत्रु कहा है।काम को दुर्जय शत्रु कहनेका तात्पर्य इससे अधिक सावधान रहनेमें है इसे दुर्जय समझकर निराश होनेमें नहीं।किसी एक कामनाकी उत्पत्ति पूर्ति अपूर्ति और निवृत्ति होती है इसलिये मात्र कामनाएँ उत्पन्न और नष्ट होनेवाली हैं। परन्तुस्वयं निरन्तर रहता है और कामनाओंके उत्पन्न तथा नष्ट होनेको जानता है। अतः कामनाओंसे वह सुगमतापूर्वक सम्बन्धविच्छेद कर सकता है क्योंकि वास्तवमें सम्बन्ध है ही नहीं। इसलिये साधकको कामनाओंसे कभी घबराना नहीं चाहिये। यदि साधकका अपने कल्याणका पक्का उद्देश्य है (टिप्पणी प0 203.2) तो वहकामको
Chapter 3 (Part 27)
सुगमतापूर्वक मार सकता है।कामनाओंके त्यागमें अथवा परमात्माके प्राप्तिमें सब स्वतन्त्र अधिकारी योग्य और समर्थ हैं। परन्तु कामनाओंकी पूर्तिमें कोई भी स्वतन्त्र अधिकारी योग्य और समर्थ नहीं है। कारण कि कामना पूरी होनेवाली है ही नहीं। परमात्माने मानवशरीर अपनी प्राप्तिके लिये ही दिया है। अतः कामनाका त्याग करना कठिन नहीं है। सांसारिक भोगपदार्थोंको महत्त्व देनेके कारण ही कामनाका त्याग कठिन मालूम देता है।सुख(अनुकूलता) की कामनाको मिटानेके लिये ही भगवान् समयसमयपर दुःख (प्रतिकूलता) भेजते हैं कि सुखकी कामना मत करो कामना करोगे तो दुःख पाना ही पड़ेगा। सांसारिक पदार्थोंकी कामनावाला मनुष्य दुःखसे कभी बच ही नहीं सकता यह नियम है क्योंकि संयोगजन्य भोग ही दुःखके हेतु हैं (गीता 5। 22)।स्वयं(स्वरूप) में अनन्त बल है। उसकी सत्ता ओर बलको पाकर ही बुद्धि मन और इन्द्रियाँ सत्तावान् एवं बलवान् होते हैं। परन्तु जडसे सम्बन्ध जोड़नेके कारण वह अपने बलको भूल रहा है और अपनेको बुद्धि मन और इन्द्रियोंके अधीन मान रहा है। अतएवकामरूप शत्रुको मारनेके लिये अपनेआपको जानना और अपने बलको पहचानना बड़ा आवश्यक है।काम जडके सम्बन्धसे और जडमें ही होता है। तादात्म्य होनेसे वह स्वयंमें प्रतीत होता है। जडका सम्बन्ध न रहे तोकाम है ही नहीं। इसलिये यहाँकाम को मारनेका तात्पर्य वस्तुतःकाम का सर्वथा अभाव बतानेमें ही है। इसके विपरीत यदिकाम अर्थात् कामनाकी सत्ताको मानकर उसे मिटानेकी चेष्टा करें तो कामनाका मिटना कठिन है। कारण कि वास्तवमें कामनाकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। कामना उत्पन्न होती है और उत्पन्न होनेवाली वस्तु नष्ट होगी ही यह नियम है। यही कामना न करें तो पहलेकी कामनाएँ अपनेआप नष्ट हो जायँगी। इसलिये कामनाको मिटानेका तात्पर्य है नयी कामना न करना।शरीरादि सांसारिक पदार्थोंकोमैंमेरा औरमेरे लिये माननेसे ही अपनेआपमें कमीका अनुभव होता है पर मनुष्य भूलसे उस कमीकी पूर्ति भी सांसारिक पदार्थोंसे ही करना चाहता है। इसलिये वह उन पदार्थोंकी कामना करता है। परन्तु वास्तवमें आजतक सांसारिक पदार्थोंसे किसीकी भी कमीकी पूर्ति हुई नहीं होगी नहीं और हो सकती भी नहीं। कारण कि स्वयं अविनाशी है और पदार्थ नाशवान् हैं। स्वयं अविनाशी होकर भी नाशवान्की कामना करनेसे लाभ तो कोई होता नहीं और हानि कोईसी भी बाकी रहती नहीं। इसलिये भगवान् कामनाको शत्रु बताते हुए उसे मार डालनेकी आज्ञा देते हैं।कर्मयोगके द्वारा इस कामनाका नाश सुगमतासे हो जाता है। कारण कि कर्मयोगका साधक संसारकी छोटीसेछोटी अथवा बड़ीसेबड़ी प्रत्येक क्रिया परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर दूसरोंके लिये ही करता है कामनाकी पूर्तिके लिये नहीं। वह प्रत्येक क्रिया निष्कामभावसे एवं दूसरोंके हित और सुखके लिये ही करता है अपने लिये कभी कुछ नहीं करता। उसके पास जो समय समझ सामग्री और सामर्थ्य है वह सब अपनी नहीं है प्रत्युत मिली हुई है और बिछुड़ जायगी। इसलिये वह उसे अपनी कभी न मानकर निःस्वार्थभावसे (संसारकी ही मानकर) संसारकी ही सेवामें लगा देता है। उसे पूरीकीपूरी संसारकी सेवामेंलगा देता है अपने पास बचाकर नहीं रखता। अपना न माननेसे ही वह पूरीकीपूरी सेवामें लगती हैअन्यथा नहीं।कर्मयोगी अपने लिये कुछ करता ही नहीं अपने लिये कुछ चाहता ही नहीं और अपना कुछ मानता ही नहीं। इसलिये उसमें कामनाओंका नाश सुगमतापूर्वक हो जाता है। कामनाओंका सर्वथा नाश होनेपर उसके उद्देश्यकी पूर्ति हो जाती है और वह अपनेआपमें ही अपनेआपको पाकर कृतकृत्य ज्ञातज्ञातव्य और प्राप्तप्राप्तव्य हो जाता है अर्थात् उसके लिये कुछ भी करना जानना और पाना शेष नहीं रहता।इस प्रकार ँ़ तत् सत् इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें कर्मयोग नामक तीसरा अध्याय पूर्ण हुआ है।।3।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।3.42 3.43।।अत्र युक्तिं श्लोकद्वयेनाह (S omits श्लोकद्वयेन) इन्द्रियाणीति। एवमिति। यत इन्द्रियाणि शत्रुलक्षणात् विषयात् अन्यानि तेभ्यश्चान्यत् मनः तस्मादपि बुद्धेर्व्यतिरेकः बुद्धेरपि यस्यान्यस्वभावत्वं स आत्मा। एवमिन्द्रियोत्पन्नेन क्रोधेन कथं मनसः बुद्धेरात्मनो वा क्षोभ इति पर्यालोचयेत् इत्यर्थः।रहस्यविदां त्वयमाशयः (N ह्ययमाशयः) बुद्धेः यः परत्र वर्तते परोऽहंकारः सर्वमहम् इत्यभेदात्मा स खलु परमोऽभेदः। अत एव च परिपूर्णस्य खण्डनाभावात् न क्रोधादय उत्पद्यन्ते (S N उदयन्ते)। अतः परमहंकारं परमोत्साहं संविदात्मकं (K परोत्साहसंवि ) गृहीत्वा क्रोधमविद्यत्मानं शत्रु जहि इति।।।शिवम्।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।3.43।।इन्द्रियादिसमाधानपूर्वकमात्मज्ञानाद् कामजयो भवतीत्युपसंहरति एवमित्यादिना। संस्कृतं मनो मनःसमाधाने हेतुरिति सूचयति संस्तभ्येति। प्रकृतं शत्रुमेव विशिनष्टि कामरूपमिति। तस्य दुरासदत्वे हेतुमाह दुर्विज्ञेयेति। अनेकविशेषोऽतादृशो महाशनत्वादिस्तदनेनोपायभूता कर्मनिष्ठा प्राधान्येनोक्ता उपेया तु ज्ञाननिष्ठा गुणत्वेनेति विवेक्तव्यम्।ँ़तत्सत् इत्यानन्दगिरिकृतटीकायां तृतीयोऽध्यायः।।3।।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।3.43।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।3.43।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.
▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।3.43।।एवं बुद्धेः अपि परं कामं ज्ञानविरोधिनं वैरिणं बुद्ध्वा आत्मानं मनः आत्मना बुद्ध्या कर्मयोगे अवस्थाप्य एनं कामरूपं दुरासदं शत्रुं जहि नाशय इति।
▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।3.43।। एवं बुद्धेः परम् आत्मानं बुद्ध्वा ज्ञात्वा संस्तभ्य सम्यक् स्तम्भनं कृत्वा आत्मानं स्वेनैव आत्मना संस्कृतेन मनसा सम्यक् समाधायेत्यर्थः। जहि एनं शत्रुं हे महाबाहो कामरूपं दुरासदं दुःखेन आसदः आसादनं प्राप्तिः यस्य तं दुरासदं दुर्विज्ञेयानेकविशेषमिति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येतृतीयोऽध्यायः।।