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4. Bhagavad Gita — Chapter 4

Chapter 4 (Part 1)

【 Verse 4.1 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् | विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca imaṁ vivasvate yogaṁ proktavānaham avyayaṁ | vivasvānmanave prāha manurikṣvākave’bravīt ||

▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: the Lord says; imaṁ: this; vivasvate: to the Sun god; yogaṁ: the science of yoga; proktavān: instructed; ahaṁ: I; avyayaṁ: imperishable; vivasvān: sun god; manave: to Manu, the father of mankind; prāha: told; manuḥ: Manu; ikṣvākave: to King Ikṣvāku; abravīt: said

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.1 Bhagavān says: ‘I taught the sun god, Vivasvān, the imperishable science of yoga and Vivasvān taught Manu, the father of mankind and Manu in turn taught Ikṣvāku.’

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.1।।श्रीभगवान् बोले मैंने इस अविनाशी योगको सूर्यसे कहा था। फिर सूर्यने (अपने पुत्र) वैवस्वत मनुसे कहा और मनुने (अपने पुत्र) राजा इक्ष्वाकुसे कहा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.1।। श्रीभगवान् ने कहा मैंने इस अविनाशी योग को विवस्वान् (सूर्य देवता) से कहा (सिखाया) विवस्वान् ने मनु से कहा मनु ने इक्ष्वाकु से कहा।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.1 इमम् this? विवस्वते to Vivasvan? योगम् Yoga? प्रोक्तवान् taught? अहम् I? अव्ययम् imperishable? विवस्वान् Vivasvan? मनवे to Manu? प्राह taught? मनुः Manu? इक्ष्वाकवे to Ikshvaku? अब्रवीत् taught.Commentary Vivasvan means the sun. Ikshvaku was the son of Manu. Ikshvaku was the reputed ancestor of the solar dynasty of Kshatriyas.This Yoga is said to be imperishable because the result or fruit? i.e.? Moksha? that can be attained through it is imperishable.If the rulers of dominions possess a knowledge of the Yoga taught by Me in the preceding two discourses? they can protect the Brahmanas and rule their kingdom with justice. So I taught this Yoga to the Sungod in the beginning of evolution.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.1. The Bhagavat said This changeless Yoga I had properly taught thus to Vivasvat; Vivasvat correctly told it ot Manu; and Manu declared to Iksvaku.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.1 "Lord Shri Krishna said: This imperishable philosophy I taught to Viwaswana, the founder of the Sun dynasty, Viwaswana gave it to Manu the lawgiver, and Manu to King Ikshwaku!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.1 The Lord said I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; Vivasvan taught it to Manu; Manu declared it to Iksvaku.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.1 The Blessed Lord said I imparted this imperishable Yoga to Vivasvan, Vivasvan taught this to Manu, and Manu transmitted this to Iksavaku.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.1 The Blessed Lord said I taught this imperishable Yoga to Vivasvan; he told it to Manu; Manu proclaimed it to Ikshvaku.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.1 See Comment under 4.3

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.1 - 4.2 The Lord said This Karma Yoga declared to you should not be considered as having been taught now merely, for creating encouragement in you for war. I Myself had taught this Yoga to Vivasvan at the commencement of Manu's age as a means for all beings to attain release, which is man's supreme end. Vivasvan taught it to Manu, and Manu to Iksvaku. The royal sages of old knew this Yoga transmitted by tradition. Because of long lapse of time and because of the dullness of the intellect of those who heard it, it has been almost lost.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.1 In the beginning of creation, with a veiw to infusing vigour into the Ksatriyas who are the protectors of the world, aham, I; proktavan, imparted; imam, this; avyayam, imperishable; yogam, Yoga, presented in the (preceding) two chapters; vivasvate, to Vivasvan, the Sun. Being endowed with this power of Yoga, they would be able to protect the Brahmana caste. The protection of the world becomes ensured when the Brahmanas and the Ksatriyas are protected. It (this Yoga) is avyayam, imperishable, because its result is undecaying. For, the result-called Liberation-of this (Yoga), which is characterized by steadfastness in perfect Illumination, does not decay. And he, Vivasvan, praha, taught (this); manave, to Manu. Manu abravit, transmitted (this); iksvakave, to Iksvaku, his own son who was the first king. [First king of the Iksvaku dynasty, otherwise known as the Solar dynasty.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.1।। जैसा कि इस अध्याय की प्रस्तावना में कहा गया है भगवान् यहाँ स्पष्ट करते हैं कि अब तक उनके द्वारा दिया गया उपदेश नवीन न होकर सनातन वेदों में प्रतिपादित ज्ञान की ही पुर्नव्याख्या है। स्वस्वरूप की स्मृति से स्फूर्त होकर भगवान् घोषणा करते हैं कि उन्होंने ही सृष्टि के प्रारम्भ में इस ज्ञान का उपदेश सूर्य देवता (विवस्वान्) को दिया था। विवस्वान् ने अपने पुत्र मनु जो भारत के प्राचीन स्मृतिकार हुए को यह ज्ञान सिखाया। मनु ने इसका उपदेश राजा इक्ष्वाकु को दिया जो सूर्यवंश के पूर्वज थे। इस वंश के राजाओं ने दीर्घकाल तक अयोध्या पर शासन किया।वेद शब्द संस्कृत के विद् धातु से बना है जिसका अर्थ है जानना। अत वेद का अर्थ है ज्ञान अथवा ज्ञान का साधन (प्रमाण)। वेदों का प्रतिपाद्य विषय है जीव के शुद्ध ज्ञान स्वरूप तथा उसकी अभिव्यक्ति के साधनों का बोध।जैसे हम विद्युत् को नित्य कह सकते हैं क्योंकि उसके प्रथम बार आविष्कृत होने के पूर्व भी वह थी और यदि हमें उसका विस्मरण भी हो जाता है तब भी विद्युत् शक्ति का अस्तित्व बना रहेगा इसी प्रकार हमारे नहीं जानने से दिव्य चैतन्य स्वरूप आत्मा का नाश नहीं होता। इस अविनाशी आत्मा का ज्ञान वास्तव में अव्यय है।आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि विश्व का निर्माण सूर्य के साथ प्रारम्भ होना चाहिये। शक्ति के स्रोत के रूप में सर्वप्रथम सूर्य की उत्पत्ति हुई और उसकी उत्पत्ति के साथ ही यह महान् आत्मज्ञान विश्व को दिया गया।वेदों का विषय आत्मानुभूति होने के कारण वाणी उसका वर्णन करने में सर्वथा असमर्थ है। कोई भी गम्भीर अनुभव शब्दों के द्वारा व्यक्त नहीं किया जा सकता। अत स्वयं की बुद्धि से ही शास्त्रों का अध्ययन करने से उनका सम्यक् ज्ञान तो दूर रहा विपरीत ज्ञान होने की ही सम्भावना अधिक रहती है। इसलिये भारत में यह प्राचीन परम्परा रही है कि अध्यात्म ज्ञान के उपदेश को आत्मानुभव में स्थित गुरु के मुख से ही श्रवण किया जाता है। गुरुशिष्य परम्परा से यह ज्ञान दिया जाता रहा है। यहाँ इस ब्रह्मविद्या के पूर्वकाल के विद्यार्थियों का परिचय कराया गया है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.1।।एवमध्यायद्वयेनोक्तस्य निष्ठाद्वयात्मकस्य वेदार्थस्य समाप्तिं मन्यमानः संप्रदायप्रदर्शनेन तं स्तुवन श्रीभगवानुवाच। इममध्यायद्वयेनोक्तं योगं सांख्ययोगं कर्मयोगरुपोपायसहितं ससंन्यासं इमं संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानान्तं कर्मयोगं ज्ञाननिष्ठोपसर्जनं पारिव्राज्यानधिकारिणं राज्ञामेव योग्यमित्यन्येषां व्याख्याने तु द्वितीयाध्यायार्थस्येदंशब्देनाग्रहणप्रसङ्गः। नचेष्टापत्तिः। अध्यायद्वयोक्तेऽर्थेऽप्रामाण्यशङ्का माभूदिति। विद्यावंशसंप्रदायं दर्शयति इममित्यादिनेति स्वोक्तिविरोधात्। एतेन राज्ञामेव योग्यमित्यपि प्रत्युक्तम्। अध्यायद्वयेन प्रतिपादिते वेदार्थेऽग्रे विस्तरेण वक्ष्यमाणे ब्राह्मणादियोग्यताभावप्रसङ्गात्। सर्गादौ विवस्वते सूर्यायाहं श्रीकृष्णः प्रोक्तवान्। ब्रह्मपरिपालनसमर्थबलाधानाय। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते सर्वं जगद्रक्षितं भवति। अव्ययमव्ययफलत्वादिदं भाष्यमुपलक्षणं अव्ययवेदमूलत्वात्। न व्येति स्वफलादित्यव्ययं अव्यभिचारिफलमित्यस्यापि। यत्त्वव्ययमविच्छिन्नसंप्रदायमिति तत्तु स कालेनेह महता योगो नष्टः परंतपेति वाक्यशेषविरोधादुपेक्ष्यम्। सच विवस्वान्मनवे श्राद्धदेवाय प्राह। सच मनुरिक्ष्वाकवे स्वपुत्रायादिराजायाब्रवीत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.1।।यद्यपि पूर्वमुपेयत्वेन ज्ञानयोगस्तदुपायत्वेन च कर्मयोग इति द्वौ योगौ कथितौ तथाप्येकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यतीत्यनया दिशा साध्यसाधनयोः फलैक्यादैक्यमुपचर्य साधनभूतं कर्मयोगं साध्यभूतं च ज्ञानयोगमनेकविधगुणविधानाय स्तौति वंशकथनेन भगवान् इममध्यायद्वयेनोक्तं योगं ज्ञाननिष्ठालक्षणं कर्मनिष्ठोपायलभ्यं विवस्वते सर्वक्षत्रियवंशबीजभूतायादित्याय प्रोक्तवान् प्रकर्षेण सर्वसंदेहोच्छेदादिरूपेणोक्तवानहं भगवान् वासुदेवः सर्वजगत्परिपालकः। सर्गादिकाले राज्ञां बलाधानेन तदधीनं सर्व जगत्पालयितुम्। कथमनेन। बलाधानमिति विशेषणेन दर्शयति। अव्ययमव्ययवेदमूलत्वादव्ययमोक्षफलत्वाच्च न व्येति स्वफलादित्यव्ययमव्यभिचारिफलम्। तथाचैतादृशेन बलाधानं शक्यमिति भावः। सच मम शिष्यो विवस्वान् मनवे वैवस्वताय स्वपुत्राय प्राह। सच मनुरिक्ष्वाकवे स्वपुत्रायादिराजायाब्रवीत्। यद्यपि प्रतिमन्वन्तरं स्वायंभुवमन्वादिसाधारणोऽयं भगवदुपदेशस्तथापि सांप्रतिकवैवस्वतमन्वन्तराभिप्रायेणादित्यमारभ्य संप्रदायो गणितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.1।।अध्यायद्वयोक्तेऽर्थेप्रामाण्यशङ्का माभूदिति विद्यावंशसंप्रदायमात्मनश्च भ्रमविप्रलम्भकत्वादिनिरासायेश्वरत्वं सर्वज्ञत्वं च दर्शयति इममित्यादिना। इमं सांख्ययोगं कर्मयोगरूपोपायसहितं ससंन्यासमिति भाष्यं। इमं संध्योपासनादिनिर्विकल्पकसमाध्यनुष्ठानान्तं कर्मयोगं ज्ञाननिष्ठोपसर्जनं पारिव्राज्यानधिकारिणां राज्ञामेव योग्यं विवस्वते सूर्याय मण्डलाभिमानिने सर्वेषां क्षत्रियाणामादिभूतायाहमादित्यान्तर्यमीय एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषो दृश्यते हिरण्यश्मश्रुर्हिरण्यकेश आप्रणखात्सर्व एव सुवर्णस्तस्य यथा कप्यासं पुण्डरीकमेवमक्षिणी तस्योदिति नाम इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धः प्रोक्तवान् पुरा। अव्ययमविच्छिन्नसंप्रदायम्। तेनानादित्वमपि। मनवे स्वपुत्राय विवस्वान्प्राह। इक्ष्वाकवे मनुः स्वपुत्रायाब्रवीत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.1।।श्रीकृष्णाय नमः।कर्मसन्न्यासयोगस्य स्वस्मिन् योगो यथा भवेत्।तदर्थं कृपया कृष्णः कौन्तेयं प्रत्युवाच ह।।1।।कर्मसन्न्यासनिरूपणप्रश्नोद्गमार्थं पूर्वानुवादमाह इममिति त्रयेण। अहमिमं योगं पूर्वोक्तं अव्ययं सफलं मत्सम्बन्धजनकत्वात् विवस्वते प्रोक्तवान्। लोकानुग्रहार्थं सोऽपि लोक एतत्प्राकट्यार्थं मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.1।।आविर्भावतिरोभावावाविष्कर्तुं स्वयं हरिः। तत्त्वंपदविवेकार्थं कर्मयोगं प्रशंसति।।1।।एवंतावदध्यायद्वयेन कर्मयोगोपायो ज्ञानयोगोपायश्च मोक्षसाधनत्वेनोक्तः तमेव ब्रह्मार्पणादिगुणविधानेन त्वंपदार्थविवेकादिना च प्रपञ्चयिष्यन्प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन्श्रीभगवानुवाच इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययं इमं योगं पुराहं विवस्वते आदित्याय कथितवान् स च स्वपुत्राय मनवे श्राद्धदेवाय प्राह स च मनुः स्वपुत्रायेक्ष्वाकवेऽब्रवीत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.1 4.3।।योगिनः कर्म कर्त्तव्यमिति पूर्वं निरूपितम्। तुरीये तु ततोऽध्याये प्रतीत्यर्थं परम्परा।।1।।योगस्य रूप्यते विष्णुर्वक्ता यस्मादभूद्रविः। उपदेशपदं तस्मादुपदेशाश्रयो मनुः।।2।।इक्ष्वाकूणामपि तथा रामचन्द्रावतारभाक्। तस्य नित्यत्वविधया विधानमुपदिश्यते।।3।।ब्रह्मभावेन सर्वत्र फलादिभावत्यागतः। योगी तदाश्रयेणैव विद्ययाऽमृतमश्नुते।।4।।एवं तावदध्यायद्वयेन योगे स्वधर्मो मोक्षसाधनमुपदिष्टः तमेव ब्रह्मभावेन प्रपञ्चयिष्यन् प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन् श्रीभगवानुवाच इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययमिमं योगं विवस्वते प्रोक्तवान् न चेमं तव युद्धप्रोत्साहनायैव केवलं वच्मि किन्तु मन्वन्तरादावेव निखिलजगदुद्धरणायेमं प्रोक्तवानस्मीति सम्प्रदायपूर्वकमाह स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.1।।कर्मयोग जिसका उपाय है ऐसा जो यह संन्याससहित ज्ञाननिष्ठारूप योग पूर्वके दो अध्यायोंमें ( दूसरे और तीसरेमें ) कहा गया है जिसमें कि वेदका प्रवृत्तिधर्मरूप और निवृत्तिधर्मरूप दोनों प्रकारका सम्पूर्ण तात्पर्य आ जाता है आगे सारी गीतामें भी भगावन्को योग शब्दसे यही ( ज्ञानयोग ) विवक्षित है इसलिये वेदके अर्थको ( ज्ञानयोगमें ) परिसमाप्त यानी पूर्णरूपसे आ गया समझकर भगवान् वंशपरम्पराकथनसे उस ( ज्ञाननिष्ठारूप योग ) की स्तुति करते हैं श्रीभगवान् बोले जगत्प्रतिपालक क्षत्रियोंमें बल स्थापन करनेके लिये मैंने उक्त दो अध्यायोंमें कहे हुए इस योगको पहले सृष्टिके आदिकालमें सूर्यसे कहा था ( क्योंकि ) उस योगबलसे युक्त हुए क्षत्रिय ब्रह्मत्वकी रक्षा करनेमें समर्थ होते हैं तथा ब्राह्मण और क्षत्रियोंका पालन ठीक तरह हो जानेपर ये दोनों सब जगत्का पालन अनायास कर सकते हैं। इस योगका फल अविनाशी है इसलिये यह अव्यय है क्योंकि इस सम्यक् ज्ञाननिष्ठारूप योगका मोक्षरूप फल कभी नष्ट नहीं होता। उस सूर्यने यह योग अपने पुत्र मनुसे कहा और मनुने अपने पुत्र सबसे पहले राजा बननेवाले इक्ष्वाकुसे कहा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.1।। व्याख्या   इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् भगवान्ने जिन सूर्य मनु और इक्ष्वाकु राजाओंका उल्लेख किया है वे सभी गृहस्थ थे और उन्होंने गृहस्थाश्रममें रहते हुए ही कर्मयोगके द्वारा परमसिद्धि प्राप्त की थी अतः यहाँके इमम् अव्ययम् योगम् पदोंका तात्पर्य पूर्वप्रकरणके अनुसार तथा राजपरम्पराके अनुसार कर्मयोग लेना ही उचित प्रतीत होता है।यद्यपि पुराणोंमें और उपनिषदोंमें भी कर्मयोगका वर्णन आता है तथापि वह गीतामें वर्णित कर्मयोगके समान साङ्गोपाङ्ग और विस्तृत नहीं है। गीतामें भगवान्ने विविध युक्तियोंसे कर्मयोगका सरल और साङ्गोपाङ्ग विवेचन किया है। कर्मयोगका इतना विशद वर्णन पुराणों और उपनिषदोंमें देखनेमें नहीं आता।भगवान् नित्य हैं और उनका अंश जीवात्मा भी नित्य है तथा भगवान्के साथ जीवका सम्बन्ध भी नित्य है। अतः भगवत्प्राप्तिके सब मार्ग (योगमार्ग ज्ञानमार्ग भक्तिमार्ग आदि) भी नित्य हैं (टिप्पणी प0 206)। यहाँ अव्ययम् पदसे भगवान् कर्मयोगकी नित्यताका प्रतिपादन करते हैं।परमात्माके साथ जीवका स्वतःसिद्ध सम्बन्ध (नित्ययोग) है। जैसे पतिव्रता स्त्रीको पतिकी होनेके लिये करना कुछ नहीं पड़ता क्योंकि वह पतिकी तो है ही ऐसे ही साधकको परमात्माका होनेके लिये करना कुछ नहीं है वह तो परमात्माका है ही परन्तु अनित्य क्रिया पदार्थ घटना आदिके साथ जब वह अपनी सम्बन्ध मान लेता है तब उसे नित्ययोग अर्थात् परमात्माके साथ अपने नित्यसम्बन्धका अनुभव नहीं होता। अतः उस अनित्यके साथ माने हुए सम्बन्धको मिटानेके लिये कर्मयोगी शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि मिली हुई समस्त वस्तुओंको संसारकी ही मानकर संसारकी सेवामें लगा देता है। वह मानता है कि जैसे धूलका छोटासेछोटा कण भी विशाल पृथ्वीका ही एक अंश है ऐसे ही यह शरीर भी विशाल ब्रह्माण्डका ही एक अंश है। ऐसा माननेसे कर्म तो संसारके लिये होंगे पर योग (नित्ययोग) अपने लिये होगा अर्थात् नित्ययोगका अनुभव हो जायगा।भगवान् विवस्वते प्रोक्तवान् पदोंसे साधकोंको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि जैसे सूर्य सदा चलते ही रहते हैं अर्थात् कर्म करते ही रहते हैं और सबको प्रकाशित करनेपर भी स्वयं निर्लिप्त रहते हैं ऐसे ही साधकोंको भी प्राप्त परिस्थितिके अनुसार अपने कर्तव्यकर्मोंका पालन स्वयं करते रहना चाहिये (गीता 3। 19) और दूसरोंको भी कर्मयोगकी शिक्षा देकर लोकसंग्रह करते रहना चाहिये पर स्वयं उनसे निर्लिप्त (निष्काम निर्मम और अनासक्त) रहना चाहिये।सृष्टिमें सूर्य सबके आदि हैं। सृष्टिकी रचनाके समय भी सूर्य जैसे पूर्वकल्पमें थे वैसे ही प्रकट हुए सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्। उन (सबके आदि) सूर्यको भगवान्ने अविनाशी कर्मयोगका उपदेश दिया। इससे सिद्ध हुआ कि भगवान् सबके आदिगुरु हैं और साथ ही कर्मयोग भी अनादि है। भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि मैं तुम्हें जो कर्मयोगकी बात बता रहा हूँ वह कोई आजकी नयी बात नहीं है। जो योग सृष्टिके आदिसे अर्थात् सदासे है उसी योगकी बात मैं तुम्हें बता रहा हूँ। प्रश्न   भगवान्ने सृष्टिके आदिकालमें सूर्यको कर्मयोगका उपदेश क्यों दिया उत्तर   (1) सृष्टिके आरम्भमें भगवान्ने सूर्यको ही कर्मयोगका वास्तविक अधिकारी जानकर उन्हें सर्वप्रथम इस योगका उपदेश दिया।(2) सृष्टिमें जो सर्वप्रथम उत्पन्न होता है उसे ही उपदेश दिया जाता है जैसे ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिमें प्रजाओँको उपदेश दिया (गीता 3। 10)। उपदेश देनेका तात्पर्य है कर्तव्यका ज्ञान कराना। सृष्टिमें सर्वप्रथम सूर्यकी उत्पत्ति हुई फिर सूर्यसे समस्त लोक उत्पन्न हुए। सबको उत्पन्न करनेवाले (टिप्पणी प0 207.1) सूर्यको सर्वप्रथम कर्मयोगका उपदेश देनेका अभिप्राय उनसे उत्पन्न सम्पूर्ण सृष्टिको परम्परासे कर्मयोग सुलभ करा देना था।(3) सूर्य सम्पूर्ण जगत्के नेत्र हैं। उनसे ही सबको ज्ञान प्राप्त होता है एवं उनके उदित होनेपर प्रायः समस्त प्राणी जाग्रत् हो जाते हैं और अपनेअपने कर्मोंमें लग जाते हैं। सूर्यसे ही मनुष्योंमें कर्तव्यपरायणता आती है। सूर्यको सम्पूर्ण जगत्की आत्मा भी कहा गया है सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च (टिप्पणी प0 207.2)। अतः सूर्यको जो उपदेश प्राप्त होगा वह सम्पूर्ण प्राणियोंको भी स्वतः प्राप्त हो जायगा। इसलिये भगवान्ने सर्वप्रथम सूर्यको ही उपदेश दिया।वास्तवमें नारायणके रूपमें उपदेश देना और सूर्यके रूपमें उपदेश ग्रहण करना जगन्नाट्यसूत्रधार भगवान्की एक लीला ही समझनी चाहिये जो संसारके हितके लिये बहुत आवश्यक थी। जिस प्रकार अर्जुन महान् ज्ञानी नरऋषिके अवतार थे परन्तु लोकसंग्रहके लिये उन्हें भी उपदेश लेनेकी आवश्यकता हुई ठीक उसी प्रकार भगवान्ने स्वयं ज्ञानस्वरूप सूर्यको उपदेश दिया जिसके फलस्वरूप संसारका महान् उपकार हुआ है हो रहा है और होता रहेगा।विवस्वान् मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् कर्मयोग गृहस्थोंकी खास विद्या है। ब्रह्मचर्य गृहस्थ वानप्रस्थ और संन्यास इन चारों आश्रमोंमें गृहस्थआश्रम ही मुख्य है क्योंकि गृहस्थआश्रमसे ही अन्य आश्रम बनते और पलते हैं। मनुष्य गृहस्थआश्रममें रहते हुए ही अपने कर्तव्यकर्मोंका पालन करके सुगमतापूर्वक परमात्मप्राप्ति कर सकता है। उसे परमात्मप्राप्तिके लिये आश्रम बदलनेकी जरूरत नहीं है। भगवान्ने सूर्य मनु इक्ष्वाकु आदि राजाओंका नाम लेकर यह बताया है कि कल्पके आदिमें गृहस्थोंने ही कर्मयोगकी विद्याको जाना और गृस्थाश्रममें रहते हुए ही उन्होंने कामनाओंका नाश करके परमात्मतत्त्वको प्राप्त किया। स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन भी गृहस्थ थे। इसलिये भगवान् अर्जुनके माध्यमसे मानो सम्पूर्ण गृहस्थोंको सावधान (उपदेश) करते हैं कि तुमलोग अपने घरकी विद्या कर्मयोग का पालन करके घरमें रहते हुए ही परमात्माको प्राप्त कर सकते हो तुम्हें दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं है।गृहस्थ होनेपर भी अर्जुन प्राप्त कर्तव्यकर्म(युद्ध) को छोड़कर भिक्षाके अन्नसे जीविका चलानेको श्रेष्ठ मानते हैं (गीता 2। 5) अर्थात् अपने कल्याणके लिये गृहस्थआश्रमकी अपेक्षा संन्यासआश्रमको श्रेष्ठ समझते हैं। इसलिये उपर्युक्त पदोंसे भगवान् मानो यह बताते हैं कि तुम भी राजघरानेके श्रेष्ठ गृहस्थ हो कर्मयोग तुम्हारे घरकी खास विद्या है इसलिये इसीका पालन करना तुम्हारे लिये श्रेयस्कर है। संन्यासीके द्वारा जो परमात्मतत्त्व प्राप्त किया जाता है वही तत्त्व कर्मयोगी गृहस्थाश्रममें रहकर भी स्वाधीनतापूर्वक प्राप्त कर सकता है। अतः कर्मयोग गृहस्थोंकी तो मुख्य विद्या है पर संन्यास आदि अन्य आश्रमवाले भी इसका पालन करके परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग ही कर्मयोग है। अतः कर्मयोगका पालन किसी भी वर्ण आश्रम सम्प्रदाय देश काल आदिमें किया जा सकता है। किसी विद्यामें श्रेष्ठ और प्रभावशाली पुरुषोंका नाम लेनेसे उस विद्याकी महिमा प्रकट होती है जिससे दूसरे लोग भी वैसा करनेके लिये उत्साहित होते हैं। जिन लोगोंके हृदयमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व है उनपर ऐश्वर्यशाली राजाओंका अधिक प्रभाव पड़ता है। इसलिये भगवान् सृष्टिके आदिमें होनेवाले सूर्यका तथा मनु आदि प्रभावशाली राजाओंके नाम लेकर कर्मयोगका पालन करनेकी प्रेरणा करते हैं।विशेष बात क्रियाओँ और पदार्थोंमें राग होनेसे अर्थात् उनके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे कर्मयोग नहीं हो पाता। गृहस्थमें रहते हुए भी सांसारिक भोगोंसे अरुचि (उपरति अथवा कामनाका अभाव) होती है। किसी भी भोगको भोगें अन्तमें उस भोगसे अरुचि अवश्य उत्पन्न होती है यह नियम है। आरम्भमें भोगकी जितनी रुचि (कामना) रहती है भोग भोगते समय वह उतनी नहीं रह जाती प्रत्युत क्रमशः घटतेघटते समाप्त हो जाती है जैसे मिठाई खानेके आरम्भमें उसकी जो रुचि होती है वह उसे खानेके साथसाथ घटती चली जाती है और अन्तमें उससे अरुचि हो जाती है। परन्तु मनुष्य भूल यह करता है कि वह उस अरुचिको महत्त्व देकर उसे स्थायी नहीं बनाता। वह अरुचिको ही तृप्ति (फल) मान लेता है। परन्तु वास्तवमें अरुचिमें थकावट अर्थात् भोगनेकी शक्तिका अभाव ही होता है।जिस रुचि या कामनाका किसी भी समय अभाव होता है वह रुचि या कामना वास्तवमें स्वयंकी नहीं होती। जिससे कभी भी अरुचि होती है उससे हमारा वास्तविक सम्बन्ध नहीं होता। जिससे हमारा वास्तविक सम्बन्ध है उस सत्स्वरूप परमात्मतत्त्वकी ओर चलनेमें कभी अरुचि नहीं होती प्रत्युत रुचि बढ़ती ही जाती है यहाँतक कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होनेपर भी प्रेम के रूपमें वह रुचि बढ़ती ही रहती है। स्वयं भी सत्स्वरूप है इसलिये अपने अभावकी रुचि भी किसीकी नहीं होती।कर्म करण (शरीर इन्द्रियाँ मन आदि) और उपकरण (पदार्थ अर्थात् कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री) ये तीनों ही उत्पन्न और नष्ट होनेवाले हैं फिर इनसे मिलनेवाला फल कैसे नित्य होगा वह तो नाशवान् ही होगा। अविनाशीकी प्राप्तिसे जो तृप्ति होती है वह नाशवान् फलकी प्राप्तिसे कैसे हो सकती है इसलिये साधकको कर्म करण और उपकरण तीनोंसे ही सम्बन्धविच्छेद करना है। इनसे सम्बन्धविच्छेद तभी होगा जब साधक अपने लिये कुछ नहीं करेगा अपने लिये कुछ नहीं चाहेगा और अपना कुछ नहीं मानेगा प्रत्युत अपने कहलानेवाले कर्म करण और उपकरण इन तीनोंसे अपना सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये इन्हें संसारका ही मानकर संसारकी ही सेवामें लगा देगा।कर्म करते हुए भी कर्मयोगीकी कर्मोंमें कामना ममता और आसक्ति नहीं होती प्रत्युत उनमें प्रीति और तत्परता होती है। कामना ममता तथा आसक्ति अपवित्रता करनेवाली हैं और प्रीति तथा तत्परता पवित्रता करनेवाली हैं। कामना ममता तथा आसक्तिपूर्वक किसी भी कर्मको करनेसे अपना पतन और पदार्थोंका नाश होता है तथा उस कर्मकी बारबार याद आती है अर्थात् उस कर्मसे सम्बन्ध बना रहता है। परन्तु प्रीति तथा तत्परतापूर्वक कर्म करनेसे अपनी उन्नति और पदार्थोंका सदुपयोग होता है नाश नहीं तथा उस कर्मकी पुनः याद भी नहीं आती अर्थात् उस कर्मसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। इस प्रकार कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होते ही नित्यप्राप्त स्वरूप अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है।कोई भी मनुष्य क्यों न हो वह सुगमतापूर्वक मान सकता है कि जो कुछ मेरे पास है वह मेरा नहीं है प्रत्युत किसीसे मिला हुआ है जैसे शरीर मातापितासे मिला है विद्यायोग्यता गुरुजनोंसे मिली है इत्यादि। तात्पर्य यह कि एकदूसरेकी सहायतासे ही सबका जीवन चलता है। धनीसेधनी व्यक्तिका जीवन भी दूसरेकी सहायताके बिना नहीं चल सकता। हमने किसीसे लिया है तो किसीको देना किसीकी सहायता करना सेवा करना हमारा भी परम कर्तव्य है। इसीका नाम कर्मयोग है। इसका पालन मनुष्यमात्र कर सकता है और इसके पालनमें कभी लेशमात्र भी असमर्थता तथा पराधीनता नहीं है।कर्तव्य उसे कहते हैं जिसे सुखपूर्वक कर सकते हैं जिसे अवश्य करना चाहिये अर्थात् जो करनेयोग्य है और जिसे करनेसे उद्देश्यकी सिद्धि अवश्य होती है। जो नहीं कर सकते उसे करनेकी जिम्मेवारी किसीपर नहीं है और जिसे नहीं करना चाहिये उसे करना ही नहीं है। जिसे नहीं करना चाहिये उसे न करनेसे दोअवस्थाएँ स्वतः आती हैं निर्विकल्प अवस्था अर्थात् कुछ न करना अथवा जिसे करना चाहिये उसे करना।कर्तव्य सदा निष्कामभावसे एवं परहितकी दृष्टिसे किया जाता है। सकामभावसे किया गया कर्म बन्धनकारक होता है इसलिये उसे करना ही नहीं है। निष्कामभावसे किया जानेवाला कर्म फलकी कामनासे रहित होता है उद्देश्यसे रहित नहीं। उद्देश्यरहित चेष्टा तो पागलकी होती है। फल और उद्देश्य दोनोंमें अन्तर होता है। फल उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है पर उद्देश्य नित्य होता है। उद्देश्य नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवका होता है जिसके लिये मनुष्यजन्म हुआ है। अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे उस परमात्माका अनुभव नहीं होता। सकामभाव प्रमाद आलस्य आदि रहनेसे अपने कर्तव्यका पालन कठिन प्रतीत होता है।वास्तवमें कर्तव्यकर्मका पालन करनेमें परिश्रम नहीं है। कर्तव्यकर्म सहज स्वाभाविक होता है क्योंकि यह स्वधर्म है। परिश्रम तब होता है जब अहंता आसक्ति ममता कामनासे युक्त होकर अर्थात् अपने लिये कर्म करते हैं। इसलिये भगवान्ने राजस कर्मको परिश्रमयुक्त बताया है (गीता 18। 24)।जैसे भगवान्के द्वारा प्राणिमात्रका हित होता है ऐसे ही भगवान्की शक्ति भी प्राणिमात्रके हितमें निरन्तर लगी हुई है। जिस प्रकार आकाशवाणीकेन्द्रके द्वारा प्रसारित विशेष शक्तियुक्त ध्वनि सब जगह फैल जाती है पर रेडियोके द्वारा जिस नंबरपर उस ध्वनिसे एकता (सजातीयता) होती है उस नंबरपर वह ध्वनि पकड़में आ जाती है। इसी प्रकार जब कर्मयोगी स्वार्थभावका त्याग करके केवल संसारमात्रके हितके भावसे ही समस्त कर्म करता है तब भगवान्की सर्वव्यापी हितैषिणी शक्तिसे उसकी एकता हो जाती है और उसके कर्मोंमें विलक्षणता आ जाती है। भगवान्की शक्तिसे एकता होनेसे उसमें भगवान्की शक्ति ही काम करती है और उस शक्तिके द्वारा ही लोगोंका हित होता है। इसलिये कर्तव्यकर्म करनेमें न तो कोई बाधा लगती है और न परिश्रमका अनुभव ही होता है।कर्मयोगमें पराश्रयकी भी आवश्यकता नहीं है। जो परिस्थिति प्राप्त हो जाय उसीमें कर्मयोगका पालन करना है। कर्मयोगके अनुसार किसीके कार्यमें आवश्यकता पड़नेपर सहायता कर देना सेवा है जैसे किसीकी गाड़ी खराब हो गयी और वह उसे धक्का देनेकी कोशिश कर रहा है अतः हम भी इस काममें उसकी सहायता करें तो यह सेवा है। जो जानबूझकर कार्यको खोजखोजकर सेवा करता है वह कर्म करता है सेवा नहीं क्योंकि ऐसा करनेसे उसका उद्देश्य पारमार्थिक न रहकर लौकिक हो जाता है। सेवा वह है जो परिस्थितिके अनुरूप की जाय। कर्मयोगी न तो परिस्थिति बदलता है और न परिस्थिति ढूँढता है। वह तो प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करता है। प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग ही कर्मयोग है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.1 4.3।।एवमित्यादि उत्तमम् इत्यन्तम्। एतच्च गुरुपरम्पराप्राप्तमपि (S परम्परायातमपि K परम्परया प्राप्तमपि) अद्यत्वे नष्टमित्यनेन (S N अद्यत्वे तन्नष्ट) भगवान् अस्य ज्ञानस्य दुर्लभतां गौरवं च प्रदर्शयति। भक्तोऽसि मे सखा चेति। त्वं भक्तः मत्परमः सखा च। चशब्देन अन्वाचय उच्यते। तेन यथा भिक्षाटने भिक्षायां प्राधान्यं गवानयने त्वप्राधान्यम् एवं भक्तिरत्र गुरुं प्रति प्रधानं न सखित्वमपीति तात्पर्यार्थं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.1।।पूर्वाभ्यामध्यायाभ्यां निष्ठाद्वयात्मनो योगस्य गीतत्वाद् वेदार्थस्य च समाप्तत्वाद् वक्तव्यशेषाभावाद् उक्तयोगस्य कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्तये वंशकथनपूर्विका स्तुतिं भगवानुक्तवानित्याह श्रीभगवानिति। तदेतद्भगवद्वचनं वृत्तानुवादद्वारेण प्रस्तौति योऽयमिति। उक्तमेव योगं विभज्यानुवदति ज्ञानेति। संन्यासेनेतिकर्तव्यतया सहितस्य ज्ञानात्मनो योगस्य कर्माख्यो योगो हेतुरतश्चोपायोपेयभूतं निष्ठाद्वयं प्रतिष्ठापितमित्यर्थः। उक्ते योगद्वये प्रमाणमुपन्यस्यति यस्मिन्निति। अथवा ज्ञानयोगस्य कर्मयोगोपायत्वमेव स्फुटयति यस्मिन्निति। प्रवृत्त्या लक्ष्यते ज्ञायते कर्मयोगो निवृत्त्या च लक्ष्यते ज्ञानयोग इति विभागः। यद्यपि पूर्वस्मिन्नध्यायद्वये यथोक्तनिष्ठाद्वयं व्याख्यातं तथापि वक्ष्यमाणाध्यायेषु वक्तव्यान्तरमस्तीत्याशङ्क्याह गीतासु चेति। कथं तर्हि समनन्तराध्यायस्य प्रवृत्तिरत आह अत इति। वंशकथनं संप्रदायोपन्यासः संप्रदायोपदेशश्च कृत्रिमत्वशङ्कानिवृत्त्या योगस्तुतौ पर्यवस्यति। गुरुशिष्यपरंपरोपन्यासमेवानुक्रामति इममिति। इममित्यस्य संनिहितं विषयं दर्शयति अध्यायेति। योगं ज्ञाननिष्ठालक्षणं कर्मयोगोपायलभ्यमित्यर्थः। स्वयमकृतार्थानां प्रयोजनव्यग्राणां परार्थप्रवृत्त्यसंभवाद्भगवतस्तथाविधप्रवृत्तिदर्शनात्कृतार्थता कल्पनीयेत्याह विवस्वत इति। अव्ययवेदमूलत्वादव्ययत्वं योगस्य गमयितव्यं किमिति भगवता कृतार्थेनापि योगप्रवचनं कृतमिति तदाह जगदिति। कथं यथोक्तेन योगेन क्षत्रियाणां बलाधानं तदाह तेनेति। युक्ताः क्षत्रिया इति शेषः। ब्रह्मशब्देन ब्राह्मणत्वजातिरुच्यते। यद्यपि योगप्रवचनेन क्षत्रं रक्षितं तेन च ब्राह्मणत्वं तथापि कथं रक्षणीयं जगदशेषं रक्षितमित्याशङ्क्याह ब्रह्मेति। ताभ्यां हि कर्मफलभूतं जगदनुष्ठानद्वारा रक्षितुं शक्यमित्यर्थः। योगस्याव्ययत्वे हेत्वन्तरमाह अव्ययफलत्वादिति। ननु कर्मफलवदुक्तयोगफलस्यापि साध्यत्वेन क्षयिष्णुत्वमनुमीयते नेत्याह नहीति। अपुनरावृत्तिश्रुतिप्रतिहतमनुमानं न प्रमाणीभवतीति भावः। भगवता विवस्वते प्रोक्तो योगस्तत्रैव पर्यवस्यतीत्याशङ्क्याह स चेति। स्वपुत्रायेत्युभयत्र संबध्यते। आदिराजायेतीक्ष्वाकोः सूर्यवंशप्रवर्तकत्वेन वैशिष्ट्यमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.1 4.3।।उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तारात्मकोऽयमध्याय इति पूर्वसङ्गताध्यायार्थस्थितौ इह प्रकरणभेदप्रतिपादनार्थमाह बुद्धेरिति।एवं ज्ञात्वा 4।15 32 इत्यतः प्राक्तेन ग्रन्थेन बुद्धेः परस्य विष्णोर्माहात्म्यमुच्यते। आद्यस्य प्रकरणस्य पूर्वेण सङ्गतिं सूचयितुंबुद्धेः परस्य इत्युक्तम्।श्रेयान् इत्यतः पूर्वेण कर्मभेदः। निवृत्तस्यकर्मणोऽन्यस्माद्भेदः। निवृत्त एव कर्मण्युपासनायज्ञादिरूपेण वा भेदः। ज्ञानमाहात्म्यं शेषेणेति।इमं विवस्वते योगं इत्युपदेशपरम्पराकथनं प्रकृतानुपयुक्तमित्यतस्तत्तात्पर्यमाह पूर्वेति। पूर्वैरनुष्ठितः।ये मे मतम् 3।31 इत्युक्तेन हेतुना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। अयं धर्मोमयि सर्वाणि 3।30 इत्यनेनोक्तः। योगशब्दोऽप्यनेन व्याख्यातः। न केवलमुपदेशपरम्पराऽत्रोच्यते किन्तु तेषामनुष्ठानमप्युपलक्ष्यते। तच्चेतोऽपि त्वयाऽनुष्ठेयमिति प्रतिपादनार्थमिति भावः।कर्मणैव हि संसिद्धिं 3।20 इत्यनेनैतद्गतार्थमिति चेत् न गृहस्थकर्म त्वया न त्याज्यमित्यस्योपपादनायाचारस्य तत्रोक्तत्वात्। अत्र तु निवृत्तधर्मानुष्ठाने सदाचारस्योच्यमानत्वात्। अत एव तत्राचार इत्येवोक्तमिह त्वयं धर्म इति।लोकेऽस्मिन्द्विविधा 3।3 इत्यत्रोक्तस्यकर्मणैव इत्युदाहरणमुक्तमिति तत्रापि न दोषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.1 4.3।।श्रीमदमलबोधाय नमः। हरिः ँ़। बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन्नध्याये। पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह इममिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.1।।श्री भगवानुवाच यः अयं तव उदितो योगः स केवलं युद्धप्रोत्साहनाय इदानीम् उदित इति न मन्तव्यम्। मन्वन्तरादौ एव निखिलजगदुद्धरणाय परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया इमं योगम् अहम् एव विवस्वते प्रोक्तवान्। विवस्वान् च मनवे मनुः इक्ष्वाकवे इति एवं सम्प्रदायपरम्परया प्राप्तम् इमं योगं पूर्वे राजर्षयो विदुः। स महता कालेन तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्याद् विनष्टप्रायः अभूत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.1।। इमम् अध्यायद्वयेनोक्तं योगं विवस्वते आदित्याय सर्गादौ प्रोक्तवान् अहं जगत्परिपालयितृ़णां क्षत्रियाणां बलाधानाय तेन योगबलेन युक्ताः समर्था भवन्ति ब्रह्म परिरक्षितुम्। ब्रह्मक्षत्रे परिपालिते जगत् परिपालयितुमलम्। अव्ययम् अव्ययफलत्वात्। न ह्यस्य योगस्य सम्यग्दर्शननिष्ठालक्षणस्य मोक्षाख्यं फलं व्येति। स च विवस्वान् मनवे प्राह। मनुः इक्ष्वाकवे स्वपुत्राय आदिराजाय अब्रवीत्।।

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【 Verse 4.2 】

▸ Sanskrit Sloka: एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु: | स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप ||

▸ Transliteration: evaṁ paraṁparāprāptamimaṁ rājarṣayo viduḥ | sa kāleneha mahatā yogo naṣṭaḥ parantapa ||

▸ Glossary: evaṁ: thus; paraṁparā: Master-disciple succession; prāptaṁ: received; imaṁ: this science; rājarṣayaḥ: the saintly kings; viduḥ: understood; saḥ: that knowl- edge; kālena: in the course of time; iha: in this world; mahatā: by great; yogaḥ: the science of yoga; naṣṭaḥ: lost; paraṁtapa: subduer of the enemies

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.2 The supreme science was thus received through the chain of master-disciple succession and the saintly kings understood it in that way. In the course of time, the succession was broken and therefore the science as it was appears to have been lost.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.2।।हे परंतप इस तरह परम्परासे प्राप्त इस योगको राजर्षियोंने जाना। परन्तु बहुत समय बीत जानेके कारण वह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.2।। इस प्रकार परम्परा से प्राप्त हुये इस योग को राजर्षियों ने जाना (परन्तु) हे परन्तप वह योग बहुत काल (के अन्तराल) से यहाँ (इस लोक में) नष्टप्राय हो गया।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.2 एवम् thus? परम्पराप्राप्तम् handed down in regular succession? इमम् this? राजर्षयः the royal sages? विदुः knew? सः this? कालेन by lapse of time? इह here? महता by long? योगः Yoga? नष्टः destroyed? परन्तप O Parantapa.Commentary The royal sages Men who were kings and at the same time sages also? learnt this Yoga.Arjuna could burn or harass his foes? like the sun? by the heat of his valour and power. Hence the name Parantapa.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.2. Thus the regal sages knew this, received in regualr succession. By the passage of long time, this Yoga has been however lost, O scorcher of enemies !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.2 The Divine Kings knew it, for it was their tradition. Then, after a long time, at last it was forgotten.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.2 Thus handed down in succession, the royal sages knew this (Karma Yoga). But with long lapse of time, O Arjuna, that Yoga was lost to the world.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.2 The king-sages knew this (yoga) which was received thus in regular succession. That Yoga, O destroyer of foes, in now lost owing to a long lapse of time.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.2 This, handed down thus in regular succession, the royal sages knew. This Yoga, by long lapse of time, has been lost here, O Parantapa (burner of the foes).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.2 See Comment under 4.3

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.1 - 4.2 The Lord said This Karma Yoga declared to you should not be considered as having been taught now merely, for creating encouragement in you for war. I Myself had taught this Yoga to Vivasvan at the commencement of Manu's age as a means for all beings to attain release, which is man's supreme end. Vivasvan taught it to Manu, and Manu to Iksvaku. The royal sages of old knew this Yoga transmitted by tradition. Because of long lapse of time and because of the dullness of the intellect of those who heard it, it has been almost lost.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.2 Rajarsayah, the king-sages, those who were kings and sages (at the same time); viduh, knew; imam, this Yoga; which was evam parampara-praptam, received thus through a regular succession of Ksatriyas. Sah, that; yogah, Yoga; nastah, is lost, has go its traditional line snapped; iha, now; mahata kalena, owing to a long lapse of time. parantapa, O destroyer of foes. By para are meant those against oneself. He who, like the sun, 'scorches' (tapayati) them by the 'rays' of the 'heat' of his prowess is parantapa, i.e. scorcher of antagonists. Noticing that the Yoga has got lost by reaching people who are weak and have no control of their organs, and that the world has become associated with goals that do not lead to Liberation,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.2।। वेदों में प्रवृत्ति और निवृत्ति मार्गों का उपदेश है। इस योग का परम्परागत रूप से राजर्षियों को ज्ञान था परन्तु लगता है इस योग का भी अपना दुर्भाग्य और सौभाग्य है इतिहास के किसी काल में मानव मात्र की सेवा के लिये यह ज्ञान उपलब्ध होता है और किसी अन्य समय अनुपयोगी सा बनकर निरर्थक हो जाता है तब अध्यात्म का स्वर्ण युग समाप्त होकर भोगप्रधान आसुरी जीवन का अन्धा युग प्रारम्भ होता है किन्तु आसुरी भौतिकवाद से ग्रस्त काल में भी वह पीढ़ी अपने ही अवगुणों से पीड़ित होने के लिये उपेक्षित नहीं रखी जाती। क्योंकि उस समय कोई महान् गुरु अध्यात्म क्षितिज पर अवतीर्ण होकर तत्कालीन पीढ़ी को प्रेरणा साहस उत्स्ााह और आवश्यक नेतृत्व प्रदान करके दुख पूर्ण पगडंडी से बाहर सांस्कृतिक पुनरुत्थान के राजमार्ग पर ले आता है।महाभारत काल का उचित मूल्यांकन करते हुए श्रीकृष्ण भगवान् ठीक ही कहते हैं कि दीर्घकाल के अन्तराल से वह योग यहाँ नष्ट हो गया है।यह देखकर कि इन्द्रिय संयम से रहित दुर्बल व्यक्तियों के हाथों में जाकर यह योग नष्टप्राय हो गया जिसके बिना जीवन का परम् पुरुषार्थ प्राप्त नहीं किया जा सकता। भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.2।।एवं क्षत्रियपरंपरया प्राप्तमागतमिमं योगं राजानश्च ते ऋषयश्च प्रभुत्वे सति सूक्ष्मार्थदर्शनसमर्थाः निमिप्रभृतयो विदुः। यत्तु जनकाजातशत्रुकैकयप्रभृयो राजानः ऋषयश्च सनकवसिष्ठाद्याः सूक्ष्मार्थदर्शिन इति पक्षान्तरप्रदर्शनं तदरुचिग्रस्तम्। तद्वीजं तु अभ्यर्हितस्य पूर्वनिपातादि। स योगो महता कालेनेह लोके नष्टः संप्रदायविच्छेदेनादर्शनं गतः। परान्शत्रून्कामादीन् तापयातीति परंतपः। दुर्बलानजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगं मत्त उपलभ्य जीतेन्द्रियस्त्वं पुनर्लोके स्थापयेति सूचयन्संबोधयति परंतपेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.2।।एवमादित्यमारभ्य गुरुशिष्यपरम्परया प्राप्तमिमं योगं। राजानश्च ते ऋषयश्चेति राजर्षयः प्रभुत्वे सति सूक्ष्मार्थनिरीक्षणक्षमा निमिप्रमुखाः स्वपित्रादिप्रोक्तं विदुः। तस्मादनादिवेदमूलत्वेनानन्तफलत्वेनानादिगुरुशिष्यपरंपराप्राप्तत्वेन च कृत्रिमत्वशङ्कानास्पदत्वान्महाप्रभावोऽयं योग इति श्रद्धातिशयाय स्तूयते स एवं महाप्रयोजनोऽपि योगः कालेन महता दीर्घेण धर्मह्रासकरेण इह इदानीमावयोर्व्यवहारकाले द्वापरान्ते दुर्बलानजितेन्द्रियाननधिकारिणः प्राप्य कामक्रोधादिभिरभिभूयमानो नष्टः विच्छिन्नसंप्रदायो जातः। तं विना पुरुषार्थाप्राप्तेः। अहो दौर्भाग्यं लोकस्येति शोचति भगवान्। हे परंतप परं कामक्रोधादिरूपं शत्रुगणं शौर्येण बलवता विवेकेन तपसा च भानुरिव तापयतीति परंतपः शत्रुतापनः। जितेन्द्रिय इत्यर्थः। उर्वश्युपेक्षणाद्यद्भुतकर्मदर्शनात्। तस्मात्त्वं जितेन्द्रियत्वादत्राधिकारिति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.2।।एवमिति। एवं परंपराप्राप्तमिक्ष्वाकोर्निमिनाभागादिक्रमेण राजर्षयो जनकाजातशत्रुकैकेयप्रभृतयो राजानः ऋषयश्च सनकवसिष्ठाद्याः सूक्ष्मार्थदर्शिनस्ते राजान एव ऋषय इति वा अविदुर्ज्ञातवन्तः।सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च इति लङो झेर्जुस्। नष्टोऽदर्शनं गतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.2।।एवं परम्पराप्राप्तं मत्परम्परयाऽऽप्तमिमं योगं राजर्षयः राज्यादिकं परित्यज्य मदर्थैकप्रयोजनवन्तोऽविदुः। ननु परम्परागतं चेदिदानीं केनापि कथं न ज्ञायत इत्याशङ्क्याहुः स कालेनेति। स योगो महता कालेन प्रमाणादिनिरासकेन महता मदिच्छारूपेण तद्व्यवधानादनवतारदशायां दर्शकाभावान्नष्टः। परन्तपेति सम्बोधनेन तवोत्कृष्टतापसंक्लेशेनाहं दर्शयामीति ज्ञापितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.2।। एवमिति। राजानश्च त ऋषयश्चान्येऽपि राजर्षयो निमिप्रमुखाः स्वपुत्रादिभिरिक्ष्वाकुप्रमुखैः प्रोक्तमिमं योगं विदुर्जानन्तिस्म। अद्यतनानामज्ञाने कारणमाह। हे परंतप शत्रुतापन स योगः कालवशादिह लोके नष्टो विच्छिन्नः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.1 4.3।।योगिनः कर्म कर्त्तव्यमिति पूर्वं निरूपितम्। तुरीये तु ततोऽध्याये प्रतीत्यर्थं परम्परा।।1।।योगस्य रूप्यते विष्णुर्वक्ता यस्मादभूद्रविः। उपदेशपदं तस्मादुपदेशाश्रयो मनुः।।2।।इक्ष्वाकूणामपि तथा रामचन्द्रावतारभाक्। तस्य नित्यत्वविधया विधानमुपदिश्यते।।3।।ब्रह्मभावेन सर्वत्र फलादिभावत्यागतः। योगी तदाश्रयेणैव विद्ययाऽमृतमश्नुते।।4।।एवं तावदध्यायद्वयेन योगे स्वधर्मो मोक्षसाधनमुपदिष्टः तमेव ब्रह्मभावेन प्रपञ्चयिष्यन् प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन् श्रीभगवानुवाच इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययमिमं योगं विवस्वते प्रोक्तवान् न चेमं तव युद्धप्रोत्साहनायैव केवलं वच्मि किन्तु मन्वन्तरादावेव निखिलजगदुद्धरणायेमं प्रोक्तवानस्मीति सम्प्रदायपूर्वकमाह स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.2।।इस प्रकार क्षत्रियोंकी परम्परासे प्राप्त हुए इस योगको राजर्षियोंने जो कि राजा और ऋषि दोनों थे जाना। हे परंतप ( अब ) वह योग इस मनुष्यलोकमें बहुत कालसे नष्ट हो गया है। अर्थात् उसकी सम्प्रदायपरम्परा टूट गयी है। अपने विपक्षियोंको पर कहते हैं उन्हें जो शौर्यरूप तेजकी किरणोंके द्वारा सूर्यके समान तपता है वह पपातप यानी शत्रुओंको तपानेवाला कहा जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.2।। व्याख्या   एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः सूर्य मनु इक्ष्वाकु आदि राजाओंने कर्मयोगको भलीभाँति जानकर उसका स्वयं भी आचरण किया और प्रजासे भी वैसा आचरण कराया। इस प्रकार राजर्षियोंमें इस कर्मयोगकी परम्परा चली। यह राजाओं(क्षत्रियों) की खास (निजी) विद्या है इसलिये प्रत्येक राजाको यह विद्या जाननी चाहिये। इसी प्रकार परिवार समाज गाँव आदिके जो मुख्य व्यक्ति हैं उन्हें भी यह विद्या अवश्य जाननी चाहिये।प्राचीनकालमें कर्मयोगको जाननेवाले राजालोग राज्यके भोगोंमें आसक्त हुए बिना सुचारुरूपसे राज्यका संचालन करते थे। प्रजाके हितमें उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति रहती थी। सूर्यवंशी राजाओंके विषयमें महाकवि कालिदास लिखते हैं प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्।सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः।।(रघुवंश 1। 18)वे राजालोग अपनी प्रजाके हितके लिये प्रजासे उसी प्रकार कर लिया करते थे जिस प्रकार सहस्रगुना बनाकर बरसानेके लिये ही सूर्य पृथ्वीसे जल लिया करते हैं।तात्पर्य यह कि वे राजालोग प्रजासे कर आदिके रूपमें लिये गये धनको प्रजाके ही हितमें लगा देते थे अपने स्वार्थमें थोड़ा भी खर्च नहीं करते थे। अपने जीवननिर्वाहके लिये वे अलग खेती आदि काम करवाते थे। कर्मयोगका पालन करनेके कारण उन राजाओंको विलक्षण ज्ञान और भक्ति स्वतः प्राप्त थी। यही कारण था कि प्राचीनकालमें बड़ेबड़े ऋषि भी ज्ञान प्राप्त करनेके लिये उन राजाओंके पास जाया करते थे। श्रीवेदव्यासजीके पुत्र शुकदेवजी भी ज्ञानप्राप्तिके लिये राजर्षि जनकके पास गये थे। छान्दोग्योपनिषद्के पाँचवें अध्यायमें भी आता है कि ब्रह्मविद्या सीखनेके लिये छः ऋषि एक साथ महाराज अश्वपतिके पास गये थे (टिप्पणी प0 210.1)।तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें जनक आदि राजाओंको और यहाँ सूर्य मनु इक्ष्वाकु आदि राजाओंको कर्मयोगी बताकर भगवान् अर्जुनको मानो यह लक्ष्य कराते हैं कि गृहस्थ और क्षत्रिय होनेके नाते तुम्हें भी अपने पूर्वजोंके (वंशपरम्पराके) अनुसार कर्मयोगका पालन अवश्य करना चाहिये (गीता 4। 15)। इसके अलावा अपने वंशकी बात (कर्मयोगकी विद्या) अपनेमें आनी सुगम भी है इसलिये आनी ही चाहिये।स कालेनेह महता योगो नष्टः परमात्मा नित्य हैं और उनकी प्राप्तिके साधन कर्मयोग ज्ञानयोग भक्तियोग आदि भी परमात्माके द्वारा निश्चित किये होनेसे नित्य हैं। अतः इनका कभी अभाव नहीं होता नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)। ये आचरणमें आते हुए न दीखनेपर भी नित्य रहते हैं। इसीलिये यहाँ आये नष्टः पदका अर्थ लुप्त अप्रकट होना ही है अभाव होना नहीं।पहले श्लोकमें कर्मयोगको अव्ययम् अर्थात् अविनाशी कहा गया है। अतः यहाँ नष्टः पदका अर्थ यदि कर्मयोगका अभाव माना जाय तो दोनों ओरसे विरोध उत्पन्न होगा कि यदि कर्मयोग अविनाशी है तो उसका अभाव कैसे हो गया और यदि उसका अभाव हो गया तो वह अविनाशी कैसे इसके सिवाय आगेके

Chapter 4 (Part 2)

(तीसरे) श्लोकमें भगवान् कर्मयोगको पुनः प्रकट करनेकी बात कहते हैं। यदि उसका अभाव हो गया होता तो पुनः प्रकट नहीं होता। भगवान्के वचनोंमें विरोध भी नहीं आ सकता। इसलिये यहाँ इह नष्टः पदोंका तात्पर्य यह है कि इस अविनाशी कर्मयोगके तत्त्वका वर्णन करनेवाले ग्रन्थोंका और इसके तत्त्वको जाननेवाले तथा उसे आचरणमें लानेवाले श्रेष्ठ पुरुषोंका इस लोकमें अभावसा हो गया है।जहाँसे जो बात कही जाती है वहाँसे वह परम्परासे जितनी दूर चली जाती है उतना ही उसमें स्वतः अन्तर पड़ता चला जाता है यह नियम है। भगवान् कहते हैं कि कल्पके आदिमें मैंने यह कर्मयोग सूर्यसे कहा था फिर परम्परासे इसे राजर्षियोंने जाना। अतः इसमें अन्तर पड़ता ही गया और बहुत समय बीत जानेसे अब यह योग इस मनुष्यलोकमें लुप्तप्राय हो गया है। यही कारण है कि वर्तमानमें इस कर्मयोगकी बात सुनने तथा देखनेमें बहुत कम आती है।कर्मयोगका आचरण लुप्तप्राय होनेपर भी उसका सिद्धान्त (अपने लिये कुछ न करना) सदैव रहता है क्योंकि इस सिद्धान्तको अपनाये बिना किसी भी योग(ज्ञानयोग भक्तियोग आदि) का निरन्तर साधन नहीं हो सकता। कर्म तो मनुष्यमात्रको करने ही पड़ते हैं। हाँ ज्ञानयोगी विवेकके द्वारा कर्मोंको नाशवान् मानकर कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करता है और भक्तियोगी कर्मोंको भगवान्के अर्पण करके कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करता है। अतः ज्ञानयोगी और भक्तियोगीको कर्मयोगका सिद्धान्त तो अपनाना ही पड़ेगा भले ही वे कर्मयोगका अनुष्ठान न करें। तात्पर्य यह कि वर्तमानमें कर्मयोग लुप्तप्राय होनेपर भी सिद्धान्तके रूपमें विद्यमानही है।वास्तवमें देखा जाय तो कर्मयोगमें कर्म लुप्त नहीं हुए हैं प्रत्युत (कर्मोंका प्रवाह अपनी ओर होनेसे) योग ही लुप्त हुआ है। तात्पर्य यह है कि जैसे संसारके पदार्थ कर्म करनेसे मिलते हैं ऐसे ही परमात्मा भी कर्म करनेसे मिलेंगे यह बात साधकोंके अन्तःकरणमें इतनी दृढ़तासे बैठ गयी है कि परमात्मा नित्यप्राप्त हैं इस वास्तविकताकी ओर उनका ध्यान ही नहीं जा रहा है। कर्म सदैव संसारके लिये होते हैं और योग सदैव अपने लिये होता है। योग के लिये कर्म करना नहीं होता वह तो स्वतःसिद्ध है (टिप्पणी प0 210.2)। अतः योग के लिये यह मान लेना कि वह कर्म करनेसे होगा यही योग का लुप्त होना है।मनुष्यशरीर कर्मयोगका पालन करनेके लिये अर्थात् दूसरोंकी निःस्वार्थ सेवा करनेके लिये ही मिला है। परन्तु आज मनुष्य रातदिन अपनी सुखसुविधा सम्मान आदिकी प्राप्तिमें ही लगा हुआ है। स्वार्थके अधिक बढ़ जानेके कारण दूसरोंकी सेवाकी तरफ उसका ध्यान ही नहीं है। इस प्रकार जिसके लिये मनुष्यशरीर मिला है उसे भूल जाना ही कर्मयोगका लुप्त होना है।मनुष्य सेवाके द्वारा पशुपक्षीसे लेकर मनुष्य देवता पितर ऋषि सन्तमहात्मा और भगवान्तकको अपने वशमें कर सकता है। परन्तु सेवाभावको भूलकर मनुष्य स्वयं भोगोंके वशमें हो गया जिसका परिणाम नरकोंमें तथा चौरासी लाख योनियोंमें पड़ जाना है। यही कर्मयोगका छिपना है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.1 4.3।।एवमित्यादि उत्तमम् इत्यन्तम्। एतच्च गुरुपरम्पराप्राप्तमपि (S परम्परायातमपि K परम्परया प्राप्तमपि) अद्यत्वे नष्टमित्यनेन (S N अद्यत्वे तन्नष्ट) भगवान् अस्य ज्ञानस्य दुर्लभतां गौरवं च प्रदर्शयति। भक्तोऽसि मे सखा चेति। त्वं भक्तः मत्परमः सखा च। चशब्देन अन्वाचय उच्यते। तेन यथा भिक्षाटने भिक्षायां प्राधान्यं गवानयने त्वप्राधान्यम् एवं भक्तिरत्र गुरुं प्रति प्रधानं न सखित्वमपीति तात्पर्यार्थं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.2।।यथोक्ते योगे परंपरागते विशिष्टजनसंमतिमुदाहरति एवमिति। तस्य कथं संप्रति वक्तव्यत्वं तदाह स कालेनेति। पूर्वार्धं व्याकरोति एवमित्यादिना। ऐश्वर्यसंपत्ती राजत्वं येषां तेषामेव सूक्ष्मार्थनिरीक्षणक्षमत्वमृषित्वम्। इहेति भगवतोऽर्जुनेन सह संव्यवहारकालो गृह्यते। परंतपेति संबोधनं विभजते आत्मन इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.1 4.3।।उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तारात्मकोऽयमध्याय इति पूर्वसङ्गताध्यायार्थस्थितौ इह प्रकरणभेदप्रतिपादनार्थमाह बुद्धेरिति।एवं ज्ञात्वा 4।15 32 इत्यतः प्राक्तेन ग्रन्थेन बुद्धेः परस्य विष्णोर्माहात्म्यमुच्यते। आद्यस्य प्रकरणस्य पूर्वेण सङ्गतिं सूचयितुंबुद्धेः परस्य इत्युक्तम्।श्रेयान् इत्यतः पूर्वेण कर्मभेदः। निवृत्तस्यकर्मणोऽन्यस्माद्भेदः। निवृत्त एव कर्मण्युपासनायज्ञादिरूपेण वा भेदः। ज्ञानमाहात्म्यं शेषेणेति।इमं विवस्वते योगं इत्युपदेशपरम्पराकथनं प्रकृतानुपयुक्तमित्यतस्तत्तात्पर्यमाह पूर्वेति। पूर्वैरनुष्ठितः।ये मे मतम् 3।31 इत्युक्तेन हेतुना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। अयं धर्मोमयि सर्वाणि 3।30 इत्यनेनोक्तः। योगशब्दोऽप्यनेन व्याख्यातः। न केवलमुपदेशपरम्पराऽत्रोच्यते किन्तु तेषामनुष्ठानमप्युपलक्ष्यते। तच्चेतोऽपि त्वयाऽनुष्ठेयमिति प्रतिपादनार्थमिति भावः।कर्मणैव हि संसिद्धिं 3।20 इत्यनेनैतद्गतार्थमिति चेत् न गृहस्थकर्म त्वया न त्याज्यमित्यस्योपपादनायाचारस्य तत्रोक्तत्वात्। अत्र तु निवृत्तधर्मानुष्ठाने सदाचारस्योच्यमानत्वात्। अत एव तत्राचार इत्येवोक्तमिह त्वयं धर्म इति।लोकेऽस्मिन्द्विविधा 3।3 इत्यत्रोक्तस्यकर्मणैव इत्युदाहरणमुक्तमिति तत्रापि न दोषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.1 4.3।।श्रीमदमलबोधाय नमः। हरिः ँ़। बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन्नध्याये। पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह इममिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.2।।श्री भगवानुवाच यः अयं तव उदितो योगः स केवलं युद्धप्रोत्साहनाय इदानीम् उदित इति न मन्तव्यम्। मन्वन्तरादौ एव निखिलजगदुद्धरणाय परमपुरुषार्थलक्षणमोक्षसाधनतया इमं योगम् अहम् एव विवस्वते प्रोक्तवान्। विवस्वान् च मनवे मनुः इक्ष्वाकवे इति एवं सम्प्रदायपरम्परया प्राप्तम् इमं योगं पूर्वे राजर्षयो विदुः। स महता कालेन तत्तच्छ्रोतृबुद्धिमान्द्याद् विनष्टप्रायः अभूत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.2।। एवं क्षत्रियपरम्पराप्राप्तम् इमं राजर्षयः राजानश्च ते ऋषयश्च राजर्षयः विदुः इमं योगम्। स योगः कालेन इह महता दीर्घेण नष्टः विच्छिन्नसंप्रदायः संवृत्तः। हे परंतप आत्मनः विपक्षभूताः परा इति उच्यन्ते तान् शौर्यतेजोगभस्तिभिः भानुरिव तापयतीति परंतपः शत्रुतापन इत्यर्थः।।दुर्बलानजितेन्द्रियान् प्राप्य नष्टं योगमिममुपलभ्य लोकं च अपुरुषार्थसंबन्धिनम्

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【 Verse 4.3 】

▸ Sanskrit Sloka: स एवायं मया तेऽद्य योग: प्रोक्त: पुरातन: | भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ||

▸ Transliteration: sa evāyaṁ mayā te’dya yogaḥ proktaḥ purātanaḥ | bhakto ’si me sakhā ceti rahasyaṁ hyetaduttamam ||

▸ Glossary: saḥ: that; eva: only; ayaṁ: this; mayā : by Me; te: to you; adya: today; yogaḥ: the science of yoga; proktaḥ: spoken; purātanaḥ: very old; bhaktaḥ: devotee; asi: you are; me: My; sakhā : friend; ca: also; iti: therefore; rahasyaṁ: mystery; hi: because etat: this; uttamaṁ: supreme

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.3 That ancient science of Enlightenment, or entering into eternal bliss, is today taught by me to you because you are my devotee as well as my friend. You will certainly understand the supreme mystery of this science.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.3।।तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है इसलिये वही यह पुरातन योग आज मैंने तुझसे कहा है क्योंकि यह बड़ा उत्तम रहस्य है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.3।। वह ही यह पुरातन योग आज मैंने तुम्हें कहा (सिखाया) क्योंकि तुम मेरे भक्त और मित्र हो। यह उत्तम रहस्य है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.3 सः that? एव even? अयम् this? मया by Me? ते to thee? अद्य today? योगः Yoga? प्रोक्तः has been taught? पुरातनः ancient? भक्तः devotee? असि thou art? मे My? सखा friend? च and? इति thus? रहस्यम् secret? हि for? एतत् this? उत्तमम् best.Commentary This Yoga contains profound and subtle teachings. Hence it is the supreme secret which is revealed by the Lord.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.3. The self-same ancient Yoga has been taught now by Me to you on the ground that you are My devotee and friend too. This is the highest secret.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.3 It is the same ancient Path that I have now revealed to thee, since thou are My devotee and My friend. It is the supreme Secret.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.3 It is the same ancient Yoga which is now taught to you by Me, as you are My devotee and My friend. For, this is a supreme mystery.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.3 That ancient Yoga itself, which is this, has been taught to you by Me today, considering that you are My devotee and friend, For, this (Yoga) is a profound secret.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.3 That same ancient Yoga has been today taught to thee by Me, for thou art My devotee and My friend; it is the supreme secret.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.1-3 Evam etc. upto uttamam. Eventhough it has come down by regular succession of teacher, it is lost now. By this [statement] the Bhagavat indicates the rarity (or difficulty) and respectability of this knowledge. You are My devotee and friend too : You are a devotee having nothing but Me as your final goal and you are a friend too. This 'too' indicates the secondary importance [of the friendship]. Hence, just as in the sentence 'wander begging food [etc]', the importance lies in the act of begging food, but unimportance in the act of bringing the cow; in the same way, in the present case it is devotion towards the teacher that is important and not the friendship also. This is the idea intended here.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.3 It is the same ancient, unchanged Yoga which is now taught to you, who out of friendship and overwhelming devotion have resorted to Me whole-heartedly. The meaning is that it has been taught to you fully with all its accessories. Because it is the most mysterious knowledge declared in the Vedanta, it cannot be known or taught by anyone other than Myself.

In this connection, in order to know the truth about the Lord's descent correctly, Arjuna asked:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.3 Sah, that; puratanah, ancient; yogah, Yoga; eva, itself; ayam, which is this; proktah, has been taught; te, to you; maya, by Me; adya, today; iti, considering that; asi, you are; me, My; bhaktah, devotee; ca sakha, and friend. Hi, for; etat, this Yoga, i.e. Knowledge; is a uttamam, profound; rahasyam, secret. Lest someone should understand that the Lord has said something contradictory, therefore, in order to prevent that (doubt), as though raising a estion,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.3।। यहाँ भगवान् अब तक के उपदिष्ट ज्ञान के प्राचीनता की घोषणा करके रूढ़िवादी विचारकों की शंका का निर्मूलन कर देते हैं।शिष्य के प्रति स्नेह भाव होने पर ही कोई गुरु उत्साह और कुशलता पूर्वक उपदेश दे सकता है। श्रीकृष्ण और अर्जुन के बीच ऐसा ही सम्बन्ध था और भगवान् को यह विश्वास था कि उनके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का वह अनुसरण करेगा। गुरु और शिष्य के बीच इस प्रकार की व्यापारिक व्यवस्था न हो कि तुम शुल्क दो और मैं पढ़ाऊँगा। प्रेम और स्वातन्त्र्य मित्रता और आपसी समझ के वातावरण में ही मन और बुद्धि विकसित होकर खिल उठते हैं। आत्मानुभव का ज्ञान प्रदान करने के लिए आवश्यक गुणों को अर्जुन में देखकर ही श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्होंने इस योग का ज्ञान उसे दिया।यहाँ इस ज्ञान को रहस्य कहने का तात्पर्य केवल इतना ही है कि कोई व्यक्ति कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो फिर भी अनुभवी पुरुष के उपदेश के बिना वह आत्मा के अस्तित्व का कभी आभास भी नहीं पा सकता। समस्त बुद्धि वृत्तियों को प्रकाशित करने वाली आत्मा स्वयं बुद्धि के परे होती है। इसलिये मनुष्य की विवेक सार्मथ्य कभी भी नित्य अविकारी आत्मा को विषय रूप में नहीं जान सकती। यही कारण है कि सत्य के विज्ञान को यहाँ उत्तम रहस्य कहा गया है।किसी के मन में यह शंका न रह जाये कि भगवान् के वाक्यों में परस्पर विरोध है इसलिये अर्जुन मानो आक्षेप करता हुआ प्रश्न पूछता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.3।।स आदित्यं प्रत्युक्त एव पुरातनोऽयं अध्यायद्वयनिरुपितस्ते तुभ्यं मया प्रोक्तो भक्तोऽसि मे सखा चासीति हेतोः। नन्वन्यस्मै कुतो नोच्यते इत्यत आह। रहस्यं गुह्यं हि यस्मादेतज्ज्ञानमुत्तमम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.3।।य एवं पुर्वमुपदिष्टोऽप्यधिकार्यभावाद्विच्छिन्नसंप्रदायोऽभूत् यं बिना च पुरुषार्थो न लभ्यते स एवायं पुरातनोऽनादिगुरुपरंपरागतो योगोऽद्य संप्रदायविच्छेदकाले मयाऽतिस्निग्धेन ते तुभ्यं प्रकर्षेणोक्तः नत्वन्यस्मै कस्मैचित्। कस्मात्। भक्तोऽसि मे सखाचेति। इतिशब्दो हेतौ। यस्मात्त्वं मम भक्तः शरणागतत्वे सत्यत्यन्तप्रीतिमान् सखा च समानवयाः स्निग्धसहायोऽसि सर्वदा भवसि अतस्तुभ्यमुक्त इत्यर्थः। अन्यस्मै कुतो नोच्यते तत्राहि हि यस्मादेतज्ज्ञानमुत्तमं रहस्यं अतिगोप्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.3।।स इति। अद्य संप्रदायविच्छेदे सति। भक्तः शरणागतः सखा प्रीतिविषयः रहस्यं गोप्यमभक्तादिभ्यो न देयम्। अन्यथा निर्वीर्या विद्या भवेदित्यर्थः। तथा च मन्त्रवर्णःविद्या ह वै ब्राह्मणमाजगाम गोपाय मा शेवधिष्टेऽहमस्मि। असूयकायानृजवे अप्रयताय न मा ब्रूया वीर्यवती तथा स्याम् इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.3।।स एवं पुरातनो योगोऽयमिति प्रत्यक्षं मत्सम्बन्धजनकस्ते तुभ्यं प्रोक्तः प्रकर्षेण मत्प्रीत्यात्मकफलयुक्त उक्तः। ननु योग एव फलसाधकश्चेद्भक्तिरस्मदादिभिः किमर्थं कर्तव्या इत्याशङ्क्याह भक्तोऽसीति। त्वं भक्तोऽसि सखा चासीति मे मदीयं रहस्यम्। एतदुत्तमं कर्मयोगादुत्तमम्। हीति निश्चयेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.3।। स एवायमिति। स एवायं योगोऽद्य विच्छिन्ने संप्रदाये सति पुनश्च मया ते तुभ्यमुक्तः। यतस्त्वं मम भक्तोऽसि सखा चेति। अन्यस्मै मया नोच्यते। हि यस्मादिदमुत्तमं रहस्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.1 4.3।।योगिनः कर्म कर्त्तव्यमिति पूर्वं निरूपितम्। तुरीये तु ततोऽध्याये प्रतीत्यर्थं परम्परा।।1।।योगस्य रूप्यते विष्णुर्वक्ता यस्मादभूद्रविः। उपदेशपदं तस्मादुपदेशाश्रयो मनुः।।2।।इक्ष्वाकूणामपि तथा रामचन्द्रावतारभाक्। तस्य नित्यत्वविधया विधानमुपदिश्यते।।3।।ब्रह्मभावेन सर्वत्र फलादिभावत्यागतः। योगी तदाश्रयेणैव विद्ययाऽमृतमश्नुते।।4।।एवं तावदध्यायद्वयेन योगे स्वधर्मो मोक्षसाधनमुपदिष्टः तमेव ब्रह्मभावेन प्रपञ्चयिष्यन् प्रथमं तावत्परम्पराप्राप्तत्वेन स्तुवन् श्रीभगवानुवाच इममिति त्रिभिः। अव्ययफलत्वादव्ययमिमं योगं विवस्वते प्रोक्तवान् न चेमं तव युद्धप्रोत्साहनायैव केवलं वच्मि किन्तु मन्वन्तरादावेव निखिलजगदुद्धरणायेमं प्रोक्तवानस्मीति सम्प्रदायपूर्वकमाह स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.3।।अजितेन्द्रिय और दुर्बल मनुष्योंके हाथमें पड़कर यह योग नष्ट हो गया है यह देखकर और साथ ही लोगोंको पुरुषार्थरहित हुए देखकर वही यह पुराना योग यह सोचकर कि तू मेरा भक्त और मित्र है अब मैंने तुझसे कहा है क्योंकि यह ज्ञानरूप योग बड़ा ही उत्तम रहस्य है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.3।। व्याख्या   भक्तोऽसि मे सखा चेति अर्जुन भगवान्को अपना प्रिय सखा पहलेसे ही मानते थे (गीता 11। 41 42) पर भक्त अभी (गीता 2। 7 में) हुए हैं अर्थात् अर्जुन सखा भक्त तो पुराने हैं पर दास्य भक्त नये हैं। आदेश या उपदेश दास अथवा शिष्यको ही दिया जाता है सखाको नहीं। अर्जुन जब भगवान्के शरण हुए तभी भगवान्का उपदेश आरम्भ हुआ।जो बात सखासे भी नहीं कही जाती वह बात भी शरणागत शिष्यके सामने प्रकट कर दी जाती है। अर्जुन भगवान्से कहते हैं कि मैं आपका शिष्य हूँ इसलिये आपके शरण हुए मुझको शिक्षा दीजिये। इसलिये भगवान् अर्जुनके सामने अपनेआपको प्रकट कर देते हैं रहस्यको खोल देते हैं।अर्जुनका भगवान्के प्रति बहुत विशेष भाव था तभी तो उन्होंने वैभव और अस्त्रशस्त्रोंसे सुसज्जित नारायणी सेना का त्याग करके निःशस्त्र भगवान्को अपने सारथि के रूपमें स्वीकार किया (टिप्पणी प0 211)।साधारण लोग भगवान्की दी हुई वस्तुओंको तो अपनी मानते हैं (जो अपनी हैं ही नहीं) पर भगवान्को अपना नहीं मानते (जो वास्तवमें अपने हैं)। वे लोग वैभवशाली भगवान्को न देखकर उनके वैभवको ही देखते हैं। वैभवको ही सच्चा माननेसे उनकी बुद्धि इतनी भ्रष्ट हो जाती है कि वे भगवान्का अभाव ही मान लेते हैं अर्थात् भगवान्की तरफ उनकी दृष्टि जाती ही नहीं। कुछ लोग वैभवकी प्राप्तिके लिये ही भगवान्का भजन करते हैं। भगवान्को चाहनेसे तो वैभव भी पीछे आ जाता है पर वैभवको चाहनेसे भगवान् नहीं आ सकते। वैभव तो भक्तके चरणोंमें लोटता है परन्तु सच्चे भक्त वैभवकी प्राप्तिके लिये भगवान्का भजन नहीं करते। वे वैभवको नहीं चाहते अपितु भगवान्को ही चाहते हैं। वैभवको चाहनेवाले मनुष्य वैभवके भक्त (दास) होते हैं और भगवान्को चाहनेवाले मनुष्य भगवान्के भक्त होते हैं। अर्जुनने वैभव(नारायणी सेना) का त्याग करके केवल भगवान्को अपनाया तो युद्धक्षेत्रमें भीष्म द्रोण युधिष्ठिर आदि महापुरुषोंके रहते हुए भी गीताका महान् दिव्य उपदेश केवल अर्जुनको ही प्राप्त हुआ और बादमें राज्य भी अर्जुनको मिल गयास एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः इन पदोंका यह तात्पर्य नहीं है कि मैंने कर्मयोगको पूर्णतया कह दिया है प्रत्युत यह तात्पर्य है कि जो कुछ कहा है वह पूर्ण है। आगे भगवान्के जन्मके विषयमें अर्जुनद्वारा किये गये प्रश्नका उत्तर देकर भगवान्ने पुनः उसी कर्मयोगका वर्णन आरम्भ किया है।भगवान् कहते हैं कि सृष्टिके आदिमें मैंने सूर्यके प्रति जो कर्मयोग कहा था वही आज मैंने तुमसे कहा है। बहुत समय बीत जानेपर वह योग अप्रकट हो गया था और मैं भी अप्रकट ही था। अब मैं भी अवतार लेकर प्रकट हुआ हूँ और योगको भी पुनः प्रकट किया है। अतः अनादिकालसे जो कर्मयोग मनुष्योंको कर्मबन्धनसे मुक्त करता आ रहा है वह आज भी उन्हें कर्मबन्धनसे मुक्त कर देगा।रहस्यं ह्येतदुत्तमम् जिस प्रकार अठारहवें अध्यायके छाछठवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनके सामने सर्वगुह्यतम बात प्रकट की कि तू मेरी शरणमें आ जा मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा उसी प्रकार यहाँ उत्तम रहस्य प्रकट करते हैं कि मैंने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश दिया था और वही मैं आज तुझे उपदेश दे रहा हूँ।भगवान् अर्जुनसे मानो यह कहते हैं कि तेरा सारथि बनकर तेरी आज्ञाका पालन करनेवाला होकर भी मैं आज तुझे वही उपदेश दे रहा हूँ जो उपदेश मैंने सृष्टिके आदिमें सूर्यको दिया था। मैं साक्षात् वही हूँ और अभी अवतार लेकर गुप्तरीतिसे प्रकट हुआ हूँ यह बहुत रहस्यकी बात है। इस रहस्यको आज मैं तेरे सामने प्रकट कर रहा हूँ क्योंकि तू मेरा भक्त और प्रिय सखा है।साधारण मनुष्यकी तो बात ही क्या है साधककी दृष्टि भी उपदेशकी ओर अधिक एवं उपदेष्टाकी ओर कम जाती है। इस प्रसङ्गको पढ़नेसुननेपर उपदिष्ट योग पर तो दृष्टि जाती है पर उपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण ही आदि नारायण हैं इसपर प्रायः दृष्टि नहीं जाती। जो बात साधारणतः पकड़में नहीं आती वह रहस्यकी होती है। भगवान् यहाँ रहस्यम् पदसे अपना परिचय देते हैं जिसका तात्पर्य है कि साधककी दृष्टि सर्वथा भगवान्की ओर ही रहनी चाहिये।अपनेआपको आदि उपदेष्टा कहकर भगवान् मानो अपनेको मानवमात्रका गुरु प्रकट करते हैं। नाटक खेलते समय मनुष्य जनताके सामने अपने असली स्वरूपको प्रकट नहीं करता पर किसी आत्मीय जनके सामने अपनेको प्रकट भी कर देता है। ऐसे ही मनुष्यअवतारके समय भी भगवान् अर्जुनके सामने अपना ईश्वरभाव प्रकट कर देते हैं अर्थात् जो बात छिपाकर रखनी चाहिये वह बात प्रकट कर देते हैं। यही उत्तम रहस्य है।कर्मयोगको भी उत्तम रहस्य माना जा सकता है। जिन कर्मोंसे जीव बँधता है (कर्मणा बध्यते जन्तुः) उन्हीं कर्मोंसे उसकी मुक्ति हो जाय यह उत्तम रहस्य है। पदार्थोंको अपना मानकर अपने लिये कर्म करनेसे बन्धन होता है और पदार्थोंको अपना न मानकर (दूसरोंका मानकर) केवल दूसरोंके हितके लिये निःस्वार्थभावपूर्वक सेवा करनेसे मुक्ति होती है। अनुकूलताप्रतिकूलता धनवत्तानिर्धनता स्वस्थतारुग्णता आदि कैसी ही परिस्थिति क्यों न हो प्रत्येक परिस्थितिमें इस कर्मयोगका पालन स्वतन्त्रतापूर्वक हो सकता है। कर्मयोगमें रहस्यकी तीन बातें मुख्य हैं (1) मेरा कुछ नहीं है। कारण कि मेरा स्वरूप सत् (अविनाशी) है और जो कुछ मिला है वह सब असत् (नाशवान्) है फिर असत् मेरा कैसे हो सकता है अनित्यका नित्यके साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है (2) मेरे लिये कुछ नहीं चाहिये। कारण कि स्वरूप(सत्) में कभी अपूर्ति या कमी होती ही नहीं फिर किस वस्तुकी कामना की जाय अनुत्पन्न अविनाशी तत्त्वके लिये उत्पन्न होनेवाली नाशवान् वस्तु कैसे काममें आसकती है (3) अपने लिये कुछ नहीं करना है। इसमें पहला कारण यह है कि स्वयं चेतन परमात्माका अंश है और कर्म जड है। स्वयं नित्यनिरन्तर रहता है पर कर्मका तथा उसके फलका आदि और अन्त होता है। इसलिये अपने लिये कर्म करनेसे आदिअन्तवाले कर्म और फलसे अपना सम्बन्ध जुड़ता है। कर्म और फलका तो अन्त हो जाता है पर उनका सङ्ग भीतर रह जाता है जो जन्ममरणका कारण होता है कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। दूसरा कारण यह है कि करने का दायित्व उसीपर आता है जो कर सकता है अर्थात् जिसमें करनेकी योग्यता है और जो कुछ पाना चाहता है। निष्क्रिय निर्विकार अपरिवर्तनशील और पूर्ण होनेके कारण चेतन स्वरूप शरीरके सम्बन्धके बिना कुछ कर ही नहीं सकता इसलिये यह विधान मानना पड़ेगा कि स्वरूपको अपने लिये कुछ नहीं करना है।तीसरा कारण यह है कि स्वरूप सत् है और पूर्ण है अतः उसमें कभी कमी आती ही नहीं आनेकी सम्भावना भी नहीं नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)। कमी न आनेके कारण उसमें कुछ पानेकी इच्छा भी नहीं होती। इससे स्वतः सिद्ध होता है कि स्वरूपपर करने का दायित्व नहीं है अर्थात् उसे अपने लिये कुछ नहीं करना है।कर्मयोगमें कर्म तो संसारके लिये होते हैं और योग अपने लिये होता है। परन्तु अपने लिये कर्म करनेसे योग का अनुभव नहीं होता। योग का अनुभव तभी होगा जब कर्मोंका प्रवाह पूराकापूरा संसारकी ओर ही हो जाय। कारण कि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ धन सम्पत्ति आदि जो कुछ भी हमारे पास है वह सबकासब संसारसे अभिन्न है संसारका ही है और उन्हें संसारकी सेवामें ही लगाना है। अतः पदार्थ और क्रियारूप संसारसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये ही दूसरोंके लिये कर्म करना है। यही कर्मयोग है। कर्मयोग सिद्ध होनेपर करनेका राग पानेकी लालसा जीनेकी इच्छा और मरनेका भय ये सब मिट जाते हैं।जैसे सूर्यके प्रकाशमें लोग अनेक कर्म करते हैं पर सूर्यका उन कर्मोंसे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता ऐसे ही स्वयं(चेतन) के प्रकाशमें सम्पूर्ण कर्म होते हैं पर स्वयं का उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं होता क्योंकि स्वयं चेतन तथा अपरिवर्तनशील है और कर्म जड तथा परिवर्तनशील हैं। परन्तु जब स्वयं भूलसे उन पदार्थों और कर्मोंके साथ थोड़ासा भी सम्बन्ध मान लेता है अर्थात् उन्हें अपने और अपने लिये मान लेता है तो फिर वे कर्म अवश्य ही उसे बाँध देते हैं।नियतकर्मका किसी भी अवस्थामें त्याग न करना तथा नियत समयपर कार्यके लिये तत्पर रहना भी सूर्यकी अपनी विलक्षणता है। कर्मयोगी भी सूर्यकी तरह अपने नियतकर्मोंको नियत समयपर करनेके लिये सदा तत्पर रहता है।कर्मयोगका ठीकठीक पालन किया जाय तो यदि कर्मयोगीमें ज्ञानके संस्कार हैं तो उसे ज्ञानकी प्राप्ति और यदि भक्तिके संस्कार हैं तो उसे भक्तिकी प्राप्ति स्वतः हो जाती है। कर्मयोगका पालन करनेसे अपना ही नहीं प्रत्युत संसारमात्रका भी परम हित होता है। दूसरे लोग देखें या न देखें समझें या न समझें मानें या न मानें अपने कर्तव्यका ठीकठीक पालन करनेसे दूसरे लोगोंको कर्तव्यपालनकी प्रेरणा स्वतः मिलती है और इस प्रकार सबकी सेवा भी हो जाती है।मार्मिक बात गीतामें भगवान्ने उपदेशके आरम्भमें दूसरे अध्यायके ग्यारहवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतक मनुष्यमात्रके अनुभव(विवेक) का वर्णन किया है। यह मनुष्यमात्रका ही अनुभव नहीं है प्रत्युत जीवमात्रका भी अनुभव है कारण कि मैं हूँ ऐसे अपनी सत्ता(होनेपन) का अनुभव स्थावरजङ्गम सभी प्राणियोंको है। वृक्ष पर्वत आदिको भी इसका अनुभव है पर वे इसे व्यक्त नहीं कर सकते। पशुपक्षियोंमें तो प्रत्यक्ष देखनेमें भी आता है जैसे पशुपक्षी आपसमें लड़ते हैं तो अपनी सत्ताको लेकर ही लड़ते हैं। यदि अपनी अलग सत्ताका अनुभव न हो तो वे लड़ें ही क्यों मनुष्यको तो इसका प्रत्यक्ष अनुभव है ही परन्तु वह न तो अपने अनुभवकी ओर दृष्टि डालता है और न उसका आदर ही करता है। इस अनुभवको ही विवेक या निजज्ञान कहते हैं। यह विवेक सबमें स्वतः है और भगवत्प्रदत्त है।इन्द्रियाँ मन और बुद्धि प्रकृतिके अंश हैं इसलिये इनसे होनेवाला ज्ञान प्रकृतिजन्य है। शास्त्रोंको पढ़सुनकर इन इन्द्रियोंमनबुद्धिके द्वारा जो पारमार्थिक ज्ञान होता है वह ज्ञान भी एक प्रकारसे प्रकृतिजन्य ही है। परमात्मतत्त्व इस प्रकृतिजन्य ज्ञानकी अपेक्षा अत्यन्त विलक्षण है। अतः परमात्मतत्त्वको निजज्ञान (स्वयंसे होनेवाला ज्ञान) से ही जाना जा सकता है। निजज्ञान अर्थात् विवेकको महत्त्व देने से मैं कौन हूँ मेरा क्या है जड और चेतन क्या हैं प्रकृति और परमात्मा क्या हैं यह सब जाननेकी शक्ति आ जाती है। यही विवेक कर्मयोगमें भी काम आता है यह मार्मिक बात है।कर्मयोगमें विवेककी दो बातें मुख्य हैं (1) अपने होनेपन(मैं हूँ) में कोई संदेह नहीं है और (2) अभी जो वस्तुएँ मिली हुई हैं उनपर अपना कोई आधिपत्य नहीं है क्योंकि वे पहले अपनी नहीं थीं और बादमें भी अपनी नहीं रहेंगी। मैं (स्वयं) निरन्तर रहता हूँ और ये मिली हुई वस्तुएँ शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि निरन्तर बदलती रहती हैं और इनका निरन्तर वियोग होता रहता है। जैसे कर्मोंका आरम्भ और समाप्ति होती है ऐसे ही उनके फलका भी संयोग और वियोग होता है। इसलिये कर्मों और पदार्थोंका सम्बन्ध संसारसे है स्वयंसे नहीं। इस प्रकार विवेक जाग्रत् होते ही कामनाका नाश हो जाता है। कामनाका नाश होनेपर स्वतःसिद्ध निष्कामता प्रकट हो जाती है अर्थात् कर्मयोग पूर्णतः सिद्ध हो जाता है।कामनासे विवेक ढक जाता है (गीता 3। 38 39)। स्वार्थबुद्धि भोगबुद्धि संग्रहबुद्धि रखनेसे मनुष्य अपने कर्तव्यका ठीकठीक निर्णय नहीं कर पाता। वह उलझनोंको उलझनसे ही अर्थात् शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिसे ही सुलझाना चाहता है और इसीलिये वह वर्तमान परिस्थितिको बदलनेका ही उद्योग करता है। परन्तु परिस्थितिको बदलना अपने वशकी बात नहीं है इसलिये उलझन सुलझनेकी अपेक्षा अधिकाधिक उलझती चली जाती है। विवेक जाग्रत् होनेपर जब स्वार्थबुद्धि भोगबुद्धि संग्रहबुद्धि नहीं रहती तब अपना कर्तव्य स्पष्ट दीखने लग जाता है और सभी प्रकारकी उलझनें स्वतः सुलझ जाती हैं।बाहरी परिस्थिति कर्मोंके अनुसार ही बनती है अर्थात् वह कर्मोंका ही फल है। धनवत्तानिर्धनता निन्दास्तुति आदरनिरादर यशअपयश लाभहानि जन्ममरण स्वस्थतारुग्णता आदि सभी परिस्थितियाँ कर्मोंके अधीन हैं (टिप्पणी प0 214)। शुभ और अशुभ कर्मोंके फलस्वरूपमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थिति सामने आती रहती है परन्तु उस परिस्थितिसे सम्बन्ध जोड़कर उसे अपनी मानकर सुखीदुःखी होना मूर्खता है। तात्पर्य यह है कि अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिका आना तो कर्मोंका फल है और उससे सुखीदुःखी होना अपनी अज्ञता मूर्खताका फल है। कर्मोंका फल मिटाना तो हाथकी बात नहीं है पर मूर्खता मिटाना बिलकुल हाथकी बात है। जिसे मिटा सकते हैं उस मूर्खताको तो मिटाते नहीं और जिसे बदल सकते नहीं उस परिस्थितिको बदलनेका उद्योग करते हैं यह महान् भूल है इसलिये अपने विवेकको महत्त्व देकर मूर्खताको मिटा देना चाहिये और अनुकूलप्रतिकूल परिस्थितियोंका सदुपयोग करते हुए उनसे ऊँचे उठ जाना अर्थात् असङ्ग हो जाना चाहिये। जो किसी भी परिस्थितिसे सम्बन्ध न जोड़कर उसका सदुपयोग करता है अर्थात् अनुकूल परिस्थितिमें दूसरोंकी सेवा करता है तथा प्रतिकूलपरिस्थितिमें दुःखी नहीं होता अर्थात् सुखकी इच्छा नहीं करता वह संसारबन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है।जिसे मनुष्य नहीं चाहता वह प्रतिकूल परिस्थिति पहले किये अशुभ(पाप) कर्मोंका फल होती है। अतः पापकर्म तो करने ही नहीं चाहिये। किसीको कष्ट पहुँचे ऐसा काम तो स्वप्नमें भी नहीं करना चाहिये। परन्तु वर्तमानमें (नये) पापकर्म न करनेपर भी पुराने पापकर्मोंके फलस्वरूप जब प्रतिकूल परिस्थिति आ जाती है तब अन्तःकरणमें चिन्ता शोक भय आदि भी आ जाते हैं। इसका कारण यह है कि हमने चिन्ताशोकको अधिक परिचित बना लिया है। जैसे बिक्री की हुई गाय पुराने स्थानसे परिचित होनेके कारण बारबार वहीं आ जाती है। परन्तु उसे बारबार नये स्थानपर पहुँचा दिया जाय तो फिर वह पुराने स्थानपर आना छोड़ देती है। ऐसे ही आज और अभी यह दृढ़ विचार कर लें कि आनेजानेवाली परिस्थितिसे सम्बन्ध जोड़कर चिन्ताशोक करना गलती है यह गलती अब हम नहीं करेंगे तो फिर ये चिन्ताशोक आना छोड़ देंगे।विवेककी पूर्ण जागृति न होनेपर भी कर्मयोगीमें एक निश्चयात्मिका बुद्धि रहती है कि जो अपना नहीं है उससे सम्बन्धविच्छेद करना है और सांसारिक सुखोंको न भोगकर केवल सेवा करनी है। इस निश्चयात्मिका बुद्धिके कारण उसके अन्तःकरणमें सांसारिक सुखोंका महत्त्व नहीं रहता। फिर भोगोंमें सुख है ऐसे भ्रममें उसे कोई डाल नहीं सकता। अतः इस एक निश्चयको अटल रखनेसे ही उसका कल्याण हो जाता है। सत्सङ्गस्वाध्यायसे ऐसी निश्चयात्मिका बुद्धिको बल मिलता है। अतः हरेक साधकको कमसेकम ऐसा कल्याणकारी निश्चय अवश्य ही बना लेना चाहिये। ऐसा निश्चय बनानेमें सब स्वाधीन हैं कोई पराधीन नहीं है। इसमें किसीकी किञ्चित् भी सहायताकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि इसमें स्वयं बलवान् है। सम्बन्ध   मैंने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश दिया था और वही मैं आज तुझे उपदेश दे रहा हूँ इसे सुनकर अर्जुनमें स्वाभाविक यह जिज्ञासा जाग्रत् होती है कि जो अभी मेरे समाने बैठे हैं इन भगवान् श्रीकृष्णने सृष्टिके आरम्भमें सूर्यको उपदेश कैसे दिया था अतः इसे अच्छी तरह समझनेके लिये अर्जुन आगेके श्लोकमें भगवान्से प्रश्न करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.1 4.3।।एवमित्यादि उत्तमम् इत्यन्तम्। एतच्च गुरुपरम्पराप्राप्तमपि (S परम्परायातमपि K परम्परया प्राप्तमपि) अद्यत्वे नष्टमित्यनेन (S N अद्यत्वे तन्नष्ट) भगवान् अस्य ज्ञानस्य दुर्लभतां गौरवं च प्रदर्शयति। भक्तोऽसि मे सखा चेति। त्वं भक्तः मत्परमः सखा च। चशब्देन अन्वाचय उच्यते। तेन यथा भिक्षाटने भिक्षायां प्राधान्यं गवानयने त्वप्राधान्यम् एवं भक्तिरत्र गुरुं प्रति प्रधानं न सखित्वमपीति तात्पर्यार्थं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.3।।किमिति वर्तमाने काले प्रकृतो योगः संप्रदायरहितोऽभूदित्याशङ्क्याधिकार्यभावादित्याह दुर्बलानिति। तदेव दौर्बल्यं प्रकृतोपयोगित्वेन व्याकरोति अजितेन्द्रियानिति। यद्यपि कामक्रोधादिप्रधानान्पुरुषान्प्रतिलभ्य कामक्रोधादिभिरभिभूयमानो योगो नष्टो विच्छिन्नसंप्रदायः संजातस्तथापि योगादृते पुरुषार्थो लोकस्य लभ्यते चेत् किमनेन योगोपदेशेनेत्याशङ्क्य यथोक्तयोगाभावे परमपुरुषार्थाप्राप्तेर्मैवमित्याह लोकं चेति। पूर्वो योगो विच्छिन्नसंप्रदायोऽधुना त्वन्यो योगो मदर्थमुच्यतेभगवतेत्याशङ्क्याह स एवेति। कस्मादन्यस्मै यस्मै कस्मैचित्पुरातनो योगो नोक्तो भगवतेत्याशङ्क्याह भक्तोऽसीति। उक्तमधिकारिणं प्रति योगस्य वक्तव्यत्वे हेतुमाह रहस्यं हीति। अनादिवेदमूलत्वाद्योगस्य पुरातनत्वम्। भक्तिः शरणबुद्ध्या प्रीतिस्तया युक्तो निजरूपमवेक्ष्य भक्तो विवक्षितः। समानवयाः स्निग्धः सहायः सखेत्युच्यते। एतदिति कथं योगो विशेष्यते तत्राह ज्ञानमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.1 4.3।।उक्तयोर्ज्ञानकर्मणोरुभयोर्विशेषविस्तारात्मकोऽयमध्याय इति पूर्वसङ्गताध्यायार्थस्थितौ इह प्रकरणभेदप्रतिपादनार्थमाह बुद्धेरिति।एवं ज्ञात्वा 4।15 32 इत्यतः प्राक्तेन ग्रन्थेन बुद्धेः परस्य विष्णोर्माहात्म्यमुच्यते। आद्यस्य प्रकरणस्य पूर्वेण सङ्गतिं सूचयितुंबुद्धेः परस्य इत्युक्तम्।श्रेयान् इत्यतः पूर्वेण कर्मभेदः। निवृत्तस्यकर्मणोऽन्यस्माद्भेदः। निवृत्त एव कर्मण्युपासनायज्ञादिरूपेण वा भेदः। ज्ञानमाहात्म्यं शेषेणेति।इमं विवस्वते योगं इत्युपदेशपरम्पराकथनं प्रकृतानुपयुक्तमित्यतस्तत्तात्पर्यमाह पूर्वेति। पूर्वैरनुष्ठितः।ये मे मतम् 3।31 इत्युक्तेन हेतुना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। अयं धर्मोमयि सर्वाणि 3।30 इत्यनेनोक्तः। योगशब्दोऽप्यनेन व्याख्यातः। न केवलमुपदेशपरम्पराऽत्रोच्यते किन्तु तेषामनुष्ठानमप्युपलक्ष्यते। तच्चेतोऽपि त्वयाऽनुष्ठेयमिति प्रतिपादनार्थमिति भावः।कर्मणैव हि संसिद्धिं 3।20 इत्यनेनैतद्गतार्थमिति चेत् न गृहस्थकर्म त्वया न त्याज्यमित्यस्योपपादनायाचारस्य तत्रोक्तत्वात्। अत्र तु निवृत्तधर्मानुष्ठाने सदाचारस्योच्यमानत्वात्। अत एव तत्राचार इत्येवोक्तमिह त्वयं धर्म इति।लोकेऽस्मिन्द्विविधा 3।3 इत्यत्रोक्तस्यकर्मणैव इत्युदाहरणमुक्तमिति तत्रापि न दोषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.1 4.3।।श्रीमदमलबोधाय नमः। हरिः ँ़। बुद्धेः परस्य माहात्म्यं कर्मभेदो ज्ञानमाहात्म्यं चोच्यतेऽस्मिन्नध्याये। पूर्वानुष्ठितश्चायं धर्म इत्याह इममिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.3।।स एव अयम् अस्खलितस्वरूपः पुरातनः योगः सख्येन अतिमात्रभक्त्या च माम् एव प्रपन्नाय ते मया प्रोक्तः सपरिकरः सविस्तरम् उक्त इत्यर्थः। मदन्येन केन अपि ज्ञातुं वक्तुं वा न शक्यम् यत इदं वेदान्तोदितम् उत्तमं रहस्यं ज्ञानम्।अस्मिन् प्रसङ्गे भगवदवतारयाथात्म्यं यथावद् ज्ञातुम् अर्जुन उवाच

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.3।। स एव अयं मया ते तुभ्यम् अद्य इदानीं योगः प्रोक्तः पुरातनः भक्तः असि मे सखा च असि इति। रहस्यं हि यस्मात् एतत् उत्तमं योगः ज्ञानम् इत्यर्थः।।भगवता विप्रतिषिद्धमुक्तमिति मा भूत् कस्यचित् बुद्धिः इति परिहारार्थं चोद्यमिव कुर्वन् अर्जुन उवाच अर्जुन उवाच

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【 Verse 4.4 】

▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वत: | कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ||

▸ Transliteration: arjuna uvāca | aparaṁ bhavato janma paraṁ janma vivasvataḥ | kathametad vijānīyāṁ tvamādau proktavāniti ||

▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna says; aparaṁ: of recent origin; bhavataḥ: Your; janma: birth; paraṁ: very old; janma: birth; vivasvataḥ: of the Sun god; kathaṁ: how;etat: this; vijānīyāṁ: can I understand; tvaṁ: You; ādau: in the beginning; proktavān: instructed; iti: thus

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.4 Arjuna says: ‘Oh Kṛṣṇa, you are younger to the sun god

Vivasvān by birth. How am I to understand that in the begin- ning you instructed this science to him?’

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.4।।अर्जुन बोले आपका जन्म तो अभीका है और सूर्यका जन्म बहुत पुराना है अतः आपने ही सृष्टिके आदिमें सूर्यसे यह योग कहा था यह बात मैं कैसे समझूँ

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.4।। अर्जुन ने कहा आपका जन्म अपर अर्थात् पश्चात का है और विवस्वान् का जन्म (आपके) पूर्व का है इसलिये यह मैं कैसे जानूँ कि (सृष्टि के) आदि में आपने (इस योग को) कहा था

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.4 अपरम् later? भवतः Thy? जन्म birth? परम् prior? जन्म birth? विवस्वतः of Vivasvan? कथम् how? एतत् this? विजानीयाम् am I to understand? त्वम् Thou? आदौ in the beginning? प्रोक्तवान् taughtest? इत thus.Commentary Thy birth took place later in the hourse of Vasudeva Vivasvan or Vivasvat (the Sun) was born earlier in the beginning of evolution. How am I to believe that Thou taughtest this Yoga in the beginning to Vivasvan? and that Thou? the selfsame person? hast now taught it to me I am not able to reconcile this. Be kind enought to enlighten me? O my Lord.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.4. Arjuna said Your birth is later, [while] the birth of Vivasvat is earlier; how am then to understand that You had properly taught [him this] in the beginnig ?

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.4 Arjuna asked: My Lord! Viwaswana was born before Thee; how then canst Thou have revealed it to him?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.4 Arjuna said Later was your birth, and earlier the birth of Vivasvan. How then am I to understand that you taught it in the beginning?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.4 Arjuna said Your birth was later, (whereas) the birth of Vivasvan was earlier. How am I to understand this that You instructed (him) in the beginning?

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.4 Arjuna said Later on was Thy birth, and prior to it was the birth of Vivasvan (the Sun); how am I to understand that Thou taughtest this Yoga in the beginning?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.4 Even though he knows the nature of the Lord, Arjuna asks this estion in order to publisize it to the world.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.4 Arjuna said According to the calculation of time, your birth was indeed later, contemporaneous with our births. And the birth of Vivasvan was at an earlier time, reckoned as twenty-eight cycles of units of four Yugas each. How can I understand as true that you taught it in the beginning?

Now, there is no contradiction here, for it was ite possible that He had taught Vivasvan in a former birth. The memory of what was done in former births is ite natural for great men. This should not be taken to mean that Arjuna does not know the son of Vasudeva, the speaker, as the Lord of all. Because he (Arjuna) says later on: 'You are the Supreme Brahman, the Supreme Light and the Supreme Purifier. All the seers proclaim You as the eternal Divine Purusa, the Primal Lord, unborn and all-pervading. So also proclaim the divine sage Narada, Asita, Devala and Vyasa. You Yourself also are saying this to me' (10.12-13.)

Arjuna had heard repeatedly from Bhisma and others during the Rajasuya sacrifice of Yudhisthira, 'Krsna alone is the cause of creation and submergence of all the worlds. This universe, consisting of things both animate and inanimate, was created for the sake of Krsna' (Ma. Bha., 2.38.23) 'The entire universe is subservient to Krsna' is the meaning of 'For the sake of Krnsa'.

This apparent contradiction may be explained as follows: Arjuna surely knows the son of Vasudeva as the Bhagavan. Though knowing Him as such, he estions as if he did not know Him. This is his intention. Can the birth of the Lord of all, who is antagonistic to all that is evil and wholly auspicious, omniscient, whose will is always true and whose desires are fulfilled - can the birth of such a Person be of the same nature as that of the gods, men etc., who are subject to Karma? Or can it be false like the illusions of a magical show? Or could it be real? In other words, is the birth of the Supreme Being as the incarnate a real fact or a mere illusory phenomenon produced by a magician's art? If His birth is real, what is the mode of His birth? What is the nature of His body? What is the manner of His birth? What is the nature of this body of His? What is the casue of His birth? To what end is He born? The way in which Sri Krsna answers Arjuna's estion, justifies the construing of his estion in this way.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.4 Bhavatah, Your; janma, was aparam, later, in the abode of Vasudeva; (whereas) the birth vivasvatah, of Visvasvan, the Sun; was param, earlier, in the beginning of creation. Therefore, katham, how; vijanyam, am I to understand; etat, this, as not inconsistent; iti, that; tvam, You, yourself; who proktavan, insturcted this Yoga; adau, in the beginning, are the same person who are now teaching me? By way of demolishing the doubt of fools with regard to Vasudeva, that He has no God-hood and omniscience-to which very purpose was Arjuna's estion-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.4।। इस अध्याय के प्रारम्भिक श्लोक में घटनाओं के काल के विषयों में स्पष्ट विरोधाभास है। श्रीकृष्ण ने कहा कि उन्होंने सृष्टि के प्रारम्भ में इस योग को विवस्वान् को सिखाया। अर्जुन के लिये स्वाभाविक था कि वह श्रीकृष्ण को देवकी के पुत्र और गोकुल के मुरलीधर कृष्ण के रूप में ही जाने। श्रीकृष्ण की निश्चित जन्म तिथि थी और वे अर्जुन के ही समकालीन थे। इस दृष्टि से उनका सूर्य के प्रति उपदेश करना असंभव था क्योंकि सम्पूर्ण ग्रहों की सृष्टि के पूर्व सूर्य का अस्तित्व सिद्ध है।गीतोपदेष्टा भगवान् श्रीकृष्ण को कोई मनुष्य न समझ ले इसलिये व्यासजी भगवान् के ही मुख से घोषणा करवाते हैं कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.4।।भगवति वासुदेवे मनुष्यवत् स्थिते याऽनीश्वरत्वासर्वज्ञत्वशङ्का मूर्खाणां तत्परिहाराय चोद्यमिव कुर्वन्नर्जुन उवाच। भवतो जन्मापरं अर्वाचीनं वसुदेवग्रहे। विवस्वतो जन्म परं पूर्वं सर्गादौ। तत्तस्मादेतज्ज्ञानं त्वमेवादौ प्रोक्तवानिति कथं विजानीयाम्। यत्तु अपरमतिहीनं न मनुष्यत्वात् परमुत्कृष्टं च देवत्वात् इति तत्तु त्वमादौ प्रोक्तवानिति वाक्यशेषविरोधादुपेक्ष्यम्। भाष्यस्योपलक्षणपरत्वेन तदविरोधेन वा ग्राह्यम्। आदित्यं प्रत्युपदेष्टा सर्वज्ञ ईश्वरस्त्वं तु तदन्यत्वादनीश्वरः। तत एवासर्वज्ञश्चेत्येवं तस्माद्विरुद्धमिदमहमादौ प्रोक्तवानिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.4।।या भगवति वासुदेवे मनुष्यत्वेनासर्वज्ञत्वानित्यत्वाशङ्का मूर्खाणां तामपनेतुमनुवदन्नर्जुन आशङ्कते अपरमल्पकालीनमिदानींतनं वसुदेवगृहे भवतो जन्म शरीरग्रहणं विहीनं च मनुष्यत्वात् परं बहुकालीनं सर्गादिभवं उत्कृष्टं च देवत्वात् विवस्वतो जन्म। अत्रात्मनो जन्माभावस्य प्राग्व्युत्पादितत्वाद्देहाभिप्रायेणैवार्जुनस्य प्रश्नः। अतः कथमेतद्विजानीयामतिविरुद्धार्थतया। एतच्छब्दार्थमेव विवृणोति त्वमादौ प्रोक्तवानिति। त्वमिदानींतनो मनुष्योऽसर्वज्ञः सर्गादौ पूर्वतनाय सर्वज्ञायादित्याय प्रोक्तवानिति विरुद्धार्थमेतदिति भावः। अत्रायं निर्गलितोऽर्थः एतद्देहावच्छिन्नस्य तव देहान्तरावच्छेदेन वा आदित्यं प्रत्युपदेष्टृत्वं एतद्देहेन वा। नाद्यः। जन्मान्तरानुभूतस्यासर्वज्ञेन स्मर्तुमशक्यत्वात्। अन्यथा ममापि जन्मान्तरानुभूतस्मरणप्रसङ्गः। तव मम च मनुष्यत्वेनासर्वज्ञत्वाविशेषात्। तदुक्तमभियुक्तैःजन्मान्तरानुभूतं च न स्मर्यते इति। नापि द्वितीयः। सर्गादाविदानींतनस्य देहस्यासद्भावात्। तदेवं देहान्तरेण सर्गादौ सद्भावसंभवेऽपीदानीं तत्स्मरणानुपपत्तिः। अनेन देहेन स्मरणोपपत्तावपि सर्गादौ सद्भावानुपपत्तिरित्यसर्वज्ञत्वानित्यत्यत्वाभ्यां द्वावर्जुनस्य पूर्वपक्षौ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.4।।भगवद्देहस्य वसुदेवादुत्पत्तिं मन्वानोऽर्जुन उवाच अपरमिति। अपरमर्वाक्कालिकं परं बहुकालिकं विजानीयाम्। यद्यपि शब्दादयमर्थो ज्ञातस्तथापि विरुद्धस्य वाक्यस्याबोधकत्वात्कथमेतद्विजानीयामित्युक्तम्। पदयोजना स्पष्टा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.4।।एवं श्रुत्वाऽर्जुनो भगवतोऽलौकिकस्वरूपत्वाद्विवस्वतो लौकिकत्वात् किमर्थं भक्तिं विहाय कर्मयोगं भगवानुक्तवानिति जिज्ञासया पृच्छति अपरमिति। मवतो जन्म प्राकट्यमपरं न विद्मते परमुत्कृष्टं पूर्वं वा यस्मात्तादृशम् विवस्वतो जन्म परमुत्कृष्टं पश्चाज्जातं वा इति हेतोस्त्वमादौ तस्मै योगं कथं किमभिप्रायेण प्नोक्तवानेतदहं विजानीयां जानामि तथा वदेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.4।। भगवतो विवस्वन्तं प्रति योगोपदेशासंभवं पश्यन्नर्जुन उवाच अपरमिति। अपरमर्वाचीनं तव जन्म परं प्राक्कालीनं विवस्वतो जन्म तस्मात्तवाधुनिकत्वाच्चिरंतनाय विवस्वते त्वमादौ योगं प्रोक्तवानित्येतत्कथमहं विजानीयां ज्ञातुं शक्नुयाम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.4।।अत्र भगवदवतारयाथात्म्यगर्भितं प्रश्नं चिकीर्षुर्विवस्वन्तं प्रति त्वदुपदेशो न सम्भवतीति मिषेणार्जुन उवाच अपरमिति। अर्वाचीनं परमं कालीनं सूर्यस्य जन्म। अत

Chapter 4 (Part 3)

एतत्सम्भावनारूपं कथं विजानीयामिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.4।।भगवान्ने असङ्गत कहा ऐसी धारणा किसीकी न हो जाय अतः उसको दूर करनेके लिये शङ्का करता हुआसा अर्जुन बोला आपका जन्म तो अर्वाचीन है अर्थात् अभी वसुदेवके घरमें हुआ है और सूर्यकी उत्पत्ति पहले सृष्टिके आदिमें हुई थी। तब मैं इस बातको अविरुद्धार्थयुक्त ( सुसङ्गत ) कैसे समझूँ कि जिन आपने इस योगको आदिकालमें कहा था वही आप मुझसे कह रहे हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.4।। व्याख्या   अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः आपका जन्म तो अभी कुछ वर्ष पूर्व श्रीवसुदेवजीके घर हुआ है पर सूर्यका जन्म सृष्टिके आरम्भमें हुआ था। अतः आपने सूर्यको कर्मयोग कैसे कहा था अर्जुनके इस प्रश्नमें तर्क या आक्षेप नहीं है प्रत्युत जिज्ञासा है। वे भगवान्के जन्मसम्बन्धी रहस्यको सुगमतापूर्वक समझनेकी दृष्टिसे ही प्रश्न करते हैं क्योंकि अपने जन्मसम्बन्धी रहस्यको प्रकट करनेमें भगवान् ही सर्वथा समर्थ हैं।कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति मैं आपको सृष्टिके आदिमें उपदेश देनेवाला कैसे जानूँ अर्जुनके प्रश्नका तात्पर्य यह है कि सूर्यको उपदेश देनेके बादसे सूर्यवंशकी (मनु इक्ष्वाकु आदि) कई पीढ़ियाँ बीत चुकी हैं और आपका अवतार अभीका है अतः आपने सृष्टिके आदिमें सूर्यको उपदेश कैसे दिया था यह बात मैं अच्छी तरह समझना चाहता हूँ। सूर्य तो अभी भी है इसलिये उसे अभी भी उपदेश दिया जा सकता है। परन्तु आपने सूर्यको उपदेश देनेके बाद सूर्यवंशकी परम्पराका भी वर्णन किया है जिससे यह सिद्ध होता है कि आपने सूर्यको उपदेश अभी नहीं दिया है। अतः आपने सूर्यको कल्पके आदिमें कैसे उपदेश दिया था  सम्बन्ध   अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें अपना अवताररहस्य प्रकट करनेके लिये भगवान् पहले अपनी सर्वज्ञताका दिग्दर्शन कराते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.4।।अपरमिति। अर्जुनो भगवत्स्वरूपं जानन्नपि लोके स्फुटीकर्तुं पृच्छति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.4।।भगवति लोकस्यानीश्वरत्वशङ्कां निवर्तयितुं चोद्यमुद्भावयति भगवतेति। परिहारार्थं भगवतो मनुष्यवदवस्थितस्यानीश्वरत्वमुपेत्य तद्वचने शङ्कितविप्रतिषेधस्येतिशेषः। भगवतो निजरूपमुपेत्य नेदं चोद्यंकिंतु लीलाविग्रहं गृहीत्वेति वक्तुं चोद्यमिवेत्युक्तम्। एतच्छब्दार्थमेव स्फुटयति यस्त्वमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.4।।ननुनत्वेवाहं 2।12 इत्यादिना सर्वप्रकारेणोत्पत्तिविनाशराहित्यमुक्तं भगवतः तच्छ्रुत्वा कथंअपरं इति पृच्छति इत्यत आह मयीति। तन्माहात्म्यमित्युपलक्षणम्। आदितः प्रमितिकारणतः।मयि सर्वाणि 3।30 इत्यत्र परमेश्वरस्य माहात्म्यं पूज्यत्वादिलक्षणमुक्तम्। अर्जुनस्य पूजकत्वादिकम्। तमिममीश्वरजीवयोः पूज्यपूजकत्वादिना भगवताऽङ्गीकृतं भेदं प्रमाणेन ज्ञातुमेवं पृच्छतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.4।।मयि सर्वाणि 3।30 इत्युक्तम्। तन्माहात्म्यमादितो ज्ञातुं पृच्छति अपरमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.4।।अर्जुन उवाच कालसंख्यया अपरम् अस्मज्जन्मसमकालमं हि भवतो जन्म विवस्वतः च कालसंख्यया परम् अष्टाविंशतिचतुर्युगसंख्यातम् त्वम् एव आदौ प्रोक्तवान् इति कथम् एतद् असम्भावनीयं विशेषण यथार्थं जानीयाम्।ननु जन्मान्तरेण अपि वक्तुं शक्यम् जन्मान्तरकृतस्य महतां स्मृतिः च युज्यते। इति अत्र न कश्चिद् विरोधः। न च असौ वक्तारम् एनं वसुदेवतनयं सर्वेश्वरं न जानाति यत एवं वक्ष्यति परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्।।आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा। असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे।। (10।1213) इति। युधिष्ठिरराजसूयादिषु भीष्मादिभ्यः च असकृत् श्रुतम् कृष्ण एव हि लोकानामुत्पत्तिप्रभवाप्ययः। कृष्णस्य हि कृते भूतमिदं विश्वं चराचरम्।। (महा0 सभा0 38।23) इत्येवमादिषु कृष्णस्य हि कृते इति कृष्णस्य शेषभूतम् इदं कृत्स्नं जगद् इत्यर्थः।अत्र उच्यते जानाति एव अयं भगवन्तं वसुदेवतनयं पार्थः। जानतः अपि अजानतः इव पृच्छतः अयम् आशयः निखिलहेयप्रत्यनीककल्याणैकतानस्य सर्वेश्वरस्य सर्वज्ञस्य सत्यसंकल्पस्य च अवाप्तसमस्तकामस्य कर्मपरवशदेवमनुष्यादिसजातीयं जन्म किम् इन्द्रजालादिवत् मिथ्या किं वा सत्यम् सत्यत्वे च कथं जन्मप्रकारः किमात्मकः अयं देहः कश्च जन्महेतुः कदा च जन्म किमर्थं वा जन्म इति परिहारप्रकारेण प्रश्नार्थो विज्ञायते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.4।। अपरम् अर्वाक् वसुदेवगृहे भवतो जन्म। परं पूर्वं सर्गादौ जन्म उत्पत्तिः विवस्वतः आदित्यस्य। तत् कथम् एतत् विजानीयाम् अविरुद्धार्थतया यः त्वमेव आदौ प्रोक्तवान् इमं योगं स एव इदानीं मह्यं प्रोक्तवानसि इति।।या वासुदेवे अनीश्वरासर्वज्ञाशङ्का मूर्खाणाम् तां परिहरन् श्रीभगवानुवाच यदर्थो ह्यर्जुनस्य प्रश्नः श्रीभगवानुवाच

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【 Verse 4.5 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन | तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परन्तप ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | bahuni me vyatītāni janmāni tava cārjuna | tānyahaṁ veda sarvāṇi na tvaṁ vettha parantapa ||

▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: The Lord says; bahūni: many; me: of Mine; vyatī tā ni: have passed; janmāni: births; tava: yours; ca: also; arjuna: O Arjuna; tā ni: all of those; ahaṁ: I; veda: do know; sarvāṇi: all; na: not; tvaṁ: yourself; vettha: know; paraṁtapa: O scorcher of the foes

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.5 Bhagavān says: Many many births both you and I have passed. I can remember all of them, but you cannot, O Parantapa!

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.5।।श्रीभगवान् बोले हे परन्तप अर्जुन मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ पर तू नहीं जानता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.5।। श्रीभगवान् ने कहा हे अर्जुन मेरे और तुम्हारे बहुत से जन्म हो चुके हैं (परन्तु) हे परन्तप उन सबको मैं जानता हूँ और तुम नहीं जानते।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.5 बहूनि may? मे My? व्यतीतानि have passed away? जन्मानि births? तव thy? च and? अर्जुन O Arjuna? तानि them? अहम् I? वेद know? सर्वाणि all? न not? त्वम् thou? वेत्थ knowest? परन्तप O Parantapa.Commentary You have no intuitional knowledge. The eye of wisdom has not been opened in you on account of your past actions. So your power of vision is limited and therefore you do not know your previous births. But I know them because I am omniscient.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.5. The Bhagavat said O Arjuna, many births of Mine, as well as of yours have passed. All of them I do know, but you do not, O scorcher of foes !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.5 Lord Shri Krishna replied: I have been born again and again, from time to time; thou too,O Arjuna! My births are known to Me, but thou knowest not thine.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.5 The Lord said Many births of Mine have passed, O Arjuna, and so is it with you also. I know them all, but you do not know them.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.5 The Blessed Lord said O Arjuna, many lives of Mine have passed, and so have yours. I know them all, (but) you know not, O scorcher of enemies!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.5 The Blessed Lord said Many births of Mine have passed as well as of thine, O Arjuna; I know them all but thou knowest not, O Parantapa (scorcher of foes).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.5 See Comment under 4.9

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.5 The Lord said By this, the reality of the Lord's birth is declared in the sentence, 'Many births of Mine have passed.' 'So is it with you' is added by way of illustration.

The mode of incarnation, the reality of His body and the cause of His birth are explained in the following verse.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.5 O Arjuna, bahuni, many; janmani, lives; me, of Mine; vyatitani, have passed; tava ca, and so have yours. Aham, I; veda know; tani, them; sarvani, all; (but) tvam, you; va vetta, know not, due to your power of understanding being obstructed by righteousness, unrighteousness, etc. However, parantapa, O scorcher of foes; aham, I know, possessing as I do unobstructed power of knowledge, because by nature I am enternal, pure, enlightened and free. 'In that case, how, in spite of the absence of righteousness and unrighteousness, can there be any birth for You who are the eternal God?' That is beng answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.5।। हिन्दू शास्त्रों के आचार्य सदैव शिष्यों के मन में उठने वाली सभी संभाव्य शंकाओं का निरसन करने को तत्पर रहते हैं। हम उनमें असीम घैर्य और शिष्यों की कठिनाइयों को समझने की क्षमता के साक्षात् दर्शन कर सकते हैं। यहाँ श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाने का प्रयत्न करते हैं कि किस प्रकार वे अनन्त स्वरूप हैं और सृष्टि के प्रारम्भ में कैसे उन्होंने सूर्य देवता को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया।पुराणों में वर्णित अवतार का सिद्धान्त इस प्रकरण में विस्तारपूर्वक बताया गया है। अनेक विदेशियों को हिन्दू दर्शन का यह प्रकरण और हिन्दुओं का अवतारवाद में विश्वास अत्यन्त भ्रामक प्रतीत हो सकता है। अनेक विद्वानों ने इस प्रकार के मत प्रगट भी किये हैं परन्तु मैक्समूलर के समान संभवत किसी ने इतनी तीब्र आलोचना नहीं की होगी। अवतार के विषय में वे कहते हैं यह आध्यात्मिक बकवास है।परन्तु यदि हम सृष्टिसम्बन्धी वेदान्त के सिद्धान्त को जानते हुये इस पर विचार करें तो अवतारवाद को समझना कठिन नहीं होगा। एक अन्य स्थान पर मनुष्य के पतन के प्रकरण में यह विस्तार पूर्वक बताया गया है कि सत्वगुणप्रधान उपाधि के माध्यम से व्यक्त होकर अनन्तस्वरूप परमार्थ सत्य ब्रह्म सर्वशक्तिमान् ईश्वर के रूप में प्रकट होता है। इसी अध्याय में आगे श्रीकृष्ण बतायेंगे कि किस प्रकार वे स्वेच्छा और पूर्ण स्वातन्त्र्य से उपाधियों को धारण करके मनुष्यों के मध्य रहते हुए कार्य करते हैं जो उनकी दृष्टि से लीलामात्र है। उन्हें कभी भी अपने दिव्य स्वरूप का विस्मरण नहीं होता।किसी एक भी प्राणी का जन्म केवल संयोग ही नहीं है। डार्विन के विकास के सिद्धान्त के अनुसार भी प्रत्येक व्यक्ति जगत में विकास की सीढी पर उन्नति करने के फलस्वरूप आया है। प्रत्येक देहधारी का जीवन उस जीव के दीर्घ आत्मचरित्र को दर्शाता है। असंख्य और विभिन्न प्रकार के शरीरों में वास करने के पश्चात् ही जीव वर्तमान विकसित स्थिति को प्राप्त करता हुआ है। प्रत्येक नवीन देह में जीव को पूर्व जन्मों का विस्मरण हो जाता है किन्तु वह पूर्व जन्मों में अर्जित वासनाओं से युक्त रहता है। परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण की स्थिति एक जीव के समान नहीं समझनी चाहिये। वे अपनी सर्वज्ञता के कारण अर्जुन के और स्वयं के अतीत को जानते हैं अत उन्होंन्ो कहा मैं उन सबको जानता हूँ और तुम नहीं जानते।आपके लिये धर्मअधर्म के अभाव में जन्म की क्या आवश्यकता है आपका जन्म कैसे सम्भव है इसका उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.5।।मूर्खाणां शङ्कां परिहरन् श्रीभगवानुवाच। बहूनि मे तवान्यस्य च जन्मानि व्यतीतानि तानि सर्वाण्यहं शुद्धबुद्धक्तस्वभावत्वादनावरणज्ञानशक्तिर्वेद जानामि। त्वं तु न वेत्थ। धर्माधर्मादिप्रतिबद्धज्ञानशक्तित्वान्न जानासि। इत्येतत्सूचनार्थमेव संबोधनद्वयम्। हे अर्जुन शुद्धधर्मवत्त्वाच्छुद्ध हे परंतप परमात्मानमन्यान्वा अधर्मेण तापयतीति तथेति विवक्षणात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.5।।तत्र सर्वज्ञत्वेन प्रथमस्य परिहारं कथयति श्रीभगवान् जन्मानि लीलादेहग्रहणानि लोकदृष्ट्यभिप्रायेणादित्यस्योदयवन्मे मम बहूनि व्यतीतानि। तव चाज्ञानिनः कर्मार्जितानि देहग्रहणानि। तवचेत्युपलक्षणमितरेषामपि जीवानां जीवैक्याभिप्रायेण वा। हे अर्जुन श्लेषेण अर्जुनवृक्षनाम्रा संबोधयन्नावृतज्ञानत्वं सूचयति। तानि जन्मान्यहं सर्वज्ञः सर्वशक्तिरीश्वरो वेद जानामि। सर्वाणि मदीयानि त्वदीयान्यन्यदीयानि च। न त्वमज्ञो जीवस्तिरोभूतज्ञानक्तिर्वेत्थ न जानासि स्वीयान्यपि किं पुनः परकीयाणि। हे परंतप परं शत्रुं भेददृष्ट्या परिकल्प्य हन्तुं प्रवृत्तोऽसीति विपरीतदर्शित्वाद्भ्रान्तोऽसीति सूचयति। तदनेन संबोधनद्वयेनावरणविक्षेपौ द्वावप्यज्ञानधर्मौ दर्शितौ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.5।।स्वदेहस्याजत्वं साधयितुं स्वस्य सर्वज्ञत्वं तावदाह बहूनीति। स्पष्टार्थः श्लोकः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.5।।अत्रोत्तरमाह भगवान् बहूनीति। मे जन्मानि बहूनि सन्ति। कीदृशानि अव्यतीतानि नित्यानीत्यर्थः। हे अर्जुन तव च जन्मानि बहूनि व्यतीतानि तानि सर्वाणि तव जन्मान्यहं वेद जानामि यतो यदर्थं यत्र यत्रोत्पादितोऽसि। हे परन्तप उत्कृष्टतपोबलयुक्त तानि मदीयानि त्वं न वेत्थ न जानासि। परन्तपेति सम्बोधनेन तपोबलेन न भगवान् ज्ञायते किन्तु तत्कृपयैवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.5।।इति पृष्टवन्तमर्जुनं रूपान्तरेणोपदिष्टवानित्यभिप्रायेणोत्तरं श्रीभगवानुवाच बहूनीति। मम बहूनि जन्मानि तव च व्यतीतानि। तानि सर्वाण्यहं वेद जानामि अलुप्तविद्याशक्तित्वात्। त्वं तु न जानासि अविद्यावृतत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.5।।रूपान्तरेणोपदिष्टवानित्यवतारस्वरूपतः संशयं परिहरन् श्रीभगवानुवाच बहूनीति। मे जन्मान्यवतारा बहवो व्यतीताः। अनेनावताराणां हेतुभूतमात्मानमवतारिणं सर्वदा सर्वांशपरिपूर्णमुपदिशति। तान्यहं जानामि न तु त्वं इति नित्यसिद्धज्ञानादिशक्तिमत्त्वं स्वस्योपदिष्टम्।तव च जन्मानि इति नराद्यवताराभिप्रायेणोक्तम्। दृष्टान्तवद्वेति केचित्। अनेन सर्वज्ञासर्वज्ञत्वाभ्यां जीवेश्वरयोरेवं भेदतः स्वरूपं ब्रह्मवाद इति दर्शितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.5।।भगवान् श्रीवासुदेवके विषयमें मूर्खोंकी जो ऐसी शङ्का है कि ये ईश्वर नहीं हैं सर्वज्ञ नहीं हैं तथा जिस शङ्काको दूर करनेके लिये ही अर्जुनका यह प्रश्न है उसका निवारण करते हुए श्रीभगवान् बोले हे अर्जुन मेरे और तेरे पहले बहुत जन्म हो चुके हैं। उन सबको मैं जानता हूँ तू नहीं जानता क्योंकि पुण्यपाप आदिके संस्कारोंसे तेरी ज्ञानशक्ति आच्छादित हो रही है। परंतु मैं तो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभाववाला हूँ इस कारण मेरी ज्ञानशक्ति आवरणरहित है इसलिये हे परन्तप मैं ( सब कुछ ) जानता हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.5।। व्याख्या   तीसरे श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनको अपना भक्त और प्रिय सखा कहा था इसलिये पीछेके श्लोकमें अर्जुन अपने हृदयकी बात निःसंकोच होकर पूछते हैं। अर्जुनमें भगवान्के जन्मरहस्यको जाननेकी प्रबल जिज्ञासा उत्पन्न हुई है इसलिये भगवान् उनके सामने मित्रताके नाते अपने जन्मका रहस्य प्रकट कर देते हैं। यह नियम है कि श्रोताकी प्रबल जिज्ञासा होनेपर वक्ता अपनेको छिपाकर नहीं रख सकता। इसलिये सन्तमहात्मा भी अपनेमें विशेष श्रद्धा रखनेवालोंके सामने अपनेआपको प्रकट कर सकते हैं (टिप्पणी प0 215) गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं। आरत अधिकारी जहँ पावहिं।।(मानस 1। 110। 1)बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन समयसमयपर मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं। परन्तु मेरा जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आगे छठे श्लोकमें करेंगे) और तेरा (जीवका) जन्म और तरहका है (जिसका वर्णन आठवें अध्यायके उन्नीसवें और तेरहवें अध्यायके इक्कीसवें एवं छब्बीसवें श्लोकमें करेंगे)। तात्पर्य यह कि मेरे और तेरे बहुतसे जन्म होनेपर भी वे अलगअलग प्रकारके हैं।दूसरे अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने अर्जुनसे कहा था कि मैं (भगवान्) और तू तथा ये राजालोग (जीव) पहले नहीं थे और आगे नहीं रहेंगे ऐसा नहीं है। तात्पर्य यह है कि भगवान् और उनका अंश जीवात्मा दोनों ही अनादि और नित्य हैं।तान्यहं वेद सर्वाणि संसारमें ऐसे जातिस्मर जीव भी होते हैं जिनको अपने पूर्वजन्मोंका ज्ञान होता है। ऐसे महापुरुष युञ्जान योगी कहलाते हैं जो साधना करके सिद्ध होते हैं। साधनामें अभ्यास करतेकरते इनकी वृत्ति इतनी तेज हो जाती है कि ये जहाँ वृत्ति लगाते हैं वहींका ज्ञान इनको हो जाता है। ऐसे योगी कुछ सीमातक ही अपने पुराने जन्मोंको जान सकते हैं सम्पूर्ण जन्मोंको नहीं। इसके विपरीत भगवान् युक्तयोगी कहलाते हैं जो साधना किये बिना स्वतःसिद्ध नित्य योगी हैं। जन्मोंको जाननेके लिये उन्हें वृत्ति नहीं लगानी पड़ती प्रत्युत उनमें अपने और जीवोंके भी सम्पूर्ण जन्मोंका स्वतःस्वाभाविक ज्ञान सदा बना रहता है। उनके ज्ञानमें भूत भविष्य और वर्तमानका भेद नहीं है प्रत्युत उनके अखण्ड ज्ञानमें सभी कुछ सदा वर्तमान ही रहता है (गीता 7। 26)। कारण कि भगवान् सम्पूर्ण देश काल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदिमें पूर्णरूपसे विद्यमान रहते हुए भी इनसे सर्वथा अतीत रहते हैं।मैं उन सबको जानता हूँ भगवान्के इस वचनसे साधकोंको एक विशेष आनन्द आना चाहिये कि हम भगवान्की जानकारीमें हैं भगवान् हमें निरन्तर देख रहे हैं हम कैसे ही क्यों न हों पर हैं भगवान्के ज्ञानमें।न त्वं वेत्थ परंतप जन्मोंको न जाननेमें मूल हेतु है अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका आकर्षण महत्त्व होना। इसीके कारण मनुष्यका ज्ञान विकसित नहीं होता। अर्जुनके अन्तःकरणमें नाशवान् पदार्थोंका व्यक्तियोंका महत्त्व था इसीलिये वे कुटुम्बियोंके मरनेके भयसे युद्ध नहीं करना चाहते थे। पहले अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें अर्जुनने कहा था कि जिनके लिये हमारी राज्य भोग और सुखकी इच्छा है वे ही ये कुटुम्बी प्राणोंकी और धनकी आशा छोड़कर युद्धमें खड़े हैं इससे सिद्ध होता है कि अर्जुन राज्य भोग और सुख चाहते थे। अतः नाशवान् पदार्थोंकी कामना होनेके कारण वे अपने पूर्वजन्मोंको नहीं जानते थे।ममताआसक्तिपूर्वक अपने सुखभोग और आरामके लिये धनादि पदार्थोंका संग्रह करना परिग्रह कहलाताहै। परिग्रहका सर्वथा त्याग करना अर्थात् अपना सुख आराम आदिके लिये किसी भी वस्तुका संग्रह न करना अपरिग्रह कहलाता है। अपरिग्रहकी दृढ़ता होनेपर पूर्वजन्मोंका ज्ञान हो जाता है अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथन्तासंबोधः। (पातञ्जलयोगदर्शन 2। 39)संसार (क्रिया और पदार्थ) सदैव परिवर्तनशील और असत् है अतः उसमें अभाव (कमी) होना निश्चित है। अभावरूप संसारसे सम्बन्ध जोड़नेके कारण मनुष्यको अपनेमें भी अभाव दीखने लग जाता है। अभाव दीखनेके कारण उसमें यह कामना पैदा हो जाती है कि अभावकी तो पूर्ति हो जाय फिर नया और मिले। इस कामनाकी पूर्तिमें ही वह दिनरात लगा रहता है। परन्तु कामनाकी पूर्ति होनेवाली है नहीं। कामनाओँके कारण मनुष्य बेहोशसा हो जाता है। अतः ऐसे मनुष्यको अनेक जन्मोंका ज्ञान तो दूर रहा वर्तमान कर्तव्यका भी ज्ञान (क्या कर रहा हूँ और क्या करना चाहिये) नहीं होता। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि मेरे और तेरे बहुतसे जन्म हो चुके हैं। अब आगेके श्लोकमें भगवान् अपने जन्म(अवतार) की विलक्षणता बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.5 4.9।।बहूनि इत्यादि अर्जुन इत्यन्तम्। श्रीभगवान् किल पूर्णषाड्गुण्यत्वात् शरीरसंपर्कमात्ररहितोऽपि स्थितिकारित्वात् कारुणिकतया आत्मांशं सृजति। आत्मा पूर्णषाड्गुण्यः अंशः उपकारकत्वेन अप्रधानभूतो ( N omit अ) यत्र तत् आत्मांशं शरीरं गृह्णाति इत्यर्थः। अत एवास्य जन्म दिव्यम् यत आत्ममायया योगप्रज्ञया स्वस्वातन्त्रयशक्त्या ( omits स्व) आरब्धम् न कर्मभिः। कर्मापि दिव्यम् फलदानासमर्थत्वात्। यश्चैवमेतत्तत्त्वं वेत्ति आत्मन्यप्येवमेव मन्यते सोऽवश्यं भगवद्वासुदेवतत्त्वं जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.5।।भगवत्यज्ञानान्मनुष्यत्वशङ्कां वारयितुं प्रतिवचनमवतारयति या वासुदेव इति। अन्यथाप्रश्ने कथमाशङ्कान्तरं परिहर्तुं भगवद्वचनमित्याशङ्क्य प्रश्नप्रतिवचनयोरेकार्थत्वमाह यदर्थो हीति। यस्य शङ्कितस्य विरोधस्य परिहारार्थो यस्य प्रश्नस्तमेव परिहारं वक्तुं भगवद्वचनमित्यर्थः। अतीतानेकजन्मवत्त्वं ममैव नासाधारणं किंतु सर्वप्राणिसाधारणमित्याह तव चेति। तानि प्रमाणाभावान्न प्रतिभान्तीत्याशङ्क्याह तानीति। ईश्वरस्यानावृतज्ञानत्वादित्यर्थः। किमिति तर्हि तानि मम न प्रतीयन्ते तवावृतज्ञानत्वादित्याह न त्वमिति। परान्परिकल्प्य तत्परिभवार्थं प्रवृत्तत्वात्तव ज्ञानावरणं विज्ञेयमित्याह परंतपेति। अर्जुनस्य भगवता सहातीतानेकजन्मवत्त्वे तुल्येऽपि ज्ञानवैषम्ये हेतुमाह धर्मेति। आदिशब्देन रागलोभादयो गृह्यन्ते। ईश्वरस्यातीतानागतवर्तमानसर्वार्थविषयज्ञानवत्त्वे हेतुमाह अहमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.5।।अत एव ज्ञाताशयो भगवान्तव च न त्वं वेत्सि इति परिहरति। अन्यथाऽनुपयुक्तं तन्न वक्तव्यमेव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.5।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.5।।श्रीभगवानुवाच अनेन जन्मनः सत्यत्वम् उक्तम्बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि इति वचनात् तव च इति दृष्टान्ततया उपादानाच्च।आत्मनः अवतारप्रकारं देहयाथात्म्यं जन्महेतुं च आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.5।। बहूनि मे मम व्यतीतानि अतिक्रान्तानि जन्मानि तव च हे अर्जुन। तानि अहं वेद जाने सर्वाणि न त्वं वेत्थ न जानीषे धर्माधर्मादिप्रतिबद्धज्ञानशक्तित्वात्। अहं पुनः नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वभावत्वात् अनावरणज्ञानशक्तिरिति वेद अहं हे परंतप।।कथं तर्हि तव नित्येश्वरस्य धर्माधर्माभावेऽपि जन्म इति उच्यते

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【 Verse 4.6 】

▸ Sanskrit Sloka: अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् | प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ||

▸ Transliteration: ajo ’pi sannavyayātmā bhūtānām īśvaro ’pi san | prakṛtiṁ svāmadhiṣṭhāya saṁbhavāmyātmamāyayā ||

▸ Glossary: ajaḥ: unborn; api: also; san: being so; avyaya: instructible; atmā: spirit; bhūtānāṁ: living entities; īśvaraḥ: supreme Lord; api: also; san: being so; prakṛtiṁ: nature; svāṁ: of Myself; adhiṣṭhāya: keeping under control; saṁbhavāmi: I come into being; ātmamāyayā: by My divine potency.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.6 Although I am unborn, imperishable and the lord of all living entities, by ruling my nature I reappear by my own māyā.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.6।।मैं अजन्मा और अविनाशीस्वरूप होते हुए भी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका ईश्वर होते हुए भी अपनी प्रकृतिको अधीन करके अपनी योगमायासे प्रकट होता हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.6।। यद्यपि मैं अजन्मा और अविनाशी स्वरूप हूँ और भूतमात्र का ईश्वर हूँ (तथापि) अपनी प्रकृति को अपने अधीन रखकर (अधिष्ठाय) मैं अपनी माया से जन्म लेता हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.6 अजः unborn? अपि also? सन् being? अव्ययात्मा of imperishable nature? भूतानाम् of beings? ईश्वरः the Lord? अपि also? सन् being? प्रकृतिम् Nature? स्वाम् My own? अधिष्ठाय governing? संभवामि come into being? आत्ममायया by My own Maya.Commentary Man is bound by Karma. So he takes birth. He is under the clutches of Nature. He,is deluded by the three alities of Nature whereas the Lord has Maya under His perfect control. He rules over Nature? and so He is not under the thraldom of the alities o Nature. He appears to be born and embodied through His own Maya or illusory power? but is not so in reality. His embodiment is ? as a matter of fact? apparent? It cannot affect in the least His true divine nature. (Cf.IX.8).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.6. Though [I am] unborn and the changeless Self; though I am the the Lord of [all] beings; yet presiding over My own nature I take birth by My own Trick-of-illusion.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.6 have no beginning. Though I am imperishable, as well as Lord of all that exists, yet by My own will and power do I manifest Myself.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.6 Though I am birthless and of immutable nature, though I am the Lord of all beings, yet by employing My own Nature (Prakrti) I am born out of My own free will.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.6 Though I am birthless, undecaying by nature, and the Lord of beings, (still) by subjugating My Prakriti, I take birth by means of My own Maya.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.6 Though I am unborn, of imperishable nature, and though I am the Lord of all beings, yet, governing My own Nature, I am born by My own Maya.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.6 See Comment under 4.9

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.6 Without forsaking any of the My special alities, as supreme rulership, birthless, imperishability etc., I am born by My free will. Prakrti means one's own nature. The meaning is that by employment of My own Nature and taking a form of My choice, I incarnate by My own will (Maya).

The character of My own Nature becomes evident from the following Srutis: 'Him who is of sun-like colour, beyond darkness (Tamas)' (Sve. U., 3.8), 'Him who abides beyond Rajas (active matter)' (Sama 17.1.4.2); 'This Golden Person who is within the sun' (Cha. U. 1.6.6); 'Within the heart, there is the Person consisting of mind, immortal and golden' (Tai. U. 1.6.1); 'All mortal creatures have come from the self-luminous Person' (Yaj., 32.2); 'Whose form is light, whose will is truth, who is the self of ethereal space, who contains all actions, contains all desires, contains all odours, contains all tastes' (Cha. U., 3.14.2); 'Like a raiment of golden colour' (Br. U., 4.3.6).

'Atma-mayaya' means through the Maya which belongs to Myself. Here the term Maya is identical with knowledge as stated in the lexicon of Yaska: 'Maya is wisdom, knowledge.' Further there is the usage of competent people: 'By Maya, He knows the good and bad of his creatures.' Hence by My own knowledge means 'by My will.' Hence, without abandoning My essential attributes which belong to Me the Lord of all, such as being free of sins, having auspicious attributes etc., and creating My own form similar to the configuration of gods, men etc., I incarnate in the form of gods etc. The Sruti teaches the same thing: 'Being unborn, He is born in various forms' (Tai. A., 3.12.7). The purport is that His birth is ite unlike that of ordinary beings. The dissimilarity consists in that He is born out of His own will unlike ordinary beings whose birth is necessitated by their Karma. Thus constured, there is no contradiction also between what was taught earlier and what is taught later as in the statements: 'Many births of Mine have passed, O Arjuna, and similarly yours also. I know them all' (4.5); 'I incarnate Myself' (4.7); and 'He who thus knows in truth My birth and work' (4.9). [All this elaboration is meant to refute the doctrine of mere apparency of incarnations as taught by the Advaitins. Ramanuja, as stated in his Introduction to the Bhasya, upholds the absolute reality of incarnations.]

Sri Krsna now specifies the times of His incarnations.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.6 Api, san ajah, though I am birthless; and avyayatma, undecaying by nature, though I am naturally possessed of an undiminishing power of Knowledge; and so also api san, though; isvarah, the Lord, natural Ruler; bhutanam, of beings, from Brahma to a clump of grass; (still) adhisthaya, by subjugating; svam, My own; prakrtim, Prakrti, the Maya of Visnu consisting of the three gunas, under whose; spell the whole world exists, and deluded by which one does not know one's own Self, Vasudeva;-by subjugating that Prakrti of Mine, sambhavami, I take birth, appear to become embodeid, as though born; atma-mayaya, by means of My own Maya; but not in reality like an ordinary man. It is being stated when and why that birth occurs:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.6।। परमेश्वर अपनी निर्बाध स्वतन्त्रता और पूर्ण स्वेच्छा से एक विशिष्ट देह को धारण करके जगत् में उस काल की मोहित पीढी का मार्गदर्शन करने आते हैं। अज्ञानी के समान देहादि के बन्धन में रहना उनके लिये वास्तविकता न होकर एक नाटक की भूमिका के समान है। र्मत्य जीव अविद्या का शिकार बनता है जबकि ईश्वर स्वमाया के स्वामी बने रहते हैं। कार का चालक कार से बंधा रहता है और उसका स्वामी स्वतन्त्र। वाहन का स्वामी अपने प्रयोजन के लिये वाहन का उपयोग करता है और गन्तव्य स्थान पर पहुँचने पर उसे छोड़कर अपने कार्य में व्यस्त हो जाता है। परन्तु बेचारा चालक चोर आदि लोगों से उसको सुरक्षित रखने के लिये एक सेवक के समान उस कार से बंधा रहता है। सृष्टि की रक्षा के खेल में भगवान् इन उपाधियों तथा तज्जनित परिच्छिन्नताओं को साधन रूप में स्वीकारते हैं किन्तु स्वयं उनके दास अथवा शिकार नहीं बन जाते।इस प्रकार स्वस्वरूप में अज और अविनाशी तथा प्राणिमात्र के ईश्वर होते हुये भी भगवान् अपनी माया को पूर्णत अपने वश में रखकर स्वेच्छा से जन्म लेते हैं जीव के समान पूर्व कर्मों के अवश्यंभावी फलों को भोगने के लिये नहीं। उन्हें न स्वस्वरूप का विस्मरण है और न माया का बन्धन है।आप अपने सेवक से स्कूटर में पेट्रोल भरवाकर लाने के लिये कहकर फिर उसे काम करते देखिये तो इस श्लोक में कथित अर्थ को आप समझ सकते हैं। स्कूटर के विषय में अनजान उस बेचारे के लिये वह भारी मशीन एक बोझ और दुख का कारण ही बन जाती है। स्कूटर के भार के कारण उसे खींचकर ले जाना कठिन होता है। इसके विपरीत यदि आप स्कूटर पर बैठकर उसे चला रहे हों अथवा उसे धक्का भी देना पड़े तो भी आप उसे सहर्ष और सरलता से ले जा सकते हैं। स्कूटर तो वही है परन्तु आपके हाथों में वह आपका दास है और अनुचर को तो वह स्वयं इधरउधर खींचकर ले जाने वाला भार है।इसी प्रकार अज्ञानी मनुष्य अपनी उपाधियों के कार्यों के विषय में कुछ नहीं जानता और इसलिये उनकी दास बना रहता है। ईश्वर के लिये जगत् कोई समस्या नहीं क्योंकि वे प्रकृति को सर्वथा अपने वश में रखते हैं। ईश्वर के पूर्ण स्वातन्त्र्य को इन दो पंक्तियों में अत्यन्त सुन्दर शैली में व्यक्त किया गया है।ईश्वर का यह जन्म कब और किसलिये होता है इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.6।। ईश्वरस्य तव धर्माधर्माद्यभावाज्जन्मैवायुक्तम्। व्यतीतानेकजन्म वत्त्वं तु दूरनिरस्तमित्याशङ्क्य वस्तुतो जन्माभावेऽपि स्वमायया जन्म संभवतीत्याह अजोऽपीति। अजो जन्मरहितोऽपि सन्नव्ययात्माऽक्षीणज्ञानशक्तिस्वभावोऽपि सन् कदापि मम विच्छेदाभावात् था भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामीश्वर ईशनशीलोऽपि सन् प्रकृतिं मम वैष्णवीं त्रिगुणात्मिकां मायां यस्या वशे सर्वं जगद्वर्तते यया मोहितः सन् स्वमात्मानं वासुदेवं न जानाति तामधिष्ठाय वशीकृत्य संभवामि देहवानिव जात इव। आत्मनः स्वस्य मायया मन्माययैव मयि विग्रहवत्त्वादिप्रतीतिः साधकानुग्रहार्थं न परमार्थं इति भावः। तदुक्तं मोक्षधर्मेएतत्त्वया न विज्ञेयं रुपवानिति दृश्यते। इच्छन्मुहूर्तान्नश्येयमीशोऽहं जगतो गुरुः।। नश्येयमदृश्यो भवेयमित्यर्थः।माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नतु मां द्रष्टुमर्हसि।। इति। सर्वभूतगुणैर्युक्तं कारणोपाधिकमित्यर्थः। अत्र केचित्नित्यो यः कारणोपाधिर्मायाख्योऽनेकशक्तिमान्। सएव भगवद्देह इति भाष्यकृतां मतम् इत्याचार्यानुसारिव्याख्यानानन्तरं तस्मतं संग्रहेणोक्त्वा मतान्तरं प्रदर्शयन्ति। अन्येतु परमेश्वरे देहदेहिभावं न मन्यन्ते। किंतु यश्च नित्यो विभुः सच्चिदानन्दघनो भगवान्वासुदेवः परिपूर्णो निर्गुणः परमात्मा जन्मविनाशरहितः सर्वभासकः सर्वकारणत्वेन सर्वभूतेश्वरोऽपि सन् अहं प्रकृतिं स्वभावं सच्चिदानन्दघनैकरसम्। मायां व्यावर्तयति स्वामिति। निजरुपामित्यर्थः।स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठित इति स्वे महिन्मीति इति श्रुतेः स्वस्वरुपमधिष्ठाय स्वरुपावस्थित एव सन् संभवामि देहदेहिभावमन्तरेणैव देहिवद्य्ववहरामि। कथं तर्ह्यदेहे सच्चिदानन्दघने देहित्वप्रतीतिरत आह आत्ममाययेति। निर्गुणे शुद्धे सच्चिदानन्दरसघने मयि भगवति वासुदेवे देहदेहिभावशून्ये तद्रूपेण प्रतीतर्मायामात्रमित्यर्थः। तदुक्तंकृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।जगद्विताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया।। इति।अहोभाग्यमहोभाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् इतिचेति। तत्रेदमवधेयम् परमेश्वरे देहदेहिभावो नास्तीत्युक्तिर्मायया देहदेहिभावो न वस्तुत इत्यङ्गीकुर्वतां भाष्यकृतां मतेन प्रतिकूला। यत्तु नित्य इत्यादि तत्र यो निर्गुणःअथात आदेशो नेतिनेतिनेदं यदिदमुपासतेएकमेवाद्वितीयंसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मविज्ञानमानन्दं ब्रह्मअस्थूलमनण्वह्नस्वमदीर्घंयत्र नान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमायो वै भूमा तत्सुखंयतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सहतदेतदपूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूःनिष्कलं निष्क्रियं शान्तं निरवद्यं निरञ्जनम्अपाणिपादम् इत्यादिश्रुतितात्पर्यसिद्धः परमात्मा सएव तद्विग्रहः। स च विग्रहः किं साकार उत निराकारः। आद्ये निर्गुणस्य परिणाम उत विवर्तः। नाद्यः। निर्विकारस्य विकाररुपपरिणामायोगात्। अन्यथा तस्यानित्यत्वं स्यात्। द्वितीये मायाया विवर्तसाधिकाया आवश्यकत्वेन न मायिक इत्युक्तिरनुपपन्ना। न द्वितीयः। सर्वाकारशून्यः पुनश्च विशेषाकारेण गृह्यत इति विग्रह इति वदतो व्याघातात्। किंच स विग्रहः किं हस्तपादादिमान् उत तद्रहितः। आद्ये हस्तादयोऽपि किं दृश्या उतादृश्याः। आद्ये विग्रहस्य भूतकार्यत्वाभावान्मायिकत्वमवश्यमभ्युपेयम्। न द्वितीयाः। भक्तानां तद्दर्शनाद्यनापत्तेः। नन्वदृश्या अपि मायया दृश्या इति चेत्तर्हि किं परमाण्वादिवददृश्या उत ब्रह्मरुपेण। आद्ये योगिनामक्षगोचराः स्युः। द्वितीये हस्तादयोऽवयवास्तद्वान्विग्रह इति कृतमुक्तिमात्रेण स्वशिष्यबन्धनेन। न द्वतीयः। तद्रहितो विग्रहश्चेति व्याघातात्। एतेन एतत्पक्षानुसारेण क्लिष्टकल्पनया श्लोकयोजनापि प्रत्युक्ता। उदाहृतवचनद्वयमपि भाष्यकृतामतएव सभ्यगुपपद्यते। तस्मात्सच्चिदानन्दस्वरुपः मायावच्छिन्नःयतो वा इमानि भूतानि जायन्ते। येन जातानि जीवन्ति। यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्तियतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे। यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षयेजन्माद्यस्य यतः इत्यादिश्रुतिस्मृतिन्यायैर्जगत्कारणत्वेन प्रतिपादितः शुद्धबुद्धमुक्तस्वभावः अशरीरी परमात्मा सर्वेश्वरो मायानियन्ता साधकानुग्रहार्थं स्वमायया लीलाविग्रहं गृहीत्वा जात इव विग्रहवानिव भातीति श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणाद्यनुग्रहीतं सर्वज्ञानां भाष्यकृतां मतं शरणीकरणीयमिति दिक्। अन्येतु न कर्मफलं भगवतः शरीरभतएव न भौतिकम्। तस्माद्युक्तमजोऽपि सन्निति। ननु तर्हि भगवच्छरीरस्य किमुपादानम्। अविद्येतिचेन्न। परमेश्वरे तदभावात्। जीवाविद्येति चेन्न। शुक्तिरजतादिवत्तुच्छत्वापत्तेः। चिन्मात्रं चेन्न। चितः साकारत्वायोगात्। तथात्वे वा तस्यातीन्द्रियत्वापत्तिः। तस्मात्किमालम्बोऽयं भगवद्देहो देवकीगर्भप्रवेशजननबाल्यकौमारपौगण्डयौवनादिप्रतीतिविषय इतिचेत् श्रुणु। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममाययेति। अयमर्थः जीवात्मनो हि अनात्मभूतां प्रकृतिं तेजोबन्नात्मिकां पञ्चभूतात्मिकां वाऽधिष्ठाय संभवन्ति जन्मादींल्लभन्ते। अहं तु स्वां प्रत्यगनन्यां प्रकृतिं प्रत्यक्चैतन्यमित्यर्थः। तदेवाधिष्ठाय नतूपादानान्तरम्। आत्ममायया स्वीयमायया संभवामि। यथा कश्चिन्मायावी स्वयं स्वस्थानादप्रच्युतस्वभावोऽप्यदृश्यो भूत्वा स्थूलसूक्ष्मभूतान्युपादायैव केवलया मायया द्वितीयं मायाविनं स्वसदृशमेव सूत्रमार्गेण गगनमारोहन्तं सृजति एवमहं कूटस्थचिन्मात्रोऽग्राह्यः स्वमायया चिन्मयमात्मनः शरीरं सृजामि तस्य बालाद्यवस्थाश्च सूत्रारोहणवद्दर्शयाभीति। एतावांस्तु विशेषः लौकिकमायावी मायामुपसंहरन् द्वितीयं मायाविनमप्युपसंहरति अहं तु तामनुपसंहरन्त्स्वविग्रहमपि नोपसंहरामीति। एंवहि सति हिरण्यमश्रुत्वादिलक्षणविग्रहयोगिनश्चेतनस्यअन्तस्तद्धर्मोपदेशात् इत्यादिन्यायसिद्धं वियदाद्युपादानलक्षणं सर्वेश्वरत्वं युज्यते नान्यथेति। तस्मात्सिद्धं परमेश्वरस्य मायामयं शरीरं नित्यमिति। एकेनैव हिरण्यश्मश्रुत्वादिलक्षणेन देहेन विवस्वन्तमुपदिश्य त्वामुदिशामीत्यादिवर्णयन्ति। अत्रेदं वक्तव्यम् नियम्यदेहातिरिक्तनियामकदेहाभावादेकेनैवत्यादि नोपपद्यते। किंच हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्ट आदित्यान्तर्यामिदेह एव यदि कृष्णादिदेहः स्यात्तर्हि तथैव प्रतीयेत नतु मेघश्यामत्वादिलक्षणः। ननु मायया तथेति चेद्वरं परमेश्वरस्याशरीरस्यैव साधकानुग्रहायादित्यान्तर्यामिरुपेण कृष्णादिदेहात्मना च भाययावस्थानवर्णनम् कृष्णादिविग्रहाणां परंपरया मायिकत्वकल्पनाया भाष्यविरुद्धाया हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्टस्यापि सविशेषत्वेन मायिकत्वात्। यदपि यथा कश्चिदित्यादि तदपि न। भगवता वासुदेवेनैवादौ चतुर्भुजं विग्रहं प्रदर्श्य पुनर्द्विभुजं रुपं प्रदर्शितम्। तदपि तिरोधाय पुनस्तदपि प्रकटितमिति प्रसिद्धेः। अन्यथा परमेश्वरदेहानां मोहिन्यादिरुपाणामनन्तानां युगपत्प्रतीत्यापत्तेः। तस्मादीश्वरो भक्तार्थं तत्तद्विग्रहमाविर्भावयति तिरोभावयति चेत्यवश्यमभ्युपेयम्। एतेनाहमित्याद्यपि प्रत्युक्तम्। अजोऽपीत्यादिविशेषणैर्भाष्योष्योक्तव्याख्यानेन च जीवाद्वैलक्षण्यस्य सम्यक्प्रतीतेः। क्लिष्टाप्रसिद्धकल्पनाया भाष्यविरुद्धाया अनौचित्यात्। अतएवेश्वरदेहाभिप्रायेणैवायमर्जुनस्य प्रश्न इति पूर्वोक्तं प्रत्युक्तम्। परमात्मनो वास्तवदेहस्याभावात्। तस्मात्त्वमपि कश्चिदसर्वज्ञोऽनीश्वरो जीवएव तस्य तवादित्यं प्रत्युपदेष्टृत्वं विरुद्धमिति मूर्खाणामभिप्रायेणार्जुनस्य शङ्काऽहं जीववद्धर्माधर्मादिपारतन्त्र्याभावादजोऽव्ययात्मा भूतानामीश्वर एतादृशोऽपि सन् प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय स्वमायया संभवामीत्यनेन योऽहमीश्वरः सर्वज्ञः सर्गादावुपदेशाय योग्यं विग्रहमुपादाय सूर्यं प्रति योगमुक्तवान् सएवाहमिदानीमुक्तवानित्युक्तरमित्यलं विस्तरेण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.6।।नन्वतीतानेकजन्मवत्त्वमात्मनः स्मरसि चेत्तर्हि जातिस्मरो जीवस्त्वं परजन्मज्ञानमपि योगिनः सार्वात्म्याभिमानेनशास्त्रदृष्ट्या तूपदेशो वामदेववत् इति न्यायेन संभवति। तथाचाह वामदेवो जीवोऽपिअहं मनुरभंव सूर्यश्चाहं कक्षीवानृषिरस्मि विप्रः इत्यादि दाशतय्याम्। अतएव न मुख्यः सर्वज्ञस्त्वम्। तथाच कथमादित्यं सर्वज्ञमुपदिष्टवानस्यनीश्वरःसन्। नहि जीवस्य मुख्यं सार्वज्ञ्यं संभवति व्यष्ट्युपाधेः परिच्छिन्नत्वेन सर्वसंबन्धित्वाभावात्। समष्ट्युपाधेरपि विराजः स्थूलभूतोपाधित्वेन सूक्ष्मभूतपरिणामविषयं मायापरिणामविषयं च ज्ञानं न संभवति। एवं सूक्ष्मभूतोपाधेरपि हिरण्यगर्भस्य तत्कारणमायापरिणामाकाशादिसर्गक्रमादिविषयज्ञानाभावः सिद्ध एव। तस्मादीश्वर एवकारणोपाधित्वादतीतानागतवर्तमानसर्वार्थविषयज्ञानवान्मुख्यः सर्वज्ञः। अतीतानागतवर्तमानविषयं मायावृत्तित्रयमेकैव वा सर्वविषया मायावृत्तिरित्यन्यत्। तस्य च नित्येश्वरस्य सर्वज्ञस्य धर्माधर्माद्यभावेन जन्मैवानुपपन्नम्। अतीतानेकजन्मवत्त्वं तु दूरोत्सारितमेव। तथाच जीवत्वे सार्वज्ञ्यानुपपत्तिरीश्वरत्वे च देहग्रहणानुपपत्तिरिति शङ्काद्वयं परिहरन्ननित्यत्वपक्षस्यापि परिहारमाह अपूर्वदेहेन्द्रियादिग्रहणं जन्म पूर्वगृहीतदेहेन्द्रियादिवियोगो व्ययः। यदुभयं तार्किकैः प्रेत्यभाव इत्युच्यते। तदुक्तम्जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्धुवं जन्म मृतस्य च इति। तदुभयं च धर्माधर्मवशाद्भवति। धर्माधर्मवशत्वं चाज्ञस्य जीवस्य देहाभिमानिनः कर्माधिकारित्वाद्भवति। तत्र यदुच्यते सर्वज्ञेश्वरस्य सर्वकारणस्येदृग्देहग्रहणं नोपपद्यत इति तत्तथैव कथम्। यदि तस्य शरीरं स्थूलभूतकार्यं स्यात्तदा व्यष्टिरूपत्वे जाग्रदवस्थाऽस्मदादितुल्यत्वं समष्टिरूपत्वे च विराट्जीवत्वम्। तस्य तदुपाधित्वात्। अथ सूक्ष्मभूतकार्यं तदा व्यष्टिरूपत्वे स्वप्नावस्थाऽस्मदादितुल्यत्वं समष्टिरूपत्वे च हिरण्यगर्भजीवत्वम्। तस्य तदुपाधित्वात्। तथाच भौतिकं शरीरं जीवानाविष्टं परमेश्वरस्य न संभवत्येवेति सिद्धम्। नच जीवाविष्ट एव तादृशे शरीरे तस्य भूतावेशवत्प्रवेश इति वाच्यम्। तच्छरीरावच्छेदेन तज्जीवस्य भोगाभ्युपगमेऽन्तर्यामिरूपेण सर्वशरीरप्रवेशस्य विद्यमानत्वेन शरीरविशेषाभ्युपगमवैयर्थ्यात्। भोगाभावे च जीवशरीरत्वानुपपत्तेः। अतो न भौतिकं शरीरमीश्वरस्येति पूर्वार्धेनाङ्गीकरोति अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्निति। अजोऽपि सन्नित्यपूर्वदेहग्रहणं अव्ययात्मापि सन्निति पूर्वदेहविच्छेदं भूतानां भवनधर्माणां सर्वेषां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानामीश्वरोऽपि सन्निति धर्माधर्मवशत्वं निवारयति। कथं तर्हि देहग्रहणमित्युत्तरार्धेनाह प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवामि प्रकृर्तिं मायाख्यां विचित्रानेकशक्तिमघटमानघटनापटीयसीं स्वां स्वोपाधिभूतामधिष्ठाय चिदाभासेन वशीकृत्य संभवामि। तत्परिणामविशेषैरेव देहवानिव जातइव च भवामि। अनादिमायैव मदुपाधिभूता यावत्कालस्थायित्वेन च नित्या जगत्कारणत्वसंपादिका मदिच्छयैव प्रवर्तमाना विशुद्धसत्त्वमयत्वेन मम मूर्तिः। तद्विशिष्टस्य चाजत्वमव्ययत्वमीश्वरत्वं चोपपन्नम्। अतोऽनेन नित्येनैव देहेन विवस्वन्तं च त्वां च प्रति इमं योगमुपदिष्टवानहमित्युपपन्नम्। तथाच श्रुतिःआकाशशरीरं ब्रह्मेति आकाशोऽत्राव्याकृतं आकाशएव तदोतं च प्रोतं च इत्यादौ तथा दर्शनात्आकाशस्तल्लिङ्गात् इति न्यायाच्च। आकाश इति होवाच इत्याकाशशब्दः परमात्मा। कुतः। तस्य परमात्मनो लिङ्गं सर्वाणि भूतानीत्यादि तस्मात्। तर्हि भौतिकविग्रहाभावात्तद्धर्ममनुष्यत्वादिप्रतीतिः कथमिति चेत् तत्राह आत्ममाययेति। मन्माययैव मयि मनुष्यत्वादि प्रतीतिर्लोकानुग्रहाय न वस्तुवृत्त्येतिभावः। तथाचोक्तं मोक्षधर्मेमाया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद। सर्वभूतगुणैर्युक्तं नतु मां द्रष्टुमर्हसि।। इति। सर्वभूतगुणैर्युक्तं कारणोपाधिं मां चर्मचक्षुषा द्रष्टुं नार्हसीत्यर्थः। उक्तंच भगवता भाष्यकारेण। सच भगवान् ज्ञानैश्वर्यशक्तिबलवीर्यतेजोभिः सदा संपन्नस्त्रिगुणात्मिकां वैष्णवीं स्वां मायां प्रकृतिं वशीकृत्याजोऽव्ययो भूतानामीश्वरो नित्यशुद्धबुद्धमुक्तस्वाभावोऽपि सन् स्वमायया देहवानिव जातइव च लोकानुग्रहं कुर्वँल्लँक्ष्यते स्वप्रयोजनाभावेऽपि भूतानुजिघृक्षयेति। व्याख्यातृभिश्चोक्तं स्वेच्छाविनिर्मितेन मायामयेन दिव्येन रूपेण संबभूवेति।नित्यो यः कारणोपाधिर्मायाख्योऽनेकशक्तिमान्। सएव भगवद्देह इति भाष्यकृतां मतम्।। अन्येतु परमेश्वरे देहदेहिभावं न मन्यन्ते किंतु यश्च नित्यो विभुः सच्चिदानन्दघनो भगवान्वासुदेवः परिपूर्णो निर्गुणः परमात्मा स एव तद्विग्रहो नान्यः कश्चिद्भौतिको मायिको वेति अस्मिन्पक्षे योजना।आकाशवत्सर्वगतश्च नित्यःअविनाशी वा अरेऽयमात्माऽनुच्छित्तिधर्मा इत्यादिश्रुतेः।असंभवस्तु सतोऽनुपपत्तेः तुशब्दो ब्रह्मण उत्पत्तिशङ्कानिराकरणार्थः। सतो ब्रह्मण उत्पत्तेरसंभवः। कुतःनचास्य कश्चिज्जनिता इति श्रुतेः। युक्तितश्च तत्कारणानुपपत्तेः।नात्माश्रुतेर्नित्यत्वाच्च ताभ्यः इत्यादिन्यायाच्च। नैवायमात्मा आकाशादिवज्जायते। कुतः। तद्वदस्योत्पत्तेरश्रुतेः। बुद्ध्याद्युत्पत्तिवदस्त्वनुमेयमित्यत आह। नित्यत्वाञ्चशब्दादजन्यत्वादिभ्यश्च। नित्यत्वादिकमेव कुत इत्यत आह। ताभ्यः ताः श्रुत्यःन जीवो म्रियतेस वा एष महानज आत्मा इत्याद्याः वस्तुगत्या जन्मविनाशरहितः सर्वभासकः सर्वकारणमायाधिष्ठानत्वेन सर्वभूतेश्वरोऽपि सन्नहं प्रकृतिं स्वभावं सच्चिदानन्दघनैकरसम्। मायां व्यावर्तयति निजस्वरुपमित्यर्थः।स भगवः कस्मिन्प्रतिष्ठितः स्वे महिम्नि इति श्रुतेः। स्वस्वरूपमधिष्ठाय स्वरूपावस्थित एव सन् संभवामि देहदेहिभावमन्तरेणैव देहिवद्व्यवहरामि। कथं तर्ह्यदेहे सच्चिदानन्दघने देहत्वप्रतीतिरत आह निर्गणे शुद्धे सच्चिदानन्दरसघने मयि भगवति वासुदेवे देहदेहिभावशून्ये तद्रूपेण प्रतीतिर्मायामात्रमित्यर्थः। तदुक्तंकृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्। जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया।। इति।अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्दगोपव्रजौकसाम्। यन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम्।। इतिच। केचित्तु नित्यस्य निरवयवस्य निर्विकारस्यापि परमानन्दस्यावयवावयविभावं वास्तवमेवेच्छन्ति तेनिर्युक्तिकं ब्रुवाणस्तु नास्माभिर्विनिवार्यते इति न्यायेन नापवाद्याः। यदि संभवेत्तथैवास्तु किमतिपल्लवितेनेत्युपरम्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.6।।किं तर्हि योगिनां सर्वज्ञत्वप्रसिद्धेस्त्वं जातिस्मरो जीवोऽसीत्याशङ्क्याह अज इति। देहान्निष्कृष्टस्याजत्वाव्ययत्वेनत्वेवाहं जातु नासं इत्यत्र साधिते इह तु देहविशिष्टस्यैव ते उच्येते।

Chapter 4 (Part 4)

ईश्वरोऽपीत्यनेन देहान्निष्कृष्टस्यास्मदादेरपीश्वरत्वंतत्त्वमसिअहं ब्रह्मास्मि इत्यादिश्रुतिप्रसिद्धमतो देहविशिष्टस्यैवाजत्वनित्यत्वे दृढीक्रियेतेऽन्यथानीश्वरत्वप्रसङ्गात्। नह्यादित्यान्तर्यामिणः परमेश्वरस्य हिरण्यश्मश्रुत्वादिविशिष्टो देहो जन्मव्ययवानिति वक्तुं शक्यम्। अकर्मजत्वात्। कर्मफलस्य हि परा काष्ठा हैरण्यगर्भशरीरप्राप्तिः। न चपुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत अत्यतिष्ठेयं सर्वाणि भूतानि अहमेवेदं सर्वं स्यामिति स एतं पुरुषमेधं पञ्चरात्रं यज्ञक्रतुमपश्यत् इत्यादिना शतपथे नारायणाख्यस्य परमात्मनःसहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात्। स भूमिं विश्वतो वृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् इतिपादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि इति च पुरुषसूक्तप्रतिपाद्यस्य सर्वाणि भूतान्यतिक्रम्य स्थितस्येश्रस्यापि शरीरं पञ्चरात्राख्यकर्मविशेषफलमिति श्रूयत इति वाच्यम्। तत्र नारायणशब्देन हिरण्यगर्भस्यैव विवक्षितत्वात्। नहि परमेश्वरस्य पूर्णकामस्य सर्वानतिक्रम्य स्थितस्य पुनरत्यतिष्ठेयं सर्वाणि भूतानीति कामना भवति। ननु परमेश्वरेऽपि कामना दृष्टासोऽकामयत बहु स्यां प्रजायेयेति इतिचेच्छ्लाघनीयप्रज्ञो देवानांप्रियः यतआप्तकामस्य का स्पृहा इति श्रुतेःलोकवत्तु लीलाकैवल्यम् इति न्यायाच्च निस्पृहस्य लीलयैव ब्रह्माण्डकोटीः सृजतो भगवतो राजगोपालस्य कर्मकिंकरेण कर्मणा सार्वात्म्यं प्रार्थयता साम्यमापादयति। तस्मान्न कर्मफलं भगवतः शरीरम्। अतएव न भौतिकम्। विराट्सूत्रात्मातिरिक्तस्य भौतिकस्याभावात्। तस्माद्युक्तमजोऽपि सन्निति। ननु तर्हि भगवच्छरीरस्य किमुपादानम्। अविद्येतिचेन्न। परमेश्वरे तदभावात्। जीवाविद्याचेन्न। शुक्तिरजतादेरिव तुच्छत्वापत्तेः। चिन्मात्रं चेन्न। चितः साकारत्वायोगात्। तथात्वे वा तस्यातीन्द्रियत्वापत्तिः। तस्मात्किमालम्बो भगवद्देहो देवकीगर्भप्रववेशजननबाल्यकौमारपौगण्डयौवनादिप्रतीतिविषय इति चेच्छृणु। प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममाययेति। अयमर्थः जीवात्मनो ह्यनात्मभूतां प्रकृतिं तेजोबन्नात्मिकां पञ्चभूतात्मिकां वाधिष्ठायसंभवन्ति जन्मादींल्लभन्ते अहं तु स्वां प्रत्यगनन्यां प्रकृतिं प्रत्यक्चैतन्यमेवेत्यर्थः। तदेवाधिष्ठाय नतूपादानान्तरम्। आत्ममायया स्वीयमायया संभवामि। यथा कश्चिन्मायावी स्वयं स्वस्थानादप्रच्युतस्वभावोऽप्यदृश्यो भूत्वा स्थूलसूक्ष्मभूतान्यनुपादायैव केवलया मायया द्वितीयं मायाविनं स्वसदृशमेव सूत्रमार्गेण गगनमारोहन्तं सृजति एवमहं कूटस्थचिन्मात्रोऽग्राह्यः स्वमायया चिन्मयमात्मनः शरीरं सृजामि तस्य बाल्याद्यवस्थाश्च सूत्रारोहणवद्दर्शयामि। एतावांस्तु विशेषः लौकिकमायावी मायामुपसंहरन् द्वितीयं मायाविनमप्युपसंहरति अहं तु तामनुपसंहरन् स्वविग्रहमपि नोपसंहरामीति। एवं हि सति हिरण्यश्मश्रुत्वादिलक्षणविग्रहयोगिनश्चैतन्यस्यअन्तस्तद्धर्मोपदेशात् इत्यादिन्यायसिद्धं वियदाद्युपादानत्वलक्षणं सर्वेश्वरत्वं युज्यते नान्यथेति। तस्मात्सिद्धं परमेश्वरस्य मायामयं शरीरं नित्यमिति एकेनैव देहेन विवस्वन्तमुपदिश्य त्वामप्युपदिशामीति। अन्यत्रापिनित्यैव सा जगन्मूर्तिः इति सावधारणं प्रतिज्ञायतेदेवानां कार्यसिद्ध्यर्थमाविर्भवति सा यदा। उत्पन्नेति तदा लोके सा नित्याप्यभिधीयते इति। नित्याया अप्याविर्भावापेक्षया सूर्यस्येव बाल्यादिकमुत्पत्त्याद्युपगम्यते। भाष्ये तु स्वां प्रकृतिं वैष्णवीं त्रिगुणात्मिकां मायामधिष्ठाय वशीकृत्य आत्ममायया संभवामि देहवान् जात इवात्मनो मायया न परमार्थतो लोकवदिति व्याख्यातम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.6।।ज्ञानार्थमेवाह अजोऽपीति। अहं भूतानामव्ययात्माऽपि सन् विनाशरहितात्मरूपः सन्नपि ईश्वरोऽपि सन् सर्वकरणसमर्थोऽपि सन् स्वां प्रकृतिं त्रिगुणात्मिकामधिष्ठाय अजजीवरूपेण सम्भवामि आत्ममायया अन्तरङ्गया अजीवरूपेण अव्ययात्मा लीलायोग्यदेहेन सम्भवामि। अत्रायं भावः यत्र धर्मरक्षार्थमाविर्भवामि तत्सामयिकजीवेषु कर्मयोगादिजीवेषु लीलार्थप्रकटीकृतस्वरूपेण रसात्मकभक्तिमेव कथयामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.6।। नन्वनादेस्तव कुतो जन्म अविनाशिनश्च कथं पुनर्जन्म येन बहूनि मे व्यतीतानीत्युच्यते ईश्व रस्य तव पुण्यपापविहीनस्य कथं जीववज्जन्मेत्यत आह अजोऽपीति। सत्यमेवं तथाप्यजोऽपि सन्नहं तथाव्ययात्माप्यनश्व रस्वभावोऽपि सन् तथा ईश्व रोऽपि कर्मपारतन्त्र्यरहितोऽपि सन्स्वमायया संभवामि सम्यगप्रच्युतज्ञानबलवीर्यादिशक्त्यैव भवामि। ननु तथापि षोडशकलात्मकलिङ्गदेहशून्यस्य तव कुतो जन्मेत्यत उक्तम्। स्वां शुद्धसत्त्वात्मिकां प्रकृतिमधिष्ठायं स्वीकृत्य विशुद्धोर्जितसत्त्व मूर्त्या स्वेच्छयावतरामीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.6।।नन्वनादेरविनाशिनस्तव जीववत्कथं जन्मोक्तं इत्यत आह अजोऽपीति। सत्यमेवं तथाप्यजोऽपि सन्नव्ययात्माऽपि सन् कर्मपारतन्त्र्यरहितोऽपि सन् स्वमायया सम्भवामि। स्वतन्त्रमायानिबन्धनं मम जन्मेति। मायाशब्दः क्वचिच्छास्त्रे हरिसामर्थ्यवाचकः।क्वाप्यविद्या मृषावाचिकृपाकपटवित्तवाक्। इति निरूपणादत्रात्मनां भक्तानामुपरि कृपयाऽऽत्मनो वा कृपयाऽऽविर्भवामि।मया सह वर्त्तमानमाया इति तृतीयस्कन्धसुबोधिनीव्याख्यातया वाऽप्रच्युतज्ञानबलैश्वर्यादिशक्त्यैव सर्वभवनसामर्थ्यरूपमायया सम्भवामि।विजातीयनिवारणायात्मपदम्। मायात्वोक्तिःशक्तिर्मे मोहिनी त्वतः एवेति वयमवोचाम्। ननु तथापि स्वरूपवैपरीत्यं जन्मभावेन जीवस्यैव तवायातमित्याशङ्क्याह प्रकृतिमिति। प्रकृतिं स्वामसाधारणस्वरूपं स्वभावं वा सच्चिदानन्दमात्रं नित्यसिद्धज्ञानक्रियाशक्त्याश्रयं षड्गुणाश्रयमधिष्ठाय अपरित्यज्य सन्नेव प्रादुर्भवामि न तु जीववत्स्वरूपादपि प्रच्युतः। जीवस्तु व्युच्चरणानन्तरं मायया पराभिध्यानात्तिरोहितानन्दषड्गुणः संसरतीति जन्ममरणपर्यावर्त्तमनुभवति अहं तु न तथा जन्मादिमान् अजत्वश्रुतेरव्ययत्वाच्च। एतेनैव षड्भावविकारा निराकृताः। यद्यपि जीवात्मनि न विकाराः षट् किन्तु प्रकृतिपरिणामभूते देहे एव तथापिआविर्भावतिरोभावजन्मनाशविकल्पवत् शरीरं जगज्जीवात्मनि प्रत्याययति विकारान् संसृतिं च करोति प्राकृतत्वात्। अत एवोक्तं सूत्रकारेण पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ ब्र.सू.3।2।5 इति। अत्र भाष्यकारः अस्य जीवस्यैश्वर्यादि तिरोहितं तत्र हेतुः पराभिध्यानात् परस्य भगवतोऽभिध्यानं स्वस्यैतस्य च सर्वतो भोगेच्छा तस्मादीश्वरेच्छया जीवस्य व्युच्चरितस्य भगवद्धर्मतिरोभावः। ऐश्वर्यतिरोभावाद्दीनत्वं पराधीनत्वं च। वीर्यतिरोभावात् सर्वदुःखसहनम्। यशस्तिरोभावात् सर्वहीनत्वम्। श्रीतिरोभावाज्जन्मादिसर्वापद्विषयत्वम्। ज्ञानतिरोभावाद्देहादिष्वहम्बुद्धिः। सर्वविपरीतज्ञानं च अपस्मारसहितस्येव। वैराग्यतिरोभावाद्विषयासक्तिः। बन्धश्चतुर्णां कार्यो विपर्ययो द्वयोस्तिरोभावादेव। नान्यथा हि युक्तोऽयमर्थः। एकस्यैकांशप्राकट्येऽपि तथाभावात् आनन्दांशस्तु पूर्वमेव तिरोहितः येन जीवभावः अत एव काममयः अकामरूपत्वादानन्दस्य। निद्रा च सुतरां तिरोभावकर्त्री भगवच्छक्तिः। अतोऽस्मिन् प्रस्तावे जीवस्य धर्मतिरोभाव उक्तः। अन्यथा भगवत ऐश्वर्यादिलीला निर्विषया स्यात्। तस्माज्जीवरूपपर्यालोचनया न किञ्चिदाशङ्कनीयम् इति। जीवस्य देहिनो जन्मनाशावुक्तौ ब्रह्मणो भगवत आविर्भावतिरोभावाविन्याशयेनैव नित्यापरिच्छिन्नतनौ प्राकट्यमिति सम्भव उक्तः। अनेन योऽहमिह दृश्यमानः पुरुषोत्तमोऽवतारी स एवान्यत्र प्रादुर्भवामि स्वत इत्युक्तं तथा चाजोऽपि जन्मवान् बालोऽपि किशोरः एकोऽप्यनेक इत्यादि विरुद्धधर्मा श्रयत्वान्नानुपपत्तिः। विशेषस्तु भाष्यादेरवगन्तव्यः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.6।।तो फिर आप नित्य ईश्वरका पुण्यपापसे सम्बन्ध न होनेपर भी जन्म कैसे होता है इसपर कहा जाता है यद्यपि मैं अजन्मा जन्मरहित अव्ययात्मा अक्षीण ज्ञानशक्तिस्वभाववाला और ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंका नियमन करनेवाला ईश्वर भी हूँ तो भी अपनी त्रिगुणात्मिका वैष्णवी मायाको जिसके वशमें सब जगत् बर्तता है और जिससे मोहित हुआ मनुष्य वासुदेवरूप अपनेआपको नहीं जानता उस अपनी प्रकृतिको अपने वशमें रखकर केवल अपनी लीलासे ही शरीरवालासा जन्म लिया हुआसा हो जाता हूँ अन्य लोगोंकी भाँति वास्तवमें जन्म नहीं लेता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.6।। व्याख्या   यह छठा श्लोक है और इसमें छः बातोंका ही वर्णन हुआ है। अज अव्यय और ईश्वर ये तीन बातें भगवान्की हैं (टिप्पणी प0 217) प्रकृति और योगमाया ये दो बातें भगवान्की शक्तिकी हैं और एक बात भगवान्के प्रकट होनेकी है।अजोऽपि सन्नव्ययात्मा इन पदोंसे भगवान् यह बताते हैं कि साधारण मनुष्योंकी तरह न तो मेरा जन्म है और न मेरा मरण ही है। मनुष्य जन्म लेते हैं और मर जाते हैं परन्तु मैं अजन्मा होते हुए भी प्रकट हो जाता हूँ और अविनाशी होते हुए भी अन्तर्धान हो जाता हूँ। प्रकट होना और अन्तर्धान होना दोनों ही मेरी अलौकिक लीलाएँ हैं।सम्पूर्ण प्राणी जन्मसे पहले अप्रकट (अव्यक्त) थे और मरनेके बाद भी अप्रकट (अव्यक्त) हो जानेवाले हैं केवल बीचमें ही प्रकट (व्यक्त) हैं (गीता 2। 28)। परन्तु भगवान् सूर्यकी तरह सदा ही प्रकट रहते हैं। तात्पर्य है कि जैसे सूर्य उदय होनेसे पहले भी ज्योंकात्यों रहता है और अस्त होनेके बाद भी ज्योंकात्यों रहता है अर्थात् सूर्य तो सदा ही रहता है किन्तु स्थानविशेषके लोगोंकी दृष्टिमें उसका उदय और अस्त होना दीखता है। ऐसे ही भगवान्का प्रकट होना और अन्तर्धान होना लोगोंकी दृष्टिमें है वास्तवमें भगवान् सदा ही प्रकट रहते हैं।दूसरे प्राणी जैसे कर्मोंके परतन्त्र होकर जन्म लेते हैं भगवान्का जन्म वैसे नहीं होता। कर्मोंकी परतन्त्रतासे जन्म होनेपर दो बातें होती हैं आयु और सुखदुःखका भोग। भगवान्में ये दोनों ही नहीं होते।दूसरे लोग जन्मते हैं तो शरीर पहले बालक होता है फिर बड़ा होकर युवा हो जाता है फिर वृद्ध हो जाता है और फिर मर जाता है। परन्तु भगवान्में ये परिवर्तन नहीं होते। वे अवतार लेकर बाललीला करते हैं और किशोरअवस्था (पंद्रह वर्षकी अवस्था) तक बढ़नेकी लीला करते हैं। किशोरअवस्थातक पहुँचनेके बाद फिर वे नित्य किशोर ही रहते हैं। सैकड़ों वर्ष बीतनेपर भी भगवान् वैसे ही सुन्दरस्वरूप रहते हैं। इसीलिये भगवान्के जितने चित्र बनाये जाते हैं उसमें उनकी दाढ़ीमूछें नहीं होतीं। (अब कोई बना दे तो अलग बात है) इस प्रकार दूसरे प्राणियोंकी तरह न तो भगवान्का जन्म होता है न परिवर्तन होता है और न मृत्यु ही होती है।भूतानामीश्वरोऽपि सन् प्राणिमात्रके एकमात्र ईश्वर (महान् शासक) रहते हुए ही भगवान् अवतारके समय छोटेसे बालक बन जाते हैं परन्तु बालक बन जानेपर भी उनके ईश्वरभाव (शासकत्व) में कोई कमी नहीं आती जैसे भगवान् श्रीकृष्णने छठीके दिन ही पूतना राक्षसीको मार दिया। पूतनाका शरीर ढाई योजनका और महान् भयंकर था। यदि उनमें ईश्वरभाव न होता तो छठीके दिन पूतनाको कैसे मार देते भगवान्ने तीन महीनेकी अवस्थामें शकटासुरको एक वर्षकी अवस्थामें तृणावर्तको और पाँच वर्षकी अवस्थामें अघासुरको मार दिया। इस तरह भगवान्ने बाल्यावस्थामें ही अनेक राक्षसोंको मार दिया। सात वर्षकी अवस्थामें ही उन्होंने गोवर्धन पर्वतको एक अँगुलीपर उठा लियासम्पूर्ण प्राणियोंके ईश्वर होते हुए भी भगवान् अवतारके समय छोटेसेछोटे बन जाते हैं और छोटासाछोटा काम भी कर देते हैं। वास्तवमें यही भगवान्की भगवत्ता है। भगवान् अर्जुनके घोड़े हाँकते हैं और उनकी आज्ञाका पालन करते हैं फिर भी भगवान्का अर्जुनपर और दूसरे प्राणियोंपर ईश्वरभाव वैसाकावैसा ही है। सारथि होनेपर भी वे अर्जुनको गीताका महान् उपदेश देते हैं। भगवान् श्रीराम पिता दशरथकी आज्ञाको टालते नहीं और चौदह वर्षके लिये वनमें चले जाते हैं फिर भी भगवान्का दशरथपर और दूसरे प्राणियोंपर ईश्वरभाव वैसाकावैसा ही है।प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय जो सत्त्व रज और तम इन तीनों गुणोंसे अलग है वह भगवान्की शुद्ध प्रकृति है। यह शुद्ध प्रकृति भगवान्का स्वकीय सच्चिदानन्दघनस्वरूप है। इसीको संधिनीशक्ति संवित्शक्ति और आह्लादिनीशक्ति कहते हैं (टिप्पणी प0 218.1)। इसीको चिन्मयशक्ति कृपाशक्ति आदि नामोंसे कहते हैं। श्रीराधाजी (टिप्पणी प0 218.2) श्रीसीताजी आदि भी यही हैं। भगवान्को प्राप्त करानेवाली भक्ति और ब्रह्मविद्या भी यही है।प्रकृति भगवान्की शक्ति है। जैसे अग्निमें दो शक्तियाँ रहती हैं प्रकाशिका और दाहिका। प्रकाशिकाशक्ति अन्धकारको दूर करके प्रकाश कर देती है तथा भय भी मिटाती है। दाहिकाशक्ति जला देती है तथा वस्तुको पकाती एवं ठण्डक भी दूर करती है। ये दोनों शक्तियाँ अग्निसे भिन्न भी नहीं हैं और अभिन्न भी नहीं हैं। भिन्न इसलिये नहीं हैं कि वे अग्निरूप ही हैं अर्थात् उन्हें अग्निसे अलग नहीं किया जा सकता और अभिन्न इसलिये नहीं हैं कि अग्निके रहते हुए भी मन्त्र औषध आदिसे अग्निकी दाहिकाशक्ति कुण्ठित की जा सकती है। ऐसे ही भगवान्में जो शक्ति रहती है उसे भगवान्से भिन्न और अभिन्न दोनों ही नहीं कह सकते।जैसे दियासलाईमें अग्निकी सत्ता तो सदा रहती है पर उसकी प्रकाशिका और दाहिकाशक्ति छिपी हुई रहती है ऐसे ही भगवान् सम्पूर्ण देश काल वस्तु व्यक्ति आदिमें सदा रहते हैं पर उनकी शक्ति छिपी हुई रहती है। उस शक्तिको अधिष्ठित करके अर्थात् अपने वशमें करके उसके द्वारा भगवान् प्रकट होते हैं। जैसे जबतक अग्नि अपनी प्रकाशिका और दाहिकाशक्तिको लेकर प्रकट नहीं होती तबतक सदा रहते हुए भी अग्नि नहीं दीखती ऐसे ही जबतक भगवान् अपनी शक्तिको लेकर प्रकट नहीं होते तबतक भगवान् हरदम रहते हुए भी नहीं दीखते।राधाजी सीताजी रुक्मिणीजी आदि सब भगवान्की निजी दिव्य शक्तियाँ हैं। भगवान् सामान्यरूपसे सब जगह रहते हुए भी कोई काम नहीं करते। जब करते हैं तब अपनी दिव्य शक्तिको लेकर ही करते हैं। उस दिव्य शक्तिके द्वारा भगवान् विचित्रविचित्र लीलाएँ करते हैं। उनकी लीलाएँ इतनी विचित्र और अलौकिक होती हैं कि उनको सुनकर गाकर और याद करके भी जीव पवित्र होकर अपना उद्धार कर लेते हैं। निर्गुणउपासनामें वही शक्ति ब्रह्मविद्या हो जाती है और सगुणउपासनामें वही शक्ति भक्ति हो जाती है। जीव भगवान्का ही अंश है। जब वह दूसरोंमें मानी हुई ममता हटाकर एकमात्र भगवान्की स्वतःसिद्धवास्तविक आत्मीयताको जाग्रत् कर लेता है तब भगवान्की शक्ति उसमें भक्तिरूपसे प्रकट हो जाती है। वह भक्ति इतनी विलक्षण है कि निराकार भगवान्को भी साकाररूपसे प्रकट कर देती है भगवान्को भी खींच लेती है। वह भक्ति भी भगवान् ही देते हैं।भगवान्की भक्तिरूप शक्तिके दो रूप हैं विरह और मिलन। भगवान् विरह भी भेजते हैं (टिप्पणी प0 218.3) और मिलन भी। जब भगवान् विरह भेजते हैं तब भक्त भगवान्के बिना व्याकुल हो जाता है। व्याकुलताकी अग्निमें संसारकी आसक्ति जल जाती है और भगवान् प्रकट हो जाते हैं।ज्ञानमार्गमें भगवान्की शक्ति पहले उत्कट जिज्ञासाके रूपमें आती है (जिससे तत्त्वको जाने बिना साधकसे रहा नहीं जाता) और फिर ब्रह्मविद्यारूपसे जीवके अज्ञानका नाश करके उसके वास्तविक स्वरूपको प्रकाशित कर देती है। परन्तु भगवान्की वह दिव्य शक्ति जिसे भगवान् विरहरूपसे भेजते हैं उससे भी बहुत विलक्षण है। भगवान् कहाँ हैं क्या करूँ कहाँ जाऊँ इस प्रकार भक्त व्याकुल हो जाता है तो यह व्याकुलता सब पापोंका नाश करके भगवान्को साकाररूपसे प्रकट कर देती है। व्याकुलतासे जितना जल्दी काम बनता है उतना विवेकविचारपूर्वक किये गये साधनसे नहीं।विशेष बात भगवान् अपनी प्रकृतिके द्वारा अवतार लेते हैं और तरहतरहकी अलौकिक लीलाएँ करते हैं। जैसे अग्नि स्वयं कुछ नहीं करती उसकी प्रकाशिकाशक्ति प्रकाश कर देती है दाहिकाशक्ति जला देती है ऐसे ही भगवान् स्वयं कुछ नहीं करते उनकी दिव्य शक्ति ही सब काम कर देती है। शास्त्रोंमें आता है कि सीताजी कहती हैं रावणको मारना आदि सब काम मैंने किया है रामजीने कुछ नहीं किया। जैसे मनुष्य और उसकी शक्ति (ताकत) है ऐसे ही भगवान् और उनकी शक्ति है। उस शक्तिको भगवान्से अलग भी नहीं कह सकते और एक भी नहीं कह सकते। मनुष्यमें जो शक्ति है उसे वह अपनेसे अलग करके नहीं दिखा सकता इसलिये वह उससे अलग नहीं है। मनुष्य रहता है पर उसकी शक्ति घटतीबढ़ती रहती है इसलिये वह मनुष्यसे एक भी नहीं है। यदि उसकी मनुष्यसे एकता होती तो वह उसके स्वरूपके साथ बराबर रहती घटतीबढ़ती नहीं। अतः भगवान् और उनकी शक्तिको भिन्न अथवा अभिन्न कुछ भी नहीं कह सकते। दार्शनिकोंने भिन्न भी नहीं कहा और अभिन्न भी नहीं कहा। वह शक्ति अनिर्वचनीय है। भगवान् श्रीकृष्णके उपासक उस शक्तिको श्रीजी(राधाजी) के नामसे कहते हैं। जैसे पुरुष और स्त्री दो होते हैं ऐसे श्रीकृष्ण और श्रीजी दो नहीं हैं। ज्ञानमें तो द्वैतका अद्वैत होता है अर्थात् दो होकर भी एक हो जाता है और भक्तिमें अद्वैतका द्वैत होता है अर्थात् एक होकर भी दो हो जाता है। जीव और ब्रह्म एक हो जायँ तो ज्ञान होता है और एक ही ब्रह्म दो रूप हो जाय तो भक्ति होती है। एक ही अद्वैततत्त्व प्रेमकी लीला करनेके लिये प्रेमका आस्वादन करनेके लिये सम्पूर्ण जीवोंको प्रेमका आनन्द देनेके लिये श्रीकृष्ण और श्रीजी इन दो रूपोंसे प्रकट होता है (टिप्पणी प0 219)। दो रूप होनेपर भी दोनोंमें बड़ा कौन है और कौन छोटा कौन प्रेमी है और कौन प्रेमास्पद इसका पता ही नहीं चलता। दोनों ही एकदूसरेसे बढ़कर विलक्षण दीखते हैं। दोनों एकदूसरेके प्रति आकृष्ट होते हैं। श्रीजीको देखकर भगवान् प्रसन्न होते हैं और भगवान्को देखकर श्रीजी। दोनोंकी परस्पर प्रेमलीलासे रसकी वृद्धि होती है। इसीको रास कहते हैं।भगवान्की शक्तियाँ अनन्त हैं अपार हैं। उनकी दिव्य शक्तियोंमें ऐश्वर्यशक्ति भी है और माधुर्यशक्ति भी। ऐश्वर्यशक्तिसे भगवान् ऐसे विचित्र और महान् कार्य करते हैं जिनको दूसरा कोई कर ही नहीं सकता। ऐश्वर्यशक्तिके कारण उनमें जो महत्ता विलक्षणता अलौकिकता दीखती है वह उनके सिवाय और किसीमेंदेखनेसुननेमें नहीं आती। माधुर्यशक्तिमें भगवान् अपने ऐश्वर्यको भूल जाते हैं। भगवान्को भी मोहित करनेवाली माधुर्यशक्तिमें एक मधुरता मिठास होती है जिसके कारण भगवान् बड़े मधुर और प्रिय लगते हैं। जब भगवान् ग्वालबालोंके साथ खेलते हैं तब माधुर्यशक्ति प्रकट रहती है। अगर उस समय ऐश्वर्यशक्ति प्रकट हो जाय तो सारा खेल बिगड़ जाय ग्वालबाल डर जायँ और भगवान्के साथ खेल भी न सकें। ऐसे ही भगवान् कहीं मित्ररूपसे कहीं पुत्ररूपसे और कहीं पतिरूपसे प्रकट हो जाते हैं तो उस समय उनकी ऐश्वर्यशक्ति छिपी रहती है और माधुर्यशक्ति प्रकट रहती है। तात्पर्य है कि भगवान् भक्तोंके भावोंके अनुसार उनको आनन्द देनेके लिये ही अपनी ऐश्वर्यशक्तिको छिपाकर माधुर्यशक्ति प्रकट कर देते हैं।जिस समय माधुर्यशक्ति प्रकट रहती है उस समय ऐश्वर्यशक्ति प्रकट नहीं होती और जिस समय ऐश्वर्यशक्ति प्रकट रहती है उस समय माधुर्यशक्ति प्रकट नहीं होती। ऐश्वर्यशक्ति केवल तभी प्रकट होती है जब माधुर्यभावमें कोई शङ्का पैदा हो जाय। जैसे माधुर्यशक्तिके प्रकट रहनेपर भगवान् श्रीकृष्ण बछड़ोंको ढूँढ़ते हैं। परन्तु बछड़े कहाँ गये यह शङ्का पैदा होते ही ऐश्वर्यशक्ति प्रकट हो जाती है और भगवान् तत्काल जान जाते हैं कि बछड़ोंको ब्रह्माजी ले गये हैं।भगवान्में एक सौन्दर्यशक्ति भी होती है जिससे हरेक प्राणी उनमें आकृष्ट हो जाता है। भगवान् श्रीकृष्णके सौन्दर्यको देखकर मथुरापुरवासिनी स्त्रियाँ आपसमें कहती हैं गोप्यस्तपः किमचरन् यदमुष्य रूपं लावण्यसारमसमोर्ध्वमनन्यसिद्धम्।दृग्भिः पिबन्त्यनुसवाभिनवं दुराप मेकान्तधाम यशसः श्रिय ऐश्वरस्य।।(श्रीमद्भा0 10। 44। 14)इन भगवान् श्रीकृष्णका रूप सम्पूर्ण सौन्दर्यका सार है सृष्टिमात्रमें किसीका भी रूप इनके रूपके समान नहीं है। इनका रूप किसीके सँवारनेसजाने अथवा गहनेकपड़ोंसे नहीं प्रत्युत स्वयंसिद्ध है। इस रूपको देखतेदेखते तृप्ति भी नहीं होती क्योंकि यह नित्य नवीन ही रहता है। समग्र यश सौन्दर्य और ऐश्वर्य इस रूपके आश्रित है। इस रूपके दर्शन बहुत ही दुर्लभ हैं। गोपियोंने पता नहीं कौनसा तप किया था जो अपने नेत्रोंके दोनोंसे सदा इनकी रूपमाधुरीका पान किया करती हैं शुकदेवजी कहते हैं निरीक्ष्य तावुत्तमपूरुषौ जना मञ्चस्थिता नागरराष्ट्रका नृप।प्रहर्षवेगोत्कलितेक्षणाननाः पपुर्न तृप्ता नयनैस्तदाननम्।।पिबन्त इव चक्षुर्भ्यां लिहन्त इव जिह्वया।जिघ्रन्त इव नासाभ्यां श्लिष्यन्त इव बाहुभिः।।(श्रीमद्भा0 10। 43। 20 21)परीक्षित् मञ्चोंपर जितने लोग बैठे थे वे मथुराके नागरिक और राष्ट्रके जनसमुदाय पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीको देखकर इतने प्रसन्न हुए कि उनके नेत्र और मुखकमल खिल उठे उत्कण्ठासे भर गये। वे नेत्रोंद्वारा उनकी मुखमाधुरीका पान करतेकरते तृप्त ही नहीं होते थे मानो वे उन्हें नेत्रोंसे पी रहे हों जिह्वासे चाट रहे हों नासिकासे सूँघ रहे हों और भुजाओँसे पकड़कर हृदयसे सटा रहे हों भगवान् श्रीरामके सौन्दर्यको देखकर विदेह राजा जनक भी विदेह अर्थात् देहकी सुधबुधसे रहित हो जाते हैं मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।(मानस 1। 215। 4)और कहते हैं सहज बिरागरूप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा।।(मानस 1। 216। 2)वनमें रहनेवाले कोलभील भी भगवान्के विग्रहको देखकर मुग्ध हो जाते हैं करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे।।चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।(मानस 2। 135। 3)प्रेमियोंकी तो बात ही क्या वैरभाव रखनेवाले राक्षस खरदूषण भी भगवान्के विग्रहकी सुन्दरताको देखकर चकित हो जाते हैं और कहते हैं नाग असुर सुर नर मुनि जेते। देखे जिते हते हम केते।।हम भरि जन्म सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।(मानस 3। 19। 2)तात्पर्य है कि भगवान्के दिव्य सौन्दर्यकी ओर प्रेमी विरक्त ज्ञानी मूर्ख वैरी असुर और राक्षसतक सबका मन आकृष्ट हो जाता है।सम्भवाम्यात्ममायया जो मनुष्य भगवान्से विमुख रहते हैं उनके सामने भगवान् अपनी योगमायामें छिपे रहते हैं और साधारण मनुष्यजैसे ही दीखते हैं। मनुष्य ज्योंज्यों भगवान्के सम्मुख होता जाता है त्योंत्यों भगवान् उसके सामने प्रकट होते जाते हैं। इसी योगमायाका आश्रय लेकर भगवान् विचित्रविचित्र लीलाएँ करते हैं (टिप्पणी प0 220)।भगवद्विमुख मूढ़ पुरुषके आगे दो परदे रहते हैं एक तो अपनी मूढ़ताका और दूसरा भगवान्की योगमायाका (गीता 7। 25)। अपनी मूढ़ता रहनेके कारण भगवान्का प्रभाव साक्षात् सामने प्रकट होनेपर भी वह उसे समझ नहीं सकता जैसे द्रौपदीका चीरहरण करनके लिये दुःशासन अपना पूरा बल लगाता है उसकी भुजाएँ थक जाती हैं पर साड़ीका अन्त नहीं आता द्रुपद सुता निरबल भइ ता दिन तजि आये निज धाम।दुस्सासन की भुजा थकित भई बसनरूप भए स्याम।। इस प्रकार भगवान्ने सभाके भीतर अपना ऐश्वर्य साक्षात् प्रकट कर दिया। परन्तु अपनी मूढ़ताके कारण दुःशासन दुर्योधन कर्ण आदिपर इस बातका कोई असर ही नहीं पड़ा कि द्रौपदीके द्वारा भगवान्को पुकारनेमात्रसे कितनी विलक्षणता प्रकट हो गयी एक स्त्रीका चीरहरण भी नहीं कर सके तो और क्या कर सकते हैं इस तरफ उनकी दृष्टि ही नहीं गयी। भगवान्का प्रभाव सामने देखते हुए भी वे उसे जान नहीं सके।यदि जीव अपनी मूढ़ता (अज्ञान) दूर कर दे तो उसे अपने स्वरूपका अथवा परमात्मतत्त्वका बोध तो हो जाता है पर भगवान्के दर्शन नहीं होते (टिप्पणी प0 221.1)। भगवान्के दर्शन तभी होते है जब भगवान् अपनी योगमायाका परदा हटा देते हैं। अपना अज्ञान मिटाना तो जीवके हाथकी बात है पर योगमायाको दूर करना उसके हाथकी बात नहीं है। वह सर्वथा भगवान्के शरण हो जाय तो भगवान् अपनी शक्तिसे उसका अज्ञान भी मिटा सकते हैं और दर्शन भी दे सकते हैं। भगवान् जितनी लीलाएँ करते हैं सब योगमायाका आश्रय लेकर ही करते हैं। इसी कारण उनकी लीलाको देख सकते हैं उसका अनुभव कर सकते हैं। यदि वे योगमायाका आश्रय न लें तो उनकी लीलाको कोई देख ही नहीं सकता उसका आस्वादन कोई कर ही नहीं सकता।अवतारसम्बन्धी विशेष बातअवतारका अर्थ है नीचे उतरना। सब जगह परिपूर्ण रहनेवाले सच्चिदानन्दस्वरूप परमात्मा अपने अनन्य भक्तोंकी इच्छा पूरी करनेके लिये अत्यधिक कृपासे एक स्थानविशेषमें अवतार लेते हैं और छोटे बन जाते हैं। दूसरे लोगोंका प्रभाव या महत्त्व तो बड़े हो जानेसे होता है पर भगवान्का प्रभाव या महत्त्व छोटे हो जानेसे होता है। कारण कि अपार असीम अनन्त होकर भी भगवान् छोटेसे बन जाते हैं यह उनकी विलक्षणता ही है। जैसे भगवान् अनन्त ब्रह्माण्डोंको धारण करते हैं परन्तु एक पर्वतको धारण करनेसे भगवान् गिरिधारी नामसे प्रसिद्ध हो गये अनन्त ब्रह्माण्ड जिनके रोमरोममें स्थित है (टिप्पणी प0 221.2) ऐसे परमेश्वर एक पर्वतको उठा लें यह कोई बड़ी बात नहीं प्रत्युत छोटी बात है। परन्तु छोटी बातमें ही भगवान्की बड़ी बात होती है। इस प्रकार अवतार लेनेमें ही भगवान्की विशेषता है।साधारण आदमी जिस स्थितिपर है उसी स्थितिपर आकर भगवान् वैसी लीला करते हैं। बिलकुल भोलेभाले साधारण बालककी तरह बनकर लीला करते हैं। ग्वालबालोंसे खेलते समय वे दूसरे ग्वालबालसे हार भी जाते हैं। जो ग्वालबाल जीत जाता है वह सवार बन जाता है और भगवान् घोड़ा बन जाते हैं। यह उनकी विशेष महत्ता है।भगवान्के प्रभावको जाननेवाले ज्ञानी महात्मालोग तो उनके स्वरूपमें मस्त रहते हैं पर भक्तोंको उनकी साधारण अज्ञ बालककी तरह भोलीभाली लीला बड़ी विचित्र और मीठी लगती है। वहाँ ज्ञानियोंका ज्ञान नहीं चलता। ज्ञानियोंके शिरोमणि ब्रह्माजी भी भगवान्की लीलाको देखकर चकरा गये बड़ेबड़े ऋषिमुनि योगीतपस्वी संतमहात्मा भी उनकी लीलाओंके रहस्यको नहीं जान सकते और इस विषयमें मूक हो जाते हैं। भगवान् ही कृपा करके जिन प्यारे अन्तरङ्ग भक्तोंको जनाना चाहते हैं वे ही उनकी लीलाके तत्त्वको जान पाते हैं सोइ जानइ जेहि देहु जनाई (मानस 2। 127। 2)। गायें चराते समय ग्वालबालोंसे खेलते समय भी भगवान् बड़ेबड़े प्रभावशाली कार्य कर देते हैं। बड़ेबड़े बलवान् राक्षसोंको भी चुटकियोंमें ही खत्म कर देते हैं। छोटेसे बालक बननेपर भी उनका प्रभाव वैसाकावैसा ही रहता है।जैसे कोई बहुत बड़ा विद्वान् किसी बालकको वर्णमाला सिखाता है तो वह बालकका हाथ पकड़कर उससे क ख ग ৷৷. लिखवाता है और मुँहसे भी वैसा बोलता है परन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह विद्वान् स्वयं वर्णमाला सीखता है। वह तो बालककी स्थितिमें आकर उसे सिखाता है जिससे वह सुगमतापूर्वक सीख जाय। ऐसे ही अनन्तब्रह्माण्डनायक भगवान् हमलोगोंके बीच हमारे सामने आते हैं और हमारी तरह ही बनकर हमें शिक्षा देते हैं। उनकी बड़ी अलौकिक विचित्रविचित्र लीलाएँ होती हैं जिनका श्रवण पठन और गायन करनेसे भी लोगोंका उद्धार हो जाता है। सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके श्लोकमें अपने अवतारका अवसर बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.5 4.9।।बहूनि इत्यादि अर्जुन इत्यन्तम्। श्रीभगवान् किल पूर्णषाड्गुण्यत्वात् शरीरसंपर्कमात्ररहितोऽपि स्थितिकारित्वात् कारुणिकतया आत्मांशं सृजति। आत्मा पूर्णषाड्गुण्यः अंशः उपकारकत्वेन अप्रधानभूतो ( N omit अ) यत्र तत् आत्मांशं शरीरं गृह्णाति इत्यर्थः। अत एवास्य जन्म दिव्यम् यत आत्ममायया योगप्रज्ञया स्वस्वातन्त्रयशक्त्या ( omits स्व) आरब्धम् न कर्मभिः। कर्मापि दिव्यम् फलदानासमर्थत्वात्। यश्चैवमेतत्तत्त्वं वेत्ति आत्मन्यप्येवमेव मन्यते सोऽवश्यं भगवद्वासुदेवतत्त्वं जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.6।।ईश्वरस्य कारणाभावाज्जन्मैवायुक्तमतीतानेकजन्मवत्त्वं तु दूरोत्सारितमिति शङ्कते कथमिति। वस्तुतो जन्माभावे़ऽपि मायावशाज्जन्म संभवतीत्युत्तरमाह उच्यत इति। पारमार्थिकजन्मायोगे कारणं पूर्वार्धेनानूद्य प्रातिभासिकजन्मसंभवे कारणमाह प्रकृतिमिति। प्रकृतिशब्दस्य स्वरूपविषयत्वं प्रत्यादेष्टुमात्ममाययेत्युक्तम्। वस्तुतो जन्माभावे कारणानुवादभागं विवृणोति अजोऽपीत्यादिना। प्रातिभासिकजन्मसंभवे कारणकथनपरमुत्तरार्धं विभजते प्रकृतिमित्यादिना। प्रकृतिशब्दस्य स्वरूपशब्दपर्यायत्वं वारयति मायामिति। तस्याः स्वातन्त्र्यं निराकृत्य भगवदधीनत्वमाह ममेति। तस्याश्चाधिकरणद्वारेणावच्छिन्नत्वं सूचयति वैष्णवीमिति। मायाशब्दस्यापि प्रज्ञानामसु पाठाद्विज्ञानशक्तिविषयत्वमाशङ्क्याह त्रिगुणात्मिकामिति। तस्याः कार्यलिङ्गकमनुमानं सूचयति यस्या इति। जगतो मायावशवर्तित्वमेव स्फुटयति ययेति। यथा लोके कश्चिज्जातो देहवानालक्ष्यते एवमहमपि मायामाश्रित्य स्ववशया संभवामि जन्मव्यवहारमनुभवामि तेन मायामयमीश्वरस्य जन्मेत्याह तां प्रकृतिमित्यादिना। संभवामीत्युक्तमेव विभजते देहवानिति। अस्मदादेरिव तवापि परमार्थत्वाभिमानो जन्मादिविषये स्यादित्याशङ्क्य प्रागुक्तस्वरूपपरिज्ञानवत्त्वादीश्वरस्य मैवमित्याह न परमार्थत इति। आवृतज्ञानवतो लोकस्य जन्मादिविषये परमार्थत्वाभिमानः संभवतीत्याह लोकवदिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.6।।प्रश्नस्य परिहृतत्वात्अजोऽपि इति किमर्थं इत्यत आह न तर्हीति। यदि जन्मानि व्यतीतानि तर्हीत्यर्थः। अनादिर्देहतोऽपि। उपलक्षणं चैतत्। मरणरहितः सर्वभूतानां ईश्वरश्चेत्यपि द्रष्टव्यम्। तथा चोक्तविरोध इति भावः ननु देहतोऽप्यनादित्वादेराक्षेपेऽजत्वादिमात्रं कथमुच्यते इत्यतोअव्ययात्मा इत्येतावता देहतोऽप्यविनाशमाचष्टे। तत्साहचर्यात्अजोऽपि इत्येतदपि तथैव व्याख्येयमिति भावेनाह अव्यय इति। अपिपदात्परं अस्येत्यध्याहार्यम्। स्यादेवं व्याख्यानं यदि भगवद्विग्रहस्याप्यव्ययत्वं गीताचार्याभिमतं स्यात् तदेव कुतः इत्यत आह अनन्तमिति। इति च रूपविशेषणमिति वर्तते। एवं तर्हि कथं तत्रैवजगृहे पौरुषं रूपं भाग.1।3।9 इति ग्रहणमुच्यते गृहीतस्य च त्यागो नियत एवेत्यत आह जगृह इति।व्यक्तिः इत्युच्यत इति शेषः। कुत एवं कल्प्यते इत्यत आह युक्तय इति। युज्यत एभिरिति युक्तयः प्रमाणानि असम्भावनापरिहारार्था अचिन्त्यशक्तित्वाद्या युक्तयो वा। उक्ता द्वितीये। अस्तु भगवद्विग्रहस्याप्यव्ययत्वम् अत्र तु स्वरूपस्यैवोच्यत इति किं न स्यात् इत्यत आह आत्मेति। आत्मनः स्वरूपस्य देहस्याप्यव्ययत्वोपपादनेनाजत्वमपि साहचर्यात्तस्यैवेति योऽभिप्रायस्तं प्रकटयितुमव्ययत्वमुपक्रम्यानादित्वमित्युक्तम्। सर्वसमं जीवानामप्यस्ति अतस्तद्विषयो नाक्षेपः परिहारो वा सम्भवतीति भावः। आत्मशब्दोऽप्यन्यथा व्यर्थः। अस्मत्पक्षे स्वरूपदेहयोरुपादानार्थः। अत एवदेहोऽपि भाग.11।13।17 इत्युक्तम्। एवं तर्हिप्रकृतिं स्वामधिष्ठाय इति कथमुक्तं इत्यतस्तदन्यथा व्याख्यातुमाह कथमिति। स्वरूपतो देहतश्चानादिनित्यस्यसम्भवामि इति जनिः कथमुच्यते व्याहतत्वादित्यत आहेतिशेषः।अधिष्ठाय इत्यतः परमितिशब्दश्च। कथमनेन परिहारः इत्यतो व्याचष्टे प्रकृत्येति। वसुदेवादिषु प्रादुर्भूतत्वादिति शेषः। अनेन जन्मभ्रान्तेर्निमित्तमुक्तम्। यथोक्तं स्त्रीपुम्प्रसङ्गादित्यादि। भ्रान्तेरुपादानमाह तयैवेति। तमोरूपया यदि मातापितृसम्बन्धोऽङ्गीकृतस्तर्हि तन्निमित्तं दुःखादिकमपि प्रसज्जत इत्याशङ्कानिरासायस्वां इतिपदं व्याख्याति न त्विति। प्रकृतेर्भगवदधीनत्वं कुतः इत्यत आह द्रव्यमिति। अत्र वाक्ये प्रकृतिर्न श्रूयत इत्यत आह सा हीति। द्रव्यपदेनेति शेषः।तस्याप्रकृतिवाचित्वं कुतः इत्यत आह तत इति। सर्वसृष्टिकारणानि ह्यत्र निर्दिश्यन्ते। तच्च प्रकृतेरेव सम्भवति। न पृथिव्यादेरित्यर्थः। आत्ममाययाऽऽत्माविद्ययेति प्रतीतिनिरासायाह आत्मेति। कुतो हेतोरेवं जीवविलक्षणं ते जन्म इत्याशङ्कानिरासार्थमेतत्। अन्यथाप्रतीतिरप्यनेन परिहृता सर्वज्ञस्याविद्यायोगात्। प्रकृतिरत्र माया किं न स्यात् इत्यत आह प्रकृतेरिति। मायाशब्दस्य ज्ञानवाचित्वं कुतः इत्यत आह केतुरिति इति प्रज्ञायाः नामधेयानीति वाक्यशेषात्। प्राक्प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय इत्यनेनैव भ्रमनिमित्तत्वमुपादानत्वं च प्रकृतेरुक्तमिति मायाशब्दो न प्रकृतिवाची पुनरुक्तिप्रसङ्गादित्युक्तम् इदानीं तस्य निमित्तमात्रपरत्वे मायाशब्दस्य प्रकृत्यर्थतायामपि न दोषः उपादानप्रतिपादनार्थत्वादिति भावेनाह सृष्टीति प्रकृत्येति शेषः। तेषां वसुदेवादीनां सृष्ट्वा तत्र प्रादुर्भूतः विमोहिकया मायाख्यया। अत्रागमसम्मतिमाह उक्तं चेति। आत्मचिद्बलादजात एव। नन्वीशनशीलानामपि ब्रह्मादीनामुत्पत्तिमरणदर्शनेन विरोधाभावादीश्वरोऽपिसम्भवामि इति कथमुच्यतेस्थेशभासपिसकसो वरच् अष्टा.3।2।175 इत्येतद्विहायान्यथा व्याचष्टे ईश्वर इति। कुत एतदित्यत आह ईशेभ्य इति। एतदागमवलादेव समासाकारलोपावनुमन्तव्यौ। अजत्वादेः सम्भवेन शाब्दो व्याघातः अस्य तु व्याप्त्येति ज्ञापनाय क्रममुल्लङ्घ्य व्याख्यातम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.6।।न तर्ह्यनादिर्भवानित्यत आह अजोऽपीति। अव्यय आत्मा देहोऽपीत्यव्ययात्मा।अनन्तं विश्वतोमुखम् 11।11 इति रूपविशेषणमुत्तरत्रएतन्नानावताराणां निधानं बीजमव्ययम् भागं.1।3।5 इति चजगृहे भाग.1।3।1 इति तु व्यक्तिः। युक्तयस्तूक्ताः मा.भा.2।24पृ139 आत्माऽनादित्वं तु सर्वसमम्। कथमनादिनित्यस्य जनिः प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय प्रकृत्या जातेषु वसुदेवादिषु तथैव तेषां जात इव प्रतीये इत्यर्थः। न तु स्वतन्त्रामधिष्ठायेत्याह स्वामिति।द्रव्यं कर्म च भाग.2।10।142 इति ह्युक्तम्। सा हि तत्रोक्ता। ततः सर्वसृष्टेः। आत्ममायया आत्मज्ञानेन प्रकृतेः पृथगभिधानात्।केतुः केतश्चितिश्चित्तं मतिः क्रतुर्मनीषा माया इति ह्यभिधानम्। सृष्टिकारणया तेषां शरीरादि सृष्ट्वा विमोहिकया। अजात एव जात इव प्रतीये वा। उक्तं च महदादेश्च माता या श्रीर्भूमिरिति कल्पिता। विमोहिका च दुर्गाख्या ताभिर्विष्णुरजोऽपि हि। जातवत्प्रथते ह्यात्मचिद्बलान्मूढचेतसाम् इति। ईश्वर ईशेभ्योऽपि वरः। तच्चोक्तम् ईशेभ्यो ब्रह्मरुद्रश्रीशेषादिभ्यो यतो भवान्। वरोऽत ईश्वराख्या ते मुख्या नान्यस्य कस्यचित् इति ब्रह्मवैवर्ते।समर्थ ईश इत्युक्तस्तद्वरत्वात्त्वमीश्वरः इति च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.6।।अजत्वाव्ययत्वसर्वेश्वरत्वादिसर्वं पारमेश्वरं प्रकारम् अजहद् एव स्वां प्रकृतिम् अधिष्ठाय आत्ममायया संभवामि प्रकृतिः स्वभावः स्वम् एव स्वभावम् अधिष्ठाय स्वेन एव रूपेण स्वेच्छया संभवामि इत्यर्थः।स्वरूपं तु आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्। (यजुर्वे0 31।18)क्षयन्तमस्य रजसः पराके। (साम0 17।1।4।2)य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्मयः पुरुषः (छा0 उ0 1।6।6) तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयोऽमृतो हिरण्मयः। (तै0 उ0 1।6।1)सर्वे निमेषा जज्ञिरे विद्युतः पुरुषादधि। (यजुर्वे0 32।2)भारूपः सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः। (छा0 उ0 3।14।2)माहारजनं वासः (बृ0 उ0 2।3।6) इत्यादिश्रुतिसिद्धम्।आत्ममायया आत्मीयया मायया।माया वयुनं ज्ञानम् (वे0 नि0 ध0 व0 22) इति ज्ञानपर्यायः अत्र मायाशब्दः। तथा च अभियुक्तप्रयोगः मायया सततं वेत्ति प्राणिनां च शुभाशुभम् इति। आत्मीयेन ज्ञानेन आत्मसंकल्पेन इत्यर्थः।अतः अपहतपाप्मत्वादिसमस्तकल्याणगुणात्मकत्वं सर्वम् ऐश्वरं स्वभावम् अजहद् एव स्वम् एव रूपं देवमनुष्यादिसजातीयस्थानं कुर्वन् आत्मसंकल्पेन देवादिरूपः संभवामि।तद् इदम् आह अजायमानो बहुधा विजायते (यजुर्वेद 31।19) इति श्रुतिः। इतरपुरुषसाधारणं जन्म अकुर्वन् देवादिरूपेण स्वसंकल्पेन उक्तप्रक्रियया जायत इत्यर्थः।बहूनि मे व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि (गीता 4।5)तदात्मानं सृजाम्यहम्।। (गीता 4।7)जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः। (गीता 4।9) इति पूर्वापराविरोधाच्च।जन्मकालम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.6।। अजोऽपि जन्मरहितोऽपि सन् तथा अव्ययात्मा अक्षीणज्ञानशक्तिस्वभावोऽपि सन् तथा भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानाम् ईश्वरः ईशनशीलोऽपि सन् प्रकृतिं स्वां मम वैष्णवीं मायां त्रिगुणात्मिकाम् यस्या वशे सर्वं जगत् वर्तते यया मोहितं सत् स्वमात्मानं वासुदेवं न जानाति तां प्रकृतिं स्वाम् अधिष्ठाय वशीकृत्य संभवामि देहवानिव भवामि जात इव आत्ममायया आत्मनः मायया न परमार्थतो लोकवत्।।तच्च जन्म कदा किमर्थं च इत्युच्यते

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【 Verse 4.7 】

▸ Sanskrit Sloka: यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत | अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ||

▸ Transliteration: yadā yadā hi dharmasya glānirbhavati bhārata | abhyutthānam adharmasya tad ātmānaṁ sṛjāmyaham ||

▸ Glossary: yadā -yadā : whenever; hi: well; dharmasya: of righteousness; glāniḥ: decline; bhavati: takes place; bhārata: O descendant of Bhārata; abhyutthānaṁ: pre- dominance; adharmasya: of unrighteousness; tadā : at that time; ātmānaṁ: self; sṛjāmi: bring forth; ahaṁ: I

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.7 Whenever positive consciousness declines, when collective negativity rises, O Bhārat, again and again, at these times, I happen Myself.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.7।।हे भरतवंशी अर्जुन जबजब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है तबतब ही मैं अपनेआपको साकाररूपसे प्रकट करता हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.7।। हे भारत जबजब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है तबतब मैं स्वयं को प्रकट करता हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.7 यदा यदा whenever? हि surely? धर्मस्य of righteousness? ग्लानिः decline? भवति is? भारत O Bharata? अभ्युत्थानम् rise? अधर्मस्य of unrighteousness? तदा then? आत्मानम् Myself? सृजामि manifest? अहम् I.Commentary Dharma is that which sustains and holds together. There is no proper eivalen for this term in the English language. That which helps a man to attain to Moksha or salvation is Dharma. That which makes a man irreligious or unrighteous is Adharma. That which elevates a man and helps him reach the goal of life and attain knowledge is Dharma that which drags him and hurls him down in the abyss of worldliness and ignorance is Adharma.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.7. For, whenever there is a decay of righteousness and the rise of unrighteousness, then, O descendant of Bharata, I send forth (or create) that is which the Self is unimportant.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.7 Whenever spirituality decays and materialism is rampant, then, O Arjuna, I reincarnate Myself!

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.7 Whenever there is a decline of Dharma, O Arjuna, and uprising of Adharma, then I incarnate Myself.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.7 O scion of the Bharata dynasty, whenever there is a decline one virtue and increase of vice, then do I manifest Myself.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.7 Whenever there is decline of righteousness, O Arjuna, and rise of unrighteousness, then I manifest Myself.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.7 See Comment under 4.9

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.7 There is no restriction as to the time of My birth; whenever the Dharma taught by the Vedas that must be observed according to the arrangements of the four stations and the four stages of life declines, and Adharma, its opposite, increases, then I Myself, by My own will and in the manner stated, incarnate Myself.

Sri Krsna gives the purpose of His birth.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.7 O scion of the Bharata dynasty, yada yada hi, whenever; bhavati, there is; a glanih, decline, decrease; dharmasya, of virtue consisting of the duties of castes and stages of life of living beings, which are the means to achieving properity and Liberation; and abhyutthanam, increase, rise; adharmasya, of vice; tada, then; do aham, I; srjami, manifest; atmanam, Myself, through Maya. Why?

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.7।। जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्कर्ष होता है तब ईश्वर अवतार लेते हैं। गीता के प्रथम अध्याय की प्रस्तावना में धर्म शब्द का अर्थ विस्तार पूर्वक बताया जा चुका है। धर्म एक पवित्र सत्य है जिसके पालन से ही समाज धारणा सम्भव होती है। जब बहुसंख्यक लोग धर्म का पालन नहीं करते तब द्विपदपशुओं के समूह द्वारा यह जगत् जीत लिया जाता है उस समय परस्पर सहयोग और आनन्द से जीवन व्यतीत करते हुये सुखी परिवार दिखाई नहीं देते। मनुष्य को शोभा देने वाला उच्च जीवन भी कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। इतिहास के ऐसे काले युग में कोई महान् व्यक्ति समाज में आकर लोगों के जीवन और नैतिक मूल्यों का स्तर ऊँचा उठाने का प्रयत्न करता है। समाज में विद्यमान नैतिक मूल्यों को आगे बढ़ाने से ही यह कार्य सम्पादित नहीं होता वरन् साथसाथ दुष्टता का भी नाश अनिवार्य होता है।इस कार्य के लिये अनन्तस्वरूप परमात्मा कभीकभी देहादि उपाधियों को धारण करके पृथ्वी पर प्रगट होते हैं उस बड़ी सम्पत्ति के स्वामी के समान जो कभीकभी अपनी सम्पत्ति का निरीक्षण करने और उसे सुव्यवस्थित करने के लिये हाथ में अस्त्र आदि लेकर निकलता है। धूप में काम करते श्रमिकों के बीच वह खड़ा रहता है तथापि अपने स्वामित्व को नहीं भूलता। इसी प्रकार समस्त जगत् के अधिष्ठाता भगवान् शरीर धारण कर र्मत्य मानवों के अनैतिक जीवन के साथ निर्लिप्त रहते हुए उनको अधर्म से बाहर निकालकर धर्म मार्ग पर लाने के लिये सदैव प्रयत्नशील रहते हैं।भगवान् के इस अवतरण में यहाँ एक बात स्पष्ट की गई है कि यद्यपि वे शरीर धारण करते हैं तथापि अपने स्वातन्त्र्य को नहीं खोते। उपाधियों में वे रहते हैं परन्तु उपाधियों के वे दास नहीं बन जाते।किस प्रयोजन के लिये

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.7।।एवं सर्वज्ञः सर्वेश्वरोऽशरीरी त्वं कदा किमर्थं देहवानिव जात इव प्रतीयस इत्यत आह यदेति। ग्लानिर्हानिः। अभ्युत्थानं वृद्धिः। भरतवंशोद्भवत्वेन धर्महानिं कर्तुमयोग्योऽसीति सूचयन्नाह भारतेति। त्वमपि धर्मसंस्थापनायैभरतवंशेऽवतीर्णोऽसीति गूढाभिप्रायेण वा संबोधयति भारतेति। मायया आत्मानं स्वं सृजामि जन्मवन्तमिव प्रदर्शयामि। आत्मानं देहं सृजामि नित्यसिद्धमेव सृष्टमिव प्रदर्शयामीति केचित्। तन्न। परमेश्वरस्य देहः किं तस्मादन्य उतानन्यः। नाद्यः। तस्यासत्त्वाद्यापत्त्या सच्चिदादिरुपत्वस्वीकारविरोधात्। द्वितीयेऽपि स देहः किं परिच्छिन्न उतापरिच्छिन्नः। आद्ये ईश्वरस्य नित्यमेव परिच्छिन्नत्वं स्यात्। तथाच देहस्य नित्यसिद्धत्वं वदद्भिः परमेश्वरस्यासत्त्वसंपादनेन मूलोच्छेद एव संपादितः। न द्वितीयः। अपरिच्छिन्नः पुनरवयवसमूहः परिमिताकारो देह इति वदतो व्याघातात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.7।।एवं सच्चिदानन्दघनस्य तव कदा किमर्थं वा देहिवद्व्यवहार इति तत्रोच्यते धर्मस्य वेदविहितस्य प्राणिनामभ्युदयनिःश्रेयससाधनस्य प्रवृत्तिनिवृत्तिलक्षणस्य वर्णाश्रमतदाचारव्यंग्यस्य यदा यदा ग्लानिर्हानिर्भवति हे भारत भरतवंशोद्भवत्वेन भा ज्ञानं तत्र रतत्वेन वा त्वं न धर्महानिं सोढुं शक्नोषीति संबोधनार्थः। एंव यदा यदाभ्युत्थानमुद्भवोऽधर्मस्य वेदनिषिद्धस्य नानाविधदुःखसाधनस्य धर्मविरोधिनः तदा तदात्मानं देहं सृजामि नित्यसिद्धमेव सृष्टमेव दर्शयामि मायया।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.7।।कदा संभवसीत्यपेक्षायमाह यदेति। ग्लानिर्ह्रासः। अभ्युत्थानं वृद्धिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.7।।एतदेव प्रकटयति यदा यदेति। हे भारत यदा यदा धर्मस्य मद्भक्त्यादिरूपस्य ग्लानिः सङ्कोचो भवति। अधर्मस्य ज्ञानादिनाशकस्याभ्युत्थानमुत्पत्तिर्भवति। हीति निश्चयेन। तदा आत्मानं लीलोपयोग्या़ञ्जीवान् ज्ञानोपयोग्याँश्चाहं सृजामि। भारतेति सम्बोधनाद्यथेदानीं धर्मरक्षार्थं त्वं सृष्टोऽसीति ज्ञाप्यते।आत्मानं इत्यत्रैकवचनं मुख्यात्माभिप्रायेण वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.7।।कदा संभवसीत्यपेक्षायामाह यदा यदेति। धर्मस्य ग्लानिर्हानिः। अधर्मस्याभ्युत्थानमाधिक्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.7 4.8।।कदा किमर्थं सम्भवसीत्यपेक्षायां स्वप्रादुर्भावकालमाह द्वाभ्याम् यदा यदा हीति। परित्राणायेति। साधूनां धर्मवतां परित्राणाय तत्प्रतिपक्षाणां दुष्कृतां दुष्टं कर्म कुर्वतां विनाशाय च युगेयुगे सम्भवामि। न चात्रावतारकालनियम इत्येतदर्थं यदा यदा युगेयुगे इत्युक्तम् नचैवं दुष्टनिग्रहं कुर्वतोऽपि वैषम्यं शङ्कनीयं यथा चोक्तं लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथाऽर्मके। तद्वदेव महेशस्य नियन्तुर्गुणदोषयोः इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.7।।वह जन्म कब और किसलिये होता है सो कहते हैं हे भारत वर्णाश्रम आदि जिसके लक्षण हैं एवं प्राणियोंकी उन्नति और परम कल्याणका जो साधन है उस धर्मकी जबजब हानि होती है और अधर्मका अभ्युत्थान अर्थात् उन्नति होती है तबतब ही मैं मायासे अपने स्वरूपको रचता हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.7।। व्याख्या   यदा यदा हि धर्मस्य ৷৷. अभ्युत्थानमधर्मस्य धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धिका स्वरूप है भगवत्प्रेमी धर्मात्मा सदाचारी निरपराध और निर्बल मनुष्योंपर नास्तिक पापी दुराचारी और बलवान् मनुष्योंका अत्याचार बढ़ जाना तथा लोगोंमें सद्गुणसदाचारोंकी अत्यधिक कमी और दुर्गुणदुराचारोंकी अत्यधिक वृद्धि हो जाना।यदा यदा पदोंका तात्पर्य है कि जबजब आवश्यकता पड़ती है तबतब भगवान् अवतार लेते हैं। एक युगमें भी जितनी बार आवश्यकता और अवसर प्राप्त हो जाय उतनी बार अवतार ले सकते हैं। उदाहरणार्थ समुद्रमन्थनके समय भगवान्ने अजितरूपसे समुद्रमन्थन किया कच्छपरूपसे मन्दराचलको धारण किया तथा सहस्रबाहुरूपसे मन्दराचलको ऊपरसे दबाकर रखा। फिर देवताओंको अमृत बाँटनेके लिये मोहिनीरूप धारण किया। इस प्रकार भगवान्ने एक साथ अनेक रूप धारण किये।अधर्मकी वृद्धि और धर्मका ह्रास होनेका मुख्य कारण है नाशवान् पदार्थोंकी ओर आकर्षण। जैसे माता और पितासे शरीर बनता है ऐसे ही प्रकृति और परमात्मासे सृष्टि बनती है। इसमें प्रकृति और उसका कार्य संसार तो प्रतिक्षण बदलता रहता है कभी क्षणमात्र भी एकरूप नहीं रहता और परमात्मा तथा उनका अंश जीवात्मा दोनों सम्पूर्ण देश काल आदिमें नित्यनिरन्तर रहते हैं इनमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तन नहीं होता। जब जीव अनित्य उत्पत्तिविनाशशील प्राकृत पदार्थोंसे सुख पानेकी इच्छा करने लगता है और उनकी प्राप्तिमें सुख मानने लगता है तब उसका पतन होने लगता है। लोगोंकी सांसारिक भोग और संग्रहमें ज्योंज्यों आसक्ति बढ़ती है त्योंहीत्यों समाजमें अधर्म बढ़ता है और

Chapter 4 (Part 5)

ज्योंज्यों अधर्म बढ़ता है त्योंहीत्यों समाजमें पापाचरण कलह विद्रोह आदि दोष बढ़ते हैं।सत्ययुग त्रेतायुग द्वापरयुग और कलियुग इन चारों युगोंकी ओर देखा जाय तो इनमें भी क्रमशः धर्मका ह्रास होता है। सत्ययुगमें धर्मके चारों चरण रहते हैं त्रेतायुगमें धर्मके तीन चरण रहते हैं द्वापरयुगमें धर्मके दो चरण रहते हैं और कलियुगमें धर्मका केवल एक चरण शेष रहता है। जब युगकी मर्यादासे भी अधिक धर्मका ह्रास हो जाता है तब भगवान् धर्मकी पुनः स्थापना करनेके लिये अवतार लेते हैं।तदात्मानं सृजाम्यहम् जबजब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है तबतब भगवान् अवतार ग्रहण करते हैं। अतः भगवान्के अवतार लेनेका मुख्य प्रयोजन है धर्मकी स्थापना करना और अधर्मका नाश करना।धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होनेपर लोगोंकी प्रवृत्ति अधर्ममें हो जाती है। अधर्ममें प्रवृत्ति होनेसे स्वाभाविक पतन होता है। भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं। इसलिये लोगोंको पतनमें जानेसे रोकनेके लिये वे स्वयं अवतार लेते हैं।कर्मोंमें सकामभाव उत्पन्न होना ही धर्मकी हानि है और अपनेअपने कर्तव्यसे च्युत होकर निषिद्ध आचरण करना ही अधर्मका अभ्युत्थान है काम अर्थात् कामनासे ही सबकेसब अधर्म पाप अन्याय आदि होते हैं (गीता 3। 37)। अतः इस काम का नाश करनेके लिये तथा निष्कामभावका प्रसार करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।यहाँ शङ्का हो सकती है कि वर्तमान समयमें धर्मका ह्रास और अधर्मकी वृद्धि बहुत हो रही है फिर भगवान् अवतार क्यों नहीं लेते इसका समाधान यह है कि युगको देखते हुए अभी वैसा समय नहीं आया है जिससे भगवान् अवतार लें। त्रेतायुगमें राक्षसोंने ऋषिमुनियोंको मारकर उनकी हड्डियोंके ढेर लगा दिये थे। यह तो त्रेतायुगसे भी गयाबीता कलियुग है पर अभी धर्मात्मा पुरुष जी रहे हैं उनका कोई नाश नहीं करता। दूसरी एक बात और है। जब धर्मका ह्रास और अधर्मकी वृद्धि होती है तब भगवान्की आज्ञासे संत इस पृथ्वीपरआते हैं अथवा यहींसे विशेष साधक पुरुष प्रकट हो जाते हैं और धर्मकी स्थापना करते हैं। कभीकभी परमात्माको प्राप्त हुए कारक महापुरुष भी संसारका उद्धार करनेके लिये आते हैं। साधक और सन्त पुरुष जिस देशमें रहते हैं उस देशमें अधर्मकी वैसी वृद्धि नहीं होती और धर्मकी स्थापना होती है।जब साधकों और सन्तमहात्माओंसे भी लोग नहीं मानते प्रत्युत उनका विनाश करना आरम्भ कर देते हैं और जब धर्मका प्रचार करनेवाले बहुत कम रहते हैं तथा जिस युगमें जैसा धर्म होना चाहिये उसकी अपेक्षा भी बहुत अधिक धर्मका ह्रास हो जाता है तब भगवान् स्वयं आते हैं। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें अपने अवतारके अवसरका वर्णन करके अब भगवान् अपने अवतारका प्रयोजन बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.5 4.9।।बहूनि इत्यादि अर्जुन इत्यन्तम्। श्रीभगवान् किल पूर्णषाड्गुण्यत्वात् शरीरसंपर्कमात्ररहितोऽपि स्थितिकारित्वात् कारुणिकतया आत्मांशं सृजति। आत्मा पूर्णषाड्गुण्यः अंशः उपकारकत्वेन अप्रधानभूतो ( N omit अ) यत्र तत् आत्मांशं शरीरं गृह्णाति इत्यर्थः। अत एवास्य जन्म दिव्यम् यत आत्ममायया योगप्रज्ञया स्वस्वातन्त्रयशक्त्या ( omits स्व) आरब्धम् न कर्मभिः। कर्मापि दिव्यम् फलदानासमर्थत्वात्। यश्चैवमेतत्तत्त्वं वेत्ति आत्मन्यप्येवमेव मन्यते सोऽवश्यं भगवद्वासुदेवतत्त्वं जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.7।।यदीश्वरस्य मायानिबन्धनं जन्मेत्युक्तं तस्य प्रश्नपूर्वकं कालं कथयति तच्चेत्यादिना। चातुर्वर्ण्ये चातुराश्रम्ये च यथावदनुष्ठीयमाने नास्ति धर्महानिरिति मन्वानो विशिनष्टि वर्णेति। वर्णैराश्रमैस्तदाचारैश्च लक्ष्यते ज्ञायते धर्मस्तस्येति यावत्। धर्महानौ समस्तपुरुषार्थभङ्गो भवतीत्यभिप्रेत्याह प्राणिनामिति। नच यथोक्तस्य धर्मस्य हानिं सोढुं शक्तो भवानित्याह भारतेति। न केवलं प्राणिनां धर्महानिरेव भगवतो मायाविग्रहस्य परिग्रहे हेतुरपि तु तेषामधर्मप्रवृत्तिरपीत्याह अभ्युत्थानमिति। यदा यदेति पूर्वेण संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.7।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.7।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.7।।न कालनियमः अस्मत्संभवस्य यदा यदा हि धर्मस्य वेदेन उदितस्य चातुर्वर्ण्यचातुराश्रम्यव्यवस्थया अवस्थितस्य कर्तव्यस्य ग्लानिः भवति यदा यदा च तद्विपर्ययस्य अधर्मस्य अभ्युत्थानं तदा अहम् एव स्वसंकल्पेन उक्तप्रकारेण आत्मानं सृजामि।जन्मनः प्रयोजनम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.7।। यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिः हानिः वर्णाश्रमादिलक्षणस्य प्राणिनामभ्युदयनिःश्रेयससाधनस्य भवति भारत अभ्युत्थानम् उद्भवः अधर्मस्य तदा तदा आत्मानं सृजामि अहं मायया।।किमर्थम्

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【 Verse 4.8 】

▸ Sanskrit Sloka: परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् | धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ||

▸ Transliteration: paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duṣkṛtām | dharma-saṁsthāpanārthāya saṁbhavāmi yuge-yuge ||

▸ Glossary: paritrāṇāya: for the protection of; sādhūnāṁ: of the pious; vināśāya: to destroy; ca: also; duṣkṛtāṁ: of the wicked; dharma: righteousness; saṁsthāpanārthāya: to establish; saṁbhavāmi: I manifest; yuge-yuge: age after age

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.8 To protect the pious and to annihilate the wicked, to re-establish righteousness I Myself appear, age after age.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.8।।साधुओं(भक्तों) की रक्षा करनेके लिये पापकर्म करनेवालोंका विनाश करनेके लिये और धर्मकी भलीभाँति स्थापना करनेके लिये मैं युगयुगमें प्रकट हुआ करता हूँ।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.8।। साधु पुरुषों के रक्षण दुष्कृत्य करने वालों के नाश तथा धर्म संस्थापना के लिये मैं प्रत्येक युग में प्रगट होता हूँ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.8 परित्राणाय for the protection? साधूनाम् of the good? विनाशाय for the destruction? च and? दुष्कृताम् of the wicked? धर्मसंस्थापनार्थाय for the establishment of righteousness? संभवामि (I) am born? युगे युगे in every age.Commentary Sadhunam The good who lead a life of righteousness? who utiles their bodies in the service of humanity? who are free from selfishness? lust and greed? and who devote their lives to divine contemplation.Dushkritam Evildoers who lead a life of unrighteousness? who break the laws of the society? who are vain and are dishonest and greedy? who injure others? who take possession of the property of others by force? and who commit atrocious crimes of various sorts.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.8. For the protection of the good people, and for the destruction of evil-doers, and for the purpose of firmly establishing righteousness, I take birth in every age.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.8 To protect the righteous, to destroy the wicked and to establish the kingdom of God, I am reborn from age to age.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.8 For the protection of the good and also for the destruction of the wicked, for the establishment of Dharma, am I born from age to age.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.8 For the protection of the pious, the destruction of the evil-doers, and establishing virtue, I manifest Myself in every age.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.8 For the protection of the good, for the destruction of the wicked and for the establishment of righteousness, I am born in every age.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.8 See Comment under 4.9

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.8 The good are those who follow the Dharma, as defined above. They are the foremost among the Vaisnavas, who have taken refuge in Me. While My name, acts and form are inaccessible to speech and thought, these devotees cannot get support, sustenance etc., for themselves without perceiving Me. They regard even a moment's time without Me as a thousand Kalpas. They become broken in every limb because of the separation from Me. So I am born from age to age in the forms of gods, men etc., for protecting them by affording them the opportunity to behold My form and acts and to converse with Me.

I am born also for the destruction of those who are opposed to such devotees and for the restoration of declining Vedic Dharma, which consists of My worship. The main purpose of incarnation is the revealing of His adorable form, so that all may worship Him. The destruction of the wicked is secondary only. There is no specific restrictions of the Yugas like Krta, Treta etc., for the appearance of Divine Incarnations.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.8 Paritranaya, for the protection; sadhunam, of the pious, the followers of the virtuous path; vinasaya, for the destruction; duskrtam, of the evil-doers, of the sinful ones; and also dharmasamsthapanarthaya, for establishing virtue fully;-for that purpose, sambhavami, I manifest Myself; yuge yuge, in every age.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.8।। यह तो स्पष्ट है कि बिना किसी इच्छा अथवा प्रयोजन के ईश्वर अपने को व्यक्त नहीं करता। इच्छाओं के आत्यन्तिक अभाव का अर्थ है कर्मों का पूर्ण अभाव। बिना किसी साधन के विद्युत् शक्ति किसी विशेष रूप में व्यक्त नहीं हो सकती। इसी प्रकार परमब्रह्म किसी प्रयोजन के अभाव में किसी उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट उपाधि को न धारण कर सकता है और न उसे उसकी कोई आवश्यकता ही होती है। जिस प्रकार शान्त और स्थिर जल में किसी वस्तु के डालने पर उसमें तरंगे उठने लगती हैं उसी प्रकार इच्छा रूपी विक्षेपक के होने पर ही परम पूर्ण स्वरूप में से उच्च या हीन किसी प्रकार की सृष्टि की उत्पत्ति संभव है।पूर्ण परमात्मा में गोपाल कृष्ण के रूप में अवतार लेने की कारण रूप जो इच्छा है उसे यहाँ व्यास जी अपने शब्दों में वर्णन करते हैं। सब इच्छाओं में सर्वोत्तम दैवी इच्छा है जगत् की निस्वार्थ भाव से सेवा करने की इच्छा किन्तु वह भी एक इच्छा ही है। कर्तव्य पालन करने वाले साधु पुरुषों के रक्षण का कार्य करते हुये अपनी माया का आश्रय लेकर एक और कार्य अवतारी पुरुष को करना होता है वह है दुष्टों का संहार।दुष्टों के संहार से तात्पर्य शब्दश दुष्ट व्यक्तियों के संहार से ही समझना आवश्यक नहीं है उसमें दुष्ट प्रवृत्तियों का नाश अभिप्रेत है। वस्त्र रखने की आलमारी रखने की पुर्नव्यवस्था करने के समान यह कार्य है। जो वस्त्र अत्यन्त निरुपयोगी हो जाते हैं उन्हें नये वस्त्रों के रखने हेतु स्थान बनाने हेतु वहाँ से हटाना ही पड़ता है। इसी प्रकार अवतारी पुरुष साधुओं का उत्साह बढ़ाते हैं दुष्टों के स्वभाव को परिवर्तित करने का प्रयत्न करते हैं और कभीकभी दुष्टों का पूर्ण संहार भी आवश्यक हो जाता है।अर्जुन के लिये इतना सब कुछ विस्तार से बताना पड़ा क्योंकि वह श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप के विषय में सर्वथा अनभिज्ञ था। श्रीकृष्ण को एक मनुष्य और मित्र के रूप में ही समझने के कारण वह प्रथम अध्याय में इतने प्रकार के तर्क प्रस्तुत करता रहा अन्यथा उसमें इतना साहस ही नहीं होता। यदि यह मान भी लिया जाय कि अर्जुन को श्रीकृष्ण के ईश्वरत्व के विषय में पूर्ण भान था तब इसका अर्थ होगा कि एक नास्तिक के समान श्रीकृष्ण की सहायता पाकर भी वह अपने विजय के प्रति पूर्ण आश्वस्त नहीं था यह उचित नहीं प्रतीत होता। जब भगवान् उसे अपना मित्र भक्त कहते हैं तब वह शिशुओं की सी सरलता से उनसे कहता है आप मुझे सिखाइये मैं आपका शष्य हूँ। इस वाक्य में श्रीकृष्ण के प्रति उसका आदर भाव तो स्पष्ट होता है किन्तु किसी भी प्रकार उसमें उनके ईश्वरत्व का ज्ञान होना सिद्ध नहीं होता।भगवान् अपने ही विषय में जानकारी क्यों दे रहे हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.8।।अवतरणप्रयोजनमाह। परित्राणाय रक्षणाय साधूनां सन्मार्गस्थानां भक्तानाम्। विनाशाय च पापिष्ठानाम्। किंच धर्मसंस्थापनार्थाय। तथाचावतरणप्रयोजनत्रयमुक्तम्। यत्तु तदुभयं कथं स्यादित्यत आह। धर्मसंस्थापनार्थायेति तच्चिन्त्यम्। धर्मसंस्थापनेन साधूनां रक्षणस्य पापिनां नाशस्य चासिद्धेः। यथा वसुदेवग्रहेऽवतीर्णेन श्रीकृष्णेन गीताद्युपदेशेन धर्मसंस्थापनं युधिष्ठिरादिपरिपालनेन साधुपरित्राणां कंसादिमारणेन दुष्कृतां विनाश इति प्रयोजनत्रयमेव संपादितम्। नहि गीतोपदेशमात्रेण तत्र तत्र कृतमर्जुनसंरक्षणं तत्तदुपायैः कर्मनाश्च सिध्यतीति दिक्। एतेन साधुरक्षणेन दुष्टवधेन च धर्मं स्थिरीकर्तुमिति प्रत्युक्तम्। नहि वसुदेवादिरक्षणेन कंसादिवधेन च कस्यचिद्धर्मस्य स्थापनं भवति धर्मस्थापनहेतुभूतैतत्कर्मद्वयाकर्तुर्व्यासावतारस्य धर्मसंस्थापनार्थस्य वैयर्थ्यापत्तेश्च। तथाच कदाचिदेकस्मै कदाचिद्द्वाभ्यां कदाचित्सर्वस्मै प्रयोजनाय भगवदवतरणमिति ध्येयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.8।।तत्किं धर्मस्य हानिरधर्मस्य च वृद्धिस्तव परितोषकारणं येन तस्मिन्नेव काल आविर्भवसीति। तथाचानर्थावह एव तवावतारः स्यादिति नेत्याह धर्महाम्या हीयमानानां साधूनां पुण्यकारिणां वेदमार्गस्थानां परित्राणाय परितः सर्वतो रक्षणाय तथा अधर्मवृद्ध्या वर्धमानानां दुष्कृतां पापकारिणां वेदमार्गविरोधिनां विनाशाय च तदुभयं कथं स्यादिति तदाह। धर्मसंस्थापनार्थाय धर्मस्य सम्यगधर्मनिवारणेन स्थापनं वेदमार्गपरिरक्षणं धर्मसंस्थापनं तदर्थं संभवामि पूर्ववत्। युगे युगे प्रतियुगम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.8।।किमर्थमात्मानं मायया सृजसीत्यत आह परित्राणायेति। दुष्कृतां दुष्टं कर्म कुर्वतां पापिनाम्। संभवाम्याविर्भवामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.8।।एवं धर्मार्थं जीवान् सृष्ट्वा तेषां रक्षणार्थं चाहं प्रकटो भवामीत्याहुः परित्राणायेति। साधूनां भक्तानां परित्राणाय दुष्कृतां धर्मप्रतिपक्षिणां नाशाय धर्मसंस्थापनाय ज्ञानकर्माश्रमादिरूपस्य सम्यक्प्रकारेणस्थापनाय युगे युगे सम्भवामीति। सम्यक्प्रकारेण भवामि प्रकटो भवामि न जीववद्भवामि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.8।।किमर्थमित्यपेक्षायामाह परित्राणायेति। साधूनां स्वधर्मवर्तिनां रक्षणाय। दुष्टं कर्म कुर्वन्तीति दुष्कृतस्तेषां वधाय च। एवं धर्मस्य संस्थापनार्थाय साधुरक्षणेन दुष्टवधेन च धर्मं स्थिरीकर्तुं युगेयुगे तत्तदवसरे संभवामीत्यर्थः। नचैवं दुष्टनिग्रहं कुर्वतोऽपि नैर्घृण्यं शङ्कनीयम्। यथाचाहुःलालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथार्भके। तद्वदेव महेशस्य नियन्तुर्गुणदोषयोः।। इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.7 4.8।।कदा किमर्थं सम्भवसीत्यपेक्षायां स्वप्रादुर्भावकालमाह द्वाभ्याम् यदा यदा हीति। परित्राणायेति। साधूनां धर्मवतां परित्राणाय तत्प्रतिपक्षाणां दुष्कृतां दुष्टं कर्म कुर्वतां विनाशाय च युगेयुगे सम्भवामि। न चात्रावतारकालनियम इत्येतदर्थं यदा यदा युगेयुगे इत्युक्तम् नचैवं दुष्टनिग्रहं कुर्वतोऽपि वैषम्यं शङ्कनीयं यथा चोक्तं लालने ताडने मातुर्नाकारुण्यं यथाऽर्मके। तद्वदेव महेशस्य नियन्तुर्गुणदोषयोः इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.8।।किसलिये सत्मार्गमें स्थित साधुओंका परित्राण अर्थात् ( उनकी ) रक्षा करनेके के लिये पापकर्म करनेवाले दुष्टोंका नाश करनेके लिये और धर्मकी अच्छी प्रकार स्थापना करनेके लिये मैं युगयुगमें अर्थात् प्रत्येक युगमें प्रकट हुआ करता हूँ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.8।। व्याख्या  परित्राणाय साधूनाम् साधु मनुष्योंके द्वारा ही अधर्मका नाश और धर्मका प्रचार होता है इसलिये उनकी रक्षा करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।दूसरोंका हित करना ही जिनका स्वभाव है और जो भगवान्के नाम रूप गुण प्रभाव लीला आदिका श्रद्धाप्रेमपूर्वक स्मरण कीर्तन आदि करते हैं और लोगोंमें भी इसका प्रचार करते हैं ऐसे भगवान्के आश्रित भक्तोंके लिये यहाँ साधूनाम् पद आया है।जिसका एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य है वह साधु है (टिप्पणी प0 223) और जिसका नाशवान् संसारका उद्देश्य है वह असाधु है।असत् और परिवर्तनशील वस्तुमें सद्भाव करने और उसे महत्त्व देनेसे कामनाएँ पैदा होती है। ज्योंज्यों कामनाएँ नष्ट होती हैं त्योंत्यों साधुता आती है और ज्योंज्यों कामनाएँ बढ़ती हैं त्योंत्यों साधुता लुप्त होती है। कारण कि असाधुताका मूल हेतु कामना ही है। साधुतासे अपना उद्धार और लोगोंका स्वतः उपकार होता है।साधु पुरुषके भावों और क्रियाओँमें पशु पक्षी वृक्ष पर्वत मनुष्य देवता पितर ऋषि मुनि आदि सबका हित भरा रहता है हेतु रहित जग जुग उपकारी। तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी।।(मानस 7। 47। 3)यदि लोग उसके मनके भावोंको जान जायँ तो वे उसके चरणोंके दास बन जायँ। इसके विपरीत यदि लोग दुष्ट पुरुषके मनके भावोंको जान जायँ तो दिनमें कई बार लोगोंसे उसकी पिटाई हो।यहाँ शङ्का हो सकती है कि यदि भगवान् साधु पुरुषोंकी रक्षा किया करते हैं तो फिर संसारमें साधु पुरुष दुःख पाते हुए क्यों देखे जाते हैं इसका समाधान यह है कि साधु पुरुषोंकी रक्षाका तात्पर्य उनके भावोंकी रक्षा है शरीर धनसम्पत्ति मानबड़ाई आदिकी रक्षा नहीं कारण कि वे इन सांसारिक पदार्थोंको महत्त्व नहीं देते। भगवान् भी इन वस्तुओंको महत्त्व नहीं देते क्योंकि सांसारिक पदार्थोंको महत्त्व देनेसे ही असाधुता पैदा होती है।भक्तोंमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व उद्देश्य होता ही नहीं तभी तो वे भक्त हैं। भक्तलोग प्रतिकूलता(दुःखदायी परिस्थिति) में विशेष प्रसन्न होते हैं क्योंकि प्रतिकूलतासे जितना आध्यात्मिक लाभ होता है उतना किसी दूसरे साधनसे नहीं होता। वास्तवमें भक्ति भी प्रतिकूलतामें ही बढ़ती है। सांसारिकराग आसक्तिसे ही पतन होता है और प्रतिकूलतासे वह राग टूटता है। इसलिये भगवान्का भक्तोंके लिये प्रतिकूलता भेजना भी वास्तवमें भक्तोंकी रक्षा करना है।विनाशाय च दुष्कृताम् दुष्ट मनुष्य अधर्मका प्रचार और धर्मका नाश करते हैं इसलिये उनका विनाश करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं।जो मनुष्य कामनाके अत्यधिक बढ़नेके कारण झूठ कपट छल बेईमानी आदि दुर्गुणदुराचारोंमें लगे हुए हैं जो निरपराध सद्गुण सदाचारी साधुओंपर अत्याचार किया करते हैं जो दूसरोंका अहित करनेमें ही लगे रहते हैं जो प्रवृत्ति और निवृत्तिको नहीं जानते भगवान् और वेदशास्त्रोंका विरोध करना ही जिनका स्वभाव हो गया है ऐसे आसुरी सम्पत्तिमें अधिक रचेपचे रहकर वैसा ही बुरा आचरण करनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ दुष्कृताम् पद आया है। भगवान् अवतार लेकर ऐसे ही दुष्ट मनुष्योंका विनाश करते हैं। शङ्का   भगवान् तो सब प्राणियोंमें सम हैं और उनका कोई वैरी नहीं है (समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्यः गीता 9। 29) फिर वे दुष्टोंका विनाश क्यों करते हैं समाधान   सम्पूर्ण प्राणियोंके परम सुहृद् होनेसे भगवान्का कोई वैरी नहीं है परन्तु जो मनुष्य भक्तोंका अपराध करता है वह भगवान्का वैरी होता है सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ। निज अपराध रिसाहिं न काऊ।।जो अपराधु भगत कर करई। राम रोष पावक सो जरई।।(मानस 2। 218। 2 3)भगवान्का एक नाम भक्तभक्तिमान् (श्रीमद्भा0 10। 86। 59) है। अतः भक्तोंको कष्ट देनेवाले दुष्टोंका विनाश भगवान् स्वयं करते हैं। पापका विनाश भक्त करते हैं और पापीका विनाश भगवान् करते हैं।साधुओंका परित्राण करनेमें भगवान्की जितनी कृपा है उतनी ही कृपा दुष्टोंका विनाश करनेमें भी है (टिप्पणी प0 224) विनाश करके भगवान् उन्हें शुद्ध पवित्र बनाते हैं।सन्तमहात्मा धर्मकी स्थापना तो करते हैं पर दुष्टोंके विनाशका कार्य वे नहीं करते। दुष्टोंका विनाश करनेका कार्य भगवान् अपने हाथमें रखते हैं जैसे साधारण मलहमपट्टी करनेका काम तो कंपाउंडर करता है पर बड़ा ऑपरेशन करनेका काम सिविल सर्जन खुद करता है दूसरा नहीं।माता और पिता दोनों समानरूपसे बालकका हित चाहते हैं। बालक पढ़ाई नहीं करता उद्दण्डता करता है तो उसको माता भी समझाती है और पिता भी समझाते हैं। बालक अपनी उद्दण्डता न छो़ड़े तो पिता उसे मारतेपीटते हैं। परन्तु बालक जब घबरा जाता है तब माता पिताको मारनेपीटनेसे रोकती है। यद्यपि माता पतिव्रता है पतिका अनुसरण करना उसका धर्म है तथापि इसका यह अर्थ नहीं कि पति बालकको मारे तो वह भी साथमें मारने लग जाय। यदि वह ऐसा करे तो बालक बेचारा कहाँ जायगा बालककी रक्षा करनेमें उसका पातिव्रतधर्म नष्ट नहीं होता। कारण कि वास्तवमें पिता भी बालकको मारनापीटना नहीं चाहते प्रत्युत उसके दुर्गुणदुराचारोंको दूर करना चाहते हैं। इसी तरह भगवान् पिताके समान हैं और उनके भक्त माताके समान। भगवान् और सन्तमहात्मा मनुष्योंको समझाते हैं। फिर भी मनुष्य अपनी दुष्टता न छोड़े तो उनका विनाश करनेके लिये भगवान्को अवतार लेकर खुद आना पड़ता है। अगर वे अपनी दुष्टता छोड़ दें तो उन्हें मारनेकी आवश्यकता ही न रहे।निर्गुण ब्रह्म प्रकृति माया अज्ञान आदिका विरोधी नहीं है प्रत्युत उनको सत्तास्फूर्ति देनेवाला तथा उनका पोषक है। तात्पर्य यह कि प्रकृति माया आदिमें जो कुछ सामर्थ्य है वह सब उस निर्गुण ब्रह्मकी ही है। इसी तरह सगुण भगवान् भी किसी जीवके साथ द्वेष वैर या विरोध नहीं रखते प्रत्युत समान रीतिसे सबको सामर्थ्य देते हैं उनका पोषण करते हैं। इतना ही नहीं भगवान्की रची हुई पृथ्वी भी रहनेके लिये सबको बराबर स्थान देती है। उसका यह पक्षपात नहीं है कि महात्माको तो विशेष स्थान दे पर दुष्टको स्थान न दे। ऐसे ही अन्न सबकी भूख बराबर मिटाता है जल सबकी प्यास समानरूपसे मिटाता है वायु सबको प्राणवायु एकसी देती है सूर्य सबको प्रकाश एकसा देता है आदि। यदि पृथ्वी अन्न जल आदि दुष्टोंको स्थान अन्न जल आदि देना बंद कर दें तो दुष्ट जी ही नहीं सकते। इस प्रकार जब भगवान्के विधानके अनुसार चलनेवाले पृथ्वी अन्न जल वायु सूर्य आदिमें भी इतनी उदारता समता है तब इस विधानके विधायक(भगवान्) में कितनी विलक्षण उदारता समता होगी वे तो उदारताके भण्डार ही हैं। यदि विधायक (भगवान्) और उनके विधानकी ओर थोड़ासा भी दृष्टिपात किया जाय तो मनुष्य गद्गद हो जाय और भगवान्के चरणोंमें उसका प्रेम हो जायभगवान्का दुष्ट पुरुषोंसे विरोध नहीं है प्रत्युत उनके दुष्कर्मोंसे विरोध है। कारण कि वे दुष्कर्म संसारका तथा उन दुष्टोंका भी अहित करनेवाले हैं। भगवान् सर्वसुहृद् हैं अतः वे संसारका तथा उन दुष्टोंका भी हित करनेके लिये ही दुष्टोंका विनाश करते हैं। उनके द्वारा जो दुष्ट मारे जाते हैं उनको भगवान् अपने ही धाममें भेज देते हैं यह उनकी कितनी विलक्षण उदारता हैयहाँ यह प्रश्न हो सकता है कि अगर हम पापकर्म ही करते रहें तो क्या हमें भी मारनेके लिये भगवान्को आना पड़ेगा अगर ऐसी बात है तो भगवान्के द्वारा मरनेसे हमारा कल्याण हो ही जायगा फिर जिनमें संयम करना पड़ता है ऐसे श्रमसाध्य सद्गुणसदाचारका पालन क्यों करें इसका उत्तर यह है कि वास्तवमें भगवान् उन्हीं पापियोंको मारनेके लिये आते हैं जो भगवान्के सिवाय दूसरे किसीसे मर ही नहीं सकते। दूसरी बात शुभकर्मोंमें जितना लगेंगे उतना तो पुण्य हो ही जायगा पर अशुभकर्मोंमें लगे रहनेसे यदि बीचमें ही मर जायँगे अथवा कोई दूसरा मार देगा तो मुश्किल हो जायगी भगवान्के हाथों मरकर मुक्ति पानेकी लालसा कैसे पूरी होगी इसलिये अशुभकर्म करने ही नहीं चाहिये।धर्मसंस्थापनार्थाय निष्कामभावका उपदेश आदेश और प्रचार ही धर्मकी स्थापना है। कारण कि निष्कामभावकी कमीसे और असत् वस्तुको सत्ता देकर उसे महत्त्व देनेसे ही अधर्म बढ़ता है जिससे मनुष्य दुष्ट स्वभाववाले हो जाते हैं। इसलिये भगवान् अवतार लेकर आचरणके द्वारा निष्कामभावका प्रचार करते हैं। निष्कामभावके प्रचारसे धर्मकी स्थापना स्वतः हो जाती है।धर्मका आश्रय भगवान् हैं (टिप्पणी प0 225.1) (गीता 14। 27) इसलिये शाश्वत धर्मकी संस्थापना करनेके लिये भगवान् अवतार लेते हैं। संस्थापना करनेका अर्थ है सम्यक् स्थापना करना। तात्पर्य है कि धर्मका कभी नाश नहीं होता केवल ह्रास होता है। धर्मका ह्रास होनेपर भगवान् पुनः उसकी अच्छी तरह स्थापना करते हैं (गीता 4। 1 3)।सम्भवामि युगे युगे आवश्यकता पड़नेपर भगवान् प्रत्येक युगमें अवतार लेते हैं। एक युगमें भी जितनी बार जरूरत पड़ती है उतनी बार भगवान् अवतार लेते हैं। कारक पुरुष (टिप्पणी प0 225.2) और सन्तमहात्माओंके रूपमें भी भगवान्का अवतार हुआ करता है। भगवान् और कारक पुरुषका अवतार तो नैमित्तिक है पर सन्तमहात्माओंका अवतार नित्य माना गया है।यहाँ शङ्का होती है कि भगवान् तो सर्वसमर्थ हैं फिर संतोंकी रक्षा करना दुष्टोंका विनाश करना और धर्मकी स्थापना करना ये काम क्या वे अवतार लिये बिना नहीं कर सकते इसका समाधान यह है कि भगवान् अवतार लिये बिना ये काम नहीं कर सकते ऐसी बात नहीं है। यद्यपि भगवान् अवतार लिये बिना अनायास ही यह सब कुछ कर सकते हैं और करते भी रहते हैं तथापि जीवोंपर विशेष कृपा करके उनका कुछ और हित करनेके लिये भगवान् स्वयं अवतीर्ण होते हैं (टिप्पणी प0 225.3)। अवतारकालमें भगवान्के दर्शन स्पर्श वार्तालाप आदिसे भविष्यमें उनकी दिव्य लीलाओंके श्रवण चिन्तन और ध्यानसे तथा उनके उपदेशोंके अनुसार आचरण करनेसे लोगोंका सहज ही उद्धार हो जाता है। इस प्रकार लोगोंका सदा उद्धार होता ही रहे ऐसी एक रीति भगवान् अवतार लेकर ही चलाते हैं।भगवान्के कई ऐसे प्रेमी भक्त होते हैं जो भगवान्के साथ खेलना चाहते हैं उनके साथ रहना चाहते हैं। उनकी इच्छा पूरी करनेके लिये भी भगवान् अवतार लेते हैं और उनके सामने आकर उनके समान बनकर खेलते हैं। जिस युगमें जितना कार्य आवश्यक होता है भगवान् उसीके अनुसार अवतार लेकर उस कार्यको पूरा करते हैं। इसलिये भगवान्के अवतारोंमें तो भेद होता है पर स्वयं भगवान्में कोई भेद नहीं होता। भगवान् सभी अवतारोंमें पूर्ण हैं और पूर्ण ही रहते हैं।भगवान्के लिये न तो कोई कर्तव्य है और न उन्हें कुछ पाना ही शेष है (गीता 3। 22) फिर भी वे समयसमयपर अवतार लेकर केवल संसारका हित करनेके लिये सब कर्म करते हैं। इसलिये मनुष्यको भी केवल दूसरोंके हितके लिये ही कर्तव्यकर्म करने चाहिये।चौथे श्लोकमें आये अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने मनुष्योंके जन्म और अपने जन्म(अवतार) में तीन बड़े अन्तर बताये हैं (1) जाननेमें अन्तर मनुष्योंके और भगवान्के बहुतसे जन्म हो चुके हैं। उन सब जन्मोंको मनुष्य तो नहीं जानते पर भगवान् जानते हैं (4। 5)।(2) जन्ममें अन्तर मनुष्य प्रकृतिके परवश होकर अपने किये हुए पापपुण्योंका फल भोगनेके लिये और फलभोगपूर्वक परमात्माकी प्राप्ति करनेके लिये जन्म लेता है पर भगवान् अपनी प्रकृतिको अधीन करके स्वाधीनतापूर्वक अपनी योगमायासे स्वयं प्रकट होते हैं (4। 6)।(3) कार्यमें अन्तर साधारणतः मनुष्य अपनी कामनाओंकी पूर्तिके लिये कार्य करते हैं जो कि मनुष्यजन्मका ध्येय नहीं है पर भगवान् केवल मात्र जीवोंके कल्याणके लिये कार्य करते हैं (4। 7 8)। सम्बन्ध   चौथे श्लोकमें आये अर्जुनके प्रश्नके उत्तरमें भगवान्ने अपने जन्मकी दिव्यताका वर्णन आरम्भ किया था। अब अपनी ओरसे निष्कामकर्म(कर्मयोग) का तत्त्व बतानेके उद्देश्यसे अपने जन्मकी दिव्यताके साथसाथ अपने कर्मकी दिव्यताको जाननेका भी माहात्म्य बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.5 4.9।।बहूनि इत्यादि अर्जुन इत्यन्तम्। श्रीभगवान् किल पूर्णषाड्गुण्यत्वात् शरीरसंपर्कमात्ररहितोऽपि स्थितिकारित्वात् कारुणिकतया आत्मांशं सृजति। आत्मा पूर्णषाड्गुण्यः अंशः उपकारकत्वेन अप्रधानभूतो ( N omit अ) यत्र तत् आत्मांशं शरीरं गृह्णाति इत्यर्थः। अत एवास्य जन्मदिव्यम् यत आत्ममायया योगप्रज्ञया स्वस्वातन्त्रयशक्त्या ( omits स्व) आरब्धम् न कर्मभिः। कर्मापि दिव्यम् फलदानासमर्थत्वात्। यश्चैवमेतत्तत्त्वं वेत्ति आत्मन्यप्येवमेव मन्यते सोऽवश्यं भगवद्वासुदेवतत्त्वं जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.8।।यथोक्ते काले कृतकृत्यस्य भगवतो मायाकृते जन्मनि प्रश्नपूर्वकं प्रयोजनमाह किमर्थमित्यादिना। यथा साधूनां रक्षणमसाधूनां निग्रहश्च भगवदवतारफलं तथा फलान्तरमपि तस्यास्तीत्याह किञ्चेति। धर्मे हि स्थापिते जगदेव स्थापितं भवत्यन्यथा भिन्नमर्यादं जगदसंगतत्वमापद्येतेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.8।।परित्राणाय साधूनां इति साधुपरित्राणादिकं भगवदवतारस्य प्रयोजनमुक्तम् तत्र किं जन्मनैव परित्राणादिकं कार्यमिति नियमः इत्यपेक्षायामाह नेति। जन्मना विनाऽपि कर्तुं समर्थत्वादिति भावः। तर्हि किमर्थं जन्मेत्यत आह तथापीति। यथेष्टचारी इच्छयैव तथा चरति तथेच्छैव किमर्था इत्यत उक्तम् लीलयेति। लीलाप्यालस्यपरिहाराद्यर्था न भवतीत्यत उक्तम् स्वभावेन चेति। अत्रैव प्रमाणान्याह तथा हीति। अयमेष इयमिच्छा। अत्र प्रवृत्तिषु विरुद्धेषुं लोकविपरीतेच्छुम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.8।।न जन्मनैव परित्राणादि कार्यमिति नियमः। तथापि लीलया स्वभावेन च यथेष्टचारी। तथा ह्युक्तम् देवस्यैष स्वभावोऽयम्।लोकवत्तु लीलाकैवल्यम् ब्र.सू.2।1।33क्रीडतो बालकस्येव चेष्टां तस्य निशामय। अरिभयादिव स्वयं पुराद्व्यवात्सीद्यदनन्तवीर्यः। पूर्णोऽयमस्यान्न न किञ्चिदाप्यं तथापि सर्वाः कुरुते प्रवृत्तीः। अतो विरुद्धेषुमिमं वदन्ति परावरज्ञा मुनयः प्रशान्ताः इत्यादि ऋग्वेदखिलेषु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.8।।साधव उक्तलक्षणधर्मशीला वैष्णवाग्रेसरा मत्समाश्रयणे प्रवृत्ता मन्नामकर्मस्वरूपाणाम् अवाङ्मनसगोचरतया मद्दर्शनाद् ऋते स्वात्मधारणपोषणादिसुखम् अलभमाना अणुमात्रकालम् अपि कल्पसहस्रं मन्वानाः प्रशिथिलसर्वगात्रा भवेयुः इति मत्स्वरूपचेष्टितावलोकनालापादिदानेन तेषां परित्राणाय तद्विपरीतानां विनाशाय च क्षीणस्य वैदिकधर्मस्य मदाराधनरूपस्य आराध्यस्वरूपप्रदर्शनेन तस्य स्थापनाय च देवमनुष्यादिरूपेण युगे युगे संभवामि। कृतत्रेतादियुगविशेषनियमः अपि नास्ति इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.8।। परित्राणाय परिरक्षणाय साधूनां सन्मार्गस्थानाम् विनाशाय च दुष्कृतां पापकारिणाम् किञ्च धर्मसंस्थापनार्थाय धर्मस्य सम्यक् स्थापनं तदर्थं संभवामि युगे युगे प्रतियुगम्।।तत्

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【 Verse 4.9 】

▸ Sanskrit Sloka: जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वत: | त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ||

▸ Transliteration: janma karma ca me divyamevaṁ yo vetti tattvataḥ | tyaktvā dehaṁ punarjanma naiti māmeti so ’rjuna ||

▸ Glossary: janma: birth; karma: work; ca: and; me: of Mine; divyaṁ: divine; evaṁ: so also; yaḥ: anyone whoever; vetti: knows; tattvataḥ: in reality; tyaktvā: after leaving aside; dehaṁ: body; punaḥ: again; janma: birth; na: never; eti: attains; māṁ:unto Me; eti: does attain; saḥ: he; arjuna: Arjuna

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.9 One who knows or experiences My divine appearance and activities does not take birth again in this material world after leaving the body but attains Me, o Arjuna.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.9।।हे अर्जुन मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं। इस प्रकार (मेरे जन्म और कर्मको) जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता अर्थात् दृढ़तापूर्वक मान लेता है वह शरीरका त्याग करके पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता प्रत्युत मुझे प्राप्त होता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.9।। हे अर्जुन मेरा जन्म और कर्म दिव्य है इस प्रकार जो पुरुष तत्त्वत जानता है वह शरीर को त्यागकर फिर जन्म को नहीं प्राप्त होता वह मुझे ही प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.9 जन्म birth? कर्म action? च and? मे My? दिव्यम् divine? एवम् thus? यः who? वेत्ति knows? तत्त्वतः in true light? त्यक्त्वा having abandoned? देहम् the body? पुनः again? जन्म birth? नः not? एति gets? माम् to Me? एति comes? सः he? अर्जुन O Arjuna.Commentary The Lord? though apparently born? is always beyond birth and death though apparently active for firmly establishing righteousness? He is ever beyond all actions. He who knows this is never born again. He attains knowledge of the Self and becomes liberated while living.The birth of the Lord is an illusion. It is Aprakrita (beyond the pale of Nature). It is divine. It is peculiar to the Lord. Though He appears in human form? His body is Chinmaya (full of consciousness? not inert matter as are human bodies composed of the five elements).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.9. Whosoever knows thus correctly the divine birth and action of Mine, he, on abandoning the body does not go to rirth, [but] goes to Me, O Arjuna !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.9 He who realises the divine truth concerning My birth and life is not born again; and when he leaves his body, he becomes one with Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.9 He who thus knows in truth My divine birth and actions does not get rirth after leaving the body; he will come to Me, O Arjuna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.9 He who thus knows truly the divine birth and actions of Mine does not get rirth after casting off the body. He attains Me, O Arjuna.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.9 He who thus know, in their true light, My divine birth and action, having abandoned the body, is not born again, he comes to Me, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.5-9 Bahuni etc. upto Arjuna. Indeed the Bhagavat is Himself devoid of all bodily connections on account of His having the group of the 'six attributes' in toto. Yet, out of His nature of stabilising [the universe], and out of compassion, He sends forth (or creates) that is which the Self is secondary. The meaning is this : He takes hold of a body, in which the Self, with the group of 'six alities' in full, remains secondary because of Its role as a helper of the body. On account of this, His birth is divine. For, it has been created not by the results of actions, but by His own Trick-of-Illusion, by the highest knowledge of Yoga, and by the energy of Freedom of His own. His action too is divine, as it is incabable of yielding fruits [for Him]. Whosoever knows this truth in this manner i.e., realises in his own Self also in this manner, he necessarily understands the Bhagavat Vasudeva beng.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.9 He who knows truly My life and actions, super-natural and special to Me, which are intended solely for the protection of the good and to enable them to take refuge in Me, - Me who am devoid of birth, unlike ordinary beings whose birth is caused by Karma associated with Prakrti and its three Gunas producing the evil of bondage, and who is endowed with auspicious attributes such as Lordship over all, omniscience, infallible will etc., - such a person after abandoning the present body will never be born, but will reach Me only. By true knowledge of My divine birth and acts, all his sins that stand in his way of taking refuge in Me are destroyed. In this birth itself, resorting to Me in the manner already described, and loving Me and concentrating on Me alone, he reaches Me.

Sri Krsna speaks of the same thing:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.9 Yah, he who; evam, thus, as described; vetti, knows tattvatah, truly, as they are in reality; that divyam, divine, supernatural; janma, birth, which is a form of Maya; ca karma, and actions, such as protection of the pious, etc.; mama, of Mine; na eti, does not get; punarjanma, rirth; tyaktva, after casting off; this deham, body. Sah, he; eti, attains, comes to; mam, Me-he gets Liberated, O Arjuna. This path of Liberation has not been opened recently. What then? Even in earlier days-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.9।। अवतार कैसे होता है तथा उसका प्रयोजन भी बताने के पश्चात् श्रीकृष्ण यहाँ कहते हैं कि जो पुरुष उनके दिव्य जन्म और कर्म को तत्त्वत जानता है वह सब बन्धनों से मुक्त होकर परमात्मस्वरूप बन जाता है। तत्त्वत शब्द से यह स्पष्ट किया गया है कि इसे केवल बुद्धि के स्तर पर जानना नहीं है वरन् यह अनुभव करना है कि अपने ही हृदय में किस प्रकार परमात्मा का अवतरण होता है। आज निसन्देह ही हम एक पशु के समान जी रहे हैं परन्तु जब कभी हम निस्वार्थ इच्छा से प्रेरित हुए कर्म करते हैं उस समय परमात्मा की ही दिव्य क्षमता हमारे कर्मों में झलकती है।इस श्लोक में सूक्ष्म संकेत यह भी है कि आत्मविकास के लिये भगवान् के आनन्दरूप की उपासना करना निराकार आत्मा के ध्यान के समान ही प्रभावकारी है। कुछ वेदान्त विचारक ऐसे भी हैं जो भगवान् के सगुणसाकार होने की कल्पना को स्वीकार नहीं करते। अत वे अवतार को भी नहीं मानते। वास्तव में यह युक्तियुक्त नहीं है। पूरी लगन से जो पुरुष साधना करता है वह सगुण अथवा निर्गुण उपासना के द्वारा लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है।यहाँ उस पूर्णत्व की स्थिति का संकेत किया गया है जिसे प्राप्त करके जीव का पुनर्जन्म नहीं होता। वैदिक साहित्य में अनेक स्थानों पर इसका संकेत अमृतत्त्व शब्द से किया गया है तो दूसरे स्थानों पर पुनर्जन्म के अभाव के रूप में। ऐसा प्रतीत होता है मानो पहले लोग मृत्यु से डरते थे इसलिये पूर्णत्व की स्थिति मे उसका अभाव बताया गया है। अन्य विचारकों ने यह अनुभव किया होगा कि मृत्यु से अधिक दुखदायी जन्म है क्योकि उसके पश्चात् दुखों की एक शृंखला प्रारम्भ हो जाती है। अत मोक्ष का लक्षण पुनर्जन्म का अभाव कहा गया है।जिनका जन्म होता हैउसी का नाश भी होता है इस कारण अमृतत्त्व और पुनर्जन्म के अभाव से पूर्णत्व की स्थिति का ही संकेत किया गया है। तथापि दूसरे शब्द से विचारकों की परिपक्वता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है।यह मोक्षमार्ग केवल वर्तमान में ही प्रवृत्त नहीं हुआ बल्कि प्राचीनकाल में भी अनेक साधकों ने इसका अनुसरण किया था राग भय और क्रोध से रहित मन्मय (मेरे में स्थिति वाले) मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञानरूप तप से पवित्र हुए मेरे स्वरूप को प्राप्त

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.9।।जन्म मायिकम्। कर्म साधुपरित्राणादि। मम परमेश्वरस्यैश्वरमप्राकृतं यस्तत्त्वतो वेत्ति स देहं त्यक्त्वा पुनरुत्पत्तिं न प्राप्नोति किंतु मां परमात्मानमेति। मुच्यत इत्यर्थः। अर्जुनेति संबोधयन् मज्जन्मकर्मतत्त्वज्ञानशोधितत्वंपदस्तत्पदाभेदं लब्ध्वा मुच्यत इति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.9।।जन्म नित्यसिद्धस्यैव मम सच्चिदानन्दघनस्य लीलया तथानुकरणं कर्म च धर्मसंस्थापनेन जगत्परिपालनं मे मम नित्यसिद्धेश्वरस्य दिव्यमप्राकृतमन्यैः कर्तुमशक्यमीश्वरस्यैवासाधारणम्। एवमजोऽपि सन्नित्यादिना प्रतिपादितं यो वेत्ति तत्त्वतो भ्रमनिवर्तनेन। मूढैर्हि मनुष्यत्वभ्रान्त्या भगवतोऽपि गर्भवासादिरूपमेव जन्म स्वभोगार्थमेव कर्मेत्यारोपितं परमार्थतः शुद्धसच्चिदानन्दघनरूपत्वाज्ञानेन तदपनुद्य अजस्यापि मायया जन्मानुकरणमकर्तुरपि परानुग्रहाय कर्मानुकरणमित्येव यो वेत्ति स आत्मनोऽपि तत्त्वस्फुरणात् त्यक्त्वा देहमिमं पुनर्जन्म नैति किंतु मां भगवन्तं वासुदेवमेव सच्चिदानन्दघनमेति। संसारान्मुच्यत इत्यर्थः। हे अर्जुन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.9।।जन्म मायामयम् कर्म साधुत्राणम् दिव्यमप्राकृतं यो वेत्ति स त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म न प्राप्नोति किंतु मामेति मामेव प्राप्नोति। एतेन भगवतो जन्मानि कर्माणि च भगवत्प्राप्तिकामेन गेयानीति दर्शितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.9।।तदेव विवृण्वन्ति जन्म कर्म चेति। मे जन्म प्राकट्यं कर्म क्रिया दिव्यं क्रीडात्मकम्। अहं लीलार्थं प्रकटो भवामीत्यर्थः। लीलायां क्रियमाणायां कालीयदमनादिरूपकर्मभिः साधूनां भक्तानां रक्षा भवतीति भावः। यतो मत्प्राकट्यं क्रीडार्थं तत एवं यो वेत्ति स तत्त्वतो देहं त्यक्त्वा लीलायां सेवार्थसृष्टदेहेन सेवां कृत्वा तदसामर्थ्ये देहं त्यक्त्वा हे अर्जुन पुनर्जन्म लौकिकं पूर्ववन्नैति न प्राप्नोति। मामेति मां प्राप्नोति। प्रकर्षेणाप्नोति अलौकिकदेहेन लीलायामिति भावः। अत एव मामित्युक्तं न तु मत्पदं मद्भावं वा एतादृशस्य दुर्लभत्वात्स इत्येकवचनमुक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.9।।एवंविधानामीश्व रजन्मकर्मणां ज्ञाने फलमाह जन्मकर्मेति। मे जन्म स्वेच्छाकृतं कर्म च धर्मपालनरूपं दिव्यमलौकिकं तत्त्वतः परानुग्रहार्थमेवेति यो वेत्ति स देहाभिमानं त्यक्त्वा पुनर्जन्म नैति न प्राप्नोति किंतु मामेव प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.9।।किञ्च उत्पत्तिस्त्रिधा। यथोक्तंवैष्णवतन्त्रेअनित्ये जननं नित्ये परिच्छिन्ने समागमः। नित्यापरिच्छिन्नतनौ प्राकट्यं चेति सा त्रिधा इति। अतो न ममायं सम्भवः प्राकृतस्येव कर्म वा मायिकं किन्त्वैच्छिकं दिव्यमित्याशयेन स्वजन्मकर्मणां ज्ञाने फलमाह जन्मकर्मेति। जन्मन इह प्रादुर्भावार्थकत्वाद्दिव्यत्वं किं पुनर्वपुषः कर्म च तथा दिव्यमलौकिकं तत्त्वतो यो वेत्ति सोऽपि जन्मफलं प्राप्य प्राकृतं देहं त्यक्त्वाऽर्थादलोकसम्बन्धिसच्चिदानन्दमयस्वरूपं प्राप्य पुनर्जन्म नैति किन्तु मामेतीत्यर्थः।अत्र केचित् जन्ममूलदेहस्य भगवति प्राकृतत्वमभ्युपगच्छन्ति तदसत् तत्र देहदेहिविभागाभावात्। पाञ्चभौतिकत्वजन्यत्वनियमस्य प्राकृतविषयत्वादप्राकृते यथाश्रुतीच्छाविषयत्वेन तत्सिद्धिः। अन्यथाज्ञानेच्छादीनामनित्यत्वनियमान्नित्यज्ञानादिकमपि वाद्यभिमतं न तत्र सिद्ध्येत्। ननु ज्ञानादिभिरेव जगत्कर्तृत्वोपपत्तौ प्रत्यक्षबाधाच्च किमित्यानन्यमयदेहोऽभ्युपेयः इति चेत् न कर्तृत्वनिर्वाहार्थमेव व्याप्तिबलेन नित्यज्ञानवत्तथाविधदेहस्वीकारात् नित्यापरिच्छिन्नतनोः प्राकट्यस्यैव जन्मत्वेन जन्यत्वाभावात्। आनन्दाद्ध्येव नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म बृ.उ.3।9।28 स यथा सैन्धवघनः बृ.उ.4।5।13आनन्दमयोऽभ्यासात् ब्र.सू.1।1।12 आह चतन्मात्रं आनन्दमात्रकरपादमुखोदरादिः इत्यादिश्रुतिन्यायपुराणवाक्यैः पूर्ण एव देहेन्द्रियप्राणान्तःकरणात्मस्वरूप एव सदानन्दरूपो ज्ञानरूपः पुरुषोत्तमः नत्वात्ममात्रमिति निर्बाधमुपैहि। ननु तथाप्यानन्दत्वदेहवत्त्वयोर्विरोध इति चेत् न स्वस्वाधिकरणे प्रमाणैरेकत्रोभयोः सिद्ध्यसिद्धिभ्यां वा विरोधाभावात्। तथाप्यानन्दस्य धर्मिरूपत्वे कथं धर्मरूपत्वम् इति चेत् न स यथा सैन्धवघनः यः सर्वज्ञः मुं.उ.1।9 इति श्रुतिभ्यां ज्ञानरूपत्वज्ञानाधारवदानन्दरूपत्वतदाधारत्वयोरविरोधात्। विरुद्धधर्माश्रयत्वाच्चानन्दादिमत्त्वमिति दिक्। एतेन यस्तत्र परिदृश्यमानरूपः स एव साक्षात्स्वेच्छातनुरानन्दमयः पुरुषोत्तमो नान्य इति यथाभूतार्थोपदेष्टृभगवद्वाक्यादवसेयम्।पुरुषोत्तम एवायं स्वैश्वर्याद्यक्षरात्मकम्। विरुद्धधर्माश्रयणं स्वीयविश्वासपूर्त्तये। क्वचित् क्वचिद्दर्शयति प्रभुर्गोपालनन्दनः। निगमप्रतिपाद्यात्मदृश्यमानवपुर्हरिः। विशेषस्तूत्तरत्र स्पष्टीभविष्यति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.9।।वह मेरा मायामय जन्म और साधुरक्षण आदि कर्म दिव्य हैं अर्थात् अलौकिक हैं यानी केवल ईश्वरशक्तिसे ही होनेवाले हैं। इस प्रकार जो तत्त्वसे यथार्थ जानता है। हे अर्जुन वह इस शरीरको छोड़कर पुनर्जन्म अर्थात् पुनः उत्पत्तिको प्राप्त नहीं होता ( बल्कि ) मेरे पास आ जाता है अर्थात् मुक्त हो जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.9।। व्याख्या   जन्म कर्म च मे दिव्यम् भगवान् जन्ममृत्युसे सर्वथा अतीत अजन्मा और अविनाशी हैं। उनका मनुष्यरूपमें अवतार साधारण मनुष्योंकी तरह नहीं होता। वे कृपापूर्वक मात्र जीवोंका हित करनेके लिये स्वतन्त्रतापूर्वक मनुष्य आदिके रूपमें जन्मधारणकी लीला करते हैं। उनका जन्म कर्मोंके परवश नहीं होता। वे अपनी इच्छासे ही शरीर धारण करते हैं (टिप्पणी प0 226)।भगवान्का साकार विग्रह जीवोंके शरीरोंकी तरह हाड़मांसका नहीं होता। जीवोंके शरीर तो पापपुण्यमय अनित्य रोगग्रस्त लौकिक विकारी पाञ्चभौतिक और रजवीर्यसे उत्पन्न होनेवाले होते हैं पर भगवान्के विग्रह पापपुण्यसे रहित नित्य अनामय अलौकिक विकाररहित परम दिव्य और प्रकट होनेवाले होते हैं। अन्य जीवोंकी अपेक्षा तो देवताओंके शरीर भी दिव्य होते हैं पर भगवान्का शरीर उनसे भी अत्यन्त विलक्षण होता है जिसका देवतालोग भी सदा ही दर्शन चाहते रहते हैं (गीता 11। 52)।भगवान् जब श्रीराम तथा श्रीकृष्णके रूपमें इस पृथ्वीपर आये तब वे माता कौसल्या और देवकीके गर्भसे उत्पन्न नहीं हुए। पहले उन्हें अपने शङ्खचक्रगदापद्मधारी स्वरूपका दर्शन देकर फिर वे माताकी प्रार्थनापर बालरूपमें लीला करने लगे। भगवान् श्रीरामके लिये गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।।लोचन अभिरामा

Chapter 4 (Part 6)

तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा।कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।।सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा।भगवान् श्रीकृष्णके लिये आया है उपसंहर विश्वात्मन्नदो रूपमलौकिकम्।शङ्खचक्रगदापद्मश्रिया जुष्टं चतुर्भुजम्।।(श्रीमद्भा0 10। 3। 30)माता देवकीने कहा विश्वात्मन् शङ्ख चक्र गदा और पद्मकी शोभासे युक्त इस चार भुजाओंवाले अपने अलौकिक दिव्य रूपको अब छिपा लीजिये तब भगवान्ने मातापिताके देखतेदेखते अपनी मायासे तत्काल एक साधारण शिशुका रूप धारण कर लिया पित्रोः सम्पश्यतोः सद्यो बभूव प्राकृतः शिशुः।। (श्रीमद्भा0 10। 3। 46) जब भगवान् श्रीराम अपने धाम पधारने लगे तब वे अन्तर्धान हुए। जीवोंके शरीरोंकी तरह उनका शरीर यहाँ नहीं रहा प्रत्युत वे इसी शरीरसे अपने धाम चले गये पितामहवचः श्रुत्वा विनिश्चित्य महामतिः।विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः।।(वाल्मीकिरामायण उत्तर0 110। 12)महामति भगवान् श्रीरामने पितामह ब्रह्माजीके वचन सुनकर और तदनुसार निश्चय करके तीनों भाइयोंसहित अपने उसी शरीरसे वैष्णव तेजमें प्रवेश किया। भगवान् श्रीकृष्णके लिये भी ऐसी ही बात आयी है लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलम्।योगधारणयाऽऽग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्।।(श्रीमद्भा0 11। 31। 6)धारणा और ध्यानके लिये अति मङ्गलरूप अपनी लोकाभिरामा मोहिनी मूर्तिको योगधारणाजनित अग्निके द्वारा भस्म किये बिना ही भगवान्ने अपने धाममें सशरीर प्रवेश किया। भगवान्के विग्रह(दिव्य शरीर) के विषयमें महामुनि वाल्मीकिजी भगवान् श्रीरामसे कहते हैं चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।।नर तनु धरेहु संत सुर काजा। कहहु करहु जस प्राकृत राजा।।(मानस 2। 127। 3)एक बार सनकादि ऋषि वैकुण्ठधाममें जा रहे थे। वहाँ भगवान्के द्वारपालोंने उन्हें भीतर जानेसे रोका तब सनकादिने उन्हें शाप दे दिया। अपने अनुचरोंके द्वारा सनकादिका अपमान हुआ जानकर भगवान् स्वयं वहाँ पधारे। उस समय भगवान्का दर्शन करनेसे उनकी बड़ी विलक्षण दशा हुई। उन्होंने भगवान्के चरणोंमें प्रणाम किया तस्यारविन्दनयनस्य पदारविन्द किञ्जल्कमिश्रतुलसीमकरन्दवायुः।।अन्तर्गतः स्वविवरेण चकार तेषां संक्षोभमक्षरजुषामपि चित्ततन्वोः।।(श्रीमद्भा0 3। 15। 43)प्रणाम करनेपर उन कमलनेत्र भगवान्के चरणकमलके परागसे मिली हुई तुलसीमञ्जरीकी वायुने उनके नासिकाछिद्रोंमें प्रवेश करके उन अक्षर परमात्मामें नित्य स्थित रहनेवाले ज्ञानी महात्माओंके भी चित्त और शरीरको क्षुब्ध कर दिया। शब्दादि विषयोंमें गंध कोई इतनी विलक्षण चीज नहीं है जिसमें मन आकृष्ट हो जाय। पर भगवान्के चरणकमलोंकी गंधसे नित्यनिरन्तर परमात्मस्वरूपमें मग्न रहनेवाले सनकादिकोंके चित्तमें भी खलबली पैदा हो गयी। कारण कि वह पृथ्वीकी विकाररूप गंध नहीं थी प्रत्युत दिव्य गंध थी। ऐसे ही भगवान्के विग्रहकी प्रत्येक वस्तु (वस्त्र आभूषण आयुध आदि) दिव्य चिन्मय और अत्यन्त विलक्षण है।भगवान्की लीलाओंको सुनने पढ़ने याद करने आदिसे लोगोंका अन्तःकरण निर्मल पवित्र हो जाता है और उनका अज्ञान दूर हो जाता है यह भगवान्के कर्मोंकी दिव्यता है। ज्ञानस्वरूप भगवान् शंकर ब्रह्माजी सनकादिक ऋषि देवर्षि नारद आदि भी उनकी लीलाओंको गाकर और सुनकर मग्न हो जाते हैं। भगवान्के अवतारके जो लीलास्थल हैं उन स्थानोंमें आस्तिकभावसे श्रद्धाप्रेमपूर्वक निवास करनेसे एवं उनका दर्शन करनेसे भी मनुष्यका कल्याण हो जाता है। तात्पर्य है कि भगवान् मात्र जीवोंका कल्याण करनेके उद्देश्यसे ही अवतार लेते हैं और लीलाएँ करते हैं अतः उनकी लीलाओंको पढ़नेसुननेसे उनका मननचिन्तन करनेसे स्वाभाविक ही उस उद्देश्यकी सिद्धि हो जाती है।चौथे श्लोकमें अर्जुनने भगवान्से केवल उनके जन्म के विषयमें पूछा था परन्तु यहाँ भगवान्ने अर्जुनके पूछे बिना अपनी तरफसे कर्म के विषयमें कहना आरम्भ कर दिया इसमें भगवान्का यह अभिप्राय प्रतीत होता है कि जैसे मेरे कर्म दिव्य हैं वैसे तुम्हारे कर्म भी दिव्य होने चाहिये। कारण कि मनुष्यका जन्म तो दिव्य नहीं हो सकता पर उसके कर्म अवश्य दिव्य हो सकते हैं क्योंकि उसीके लिये उसका जन्म हुआ है। कर्मोंमें दिव्यता (शुद्धि) योगसे आती है। जो कर्म बाँधनेवाले होते हैं उनमें दिव्यता आनेसे वे ही कर्म मुक्ति देनेवाले हो जाते हैं। कर्म दिव्य (फलेच्छा ममताआसक्तिसे रहित) होनेपर कर्ता एक तो उन कर्मोंसे बँधतानहीं दूसरे वह पुराने कर्मोंसे भी नहीं बँधता मुक्त हो जाता है और तीसरे उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंसे दूसरोंका भी हित स्वतः होता रहता है।गम्भीरतापूर्वक विचार करके देखें तो उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंके साथ अपना सम्बन्ध माननेसे ही कर्मोंमें मलिनता आती है और वे बाँधनेवाले होते हैं। विनाशीसे अपना सम्बन्ध माननेसे अन्तःकरण कर्म और पदार्थ तीनों ही मलिन हो जाते हैं और विनाशीसे माना हुआ सम्बन्ध छूट जानेसे ये तीनों स्वतः पवित्र हो जाते हैं। अतः विनाशीसे माना हुआ सम्बन्ध ही मूल बाधा है।एवं यो वेत्ति तत्त्वतः अजन्मा और अविनाशी होते हुए तथा प्राणिमात्रका ईश्वर होते हुए भी भगवान् मात्र जीवोंके हितके लिये अपनी प्रकृतिको अधीन करके स्वतन्त्रतापूर्वक युगयुगमें मनुष्य आदिके रूपमें अवतार लेते हैं इस तत्त्वको जानना अर्थात् दृढ़तापूर्वक मानना भगवान्के जन्मोंकी दिव्यताको जानना है।सम्पूर्ण क्रियाओँको करते हुए भी भगवान् अकर्ता ही हैं अर्थात् उनमें करनेका अभिमान नहीं है (गीता 4। 13) और किसी भी कर्मफलमें उनकी स्पृहा (फलेच्छा) नहीं है (गीता 4। 14) इस तत्त्वको जानना भगवान्के कर्मोंकी दिव्यताको जानना है।जैसे भगवान्के जन्ममें स्वाभाविक ही मात्र जीवोंकी हितैषिता और कर्ममें निर्लिप्तता है ऐसे ही मनुष्यमें भी मात्र जीवोंकी हितैषिता और कर्ममें निर्लिप्तता आ जाना ही वास्तवमें भगवान्के जन्म और कर्मके तत्त्वको जानना है।त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति भगवान्को त्रिलोकीमें न तो कुछ करना शेष है और न कुछ पाना ही शेष है (गीता 3। 22)। फिर भी वे केवल जीवमात्रका उद्धार करनेके लिये कृपापूर्वक इस भूमण्डलपर अवतार लेते हैं और तरहतरहकी अलौकिक लीलाएँ करते हैं। उन लीलाओंको गानेसे सुननेसे पढ़नेसे और उनका चिन्तन करनेसे भगवान्के साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है। भगवान्से सम्बन्ध जुड़नेपर संसारका सम्बन्ध छूट जाता है। संसारका सम्बन्ध छूटनेपर पुनर्जन्म नहीं होता अर्थात् मनुष्य जन्ममरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जाता है। वास्तवमें कर्म बन्धनकारक नहीं होते। कर्मोंमें जो बाँधनेकी शक्ति है वह केवल मनुष्यकी अपनी बनायी हुई (कमाना) है। कामनाकी पूर्तिके लिये रागपूर्वक अपने लिये कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मोंसे बँध जाता है। फिर ज्योंज्यों कामना बढ़ती है त्योंत्यों वह पापोंमें प्रवृत्त होने लगता है इस प्रकार उसके कर्म अत्यन्त मलिन हो जाते हैं जिससे वह बारंबार नीच योनियों और नरकोंमें गिरता रहता है। परन्तु जब वह केवल दूसरोंकी सेवाके लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करता है तब उसके कर्मोंमें दिव्यता विलक्षणता आती चली जाती है। इस प्रकार कामनाका सर्वथा नाश होनेपर उसके कर्म दिव्य हो जाते हैं अर्थात् बन्धनकारक नहीं होते फिर उसके पुनर्जन्मका प्रश्न ही नहीं रहता।मामेति सोऽर्जुन नाशवान् कर्मोंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण नित्यप्राप्त परमात्मा भी अप्राप्त प्रतीत होते हैं। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्म करनेसे मात्र कर्मोंका प्रवाह केवल संसारकी तरफ हो जाता है और नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है।जीवोंपर महान् कृपा ही भगवान्के जन्ममें कारण है इस प्रकार भगवान्के जन्मकी दिव्यताको जाननेसे मनुष्यकी भगवान्में भक्ति हो जाती है (टिप्पणी प0 228)। भक्तिसे भगवान्की प्राप्ति हो जाती है। भगवान्के कर्मोंकी दिव्यताको जाननेसे मनुष्यके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं अर्थात् वे बन्धनकारक न होकर खुदका और दूसरोंका कल्याण करनेवाले हो जाते हैं जिससे संसारसे सम्बन्धविच्छेदपूर्वक भगवान्की प्राप्ति हो जातीहै।मार्मिक बात सम्पूर्ण कर्म आरम्भ और समाप्त होनेवाले हैं (और कर्मके फलस्वरूप जो कुछ प्राप्त होता है वह भी अनित्य और नाशवान् होता है) परन्तु स्वयं (जीवात्मा) नित्यनिरन्तर रहनेवाला है। अतः वास्तवमें स्वयंका कर्मोंके साथ कोई सम्बन्ध है नहीं प्रत्युत माना हुआ है। अतः सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी उनके साथ अपना सम्बन्ध है ही नहीं ऐसा अनुभव करे तो उसके कर्म दिव्य हो जाते हैं यह कर्मोंका तत्त्व है। यही कर्मयोग हैक्रियाशील प्रकृतिके साथ तादात्म्य होनेके कारण मनुष्यमात्रमें कर्म करनेका वेग रहता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रहता (गीता 3। 5)। संसारमें वह देखता है कि कर्म करनेसे ही सिद्धि (वस्तुकी प्राप्ति) होती है। इसी कारण वह परमात्माकी प्राप्ति भी कर्मोंके द्वारा ही करना चाहता है परन्तु यह उसकी महान् भूल है। कारण कि नाशवान् कर्मोंके द्वारा नाशवान् वस्तुकी ही प्राप्ति होती है अविनाशीकी प्राप्ति नहीं होती। अविनाशीकी प्राप्ति तो कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर ही होती है। कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद कर्मयोगमें (ज्ञानयोगकी अपेक्षा भी) सरलतासे हो जाता है। कारण कि कर्मयोगमें स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे होनेवाले सम्पूर्ण कर्म निष्कामभावपूर्वक केवल संसारके हितके लिये होनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है और अपना कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है।यहाँ भगवान्ने माम् एति पदोंसे यह भाव प्रकट किया है कि मनुष्य कर्मोंके द्वारा जिसकी सिद्धि चाहता है वह परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध (नित्यप्राप्त) है। स्वतःसिद्ध वस्तुके लिये करना कैसा जो वस्तु प्राप्त है उसे प्राप्त करना कैसा करनेसे तो उस वस्तुकी प्राप्ति होती है जो पहले अप्राप्त थी।एक उत्पत्ति होती है और एक खोज होती है। उत्पत्ति उसकी होती है जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है जिसका पहले अभाव है और बादमें जिसका विनाश हो जाता है। खोज उसकी होती है जिसकी स्वतन्त्र सत्ता है जो पहलेसे विद्यमान है और नित्यनिरन्तर रहता है किन्तु जो क्रिया और पदार्थरूप संसारका महत्त्व मान लेनेसे छिप गया है। जब मनुष्य क्रियाओँ और पदार्थोंको केवल दूसरोंकी सेवामें लगा देता है तब क्रियापदार्थरूप संसारसे स्वतः सम्बन्धविच्छेद और नित्यप्राप्त परमात्माका साक्षात् अनुभव हो जाता है। यही नित्यप्राप्तकी खोज है।कर्तव्यकर्मोंको न करके प्रमादआलस्य करना और कर्तव्यकर्मोंको करके उनके फलकी इच्छा रखना इन दोनों कारणोंसे मनुष्यको नित्यप्राप्त परमात्माके अनुभवमें बाधा लगती है। इस बाधाको दूर करनेका उपाय है फलकी इच्छा न रखकर दूसरोंकी सेवाके रूपसे कर्तव्यकर्म करना। फलकी इच्छा न रखकर कर्तव्यकर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद होते ही परमात्मासे हमारा जो स्वतःसिद्ध नित्यसम्बन्ध है उसका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   भगवान्के जन्मकर्मकी दिव्यताको जाननेवाले कैसे होते हैं इसका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.5 4.9।।बहूनि इत्यादि अर्जुन इत्यन्तम्। श्रीभगवान् किल पूर्णषाड्गुण्यत्वात् शरीरसंपर्कमात्ररहितोऽपि स्थितिकारित्वात् कारुणिकतया आत्मांशं सृजति। आत्मा पूर्णषाड्गुण्यः अंशः उपकारकत्वेन अप्रधानभूतो ( N omit अ) यत्र तत् आत्मांशं शरीरं गृह्णाति इत्यर्थः। अत एवास्य जन्म दिव्यम् यत आत्ममायया योगप्रज्ञया स्वस्वातन्त्रयशक्त्या ( omits स्व) आरब्धम् न कर्मभिः। कर्मापि दिव्यम् फलदानासमर्थत्वात्। यश्चैवमेतत्तत्त्वं वेत्ति आत्मन्यप्येवमेव मन्यते सोऽवश्यं भगवद्वासुदेवतत्त्वं जानाति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.9।।मायामयमीश्वरस्य जन्म न वास्तवं तस्यैव च जगत्परिपालनं कर्म नान्यस्येति जानतः श्रेयोवाप्तिं दर्शयन् विपक्षे प्रत्यवायं सूचयति तज्जन्मेत्यादिना। यथोक्तं मायामयं कल्पितमिति यावत् वेदनस्य यथावत्त्वं वेद्यस्य जन्मादेरुक्तरूपानतिवर्तित्वम्। यदि पुनर्भगवतो वास्तवं जन्म साधुजनपरिपालनादि चान्यस्यैव कर्म क्षत्रियस्येति विवक्ष्यते तदा तत्त्वापरिज्ञानप्रयुक्तो जन्मादिः संसारो दुर्वारः स्यादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.9।।जन्म कर्म चेति। भगवज्जन्मादिज्ञानमात्रेण मुक्तिरुच्यत इति प्रतीतिनिरासायाह पृथगिति।एकदेशज्ञानेनेत्यर्थः। दर्शनार्थमुपलक्षणार्थम्। यथाप्रतीत एवार्थः किं न स्यात् इत्यत आह न त्विति उक्तं तृतीये। प्रमाणान्तरं चाह वेदादीति। वाक्यत्वाविशेषादेतस्य गीताबाधकत्वं कुतः इत्यतः सावकाशत्वनिरवकाशत्वाभ्यामित्याह अत्रेति। अयोगव्यवच्छेदमात्रपरत्वमित्यर्थः। एतच्च पूर्वोक्तादर्थान्तरमिति ज्ञेयम्। इतरवाक्यान्यधिकारिविशेषापेक्षया सावकाशानीति कुतो नान्या गतिः इत्यत आह नेति। विशेषणात् पक्षान्तरव्यवच्छेदात्। इतोऽप्यत्र सर्वज्ञानमङ्गीकार्यमित्याह तत्त्वत इति।आपतति इत्यनेनार्थापत्तिमभिप्रैति। एतमेवन्यायमन्यप्राप्यमतिदिशति यत्रेति। एवं भवति सर्वज्ञाने प्रमितेऽप्येकदेशज्ञानोक्तिर्भवति। तत्त्वतो ज्ञानं कथं सर्वज्ञतामाक्षिपतीत्यत आह उक्तं चेति। जिज्ञसेत् जिज्ञासेत। अन्यत्रापिएको भावस्तत्त्वतो येन दृष्टः सर्वे भावास्तत्त्वतस्तेन दृष्टाः इति। सर्वत्र सार्वज्ञं यथाशक्ति विवक्षितमित्यवधेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.9।।पृथङ्मुक्त्युक्तिर्हि सर्वज्ञानि(न)नियमदर्शनार्थम्। न तु तावन्मात्रेण मुक्तिरित्युक्तम् 3।20।वेदाद्युक्तं तु सर्वं यो ज्ञात्वोपास्ते सदा हि माम्। तस्यैव दर्शनपथं यामि नान्यस्य कस्यचित् इत्युक्तेश्च महाकौर्मे। अत्रोक्तस्यैतज्ज्ञात्वैव जन्म नैतीति गतिः। इतरवाक्यानां नान्या गतिः। नान्यस्य कस्यचिदिति विशेषणात् तत्त्वत इति विशेषणाच्च सर्वं ज्ञानमापतति। यत्रैवं भवति तत्र तत्त्वत इति विशेषणे न विरोधः। उक्तं च एकं च तत्त्वतो ज्ञातुं विना सर्वज्ञतां नरः। न समर्थो महेन्द्रोऽपि तस्मात्सर्वत्र जिज्ञसेत् इति स्कान्दे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.9।।एवं कर्ममूलभूतहेयत्रिगुणप्रकृतिसंसर्गरूपजन्मरहितस्य सर्वेश्वरत्वसर्वज्ञत्वसत्यसंकल्पत्वादिसमस्तकल्याणगुणोपेतस्य साधुपरित्राणमत्समाश्रयणैकप्रयोजनं दिव्यम् अप्राकृतं मदसाधारणं मम जन्म चेष्टितं च तत्त्वतः यो वेत्ति स वर्तमानं देहं परित्यज्य पुनः जन्म न एति माम् एव प्राप्नोति।मदीयदिव्यजन्मचेष्टितयाथात्म्यविज्ञानेन विध्वस्तसमस्तमत्समाश्रयणविरोधिपाप्मा अस्मिन् एव जन्मनि यथोदितप्रकारेण माम् आश्रित्य मदेकप्रियो मदेकचित्तो माम् एव प्राप्नोति।तद् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.9।। जन्म मायारूपं कर्म च साधूनां परित्राणादि मे मम दिव्यम् अप्राकृतम् ऐश्वरम् एवं यथोक्तं यः वेत्ति तत्त्वतः तत्त्वेन यथावत् त्यक्त्वा देहम् इमं पुनर्जन्म पुनरुत्पत्तिं न एति न प्राप्नोति। माम् एति आगच्छति सः मुच्यते हे अर्जुन।।नैष मोक्षमार्ग इदानीं प्रवृत्तः किं तर्हि पूर्वमपि

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【 Verse 4.10 】

▸ Sanskrit Sloka: वीतरागभयक्रोधा मन्मया मामुपाश्रिता: | बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागता: ||

▸ Transliteration: vītarāgabhayakrodhā manmayā māmupāśritāḥ | bahavo jñānatapasā pūtā madbhāvamāgatāḥ ||

▸ Glossary: vīta: free from; rāga: passion; bhaya: fear; krodhāḥ: anger; manmayā: fully absorbed in Me; māṁ: unto Me; upāśritāḥ: taking refuge; bahavaḥ: many beings; jñāna: wisdom; tapasā: by penance; pūtāḥ: sanctified; mad bhāvaṁ: My nature; āgatāḥ: attained

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.10 Being freed from attachment, fear and anger, being filled with me and by taking refuge in me, many beings in the past have become sanctified by the knowledge of me and have realized me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.10।।राग भय और क्रोधसे सर्वथा रहित मेरेमें ही तल्लीन मेरे ही आश्रित तथा ज्ञानरूप तपसे पवित्र हुए बहुतसे भक्त मेरे भाव(स्वरूप) को प्राप्त हो चुके हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.10।। राग भय और क्रोध से रहित मनमय मेरे शरण हुए बहुत से पुरुष ज्ञान रुप तप से पवित्र‌ हुए मेरे स्वरुप को प्राप्त हुए हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.10 वीतरागभयक्रोधाः freed from attachment? fear and anger? मन्मयाः absorbed in Me? माम् Me? उपाश्रिताः taking refuge in? बहवः many? ज्ञानतपसा by the fire of knowledge? पूताः purified? मद्भावम् My Being? आगताः have attained.Commentary When one gets knowledge of the Self? attachment to senseobjects ceases. When he realises he is the constant? indestructible? eternal Self and that change is simply a ality of the body? then he becomes fearless. When he becomes desireless? when he is free from selfishness? when he beholds the Self only everywhere? how can anger arise in himHe who takes refuge in Brahman or the Absolute becomes firmly devoted to Him. He becomes,absorbed in Him (Brahmalina or Brahmanishtha). Jnanatapas is the fire of wisdom. Just as fire burns cotton? so also this Jnanatapas burns all the latent tendencies (Vasanas)? cravings (Trishnas)? mental impressions (Samskaras)? sins and all actions? and purifies the aspirants. (Cf.II.56IV.19to37).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.10. Many persons, who are free from passion, fear and anger; are full of Me; take refuge in Me; and have become pure by the austerity of wisdom-they have come to My being.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.10 Many have merged their existences in Mine, being freed from desire, fear and anger, filled always with Me and purified by the illuminating flame of self-abnegation.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.10 Freed from desire, fear and wrath, absorbed in Me, depending upon Me, purified by the austerity of knowledge, many have attained My state.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.10 Many who were devoid of attachment, fear and anger, who were absorbed in Me, who had taken refuge in Me, and were purified by the austerity of Knowledge, have attained My state.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.10 Freed from attachment, fear and anger, absorbed in Me, taking refuge in Me, purified by the fire of knowledge, many have attained to My Being.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.10 Vita-etc. Therefore many persons, who realise in this manner are free anger etc., because they have [all] their desires completely fulfilled, due to their being full of Me; and who perform actions which are to be performed and which do not yield any fruit [for them] - they have attained My own nature. For-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.10 Purified by the austerity called knowledge of the truth of My life and deeds, many have become transformed in this manner. The Sruti says to the same effect: 'The wise know well the manner in which He is born' (Tai. A., 3.13.1). 'Dhiras' means the foremost among the wise. The meaning is the wise know the manner of His birth thus.

It is not that I protect only those who resort to Me in incarnations in the shapes of gods, men etc.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.10 Bahavah, many; vita-raga-bhaya-krodhah, who were devoid of attachment, fear and anger; manmayah, who were absorbed in Me, who were knowers of Brahman, who were seers of (their) identity with God; mam upasrithah, who had taken refuge only in Me, the supreme God, i.e. who were steadfast in Knowledge alone; and were putah, purified, who had become supremely sanctified; jnana-tapasa, by the austerity of Knowledge-Knowledge itself, about the supreme Reality, being the austerity; becoming sanctified by that austerity of Knowledge-; agatah, have attained; madbhavam, My state, Goodhood, Liberation. The particular mention of 'the austerity of Knowledge' is to indicate that steadfastness in Knowledge does not depend on any other austerity. 'In that case, You have love and aversion, because of which You grant the state of identity with Yourself only to a few but not to others?' The answer is:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.10।। इस श्लोक में अध्यात्म साधना एवं साध्य दोनों को ही स्पष्टरूप से बताया गया है किसी भी साधक के लिये राग और उसके कार्यों का त्याग किये बिना कोई उन्नति करना संभव नहीं क्योंकि वे सदैव उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न करते रहते हैं। एक बार मन इनसे उत्पन्न विक्षेपों से रहित होकर शान्त और स्थिरचित्त हो जाता है तब पूर्णत्व की स्थिति उसके जीवन का एक मात्र लक्ष्य होती है जो उसे आगे बढ़ने के लिये उत्साहित करती है। आत्मविकास की इस स्थिति पर पहुँचने पर उस साधक को शास्त्राध्ययन की योग्यता प्राप्त होती है।उपनिषदों में वर्णित आत्मप्राप्ति की साधना इस प्रकार है (क) गुरु के चरणों के पास बैठकर वेदान्त का श्रवण (ख) श्रवण किये हुए विषय पर युक्ति पूर्वक मनन और (ग) इस प्रकार जाने हुए आत्मतत्त्व का निदिध्यासन अर्थात् ध्यान। वेदान्त के सिद्धान्त का अध्ययन और उस ज्ञान के अनुसार जीवन में आचरण करने को ही इस श्लोक में ज्ञानतप कहा गया।कुछ व्याख्याकारों के मतानुसार इस श्लोक में कर्म भक्ति एवं ज्ञान इन तीनों योगों के समुच्चय का उपदेश दिया गया है। कैसे उनके अनुसार कर्मयोग की भावना से अपने कार्य क्षेत्र में कर्म किये बिना राग भय और क्रोध निवृत्ति नहीं हो सकती। मन्मया और मामुपाश्रिता अर्थात् मुझमें स्थित और मेरे शरण हुए इन शब्दों में भक्तियोग का संकेत है क्योंकि ईश्वर की शरण में गया हुआ भक्त भगवान् के साथ में एकरूप हो जाता है। आत्मानात्मविवेक करके आत्मा के साथ तादात्म्य रखने के प्रयत्न को ज्ञानयोग कहते हैं जिसे यहाँ ज्ञानतप कहा गया है। इन सबका निष्कर्ष यह है कि भिन्नभिन्न प्रतीत होने वाले साधना मार्गों का अनुसरण करने पर साघकगण मुझ परमात्मा को ही प्राप्त होते हैं।वास्तव में देखा जाय तो ये समस्त साधनामार्ग मन को साधन सम्पन्न बनाने के लिये ही हैं जिसे शास्त्रीय भाषा में अन्तकरण शुद्धि कहते हैं। हममें से कुछ लोगों का अपनी देह के साथ अत्यधिक तादात्म्य होता है। कुछ व्यक्ति अधिक भावुक होते हैं तो अन्य लोग बुद्धिवादी। इन सबके लिये एक ही प्रकार के साधन का उपदेश करने पर इस बात की सम्भावना रहती है कि उसे सार्वभौमिक स्वीकृति न मिले तथा सबके लिये उसकी उपयोगिता सिद्ध न हो सके।यह स्पष्ट है कि साधना मार्गों में विविधता होने पर भी सभी साधकों का आत्मानुभव एक ही है। यह एक विवादरहित तथ्य है क्योंकि विश्व के आध्यात्मिक साहित्य के अध्ययन करने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रत्येक सन्त ने अपने पूर्वकालीन साहित्य से विचारों को लेकर उनकी नयी प्रति प्रस्तुत कर दी हो इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान् रागद्वेषवान् हैं क्योंकि वे किसी को मोक्ष प्रदान करते हैं और अन्यों को नहीं। इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.10।।अस्य मोक्षर्मागस्याधुनिकत्वं वारयति वीतेति। रागो विषयेषु रञ्जनात्मकश्िचत्तवृत्तिविशेषः विषयत्यागान्नाशाच्च भयम् विषयप्राप्तौ विघ्नकर्तुषु ताडनाक्रोशनादिकर्तृषु च क्रोधः। वीता विगता रागादयो येभ्यस्ते अतएव मन्मया ईश्वराभेददर्शिनः। कर्मानुष्ठानसहभावं वारयति। मामेव परमेश्वरमुपाश्रिताः। केवलज्ञाननिष्ठा इत्यर्थः। तन्निष्ठस्य मोक्षोपदेशादिति न्यायात् इतरकर्मानपेक्षाः। केवलज्ञाननिष्ठा मुच्यन्त इति ज्ञापयन् विशिनष्टि। बहवोऽनेके ज्ञानमेव तपः तेन पूताः परां शुद्धिं गताः पूर्वेषामघानां नाशादुत्तरेषामसंबाधाच्चतदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्य्वपदेशात् इति न्यायात्। मद्भावं ब्रह्मभावं मोक्षं प्राप्ताः। यत्तु मन्मयाः मदेकचित्ताः मामुपाश्रिता एकान्तभक्त्या मामीश्वरं शरणं गताः सन्तो मत्प्रसादलभ्यं यदात्मज्ञानं तपश्च तत्परिपाकहेतुः स्वधर्मस्तयोः। द्वन्द्वैकवद्भावः। तेन पूताः शुद्धाः निरस्ताज्ञानतत्कार्यमलाः मद्भावं सायुज्यं प्राप्ता इति। तत्रेदं बोध्यम् मन्मयशब्दार्थत्यागे कारणाभावात्तच्छब्दार्थानुरोधेन मामुपाश्रिता इत्यस्यापि भाष्योक्तव्याख्यानमेव सम्यगिति। यदपि यदात्मज्ञानं चेत्यादि तदपि न। समुच्चयप्रसङ्गात्। यत्तु मद्भावं मद्विषयं भावं रत्याख्यं प्रेमाणमागता इति वेति तच्चिन्त्यम्। त्यक्त्वा देहमित्यादिपूर्वग्रन्थानुगुण्याभावप्रसङ्गात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.10।।मामेति सोऽर्जुनेत्युक्तं तत्र स्वस्य सर्वमुक्तप्राप्यतया पुरुषार्थत्वं अस्य मोक्षमार्गस्यानादिपरंपरागतत्वं च दर्शयति रागस्तत्फलं तृष्णां सर्वान्विषयान्परित्यज्य ज्ञानमार्गे कथं जीवितव्यमिति त्रासो भयम् सर्वविषयोच्छेदकोऽयं ज्ञानमार्गः कथं हितः स्यादिति द्वेषः क्रोधः त एते रागभयक्रोधाः वीता विवेकेन विगता येभ्यस्ते वीतरागभयक्रोधाः शुद्धसत्त्वाः मन्मयाः मां परमात्मानं तत्पदार्थं त्वंपदार्थाभेदेन साक्षात्कृतवन्तः मदेकचित्ता वा मामुपाश्रिताः एकान्तप्रेमभक्त्या मामीश्वरं शरणं गताः बहवोऽनेके ज्ञानतपसा ज्ञानमेव तपः सर्वकर्मक्षयहेतुत्वात्।नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते इति हि वक्ष्यति तेन पूताः क्षीणसर्वपापाः सन्तो निरस्ताज्ञानतत्कार्यमलाः। मद्भावं मद्रूपत्वं विशुद्धसच्चिदानन्दघनं मोक्षमागताः अज्ञानमात्रापनयेन मोक्षं प्राप्ताः। ज्ञानतपसा पूता जीवन्मुक्ताः सन्तो मद्भावं मद्विषयं भावं रत्याख्यं प्रेमाणमागता इति वा।तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते इति हि वक्ष्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.10।।एतस्यापि भगवत्प्राप्तेर्द्वारमाह वीतेति। रागो विषयेषु प्रीतिः भयं स्वोच्छेदाशङ्का क्रोधः स्वपरपीडाहेतुरभिज्वलनं ते त्रयो वीता येभ्यस्ते वीतरागभयक्रोधाः। अतएव मन्मयाः मदेकप्रधानाः। किं जारिणी यथा जारमपि भर्तारं चाश्रिता योगक्षेमार्थं तद्वन्नेत्याह। मामुपाश्रिताः ज्ञानतपसा ज्ञानमयं तप आलोचनं मम जन्मकर्मणोः स्वरूपस्य च निरन्तरं चिन्तनंयस्य ज्ञानमयं तपः इति श्रुतिप्रसिद्धं ज्ञानतपस्तेन पूताः सन्तो मद्भावं मत्तादात्म्यं प्राप्ता इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.10।।एवं भक्तानां स्वप्राप्तिं स्वप्राकट्यस्वरूपज्ञानेनोक्त्वा ज्ञानेन द्वितीयायां स्वप्राप्तिस्वरूपमाहुः वीतरागेति। बहवो ज्ञानतपसा ज्ञानयुक्तेन तपसा पूताः सन्तो मामुपाश्रिताः उप समीपे आगताः। आश्रयणमात्रमेव कृतवन्तः न तु सेवादिकं तादृशा मन्मया मद्रूपं सर्वत्र ज्ञानरूपेण पश्यन्तस्तत्रैव लीना भूत्वा आगताः प्राप्तजन्मानो मद्भावं मोक्षं प्राप्नुवन्ति। कीदृशाः वीतरागभयक्रोधा ज्ञानप्रतिपक्षरहिताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.10।।कथं जन्मकर्मज्ञानेन त्वत्प्राप्तिः स्यादित्यत्राह वीतरागेति। अहं शुद्धसत्त्वावतारैर्धर्मपरिपालनं करोमीति मदीयं परमकारुणिकत्वं ज्ञात्वा वीता विगता रागभयक्रोधा येभ्यस्ते विक्षेपाभावात्। मन्मया मदेकचित्ता भूत्वा मामेवोपाश्रिताः सन्तो मत्प्रसादलभ्यं यदात्मज्ञानं च तपश्च तत्परिपाकहेतुः स्वधर्मस्तयोः। द्वन्द्वैकवद्भावः। तेन ज्ञानतपसा पूताः शुद्धा निरस्ताज्ञानतत्कार्यमलाः सन्तो मद्भावं मत्सायुज्यं प्राप्ता बहवः नत्वधुनैव प्रवृत्तोऽयं मद्भक्तिमार्ग इत्यर्थः। तदेवंतान्यहं वेद सर्वाणि इत्यादिना विद्याविद्योपाधिभ्यां तत्त्वंपदार्थावीश्व रजीवौ प्रदर्श्येश्व रस्य चाविद्याभावेन नित्यशुद्धत्वाज्जीवस्य चेश्व रप्रसादलब्धज्ञानेनाज्ञाननिवृत्तेः शुद्धस्य सतश्चिदंशेन तदैक्यमुक्तमिति द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.10।।किञ्च यद्यहं प्राकृतजन्मकर्मा तदा मदुपाश्रयान्न कोऽपि मुक्तः स्यात् दृश्यन्ते तु मुक्त्वा इत्याह वीतेति। मां पूर्णपुरुषोत्तममुपाश्रिता बहवो गोपीकंसचैद्यादयो अमुनाऽवतारेणैव वीतशब्दोऽव्याप्तौ साङ्ख्ये सङ्केतितः तथैव सूत्रंवीतनिवीतपरिचाय्ये इति। एवमाधिव्याप्तरागव्याप्तभयव्याप्तक्रोधव्याप्तास्तत्तदुपाधिकभाववन्तोऽपि तत्तद्दोषशून्याः पूताः साक्षाद्वस्तुसामर्थ्यान्निर्दोषाः अतो ज्ञानेन कीटभृङ्गन्यायेनसोऽस्मि इति भावनया अन्ये क्षात्त्राश्रितास्तपसा वा परेथ पूताः सन्तः तापेन च मन्मया मदाकारमज्जन्मादिना च ज्ञानरूपेण पूता वा प्रारब्धनिर्वाणसमये देहं प्राकृतं त्यक्त्वा लोकातिरिक्तां दिव्यां भागवतीं तनुं प्राप्ता इत्याशयेन मद्भावमागता इति तेषां स्वस्थितावागमनं वक्ति। एवं च बहवो मुक्ता मद्भावमागता दैवा आसुरा विवेकिनश्च निरूपिताः न त्वधुना एवायं प्रवृत्तो मदाश्रयमार्ग इत्यर्थः। एतेन व्यापिवैकुण्ठे मुक्तजीवानां प्राकृतदेहेन्द्रियासुहीनानां दिव्यत्वं बहुत्वं च सूचितं तेनान्ये एकदेशिकपक्षा व्यावर्त्तिताः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.10।।यह मोक्षमार्ग अभी आरम्भ हुआ है ऐसी बात नहीं किंतु पहले भी जिनके राग भय और क्रोध चले गये हैं ऐसे रागादि दोषोंसे रहित ईश्वरमें तन्मय हुए ईश्वरसे अपना अभेद समझनेवाले ब्रह्मवेत्ता और मुझ परमेश्वरके ही आश्रित केवल ज्ञाननिष्ठामें स्थित ऐसे बहुतसे महापुरुष परमात्मविषयक ज्ञानरूप तपसे परमशुद्धिको प्राप्त होकर मुझ ईश्वरके भावको मोक्षको प्राप्त हो गये हैं। ज्ञानतपसा यह विशेषण इस बातका द्योतक है कि ज्ञाननिष्ठा अन्य तपोंकी अपेक्षा नहीं रखती।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.10।। व्याख्या   वीतरागभयक्रोधाः परमात्मासे विमुख होनेपर नाशवान् पदार्थोंमें राग हो जाता है। रागसे फिर प्राप्तमें ममता और अप्राप्तकी कामना उत्पन्न होती है। रागवाले (प्रिय) पदार्थोंकी प्राप्ति होनेपर तो लोभ होता है पर उनकी प्राप्तिमें बाधा पहुँचनेपर (बाधा पहुँचानेवालेपर) क्रोध होता है। यदि बाधा पहुँचानेवाला व्यक्ति अपनेसे अधिक बलवान् हो और उसपर अपना वश न चल सकता हो तथासमयपर वह हमारा अनिष्ट कर देगा ऐसी सम्भावना हो तो भय होता है। इस प्रकार नाशवान् पदार्थोंके रागसे ही भय क्रोध लोभ ममता कामना आदि सभी दोषोंकी उत्पत्ति होती है। रागके मिटनेपर ये सभी दोष मिट जाते हैं। पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर दूसरोंका और दूसरोंके लिये मानकर उनकी सेवा करनेसे राग मिटता है। कारण कि वास्तवमें पदार्थ और क्रियासे हमारा सम्बन्ध है ही नहीं।अपना कोई प्रयोजन न रहनेपर भी भगवान् केवल हमारे कल्याणके लिये ही अवतार लेते हैं। कारण कि वे प्राणीमात्रके परम सुहृद् हैं और उनकी सम्पूर्ण क्रियाएँ मात्र जीवोंके कल्याणके लिये ही होती हैं। इस प्रकार भगवान्की परम सुहृत्तापर दृढ़ विश्वास होनेसे भगवान्में आकर्षण हो जाता है। भगवान्में आकर्षण होनेसे संसारका आकर्षण (राग) स्वतः मिट जाता है। जैसे बचपनमें बालकोंका कंकड़पत्थरोंमें आकर्षण होता है और उनसे वे खेलते हैं। खेलमें वे कंकड़पत्थरोंके लिये लड़ पड़ते हैं। एक कहता है कि यह मेरा है और दूसरा कहता है कि यह मेरा है। इस प्रकार गलीमें पड़े कंकड़पत्थरोंमें ही उन्हें महत्ता दीखती है। परन्तु जब वे बड़े हो जाते हैं तब कंकड़पत्थरोंमें उनका आकर्षण मिट जाता है और रुपयोंमें आकर्षण हो जाता है। रुपयोंमें आकर्षण होनेपर उन्हें कंकड़पत्थरोंमें अथवा खिलौनोंमें कोई महत्ता नहीं दीखती। ऐसे ही जब मनुष्यकी परमात्मामें लगन लग जाती है तब उसके लिये संसारके रुपये और सब पदार्थ आकर्षक न रहकर फीके पड़ जाते हैं। उसका संसारमें आकर्षण या राग मिट जाता है। राग मिटते ही भय और क्रोध दोनों मिट जाते हैं क्योंकि ये दोनों रागके ही आश्रित रहते हैं।मन्मयाः भगवान्के जन्म और कर्मकी दिव्यताको तत्त्वसे जाननेसे मनुष्योंकी भगवान्में प्रियता हो जाती है प्रियता होनेसे वे भगवान्के ही शरण हो जाते हैं और शरण होनेसे वे स्वयं मन्मयाः अर्थात् भगवन्मय हो जाते हैं।सांसारिक भोगोंमें आकर्षणवाले मनुष्य भोगोंकी कामनाओंमें तन्मय हो जाते हैं कामात्मानः (गीता 2। 43) और भगवान्में आकर्षणवाले मनुष्य भगवान्में तन्मय हो जाते हैं तन्मयाः (नारदभक्तिसूत्र 70)। वे हर समय भगवान्में ही तल्लीन रहते हैं। उनके विचारों आचरणों आदिमें भगवान्की ही मुख्यता रहती है। प्रेमकी अधिकताके कारण वे भगवत्स्वरूप बन जाते हैं मानो उनकी अपनी कोई अलग सत्ता ही न हो (टिप्पणी प0 230.1)।मामुपाश्रिताः वीतरागभयक्रोधाः में संसारसे स्वयंका सम्बन्धविच्छेद है और मन्मयाः माम् उपाश्रिताः में भगवान्की तल्लीनता है।किसीनकिसीका आश्रय लिये बिना मनुष्य रह ही नहीं सकता। भगवान्का अंश जीव भगवान्से विमुख होकर दूसरेका आश्रय लेता है तो वह आश्रय टिकता नहीं प्रत्युत मिटता जाता है। धनादि नाशवान् पदार्थोंका आश्रय पतन करनेवाला होता है। इतना ही नहीं शुभकर्मोंको करनेमें बुद्धिका भगवत्प्राप्तिके साधनोंका तथा भोग और संग्रहके त्यागका आश्रय लेनेपर भी भगवत्प्राप्तिमें देरी लगती है। जबतक मनुष्य स्वयं (स्वरूपसे) भगवान्के आश्रित नहीं हो जाता तबतक उसकी पराधीनता मिटती नहीं और वह दुःख पाता ही रहता है।संसारके पदार्थोंमें मनुष्यका आकर्षण और आश्रय अलगअलग होता है जैसे मनुष्यका आकर्षण तो स्त्री पुत्र आदिमें होता है और आश्रय बड़ोंका होता है। परन्तु भगवान्में लगे हुए मनुष्यका भगवान्में ही आकर्षण होता है और भगवान्का ही आश्रय होता है क्योंकि प्रियसेप्रिय भी भगवान् हैं और बड़ेसेबड़े भी भगवान् हैं।बहवो ज्ञानतपसा पूता मद्भावमागताः यद्यपि ज्ञानयोग(सांख्यनिष्ठा) से भी मनुष्य पवित्र हो सकता है तथापि यहाँ भगवान्के जन्म और कर्मकी दिव्यताको तत्त्वसे जाननेको ज्ञान कहा गया है। इस ज्ञानसे मनुष्य पवित्र हो जाता है क्योंकि भगवान् पवित्रोंसे भी पवित्र हैं पवित्राणां पवित्रं यः। भगवान्का ही अंश होनेसे जीवमें भी स्वतःस्वाभाविक पवित्रता है चेतन अमल सहज सुख रासी (मानस 7। 117। 1)। नाशवान् पदार्थोंको महत्त्व देनेसे उनको अपना माननेसे ही यह अपवित्र होता है क्योंकि नाशवान् पदार्थोंकी ममता ही मल (अपवित्रता) है (टिप्पणी प0 230.2)। भगवान्के जन्मकर्मके तत्त्वको जाननेसे जब नाशवान् पदार्थोंका आकर्षण उनकी ममता सर्वथा मिट जाती है तब सब मलिनता नष्ट हो जाती है और मनुष्य परम पवित्र हो जाता है।कर्मयोगका प्रसङ्ग होनेसे उपर्युक्त पदोंमें आये ज्ञान शब्दका अर्थ कर्मयोगका ज्ञान भी माना जा सकता है। कर्मयोगका ज्ञान है शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पद योग्यता अधिकार धन जमीन आदि मिली हुई मात्र वस्तुएँ संसारकी और संसारके लिये ही हैं अपनी और अपने लिये नहीं हैं। कारण कि स्वयं (स्वरूप) नित्य है अतः उसके साथ अनित्य वस्तु कैसे रह सकती है तथा उसके काम भी कैसे आ सकती है शरीरादि वस्तुएँ जन्मसे पहले भी हमारे साथ नहीं थीं और मरनेके बाद भी नहीं रहेंगी तथा इस समय भी उनका प्रतिक्षण हमसे सम्बन्धविच्छेद हो रहा है। इन मिली हुई वस्तुओंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है अपनी माननेका अधिकार नहीं। ये वस्तुएँ संसारकी ही हैं अतः इन्हें संसारकी ही सेवामें लगाना है। यही इनका सदुपयोग है। इनको अपनी और अपने लिये मानना ही वास्तवमें बन्धन या अपवित्रता है।इस प्रकार नाशवान् वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानना ज्ञानतप है जिससे मनुष्य परम पवित्र हो जाता है। जितने भी तप हैं उन सबसे बढ़कर ज्ञानतप है। इस ज्ञानतपसे जडके साथ माने हुए सम्बन्धका सर्वथा विच्छेद हो जाता है। जबतक मनुष्य जडके साथ अपना सम्बन्ध मानता रहता है तबतक दूसरी तपस्यासे उसकी उतनी पवित्रता नहीं होती जितनी पवित्रता ज्ञानतपसे जडका सम्बन्धविच्छेद करनेसे होती है। इस ज्ञानतपसे पवित्र होकर मनुष्य भगवान्के भाव(सत्ता) को अर्थात् सच्चिदानन्दघन परमात्मतत्त्वको प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य है कि जैसे भगवान् नित्यनिरन्तर रहते हैं ऐसे वह भी उनमें नित्यनिरन्तर रहता है जैसे भगवान् निर्लिप्तनिर्विकार रहते हैं ऐसे वह भी निर्लिप्तनिर्विकार रहता है जैसे भगवान्के लिये कुछ भी करना शेष नहीं है ऐसे ही उसके लिये भी कुछ करना शेष नहीं रहता। ज्ञानमार्गसे भी मनुष्य इसी प्रकार भगवान्के भावको प्राप्त हो जाता है (गीता 14। 19)।पहले भी बहुतसे भक्त ज्ञानतपसे पवित्र होकर भगवान्को प्राप्त हो चुके हैं। अतः साधकोंको वर्तमानमें ही ज्ञानतपसे पवित्र होकर भगवान्को प्राप्त कर लेना चाहिये। भगवान्को प्राप्त करनेमें सभी स्वतन्त्र हैं कोई भी परतन्त्र नहीं है। कारण कि मानवशरीर भगवत्प्राप्तिके लिये ही मिला है। सम्बन्ध   जन्मकी दिव्यताका वर्णन तो हो गया अब कर्मोंकी दिव्यता क्या होती है इस विषयका आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.10।।वीतेति। तथा चैवं विदन्तो मन्मयत्वात् परिपूर्णच्छत्वात् क्रोधादिरहिताः निष्फलं कर्म करणीयं कुर्वाणाः बहवो मत्स्वरूपमवाप्ताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.10।।संप्रति प्रस्तुतमोक्षमार्गस्य नूतनत्वेनाव्यवस्थितत्वमाशङ्क्य परिहरति नैष इति। मन्मयत्वस्य मद्भावगमनेनापौनरुक्त्यं दर्शयति ब्रह्मविद इति। आत्मनो भिन्नत्वेन भिन्नाभिन्नत्वेन वा ब्रह्मणो वेदनं व्यावर्तयति ईश्वरेति। अभेददर्शनेन समुच्चित्य कर्मानुष्ठानं प्रत्याचष्टे मामेवेति। तदुपाश्रयत्वमेवविशदयति केवलेति। मामुपाश्रिता इति केवलज्ञाननिष्ठत्वमुक्त्वा ज्ञानतपसा पूता इति किमर्थं पुनरुच्यते तत्राह इतरेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.10।।किं चोत्तरश्लोकेऽधिकानुवादान्नात्रैतावन्मात्रं विवक्षितमिति भावेन तात्पर्यमाह सन्ति चेति। तथोक्तज्ञानेन आह श्रद्धोत्पादनार्थमिति शेषः। मन्मया मदात्मका इति प्रतीनिरासार्थमाह मन्मया इति। सर्वेषां भगवान् प्रचुरः को विशेषो ज्ञानिना इत्यत आह सर्वत्रेति। सर्वेषु पदार्थेषु किञ्चित्सत्तादिकम्। मदायत्तमेव सर्वे पश्यन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.10।।सन्ति च तथा मुक्ता इत्याह वीतरागेति। मन्मयाः मत्प्रचुराः सर्वत्र मां विना न किञ्चित्पश्यन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.10।।मदीयजन्मकर्मतत्त्वज्ञानाख्येन तपसा पूता बहव एवं संवृत्ताः। तथा च श्रुतिः तस्य धीराः परिजानन्ति योनिम् इति। धीरा धीमतामग्रेसरा एव तस्य जन्मप्रकारं जानन्ति इत्यर्थः।न केवलं देवमनुष्यादिरूपेण अवतीर्य मत्समाश्रयणापेक्षाणां परित्राणं करोमि। अपि तु

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.10।। वीतरागभयक्रोधाः रागश्च भयं च क्रोधश्च वीताः विगताः येभ्यः ते वीतरागभयक्रोधाः मन्मयाः ब्रह्मविदः ईश्वराभेददर्शिनः मामेव च परमेश्वरम् उपाश्रिताः केवलज्ञाननिष्ठा इत्यर्थः। बहवः अनेके ज्ञानतपसा ज्ञानमेव च परमात्मविषयं तपः तेन ज्ञानतपसा पूताः परां शुद्धिं गताः सन्तः मद्भावम् ईश्वरभावं मोक्षम् आगताः समनुप्राप्ताः। इतरतपोनिरपेक्षज्ञाननिष्ठा इत्यस्य लिङ्गम् ज्ञानतपसा इति विशेषणम्।।तव तर्हि रागद्वेषौ स्तः येन केभ्यश्चिदेव आत्मभावं प्रयच्छसि न सर्वेभ्यः इत्युच्यते

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【 Verse 4.11 】

▸ Sanskrit Sloka: ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् | मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्या: पार्थ सर्वश: ||

▸ Transliteration: ye yathā māṁ prapadyante tāṁstathaiva bhajāmyaham | mama vartmānuvartante manuṣyāḥ pārtha sarvaśah ||

▸ Glossary: ye: whoever; yathā: whatever way; māṁ: unto Me; prapadyante: seek; tān: unto them; tathā eva: in the same way; bhajāmi : I approach; ahaṁ: I; mama: My; vartma: of the path; anuvartante: follow; manuṣyāḥ: people; pārtha: son of Pritā; sarvaśaḥ: in all respects

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.11 I reward everyone, I show Myself to all people, according to the manner in which they surrender unto me, in the manner that they are devoted to me, O Pārtha!

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.11।।हे पृथानन्दन जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.11।। जो मुझे जैसे भजते हैं मैं उन पर वैसे ही अनुग्रह करता हूँ हे पार्थ सभी मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुवर्तन करते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.11 ये who? यथा in whatever way? माम् Me? प्रपद्यन्ते approach? तान् them? तथा so? एव even? भजामि reward? अहम् I? मम My? वर्त्म path? अनुवर्तन्ते follow? मनुष्याः men? पार्थ O Partha? सर्वशः in all ways.Commentary I reward men by bestowing on them the objects they desire in accordance with their ways and the motives with which they seek Me. If anyone worships Me with selfish motives I grant him the objects he desires. If he worships Me unselfishly for attaining knowledge of the Self? I grant him Moksha or final liberation. I am not at all partial to anyone. (Cf.VII.21andIX.23).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.11. The way in which men resort to Me, in the same way I favour them. O son of Prtha, all sorts of men follow the path of Mine.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.11 Howsoever men try to worship Me, so do I welcome them. By whatever path they travel, it leads to Me at last.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.11 Whoever resortt to Me in any manner, in the same manner do I favour them; men experience Me alone in different ways, O Arjuna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.11 According to the manner in which they approach Me, I favour them in that very manner. O son of Partha, human beings follow My path in every way.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.11 In whatever way men approach Me even so do I reward them; My path do men tread in all ways, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.11 See Comment under 4.12

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.11 Whoever desirous of resorting to Me, in whatever manner they think of Me according to their inclinations and take refuge in Me, i.e., resort to Me - I favour them in the same manner as desired by them; I reveal Myself to them. Why say much here! All men who are intent on following Me do experience, with their own eyes and other organs of sense in all ways, i.e., in every way wished by them, My form (including images), however inaccessible it might be to speech and thought of the Yogins.

Now, after completing the incidental topic (with regard to divine incarnations), in order to teach the mode in which Karma Yoga itself acires the form of Jnana, He begins to speak of the difficulty in finding persons who are alified for Karma Yoga of this kind.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.11 Yatha, according to the manner in which, the purpose for which, seeking, whatever fruit; prapadyante, they approach; mam, Me; aham, I; bhajami, favour; tan, them; tatha eva, in that very manner, by granting that fruit. This is the idea. For they are not seekers of Liberation. It is certainly impossible for the same person to be a seeker of Liberation and, at the same time, a seeker of rewards (of actions). Therefore, by granting fruits to those who hanker after fruits; by granting Knowledge to those who follow what has been stated (in the scriptures) and are seekers of Liberation, but do not hanker after rewards; and by granting Liberation to those who are men of wisdom and are monks aspiring for Liberation; and so also by removing the miseries of those who suffer- in these ways I favour them just according to the manner, in which they approach Me. This is the meaning. On the other hand, I do not favour anybody out of love or aversion, or out of delusion. Under all circumstances, O son of Prtha, manusyah, human beings; anuvartante, follow; sarvasah, in every way; mama, My; vartma, path, [The paths characterized by Knowledge and by action (rites and duties).] the path of God who am omnipresent. By 'human beings' are meant those people who become engaged in their respective duties to which they are alified according to the results they seek. 'If Your wish to be favourable is the same towards all creatures on account of the absence of the defects of love and aversion in You who are God, and You are there with Your capacity to grant all rewards, why then do not all, becoming desirous of Liberation, take refuge in You alone with the very knowledge that Vasudeva is everything?' As to that, hear the reason for this:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.11।। भगवान् में राग द्वेष आदि की दुर्बलताओं का आरोप उचित नहीं है। वे तो शक्तिपुञ्ज हैं जो समस्त कर्मों एवं उपलब्धियों का मूल है। उस ईश्वर की शक्ति का आह्वान करने के लिये हमें उपाधियाँ दी गयी हैं। बुद्धिमत्ता पूर्वक यदि इन उपाधियों का तथा शक्ति का हम उपयोग करें तो निश्चय ही लक्ष्य को पा सकते हैं अन्यथा वही शक्ति हमारे नाश का कारण बन सकती है।यन्त्रों की सहायता से पेट्रोल की ईन्धन शक्ति को अश्वशक्ति में परिवर्तित किया जा सकता है। उस परिवर्तित शक्ति का उपयोग करके वाहन द्वारा हम अपने गन्तव्य तक पहुँच सकते हैं अथवा किसी

Chapter 4 (Part 7)

वृक्ष आदि से टक्कर मारकर अपनी हड्डियाँ भी चूरचूर कर सकते हैं इस प्रकार की दुर्घटनायें वाहन चालकों की असावधानी के कारण होती हैं। यद्यपि जिस वेग से वाहन टकराया उस वेग को उसने पेट्रोल से ही प्राप्त किया था। हम यह नहीं कह सकते कि जो लोग लक्ष्य तक पहुँच गये उनके प्रति पेट्रोल को राग था और दुर्घटनाग्रस्त लोगों से द्वेष। बिना किसी पक्षपात के पेट्रोल अपनी शक्ति प्रदान करता है परन्तु यन्त्रों द्वारा उसका सदुपयोग अथवा दुरुपयोग करना हमारी अपनी बुद्धि पर निर्भर करता है। यही बात विद्युत् शक्ति के सम्बन्ध में भी समझनी चाहिये। विद्युत् की अभिव्यक्ति विभिन्न उपकरणों में विभिन्न प्रकार से होती है वह उन सब उपकरणों का गुण धर्म है और न कि विद्युत शक्ति का।इसी प्रकार भगवान् यहाँ कहते हैं जो मुझे जैसा भजते हैं मैं उन पर वैसी ही कृपा करता हूँ। जिस रूप में हम ईश्वर का आह्वान करेंगे उसी रूप में वे हमारी इच्छा को पूर्ण करेंगे।यदि भगवान् पक्षपातादि अवगुणों से सर्वथा मुक्त हैं तो उनकी कृपा सब पर एक समान ही होगी फिर सामान्य मनुष्य भगवान् की शरण में न जाकर अन्य विषयों की ही क्यों इच्छा करते हैं इस प्रश्न का उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.11।। एवं स्वस्मिन्प्रसक्तौ रागद्वेषौ वारयति य इति। ये यथा येन प्रकारेण यदर्थं मोक्षाथमर्थार्थमार्तिनिवृत्त्यर्थं ज्ञानार्थं च मां प्रपद्यन्ते भजन्ति तांस्तथैव तत्तत्फलप्रदानेनाहं समस्तफलप्रदाता परमेश्वरो भजाम्यनुगृह्णामि। ये मनुष्याः यत्फलार्थितया यस्मिन्कर्मण्यधिकृता इन्द्रादिदेवतान्तरं यजन्ते सर्वशः सर्वप्रकारेण प्रवृत्तास्ते ममैव सर्वात्मनस्तत्कर्मात्मकं वर्त्म मार्गभनुवर्तन्ते। येतु ये मनुष्याः मां सर्वशरीरस्थं यथा येन प्रकारेण शत्रुत्वेन मित्रत्वेन वा प्रपद्यन्ते प्राप्नुवन्ति तांस्तेनैव प्रकारेणाहमपि भजाम्यनुसरामि। येतु मम वर्त्म भक्तिध्यानप्रणिधानात्मकं अनुवर्तन्ते तान्ममात्मभूतान् तथैव सर्वशः सर्वप्रकारैः अनुवर्तेऽहमिति वर्णयन्ति तैस्त्वर्थान्तरं वर्णनीयमिति व्यग्रचित्तैः मामुपाश्रिताः यजन्त इति पूर्वोत्तरग्रन्थानुसारी प्रपद्यन्ते भजामीत्यनयोर्यथाश्रुतार्थः परित्यक्तः। एतेन ममेत्यादिक्लिष्टकल्पनापि प्रत्युक्ता। इतरमनुष्या अपि मम वर्त्मानुवर्तन्ते त्वया तु मत्संबन्धिनापि मदनुर्वतनं न क्रियत इत्यत्याश्चर्यमिति द्योतयन्नाह पार्थेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.11।।ननु ये ज्ञानतपसा पूता निष्कामास्ते त्वद्भावं गच्छन्ति ये त्वपूताः सकामास्ते न गच्छन्तीति फलदातुस्तव वैषम्यनैर्घृण्ये स्यातामिति नेत्याह ये आर्ताः अर्थार्थिनो जिज्ञासवो ज्ञानिनश्च यथा येन प्रकारेण सकामतया निष्कामतया च मामीश्वरं सर्वफलदातारं प्रपद्यन्ते भजन्ति तांस्तथैव तदपेक्षितफलदानेनैव भजाम्यनुगृह्णाम्यहम्। न। यदुच्यते सर्वज्ञस्येश्वरस्य सर्वकार्यविपर्ययेण तत्रामुमुक्षूनार्तानर्थार्थिनश्चार्तिहरणेनार्थदानेन चानुगृह्णामि। जिज्ञासून्विविदिषन्ति यज्ञेन इत्यादिश्रुतिविहितनिष्कामकर्मानुष्ठातृ़न् ज्ञानदानेन ज्ञानिनश्च मुभुक्षून् मोक्षदानेन न त्वन्यकामायान्यद्ददामीत्यर्थः। ननु तथापि स्वभक्तानामेव फलं ददासि नत्वन्यदेवभक्तानामिति वैषम्यं स्थितमेवेति नेत्याह मम सर्वात्मनो वासुदेवस्य वर्त्म भजनमार्गं कर्मज्ञानलक्षणमनुवर्तन्ते। हे पार्थ सर्वशः सर्वप्रकारैरिन्द्रादीनप्यनुवर्तमाना मनुष्या इति कर्माधिकारेणइन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुः इत्यादिमन्त्रवर्णात्फलमत उपपत्तेः इति न्यायाच्च सर्वरूपेणापि फलदाता भगवानेक एवेत्यर्थः। तथाच वक्ष्यतियेऽप्यन्यदेवताभक्ता इत्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.11।।ननु साध्वसाध्वोस्त्राणविनाशौ कुर्वतस्तव वैषम्यनैर्घृण्ये स्तोऽतः किं तवास्मदादितुल्यस्य जन्मकर्मस्वरूपाणां चिन्तनेनेत्याशङ्क्याह ये यथेति। ये मनुष्याः मां सर्वशरीरस्थं यथा येन प्रकारेण शत्रुत्वेन मित्रत्वेन वा प्रपद्यन्ते प्राप्नुवन्ति तांस्तेनैव प्रकारेणाहमपि भजाम्यनुसरामि। ये तु मम वर्त्म भक्तिध्यानप्रणिधानात्मकमनुवर्तन्ते तान्ममात्मभूतांस्तथैव सर्वशः सर्वैः प्रकारैरनुवर्तेऽहमिति योजना। ततश्च मद्बिम्बभूते प्राणिजाते यथा यः प्रीतिं द्वेषं वा करोति तस्मिन्प्रतिबिम्बभूतेऽहमपि तथैव प्रीतिं द्वेषं च करोमि। बिम्बपूजापरिभवौ प्रतिबिम्बे एव संक्रामतोऽतो न मम वैषम्यनैर्घृण्ये स्तः। तस्मात् श्रेयोर्थिना सर्वस्य कल्याणायैव यतितव्यमिति भावः। भाष्ये तु ये यथा येन प्रकारेण येन प्रयोजनेन आर्ता जिज्ञासवोऽर्थार्थिनो ज्ञानिनो वा प्रतिपद्यन्ते तांस्तथैव पीडापरिहारेण ज्ञानदानेन अर्थदानेन मोक्षदानेन वाऽनुगृह्णामि। सर्वथा ते ममैव वर्त्मानुवर्तन्त इति अन्यदेवताभक्ता इति चैतद्व्याचक्षते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.11।।ननु त्वत्सङ्गता एवैके लीलायां सम्बन्धं प्राप्नुवन्ति एके मुक्तिं तत्र किं कारणं इत्याशङ्क्याहुः ये यथा मामिति। हे पार्थ ये मां यथा येन प्रकारेण यदिच्छया वा प्रपद्यन्ते प्रपन्ना भवन्ति अहं तांस्तथैव भजामि तत्फलरूपेण वशे भवामि। अत्रायमर्थः यौ तु साक्षान्मत्प्राप्त्यर्थं च भक्तिज्ञानमार्गावुक्तौ तत्र यस्योत्तमत्वज्ञानेन यत्र रुचिः स्यात्तस्य तददाने तन्मनोरथो न स्यात् दुःखं स्यात् तदा ममात्मत्वं भज्येताऽतस्तथा करोमि।ये इत्युक्त्या मर्यादामार्गीयज्ञानोपयोग्यजीवानामपि स्नेहभजने पुष्टिमर्यादायां मत्प्राप्तिरूपं फलं ददामीति व्यज्यते। पार्थेति सम्बोधनेन मूलतो भक्तेऽपि त्वय्येवं प्रश्नयोग्ये त्वत्प्रश्नानुसारेणोत्तरं प्रयच्छामीति त्वयैवानुभूयत इति ध्वन्यते। किञ्च ये मनुष्या मम वर्त्म मदुक्तमार्गं पुष्टिमार्गमनुवर्तन्ते मदुक्तप्रकारेण अनु पश्चाद्वर्तन्ते तान् सर्वप्रकारैरहं भजामि व्रजरीत्येति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.11।।ननु तर्हि किं त्वय्यपि वैषम्यमस्ति यस्मादेवं त्वदेकशरणानामेवात्मभावं ददासि नान्येषां सकामानामित्यत आह ये यथेति। यथा येन प्रकारेण सकामतया निष्कामतया वा ये मां भजन्ति तानहं तथैव तदपेक्षितफलदानेन भजाम्यनुगृह्णामि नतु ये सकामा मां विहायेन्द्रादीनेव भजन्ते तानहमुपेक्ष इति मन्तव्यम्। यतः सर्वशः सर्वप्रकारैरिन्द्रादिसेवका अपि ममैव वर्त्म भजनमार्गमनुवर्तन्ते। इन्द्रादिरूपेणापि ममैव सेव्यत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.11।।ननु तर्हि त्वय्यपि वैषम्यं यस्मादेवमुपाश्रितानामेवात्मभावं ददासि नान्येषामिति तत्राह ये यथेति। ये यादृशा अधिकारिणः पुष्टिप्रवाहमर्यादामार्गीयाः येन येन प्रकारेण सकामतया निष्कामतया वा मां प्रपद्यन्ते आश्रयन्ते तानहं तथैव भजाम्यनुकरोमि।तच्चात्मने प्रतिमुखस्य यथा मुखश्रीः इतिन्यायेनाङ्गीकरोमि कल्पतरुवत्। न तु सकामा ये मां विहायेन्द्रादीनेव यजन्ते तानहमुपेक्षे इति मन्तव्यं यतः सर्वशः सर्वप्रकारैर्देवान्तरभजनभेदैर्मनुष्या मम वर्त्मानुवर्तन्ते। न तु मामेवाऽथापि। तत्तद्रूपेण ममैव सेव्यत्वश्रवणात् तथा तेषामविवेकतो भजनं न साधु वस्तुविमर्शे तन्ममैवायाति तदंशित्वात्। वक्ष्यते च येऽप्यन्यदेवताभक्ताः 9।3 इत्यादिना।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.11।।तब क्या आपमें रागद्वेष हैं जिससे कि आप किसीकिसीको ही आत्मभाव प्रदान करते हैं सबको नहीं करते इसपर कहते हैं जो भक्त जिस प्रकारसे जिस प्रयोजनसे जिस फलप्राप्तिकी इच्छासे मुझे भजते हैं उनको मैं उसी प्रकार भजता हूँ अर्थात् उनकी कामनाके अनुसार ही फल देकर मैं उनपर अनुग्रह करता हूँ क्योंकि उन्हेंमोक्षकी इच्छा नहीं होती। एक ही पुरुषमें मुमुक्षुत्व और फलार्थित्व ( फलकी इच्छा करना ) यह दोनों एक साथ नहीं हो सकते। इसलिये जो फलकी इच्छावाले हैं उन्हें फल देकर जो फलको न चाहते हुए शास्त्रोक्त प्रकारसे कर्म करनेवाले और मुमुक्षु हैं उनको ज्ञान देकर जो ज्ञानी संन्यासी और मुमुक्षु हैं उन्हें मोक्ष देकर तथा आर्तोंका दुःख दूर करके इस प्रकार जो जिस तरहसे मुझे भजते हैं उनको मैं भी वैसे ही भजता हूँ। रागद्वेषके कारण यह मोहके कारण तो मैं किसीको भी नहीं भजता। हे पार्थ मनुष्य सब तरहसे बर्तते हुए भी सर्वत्र स्थित मुझ ईश्वरके ही मार्गका सब प्रकारसे अनुसरण करते हैं जो जिस फलकी इच्छासे जिस कर्मके अधिकारी बने हुए ( उस कर्मके अनुरूप ) प्रयत्न करते हैं वे ही मनुष्य कहे जाते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.11।। व्याख्या   ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् भक्त भगवान्की जिस भावसे जिस सम्बन्धसे जिस प्रकारसे शरण लेता है भगवान् भी उसे उसी भावसे उसी सम्बन्धसे उसी प्रकारसे आश्रय देते हैं। जैसे भक्त भगवान्को अपना गुरु मानता है तो वे श्रेष्ठ गुरु बन जाते हैं शिष्य मानता है तो वे श्रेष्ठ शिष्य बन जाते हैं मातापिता मानता है तो वे श्रेष्ठ मातापिता बन जाते हैं पुत्र मानता है तो वे श्रेष्ठ पुत्र बन जाते हैं भाई मानता है तो वे श्रेष्ठ भाई बन जाते हैं सखा मानता है तो वे श्रेष्ठ सखा बन जाते हैं नौकर मानता है तो वे श्रेष्ठ नौकर बन जाते हैं। भक्त भगवान्के बिना व्याकुल हो जाता है तो भगवान् भी भक्तके बिना व्याकुल हो जाते हैं।अर्जुनका भगवान् श्रीकृष्णके प्रति सखाभाव था तथा वे उन्हें अपना सारथि बनाना चाहते थे अतः भगवान् सखाभावसे उनके सारथि बन गये। विश्वामित्र ऋषिने भगवान् श्रीरामको अपना शिष्य मान लिया तो भगवान् उनके शिष्य बन गये। इस प्रकार भक्तोंके श्रद्धाभावके अनुसार भगवान्का वैसा ही बननेका स्वभाव है।अनन्त ब्रह्माण्डोंके स्वामी भगवान् भी अपने ही बनाये हुए साधारण मनुष्योंके भावोंके अनुसार बर्ताव करते हैं यह उनकी कितनी विलक्षण उदारता दयालुता और अपनापन है भगवान् विशेषरूपसे भक्तोंके लिये ही अवतार लेते हैं ऐसा प्रस्तुत प्रकरणसे सिद्ध होता है। भक्तलोग जिस भावसे जिस रूपमें भगवान्की सेवा करना चाहते हैं भगवान्को उनके लिये उसी रूपमें आना पड़ता है। जैसे उपनिषद्में आया है एकाकी न रमते (बृहदारण्यक0 1। 4। 3) अकेले भगवान्का मन नहीं लगा तो वे ही भगवान् अनेक रूपोंमें प्रकट होकर खेल खेलने लगे। ऐसे ही जब भक्तोंके मनमें भगवान्के साथ खेल खेलनेकी इच्छा हो जाती है तब भगवान् उनके साथ खेल खेलने(लीला करने) के लिये प्रकट हो जाते हैं। भक्त भगवान्के बिना नहीं रह सकता तो भगवान् भी भक्तके बिना नहीं रह सकते।यहाँ आये यथा और तथा इन प्रकारवाचक पदोंका अभिप्राय सम्बन्ध भाव और लगन से है। भक्त और भगवान्का प्रकार एकसा होनेपर भी इनमें एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि भगवान् भक्तकी चालसे नहीं चलते प्रत्युत अपनी चाल(शक्ति) से चलते हैं (टिप्पणी प0 232.1)। भगवान् सर्वत्र विद्यमान सर्वसमर्थ सर्वज्ञ परम सुहृद् और सत्यसंकल्प हैं। भक्तको केवल अपनी पूरी शक्ति लगा देनी है फिर भगवान् भी अपनी पूरी शक्तिसे उसे प्राप्त हो जाते हैं।भगवत्प्राप्तिमें बाधा साधक स्वयं लगाता है क्योंकि भगवत्प्राप्तिके लिये वह समझ सामग्री समय और सामर्थ्यको अपनी मानकर उन्हें पूरा नहीं लगाता प्रत्युत अपने पास बचाकर रख लेता है। यदि वह उन्हें अपना न मानकर उन्हें पूरा लगा दे तो उसे शीघ्र ही भगवत्प्राप्ति हो जाती है। कारण कि यह समझ सामग्री आदि उसकी अपनी नहीं हैं प्रत्युत भगवान्से मिली हैं भगवान्की हैं। अतः इन्हें अपनी मानना ही बाधा है। साधक स्वयं भी भगवान्का ही अंश है। उसने खुद अपनेको भगवान्से अलग माना है भगवान्ने नहीं। भक्ति (प्रेम) कर्मजन्य अर्थात् किसी साधनविशेषका फल नहीं है। भगवान्के सर्वथा शरण होनेवालेको भक्ति स्वतः प्राप्त होती है। दास्य सख्य वात्सल्य माधुर्य आदि भावोंमें सबसे श्रेष्ठ शरणागतिका भाव है। यहाँ भगवान् मानो इस बातको कह रहे हैं कि तुम अपना सब कुछ मुझे दे दोगे तो मैं भी अपना सब कुछ तुम्हें दे दूँगा और तुम अपनेआपको मुझे दे दोगे तो मैं भी अपनेआपको तुम्हें दे दूँगा। भगवत्प्राप्तिका कितना सरल और सस्ता सौदा हैअपनेआपको भगवच्चरणोंमें समर्पित करनेके बाद भगवान् भक्तकी पुरानी त्रुटियोंको यादतक नहीं करते। वे तो वर्तमानमें साधकके हृदयका दृढ़ भाव देखते हैं रहति न प्रभु चित चूक किए की।करत सुरति सय बार हिए की।।(मानस 1। 29। 3)इस (ग्यारहवें) श्लोकमें द्वैतअद्वैत सगुणनिर्गुण सायुज्यसामीप्य आदि शास्त्रीय विषयका वर्णन नहीं है प्रत्युत भगवान्से अपनेपनका ही वर्णन है। जैसे नवें श्लोकमें भगवान्के जन्मकर्मकी दिव्यताको जाननेसे भगवत्प्राप्ति होनेका वर्णन है। केवल भगवान् ही मेरे हैं और मैं भगवान्का ही हूँ दूसरा कोई भी मेरा नहीं है और मैं किसीका भी नहीं हूँ इस प्रकार भगवान्में अपनापन करनेसे उनकी प्राप्ति शीघ्र एवं सुगमतासेहो जाती है। अतः साधकको केवल भगवान्में ही अपनापन मान लेना चाहिये (जो वास्तवमें है) चाहे समझमें आये अथवा न आये। मान लेनेपर जब संसारके झूठे सम्बन्ध भी सच्चे प्रतीत होने लगते हैं फिर जो भगवान्का सदासे ही सच्चा सम्बन्ध है वह अनुभवमें क्यों नहीं आयेगा अर्थात् अवश्य आयेगा। शङ्का   जो भगवान्को जिस भावसे स्वीकार करते हैं भगवान् भी उनसे उसी भावसे बर्ताव करते हैं तो फिर यदि कोई भगवान्को द्वैष वैर आदिके भावसे स्वीकार करेगा तो क्या भगवान् भी उससे उसी (द्वेष आदिके) भावसे बर्ताव करेंगे  समाधान   यहाँ प्रपद्यन्ते पदसे भगवान्की प्रपत्ति अर्थात् शरणागतिका ही विषय है उनसे द्वेष वैर आदिका विषय नहीं। अतः यहाँ इस विषयमें शङ्का ही नहीं उठ सकती। फिर भी इसपर थोड़ा विचार करें तो भगवान्के स्वीकार करनेका तात्पर्य है कल्याण करना। जो भगवान्को जिस भावसे स्वीकार करता है भगवान् भी उससे वैसा ही आचरण करके अन्तमें उसका कल्याण ही करते हैं (टिप्पणी प0 232.2)। भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं (गीता 5। 29)। इसलिये जिसका जिसमें हित होता है भगवान् उसके लिये वैसा ही प्रबन्ध कर देते हैं। वैरद्वेष रखनेवालोंका भी जिससे कल्याण हो जाय वैसा ही भगवान् कहते हैं। वैरद्वेष रखनेवाले भगवान्का बिगाड़ भी क्या कर लेंगे अंगदजीको रावणकी सभामें भेजते समय भगवान् श्रीराम कहते हैं कि वही बात कहना जिससे हमारा काम भी हो और रावणका हित भी हो काजु हमार तासु हित होई (मानस 6। 17। 4)।भगवान्की सुहृत्ताकी तो बात ही क्या भक्त भी समस्त प्राणियोंके सुहृद् होते हैं सुहृदः सर्वदेहिनाम् (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)। जब भक्तोंसे भी किसीका किञ्चिन्मात्र भी अहित नहीं होता तब भगवान्से किसीका अहित हो ही कैसे सकता है भगवान्से किसी प्रकारका भी सम्बन्ध जोड़ा जाय वह कल्याण करनेवाला ही होता है क्योंकि भगवान् परम दयालु परम सुहृद् और चिन्मय हैं। जैसे गङ्गामें स्नान वैशाख मासमें किया जाय अथवा माघ मासमें दोनोंका ही माहात्म्य एक समान है। परन्तु वैशाखके स्नानमें जैसी प्रसन्नता होती है वैसी प्रसन्नता माघके स्नानमें नहीं होती। इसी प्रकार भक्तिप्रेमपूर्वक भगवान्से सम्बन्ध जोड़नेवालोंको जैसा आनन्द होता है वैसा आनन्द वैरद्वेषपूर्वक भगवान्से सम्बन्ध जोड़नेवालोंको नहीं होता।मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है दूसरे लोग भी उसीके अनुसार आचरण करने लग जाते हैं (गीता 3। 21)। भगवान् सबसे श्रेष्ठ (सर्वोपरि) हैं इसलिये सभी लोग उनके मार्गका अनुसरण करते हैं तीसरे अध्यायमें तेईसवें श्लोकके उत्तरार्धमें भी यही बात (उपर्युक्त पदोंसे ही) कही गयी है।साधक भगवान्के साथ जिस प्रकारका सम्बन्ध मानता है भगवान् उसके साथ वैसा ही सम्बन्ध माननेके लिये तैयार रहते हैं। महाराज दशरथजी भगवान् श्रीरामको पुत्रभावसे स्वीकार करते हैं तो भगवान् उनके सच्चे पुत्र बन जाते हैं और सामर्थ्यवान् होकर भी पिता दशरथजीके वचनोंको टालनेमें अपनेको असमर्थ मानते हैं (टिप्पणी प0 233)। इस प्रकारके आचरणोंसे भगवान् यह रहस्य प्रकट करते हैं कि यदि तुम्हारी संसारमें किसीके साथ सम्बन्धके नाते प्रियता हो तो वही सम्बन्ध तुम मेरे साथ कर लो जैसे मातामें प्रियता हो तो मेरेको अपनी माता मान लो पितामें प्रियता हो तो मेरेको अपना पिता मान लो पुत्रमें प्रियता हो तो मेरेको अपना पुत्र मान लो आदि। ऐसा माननेसे मेरेमें वास्तविक प्रियता हो जायगी और मेरी प्राप्ति सुगमतापूर्वक हो जायगी।दूसरी बात भगवान् अपने आचरणोंसे यह शिक्षा देते हैं कि जिस प्रकार मेरे साथ जो जैसा सम्बन्ध मानता है उसके लिये मैं भी वैसा ही बन जाता हूँ उसी प्रकार तुम्हारे साथ जो जैसा सम्बन्ध मानता है तुम भी उसके लिये वैसे ही बन जाओ जैसे मातापिताके लिये तुम सुपुत्र बन जाओ पत्नीके लिये तुम सुयोग्यपति बन जाओ बहनके लिये तुम श्रेष्ठ भाई बन जाओ आदि। परन्तु बदलेमें उनसे कुछ चाहो मत जैसे कुछ लेनेकी इच्छासे मातापिताको अपने न मानकर केवल सेवा करनेके लिये ही उन्हें अपने मानो। ऐसा मानना ही भगवान्के मार्गका अनुसरण करना है। अभिमानरहित होकर निःस्वार्थभावसे दूसरेकी सेवा करनेसे शीघ्र ही दूसरेकी ममता छूटकर भगवान्में प्रेम हो जायगा जिससे भगवान्की प्राप्ति हो जायगी।विशेष बात अहंकाररहित होकर निःस्वार्थभावसे कहीं भी प्रेम किया जाय तो वह प्रेम स्वतः प्रेममय भगवान्की तरफ चला जाता है। कारण कि अपना अहंकार और स्वार्थ ही भगवत्प्रेममें बाधा लगाता है। इन दोनोंके कारण मनुष्यका प्रेमभाव सीमित हो जाता है और इनका त्याग करनेपर उसका प्रेमभाव व्यापक हो जाता है। प्रेमभाव व्यापक होनेपर उसके माने हुए सभी बनावटी सम्बन्ध मिट जाते हैं और भगवान्का स्वाभाविक नित्यसम्बन्ध जाग्रत् हो जाता है।जीवमात्रका परमात्माके साथ स्वतः नित्यसम्बन्ध है (गीता 15। 7)। परन्तु जबतक जीव इस सम्बन्धको पहचानता नहीं और दूसरा सम्बन्ध जोड़ लेता है तबतक वह जन्ममरणके बन्धनमें पड़ा रहता है। उसका यह बन्धन दो ओरसे होता है एक तो वह भगवान्के साथ अपने नित्यसम्बन्धको पहचानता नहीं और दूसरे जिसके साथ वास्तवमें अपना सम्बन्ध है नहीं उसके सम्बन्धको नित्य मान लेता है। जब जीव ये यथा मां प्रपद्यन्ते के अनुसार अपना सम्बन्ध केवल भगवान्से मान लेता है अर्थात् पहचान लेता है तब उसे भगवान्से अपने नित्यसम्बन्धका अनुभव हो जाता है।भगवान्के नित्यसम्बन्धको पहचानना ही भगवान्के शरण होना है। शरण होनेपर भक्त निश्चिन्त निर्भय निःशोक और निःशङ्क हो जाता है। फिर उसके द्वारा भगवान्की आज्ञाके विरुद्ध कोई क्रिया कैसे हो सकती है उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भगवान्के आज्ञानुसार ही होती हैं मम वर्त्मानुवर्तन्ते। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि जो मुझे जिस भावसे स्वीकार करता है मैं भी उसे उसी भावसे स्वीकार करता हूँ अर्थात् मेरी प्राप्ति बहुत सरल और सुगम है। ऐसा होनेपर भी लोग भगवान्का आश्रय क्यों नहीं लेते इसका कारण आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.11 4.12।।यतः ये यथेति। कांक्षन्त इति। ये यथैव (S K ययैव) बुद्ध्या मामाश्रयन्ते तान् प्रति तदेव स्वरूपमहं गृह्णन् ताननुगृह्णामि। एवमेव मदीयं मार्गं मन्मया अमन्मयाश्च सर्व एवानुवर्तन्ते। न हि ज्योतिष्टोमादिरन्यो मार्गः मदीयैव सा तथेच्छा। वक्ष्यते हि चातुर्वर्ण्य मया सृष्टमिति।अन्यस्तु आह लिङ्गर्थे लट् यथा अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति इत्यत्र (S omits इत्यत्र) गृह्णीयु इत्यर्थः एवमिहापि अनुवर्तन्ते (N omits अनुवर्तन्ते) अनुवर्तेरन् इति।मानुषे एव लोके भोगापवर्गलक्षणा सिद्धिः नान्यत्रेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.11।।ईश्वरः सर्वेभ्यो भूतेभ्यो मोक्षं प्रयच्छति चेत्प्रागुक्तविशेषणवैयर्थ्यं यदि तु केभ्यश्चिदेव मोक्षं प्रयच्छेत्तर्हि तस्य रागादिमत्त्वादनीश्वरत्वापत्तिरिति शङ्कते तव तर्हीति। ये मुमुक्षवस्तेभ्यो मोक्षमीश्वरो ज्ञानसंपादनद्वारा प्रयच्छति फलान्तरार्थिभ्यस्तु तत्तदुपायानुष्ठानेन तत्तदेव ददातीति नास्य रागद्वेषाविति परिहरति उच्यत इति। मुमुक्षूणामीश्वरानुसारित्वेऽपि फलान्तरार्थिनां कुतस्तदनुसारित्वमित्याशङ्क्यफलमत उपपत्ते रिति न्यायेन तत्फलस्येश्वरायत्तत्वात्तदनुवर्तित्वमावश्यकमित्याह ममेति। भगवद्वचनभागिनां सर्वेषामेव कैवल्यमेकरूपं किमिति नानुगृह्यते तत्राह तेषामिति। अभ्युदयनिःश्रेयसार्थित्वं प्रार्थनावैचित्र्यादेकस्यैव किं न स्यादित्याशङ्क्य पर्यायेण तदनुपपत्तिं साधयति नहीति। मुमुक्षूणां फलार्थिनां च विभागे स्थिते सत्यनुग्रहविभागं फलितमाह अत इति। फलप्रदानेनानुगृह्णामीति संबन्धः। नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठायिनामेव फलार्थित्वाभावे सति मुमुक्षुत्वे कथं तेष्वनुग्रहः स्यादिति तत्राह ये यथोक्तेति। ज्ञानप्रदानेन भजामीत्युत्तरत्र संबन्धः। सन्ति केचित्त्यक्तसर्वकर्माणो ज्ञानिनो मोक्षमेवापेक्ष्यमाणास्तेष्वनुग्रहप्रकारं प्रकटयति ये ज्ञानिन इति। केचिदार्ताः सन्तो ज्ञानादिसाधनान्तररहिता भगवन्तमेवार्तिमपहर्तुमनुवर्तन्ते तेषु भगवतोऽनुग्रहविशेषं दर्शयति तथेति। पूर्वार्धव्याख्यानमुपसंहरति इत्येवमिति। भगवतोऽनुग्रहे निमित्तान्तरं निवारयति न पुनरिति। फलार्थित्वे मुमुक्षुत्वे च जन्तूनां भगवदनुसरणमावश्यकमित्युत्तरार्धं विभजते सर्वथापीति। सर्वावस्थत्वं तेन तेनात्मना परस्यैवेश्वरस्यावस्थानं मार्गो ज्ञानकर्मलक्षणः। मनुष्यग्रहणादितरेषामीश्वरमार्गानुवर्तित्वपर्युदासः स्यादित्याशङ्क्याह यत्फलेति। सर्वप्रकारैर्मम मार्गमनुवर्तन्त इति पूर्वेण संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.11।।ये यथा इति वाक्यं न प्रकृतेन साक्षात् सङ्गतम् अतस्तत्सङ्गमयितुं मध्ये शङ्कान्तरं निराकरोति न चेति। मामुपासिता मद्भावमागता इत्युक्त्याऽन्यदेवतादिरूपेण मद्भजनमात्रेण त्रैविद्यानामपि मुक्तिर्भवतीति नाशङ्कनीयमित्यर्थः। विष्णुं सामान्यतः सर्वोत्तमं ज्ञात्वाऽन्यदेवताः पितृ़ंश्चेष्ट्वाऽन्ते विष्णौ समर्पणमन्यदेवतादिरूपेण भगवद्भजनम्। उपपत्तिं तूत्तरत्र वक्ष्यामीति भगवतोऽभिप्रायः। तत्किं त्रैविद्यानां त्वद्भजनं निरर्थकमेव इत्यत आह तथापीति। यद्यपि न मुक्तिं ददामि तथापि तदभिप्रेतं स्वर्गादिकं ददामीति शेषः। एवं तर्हि ज्ञानिभ्यो मुक्तिं त्रैविद्येभ्योऽल्पं फलं ददद्विषमो भगवान् स्यादित्याशङ्कानिरासार्थत्वेनोत्तरवाक्यं सङ्गमयन्नाह सर्वेषामिति। अनुरूपेण सेवानुसारेण सर्वेषां ज्ञानिनां त्रैविद्यानां चेति चतुर्थ्यर्थे षष्ठी।तथैव भजामि इत्येतदन्यथाप्रतीतिनिरासाय व्याचष्टे सेवयामीति।बहुलमेतन्निदर्शनम् इति वचनात्स्वार्थे णिच्।मम वर्त्म इत्यस्य सङ्गत्यप्रतीतेस्तामाह कथमिति। यः फलतारतम्यहेतुरयं ज्ञानिभ्यस्त्रैविद्यानां सेवायां विशेषः कथं किम्प्रकार इत्यर्थः। कथमनेनैतच्छङ्कापरिहारः इत्यतो व्याचष्टे अन्येति। न केवलं ज्ञानिनः किन्त्वन्यदेवता यजन्तोऽपि त्रैविद्या इति यावत्। किं तत्सर्वेषां त्वद्वर्त्मानुवर्तनं इत्यत आह सर्वेति। भोक्तृत्वाद्धविरादीनाम्। एतत् द्वयमेव भगवद्वर्त्मानुवर्तनम्। तथा व्यवहारे निमित्तत्वात्पञ्चमी। इदमुक्तं भवति। अहमेव सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रेरकश्च। तदेतज्ज्ञात्वा भागवता निष्कामा मामेव यजन्ते। त्रैविद्यास्त्वेतत्तत्त्वतोऽजानानाः कर्मणां सिद्धिं काङ्क्षन्तोऽन्यदेवता यजन्ते। एवं सेवाविशेषाद्युक्तं फलतारतम्यमिति। कुत इदं भगवतोऽभिप्रेतम् इत्यत आह येऽपीति। अनेन श्लोकद्वयमुपात्तम्। तत्र च स्पष्टमेषोऽर्थः प्रतीयते। नन्विन्द्रादिनामवद्भिर्मन्त्रैर्दत्तं हविरादिकं कथं भगवान् भुङ्क्ते भगवतः सर्वनामत्वेन मन्त्राणां तत्परत्वादिति भावेनाह य इति। ननु विश्वकर्मैवमुच्यत इत्यत आह भगवानेवेति। तत्र चेति सम्बन्धः। अनेन भगवतः सर्वयज्ञादिभोक्तृत्वे बाधकं परिहृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.11।।न च मद्भजनमात्रेण मुक्तिर्भवत्यन्यदेवतारूपेण तथापि सर्वेषामानुरूप्येण फलं ददामीत्याह येयथेति। सेवयामि फलदानेन न तु गुणभावेन। कथमयं विशेषः इत्यत आह मम वर्त्मेति। अन्यदेवता यजन्तोऽपि मम वर्त्मैवानुवर्तन्ते। सर्वकर्मकर्तृत्वात् भोक्तृत्वाच्च मम।येऽप्यन्यदेवताभक्ताः 9।23 इति वक्ष्यति। यो देवानां नामधा एक एव ऋक्सं.8।3।17।3 इति श्रुतिः। भगवानेव च तत्राभिधीयते। अजस्य नाभावध्येकमर्पितम् ऋक्सं.8।3।17।6 इति तल्लिङ्गात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.11। ये मत्समाश्रयणापेक्षा यथा येन प्रकारेण स्वापेक्षानुरूपं मां संकल्प्य प्रपद्यन्ते समाश्रयन्ते तान् प्रति तथैव तन्मनीषितप्रकारेण भजामि मां दर्शयामि। किमत्र बहुना सर्वे मनुष्या मदनुवर्तनैकमनोरथा मम वर्त्म मत्स्वभावं सर्वं योगिनां वाङ्मनसागोचरम् अपि स्वकीयैः चक्षुरादिकरणैः सर्वशः स्वापेक्षितैः सर्वप्रकारैः अनुभूय अनुवर्तन्ते।इदानीं प्रासङ्गिकं परिसमाप्य प्रकृतस्य कर्मयोगस्य ज्ञानाकारताप्रकारं वक्तुं तथाविधकर्मयोगाधिकारिणो दुर्लभत्वम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.11।। ये यथा येन प्रकारेण येन प्रयोजनेन यत्फलार्थितया मां प्रपद्यन्ते तान् तथैव तत्फलदानेन भजामि अनुगृह्णामि अहम् इत्येतत्। तेषां मोक्षं प्रति अनर्थित्वात्। न हि एकस्य मुमुक्षुत्वं फलार्थित्वं च युगपत् संभवति। अतः ये फलार्थिनः तान् फलप्रदानेन ये यथोक्तकारिणस्तु अफलार्थिनः मुमुक्षवश्च तान् ज्ञानप्रदानेन ये ज्ञानिनः संन्यासिनः मुमुक्षवश्च तान् मोक्षप्रदानेन तथा आर्तान् आर्तिहरणेन इत्येवं यथा प्रपद्यन्ते ये तान् तथैव भजामि इत्यर्थः। न पुनः रागद्वेषनिमित्तं मोहनिमित्तं वा कञ्चित् भजामि। सर्वथापि सर्वावस्थस्य मम ईश्वरस्य वर्त्म मार्गम् अनुवर्तन्ते मनुष्याः यत्फलार्थितया यस्मिन् कर्मणि अधिकृताः ये प्रयतन्ते ते मनुष्या अत्र उच्यन्ते हे पार्थ सर्वशः सर्वप्रकारैः।।यदि तव ईश्वरस्य रागादिदोषाभावात् सर्वप्राणिषु अनुजिघृक्षायां तुल्यायां सर्वफलप्रदानसमर्थे च त्वयि सति वासुदेवःसर्वम् इति ज्ञानेनैव मुमुक्षवः सन्तः कस्मात् त्वामेव सर्वे न प्रतिपद्यन्ते इति शृणु तत्र कारणम्

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【 Verse 4.12 】

▸ Sanskrit Sloka: काङ् क्षन्त: कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवता: | क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा ||

▸ Transliteration: kāṅkṣantaḥ karmaṇāṁ siddhiṁ yajanta iha devatāḥ | kṣipraṁ hi mānuṣe loke siddhirbhavati karmajā ||

▸ Glossary: kāṅkṣantaḥ: desiring; karmaṇāṁ: of activities; siddhiṁ: success; yajante: wor- ship; iha: in this world; devatāḥ: gods; kṣipraṁ: quickly; hi: for; mānuṣe loke: in human society; siddhiḥ bhavati: success comes; karmajā : born of action

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.12 Men in this world desire success from activities and therefore they worship the gods. Men get instant results from active work in this world.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.12।।कर्मोंकी सिद्धि (फल) चाहनेवाले मनुष्य देवताओंकी उपासना किया करते हैं क्योंकि इस मनुष्यलोकमें कर्मोंसे उत्पन्न होनेवाली सिद्धि जल्दी मिल जाती है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.12।। (सामान्य मनुष्य) यहाँ (इस लोक में) कर्मों के फल को चाहते हुये देवताओं को पूजते हैं क्योंकि मनुष्य लोक में कर्मों के फल शीघ्र ही प्राप्त होते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.12 काङ्क्षन्तः those who long for? कर्मणाम् of actions? सिद्धिम् success? यजन्ते sacrifice? इह in this world? देवताः gods? क्षिप्रम् ickly? हि because? मानुषे in the human? लोके (in the) world? सिद्धिः success? भवति is attained? कर्मजा born of action.Commentary It is very difficult to attain to the knowledge of the Self or Selfrealisation. It demans perfect renunciation. The aspirnat should possess the four means and many other virtues? and practise constant and intense meditaion. But worldly success can be attained ickly and easily.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.12. Those, who are desirous of success of their actions, perform sacrifices intending the deities. For, the success born of [ritualistic] actions is ick in the world of men.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.12 Those who look for success, worship the Powers; and in this world their actions bear immediate fruit.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.12 Those who desire the fruits of their ritualistic acts, sacrifice to the gods here; for, success born of such acts ickly accrues in the world of men.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.12 Longing for the fruition of actions (of their rites and duties), they worship the gods here. For, in the human world, success from action comes ickly.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.12 Those who long for success in action in this world sacrifice to the gods; because success is ickly attained by men through action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.11-12 Ye yatha etc. and Kanksantah etc. Different persons with differents forms in their mind take refuge in Me. Assuming the same [respective] forms for them I favour the. Only in this manner, those who are full of Me and those who are not so-all just follow my Path. For [even the performance of sacrifices] Jyotistoma and so on, is not a different path; that is also My own will of that nature. Indeed it is going to be declared [by the Lord] as 'the four-fold caste-structure has been created by Me'.

Some one says : The Present Tense (anuvarttante) is in the sense of Potential. Just as in the sentence 'They take hold of the group of sixteen in the Atiratra [sacrifce]', the expression 'They take hold of' means 'They should take hold of' in the same way in the present sentence too 'they follow', means 'they should follow'.

The success [of the action] viz., the enjoyment and emancipation is [achieved] here alone in this word of men and not anywhere else.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.12 All men, desirous of the fruits of their actions, 'sacrifice', i.e., worship or propitiate Indra and other divinities only. But nobody worships Me abandoning attachment to fruits - Me, who am the Self of Indra and other divinities and the real enjoyer of all sacrifices. Why is this so? Because in this world of men, fruits in the form of sons, cattle, food etc., follow soon from their performance of such sacrificial rites. The phrase, 'the world of men' implies heaven etc., also. Because the unending accumulation of evil heaped up from beginningless time has not been exhausted, all those worldly people lack discernment. Therefore they want rapid results and perform those rituals which consist of the worship of Indra and other divinities for the sake of sons, cattle, food etc., and for the sake of heaven etc. But none with his mind anguished by Samsara and aspiring for final release, practises Karma Yoga of the kind described above. Real Karma Yoga is My worship.

Sri Krsna now speaks of the cause which annuls the evil obstructing the starting of Karma Yoga.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.12 Kanksantah, longing for, praying for; siddim, fruition, fructification of the results; karmanam, of actions; yajante, they worship; iha, here, in this world; devatah, the gods, Indra, Fire and others- which accords with the Upanisadic text, 'While he who worships another god thinking, "He is one, and I am another," does not know. He is like an animal to the gods' (Br. 1.4.10). [This text points out that the reason for adoring other deties is the ignorance of the Self, which gives rise to the ideas of difference between the worshipped and the worshipper. As animals are beneficial to human beings, so also is the sacrificer to the gods, because through oblations he works for their pleasure!] Hi, for, in the case of those, indeed, who sacrifice to other gods and long for results; (siddhih, success; karmaja, from action;) bhavati, comes; ksiparm, ickly; manuse-loke, in the human world, because the authority of the scriptures extends only over the human world. By the specific statement, 'For, in the human world, success comes ickly,' the Lord shows that results of actions can accrue even in the other worlds. The difference lies in this that, in the human world eligibility for [Ast. and A.A. omit 'adhikara, elegibility for', and read karmani.-Tr.] actions is according to castes, stages of life, etc. The fruition of the results of those actions of persons who are eligible according to castes, stages of life, etc. comes ickly. What is the reason for the rule that the competence for rites and duties according to castes, stages of life, etc. obtains only in the human world, but not in the other worlds? Or:-It has been said, 'Human beings, having such divisions as castes, stages of life, etc., follow My path in every way.' For what reason, again, do they as a rule follow Your path alone, but not of others?

This is being answered:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.12।। सुकर्म अथवा दुष्कर्म करने के लिये आत्म चैतन्य अथवा ईश्वर की शक्ति की समान रूप से आवश्यकता है और वह उपलब्ध भी है। परन्तु मन की प्रवृत्ति बहिर्मुखी ही बनी रहने के कारण है इन्द्रियों का विषयों के साथ सम्पर्क होने पर निम्न स्तर के सुख की संवेदनाओं में उसकी आसक्ति। इस प्रकार के सुख सरलता से प्राप्त भी हो जाते हैं।अनेक प्रयत्नों के बावजूद हम वैषयिक सुख में ही रमते हैं जिसका कारण भगवान् बताते हैं मनुष्य लोक में कर्म की सिद्धि शीघ्र ही होती है।इस जगत् में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाना सामान्य मनुष्य के लिये सरल प्रतीत होता है। वह सुख निकृष्ट होने पर भी बिना किसी प्रतिरोध के मिलता है और इस कारण सुख शान्ति की इच्छा करने वाला पुरुष अपनी आध्यात्मिक शक्ति को व्यर्थ ही इन वस्तुओं की प्राप्ति और भोग करने में खो देता है। इस कथन के सत्यत्व का हम सबको अनुभव है।उपर्युक्त विवरण का सम्बन्ध केवल लौकिक सामान्य भोगों में ही सीमित नहीं वरन् हमारी अन्य उपलब्धियों से भी है। वनस्पति एवं पशु जगत् की अपेक्षा हम सुनियोजित कर्मों के द्वारा प्रकृति को अपने लिये अधिक सुख प्रदान करने को बाध्य कर सकते हैं।जीवन के उत्कृष्ट एवं निकृष्ट मार्गों का अनुसरण करने वाले लोगों को हम उनकी अन्तर्मुखी और बहिर्मुखी प्रवृत्तियों के आधार पर विभाजित कर सकते हैं इन बहिर्मुखी लोगों का फिर चार प्रकार से वर्गीकरण किया जा सकता है जिसका आधार है उनके विचार (गुण) और कर्म।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.12।।ननु वासुदेवः सर्वमिति ज्ञानार्थं सर्वे त्वामेव कुतो नानुवर्तन्त इत्याशङ्क्य मम वर्त्मेत्यादिविवृण्वन् तत्र कारणमाह। काङ्क्षन्तः प्रार्थयन्तः इहास्िमँल्लोके इन्द्राग्नयादयः देवता यजन्ते। हि यस्मान्मानुषे लोके काम्यकर्मजा सिद्धिः फलं क्षिप्रं शीघ्रं भवति। क्षिप्रं मानुषे लोके इति विशेषणादन्येष्वपि कर्मफलसिद्धिं दर्शयति भगवान्। मानुषे लोके वर्णाश्रमादिकर्माणीति विशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.12।।ननु त्वामेव भगवन्तं वासुदेवं किमिति सर्वे न प्रपद्यन्त इति तत्राह कर्मणां सिद्धिं फलनिष्पत्तिं काङ्क्षन्त इह लोके देवताः देवानिन्द्राग्न्याद्यान्यजन्ते पूजयन्ति अज्ञानप्रतिहतत्वान्नतु निष्कामाः सन्तो मां भगवन्तं वासुदेवमिति शेषः। कस्मात्। हि यस्मात् इन्द्रादिदेवतायाजिनां तत्फलकाङ्क्षिणां कर्मजा सिद्धिः कर्मजन्यं फलं क्षिप्रं शीघ्रमेव भवति मानुषे लोके। ज्ञानफलं त्वन्तःकरणशुद्धिसापेक्षत्वान्न क्षिप्रं प्रभवति। मानुषे लोके कर्मफलं शीघ्रं भवतीति विशेषणादन्यलोकेऽपि वर्णाश्रमधर्मव्यतिरिक्तिकर्मफलसिद्धिर्भगवता सूचिता। यतस्तत्तत्क्षुद्रफलसिद्ध्यर्थं सकामा मोक्षविमुखाः अन्या देवता यजन्तेऽतो न मुमुक्षव इव मां वासुदेवं साक्षात्ते प्रपद्यन्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.12।।काङ्क्षन्त इति। हि यस्मात् मानुषे लोके कर्मसिद्धिः काम्यकर्मफलं पुत्रपश्वादिकं क्षिप्रं भवति न तु निष्कामकर्मजा चित्तशुद्धिः। अतो ये कर्मणां सिद्धिं फलं इहैव क्षिप्रं काङ्क्षन्तः काङ्क्षमाणा देवता इन्द्रादीन्यजन्ते तेऽपि ममैव वर्त्मानुवर्तन्त इति पूर्वेणान्वयः। वक्ष्यति चयेप्यन्यदेवताभक्ताः इत्यादि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.12।।नन्वेवं चेत्तदा कथं न सर्वे त्वामेव सेवन्ते इत्याशङ्क्याहुः काङ्क्षन्त इति। इह अस्मिन्नेव जन्मनि सिद्धिं काङ्क्षन्तो ये वाञ्छन्ति तादृशाः सन्तः कर्मणां देवताः कर्माधिष्ठातार इन्द्रादयस्तान् यजन्ते। यतः क्षिप्रं शीघ्रं मानुषे लोके अस्मिन्नेव जन्मनि कर्मजा सिद्धिर्भवति न मत्प्राप्तिः। हीति युक्तत्वाय। तथा चायमर्थः पुरुषोत्तमसम्बन्धो न लौकिकदेहप्राप्यः किन्त्वलौकिकस्वरूपप्राप्यः। तत्स्वरूपं च लौकिकदेहेन सेवायां क्रियमाणायां प्रेमोत्पत्त्या परीक्षासिद्ध्यनन्तरं तापे जाते तदनुभवार्थत्यागानन्तरमेतद्देहनिवृत्त्यनन्तरं भवति। तत्रापि परीक्षासिद्धौ परमतापे सति तदनुभवः स्यात्। सोऽपि क्लेशानन्दानुभवात्मकः। एतत्सर्वं व्रजे प्रसिद्धं कालीय अन्तर्गतभगवदन्तर्धानपुनःप्राकट्यरमणवनगमन श्रीमदुद्धवप्रसङ्गादिभिः। अन्यदेवानां तु जीववदंशरूपत्वादत्रैव मनुष्यलोके शीघ्रं तदर्थकृतकर्मसिद्धिर्भवति। अतोऽत्रैव शीघ्रं फलाभिलाषिणस्तत्र प्रवर्तन्ते न मद्भजने तत्र प्रवृत्तौ तेषां तत्सिद्धिर्भवति। देवानां मत्स्वरूपत्वादत्रैव लौकिकदेहेन लौकिकफलसिद्धिर्युक्तैवेति ज्ञापनाय हीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.12।।तर्हि मोक्षार्थमेव किमिति सर्वे त्वां न भजन्तीत्यत आह काङ्क्षन्त इति। कर्मणां सिद्धिं फलं काङ्क्षन्तः प्रायशः इह मनुष्यलोके इन्द्रादिदेवता एव यजन्ते नतु साक्षान्मामेव। हि यस्मात्कर्मजा सिद्धिः कर्मजं फलं शीघ्रं भवति नतु ज्ञानफलं कैवल्यम्। दुष्प्राप्यत्वाज्ज्ञानस्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.12।।ननु देवान्तरभजनमन्ये कुर्वन्ति इह किं इति तत्राह काङ्क्षन्त इति। हि यतः देवान्तरभजनेन कृत्वा शीघ्रं मानुषे लोके सिद्धिः फलं प्राकृतं कर्मजं भवति अतो देवता इन्द्रादीन् यजन्ते भगवन्तं न मां क्षिप्रं फलदातृत्वाभावनिश्चयात् निरुपाधिकस्यौपाधिककामितदाने विचारस्तत्पूर्वकपरीक्षा शोधनेन च विलम्बसम्भवात् तथाभावेन दातृत्वादित्यवगम्य क्षिप्रफलदानौपाधिकान्देवान्यजन्त इत्युक्तम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.12।।यदि रागादि दोषोंका अभाव होनेके कारण सभी प्राणियोंपर आप ईश्वरकी दया समान है एवं आप सब फल देनेमें समर्थ भी हैं तो फिर सभी मनुष्य मुमुक्षु होकर यह सारा विश्व वासुदेवरूप है इस प्रकारके ज्ञानसे केवल आपको ही क्यों नहीं भजते इसका कारण सुन कर्मोंकी सिद्धि चाहनेवाले अर्थात् फलप्राप्तिकी कामना करनेवाले मनुष्य इस लोकमें इन्द्र अग्नि आदि देवोंकी पूजा किया करते हैं। श्रुतिमें कहा है कि जो अन्य देवताकी इस भावसे उपासना करता है कि वह ( देवता ) दूसरा है और मैं ( उपासक ) दूसरा हूँ वह कुछ नहीं जानता जैसे पशु होता है वैसे ही वह देवताओंका पशु है। ऐसे उन भिन्नरूपसे देवताओंका पूजन करनेवाले फलेच्छुक मनुष्योंकी इस मनुष्यलोकमें ( कर्मसे उत्पन्न हुई ) सिद्धि शीघ्र ही हो जाती है क्योंकि मनुष्यलोकमें शास्त्रका अधिकार है ( यह विशेषता है )। क्षिप्रं हि मानुषे लोके इस वाक्यमें क्षिप्र विशेषणसे भगवान् अन्य लोकोंमें भी कर्मफलकी सिद्धि दिखलाते हैं। पर मनुष्यलोकमें वर्णआश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है यह विशेषता है। उन वर्णाश्रम आदिमें अधिकार रखनेवालोंके कर्मोंकी कर्मजनित फलसिद्धि शीघ्र होती है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.12।। व्याख्या   काङ्क्षन्तः कर्मणां सिद्धिं यजन्त इह देवताः मनुष्यको नवीन कर्म करनेका अधिकार मिला हुआ है। कर्म करनेसे ही सिद्धि होती है ऐसा प्रत्यक्ष देखनेमें आता है। इस कारण मनुष्यके अन्तःकरणमें यह बात दृढ़तासे बैठी हुई है कि कर्म किये बिना कोई भी वस्तु नहीं मिलती। वे ऐसा समझते हैं कि सांसारिक वस्तुओंकी तरह भगवान्की प्राप्ति भी कर्म (तप ध्यान समाधि आदि) करनेसे ही होती है। नाशवान् पदार्थोंकी कामनाओंके कारण उनकी दृष्टि इस वास्तविकताकी ओर जाती ही नहीं कि सांसारिक वस्तुएँ कर्मजन्य हैं एकदेशीय हैं हमें नित्य प्राप्त नहीं हैं हमारेसे अलग हैं और परिवर्तनशील हैं इसलिये उनकी प्राप्तिके लिये कर्म करने आवश्यक हैं। परन्तु भगवान् कर्मजन्य नहीं हैं सर्वत्र परिपूर्ण हैं हमें नित्यप्राप्त हैं हमारेसे अलग नहीं हैं और अपरिवर्तनशील हैं इसलिये भगवत्प्राप्तिमें सांसारिक वस्तुओंकी प्राप्तिका नियम नहीं चल सकता। भगवत्प्राप्ति केवल उत्कट अभिलाषासे होती है। उत्कट अभिलाषा जाग्रत् न होनेमें खास कारण सांसारिक भोगोंकी कामना ही है।भगवान् तो पिताके समान हैं और देवता दूकानदारके समान। अगर दूकानदार वस्तु न दे तो उसको पैसे लेनेका अधिकार नहीं है परन्तु पिताको पैसे लेनेका भी अधिकार है और वस्तु देनेका भी। बालकको पितासे कोई वस्तु लेनेके लिये कोई मूल्य नहीं देना पड़ता पर दूकानदारसे वस्तु लेनेके लिये मूल्य देना पड़ता है। ऐसे ही भगवान्से कुछ लेनेके लिये कोई मूल्य देनेकी जरूरत नहीं है परन्तु देवताओंसे कुछ प्राप्त करनेके लिये विधिपूर्वक कर्म करने पड़ते हैं। दूकानदारसे बालक दियासलाई चाकू आदि हानिकारक वस्तुएँ भी पैसे देकर खरीद सकता है परन्तु यदि वह पितासे ऐसी हानिकारक वस्तुएँ माँगे तो वे उसे नहीं देंगे और पैसे भी ले लेंगे। पिता वही वस्तु देते हैं जिसमें बालकका हित हो। इसी प्रकार देवतालोग अपने उपासकोंको (उनकी उपासना साङ्गोपाङ्ग होनेपर) उनके हितअहितका विचार किये बिना उनकी इच्छित वस्तुएँ दे देते हैं परन्तु परमपिता भगवान् अपने भक्तोंको अपनी इच्छासे वे ही वस्तुएँ देते हैं जिसमें उनका परमहित हो। ऐसे होनेपर भी नाशवान् पदार्थोंकी आसक्ति ममता और कामनाके कारण अल्पबुद्धिवाले मनुष्य भगवान्की महत्ता और सुहृत्ताको नहीं जानते इसलिये वे अज्ञानवश देवताओंकी उपासना करते हैं (गीता 7। 20 23 9। 23 24)।क्षिप्रं हि मानुषे लोके सिद्धिर्भवति कर्मजा यह मनुष्यलोक कर्मभूमि है कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके (गीता 15। 2)। इसके सिवाय दूसरे लोक (स्वर्गनरकादि) भोगभूमियाँ हैं। मनुष्यलोकमें भी नया कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है पशुपक्षी आदिको नहीं। मनुष्यशरीरमें किये हुए कर्मोंका फल ही लोक तथा परलोकमें भोगा जाता है।मनुष्यलोकमें कर्मोंकी आसक्तिवाले मनुष्य रहते हैं कर्मसङ्गिषु जायते (गीता 14। 15)। कर्मोंकी आसक्तिके कारण वे कर्मजन्य सिद्धिपर ही लुब्ध होते हैं। कर्मोंसे जो सिद्धि होती है वह यद्यपि शीघ्र मिल जाती है तथापि वह सदा रहनेवाली नहीं होती। जब कर्मोंका आदि और अन्त होता है तब उनसे होनेवाली सिद्धि (फल) सदा कैसे रह सकती है इसलिये नाशवान् कर्मोंका फल भी नाशवान् ही होता है। परन्तु कामनावाले मनुष्यकी दृष्टि शीघ्र मिलनेवाले फलपर तो जाती है पर उसके नाशकी ओर नहीं जाती। विधिपूर्वक साङ्गोपाङ्ग किये गये कर्मोंका फल देवताओंसे शीघ्र मिल जाया करता है इसलिये वे देवताओंकी ही शरण लेते हैं और उन्हींकी आराधना करते हैं। कर्मजन्य फल चाहनेके कारण वे कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं होते और परिणामस्वरूप बारंबार जन्मतेमरते रहते हैं। जो वास्तविक सिद्धि है वह कर्मजन्य नहीं है। वास्तविक सिद्धि भगवत्प्राप्ति है। भगवत्प्राप्तिके साधन कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग भी कर्मजन्य नहीं हैं। योगकी सिद्धि कर्मोंके द्वारा नहीं होती प्रत्युत कर्मोंके सम्बन्धविच्छेदसे होती है। शङ्का   कर्मयोग की सिद्धि तो कर्म करनेसे ही बतायी गयी है आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते (गीता 6। 3) तो फिर कर्मयोग कर्मजन्य कैसे नहीं है  समाधान   कर्मयोगमें कर्मोंसे और कर्मसामग्रीसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये ही कर्म किये जाते हैं। योग (परमात्माका नित्यसम्बन्ध) तो स्वतःसिद्ध और स्वाभाविक है। अतः योग अथवा परमात्मप्राप्ति कर्मजन्य नहीं है। वास्तवमें कर्म सत्य नहीं है प्रत्युत परमात्मप्राप्तिके साधनरूप कर्मोंका विधान सत्य है। कोई भी कर्म जब सत्के लिये किया जाता है तब उसका परिणाम सत् होनेसे उस कर्मका नाम भी सत् हो जाता है कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते (गीता 17। 27)।अपने लिये कर्म करनेसे ही योग(परमात्माके साथ नित्ययोग) का अनुभव नहीं होता। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म किये जाते हैं अपने लिये अर्थात् फलप्राप्तिके लिये नहीं कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन (गीता 2। 47)। अपने लिये कर्म करनेसे मनुष्य बँधता है (गीता 3। 9) और दूसरोंके लिये कर्म करनेसे वह मुक्त होता है (गीता 4। 23)। कर्मयोगमें दूसरोंके लिये ही सब कर्म करनेसे कर्म और फलसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है जो योग का अनुभव करानेमें हेतु है।कर्म करनेमें पर अर्थात् शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ व्यक्ति देश काल आदि परिवर्तनशीलवस्तुओंकी सहायता लेनी पड़ती है। पर की सहायता लेना परतन्त्रता है। स्वरूप ज्योंकात्यों है। उसमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। इसलिये उसकी अनुभूतिमें पर कहे जानेवाले शरीरादि पदार्थोंके सहयोगकी लेशमात्र भी अपेक्षा आवश्यकता नहीं है। पर से माने हुए सम्बन्धका त्याग होनेसे स्वरूपमें स्वतःसिद्ध स्थितिका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   आठवें श्लोकमें अपने अवतारके उद्देश्यका वर्णन करके नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको जाननेका माहात्म्य बताया। कर्मजन्य सिद्धि चाहनेसे ही कर्मोंमें अदिव्यता (मलिनता) आती है। अतः कर्मोंमें दिव्यता (पवित्रता) कैसे आती है इसे बतानेके लिये अब भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका विशेष वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.11 4.12।।यतः ये यथेति। कांक्षन्त इति। ये यथैव (S K ययैव) बुद्ध्या मामाश्रयन्ते तान् प्रति तदेव स्वरूपमहं गृह्णन् ताननुगृह्णामि। एवमेव मदीयं मार्गं मन्मया

Chapter 4 (Part 8)

अमन्मयाश्च सर्व एवानुवर्तन्ते। न हि ज्योतिष्टोमादिरन्यो मार्गः मदीयैव सा तथेच्छा। वक्ष्यते हि चातुर्वर्ण्य मया सृष्टमिति।अन्यस्तु आह लिङ्गर्थे लट् यथा अतिरात्रे षोडशिनं गृह्णन्ति इत्यत्र (S omits इत्यत्र) गृह्णीयु इत्यर्थः एवमिहापि अनुवर्तन्ते (N omits अनुवर्तन्ते) अनुवर्तेरन् इति।मानुषे एव लोके भोगापवर्गलक्षणा सिद्धिः नान्यत्रेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.12।।अनुग्राह्याणां ज्ञानकर्मानुरोधेन भगवता तेष्वनुग्रहविधानात्तस्य रागद्वेषौ यदि न भवतस्तर्हि तस्य रागाद्यभावादेव सर्वेषु प्राणिष्वनुग्रहेच्छा तुल्या प्राप्ता नच तस्यां सत्यामेव फलस्याल्पीयसः संपादने सामर्थ्यं नतु भगवतो महतो मोक्षाख्यस्य फलस्य प्रदानेऽशक्तिरिति युक्तमप्रतिहतज्ञानेच्छाक्रियाशक्तिमतस्तव सर्वफलप्रदानसामर्थ्यात् तथाच यथोक्तानुजिघृक्षायां सत्यां त्वयि च यथोक्तसामर्थ्यवति सति सर्वे फल्गुफलादभ्युदयाद्विमुखा मोक्षमेवापेक्षमाणा ज्ञानेन त्वामेव किमिति न प्रतिपद्येरन्निति चोदयति यदीति। मोक्षापेक्षाभावात्तदुपायभूतज्ञानादपि वैमुख्याद्भगवत्प्राप्त्यभावे हेतुमभिदधानः समाधत्ते शृण्विति। कर्मफलसिद्धिमिच्छता किमिति मानुषे लोके देवतापूजनमिष्यते तत्राह क्षिप्रं हीति। कर्मफलसंपत्त्यर्थिनां यष्टृयष्टव्यविभागदर्शिनां तद्दर्शने कारणमात्मज्ञानमित्यत्र बृहदारण्यकश्रुतिमुदाहरति अथेति। अविद्याप्रकरणोपक्रमार्थमथेत्युक्तम्। उपासनं भेददर्शनमित्यनूद्य कारणमात्माज्ञानं न तत्रेति दर्शयति नेति। यथास्मदादीनां हलवहनादिना पशुरुपकरोत्येवमज्ञो देवादीनां यागादिभिरुपकरोतीत्याह यथेति। किमिति ते फलाकाङ्क्षिणो भिन्नदेवतायाजिनो ज्ञानमार्गं नापेक्षन्ते तत्रोत्तरार्धमुत्तरत्वेन योजयति तेषामित्यादिना। यस्माद्यथोक्तानामधिकारिणां कर्मप्रयुक्तं फलं लोकविशेषे झटिति सिध्यति तस्मात्तेषां मोक्षमार्गादस्ति वैमुख्यमित्यर्थः। मानुषलोकविशेषणं किमर्थमित्याशङ्क्याह मनुष्यलोके हीति। लोकान्तरेषु तर्हि कर्मफलसिद्धिर्नास्तीत्याशङ्क्य क्षिप्रविशेषणस्य तात्पर्यमाह क्षिप्रमिति। क्वचित्कर्मफलसिद्धिरविलम्बेन भवत्यन्यत्र तु विलम्बेनेति विभागे को हेतुरित्याशङ्क्य सामग्रीभावाभावाभ्यामित्याह मानुष इति। मनुष्यलोके कर्मफलसिद्धेः शैघ्र्यात्तदभिमुखानां ज्ञानमार्गवैमुख्यं प्रायिकमित्युपसंहरति तेषामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.12।।साधकं तु प्रमाणं पृच्छति कुत इति।मम वर्त्मानुवर्तन्ते 4।11 इति यत्सर्वयज्ञादिभोक्तृत्वमुक्तम् तत्कुतः प्रमाणाज्ज्ञायते इत्यर्थः। सर्वकर्तृत्वं तु जीवानामस्वातन्त्र्यदर्शनात्सिद्धम्। इत्यत आहेति शेषः। हीत्यतः परमितिशब्दश्च। किमनेन प्रमाणमुक्तं इत्यत आह अत एव हीति। कर्मजा सिद्धिः फलप्राप्तिस्तावत् क्षिप्रं प्रत्यक्षोपलभ्याऽस्ति। सा चात एव कर्मणां भगवता भुक्तत्वादेव हि युज्यते नान्यथेत्यर्थः। इन्द्रादिभ्योऽपि फलप्राप्त्युपपत्तेरुपक्षीणार्थापत्तिरित्यतश्चाह अत एव हीति भगवत एव। अत्र हीति सूचितं प्रमाणमाह तस्मादिति। धनसनयो धनलाभवन्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.12।।कुतो मम वर्त्मानुवर्तन्ते क्षिप्रं हि अत एव हि फलप्राप्तिः। तस्मात्ते धनसनयः छां.उ.1।7।6 इति श्रुतिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.12।।सर्व एव पुरुषाः कर्मणां फलं काङ्क्षमाणा इन्द्रादिदेवता यथाशास्त्रं यजन्ते आराधयन्ति। न तु कश्चिद् अनभिसंहितफल इन्द्रादिदेवतात्मभूतं सर्वयज्ञानां भोक्तारं मां यजते। कुत एतत् यतः क्षिप्रम् अस्मिन् एव मानुषे लोके कर्मजा पुत्रपश्वन्नाद्या सिद्धिः भवति। मनुष्यलोकशब्दः स्वर्गादिलोकप्रदर्शनार्थः।सर्व एव हि लौकिकाः पुरुषा अक्षीणानादिकालप्रवृत्तानन्तपापसंचयतया अविवेकिनः क्षिप्रफलाभिकाङ्क्षिणः पुत्रपश्वन्नादिस्वर्गाद्यर्थतया सर्वाणि कर्माणि इन्द्रादिदेवताराधनमात्राणि कुर्वते न तु कश्चित् संसारोद्विग्नहृदयो मुमुक्षुः उक्तलक्षणं कर्मयोगं मदाराधनभूतम् आरभते इत्यर्थः।यथोक्तकर्मयोगारम्भविरोधिपापक्षयहेतुम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.12।। काङ्क्षन्तः अभीप्सन्तः कर्मणां सिद्धिं फलनिष्पत्तिं प्रार्थयन्तः यजन्ते इह अस्मिन् लोके देवताः इन्द्राग्न्याद्याः अथ योऽन्यां देवतामुपास्ते अन्योऽसावन्योऽहमस्मीति न स वेद यथा पशुरेवं स देवानाम् (बृ0 उ0 1.4.10) इति श्रुतेः। तेषां हि भिन्नदेवतायाजिनां फलाकाङ्क्षिणां क्षिप्रं शीघ्रं हि यस्मात् मानुषे लोके मनुष्यलोके हि शास्त्राधिकारः। क्षिप्रं हि मानुषे लोके इति विशेषणात् अन्येष्वपि कर्मफलसिद्धिं दर्शयति भगवान्। मानुषे लोके वर्णाश्रमादिकर्माणि इति विशेषः तेषां च वर्णाश्रमाद्यधिकारिकर्मणां फलसिद्धिः क्षिप्रं भवति। कर्मजा कर्मणो जाता।।मानुषे एव लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकारः न अन्येषु लोकेषु इति नियमः किंनिमित्त इति अथवा वर्णाश्रमादिप्रविभागोपेताः मनुष्याः मम वर्त्म अनुवर्तन्ते सर्वशः इत्युक्तम्। कस्मात्पुनः कारणात् नियमेन तवैव वर्त्म अनुवर्तन्ते न अन्यस्य इति उच्यते

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【 Verse 4.13 】

▸ Sanskrit Sloka: चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागश: | तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् ||

▸ Transliteration: cāturvarṇyaṁ mayā sṛṣṭaṁ guṇakarma vibhāgaśaḥ | tasya kartāram api māṁ viddhyakartāramavyayam ||

▸ Glossary: cāturvarṇyaṁ: the four divisions of human society; mayā: by Me; sṛṣṭaṁ: created; guṇa: attribute; karma: work; vibhāgaśaḥ: in terms of division; tasya: of that; kartāraṁ: doer; api: although; māṁ: Me; viddhi: know; akartāraṁ: as the non-doer; avyayaṁ: immortal

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.13 Depending upon the distribution of the three attributes or guṇas and action, I have created the four castes. Yet, I am to be known as the non-doer, the unchangeable.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.13 4.14।।मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस(सृष्टिरचना आदि) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.13।। गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्वण्य मेरे द्वारा रचा गया है। यद्यपि मैं उसका कर्ता हूँ तथापि तुम मुझे अकर्ता और अविनाशी जानो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.13 चातुर्वर्ण्यम् the fourfold caste? मया be Me? सृष्टम् has been created? गुणकर्मविभागशः according to the differentiation of Guna and Karma? तस्य thereof? कर्तारम् the author? अपि also? माम् Me? विद्धि know? अकर्तारम् nondoer? अव्ययम् immutable.Commentary The four castes (Brahmana? Kshatriya? Vaishya and Sudra) are classified according to the differentiation of Guna and Karma. In a Brahmana? Sattva predominates. He possesses selfrestraint? purity? serenity? straightforwardness? devotion? etc. In a Kshatriya? Rajs predominates. He possesses prowess? splendour? firmness? dexterity? generosity and the nature of a ruler. In a Vaishya? Rajas predominates and Tamas is subordinate to Rajas. He does the duty of ploughing? protection of cattle and trade. In a Sudra Tamas predominates and Rajas is subordinate to Tamas. He does service to the other three castes. Human temperaments and tendencies vary according to the Gunas.Though the Lord is the author of the caste system? yet He is not the author as He is the nondoer. He is not subject to Samsara. Really Maya does everything. Maya is the real author. Society can exist in a flourishing state if the four castes do their duties properly. Otherwise there will be chaos? rupture and fighting. (Cf.XVIII.41).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.13. The four-fold caste-structure has been created by Me, according to the division of [their respective] alities and actions. Though I am the creator of this, know Me as a changeless non-creator.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.13 The four divisions of society (the wise, the soldier, the merchant, the labourer) were created by Me, according to the natural distribution of Qualities and instincts. I am the author of them, though I Myself do no action, and am changeless.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.13 The system of four stations was created by Me according to distinction of Gunas and Karma. Though I am their creator, know Me as non-agent and immutable.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.13 The four castes have been created by Me through a classification of the gunas and duties. Even though I am the agent of that (act of classification), still know Me to be a non-agent and changeless.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.13 The fourfold caste has been created by Me according to the differentiation of Guna and Karma; though I am the author thereof know Me as non-doer and immutable.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.13 See Comment under 4.14

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.13 The whole universe beginning with Brahma and ending with a cluster of grass, with the system of four stations divided according to Sattva and other Gunas and by actions like self-control corresponding to the Gunas, was created by Me. The mention of 'creation' is for illustration. The universe is protected by Me alone and is withdrawn by Me alone. Know Me to be the creator of his manifold actions of creation etc., but at the same time to be non-agent.

Sri Krsna explains here how this is possible.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.13 Catur-varnyam-meaning the same as catvarah varnah, the four castes; srstam, have been created; maya, by Me who am God, which accords with such Vedic texts as, 'The Brahmanas were His face৷৷.' (Rg. 10.90.12); guna-karma-vibhagasah, through a classification of the gunas and duties. [A.G. writes: guna-vibhagena karma-vibhagah, classification of the duties, determined by the classification of the gunas.-Tr] By the gunas are meant sattva, rajas and tamas (see note under 2.45; also see Chapter 14). As to that, the control of the mind and body, austerity, etc. are the duties of the Brahmanas, who are sattvika, i.e. have a predominance of the ality of sattva (purity, goodness, etc.). Courage, valour, etc. are the duties of the Ksatriyas, in whom sattva becomes secondary and rajas (passion, attachment, etc.) preponderates. Agriculture etc. are the duties of the Vaisya, in whom tamas (indolence, ignorance, etc.) is secondary and rajas is predominant. Service is the only duty of the Sudra, in whom rajas is secondary and tamas predominates (see chapters 14, 16,17 and 18). In this way, the four castes have been created by Me through a classification of the gunas and duties. This is the idea. And these four castes do not prevail in the other worlds. Hence the specification, 'in the human world'. 'Well, in that caste, by virtues of Your being he agent of the acts of creation of the four castes,etc. You become subject tothe conseence of those actions? Therefore you are not eternally free and the eternal Lord!' This is being answered: Api, even though; I am kartaram, the agent; tasya, of that act, from the empirical standpoint of maya; still, from the highest standpoint, viddhi, know; mam, Me; to be akartaram, a non-agent; and therefore, also know Me to be avyayam, changeless, not subject to the cycle of births and deaths. 'In reality, however, I am not the agent of those actions of which you think I am the agent.' Because

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.13।। कुछ काल से इस श्लोक का अत्यन्त दुरुपयोग करके इसे विवादास्पद विषय बना दिया गया है। वर्ण शब्द का अर्थ है रंग। योगशास्त्र में प्रकृति के तीन गुणों सत्त्व रज और तम को तीन रंगों से सूचित किया जाता है। जैसाकि पहले बता चुके हैं इन तीन गुणों का अर्थ है मनुष्य के विभिन्न प्रकार के स्वभाव। सत्त्व रज और तम का संकेत क्रमश श्वेत रक्त और कृष्ण वर्णों से किया जाता है। मनुष्य अपने मन में उठने वाले विचारों के अनुरूप ही होता है। दो व्यक्तियों के विचारों में कुछ साम्य होने पर भी दोनों के स्वभाव में सूक्ष्म अन्तर देखा जा सकता है।इन स्वभावों की भिन्नता के आधार पर अध्यात्म की दृष्टि से अध्ययन करने के लिए मनुष्यों का चार भागों में वर्गीकरण किया जाता है इसको ही वर्ण कहते हैं। जैसे किसी बड़े नगर अथवा राज्य में व्यवसाय की दृष्टि से लोगों का वर्गीकरण चिकित्सक वकील प्राध्यापक व्यापारी राजनीतिज्ञ ताँगा चालक आदि के रूप में करते हैं उसी प्रकार विचारों के भेद के आधार पर प्राचीन काल में मनुष्यों को वर्गीकृत किया जाता था। किसी राज्य के लिये चिकित्सक और तांगा चालक उतने ही महत्व के हैं जितने कि वकील और यान्त्रिक। इसी प्रकार स्वस्थ सामाजिक जीवन के लिये भी इन चारों वर्णों अथवा जातियों को आपस में प्रतियोगी बनकर नहीं वरन् परस्पर सहयोगी बनकर रहना चाहिये। एक वर्ण दूसरे का पूरक होने के कारण आपस में द्वेषजन्य प्रतियोगिता का कोई प्रश्न ही नहीं होना चाहिये।तदोपरान्त भारत में मध्य युग की सत्ता लोलुपता के कारण साम्प्रदायिकता की भावना उभरने लगी जिसने आज अत्यन्य कुरूप और भयंकर रूप धारण कर लिया है। उस काल में शास्त्रीय विषयों में सामान्य जनों के अज्ञान का लाभ उठाते हुए अर्धपण्डितों ने शास्त्रों के कुछ अंशों को बिना किसी सन्दर्भ के उद्घृत करते हुए अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना प्रारम्भ कर दिया।हिन्दुओं के पतनोन्मुखी काल में ब्राह्मण वर्ग को इस श्लोक की प्रथम पंक्ति का अर्ध भाग अत्यन्त अनुकूल लगा और वे इसे दोहराने लगे मैंने चातुर्र्वण्य की रचना की। इसका उदाहरण देदेकर समाज के वर्तमान दुर्भाग्यपूर्ण विभाजन को दैवी प्रमाणित करने का प्रयत्न किया गया। जिन लोगों ने ऐसे प्रयत्न किये उन्हें ही हिन्दू धर्म का विरोधी समझना चाहिये। वेदव्यासजी ने इसी श्लोक की प्रथम पंक्ति में ही इसी प्रकार के वर्गीकरण का आधार भी बताया कि गुणकर्म विभागश अर्थात् गुण और कर्मों के विभाग से चातुर्र्वण्य बनाया हुआ है।वर्ण शब्द की यह सम्पूर्ण परिभाषा न केवल हमारी वर्तमान विपरीत धारणा को ही दूर करती है बल्कि उसे यथार्थ रूप में समझने में भी सहायता करती है। जन्म से कोई व्यक्ति ब्राह्मण नहीं होता। शुभ संकल्पों एवं श्रेष्ठ विचारों के द्वारा ही ब्राह्मणत्व को प्राप्त किया जा सकता है। केवल शरीर पर तिलक चन्दन आदि लगाने से अथवा कुछ धार्मिक विधियों के पालन मात्र से हम ब्राह्मण होने का दावा नहीं कर सकते। परिभाषा के अनुसार उसके विचारों एवं कर्मों का सात्त्विक होना अनिवार्य है। रजोगुणप्रधान विचारों तथा कर्मों का व्यक्ति क्षत्रिय कहलाता है। जिसके केवल विचार ही तामसिक नहीं बल्कि जो अत्यन्त निम्न स्तर का जीवन शारीरिक सुखों के लिय्ो ही जीता है उस पुरुष को शूद्र समझना चाहिये। गुण और कर्म के आधार पर किये गये इस वर्गीकरण से इस परिभाषा की वैज्ञानिकता सिद्ध होती है।सत्त्व (ज्ञान) रज (क्रिया) और तम (जड़त्व) इन तीन गुणों से युक्त है जड़ प्रकृति अथवा माया। चैतन्य स्वरूप आत्मा के इसमें व्यक्त होने पर ही सृष्टि उत्पन्न होकर उसमें ज्ञान क्रिया रूप व्यवहार सम्भव होता है। उसके बिना जगत् व्यवहार संभव ही नहीं हो सकता। इस चैतन्य स्वरूप के साथ तादात्म्य करके श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे चातुर्र्वण्यादि के कर्ता हैं क्योंकि उसके बिना जगत् का कोई अस्तित्व नहीं है और न कोई क्रिया संभव है। जैसे समुद्र तरंगों लहरों फेन आदि का कर्त्ता है अथवा स्वर्ण सब आभूषणों का कर्त्ता है वैसे ही भगवान् का कर्तृत्व भी समझना चाहिये।इसी श्लोक में भगवान् स्वयं को कर्त्ता कहते हैं परन्तु दूसरे ही क्षण कहते हैं कि वास्तव में वे अकर्त्ता हैं। कारण यह है कि अनन्त सर्वव्यापी चैतन्य आत्मा में किसी प्रकार की क्रिया नहीं हो सकती। देशकाल से परिच्छिन्न वस्तु ही क्रिया कर सकती हैं। आत्मस्वरूप की दृष्टि से भगवान् अकर्त्ता ही है।शास्त्रों की अध्ययन प्रणाली से अनभिज्ञ विद्यार्थियों को वेदान्त के ये परस्पर विरोधी वाक्य भ्रमित करने वाले होते हैं। परन्तु हम अपने दैनिक संभाषण में भी इस प्रकार के वाक्य बोलते हैं और फिर भी उसके तात्पर्य को समझ लेते हैं। जैसे हम कहते हैं कार मे बैठकर मैं गन्तव्य तक पहुँचा। अब यह तो सपष्ट है कि बैठने से मैं अन्य स्थान पर कभी नहीं पहुँच सकता तथापि कोई अन्य व्यक्ति हमारे वाक्य की अधिक छानबीन नहीं करता। इस प्रकार के वाक्यों में कार की गति का आरोप बैठे यात्री पर किया जाता है। वह अपनी दृष्टि से तो स्थिर बैठा है परन्तु वाहन की दृष्टि से गतिमान् प्रतीत होता है। इसी प्रकार विभिन्न स्वभावों की उत्पत्ति मन्ा और बुद्धि का धर्म है फिर भी उसका आरोप चैतन्य आत्मा पर करके उसे ही कर्त्ता कहते हैं किन्तु स्वस्वरूप से सर्वव्यापी अविकारी आत्मा अकर्त्ता ही है।वास्तव में मैं अकर्त्ता हूँ इसलिये

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.13।।कस्मात्पुनः कारणात्तवैव वर्त्मानुवर्तन्ते नान्यस्येत्यत आह। यद्वा मानुष एव लोके वर्णाश्रमकर्माधिकारो नान्येष्वितिनियमः किंनिमित्त इति तत्राह चातुर्वर्ण्यमिति। यत्तु ननु च केचित्सकामतया वर्तन्ते केचिन्निष्कामतयेति कर्मवैचित्र्यं तत्कर्तृ़णां ब्राह्मणादीनां उत्तममध्यमादिवैचित्र्यं च कुर्वतस्तव कथं वैषम्यं नास्तीत्याशङ्क्याहेति तदुपेक्ष्यम्। भाष्योक्तरीत्याऽव्यवहितेन संबन्धे संभवति व्यवहितसंबन्धेनोत्थानानौचित्यात्। शरीरारम्भकगुणवैषम्यादपि न सर्वे समानस्वभावा इत्याहेति वा। अस्मिन्पक्षे गुणकर्मविभागशश्चातुर्वर्ण्यमुत्पन्नमित्येतावतैव निर्वाहे मया सृष्टमित्यस्य प्रयोजनं चिन्त्यम्। चत्वार एव वर्णाश्चातुर्वर्ण्यम्। गुणाविभागशः कर्मविभागशश्च सत्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमदमादीनि कर्माणि सत्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य राजन्यस्य शौर्यादीनि तमउपसर्जनस्य रजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि रजउपसर्जनस्य तमःप्रधानस्य शूद्रस्य त्रैवर्णिकशुश्रूषैवेत्येवं गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यं मयेश्वरेण सृष्टम्। चातुर्णां वर्णानां हितं चातुर्वर्ण्यम्। गुणाश्च कर्माणि चेति गुणकर्म। द्वन्द्वैकवद्भावः। कर्माण्यग्निहोत्रादीनि गुणाश्च द्रव्यदेवतारुपाः विभागशः साधारणासाधारणविभागेन। तथाहि दानजपादिकं सर्वसाधारणम् अग्निहोत्रादिकं त्रैवर्णिकस्यैव न शूद्रस्य राजसूयादिकं राज्ञ एव नेतरेषामिति विभागो दृश्यते। यतश्चातुर्वर्ण्यं गुणकर्म च मया सृष्ट ततोऽन्यदेवतानामपि मदुत्थत्वात्। पुत्रप्रीत्या पितुरिव तत्प्रीत्या ममैव तृप्तिरस्तीत्यर्थस्तु विभागपदेन साकाङ्क्षेण गुणकर्मणोः समासस्यौचित्यमभिप्रेत्याचार्यैर्न प्रदर्शित इति बोध्यम्। एवं तर्हि चातुर्वर्ण्यस्य विषमस्वभावस्य सृष्ट्यादेस्तन्निष्ठव्यापारस्य च निर्वर्तकत्वात् वैषम्यस्य कर्मफलस्य कर्तृगामित्वात् कर्तृत्वभोक्तृत्वयोश्च त्वयि प्रसङ्गात् संसारित्वादिकं ते स्यादित्याशङ्क्य मायया कर्तृत्वं न वस्तुत इत्यतो नित्यमुक्तस्य मम संसारित्वस्याभाव इत्याशयेनाह। तस्य चातुर्वर्ण्यस्य मायिकेन व्यवहारेण कर्तारमपि मां परमार्थतोऽकर्तारं विद्धि। अतएव कर्तृत्वाभावादभोक्तृत्वादिसिद्य्धाऽव्ययमविकारिणमक्षीणमहिमानम्। असंसारिणमितियावत्। आसक्तिराहित्येन श्रमरहितमित्यर्थस्त्वयुक्तः। फलासक्तिरहितानां जीवानां श्रमस्योपलब्धेः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.13।।शरीरारम्भकगुणवैषम्यादपि न सर्वे समानस्वभावा इत्याह चत्वारो वर्णा एव चातुर्वर्ण्यं स्वार्थे ष्यञ्। मयेश्वरेण सृष्टमुत्पादितम्। गुणकर्मविभागशः गुणविभागशः कर्मविभागश्च। तथाहि सत्वप्रधान ब्राह्मणास्तेषां च सात्विकानि शमदमादीनि कर्माणि। सत्वोपसर्जनरजःप्रधानाः क्षत्रियास्तेषां च तादृशानि शौर्यतेजःप्रभृतीनि कर्माणि। तमउपसर्जनरजःप्रधाना वैश्यास्तेषां च कृष्यादीनि तादृशानि कर्माणि। तमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां च तामसीनि त्रैवर्णिकशुश्रूषादीनि कर्माणीति मानुषे लोके व्यवस्थितानि। एवं तर्हि विषमस्वभावचातुर्वर्ण्यस्रष्टृत्वेन तव वैषम्यंदुर्वारमित्याशङ्क्य नेत्याह तस्य विषमस्वभावस्य चातुर्वर्ण्यस्य व्यवहारदृष्ट्या कर्तारमपि मां परमार्थदृष्ट्या विद्ध्यकर्तारमव्ययं निरहंकारत्वेनाक्षीणमहिमानम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.13।।अन्यदेवताभक्ता अपि कस्मात्पुनः कारणात्तवैव वर्त्मानुवर्तन्ते नान्यस्येत्यत आह चातुर्वर्ण्यमिति।चतुर्णां वर्णानां हितं चातुर्वर्ण्यम्। गुणाश्च कर्माणि चेति गुणकर्म। द्वन्द्वैकवद्भावः। कर्माण्यग्निहोत्रादीनि। गुणाश्च द्रव्यदेवतादिरूपाः। विभागशः साधारणासाधारणविभागेन। तथाहि दानजपादिकं सर्वसाधारणम्। अग्निहोत्रादिकं त्रैवर्णिकस्यैव न शूद्रस्य। राजसूयादिकं राज्ञ एव नेतरेषामिति विभागो दृश्यते। यतश्चातुर्वर्ण्यं गुणकर्म मया सृष्टं ततोऽन्यदेवतानामपि मदुत्थत्वात्पुत्रप्रीत्या पितुरिव तत्प्रीत्या ममैव तृप्तिरस्तीत्यर्थः। यद्वा गुणविभागशः कर्मविभागश इति योज्यम्। तथाहि सत्त्वप्रधाना ब्राह्मणास्तेषां कर्म शमदमादिकम् सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानाः क्षत्रियास्तेषां कर्म शौर्यादि तम उपसर्जनरजःप्रधाना वैश्यास्तेषां कर्म कृष्यादि रज उपसर्जनतमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां कर्म शुश्रूषैवेति गुणकर्मविभागो दृश्यते तदा चातुर्वर्ण्यमिति स्वार्थे ष्यञ्। चत्वारो वर्णाः गुणकर्मविभागशो मया सृष्टा इत्यर्थः। अन्यदेवताभक्ता अपि मदुक्तकर्मकारित्वान्मद्भक्ता एवेति भावः। ननु यद्येवं त्वं स्वसन्ततितर्पणेन स्वाज्ञाकरणेन प्रीयसे तदर्थं च त्वया चातुर्वर्ण्यं सृष्टं तर्हि महान्संसारीं त्वमसीत्याशङ्क्याह तस्येति। कर्तारं मायायोगात् वस्तुतोऽकर्तारम्। अतएवाव्ययमविकारिणम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.13।।ननु कर्मसिद्धिरपि त्वां विना कथं भवति इत्याशङ्क्याह चातुर्वर्ण्यमिति। चातुर्वर्ण्यं वर्णचतुष्टयं गुणकर्मविभागशः गुणकर्मविभागैः सत्त्वरजस्तमसां यानि कर्माणि तेषां विभागैर्मया सृष्टम् अतस्तस्य चातुर्वर्ण्यस्य कर्तारमव्ययमविनाशिनं ब्रह्मरूपमकर्तारं रसमार्गस्थं रसपरवशं मां तस्य चातुर्वर्ण्यस्य कर्तारमपि विद्धि। इच्छया अंशैः कर्ता न तु साक्षात्स्वयं इत्यपिशब्देन बोध्यते। अतो मदंशसम्बन्धेन तत्र सिद्धिर्भवतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.13।।ननु केचित्सकामतया प्रवर्तन्ते केचिन्निष्कामतयेति कर्मवैचित्र्यम् तत्कर्तृ़णां च ब्राह्मणादीनामुत्तममध्यमादिवैचित्र्यं कुर्वतस्तव कथं वैषम्यं नास्तीत्याशङ्क्याह चातुर्वर्ण्यमिति। चत्वारो वर्णा एव चातुर्वर्ण्यम्। स्वार्थे ष्यञ्प्रत्ययः। अयमर्थः सत्वप्रधाना ब्राह्मणास्तेषां शमदमादीनि कर्माणि सत्वरजःप्रधानाः क्षत्रियास्तेषां च शौर्ययुद्धादीनि कर्माणि रजस्तमःप्रधाना वैश्यास्तेषां कृषिवाणिज्यादीनि कर्माणि तमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां च त्रैवर्णिकशुश्रूषादिकर्माणीत्येवं गुणानां कर्मणां च विभागैश्चातुर्वर्ण्यं मयैव सृष्टमिति। सत्यम्। तथाप्येवं तस्य कर्तारमपि फलतोऽकर्तारमेव मां विद्धि। तत्र हेतुः। अव्ययमासक्तिराहित्येन श्रमरहितं नाशादिरहितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.13।।ननु केचित्सकामतया देवान्प्रपद्यन्ते केचिदतिकामितया देवान्प्रपद्यन्ते केचिन्निष्कामतया त्वां न सर्वे एकमेवेति कर्मवैचित्र्यं तत्कर्तृ़णां च ब्राह्मणादीनाम् उत्तमादिवैचित्र्यं कुर्वतस्तव कथं वैषम्यनैर्घृण्ये न स्याताम् इत्याशङ्क्याह चातुर्वर्ण्यमिति। चतुर्वर्णात्मकं जगन्मया सृष्टंचत्वारो जज्ञिरे वर्णाः पुरुषादाश्रमैः सह इतिभगवद्वाक्यात्। परं गुणकर्मविभागश इति गुणाः सत्त्वादयः तदनुगुणकर्माणि तैर्विभागस्तेषां कृतः स्थूलः। दैवासुरविभागस्तु पूर्वत एव कृतः सूक्ष्मः। तत्र सत्त्वप्रधाना विप्रास्तेषां च शमदमादीनि कर्माणि सत्त्वरजःप्रधानाः क्षत्ित्रयास्तेषां शौर्यादि रजस्तमःप्रधाना वैश्यास्तेषां कृषिवाणिज्यादि तमःप्रधानाः शूद्रास्तेषां द्विजशुश्रूषेत्येवं सृष्टं मयैव। जीवेषु चतुर्वणेष्वपि प्रकृत्या सह संसृष्टत्वाद्गुणकर्माणि सहैवेन्द्रियैर्दत्तानिबुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् जनानामसृजद्विभुः। मात्रार्थं च भवार्थं च स्वात्मनेऽकल्पनाय च भाग.10।87।2 इति वाक्यात्। तानि तु तैर्यथा कृतानि तथैव च फलदानि ब्रह्मणो वरदानादिति पूर्वं उक्तंदेवान् भावयतावेन 3।11 इत्यादिना। अतः कर्त्तारमपि जनकमपि मां तत्त्वतोऽकर्त्तारमेव विद्धि यतः अव्ययमिति अहङ्कारादिरहितमित्यर्थः। तथाच सूत्रंवैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात्तथाहि दर्शयति। ब्र.सू.2।1।34 अत्र भाष्यकारः जीवानां कर्मानुरोधात्सुखदुःखे प्रयच्छति इति वादिबोधनायोक्तं सापेक्षत्वात् इति। वस्तुतस्तु आत्मसृष्टैर्वैषम्यनैर्घृण्यसम्भवोऽपि न वृष्टिवद्भगवान् बीजवत्कर्म तथाहि दर्शयति एष ह्येव साधु कर्म कारयति यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषति एष उ एव वाऽसाधु कर्म कारयति यमधो निनीषति कौ.उ.3।3।9 पुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापःपापेन (वा) बृ.उ.4।4।5 इति च सापेक्षमपि कुर्वन्नीश्वरमाहात्म्यमिति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.13।।मनुष्यलोकमें ही वर्णाश्रम आदिके कर्मोंका अधिकार है अन्य लोकोंमें नहीं यह नियम किस कारणसे है यह बतानेके लिये ( अगला श्लोक कहते हैं ) अथवा वर्णाश्रम आदि विभागसे युक्त हुए मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गके अनुसार बर्तते हैं ऐसा आपने कहा सो नियमपूर्वक वे आपके ही मार्गका अनुसरण क्यों करते हैं दूसरेके मार्गका क्यों नहीं करते इसपर कहते हैं ( ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र इन ) चारों वर्णोंका नाम चातुर्वर्ण्य है। सत्त्व रज तम इन तीनों गुणोंके विभागसे तथा कर्मोंके विभागसे यह चारों वर्ण मुझ ईश्वरद्वारा रचे हुए उत्पन्न किये हुए हैं। ब्राह्मण इस पुरुषका मुख हुआ इत्यादि श्रुतियोंसे यह प्रमाणित है। उनमेंसे सात्त्विक सत्त्वगुणप्रधान ब्राह्मणके शम दम तप इत्यादि कर्म हैं। जिसमें सत्त्वगुण गौण है और रजोगुण प्रधान है उस क्षत्रियके शूरवीरता तेज प्रभृति कर्म हैं। जिसमें तमोगुण गौण और रजोगुण प्रधान है ऐसे वैश्यके कृषि आदि कर्म हैं। तथा जिसमें रजोगुण गौण और तमोगुण प्रधान है उस शूद्रका केवल सेवा ही कर्म है। इस प्रकार गुण और कर्मोंके विभागसे चारों वर्ण मेरेद्वारा उत्पन्न किये गये हैं यह अभिप्राय है। ऐसी यह चार वर्णोंकी अलगअलग व्यवस्था दूसरे लोकोंमें नहीं है इसलिये ( पूर्वश्लोकमें ) मानुषे लोके यह विशेषण लगाया गया है। यदि चातुर्वर्ण्यकी रचना आदि कर्मके आप कर्ता हैं तब तो उसके फलसे भी आपका सम्बन्ध होता ही होगा इसलिये आप नित्यमुक्त और नित्यईश्वर भी नहीं हो सकते इसपर कहा जाता है यद्यपि मायिक व्यवहारसे मैं उस कर्मका कर्ता हूँ तो भी वास्तवमें मुझे तू अकर्ता ही जान तथा इसीलिये मुझे अव्यय और असंसारी ही समझ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.13।। व्याख्या   चातुर्वर्ण्यं (टिप्पणी प0 235.1) मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके अनुसार सत्त्व रज और तम इन तीनों गुणोंमें न्यूनाधिकता रहती है। सृष्टिरचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार भगवान् ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं (टिप्पणी प0 235.2)। मनुष्यके सिवाय देव पितर तिर्यक् आदि दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान् गुणों और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसमें भगवान्की किञ्चिन्मात्र भी विषमता नहीं है।चातुर्वर्ण्यम् पद प्राणिमात्रका उपलक्षण है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य ही चार प्रकारके नहीं होते अपितु पशु पक्षी वृक्ष आदि भी चार प्रकारके होते हैं जैसे पक्षियोंमें कबूतर आदि ब्राह्मण बाज आदि क्षत्रिय चील आदि वैश्य और कौआ आदि शूद्र पक्षी हैं। इसी प्रकार वृक्षोंमें पीपल आदि ब्राह्मण नीम आदि क्षत्रिय इमली आदि वैश्य और बबूल (कीकर) आदि शूद्र वृक्ष हैं। परन्तु यहाँ चातुर्वर्ण्यम् पदसे मनुष्योंको ही लेना चाहिये क्योंकि वर्णविभागको मनुष्य ही समझ सकते हैं और उसके अनुसार कर्म कर सकते हैं। कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है।चारों वर्णोंकी रचना मैंने ही की है इससे भगवान्का यह भाव भी है कि एक तो ये मेरे ही अंश हैं और दूसरे मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ इसलिये मैं सदा उनके हितको ही देखता हूँ। इसके विपरीत ये न तो देवताके अंश हैं और न देवता सबसे सुहृद् ही हैं। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह अपने वर्णके अनुसार समस्त कर्तव्यकर्मोंसे मेरा ही पूजन करे (गीता 18। 46)।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् यहाँ अकर्तारम् पद कर्म करते हुए भी कर्तृत्वाभिमानका अभाव बतानेके लिये आया है। सृष्टिकी रचना पालन संहार आदि सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी भगवान् उन कर्मोंसे सर्वथा अतीत निर्लिप्त ही रहते हैं।सृष्टिरचनामें भगवान् ही उपादान कारण हैं और वे ही निमित्त कारण हैं। मिट्टीसे बने पात्रमें मिट्टी उपादान कारण है और कुम्हार निमित्त कारण है। मिट्टीसे पात्र बननेमें मिट्टी व्यय (खर्च) हो जाती है और उसे बनानेमें कुम्हारकी शक्ति भी खर्च होती है परन्तु सृष्टिरचनामें भगवान्का कुछ भी व्यय नहीं होता। वे ज्योंकेत्यों ही रहते हैं। इसलिये उन्हें अव्ययम् कहा गया है।जीव भी भगवान्का अंश होनेसे अव्यय ही है। विचार करें कि शरीरादि सब वस्तुएँ संसारकी हैं और संसारसे ही मिली हैं। अतः उन्हें संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे अपना क्या व्यय हुआ हम तो (स्वरूपतः) अव्यय ही रहे। इसलिये यदि साधक शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि धन सम्पत्ति आदि मिले हुए सांसारिक पदार्थोंको अपना और अपने लिये न माने तो फिर उसे अपनी अव्ययताका अनुभव हो जायगा।यहाँ विद्धि पदसे भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको समझनेकी आज्ञा दी है। कर्म करते हुए भी कर्मकर्मसामग्री और कर्मफलसे अपना कोई सम्बन्ध न रहना ही कर्मोंकी दिव्यता है।न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा विश्वरचनादि समस्त कर्म करते हुए भी भगवान्का उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। उनके कर्मोंमें विषमता पक्षपात आदि दोष लेशमात्र भी नहीं हैं। उनकी कर्मफलमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति ममता या कामना नहीं है। इसलिये वे कर्म भगवान्को लिप्त नहीं करते।उत्पत्तिविनाशशील वस्तु मात्र कर्मफल है। भगवान् कहते हैं कि जैसे मेरी कर्मफलमें स्पृहा नहीं है ऐसे ही तुम्हारी भी कर्मफलमें स्पृहा नहीं होनी चाहिये। कर्मफलमें स्पृहा न रहनेसे सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी तुम कर्मोंसे बँधोगे नहीं।पीछेके (तेरहवें) श्लोकमें भगवान्ने बताया कि सृष्टिरचनादि समस्त कर्मोंका कर्ता होते हुए भी मैं अकर्ता हूँ अर्थात् मुझमें कर्तृत्वाभिमान नहीं है और इस श्लोकमें बताते हैं कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है अर्थात् मुझमें भोक्तृत्वाभिमान भी नहीं है। अतः साधकको भी इन दोनोंसे रहित होना चाहिये। फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों ही नहीं रहते। कर्तृत्वभोक्तृत्व ही संसार है। अतः इनके न रहनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध ही है।इति मां योऽभिजानाति मनुष्यमें जब कामनाएँ उत्पन्न होती हैं तब उसकी दृष्टि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंपर रहती है। उत्पत्तिविनाशशील (अनित्य) पदार्थोंपर दृष्टि रहनेसे वह नित्य भगवान्को तत्त्वसे नहीं जान सकता। पर कामनाओंके मिटनेसे जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है तब भगवान्की ओर स्वतः दृष्टि जाती है। भगवान्की ओर दृष्टि जानेपर मनुष्य जान जाता है कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं इसलिये उनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं। भगवान् तो जीवोंको कर्मबन्धनसे रहित करनेके लिये ही उन्हें मनुष्यशरीर देते हैं पर इस बातको न समझनेके कारण जीव कर्मोंसे नयेनये सम्बन्ध मानकर और बन्धन उत्पन्न कर लेता है। इसलिये कर्तापन और फलेच्छा न होनेपर भी वे केवल कृपा करके जीवोंको कर्मबन्धनसे रहित करके उनका उद्धार करनेके लिये ही सृष्टिरचनाका कार्य करते हैं। भगवान्को इस तरह जान लेनेसे मनुष्य भगवान्की ओर खिंच जाता है उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।(मानस 5। 34। 2)कर्मभिर्न स बध्यते भगवान्के कर्म तो दिव्य हैं ही सन्तमहात्माओंके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं। वास्तवमें सन्तमहात्मा ही नहीं मनुष्यमात्र अपने कर्मोंको दिव्य बना सकता है। जब कर्मोंमें मलिनता (कामना ममता आसक्ति आदि) होती है तब वे कर्म बाँधनेवाले हो जाते हैं। जब मलिनताके दूर हो जानेपर कर्म दिव्य हो जाते हैं तब वे उसे नहीं बाँधते। इतना ही नहीं वे कर्म उस कर्ताको और दूसरोंको भी (उसके अनुसार आचरण करनेसे) मुक्त करनेवाले हो जाते हैं। अपने कर्मोंको दिव्य बनानेका सरल उपाय है संसारसे मिली हुई वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर (संसारकी और संसारके लिये मानते हुए) संसारकी सेवामें लगा देना।विचार करना चाहिये कि हमारे पास शरीर आदि जितनी भी बाह्य वस्तुएँ हैं उन सबको हम साथ लाये नहीं और जायँगे तब साथ ले जा सकते नहीं उनके रहते हुए उनमें इच्छानुसार परिवर्तन कर सकते नहीं उन्हें इच्छानुसार रख सकते नहीं अर्थात् उनपर हमारा कोई आधिपत्य नहीं है। इसी प्रकार जन्मजन्मान्तरोंसेसाथ आये सूक्ष्म और कारणशरीर भी परिवर्तनशील और प्रकृतिके कार्य हैं इसलिये उनके साथ भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। वे वस्तुएँ अपने लिये भी नहीं हैं क्योंकि उनके मिलनेपर भी और मिले यह इच्छा रहती है। यदि वे वस्तुएँ अपने लिये होतीं तो और मिलनेकी इच्छा नहीं रहती। ऐसा होनेपर भी उन वस्तुओँको अपनी और अपने लिये मानना कितनी बड़ी भूल है उन वस्तुओंमें जो अपनापन दीखता है वह वास्तवमें केवल उनका सदुपयोग करनेके लिये है उनपर अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं।सेवा करनेके लिये तो सब अपने हैं पर लेनेके लिये कोई अपना नहीं है। संसारकी तो बात ही क्या है भगवान् भी लेनेके लिये अपने नहीं हैं अर्थात् भगवान्से भी कुछ नहीं लेना है प्रत्युत अपनेआपको ही भगवान्के समर्पित करना है। कारण कि जो वस्तु हमें चाहिये और हमारे हितकी है वह भगवान्ने हमें पहलेसे ही बिना माँगे दे रखी है और ज्यादा दे रखी है कम नहीं। हमारी जरूरतको जितना भगवान् समझते हैं उतना हम समझ भी नहीं सकते क्योंकि भगवान्की उदारता अपार है। उनके सामने हमारी समझ तो बहुत ही अल्प है। इसलिये उनसे माँगना किस बातका जो कुछ हमें मिला है उसीका हमें सदुपयोग करना है। वस्तुओँको अपनी और अपने लिये न मानकर निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितमें लगा देना ही वस्तुओँका सदुपयोग है। इससे कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और महान् आनन्दस्वरूप परमात्माका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें अपना उदाहरण देकर अब आगेके श्लोकमें भगवान् मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हुए अर्जुनको निष्कामभावपूर्वक अपना कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.13 4.14।।चातुर्वर्ण्यमिति। न मामिति। मम किल कथमाकाशकल्पस्य कर्मभिः लेपः आकाशप्रतिमत्वं कामनाभावात्। इति (S इत्यनेन) ज्ञानप्रकारेण यो भगवन्तमेवाश्रयते सर्वत्र सर्वदा आनन्दघनं परमेश्वरमेव न वासुदेवात्परमस्ति किंचित् इति रीत्या ( N K नीत्या) विमृशति तस्य किं कर्मभिः बन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.13।।मनुष्यलोके चातुर्वर्ण्यं चातुराश्रम्यमित्यनेन द्वारेण कर्माधिकारनियमे कारणं पृच्छति मानुष एवेति। आदिशब्देनावस्थाविशेषा विवक्ष्यन्ते। प्रकारान्तरेण वृत्तानुवादपूर्वकं चोद्यमुत्थापयति अथवेत्यादिना। प्रश्नद्वयं परिहरति उच्यत इति। तर्हि तव कर्तृत्वभोक्तृत्वसंभवादस्मदादितुल्यत्वेनानीश्वरत्वमित्याशङ्क्याह तस्येति। ईश्वरस्य विषमसृष्टिं विदधानस्य सृष्टिवैषम्यनिर्वाहकं कथयति गुणेति। गुणविभागेन कर्मविभागस्तेन चातुर्वर्ण्यस्य सृष्टिमेवोपदिष्टां स्पष्टयति तत्रेत्यादिना। प्रश्नद्वयप्रतिविधानं प्रकृतमुपसंहरति तच्चेदमिति। मनुष्यलोके परं वर्णाश्रमादिपूर्वके कर्मण्यधिकारस्तत्रैव वर्णादेरीश्वरेण सृष्टत्वान्न लोकान्तरेषुतत्र वर्णाद्यभावादीश्वरमेव चातुर्वर्ण्याश्रमादिविभागभागिनोऽधिकारिणोऽनुवर्तन्ते तेनैव वर्णादेस्तद्व्यापारस्य च सृष्टत्वात्तदनुवर्तनस्य युक्तत्वादित्यर्थः। तस्येत्यादि द्वितीयभागापोह्यं चोद्यमनुद्रवति हन्तेति। यदि चातुर्वर्ण्यादिकर्तृत्वादीश्वरस्य प्रागुक्तो नियमोऽभिमतस्तर्हि तद्विषयसृष्ट्यादेस्तन्निष्ठव्यापारस्य च धर्मादेर्निवर्तकत्वात्तत्फलस्य कर्तृगामित्वात् कर्तृत्वभोक्तृत्वयोस्त्वयि प्रसङ्गात् नित्यमुक्तत्वादि ते न स्यादित्यर्थः। मायया कर्तृत्वं परमार्थतश्चाकर्तृत्वमित्यभ्युपगमान्नित्यमुक्तत्वादि सिध्यतीत्युत्तरमाह उच्यत इति। मायावृत्यादिसंव्यवहारेण चातुर्वर्ण्यादेस्तत्कर्मणश्च यद्यपि कर्ताहं तथापि तथाविधं मां परमार्थतोऽकर्तारं विद्धीति योजना। अकर्तृत्वादेवाभोक्तृत्वसिद्धिरित्याह अतएवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.13।।चातुर्वर्ण्यमित्यस्य सङ्गतिं सूचयन् तात्पर्यमाह अहमेव हीति। यस्मादहमेव चातुर्वर्ण्यस्य कर्ता त्रैविद्याश्च तदन्तर्भूताः तस्मात्स्वपितरं मां परित्यज्यान्यदेवता यजन्तः कथं महाफलभाजो भवेयुःइत्याहेत्यर्थः।विचित्रा तद्धितगतिः इति वचनादतिरिक्तार्थसम्भवेचतुर्वर्णादिभ्यः स्वार्थ उपसङ्ख्यानम् वार्ति.7।3।31 इति नादरणीयमिति भावेनाह चतुर्वर्णेति। वर्णाश्चत्वारो गुणास्त्रयः तत्कथं तेषु गुणविभागः इत्यत आह सात्त्विक इति। राजसस्थसात्त्विकेष्वेवायं विभाग इति ज्ञातव्यम्। निर्देशप्राथम्यात्क्षत्ित्रये रजसः सत्त्वमधिकम्। तत एव वैश्ये तमसो रजस्तच्च समत्वयुतं रजोपेक्षया तमोऽधिकं शूद्र इत्यसौ तामसः। सत्त्वं तु तमसोऽप्यधिकम्। कर्मविभागः कीदृशः इत्यत आह कर्मेति। यदि चातुर्वर्ण्यं त्वया सृष्टं तर्हि कर्तृत्वात् जीववत्तवापि कर्मलेपः प्रसज्यत इत्यतः कर्मलेपाभावं वक्तुं हेतुस्तावदुच्यतेतस्य इति तदेतद्व्याहतमित्यत आह क्रियायामिति। कथं वैलक्षण्यमित्यतः श्रुत्यैव दर्शयति तथा हीति। विश्वकर्माऽपि विमनास्तत्राभिनिवेशरहित इत्यर्थः। प्रकारान्तरेण वैलक्षण्यं पुराणेन दर्शयति तनुरिति। क्रियाया मिथ्यात्वात्कर्ताऽप्यकर्तेति परव्याख्यां प्रत्याख्याति साधितं चेति। एतत्क्रियायाः सत्यत्वं पुरस्तात् द्वितीये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.13।।अहमेव हि कर्तेत्याह चातुर्वर्ण्यमिति चतुर्वर्णसमुदायः। सात्त्विको ब्राह्मणः सात्त्विकराजसः क्षत्रियः राजसतामसो वैश्यः तामसः शूद्र इति गुणविभागः। कर्मविभागस्तुशमो दमः 18।42 इत्यादिना वक्ष्यते। क्रियायां वैलक्षण्यात्कर्ताऽप्यकर्ता। तथा हि श्रुतिः विश्वकर्मा विमनाः ऋक्सं.8।3।17 इत्यादि।तनुर्विद्या क्रियाऽऽकृतिः भाग.6।4।46 इति च। साधितं चैतत्पुरस्तात् पृ.142।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.13।।चातुर्वर्ण्यप्रमुखं ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं कृत्स्नं जगत् सत्त्वादिगुणविभागेन तदनुगुणशमादिकर्मविभागेन च प्रविभक्तं मया सृष्टम्। सृष्टिग्रहणं प्रदर्शनार्थम् मया एव रक्ष्यते मया एव च उपसंह्रियते। तस्य विचित्रसृष्टयादेः कर्तारम् अपि अकर्तारं मां विद्धि।कथम् इति अत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.13।। चत्वार एव वर्णाः चातुर्वर्ण्यं मया ईश्वरेण सृष्टम् उत्पादितम् ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत् इत्यादिश्रुतेः। गुणकर्मविभागशःगुणविभागशः कर्मविभागशश्च। गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि। तत्र सात्त्विकस्य सत्त्वप्रधानस्य ब्राह्मणस्य शमो दमस्तपः इत्यादीनि कर्माणि सत्त्वोपसर्जनरजःप्रधानस्य क्षत्रियस्य शौर्यतेजःप्रभृतीनि कर्माणि तमउपसर्जनरजःप्रधानस्य वैश्यस्य कृष्यादीनि कर्माणि रजउपसर्जनतमःप्रधानस्य शूद्रस्य शुश्रूषैव कर्म इत्येवं गुणकर्मविभागशः चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम् इत्यर्थः। तच्च इदं चातुर्वर्ण्यं न अन्येषु लोकेषु अतः मानुषे लोके इति विशेषणम्। हन्त तर्हि चातुर्वर्ण्यस्य सर्गादेः कर्मणः कर्तृत्वात् तत्फलेन युज्यसे अतः न त्वं नित्यमुक्तः नित्येश्वरश्च इति उच्यते यद्यपि मायासंव्यवहारेण तस्य कर्मणः कर्तारमपि सन्तं मां परमार्थतः विद्धि अकर्तारम्। अत एव अव्ययम् असंसारिणं च मां विद्धि।।येषां तु कर्मणां कर्तारं मां मन्यसे परमार्थतः तेषाम् अकर्ता एवाहम् यतः

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【 Verse 4.14 】

▸ Sanskrit Sloka: न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा | इति मां योऽभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते ||

▸ Transliteration: na māṁ karmāṇi limpanti na me karmaphale spṛhā | iti māṁ yo’bhijānāti karmabhirna sa badhyate ||

▸ Glossary: na: never; māṁ: Me; karmāṇi: work; limpanti: affect; na: not; me: My; kar- maphale: in fruits of action; spṛhā : longing for; iti: thus; māṁ: Me; yaḥ: onewho; abhijānāti: understands; karmabhiḥ : by the action; na: never; saḥ: he; badhyate: is bound.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.14 I am not affected by any work; nor do I long for the outcome of such work. One who understands this truth about me also does not get caught in the bondage of work.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.13 4.14।।मेरे द्वारा गुणों और कर्मोंके विभागपूर्वक चारों वर्णोंकी रचना की गयी है। उस(सृष्टिरचना आदि) का कर्ता होनेपर भी मुझ अव्यय परमेश्वरको तू अकर्ता जान। कारण कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते। इस प्रकार जो मुझे तत्त्वसे जान लेता है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.14।। कर्म मुझे लिप्त नहीं करते न मुझे कर्मफल में स्पृहा है। इस प्रकार मुझे जो जानता है वह भी कर्मों से नहीं बन्धता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.14 न not? माम् Me? कर्माणि actions? लिम्पन्ति taint? न not? मे to Me? कर्मफले in the fruit of actions? स्पृहा desire? इति thus? माम् Me? यः who? अभिजानाति knows? कर्मभिः by actions? न not? सः he? बध्यते is bound.Commentary As I have neither egoism nor desire for fruits? I am not bound by actions. Wordly people think they are the agents and they perfrom actions. They also expect fruits for their actions. So they take birth again and again. If one works without attachment? without egoism? without expectation of fruits? he too will not be bound by actions. He will be freed from birth and death. (Cf.IX.9).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.14. Actions do not stain Me; nor do I have a desire for the fruits [of actions] also. Whosoever comprehends Me as such, he is not bound by actions.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.14 My actions do not fetter Me, nor do I desire anything that they can bring. He who thus realises Me is not enslaved by action.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.14 Works do not contaminate Me. In Me there is no desire for fruits of actions. He who understands Me thus is not bound by actions.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.14 Actions do not taint Me; for Me there is no hankering for the results of actions. One who knows Me thus, does not become bound by actions.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.14 Actions do not taint Me, nor have I a desire for the fruit of actions. He who knows Me thus is not bound by actions.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.13-14 Catur-varnyam etc. Na mam etc. How can there be taint of actions in Me Who remain like the ether ? The comparison with ether is due to the absence of desire [in both]. As such etc. : whosoever, with this sort of thought, takes refuge in the Bhagavat i.e. contemplates everywhere at all times on the Bliss-dense Supreme Lord as 'There exits nothing othe than Vasudeva [the Absolute]' - for him can there be any bondage by actions ?

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.14 These actions of varied nature like creation etc., do not contaminate Me i.e., do not bind Me. For the distinctions of gods, men etc., are not brought about by Me, but by the particular Karmas, good and evil, of created beings. Therefore by the process of discriminating between the acired and the inherent, it will be found that I am not the author of this varied creations etc. The created or embodied selves, who are endowed with bodies and organs at the time of creation in accordance with their own Karmas springing from attachment to fruits etc., experience all enjoyments available in creation. Thus for them (embodied selves) alone there is desire for the results of creation etc., and for the results of their Karmas. There is no desire in Me for it.

The Sutrakara says to the same effect: 'No partiality or cruelty on account of there being dependence (on the Karma of souls for inealities' (Br. S., 2.1.34). Bhagavan Parasara also says so: 'He (the Lord) is only the operative cause in the creation of beings. That from which the creative forces spring constitutes the material cause. Leaving aside the material cause, the being that

Chapter 4 (Part 9)

becomes embodied does not reire the help of any other thing whatever. A thing is led into the condition in which it is, O best of ascetics, only by its own potentiality' (V. P., 1.4.51-2). The Supreme Person is only the operative cause with regard to the creation of those to be created, i.e., the selves in the bodies of gods etc. The material cause for the differences into gods etc., is the potentiality in the form of previous Karmas of the selves to be created. Therefore, leaving aside the operative cause, i.e., the Supreme Person, the creator, the embodied beings do not reire anything else for causing difference into conditions of gods etc. For these selves are led to take the forms of gods etc., by the potentiality of their own old Karma with which they are connected. Such is the meaning.

He who knows Me thus to be the agent of creation etc., and still a non-agent, i.e., as one who has no desire for the results of the acts of creation etc., - such a person is not tied by previous actions, i.e., he is freed from the old Karmas which obstruct the undertaking of Karma Yoga by causing attachment to results. Such is the purport.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.14 Because of the absence of egoism, those karmani, actions; na limpanti, do not taint; mam, Me, by becoming the originators of body etc. And me, for Me; na sprha, there is no hankering for the results of those actions. But in the case of transmigrating beings, who have self-identification in the form, 'I am the agent', and thirst for actions as also for their results, it is reasonable that actions should taint them. Owing to the absence of these, actions do not taint Me. Anyone else, too, yah, who; abhijanati, knows; mam, Me; iti, thus, as his own Self, and (knows), 'I am not an agent; I have no hankering for the results of actions'; sah, he; na badhyate, does not become bound; karmabhih, by actions. In his case also actions cease to be the originators of body etc. This is the import.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.14।। नित्य शुद्ध और परिपूर्ण आत्मा को किसी प्रकार की अपूर्णता का भान नहीं हो सकता जो किसी इच्छा को जन्म दे। इस दृष्टि से श्रीकृष्ण भगवान् कहते हैं कर्म मुझे दूषित नहीं कर सकते और न मुझे कर्मफल में कोई आसक्ति ही है। इच्छा अथवा कर्म का बन्धन जीवअहंकार के लिये ही हो सकता है। मन और बुद्धि की उपाधियों से युक्त चैतन्य आत्मा ही जीव कहा जाता है। इन उपाधियों के दोषयुक्त होने पर जीव ही दूषित हुआ समझा जाता है। इसे एक दृष्टान्त के द्वारा हम भली भांति समझ सकेंगे।यदि किसी पात्र में रखे जल में सूर्य प्रतिबिम्वित होता है तो उस प्रतिबिम्ब की स्थिति पूर्णतया उस जल की स्थिति पर निर्भर करती है। जल के शान्त अस्थिर अथवा मैले होने पर वह प्रतिबिम्ब भी स्थिर क्षुब्ध अथवा धुंधला दिखाई देगा। परन्तु महाकाश स्थित वास्तविक सूर्य पर इस चंचलता अथवा निश्चलता का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसी प्रकार इच्छा आसक्ति आदि का प्रभाव अहंकार पर ही पड़ता है। नित्य मुक्त चैतन्य स्वरूप आत्मा इन सबसे किसी प्रकार भी दूषित नहीं होती।आत्मविकास की वैदिक साधना का यह अर्थ नवीन प्रतीत होता है। क्या इसके पूर्व किसी ने इसका आचरण किया था उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.14।।अतएवाहंकाराभावात्तानि कर्माणि मां न लिम्पन्ति देहाद्यारम्भकत्वेन न निबन्धन्ति। आसक्तं न कुर्वन्तीत्यर्थस्तु न मे कर्मफले स्पृहेत्यनेन पौनरुक्त्यमभिप्रेत्याचार्यैर्न दर्शितः। मे मम कर्मफले स्पृहा तृष्णा आसक्तिर्नास्ति। अतोऽपि मां कर्माणि न लिम्पन्तीत्येतत्। यत्तु ननु कर्तुरपि कथमकर्तृत्वमत आह न मामिति। कर्मलेपोऽपि कुतो नास्तीत्यत आह न मे इति। यः कर्तृत्वाभिमानी स लिप्यते। यस्तु फलेच्छुः स एवात्मनः कर्तृत्वं मन्यत इति। फलेच्छाभावादकर्ताऽकर्तृत्वाच्च न लिप्यत इति तच्चिन्त्यम्। कर्तृत्वाभिनिवेशस्य फलासक्तेश्च बन्धकतयोक्तत्वेनात्रान्यथावर्णनस्या नौचित्यात्। फलेच्छारहितस्य मुमुक्षोस्तावतैवाकर्तृत्वापत्त्या। निर्लेपत्वेन जन्माभावप्रसङ्गाश्च। मां कर्माणि न लिम्पन्तीति क वक्तव्यम्। इति मां य आत्मत्वेनाभिजानाति परात्माभिन्नस्य मे कर्तृत्वं कर्मफले स्पृहा च नास्तीति स कर्मभिर्न निबध्यते। देहादि संबन्धं प्राप्य न संसरतीत्यर्थः। यत्तु मम निर्लेपत्वे कारणं निरहंकारत्वनिस्पृहत्वादिकं जानतस्तस्याप्यहंकारशैथित्यादिति तच्चिन्त्यम्। ईश्वराभेदसाक्षात्कारं विना कर्तृत्वादेर्मूलोच्छेदाभावेनोक्तज्ञानवतो मोक्षासंभवात्। अन्यथा मूर्खाणामप्येतावज्ज्ञानवतां कर्मप्रयुक्तबन्धनाभावप्रसङ्गात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.14।।कर्माणि विश्वसर्गादीनि मां निरहंकारत्वेन कर्तृत्वाभिमानहीनं भगवन्तं न लिम्पन्ति देहारम्भकत्वेन न बध्नन्ति। एवं कर्तृत्वं निराकरोति न मे ममाप्तकामस्य कर्मफले स्पृहा तृष्णा।आप्तकामस्य का स्पृहा इति श्रुतेः। कर्तृत्वाभिमानफलस्पृहाभ्यां हि कर्माणि लिम्पन्ति तदभावान्न मां कर्माणि लिम्पन्ति इति एवं योऽन्योऽपि मामकर्तारमभोक्तारं चात्मत्वेनाभिजानाति कर्मभिर्न स बध्यते। अकर्त्रात्मज्ञानेन मुच्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.14।।ननु कर्तुरपि कथमकर्तृत्वमत आह न मामिति। कर्मलेपोऽपि कुतो नास्तीत्यत आह न मे इति। यः कर्तृत्वाभिमानी स लिप्यते यस्तु फलेच्छुः स एवात्मनः कर्तृत्वं मनुत इति फलेच्छाभावादकर्ता अकर्तृत्वाच्च न लिप्यतेऽथं इति मां योऽभिजानाति स कर्मफलस्पृहात्यागात्कर्मभिर्न बध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.14।।नन्वेवं चेद्विद्वांसः किमिति कर्म कुर्वन्ति तत्राह न मामिति। मां कर्माणि न लिम्पन्ति वशे न कुर्वन्ति। मे मम कर्मफले यज्ञाद्ये इन्द्रियादिवत् स्पृहा इच्छा न। इत्यनेन प्रकारेण मां योऽभितो जानाति स फलभोगैर्न बध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.14।। तदेव दर्शयन्नाह न मामिति। कर्माणि विश्व सृष्ट्यादीन्यपि मां न लिम्पन्ति आसक्तं न कुर्वन्ति। निरहंकारत्वात्। आप्तकामत्वेन मम कर्मफले स्पृहाभावाच्च मां न लिम्पन्तीति किं वक्तव्यम्। यतः कर्मफले स्पृहाराहित्येन मां योऽभिजानाति सोऽपि कर्मभिर्न बध्यते। मम निर्लेपत्वे कारणं निरहंकारत्वनिःस्पृहत्वादिकं जानतस्तस्याप्यहंकारादिशैथिल्यात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.14।।तथाहि न मामिति यतो न कर्मफल स्पृहेति इदमेव मम जीवतो विलक्षणत्वमिति मां योऽभिजानाति सोऽपि मद्धर्मा भवति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.14।।जिन कर्मोंका तू मुझे कर्ता मानता है वास्तवमें मैं उनका अकर्ता ही हूँ क्योंकि मुझमें अहंकारका अभाव है इसलिये वे कर्म देहादिकी उत्पत्तिके कारण बनकर मुझे लिप्त नहीं करते और उन कर्मोंके फलमें मेरी लालसा अर्थात् तृष्णा भी नहीं है। जिन संसारी मनुष्योंका कर्मोंमें मैं कर्ता हूँ ऐसा अभिमान रहता है एवं जिनकी उन कर्मोंमें और उनके फलोमें लालसा रहती है उनको कर्म लिप्त करते हैं यह ठीक है परंतु उन दोनोंका अभाव होनेके कारण वे ( कर्म ) मुझे लिप्त नहीं कर सकते। इस प्रकार जो कोई दूसरा भी मुझे आत्मरूपसे जान लेता है कि मैं कर्मोंका कर्ता नहीं हूँ मेरी कर्मफलमें स्पृहा भी नहीं है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता अर्थात् उसके भी कर्म देहादिके उत्पादक नहीं होते।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.14।। व्याख्या   चातुर्वर्ण्यं (टिप्पणी प0 235.1) मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः पूर्वजन्मोंमें किये गये कर्मोंके अनुसार सत्त्व रज और तम इन तीनों गुणोंमें न्यूनाधिकता रहती है। सृष्टिरचनाके समय उन गुणों और कर्मोंके अनुसार भगवान् ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य और शूद्र इन चारों वर्णोंकी रचना करते हैं (टिप्पणी प0 235.2)। मनुष्यके सिवाय देव पितर तिर्यक् आदि दूसरी योनियोंकी रचना भी भगवान् गुणों और कर्मोंके अनुसार ही करते हैं। इसमें भगवान्की किञ्चिन्मात्र भी विषमता नहीं है।चातुर्वर्ण्यम् पद प्राणिमात्रका उपलक्षण है। इसका तात्पर्य है कि मनुष्य ही चार प्रकारके नहीं होते अपितु पशु पक्षी वृक्ष आदि भी चार प्रकारके होते हैं जैसे पक्षियोंमें कबूतर आदि ब्राह्मण बाज आदि क्षत्रिय चील आदि वैश्य और कौआ आदि शूद्र पक्षी हैं। इसी प्रकार वृक्षोंमें पीपल आदि ब्राह्मण नीम आदि क्षत्रिय इमली आदि वैश्य और बबूल (कीकर) आदि शूद्र वृक्ष हैं। परन्तु यहाँ चातुर्वर्ण्यम् पदसे मनुष्योंको ही लेना चाहिये क्योंकि वर्णविभागको मनुष्य ही समझ सकते हैं और उसके अनुसार कर्म कर सकते हैं। कर्म करनेका अधिकार मनुष्यको ही है।चारों वर्णोंकी रचना मैंने ही की है इससे भगवान्का यह भाव भी है कि एक तो ये मेरे ही अंश हैं और दूसरे मैं प्राणिमात्रका सुहृद् हूँ इसलिये मैं सदा उनके हितको ही देखता हूँ। इसके विपरीत ये न तो देवताके अंश हैं और न देवता सबसे सुहृद् ही हैं। इसलिये मनुष्यको चाहिये कि वह अपने वर्णके अनुसार समस्त कर्तव्यकर्मोंसे मेरा ही पूजन करे (गीता 18। 46)।तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम् यहाँ अकर्तारम् पद कर्म करते हुए भी कर्तृत्वाभिमानका अभाव बतानेके लिये आया है। सृष्टिकी रचना पालन संहार आदि सम्पूर्ण कर्मोंको करते हुए भी भगवान् उन कर्मोंसे सर्वथा अतीत निर्लिप्त ही रहते हैं।सृष्टिरचनामें भगवान् ही उपादान कारण हैं और वे ही निमित्त कारण हैं। मिट्टीसे बने पात्रमें मिट्टी उपादान कारण है और कुम्हार निमित्त कारण है। मिट्टीसे पात्र बननेमें मिट्टी व्यय (खर्च) हो जाती है और उसे बनानेमें कुम्हारकी शक्ति भी खर्च होती है परन्तु सृष्टिरचनामें भगवान्का कुछ भी व्यय नहीं होता। वे ज्योंकेत्यों ही रहते हैं। इसलिये उन्हें अव्ययम् कहा गया है।जीव भी भगवान्का अंश होनेसे अव्यय ही है। विचार करें कि शरीरादि सब वस्तुएँ संसारकी हैं और संसारसे ही मिली हैं। अतः उन्हें संसारकी ही सेवामें लगा देनेसे अपना क्या व्यय हुआ हम तो (स्वरूपतः) अव्यय ही रहे। इसलिये यदि साधक शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि धन सम्पत्ति आदि मिले हुए सांसारिक पदार्थोंको अपना और अपने लिये न माने तो फिर उसे अपनी अव्ययताका अनुभव हो जायगा।यहाँ विद्धि पदसे भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताको समझनेकी आज्ञा दी है। कर्म करते हुए भी कर्मकर्मसामग्री और कर्मफलसे अपना कोई सम्बन्ध न रहना ही कर्मोंकी दिव्यता है।न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मे कर्मफले स्पृहा विश्वरचनादि समस्त कर्म करते हुए भी भगवान्का उन कर्मोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है। उनके कर्मोंमें विषमता पक्षपात आदि दोष लेशमात्र भी नहीं हैं। उनकी कर्मफलमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति ममता या कामना नहीं है। इसलिये वे कर्म भगवान्को लिप्त नहीं करते।उत्पत्तिविनाशशील वस्तु मात्र कर्मफल है। भगवान् कहते हैं कि जैसे मेरी कर्मफलमें स्पृहा नहीं है ऐसे ही तुम्हारी भी कर्मफलमें स्पृहा नहीं होनी चाहिये। कर्मफलमें स्पृहा न रहनेसे सम्पूर्ण कर्म करते हुए भी तुम कर्मोंसे बँधोगे नहीं।पीछेके (तेरहवें) श्लोकमें भगवान्ने बताया कि सृष्टिरचनादि समस्त कर्मोंका कर्ता होते हुए भी मैं अकर्ता हूँ अर्थात् मुझमें कर्तृत्वाभिमान नहीं है और इस श्लोकमें बताते हैं कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है अर्थात् मुझमें भोक्तृत्वाभिमान भी नहीं है। अतः साधकको भी इन दोनोंसे रहित होना चाहिये। फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों ही नहीं रहते। कर्तृत्वभोक्तृत्व ही संसार है। अतः इनके न रहनेसे मुक्ति स्वतःसिद्ध ही है।इति मां योऽभिजानाति मनुष्यमें जब कामनाएँ उत्पन्न होती हैं तब उसकी दृष्टि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंपर रहती है। उत्पत्तिविनाशशील (अनित्य) पदार्थोंपर दृष्टि रहनेसे वह नित्य भगवान्को तत्त्वसे नहीं जान सकता। पर कामनाओंके मिटनेसे जब अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है तब भगवान्की ओर स्वतः दृष्टि जाती है। भगवान्की ओर दृष्टि जानेपर मनुष्य जान जाता है कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं इसलिये उनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं। भगवान् तो जीवोंको कर्मबन्धनसे रहित करनेके लिये ही उन्हें मनुष्यशरीर देते हैं पर इस बातको न समझनेके कारण जीव कर्मोंसे नयेनये सम्बन्ध मानकर और बन्धन उत्पन्न कर लेता है। इसलिये कर्तापन और फलेच्छा न होनेपर भी वे केवल कृपा करके जीवोंको कर्मबन्धनसे रहित करके उनका उद्धार करनेके लिये ही सृष्टिरचनाका कार्य करते हैं। भगवान्को इस तरह जान लेनेसे मनुष्य भगवान्की ओर खिंच जाता है उमा राम सुभाउ जेहिं जाना। ताहि भजनु तजि भाव न आना।।(मानस 5। 34। 2)कर्मभिर्न स बध्यते भगवान्के कर्म तो दिव्य हैं ही सन्तमहात्माओंके कर्म भी दिव्य हो जाते हैं। वास्तवमें सन्तमहात्मा ही नहीं मनुष्यमात्र अपने कर्मोंको दिव्य बना सकता है। जब कर्मोंमें मलिनता (कामना ममता आसक्ति आदि) होती है तब वे कर्म बाँधनेवाले हो जाते हैं। जब मलिनताके दूर हो जानेपर कर्म दिव्य हो जाते हैं तब वे उसे नहीं बाँधते। इतना ही नहीं वे कर्म उस कर्ताको और दूसरोंको भी (उसके अनुसार आचरण करनेसे) मुक्त करनेवाले हो जाते हैं। अपने कर्मोंको दिव्य बनानेका सरल उपाय है संसारसे मिली हुई वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर (संसारकी और संसारके लिये मानते हुए) संसारकी सेवामें लगा देना।विचार करना चाहिये कि हमारे पास शरीर आदि जितनी भी बाह्य वस्तुएँ हैं उन सबको हम साथ लाये नहीं और जायँगे तब साथ ले जा सकते नहीं उनके रहते हुए उनमें इच्छानुसार परिवर्तन कर सकते नहीं उन्हें इच्छानुसार रख सकते नहीं अर्थात् उनपर हमारा कोई आधिपत्य नहीं है। इसी प्रकार जन्मजन्मान्तरोंसेसाथ आये सूक्ष्म और कारणशरीर भी परिवर्तनशील और प्रकृतिके कार्य हैं इसलिये उनके साथ भी हमारा सम्बन्ध नहीं है। वे वस्तुएँ अपने लिये भी नहीं हैं क्योंकि उनके मिलनेपर भी और मिले यह इच्छा रहती है। यदि वे वस्तुएँ अपने लिये होतीं तो और मिलनेकी इच्छा नहीं रहती। ऐसा होनेपर भी उन वस्तुओँको अपनी और अपने लिये मानना कितनी बड़ी भूल है उन वस्तुओंमें जो अपनापन दीखता है वह वास्तवमें केवल उनका सदुपयोग करनेके लिये है उनपर अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं।सेवा करनेके लिये तो सब अपने हैं पर लेनेके लिये कोई अपना नहीं है। संसारकी तो बात ही क्या है भगवान् भी लेनेके लिये अपने नहीं हैं अर्थात् भगवान्से भी कुछ नहीं लेना है प्रत्युत अपनेआपको ही भगवान्के समर्पित करना है। कारण कि जो वस्तु हमें चाहिये और हमारे हितकी है वह भगवान्ने हमें पहलेसे ही बिना माँगे दे रखी है और ज्यादा दे रखी है कम नहीं। हमारी जरूरतको जितना भगवान् समझते हैं उतना हम समझ भी नहीं सकते क्योंकि भगवान्की उदारता अपार है। उनके सामने हमारी समझ तो बहुत ही अल्प है। इसलिये उनसे माँगना किस बातका जो कुछ हमें मिला है उसीका हमें सदुपयोग करना है। वस्तुओँको अपनी और अपने लिये न मानकर निष्कामभावपूर्वक दूसरोंके हितमें लगा देना ही वस्तुओँका सदुपयोग है। इससे कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और महान् आनन्दस्वरूप परमात्माका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें अपना उदाहरण देकर अब आगेके श्लोकमें भगवान् मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हुए अर्जुनको निष्कामभावपूर्वक अपना कर्तव्यकर्म करनेकी आज्ञा देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.13 4.14।।चातुर्वर्ण्यमिति। न मामिति। मम किल कथमाकाशकल्पस्य कर्मभिः लेपः आकाशप्रतिमत्वं कामनाभावात्। इति (S इत्यनेन) ज्ञानप्रकारेण यो भगवन्तमेवाश्रयते सर्वत्र सर्वदाआनन्दघनं परमेश्वरमेव न वासुदेवात्परमस्ति किंचित् इति रीत्या ( N K नीत्या) विमृशति तस्य किं कर्मभिः बन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.14।।ईश्वरस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वयोर्वस्तुतोऽभावे कर्मतत्फलसंबन्धवैधुर्यं फलतीत्याह येषां त्विति। कर्मतत्फलसंस्पर्शशून्यमीश्वरं पश्यतो दर्शनानुरूपं फलं दर्शयति न मामिति। तानि कर्माणीति येषां कर्मणामहं कर्ता तवाभिमतस्तानीति यावत्। देहेन्द्रियाद्यारम्भकत्वेन तेषां कर्मणामीश्वरे संस्पर्शाभावे तस्य तत्कारणावस्थायामहंकाराभावं हेतुं करोति अहंकाराभावादिति। कर्मफलतृष्णाभावाच्चेश्वरं कर्माणि न लिम्पन्तीत्याह नचेति। उक्तमेव प्रपञ्चयति येषां त्विति। तदभावात्कर्मस्वहं कर्तेत्यभिमानस्य तत्फलेषु स्पृहायाश्चाभावादित्यर्थः। ईश्वरस्य कर्मनिर्लेपेऽपि क्षेत्रज्ञस्य किमायातमित्याशङ्क्योत्तरार्धं व्याचष्टे इत्येवमिति। अभिज्ञानप्रकारमभिनयति नाहमिति। ज्ञानफलं कथयति स कर्मभिरिति। कर्मासंबन्धं विदुषि विशदयति तस्यापीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.14।।अपव्याख्यानस्य दूषणान्तरं सूचयन् क्रियावैलक्षण्यकथनस्य का सङ्गतिः इत्यत उत्तरेण सङ्गतिमाह अत एवेति। एवशब्देनास्मद्व्याख्यान एवायं हेतुहेतुमद्भावो युज्यते न परव्याख्यान इति सूचयति। जीवानां कर्मलेपेऽभिनिवेशादिकं कारणं तस्य नास्तीति। मिथ्यात्वं तु जीवक्रियायामपि समानमिति तेषामपि लेपाभावे किमाश्रय आक्षेपः स्यात् ज्ञानेन विशेष इति चेत् न तस्याश्रवणात्। लेपनिवारणं च व्यर्थम् तस्यापि मिथ्यात्वेन ज्ञातव्यत्वात्। हेतुहेतुमतोरुक्तत्वात्न मे कर्म इति किमर्थं इत्यत आह इतश्चेति। नन्वात्मार्थं भगवतः फलस्पृहाभावेऽपि परार्थमस्त्येव तत्कथमेवमुच्यते इत्यत आह इच्छेति। तत्र कर्मफले येन तत्प्राप्तिपर्यन्तं मनसो विक्षेपः सोऽभिनिवेशः। अत्र प्रमाणमाह तच्चेति।व्यत्ययो बहुलम् अष्टा.3।1।85 इति व्यत्ययः। ज्ञानं ज्ञानमिव इति मामित्येवं ज्ञानिनो मुक्तिः फलमुच्यते। सा च वर्तमानप्रत्ययेन। प्राक् च भूंतप्रत्ययेनमद्भावमागताः 4।10 इति। तत्रैकजीववादिनामाक्षेपमुद्भाव्य प्रतिषेधति न चेति। केचिदिदानीं मुक्ता भवन्ति केचिद्भूता इति पक्षेऽतीत एव काले क्रमेण सर्वमुक्तिः स्यात्। तथा चेदानीं संसारानुपलम्भः स्यादिति शङ्कनीयम्। कस्मात् यतः श्रुतिरेवमाशङ्क्य पर्यहार्षीदित्याह तथा हीति। हृदा बुद्ध्या च इत्येतत्कथं वा युज्यते उक्ताक्षेपादित्याशङ्कायामनन्ता जीवा इत्युत्तरम्। ननु कालोऽप्यनन्तोऽत् इत्यस्योत्तरमाह अनन्तवदिति। यथा भगवान् कालक्षणेभ्योऽप्यतिशयेनानन्तस्तथाऽनन्ताः कुत इति होवाच इति श्रुत्यन्तरमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.14।।अत एवन मां कर्माणि लिम्पन्ति 4।14 इतश्च न लिम्पन्तीत्याह न मे कर्मफले स्पृहेति। इच्छामात्रं त्वस्ति न तु तत्राभिनिवेशः। तच्चोक्तम् आकाङ्क्षन्नपि देवोऽसौ नेच्छते लोकवत्परः। न ह्याग्रहस्तस्य विष्णोर्ज्ञानं कामो हि तस्य तु इति। न च केचिन्मुक्ता भवन्तीति क्रमेण सर्वमुक्तिः। तथा हि श्रुतिः ज्ञात्वा तमेवं मनसा हृदि च भूयो न मृत्युमुपयाति विद्वान् म.ना.उ. इति। कथं वा इत्यनन्ता वेत्यनन्तवदिति होवाच इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.14।।यत इमानि विचित्रसृष्ट्यादीनि न मां कर्माणि लिम्पन्ति न मां संबध्नन्ति। न मत्प्रयुक्तानि इमानि देवमनुष्यादिवैचित्र्याणि सृज्यानां पुण्यपापरूपकर्मविशेषप्रयुक्तानि इत्यर्थः। अतः प्राप्ताप्राप्तविवेकन विचित्रसृष्ट्यादेः न अहं कर्ता। यतश्च सृष्टाः क्षेत्रज्ञाः सृष्टिलब्धकरणकलेवराः सृष्टिलब्धं भोग्यजातं फलसङ्गादिहेतुस्वकर्मानुगुणं भुञ्जते सृष्ट्यादिकर्मफले च तेषाम् एव स्पृहा इति न मे स्पृहा।तथा सूत्रकारः वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् (ब्र0 सू0 2।1।34) इति। तथा आह भगवान् पराशरः निमित्तमात्रमेवायं सृज्यानां सर्गकर्माणि। प्रधानकारणीभूता यतो वै सृज्यशक्तयः।।निमित्तमात्रं मुक्त्वेदं नान्यत्किञ्चिदपेक्ष्यते। नीयते तपतां श्रेष्ठ स्वशक्त्या वस्तु वस्तुताम्।। (वि0 पु0 1।4।5152) इति। सृज्यानां देवादीनां क्षेत्रज्ञानां सृष्टेः कारणमात्रम् एव अयं परमपुरुषः देवादिवैचित्र्ये तु प्रधानकारणं सृज्यभूतक्षेत्रज्ञानां प्राचीनकर्मशक्तय एव। अतो निमित्तमात्रं मुक्तवा सृष्टेः कर्तारं परमपूरुषं मुक्त्वा इदं क्षेत्रज्ञवस्तु देवादिविचित्रभावे न अन्यद् अपेक्षते स्वगतप्राचीनकर्मशक्त्या एव हि देवादिवस्तुभावं नीयते इत्यर्थः।एवम् उक्तेन प्रकारेण सृष्ट्यादेः कर्तारम् अपि अकर्तारं सृष्ट्यादिकर्मफलसङ्गरहितं च यो माम् अभिजानाति स कर्मयोगारम्भविरोधिभिः फलसङ्गादिहेतुभिः प्राचीनकर्मभिः न संबध्यते मुच्यते इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.14।। न मां तानि कर्माणि लिम्पन्ति देहाद्यारम्भकत्वेन अहंकाराभावात्। न च तेषां कर्मणां फलेषु मे मम स्पृहा तृष्णा। येषां तु संसारिणाम् अहं कर्ता इत्यभिमानः कर्मसु स्पृहा तत्फलेषु च तान् कर्माणि लिम्पन्ति इति युक्तम् तदभावात् न मां कर्माणि लिम्पन्ति। इति एवं यः अन्योऽपि माम् आत्मत्वेन अभिजानाति नाहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहा इति सः कर्मभिः न बध्यते तस्यापि न देहाद्यारम्भकाणि कर्माणि भवन्ति इत्यर्थः।।नाहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहा इति

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【 Verse 4.15 】

▸ Sanskrit Sloka: एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभि: | कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वै: पूर्वतरं कृतम् ||

▸ Transliteration: evaṁ jñātvā kṛtaṁ karma pūrvairapi mumukṣubhiḥ | kuru karmaiva tasmāttvaṁ pūrvaiḥ pūrvataraṁ kṛtam ||

▸ Glossary: evaṁ: thus; jñātvā: knowing well; kṛtaṁ: performed; karma: work; pūrvaiḥ: by the ancient people; api: also; mumukṣubhiḥ: by those seeking liberation; kuru: perform; karma: prescribed duty; eva: only; tasmāt: therefore; tvaṁ: you; pūrvaiḥ: by the predecessors; pūrvataraṁ: as in the past; kṛtaṁ: as performed

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.15 All the wise and liberated souls of ancient times have acted with this understanding and thus attained liberation. Just as the ancients did, perform your duty with this understanding.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.15।।पूर्वकालके मुमुक्षुओंने भी इस प्रकार जानकर कर्म किये हैं इसलिये तू भी पूर्वजोंके द्वारा सदासे किये जानेवाले कर्मोंको ही (उन्हींकी तरह) कर।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.15।। पूर्व के मुमुक्ष पुरुषों द्वारा भी इस प्रकार जानकर ही कर्म किया गया है इसलिये तुम भी पूर्वजों द्वारा सदा से किये हुए कर्मों को ही करो।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.15 एवं thus? ज्ञात्वा having known? कृतम् (was) done? कर्म action? पूर्वैः by ancients? अपि also? मुमुक्षुभिः seekers after freedom? कुरु perform? कर्म action? एव even? तस्मात् therefore? त्वम् thou? पूर्वैः by ancients?,पूर्वतरम् in the olden time? कृतम् done.Commentary Knowing thus that the Self can have no desire for the fruits of actions and cannot be tainted by them? and knowing that no one can be tainted if he works without egoism? attachment and expectation of fruits? do thou perform your duty.If your heart is impure? perform actions for its purification. If you have attained AtmaJnana or the knowledge of the Self? work for the wellbeing of the world. The ancients such as Janaka and others performed actions in the days of yore. So do thou also perform action.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.15. Realizing in this fashion, action had been under-taken also by ancient seekers of salvation. Hence, you too should perform, by all means, the more ancient action that had been performed by the ancients.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.15 In the light of wisdom, our ancestors, who sought deliverance, performed their acts. Act thou also, as did our fathers of old.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.15 Knowing thus, even ancient seekers for liberation and work. Therefore, do your wok only as the ancients did in olden times.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.15 Having known thus, duties were performed even by the ancient seekers of Liberation. Thererfore you undertake action itself as was performed earlier by the ancient ones.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.15 Having known this, the ancient seekers after freedom also performed action; therefore do thou also perform action, as did the ancients in days of yore.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.15 Evam etc. Therefore being purified by this [sort of] conviction you too should perform actions that are to be necessarily performed. But, if it is said that success would result just from the non-performance of action, that is not correct. For -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.15 Actions of the kind described above were performed even by the aspirants of old for liberation, who have become free from evil after knowing Me in this way. Therefore, after having got rid of the sins by knowledge of Me in the aforesaid way, perform actions in the same way as they were performed by those ancients like Vivasvan, Manu etc., in olden times, in the way in which their performance was taught by Me even then. I shall declare it again in what follows.

Sri Krsna stresses the difficulty of undertaking the type of Karma that is going to be taught now.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.15 Jnatva, having known; evam, thus, that 'I am not an agent; I have no desire for the results of actions'; karma, duties; krtam, were undertaken; api, even; purvaih, by the ancient; mumuksubhih, seekers of Liberation. Tasmat, therefore; tvam, you; kuru, undertake; karma, action; eva, itself. You ought not to sit ietly, or even renounce. Therefore, you (undertake actions) because they were performed by the ancients as well-if you have no Self-knowledge, then (undertake actions) for self-purification; or, if you have Self-knowledge, then (undertake actions) in order to prevent people from going astray-, as were krtam, performed; purvataram, earlier; purvaih, by the ancient ones, Janaka and others; not actions as are undertaken in the present day. [This last portion of the sentence is translated by some as follows: You should not undertake actions which are done in the present manner (i.e. do not perform actions in the manner undertakne by people nowadays, which neither purifies the mind nor helps people). (See G1. Pr. p. 114.) 'If action has to be undertaken here, then I shall do so following Your instruction itself. What is the use of specifying that it was done earlier by the ancient ones?' 'The answer is: Because there is a great difficult as regards actions.' How?

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.15।। परमात्मा में कर्तृत्व तथा फलासक्ति का अभाव है और उस आत्मस्वरूप का साक्षात् अनुभव कर लेने पर साधक में न इच्छा रहती है और न अहंकार जनित अन्य वृत्तियाँ। पूर्व अध्याय में वर्णित कर्मयोग का आचरण प्राचीन समय में अनेक बुद्धिमान मुमुक्ष पुरुषों ने किया था। अर्थ यह हुआ कि यह मार्ग कोई नवीन नहीं है।आपके उपदेशमात्र से मैं कर्मयोग का पालन करूँगा किन्तु इसमें पूर्व के मुमुक्षुओं का सन्दर्भ देने की क्या आवश्यकता है इसके उत्तर में भगवान् कहते हैं क्योंकि कर्म क्या है इस विषय को समझने में कठिनाई है कैसे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.15।। नाहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहेत्येवंज्ञात्वा पूर्वैरपि मुमुक्षुभिश्चित्तशुद्धिद्वारा ज्ञानार्थं कर्म कृतं तस्मात्त्वमपि कर्मैव कुरु। नापि तूष्णीमासनं नापि संन्यासम्। यस्मात्त्वत्तोऽपि पूर्वैर्जनकादिभिः ज्ञानिभिर्लोकसंग्रहार्थं अनादिसिद्धत्वात्पूर्वतरं कृतम्। यद्यज्ञो मुमुक्षुस्त्वं तर्हि सत्त्वशुद्य्धर्थं तत्त्वविच्चेत्तर्हि लोकसंग्रहार्थं कर्म कुर्वित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.15।।यतो नाहं कर्ता न मे कर्मफले स्पृहेति ज्ञानात्कर्मभिर्न बध्यते अतः एवं आत्मनोऽकर्तुः कर्मालेपं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरतिक्रान्तैरपि अस्मिन् युगे ययातियदुप्रभृतिभिर्मुमुक्षुभिः। तस्मात्त्वमपि कर्मैव कुरु न तूष्णीमासनं नापि संन्यासम्। यद्यतत्त्ववित्तदात्मशुद्ध्यर्थं तत्त्वविच्चेल्लोकसंग्रहार्थं पूर्वैः जनकादिभिः पूर्वतरं अतिपूर्वं युगान्तरेऽपि कृतम्।एतेनास्मिन्युगेऽन्ययुगे च पूर्वपूर्वतरैः कृतत्वादवश्यं त्वया कर्तव्यं कर्मेति दर्शयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.15।।एतदेव शिष्टाचारप्रदर्शनपूर्वकं ग्राहयति एवं ज्ञात्वेति। पूर्वतरं वेदोक्तत्वान्नत्वधुना केनचित्कल्पितमित्यर्थः। पूर्वतरं प्रथमतरं कृतं अत्यावश्यकत्वादिति वार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.15।।पूर्वैर्मुमुक्षुभिरपि विद्वद्भिरप्येवं मत्स्वरूपं ज्ञात्वा कर्म कृतं मदाज्ञारूपत्वात् कृतमिति भावः। तैर्मदाज्ञया कृतं त्वमपि पूर्वाध्यायोक्तप्रकारेण मदाज्ञयैव कुर्वित्याह एवं ज्ञात्वेति। तस्मादेवं बन्धकाभावादेव पूर्वैर्मुमुक्षुभिः कृतं त्वं मदाज्ञारूपत्वेन कर्म कुरु। कीदृशं पूर्वतरं परम्परया मुक्तैरपि मुमुक्षुदशायां कृतम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.15।।ये यथा मां प्रपद्यन्ते इत्यादिचतुर्भिः श्लोकैः प्रासङ्गिकमीश्व रस्य वैषम्यं परिहृत्य पूर्वोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयितुमनुस्मारयति एवमिति। अहंकारादिराहित्येन कृतं कर्म बन्धकं न भवतीत्येवं ज्ञात्वा पूर्वैर्जनकादिभिरपि मुमुक्षुभिः सत्त्वशुद्ध्यर्थं पूर्वतरं युगान्तरेष्वपि कृतम्। तस्मात्त्वमपि प्रथमं कर्मैव कुरु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.15।।एवं प्रासङ्गिकमुक्त्वा पूर्वोक्तयोगे कर्त्तव्यं कर्म प्रपञ्चयितुमनुस्मारयति एवं ज्ञात्वेति। पूर्वोक्तप्रकारेण योगिभावतो भगवता कृतं कर्म न बधन्कमिति ज्ञात्वा पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः कक्षीवन्नारदादिभिर्मन्वादिभिर्वा जनकादिभिर्वा कर्म स्वधर्माख्यं वक्ष्यमाणप्रकारेण कृतम् तस्मात्त्वमपि कर्मैव कुरु। न चेदमाधुनिकम् किन्तु पूर्वतरं पूर्वैश्च कृतम्। इति शिष्टाचारात्कर्त्तव्यता बोधिता।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.15।।मैं न तो कर्मोंका कर्ता ही हूँ और न मुझे कर्मफलकी चाहना ही है ऐसा समझकर ही पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंने भी कर्म किये थे। इसलिये तू भी कर्म ही कर। तेरे लिये चुपचाप बैठ रहना या संन्यास लेना यह दोनों ही कर्तव्य नहीं है। क्योंकि पूर्वजोंने भी कर्मका आचरण किया है इसलिये यदि तू आत्मज्ञानी नहीं है तब तो अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये और यदि तत्त्वज्ञानी है तो लोकसंग्रहके लिये जनकादि पूर्वजोंद्वारा सदासे किये हुए (प्रकारसे ही ) कर्म कर नये ढंगसे किये जानेवाले कर्म मत कर।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.15।। व्याख्या   नवें श्लोकमें भगवान्ने अपने कर्मोंकी दिव्यताका जो प्रसङ्ग आरम्भ किया था उसका यहाँ उपसंहार करते हैं।एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैरपि मुमुक्षुभिः अर्जुन मुमुक्षु थे अर्थात् अपना कल्याण चाहते थे। परन्तु युद्धरूपसे प्राप्त अपने कर्तव्यकर्मको करनेमें उन्हें अपना कल्याण नहीं दीखता प्रत्युत वे उसको घोरकर्म समझकर उसका त्याग करना चाहते हैं (गीता 3। 1)। इसलिये भगवान् अर्जुनको पूर्वकालके मुमुक्षु पुरुषोंका उदाहरण देते हैं कि उन्होंने भी अपनेअपने कर्तव्यकर्मोंका पालन करके कल्याणकी प्राप्ति की है इसलिये तुम्हें भी उनकी तरह अपने कर्तव्यका पालन करना चाहिये।तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें जनकादिका उदाहरण देकर तथा इसी (चौथे) अध्यायके पहलेदूसरे श्लोकोंमें विवस्वान् मनु इक्ष्वाकु आदिका उदाहरण देकर भगवान्ने जो बातें कही थी वही बात इस श्लोकमें भी कह रहे हैं।शास्त्रोंमें ऐसी प्रसिद्धि है कि मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर देना चाहिये क्योंकि मुमुक्षाके बाद मनुष्य कर्मका अधिकारी नहीं होता प्रत्युत ज्ञानका अधिकारी हो जाता है (टिप्पणी प0 238)। परन्तु यहाँ भगवान् कहते हैं कि मुमुक्षुओंने भी कर्मयोगका तत्त्व जानकर कर्म किये हैं। इसलिये मुमुक्षा जाग्रत् होनेपर भी अपने कर्तव्यकर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये प्रत्युत निष्कामभावपूर्वक कर्तव्यकर्म करते रहना चाहिये।कर्मयोगका तत्त्व है कर्म करते हुए योगमें स्थित रहना और योगमें स्थित रहते हुए कर्म करना। कर्म संसारके लिये और योग अपने लिये होता है। कर्मोंको करना और न करना दोनों अवस्थाएँ हैं। अतः प्रवृत्ति (कर्म करना) और निवृत्ति (कर्म न करना) दोनों ही प्रवृत्ति (कर्म करना) है। प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंसे ऊँचा उठ जाना योग है जो पूर्ण निवृत्ति है। पूर्ण निवृत्ति कोई अवस्था नहीं है।चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते। जो मनुष्य कर्म करनेकी इस विद्या(कर्मयोग) को जानकर फलेच्छाका त्याग करके कर्म करता है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता कारण कि फलेच्छासे ही मनुष्य बँधता है फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)। अगर मनुष्य अपने सुखभोगके लिये अथवा धन मान बड़ाई स्वर्ग आदिकी प्राप्तिके लिये कर्म करता है तो वे कर्म उसे बाँध देते हैं (गीता 3। 9)। परन्तु यदि उसका लक्ष्य उत्पत्तिविनाशशील संसार नहीं है प्रत्युत वह संसारसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये निःस्वार्थ सेवाभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है तो वे कर्म उसे बाँधते नहीं (गीता 4। 23)। कारण कि दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारकी तरफ हो जाता है जिससे कर्मोंका सम्बन्ध (राग) मिट जाता है और फलेच्छा न रहनेसे नया सम्बन्ध पैदा नहीं होता।कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् इन पदोंसे भगवान् अर्जुनको आज्ञा दे रहे हैं कि तू मुमुक्षु है इसलिये जैसे पहले अन्य मुमुक्षुओंने लोकहितार्थ कर्म किये हैं ऐसे ही तू भी संसारके हितके लिये कर्म कर।शरीर इन्द्रियाँ मन आदि कर्मकी सब सामग्री अपनेसे भिन्न तथा संसारसे अभिन्न है। वह संसारकी है और संसारकी सेवाके लिये ही मिली है। उसे अपनी मानकर अपने लिये कर्म करनेसे कर्मोंका सम्बन्ध अपने साथ हो जाता है। जब सम्पूर्ण कर्म केवल दूसरोंके हितके लिये किये जाते हैं तब कर्मोंका सम्बन्ध हमारे साथ नहीं रहता। कर्मोसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर योग अर्थात् परमात्माके साथ हमारे नित्यसिद्ध सम्बन्धका अनुभव हो जाता है जो कि पहलेसे ही है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पदोंसे कर्मोंको जाननेकी बात कही गयी थी। अब भगवान् आगेके श्लोकसे कर्मोंको तत्त्व से जाननेके लिये प्रकरण आरम्भ करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.15।।एवमिति। तस्मादनया बुद्ध्या पवित्रीकृतस्त्वमपि कर्माण्यवश्यं कर्तव्यानि कुरु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.15।।तव कर्मतत्फलसंबन्धाभावे तथा ज्ञानवतश्च तदसंबन्धे ममापि किं कर्मणेत्याशङ्क्य कर्मणि कर्तृत्वाभिमानं तत्फले स्पृहां चाकृत्वा मुमुक्षुवत्त्वया कर्म कर्तव्यमेवेत्याह नाहमित्यादिना। नाहं कर्तेत्येवमादि एवमा परामृश्यते तेन पूर्वैर्मुमुक्षुभिरनुष्ठितत्वेन हेतुनेत्यर्थः। कर्मैवेत्येवकारार्थमाह नेत्यादिना। त्वंशब्दस्य क्रियापदेन संबन्धः। तस्मादित्युक्तमेव स्फुटयति पूर्वैरिति। यदुक्तं किं मम कर्मणेति तत्र त्वमज्ञो वा तत्त्वविद्वा। यद्यज्ञस्तदा चित्तशुद्ध्यर्थं कुरु कर्मेत्याह यदीति। द्वितीयं प्रत्याह तत्त्वविदिति। कुरु कर्मेति संबन्धः। पूर्वैर्मूढैराचरितमित्येतावता किमिति विवेकवता मया तत्कर्तव्यमित्याशङ्क्याह जनकादिभिरिति। ते तावदेवं संपाद्य कर्म कृतवन्तो न तदिदानीमप्रामाणिकत्वादनुष्ठेयमित्याशङ्क्याह पूर्वतरमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.15।।नन्वेवं ज्ञात्वेति पुनरुक्तम् कर्मकरण आचारस्य प्रागेवोक्तत्वात् इत्यत आह एवमिति। यदि ज्ञानी कर्मभिर्न बद्ध्यते तर्हि ममापि ज्ञानित्वेन कर्मबन्धाभावात् कथं कर्मविधानं इत्याशङ्क्य ज्ञानिनामप्यधिकमोक्षाकाङ्क्षया कर्मकरणमाचारोऽत्रोच्यते। प्राक्तु जनकादीनां विवस्वदादीनां च विद्यमानमपि ज्ञानित्वं भगवता न विवक्षितमिति भावः। अत एव भाष्यकारेणतत्र कर्म कृत्वैव इत्याद्युक्तम्। न हि ज्ञानिनां कर्मज्ञानद्वारा मुक्तिहेतुः। मुमुक्षुभिरितितत्साधुकारिणि अष्टा.3।2।13 उप्रत्ययः। पूर्वैः कृतमित्यनेनैव पूर्वतर त्वस्योक्तत्वात् पुनरुक्तिरित्यत आह पूर्वतरमिति। तैरपि ततोऽपि पूर्वभावि कृतमित्यर्थः। कर्मणः क्षणिकत्वात्कथं तदेव कर्तव्यं इत्यतो वेदमुक्तम्। पूर्वमिव भवतीति पूर्वभावि अत एव कर्मेत्यनुवादः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.15।।एवं ज्ञात्वा कर्मकरणे आचारोऽप्यस्तीत्याह एवमिति। पूर्वतरं कर्म पूर्वभावीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.15।।एवं मां ज्ञात्वा अपि विमुक्तपापैः पूर्वैः अपि मुमुक्षुभिः उक्तलक्षणं कर्म कृतम्। तस्मात् त्वम् उक्तप्रकारमद्विषयज्ञानविधूतपापः पूर्वैः विवस्वन्मन्वादिभिः कृतं पूर्वतरं पुरातनं तदानीम् एव मया उक्तं वक्ष्यमाणाकारं कर्म एव कुरु।वक्ष्यमाणस्य कर्मणो दुर्ज्ञानताम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.15।। एवं ज्ञात्वा कृतं कर्म पूर्वैः अपि अतिक्रान्तैः मुमुक्षुभिः। कुरु तेन कर्मैव त्वम् न तूष्णीमासनं नापि संन्यासः कर्तव्यः तस्मात् त्वं पूर्वैरपि अनुष्ठितत्वात् यदि अनात्मज्ञः त्वं तदा आत्मशुद्ध्यर्थम् तत्त्वविच्चेत् लोकसंग्रहार्थं पूर्वैः जनकादिभिः पूर्वतरं कृतं न अधुनातनं कृतं निर्वर्तितम्।।तत्र कर्म चेत् कर्तव्यं त्वद्वचनादेव करोम्यहम् किं विशेषितेन पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् (गीता 4.15) इत्युच्यते यस्मात् महत् वैषम्यं कर्मणि। कथम्

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【 Verse 4.16 】

▸ Sanskrit Sloka: किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिता: | तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||

▸ Transliteration: kiṁ karma kimakarmeti kavayo’pyatra mohitāḥ | tat te karma pravakṣyāmi yaj jñātvā mokṣyase’śubhāt ||

▸ Glossary: kiṁ: what; karma: action; kiṁ: what; akarma: inaction; iti: thus; kavayaḥ: the wise; api: also; atra: in this matter; mohitāḥ: confused; tat: that; te: unto you; karma: action; pravakṣyāmi: I shall explain; yat: which; jñātvā: after knowing; mokṣyase: be liberated; aśubhāt: from ills

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.16 What is action and what is inaction, even the wise are con- fused. Let me explain to you what action is, knowing which you shall be liberated from all ills.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.16।।कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्मतत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा जिसको जानकर तू अशुभ(संसारबन्धन)से मुक्त हो जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.16।। कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस विषय में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रमित हो जाते हैं। इसलिये मैं तुम्हें कर्म कहूँगा (अर्थात् कर्म और अकर्म का स्वरूप समझाऊँगा) जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बन्धन) से मुक्त हो जाओगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.16 किम् what? कर्म action? किम् what? अकर्म inaction? इति thus? कवयः wise? अपि also? अत्र in this? मोहिताः (are) deluded? तत् that? ते to thee? कर्म action? प्रवक्ष्यामि (I) shall teach? यत् which? ज्ञात्वा having known? मोक्ष्यसे (thou) shalt be liberated? अशुभात् from evil.No Commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.16. Even the wise are perplexed about what is action and what is non-action; I shall preperly teach you the action, by knowing which you shall be freed from evil.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.16 What is action and what is inaction? It is a question which has bewildered the wise. But I will declare unto thee the philosophy of action, and knowing it, thou shalt be free from evil.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.16 What is action? What is non-action? Even the wise are puzzled in respect of these. I shall declare to you that kind of action by knowing which you will be freed from evil.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.16 Even the intelligent are confounded as to what is action and what is inaction. I shall tell you of that action by knowing which you will become free from evil.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.16 What is action? What is inaction? As to this even the wise are confused. Therefore I shall teach thee such action (the nature of action and inaction) by knowing which thou shalt be liberated from the evil (of Samsara, the wheel of birth and death).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.16 See Comment under 4.17

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.16 What is the form of the action which should be done by an aspirant for liberation? And what is non-action? Knowledge about the true nature of the acting self, is spoken of as non-action. The wise, even the learned scholars, are puzzled, i.e., do not truly know, both these - the proper form of the actions to be performed and the proper form of knowledge included in it. I shall teach you that action which includes knowledge within itself. Knowing, i.e., following it, you will be released from evil, i.e., from the bondage of Samsara. Knowledge about the work to be performed results in its performance.

Why is it so difficult to know this Karma? Sri Krsna replies:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.16 Kavayah api, even the intelligent; mohitah, are confounded in this subject of action etc.; iti atra, as to; kim karma, what is action; and kim akarma, what is inaction. Therefore, pravaksyami, I shall tell; te, you; of karma, action; akarma ca, as also of inaction; jnatva, by knowing; yat, which-action etc.; moksyase, you will become free: asubhat, from evil, from transmigration. 'And you should not think thus: What is called karma is the movement of the body etc. as are well-known in the world; and akarma, inaction, is not doing those, (i.e.) sitting ietly. What is there to understand (further) in that regard?' 'Why?' The answer is:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.16।। सामान्य दृष्टि से हम किसी भी प्रकार की शारीरिक क्रिया को कर्म और वैसी क्रिया के अभाव को अकर्म समझते है। दैनिक जीवन के कार्यकलापों के सन्दर्भ में यह परिभाषा योग्य ही है। परन्तु दर्शनशास्त्र के दृष्टिकोण से कर्म और अकर्म के लक्षण भिन्न है।आत्मविकास की दृष्टि से कर्म का तात्पर्य केवल उसका स्थूल रूप जो शरीर द्वारा व्यक्त होता है नहीं समझना चाहिये किन्तु उसके साथ ही उसी कर्म के पीछे जो सूक्ष्म उद्देश्य है उसे भी ध्यान में रखना आवश्यक है। कर्म अपने आप में न अच्छा होता है और न बुरा। कर्म के उद्देश्य से कर्म का स्वरूप निश्चित किया जाता है। जैसे किसी फल की सुन्दरता से ही हम नहीं कह सकते कि वह खाने योग्य है अथवा नहीं क्योंकि वह तो उस फल में निहित तत्त्वों पर निर्भर करता है। उसी प्रकार अत्यन्त श्रेष्ठ प्रतीत होने वाले कर्म भी अपराधपूर्ण हो सकते हैं यदि उनका उद्देश्य निम्नस्तरीय और पापपूर्ण हो।इसलिये यहाँ कहा गया है कि कर्मअकर्म का विवेक करने में कवि लोग भी मोहित होते हैं। आजकल कविता लिखने वाले व्यक्ति को ही कवि कहा जाता है किन्तु पूर्व काल में उपनिषदों के मन्त्र द्रष्टा ऋषियों के लिये अथवा बुद्धिमान् पुरुषों के लिये यह शब्द प्रयुक्त होता था। प्रेरणा प्राप्त कोई भी पुरुष जो श्रेष्ठ सत्य को उद्घाटित करता था सिद्धकवि कहा जाता था।कर्मअकर्म की कठिन समस्या की ओर संकेत करके श्रीकृष्ण अर्जुन को आश्वासन देते हैं कि वे उसे कर्मअकर्म का तत्त्व समझायेंगे जिसे जानकर मनुष्य स्वयं को सांसारिक बन्धनों से मुक्त कर सकता है।यह सर्वविदित है कि कोई भी क्रिया कर्म है और क्रिया का अभाव शान्त बैठना अकर्म है। इसके विषय में और अधिक जानने योग्य क्या बात है इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.16।।ननु कर्म कर्तव्यं चेत्त्वदुत्त्यैवाहमिदं कर्मेति खबुद्य्धा विचार्य करोमि किं पूर्वैः पूर्वतरं कतमिति विशेषितेनेत्याशङ्क्य कर्मणि महावैषम्यस्य सत्त्वात् तस्य पूर्वौरत्यादिविशेषितत्वेन तव प्रवृत्तिस्तस्मिन्सुकरेत्याशयेन कर्मणो दुर्विज्ञेयत्वमाह किमिति। यत्तु तच्च तत्त्वविद्भिः सह विचार्य कर्तव्यं न लोकपरम्परामात्रेणेत्याहिति तच्चिन्त्यम्। कुरु कर्मैव तस्मात्त्वं पूर्वैः पूर्वतरं कृतमिति स्वयमतिनिर्बन्धेनोक्त्वा पुनस्तत्रैवानिर्बन्धं वदतः परमेश्वरस्य पूर्वोपरविरोधापत्तेः। अत्रास्मिन्कर्मादिविषये कवयो मेधाविनोऽपि मोहं किं कर्म किम कर्मेति संशयं गताः प्राप्ताः। अतस्ते तुभ्यमहं कर्म अकारप्रश्लेषेणाकर्म च प्रवक्ष्यामि। यत्कर्मादि ज्ञात्वाऽशुभात्संसारान्मोक्ष्यसे।

▸ Sanskrit

Chapter 4 (Part 10)

Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.16।।ननु कर्मविषये किं कश्चित्संशयोऽप्यस्ति येन पूर्वैः पूर्वतरं कृतमित्यतिनिर्बध्नासि अस्त्येवेत्याह नौस्थस्य निष्क्रियेष्वपि तटस्थवृक्षेषु गमनभ्रमदर्शनात् तथाऽदूराच्चक्षुःसंनिकृष्टेषु गच्छत्स्वपि पुरुषेष्वगमनभ्रमदर्शनात् परमार्थतः किं कर्म किंवा परमार्थतोऽकर्मेति कवयो मेधाविनाऽप्यत्रास्मिन्विषये मोहिताः मोहं निर्णयासामर्थ्यं प्राप्ताः। अत्यन्तदुर्निरूपत्वादित्यर्थः। तत्तस्मात्ते तुभ्यमहं कर्म अकारप्रश्लेषेण छेदादकर्म च प्रवक्ष्यामि प्रकर्षेण संदेहोच्छेदेन वक्ष्यामि। यत्कर्माकर्मस्वरूपं ज्ञात्वा मोक्ष्यसे मुक्तो भविष्यस्यशुभात्संसारात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.16।।आवश्यकत्वेऽपि न कर्मणो गतानुगतिकतयानुष्ठानं कर्तव्यं किंतुज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत इतिवचनात्कर्माश्रितं किंचिद्विशेषं ज्ञापयितुमुपोद्धातयति किं कर्मेति। यतः कर्माकर्मणी कवीनामपि दुर्निरूपे तत्तस्मात्ते तुभ्यं कर्म अकर्म चाकारप्रश्लेषेण ग्राह्यम्। ते उभे प्रवक्ष्यामि यत् द्वयं ज्ञात्वाऽशुभात्संसारान्मोक्ष्यसे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.16।।ननु लौकिकफलसाधकं कर्मरूपमेवेति चेत्तत्राह किं कर्मेति। किं कर्म कीदृशं कर्म कर्तव्यम् अकर्म किम् अकर्म कीदृशं अकर्तव्यम् इत्यत्र एतज्ज्ञाने कवयोऽपि शब्दार्थज्ञातारोऽपि मोहिता मोहं भ्रमं प्राप्ताः। तत्तस्मात्कारणात्ते कर्म कर्तव्यं प्रवक्ष्यामि प्रकर्षेण सन्देहाभावपूर्वकं कथयामीत्यर्थः। यत्कर्म ज्ञात्वा अशुभादकर्मणो लौकिकफलसाधकात् मोक्ष्यसे मुक्तो भविष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.16।।तच्च तत्त्वविद्भिः सह विचार्य कर्तव्यं न लोकपरम्परामात्रेणेत्याह किं कर्मेति। किं कर्म कीदृशं कर्मकरणम् किमकर्म कीदृशं कर्माकरणमित्येतस्मिन्नर्थे विवेकिनोऽपि मोहिताः अतो यज्ज्ञात्वानुष्ठाय अशुभात्संसारान्ममोक्ष्यसे मुक्तो भविष्यसि तत्कर्माकर्म च तुभ्यमहं प्रवक्ष्यामि श्रृणु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.16।।तदिदं विचार्यैव कर्त्तव्यं न लोकपरम्परामात्रत इत्यत आह किं कर्म किमकर्मेति।किं विहितमुक्तं किञ्चाऽविहितं अत्र कवयोऽपि मोहिताः तदहं सुबोधतया वक्ष्यामि यत्कर्म ज्ञात्वा तृतीयाद्विकर्मणोऽशुभाद्विमुक्तो भविष्यसि।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.16।।यदि कर्म ही कर्तव्य है तो मैं आपकी आज्ञासे ही करनेको तैयार हूँ फिर पूर्वैः पूर्वतरं कृतम् विशेषण देनेकी क्या आवश्यकता है इसपर कहते हैं कि कर्मके विषयमें बड़ी भारी विषमता है अर्थात् कर्मका विषय बड़ा गहन है। सो किस प्रकार कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस कर्मादिके विषयमें बड़ेबड़े बुद्धिमान् भी मोहित हो चुके हैं इसलिये मैं तुझे वह कर्म और अकर्म बतलाऊँगा जिस कर्मादिको जानकर तू अशुभसे यानी संसारसे मुक्त हो जायगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.16।। व्याख्या   किं कर्म साधारणतः मनुष्य शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाओँको ही कर्म मान लेते हैं तथा शरीर और इन्द्रियोंकी क्रियाएँ बंद होनेको अकर्म मान लेते हैं। परन्तु भगवान्ने शरीर वाणी और मनके द्वारा होनेवाली मात्र क्रियाओँको कर्म माना है शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः (गीता 18। 15)।भावके अनुसार ही कर्मकी संज्ञा होती है। भाव बदलनेपर कर्मकी संज्ञा भी बदल जाती है। जैसे कर्म स्वरूपसे सात्त्विक दीखता हुआ भी यदि कर्ताका भाव राजस या तामस होता है तो वह कर्म भी राजस या तामस हो जाता है। जैसे कोई देवीकी उपासनारूप कर्म कर रहा है जो स्वरूपसे सात्त्विक है। परन्तु यदि कर्ता उसे किसी कामनाकी सिद्धिके लिये करता है तो वह कर्म राजस हो जाता है और किसीका नाश करनेके लिये करता है तो वही कर्म तामस हो जाता है। इस प्रकार यदि कर्तामें फलेच्छा ममता और आसक्ति नहीं है तो उसके द्वारा किये गये कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् फलमें बाँधनेवाले नहीं होते। तात्पर्य यह है कि केवल बाहरी क्रिया करने अथवा न करनेसे कर्मके वास्तविक स्वरूपका ज्ञान नहीं होता। इस विषयमें शास्त्रोंको जाननेवाले बड़ेबड़े विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं अर्थात् कर्मके तत्त्वका यथार्थ निर्णय नहीं कर पाते। जिस क्रियाको वे कर्म मानते हैं वह कर्म भी हो सकता है अकर्म भी हो सकता है और विकर्म भी हो सकता है। कारण कि कर्ताके भावके अनुसार कर्मका स्वरूप बदल जाता है। इसलिये भगवान् मानो यह कहते हैं कि वास्तविक कर्म क्या है वह क्यों बाँधता है कैसे बाँधता है इससे किस तरह मुक्त हो सकते हैं इन सबका मैं विवेचन करूँगा जिसको जानकर उस रीतिसे कर्म करनेपर वे बाँधनेवाले न हो सकेंगे।यदि मनुष्यमें ममता आसक्ति और फलेच्छा है तो कर्म न करते हुए भी वास्तवमें कर्म ही हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे लिप्तता है। परन्तु यदि ममता आसक्ति और फलेच्छा नहीं है तो कर्म करते हुए भी कर्म नहीं हो रहा है अर्थात् कर्मोंसे निर्लिप्तता है। तात्पर्य यह है कि यदि कर्ता निर्लिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना दोनों ही अकर्म हैं और यदि कर्ता लिप्त है तो कर्म करना अथवा न करना दोनों ही कर्म हैं औरबाँधनेवाले हैं।किमकर्मेति भगवान्ने कर्मके दो भेद बताये हैं कर्म और अकर्म। कर्मसे जीव बँधता है और अकर्मसे (दूसरोंके लिये कर्म करनेसे) मुक्त हो जाता है।कर्मोंका त्याग करना अकर्म नहीं है। भगवान्ने मोहपूर्वक किये गये कर्मोंके त्यागको तामस बताया है (गीता 18। 7)। शारीरिक कष्टके भयसे किये गये कर्मोंके त्यागको राजस बताया गया है (गीता 18। 8)। तामस और राजस त्यागमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग होनेपर भी कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद नहीं होता। कर्मोंमें फलेच्छा और आसक्तिका त्याग सात्त्विक है (गीता 18। 9)। सात्त्विक त्यागमें स्वरूपसे कर्म करना भी वास्तवमें अकर्म है क्योंकि सात्त्विक त्यागमें कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। अतः कर्म करते हुए भी उससे निर्लिप्त रहना वास्तवमें अकर्म है।शास्त्रोंके तत्त्वको जाननेवाले विद्वान् भी अकर्म क्या है इस विषयमें मोहित हो जाते हैं। अतः कर्म करने अथवा न करने दोनों ही अवस्थाओंमें जिससे जीव बँधे नहीं उस तत्त्वको समझनेसे ही कर्म क्या है और अकर्म क्या है यह बात समझमें आयेगी। अर्जुन युद्धरूप कर्म न करनेको कल्याणकारक समझते हैं। इसलिये भगवान् मानो यह कहते हैं कि युद्धरूप कर्मका त्याग करनेमात्रसे तेरी अकर्मअवस्था (बन्धनसे मुक्ति) नहीं होगी (गीता 3। 4) प्रत्युत युद्ध करते हुए भी तू अकर्मअवस्थाको प्राप्त कर सकता है (गीता 2। 38) अतः अकर्म क्या है इस तत्त्वको तू समझ।निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना यही वास्तवमें अकर्मअवस्था है।कवयोऽप्यत्र मोहिताः साधारण मनुष्योंमें इतनी सामर्थ्य नहीं कि वे कर्म और अकर्मका तात्त्विक निर्णय कर सकें। शास्त्रोंके ज्ञाता बड़ेबड़े विद्वान् भी इस विषयमें भूल कर जाते हैं। कर्म और अकर्मका तत्त्व जाननेमें उनकी बुद्धि भी चकरा जाती है। तात्पर्य यह हुआ कि इनका तत्त्व या तो कर्मयोगसे सिद्ध हुए अनुभवी तत्त्वज्ञ महापुरुष जानते हैं अथवा भगवान् जानते हैं।तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि जीव कर्मोंसे बँधा है तो कर्मोंसे ही मुक्त होगा। यहाँ भगवान् प्रतिज्ञा करते हैं कि मैं वह कर्मतत्त्व भलीभाँति कहूँगा जिससे कर्म करते हुए भी वे बन्धनकारक न हों। तात्पर्य यह है कि कर्म करनेकी वह विद्या बताऊँगा जिससे तू कर्म करते हुए भी जन्ममरणरूप बन्धनसे मुक्त हो जायगा।कर्म करनेके दो मार्ग हैं प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग। प्रवृत्तिमार्गको कर्म करना कहते हैं और निवृत्तिमार्गको कर्म न करना कहते हैं। ये दोनों ही मार्ग बाँधनेवाले नहीं हैं। बाँधनेवाली तो कामना ममता आसक्ति है चाहे यह प्रवृत्तिमार्गमें हो चाहे निवृत्तिमार्गमें हो। यदि कामना ममता आसक्ति न हो तो मनुष्य प्रवृत्तिमार्ग और निवृत्तिमार्ग दोनोंमें स्वतः मुक्त है। इस बातको समझना ही कर्मतत्त्वको समझना है।दूसरे अध्यायके पचासवें श्लोकमें भगवान्ने योगः कर्मसु कौशलम् कर्मोंमें योग ही कुशलता है ऐसा कहकर कर्मतत्त्व बताया है। तात्पर्य है कि कर्मबन्धनसे छूटनेका वास्तविक उपाय योग अर्थात् समता ही है। परन्तु अर्जुन इस तत्त्वको पकड़ नहीं सके इसलिये भगवान् इस तत्त्वको पुनः समझानेकी प्रतिज्ञा कर रहे हैं।विशेष बात कर्मयोग कर्म नहीं है प्रत्युत सेवा है। सेवामें त्यागकी मुख्यता होती है। सेवा और त्याग ये दोनों ही कर्मनहीं हैं। इन दोनोंमें विवेककी ही प्रधानता है।हमारे पास शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि जितनी भी वस्तुएँ हैं वे सब मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। मिली हुई वस्तुको अपनी माननेका हमें अधिकार नहीं है। संसारसे मिली वस्तुको संसारकी ही सेवामें लगानेका हमें अधिकार है। जो वस्तु वास्तवमें अपनी है उस(स्वरूप या परमात्मा) का त्याग कभी हो ही नहीं सकता और जो वस्तु अपनी नहीं है उस(शरीर या संसार) का त्याग स्वतःसिद्ध है। अतः त्याग उसीका होता है जो अपना नहीं है पर जिसे भूलसे अपना मान लिया है अर्थात् अपनेपनकी मान्यताका ही त्याग होता है। इस प्रकार जो वस्तु अपनी है ही नहीं उसे अपना न मानना त्याग कैसे यह तो विवेक है।कर्मसामग्री (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि) अपनी और अपने लिये नहीं हैं प्रत्युत दूसरोंकी और दूसरोंके लिये ही हैं। इसका सम्बन्ध संसारके साथ है। स्वयंके साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं है क्योंकि स्वयं नित्यनिरन्तर निर्विकाररूपसे एकरस रहता है पर कर्मसामग्री पहले अपने पास नहीं थी बादमें भी अपने पास नहीं रहेगी और अब भी निरन्तर बिछुड़ रही है। इसलिये इसके द्वारा जो भी कर्म किया जाय वह दूसरोंके लिये ही होता है अपने लिये नहीं। इसमें एक मार्मिक बात है कि कर्मसामग्रीके बिना कोई भी कर्म नहीं किया जा सकता जैसे कितना ही बड़ा लेखक क्यों न हो स्याही कलम और कागजके बिना वह कुछ भी नहीं लिख सकता। अतः जब कर्मसामग्रीके बिना कुछ किया नहीं जा सकता तब यह विधान मानना ही पड़ेगा कि अपने लिये कुछ करना नहीं है। कारण कि कर्मसामग्रीका सम्बन्ध संसारके साथ है अपने साथ नहीं। इसलिये कर्मसामग्री और कर्म सदा दूसरोंके हितके लिये ही होते हैं जिसे सेवा कहते हैं। दूसरोंकी ही वस्तु दूसरोंको मिल गयी तो यह सेवा कैसे यह तो विवेक है।इस प्रकार त्याग और सेवा ये दोनों ही कर्मसाध्य नहीं हैं प्रत्युत विवेकसाध्य हैं मिली हुई वस्तु अपनी नहीं है दूसरोंकी और दूसरोंकी सेवामें लगानेके लिये ही है यह विवेक है। इसलिये मूलतः कर्मयोग कर्म नहीं है प्रत्युत विवेक है।विवेक किसी कर्मका फल नहीं है प्रत्युत प्राणिमात्रको अनादिकालसे स्वतः प्राप्त है। यदि विवेक किसी शुभ कर्मका फल होता तो विवेकके बिना उस शुभ कर्मको कौन करता क्योंकि विवेकके द्वारा ही मनुष्य शुभ और अशुभ कर्मके भेदको जानता है तथा अशुभ कर्मका त्याग करके शुभ कर्मका आचरण करता है। अतः विवेक शुभ कर्मोंका कारण है कार्य नहीं। यह विवेक स्वतःसिद्ध है इसलिये कर्मयोग भी स्वतःसिद्ध है अर्थात् कर्मयोगमें परिश्रम नहीं है। इसी प्रकार ज्ञानयोगमें अपना असङ्ग स्वरूप स्वतःसिद्ध है और भक्तियोगमें भगवान्के साथ अपना सम्बन्ध स्वतःसिद्ध है।यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् जीव स्वयं शुभ है और परिवर्तनशील संसार अशुभ है। जीव स्वयं परमात्माका नित्य अंश होते हुए भी परमात्मासे विमुख होकर अनित्य संसारमें फँस गया है। भगवान् कहते हैं कि मैं उस कर्मतत्त्वका वर्णन करूँगा जिसे जानकर कर्म करनेसे तू अशुभसे अर्थात् जन्ममरणरूप संसारबन्धनसे मुक्त हो जायगा।इस श्लोकमें कर्मोंको जाननेका जो प्रकरण आरम्भ हुआ है उसका उपसंहार बत्तीसवें श्लोकमें एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे पदोंसे किया गया है।मार्मिक बातकर्मयोगका तात्पर्य है कर्म संसारके लिये और योग अपने लिये। कर्मके दो अर्थ होते हैं करना और न करना। कर्म करना और न करना ये दोनों प्राकृत अवस्थाएँ हैं। इन दोनों ही अवस्थाओंमें अहंता रहती है। कर्म करनेमें कार्यरूपसे अहंता रहती है और कर्म न करनेमें कारण रूपसे। जबतक अहंता है तबतक संसारसे सम्बन्ध है और जबतक संसारसे सम्बन्ध है तबतक अहंता है। परन्तु योग दोनों अवस्थाओंसे अतीत है। उस योगका अनुभव करनेके लिये अहंतासे रहित होना आवश्यक है। अहंतासे रहित होनेका उपाय है कर्म करते हुए अथवा न करते हुए योगमें स्थित रहना और योगमें स्थित रहते हुए कर्म करना अथवा न करना। तात्पर्य है कि कर्म करने अथवा न करने दोनों अवस्थाओँमें निर्लिप्तता रहे योगस्थः कुरु कर्माणि (गीता 2। 48)।कर्म करनेसे संसारमें और कर्म न करनेसे परमात्मामें प्रवृत्ति होती है ऐसा मानते हुए संसारसे निवृत्त होकर एकान्तमें ध्यान और समाधि लगाना भी कर्म करना ही है। एकान्तमें ध्यान और समाधि लगानेसे तत्त्वका साक्षात्कार होगा इस प्रकार भविष्यमें परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति करनेका भाव भी कर्मका सूक्ष्म रूप है। कारण कि करनेके आधारपर ही भविष्यमें तत्त्वप्राप्तिकी आशा होती है। परन्तु परमात्मतत्त्व करने और न करने दोनोंसे अतीत है।भगवान् कहते हैं कि मैं वह कर्मतत्त्व कहूँगा जिसे जाननेसे तत्काल परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जायगी। इसके लिये भविष्यकी अपेक्षा नहीं है क्योंकि परमात्मतत्त्व सम्पूर्ण देश काल वस्तु व्यक्ति शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिमें समानरूपसे परिपूर्ण है। मनुष्य अपनेको जहाँ मानता है परमात्मा वहीं हैं। कर्म करते समय अथवा न करते समय दोनों अवस्थाओंमें परमात्मतत्त्वका हमारे साथ सम्बन्ध ज्योंकात्यों रहता है। केवल प्रकृतिजन्य क्रिया और पदार्थसे सम्बन्ध माननेके कारण ही उसकी अनुभूति नहीं हो रही है।अहंतापूर्वक किया हुआ साधन और साधनका अभिमान जबतक रहता है तबतक अहंता मिटती नहीं प्रत्युत दृढ़ होती है चाहे वह अहंता स्थूलरूपसे (कर्म करनेसे साथ) रहे अथवा सूक्ष्मरूपसे (कर्म न करनेके साथ) रहे।मैं करता हूँ इसमें जैसी अहंता है ऐसी ही अहंता मैं नहीं करता हूँ इसमें भी है। अपने लिये कुछ न करनेसे अर्थात् कर्ममात्र संसारके हितके लिये करनेसे अहंता संसारमें विलीन हो जाती है। सम्बन्ध   अब भगवान् कर्मोंके तत्त्वको जाननेकी प्रेरणा करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.16 4.17।।अथ उच्यतेऽकरणादेव सिद्धिरिति तन्न। यतः किं कर्म इति। कर्मणो ह्यपि इति। कर्माकर्मणोर्विभागः दुष्परिज्ञानः। तथा च विहिते कर्मण्यपि (S N तथा च ( N omit च) कर्मण्यपि ( णोऽपि) मध्ये दुष्टं कर्मास्ति अग्निष्टोमे इव पशुवधः। विरुद्धेऽपि च कर्मणि शुभमस्ति कर्म। तथाहि ( N यथा instead of तथा हि) हिंस्रप्राणिवधे प्रजोपतापाभावः। अकरणेऽपि च शुभाशुभं कर्म अस्ति वाङ्मनसकृतानां कर्मणामवश्यं भावात् (S श्यभावित्वात् K ( n) वित्वादिति) तेषां ज्ञानमन्तरेण दुष्परिहरत्वात्। अतः कुशलैरपि गहनत्वात् कर्म न ज्ञायते अनेन (S तेन) शुभकर्मणा शुभमस्माकं भविष्यति अनेन च कर्मणामनारंभेण मोक्षो न (नो) भविष्यति इति। तस्माद्वक्ष्यमाणो विज्ञानवह्निरेव अवश्यं सकलशुभाशुभकर्मेन्धनप्लोषसमर्थः शरणत्वेनान्वेष्य इति भगवतोऽभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.16।।कर्मविशेषणमाक्षिपति तत्रेति। मनुष्यलोकः सप्तम्यर्थः। कर्मणि महतो वैषम्यस्य विद्यमानत्वात्तस्य पूर्वैरनुष्ठितत्वेन पूर्वतरत्वेन च विशेषितत्वे तस्मिन्प्रवृत्तिस्तव सुकरेति युक्तं विशेषणमिति परिहरति उच्यत इति। कर्मणि देहादिचेष्टारूपे लोकप्रसिद्धे नास्ति वैषम्यमिति शङ्कते कथमिति। विज्ञानवतामपि कर्मादिविषये व्यामोहोपपत्तेः सुतरामेव तव तद्विषये व्यामोहसंभवात्तदपोहार्थमाप्तवाक्यापेक्षणादस्ति कर्मणि वैषम्यमित्युत्तरमाह किं कर्मेति। तत्ते कर्मेत्यत्राकारानुबन्धेनापि पदं छेत्तव्यम्। कर्मादिप्रवचनस्य प्रयोजनमाह यज्ज्ञात्वेति। तत्कर्माकर्म चेति संबन्धः। अतो मेधाविनामपि यथोक्ते विषये व्यामोहस्य सत्त्वादित्यर्थः। कर्मणोऽकर्मणश्च प्रसिद्धत्वात्तद्विषये न किंचिद्बोद्धव्यमिति चोद्यमनूद्य निरस्यति नचेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.16।।किं कर्म इत्यस्य सङ्गतिर्न प्रतीयतेऽत आह कर्मेति। तस्य कर्तव्यतयोक्तस्य। किमर्थम् सम्यग्वक्तुम्। एतदेव सम्यग्वचनम् यज्जिज्ञासितकथनम् जिज्ञासा च दुर्विज्ञेयत्वोक्तौ भवतीति भावः। अत एव प्रकर्षेण वक्ष्यामीत्याह। ननूत्तरश्लोकेविकर्मणोऽपि गृहीतत्वादिहाप्यकर्मशब्दस्तदुपलक्षणार्थ इति स्थिते कर्मादीनामिति वक्तव्यंकर्मणः इति कथम् अनुष्ठेयत्वात्। अकर्मादिकं हेयतया ज्ञेयम्। अत एवतत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि इत्याह। तत्राप्यकर्मादेरुपलक्षणात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.16।।कर्म कुरु इत्युक्तम् तस्य कर्मणो दुर्विज्ञेयत्वमाह सम्यग्वक्तुम् किं कर्म किमकर्मेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.16।।मुमुक्षुणा अनुष्ठेयं कर्म किंस्वरूपम् अकर्म च किम् फलाभिसन्धिरहितं भगवदाराधनरूपं कर्म अकर्म इति कर्तुः आत्मनो याथात्म्यज्ञानम् उच्यते। अनुष्ठेयं कर्म तदन्तर्गतं ज्ञानं च किंस्वरूपम् इति उभयत्र कवयः विद्वांसः अपि मोहिताः यथार्थतया न जानन्ति। एवम् अन्तर्गतज्ञानं यत् कर्म तत् ते प्रवक्ष्यामि यद् ज्ञात्वा अनुष्ठाय अशुभात् संसारबन्धात् मोक्ष्यसे। कर्तव्यकर्मज्ञानं हि अनुष्ठानफलम्।कुतः अस्य दुर्ज्ञानता इति अत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.16।। किं कर्म किं च अकर्म इति कवयः मेधाविनः अपि अत्र अस्मिन् कर्मादिविषये मोहिताः मोहं गताः। तत् अतः ते तुभ्यम् अहं कर्म अकर्म च प्रवक्ष्यामि यत् ज्ञात्वा विदित्वा कर्मादि मोक्ष्यसे अशुभात् संसारात्।।न चैतत्त्वया मन्तव्यम् कर्म नाम देहादिचेष्टा लोकप्रसिद्धम् अकर्म नाम तदक्रिया तूष्णीमासनम् किं तत्र बोद्धव्यम् इति। कस्मात् उच्यते

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【 Verse 4.17 】

▸ Sanskrit Sloka: कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यं च विकर्मण: | अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कर्मणो गति: ||

▸ Transliteration: karmaṇo hyapi boddhavyaṁ boddhavyaṁ ca vikarmaṇaḥ | akarmaṇaśca boddhavyaṁ gahanā karmaṇo gatiḥ ||

▸ Glossary: karmaṇaḥ: of action; hi: for; api: also; boddhavyaṁ: should be understood; boddhavyaṁ: to be understood; ca: also; vikarmaṇaḥ: wrong action; akar- maṇaḥ: inaction; ca: also; boddhavyaṁ: should be understood; gahanā: mysterious; karmaṇaḥ: of action; gatiḥ: way.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.17 The complexities of action are very difficult to understand. Understand fully the nature of proper action by understanding the nature of wrong action and inaction.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.17।।कर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये और अकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये तथा विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये क्योंकि कर्मकी गति गहन है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.17।। कर्म का (स्वरूप) जानना चाहिये और विकर्म का (स्वरूप) भी जानना चाहिये (बोद्धव्यम्) तथा अकर्म का भी (स्वरूप) जानना चाहिये (क्योंकि) कर्म की गति गहन है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.17 कर्मणः of action? हि for? अपि also? बोद्धव्यम् should be known? बोद्धव्यम् should be known? च and? विकर्मणः of the forbidden action? अकर्मणः of inaction? च and? बोद्धव्यम् should be known? गहना deep? कर्मणः of action? गतिः the path.No Commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.17. Something has got to be understand of [good] action also; and something is to be understood of the wrong action; and something is to be understood of non-action. Difficult is to comprehend the way of action.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.17 It is necessary to consider what is right action, what is wrong action, and what is inaction, for mysterious is the law of action.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.17 For, there is what ought to be known in action. Likewise there is what ought to be known in multi-form action. And there is what ought to be understood in non-action. Thus mysterious is the way of action.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.17 For there is something to be known even about action, and something to be known about prohibited action; and something has to be known about inaction. The true nature of action is inscrutable.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.17 For verily (the true nature) of action (enjoined by the scriptures) should be known, also (that) of forbidden (or unlawful) action, and of inaction; hard to understand is the nature (path) of action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.16-17 Kim karma etc. Karmanah etc. The classification of [good] action and non-action is difficult to comprehend. That is to say there is bad action even among the action that has been ordained [in the scriptures], just as the animal-slaughter in the [pious] Agnistoma sacrifice. Again, even in the midst of action, that goes against [the scripture], there is auspicious action; for example there is an end for the trouble of the people in the act of killing a murderous animal. Even in the case of non-performance of action, there do exist [both] the auspicious and inauspicious acts; for there will be necessarily [some] acts performed by the sense of speech and by the mind as they are difficult to avoid without wisdom. Therefore on account of its mysterious nature, even hte experts have not properly understood the action as : 'Prosperity would be for as by this [particular] auspicious action; and emancipation would be for us by that [particular] non-undertaking of [certain] actions'. Therefore, it is the fire of wisdom taught in the seel, that alone is capable of positively burning down the fuel of all the auspicious and inauspicious actions; and hence that is to be sought after as a refuge. This is what is intended by the Bhagavat. In order to calrify the same, [the Lord] says -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.17 There is something which ought to be known in regard to action (Karma) which forms the means of attaining release. So also is the case in regard to 'multi-form or varied forms of action' (Vikarma). These are what have acired variegation as obligatory, occasional and desire-prompted works reiring numerous reisites. There is also something to be known about non-action, i.e., knowledge of the self. Therefore, deep, i.e., difficult to understand, is the way of action to be pursued by the seeker after release. What should be known as regards multi-form or variegated forms of Karma is that the attribution of differences leading to differences of fruits in obligatory, occasional and desire-prompted rites and acisition of things reired for their performace, etc., must be renounced, realising that the Sastras aim at only one result, i.e., release (and not several results said to accrue from these works). This has been declared in connection with the teaching, 'The resolute mind is one-pointed' (2.41) and is not elaborated here.

Sri Krsna explains what must be known in regard to action and non-action.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.17 Hi, for; there is something boddhavyam, to be known; api, even; karmanah, about action enjoined by the scriptures; and there is certainly something to be known vikarmanah, about prohibited action; so, also, there is something to be known akarmanah, about inaction, about sitting ietly. (The words 'there is' are to be supplied in all the three cases.) Because gatih, the true nature, i.e. the essential nature; karmanah, of action-implying karma etc., viz action, prohibited action and inaction; is gahana, inscrutable, hard to understand. 'What, again, is the essential nature of action etc. which has to be understood, and about which it was promised, "I shall tell you৷৷." (16)?' This is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.17।। जीवन क्रियाशील है। क्रिया की समाप्ति ही मृत्यु का आगमन है। क्रियाशील जीवन में ही हम उत्थान और पतन को प्राप्त हो सकते हैं। एक स्थान पर स्थिर जल सड़ता और दुर्गन्ध फैलाता है जबकि सरिता का प्रवाहित जल सदा स्वच्छ और शुद्ध बना रहता है। जीवन शक्ति की उपस्थिति में कर्मो का आत्यन्तिक अभाव नहीं हो सकता।चूँकि मनुष्य को जीवनपर्यन्त क्रियाशील रहना आवश्यक है इसलिये प्राचीन मनीषियों ने जीवन के सभी सम्भाव्य कर्मों का अध्ययन किया क्योंकि वे जीवन का मूल्यांकन उसके पूर्णरूप में करना चाहते थे। निम्नांकित तालिका में उनके द्वारा किये गये कर्मों का वर्गीकरण दिया हुआ है।क्रिया ही जीवन है। निष्क्रियता से उन्नति और अधोगति दोनों ही सम्भव नहीं। गहन निद्रा अथवा मृत्यु की कर्म शून्य अवस्था मनुष्य के विकास में न साधक है न बाधक।कर्म के क्षण मनुष्य का निर्माण करते हैं। यह निर्माण इस बात पर निर्भर करता है कि हम कौन से कर्मों को अपने हाथों में लेकर करते हैं। प्राचीन ऋषियों के अनुसार कर्म दो प्रकार के होते हैं निर्माणकारी (कर्तव्य) और विनाशकारी (निषिद्ध)। इस श्लोक के कर्म शब्द में मनुष्य के विकास में साधक के निर्माणकारी कर्तव्य कर्मों का ही समावेश है। जिन कर्मों से मनुष्य अपने मनुष्यत्व से नीचे गिर जाता है उन कर्मों को यहाँ विकर्म कहा है जिन्हें शास्त्रों ने निषिद्ध कर्म का नाम दिया है।कर्तव्य कर्मों का फिर तीन प्रकार से वर्गीकरण किया गया है और वे हैं नित्य नैमित्तिक और काम्य। जिन कर्मों को प्रतिदिन करना आवश्यक है वे नित्य कर्म तथा किसी कारण विशेष से करणीय कर्मों को नैमित्तिक कर्म कहा जाता है। इन दो प्रकार के कर्मों को करना अनिवार्य है। किसी फल विशेष को पाने के लिए उचित साधन का उपयोग कर जो कर्म किया जाता है उसे काम्य कर्म कहते हैं जैसे पुत्र या स्वर्ग पाने के लिये किया गया कर्म। यह सबके लिये अनिवार्य नहीं होता।आत्मविकास के लिये विकर्म का सर्वथा त्याग और कर्तव्य का सभी परिस्थितियों में पालन करना चाहिये। वैज्ञानिक पद्धति से किये हुए इस विश्लेषण में श्रीकृष्ण अकर्म की पूरी तरह उपेक्षा करते हैं।यह आवश्यक है कि अपने भौतिक अभ्युदय तथा आध्यात्मिक उन्नति के इच्छुक साधक कर्मों के इस वर्गीकरण को भली प्रकार समझें।भगवान् श्रीकृष्ण इस बात को स्वीकार करते हैं कि कर्मों के इस विश्लेषण के बाद भी सामान्य मनुष्य को कर्मअकर्म का विवेक करना सहज नहीं होता क्योंकि कर्म की गति गहन है।उपर्युक्त कथन से यह स्पष्ट होता है कि कर्म का मूल्यांकन केवल उसके वाह्य स्वरूप को देखकर नहीं बल्कि उसके उद्देश्य को भी ध्यान में रखते हुये करना चाहिये। उद्देश्य की श्रेष्ठता एवं शुचिता से उस व्यक्ति विशेष के कर्म श्रेष्ठ एवं पवित्र होंगे। इस प्रकार कर्म के स्वरूप का निश्चय करने में जब व्यक्ति का इतना प्राधान्य है तो भगवान् का यह कथन है कि कर्म की गति गहन है अत्यन्त उचित है।कर्म और अकर्म के विषय में और विशेष क्या जानना है इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.17।।ननु देहादिव्यापारः कर्माकरणं तूष्णीमासनमिति लोकप्रसिद्य्धैव ज्ञातुं शक्यमिति तत्राह कर्मण इति। हि यस्मात्कर्मणः शास्त्रविहितस्यापि तत्त्वं बोद्धव्यं ज्ञातव्यमस्ति। विकर्मणश्च प्रतिषिद्धस्य तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति। अकर्मणश्च तूष्णींभावस्य तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति। सर्वत्र तत्त्वमस्तीति पदाध्याहारः। भाष्ये त्वस्तीत्यस्याध्याहारकथनमुपलक्षणमित्यविरोधः। यस्माद्गहना कर्मण इत्युपलक्षणार्थम्। कर्माकर्मविकर्मणां गतिस्तत्त्वं याथात्म्यमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.17।।ननु सर्वलोकप्रसिद्धत्वादहमेवैतज्जानामि देहेन्द्रियादिव्यापारः कर्म तूष्णीमासनमकर्मेति तत्र किं त्वया वक्तव्यमिति तत्राह हि यस्मात् कर्मणः शास्त्रविहितस्यापि तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति। विकर्मणश्च प्रतिषिद्धस्य। अकर्मणश्च तूष्णींभावस्य। अत्र वाक्यत्रयेऽपि बोद्धव्यं तत्त्वमस्तीत्यध्याहारः। यस्मात् गहना दुर्ज्ञाना। कर्मण इत्युपलक्षण्। कर्माकर्मविकर्मणां गतिस्तत्त्वमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.17।।एतज्ज्ञानमावश्यकमित्याह कर्मण इति। तत्त्वं बोधव्यमस्तीति स्थलत्रयेऽपि तत्त्वमस्तीति पदद्वयाध्याहारः। कर्मणः शास्त्रविहितस्य। विकर्मणः प्रतिषिद्धस्य। अकर्मणस्तूष्णींभावस्य। गहना कर्मण इत्यत्र कर्मण इति त्रितयोपलक्षणम्। कर्मविकर्माकर्मणां गतिर्याथात्म्यं तत्त्वं गहनम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.17।।तदेवाह कर्मण इति। हीति निश्चयेन कर्मणः कर्तव्यस्य स्वरूपं बोद्धव्यं ज्ञातव्यम् ततो ज्ञात्वा कर्त्तव्यमित्यर्थः मत्स्वरूपज्ञानार्थं विकर्माकर्मणोः स्वरूपं त्यागार्थं ज्ञातव्यमित्याह। च पुनः विकर्मणो निषिद्धकर्मणः संसारफलसाधकस्य वा तस्य स्वरूपं तथैव। च पुनः अकर्मणोऽकर्तव्यस्य आसुरस्य स्वरूपं बोद्धव्यम्। कर्मणो गतिः त्रयाणां कर्त्तव्यस्य पर्यवसानफलाप्तिरूपा गहना दुर्विज्ञेयेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.17।।ननु लोकप्रसिद्धमेव कर्म देहादिव्यापारात्मकम् अकर्म च तदव्यापारात्मकम् अतः कथमुच्यते कवयोऽप्यत्र मोहं प्राप्ता इति तत्राह कर्मण इति। कर्मणो विहितव्यापारस्यापि तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति नतु लोकसिद्धमात्रमेव अकर्मणाऽविहितव्यापारस्यापि तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति विकर्मणोऽपि निषिद्धस्यापि तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति यतः कर्मणो गतिर्गहना। कर्मण इत्युपलक्षणार्थम्। कर्माकर्मविकर्मणां तत्त्वं बोद्धव्यमस्ति। यतो दुर्विज्ञेयमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.17।।कर्मणो ह्यपीति।यतश्च सुतरामेव कर्ममार्गो दुरत्ययः। अतोऽपि भजनं कार्यं भजनेन हि तादृशम्। अन्योन्यनाशकत्वं च कर्मणां भवति क्वचित्। कर्ममार्गे फलं तस्मान्न निरूप्यं हि सर्वथा। जायस्वेति म्रियस्वेति तृतीयो य उदाहृतः। प्रकीर्णकानां सर्वेषां तत्फलं परिकीर्तितम् इति। अतो विहितस्य कर्मणः स्वरूपमिति शेषः। अविहितस्य कर्मणोऽथ च निषिद्धकर्मणस्तत् बोद्धव्यम् तत्र कर्मण एव गतिर्गहना किं पुनरन्येषाम् इत्येकग्रहणं प्रकृतार्थम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.17।।तुझे यह नहीं समझना चाहिये कि केवल देहादिकी चेष्टाका नाम कर्म है और उसे न करके चुपचाप बैठ रहनेका नाम अकर्म है उसमें जाननेकी बात ही क्या है यह तो लोकमें प्रसिद्ध ही है। क्यों ( ऐसा नहीं समझना चाहिये ) इस पर कहते हैं कर्मकाशास्त्रविहित क्रियाका भी ( रहस्य ) जानना चाहिये विकर्मकाशास्त्रवर्जित कर्मका भी ( रहस्य ) जानना चाहिये और अकर्मका अर्थात् चुपचाप बैठ रहनेका भी ( रहस्य ) समझना चाहिये। क्योंकि कर्मोंकी अर्थात् कर्म अकर्म और विकर्मकी गति उनका यथार्थ स्वरूप तत्त्व बड़ा गहन है समझनेमें बड़ा ही कठिन है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.17।। व्याख्या   कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यम् कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना ही कर्मके तत्त्वको जानना है जिसका वर्णन आगे अठारहवें श्लोकमें कर्मण्यकर्म यः पश्येत् पदोंसे किया गया है।कर्म स्वरूपसे एक दीखनेपर भी अन्तःकरणके भावके अनुसार उसके तीन भेद हो जाते हैं कर्म अकर्म और विकर्म। सकामभावसे की गयी शास्त्रविहित क्रिया कर्म बन जाती है। फलेच्छा ममता और आसक्तिसे रहित होकर केवल दूसरोंके हितके लिये किया गया कर्म अकर्म बन जाता है। विहित कर्म भी यदि दूसरेका हित करने अथवा उसे दुःख पहुँचानेके भावसे किया गया हो तो वह भी विकर्म बन जाता है। निषिद्ध कर्म तो विकर्म है ही।अकर्मणश्च बोद्धव्यम् निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना ही अकर्मके तत्त्वको जानना है जिसका वर्णन आगे अठारहवें श्लोकमें अकर्मणि च कर्म यः पदोंसे किया गया है।बोद्धव्यम् च विकर्मणः कामनासे कर्म होते हैं। जब कामना अधिक बढ़ जाती है तब विकर्म (पापकर्म) होते हैं।दूसरे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया है कि अगर युद्धजैसा हिंसायुक्त घोर कर्म भी शास्त्रकी आज्ञासे और समतापूर्वक (जयपराजय लाभहानि और सुखदुःखको समान समझकर) किया जाय तो उससे पाप नहीं लगता। तात्पर्य यह है कि समतापूर्वक कर्म करनेसे दीखनेमें विकर्म होता हुआ भी वह अकर्म हो जाता है।शास्त्रनिषिद्ध कर्मका नाम विकर्म है। विकर्मके होनेमें कामना ही हेतु है (गीता 3। 36 37 (टिप्पणी प0 241)। अतः विकर्मका तत्त्व है कामना और विकर्मके तत्त्वको जानना है विकर्मका स्वरूपसे त्याग करना तथा उसके कारण कामनाका त्याग करना।गहना कर्मणो गतिः कौनसा कर्म मुक्त करनेवाला और कौनसा कर्म बाँधनेवाला है इसका निर्णय करना बड़ा कठिन है। कर्म क्या है अकर्म क्या है और विकर्म क्या है इसका यथार्थ तत्त्व जाननेमें बड़ेबड़े शास्त्रज्ञ विद्वान् भी अपनेआपको असमर्थ पाते हैं। अर्जुन भी इस तत्वको न जाननेके कारण अपने युद्धरूप कर्तव्यकर्मको घोर कर्म मान रहे हैं। अतः कर्मकी गति (ज्ञान या तत्त्व) बहुत गहन है। शङ्का   इस (सत्रहवें) श्लोकमें भगवान्ने बोद्धव्यं च विकर्मणः पदोंसे यह कहा कि विकर्मका तत्त्व भी जानना चाहिये। परन्तु उन्नीसवेंसे तेईसवें श्लोकतकके प्रकरणमें भगवान्ने विकर्म के विषयमें कुछ कहा ही नहीं फिर केवल इस श्लोकमें ही विकर्मकी बात क्यों कही  समाधान   उन्नीसवें श्लोकसे लेकर तेईसवें श्लोकतकके प्रकरणमें भगवान्ने मुख्यरूपसे कर्ममें अकर्म की बात कही है जिससे सब कर्म अकर्म हो जायँ अर्थात् कर्म करते हुए भी बन्धन न हो। विकर्म कर्मके बहुत पास पड़ता है क्योंकि कर्मोंमें कामना ही विकर्मका मुख्य हेतु है। अतः कामनाका त्याग करनेके लिये तथा विकर्मको निकृष्ट बतानेके लिये भगवान्ने विकर्मका नाम लिया है।जिस कामनासे कर्म होते हैं उसी कामनाके अधिक बढ़नेपर विकर्म होने लगते हैं। परन्तु कामना नष्ट होनेपर सब कर्म अकर्म हो जाते हैं। इस प्रकरणका खास तात्पर्य अकर्म को जाननेमें ही है और अकर्म होता है कामनाका नाश होनेपर। कामनाका नाश होनेपर विकर्म होता ही नहीं अतः विकर्मके विवेचनकी जरूरत ही नहीं। इसलिये इस प्रकरणमें विकर्मकी बात नहीं आयी है। दूसरी बात पापजनक और नरकोंकी प्राप्ति करानेवाला होनेके कारण विकर्म सर्वथा त्याज्य है। इसलिये भी इसका विस्तार नहीं किया गया है। हाँ विकर्मके मूल कारण कामना का त्याग करनेका भाव इस प्रकरणमें मुख्यरूपसे आया है जैसे कामसंकल्पवर्जिताः (4। 19) त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम् (4। 20) निराशीः (4। 21) समः सिद्धावसिद्धौ च (4। 22) गतसङ्गस्य यज्ञायाचरतः (4। 23)।इस प्रकार विकर्मके मूल कामना के त्यागका वर्णन करनेके लिये ही इस श्लोकमें विकर्मको जाननेकी बात कही गयी है। सम्बन्ध   अब भगवान् कर्मोंके तत्त्वको जाननेवाले मनुष्यकी प्रशंसा करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.16 4.17।।अथ उच्यतेऽकरणादेव सिद्धिरिति तन्न। यतः किं कर्म इति। कर्मणो ह्यपि इति। कर्माकर्मणोर्विभागः दुष्परिज्ञानः। तथा च विहिते कर्मण्यपि (S N तथा च ( N omit च) कर्मण्यपि ( णोऽपि) मध्ये दुष्टं कर्मास्ति अग्निष्टोमे इव पशुवधः। विरुद्धेऽपि च कर्मणि शुभमस्ति कर्म। तथाहि ( N यथा instead of तथा हि) हिंस्रप्राणिवधे प्रजोपतापाभावः। अकरणेऽपि च शुभाशुभं कर्म अस्ति वाङ्मनसकृतानां कर्मणामवश्यं भावात् (S श्यभावित्वात् K ( n) वित्वादिति) तेषां ज्ञानमन्तरेण दुष्परिहरत्वात्। अतः कुशलैरपि गहनत्वात् कर्म न ज्ञायते अनेन (S तेन) शुभकर्मणा शुभमस्माकं भविष्यति अनेन च कर्मणामनारंभेण मोक्षो न (नो) भविष्यति इति। तस्माद्वक्ष्यमाणो विज्ञानवह्निरेव अवश्यं सकलशुभाशुभकर्मेन्धनप्लोषसमर्थः शरणत्वेनान्वेष्य इति भगवतोऽभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.17।।तत्र हेत्वाकाङ्क्षापूर्वकमनन्तरं श्लोकमवतारयति कस्मादिति। त्रिष्वपि कर्माकर्मविकर्मसु बोद्धव्यमस्तीति यस्मादध्याहारस्तस्मान्मदीयं प्रवचनमर्थवदिति योजना। बोद्धव्यसद्भावे हेतुमाह यस्मादिति। त्रितयं प्रकृत्यान्यतमस्य गहनत्ववचनमयुक्तमित्याशङ्क्यान्यतमग्रहणस्योपलक्षणार्थत्वमुपेत्य विवक्षितमर्थमाह कर्मादीनामिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.17।।ननुयज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् 4।16 इत्यनेनैव कर्मस्वरूपं मुमुक्षुणा ज्ञातव्यमिति लब्धम् तत्किमर्थंकर्मणो हि इत्याद्युच्यते इत्यत आह न केवलमिति। तत्कर्मादिकम्। सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थ इति भावः। अत्रैव प्रमाणमाह तच्चेति। दर्शनापेक्षया समानकर्तृकत्वात् क्त्वानिर्देशः। कर्मशब्दार्थो भगवतैव वक्ष्यते। अकर्मशब्दार्थावाह अकर्मेति। किं तद्विकर्म इत्यत आह निषिद्धमिति। एवं चेत्कामाद्युपेतस्यकुत्रान्तर्भावः इति चेत् विकर्मणीति ब्रूमः। कथं तस्य निषिद्धत्वं इत्यत आह बन्धकत्वादिति। अस्त्वेवं शब्दार्थः योजना तु कथं इत्यतो लाघवार्थं द्वितीयपादयोजनां तावदाह तत इति। ततो विकर्मणः कर्मादि कर्माकर्म च इत्यादीत्यनेनाद्यतृतीयपादयोजनां सूचयति। कर्मणो विविच्य विकर्मादि बोद्धव्यम्। अकर्मणश्च विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमिति। ननुकवयोऽप्यत्र मोहिताः 4।16 इत्यनेन कर्मादेर्दुर्ज्ञेयत्वमुक्तम् तत्पुनः किमर्थमुच्यते इत्यत आह न चेति। ज्ञातुं स्वभावेनेति शेषः। एतच्च श्रोतुरधिकादरणननार्थमिति ज्ञेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.17।।न केवलं तज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसे ज्ञात्वैवेत्याशयवानाह कर्मण इति। तच्चोक्तम् अज्ञात्वा भगवान्कस्य कर्माकर्मविकर्मकम्। दर्शनं याति हि मुने कुतो मुक्तिश्च तद्विना इति। अकर्म कर्माकरणम् कर्माकर्मान्यद्विकर्म निषिद्धं कर्म बन्धकत्वात्। ततो विविच्य कर्मादि बोद्धव्यमित्यादि। न च शापादिनाकवयोऽप्यत्र मोहिताः 4।16 अशक्यं चैतज्ज्ञातुमित्याह गहनेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.17।।यस्मात् मोक्षसाधनभूते कर्मणः स्वरूपे बोद्धव्यम् अस्ति विकर्मणि च नित्यनैमित्तिककाम्यकर्मरूपेण तत्साधनद्रव्यार्जनाद्याकारेण च विविधताम् आपन्नं कर्म विकर्म। अकर्मणि ज्ञाने च बोद्धव्यम् अस्ति। गहना दुर्विज्ञाना मुमुक्षोः कर्मणो गतिः।विकर्मणि च बोद्धव्यम् नित्यनैमित्तिककाम्यद्रव्यार्जनादौ कर्मणि फलभेदकृतं वैविध्यं परित्यज्य मोक्षैकफलतया एकशास्त्रार्थत्वानुसन्धानम् तदेतद्व्यवसायात्मिका बुद्धिरेका (गीता 2।41) इत्यत्र एव उक्तम् इति न इह प्रपञ्च्यते।कर्माकर्मणोः बोद्धव्यम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.17।। कर्मणः शास्त्रविहितस्य हि यस्मात् अपि अस्ति बोद्धव्यम् बोद्धव्यं च अस्त्येव विकर्मणः प्रतिषिद्धस्य तथा अकर्मणश्च तूष्णींभावस्य बोद्धव्यम् अस्ति इति त्रिष्वप्यध्याहारः कर्तव्यः। यस्मात् गहना विषमा दुर्ज्ञेया कर्मणः इति उपलक्षणार्थं कर्मादीनाम् कर्माकर्मविकर्मणां गतिः याथात्म्यं तत्त्वम् इत्यर्थः।।किं पुनस्तत्त्वं कर्मादेः यत् बोद्धव्यं वक्ष्यामि इति प्रतिज्ञातम् उच्यते

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【 Verse 4.18 】

▸ Sanskrit Sloka: कर्मण्यकर्म य: पश्येदकर्मणि च कर्म य: | स बुद्धिमान्मनुष्येषु स युक्त: कृत्स्नकर्मकृत् ||

▸ Transliteration: karmaṇyakarma yaḥ paśyedakarmaṇi ca karma yaḥ | sa buddhimān manuṣyeṣu sa yuktaḥ kṛtsnakarmakṛt ||

▸ Glossary: karmaṇi: in action; akarma: inaction; yaḥ: one who; paśyet: sees; akarmaṇi: in inaction; ca: also; karma: action; yaḥ: one who; saḥ: he; buddhimān: wise; manuṣyeṣu: among men; saḥ: he; yuktaḥ: yogi; kṛtsnakarmakṛt: engaged in all activities

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.18 He who sees inaction in action and action in inaction, is wise and a yogi, Even if engaged in all activities.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.18।।जो मनुष्य कर्ममें अकर्म देखता है और जो अकर्ममें कर्म देखता है वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है योगी है और सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.18।। जो पुरुष कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखता है वह मनुष्यों में बुद्धिमान है वह योगी सम्पूर्ण कर्मों को करने वाला है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.18 कर्मणि in action? अकर्म inaction? यः who? पश्येत् would see? अकर्मणि in inaction? च and? कर्म action? यः who? सः he? बुद्धिमान् wise? मनुष्येषु among men? सः he? युक्तः Yogi? कृत्स्नकर्मकृत् performer of all actions.Commentary In common parlance action means movement of the body? movement of the hands and feet? and inaction means to sit iet.It is the idea of agency? the idea I am the doer that binds man to Samsara. If this idea vanishes? action is no action at all. It will not bind one to Samsara. This is inaction in action. If you stand as s spectator or silent witness of Natures activities? feeling Nature does everything I am nondoer (Akarta)? if you identify yourself with the actionless Self? no matter what work or how much of it is done? action is no action at all. This is inaction in action. By such a practice and feeling? action loses its binding nature.A man may sit ietly. He may not do anything. But if he has the idea of agency or doership? or if he thinks that he is the doer? he is every doing action? though he is sitting ietly. This is action in inaction. The restless mind will ever be doing actions even though one sits ietly. Actions of the mind are real actions. Nor can anyone even for one moment remain really actionless? for helplessly is everyone driven to action by the alities of Nature. (Chapter III.5)Inaction also induces the feeling of egoism. The inactive man says? I sit ietly I do nothing. Inaction? like action? is wrongly attributed to the Self.He is the performer of all actions who knows this truth. He has attained the end of all actions? i.e.? freedom or knowledge or perfection.When a steamer moves? the trees on the shore which are motionless? appear to move in the opposite direction to a man who is in the steamer. Moving objects that are very far away appear to be stationary or motionless. Even so in the case of the Self inaction is mistaken for action and,action for inaction.The Self is actionless (Akarta or nondoer? Nishkriya or without work). The body and the senses perform action. The actions of the body and the senses are falsely and wrongly attributed by the ignorant to the actionless Self. Therefore the ignorant man thinks? I act. He thinks that the Self is the doer or the agent of the action. This is a mistake. This is ignorance.Just as motion does not really belong to the trees on the shore which appear to move in the opposite direction to a man on board the ship? so also action does not really pertain to the Self.This ignorance which is the cause of birth and death vanishes when you attain Selfrealisaion.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.18. He, who finds non-action in the action, and action in the non-action, is an intelligent one, among men and is said to be a performer or destroyer of all actions.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.18 He who can see inaction in action, and action in inaction, is the wisest among men. He is a saint, even though he still acts.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.18 He who sees non-action in action and also action in non-action is wise among men. He is fit for release and has carried out all actions.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.18 He who finds inaction in action, and action in inaction, he is the wise one [Possessed of the knowledge of Brahman] among men; he is engaged in yoga and is a performer of all actions!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.18 He who seeth inaction in action and action in inaction, he is wise among men; he is a Yogi and performer of all actions.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.18 Karmani etc : He who finds the actions, [seemingly] of his own, to be non-actions [of his], on account of his being non-performer [of any action], because of his state of total tranility; and he who recognises the non-actions [of his] i.e., the actions performed by others, as actions being performed by himself (or who recognises the non-actions undertaken by others as being undertaken by himself), because of his intrinsic nature of the fully risen state; that person alone is a man of intelligence in the midst of all; and he [alone] performs action fully i.e., in its entirity. Therefore what fruit should be borne for him by what action ? This is at the stage of rising. But, at the stage of total tranility he injures, or cuts all actions. Thus he performs all action or performs no action. This is the secret and sacred knowledge, got by sitting near (by serving) the feet of the preceptors. Therefore -

▸ English Translation

Chapter 4 (Part 11)

of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.18 Here by the term 'non-action', the knowledge of the self, which is distinct from action and which forms the subject under consideration, is meant. 'He who sees non-action in action and also action in non-action,' denotes him who can perceive knowledge of the self even while action is being performed and who can also perceive action while engaged in non-action, i.e., knowledge of the self. What is the import of this saying? What is taught here is this: One can perceive, by constant contemplation on the truth about the self, that the action that is being performed in itself is a form of knowledge. One can also perceive that this knowledge is also of the form of Karma because of its being contained in Karma Yoga. Both these (i.e., action in the form of knowledge and knowledge in the form of actions) are accomplished by contemplation on the true nature of the self, even while work is being performed. Thus, he who can see actions as included in contemplation on the reality of the self, is wise, i.e., he knows the full meaning of the Sastras; he is fit among men, i.e., fit to attain release. He alone has fulfilled all actions, i.e., carried out the entire purpose of the Sastras. [The purport is that no contradiction between knowledge and action is felt by one who knows the philosophy of the self].

How is the form of knowledge accomplished through works which are obviously activities that are being performed? Sri Krsna explains:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.18 Since engagement and non-engagement (in action) depend on an agent, therefore, yah, he who; pasyet, ie. pasyati, finds; akarma, inaction, absence of action; karmani, in action-karma means whatever is done, action in general; in tha action-; and yah, who; finds karma, action; akarmani, in inaction, in the absence of action; sah, he; is buddhiman, a wise one; manusyesu, among men. All dealings involving an act, accessories, etc. exist certainly on the plane of ignorance, [Both engagement and non-engagement presuppose agentship and an act of some kind. This, however, holds good on the plane of ignorance, but not on that of Self-realization.] only so long as one has not attained to the Reality. He is a yogi, yuktah, engaged in yoga; and a krtsna-karma-krt, performer of all actions. One who discriminates between action and actions. One who discriminates between action and inaction is praised thus. Objection: Well, what is meant by this contradictory statement, 'He who finds inaction in action', and 'action in inaction'? For action cannot become inaction, nor inaction action. That being so, how can a witness have (such) an incongruous perception? Vedantin: Is it not that [Ast. reads na in place of nanu.-Tr.] to an ordinary foolsih observer, that which is reality is inaction appears as action, and similarly, action itself as inaction? That being so, in order to show things as they are the Lord says, 'He who finds inaction in action', etc. Therefore there is no incongruity. Besides, the alifications such as 'intelligent' etc. (thus) become logical. And by saying, 'there is something to be known', is implied the perception of things as they are. Moreover, freedom from evil cannot follow from an erroneous perception; whereas it has been said, 'by knowing which you will become free from evil'. Therefore, one account of action and inaction being perceived contrarily by the creatures, the Lord's utterance, 'he who finds inaction in action,' etc. is for dispelling their contrary perception. Not that in the empirical plane inaction has action as its receptacle, like a plum in a bowl! Nor even has action inaction as its receptacle, because inaction is a negation of action. Therefore, action and inaction are actually perceived contrarily by the ordinary persons-like seeing water in a mirage, or silver in nacre. Objection: Is it not that to every one action is action itself? Never is there an exception to this. Vedantin: That is not so, becuase when a boat is moving, motionless trees on the bank appear to move in the opposite direction to a man on the boat; an absence of motion is noticed in distant moving things which are not near one's eyes. Similarly, here also occurs the contrary perceptions, viz seeing action in inaction under the idea, 'I am doing', [Ast. omits 'aham karomi iti, under the idea, "I am doing"'.-Tr.] and seeing, inaction in acion,-because of which it is said, 'He who finds inaction in action,' etc. in order to eliminate them. As such, although this answer has been given more than once, still a man becomes repeatedly deluded under the influence of a totally opposite perception. And forgetting the truth that has been heard again and again, he repeatedly raises false issues and estions! And therefore, observing that the subject is difficult to understand, the Lord gives His answer again and again. The absence of action in the Self-well-known from the Vedas, Smrtis and logic, as stated in, '(It is said that) This is unmanifest; This is inconceivable' (2.25), 'Never is this One born, and never does It die' (2.20; Ka. 1.2.18), etc.-has been and will be spoken of. The contrary perception of action in that actionless Self, i.e. in inaction, is very deep-rooted, owing to which 'even the intelligent are confounded as to what is action and what is inaction.' And as a conseence of the superimposition of aciton pertaining to the body etc. on the Self, there arises such ideas as, 'I am an agent; this is my action; its result is to be enjoyed by me.' Similarly, with the idea, 'I shall remain iet, whery I shall be free from exertion, free from activity, and happy', and superimposing on the Self the cessation of activities pertaining to the body and organs and the resulting happiness, a man imagines, 'I shall not do anything; I shall sit ietly and happily.' That being so, the Lord says, 'he who finds inaction in action,' etc. with a view to removing this contrary understanding of man. And here in this world, though action belonging to the body and organs continues to be action, still it is superimposed by everyone on the acitonless, unchanging Self, as a result of which even a learned person things, 'I act.' Therefore, in action (karmani), which is universally considered by all people to be inherent in the Self, like the perception of motion in the (stationary) trees on the bank of a river-(in that action) he who contrariwise finds the fact of inaction, like perceiving absence of motion in those trees-. And, in inaction (akarmani) in the cessation of the activities pertaining to the body and organs and ascribed to the Self in the same way that actions are ascribed-, in that action, he who sees action because of egoism being implicit in the idea, 'I am happily seated ietly, without doing anything'-; he who knows thus the distinction between action and inaction, is wise, is learned among men; he is engaged in yoga, he is a yogi, and a performer of all actions. And he, freed from evil, attains fulfilment. This is the meaning. This verse is interpreted by some in another way. How? (Thus:) 'Since the daily obligatory duties (nityakarmas) certainly have no results when performed as a dedication to God, therefore, in a secondary sense, they are said to be inaction. Again, the non-performance of these (nitya-karmas) is inaction; since this produces an evil result, therefore it is called action, verily in a figurative sense. That being so, he who sees inaction in the daily obligatory duties (nitya-karmas) owing to the obsence of their results-in the same way as a cow that does not yield milk is said to be not a cow, though in reality it is so-so also, in the non-performance of the daily obligatory duties, i.e. in inaction, he who sees action since that yields results such as hell etc৷৷.' This explanation is not logical, because freedom from evil as a result of such knowledge is unreasonable, and the utterance of the Lord in the sentence, '৷৷.by knowing which you will become freed from evil', will be contradicted. How? Even if it be that liberation from evil follows from the performance of nitya-karmas, it cannot, however, follow from the knowledge of the absence of their results. For it has not been enjoined (anywhere) that knowledge of the nityakarmas (themselves), leads to the result of freedom from evil. Nor has this been stated here by the Lord Himself. Hery is refuted the 'seeing of action in inaction' [As explained by others.-Tr.], for (according to the opponent) 'seeing of action in inaction' has not been enjoined here [Here, in the present verse.] as a duty, but (what has been enjoined is) merely that performance of the nityakarmas is obligatory. Moreover, no result can accrue from the knowledge that evil arises from non-performance of nityakramas. Nor even has non-performance of nityakarmas. been enjoined as something that should be known. Besides, such results as freedom from evil, wisdom, engagement in yoga, and being a performer of all actions cannot reasonably follow from a false perception of action as inaction. Nor is this a eulogy of false perception. [The stated results accrue from correct knowledge, not from false perception; and correct knowledge alone is praise-worthy.] Indeed, false perception is itself an abvious form of evil! How can it bring about liberation from another evil? Surely, darkness does not become the remover of darkness! Opponent: Well, the seeing of inaction in action, or the seeing of action in inaction-that is not a false perception. Vadantin: What then? Opponent: It is a figurative statement based on the existence or the non-existence of results. Vedantin: Not so, because there is no such scriptural statement that something results from knowing action as inaction and inaction as action, even in a figurative sense. Besides, nothing particular is gained by rejecting what is heard of (in the scriptures) and imagining something that is not. Further, it was possible (for the Lord) to express in His own words that there is no result from the nityakarmas, and that by their non-performance one would have to go to hell. Under such circumstances, what was the need of the ambiguous statement, 'He who sees inaction in action,' etc., which is misleading to others? This being the case, such an explanation by anyone will be clearly tantamount to imagining that statement of the Lord as meant for deluding people. Moreover, this subject-matter (performance of nityakarmas) is not something to be protected with mystifying words. It is not even logical to say that the subject-matter will become easy for comprehension if it is stated again and again through different words. For, the subject-matter that was stated more clearly in, 'Your right is for action alone' (2.47), does not need any repetition. And everwhere it is said that whatever is good and ought to be practised deserves to be understood; anything purposeloss does not deserve to be known. Besides, neither is false knowledge worth aciring nor is the semblance of an object presented by it worth knowing. Nor even can any evil, which is an entity, arise from the non-performance of nityakarmas, which is a non-entity, for there is the statement, 'Of the unreal there is no being' (2.16), and (in the Upanisad) it has been pointed out, 'How can existence originate from nonexistence?' (Ch. 4.2.2). Since emergence of the existent from the nonexistent has been denied, therefore anyone's assertion that the existent originates from the nonexistent will amount to saying that a non-entity becomes an entity, and an entity becomes a non-entity! And that is not rational because it runs counter to all the means of valid knowledge. Further, the scriptures cannot enjoin fruitless actions, they being naturally painful; and it is illogical that what is painful should be done intentionally. Also, if it is admitted that falling into hell results from their non-performance (i.e. of the nityakarmas), then that too is surely a source of evil. In either case, whether one undertakes them or not, the scriptures will be imagined to be useless. And there will be a contradiction with your own standpoint when, after holding that the nityakarmas are fruitless, you assert that they lead to Liberation. Therefore, the meaning of 'He who finds inaction in action,' etc. is just what stands out literally. And the verse has been explained by us accordingly. The aforesaid perception of 'inaction in action,' etc. is being praised:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.18।। वेदान्त के वर्णनानुसार दीर्घकाल तक जब मनुष्य कर्तव्य कर्मों का पालन करता है तब सभी सच्चे साधकों के मन में एक प्रश्न उठता है कि उन्हें कैसे ज्ञात हो कि उन्होंने पूर्णत्व की स्थिति प्राप्त कर ली है। इस श्लोक में श्रीकृष्ण उस स्थिति का वर्णन कर रहे हैं।शारीरिक कर्म बुद्धि में स्थित किसी ज्ञात अथवा अज्ञात इच्छा की केवल स्थूल अभिव्यक्ति है। पूर्ण नैर्ष्कम्य की स्थिति का अर्थ निष्कामत्व की स्थिति होनी चाहिए इसे ही पूर्ण ईश्वरत्व की स्थिति कहते हैं। परन्तु यहाँ बताया हुआ लक्ष्य अनन्तस्वरूप पूर्णत्व न होकर ज्ञान की तीर्थयात्रा के मध्य पड़ने वाला एक स्थान है। विवेकी पुरुष सहजता से अवलोकन कर सकता है कि शरीर से अकर्म होने पर भी उसके मन और बुद्धि पूर्ण वेग से कार्य कर रहे होते हैं। वह यह भी अनुभव करता है कि शरीर द्वारा निरन्तर कर्म करते रहने पर भी वह शान्त और स्थिर रहकर केवल द्रष्टाभाव से उन्हें स्वयं अकर्म में रहते हुए देख सकता है यह अकर्म सात्त्विक गुण की चरम्ा सीमा है।ऐसा व्यक्ति समत्व की महान् स्थिति को प्राप्त हुआ समझना चाहिये जो ध्यानाभ्यास की सफलता के लिए अनिवार्य है। जैसा कि अनेक लोगों का विश्वास है कि कर्तव्य कर्म ही हमें पूर्णत्व की प्राप्ति करा देंगे ऐसा यहाँ नहीं कहा गया है। यह सर्वथा असंभव है। कर्म स्वयं ही इच्छा का शिशु है और कर्मों के द्वारा हम वस्तुओं को उत्पन्न कर सकते हैं और कोई भी उत्पन्न की हुई वस्तु स्वभाव से ही परिच्छिन्न विनाशी होती है। इस प्रकार कर्मों के द्वारा प्राप्त किया ईश्वरत्व रविवासरीय ईश्वरत्व होगा जो आगामी सोमवार को हम से विलग हो जायेगा श्री शंकराचार्य और अन्य आचार्यवृन्द पुनपुन यह दोहराते हैं कि कर्तव्य पालन से शुद्धान्तकरण वाले व्यक्ति में वह सार्मथ्य आ जाती है कि वह स्वयं के मन में तथा बाहर होने वाली क्रियाओं को साक्षी भाव से देख सकता है। जब वह यह जान लेता है कि उसके कर्म विश्व में हो रहे कर्मों के ही भाग हैं तब उसे एक अनिर्वचनीय समता का भाव प्राप्त हो जाता है जो ध्यान के अभ्यास के लिए आवश्यक है।किसी व्यक्ति के शान्त बैठे रहने मात्र से उसे निष्क्रिय नहीं कहा जा सकता। शारीरिक निष्क्रियता (अकर्म) किसी व्यक्ति के क्रियाहीन होने का मापदण्ड नहीं हो सकता। यह एक सुविदित तथ्य है कि जब कभी हम गम्भीर निर्माणकारी विचारों में मग्न होते हैं तो हम केवल शारीरिक दृष्टि से बिल्कुल शान्त और निष्क्रिय हो जाते हैं। इसलिए जीवन के पादमार्ग (फुटपाथ) पर ही चलने वाले लोगों की दृष्टि से जो व्यक्ति क्रियाहीन कहलाता है उसके हृदय में गम्भीर विचारों की क्रिया का चलना सम्भव हो सकता है। बोधि वृक्ष के नीचे बैठे हुए बुद्ध वाद्यों के समीप एक संगीतज्ञ हाथ में लेखनी लिए एक लेखक इन सब में कभीकभी निष्क्रयता देखी जाती है परन्तु वह निष्क्रियता सत्त्वगुण की है तमोगुण की नहीं। इन शान्त क्षणों के बाद ही वे अपनी श्रेष्ठ कलाकृति प्रस्तुत करते हैं। इस प्रकार जिस पुरुष में आत्मनिरीक्षण की क्षमता है वह अकर्म में कर्म को पहचान सकता है।एक विवेकी पुरुष जब जगत् में क्रियाशील रहता है उस समय मानो अपने आपको सब उपाधियों से अलग करके साक्षीभाव से स्वयं अकर्म में रहते हुए वह सब कर्मों को होते हुए देख सकता है।जब मैं इन शब्दों को लिख रहा हूँ तब मेरा ही कोई भाग मानों द्रष्टाभाव से देख सकता है कि हाथ में पकड़ी हुई लेखनी कागज पर शब्दों को लिख रही है। इसी प्रकार सभी कर्मों में स्वयं अकर्म में रहते हुए कर्मों को देखने की क्षमता दुर्लभ नहीं है। जो कोई पुरुष इसका उपयोग करेगा वह स्पष्ट रूप से सब कर्मों में इस द्रष्टा को अकर्म रूप से पहचान सकता है।रेल चलती है वाष्प नहीं। पंखा घूमता है विद्युत नहीं। इसी प्रकार ईंधन जलता है अग्नि नहीं। शरीर मन और बुद्धि कार्य करते है परन्तु चैतन्य आत्मा नहीं।इस प्रकार कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने वाले पुरुष को सब मनुष्यों में बुद्धिमान कहा जाता है। उसे यहाँ आत्मानुभवी नहीं कहा गया है। निसन्देह वह मनुष्यों में श्रेष्ठ है और आत्मप्राप्ति के अत्यन्त समीपस्थ है।संक्षेप में निष्कर्ष यह है कि निस्वार्थ भाव तथा अर्पण की भावना से कर्माचरण करने पर चित्त शुद्ध होता है और बुद्धि में कर्म में अकर्म और अकर्म में कर्म देखने की क्षमता आती है। यह क्षमता दैवी और श्रेष्ठ है क्योंकि इसके द्वारा ही हम अपने आप को सांसारिक बन्धनों से मुक्त कर सकते हैं।उपर्युक्त ज्ञान की प्रशंसा अगले श्लोकों में की गयी है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.18।।किं पुनः कर्मादस्तत्त्वं बोद्धव्यमस्तीत्यपेक्षायामाह कर्मणीति। नौस्थस्य तटस्थतरुपर्वतादिषुसमारोपितचाञ्चल्यप्रतीतिरिव लोकस्य देहाद्याश्रयं कर्मात्मन्यारोप्याहं कर्ता ममैतत्कर्मास्य फलं मया भोक्तव्यमिति भ्रान्त्या प्रतीतिस्तन्निवृत्त्यर्थं भगवानाह। कर्मणि क्रियत इति कर्म व्यापारमात्रमात्मन्यारोपितं तस्मिन्नकर्म पूर्वैर्जनकादिभिर्मुक्तैर्मुमुक्षुभिश्च नाहं कर्ता न ममैतत्कर्मास्य फलं मम नापेक्षितमिति कर्माभावो यथा दृष्टः तथाधुनातनोऽपि यः कश्चित्पश्यति सूर्यादिषु गच्छत्स्वप्यगमनप्रतीतिरिव देहेन्द्रियादिषु मायिकेषु नित्यं प्रवृत्तिनिवृत्तिरुपक्रियायुक्तेषु निर्व्यापारस्तूष्णीं सुखमास इति भ्रान्त्या प्रतीतिस्तन्निराकरणायाह अकर्मणि कर्म यः पश्यति। निवृत्तेरपि क्रियात्वात्। स मनुष्येषु बुद्धिमान् स युक्तः योगी कृत्स्नकर्मकृत् समस्तकर्मकृच्च स इति कर्माकर्मणोस्तत्त्वदर्शी स्तूयते। यत्तु परमेश्वराराधनलक्षणे कर्मणि विषयेऽकर्म कर्मेदं न भवति इति यः पश्येत्तस्य ज्ञानहेतुत्वेन बन्धकत्वाभावात्। अकर्मणि च विहिताकरणे कर्म यः पश्येत्प्रत्यवायोत्पादकत्वेन बन्धहेतुत्वात् स बुद्धिमानित्यादि तदसंगतम्। एवं ज्ञानादशुभान्मोक्षस्यानुपपत्त्या यज्ज्ञात्वेत्यादि भगवदुक्तिबाध प्रसङ्गात्। नहि नित्यानामनुष्ठानसापेक्षाणां कर्मणां फलाभावज्ञानान्मोक्षणं भवति। नापि कर्माकर्माकर्म कर्मेति मिथ्याज्ञानादशुभस्वरुपादन्यतोऽशुभान्मोक्ष उपपद्यते। अकर्मणश्चाभावरुपतया भावरुपस्य प्रत्यवायस्योत्पत्तेर्वर्णनम्कथमसतः सञ्जायत इति श्रुतिविरुद्धमिति संक्षेपः। विस्तरस्तु भाष्ये द्रष्टव्यः। यदपि कर्मणि ज्ञानकर्मणि दृश्ये जडे सद्रूपेण स्फुरणरुपेण चानुस्यूतं सर्वभ्रमाधिष्ठानमकर्मवेद्यं स्वप्रकाशचैतन्यं परमार्थदृष्ट्या यः पश्येत्तथाऽकर्मणि च स्वप्रकाशे दृग्वस्तुनि कल्पितं कर्म दृश्यं मायामयं न परमार्थसत् दृग्दृश्ययोः संबन्धानुपपत्तेः। एवं परस्पराध्यासेऽपि शुद्धं वस्तु यः पश्यति स परमार्थदर्शित्वादुद्धिमानित्यादिवास्तवैरेव गुणैः स्तूयत इति कैश्चद्य्धाख्यातं तदप्युपेक्ष्यम्। ज्ञानकर्मणः घटादिरुपस्याप्रस्तुत्वात्। एवं ज्ञात्वेत्यादिनोपक्रम्य किं कर्मेत्यनेन तत्र वैषम्यं प्रदर्श्य तस्य कर्मणो बोद्धव्यं तत्त्वमस्तीति निरुप्यानेन श्लोकेन तत्त्वकथनस्योचितत्वेन ज्ञानकर्मणोऽकर्तव्यस्य वर्णनमसंगतमिति दिक्। यदपि कर्माकर्मणी वक्तव्यत्वेन बोद्धव्यत्वेन चोपक्षिप्यात्र तयोर्लक्षणदर्शनमुचितम्। अतो यदकर्मणा विशेषितं तदेव कर्म नान्यदिति कर्मलक्षणम्। यच्च कर्मणा विशेषितं तदेवाकर्म इत्यकर्मलक्षणमिति व्याख्येयम्। अक्षरार्थस्तु कर्म यज्ञादिकं ससाधनं तदकर्म स्पन्दशून्यं कूटस्थं ब्रह्म यः पश्येत्कर्म तदङ्गेषु ब्रह्मदृष्टिमध्यसेत्।अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमाग्निरहं हुतम् इत्युक्तेः। अन्यथा यत्कृतं तदृथाचेष्टारुपमेवातो गहना कर्मणो गतिः। किं तदकर्म यत्कर्मण्यध्यस्यते इत्याकाङ्क्षायां यत्रैतत्कर्म पुण्यपापात्मकं दृश्यतेपुण्यः पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन इति तत्फलं च सुखदुःखादिकमहं सुख्यहं दुःखीति स प्रत्यक्चेतनोऽकर्म तत्रैवेदं कर्म अस्पन्दे स्पन्दात्मकं सर्पः असर्प इव अध्यस्तमित यः पश्येदिति तदप्यसंगतमेव प्रकरणविरोधस्यात्रापि तुल्यत्वात्। प्रस्तुतस्य तूष्णींभावात्मकस्याकर्मणः प्रत्यक्चैतन्यपरत्ववर्णने प्रस्तुतविरोधः स्फुटः। तथा कर्मण्यकर्मेत्यत्रापि कर्मप्रतियोगिकमेवाकर्मापेक्षितं नापि यज्ञरुपे कर्मणि ब्रह्मदृष्ट्यध्यासत्फलाभिसंधिकर्तृत्वाभिनिवेशत्यागं विनाऽशुभान्मोक्षणं भवति। तस्मात्सर्वज्ञैर्भाष्यकृद्भिरुक्तं व्याख्यानमेव समीचीनमिति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.18।।कीदृशं तर्हि कर्मादीनां तत्त्वमिति तदाह कर्मणि देहेन्द्रियादिव्यापारे विहिते प्रतिषिद्धे च अहं करोमीति धर्माध्यासेनात्मन्यारोपिरो नौस्थेनाचलत्सु तटस्थवृक्षादिषु समारोपिते चलनइवाकर्त्रात्मस्वरूपालोचनेन वस्तुतः कर्माभावं तटस्थवृक्षादिष्विव यः पश्येत्पश्यति। तथा देहेन्द्रियादिषु त्रिगुणमायापरिणामत्वेन सर्वदा सव्यापारेषु निर्व्यापारस्तूष्णीं सुखमास इत्यभिमानेन समारोपितेऽकर्मणि व्यापारोपरमे दूरस्थचक्षुःसंनिकृष्टपुरुषेषु गच्छत्स्वप्यगमन इव सर्वदा सव्यापारदेहेन्द्रियादिस्वरूपपर्यालोचनेन वस्तुगत्या कर्मनिवृत्त्याख्यप्रयत्नरूपं व्यापारं यः पश्येदुदाहृतपुरुषेषु गमनमिव। औदासीन्यावस्थायामप्युदासीनोऽहमास इत्यभिमान एव कर्म। एतादृशः परमार्थदर्शी स बुद्धिमानित्यादिना बुद्धिमत्त्वयोगयुक्तत्वसर्वधर्मकृत्त्वैस्त्रिभिर्धमैः स्तूयते। अत्र प्रथमपादेन कर्मविकर्मणोस्तत्त्वं कर्मशब्दस्य विहितप्रतिषिद्धपरत्वात् द्वितीयपादेन चाकर्मणस्तत्त्वं दर्शितमिति द्रष्टव्यम्। तत्र यत्त्वं मन्यसे कर्मणो बन्धहेतुत्वात्तूष्णीमेव मया सुखेन स्थातव्यमिति तन्मृषा। असति कर्तृत्वाभिमाने विहितस्य प्रतिषिद्धस्य वा कर्मणो बन्घहेतुत्वाभावात्। तथाच व्याख्यातं न मां कर्माणि लिम्पन्तीत्यादिना। सति च कर्तृत्वाभिमाने तूष्णीमहमास इत्यौदासीन्याभिमानात्मकं यत्कर्म तदपि बन्धहेतुरेव वस्तुतत्त्वापरिज्ञानात्। तस्मात्कर्मविकर्माकर्मणां तत्त्वमीदृशं ज्ञात्वा विकर्माकर्मणी परित्यज्य कर्तृत्वाभिमानफलाभिसंधिहानेन विहितं कर्मैव कुर्वित्यभिप्रायः। अपरा व्याख्या कर्मणि ज्ञानकर्मणि दृश्ये जडे सद्रूपेण स्फुरणरूपेण चानुस्यूतं सर्वभ्रमाधिष्ठानमकर्मावेद्यं स्वप्रकाशचैतन्यं परमार्थदृष्ट्या यः पश्येत्। तथा अकर्मणि च स्वप्रकाशे दृग्वस्तुनि कल्पितं कर्म दृश्यं मायामयं न परमार्थसत् दृग्दृश्ययोः संबन्धानुपपत्तेःयस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्येवानुपश्यति। सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते इति श्रुतेः। एवं परस्पराध्यासेऽपि शुद्धं वस्तु यः पश्यति मनुष्येषु मध्ये स एव बुद्धिमान्नान्यः। अस्य परमार्थदर्शित्वादन्यस्य चापरमार्थदर्शित्वात्। सच बुद्धिसाधनयोगयुक्तोऽन्तःकरणशुद्ध्या एकाग्रचित्तः। अतः सएवान्तःकरणशुद्धिसाधनकृत्स्नकर्मकृदिति वास्तवधर्मैरेव स्तूयते। यस्मादेवं तस्मात्त्वमपि परमार्थदर्शी भव तावतैव कृत्स्नकर्मकारित्वोपपत्तेरित्यभिप्रायः। अतो यदुक्तं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभादिति यच्चोक्तं कर्मादीनां तत्त्वं बोद्धव्यमस्तीति स बुद्धिमानित्यादिस्तुतिश्च तत्सर्वं परमार्थदर्शने संगच्छते। अन्यज्ज्ञानादशुभात्संसारान्मोक्षानुपपत्तेः। अतत्वं चान्यन्न बोद्धव्यं न वा तज्ज्ञाने बुद्धिमत्त्वमिति युक्तैव परमार्थदर्शिनां व्याख्या। यत्तु व्याख्यानं कर्मणि नित्ये परमेश्वरार्थेऽनुष्ठीयमाने बन्धहेतुत्वाभावादकर्मेदमिति यः पश्येत् तथा अकर्मणि च नित्यकर्माकरणे प्रत्यवायहेतुत्वेन कर्मेदमिति यः पश्येत् स बुद्धिमानित्यादि तदसङ्गतमेव। नित्यकर्मण्यकर्मेदमिति ज्ञानस्याशुभमोक्षहेतुत्वाभावात् मिथ्याज्ञानत्वेन तस्यैवाशुभत्वाच्च। नचैतादृशं मिथ्याज्ञानं बोद्धव्यं तत्त्वं नाप्येतादृशज्ञाने बुद्धिमत्त्वादिस्तुत्युपपत्तिर्भ्रान्तत्वात्। नित्यकर्मानुष्ठानं हि स्वरूपतोऽन्तःकरणशुद्धिद्वारोपयुज्यते न तत्राकर्मबुद्धिः कुत्राप्युपयुज्यते शास्त्रेण नामादिषु ब्रह्मदृष्टिवदविहितत्वात्। नापी दमेव वाक्यं तद्विधायकम्। उपक्रमादिविरोधस्योक्तेः। एवं नित्यकर्माकरणमपि स्वरूपतो नित्यकर्मविरुद्धकर्मलक्षकतयोपयुज्यते नतु तत्र कर्मदृष्टिः क्वाप्युपयुज्यते। नापि नित्यकर्माकरणात्प्रत्यवायः अभावाद्भावोत्पत्त्ययोगात्। अन्यथा तदविशेषेण सर्वदा कार्योत्पत्तिप्रसङ्गात् भावार्थाः कर्मशब्दास्तेभ्यः क्रिया प्रतीयेतैष ह्यर्थो विधीयत इति न्यायेन भावार्थस्यैवापूर्वजनकत्वात्।अतिरात्रे षोडशिनं न गृह्णाती त्यादावपि संकल्पविशेषस्यैवापूर्वजनकत्वाभ्युपगमात्नेक्षेतोद्यन्तमादित्यम् इत्यादि प्रजापतिव्रतवत्। अतो नित्यकर्मानुष्ठानार्हे काले तद्विरुद्धतया यदुपवेशनादिकर्म तदेव नित्यकर्माकरणोपलक्षितं प्रत्यवायहेतुरिति वैदिकानां सिद्धान्तः। अतएवाकुर्वन्विहितं कर्मेत्यत्र लक्षणार्थे शता व्याख्यातः। लक्षणहेत्वोः क्रियायाः इत्यविशेषस्मरणेऽप्यत्र हेतुत्वानुपपत्तेः। तस्मान्मिथ्यादर्शनापनोदे प्रस्तुते मिथ्यादर्शनव्याख्यानं न शोभतेतरां नापि नित्यानुष्ठानपरमेवैतद्वाक्यम्। नित्यानि कुर्यादित्यर्थे कर्मण्यकर्म यः पश्येदित्यादि तद्बोधकं वाक्यं प्रयुञ्जानस्य भगवतः प्रतारकत्वोपपत्तेरित्यादि भाष्य एव विस्तरेण व्याख्यातमित्युपरम्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.18।।यत्कर्मादेस्तत्त्वं वक्ष्यामीति प्रतिज्ञातं तदाह कर्मणीति। कर्मणि कर्माकर्मविकर्मात्मके देहेन्द्रियादिव्यापारे अविद्यया प्रत्यगात्मन्यारोपिते सति तत्राकर्म कर्माभावं नौस्थे तीरतरौ चलने आरोपिते सति तत्त्वबुद्ध्या तत्र चलनाभावमिव यः पश्येत् तथाचलं गुणवृत्तम् इति न्यायेन त्रिगुणात्मकेषु देहेन्द्रियादिषु नित्यकर्मवत्सु यश्चन्द्रतारकादौ गत्यभावमिव तूष्णींभूतोऽहमस्मि न किंचित्करोमीत्यध्यस्ते अकर्मणि कर्माभावे कर्म तन्निग्रहाख्यप्रयत्नरूपं यः पश्यति स मनुष्येषु बुद्धिमान् तत्त्वदर्शी। आत्मनि भ्रान्तिजनितव्यापारस्य अनात्मनि च तादृशनिर्व्यापारत्वस्य बाधात्। स एव च युक्तो योगी कृत्स्नकर्मकृच्च। कर्मयोगफलस्य तत्त्वज्ञानस्य प्राप्तत्वादिति स्तुतिमात्रम्। आत्मनोऽकर्तृत्वं संघातस्यैव कर्तृत्वमिति भावयता कर्माणि कर्तव्यानीत्यर्थः। यद्यप्येतद्बहुधा प्रपञ्चितंअव्यक्तोऽयम् इत्यादौ तथापि तत्त्वस्य दुर्ज्ञेयत्वात्पुनःपुनरुच्यत इति प्राञ्चः। यत्तु कर्मणि नित्ये परमेश्वरार्थेऽनुष्ठीयमाने बन्धहेतुत्वाभावादकर्मेदमिति यः पश्येत्तथाऽकर्मणि नित्यकर्माकरणे प्रत्यवायहेतुत्वेन कर्मेदमिति च यः पश्येत्स बुद्धिमानिति तदसंगतमेव। नित्यकर्मण्यकर्मेदमिति ज्ञानस्याशुभमोक्षहेतुत्वाभावान्मिथ्याज्ञानत्वेन तस्यैवाशुभत्वाच्च। न चैतादृशां मिथ्याज्ञानं बोद्धव्यं तत्त्वं नाप्येतादृशज्ञाने बुद्धिमत्त्वादिस्तुत्युपपत्तिरिति दिक्। ये तु कर्मणि ज्ञानकर्मणि दृश्ये जडे सद्रूपेण स्फुरणरूपेण वानुस्यूतं सर्वभ्रमाधिष्ठानं अकर्म अवेद्यं स्वप्रकाशचैतन्यं परमार्थदृष्ट्या यः पश्येत् तथा अकर्मणि स्वप्रकाशे दृग्वस्तुनि कल्पितं कर्म दृश्यं मायामयं न परमार्थं सदिति यः पश्यति स बुद्धिमानिति परमार्थदर्शितत्वाद्वास्तवैरेव गुणैः स्तूयत इत्यपि व्याचख्युस्तदप्यसंगतमेव। कर्म कुरु कर्म प्रवक्ष्यामीत्यनुष्ठेयकर्मप्रस्तावे तत्त्वज्ञानानवसरात्। नापिकर्तुरीप्सिततमं कर्म इति पारिभाषिक्या कर्मसंज्ञया दृश्यस्य कर्मशब्दार्थत्वं ग्रहीतुं शक्यम्। तस्या घुटिभादिसंज्ञानामिवागमार्थनिर्णयानर्हत्वादिति संक्षेपः। वस्तुतस्तुकर्मणो हीति श्लोके कर्मविकर्माकर्मणां गतिशब्दितं पर्यवसानं गहनत्वाद्बोद्धव्यमित्युपक्षिप्तं तद्व्याख्यानं कर्मण्यकर्म यः पश्येत्स मनुष्येषु बुद्धिमानिति। तथाहि। कर्मणि कर्माकर्मविकर्मरूपे अकर्म तद्वैपरीत्यं शास्त्रतो दृश्यत। यथा क्रतुः कर्मणि श्रद्धाहीनस्य कृतोऽप्यकृत एव भवतीत्यकर्मणि पर्यवस्यति। दाम्भिकस्य तु विकर्मणि पर्यवस्यति। यथोक्तंअश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह इतिचत्वारि कर्माण्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथा कृतानि। मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञः। इति च। एवमौदासीन्यमकर्मापि शक्तस्यार्तपरित्राणाभावाद्विकर्मणि पर्यवस्यति। दीक्षितस्य भगवद्ध्यानाद्यसक्तस्य वा स्वकाले पञ्चयज्ञाद्यकरणंदीक्षितो न ददाति इत्यादिवचनात्सर्वधर्मान्परित्यज्य इत्यादिवचनाच्च कर्मण्येव पर्यवस्यति। नित्यकर्मकाले प्रत्यवायहेतोरन्यस्याविहितस्याकरणात्। एवं विकर्मापि हिंसाअग्नीषोमीयं पशुमालभेत इति वचनाद्यज्ञे कर्मैव भवति सैव वृथा नष्टे पशौ न कर्म। विध्यर्थानिष्पत्तेः। नापि विकर्म कामकारेणाकृतत्वात्। किंतु परिशेषात्कृताप्यकृतैवेत्यकर्मणि पर्यवस्यति। एवं स्तेनप्रमोचनं तत्सयूथ्यानां कर्मापि राज्ञो विकर्म।स्तेनः प्रमुक्तो राजनि पापं मार्ष्टि इति वचनात् तदेव यतीनामुपेक्षणीयत्वादकर्म। एवं हिंसाफलके सत्यादौ दानफलकेऽनृतादौ च विकर्मत्वकर्मत्वे बोध्ये। तस्मात्कर्माकर्मविकर्माख्ये कर्मणि अकर्म तद्वैपरीत्यं यः पश्येत् स कार्याकार्यविभागज्ञो बोद्धव्यानामेषां प्रबोधात् बुद्धिमानित्युच्यते। तथा किं कर्मेति श्लोके यत्र कवीनामपि मोहोऽस्ति ययोश्च ज्ञानमशुभमोक्षहेतुस्ते कर्माकर्मणी प्रवक्ष्यामीत्युपक्षिप्तं तद्व्याख्या न कर्मणि च कर्म यः पश्येत्स युक्त इति। चकारो दर्शनद्वयसमुच्चयार्थः। तेन यो बुद्धिमान्युक्तश्च स एव कृत्स्नकर्मकृत् नत्वेकैक इत्यपि ज्ञेयम्। तथाहि अकर्मणि स्पन्दशून्ये कूटस्थे वस्तुनि कर्म सस्पन्दं बाह्यं वियदादि आभ्यन्तरं प्रमात्रादिकं चाधाराधेयभावेन वा उपादानोपादेयभावेन वा अधिष्ठानाध्यस्तभावेन वा पश्यन्तः शास्त्रविदः कर्माणि कुर्वन्ति। तत्राद्यः सांख्येऽसङ्गे मयि संघातकर्म एव सन्कर्त्रादिरविवेकात्स्फटिके लौहित्यमिव भातीति मन्यते। द्वितीयस्तु कनककुण्डलवद्ब्रह्मोद्भवं सर्वं ब्रह्मैवेति कर्म तत्साधनादिकमहं च ब्रह्मैवेति भावयन्करोति। एतौ युक्तावप्यतिबुद्धिमानप्ययुक्तः करोति तस्य सर्वमसदेव भवति नत्वशुभमोक्षाय।यो वा एतदक्षरं गार्ग्यविदित्वास्मिन्लोके यजति ददाति तपस्तप्यतेऽपि बहूनि वर्षसहस्राण्यन्तवदेवास्य तद्भवति इति श्रुतेः। यस्तु युक्तोऽपि निर्बुद्धित्वादकार्यमपि करोति स प्रत्यवैति। पापाश्लेषनिमित्तस्यापरोक्षज्ञानस्याभावात्। अनयोश्चाविद्याविद्याशब्दतयोः कर्मपरोक्षज्ञानयोः समुच्चयः श्रूयतेविद्यां चाविद्यां च इति मन्त्रे। यद्वा द्विविधं कर्मणि कर्मदर्शनं परोक्षमपरोक्षं च। तत्राद्यवान् ज्ञानकर्मसमुच्चयानुष्ठाता बुद्धिमानुच्यते। अपरोक्षमपि द्विविधम्। उपास्यसाक्षात्काररूपं तत्त्वसाक्षात्काररूपं च। तत्राद्यमपि व्याकृताव्याकृतरूपोपास्यभेदेन द्विविधम्। तत्रापि व्याकृतं सूत्रं कार्यम्। तद्दर्शी विगतदेहाहंकारत्वाद्योगशास्त्रे विदेह उच्यते। अव्याकृतं कारणं तद्दर्शी प्रकृतिलय उच्यते। अनयोरुपासनयोः संभवासंभवसंज्ञयोः समुच्चयो विधीयतेअन्यदेवाहुः संभवात् इत्यादिना। सोयं युक्त इत्युच्यते। अस्याप्यग्रे कर्तव्यमवशिष्टमस्तीति नायमपि कृत्स्नकर्मकृत् किंतु यस्य कर्मबाधेनाकर्मदर्शनं मुख्यमस्ति स एव कृतकृत्यत्वान्मुख्यः कृत्स्नकर्मकृदिति। एतेष्वाद्यो मनुष्येषु देहाभिमानिष्वेव बुद्धिमानित्यक्रान्तदर्शित्वादकविरेव। मध्यमौ क्रान्तदर्शिनावपि तत्त्वविषये मूढत्वात्कवयोऽप्यत्र मोहिता इत्युक्तौ। एतयोर्व्यवधानेनाशुभान्मुक्तिः। उत्तमस्तु जीवन्नेवाशुभान्मुक्त इति श्लोकार्थः प्रतिभाति।व्याख्यातुरपि मे नास्ति भाष्यकारेण तुल्यता। गुहावद्योतिनोऽप्यस्ति किं दीपस्यार्कतुल्यता। यद्वा कर्माकर्मणी वक्तव्यत्वेन बोद्धव्यत्वेन चोपक्षिप्यात्र तयोर्लक्षणप्रदर्शनमुचितम्। अतो यदकर्मणा विशेषितं तदेव कर्म नान्यदिति कर्मलक्षणम्। यच्च कर्मणा विशेषितं तदेवाकर्मेत्यकर्मलक्षणमिति व्याख्येयम्। अक्षरार्थस्तु कर्म यज्ञादिकं ससाधनम्। तत्राकर्म स्पन्दशून्यं कूटस्थं ब्रह्म यः पश्येत् कर्मतदङ्गेषु ब्रह्मदृष्टिमध्यस्येत्अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् इत्युक्तप्रकारेण। अन्यथा यत्कृतं तद्वृथा चेष्टारूपमेवातो गहना कर्मणो गतिः। किं तदकर्म यत्कर्मण्यध्यस्यत इत्याकाङ्क्षायां यत्रैतत्कर्म पुण्यपापात्मकं दृश्यतेपुण्यो वै पुण्येन कर्मणा भवति पापः पापेन इति तत्फलं च सुखदुःखादिकं अहं सुखी अहं दुःखीति स प्रत्यक्चेतनोऽकर्म तत्रैवेदं कर्म अस्पन्दे स्पन्दात्मकमसर्पे सर्प इवाध्यस्तमिति यः पश्येदिति। अयं भावः यथा रज्ज्वामध्यस्तं सर्पं पश्यन्नायं सर्पो रज्जुरियमिति वाक्यात्तस्य रज्जुत्वं विक्षेपप्राबल्यादप्रतिपद्यमानो नरः सर्पमिमं रज्जुदृष्ट्योपास्स्वेति नियोज्यते सचोपासनादाढ्ये सर्पं विस्मृत्य रज्जुतत्त्वमेव विन्दति। यस्तु वाक्यादेव रज्जुतत्त्वं विन्दति न तस्य प्रत्ययावृत्तिलक्षणया उपास्त्या प्रयोजनमस्ति। एवमकर्मण्यध्यस्तं कर्त्रादितत्त्वमसीतिवाक्याद्बाधितत्वाऽकर्मप्रतिपत्तिर्भवति शुद्धसत्वस्य। अन्यस्य तु कर्त्रादीनेवाकर्मदृष्ट्याउपासीनस्य भावनादार्ढ्यात्कर्त्रादिरूपतिरोधानेनाकर्मतत्त्वप्रतिपत्तिरिति। यद्वा कर्मणीवाकर्मण्यपि विकर्मसहितेऽकर्मदृष्टिर्माभूदित्याशङ्क्याह कर्मणीति। विहिताकरणे प्रतिषिद्धाचरणे च कर्मदृष्टिरेव भवेत्। अकर्मतो बिभ्यत्कर्म ब्रह्मदृष्ट्या कुर्यान्न त्वकर्मापि तादृशदृष्ट्या कुर्यादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.18।।दुर्विज्ञेयत्वाज्ज्ञानार्थं तत्स्वरूपमाह कर्मणीति। यः कर्मणि अकर्म पश्येत् कर्त्तव्ये अकर्तव्यं पश्येत्। मत्सम्बन्धं विना मदाज्ञां विना विकर्मणि अकर्त्तव्यं पश्येत्। तथैव मदाज्ञया अकर्मणि अकर्त्तव्ये कर्मणि कर्तव्यं पश्येत्। एवं ज्ञात्वा यः कृत्स्नकर्मकर्ता मनुष्येषु स बुद्धिमान् भवेत् स ज्ञानवान् स युक्तः। ममेति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.18।। तदेवं कर्मादीनां दुर्विज्ञेयत्वं दर्शयन्नाह कर्मण्यकर्मेति। परमेश्व राराधनलक्षणे कर्मणि विषये अकर्म कर्मेदं न भवतीति यः पश्येत्तस्य ज्ञानहेतुत्वेन बन्धकत्वाभावात्। अकर्मणि च विहिताकरणे कर्म यः पश्येत्तस्य प्रत्यवायोत्पादकत्वेन बन्धहेतुत्वात् मनुष्येषु कर्मकुर्वाणेषु स बुद्धिमान्व्यवसायात्मकबुद्धिमत्त्वाच्छ्रेष्ठः संस्तौति स युक्तः योगी तेन कर्मणा ज्ञानयोगावाप्तेः स एव कृत्स्नकर्मकर्ता च। सर्वतः संप्लुतोदकस्थानीये तस्मिन्कर्मणि सर्वकर्मफलानामन्तर्भूतत्वात्। तदेवमारुरुक्षोः कर्मयोगाधिकारावस्थायांन कर्मणामनारम्भात् इत्यादिनोक्त एव कर्मयोगः स्फुटीकृतः। तत्प्रपञ्चरूपत्वाच्चास्य प्रकरणस्य न पौनरुक्त्यदोषः। अनेनैव योगारूढावस्थायांयस्त्वात्मरतिरेव स्यात् इत्यादिना यः कर्मानुपयोग उक्तस्तस्याप्यर्थात्प्रपञ्चः कृतो वेदितव्यः। यदा आरुरुक्षोरपि कर्म बन्धकं न भवति तदाऽऽरूढस्य कुतो बन्धकं स्यादित्यत्रापि श्लोको योज्यते। यद्वा कर्मणि देहेन्द्रियादिव्यापारे वर्तमानोऽप्यात्मनो देहादिव्यतिरेकानुभवेनाकर्म स्वाभाविकं नैष्कर्म्यमेव यः पश्येत् तथा कर्मणि च ज्ञानरहिते दुःखबुद्ध्या कर्मणां त्यागे कर्म यः पश्येत् तस्य प्रतिबन्धकत्वेन मिथ्याचारत्वात्। तदुक्तंकर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् इति। य एवंभूतः स तु सर्वेषु मनुष्येषु बुद्धिमान्पण्डितः। तत्र हेतुः कृत्स्नानि सर्वाणि यदृच्छया प्राप्तान्याहारादीनि कर्माणि कुर्वन्नपि स युक्त एवाकर्त्रात्मज्ञानेन समाधिस्थ एवेत्यर्थः। अनेनैव ज्ञानिनः स्वभावादापन्नं कलञ्जभक्षणादिकं न दोषाय अज्ञस्य तु रागतः कृतं दोषायेति विकर्मणोऽपि तत्त्वं निरूपितं द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.18।।तस्यैव कर्मणो याथात्म्यं स्वयं दर्शयन् क्रियाद्वैतमाह कर्मण्यकर्मेति। वैदिकरूपे विहिते कर्मणि यज्ञकर्मणि स्वक्रियानिर्वर्त्त्ये उक्तप्रकारके कर्मणीत्युपलक्षणं सर्वत्रैव अकर्म निर्बन्धकत्वं समं ब्रह्म वा साङ्ख्ययोगमार्गीयः सन् पश्येत् भावयेत् सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत छा.उ.3।1।4।1 इति श्रुतेःसर्वं ब्रह्मात्मकं जानन् तथा कर्म च भावयेत् इत्याचार्योक्तेश्च। अयमेव ज्ञानयज्ञ इति स्वयमेव वक्ष्यति भगवान्। इदं चोत्तमाधिकारिककर्मणो याथात्म्यं सङ्क्षेपत उक्तम्। कर्माधिकारिणोऽकर्मणि च निषिद्धे अकरणे वा कर्म बन्धनं पश्येत्। अत्रेदमाकूतम्या निशा सर्वभूतानां 2।69 इत्यत्रेव परस्परं विपरीतस्वभावयोरुत्तमापकृष्टयोर्विपरीते क्रियानिर्वर्त्ये कर्मणी भवतः तेनापकृष्टाधिकारिकं कर्मोत्तमाधिकारिणो कर्मैव उत्तमाधिकारिककर्म चापकृष्टाधिकारिणः अकर्माकर्त्तव्यमेव। तत्र चान्योन्यभावधीभेदात् फलवैलक्षण्यं युक्तमेवेति। तदेवं यथाभूतं यः पश्येत्स सर्वमनुष्येषु बुद्धिमान् युक्तः ब्रह्मणि योगे च प्रवणः कृत्स्नकर्मकृच्च तत्कर्मणि सर्वकर्मफलानामानन्दानामन्तर्भूतत्वात्तत्कर्त्ता भवति। अन्येत्वयुक्ता अबुद्धिमन्तोऽपूर्णकर्मकारिणश्चेत्युक्ताः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.18।।कर्मादिका वह तत्त्व क्या है जो कि जाननेयोग्य है जिसके लिये आपने यह प्रतिज्ञा की थी कि कहूँगा। इसपर कहते हैं जो कुछ किया जाय उस चेष्टामात्रका नाम कर्म है। उस कर्ममें जो अकर्म देखता है अर्थात् कर्मका अभाव देखता है तथा अकर्ममें शरीरादिकी चेष्टाके अभावमें जो कर्म देखता है। अर्थात् कर्मका करना और न करना दोनों ही कर्ताके अधीन हैं। तथा आत्मतत्त्वकी प्राप्तिसे पूर्व अज्ञानावस्थामें ही सब क्रियाकारक आदि व्यवहार है ( इसीलिये कर्मका त्याग भी कर्म ही है ) इस प्रकार जो अकर्ममें कर्म देखता है। वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् है वह योगी है और वह समस्त कर्मोंको करनेवाला है इस प्रकार कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवालेकी स्तुति की जाती है। पू0 जो कर्ममें अकर्म देखता है और अकर्ममें कर्म देखता है यह विरुद्ध बात किस भावसे कही जा रही है क्योंकि कर्म तो अकर्म नहीं हो सकता और अकर्म कर्म नहीं हो सकता तब देखनेवाला विरुद्ध कैसे देखे उ0 वास्तवमें जो अकर्म है वही मूढमति लोगोंको कर्मके सदृश भास रहा है और उसी तरह कर्म अकर्मके सदृश भास रहा है उसमें यथार्थ तत्त्व देखनेके लिये भगवान्ने कर्मणि अकर्म यः पश्येत् इत्यादि वाक्य कहे हैं इसलिये ( उनका कहना ) विरुद्ध नहीं है क्योंकि बुद्धिमान् आदि विशेषण भी तभी सम्भव हो सकते हैं। इसके सिवा यथार्थ ज्ञानको ही जाननेयोग्य कहा जा सकता है ( मिथ्या ज्ञानको नहीं )। तथा जिसको जानकर अशुभसे मुक्त हो जायगा। यह भी कहा है सो विपरीत ज्ञानद्वारा ( जन्ममरणरूप ) अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती। सुतरां प्राणियोंने जो कर्म और अकर्मको विपरीतरूपसे समझ रक्खा है उस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये ही भगवान्के कर्मण्यकर्म यः इत्यादि वचन हैं। यहाँ कुण्डेमें बेरोंकी तरह कर्मका आधार अकर्म नहीं है और उसी तरह अकर्मका आधार कर्म भी नहीं है क्योंकि कर्मके अभावका नाम अकर्म है। इसलिये ( यही सिद्ध हुआ कि ) मृगतृष्णामें जलकी भाँति एवं सीपमें चाँदीकी तरह लोगोंने कर्म और अकर्मको विपरीत मान रक्खा है। पू0 कर्मको सब कर्म ही मानते हैं इसमें कभी फेरफार नहीं होता। उ0 यह बात नहीं क्योंकि नाव चलते समय नौकामें बैठे हुए पुरुषको तटके अचल वृक्षोंमें प्रतिकूल गतिदीखती है अर्थात् वे वृक्ष उलटे चलते हुए दीखते हैं और जो ( नक्षत्रादि ) पदार्थ नेत्रोंके पास नहीं होते बहुत दूर होते हैं उन चलते हुए पदार्थोंमें भी गतिका अभाव दीख पड़ता है अर्थात् वे अचल दीखते हैं। इसी तरह यहाँ भी अकर्ममें ( क्रियारहित आत्मामें ) मैं करता हूँ यह कर्मका देखना और ( त्यागरूप ) कर्ममें ( मैं कुछ नहीं करता इस ) अकर्मका देखना ऐसे विपरीत देखना होता है अतः उसका निराकरण करनेके लिये कर्मणि अकर्म यः पश्येत् इत्यादि वचन भगवान् कहते हैं। यद्यपि यह विषय अनेक बार शंकासमाधानोंद्वारा सिद्ध किया जा चुका है तो भी अत्यन्त विपरीत ज्ञानकी भावनासे अत्यन्त मोहित हुए लोग अनेक बार सुने हुए तत्त्वको भी भूलकर मिथ्या प्रसंग लालाकर शंका करने लग जाते हैं इसलिये तथा आत्मतत्त्वको दुर्विज्ञेय समझकर भगवान् पुनःपुनः उत्तर देते हैं। श्रुति स्मृति और न्यायसिद्ध जो आत्मामें कर्मोंका अभाव है वह अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् न जायते म्रियते इत्यादि श्लोकोंसे कहा जा चुका और आगे भी कहा जायगा। उस क्रियारहित आत्मामें अर्थात् अकर्ममें कर्मका देखनारूप जो विपरीत दर्शन है यह लोगोंमें अत्यन्त स्वाभाविकसा हो गया है। क्योंकि कर्म क्या है और अकर्म क्या है इस विषयमें बुद्धिमान् भी मोहित हैं। अर्थात् देहइन्द्रियादिसे होनेवाले कर्मोंका आत्मामें अध्यारोप करके मैं कर्ता हूँ मेरा यह कर्म है मुझे इसका फल भोगना है इस प्रकार ( लोग मानते हैं। ) तथा मैं चुप होकर बैठता हूँ जिससे कि परिश्रमरहित और कर्मरहित होकर सुखी हो जाऊँ इस प्रकार देहइन्द्रियोंके व्यापारकी उपरामताका और उससे होनेवाले सुखीपनका आत्मामें अध्यारोप करके मैं कुछ भी नहीं करता हूँ चुपचाप सुखसे बैठा हूँ इस प्रकार लोग मानते हैं। लोगोंके इस विपरीत ज्ञानको हटानेके लिये कर्मणि अकर्म यः पश्येत् इत्यादि वचन भगवान्ने कहे हैं। यहाँ देहेन्द्रियादिके आश्रयसे होनेवाला कर्म यद्यपि क्रियारूप है तो भी उसका लोगोंने कर्मरहित अविक्रिय आत्मामें अध्यारोप कर रक्खा है क्योंकि शास्त्रज्ञ विद्वान् भी मैं करता हूँ ऐसा मान बैठता है। अतः नदीतीरस्थ वृक्षोंमें भ्रमसे प्रतिकूल गति प्रतीत होनेकी भाँति अज्ञानसे आत्माके नित्य सम्बन्धी माने जाकर जो लोकमें कर्म नामसे प्रसिद्ध हो रहे हैं उन कर्मोंमें वस्तुतः नदीतीरस्थ वृक्षोंमें गतिका अभाव देखनेकी भाँति जो अकर्म देखता है अर्थात् कर्माभाव देखता है तथा कर्मकी भाँति आत्मामें अज्ञानसे आरोपित किये हुए शरीर इन्द्रिय आदिकी उपरामतारूप अकर्ममें अर्थात् क्रियाके त्यागमें भी मैं कुछ न करता हुआ चुपचाप सुखपूर्वक बैठा हूँ इस अहंकारका सम्बन्ध होनेके कारण जो कर्म देखता है यानी उस त्यागको भी जो कर्म समझता है। इस प्रकार जो कर्म और अकर्मके विभागको ( तत्त्वसे ) जाननेवाला है वह मनुष्योंमें बुद्धिमान् पण्डित है वह युक्त योगी है और सम्पूर्ण कर्म करनेवाला भी वही है अर्थात् वह पुण्यपापरूप अशुभसे मुक्त हुआ कृतकृत्य है। कई टीकाकार इस श्लोककी दूसरी तरहसे ही व्याख्या करते हैं। कैसे ईश्वरके लिये किये जानेवाले जो ( पञ्च महायज्ञादि ) नित्यकर्म हैं उनका फल नहीं मिलता इस कारण वे गौणी वृत्तिसे अकर्म कहे जाते हैं ( इसी प्रकार ) उन नित्यकर्मोंके न करनेका नाम अकर्म है वह भी पापरूप फलके देनेवाला होनेके कारण गौणरूपसे ही कर्म कहा जाता है। जैसे कोई गौ ब्यायी हुई होनेपर भी यदि दूधरूप फल नहीं देती तो वह अगौ कह दी जाती है वैसे ही नित्यकर्ममें उसके फलका अभाव होनेके कारण जो अकर्म देखता है और नित्यकर्मका न करनारूप जो अकर्म है उसमें कर्म देखता है क्योंकि वह नरकादि विपरीत फल देनेवाला है। यह व्याख्या ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकार जाननेसे अशुभसे मुक्ति नहीं हो सकती अर्थात् जन्ममरणबन्धन नहीं टूट सकता। अतः यह अर्थ मान लेनेसे भगवान्के कहे हुए ये वचन कि जिसको जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा। कट जायँगे। क्योंकि नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे तो शायद अशुभसे छुटकारा हो भी जाय परंतु उन नित्यकर्मोंका फल नहीं होता इस ज्ञानसे तो मोक्ष हो ही नहीं सकता। क्योंकि नित्यकर्मोंका फल नहीं होता यह ज्ञान या नित्यकर्मोंका ज्ञान अशुभसे मुक्त कर देनेवाला है ऐसा शास्त्रोंमें कहीं नहीं कहा और न भगवान्ने ही गीताशास्त्रमें कहीं ऐसा कहा है। इसी युक्तिसे ( उनके बतलाये हुए ) अकर्ममें कर्मदर्शनका भी खण्डन हो जाता है। क्योंकि यहाँ ( गीतामें ) नित्यकर्मोंके अभावरूप अकर्ममें कर्म देखनेको कहीं कर्तव्यरूपसे विधान नहीं किया केवल नित्यकर्मकी कर्तव्यताका विधान है। इसके सिवा नित्यकर्म न करनेसे पाप होता है ऐसा जान लेनेसे ही कोई फल नहीं हो सकता। और यह नित्यकर्मका न करनारूप अकर्म शास्त्रोंमें कोई जाननेयोग्य विषय भी नहीं बताया गया है। तथा इस प्रकार दूसरे टीकाकारोंके माने हुए कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शन रूप इस मिथ्यादर्शनसे अशुभसे मुक्ति बुद्धिमत्ता युक्तता सर्वकर्मकर्तृत्व इत्यादि फल भी सम्भव नहीं और ऐसे मिथ्याज्ञानकी स्तुति भी नहीं बन सकती। जब कि मिथ्याज्ञान स्वयं ही अशुभरूप है तब वह

Chapter 4 (Part 12)

दूसरे अशुभसे किसीको कैसे मुक्त कर सकेगा क्योंकि अन्धकार ( कभी ) अन्धकारका नाशक नहीं हो सकता। पू0 यहाँ जो कर्ममें अकर्म देखना और अकर्ममें कर्म देखना ( उन टीकाकारोंने ) बतलाया है वह मिथ्याज्ञान नहीं है किंतु फलके होने और न होनेके निमित्तसे गौणरूपसे देखना है। उ0 यह कहना भी ठीक नहीं क्योंकि गौणरूपसे कर्मको अकर्म और अकर्मको कर्म जान लेनेसे भी कोई लाभ नहीं सुना गया। इसके सिवा श्रुतिसिद्ध बातको छोड़कर श्रुतिविरुद्ध बातकी कल्पना करनेमें कोई विशेषता भी नहीं दिखलायी देती। ( भगवान्को यदि यही अभीष्ट होता तो वे ) उसी प्रकारके शब्दोंसे भी स्पष्ट कह सकते थे कि नित्यकर्मोंका कोई फल नहीं है और उनके न करनेसे नरकप्राप्ति होती है। फिर इस प्रकार कर्ममें जो अकर्म देखता है इत्यादि दूसरोंको मोहित करनेवाले मायायुक्त वचन कहनेसे क्या प्रयोजन था। इस प्रकार उपर्युक्त अर्थ करनेवालोंका तो स्पष्ट ही यह मानना हुआ कि भगवान्द्वारा कहे हुए वचन संसारको मोहित करनेके लिये हैं। इसके सिवा न तो यह कहना ही उचित है कि यह नित्यकर्मअनुष्ठानरूप विषय मायायुक्त वचनोंसे गुप्त रखनेयोग्य है और न यही कहना ठीक है कि ( यह विषय बड़ा गहन है इसलिये ) बारंबार दूसरेदूसरे शब्दोंद्वारा कहनेसे सुबोध होगा। क्योंकि कर्मण्येवाधिकारस्ते इस श्लोकमें स्पष्ट कहे हुए अर्थको फिर कहनेकी आवश्यकता नहीं होती। तथा सभी जगह जो बात करनेयोग्य होती है वही प्रशसंनीय और जाननेयोग्य बतलायी जाती है। निरर्थक बातको जाननेयोग्य है ऐसा नहीं कहा जाता। मिथ्याज्ञान या उसके द्वारा स्थापित की हुई आभासमात्र वस्तु जाननेयोग्य नहीं हो सकती। इसके सिवा नित्यकर्मोंके न करनेरूप अभावसे प्रत्यवायरूप भावकी उत्पत्ति भी नहीं हो सकती। क्योंकि नासतो विद्यते भावः इत्यादि भगवान्के वाक्य हैं तथा असत्से सत् कैसे उत्पन्न हो सकता है इत्यादि श्रुतिवाक्य भी पहले दिखलाये जा चुके हैं। इस प्रकार असत्से सत्की उत्पत्तिका निषेध कर दिया जानेपर भी जो असत्से सत्की उत्पत्ति बतलाते हैं उनका तो यह कहना हुआ कि असत् तो सत् होता है और सत् असत् होता है परंतु यह सब प्रमाणोंसे विरुद्ध होनेके कारण अयुक्त है। तथा शास्त्र भी निरर्थक कर्मोंका विधान नहीं कर सकता क्योंकि सभी कर्म ( परिश्रमकी दृष्टिसे ) दुःख रूप हैं और जानबूझकर ( बिना प्रयोजन ) किसीका भी दुःखमें प्रवृत्त होना सम्भव नहीं। तथा उन नित्यकर्मोंको न करनेसे नरकप्राप्ति होती है ऐसा शास्त्रका आशय मान लेनेपर तो यह मानना हुआ कि कर्म करने और न करनेमें दोनों प्रकारसे शास्त्र अनर्थका ही कारण है अतः व्यर्थ है। इसके सिवा नित्यकर्मोंका फल नहीं है ऐसा मानकर फिर उनको मोक्षरूप फलके देनेवाला कहनेसे उन व्याख्याकारोंके मतमें स्वचोविरोध भी होता है। सुतरां कर्मणि अकर्म यः पश्येत् इत्यादि श्लोकका अर्थ जैसा ( गुरुपरम्परासे ) सुना गया है वही ठीक है और हमने भी उसीके अनुसार इस श्लोककी व्याख्या की है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.18।। व्याख्या   कर्मण्यकर्म यः पश्येत् कर्ममें अकर्म देखनेका तात्पर्य है कर्म करते हुए अथवा न करते हुए उससे निर्लिप्त रहना अर्थात् अपने लिये कोई भी प्रवृत्ति या निवृत्ति न करना। अमुक कर्म मैं करता हूँ इस कर्मका अमुक फल मुझे मिले ऐसा भाव रखकर कर्म करनेसे ही मनुष्य कर्मोंसे बँधता है। प्रत्येक कर्मका आरम्भ और अन्त होता है इसलिये उसका फल भी आरम्भ और अन्त होनेवाला होता है। परन्तु जीव स्वयं नित्यनिरंतर रहता है। इस प्रकार यद्यपि जीव स्वयं परिवर्तनशील कर्म और उसके फलसे सर्वथा सम्बन्धरहित है फिर भी वह फलकी इच्छाके कारण उनसे बँध जाता है। इसीलिये चौदहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि मेरेको कर्म नहीं बाँधते क्योंकि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है। फलकी स्पृहा या इच्छा ही बाँधनेवाली है फले सक्तो निबध्यते (गीता 5। 12)।फलकी इच्छा न रखनेसे नया राग उत्पन्न नहीं होता और दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे पुराना राग नष्ट हो जाता है। इस प्रकार रागरूप बन्धन न रहनेसे साधक सर्वथा वीतराग हो जाता है। वीतराग होनेसे सब कर्म अकर्म हो जाते हैं। जीवका जन्म कर्मोंके अनुबन्धसे होता है। जैसे जिस परिवारमें जन्म लिया है उस परिवारके लोगोंसे ऋणानुबन्ध है अर्थात् किसीका ऋण चुकाना है और किसीसे ऋण वसूल करना है। कारण कि अनेक जन्मोंमें अनेक लोगोंसे लिया है और अनेक लोगोंको दिया है। यह लेनदेनका व्यवहार अनेक जन्मोंसे चला आ रहा है। इसको बंद किये बिना जन्ममरणसे छुटकारा नहीं मिल सकता। इसको बंद करनेका उपाय है आगेसे लेना बंद कर दें अर्थात् अपने अधिकारका त्याग कर दें और हमारेपर जिनका अधिकार है उनकी सेवा करनी आरम्भ कर दें। इस प्रकार नया ऋण लें नहीं और पुराना ऋण (दूसरोंके लिये कर्म करके) चुका दें तो ऋणानुबन्ध (लेनदेनका व्यवहार) समाप्त हो जायगा अर्थात् जन्ममरण बंद हो जायगा (गीता 4। 23)। जैसे कोई दूकानदार अपनी दूकान उठाना चाहता है तो वह दो काम करेगा पहला जिसको देना है उसको दे देगा और दूसरा जिससे लेना है वह ले लेगा अथवा छोड़ देगा। ऐसा करनेसे उसकी दूकान उठ जायगी। अगर वह यह विचार रखेगा कि जो लेना है वह सबकासब ले लूँ तो दूकान उठेगी नहीं। कारण कि जबतक वह लेनेकी इच्छासे वस्तुएँ देता रहेगातबतक दूकान चलती ही रहेगी उठेगी नहीं।अपने लिये कुछ भी न करने और न चाहनेसे असङ्गता स्वतः प्राप्त हो जाती है। कारण कि करण (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण) और उपकरण (कर्म करनेमें उपयोगी सामग्री) संसारके हैं और संसारकी सेवामें लगानेके लिये ही मिले हैं अपने लिये नहीं। इसलिये सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म (सेवा भजन जप ध्यान समाधि भी) केवल संसारके हितके लिये ही करनेसे कर्मोंका प्रवाह संसारकी ओर चला जाता है और साधक स्वयं असङ्ग निर्लिप्त रह जाता है। यही कर्ममें अकर्म देखना है।जबतक प्रकृतिके साथ सम्बन्ध है तबतक कर्म करना अथवा न करना दोनों ही कर्म हैं। इसलिये कर्म करने अथवा न करने दोनों ही अवस्थाओंमें कर्मयोगीको निर्लिप्त रहना चाहिये। कर्म करनेमें निर्लिप्त रहनेका तात्पर्य है कर्म करनेसे हमें अच्छा फल मिलेगा हमें लाभ होगा हमारी सिद्धि होगी लोग हमें अच्छा मानेंगे इस लोकमें और परलोकमें भोग मिलेंगे इस प्रकारकी किसी भी इच्छाका न होना। ऐसे ही कर्म न करनेमें निर्लिप्त रहनेका तात्पर्य है कर्मोंका त्याग करनेसे हमें मान आदर भोग शरीरका आराम आदि मिलेंगे इस प्रकारकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छाका न होना।दुःख समझकर एवं शारीरिक क्लेशके भयसे कर्म न करना राजस त्याग है और मोह आलस्य प्रमादके कारण कर्म न करना तामस त्याग है। ये दोनों ही त्याग सर्वथा त्याज्य हैं। इसके सिवाय कर्म न करना यदि अपनी विलक्षण स्थितिके लिये है समाधिका सुख भोगनेके लिये है जीवन्मुक्तिका आनन्द लेनेके लिये है तो इस त्यागसे भी प्रकृतिका सम्बन्धविच्छेद नहीं होता। कारण कि जबतक कर्म न करनेसे सम्बन्ध है तबतक प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहता है। प्रकृतिसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर कर्मयोगी कर्म करने और न करने इन दोनों अवस्थाओंमें ज्योंकात्यों निर्लिप्त रहता है।अकर्मणि च कर्म यः अकर्ममें कर्म देखनेका तात्पर्य है निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा न करना। भाव है कि कर्म करते समय अथवा न करते समय भी नित्यनिरन्तर निर्लिप्त रहे।संसारमें कोई कार्य करनेके लिये प्रवृत्त होता है तो उसके सामने प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना) दोनों आती हैं। किसी कार्यमें प्रवृत्ति होती है और किसी कार्यसे निवृत्ति होती है। परन्तु कर्मयोगीकी प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों निर्लिप्ततापूर्वक और केवल संसारके हितके लिये होती हैं। प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंसे ही उसका कोई प्रयोजन नहीं होता नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन (गीता 3। 18)। यदि प्रयोजन होता है तो वह कर्मयोगी नहीं है प्रत्युत कर्मी है। साधक जबतक प्रकृतिसे अपना सम्बन्ध मानता है तबतक वह कर्म करनेसे अपनी सांसारिक उन्नति मानता है और कर्म न करनेसे अपनी पारमार्थिक उन्नति मानता है। परन्तु वास्तवमें प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही प्रवृत्ति हैं क्योंकि दोनोंमें ही प्रकृतिके साथ सम्बन्ध रहता है। जैसे चलनाफिरना खानापीना आदि स्थूलशरीरकी क्रियाएँ हैं ऐसे ही एकान्तमें बैठे रहना चिन्तन करना ध्यान लगाना सूक्ष्मशरीरकी क्रियाएँ और समाधि लगाना कारणशरीरकी क्रियाएँ हैं। इसलिये निर्लिप्त रहते हुए ही लोकसंग्रहार्थ कर्तव्यकर्म करना है। यही अकर्ममें कर्म है। इसीको दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें योगस्थः कुरु कर्माणि (योग अर्थात् समतामें स्थित होकर कर्म कर) पदोंसे कहा गया है।सांसारिक प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों कर्म हैं। प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करते हुए निर्लिप्त रहना और निर्लिप्त रहते हुए ही प्रवृत्ति अथवा निवृत्ति करना इस प्रकार प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंमें सर्वथा निर्लिप्त रहना योग है। इसीको कर्मयोग कहते हैं। शङ्का   कर्म करते हुए अथवा न करते हुए निर्लिप्त रहना और निर्लिप्त रहते हुए कर्म करना अथवा न करना इन दोनोंमें अकर्म अर्थात् एक निर्लिप्तता ही मुख्य हुई फिर भगवान्ने कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म ये दो बातें क्यों कही हैं समाधान   कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म इन दोनोंमें एक निर्लिप्तता सार होते हुए भी पहले(कर्ममें अकर्म) में कर्म करते हुए अथवा न करते हुए दोनों अवस्थाओंमें रहनेवाली निर्लिप्तताकी मुख्यता है और दूसरे(अकर्ममें कर्म) में निर्लिप्त रहते हुए कर्म करने अथवा न करनेकी मुख्यता है। तात्पर्य है कि निर्लिप्तता अपने लिये और कर्म संसारके लिये है क्योंकि निर्लिप्तताका सम्बन्ध स्व(स्वरूप) के साथ और कर्म करने अथवा न करनेका सम्बन्ध पर(शरीर संसार) के साथ है। इसलिये निर्लिप्तता स्वधर्म और कर्म करना अथवा न करना परधर्म है। इन दोनोंका विभाग सर्वथा अलगअलग बतानेके लिये ही भगवान्ने उपर्युक्त दो बातें कही हैं।कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म ये दोनों बातें कर्मयोगकी हैं जिनका तात्पर्य यह है कि प्रकृतिसे तो सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाय अर्थात् करने अथवा न करनेसे अपना कोई प्रयोजन न रहे और लोकसंग्रहके लिये कर्मोंको करना अथवा न करना हो। कारण कि कर्म करते हुए निर्लिप्त रहना और निर्लिप्त रहते हुए भी दूसरोंके हितके लिये कर्म करना ये दोनों ही गीताके सिद्धान्त हैं।प्रवृत्ति (करना) और निवृत्ति (न करना) दोनों प्रकृतिके राज्यमें ही हैं। प्रकृति निरन्तर परिवर्तनशील है इसलिये प्रवृत्तिका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा निवृत्तिका भी आरम्भ और अन्त होता है। परन्तु इनसे सर्वथा अतीत परमनिवृत्ततत्त्व अपने स्वरूपका आदि और अन्त नहीं होता। वह प्रवृत्ति और निवृत्तिके आरम्भमें भी रहता है और उनके अन्तमें भी रहता है तथा प्रवृत्ति और निवृत्तिकालमें भी ज्योंकात्यों रहता है। वह प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनोंका प्रकाशक और आधार है। इसलिये उसमें न प्रवृत्ति है और न निवृत्ति है इस तत्त्वको समझनेके लिये और उसमें स्थित होकर लोकसंग्रहार्थ(यज्ञार्थ) कर्म करनेके लिये यहाँ कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म ये दो बातें कही गयी हैं।स बुद्धिमान्मनुष्येषु जो पुरुष कर्ममें अकर्म देखता है और अकर्ममें कर्म देखता है अर्थात् नित्यनिरन्तरनिर्लिप्त रहता है वही वास्तवमें कर्मतत्त्वको जाननेवाला है। जबतक वह निर्लिप्त नहीं हुआ है अर्थात् कर्म और पदार्थको अपना और अपने लिये मानता है तबतक उसने कर्मतत्त्वको समझा ही नहीं है।परमात्माको जाननेके लिये स्वयंको परमात्मासे अभिन्नताका अनुभव करना होता है और संसारको जाननेके लिये स्वयंको संसार(क्रिया और पदार्थ) से सर्वथा भिन्नताका अनुभव करना होता है। कारण कि वास्तवमें हम (स्वरूपसे) परमात्मासे अभिन्न और संसारसे भिन्न हैं। इसलिये कर्मोंसे अलग होकर अर्थात् निर्लिप्त होकर ही कर्मतत्त्वको जान सकते हैं। कर्म आदिअन्तवाले हैं और मैं (स्वयं जीव) नित्य रहनेवाला हूँ अतः मैं स्वरूपसे कर्मोंसे अलग (निर्लिप्त) हूँ इस वास्तविकताका अनुभव करना ही जानना है। वास्तविकताकी तहमें बैठे बिना जानना हो ही कैसे सकता है जैसे काजलकी कोठरीमें प्रवेश करके भी काजलसे सर्वथा निर्लिप्त रहना साधारण बुद्धिमान्का काम नहीं है ऐसे ही सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको करते हुए भी कर्मोंसे सर्वथा निर्लिप्त रहना साधारण बुद्धिमान्के वशका काम नहीं है। इसलिये भगवान् ऐसे कर्मयोगीको मनुष्योंमें बुद्धिमान् कहते हैं। अठारहवें अध्यायके दसवें श्लोकमें भी भगवान्ने उसे मेधावी (बुद्धिमान्) कहा है।अभी सत्रहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्म अकर्म और विकर्म तीनोंका तत्त्व समझनेके लिये कहा था। यहाँ मनुष्येषु बुद्धिमान् पद देकर भगवान् मानो यह बताते हैं कि जिसने कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मके तत्त्वको जान लिया है उसने सब कुछ जान लिया है अर्थात् वह ज्ञातज्ञातव्य हो गया है।स युक्तः कर्मयोगी सिद्धिअसिद्धिमें सम रहता है। कर्मका फल मिले या न मिले उसमें कभी विषमता नहीं आती क्योंकि उसने फलेच्छाका सर्वथा त्याग कर दिया है। समताका नाम योग है। वह नित्यनिरन्तर समतामें स्थित है इसलिये वह योगी है।प्राणिमात्रका परमात्मासे स्वतःसिद्ध नित्ययोग है। परन्तु मनुष्यने संसारसे अपना सम्बन्ध मान लिया इसीसे वह उस नित्ययोगको भूल गया। तात्पर्य यह कि जडके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही परमात्माके साथ अपने नित्य सम्बन्धको भूलना है। कर्मयोगी फलेच्छा ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल दूसरोंके लिये ही कर्तव्यकर्म करता है जिससे उसका जडसे माना हुआ सम्बन्ध टूट जाता है और उसे परमात्मासे स्वतःसिद्ध नित्ययोगकी अनुभूति हो जाती है। इसलिये उसे योगी कहा गया है।युक्तः पदमें यह भाव है कि उसने प्राप्त करनेयोग्य तत्त्वको प्राप्त कर लिया है अर्थात् वह प्राप्तप्राप्तव्य हो गया है।कृत्स्नकर्मकृत् जबतक कुछ पाना शेष रहता है तबतक करना शेष रहता ही है अर्थात् जबतक कुछनकुछ पानेकी इच्छा रहती है तबतक करनेका राग नहीं मिटता।नाशवान् कर्मोंसे मिलनेवाला फल भी नाशवान् ही होता है। जबतक नाशवान् फलकी इच्छा है तबतक (कर्म) करना समाप्त नहीं होता। परन्तु जब नाशवान्से सर्वथा सम्बन्ध छूटकर परमात्मप्राप्तिरूप अविनाशी फलकी प्राप्ति हो जाती है तब (कर्म) करना सदाके लिये समाप्त हो जाता है और कर्मयोगीका कर्म करने तथा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता। ऐसा कर्मयोगी सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला है अर्थात् उसके लिये अब कुछ करना शेष नहीं है वह कृतकृत्य हो गया है।करना जानना और पाना शेष नहीं रहनेसे वह कर्मयोगी अशुभ संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है (गीता 4। 16 32)। सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाले अर्थात् कर्मोंका तत्त्व जाननेवाले सिद्ध कर्मयोगी महापुरुषका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.18।।तमेव उद्बोधयितुमाह कर्मणि इति। आत्मीयेषु कर्मसु यः अकर्तृत्वं पश्यति प्रशान्ततया अकर्मसु च परकृतेषु आत्मकृतत्वं जानाति परिपूर्णोदितरूपत्वेन स एव सर्वस्य मध्ये बुद्धिमान् कार्त्स्येन साकल्येनासौ कर्म करोति अतोऽस्य केन कर्मणा फलं दीयताम इति उदितदशायाम्। प्रशान्तत्वे तु कृत्स्नानि कर्माणि कृन्तति छिनत्ति। अतः सर्वमेव कर्म करोति न किञ्चिद्वा करोति इत्युपनिषत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.18।।उत्तरश्लोकमाकाङ्क्षापूर्वकमुपादत्ते किं पुनरिति। प्रथमपादस्याक्षरोत्थमर्थं कथयति कर्मणीत्यादिना। द्वितीयपादस्यापिशब्दप्रकाशितमर्थं निर्दिशति अकर्मणि चेति। कर्माभावे यः कर्म पश्यतीति संबन्धः। प्रवृत्तेरेव कर्मत्वान्निवृत्तेस्तदभावत्वात्तत्र कथं कर्मदर्शनमित्याशङ्क्य द्वयोरपि कारकाधीनत्वेनाविशेषमभिप्रेत्याह कर्तृतन्त्रत्वादिति। प्रवृत्ताविव निवृत्तावपि कर्मदर्शनमविरुद्धमिति शेषः। ननु निवृत्तेर्वस्त्वधीनत्वात् कारकनिबन्धनाभावान्न तत्र कर्मदर्शनं युज्यते तत्राह वस्त्विति।क्रियाकारकफलव्यवहारस्य सर्वस्याविद्यावस्थायामेव प्रवृत्तत्वाद्वस्तुसंस्पर्शशून्यत्वात्प्रवृत्तिवन्निवृत्तावपि यः कर्म पश्यति स मनुष्येषु बुद्धिमानिति संबन्धः। कर्मण्यकर्माऽकर्मणि च कर्म पश्यतो बुद्धिमत्त्वं युक्तत्वं समस्तकर्मकृत्त्वं च कथमित्याशङ्क्याह इति स्तूयत इति। श्लोकस्य शब्दोत्थेऽर्थे दर्शिते तात्पर्यार्थापरिज्ञानान्मिथो विरोधं शङकते नन्विति। कथमिदं विरुद्धमित्याशङ्क्य कर्मणीति विषयसप्तमी वा स्यादधिकरणसप्तमी वेति विकल्प्याद्येऽन्याकारं ज्ञानमन्यावलम्बनमिति स्पष्टो विरोधः स्यादित्याह नहीति। अन्यस्यान्यात्मतायोगात्कर्माकर्मणोरभेदासंभवादकर्माकारं कर्मावलम्बनं ज्ञानमयुक्तमित्यर्थः। द्वितीयं दूषयति तत्रेति। कर्मण्यधिकरणे ततो विरुद्धमकर्म कथमाधेयं द्रष्टा द्रष्टुमीष्टे। नहि कर्माकर्मणोर्मिथोविरुद्धयोराधाराधेयभावः संभवतीत्यर्थः। विषयसप्तमीमभ्युपेत्य सिद्धान्ती परिहरति नन्वकर्मैवेति। लोकस्य मूढदृष्टेर्विवेकवर्जितस्य परमार्थतो ब्रह्माकर्माक्रियमेव सद् भ्रान्त्या कर्मसहितं क्रियावदिव प्रतिभातीत्यक्षरार्थः। परस्पराध्यासमभ्युपेत्योक्तं तथेति। यथा खल्वकर्म ब्रह्म कर्मवदुपलभ्यते तथा कर्म सक्रियमेव द्वैतमक्रिये ब्रह्मण्यधिष्ठाने संसृष्टं तद्वद्भातीत्यक्षरयोजना। कर्माकर्मणोरितरेतराध्यासे सिद्धे सम्यग्दर्शनसिद्ध्यर्थं भगवतो वचनमुचितमित्याह तत्रेति। यथा यदिदं रजतमिति प्रतिपन्नं तदिदानीं शुक्तिशकलं पश्येति भ्रमसिद्धरजतरूपविषयानुवादेन तदधिष्ठानं शुक्तिमात्रमुपदिश्यते तथा भ्रमसिद्धकर्माद्यात्मकविषयानुवादेन तदधिष्ठानं कर्मादिरहितं कूटस्थं ब्रह्म भगवता व्यपदिश्यते तथाच भगवद्वचनमविरुद्धमित्याह अत इति। इतश्चाध्यारोपितकर्माद्यनुवादपूर्वकं तदधिष्ठानस्य कर्मादिरहितस्य निर्विशेषस्य ब्रह्मणो भगवता बोध्यमानत्वान्न तत्र विरोधाशङ्कावकाशो भवतीत्याह बुद्धिमत्त्वादीति। कूटस्थाद्ब्रह्मणोऽन्यस्य सर्वस्य मायामात्रत्वादन्यज्ञानाद्बुद्धिमत्त्वयुक्तत्वसर्वकर्मकृत्त्वानामनुपपत्तेरत्र नस बुद्धिमानित्यादिना बुद्धिमत्त्वादिनिर्देशाद्ब्रह्मज्ञानादेव तदुपपत्तेः सर्वविक्रियारहितब्रह्मज्ञानमेव विवक्षितमित्यर्थः। बोधशब्दस्य सम्यग्ज्ञाने प्रसिद्धत्वात्कर्माकर्मविकर्मणां स्वरूपं बोद्धव्यमस्तीति वदता सम्यग्ज्ञानोपदेशस्य विवक्षितत्वादपि कूटस्थं ब्रह्मात्राभिप्रेतमित्याह बोद्धव्यमिति चेति। फलवचनपर्यालोचनायामपि कूटस्थं ब्रह्मात्राभिप्रेतं प्रतिभातीत्याह नचेति। सम्यग्ज्ञानाधीनफलमत्र न श्रुतमित्याशङ्क्याह यज्ज्ञात्वेति। अध्यारोपापवादार्थं भगवद्वचनमविरुद्धमित्युपपादितमुपसंहरति तस्मादिति। तद्विपर्ययेत्यत्र तच्छब्देन प्राणिनो गृह्यन्ते। विषयसप्तमीपरिग्रहेण परिहारमभिधायाधिकरणसप्तमीपक्षे दर्शितं दूषणमनङ्गीकारेण परिहरति नचेति। व्यवहारभूमिरत्रेत्युच्यते योग्यत्वे सत्यनुपलब्धेरित्यर्थः। अकर्माधिकरणं कर्म न संभवतीत्यत्र हेत्वन्तरमाह कर्माभावत्वादिति। नहि तुच्छस्याधिकरणं क्वचिद्द्रष्टुमिष्टं चेत्यर्थः। निरूप्यमाणे कर्माकर्मणोरधिकरणाधिकर्तव्यभावासंभवे फलितमाह अत इति। शास्त्रपरिचयविरहिणामध्यारोपमुदाहरति यथेति। कर्माकर्मणोरारोपितत्वमुक्तममृष्यमाणः सन्नाशङ्कते नन्विति। कर्म कर्मैवेत्यत्राकर्म चाकर्मैवेति द्रष्टव्यं। विमतं सत्यमव्यभिचारित्वाद्ब्रह्मवदित्यर्थः। तत्र कर्म तत्त्वतो नाव्यभिचारि कर्मत्वान्नौस्थस्य तटस्थवृक्षगमनवदित्यव्यभिचारित्वं कर्मण्यसिद्धमिति परिहरति तन्नेति। अकर्म च तत्त्वतो नाव्यभिचारि कर्माभावत्वाद् दूरप्रदेशे चैत्रमैत्रादिषु गच्छत्स्वेव चक्षुषा संनिधानविधुरेषु दृश्यमानगत्यभाववदित्याह दूरेष्विति। दूरत्वादेव विशेषतः संनिकर्षविरहितेषु तेषु स्वरूपेण चक्षुःसंनिकृष्टेषु चक्षुषा गत्यभावदर्शनादिति योजना। गतिरहितेषु तरुषु गतिदर्शनवत्प्रकृते ब्रह्मण्यविक्रिये कर्मदर्शनं सक्रिये च द्वैतप्रपञ्चे चितिमत्सु चैत्रादिषु गत्यभावदर्शनवत्कर्माभावस्य विपरीतस्य दर्शनं येन हेतुना संभवति तेन तस्य विपरीत दर्शनस्य निरसनार्थं भगवद्वचनमिति दार्ष्टान्तिकं निगमयति एवमित्यादिना। ननु कर्मतदभावयोरारोपितत्वादविक्रियस्य ब्रह्मणो ज्ञानमात्राभिप्रेतं चेदव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयं न जायते म्रियते वेत्यादिना पौनरुक्त्यं प्राप्तं तत्रैव ब्रह्मात्मनो निर्विकारत्वस्योक्तत्वादिति तत्राह तदेतदिति। तदेतदात्मनि शङ्कितं सक्रियत्वमसकृदुक्तप्रतिवचनमपि निर्विकारात्मवस्त्वपेक्षयात्यन्तविपरीतदर्शनं मिथ्याज्ञानं तेन भावितत्वं तत्संस्कारप्रचयवत्त्वं ततोऽतिशयेन मोहमापद्यमानो लोकः श्रुतमपि तत्त्वं विस्मृत्य पुनर्यत्किंचित्प्रसङ्गमापाद्य सक्रियत्वमेवात्मनश्चोदयतीति पुनः पुनस्तत्त्वभूतमुत्तरं भगवानभिधत्ते। वस्तुनश्च दुर्विज्ञेयत्वात्पुनः पुनः प्रतिपादनं तत्तद्भ्रमनिराकरणार्थमुपयुज्यते। तथाच नास्ति पुनरुक्तिरित्यर्थः। असकृदुक्तप्रतिवचनमेवानुवदति अव्यक्तोऽयमिति। कर्माभाव उक्त इति संबन्धः। उक्तस्यन जायते म्रियते वा विपश्चिदि त्यादिश्रुतौ प्रकृतस्मृतावसङ्गत्वादिन्यायेन च प्रसिद्धत्वमस्तीत्याह श्रुतीति। न केवलमुक्तः कर्माभावः किंतु सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्येत्यादौ वक्ष्यमाणश्चेत्याह वक्ष्यमाणश्चेति। ननु कर्मणो देहादिनिर्वर्त्यत्वेनत्रैविध्यात्कूटस्थस्वभावस्यात्मनोऽसङ्गत्वात्तद्व्यापाररूपस्य कर्मणोऽप्रसिद्धत्वान्न तस्मिन्नकर्मणि विपरीतस्य कर्मणो दर्शनं सिध्यतीत्याशङ्क्याह तस्मिन्निति। कर्मैव विपरीतं तस्य दर्शनमिति यावत्। अहं कर्तेत्यात्मसमानाधिकरणस्य व्यापारस्यानुभवात्कर्मभ्रमस्तावदात्मन्यत्यन्तरूढोऽस्तीत्यर्थः। आत्मनि कर्मविभ्रमोऽस्तीत्यत्र हेतुमाह यत इति। आत्मनो निष्क्रियत्वे कुतस्तस्मिन्यथोक्तो विभ्रमः संभवेदित्याशङ्क्याह देहेति। इदानीमात्मन्यकर्मभ्रममुदाहरति तथेत्यादिना। यथा शुक्तौ स्वाभाविकमरूप्यत्वं रूप्यत्वमारोपितं तदभावोऽप्यारोप्याभावत्वादारोपपक्षपाती तथात्मनोऽपि स्वाभाविकमविक्रियत्वं सक्रियत्वं पुनरध्यस्तं तदभावत्वात्कर्माभावोऽप्यध्यस्त एवेति मन्वानः सन्नुपसंहरति तत्रेदमिति। आत्मनि कर्मादिविभ्रमे लौकिके सिद्धे सतीदं कर्मणीत्यादिवचनं तत्परिहारार्थं भगवानुक्तवानित्यर्थः। संप्रत्युक्तेर्थे श्लोकाक्षरसमन्वयं दर्शयितुं कर्मणीत्यादि व्याचिख्यासुर्भूमिकां करोति अत्र चेति। व्यवहारभूमौ कार्यकरणाधिकरणं कर्म स्वेनैव रूपेण व्यवस्थितं सदात्मन्यविक्रिये कार्यकरणारोपणद्वारेण सर्वैरारोपितमित्यत्र हेतुमाह यत इति। अविवेकिनां तु कर्तृत्वाभिमानः सुतरामिति वक्तुमपिशब्दः। एवमात्मनि कर्मारोपमुपपाद्य प्रथमपादं व्याचष्टे अत इति। आत्मनि कर्मरहिते कर्मारोपे दृष्टान्तमाह नदीति। आरोपवशादात्मनिष्ठत्वेन कर्मणि सर्वलोकप्रसिद्धे कर्माभावं यः पश्येत्स बुद्धिमानिति संबन्धः। अकर्मदर्शनस्य यथाभूतत्वं सम्यक्त्वम्। तत्र दृष्टान्तमाह गत्यभावमिवेति। द्वितीयपादं व्याकरोति अकर्मणि चेति। अध्यारोपमभिनयति तूष्णीमिति। अकर्मणि कर्मदर्शने युक्तिमाह अहंकारेति। पूर्वार्धेनोक्तमनूद्योत्तरार्धं विभजते य एवमिति। आत्मनि कार्यकरणसंघातसमारोपद्वारेण तद्व्यापारमात्रे कर्मणि शुक्तिकायामिव रजतमारोपितविषये तदभावमकर्म वस्तुतो यो रजताभाववदनुभवत्यकर्मणि च संघातव्यापारोपरमे तद्द्वारा स्वात्मन्यहं तूष्णीमासे सुखमित्यारोपिते गोचरे कर्माहंकारहेतुकं यस्तत्त्वतो मन्यते स रूप्यतदभावविभागहीनशुक्तिमात्रवदात्ममात्रं कर्मतदभावविभागशून्यं कूटस्थं परमार्थतोऽवगच्छन्बुद्धिमानित्यादिस्तुतियोग्यतां गच्छतीत्येवं स्वाभिप्रायेण श्लोकं व्याख्यायात्र वृत्तिकारव्याख्यानमुत्थापयति अयमिति। अन्यथाव्याख्यानमेव प्रश्नद्वारा प्रकटयति कथमित्यादिना। ईश्वरार्थेनानुष्ठाने फलाभाववचनं व्याहतमिति मत्वाह किलेति। नित्यानामकर्मत्वमप्रसिद्धमित्याशङ्क्य फलराहित्यगुणयोगात्तेष्वकर्मत्वव्यवहारः सिध्यतीत्याह गौण्येति। नित्यानामकरणं मुख्यवृत्त्यैवाकर्म वाच्यमित्याह तेषां चेति। तत्र कर्मशब्दस्य प्रत्यवायाख्यफलहेतुत्वगुणयोगाद् गौण्यैव वृत्त्या प्रवृत्तिरित्याह तच्चेति। पातनिकामेवं कृत्वा श्लोकाक्षराणि व्याचष्टे तत्रेत्यादिना। अकर्मणि चेत्यादि व्याकरोति तथेति। स बुद्धिमानित्यादि पूर्ववत्। परकीयं व्याख्यानं व्युदस्यति नैतदिति। नित्यं कर्माकर्म नित्याकरणं कर्मेति ज्ञानाद्दुरितनिवृत्त्यनुपपत्तेर्भगवद्वचनं वृत्तिकारमते बाधितं स्यादित्यर्थः।धर्मेण पापमपनुदति इति श्रुतेर्नित्यानुष्ठानाद् दुरितनिबर्हणप्रसिद्धेस्तदनुष्ठानस्य फलान्तराभावात्तदकर्मेति ज्ञात्वानुष्ठाने क्रियमाणे कथमशुभक्षयो नेति शङ्कते कथमिति।क्षेत्रज्ञस्येश्वरज्ञानादिशुद्धिः परमा मता इति स्मरणात्कर्मणात्यन्तिकाशुभक्षयाभावेऽप्यङ्गीकृत्य परिहरति नित्यानामिति। नित्यानुष्ठानादशुभक्षयेऽपि नास्मिन्प्रकरणे तद्विवक्षितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभादिति ज्ञानादशुभक्षयस्य प्रतिज्ञातत्वात् न च तज्ज्ञानफलाभावविषयमेषितव्यमित्याह नत्विति। अशुभस्य फलाभावाज्ञानकार्यत्वाभावान्न फलाभावज्ञानात्क्षयः सिध्यतीत्यर्थः। किंचातीन्द्रियोऽर्थः शास्त्रान्निश्चीयते न च नित्यकर्मणां फलाभावज्ञानादशुभनिवृत्तिरित्यत्र शास्त्रमस्तीत्याह नहीति। नित्याकरणं कर्मेति ज्ञानमपि नाशुभनिवृत्तिफलत्वेन चोदितमस्तीत्याह नित्यकर्मेति। भगवद्वचनमेवात्र प्रमाणमित्याशङ्क्याह नचेति। साधारणमेव यज्ज्ञात्वेत्यादि भगवतो वचनं नतु नित्यानां फलाभावं ज्ञात्वेति विशेषविषयमित्यर्थः। अशुभमोक्षणासंभवप्रदर्शनेन कर्मण्यकर्मदर्शननिराकरणन्यायेनाकर्मणि कर्मदर्शनं निराकरोति एतेनेति। नामादिषु फलाय ब्रह्मदृष्टिवदकर्मण्यपि फलार्थं कर्मदृष्टिविधानान्नाशुभमोक्षणानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह नहीति। अत्र हि श्लोके नित्यस्य कर्तव्यतामात्रं परमते विवक्षितमतश्चाकर्मणि कर्मदर्शनं विधीयते तत्फलायेति कल्पना परस्य सिद्धान्ताविरुद्धेत्याह नित्यस्य त्विति। परमतेऽपि नित्यस्य कर्तव्यतामात्रमत्र श्लोके न विवक्षितं किंतु नित्यानुष्ठाने प्रवृत्तिसिद्ध्यर्थं नित्याकरणात्प्रत्यवायो भवतीति ज्ञानमपि कर्तव्यत्वेनात्र विवक्षितमेवेत्याशङ्क्याह नचेति। न तावत्प्रवृत्तिरस्य विज्ञानस्य फलं नियोगादेव तदुपपत्तेर्नापिफलान्तरमनुपलम्भादतोऽफलत्वादकरणात्प्रत्यवायो भवतीति ज्ञानं नात्र कर्तव्यत्वेन विवक्षितमित्यर्थः।किंचाकरणे कर्मदृष्टिविधावकरणस्यालम्बनत्वेन प्रधानत्वाज्ज्ञेयत्वं वक्तव्यं तच्च तुच्छत्वादनुपपन्नमित्याह नापीति। अकरणस्यासतो नामादिवदाश्रयत्वेन दर्शनासंभवेऽपि सामानाधिकरण्येनेदं रजतमितिवद्दर्शनं भविष्यतीत्याशङ्क्याह नापि कर्मेति। आदिशब्देन सर्वोत्कर्षादि गृह्यते फलवत्त्वं स्तुतिर्वा सम्यग्ज्ञानस्य युक्तं न मिथ्याज्ञानस्यानुपपत्तेरित्यर्थः। स्वप्ने मिथ्याज्ञानमपि फलवदुपलब्धमित्याशङ्क्य मिथ्याज्ञानस्याशुभाविरोधित्वान्न तस्मात्तन्निवृत्तिरित्याह मिथ्याज्ञानमेवेति। अशुभादेवाशुभानिवृत्तौ दृष्टान्तमाह नहीति। अविवेकपूर्वकमिदं रजतमिति सदसतोः सामानाधिकरण्यान्मिथ्याज्ञानं युक्तं कर्माकर्मणोस्तु विवेकेन भासमानयोः सामानाधिकरण्याधीनं ज्ञानं सिंहदेवदत्तयोरिव गौणं न मिथ्याज्ञानमिति शङ्कते नन्विति। कर्माकर्मेति दर्शने फलाभावो गुणोऽकर्म कर्मेति दर्शने तु फलाभावो गुणस्तन्निमित्तमिदं ज्ञानं गौणमित्याह फलेति। यथोक्तज्ञानस्य गौणत्वेऽपि प्रामाणिकफलाभावान्न तद्गौणतोचितेति दूषयति नेत्यादिना। कर्माकर्मेत्यादिगौणविज्ञानोपन्यासव्याजेन नित्यकर्मणः कर्तव्यतया विवक्षितत्वाद्गौणज्ञानस्याफलत्वमदूषणमित्याशङ्क्याह नापीति। ज्ञानादशुभमोक्षणस्य श्रुतस्य हानिरश्रुतस्य नित्यानुष्ठानस्य कल्पनेत्यनेन व्यापारगौरवेण न कश्चिद्विशेषः सिध्यतीत्यर्थः। उक्तमेव प्रपञ्चयति स्वशब्देनेति। नरकपातः स्यादतो विधेरेवानुष्ठेयानि तानीति शेषः। यथोक्तवाचकशब्दप्रयोगादेवापेक्षितार्थसिद्धिसंभवे भगवतो व्याजवचनकल्पनमनुचितमित्याह तत्रेति। प्रकृते श्लोके वृत्तिकृतां व्याख्यानेन परमाप्तस्यैव भगवतो विप्रलम्भकत्वमापादितमिति तदीयं व्याख्यानमुपेक्षितव्यमिति फलितमाह तत्रैवमिति। नित्यकर्मानुष्ठानसिद्ध्यर्थं व्याजरूपमिति भगवद्वचनमुचितमित्याशङ्क्यस्वशब्देनापीत्यादिप्रागुक्तपरिपाट्या तदनुष्ठानबोधनसंभवान्मैवमित्याह नचैतदिति। वस्तुशब्देन नित्यकर्मानुष्ठानमुच्यते। यथात्मप्रतिपादनं सुबोधत्वसिद्ध्यर्थं पौनःपुन्येन क्रियते तथा नित्यानामपि कर्मणामनुष्ठानं कर्मण्यकर्मेत्यादिशब्दान्तरेणोच्यमानं सुबोधं स्यादिति भगवतः शब्दान्तरं युक्तमित्याशङ्क्य तस्य नित्यानुष्ठानवाचकत्वाभावान्मैवमित्याह नापीति। किञ्च पूर्वमेव नित्यानुष्ठानस्य स्पष्टमुपदिष्टत्वान्न तस्य सुबोधनार्थं शब्दान्तरमपेक्षितमित्याह कर्मण्येवेति। कर्माकर्मादिविज्ञानव्याजेन नित्यकर्मानुष्ठानकर्तव्यतायां तात्पर्यमित्येतन्निराकृत्यकर्माकर्मादिदर्शनं गौणमिति पक्षे दूषणान्तरमाह सर्वत्र चेति। लोके वेदे च यथा प्रशस्तं देवतादितत्त्वं यच्च कर्तव्यमनुष्ठानार्हमग्निहोत्रादि तदेव बोद्धव्यमित्युच्यते न निष्फलं काकदन्तादि कर्मण्यकर्मदर्शनमकर्मणि च कर्मदर्शनं गौणत्वादेवाप्रशस्तमकर्तव्यं च नातस्तद्बोद्धव्यमिति वचनमर्हतीत्यर्थः। किञ्च कर्मादेर्मायामात्रत्वाद्गौणमपि तद्विषयं ज्ञानं मिथ्याज्ञानमिति न तस्य बोद्धव्यत्वसिद्धिरित्याह नचेति। मिथ्याज्ञानस्य बोद्धव्यत्वाभावेऽपि तद्विषयस्य बोद्धव्यता सिध्येदित्याशङ्क्य वस्त्वाभासत्वान्मैवमित्याह तत्प्रत्युपस्थापितं चेति। यत्पुनरकरणस्य प्रत्यवायहेतुत्वमकरणे गौण्या वृत्त्या कर्मशब्दप्रयोगे निमित्तमिति तद्दूषयति नापीति। अकरणात्प्रत्यवायो भवतीत्यत्र श्रुतिस्मृतिविरोधमभिधाय युक्तिविरोधमभिदधाति असत इति। असतः सद्रूपेण भवनमभवनं च निःस्वरूपत्वादनुपपन्नं निरस्तसमस्ततत्त्वस्य किंचित्तत्त्वाभ्युपगमे सर्वप्रमाणानामप्रामाण्यप्रसङ्गादित्याह तच्चेति। यत्तु नित्यानां फलराहित्यं तत्राकर्मशब्दप्रयोगे निमित्तमिति तन्निरस्यति नचेति। न केवलं विध्युद्देशे स्वफलाभावान्नित्यानां विध्यनुपपत्तिरपितु धात्वर्थस्य क्लेशात्मकत्वात्तत्र श्रुतफलाभावेनैव विधिरवकाशमासादयेदित्याह दुःखेति। दुःखरूपस्यापि धात्वर्थस्य साध्यत्वेन कार्यत्वात्तद्विषयो विधिः स्यादिति चेन्नेत्याह दुःखस्य चेति। स्वर्गादिफलाभावेऽपि नित्यानामकरणनिमित्तनिरयनिरासार्थं दुःखरूपाणामपि स्यादनुष्ठेयत्वमित्याशङ्क्याह तदकरणे चेति। फलान्तराभावेऽपि मोक्षसाधनत्वान्मुमुक्षुणा नित्यानि कर्माण्यनुष्ठेयानीत्याशङ्क्याह स्वाभ्युपगमेति। वृत्तिकारव्याख्यानासद्भावे फलितमुपसंहरति तस्मादिति। कोऽसौ यथाश्रुतोऽर्थः श्लोकस्येत्याशङ्क्याह तथाचेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.18।।कर्म प्रवक्ष्यामि 4।16 इति प्रतिज्ञातं कर्मादिप्रवचनं क्वापि नोपलक्ष्यतेकर्माणि इति श्लोकस्य यत्किञ्चिद्दर्शनस्तुतिरूपत्वादित्यत आह कर्मादीति। यद्यप्ययं श्लोकोऽन्यथा प्रतीयते तथाप्यविहितस्य स्तुत्ययोगाद्वाक्यभेदेन कर्मादिकं प्रतिपाद्य तत्स्तुतिः क्रियते इति भावः। कथमनेन तत्स्वरूपमुच्यते इत्यतो व्याचष्टे कर्मणीति वर्णाश्रमोचिते। अकर्म कर्माभावं स्वस्य। तद्विवृणोति विष्णोरेवेति।चित्प्रतिबिम्बः इत्यनेन तदधीनः करोमीत्यपि सूचयति। सुप्त्यादिकं कथमकर्म इत्यत उक्तम् अकरणेति। जीवापेक्षयेदम्। एतदपि विवृणोति अयमेवेति। सर्वदा जीवव्यापारभावेऽभावे च सर्वस्य महदादेः स्वप्नगजादेश्च अनेन भगवतः परानपेक्षया कर्तृत्वं स्वस्य तदधीनकर्तृत्वं च ज्ञात्वा वर्णाश्रमविहितानुष्ठानं कर्मेत्युक्तं भवति। अनेनैवोक्तलक्षणे विकर्माकर्मणी प्रोक्तप्रायो यः पश्येत्स बुद्धिमानिति कोऽर्थभेदः कथं च स्तुतिः इत्यत आह स इति। ज्ञानिशब्दो हि पामरविलक्षणे प्रसिद्धः। मतुबादीनां प्रशंसार्थत्वात् स युक्त इत्येतत्स्तुतियथा स्यात्तथा व्याचष्टे स एव चेति।कृत्स्नकर्मकृत् इत्येतन्मुख्ये बाधकं प्रदर्शयन् गौणं व्याख्याति सर्वेति। सर्वस्याश्वमेधादेः। कृत्स्नकर्मणां फलस्य ज्ञानस्य मोक्षस्य प्राप्तप्रायत्वादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.18।।कर्मादिस्वरूपमाह कर्मणीति। कर्मणि क्रियमाणे सत्यकर्म यः पश्येत् विष्णोरेव कर्म नाहं चित्प्रतिबिम्बः किञ्चित्करोमीति। अकर्मणि सुप्त्यादावकरणावस्थायाम्। परमेश्वरस्य यः कर्म पश्यति अयमेव परमेश्वरः सर्वदा सर्वसृष्ट्यादिकं करोतीति स बुद्धिमान् ज्ञानी स एव स युक्तो योगयुक्तः। सर्वाकरणाप्स एव च कृत्स्नकर्मकृत कृत्स्नफलवत्त्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.18।।अकर्मशब्देन अत्र कर्मेतरत् प्रस्तुतम् आत्मज्ञानम् उच्यते। कर्मणि क्रियमाणे एव आत्मज्ञानं य पश्येत् अकर्मणि च आत्मज्ञाने वर्तमान एव यः कर्म पश्येत्।किम् उक्तं भवतिक्रियमाणम् एव कर्म आत्मयाथात्म्यानुसन्धानेन ज्ञानाकारं यः पश्येत् तत् च ज्ञानं कर्मणि अन्तर्गततया कर्माकारं यः पश्येद् इति उक्तं भवति क्रियमाणे हि कर्मणि कर्तृभूतात्मयाथात्म्यानुसन्धानेन तद् उभयं सम्पन्नं भवति।एवम् आत्मयाथात्म्यानुसन्धानगर्भं कर्म यः पश्येत् स बुद्धिमान् कृत्स्नशास्त्रार्थवित् मनुष्येषु स युक्तः मोक्षार्हः स एव कृत्स्नकर्मकृत् कृत्स्नशास्त्रार्थकृत्।प्रत्यक्षेण क्रियमाणस्य कर्मणो ज्ञानाकारता कथम् उपपद्यते इत्यत्र आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.18।। कर्मणि क्रियते इति कर्म व्यापारमात्रम् तस्मिन् कर्मणि अकर्म कर्माभावं यः पश्येत् अकर्मणि च कर्माभावे कर्तृतन्त्रत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्त्योः वस्तु अप्राप्यैव हि सर्व एव क्रियाकारकादिव्यवहारः अविद्याभूमौ एव कर्म यः पश्येत् पश्यति सः बुद्धिमान् मनुष्येषु सः युक्तः योगी च कृत्स्नकर्मकृत् समस्तकर्मकृच्च सः इति स्तूयते कर्माकर्मणोरितरेतरदर्शी।।ननु किमिदं विरुद्धमुच्यते कर्मणि अकर्म यः पश्येत् इति अकर्मणि च कर्म इति न हि कर्म अकर्म स्यात् अकर्म वा कर्म। तत्र विरुद्धं कथं पश्येत् द्रष्टा न अकर्म एव परमार्थतः सत् कर्मवत् अवभासते मूढदृष्टेः लोकस्य तथा कर्मैव अकर्मवत्। तत्र यथाभूतदर्शनार्थमाह भगवान् कर्मण्यकर्म यः पश्येत् (गीता 4.18) इत्यादि। अतो न विरुद्धम्। बुद्धिमत्त्वाद्युपपत्तेश्च। बोद्धव्यम् इति च यथाभूतदर्शनमुच्यते। न च विपरीतज्ञानात् अशुभात् मोक्षणं स्यात् यत् ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् (गीता 4.16) इति च उक्तम्। तस्मात् कर्माकर्मणी विपर्ययेण गृहीते प्राणिभिः तद्विपर्ययग्रहणनिवृत्त्यर्थं भगवतो वचनम् कर्मण्यकर्म यः इत्यादि। न च अत्र कर्माधिकरणमकर्म अस्ति कुण्डे बदराणीव। नापि अकर्माधिकरणंकर्मास्ति कर्माभावत्वादकर्मणः। अतः विपरीतगृहीते एव कर्माकर्मणी लौकिकैः यथा मृगतृष्णिकायामुदकं शुक्तिकायां वा रजतम्। ननु कर्म कर्मैव सर्वेषां न क्वचित् व्यभिचरति तत् न नौस्थस्य नावि गच्छन्त्यां तटस्थेषु अगतिषु नगेषु प्रतिकूलगतिदर्शनात् दूरेषु चक्षुषा असंनिकृष्टेषु गच्छत्सु गत्यभावदर्शनात् एवम् इहापि अकर्मणि कर्मदर्शनं कर्मणि च अकर्मदर्शनं विपरीतदर्शनं येन तन्निराकरणार्थमुच्यतेकर्मण्यकर्म यः पश्येत् इत्यादि।।तदेतत् उक्तप्रतिवचनमपि असकृत् अत्यन्तविपरीतदर्शनभाविततया मोमुह्यमानो लोकः श्रुतमपि असकृत् तत्त्वं विस्मृत्य विस्मृत्य मिथ्याप्रसङ्गम् अवतार्यावतार्य चोदयति इति पुनः पुनः उत्तरमाह भगवान् दुर्विज्ञेयत्वं च आलक्ष्य वस्तुनः।अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयम् न जायते म्रियते इत्यादिना आत्मनि कर्माभावः श्रुतिस्मृतिन्यायप्रसिद्धः उक्तः वक्ष्यमाणश्च। तस्मिन् आत्मनि कर्माभावे अकर्मणि कर्मविपरीतदर्शनम् अत्यन्तनिरूढम् यतः किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः (गीता 4.16)। देहाद्याश्रयं कर्म आत्मन्यध्यारोप्य अहं कर्ता मम एतत् कर्म मया अस्य कर्मणः फलं भोक्तव्यम् इति च तथा अहं तूष्णीं भवामि येन अहं निरायासः अकर्मा सुखी स्याम् इति कार्यकरणाश्रयं व्यापारोपरमं तत्कृतं च सुखित्वम् आत्मनि अध्यारोप्य न करोमि किंचित् तूष्णीं सुखमासे इति अभिमन्यते लोकः। तत्रेदं लोकस्य विपरीतदर्शनापनयाय आह भगवान् कर्मण्यकर्म यः पश्येत् इत्यादि।।अत्र च कर्म कर्मैव सत् कार्यकरणाश्रयं कर्मरहिते अविक्रिये आत्मनि सर्वैः अध्यस्तम् यतः पण्डितोऽपि अहं करोमि इति मन्यते। अतः आत्मसमवेततया सर्वलोकप्रसिद्धे कर्मणि नदीकूलस्थेष्विव वृक्षेषु गतिप्रातिलोम्येन अकर्म कर्माभावं यथाभूतं गत्यभावमिव वृक्षेषु यः पश्येत् अकर्मणि च कार्यकरणव्यापारोपरमे कर्मवत् आत्मनि अध्यारोपिते तूष्णीं अकुर्वन् सुखंआसे इत्यहंकाराभिसंधिहेतुत्वात् तस्मिन् अकर्मणि च कर्म यः पश्येत् यः एवं कर्माकर्मविभागज्ञः सः बुद्धिमान् पण्डितः मनुष्येषु सः युक्तः योगी कृत्स्नकर्मकृच्च सः अशुभात् मोक्षितः कृतकृत्यो भवति इत्यर्थः।।अयं श्लोकः अन्यथा व्याख्यातः कैश्चित्। कथम् नित्यानां किल कर्मणाम् ईश्वरार्थे अनुष्ठीयमानानां तत्फलाभावात् अकर्माणि तानि उच्यन्ते गौण्या वृत्त्या। तेषां च अकरणम् अकर्म तच्च प्रत्यवायफलत्वात् कर्म उच्यते गौण्यैव वृत्त्या। तत्र नित्ये कर्मणि अकर्म यः पश्येत् फलाभावात् यथा धेनुरपि गौः अगौः इत्युच्यते क्षीराख्यं फलं न प्रयच्छति इति तद्वत्। तथा नित्याकरणे तु अकर्मणि च कर्म यः पश्येत् नरकादिप्रत्यवायफलं प्रयच्छति इति।।नैतत् युक्तं व्याख्यानम्। एवं ज्ञानात् अशुभात् मोक्षानुपपत्तेः यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् इति भगवता उक्तं वचनं बाध्येत। कथम् नित्यानामनुष्ठानात् अशुभात् स्यात् नाम मोक्षणम् न तु तेषां फलाभावज्ञानात्। न हि नित्यानां फलाभावज्ञानम् अशुभमुक्तिफलत्वेन चोदितम् नित्यकर्मज्ञानं वा। न च भगवतैवेहोक्तम्। एतेन अकर्मणि कर्मदर्शनं प्रत्युक्तम्। न हि अकर्मणि कर्म इति दर्शनं कर्तव्यतया इह चोद्यते नित्यस्य तु कर्तव्यतामात्रम्। न च अकरणात् नित्यस्य प्रत्यवायो भवति इति विज्ञानात् किञ्चित् फलं स्यात्। नापि नित्याकरणं ज्ञेयत्वेन चोदितम्। नापि कर्म अकर्म इति मिथ्यादर्शनात् अशुभात् मोक्षणं बुद्धिमत्त्वं युक्तता कृत्स्नकर्मकृत्त्वादि च फलम् उपपद्यते स्तुतिर्वा। मिथ्याज्ञानमेव हि साक्षात् अशुभरूपम्। कुतः अन्यस्मादशुभात् मोक्षणम् न हि तमः तमसो निवर्तकं भवति।।ननु कर्मणि यत् अकर्मदर्शनम् अकर्मणि वा कर्मदर्शनं न तत् मिथ्याज्ञानम् किं तर्हि गौणं फलभावाभावनिमित्तम् न कर्माकर्मविज्ञानादपि गौणात् फलस्य अश्रवणात्। नापि श्रुतहान्यश्रुतपरिकल्पनायां कश्चित् विशेष उपलभ्यते। स्वशब्देनापि शक्यं वक्तुम् नित्यकर्मणां फलं नास्ति अकरणाच्च तेषां नरकपातः स्यात् इति तत्र व्याजेन परव्यामोहरूपेणकर्मण्यकर्म यः पश्येत् इत्यादिना किम् तत्र एवं व्याचक्षाणेन भगवतोक्तं वाक्यं लोकव्यामोहार्थमिति व्यक्तं कल्पितं स्यात्। न च एतत् छद्मरूपेण वाक्येन रक्षणीयं वस्तु नापि शब्दान्तरेण पुनः पुनः उच्यमानं सुबोधं स्यात् इत्येवं वक्तुं युक्तम्। कर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यत्र हि स्फुटतर उक्तः अर्थः न पुनर्वक्तव्यो भवति। सर्वत्र च प्रशस्तं बोद्धव्यं च कर्तव्यमेव। न निष्प्रयोजनं बोद्धव्यमित्युच्यते।।न च मिथ्याज्ञानं बोद्धव्यं भवति तत्प्रत्युपस्थापितं वा वस्त्वाभासम्। नापि नित्यानाम् अकरणात् अभावात् प्रत्यवायभावोत्पत्तिः नासतो विद्यते भावः (गीता 2.16) इति वचनात् कथं असतः सज्जायेत (बृ0 उ0 6.2.2) इति च दर्शितम् असतः सज्जन्मप्रतिषेधात्। असतः सदुत्पत्तिं ब्रुवता असदेव सद्भवेत् सच्चापि असत् भवेत् इत्युक्तं स्यात्। तच्च अयुक्तम्सर्वप्रमाणविरोधात्। न च निष्फलं विदध्यात् कर्म शास्त्रम् दुःखस्वरूपत्वात् दुःखस्य च बुद्धिपूर्वकतया कार्यत्वानुपपत्तेः। तदकरणे च नरकपाताभ्युपगमात् अनर्थायैव उभयथापि करणे च अकरणे च शास्त्रं निष्फलं कल्पितं स्यात्। स्वाभ्युपगमविरोधश्च नित्यं निष्फलं कर्म इति अभ्युपगम्य मोक्षफलाय इति ब्रुवतः। तस्मात् यथाश्रुत एवार्थः कर्मण्यकर्म यः इत्यादेः। तथा च व्याख्यातः अस्माभिः श्लोकः।।तदेतत् कर्मणि अकर्मदर्शनं स्तूयते

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【 Verse 4.19 】

▸ Sanskrit Sloka: यस्य सर्वे समारम्भा: कामसङ्कल्पवर्जिता: | ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तमाहु: पण्डितं बुधा: ||

▸ Transliteration: yasya sarve samārambhāḥ kāmasaṅkalpavarjitāḥ | jñānāgnidagdhakarmāṇaṁ tam āhuḥ paṇḍitaṁ budhāḥ ||

▸ Glossary: yasya: one whose; sarve: all kinds of; samārambhāḥ: in all situations; kāma: desire for sense gratification; saṅkalpa: purpose; varjitāḥ: devoid of; jñāna: of perfect knowledge; agni: fire; dagdhakarmāṇaṁ: whose actions have been burnt; taṁ: him; āhuḥ: declare; paṇḍitaṁ: wise; budhāḥ: the wise.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.19 He who is determined and devoid of all desires for sense gratification, he is of perfect knowledge. The sages declare such a person wise whose actions are burnt by the fire of knowledge.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.19।।जिसके सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भ संकल्प और कामनासे रहित हैं तथा जिसके सम्पूर्ण कर्म ज्ञानरूपी अग्निसे जल गये हैं उसको ज्ञानिजन भी पण्डित (बुद्धिमान्) कहते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.19।। जिसके समस्त कार्य कामना और संकल्प से रहित हैं ऐसे उस ज्ञानरूप अग्नि के द्वारा भस्म हुये कर्मों वाले पुरुष को ज्ञानीजन पण्डित कहते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.19 यस्य whose? सर्वे all? समारम्भाः undertakings? कामसङ्कल्पवर्जिताः devoid of desires and purposes? ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम् whose actions have been burnt by the fire of knowledge? तम् him? आहुः call? पण्डितम् a sage? बुधाः the wise.Commentary A sage performs actions only with a view to set an example to the masses. Though he works? he does nothing as he has no selfish interests? as his actions are burnt by the fire of wisdom which consists in the realisaion of inaction in action? through the knowledge of the Self or BrahmaJnana. BrahmaJnana is a mighty spiritual fire which consumes the results of all kinds of actions (Karmas)? good and bad? and makes the enlightened sage ite free from the bonds of action. The sage who leads a life of perfect renunciation does only what is reired for the bare existence of his body. (Cf.III.19IV.10IV.37).

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.19. He, whose every exertion is devoid of intention for the desirable objects, and whose actions are burnt up by the fire of wisdom-him the wise call a man of learning.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.19 The wise call him a sage, for whatever he undertakes is free from the motive of desire, and his deeds are purified by the fire of Wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.19 He whose every undertaking is free from desire and delusive identification (of the body with the self), whose actions are burnt up in the fire of knowledge - him the wise describe as a sage.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.19 The wise call him learned whose actions are all devoid of desires and their thougts, [Kama-sankalpa is variously translated as 'desires and purposes', 'plans and desires for results', 'hankering for desires', etc. But Sankarcarya shows sankalpa as the cause of kama. -Tr.] and whose actions have been burnt away by the fire of wisdom.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.19 He whose undertakings are all devoid of desires and (selfish) purposes and whose actions have been burnt by the fire of knowledge, him the wise call a sage.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.19 Yasya etc. The actions, performed without intention for the desirable objects, - i.e., the fruits desired for - are burnt up by putting them into the fire of wisdom, the nature of which has been earlier described , and also is to be described in the seel.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.19 In the case of an aspirant for release, all undertakings of actions in the form of obligatory, occasional and desiderative acts accomplished through the acisition of materials for their performance as also other works, are free from desire, i.e., are devoid of attachment to fruits. They are devoid of delusive identification. If the mind identifies the self with Prakrti and its Gunas, it is Sankalpa, i.e., 'delusive identification.' Genuine Karma Yoga is free from such identification. Such identification is overcome through contemplation on the real nature of the self as different from Prakrti. Those who know the truth call him a sage, who acts in this way and whose previous Karmas are thery burnt up by the fire of knowledge of the real nature of the self generated along with his actions. He is a true Karma Yogin.

Thus that knowledge is involved in true Karma Yoga, is established.

Sri Krsna elaborates this point again:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.19 Budhah, the wise, the knowers of Brahman; ahuh, call; tam, him; panditam, learned, in the real sense; yasya, whose, of the one who perceives as stated above; samarambhah, actions-whatever are undertaken; are sarve, all; kama-sankalpa-varjitah, devoid of desires and the thoughts which are their (desires') causes (see 2.62)-i.e., (those actions) are performed as mere movements, without any selfish purpose: if they are performed by one (already) engaged in actions, then they are for preventing people from going astray, and if they are done by one who has withdrawn from actions, then they are merely for the maintenance of the body-; and jnanagni-dagdha-karmanam, whose actions have been burnt away by the fire of wisdom. Finding inaction etc. in action etc. is jnana, wisdom; that itself is agnih, fire. He whose actions, karma, described as good and bad, have been dagdhani, burnt away by that fire of wisdom, is jnana-agni-dagdha-karma. However, one who is a perceiver of 'inaction' etc. [Perceiver of inaction etc.: He who knows the truth about action and inaction as explained before.-Tr.] is free from actions owing to the very fact of his seeing 'inaction' etc. He is a monk, who acts merely for the purpose of maintaining the body. Being so, he does not engage in actions although he might have done so before the dawn of discrimination. He again who, having been engaged in actions under the influence of past

Chapter 4 (Part 13)

tendencies, later on becomes endowed with the fullest Self-knowledge, he surely renounces (all) [Ast. adds this word sarva, all.-Tr.] actions along with their accessories as he does nnot find any purpose in activity. For some reason, if it becomes impossible to renounce actions and he, for the sake of preventing people from going astray, even remains engaged as before in actions-without attachment to those actions and their results because of the absence of any selfish purpose-, still he surely does nothing at all! His actions verily become 'inaction' because of having been burnt away by the fire of wisdom. By way of pointing out this idea, the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.19।। जिस पुरुष के सभी कर्म कामना और फलों के संकल्प (आसक्ति) से रहित होते हैं वह पुरुष सन्त या आत्मानुभवी कहलाता है। भविष्य में विषयोपभोग के द्वारा सुख पाने की बुद्धि की योजना को कामना कहते हंै। यह योजना बनाना स्वयं की स्वतन्त्रता को सीमित करना ही है। कामना करने का अर्थ है कि परिस्थितियों को अपने अनुकूल होने का आग्रह करना। इस प्रकार प्राप्त परिस्थितियों से सदा असन्तुष्ट रहते हुये भविष्य में उन्हें अनुकूल बनाने के प्रयत्न में हम अपने आप को भ्रमित करके अनेक विघ्नों का सामना करते रहते हैं। कर्म करने की यह पद्धति कर्त्ता के आनन्द और प्रेरणा का हरण कर लेती है।हम इस पर पहले ही विचार कर चुके हैं कि फलासक्ति किस प्रकार हमारी शक्तियों को नष्ट कर देती है। कर्मफल सदैव भविष्य में मिलता है इसलिए उसकी चिन्ता करने का तात्पर्य वर्तमान से पलायन करके अनुत्पन्न भविष्य में जीना है। यह नियम है कि कारणों अर्थात् कर्मों के अनुरूप ही कर्मफल मिलता है अत निश्चित रूप से सफलता पाने का एक मात्र उपाय है वर्तमान काल में पूरी लगन से कार्य करना।यहाँ कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष के सब कर्म काम और संकल्प से रहित होते हैं। प्रकरण के सन्दर्भ में इन दो शब्दों को ठीक से समझने की आवश्यकता है क्योंकि केवल शाब्दिक अर्थ लेने से यह कथन अत्यन्त अनुपयुक्त होगा। भगवान् के कथन से कोई यह न समझ ले कि समत्व में स्थित ज्ञानी पुरुष अपने स्फूर्त कर्मों में इष्ट फल पाने के लिए अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं करता है। इसका आशय इतना ही है कि वह कर्म करते समय काल्पनिक भय चिन्ता आदि में अपने मन की शक्ति विनष्ट नहीं करता। वेदान्त मनुष्य की बुद्धि की उपेक्षा नहीं करता है। गीता में उपदिष्ट जीवन यापन का मार्ग तो हमें वह साधन प्रदान करता है कि हम अधिकाधिक कुशलतापूर्वक कर्म करके अपनी क्षमताओं का पूर्ण उपयोग करते हुए अपने कार्य क्षेत्र में सर्वोच्च सफलता प्राप्त करें।जो व्यक्ति बुद्धिमत्तापूर्वक जीने और कुशलतापूर्वक काम करने की कला को सीख लेता है वह कर्म करने में ही आनन्द को पाकर उसी में रम जाता है। किसी दिव्य और श्रेष्ठ लक्ष्य के अभाव के कारण ही हमारा मन अनेक चिन्ताओं से ग्रस्त रहता है। ज्ञानी पुरुष का मन दिव्य चैतन्यस्वरूप में स्थित रहने के कारण जगत् में सब प्रकार के कर्म करते हुए भी वह आनन्द का ही अनुभव करता है।ज्ञानी पुरुष की मनस्थिति के वर्णन का प्रयोजन अर्जुन जैसे साधकों के लिए साधन मार्ग का निर्देश करना है। अर्जुन के निमित्त दिया भगवान् श्रीकृष्ण का यह उपदेश सभी कालों के साधकों के लिए भी अनुकरणीय है।यदि हमारा पुत्र चिकित्सक बनना चाहता है तो हम उसे अन्य चिकित्सकों के संघर्ष की कहानी बताते हैं जिससे उत्तम चिकित्सक बनने के लिए आवश्यक गुणों को वह अर्जित कर सके। इसी प्रकार यहाँ ज्ञानी पुरुष के स्वाभाविक लक्षण बताकर भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन को साधन मार्ग में प्रवृत्त करते हैं जिससे वह जीवन के लक्ष्य तक पहुँच सके।उपर्युक्त लक्षणों से युक्त ज्ञानी पुरुष समाज के लिए कर्म करता हुआ भी वास्तव में कुछ कर्म नहीं करता है। उसके कर्म अकर्म तुल्य ही हैं क्योंकि ज्ञानाग्नि से उसके कर्म (अर्थात् बन्धन के कारणभूत अहंकार और स्वार्थ) भस्म हो चुके होते हैं यह सात्त्विक स्थिति की चरम सीमा है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.19।।तदेतत्स्तौति यस्येति। यथोक्तदर्शिनः सर्वे समारभ्यन्त इति समारम्भाः कर्माणि कामैः फलतृष्णाभिः संकल्पैस्तत्रतत्र कर्तृत्वाभिनिवेशैस्तत्कारणीभूतैः यद्वा काम्यन्त इति कामाः फलानि तैः तत्कारणीभूतैस्तत्संकल्पैश्च वर्जिताः मुधैव चेष्टामात्रा अनुष्ठीयन्ते। कर्मादावकर्मादिदर्शनं ज्ञानं तदैवाग्निस्तेन दग्धानि शुभाशुभलक्षणानि कर्माणि यस्य तं परमार्थतः पण्डितं बुधाः तत्त्वदर्शिन आहुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.19।।तदेतत्परमार्थदर्शिनः कर्तृत्वाभिमानाभावेन कर्मालिप्तत्वं प्रपञ्च्यते यस्येति ब्रह्मकर्मसमाधिनेत्यन्तेन। यस्य पूर्वोक्तपरमार्थदर्शिनः सर्वे यावन्तो वैदिका लौकिका वा समारम्भाः समारभ्यन्त इति व्युत्पत्त्या कर्माणि कामसंकल्पवर्जिताः कामः फलतृष्णा संकल्पोऽहं करोमीति कर्तृत्वाभिमानस्ताभ्यां वर्जिताः लोकसंग्रहार्थं वा जीवनमात्रार्थं वाप्रारब्धकर्मवेगाद्वृथाचेष्टारूपा भवन्ति। तं कर्मादावकर्मादिदर्शनं ज्ञानं तदेवाग्निस्तेन दग्धानि शुभाशुभलक्षणानि कर्माणि यस्य तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात् इति न्यायात्। ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं तं बुधा ब्रह्मविदः परमार्थतः पण्डितमाहुः। सम्यग्दर्शी हि पण्डित उच्यते नतु भ्रान्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.19।।अविदुषां कर्मण्यकर्मभावनां द्रढयितुं विदुषां कर्मदर्शनं स्तौति यस्य सर्वे समारम्भा इत्यादिभिः षड्भिः। यस्य विदुषः सर्वे समारभ्यन्त इति समारम्भाः कर्माणि। कामेन फलेच्छया संकल्पेनाहमिदं करोमीत्यभिमानेन च वर्जिताः तं ज्ञानाग्निना कर्मादावकर्मादिदर्शनेन दग्धान्यङ्कुरीभावाच्च्यावितानि कर्माणि शुभाशुभानि येन तं पण्डितं बुधा आहुः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.19।।किञ्च यो निष्कामो मदाज्ञात्वेन कर्म करोति स मद्भक्तानां च मे मत इत्याह यस्येति। यस्य सर्वे समारम्भाः सर्वकर्मणां सम्यक् मदाज्ञात्वेन आरम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः कामः फलं सङ्कल्पस्तदिच्छा एतदुभयरहिताः तं ज्ञानाग्निना दग्धकर्माणं ज्ञानाग्निना दग्धानि कर्माणि यस्य तादृशं दग्धत्वादग्रे तद्भोगवृक्षोत्पत्तिबीजभावरहितं बुधाः भक्ताः पण्डितं शास्त्रोक्तसर्वस्वरूपज्ञमाहुः वदन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.19।।कर्मण्यकर्म यः पश्येत् इति श्रुत्यर्थार्थापत्तिभ्यां यदुक्तमर्थद्वयं तदेव स्पष्टयति यस्येत्यादिपञ्चभिः।सम्यगारभ्यन्त इति समारम्भाः कर्माणि। काम्यत इति कामो बलं तत्संकल्पेन वर्जिता यस्य भवन्ति तं पण्डितभाहुः। तत्र हेतुः। यतस्तैः समारम्भैः शुद्धचित्ते सति जातेन ज्ञानाग्निना दग्धान्यकर्मतां नीतानि कर्माणि यस्य तम्। आरूढावस्थायां तु कामः फलविषयस्तदर्थमिदं कर्म कर्तव्यमिति कर्मविषयः संकल्पश्च ताभ्यां वर्जितः। शेषं स्पष्टम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.19।।एतस्यैव बुद्धिमत्त्वं द्रढयति यस्येति। क्रियासमारम्भाः कामफलेममेदं कर्म फलसाधकं इति सङ्कल्पश्च ताभ्यां वर्जिताः स एवम्भूतः सकर्माऽप्यकर्मैव। यतो ब्रह्मज्ञानेनाग्निना दग्धकर्मा कर्मबीजबन्धनशून्य इत्यकर्मोच्यते अधेनुगोवत् तं पण्डा विवेकवती बुद्धिः सञ्जाता यस्य तथाविधमाहुर्बुधाः।यथार्थदर्शी ज्ञानाग्निदग्धकर्माशयोऽमलः। ब्रह्मभावरतो योगी कर्मवानपि पण्डितः इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.19।।उपर्युक्त कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनकी स्तुति करते हैं जिनका प्रारम्भ किया जाता है उनका नाम समारम्भ है इस व्युत्पत्तिसे सम्पूर्ण कर्मोंका नाम समारम्भ है। उपर्युक्त प्रकारसे कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाले जिस पुरुषके समस्त समारम्भ ( कर्म ) कामनासे और कामनाके कारणरूप संकल्पोंसे भी रहित हो जाते हैं अर्थात् जिसके द्वारा बिना ही किसी अपने प्रयोजनके यदि वह प्रवृत्तिमार्गवाला है तो लोकसंग्रहके लिये और निवृत्तिमार्गवाला है तो जीवनयात्रानिर्वाहके लिये केवल चेष्टामात्र ही क्रिया होती है तथा कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मदर्शनरूप ज्ञानाग्निसे जिसके पुण्यपापरूप सम्पूर्ण कर्म दग्ध हो गये हैं ऐसे ज्ञानाग्निदग्धकर्मा पुरुषको ब्रह्मवेत्ताजन वास्तवमें पण्डित कहते हैं। जो कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्म देखनेवाला है वह यदि विवेक होनेसे पूर्व कर्मोंमें लगा हो तो भी कर्ममें अकर्म और अकर्ममें कर्मका ज्ञान हो जानेसे केवल जीवननिर्वाहमात्रके लिये चेष्टा करता हुआ कर्मरहित संन्यासी ही हो जाता है फिर उसकी कर्मोंमें प्रवृत्ति नहीं होती। अर्थात् जो पहले कर्म करनेवाला हो और पीछे जिसको आत्माका सम्यक् ज्ञान हुआ हो ऐसा पुरुष कर्मोंमें कोई प्रयोजन न देखकर साधनोंसहित कर्मोंका त्याग कर ही देता है। परंतु किसी कारणसे कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर कोई ऐसा पुरुष यदि कर्मोंमें और उनके फलमें आसक्तिरहित होकर केवल लोकसंग्रहके लिये पहलेके सदृश कर्म करता रहता है तो भी निजका प्रयोजन न रहनेके कारण ( वास्तवमें ) वह कुछ भी नहीं करता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.19।। व्याख्या   यस्य सर्वे समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः (टिप्पणी प0 245) विषयोंका बारबार चिन्तन होनेसे उनकी बारबार याद आनेसे उन विषयोंमें ये विषय अच्छे हैं काममें आनेवाले हैं जीवनमें उपयोगी हैं और सुख देनेवाले हैं ऐसी सम्यग्बुद्धिका होना संकल्प है और ये विषयपदार्थ हमारे लिये अच्छे नहीं हैं हानिकारक हैं ऐसी बुद्धिका होना विकल्प है। ऐसे संकल्प और विकल्प बुद्धिमें होते रहते हैं। जब विकल्प मिटकर केवल एक संकल्प रह जाता है तब ये विषयपदार्थ हमें मिलने चाहिये ये हमारे होने चाहिये इस तरह अन्तःकरणमें उनको प्राप्त करनेकी जो इच्छा पैदा हो जाती है उसका नाम काम (कामना) है। कर्मयोगसे सिद्ध हुए महापुरुषमें संकल्प और कामना दोनों ही नहीं रहते अर्थात् उसमें न तो कामनाओंका कारण संकल्प रहता है और न संकल्पोंका कार्य कामना ही रहती है। अतः उसके द्वारा जो भी कर्म होते हैं वे सब संकल्प और कामनासे रहित होते हैं।संकल्प और कामना ये दोनों कर्मके बीज हैं। संकल्प और कामना न रहनेपर कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् कर्म बाँधनेवाले नहीं होते। सिद्ध महापुरुषमें भी संकल्प और कामना न रहनेसे उसके द्वारा होनेवाले कर्म बन्धनकारक नहीं होते। उसके द्वारा लोकसंग्रहार्थ कर्तव्यपरम्परासुरक्षार्थ सम्पूर्ण कर्म होते हुए भी वह उन कर्मोंसे स्वतः सर्वथा निर्लिप्त रहता है।भगवान्ने कहींपर संकल्पोंका (6। 4) कहींपर कामनाओंका (2। 55) और कहींपर संकल्प तथा कामना दोनोंका (6। 24 25) त्याग बताया है। अतः जहाँ केवल संकल्पोंका त्याग बताया गया है वहाँ कामनाओंका और जहाँ केवल कामनाओंका त्याग बताया गया है वहाँ संकल्पोंका त्याग भी समझ लेना चाहिये क्योंकि संकल्प कामनाओंका कारण है और कामना संकल्पोंका कार्य है। तात्पर्य है कि साधकको सम्पूर्ण संकल्पों और कामनाओंका त्याग कर देना चाहिये।मोटरकी चार अवस्थाएँ होती हैं 1 मोटर गैरेजमें खड़ी रहनेपर न इंजन चलता है और न पहिये चलते हैं। 2 मोटर चालू करनेपर इंजन तो चलने लगता है पर पहिये नहीं चलते। 3 मोटरको वहाँसे रवाना करनेपर इंजन भी चलता है और पहिये भी चलते हैं। 4 निरापद ढलवाँ मार्ग आनेपर इंजनको बंद कर देते हैं और पहिये चलते रहते हैं। इसी प्रकार मनुष्यकी भी चार अवस्थाएँ होती हैं 1 न कामना होती है और न कर्म होता है। 2 कामना होती है पर कर्म नहीं होता। 3 कामना भी होती है और कर्म भी होता है। 4 कामना नहीं होती और कर्म होता है।मोटरकी सबसे उत्तम (चौथी) अवस्था यह है कि इंजन न चले और पहिये चलते रहें अर्थात् तेल भी खर्च न हो और रास्ता भी तय हो जाय। इसी तरह मनुष्यकी सबसे उत्तम अवस्था यह है कि कामना न हो और कर्म होते रहें। ऐसी अवस्थावाले मनुष्यको ज्ञानिजन भी पण्डित कहते हैं।समारम्भाः (टिप्पणी प0 246.1) पदका यह भाव है कि कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषके द्वारा हरेक कर्म सुचारुरूपसे साङ्गोपाङ्ग और तत्परतापूर्वक होता है। दूसरा एक भाव यह भी है कि उसके कर्म शास्त्रसम्मत होते हैं। उसके द्वारा करनेयोग्य कर्म ही होते हैं। जिससे किसीका अहित होता हो वह कर्म उससे कभी नहीं होता।सर्वे पदका यह भाव है कि उसके द्वारा होनेवाले सबकेसब कर्म संकल्प और कामनासे रहित होते हैं। कोईसा भी कर्म संकल्पसहित नहीं होता। प्रातः उठनेसे लेकर रातमें सोनेतक शौचस्नान खानापीना पाठपूजा जपचिन्तन ध्यानसमाधि आदि शरीरनिर्वाहसम्बन्धी सम्पूर्ण कर्म संकल्प और कामनासे रहित ही होते हैं।ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम् कर्मोंका सम्बन्ध पर(शरीरसंसार) के साथ है स्व(स्वरूप) के साथ नहीं क्योंकि कर्मोंका आरम्भ और अन्त होता है पर स्वरूप सदा ज्योंकात्यों रहता है इस तत्त्वको ठीकठीक जानना ही ज्ञान है। इस ज्ञानरूप अग्निसे सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं अर्थात् कर्मोंमें फल देनेकी (बाँधनेकी) शक्ति नहीं रहती (गीता 4। 16 32)।वास्तवमें शरीर और क्रिया दोनों संसारसे अभिन्न हैं पर स्वयं सर्वथा भिन्न होता हुआ भी भूलसे इनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है। जब महापुरुषका अपने कहलानेवाले शरीरके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं रहता तब जैसे संसारमात्रसे सब कर्म होते हैं ऐसे ही उसके कहलानेवाले शरीरसे सब कर्म होते हैं। इस प्रकार कर्मोंसे निर्लिप्तताका अनुभव होनेपर उस महापुरुषके वर्तमान कर्म ही नष्ट नहीं होते प्रत्युत संचित कर्म भी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। प्रारब्धकर्म भी केवल अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितिके रूपमें उसके सामने आकर नष्ट हो जाते हैं परन्तु फलसे असङ्ग होनेके कारण वह उनका भोक्ता नहीं बनता अर्थात् किञ्चिन्मात्र भी सुखी या दुःखी नहीं होता। इसलिये प्रारब्धकर्म भी अस्थायी परिस्थितिमात्र उत्पन्न करके नष्ट हो जाते हैं।तमाहुः पण्डितं बुधाः जो कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके परमात्मामें लगा हुआ है उस मनुष्यको समझना तो सुगम है पर जो कर्मोंसे किञ्चिन्मात्र भी लिप्त हुए बिना तत्परतापूर्वक कर्म कर रहा है उसे समझना कठिन है। सन्तोंकी वाणीमें आया है त्यागी शोभा जगतमें करता है सब कोय। हरिया गृहस्थी संतका भेदी बिरला होय।।तात्पर्य यह है कि संसारमें (बाहरसे त्याग करनेवाले) त्यागी पुरुषकी महिमा तो सब गाते हैं पर गृहस्थमें रहकर सब कर्तव्यकर्म करते हुए भी जो निर्लिप्त रहता है उस (भीतरका त्याग करनेवाले) पुरुषको समझनेवाला कोई बिरला ही होता है।जैसे कमलका पत्ता जलमें ही उत्पन्न होकर और जलमें रहते हुए भी जलसे लिप्त नहीं होता ऐसे ही कर्मयोगी कर्मयोनि(मनुष्यशरीर) में ही उत्पन्न होकर और कर्ममय जगत्में रहकर कर्म करते हुए भी कर्मोंसे लिप्त नहीं होता (टिप्पणी प0 246.2)। कर्मोंसे लिप्त न होना कोई साधारण बुद्धिमानीका काम नहीं है। पीछेके अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने ऐसे कर्मयोगीको मनुष्योंमें बुद्धिमान् कहा है और यहाँ कहा है कि उसे ज्ञानिजन भी पण्डित अर्थात् बुद्धिमान् कहते हैं। भाव यह है कि ऐसा कर्मयोगी पण्डितोंका भी पण्डित ज्ञानियोंका भी ज्ञानी है (टिप्पणी प0 246.3)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.19।।अत एव यस्येति। कामेषु काम्यमानेषु फलेषु संकल्पं विहाय क्रियमाणानि कथितकथयिष्यमाणस्वरूपे ज्ञानाग्नौ अनुप्रवि(वे)श्य दह्यन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.19।।कर्मण्यकर्मदर्शनं पूर्वोक्तं स्तोतुमुत्तरश्लोकं प्रस्तौति तदेतदिति। यथोक्तदर्शित्वं पूर्वोक्तदर्शनसंपन्नत्वम्। समारम्भशब्दस्य कर्मविषयत्वं न रूढ्या किंतु व्युत्पत्त्येत्याह समारभ्यन्त इतीति। कामसंकल्पवर्जितत्वे कथं कर्मणामनुष्ठानमित्याशङ्क्याह मुधैवेति। उद्देशफलाभावे तेषामनुष्ठानं यादृच्छिकं स्यादित्याशङ्क्य प्रवृत्तेन निवृत्तेन वा तेषामनुष्ठानं यादृच्छिकं स्यादिति विकल्प्य क्रमेण निरस्यति प्रवृत्तेनेत्यादिना। ज्ञानाग्नीत्यादि विभजते कर्मादाविति यथोक्तज्ञानं योग्यमेव दहति नायोग्यमितिविवक्षितत्वात्तस्मिन्नग्निपदम्। यथोक्तविज्ञानविरहिणामपि वैशेषिकादीनां पण्डितत्वप्रसिद्धिमाशङ्क्य तेषां पण्डिताभासत्वं विवक्षित्वा विशिनष्टि परमार्थत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.19।।ननु प्रतिज्ञातमुक्तं किमुत्तरैः श्लोकैः इत्यत आह एतदेवेति कर्मस्वरूपमेव। अनेनात्रापि वाक्यभेदेन कामादिवर्जनं विधाय स्तुतिः क्रियत इति सूचितम्। मिथ्यात्वज्ञानेन कर्मणामुपमर्दो ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वमिति व्याख्यानमसदिति भावेनाह उक्तेति। परमेश्वरस्यैव कर्तृत्वं ज्ञात्वा स्वस्य स्वातन्त्र्येण कर्माभावज्ञानमेव ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.19।।एतदेव प्रपञ्चयति यस्येत्यादिना श्लोकपञ्चकेन। उक्तप्रकारेण ज्ञानाग्निदग्धकर्माणम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.19।।यस्य मुमुक्षोः सर्वे द्रव्यार्जनादिलौकिककर्मपूर्वकनित्यनैमित्तिककाम्यरूपकर्मसमारम्भाः कामवर्जिताः फलसङ्गरहिताः संकल्पवर्जिताः च।प्रकृत्या तद्गुणैः च आत्मानम् एकीकृत्य अनुसन्धानं संकल्पः। प्रकृतिवियुक्तात्मस्वरूपानुसन्धानयुक्ततया तद्रहिताः। तम् एवं कर्म कुर्वाणं पण्डितं कर्मान्तर्गतात्मयाथात्म्यज्ञानाग्निना दग्धप्राचीनकर्माणम् आहुः तत्त्वज्ञाः। अतः कर्मणो ज्ञानाकारत्वम् उपपद्यते।एतद् एव विवृणोति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.19।। यस्य यथोक्तदर्शिनः सर्वे यावन्तः समारम्भाः सर्वाणि कर्माणि समारभ्यन्ते इति समारम्भाः कामसंकल्पवर्जिताः कामैः तत्कारणैश्च संकल्पैः वर्जिताः मुधैव चेष्टामात्रा अनुष्ठीयन्ते प्रवृत्तेन चेत् लोकसंग्रहार्थम् निवृत्तेन चेत् जीवनमात्रार्थम्। तं ज्ञानाग्निदग्धकर्माणं कर्मादौ अकर्मादिदर्शनं ज्ञानं तदेव अग्निः तेन ज्ञानाग्निना दग्धानि शुभाशुभलक्षणानि कर्माणि यस्य तम् आहुः परमार्थतः पण्डितं बुधाः ब्रह्मविदः।।यस्तु अकर्मादिदर्शी सः अकर्मादिदर्शनादेव निष्कर्मा संन्यासी जीवनमात्रार्थचेष्टः सन् कर्मणि न प्रवर्तते यद्यपि प्राक् विवेकतः प्रवृत्तः। यस्तु प्रारब्धकर्मा सन् उत्तरकालमुत्पन्नात्मसम्यग्दर्शनः स्यात् सः सर्वकर्मणि प्रयोजनमपश्यन् ससाधनं कर्म परित्यजत्येव। सः कुतश्चित् निमित्तात् कर्मपरित्यागासंभवे सति कर्मणि तत्फले च सङ्गरहिततया स्वप्रयोजनाभावात् लोकसंग्रहार्थं पूर्ववत् कर्मणि प्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित् करोति ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वात् तदीयं कर्म अकर्मैव संपद्यते इत्येतमर्थं दर्शयिष्यन् आह

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【 Verse 4.20 】

▸ Sanskrit Sloka: त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं नित्यतृप्तो निराश्रय: | कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति स: ||

▸ Transliteration: tyaktvā karmaphalāsaṅgaṁ nityatṛpto nirāśrayaḥ | karmaṇyabhipravṛtto’pi naiva kiñcitkaroti saḥ ||

▸ Glossary: tyaktvā : having given up; karmaphalāsaṅgaṁ: attachment to results of action; nitya: always; tṛptaḥ: satisfied; nirāśrayaḥ: without shelter; karmaṇi: in action; abhipravṛttaḥ: being fully engaged; api: although; na: does not; eva: verily; kiñcit: anything; karoti: does; saḥ: he

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.20 Having given up all attachment to the results of his action, always satisfied and independent, the wise man does not act, though he is engaged in all kinds of action.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.20।।जो कर्म और फलकी आसक्तिका त्याग करके आश्रयसे रहित और सदा तृप्त है वह कर्मोंमें अच्छी तरहसे लगा हुआ भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.20।। जो पुरुष कर्मफलासक्ति को त्यागकर नित्यतृप्त और सब आश्रयों से रहित है वह कर्म में प्रवृत्त होते हुए भी (वास्तव में) कुछ भी नहीं करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.20 त्यक्त्वा having abandoned? कर्मफलासङ्गम् attachment to the fruits of action? नित्यतृप्तः even content? निराश्रयः depending on nothing? कर्मणि in action? अभिप्रवृत्तः engaged? अपि even? न not? एव verily? किञ्चित् anything? करोति does? सः he.Commentary The same idea of inaction in action is repeated here to produce a deep impression on the minds of the aspirants. He who works for the wellbeing of the world and he who performs actions without egoism and attachment for the fruits? to set an example to the masses? really does nothing at all though he is ever engaged in activity? as he possesses the knowledge of the Self which is beyond all activity and as he has realised his identity with It.As Brahman the Absolute is selfcontained? all the desires are gratified if one realises the Self. He is ever satisfied and does not depend on anything? just as a man who has the favour of the king does not depend on the minister or the government official for anything. (Cf.IV.41)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.20. By abandoning attachment for fruits of actions, remaining ever content and depending on nothing, that person, even though he is engaged in action, does not at all perform anything.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.20 Having surrendered all claim to the results of his actions, always contented and independent, in reality he does nothing, even though he is apparently acting.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.20 Having renounced attachment to the fruits of his actions, ever contented with the eternal self, and dependent on none, one does not act at all, even though engaged in action.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.20 Having given up attachment to the results of action, he who is ever-contented, dependent on nothing, he really does not do anything even though engaged in action.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.20 Having abandoned attachment to the fruits of the action, ever content, depending on nothing, he does not do anything though engaged in activity.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.20 See Comment under 4.21

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.20 Whoever performs actions, renouncing attachment to their fruits and is satisfied with the eternal, i.e., satisfied with his own self, and dependent on none, i.e., devoid of dependence on transient Prakrti (body and external nature) - such a perosn, even though fully engaged in actions, does not act at all. He is engaged in the practice of knowledge under the form of action.

Again, Karma, having the form of knowledge, is examined:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.20 With the help of the above-mentioned wisdom, tyaktva, having given up the idea of agentship; and phala-asangam, attachment to the results of action; he who is nitya-trptah, ever-trptah, ever-contented, i.e. has no hankering for objects; and nirasrayah, dependent on nothing-. Asraya means that on which a person leans, desiring to achieve some human goal. The idea is that he is dependent of any support which may be a means of attaining some coveted seen or unseen result. In reality, actions done by a man of Knowledge are certainly inactions, since he is endowed with the realization of the actionless Self. Actions together with their accessories must be relinished by one who has become thus, because they have no end to serve. This being so, api, even though; he remains abhi-pravrttah, engaged as before; karmani, in actions-getting out of those (actions) being impossible-, either with the intention of preventing people from going astray or with a view to avoiding the censure of the wise people; sah, he; eva, really; na karoti, does not do; kincit, anything, because he is endued with the realization of the actionless Self. [From the subjective standpoint of the enlightened there are no actions, but ordinary people mistakenly think them to be actions, which in reality are a mere semblance of it.] On the other hand, one who is the opposite of the above-mentioned one, (and) in whom, even before undertaking works, has dawned the realization of his identity with Brahman, the all-pervasive, inmost, actionless Self; who,being bereft of solicitation for desirable objects seen or unseen, has renounced actions along with their accessories, by virtue of seeing no purpose to be served by undertaking actions meant to secure some seen or unseen result, and makes effort only for the maintenance of the body, he, the monk steadfast in Knowledge, becomes free. Hence, in order to express this idea the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.20।। यहाँ हमें न कर्मफल त्यागने को कहा गया है और न ही उसकी उपेक्षा करने को किन्तु फल के साथ हमारी मानसिक दासता तथा आसक्ति का त्याग करने को कहा गया है। जब हम इच्छित फलों की चिन्ताओं से ग्रस्त हो जाते हैं तब हम अपने कर्मों को कुशलतापूर्वक नहीं कर पाते हैं। इस चिन्ता और आसक्ति का त्याग करके समाज कल्याण के लिए हमको प्रयत्नशील होना चाहिये।एक सच्चा कलाकार अपनी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति का कभी भी स्वेच्छा से विक्रय करने को तैयार नहीं होगा जिस चित्र को चित्रित करने के लिए उसने इतना अधिक परिश्रम किया और समय दिया वह चित्र ही उसका वास्तविक पारितोषिक होता है। यदि भूखे भी रहना पड़े तो भी वह उस चित्र की बिक्री करना नहीं चाहेगा उस चित्र को देखने मात्र से उसे जो सन्तोष और आनन्द का अनुभव होता है उसकी तुलना में सम्पूर्ण जगत् की सम्पत्ति भी तुच्छ प्रतीत होती है। यदि एक लघु परिच्छिन्न कलाकृति उस सामान्य व्यक्ति को इतना अधिक आनन्द प्रदान कर सकती है तो आत्मस्वरूप में स्थित दैवी आनन्द की अनुभूति में रमे हुए नामरूपमय जगत् में काम करते हुए ज्ञानी पुरुष के आनन्द का क्या मापदण्ड हो सकता है वास्तव में अनन्त तत्त्व को आत्मरूप से अनुभव किया हुआ पुरुष बाह्य आश्रयों से सर्वथा मुक्त हो जाता है।फलासक्ति असन्तोष तथा बाह्य वस्तुओं पर आश्रय ये सब अविद्याजनित जीव के लिए ही होते हैं। यह जीव ही इन सबसे पीड़ित होता है। जब सत्य का साधक यह पहचान लेता है कि इस जीव का वास्तविक स्वरूप अनन्त और परिपूर्ण है तब यह जीवभाव (अहंकार) नष्ट हो जाता है और स्वभावत उसके सब दुखो का अन्त होना अवश्यंभावी है। पात्र में रखे हुये जल को हिलाने से उसमें स्थित सूर्य का प्रतिबिम्ब भी हिलता है। परन्तु जल को फेंक देने पर प्रतिबिम्ब लुप्त हो जाता है और फिर किसी भी प्रकार आकाश में स्थित सूर्य को हिलाया नहीं जा सकता । ऐसा आत्मज्ञानी पुरुष कर्म में प्रर्वत्त हुआ भी किञ्चिन्मात्र कर्म नहीं करता है।शरीर मन और बुद्धि बाह्य जगत् में कार्य करते रहते हैं किन्तु सर्वव्यापी आत्मा नहीं। इस चैतन्य आत्मा के बिना शरीर कार्य नहीं कर सकता परन्तु उसकी क्रिया का आरोप अकर्म आत्मा पर नहीं किया जा सकता है। अत आत्मस्वरूप में स्थित पुरुष कार्य करते हुए भी कर्त्ता नहीं कहा जा सकता। रेल चलती है परन्तु यह कहना ठीक नहीं होगा कि वाष्प गतिशील है।वेदान्त के शिक्षार्थी के मन में यह शंका उठती है कि आत्मानुभव होने पर ज्ञानी के पूर्वार्जित सभी कर्म नष्ट हो सकते हैं परन्तु तत्पश्चात् पुन जगत् में कर्म करने से हो सकता है कि वह नये पापपुण्यरूप कर्म करें जिसका फल भोगने हेतु उसे नए जन्मों को भी लेना पड़े। इस श्लोक में उपर्युक्त शंका को निर्मूल कर दिया गया है। यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि ज्ञानी पुरुष कर्म करने पर भी किञ्चित कर्म नहीं करता है तब फिर उसे बन्धन कैसे होगा प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। सन्त पुरुष के शारीरिक कर्मों का भी कुछ तो फल होना ही चाहिये। यह सामान्य युक्तिवाद है जिसका खण्डन करते हुये भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.20।।ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वात्तदीयं ज्ञानोत्तरं क्रियमाणामपि कर्माकर्मैव संपद्यत इत्येतमर्थं दर्शयन्नाह त्यक्त्वेत्यादिना। यत्तु भवतु ज्ञानाग्निना प्राक्तनानामप्रारब्धकर्मणा दाहः। आगामिनां चानुत्पत्तिः। ज्ञानोत्पत्तिकाले क्रियमाणं तु पूर्वोत्तरयोरनन्तर्भावात् फलाय भवेदिति भवेत्कस्यचिदाशङ्का तामपनुदतीति तच्चिन्त्यम्। मूलात्तद्भाष्यादेवंभूतो जीवन्मुक्तो व्युत्थानदशायां कर्मणि वैदिके लौकिके प्रवृत्तोऽपीत्यादिस्वग्रन्थाच्च ज्ञानोत्तरक्रियमाणकर्माश्लेषस्य प्रतीतेः स्फुटत्वेनैवमुत्थानानौचित्यात्। ज्ञानोत्पत्तिकाल इत्यस्य किं ज्ञानोत्पत्तिक्षण इत्यर्थ उत ज्ञानसाधनानामनुष्ठानकाल इति। आद्ये पापादेरसंभवः। द्वितीये तत्कर्मणः पूर्वकर्मण्यन्तर्भाव इति शङ्काया अप्यनुत्थानाच्च। अतएव तस्य नाशो वा विश्लेषो वा व्यासेन पृथक् न सूत्रितः। कर्मस्वभिमानं फलासक्तिं च त्यक्त्वा यथोक्तेन ज्ञानेन नित्यतृप्तः। विषयेषु निराकाङ्क्षः। अतएव दृष्टादृष्टेष्टफलसाधनाश्रयरहतिः। योगक्षेमार्थाश्रयणीयरहित इति व्याख्या तु भाष्यान्तर्भूता। यत्त्वाश्रयो देहेन्द्रियादिरद्वैतदर्शनेन निर्गतो यस्मात्स निराश्रयः देहेन्द्रियाद्यभिमानशून्यः। फलकामनायाः कर्तृत्वाभिनिवेशस्य च निवृत्तौ क्रमेण विशेषणद्वयमिति व्याख्यानं तदपि दृष्टादृष्टेष्टफलसाधनानि देहेन्द्रियादीनि तदेवाश्रयस्तद्रहितः देहाद्यभिमानशून्य इति भाष्यं व्याख्याय तदविरोधेनादेयं तेनैवंभूतेन प्रयोजनाभावात्समग्रं कर्म यद्यपि त्याज्यं तथापि प्रारब्धप्राबल्यात् लोकसंग्रहार्थं लोकदृष्ट्या पूर्ववत्कर्मण्यभितः साङ्गोपाङ्गानुष्ठानाय प्रवृत्तोऽपि निष्क्रियात्मदर्शनसंपन्नत्वात्स्वदृष्ट्या नैव किंचित्करोति सः। तत्त्वविदः क्रियमाणकर्मसंबन्धो न भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.20।।भवतु ज्ञानाग्निना प्राक्तनानामप्रारब्धकर्मणां दाहः आगामिनां चानुत्पत्तिः ज्ञानोत्पत्तिकाले क्रियमाणं तु पूर्वोत्तरयोरनन्तर्भावात्फलाय भवेदिति भवेत्कस्यचिदाशङ्का तामपनुदति कर्मणि फले चासङ्ग कर्तृत्वाभिमानं भोगाभिलाषं च त्यक्त्वा अकर्त्रभोक्त्रात्मसम्यग्दर्शनेन बाधित्वा नित्यतृप्तः परमानन्दस्वरूपलाभेन सर्वत्र निराकाङ्क्षः। निराश्रयः आश्रयो देहिन्द्रयादिरद्वैतदर्शनेन निर्गतो यस्मात्स निराश्रयो देहेन्द्रियाद्यभिमानशून्यः। फलकामनायाः कर्तृत्वाभिमानस्य च निवृत्तौ क्रमेण हेतुगर्भं विशेषणद्वयम्। एवंभूतो जीवन्मुक्तो व्युत्थानदशायां कर्मणि वैदिके लौकिके वा अभिप्रवृत्तोऽपि प्रारब्धकर्मवशाल्लोकदृष्ट्याऽभितः साङ्गोपाङ्गानुष्ठानाय प्रवृत्तोऽपि स्वदृष्ट्या नैव किंचित्करोति सः। निष्क्रियात्मदर्शनेन बाधितत्वादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.20।।ननु प्रायश्चित्तेनेव ज्ञानाग्निना पूर्वकर्मदाहेऽपि क्रियमाणं तत्फलाय भवेदित्यत आह त्यक्त्वेति। आत्मलाभेन नित्यतृप्तत्वात्फलासङ्गं त्यक्त्वा निराश्रयत्वात्। अहंकाराद्याश्रयेण हि कर्म क्रियते। निराश्रयो निरहंकारो यस्मात् ततः कर्मसङ्गमहंकरोमीत्यभिमानं च त्यक्त्वा कर्मणि लौकिके वैदिके वा अभितः सर्वाङ्गोपसंहारेण प्रवृत्तोऽपि स नैव किंचित्करोति। अतोऽस्य क्रियमाणमपि कर्म न फलाय प्रभवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.20।।ननु फलेच्छारहितस्त्वत्सेवां विहाय किमिति कर्म करोति इत्याशङ्क्याह त्यक्त्वेति। यो नित्यतृप्तो मन्निष्ठया नित्यं तृप्तः पूर्णः कर्मफलासङ्गं त्यक्त्वा कर्मफलेच्छासक्तिं त्यक्त्वा निराश्रयः कर्मजनितादृष्टाद्याश्रयरहितः कर्मणि मदाज्ञात्वेन अभिप्रवृत्तः सोऽपि नैव किञ्चित् करोति। मदाज्ञारूपत्वात्तस्य तत्कर्म मोक्षे स्वफलभोगादिना बन्धकं न भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.20।।किंच त्यक्त्वेति। कर्मणि तत्फले चासक्तिं त्यक्त्वा नित्येन निजानन्देन तृप्तः अतएव योगक्षेमार्थमाश्रयणीयरहितः एवंभूतो यः स्वाभाविके विहिते च कर्मण्यभितः प्रवृत्तोऽपि किंचिदपि नैव करोति। तस्य कर्माकर्मतामापद्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.20।।एवं कर्त्ताऽप्यकर्त्तैव स असङ्गात् ब्रह्मवत् तदाह त्यक्त्वेति। अत्रकर्मण्यकर्म यः पश्येत् 4।18 इत्याद्युक्तं स्वयमेव विवृणोति भगवांश्चतुर्भिः। क्रियानिर्वर्त्ये कर्मणि यज्ञादौ फलं स्वर्गादि प्राकृतं तथा सङ्गं प्राकृतं स्वस्य कर्तृत्वाभिनिवेशनं च त्यक्त्वा अर्थात् अप्राकृतं वस्तु यथाभूततया सर्वं विभाव्य कर्मणि प्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति अकर्मैव स यथा ब्रह्मा कर्मोक्तं तथैव नित्यानन्देन तृप्तः प्राकृताश्रयरहितश्च तत्तद्वस्तुनि ब्रह्मभावनादिति वक्ष्यति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.20।।क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा भस्मीभूत हो जानेके कारण उसके कर्म अकर्म ही हो जाते हैं। इसी आशयको दिखानेकी इच्छासे भगवान् कहते हैं उपर्युक्त ज्ञानके प्रभावसे कर्मोंमें अभिमान और फलासक्तिका त्याग करके जो नित्यतृप्त है अर्थात् विषयकामनासे रहित हो गया है तथा आश्रयसे रहित है। जिस फलका आश्रय लेकर मनुष्य पुरुषार्थ सिद्ध करनेकी इच्छा किया करता है उसका नाम आश्रय है ऐसे इस लोक और परलोकके इष्टफलसाधनरूप आश्रयसे जो रहित है उस ज्ञानीद्वारा किये हुए कर्म वास्तवमें अकर्म ही हैं क्योंकि वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न है। अपना कोई प्रयोजन न रहनेके कारण ऐसे पुरुषको साधनोंसहित कर्मोंका परित्याग कर ही देना चाहिये ऐसी कर्तव्यता प्राप्त होनेपर भी उन कर्मोंसे निवृत्त होना असम्भव होनेके कारण लोकसंग्रहकी इच्छासे या श्रेष्ठ पुरुषोंद्वारा की जानेवाली निन्दाको दूर करनेकी इच्छासे यदि ( कोई ज्ञानी ) पहलेकी तरह कर्मोंमें प्रवृत्त है तो भी वह निष्क्रिय आत्माके ज्ञानसे सम्पन्न होनेके कारण वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। परंतु जो उससे विपरीत है अर्थात् उपर्युक्त प्रकारसे कर्म करनेवाला नहीं है कर्मोंका आरम्भ करनेसे पहले ( गृहस्थी न बनकर ब्रह्मचर्य आश्रममें ) ही जिसका सबके अंदर व्यापक अन्तरात्मारूप निष्क्रिय ब्रह्ममें आत्मभाव प्रत्यक्ष हो गया है

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.20।। व्याख्या   त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम् जब कर्म करते समय कर्ताका यह भाव रहता है कि शरीरादि कर्मसामग्री मेरी है मैं कर्म करता हूँ कर्म मेरा और मेरे लिये है तथा इसका मेरेको अमुक फल मिलेगा तब वह कर्मफलका हेतु बन जाता है। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषको प्राकृत पदार्थोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेदका अनुभव हो जाता है इसलिये कर्म करनेकी सामग्रीमें कर्ममें तथा कर्मफलमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति न रहनेके कारण वह कर्मफलका हेतु नहीं बनता।सेना विजयकी इच्छासे युद्ध करती है। विजय होनेपर विजय सेनाकी नहीं प्रत्युत राजाकी मानी जाती है क्योंकि राजाने ही सेनाके जीवननिर्वाहका प्रबन्ध किया है उसे युद्ध करनेकी सामग्री दी है और उसे युद्ध करनेकी प्रेरणा की है और सेना भी राजाके लिये ही युद्ध करती है। इसी प्रकार शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि कर्मसामग्रीके साथ सम्बन्ध जोड़नेसे ही जीव उनके द्वारा किये गये कर्मोंके फलका भागी होता है।कर्मसामग्रीके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध न होनेके कारण महापुरुषका कर्मफलके साथ कोई सम्बन्ध नहीं होता।वास्तवमें कर्मफलके साथ स्वरूपका सम्बन्ध है ही नहीं। कारण कि स्वरूप चेतन अविनाशी और निर्विकार है परन्तु कर्म और कर्मफल दोनों जड तथा विकारी हैं और उनका आरम्भ तथा अन्त होता है। सदा स्वरूपके साथ न तो कोई कर्म रहता है तथा न कोई फल ही रहता है। इस तरह यद्यपि कर्म और फलसे स्वरूपका कोई सम्बन्ध नहीं है तथापि जीवने भूलसे उनके साथ अपना सम्बन्ध मान लिया है। यह माना हुआ सम्बन्ध ही बन्धनका कारण है। अगर यह माना हुआ सम्बन्ध मिट जाय तो कर्म और फलसे उसकी स्वतःसिद्ध निर्लिप्तताका बोध हो जाता है।निराश्रयः देश काल वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदिका किञ्चिन्मात्र भी आश्रय न लेना ही निराश्रय अर्थात् आश्रयसे रहित होना है। कितना ही बड़ा धनी राजामहाराजा क्यों न हो उसको देश काल आदिका आश्रय लेना ही पड़ता है। परन्तु कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुष देश काल आदिका कोई आश्रय नहीं मानता। आश्रय मिले या न मिले इसकी उसे किञ्चिन्मात्र भी परवाह नहीं होती। इसलिये वह निराश्रय होता है।नित्यतृप्तः जीव (आत्मा) परमात्माका सनातन अंश होनेसे सत्स्वरूप है। सत्का कभी अभाव नहीं होता नाभावो विद्यते सतः (गीता 2। 16)। परन्तु जब वह असत्के साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है तब उसे अपनेमें अभाव अर्थात् कमीका अनुभव होने लगता है। उस कमीकी पूर्ति करनेके लिये वह सांसारिक वस्तुओंकी कामना करने लगता है। इच्छित वस्तुओंके मिलनेसे एक तृप्ति होती है परन्तु वह तृप्ति ठहरती नहीं वह क्षणिक होती है। कारण कि संसारकी प्रत्येक वस्तु व्यक्ति परिस्थिति आदि प्रतिक्षण अभावकी ओर जा रही है अतः उनके आश्रित रहनेवाली तृप्ति स्थायी कैसे रह सकती है सत्वस्तुकी तृप्ति असत् वस्तुसे हो ही कैसे सकती है अतः जीव जबतक उत्पत्तिविनाशशील क्रियाओँ और पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध मानता है तथा उनके आश्रित रहता है तबतक उसे स्वतःसिद्ध नित्यतृप्तिका अनुभव नहीं होता।कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुष निराश्रय अर्थात् संसारके आश्रयसे सर्वथा रहित होता है इसलिये उसे स्वतःसिद्ध नित्यतृप्तिका अनुभव हो जाता है। तीसरे अध्यायके सत्रहवें श्लोकमें आत्मतृप्तः पदसे भी इसी नित्यतृप्तिकी बात आयी है।कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः अभिप्रवृत्तः पदका तात्पर्य है कि कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषके द्वारा होनेवाले सब कर्म साङ्गोपाङ्ग रीतिसे होते हैं क्योंकि कर्मफलमें उसकी किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति नहीं होती। उसके सम्पूर्ण कर्म केवल संसारके हितके लिये होते हैं।जिसकी कर्मफलमें आसक्ति होती है वह साङ्गोपाङ्ग रीतिसे कर्म नहीं कर सकता क्योंकि फलके साथ सम्बन्ध होनेसे कर्म करते हुए बीचबीचमें फलका चिन्तन होनेसे उसकी शक्ति व्यर्थ खर्च हो जाती है जिससे उसकी शक्ति पूरी तरह कर्म करनेमें नहीं लगती।अपि पदका तात्पर्य है कि साङ्गोपाङ्ग रीतिसे सब कर्म करते हुए भी वह वास्तवमें किञ्चिन्मात्र भी कोई कर्म नहीं करता क्योंकि सर्वथा निर्लिप्त होनेके कारण कर्मका स्पर्श ही नहीं होता। उसके सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।जब वह कुछ भी नहीं करता तब वह कर्मफलसे बँध ही कैसे सकता है इसीलिये अठारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्मफलका त्याग करनेवाले कर्मयोगीको कर्मोंका फल कहीं भी नहीं मिलता न तु संन्यासिनां क्वचित्।प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है। अतः जबतक प्रकृतिके गुणों(क्रिया और पदार्थ) से सम्बन्ध है तबतक कर्म न करते हुए भी मनुष्यका कर्मोंके साथ सम्बन्ध हो जाता है। प्रकृतिके गुणोंसे सम्बन्ध न रहनेपर मनुष्य कर्म करते हुए भी कुछ नहीं करता। कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषका प्रकृतिजन्य गुणोंसे कोई सम्बन्ध नहीं रहता इसलिये वह लोकहितार्थ सब कर्म करते हुए भी वास्तवमें कुछ नहीं करता। सम्बन्ध   उन्नीसवेंबीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगसे सिद्ध महापुरुषकी कर्मोंसे निर्लिप्तताका वर्णन करके अब भगवान् इक्कीसवें श्लोकमें निवृत्तिपरायण और बाईसवें श्लोकमें प्रवृत्तिपरायण कर्मयोगके साधककी कर्मोंसे निर्लिप्तताका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.20 4.21।।त्यक्त्वेति। निराशीरिति। अभिप्रवृत्तोऽपि आभिमुख्येन प्रवृत्तोऽपि। शरीरोपयोगि इन्द्रियव्यापारात्मकं कर्म शारीरं यत् मनोबुद्धिभ्यां न तथा अनुरञ्जितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.20।।विवेकात्पूर्वं कर्मणि प्रवृत्तावपि सति विवेके तत्र न प्रवृत्तिरित्याशङ्क्याङ्गीकरोति यस्त्विति। विवेकात्पूर्वमभिनिवेशेन प्रवृत्तस्य विवेकानन्तरमभिनिवेशाभावात्प्रवृत्त्यसंभवेऽपि जीवनमात्रमुद्दिश्य प्रवृत्त्याभ्यासः संभवतीत्यर्थः। सत्यपि विवेके तत्तत्साक्षात्कारानुदयात्कर्मणि प्रवृत्तस्य कथं तत्त्यागः स्यादित्याशङ्क्याह यस्तु प्रारब्धेति। त्यक्तेत्यादि समनन्तरश्लोकमवतारयितुं भूमिकां कृत्वा तदवतारणप्रकारं दर्शयति स कुतश्चिदिति। लोकसंग्रहादिनिमित्तं विवक्षितं कर्म परित्यागासंभवे सति तस्मिन्प्रवृत्तोऽपि नैव करोति किंचिदिति संबन्धः। कर्मणि प्रवृत्तो न करोति कर्मेति कथमुच्यते तत्राह स्वप्रयोजनाभावादिति। कथं तर्हि कर्मणि प्रवर्तते तत्राह लोकेति। प्रवृत्तेरर्थक्रियाकारित्वाभावंपश्वादिभिश्चाविशेषात् इति न्यायेन व्यावर्तयति पूर्ववदिति। कथं तर्हि विवेकिनामविवेकिनां च विशेषः स्यादित्याशङ्क्य कर्मादौ सङ्गासङ्गाभ्यामित्याह कर्मणीति। उक्तेऽर्थे समनन्तरश्लोकमवतारयति ज्ञानाग्नीति। एतमर्थं दर्शयिष्यन्निमं श्लोकमाहेति योजना। यथोक्तं ज्ञानं कूटस्थात्मदर्शनं तेन स्वरूपभूतं सुखं साक्षादनुभूय कर्मणि तत्फले च सङ्गमपास्य विषयेषु निरपेक्षश्चेष्टते विद्वानित्याह त्यक्त्वेत्यादिना। इष्टसाधनसापेक्षस्य कुतो निरपेक्षत्वमित्याशङ्क्य विशिनष्टि निराश्रय इति। यदाश्रित्येति यच्छब्देन फलसाधनमुच्यते। आश्रयरहितमित्यस्यार्थं स्पष्टयति दृष्टेति। तेन ज्ञानवता पुरुषेणैवंभूतेन। त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गमित्यादिना विशेषितेनेत्यर्थः। ततः ससाधनात्कर्मणः सकाशादिति यावत्। निर्गमासंभवे हेतुमाह लोकेत्यादिना। पूर्ववज्ज्ञानोदयात्प्रागवस्थायामिवेत्यर्थः। अभिप्रवृत्तोऽपि लोकदृष्ट्येति शेषः। नैव करोति किंचिदिति स्वदृष्ट्येति द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.20।।यस्य सर्वे समारम्भाः कामसङ्कल्पवर्जिताः 4।19 इत्यनेन यदुक्तं तदेवत्यक्त्वा कर्मफलासङ्गं इत्यनेनोच्यते। सङ्कल्पो हि कर्मासङ्गः कामश्च फलासङ्ग इत्यतः सङ्गतिपूर्वमन्यथा व्याचष्टे न चेति। नैतावता कर्मस्वरूपं सम्पूर्णमित्यर्थः। किं तर्हीत्यध्याहारः। ननुनित्यतृप्तो निराश्रयः इति साध्योऽर्थः कथं साधने निवेश्यते इत्यत आह ज्ञानेति। कर्मण्यकर्मेत्यपेक्षया पुनरिति। मिथ्याज्ञानमेतदित्यतोऽभिप्रायमाह नित्येति। इति हेतोरहमपि तथाविधः किन्त्वविद्यया तथा न प्रतीयत इति जानन्नित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.20।।न च कामसङ्कल्पाभावेनालम् आसङ्गं स्नेहं च त्यक्त्वा ज्ञानस्वरूपमाह पुनर्नित्यतृप्त इति। नित्यतृप्तनिराश्रयेश्वरसरूपोऽस्मीति तथाविधः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.20।।कर्मफलासङ्गं त्यक्त्वा नित्यतृप्तो नित्ये स्वात्मनि एव तृप्तः निराश्रयः अस्थिरप्रकृतौ आश्रयबुद्धिरहितो यः कर्माणि करोति। स कर्मणि आभिमुख्येन प्रवृत्तः अपि न एव किञ्चित् कर्म करोति कर्मापदेशेन ज्ञानाभ्यासम् एव करोति इत्यर्थः।पुनः अपि कर्मणा ज्ञानाकारता एव विशोध्यते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.20।। त्यक्त्वा कर्मसु अभिमानं फलासङ्गं च यथोक्तेन ज्ञानेन नित्यतृप्तः निराकाङ्क्षो विषयेषु इत्यर्थः। निराश्रयः आश्रयरहितः आश्रयो नाम यत् आश्रित्य पुरुषार्थं सिसाधयिषति दृष्टादृष्टेष्टफलसाधनाश्रयरहित इत्यर्थः। विदुषा क्रियमाणं कर्म परमार्थतोऽकर्मैव तस्य निष्क्रियात्मदर्शनसंपन्नत्वात्। तेन एवंभूतेन स्वप्रयोजनाभावात् ससाधनं कर्म परित्यक्तव्यमेव इति प्राप्ते ततः निर्गमासंभवात् लोकसंग्रहचिकीर्षया शिष्टविगर्हणापरिजिहीर्षया वा पूर्ववत् कर्मणि अभिप्रवृत्तोऽपि निष्क्रियात्मदर्शनसंपन्नत्वात् नैव किञ्चित् करोति सः।।यः पुनः पूर्वोक्तविपरीतः प्रागेव कर्मारम्भात् ब्रह्मणि सर्वान्तरे प्रत्यगात्मनि निष्क्रिये संजातात्मदर्शनः स दृष्टादृष्टेष्टविषयाशीर्विवर्जिततया दृष्टादृष्टार्थे कर्मणि प्रयोजनमपश्यन् ससाधनं कर्म संन्यस्य शरीरयात्रामात्रचेष्टः यतिः ज्ञाननिष्ठो मुच्यते इत्येतमर्थं दर्शयितुमाह

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【 Verse 4.21 】

▸ Sanskrit Sloka: निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रह: | शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ||

▸ Transliteration: nirāśī ryatacittātmā tyaktasarvaparigrahaḥ | śārīraṁ kevalaṁ karma kurvannāpnoti kilbiṣam ||

▸ Glossary: nirāśīḥ: without desire for the result; yata: controlled; cittātmā: mind and consciousness; tyakta: giving up; sarva: all; parigrahaḥ: sense of ownership; śārīraṁ: bodily effort; kevalaṁ: only; karma: work; kurvan: doing so; na: never; āpnoti: acquire; kilbiṣaṁ: sin

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.21 The person who acts without desire for the result; with his consciousness controlling the mind, giving up all sense of ownership over his possessions and body and only working, incurs no sin.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.21।।जिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीरसम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.21।। जो आशा रहित है तथा जिसने चित्त और आत्मा (शरीर) को संयमित किया है जिसने सब परिग्रहों का त्याग किया है ऐसा पुरुष शारीरिक कर्म करते हुए भी पाप को नहीं प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.21 निराशीः without hope? यतचित्तात्मा one with the mind and self controlled? त्यक्तसर्वपरिग्रहः having abandoned all covetousness? शारीरम् bodily? केवलम् merely? कर्म action? कुर्वन् doing? न not? आप्नोति obtains? किल्बिषम् sin.Commentary The liberated sage renounces all actions except what is necessary for the bare maintenance of the body. He has abandoned all possessions. He incurs no sin which will cause evil effects. For a man who thirsts for liberation (Mumukshu) even righteous activity (Dharma) is a sin as it causes bondage to Samsara. Dharma is a golden fetter for him. A golden fetter is also a fetter. A sage is liberated from

Chapter 4 (Part 14)

both Dharma and Adharma? good and evil or virtue and vice. (Cf.III.7)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.21. Being rid of cravings, having mind and self (body) all controlled, abandoning all sense of possession, and performing exclusively bodily action, he does not incur any sin.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.21 Expecting nothing, his mind and personality controlled, without greed, doing bodily actions only; though he acts, yet he remains untainted.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.21 Free from desire, his intellect and mind controlled, giving up all possessions, and doing bodily work only, he is not subject to evil:

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.21 One who is without solicitation, who has the mind and organs under control, (and) is totally without possessions, he incurs no sin by performing actions merely for the (maintenance of the) body.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.21 Without hope and with the mind and the self controlled, having abandoned all covetousness, doing mere bodily action, he incurs no sin.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.21 Tyaktva etc. Nirasih etc. Even though he sets upon : Even though he is directly exerting in. Bodily action : the action which is in the form of activity of the organs for simply maintaining the body, and which is not coloured (desired) so much by the mind and intellect.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.21 'Free from desire' means having no attachment to the fruits of actions. 'His intellect and mind controlled' means one whose intellect and mind are under control. 'Giving up all possessions' means one who, on account of his having the self as his primary objective, is devoid of the sense of ownership in relation to Prakrti and its derivatives. One who is thus engaged in bodily work alone as long as he lives, does not incur any sin, i.e., does not get engrossed in Samsara. He gets the vision of the self by Karma Yoga of this kind itself, and need not resort to any exlusive practice of Jnana Yoga in between liberation and the practice of Karma Yoga of the alone description.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.21 Nirasih, one who is without solicitation-one from whom asisah [Asih is a kind of desire that can be classed under prayer. (Some translate it as desire, hope.-Tr.)], solicitations, have departed; yata-citta-atma, who has the mind and organs under control-one by whom have been controlled (yatau) both the internal organ (citta) and the external aggregate of body and organs (atma); (and) is tyakta-sarva-parigrahah, [ Parigraha: receiving, accepting, possessions, belongings.-V.S.A] totally without possessions- one by whom have been renounced (tyaktah) all (sarvah) possessions (parigrahah); na apnoti, he does not incur; kilbisam, sin, in the form of evil as also rigtheousness-to one aspiring for Liberation, even righteousness is surely an evil because it brings bondage-; [Here Ast. adds tasmat tabhyam mukto bhavati samsarat mukto bhavati ityarthah, therefore, he becomes free from both of them, i.e. he becomes liberated from transmigration.-Tr.] kurvan, by performing; karma, actions; kevalam, merely; sariram, for the purpose of maintaining the body-without the idea of agenship even with regard to these (actions). Further, in the expression, 'kevalam sariram karma', do the words sariram karma mean 'actions done by the body' or 'actions merely for the purpose of maintaining the body? Again, what does it matter if by (the words) sariram karma is meant 'actions done by the body' or 'actions merely for the purpose of maintaning the body? The answer is: If by sariram karma is meant actions done by the body, then it will amount to a contradiction [Contradiction of the scriptures.] when the Lord says, 'one does not incur sin by doing with his body any action meant for seen or unseen purposes, even though it be prohibited.' Even if the Lord were to say that 'one does not incur sin by doing with his body some scripturally sanctioned action intended to secure a seen or an unseen end', then there arises the contingency of His denying something (some evil) that has not come into being! (Further,) from the specification, sariram karma kurvan (by doing actions with the body), and from the use of the word kevala (only), it will amount to saying that one incurs sin by performing actions, called righteous and unrighteous, which can be accomplished with the mind and speech and which come within the purview of injunction and prohibition. Even there, the statement that one incurs sin by performing enjoined actions through the mind and speech will involve a contradiction; even in the case of doing what is prohibited, it will amount to a mere purposeless restatement of a known fact. On the other hand, when the sense conveyed by sariram karma is taken as acctions merely for the purpose of maintaining the body, then the implication will be that he does not do any other work as can be accomplished physically, orally, or mentally, which are known from injunctions and prohibitions (of the scriptures) and which have in view seen or unseen results; while he appears to people to be working with those very body (speech) etc. merely for the purpose of maintaining the body, yet he does not incur sin by merely making movements of the body etc., because from the use of the word kevala, (merely) it follows that he is devoid of the sense of agentship implicit in the idea, 'I do.' Since there is no possibility of a person who has reached such a state incurring evil as suggest by the word sin, therefore he does not become subject to the evil of transmigration. That is to say, he certainly becomes free without any obstacle since he has all his actions burnt away by the fire of wisdom. This verse is only a reiteration of the result of full illumination stated earlier. It becomes faultless by accepting the interpretation of sariram karma thus. In the case of the monk who has renounced all possessions, since owning food etc. meant for the bare sustenance of the body is absent, therefore it becomes imperative to beg for alms etc. for the upkeep of the body. Under this circumstance, by way of pointing out the means of obtaining food etc. for the maintenance of the body of a monk as permitted by the text, 'What comes unasked for, without forethought and spontaneously৷৷.' [Unasked for: what comes before the monk gets ready for going out for alms; without forethought: alms that are not given with abuses, and have not fallen on the ground, but collected from five or seven houses without any plan; spontaneously: alms brought to one spontaneously by devoted people.] (Bo. Sm. 21. 8. 12) etc., the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.21।। केवल शरीर द्वारा कर्म किए जाने से वासना के रूप में प्रतिक्रिया उत्पन्न नहीं हो सकती। वासनायें अन्तकरण में उत्पन्न होती हैं और उनकी उत्पत्ति का कारण कर्तृत्वाभिमान के साथ किए कर्म हैं। स्वार्थ के प्रबल होने पर ही ये वासनाएँ बन्धनकारक बनती हैं।आत्मा के साथ शरीर मन और बुद्धि इन अविद्याजनित उपाधियों के मिथ्या तादात्म्य से अहंकार उत्पन्न होता है। इस अहंकार की प्रतिष्ठा भविष्य की आशाओं तथा वर्तमान में प्राप्त विषयोपभोगजनित सन्तोष में है।इसलिए इस श्लोक में कहा गया है कि जो व्यक्ति (क) आशारहित है (ख) जिसने शरीर और मन को संयमित किया है (ग) जो सब परिग्रहों से मुक्त है उस व्यक्ति में इस मिथ्या अहंकार का कोई अस्तित्व शेष नहीं रह सकता। अहंकार के नष्ट होने पर केवल शरीर द्वारा किये गये कर्मों में यह सार्मथ्य नहीं होती कि वे अंतकरण में नये संस्कारों को उत्पन्न कर सकें।निद्रावस्था में किसी व्यक्ति के विवस्त्र हो जाने पर किसी प्रकार के अशोभनीय व्यवहार का आरोप नहीं किया जा सकता। निद्रा में यदि किसी व्यक्ति का पदाघात उसके अपने पुत्र को लगता है तो उस पर क्रूरता का आरोप भी नहीं हो सकता। क्योंकि उस समय शरीर में मैं नहीं था। इसका कारण है कि दोनों ही स्थितियों में व्यक्ति में कर्तृत्त्व का अभिमान नहीं था। अत स्पष्ट है कि सभी प्रकार के दुख कष्ट बन्धन आदि केवल कर्तृत्वाभिमानी जीव को ही होते हैं और उसके अभाव में शारीरिक कर्मों में मनुष्य को बांधने की क्षमता नहीं होती है।आत्मानुभवी सन्त पुरुष के कर्म उसे स्पर्श तक नहीं कर सकते क्योंकि वह उनका कर्ता ही नहीं है कर्म केवल उसके द्वारा व्यक्त होते हैं। ऐसा महान् पुरुष कर्मों का कर्त्ता नहीं वरन् ईश्वर की इच्छा को व्यक्त करने का सर्वोत्तम करण अथवा माध्यम है।यदि वीणा से मधुर संगीत व्यक्त नहीं हो रहा हो तो श्रोतागण उस वाद्य पर आक्रमण नहीं करते यद्यपि वीणा वादक भी सुरक्षित नहीं रह सकता है वीणा अपने आप मधुर ध्वनि को उत्पन्न नहीं करती परन्तु वादक की उंगलियों के स्पर्शमात्र से अपने में से संगीत को व्यक्त होने देती है। वादक की इच्छा और स्पर्श के अनुसार झुक जाने भर से उसका कर्त्तव्य समाप्त हो जाता है। अहंकार से रहित आत्मज्ञानी पुरुष भी वह श्रेष्ठतम माध्यम है जिसके द्वारा ईश्वर की इच्छा पूर्णरूप से प्रगट होती है। ऐसे पुरुष के कर्म उसके लिए पाप और पुण्य रूप बन्धन नहीं उत्पन्न कर सकते वह तो केवल माध्यम है।ज्ञानयोग में स्थित शरीर धारण के लिये आवश्यक कर्म करता हुआ पुरुष नित्य मुक्त ही है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.21।।सत्यपि विक्षेपके दर्शपूर्णमासादिकर्मणि निष्क्रियात्मवित् निर्लेप एव भवति किं पुनर्वक्तव्यं यो विक्षेपरहितः शरीरमात्रचेष्टो यतिर्ज्ञाननिष्ठो नाप्नोति किल्बिषमितीत्याशयेनाह। निराशीः निर्गता आशिषस्तृष्णा यस्मात्सः। यतौ निगृहीतौ चित्तात्मानावन्तःकरणबाह्यकार्यकरणसंघातौ येन सः। त्यक्तः सर्वः परिग्रहो येन सः केवलं शारीरं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं भिक्षाशनादिकं कर्म तत्रापि अभिमानवर्जितं लोकदृष्ट्या कुर्वन्किल्बिषं धर्माधर्माख्यं संसारं नाप्नोति। मुमुक्षुं प्रति बन्धोदर्कत्वेन धर्मस्यापि किल्बिषरुपत्वात्। यत्तु नन्वेतस्माद्गौणात्करणादकरणं मुख्यमेव तद्वरमित्याशङ्क्य गृहस्थस्य तत्प्रत्यवायावहमिति व्यतिरेकमुखेनाह। यस्तु त्यक्तसर्वपरिग्रहः स निराशीरपि यतचित्तात्मापि केवलमपि शारीरं कर्म कुर्वन् विहिताकरणात्किल्बिषं प्राप्नोत्येवेत्यर्थं इति तदुपेक्ष्यम्। निराशीरित्यादिविशेषणाननुरुपया कुकल्पनया व्यतिरेकमुखेननैव किंचित्करोति सः। कृत्वापि न निबध्यते। हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यत इत्यादिविरुद्धार्थप्रदर्शनानौचित्यात्कथमसतः सज्जायेत इति श्रुत्या अकरणादभावरुपात्किल्बिषस्य भावस्य उत्पर्तिर्न जायतेऽपितु प्रतिषिद्धा चरणादित्यसकृद्भाष्यकारैरुक्तत्वेन च शरीरं केवलमिति विशेषणात् किल्बिषस्याप्राप्तेः प्राप्नोत्येवेत्यस्यासंगतत्वात् प्रत्यवायेन निबध्यत इति स्वपरग्रन्थविरोधाच्चेति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.21।।यदात्यन्तविक्षेपहेतोरपि ज्योतिष्टोमादेः सम्यग्ज्ञानवशान्न तत्फलजनकत्वं तदा शरीरस्थितिमात्रहेतोरविक्षेपकस्य भिक्षाटनादेर्नास्त्येव बन्धहेतुत्वमिति कैमुत्यन्यायेनाह निराशीर्गततृष्णः यतचित्तात्मा चित्तमन्तःकरणं आत्मा बाह्येन्द्रियसहितो देहस्तौ संयतौ प्रत्याहारेण निगृहीतौ येन सः। यतो जितेन्द्रियोऽतो विगततृष्णत्वात् त्यक्तसर्वपरिग्रहः त्यक्ताः सर्वे परिग्रहा भोगोपकरणानि येन सः एतादृशोऽपि प्रारब्धकर्मवशात् शारीरं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं कौपीनाच्छादनादिग्रहणभिक्षाटनादिरूपं यतिं प्रति शास्त्राभ्यनुज्ञातं कर्म कायिकं वाचिकं मानसं च तदपि केवलं कर्तृत्वाभिमानशून्यं पराध्यारोपितकर्तृत्वेन कुर्वन्परमार्थतोऽकर्त्रात्मदर्शनान्नाप्नोति न प्राप्नोति किल्बिषं धर्माधर्मफलभूतमनिष्टं संसारम्। पापवत्पुण्यस्याप्यनिष्टफलत्वेन किल्बिषत्वात्। ये तु शरीरनिर्वर्त्यं शारीरमिति व्याचक्षते तन्मते केवलं कर्म कुर्वन्नित्यतोऽधिकार्थालाभादव्यावर्तकत्वेन शारीरपदस्य वैयर्थ्यम्। अथ वाचिकमानसिकव्यावर्तनार्थमिति ब्रूयात् तदा कर्मपदस्य विहितमात्रपरत्वेन शारीरं विहितं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषमित्यप्रसक्तप्रतिषेधोऽनर्थकः वाचिकं मानसं च विहितं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषमिति च शास्त्रविरुद्धमुक्तं स्यात् विहितप्रतिषिद्धसाधारण्यपरत्वेऽप्येवमेव व्याघात इति भाष्य एव विस्तरः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.21।।नन्वेतस्माद्गौणात्कर्मकरणादकरणं मुख्यमेव तद्वरमित्याशङ्क्य गृहस्थस्य तत्प्रत्यवायावहमिति व्यतिरेकमुखेनाह निराशीरिति। यो निष्परिग्रहः स्त्र्यादिपरिग्रहरहितः संन्यासी स चेन्निराशीः योगैश्वर्यमप्यनिच्छन् यतं चित्तं बुद्धिरात्मा च देहेन्द्रियसंघातो येन स यतचित्तात्मा। समाधिकाले निरुद्धबाह्याभ्यन्तरवृत्तरित्यर्थः। स व्युत्थानकाले शारीरं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं भिक्षाटनादि। तदपि केवलं कर्तृत्वाभिमानशून्यं पराध्यारोपितकर्तृत्वेन कुर्वन्नपि किल्बिषंयावज्जीवमग्निहोत्रं जुहुयात् इति यावज्जीवाधिकारचोदिताग्निहोत्राद्यकरणजं प्रत्यवायं नाप्नोति। विधितस्तेषां त्यागात्। यस्तु सपरिग्रहः स निराशीरपि यतचित्तात्मापि केवलमपि शारीरं कर्म कुर्वन् विहिताकरणात्किल्बिषं प्राप्नोत्येवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.21।।नन्वेवमपि कर्मादिमन्त्रेषूत्कृष्टबुद्ध्या कर्म बन्धकं भवेदेवेति चेत्तत्राह निराशीरिति। निराशीः निस्पृहः। यतचित्तात्मा वशीकृतेन्द्रियदेहः। त्यक्तसर्वपरिग्रहः त्यक्तः सर्वपरिग्रहः पशुपुत्रादिर्येन। सर्व शब्देन दैहिकोऽपि सुखरूप उच्यते। एतादृशः सन् केवलशारीरं कर्म कुर्वन् ब्राह्मणादिदेहत्वात् फलाभावेन मलमूत्रादिशारीरकर्मवद्भगवन्नामादिग्रहणं शुद्ध्यर्थं कुर्वन् किल्बिषं बन्धं नाप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.21।।किंच निराशीरिति। निर्गता आशिषः कामना यस्मात्। यतं नियतं चित्तं आत्मा च शरीरं यस्य। त्यक्ताः सर्वे परिग्रहा येन सः। शारीरं शरीरमात्रनिर्वर्त्यं कर्तृत्वाभिनिवेशरहितं कर्म कुर्वन्नपि किल्बिषं बन्धनं न प्राप्नोति। योगारूढपक्षे शरीरनिर्वाहमात्रोपयोगि स्वाभाविकं भिक्षाटनादि कर्मं कुर्वन्नपि किल्बिषं विहिताकरणनिमित्तं दोषं न प्राप्नोतीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.21।।निराशीरिति। अपकृष्टाधिकारी स्वर्गाद्याशीःपराङ्मुखः योगेन च यतं चित्तं आत्मा देहश्च यस्य त्यक्तः सर्वपरिग्रहो लोकभावो येन केवलं शरीरनिर्वर्त्यं कर्म कुर्वन्न चात्माहङ्कारकृतं कुर्वन् भवति स चैवमनहङ्कारादिना केवलशरीरमात्रेण कुर्वन् किल्बिषं शुभेतरोत्थं प्रत्यवायसंज्ञं पापं नाप्नोतीत्यकर्मत्वं कर्तृत्वाभिनिवेशाभावात् ब्रह्मभावनाच्च यथोक्तंदेहेन्द्रियासवस्तस्य निरध्यस्ता भवन्ति हि इति। अत्राध्यास एवापयाति न स्वरूपं प्रपञ्चमध्यगतत्वात्। अध्यासाभावे स्थितिर्न स्यादिति चेत् न स्वबुद्ध्या लीनवत्प्रतिभानेऽपि सर्वेषां बुद्ध्या तथा प्रतिभानाभावात्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.21।।वह केवल शरीरयात्राके लिये चेष्टा करनेवाला ज्ञाननिष्ठ यति इस लोक और परलोकके समस्त इच्छित भोगोंको आशासे रहित होनेके कारण इस लोक और परलोकके भोगरूप फल देनेवाले कर्मोंमें अपना कोई भी प्रयोजन न देखकर कर्मोंको और कर्मोंके साधनोंको त्यागकर मुक्त हो जाता है। इसी भावको दिखलानेके लिये ( अगला श्लोक ) कहते हैं जिसकी सम्पूर्ण आशाएँ दूर हो गयी हैं वह निराशीः है जिसने चित्त यानी अन्तःकरणको और आत्मा यानी बाह्य कार्यकरणके संघातरूप शरीरको इन दोनोंको भलीप्रकार अपने वशमें कर लिया है वह यतचित्तात्मा कहलाता है जिसने समस्त परिग्रहका अर्थात् भोगोंकी सामग्रीका सर्वथा त्याग कर दिया है वह त्यक्तसर्वपरिग्रह है। ऐसा पुरुष केवल शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले और अभिमानरहित कर्मोंको करता हुआ पापकोअर्थात् अनिष्टरूप पुण्य पाप दोनोंको नहीं प्राप्त होता। बन्धनकारक होनेसे धर्म भी मुमुक्षुके लिये तो पाप ही है। यहाँ शारीरं केवलं कर्म इस पदमें शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं या शरीरनिर्वाहमात्रके लिये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने गये हैं चाहे शरीरद्वारा होनेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने जायँ या शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म माने जायँ इस विवेचनसे क्या प्रयोजन है इसपर कहते हैं जो शरीरद्वारा होनेवाले कर्मोंका नाम शारीरिक कर्म मान लिया जाय तो इस लोकमें या परलोकमें फल देनेवाले निषिद्ध कर्मोंको भी शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता ऐसा कहनेसे भगवान्के कथनमें विरुद्ध विधानका दोष आता है। और इस लोक या परलोकमें फल देनेवाले शास्त्रविहित कर्मोंको शरीरद्वारा करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता ऐसा कहनेसे भी बिना प्राप्त हुए दोषके प्रतिषेध करनेका प्रसङ्ग आ जाता है। तथा शारीरिक कर्म करता हुआ इस विशेषणसे और केवल शब्दके प्रयोगसे ( उपर्युक्त मान्यताके अनुसार ) भगवान्का यह कहना हो जाता है कि ( शरीरके सिवा ) मनवाणीद्वारा किये जानेवाले विहित और प्रतिषिद्ध कर्मोंको जो कि धर्म और अधर्म नामसे कहे जाते हैं करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त होता है। उसमें भी मनवाणीद्वारा विहित कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है यह कहना तो विरुद्ध विधान होगा और निषिद्ध कर्मोंको करता हुआ पापको प्राप्त होता है यह कहना अनुवादमात्र होनेसे व्यर्थ होगा। परंतु जब शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले कर्म शारीरिक कर्म मान लिये जायँगे तब इसका यह अर्थ हो जायगा कि इस लोक या परलोकके भोग ही जिनका प्रयोजन है जो विधिनिषेधात्मक शास्त्रोंद्वारा जाने जाते हैं जो शरीर मन या वाणीद्वारा किये जाते हैं ऐसे अन्य कर्मोंको न करता हुआ उन शरीर मन या वाणीसे केवल शरीरनिर्वाहके लिये आवश्यक कर्म लोकदृष्टिसे करता हुआ पुरुष किल्बिषको प्राप्त नहीं होता। यहाँ केवल शब्दके प्रयोगसे यह अभिप्राय है कि वह मैं करता हूँ इस अभिमानसे रहित होकर केवल लोकदृष्टिसे ही शरीर वाणी आदिकी चेष्टामात्र करता है। ऐसे पुरुषको पापरूप किल्बिष प्राप्त होना तो असम्भव है इसलिये यहाँ यह समझना चाहिये कि वह किल्बिषको यानी संसारको प्राप्त नहीं होता। ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके समस्त कर्मोंका नाश हो जानेके कारण वह बिना किसी प्रतिबन्धके मुक्त ही हो जाता है। यह पहले कहे हुए यथार्थ आत्मज्ञानके फलका अनुवादमात्र है। शारीरं केवलं कर्म इस वाक्यका इस प्रकार अर्थ मान लेनेसे वह अर्थ निर्दोष सिद्ध होता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.21।। व्याख्या   यतचित्तात्मा संसारमें आशा या इच्छा रहनेके कारण ही शरीर इन्द्रियाँ मन आदि वशमें नहीं होते। इसी श्लोकमें निराशीः पदसे बताया है कि कर्मयोगीमें आशा या इच्छा नहीं रहती। अतः उसके शरीर इन्द्रियाँ और अन्तःकरण स्वतः वशमें रहते हैं। इनके वशमें रहनेसे उसके द्वारा व्यर्थकी कोई क्रिया नहीं होती। त्यक्तसर्वपरिग्रहः कर्मयोगी अगर संन्यासी है तो वह सब प्रकारकी भोगसामग्रीके संग्रहका स्वरूपसे त्याग कर देता है। अगर वह गृहस्थ है तो वह भोगबुद्धिसे (अपने सुखके लिये) किसी भी सामग्रीका संग्रह नहीं करता। उसके पास जो भी सामग्री है उसको वह अपनी और अपने लिये न मानकर संसारकी और संसारके लिये ही मानता है तथा संसारके सुखमें ही उस सामग्रीको लगाता है। भोगबुद्धिसे संग्रहका त्याग करना तो साधकमात्रके लिये आवश्यक है।ऐसा निवृत्तिपरक श्लोक गीतामें और कहीं नहीं आया है। छठे अध्यायके दसवें श्लोकमें ध्यानयोगीके लिये और अठारहवें अध्यायके तिरपनवें श्लोकमें ज्ञानयोगीके लिये परिग्रहका त्याग करनेकी बात आयी है। परन्तु उनसे भी ऊँची श्रेणीके परिग्रहत्यागकी बात त्यक्तसर्वपरिग्रहः पदसे यहीं आयी है क्योंकि परिग्रह के साथ सर्व शब्द केवल यहाँ आया है। बारहवें अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें भक्तियोगीके लिये अनिकेतः पद आया है पर वहाँ इसका अर्थ निवासस्थानमें ममताआसक्तिसे रहित होना है।निराशीः कर्मयोगीमें आशा कामना स्पृहा वासना आदि नहीं रहते। वह बाहरसे ही भोगसामग्रीके संग्रहका त्याग करता हो इतनी ही बात नहीं है प्रत्युत वह भीतरसे भी भोगसामग्रीकी आशा या इच्छाका त्याग कर देता है। आशा या इच्छाका सर्वथा त्याग न होनेपर भी उसका उद्देश्य इनके त्यागका ही रहता है।शारीरं केवलं कर्म कुर्वन् शारीरम् कर्म (शरीरसम्बन्धी कर्म) के दो अर्थ होते हैं एक तो शरीरसे होनेवाला कर्म और दूसरा शरीरनिर्वाहके लिये किया जानेवाला कर्म। शरीरसे होनेवाले कर्मकी बात पाँचवें अध्यायके ग्यारहवें श्लोकमें भी आयी है जिसका तात्पर्य है कि सभी कर्म केवल शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धिके द्वारा ही हो रहे हैं मेरा उनसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं है ऐसा मानकर कर्मयोगी अन्तःकरणकी शुद्धिके लियेकर्म करते हैं। परन्तु यहाँ आया श्लोक निवृत्तिपरक है इसलिये यहाँ उपर्युक्त पदोंका अर्थ शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले आवश्यककर्म (खानपान शौचस्नान आदि) मानना ही उपयुक्त प्रतीत होता है। निवृत्तिपरायण कर्मयोगी केवल उतने ही कर्म करता है जितनेसे केवल शरीरनिर्वाह हो जाय।नाप्नोति किल्बिषम् जो कर्म करने अथवा न करनेसे अपना किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध रखता है वह पापको अर्थात् जन्ममरणरूप बन्धनको प्राप्त होता है। परन्तु आशारहित कर्मयोगी कर्म करने अथवा न करनेसे अपना कुछ भी सम्बन्ध नहीं रखता इसलिये वह पापको प्राप्त नहीं होता अर्थात् उसके सब कर्म अकर्म हो जाते हैं।निवृत्तिपरायण होनेपर भी कर्मयोगी कभी आलस्यप्रमाद नहीं करता। आलस्यप्रमादका भी भोग होता है। एकान्तमें यों ही पड़े रहनेसे आलस्यका भोग होता है और शास्त्रविरुद्ध तथा निरर्थक कर्म करनेसे प्रमादका भोग होता है। इस प्रकार निवृत्तिमें आलस्यके सुखका और प्रवृत्तिमें प्रमादके सुखका भोग हो सकता है। अतः आलस्यप्रमादसे मनुष्य पापको प्राप्त होता है। परन्तु बहुत कम कर्म करनेपर भी निवृत्तिपरायण कर्मयोगीमें किञ्चिन्मात्र भी आलस्यप्रमाद नहीं आते। यदि उसमें किञ्चिन्मात्र भी आलस्यप्रमाद आते तो किल्बिषम् न आप्नोति कहना बनता ही नहीं। वह यतचित्तात्मा है अर्थात् उसके शरीर इन्द्रियाँ और अन्तःकरण संयत हैं इसलिये उसमें आलस्यप्रमाद आ ही नहीं सकते। शरीर इन्द्रियाँ तथा अन्तःकरणके वशमें होनेसे भोगसामग्रीका त्याग करनेसे तथा आशा कामना ममता आदिसे रहित होनेसे उसके द्वारा निषिद्ध क्रिया हो सकती ही नहीं।यहाँ शङ्का हो सकती है कि जब उसके द्वारा पापक्रिया हो सकती ही नहीं तब यह क्यों कहा गया कि वह पापको प्राप्त नहीं होता इसका समाधान यह है कि क्रियामात्रके आरम्भमें अनिवार्य दोष (पाप) पाये जाते हैं सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः (गीता 18। 48)। परन्तु मूलमें असत्के सङ्ग कामना ममता और आसक्तिसे ही पाप लगते हैं। कर्मयोगीमें कामना ममता और आसक्ति होती ही नहीं अथवा उसका कामना ममता और आसक्तिका उद्देश्य ही नहीं होता इसलिये उसका कर्म करनेसे अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं होता। इसी कारण न तो उसे कर्मोंमें रहनेवाला आनुषङ्गिक पाप लगता है और न उसे शास्त्रविहित कर्मोंके त्यागका ही पाप लगता है।दूसरी एक शङ्का यह हो सकती है कि तीसरे अध्यायमें भगवान्ने सिद्ध महापुरुषको भी (अपने लिये कोई कर्तव्य शेष न रहनेपर भी) लोकसंग्रहके लिये कर्म करनेकी प्रेरणा की है (3। 25 26)। अपने लिये भी भगवान्ने कहा है कि त्रिलोकीमें कुछ भी कर्तव्य और प्राप्तव्य न होनेपर भी मैं सावधानीपूर्वक कर्म करता हूँ (3। 22 24)। अतः शरीरनिर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाले कर्मयोगीको क्या लोकसंग्रहके त्यागका दोष नहीं लगेगा इसका समाधान यह है कि कामना ममता आदि न रहनेके कारण उसे कोई दोष नहीं लगता। यद्यपि सिद्ध महापुरुषमें और भगवान्में कामना ममता आदिका सर्वथा अभाव होता है तथापि वे जो लोकसंग्रहके लिये कर्म करते हैं यह उनकी दया कृपा ही है। वास्तवमें वे लोकसंग्रह करें अथवा न करें इसमें वे स्वतन्त्र हैं इसकी उनपर कोई जिम्मेवारी नहीं है (गीता 3। 18)। वास्तवमें यह भी निवृत्तिपरायण साधकोंके लिये एक लोकसंग्रह ही है। लोकसंग्रह किया नहीं जाता प्रत्युत होता है।तीसरी एक शङ्का यह भी हो सकती है कि तीसरे अध्यायके तेरहवें श्लोकमें भगवान्ने केवल अपने शरीरका पोषण करनेवाले मनुष्यको पापी कहा है और यहाँ कहते हैं कि शरीरनिर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाले पापको नहीं प्राप्त होता। दोनोंका सामञ्जस्य कैसे हो इसका समाधान यह है कि जबतक भोगबुद्धि है और कर्मों तथा पदार्थोंमें आसक्ति बनी हुई है तबतक कर्म करने अथवा न करनेसे पाप लगता ही है इसीलिये वहाँ पचन्ति आत्मकारणात् पद आये हैं। परन्तु उस कर्मयोगीमें भोगबुद्धि नहीं है और कर्मों तथा पदार्थोंमें आसक्ति भी नहीं है अतः सर्वथा निर्लिप्त होनेसे उसे कर्म करने अथवा न करनेसे किञ्चिन्मात्र भी पाप नहींलगता। प्रश्न   इस श्लोकको अगर सांख्ययोगीका मान लें तो क्या आपत्ति है क्योंकि इसमें आये सब लक्षण सांख्ययोगीमें घटते हैं उत्तर   पहली बात तो यह है कि यहाँ कर्मयोगका प्रसङ्ग है इसलिये यह श्लोक मुख्यरूपसे कर्मयोगीका ही है। दूसरी बात सांख्ययोगी अपनेको कर्ता मानता ही नहीं। उसमें मैं कुछ भी नहीं करता हूँ (गीता 5। 8) ऐसा स्पष्ट विवेक रहता है फिर उसके लिये कर्म करता हुआ भी पापको नहीं प्राप्त होता ऐसा कहना कैसे बन सकता हैकर्मयोगके साधकमें वैसा स्पष्ट विवेक जाग्रत् न होनेपर भी उसका यह निश्चय रहता है कि मेरा कुछ नहीं है मेरे लिये कुछ नहीं चाहिये मेरे लिये कुछ नहीं करना है। इन तीन बातोंका दृढ़ निश्चय रहनेके कारण वह कर्म करते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है।लोगोंमें प्रायः ऐसी मान्यता है कि कर्मयोगी गृहस्थआश्रममें और ज्ञानयोगी (सांख्ययोगी) संन्यासआश्रममें रहता है। परन्तु वास्तवमें ऐसी बात नहीं है। जिसे शरीरसे अपनी अलग सत्ताका स्पष्ट विवेक है वह ज्ञानयोगी ही है चाहे वह गृहस्थआश्रममें हो अथवा संन्यासआश्रममें। जिसमें इतना विवेक नहीं है पर उपर्युक्त तीन बातोंका निश्चय पक्का है वह कर्मयोगी ही है चाहे वह गृहस्थआश्रममें हो अथवा संन्यासआश्रममें।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.20 4.21।।त्यक्त्वेति। निराशीरिति। अभिप्रवृत्तोऽपि आभिमुख्येन प्रवृत्तोऽपि। शरीरोपयोगिइन्द्रियव्यापारात्मकं कर्म शारीरं यत् मनोबुद्धिभ्यां न तथा अनुरञ्जितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.21।।सत्यपि विक्षेपके कर्मणि कूटस्थात्मानुसंधानस्य सिद्धे कैवल्यहेतुत्वे विक्षेपाभावे सुतरां तस्य तद्धेतुत्वसिद्धिरित्यभिप्रेत्याह यः पुनरिति। पूर्वोक्तविपरीतत्वं लोकसंग्रहादिनिरपेक्षत्वं। तदेव वैपरीत्यं स्फोरयति प्रागेवेति। ससाधनसर्वकर्मसंन्यासे शरीरस्थितिरपि कथमित्याशङ्क्याह शरीरेति। तर्हि तथाविधचेष्टानिविष्टचेतस्तया सम्यग्ज्ञानबहिर्मुखस्य कुतो मुक्तिरित्याशङ्क्य यथोपदिष्टचेष्टायामनादरान्नैवमित्याह ज्ञाननिष्ठ इति। इति दर्शयितुमिमं श्लोकं प्राहेति पूर्ववत्। आशिषः प्रार्थनाभेदास्तृष्णाविशेषाः। आशिषां विदुषो निर्गतत्वे हेतुमाह यतेति। चित्तवदात्मनः संयमनं कथमित्याशङ्क्याह आत्मा बाह्य इति। द्वयोः संयमने सत्यर्थसिद्धमर्थमाह त्यक्तेति। सर्वपरिग्रहपरित्यागे देहस्थितिरपि दुःस्था स्यादित्याशङ्क्याह शरीरमिति। मात्रशब्देन पौनरुक्त्यादनर्थकं केवलं पदमित्याशङ्क्याह तत्रापीति। शारीरं केवलमित्यादौ शरीरपदार्थं स्फुटीकर्तुमुभयथा संभावनया विकल्पयति शारीरमिति। शरीरनिर्वर्त्यं शारीरमित्यस्मिन्पक्षे किं दूषणं शरीरस्थितिमात्रं शारीरमित्यस्मिन्वा पक्षे किं फलमिति पूर्ववादी पृच्छति किञ्चात इति। शरीरनिर्वर्त्यं शारीरमित्यस्मिन्पक्षे सिद्धान्ती दूषणमाह उच्यत इति। शरीरेण यन्निर्वर्त्यं तत्किं प्रतिषिद्धं विहितं वा प्रथमे विरोधः स्यादित्याह यदेति। प्रतिषिद्धाचरणेऽपि नानिष्टप्राप्तिरित्युक्ते प्रतिषेधशास्त्रविरोधः स्यादित्यर्थः। द्वितीये विहितकरणे सत्यनिष्टप्राप्त्यभावादप्राप्तप्रतिषेधः स्यादित्याह शास्त्रीयं चेति। दृष्टप्रयोजनं कारीर्यादिकं कर्म अदृष्टप्रयोजनं स्वर्गसाधनं ज्योतिष्टोमादिकं कर्मेति विभागः। शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरमभिमतमिति पक्षे दूषणान्तरमाह शारीरमिति। वाचा मनसा चाकर्मणोऽनुष्ठाने संन्यासिनो भवत्येव किल्बिषप्राप्तिरित्याशङ्क्याह तत्रापीति। वाङ्मनोभ्यां विहितानुष्ठाने वा प्रतिषिद्धकरणे वा किल्बिषप्राप्तिः संन्यासिनः स्यादिति विकल्प्याद्ये जपध्यानविधिविरोधः स्यादित्युक्त्वा द्वितीयं दूषयति प्रतिषिद्धेति। शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरमिति पक्षमेवं प्रतिक्षिप्य द्वितीयपक्षे लाभं दर्शयति यदा त्विति। अन्यदेहस्थितिप्रयोजनात्कर्मणः सकाशादिति शेषः। तत्रापि विदुषः स्वदृष्ट्या न प्रवृत्तिरिति सूचयति लोकेति। विद्वानुक्तया रीत्या वर्तमानो नाप्नोति किल्बिषमित्यत्र विवक्षितमर्थमाह एवंभूतस्येति। विधिनिषेधगम्यं कर्म देहस्थितिहेतुव्यतिरिक्तमकुर्वत इत्यर्थः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषमित्यस्योक्तेन प्रकारेण परिग्रहे शारीरं केवलमिति विशेषणद्वयं निर्दोषं सिध्यतीति फलितमाह एवमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.21।।कामादिवर्जितत्वमेवनिराशीः इत्यनेनोच्यत इत्यत आह कामेति। आदिपदेन सङ्कल्पादिपरिग्रहः। कथमित्यतो योजयति यतेति। निराशीः त्यक्तसर्वपरिग्रहश्च भवतीति शेषः। सेन्द्रियं शरीरमात्मेत्यसत् अन्तःकरणवृत्तेः नियमेनैवैतन्नियमसिद्धेरिति भावेनाह आत्मेति। ननु परिग्रहो देहादिः तत्त्यागः कथं साधकस्य इत्यत आह परिग्रहेति। अनभिमानमिति। स्थितिरित्यादिक्रियाविशेषणम्। अर्थाभावेऽव्ययीभावो वाऽयम्। अभिमानाभाव इत्यर्थः। पूर्वश्लोकेकर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किञ्चित्करोति सः इति कर्मणां मिथ्यात्वज्ञानादिति व्याख्यानमसत्। अत्र श्लोके अन्यथा तदभिप्रायस्य वर्णितत्वादिति भावेनाह नैवेति। गौण्या वृत्त्यैतदभिप्रायकथनमवधेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.21।।कामादित्यागोपायमाह निराशीरिति। यतचित्तात्मा भूत्वा निराशीरित्यर्थः। आत्मा मनः। परिग्रहत्यागोऽनभिमानम्।नैव किञ्चित्करोति 4।20 इत्यस्याभिप्रायमाह नाप्नोति किल्बिषमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.21।।निराशीः निर्गतफलाभिसन्धिः यतचित्तात्मा यतचित्तमनाः त्यक्तसर्वपरिग्रहः आत्मैकप्रयोजनतया प्रकृतिप्राकृतवस्तुनि ममतारहितो यावज्जीवं केवलं शारीरम् एव कर्म कुर्वन् किल्बिषं संसारं न आप्नोति। ज्ञाननिष्ठाव्यवधानरहितकेवलकर्मयोगेन एवं रूपेण आत्मानं पश्यति इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.21।। निराशीः निर्गताः आशिषः यस्मात् सः निराशीः यतचित्तात्मा चित्तम् अन्तःकरणम् आत्मा बाह्यः कार्यकरणसंघातः तौ उभावपि यतौ संयतौ येन सः यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः त्यक्तः सर्वः परिग्रहः येन सः त्यक्तसर्वपरिग्रहः शारीरं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनम् केवलं तत्रापि अभिमानवर्जितम् कर्म कुर्वन् न आप्नोति न प्राप्नोति किल्बिषम् अनिष्टरूपं पापं धर्मं च। धर्मोऽपि मुमुक्षोः किल्बिषमेव बन्धापादकत्वात्। तस्मात् ताभ्यां मुक्तः भवति संसारात् मुक्तो भवति इत्यर्थः।।शारीरं केवलं कर्म इत्यत्र किं शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म अभिप्रेतम् आहोस्वित् शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म इति किं च अतः यदि शरीरनिर्वर्त्यं शारीरं कर्म यदि वा शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरम् इति उच्यते यदा शरीरनिर्वर्त्यं कर्म शारीरम् अभिप्रेतं स्यात् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म प्रतिषिद्धमपि शरीरेण कुर्वन् नाप्नोति किल्बिषम् इत्यपि ब्रुवतो विरुद्धाभिधानं प्रसज्येत। शास्त्रीयं च कर्म दृष्टादृष्टप्रयोजनं शरीरेण कुर्वन् नाप्नोति किल्बिषम् इत्यपि ब्रुवतः अप्राप्तप्रतिषेधप्रसङ्गः। शारीरं कर्म कुर्वन् इति विशेषणात् केवलशब्दप्रयोगाच्च वाङ्मनसनिर्वर्त्यं कर्म विधिप्रतिषेधविषयं धर्माधर्मशब्दवाच्यं कुर्वन् प्राप्नोति किल्बिषम् इत्युक्तं स्यात्। तत्रापि वाङ्मनसाभ्यां विहितानुष्ठानपक्षे किल्बिषप्राप्तिवचनं विरुद्धम् आपद्येत। प्रतिषिद्धसेवापक्षेऽपि भूतार्थानुवादमात्रम् अनर्थकं स्यात्। यदा तु शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं शारीरं कर्म अभिप्रेतं भवेत् तदा दृष्टादृष्टप्रयोजनं कर्म विधिप्रतिषेधगम्यं शरीरवाङ्मनसनिर्वर्त्यम् अन्यत् अकुर्वन् तैरेव शरीरादिभिः शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं केवलशब्दप्रयोगात् अहं करोमि इत्यभिमानवर्जितः शरीरादिचेष्टामात्रं लोकदृष्ट्या कुर्वन् नाप्नोति किल्बिषम्। एवंभूतस्य पापशब्दवाच्यकिल्बिषप्राप्त्यसंभवात् किल्बिषं संसारं न आप्नोति ज्ञानाग्निदग्धसर्वकर्मत्वात् अप्रतिबन्धेन मुच्यत एव इति पूर्वोक्तसम्यग्दर्शनफलानुवाद एव एषः। एवम् शारीरं केवलं कर्म इत्यस्य अर्थस्य परिग्रहेनिरवद्यं भवति।।त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः अन्नादेः शरीरस्थितिहेतोः परिग्रहस्य अभावात् याचनादिना शरीरस्थितौ कर्तव्यतायां प्राप्तायाम् अयाचितमसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया (बोधा0 स्मृ0 21.8.12) इत्यादिना वचनेन अनुज्ञातं यतेः शरीरस्थितिहेतोः अन्नादेः प्राप्तिद्वारम् आविष्कुर्वन् आह

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【 Verse 4.22 】

▸ Sanskrit Sloka: यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सर: | सम: सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ||

▸ Transliteration: yadṛcchālābhasantuṣṭo dvandvātī to vimatsaraḥ | samaḥ siddhāvasiddhau ca kṛtvāpi na nibadhyate ||

▸ Glossary: yadṛcchā lābha: what is obtained unsought; santuṣṭa: satisfied; dvandva: pairs of opposites; atī taḥ: surpassed; vimatsaraḥ: free from envy; samaḥ: equal; siddhau: in success; asiddhau: in failure; ca: also; kṛtvā: after doing; api: even; na: never; nibadhyate: bound

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.22 He who is satisfied with profit which comes of its own accord and who has gone beyond duality, who is free from envy, who is in equanimity both in success and failure, such a person though doing action, is never affected.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.22।।जो (कर्मयोगी) फलकी इच्छाके बिना अपनेआप जो कुछ मिल जाय उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.22।। यदृच्छया (अपने आप) जो कुछ प्राप्त हो उसमें ही सन्तुष्ट रहने वाला द्वन्द्वों से अतीत तथा मत्सर से रहित सिद्धि व असिद्धि में समभाव वाला पुरुष कर्म करके भी नहीं बन्धता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.22 यदृच्छालाभसन्तुष्टः content with what comes to him without effort? द्वन्द्वातीतः free from the pairs of,opposites? विमत्सरः free from envy? समः evenminded? सिद्धौ in success? असिद्धौ in failure? च and? कृत्वा acting? अपि even? न not? निबध्यते is bound.Commentary The sage is ite satisfied with what comes to him by chance. In verses IV. 18? 19? 20? 22? 22 and 23 there is only a reiteration of the results of the knowledge of the Self which is beyond action. The sage who identifies himself with the actionless Self is not bound as action and its cause which bind one to the round of birth and death have been burnt in the fire of the knowledge of the Self or BrahmaJnana. Just as a seed burnt in the fire cannot germinate? so also the Karmas or actions burnt by the fire of knowledge of the Self cannot produce future birth.Ordinary people think that the sage is also a doer of actions? an agent? active and therefore bound? when they see him doing actions. This is a mistake. From his own point of view and? in truth? he is not an agent at all. He really does no action at all. He feels and says? I do nothing at all. Nature does or the three alities of Nature do everything.He is not affected by heat and cold? pleasure and pain? success and failure? as he always has a balanced state of mind. He is not attached even to the things which are necessary for the bare maintenance of his body. He experiences neither pleasure nor pain? whether or not he obtains food and the other things which are reired for the maintenance of his body. The reason is that he is resting in his essential nature as ExistenceKnowledgeBliss Absolute (SatchidanandaSvarupa) he is swimming in the ocean of bliss. So he does not care for his body and its needs.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.22. Remaining contended wiht the gain brought by chance, transcending the dualities (pairs of opposites), entertaining no jealously, and remaning eal in success and in failure, he does not get bound, even when he acts.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.22 Content with what comes to him without effort of his own, mounting above the pairs of opposites, free from envy, his mind balanced both in success and failure; though he acts, yet the consequences do not bind him.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.22 Content with what chance may bring, rising above the pairs of opposites, free from ill-will, even-minded in success and failure, though he acts, he is not bound.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.22 Remaining satisfied with what comes unasked for, having transcended the dualities, being free from spite, and eipoised under success and failure, he is not bound even by performing actions.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.22 Content with what comes to him without effort, free from the pairs of opposites and envy, even-minded in success and failure, though acting, he is not bound.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.22 Yadrccha-etc. He does not get bound even when he acts : Here nibadhyate 'gets bound' is a usage of transitive verb with its object functioning as the subject. [Hence] the meaning is : The Self binds Itself by undertaking the dirt of mental impressions for fruits [of action]. Otherwise [the usage would amount to attribute] freedom of actions to the insentient in binding [the Self] - a proposition which is not a very happy one.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.22 Content with whatever chance may bring for the maintenance of the body; 'rising above the pairs of opposites' means enduring cold, heat and such other experiences until one has completed the practice of Karma Yoga; 'free from ill-will?' i.e., free from ill-will towards others, seeing his own Karma as the cause of his adversity; 'even-minded in success and failure,' i.e., even-minded at success like victory in war, etc., and failure therein - such a person 'is not bound,' i.e., he does not fall into Samsara, though devoted to action without any exclusive practice of Jnana Yoga.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.22 Yadrccha-labha-santustah, remaining satisfied with what comes unasked for-yadrccha-labha means coming to possess something without having prayed for it; feeling contented with that-. Dvandva-atitah,having transcended the dualities-one is said to be beyond dualities when his mind is not distressed even when afflicted by such opposites as heat and cold, etc.-. Vimatsarah, being free from spite, from the idea of enmity; and samah, eipoised; siddhau ca asiddhau, is success and failure, with regard to things that come unasked for-. The monk who is such, who is eipoised, not delighted or sorrowful in getting or not getting food etc. for the sustenance of the body, who sees inaction etc. in action etc., who is ever poised in the realization of the Self as It is, who, with regard to the activities accomplished by the body etc. in the course of going about for alms etc. for the bare maintenance of the body, is ever clearly conscious of the fact, 'I certainly do not anything; the organs act on the objects of the organs' (see 5.8; 3.28), he, realizing the absence of agentship in the Self, certainly does not do any actions like going about for alms etc. But when, abserving similarly with common human behaviour, agentship is attributed to him by ordinary poeple, then he (apparently) becomes an agent with regard to such actions as moving about for alms etc. However, from the standpoint of his own realization which has arisen from the valid means of knowledge presented in the scriptures, he is surely not an agent. He, to whom is thus ascribed agentship by others, na nibadhyate, is not bound; api, even; krtva, by performing such actions as moving about for alms merely for the maintenance of the body, because action which is a source of bondage has been burnt away along with its cause by the fire of wisdom. Thus, this is only a restatement of what has been said earilier. When a person who has already started works becomes endowed with the realization of the identity of the Self with the actionless Brahman, then it follows that in the case of that man, who has experienced the absence of agentship, actions and purposes in the Self, actions become relinished. But if this becomes impossible for some reason and he continues to be engaged in those acitons as before, still he certainly does not do anything. This absence of action has been shown in the verse, 'Having given up attachment to the results of action৷৷.' (20). Of that very person with regard to whom has been shown the absence of aciton-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.22।। अहंकार से परे आत्मस्वरूप में स्थित पुरुष इच्छा तथा फलासक्ति से प्रेरित होकर कर्म नहीं करता। कर्मों को करने से प्राप्त फल से ही वह सन्तुष्ट रहता है। अहंकाररहित अवस्था का अर्थ है अन्तकरण पर पूर्ण संयम। स्वभाविक ही शीतउष्ण सिद्धिअसिद्धि सुखदुख इत्यादि द्वन्द्वात्मक अनुभव उसे व्यथित नहीं कर सकते क्योंकि वे सब मन की बाह्यजगत् के साथ होने वाली प्रतिक्रियायें मात्र हैं।मन के प्रभावहीन होने पर बुद्धि अपने पूर्वाग्रह ईर्ष्या और मत्सर आदि से ज्ञानी पुरुष को प्रभावित नहीं कर सकती। सामान्यत सिद्धि में हमें हर्षातिरेक और असिद्धि में अत्यन्त विषाद होता है। परन्तु जब अविद्याजनित अहंकार पूर्णरूप से दैवी स्वरूप को प्राप्त हो जाता है तब वह पुरुष सफलता और असफलता में समान भाव से स्थित रहता है। ऐसा ज्ञानी पुरुष कर्म करके भी कर्मफलों से नहीं बंधता।जब आत्मज्ञानी पुरुष हमारे मध्य रहता हुआ कर्म करता है तब उसका व्यवहार सामान्य जनों के समान ही प्रतीत होता है तथापि उसके कर्मों में एक विशेष शक्ति और प्रभाव दिखाई पड़ता है जो उसे कर्मक्षेत्र में सामान्य से कहीं अधिक सफलता प्रदान करता है। श्रीकृष्ण के कथनानुसार ऐसे पुरुष को कर्मों का बंधन नहीं होता। सामान्य जनों को ज्ञानी पुरुष की इस उपलब्धि को समझने में कठिनाई होती है।जिस दैवी प्रेरणा एवं भावना से ज्ञानी पुरुष जगत् में कर्म करता है उसका वर्णन भगवान् अगले श्लोकों में करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.22।।ननु त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः अन्नादेः शरीरस्थितिहेतोः परिग्रहाभावात् याचनादिना शरीरस्थितिः कर्तव्येत्याशङ्क्यअयाचितमसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया इति वचनानुरोधेनोत्तरमाह यदृच्छेति। अप्रार्थितोऽप्रयत्नो लाभो यदृच्छालाभः तेन संतुष्टः संजातालंप्रत्ययः। द्वन्द्वैः शीतोष्णादिभिः स्वप्रयत्नमन्तरेण वस्त्राद्यलाभे पीड्यमानोऽप्यखिन्नचित्तः द्वन्द्वातीतः अतएव परस्य कौपीनाच्छादनलाभेन परोत्कर्षासहनरुपमंत्सरशून्यः। निर्वैर इत्यर्थः। समस्तुल्यो यदृच्छालाभस्य सिद्धावसिद्धौ च हर्षविषादरहित इत्यर्थः। यतयो भिक्षार्थं ग्रामं प्रविशन्तिविधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने। अतीत पात्रसंचारे भिक्षां लिप्सेत वै मुनिः। कौपीनयुगुलं वासः कन्थां शीतनिवारिणीम्। पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम्।। इत्यादिशास्त्राल्लोकदृष्ट्या भिक्षाटनादिकं शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं कर्म कृत्वापि कर्मादावकर्मादिदर्शी यथा भूतात्मज्ञाननिष्ठः कृत्वापि न निबध्यते बन्धहेतोः सहेतुकस्य कर्मणः ज्ञानाग्निना दग्धत्वादित्युक्तानुवादः। यत्त्वन्ये ननु सपरिग्रहः कुटुम्बभरणव्यग्रचित्ततया कथं

Chapter 4 (Part 15)

व्ययायासमाध्याग्निहोत्रादीन्यनुतिष्ठेदित्याशङ्क्याह। यदृच्छालाभसंतुष्टः द्वन्द्वातीतो बहुलाभेऽलाभे वा सुखदुःखाद्यतीतः परस्य लाभं दृष्टवा संतापहीनः समः यदृच्छालाभेनैव इष्टिपशुचातुर्मास्यादेर्नित्यात्कर्मणः सिद्धावसिद्धौ च समः निर्विकारः एवंभूत इष्ट्यादीनि कृत्वापि तन्मूलेन स्वर्गादिना न निबध्यते। अपिशब्दात्तज्जेन प्रत्यवायेन न निबध्यते। बन्धहेतोः कर्मणस्तत्त्वज्ञानेनैव दाहात्। तथाच स्मृतिःन्यायागतधनस्तत्त्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिप्रियः। श्राद्धकृत्सत्यवादी च गृहस्थोऽपि विमुच्यते।। इति व्याचख्युः तदसंगतम्। उक्तरीत्या त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः पूर्वश्लोकेन वर्णनौचित्येनैवमुत्थापनस्यानौचित्यात्। शङ्कानुरुपस्य श्लोकाक्षरैरुत्तरस्याप्रतीतेश्च। तस्मादनेन श्लोकेन परिग्रहरहितस्यैव वर्णनं न्याय्यमिति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.22।।त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यतेः शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं कर्माभ्यनुज्ञातं तत्रान्नाच्छादनादिव्यतिरेकेणशरीरस्थितेरसंभवाद्याञ्चादिनापि स्वप्रयत्नेनान्नादिकं संपाद्यमिति प्राप्ते नियमायाह शास्त्राननुमतप्रयत्नव्यतिरेको यदृच्छा तयैव यो लाभोऽन्नाच्छादनादेः शास्त्रानुमतस्य स यदृच्छालाभस्तेन संतुष्टस्तदधिकतृष्णारहितः। तथाच शास्त्रंभैक्षं चरेत् इति प्रकृत्यअयाचितसंक्लृप्तमुपपन्नं यदृच्छया इति याञ्चासंकल्पादिप्रयत्नं वारयति। मनुरपिनचोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया। नानुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत कर्हिचित्।। इति। यतयो भिक्षार्थं ग्रामं विशन्तीत्यादिशास्त्रानुमतस्तु प्रयत्नः कर्तव्य एव। एवं लब्धव्यमपि शास्त्रनियतमेवकौपीनयुगलं वासः कन्थां शीतनिवारिणीम्। पादुके चापि गृह्णीयात्कुर्यान्नान्यस्य संग्रहम्।। इत्यादि। एवमन्यदपि विधिनिषेधरूपं शास्त्रमूह्यम्। ननु स्वप्रयत्नमन्तरेणालाभे शीतोष्णादिपीडितः कथं जीवेदतआह द्वन्द्वातीतः द्वन्द्वानि क्षुत्पिपासाशीतोष्णवर्षादीनि अतीतोऽतिक्रान्तः समाधिदशायां तेषामस्फुरणात्। व्युत्थानदशायां स्फुरणेऽपि परमानन्दाद्वितीयाकर्त्रभोक्त्रात्मप्रत्ययेन बाधात् तैऽर्द्वन्द्वैरुपहन्यमानोऽप्यक्षुभितचित्तः। अतएव परस्य लाभे स्वस्यालाभे च विमत्सरः। परोत्कर्षासहनपूर्विका स्वोत्कर्षवाञ्छा मत्सरस्तद्रहितोऽद्वितीयात्मदर्शनेन निर्वैरबुद्धिः। अतएव समस्तुल्यो यदृच्छालाभस्य सिद्धावसिद्धौ च सिद्धौ न हृष्टः नाप्यसिद्धौ विषण्णः स स्वानुभवेनाकर्तैव परैरारोपितकर्तृत्वः शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं भिक्षाटनादिरूपं कर्म कृत्वापि न निबध्यते बन्धहेतोः सहेतुकस्य कर्मणो ज्ञानाग्निना दग्धत्वादिति पूर्वोक्तानुवादः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.22।।ननु सपरिग्रहः कुटुम्बभरणव्यग्रतया कथं वित्तव्ययायाससाध्यान्यग्निहोत्रादीन्यनुतिष्ठेदित्याशङ्क्याह यदृच्छेति। यदृच्छया अप्रार्थितोपनतो लाभो यदृच्छालाभस्तेन संतुष्टः। तथाहि ऋतामृताभ्यां जीवनं ब्राह्मणस्य विधाय व्याख्यातंऋतमुञ्छशिलं प्रोक्तममृतं स्यादयाचितम् इति। द्वन्द्वातीतो बहुलाभेऽलाभे वा सुखदुःखाद्यतीतः। विमत्सरः परस्य लाभं दृष्ट्वा संतापहीनः। समो यदृच्छालाभेनैवेष्टिपशुचातुर्मास्यादेर्नित्यकर्मणः सिद्धावसिद्धौ वा समो निर्विकार एवंभूत इष्ट्यादीनि कृत्वापि तत्फलेन स्वर्गादिना न निबध्यते। अपिशब्दात्तज्जेन प्रत्यवायेन न निबध्यते। बन्धहेतोः कर्मणस्तत्त्वज्ञानेनैव दाहात्। तथा च स्मृतिःन्यायागतधनस्तत्त्वज्ञाननिष्ठोऽतिथिप्रियः। श्राद्धकृत्सत्यवादी च गृहस्थोऽपि विमुच्यते। इति। भाष्ये त्वयं श्लोकः संन्यासिपरत्वेनैव व्याख्यातः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.22।।अथ उत्कृष्टज्ञानेऽपि फलेच्छारहितं कर्म न बन्धकमित्याह यदृच्छेति। यदृच्छालाभसन्तुष्टः भगवदिच्छालाभसन्तुष्ट द्वन्द्वातीतः सुखदुःखसमः विमत्सरः दुष्टवचनजक्षोभादिरहितः सिद्धौ यथोक्तकर्मसिद्धौ फलोन्मुखत्वादानन्दरहितः च पुनः असिद्धौ फलोन्मुखत्वाद्दुःखरहितः समः कर्म कृत्वाऽपि तेन कर्मणा न निबद्ध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.22।।किंच यदृच्छेति। अप्रार्थितोपस्थितो लाभो यदृच्छालाभः। तेन संतुष्टः। द्वन्द्वानि शीतोष्णादीन्यतीतोऽतिक्रान्तः। तत्सहनशील इत्यर्थः। विमत्सरो निर्वैरः। यदृच्छालाभस्यापि सिद्धावसिद्धौ च समो हर्षविषादरहितः। य एवंभूतः स पूर्वोत्तरभूमिकयोर्यथायथं विहितं स्वाभाविकं वा कर्म कृत्वापि न बन्धं प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.22।।यतः यदृच्छेति। सिद्धावसिद्धौ च सम इति पूर्वोक्तसाङ्ख्ययोगार्थः प्रदर्शितः न निबद्ध्यत इति अकर्मत्वं सूचितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.22।।जिसने समस्त संग्रहका त्याग कर दिया है ऐसे संन्यासीके पास शरीरनिर्वाहके कारणरूप अन्नादिका संग्रह नहीं होता इसलिये उसको याचनादिद्वारा शरीरनिर्वाह करनेकी योग्यता प्राप्त हुई। इसपर बिना याचना किये बिना संकल्पके अथवा बिना इच्छा किये प्राप्त हुए इत्यादि वचनोंसे जो शास्त्रमें संन्यासीके शरीरनिर्वाहके लिये अन्नादिकी प्राप्तिके द्वार बतलाये गये हैं उनको प्रकट करते हुए कहते हैं जो बिना माँगे अपनेआप मिले हुए पदार्थसे संतुष्ट है अर्थात् उसीमें जिसके मनका यह भाव हो जाता है कियही पर्याप्त है जो द्वन्द्वोंसे अतीत है अर्थात् शीतउष्ण आदि द्वन्द्वोंसे सताये जानेपर भी जिसके चित्तमें विषाद नहीं होता जो ईर्ष्यासे रहित अर्थात् निर्वैरबुद्धिवाला है और जो अपनेआप प्राप्त हुए लाभकी सिद्धिअसिद्धिमें भी सम रहता है जो ऐसा शरीरस्थितिके हेतुरूप अन्नादिके प्राप्त होने या न होनेमें भी हर्षशोकसे रहित समदर्शी है और कर्मादिमें अकर्मादि देखनेवाला यथार्थ आत्मदर्शननिष्ठ एवं शरीरस्थितिमात्रके लिये किये जानेवाले और शरीरादिद्वारा होनेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंमें भी मैं कुछ नहीं करता गुण ही गुणोंमें बर्त रहे हैं इस प्रकार सदा देखनेवाला है वह यति अपनेमें कर्तापनका अभाव देखनेसे अर्थात् आत्माको अकर्ता समझ लेनेसे वास्तवमें भिक्षाटनादि कुछ भी कर्म नहीं करता है। ऐसा पुरुष लोकव्यवहारकी साधारण दृष्टिसे तो सांसारिक पुरुषोंद्वारा आरोपित किये हुए कर्तापनके कारण भिक्षाटनादि कर्मोंका कर्ता होता है। परंतु शास्त्रप्रमाण आदिसे उत्पन्न अपने अनुभवसे ( वस्तुतः ) वह अकर्ता ही रहता है। इस प्रकार दूसरोंद्वारा जिसपर कर्तापनका अध्यारोप किया गया है ऐसा वह पुरुष शरीरनिर्वाहमात्रके लिये किये जानेवाले भिक्षाटनादि कर्मोंको करता हुआ भी नहीं बँधता क्योंकि ज्ञानरूप अग्निद्वारा उसके ( समस्त ) बन्धनकारक कर्म हेतुसहित भस्म हो चुके हैं। यह पहले कहे हुएका ही अनुवादमात्र है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.22।। व्याख्या   यदृच्छालाभसंतुष्टः कर्मयोगी निष्कामभावपूर्वक साङ्गोपाङ्ग रीतिसे सम्पूर्ण कर्तव्यकर्म करता है। फलप्राप्तिका उद्देश्य न रखकर कर्म करनेपर फलके रूपमें उसे अनुकूलता या प्रतिकूलता लाभ या हानि मान या अपमान स्तुति या निन्दा आदि जो कुछ मिलता है उससे उसके अन्तःकरणमें कोई असन्तोष पैदा नहीं होता। जैसे वह व्यापार करता है तो उसे व्यापारमें लाभ हो अथवा हानि उसके अन्तःकरणपर उसका कोई असर नहीं पड़ता। वह हरेक परिस्थितिमें समानरूपसे सन्तुष्ट रहता है क्योंकि उसके मनमें फलकी इच्छा नहीं होती। तात्पर्य यह है कि व्यापारमें उसे लाभहानिका ज्ञान तो होता है तथा वह उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी करता है पर परिणाममें वह सुखीदुःखी नहीं होता। यदि साधकके अन्तःकरणपर अनुकूलताप्रतिकूलताका थोड़ा असर पड़ भी जाय तो भी उसे घबराना नहीं चाहिये क्योंकि साधकके अन्तःकरणमें वह प्रभाव स्थायी नहीं रहता शीघ्र मिट जाता है।उपर्युक्त पदोंमें आया लाभ शब्द प्राप्तिके अर्थमें है जिसके अनुसार केवल लाभ या अनुकूलताका मिलना ही लाभ नहीं है प्रत्युत लाभहानि अनुकूलताप्रतिकूलता आदि जो कुछ प्राप्त हो जाय वह सब लाभ ही है।विमत्सरः कर्मयोगी सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी एकता मानता है सर्वभूतात्मभूतात्मा (गीता 5। 7)। इसलिये उसका किसी भी प्राणीसे किञ्चिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव नहीं रहता।विमत्सरः पद अलगसे देनेका भाव यह है कि अपनेमें किसी प्राणीके प्रति किञ्चिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव न आ जाय इस विषयमें कर्मयोगी बहुत सावधान रहता है। कारण कि कर्मयोगीकी सम्पूर्ण क्रियाएँ प्राणिमात्रके हितके लिये ही होती हैं अतः यदि उसमें किञ्चिन्मात्र भी ईर्ष्याका भाव होगा तो उसकी सम्पूर्ण क्रियाएँ दूसरोंके हितके लिये नहीं हो सकेंगी।ईर्ष्यादोष बहुत सूक्ष्म है। दो दूकानदार हैं और आपसमें मित्रता रखते हैं। उनमें एककी दूकान दूसरेकीअपेक्षा ज्यादा चल जाय तो दूसरेमें थोड़ी ईर्ष्या पैदा हो जायगी कि उसकी दूकान ज्यादा चल गयी मेरी कम चली। इस प्रकार ईर्ष्यादोषके कारण मित्रसे भी मित्रकी उन्नति नहीं सही जाती। जहाँ आपसमें प्रेम है एकता है मित्रता है वहाँ भी ईर्ष्यादोष आ जाता है फिर जहाँ वैर भिन्नता आदि हो वहाँका तो कहना ही क्या है इसलिये साधकको इस दोषसे बचनेके लिये विशेष सावधान रहना चाहिये।द्वन्द्वातीतः कर्मयोगी लाभहानि मानअपमान स्तुतिनिन्दा अनुकूलताप्रतिकूलता सुखदुःख आदि द्वन्द्वोंसे अतीत होता है इसलिये उसके अन्तःकरणमें उन द्वन्द्वोंसे होनेवाले रागद्वेष हर्षशोक आदि विकार नहीं होते।द्वन्द्व अनेक प्रकारके होते हैं जैसे भगवान्का सगुणसाकाररूप ठीक है या निर्गुणनिराकाररूप ठीक है अद्वैत सिद्धान्त ठीक है या द्वैत सिद्धान्त ठीक है भगवान्में मन लगा या नहीं लगा एकान्त मिला या नहीं मिला शान्ति मिली या नहीं मिली सिद्धि मिली या नहीं मिली इत्यादि। इन सब द्वन्द्वोंके साथ सम्बन्ध न होनेसे ही साधक निर्द्वन्द्व होता है। जैसे तराजू किसी भी तरफ झुक जाय तो वह बराबर नहीं कहलाता ऐसे ही साधकके अन्तःकरणमें किसी भी तरफ झुकाव हो जाय तो वह द्वन्द्वातीत नहीं कहलाता।कर्मयोगी सब प्रकारके द्वन्द्वोंसे अतीत होता है इसलिये वह सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है (गीता 5। 3)।समः सिद्धावसिद्धौ च किसी भी कर्तव्यकर्मका निर्विघ्नरूपसे पूरा हो जाना सिद्धि है और किसी प्रकारके विघ्न बाधाके कारण उसका पूरा न होना असिद्धि है। कर्मका फल मिल जाना सिद्धि है और न मिलना असिद्धि है। सिद्धि और असिद्धिमें रागद्वेष हर्षशोक आदि विकारोंका न होना ही सिद्धिअसिद्धिमें सम रहना है। दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा पदोंमें भी यही भाव आया है।अपना कुछ भी नहीं है अपने लिये कुछ भी नहीं चाहिये और अपने लिये कुछ भी नहीं करना है ये तीनों बातें ठीकठीक अनुभवमें आ जायँ तभी सिद्धि और असिद्धिमें पूर्णतः समता आयेगी।कृत्वापि न निबध्यते यहाँ कृत्वा अपि पदोंका तात्पर्य है कि कर्मयोगी कर्म करते हुए भी नहीं बँधता फिर कर्म न करते हुए बँधनेका प्रश्न ही पैदा नहीं होता। वह दोनों अवस्थाओंमें निर्लिप्त रहता है।जैसे शरीरनिर्वाहमात्रके लिये कर्म करनेवाला कर्मयोगी कर्मोंसे नहीं बँधता वैसे ही शास्त्रविहित सम्पूर्ण कर्मोंको करनेवाला कर्मयोगी भी कर्मोंसे नहीं बँधता। वास्तवमें देखा जाय तो कर्मयोगमें कर्म करना अधिक करना कम करना अथवा न करना बन्धन या मुक्तिका कारण नहीं है। इनके साथ जो लिप्तता (लगाव) है वही बन्धनका कारण है और जो निर्लिप्तता है वही मुक्तिका कारण है। जैसे नाटकमें एक व्यक्ति लक्ष्मणका और दूसरा व्यक्ति मेघनादका स्वाँग धारण करता है और दोनों व्यक्ति अपनेअपने स्वाँगको ठीकठीक निभाते हुए भी उससे निर्लिप्त रहते हैं अर्थात् अपनेको वास्तवमें लक्ष्मण या मेघनाद नहीं मानते। ऐसे ही कर्मयोगी अपने वर्ण आश्रम आदिके अनुसार कर्तव्यका पालन करते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहता है अर्थात् उनसे अपना कोई सम्बन्ध नहीं मानता। उसका सम्बन्ध नित्यनिरन्तर रहनेवाले स्वरूपके साथ रहता है प्रतिक्षण परिवर्तनशील प्रकृतिके साथ नहीं। इसलिये उसकी स्थिति स्वाभाविक ही समतामें रहती है। समतामें स्थिति रहनेसे वह कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधता।यदि विशेष विचारपूर्वक देखा जाय तो समता स्वतःसिद्ध है। यह प्रत्येक मनुष्यका अनुभव है कि अनुकूल परिस्थितिमें हम जो रहते हैं प्रतिकूल परिस्थिति आनेपर भी हम वही रहते हैं। यदि हम वही (एक ही) नरहते तो दो अलगअलग (अनुकूल और प्रतिकूल) परिस्थितियोंका ज्ञान किसे होता इससे सिद्ध हुआ कि परिवर्तन परिस्थितियोंमें होता है अपने स्वरूपमें नहीं। इसलिये परिस्थितियोंके बदलनेपर भी स्वरूपसे हम सम (ज्योंकेत्यों) ही रहते हैं। भूल यह होती है कि हम परिस्थितियोंकी ओर तो देखते हैं पर स्वरूपकी ओर नहीं देखते। अपने सम स्वरूपकी ओर न देखनेके कारण ही हम आनेजानेवाली परिस्थितियोंसे मिलकर सुखीदुःखी होते हैं। सम्बन्ध   तीसरे अध्यायके नवें श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने व्यतिरेक रीति से कहा था कि यज्ञसे अतिरिक्त कर्म मनुष्यको बाँधते हैं। अब तेईसवें श्लोकके उत्तरार्धमें उसी बातको अन्वय रीति से कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.22।।यदृच्छेति। कृत्वापि न निबध्यते। कर्मकर्तरि प्रयोगः। स्वयमेव हि आत्मानं बध्नाति फलवासनाकालुष्यमुपाददानः ( N उपाददानः गृह्णानः) इत्यर्थः (S omits इत्यर्थः)। अन्यथा जडानां कर्मणां बन्धने स्वातन्त्र्यं न तथा हृदयंगमम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.22।।पूर्वश्लोकेन संगतिं दर्शयन्नुत्तरश्लोकमुत्थापयति त्यक्तेति। अन्नादेरित्यादिशब्देन पादुकाच्छादनादि गृह्यते याचनादिनेत्यादिपदेन सेवाकृष्याद्युपादीयते भिक्षाटनार्थमुद्योगात्प्राक्काले केनापि योग्येन निवेदितं भैक्ष्यमयाचितमभिशस्तं पतितं च वर्जयित्वा संकल्पमन्तरेण पञ्चभ्यः सप्तभ्यो वा गृहेभ्यः समानीतं भैक्ष्यमसंक्लृप्तसिद्धमन्नं भक्तजनैः स्वसमीपमुपानीतमुपपन्नं यदृच्छया। स्वकीयप्रयत्नव्यतिरेकेणेति यावत्। आदिशब्देनमाधूकरमसंक्लृप्तं प्राक्प्रणीतमयाचितम्। तत्तत्कालोपपन्नं च भैक्ष्यं पञ्चविधं स्मृतम् इत्यादि गृह्यते। आविष्कुर्वन्निदं वाक्यमाहेति योजनीयम्। परोत्कर्षामर्षपूर्विका स्वस्योत्कर्षाभिवाञ्छा विगता यस्मादिति व्युत्पत्तिमाश्रित्य विवक्षितमर्थमाह निर्वैरेति। संक्षेपतो दर्शितमर्थं विशदयति य एवंभूत इति। तथापि प्रकृतस्य यतेर्भिक्षाटनादौ कर्तृत्वं प्रतिभाति तदभावे भिक्षाटनाद्यभावेन जीवनाभावप्रसङ्गादित्याशङ्क्याह लोकेति। लौकिकैरविवेकिभिः सह व्यवहारस्य स्नानाचमनभोजनादिलक्षणस्य विदुषापि सामान्येन दर्शनात्तदनुसारेण लौकिकैरध्यारोपितकर्तृत्वभोक्तृत्वाद्विद्वानपि लोकदृष्ट्या भिक्षाटनादौ कर्तृत्वमनुभवतीत्यर्थः। कथं तर्हि तस्याकर्तृत्वं तत्राह स्वानुभवेनेति। यदृच्छेत्यादिपादत्रयं व्याख्याय कृत्वापीत्यादिचतुर्थपादं व्याचष्टे स एवमिति। भिक्षाटनादिना प्रातिभासिकेन कर्मणा विदुषो बद्धत्वाभावेऽपि कर्मान्तरेण निबद्धत्वं भविष्यतीत्याशङ्क्याह बन्धेति। ज्ञानाग्निदग्धत्वादित्येवं शारीरं केवलमित्यादावुक्तस्यायमनुवाद इति योजना। यथोक्तस्य कर्मणो युक्त्या महाविरोधाभ्युपगमसूचनार्थोऽपिशब्दः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.22।।कामादिवर्जने यदृच्छालाभसन्तुष्टत्वादिकमर्थात्सिद्धम् तत्किमर्थमुच्यत इत्यत आह यतेति।द्वन्द्वातीत इत्युक्तमेवसमः सिद्धावसिद्धौ च इत्यनेनोच्यत इत्यत आह कथमिति किम्प्रकारकं इत्यर्थः। इति जिज्ञासायामिति शेषः। व्याख्यानव्याख्येयत्वेन न पुनरुक्तिदोष इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.22।।यतचित्तात्मनो लक्षणमाह यदृच्छालाभेति। कथं द्वन्द्वातीतत्वं इति आह समः सिद्धाविति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.22।।यदृच्छोपनतशरीरधारणहेतुवस्तुसन्तुष्टः द्वन्द्वातीतः यावत्साधनसमाप्त्यवर्जनीयशीतोष्णादिसहः विमत्सरः अनिष्टोपनिपातहेतुभूतस्वकर्मनिरूपेण परेषु विगतमत्सरः समः सिद्धौ असिद्धौ च युद्वादिकर्मसु जयादिसिद्ध्यसिद्ध्योः समचित्तः कर्म एव कृत्वा अपि ज्ञाननिष्ठां विना अपि न निबध्यते न संसारं प्रतिपद्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.22)यदृच्छालाभसंतुष्टः अप्रार्थितोपनतो लाभो यदृच्छालाभः तेन संतुष्टः संजातालंप्रत्ययः। द्वन्द्वातीतः द्वन्द्वैः शीतोष्णादिभिः हन्यमानोऽपि अविषण्णचित्तः द्वन्द्वातीतः उच्यते। विमत्सरः विगतमत्सरः निर्वैरबुद्धिः समः तुल्यः यदृच्छालाभस्य सिद्धौ असिद्धौ च। यः एवंभूतो यतिः अन्नादेः शरीरस्थितिहेतोः लाभालाभयोः समः हर्षविषादवर्जितः कर्मादौ अकर्मादिदर्शी यथाभूतात्मदर्शननिष्ठः सन् शरीरस्थितिमात्रप्रयोजने भिक्षाटनादिकर्मणि शरीरादिनिर्वर्त्ये नैव किञ्चित् करोम्यहम् गुणा गुणेषु वर्तन्ते (गीता 3.28) इत्येवं सदा संपरिचक्षाणः आत्मनः कर्तृत्वाभावं पश्यन्नैव किञ्चित् भिक्षाटनादिकं कर्म करोति लोकव्यवहारसामान्यदर्शनेन तु लौकिकैः आरोपितकर्तृत्वे भिक्षाटनादौ कर्मणि कर्ता भवति। स्वानुभवेन तु शास्त्रप्रमाणादिजनितेन अकर्तैव। स एवं पराध्यारोपितकर्तृत्वः शरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं भिक्षाटनादिकं कर्म कृत्वापि न निबध्यते बन्धहेतोः कर्मणः सहेतुकस्य ज्ञानाग्निना दग्धत्वात् इति उक्तानुवाद एव एषः।।त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम् (गीता 4.20) इत्यनेन श्लोकेन यः प्रारब्धकर्मा सन् यदा निष्क्रियब्रह्मात्मदर्शनसंपन्नः स्यात् तदा तस्य आत्मनः कर्तृकर्मप्रयोजनाभावदर्शिनः कर्मपरित्यागे प्राप्ते कुतश्चिन्निमित्तात् तदसंभवे सति पूर्ववत् तस्मिन् कर्मणि अभिप्रवृत्तस्य अपि नैव किञ्चित् करोति सः इति कर्माभावः प्रदर्शितः। यस्य एवं कर्माभावो दर्शितः तस्यैव

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【 Verse 4.23 】

▸ Sanskrit Sloka: गतसङ्गस्य मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतस: | यज्ञायाचरत: कर्म समग्रं प्रविलीयते ||

▸ Transliteration: gatasaṅgasya muktasya jñānāvasthitacetasaḥ | yajñāyācarataḥ karma samagraṁ pravilī yate ||

▸ Glossary: gatasaṅgasya: unattached to the modes of material nature; muktasya: of the liberated; jñānā: knowledge; avasthita: established; cetasaḥ: of such spirit; yajñāya: for the sake of sacrifice; ācarataḥ: practice; karma: work; samagraṁ: in total; pravilī yate: melts away.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.23 The work of a liberated man who is unattached to the modes of material nature and who is fully centered in the ul- timate knowledge, who works totally for the sake of sacrifice, merges entirely into the knowledge.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.23।।जिसकी आसक्ति सर्वथा मिट गयी है जो मुक्त हो गया है जिसकी बुद्धि स्वरूपके ज्ञानमें स्थित है ऐसे केवल यज्ञके लिये कर्म करनेवाले मनुष्यके सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.23।। जो आसक्तिरहित और मुक्त है जिसका चित्त ज्ञान में स्थित है यज्ञ के लिये आचरण करने वाले ऐसे पुरुष के समस्त कर्म लीन हो जाते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.23 गतसङ्गस्य one who is devoid of attachment? मुक्तस्य of the liberated? ज्ञानावस्थितचेतसः whose mind is established in knowledge? यज्ञाय for sacrifice? आचरतः acting? कर्म action? समग्रम् whole? प्रविलीयते is dissolved.Commentary One who is free from attachment? who is liberated from the bonds of Karma? whose mind is centred and rooted in wisdom? who performs actions for the sake of sacrifice? in order to please the Lord -- all his actions with their results melt away. His actions are reduced to nothing. They are? in fact? no actions at all.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.23. The action gets dissolved completely in the case of the person who undertakes it for the sake of sacrifice; who is rid of attachment and is freed; and who has his mind fixed in wisdom.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.23 He who is without attachment, free, his mind centered in wisdom, his actions, being done as a sacrifice, leave no trace behind.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.23 Of one whose attachments are gone, who is free, whose mind is established in knowledge, who works only for sacrifices, his Karma is entirely dissolved.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.23 Of the liberated person who has got rid of attachment, whose mind is fixed in Knowledge, actions undertaken for a sacrifice get totally destroyed.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.23 To one who is devoid of attchment, who is liberated, whose mind is established in knowledge, who works for the sake of sacrifice (for the sake of God), the whole action is dissolved.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.23 Gatasangasya etc. For sacrifice (yajnaya) : The singular number is to be construed with the class [yajnatva]. [Hence the meaning is] : 'The sacrifice' that are being defined in the seel. It has been said 'for the sake of sacrifice etc.' Now their general nature, [the Lord] describes :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.23 Of a person whose attachment to all objects is gone because of his mind being established in the knowledge of the self, who is therefore liberated from accepting all worldly possessions and who is engaged in the performance of sacrifices etc., as described above - in the case of such a person his beginningless load of Karma, which is the cause of his bondgae, is completely dissolved, i.e., destroyed without leaving any residue.

So far the nature of Karma as having the form of knowledge has been described as emerging from constant contemplation on the nature of the self as different from Prakrti. And now Sri Krsna says that all actions together with their ancillaries, have the form of knowledge because of constant contemplation by the aspirant on the Supreme Person who is the Supreme Brahman, as being his soul.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.23 Muktasya, of the liberated person who has become relieved of such bondages as righteousness and unrighteousness, etc.; gatasangasya, who has got rid of attachment, who has become detached from everything; jnana-avasthita-cetasah, whose mind is fixed in Knowledge only; his karma, actions; acaratah, undertaken; yajnaya, for a sacrifice, to accomplish a sacrifice [A.G. takes yajna to mean Visnu. So, yajnaya will mean 'for Visnu'. Sankaracarya also interprets this word similarly in 3.9.-Tr.]; praviliyate, gets destroyed; samagram, totally-saha (together) agrena (with its conseence, result). This is the meaning. For what reason, again, does an action that is underway get destroyed totally without producing its result? This is being answered: Because,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.23।। इस श्लोक में ज्ञानी पुरुष के लक्षणों का वर्णन करके जिस क्रम में उसके गुणों को बताया गया है वह स्वयं साधना मार्ग की ओर संकेत करता है। उपदेश को सूत्ररूप में वर्णन करने की सभी शास्त्रीय ग्रन्थों की एक विशेष शैली होती है। उसमें भी प्रतीक शब्दों के चयन के प्रति शास्त्रज्ञ अधिक सजग रहते हैं और उन शब्दों को एक विशेष क्रम देने में भी उन्हें आनन्द का अनुभव होता है। विचाराधीन श्लोक इसका एक उदाहरण है।गतसंगस्य जिस दैवी स्वरूप को ऋषियों ने प्राप्त किया वह कोई अज्ञात स्थल से प्राप्त की हुई नवीन उपलब्धि नहीं थी। यह पूर्णत्व तो सबका स्वयं सिद्ध स्वरूप ही है जिसे उन्होंने केवल पहचाना। बाह्य विषयों के साथ आसक्ति के कारण हमने अपने आपको स्वस्वरूप के राज्य के बाहर निष्कासित कर लिया है। ज्ञानी पुरुष वह है जो परिच्छिन्न जगत् की आसक्ति से पूर्णतया मुक्त है।मुक्तस्य अधिकांश साधकों को मुक्ति के संबंध में स्पष्ट ज्ञान नहीं होता। हम अपने आप ही अपने लिये बंधन उत्पन्न कर लेते हैं। अनेक प्रकार के बन्धनों का कारण है विषयों के साथ हमारी आसक्ति। विषयोपभोग में ही यह जीव सुखसन्तोष का अनुभव करता है। यही कारण है कि वह उसमें आसक्त हो जाता है। इस प्रकार शरीर मन और बुद्धि की दृष्टि से वह क्रमश बाह्य विषयों भावनाओं एवं विचारों के साथ बंध जाता है। ज्ञानी पुरुष इन सबसे मुक्त होता है।ज्ञानावस्थितचेतस नित्यानित्यवस्तु के विवेक के द्वारा नित्य स्वरूप को पहचान कर उसमें प्राप्त की हुई स्थिति के द्वारा ही विषयासक्ति के बंधन से मुक्ति हो सकती है।विवेकजनित विज्ञान के प्रकाश में अविद्या से उत्पन्न आसक्ति के नष्ट होने पर वह पूर्णत्व प्राप्त पुरुष वैषयिक प्रवृत्ति और अनैतिकता की शृंखलाओं से मुक्त हो जाता है। ऐसा पुरुष यज्ञ की अर्थात् निस्वार्थ सेवा और अर्पण की भावना से जीवन पर्यन्त कर्म करता रहता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञ के लिये कर्म करने वाले पुरुष के सब कर्म लीन हो जाते हैं। अर्थात् वे नई वासनाएँ नहीं उत्पन्न करते।वेदों में प्रयुक्त यज्ञ शब्द को लेकर भगवान् श्रीकृष्ण ने यहाँ उसके अर्थ को और अधिक व्यापक रूप दिया है जिससे सम्पूर्ण विश्व में उसकी उपादेयता सिद्ध हो सके। केवल यज्ञयागादि ही नहीं बल्कि वे सब कर्म जो अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित न होकर सेवाभाव पूर्वक किये गये हों यज्ञ कर्म में ही समाविष्ट हैं।आगे के 6 श्लोकों में लगभग 12 प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया गया है जिसका आचरण प्रत्येक व्यक्ति सर्वत्र सभी परिस्थितियों में और अपने कार्यक्षेत्र में कर सकता है।क्या कारण है कि ज्ञानी पुरुष के कर्म प्रतिक्रया उत्पन्न किये बिना लीन हो जाते हैं इसका कारण बताते हुए कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.23।।यस्तु प्रारब्धवशात्पूर्वं कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोतीत्युक्तं तदेव विवृण्वन्नाह गतसङ्गस्येति। गतः सर्वतो निवृत्तः सङ्ग आसक्तिर्यस्य तस्य मुक्तस्य निवृत्तधर्माधर्मादिबन्धनस्येति भाष्यम्। तत्रादिशब्देन कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यध्यासो रागादिश्च गृह्यत इत्यविरोधः। ज्ञान एवावस्थितं चेतो यस्य तस्य यज्ञायाग्निष्टोमादियज्ञनिर्वृत्त्यर्थं विष्णुप्रीतिनिर्वृत्त्यर्थमिति वा आचरतः कुर्वतः सहाग्रेण फलेन वर्तत इति समग्रं प्रकर्षेण कारणोच्छेदेन तत्त्वसाक्षात्काराद्विलीयते नश्यतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.23।।त्यक्तसर्वपरिग्रहस्य यदृच्छालाभसंतुष्टस्य यतेर्यच्छरीरस्थितिमात्रप्रयोजनं भिक्षाटनादिरूपं कर्म तत्कृत्वा न निबध्यत इत्युक्तेर्गृहस्थस्य ब्रह्मविदो जनकादेर्यंज्ञादिरूपं यत्कर्म तद् बन्धहेतुः स्यादिति भवेत्कस्यचिदाशङ्का तामपनेतुं त्यक्त्वा कर्मफलासङमित्यादिनोक्तं विवृणोति गतसङ्गस्य फलासङ्गशून्यस्य मुक्तस्य कर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यध्यासशून्यस्य ज्ञानावस्थितचेतसः निर्विकल्पब्रह्मात्मैक्यबोध एव स्थितं चित्तं यस्य तस्य स्थितप्रज्ञस्येत्यर्थः। उत्तरोत्तरविशेषणस्य पूर्वपूर्वहेतुत्वेनान्वयो द्रष्टव्यः। गतसङगत्वं कुतः। यतोऽध्यासहीनत्वम् तत्कुतः। यतः स्थितप्रज्ञत्वमिति ईदृशस्यापि प्रारब्धकर्मवशात् यज्ञाय यज्ञसंरक्षणार्थं ज्योतिष्टोमादियज्ञे श्रेष्ठाचारत्वेन लोकप्रवृत्त्यर्थं यज्ञाय विष्णवे तत्प्रीत्यर्थमिति वा। आचरतः कर्म यज्ञदानादिकं समग्रं सहाग्रेण फलेन विद्यत इति समग्रं प्रविलीयते प्रकर्षेण कारणोच्छेदेन तत्त्वदर्शनाद्विलीयते। विनश्यतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.23।।त्यक्त्वा कर्मफलासङ्गम् इत्यादिना श्लोकत्रयेण विद्वान्कर्माणि कुर्वन्नपि न करोति अतो न लिप्यते लेपाभावाच्च न बध्यत इत्युक्तं तत्किं कर्मणां फलदानशक्तिप्रतिबन्धो वा ज्ञानेन क्रियते उत निरन्वयोच्छेद एवेत्याशङ्क्याद्ये मुक्तस्यापि पुनः संसारप्रसक्तिं पश्यन् द्वितीयमभ्युपगच्छति गतसङ्गस्येति। यतो विद्वान् गतसङ्गः कर्तृत्वाभिमानशून्योऽतो न करोतीत्युक्तम्। यतो मुक्तः फलकामनामुक्तः अतो न लिप्यत इत्युक्तम्। यतो यज्ञायैव यज्ञेश्वरप्रीत्यर्थमेवाचरति न फलान्तरार्थम् प्राप्याभावात्। अतस्तामेवोत्पाद्य कृतार्थैः कर्मभिर्न बध्यत इत्युक्तम्। यतोऽयं ज्ञाने सम्यग्दर्शनेऽवस्थितचेताः प्रतिष्ठितप्रज्ञः अत ईश्वरप्रीतिफलस्य ज्ञाननिष्ठाप्राप्तिरूपस्यापि प्रागेव लाभात् अस्य गतसङ्गस्य मुक्तस्य यज्ञाय कर्माचरतो ज्ञानावस्थितस्य सर्वं कर्म क्रियमाणादिकं सर्वप्रकारेण निष्प्रयोजनं सत्समग्रं अग्रेण फलेन वासनया वा सह समग्रं प्रकर्षेण निरन्वयं विलीयते नश्यत्यतो न कदाचिदपि प्रादुर्भवति। अयं च क्रियमाणकर्मप्रलयो विद्वद्दृष्ट्यैव। स्वाभाविकस्य तेषां फलजननसामर्थ्यस्य वह्न्यौष्ण्यवदप्रत्याख्येयत्वात्। अतएव ज्ञानेन पूर्वकर्मणां दाह उत्तरेषामश्लेषश्च श्रूयते नतूत्तरेषामपि दाहः।तद्यथैषीकतूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते इति।तं विदित्वा न कर्मणा लिप्यते पापकेन इति च।तस्य पुत्रा दायमुपयन्ति सुहृदः साधुकृत्यां द्विषन्तः पापकृत्याम् इति।विदुषो धनस्येव कर्मणामप्यन्यत्र गमनदर्शनान्न तेषां वस्तुवृत्त्या प्रलयोऽस्तीति ध्येयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.23।।ननु कृतं कर्म फलभोगाभावे कथं नश्यति इत्याशङ्कायामाह गतसङ्गस्येति। गतसङ्गस्य त्यक्तलौकिकपरिग्रहादेः मुक्तस्य कर्मफलैर्मुक्तस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ज्ञानेन भगवति सुस्थिरचित्तस्य यज्ञाय विष्णवे भगवदर्पणबुद्ध्या कर्म आचरतः कुर्वतः समग्रं फलसहितं कर्म प्रविलीयते। ईश्वरप्राप्तिरूपे लीनं भवतीत्यर्थः। यद्वा यज्ञाय लोकशिक्षणार्थं मदाज्ञयाऽग्रे यज्ञप्रवृत्त्यर्थमाचरतः समग्रं सफलं कर्म प्रविलीयते।यज्ञप्रवृत्तावेव लीनं भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.23।।किंच गतसङ्गस्येति। गतसङ्गस्य निष्कामस्य रागादिभिर्मुक्तस्य। ज्ञानेऽवस्थितं चेतो यस्य। यज्ञायपरमेश्वरार्थं कर्माचरतः सतः समग्रं सवासनं कर्म प्रविलीयते अकर्मभावमापद्यते। आरूढयोगपक्षे यज्ञायेति। यज्ञसंरक्षणार्थं लोकसंग्रहार्थमेव कर्म कुर्वत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.23।।तथा चासावकर्मा योगी सर्वतो मुक्तोऽखण्डब्रह्मयाथात्म्यज्ञानेनाऽवस्थितचेताः यज्ञाय ब्रह्मणे ब्रह्मकर्माचरन् भवति तत्सर्वं कर्म प्रविलीयते अकर्मभावमापद्यते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.23।।जो कर्म करना प्रारम्भ कर चुका है ऐसा पुरुष जब कर्म करतेकरते इस ज्ञानसे सम्पन्न हो जाता है कि निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है तब अपने कर्ता कर्म और प्रयोजनादिका अभाव देखनेवाले उस पुरुषके लिये कर्मोंका त्याग कर देना ही उचित होता है। किंतु किसी कारणवश कर्मोंका त्याग करना असम्भव होनेपर यदि वह पहलेकी तरह उन कर्मोंमें लगा रहे तो भी वास्तवमें कुछ भी नहीं करता। इस प्रकार त्यक्त्वा कर्मंफलासङ्गम् इस श्लोकसे ( ज्ञानीके ) कर्मोंका अभाव ( अकर्मत्व ) दिखलाया जा चुका है। जिस पुरुषके कर्मोंका इस प्रकार अभाव दिखाया गया है उसीके ( विषयमें अगला श्लोक कहते हैं ) जिस पुरुषकी सब ओरसे आसक्ति निवृत्त हो चुकी है जिसके पुण्यपापरूप बन्धन छूट गये हैं जिसका चित्त निरन्तर ज्ञानमें ही स्थित है ऐसे केवल यज्ञसम्पादनके लिये ही कर्मोंका आचरण करनेवाले उस सङ्गहीन मुक्त और ज्ञानावस्थितचित्त पुरुषके समग्र कर्म विलीन हो जाते हैं। अग्र शब्द फलका वाचक है। उसके सहित कर्मोंको समग्र कर्म कहते हैं अतः यह अभिप्राय हुआ कि उसके फलसहित समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.23।। व्याख्या   कर्मयोगीके सम्पूर्ण कर्मोंके विलीन होनेकी बात गीताभरमें केवल इसी श्लोकमें आयी है इसलिये यह कर्मयोगका मुख्य श्लोक है। इसी प्रकार चौथे अध्यायका छत्तीसवाँ श्लोक ज्ञानयोगका और अठारहवें अध्यायका छाछठवां श्लोक भक्तियोगका मुख्य श्लोक है।गतसङ्गस्य क्रियाओँका पदार्थोंका घटनाओंका परिस्थितियोंका व्यक्तियोंका जो सङ्ग है इनके साथ जो हृदयसे लगाव है वही वास्तवमें बाँधनेवाला अर्थात् जन्ममरण देनेवाला है (गीता 13। 21)। स्वार्थभावको छोड़कर केवल लोगोंके हितके लिये लोकसंग्रहार्थ कर्म करते रहनेसे कर्मयोगी क्रियाओँ पदार्थों आदिसे असङ्ग हो जाता है अर्थात् उसकी आसक्ति सर्वथा मिट जाती है।वास्तवमें मनुष्य स्वरूपसे असङ्ग ही है असङ्गो ह्ययं पुरुषः (बृहदारण्यक0 4। 3। 15)। किंतु असङ्ग होते हुए भी यह शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ परिस्थिति व्यक्ति आदिसे सम्बन्ध मानकर सुखकी इच्छासे उनमें आबद्ध हो जाता है। मेरी मनचाही हो अर्थात् जो मैं चाहता हूँ वही हो और जो मैं नहीं चाहता वह नहीं हो ऐसा भाव जबतक रहता है तबतक यह सङ्ग बढ़ता ही रहता है। वास्तवमें होता वही है जो होनेवाला है। जो होनेवाला है उसे चाहें या न चाहें वह होगा ही और जो नहीं होनेवाला है उसे चाहें या न चाहें वह नहीं होगा। अतः अपनी मनचाही करके मनुष्य व्यर्थमें (बिना कारण) फँसता है और दुःख पाता है।कर्मयोगी संसारसे मिली हुई शरीरादि वस्तुओंको अपनी और अपने लिये न मानकर उन्हें संसारकी ही मानकर संसारकी सेवामें अर्पण कर देता है। इससे वस्तुओं और क्रियाओंका प्रवाह संसारकी ओर ही हो जाता है और अपना असङ्ग स्वरूप ज्योंकात्यों रह जाता है।कर्मयोगीका अहम् भी सेवामें लग जाता है। तात्पर्य यह है कि उसके भीतर मैं सेवक हूँ यह भाव भी नहीं रहता। यह भाव तो मनुष्यको सेवकपनेके अभिमानसे बाँध देता है। सेवकपनेका अभिमान तभी होता है जब सेवासामग्रीके साथ अपनापन होता है। सेवाकी वस्तु उसीकी थी उसीको दे दी तो सेवा क्या हुई हम तो उससे उऋण हुए। इसलिये सेवक न रहे केवल सेवा रह जाय। यह भाव रहे कि सेवाके बदलेमें धन मान बड़ाई पद अधिकार आदि कुछ भी लेना नहीं है क्योंकि उसपर हमारा हक ही नहीं लगता। उसे स्वीकार करना तो अनधिकार चेष्टा है। लोग मेरेको सेवक कहें ऐसा भाव भी न रहे और यदि वे कहें तो उसमें राजी भी न हो। इस प्रकार संसारकी वस्तुओँको संसारकी सेवामें सर्वथा लगा देनेसे अन्तःकरणमें एक प्रसन्नता होती है। उस प्रसन्नताका भी भोग न किया जाय तो स्वतःसिद्ध असङ्गताका अनुभव हो जाता है।मुक्तस्य जो अपने स्वरूपसे सर्वथा अलग हैं उन क्रियाओँ और शरीरादि पदार्थोंसे अपना सम्बन्ध न होते हुए भी कामना ममता और आसक्तिपूर्वक उनसे अपना सम्बन्ध मान लेनेसे मनुष्य बँध जाता है अर्थात् पराधीन हो जाता है। कर्मयोगका अनुष्ठान करनेसे जब माना हुआ (अवास्तविक) सम्बन्ध मिट जाता है तब कर्मयोगी सर्वथा असङ्ग हो जाता है। असङ्ग होते ही वह सर्वथा मुक्त हो जाता है अर्थात् स्वाधीन हो जाताहै।ज्ञानावस्थितचेतसः जिसकी बुद्धिमें स्वरूपका ज्ञान नित्यनिरन्तर जाग्रत् रहता है वह ज्ञानावस्थितचेतसः है। स्वरूपज्ञान होते ही उसकी स्वरूपमें स्थिति हो जाती है जो वास्तवमें पहलेसे ही थी।वास्तवमें ज्ञान संसारका ही होता है। स्वरूपका ज्ञान नहीं होता क्योंकि स्वरूप स्वतःज्ञानस्वरूप है। क्रिया और पदार्थ ही संसार है। क्रिया और पदार्थका विभाग अलग है तथा स्वरूपका विभाग अलग है अर्थात् क्रिया और पदार्थका स्वरूपके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। क्रिया और पदार्थ जड हैं तथा स्वरूप चेतन है। क्रिया और पदार्थ प्रकाश्य हैं तथा स्वरूप प्रकाशक है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थकी स्वरूपसे भिन्नताका ठीकठीक ज्ञान होते ही क्रिया और पदार्थरूप संसारसे सम्बन्धविच्छेद होकर स्वतःसिद्ध असङ्ग स्वरूपमें स्थितिका अनुभव हो जाता है।यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते कर्ममें अकर्म देखनेका ही एक प्रकार है यज्ञार्थ कर्म अर्थात् यज्ञके लिये कर्म करना। निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना यज्ञ है। जो यज्ञके लिये ही सम्पूर्ण कर्म करता है वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है और जो यज्ञके लिये कर्म नहीं करता अर्थात् अपने लिये कर्म करता है वह कर्मोंसे बँध जाता है यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः (गीता 3। 9)।प्रकृतिका कार्य है क्रिया और पदार्थ। इन दोनोंमें क्रियाका भी आदि और अन्त होता है तथा पदार्थका भी आदि और अन्त होता है। क्रिया आरम्भ होनेसे पहले भी नहीं थी और समाप्त होनेके बाद भी नहीं रहेगी इसलिये बीचमें भी वह नहीं है ऐसा सिद्ध हुआ। इसी प्रकार पदार्थ उत्पन्न होनेसे पहले भी नहीं था और नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहेगा इसलिये बीचमें भी वह नहीं है यह सिद्ध हुआ क्योंकि यह सिद्धान्त है कि जो वस्तु आदि और अन्तमें नहीं होती वह मध्य (वर्तमान) में भी नहीं होती (टिप्पणी प0 252)। परन्तु चेतन स्वरूपका आदि और अन्त नहीं होता वह सदा अक्रियरूपसे ज्योंकात्यों रहता है। वह चेतनतत्त्व क्रिया और पदार्थ दोनोंका प्रकाशक है। इस प्रकार क्रिया और पदार्थके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध न होते हुए भी जब वह इनके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है तब वह बँध जाता है। इस बन्धनसे छूटनेका उपाय है फलेच्छाका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना।संसारमें अनेक प्रकारकी क्रियाएँ हो रही हैं और अनेक प्रकारके पदार्थ विद्यमान हैं। परन्तु मनुष्य जिन क्रियाओँ और पदार्थोंसे आसक्ति ममता और कामनापूर्वक अपना सम्बन्ध मानता है उन्हीं क्रियाओँ और पदार्थोंसे वह बँधता है। जब मनुष्य कामना ममता और आसक्तिका त्याग करके केवल दूसरोंके हितके लिये सम्पूर्ण कर्म करता है और मिले हुए पदार्थोंको दूसरोंका ही मानकर उनकी सेवामें लगाता है तब कर्मयोगीके सम्पूर्ण (क्रियमाण सञ्चित और प्रारब्ध) कर्म विलीन हो जाते हैं अर्थात् उसे कर्मोंके साथ अपनी स्वतःसिद्ध असङ्गताका अनुभव हो जाता है।विशेष बात(1) कर्ता करण और कर्म इन तीनोंके मिलनेसे कर्मोंका संचय होता है (गीता 18। 18)। यदि कर्तापन न रहे तो कर्मोंका संग्रह नहीं होता क्योंकि करण और कर्म दोनों कर्ताके ही अधीन हैं। अतः कर्मसंचयका मुख्य हेतु कर्तापन ही है।विचारपूर्वक देखा जाय तो कुछनकुछ पानेकी इच्छासे ही करनेकी इच्छा उत्पन्न होती है जिससे कर्तापन उत्पन्न होता है। कर्तापनसे बन्धन होता है जिससे कर्तापन उत्पन्न होता है। कर्तापनसे बन्धन होता है। जबमनुष्य पानेकी इच्छासे अपने लिये कर्म करता है तब उसका कर्तापन दृढ़ हो जाता है। जब कर्मयोगी पानेकी इच्छाका त्याग करके केवल यज्ञके लिये अर्थात् दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है तब उसका कर्तापन दूसरोंके लिये होता है इससे उसे अपनी असङ्गताका अनुभव हो जाता है। इसलिये उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंका संचय नहीं होता। कारण कि जब आधार (कर्तापन) ही नहीं रहा तब कर्म टिकेंगे ही कहाँकर्मयोगमें ममता(मेरापन) का त्याग और ज्ञानयोगमें अहंता(मैंपन) का त्याग मुख्य है। ममताका त्याग होनेसे अहंताका और अहंताका त्याग होनेसे ममताका त्याग स्वतः हो जाता है। इसलिये कर्मयोगमें पहले ममता मिटती है फिर अहंता स्वतः मिट जाती है (टिप्पणी प0 253.1) और ज्ञानयोगमें पहले अहंता मिटती है फिर ममता स्वतः मिट जाती है। अहंता और ममताके मिटनेपर कर्तापन और भोक्तापन भी मिट जाते हैं।कर्मयोगी अपने लिये कोई कर्म करता ही नहीं और कुछ चाहता ही नहीं अतः वह कर्मोंके फलका भोक्ता नहीं बनता। जैसे एक व्यक्तिको यहाँ कई दण्ड भोगने हैं। परन्तु वह मर जाय तो यहाँ उसके सभी दण्ड समाप्त हो जाते हैं क्योंकि जब भोगनेवाला व्यक्ति ही नहीं रहा तब दण्ड भोगेगा ही कौन ऐसे ही जब कर्मयोगीका भोक्तपन मिट जाता है तब उसके सभी कर्म समाप्त हो जाते हैं क्योंकि जब भोक्ता ही नहीं रहा तब कर्मोंका फल भोगेगा ही कौन(2) इसी अध्यायके नवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मेरे जन्म और कर्म दिव्य हैं इस प्रकार जो मनुष्य तत्त्वसे जान लेता है वह मेरेको प्राप्त होता है। जन्म तो केवल भगवान्के ही दिव्य होते हैं पर कर्म मनुष्यमात्रके भी (यदि वे करना चाहें तो) दिव्य हो सकते हैं। अतः इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें भगवान् अपने कर्मोंकी दिव्यताका कारण बताते हैं कि कर्मोंके फलमें मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म लिप्त नहीं करते अर्थात् मेरे कर्म अकर्म हो जाते हैं। इस प्रकार कर्मोंका तत्त्व जानकर जो कर्म करता है उसके भी कर्म अकर्म हो जाते हैं। फिर पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि मुमुक्षुओंने भी इसी प्रकार जानकर कर्म किये हैं। इसके बाद सोलहवें श्लोकमें भगवान् कर्मोंका तत्त्व कहनेकी प्रतिज्ञा करते हैं और सत्रहवें श्लोकमें कहते हैं कि कर्म विकर्म और अकर्म तीनोंका तत्त्व जानना चाहिये। फिर अठारहवें श्लोकमें भगवान्ने मुख्यरूपसे कर्मोंका तत्त्व (अकर्म अथवा निर्लिप्तता) बतलाया।कामनासे कर्म होते हैं कामनाके बढ़नेपर विकर्म होते हैं और कामनाका अत्यन्त अभाव होनेसे अकर्म होता है। मूलमें इस (सोलहवेंसे बत्तीसवें श्लोकतकके) प्रकरणका तात्पर्य अकर्म का वर्णन करना ही है। इसीलिये भगवान्ने कर्म और विकर्म दोनोंके मूल कारण कामना के त्यागका तथा अकर्मका वर्णन उन्नीसवेंसे तेईसवें श्लोकतक प्रत्येक श्लोकमें किया है (टिप्पणी प0 253.2) और अन्तमें बत्तीसवें श्लोकमें इस प्रकरणका उपसंहार किया है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि यज्ञके लिये कर्म करनेसे सम्पूर्ण कर्म विलीन हो जाते हैं। साधकोंकी रुचि विश्वास और योग्यताकी भिन्नताके कारण साधन भी भिन्नभिन्न प्रकारके होते हैं। इसलिये अब आगेके सात श्लोकोंमें (चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक) भगवान् भिन्नभिन्न प्रकारके साधनोंका यज्ञ रूपसे वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.23।।गतसंगस्येति। यज्ञायेति जातावेकवचनम्। यज्ञाः वक्षामाणलक्षणाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.23।।गतसङ्गस्येत्यादिश्लोकस्य व्यवहितेन संबन्धं वक्तुं वृत्तं कीर्तयति त्यक्त्वेति। अनेन श्लोकेननैव किंचित्करोति सः इत्यत्र कर्माभावः प्रदर्शित इति संबन्धः। कस्य कर्माभावप्रदर्शनमित्याशङ्क्याह यः प्रारब्धेति। प्रारब्धकर्मा सन् योऽवतिष्ठते तस्य कर्माभावः प्रदर्शितश्चेद्विरोधः स्यादित्याशङ्क्यावस्थाविशेषे तत्प्रदर्शनान्मैवमित्याह यदेति। ननु ज्ञानवतः क्रियाकारकफलाभावदर्शिनः कर्मपरित्यागध्रौव्यात्कर्माभाववचनमप्राप्तप्रतिषेधः स्यादित्याशङ्क्याह आत्मन इति। लोकसंग्रहादिनिमित्तं प्रागेवोक्तमविद्यावस्थायामिव पूर्ववदित्युक्तम्। एवं वृत्तमनूद्योत्तरश्लोकमवतारयति यस्येति। यथोक्तस्यापि विद्यावतो मुक्तस्य भगवत्प्रीत्यर्थं कर्मानुष्ठानोपलम्भात्ततो बन्धारम्भः संभाव्येतेत्याशङ्क्याह यज्ञायेति। धर्माधर्मादीत्यादिशब्देन रागद्वेषादिसंग्रहः। तस्य बन्धनत्वं करणव्युत्पत्त्या प्रतिपत्तव्यम्। यज्ञनिर्वृत्त्यर्थं यज्ञशब्दितस्य भगवतोऽविष्णोर्नारायणस्य प्रीतिसंपत्त्यर्थमिति यावत्। ज्ञानमेव वाञ्छतो ज्ञानस्य प्रतिबन्धकं कर्म परिशङ्कितं परिहरति कर्मेति। समग्रेणेत्यङ्गीकृत्य व्याचष्टे सहेत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.23।।यदुक्तं कामादिवर्जनं तदेवगतसङ्गस्य इत्यनेनोच्यते।त्यक्तसर्वपरिग्रहः 4।21 इत्येतत्मुक्तस्य इत्यनेन कर्मणीति नित्यतृप्त इति चज्ञानावस्थितचेतसः इत्यनेन। अतः पुनरुक्तिरित्यत आह उपसंहरतीति। विक्षिप्तं पिण्डीकरोतीत्यर्थः। गतसङ्गस्येति विषयसापेक्षम् अतस्तत्प्रदर्शनेन व्याख्याति गतेति। मुक्तस्यै तत्साधके घटयति मुक्तस्येति। अनेनाभिमानान्मुक्तस्येति वा मुक्तसदृशस्येति वा व्याख्यातं भवति। ज्ञानस्य विषयसापेक्षत्वात्तं प्रदर्शयन् व्याचष्टे ज्ञानेति आत्मज्ञानस्याप्युपलक्षणमेतत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.23।।उपसंहरति गतसङ्गस्येति। गतसङ्गस्य फलस्नेहरहितस्य मुक्तस्य शरीराद्यनभिमानिनः। ज्ञानावस्थितचेतसः परमेश्वरज्ञानिनः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.23।।आत्मविषयज्ञानावस्थितमनस्त्वेन विगततदितरसङ्गस्य तत एव निखिलपरिग्रहविनिर्मुक्तस्य उक्तलक्षणयज्ञादिकर्मनिर्वृत्तये वर्तमानस्य पुरुषस्य बन्धहेतुभूतं प्राचीनं कर्म समग्रं प्रविलीयते निःशेषं क्षीयते।प्रकृतिवियुक्तात्मस्वरूपानुसन्धानयुक्ततया कर्मणो ज्ञानाकारत्वम् उक्तम्। इदानीं सर्वस्य सपरिकरस्य कर्मणः परब्रह्मभूतपरमपुरुषात्मकत्वानुसन्धानयुक्ततया ज्ञानाकारत्वम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.23।। गतसङ्गस्य सर्वतोनिवृत्तासक्तेः मुक्तस्य निवृत्तधर्माधर्मादिबन्धनस्य ज्ञानावस्थितचेतसः ज्ञाने एव अवस्थितं चेतः यस्य सोऽयं ज्ञानावस्थितचेताः तस्य यज्ञाय यज्ञनिर्वृत्त्यर्थम् आचरतः निर्वर्तयतः कर्म समग्रं सह अग्रेण फलेन वर्तते इति समग्रं कर्म तत् समग्रं प्रविलीयते विनश्यति इत्यर्थः।।कस्मात् पुनः कारणात् क्रियमाणं कर्म स्वकार्यारम्भम् अकुर्वत् समग्रं प्रविलीयते इत्युच्यते यतः

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【 Verse 4.24 】

▸ Sanskrit Sloka: ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् | ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना ||

▸ Transliteration: brahmārpaṇaṁ brahmahavir brahmāgnau brahmaṇā hutam | brahmaiva tena gantavyaṁ brahmakarmasamādhinā ||

▸ Glossary: brahma: supreme; arpaṇaṁ: offering; brahma: supreme; haviḥ: oblation; brah- ma: supreme; agnau: in the fire of; brahmaṇā: by the supreme; hutaṁ: offered; brahma: supreme; eva: only; tena: by him; gantavyaṁ: to be reached; brahma: supreme; karma: action; samādhinā: by complete absorption

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.24 The offering, the offered butter to the supreme in the fire of the supreme is offered by the supreme. Certainly, the supreme can be reached by him who is absorbed completely in action.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.24।।जिस यज्ञमें अर्पण भी ब्रह्म है हवि भी ब्रह्म है और ब्रह्मरूप कर्ताके द्वारा ब्रह्मरूप अग्निमें आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है (ऐसे यज्ञको करनेवाले) जिस मनुष्यकी ब्रह्ममें ही कर्मसमाधि हो गयी है उसके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.24।। अर्पण (अर्थात् अर्पण करने का साधन श्रुवा) ब्रह्म है और हवि (शाकल्य अथवा हवन करने योग्य द्रव्य) भी ब्रह्म है ब्रह्मरूप अग्नि में ब्रह्मरूप कर्ता के द्वारा जो हवन किया गया है वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार ब्रह्मरूप कर्म में समाधिस्थ पुरुष का गन्तव्य भी ब्रह्म ही है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.24 ब्रह्म Brahman? अर्पणम् the oblation? ब्रह्म Brahman? हविः the clarified butter? ब्रह्माग्नौ in

Chapter 4 (Part 16)

the fire of Brahman? ब्रह्मणा by Brahman? हुतम् is offered? ब्रह्म Brahman? एव only? तेन by him? गन्तव्यम् shall be reached? ब्रह्मकर्मसमाधिना by the man who is absorbed in action which is Brahman.Commentary This is JnanaYajna or wisdomsacrifice wherein the idea of Brahman is substituted for the ideas of the instrument and other accessories of action? the idea of action itself and of its results. By entertaining such an idea the whole action melts away? as stated in the previous verse (No.23).When one attains to the knowledge of the Self or Selfrealisation his whole life becomes a wisdomsacrifice in which the oblation? the melted butter or the offering? the performer of the sacrifice? the action and the goal are all Brahman. He who meditates thus wholly upon Brahman shall verily attain to Brahman.The sage who has the knowledge of the Self knows that the oblation? the fire? the instrument by which the melted butter is poured into the fire and himself have no existence apart from that of Brahman. He who has realised through direct cognitio (Anubhava) that all is Brahman? does no action even if he performs actions. (Cf.III.15)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.24. The Brahman-oblation that is to be offered ot the Brahman, is poured into the Brahman-fire by the Brahman; it is nothing but the Brahman that is to be attained by him whose deep contemplation is the [said] Brahman-action.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.24 For him, the sacrifice itself is the Spirit; the Spirit and the oblation are one; it is the Spirit Itself which is sacrificed in Its own fire, and the man even in action is united with God, since while performing his act, his mind never ceases to be fixed on Him.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.24 Brahman is the instrument to offer with; Brahman is the oblation. By Brahman is the oblation offered into the fire of Brahman; Brahman alone is to be reached by him who meditates on Him in his works.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.24 The ladle is Brahman [Some translate as 'Brahman is the ladle৷৷.,' etc.-Tr.], the oblations is Brahman, the offering is poured by Brahman in the fire of Brahman. Brahman alone is to be reached by him who has concentration on Brahman as the objective [As an object to be known and attained. (Some translate brahma-karma-samadhina as, 'by him who sees Brahman in action'.)

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.24 Brahman is the oblation; Brahman is the melted butter (ghee); by Brahman is the oblation poured into the fire of Brahman; Brahman verily shall be reached by him who always sees Brahman in action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.24 Brahmarpanam etc. That is to be offered to the Brahman (list) : that, the offering of which is in the Brahman i.e., the reentrance of which is only into That, just from which it has originated. The Brahman (2nd) : That which is the same as the entire universe what we see - this is that very oblation. Into the Brahman-fire : into the fire which is the same as the Brahman, the highly tranil Supreme Consciousness. By the Brahman : by one or the other action. Is poured : is offered for the augmentation of It's lumination. Hence, a man of Yoga, whose Brahman-action of this sort is itself a deep concentration - by him, the Brahman alone is [a goal] to be attained i.e., to be realised, not anything else; for there is no other thing.

Alternatively [in the verse] the meaning 'by him' brings in, by implication, the meaning 'by whom'. So the following is the alignment [of words] : The action, in which the Brahman-oblation, intended to be an offering to a deity of the Brahman-nature, has been indeed poured into the Brahman-fire by the sacrificer, identical with the Brahman - that very Brahman-action of this sort is itself a deep contemplaiton, because it is the means to gain the innate nature of the Self. And what is attained by this Brahman-action-contemplation is the very Brahman Itself and not any other fruit. Indeed it has been maintained [by the Lord] as :

      'The way in which  men  resort to Me,
       [in the same way  I favour them]'. (IV, II) 

'Those, who have cultivated the nature of performing sacrifice which is nothing but Me, but of the delimited nature - they attain, therefore, the fruit of similar [limited] nature. This is different matter. But, with regard to those who have realised the nature of the sacrifice identical with Me ( the Supreme Consciousness), the Unlimited and complete; how could they be entertaining a craving for a bit of limited fruit ?' This is the idea here.

Thus, a top secret is furnished by this and by the succeeding verses. that has been also detailed by us (Ag.) - even though our intelligence is limited - as far as our intelligence permits, by not transgressing the instructions of our preceptors. Maybe, for a person without a regular course of the oral tradition [of the system], this looks like a picture painted on the sky and does not appeal to his mind. On that account we should not be blamed.

It has been declared by some, in this context, that [here in this verse] the oblation, the fire and the instruments like sruk [used for offering the oblation into the fire in the sacrifice] and also the act [of offering] are all adjectives alifying the Brahmam. This [explanation] deserves to be ignored. For, these commentators have not troden on the path of the secret tradition.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.24 The expression 'Brahman is the instrument to offer with' (It is to be remembered that in Ramanuja's system 'Brahman' in the primary sense is the 'Whole' with the Supreme Being as the Soul and Atmans and Matter (Prakrti) as His body in inseparable union with the Whole. So the word 'Brahman' can, according to the needs of each context, be used to indicate the Supreme Being, the Atman, or Prakrti; In verse 24 it has been used in all these senses. We have therefore put it in italics. See Introduction.) is adjectival to 'the oblation'. That by which an offering is given, such as a ladle, is an Arpana. It is called Brahman because it is an effect of Brahman, Brahman being the material cause of the universe. 'Brahmaarpanam' is the oblation, of which the instrument is Brahman. The oblation, just like the instrument with which it is offered, is also Brahman. It is offered by the agent Brahman into the fire of Brahman. He is the Brahma-karma-samadhi who contemplates thus on all acts as filled with the Supreme Brahman or as having the Supreme Brahman as the Self. He who contemplates on Brahman as the Soul of all actions, reaches Brahman alone, as his own self has the Supreme Brahman as Its Self. The meaning is that the individual self - which is Brahman because of Its having Brahman as Its Self - has to realise Its own real nature. All actions performed by an aspirant for release have the form of knowledge because of their association with the contemplation of the Supreme Brahman as their self. They are a direct means for the vision of the self without the meditation of Jnana Yoga.

Thus, Sri Krsna, after explaining how Karma takes the form of knowledge, now speaks of the various kinds of Karma Yoga.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.24 Brahma-arpanam, the ladle is Brahman: The knower of Brahman perceives the instrument with which he offers oblation in the fire as Brahman Itself. He perceives it as not existing separately from the Self, as one sees the non-existence of silver in nacre. In this sense it is that Brahman Itself is the ladle-just as what appears as silver is only narcre. (The two words brahma and arpanam are not parts of a compound word, samasa.) The meaning is that, to a knower of Brahman, what is perceived in the world as ladle is Brahman Itself. Similarly, brahma-havih, the oblations is Brahman: To him, what is seen as oblations is nothing but Brahman. In the same way, brahma-agnau, (-this is a compound word-) in the fire of Brahman: The fire into which oblation is hutam, poured; brahmana, by Brahman, by the agent, is Brahman Itself. The meaning is that Brahman Itself is the agent (of the offering). That he makes the offering-the act of offering-, that is also Brahman. And the result that is gantavyam, to be reached by him; that also is brahma eva, surely Brahman. Brahma-karma-samadhina, by him who has concentration on Brahman as the objective: Brahman Itself is the objective (karma); he who has concentration (samadhi) on That is brahma-karma-samdhih. The goal to be reached by him is Brahman alone. Thus, even the action undertaken by one who desires to prevent mankind from going astray is in reality inaction, for it has been sublated by the realization of Brahman. This being so, in the case of the monk from whom aciton has dropped off, who has renounced all activity, viewing his Knowledge as a (kind of) sacrifice, too, becomes all the more justifiable from the point of view of praising full realization. That is, whatever is well known as ladle etc. in the context of a sacrifice, all that, in the context of the Self, is Brahman Itself to one who has realized the supreme Truth. If not so, then, since all in Brahman, it would have been uselesss to specifically mention ladle etc. as Brahman. Therefore, all actions cease to exist for the man of realization who knows that Brahman Itself is all this. And this follows also from the absence (in him) of the idea of accessories. [See note on p.211.-Tr.] For the act called 'sacarifice' is not seen to exist without being in association with the idea of accessories. All such acts as Agnihotra etc. are associated with the ideas of such accessories as making an offering etc. to the particular gods who are revealed in the scriptures, and with the idea of agentship as also desire for results. But they are not found bereft of the ideas of such distinctions as exist among action, accessories and results, or unassociated with the ideas of agentship hankering for results. This (apparent) (activity of the man of Knowledge), however, stands dissociated from the ideas of differences among the accessories like ladle etc., actions and results, which get destroyed by the Knowledge of Brahman. Hence, it is inaction to be sure. And thus has it been shown in, 'He who finds inaction in action' (18), 'he really does not do anything even though engaged in action' (20), 'the organs act on the objects of the organs' (3.28), 'Remaining absorbed in the Self, the knower of Reality should think, "I certainly do not do anything"' (5.8), etc. While pointing out thus, the Lord demolishes in various places the ideas of differences among actions, accessories and results. And it is also seen in the case of rites such as Agnihotra undertaken for results (kamya), that the Agnihotra etc. cease to be (kamya) rites undertaken for selfish motives when the desire for their results is destroyed. Similarly, it is seen that actions done intentionally and unintentionally yeild different results. So, here as well, in the case of one who has his ideas of distinctions among accessories like ladle etc., actions and results eliminated by the knowledge of Brahman, even activites which are merely external movements amount to inaction. Hence it was said, 'gets totally destroyed.' Here some say: That which is Brahman is the ladle etc. It is surely Brahman Itself which exists in the five forms [Asscessories that can be indicated by the five grammatical case-ending, viz Nominative, Objective, Instrumental, Dative and Locative. (As for instance, the sacrificer, oblation, ladle, sacrificial fire, and Brahman.-Tr.) of accessories such as the ladle etc. and it is Itself which undertakes actions. There the ideas of ladle etc. are not eradicated, but the idea of Brahman is attributed to the ladle etc. as one does the ideas of Visnu etc. to images etc., or as one does the idea of Brahman ot name etc. Reply: True, this could have been so as well if the context were not meant for the praise of jnanayajna (Knowledge considered as a sacrifice). Here, however, after presenting full realization as expressed by the word jnana-yajna, and the varieties of rites as referred to by the word yajna (sacrifice), Knowledge has been praised by the Lord in, 'Jnana-yajna (Knowledge considered as a sacrifice) is greater than sacrifices reiring materials' (33). And in the present context, this statement, 'the ladle is Brahman' etc., is capable of presenting Knowledge as a sacrifice; otherwise, since Brahman is everything, it will be purposeless to speak specially only of ladle etc. as Brahman. But those who maintain that one has to superimpose the idea of Brahman on the ladle etc., like superimposing the idea of Visnu and others on images etc. and of Brahman on name etc., for them the knowledge of Brahma stated (in the verse) cannot be the intended subject-matter dealt with here, because according to them ladle etc. are the (primary) objects of knowledge (in the context of the present verse). Besides, knowledge in the form of superimposition of an idea cannot lead to Liberation as its result; and what is said here is, 'Brahman alone in to be realized by him'. Also, it is inconsistent to maintain that the result of Liberation can be achieved without full realization. And it goes against the context-the context being of full realization. This is supported by the fact that (the subject of ) full realization is introduced in the verse, 'He who finds inaction in action,' and at the end (of this chapter) the conclusion pertains to that very subject-matter. The chapter comes to a close by eulozing full realization itself in, 'Jnana-yajna (Knowledge considered as a sacrifice) is greater than sacrifices reiring materials', 'Achieving Knowledge, one৷৷.attains supreme Peace,' (39) etc. That being so, it is unjustifiable to suddenly say out of context that one has to superimpose the idea of Brahman on the ladle etc. like the superimposition of the idea of Visnu on images. Therefore this verse bears the meaing just as it has been already explained. As to that, after having presented Knowledge as a sacrifice, other sacrifices also are being mentioned now in, the verses beginning with, '(Other yogis undertake) sacrifice to gods alone,' etc., for eulogizing that Knowledge:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.24।। यह एक प्रसिद्ध श्लोक है जिसको भारत में भोजन प्रारम्भ करने के पूर्व पढ़ा जाता है किन्तु अधिकांश लोग न तो इसका अर्थ जानते हैं और न जानने का प्रयत्न ही करते हैं। तथापि इसका अर्थ गंभीर है और इसमें सम्पूर्ण वेदान्त के सार को बता दिया गया है।वह अनन्त पारमार्थिक सत्य जो इस दृश्यमान नित्य परिवर्तनशील जगत् का अधिष्ठान है वेदान्त में ब्रह्म शब्द के द्वारा निर्देशित किया जाता है। यही ब्रह्म एक शरीर से परिच्छिन्नसा हुआ आत्मा कहलाता है। एक ही तत्त्व इन दो शब्दों से लक्षित किया है और वेदान्त केसरी की यह गर्जना है कि आत्मा ही ब्रह्म है।इस श्लोक में वैदिक यज्ञ का रूपक है। प्रत्येक यज्ञ में चार प्रमुख आवश्यक वस्तुएं होती हैं (1) यज्ञ का देवता जिसे आहुति दी जाती है (2) अग्नि (3) हवन के योग्य द्रव्य पदार्थ हवि (शाकल्य) और (4) यज्ञकर्ता व्यक्ति।यज्ञ भावना से कर्म करते हुए ज्ञानी पुरुष की मन की स्थिति एवं अनुभूति का वर्णन इस श्लोक में किया गया है। उसके अनुभव की दृष्टि से एक पारमार्थिक सत्य ही विद्यमान है न कि अविद्या से उत्पन्न नामरूपमय यह जगत्। अत वह जानता है कि सभी यज्ञों की उत्पत्ति ब्रह्म से ही होती है जिनमें देवता अग्नि हवि और यज्ञकर्ता सभी ब्रह्म हैं। जब एक तरंग दूसरी तरंग पर से उछलती हुई अन्य साथी तरंग से मिल जाती है तब इस दृश्य को देखते हुए हम जानते हैं कि ये सब तरंगे समुद्र के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। समुद्र में ही समुद्र का खेल चल रहा है।यदि कोई व्यक्ति जगत् के असंख्य नामरूपों कर्मों और व्यवहारों में अंतर्बाह्य व्याप्त अधिष्ठान स्वरूप परमार्थ तत्त्व को देख सकता है तो फिर उसे सर्वत्र सभी परिस्थितियों में वस्तुओं और प्राणियों का दर्शन अनन्त आनन्द स्वरूप सत्य का ही स्मरण कराता है। संत पुरुष ब्रह्म का ही आह्वान करके प्रत्येक कर्म करता है इसलिये उसके सब कर्म लीन हो जाते हैं।भोजन के पूर्व इस श्लोक के पाठ का प्रयोजन अब स्वत स्पष्ट हो जाता है। शरीर धारण के लिये भोजन आवश्यक है और तीव्र क्षुधा लगने पर किसी भी प्रकार का अन्न स्वादिष्ट लगता है। इस प्रार्थना का भाव यह है कि भोजन के समय भी हमें सत्य का विस्मरण नहीं होना चाहिए। यह ध्यान रहे कि भोक्तारूप ब्रह्म ब्रह्म का आह्वान करके अन्नरूप ब्रह्म की आहुति उदर में स्थित अग्निरूप ब्रह्म को ही दे रहा है। इस ज्ञान का निरन्तर स्मरण रहने पर मनुष्य भोगों से ऊपर उठकर अपने अनन्तस्वरूप को प्राप्त कर लेता है।यज्ञ की सर्वोच्च भावना को स्पष्ट करने के पश्चात् भगवान् अर्जुन को समझाते हैं कि सम्यक् भावना के होने से किस प्रकार प्रत्येक कर्म यज्ञ बन जाता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.24।।ननुनाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम् इत्यादिवचनेभ्यः कर्मफलस्यावश्यंभावित्वकथनात्। कस्मात्पुनः कारणात्क्रियमाणं कर्म स्वकार्यारम्भं बन्धनमकुर्वत्समग्रं प्रविलीयत इत्याशङ्क्य सर्वक्रियाकारकफलजातं द्वैतं ब्रह्मैव ब्रह्मविद इति हेतोस्तस्य समग्रं कर्म विनश्यतीत्याह। ब्रह्म अर्पणमित्यसमस्ते पदे। अर्प्यतेऽनेन हस्तादिना करणेनेत्यर्पणम्। करणं कारकम्। अर्प्यतेऽस्मिन्नित्यर्पणमधिकरणं देशकालादि। अर्प्यतेऽस्मै इत संप्रदानं देवतारुपं। भाष्यस्योपलक्षणार्थतयाऽविरोधः। तद्ब्रह्मैवेति बाधायां सामानाधिकरण्यं यश्चोरः स स्थाणुरितिवत्। एवमग्रेऽपि यद्धविर्बुद्य्धा गृह्यमाणं घृतादिकं त्यागप्रक्षेपक्रिययोः साक्षात्कर्मकारकं तदपि ब्रह्मैव तत्त्वविदः तथा ब्रह्माग्नाविति समस्तं पदम्। एतेन ब्रह्मणीति पदमध्याहर्तव्यमित्यपास्तम्। यस्मिन्हूयते सोऽग्निरधिकरणकारकमपि ब्रह्मैव। तथा येन यजमानेनाध्वर्युणा च त्यज्यते क्षिप्यते च तदुभयमपि कर्तृ कारकं ब्रह्मैवेत्यर्थः। यत्तेन हुतं हवनक्रियापि ब्रह्मैव। अत्रत्य एवकारः सर्वत्र संबध्यते। ब्रह्मपदं च काकाक्षिगोलकन्यायेनोभयत्र ब्रह्मैव कर्म तत्र समाधिर्यस्य सः। तेन गन्तव्यं फलमपि ब्रह्मैव। एवं लोकसंग्रहचिकीर्षुणापि क्रियमाणं कर्म परमार्थतोऽकर्म ब्रह्मबुद्य्धुपमर्दितत्वात् निवृत्तकर्मणोऽपि यतेः सभ्यग्दर्शिनः सम्यग्दर्शननस्तुत्यर्थं ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनं सुतरामुपपद्यते। यदर्पणादि यज्ञे प्रसिद्धं तदस्याध्यात्मं ब्रह्मैव अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वेऽर्पणादीनामेव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानमनर्थकं स्यात्। यत्तु यद्ब्रह्म तदर्पणादीति ब्रह्मैव खल्वर्पणादिना पञ्चविधेनकारकात्मनावस्थितं सत् तदेव कर्म करोति नात्रार्पणादिबुद्धिर्निवर्त्यते किंत्वर्पणादिषु प्रतिमादौ विष्णुबुद्धिरिव ब्रह्मबुद्धिराधीयत इति तदसत्। ज्ञानयज्ञस्तुत्यर्थत्वादस्य प्रकरणस्य। अत्र सम्यग्दर्शनं ज्ञानयज्ञशब्दप्रतिपादितम्। अनेकान्क्रियाविशेषान्यज्ञशब्दितानुपन्यस्यश्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः इति ज्ञानं स्तौतीति भाष्ये विस्तरः। एतेनकर्मण्यकर्म यः पश्येदि त्यारभ्यारुरुक्षुपरत्वेन दृश्यमानमपरेषां व्याख्यानमसंगतमिति ध्येयम्। यत्तु अथवार्प्यतेऽस्मै फलायेति व्युत्पत्त्यार्पणपदेन स्वर्गादिफलमपि ग्राह्यम्। तथाच ब्रह्मैवेत्याद्युत्तरार्धं ज्ञानफलकथनायैवेति समञ्जसम्। अस्मिन्पक्षे ब्रह्मकर्मसमाधिनेत्येकं वा पदम्। पूर्वं ब्रह्मपदं हुतमित्यनेन संबध्यते गन्तव्यमित्यनेनेति भिन्नं वा पदम्। एवंच नानुषङ्गद्वयक्लेश इति तच्चिन्त्यम्। श्रुतं गन्तव्यपदं विहाय क्लिष्टव्युत्पत्त्या तदानयनस्यान्याय्यत्वात्। ज्ञानप्रभावमुक्त्वाज्ञान लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छती ति ज्ञानयज्ञफलस्य वक्ष्यमाणत्वात्। भाष्ये तु ब्रह्मकयंसमाधिना ब्रह्मैव गन्तव्यमिति तेन गन्तव्यं फलमपि ब्रह्मैवेत्यस्यानुवादो ब्रह्मेत्यादिपदस्यान्वयप्रदर्शनार्थः नतु ब्रह्मैव गन्तव्यमिति पदद्वयानुषङ्गेण ज्ञानफलप्रदर्शनम्। एतेन पूर्वमित्यादि परास्तम्। काकाक्षिगोलकन्यायस्य पदर्शितत्वादिति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.24।।ननु क्रियमाणं कर्म फलमजनयित्वैव कुतो नश्यति ब्रह्मबोधे तत्कारणोच्छेदादित्याह अनेककारकसाध्या हि यज्ञादिक्रिया भवति। देवतोद्देशेन हि द्रव्यत्यागो यागः। स एव त्यज्यमानद्रव्यस्याग्नौ प्रक्षेपाद्धोम इत्युच्यते। तत्रोद्देश्या देवता संप्रदानम्। त्यज्यमानं द्रव्यं हविःशब्दवाच्यं साक्षाद्धात्वर्थकर्म। तत्फलं तु स्वर्गादिव्यवहितं भावनाकर्म। एवं धारकत्वेन हविषोऽग्नौ प्रक्षेपे साधकतमतया जुह्वादि करणं प्रकाशकतया मन्त्रादीति करणमपि कारकज्ञापकभेदेन द्विविधम्। एवं त्यागोऽग्नौ प्रक्षेपश्च द्वे क्रिये। तत्राद्यायां यजमानः कर्ता प्रक्षेपे तु यजमानपरिक्रीतोऽध्वर्युः प्रक्षेपाधिकरणं चाग्निः। एवं देशकालादिकमप्यधिकरणं सर्वक्रियासाधारणं द्रष्टव्यम्। तदेवं सर्वेषां क्रियाकारकादिव्यवहाराणां ब्रह्माज्ञानकल्पितानां रज्ज्वज्ञानकल्पितानां सर्पधारादण्डादीनां रज्जुतत्त्वज्ञानेनेव ब्रह्मतत्त्वज्ञानेन बाधे बाधितानुवृत्त्या क्रियाकारकादिव्यवहाराभासो दृश्यमानोऽपि दग्धपटन्यायेन न फलाय कल्पत इत्यनेन श्लोकेन प्रतिपाद्यते। ब्रह्मदृष्टिरेव च सर्वयज्ञात्मिकेति स्तूयते। तथाहि अर्प्यतेऽनेनेति करणव्युत्पत्त्याऽर्पणं जुह्वादि मन्त्रादि च। एवमर्प्यतेऽस्मा इति व्युत्पत्त्याऽर्पणं देवतारूपं संप्रदानम्। एवमर्प्यतेऽस्मिन्निति व्युत्पत्त्याऽर्पणमधिकरणं देशकालादि। तत्सर्वं ब्रह्मणि कल्पितत्वाद्ब्रह्मैव रज्जुकल्पितभुजङ्गवदधिष्ठानव्यतिरेकेणासदित्यर्थः। एवं हविस्त्यागप्रक्षेपक्रिययोः साक्षात्कर्म कारकं तदपि ब्रह्मैव। एंव यत्र प्रक्षिप्यतेऽग्नौ सोऽपि ब्रह्मैव। ब्रह्माग्नाविति समस्तं पदम्। तथा येन कर्त्रा यजमानेनाध्वर्युणा च त्यज्यते प्रक्षिप्यते च तदुभयमपि कर्तृकारकं कर्तरि विहितया तृतीययानूद्य ब्रह्मेति विधीयते ब्रह्मणेति। एवं हुतमिति हवनं त्यागग्रिया प्रक्षेपक्रिया च तदपि ब्रह्मैव। तथा तेन हवनेन यद्गन्तव्यं स्वर्गादिव्यवहितं कर्म तदपि ब्रह्मैव। अत्रत्य एवकारः सर्वत्र संबध्यते। हुतमित्यत्रापीतएव ब्रह्मेत्यनुषज्यते। व्यवधानाभावात् साकाङ्क्षत्वाच्चचित्पतिस्त्वा पुनातु इत्यादावच्छिद्रेणेत्यादिपरवाक्यशेषवत्। अनेन रूपेण कर्मणि समाधिर्ब्रह्मज्ञानं यस्य स कर्मसमाधिस्तेन ब्रह्मविदा कर्मानुष्ठात्रापि ब्रह्म परमानन्दाद्वयं गन्तव्यमित्यनुषज्यते। साकाङ्क्षत्वादव्यवधानाच्चया ते अग्ने रजाशया इत्यादौ तनूर्वर्षिष्ठेत्यादिपूर्ववाक्यशेषवत्। अथवाऽर्प्यतेऽस्मै फलायेति व्युत्पत्त्याऽर्पणपदेनैव स्वर्गादिफलमपि ग्राह्मम्। तथाचब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिने त्युत्तरार्धं ज्ञानफलकथनायैवेति समञ्जसम्। अस्मिन्पक्षे ब्रह्मकर्मसमाधिनेत्येकं वा पदम्। पूर्वं ब्रह्मपदं हुतमित्यनेन संबध्यते चरमं गन्तव्यपदेनेति भिन्नं वा पदम्। एवंच नानुषङ्गद्वयक्लेश इति द्रष्टव्यम्। ब्रह्म गन्तव्यमित्यभेदेनैव तत्प्राप्तिरुपचारात्। अतएव न स्वर्गादि तुच्छफलं तेन गन्तव्यं विद्यया आविद्यककारकव्यवहारोच्छेदात्। तदुक्तं वार्तिककृद्भिःकारकव्यवहारे हि शुद्धं वस्तु न वीक्ष्यते। शुद्धे वस्तुनि सिद्धे च कारकव्यापृतिः कुतः।। इति। अर्पणादिकारकस्वरूपानुपमर्देनैव तत्र नामादाविव ब्रह्मदृष्टिः क्षिप्यते संपन्मात्रेण फलविशेषायेति केषांचिद्व्याख्यानंभाष्यकृद्भिरेव निराकृतमुपक्रमादिविरोधाद्ब्रह्मविद्याप्रकरणे संपन्मात्रस्याप्रसक्तत्वादित्यादियुक्तिभिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.24।।कुतो विदुषां कर्माणि प्रविलीयन्त इत्याशङ्क्याह ब्रह्मार्पणमिति। यतस्ते विद्वांसः सविकल्पसमाधौ सर्वं जगत्प्रत्यक्चितिशक्तिनिर्मितं पश्यन्ति। तथा च श्रुतिःकिं कारणम् इत्युपक्रम्य कालः स्वभाव इति कालादीनि लोकदृष्ट्यानेकानि कारणान्युपक्षिप्य कारणं निर्णीयते ध्यानयोगानुगता अपश्यन्देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् इति समाधिना दर्शयति। तथा च समाधिना सर्वस्य ब्रह्मणि कल्पितत्वं पश्यतां तेषां यदर्पणमर्पणसाधनं मन्त्रजुह्वादि तत् ब्रह्मैव। एवशब्दः सर्वत्रानुषञ्जनीयः। यदर्पणीयं हविस्तदपि ब्रह्मैव। यत् हुतं हवनक्रिया हुतं तर्पितं देवब्राह्मणादि वा तदपि ब्रह्मैव। यदग्नौ हुतं तदपि ब्रह्मण्येव हुतम्। अत्र ब्रह्मणीति पदमध्याहर्तव्यम्। यद्यजमानेन हुतं तद्ब्रह्मणैव हुतम्। यत्तेन कर्मणा गन्तव्यं प्राप्तव्यं फलं तदपि ब्रह्मैव। किं बहुना यत्किंचित्तस्य कर्म शयनासनादिकं तत्सर्वं ब्रह्मैव। तत्र कारणं समाधिना समाधिजेनात्मसाक्षात्कारेण। यतः सर्वमस्य ब्रह्मात्मकं ब्रह्म च प्रत्यगनन्यत अतः प्रदेयस्य फलस्याभावात् कर्माणि प्रविलीन्यन्ते दाह्याभावाद्दहन इवेति भावः। यत्तु कर्मणि तदङ्गेषु च नामादिष्विव ब्रह्मदृष्टिरत्र विधीयत इति व्याख्यानं तदुपक्रमादिविरोधाद्ब्रह्मविद्यायाः प्रकृतत्वाच्चासंगतमिति भाष्ये एव निरस्तम्। या हि ब्रह्मविदां कर्माङ्गेषु तात्विकी ब्रह्मदृष्टिः कीर्तिता सा स्थितप्रज्ञलक्षणवदब्रह्मविदामनुष्ठानायैव फलतो भवतीति न तत्र तस्यास्तात्पर्यं वर्णनीयमिति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.24।।ननु ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्नोति (ब्रह्माप्येति) बृ.उ.4।4।6तै.आ.2।2नृ.उ.उ.5 सर्वं खल्विदं ब्रह्म छा.उ.3।14।1 इति ब्रह्मात्मकत्वं सर्वस्याह। कस्य कर्मणो ब्रह्मात्मकत्वमाह ब्रह्मार्पणमिति। अर्पणम् अर्प्यते हूयतेऽनेन तदर्पणं सामग्रीस्रुक्स्रुवादिकं ब्रह्म हविः घृतादिकं ब्रह्म ब्रह्माग्नौ ब्रह्मात्मकोऽग्निस्तस्मिन् ब्रह्मणा कर्त्रा हुतम्। एवं प्रकारेण कर्म ब्रह्म अतः समाधिना समाध्यवस्थया तेन ब्रह्मात्मकेन कर्मणा ब्रह्मैव गन्तव्यं प्राप्तव्यम्। अतो ब्रह्मात्मकत्वात्तत्र लीयत इत्यर्थः। अत एव श्रुतिरपि सर्वं खल्विदं ब्रह्म इति ब्रह्मात्मकत्वं सर्वस्याह।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.24।।तदेवं परमेश्व राराधनलक्षणं कर्म ज्ञानहेतुत्वेन बन्धकत्वाभावादकर्मैव। आरूढावस्थायां त्वकर्त्रात्मज्ञानेन बाधितत्वात्स्वाभाविकमपि कर्माकर्मैवेतिकर्मण्यकर्म यः पश्येत् इत्यनेनोक्तः कर्मप्रविलयः प्रपञ्चितः। इदानीं कर्मणि तदङ्गेषु च ब्रह्मैवानुस्यूतं पश्यतः कर्मप्रविलयमाह ब्रह्मार्पणमिति। अर्प्यतेऽनेनेत्यर्पणं स्रुवादि तदपि ब्रह्मैव। अर्प्यमाणं हविरपि घृतादिकं ब्रह्मैव। ब्रह्मैवाग्निस्तस्मिन्ब्रह्मणा कर्त्रा च हुतं ब्रह्मैव। होमः अग्निश्च कर्ता च क्रिया च ब्रह्मैवेत्यर्थः। एवं ब्रह्मण्येव कर्मात्मके समाधिश्चित्तैकाग्र्यं यस्य तेन ब्रह्मैव गन्तव्यं प्राप्यं नतु फलान्तरमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.24।।प्रविलयस्वरूपमाह ब्रह्मार्पणमिति। भावाद्वैतं क्रियाद्वैतं द्रव्याद्वैतं उच्यते भगवता स्वमुखेन अग्निहोत्रं तथा दर्शपूर्णमासः पशुस्तथा। चातुर्मास्यानि सोमश्च क्रमात्प़ञ्चात्मको हरिः। तत्साधनं च स हरिः प्रयाजादिस्रुगादि यत्। प्राकृतं रूपमेतद्धि नित्यं काम्यं तु वैकृतम्। ज्ञानिनस्तदभिव्यक्तौ कर्तुर्मोक्षः क्रमाद्भवेत् इति निबन्धोक्तेः। तथाहि ज्ञानिनः सर्वं कर्म ब्रह्मार्पणं भवति। अर्पणं स्रुगादि ब्रह्म भवति हविर्ब्रह्म ब्रह्मणि अग्नौ ब्रह्मणा कर्त्रा हुतं ब्रह्मैव यज्ञस्तत्र फलं ब्रह्मैव प्राप्तव्यम्। केन ब्रह्मैव कर्म तत्समाधिनेति। प्रकृतिनिविष्टं सच्चिदानन्दकं पुरुषाभिधं ब्रह्मैव यद्यप्यप्राकृतं सर्वं भवति तथापि न जानात्यज्ञस्तत् विज्ञस्तु तदिदं ज्ञानयज्ञेन ब्रह्मोपासीताभेदभावात्। ननु ब्रह्मात्मैक्यस्य भेदात्यन्ताभावरूपत्वात् अंशत्वात् त्यागो भगवन्नियम्यत्वं च कथं इति चेत् उच्यते ब्रह्मात्मैक्येऽप्यभेदोऽस्य किं भेदसहनक्षमः। किंवा तदक्षमः श्रुत्या सिद्ध्यत्येतद्विचार्यते।अत्र केचिदाहुः तदक्षम इति। स्वमते तु भेदसहनक्षम एव। कुतः सत्कार्यवादस्यैव श्रौतत्वेन सृष्टिपूर्वदशायामपि सर्वसत्त्वात्। तथाहि सदेव सोम्येदमग्र आसीत् छा.उ.6।2।1 इति श्रुताविदमापुरोवर्त्तिनं प्रपञ्चं निर्दिश्य पूर्वकाले तस्य सद्रूपतामुक्त्वा ततो ब्रह्मरूपत्वं जगत्कारणत्वं च बोधयित्वा तस्माद्वितीयत्वं वक्ति। ततः तद्धैक आहुः छा.उ.6।2।1 इत्यादिनाऽसत्कार्यवादमाशङ्क्य कुतस्तु खलु सौम्यैवं स्यात् छां0उ06।2।2 इत्यादिना तन्निषेधति। एवं सति आकारकार्यत्वप्रभृतयो धर्मा यदि ब्रह्मणि पूर्वं न स्युस्तदाऽसत्कार्यवादनिरासिका सत्कार्यबोधिका च श्रुतिः पीड्येत। अत उभयसामञ्जस्यार्थं तत्तद्धर्मादिविशिष्टमेकमेव ब्रह्म कारणमिति मन्तव्यम्। तता सति यथेदानीं कार्याणां तत्तदाकाराणां च परस्परं भेदः कारणेन सह चाभेदः कार्यत्वादिरूपेण भेदश्च लोके कटककुण्डलसुवर्णप्रभृतीनां दृश्यते तथा ब्रह्मजगतोरपीति मन्तव्यः।एवंमंशांशिनोर्जीवब्रह्मणोरपि सुवर्णखण्डसुवर्णयोरिव सृष्टिप्राकट्याविर्भावतिरोभावाभ्यामेव तदुपपत्तिः अन्यथाऽव्याकृतश्रुतिविरोधापत्तिः। पुरुषविधब्राह्मणे हि सृष्टिमुक्त्वाऽग्रे तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत्तन्नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौ नामाऽयमिति इद ँ् रूप इति (नामाऽयमिद ँ् रूप इति) तदिदमप्येतर्हि नामरूपाभ्यामेव व्याक्रियतेऽसौ नामाऽयमिद ँ् रूप इति बृ.उ.1।4।7 इति। अत्र नामरूपत्र्याकरणे लौकिकमेवोदाहरणं तत्साधनायाह। लोके च सिद्धमेव वस्तु नामरूपाभ्यां व्याक्रियते इति सृष्टिपूर्वदशायामपि तस्य सिद्धत्वमेव व्यक्तीभवतीति नासत्कार्यवादः प्रामाणिकः। भागवते तृतीयस्कन्धे 10।1213 चविश्वं वै ब्रह्म तन्मात्रं संस्थितं विष्णुमायया। ईश्वरेण परिच्छिन्नं कालेनाव्यक्तमूर्तिना। यथेदानीं तथाऽग्रे च पश्चादप्येतदीदृशम् इति कालत्रये एकरूपामेव सर्वस्य स्थितिमाह। इदमेवाविरोधाध्यायेऽसद्व्यपदेशाधिकरणे व्यासचरणैरपि व्युत्पादितम्। असद्वा इदमग्र आसीत् तै.उ.2।7 इति श्रुतौ सृष्टिपूर्वदशायां यो जगतोऽसत्त्वेन व्यपदेशः सोऽव्याकृतत्वेन धर्मान्तरेण विद्यमानत्वेऽपि व्याकृतत्वेनाविद्यमानत्वात् तदात्मानं स्वयमकुरुत तै.उ.2।7 इति वाक्यशेषेण तथाऽवगमात्इदं इति प्रयोगात्आसीत् इति प्रयोगाच्च अन्यथा तद्विरोधापत्तेः नित्यस्य समवायस्य सम्बन्धस्य द्विनिष्ठत्वेन कार्याभावे तदभावापत्तेः तन्नित्यताहानेश्च। असम्बद्धोत्पत्तौ जगद्दृष्टान्तेन घटपटादीनामपि कार्याणां नियतावधिकत्वहानेश्च।न च यत्र यत्प्रागभावस्तदेव कार्यं ततः करणादुत्पद्यत इति नियमात् न नियतावधिकत्वभङ्ग इति वाच्यम् कारणावस्थातिरिक्तस्य प्रागभावस्यैवं वक्तुमशक्यत्वात् कपालावस्थां पश्यत् एवेह कपाले घटो भविष्यतीति प्रत्ययेन तथा निश्चयात् तदवस्थाव्यङ्ग्यस्य तदतिरिक्तस्य प्रागभावस्यैवाङ्गीकारे गौरवाच्च। न च उत्पत्तेः पूर्वं कार्यस्य सत्त्वे कर्तृव्यापारबाधप्रसक्तिरिति शङ्क्यम् कार्याभिव्यञ्जनार्थतया सार्थक्यात् तथा ब्रह्मवाक्याच्च। संवेष्टितपटप्रसारणादौ तथा निश्चयात्। न चैवमनुद्भूतसत्ताङ्गीकारेऽदृश्यप्रेतादिजनितदुःखवत् ततः क्वचिदर्थक्रियापत्तिरिति शङ्क्यम् अनुद्भूतगन्धरूपादौ व्यभिचारात्। योगेनाकुञ्चनप्राणायामादिनियमने जीवनमात्रस्य नियमनत्यागे आकुञ्चनप्रसारणादिरूपकार्यस्य च दर्शनेन तथा निश्चयादिति।एवं स्थिते सत्कार्यवादे सृष्टिपूर्वदशायामपि जगज्जीवयोः सत्त्वात् एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म छां.उ.6।2।12 इत्याद्युक्तोऽभेदः तद्भिन्नतया जगज्जीवप्रतीत्यभावे पर्यवस्यन् भेदसहनक्षममेवाभेदं साधयतीति सृष्टिदशायां जगद्ब्रह्मणोः कार्यकारणभावात् जगज्जीवयोरंशांशिभावाच्च औपचारिको भवन्नपि न वास्तवं तमभेदं निहन्ति। तेनेदानीमपि भेदसहिष्णुरेवाभेदः। एवं सति नानात्वदर्शनभेददर्शनयोः भेदनिन्दाश्रवणमप्यभेदविरुद्धभेददर्शन एव पर्यवस्यतीति बोध्यम्। (यदा ह्येवैष) य एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते तै.उ.2।7 इति श्रुतौकुरुते इतिपदेन क्रियारब्धस्य एव भेदनिन्दनात् आरम्भस्य च असतः सत्तायामेव पर्यवसानात् अभेदविरुद्ध एव क्रियमाणे भेद एव पर्यवस्यतीत्यभेदाविरुद्धभेददर्शने तु न निन्द्यत्वलेशोऽपीति बोध्यम्। एवं च परममुक्तिदशायामपि यथोदकं शुद्धे निषिक्तं (शुद्धमासिक्त) तादृगेव भवति एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम इति काठकश्रुत्या 4।15 आत्मनो ब्रह्मसाम्यश्रवणात् भिन्नप्रतीत्यभावस्वरूप एवाभेदः न तु भेदाभावस्वरूप इति सिध्यति। अत एव मैत्रेयीब्राह्मणे यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं पश्येत् बृ.उ.4।5।15 इत्यादिना यदितरज्ञानश्रवणं तदपि द्वैतदृष्टिनिवृत्तावेव पर्यवस्यति न तु द्वैताभावे। एतदग्रे द्वैतीयकमैत्रेयीब्राह्मणे यद्वैतन्न पश्यति पश्यन् वै तत् (द्रष्टत्वं) न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो भवति (विद्यते) अविनाशित्वात् न तु तद्वितीयमस्ति (ततोऽन्यद्वितीयमस्ति) ततोऽन्यद्विभक्तं (यत्) पश्येत् बृ.उ.4।3।23 इत्यादिभिरन्यादर्शने पश्यत एव अदर्शनस्य द्वितीयत्वाभावस्य विभागभावस्य अन्यत्वाभावस्य च हेतुतया श्रावणेन तथा निश्चयात्। अग्रे च यत्र वाऽन्यदिव स्यात् बृ.उ.4।3।31 इत्यादिना वैलक्षण्यहेतुकमन्यदर्शनमनूद्य यत्र त्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन৷৷. बृ.उ.4।5।15 इत्यादिना स्वस्य द्रष्टृविभागेन विज्ञातृविज्ञाने तं केन विजानीयात् सैवश्रु. इति अनेन ज्ञानकरणाभावं हेतुत्वेन वक्ति इत्यतोऽपि तथा निश्चयात्। अन्यथा पूर्वब्राह्मण एव मैत्रेयीमोहनिवृत्त्या पुनर्द्वितीयं ब्राह्मणं न वदेत्। अतस्तत्र यः सन्दिग्धोऽर्थः तन्निश्चायनार्थमेव द्वितीयं ब्राह्मणमिति भेददर्शनाभावरूप एव अभेदः न तु भेदाभावरूप इति भेदसहिष्णुरेवाभेदः।यत्तु बहु स्यां छां.उ.6।2।3 इति श्रुतौ सृष्ट्यारम्भे एकस्य बहुत्वश्रावणात् पूर्व जगदाद्यभाव एव श्रुत्यभिमतःन तु कार्यस्यापि सत्त्वम्। तथा सति इदं सर्वमसृजत् बृ.उ.1।2।5 इति श्रुतिविरोधः अतः सृष्टितः पूर्वमसत्त्वादभेदविरोध्येव स इत्यर्द्धवैनाशिकमतमेव साधीय इति तन्मन्दम् तद्धैक आहुरसदेवेदमग्र आसीत् छा.उ.6।2।1 इत्याद्यनूद्य कुतः खलु (सोम्यैमाः प्रजाः) सोम्यैवं स्यात् छां.उ.6।2।2 इति श्रुत्यैव तन्निषेधात्। न च तत्र कारणसत्ताया एव निषेधः न तु कार्यसत्तायाः कथमसतः सज्जायेत इति श्रुत्या तथा निश्चयादिति वाच्यम् पूर्वं कार्यस्यासत्त्वे तद्धेदं तर्ह्यव्याकृतमासीत् बृ.उ.1।4।7 इति श्रुतिविरोधापत्तेः। अत्रतर्हि इत्यनेन सृष्टिपूर्वकालं लक्षीकृत्य इदमानिर्दिष्टस्य जगतस्तदानीमव्याकृतत्वमपि नानुवदेत् स्वरूपस्यैवाभावात्। अतः बहु स्यां छा.उ.6।2।3 इत्यत्रापि बहुत्वादेरव्याकृतत्वमेवोच्यते सतः न त्वसतः सत्ता सृजनमपि नामरूपव्याकरणमेव अन्यथा प्रागिव सृष्टिदशायामपि व्यवहाराभावप्रसङ्गात्।एवं सिद्धे सर्वदासत्वेऽद्वैतश्रुतिविरोधाय तदानीमपि परापरभावघटित एव ब्रह्मत्वेनैव रूपेणाविरोध इदानीमि वेति मन्तव्यम्। एतावान् परं विशेषः यदिदानीमविद्यावलिप्ताल्पबुद्धित्त्वान्न प्रतीयते तदानीं तु करणग्रामलयादिति। एवं च परममुक्तावपि परापरभावघटितो भेदसहनक्षम एवाभेदः ब्रह्मरूपस्यैव तथात्वात्। अत एव दशमस्कन्धे 85।23 भागवते यत्र भगवता श्रीवसुदेवं प्रति अखण्डब्रह्मज्ञानोपदेशः कृतस्तत्र वसुदेवोक्तमङ्गीकृत्य अहं यूयमसावार्यः इत्यनेन सर्वेषां तथात्वमुक्त्वा ब्रह्माण्डानन्त्यमारोपितज्ञानदृष्टिं च निवारयितुं आत्मा ह्येकः स्वयञ्ज्योतिः भाग.10।85।24 इत्यनेन सर्वत्रात्मैक्यनानात्वदृष्टेश्चौपाधिकत्वेन भ्रान्तत्वं निरूप्य खं वायुर्ज्योतिरापो भूः इति द्वितीये (श्लोके 26) स्वादिपञ्चमहाभूतदृष्टान्तेन नानात्वस्य वास्तवत्वमुपाधिव्यङ्ग्यत्वं च वदति अन्यथा पूर्वश्लोक एव नानात्वदृष्टेर्गुणोपाधिकत्वेन भ्रान्तत्वे बोधिते तत एव नानात्वस्य निवृत्तत्वात् खादिपञ्चमहाभूतदृष्टान्तेन पुनर्नानात्वप्राप्तिं न स्थापयेत्। अतोऽखण्डब्रह्मवादेऽप्यंशादिनानात्वस्य विद्यमानत्वात् परापरभावादिभेदसहिष्णुरेवाभेदो भगवदभिमतो भातीति बोध्यम्।किञ्च इदं सर्वं यदयमात्मा बृ.उ.2।4।64।5।7 इत्यन्तेन सर्वस्य ब्रह्मत्वे बोधिते कथं सर्वस्य ब्रह्मत्वं इत्याकाङ्क्षायां दुन्दुभ्यादिदृष्टान्तैरवान्तरसर्वग्रहणं दुन्दुभ्यादिशब्दग्रहणेनैव अवान्तरसर्वशब्दग्रहणवत् आत्मग्रहणेनैव तदभिन्नावान्तरसर्वग्रहणम्। अग्निधूमदृष्टान्तेन ब्रह्मणः सकाशाद्वैदादिसर्वोत्पत्तिं चोक्त्वा स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायनं बृ.उ.2।4।11 इत्यादिभिर्बहुदृष्टान्तैः सर्वाधारत्वं निरूपयति। यदि सृष्ट्यभावदशायां सर्वस्यैकरूप्यमेव स्यात् तदा दुन्दुभिशब्दादीन् समुद्रादींश्च नानादृष्टान्तान्न वदेत् दुन्दुभिशब्ददृष्टान्तेन सर्वस्य ब्रह्मरूपतया एकेनैव समुद्रदृष्टान्तेन ब्रह्मणः सर्वाधारत्वस्य च सिद्धेः। अतः सृष्ट्यभावदशायामपि नानात्वाविरुद्धमेव स्वरूपैक्यं एवं वाऽरे (अयमात्मा) इदं महद्भूतं बृ.उ.2।4।12 इत्यादिना प्रेत्यसंज्ञाभावकथनेन पूर्वसंज्ञानस्यैव बोधनात्। तच्च ज्ञानं भेदाविरुद्धसम्पदात्मकमभेदमेव बोधयतीति प्रागुपपादितं अतो न कोऽपि संशयः। एवं सति तद्गुणसारत्वात्तद्व्यपदेश इत्यत्र ब्रह्मांशे जीवे ब्रह्मत्वव्यपदेश औपचारिकः स च मुक्तावपि तुल्यः पूर्वोक्तसत्कारणतावादसिद्धस्य भेदस्यानपायादिति। एवं प्रलयदशायां जडस्यापि बोध्यम्। एवं ब्रह्मणो निरंशत्वेऽपि सांशत्वं विरुद्धधर्माश्रयत्वादुपपन्नं एवं जगतो हविरादेश्च प्रकृतस्य ब्रह्मत्वं भावनीयं तथात्वेऽपि कार्यत्वमपीति सर्वं सुस्थम्। अयमेव भावाद्वैतपदार्थः कार्यकारणवस्त्वैक्यमर्शनं पटतन्तुवदिति निरूपितम्। अक्षरार्थस्तु भावमात्रस्य जगत्कारणेन सहैक्यमर्शनं पटतन्तुवदिति।यद्यपि नैकविधं जगत्तथापि भगवत ईश्वरादुद्भूतं न ततोऽतिरिच्यते तद्योगमायात एव तत्सच्चिदान्दांशप्रपञ्चरूपं सर्वं तत्त्वतः परिणतम् यथोक्तं तात्त्विकोऽन्यथाभावः परिणामः अतात्त्विकोऽन्यथाभावोविवर्तः इति। कार्यं न विवर्त्तात्मकं भूमितो घटपटादिकमिव वस्तुतः पार्थिवं न ततोऽतिरिच्यते प्रलयेऽव्याकृततया तदभिन्नरूपतावगमात्। एवमत्रापि कार्यदशायां सर्वं न ततोऽतिरिक्तं भाव्यम्। यद्यपि साङ्ख्ये कारणत्वं प्रकृतेरिति प्राकृतमेव घटादिजगदित्युक्तं तथाप्यत्र जगतः प्राकृतत्वमस्तु इत्यतो मतान्तरेऽभ्युपेताया अपि प्रकृतेः स्वमते तदंशत्वात् कारणत्वमेव न मुख्यकारणमिति सङ्क्षेपः। तदिदमनेकविधब्रह्मोपासनायामभेदभावनायां भगवतः सच्चिदानन्दांशप्रपञ्चभूतं कार्यं कारणानन्यत्वेन भातंब्रह्मवादिनां ज्ञानिनां ब्रह्मयज्ञ एवेति निरूपितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.24।।किये जानेवाले कर्म अपना कार्य आरम्भ किये बिना ही ( कुछ फल दिये बिना ही ) किस कारणसे फलसहित विलीन हो जाते हैं इसपर कहते हैं ब्रह्मवेत्ता पुरुष जिस साधनद्वारा अग्निमें हवि अर्पण करता है उस साधनको ब्रह्मरूप ही देखा करता है अर्थात् आत्माके सिवा उसका अभाव देखता है। जैसे ( सीपको जाननेवाला ) सीपमें चाँदीका अभाव देखता है ब्रह्म ही अर्पण है इस पदसे भी वही बात कही जाती है। अर्थात् जैसे यह समझता है कि जो चाँदीके रूपमें दीख रही है वह सीप ही है। ( वैसे ही ब्रह्मवेत्ता भी समझता है कि जो अर्पण दीखता है वह ब्रह्म ही है ) ब्रह्म और अर्पण यह दोनों पद अलगअलग हैं। अभिप्राय यह कि संसारमें जो अर्पण माने जाते हैं वे स्रुक् स्रुव आदि सब पदार्थ उस ब्रह्मवेत्ताकी दृष्टिमें ब्रह्म ही हैं। वैसे ही जो वस्तु हविरूपसे मानी जाती है वह भी उसकी दृष्टिमें ब्रह्म ही होता है। ब्रह्माग्नौ यह पद समासयुक्त है। इसलिये यह अर्थ हुआ कि ब्रह्मरूप कर्ताद्वारा जिसमें हवन किया जाता है वह अग्नि भी ब्रह्म ही है और वह कर्ता भी ब्रह्म ही है और जो उसके द्वारा हवनरूप क्रिया की जाती है वह भी ब्रह्म ही है। उस ब्रह्मकर्ममें स्थित हुए पुरुषद्वारा प्राप्त करनेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है। अर्थात् ब्रह्मरूप कर्ममें जिसके चित्तका समाधान हो चुका है उस पुरुषद्वारा प्राप्त किये जानेयोग्य जो फल है वह भी ब्रह्म ही है। इस प्रकार लोकसंग्रह करना चाहनेवाले पुरुषद्वारा किये हुए कर्म भी ब्रह्मबुद्धिसे बाधित होनेके कारण अर्थात् फल उत्पन्न करनेकी शक्तिसे रहित कर दिये जानेके कारण वास्तवमें अकर्म ही हैं। ऐसा अर्थ मान लेनेपर कर्मोंको छोड़ देनेवाले कर्म संन्यासीके ज्ञानको भी यथार्थ ज्ञानकी स्तुतिके लिये यज्ञरूप समझना भली प्रकार बन सकता है अधियज्ञमें जो स्रुवादि वस्तुएँ प्रसिद्ध हैं वे सब इस यथार्थ ज्ञानी संन्यासीके ( सम्यक्ज्ञानरूप ) अध्यात्मयज्ञमें ब्रह्म ही हैं। उपर्युक्त अर्थ नहीं माननेसे वास्तवमें सब ही ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल स्रुव आदिको ही विशेषतासे ब्रह्मरूप बतलाना व्यर्थ होगा। सुतरां यह सब कुछ ब्रह्म ही है इस प्रकार समझनेवाले ज्ञानीके लिये वास्तवमें सब कर्मोंका अभाव ही हो जाता है। तथा उसके अन्तःकरणमें ( क्रिया फल आदि ) कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिका अभाव होनेके कारण भी यही सिद्ध होता है क्योंकि कोई भी यज्ञ नामक कर्म कारकसम्बन्धी भेदबुद्धिसे रहित नहीं देखा गया। अभिप्राय यह है कि अग्निहोत्रादि सभी कर्म ( इन्द्राय वरुणाय आदि ) शब्दोंद्वारा हवि आदि द्रव्य जिनके अर्पण किये जाते हैं उन देवताविशेषरूप सम्प्रदान आदि कारकबुद्धिवाले तथा कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे युक्त देखे गये हैं। जिसमेंसे क्रिया कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी हो तथा जो कर्तापनके अभिमानसे और फलकी इच्छासे रहित हो ऐसा यज्ञ नहीं देखा गया। परंतु यह उपर्युक्त कर्म तो ऐसा है कि जिसमें सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेके कारण अर्पणादि कारक क्रिया और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है। इसलिये यह अकर्म ही है। यही बात कर्मण्यकर्म यः पश्येत् कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः गुणा गुणेषु वर्तन्ते नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् इत्यादि श्लोकोंद्वारा भी दिखलायी गयी है। और इसी प्रकार दिखलाते हुए भगवान् जगहजगह क्रिया कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धिका निषेध कर रहे हैं। देखा भी गया है कि सकाम अग्निहोत्रादिमें कामना न रहनेपर वे सकाम अग्निहोत्रादि नहीं रहते। ( उनकी सकामता नष्ट हो जाती है। ) तथा यह भी देखा गया है कि जानबूझकर किये हुए और अनजानमें किये हुए कर्म भिन्नभिन्न कार्योंके आरम्भक होते हैं अर्थात् उनका फल अलगअलग होता है। वैसे ही यहाँ भी जिस पुरुषकी सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि हो जानेसे ( स्रुव हवि आदिमें ) क्रिया कारक और फलसम्बन्धी भेदबुद्धि नष्ट हो गयी है उस ज्ञानी पुरुषके बाह्य चेष्टामात्रसे होनेवाले कर्म भी अकर्म हो जाते हैं। इसलिये कहा है कि उसके फलसहित कर्म विलीन हो जाते हैं। इस विषयमें कोईकोई टीकाकार कहते हैं कि जो ब्रह्म है वही स्रुव आदि है अर्थात् ब्रह्म ही स्रुव आदि पाँच प्रकारके कारकोंके रूपमें स्थित है और वही कर्म किया करता है ( उनके सिद्धान्तानुसार ) उपर्युक्त यज्ञमें स्रुव आदि बुद्धि निवृत्त नहीं की जाती किंतु स्रुव आदिमें ब्रह्मबुद्धि स्थापित की जाती है जैसे कि मूर्ति आदिमें विष्णु आदि देवबुद्धि या नाम आदिमें ब्रह्मबुद्धि की जाती है। ठीक है यदि यह प्रकरण ज्ञानयज्ञकी स्तुतिके लिये न होता तो यह अर्थ भी हो सकता था। परंतु इस प्रकरणमें तो यज्ञ नामसे कहे जानेवाले अलगअलग बहुतसे क्रियाभेदोंको कहकर फिर द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ कल्याणकर है इस कथनद्वारा ज्ञानयज्ञ शब्दसे कथित सम्यक् दर्शनकी स्तुति करते हैं। तथा इस प्रकरणमें जो ब्रह्मार्पणम् इत्यादि वचन है यह ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करनेमें समर्थ भी है नहीं तो वास्तवमें सब कुछ ब्रह्मरूप होनेके कारण केवल अर्पण ( स्रुव ) आदिको ही अलग करके ब्रह्मरूपसे विधान करना व्यर्थ होगा। जो ऐसा कहते हैं कि यहाँ मूर्तिमें विष्णु आदिकी दृष्टिके सदृश या नामादिमें ब्रह्मबुद्धिकी भाँति अर्पण ( स्रुव ) आदि यज्ञकी सामग्रीमें ब्रह्मबुद्धि स्थापन करायी गयी है उनकी दृष्टिसे सम्भवतः इस प्रकरणमें ब्रह्मविद्या नहीं कही गयी है क्योंकि ( उनके मतानुसार ) ज्ञानका विषय स्रुव आदि यज्ञकी सामग्री ही है ब्रह्म नहीं। इस प्रकार केवल ब्रह्मदृष्टि सम्पादनरूप ज्ञानसे मोक्षरूप फल नहीं मिल सकता और यहाँ ( स्पष्ट ही ) यह कहा है कि उसके द्वारा प्राप्त

Chapter 4 (Part 17)

किया जानेवाला फल ब्रह्म ही है फिर बिना यथार्थ ज्ञानके मोक्षरूप फल मिलता है यह कहना सर्वथा विपरीत है। इसके सिवा ( ऐसा मान लेनेसे ) प्रकरणमें भी विरोध आता है। अभिप्राय यह है कि जो कर्ममें अकर्म देखता है इस प्रकार यहाँ आरम्भमें सम्यक् ज्ञानका ही प्रकरण है तथा उसीमें उपसंहार होनेके कारण अन्तमें भी यथार्थ ज्ञानका ही प्रकरण है। क्योंकि द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है ज्ञानको पाकर परम शान्तिको तुरंत ही प्राप्त हो जाता है इत्यादि वचनोंसे यथार्थ ज्ञानकी स्तुति करते हुए ही यह अध्याय समाप्त हुआ है। फिर बिना प्रकरण अकस्मात् मूर्तिमें विष्णुदृष्टिकी भाँति स्रुव आदिमें ब्रह्मदृष्टिका विधान बतलाना उपयुक्त नहीं। सुतरां जिस प्रकार इसकी व्याख्या की गयी है इस श्लोकका अर्थ वैसा ही है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.24।। व्याख्या   यज्ञमें आहुति मुख्य होती है। वह आहुति तब पूर्ण होती है जब वह अग्निरूप ही हो जाय अर्थात् हव्य पदार्थकी अग्निसे अलग सत्ता ही न रहे। इसी प्रकार जितने भी साधन हैं सब साध्यरूप हो जायँ तभी वे यज्ञ होते हैं।जितने भी यज्ञ हैं उनमें परमात्मतत्त्वका अनुभव करना भावना नहीं है प्रत्युत वास्तविकता है। भावना तोपदार्थोंकी है।इस चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकतक जिन यज्ञोंका वर्णन किया गया है वे सब कर्मयोग के अन्तर्गत हैं। कारण कि भगवान्ने इस प्रकरणके उपक्रममें भी तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् (4। 16) ऐसा कहा है और उपसंहारमें भी कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे (4। 32) ऐसा कहा है तथा बीचमें भी कहा है यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते (4। 23)। मुख्य बात यह है कि यज्ञकर्ताके सभी कर्म अकर्म हो जायँ। यज्ञ केवल यज्ञपरम्पराकी रक्षाके लिये किये जायँ तो सबकेसब कर्म अकर्म हो जाते हैं। अतः इन सब यज्ञोंमें कर्ममें अकर्म का ही वर्णन है।ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः जिस पात्रसे अग्निमें आहुति दी जाती है उस स्रुक् स्रुवा आदिको यहाँ अर्पणम् पदसे कहा गया है अर्प्यते अनेन इति अर्पणम्। उस अर्पणको ब्रह्म ही माने।तिल जौ घी आदि जिन पदार्थोंका हवन किया जाता है उन हव्य पदार्थोंको भी ब्रह्म ही माने।ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम् आहुति देनेवाला भी ब्रह्म ही है (गीता 13। 2) जिसमें आहुति दी जा रही है वह अग्नि भी ब्रह्म ही है और आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म ही है ऐसा माने।ब्रह्मकर्मसमाधिना जैसे हवन करनेवाला पुरुष स्रुवा हवि अग्नि आदि सबको ब्रह्मका ही स्वरूप मानता है ऐसे ही जो प्रत्येक कर्ममें कर्ता करण कर्म और पदार्थ सबको ब्रह्मरूप ही अनुभव करता है उस पुरुषकी ब्रह्ममें ही कर्मसमाधि होती है अर्थात् उसकी सम्पूर्ण कर्मोंमें ब्रह्मबुद्धि होती है। उसके लिये सम्पूर्ण कर्म ब्रह्मरूप ही बन जाते हैं। ब्रह्मके सिवाय कर्मोंका अपना कोई अलग स्वरूप रहता ही नहीं।ब्रह्मैव तेन गन्तव्यम् ब्रह्ममें ही कर्मसमाधि होनेसे जिसके सम्पूर्ण कर्म ब्रह्मरूप ही बन गये हैं उसे फलके रूपमें निःसन्देह ब्रह्मकी ही प्राप्ति होती है। कारण कि उसकी दृष्टिमें ब्रह्मके सिवाय और किसीकी स्वतन्त्र सत्ता रहती ही नहीं।इस (चौबीसवें) श्लोकको शिष्टजन भोजनके समय बोलते हैं जिससे भोजनरूप कर्म भी यज्ञ बन जाय। भोजनरूप कर्ममें ब्रह्मबुद्धि इस प्रकार की जाती है (1) जिससे अर्पण किया जाता है वह हाथ भी ब्रह्मरूप है सर्वतः पाणिपादं तत् (गीता 13। 13)।(2) भोजनके पदार्थ भी ब्रह्मरूप हैं अहमेवाज्यम् (गीता 9। 16)।(3) भोजन करनेवाला भी ब्रह्मरूप है ममैवांशो जीवलोके (गीता 15। 7)।(4) जठराग्नि भी ब्रह्मरूप है अहं वैश्वानरः (गीता 15। 14)।(5) भोजन करनारूप क्रिया अर्थात् जठराग्निमें अन्नकी आहुति देनारूप क्रिया भी ब्रह्म है अहं हुतम् (गीता 9। 16)।(6) इस प्रकार भोजन करनेवाले मनुष्योंके द्वारा प्राप्त करनेयोग्य फल भी ब्रह्म ही है यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् (गीता 4। 31)।मार्मिक बातप्रकृतिके कार्य संसारका स्वरूप है क्रिया और पदार्थ। वास्तविक दृष्टिसे देखा जाय तो प्रकृति या संसार क्रियारूप ही है (टिप्पणी प0 255)। कारण कि पदार्थ एक क्षण भी स्थिर नहीं रहता उसमें निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। अतः वास्तवमें पदार्थ परिवर्तनरूप क्रियाका पुञ्ज ही है। केवल राग के कारण पदार्थकी मुख्यता दीखती है। सम्पूर्ण क्रियाएँ अभावमें जा रही हैं। अतः संसार अभावरूप ही है। भावरूपसे केवल एक अक्रियतत्त्व ब्रह्म ही है जिसकी सत्तासे अभावरूप संसार भी सत्तावान् प्रतीत हो रहा है। संसारकी अभावरूपताको इस प्रकारसे समझ सकते हैं संसारकी तीन अवस्थाएँ दीखती हैं उत्पत्ति स्थिति और प्रलय जैसे वस्तु उत्पन्न होती है फिर रहती है और अन्तमें नष्ट हो जाती है अथवा मनुष्य जन्म लेता है फिर रहता है और अन्तमें मर जाता है। इससे आगे विचार करें तो केवल उत्पत्ति और प्रलयका ही क्रम है स्थिति वस्तुतः है ही नहीं जैसे यदि मनुष्यकी पूरी आयु पचास वर्षकी है तो बीस वर्ष बीतनेपर उसकी आयु तीस वर्ष ही रह जाती है। इससे आगे विचार करें तो केवल प्रलयहीप्रलय (नाशहीनाश) है उत्पत्ति है ही नहीं जैसे आयुके जितने वर्ष बीत गये उतने वर्ष मनुष्य मर ही गया। इस प्रकार मनुष्य प्रतिक्षण ही मर रहा है उसका जीवन प्रतिक्षण ही मृत्युमें जा रहा है। दृश्यमात्र प्रतिक्षण अदृश्यमें जा रहा है। प्रलय अभावका ही नाम है इसलिये अभाव ही शेष रहा। अभावकी सत्ता भावरूप ब्रह्मपर ही टिकी हुई है। अतः भावरूपसे एक ब्रह्म ही शेष रहा सर्वं खल्विदं ब्रह्म (छान्दोग्य0 3। 14। 1) वासुदेवः सर्वम् (गीता 7। 19)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.24।।यज्ञायेत्युक्तम् तत्स्वरूपसामान्यं तावदाह ब्रह्मार्पणमिति। ब्रह्मणि अर्पणं तत एव प्रवृत्तस्य पुनस्तत्रैव अनुप्रवेशनं यस्य तत्। ब्रह्म समग्रं विश्वात्माकं यदेतत् हविः तत् ब्रह्मणि परमबोधे प्रशान्ते अग्नौ ब्रह्मणा येन केनचित् कर्मणा हुतं तद्दीप्त्यभिवृद्धये समर्पितम् इति ईदृशं ब्रह्मकर्मैव समाधिः यस्य योगिनः तेन ब्रह्मैव गन्तव्यं ज्ञेय नान्यत् ( नान्यदपि) किञ्चित् अन्याभावात्।यदि वा तदर्थेन यदर्थाक्षेपात् एवं संबन्धः यत् खलु ब्रह्मस्वरूपेण यजमानेन ब्रह्माग्नौ ब्रह्महविर्हुतं ब्रह्मणि(णे) ब्रह्मस्वभावदेवतोद्देशेन अर्पणं यस्य तत् एवंभूतं यत् ब्रह्मकर्म तदेव समाधिः आत्मस्वरूप ( omits स्वरूप) लाभोपायत्वात् तेन ब्रह्मकर्मसमाधिना नान्यत् फलमवाप्यते अपि तु ब्रह्मैव इति। ये यथा मा प्रपद्यन्ते इति निर्वाहितम्। मितस्वरूपीकृतमदात्मकयज्ञस्वभावा इति तादृशफलभागिन इत्यन्यत् ( K इत्युक्तम्)। अपरिमितपरिपूर्णमदात्मकयज्ञस्वरूपवेदिनस्तु कथं परिमितफललवलापट्यभागिनो भवेयुरिति तात्पर्यम् इति।अनेन श्लोकेन वक्ष्यमाणैश्च श्लोकैः परमं रहस्यमुपनिबद्धम्। तच्चास्माभिर्मितबुद्धिभिरपि यथाबुद्धि यथागुर्वाम्नायं च विवृतम्। मुखसंप्रदायक्रममन्तरेण नैतन्नभश्चित्रमिव चित्तमुपारोहति इति न वयमुपालम्भनीयाः।अत्र कैश्चित् हविषः अग्नेः करणानां च स्रुगादीनां क्रियायाश्च ब्रह्मविशेषणत्वमित्युक्तम् ( S अत्र हविषः मिति कैश्चिदुक्तम्) तदुपेक्ष्यमेव। तेषां रहस्यसप्रदायक्रमे (S संप्रदाये) अक्षुण्णत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.24।।नाभुक्तं क्षीयते कर्म इति स्मृतिमाश्रित्य शङ्कते कस्मादिति। समस्तस्य क्रियाकारकफलात्मकस्य द्वैतस्य ब्रह्ममात्रत्वेन बाधितत्वाद्ब्रह्मविदा ब्रह्ममात्रस्य कर्म प्रविलीयते सर्वमिति युक्तमित्याह उच्यत इति। ब्रह्मविदो ब्रह्मैव सर्वक्रियाकारकफलजातं द्वैतमित्यत्र हेतुत्वेनानन्तरश्लोकमवतारयति यत इति। अर्पणशब्दस्य करणाविषयत्वं दर्शयन्नर्पणं ब्रह्मेति पदद्वयपक्षे सामानाधिकरण्यं साधयति येनेति। यद्रजतं सा शुक्तिरितिवद्बाधायामिदं सामानाधिकरण्यमित्याह तस्येति। तत्र दृष्टान्तमाह यथेति। उक्तेऽर्थे पदद्वयमवतारयति तद्वदुच्यत इति। उक्तमेवार्थं स्पष्टयति यथा यदिति। समाससंख्यां व्यावर्तयति ब्रह्मेति। पदद्वयपक्षे विवक्षितमर्थं कथयति यदर्पणेति। ब्रह्महविरिति पदद्वयमवतार्य व्याचष्टे ब्रह्मेत्यादिना। यदर्पणबुद्ध्या गृह्यते तद्ब्रह्मविदो ब्रह्मैवेति यथोक्तं तथेहापीत्याह तथेति। अस्येति षष्ठी ब्रह्मविदमधिकरोति। पर्ववदसमासमाशङ्क्य व्यावर्तयन्पदान्तरमवतार्य व्याकरोति तथेति। प्रागुक्तासमासवदिति व्यतिरेकः। तत्र विवक्षितमर्थमाह अग्निरपीति। ब्रह्मणेति पदस्याभिमतमर्थमाह ब्रह्मणेति। कर्त्रा हूयत इति संबन्धः। कर्ता ब्रह्मणः सकाशाद्व्यतिरिक्तो नास्तीत्येतदभिमतमित्याह ब्रह्मैवेति। हुतमित्यस्य विवक्षितमर्थमाह यत्तेनेति। ब्रह्मैव तेनेत्यादि भागं विभजते ब्रह्मैवेत्यादिना। ब्रह्म कर्मेत्याद्यवतार्य व्याकरोति ब्रह्मेति। कर्मत्वं ब्रह्मणो ज्ञेयत्वात्प्राप्यत्वाच्च प्रतिपत्तव्यम्। एवं ब्रह्मार्पणमन्त्रस्याक्षरार्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमाह एवमिति। निवृत्तकर्माणं संन्यासिनं प्रति कथमस्य मन्त्रस्य प्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह निवृत्तेति। यथा बाह्ययज्ञानुष्ठानासमर्थस्याज्ञस्य संकल्पात्मकयज्ञो दृष्टस्तथा ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनं स्तुत्यर्थं सुतरामुपपद्यते तेन स्तुतिलाभात्कल्पनायाः स्वाधीनत्वाद्वेत्यर्थः।ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनमभिनयति यदर्पणादीति। केन प्रमाणेनात्र यज्ञत्वसंपादनमवगतमित्याशङ्क्य अर्पणादीनां विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानानुपपत्त्येत्याह अन्यथेति। ज्ञानस्य यज्ञत्वे संपादिते फलितमाह तस्मादिति। आत्मैवेदं सर्वमित्यात्मव्यतिरेकेण सर्वस्यावस्तुत्वं प्रतिपाद्यमानस्य कर्माभावे हेत्वन्तरमाह कारकेति। कारकबुद्धेस्तेष्वभिमानस्याभावेऽपि किमिति कर्म न स्यादित्याशङ्क्याह नहीति। उक्तमेवान्वयव्यतिरेकाभ्यां द्रढयति सर्वमेवेति। इन्द्रायेत्यादिना शब्देन समर्पितो देवताविशेषः संप्रदानं कारकम् आदिशब्दाद् व्रीह्यादिकरणकारकं तद्विषयबुद्धिमत्कर्तास्मीत्यभिमानपूर्वकं मोक्षफलमस्येति फलाभिसंधिमच्च कर्म दृष्टमिति योजना। अन्वयमुक्त्वा व्यतिरेकमाह नेत्यादिना। उपमृदिता क्रियादिभेदविषया बुद्धिर्यस्य तत्कर्म तथा कर्तृत्वाभिमानपूर्वको मोक्षे फलमस्येति योऽभिसंधिस्तेन रहितं च न कर्म दृष्टमित्यन्वयः। तथापि ब्रह्मविदो भासमानकर्माभावे किमायातमित्याशङ्क्याह इदमिति। यदिदं ब्रह्मविदो दृश्यमानं कर्म तदहमस्मि ब्रह्मेति बुद्ध्या निराकृतकारकादिभेदविषयबुद्धिमदतश्च कर्मैव न भवति तत्त्वज्ञाने सति व्यापकं कारकादिव्यावर्तमानं व्याप्यं कर्मापि व्यावर्तयति तत्त्वविदः शरीरादिचेष्टाकर्माभावः कर्म व्यापकरहितत्वात्सुषुप्तचेष्टावदित्यर्थः। ज्ञानवतो दृश्यमानं कर्माकर्मैवेत्यत्र भगवदनुमतिमाह तथाचेति। ब्रह्मविदो दृष्टं कर्म नास्तीत्युक्तेऽपि तत्कारणानुपमर्दात्पुनर्भविष्यतीत्याशङ्क्याह तथाच दर्शयन्निति। अविद्वानिव विद्वानपि कर्मणि प्रवर्तमानो दृश्यते तथापि तस्य कर्माकर्मैवेत्यत्र दृष्टान्तमाह दृष्टा चेति। विद्वत्कर्मापि कर्मत्वाविशेषादितरकर्मवत्फलारम्भकमित्यपि शङ्का न युक्तेत्याह तथेति। इदं कर्मैव कर्तव्यमस्य च फलं भोक्तव्यमिति मतिस्तत्पूर्वकाण्यतत्पूर्वकाणि च कर्माणि तेषामवान्तरभेदसंग्रहार्थमादिपदम्। दार्ष्टान्तिकमाह तथेति। सप्तम्या विद्वत्प्रकरणं परामृष्टम्। षष्ठ्यौ समानाधिकरणे। उक्तेऽर्थे पूर्ववाक्यमनुकूलयति अत इति। ब्रह्मार्पणमन्त्रस्य स्वव्याख्यानमुक्त्वा स्वयूथ्यव्याख्यानमनुवदति अत्रेति। प्रसिद्धोद्देशेनाप्रसिद्धविधानस्य न्याय्यत्वादप्रसिद्धोद्देशेन प्रसिद्धविधानं कथमित्याशङ्क्याह ब्रह्मैवेति। किलेत्यस्मिन्व्याख्याने सिद्धान्तिनोऽसंप्रतिपत्तिं सूचयति। कर्तृकर्मकरणसंप्रदानाधिकरणरूपेण पञ्चविधेन ब्रह्मैव व्यवस्थितं कर्म करोतीत्यङ्गीकारात्तदप्रसिद्ध्यभावात्तदनुवादेनार्पणादिष्वविरुद्धस्तद्दृष्टिविधिरित्यर्थः। दृष्टिविधिपक्षे सिद्धान्ताद्विशेषं दर्शयति तत्रेति। अर्पणादिषु कर्तव्यां ब्रह्मबुद्धिं दृष्टान्ताभ्यां स्पष्टयति यथेत्यादिना। दृष्टिविधाने विधेयदृष्टेर्मानसक्रियात्वेन सम्यग्ज्ञानत्वाभावात्प्रकरणभङ्गः स्यादित्यभिप्रेत्य परिहरति सत्यमेवमिति। विधित्सितदृष्टिस्तुतिपरमेव प्रकरणं न ज्ञानस्तुतिपरमित्याशङ्क्य प्रकरणपर्यालोचनया ज्ञानस्तुतिरेवात्र प्रतिभातीति प्रतिपादयति अत्र त्विति। किञ्च ब्रह्मार्पणमन्त्रस्यापि सम्यग्ज्ञानस्तुतौ सामर्थ्यं प्रतिभातीत्याह अत्र चेति। नन्वर्पणादिषु ब्रह्मदृष्टिं कुर्वतामपि ब्रह्मविद्यैवात्र विवक्षितेति पक्षभेदासिद्धिरिति चेत्तत्राह येत्विति। यथा ब्रह्मदृष्ट्या नामादिकमुपास्यं तथार्पणादिषु ब्रह्मदृष्टिकरणे सत्यर्पणादिकमेव प्राधान्येन ज्ञेयमिति ब्रह्मविद्या यथोक्तेन वाक्येन विवक्षिता न स्यादित्यर्थः। किञ्च ब्रह्मैव तेन गन्तव्यमिति ब्रह्मप्राप्तिफलाभिधानादपि दृष्टिविधानमश्लिष्टमित्याह नचेति। नचार्पणाद्यालम्बना दृष्टिर्ब्रह्म प्रापयत्यप्रतीकालम्बनान्नयतीति न्यायविरोधादिति भावः। दृष्टिविधानेऽपि नियोगबलादेव स्वर्गवददृष्टो मोक्षो भविष्यतीत्याशङ्क्याह विरुद्धं चेति। ज्ञानादेव कैवल्यमुक्त्वा मार्गान्तरापवादिन्या श्रुत्या विरुद्धं मोक्षस्याविद्यानिवृत्तिलक्षणस्य दृष्टस्य नैयोगिकत्ववचनमित्यर्थः। दृष्टिनियोगान्मोक्षो भवतीत्येतत्प्रकरणविरुद्धं चेत्याह प्रकृतेति। तदेव प्रपञ्चयति सम्यग्दर्शनं चेति। अन्ते च सम्यग्दर्शनं प्रकृतमिति संबन्धः। तत्र हेतुः तस्यैवेति। सम्यग्ज्ञानेनोपक्रम्य तेनैवोपसंहारेऽपि मध्ये किंचिदन्यदुक्तमिति प्रकरणस्यातद्विषयत्वमित्याशङ्क्याह श्रेयानिति। प्रकरणे सम्यग्ज्ञानविषये सत्यनुपपन्नो दर्शनविधिरिति फलितमाह फलितमाह तत्रेति। ब्रह्मार्पणमन्त्रे परकीयव्याख्यानासंभवे स्वकीयव्याख्यानं व्यवस्थितमित्युपसंहरति तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.24।।ननु कर्मस्वरूपं प्रतिज्ञाय सङ्क्षेपविस्तराभ्यां प्रतिपाद्योपसंहृतं किमिदं ब्रह्मार्पणमित्यनेनोच्यते इत्यत आह ज्ञानावस्थितेति। एतेनइति यो जानाति इत्यध्याहारोऽत्र सूचितो भवति। अत्रार्पणादेः ब्रह्मस्वरूपत्वमुच्यत इत्यन्यथा प्रतीतिनिरासायाह सर्वमिति। कुत एतदित्यत आह उक्तं हीति। सर्वस्य भगवदधीनत्वे प्रमाणमाह सर्वमिति। प्रज्ञा ब्रह्म नेत्रं नेतृ यस्य तत्तथोक्तम्।एतं हि इत्यनेन सर्वान्तर्यामित्वमुच्यते ब्रह्मकर्म ब्रह्मविषयः समाधिर्यस्यासौ तथोक्त इति व्याख्यानं प्रक्रमविरुद्धमिति भावेनान्यथा व्याख्याति समाधिनेति। समाधिरपि ब्रह्मेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.24।।ज्ञानावस्थितचेतस्त्वं स्पष्टयति ब्रह्मार्पणमिति। सर्वमेतद्ब्रह्मेत्युच्यते तदधीनसत्ताप्रवृत्तिमत्त्वात् न तु तत्स्वरूपत्वात्। उक्तं हित्वदधीनं यतः सर्वमतः सर्वो भवानिति। वदन्ति मुनयः सर्वे न तु सर्वस्वरूपतः इति पाद्मे। सर्वं तत्प्रज्ञानेत्रम् ऐ.उ.5।3 इति च एतं ह्येव बह्वृचः ऐ.आ.3।2।9 इत्यादि च। समाधिना सह ब्रह्मैव कर्म।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.24।।हविः विशेष्यते अर्प्यते अनेन इति अर्पणं स्रुगादि तद् ब्रह्मकार्यत्वाद् ब्रह्म ब्रह्म यस्य हविषः अर्पणं तद्ब्रह्मार्पणम्। ब्रह्म हविः स्वयं च ब्रह्मभूतं ब्रह्माग्नौ ब्रह्मभूते अग्नौ ब्रह्मणा कर्त्रा हुतम् इति सर्वं कर्मब्रह्मात्मकत्वाद् ब्रह्ममयम् इति यः समाधत्ते स ब्रह्मकर्मसमाधिः। तेन ब्रह्मकर्मसमाधिना ब्रह्म एव गन्तव्यम्। ब्रह्मात्मकतया ब्रह्मभूतम् आत्मस्वरूपं गन्तव्यम्। मुमुक्षूणां क्रियमाणं कर्म परब्रह्मात्मकम् एव इत्यनुसन्धानयुक्ततया ज्ञानाकारं साक्षादात्मावलोकनसाधनम् न ज्ञाननिष्ठाव्यवधानेन इत्यर्थः।एवं कर्मणो ज्ञानाकारतां प्रतिपाद्य कर्मयोगभेदान् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.24)ब्रह्म अर्पणं येन करणेन ब्रह्मवित् हविः अग्नौ अर्पयति तत् ब्रह्मैव इति पश्यति तस्य आत्मव्यतिरेकेण अभावं पश्यति यथा शुक्तिकायां रजताभावं पश्यति तदुच्यते ब्रह्मैव अर्पणमिति यथा यद्रजतं तत् शुक्तिकैवेति। ब्रह्म अर्पणम् इति असमस्ते पदे। यत् अर्पणबुद्ध्या गृह्यते लोके तत् अस्य ब्रह्मविदः ब्रह्मैव इत्यर्थः। ब्रह्म हविः तथा यत् हविर्बुद्ध्या गृह्यमाणं तत् ब्रह्मैव अस्य। तथा ब्रह्माग्नौ इति समस्तं पदम्। अग्निरपि ब्रह्मैव यत्र हूयते ब्रह्मणा कर्त्रा ब्रह्मैव कर्तेत्यर्थः। यत् तेन हुतं हवनक्रिया तत् ब्रह्मैव। यत् तेन गन्तव्यं फलं तदपि ब्रह्मैव ब्रह्मकर्मसमाधिना ब्रह्मैव कर्म ब्रह्मकर्म तस्मिन् समाधिः यस्य सः ब्रह्मकर्मसमाधिः तेन ब्रह्मकर्मसमाधिना ब्रह्मैव गन्तव्यम्।।एवं लोकसंग्रहं चिकीर्षुणापि क्रियमाणं कर्म परमार्थतः अकर्म ब्रह्मबुद्ध्युपमृदितत्वात्। एवं सति निवृत्तकर्मणोऽपि सर्वकर्मसंन्यासिनः सम्यग्दर्शनस्तुत्यर्थं यज्ञत्वसंपादनं ज्ञानस्य सुतरामुपपद्यते यत् अर्पणादि अधियज्ञे प्रसिद्धं तत् अस्य अध्यात्मं ब्रह्मैव परमार्थदर्शिन इति। अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वे अर्पणादीनामेव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानम् अनर्थकं स्यात्। तस्मात् ब्रह्मैव इदं सर्वमिति अभिजानतः विदुषः कर्माभावः। कारकबुद्ध्यभावाच्च। न हि कारकबुद्धिरहितं यज्ञाख्यं कर्म दृष्टम्। सर्वमेव अग्निहोत्रादिकं कर्म शब्दसमर्पितदेवताविशेषसंप्रदानादिकारकबुद्धिमत् कर्त्रभिमानफलाभिसंधिमच्च दृष्टम् न उपमृदितक्रियाकारकफलभेदबुद्धिमत् कर्तृत्वाभिमानफलाभिसंधिरहितं वा। इदं तु ब्रह्मबुद्ध्युपमृदितार्पणादिकारकक्रियाफलभेदबुद्धि कर्म। अतः अकर्मैव तत्। तथा च दर्शितम् कर्मण्यकर्म यः पश्येत् कर्मण्यभिप्रवृत्तोऽपि नैव किंचित्करोति सः गुणा गुणेषु वर्तन्ते नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् इत्यादिभिः। तथा च दर्शयन् तत्र तत्र क्रियाकारकफलभेदबुद्ध्युपमर्दं करोति। दृष्टा च काम्याग्निहोत्रादौ कामोपमर्देन काम्याग्निहोत्रादिहानिः। तथा मतिपूर्वकामतिपूर्वकादीनां कर्मणां कार्यविशेषस्य आरम्भकत्वं दृष्टम्। तथा इहापि ब्रह्मबुद्ध्युपमृदितार्पणादिकारकक्रियाफलभेदबुद्धेः बाह्यचेष्टामात्रेण कर्मापि विदुषः अकर्म संपद्यते। अतः उक्तम् समग्रं प्रविलीयते इति।।अत्र केचिदाहुः यत् ब्रह्म तत् अर्पणादीनि ब्रह्मैव किल अर्पणादिना पञ्चविधेन कारकात्मना व्यवस्थितं सत् तदेव कर्म करोति। तत्र न अर्पणादिबुद्धिः निवर्त्यते किं तु अर्पणादिषु ब्रह्मबुद्धिः आधीयते यथा प्रतिमादौ विष्ण्वादिबुद्धिः यथा वा नामादौ ब्रह्मबुद्धिरिति।।सत्यम् एवमपि स्यात् यदि ज्ञानयज्ञस्तुत्यर्थं प्रकरणं न स्यात्। अत्र तु सम्यग्दर्शनं ज्ञानयज्ञशब्दितम् अनेकान् यज्ञशब्दितान् क्रियाविशेषान् उपन्यस्य श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञात् ज्ञानयज्ञः (गीता 4.33) इति ज्ञानं स्तौति। अत्र च समर्थमिदं वचनम् ब्रह्मार्पणम् इत्यादि ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादने अन्यथा सर्वस्य ब्रह्मत्वे अर्पणादीनामेव विशेषतो ब्रह्मत्वाभिधानमनर्थकं स्यात्। ये तु अर्पणादिषु प्रतिमायां विष्णुदृष्टिवत् ब्रह्मदृष्टिः क्षिप्यते नामादिष्विव चेति ब्रुवते न तेषां ब्रह्मविद्या उक्ता इह विवक्षिता स्यात् अर्पणादिविषयत्वात् ज्ञानस्य। न च दृष्टिसंपादनज्ञानेन मोक्षफलं प्राप्यते। ब्रह्मैव तेन गन्तव्यम् इति चोच्यते। विरुद्धं च सम्यग्दर्शनम् अन्तरेण मोक्षफलं प्राप्यते इति। प्रकृतविरोधश्च सम्यग्दर्शनं च प्रकृतम् कर्मण्यकर्म यः पश्येत् इत्यत्र अन्ते च सम्यग्दर्शनम् तस्यैव उपसंहारात्। श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञात् ज्ञानयज्ञः ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् इत्यादिना सम्यग्दर्शनस्तुतिमेव कुर्वन् उपक्षीणः अध्यायः। तत्र अकस्मात् अर्पणादौ ब्रह्मदृष्टिः अप्रकरणे प्रतिमायामिव विष्णुदृष्टिः उच्यते इति अनुपपन्नम्। तस्मात् यथाव्याख्यातार्थ एव अयं श्लोकः।।तत्र अधुना सम्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं संपाद्य तत्स्तुत्यर्थम् अन्येऽपि यज्ञा उपक्षिप्यन्ते

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【 Verse 4.25 】

▸ Sanskrit Sloka: दैवमेवापरे यज्ञं योगिन: पर्युपासते | ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति ||

▸ Transliteration: daivamevāpare yajñaṁ yoginaḥ paryupāsate | brahmāgnāvapare yajñaṁ yajñenaivopajuhvati ||

▸ Glossary: daivaṁ: gods; eva: only; apare: others; yajñaṁ: sacrifices; yoginaḥ: yogis; paryupāsate: worship; brahma: supreme; agnau: in the fire; apare: others; yajñaṁ: sacrifice; yajñena: by sacrifice; eva: only; upajuhvati: offer as sacrifice.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.25 Some yogis worship the gods by offering various sacrifices to them, While others worship by offering sacrifices in the fire of the supreme.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.25।।अन्य योगीलोग भगवदर्पणरूप यज्ञका ही अनुष्ठान करते हैं और दूसरे योगीलोग ब्रह्मरूप अग्निमें विचाररूप यज्ञके द्वारा ही जीवात्मारूप यज्ञका हवन करते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.25।। कोई योगीजन देवताओं के पूजनरूप यज्ञ को ही करते हैं और दूसरे (ज्ञानीजन) ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ के द्वारा यज्ञ को हवन करते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.25 दैवम् pertaining to Devas? एव only? अपरे some? यज्ञम् sacrifice? योगिनः Yogis? पर्युपासते perform? ब्रह्माग्नौ in the fire of Brahman? अपरे others? यज्ञम् sacrifice? यज्ञेन by sacrifice? एव verily? उपजुह्वति offer as sacrifice.Commentary Some Yogis who are devoted to Karma Yoga perform sacrificial rites to the shining ones or Devas (gods). The second Yajna is JnanaYajna or the wisdom sacrifice performed by those who are devoted to Jnana Yoga. The oblation in this sacrifice is the Self. Yajna here means the Self. The Upadhis or the limiting adjuncts such as the physical body? the mind? the intellect? etc.? which are superimposed on Brahman through ignorance are sublated and the identity of the individual soul with the Supreme Soul or Brahman is realised. To sacrifice the self in Brahman is to know through direct cognition (Aparoksha Anubhuti) that the individual soul is identical with Brahman. This is the highest Yajna. Those who are established in Brahman? those who have realised their oneness with the Supreme Soul or Paramatma perform this kind of sacrifice. This is superior to all other sacrifices.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.25. Certain other men of Yoga are completely devoted to yajna, connected with the devas and offer that yajna, simply as a yajna, into the insatiable fire of the Brahman.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.25 Some sages sacrifice to the Powers; others offer themselves on the alter of the Eternal.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.25 Some Yogins resort only to the sacrifice relating to gods. Others offer sacrifice into the fire of Brahman solely by means of sacrifice.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.25 Other yogis undertake sacrifice to gods alone, Others offer the Self, as a sacrifice by the Self itself, in the fire of Brahman.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.25 Some Yogies perform sacrifice to the gods alone; while others (who have realised the Self) offer the self as sacrifice by the Self in the fire of Brahman alone.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.25 Daivam etc. the Devas are the sense-organs that are playful. The yajna that stands based on them is nothing but the act of receiving objects of their own. Certain persons are thoroughly devoted only to that yajna, i.e., they gain the gain of their own Self by examining this (yajna) from its root . That is why they are men of Yoga; for, they are absorbed in the Yoga permanently at all stages. Indeed in Yogin the suffix ini, a synonym of matup, here signifies 'perpetual connection'. Further, they (Yogins) pour, as an offering, the self-same yajna, above defined, into the Brhaman-fire that is insatiable i.e. that cannot be satisfied. Thus [the verse] has been interpreted by some.

However, the Sage (the author of the Gita) does not violate the context. Hence, that meaning which exists in his heart we shall show : Certain masters of Yoga perform godly sacrifice i.e., sacrifice, consisting of external objects, and intending only deities like Indra etc., of varied forms. Further, with a single conviction that 'It is a Yajna and a thing to be performed', i.e., with no craving for fruit, they offer the same sacrifice, that is being performed, into the Brahman - fire which is insatiable i.e., difficult to satisfy. Thus even those, who perform sacrificial rites with material objects, attain the Supreme Brahman. For, it is going to be declared in the seel : 'All these persons too have understood sacrifice' (IV, 30 below). The Vedic text also [says] :

  'The gods offered sacrifice  [just] as sacrifice'.  (RV, I, 164, 50; TS, III, v, II, 5; etc.)

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.25 Some Karma Yogins resort to the sacrifice relating to gods, i.e., the sacrifice which takes the form of worshipping gods. The meaning is that they have steadfast devotion only in this. 'Others offer sacrifice into the fire of Brahman solely by means of sacrifice.' Here the term, 'sacrifice' is used in the sense of the oblation, the ladle etc., reired for performing a sacrifice and therefore they are said to constitute 'sacrificing.' These are of the nature of Brahman. 'Offer by means of sacrifice' indicates the ladle and other implements for the accomplishment of sacrifice.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.25 Apare, other; yoginah, yogis, ritualists; pari-upasate, undertake; yajnam, sacrifice; daivam, to gods; eva, alone. A sacrifice by which the gods are adored is daiva-yajna; they perform only that. This is the meaning. Brahma-agnau, in the fire of Brahman: By the word brahman is meant That which is referred to in such sentences as, 'Brahman is Truth, knowledge and infinite' (Tai. 2.1), 'Knowledge, Bliss, Brahman' (Br. 3.9.28), 'the Brahman that is immediate and direct-the self that is within all' (Br.3.4.1), which is devoid of all worldly characteristiscs like hunger etc. and which is beyond all particular alifications-as stated in, 'Not this, not this' (Br.4.4.22). That which is Brahman is the fire. [Brahman is called fire because, as reflected in wisdom, It burns away everything, i.e. ignorance, or because everything merges into It during dissolution (pralaya).] And it is spoken of as Brahmagni with a view to referring to It as that into which the offering is made. In that fire of Brahman, apare, others, other knowers of Brahman; upa-juhvati, offer; yajnam, the Self, which is referred to by the word yajna (sacrifice), it, having, been presented as a synonym of the Self;-that Self, which is a sacrifice, which is reality is verily the supreme Brahman, which is associated with such limiting adjuncts as the intellect etc., which is associated with all the alities of the limiting adjuncts superimposed on it, and which is the oblation, (they offer) yajnena, by the Self itself as described above. The offering (of the Self) in that (Brahman) is nothing but the realization of that Self which is assoicated with the limiting adjuncts to be the supreme Brahman which is free from adjuncts. The monks, steadfast in the realization of the identity of Brahman and the Self, make that offering. This is the meaning. Beginning with, 'The ladle is Brahman' etc., this sacrifice characterized as full realization is being included among such sacrifices as daiva-yajna etc. with a view to eulogizing it in the verses beginning with, 'O destroyer of enemies, jnana-yajna is greater than the sacrifices involving (sacrificial) materials'.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.25।। जगत् में कार्य करते हुए ज्ञानी पुरुष के हृदय के भाव को ही कुछ श्लोकों में बताया गया है। साधक के मन में एक शंका सदैव उठती है कि ध्यानावस्था में बुद्धि से भी परे अर्थात् उसकी द्रष्टा आत्मा का साक्षात् अनुभव होता है परन्तु कुछ काल के लिये ही। गौतम बुद्ध जैसे कुछ महापुरुषों को हम कार्य में अत्याधिक व्यस्त देखते हैं जबकि कोई महात्मा एक स्थान पर ही रहकर अपने सीमित क्षेत्र में कार्य करते देखे जाते हैं जैसे भगवान् रमण महर्षि। कुछ अन्य सन्त सामान्य जीवन ही व्यतीत करते हैं। साधक को यह जानने की उत्सुकता रहती है कि जगत् में अनेक वस्तुओं के सम्पर्क में आने पर ज्ञानी पुरुष के मन की क्या भावना होती है।जो पुरुष सभी उपलब्ध साधनों के उपयोग से अपने आपको शारीरिक मानसिक एवं बौद्धिक अपूर्णताओं दुर्बलताओं से ऊँचा उठाने का सतत् प्रयत्न करता है वह योगी कहलाता है। इस दृष्टि से इस श्लोक के केवल सामान्य अर्थ को ही ग्रहण करना उचित नहीं होगा।जो प्रकाशरूप है उसे कहते हैं देव। अध्यात्म की दृष्टि से ये देव पंच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। इन इन्द्रियों के द्वारा शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध ये पाँच विषय प्रकाशित किये जाते हैं। साधक तथा सिद्ध पुरुष भी इन्द्रियों के माध्यम से ही विषय ग्रहण करते हैं परन्तु उनकी दृष्टि में यह भी एक यज्ञ है जिसमें विषयों की आहुतियाँ इन्द्रियरूप देवों को दी जारही हैं। अज्ञानी के लिये जो विषयग्रहण की क्रिया मात्र है वही ज्ञानियों की दृष्टि से विषयों की इन्द्रियों के प्रति भक्ति की साधना है।यज्ञ की भावना बनाये रखने से साधक को धीरेधीरे उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट सभी प्रकार के इन्द्रियोपभोगों से वैराग्य हो जाता है जो आन्तरिक समता बनाये रखने में सहायक होता है।देवयज्ञ के वर्णन के बाद श्रीकृष्ण कहते हैं अन्य लोग ब्रह्मयज्ञ करते हैं जिसमें ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ (आत्मा) के द्वारा यज्ञ का (आत्मा का) हवन करते हैं। अध्यात्म की दृष्टि से विचार करने पर इस कथन का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। जब तक हम शरीर धारण किये हुए इस जगत् में रहते हैं तब तक विषयों के साथ हमारा सम्पर्क अवश्य रहता है। परन्तु हमें जो सुखदुख का अनुभव होता है वह बाह्य जगत् के कारण नहीं वरन् हमारे विषयों के प्रति रागद्वेष के कारण होता है। विषयों में स्वयं सुख या दुख देने की क्षमता नहीं है।ज्ञानी पुरुष जानते हैं कि इन्द्रियाँ विषय ग्रहण की साधन मात्र हैं और वे केवल चैतन्य आत्मा के सानिध्य से ही कार्य कर सकती हैं। इस ज्ञान के कारण वे इन्द्रियों की ब्रह्मज्ञान की अग्नि में स्वयं ही आहुति देते हैं। यहाँ साधकों को उपदेश हैं कि वे अपनी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का उपयोग स्वार्थ के लिये न करके जगत् की सेवार्थ करें इससे वे जगत् में रहकर कार्य करते हुए भी विषयासक्ति के बन्धन में नहीं पड़ सकते।अगले श्लोक में भगवान् दो प्रकार के यज्ञ बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.25।। सभ्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं संपाद्य तत्स्तुत्यर्थमन्येऽपि यज्ञा उपक्षिप्यन्ते दैवमेवेत्यादिना। देवा एवेज्यन्तेऽनेनाग्निष्टोमादिनासौ दैवो यज्ञस्तमपरे कर्मयोगिनः पर्युपासते कुर्वन्ति ब्रह्माग्नौसत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म इत्यादिश्रुत्युक्तमसंसारिस्वरुपं ब्रह्म तदेव होमाधिकरणविवक्षयाऽग्निः तस्मिन्नपरे ब्रह्मविदः। आत्मनाभसु यज्ञशब्दस्य पाठात्। यज्ञमात्मानं जीवमाहुतिरुपं यज्ञेन सत्यादिलक्षणेनोपजुह्वति सोपाधिकस्यात्मनो निरुपाधिकेन परब्रह्मरुपेणैव। यदवलोकनं स तस्मिन्होमस्तं कुर्वन्तीत्यर्थः। ब्रह्मरुपेऽग्नौ यज्ञेनैवोपायेन ब्रह्मार्पणमित्युक्तप्रकारेण यज्ञमुपजुह्वति। यज्ञादिसर्वकर्म प्रविलापयन्तीत्यर्थ इति वा। अस्मिन्पक्षे यज्ञं यज्ञेनेत्यनयोः स्वारस्यं श्रोत्रादीनीत्यादिनोक्तयज्ञानुगुण्यं चिन्त्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.25।।अधुना सम्यग्दर्शनस्य यज्ञरूपत्वेन स्तावकतया ब्रह्मार्पणमन्त्रे स्थिते पुनरपि तस्य स्तुत्यर्थमितरान्यज्ञानुपन्यस्यति देवा इन्द्राग्नायादय इज्यन्ते येन स दैवस्तमेव यज्ञं दर्शपूर्णमासज्योतिष्टोमादिरूपमपरे योगिनः कर्मिणः पर्युपासते सर्वदा कुर्वन्ति न ज्ञानयज्ञम्। एवं कर्मयज्ञमुक्त्वाऽन्तःकरणशुद्धिद्वारेण तत्फलभूतं ज्ञानयज्ञमाह ब्रह्माग्नौ सत्यज्ञानानन्तानन्दरूपं निरस्तसमस्तविशेषं ब्रह्म तत्पदार्थस्तस्मिन्नग्नौ यज्ञं प्रत्यगात्मानं त्वंपदार्थं यज्ञेनैव। यज्ञशब्द आत्मनामसु यास्केन पठितः। इत्थंभूतलक्षणे तृतीया। एवकारो भेदाभेदव्यावृत्त्यर्थः। त्वंपदार्थाभेदेनैवोपजुह्वति तत्स्वरूपतया पश्यन्तीत्यर्थः। अपरे पूर्वविलक्षणास्तत्त्वदर्शननिष्ठाः संन्यासिन इत्यर्थः। जीवब्रह्माभेददर्शनं यज्ञत्वेन संपाद्य तत्साधनयज्ञमध्ये पठ्यतेश्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ इत्यादिना स्तोतुम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.25।।एवं सम्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं संपाद्य तत्स्तुत्यर्थं यज्ञान्तराण्युपक्षिपति दैवमेवेत्यादिना। दैवं देवताप्रधानमेव दर्शपूर्णमासादियज्ञं नान्यं एके योगिनः कर्मयोगिनः पर्युपासते अपरे तु ब्रह्मैव सत्यज्ञानानन्तानन्दात्मकमखण्डैकरसं वस्तु तदेव ज्ञातं सत्सर्वकर्मदग्धृत्वादग्निरिवाग्निर्ब्राह्माग्निस्तत्र यज्ञं जीवम्। यज्ञशब्दस्यात्मनामसु पाठात्। सोपाधिं यज्ञेनैवात्मनैव निरुपाधिकेन रूपेण जुह्वति घटाकाशमिव महाकाशे उपाधिप्रहाणेन प्रविलापयन्ति सोऽयं ज्ञानयज्ञो मुख्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.25।।ननु ब्रह्मात्मकत्वे सति ज्ञानाज्ञानकृतं कर्म कथं न ब्रह्मणि लीयतेऽग्निस्पर्शे दाहवत् इत्याशङ्क्य सजातीयप्रचयसंवलित एवाग्निर्दाहसमर्थः न तु विस्फुलिङ्गात्मक इति सर्वत्र ब्रह्मात्मकज्ञानाभावे तज्ज्ञानानुरूपमेवागाधजलनिमग्नस्य ग्रहणसामर्थ्यं पूर्णघटवत् फलं भवतीत्याह दैवमित्यादिषड्भिः। अपरे योगिनः यत्किञ्चित्स्वरूपज्ञानेन कर्मफलेच्छया कर्मकर्त्तारः। यज्ञं कर्म दैवमेव ज्ञात्वा पर्युपासते परितः सर्वभावेन कुर्वन्ति। तेषां लौकिकदेहेन साधनात्मकभगवत्सेवायां सुखरूपं फलं भवतीत्यर्थः। अपरे तत्त्वज्ञानानुसारिणो ब्रह्माग्नौ अग्निं ब्रह्मस्वरूपं ज्ञात्वा तस्मिन् यज्ञं यज्ञात्मकं विष्णुं यज्ञेनैव यज्ञात्मकविष्णुरूपेण हविषा उपजुह्वति होमं कुर्वन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.25।।एतदेव यज्ञत्वेन संपादितं सर्वत्र ब्रह्मदर्शनलक्षणं ज्ञानं सर्वयज्ञोपायप्राप्यत्वात्सर्वयज्ञेभ्यः श्रेष्ठमित्यवं स्तोतुं अधिकारिभेदेन ज्ञानोपायभूतान्बहून्यज्ञानाह दैवमित्यष्टभिः। देवा इन्द्रवरुणादय इज्यन्ते यस्मिन्। एवकारेणेन्द्रादिषु ब्रह्मबुद्धिराहित्यं दर्शितम्। तं दैवं यज्ञं अपरे कर्मयोगिनः पर्युपासते श्रद्धयानुतिष्ठन्ति। अपरे तु ज्ञानयोगिनो ब्रह्मरूपेऽग्नौ यज्ञेनैवोपायभूतेन ब्रह्मार्पणमित्युक्तप्रकारेण यज्ञमुपजुह्वति। यज्ञादिसर्वकर्माणि प्रविलापयन्तीत्यर्थः। सोऽयं ज्ञानयज्ञः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.25।।एवं तत्कर्मणो ब्रह्मभावज्ञानकारणतां प्रतिपाद्यधिकारिभेदेन प्रसङ्गादन्यानपि बहून् यज्ञानाह दैवमेवापरे इति। तत्तद्देवाराधनात्मकं योगिनो योगकर्मिणः ब्रह्माग्नाविति ज्ञानिनो ब्रह्मवादिन उक्तप्रकारकं ब्रह्माग्नौ यज्ञं कर्म भावितेन ब्रह्मणा यज्ञेनोपजुह्वति प्रविलापयन्ति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.25।।उपर्युक्त श्लोकमें यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन करके अब उसकी स्तुति करनेके लिये दैवम् एव इत्यादि श्लोकोंसे दूसरेदूसरे यज्ञोंका भी उल्लेख किया जाता है जिस यज्ञके द्वारा देवोंका पूजन किया जाता है वह देवसम्बन्धी यज्ञ है अन्य ( कितने ही ) योगी अर्थात् कर्म करनेवाले लोग उस दैवयज्ञका ही अनुष्ठान किया करते हैं। अन्य ( ब्रह्मवेत्ता पुरुष ) ब्रह्माग्निमें ( हवन करते हैं ) अर्थात् ब्रह्म सत्यज्ञानअनन्तस्वरूप है विज्ञान और आनन्द ही ब्रह्म है जो साक्षात् अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है वह ब्रह्म है जो सर्वान्तर आत्मा है वह ब्रह्म है इत्यादि वचनोंसे जिसका वर्णन किया गया है जो भूखप्यास आदि समस्त सांसारिक धर्मोंसे रहित है जो ऐसा नहीं ऐसा नहीं इस प्रकार वेदवाक्योंद्वारा सब विशेषणोंसे परे बतलाया गया है वह ब्रह्म शब्दसे कहा जाता है। हवनका अधिकरण बतलानेके लिये उस ब्रह्मको ही यहाँ अग्नि कह दिया है। उस ब्रह्मरूप अग्निमें कितने ही ब्रह्मवेत्ता ज्ञानी यज्ञद्वारा यज्ञको हवन करते हैं। आत्माके नामोंमें यज्ञ शब्दका पाठ होनेसे आत्माका नाम यज्ञ है जो कि वास्तवमें परब्रह्म ही है परंतु बुद्धि आदि उपाधियोंसे युक्त हुआ उपाधियोंके धर्मोंको अपनेमें मान रहा है। उस आहुतिरूप आत्माको उपर्युक्त आत्माद्वारा ही हवन करते हैं। सारांश यह कि उपाधियुक्त आत्माको जो उपाधिरहित परब्रह्मरूपसे साक्षात् करना है वही उसका उसमें हवन करना है ब्रह्म और आत्माके एकत्वज्ञानमें स्थित हुए वे संन्यासी लोग ऐसा हवन किया करते हैं। श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप इत्यादि श्लोकोंसे स्तुति करनेके लिये यह सम्यग्दर्शनरूप यज्ञ ब्रह्मार्पणम् इत्यादि श्लोकोंद्वारा दैवयज्ञ आदि यज्ञोंमें सम्मिलित किया जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.25।। व्याख्या   दैवमेवापरे यज्ञं योगिनः पर्युपासते पूर्वश्लोकमें भगवान्ने सर्वत्र ब्रह्मदर्शनरूप यज्ञ करनेवाले साधकका वर्णन किया। यहाँ भगवान् अपरे पदसे उससे भिन्न प्रकारके यज्ञ करनेवाले साधकोंका वर्णन करते हैं।यहाँ योगिनः पद यज्ञार्थ कर्म करनेवाले निष्काम साधकोंके लिये आया है।सम्पूर्ण क्रियाओं तथा पदार्थोंको अपना और अपने लिये न मानकर उन्हें केवल भगवान्का और भगवान्के लिये ही मानना दैवयज्ञ अर्थात् भगवदर्पणरूप यज्ञ है। भगवान् देवोंके भी देव हैं इसलिये सब कुछ उनके अर्पण कर देनेको ही यहाँ दैवयज्ञ कहा गया है।किसी भी क्रिया और पदार्थमें किञ्चिन्मात्र भी आसक्ति ममता और कामना न रखकर उन्हें सर्वथा भगवान्का मानना ही दैवयज्ञका भलीभाँति अनुष्ठान करना है।ब्रह्माग्नावपरे यज्ञं यज्ञेनैवोपजुह्वति इस श्लोकके पूर्वार्धमें बताये गये दैवयज्ञसे भिन्न दूसरे यज्ञका वर्णन करनेके लिये यहाँ अपरे पद आया है।चेतनका जडसे तादात्म्य होनेके कारण ही उसे जीवात्मा कहते हैं। विवेकविचारपूर्वक जडसे सर्वथा विमुख होकर परमात्मामें लीन हो जानेको यहाँ यज्ञ कहा गया है। लीन होनेका तात्पर्य है परमात्मतत्त्वसे भिन्न अपनी स्वतन्त्र सत्ता किञ्चिन्मात्र न रखना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.25।।दैवमेवेति। अपरे दैवानि क्रीडनशीलानि (K क्रीडाशीलानि) इन्द्रियाणि आश्रित्य यः स्थितो यज्ञो निजविषयग्रहणलक्षणः तमेव परितः उपासते आमूलाद्विमृशन्ते स्वात्मलाभं लभन्ते। अत एव ते योगिनः सर्वावस्थासु सततमेव योगयुक्तत्वात्। नित्ययोगे ह्यत्रायं मत्वर्थीयः इनिः । एनमेव च विषयग्रहणात्मकं यज्ञं यज्ञेनैव तेनैव उक्त लक्षणेन अपरे पूरयितुमशक्ये ब्रह्माग्नौ जुह्वति इति कैश्चित् व्याख्यातम्।मुनेस्तु पौर्वापर्याविरुद्धत्वात् योऽर्थ तस्य हृदि स्थितः तं प्रकाशयामः। केचिद्योगयुक्तः सन्तो दैवं नानारूपेन्द्रादिदेवतोद्देशेनैव बाह्यद्रव्यमयं यज्ञमुपाचरन्ति। तं च क्रियमाणमेव यज्ञं यज्ञेन कर्तव्यमिदमित्येव बुद्ध्या फलानपेक्षया (S पेक्षितया) अपरे दुष्पूरे ब्रह्माग्नौ अर्पयन्तीति द्रव्ययज्ञा अपि परं ( omits परम) ब्रह्म यान्ति। यतो वक्ष्यते सर्वेऽप्येते यज्ञविदः इति (गीता 4.30) श्रुतिरपियज्ञेन यजमयजन्त देवाः(ऋ. सं. X 164 50 ) इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.25।।ज्ञानस्य यज्ञत्वं संपाद्य पूर्वश्लोके स्थिते सत्यधुना तस्यैव ज्ञानस्य स्तुत्यर्थं यज्ञान्तरनिर्देशार्थमुत्तरग्रन्थप्रवृत्तिरित्याह तत्रेति। सर्वस्य श्रेयःसाधनस्य मुख्यगौणवृत्तिभ्यां यज्ञत्वं दर्शयन्नादौ यज्ञद्वयमादर्शयति दैवमेवेत्यादिना। प्रतीकमादाय दैवयज्ञं व्याचष्टे देवा इति। सम्यग्ज्ञानाख्यं यज्ञं विभजते ब्रह्माग्नाविति। तत्र ब्रह्मशब्दार्थं श्रुत्यवष्टम्भेन स्पष्टयति सत्यमिति। यदजमनृतं विपरीतमपरिच्छिन्नं ब्रह्म तस्य परमानन्दत्वेन परमपुरुषार्थत्वमाह विज्ञानमिति। तस्य ज्ञानाधिकरणत्वेनज्ञानत्वमौपचारिकमित्याशङ्क्याह यत्साक्षादिति। जीवब्रह्मविभागे कथमपरिच्छिन्नत्वमित्याशङ्क्य विशिनष्टि य आत्मेति। परस्यैवात्मत्वं सर्वस्माद्देहादेरव्याकृतान्तादान्तरत्वेन साधयति सर्वान्तर इति। विधिमुखं सर्वमेवोपनिषद्वाक्यं ब्रह्मविषयमादिशब्दार्थः। निषेधमुखं ब्रह्मविषयमुपनिषद्वाक्यमशेषमेवार्थतो निबध्नाति अशनायेति। ब्रह्मण्यग्निशब्दप्रयोगे निमित्तमाह स होमेति। बुद्ध्यारूढतया सर्वस्य दाहकत्वाद्विलयस्य वा हेतुत्वादिति द्रष्टव्यम्। यज्ञशब्दस्यात्मनि त्वंपदार्थे प्रयोगे हेतुमाह आत्मनामस्विति। आधाराधेयभावेन वास्तवभेदं ब्रह्मात्मनोर्व्यावर्तयति परमार्थत इति। कथं तर्हि होमो नहि तस्यैव तत्र होमः संभवतीत्याशङ्क्याह बुद्ध्यादीति। उपाधिसंयोगफलं कथयति अध्यस्तेति। उपाध्यध्यासद्वारा तद्धर्माध्यासे प्राप्तमर्थं निर्दिशति आहुतीति। इत्थंभूतलक्षणां तृतीयामेव व्याकरोति उक्तेति। अशनायादिसर्वसंसारधर्मवर्जितेन निर्विशेषेण स्वरूपेणेति यावत्। आत्मनो ब्रह्मणि होममेव प्रकटयति सोपाधिकस्येति। अपर इत्यस्यार्थं स्फोरयति ब्रह्मेति। उक्तस्य ज्ञानयज्ञस्य दैवयज्ञादिषु ब्रह्मार्पणमित्यादिश्लोकैरुपक्षिप्यमाणत्वं दर्शयति सोऽयमिति। उपक्षेपप्रयोजनमाह श्रेयानिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.25।।उत्तरप्रकरणप्रतिपाद्यं बुद्ध्यारोहार्थमाह यज्ञेति। सामान्यतः कर्मस्वरूपमुक्तम् तच्च यज्ञादिभेदभिन्नम्। तत्रनायं लोकोऽस्ति 4।31 इति वक्ष्यति तदनुपपन्नम् यत्याद्याश्रमविलोपप्रसङ्गादित्याद्याशङ्कानिरासार्थमिति शेषः। तत्रदैवं देवविषयं इति व्याख्यानमसत्।द्रव्ययज्ञाः 4।28 इत्यस्य पुनरुक्तत्वादिति भावेनाह दैवमिति। एवं तर्हिकेचित् भगवन्तमुपासते इत्युक्तं स्यात्। तथा च नेयं यज्ञोक्तिरित्यत आह स एवेति। स इति परामृष्टं दर्शयति भगवदिति। भगवदुपासनस्य यज्ञत्वमिह कथं लभ्यते इत्यत आह यज्ञमिति। भगवदित्यादिकं क्रियाविशेषणत्वप्रदर्शनार्थमेकमेव वाक्यम्। साधनं परित्यज्य धात्वर्थमात्रस्य विशेषणं क्रियाविशेषणम्। अवधारणार्थं दर्शयति नान्यदिति। अन्यद्भगवदुपासनात्। अनेन एवशब्दो भिन्नक्रम इत्युक्तं भवति। दैवमेवोपासते नान्यदिति तु प्रकृतासङ्गतम्। केषाञ्चित्परमहंसानाम्। अन्येषां बाह्यकर्मणोऽपि भावात्। यद्वाकेषाञ्चित् इत्यस्यैव व्याख्यानं यतीनामिति।ब्रह्माग्नौ इत्यस्यआत्मानमात्मनैव मनसा वा ब्रह्मणैकीभावयन्ति इति व्याख्यानमसदिति भावेन यज्ञमित्येतद्व्याचष्टे यज्ञमिति। भगवतो यज्ञशब्दार्थत्वं कुतः इत्यत आह यज्ञेनेति।यज्ञेन इत्यस्यार्थमाह यज्ञेनेति। एवशब्देनापव्याख्यानं निराकरोति। एवं चेद्यज्ञमित्यस्य कथमन्वयः इत्यत आह यज्ञमिति। एतद्व्याख्यानमन्यत्रातिदिशति इति सर्वत्रेति। अतिप्रसङ्गनिवारणायसर्वत्र इत्युक्तं विवृणोति तमिति। एवं तर्ह्यग्रतो जातं तं पुरुषं यज्ञं भगवन्तं प्रति बर्हिषि प्रौक्षन्नित्यर्थः स्यात्। स च निर्मूल इत्यत आह उक्तं चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.25।।यज्ञभेदानाह दैवमित्यादिना। दैवं भगवन्तम् स एव तेषां यज्ञः। भगवदुपासनं यज्ञमिति क्रियाविशेषण्। नान्यत्तेषामस्ति यतीनां केषाञ्चित्। यज्ञं भगवन्तम्। यज्ञेन यज्ञम् ऋक्सं.8।4।19।6 यजुस्सं.31।16 यज्ञो विष्णुर्देवता इत्यादिश्रुतिः। यज्ञेन प्रसिद्धेनैव यज्ञं प्रति जुह्वतीति सर्वत्र समम्। तं यज्ञं ऋक्सं.8।4।18।2 यजुस्सं.31।9 इत्यादौ। उक्तं चविष्णुं रुद्रेण पशुना ब्रह्मा ज्येष्ठेन सूनुना। अयजन्मानसे यज्ञे पितरं प्रपितामहः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.25।।दैवं दैवार्चनरूपं यज्ञम् अपरे कर्मयोगिनः पर्युपासते सेवन्ते तत्र एव निष्ठां कुर्वन्ति इत्यर्थः। अपरे ब्रह्माग्नौ यज्ञं यज्ञेन एव उपजुह्वति। यज्ञं यज्ञरूपं ब्रह्मात्मकम् आज्यादिद्रव्यं यज्ञेन यज्ञसाधनभूतेन स्रुगादिना जुह्वति। अत्र यज्ञशब्दो हविःस्रुगादियज्ञसाधने वर्तते। ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविः इति न्यायेन यागहोमयोर्निष्ठां कुर्वन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.25)दैवमेव देवा इज्यन्ते येन यज्ञेन असौ दैवो यज्ञः तमेव अपरे यज्ञं योगिनः कर्मिणः पर्युपासते कुर्वन्तीत्यर्थः। ब्रह्माग्नौ सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म (तैत्ति0 उ0 2.1) विज्ञानमानन्दं ब्रह्म (बृह0 उ0 3.9.22) यत् साक्षादपरोक्षात् ब्रह्म य आत्मा सर्वान्तरः (बृह0 उ0 3.4.1) इत्यादिवचनोक्तम् अशनायादिसर्वसंसारधर्मवर्जितम् नेति नेति इति निरस्ताशेषविशेषं ब्रह्मशब्देन उच्यते। ब्रह्म च तत् अग्निश्च सः होमाधिकरणत्वविवक्षया ब्रह्माग्निः। तस्मिन् ब्रह्माग्नौ अपरे अन्ये ब्रह्मविदः यज्ञम् यज्ञशब्दवाच्य आत्मा आत्मनामसु यज्ञशब्दस्य पाठात् तम् आत्मानं यज्ञं परमार्थतः परमेव ब्रह्म सन्तं बुद्ध्याद्युपाधिसंयुक्तम् अध्यस्तसर्वोपाधिधर्मकम् आहुतिरूपं यज्ञेनैव आत्मनैव उक्तलक्षणेन उपजुह्वति प्रक्षिपन्ति सोपाधिकस्य आत्मनः निरुपाधिकेन परब्रह्मस्वरूपेणैव यद्दर्शनं स तस्मिन् होमः तं कुर्वन्ति ब्रह्मात्मैकत्वदर्शननिष्ठाः संन्यासिनः इत्यर्थः।।सोऽयं सम्यग्दर्शनलक्षणः यज्ञः दैवयज्ञादिषु यज्ञेषु उपक्षिप्यते ब्रह्मार्पणम् इत्यादिश्लोकैः प्रस्तुतः श्रेयान् द्रव्यमयाद्यज्ञात् ज्ञानयज्ञः परंतप (गीता 4.33) इत्यादिना स्तुत्यर्थम्

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【 Verse 4.26 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति | शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति ||

▸ Transliteration: śrotrādī nīndriyāṇyanye saṁyamāgniṣu juhvati | śabdādī nviṣayānanya indriyāgniṣu juhvati ||

▸ Glossary: śrotrādīnī : organ of hearing; indriyāṇi: senses; anye: others; saṁyama : self discipline;

Chapter 4 (Part 18)

agniṣu: in the fire; juhvati: offer as sacrifice; śabdādī n: sound vi- brations; viṣayān: objects of sense gratification; anye: others; indriya: of sense organs; agniṣu: in the fire; juhvati: sacrifice

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.26 Some sacrifice the hearing process and other senses in the fire of equanimity and others offer as sacrifice the objects of the senses, such as sound in the fire of the sacrifice.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.26।।अन्य योगीलोग श्रोत्रादि समस्त इन्द्रियोंका संयमरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं और दूसरे योगीलोग शब्दादि विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन किया करते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.26।। अन्य (योगीजन) श्रोत्रादिक सब इन्द्रियों को संयमरूप अग्नि में हवन करते हैं और अन्य (लोग) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.26 श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि organ of hearing and other senses? अन्ये others? संयमाग्निषु in the fire of restraint? जुह्वति sacrifice? शब्दादीन् विषयान् senseobjects such as sound? etc.? अन्ये others? इन्द्रियाग्निषु in the fire of the senses? जुह्वति sacrifice.Commentary Some Yogis are constantly engaged in restraining the senses. They gather their senses under the guidance of the Self and do not allow them to come in contact with the sensual objects. This is also an act of sacficie. Others direct their senses only to the pure and unforbidden objects of the senses. This is also a kind of sacrifice.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.26. [Yet] others offer the sense-organs like sense-of-hearing and the rest into the fiires of [their] restrainer; others offer the objects like sound and the rest into the fires of the sense-organs.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.26 Some sacrifice their physical senses in the fire of self-control; others offer up their contact with external objects in the sacrificial fire of their senses.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.26 Others offer as oblations hearing and other senses in the fires of restraint. Some others offer as oblations the objects of the senses, such as sound and the rest, into the fires of their senses.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.26 Others offer the organs, viz ear etc., in the fires of self-control. Others offer the objects, viz sound etc., in the fires of the organs.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.26 Some again offer the organ of hearing and other senses as sacrifice in the fire of restraint; others offer sound and other objects of the senses as sacrifice in the fire of the senses.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.26 Srotradini etc. But others [offer] the sense-organs into the fires of the restrainer. Restrainer : the mind. Its fires are the tongues of flame that are in the form of subdued views of objects and are capable of burning up desires. Into them they offer the sense-organs. Hence, they are the performers of penance-sacrifices. Still others offer objects into the fires of sense-organs that are fully set-blaze by wisdom and that are capable of burning up the fruits [of actions]. I.e., they seek enjoyment only for destroying the [past] mental impression of differences [between the enjoyer and the objects of enjoyment]. This is the secret and sacred truth. Hence I (Ag.) have myself stated in the laghvi Prakriya (the Little Process) as :

'The object of enjoyment does not manifest as different from you, the enjoyer. Because, it is the [process of] enjoyment that itself is the identification (or unity) of hte enjoyer and the object of enjoyment'.

In the [work] Spanda also [it has been said] :

'It is the enjoyer himself who remains in all the instances and at all times, in the form of the object of enjoyment'.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.26 Others endeavour towards the restraint of the senses like ear and the rest, i.e., keep themselves away from the objects pleasing to the senses. Other Yogins endeavour to prevent the attachment of the senses to sound and other objects of the senses, i.e., they abstain from the sense objects even when they are allowed to be near, by the discriminative process of belittling their valure and enjoyable nature.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.26 Anye, others, other yogis; juhvati, offer; indriyani, the organs; viz srotradini, car etc.; samyama-agnisu, in the fires of self-control. The plural (in fires) is used because self-control is possible in respect of each of the organs. Self-control itself is the fire. In that they make the offering, i.e. they practise control of the organs. anye, others; juhvati, offer; visayan, the objects; sabdadin, viz sound etc.; indriyagnisu, in the fires of the organs. The organs themselves are the fires. They make offerings in those fires with the organs of hearing etc. They consider the perception of objects not prohibited by the scriputures to be a sacrifice.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.26।। सुपरिचित वैदिक यज्ञ के रूपक के द्वारा यहां सब यज्ञों अर्थात् साधनाओं का निरूपण अर्जुन के लिये किया गया है। यज्ञ विधि में देवताओं का अनुग्रह प्राप्त करने के लिये अग्नि में आहुतियाँ दी जाती थीं। इस रूपक के द्वारा यह दर्शाया गया है कि इस विधि में न केवल आहुति भस्म हो जाती है बल्कि उसके साथ ही देवता का आशीर्वाद भी प्राप्त होता है। आत्मज्ञानी पुरुष अथवा साधकगण श्रोत्रादि इन्द्रियों की आहुति संयमाग्नि में देते हैं अर्थात् वे आत्मसंयम का जीवन जीते हैं। इस प्रकार इन्द्रियों की बहिर्मुखी प्रवृत्ति भस्म हो जाती है और साधक को आन्तरिक स्वातन्त्र्य का आनन्द भी प्राप्त होता है। यह एक सुविदित तथ्य है कि इन्द्रियों को जितना अधिक सन्तुष्ट रखने का प्रयत्न हम करते हैं वे उतनी ही अधिक प्रमथनशील होकर हमारी शान्ति को लूट ले जाती हैं। आत्मसंयम की साधना के अभ्यास के द्वारा ही साधक को ध्यान की योग्यता प्राप्त होती हैं।इस श्लोक की प्रथम पंक्ति में इन्द्रिय संयम का उपदेश है तो दूसरी पंक्ति में मनसंयम का। इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों की संवेदनाएं प्राप्त करके ही मन का अस्तित्व बना रहता है। जहां शब्दस्पर्शादि पाँच विषयों का ग्रहण नहीं होता वहां मन कार्य कर ही नहीं सकता। इसलिये विषयों से मन को अप्रभावित रखने की साधना यहां बतायी गयी है जिसके अभ्यास से ध्यानाभ्यास के लिये आवश्यक मन की स्थिरता प्राप्त की जा सकती है। जिस पुरुष ने मन को पूर्ण रूप से संयमित कर लिया है उसके विषय में भगवान् कहते हैं अन्य (साधक) शब्दादिक विषयों को इन्द्रियाग्नि में आहुति देते हैं।प्रथम विधि में विषयों की संवेदनाओं को इन्द्रियों के प्रवेश द्वार पर ही संयमित किया जाता है जबकि दूसरी विधि में (अभ्यांतर में ) मन के सूक्ष्मतर स्तर पर उन्हें नियन्त्रित करने की साधना है।और भी दूसरे प्रकार के यज्ञ बताते हुए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.26।।श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाण्यन्ये योगिनः प्रत्याहारपराः प्रतीन्द्रियं संयम्यप्रत्याहारस्य सत्त्वाद्बहुवचनम्। संयमा एवाग्नयस्तेषु जुह्वति। इन्द्रियसंयमनमेव कुर्वन्तीत्यर्थः। यत्तु धारणाध्यानसमाधित्रितयमेकविषयं संयमशब्देनोच्यते तत्र हृत्पुण्डरीकादौ मनसश्चिरकालस्थापनं धारणा। एवमेकत्र धृतस्य चित्तस्य भगवदाकारवृत्तिप्रवाहोऽन्तरान्तराऽन्याकारप्रत्ययव्यवहितो ध्यानम्। सर्वथा विजातीय प्रत्ययानन्तरितः सजातीयप्रत्ययप्रवाहः समाधिः अनेन रुपेण संयमानां भेदात् अग्निष्विति बहुवचनं तेष्विन्द्रियाणि जुह्वति धारणाध्यानसमाधिसिद्य्धर्थं सर्वाणीन्द्रियाणि स्वस्वविषयेभ्यः प्रत्याहरन्तीत्यर्थ इत्यादि तच्चिन्त्यम्। प्रत्याहाररुपेष्वग्निषु श्रोत्रादीन्द्रियाणां होमस्यात्र विवक्षितत्वादन्यथा होमाधिकरणस्यालाभात् ध्यानादीनां तु मनोहोमाधिकरणत्वादिति दिक्। एतेन तदनेन प्रत्याहारध्यानधारणासमाधिरुपं योगाङ्गचतुष्टयमुक्तमिति प्रत्युक्तम्। प्रत्याहारस्यैवात्राक्षरस्वारस्यात्प्रतीतेः। अतएव तत्र कंचित् बाह्यमाभ्यन्तरं वा विशेषमुपादाय तत्र चेतसो नियमनं क्रियते। ते च संयमा अनेकविषयत्वादनेके पृथक्फलाश्च। तथाच योगसूत्रकृता प्रोक्तंभुवनज्ञानं सूर्यें संयमात् चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानं कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः इत्यादीति परास्तम्। अन्ये तत्त्वविदः प्रारब्धवशादुपलब्धान् शब्दादीन् शास्त्राविरुद्धान्विषयान् इन्द्रियाग्निषु जुह्वति श्रोत्रादिभिरविरुद्धविषयग्रहणं होमं मन्यन्त इत्यर्थः। यत्तु तथान्ये विषयेभ्यः प्रत्याहृतकरणाः धारणाध्यानसमाध्यात्मकं मनसः संयममेकत्र मूलाधाराद्यन्यतमचक्रे कर्तुमशक्ताः समनस्केन्द्रियेषु विषयवियोगाद्दग्धेन्धनानलवत्स्वयं विलीनेषु येषां समाधिबुद्धिस्तैः समनस्केन्द्रियेषु विषया एवोपसंहृता इत्याद्यन्ये समनस्केन्द्रियेषु विषयवियोगाद्दग्धेन्धनानलवत्स्वयं विलीनेषु येषां समाधिबुद्धिस्तैः समनस्केन्द्रियेषु विषया एवोपसंहृता इत्याद्यन्ये वर्णयन्ति तदसत्। इन्द्रियप्रत्याहाररुपस्य यज्ञस्य श्रोत्रादीनीत्यादिनोक्तत्वेन यज्ञान्तरत्वाभावप्रसङ्गात्। उक्तरीत्या विषयासन्निकर्षाग्नौ इन्द्रियाणि जुह्वतीति वक्तव्यत्वापत्तेश्चेति दिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.26।।तदनेन मुख्यगौणौ द्वौ यज्ञौ दर्शितौ यावद्धि किंचिद्वैदिकं श्रेयःसाधनं तत्सर्वं यज्ञत्वेन संपाद्यते तत्र श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि तानि शब्दादिविषयेभ्यः प्रत्याहृत्यान्ये प्रत्याहारपराः संयमाग्निषु धारणा ध्यानं समाधिरिति त्रयमेकविषयं संयमशब्देनोच्यते। तथाचाह भगवान्तपतञ्जलिःत्रयमेकत्र संयमः इति। तत्र हृत्पुण्डरीकादौ मनसश्चिरकालस्थापनं धारणा। एवमेकत्र धृतस्य चित्तस्य भगवदाकारवृत्तिप्रवाहोऽन्तराऽन्याकारप्रत्ययव्यवहितो ध्यानम्। सर्वथा विजातीयप्रत्ययानन्तरितः सजातीयप्रत्ययप्रवाहः समाधिः। सतु चित्तभूमिभेदेन द्विविधः संप्रज्ञातोऽसंप्रज्ञातश्च। चित्तस्य हि पञ्च भूमयो भवन्ति क्षिप्तं मूढं विक्षिप्तमेकाग्रं निरुद्धमिति। तत्र रागद्वेषादिवशाद्विषयेष्वभिनिविष्टं क्षिप्तं तन्द्रादिग्रस्तं मूढं सर्वदा विषयासक्तमपि कदाचिद्ध्याननिष्ठं क्षिप्ताद्विशिष्टतया विक्षिप्तं तत्र क्षिप्तमूढयोः समाधिशङ्कैव नास्ति। विक्षिप्ते तु चेतसि कादाचित्कः समाधिर्विक्षेपप्राधान्याद्योगपक्षे न वर्तते किंतु तीव्रपवनविक्षिप्तप्रदीपवत्स्यमेव नश्यति। एकाग्रं तु एकविषयकधारावाहिकवृत्तिसमर्थं सत्त्वोद्रेकेण तमोगुणकृततन्द्रादिरूपलयाभावादात्माकारवृत्तिः। साच रजोगुणकृतचाञ्चल्यरूपविक्षेपाभावादेकविषयैवेति शुद्धे सत्त्वे भवति चित्तमेकाग्रम् अस्यां भूमौ संप्रज्ञातः समाधिः। तत्र ध्येयाकारा वृत्तिरपि भासते। तस्या अपि निरोधे निरुद्धं चित्तमसंप्रज्ञातसमाधिभूमिः। तदुक्तंतस्या अपि निरोधे सर्ववृत्तिनिरोधान्निर्बीजः समाधिः इति। अयमेव सर्वतो विरक्तस्य समाधिफलमपि सुखमनपेक्षमाणस्य योगिनो दृढभूमिः सन् धर्ममेघ इत्युच्यते। तदुक्तंप्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः इति। अनेन रूपेण संयमानां भेदादग्निष्विति बहुवचनम्। तेषु इन्द्रियाणि जुह्वति धारणाध्यानसमाधिसिद्ध्यर्थं सर्वाणीन्द्रियाणि स्वस्वविषयेभ्यः प्रत्याहरन्तीतत्यर्थः। तदुक्तं स्वस्वविषयासंप्रयोगे चित्तरूपानुकार एवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः इति। विषयेभ्यो निगृहीतानीन्द्रियाणि चित्तरूपाण्येव भवन्ति। ततश्च विक्षेपाभावाच्चित्तं धारणादिकं निर्वहतीत्यर्थः। तदनेन प्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिरूपं योगाङ्गचतुष्टमुक्तम्। तदेवं समाध्यवस्थायां सर्वेन्द्रियवृत्तिनिरोधो यज्ञत्वेनोक्तः। इदानीं व्युत्थानावस्थायां रागद्वेषराहित्येन विषयभोगो यः सोऽप्यपरो यज्ञ इत्याह शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति। अन्ये व्युत्थितावस्थाः श्रोत्रादिभिरविरुद्धविषयग्रहणं स्पृहाशून्यत्वेनान्यसाधारणं कुर्वन्ति स एव तेषां होमः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.26।।यज्ञान्तरमाह श्रोत्रादीनीति। तत्र कंचिद्बाह्यमाभ्यन्तरं वा विशेषमुपादाय तत्र चेतसो नियमनं क्रियते। ते च संयमा अनेकविषयत्वादनेके पृथक्फलाश्च। तथा च योगसूत्रकृता प्रोक्तम्भुवनज्ञानं सूर्ये संयमाच्चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानं कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्ति रित्यादि। त एवाग्नय इन्द्रियेन्धनसंहारहेतुत्वात् तेषु संयमाग्निषु श्रोत्रादीनि जुह्वति प्रक्षिपन्ति। तत्र श्रोत्रमनाहते ध्वनौ संनियम्य हंसोपनिषदुक्तरीत्या घण्टानादादीन्दशनादाननुभवन्ति। नहि तत्र सन्नियते चेतसि शब्दान्तरग्रहणं तदा भवति सोऽयं श्रोत्रस्य संयमाग्नौ होमो बोध्यः। एवमन्यत्रापि तद्वारा च निष्कलं तत्त्वं प्रतिपद्यन्ते। तथान्ये विषयेभ्यः प्रत्याहृतकरणाः धारणाध्यानसमाध्यात्मकं मनसः संयमं एकत्र मूलाधाराद्यन्यतमचक्रे कर्तुमशक्ताः समनस्केन्द्रियेषु विषयवियोगाद्दग्धेन्धनानलवत्स्वयं विलीनेषु येषां समाधिबुद्धिस्तैरिन्द्रियेषु विषया एवोपसंहृता न त्विन्द्रियादीनि मन आदिषु पूर्वोक्तरीत्या उपसंहृतानि। तानेतानिन्द्रियचिन्तकान्प्रकृत्योक्तं वायवीयेदशमन्वन्तराणीह तिष्ठन्तीन्द्रियचिन्तकाः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.26।।अन्ये योगिनः श्रोत्रादीनीन्द्रियाणि संयमाग्निषु जुह्वति।अयमर्थः योगेन मत्प्राप्तीच्छया प्राप्तिप्रतिबन्धकानीन्द्रियाणि निरोधात्मकक्लेशाग्नौ भस्मीकुर्वन्ति। अन्ये भक्तियुतयोगिनः शब्दादीन् विषयान् मत्कथाश्रवणादिरूपान् इन्द्रियाग्निषु भगवत्साक्षात्कारसाधकतयाऽऽत्मभावेनेन्द्रियेषु जुह्वति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.26।।श्रोत्रादीनीति। अन्ये नैष्ठिकब्रह्मचारिणस्तत्तदिन्द्रियसंयमरूपेष्वग्निषु श्रोत्रादीनि जुह्वति प्रविलापयन्ति। इन्द्रियाणि निरुध्य संयमप्रधानास्तिष्ठन्तीत्यर्थः। इन्द्रियाण्येवाग्नयस्तेषु शब्दादीनन्ये गृहस्था जुह्वति विषयान्। भोगसमयेऽप्यनासक्ताः सन्तोऽग्नित्वेन भावितेष्विन्द्रियेषु हविष्ट्वेन भाविताञ्शब्दादीन्प्रक्षिपन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.26।।श्रोत्रादीनिति। अन्ये नैष्ठिकाः संयमरूपेष्वग्निषु प्रविलापयन्ति। अन्ये उपकुर्वाणाः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.26।।अन्य योगीजन संयमरूप अग्नियोंमें श्रोत्रादि इन्द्रियोंका हवन करते हैं। संयम ही अग्नियाँ हैं उन्हींमें हवन करते हैं अर्थात् इन्द्रियोंका संयम करते हैं। प्रत्येक इन्द्रियका संयम भिन्नभिन्न है इसलिये यहाँ बहुवचनका प्रयोग किया गया है। अन्य ( साधकलोग ) इन्द्रियरूप अग्नियोंमें शब्दादि विषयोंका हवन करते हैं। इन्द्रियाँ ही अग्नियाँ हैं उन इन्द्रियाग्नियोंमें हवन करते हैं अर्थात् उन श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा शास्त्रसम्मत विषयोंके ग्रहण करनेको ही होम मानते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.26।। व्याख्या   श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्ये संयमाग्निषु जुह्वति यहाँ संयमरूप अग्नियोंमें इन्द्रियोंकी आहुति देनेको यज्ञ कहा गया है। तात्पर्य यह है कि एकान्तकालमें श्रोत्र त्वचा नेत्र रसना और घ्राण ये पाँचों इन्द्रियाँ अपनेअपने विषयों (क्रमशः शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध) की ओर बिलकुल प्रवृत्त न हों। इन्द्रियाँ संयमरूप ही बन जायँ।पूरा संयम तभी समझना चाहिये जब इन्द्रियाँ मन बुद्धि तथा अहम् इन सबमेंसे रागआसक्तिका सर्वथा अभाव हो जाय (गीता 2। 58 59 68)।शब्दादीन्विषयानन्य इन्द्रियाग्निषु जुह्वति शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध ये पाँच विषय हैं। विषयोंका इन्द्रियरूप अग्नियोंमें हवन करनेसे वह यज्ञ हो जाता है। तात्पर्य यह है कि व्यवहारकालमें विषयोंका इन्द्रियोंसे संयोग होते रहनेपर भी इन्द्रियोंमें कोई विकार उत्पन्न न हो (गीता 2। 64 65)। इन्द्रियाँ रागद्वेषसे रहित हो जायँ। इन्द्रियोंमें रागद्वेष उत्पन्न करनेकी शक्ति विषयोंमें रहे ही नहीं।इस श्लोकमें कहे गये दोनों प्रकारके यज्ञोंमें रागआसक्तिका सर्वथा अभाव होनेपर ही सिद्धि (परमात्मप्राप्ति) होती है। रागआसक्तिको मिटानेके लिये ही दो प्रकारकी प्रक्रियाका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है पहली प्रक्रियामें साधक एकान्तकालमें इन्द्रियोंका संयम करता है। विवेकविचार जपध्यान आदिसे इन्द्रियोंका संयम होने लगता है। पूरा संयम होनेपर जब रागका अभाव हो जाता है तब एकान्तकाल और व्यवहारकाल दोनोंमें उसकी समान स्थिति रहती है।दूसरी प्रक्रियामें साधक व्यवहारकालमें रागद्वेषरहित इन्द्रियोंसे व्यवहार करते हुए मन बुद्धि और अहम्से भी रागद्वेषका अभाव कर देता है। रागका अभाव होनेपर व्यवहारकाल और एकान्तकाल दोनोंमें उसकी समान स्थिति रहती है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.26।।श्रोत्रादीनीति। अन्ये तु संयमाग्निष्विन्द्रियाणीति। संयमः मनः तस्य ये अग्नयः प्रतिपन्नभावभावनारूपा अभिलाषप्लोषका विस्फुलिङ्गाः तेषु इन्द्रियाणि अर्पयन्ति। अत एव ते तपोयज्ञाः। इतरे ज्ञानपरिदीपितेषु फलदाहकेषु इन्द्रियाग्निषु विषयानर्पयन्ति भेदवासनानिरासायैव (K भोगवासना) भोगानभिलषन्ति इत्युपनिषत्। तथाच मयैव लघ्व्यां प्रक्रियायामुक्तम् न भोग्यं व्यतिरिक्तं हि भोक्तुस्त्वत्तो विभाव्यते।एष एव ही भोगो यत् तादात्म्यं भोक्तृभोग्ययोः।।4. इति स्पन्देऽपि ( omits स्पन्देऽपि and the succeeding hemistitch. ) भोक्तैव भोग्यभावेन सदा सर्वत्र संस्थितः।इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.26।।संप्रति यज्ञद्वयमुपन्यस्यति श्रोत्रादीनीति। बाह्यानां करणानां मनसि संयमस्यैकत्वात्कथं संयमाग्निष्विति बहुवचनमित्याशङ्क्याह प्रतीन्द्रियमिति। संयमानां प्रत्याहाराधिकरणत्वेन व्यवस्थितानां मनोरूपाणां होमाधारत्वादग्नित्वं व्यपदिशति संयमा इति। विषयेभ्योऽन्तर्बाह्यानीन्द्रियाणि प्रत्याहरन्तीति संयमयज्ञं संक्षिप्य दर्शयति इन्द्रियेति। श्रोत्रादीन्द्रियाग्निषु शब्दादिविषयहोमस्य तत्तदिन्द्रियैस्तत्तद्विषयोपभोगलक्षणस्य सर्वसाधारणत्वमाशङ्क्य प्रतिषिद्धान्वर्जयित्वा रागद्वेषरहितो भूत्वा प्राप्तान्विषयानुपभुञ्जते तैस्तैरिन्द्रियैरिति विवक्षितं होमं विशदयति श्रोत्रादिभिरिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.26।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.26।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.26।।अन्ये श्रोत्रादीनाम् इन्द्रियाणां संयमने प्रयतन्ते। शब्दादीन् विषयान् अन्ये योगिनः इन्द्रियाणां शब्दादिविषयप्रवणतानिवारणे प्रयतन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.26।। श्रोत्रादीनि इन्द्रियाणि अन्ये योगिनः संयमाग्निषु। प्रतीन्द्रियं संयमो भिद्यते इति बहुवचनम्। संयमा एव अग्नयः तेषु जुह्वति इन्द्रियसंयममेव कुर्वन्ति इत्यर्थः। शब्दादीन् विषयान् अन्ये इन्द्रियाग्निषु इन्द्रियाण्येव अगन्यः तेषु इन्द्रियाग्निषु जुह्वति श्रोत्रादिभिरविरुद्धविषयग्रहणं होमं मन्यन्ते।।किञ्च

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【 Verse 4.27 】

▸ Sanskrit Sloka: सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे | आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते ||

▸ Transliteration: sarvāṇīndriyakarmāṇi prāṇakarmāṇi cāpare | ātmasaṁyamayogāgnau juhvati jñānadī pite ||

▸ Glossary: sarvāṇi: all; indriya: senses; karmāṇi: actions; prāṇakarmāṇi: activities of the life breath; ca: also; apare: others; ātmasaṁyama: self control; yoga: yoga; agnau: in the fire of; juhvati: offer; jñāna dīpite: kindled by wisdom.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.27 One who is interested in knowledge offers all the actions due to the senses, including the action of taking in the life breath into the fire of Yoga and is engaged in the yoga of the equanimity of the mind.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.27।।अन्य योगीलोग सम्पूर्ण इन्द्रियोंकी क्रियाओंको और प्राणोंकी क्रियाओंको ज्ञानसे प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.27।। दूसरे (योगीजन) सम्पूर्ण इन्द्रियों के तथा प्राणों के कर्मों को ज्ञान से प्रकाशित आत्मसंयमयोगरूप अग्नि में हवन करते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.27 सर्वाणि all? इन्द्रियकर्माणि functions of the senses? प्राणकर्माणि functions of the breath (vital energy)? च and? अपरे other? आत्मसंयमयोगाग्नौ in the fire of the Yoga of selfrestraitn? जुह्वति sacrifice? ज्ञानदीपिते kindled by knowledge.Commentary Just as a lamp is kindled by oil? so also the fire of the Yoga of selfcontrol is kindled by knowledge. When the Yogi concentrates or fixes his mind on Brahman or the Self? the senses and the breath cease to function. The senses and the breath are absorbed into their cause.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.27. Some others offer all actions of their sense-organs and the actions of their life-breath into the fire of Yoga of the self control, set ablaze by wisdom.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.27 Other again sacrifice their activities and their vitality in the Spiritual fire of self-abnegation, kindled by wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.27 Some again offer as oblation the functions of the senses and the activity of the vital breaths into the fire of the Yoga of restraint of the mind kindled by knowledge.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.27 Others offer all the activities of the organs and the activities of the vital force into the fire of the yoga of sel-control which has been lighted by Knowledge.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.27 Others again sacrifice all the functions of the senses and those of the breath (vital energy or Prana) in the fire of the Yoga of self-restraint kindled by knowledge.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.27 See Comment under 4.28

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.27 Some again offer as oblations all the functions of the senses, the activities of the vital breath etc., into the fire of Yoga of restraint of the mind kindled by knowledge. They endeavour to prevent the mind from getting attached to the functions of the senses and vital breaths. That is, by contemplating on the self they sublimate these energies and overcome even the lurking subtle desires for them.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.27 Further, apare, others; juhvati, offer, i.e. merge; sarvani, all; indriya-karmani, the activities of the organs; and also the prana-karmani, activities of the vital force- prana means the air in the body; they offer its activities such as contraction, expansion, etc; atma-samyama yoga-agnau, into the fire of the yoga of self-control-withdrawal (samyama) [Samyama consists of concentration, meditation, and Self-absorption. The idea conveyed by the verse is that by stopping all activities, they concentrate the mind on the Self.] into the Self (atma) is self-control (atma-samyama); that itself is the fire of yoga (yoga-agni); (they offer) into that fire; jnana-dipite, which has been lighted by Knowledge, made to blaze up by discriminating knowledge, as if lighted up by oil.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.27।। दिव्य सत्य के ज्ञान के द्वारा अहंकार को संयमित करने को यहां आत्मसंयम योग कहा गया है।आत्मानात्मविवेक के द्वारा परिच्छिन्न संसारी अहंकार से अपरिच्छिन्न आनन्दस्वरूप आत्मा को विलग करके उसमें ही दृढ़ स्थिति प्राप्त करने के अभ्यास का अर्थ ही आत्मा के द्वारा अहंकार को संयमित करना है। इसे ही आत्मसंयम कहते हैं। इस साधना के द्वारा कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों के अनियन्त्रित व्यापार को नियन्त्रित किया जा सकता है।इस प्रकार पांच यज्ञों का वर्णन करने के पश्चात् भगवान् अगले श्लोक में पाँच और साधनाएँ बताते हैं मानो वे अर्जुन को यह समझाना चाहते हों कि इस प्रकार की सैकड़ो साधनाएं बतायी जा सकती हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.27।। किंच सर्वाणीन्द्रियकर्माणि इन्द्रियाणां श्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाख्यानां ज्ञानेन्द्रियाणां वाक्पाणिपादपायूस्थाभिधानां कर्मेन्द्रियाणां कर्माणि शब्दस्पर्शरुपरसगन्धग्रहणात्मकानि वचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाख्यानि च तथा प्राणानां प्राणापानव्यानोदानसमानाभिधानां कर्माणि बहिर्नयनमधोनयनमाञ्चनप्रसारणादि अशितपीतसमनयनमूर्ध्वनयनमित्यादिनिउद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्मृतः। कुकरः क्षुत्करो ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे। न जहाति भृतं चापि सर्वव्यापी धनंजयः इत्युक्तानि नागादिपञ्चप्राणकर्माणि चापरे आत्मनि संयमः प्रविलापनं सएव योगाग्निस्तस्मिन् तैलेन दीप इव ज्ञानेन विवेकेन सर्वोपाधिनिरासेनोज्जवलतामापादिते जुह्वति। प्रविलापयन्तीत्यर्थः। अत्र भाष्यस्य समानरुपतया न तेन व्याख्यान्तराणां विरोध इति ध्येयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.27।।तदेवं पातञ्जलमतानुसारेण लयपूर्वकं समाधिं ततो व्युत्थानं च यज्ञद्वयमुक्त्वा ब्रह्मवादिमतानुसारेण बाधपूर्वकं समाधिं कारणोच्छेदेन व्युत्थानशून्यं सर्वफलभूतं यज्ञान्तरमाह द्विविधो हि समाधिर्भवति लयपूर्वको बाधपूर्वकश्च। तत्रतदनन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः इति न्यायेन कारणव्यतिरेकेण कार्यस्यासत्त्वात्पञ्चीकृतपञ्चभूतकार्यं व्यष्टिरूपं समष्टिरूपविराट्कार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। तथा समष्टिरूपमपि पञ्चीकृतपञ्चभूतात्मकं कार्यमपञ्चीकृतपञ्चमहाभूतकार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। तत्रापि पृथिवी शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाख्यपञ्चगुणा गन्धेतरचतुर्गुणाप्कार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। ताश्चर्गुणा आपो गन्धरसेतरत्रिगुणात्मकतेजःकार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण न सन्ति। तदपि त्रिगुणात्मकं तेजो गन्धरसरुपेतरद्विगुणवायुकार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। सोऽपि द्विगुणात्मको वायुः शब्दमात्रगुणाकाशकार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। सच शब्दगुण आकाशो बहु स्यामिति पमेरश्वरसंकल्पात्मकाहंकारकार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। सोऽपि संकल्पात्मकोऽहंकारो मायेक्षणरूपमहत्तत्वकार्यत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। तदपीक्षणरूपं महत्तत्त्वं मायापरिणामत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्ति। तदपि मायाख्यं कारणं जडत्वेन चैतन्येऽध्यस्तत्वात्तद्व्यतिरेकेण नास्तीत्यनुसंधानेन विद्यामार्थेऽपि कार्यकारणात्मके प्रपञ्चे चैतन्यमात्रगोचरो यः समाधिः स लयपूर्वक उच्यते। तत्र तत्त्वमस्यादिवेदान्तमहावाक्यार्थज्ञानाभावेनाविद्यातत्कार्यस्याक्षीणत्वात्। एवं चिन्तनेऽपि कारणसत्त्वेन पुनः कृत्स्नप्रञ्चोत्थानादयं सुषुप्तिवत्सबीजः समाधिर्न मुख्यः। मुख्यस्तु तत्त्वमस्यादिमहावाक्यार्थसाक्षात्कारेणाविद्यायां निवृत्तौ सर्गक्रमेण तत्कार्यनिवृत्तेरनाद्यविद्यायाश्च पुनरुत्थानाभावेन तत्कार्यस्यापि पुनरुत्थानाभावान्निर्बीजो बाधपूर्वकः समाधिः।सएवानेन श्लोकेन प्रदर्श्यते। तथाहि सर्वाणि निखिलानि स्थूलरूपाणि संस्काररूपाणि चेन्द्रियकर्माणीन्द्रियाणश्रोत्रत्वक्चक्षूरसनघ्राणाख्यानां पञ्चानां वाक्पाणिपाद्पायूपस्थाख्यानां च पञ्चानां बाह्यानामान्तरयोश्च मनोबुद्ध्योः कर्माणि शब्दश्रवणस्पर्शग्रहणरूपदर्शनरसग्रहणगन्धग्रहणानिवचनादानविहरणोत्सर्गानन्दाख्यानि च संकल्पाध्यवसायौ च एवं प्राणकर्माणि च प्राणानां प्राणापानव्यानोदानसमानाख्यानां पञ्चानां कर्माणि बहिर्नयनमधोनयनमाकुञ्चनप्रसारणादि अशितपीतसमनयनमूर्ध्वनयनमित्यादीनि। अनेन पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि पञ्च कर्मेन्द्रियाणि पञ्च प्राणा मनो बुद्धिश्चेति सप्तदशात्मकं लिङ्गमुक्तम। तच्च सूक्ष्मभूतसमष्टिरूपं हिरण्यगर्भाख्यमिह विवक्षितमिति वदितुं सर्वाणीति विशेषणम्। आत्मसंयमयोगाग्नौ आत्मविषयकः संयमो धारणाध्यानसंप्रज्ञातसमाधिरूपस्तत्परिपाके सति योगो निरोधसमाधिः। यं पतञ्जलिः सूत्रयामासव्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधलक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः इति। व्युत्थानं क्षिप्तमूढविक्षिप्ताख्यं भूमित्रयं तत्संस्काराः समाधिविरोधिनस्ते योगिना प्रयत्नेन प्रतिदिनं प्रतिक्षणं चाभिभूयन्ते। तद्विरोधिनश्च निरोधसंस्काराः प्रादुर्भवन्ति। ततश्च निरोधमात्रक्षणेन चित्तान्वयो निरोधपरिणाम इति। तस्य फलमाह ततः प्रशान्तवाहितासंस्कारादिति। तमोरजसोः क्षयाल्लयविक्षेपशून्यत्वेन शुद्धसत्त्वस्वरूपं चित्तं प्रशान्तमित्युच्यते। पूर्वपूर्वप्रशमसंस्कारपाटवेन तदाधिक्यं प्रशान्तवाहितेति। तत्कारणं च सूत्रयामासविरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः इति। विरामो वृत्त्युपरमस्तस्य प्रत्ययः कारणं वृत्त्युपरमार्थः पुरुषप्रयत्नस्तस्याभ्यासः पौनःपुन्येन संपादनं तत्पूर्वकस्तज्जन्योऽन्यः संप्रज्ञाताद्विलक्षणोऽसंप्रज्ञात इत्यर्थः। एतादृशो य आत्मसंयमयोगः स एवाग्निस्तस्मिञ्ज्ञानदीपिते ज्ञानं वेदान्तवाक्यजन्यो ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारस्तेनाविद्यातत्कार्यनाशद्वारा दीपिते अत्यन्तोज्ज्वलिते बाधपूर्वके समाधौ समष्टिलिङ्गशरीरमपरे जुह्वति। प्रविलापयन्तीत्यर्थः। अत्र च सर्वाणीति आत्मेति ज्ञानदीपित इति विशेषणैरग्नावित्येकवचनेन च पूर्ववैलक्षण्यं सूचितमिति न पौनरुक्त्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.27।।इतो विशिष्टं योगान्तरमाह सर्वाणीति। इन्द्रियाणां कर्माणि शब्दादिग्रहणानि प्राणकर्माण्याकुञ्चनप्रसारणश्वासप्रश्वासादीनि। अपरे यगिनः आत्मनि बुद्धौ संयमः स एव योगोऽग्निश्च तस्मिन् ज्ञानेन देहेन्द्रियप्राणमनोव्यतिरिक्तात्मज्ञानेन दीपिते प्रकाशिते जुह्वति प्रविलापयन्ति। इन्द्रिययोगिनां हि सुप्ताविव प्राणोऽनुपसंहृत एवास्ते। तत्सहचरस्य मनसोऽनुपसंहारात्। बुद्धियोगिनां तु मनसोऽप्युपसंहारात्तदायत्तस्य प्राणस्याप्युसंहारो भवतीति विशेषः। एतेषामपि बुद्धौ बोद्धव्याभावात्पूर्ववल्लीनायां समाधिबुद्धिरस्ति नत्वेतैर्बुद्धेरन्यत्वेन नात्मा ज्ञातो नापि तस्मिन्बुद्धिरुपसंहृता। अतएवैतान्प्रकृत्योक्तं वायवीयेबौद्धा दशसहस्राणि तिष्ठन्ति विगतज्वराः इति। बौद्धा बुद्धौ लीनाः दशसहस्राणि मन्वन्तराणीत्यनुषङ्गात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.27।।अपरे योगिनः सर्वाणि इन्द्रियकर्माणि इन्द्रियकृत्यान्। अकृत्वैव च पुनः प्राणकर्माणि पञ्चप्राणकृत्यान् क्षुत्पिपासादिना भोजनपानादीनकृत्वैव ज्ञानदीपिते ज्ञानेन मत्स्वरूपाप्तितापोन्मुखीकृते आत्मनो मत्प्राप्त्यर्थं यः संयमो नियमनं स एवाग्निः सर्वस्यापि स्वकरणरूपस्तस्मिन् जुह्वति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.27।।सर्वाणीति। अपरे ध्याननिष्ठाः बुद्धीन्द्रियाणां श्रोत्रादीनां कर्माणि श्रवणदर्शनादीनि। कर्मेन्द्रियाणां वाक्पाण्यादीनां कर्माणि वचनोपादानादीनि च प्राणानां दशानां कर्माणि। प्राणस्य बहिर्गमनम्। अपानस्याधोनयनम्। व्यानस्य व्यानयनाकुञ्चनप्रसारणादि। समानस्याशितपीतादीनां सम्यगुन्नयनम्। उदानस्योर्ध्वनयनम्।उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्मृतः। कृकरः क्षुतकृज्ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे। न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापी धनंजयः इत्येवंरूपाणि जुह्वति। क्व। आत्मनि संयमो ध्यानैकाग्र्यं स एव योगः स एवाग्निस्तस्मिन् ज्ञानेन ध्येयविषयेण दीपिते प्रज्वलिते ध्येयं सम्यग्ज्ञात्वा तस्मिन्मनः संयम्य तानि सर्वाणि कर्माण्युपरमयन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.27।।अपरे ध्याननिष्ठाः ज्ञानेन ध्येयविषयकेण। एवं त्रयो यज्ञकर्त्तारः मध्यमजधन्योत्तमा निरूपिताः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.27।।तथा दूसरे साधक इन्द्रियोंके सम्पूर्ण कर्मोंको और शरीरके भीतर रहनेवाला वायु जो प्राण कहलाता है उसके संकुचित होने फैलने आदि कर्मोंको ज्ञानसे प्रकाशित हुई आत्मसंयमरूप योगाग्निमें हवन करते हैं। आत्मविषयक संयमका नाम आत्मसंयम है वही यहाँ योगाग्नि है। घृतादि चिकनी वस्तुसे प्रज्वलित हुई अग्निकी भाँति विवेकविज्ञानसे उज्ज्वलताको प्राप्त हुई ( धारणाध्यानसमाधिरूप ) उस आत्मसंयम योगाग्निमें ( वे प्राण और इन्द्रियोंके कर्मोंको ) विलीन कर देते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.27।। व्याख्या   सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे इस श्लोकमें समाधिको यज्ञका रूप दिया गया है। कुछ योगीलोग दसों इन्द्रियोंकी क्रियाओंका समाधिमें हवन किया करते हैं। तात्पर्य यह है कि समाधिअवस्थामें मनबुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों(ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों) की क्रियाएँ रुक जाती हैं। इन्द्रियाँ सर्वथा निश्चल और शान्त हो जाती हैं।समाधिरूप यज्ञमें प्राणोंकी क्रियाओँका भी हवन हो जाता है अर्थात् समाधिकालमें प्राणोंकी क्रियाएँ भी रुक जाती हैं। समाधिमें प्राणोंकी गति रोकनेके दो प्रकार हैं एक तो हठयोगकी समाधि होती है जिसमें प्राणोंको रोकनेके लिये कुम्भक किया जाता है। कुम्भकका अभ्यास बढ़तेबढ़ते प्राण रुक जाते हैं जो घंटोंतक दिनोंतक रुके रह सकते हैं। इस प्राणायामसे आयु बढ़ती है जैसे वर्षा होनेपर जल बहने लगता है तो जलके साथसाथ बालू भी आ जाती है उस बालूमें मेढक दब जाता है। वर्षा बीतनेपर जब बालू सूख जाती है तब मेढक उस बालूमें ही चुपचाप सूखे हुएकी तरह पड़ा रहता है उसके प्राण रुक जाते हैं। पुनः जब वर्षा आती है तब वर्षाका जल ऊपर गिरनेपर मेढकमें पुनः प्राणोंका संचार होता जाता है और वह टर्राने लग जाता है।दूसरे प्रकारमें मनको एकाग्र किया जाता है। मन सर्वथा एकाग्र होनेपर प्राणोंकी गति अपनेआप रुक जाती है।ज्ञानदीपिते समाधि और निद्रा दोनोंमें कारणशरीरसे सम्बन्ध रहता है इसलिये बाहरसे दोनोंकी समान अवस्था दिखायी देती है। यहाँ ज्ञानदीपिते पदसे समाधि और निद्रामें परस्पर भिन्नता सिद्ध की गयी है। तात्पर्य यह कि बाहरसे समान दिखायी देनेपर भी समाधिकालमें एक सच्चिदानन्द परमात्मा ही सर्वत्र परिपूर्ण है ऐसा ज्ञान प्रकाशित (जाग्रत्) रहता है और निद्राकालमें वृत्तियाँ अविद्यामें लीन हो जाती हैं। समाधिकालमें प्राणोंकी गति रुक जाती है और निद्राकालमें प्राणोंकी गति चलती रहती है। इसलिये निद्राआनेसे समाधि नहीं लगती।आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति चित्तवृत्तिनिरोधरूप अर्थात् समाधिरूप यज्ञ करनेवाले योगीलोग इन्द्रियों तथा प्राणोंकी क्रियाओंका समाधियोगरूप अग्निमें हवन किया करते हैं अर्थात् मनबुद्धिसहित सम्पूर्ण इन्द्रियों और प्राणोंकी क्रियाओंको रोककर समाधिमें स्थित हो जाते हैं। समाधिकालमें सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और प्राण अपनी चञ्चलता खो देते हैं। एक सच्चिदानन्दघन परमात्माका ज्ञान ही जाग्रत् रहता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.27 4.28।।सर्वाणीति। द्रव्ययज्ञा इति। ते च सर्वानिन्द्रियव्यापान् मानसान् व्यापारान् मुखनासिकानिर्गमनमूत्राद्यधोनयनादीन् वायवीयांश्च आत्मनो मनसः ( N मनसश्च) संयमहेतौ योगनाम्नि ऐकाग्र्यवह्नौ सम्यग्ज्ञानपरिदीपिते ( परिबोधिते) पूरयितव्ये निवेशयन्ति। गृह्यमाणं विषयं संकल्प्यमानं वा तदेकाग्रतयैव परित्यक्तान्यव्यापारया ( N तत्परित्यक्तान्य ) बुद्ध्या गृह्णन्ति इति तात्पर्यम्। तदुक्तं शिवोपनिषदि भावेऽत्यक्ते (S N भावे त्यक्ते) निरुद्धा चित् ( N चेत्) नैव भावान्तरं व्रजेत्।तदा तन्मध्यभावेन (K तन्मयभावेन) विकसत्यति भावना।।4. (विज्ञानभैरव 62 ) इति।एवं योगयज्ञाः व्याख्यातः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.27।।यज्ञान्तरं कथयति किञ्चेति। इन्द्रियाणां कर्माणि श्रवणवदनादीन्यात्मनि संयमो धारणाध्यानसमाधिलक्षणः। सर्वमपि व्यापारं निरुध्यात्मनि चित्तसमाधानं कुर्वन्तीत्याह विवेकेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.27।।आत्मसंयमेत्येतद्दुर्गमार्थत्वाद्व्याख्याति आत्मेति। आत्मनो मनसः। आत्मसंयमाख्योऽयमुपायः स एवाग्निः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.27।।आत्मसंयमाख्योपायाग्नौ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.27।।अन्ये ज्ञानदीपिते मनःसंयमयोगाग्नौ सर्वाणि इन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि च जुह्वति मनसा इन्द्रियप्राणानां कर्मप्रवणतानिवारणे प्रयतन्ते इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.27।। सर्वाणि इन्द्रियकर्माणि इन्द्रियाणां कर्माणि इन्द्रियकर्माणि तथा प्राणकर्माणि प्राणो वायुः आध्यात्मिकः तत्कर्माणि आकुञ्चनप्रसारणादीनि तानि च अपरे आत्मसंयमयोगाग्नौ आत्मनि संयमः आत्मसंयमः स एव योगाग्निः तस्मिन् आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति ज्ञानदीपिते स्नेहेनेव प्रदीपे विवेकविज्ञानेन उज्ज्वलभावम् आपादिते जुह्वति प्रविलापयन्ति इत्यर्थः।।

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【 Verse 4.28 】

▸ Sanskrit Sloka: द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे | स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतय: संशितव्रता: ||

▸ Transliteration: dravyayajñāstapoyajñā yogayajñāstathāpare | svādhyāyajñānayajñāśca yatayaḥ saṁśitavratāḥ ||

▸ Glossary: dravya: material wealth; yajñāḥ : sacrifice; tapo: penance; yajñāḥ : sacrifice; yoga: yoga; yajñāḥ: sacrifice; tathā : and; apare: others; svādhyāya: self-study; jñāna: knowledge; yajñāḥ: sacrifice; ca: and; yatayaḥ: striving souls; saṁśita vratāḥ: those of strict vows.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.28 There is the sacrifice of material wealth, sacrifice through penance, sacrific through yoga and other sacrifices while there is sacrifice through self-study and through strict vows.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.28।।दूसरे कितने ही तीक्ष्ण व्रत करनेवाले प्रयत्नशील साधक द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं और कितने ही तपोयज्ञ करनेवाले हैं और दूसरे कितने ही योगयज्ञ करनेवाले हैं तथा कितने ही स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.28।। कुछ (साधक) द्रव्ययज्ञ तपयज्ञ और योगयज्ञ करने वाले होते हैं और दूसरे कठिन व्रत करने वाले स्वाध्याय और ज्ञानयज्ञ करने वाले योगीजन होते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.28 द्रव्ययज्ञाः those who offer wealth as sacrifice? तपोयज्ञाः those who offer austerity as sacrifice? योगयज्ञाः those who offer Yoga as sacrifice? तथा thus? अपरे others? स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः those who offer study and knowledge as sacrifice? च and? यतयः ascetics or anchorites (persons of selfrestraint)? संशितव्रताः persons of rigid vows.Commentary Some do sacrifice by distributing their wealth to the deserving as charity some offer their Tapas (austerities) as sacrifice some practise the eight limbs of Raja Yoga? viz.? Yama (the five great vows)? Niyama (the canons of conduct)? Asana (posture)? Pranayama (restraint of breath)? Pratyahara (withdrawal of the senses)? Dharana (concentration)? Dhyana (meditation) and Samadhi (superconscious state)? and offer this Yoga as a sacrifice some study the scriptures and offer it as sacrifice.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.28. [These] are [respectively] the performs of sacrifices with material objects, the performers of sacrifices with penance, and the performers of sacrifices with Yoga. Likewise [there are] yet other ascetics with rigid vows whose sacrifices are the svadhyaya-knowledge.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.28 And yet others offer as their sacrifice wealth, austerities and meditation. Monks wedded to their vows renounce their scriptural learning and even their spiritual powers.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.28 Self-controlled and firm of resolve, others perform the sacrifice of material objects or austerities or Yoga; while others offer their scriptural study and knowledge.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.28 Similarly, others are performers of sacrifices through wealth, through austerity, through yoga, and through study and knowledge; others are ascetics with severe vows.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.28 Others again offer wealth, austerity and Yoga as sacrifice, while the ascetics of self-restraint and rigid vows offer study of scriptures and knowledge as sacrifice.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.27-28 Sarvani etc. Dravyayajnak etc. Again all the activities of their sense-organs, the activities of their mind, and the activities of their vital airs, such as issuing through the mouth and nose, driving down the urine etc., other [seekers] established in the fire of concentration, named Yoga, which is the means for subduing the self i.e., the mind, and which is set ablaze by i.e., to be filled with, knowledge. The idea is this : With their intellect that has completely abandoned all other activities due to their concentration on the object, they receive the object that is being perceived on conceived. That has been stated in the Sivopanisad :

'When the intellect, concentrated on a certain object, not rejected, would not go to another object, at that time the meditation, remaining in the core of the objects, blossoms very much.'

Thus the Yoga-sacrifices are explained. So far the performers of the material-object-sacrifices, the austerity-sacrifices, and the yoga-sacrifices have been defined. Those, who are the performers of the svadhyaya-knowledge-sacrifices are defined now [as] -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.28 Some Karma Yogins perform the sacrifice of material objects. Some worship the gods with materials honestly acired. Some practise charity, some engage themselves in sacrifices and in making oblations into the sacred fire. All these perform sacrifice with material objects. Some do the sacrifice of austerity by devoting themselves to Krcchra, Candrayana, fast, etc. Others perform the sacrifice of Yoga. Some devote themselves to making pilgrimages to sacred sanctuaries and holy places. Here the term Yoga means pilgrimages to sacred sancturaries and holy places as the context relates to aspects of Karma Yoga. Some are devoted to recitation of Vedic texts and some to learning their meaning. They are all devoted to the practice of self-control and of strict vows, i.e., they are men to steady resolution.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.28 Tatha, similarly; apare, others; are dravya-yajnah, perfomers of sacrifices through wealth-those sacrificers who spend wealth (dravya) in holy places under the idea of performing sacrifices; tapo-yajnah, performers of sacrifices through austerity, men of austerity, to whom austerity is a sacrifice; [This is according to Ast.-Tr.] yogayajnah, performers of sacrifice through yoga-those to whom the yoga consisting in the control of the vital forces, withdrawal of the organs, etc., is a sacrifice; and svadhyaya-jnana-yajnah, performers of sacrifices through study and knowledge. Sacrificers through study are those to whom the study of Rg-veda etc. accroding to rules is a sacrifice. And sacrificers through knowledge are those to whom proper understanding of the meaing of the scriptures is a sacrifice. Others are yatayah, ascetics, who are deligent; samsita-vratah, in following severe vows. Those whose vows (vratah) have been fully sharpened (samsita), made very rigid, are samsita-vratah. [Six kinds of sacrifices have been enumerated in this verse.] Further,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.28।। द्रव्ययज्ञ यहां द्रव्य शब्द को उसके व्यापक अर्थ में समझना चाहिये। ईमानदारी से अर्जित किये धन का समाज सेवा में भक्तिभाव सहित विनियोग करने को द्रव्ययज्ञ कहते हैं। यह आवश्यक नहीं कि इसमें केवल अन्न या धन का ही दान हो।द्रव्य शब्द के अर्थ में वे सब वस्तुएं समाविष्ट हैं जो हमारे पास हैं जैसे भौतिक सम्पत्ति प्रेम और सद्विचार। ईश्वर की पूजा समझ कर अपनी इन भौतिक मानसिक एवं बौद्धिक

Chapter 4 (Part 19)

सम्पदाओं का समाजसेवा में सदुपयोग करना ही द्रव्ययज्ञ कहलाता है। अत इस यज्ञ के अनुष्ठान के लिए साधक का धनवान होना आवश्यक नहीं है। दरिद्र अथवा शरीर से अपंग होते हुए भी हम जगत् के कल्याण की कामना कर सकते हैं और हृदय से प्रार्थना कर सकते हैं। हार्दिक सहानुभूति का एक शब्द कृपा का एक कटाक्ष स्नेह सिंचित स्मिति अथवा मैत्रीपूर्ण सदव्यवहार पाषाणीमन से दी हुई बड़ी धनराशि से भी अधिक महत्व का होता है।तपोयज्ञ कुछ साधक गण अपना तपोमय जीवन ईश्वर को अर्पित करते हैं। विश्व में ऐसा कोई धर्म नहीं जो किसी न किसी प्रकार से तप या व्रत का जीवन जीने का उपदेश न करता हो। ये व्रत परमेश्वर प्रीत्यर्थ ही किये जाते हैं। यह तो सब जानते ही हैं कि भक्त द्वारा किये गये भोग के त्याग से समस्त विश्व के पालन और पोषणकर्त्ता करुणासागर परमात्मा का कोई विशेष प्रयोजन सिद्ध होने का नहीं तथापि साधकगण उसे ईश्वरार्पण करते हैं जिससे उन्हें आत्मसंयम और चित्त शुद्धि प्राप्त हो। कोईकोई तप शरीर के लिये अत्यन्त पीड़ादायक होते हैं फिर भी यदि उन्हें समझ कर किया जाय तो इन्द्रिय संयम प्राप्त हो सकता है।योगयज्ञ अपने मन से निकृष्ट प्रवृत्तियों का त्याग करके उत्कृष्ट जीवन जीने के सतत् प्रयत्न का नाम है योग। इसकी प्राथमिक साधना है अपने हृदय के इष्ट भगवान् की भक्ति पूर्वक पूजा करना। इसका ही नाम है उपासना। निष्काम भावना से उपासना का अनुष्ठान करने पर साधक की अध्यात्म मार्ग में प्रगति होती है इसलिये इसे योग कहा गया है और यज्ञ भावना से इसका अनुष्ठान करने के कारण यहां योगयज्ञ कहा गया है।स्वाध्याय यज्ञ प्रतिदिन शास्त्रों का अध्ययन करना स्वाध्याय कहलाता है। शास्त्रों के अध्ययन के बिना हम न तो अपने लक्ष्य को ही निर्धारित कर सकते हैं और न ही साधना अभ्यास का अर्थ ही समझ सकते हैं। ज्ञानरहित यन्त्रवत् साधना से अपेक्षित प्रगति नहीं हो सकती। यही कारण है कि सभी धर्मों में दैनिक स्वाध्याय पर विशेष बल दिया जाता है। आत्मानुभव के पश्चात् भी ऋषि मुनि अपना अधिकांश समय शास्त्राध्ययन तथा उसके गम्भीर चिन्तन मनन में व्यतीत करते हैं।अध्यात्म दृष्टि से स्वाध्याय का अर्थ है स्वयं का अध्ययन अर्थात् आत्मनिरीक्षण के द्वारा अपनी दुर्बलताओं को समझना जिससे उनका परित्याग किया जा सके। साधक के लिये यह आत्मविकास का एक साधन है तो सिद्ध पुरुषों के लिये आत्मानुभव में रमण का।ज्ञानयज्ञ गीता में यह शब्द अनेक स्थानों पर प्रयुक्त है और व्यास जी ने जिन मौलिक शब्दों का प्रयोग गीता में किया है उनमें से यह एक है। वह साधना ज्ञानयज्ञ कहलाती है जिसमें साधक ज्ञान की अग्नि प्रज्वलित करके उसमें अपने अज्ञान की आहुति देता है। आत्मानात्मविवेक के द्वारा अनात्म वस्तु का निषेध एवं आत्मा के पारमार्थिक सत्यस्वरूप का प्रतिपादन इस यज्ञ के अंग हैं। निदिध्यासन में इसी का अभ्यास किया जाता है।आत्मोन्नति के उपर्युक्त पाँच साधनों का लाभ दृढ़ निश्चयी एवं उत्साहपूर्ण अभ्यासी साधकों को ही मिल सकता है। इन साधकों को केवल ज्ञान अथवा आत्मविकास की इच्छामात्र से कोई प्रगति नहीं हो सकती। पूर्ण लगन से जो निरन्तर साधना का अभ्यास करते हैं केवल वे ही साधक अध्यात्म के मार्ग पर सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकते हैं।साधनोपदेश के क्रम में अब भगवान् प्राणायाम की विधि बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.28।।एवं त्रिभिः श्लोकैर्यज्ञपञ्चकमुक्त्वाथैकेन पञ्च यज्ञानाह द्रव्ययज्ञा इति। तीर्थेषु द्रव्यविनियोगं यज्ञबुद्य्धा ये कुर्वन्ति ते द्रव्ययज्ञा इति भाष्यम्। तस्यैव विवरणं द्रव्ययज्ञाः पूर्तदत्ताख्यस्मार्तयज्ञपराः। तथाच स्मृतिःवापीकूपतडागादिदेवतायतनानि च। अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते।।शरणागतसंत्राणं भूतानां चाप्यहिंसनम्। बहिर्वेदि च यद्दानं दत्तमित्यभिधीयते।। इत्यादीति बोध्यम्। तथा पञ्चाग्निसेवनादि तप एव यज्ञो येषां ते तपोयज्ञाः। तथा यमनियमासनप्राणायमप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिलक्षणो योग एव यज्ञो येषां ते योगयज्ञाः। तथा परे स्वाध्यायो विधिवद्वेदाभ्यासो यज्ञो येषां ते स्वाध्याययज्ञाः। ज्ञानं पूर्वोत्तरमीमांसाविचारेण शास्त्रार्थपरिज्ञानं यज्ञो येषां ते ज्ञानयज्ञाश्च यतयो यत्नशीलाः सभ्यक् शितानि सूक्ष्माणि तीक्ष्णीकृतानि च व्रतानि येषां ते। इति सर्वेषां विशेषणमन्त्यानां वा। केचित्त्वनेन विशेषणेन यज्ञान्तरं वर्णयन्ति व्रतयज्ञा इत्यर्थ इति तेषां कृच्छ्रचान्द्रायणादि तप एव यज्ञो येषामिति तपोयज्ञा इत्यस्य व्याख्यानकर्तृ़णां मते पौनरुक्त्यं यज्ञानां च त्रयोदशत्वं चापतति। अपान इत्यादिसार्धश्लोकेनैकयज्ञवर्णनं तु प्रामादिकं अपर इत्यस्य वारद्वयमुपलब्धेरिति ज्ञेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.28।।एवं त्रिभिः श्लोकैः प़ञ्चयज्ञानुक्त्वाऽधुनैकेन श्लोकेन षड्यज्ञानाह द्रव्यत्याग एव यथाशास्त्रं यज्ञो येषां ते द्रव्ययज्ञाः पूर्तदत्ताख्यरूपस्मार्तकर्मपराः। तथाच स्मृतिःवापीकूपतडागादि देवतायतनानि च। अन्नप्रदानमारामः पूर्तमित्यभिधीयते।।शरणागतसंत्राणं भूतानां चाप्यहिंसनम्। बहिर्वेदि च यद्दानं दत्तमित्यभिधीयते।। इति। इष्टाख्यं श्रौतं कर्म तुदैवमेवापरे यज्ञमित्यत्रोक्तम्। अन्तर्वेदि दानमपि तत्रैवान्तर्भूतम्। तथा कृच्छ्रचांन्द्रायणादि तप एव यज्ञो येषां ते तपोयज्ञास्तपस्विनः। तथा योगश्चित्तवृत्तिनिरोधोऽष्टाङ्गो यज्ञो येषां ते योगयज्ञा यमनियमासनादियोगाङ्गानुष्ठानपराः। यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयो हि योगस्यष्टावङ्गानि। तत्र प्रत्याहारः श्रोत्रादीनीन्द्रियाण्यन्य इत्यत्रोक्तः। धारणाध्यानसमाधय आत्मसंयमयोगाग्नावित्यत्रोक्ताः। प्राणायामोऽपाने जुह्वति प्राणमित्यनन्तरश्लोके वक्ष्यते। यमनियमासनान्यत्रोच्यन्ते। अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः पञ्च। शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः पञ्च। स्थिरसुखमासनं पद्मकस्वस्तिकाद्यनेकविधम्। अशास्त्रीयः प्राणिवधो हिंसा। सा च कृतकारितानुमोदितभेदेन त्रिविधा। एवमयथार्थभाषणमवध्यहिंसानुबन्धि यथार्थभाषणं चानृतम् स्तेयमशास्त्रीयमार्गेण परद्रव्यस्वीकरणम् अशास्त्रीयःस्त्रीपुंसव्यतिकरो मैथुनम् शास्त्रनिषिद्धमार्गेण देहयात्रानिर्वाहकाधिकभोगसाधनस्वीकारः परिग्रहः। एतन्निवृत्तिलक्षणा उपरमा यमाः।यम उपरमे इति स्मरणात्। तथा शौचं द्विविधं बाह्यमाभ्यन्तरं च। मृज्जलादिभिः कायादिक्षालनं हितमितमेध्याशनादि च बाह्मम्। मैत्रीमुदितादिभिर्मदमानादिचित्तमलक्षालनमान्तरम्। संतोषो विद्यमानभोगोपकरणादधिकस्यानुपादित्सारूपा चित्तवृत्तिः। तपः क्षुत्पिपासाशीतोष्णादिद्वन्द्वसहनं काष्ठमौनाकारमौनादिव्रतानि च। इङ्गितेनापि स्वाभिप्रायाप्रकाशनं काष्ठमौनम् अवचनमात्रमाकारमौनमिति भेदः। स्वाध्यायो मोक्षशास्त्राणामध्ययनं प्रणवजपो वा। ईश्वरप्रणिधानं सर्वकर्मणां तस्मिन्परमगुरौ फलनिरपेक्षतयाऽर्पणम्। एते विधिरूपा नियमाः। पुराणेषु येऽधिका उक्तास्त एष्वेव यमनियमेष्वन्तर्भाव्याः। एतादृशयमनियमाद्यभ्यासपरा योगयज्ञाः। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यथाविधि वेदाभ्यापराः स्वाध्याययज्ञाः। न्यायेन वेदार्थनिश्चयपरा ज्ञानयज्ञाः। यज्ञान्तरमाह यतयो यत्नशीलाः संशितव्रताः सम्यक् शितानि तीक्ष्णीकृतान्यतिदृढानि व्रतानि येषां ते संशितव्रतयज्ञा इत्यर्थः। तथाच भगवान्पतञ्जलिःते जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् इति। ये पूर्वमहिंसाद्याः पञ्च यमा उक्तास्त एव जात्याद्यनवच्छेदेन दृढभूमयो महाव्रतशब्दवाच्याः। तत्राहिंसा जात्यवच्छिन्ना यथा मृगयोर्मृगातिरिक्तान्न हनिष्यामीति। देशावच्छिन्ना न तीर्थे हनिष्यामीति। सैव कालवच्छिन्ना यथा न चतुर्दश्यां न पुण्येऽहनीति। सैव प्रयोजनविशेषरूपसमयावच्छिन्ना तथा क्षत्रियस्य देवब्राह्मणप्रयोजनव्यतिरेकेणन हनिष्यामि युद्धं विना न हनिष्यामीति च। एवं विवाहादिप्रयोजनव्यतिरेकेणानृतं न वदिष्यामीति एवमापत्कालव्यतिरेकेण क्षुद्भयाद्यतिरिक्तस्तेयं न करिष्यामीति च। एवमृतुव्यतिरिक्तकाले पत्नीं न गमिष्यामीति एवं गुर्वादिप्रयोजनमन्तरेण न परिग्रहीष्यामीति यथायोग्यमवच्छेदो द्रष्टव्यः। एतादृगवच्छेदपरिहारेण यदा सर्वजातिसर्वदेशसर्वकालसर्वप्रयोजनेषु भवाः सार्वभौमा अहिंसादयो भवन्ति महता प्रयत्नेन परिपाल्यमानत्वात् तदा ते महाव्रतशब्देनोच्यन्ते। एवं काष्ठमौनादिव्रतमपि द्रष्टव्यम्। एतादृशव्रतदार्ढ्ये चकामक्रोधलोभमोहानां चतुर्णामपि नरकद्वारभूतानां निवृत्तिः। तत्राहिंसया क्षमया क्रोधस्य ब्रह्मचर्येण वस्तुविचारेण कामस्य अस्तेयापरिग्रहरूपेण संतोषेण लोभस्य सत्येन यथार्थज्ञानरूपेण विवेकेन मोहस्य तन्मूलानां च सर्वेषां निवृत्तिरिति द्रष्टव्यम्। इतराणि च फलानि सकामानां योगाशास्त्रे कथितानि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.28।।एवं यज्ञपञ्चकं श्लोकत्रयेणोक्तम्। अथैकेनैव श्लोकेन पञ्चयज्ञानाह द्रव्येति। द्रव्यसाध्याः वापीकूपारामाः तीर्थे बहिर्वेदिकादानं श्रौतयज्ञानां प्रागेव ग्रहणात् त एव यज्ञा येषां ते द्रव्ययज्ञाः। तथा तपःकृच्छ्रचान्द्रायणमासोपवासादि तदेव यज्ञस्थानीयं येषां ते तपोयज्ञाः। तथा योगयज्ञाः सङ्गफलत्यागपूर्वकं संध्योपासनादिनिर्विकल्पसमाध्यन्तानां कर्मणामनुष्ठानं तृतीयाध्यायोक्तं योगः स एव यज्ञो येषां ते योगयज्ञाः। यद्वा यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधिरूपोऽष्टाङ्गोपेतोयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः इति सूत्रितो योग एव यज्ञो येषां त इति। तथा स्वाध्याययज्ञाः नित्यं वेदाध्ययनरतास्ते स्वाध्याययज्ञाः। ज्ञानं स्वाध्यायार्थस्य पूर्वोत्तरमीमांसाविचारः स एव यज्ञो येषाम्। स्वाध्याययज्ञा ज्ञानयज्ञाश्चेति स्वाध्यायज्ञानयज्ञा इति समासः। यतयो यतनशीलाः संशितव्रताः सम्यक् शितं तीक्ष्णं व्रतमहिंसादिकं येषां ते इति सर्वेषां विशेषणम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.28।।द्रव्ययज्ञाः यज्ञनिष्क्रयद्रव्यदातारः। तपोयज्ञाः साधनाद्यभावेन यज्ञजमत्प्रीत्युत्पादनार्थं तप एव यज्ञबुद्ध्या कुर्वन्ति। योगयज्ञाः पूर्वोक्तवत् मत्प्रीत्यर्थं यज्ञबुद्ध्या अष्टाङ्गयोगकर्तारः। अपरे तथा पूर्वोक्तप्रकारेण स्वाध्यायं वेदाध्ययनमेव यज्ञबुद्ध्या कर्तारः। च पुनः ज्ञानमेव यज्ञत्वेन ज्ञातारः। ते कीदृशाः यतयः सर्वपरित्यागिनः। पुनः कीदृशाः संशितव्रताः सूक्ष्मीकृतकर्मणो भगवत्स्मरणमात्रैकपराः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.28।।किंच द्रव्येति। द्रव्यदानमेव यज्ञो येषां ते द्रव्ययज्ञाः। कृच्छ्रचान्द्रायणादितप एव यज्ञो येषां ते तपोयज्ञाः। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधलक्षणः समाधिः स एव यज्ञो येषां ते योगयज्ञाः। स्वाध्यायेन वेदेन श्रवणमननादिना यत्तदर्थज्ञानं तदेव यज्ञो येषां ते। अथवा वेदपाठयज्ञास्तदर्थज्ञानयज्ञाश्चेति द्विविधा यतयः प्रयत्नशीलाः। सम्यक् शितं निशितं तीक्ष्णीकृतं व्रतं येषां ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.28।।अन्ये चद्रव्ययज्ञाः इति गृहिणो निरूपिताः तपोयज्ञा वनस्थाश्च। योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। समाधिलक्षणो यज्ञो येषां ते च। स्वाध्याययज्ञा आत्मज्ञानयज्ञाश्चेत्येते यतयः संशितव्रता उक्ताः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.28।।जो यज्ञबुद्धिसे तीर्थादिमें द्रव्य लगाते हैं वे द्रव्ययज्ञा यानी द्रव्यसम्बन्धी यज्ञ करनेवाले हैं। जो तपस्वी हैं वे तपोयज्ञा यानी तपरूप यज्ञ करनेवाले हैं। प्राणायाम प्रत्याहाररूप योग ही जिनका यज्ञ है वे योगयज्ञा यानी योगरूप यज्ञ करनेवाले हैं। वैसे ही अन्य कई स्वाध्याययज्ञ और ज्ञानयज्ञकरनेवाले भी हैं। जिनका यथाविधि ऋग्वेद आदिका अभ्यासरूप स्वाध्याय ही यज्ञ है वे स्वाध्याययज्ञ करनेवाले हैं और शास्त्रोंका अर्थ जाननारूप ज्ञान जिनका यज्ञ है वे ज्ञानयज्ञ करनेवाले हैं। इसी तरह कई यत्नशील संशित व्रतवाले हैं। जिनके व्रतनियम अच्छी प्रकार तीक्ष्ण किये हुए यानी सूक्ष्मशुद्ध किये हुए होते हैं वे पुरुष संशितव्रत कहलाते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.28।। व्याख्या   यतयः संशितव्रताः अहिंसा सत्य अस्तेय (चोरीका अभाव) ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (भोगबुद्धिसे संग्रहका अभाव) ये पाँच यम हैं (टिप्पणी प0 257) जिन्हें महाव्रत के नामसे कहा गया है। शास्त्रोंमें इन महाव्रतोंकी बहुत प्रशंसा महिमा है। इन व्रतोंका सार यही है कि मनुष्य संसारसे विमुख हो जाय। इन व्रतोंका पालन करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ संशितव्रताः पद आया है। इसके सिवाय इस श्लोकमें आये चारों यज्ञोंमें जोजो पालनीय व्रत अर्थात् नियम हैं उनपर दृढ़ रहकर उनका पालन करनेवाले भी सब संशितव्रताः हैं। अपनेअपने यज्ञके अनुष्ठानमें प्रयत्नशील होनेके कारण उन्हें यतयः कहा गया है।संशितव्रताः पदके साथ (द्रव्ययज्ञाः तपोयज्ञाः योगयज्ञाः और ज्ञानयज्ञाः की तरह) यज्ञाः पद नहीं दिया जानेके कारण इसे अलग यज्ञ नहीं माना गया है।द्रव्ययज्ञाः मात्र संसारके हितके उद्देश्यसे कुआँ तालाब मन्दिर धर्मशाला आदि बनवाना अभावग्रस्त लोगोंको अन्न जल वस्त्र औषध पुस्तक आदि देना दान करना इत्यादि सब द्रव्ययज्ञ है। द्रव्य(तीनों शरीरोंसहित सम्पूर्ण पदार्थों) को अपना और अपने लिये न मानकर निःस्वार्थभावसे उन्हींका मानकर उनकी सेवामें लगानेसे द्रव्ययज्ञ सिद्ध हो जाता है।शरीरादि जितनी वस्तुएँ हमारे पास हैं उन्हींसे यज्ञ हो सकता है अधिककी आवश्यकता नहीं है। मनुष्य बालकसे उतनी ही आशा रखता है जितना वह कर सकता है फिर सर्वज्ञ भगवान् तथा संसार हमसे हमारी क्षमतासे अधिककी आशा कैसे रखेंगेतपोयज्ञाः अपने कर्तव्य(स्वधर्म) के पालनमें जोजो प्रतिकूलताएँ कठिनाइयाँ आयें उन्हें प्रसन्नतापूर्वक सह लेना तपोयज्ञ है। लोकहितार्थ एकादशी आदिका व्रत रखना मौन धारण करना आदि भी तपोयज्ञ अर्थात् तपस्यारूप यज्ञ हैं। परन्तु प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थिति वस्तु व्यक्ति घटना आनेपर भी साधक प्रसन्नतापूर्वक अपने कर्तव्यका पालन करता रहे अपने कर्तव्यसे थोड़ा भी विचलित न हो तो यह सबसे बड़ी तपस्या है जो शीघ्र सिद्धि देनेवाली होती है। गाँवभरकी गन्दगी कूड़ाकरकट बाहर एक जगह इकट्ठा हो जाय तो वह बुरा लगता है परन्तु वही कूड़ाकरकट खेतमें पड़ जाय तो खेतीके लिये खादरूपसे बढ़िया सामग्री बन जाता है। इसी प्रकार प्रतिकूलता बुरी लगती है और उसे हम कूड़ेकरकटकी तरह फेंक देते हैं अर्थात् उसे महत्त्व नहीं देते परन्तु वही प्रतिकूलता अपना कर्तव्यपालन करनेके लिये बढ़िया सामग्री है। इसलिये प्रतिकूलसेप्रतिकूल परिस्थितिको सहर्ष सहनेके समान दूसरा कोई तप नहीं है। भोगोंमें आसक्ति रहनेसे अनुकूलता अच्छी और प्रतिकूलता बुरी लगती है। इसी कारण प्रतिकूलताका महत्त्व समझमें नहीं आता। योगयज्ञास्तथापरे यहाँ योग नाम अन्तःकरणकी समताका है। समताका अर्थ है कार्यकी पूर्ति और अपूर्तिमें फलकी प्राप्ति और अप्राप्तिमें अनुकूल और प्रतिकूल परिस्थितिमें निन्दा और स्तुतिमें आदर और निरादरमें सम रहना अर्थात् अन्तःकरणमें हलचल रागद्वेष हर्षशोक सुखदुःखका न होना। इस तरह सम रहना ही योगयज्ञ है।स्वाध्यायज्ञानयज्ञाः केवल लोकहितके लिये गीता रामायण भागवत आदिका तथा वेद उपनिषद् आदिका यथाधिकार मननविचारपूर्वक पठनपाठन करना अपनी वृत्तियोंका तथा जीवनका अध्ययन करना आदि सब स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ है।गीताके अन्तमें भगवान्ने कहा है कि जो इस गीता शास्त्रका अध्ययन करेगा उसके द्वारा मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा ऐसा मेरा मत है (18। 70)। तात्पर्य यह है कि गीताका स्वाध्याय ज्ञानयज्ञ है। गीताके भावोंमें गहरे उतरकर विचार करना उसके भावोंको समझनेकी चेष्टा करना आदि सब स्वाध्यायरूप ज्ञानयज्ञ है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.27 4.28।।सर्वाणीति। द्रव्ययज्ञा इति। ते च सर्वानिन्द्रियव्यापान् मानसान् व्यापारान् मुखनासिकानिर्गमनमूत्राद्यधोनयनादीन् वायवीयांश्च आत्मनो मनसः ( N मनसश्च) संयमहेतौ योगनाम्नि ऐकाग्र्यवह्नौ सम्यग्ज्ञानपरिदीपिते ( परिबोधिते) पूरयितव्ये निवेशयन्ति। गृह्यमाणं विषयं संकल्प्यमानं वा तदेकाग्रतयैव परित्यक्तान्यव्यापारया ( N तत्परित्यक्तान्य ) बुद्ध्या गृह्णन्ति इति तात्पर्यम्। तदुक्तं शिवोपनिषदि भावेऽत्यक्ते (S N भावे त्यक्ते) निरुद्धा चित् ( N चेत्) नैव भावान्तरं व्रजेत्।तदा तन्मध्यभावेन (K तन्मयभावेन) विकसत्यति भावना।।4. (विज्ञानभैरव 62 ) इति।एवं योगयज्ञाः व्याख्यातः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.28।।यज्ञषट्कमवतारयति द्रव्येति। तत्र द्रव्ययज्ञान्पुरुषानुपादाय विभजते तीर्थेष्विति। तपस्विनां यज्ञबुद्ध्या तपोऽनुतिष्ठन्तो नियमवन्त इत्यर्थः। प्रत्याहारादीत्यादिशब्देन यमनियमासनध्यानधारणासमाधयो गृह्यन्ते यथाविधि प्राङ्मुखत्वपवित्रपाणित्वाद्यङ्गविधिमनतिक्रम्येति यावत् व्रतानां तीक्ष्णीकरणमतिदृढत्वम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.28।।ननु द्रव्यं यज्ञो न भवति तत्कथं बहुव्रीहिः तत्पुरुषत्वे च कथं पुरुषसामानाधिकरण्यं इत्यत आह द्रव्यमिति। अनेन नायं यज्ञशब्दो भावार्थः किन्तु कर्त्रर्थः। तथा च द्रव्यस्य यज्ञा याजका इत्यर्थ इत्युक्तं भवति। एतदाशङ्कापरिहारायैव तपोयज्ञा इत्येतदप्येवं व्याचष्टे तप इति। तत्र परमेश्वरे।योगयज्ञाः इत्यादिकमप्येवमेव व्याख्येयमिति दर्शयति इत्यादीति। तपसो होमः कथं इत्यत आह इदमिति। तपश्चरणमेव तपोयज्ञत्वं किं न स्यात् इत्यत आह तदर्पण एवेति। अनेनैव प्रकारेण यज्ञत्वसम्पादनं नान्यथेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.28।।द्रव्यं जुह्वतीति द्रव्ययज्ञाः। तपः परमेश्वरार्पणबुद्ध्या तत्र जुह्वतीति तपोयज्ञा इत्यादि। इदं तपो हविः एतद्ब्रह्माग्नौ जुहोति तत्पूजार्थमिति होमः। तदर्पण एव होमबुद्धिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.28।।केचित् कर्मयोगिनो द्रव्ययज्ञाः न्यायतो द्रव्याणि आदाय देवार्चने प्रयतन्ते केचित् च दानेषु केचित् च यागेषु केचित् च होमेषु एते सर्वे द्रव्ययज्ञाः।केचित्तपोयज्ञाः कृच्छ्रचान्द्रायणोपवासादिषु निष्ठां कुर्वन्ति योगयज्ञाः च अपरे पुण्यतीर्थे पुण्यस्थानप्राप्तिषु निष्ठां कुर्वन्ति। इह योगशब्दः कर्मनिष्ठाभेदप्रकरणात् तद्विषयः।केचित् स्वाध्यायपराः स्वाध्यायाभ्यासपराः केचित्तदर्थज्ञानाभ्यासपराः यतयः यतनशीलाः शंसितव्रताः दृढसंकल्पाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.28।। द्रव्ययज्ञाः तीर्थेषु द्रव्यविनियोगं यज्ञबुद्ध्या कुर्वन्ति ये ते द्रव्ययज्ञाः। तपोयज्ञाः तपः यज्ञः येषां तपस्विनां ते तपोयज्ञाः। योगयज्ञाः प्राणायामप्रत्याहारादिलक्षणो योगो यज्ञो येषां ते योगयज्ञाः। तथा अपरे स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च स्वाध्यायः यथाविधि ऋगाद्यभ्यासः यज्ञः येषां ते स्वाध्याययज्ञाः। ज्ञानयज्ञाः ज्ञानं शास्त्रार्थपरिज्ञानं यज्ञः येषां ते ज्ञानयज्ञाश्च यतयः यतनशीलाः संशितव्रताः सम्यक् शितानि तनूकृतानि तीक्ष्णीकृतानि व्रतानि येषां ते संशितव्रताः।।किञ्च

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【 Verse 4.29 】

▸ Sanskrit Sloka: अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे | प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणा: ||

▸ Transliteration: apāne juhvati prāṇaṁ prāṇe ’pānaṁ tathāpare | prāṇāpānagatī ruddhvā prāṇāyāmaparāyaṇāḥ ||

▸ Glossary: apāne: in the out going breath; juhvati: sacrifice; prāṇaṁ: life energy; prāṇe: in the life energy; apānaṁ: the outgoing breath; tathā : thus; apare: others; prāṇa: inhaling; apāna: exhaling; gatī : movement; ruddhvā : after restraining; prāṇāyāma: breath control; parāyaṇāḥ : so inclined

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.29 There are others who sacrifice the life energy in the form of incoming breath and outgoing breath, thus checking the movement of the incoming and outgoing breaths and con- trolling the breath.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.29 4.30।।दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.29।। अन्य (योगीजन) अपानवायु में प्राणवायु को हवन करते हैं तथा प्राण में अपान की आहुति देते हैं प्राण और अपान की गति को रोककर वे प्राणायाम के ही समलक्ष्य समझने वाले होते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.29 अपाने in the outgoing breath? जुह्वति sacrifice? प्राणम् incoming breath? प्राणे in the incoming breath? अपानम् outgoing breath? तथा thus? अपरे others? प्राणापानगती courses of the outgoing and incoming breaths? रुद्ध्वा restraining? प्राणायामपरायणाः solely absorbed in the restraint of breath.Commentary Some Yogis practise Puraka (inhalation)? some Yogis practise Rechaka (exhalation)?,and some Yogis practise Kumbhaka (retention of breath).The five subPranas and the other Pranas are merged in the chief Prana (MukhyaPrana) by the practice of Pranayama. When the Prana is controlled? the mind also stops its wanderings and becomes steady the senses are also thinned out and merged in the Prana. It is through the vibration of Prana that the activities of the mind and the senses are kept up. If the Prana is controlled? the mind? the intellect and the senses cease to function.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.29. - 4.30. [Some sages] offer the prana into the apana; like-wise others offer the apana into the prana. Having controlled both the courses of the prana and apana, the same sages, with their desire fulfilled by the above activities, and with their food restricted, offer the pranas into pranas. All these persons know what sacrifices are and have their sins destroyed by sacrifices.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.29 There are some who practise control of the Vital Energy and govern the subtle forces of Prana and Apana, thereby sacrificing their Prana unto Apana, or their Apana unto Prana.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.29 Others, with restricted diet, are devoted to the control of breath. Some sacrifice the inward breath in the outward breath. Similarly others sacrifice the outward breath in the inward breath. Some others, stopping the flow of both the inward breath and the outward, sacrifice the inward breaths and outward breaths.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.29 Constantly practising control of the vital forces by stopping the movements of the outgoing and the incoming breaths, some offer as a sacrifice the outgoing breath in the incoming breath; while still others, the incoming breath in the outgoing breath.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.29 Others offer as sacrifice the outgoing breath in the incoming, and the incoming in the outgoing, restraining the course of the outgoing and the incoming breaths, solely absorbed in the restraint of the breath.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.29 See Comment under 4.30

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.29 - 4.30 Other Karma Yogins are devoted to the practice of breath control. They are of three types because of the differences in inhalation, exhalation and stoppage of breath. Puraka (inhalation) is that in which the inward breath is sacrificed in the outward breath. Recaka (exhalation) is that when the outward breath is sacrificed in the inward breath. Kumbhaka (stoppage of breath) is that when the flow of both inward and outward breaths is stopped. The clause, restricting of diet, applies to all the three types of persons devoted to the control of breath.

All these, according to their liking and capacity are engaged in performing the various kinds of Karma Yoga beginning from the sacrifice of material objects to the control of breath. They know and are devoted to sacrifices comprising obligatory and occasional rituals preceded by the performance of 'the great sacrifices' (Panca-Maha-Yajna), as alluded to in 'Creating men along with the sacrifices' (3.10). Because of this only, their sins are done away with. Those who are engaged in Karma Yoga by sustaining their bodies only by the ambrosia of sacrificial remains will go to the eternal Brahman. 'Go to Brahman' here means realise the self which has Brahman for Its soul.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.29 Pranayama-parayanah, constantly practising control of the vital forces-i.e. they practise a form of pranayama called Kumbhaka (stopping the breath either inside or outside) ['Three sorts of motion of Pranayama (control of the vital forces) are, one by which we draw the breath in, another by which we throw it out, and the third action is when the breath is held in the lungs or stopped from entering the lungs.'-C.W., Vol.I, 1962, p. 267. Thus, there are two kinds of Kumbhaka-internal and external.]-; prana-apana-gati ruddhva, by stopping the movements of the outgoing and the incoming breaths-the outgoing of breath (exhalation) through the mouth and the nostrils is the movement of the Prana; as opposed to that, the movement of Apana is the going down (of breath) (inhalation); these constitute the prana-apana-gati, movements of Prana and Apana; by stopping these; some juhvati, offer as a sacrifice; pranam, the outgoing breath, which is the function of Prana; apane, in the incoming breath, which is the function of Apana-i.e. they practised a form of pranayama called Puraka ('filling in'); while tatha apare, still others; offer apanam, the incoming breath; prane, in the outgoing breath, i.e. they practise a form of pranayama called Recaka ('emptying out'). [Constantly practising control of the vital, forces, they perform Kumbhaka after Recaka and Puraka.]

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.29।। इस श्लोक में आत्मसंयम के लिये उपयोगी प्राणायाम विधि का वर्णन किया गया है जिसका अभ्यास कुछ साधकगण करते हैं।अन्दर ली जाने वाली वायु को प्राण तथा बाहर छोड़ी जाने वाली वायु को अपान कहते हैं। योगशास्त्र के अनुसार हमारी श्वसन क्रिया के तीन अंग हैं पूरक रेचक और कुम्भक। श्वास द्वारा वायु को अन्दर लेने को पूरक तथा उच्छ्वास द्वारा बाहर छोड़ने को रेचक कहते हैं। एक पूरक और एक रेचक के बीच कुछ अन्तर होता है। जब वायु केवल अन्दर ही या केवल बाहर ही रहती है तो इसे कुम्भक कहते हैं। सामान्यत हमारी श्वसन क्रिया नियमबद्ध नहीं होती। अत पूरककुम्भकरेचककुम्भक रूप प्राणायाम की विधि का उपदिष्ट अनुपात में अभ्यास करने से प्राण को संयमित किया जा सकता है जो मनसंयम के लिये उपयोगी सिद्ध हो सकता है। इस श्लोक में क्रमश रेचक पूरक और कुम्भक का उल्लेख है। प्राणायाम को यज्ञ समझ कर जो व्यक्ति इसका अभ्यास करता है वह अन्य उपप्राणों को मुख्य प्राण में हवन करना भी सीख लेता है।जैसी कि सामान्य धारणा है प्राण का अर्थ केवल वायु अथवा श्वास नहीं है। हिन्दु शास्त्रों में प्रयुक्त प्राण शब्द का अभिप्राय जीवन शक्ति के उन कार्यो से है जो एक जीवित व्यक्ति के शरीर में होते रहते हैं। शास्त्रों में वर्णित पंचप्राणों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि वे शरीर धारणा के पाँच प्रकार के कार्य हैं। वे पंचप्राण हैं प्राण अपान व्यान समान और उदान जो क्रमश विषय ग्रहण मलविसर्जन शरीर में रक्त प्रवाह अन्नपाचन एवं विचार की क्षमताओं को इंगित करते हैं। सामान्यत मनुष्य को इन क्रियायों का कोई भान नहीं रहता परन्तु प्राणायाम के अभ्यास से इन सबको अपने वश में रखा जा सकता है। अत वास्तव में प्राणायाम भी एक उपयोगी साधना है।अगले श्लोक में अन्तिम बारहवीं प्रकार की साधना का वर्णन किया गया है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.29।।एकादशयज्ञमाह। अपानेऽपानवृत्तौ प्राणवृत्तिमपरे जुह्वति। पूरकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः। तथा प्राणेऽपानं जुह्वति रेचकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्ति प्राणापानयोर्मुखनासिकाभ्यां वायोर्निर्गमनाधोगमनरुपे गती निरुध्य प्राणायामपरायणाः प्राणायामतत्पराः कुम्भकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.29।।प्राणायामयज्ञमाह सार्धेन अपानेऽपानवृत्तौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति प्राणवृत्तिम्। बाह्यवायोः शरीराभ्यन्तरप्रवेशेन पूरकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः। प्राणोऽपानं तथाऽपरे जुह्वति शारीरवायोर्बहिर्निर्गमनेन रेचकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः। पूरकरेचककथनेन च तदविनाभूतो द्विविधः कुम्भकोऽपि कथित एव। यथाशक्ति वायुमापूर्यानन्तरं श्वासप्रश्वासनिरोधः क्रियमाणोऽन्तःकुम्भकः। यथाशक्ति सर्वं वायुं विरिच्यानन्तरं क्रियमाणो बहिःकुम्भकः। एतत्प्राणायामत्रयानुवादपूर्वकं चतुर्थं कुम्भकमाह प्राणापानगती मुखनासिकाभ्यामान्तरस्य वायोर्बहिर्निर्गमः श्वासः प्राणस्य गतिः। बहिर्निर्गतस्यान्तःप्रवेशः प्रश्वा सोऽपानस्य गतिः। तत्र पूरके प्राणगतिनिरोधः रेचकेऽपानगतिनिरोधः कुम्भके तूभयगतिनिरोध इति क्रमेण युगपच्च श्वा सप्रस्वासाख्ये प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः सन्तोऽपरे पूर्वविलक्षणानियताहाराः आहारनियमादियोगसाधनविशिष्टाः प्राणेषु बाह्याभ्यन्तरकुम्भकाभ्यासनिगृहीतेषु प्राणान् ज्ञानेन्द्रियकर्मर्मेन्द्रियरूपान्जुह्णति चतुर्थकुम्भकाभ्यासेन विलापयन्तीत्यर्थः। तदेतसर्वं भगवता पतञ्जलिना संक्षेपविस्तराभ्यां सूत्रितम्। तत्र संक्षेपसूत्रतस्मिन्सति श्वा सप्रश्वा सयोर्गतिविच्छेदलक्षणः प्राणायामः इति। तस्मिन्नासने स्थिरे सति प्राणायामोऽनुष्ठेयः। कीदृशः श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदलक्षणः श्वासप्रश्वासयोः प्राणापानधर्मयोर्या गतिः पुरुषप्रयत्नमन्तरेण स्वाभाविकप्रवहणं क्रमेण युगपञ्च पुरुषप्रयत्नविशेषेण तस्या विच्छेदो निरोध एव लक्षणं स्वरूपं यस्य स तथेति। एतदेव विवृणोतिबाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः इति। बाह्यगतिनिरोधरूपत्वाद्बाह्यवृत्तिः। पूरकः। आन्तरगतिनिरोधरूपत्वादान्तरवृत्ती रेचकः कैश्चित्तु बाह्यशब्देन रेचकः आन्तरशब्देन च पूरको व्याख्यातः। युगपदुभयगतिनिरोधस्तम्भस्तद्वृत्तिः कुम्भकः। तदुक्तंयत्रोभयोः श्वासप्रश्वासयोः सकृदेव विधारकात्प्रयत्नाद्भावो भवति न पुनः पूर्ववदापूरणप्रयत्नौघविधारणं नापि रेचनप्रयत्नौधविधारणं किंतु यथा तप्त उपले निहितं जलं परिशुष्यत्सर्वतः संकोचमापद्यते एवमयमपि मारुतो वहनशीलो बलवद्विधारकप्रयत्नावरुद्धक्रियः शरीर एव सूक्ष्मभूतोऽवतिष्ठते नतु पूरयति येन पूरकः नतु रेचयति येन रेचक इति। त्रिविधोऽयं प्राणायामो देशेन कालेन संख्यया च परीक्षितों दीर्घसूक्ष्मसंज्ञो भवति। यथा घनीभूतस्तूलपिण्डः प्रसार्यमाणो विरलतया दीर्घः सूक्ष्मश्च भवति तथा प्राणोऽपि देशकालसंख्याधिक्येनाभ्यस्यमानो दीर्घो दुर्लक्ष्यतया सूक्ष्मोऽपि संपद्यते। तथाहि हृदयान्निर्गत्य नासाग्रसंमुखे द्वादशाङ्गुलपर्यन्ते देशे श्वासः समाप्यते। ततएव च परावृत्त्य हृदयपर्यन्तं प्रविशतीति स्वाभाविकी प्राणापानयोर्गतिः। अभ्यासेन तु क्रमेण नाभेराधारद्वारा निर्गच्छति। नासान्तश्चतुर्विंशत्यङ्गुलपर्यन्ते षट्त्रिंशदङ्गुलपर्यन्ते वा देशे समाप्यते। एवं प्रवेशोऽपि तावानवगन्तव्यः। तत्र बाह्यदेशव्याप्तिर्निर्वाते देशे इषीकादिसूक्ष्मतूलक्रिययाऽनुमातव्या। अन्तरपि पिपीलिकास्पर्शसदृशेन स्पर्शेनानुमातव्या। सेयं देशपरीक्षा। तथा निमेषक्रियावच्छिन्नस्य कालस्य चतुर्थो भागः क्षणस्तेषामियत्ताऽवधारणीया। स्वजानुमण्डलं पाणिना त्रिःपरामृश्य छोटिकावच्छिन्नः कालो मात्रा। ताभिः षड्त्रिंशतामात्राभिः प्रथम उद्धातो मन्दः स एव द्विगुणीकृतो द्वितीयो मध्यः स एव त्रिगुणीकृतस्तृतीयस्तीव्र इति। नाभिमूलात्प्रेरितस्य वायोर्विरिच्यमानस्य शिरस्यभिहननमुद्धात इत्युच्यते। सेयं कालपरीक्षा। संख्यापरीक्षा च प्रणवजपावृत्तिभेदेन वा संख्यापरीक्षा श्वासप्रवेशगणनया वा। कालसंख्ययोः कथंचिद्भेदविवक्षया पृथगुपन्यासः। यद्यपि कुम्भके देशव्याप्तिर्नावगम्यते तथापि कालसंख्याव्याप्तिरवगम्यत एव। स खल्वयं प्रत्यहमभ्यस्तो दिवसपक्षमासादिक्रमेण देशकालप्रचयव्यापितया दीर्घः परमनैपुण्यसमधिगमनीयतया च सूक्ष्म इति निरूपितस्त्रिविधः प्राणायामः। चतुर्थं फलभूतं सूत्रयतिस्म बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः इति। बाह्मविषयः श्वासो रेचकः। अभ्यन्तरविषयः प्रश्वास पूरकः। वैपरीत्यं वा। तावुभावपेक्ष्य सकृद्बलवद्विधारकप्रयत्नवशाद्भवति बाह्याभ्यन्तरभेदन द्विविधस्ततृतीयः कुम्भकः। तावुभावनपेक्ष्यैव केवलकुम्भकाभ्यासपाटवेनासकृत्तत्तत्प्रयत्नवशाद्भवति चतुर्थः कुम्भकः। तथाच बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपीति तदनपेक्ष इत्यर्थः। अन्या व्याख्या बाह्यो विषयो द्वादशान्तादिराभ्यन्तरो विषयो हृदयनाभिचक्रादिः तौ द्वौ विषयावाक्षिप्य पर्यालोच्य यः स्तम्भरूपो गतिविच्छेदः स चतुर्थः प्राणायाम इति। तृतीयस्तु बाह्याभ्यन्तरौ विषयावपर्यालोच्यैव सहसा भवतीति विशेषः। एतादृशश्चतुर्विधः प्राणायामेऽपाने जुह्वति प्राणमित्यादिना सार्धेन श्लोकेन दर्शितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.29।।एकादशं यज्ञमाह अपान इति। अपरे अपानेऽपानवृत्तौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति प्राणं प्राणवृत्तिम्। पूरकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः। तथा प्राणे च अपानं प्रक्षिपन्ति। रेचकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः। प्राणापानगती रुद्ध्वा मुखनासिकाभ्यां वायोर्निर्गमनं प्राणस्य गतिः तद्विपर्ययेणाधोगमनमपानस्य गतिः ये प्राणापानगति एते निरुध्य प्राणायामपरायणाः प्राणायामतत्पराः कुम्भकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.29।।अपरे योगिनोऽपानेऽधस्स्थे प्राणं ऊर्ध्वस्थं पूरकविधिना जुह्वति। तथा अपरे रेचकविधिना अपानं प्राणे। कुम्भकविधिना प्राणापानयोर्गतिनिरोधं कृत्वा प्राणायामपराः ईश्वरचिन्तननिष्ठा भवन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.29।।किंच अपान इति। अपाने अधोवृत्तौ प्राणमूर्ध्ववृत्तिं पूरकेण जुह्वति पूरककाले प्राणमपानेनैकीकुर्वन्ति। तथा कुम्भकेन प्राणापानयोरूर्ध्वाधोगती रुद्ध्वा रेचककालेऽपानं प्राणे जुह्वति। एवं पूरककुम्भकरेचकैः प्राणायामपरायणा अपरे इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.29।।योगधारणवतामपि मध्ये केचित् प्राणायामपराः केचिन्नियताहारा उत्तममध्यमा इति तान्निरूपयति अपानेति। अधोवृत्तिप्राणा ऊर्द्धृवृत्तिरिति पर्यायेण तद्रोधे तथाविधाः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.29।।तथा ( कोई ) अपानवायुमें प्राणवायुका हवन करते हैं अर्थात् पूरक नामक प्राणायाम किया करते हैं। वैसे ही अन्य कोई प्राणमें अपानका हवन करते हैं अर्थात् रेचक नामक प्राणायाम किया करते हैं। मुख और नासिकाके द्वारा वायुका बाहर निकलना प्राणकी गति है और उसके विपरीत ( पेटमें ) नीचेकी और जाना अपानकी गति है। उन प्राण और अपान दोनोंकी गतियोंको रोककर कोई अन्य लोग प्राणायामपरायण होते हैं अर्थात् प्राणायाममें तत्पर हुए वे केवल कुम्भक नामक प्राणायाम किया करते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.29। व्याख्या   अपाने जुह्वति ৷৷. प्राणायामपरायणाः (टिप्पणी प0 258.1) प्राणका स्थान हृदय (ऊपर) तथा अपानका स्थान गुदा (नीचे) है (टिप्पणी प0 258.2)। श्वासको बाहर निकालते समय वायुकी गति ऊपरकी ओर तथा श्वासको भीतर ले जाते समय वायुकी गति नीचेकी ओर होती है। इसलिये श्वासको बाहर निकालना प्राण का कार्य और श्वासको भीतर ले जाना अपान का कार्य है। योगीलोग पहले बाहरकी वायुको बायीं नासिका(चन्द्रनाड़ी) के द्वारा भीतर ले जाते हैं। वह वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुको साथ लेकर नाभिसे होती हुई स्वाभाविक ही अपानमें लीन हो जाती है। इसको पूरक कहते हैं। फिर वे प्राणवायु और अपानवायु दोनोंकी गति रोक देते हैं। न तो श्वास बाहर जाता है और न श्वास भीतर ही आता है। इसको कुम्भक कहते हैं। इसके बाद वे भीतरकी वायुको दायीं नासिका(सूर्यनाड़ी) के द्वारा बाहर निकालते हैं। वह वायु स्वाभाविक ही प्राणवायुको तथा उसके पीछेपीछे अपानवायुको साथ लेकर बाहर निकलती है। यही प्राणवायुमें अपानवायुका हवन करना है। इसको रेचक कहते हैं। चार भगवन्नामसे पूरक सोलह भगवन्नामसे कुम्भक और आठ भगवन्नामसे रेचक किया जाता है।इस प्रकार योगीलोग पहले चन्द्रनाड़ीसे पूरक फिर कुम्भक और फिर सूर्यनाड़ीसे रेचक करते हैं। इसके बाद सूर्यनाड़ीसे पूरक फिर कुम्भक और फिर चन्द्रनाड़ीसे रेचक करते हैं। इस तरह बारबार पूरककुम्भकरेचक करना प्राणायामरूप यज्ञ है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे निष्कामभावपूर्वक प्राणायामके परायण होनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 258.3)।अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति नियमित आहारविहार करनेवाले साधक ही प्राणोंका प्राणोंमें हवन कर सकते हैं। अधिक या बहुत कम भोजन करनेवाला अथवा बिलकुल भोजन न करनेवाला यह प्राणायाम नहीं कर सकता (गीता 6। 16 17)।प्राणोंका प्राणोंमें हवन करनेका तात्पर्य है प्राणका प्राणमें और अपानका अपानमें हवन करना अर्थात् प्राण और अपानको अपनेअपने स्थानोंपर रोक देना। न श्वास बाहर निकालना और न श्वास भीतर लेना। इसे स्तम्भवृत्ति प्राणायाम भी कहते हैं। इस प्राणायामसे स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शान्त होती हैं और पापोंका नाश हो जाता है। केवल परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्राणायाम करनेसे अन्तःकरण निर्मल हो जाता है और परमात्मप्राप्ति हो जाती है।सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है उनका अनुष्ठान करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ सर्वेऽप्येते पद आया है। उन यज्ञोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और अविनाशी परमात्माका प्राप्ति हो जाती है।वास्तवमें सम्पूर्ण यज्ञ केवल कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये ही हैं ऐसा जाननेवाले ही यज्ञवित् अर्थात् यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले हैं। कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर परमात्माका अनुभव हो जाता है। जो लोग अविनाशी परमात्माका अनुभव करनेके लिये यज्ञ नहीं करते प्रत्युत इस लोक और परलोक (स्वर्गादि) के विनाशी भोगोंकी प्राप्तिके लिये ही यज्ञ करते हैं वे यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले नहीं हैं। कारण कि विनाशी पदार्थोंकी कामना ही बन्धनका कारण है गतागतं कामकामा लभन्ते (गीता 9। 21)। अतः मनमें कामनावासना रखकर परिश्रमपूर्वक बड़ेबड़े यज्ञ करनेपर भी जन्ममरणका बन्धन बना रहता है मिटी न मनकी वासना नौ तत भये न नास।तुलसी केते पच मुये दे दे तन को त्रास।।विशेष बात यज्ञ करते समय अग्निमें आहुति दी जाती है। आहुति दी जानेवाली वस्तुओंके रूप पहले अलगअलग होते हैं परन्तु अग्निमें आहुति देनेके बाद उनके रूप अलगअलग नहीं रहते अपितु सभी वस्तुएँ अग्निरूप हो जाती हैं। इसी प्रकार परमात्मप्राप्तिके लिये जिन साधनोंका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है उनमें आहुति देनेका तात्पर्य यही है कि आहुति दी जानेवाली वस्तुओँकी अलग सत्ता रहे ही नहीं सब स्वाहा हो जायँ। जबतक उनकी अलग सत्ता बनी हुई है तबतक वास्तवमें उनकी आहुति दी ही नहीं गयी अर्थात् यज्ञका अनुष्ठान हुआ ही नहीं।इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकसे भगवान् कर्मोंके तत्त्व (कर्ममें अकर्म) का वर्णन कर रहे हैं। कर्मोंका तत्त्व है कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधना। कर्मोंसे न बँधनेका ही एक साधन है यज्ञ। जैसे अग्निमें डालनेपर सब वस्तुएँ स्वाहा हो जाती हैं ऐसे ही केवल लोकहितके लिये किये जानेवाले सब कर्म स्वाहा हो जाते हैं यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते (गीता 4। 23)।निष्कामभावपूर्वक केवल लोकहितार्थ किये गये साधारणसेसाधारण कर्म भी परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हो जाते हैं। परन्तु सकामभावपूर्वक किये गये बड़ेसेबड़े कर्मोंसे भी परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती। कारण कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी कामना ही बाँधनेवाली है। पदार्थ और क्रियारूप संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण मनुष्यमात्रमें पदार्थ पाने और कर्म करनेका राग रहता है कि मुझे कुछनकुछ मिलता रहे और मैं कुछनकुछ करता रहूँ। इसीको पानेकी कामना तथा करनेका वेग कहते हैं।मनुष्यमें जो पानेकी कामना रहती है वह वास्तवमें अपने अंशी परमात्माको ही पानेकी भूख है परन्तु परमात्मासे विमुख और संसारके सम्मुख होनेके कारण मनुष्य इस भूखको सांसारिक पदार्थोंसे ही मिटाना चाहता है। सांसारिक पदार्थ विनाशी हैं और जीव अविनाशी है। अविनाशीकी भूख विनाशी पदार्थोंसे मिट ही कैसे सकती है परन्तु जबतक संसारकी सम्मुखता रहती है तबतक पानेकी कामना बनी रहती है। जबतक मनुष्यमें पानेकी कामना रहती है तबतक उसमें करनेका वेग बना रहता है। इस प्रकार जबतक पानेकी कामना और करनेका वेग बना हुआ है अर्थात् पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध बना हुआ है तबतक जन्ममरण नहीं छूटता। इससे छूटनेका उपाय है कुछ भी पानेकी कामना न रखकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको लोकसंग्रह यज्ञार्थ कर्म लोकहितार्थ कर्म आदि नामोंसे कहा गया है।केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे संसारसे सम्बन्ध छूट जाता है और असङ्गता आ जाती है। अगर केवल भगवान्के लिये कर्म किये जायँ तो संसारसे सम्बन्ध छूटकर असङ्गता तो आ ही जाती है इसके साथ एक और विलक्षण बात यह होती है कि भगवान्का प्रेम प्राप्त हो जाता है सम्बन्ध   चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक भगवान्ने कुल बारह प्रकारके यज्ञोंका वर्णन किया और तीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा की। अब भगवान् आगेके श्लोकमें यज्ञ करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.29 4.30।।एवं द्रव्ययज्ञः तपोयज्ञो योगयज्ञश्चोक्तलक्षणाः। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च ये ते संप्रति लक्ष्यन्ते अपाने इति। अपरे इति। प्राणम् उदयमानं ( N उदीयमानम्) नादं (S omit नादम्) प्रणवादिमात्रालयान्तम् अपाने अस्तं याति स्वानन्दान्तः प्रवेशात्मनि जुह्वति इति पिण्डस्थैर्यात्मा स्वाध्यायः। शिष्यात्मना च नयानयग्रहणाय केचिदस्तं यान्तम् उदी(द) यमाने संवेश्य तदेकीकारेण अपवर्गदानात्(S अपवर्गात्) आत्मनि शिष्यात्मनि च शोधनबोधनप्रवेशनयोजनरूपे स्वाध्याययज्ञे (S N स्वाध्यायज्ञाने) स्वपरानन्दमये प्रतिष्ठितमनसः। अत एव पूरकः प्रथममुक्तः चरमं रेचकः। प्रथमेन च पादेन ( N भागेन) विषयभोगान्तर्मुखीकरणं द्वितीयेन महाविदेहधारणाक्रमाद्विषयग्रहणाय निस्सरणं (N विसारणम्) ध्वन्यते। अतश्च स्वाध्याययज्ञेभ्यो न अन्ये ज्ञानयज्ञाः। एत एवोक्तव्यापारपरिशीलनावशपरिपूरितस्वात्मशिष्यात्ममनोरथाः द्वे अप्येते गती निरुध्य आहारं विषयभोगात्मकं नियम्य प्राणान् सकलचित्तवृत्त्युदयान् प्राणेषु परनिरानन्दोल्लासेषु जुह्वति कुंभकप्रशान्त्या अर्पयन्ति (S omits अर्पयन्ति)। सर्वे चैते द्रव्ययज्ञात् प्रभृति ज्ञानयज्ञान्तं यज्ञस्य तत्त्वज्ञाः तेनैव च क्षपितकल्मषाः समूलोन्मूलितभेदवासनामयमहामोहाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.29।।प्राणायामाख्यं यज्ञमुदाहरति किञ्चेति। प्राणायामपरायणाः सन्तो रेचकं पूरकं च कृत्वा कुम्भकं कुर्वन्तीत्याह प्राणेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.29।।अपाने जुह्वति इत्येतत् पूरकरेचककुम्भकपरतया केचिद्व्याचक्षते तदसत् अध्याहारादिप्रसङ्गात्। पूरकरेचकयोः कुम्भकार्थत्वेन पृथक्प्राणायामत्वाभावाच्चेति भावेन कुम्भकमात्रपरतया योजयति अपर इति।परायणाः इत्यतः परंप्राणापानगती रुद्धा इति द्रष्टव्यम्। अभिप्रायमाह कुम्भकस्था एवेति। एवशब्देनापव्याख्यानं व्यावर्तयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.29।।अपरे प्राणायामपरायणाः प्राणमपाने जुह्वति अपानं च प्राणे। कुम्बकस्था एव भवन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.29।।अपरे कर्मयोगिनः प्राणायामेषु निष्ठां कुर्वन्ति। ते च त्रिविधाः पूरकरेचककुम्भकभेदेन। अपानेजुह्वति प्राणम् इति पूरकः प्राणे अपानम् इति रेचकः प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणान् प्राणेषु जुह्वति इति कुम्भकः। प्राणायामपरेषु त्रिषु अपि अनुषज्यते नियताहारा इति। द्रव्ययज्ञप्रभृतिप्राणायामपर्यन्तेषु कर्मयोगभेदेषु स्वसमीहितेषु प्रवृत्ता एते सर्वेसहयज्ञैः प्रजाः सृष्ट्वा (गीता 3।10) इति अभिहितमहायज्ञपूर्वकनित्यनैमित्तिककर्मरूपयज्ञविदः तन्निष्ठाः तत एव क्षपितकल्मषाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.29।। अपाने अपानवृत्तौ जुह्वति प्रक्षिपन्ति प्राणं प्राणवृत्तिम् पूरकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः। प्राणे अपानं तथा अपरे जुह्वति रेचकाख्यं च प्राणायामं कुर्वन्तीत्येतत्। प्राणापानगती मुखनासिकाभ्यां वायोः निर्गमनं प्राणस्य गतिः तद्विपर्ययेण अधोगमनम् अपानस्य गतिः ते प्राणापानगती एते रुद्ध्वा निरुध्य प्राणायामपरायणाः प्राणायामतत्पराः कुम्भकाख्यं प्राणायामं कुर्वन्तीत्यर्थः।।किञ्च

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【 Verse 4.30 】

▸ Sanskrit Sloka: अपरे नियताहारा: प्राणान्प्राणेषु जुह्वति | सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषा: ||

▸ Transliteration: apare niyatāhārāḥ prāṇānprāṇeṣu juhvati | sarve’pyete yajñavido yajñakṣapitakalmaṣāḥ ||

▸ Glossary: apare: others; niyata: controlled; āhārāḥ: eating; prāṇān: vital energy; prāṇeṣu: in the vital energy; juhvati: sacrifice; sarve api ete: all of these; yajñavidaḥ: those knowing sacrifice; yajña kṣapita kalmaṣāḥ: those destroying their sins through sacrifice.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.30 There are others who sacrifice through controlled eating and offering the outgoing breath, life energy. All these people know the meaning of sacrifice and are

Chapter 4 (Part 20)

purified of sin or karma.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.29 4.30।।दूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.30।। दूसरे नियमित आहार करने वाले (साधक जन) प्राणों को प्राणों में हवन करते हैं। ये सभी यज्ञ को जानने वाले हैं जिनके पाप यज्ञ के द्वारा नष्ट हो चुके हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.30 अपरे other persons? नियताहाराः of regulated food? प्राणान् lifreaths? प्राणेषु in the lifreaths? जुह्वति sacrifice? सर्वे all? अपि also? एते these? यज्ञविदः knowers of sacrifice? यज्ञक्षपितकल्मषाः whose sins are destroyed by sacrifice.Commentary Niyataharah means persons of regulated or limited food. They take moderate food. By rigid dieting they control the passions and appetites by weakening the functions of the organs of action.Yogis pour the lifreaths as sacrifice in the controlled lifreath. The former becomes merged in the latter.Performance of the above sacrifice leads to the purification of the mind and destruction of sins.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.29. - 4.30. [Some sages] offer the prana into the apana; like-wise others offer the apana into the prana. Having controlled both the courses of the prana and apana, the same sages, with their desire fulfilled by the above activities, and with their food restricted, offer the pranas into pranas. All these persons know what sacrifices are and have their sins destroyed by sacrifices.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.30 Others, controlling their diet, sacrifice their worldly life to the spiritual fire. All understand the principal of sacrifice, and by its means their sins are washed away.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.30 All these know the meaning of sacrifices and through sacrifices are their sins eradicated. Those who subsist on the ambrosial food, the remnants of sacrifices, go to eternal Brahman.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.30 Others, having their food regulated, offer the vital forces in the vital forces. All of them are knowers of the sacrifice and have their sins destroyed by sacrifice.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.30 Others who regulate their diet offer life-breaths in life-breaths. All these are knowers of sacrifice, whose sins are destroyed by sacrifice.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.29-30 Apane etc. Apare etc. Prana (1st) : the arising one i.e., the nada which has, as its end, that one where the first syllabic instance of Pranava dissolves. Into the apana : into what sets down, and is of the nature of entering inot the Svananda. They offer : Thus is the svadhyaya of the nature of the firmness of the body is described.

What sets down, some [sages] established on what rises up, so that the pupil's self (mind) may learn the processes of sending out and drawing in [the vital airs]. By [thus] uniting these two, they bestow emanciaption on their own Self and on the Self of the pupils; and they, on that account, remain with their mind firmly established on the svadhyaya-sacrifice full of Svananda (i.e., Nijananda) and Parananda - a svadhyaya of the nature of examining, enlightening, entering and uniting [the prana nad apana] in their own Self and in the Self of the pupils. That is why the process of filling [the vital air] in has been first mentioned; and the process of emptying the same out at the last. Further, the process of the inward turning of the act of enjoying objects, is suggested by the first arter of the verse (29), and by the second arter the act of coming out for enjoying the objects through the process of having the supreme state-of-bodylessness. Therefore, the performers of the sacrifice of wisdom are not different from the performers of the svadhyaya-sacrifice.

The same sages have the desries of their own and of their pupils fulfilled on account of their thorough practice of the said activity; control both the said paths, restrict their food viz., enjoyment of objects; and offer pranas into the pranas, i.e, they offer, by means of the ietude at the stage of stopping [the vital air], the rising of all the mental modifications into the splendour of rising waves of Parananda and Nirananda. All these persons know the truth (or nature) of hte sacrifices, starting from the material-sacrifice upto the wisdom-sacrifice; only by that means they have eradicated their sins; that is to say, they have uprooted the mighty delusion with its roots, made of mental impressions of duality.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.29 - 4.30 Other Karma Yogins are devoted to the practice of breath control. They are of three types because of the differences in inhalation, exhalation and stoppage of breath. Puraka (inhalation) is that in which the inward breath is sacrificed in the outward breath. Recaka (exhalation) is that when the outward breath is sacrificed in the inward breath. Kumbhaka (stoppage of breath) is that when the flow of both inward and outward breaths is stopped. The clause, restricting of diet, applies to all the three types of persons devoted to the control of breath.

All these, according to their liking and capacity are engaged in performing the various kinds of Karma Yoga beginning from the sacrifice of material objects to the control of breath. They know and are devoted to sacrifices comprising obligatory and occasional rituals preceded by the performance of 'the great sacrifices' (Panca-Maha-Yajna), as alluded to in 'Creating men along with the sacrifices' (3.10). Because of this only, their sins are done away with. Those who are engaged in Karma Yoga by sustaining their bodies only by the ambrosia of sacrificial remains will go to the eternal Brahman. 'Go to Brahman' here means realise the self which has Brahman for Its soul.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.30 Besides, apare, others; niyata-aharah, having their food regulated; juhvati, offer; pranan, the vital forces, the different kinds of vital forces; pranesu, in the vital forces themselves. Whichever function of the vital forces is brought under control, in it they offer the other functions. These latter become, as it were, merged in the former. Sarve api, all; of ete, them; yajna-vidah, are knowers of the sacrifice; and yajna-ksapita-kamasah, have their sins destroyed by the sacrifices as mentioned above. After accomplishing the above-mentioned sacrifices,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.30।। कुछ ऐसे साधक होते हैं जो आहार संयम के द्वारा कामक्रोधादि से उत्पन्न मन की उत्तेजनाओं को संयमित करने का अभ्यास करते हैं। भारत में आहार संयम की विधि अपरिचित और नई नहीं है। प्राचीन ऋषियों को अन्न के पोषक तत्त्वों के विषय में पूर्ण ज्ञान था। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने समाज के विभिन्न स्तर के व्यक्तियों के स्वभाव एवं कार्यों के लिए उपयुक्त शाकसब्जियों तथा धान्यों का भी वैज्ञानिक पद्धति से वर्गीकरण किया था। केवल विचार ही नहीं वरन् उन्होंने प्रयोग करके यह दर्शाया भी था कि आहार संयम के द्वारा किस प्रकार मनुष्य अपने गुणों तथा व्यवहार को परिष्कृत करके सांस्कृतिक उन्नति कर सकता है।यज्ञविद शब्द से तात्पर्य उन साधकों से है जो उपर्युक्त साधनों को समझ कर उनमें से सभी अथवा कुछ साधनों का ही अभ्यास निस्वार्थ भावना से करते हैं। ऐसे ही लोग इनसे लाभान्वित होंगे। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस श्लोक में स्पष्ट कहा गया है कि यज्ञ के द्वारा मनुष्य पापमुक्त होगा और न कि इनसे सीधे ही परमात्मा की प्राप्ति होगी।देहादि अनात्म पदार्थों के साथ तादात्म्य से उत्पन्न अहंका देह तथा बाह्य विषयों में आसक्त हुआ अनेक प्रकार के संकल्प करता रहता है। इन संकल्पों के अनुरूप ही कर्म और फलोपभोग से वासनायें उत्पन्न होती हैं जो सदैव मनुष्य को विषयों में प्रवृत्त करती हैं। यही पाप है जो मनुष्य को पशु के स्तर तक गिरा देता है। उपर्युक्त यज्ञों के अनुष्ठान से न केवल विद्यमान वासनायें नष्ट होती हैं वरन् नवीन विनाशकारी वासनायें भी नहीं उत्पन्न होती।संक्षेप में निष्कर्ष निकलता है कि ये समस्त यज्ञ साध्य न होकर अन्तकरण की शुद्धि के साधनमात्र हैं। चित्त शुद्ध होने पर निदिध्यासन के अभ्यास से ही परमात्मा की प्राप्ति होती है। अनेक साधक लोग अज्ञानवश किसी एक विशेष साधना में ही इतना आसक्त हो जाते हैं कि उनकी आगे की प्रगति अवरुद्ध हो जाती है।इन सभी यज्ञों में पुरुषार्थ अर्थात् स्वयं का प्रयत्न अत्यन्त आवश्यक है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.30।।द्वादशयज्ञमाह अपर इति। नियतः परिमित आहारो येषां ते नियताहाराः सन्तः प्राणानजितान्वायुभेदान् प्राणेषु जितेषु वायुभेदेषु जुह्वति। तेऽजिता अपि तत्र प्रविष्टा जिता इव भवन्तीत्यर्थः। यत्तु अपरे त्वाहारसंकोचमभ्यसन्तः स्वयमेव जीर्यमाणेष्विन्द्रियेषु तत्तदिन्द्रियवृत्तिलयं होमं भावयन्तीत्यर्थः। यद्वाअपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे इत्यनेन पूरकरेचकयोरावर्तमानयोर्हंसः सोहमित्यनुलोमतः प्रतिलोमतश्चाभिव्यज्यमानाऽजपामन्त्रेण तत्त्वंपदार्थैक्यं व्यतिहारेण भावयन्तीत्यर्थः। प्राणापानगती इत्यनेन तु श्लोकेन प्राणायामयज्ञाः अपने कल्प्यन्ते तत्रायमर्थः द्वौ भागौ पूरयेदन्नैस्तोयेनैकं प्रपूरयेत्। मारुतस्य प्रचारार्थ चतुर्थमवशेष्येत्।। इत्येवमुक्तो नियतः आहारो येषां ते कुम्भकेन प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः सन्तः प्राणानिन्द्रियाणि प्राणेषु जुह्वति। कुम्भके सर्वे प्राणा एकीभवन्ति तत्रैव लीयमानेष्विन्द्रियेषु होमं भावयन्तीति भाष्यविरुद्धं व्याचख्युस्तदुपेक्ष्यम्। प्रसिद्धार्थपरित्यागबीजभूतानुपपत्त्याद्यनुपलब्ध्या श्रोत्रादीन्द्रिहोमस्य प्रत्याहाररुपेष्वग्निषूक्तत्वेन च पक्षान्तरे श्लोकोत्तरार्धस्य सत्यपि संभवे स्वपूर्वार्धेनान्वयं विहायापरपूर्वार्धेनान्वयस्यान्याय्यत्वेन पूरकरेचकयोरित्यादिग्रन्थस्याक्षरार्थत्वाभावेन च पूरकरेचककुम्भकरुपं प्राणायामं कुर्वन्तीति भाष्योक्तस्यैव सम्यक्त्वात्। एतेन प्राणानिन्द्रियाणीत्याद्यापि प्रत्युक्तम् लोकाप्रसिद्धार्थकल्पनापत्तेः। अतएव प्राणेषु बाह्याभ्यन्तरकुम्भकाभ्यासनिगृहीतेषु प्राणान् ज्ञानेन्द्रियकर्मेन्द्रियरुपान् जुह्वति चतुष्कुम्भकाभ्यासेन विलापयन्तीत्यर्थ इत्यपास्तम्। इन्द्रियाणि जुह्वती युक्त्या इन्द्रियनिरोधयज्ञस्याप्युपलब्ध्या प्राणायामयज्ञमाह सार्धेनेति स्वोक्तिविरोधाच्च। यदपि नियताहारा वैराग्यादिमन्तः प्राणानत्र समनस्कानीन्द्रियाणि प्राणशब्देन गृह्यन्ते। द्वितीयान्तप्राणशब्देन श्रोत्रादीनि वागादीनि च गृह्यन्ते तान्प्राणान्प्राणेषु समनश्चित्ताहंकारेष्वन्तःकरणवृत्तिभेदेषु जुह्वति प्रविलापयन्ति। इन्द्रियाणि संकल्पात्मके मनसि संहृत्य मनोऽपि स्मरणात्मके चित्ते संहृत्य तदप्यहंकारे संहरन्ति स चाभिमानरुपोऽहंकारोऽभिमन्तव्याभावात्स्वयमेव दग्धेन्धनानलवद्विलीयत इत्यन्ये। तदप्यसमञ्जसम्। लोकाप्रसिद्धार्थकल्पनादिदोषस्यात्रापि तुल्यत्वादितिदिक्। एते सर्वेऽपि यज्ञविदो यज्ञानां ज्ञातारः कर्तारश्च यज्ञैर्यथोक्तैः क्षपिता नाशिताः कल्मषाः पापानि येषां ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.30।।तदेवमुक्तानां द्वादशधा यज्ञविदां फलमाह यज्ञान्विदन्ति जानन्ति विन्दन्ति लभन्ते वेति यज्ञविदो यज्ञानां ज्ञातारः कर्तारश्च। यज्ञैः पूर्वोक्तैः क्षपितं नाशितं कल्मषं पापं येषां ते यज्ञक्षपितकल्मषाः। यज्ञान्कृत्वाऽवविष्टे कालेऽन्नममृतशब्दवाच्यं भुञ्जत इति यज्ञशिष्टामृतभुजः। ते सर्वेऽपि सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नित्यं संसारान्मुच्यन्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.30।।द्वादशं यज्ञमाह अपरे इति। नियतो निगृहीत आहारो विषयभोगो यैस्ते नियताहाराः वैराग्यादिमन्तः प्राणान्। अत्र समनस्कानीन्द्रियाणि प्राणशब्देन गृह्यन्ते। तान्प्राणेषु मनश्चित्ताहंकारेष्वन्तःकरणवृत्तिभेदेषु। बुद्धेः प्राग्गृहीतत्वादग्रहणम्। जुह्वति प्रविलापयन्ति। इन्द्रियाणि संकल्पात्मके मनसि संहृत्य मनोऽपि स्मरणात्मके चित्ते संहृत्य तदप्यहंकारे संहरन्ति। स चाभिमानरूपोऽहंकारोऽभिमन्तव्याभावात्स्वयमेव दग्धेन्धनानलवद्विलीयते। तत्र येषां समाधिबुद्धिरस्ति ते आभिमानिका बुद्धियोगिभ्यः पूर्वोक्तेभ्यो निकृष्टाः। अतएव एतान्प्रकृत्योक्तं वायवीयेसहस्रं त्वाभिमानिकाः इति। सहस्रं मन्वन्तराणीत्यनुषङ्गः। भौतिकस्तु योगोऽत्र नोक्तः। यदनुष्ठातृ़न्प्रकृत्य तत्रैवोक्तंभौतिकास्तु शतं पूर्णम् इति। अत्रापि शतं मन्वन्तराणात्यनुषञ्जनीयम्। सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञलब्धारो यज्ञेन क्षपितं कल्मषं येषां ते तथाविधा भवन्ति सर्वे यज्ञाः कल्मषक्षयायैव भवन्ति न पुनः साक्षान्मोक्षायेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.30।।अपरे योगिनो नियताहाराः नियमितभोजनाःद्वौ भागौ पूरयेदन्नैस्तोयेनैकं च पूरयेत्। मारुतस्य प्रचारार्थं चतुर्थमवशेषयेत् इत्युक्तम्। तथाप्यन्तःकरणशुद्ध्यर्थं देहस्थितिमात्ररूपभगवत्प्रसादैकभोक्तारः प्राणान् लौकिकान् प्राणेष्वाधिदैविकेषु भगवदुपयोग्येषु जुह्वति। सर्वेऽप्येते सार्द्धपञ्चश्लोकोक्ताः यज्ञविदः यज्ञस्वरूपज्ञाः। यज्ञक्षपितकल्मषाः स्वस्वाधिकारकृतस्वयज्ञेन दूरीकृतं मत्स्मरणप्रतिबन्धकात्मकं कल्मषं यैस्ते दूरीकृतकल्मषा भवन्तीति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.30।। किंच अपर इति। अपरे त्वाहारसंकोचमभ्यस्यन्तः स्वयमेव जीर्यमाणेष्विन्द्रियेषु तत्तदिन्द्रियवृत्तिलयं होमं भावयन्तीत्यर्थः। यद्वा अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथा परे इत्यनेन पूरकरेचकयोरावर्त्यमानयोर्हंसः सोहमित्यनुलोमतः प्रतिलोमतश्चाभिव्यज्यमानेनाऽजपामन्त्रेण तत्त्वंपदार्थैक्यं व्यतिहारेण भावयन्तीत्यर्थः। तदुक्तं योगशास्त्रेसकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत्पुनः। प्राणस्तत्र स एवाहं हंस इत्यनुचिन्तयेत् इति। प्राणापानगती रुद्ध्वेत्यनेन तु श्लोकेन प्राणायामयज्ञा अपरैः कथ्यन्ते तत्रायमर्थःद्वौ भागौ पूरयेदन्नैस्तोयेनैकं प्रपूरयेत्। मारुतस्य प्रचारार्थं चतुर्थमवशेषयेत्।। इत्येवमादिवचनोक्तो नियत आहारो येषां ते। कुम्भकेन प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः सन्तः प्राणानिन्द्रियाणि प्राणेषु जुह्वति। कुम्भके हि सर्वे प्राणा एकीभवन्तीति तत्रैव लीयमानेष्विन्द्रियेषु होमं भावयन्तीत्यर्थः। तदुक्तं योगशास्त्रेयथा यथा सदाभ्यासान्मनसः स्थिरता भवेत्। वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा।। इति। तदेवमुक्तानां द्वादशानां यज्ञविदां फलमाह सर्व इति। यज्ञान्विदन्ति लभन्त इति यज्ञविदः। यज्ञज्ञा इति वा। यज्ञैः क्षपितं नाशितं कल्मषं यैस्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.30 4.31।।अपरे तु आहारतर्पणप्राणानेव (वृत्तीः) प्राणेषु विलापयन्ति इति संयताहाराः। अन्यथौदरीयसर्वभागपूरणे रोधो योगश्च न स्यात्। तदर्थं प्रारीप्सूनामाहारो नियन्तव्य एव। एते सर्वे यज्ञविदस्तेन च निष्कलमषाः स्वाधिकारागतं यज्ञशिष्टममृतं च भुञ्जत इति तथा ते सर्वे सनातनं नित्यं ब्रह्म साक्षात् परम्परया च यान्ति। तदकरणे दोषदर्शनेन व्यतिरेचयति नायमिति। अयमल्पानन्दोऽपि लोको देहो वाऽयज्ञस्य न भवति ततोऽन्यो दिव्यस्तु कुतः इति कर्त्तव्यता बोधिता। अपरं च दर्शनप्रकारः प्रसङ्गादुक्तः। ब्रह्मज्ञानिनाऽपि सर्वसन्न्यासतो ब्रह्मयज्ञाभिधः क्रियते इतिन हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठति 3।5 इति समर्थितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.30।।तथा अन्य कितने ही नियताहारी अर्थात् जिनका आहार नियमित किया हुआ है ऐसे परिमित भोजन करनेवाले प्राणोंको यानी वायुके भिन्नभिन्न भेदोंको प्राणोंमें ही हवन किया करते हैं। भाव यह है कि वे जिसजिस वायुको जीत लेते हैं उसीमें वायुके दूसरे भेदोंको हवन कर देते हैं यानी वे सब वायुभेद उसमें विलीनसे हो जाते हैं। ये सभी पुरुष यज्ञोंको जाननेवाले और यज्ञोंद्वारा निष्पाप हो गये होते हैं अर्थात् उपर्युक्त यज्ञोंद्वारा जिनके सब पाप नष्ट हो गये हैं वे यज्ञक्षपितकल्मष कहलाते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.30।। व्याख्या   अपाने जुह्वति ৷৷. प्राणायामपरायणाः (टिप्पणी प0 258.1) प्राणका स्थान हृदय (ऊपर) तथा अपानका स्थान गुदा (नीचे) है (टिप्पणी प0 258.2)। श्वासको बाहर निकालते समय वायुकी गति ऊपरकी ओर तथा श्वासको भीतर ले जाते समय वायुकी गति नीचेकी ओर होती है। इसलिये श्वासको बाहर निकालना प्राण का कार्य और श्वासको भीतर ले जाना अपान का कार्य है। योगीलोग पहले बाहरकी वायुको बायीं नासिका(चन्द्रनाड़ी) के द्वारा भीतर ले जाते हैं। वह वायु हृदयमें स्थित प्राणवायुको साथ लेकर नाभिसे होती हुई स्वाभाविक ही अपानमें लीन हो जाती है। इसको पूरक कहते हैं। फिर वे प्राणवायु और अपानवायु दोनोंकी गति रोक देते हैं। न तो श्वास बाहर जाता है और न श्वास भीतर ही आता है। इसको कुम्भक कहते हैं। इसके बाद वे भीतरकी वायुको दायीं नासिका(सूर्यनाड़ी) के द्वारा बाहर निकालते हैं। वह वायु स्वाभाविक ही प्राणवायुको तथा उसके पीछेपीछे अपानवायुको साथ लेकर बाहर निकलती है। यही प्राणवायुमें अपानवायुका हवन करना है। इसको रेचक कहते हैं। चार भगवन्नामसे पूरक सोलह भगवन्नामसे कुम्भक और आठ भगवन्नामसे रेचक किया जाता है।इस प्रकार योगीलोग पहले चन्द्रनाड़ीसे पूरक फिर कुम्भक और फिर सूर्यनाड़ीसे रेचक करते हैं। इसके बाद सूर्यनाड़ीसे पूरक फिर कुम्भक और फिर चन्द्रनाड़ीसे रेचक करते हैं। इस तरह बारबार पूरककुम्भकरेचक करना प्राणायामरूप यज्ञ है। परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यसे निष्कामभावपूर्वक प्राणायामके परायण होनेसे सभी पाप नष्ट हो जाते हैं (टिप्पणी प0 258.3)।अपरे नियताहाराः प्राणान् प्राणेषु जुह्वति नियमित आहारविहार करनेवाले साधक ही प्राणोंका प्राणोंमें हवन कर सकते हैं। अधिक या बहुत कम भोजन करनेवाला अथवा बिलकुल भोजन न करनेवाला यह प्राणायाम नहीं कर सकता (गीता 6। 16 17)।प्राणोंका प्राणोंमें हवन करनेका तात्पर्य है प्राणका प्राणमें और अपानका अपानमें हवन करना अर्थात् प्राण और अपानको अपनेअपने स्थानोंपर रोक देना। न श्वास बाहर निकालना और न श्वास भीतर लेना। इसे स्तम्भवृत्ति प्राणायाम भी कहते हैं। इस प्राणायामसे स्वाभाविक ही वृत्तियाँ शान्त होती हैं और पापोंका नाश हो जाता है। केवल परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रखकर प्राणायाम करनेसे अन्तःकरण निर्मल हो जाता है और परमात्मप्राप्ति हो जाती है।सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है उनका अनुष्ठान करनेवाले साधकोंके लिये यहाँ सर्वेऽप्येते पद आया है। उन यज्ञोंका अनुष्ठान करते रहनेसे उनके सम्पूर्ण पाप नष्ट हो जाते हैं और अविनाशी परमात्माका प्राप्ति हो जाती है।वास्तवमें सम्पूर्ण यज्ञ केवल कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये ही हैं ऐसा जाननेवाले ही यज्ञवित् अर्थात् यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले हैं। कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर परमात्माका अनुभव हो जाता है। जो लोग अविनाशी परमात्माका अनुभव करनेके लिये यज्ञ नहीं करते प्रत्युत इस लोक और परलोक (स्वर्गादि) के विनाशी भोगोंकी प्राप्तिके लिये ही यज्ञ करते हैं वे यज्ञके तत्त्वको जाननेवाले नहीं हैं। कारण कि विनाशी पदार्थोंकी कामना ही बन्धनका कारण है गतागतं कामकामा लभन्ते (गीता 9। 21)। अतः मनमें कामनावासना रखकर परिश्रमपूर्वक बड़ेबड़े यज्ञ करनेपर भी जन्ममरणका बन्धन बना रहता है मिटी न मनकी वासना नौ तत भये न नास।तुलसी केते पच मुये दे दे तन को त्रास।।विशेष बातयज्ञ करते समय अग्निमें आहुति दी जाती है। आहुति दी जानेवाली वस्तुओंके रूप पहले अलगअलग होते हैं परन्तु अग्निमें आहुति देनेके बाद उनके रूप अलगअलग नहीं रहते अपितु सभी वस्तुएँ अग्निरूप हो जाती हैं। इसी प्रकार परमात्मप्राप्तिके लिये जिन साधनोंका यज्ञरूपसे वर्णन किया गया है उनमें आहुति देनेका तात्पर्य यही है कि आहुति दी जानेवाली वस्तुओँकी अलग सत्ता रहे ही नहीं सब स्वाहा हो जायँ। जबतक उनकी अलग सत्ता बनी हुई है तबतक वास्तवमें उनकी आहुति दी ही नहीं गयी अर्थात् यज्ञका अनुष्ठान हुआ ही नहीं।इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकसे भगवान् कर्मोंके तत्त्व (कर्ममें अकर्म) का वर्णन कर रहे हैं। कर्मोंका तत्त्व है कर्म करते हुए भी उनसे नहीं बँधना। कर्मोंसे न बँधनेका ही एक साधन है यज्ञ। जैसे अग्निमें डालनेपर सब वस्तुएँ स्वाहा हो जाती हैं ऐसे ही केवल लोकहितके लिये किये जानेवाले सब कर्म स्वाहा हो जाते हैं यज्ञायाचरतः कर्म समग्रं प्रविलीयते (गीता 4। 23)।निष्कामभावपूर्वक केवल लोकहितार्थ किये गये साधारणसेसाधारण कर्म भी परमात्माकी प्राप्ति करानेवाले हो जाते हैं। परन्तु सकामभावपूर्वक किये गये बड़ेसेबड़े कर्मोंसे भी परमात्माकी प्राप्ति नहीं होती। कारण कि उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंकी कामना ही बाँधनेवाली है। पदार्थ और क्रियारूप संसारसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण मनुष्यमात्रमें पदार्थ पाने और कर्म करनेका राग रहता है कि मुझे कुछनकुछ मिलता रहे और मैं कुछनकुछ करता रहूँ। इसीको पानेकी कामना तथा करनेका वेग कहते हैं।मनुष्यमें जो पानेकी कामना रहती है वह वास्तवमें अपने अंशी परमात्माको ही पानेकी भूख है परन्तु परमात्मासे विमुख और संसारके सम्मुख होनेके कारण मनुष्य इस भूखको सांसारिक पदार्थोंसे ही मिटाना चाहता है। सांसारिक पदार्थ विनाशी हैं और जीव अविनाशी है। अविनाशीकी भूख विनाशी पदार्थोंसे मिट ही कैसे सकती है परन्तु जबतक संसारकी सम्मुखता रहती है तबतक पानेकी कामना बनी रहती है। जबतक मनुष्यमें पानेकी कामना रहती है तबतक उसमें करनेका वेग बना रहता है। इस प्रकार जबतक पानेकी कामना और करनेका वेग बना हुआ है अर्थात् पदार्थ और क्रियासे सम्बन्ध बना हुआ है तबतक जन्ममरण नहीं छूटता। इससे छूटनेका उपाय है कुछ भी पानेकी कामना न रखकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको लोकसंग्रह यज्ञार्थ कर्म लोकहितार्थ कर्म आदि नामोंसे कहा गया है।केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करनेसे संसारसे सम्बन्ध छूट जाता है और असङ्गता आ जाती है। अगर केवल भगवान्के लिये कर्म किये जायँ तो संसारसे सम्बन्ध छूटकर असङ्गता तो आ ही जाती है इसके साथ एक और विलक्षण बात यह होती है कि भगवान्का प्रेम प्राप्त हो जाता है सम्बन्ध   चौबीसवें श्लोकसे तीसवें श्लोकके पूर्वार्धतक भगवान्ने कुल बारह प्रकारके यज्ञोंका वर्णन किया और तीसवें श्लोकके उत्तरार्धमें यज्ञ करनेवाले साधकोंकी प्रशंसा की। अब भगवान् आगेके श्लोकमें यज्ञ करनेसे होनेवाले लाभ और न करनेसे होनेवाली हानि बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.29 4.30।।एवं द्रव्ययज्ञः तपोयज्ञो योगयज्ञश्चोक्तलक्षणाः। स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च ये ते संप्रति लक्ष्यन्ते अपाने इति। अपरे इति। प्राणम् उदयमानं ( N उदीयमानम्) नादं (S omit नादम्) प्रणवादिमात्रालयान्तम् अपाने अस्तं याति स्वानन्दान्तः प्रवेशात्मनि जुह्वति इति पिण्डस्थैर्यात्मा स्वाध्यायः। शिष्यात्मना च नयानयग्रहणाय केचिदस्तं यान्तम् उदी(द) यमाने संवेश्य तदेकीकारेण अपवर्गदानात्(S अपवर्गात्) आत्मनि शिष्यात्मनि च शोधनबोधनप्रवेशनयोजनरूपे स्वाध्याययज्ञे (S N स्वाध्यायज्ञाने) स्वपरानन्दमये प्रतिष्ठितमनसः। अत एव पूरकः प्रथममुक्तः चरमं रेचकः। प्रथमेन च पादेन ( N भागेन) विषयभोगान्तर्मुखीकरणं द्वितीयेन महाविदेहधारणाक्रमाद्विषयग्रहणाय निस्सरणं (N विसारणम्) ध्वन्यते। अतश्च स्वाध्याययज्ञेभ्यो न अन्ये ज्ञानयज्ञाः। एत एवोक्तव्यापारपरिशीलनावशपरिपूरितस्वात्मशिष्यात्ममनोरथाः द्वे अप्येते गती निरुध्य आहारं विषयभोगात्मकं नियम्य प्राणान् सकलचित्तवृत्त्युदयान् प्राणेषु परनिरानन्दोल्लासेषु जुह्वति कुंभकप्रशान्त्या अर्पयन्ति (S omits अर्पयन्ति)। सर्वे चैते द्रव्ययज्ञात् प्रभृति ज्ञानयज्ञान्तं यज्ञस्य तत्त्वज्ञाः तेनैव च क्षपितकल्मषाः समूलोन्मूलितभेदवासनामयमहामोहाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.30।।प्राणापानयोर्गती श्वासप्रश्वासौ निरुध्य किं कुर्वन्तीत्यपेक्षायामाह किञ्चेति। प्राणापानगतिनिरोधरूपं कुम्भकं कृत्वा पुनःपुनर्वायुजयं कुर्वन्तीत्यर्थः। आहारस्य परिमितत्वं हितत्वमेध्यत्वोपलक्षणार्थम्। प्राणानां प्राणेषु होममेव विभजते यस्येति। जितेषु वायुभेदेष्वजितानां तेषां होमप्रकारं प्रकटयति ते तत्रेति। प्रकृतान्यज्ञानुपसंहरति सर्वेऽपीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.30 4.31।।अपरे नियत इत्यत्र प्राणानां प्राणेषु कीदृशो होमः नियताहारत्वस्य कथं तत्रोपयोगः इत्यत आह नियतेति। प्राणशोषादिन्द्रियवृत्तीनां वृत्तिमत्त्विन्द्रियेषु सङ्कोचाज्जुह्वतीत्युच्यत इति शेषः। एवशब्देन श्रोत्रादीनीत्यतो भेदं दर्शयति। तत्र प्रत्याहारेणात्र नियताहारत्वेनेति। प्राणनित्यादिकं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे यच्छेदिति। वाग्वाचं मनसि यच्छेत्। तन्नियतां ध्यायेत् अवराणामिन्द्रियदेवतानां उत्तमेन्द्रियदेवतानियतत्वचिन्तनं प्रकारार्थः। वा प्राणानां प्राणेषु होम इति शेषः। अस्मिन्पक्षे नियताहार इति पृथक् यज्ञो ज्ञातव्यः। इदमेवास्तु व्याख्यानं श्रौतत्वात्किं पूर्वेणेत्यत आह अन्यदपीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.30 4.31।।नियताहारत्वेनैव प्राणशोषात्प्राणान् प्राणेषु जुह्वति। यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः कठ.3।13 इत्यादिश्रुत्युक्तप्रकारेण वा। अन्यदपि ग्रन्थान्तरे सिद्धम्।यदस्याल्पाशनं तेन प्राणाः प्राणेषु वै हुताः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.30।।अपरे कर्मयोगिनः प्राणायामेषु निष्ठां कुर्वन्ति। ते च त्रिविधाः पूरकरेचककुम्भकभेदेन। अपानेजुह्वति प्राणम् इति पूरकः प्राणे अपानम् इति रेचकः प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणान् प्राणेषु जुह्वति इति कुम्भकः। प्राणायामपरेषु त्रिषु अपि अनुषज्यते नियताहारा इति। द्रव्ययज्ञप्रभृतिप्राणायामपर्यन्तेषु कर्मयोगभेदेषु स्वसमीहितेषु प्रवृत्ता एते सर्वेसहयज्ञैः प्रजाः सृष्ट्वा (गीता 3।10) इति अभिहितमहायज्ञपूर्वकनित्यनैमित्तिककर्मरूपयज्ञविदः तन्निष्ठाः तत एव क्षपितकल्मषाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.30।। अपरे नियताहाराः नियतः परिमितः आहारः येषां ते नियताहाराः सन्तः प्राणान् वायुभेदान् प्राणेषु एव जुह्वति यस्य यस्य वायोः जयः क्रियते इतरान् वायुभेदान् तस्मिन् तस्मिन् जुह्वति ते तत्र प्रविष्टा इव भवन्ति। सर्वेऽपि एते यज्ञविदः यज्ञक्षपितकल्मषाः यज्ञैः यथोक्तैः क्षपितः नाशितः कल्मषो येषां ते यज्ञक्षपितकल्मषाः।।एवं यथोक्तान् यज्ञान् निर्वर्त्य

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【 Verse 4.31 】

▸ Sanskrit Sloka: यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् | नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्य: कुरुसत्तम ||

▸ Transliteration: yajñaśiṣṭāmṛtabhujo yānti brahma sanātanam | nāyaṁ loko’styayajñasya kuto’nyaḥ kurusattama ||

▸ Glossary: yajñaśiṣṭa: left over of sacrifice; amṛta: nectar; bhujaḥ: one who enjoys; yānti: attain; brahma: supreme; sanātanaṁ: eternal; na: not; ayaṁ: this; lokah: world; asti: is; ayajñasya: to one who does not sacrifice; kutaḥ: where; anyaḥ: other; kuru sattama: O best among the Kurus

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.31 Having tasted the nectar of the results of such sacrifices, they go to the supreme eternal consciousness. This world is not for those who have not sacrificed. How can the other be, Arjuna?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.31।।हे कुरुवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन यज्ञसे बचे हुए अमृतका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करनेवाले मनुष्यके लिये यह मनुष्यलोक भी सुखदायक नहीं है फिर परलोक कैसे सुखदायक होगा

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.31।। हे कुरुश्रेष्ठ यज्ञ के अवशिष्ट अमृत को भोगने वाले पुरुष सनातन ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ रहित पुरुष को यह लोक भी नहीं मिलता फिर परलोक कैसे मिलेगा

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.31 यज्ञशिष्टामृतभुजः eaters of the nectar -- the remnants of the sacrifice? यान्ति go? ब्रह्म Brahman? सनातनम् eternal? न not? अयम् this? लोकः world? अस्ति is? अयज्ञस्य of the nonsacrificer? कुतः how? अन्यः other? कुरुसत्तम O best of the Kurus.Commentary They go to the eternal Brahman in course of time after attaining the knowledge of the Self through purification of the mind by performing the above sacrifices. He who does not perform any of these is not fit even for this miserable world. How then can he hope to get a better world than this (Cf.III.13)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.31. The eaters of the sacrifice-ordained (or sacrificial remnant) nectar, attain the eternal Brahman. [Even] this world is not for a non-sacrificer, how can there be the other ? O best of the Kurus !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.31 Tasting the nectar of immortality, as the reward of sacrifice, they reach the Eternal. This world is not for those who refuse to sacrifice; much less the other world.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.31 This world is not for him who makes no sacrifice. How then the other, O Arjuna?

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.31 Those who partake of the nectar left over after a sacrifice, reach the eternal Brahman. This world ceases to exist for one who does not perform sacrifices. What to speak of the other (world), O best among the Kurus (Arjuna)!

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.31 Those who eat the remnants of the sacrifice, which are like nectar, go to the eternal Brahman. This world is not for the man who does not perform sacrifice; how then can he have the other, O Arjuna?

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.31 Yajna-etc. They enjoy the nectar of the Parananda and the Nirananda, which is of the nature of relaxing in their own Self and which has been ordained-i.e., brought about - by the sacrifice and which is the remnant of the sacrifice in the form of satisfying [the deities of] their own sense-organs. Yet, remaining as Brahman Itself, they get themselves mixed [in this mundane life] to their heart-content.

Here we refrain [ourselves] from the free talk of clearly disclosing what is highly secret. Further, here a good amount of tasty secret has been kept well hidden. Yet, this becomes an object of [actual] chewing and [thus] becomes the cause for enjoying (realising) what is Real, in the case of those persons whose [bodily and internal] elements have been ealised by the powerful medicines of the tradition learnt from the revered teachers, pleased with service, laden with very assiduous devotion.

In this context other explanations have been offered by [other] commentators. However, let the intellectuals weigh and decide for themselves, those explanations and the etymological interpretations offered by our revered preceptors. So, look ! What is the use of the sport of criticising the statements of those commentators ? Hence let us stick to only what we have begun with.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.31 He 'who offers no sacrifices,' i.e., he who does not devote himself to obligatory and occasional actions, preceded by the performance of the 'great sacrifices' etc., will not be able to achieve human ends which are associated with the material world and are called by the names of virtue, wealth and worldly satisfactions. How then can the man's supreme end called release (Moksa), which is other than these, be attained? As Moksa, man's supreme end, has been mentioned, other objectives different from it, are named 'this world.' That is, indeed, the material world.

[Perhaps the idea is that all types of sacrificers should perform the Panca-Maha-Yajnas, and take the remnants of it as their daily food. Only in this way can we give some meaning to 'ambrosial food' connected with the performance of all the various kinds of sacrifice mentioned in the above verses.]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.31 Yajna-sista-amrta-bhujah, those who partake of the nectar left over after a sacrifice, i.e. those who, after performing the sacrifices described above, eat, during the leisure after the sacrifice, the food called nectar, as prescribed by the injunctions; yanti, reach; sanatanam brahma, the eternal Brahman. For the sake of consistency (with the Upanisads) it is understood that if they (the sacrificers) are seekers of liberation, (then they reach Brahman) in due course of time. [The Upanisads describe the different stages through which those who do good deeds and practise meditation have to pass before reaching the alified Brahman after death. For liberation there is need also of purification of the heart, Thus, they reach Brahman by stages, and not immediately after death. (See Ch. 8.5 and subseent portion; also, Br. 4.3.35 to 4.4.25, etc.)] Even ayam lokah, this world, common to all beings; na asti, ceases to exist; ayajnasya, for one who does not perform sacrifices, for him who does not have to his credit even a single one of the above sacrifices. Kutah anyah, what to speak of the other world which can be achieved through special disciplines; kurusattama, O best among the Kurus!

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.31।। प्राचीनकाल में यज्ञकर्म में अग्नि की आहुति देने के पश्चात् जो कुछ अवशिष्ट रह जाता था उसे ही अमृत कहते थे जिसका सेवन भक्तगण ईश्वर का प्रसाद समझकर करते थे। उनका यह विश्वास था कि भक्तिपूर्वक इस अमृतसेवन से अन्तकरण की शुद्धि हो सकती है।इस रूपक के आध्यात्मिक लक्ष्यार्थ पर विचार करने पर ज्ञात होगा कि अवशिष्ट अमृत का अभिप्राय उपर्युक्त यज्ञों के आचरण से प्राप्त फल से है। इन यज्ञों के आचरण का फल है आत्मसंयम अथवा दूसरे शब्दों में संगठित व्यक्तित्व। इस फल को प्राप्त पुरुष ही ध्यानाभ्यास के योग्य होते हैं।संगठित व्यक्तित्व का पुरुष ही ध्यान के लिये आवश्यक मन के समत्व को प्राप्त करके अनन्तस्वरूप ब्रह्म को आत्मरूप से पहचान सकता है। इस श्लोक की दूसरी पंक्ति निषेध की भाषा में उपर्युक्त सिद्धांत को और अधिक स्पष्ट करती है। पुरुषार्थ के बिना आत्मविकास नहीं हो सकता। अकर्मण्यता से कोई किसी भी क्षेत्र में लाभान्वित नहीं हो सकता। निस्वार्थ कर्म के बिना जब इस लोक में ही कोई शाश्वत फल नहीं प्राप्त होता तब परलोक के सम्बन्ध में क्या कर सकता है इस स्थान पर दो शंकाएं मन में उठ सकती हैं। क्या ये सभी मार्ग एक ही लक्ष्य तक पहुँचाते हैं अथवा विभिन्न लक्ष्यों तक तथा दूसरी शंका यह हो सकती है कि क्या ये सब मार्ग भगवान् के बौद्धिक विचार मात्र तो नहीं हैं भगवान् इन शंकाओं का निराकरण करते हुए कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.31।। एवं यथोक्तान्यज्ञान्निर्वर्त्य तच्छिष्टेन कालेन यथाविधिचोदितमन्नं अमृताख्यं भूञ्जत इति यज्ञशिष्टामृतभुजः। यत्त्वन्ये सर्वेषामप्येतेषां मध्येऽन्यतममप्यनुष्ठातुमशक्यं प्रति प्राह यञ्जेति। यज्ञाः पञ्चमहायज्ञास्तेभ्यः शिष्टमवशिष्टमन्नममृताख्यं ये भुञ्जत इत्यादि तच्चिन्त्यम्। श्रुतहानेरश्रुतकल्पनायाश्चान्याय्यत्वात्। पञ्चयज्ञानामपि दैवादिश्रौतस्मार्तयज्ञेष्वन्तर्भावाच्च। ब्रह्म सनातनं मोक्षाख्यं यान्ति। यथोक्तानां यज्ञानामेकोऽपि यज्ञो यस्य नास्ति सोऽयज्ञः तस्यायं लोकः सर्वप्राणिसाधारणोऽपि नास्ति। शुद्धचितेन श्रवणादिविशिष्टसाधनलभ्योऽन्यः सर्वलोकातीत आत्मस्वरुपस्तस्य कुतः। कुरुसत्तमेति संबोधयन् कुरवोऽपि यज्ञविद आसन् त्वं तु तेषु सत्तमः श्रेष्ठोऽतः त्वया यज्ञवित्त्वमवश्यं संपादनीयमिति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.31।।एवमन्वये गुणमुक्त्वा व्यतिरेके दोषमाहार्धेन उक्तानां यज्ञानां मध्येऽन्यतमोऽपि यज्ञो यस्य नास्ति सोऽयज्ञस्तस्यायमल्पसुखोऽपि मनुष्यलोको नास्ति सर्वनिन्द्यत्वात् कुतोऽन्यो विशिष्टसाधनसाध्यः परलोकः हे कुरुसत्तम।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.31।।सर्वेषामेतेषां मध्येऽन्यतममप्यनुष्ठातुमशक्तं प्रति प्राह यज्ञेति। यज्ञाः पञ्चमहायज्ञास्तेभ्यः शिष्टमवशिष्टमन्नममृताख्यं ये भुञ्जते तेऽपि चित्तशुद्धिद्वारा सनातनं ब्रह्म यान्ति प्राप्नुवन्ति। अयज्ञस्य पूर्वोक्तेषु द्वादशस्वन्यतमो वा नित्याः पञ्च वा यस्य यज्ञा न सन्ति सोऽयज्ञस्तस्यायमपि लोको नास्ति अन्यः परलोक आत्मलोको वा कुतो भवेत्। न कुतश्चिदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.31।।एवं यज्ञैर्निष्कल्मषा भूत्वा मत्स्मरणादिना ब्रह्म प्राप्नुवन्तीत्याह यज्ञशिष्टेति। यज्ञशिष्टामृतभुजः यज्ञे शिष्टमवशिष्टं यदमृतं मत्स्मरणरूपं तद्भुजस्तद्भोगकर्तारः सनातनं ब्रह्म अक्षरात्मकं यान्ति प्राप्नुवन्ति। अत एवयस्य स्मृत्या इत्यादिना भगवत्स्मरणेनैव कर्मादीनां पूर्णत्वम्। एवं यज्ञकर्तृ़णामक्षरप्राप्तिमुक्त्वा तदकर्तृ़णां बाधकमाह नायमिति। हे कुरुसत्तम सत्कुलोत्पन्न अयज्ञस्यमद्विभूतिरूपमदाज्ञादिरूपयज्ञरहितस्यायं लोको नास्ति। अस्मिन्नपि लोके निन्दितः सन् तदा अन्यः अक्षरात्मकः कुतः प्राप्यः इति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.31।।यज्ञशिष्टेति। यज्ञान्कृत्वाऽवशिष्टे कालेऽनिषिद्धमन्नममृतरूपं भुञ्जत इति तथा ते सनातनं ब्रह्म ज्ञानद्वारेण प्राप्नुवन्ति। तदकरणे दोषमाह नायं लोक इति। अयमल्पसुखोऽपि मनुष्यलोकोऽयज्ञस्य यज्ञानुष्ठानशून्यस्य नास्ति। कुतोऽन्यः परलोकः। अतो यज्ञाः सर्वथा कर्तव्या इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.30 4.31।।अपरे तु आहारतर्पणप्राणानेव (वृत्तीः) प्राणेषु विलापयन्ति इति संयताहाराः। अन्यथौदरीयसर्वभागपूरणे रोधो योगश्च न स्यात्। तदर्थं प्रारीप्सूनामाहारो नियन्तव्य एव। एते सर्वे यज्ञविदस्तेन च निष्कलमषाः स्वाधिकारागतं यज्ञशिष्टममृतं च भुञ्जत इति तथा ते सर्वे सनातनं नित्यं ब्रह्म साक्षात् परम्परया च यान्ति। तदकरणे दोषदर्शनेन व्यतिरेचयति नायमिति। अयमल्पानन्दोऽपि लोको देहो वाऽयज्ञस्य न भवति ततोऽन्यो दिव्यस्तु कुतः इति कर्त्तव्यता बोधिता। अपरं च दर्शनप्रकारः प्रसङ्गादुक्तः। ब्रह्मज्ञानिनाऽपि सर्वसन्न्यासतो ब्रह्मयज्ञाभिधः क्रियते इतिन हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठति 3।5 इति समर्थितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.31।।इस प्रकार उपर्युक्त यज्ञोंका सम्पादन करके यज्ञोंके शेषका नाम यज्ञशिष्ट है वही अमृत है उसको जो भोगते हैं वे यज्ञशिष्ट अमृतभोजी हैं। उपर्युक्त यज्ञोंको करके उससे बचे हुए समयद्वारा यथाविधि प्राप्त अमृतरूप विहित अन्नको भक्षण करनेवाले यज्ञशिष्ट अमृतभोजी पुरुष सनातन यानी चिरन्तन ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। यहाँ यान्ति इस गतिविषयक शब्दकी शक्तिसे यह पाया जाता है कि यदि यज्ञ करनेवाले मुमुक्षु होते हैं तो कालातिक्रमकी अपेक्षासे ( मरनेके बाद कितने ही कालतक ब्रह्मलोकमें रहकर फिर प्रलयके समय ) ब्रह्मको प्राप्त होते हैं। हे कुरुश्रेष्ठ जो मनुष्य उपर्युक्त यज्ञोंमेंसे एक भी यज्ञ नहीं करता उस यज्ञरहित पुरुषको सब प्राणियोंके लिये जो साधारण है ऐसा यह लोक भी नहीं मिलता फिर विशेष साधनोंद्वारा प्राप्त होनेवाला अन्य लोक तो मिल ही कैसे सकता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.31।। व्याख्या   यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम् यज्ञ करनेसे अर्थात् निष्कामभावपूर्वक दूसरोंको सुख पहुँचानेसे समताका अनुभव हो जाना ही यज्ञशिष्ट अमृत का अनुभव करना है। अमृत अर्थात् अमरताका अनुभव करनेवाले सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त हो जाते हैं ( गीता 3। 13)।स्वरूपसे मनुष्य अमर है। मरनेवाली वस्तुओंके सङ्गसे ही मनुष्यको मृत्युका अनुभव होता है। इन वस्तुओंको संसारके हितमें लगानेसे जब मनुष्य असङ्ग हो जाता है तब उसे स्वतःसिद्ध अमरताका अनुभव हो जाता है।कर्तव्यमात्र केवल कर्तव्य समझकर किया जाय तो वह यज्ञ हो जाता है। केवल दूसरोंके हितके लिये किया जानेवाला कर्म ही कर्तव्य होता है। जो कर्म अपने लिये किया जाता है वह कर्तव्य नहीं होता प्रत्युत कर्ममात्र होता है जिससे मनुष्य बँधता है। इसलिये यज्ञमें देनाहीदेना होता है लेना केवल निर्वाहमात्रके लिये होता है (गीता 4। 21)। शरीर यज्ञ करनेके लिये समर्थ रहे इस दृष्टिसे 2शरीरनिर्वाहमात्रके लिये वस्तुओंका2 उपयोग करना भी यज्ञके अन्तर्गत है। मनुष्यशरीर यज्ञके लिये ही है। उसे मानबड़ाई सुखआराम आदिमें लगाना बन्धनकारक है। केवल यज्ञके लिये कर्म करनेसे मनुष्य बन्धनरहित (मुक्त) हो जाता है और उसे सनातन ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम जैसे तीसरे अध्यायके आठवें श्लोकमें भगवान्ने कहा कि कर्म न करनेसे तेरा शरीरनिर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा ऐसे ही यहाँ कहते हैं कि यज्ञ न करनेसे तेरा यह लोक भी लाभदायक नहीं रहेगा फिर परलोकका तो कहना ही क्या है केवल स्वार्थभावसे (अपने लिये) कर्म करनेसे इस लोकमें संघर्ष उत्पन्न हो जायगा और सुखशान्ति भंग हो जायगी तथा परलोकमें कल्याण भी नहीं होगा।अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे घरमें भी भेद और संघर्ष पैदा हो जाता है खटपट मच जाती है। घरमें कोई स्वार्थी पेटू व्यक्ति हो तो घरवालोंको उसका रहना सुहाता नहीं। स्वार्थत्यागपूर्वक अपने कर्तव्यसे सबको सुख पहुँचाना घरमें अथवा संसारमें रहनेकी विद्या है। अपने कर्तव्यका पालन करनेसे दूसरोंको भी कर्तव्यपालनकी प्रेरणा मिलती है। इससे घरमें एकता और शान्ति स्वाभाविक आ जाती है। परन्तु अपने कर्तव्यका पालन न करनेसे इस लोकमें सुखपूर्वक जीना भी कठिन हो जाता है और अन्य लोकोंकी तो बात ही क्या है इसके विपरीत अपने कर्तव्यका ठीकठीक पालन करनेसे यह लोक भी सुखदायक हो जाता है और परलोक भी। सम्बन्ध   इसी अध्यायके सोलहवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मोंका तत्त्व बतानेकी प्रतिज्ञा की थी। उसका विस्तारसे वर्णन करके अब भगवान् उसका उपसंहार करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.31।।यज्ञेति। यज्ञेन शिष्टम् आहृतं यज्ञाच्च ( N यज्ञाश्च) निजकरणतर्पणरूपादवशिष्टं वा स्वात्मविश्रान्तिरूपं परानन्द ( N परानन्दं) निरानन्दात्मकममृतमुपभुञ्जाना अपि ( N भुञ्जाना इति यथेच्छम्) यथेच्छं संसृज्यन्ते ब्रह्मतयेति। तदुपरम्यते अतिरहस्यस्फुटप्रकटनवाचालतायाः।अत्र बहुतरो रहस्यरसः अन्तःसंलीनीकृतोऽपि निबिडतरभक्तिसेवासम्प्रसादितगुरुचरण (S N गुरुवचनसं ) संप्राप्तसंप्रदायमहौषधसमीकृतधातूनां चर्वणादिविषयतां भूतार्थास्वादहेतुतां च प्रतिपद्यते ( प्रतिपाद्यते)।अत्र व्याख्यान्तराणि टीकाकारैः प्रदर्शितानि। तानि अस्मद्गुरुपादनिरुक्तानि च स्वयमेव सचेतसः संप्रधार्यन्तामितिं किमन्येन ( omits किमन्येन) हन्त व्याख्यातृवचनदूषणाविनोदनेन। तदुपक्रान्तमेवोपक्रम्यते (S पगम्यते)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.31।।यथोक्तयज्ञनिर्वर्तनानन्तरं क्षीणे कल्मषे किं स्यादित्याशङ्क्याह एवमिति। यथोक्तानां यज्ञानां मध्ये केनचिदपि यज्ञेनाविशेषितस्य पुरुषस्य प्रत्यवायं दर्शयति नायमिति। कथं यथोक्तयज्ञानुष्ठायिनामवशिष्टेन कालेन विहितान्नभुजां ब्रह्मप्राप्तिरित्याशङ्क्य मुमुक्षुत्वे सति चित्तशुद्धिद्वारेत्याह मुमुक्षवश्चेदिति। तत्किमिदानीं साक्षादेव मोक्षो विवक्षितः तथाच गतिश्रुतिविरोधः स्यादित्याशङ्क्य गतिनिर्देशसामर्थ्यात्क्रममुक्तिरत्राभिप्रेतेत्याह कालातीति। तृतीयं पादं व्याचष्टे नायमिति। विवक्षितं कैमुतिकन्यायमाह कुत इति। साधारणलोकाभावे पुनरसाधारणलोकप्राप्तिर्दूरनिरस्तेत्यर्थः। यथोक्तेऽर्थे बुद्धिसमाधानं कुरुकुलप्रधानस्यार्जुनस्यानायासलभ्यमिति वक्तुं कुरुसत्तमेत्युक्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.30

Chapter 4 (Part 21)

4.31।।अपरे नियत इत्यत्र प्राणानां प्राणेषु कीदृशो होमः नियताहारत्वस्य कथं तत्रोपयोगः इत्यत आह नियतेति। प्राणशोषादिन्द्रियवृत्तीनां वृत्तिमत्त्विन्द्रियेषु सङ्कोचाज्जुह्वतीत्युच्यत इति शेषः। एवशब्देन श्रोत्रादीनीत्यतो भेदं दर्शयति। तत्र प्रत्याहारेणात्र नियताहारत्वेनेति। प्राणनित्यादिकं प्रकारान्तरेण व्याचष्टे यच्छेदिति। वाग्वाचं मनसि यच्छेत्। तन्नियतां ध्यायेत् अवराणामिन्द्रियदेवतानां उत्तमेन्द्रियदेवतानियतत्वचिन्तनं प्रकारार्थः। वा प्राणानां प्राणेषु होम इति शेषः। अस्मिन्पक्षे नियताहार इति पृथक् यज्ञो ज्ञातव्यः। इदमेवास्तु व्याख्यानं श्रौतत्वात्किं पूर्वेणेत्यत आह अन्यदपीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.30 4.31।।नियताहारत्वेनैव प्राणशोषात्प्राणान् प्राणेषु जुह्वति। यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञः कठ.3।13 इत्यादिश्रुत्युक्तप्रकारेण वा। अन्यदपि ग्रन्थान्तरे सिद्धम्।यदस्याल्पाशनं तेन प्राणाः प्राणेषु वै हुताः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.31।।यज्ञशिष्टामृतेन शरीरधारणं कुर्वन्त एव कर्मयोगे व्यापृताः सनातनं च ब्रह्म यान्ति। अयज्ञस्य महायज्ञादिपूर्वकनित्यनैमित्तिककर्मरहितस्य न अयं लोकः न प्राकृतलोकः प्राकृतलोकसम्बन्धिधर्मार्थकामाख्यः पुरुषार्थः न सिध्यति कुतः इतः अन्यः मोक्षाख्यः पुरुषार्थः। परमपुरुषार्थतया मोक्षस्य प्रस्तुतत्वात् तदितरपुरुषार्थःअयं लोकः इति निर्दिश्यते स हि प्राकृतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.31।। यज्ञशिष्टामृतभुजः यज्ञानां शिष्टं यज्ञशिष्टं यज्ञशिष्टं च तत् अमृतं च यज्ञशिष्टामृतं तत् भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजः। यथोक्तान् यज्ञान् कृत्वा तच्छिष्टेन कालेन यथाविधिचोदितम् अन्नम् अमृताख्यं भुञ्जते इति यज्ञशिष्टामृतभुजः यान्ति गच्छन्ति ब्रह्म सनातनं चिरन्तनं मुमुक्षवश्चेत् कालातिक्रमापेक्षया इति सामर्थ्यात् गम्यते। न अयं लोकः सर्वप्राणिसाधारणोऽपि अस्ति यथोक्तानां यज्ञानां एकोऽपि यज्ञः यस्य नास्ति सः अयज्ञः तस्य। कुतः अन्यो विशिष्टसाधनसाध्यः कुरुसत्तम।।

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【 Verse 4.32 】

▸ Sanskrit Sloka: एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे | कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे ||

▸ Transliteration: evaṁ bahuvidhā yajñā vitatā brahmaṇo mukhe | karmajānviddhi tānsarvānevaṁ jñātvā vimokṣyase ||

▸ Glossary: evaṁ: thus; bahu: many; vidhāḥ: kinds of; yajñāḥ: sacrifices; vitatā : explained; brahmaṇaḥ mukhe: in the words of the Veda; karmajān: born of actions of mind, sense and body; viddhi: know; tān: those; sarvān: all; evaṁ: thus; jñātvā: after knowing; vimokṣyase: will be liberated

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.32 Thus, there are many kinds of sacrifices born of work mentioned in the Vedas. Thus, knowing these, one will be liberated.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.32।।इस प्रकार और भी बहुत तरहके यज्ञ वेदकी वाणीमें विस्तारसे कहे गये हैं। उन सब यज्ञोंको तू कर्मजन्य जान। इस प्रकार जानकर यज्ञ करनेसे तू (कर्मबन्धनसे) मुक्त हो जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.32।। ऐसे अनेक प्रकार के यज्ञों का ब्रह्मा के मुख अर्थात् वेदों में प्रसार है अर्थात् वर्णित हैं। उन सब को कर्मों से उत्पन्न हुए जानो इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.32 एवम् thus? बहुविधाः manifold? यज्ञाः sacrifices? वितताः are spread? ब्रह्मणः of Brahman (or of the Veda)? मुखे in the face? कर्मजान् born of action? विद्धि know (thou)? तान् them? सर्वान् all? एवम् thus? ज्ञात्वा having known? विमोक्ष्यसे thou shalt be liberated.Commentary The word Brahmanah has also been interpreted to mean In the Vedas.Various kinds of sacrifices are spread out at the mouth of Brahman? i.e.? they are known from the Vedas. Know that they are born of action? because the Self is beyond action. If you realise that these actions do not concern me? they are not my actin? and I am actionless? you will surely be liberated from the bondage of Samsara by this right knowledge. (Cf.IX.27XIII.15)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.32. Thus, sacrifices of many varieties have been elaborated in the mouth of the Brahman. Know them all as having sprung from actions. By knowing thus you shall be liberated.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.32 In this way other sacrifices too may be undergone for the Spirit's sake. Know thou that they all depend on action. Knowing this, thou shalt be free.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.32 Thus many forms of sacrifices have been spread out as means of reaching Brahman (individual self in its own nature). Know that all these born of actions. Knowing thus, you shall be free.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.32 Thus, various kinds of sacrifices lie spread at the mouth of the Vedas. Know them all to be born of action. Knowing thus, you will become liberated.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.32 Thus, manifold sacrifices are spread out before Brahman (literally) at the mouth or face of Brahman). Know them all as born of action and thus knowing, thou shalt be liberated.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.32 Evam etc. All these sacrifices have been detailed in the mouth of i.e., at the entrance to, i.e., as means to [attain], the Brahman. In them there lies the practice of actions as common factor. By knowing in this manner, you too shall attain liberation from bondage. The speciality here is this :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.32 Thus there are many kinds of Kamra Yoga, which are spread out for the attainment of the Brahman. That means, they lead to the realisaion of the true nature of the individual self. Know that all these are forms of Karma Yoga, which have been previoulsy defined and diversified, as born of actions. That means, know them as resulting from occasional and obligatory rites performed day by day. Knowing thus, observing them in the manner prescribed, you will be released.

It has been stated that actions have the form of knowledge because of the inclusion of knowledge in them. Now Sri Krsna explains the predominance of the component of knowledge in such actions which include knowledge within themselves.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.32 Evam, thus; bahu-vidha yajnah, various kinds of sacrifices as described; vitatah, lie spread; mukhe, at the mouth, at the door; brahmanah, of the Vedas. Those which are known through the Vedas- as for instance, 'We offer the vital force into speech', etc.-are said to be vitatah, spread, elaborated; mukhe, at the mouth; brahmanah, of the Vedas. Viddhi, know; tan, them; sarvan, all; to be karmajan, born of action, accoplished through the activities of body, speech and mind, but not born of the Self. For the Self is actionless. Hence, jnatva, knowing; evam, thus; vimoksyase, you will become liberated from evil. By knowing thus- 'These are not my actions; I am actionless and detached'-You will be freed from worldly bondage as a result of this full enlightenment. This is the purport. Through the verse beginning with, 'The ladle is Brahman' etc., complete Illumination has been represented as a sacrifice. And sacrifices of various kinds have been taught. With the help of [Some translate this as: As compared with৷৷.-Tr.] those (sacrifices) that are meant for accomplishing desireable human ends, Knowledge (considered as a sacrifice) is being extolled: How?

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.32।। जगत् में देखा जाता है कि दो विभिन्न कर्मों के फल भी भिन्नभिन्न होते हैं। अत इन बारह यज्ञकर्मों के फल भी विभिन्न होने चाहिए। यह दर्शाने के लिये कि इनमें भेद प्रतीत होते हुए भी सब का लक्ष्य एक ही है यहाँ कहा है कि इस प्रकार बहुत से यज्ञ ब्रह्मा के मुख में फैले हुए है इसका तात्पर्य है कि सभी यज्ञों का लक्ष्य ब्रह्म ही है। सभी राजमार्ग राजधानी को ही जाते हैं।उन सबको कर्मों से उत्पन्न हुए जानो भगवान् के इस कथन से दो अभिप्राय हैं (क) वेदों में उपदिष्ट इन साधनों का अभ्यास प्रयत्नपूर्वक करना चाहिये। भगवान् अर्जुन को स्मरण दिलाते हैं कि यदि वह आत्मविकास का इच्छुक है तो कर्म अपरिहार्य है। तथा (ख) ये सब यज्ञ केवल साधन हैं साध्य नहीं। हमारा लक्ष्य है पूर्णत्व की स्थिति जबकि कर्म उस पूर्णस्वरूप के अज्ञान से उत्पन्न इच्छाओं के कारण ही होते हैं।इस प्रकार जानकर तुम मुक्त हो जाओगे जानने का अर्थ बौद्धिक स्तर पर न होकर साक्षात् आत्मानुभूति से है।सम्यक् ज्ञान को ज्ञानयज्ञ कहा गया था। तत्पश्चात् अनेक प्रकार के यज्ञों का वर्णन किया गया है। अब अन्य यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ की विशेषता बताते हुए उसकी प्रशंसा करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.32।। उक्तानां यज्ञानां वेदमूलत्वेनाप्रामाण्यशङ्का वारयति एवमिति। बहुविधा बहुप्रकारा यज्ञाः ब्रह्मणो वेदस्य मुखे द्वारे वितता विस्तीर्णाः वेदद्वारेणावगम्यमानाः तान्सर्वान्कायिकवाचिकमानसकर्मोद्भवान् विद्धि। निर्व्यापारो ह्यात्मा न ममात्मस्वरुपस्योदासीनस्य व्यापारा एते इत्येवं ज्ञात्वाऽस्मात्संसारबन्धनान्मोक्ष्यसे।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.32।।किं त्वया स्वोत्प्रेक्षामात्रेणैवमुच्यते नहि वेद एवात्र प्रमाणमित्याह एवं यथोक्ता बहुविधा बहुप्रकारा यज्ञाः सर्ववैदिकश्रेयःसाधनरूपा वितता विस्तृताः ब्रह्मणो वेदस्य मुखे द्वारे वेदद्वारेणैव तेऽवगता इत्यर्थः। वेदवाक्यानि तु प्रत्येकं विस्तरभयान्नोदाह्नियन्ते। कर्मजान्कायिकवाचिकमानसकर्मोद्भवान्विद्धि जानीहि तान्सर्वान्यज्ञान्नात्मजान्। निर्व्यापारो ह्यात्मा न तद्व्यापारा एते किंतु निर्व्यापारोऽहमुदासीन इत्येवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे। अस्मात्संसारबन्धनादिति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.32।।एवमिति। ब्रह्मणो वेदस्य मुखे द्वारे। वेदद्वारेणैव वितता विस्तारिताः। गुरुभिरुपदिष्टा इत्यर्थः। कर्मजान्कायिकवाचिकमानसिककर्मजान्नतु नैष्कर्म्यरूपान्। एवं ज्ञात्वास्मादशुभान्मोक्ष्यसे। तत्त्वज्ञानोत्पत्तिद्वारेणेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.32।।नन्वेवं बहुप्रकारयज्ञस्वरूपोक्त्या मया किं कार्यं इत्याशङ्क्याह एवमिति। एवं बहुविधाः पूर्वोक्तप्रकारेण बहुप्रकारा यज्ञा मदंशकाः ब्रह्मणो वेदस्य मुखे वितताः निस्सृताः तान् सर्वान् कर्मजान् एतत्क्रियोत्पन्नान् विद्धि जानीहि। एवं तान् ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे मत्प्राप्तिप्रतिबन्धैर्मुक्तो भविष्यसीत्यर्थः। मया तव वेदाद्युक्तत्वाद्यज्ञादिकर्मसु आसक्त्यभावार्थमेवं बहुप्रकारका यज्ञा उक्ता इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.32।।ज्ञानयज्ञं स्तोतुमुक्तान्यज्ञानुपसंहरति एवमिति। ब्रह्मणो वेदस्य मुखे वितताः। वेदेन साक्षाद्विहिता इत्यर्थः। तथापि तान्सर्वान्वाङ्मनःकायकर्मजनितानात्मस्वरूपसंस्पर्शरहितान्विद्धि जानीहि। आत्मनः कर्मागोचरत्वादेवं ज्ञात्वा ज्ञाननिष्ठः सन्संसाराद्विमुक्तो भविष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.32।।एवं च वेदे प्रारम्भ एव बहुविधा यज्ञा वितताः तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् ऋक्सं.8।6।19।6यजुस्सं.31।16 यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवाः विश्वसृजो वै सत्त्रमासते इत्यादौ कर्मजान् स्वक्रियानिर्वर्त्यान् वेदोक्तान् यज्ञपदवाच्यानवधारय एवं ज्ञात्वा मोक्ष्यसे। दुःखाभावः सुखं चेति पुरुषार्थद्वयं मतम्। मोक्षः कामस्तयोरङ्गं इति वाक्यान्मोक्षस्तव भवष्यतीति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.32।।इसी प्रकार उपर्युक्त बहुत प्रकारके यज्ञ ब्रह्मके यानी वेदके मुखमें विस्तृत हैं। वेदद्वारा ही सब यज्ञ जाननेमें आते हैं इसी अभिप्रायसे ब्रह्मके मुखमें विस्तारित हैं ऐसा कहा है। जैसे हम वाणीमें ही प्राणोंको हवन करते हैं इत्यादि ( इसी तरह अन्य सब यज्ञोंका भी वेदमें विधान है )। उन सब यज्ञोंको तू कर्मजकायिक वाचिक और मानसिक क्रियाद्वारा ही होनेवाले जान वे यज्ञ आत्मासे होनेवाले नहीं हैं क्योंकि आत्मा हलनचलन आदि क्रियाओंसे रहित है। सुतरां इस प्रकार जानकर तू अशुभसे मुक्त हो जायगा अर्थात् यह सब कर्म मेरेद्वारा सम्पादित नहीं हैं मैं तो निष्क्रिय और उदासीन हूँ इस प्रकार जानकर इस सम्यक् ज्ञानके प्रभावसे तू संसारबन्धनसे मुक्त हो जायगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.32।। व्याख्या   एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन बारह यज्ञोंका वर्णन किया गया है उनके सिवाय और भी अनेक प्रकारके यज्ञोंका वेदकी वाणीमें विस्तारसे वर्णन किया गया है। कारण कि साधकोंकी प्रकृतिके अनुसार उनकी निष्ठाएँ भी अलगअलग होती हैं और तदनुसार उनके साधन भी अलगअलग होते हैं।वेदोंमें सकाम अनुष्ठानोंका भी विस्तारसे वर्णन किया गया है। परन्तु उन सबसे नाशवान् फलकी ही प्राप्ति होती है अविनाशीकी नहीं। इसलिये वेदोंमें वर्णित सकाम अनुष्ठान करनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकको जाते हैं और पुण्य क्षीण होनेपर पुनः मृत्युलोकमें आ जाते हैं। इस प्रकार वे जन्ममरणके बन्धनमें पड़े रहते हैं (गीता 9। 21)। परन्तु यहाँ उन सकाम अनुष्ठानोंकी बात नहीं कही गयी है। यहाँ निष्कामकर्मरूप उन यज्ञोंकी बात कही गयी है जिनके अनुष्ठानसे परमात्माकी प्राप्ति होती है यान्ति ब्रह्म सनातनम् (गीता 4। 31)।वेदोंमें केवल स्वर्गप्राप्तिके साधनरूप सकाम अनुष्ठानोंका ही वर्णन हो ऐसी बात नहीं है। उनमें परमात्मप्राप्तिके साधनरूप श्रवण मनन निदिध्यासन प्राणायाम समाधि आदि अनुष्ठानोंका भी वर्णन हुआ है। उपर्युक्त पदोंमें उन्हींका लक्ष्य है।तीसरे अध्यायके चौदहवेंपंद्रहवें श्लोकोंमें कहा गया है कि यज्ञ वेदसे उत्पन्न हुए हैं और सर्वव्यापी परमात्मा उन यज्ञोंमें नित्य प्रतिष्ठित (विराजमान) हैं। यज्ञोंमें परमात्मा नित्य प्रतिष्ठित रहनेसे उन यज्ञोंका अनुष्ठान केवल परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये ही करना चाहिये।कर्मजान्विद्धि तान्सर्वान् चौबीसवेंसे तीसवें श्लोकतक जिन बारह यज्ञोंका वर्णन हुआ है तथा उसी प्रकार वेदोंमें जिन यज्ञोंका वर्णन हुआ है उन सब यज्ञोंके लिये यहाँ तान् सर्वान् पद आये हैं।कर्मजान् विद्धि पदोंका तात्पर्य है कि वे सबकेसब यज्ञ कर्मजन्य हैं अर्थात् कर्मोंसे होनेवाले हैं। शरीरसे जो क्रियाएँ होती हैं वाणीसे जो कथन होता है और मनसे जो संकल्प होते हैं वे सभी कर्म कहलाते हैं शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः (गीता 18। 15)।अर्जुन अपना कल्याण तो चाहते हैं पर युद्धरूप कर्तव्यकर्मको पाप मानकर उसका त्याग करना चाहते हैं। इसलिये कर्मजान् विद्धि पदोंसे भगवान् अर्जुनके प्रति ऐसा भाव प्रकट कर रहे हैं कि युद्धरूप कर्तव्यकर्मका त्याग करके अपने कल्याणके लिये तू जो साधन करेगा वह भी तो कर्म ही होगा। वास्तवमें कल्याण कर्मसे नहीं होता प्रत्युत कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेसे होता है। इसलिये यदि तू युद्धरूप कर्तव्यकर्मको भी निर्लिप्त रहकर करेगा तो उससे भी तेरा कल्याण हो जायगा क्योंकि मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते प्रत्युत (कर्मकी और उसके फलकी) आसक्ति ही बाँधती है (गीता 6। 4)। युद्ध तो तेरा सहज कर्म (स्वधर्म) है इसलिये उसे करना तेरे लिये सुगम भी है।एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे भगवान्ने इसी अध्यायके चौदहवें श्लोकमें बताया कि कर्मफलमें मेरी स्पृहा नहीं है इसलिये मुझे कर्म नहीं बाँधते इस प्रकार जो मुझे जान लेता है वह भी कर्मोंसे नहीं बँधता। तात्पर्य यह है कि जिसने कर्म करते हुए भी उनसे निर्लिप्त रहनेकी विद्या ( कर्मफलमें स्पृहा न रखना) को सीखकर उसका अनुभव कर लिया है वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। फिर पंद्रहवें श्लोकमें भगवान्ने इसी बातको एवं ज्ञात्वा पदोंसे कहा। वहाँ भी यही भाव है कि मुमुक्षु पुरुष भी इसी प्रकार जानकर कर्म करते आये हैं। सोलहवें श्लोकमें कर्मोंसे निर्लिप्त रहनेके इसी तत्त्वको विस्तारसे कहनेके लिये भगवान्ने प्रतिज्ञा की और यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् पदोंसे उसे जाननेका फल मुक्त होना बताया। अब इस श्लोकमें एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे पदोंसे ही उस विषयका उपसंहार करते हैं। तात्पर्य यह है कि फलकी इच्छाका त्याग करके केवल लोकहितार्थ कर्म करनेसे मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। संसारमें असंख्य क्रियाएँ होती रहती हैं परन्तु जिन क्रियाओंसे मनुष्य अपना सम्बन्ध जोड़ता है उन्हींसे वह बँधता है। संसारमें कहीं भी कोई क्रिया (घटना) हो जब मनुष्य उससे अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है उसमें राजी या नाराज होता है तब वह उस क्रियासे बँध जाता है। जब शरीर या संसारमें होनेवाली किसी भी क्रियासे मनुष्यका सम्बन्ध नहीं रहता तब वह कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध  यज्ञोंका वर्णन सुनकर ऐसी जिज्ञासा होती है कि उन यज्ञोंमेंसे कौनसा यज्ञ श्रेष्ठ है इसका समाधान भगवान् आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.32।।एवमिति। सर्वे च एते यज्ञा ब्रह्मणो मुखे द्वारा उपायत्वे कथिताः। तेषु कर्मणामनुगमोऽस्तीत्येवं ज्ञात्वा त्वमपि बन्धनान्मोक्षमेष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.32।।उक्तानां यज्ञानां वेदमूलकत्वेनोत्प्रेक्षानिबन्धनत्वं निरस्यति एवमिति।आत्मव्यापारसाध्यत्वमुक्तकर्मणामाशङ्क्य दूषयति कर्मजानिति। आत्मनो निर्व्यापारत्वज्ञाने फलमाह एवमिति। कथं यथोक्तानां यज्ञानां वेदस्य मुखे विस्तीर्णत्वमित्याशङ्क्याह वेदद्वारेणेति। तेनावगम्यमानत्वमेवोदाहरति तद्यथेति।एतद्ध स्म वै तत्पूर्वे विद्वांस आहुः इत्युपक्रम्याध्ययनाद्याक्षिप्य हेत्वाकाङ्क्षायामुक्तं वाचि हीति। ज्ञानशक्तिमद्विषये क्रियाशक्तिमदुपसंहारोऽत्र विवक्षितःप्राणे वा वाचं यो ह्येव प्रभवः स एवाप्ययः इति वाक्यमादिशब्दार्थः। ज्ञानशक्तिमतां क्रियाशक्तिमतां चान्यान्योत्पत्तिप्रलयत्वात्तदभावे नाध्ययनादिसिद्धिरित्यर्थः। कर्मणामात्मजन्यत्वाभावे हेतुमाह निर्व्यापारो हीति। तस्य च निर्व्यापारत्वं फलवत्त्वाज्ज्ञातव्यमित्याह अत इति। एवं ज्ञानमेव ज्ञापयन्नुक्तं व्यनक्ति नेत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.32।।ब्रह्मणो मुखे वितताः इत्यस्य वेदप्रतिपादिता इति व्याख्यानमसत् मुखशब्दवैयर्थ्यादित्यभिप्रायेणाह ब्रह्मण इति। परमात्मनः सर्वयज्ञभोक्तृत्वं कुतो भगवत्सम्मतं इत्यत आह अहं हीति। उपासनादीनां कर्मजत्वाभावात्कर्मजान्विद्धि तान् सर्वान् इत्ययुक्तमित्यत आह मानसिकेति। अत्र विमोक्ष्यस इति सन्नन्तान्मुचः कर्मकर्तरि लट्। तस्य प्रकृतोपयुक्ततयाऽर्थमाह एवमिति। एवं ज्ञात्वाऽपि यदि सर्वेऽपि यज्ञाः कर्मजा इति जानासि तर्हि तानि युद्धादीनि स्वविहितानि कर्माणि कृत्वैव विमोक्ष्यसे संसारादात्मानं मोक्तुमिच्छसि। सर्वेषां कर्मजत्वज्ञाने तवैव मोक्षार्थं युद्धादिकं कर्तव्यमितीच्छा भविष्यतीत्यर्थः। तत्कथमित्यत आह युद्धमिति। यद्येवमनेके यज्ञास्तर्हि किं कर्मात्मकेन युद्धेन उपासनादिनैवाहं कृती स्यामित्यर्जुनस्य हार्दं ज्ञात्वा भगवतेदमुक्तम्। तस्यायं भावः मोक्षार्थं यदुपासनादिकं युद्धं परित्यज्य करिष्यसि तदपि कर्म। तथा च त्वया विहितातिक्रम एव कृतः स्यात्। न तु कर्मत्यागः। अत एवं जानतस्तव विहितयुद्धादिकं न त्याज्यमिति बुद्धिर्भविष्यतीत्यर्थः। विमोक्ष्यस इति लृडन्तत्वपक्षेऽयमर्थः। किं सर्वयज्ञानां कर्मजत्वज्ञानमात्रेण मोक्षः तथा चकुरु कर्मैव 4।15 इति विधानं व्यर्थमित्यत आह एवमिति।कर्मजान्विद्धि इत्यनेन कथमर्जुनस्य शङ्कापरिहारः इत्यत आह युद्धमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.32।।ब्रह्मणः परमात्मनो मुखे।अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च 9।24 इति वक्ष्यति। मानसिकवाचिककायिककर्मजा एव हि ते सर्वे। एवं ज्ञात्वा तानि कर्माणि कृत्वा विमोक्ष्यसे। युद्धं परित्यज्य यन्मोक्षार्थं करिष्यसि तदपि कर्म। अतो विहितं न त्याज्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.32।।एवं हि बहुप्रकाराः कर्मयोगाः ब्रह्मणो मुखे वितताः आत्मयाथात्म्यावाप्तिसाधनतया स्थिताः तान् उक्तलक्षणानुक्तभेदान् कर्मयोगान् सर्वान् कर्मजान् विद्धि। अहरहः अनुष्ठीयमाननित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानजान् विद्धि। एवं ज्ञात्वा यथोक्तप्रकारेण अनुष्ठाय विमोक्ष्यसे।अन्तर्गतज्ञानतया कर्मणो ज्ञानाकारत्वम् उक्तम् तत्र अन्तर्गतज्ञाने कर्मणि ज्ञानांशस्य एव प्राधान्यम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.32।। एवं यथोक्ता बहुविधा बहुप्रकारा यज्ञाः वितताः विस्तीर्णाः ब्रह्मणो वेदस्य मुखे द्वारे वेदद्वारेण अवगम्यमानाः ब्रह्मणो मुखे वितता उच्यन्ते तद्यथा वाचि हि प्राणं जुहुमः इत्यादयः। कर्मजान् कायिकवाचिकमानसकर्मोद्भवान् विद्धि तान् सर्वान् अनात्मजान् निर्व्यापारो हि आत्मा। अत एवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे अशुभात्। न मद्व्यापारा इमे निर्व्यापारोऽहम् उदासीन इत्येवं ज्ञात्वा अस्मात् सम्यग्दर्शनात् मोक्ष्यसे संसारबन्धनात् इत्यर्थः।।ब्रह्मार्पणम् इत्यादिश्लोकेन सम्यग्दर्शनस्य यज्ञत्वं संपादितम्। यज्ञाश्च अनेके उपदिष्टाः। तैः सिद्धपुरुषार्थप्रयोजनैः ज्ञानं स्तूयते। कथम्

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【 Verse 4.33 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञ: परन्तप | सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ||

▸ Transliteration: śreyān-dravya-mayād yajñāj jñāna-yajñaḥ parantapa | sarvaṁ karmā’khilaṁ pārtha jñāne parisamāpyate ||

▸ Glossary: śreyān: superior; dravyamayāt: material wealth; yajñāt: sacrifice; jñāna ya- jñaḥ: sacrifice in wisdom; paraṁtapa: O subduer of foes; sarvaṁ: all; karma:

activities; akhilaṁ: in totality; pārtha: O son of Pritā; jñāne: in wisdom; pari- samāpyate: ends in

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.33 O Parantapa (conqueror of foes), the sacrifice of wisdom is superior to the sacrifice of material wealth. After all, all activities totally end in wisdom.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.33।।हे परन्तप अर्जुन द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान(तत्त्वज्ञान)में समाप्त हो जाते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.33।। हे परन्तप द्रव्यों से सम्पन्न होने वाले यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। हे पार्थ सम्पूर्ण अखिल कर्म ज्ञान में समाप्त होते हैं अर्थात् ज्ञान उनकी पराकाष्ठा है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.33 श्रेयान् superior? द्रव्यमयात् with objects? यज्ञात् than sacrifice? ज्ञानयज्ञः knowledgesacrifice? परन्तप O Parantapa? सर्वम् all? कर्म action? अखिलम् in its entirely? पार्थ O Partha? ज्ञाने in knowledge? परिसमाप्यते is culminated.Commentary Sacrifices with material objects cause material effects and bring the sacrificer to this world for the enjoyment of the fruits? while wisdomsacrifice leads to Moksha. Therefore wisdomsacrifice is superior to the sacrifice performed with material objects. Just as rivers join the ocean? so do all actions join knowledge? i.e.? they culminate in knowledge. All actions purify the heart and lead to the dawn of knowledge of the Self.All actions that are performed as offerings unto the Lord with their fruits are contained in the knowledge of Brahman. (Cf.IX.15X.25XVIII.70)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.33. The sacrifice by knowledge is superior to the sacrifice by material. O son of Prtha, scorcher of foes ! All actions, leaving no bit, meet their total end in knowledge.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.33 The sacrifice of wisdom is superior to any material sacrifice, for, O Arjuna, the climax of action is always Realisation.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.33 The sacrifice of knowledge is superior to materials sacrifice. O Arjuna, all actions and everything else culminate in knowledge.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.33 O destroyer of enemies, Knowledge considered as a sacrifice is greater than sacrifices reiring materials. O son of Prtha, all actions in their totality culminate in Knowledge.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.33 Superior is wisdom-sacrifice to the sacrifice with objects, O Parantapa (scorcher of the foes). All actions in their entirely, O Arjuna, culminate in knowledge.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.33 Sreyan etc. The sacrifice, illuminated by knowledge, is much more superior to the sacrifice consisting of materials exclusively. The exclusive nature [of it] is indicated by the suffix mayat [in dravyamaya]. For, all actions attain their finality in knowledge.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.33 Karma Yoga has two aspects - knowledge and material ingredients. Of these two, the component of knowledge is superior to the component of material ingredients. Knowledge is the culmination of all actions and of everything else, accessories and other things helpful. This knowledge alone, which is to be obtained by all means, is practised as comprehended in Karma Yoga. And this knowledge being regularly practised, reaches gradually what is ultimately attainable i.e., the vision of the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.33 O destroyer of enemies, jnana-yajnah, Knowledge considered as a sacrifice; is sreyan, greater; dravyamayat yajnat, than sacrifices reiring materials [Including study of the Vedas, etc. also.] For, a sacrifice performed with materials is an originator of results, [Worldly prosperity, attaining heaven, etc.], but Knowledge considered as a sacrifice is not productive of results. [It only reveals the state of Liberation that is an achieved fact. (According to Advaitism, Liberation consists in the removal of ignorance by Illumination. Nothing new is produced thery.-Tr.)]. Hence it is greater, more praiseworthy. How? Because, sarvam, all; karma-akhilam, actions in their totality, without exception; O son of Prtha, parisamapyate, culminate, get merged (attain their consummation); jnane, in Knowledge, which is a means to Liberation and is comparable to 'a flood all around' (cf.2.46). This is the idea, which accords with the Upanisadic text, 'As when the (face of a die) bearing the number 4, called Krta, wins, the other inferior (numbers on the die-faces) get included in it, so whatever good actions are performed by beings, all that gets merged in this one (Raikva). (So it happens) to anyone who knows what he (Raikva) knew' (Ch. 4.1.4). In that case, by what means is this highly estimable Knowledge acired? The answer is being given:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.33।। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि आत्मोन्नति के लिए अनेक द्रव्य पदार्थों के उपयोग से सिद्ध होने वाले यज्ञों की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ ही श्रेष्ठ है। दूसरी पंक्ति में भगवान् उसके श्रेष्ठत्व का कारण भी बताते हैं। कर्मकाण्ड में उपादिष्ट द्रव्यमय यज्ञ ऐसे फलों को उत्पन्न करते हैं जिनके उपभोग के लिए कर्तृत्वाभिमानी जीव को अनेक प्रकार के देह धारण करने पड़ते हैं जिनमें और भी नएनए कर्म किये जाते रहते हैं। कर्म से ही कर्म की समाप्ति नहीं होती। अत कर्म की पूर्णता स्वयं में ही कभी नहीं हो सकती।इसके विपरीत ज्ञान के प्रकाश में अज्ञान जनित अहंकार नष्ट हो जाता है। अज्ञान से कामना और कामना से कर्म उत्पन्न होते हैं। इसलिए ज्ञान के द्वारा कर्म के मूल स्रोत अज्ञान के ही नष्ट हो जाने पर कर्म स्वत समाप्त हो जाते हैं। सम्पूर्ण कर्मों की परिसमाप्ति ज्ञान में होती है।यदि केवल ज्ञान से ही पूर्णत्व की प्राप्ति होती हो तो उस ज्ञान को हम कैसे प्राप्त कर सकते हैं जिससे कि सब कर्मों का क्षय तत्काल हो जाये इसका उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.33।।कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानित्युक्त्या सर्वेषु ज्ञानयज्ञस्याप्युक्तत्वादितरसाभ्यमाशङ्क्याह श्रेयानिति।देहेन्द्रियादिद्रव्यसाध्यात्संसारफलात् द्रव्ययज्ञाज्ज्ञानयज्ञो मोक्षफलकोऽतिशयेन श्रेष्ठः। परंतपेति संबोधयन् चित्तशुद्य्धा ज्ञानं लब्ध्वाऽज्ञानात्मकं शत्रुं तापयितुं मारयितुं समर्थो भविष्यसि न कर्ममात्रेणेति सूचयति। तत्र हेतुमाह सर्वमग्निहोत्रादिकं कर्मोक्तद्वादशयज्ञात्मकं सर्वमिति प्रकरणात्संकोचमाशङ्क्याह। अखिलमुक्तानुक्त श्रौतस्मार्तमुपासनादिरुपं ज्ञाने तत्त्वसाक्षात्कारे मोक्षसाधने परिसमाप्यतेऽन्तर्भवति।यावनर्थ उदपाने सर्वतःसप्लुतोदके। तावान्सर्वेषु वेदेषु ब्राह्मणस्य विजानतः इत्युक्तत्वात्। यद्वा प्रतिबन्धक्षयद्वारेण पर्यवस्यतितमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन इत्यादिश्रुतेःसर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् इति न्यायाच्चेत्यर्थः। अस्मिन्पक्षे निष्कामकर्मणामेव तत्र विनियोगात्सर्वं कर्माखिलमिति संकोचनिवारकयोः सर्वाखिलपदयोरन्यतरस्य प्रयोजनं चिन्त्यम्। यथा युधिष्ठिरभीमसेनयोरपि पार्थेत्यस्मिन्नन्तर्भावः तथाएतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति इति श्रुत्या ज्ञानकाण्डफले तत्त्वसाक्षात्कारे इतरकाण्डफलस्यान्तर्भाव इति ध्वनयन्नाह पार्थेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.33।।सर्वेषां तुल्यवन्निर्देशात्कर्मज्ञानयोः साम्यप्राप्तावाह श्रेयान्प्रशस्यतरः साक्षान्मोक्षफलत्वात् द्रव्यमयात्तदुपलक्षिताज्ज्ञानशून्यात्सर्वस्मादपि यज्ञात्संसारफलाज्ज्ञानयज्ञ एकएव हे परन्तप। कस्मादेवं यस्मात् सर्वं कर्म इष्टिपशुसोमचयनरूपं श्रौतमखिलं निरवशेषं स्मार्तमुपासनादिरूपं च यत्कर्मं तत् ज्ञाने ब्रह्मात्मैक्यसाक्षात्कारे समाप्यते प्रतिबन्धक्षयद्वारेण पर्यवस्यति।तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इतिधर्मेण पापमपनुदति इति च श्रुतेः।सर्वापेक्षा च यज्ञादिश्रुतेरश्ववत् इति न्यायाच्चेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.33।।यदर्थमेते यज्ञा उपन्यस्तास्तं ज्ञानयज्ञं स्तौति श्रेयानिति। द्रव्यं बाह्यमाभ्यन्तरं च देहेन्द्रियादितत्साध्याद्द्रव्यमयाद्यज्ञात् ज्ञानयज्ञो निःशेषवाङ्मनःकायप्रवृत्त्युपरमात्मकः श्रेयान्प्रशस्तरः। ईयसुन्प्रत्ययेन तेषामपि प्रशस्तत्वं द्योत्यते तत्र हेतुः सर्वमिति। कर्म कर्मफलं सर्वमखिलं सर्वाङ्गोपसंहारयुक्तं ज्ञाने परिसमाप्यतेऽन्तर्भवति।यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेवैनं सर्वं तदभिसमेति यत्किंच प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.33।।ननु ममैतत्फलानभिलाषित्वादाज्ञया लोकसङ्ग्रहार्थं कर्त्तव्यानां तेषां ज्ञानेन किं फलं इत्यत आह श्रेयानिति। हे परन्तप ज्ञानयोग्य ज्ञानाभावे भगवदीयस्य निषिद्धप्रकारेण स्वर्गादिफलकत्वेन क्रियमाणस्यानुचितत्वात् द्रव्यमया यज्ञा()त् ज्ञानयज्ञः ज्ञानात्मको ज्ञानेन वा यज्ञः श्रेयान् स उत्तम इत्यर्थः। किञ्च द्रव्यमयो यज्ञः पूर्णत्वाभावादपि नोत्तमः ज्ञानमयस्तु सम्पूर्णो भवतीत्याह सर्वमिति। हे पार्थ सर्वं कर्म ज्ञाने अखिलं पूर्णँ परिसमाप्यते पूर्णं मत्समीपं भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.33।। कर्मयज्ञाज्ज्ञानयज्ञस्तु श्रेष्ठ इत्याह श्रेयानिति। द्रव्यमयादनात्मव्यापारजन्याद्दैवादियज्ञाज्ज्ञानयज्ञः श्रेयान्श्रेष्ठः। यद्यपि ज्ञानयज्ञस्यापि मनोव्यापाराधीनत्वमस्त्येव तथाप्यात्मरूपस्य ज्ञानस्य मनःपरिणामेऽभिव्यक्तिमात्रं नतु तज्जन्यत्वमिति द्रव्यमयाद्विशेषः। श्रेष्ठत्वे हेतुः। सर्वं कर्माखिलं फलसहितं ज्ञाने परिसमाप्यते। अन्तर्भवतीत्यर्थः।सर्वं तदभिसमेति यत्किंचित्प्रजाः साधु कुर्वन्ति इति श्रुतेः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.33।।सर्वेभ्यो यज्ञेभ्यो ब्रह्मात्मकत्वज्ञानयज्ञस्य श्रेष्ठतामाह श्रेयानिति। साङ्ख्ययोगयोरेकार्थरूपो ब्रह्मात्मकत्वज्ञानयज्ञोऽन्यतः श्रेष्ठः यतस्तत्राखिलं फलसहितं सर्वं कर्म परिसमाप्यते अन्तर्भवति सर्वं तदभिसमेति यत्किञ्चित्प्रजाः साधु कुर्वन्ति (साध्वकुर्वत) छां.उ.41।4 इति श्रुतेः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.33।।ब्रह्मार्पणम् इत्यादि श्लोकद्वारा यथार्थ ज्ञानको यज्ञरूपसे सम्पादन किया फिर बहुतसे यज्ञोंका वर्णन किया। अब पुरुषका इच्छित प्रयोजन जिन यज्ञोंसे सिद्ध होता है उन उपर्युक्त अन्य यज्ञोंकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञकी स्तुति करते हैं। कैसे सो कहते हैं हे परन्तप द्रव्यमय यज्ञकी अपेक्षा अर्थात् द्रव्यरूप साधनद्वारा सिद्ध होनेवाले यज्ञकी अपेक्षा ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठतर है। क्योंकि द्रव्यमय यज्ञ फलका आरम्भ करनेवाला है और ज्ञानयज्ञ ( जन्मादि ) फल देनेवाला नहीं है। इसलिये वह श्रेष्ठतर अर्थात् अधिक प्रशंसनीय है। क्योंकि हे पार्थ सबकेसब कर्म मोक्षसाधनरूप ज्ञानमें जो कि सब ओरसे परिपूर्ण जलाशयके समान है समाप्त हो जाते हैं अर्थात् उन सबका ज्ञानमें अन्तर्भाव हो जाता है। जैसे ( चौपड़के खेलमें कृतयुग त्रेता द्वापर और कलियुग ऐसे नामवाले जो चार पासे होते हैं उनमेंसे ) कृतयुग नामक पासेको जीत लेनेपर नीचेवाले सब पासे अपनेआप ही जीत लिये जाते हैं ऐसे ही जिसको वह रैक्व जानता है उस ब्रह्मको जो कोई भी जान लेता है प्रजा जो कुछ भी अच्छे कर्म करती है उन सबका फल उसे अपनेआप ही मिल जाता है। इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.33।। व्याख्या   श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप जिन यज्ञोंमें द्रव्यों (पदार्थों) तथा कर्मोंकी आवश्यकता होती है वे सब यज्ञ द्रव्यमय होते हैं। द्रव्य शब्दके साथ मय प्रत्यय प्रचुरताके अर्थमें है। जैसे मिट्टीकी प्रधानतावाला पात्र मृन्मय कहलाता है ऐसे ही द्रव्यकी प्रधानतावाला यज्ञ द्रव्यमय कहलाता है। ऐसे द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है क्योंकि ज्ञानयज्ञमें द्रव्य और कर्मकी आवश्यकता नहीं होती।सभी यज्ञोंको भगवान्ने कर्मजन्य कहा है (4। 32)। यहाँ भगवान् कहते हैं कि सम्पूर्ण कर्म ज्ञानयज्ञमें परिसमाप्त हो जाते हैं अर्थात् ज्ञानयज्ञ कर्मजन्य नहीं है प्रत्युत विवेकविचारजन्य है। अतः यहाँ जिस ज्ञानयज्ञकी बात आयी है वह पूर्ववर्णित बारह यज्ञोंके अन्तर्गत आये ज्ञानयज्ञ (4। 28) का वाचक नहीं है प्रत्युत आगेके (चौंतीसवें) श्लोकमें वर्णित ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रक्रियाका वाचक है। पूर्ववर्णित बारह यज्ञोंका वाचक यहाँ द्रव्यमय यज्ञ है। द्रव्यमय यज्ञ समाप्त करके ही ज्ञानयज्ञ किया जाता है।अगर सूक्ष्मदृष्टिसे देखा जाय तो ज्ञानयज्ञ भी क्रियाजन्य ही है परन्तु इसमें विवेकविचारकी प्रधानता रहती है।सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते सर्वम् और अखिलम् दोनों शब्द पर्यायवाची हैं और उनका अर्थ सम्पूर्ण होता है। इसलिये यहाँ सर्वम् कर्म का अर्थ सम्पूर्ण कर्म (मात्र कर्म) और अखिलम् का अर्थ सम्पूर्ण द्रव्य (मात्र पदार्थ) लेना ही ठीक मालूम देता है।जबतक मनुष्य अपने लिये कर्म करता है तबतक उसका सम्बन्ध क्रियाओँ और पदार्थोंसे बना रहता है। जबतक क्रियाओँ और पदार्थोंसे सम्बन्ध रहता है तभीतक अन्तःकरणमें अशुद्धि रहती है इसलिये अपने लिये कर्म न करनेसे ही अन्तःकरण शुद्ध होता है।अन्तःकरणमें तीन दोष रहते हैं मल (संचित पाप) विक्षेप (चित्तकी चञ्चलता) और आवरण (अज्ञान)। अपने लिये कोई भी कर्म न करनेसे अर्थात् संसारमात्रकी सेवाके लिये ही कर्म करनेसे जब साधकके अन्तःकरणमें स्थित मल और विक्षेप दोनों दोष मिट जाते हैं तब वह ज्ञानप्राप्तिके द्वारा आवरणदोषको मिटानेके लिये कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके गुरुके पास जाता है। उस समय वह कर्मों और पदार्थोंसे ऊँचा उठ जाता है अर्थात् कर्म और पदार्थ उसके लक्ष्य नहीं रहते प्रत्युत एक चिन्मय तत्त्व ही उसका लक्ष्य रहता है। यही सम्पूर्ण कर्मों और पदार्थोंका तत्त्वज्ञानमें समाप्त होना है।ज्ञानप्राप्तिकी प्रचलित प्रक्रियाशास्त्रोंमें ज्ञानप्राप्तिके आठ अन्तरङ्ग साधन कहे गये हैं (1) विवेक (2) वैराग्य (3) शमादि षट्सम्पत्ति (शम दम श्रद्धा उपरति तितिक्षा और समाधान) (4) मुमुक्षुता (5) श्रवण (6) मनन (7) निदिध्यासन और (8) तत्त्वपदार्थसंशोधन। इनमें पहला साधन विवेक है। सत् और असत्को अलगअलग जानना विवेक कहलाता है। सत्असत्को अलगअलग जानकर असत्का त्याग करना अथवा संसारसे विमुख होना वैराग्य है। इसके बाद शमादि षट्सम्पत्ति आती है। मनको इन्द्रियोंके विषयोंसे हटाना शम है। इन्द्रियोंको विषयोंसे हटाना दम है। ईश्वर शास्त्र आदिपर पूज्यभावपूर्वक प्रत्यक्षसे भी अधिक विश्वास करना श्रद्धा है। वृत्तियोंका संसारकी ओरसे हट जाना उपरति है। सरदीगरमी आदि द्वन्द्वोंको सहना उनकी उपेक्षा करना तितिक्षा है। अन्तःकरणमें शङ्काओंका न रहना समाधान है। इसके बाद चौथा साधन है मुमुक्षुता। संसारसे छूटनेकी इच्छा मुमुक्षता है।मुमुक्षुता जाग्रत् होनेके बाद साधक पदार्थों और कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास जाता है। गुरुके पास निवास करते हुए शास्त्रोंको सुनकर तात्पर्यका निर्णय करना तथा उसे धारण करना श्रवण है। श्रवणसे प्रमाणगत संशय दूर होता है। परमात्मतत्त्वका युक्तिप्रयुक्तियोंसे चिन्तन करना मनन है। मननसे प्रमेयगत संशय दूर होता है। संसारकी सत्ताको मानना और परमात्मतत्त्वकी सत्ताको न मानना विपरीत भावना कहलाती है। विपरीत भावनाको हटाना निदिध्यासन है। प्राकृत पदार्थमात्रसे सम्बन्धविच्छेद हो जाय और केवल एक चिन्मयतत्त्व शेष रह जाय यह तत्त्वपदार्थसंशोधन है। इसे ही तत्त्वसाक्षात्कार कहते हैं (टिप्पणी प0 262)।विचारपूर्वक देखा जाय तो इन सब साधनोंका तात्पर्य है असाधन अर्थात् असत्के सम्बन्धका त्याग। त्याज्य वस्तु अपने लिये नहीं होती पर त्यागका परिणाम (तत्त्वसाक्षात्कार) अपने लिये होता है। सम्बन्ध   अर्जुन अपना कल्याण चाहते हैं अतः कल्याणप्राप्तिके विभिन्न साधनोंका यज्ञरूपसे वर्णन करके अब भगवान् ज्ञानयज्ञके द्वारा तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.33।।अत्र त्वयं विशेषः श्रेयानिति। द्रव्ययज्ञात् केवलात् ज्ञानदीपितो यज्ञः श्रेष्ठः। केवलता मयटा सूचिता। यतः सर्वं कर्म ज्ञाने निष्ठामेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.33।।कर्मयोगेऽनेकधाभिहिते सर्वस्य श्रेयःसाधनस्य कर्मात्मकत्वप्रतिपत्त्या केवलं ज्ञानमनाद्रियमाणमर्जुनमालक्ष्य वृत्तानुवादपूर्वकमुत्तरश्लोकस्य तात्पर्यमाह ब्रह्मेत्यादिना। सिद्धेति। सिद्धं पुरुषार्थभूतं पुरुषापेक्षितलक्षणं प्रयोजनं येषां यज्ञानां तैः। अनन्तरोपदिष्टैरिति यावत्। प्रश्नपूर्वकं स्तुतिप्रकारं प्रकटयति कथमित्यादिना। ज्ञानयज्ञस्य द्रव्ययज्ञात्प्रशस्यतरत्वे हेतुमाह सर्वमिति। द्रव्यसाधनसाध्यादित्युपलक्षणं स्वाध्यायादेरपि। ततोऽपि ज्ञानयज्ञस्य श्रेयस्त्वाविशेषाद्द्रव्यमयादियज्ञेभ्यो ज्ञानयज्ञस्य प्रशस्यतरत्व प्रपञ्चयति द्रव्यमयो हीति। फलस्याभ्युदयस्येत्यर्थः। न फलारम्भको न कस्यचित्फलस्योत्पादकः किंतु नित्यसिद्धस्य मोक्षस्याभिव्यञ्जक इत्यर्थः। तस्य प्रशस्यतरत्वे हेत्वन्तरमाह यत इति। समस्तं कर्मेत्यग्निहोत्रादिकमुच्यते। अखिलमविद्यमानं खिलं शेषोऽस्येत्यनल्पम् महत्तरमिति यावत्। सर्वमखिलमिति पदद्वयोपादानमसंकोचार्थम्। सर्वं कर्म ज्ञानेऽन्तर्भवतीत्यत्र छान्दोग्यश्रुतिं प्रमाणयति यथेति। चतुरायके हि द्यूते कश्चिदायश्चतुरङ्कः सन्कृतशब्देनोच्यते तस्मै विजिताय कृताय तादर्थ्येनाधरेयास्तस्मादधस्ताद्भाविनस्त्रिद्व्येकाङ्कास्त्रेताद्वापरकलिनामानः संयन्त्यायाः संगच्छन्ते चतुरङ्के खल्वाये त्रिद्व्येकाङ्कानामायानामन्तर्भावो भवति महासंख्यायामवान्तरसंख्यान्तर्भावावश्यंभावादेवमेनं विद्यावन्तं पुरुषं सर्वं तदाभिमुख्येन समेति संगच्छते। किं तत्सर्वं यद्विदुषि पुरुषेऽन्तर्भवति तदाह यत्किञ्चिदिति। प्रजाः सर्वा यत्किमपि साधु कर्म कुर्वन्ति तत्सर्वमित्यर्थः। एनमभिसमेतीत्युक्तं तमेव विद्यावन्तं पुरुषं विशिनष्टि यस्तदिति। किं तदित्युक्तं तदेव विशदयति यत्स इति। स रैक्वो यत्तत्त्वं वेद तत्तत्त्वं योऽन्योऽपि जानाति तमेनं सर्वं साधु कर्माभिसमेतीति योजना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.33।।सर्वं कर्म इत्युक्तत्वात् अखिलमिति पुनरुक्तिरित्यत आह अखिलमिति। कर्मसमृद्ध्यार्थान्युपासनानि वेद एवोच्यन्ते। खिलं सशेषं न भवतीति अखिलमित्यर्थः।ज्ञाने परिसमाप्यते इत्यस्य ज्ञाने जाते न कर्म कार्यमित्यन्यथाप्रतीतिनिवारणाय तात्पर्यमाह ज्ञानेति। परिसमाप्तिः सम्पूर्णता सफलता सा च ज्ञाने सतीति सन्निधानाज्ज्ञानलक्षणेनैव फलेनेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.33।।अखिलमुपासनाद्यङ्गयुक्तम्। ज्ञानफलमेवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.33।।उभयाकारे कर्मणि द्रव्यमयाद् अंशाद् ज्ञानमयः अंशः श्रेयान्। सर्वस्य कर्मणः तदितरस्य च अखिलस्य उपादेयस्य ज्ञाने परिसमाप्तेः।तद् एवं सर्वैः साधनैः प्राप्यभूतं ज्ञानं कर्मान्तर्गतत्वेन अभ्यस्यते। तद् एव हि अभ्यस्यमानं क्रमेण प्राप्यदशां प्रतिपद्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.33।। श्रेयान् द्रव्यमयात् द्रव्यसाधनसाध्यात् यज्ञात् ज्ञानयज्ञः हे परंतप। द्रव्यमयो हि यज्ञः फलस्यारम्भकः ज्ञानयज्ञः न फलारम्भकः अतः श्रेयान् प्रशस्यतरः। कथम् यतः सर्वं कर्म समस्तम् अखिलम् अप्रतिबद्धं पार्थ ज्ञाने मोक्षसाधने सर्वतःसंप्लुतोदकस्थानीये परिसमाप्यते अन्तर्भवतीत्यर्थः यथा कृताय विजितायाधरेयाः संयन्त्येवमेनं सर्वं तदभिसमेति यत् किञ्चित्प्रजाः साधु कुर्वन्ति यस्तद्वेद यत्स वेद (छा0 उ0 4.1.4) इति श्रुतेः।।तदेतत् विशिष्टं ज्ञानं तर्हि केन प्राप्यते इत्युच्यते

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【 Verse 4.34 】

▸ Sanskrit Sloka: तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया | उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिन: ||

▸ Transliteration: tadviddhi praṇipātena paripraśnena sevayā | upadekṣyanti te jñānaṁ jñāninastattvadarśinaḥ ||

▸ Glossary: tat: that; viddhi: understand; praṇipātena: by approaching a spiritual master; paripraśnena: by questioning; sevayā: by offering service; upadekṣyanti: will advise; te: unto you; jñānaṁ: knowledge; jñāninaḥ : the enlightened; tattva darśinaḥ: the spiritual seers.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.34 Understand these truths by approaching a spiritual Mas- ter, by asking him your questions, by offering service. The enlightened person can initiate the wisdom unto you because he has seen the truth

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.34।।उस(तत्त्वज्ञान)को (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर) समझ। उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करनेसे उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.34।। उस (ज्ञान) को (गुरु के समीप जाकर) साष्टांग प्रणिपात प्रश्न तथा सेवा करके जानो ये तत्त्वदर्शी ज्ञानी पुरुष तुम्हें ज्ञान का उपदेश करेंगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.34 तत् That? विद्धि know? प्रणिपातेन by long prostration? परिप्रश्नेन by estion? सेवया by service? उपदेक्ष्यन्ति will instruct? ते to thee? ज्ञानम् knowledge? ज्ञानिनः the wise? तत्त्वदर्शिनः those who have realised the Truth.Commentary Go to the teachers (those who are well versed in the scriptures dealing with Brahman or Brahmasrotris? and who are established in Brahman or Brahmanishthas). Prostrate yourself before them with profound humility and perfect devotion. Ask them estions? O venerable Guru What is the cause of bondage How can I get liberation What is the nature of ignorance What is the nature of knowledge What is the AntarangaSadhana (inward spiritual practice) for attaining Selfrealisation Serve the Guru wholeheartedly. A teacher who is versed in the scriptures (Sastras) but who has no direct Selfrealisaiton will not be able to help you in the attainment of the knowledge of the Self. He who has knowledge of the scriptures and who is also established in Brahman will be able to instruct thee in that knowledge and help thee in the attainment of Selfrealisation. Mere prostrations alone will not do. They may be

Chapter 4 (Part 22)

tinged with hypocrisy. You must have perfect faith in your Guru and his teaching. You must serve him wholeheartedly with great devotion. Now hypocrisy is not possible.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.34. This you should learn [from those, endowed with knowledge], by prostration, by iniry and by service [all offered to them]; those who are endowed with knowledge and are capable of showing the truth will give you the truth nearby;

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.34 This shalt thou learn by prostrating thyself at the Master's feet, by questioning Him and by serving Him. The wise who have realised the Truth will teach thee wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.34 Know this by prostration, estioning and by service. The wise, who have realised the truth, will instruct you in knowledge.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.34 Know that through prostration, iniry and service. The wise ones who have realized the Truth will impart the Knowledge to you.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.34 Know That by long prostration, by estion and by service; the wise who have realised the Truth will instruct thee in (that) knowledge.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.34 See Comment under 4.35

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.34 This is the knowledge concerning the self that has been taught by Me in the verses beginning with 'Know that to be indestructibe' (2.17) and ending with 'this has been given to you' (2.39). So engaged in appropriate actions, you can learn, according to the maturity of your competence, this wisdom from the wise, who will explain it to you, if you attend on them through prostrating and estioning and by serving them. The wise are those who have immediate apprehension (or vision) of the true nature of the self. Having been honoured by you through prostration etc., and observing your mental disposition characterised by desire for knowledge which you have evinced by your estions, they will teach you this knowledge.

Sri Krsna now speaks of the characterisitcs of knowledge concerning the nature of the self, in the form of direct perception.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.34 Viddhi, know; tat, that, the process by which It is acired; by approaching teachers pranipatena, through prostration, by lying fully streched on the ground with face downward, with prolonged salutation; pariprasnena, through iniry, as to how bondage and Liberation come, and what are Knowledge and ignorance; and sevaya, through the service of the guru. (Know it) through these and other (disciplines) [Other disciplines such as control of the mind, body, etc. Sankaracarya's own words in the Commentary are evamadina, after which Ast. puts a full stop, and agreeing with this, A.G. says that the word viddhi (know) is to be connected with evamadina. Hence this translation. Alternatively, those words have to be taken with prasrayena. Then the meaning will be, 'Being pleased with such and other forms of humility৷৷.'-Tr.]. Being pleased with humility, jnaninah, the wise ones, the teachers; tattva-darsinah, who have realized the Truth; upadeksyanti, will impart, will tell; te, you; jnanam, the Knowledge as described above. Although people may be wise, some of them are apt to know Truth just as it is, while others may not be so. Hence the alification, 'who have realized the Truth'. The considered view of the Lord is that Knowledge imparted by those who have full enlightenment becomes effective, not any other. That being so, the next verse also becomes appropriate:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.34।। जीवन के परम पुरुषार्थ को प्राप्त करने के लिए ज्ञान का उपदेश अनिवार्य है। उस ज्ञानोपदेश को देने के लिए गुरु का जिन गुणों से सम्पन्न होना आवश्यक है उन्हें इस श्लोक में बताया गया है। गुरु के उपदेश से पूर्णतया लाभान्वित होने के लिए शिष्य में जिस भावना तथा बौद्धिक क्षमता का होना आवश्यक है उसका भी यहाँ वर्णन किया गया है।प्रणिपातेन वैसे तो साष्टांग दण्डवत शरीर से किया जाता है परन्तु यहाँ प्रणिपात से शिष्य का प्रपन्नभाव और नम्रता गुरु के प्रति आदर एवं आज्ञाकारिता अभिप्रेत है। सामान्यत लोगों को अपने ही विषय में पूर्ण अज्ञान होता है। वे न तो अपने मन की प्रवृत्तियों को जानते हैं और न ही मनसंयम की साधना को। अत उनके लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे गुरु के समीप रहकर उनके दिये उपदेशों को समझने तथा उसके अनुसार आचरण करने में सदा तत्पर रहें।जिस प्रकार जल का प्रवाह ऊपरी धरातल से नीचे की ओर होता है उसी प्रकार ज्ञान का उपदेश भी ज्ञानी गुरु के मुख से जिज्ञासु शिष्य के लिये दिया जाता है। इसलिये शिष्य में नम्रता का भाव होना आवश्यक है जिससे कि उपदेश को यथावत् ग्रहण कर सके।परिप्रश्नेन प्रश्नों के द्वारा गुरु की बुद्धि मंजूषा में निहित ज्ञान निधि को हम खोल देते हैं। एक निष्णात गुरु शिष्य के प्रश्न से ही उसके बौद्धिक स्तर को समझ लेते हैं। शिष्य के विचारों में हुई त्रुटि को दूर करते हुए वे अनायास ही उसके विचारों को सही दिशा भी प्रदान करते हैं। प्रश्नोत्तर रूप इस संवाद के द्वारा गुरु के पूर्णत्व की आभा शिष्य को भी प्राप्त हो जाती है इसलिये हिन्दू धर्म में गुरु और शिष्य के मध्य प्रश्नोत्तर की यह प्रथा प्राचीन काल से चली आ रही है जिसे सत्संग कहते हैं। विश्व के सभी धर्मों में शिष्य को यह विशेष अधिकार प्राप्त नहीं है। वास्तव में केवल वेदान्त दर्शन ही हमारी बुद्धि को पूर्ण स्वतन्त्रता देता है। उसका व्यापार साधकों की अन्धश्रद्धा पर नहीं चलता। अन्य धर्मों में श्रद्धा का अत्याधिक महत्व होने के कारण उनके धर्मग्रन्थों में बौद्धिक दृष्टि से अनेक त्रुटियां रह गयी हैं जिनका समाधानकारक उत्तर नहीं मिलता। अत उनके धर्मगुरुओं के लिये आवश्यक है कि शास्त्र संबन्धी प्रश्नों को पूछने के अधिकार से साधकों को वंचित रखा जाय।सेवया गुरु को फल फूल और मिष्ठान आदि अर्पण करना ही सेवा नहीं कही जाती। यद्यपि आज धार्मिक संस्थानों एवं आश्रमों में इसी को ही सेवा समझा जाता है। गुरु के उपदेश को ग्रहण करके उसी के अनुसार आचरण करने का प्रयत्न ही गुरु की वास्तविक सेवा है। इससे बढ़कर और कोई सेवा नहीं हो सकती।शिष्यों को ज्ञान का उपदेश देने के लिये गुरु में मुख्यत दो गुणों का होना आवश्यक है (क) आध्यात्मिक शास्त्रों का पूर्ण ज्ञान तथा (ख) अनन्त स्वरूप परमार्थ सत्य के अनुभव में दृढ़ स्थिति। इन दो गुणों को इस श्लोक में क्रमश ज्ञानिन और तत्त्वदर्शिन शब्दों से बताया गया है। केवल पुस्तकीय ज्ञान से प्रकाण्ड पंडित बना जा सकता है लेकिन योग्य गुरु नहीं। शास्त्रों से अनभिज्ञ आत्मानुभवी पुरुष मौन हो जायेगा क्योंकि शब्दों से परे अपने निज अनुभव को वह व्यक्त ही नहीं कर पायेगा। अत गुरु का शास्त्रज्ञ तथा ब्रह्मनिष्ठ होना आवश्यक है।उपर्युक्त कथन से भगवान् का अभिप्राय यह है कि ज्ञानी और तत्त्वदर्शी आचार्य द्वारा उपादिष्ट ज्ञान ही फलदायी होता है और अन्य ज्ञान नहीं। अस्तु निम्नलिखित कथन भी सत्य ही है कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.34।।तदेतत्सर्वोत्तमं ज्ञानं तर्हि केन साधनेन लभ्यत इत्यत आह तदिति। यत्र सर्वकर्मफलमन्तर्भवति तज्ज्ञानं विद्धि जानीहि। येन विधिनां प्राप्यत इति विद्धि लभस्वेत्यर्थस्तु अदादेर्ज्ञानार्थत्वात् मुख्ये संभवति अमुख्यस्यान्याय्यत्वादाचार्यैर्न प्रदर्शितः। आचार्यानभिगभ्य प्रकर्षेण नीचैः पतनं प्रणिपातो दीर्घनमस्कारः तेनकथं बन्धः कथं मोक्षः कस्य केन विमुच्यते। विद्याविद्ये कथंभूते कोऽहं दृश्यमिदं च किम् इतिपरिप्रश्नेन सेवया गुरुशुश्रूषा गुर्वाभिमुख्यसंपादिकया मायाविनिर्मुक्तया इत्येवमादिना प्रश्रयेण प्रसादिता गुरुवो ज्ञानिनः न्यायविचारपूर्वकवेदार्थज्ञाः तत्त्वदर्शिनः तत्त्वसाक्षात्कारवन्तः ते ज्ञानमुपदेक्ष्यन्ति पद्वाक्यप्रमाणज्ञैः सम्यक्तत्त्वविलोकिभिःउक्ताज्ज्ञानाद्भवेत्कार्यं नान्यैरिति हरेर्मतम् तथाच श्रुतिःतद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् इति। बहुवचनं त्वादरार्थमिति बोध्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.34।।एतादृशज्ञानप्राप्तौ कोऽतिप्रत्यासन्न उपाय इति उच्यते तत्सर्वकर्मफलभूतं ज्ञानं विद्धि लभस्व। आचार्यानभिगम्य तेषां प्रणिपातेन प्रकर्षेण नीचैः पतनं प्रणिपातो दीर्घनमस्कारस्तेन। कोऽहं कथं बद्धोऽस्मि केनोपायेन मुच्येयमित्यादिना परिप्रश्नेन बहुविषयेण प्रश्नेन। सेवया सर्वभावेन तदनुकूलकारितया। एवं भक्तिश्रद्धातिशयपूर्वकेणावनतिविशेषेणाभिमुखाः सन्तः उपदेक्ष्यन्ति उपदेशेन संपादयिष्यन्ति ते तुभ्यं ज्ञानं परमात्मविषयं साक्षान्मोक्षफलं ज्ञानिनः पदवाक्यन्यायादिमाननिपुणास्तत्त्वदर्शिनः कृतसाक्षात्काराः। साक्षात्कारवद्भिरुपदिष्टमेव ज्ञानं फलपर्यवसायि नतु तद्रहितैः पदवाक्यमाननिपुणैरपीति भगवतो मतम्तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठम् इति श्रुतिसंवादि। तत्रापि श्रोत्रियमधीतवेदं ब्रह्मनिष्ठं कृतब्रह्मसाक्षात्कारमिति व्याख्यानात्। बहुवचनं चेदमाचार्यविषयमेकस्मिन्नपि गौरवातिशयार्थं नतु बहुत्वविवक्षया। एकस्मादेव तत्त्वसाक्षात्कारवत आचार्यात्तत्त्वज्ञानोदये सत्याचार्यान्तरगमनस्य तदर्थमयोगादिति द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.34।।तद्विद्धीति। ज्ञानिनः ग्रन्थज्ञाः। तत्त्वदर्शिनोऽनुभववन्तः। ज्ञानं ब्रह्म स्पष्टार्थः श्लोकः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.34।।तज्ज्ञानं कथं स्यात् इत्यत आह तदिति। तज्ज्ञानं ज्ञानिनो मत्स्वरूपविदः प्रणिपातेन नम्रतया परिप्रश्नेन जिज्ञासुतया प्रश्नेन सेवया भगवद्बुद्ध्या ते तव ज्ञानिनः मत्स्वरूपविदः तत्त्वदर्शिनः योग्यानामुपदेशदातारमहं प्रसन्नो भवामीति पश्यन्त्यतो ज्ञानमुपदेक्ष्यन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.34।।एवंभूतात्मज्ञाने साधनमाह तद्विद्धीति। तज्ज्ञानं विद्धि प्राप्नुहि। ज्ञानिनां प्रणिपातेन दण्डवन्नमस्कारेण ततः परिप्रश्नेन कुतोऽयं मम संसारः कथं वा निवर्तत इति प्रश्नेन सेवया शुश्रूषया च ज्ञानिनः शास्त्रज्ञास्तत्त्वदर्शिनः अपरोक्षानुभवसंपन्नाश्च ते तुभ्यं ज्ञानमुपदेशेन संपादयिष्यन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.34।।तत्र साधनमाहुः तद्विद्धीति। प्रथमं प्रणिपातेन कायिकेनामानित्वसाधनेन ततश्च वाचिकेन महदुपसदनं गत्वा प्रणयकृतेन परिप्रश्नेन आन्तरीयेण सेवनेन च। तेषां वा सेवनेनैतत्कृतेन त्वं तत्प्राप्नुहि इतिपृथगेव मुख्यं साधनंस्यान्महत्सेवया इति वाक्यात्। ततस्ते तुभ्यं उपदेशेन तज्ज्ञानं सम्पादयिष्यन्ति तत्त्वदर्शिनः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.34।।इस प्रकारसे श्रेष्ठ बतलाया हुआ वह ज्ञान किस उपायसे मिलता है सो कहते हैं वह ज्ञान जिस विधिसे प्राप्त होता है वह तू जान यानी सुन आचार्यके समीप जाकर भलीभाँति दण्डवत् प्रणाम करनेसे एवं किस तरह बन्धन हुआ कैसे मुक्ति होगी विद्या क्या है अविद्या क्या है इस प्रकार ( निष्कपट भावसे ) प्रश्न करनेसे और गुरुकी यथायोग्य सेवा करनेसे ( वह ज्ञान प्राप्त होता है )। अभिप्राय यह कि इस प्रकार सेवा और विनय आदिसे प्रसन्न हुए तत्त्वदर्शी ज्ञानी आचार्य तुझे उपर्युक्त विशेषणोंवाले ज्ञानका उपदेश करेंगे। ज्ञानवान् भी कोईकोई ही यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं सब नहीं होते। इसलिये ज्ञानीके साथ तत्त्वदर्शी यह विशेषण लगाया है। इससे भगवान्का यह अभिप्राय है कि जो यथार्थ तत्त्वको जाननेवाले होते हैं उनके द्वारा उपदेश किया हुआ ही ज्ञान अपने कार्यको सिद्ध करनेमें समर्थ होता है दूसरा नहीं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.34।। व्याख्या   तद्विद्धि अर्जुनने पहले कहा था कि युद्धमें स्वजनोंको मारकर मैं हित नहीं देखता (गीता 1। 31) इन आततायियोंको मारनेसे तो पाप ही लगेगा (गीता 1। 36)। युद्ध करनेकी अपेक्षा मैं भिक्षा माँगकर जीवननिर्वाह करना श्रेष्ठ समझता हूँ (गीता 2। 5)। इस तरह अर्जुन युद्धरूप कर्तव्यकर्मका त्याग करना श्रेष्ठ मानते हैं परन्तु भगवान्के मतानुसार ज्ञानप्राप्तिके लिये कर्मोंका त्याग करना आवश्यक नहीं है (गीता 3। 20 4। 15)। इसीलिये यहाँ भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि अगर तू कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके ज्ञान प्राप्त करनेको ही श्रेष्ठ मानता है तो तू किसी तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषके पास ही जाकर विधिपूर्वक ज्ञानको प्राप्त कर मैं तुझे ऐसा उपदेश नहीं दूँगा।वास्तवमें यहाँ भगवान्का अभिप्राय अर्जुनको ज्ञानी महापुरुषके पास भेजनेका नहीं प्रत्युत उन्हें चेतानेका प्रतीत होता है। जैसे कोई महापुरुष किसीको उसके कल्याणकी बात कह रहा है पर श्रद्धाकी कमीके कारण सुननेवालेको वह बात नहीं जँचती तो वह महापुरुष उसे कह देता है कि तू किसी दूसरे महापुरुषके पास जाकर अपने कल्याणका उपाय पूछ ऐसे ही भगवान् मानो यह कहे रहे हैं कि अगर तूझे मेरी बात नहीं जँचती तो तू किसी ज्ञानी महापुरुषके पास जाकर प्रचलित प्रणालीसे ज्ञान प्राप्त कर। ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणाली है कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके जिज्ञासापूर्वक श्रोत्रिय और ब्रह्मनिष्ठ गुरुके पास जाकर विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करना (टिप्पणी प0 263)।आगे चलकर भगवान्ने अड़तीसवें श्लोकमें कहा है कि यही तत्त्वज्ञान तुझे अपना कर्तव्यकर्म करतेकरते (कर्मयोग सिद्ध होते ही) दूसरे किसी साधनके बिना स्वयं अपनेआपमें प्राप्त हो जायगा। उसके लिये किसी दूसरेके पास जानेकी जरूरत नहीं है।प्रणिपातेन ज्ञानप्राप्तिके लिये गुरुके पास जाकर उन्हें साष्टाङ्ग दण्डवत्प्रणाम करे। तात्पर्य यह है कि गुरुके पास नीच पुरुषकी तरह रहे नीचवत् सेवेत सद्गुरुम् जिससे अपने शरीरसे गुरुका कभी निरादर तिरस्कार न हो जाय। नम्रता सरलता और जिज्ञासुभावसे उनके पास रहे और उनकी सेवा करे। अपनेआपको उनके समर्पित कर दे उनके अधीन हो जाय। शरीर और वस्तुएँ दोनों उनके अर्पण कर दे। साष्टाङ्ग दण्डवत्प्रणामसे अपना शरीर और सेवासे अपनी वस्तुएँ उनके अर्पण कर दे।सेवया शरीर और वस्तुओंसे गुरुकी सेवा करे। जिससे वे प्रसन्न हों वैसा काम करे। उनकी प्रसन्नता प्राप्त करनी हो तो अपनेआपको सर्वथा उनके अधीन कर दे। उनके मनके संकेतके आज्ञाके अनुकूल काम करे। यही वास्तविक सेवा है।सन्तमहापुरुषकी सबसे बड़ी सेवा है उनके सिद्धान्तोंके अनुसार अपना जीवन बनाना। कारण कि उन्हें सिद्धान्त जितने प्रिय होते हैं उतना अपना शरीर प्रिय नहीं होता। सिद्धान्तकी रक्षाके लिये वे अपने शरीरतकका सहर्ष त्याग कर देते हैं। इसलिये सच्चा सेवक उनके सिद्धान्तोंका दृढ़तापूर्वक पालन करता है।परिप्रश्नेन केवल परमात्मतत्त्वको जाननेके लिये जिज्ञासुभावसे सरलता और विनम्रतापूर्वक गुरुसे प्रश्न करे। अपनी विद्वत्ता दिखानेके लिये अथवा उनकी परीक्षा करनेके लिये प्रश्न न करे। मैं कौन हूँ संसार क्या है बन्धन क्या है मोक्ष क्या है परमात्मतत्त्वका अनुभव कैसे हो सकता है मेरे साधनमें क्याक्या बाधाएँ हैं उन बाधाओंको कैसे दूर किया जाय तत्त्व समझमें क्यों नहीं आ रहा है आदिआदि प्रश्न केवल अपने बोधके लिये (जैसेजैसे जिज्ञासा हो वैसेवैसे) करे।ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः तत्त्वदर्शिनः पदका तात्पर्य यह है कि उस महापुरुषको परमात्मतत्त्वका अनुभव हो गया हो और ज्ञानिनः पदका तात्पर्य यह है कि उन्हें वेदों तथा शास्त्रोंका अच्छी तरह ज्ञान हो। ऐसे तत्त्वदर्शी और ज्ञानी महापुरुषके पास जाकर ही ज्ञान प्राप्त करना चाहिये।अन्तःकरणकी शुद्धिके अनुसार ज्ञानके अधिकारी तीन प्रकारके होते हैं उत्तम मध्यम और कनिष्ठ। उत्तम अधिकारीको श्रवणमात्रसे तत्त्वज्ञान हो जाता है (टिप्पणी प0 264)। मध्यम अधिकारीको श्रवण मनन और निदिध्यासन करनेसे तत्त्वज्ञान होता है। कनिष्ठ अधिकारी तत्त्वको समझनेके लिये भिन्नभिन्न प्रकारकी शङ्काएँ किया करता है। उन शङ्काओंका समाधान करनेके लिये वेदों और शास्त्रोंका ठीकठीक ज्ञान होना आवश्यक है क्योंकि वहाँ केवल युक्तियोंसे तत्त्वको समझाया नहीं जा सकता। अतः यदि गुरु तत्त्वदर्शी हो पर ज्ञानी न हो तो वह शिष्यकी तरहतरहकी शङ्काओंका समाधान नहीं कर सकेगा। यदि गुरु शास्त्रोंका ज्ञाता हो पर तत्त्वदर्शी न हो तो उसकी बातें वैसी ठोस नहीं होंगी जिससे श्रोताको ज्ञान हो जाय। वह बातें सुना सकता है पुस्तकें पढ़ा सकता है पर शिष्यको बोध नहीं करा सकता। इसलये गुरुका तत्त्वदर्शी और ज्ञानी दोनों ही होना बहुत जरूरी है।उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम् महापुरुषको दण्डवत्प्रणाम करनेसे उनकी सेवा करनेसे और उनसे सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे तुझे तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे इसका यह तात्पर्य नहीं है कि महापुरुषको इन सबकी अपेक्षा रहती है। वास्तवमें उन्हें प्रणाम सेवा आदिकी किञ्चिन्मात्र भी भूख नहीं होती। यह सब कहनेका भाव है कि जब साधक इस प्रकार जिज्ञासा करता है और सरलतापूर्वक महापुरुषके पास जाकर रहता है तब उस महापुरुषके अन्तःकरणमें उसके प्रति विशेष भाव पैदा होते हैं जिससे साधकको बहुत लाभ होता है। यदि साधक इस प्रकार उनके पास न रहे तो ज्ञान मिलनेपर भी वह उसे ग्रहण नहीं कर सकेगा।ज्ञानम् पद यहाँ तत्त्वज्ञान अथवा स्वरूपबोधका वाचक है। वास्तवमें ज्ञान स्वरूपका नहीं होता प्रत्युत संसारका होता है। संसारका ज्ञान होते ही संसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है और स्वतःसिद्ध स्वरूपका अनुभव हो जाता है।उपदेक्ष्यन्ति पदका यह तात्पर्य है कि महापुरुष ज्ञानका उपदेश तो देते हैं पर उससे साधकको बोध हो ही जाय ऐसा निश्चित नहीं है। आगे उन्तालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि श्रद्धावान् पुरुष ज्ञानको प्राप्त करता है श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्। कारण कि श्रद्धा अन्तःकरणकी वस्तु है परन्तु प्रणाम सेवा प्रश्न आदि कपटपूर्वक भी किये जा सकते हैं। इसलिये यहाँ महापुरुषके द्वारा केवल ज्ञानका उपदेश देनेकी ही बात कही गयी है और उन्तालीसवें श्लोकमें श्रद्धावान् साधकके द्वारा ज्ञान प्राप्त होनेकी बात कही गयी है। सम्बन्ध   तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीका वर्णन करके अब भगवान् आगेके तीन (पैंतीसवें छत्तीसवें और सैंतीसवें) श्लोकोंमें तत्त्वज्ञानका वास्तविक माहात्म्य बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.34 4.35।।तद्विद्धीति। यज्ज्ञात्वेति। तच्च ज्ञानं प्रणिपातेन भक्त्या परिप्रश्नेन ऊहापोहतर्कवितर्कादिभिः सेवया अभ्यासेन जानीहि। यतः एवंभूतस्य तव ज्ञानिनः निजा एव संवित्तिविशेषानुगृहीता इन्द्रियविशेषाः तत्त्वम् उप समीपे देक्ष्यन्ति प्रापयिष्यन्ति। तथाहि ते तत्त्वमेव दर्शयन्तीति तत्त्वदर्शिनः। उक्तं हि योग एव योगस्योपाध्यायः इति।ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा (Y S I 48 ) इति च।अन्ये ज्ञानिनः पुरुषा इति व्याख्यायमाने भगवान् स्वयं यत् उपदिष्टवान् तदसत्यमित्युक्तं स्यात्। अथवा एवमभिधाने (S. अभिधानेन च) प्रयोजनम् अन्येऽपि लोकाः प्रणिपातादिना ज्ञानिभ्यो ज्ञानं गृह्णीयुः न यथाकथंचित् इति समयप्रतिपादनम्।आत्मनि मयि मत्स्वरूपतां यति (S K प्राप्ते) आत्मनि इति सामानाधिकरण्यम्। अथोशब्दः पादपूरणे। आत्मना ईश्वरस्य साम्ये कोऽपि विशेष उक्तः। असाम्ये विकल्पार्थानुपपत्तिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.34।।यद्येवं प्रशस्यतरमिदं ज्ञानं तर्हि केनोपायेन तत्प्राप्तिरिति पृच्छति तदेतदिति। ज्ञानप्राप्तौ प्रत्यासन्नमुपायमुपदिशति उच्यत इति। तद्विज्ञानं गुरुभ्यो विद्धि गुरवश्च प्रणिपातादिभिरुपायैरावर्जितचेतसो वदिष्यन्तीत्याह तद्विद्धीति। उपदेष्टृत्वमुपदेशकर्तृत्वम्। परोक्षज्ञानमात्रेण न भवतीत्याह उपदेक्ष्यन्तीति। तदिति प्रेप्सितं ज्ञानसाधनं गृह्यते येन विधिनेति शेषदर्शनात्। यद्वा येनाचार्यावर्जनप्रकारेण तदुपदेशवशादपेक्षितं ज्ञानं लभ्यते तथा तज्ज्ञानमाचार्येभ्यो लभस्वेत्यर्थः। तदेव स्फुटयति आचार्या इति। एवमादिनेत्यादिशब्देन शमादयो गृह्यन्ते एवमादिना विद्धीति पूर्वेण संबन्धः। उत्तरार्धं व्याचष्टे प्रश्रयेणेति। प्रश्रयो भक्तिश्रद्धापूर्वको निरतिशयो नतिविशेषः यथोक्तविशेषणं पूर्वोक्तेन प्रकारेण प्रशस्यतममित्यर्थः। विशेषणस्य पौनरुक्त्यपरिहारार्थमर्थभेदं कथयति ज्ञानवन्तोऽपीति। ज्ञानिन इत्युक्त्वा पुनस्तत्त्वदर्शिन इति ब्रुवतो भगवतोऽभिप्रायमाह ये सम्यगिति। बहुवचनं चैतदाचार्यविषयं बहुभ्यः श्रोतव्यं बहुधा चेति सामान्यन्यायाभ्यनुज्ञानार्थं न त्वात्मज्ञानमधिकृत्याचार्यबहुत्वं विवक्षितम् तस्य तत्त्वसाक्षात्कारवदाचार्यमात्रोपदेशादेवोदयसंभवात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.34।।तद्विद्धि इत्युक्तत्वात् इदानीमर्जुनो न ज्ञानीति प्रतीतिं निवारयति इदानीमपीति।तद्विद्धि इत्यधिकज्ञानच्चैमुक्तमिति भावः। ज्ञानी चेत्तर्हियज्ज्ञात्वा 4।35 इति तस्य मोहः कथमुच्यते इत्यत आह तथापीति। अभिभवात् ज्ञानस्य। अर्जुनस्य ज्ञानित्वे सिद्धे भवेदेतत्। तत्रैव किं प्रमाणं इत्यत आह मा त्विति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.34।।इदानीमपि ज्ञान्येव। तथाऽप्यभिभवान्मोहः। मा तूक्ता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.34।।तद् आत्मविषयं ज्ञानम्अविनाशि तु तद् विद्धि (गीता 2।17) इति आरभ्यएषा तेऽभिहिता (गीता 2।39) इत्यन्तेन मया उपदिष्टम् मदुक्तकर्मणि वर्तमानः त्वं विपाकानुगुणं काले प्रणिपातपरिप्रश्नसेवाभिः विशदाकारं ज्ञानिभ्यो विद्धि।साक्षात्कृतात्मस्वरूपाः तु ज्ञानिनः प्रणिपातादिभिः सेविताः ज्ञानबुभुत्सया परितः पृच्छतः तव आशयम् आलक्ष्य ज्ञानम् उपदेक्ष्यन्ति।आत्मयाथात्म्यविषयसाक्षात्काररूपस्य लक्षणम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.34।। तत् विद्धि विजानीहि येन विधिना प्राप्यते इति। आचार्यान् अभिगम्य प्रणिपातेन प्रकर्षेण नीचैः पतनं प्रणिपातः दीर्घनमस्कारः तेन कथं बन्धः कथं मोक्षः का विद्या का चाविद्या इति परिप्रश्नेन सेवया गुरुशुश्रूषया एवमादिना। प्रश्रयेण आवर्जिता आचार्या उपदेक्ष्यन्ति कथयिष्यन्ति ते ज्ञानं यथोक्तविशेषणं ज्ञानिनः। ज्ञानवन्तोऽपि केचित् यथावत् तत्त्वदर्शनशीलाः अपरे न अतो विशिनष्टि तत्त्वदर्शिनः इति। ये सम्यग्दर्शिनः तैः उपदिष्टं ज्ञानं कार्यक्षमं भवति नेतरत् इति भगवतो मतम्।।तथा च सति इदमपि समर्थं वचनम्

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【 Verse 4.35 】

▸ Sanskrit Sloka: यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव | येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ||

▸ Transliteration: yajjñātvā na punar moham evaṁ yāsyasi pāṇḍava | yena bhūtāny aśeṣeṇa drakṣyasy ātmanyatho mayi ||

▸ Glossary: yat: which; jñātvā: after knowing; na: not; punaḥ: again; mohaṁ: desire; evaṁ: thus; yāsyasi: shall attain; pāṇḍava: O son of Pāṇḍu; yena: by which; bhūtāni: living entities; aśeṣeṇa: totally; drakṣyasi: will see; ātmani: within yourself; atho: then; mayi: in Me

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.35 O Pāṇḍava, knowing this you will never suffer from desire or illusion, you will know that all living beings are in the supreme, in Me.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.35।।जिस(तत्त्वज्ञान) का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा और हे अर्जुन जिस(तत्त्वज्ञान)से तू सम्पूर्ण प्राणियोंको निःशेषभावसे पहले अपनेमें और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखेगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.35।। जिसको जानकर तुम पुन इस प्रकार मोह को नहीं प्राप्त होगे और हे पाण्डव जिसके द्वारा तुम भूतमात्र को अपने आत्मस्वरूप में तथा मुझमें भी देखोगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.35 यत् which? ज्ञात्वा having known? न not? पुनः again? मोहम् delusion? एवम् thus? यास्यसि will get? पाण्डव O Pandava? येन by this? भूतानि beings? अशेषेण all? द्रक्ष्यसि (thou) shalt see? आत्मनि in (thy) Self? अथो also? मयि in Me.Commentary That? the knowledge of the Self mentioned in the previous verse? that is to be learnt from the Brahmanishtha Guru through prostration? estioning and service. When you acire this knowledge you will not be again subject to confusion or error. You will behold that underlying basic unity. You will behold or directly cognise through internal experience or intuition that all beings from the Creator down to a blade of grass exist in your own Self and also in Me. (Cf.IX.15XVIII.20)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.35. By knowing which you shall not get deluded once again in this manner, O son of Pandu; and by which means you shall see all beings without exception in [your] Self i.e., in Me.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.35 Having known That, thou shalt never again be confounded; and, O Arjuna, by the power of that wisdom, thou shalt see all these people as if they were thine own Self, and therefore as Me.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.35 Knowing which, O Arjuna, you will not fall again into delusion in this way - by that knowledge you will see all beings without exception in your-self and then in Me.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.35 Knowing which, O Pandava (Arjuna), you will not come under delusion again in this way, and through which you will see all beings without exception in the Self and also in Me.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.35 Knowing ï1thatï1 thou shalt not, O Arjuna, again get deluded like this; and by that thou shalt see all beings in thy Self and also in Me.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.34-35 Tat etc. Yaj=jnatva etc. This : the knowledge. By prostration : by devotion. By iniry : by the consideration of pros and cons, by good reasoning etc. By service : by practice. You should learn [this], For, those that are endowed with knowledge i.e., your own different sense-organs, that are exceedingly favoured by consciousness, will point out nearby i.e., will lead the truth to you if you remain practising in the said manner. For this, it has been said that they (sense-organs) are capable of showing the truth i.e., they show nothing but the truth. That has been said :

'The Yoga alone is the teacher of Yoga [practice]'

and

'On [reaching] that [seeded Yoga] [there arises] an insight, truth-bearing' (YS, I, 48).

If 'those that are endowed with knowledge' is interpreted to mean 'other wise persons', then it would amount to say that what the Bhagavat Himself had taught is untruth. Or, the purpose of saying in this manner may be to teach a conventional rule : Other persons too should learn from the men of wisdom only by prostration etc., and not by any other means.

The [locatives] atmani 'in your Self' and mayi 'in Me' are in the same-case-relationship, and they mean 'in your Soul that has attained (realised Its) identity with Me'. Atho is an expletive. In order to established the [total] sameness (identity) of the Absolute with the [individual] Self, a certain characteristic mark [of the two], is mentioned [here]. If the non-sameness (non-identity) [of these two] is intended, then the meanings 'choice' etc., [of atho] have no relevance here. Saying that 'the sin also perishes' in the first verse [of following two], in order to clarify the earlier statement 'all actions, leaving no bit, [meet their end in knowledge' - verse 33 above]; indicating, by 'all actions' - in the second verse-that the suggested meaning of 'leaving no bit (verse 33)' is 'not even a bit of mental impression [of actions] survives'; [the Lord] explains-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.35 Having which knowledge, you will not again fall into this delusion of mistaking the body etc., for the self, which is the cause of possessiveness etc. By this (knowledge) you will see in yourself all the beings which appear in diversity of forms such as gods, men etc.; for between you and other beings there is eality of nature when freed from the hold of Prakrti, as your self and all other selves have the form of knowledge as fas as their essence is concerned. Sri Krsna will later on instruct that the nature of the self, dissociated from the evil of contact with Prakrti, is eal in all beings. 'For faultless Brahman (individual self) is alike everywhere; therefore, abide in Brahman' (5.19). And then you will see all beings without any exception in Me, because of the similarity of nature of the pure selves with one another and with My nature. For Sri Krsna will teach later on:

'Resorting to this knowledge and partaking of My nature' (14.5). So the euality of the selves, devoid of name and form, with the nature of the Supreme, is known from the texts like: 'Then the wise, shaking off good and evil, stainless, attain supreme eality' (Mun. U., 3.1.3). Therefore all selves dissociated from Prakrti are eal in nature to one another and eal in nature to the Lord of all. [The idea is that blissfulness is the basic nature of all selves. Blissfulness (Ananda) is the nature of the Supreme Being also. Eality contemplated is in this respect only, but not in power of creation, which belongs only to Isvara]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.35 Jnatva, knowing; yat, which-by aciring which Knowledge imparted by them; O Pandava, na vasyasi, you will not come under; moham, delusion; punah, again; evam, in this way, in the way you have come under delusion now. Besides, yena, through which Knowledge; draksyasi, you will see directly; bhutani, all beings; asesena, without exception, counting from Brahma down to a clump of grass; atmani, in the Self, in the innermost Self, thus-'These beings exist in me' ; and atha, also; see that these are mayi. in Me, in Vasudeva, the supreme Lord. The purport is, 'You will realize the identity of the individual Self and God, which is well known in the Upanisads.' Moreover, the greatness of this Knowledge is:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.35।। इस प्रकरण के संदर्भ किसी के मन में यह शंका उठ सकती है कि इतना अधिक परिश्रम करके ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है परन्तु हो सकता है कि मृत्यु के पश्चात् फिर हम उसी अज्ञान अवस्था को पुन प्राप्त हो जायें। अपने एक ही जीवन में हम अनेक प्रकार के ज्ञान प्राप्त करते हैं लेकिन सब का ही हमें स्मरण नहीं रहता। इसी प्रकार आत्मज्ञान को भी प्राप्त करके यदि उसका विस्मरण हो जाता है तब तो वास्तव में बड़ी ही हानि होगी।इस प्रकार की शंका का निवारण करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण निश्चयपूर्वक कहते हैं इसे जानकर पुन तुम मोह को प्राप्त नहीं होगे। किसी कट्टरवादी की अत्युत्साही शैली की भाँति प्रतीत होने वाला यह कथन है तथापि विचार की प्रारम्भिक अवस्था में इसे इसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिये। सभी आचार्य इस विषय पर एकमत हैं और चूँकि अपनी पीढ़ी की वंचना करने में उनका कोई स्वार्थ नहीं हो सकता इसलिये उनके मत को विश्वासपूर्वक स्वीकार करने में ही बुद्धिमानी है। इस श्रद्धा की आवश्यकता तब तक ही है जब तक हम स्वयं आत्मा का साक्षात् अनुभव नहीं कर लेते। वैवाहिक जीवन का आनन्द एक बालक नहीं समझ सकता। इसी प्रकार अज्ञान अव्ास्था में शोक मोह से ग्रस्त हम लोग भी देशकालातीत आत्मतत्त्व की अनुभूति के आनन्द को नहीं समझ सकते। गुरु चाहे जितना ही वर्णन क्यों न करें परन्तु आन्तरिक परिपक्वता प्राप्त किए बिना उनके वाक्यों के लक्ष्यार्थ को हम यथार्थरूप में ग्रहण नहीं कर सकेंगे।आत्मानुभूति का लक्षण बताते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं आत्मा की पहचान होने पर बाह्य विषयों भावनाओं एवं विचारों की सम्पूर्ण सृष्टि आत्मा में ही प्रतीत होगी और वह आत्मा ही श्रीकृष्ण परमात्मा का स्वरूप है। एक बार समुद्र की पहचान हो जाने पर उस मनुष्य के लिए सम्पूर्ण लहरें समुद्ररूप ही हो जाती हैं।पूर्व श्लोकों में वर्णित ज्ञान के साक्षात्कार के लक्षण इस श्लोक में बताये गये हैं। यहाँ स्पष्ट हो जाता हैं कि शिष्य को गुरु के सानिध्य की आवश्यकता तभी तक रहती है जब तक वह समस्त सृष्टि को परमात्मा से अभिन्न आत्मस्वरूप में अनुभव नहीं कर लेता।इस ज्ञान का महात्म्य देखिये कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.35।।ज्ञानफलमाह यदिति। यत्तैरुपदिष्टं ज्ञानं ज्ञात्वा लब्धवा। यत्तु यच्चिन्मात्रस्वरुपं ब्रह्म ज्ञात्वेति तन्न। पूर्वप्रस्तुतज्ञानपरामर्शेनार्थसंभवे यच्छब्देनाप्रस्तुतपरामर्शस्यान्याय्यत्वात्। एवमिदानीमिव पुनर्मोहं न यास्यसि न प्राप्स्यसि। किंच न केवलं स्वसंबन्धिनिबन्धमेव मोहं यास्यस्यपि तु सर्वभूतनिबन्धनमित्याह। येन ज्ञानेनाशेषेण सर्वाणि भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि मयि प्रत्यगात्मनि कल्पितानीति स्वस्मिन्साक्षाद्द्रक्ष्यसि अथो अयि वासुदेवे परमेश्वरे चेमानीति प्रत्यगात्मैकत्वं सर्ववेदान्तेषु प्रसिद्धंद्रक्ष्यसीत्यर्थः। अथो अनन्तरमात्मानं मयि परमात्मन्यभेदेनेति वा। अस्मिपक्षेऽध्याहारदोषः परिहर्तव्यः। यद्वाथो अपिच येन ज्ञानेन भूतान्यात्मनि मयि त्वंपदलक्ष्यार्थादनन्यभूते इति अस्मिन्पक्षे सति संभवेऽथोशब्दस्य दूरान्वयोऽयुक्त इति ध्येयम्। पाण्डवेति संबोधयन् यथाधुनाऽहं पाण्डुपुत्र एते मदीया इत्यहंकारममकाराभ्यां मोहं गतोऽसि तथा ज्ञानं तन्मूलोच्छेदकं लब्ध्वा न यास्यसीति द्योतयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.35।।एवमतिनिर्बन्धेन ज्ञानोत्पादने किं स्यादत आह यत्पूर्वोक्तं ज्ञानमाचार्यैरुपदिष्टं ज्ञात्वा प्राप्य। ज्ञात्वा प्राप्य। ओदनपाकं पचतीतिवत्तस्यैव धातोः सामान्यविवक्षया प्रयोगः। न पुनर्मोहमेवं बन्धुवधादिनिमित्तं भ्रमं यास्यसि। हे पाण्डव कस्मादेवं यस्मादेव ज्ञानेन भूतानि पितृपुत्रादीनि अशेषेण ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानि स्वाविद्याविजृम्भितानि आत्मनि त्वयि त्वंपदार्थे अथो अपि मयि भगवति वासुदेवे तत्पदार्थे परमार्थतो भेदरहितेऽधिष्ठानभूते द्रक्षस्यभेदेनैव। अधिष्ठानातिरेकेण कल्पितस्याभावात्। मां भगवन्तं वासुदेवमात्मत्वेन साक्षात्कृत्य सर्वाज्ञाननाशे तत्कार्याणि भूतानि न स्थास्यन्तीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.35।।यज्ज्ञात्वेति। यत् चिन्मात्रस्वरूपं ब्रह्म ज्ञात्वा एवमिदानीमिव पुनर्मोहं न यास्यसि। अथो अपि च येन ज्ञानेन भूतानि ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तान्यात्मनि मयि त्वंपदलक्ष्यार्थादनन्यभूते परमेश्वरे द्रक्ष्यसि।नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा इति प्रतीचोऽन्यस्य द्रष्टुर्निषेधात्। भाष्ये तु साक्षादात्मनि मत्स्थानीमानीति द्रक्ष्यसि। अथो अपि मयि वासुदेवे परमेश्वरे च इमानीति क्षेत्रज्ञेश्वरैकत्वं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धं द्रक्ष्यसीत्यर्थ इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.35।।एवमुपदिष्टज्ञानेन मोहो न भवत्येवेत्याह यदिति। हे पाण्डव यत् उपदिष्टज्ञानात्मकं मत्स्वरूपं ज्ञात्वा पुनरेवं भूयः प्रश्नादिरूपं (मोहं) न यास्यसि न प्राप्स्यसि। अथो एतदनन्तरं मोहाभावानन्तरं येन ज्ञानेन भूतानि कारणरूपाणि जीवात्मकानि च अशेषेण जगद्रूपेण आत्मनि मयि आत्मरूपे मयि द्रक्ष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.35।। ज्ञानफलमाह यज्ज्ञात्वेतिसार्धैस्त्रिभिः। यज्ज्ञानं ज्ञात्वा प्राप्य पुनर्बन्धुवधादिनिमित्तं मोहं न प्राप्स्यसि। तत्र हेतुः। येन ज्ञानेन भूतानि पितृपुत्रादीनि स्वाविद्यारचितानि स्वात्मन्येवाभेदेन द्रक्ष्यसि। अथो अनन्तरमात्मानं मयि परमात्मन्येवाभेदेन द्रक्ष्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.35।।ज्ञाने फलमाह यज्ज्ञात्वेति सार्द्धैस्त्रिभिः। यत्साङ्ख्ययोगयोरेकार्थरूपं सर्वं ब्रह्मात्मज्ञानं प्राप्य येन च भूतानि चिदंशभूताः आत्मनि पुरुषे चेतने मयि च द्रक्ष्यसि। यदा भूतपृथग्भावमेकस्थं 13।30 इति वक्ष्यति चाग्रे। अशेषेणेति पदेन प्रकृतिकार्यं देहादिकमपि तत्कारणे च द्रक्ष्यसि। तमात्मानं वा मयि परब्रह्मणि मदंशभूतत्वात्समष्टिपुरुषस्य।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.35।।ऐसा होनेपर यह कहना भी ठीक है हे पांडव उनके द्वारा बतलाये हुए जिस ज्ञानको पाकर फिर तू इस प्रकार मोहको प्राप्त नहीं होगा जैसे कि अब हो रहा है। तथा जिस ज्ञानके द्वारा तू सम्पूर्णतासे सब भूतोंको अर्थात् ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त समस्त प्राणियोंको यह सब भूत मुझमें स्थित हैं इस प्रकार साक्षात् अपने अन्तरात्मामें ही देखेगा और मुझ वासुदेव परमेश्वरमें भी इन सब भूतोंको देखेगा। अर्थात् सभी उपनिषदोंमें जो जीवात्मा और ईश्वरकी एकता प्रसिद्ध है उसको प्रत्यक्ष अनुभव करेगा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.35।। व्याख्या   यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव पूर्वश्लोकमें भगवान्ने कहा कि वे महापुरुष तेरेको तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे परन्तु उपदेश सुननेमात्रसे वास्तविक बोध अर्थात् स्वरूपका यथार्थ अनुभव नहीं होता श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् (गीता 2। 29) और वास्तविक बोधका वर्णन भी कोई कर नहीं सकता। कारण कि वास्तविक बोध करणनिरपेक्ष है अर्थात् मन वाणी आदिसे परे है। अतः वास्तविक बोध स्वयंके द्वारा ही स्वयंको होता है और यह तब होता है जब मनुष्य अपने विवेक (जडचेतनके भेदका ज्ञान) को महत्त्व देता है। विवेकको महत्त्व देनेसे जब अविवेक सर्वथा मिट जाता है तब वह विवेक ही वास्तविक बोधमें परिणत हो जाता है और जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद करा देता है। वास्तविक बोध होनेपर फिर कभी मोह नहीं होता।गीताके पहले अध्यायमें अर्जुनका मोह प्रकट होता है कि युद्धमें सभी कुटुम्बी सगेसम्बन्धी लोग मर जायँगे तो उन्हें पिण्ड और जल देनेवाला कौन होगा पिण्ड और जल न देनेसे वे नरकोंमें गिर जायँगे। जो जीवित रह जायँगे उन स्त्रियोंका और बच्चोंका निर्वाह और पालन कैसे होगा आदिआदि। तत्त्वज्ञान होनेके बाद ऐसा मोह नहीं रहता। बोध होनेपर जब संसारसे मैंमेरेपनका सम्बन्ध नहीं रहता तब पुनः मोह होनेका प्रश्न ही नहीं रहता।येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मनि तत्त्वज्ञान होते ही ऐसा अनुभव होता है कि मेरी सत्ता सर्वत्र परिपूर्ण है और उस सत्ताके अन्तर्गत ही अनन्त ब्रह्माण्ड हैं। जैसे स्वप्नसे जगा हुआ मनुष्य स्वप्नकी सृष्टिको अपनेमें ही देखता है ऐसे ही तत्त्वज्ञान होनेपर मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियों (जगत्) को अपनेमें ही देखता है। छठे अध्यायके उन्तीसवें श्लोकमें आये सर्वभूतानि चात्मनि पदोंसे भी इसी स्थितिका वर्णन किया गया है।अथो मयि तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी जो प्रचलित प्रक्रिया है उसीके अनुसार भगवान् कह रहे हैं कि गुरुसे विधिपूर्वक (श्रवण मनन और निदिध्यासनपूर्वक) तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेपर साधक पहले अपने स्वरूपमें सम्पूर्ण प्राणियोंको देखता है यह त्वम् पदका अनुभव हुआ फिर वह स्वरूपको तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको एक सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखता है यह तत् पदका अनुभव हुआ। इस तरह उसको पहले त्वम (स्वरूप) का और फिर तत् (परमात्मतत्त्व) के साथ त्वम् की एकताका अनुभव हो जाता है। एक ब्रह्महीब्रह्म शेष रह जाता है। ऐसी अवस्थामें द्रष्टा दृश्य और दर्शन ये तीनों ही नहीं रहते। परन्तु लोगोंकी दृष्टिमें उसके अपने कहलानेवाले अन्तःकरणमें जो भाव दीखता है उसको लेकर ही भगवान् कहते हैं कि वह सबको मेरेमें देखता है।स्थूल दृष्टिसे समुद्र और लहरोंमें भिन्नता दीखती है। लहरें समुद्रमें ही उठती और लीन होती रहती हैं। परन्तु सूक्ष्म दृष्टिसे समुद्र और लहरोंकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। सत्ता केवल एक जलतत्त्वकी ही है। जलतत्त्वमें न समुद्र है न लहरें। पृथ्वीसे सम्बन्ध होनेके कारण समुद्र भी सीमित है और लहरें भी परन्तु जलतत्त्व सीमित नहीं है। अतः समुद्र और लहरोंको न देखकर एक जलतत्त्वको देखना ही यथार्थ दृष्टि है। इसी तरह संसाररूप समुद्र और शरीररूप लहरोंमें भिन्नता दीखती है। शरीर संसारमें ही उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं। परन्तु वास्तवमें संसार और शरीरसमुदायकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। सत्ता केवल परमात्मतत्त्वकी ही है। परमात्मतत्त्वमें न संसार है न शरीर। प्रकृतिसे सम्बन्ध होनेके कारण संसार भी सीमित है और शरीर भी। परन्तु परमात्मतत्त्व सीमित नहीं है। अतः संसार और शरीरोंको न देखकर एक परमात्मतत्त्वको देखना ही यथार्थ दृष्टि है (गीता 13। 27)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.34 4.35।।तद्विद्धीति। यज्ज्ञात्वेति। तच्च ज्ञानं प्रणिपातेन भक्त्या परिप्रश्नेन ऊहापोहतर्कवितर्कादिभिः सेवया अभ्यासेन जानीहि। यतः एवंभूतस्य तव ज्ञानिनः निजा एव संवित्तिविशेषानुगृहीता इन्द्रियविशेषाः तत्त्वम् उप समीपे देक्ष्यन्ति प्रापयिष्यन्ति। तथाहि ते तत्त्वमेव दर्शयन्तीति तत्त्वदर्शिनः। उक्तं हि योग एव योगस्योपाध्यायः इति।ऋतंभरा तत्र प्रज्ञा (Y S I 48 ) इति च।अन्ये ज्ञानिनः पुरुषा इति व्याख्यायमाने भगवान् स्वयं यत् उपदिष्टवान् तदसत्यमित्युक्तं स्यात्। अथवा एवमभिधाने (S. अभिधानेन च) प्रयोजनम् अन्येऽपि लोकाः प्रणिपातादिना ज्ञानिभ्यो ज्ञानं गृह्णीयुः न यथाकथंचित् इति समयप्रतिपादनम्।आत्मनि मयि मत्स्वरूपतां यति (S K प्राप्ते) आत्मनि इति सामानाधिकरण्यम्। अथोशब्दः पादपूरणे। आत्मना ईश्वरस्य साम्ये कोऽपि विशेष उक्तः। असाम्ये विकल्पार्थानुपपत्तिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.35।।विशिष्टैराचार्यैरुपदिष्टे ज्ञाने कार्यक्षमे प्राप्ते सति समनन्तरवचनमपि योग्यविषयमर्थवद्भवतीत्याह तथाचेति। अतस्तस्मिन्विशिष्टे ज्ञाने कार्यक्षमे त्वदीयमोहापोहहेतौ निष्ठावता भवितव्यमिति शेषः। तत्र निष्ठाप्रतिष्ठायै तदेव ज्ञानं पुनर्विशिनष्टि येनेति। यज्ज्ञात्वेत्ययुक्तं ज्ञाने ज्ञानायोगादित्याशङ्क्य प्राप्त्यर्थत्वमधिपूर्वस्य गमेरङ्गीकृत्य व्याकरोति अधिगम्येति। इतश्चाचार्योपदेशलभ्ये ज्ञाने फलवति प्रतिष्ठावता भवितव्यमित्याह किञ्चेति। जीवे चेश्वरे चोभयत्र भूतानां प्रतिष्ठितत्वप्रतिनिर्देशे भेदवादानुमतिःस्यादित्याशङ्क्याह क्षेत्रज्ञेति। मूलप्रमाणाभावे कथं तदेकत्वदर्शनं स्यादित्याशङ्क्याह सर्वेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.35।।येन भूतानि इत्यस्य येन मोहेन सर्वाणि भूतान्यात्मनि स्वस्मिन्नथो मयि च द्रक्ष्यसीत्यन्यथाप्रतीतिनिरासार्थमाह येनेति। आत्मभूते सर्वान्तर्यामिणि। द्रक्ष्यसीत्येतत्पश्यसीति व्याख्यातं इदानीमपि ज्ञान्येवेति ज्ञापयितुम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.35।।येन ज्ञानेन मय्यात्मभूते सर्वभूतान्यथो तस्मादेव मोहनाशात्पश्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.35।।यद ज्ञानं ज्ञात्वा पुनः एवं देहाद्यात्माभिमानरूपं तत्कृतं ममताद्यास्पदं च मोहं न यास्यसि येन देवमनुष्याद्याकेरण अननुसंहितानि सर्वाणि भूतानि स्वात्मनि एव द्रक्ष्यसि यतः तव अन्येषां च भूतानां प्रकृतिवियुक्तानां ज्ञानैकाकारतया साम्यम्। प्रकृतिसंसर्गदोषविनिर्मुक्तम् आत्मस्वरूपं सर्वं समम् इति च वक्ष्यते निर्दोषं हि समं ब्रह्म (गीता 5।19) इति।अथो मयि सर्वाणि भूतानि अशेषेण द्रक्ष्यसि मत्स्वरूपसाम्यात् च परिशुद्धस्य सर्वस्य आत्मवस्तुनः।इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः (गीता 14।2) इति हि वक्ष्यतेतथा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरञ्जनः परमं साम्यमुपैति (मु0 उ0 3।1।3) इत्येवमादिषु नामरूपविनिर्मुक्तस्य आत्मवस्तुनः परं स्वरूपसाम्यम् अवगम्यते अतः प्रकृतिविनिर्मुक्तं सर्वम् आत्मवस्तु परस्परं समं सर्वेश्वरेण च समम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.35।। यत् ज्ञात्वा यत् ज्ञानं तैः उपदिष्टं अधिगम्य प्राप्य पुनः भूयः मोहम् एवं यथा इदानीं मोहं गतोऽसि पुनः एवं न यास्यसि हे पाण्डव। किञ्च येन ज्ञानेन भूतानि अशेषेण ब्रह्मादीनि स्तम्बपर्यन्तानि द्रक्ष्यसि साक्षात् आत्मनि प्रत्यगात्मनिमत्संस्थानि इमानि भूतानि इति अथो अपि मयि वासुदेवे परमेश्वरे च इमानि इति क्षेत्रज्ञेश्वरैकत्वं सर्वोपनिषत्प्रसिद्धं द्रक्ष्यसि इत्यर्थः।।किञ्च एतस्य ज्ञानस्य माहात्म्यम्

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【 Verse 4.36 】

▸ Sanskrit Sloka: अपि चेदसि पापेभ्य: सर्वेभ्य: पापकृत्तम: | सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ||

▸ Transliteration: api cedasi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpakṛttamaḥ | sarvaṁ jñānaplavenaiva vṛjinaṁ santariṣyasi ||

▸ Glossary: api: even; cet: if; asi: you are; pāpebhyaḥ: of sinners; sarvebhyaḥ: of all; pāpa- kṛttamaḥ: greatest sinner; sarvaṁ: all; jñāna plavena: by the boat of knowledge; eva: only; vṛjinaṁ: the ocean of miseries;

Chapter 4 (Part 23)

santariṣyasi: you will cross.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.36 Even if you are the most sinful of all sinners, you will certainly cross completely the ocean of miseries through the boat of knowledge.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.36।।अगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.36।। यदि तुम सब पापियों से भी अधिक पाप करने वाले हो तो भी ज्ञानरूपी नौका द्वारा निश्चय ही सम्पूर्ण पापों का तुम संतरण कर जाओगे।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.36 अपि even? चेत् if? असि (thou) art? पापेभ्यः than sinners? सर्वेभ्यः (than) all? पापकृत्तमः most sinful? सर्वम् all? ज्ञानप्लवेन by the raft of knowledge? एव alone? वृजिनम् sin? सन्तरिष्यसि (thou) shalt cross.Commentary You can cross the ocean of sin with the boat of the knowledge of the Self. (Cf.IX.30)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.36. Even if you are the highest sinner amongst all sinners, you shall cross over [the ocean of] all the sin just by the boat of knowledge.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.36 Be thou the greatest of sinners, yet thou shalt cross over all sin by the ferryboat of wisdom.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.36 Even if you be the most sinful of all sinners, you will cross over all sins by the boat of knowledge alone.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.36 Even if you be the worst sinner among all sinners, still you will cross over all the wickedness with the raft of Knowledge alone.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.36 Even if thou art the most sinful of all sinners, yet thou shalt verily cross all sins by the raft of knowledge.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.36 See Comment under 4.37

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.36 Even though you be the most sinful of all sinners, you will completely cross over the sea of sins previoulsy accumulated, with the boat of knowledge concerning the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.36 Api cet asi, even if you be; papa-krt-tamah, the worst sinner, extremely sinful; sarvhyah, among all; paphyah, the sinners (papa, lit. sin, means here sinner) ; still santarisyasi, you will cross over; sarvam, all; the vrjinam, wickedness, the ocean of wickedness, sin; [Ast. reads papa-samudram, (ocean of sin) in place of papam.-Tr.] jnana-plavena eva, with the raft of Knowledge alone, by using Knowledge alone as a float. Here [Here, in the scriptures imparting spiritual instructions.], righteousness (formal religious observance), too, is said to be an evil in the case of one aspiring for Liberation. How Knowledge destroys sin is being told with the help of an illustration:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.36।। यद्यपि भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मसाक्षात्कार का आश्वासन दिया था किन्तु वह अनुभव इतना भव्य और उच्चकोटि का था कि अर्जुन को स्वयं पर विश्वास नहीं हो रहा था। उसकी स्वयं के विषय में यह धारणा थी कि वह इस अनुभव को प्राप्त करने के योग्य नहीं था। जिस किसी विवेकी पुरुष को अपने अवगुणों का भान है उसके मन में ऐसी शंका आ सकती है।वेदान्त ऐसा दर्शन नहीं है कि वह निष्ठुरहृदय होकर पापियों को ज्ञानार्जन से वंचित रखे। वेदान्त इस धारणा में विश्वास नहीं रखता कि कोई व्यक्ति पतित है और वह हीन योनियों में सदा भटकता रहेगा तथा उस पतित व्यक्ति का उद्धार केवल तभी होगा जब वह वेदान्त मंदिर में प्रवेश करेगा अत्यन्त सहिष्णु वेदान्त दर्शन केवल सत्य की और केवल सत्य की ही घोषणा करता है। सर्वव्यापी दिव्य तत्त्व सर्वत्र व्यक्त हो रहा है और इसलिये कोई भी पापी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वप्रयत्न से अपने जन्मसिद्ध पूर्णत्व के अधिकार को प्राप्त न कर सके।गीता मानव मात्र के लिये लिखा गया एक जीवन शास्त्र है और उसकी सार्वभौमिकता इस श्लोक में स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। गीता का आश्वासन है कि अत्यन्त पापी पुरुष भी वर्तमान जीवन की परिच्छिन्नताओं तथा दुखदायी अवगुणों को तैर कर पूर्णत्व के तट पर ज्ञान नौका के द्वारा पहुँच सकता है। मनुष्य के पूर्णत्व प्राप्ति का यह अधिकार विश्व के किसी भी धर्मग्रन्थ में इतने स्पष्ट रूप से उल्लिखित नहीं है।यह पहचान कर कि जीव का वास्तविक स्वरूप पूर्ण परमात्मा से भिन्न नहीं है तथा तत्पश्चात् आत्मरूप में रहने को ही सम्यक् ज्ञान कहते हैं। अपने पारमार्थिक आनन्दस्वरूप को पहचान लेने पर वैषयिक सुख हमें प्रलोभित नहीं कर सकते और न पापपूर्ण जीवन में हमें खींच सकते हैं। बड़े ही सुन्दर शब्दों में यहां कहा गया है ज्ञान नौका द्वारा तुम सम्पूर्ण पापों को तर जाओगे।किस प्रकार यह ज्ञान पापों को नष्ट करता है एक दृष्टान्त के द्वारा इसका उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.36।।किंच न केवलमेतावदेव किंत्वन्यज्ज्ञानमाहात्म्यमपि श्रृण्वित्याह अपिचेदिति। असंभाविताभ्युपगमार्थं निपातद्वयम्। यदिचेत्त्वं सर्वेभ्यः पापकृद्यभोऽतिशयेन पापकृदसि तथापि ज्ञानमेव प्लवं पोतं तरणसाधनं कृत्वा वृजिनार्णवं धर्माधर्मरुपदुःखसमुद्रं तरिष्यसि। मुमुक्षुं प्रति पुण्यस्यापि वृजिनरुपत्वात्। तथाच श्रुतिःतथा सयोऽहमां वेद न ह वै तस्य केनच न कर्मणा लोको मीयते न स्तेयेन न भ्रूणहत्यया न साधुना कर्मणा भूयान् भवति नो एवासाधुना कनीयान् त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्रमहनमरुन्मुखान्यतीन्सालावृकेभ्यः प्रायच्छम् इत्याद्या।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.36।।किंच शृणु ज्ञानस्य माहात्म्यम् अपिचेदित्यसंभाविताभ्युपगमप्रदर्शनार्थौ निपातौ। यद्यप्ययमर्थो न संभवत्येव तथापि ज्ञानफलकथनायाभ्युपेत्योच्यते। यद्यपि त्वं पापकारिभ्यः सर्वेभ्योऽप्यतिशयेन पापकारी पापकृत्तमः स्यास्तथापि सर्वं वृजिनं पापम् अतिदुस्तरत्वेनार्णवसदृशं ज्ञानप्लवेनैव नान्येन ज्ञानमेव प्लवं पोतं कृत्वा संतरिष्यसि सम्यगनायासेन पुनरावृत्तिवर्जितत्वेन च तरिष्यस्यतिक्रमिष्यसि। वृजिनशब्देनात्र धर्माधर्मरूपं कर्म संसारफलममिभिप्रेतं मुमुक्षोः पापवत्पुण्यस्याप्यनिष्टवात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.36।।अपि चेदिति। वृजिनं वृजिनार्णवम्। धर्मोपीह मुमुक्षोः पापमित्युच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.36।।तथा चायं भावः भगवताऽग्रे पुष्टिमार्गरीत्योपदेशेन स्वानुभवः कारणीयस्तदुपदेशयोग्यार्थं सर्वत्र भगवद्भावात्मकज्ञानरूपः संस्कारः कर्त्तव्यः स च साक्षात्स्वोपदेशेऽग्रे कार्यविलम्बः स्यादिति ज्ञानवाक्यानुसारेण स्वरूपपापार्थमुद्यतस्तद्भोगं विना किं ज्ञानेन स्यात् इत्यत आह अपीति। क्षत्ित्रयाणां त्वयं धर्म एव अपि चेत् यदि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृद्भ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः पापकृन्मुख्योऽसि तथापि ज्ञानप्लवेनैव ज्ञानरूपोडुपेन तरणसाधनेन सर्वं वृजिनं पापं सर्वं पापं सर्वपदेनार्णवरूपं सन्तरिष्यसि सम्यक्प्रकारेणानायासेन तरिष्यसि पापविनिर्मुक्तो भविष्यसीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.36।।किंच अपिचेदिति। सर्वेभ्यः पापकारिभ्यो यद्यप्यतिशयेन पापकारी त्वमसि तथापि सर्वं पापसमुद्रं ज्ञानपोतेनैव सम्यगनायासेन तरिष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.36।।किञ्च अपि चेदिति। स्पष्टार्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.36।।इस ज्ञान का माहात्म्य क्या है ( सो सुन ) यदि तू पाप करने वाले सब पापियों से अधिक पाप करनेवाला अति पापी भी है तो भी ज्ञानरूप नौका द्वारा अर्थात् ज्ञान को ही नौका बनाकर समस्त पापरूप समुद्रसे अच्छी तरह पार उतर जायगा। यहाँ मुमुक्षु के लिये धर्म भी पाप ही कहा जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.36।। व्याख्या   अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः पाप करनेवालोंकी तीन श्रेणियाँ होती हैं (1) पापकृत् अर्थात् पाप करनेवाला (2) पापकृत्तर अर्थात् दो पापियोंमें एकसे अधिक पाप करनेवाला और (3) पापकृत्तम अर्थात् सम्पूर्ण पापियोंमें सबसे अधिक पाप करनेवाला। यहाँ पापकृत्तमः पदका प्रयोग करके भगवान् कहते हैं कि अगर तू सम्पूर्ण पापियोंमें भी अत्यन्त पाप करनेवाला है तो भी तत्त्वज्ञानसे तू सम्पूर्ण पापोंसे तर सकता है।भगवान्का यह कथन बहुत आश्वासन देनेवाला है। तात्पर्य यह है कि जो पापोंका त्याग करके साधनमें लगा हुआ है उसका तो कहना ही क्या है पर जिसने पहले बहुत पाप किये हों उसको भी जिज्ञासा जाग्रत् होनेके बाद अपने उद्धारके विषयमें कभी निराश नहीं होना चाहिये। कारण कि पापीसेपापी मनुष्य भी यदि चाहे तो इसी जन्ममें अभी अपना कल्याण कर सकता है। पुराने पाप उतने बाधक नहीं होते जितने वर्तमानके पाप बाधक होते हैं। अगर मनुष्य वर्तमानमें पाप करना छोड़ दे और निश्चय कर ले कि अब मैं कभी पाप नहीं करूँगा और केवल तत्त्वज्ञानको प्राप्त करूँगा तो उसके पापोंका नाश होते देरी नहीं लगती।यदि कहीं सौ वर्षोंसे घना अँधेरा छाया हो और वहाँ दीपक जला दिया जाय तो उस अँधेरेको दूर करके प्रकाश करनेमें दीपकको सौ वर्ष नहीं लगते प्रत्युत दीपक जलाते ही तत्काल अँधेरा मिट जाता है। इसी तरह तत्त्वज्ञान होते ही पहले किये गये सम्पूर्ण पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं।चेत् (यदि) पद देनेका तात्पर्य यह है कि प्रायः ऐसे पापी मनुष्य परमात्मामें नहीं लगते परन्तु वे परमात्मामें लग नहीं सकते ऐसी बात नहीं है। किसी महापुरुषके सङ्गसे अथवा किसी घटना परिस्थिति वातावरण आदिके प्रभावसे यदि उनका ऐसा दृढ़ निश्चय हो जाय कि अब परमात्मतत्त्वका ज्ञान प्राप्त करना ही है तो वे भी सम्पूर्ण पापसमुद्रसे भलीभाँति तर जाते हैं।नवें अध्यायके तीसवेंइकतीसवें श्लोकोंमें भी भगवान् ऐसी ही बात अनन्यभावसे अपना भजन करनेवालेके लिये कही है कि महान् दुराचारी मनुष्य भी अगर यह निश्चय कर ले कि अब मैं भगवान्का भजन ही करूँगा तो उसका भी बहुत जल्दी कल्याण हो जाता है।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि प्रकृतिके कार्य शरीर और संसारके सम्बन्धसे ही सम्पूर्ण पाप होते हैं। तत्त्वज्ञान होनेपर जब इनसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है तब पाप कैसे रह सकते हैं मूलाभावे कुतः शाखा परमात्माके स्वतःसिद्ध ज्ञानके साथ एक होना ही ज्ञानप्लव अर्थात् ज्ञानरूप नौकाका प्राप्त होना है। मनुष्य कितना ही पापी क्यों न रहा हो ज्ञानरूप नौकासे वह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जाता है। यह ज्ञानरूप नौका कभी टूटतीफूटती नहीं इसमें कभी छिद्र नहीं होता और यह कभी डूबती भी नहीं। यह मनुष्यको पापसमुद्रसे पार करा देती है।ज्ञानयज्ञ (4। 33) से ही यह ज्ञानरूप नौका प्राप्त होती है। यह ज्ञानयज्ञ आरम्भसे ही विवेक को लेकर चलता है और तत्त्वज्ञान में इसकी पूर्णता हो जाती है। पूर्णता होनेपर लेशमात्र भी पाप नहीं रहता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.36 4.37।।सर्वं कर्माखिलम् (श्लो. 433) इति यदुक्तं तत्स्फुटयितुं प्रथमश्लोकेन अधर्मोऽपि नश्यति इति वदन् सर्वं कर्म इति द्वितीयेन संस्कारलेशोऽपि नावतिष्ठतीति सूचयन् अखिलम् इति व्याचष्टे अपि चेदिति। यथेति। सुसमिद्धोऽभ्यासजातप्रतिपत्तिदार्ढ्यबन्धेन (K omits सु) ज्ञानाग्निर्भवति यथा तथा प्रयतनीयमिति भावः ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.36।।ज्ञानस्य प्रकारान्तरेण प्रशंसां प्रस्तौति किञ्चेति। पापकारिभ्यः सर्वेभ्यः सकाशादतिशयेन पापकारित्वमेकस्मिन्नसंभावितमपि ज्ञानमाहात्म्यप्रसिद्ध्यर्थमङ्गीकृत्य ब्रवीति अपिचेदिति। ब्रह्मात्मैक्यज्ञानस्य सर्वपापनिवर्तकत्वेन माहात्म्यमिदानीं प्रकटयति सर्वमिति। अधर्मे निवृत्तेऽपि धर्मप्रतिबन्धाज्ज्ञानवतोऽपि मोक्षः संभवतीत्याशङ्क्याह धर्मोऽपीति। इहेत्यध्यात्मशास्त्रं गृह्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.36।।येन 4।35 इति ज्ञानस्यैव निर्देश इति स्थापयन्अपि चेत् इत्यादेः प्रतिपाद्यमाह करणेति। येनेति करणतया निर्दिष्टमित्यर्थः।श्रेयान्। 4।33 इत्याद्यपेक्षया पुनरिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.36।।करणभूतं ज्ञानं स्तौति पुनः श्लोकत्रयेण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.36।।यदि अपि सर्वेभ्यः पापकृत्तमः असि सर्वं पूर्वाजितं वृजिनरूपं समुद्रम् आत्मविषयज्ञानरूपप्लवेन एव संतरिष्यसि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.36।। अपि चेत् असि पापेभ्यः पापकृद्भ्यः सर्वेभ्यः अतिशयेन पापकृत् पापकृत्तमः सर्वं ज्ञानप्लवेनैव ज्ञानमेव प्लवं कृत्वा वृजिनं वृजिनार्णवं पापसमुद्रं संतरिष्यसि। धर्मोऽपि इह मुमुक्षोः पापम् उच्यते।।ज्ञानं कथं नाशयति पापमिति दृष्टान्त उच्यते

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【 Verse 4.37 】

▸ Sanskrit Sloka: यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन | ज्ञानाग्नि: सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ||

▸ Transliteration: yathaidhāṁsi samiddho’gnir bhasmasātkurute’rjuna | jñānāgniḥ sarvakarmāṇi bhasmasātkurute tathā ||

▸ Glossary: yathā: as; edhāṁsi: firewood; samiddhaḥ : blazing; agniḥ: fire; bhasmasāt: ashes; kurute: does; arjuna: O Arjuna; jñāna: knowledge; agniḥ: fire; sarva: all; karmāṇi: actions; bhasmasāt: ashes; kurute: does; tathā: in the same way.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.37 Just as a blazing fire turns firewood to ashes, O Arjuna, so does the fire of wisdom burn to ashes all actions, all your karma.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.37।।हे अर्जुन जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको सर्वथा भस्म कर देती है ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सर्वथा भस्म कर देती है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.37।। जैसे प्रज्जवलित अग्नि ईन्धन को भस्मसात् कर देती है वैसे ही हे अर्जुन ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मों को भस्मसात् कर देती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.37 यथा as? एधांसि fuel? समिद्धः blazing? अग्निः fire? भस्मसात्कुरुते reduces to ashes? अर्जुन O Arjuna? ज्ञानाग्निः fire of knowledge? सर्वकर्माणि all actions? भस्मसात्कुरुते reduces to ashes? तथा so.Commentary Just as the sees that are roasted cannot germinate? so also the actions that are burnt by the fire of knowledge cannot bear fruits? i.e.? cannot bring man to this world again for the enjoyment of the fruits of his actions. This is reducing actions to ashes. The actions lose their potency as they are burnt by the fire of knowledge. When the knowledge of the Self dawns? all actions with their results are burnt by the fire of that knowledge just as fuel is burnt by the fire. When there is no agencymentality (the idea I do this)? when there is no desire for the fruits? action is no action at all. It has lost its potency. The fire of knowledge can burn all actions except the Prarabdha Karma? or the result of the past action which has brought this body into existence and which has thus already begun to bear fruits or produce effects.According to some philosophers even the Prarabdha Karma is destroyed by the fire of knowledge. Sri Sankara says in his AparokshanubhutiIn the passage his actions are destroyed when the Supreme is realised the Veda expressly speaks of actions (Karmas) in the plural? in order to signify the destruction of even the Prarabdha.There are three kinds of Karmas or reaction to or fructification of past actions (1) Prarabdha? so much of the past actions as has given rise to the present birth? (2) Sanchita? the balance of the past actions that will give rise to future births -- the storehouse of accumulated actions? and (3) Agami or Kriyamana? acts being done in the present life. If by the knowledge of the Self only the Sanchita and Agami were destroyed and not Prarabdha? the dual number would have been used and not the plural. (Sanskrit grammar has singular? dual and plural numbers). (Cf.IV.1019)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.37. Just as the fire, well inflamed, reduces the fuels to ashes, so also the fire of knowledge reduces all actions to ashes.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.37 As the kindled fire consumes the fuel, so, O Arjuna, in the flame of wisdom the embers of action are burnt to ashes.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.37 Just as burning fire turns fuel to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge turn all Karma to ashes.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.37 O Arjuna, as a blazing fire reduces pieces of wood to ashes, similarly the fire of Knowledge reduces all actions to ashes.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.37 As the blazing fire reduces fuel to ashes, O Arjuna, so does the fire of knowledge reduce all actions to ashes.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.36-37 Api cet etc. Yatha etc. The idea is this : One should exert is such a way so that the fire of knowledge remains well fuelled with the knot of firmness of conviction born of practice.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.37 The fire of knowledge concerning the real nature of the self reduces to ashes the collection of endless Karmas accumulated from beginningless times, just as a well-kindled fire reduces to ashes a bundle of firewood.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.37 O Arjuna, yatha, as; a samiddhah, blazing; agnih, fire, a well lighted fire; kurute, reduces; edhamsi, pieces of wood; bhasmasat, to ashes; tatha, similarly; jnanagnih, the fire of Knowledge-Knowledge itself being the fire; kurute, reduces; bhasmasat, to ashes; sarva-karmani, all actions, i.e. it renders them ineffective, for the fire of Knowledge itself cannot directly [Knowledge destroys ignorance, and thery the idea of agentship is eradicated. This in turn makes actions impossible.] burn actions to ashes, like pieces of wood. So, the idea implied is that full enlightenment is the cuase of making all actions impotent. From the force the context [If the body were to die just with the dawn of Knowledge, imparting of Knowledge by enlightened persons would be impossible, and thus there would be no teacher to transmit Knowledge!] it follows that, since the result of actions owing to which the present body has been born has already become effective, therefore it gets eshausted only through experiencing it. Hence, Knowledge reduces to ashes only all those actions that were done (in this life) prior to the rise of Knowledge and that have not become effective, as also those performed along with (i.e. after the dawn of) Knowledge, and those that were done in the many past lives. Since this is so, therefore,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.37।। यह दृष्टान्त सुपरिचित तथा अत्यन्त उपयुक्त है। ईन्धन की लकड़ियों का आकारप्रकार या रंग कुछ भी हो जब उन्हें अग्निकुण्ड में डाला जाता है तब सब का अन्तिम परिणाम एक ही होता है भस्म। उस भस्म के ढेर से हम विभिन्न लकड़ियों की राख को अलगअलग नहीं कर सकते। उनका मूलरूप सर्वथा नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार पाप और पुण्य जो भी और जितने भी कर्म हैं वे सब ज्ञानाग्नि में भस्मीभूत हो जाते है। उनका पूर्व का कार्यकारण रूप नष्ट हो जाता है।कर्म फल प्रदान करते हैं। परन्तु सभी कर्म एक साथ ही फलदायी नहीं हो सकते। नियमानुसार जब वे परिपक्व हो जाते हैं तभी उनका फल प्राप्त होने लगता हैं। अनादि काल से जीव कर्तृत्व का अभिमान करके अनेक कर्मों को करता आ रहा है। इसीलिये उसे अनेक प्रकार के शरीर भी धारण करने पड़ते हैं। इन कर्मों का फलोपभोग आवश्यक होता है।शास्त्रों में इन कर्मों का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया है (क) संचितअर्जित किये कर्म जो अभी फलदायी नहीं हुए हैं (ख) प्रारब्ध जिन्होंने फल देना प्रारम्भ कर दिया है तथा (ग) आगामी अर्थात् जिन कर्मों का फल भविष्य में मिलेगा। इस श्लोक में सब कर्मों से तात्पर्य संचित और आगामी कर्मों से है।इसलिये

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.37।।ननु ज्ञानप्लवेन तरिष्यसीत्युक्त्या ज्ञानस्य पापनाशक्त्वं नागतमित्याशङ्क्य पापं नाशयति ज्ञानं नावशेषयति तन्नाश एव तत्तरणमित्यभिप्रेत्य सदृष्टान्तमाह। यथैधांसि काष्ठानि सभ्यग्दीप्तोऽग्निर्भस्मसाद्भस्मीभावं कुरुते। तथा ज्ञानमेवाग्निर्ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मीभावं कुरुते। निर्बीजं करोतीत्यर्थः। अर्जुनेतिसंबोधयन् शुद्धचित्तेनैवेदृशं ज्ञानं लभ्यते नान्येनेति द्योतयति। यद्वा तच्च ज्ञानं सर्वकर्माणि दग्ध्वा शुद्धं ब्रह्म संपद्यत इति सूचयति। यद्वैवंभूतेन ज्ञानेन सर्वाणि कर्माणि भस्मसात्कृत्वाऽन्वर्थशंज्ञो भवेति सूचयन्नाहार्जुनेति। सभ्यग्दर्शनं प्रारब्धकर्मव्यतिरिक्तानां सर्वकर्मणां निर्बीजत्वकारणमित्यभिप्रायः। प्रारब्धकर्मणां प्रवृत्तफलानां भोगेनैव क्षयात्। तस्माद्यन्यप्रवृत्तफलान्यतीतानेकजन्मार्जितानि ज्ञानोत्पत्तेः पूर्वमस्मिन्जन्मनि कृतानि ज्ञानाग्निसाधनानुष्ठानकालिकानि च सर्वाणि भस्मसात्कुरुते। ज्ञानोत्तरभाविनामसंबन्धोऽपि बोध्यः। तथाच भगवतो बादरायणस्य सूत्राणितदिघिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्य्वपदेशात् इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तुअनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेःभोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते इति फलार्थत्वात्कर्मणः फलमदत्त्वा क्षयासंभवात्। ब्रह्माधिगमे सति तद्विपरीतफलं दुरितं न क्षीयत इति प्राप्ते राद्धान्तः। तदधिगमे ब्रह्मसाक्षात्कारे सति उत्तरस्याघस्य दुरितस्याश्लेषोऽसंबन्धः पूर्वस्य विनाशः। कस्मात्तद्य्वपदेशात् तयोरश्लेषविनाशयोः श्रुतिभिर्व्यपदेशात्। तथाच श्रुतयःतद्यथा पुष्करपलाश आपो न श्लिष्यन्त एवमेवंविदि पापं कर्मं न श्लिष्यतेतद्यथैषीकातूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयत एवँहास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्तेभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इति धर्मस्य पुनः शास्त्रीयत्वाच्छास्त्रीयेण ज्ञानेनाविरोध इत्याशङ्क्याह। इतरस्यापि पुण्यस्य कर्मणः एवमघवदसंश्लेषविनाशौ भवतः। कुतस्तस्यापि स्वफलहेतुत्वेन ज्ञानप्रतिबन्धित्वप्रसङ्गात्।उभे इहैवैष एते तरति इत्यादिश्रुतिषु च दुष्कृतवत्सु कृतस्यापि विनाशव्यपदेशात्। अकर्त्रात्मत्वबोधनिमित्तस्य च कर्मक्षयस्य सुकृतदुष्कृतयोस्तुल्यत्वात्।क्षीयन्ते चास्य कर्माणी ति चाविशेषश्रुतेः। यत्रापि केवल एव पाप्मशब्दः पठ्यते तत्रापि तेनैव पुण्यमप्याकलितमिति द्रष्टव्यम्। ज्ञानापेक्षया निकृष्टफलत्वात्। तुशब्द एवकारार्थः। एवं पुण्यपापयोर्बन्धहेत्वोर्विद्यासामर्थ्यादश्लेषविनाशसिद्य्धा विदुषो देहपाते मुक्तिरवश्यमेव भवतीत्यर्थः। तत्र उभे इहैव एष एते तरतीत्यादिश्रुतिविशेषश्रवणात् अविशेषेणारब्धकार्ययोरनारब्धकार्ययोश्च क्षय इति प्राप्ते प्रत्याह। अनारब्धकार्ये अप्रवृत्तफले एव तु पूर्वे जन्मान्तरसंचिते अस्मिन्नपि च जन्मनि प्राक् ज्ञानोत्पत्तेः संचिते पुण्यपापे तदधिगमात्क्षीयेते नत्वारब्धकार्ये याभ्यामेतह्ब्रह्मज्ञानायतनं जन्म निर्मितम् कुतस्तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्य इति शरीरपातावधिकरणात्क्षेमप्राप्तेः। ननु वस्तु बलेनाकर्त्रात्मावगत्या प्रारब्धकर्माण्यपि कुतो न क्षीयन्ते। अग्निसंबन्धे बीजशक्तिरिवेति चेदुच्यते। न तावदनाश्रित्यारब्धकार्य कर्माशयं तत्त्वावगत्युत्पत्तिरुपपद्यते। आश्रिते च तस्मिन्कुलालचक्रवत्प्रवृत्तवेगस्यान्तराले प्रतिबन्धासंभवात् भवतिवेगक्षयपरिपालनं अकर्त्रात्मावगत्याबाधितमपि मिथ्याज्ञानं कर्माधिष्ठानं जले वृक्षज्ञानवत्संस्कारवशात्कंचित्कालमनुवर्तत एव। अनारब्धकार्ययोः पुण्यपापयोः विद्यासामर्थ्यात्क्षय उक्तः इतरे त्वारब्धकार्ये ते उपभोगेन क्षपयित्वा ब्रह्म संपद्यते। तस्य तावदेवेत्यादि ब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येतीति चैवमादिश्रुतिभ्य इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.37।।ननु समुद्रवत्तरणे कर्मणां नाशो न स्यादित्याशङ्क्य दृष्टान्तान्तरमाह यथा एधांसि काष्ठानि समिद्धः प्रज्वलितोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते भस्मीभावं नयति हे अर्जुन ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि पापानि पुण्यानि चाविशेषेण प्रारब्धफलभिन्नानि भस्मसात्कुरुते तथा तत्कारणाज्ञानविनाशेन विनाशयतीत्यर्थः। तथाच श्रुतिःभिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः। क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे इतितदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात्इतरस्याप्येवमसंश्लेषः पाते तु इति च सूत्रे। अनारब्धे पुण्यपापे नश्यत एवेत्यत्र सूत्रंअनारब्धकार्ये एव तु पूर्वे तदवधेः इति। ज्ञानोत्पादकदेहारम्भकाणां तु तद्देहान्तएव विनाशःतस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्येऽथ संपत्स्ये इति श्रुतेःभोगेन त्वितरे क्षपयित्वा संपद्यते इति सूत्राच्च। आधिकारिकाणां तु यान्येव ज्ञानोत्पादकदेहारम्भकाणि तान्येव देहान्तरारम्भकाण्यपि। यथा वसिष्ठापान्तरतमःप्रभृतीनाम। तथाच सूत्रम्यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिकाणाम् इति।अधिकारोऽनेकदेहारम्भकं बलवत्प्रारब्धफलं कर्म। तच्चोपासकानामेव नान्येषाम्। अनारब्धफलानि नश्यन्ति आरब्धफलानि तु यावद्भोगसमाप्ति तिष्ठन्ति। भोगश्चैकेन देहेनानेकेन वेति न विशेषः। विस्तरस्त्वाकरे द्रष्टव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.37।।यथेति। एधांसि काष्ठानि। कर्माणि प्रारब्धादन्यानि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.37।।पापस्यार्णवत्वोक्त्या ज्ञानस्य प्लवत्वोक्त्या च तस्यानल्पत्वादगाधत्वादस्याल्पत्वात्तन्मध्यपातित्वात् कदाचिन्मज्जनसम्भावनापि स्यादित्यल्पस्वरूपस्य महद्वस्तुनिराकारणसामर्थ्ये दृष्टान्तमाह यथैधांसीति। हे अर्जुन यथा अग्निः काष्ठेभ्यः स्वल्पतरोऽपि समिद्धः सन् सम्यक्प्रकारेण सन्धुक्षितः सन् एधांसि काष्ठानि भस्मसात्कुरुते तथा ज्ञानाग्निः ज्ञानरूपोऽग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते भस्मरूपाण्यग्रेऽस्य फलभोगजननासमर्थानि कुरुते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.37।।समुद्रवत्स्थितस्यैव पापस्यातिलङ्घनमात्रं नतु पापस्य नाश इति भ्रान्तिं दृष्टान्तेन वारयन्नाह यथेति। एधांसि काष्ठानि प्रदीप्तोऽग्निर्यथा भस्मीभावं नयति तथा आत्मज्ञानरूपोऽग्निः प्रारब्धकर्मव्यतिरिक्तानि सर्वाणि कर्माणि भस्मीकरोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.37।।ननु महतो वृजिनतो ज्ञानस्य निर्बलत्वप्लवत्वेनात्यल्पत्वादित्याशङ्क्य ज्ञानस्य प्रबलत्वमग्निदृष्टान्तद्वारा निरूपयति यथेति। समिद्धोऽग्निर्ज्ञानं च प्रबलं भवति। सर्वकर्माणि स्वोत्पत्तिकाले सम्भूतानि लघूनि गुरूणि च। प्रारब्धकर्मणां तु स्वोत्पत्तिकालसम्भूतत्वाभावान्न दाहः अन्यथा ज्ञानं न स्यात्।अनारब्धकार्ये एव तु पूर्वं तदवधेः ब्र.सू.4।1।15 इति तत्त्वसूत्रात्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.37।।ज्ञान पापको किस प्रकार नष्ट कर देता है सो दृष्टान्तसहित कहते हैं हे अर्जुन जैसे अच्छी प्रकारसे प्रदीप्त यानी प्रज्वलित हुआ अग्नि ईंधनको अर्थात् काष्ठके समूहको भस्मरूप कर देता है वैसे ही ज्ञानरूप अग्नि सब कर्मोंको भस्मरूप कर देता है अर्थात् निर्बीज कर देता है। क्योंकि ईंधनकी भाँति ज्ञानरूप अग्नि कर्मोंको साक्षात् भस्मरूप नहीं कर सकता इसलिये इसका यही अभिप्राय है कि यथार्थ ज्ञान सब कर्मोंको निर्बीज करनेका हेतु है। जिस कर्मसे शरीर उत्पन्न हुआ है वह फल देनेके लिये प्रवृत्त हो चुका इसलिये उसका नाश तो उपभोगद्वारा ही होगा। यह युक्तिसिद्ध बात है। अतः इस जन्ममें ज्ञानकी उत्पत्तिसे पहले और ज्ञानके साथसाथ किये हुए एवं पुराने अनेक जन्मोंमें किये हुए जो कर्म अभीतक फल देनेके लिये प्रवृत्त नहीं हुए हैं उन सब कर्मोंको ही ज्ञानाग्नि भस्म करता है ( प्रारब्धकर्मोंको नहीं )।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.37।। व्याख्या   यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन पीछेके श्लोकमें भगवान्ने ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा सम्पूर्ण पापसमुद्रको तरनेकी बात कही। उससे यह प्रश्न पैदा होता है कि पापसमुद्र तो शेष रहता ही है फिर उसका क्या होगा अतः भगवान् पुनः दूसरा दृष्टान्त देते हुए कहते हैं कि जैसे प्रज्वलित अग्नि काष्ठादि सम्पूर्ण ईंधनोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनका किञ्चिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता ऐसे ही ज्ञानरूप अग्नि सम्पूर्ण पापोंको इस प्रकार भस्म कर देती है कि उनका किञ्चिन्मात्र भी अंश शेष नहीं रहता।ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा जैसे अग्नि काष्ठको भस्म कर देती है ऐसे ही तत्त्वज्ञानरूपी अग्नि संचित प्रारब्ध और क्रियमाण तीनों कर्मोंको भस्म कर देती है। जैसे अग्निमें काष्ठका अत्यन्त अभाव हो जाता है ऐसे ही तत्त्वज्ञानमें सम्पूर्ण कर्मोंका अत्यन्त अभाव हो जाता है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान होनेपर कर्मोंसे अथवा संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। सम्बन्धविच्छेद होनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अनुभव नहीं होता प्रत्युत एक परमात्मतत्त्व ही शेष रहता है।वास्तवमें मात्र क्रियाएँ प्रकृतिके द्वारा ही होती हैं (गीता 13। 29)। उन क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेनेसे कर्म होते हैं। नाड़ियोंमें रक्तप्रवाह होना शरीरका बालकसे जवान होना श्वासोंका आनाजाना भोजनका पचना आदि क्रियाएँ जिस समष्टि प्रकृतिसे होती हैं उसी प्रकृतिसे खानापीना चलना बैठना देखना बोलना आदि क्रियाएँ भी होती हैं। परन्तु मनुष्य अज्ञानवश उन क्रियाओंसे अपना सम्बन्ध मान लेता है अर्थात् अपनेको उन क्रियाओंका कर्ता मान लेता है। इससे वे क्रियाएँ कर्म बनकर मनुष्यको बाँध देती हैं। इस प्रकार माने हुए सम्बन्धसे ही कर्म होते हैं अन्यथा क्रियाएँ ही होती हैं।तत्त्वज्ञान होनेपर अनेक जन्मोंके संचित कर्म सर्वथा नष्ट हो जाते हैं। कारण कि सभी संचित कर्म अज्ञानके आश्रित रहते हैं अतः ज्ञान होते ही (आश्रय आधाररूप अज्ञान न रहनेसे) वे नष्ट हो जाते हैं। तत्त्वज्ञान होनेपर कर्तृत्वाभिमान नहीं रहता अतः सभी क्रियमाण कर्म अकर्म हो जाते हैं अर्थात् फलजनक नहीं होते। प्रारब्ध कर्मका घटनाअंश (अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति) तो जबतक शरीर रहता है तबतक रहता है परन्तु ज्ञानीपर उसका कोई असर नहीं पड़ता। कारण कि तत्त्वज्ञान होनेपर भोक्तृत्व नहीं रहता अतः अनुकूलप्रतिकूल परिस्थिति सामने आनेपर वह सुखीदुःखी नहीं होता। इस प्रकार तत्त्वज्ञान होनेपर संचित प्रारब्ध और क्रियमाण तीनों कर्मोंसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं रहता। कर्मोंसे अपना सम्बन्ध न रहनेसे कर्म नहीं रहते भस्म रह जाती है अर्थात् सभी कर्म अकर्म हो जाते हैं। सम्बन्ध   अब भगवान् आगे कहे श्लोकके पूर्वार्धमें तत्त्वज्ञानकी महिमा बताते हुए उत्तरार्धमें कर्मयोगकी विशेष महत्ता प्रकट करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.36 4.37।।सर्वं कर्माखिलम् (श्लो. 433) इति यदुक्तं तत्स्फुटयितुं प्रथमश्लोकेन अधर्मोऽपि नश्यति इति वदन् सर्वं कर्म इति द्वितीयेन संस्कारलेशोऽपि नावतिष्ठतीति सूचयन् अखिलम् इति व्याचष्टे अपि चेदिति। यथेति। सुसमिद्धोऽभ्यासजातप्रतिपत्तिदार्ढ्यबन्धेन (K omits सु) ज्ञानाग्निर्भवति यथा तथा प्रयतनीयमिति भावः ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.37।।ज्ञाने सत्यपि धर्माधर्मयोरुपलम्भात्कुतस्ततो निवृत्तिरित्याशङ्क्य ज्ञानस्य धर्माधर्मनिवर्तकत्वं दृष्टान्तेन दर्शयितुमनन्तरश्लोकमवतारयति ज्ञानमिति। योग्यायोग्यविभागेन निवर्तकत्वानिवर्तकत्वविभागमुदाहरति यथेति। दृष्टान्तानुरूपं दार्ष्टान्तिकमाचष्टे ज्ञानाग्निरिति। योग्यविषयेऽपि दाहकत्वमग्नेरप्रतिबन्धापेक्षयेति विवक्षित्वा विशिनष्टि सम्यगिति। दार्ष्टान्तिकं व्याचष्टे ज्ञानमेवेति। ननु ज्ञानं साक्षादेव कर्मदाहकं किमिति नोच्यते निर्बीजीकरोति कर्मेति किमिति व्याख्यानमित्याशङ्क्याह नहीति। ज्ञानस्य स्वप्रमेयावरणाज्ञानापाकरणे सामर्थ्यस्य लोके दृष्टत्वादविक्रियब्रह्मात्मज्ञानमपि तदज्ञानं निवर्तयन् तज्जन्यकर्तृत्वभ्रमं कर्मबीजभूतं निवर्तयति। तन्निवृत्तौ च कर्माणि न स्थातुं पारयन्ति नतु साक्षात्कर्मणां निवर्तकं ज्ञानमज्ञानस्यैव निवर्तकमिति व्याप्तेस्तदनिवृत्तौ तु पुनरपि कर्मोद्भवसंभवादित्यर्थः। ज्ञानस्य साक्षात्कर्मनिवर्तकत्वाभावे फलितमाह तस्मादिति। सम्यग्ज्ञानं मूलभूताज्ञाननिवर्तनेन कर्मनिवर्तकमिष्टं चेदारब्धफलस्यापि कर्मणो निवृत्तिप्रसङ्गाज्ज्ञानोदयसमकालमेव शरीरपातः स्यादित्याशङ्क्याह सामर्थ्यादिति। ज्ञानोदयसमसमयमेव देहापोहे तत्त्वदर्शिभिरुपदिष्टं ज्ञानं फलवदिति भगवदभिप्रायस्य बाधितत्वप्रसङ्गादाचार्यलाभान्यथानुपपत्त्या प्रवृत्तफलकर्मसंपादकमज्ञानलेशं न नाशयति ज्ञानमित्यर्थः। कथं तर्हि प्रारब्धफलं कर्म नश्यतीत्याशङ्क्याह येनेति। तर्हि कथं ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्करोतीत्युक्तं तत्राह अत इति। ज्ञानादारब्धफलानां कर्मणां निवृत्त्यनुपपत्तेरनारब्धफलानि यानि कर्माणि पूर्वं ज्ञानोदयादस्मिन्नेव जन्मनि कृतानि ज्ञानेन च सह वर्तमानानि प्राचीनेषु चानेकेषु जन्मस्वर्जितानि तानि सर्वाणि ज्ञानं कारणनिवर्तनेन निवर्तयतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.37।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.37।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.37।।सम्यक् प्रवृद्ध अग्निः इन्धनसमुच्चयम् इव आत्मयाथात्म्यज्ञानरूपः अग्निः जीवात्मगतम् अनादिकालप्रवृत्तानेककर्मसञ्चयं भस्मीकरोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.37।। यथा एधांसि काष्ठानि समिद्धः सम्यक् इद्धः दीप्तः अग्निः भस्मसात् भस्मीभावं कुरुते हे अर्जुन ज्ञानमेव अग्निः ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात् कुरुते तथा निर्बीजीकरोतीत्यर्थः। न हि साक्षादेव ज्ञानाग्निः कर्माणि इन्धनवत् भस्मीकर्तुं शक्नोति। तस्मात् सम्यग्दर्शनं सर्वकर्मणां निर्बीजत्वे कारणम् इत्यभिप्रायः। सामर्थ्यात् येन कर्मणा शरीरम् आरब्धं तत् प्रवृत्तफलत्वात् उपभोगेनैव क्षीयते। अतो यानि अप्रवृत्तफलानि ज्ञानोत्पत्तेः प्राक् कृतानि ज्ञानसहभावीनि च अतीतानेकजन्मकृतानि च तान्येव सर्वाणि भस्मसात् कुरुते।।यतः एवम् अतः

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【 Verse 4.38 】

▸ Sanskrit Sloka: न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते | तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विन्दति ||

▸ Transliteration: na hi jñānena sadṛśaṁ pavitramiha vidyate | tatsvayaṁ yogasaṁsiddhah kālenātmani vindati ||

▸ Glossary: na: not; hi: certainly; jñānena: with knowledge; sadṛśaṁ: similar; pavitraṁ: pure; iha: here; vidyate: exists; tat: that; svayaṁ: himself; yoga: in devotion; saṁsiddhaḥ: purified; kālena: in course time; ātmani: within self; vindati: acquires.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.38 Truly, in this world, there is nothing as pure as wisdom. One who has matured to know this enjoys in himself in due course of time.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.38।।इस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भलीभाँति सिद्ध हो गया है वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपनेआपमें पा लेता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.38।। इस लोक में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निसंदेह कुछ भी नहीं है। योग में संसिद्ध पुरुष स्वयं ही उसे (उचित) काल में आत्मा में प्राप्त करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.38 न not? हि verily? ज्ञानेन to wisdom? सदृशम् like? पवित्रम् pure? इह here (in this world)? विद्यते is? तत् that? स्वयम् oneself? योगसंसिद्धः perfected in Yoga? कालेन in time? आत्मनि in the Self? विन्दति finds.Commentary There exists no purifier eal to knowledge of the Self. He who has attained perfection by the constant practice of Karma Yoga and Dhyana Yoga (the Yoga of meditation) will? after a time? find the knowledge of the Self in himself.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.38. In this world there exists no purifier comparabel to knowledge. One who becomes perfect in Yoga finds this, on his own accord, in his Self in course of time.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.38 There is nothing in the world so purifying as wisdom; and he who is a perfect saint finds that at last in his own Self.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.38 For there is no purifier here eal to knowledge; he that is perfected in Karma Yoga finds this (knowledge) of his own accord in himself in due time.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.38 Indeed, there is nothing purifying here comparable to Knowledge. One who has become perfected after a (long) time through yoga, realizes That by himself in his own heart.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.38 Verily, there is no purifier in this world like knowledge. He who is perfected in Yoga finds it in the Self in time.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.38 Na hi etc. There exists no purifier similar to the knowledge. The purity of other things is due to the touch of Consciousness and is not intrinsic. This point is not elaborated here for fear of a lengthy discussion. This purifying nature of the knowledge, one would understand for himself on reaching the stage of being perfectly enlightened.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.38 Nothing here in this world purifies like this knowledge; for the knowledge of the self destroys all evil. He who has reached perfection by practising Karma Yoga in its form of knowledge daily in the manner taught, in due time, of his own accord, attaints it, i.e., knowledge concerning his own self.

Sri Krsna expounds the same lucidly thus:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.38 Hi, indeed; na vidyate, there is nothing; pavitram, purifying, sanctifying; iha, here; sadrsam, comparable; jnanena, to Knowledge. Yoga-samsiddhah, one who has become perfected, who as attained fitness through yoga-the seeker after Liberation who has become samsiddhah, purified, qualified; yogena, through the yoga of Karma and the yoga of concentration-; kalena, after a long time; vindati, realizes, i.e. attains; tat, That, Knowledge; verily svayam, by himself; atmani, in his own heart. That means by which Knowledge is invariably attained is being taught:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.38।। जिस प्रकार पानी में डूबते हुए पुरुष के लिये जीवन रक्षक वस्तु के अलावा अन्य कोई भी वस्तु अधिक महत्व की नहीं हो सकती उसी प्रकार एक मोहित जीव के लिये इस ज्ञानार्जन से बढ़कर कोई सम्पत्ति नहीं होती।योग में संसिद्धि अर्थात् अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त पुरुष ही आत्मज्ञान को प्राप्त कर सकता है। इस चित्तशुद्धि के लिये ही बारह प्रकार के साधनरूप यज्ञों का वर्णन किया गया है। कोई भी गुरु अपने शिष्य को चित्तशुद्धि प्रदान नहीं कर सकते। उसके लिये शिष्य को ही प्रयत्न करना पड़ेगा। लोगों में मिथ्या धारणा फैली हुई हैं कि गुरु अपने स्पर्श मात्र से शिष्य को सिद्ध बना सकता है। यह असंभव है। अन्यथा अपने अत्यन्त प्रिय मित्र एवं शिष्य अर्जुन को स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण स्पर्शमात्र से ही सम्पूर्ण आध्यात्मिक ज्ञान करा सकते थे।अनेक साधक पुरुष गुरु की कुछ सेवा के प्रतिदान स्वरूप उनका अर्जित किया हुआ ज्ञान क्षणमात्र में प्राप्त करना चाहते हैं। ऐसी इच्छा करना जीवन के सुअवसरों को खोना ही है। कितने ही चेले ईश्वरत्व को सस्ते में खरीदने की प्रतीक्षा में जीवन के बहुमूल्य क्षणों को व्यर्थ खो रहे हैं यद्यपि इस देश में अनेक गुरु अपने आश्रमों में आध्यात्मिकता का विक्रय करते हैं परन्तु यहां साधकों को सावधान किया जाता है कि इस प्रकार के विक्रय के लिये शास्त्र का कोई आधार नहीं हैं। भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुन से स्पष्ट कहते हैं कि उसे स्वयं चित्तशुद्धि के लिये प्रयत्न करना होगा जिससे उचित समय में पारमार्थिक सत्य का वह साक्षात् अनुभव कर सकेगा।पूर्णत्व की प्राप्ति के लिये किसी निश्चित समय का यहां आश्वासन नहीं दिया गया है। केवल इतना ही कहा गया है कि जो पुरुष पूर्ण मनोयोग से पूर्व वर्णित यज्ञों का अनुष्ठान करेगा उसे आवश्यक आन्तरिक योग्यता प्राप्त होगी और फिर उचित समय में वह आत्मानुभव को प्राप्त करेगा। कालेन शब्द से यह बताया गया है कि यदि साधक अधिक प्रयत्न करे तो लक्ष्य प्राप्ति में उसे अधिक समय नहीं लगेगा। अत सभी साधकों को चाहिए कि वे इसके लिये निरन्तर प्रयत्न करते रहें।ज्ञानप्राप्ति का निश्चित साधन अगले श्लोक में बताते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.38।।यत एवमतो नहि ज्ञानेन तुल्यं पवित्रं पापनाशनं शुद्धिकरमिह दैवादियज्ञादौ विद्यते तस्य ज्ञानभिन्नस्याज्ञानानिवर्तकत्वेनात्यन्तशुद्धिकरत्वाभावात्। तर्हि किमन्यैर्यज्ञादिभिः मयाऽन्यैश्च ज्ञानमेव कुतो न संपाद्यमित्याशङ्क्याह। तत् ज्ञानं स्वयमेव योगेन निष्कामकर्मयोगेन समाधियोगेन च संसिद्धः संस्कृत योग्यतां प्राप्तः सन् मुमुक्षुर्महता कालेनात्मनि अखण्डात्मविषयं ज्ञानं विन्दति लभते। स्वयमेव स्वप्रयत्नेनैव योगसिद्धः स्वयमैव विन्दतीति वा। आत्मविषयसाक्षात्कारस्य स्वेनैव लभ्यत्वात्। गुर्वादेः परोक्षज्ञान एवोपयोगात्। यस्माद्योगसंसिद्धेरेवान्यैर्ज्ञानं लभ्यते तस्मात्त्वमपि तथाभूतः सन् तल्लभस्वेत्याशयः

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.38।।यस्मादेवं तस्मात् नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रं पावनं शुद्धिकरमन्यदिह वेदे लोकव्यवहारे वा विद्यते ज्ञानभिन्नस्याज्ञानानिवर्तकत्वेन समूलपापनिवर्तकत्वाभावात् कारणसद्भावेन पुनः पापोदयाच्च। ज्ञानेन त्वज्ञाननिवृत्त्या समूलपापनिवृत्तिरिति तत्सममन्यन्न विद्यते। तदात्मविषयं ज्ञानं सर्वेषां किमिति झटिति नोत्पद्यते तत्राह तज्ज्ञानं कालेन महता योगसंसिद्धो योगेन पूर्वोक्तकर्मयोगेन संसिद्धः संस्कृतो योग्यतामापन्नः स्वयमात्मन्यन्तःकरणे विन्दति लभते नतु योग्यतामापन्नोऽन्यदत्तं स्वनिष्ठतया न वा परनिष्ठं स्वीयतया विन्दतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.38।।नहीति। योगेन निष्कामकर्मानुष्ठानेन समाधियोगेन वा संसिद्धः संस्कृतो योग्यतामापन्नः। कालेनेति चिरप्रयत्नसाध्यत्वं ज्ञानस्योच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.38।।एवं ज्ञानस्य प्रतिबन्धनिरासकत्वमुक्त्वा स्वप्रापकत्वमाह न हीति। हीति निश्चयेन ज्ञानेन सदृशं इह साधनेषु पवित्रं न विद्यते। अतः योगसंसिद्धः कर्मयोगादिभिः सम्यक्प्रकारेण सिद्धो मत्तोषार्थं मदाज्ञया फलानभिलाषेण कृतकर्मयोगः तत् मत्स्वरूपात्मकं ज्ञानं कालेन अलौकिकेन तज्ज्ञानदानार्थमाविर्भूतेन आत्मनि स्वयं स्वात्मस्वरूपेण विन्दति जानातीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.38।।तत्र हेतुमाह नहीति। पवित्रं शुद्धिकरं इह तपोयोगादिषु मध्ये ज्ञानतुल्यं नास्त्येव। तर्हि सर्वेऽप्यात्मज्ञानमेव किं नाभ्यस्यन्तीत्यत आह तत्स्वयमिति सार्धेन। तदात्मविषयं ज्ञानं कालेन महता कर्मयोगेन संसिद्धो योग्यतां प्राप्तःसन्स्वयमेवानायासेन लभते नतु कर्मयोगं विनेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.38।।तत्र हेतुमाह नहीति। तपोध्यानादिषु मध्ये साङ्ख्ययोगैकार्थरूपज्ञानेन तुल्यं पवित्रं नास्ति यतस्तत्साङ्ख्यनिष्पन्नमपि योगे संसिद्धे एव कालानुगुण्येनात्मनि प्राप्नोति। कश्चित्तु साङ्ख्यज्ञानमेकं प्राप्नोति। योगं प्रतिपक्षीकरोति। च तथाऽन्योऽपि। मदुक्तानुसारेण तु विशेष्यैकविषयस्य साङ्ख्यस्य विशिष्टविशेष्यविषयकस्य योगस्य चैकार्थरूपं ब्रह्मज्ञानं मदनुगृहीतः प्राप्नोतीति स्वयमुक्तम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.38।।क्योंकि ज्ञानका इतना प्रभाव है इसलिये ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला शुद्ध करनेवाला इस लोकमें ( दूसरा कोई ) नहीं है। कर्मयोग या समाधियोगद्वारा बहुत कालमें भली प्रकार शुद्धान्तःकरण हुआ अर्थात् वैसी योग्यताको प्राप्त हुआ मुमुक्ष स्वयं अपने आत्मामें ही उस ज्ञानको पाता है यानी साक्षात् किया करता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.38।। व्याख्या   न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते यहाँ इह पद मनुष्यलोकका वाचक है क्योंकि सबकीसब पवित्रता इस मनुष्यलोकमें ही प्राप्त की जाती है।

Chapter 4 (Part 24)

पवित्रता प्राप्त करनेका अधिकार और अवसर मनुष्यशरीरमें ही है। ऐसा अधिकार किसी अन्य शरीरमें नहीं है। अलगअलग लोकोंके अधिकार भी मनुष्यलोकसे ही मिलते हैं।संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको माननेसे तथा उससे सुख लेनेकी इच्छासे ही सम्पूर्ण दोष पाप उत्पन्न होते हैं (गीता 3। 37)। तत्त्वज्ञान होनेपर जब संसारकी स्वतन्त्र सत्ता ही नहीं रहती तब सम्पूर्ण पापोंका सर्वथा नाश हो जाता है और महान् पवित्रता आ जाती है। इसलिये संसारमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला दूसरा कोई साधन है ही नहीं।संसारमें यज्ञ दान तप पूजा व्रत उपवास जप ध्यान प्राणायाम आदि जितने साधन हैं तथा गङ्गा यमुना गोदावरी आदि जितने तीर्थ हैं वे सभी मनुष्यके पापोंका नाश करके उसे पवित्र करनेवाले हैं। परन्तु उन सबमें भी तत्त्वज्ञानके समान पवित्र करनेवाला कोई भी साधन तीर्थ आदि नहीं है क्योंकि वे सब तत्त्वज्ञानके साधन हैं और तत्त्वज्ञान उन सबका साध्य है।परमात्मा पवित्रोंके भी पवित्र हैं पवित्राणां पवित्रम् (विष्णुसहस्र0 10)। उन्हीं परमपवित्र परमात्माका अनुभव करानेवाला होनेसे तत्त्वज्ञान भी अत्यन्त पवित्र है।योगसंसिद्धः जिसका कर्मयोग सिद्ध हो गया है अर्थात् कर्मयोगका अनुष्ठान साङ्गोपाङ्ग पूर्ण हो गया है उस महापुरुषको यहाँ योगसंसिद्धः कहा गया है छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें उसीको योगारूढः कहा गया है। योगारूढ़ होना कर्मयोगकी अन्तिम अवस्था है। योगारूढ़ होते ही तत्त्वबोध हो जाता है। तत्त्वबोध हो जानेपर संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है।कर्मयोगकी मुख्य बात है अपना कुछ भी न मानकर सम्पूर्ण कर्म संसारके हितके लिये करना अपने लिये कुछ भी न करना। ऐसा करनेपर सामग्री और क्रियाशक्ति दोनोंका प्रवाह संसारकी सेवामें हो जाता है। संसारकी सेवामें प्रवाह होनेपर मैं सेवक हूँ ऐसा (अहम्का) भाव भी नहीं रहता अर्थात् सेवक नहीं रहता केवल सेवा रह जाती है। इस प्रकार जब सेवक सेवा बनकर सेव्यमें लीन हो जाता है तब प्रकृतिके कार्य शरीर तथा संसारसे सर्वथा वियोग (सम्बन्धविच्छेद) हो जाता है। वियोग होनेपर संसारकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रह जाती केवल क्रिया रह जाती है। इसीको योगकी संसिद्धि अर्थात् सम्यक् सिद्धि कहते हैं।कर्म और फलकी आसक्तिसे ही योग का अनुभव नहीं होता। वास्तवमें कर्मों और पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेद स्वतःसिद्ध है। कारण कि कर्म और पदार्थ तो अनित्य (आदिअन्तवाले) हैं और अपना स्वरूप नित्य है। अनित्य कर्मोंसे नित्य स्वरूपको क्या मिल सकता है इसलिये स्वरूपको कर्मोंके द्वारा कुछ नहीं पाना है यह कर्मविज्ञान है। कर्मविज्ञानका अनुभव होनेपर कर्मफलसे भी सम्बन्धविच्छेद हो जाता है अर्थात् कर्मजन्य सुख लेनेकी आसक्ति सर्वथा मिट जाती है जिसके मिटते ही परमात्माके साथ अपने स्वाभाविक नित्यसम्बन्धका अनुभव हो जाता है जो योगविज्ञान है। योगविज्ञानका अनुभव होना ही योगकी संसिद्धि है।तत्स्वयं कालेनात्मनि विन्दति जिस तत्त्वज्ञानसे सम्पूर्ण कर्म भस्म हो जाते हैं और जिसके समान पवित्र करनेवाला संसारमें दूसरा कोई साधन नहीं है उसी तत्त्वज्ञानको कर्मयोगी योगसंसिद्ध होनेपर दूसरे किसी साधनके बिना स्वयं अपनेआपमें ही तत्काल प्राप्त कर लेता है।चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने बताया था कि प्रचलित प्रणालीके अनुसार कर्मोंका त्याग करके गुरुके पास जानेपर वे तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानम्। किंतु गुरु तो उपदेश दे देंगे पर उससे तत्त्वज्ञान हो ही जायगा ऐसा निश्चित नहीं है। फिर भी भगवान् यहाँ बताते हैं कि कर्मयोगकी प्रणालीसे कर्म करनेवाले मनुष्यको योगसंसिद्धि मिल जानेपर तत्त्वज्ञान हो ही जाता है।उपर्युक्त पदोंमें आया कालेन पद विशेष ध्यान देनेयोग्य है। भगवान्ने व्याकरणकी दृष्टिसे कालेन पद तृतीयामें प्रयुक्त करके यह बताया है कि कर्मयोगसे अवश्य ही तत्त्वज्ञान अथवा परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है (टिप्पणी प0 268)।स्वयम् पद देनेका तात्पर्य यह है कि तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेके लिये कर्मयोगीको किसी गुरुकी ग्रन्थकी या दूसरे किसी साधनकी अपेक्षा नहीं है। कर्मयोगकी विधिसे कर्तव्यकर्म करते हुए ही उसे अपनेआप तत्त्वज्ञान प्राप्त हो जायगा।आत्मनि विन्दति पदोंका तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञानको प्राप्त करनेके लिये कर्मयोगीको किसी दूसरी जगह जानेकी जरूरत नहीं है। कर्मयोग सिद्ध होनेपर उसे अपनेआपमें ही स्वतःसिद्ध तत्त्वज्ञानका अनुभव हो जाता है।परमात्मा सब जगह परिपूर्ण होनेसे अपनेमें भी हैं। जहाँ साधक मैं हूँ रूपसे अपनेआपको मानता है वहीं परमात्मा विराजमान हैं परन्तु परमात्मासे विमुख होकर संसारसे अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण अपनेआपमें स्थित परमात्माका अनुभव नहीं होता। कर्मयोगका ठीकठीक अनुष्ठान करनेसे जब संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है अर्थात् संसारसे तादात्म्य ममता और कामना मिट जाती है तब उसे अपनेआपमें ही तत्त्वका सुखपूर्वक अनुभव हो जाता है निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते (गीता 5। 3)।परमात्मतत्त्वका ज्ञान करणनिरपेक्ष है। इसलिये उसका अनुभव अपनेआपसे ही हो सकता है इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि करणोंसे नहीं। साधक किसी भी उपायसे तत्त्वको जाननेका प्रयत्न क्यों न करे पर अन्तमें वह अपनेआपसे ही तत्त्वको जानेगा। श्रवणमनन आदि साधन तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेमें असम्भावना विपरीत भावना आदि ज्ञानकी बाधाओंको दूर करनेवाले परम्परागत साधन माने जा सकते हैं पर वास्तविक बोध अपनेआपसे ही होता है कारण कि मन बुद्धि आदि सब जड हैं। जडके द्वारा उस चिन्मय तत्त्वको कैसे जाना जा सकता है जो जडसे सर्वथा अतीत है वास्तवमें तत्त्वका अनुभव जडके सम्बन्धविच्छेदसे होता है जडके द्वारा नहीं। जैसे आँखोंसे संसारको तो देखा जा सकता है पर आँखोंसे आँखोंको नहीं देखा जा सकता परन्तु यह कहा जा सकता है कि जिससे देखते हैं वही आँख है। इसी प्रकार जो सबको जाननेवाला है उसे किसके द्वारा जाना जा सकता है विज्ञातारमरे केन विजानीयात् (बृहदारण्यक0 2। 4। 14) परन्तु जिससे सम्पूर्ण वस्तुओंका ज्ञान होता है वही परमात्मतत्त्व है।विशेष बातइस अध्यायके तैंतीसवेंसे सैंतीसवें श्लोकतक भगवान्ने ज्ञानकी जो प्रशंसा की है उससे ज्ञानयोगकी विशेष महिमा झलकती है परन्तु वास्तवमें उसे ज्ञानयोगकी ही महिमा मान लेना उचित प्रतीत नहीं होता। गहरा विचार करें तो इसमें अर्जुनके प्रति भगवान्का एक गूढ़ अभिप्राय प्रतीत होता है कि जो तत्त्वज्ञान इतना महान् और पवित्र है तथा जिस ज्ञानको प्राप्त करनेके लिये मैं तुझे तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जानेकी आज्ञा दे रहा हूँ उस ज्ञानको तू स्वयं कर्मयोगके द्वारा अवश्यमेव प्राप्त कर सकता है तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति (गीता 4। 38)। इस प्रकार ज्ञानयोगकी प्रशंसाके ये श्लोक वास्तवमें प्रकारान्तरसे कर्मयोगकी ही विशेषता महिमा बतानेके लिये हैं। भगवान्का अभिप्राय यह नहीं था कि अर्जुन ज्ञानियोंके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करे। भगवान्का अभिप्राय यह था कि जो ज्ञान इतनी दुर्लभतासे ज्ञानियोंके पास रहकर उनकी सेवा करके और विनयपूर्वक प्रश्नोत्तर करके तथा उसके अनुसार श्रवण मनन और निदिध्यासन करके प्राप्त करेगा वही ज्ञान तुझे कर्मयोगकी विधिसे प्राप्त कर्तव्य(युद्ध) का पालन करनेसे ही प्राप्त हो जायगा। जिस तत्त्वज्ञानके लिये मैंने तत्त्वदर्शी महापुरुषोंके पास जानेकी प्रेरणा की है वह तत्त्वज्ञान प्राप्त हो ही जायगा यह निश्चित नहीं है क्योंकि जिस पुरुषके पास जाओगे वह तत्त्वदर्शी ही है इसका क्या पता और उस महापुरुषके प्रति श्रद्धाकी कमी भी रह सकती है। दूसरी बात इस प्रक्रियामें पहले सम्पूर्ण प्राणियोंको अपनेमें देखेगा और उसके बाद सम्पूर्ण प्राणियोंको एक परमात्मतत्त्वमें देखेगा (गीता 4। 35)। इस प्रकार ज्ञान प्राप्त करनेकी इस प्रक्रियामें संशय तथा विलम्बकी सम्भावना है। परन्तु कर्मयोगके द्वारा अन्य पुरुषकी अपेक्षाके बिना अवश्यमेव और तत्काल उस तत्त्वज्ञानका अनुभव हो जाता है। इसलिये मैं तेरे लिये कर्मयोगको ही ठीक समझता हूँ अतः तुझे प्रचलित प्रणालीके ज्ञानका उपदेश मैं नहीं दूँगा।भगवान् तो महापुरुषोंके भी महापुरुष हैं। अतः वे अर्जुनको किसी दूसरे महापुरुषके पास जाकर ज्ञान सीखनेके लिये कैसे कह सकते हैं आगे इसी अध्यायके इकतालीसवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगकी प्रशंसा करके बयालीसवें श्लोकमें अर्जुनको समतामें स्थित होकर युद्ध करनेकी स्पष्टरूपसे आज्ञा दी है। सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके श्लोकमें ज्ञानप्राप्तिके पात्रका निरूपण करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.38।।नहीति। पवित्रं हि ज्ञानसमं नास्ति। अन्यस्य संवृद्ध्या (K ( n ) संवृत्या) पवित्रत्वं न वस्तुत इत्यतिप्रसंगभयात् न प्रताय्यते। पवित्रत्वं (S K पवित्रताम्) चास्य स्वयं ज्ञास्यतीति सुबुद्धतायाम्(S स्वप्रबुद्धतायाम्)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.38।।नन्वन्येनैव परिशुद्धिकरेण केनचिदश्वमेधादिना परमपुरुषार्थसिद्धेरलमात्मज्ञानेनेत्याशङ्क्याह यत इति। पूर्वोक्तेन प्रकारेण ज्ञानमाहात्म्यं यतः सिद्धमतस्तेन ज्ञानेन तुल्यं परिशुद्धिकरं परमपुरुषार्थौपयिकमिह व्यवहारभूमौ नास्तीत्यर्थः। तत्पुनरात्मविषयं ज्ञानं सर्वेषां किमिति झटिति नोत्पद्यते तत्राह तत्स्वयमिति। महता कालेन यथोक्तेन साधनेन योग्यतामापन्नस्तदधिकृतः स्वयं तदात्मनि ज्ञानं विन्दतीति योजना। सर्वेषां झटिति ज्ञानानुदयो योग्यतावैधुर्यादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.38 4.39।।उत्तरस्य श्लोकत्रयस्य सङ्कीर्णार्थत्वादेकोक्त्यैव तात्पर्यमुक्त्वा तस्मादिति चतुर्थस्य प्रतिपाद्यमाह तदिति। तस्य ज्ञानस्य साधनमन्तरङ्गं श्रद्धादिकम्। विरोध्यज्ञानादिकं ज्ञानस्य फलं परमशान्त्यादिकम्। विरोधिनः फलं विनाशादिकमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.38 4.39।।तत्साधनं विरोधिफलं च तदुत्तरैरुक्त्वोपसंहरति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.38।।यस्माद् आत्मज्ञानेन सदृशं पवित्रं शुद्धिकरम् इह जगति वस्त्वन्तरं न विद्यते तस्मादात्मज्ञानं सर्वं पापं नाशयति इत्यर्थः। तत् तथाविधं ज्ञानं यथोपदेशमहरहरनुष्ठीयमानं ज्ञानाकारकर्मयोगेन संसिद्धः कालेन स्वात्मनि स्वयमेव लभते।तद् एव स्पष्टम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.38।। न हि ज्ञानेन सदृशं तुल्यं पवित्रं पावनं शुद्धिकरम् इह विद्यते। तत् ज्ञानं स्वयमेव योगसंसिद्धः योगेन कर्मयोगेन समाधियोगेन च संसिद्धः संस्कृतः योग्यताम् आपन्नः सन् मुमुक्षुः कालेन महता आत्मनि विन्दति लभते इत्यर्थः।।येन एकान्तेन ज्ञानप्राप्तिः भवति स उपायः उपदिश्यते

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【 Verse 4.39 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्पर: संयतेन्द्रिय: | ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ||

▸ Transliteration: śraddhāvāllabhate jñānaṁ tatparaḥ saṁyatendriyaḥ | jñānaṁ labdhvā parāṁ śāntimacireṇādhigacchati ||

▸ Glossary: śraddhāvān: faithful person; labhate: achieves; jñānaṁ: knowledge; tatparaḥ: attached; saṁyata: controlled; indriyaḥ: senses; jñānaṁ: knowledge; labdh- vā: having achieved; parāṁ: supreme; śāntiṁ: peace; acireṇa: without delay; adhigacchati: attains

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.39 A person with śraddhā (courageous faith) achieves wisdom and has control over the senses. Achieving wisdom, without delay, he attains supreme peace.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.39।।जो जितेन्द्रिय तथा साधनपरायण है ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.39।। श्रद्धावान् तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष ज्ञान प्राप्त करता है। ज्ञान को प्राप्त करके शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.39 श्रद्धावान् the man of faith? लभते obtains? ज्ञानम् knowledge? तत्परः devoted? संयतेन्द्रियः who has subdued the senses? ज्ञानम् knowledge? लब्ध्वा having obtained? पराम् supreme? शान्तिम् to peace? अचिरेण at once? अधिगच्छति attains.Commentary He who is full of faith? who constantly serves his Guru and hears his teachings? who has subdued the senses surely gets the knowledge and ickly attains the supreme peace or salvation (Moksha). All the above three alifications are indispensable for an aspirant if he wants to attain to the supreme peace of the Eternal ickly. One alifiaction alone will not suffice. (Cf.X.10?11)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.39. He, who has faith, gains knowledge, if he is solely intending upon it and has his sense-organs well-controlled; having gained the knowledge, he attains, before long, the Peace Supreme.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.39 He who is full of faith attains wisdom, and he too who can control his senses, having attained that wisdom, he shall ere long attain Supreme Peace.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.39 He who has faith, who is intent on it, and who has mastered his senses, attains knowledge. Having attained knowledge, he goes soon to supreme peace.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.39 The man who has faith, is diligent and has control over the organs, attains Knowledge. Achieving Knowledge, one soon attains supreme Peace.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.39 The man who is full of faith, who is devoted to it, and who has subdued the senses obtains (this) knowledge; and having obtained the knowledge he attains at once to the supreme peace.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.39 See Comment under 4.40

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.39 After attaining knowledge through instruction in the manner described, he must have firm faith in it and the possibility of its development into ripe knowledge. He must be intent on it, i.e., his mind must be focussed thereupon. He must control his senses and keep them away from all their objects. Soon will he then reach the aforesaid state of maturity and obtain knowledge. Soon after attaining such kind of knowledge, he will reach supreme peace, i.e., he attains the supreme Nirvana (realisation of the self).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.39 Sraddhavan, the man who has faith; labhate, attains; jnanam, Knowledge. Even when one has faith, he may be indolent. Therefore the Lord says, tatparah, who is diligent, steadfast in the service of the teacher, etc., which are the means of attaining Knowledge. Even when one has faith and is diligent, one may not have control over the organs. Hence the Lord says, samyata-indriyah, who has control over the organs-he whose organs (indriyani) have been withdrawn (samyata) from objects. He who is such, who is full of faith, diligent, and has control over the organs, does surely attain Knowledge. However, prostrations etc., which are external, are not invariably fruitful, for there is scope for dissimulation faith etc. But this is not so in the case of one possessing faith etc. Hence they are the unfailing means of acquiring Knowledge. What, again, will result from gaining Knowledge? This is being answered: Labdhva, achieving; jnanam, Knowledge; adhigacchati, one attains; acirena, soon indeed; param, supreme; santim, Peace, supreme detachment called Liberation. That Liberation soon follows from full Knowledge is a fact well ascertained from all the scriptures and reasoning. One should not entertain any doubt in this matter. For doubt is the most vicious thing. Why? The answer is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.39।। योग्यता के बिना किसी भी लक्ष्य की प्रप्ति नहीं होती। इस श्लोक में वर्णित आवश्यक गुणों को समझने से यह भी स्पष्ट हो जायेगा कि अनेक वर्षों तक साधना करने पर भी कुछ साधक लक्ष्य तक क्यों नहीं पहुँच पाते हैं। श्रद्धा तत्परता (भक्ति) तथा इंद्रिय संयम ये वे तीन अत्यावश्यक गुण हैं जिनके द्वारा जीवत्व के बन्धनों से मुक्त होकर हम देवत्व को प्राप्त करने की आशा कर सकते हैं। परन्तु इन तीनों शब्दों के अर्थों के विषय में अनेक विपरीत धारणायें फैल गयी हैं।श्रद्धा अनेक पाखण्डी गुरु लोगों की धार्मिक भावनाओं का अनुचित लाभ उठाते हुये श्रद्धा शब्द की आड़ में विपुल धन अर्जित करते हैं। श्रद्धा शब्द का अर्थ अन्धविश्वास करके सामान्य भक्त जनों के बौद्धिक एवं मानसिक विकास की सर्वथा उपेक्षा कर दी जाती है। श्रद्धा का अर्थ यह नहीं है कि दैवी माने जाने वाली किसी घोषणा को बिना सोचे समझे वैसे ही स्वीकार कर लिया जाय।श्री शंकराचार्य के अनुसार श्रद्धा वह है जिसके द्वारा मनुष्य शास्त्र एवं आचार्य द्वारा दिये गये उपदेश से तत्त्व का यथावत् ज्ञान प्राप्त कर सकता है।तत्पर आत्मविकास के किसी भी मार्ग पर अग्रसर साधक के लिये आवश्यक है कि वह उस मार्ग की ओर पूर्ण ध्यान दे तथा मन में ईश्वर का स्मरण रखे। शास्त्रों का केवल बौद्धिक अध्ययन हमें अन्तकरण शुद्धि प्रदान नहीं कर सकता। मन और बुद्धि को संगठित करके उपनिषदों में उपदिष्ट जीवन जीना चाहिये।जितेन्द्रिय आत्मसंयम के बिना श्रद्धा और ज्ञान में दृढ़ता आनी कठिन है। इन्द्रियां ही हमें विषयों की ओर आकर्षित करके खींच ले जाती हैं। एक बार वैषयिक उपभोगों में आसक्त हो जाने पर जीवन के उच्च मूल्यों को बनाये रखना संभव नहीं होता। दिव्य मार्ग पर चलने का अर्थ है विषयोपभोग की नालियों से बाहर निकल जाना। ये दोनों प्रकार के जीवन परस्पर विरोधी हैं। एक की उपस्थिति में दूसरे का अभाव होता है। जहाँ हृदय में शान्ति के प्रकाश का उदय हुआ वहाँ वैषयिक और पाशविक प्रवृत्तियों से उत्पन्न क्षोभ का अन्धकार नष्ट हो जाता है अस्तु साधक के लिये आत्मसंयम का जीवन अनिवार्य हो जाता है।विषय सुख का त्याग कर स्वयं में तथा शास्त्रों में विश्वास रखते हुए दिव्य लक्ष्य को ही प्राप्त करने का प्रयत्न क्यों करना चाहिये साधना की प्रारम्भिक अवस्था में साधक बुद्धि के स्तर पर ही रहता है और बुद्धि का कार्य प्रत्येक वस्तु के कारण की खोज करना है। स्वाभाविक है कि विचारशील पुरुष के मन में प्रश्न उठेगा कि आखिर विषय सुख के त्य़ाग का फल क्या होगा दूसरी पंक्ति में इसका उत्तर दिया गया है।उपनिषदों के मन्त्रद्रष्टा ऋषियों का यह निश्चयात्मक आश्वासन है कि श्रद्धावान तत्पर और जितेन्द्रिय पुरुष आत्मज्ञान को प्राप्त करता है। यहां भगवान् कहते हैं कि इस ज्ञान का फल है परम शान्ति। पूर्व श्लोक के समान यहां भी इस शान्ति को प्राप्त करने का निश्चित समय नहीं बताया गया क्योंकि वह साधक के प्रयत्न पर निर्भर करता है। परन्तु यह निश्चित है कि ज्ञान को प्राप्त कर शीघ्र ही वह परम शान्ति को प्राप्त होता है।परमशान्ति परम का अर्थ है अनन्त। अत परम शान्ति वह है जो कभी क्षीण नहीं होती। आज के युग में जहां शान्ति के नाम पर युद्ध होते रहते हैं वहां इस श्लोक में निर्दिष्ट शान्ति को भी कोई व्यक्ति शंका की दृष्टि से देखे तो कोई आश्चर्य नहीं। समयसमय पर शान्ति वार्ता करने वाले राजनीतिज्ञों की यह शान्ति नहीं है वरन् मनोविज्ञान की दृष्टि से इसका गंभीर अर्थ है।यह एक सुविदित तथ्य है कि प्रत्येक प्राणी जीवन पर्यन्त प्रति क्षण अधिकाधिक सुख प्राप्त करने का प्रयत्न करता रहता है। श्वसन तथा भोजन से लेकर युद्ध और नाश के द्वारा सम्पूर्ण विश्व पर आधिपत्य स्थापित करने के सुनियोजित प्रयत्नों तक प्रत्येक मनुष्य का ध्येय सुख प्राप्ति ही है। केवल मनुष्य ही नहीं बल्कि पशु एवं वनस्पति भी इसी के लिये कार्यरत रहते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि सुख प्राप्ति की आन्तरिक प्रेरणा के बिना कोई भी कर्म संभव नहीं हो सकता।इस प्रकार यदि जगत् में सभी प्राणी अधिकसेअधिक सुख पाने तथा उसके रक्षण के लिये प्रयत्नशील रहते हैं तब जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य शाश्वत सुख अनन्त आनन्द ही होना चाहिये ऐसा आनन्द कि जहां सब संघर्ष समाप्त हो जाते हैं सब इच्छाएं पूर्ण हो जाती हैं और मन के सभी विक्षेपों का सदा के लिये अन्त हो जाता है। सुख की कामना के कारण ही मन में विक्षेप उत्पन्न होते हैं तथा मनुष्य शरीर द्वारा बाह्य जगत् में कर्म करता है। पारमार्थिक शाश्वत आनन्द के प्राप्त होने पर मन के विक्षेप तथा शारीरिक शिथिलता दोनों का ही कष्ट समाप्त हो जाता है। इसलिये परम शान्ति का अर्थ है परम आनन्द। यही हमारे जीवन का वास्तविक लक्ष्य है।इस विषय में संशय नहीं करना चाहिये क्योंकि संशय बड़ा पापिष्ठ है। कैसे सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.39।।योगेन योग्यतामापन्नस्य येनैकान्तेन तत्त्वज्ञानं भवति तमुपायमाह श्रद्धावानिति। गुरुवेदान्तवाक्येष्विदमित्थमित्यास्तिक्यं श्रद्धा तद्वान्। तत्रापि तत्परः गुरुपासनादावभियुक्तः। तत्रापि संयतानि विषयेभ्यो निवर्तितानि इन्द्रियाणि येन सः। एवं विशेषणत्रयविशिष्टश्चेदवश्यं ज्ञानं लभते। प्रणिपातादेर्माययापि संभवेन नैकान्तिकत्वमेतेषां न तथात्वमत एकान्तिकं ज्ञानं लब्धवा किं स्यादत आह। ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिं मोक्षाभिधामचिरेण जन्मान्तरं लोकान्तरगमनं च विनैवाधिगच्छति प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.39।।येनैकान्तेन ज्ञानप्राप्तिर्भवति स उपायः पूर्वोक्तप्रणिपाताद्यपेक्षयाप्यासन्नतर उच्यते। गुरुवेदान्तवाक्येष्विदमित्थमेवेति प्रमारूपास्तिक्यबुद्धिः श्रद्धा तद्वान्पुरुषो लभते ज्ञानम्। एतादृशोऽपि कश्चिदलसः स्यात्तत्राह तत्परः गुरूपासनादौ ज्ञानोपायेऽत्यन्ताभियुक्तः। श्रद्धावांस्तत्परोऽपि कश्चिदजितेन्द्रियः स्यादत आह संयतानि विषयेभ्यो निवर्तितानीन्द्रियाणि येन स संयतेन्द्रियः। य एवं विशेषणत्रययुक्तः सोऽवश्यं ज्ञानं लभते। प्रणिपातादिस्तु बाह्यो मायावित्वादिसंभवादनैकान्तिकोऽपि। श्रद्धावत्त्वादिस्त्वैकान्तिक उपाय इत्यर्थः। ईदृशेनोपायेन ज्ञानं लब्ध्वा परां चरमां शान्तिमविद्यातत्कार्यनिवृत्तिरूपां मुक्तिमचिरेण तदव्यवधानेनैवाधिगच्छति लभते। यथाहि दीपः स्वोत्पत्तिमात्रेणैवान्धकारनिवृत्तिं करोति नतु कंचित्सहकारिणमपेक्षते तथा ज्ञानमपि स्वोत्पत्तिमात्रेणैवाज्ञाननिवृत्तिं करोति नतु किंचित्प्रसंख्यानादिकमपेक्षत इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.39।।श्रद्धावान् ज्ञानं लभते। श्रद्धावानपि मन्दप्रयत्नो माभूदत आह तत्पर इति। तत्परोऽप्यजितेन्द्रियो माभूदत आह संयतेन्द्रिय इति। परां शान्तिं विदेहकैवल्यम्। अचिरेण प्रारब्धकर्मसमाप्तौ सत्याम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.39।।तत्कालज्ञानं सूक्ष्मत्वान्न भवतीति निरन्तरं तत्परः सन् जितेन्द्रियस्तिष्ठेत् तेन तत्प्राप्तिः स्यादित्याह श्रद्धावानिति। श्रद्धावान् श्रद्धायुक्तः पूर्वोक्तप्रकारकगुरुसेवादौ तत्परस्तन्निष्ठः गुरुनिष्ठो ज्ञाननिष्ठो वा संयतेन्द्रियः वशीकृतेन्द्रियः निवृत्तविषयो यः स ज्ञानं लभते प्राप्नोति। ततो ज्ञानं लब्ध्वा अचिरेण शीघ्रमेव परांशान्तिं मद्भक्तिं अधिगच्छति प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.39।।किंच श्रद्धावानिति। श्रद्धावान् गुरूपदिष्टेऽर्थे आस्तिक्यबुद्धिमान्। तत्परस्तदेकनिष्ठः। संयतेन्द्रियश्च तज्ज्ञानं लभते नान्यः। अतः श्रद्धादिसंपत्त्या ज्ञानलाभात्प्राक्कर्मयोग एव शुद्ध्यर्थमनुष्ठेयः। ज्ञानलाभानन्तरं तु न तस्य किंचित्कृत्यमस्तीत्याह। ज्ञानं लब्ध्वा त्वचिरेण परां शान्तिं मोक्षं प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.39।।तादृशज्ञानदाने गुरूणां परीक्ष्ये शिष्ये श्रद्धैवेति तामभिमुखीकरोति श्रद्धावानिति। शान्तिं चित्तोपशमम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.39।।जिसके द्वारा निश्चय ही ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है वह उपाय बतलाया जाता है श्रद्धावान् श्रद्धालु मनुष्य ज्ञान प्राप्त किया करता है। श्रद्धालु होकर भी तो कोई मन्द प्रयत्नवाला हो सकता है इसलिये कहते हैं कि तत्पर अर्थात् ज्ञानप्राप्तिके गुरुशुश्रूषादि उपायोंमें जो अच्छी प्रकार लगा हुआ हो। श्रद्धावान् और तत्पर होकर भी कोई अजितेन्द्रिय हो सकता है इसलिये कहते हैं कि संयतेन्द्रिय भी होनाचाहिये। जिसकी इन्द्रियाँ वशमें की हुई हों यानी विषयोंसे निवृत्त कर ली गयी हों वह संयतेन्द्रिय कहलाता है। जो इस प्रकार श्रद्धावान् तत्पर और संयतेन्द्रिय भी होता है वह अवश्य ही ज्ञानको प्राप्त कर लेता है। जो दण्डवत्प्रणामादि उपाय हैं वे तो बाह्य हैं और कपटी मनुष्यद्वारा भी किये जा सकते हैं इसलिये वे ( ज्ञानरूप फल उत्पन्न करनेमें ) अनिश्चित भी हो सकते हैं। परंतु श्रद्धालुता आदि उपायोंमें कपट नहीं चल सकता इसलिये ये निश्चयरूपसे ज्ञानप्राप्तिके उपाय हैं। ज्ञानप्राप्तिसे क्या होगा सो ( उत्तरार्धमें ) कहते हैं ज्ञानको प्राप्त होकर मनुष्य मोक्षरूप परम शान्तिको यानी उपरामताको बहुत शीघ्रतत्काल ही प्राप्त हो जाता है। यथार्थ ज्ञानसे तुरंत ही मोक्ष हो जाता है यह सब शास्त्रों और युक्तियोंसे सिद्ध सुनिश्चित बात है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.39।। व्याख्या   तत्परः संयतेन्द्रियः इस श्लोकमें श्रद्धावान् पुरुषको ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयीहै। अपनेमें श्रद्धा कम होनेपर भी मनुष्य भूलसे अपनेको अधिक श्रद्धावाला मान सकता है इसलिये भगवान्ने श्रद्धाकी पहचानके लिये दो विशेषण दिये हैं संयतेन्द्रियः और तत्परः।जिसकी इन्द्रियाँ पूर्णतया वशमें हैं वह संयतेन्द्रियः है और जो अपने साधनमें तत्परतापूर्वक लगा हुआ है वह तत्परः है। साधनमें तत्परताकी कसौटी है इन्द्रियोंका संयत होना। अगर इन्द्रियाँ संयत नहीं हैं और विषयभोगोंकी तरफ जाती हैं तो साधनपरायणतामें कमी समझनी चाहिये।श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम् परमात्मामें महापुरुषोंमें धर्ममें और शास्त्रोंमें प्रत्यक्षकी तरह आदरपूर्वक विश्वास होना श्रद्धा कहलाती है।जबतक परमात्मतत्त्वका अनुभव न हो तबतक परमात्मामें प्रत्यक्षसे भी बढ़कर विश्वास होना चाहिये। वास्तवमें परमात्मासे देश काल आदिकी दूरी नहीं है केवल मानी हुई दूरी है। दूरी माननेके कारण ही परमात्मा सर्वत्र विद्यमान रहते हुए भी अनुभवमें नहीं आ रहे हैं। इसलिये परमात्मा अपनेमें हैं ऐसा मान लेनेका नाम ही श्रद्धा है। कैसा ही व्यक्ति क्यों न हो अगर वह एकमात्र परमात्माको प्राप्त करना चाहता है और परमात्मा अपनेमें हैं ऐसी श्रद्धावाला है तो उसे अवश्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान हो जाता है।संसार प्रतिक्षण ही जा रहा है एक क्षण भी टिकता नहीं। उसकी स्वतन्त्र सत्ता है ही नहीं। केवल परमात्माकी सत्तासे ही वह सत्तावान् दीख रहा है। इस तरह संसारकी स्वतन्त्र सत्ताको न मानकर एक परमात्माकी सत्ताको ही मानना श्रद्धा है। ऐसी श्रद्धा होनेपर तत्काल ज्ञान हो जाता है।जबतक इन्द्रियाँ संयत न हों और साधनमें तत्परता न हो तबतक श्रद्धामें कमी समझनी चाहिये। यदि इन्द्रियाँ विषयोंकी तरफ जाती हैं तो साधनमें तत्परता नहीं आती। साधनमें तत्परता न होनेसे दूसरेकी परायणता दूसरेका आदर होता है। जबतक साधनपरायणता नहीं होती तबतक श्रद्धा भी पूरी नहीं होती। श्रद्धा पूरी न होनेके कारण ही तत्त्वके अनुभवमें देरी लगती है नहीं तो नित्यप्राप्त तत्त्वके अनुभवमें देरीका कारण है ही नहीं।इसी अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भगवान्ने गुरुके पास जाकर विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रणालीका वर्णन करते हुए तीन साधन बताये प्रणिपात परिप्रश्न और सेवा। यहाँ भगवान्ने ज्ञान प्राप्त करनेका एक साधन बताया है श्रद्धा। चौंतीसवें श्लोकमें उपदेक्ष्यन्ति पदसे गुरुके द्वारा केवल ज्ञानका उपदेश देनेकी बात आयी है उपदेशसे ज्ञान प्राप्त हो जायगा ऐसी बात वहाँ नहीं आयी। परन्तु इस श्लोकमें लभते पदसे ज्ञान प्राप्त होनेकी बात आयी है। तात्पर्य यह है कि चौंतीसवें श्लोकमें कहे साधनोंसे ज्ञान प्राप्त हो जायगा ऐसा निश्चित नहीं है परन्तु इस श्लोकमें कहे साधनसे निश्चितरूपसे ज्ञान प्राप्त हो जाता है। कारण यह है कि चौंतीसवें श्लोकमें कहे साधन बहिरङ्ग होनेसे कपटभावसे तथा साधारणभावसे भी किये जा सकते हैं परन्तु इस श्लोकमें कहा साधन अन्तरङ्ग होनेसे कपटभावसे तथा साधारण भावसे नहीं किया जा सकता (गीता 17। 3)। इसलिये ज्ञानकी प्राप्तिमें श्रद्धा मुख्य है।ऐसा एक तत्त्व या बोध है जिसका अनुभव मेरेको हो सकता है और अभी हो सकता है यही वास्तवमें श्रद्धा है। तत्त्व भी विद्यमान है मैं भी विद्यमान हूँ और तत्त्वका अनुभव करना भी चाहता हूँ फिर देरी किस बातकीविशेष बातबड़े आश्चर्यकी बात है कि जो नित्यनिरन्तर विद्यमान रहता है वह तो प्रिय नहीं लगता और जो निरन्तर हीबदल रहा है जा रहा है वह संसार प्रिय लगता है इसमें कारण यही है कि जिस संसारकी एक क्षण भी स्थिति नहीं है जो निरन्तर ही अभावमें जा रहा है उसे हम स्थायी मान लेते हैं। स्थायी माननेके कारण ही उससे स्थायी सुख लेना चाहते हैं जो सर्वथा असम्भव है।सुख लेनेके लिये हम संसारमें अपनापन कर लेते हैं जो किसी भी कालमें अपना नहीं है। अपनी वस्तु वही है जो हमसे कभी अलग नहीं होती और जिससे हम कभी अलग नहीं होते। यदि संसार अपना होता तो प्रत्येक परिस्थिति हमारे साथ रहती। परन्तु न तो परिस्थिति हमारे साथ रहती है और न हम ही परिस्थितिके साथ रहते हैं। इसलिये वह अपनी है ही नहीं। जिन अन्तःकरण और इन्द्रियोंसे हम संसारको देखते हैं उन्हें भी हम भूलसे अपनी मान लेते हैं। परन्तु इनपर भी हमारा कोई अधिकार नहीं चलता। अन्तःकरण और इन्द्रियोंसहित सम्पूर्ण संसार प्रलयकी ओर जा रहा है। उसकी स्थिति है ही नहीं।संसारकी प्रतीतिमात्र होती है इसलिये इसकी प्राप्ति कभी हो ही नहीं सकती। संसार अपने स्वरूपतक पहुँच ही नहीं सकता पर स्वरूप सब जगह सत्तारूपसे विद्यमान रहता है। संसारका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है पर अपना अस्तित्व नित्यनिरन्तर रहता है। स्वरूपका अर्थात् अपने होनेपनका प्रत्यक्ष अनुभव होता है। स्वरूप अपरिवर्तनशील है। यदि वह परिवर्तनशील होता तो संसारके परिवर्तनको कौन देखता हमें जैसे संसारके निरन्तर परिवर्तन और अभावका अनुभव होता है ऐसे अपने परिवर्तन और अभावका अनुभव कभी नहीं होता। ऐसा होनेपर भी परिवर्तनशील शरीरके साथ अपनेको मिलाकर उसके परिवर्तनको भूलसे अपना परिवर्तन मान लेते हैं। शरीरके साथ सम्बन्ध मानकर शरीरकी अवस्थाको अपनी अवस्था मान लेते हैं। विचार करें कि यदि शरीरकी अवस्थाके साथ हम एक होते तो अवस्थाके चले जानेपर हम भी चले गये होते। इससे सिद्ध होता है कि जानेवाली अवस्था दूसरी है और हम दूसरे हैं। इस प्रकारके अपने नित्यसिद्ध स्वरूपका अनुभव होना ज्ञान है।दूसरी बात इस उन्तालीसवें श्लोकमें लभते पद आया है जिसका तात्पर्य है जिस वस्तुका निर्माण नहीं होता ऐसी नित्यसिद्ध वस्तुकी प्राप्ति। जिस वस्तुका निर्माण होता है अर्थात् जो वस्तु पहले नहीं होती प्रत्युत बनायी जाती है उस वस्तुकी प्राप्तिको लभते नहीं कह सकते। कारण कि जो वस्तु पहले नहीं थी तथा बादमें भी नहीं रहेगी ऐसी वस्तुकी प्रतीति तो होती है पर प्राप्ति नहीं होती। प्रतीत होनेवाली वस्तुको प्राप्त मान लेना अपने विवेकका सर्वथा अनादर है।जो संसारकी उत्पत्तिके पहले भी रहता है संसारकी (उत्पन्न होकर होनेवाली) स्थितिमें भी रहता है और संसारके नष्ट होनेके बाद भी रहता है वह तत्त्व है नामसे कहा जाता है और है की प्राप्तिको ही लभते कहते हैं। परन्तु जो वस्तु उत्पन्न होनेसे पहले भी नहीं थी और नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहेगी तथा बीचमें भी निरन्तर नाशकी ओर जा रही है वह वस्तु नहीं नामसे कही जाती है। नहीं की प्रतीति होती है प्राप्ति नहीं। जो है वह तो है ही और जो नहीं है वह है ही नहीं। नहीं को नहींरूपसे मानते हुए है को हैरूपसे मान लेना श्रद्धा है जिससे नित्यसिद्ध ज्ञानकी प्राप्ति हो जाती है श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानम्।ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति नवें अध्यायके तीसरे श्लोकमें भगवान्ने निषेधमुखसे कहा है कि श्रद्धारहित पुरुष मेरेको प्राप्त न होकर जन्ममरणरूप संसारचक्रमें घूमते रहते हैं। उसी बातको यहाँ विधिमुखसे कहते हैं कि श्रद्धावान् पुरुष परमशान्तिको प्राप्त हो जाता है अर्थात् मेरेको प्राप्त होकर जन्ममरणरूप संसारचक्रसे छूट जाता है।परमशान्तिका तत्काल अनुभव न होनेका कारण है जो वस्तु अपनेआपमें है उसको अपनेआपमें नढूँढ़कर बाहर दूसरी जगह ढूँढ़ना। परमशान्ति प्राणिमात्रमें स्वतःसिद्ध है। परन्तु मनुष्य परमशान्तिस्वरूप परमात्मासे तो विमुख हो जाता है और सांसारिक वस्तुओंमें शान्ति ढूँढ़ता है। इसलिये अनेक जन्मोंतक शान्तिकी खोजमें भटकते रहनेपर भी उसे शान्ति नहीं मिलती। उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंमें शान्ति मिल ही कैसे सकती है तत्त्वज्ञानका अनुभव होनेपर जब दुःखरूप संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है तब स्वतःसिद्ध परमशान्तिका तत्काल अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   जो ज्ञानप्राप्तिका अपात्र है ऐसे विवेकहीन संशयात्मा मनुष्यकी भगवान् आगेके श्लोकमें निन्दा करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.39 4.40।।श्रद्धावानिति। अज्ञ इति। अत्र च श्रद्धागमः तत्परव्यापारत्वं च झगित्येव आस्तिकत्वात् असंशयत्वे सति उत्पद्यते। तस्मादसंशयवता गुर्वागमादृतेन भाव्यम् संशयस्य सर्वनाशकत्वात् ससंशयो हि न किञ्चिज्जानाति अश्रद्दधानत्त्वात्। तस्मात् निःसंशयेन भाव्यम् इति वाक्यार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.39।।कर्मयोगेन समाधियोगेन च संपन्नस्य ज्ञानोत्पत्तावन्तरङ्गं साधनमुपदिशति येनेति। ज्ञानलाभप्रयोजनमाह ज्ञानमिति। न केवलं श्रद्धालुत्वमेवासहायं ज्ञानलाभे हेतुरपि तु तात्पर्यमपीत्याह श्रद्धालुत्वेऽपीति। मन्दप्रस्थानत्वं तात्पर्यविधुरत्वं नच तस्योपदिष्टमपि ज्ञानमुत्पत्तुमीष्टे तेन तात्पर्यमपि तत्र कारणं भवतीत्याह अत आहेति। अभियुक्तो निष्ठावान् उपासनादावित्यादिशब्देन श्रवणादि गृह्यते। नच श्रद्धा तात्पर्यं चेत्युभयमेव ज्ञानकारणं किंतु संयतेन्द्रियत्वमपि तदभावे श्रद्धादेरकिंचित्करत्वादित्याशयेनाह श्रद्धावानिति। उक्तसाधनानां ज्ञानेन सहैकान्तिकत्वमाह य एवंभूत इति।तद्विद्धि प्रणिपातेन इत्यादौ प्रागेव प्रणिपातादेर्ज्ञानहेतोरुक्तत्वात्किमितीदानीं हेत्वन्तरमुच्यते तत्राह प्रणिपातादिस्त्विति। तद्धि बहिरङ्गमिदं पुनरन्तरङ्गं नच तत्र ज्ञाने प्रतिनियमो मनस्यन्यथा कृत्वा बहिरन्यथाप्रदर्शनात्मनो मायावित्वस्य संभवाद्विप्रलम्भकत्वादेरपि संभावनोपनीतत्वादित्यर्थः। मायावित्वादेः श्रद्धावत्त्वतात्पर्यादावपि संभवादनैकान्तिकत्वमविशिष्टमित्याशङ्क्याह नत्विति। नहि मायया विप्रलम्भेन वा श्रद्धातात्पर्यसंयमाभियोगतोऽनुष्ठातुमर्हन्तीत्यर्थः। उत्तरार्धं प्रश्नपूर्वकमवतार्य व्याकरोति किंपुनरित्यादिना। सम्यग्ज्ञानादभ्यासादिसाधनानपेक्षान्मोक्षो भवतीत्यत्र प्रमाणमाह सम्यग्दर्शनादिति। शास्त्रशब्देनतमेव विदित्वाज्ञानादेव तु कैवल्यम् इत्यादि विवक्षितम् न्यायस्तु ज्ञानादज्ञानविवृत्ते रज्ज्वादौप्रसिद्धत्वादात्मज्ञानादपि निरपेक्षादज्ञानतत्कार्यप्रक्षयलक्षणो मोक्षः स्यादित्येवंलक्षणः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.38 4.39।।उत्तरस्य श्लोकत्रयस्य सङ्कीर्णार्थत्वादेकोक्त्यैव तात्पर्यमुक्त्वा तस्मादिति चतुर्थस्य प्रतिपाद्यमाह तदिति। तस्य ज्ञानस्य साधनमन्तरङ्गं श्रद्धादिकम्। विरोध्यज्ञानादिकं ज्ञानस्य फलं परमशान्त्यादिकम्। विरोधिनः फलं विनाशादिकमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.38 4.39।।तत्साधनं विरोधिफलं च तदुत्तरैरुक्त्वोपसंहरति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.39।।एवम् उपदेशाद् ज्ञानं लब्ध्वा च उपदिष्टज्ञानवृद्धौ श्रद्धावान् तत्परः तत्र एव नियमितमनाः तदितरविषयात् संयतेन्द्रियः अचिरेण कालेन उक्तलक्षणविपाकदशापन्नं ज्ञानं लभते। तथाविधं ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिम् अचिरेण अधिगच्छति परं निर्वाणं प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.39।। श्रद्धावान् श्रद्धालुः लभते ज्ञानम्। श्रद्धालुत्वेऽपि भवति कश्चित् मन्दप्रस्थानः अत आह तत्परः गुरूपासदनादौ अभियुक्तः ज्ञानलब्ध्युपाये श्रद्धावान्। तत्परः अपि अजितेन्द्रियः स्यात् इत्यतः आह संयतेन्द्रियः संयतानि विषयेभ्यो निवर्तितानि यस्य इन्द्रियाणि स संयतेन्द्रियः। य एवंभूतः श्रद्धावान् तत्परः संयतेन्द्रियश्च सः अवश्यं ज्ञानं लभते। प्रणिपातादिस्तु बाह्योऽनैकान्तिकोऽपि भवति मायावित्वादिसंभवात् न तु तत् श्रद्धावत्त्वादौ इत्येकान्ततः ज्ञानलब्ध्युपायः। किं पुनः ज्ञानलाभात् स्यात् इत्युच्यते ज्ञानं लब्ध्वा परं मोक्षाख्यां शान्तिम् उपरतिम् अचिरेण क्षिप्रमेव अधिगच्छति। सम्यग्दर्शनात् क्षिप्रमेव मोक्षो भवतीति सर्वशास्त्रन्यायप्रसिद्धः सुनिश्चितः अर्थः।।अत्र संशयः न कर्तव्यः पापिष्ठो हि संशयः कथम् इति उच्यते

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【 Verse 4.40 】

▸ Sanskrit Sloka: अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति | नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मन: ||

▸ Transliteration: ajñaś cāśraddadhānaś ca saṁśayātmā vinaśyati | nāyaṁ loko ’sti na paro na sukhaṁ saṁśayātmanaḥ ||

▸ Glossary: ajñaḥ: ignorant; ca: and; aśraddadhānaḥ: one having no faith; ca: and; saṁśayātmā: doubting soul; vinaśyati: perish; na: not; ayaṁ: this; lokah: world; asti : is; na: not; paraḥ: next; na: not; sukhaṁ: happiness; saṁśayātmanaḥ: of the doubting soul.

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.40 Those who have no wisdom and faith, who always have doubts, are destroyed. There is no happiness in this world or the next.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.40।।विवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.40।। अज्ञानी तथा श्रद्धारहित और संशययुक्त पुरुष नष्ट हो जाता है (उनमें भी) संशयी पुरुष के लिये न यह लोक है न परलोक और न सुख।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.40 अज्ञः the ignorant? च and? अश्रद्दधानः the faithless? च and? संशयात्मा the doubting self? विनश्यति goes to destruction? न not? अयम् this? लोकः world? अस्ति is? न not? परः the next? न not? सुखम् happiness? संशयात्मनः for the doubting self.Commentary The ignorant one who has no knowledge of the Self. The man without faith one who has no faith in his own self? in the scriptures and the teachings of his Guru.A man of doubting mind is the most sinful of all. His condition is very deplorable. He is full of doubts as regards the next world. He does not rejoice in this world also? as he is very suspicious. He has no happiness.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.40. But he, who is ignorant and has no faith, perishes, with his self (mind) full of doubts. Neither this world nor the other, nor happiness is for a person, who is by nature is full of doubts.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.40 But the ignorant man, and he who has no faith, and the sceptic are lost. Neither in this world nor elsewhere is there any happiness in store for him who always doubts.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.40 The ignorant, the faithless and the doubting one peirsh; for the doubting one there is neither this world, nor that beyond, nor happiness.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.40 One who is ignorant and faithless, and has a doubting mind perishes. Neither this world nor the next nor happiness exists for one who has a doubting mind.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.40 The ignorant the faithless, the doubting self goes to destruction; there is neither this world nor the other, nor happiness for the doubting.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.39-40 Sraddhavan etc. Ajnah etc. Here the idea of the passage is this : The incoming of faith and the performance of activities intending this [knowledge], both spring up soon no doubt, if one, being a believer, entertains no doubt. Therefore, one should remain being favoured by the preceptors and the scriptures, and not entertaining any doubt. For, the doubt is a destroyer of everything [good]. Indeed a person with doubt knows nothing, because he does not have faith. Hence one should remain without doubt. The subject matter that has been elaborated in this entire chapter is now summarised by a pair of the [following] verses :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.40 'The ignorant,' i.e., one devoid of knowledge received through instruction, 'the faithless' or one who has no faith in developing this knowledge taught to him, i.e., who does not strive to progress ickly, and 'the doubting one,' i.e., one who is full of doubts in regard to the knowledge taught - such persons perish, are lost. When this knowledge taught to him about the real nature of the self is doubted, then he loses this material world as also the next world. The meaning is that the ends of man, such as Dharma, Artha and Karma which constitute the material ends or fulfilments, are not achieved by such a doubting one. How then can man's supreme end, release be achieved by such a doubting one? For all the ends of human life can be achieved through the actions which are prescribed by the Sastras, but their performance reires the firm conviction that the self is different from the body. Therefore, even a little happiness does not come to the person who has a doubting mind concerning the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.40 Ajnah, one who is ignorant, who has not known the Self; and asradda-dhanah, who is faithless; [Ast. adds here: guruvakya-sastresu avisvasavan, who has no faith in the instructions of the teacher and the scriptures.-Tr.] and samsaya-atma, who has a doubting mind; vinasyati, perishes. Although the ignorant and the faithless get ruined, yet it is not to the extent that a man with a doubting mind does. As for one with a doubting mind, he is the most vicious of them all. How? Na ayam lokah, neither this world which is familiar; na, nor also; parah, the next world; na sukham, nor happiness; asti, exist; samsaya-atmanah, for one who has a doubting mind. For doubt is possible even with regard to them! Therefore one should not entertain doubt. Why?

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.40।। इसके पूर्व के श्लोक में कहा गया है कि श्रद्धा तथा ज्ञान से युक्त पुरुष परम शान्ति प्राप्त करता है। इसी तथ्य पर बल देने के लिये निषेधात्मक भाषा में कहते हैं कि उपर्युक्त गुणों से रहित पुरुष अपनी ही हानि करता हुआ अन्त में नष्ट हो जाता है।जो अज्ञानी है अर्थात् वह पुरुष जिसे बौद्धिक स्तर पर भी आत्मा का ज्ञान नहीं है। इस प्रकार के श्रद्धारहित और संशयी स्वभाव के पुरुष का नाश अवश्यंभावी है।दूसरी पंक्ति में भगवान् श्रीकृष्ण संशयात्मा पुरुष की निन्दा करते हुये उसके जीवन की त्रासदी बताते हैं। ऐसे पुरुष को न इस लोक में सुख मिलता है और न अन्यत्र। इसका अभिप्राय यह हुआ कि अज्ञानी तथा अश्रद्धालु पुरुष कुछ मात्रा में तो इस लोक का सुख प्राप्त कर सकते हैं परन्तु संशयी स्वभाव के व्य़क्ति के भाग्य में वह भी नहीं लिखा होता ऐसे पुरुष मानसिक रूप से किसी भी परिस्थिति का आनन्द लेने में सर्वथा असमर्थ हो जाते हैं क्योंकि संशय की प्रवृत्ति प्रत्येक अनुभव में विष घोल देती है। तथाकथित बुद्धिमान अश्रद्धालु और संशयी स्वभाव के पुरुषों पर इस पंक्ति मे तीक्ष्ण व्यंग्य प्रहार किया गया है।अत इस विषय में संशय नहीं करना चाहिये। भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.40।।अस्मिन्सर्वशास्त्रन्यायसिद्धे सुनिश्चितेऽर्थे संशयो न कर्तव्यः। तस्य पापिष्ठत्वादित्याशयेनाह यज्ञ इति। अज्ञो गुरुमुखादनधीतशास्त्रत्वेनात्मज्ञानशून्यश्च पूर्वोक्तश्रद्धारहितश्च इदमेवं भवति न वेति सर्वत्र संशयाकान्तचेता निनश्यति स्वार्थलाभाद्भश्यति। अज्ञाश्रद्दधानसंशयात्मापेक्षया चकारद्वयसूचितममुख्यत्वं स्फुटयति। संशयात्मा तु सर्वतः पापिष्ठः। यतस्तस्यायं मनुष्यलोको वित्तार्जनविवाहादिसाध्यो न। नच पर उपासनादिसाध्यो देवलोकः। नच तत्त्वज्ञानसाध्यजीवन्मुक्तिसुखं सर्वत्रापि संशयस्य सत्त्वात्। अज्ञानश्रद्दधानयोः परलोकस्य जीवन्मुक्तिसुखस्य चाभावेऽपि मनुष्यलोकोऽस्त्येव। यद्वा यज्ञः कदाचिदभ्यासवशात्परलोकादिसाधनं देहात्मविवेकादिज्ञानं लभते। अश्रद्दधानोऽपि युक्तियुक्तं श्रुत्वा श्रद्धां लभते। ततश्च परलोकादिभाजौ भवतः। सदा सर्वत्र संशयग्रस्तस्तु न तथा किंत्वतिपापिष्ठ इत्यर्थः। तस्मात्संशयो न कर्तव्य इत्याशयः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.40।।अत्र च संशयो न कर्तव्यः कस्मात् अज्ञोऽनधीतशास्त्रत्वेनात्मज्ञानशून्यः। गुरुवेदान्तवाक्यार्थे इदमेवं न भवत्येवेति विपर्ययरूपा

Chapter 4 (Part 25)

नास्तिक्यबुद्धिरश्रद्धा तद्वानश्रद्धधानः। इदमेवं भवति नवेति सर्वत्र संशयाक्रान्तचित्तः संशयात्मा विनश्यति स्वार्थाद्भ्रष्टो भवति। अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च विनश्यतीति संशयात्मापेक्षया न्यूनत्वकथनार्थं चकाराभ्यां तयोः प्रयोगः। कुतः संशयात्मा हि सर्वतः पापीयान्। यतो नायं मनुष्यलोकोऽस्ति वित्तार्जनाद्यभावात् न परलोकः स्वर्गमोक्षादिः धर्मज्ञानाद्यभावात् न सुखं भोजनादिकृतं संशयात्मनः सर्वत्र संदेहाक्रान्तचित्तस्य। अज्ञस्याश्रद्दधानस्य च परो लोको नास्ति मनुष्यलोके भोजनादिसुखं च वर्तते। संशयात्मा तु त्रितयहीनत्वेन सर्वतः पापीयानित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.40।।अज्ञ इति। अज्ञः सुखेन चिकित्सितुं शक्यः। अश्रद्दधानो यत्नेन। संशयात्मा त्वसाध्य एव। यतो मित्रादिष्वपि संशयं कुर्वतोऽस्यायं लोकोऽपि नास्ति नापि परः। वेदवाक्येऽपि संशयात्। अतएव सर्वदा संशयाकुलत्वात्सुखमपि तस्य नास्ति। तस्मात्संशयो न कर्तव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.40।।अत्र मदुक्तौ संशयो न कर्तव्य इत्याह संशयात्माभविष्यति न वा इति सन्देहवान् अज्ञः मूर्खः अनात्मज्ञः अश्रद्दधानः गुरौ ज्ञानसाधनेषु च श्रद्धारहितो भूत्वा विनश्यति नष्टो भवति। चकारद्वयेन धर्मरहितः सन्तोषरहितश्च भवेदिति ज्ञाप्यते। किञ्च संशयात्मनः साधारणरीत्यापीह लोके परलोके च सुखं न स्यादित्याह नायमिति। संशयात्मनः सन्देहवतः अयं लोकः पशुपुत्रादिरूपो न सिद्धो भवति न परः स्वर्गादिरूपसुखं ऐश्वर्यारोग्यादिरूपं न भवतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.40।।ज्ञानाधिकारिणमुक्त्वा तद्विपरीतमनधिकारिणमाह अज्ञश्चेति। अज्ञो गुरूपदिष्टार्थानभिज्ञः कथंचिज्ज्ञाने जातेऽप्यश्रद्दधानश्च जातायामपि श्रद्धायां ममेदं सिध्येद्वा न वेति संशयाक्रान्तचित्तश्च नश्यति स्वार्थाद्भ्रश्यति। एतेषु त्रिष्वपि संशयात्मा सर्वथा नश्यति यतस्तस्यायं लोको नास्ति धनार्जनविवाहाद्यसिद्धेः। नच परलोकः धर्मस्यानिष्पत्तेः। नच सुखं संशयेनैव भोगस्याप्यसंभवात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.40।।अश्रद्दधानस्तु नाधिकारी इत्येतावति वक्तव्ये अन्यमप्यनधिकारिणमाह। अज्ञ उपदिष्टार्थानभिज्ञः अनधिकारी तत्र च सत्यपि ज्ञानेऽश्रद्धावान् तथा संशयानश्च विनश्यत्येवेत्यन्ते महाननधिकारी निर्दिष्टः अनिश्चयात्तस्य महत्त्वमनधिकारे। तथा हि नायं लोकोऽस्तीति न च सुखं परलोकश्च। अतो निश्चयात्मिकैव बुद्धिरुचितेति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.40।।इस विषयमें संशय नहीं करना चाहिये क्योंकि संशय बड़ा पापी है। कैसे सो कहते हैं जो अज्ञ यानी आत्मज्ञानसे रहित है जो अश्रद्धालु है और जो संशयात्मा है ये तीनों नष्ट हो जाते हैं। यद्यपि अज्ञानी और अश्रद्धालु भी नष्ट होते हैं परंतु जैसा संशयात्मा नष्ट होता है वैसे नहीं क्योंकि इन सबमें संशयात्मा अधिक पापी है। अधिक पापी कैसे है ( सो कहते हैं ) संशयात्माको अर्थात् जिसके चित्तमें संशय है उस पुरुषको न तो यह साधारण मनुष्यलोक मिलता है न परलोक मिलता है और न सुख ही मिलता है क्योंकि वहाँ भी संशय होना सम्भव है इसलिये संशय नहीं करना चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.40।। व्याख्या   अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति जिस पुरुषका विवेक अभी जाग्रत् नहीं हुआ है तथा जितना विवेक जाग्रत् हुआ है उसको महत्त्व नहीं देता और साथ ही जो अश्रद्धालु है ऐसे संशययुक्त पुरुषका पारमार्थिक मार्गसे पतन हो जाता है। कारण कि संशययुक्त पुरुषकी अपनी बुद्धि तो प्राकृत शिक्षारहित है और दूसरेकी बातका आदर नहीं करता फिर ऐसे पुरुषके संशय कैसे नष्ट हो सकते हैं और संशय नष्ट हुए बिना उसकी उन्नति भी कैसे हो सकती हैअलगअलग बातोंको सुननेसे यह ठीक है अथवा वह ठीक है इस प्रकार सन्देहयुक्त पुरुषका नाम संशयात्मा है। पारमार्थिक मार्गपर चलनेवाले साधकमें संशय पैदा होना स्वाभाविक है क्योंकि वह किसी भी विषयको पढ़ेगा तो कुछ समझेगा और कुछ नहीं समझेगा। जिस विषयको कुछ नहीं समझते उस विषयमें संशय पैदा नहीं होता और जिस विषयको पूरा समझते हैं उस विषयमें संशय नहीं रहता। अतः संशय सदा अधूरे ज्ञानमें ही पैदा होता है इसीको अज्ञान कहते हैं (टिप्पणी प0 272.1)। इसलिये संशयका उत्पन्न होना हानिकारक नहीं है प्रत्युत संशयको बनाये रखना और उसे दूर करनेकी चेष्टा न करना ही हानिकारक है। संशयको दूर करनेकी चेष्टा न करनेपर वह संशय ही सिद्धान्त बन जाता है। कारण कि संशय दूर न होनेपर मनुष्य सोचता है कि पारमार्थिक मार्गमें सब कुछ ढकोसला है और ऐसा सोचकर उसे छोड़ देता है तथा नास्तिक बन जाता है। परिणामस्वरूप उसका पतन हो जाता है। इसलिये अपने भीतर संशयका रहना साधकको बुरा लगना चाहिये। संशय बुरा लगनेपर जिज्ञासा जाग्रत् होती है जिसकी पूर्ति होनेपर संशयविनाशक ज्ञानकी प्राप्ति होती है।साधकका लक्षण है खोज करना। यदि वह मन और इन्द्रियोंसे देखी बातको ही सत्य मान लेता है तो वहीं रुक जाता है आगे नहीं बढ़ पाता। साधकको निरन्तर आगे ही बढ़ते रहना चाहिये। जैसे रास्तेपर चलते समय मनुष्य यह न देखे कि कितने मील आगे आ गये प्रत्युत यह देखे कि कितने मील अभी बाकी पड़े हैं तब वह ठीक अपने लक्ष्यतक पहुँच जायगा। ऐसे ही साधक यह न देखे कि कितना जान लिया अर्थात् अपने जाने हुएपर सन्तोष न करे प्रत्युत जिस विषयको अच्छी तरह नहीं जानता उसे जाननेकी चेष्टा करता रहे। इसलिये संशयके रहते हुए कभी सन्तोष नहीं होना चाहिये प्रत्युत जिज्ञासा अग्निकी तरह दहकती रहनी चाहिये। ऐसा होनेपर साधकका संशय सन्तमहात्माओंसे अथवा ग्रन्थोंसे किसीनकिसी प्रकारसे दूर हो ही जाता है। संशय दूर करनेवाला कोई न मिले तो भगवत्कृपासे उसका संशय दूर हो जाता है।विशेष बातजीवात्मा परमात्माका अंश है ममैवांशो जीवलोके (गीता 15। 7)। इसलिये जब उसमें अपने अंशी परमात्माको प्राप्त करनेकी भूख जाग्रत् होती है और उसकी पूर्ति न होनेका दुःख होता है तब उस दुःखको भगवान् सह नहीं सकते। अतः उसकी पूर्ति भगवान् स्वतः करते हैं। ऐसे ही जब साधकको अपने भीतर स्थित संशयसे व्याकुलता या दुःख होता है तब वह दुःख भगवान्को असह्य होता है। संशय दूर करनेके लिये भगवान्से प्रार्थना नहीं करनी पड़ती प्रत्युत जिस संशयको लेकर साधकको दुःख हो रहा है उससंशयको दूर करके भगवान् स्वतः उसका वह दुःख मिटा देते हैं। संशयात्मा पुरुषकी एक पुकार होती है जो स्वतः भगवान्तक पहुँच जाती है।संशयके कारण साधककी वास्तविक उन्नति रुक जाती है इसलिये संशय दूर करनेमें ही उसका हित है। भगवान् प्राणिमात्रके सुहृद् हैं सुहृदं सर्वभूतानाम् (गीता 5। 29) इसलिये जिस संशयको लेकर मनुष्य व्याकुल होता है और वह व्याकुलता उसे असह्य हो जाती है तो भगवान् उस संशयको किसी भी रीति उपायसे दूर कर देते हैं। गलती यही होती है कि मनुष्य जितना जान लेता है उसीको पूरा समझकर अभिमान कर लेता है कि मैं ठीक जानता हूँ। यह अभिमान महान् पतन करनेवाला हो जाता है।नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः इस श्लोकमें ऐसे संशयात्मा मनुष्यका वर्णन है जो अज्ञ और अश्रद्धालु है। तात्पर्य यह है कि भीतर संशय रहनेपर भी उस मनुष्यकी न तो अपनी विवेकवती बुद्धि है और न वह दूसरेकी बात ही मानता है। इसलिये उस संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। उसके लिये न यह लोक है न परलोक है और न सुख ही है (टिप्पणी प0 272.2)।संशयात्मा मनुष्यका इस लोकमें व्यवहार बिगड़ जाता है। कारण कि वह प्रत्येक विषयमें संशय करता है जैसे यह आदमी ठीक है या बेठीक है यह भोजन ठीक है या बेठीक है इसमें मेरा हित है या अहित है आदि। उस संशयात्मा मनुष्यको परलोकमें भी कल्याणकी प्राप्ति नहीं होती क्योंकि कल्याणमें निश्चयात्मिका बुद्धिकी आवश्यकता होती है और संशयात्मा मनुष्य दुविधामें रहनेके कारण कोई एक निश्चय नहीं कर सकता जैसे जप करूँ या स्वाध्याय करूँ संसारका काम करूँ या परमात्मप्राप्ति करूँ आदि। भीतर संशय भरे रहनेके कारण उसके मनमें भी सुखशान्ति नहीं रहती। इसलिये विवेकवती बुद्धि और श्रद्धाके द्वारा संशयको अवश्य ही मिटा देना चाहिये।दो अलगअलग बातोंको पढ़नेसुननेसे संशय पैदा होता है। वह संशय या तो विवेकविचारके द्वारा दूर हो सकता है या शास्त्र तथा सन्तमहापुरुषोंकी बातोंको श्रद्धापूर्वक माननेसे। इसलिये संशययुक्त पुरुषमें यदि अज्ञता है तो वह विवेकविचारको बढ़ाये और यदि अश्रद्धा है तो श्रद्धाको बढ़ाये क्योंकि इन दोनोंमेंसे किसी एकको विशेषतासे अपनाये बिना संशय दूर नहीं होता। सम्बन्ध   भगवान्ने तैंतीसवें श्लोकसे ज्ञानयोगका प्रकरण आरम्भ करते हुए ज्ञानप्राप्तिका उपाय तथा ज्ञानकी महिमा बतायी। जो ज्ञान गुरुके पास रहकर उनकी सेवा आदि करनेसे होता है वही ज्ञान कर्मयोगसे सिद्ध हुए मनुष्यको अपनेआप प्राप्त हो जाता है ऐसा बताकर भगवान्ने ज्ञानप्राप्तिके पात्रअपात्रका वर्णन करते हुए प्रकरणका उपसंहार किया।अब प्रश्न होता है कि सिद्ध होनेके लिये कर्मयोगीको क्या करना चाहिये इसका उत्तर भगवान् आगेके श्लोकमें देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.39 4.40।।श्रद्धावानिति। अज्ञ इति। अत्र च श्रद्धागमः तत्परव्यापारत्वं च झगित्येव आस्तिकत्वात् असंशयत्वे सति उत्पद्यते। तस्मादसंशयवता गुर्वागमादृतेन भाव्यम् संशयस्य सर्वनाशकत्वात् ससंशयो हि न किञ्चिज्जानाति अश्रद्दधानत्त्वात्। तस्मात् निःसंशयेन भाव्यम् इति वाक्यार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.40।।उत्तरश्लोकस्य पातनिकां करोति अत्रेति। यथोक्तसाधनवानुपदेशमपेक्ष्याचिरेण ब्रह्म साक्षात्करोति साक्षात्कृतब्रह्मत्वेऽचिरेणैव मोक्षं प्राप्नोतीत्येषोऽर्थः सप्तम्या परामृश्यते। संशयस्याकर्तव्यत्वे हेतुमाह पापिष्ठो हीति। उक्तं हेतुं प्रश्नपूर्वकमुत्तरश्लोकेन साधयति कथमिति। अज्ञादश्रद्दधानाच्च संशयचित्तस्य विशेषमादर्शयति नायमिति। द्वितीयविभागविभजनार्थं भूमिकां करोति अज्ञेति। अज्ञादीनां मध्ये संशयात्मनो यत्पापिष्ठत्वं तत्प्रश्नद्वारा प्रकटयति कथमिति। लोकद्वयस्य तत्प्रयुक्तसुखस्य चाभावे हेतुमाह तत्रापीति। संशयचित्तस्य सर्वत्र संशयप्रवृत्तेर्दुर्निवारत्वादित्यर्थः। संशयस्यानर्थमूलत्वे स्थिते फलितमाह तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.40।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.40।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.40।।अज्ञः एवम् उपदेशलब्धज्ञानरहितः उपदिष्टज्ञानवृद्ध्युपाये च अश्रद्दधानः अत्वरमाणः उपदिष्टे च ज्ञाने संशयात्मा संशयितमना विनश्यति नष्टो भवति। अस्मिन् उपदिष्टे आत्मयाथात्म्यविषये ज्ञाने संशयात्मनः अयम् अपि प्राकृतलोको न अस्ति न च परः धर्मार्थकामादिपुरुषार्थाः च न सिद्ध्यन्ति कुतो मोक्ष इत्यर्थः।शास्त्रीयकर्मसिद्धिरूपत्वात् सर्वेषां पुरुषार्थानां शास्त्रीयकर्मजन्यसिद्धेः च देहातिरिक्तात्मनिश्चयपूर्वकत्वात् अतः सुखलवभागित्वम् आत्मनि संशयात्मनो न संभवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.40।। अज्ञश्च अनात्मज्ञश्च अश्रद्दधानश्च गुरुवाक्यशास्त्रेषु अविश्वासवांश्च संशयात्मा च संशयचित्तश्च विनश्यति। अज्ञाश्रद्दधानौ यद्यपि विनश्यतः न तथा यथा संशयात्मा। संशयात्मा तु पापिष्ठः सर्वेषाम्। कथम् नायं साधारणोऽपि लोकोऽस्ति। तथा न परः लोकः। न सुखम् तत्रापि संशयोत्पत्तेः संशयात्मनः संशयचित्तस्य। तस्मात् संशयो न कर्तव्यः।।कस्मात्

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【 Verse 4.41 】

▸ Sanskrit Sloka: योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयम् | आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ||

▸ Transliteration: yoga-sannyasta-karmāṇaṁ jñānas-aṁchinna-saṁśayam | ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhañanjaya ||

▸ Glossary: yogasannyastakarmāṇaṁ: one who has dedicated his actions to god accord- ing to Karma yoga; jñānasaṁchinna saṁśayaṁ: whose doubts have been cleared by knowledge; ātmavantaṁ: self possessed; na: not; karmāṇi: actions; nibadhnanti: bind; dhañanjaya: O Dhañanjaya

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.41 O Dhanañjaya (winner of riches), one who has renounced the fruits of his actions, whose doubts are destroyed, who is well-situated in the Self, is not bound by his actions.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.41।।हे धनञ्जय योग(समता) के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका नाश हो गया है ऐसे स्वरूपपरायण मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.41।। जिसने योगद्वारा कर्मों का संन्यास किया है ज्ञानद्वारा जिसके संशय नष्ट हो गये हैं ऐसे आत्मवान् पुरुष को हे धनंजय कर्म नहीं बांधते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.41 योगसंन्यस्तकर्माणम् one who has renounced actions by Yoga? ज्ञानसंछिन्नसंशयम् one whose doubts are rent asunder by knowledge? आत्मवन्तम् possessing the self? न not? कर्माणि actions? निबध्नन्ति bind? धनञ्जय O Dhananjaya.Commentary Sri Madhusudana Sarasvati explains Atmavantam as always watchful.He who has attained to Selfrealisation renounces all actions by means of Yoga or the knowledge of Brahman. As he is established in the knowledge of the identity of the individual soul with the,Supreme Soul? all his doubts are cut asunder. Actions do not bind him as they are burnt in the fire of wisdom and as he is always watchful over himself. (Cf.II.48III.9IV.20)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.41. O Dhananjaya ! Actions do not bind him who has renounced [all] actions through Yoga; who has cut off his doubts by the sword of knowledge; and who is a master of his own self.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.41 But the man who has renounced his action for meditation, who has cleft his doubt in twain by the sword of wisdom, who remains always enthroned in his Self, is not bound by his acts.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.41 Actions do not bind him, O Arjuna, who has renounced them through Karma Yoga and whose doubts are sundered by knowledge, and who therefore possesses a steady mind.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.41 O Dhananjaya (Arjuna), actions do not bind one who has renounced actions through yoga, whose doubt has been fully dispelled by Knowledge, and who is not inadvertent.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.41 He who has renounced actions by Yoga, whose doubts are rent asunder by knowledge, and who is self-possessed actions do not bind him, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.41 Yoga-etc. Renunciation of actions becomes possible only through Yoga and not otherwise. This has been discussed also [in the seel].

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.41 The countless ancient Karmas which constitute the cause of bondage, do not bind him who has renounced actions through Karma Yoga in the manner explained before, who has sundered all doubts concerning the self by the knowledge of the self in the manner explained before, and who is of steady mind, i.e., unshakable, with the mind focussed steadily on the meaning that has been forth.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.41 Yoga-sannyasta-karmanam, one who has renounced actions through yoga: that person who is a knower of the supreme Goal, by whom actions called righteous or unrighteous have been renounced through the yoga characterized as the Knowledge of the supreme Goal. How does one become detached from actions through yoga? The Lord says: He is jnana-samchinna-samsayah, one whose doubts (samsaya) have been fully dispelled (samchinna) by Knowledge (jnana) characterized as the realization of the identity of the individual Self and God. O Dhananjaya, he who has thus renounced actions through yoga, atmavantam, who is not inadvertent, not careless; him, karmani, actions, seen as the activities of the gunas (see 3.28); na nibadhnanti, do not bind, (i.e.) they do not produce a result in the form of evil etc. Since one whose doubts have been destroyed by Knowledge-arising from the destruction of the impurities (of body, mind, etc.) as result of the practise of Karma-yoga-does not get bound by acitons owing to the mere fact of his actions having been burnt away by Knowledge; and since one who has doubts with regard to the practice of the yogas of Knowledge and actions gets ruined-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.41।। इस अध्याय में विस्तारपूर्वक बतायी हुयी जीवन जीने की कला को इस श्लोक में अत्यन्त सुन्दर प्रकार से संक्षेप में बताया गया है। कर्मसंन्यास से तात्पर्य फलासक्ति के त्याग से है। जब हम कर्मयोग की भावना से कर्म करते हुये कर्मफलों की आसक्ति त्यागना सीख लेते हैं तथा आत्मानुभवरूप ज्ञान के द्वारा जीवन के लक्ष्य सम्बन्धी हमारे सब संशय छिन्नभिन्न हो जाते हैं तब अहंकार नष्ट होकर शुद्ध आत्मस्वरूप में हमारी स्थिति दृढ़ हो जाती है। ऐसा आत्मवान् पुरुष कर्म करता हुआ भी उनसे नहीं बन्धता।कर्तृत्व के अभिमान तथा स्वार्थ से प्रेरित होकर किये गये कर्म ही वासनाएं उत्पन्न करके हमें बन्धन में डालते हैं। कर्मयोग की भावना से निरहंकार होकर कर्म करने पर बन्धन नहीं हो सकता। स्वप्न में स्वप्न की पत्नी की हत्या करने पर स्वाप्निक दण्ड तो भोगना पड़ सकता है परन्तु स्वप्न द्रष्टा के जागने पर जाग्रत् अवस्था में उसे कोई दण्ड नहीं दे सकता क्योंकि स्वप्न के साथसाथ स्वप्न द्रष्टा भी नष्ट हो जाता है। जाग्रत्पुरुष को स्वप्न द्रष्टा का किया कर्म नहीं बांध सकता। इसी प्रकार अहंकार पूर्वक किये गये कर्म अहंकार के लिये बन्धनकारक हो सकते हैं परन्तु आत्मानुभूति में उसके ही नष्ट हो जाने पर आत्मा को वे कर्म कैसे बांध सकेंगे जिसका अहंकार नष्ट हो चुका है उसी पुरुष को यहाँ आत्मवान् कहा गया है।इस आत्मज्ञान का फल सर्वश्रेष्ठ है इसलिये श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.41।।ननु संशयनिवर्तकाभावे तदकरणमस्वाधीनमित्याशङ्क्य तन्निवृत्युपायमात्मज्ञाननिश्चयं ज्ञापयन् तत्त्वसाक्षात्कारसंच्छिन्नसंशयं कर्माणि न निबन्धन्तीत्याह योगेनेति। योगेन परमार्थदर्शनलक्षणेन सम्यक् न्यस्तानि त्यक्तानि शक्तिप्रतिबन्धेन धर्माधर्माख्यानि संचितादीनि कर्माणि येन तम्।क्षीयन्ते चास्य कर्माणि इति श्रुतेः। योगेन भगवदाराधनलक्षणसमत्वबुद्धिरुपेण संन्यस्तानि भगवति समर्पितानि कर्माणि येनेति वा। अस्मिन्पक्षे कर्मपदसंकोचाद्यापत्तिरुपाऽरुचिर्बोध्या। यद्वा भाष्यस्योपलक्षणार्थतया तन्त्रेणायमपि पक्षोऽस्तु। यस्मात्कर्मयोगानुष्ठानात् अशुद्धिक्षयहेतुकज्ञानसंच्छिन्नसंशयो न निबध्यते कर्मभिरित्यग्रिमभाप्यात्। तत्र हेतुमाह ज्ञानेनात्मेश्वरैकत्वदर्शनलक्षणेन छिन्नः संशयः आत्मा देहाद्यभिन्नो भिन्नो वा भिन्नोऽप्यविभुर्विभुर्वा सोऽपि कर्ताऽकर्ता वा कर्तापि भोक्ताऽभोक्ता वा अभोक्ताप्यनेकएको वा सोऽपि सविशेषो निर्विशेषो वा निर्विशेषज्ञानात्केनचित्समुच्चितान्मोक्षः केवलाद्वा केवलज्ञाननिवर्त्यः प्रपञ्चः सत्यो मिथ्याभूतो वेत्येवमादिरुपो यस्य तम्। अत्र हेतुमाह आत्मवन्तमप्रमत्तं शमदमादिपरं कर्माणि गुणा गुणेषु वर्तन्त इति बुद्य्धा क्रियमाणानि न निबध्नन्ति अनिष्टादिरुपं फलं नारभन्ते राज्ञामतिप्रबलत्वत्तान्त्रिजित्य धनमाहर्तुं मम सामर्थ्यमस्ति न वेति संशयमपिप्रबलात्मस्वरुपनिश्चयेन मुक्त्वा धनं जितवांस्त्वमेवात्र दृष्टान्त इति ध्वनयन्नाह धनं जयेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.41।।एतादृशस्य सर्वानर्थमूलस्य संशयस्य निराकरणायात्मनिश्चयमुपायं वदन्नध्यायद्वयोक्तां पूर्वापरभूमिकाभेदेन कर्मज्ञानमयीं द्विविधां ब्रह्मनिष्ठामुपसंहरति योगेन भगवदाराधनलक्षणसमत्वबुद्धिरुपेण संन्यस्तानि भगवति समर्पित्तानि कर्माणि येन। यद्वा परमार्थदर्शनलक्षणेन योगेन संन्यस्तानि त्यक्तानि कर्माणि येन तं योगसंन्यस्तकर्माणम्। संशये सति कथं योगसंन्यस्तकर्मत्वमत आह ज्ञानसंच्छिन्नसंशयं ज्ञानेनात्मनिश्चयलक्षणेन छिन्नः संशयो येन तम्। विषयपरवशत्वरूपप्रमादे सति कुतो ज्ञानोत्पत्तिरित्यत आह आत्मवन्तमप्रमादिनं सर्वदा सावधानं एतादृशमप्रमादित्वेन ज्ञानवन्तं ज्ञानसंच्छिन्नसंशयत्वेन योगसंन्यस्तकर्माणं कर्माणि लोकसंग्रहार्थानि वृथाचेष्टारूपाणि वा न निबध्नन्ति अनिष्टमिष्टं मिश्रं वा शरीरं नारभन्ते हे धनंजय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.41।।किंच योगेति। योगेन कर्मण्यकर्मदर्शनात्मकेन संन्यस्तानि फलतः स्वरूपतो वा त्यक्तानि कर्माणि येन तं योगसंन्यस्तकर्माणम्। ज्ञानेन सम्यग्दर्शनेन सम्यक् छिन्नाः संशयाः आत्मा देहेऽन्यो वा अन्योऽपि विभुरविभुर्वा विभुरपि कर्ताऽकर्ता वा अकर्ताप्येकोऽनेको वा एकोऽपि सगुणो निर्गुणो वेत्येवमादयो यस्य स ज्ञानसंछिन्नसंशयस्तं आत्मवन्तं शमदमादिपरं कर्माणि कृतानि न निबध्नन्ति हे धनंजय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.41।।सन्देहरहितस्य भोगलोकादिप्रतिबन्धो न भवेदित्याह योगसन्न्यस्तेति। हे धनञ्जय कर्माणि नियतफलभोगकारणरूपाणि योगसन्न्यस्तकर्माणं भगवदात्मकयोगेन त्यक्तकर्मफलं ज्ञानसञ्छिन्नसंशयं ज्ञानेन वा सञ्छिन्नः संशयो जीवस्वरूपादिरूपोऽस्य तमात्मवन्तं स्वसेवार्थमात्मा भगवान् प्रकटीकृत इत्याह () आत्मस्वरूपज्ञं न निबध्नन्ति। न बन्धकानि भवन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.41।।अध्यायद्वयोक्तां पूर्वापरभूमिकाभेदेन कर्मज्ञानमयीं द्विविधां ब्रह्मनिष्ठामुपसंहरति योगेति द्वाभ्याम्। योगेनपरमेश्वराराधनरूपेण तस्मिन्संन्यस्तानि समर्पितानि कर्माणि येन तं पुरुषं कर्माणि स्वफलैर्निबध्नन्ति। अतश्च ज्ञानेनाकर्त्रात्मबोधेन संच्छिन्नः संशयो देहाद्यभिमानलक्षणो यस्य तं चात्मवन्तमप्रमादिनं कर्माणि लोकसंग्रहार्थानि स्वाभाविकानि वा न निबध्नन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.41।।उभयोरेकार्थनिष्ठं स्तौति योगेनोक्तरूपेण सिद्ध्यसिद्धिसमानचित्तवृत्तिकेन बाह्यतः क्रियानिष्ठमपि तेनाऽन्तस्सन्न्यस्तकर्माणं धीरं अन्तःकरणसम्बन्धशून्यं साङ्ख्येन च सञ्छिन्नसंशयं आत्मानात्मनिश्चयात्मिकबुद्धिमन्तं अत एव केवलमात्मवन्तं न तु केवलमनात्माभिमानवन्तं पुरुषं क्रियमाणानि तानि कर्माणि न निबध्नन्ति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.41।।कैसे जिस परमार्थदर्शी पुरुषने परमार्थज्ञानरूप योगके द्वारा पुण्यपापरूप सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग कर दिया हो वह योगसंन्यस्तकर्मा है। ( उसको कर्म नहीं बाँधते। ) वह योगसंन्यस्तकर्मा कैसे है सो कहते हैं आत्मा और ईश्वरकी एकतादर्शनरूप ज्ञानद्वारा जिसका संशय अच्छी प्रकार नष्ट हो चुका है वह ज्ञानसंछिन्नसंशय कहलाता है। ( इसलिये वह योगसंन्यस्तकर्मा है। ) जो इस प्रकार योगसंन्यस्तकर्मा है उस आत्मवान् यानी आत्मबलसे युक्त प्रमादरहित पुरुषको हे धनंजय ( गुण ही गुणोंमें बर्तते हैं इस प्रकार ) गुणोंकी चेष्टामात्रके रूपमें समझे हुए कर्म नहीं बाँधते अर्थात् इष्ट अनिष्ट और मिश्र इन तीन प्रकारके फलोंका भोग नहीं करा सकते।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 4.41।। व्याख्या   योगसंन्यस्तकर्मणाम् शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि जो वस्तुएँ हमें मिली हैं और हमारी दीखती हैं वे सब दूसरोंकी सेवाके लिये ही हैं अपना अधिकार जमानेके लिये नहीं। इस दृष्टिसे जब उन वस्तुओंको दूसरोंकी सेवामें (उनका ही मानकर) लगा दिया जाता है तब कर्मों और वस्तुओंका प्रवाह संसारकी ओर ही हो जाता है और अपनेमें स्वतःसिद्ध समताका अनुभव हो जाता है। इस प्रकार योग(समता) के द्वारा जिसने कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है वह पुरुष योगसंन्यस्तकर्मा है।जब कर्मयोगी कर्ममें अकर्म तथा अकर्ममें कर्म देखता है अर्थात् कर्म करते हुए अथवा न करते हुए दोनों अवस्थाओंमें नित्यनिरन्तर असङ्ग रहता है तब वही वास्तवमें योगसंन्यस्तकर्मा होता है।ज्ञानसंछिन्नसंशयम् मनुष्यके भीतर प्रायः ये संशय रहते हैं कि कर्म करते हुए ही कर्मोंसे अपना सम्बन्धविच्छेद कैसे होगा अपने लिये कुछ न करें तो अपना कल्याण कैसे होगा आदि। परन्तु जब वह कर्मोंके तत्त्वको अच्छी तरह जान लेता है (टिप्पणी प0 273) तब उसके समस्त संशय मिट जाते हैं। उसे इस बातका स्पष्ट ज्ञान हो जाता है कि कर्मों और उनके फलोंका आदि और अन्त होता है पर स्वरूप सदा ज्योंकात्यों रहता है। इसलिये कर्ममात्रका सम्बन्ध पर(संसार) के साथ है स्व(स्वरूप) के साथ बिलकुल नहीं। इस दृष्टिसे अपने लिये कर्म करनेसे कर्मोंके साथ सम्बन्ध जुड़ जाता है और निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके लिये कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। इससे सिद्ध होता है कि अपना कल्याण दूसरोंके लिये कर्म करनेसे ही होता है अपने लिये कर्म करनेसे नहीं।आत्मवन्तम् कर्मयोगीका उद्देश्य स्वरूपबोधको प्राप्त करनेका होता है इसलिये वह सदा स्वरूपके परायण रहता है। उसके सम्पूर्ण कर्म संसारके लिये ही होते हैं। सेवा तो स्वरूपसे ही दूसरोंके लिये होती है खानापीना सोनाबैठना आदि जीवननिर्वाहकी सम्पूर्ण क्रियाएँ भी दूसरोंके लिये ही होती हैं क्योंकि क्रियामात्रका सम्बन्ध संसारके साथ है स्वरूपके साथ नहीं। न कर्माणि निबध्नन्ति अपने लिये कोई भी कर्म न करनेसे कर्मयोगीका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है अर्थात् वह सदाके लिये संसारबन्धनसे सर्वथा मुक्त हो जाता है (गीता 4। 23)।कर्म स्वरूपसे बन्धनकारक हैं ही नहीं। कर्मोंमें फलेच्छा ममता आसक्ति और कर्तृत्वाभिमान ही बाँधनेवाला है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि ज्ञानके द्वारा संशयका नाश होता है और समताके द्वारा कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद होता है। अब आगेके श्लोकमें भगवान् ज्ञानके द्वारा अपने संशयका नाश करके समतामें स्थित होनेके लिये अर्जुनको आज्ञा देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.41।।सकलाध्यायविस्फारितोऽर्थः श्लोकद्वयेन संक्षिप्य उच्यते (K संक्षिप्यते) योगेति। योगेनैव कर्मणां संन्यास उपपद्यते नान्यथा इति विचारितं विचारयिष्यते च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.41।।यद्यपि संशयः सर्वानर्थहेतुत्वात्कर्तव्यो न भवति तथापि निवर्तकाभावे तदकरणमस्वाधीनमिति शङ्कते कस्मादिति। श्रुतियुक्तिप्रयुक्तमैक्यज्ञानं तन्निवर्तकमित्युत्तरमाह ज्ञानेति। संशयरहितस्यापि कर्माण्यनर्थहेतवो भवन्तीत्याशङ्क्याह योगेति। विषयपरवशस्य पुंसो योगायोगात्कुतो योगसंन्यस्तकर्मत्वमित्याशङ्क्याह आत्मवन्तमिति। परमार्थदर्शनतः संशयोच्छित्तौ तदुच्छेदकज्ञानमाहात्म्यादेव कर्मणां च निवृत्तावप्रमत्तस्य प्रातिभासिकानि कर्माणि बन्धहेतवो न भवन्तीत्याह न कर्माणीति। कर्मयोगादेव कर्मसंन्यासस्यानुपपत्तिमाशङ्क्याद्यं पादं विभजते परमार्थेति। तच्च वैधसंन्यासपक्षे परोक्षं फलसंन्यासपक्षे त्वपरोक्षमिति विवेकः। यथोक्तज्ञानेन संन्यस्तकर्मत्वमेव सति संशये न सिध्यति संशयवतस्तदयोगादिति शङ्कते कथमिति। द्वितीयं पादं व्याकुर्वन्परिहरति आहेत्यादिना। पाठक्रमादर्थक्रमस्य बलीयस्त्वादादौ द्वितीयं पादं व्याख्याय पश्चादाद्यं पादं व्याचक्षीतेत्याह य एवमिति। सर्वमिदं प्रमादवतो विषयपरवशस्य न सिध्यतीत्यभिसंधायात्मवन्तं व्याकरोति अप्रमत्तमिति। न कर्माणीत्यादिफलोक्तिं व्याचष्टे गुणचेष्टेति। अनिष्टादीत्यादिशब्देनेष्टं मिश्रं च गृह्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.41।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.41।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.41।।यथोपदिष्टयोगेन संन्यस्तकर्माणं ज्ञानाकारतापन्नकर्माणं यथोपदिष्टेन च आत्मज्ञानेन आत्मनि संछिन्नसंशयम् आत्मवन्तं मनस्विनम् उपदिष्टार्थे दृढावस्थितमनसं बन्धहेतुभूतप्राचीनानन्तकर्माणि न निबध्नन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.41।। योगसंन्यस्तकर्माणं परमार्थदर्शनलक्षणेन योगेन संन्यस्तानि कर्माणि येन परमार्थदर्शिना धर्माधर्माख्यानि तं योगसंन्यस्तकर्माणम्। कथं योगसंन्यस्तकर्मेत्याह ज्ञानसंछिन्नसंशयं ज्ञानेन आत्मेश्वरैकत्वदर्शनलक्षणेन संछिन्नः संशयो यस्य सः ज्ञानसंछिन्नसंशयः। य एवं योगसंन्यस्तकर्मा तम् आत्मवन्तम् अप्रमत्तं गुणचेष्टारूपेण दृष्टानि कर्माणि न निबध्नन्ति अनिष्टादिरूपं फलं नारभन्ते हे धनञ्जय।।यस्मात् कर्मयोगानुष्ठानात् अशुद्धिक्षयहेतुकज्ञानसंछिन्नसंशयः न निबध्यते कर्मभिः ज्ञानाग्निदग्धकर्मत्वादेव यस्माच्च ज्ञानकर्मानुष्ठानविषये संशयवान् विनश्यति

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【 Verse 4.42 】

▸ Sanskrit Sloka: तस्मादज्ञानसम्भूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनात्मन: | छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ||

▸ Transliteration: tasmād ajñāna saṁbhūtaṁ hṛtsthaṁ jñānāsinātmanaḥ | chittvainaṁ saṁśayaṁ yogam ātiṣṭhottiṣṭha bhārata ||

▸ Glossary: tasmāt: therefore; ajñāna: ignorance; saṁbhūtaṁ: born of; hṛtsthaṁ: situated in the heart; jñānāsinā: by the sword of knowledge; ātmanaḥ: of the self; chittvā: having cutting off; enaṁ: this; saṁśayaṁ: doubt; yogaṁ: in yoga; ātiṣṭha: be firm; uttiṣṭha: stand up; bhārata: O descendant of Bhārata

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 4.42 O descendant of Bhārata, therefore, stand up, be situated in yoga. Armed with the sword of knowledge; cut the doubt born of ignorance that exists in your heart.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।4.42।।इसलिये हे भरतवंशी अर्जुन हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशयका ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग(समता) में स्थित हो जा (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।4.42।। इसलिये अपने हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान खड्ग से काटकर हे भारत योग का आश्रय लेकर खड़े हो जाओ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 4.42 तस्मात् therefore? अज्ञानसंभूतम् born out of ignorance? हृत्स्थम् residing in the heart? ज्ञानासिना by the sword of knowledge? आत्मनः of the Self? छित्त्वा having cut? एनम् this? संशयम् doubt? योगम् Yoga? आत्तिष्ठ take refuge? उत्तिष्ठ arise? भारत O Bharata.Commentary Doubt causes a great deal of mental torment. It is most sinful. It is born of ignorance. Kill it ruthlessly with the knowledge of the Self. Now stand up and fight? O Arjuna.(This chapter is known by the names Jnana Yoga? Abhyasa Yoga and jnanakarmasannyasa Yoga also.)Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the fourth discourse entitledThe Yoga of the Division of Wisdom. ,

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 4.42. Therefore, thus cutting off, by means of knowledge-sword, the doubt that has sprung from ignornace and exists in [your] heart, practise the Yoga ! Stand up ! O descendant of Bharata !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 4.42 Therefore, cleaving asunder with the sword of wisdom the doubts of the heart, which thine own ignorance has engendered, follow the Path of Wisdom and arise!"

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 4.42 Therefore, sunder, with the sword of knowledge, this doubt present in your heart resulting from ignorance concerning the self. Practise this Yoga, O Arjuna, and rise up.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 4.42 Therefore, O scion of the Bharata dyasty, take recourse to yoga and rise up, cutting asunder with the sword of Knowledge this doubt of your own in the heart, arising from ignorance.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 4.42 Therefore with the sword of the knowledge (of the Self) cut asunder the doubt of the self born of ignorance, residing in thy heart, and take refuge in Yoga. Arise, O Arjuna.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 4.42 Tasmat etc. Cutting asunder the doubt, you must practise, by the said method, the Yoga, the dexterity in action; and then stand up i.e., perform your activities simply with the idea that they are to be performed.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 4.42 Therefore, after sundering this doubt concerning the self, born of beginningless ignorance and present in the heart, by the sword of the knowledge of the self in the manner explained before, practise the Karma Yoga taught by Me. For that, rise up, O Arjuna.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 4.42 Tasmat, therefore, O scion of the Bharata dynasty; atistha, take recourse to, i.e. undertake; yogam, yoga -performance of actions, which is a means to full Illumination; and now, uttistha, rise up for battle; chittva, cutting asunder; jnanasina, with the sword of Knowledge-Knowledge is full Illumination, which is a destroyer of such defects as sorrows, delusion, etc.; that itself is the sword; with that sword of Knowledge-;enam, this; samsayam, doubt; atmanah, of your own, which is a source of one's own ruin and is most sinful; hrtstham, in the heart, residing in the intellect; ajnana-sambhutam, arising from ignorance, born of non-discrimination. The word atmanah is used because doubt concerns oneself. Indeed, another's doubt cannot be removed by someone else. Hence the word 'own' is used. So, although the doubt is with regard to the Self, it is really one's own.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।4.42।। इस अन्तिम श्लोक में श्रीकृष्ण द्वारा दी गया सम्मति संक्षिप्त होते हुये भी प्रेमाग्रहपूर्ण है। यह श्लोक अर्जुन के प्रति उनकी स्नेह भावना से झंकृत हो रहा है।हिमालय की गिरिकन्दराओं के शान्त और एकान्त वातावरण मे दिये गये ऋषियों के उपदेश को यहाँ श्रीकृष्ण अपने योद्धामित्र अर्जुन को युद्ध की भाषा में ही समझाते हैं। हृदय में स्थित अज्ञान से उत्पन्न आत्मविषयक संशय को ज्ञान की तलवार द्वारा छिन्नभिन्न करने के लिये वे अर्जुन को प्रोत्साहित करते हैं।यहाँ संशय को हृदय मे स्थित कहा गया है आज के शिक्षित पुरुष को यह कुछ विचित्र जान पड़ेगा क्योंकि संशय बुद्धि से उत्पन्न होता है हृदय से नहीं।वेदान्त की धारण के अनुसार बुद्धि का निवास स्थान हृदय है। परन्तु स्थूल शरीर का अंगरूप हृदय यहां अभिप्रेत नहीं है। दर्शनशास्त्र में हृदय शब्द का मनोवैज्ञानिक अर्थ मे साहित्यिक प्रयोग किया जाता है। प्रेम सहानुभूति तथा इसी प्रकार की मनुष्य की श्रेष्ठ एवं आदर्श भावनाओं का स्रोत हृदय ही है। इस प्रेम से परिपूर्ण हृदय से जो बुद्धि कार्य करती है वही वास्तव में दर्शनशास्त्र की दृष्टि से मनुष्य की बुद्धि मानी जा सकती है। इसलिये जब यहाँ संशय को हृदय में स्थित कहा गया तब उसका तात्पर्य कुछ साधकों की विकृत बुद्धि से है जिसके कारण वे आत्मदर्शन नहीं कर पाते। अनेक प्रकार के संशयों की आत्यन्तिक निवृत्ति तभी संभव होगी जब साधक पुरुष आत्मा का साक्षात् अनुभव कर लेगा।यह योग के अभ्यास द्वारा ही संभव है। परन्तु योग का अर्थ कोई रहस्यमयी साधना नहीं जिसे कोई विरले गुरु गुप्त रूप से बतायेंगे और न ही वह ऐसी साधना है जिसका अभ्यास हिमालय की निर्जन गुफाओं में बैठकर करना पड़ेगा। योग सम्बन्धित जो भी भय उत्पन्न करने वाली मिथ्या धारणाएं है गीता में उन्हें सदा के लिये दूर करके उस शब्द को सुपरिचित और व्यावहारिक बना दिया गया है। जीवन के सभी कार्य क्षेत्रों में योग उपयोगी है। भगवान् श्रीकृष्ण के द्वारा इस अध्याय में जो बारह प्रकार के यज्ञ बताये गये हैं वे ही योग शब्द से लक्षित हैं।इस अध्याय की समाप्ति अर्जुन को उठने के आह्वान के साथ होती है उत्तिष्ठ भारत। यद्यपि गीतोपदेश के सन्दर्भ में भारत शब्द अर्जुन को ही सम्बोधित करता है तथापि अर्जुन के माध्यम से समस्त साधकों का यहाँ आह्वान किया गया है। यज्ञ साधना का आचरण करके हमको अधिकाधिक अन्तकरण शुद्धि प्राप्त करनी चाहिये जिससे कि निदिध्यासन के द्वारा हम विकास के चरम लक्ष्य परम शान्ति को प्राप्त कर सकें।Conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे ज्ञानकर्मसंन्यासयोगो नाम चतुर्थोऽध्याय।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।4.42।।यस्माच्चित्तशुद्धिलभ्यं ज्ञानमेवभूतं यस्माच्च संशयात्मा विनश्यति यस्माच्च ज्ञानसंच्छिन्नसंशयः कर्मभिर्न निबध्यते तस्मात्पापिष्ठमात्मनः संशयं अज्ञानादविवेकाज्जातं बुद्धौ स्थितं शोकमोहादिदोषहरं सभ्यग्दर्शनं ज्ञानं तदेवासिः खड्गः तेनात्मो ज्ञानासिना छित्त्वा योगमात्मज्ञानोपायं कर्मानुष्ठानमातिष्ठ कुर्वित्यर्थः। इदानीं तु स्वधर्मभूताय युद्धायोत्तिष्ठ। भारतेति तत्र योग्यतासूचकं संबोधनम्। तदनेन चतुर्थाध्यायेन योगस्य संप्रदायसिद्धत्वं भगवतो वासुदेवस्य सर्वज्ञत्वमीश्वरत्वं च प्रतिपाद्य योग्यतासंपत्तये कर्मनिष्ठां तत्साध्यां ज्ञाननिष्ठामत्युत्तमां तत्र प्रणिपातादीनि बहिरङ्गसाधनानि श्रद्धादीन्यन्तरङ्गाणि तस्याः फलं सर्वानर्थनिवृत्त्या ब्रह्मभावं अतिपापिष्ठं संशयं चाभिदधताऽशेषदोषवन्तं संशयं विहायोत्तमाधिकरिणो ज्ञाननिष्ठाऽपरस्य कर्मनिष्ठेति स्थापितम्।इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीबालस्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचितायां श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां चतुर्थोऽध्यायः।।4।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।4.42।।यस्मादेवं अज्ञानादविवेकात्संभूतमुत्पन्नं हृत्स्थं हृदि बुद्धौ स्थितं करणस्याश्रयस्य च ज्ञाने शत्रुः सुखेन हन्तुं शक्यत इत्युभयोपन्यासः। एनं सर्वानर्थमूलभूतं संशयमात्मनो ज्ञानासिना आत्मविषयकनिश्चयखङ्गेन छित्त्वा योगंसम्यग्दर्शनोपायं निष्कामकर्मातिष्ठ कुरु। अत इदानीमुत्तिष्ठ युद्धाय हे भारत भरतवंशे जातस्य युद्धोद्यमो न निष्फल इति भावः। स्वस्यानीशत्वाबाधेन भक्तिश्रद्धे दृढीकृते। धीहेतुः कर्मनिष्ठा च हरिणेहोपसंहृता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।4.42।।तस्मादिति। हृत्स्थं बुद्धिस्थम्। ज्ञानासिना ज्ञानखङ्गेन। योगं सम्यग्दर्शनोपायम्। निष्कामकर्म आतिष्ठ कुरु। उत्तिष्ठ। युद्धायेति शेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।4.42।।यतः संशयात्मा न पश्यति आत्मज्ञानवन्तं च कर्माणि न निबध्नन्ति तस्मादात्मज्ञानेन संशयं त्यजेत्याह तस्मादिति। हे भारत सत्कुलोत्पन्न संशयकरणायोग्य यस्मात् संशयेन नश्यति तस्मादात्मनः अज्ञानसम्मूतं आत्मस्वरूपाज्ञानोत्पन्नं हृत्स्थं हृदिस्थं एनं प्रत्यक्षमनुभूयमानं मद्वचनेष्वविश्वासात्मकं संशयं ज्ञानासिना ज्ञानात्मकखङ्गेन छित्त्वा योगं मदात्मकं मत्प्राप्त्यर्थं आतिष्ठ कुरु उत्तिष्ठ सावधानो भव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।4.42।।तस्मादिति। यस्मादेवं तस्मादात्मनोऽज्ञानेन संभूतं हृदि स्थितमेनं संशयं शोकादिनिमित्तं देहात्मविवेकज्ञानखङ्गेन छित्त्वा परमात्मज्ञानोपायभूतं कर्मयोगमातिष्ठाश्रय। तत्र च प्रथमं प्रस्तुताय युद्धायोत्तिष्ठ। हे भारत इति क्षत्रियत्वेन युद्धस्य स्वधर्मत्वं दर्शितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।4.42।।तस्मात्त्वमपि साङख्यबुद्ध्याऽनात्मभूतं संशयं छित्त्वोक्तं योगमातिष्ठ युद्धाय च स्वकर्मणे उद्युक्तो भव तदापि निर्बन्धनतेति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।4.42।।क्योंकि कर्मयोगका अनुष्ठान करनेसे अन्तःकरणकी अशुद्धिका क्षय हो जानेपर उत्पन्न होनेवाले आत्मज्ञानसे जिसका संशय नष्ट हो गया है ऐसा पुरुष तो ज्ञानाग्निद्वारा उसके कर्म दग्ध हो जानेके कारण कर्मोंसे नहीं बँधता तथा ज्ञानयोग और कर्मयोगके अनुष्ठानमें संशय रखनेवाला नष्ट हो जाता है इसलिये अज्ञान यानी अविवेकसे उत्पन्न और अन्तःकरणमें रहनेवाले ( अपने नाशकके हेतुभूत ) इस अत्यन्तपापी अपने संशयको ज्ञानखड्गद्वारा अर्थात् शोकमोह आदि दोनोंका नाश करनेवाला यथार्थ दर्शरूप जो ज्ञान है वही खड्ग है उस स्वरूपज्ञानरूप खड्गद्वारा ( छेदन करके कर्मयोगमें स्थित हो )। यहाँ संशय आत्मविषयक है इसलिये ( उसके साथ आत्मनः विशेषण दिया गया है। ) क्योंकि एकका संशय दूसरेके द्वारा छेदन करनेकी शङ्का यहाँ प्राप्त नहीं होती जिससे कि ( ऐसी शङ्काको दूर करनेके उद्देश्यसे ) आत्मनः विशेषण दिया जावे अतः ( यही समझना चाहिये कि ) आत्मविषयक होनेसे भी अपना कहा जा सकता है। ( सुतरां संशयको अपना बतलाना असंगत नहीं है। ) अतः अपने नाशके कारणरूप इस संशयको ( उपर्युक्त प्रकारसे ) काटकर पूर्ण ज्ञानकी प्राप्तिके उपायरूप कर्मयोगमें स्थित हो और हे भारत अब युद्धके लिये खड़ा हो जा।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।4.42।। व्याख्या   तस्मादज्ञानसम्भूतं ৷৷. छित्त्वैनं संशयम् पूर्वश्लोकमें भगवान्ने यह सिद्धान्त बताया कि जिसने समताके द्वारा समस्त कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद कर लिया है और ज्ञानके द्वारा समस्त संशयोंको नष्ट कर दिया है उस आत्मपरायण कर्मयोगीको कर्म नहीं बाँधते अर्थात् वह जन्ममरणसे मुक्त हो जाता है। अब भगवान् तस्मात् पदसे अर्जुनको भी वैसा ही जानकर कर्तव्यकर्म करनेकी प्रेरणा करते हैं।अर्जुनके हृदयमें संशय था युद्धरूप घोर कर्मसे मेरा कल्याण कैसे होगा और कल्याणके लिये मैं कर्मयोगका अनुष्ठान करूँ अथवा ज्ञानयोगका इस श्लोकमें भगवान् इस संशयको दूर करनेकी प्रेरणा करते हैं क्योंकि संशयके रहते हुए कर्तव्यका पालन ठीक तरहसे नहीं हो सकता।अज्ञानसम्भूतम् पदका भाव है कि सब संशय अज्ञानसे अर्थात् कर्मोंके और योगके तत्त्वको ठीकठीक न समझनेसे ही उत्पन्न होते हैं। क्रियाओँ और पदार्थोंको अपना और अपने लिये मानना ही अज्ञान है। यह अज्ञान जबतक रहता है तबतक अन्तःकरणमें संशय रहते हैं क्योंकि क्रियाएँ और पदार्थ विनाशी हैं और स्वरूप अविनाशी है। तीसरे अध्यायमें कर्मयोगका आचरण करनेकी और इस चौथे अध्यायमें कर्मयोगको तत्त्वसे जाननेकी बात विशेषरूपसे आयी है। कारण कि कर्म करनेके साथसाथ कर्मको जाननेकी भी बहुत आवश्यकता है। ठीकठीक जाने बिना कोई भी कर्म बढ़िया रीतिसे नहीं होता। इसके सिवाय अच्छी तरह जानकर कर्म करनेसे जो कर्म बाँधनेवाले होते हैं वे ही कर्म मुक्त करनेवाले हो जाते हैं (गीता 4। 16 32)। इसलिये इसअध्यायमें भगवान्ने कर्मोंको तत्त्वसे जाननेपर विशेष जोर दिया है।पूर्वश्लोकमें भी ज्ञानसंछिन्नसंशयम् पद इसी अर्थमें आया है। जो मनुष्य कर्म करनेकी विद्याको जान लेता है उसके समस्त संशयोंका नाश हो जाता है। कर्म करनेकी विद्या है अपने लिये कुछ करना ही नहीं है।योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत अर्जुन अपने धनुषबाणका त्याग करके रथके मध्यभागमें बैठ गये थे (1। 47)। उन्होंने भगवान्से साफ कह दिया था कि मैं युद्ध नहीं करूँगा न योत्स्ये (गीता 2। 9)। यहाँ भगवान् अर्जुनको योगमें स्थित होकर युद्धके लिये खड़े हो जानेकी आज्ञा देते हैं। यही बात भगवान्ने दूसरे अध्यायके अड़तालीसवें श्लोकमें योगस्थः कुरु कर्माणि (योगमें स्थित होकर कर्तव्यकर्म कर) पदोंसे भी कही थी। योगका अर्थ समता है समत्वं योग उच्यते (गीता 2। 48)।अर्जुन युद्धको पाप समझते थे (गीता 1। 36 45)। इसलिये भगवान् अर्जुनको समतामें स्थित होकर युद्ध करनेकी आज्ञा देते हैं क्योंकि समतामें स्थित होकर युद्ध करनेसे पाप नहीं लगता (गीता 2। 38)। इसलिये समतामें स्थित होकर कर्तव्यकर्म करना ही कर्मबन्धनसे छूटनेका उपाय है।संसारमें रातदिन अनेक कर्म होते रहते हैं पर उन कर्मोंमें रागद्वेष न होनेसे हम संसारके उन कर्मोंसे बँधते नहीं प्रत्युत निर्लिप्त रहते हैं। जिन कर्मोंमें हमारा राग या द्वेष हो जाता है उन्हीं कर्मोंसे हम बँधते हैं। कारण कि राग या द्वेषसे कर्मोंके साथ अपना सम्बन्ध जुड़ जाता है। जब रागद्वेष नहीं रहते अर्थात् समता आ जाती है तब कर्मोंके साथ अपना सम्बन्ध नहीं जुड़ता अतः मनुष्य कर्मबन्धनसे मुक्त हो जाता है।अपने स्वरूपको देखें तो उसमें समता स्वतःसिद्ध है। विचार करें कि प्रत्येक कर्मका आरम्भ होता है और समाप्ति होती है। उन कर्मोंका फल भी आदि और अन्तवाला होता है। परन्तु स्वरूप निरन्तर ज्योंकात्यों रहता है। कर्म और फल अनेक होते हैं पर स्वरूप एक ही रहता है। अतः कोई भी कर्म अपने लिये न करनेसे और किसी भी पदार्थको अपना और अपने लिये न माननेसे जब क्रियापदार्थरूप संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद हो जाता है तब स्वतःसिद्ध समताका अपनेआप अनुभव हो जाता है।इस प्रकार ँ़ तत् सत् इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूपश्रीकृष्णार्जुनसंवादमें ज्ञानकर्मसंन्यासयोग नामक चौथा अध्याय पूर्ण हुआ।।4।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।4.42।।यत एवम् (S omits यत एवम्) तस्मादिति। संशयं छित्त्वा योगं कर्मसु कौशलम् उक्तक्रमेण आतिष्ठ। ततश्च उत्तिष्ठ त्वं स्वव्यापारं कर्तव्यतामात्रेण कुर्विति।

Chapter 4 (Part 26)

Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।4.42।।तस्मादित्यादिसमनन्तरश्लोकगततत्पदापेक्षितमर्थमाह यस्मादिति। सतां कर्मणामस्मदादिषु फलारम्भकत्वोपलम्भाद्विदुष्यपि तेषां तद्भाव्यमनपबाधमित्याशङ्क्याह ज्ञानाग्नीति। ननु संदिहानस्य तत्प्रतिबन्धान्न कर्मयोगानुष्ठानं नापि तद्धेतुकज्ञानं तत्रापि संशयावतारादित्याशङ्क्याह यस्माच्चेति। श्लोकाक्षराणि व्याचष्टे तस्मादित्यादिना। पापिष्ठमिति संशयस्य सर्वानर्थमूलत्वेन त्याज्यत्वं सूच्यते। विवेकाग्रहप्रसूतत्वादपि तस्यावहेयत्वमविवेकस्यानर्थकरत्वप्रसिद्धेरित्याह अविवेकादिति। नच तस्य चैतन्यवदात्मनिष्ठत्वादत्याज्यत्वं शङ्कितव्यमित्याह हृदीति। शोकमोहाभ्यामभिभूतस्य पुंसो मनसि प्रादुर्भवतः संशयस्य प्रबलप्रतिबन्धकाभावेनैव प्रध्वंसः सिध्येदित्याशङ्क्याह ज्ञानासिनेति। स्वाश्रयस्य संशयस्य स्वाश्रयेणैव ज्ञानेन समुच्छेदसंभवात्किमिति स्वस्येति विशेषणमित्याशङ्क्याह आत्मविषयत्वादिति। स्थाण्वादिविषयः संशयस्तद्विषयेण ज्ञानेन देवदत्तनिष्ठेन तन्निष्ठो व्यावर्त्यते प्रकृते त्वात्मविषयस्तदाश्रयश्च संशयस्तथाविधेन ज्ञानेनापनीयते तेन विशेषणमर्थवदित्यर्थः। तदेव प्रपञ्चयति नहीति। आत्माश्रयत्वस्य प्रकृते संशये सिद्धत्वेनाविवक्षितत्वात्तद्विषयस्य तद्विषयेणैव तस्य तेन निवृत्तिर्विवक्षितेत्युपसंहरति अत इति। संशयसमुच्छित्त्यनन्तरं कर्तव्यमुपदिशति छित्त्वैनमिति। अग्निहोत्रादिकं कर्म भगवदाज्ञया क्रमेण करिष्यामि युद्धात्पुनरुपरिरंसैवेत्याशङ्क्याह उत्तिष्ठेति। भरतान्वये महति क्षत्रियवंशे प्रसूतस्य समुपस्थितसमरविमुखत्वमनुचितमिति मन्वानः सन्नाह भारतेति। तदनेन योगस्य कृत्रिमत्वं भगवतोऽनीश्वरत्वं च निराकृत्य कर्मादावकर्मादिदर्शनादात्मनः सम्यग्ज्ञानात्प्रणिपातादेर्बहिरङ्गादन्तरङ्गाच्च श्रद्धादेरुद्भूतादशेषानर्थनिवृत्त्या ब्रह्मभावमभिदधता सर्वस्मादुत्कृष्टे तस्मिन्नसंशयानस्याधिकारादशेषदोषवन्तम्। संशयं हित्वोत्तमस्य ज्ञाननिष्ठापरस्य कर्मनिष्ठेति स्थापितम्।इत्यानन्दगिरिकृतगीताभाष्यटीकायां चतुर्थोऽध्यायः।।4।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।4.42।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।4.42।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।4.42।।तस्माद् अनाद्यज्ञानसंभूतं हृत्स्थम् आत्मविषयं संशयं मया उपदिष्टेन आत्मज्ञानासिना छित्त्वा मया उपदिष्टं कर्मयोगम् आतिष्ठ तदर्थम् उत्तिष्ठ भारत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।4.42) तस्मात् पापिष्ठम् अज्ञानसंभूतम् अज्ञानात् अविवेकात् जातं हृत्स्थं हृदि बुद्धौ स्थितं ज्ञानासिना शोकमोहादिदोषहरं सम्यग्दर्शनं ज्ञानं तदेव असिः खङ्गः तेन ज्ञानासिना आत्मनः स्वस्य आत्मविषयत्वात् संशयस्य। न हि परस्य संशयः परेण च्छेत्तव्यतां प्राप्तः येन स्वस्येति विशेष्येत। अतः आत्मविषयोऽपि स्वस्यैव भवति। छित्त्वा एनं संशयं स्वविनाशहेतुभूतम् योगं सम्यग्दर्शनोपायं कर्मानुष्ठानम् आतिष्ठ कुर्वित्यर्थः। उत्तिष्ठ च इदानीं युद्धाय भारत इति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रोगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येचतुर्थोऽध्यायः।।