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5. Bhagavad Gita — Chapter 5

Chapter 5 (Part 1)

【 Verse 5.1 】

▸ Sanskrit Sloka: अर्जुन उवाच | संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि | यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ||

▸ Transliteration: arjuna uvāca | sannyāsaṁ karmaṇāṁ kṛṣṇa punaryogaṁ ca śaṁsasi | yacchreya etayorekaṁ tanme brūhi suniścitaṁ ||

▸ Glossary: arjuna uvāca: Arjuna says; sannyāsaṁ: renunciation; karmaṇāṁ: of all actions; kṛṣṇa: O Kṛṣṇa; punaḥ: again; yogaṁ: devotion; ca: also; śaṁsasi: praising; yat: which; śreyaḥ: beneficial; etayoḥ: of the two; ekaṁ: one; tat: that; me: to me; brūhi: please tell; suniścitaṁ: definitely

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.1 Arjuna says: Oh Kṛṣṇa, you asked me to renounce work first and then you asked me to work with devotion. Will you now please tell me, definetely, which of the two will be more beneficial to me?

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.1।।अर्जुन बोले हे कृष्ण आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। अतः इन दोनों साधनोंमें जो निश्चितरूपसे कल्याणकारक हो उसको मेरे लिये कहिये।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.1।। अर्जुन ने कहा हे कृष्ण आप कर्मों के संन्यास की और फिर योग (कर्म के आचरण) की प्रशंसा करते हैं। इन दोनों में एक जो निश्चय पूर्वक श्रेयस्कर है उसको मेरे लिए कहिये।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.1 संन्यासम् renunciation? कर्मणाम् of actions? कृष्ण O Krishna? पुनः again? योगम् Yoga? च and? शंससि (Thou) praisest? यत् which? श्रेयः better? एतयोः of these two? एकम् one? तत् that? मे to me? ब्रूहि tell? सुनिश्चितम् conclusively.Commentary Thou teachest renunciation of actions and also their performance. This has confused me. Tell decisively now which is better. It is not possible for a man to resort to both of them at the same time. Yoga here means Karma Yoga. (Cf.III.2)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.1. Arjuna said O krsna, you commend renunciation of action and again the Yoga of action; which one of these two is superior [to the other] ? Please tell me that for certain.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.1 "Arjuna said: My Lord! At one moment Thou praisest renunciation of action; at another, right action. Tell me truly, I pray, which of these is the more conducive to my highest welfare?

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.1 Arjuna said You praise, O Krsna, the renunciation of actions and then praise Karma Yoga also. Tell me with certainly which of these is the superior one leading to the ultimate good.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.1 Arjuna said O Krsna, You praise renunciation of actions, and again, (Karma-) yoga. Tell me for certain that one which is better between these two.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.1 Arjuna said Renunciation of actions, O Krishna, Thou praisest, and again Yoga. Tell me conclusively that which is the better of the two.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.1 Samnyasam etc. Is renunciation superior or Yoga ? this is the estion of the doubting person (Arjuna).

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.1 Arjuna said 'You praise the renunciation of actions, i.e., Jnana Yoga at one time, and next Karma Yoga'. This is what is objected to: In the second chapter, you have said that Karma Yoga alone should be practised first by an aspirant for release; and that the vision of the self should be achieved by means of Jnana Yoga by one whose mind has its blemishes washed away by Karma Yoga. Again, in the third and fourth chapters, you have praised Karma Yoga or devotion to Karma as better than Jnana Yoga even for one who has attained the stage of Jnana Yoga, and that, as a means of attaining the self, it (Karma Yoga) is independent of Jnana Yoga. Therefore, of these two, Jnana Yoga and Karma Yoga - tell me precisely which by itself is superior, i.e., most excellent, being more easy to practise, and icker to confer the vision of the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.1 (O Krsna,) samsasi, You praise, i.e. speak of; sannyasam, renunciation; karmanam, of actions, of performance of various kinds of rites enjoined by the scriptures; punah ca, and again; You praise yogam, yoga, the obligatory performance of those very rites! Therefore I have a doubt as to which is better-Is the performance of actions better, or their rejection? And that which is better should be undertaken. And hence, bruhi, tell; mam, me; suniscitam, for certain, as the one intended by You; tat ekam, that one-one of the two, since performance of the two together by the same person is impossible; yat, which; is sreyah, better, more commendable; etayoh, between these two, between the renunciation of actions and the performance of actions [Ast. reads karma-yoga-anusthana (performance of Karma-yoga) in place of karma-anusthana (performance of actions).-Tr.], by undertaking which you think I shall acire what is beneficial. While stating His own opinion in order to arrive at a conclusion-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.1।। अर्जुन के इस प्रश्न से स्पष्ट होता है कि अनजाने में ही वह अपनी नैराश्य अवस्था से बहुत कुछ मुक्त हुआ भगवान् के उपदेश को ध्यानपूर्वक श्रवण करके विचार भी करने लगा था। स्वभाव से क्रियाशील होने के कारण अर्जुन को कर्मयोग रुचिकर तथा स्वीकार्य था। परन्तु अनेक स्थानों पर श्रीकृष्ण द्वारा अन्य यज्ञों की अपेक्षा ज्ञान अथवा कर्मसंन्यास को अधिक श्रेष्ठ प्रतिपादित करने से अर्जुन के मन में सन्देह उत्पन्न हुआ और यही कारण था कि वह स्वयं के लिए किसी मार्ग का निश्चय नहीं कर सका। अत इसका निश्चय कराना ही अर्जुन के प्रश्न का प्रयोजन है।और एक बात यह भी है कि मानसिक उन्माद का रोगी उस रोग के प्रभाव से कुछ मुक्त होने पर भी शीघ्र ही पूर्ण आत्मविश्वास नहीं जुटा पाता। यह सबका अनुभव है कि भयंकर स्वप्न से जागे हुए व्यक्ति को पुन संयमित होकर निद्रा अवस्था में आने के उपक्रम में कुछ समय लग जाता है। अर्जुन की ठीक ऐसी ही स्थिति थी। मानसिक तनाव एवं उन्माद की स्थिति से बाहर आने पर भी अपने सारथी श्रीकृष्ण के उपदेश को पूर्णरूप से समझने तथा विचार करने में वह स्वयं को असमर्थ पा रहा था। अर्जुन इस निष्कर्ष पर पहुँचा था कि भगवान् उसके सामने कर्मयोग तथा कर्मसंन्यास के रूप में दो विकल्प प्रस्तुत कर रहे हैं। अत वह श्रीकृष्ण से यह जानना चाहता है कि उसके आत्मकल्याण के लिये इन दोनों में से कौन सा एक निश्चित मार्ग अनुकरणीय है। इस अध्याय का प्रयोजन यह बताने का है कि ये दो मार्ग विकल्प रूप नहीं है और न ही परस्पर पूरक होते हुये युगपत अनुष्ठेय हैं।कर्मयोग तथा कर्मसंन्यास इनका इसी क्रम में आचरण करना है और न कि एक साथ दोनों का। यही इस अध्याय का विषय है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.1।।निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्। यदृच्छालाभसंतुष्टः इत्यादिना सर्वकर्मसन्यासंछित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोतिष्ठ भारत इति कर्मयोगं च श्रुत्वोभयोश्च स्थितिगतिवत्परस्परविरोधादेकेन सह कर्तुमशक्यत्वात् कालभेदेन विधानाभावादर्थात्तयोरन्यतरस्य कर्तव्यताप्राप्तौ सत्यामज्ञस्याशुद्धचेतस एतयोः संन्यासकर्मयोग्योः किं श्रेयस्करमिति बुभुत्सयार्जुन उवाच संन्यासमिति। संन्यासं परित्यागं कर्मणां शास्त्रीयाणामनुष्ठानविशेषाणां पुनस्तेषामनुष्ठानं च।एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रवजन्तितमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इत्यादि वेदमूलकैः पूर्वोक्तैर्वचनैः शंससि कथयसि। कृष्णेति संबोधयन् मया त्यागः कर्तव्य उत कर्मानुष्ठेयमिति तत्रतत्र मच्चित्ताकर्षणं करोषीति सूचयति। अतो मे कतरच्छ्रेय इति संशयो भवति तस्माद्यदेतयोरेकं प्रशस्यतरं सुनिश्चितं तन्मे ब्रूहि निःसंशयाय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.1।।अध्यायाभ्यां कृतो द्वाभ्यां निर्णयः कर्मबोधयोः। कर्मतत्त्यागयोर्द्वाभ्यां निर्णयः क्रियतेऽधुना।।तृतीयेऽध्यायेज्यायसी चेत्कर्मणस्ते इत्यादिनाऽर्जुनेन पृष्टो भगवाञ्ज्ञानकर्मणोर्विकल्पसमुच्चयासंभवेनाधिकारिभेदव्यवस्थयालोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा पुरा प्रोक्ता मया इत्यादिना निर्णयं कृतवान्। तथाचाज्ञाधिकारिकं कर्म न ज्ञानेन सह समुच्चीयते तेजस्तिमिरयोरिव युगपदसंभवात् कर्माधिकारहेतुभेदबुद्ध्यपनोदकत्वेन ज्ञानस्य तद्विरोधित्वात्। नापि विकल्प्यते एकार्थत्वाभावात् ज्ञानकार्यस्याज्ञाननाशस्य कर्मणा कर्तुमशक्यत्वात्।तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति श्रुतेः। ज्ञाने जाते तु कर्मकार्यं नापेक्ष्यत एवेत्युक्तंयावानर्थ उदपाने इत्यत्र। तथाच ज्ञानिनः कर्मानधिकारे निश्चिते प्रारब्धकर्मवशाद्वृथाचेष्टारूपेण तदनुष्ठानं वा सर्वकर्मसंन्यासो वेति निर्विवादं चतुर्थे निर्णीतम्। अज्ञेन त्वन्तःकरणशुद्धिद्वारा ज्ञानोत्पत्तये कर्माण्यनुष्ठेयानितमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इति श्रुतेःसर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते इति भगवद्वचनाच्च। एवं सर्वाणि कर्माणि ज्ञानार्थानि तथा सर्वकर्मसंन्यासोऽपि ज्ञानार्थः श्रूयतेएतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्तिशान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्येत्त्यजतैव हि तज्ज्ञेयं त्यक्तुः प्रत्यक् परं पदम्सत्यानृते सुखदुःखे वेदानिमं लोकममुं च परित्यज्यात्मानमन्विच्छेत् इत्यादौ। तत्र कर्मतत्त्यागयोरारादुपकारकसन्निपत्योपकारकयोः प्रयाजावघातयोरिव न समुच्चयः संभवति विरुद्धत्वेन यौगपद्याभावात्। नापि कर्मतत्त्यागयोरात्मज्ञानमात्रफलत्वेनैकार्थत्वादतिरात्रार्थयोः षोडशिग्रहणाग्रहणयोरिव विकल्पः स्यात् द्वारभेदेनैकार्थत्वाभावात्। कर्मणो हि पाक्षयरूपमदृष्टमेव द्वारम् संन्यासस्य तु सर्वविक्षेपाभावेन विचारावसरदानरूपं दृष्टमेव द्वारम् नियमापूर्वं तु दृष्टसमवायित्वादवघातादाविव न प्रयोजकम्। तथा चादृष्टार्थयोरारादुपकारकसन्निपत्योपकारकयोरेकप्रधानार्थत्वेऽपि विकल्पो नास्त्येव। प्रयाजावघातादीनामपि तत्प्रसङ्गात्। तस्मात्क्रमेणोभयमप्यनुष्ठेयम्। तत्रापि संन्यासानन्तरं कर्मानुष्ठानं चेत्तदा परित्यक्तपूर्वाश्रमस्वीकारेणारूढपतित्वात्कर्मानधिकारित्वं प्राक्तनसंन्यासवैयर्थ्यं च तस्यादृष्टार्थत्वाभावात्। प्रथमकृतसंन्यासेनैव ज्ञानाधिकारलाभे तदुत्तरकाले कर्मानुष्ठानवैयर्थ्यं च। तस्मादादौ भगवदर्पणबुद्ध्या निष्कामकर्मानुष्ठानादन्तःकरणशुद्धौ तीव्रेण वैराग्येण विविदिषायां दृढायां सर्वकर्मसंन्यासः श्रवणमननादिरूपवेदान्तवाक्यविचाराय कर्तव्य इति भगवतो मतम्। तथाचोक्तंन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते इति। वक्ष्यते चआरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते। योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते।। इति। योगोऽत्र तीव्रवैराग्यपूर्विका विविदिषा। तदुक्तं वार्तिककारैःप्रत्यग्विविदिषासिद्ध्यै वेदानुवचनादयः। ब्रह्मावाप्त्यै तु तत्त्यागमीप्सन्तीति श्रुतेर्बलात्।। इति। स्मृतिश्चकषायपक्तिः कर्माणि ज्ञानं तु परमा गतिः। कषाये कर्मभिः पक्वे ततो ज्ञानं प्रवर्तते।। इति। मोक्षधर्मे चकषायं पाचयित्वा च श्रेणीस्थानेषु च त्रिषु। प्रव्रजेच्च परं स्थानं पारिव्राज्यमनुत्तमम्।।भावितैः करणैश्चायं बहुसंसारयोनिषु। आसादयति शुद्धात्मा मोक्षं वै प्रथमाश्रमे।।तमासाद्य तु मुक्तस्य दृष्टार्थस्य विपश्चितः। त्रिष्वाश्रमेषु कोन्वर्थो भवेत्परमभीप्सितः।। इति। मोक्षं वैराग्यम्। एतेन क्रमाक्रमसंन्यासौ द्वावपि दर्शितौ। तथाच श्रुतिःब्रह्मचर्यं समाप्य गृही भवेद्गृहाद्वनीभूत्वा प्रव्रजेद्यदिवेतरथा ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेद्गृहाद्वा वनाद्वा यदहरेव विरजेत्तदहरेव प्रव्रजेत् इति। तस्मादज्ञस्याविरक्ततादशायां कर्मानुष्ठानमेव। तस्यैव विरक्ततादशायां संन्यासः श्रवणाद्यवसरदानेन ज्ञानार्थ इति दशाभेदेनाज्ञमधिकृत्यैव कर्मतत्त्यागौ व्याख्यातुं पञ्चमषष्ठावध्यायावारभ्येते। विद्वत्संन्यासस्तु ज्ञानबलादर्थसिद्धि एवेति संदेहाभावान्नात्र विचार्यते। तत्रैकमेव जिज्ञासुमज्ञं प्रति ज्ञानार्थत्वेन कर्मतत्त्यागयोर्विधानात्तयोश्च विरुद्धयोर्युगपदनुष्ठानासंभवान्मया जिज्ञासुना किमिदानीमनुष्ठेयमिति संदिहानः अर्जुन उवाच हे कृष्ण सदानन्दरूप भक्तदुःखकर्षणेति वा। कर्मणां यावज्जीवादिश्रुतिविहितानां नित्यानां नैमित्तिकानां च संन्यासं त्यागं जिज्ञासुमज्ञं प्रति कथयसि वेदमुखेन पुनस्तद्विरुद्धं योगं च कर्मानुष्ठानरूपं शंससि।एतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्तितमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन इत्यादिवाक्यद्वयेन।निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः। शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम्।।छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत इति गीतावाक्यद्वयेन वा। तत्रैकमज्ञं प्रति कर्मतत्त्यागयोर्विधानाद्युगपदुभयानुष्ठानासंभवादेतयोः कर्मतत्त्यागयोर्मध्ये यदेकं श्रेयः प्रशस्यतरं मन्यसे कर्म वा तत्त्यागं वा तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितं तव मतमनुष्ठानाय।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.1।।तृतीयेऽध्यायेलोकेऽस्मिन्द्विविधा निष्ठा इति विभिन्नाधिकारिकं निष्ठाद्वयं प्रस्तुत्यन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते इत्यादिना कर्मनिष्ठाया ज्ञाननिष्ठाङ्गत्वेन भूयसा निर्बन्धेनानुष्ठेयत्वमुक्तम्कर्मण्येवाधिकारस्ते इत्यादिना। चतुर्थे तूत्पन्नसम्यग्दर्शनैः कृतमपि कर्माकृतमेव भवति ज्ञानेन कर्तृत्वादिबाधात्। अतस्तैर्वृथाचेष्टावत्कर्म वा कर्तव्यं संन्यासो वा कर्तव्य इत्यनास्थया प्रोक्तम्। अथेदानीं पञ्चमषष्ठयोरज्ञानिना ज्ञानार्थिना वैराग्योत्पत्तेः प्राक्कर्मैवानुष्ठेयम्। संपन्ने तु वैराग्ये दृष्टविक्षेपनिवृत्त्यर्थं कर्मसंन्यासं कृत्वा ज्ञानोत्पत्त्यर्थं योगोऽनुष्ठेय इत्युच्यते। तत्र चतुर्थेत्यक्तसर्वपरिग्रहः इति संन्यासोयोगमातिष्ठ इति कर्मयोगश्चैकं मां प्रति विहितः। न चैतयोः स्थितिगतिवद्युगपदेकेन मयानुष्ठानं कर्तुं शक्यते परस्परविरुद्धत्वादिति मन्वानोऽर्जुन उवाच संन्यासमिति। हे कृष्ण पापकर्षण मे मह्यं ज्ञानार्थिने संन्यासं कर्मयोगं चेति द्वयं परस्परविरुद्धं कथं शंससि कथयसि। पुनरित्यनेन प्रागपि त्वया वेदकर्त्रा इदं द्वयं विहितमस्तीति गम्यते। तथाच श्रुतिस्मृति भवतःएतमेव प्रव्राजिनो लोकमिच्छन्तः प्रव्रजन्तिसंसारमेवं निःसारं दृष्ट्वा सारदिदृक्षया। प्रव्रजन्त्यकृतोद्वाहाः परं वैराग्यमास्थिताः। इति च। तथातमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन इतिमहायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं क्रियते तनुः इति च। ब्राह्मी ब्रह्मदर्शनयोग्या। अत एतयोः श्रुतिविहितत्वेन प्रशस्यतयोर्मध्ये एकं श्रेयः प्रशस्तरं यत्तन्मे सुनिश्चितं ब्रूहीति प्रश्नः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.1।।सन्न्यासं कर्मयोगं च श्रीकृष्णोक्तं धनञ्जयः। श्रुत्वा संशयमापन्नः पुनः प्रश्नं चकार ह।।अर्जुन उवाच सन्न्यासमिति। हे कृष्ण सदानन्द आनन्दैकदानयोग्य कर्मणां सन्न्यासं त्यागंन मां कर्माणि 4।14 इत्यारभ्यकृत्वाऽपि न निबध्यते 4।22 इत्यन्तं शंससि पुनःयोगमातिष्ठ 4।42 इत्यनेन योगं च शंससि। एतयोरुभयोर्मध्ये एकं सुनिश्चितं निर्धारितं ब्रूहि। च पुनरेतयोरुभयोः सकाशादेकमन्यद्यच्छ्रेयः श्रेयोरूपं भक्तिरूपं भवेत् तन्मे मम त्वदीयस्य सुनिश्चितं संशयरूपं ब्रूहि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.1।।निर्वाय संशयं जिष्णोः कर्मसंन्यासयोगयोः। जितेन्द्रियस्य च यतेः पञ्चमे मुक्तिमब्रवीत्।।1।।अज्ञानसंभूतं संशयं ज्ञानासिना छित्त्वा कर्मयोगमातिष्ठेत्युक्तं तत्र पूर्वापरविरोधं मन्वानोऽर्जुन उवाच संन्यासमिति।यस्त्वात्मरतिरेव स्यात् इत्यादिनासर्वं कर्माखिलं पार्थ इत्यादिना च ज्ञानिनः कर्मसंन्यासं कथयसि। ज्ञानासिना संशयं छित्त्वा योगमातिष्ठेति पुनर्योगं च कथयसि। न च कर्मसंन्यासः कर्मयोगश्चैकस्यैकदैव संभवतः विरुद्धस्वरूपत्वात्। तस्मादेतयोर्मध्ये एकस्मिन्ननुष्ठातव्ये सति मम यच्छ्रेयः श्रेष्ठं सुनिश्चितं तदेकं ब्रूहि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.1।।साङ्ख्ययोगैकार्थमतं स्वकर्मकरणं बहिः। इत्यबुद्ध्वा निजश्रेयोनिश्चये पृच्छति क्षमम्।।1।।अर्जुन उवाच सन्न्यासमिति। साङ्ख्यानामेव कर्मणां सन्न्यासं त्यागं कथयसि योगं च। तत्र कर्मणां पुनर्योगे सम्बन्धं वा कथयसि। नहि कर्मसन्न्यासः कर्मयोगश्चैकस्यैकदैव सम्भवतः विरुद्धस्वरूपत्वात्। तस्मादेकं सुनिश्चितं मम श्रेयो वद।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.1।।केवल संन्यास करनेमात्रसे ही सिद्धिको प्राप्त नहीं होता है इस वचनसे ज्ञानसहित संन्यासको ही सिद्धिका साधन माना है साथ ही कर्मयोगका भी विधान किया है इसलिये ज्ञानरहित संन्यास कल्याणकर हैअथवा कर्मयोग इन दोनोंकी विशेषता जाननेकी इच्छासे अर्जुन बोला आप पहले तो शास्त्रोक्त बहुत प्रकारके अनुष्ठानरूप कर्मोंका त्याग करनेके लिये कहते हैं अर्थात् उपदेश करते हैं और फिर उनके अनुष्ठानकी अवश्यकर्तव्यतारूप योगको भी बतलाते हैं। इसलिये मुझे यह शङ्का होती है कि इनमेंसे कौनसा श्रेयस्कर है। कर्मोंका अनुष्ठान करना कल्याणकर है अथवा उनका त्याग करना जो श्रेष्ठतर हो उसीका अनुष्ठान करना चाहिये इसलिये इन कर्मसंन्यास और कर्मयोगमें जो श्रेष्ठ हो अर्थात् जिसका अनुष्ठान करनेसे आप यह मानते हैं कि मुझे कल्याणकी प्राप्ति होगी उस भलीभाँति निश्चय किये हुए एक ही अभिप्रायको अलग करके कहिये क्योंकि एक पुरुषद्वारा एक साथ दोनोंका अनुष्ठान होना असम्भव है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.1।। व्याख्या   संन्यासं कर्मणां कृष्ण कौटुम्बिक स्नेहके कारण अर्जुनके मनमें युद्ध न करनेका भाव पैदा हो गया था। इसके समर्थनमें अर्जुनने पहले अध्यायमें कई तर्क और युक्तियाँ भी सामने रखीं। उन्होंने युद्ध करनेको पाप बताया (गीता 1। 45)। वे युद्ध न करके भिक्षाके अन्नसे जीवननिर्वाह करनेको श्रेष्ठ समझने लगे (2। 5) और उन्होंने निश्चय करके भगवान्से स्पष्ट कह भी दिया कि मैं किसी भी स्थितिमें युद्ध नहीं करूँगा (2। 9)।प्रायः वक्ताके शब्दोंका अर्थ श्रोता अपने विचारके अनुसार लगाया करते हैं। स्वजनोंको देखकर अर्जुनके हृदयमें जो मोह पैदा हुआ उसके अनुसार उन्हें युद्धरूप कर्मके त्यागकी बात उचित प्रतीत होने लगी। अतः भगवान्के शब्दोंको वे अपने विचारके अनुसार समझ रहे हैं कि भगवान् कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके प्रचलित प्रणालीके अनुसार तत्त्वज्ञान प्राप्त करनेकी ही प्रशंसा कर रहे हैं।पुनर्योगं च शंससि चौथे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें भगवान्ने कर्मयोगीको दूसरे किसी साधनके बिना अवश्यमेव तत्त्वज्ञान प्राप्त होनेकी बात कही है। उसीको लक्ष्य करके अर्जुन भगवान्से कह रहे हैं कि कभी तो आप ज्ञानयोगकी प्रशंसा (4। 33) करते हैं और कभी कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं (4। 41)।यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् इसी तरहका प्रश्न अर्जुनने दूसरे अध्यायके सातवें श्लोकमें भी यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे पदोंसे किया था। उसके उत्तरमें भगवान्ने दूसरे अध्यायके सैंतालीसवेंअड़तालीसवें श्लोकोंमें कर्मयोगकी व्याख्या करके उसका आचरण करनेके लिये कहा। फिर तीसरे अध्यायके दूसरे श्लोकमें अर्जुनने तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् पदोंसे पुनः अपने कल्याणकी बात पूछी जिसके उत्तरमें भगवान्ने तीसरे अध्यायके तीसवें श्लोकमें निष्काम निर्मम और निःसंताप होकर युद्ध करनेकी आज्ञा दी तथा पैंतीसवें श्लोकमें अपने धर्मका पालन करनेको श्रेयस्कर बताया।यहाँ उपर्युक्त पदोंसे अर्जुनने जो बात पूछी है उसके उत्तरमें भगवान्ने कहा है कि कर्मयोग श्रेष्ठ है (5। 2) कर्मयोगी सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है (5। 3) कर्मयोगके बिना सांख्ययोगका साधन सिद्ध होना कठिन है परन्तु कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है (5। 6)। इस प्रकार कहकर भगवान् अर्जुनको मानो यह बता रहे हैं कि कर्मयोग ही तेरे लिये शीघ्रता और सुगमतापूर्वक ब्रह्मकी प्राप्ति करानेवाला है अतः तू कर्मयोगका ही अनुष्ठान कर।अर्जुनके मनमें मुख्यरूपसे अपने कल्याणकी ही इच्छा थी। इसलिये वे बारबार भगवान्के सामने श्रेयविषयक जिज्ञासा रखते हैं (2। 7 3। 2 5। 1)। कल्याणकी प्राप्तिमें इच्छाकी प्रधानता है। साधनकी सफलतामें देरीका कारण भी यही है कि कल्याणकी इच्छा पूरी तरह जाग्रत् नहीं हुई। जिन साधकोंमें तीव्र वैराग्य नहीं है वे भी कल्याणकी इच्छा जाग्रत् होनेपर कर्मयोगका साधन सुगमतापूर्वक कर सकते हैं (टिप्पणी प0 278)। अर्जुनके हृदयमें भोगोंसे पूरा वैराग्य नहीं है पर उनमें अपने कल्याणकी इच्छा है इसलिये वे कर्मयोगके अधिकारी हैं।पहले अध्यायके बत्तीसवें तथा दूसरे अध्यायके आठवें श्लोकको देखनेसे पता लगता है कि अर्जुन मृत्युलोकके राज्यकी तो बात ही क्या है त्रिलोकीका राज्य भी नहीं चाहते। परन्तु वास्तवमें अर्जुन राज्य तथा भोगोंको सर्वथा नहीं चाहते हों ऐसी बात भी नहीं है। वे कहते हैं कि युद्धमें कुटुम्बीजनोंको मारकर राज्य तथा विजय नहीं चाहता। इसका तात्पर्य है कि यदि कुटुम्बीजनोंको मारे बिना राज्य मिल जाय तो मैं उसे लेनेको तैयार हूँ। दूसरे अध्यायके पाँचवें श्लोकमें अर्जुन यही कहते हैं कि गुरुजनोंको मारकर भोग भोगनाठीक नहीं है। इससे यह ध्वनि भी निकलती है कि गुरुजनोंको मारे बिना राज्य मिल जाय तो वह स्वीकार है। दूसरे अध्यायके छठे श्लोकमें अर्जुन कहते हैं कि कौन जीतेगा इसका हमें पता नहीं और उन्हें मारकर हम जीना भी नहीं चाहते। इसका तात्पर्य है कि यदि हमारी विजय निश्चित हो तथा उनको मारे बिना राज्य मिलता हो तो मैं लेनेको तैयार हूँ। आगे दूसरे अध्यायके सैंतीसवें श्लोकमें भगवान् अर्जुनसे कहते हैं कि तेरे तो दोनों हाथोंमें लड्डू हैं यदि युद्धमें तू मारा गया तो तुझे स्वर्ग मिलेगा और जीत गया तो राज्य मिलेगा। यदि अर्जुनके मनमें स्वर्ग और संसारके राज्यकी किञ्चिन्मात्र भी इच्छा नहीं होती तो भगवान् शायद ही ऐसा कहते। अतः अर्जुनके हृदयमें प्रतीत होनेवाला वैराग्य वास्तविक नहीं है। परन्तु उनमें अपने कल्याणकी इच्छा है जो इस श्लोकमें भी दिखायी दे रही है। सम्बन्ध   अब भगवान् अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.1।।संन्यासमिति। संन्यासः प्रधानम् पुनः योगः इति ससंशयस्य प्रश्नः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.1।।पूर्वोत्तराध्याययोः संबन्धमभिदधानो वृत्तानुवादपूर्वकमर्जुनप्रश्नस्याभिप्रायं प्रदर्शयितुं प्रक्रमते कर्मणीत्यादिना। इत्यारभ्य कर्मण्यकर्मदर्शनमुक्त्वा तत्प्रशंसा प्रसारितेत्याह स युक्त इति। ज्ञानवन्तं सर्वाणि कर्माणि लोकसंग्रहार्थं कुर्वन्तं ज्ञानलंक्षणेनाग्निना दग्धसर्वकर्माणं कर्मप्रयुक्तबन्धविधुरं विवेकवन्तो वदन्तीति ज्ञानवतो ज्ञानफलभूतं संन्यासं विवक्षन्विविदिषोः साधनरूपमपि संन्यासं भगवान्विवक्षितवानित्याह ज्ञानाग्नीति। निराशीरित्यारभ्य शरीरस्थितिमात्रकारणं कर्म शरीरस्थितावपि सङ्गरहितः सन्नाचरन्धर्माधर्मफलभागी न भवतीत्यपि पूर्वोत्तराभ्यामध्यायाभ्यां द्विविधं संन्यासं सूचितवानित्याह शारीरमिति। यदृच्छेत्यादावपि संन्यासः सूचितस्तद्धर्मफलायोपदेशादित्याह यदृच्छेति। ज्ञानस्य यज्ञत्वसंपादनपूर्वकं प्रशंसावचनादपि कर्मसंन्यासो दर्शितो ज्ञाननिष्ठस्येत्याह ब्रह्मार्पणमिति। ज्ञानयज्ञस्तुत्यर्थं नानाविधान्यज्ञाननूद्य तेषां देहादिव्यापारजन्यत्ववचनेनात्मनो निर्व्यापारत्वविज्ञानफलाभिलाषादपि यथोक्तमात्मानं विविदिषोः सर्वकर्मसंन्यासेऽधिकारो ध्वनित इत्याह कर्मजानिति। समस्तस्यैवावशेषवर्जितस्य कर्मणो ज्ञाने पर्यवसानाभिधानाच्च जिज्ञासोः सर्वकर्मसंन्यासः सूचित इत्याह सर्वमिति। तद्विद्धीत्यादिना ज्ञानप्राप्त्युपायं प्रणिपातादि प्रदर्श्य प्राप्तेन ज्ञानेनातिशयमाहात्म्यवता सर्वकर्मणां निवृत्तिरेवेति वदता च ज्ञानार्थिनः संन्यासेऽधिकारो दर्शितो भगवतेत्याह ज्ञानाग्निरिति। ज्ञानेन समुच्छिन्नसंशयं तस्मादेव ज्ञानात्कर्माणि संन्यस्य व्यवस्थितमप्रमत्तं वशीकृतकार्यकरणसंघातवन्तं प्रातिभासिकानि कर्माणि न निबध्नन्तीत्यपि द्विविधः संन्यासो भगवतोक्त इत्याह योगेति। कर्मणीत्यारभ्य योगसंन्यस्तकर्माणमित्यन्तैरुदाहृतैर्वचनैरुक्तं संन्यासमुपसंहरति इत्यन्तैरिति। तर्हि कर्मसंन्यासस्यैव जिज्ञासुना ज्ञानवता चादरणीयत्वात्कर्मानुष्ठानमनादेयमापन्नमित्याशङ्क्योक्तमर्थान्तरमनुवदति छित्त्वैनमिति। कर्मतत्त्यागयोरुक्तयोरेकेनैव पुरुषेणानुष्ठेयत्वसंभवान्न विरोधोऽस्तीत्याशङ्क्य युगपद्वा क्रमेण वानुष्ठानमिति विकल्प्याद्यं दूषयति उभयोश्चेति। द्वितीयं प्रत्याह कालभेदेनेति। उक्तयोर्द्वयोरेकेन पुरुषेणानुष्ठेयत्वासंभवे कथं कर्तव्यत्वसिद्धिरित्याशङ्क्याह अर्थादिति। द्वयोरुक्तयोरेकेन युगपत्क्रमाभ्यामनुष्ठानानुपपत्तेरित्यर्थः। अन्यतरस्य कर्तव्यत्वे कतरस्येति कुतो निर्णयो द्वयोः संनिधानाविशेषादित्याशङ्क्याह यत्प्रशस्यतरमिति। भगवता कर्मणां संन्यासो योगश्चोक्तो नच तयोः समुच्चित्यानुष्ठानं तेनान्यतरस्य श्रेष्ठस्यानुष्ठेयत्वे तद्बुभुत्सया प्रश्नोपपत्तिरित्युपसंहरति इत्येवमिति। नायं प्रष्टुरभिप्रायः कर्मसंन्यासकर्मयोगयोर्भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वस्योक्तत्वादेकस्मिन्पुरुषे प्राप्त्यभावादिति शङ्कते नन्विति। चोद्यमङ्गीकृत्य परिहरति सत्यमेवेति। कीदृशस्तर्हि प्रष्टुरभिप्रायो येन प्रश्नप्रवृत्तिरिति पृच्छति कथमिति। एकस्मिन्पुरुषे कर्मतत्त्यागयोरस्ति प्राप्तिरिति प्रष्टुरभिप्रायं प्रतिनिर्देष्टुं प्रारभते पूर्वोदाहृतैरिति। यथास्वर्गकामो यजेत इति स्वर्गकामोद्देशेन यागो विधीयते नतु तस्यैवाधिकारो नान्यस्येत्यपि प्रतिपाद्यते वाक्यभेदप्रसङ्गात्तथानात्मवित्कर्ता संन्यासपक्षे प्राप्तोऽनूद्यते नचात्मवित्कर्तृकत्वमेव संन्यासस्य नियम्यते वैराग्यमात्रेणाज्ञस्यापि संन्यासविधिदर्शनात्। तस्मात्कर्मतत्त्यागयोरविद्वत्कर्तृकत्वमस्तीति मन्वानस्यार्जुनस्य प्रश्नः संभवतीति भावः। भवतु संन्यासस्य कर्तव्यत्वविवक्षा तथापि कथं प्रशस्यतरबुभुत्सया प्रश्नप्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह प्राधान्यमिति। तथापि कथमेकस्मिन्पुरुषे तयोरप्राप्तावुक्ताभिप्रायेण प्रश्नवचनं प्रकल्प्यते तत्राह अनात्मविदपीति। आत्मविदो विद्यासामर्थ्यात्कर्मत्यागध्रौव्यवदितरस्यापि सति वैराग्ये तत्त्यागस्यावश्यकत्वात्तत्र कर्तासौ प्राप्तोऽत्रानूद्यते। तथाच कर्मतत्त्यागयोरेकस्मिन्नविदुषि प्राप्तेर्व्यक्तत्वादुक्ताभिप्रायेण प्रश्नप्रवृत्तिरविरुद्धेत्यर्थः। संन्यासस्यात्मवित्कर्तृकत्वमेवात्र विवक्षितं किं न स्यादित्याशङ्क्य कर्त्रन्तरपर्युदासः संन्यासविधिश्चेत्यर्थभेदे वाक्यभेदप्रसङ्गान्मैवमित्याह इति न पुनरिति। इतिशब्दो वाक्यभेदप्रसङ्गहेतुद्योतनार्थः। ततः किमित्याशङ्क्य फलितमाह एवमिति। कर्मानुष्ठानकर्मसंन्यासयोरविद्वत्कर्तृकत्वमप्यस्तीत्येवं मन्वानस्यार्जुनस्य प्रशस्यतरविविदिषया प्रश्नो नानुपपन्न इति संबन्धः। तयोः समुच्चित्यानुष्ठानसंभवे कथं प्रशस्यतरविविदिषेत्याशङ्क्याह पूर्वोक्तेनेति।उभयोश्चेत्यादावुक्तप्रकारेण कर्मतत्त्यागयोर्मिथो विरोधान्न समुच्चित्यानुष्ठानं सावकाशमित्यर्थः। भवतु तर्हि यस्य कस्यचिदन्यतरस्यानुष्ठेयत्वमिति कुत उक्ताभिप्रायेण प्रश्नप्रवृत्तिरित्याशङ्क्याह अन्यतरस्येति। उभयप्राप्तौ समुच्चयानुपपत्तावन्यतरपरिग्रहे विशेषस्यान्वेष्यत्वादुक्ताभिप्रायेण प्रश्नोपपत्तिरित्यर्थः। इतश्चाविद्वत्कर्तृकयोः संन्यासकर्मयोगयोः कतरः श्रेयानिति प्रष्टुरभिप्रायो भातीत्याह प्रतिवचनेति। किं तत्प्रतिवचनं कथं वा तन्निरूपणमिति पृच्छति कथमिति। तत्र प्रतिवचनं दर्शयति संन्यासेति। तन्निरूपणं कथयति एतदिति। तदुभयमिति निःश्रेयसकरत्वं कर्मयोगस्य श्रेष्ठत्वं चेत्यर्थः। गुणदोषविभागविवेकार्थं पृच्छति किंचेति। अतोऽस्मिन्नाद्ये पक्षे किं दूषणमस्मिन्वा द्वितीये पक्षे किं फलमिति प्रश्नार्थः। तत्र सिद्धान्ती प्रथमपक्षे दोषमादर्शयति अत्रेत्यादिना। तदेवानुपपन्नत्वं व्यतिरेकद्वारा विवृणोति यदीत्यादिना। निःश्रेयसकरत्वोक्तिरित्यत्र पारम्पर्येणेति द्रष्टव्यम् विशिष्टत्वाभिधानमिति प्रतियोगिनोऽसहायत्वादस्य च शुद्धिद्वारा ज्ञानार्थत्वादित्यर्थः। आत्मज्ञस्य कर्मसंन्यासकर्मयोगयोरसंभवे दर्शिते चोदयति अत्राहेति। चोदयिता निर्धारणार्थं विमृशति किमित्यादिना। अन्यतरासंभवेऽपि संदेहात्प्रश्नोऽवतरतीत्याह यदा चेति। यस्य कस्यचिदन्यतरस्यासंभवो भविष्यतीत्याशङ्क्य कारणमन्तरेणासंभवो भवन्नतिप्रसङ्गः स्यादिति मन्वानः सन्नाह असंभव इति। आत्मविदः सकारणं कर्मयोगासंभवं सिद्धान्ती दर्शयति अत्रेति। संग्रहवाक्यं विवृण्वन्नात्मवित्त्वं विवृणोति जन्मादीति। तस्य यदुक्तं निवृत्तमिथ्याज्ञानत्वं तदिदानीं व्यनक्ति सम्यगिति। विपर्ययज्ञानमूलस्येत्यादिनोक्तं प्रपञ्चयति निष्क्रियेति। यथोक्तसंन्यासमुक्त्वा ततो विपरीतस्य कर्मयोगस्याभावः प्रतिपाद्यत इति संबन्धः। वैपरीत्यं स्फोरयन्कर्मयोगमेव विशिनष्टि मिथ्याज्ञानेति। मिथ्या च तदज्ञानं चेत्यनाद्यनिर्वाच्यमज्ञानं तन्मूलोऽहं कर्तेत्यात्मनि कर्तृत्वाभिमानस्तज्जन्यस्तस्येति यावत्। यथोक्तं संन्यासमुक्त्वा यथोक्तकर्मयोगस्यासंभवप्रतिपादने हेतुमाह सम्यग्ज्ञानेति। कुत्र तदभावप्रतिपादनं तदाह इहेति। उक्तं हेतुं कृत्वात्मज्ञस्य कर्मयोगसंभवे फलितमाह यस्मादिति। इह शास्त्रे तत्र तत्रेत्यादावुक्तमेव व्यक्तीकर्तुं पृच्छति केषु केष्विति। तानेव प्रदेशान्दर्शयति अत्रेति। आत्मस्वरूपनिरूपणप्रदेशेषु संन्यासप्रतिपादनादात्मविदः संन्यासो विवक्षितश्चेत्तर्हि कर्मयोगोऽपि तस्य कस्मान्न भवति प्रकरणाविशेषादिति शङ्कते ननु चेति। आत्मविद्याप्रकरणे कर्मयोगप्रतिपादनमुदाहरति तद्यथेति। प्रकरणादात्मविदोऽपि कर्मयोगस्य संभवे फलितमाह अतश्चेति। आत्मज्ञानोपायत्वेनापि प्रकरणपाठसिद्धौ ज्ञानादूर्ध्वं न्यायविरुद्धं कर्म कल्पयितुमशक्यमिति परिहरति अत्रोच्यत इति। सम्यग्ज्ञानमिथ्याज्ञानयोस्तत्कार्ययोश्च भ्रमनिवृत्तिभ्रमसद्भावयोर्मिथो विरोधात्कर्तृत्वादिभ्रममूलं कर्म सम्यग्ज्ञानादूर्ध्वं न संभवतीत्यर्थः। आत्मज्ञस्य कर्मयोगासंभवे हेत्वन्तरमाह ज्ञानयोगेनेति। इतश्चात्मविदो ज्ञानादूर्ध्वं कर्मयोगो न युक्तिमानित्याह कृतकृत्यत्वेनेति। ज्ञानवतो नास्ति कर्मेत्यत्र कारणान्तरमाह तस्येति। तर्हि ज्ञानवता कर्मयोगस्य हेयत्ववज्जिज्ञासुनापि तस्य त्याज्यत्वं ज्ञानप्राप्त्या तस्यापि पुरुषार्थसिद्धेरित्याशङ्क्य जिज्ञासोरस्ति कर्मयोगापेक्षेत्याह न कर्मणामिति। स्वरूपोपकार्यङ्गमन्तरेणाङ्गिस्वरूपानिष्पत्तेर्ज्ञानार्थिना कर्मयोगस्य शुद्ध्यादिद्वारा ज्ञानहेतोरादेयत्वमित्यर्थः। तर्हि ज्ञानवतामपि ज्ञानफलोपकारित्वेन कर्मयोगो मृग्यतामित्याशङ्क्याह योगारूढस्येति। उत्पन्नसम्यग्ज्ञानस्य कर्माभावे शरीरस्थितिहेतोरपि कर्मणोऽसंभवान्न तस्य शरीरस्थितिस्तदस्थितौ च कुतो जीवन्मुक्तिस्तदभावे च कस्योपदेष्ट्टत्वमुपदेशाभावे च कुतो ज्ञानोदयः स्यादित्याशङ्क्याह शारीरमिति। विदुषोऽपि शरीरस्थितिरास्थिता चेत्तन्मात्रप्रयुक्तेषु दर्शनश्रवणादिषु कर्तृत्वाभिमानोऽपि स्यादित्याशङ्क्याह नैवेति। तत्त्वविदित्यनेन च समाहितचेतस्तया करोमीति प्रत्ययस्य सदैवाकर्तव्यत्वोपदेशादिति संबन्धः। यत्तु विदुषः शरीरस्थितिनिमित्तकर्माभ्यनुज्ञाने तस्मिन्कर्तृत्वाभिमानोऽपि स्यादिति तत्राह शरीरेति। आत्मयाथात्म्यविदस्तेष्वपि नाहं करोमीति प्रत्ययस्य नैव किंचित्करोमीत्यादावकर्तृत्वोपदेशान्न कर्तृत्वाभिमानसंभावनेत्यर्थः। यथोक्तोपदेशानुसंधानाभावे विदुषोऽपि करोमीति स्वाभाविकप्रत्ययद्वारा कर्मयोगः स्यादित्याशङ्क्याह आत्मतत्त्वेति। यद्यपि विद्वान्यथोक्तमुपदेशं कदाचिन्नानुसंधत्ते तथापि तत्त्वविद्याविरोधान्मिथ्याज्ञानं तन्निमित्तं कर्म वा तस्य संभावयितुमशक्यमित्यर्थः। आत्मवित्कर्तृकयोः संन्यासकर्मयोगयोरयोगात्तयोर्निःश्रेयसकरत्वमन्यतरस्य विशिष्टत्वमित्येतदयुक्तमिति सिद्धत्वाद्द्वितीयं पक्षमङ्गीकरोति यस्मादित्यादिना। तदीयाच्च कर्मसंन्यासात्कर्मयोगस्य विशिष्टत्वाभिधानमिति संबन्धः। ननु कर्मयोगेन शुद्धबुद्धेः संन्यासो जायमानस्तस्मादुत्कृष्यते कथं तस्मात्कर्मयोगस्योत्कृष्टत्ववाचोयुक्तिर्युक्तेति तत्राह पूर्वोक्तेति। वैलक्षण्यमेव स्पष्टयति सत्येवेति। स्वाश्रमविहितश्रवणादौ कर्तृत्वविज्ञाने सत्येव पूर्वाश्रमोपात्तकर्मैकदेशविषयसंन्यासात्कर्मयोगस्य श्रेयस्त्ववचनंनैतादृशं ब्राह्मणस्यास्ति वित्तम् इत्यादिस्मृतिविरुद्धमित्याशङ्क्याह यमनियमादीति।आनृशंस्यं क्षमा सत्यमहिंसा दम आर्जवम्। प्रीतिः प्रसादो माधुर्यमक्रोधश्च यमा दश।।दानमिज्या तपो ध्यानं स्वाध्यायोपस्थनिग्रहौ। व्रतोपवासौ मौनं च स्नानं च नियमा दश।। इत्युक्तैर्यमनियमैरन्यैश्चाश्रमधर्मैर्विशिष्टत्वेनानुष्ठातुमशक्यत्वादुक्तसंन्यासात्कर्मयोगस्य विशिष्टत्वोक्तिर्युक्तेत्यर्थः। नहि कश्चिदिति न्यायेन कर्मयोगस्येतरापेक्षया सुकरत्वाच्च तस्य विशिष्टत्ववचनं श्लिष्टमित्याह सुकरत्वेन चेति। प्रतिवचनवाक्यार्थालोचनात्सिद्धमर्थमुपसंहरति इत्येवमिति। संन्यासकर्मयोगयोर्मिथोविरुद्धयोः समुच्चित्यानुष्ठातुमशक्ययोरन्यतरस्य कर्तव्यत्वे प्रशस्यतरस्य तद्भावात्तद्भावस्य चानिर्धारितत्वात्तन्निर्दिधारयिषया प्रश्नः स्यादिति प्रश्नवाक्यार्थपर्यालोचनया प्रष्टुरभिप्रायो यथा पूर्वमुपदिष्टस्तथा प्रतिवचनार्थनिरूपणेनापि तस्य निश्चितत्वात्प्रश्नोपपत्तिः सिद्धेत्यर्थः। ननु तृतीये यथोक्तप्रश्नस्य भगवता निर्णीतत्वान्नात्र प्रश्नप्रतिवचनयोः सावकाशत्वमित्याशङ्क्य विस्तरेणोक्तमेव संबन्धं पुनः संक्षेपतो दर्शयति ज्यायसी चेदिति। सांख्ययोगयोर्भिन्नपुरुषानुष्ठेयत्वेन निर्णीतत्वान्न पुनः प्रश्नयोग्यत्वमित्यर्थः। इतोऽपि न तयोः प्रश्नविषयत्वमित्याह नचेति। एवकारविशेषणाज्ज्ञानसहितसंन्यासस्य सिद्धसाधनत्वं भगवतोऽभिमतंछित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठ इति च कर्मयोगस्य विधानात्तस्यापि सिद्धसाधनत्वमिष्टं ततश्च निर्णीतत्वान्न प्रश्नस्तद्विषयः सिध्यतीत्यर्थः। केनाभिप्रायेण तर्हि प्रश्नः स्यादित्याशङ्क्य ज्ञानरहितसंन्यासात्कर्मयोगस्य प्रशस्यतरत्वबुभुत्सयेत्याह ज्ञानरहित इति। प्रष्टुरभिप्रायमेवं प्रदर्श्य प्रश्नोपपत्तिमुक्त्वा प्रश्नमुत्थापयति संन्यासमिति। तर्हि द्वयं त्वयानुष्ठेयमित्याशङ्क्य तदशक्तेरुक्तत्वात्प्रशस्यतरस्यानुष्ठानार्थं तदिदमिति निश्चित्य वक्तव्यमित्याह यच्छ्रेय इति। काम्यानां प्रतिषिद्धानां च कर्मणां परित्यागो मयोच्यते न सर्वेषामित्याशङ्क्य कर्मण्यकर्मेत्यादौ विशेषदर्शनान्मैवमित्याह शास्त्रीयाणामिति। अस्तु तर्हि शास्त्रीयाशास्त्रीययोरशेषयोरपि कर्मणोस्त्यागो नेत्याह पुनरिति। तर्हि कर्मत्यागस्तद्योगश्चेत्युभयमाहर्तव्यमित्याशङ्क्य विरोधान्मैवमित्यभिप्रेत्याह अत इति। द्वयोरेकेनानुष्ठानायोगस्योक्तत्वात्कर्तव्यत्वोक्तेश्च संशयो जायते तमेव संशयं विशदयति किं कर्मेति। प्रशस्यतरबुभुत्सा किमर्थेत्याशङ्क्याह प्रशस्यतरं चेति। तस्यैवानुष्ठेयत्वे प्रश्नस्य सावकाशत्वमाह अतश्चेति। तदेव प्रशस्यतरं विशिनष्टि यदनुष्ठानादिति। तदेकमन्यतरन्मे ब्रूहीति संबन्धः। उभयोरुक्तत्वे सति किमित्येकं वक्तव्यमिति नियुज्यते तत्राह सहेति। कर्मतत्त्यागयोर्मिथो विरोधादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.1।।पूर्वसङ्गतत्वेनैतदध्यायप्रतिपादनमर्थमाह तृतीयेति। कर्मयोगो नाम कर्माणि कृत्वा तेषां ब्रह्मात्मकत्वज्ञानमिति कश्चित् तद्व्यावर्तयितुमेवशब्दः। फलकामनादित्यागेनेश्वरार्पणबुद्ध्या वर्णाश्रमविहितकर्मानुष्ठानमेव कर्मयोगोऽत्र प्रपञ्च्यते तस्यैव पूर्वमुक्तत्वात् नान्यः तस्याप्रकृत्वात्। द्व्यंशश्चायं कर्मयोगः कामादिवर्जनमीश्वरार्पणबुद्ध्या कर्मानुष्ठानं चेति। तत्राद्यं सन्न्यासशब्दोक्तम् द्वितीयमुपचारेण कर्मयोगशब्दोक्तम् तदभिप्रायेण योगसन्न्यासयोर्लक्षणं स्पष्टयतीत्यन्यत्रोक्तमिति सन्न्यासमित्यादिना। कुत्रोक्तमर्जुनोऽनुवदति इत्यत आह यदृच्छेति।कर्मयोगं इति वदताकर्मणां इत्येतद्योगशब्देन सम्बध्यत इत्युक्तं भवति। तथा चकर्मणां सन्न्यासं त्यागं इति व्याख्यानमसदिति सूचितम्।शंससि इत्यनेनान्वयः। चतुर्थाध्यायोक्तस्यार्थस्यतदध्यायोत्थानबीजत्वात्तृतीयाध्यायार्थप्रपञ्चनात्मकस्याप्यस्य चतुर्थानन्तर्यं युक्तमित्यप्यनेन ज्ञापितम्। कृष्णशब्दो वर्णविशेषमात्रवचन इति प्रतीतिनिरासायाह नियमनादिनेति।नित्यनैमित्तिककाम्यनिषिद्धरूपसर्वकर्मत्यागः सन्न्यासशब्दार्थः इति व्याख्यानं दूषयति सन्न्यासेति।ज्ञेयः स नित्यसन्न्यासी 5।3 इति सन्न्यासशब्दस्य भगवतैवान्यथा व्याख्यातत्वात् तद्विरुद्धं परव्याख्यानमित्यर्थः। यदि सर्वकर्मपरित्यागो न सन्न्यासशब्दार्थः किन्तु द्वेषादिवर्जनमेव तर्हि तस्य योगेन विरोधाभावात्सन्न्यासयोगयोर्विरोधाभिप्रायेण श्रेयःप्रश्नोऽनुपपन्नः स्यादित्यत आह अयमिति। अत्र श्रेय इति यथास्थितं गीतापदमनूद्य सन्न्यासपदानुगुण्येनाधिक इति व्याख्यातम्। नन्वेतत्घोरः इति चोदितंश्रेयान् इति च परिहृतं च सत्यम् अतएवात्रेषदित्युक्तमिति अतस्तत्यक्त्वा सन्न्यास एव कर्तव्ये किं वैगुण्यमङ्गीकृत्यापि विधीयते युद्धमित्याशयशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.1।।तृतीयाध्यायोक्तमेव कर्मयोगं प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेनयदृच्छालाभसन्तुष्टः 4।22 इत्यादिसन्न्यासंकुरु कर्मैव 4।15 इत्यादि कर्मयोगं च। नियमनादिना सकललोककर्षणात्कृष्णः। तच्चोक्तम् यतः कर्षसि देवेश नियम्य सकलं जगत्। अतो वदन्ति मुनयः कृष्णं त्वां ब्रह्मवादिनः इति महाकौर्मे। सन्न्यासशब्दार्थं भगवानेव वक्ष्यति। अयं प्रश्नाशयः यदि सन्न्यासः श्रेयोऽधिकः स्यात् तर्हि सन्न्यासस्येषद्विरोधि युद्धमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.1।।अर्जुन उवाच कर्मणां सन्यासं ज्ञानयोगं पुनः कर्मयोगं च शंससि। एतद् उक्तं भवति द्वितीये अध्यायेमुमुक्षोः प्रथमं कर्मयोग एव कार्यः कर्मयोगेन मृदितान्तःकरणकषायस्य ज्ञानयोगेन आत्मदर्शनं कार्यम् इति प्रतिपाद्य पुनः तृतीयचतुर्थयोःज्ञानयोगाधिकारदशाम् आपन्नस्य अपि कर्मनिष्ठा एव ज्यायसी सा एव ज्ञाननिष्ठानिरपेक्षा आत्मप्राप्त्येकसाधनम् इति कर्मनिष्ठां प्रशंससि इति। तत्र एतयोः ज्ञानयोगकर्मयोगयोः आत्मप्राप्तिसाधनभावे यद् एकं सौकर्यात् शैघ्र्यात् च श्रेयः श्रेष्ठम् इति सुनिश्चितम् तत् मे ब्रूहि।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.1।। संन्यासं परित्यागं कर्मणां शास्त्रीयाणाम् अनुष्ठेयविशेषाणां शंससि प्रशंससि कथयसि इत्येतत्। पुनः योगं च तेषामेव अनुष्ठानम् अवश्यकर्तव्यंत्वं शंससि। अतः मे कतरत् श्रेयः इति संशयः किं कर्मानुष्ठानं श्रेयः किं वा तद्धानम् इति। प्रशस्यतरं च अनुष्ठेयम्। अतश्च यत् श्रेयः प्रशस्यतरम् एतयोः कर्मसंन्यासकर्मयोगयोः यदनुष्ठानात् श्रेयोऽवाप्तिः मम स्यादिति मन्यसे तत् एकम् अन्यतरत् सह एकपुरुषानुष्ठेयत्वासंभवात् मे ब्रूहि सुनिश्चितम् अभिप्रेतं तवेति।।स्वाभिप्रायम् आचक्षाणो निर्णयाय श्रीभगवानुवाच

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【 Verse 5.2 】

▸ Sanskrit Sloka: श्रीभगवानुवाच | संन्यास: कर्मयोगश्च नि:श्रेयसकरावुभौ | तयोस्तु कर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते ||

▸ Transliteration: śrībhagavānuvāca | sannyāsaḥ karmayogaś ca niḥśreyasakarāvubhau | tayostu karma-sannyāsāt karmayogo viśiṣyate ||

▸ Glossary: śrī bhagavān uvāca: Lord Kṛṣṇa says; sannyāsah: renunciation; karmayogaḥ: work in devotion; ca: also; niḥśreyasakarāv: for liberation; ubhau: both; tayoḥ: of the two; tu: but; karmasannyāsāt: between work and renunciation; karmayogaḥ: work in devotion; viśiṣyate: better

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.2 Bhagavān says: The renunciation of work [sannyāsa] and work in devotion [karmayoga] are both good for liberation. But, of the two, work in devotional service is better than re- nunciation of work.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.2।।श्रीभगवान् बोले संन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास(सांख्ययोग)से कर्मयोग श्रेष्ठ है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.2।। श्रीभगवान् ने कहा कर्मसंन्यास और कर्मयोग ये दोनों ही परम कल्याणकारक हैं परन्तु उन दोनों में कर्मसंन्यास से कर्मयोग श्रेष्ठ है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.2 संन्यासः renunciation? कर्मयोगः Yoga of action? च and? निःश्रेयसकरौ leading to the highest bliss? उभौ both? तयोः of these two? तु but? कर्मसंन्यासात् than renunciation of action? कर्मयोगः Yoga of action? विशिष्यते is superior.Commentary Sannyasa (renunciation of action) and Karma Yoga (performance of action) both lead to Moksha or liberation or the highest bliss. Though both lead to Moksha? yet of the two means of attaining to Moksha? Karma Yoga is better than mere Karma Sannyasa (renunciation of action) without the knowledge of the Self.But renunciation of actions with the knowledge of the Self is decidedly superior to Karma Yoga.Moreover? Karma Yoga is easy and is therefore suitable to all. (Cf.III.3V.5VI.46)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.2. The Bhagavat said Both renunciation and the Yoga of action effect salvation. But, of these two, the Yoga of action is better than renunciation of action.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.2 Lord Shri Krishna replied: Renunciation of action and the path of right action both lead to the highest; of the two, right action is the better.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.2 The Lord said Renunciation of actions and Karma Yoga, both lead to the highest excellence. But, of the two, Karma Yoga excels the renunciation of actions.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.2 The Blessed Lord said Both renunciation of actions and Karma-yoga lead to Liberation. Between the two, Karma-yoga, however, excels over renunciation of actions.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.2 The Blessed Lord said Renunciation and the Yoga of action both lead to the highest bliss; but of the two, the Yoga of action is superior to the renunciation of action.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.2 Samnyasah etc. Renunciation and the Yoga of action-not only one, but two-are mentioned here. Happily joining together they yield salvation. (However), the superiority of the Yoga [over the renunciation] is due to the fact that but for the Yoga, renunciation does not exist.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.2 The Lord said Even while granting that some persons are competent for the practice of Jnana Yoga exclusively, it has to be conceded that renunciation, i.e., Jnana Yoga, and Karma Yoga can be practised as independent of each other in the pursuit of the highest excellence. Still, of these two, Karma Yoga excels over the renunciation of actions, i.e., Jnana Yoga.

Sri Krsna explains why this is so.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.2 Ubhau, both, to be sure; sannyasah, renunciation of actions; ca, and; karma-yogah, Karma-yoga-their performance-; nihsreyasa-karau, lead to Liberation. Though both lead to Liberation by virtue of being the cause of the rise of Knowledge, even then, tayoh, between the two which are the causes of Liberation; Karma-yoga, tu, however; visisyate, excels; karma-sannyasat, over mere renunciation of actions. Thus He extols Karma-yoga. [Karma-yoga is better than renunciation of actions that is not based on Knowledge.] Why? In answer the Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.2।। अर्जुन के प्रश्न से श्रीकृष्ण समझ गये किस तुच्छ अज्ञान की स्थिति में अर्जुन पड़ा हुआ है। वह कर्मसंन्यास और कर्मयोग इन दो मार्गों को भिन्नभिन्न मानकर यह समझ रहा था कि वे साधक को दो भिन्न लक्ष्यों तक पहुँचाने के साधन थे।मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति निष्क्रियता की ओर होती है। यदि मनुष्यों को अपने स्वभाव पर छोड़ दिया जाय तो अधिकांश लोग केवल यही चाहेंगे कि जीवन में कमसेकम परिश्रम और अधिकसेअधिक आराम के साथ भोजन आदि प्राप्त हो जाय। इस अनुत्पादक अकर्मण्यता से उसे क्रियाशील बनाना उसके विकास की प्रथम अवस्था है। यह कार्य मनुष्य की सुप्त इच्छाओं को जगाने से सम्पादित किया जा सकता है। विकास की इस प्रथमावस्था में स्वार्थ से प्रेरित कर्म उसकी मानसिक एवं बौद्धिक शिथिलता को दूर करके उसे अत्यन्त क्रियाशील बना देते हैं।तदुपरान्त मनुष्य को क्रियाशील रहते हुये स्वार्थ का त्याग करने का उपदेश दिया जाता है। कुछ काल तक निष्काम भाव से ईश्वर की पूजा समझ कर जगत् की सेवा करने से उसे जो आनन्द प्राप्त होता है वही उसके लिए स्फूर्ति एवं प्रेरणा का स्रोत बन जाता है। इसी भावना को कर्मयोग अथवा यज्ञ की भावना कहा गया है। कर्मयोग के पालन से वासनाओं का क्षय होकर साधक को मानो ध्यानरूप पंख प्राप्त हो जाते हैं जिनकी सहायता से वह शांति और आनन्द के आकाश मे ऊँचीऊँची उड़ाने भर सकता है। ध्यानाभ्यास का विस्तृत विवेचन अगले अध्याय में किया गया है।उपर्युक्त विचार से हम इस निष्कर्ष

Chapter 5 (Part 2)

पर पहुँचते हैं कि आत्मविकास के लिये तीन साधन हैं काम्य कर्म निष्काम कर्म तथा निदिध्यासन। पूर्व अध्यायों में कर्म योग का वर्णन हो चुका है और अगले अध्याय का विषय ध्यान योग है। अत इस अध्याय में अहंकार और स्वार्थ के परित्याग द्वारा कर्मों के संन्यास का निरूपण किया गया है।इस श्लोक में भगवान् ने कहा है कि कर्मसंन्यास और कर्मयोग दोनों ही कल्याणकारक हैं तथापि इन दोनों में कर्मयोग श्रेष्ठतर है। श्रीकृष्ण के इस कथन का अर्थ यह कदापि नहीं है कि वे कर्मयोग की अपेक्षा संन्यास को हीनतर बताते हैं। ऐसा समझना अपने अज्ञान का प्रदर्शन करना है अथवा अब तक किये भगवान् के उपदेश को ही नहीं समझना है। यहाँ संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग को श्रेष्ठ कहने के अभिप्राय को हमें समझना चाहिये। विकास की जिस अवस्था में अर्जुन था उसको तथा युद्ध की विशेष परिस्थितियों को ध्यान में रखकर अर्जुन के लिए संन्यास की अपेक्षा कर्म करने का उपदेश ही उपयुक्त था। अर्थ यह हुआ कि दोनों ही श्रेयष्कर होने पर भी विशेष परिस्थितियों को देखते हुये संन्यास की अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ कहा गया है। अधिकांश लोग अर्जुन के रोग से पीड़ित होते हैं उन सबके लिए कर्मयोग ही वासना क्षय का एकमात्र उपाय है। अत यहाँ कर्मयोग को श्रेष्ठ कहने के तात्पर्य को हमको ठीक से समझना चाहिए।ऐसा क्यों इस पर कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.2।।अर्जुनसंशयनिर्वतकमुत्तरं श्रीभगवानुवाच संन्यास इति। उभो यद्यपि निःश्रेयसकरौ ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन मोक्षोपयोगिनौ तथापि तयोस्तु कर्मसंन्यासादशुद्धचित्तेनाविरक्तेन कृतात्कर्मयोगश्चित्तशुद्य्धा वैराग्यादिजनको विशिष्यत उत्कृष्टो भवतीति कर्मयोगं स्तौति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.2।।एवमर्जुनस्य प्रश्ने तदुत्तरं श्रीभगवानुवाच निःश्रेयसकरौ ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन मोक्षोपयोगिनौ। तयोस्तु कर्मसंन्यासादनधिकारिकृतात्कर्मयोगो विशिष्यते श्रेयानधिकारसंपादकत्वेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.2।।अस्योत्तरं भगवानुवाच संन्यास इति। निःश्रेयसकरौ ज्ञानोत्पत्तिहेतुतया। तथापि कर्मसंन्यासादविरक्तकृतात्कर्मयोग एव विशिष्यते। चित्तशुद्धिद्वारा वैराग्यादिहेतुत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.2।।भगवानेतत्प्रश्नोत्तरमाह कृपया सन्न्यास इति। सन्न्यासः कर्मणां त्यागः कर्मयोगः कर्मानुष्ठानमेतावुभौ निश्श्रेयसकरौ मोक्षापादकौ तयोरपि कर्मसन्न्यासात् केवलं कर्मत्यागात् मदाज्ञया फलानभिलाषेण मदर्पणधिया कर्मयोगः कर्मानुष्ठानं विशिष्यते उत्तममित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.2।। अत्रोत्तरं श्रीभगवानुवाच संन्यास इति। अयं भावःनहि वेदान्तवेद्यात्मतत्त्वविदं प्रति कर्मयोगमहं ब्रवीमि यतः पूर्वोक्तेन संन्यासेन विरोधः स्यात् अपितु देहात्माभिमानिनं त्वां बन्धुवधादिनिमित्तशोकमोहादिकृतमेनं संशयं देहात्मविवेकज्ञानासिना छित्त्वा परमात्मज्ञानोपायभूतं कर्मयोगमातिष्ठेति ब्रवीमि। कर्मयोगेन शुद्धचित्तस्य चात्मतत्त्वज्ञाने जाते सति तत्परिपाकार्थं ज्ञाननिष्ठाङ्गत्वेन संन्यासः पूर्वमुक्तः। एवं सत्यङ्गप्रधानयोर्विकल्पायोगात्संन्यासः कर्मयोगश्चेत्येतावुभावपि भूमिकाभेदेन समुच्चितावेव निःश्रेयसं साधयतः तथापि तु तयोर्मध्ये कर्मसंन्यासात्सकाशात्कर्मयोगो विशिष्टो भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.2।।इति प्रश्ने भगवानर्जुनं पुष्टिनिष्ठभक्तं तदोभयकोटिसंशयापन्नं योगसाङ्ख्यसारं ग्राहयन् पूर्वशिष्टां कर्मयोगस्थितिमुत्तरमाह सन्न्यासः कर्मयोगश्चेति। हे अर्जुन यद्यपि साङ्ख्यीयः सन्न्यासः कर्मयोगश्चेत्युभौ मुख्यतः स्वतन्त्रतया पुरुषार्थसाधकौ नात्राङ्गप्रधानभावः एतयोरेकमप्यास्थितः परं श्रेयो मोक्षलक्षणं विन्दति। तथापि कर्मसन्न्यासात् कर्मणां त्यागात् सर्वस्यैव त्यागो बाह्यतः कर्मयोगो विशिष्यते तत्त्वज्ञानिनोऽपि लोकानुग्रहार्थं कर्मकरणश्रवणात्। मनसैव त्यागः न बाह्यतः। तवापि फलद इति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.2।।अर्जुनके प्रश्नका निर्णय करनेके लिये भगवान् अपना अभिप्राय बतलाते हुए बोले संन्यास कर्मोंका परित्याग और कर्मयोग उनका अनुष्ठान करना ये दोनों ही कल्याणकारक अर्थात् मुक्तिके देनेवाले हैं। यद्यपि ज्ञानकी उत्पत्तिमें हेतु होनेसे ये दोनोंही कल्याणकारक हैं तथापि कल्याणके उन दोनों कारणोंमें ज्ञानरहित केवल संन्यासकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है। इस प्रकार भगवान् कर्मयोगकी स्तुति करते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.2।। व्याख्या   भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार सांख्ययोग और कर्मयोगका पालन प्रत्येक वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिके मनुष्य कर सकते हैं। कारण कि उनका सिद्धान्त किसी वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिको लेकर नहीं है। इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका त्याग करके विधिपूर्वक ज्ञान प्राप्त करनेकी प्रचलित प्रणालीको कर्मसंन्यास नामसे कहा है। परन्तु भगवान्के सिद्धान्तके अनुसार ज्ञानप्राप्तिके लिये सांख्ययोगका पालन प्रत्येक मनुष्य स्वतन्त्रतासे कर सकता है और उसका पालन करनेमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता भी नहीं है। इसलिये भगवान् प्रचलित मतका भी आदर करते हुए अपने सिद्धान्तके अनुसार अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हैं।संन्यासः यहाँ संन्यासः पदका अर्थ सांख्ययोग है कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं। अर्जुनके प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् कर्मोंके त्यागपूर्वक संन्यासका विवेचन न करके कर्म करते हुए ज्ञानको प्राप्त करनेका जो सांख्ययोगका मार्ग है उसका विवेचन करते हैं। उस सांख्ययोगके द्वारा मनुष्य प्रत्येक वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिमें रहते हुए प्रत्येक परिस्थितिमें स्वतन्त्रतापूर्वक ज्ञान प्राप्त कर सकता है अर्थात् अपना कल्याण कर सकता है।सांख्ययोगकी साधनामें विवेकविचारकी मुख्यता रहती है। विवेकपूर्वक तीव्र वैराग्यके बिना यह साधना सफल नहीं होती। इस साधनामें संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होकर एकमात्र परमात्मतत्त्वपर दृष्टि रहती है। राग मिटे बिना संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन है। इसलिये भगवान्ने देहाभिमानियोंके लिये यह साधन क्लेशयुक्त बताया है (गीता 12। 5)। इसी अध्यायके छठे श्लोकमें भी भगवान्ने कहा है कि कर्मयोगका साधन किये बिना संन्यासका साधन होना कठिन है क्योंकि संसारसे राग हटानेके लिये कर्मयोग ही सुगम उपाय है।कर्मयोगश्च मानवमात्रमें कर्म करनेका राग अनादिकालसे चला आ रहा है जिसे मिटानेके लिये कर्म करना आवश्यक है (गीता 5। 3)। परन्तु वे कर्म किस भाव और उद्देश्यसे कैसे किये जायँ कि करनेका राग सर्वथा मिट जाय उस कर्तव्यकर्मको करनेकी कलाको कर्मयोग कहते हैं। कर्मयोगमें कार्य छोटा है या बड़ा इसपर दृष्टि नहीं रहती। जो भी कर्तव्यकर्म सामने आ जाय उसीको निष्कामभावसे दूसरोंके हितके लिये करना है। कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये यह आवश्यक है कि कर्म अपने लिये न किये जायँ। अपने लिये कर्म न करनेका अर्थ है कर्मोंके बदलेमें अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा न होना। जबतक अपने लिये कुछ भी पानेकी इच्छा रहती है तबतक कर्मोंके साथ सम्बन्ध बना रहता है।निःश्रेयसकरावुभौ अर्जुनका प्रश्न था कि सांख्ययोग और कर्मयोग इन दोनों साधनोंमें कौनसा साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाला है उत्तरमें भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन ये दोनों ही साधन निश्चयपूर्वक कल्याण करनेवाले हैं। कारण कि दोनोंके द्वारा एक ही समताकी प्राप्ति होती है। इसी अध्यायके चौथेपाँचवें श्लोकोंमें भी भगवान्ने इसी बातकी पुष्टि की है। तेरहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने सांख्ययोग और कर्मयोग दोनोंसे परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेकी बात कही है। इसलिये ये दोनों ही परमात्मप्राप्तिके स्वतन्त्र साधन हैं (गीता 3। 3)।तयोस्तु कर्मसंन्यासात् एक ही सांख्ययोगके दो भेद हैं एक तो चौथे अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें कहा हुआ सांख्ययोग जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग है और दूसरा दूसरे अध्याके ग्यारहवेंसे तीसवें श्लोकतक कहा हुआ सांख्ययोग जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग नहीं है। यहाँ कर्मसंन्यासात् पद दोनों ही प्रकारके सांख्ययोगका वाचक है।कर्मयोगो विशिष्यते आगेके (तीसरे) श्लोकमें भगवान्ने इन पदोंकी व्याख्या करते हुए कहा है कि कर्मयोगी नित्यसंन्यासी समझनेयोग्य है क्योंकि वह सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। फिर छठे श्लोकमें भगवान्ने कहा है कि कर्मयोगके बिना सांख्ययोगका साधन होना कठिन है तथा कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त कर लेता है। तात्पर्य है कि सांख्ययोगमें तो कर्मयोगकी आवश्यकता है पर कर्मयोगमें सांख्ययोगकी आवश्यकता नहीं है। इसलिये दोनों साधनोंके कल्याणकारक होनेपर भी भगवान् कर्मयोगको ही श्रेष्ठ बताते हैं।कर्मयोगी लोकसंग्रहके लिये कर्म करता है लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ( गीता 3। 20)। लोकसंग्रहका तात्पर्य है निःस्वार्थभावसे लोकमर्यादा सुरक्षित रखनेके लिये लोगोंको उन्मार्गसे हटाकर सन्मार्गमें लगानेके लिये कर्म करना अर्थात् केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करना। इसीको गीतामें यज्ञार्थ कर्म के नामसे भी कहा गया है। जो केवल अपने लिये कर्म करता है वह बँध जाता है (3। 9 13)। परन्तु कर्मयोगी निःस्वार्थभावसे केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है अतः वह कर्मबन्धनसे सुगमतापूर्वक मुक्त हो जाता है (4। 23)। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है।कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके द्वारा किया जा सकता है चाहे वह किसी भी वर्ण आश्रम सम्प्रदाय आदिका क्यों न हो। परन्तु अर्जुन जिस कर्मसंन्यासकी बात कहते हैं वह एक विशेष परिस्थितिमें किया जा सकता है (गीता 4। 34) क्योंकि तत्त्वज्ञ महापुरुषका मिलना उनमें अपनी श्रद्धा होना और उनके पास जाकर निवास करना ऐसी परिस्थिति हरेक मनुष्यको प्राप्त होनी सम्भव नहीं है। अतः प्रचलित प्रणालीके सांख्ययोगका साधन एक विशेष परिस्थितिमें ही साध्य है जबकि कर्मयोगका साधन प्रत्येक परिस्थितिमें और प्रत्येक व्यक्तिके लिये साध्य है। इसलिये कर्मयोग श्रेष्ठ है।प्राप्त परिस्थितिका सदुपयोग करना कर्मयोग है। युद्धजैसी घोर परिस्थितिमें भी कर्मयोगका पालन किया जा सकता है। कर्मयोगका पालन करनेमें कोई भी मनुष्य किसी भी परिस्थितिमें असमर्थ और पराधीन नहीं है क्योंकि कर्मयोगमें कुछ भी पानेकी इच्छाका त्याग होता है। कुछनकुछ पानेकी इच्छा रहनेसे ही कर्तव्यकर्म करनेमें असमर्थता और पराधीनताका अनुभव होता है।कर्तृत्वभोक्तृत्व ही संसार है। सांख्ययोगी और कर्मयोगी इन दोनोंको ही संसारसे सम्बन्धविच्छेद करना है इसलिये दोनों ही साधकोंको कर्तृत्व और भोक्तृत्व इन दोनोंको मिटानेकी आवश्यकता है। तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि होनेसे सांख्ययोगी कर्तृत्वको मिटाता है। उतना तीव्र वैराग्य और तीक्ष्ण बुद्धि न होनेसे कर्मयोगी दूसरोंके हितके लिये ही सब कर्म करके भोक्तृत्वको मिटाता है। इस प्रकार सांख्ययोगी कर्तृत्वका त्याग करके संसारसे मुक्त होता है और कर्मयोगी भोक्तृत्वका अर्थात् कुछ पानेकी इच्छाका त्याग करके मुक्त होता है। यह नियम है कि कर्तृत्वका त्याग करनेसे भोक्तृत्वका त्याग और भोक्तृत्वका त्याग करनेसे कर्तृत्वका त्याग स्वतः हो जाता है। कुछनकुछ पानेकी इच्छासे ही कर्तृत्व होता है। जिस कर्मसे अपने लिये किसी प्रकारके भी सुखभोगकी इच्छा नहीं है वह क्रियामात्र है कर्म नहीं। जैसे यन्त्रमें कर्तृत्व नहीं रहता ऐसे हीकर्मयोगीमें कर्तृत्व नहीं रहता।साधकको संसारके प्राणी पदार्थ परिस्थिति आदिमें स्पष्ट ही अपना राग दीखता है। उस रागको वह अपने बन्धनका खास कारण मानता है तथा उसे मिटानेकी चेष्टा भी करता है। उस रागको मिटानेके लिये कर्मयोगी किसी भी प्राणी पदार्थ आदिको अपना नहीं मानता (टिप्पणी प0 280) अपने लिये कुछ नहीं करता तथा अपने लिये कुछ नहीं चाहता। क्रियाओँसे सुख लेनेका भाव न रहनेसे कर्मयोगीकी क्रियाएँ परिणाममें सबका हित तथा वर्तमानमें सबकी प्रसन्नता और सुखके लिये ही हो जाती हैं। क्रियाओँसे सुख लेनेका भाव होनेसे क्रियाओँमें अभिमान (कर्तृत्व) और ममता हो जाती है। परन्तु उनसे सुख लेनेका भाव सर्वथा न रहनेसे कर्तृत्व समाप्त हो जाता है। कारण कि क्रियाएँ दोषी नहीं हैं क्रियाजन्य आसक्ति और क्रियाओंके फलको चाहना ही दोषी है। जब साधक क्रियाजन्य सुख नहीं लेता तथा क्रियाओंका फल नहीं चाहता तब कर्तृत्व रह ही कैसे सकता है क्योंकि कर्तृत्व टिकता है भोक्तृत्वपर। भोक्तृत्व न रहनेसे कर्तृत्व अपने उद्देश्यमें (जिसके लिये कर्म करता है उसमें) लीन हो जाता है और एक परमात्मतत्त्व शेष रह जाता है।कर्मयोगीका अहम् (व्यक्तित्व) शीघ्र तथा सुगमतापूर्वक नष्ट हो जाता है जबकि ज्ञानयोगीका अहम् दूरतक साथ रहता है। कारण यह है कि मैं सेवक हूँ (केवल सेव्यके लिये सेवक हूँ अपने लिये नहीं) ऐसा माननेसे कर्मयोगीका अहम् भी सेव्यकी सेवामें लग जाता है परन्तु मैं मुमुक्षु हूँ ऐसा माननेसे ज्ञानयोगीका अहम् साथ रहता है। कर्मयोगी अपने लिये कुछ न करके केवल दूसरोंके हितके लिये सब कर्म करता है पर ज्ञानयोगी अपने हितके लिये साधन करता है। अपने हितके लिये साधन करनेसे अहम् ज्योंकात्यों बना रहता है।ज्ञानयोगकी मुख्य बात है संसारकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव करना और कर्मयोगकी मुख्य बात है रागका अभाव करना। ज्ञानयोगी विचारके द्वारा संसारकी सत्ताका अभाव तो करना चाहता है पर पदार्थोंमें राग रहते हुए उसकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव होना बहुत कठिन है। यद्यपि विचारकालमें ज्ञानयोगके साधकको पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ताका अभाव दीखता है तथापि व्यवहारकालमें उन पदार्थोंकी स्वतन्त्र सत्ता प्रतीत होने लगती है। परन्तु कर्मयोगके साधकका लक्ष्य दूसरोंको सुख पहुँचानेका रहनेसे उसका राग स्वतः मिट जाता है। इसके अतिरिक्त मिली हुई सामग्रीका त्याग करना कर्मयोगीके लिये जितना सुगम पड़ता है उतना ज्ञानयोगीके लिये नहीं। ज्ञानयोगकी दृष्टिसे किसी वस्तुको मायामात्र समझकर ऐसे ही उसका त्याग कर देना कठिन पड़ता है परन्तु वही वस्तु किसीके काम आती हुई दिखायी दे तो उसका त्याग करना सुगम पड़ता है। जैसे हमारे पास कम्बल पड़े हैं तो उन कम्बलोंको दूसरोंके काममें आते जानकर उनका त्याग करना अर्थात् उनसे अपना राग हटाना साधारण बात है परन्तु (यदि तीव्र वैराग्य न हो तो) उन्हीं कम्बलोंको विचारद्वारा अनित्य क्षणभङ्गुर स्वप्नके मायामय पदार्थ समझकर ऐसे ही छोड़कर चल देना कठिन है। दूसरी बात मायामात्र समझकर त्याग करनेमें (यदि तेजीका वैराग्य न हो तो) जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि नहीं है उन खराब वस्तुओंका त्याग तो सुगमतासे हो जाता है पर जिनमें हमारी सुखबुद्धि है उन अच्छी वस्तुओंका त्याग कठिनतासे होता है। परन्तु दूसरेके काम आती देखकर जिन वस्तुओंमें हमारी सुखबुद्धि है उन वस्तुओंका त्याग सुगमतासे हो जाता है जैसे भोजनके समय थालीमेंसे रोटी निकालनी पड़े तो ठंडी बासी और रूखी रोटी ही निकालेंगे। परन्तु यदि वही रोटी किसी दूसरेको देनी हो तो अच्छी रोटी ही निकालेंगे खराब नहीं। इसलिये कर्मयोगकी प्रणालीसे रागको मिटाये बिना सांख्ययोगका साधन होना बहुत कठिन है। विचारद्वारा पदार्थोंकी सत्ता न मानते हुए भी पदार्थोंमें स्वाभाविक राग रहनेके कारण भोगोंमें फँसकर पतनतक होनेकी सम्भावना रहती है।केवल असत्के ज्ञानसे अर्थात् असत्को असत् जान लेनेसे रागकी निवृत्ति नहीं होती (टिप्पणी प0 281)। जैसे सिनेमामें दीखनेवाले पदार्थों आदिकी सत्ता नहीं है ऐसा जानते हुए भी उसमें राग हो जाता है।सिनेमा देखनेसे चरित्र समय नेत्रशक्ति और धन इन चारोंका नाश होता है ऐसा जानते हुए भी रागके कारण सिनेमा देखते हैं। इससे सिद्ध होता है कि वस्तुकी सत्ता न होनेपर भी उसमें राग अथवा सम्बन्ध रह सकता है। यदि राग न हो तो वस्तुकी सत्ता माननेपर भी उसमें राग उत्पन्न नहीं होता। इसलिये साधकका मुख्य काम होना चाहिये रागका अभाव करना सत्ताका अभाव करना नहीं क्योंकि बाँधनेवाली वस्तु राग या सम्बन्ध ही है सत्तामात्र नहीं। पदार्थ चाहे सत् हो चाहे असत् हो चाहे सत्असत्से विलक्षण हो यदि उसमें राग है तो वह बाँधनेवाला हो ही जायगा। वास्तवमें हमें कोई भी पदार्थ नहीं बाँधता। बाँधता है हमारा सम्बन्ध जो रागसे होता है। अतः हमारेपर राग मिटानेकी ही जिम्मेवारी है। सम्बन्ध   अब भगवान् कर्मयोगको श्रेष्ठ कहनेका कारण बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.2।।संन्यास इति। संन्यासः कर्म योगः च नात्र एकोऽभिहितः अपि तु उभौ। संमिलितौ तौ निश्श्रेयसं दत्तः। योगेन विना संन्यासो न संभवतीति योगस्य विशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.2।।प्रश्नमेवमुत्थाप्य प्रतिवचनमुत्थापयति स्वाभिप्रायमिति। निर्णयाय तद्द्वारेण परस्य संशयनिवृत्त्यर्थमित्यर्थः। एवं प्रश्ने प्रवृत्ते कर्मयोगस्य सौकर्यमभिप्रेत्य प्रशस्यतरत्वमभिधित्सुर्भगवान्प्रतिवचनं किमुक्तवानित्याशङ्क्याह संन्यास इति। उभयोरपि तुल्यत्वशङ्कां वारयति तयोस्त्विति। कथं तर्हि ज्ञानस्यैव मोक्षोपायत्वं विवक्ष्यते तत्राह ज्ञानोत्पत्तीति। तर्हि द्वयोरपि प्रशस्यत्वमप्रशस्यत्वं वा तुल्यमित्याशङ्क्याह उभाविति। ज्ञानसहायस्य कर्मसंन्यासस्य कर्मयोगापेक्षया विशिष्टत्वविवक्षया विशिनष्टि केवलादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.2।।सन्न्यासमिति प्रश्नवाक्ये सन्न्यास इति परिहारवाक्ये च सन्न्यासयोगशब्दौ यतिगृहस्थाश्रमविषयावेव तयोः सर्वकर्मत्यागात्तदनुष्ठानरूपत्वात्। ज्ञेय इति वचनं तु न सन्न्यासशब्दव्याख्यानपरम्। किन्तु यो द्वेषादिवर्जितो गृही सोऽपि सन्न्यासी ज्ञातव्य इति स्तुतिपरमेवेत्यत आह नायमिति। अयं परिहारवाक्यस्थः। प्रश्नवाक्यस्थस्य तात्पर्यनिर्णये तथाऽभ्युपगमात्। योगश्च न गृहस्थाश्रम इत्यपि द्रष्टव्यम्। कुतो न इति चेत् अत्र तयोस्त्विति सन्न्यासात्कर्मयोगस्य विशिष्टत्ववचनात् तस्य चास्मत्पक्ष एव सम्भवादन्यत्रासम्भवादिति भावः। कुतो भवत्पक्षे सम्भवः इत्यत आह द्वन्द्वेति। मत्पूजा मदर्पणबुद्ध्या कर्मानुष्ठानम्। आश्रमार्थत्वे कुतोऽसम्भवः इत्यत आह तानीति। तान्याधानादीनि। अत्यरेचयत् अत्यरिच्यत इतिवचनादिति वर्तते। न्यस्यतेऽस्मिन्सर्वमिति ब्रह्मैव न्यास इति कश्चित्। तदसत् तपोऽपेक्षयोत्तमत्वाभिधानस्यासङ्गतत्वात्। उपायोपेयभावेन सङ्गतिरिति चेत् तर्हि तत्सिद्धौ लोकत एवोत्तमत्वसिद्धेरभिधानवैयर्थ्यात्। गृहस्थाश्रमाद्यत्याश्रमस्योत्तमत्वमयुक्तम्। गृहस्थाश्रमो हि सर्वधर्मोपपन्नस्तत्समर्थे मध्यमे वयसि अनुष्ठेयो महाफलश्च यत्याश्रमस्तु निष्क्रियश्चरमे वयसि गृहस्थधर्मानधिकृतैरन्धपङ्गवादिभिरनुष्ठेयोऽल्पफलश्चेति केचित् तन्निरासार्थमाह सन्न्यासस्त्विति। काम्यकर्मरहितत्वात् निष्क्रियाख्योऽपि सधर्मकः। न केवलं सधर्मकः किन्तु न तस्माद्यत्याश्रमानुष्ठेयाद्यतिभक्त्यापि यत्फलं प्राप्नुयान्न तत्सर्वैर्गृहस्थधर्मैरित्यर्थः। ब्रह्मचर्यादेव ब्रह्मचर्यं विसृज्यैव विरजेत् विरक्तो भवेत् तदहरेव प्रव्रजेत् जा.उ.4या.उ.1 इति श्रुतिशेषः। कर्मेत्याश्रमान्तरम्। यदुक्तंनायं इत्यादि तदुपसंहरति अत इति। अत्र परिहारवाक्ये।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.2।।नायं सन्न्यासो यत्याश्रमः।द्वन्द्वत्यागात्तु सन्न्यासान्मत्पूजैव गरीयसी इति वचनात्।तानि वा एतान्यवराणि तपांसि न्यास एवात्यरेचयत् इति च।सन्नायासस्तु तुरीयो यो निष्क्रियाख्यः सधर्मकः। न तस्मादुत्तमो धर्मो लोके कश्चन विद्यते। तद्भक्तोऽपि हि यद्गच्छेतद्गृहस्थो न धार्मिकः। मद्भक्तिश्च विरक्तिस्तदधिकारो निगद्यते। यदाधिकारो भवति ब्रह्मचार्यपि प्रव्रजेत् इति नारदीये। ब्रह्मचर्यादेव प्रव्रजेत् ৷৷. यदहरेव विरजेत् जा.उ.4 या.उ.1 इति च। सन्न्यासे तु तुरीये वै प्रीतिर्मम महीयसी। येषामत्राधिकारो न तेषां कर्मेति निश्चयः इत्यादेश्च ब्राह्मे। अतो नात्राश्रमः सन्न्यास उक्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.2।।श्रीभगवानुवाच संन्यासः ज्ञानयोगः कर्मयोगः च ज्ञानयोगशक्तस्य अपि उभौ निरपेक्षौ निःश्रेयसकरौ। तयोः तु कर्मसंन्यासाद् ज्ञानयोगात् कर्मयोगः एव विशिष्यते।कुत इत्यत आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.2।। संन्यासः कर्मणां परित्यागः कर्मयोगश्च तेषामनुष्ठानं तौ उभौ अपि निःश्रेयसकरौ मोक्षं कुर्वाते ज्ञानोत्पत्तिहेतुत्वेन। उभौ यद्यपि निःश्रेयसकरौ तथापि तयोस्तु निःश्रेयसहेत्वोः कर्मसंन्यासात् केवलात् कर्मयोगो विशिष्यते इति कर्मयोगं स्तौति।।कस्मात् इति आह

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【 Verse 5.3 】

▸ Sanskrit Sloka: ज्ञेय: स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ् क्षति | निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ||

▸ Transliteration: jñeyaḥ sa nityasannyāsī yo na dveṣṭi na kāṅkṣati | nirdvandvo hi mahābāho sukhaṁ bandhātpramucyate ||

▸ Glossary: jñeyaḥ: should be known; saḥ: he; nitya: always; saṁnyāsī : renouncer; yaḥ: who; na: never; dveṣṭi: hates; na: never; kāṅkṣati: desires; nirdvandvaḥ: free from all dualities; hi: certainly; mahābāho: mighty-armed one; sukham: easily; bandhāt: from bondage; pramucyate: completely liberated

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.3 He who neither hates nor desires the fruits of his activities has renounced. Such a person, free from all dualities, easily overcomes material bondage and is completely liberated, Oh Arjuna!

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.3।।हे महाबाहो जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.3।। जो पुरुष न किसी से द्वेष करता है और न किसी की आकांक्षा वह सदा संन्यासी ही समझने योग्य है क्योंकि हे महाबाहो द्वन्द्वों से रहित पुरुष सहज ही बन्धन मुक्त हो जाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.3 ज्ञेयः should be known? सः he? नित्यसंन्यासी perpetual ascetic? यः who? न not? द्वेष्टि hates? न not? काङ्क्षति desires? निर्द्वन्द्वः one free from the pairs of opposites? हि verily? महाबाहो O mightyarmed? सुखम् easily? बन्धात् from bondage? प्रमुच्यते is set free.Commentary A man does not become a Sannyasi by merely giving up actions because of laziness or ignorance or some family arrel or calamity or unemployment. A true Sannyasi is not a hypocritical coward.The Karma Yogi who neither hates pain and the objects which give him pain? nor desires pleasure and the objects that give him pleasure? who has neither attachment nor aversion to any senseobject and who has risen above the pairs of heat and cold? joy and sorrow? success and failure? victory and defeat? gain and loss? praise and censure? honour and dishonour? should be known as a perpetual Sannyasi though he is ever engaged in action.One need not have taken Sannyasa formally but if he has the above mental attitutde? he is a perpetual Sannyasi. Mere ochrecoloured robe cannot make one a Sannyasi. What is wanted is a pure heart with true renunciation of egoism and desires. Physical renunciation of objects is no renunciation at all. (Cf.VI.1)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.3. That person may be considered a man of permanent renunciation, who neither hates nor desires. For, O mighty-armed ! he who is free from the pairs [of opposites] is easily released from bondage [of action].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.3 He is a true ascetic who never desires or dislikes, who is uninfluenced by the opposites and is easily freed from bondage.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.3 He who neither hates nor desires and is beyond the pairs of opposites is to be understood as an ever-renouncer. Hence, he is easily set free from bondage, O Arjuna.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.3 He who does not hate and does not crave should be known as a man of constant renunciation.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.3 He should be known as a perpertual Sannyasi who neither hates nor desires; for, free from the pairs of opposites, O mighty-armed Arjuna, he is easily set free from bondage.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.3 Jneyah etc. Therefore he alone is all the time man-of-renunciation, by whom both desire and hatred have been renounced from his mind. Because his intellect has come out of the pairs of anger, delusion and others, he is released just easily.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.3 That Karma Yogin, who, being satisfied with the experience of the self implied in Karma Yoga, does not desire anything different therefrom and conseently does not hate anything, and who, because of this, resignedly endures the pairs of opposites - he should be understood as ever given to renunciation, i.e., even devoted to Jnana Yoga. Such a one therefore is freed from bondage because of his being firmly devoted to Karma Yoga which is easy to practise.

The independence of Jnana Yoga and Karma Yoga from each other as means for attainment of the self is now declared.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.3 For, O mighty-armed one, he who is free from duality becomes easily freed from bondage. That performer of Karma-yoga, yah, who; na dvesti, does not hate anything; and na kanksati, does not crave; jneyah, should be known; as nitya-sannyasi, a man of constant [A man of constant renunciation: He is a man of renunciation ever before the realization of the actionless Self.] renunciation. The meaning is that he who continues to be like this in the midst of sorrow, happiness and their sources should be known as a man of constant renunciation, even though engaged in actions. Hi, for; mahabaho, O mighty-armed one; nirdvandvah, one who is free from duality; pramucyate, becomes freed; sukham, easily, without trouble; bandhat, from bondage. It is reasonable that in the case of renunciation and Karma-yoga, which are opposed to each other and can be undertaken by different persons, there should be opposition even between their results; but it canot be that both of them surely lead to Liberation. When such a estion arises, this is the answer stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.3।। इस श्लोक में स्वयं भगवान् ही कर्मयोग के श्रेष्ठत्व का कारण बताते हैं। भगवान् द्वारा यहां दी हुई संन्यास की परिभाषा उसके विषय में प्रचलित निरर्थक धारणाओं को दूर कर देती है। वेषभूषा के बाह्य आडंबर की अपेक्षा आन्तरिक गुणों का अधिक महत्व है। श्रीकृष्ण के विचारानुसार राग और द्वेष से रहित पुरुष ही संन्यासी कहलाने योग्य है।रागद्वेष जयपराजय सुखदुख आदि इसी प्रकार के द्वन्द्वात्मक चक्र हैं जिन पर आरू ढ़ मन जीवन में अनेक प्रकार के अनुभव प्राप्त करता हुआ आगे बढ़ता है। हम तुलनात्मक अध्ययन के द्वारा ही जीवन में आनेवाली परिस्थितियों को समझ पाते हैं। अन्धकार के सन्दर्भ में ही प्रकाश का ज्ञान होता है। किसी वस्तु के विपरीत धर्मवाली वस्तु के न होने पर हम उस वस्तु को यथार्थ रूप मे नहीं समझ पाते।यदि वस्तुओं का ज्ञान प्राप्त करने के लिए बुद्धि के पास तुलनात्मक अध्ययन प्रणाली ही उपलब्ध हो तब उसका त्याग करने का अर्थ होगा विचार के साधन अन्तकरण का ही त्याग करना। एक वाहन द्वारा सड़क पर यात्रा करना संभव है परन्तु समुद्र यात्रा नहीं। उसके लिए उस वाहन का त्याग करके जलपोत की आवश्यकता होती है। असंख्य नामरूपों की सृष्टि में तो बुद्धि का उपयोग किया जा सकता है। यहाँ कहा गया है कि समस्त प्रकार के भेद दर्शनों से मुक्त हुआ अर्थात् मन और बुद्धि के अतीत हुआ पुरुष ही सच्चा संन्यासी है।यह कोई सहज कार्य नहीं है। द्वन्द्वों से रहित होने का अर्थ है र्मत्य जीव का सभी बन्धनों से मुक्त हो जाना। संन्यासी की इस परिभाषा से यह नहीं समझें कि साधकों के लिए दुखपूर्ण निराशा के जीवन को चित्रित करने का भगवान् का प्रयत्न है। अर्जुन के मन में दीर्घकाल से अर्जित वासनाओं का संचय था। अत उसके आत्मविकास को ध्यान मे रखकर भगवान् उसे संन्यास जीवन को स्वीकार करने की शीघ्रता से परावृत करना चाहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.3।।तत्र हेतुमाह ज्ञेय इति। स निषकामकर्मयोगी नित्यं संन्यासी ज्ञातव्यः। यत्तु यदोयोगात्तदोऽध्याहारः। सनित्यसंन्यासीत्येकं पदम्। नित्यैः कर्मभिः सह वर्तत इति सनित्यः स चासौ संन्यासी चेति तन्न। स इत्येनेनैव नित्यादिकर्मानुष्ठातुर्लामेनाध्याहारस्य क्लिष्टकल्पनायाश्च वैयर्थ्यात्। नित्यसंन्यासीति विवक्षितार्थालाभाच्च। केऽसौ यो न द्वेष्टि दुःखं तत्साधनं च सुखं तत्साधनं च नाकाङ्क्षति रागद्वेषराहित्यरुपसंन्यासगुणयोगात् अयमपि संन्यासीति भावः। एतेन द्वेषमूलकानि श्येनादीनि नानुतिष्ठति स्वर्गादिफलाकाङ्क्षप्रयुक्तानि ज्योतिष्टोमादीन्यपि। तस्मात्संन्यासगुणयोगादयमपि संन्यासीति भाव इति प्रत्युक्तम्। क्रियायाः कर्ममात्रसाकाङ्क्षत्वेनास्यार्थस्यार्थिकत्वात्। श्येनाद्यननुष्ठानमात्रेण सर्वत्र रागद्वेषानिवृत्त्या संन्यासिगुणयोगासिद्धेः। अत्रादिपदाभ्यां आभिचारिककर्मणां अग्निष्टोमादीनां चैव लाभः श्येनादिसमभिव्याहारात् द्वेषेत्यादिना विशेषितत्वाच्च। यद्यादिपदाभ्यां भाष्योक्तमपि लभ्यत इत्याग्रहस्तर्हि तेनैव निर्वाहे कृतमनया कुसष्ट्या। यत्तु न द्वेष्टि भगवदर्पणबुद्य्धा क्रियमाणं कर्म निष्फलत्वशङ्क्येति तच्चिन्त्यम्। संकोचे मानाभावात् संन्यासिगुणयोगालाभाच्च। हि यस्मात्सुखदुःखराग्द्वेषशीतोष्णादिद्वन्द्ववर्जितः सुखमनायासेनैव बन्धात्संसाराज्ज्ञानप्राप्त्या प्रमुच्यते यथा त्वं महाबाहुत्वादस्माद्युद्धादनायासेनैव मोक्ष्यसे तथेति द्योतयन्नाह महाबाहो इति। यत्तु यद्यप्येवं तथापि हि प्रसिद्धं निर्द्वन्द्वः द्वन्द्वं सत्यानृतयोरात्मानात्मनोर्मिथुनं परस्पराध्यासः तद्रहितः सांख्यः रागाद्युदयहेतोरज्ञानस्यात्यन्तोच्छेदात् सुखं कर्मकरणायासं विनापि बन्धात् केवलेन ज्ञानेनैव मुच्यते न कर्माण्यपेक्षते। यद्वाद्वन्द्वं वै मिथुनं तस्माद्वन्द्वामिन्थुनं प्रजायते इति श्रुतेर्द्वन्द्वं स्त्रीपुंसयोर्मिथुनं तद्रहितः स्त्र्यादित्यागी संन्यासी अनायासेन मुच्यते। रागादिभयस्योभयत्र तुल्यत्वात् अत्र च कुटुम्बभरणवैयग्र्याभावात् सुखं मुच्यत इत्यर्थ इति व्याचख्युः तत्प्रकरणविरोधादुपेक्ष्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.3।।तमेव कर्मयोगं स्तौति त्रिभिः स कर्मणि प्रवृत्तोऽपि नित्यं संन्यासीति ज्ञेयः। कोऽसौ। यो न द्वेष्टि भगवदर्पणबुद्ध्या क्रियमाणं कर्म निष्फलत्वशङ्क्या न काङ्क्षति स्वर्गादिकम्। निर्द्वन्द्वो रागद्वेषरहितः हि यस्मात्सुखमनायासेन हे महाबाहो बन्धादन्तःकरणाशुद्धिरूपाज्ज्ञानप्रतिबन्धात्प्रमुच्यते नित्यानित्यवस्तुविवेकादिप्रकर्षेण मुक्तोभवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.3।।ननु प्रत्यक्षः कर्मयोगिनां विक्षेपः संन्यासिनां तु स नास्तीति कथमुच्यते कर्मयोगो विशिष्यत इत्याशङ्क्याह ज्ञेय इति। यो रागद्वेषरहितः स कर्मसु स्वरूपतस्त्यक्तेष्वत्यक्तेषु वा नित्यं संन्यास्येव। एतेन साधनभूतयोः सांख्ययोगयोः रागद्वेषराहित्यकृतं साम्यमुक्तम्। फलभूतयोस्तु सर्वविकल्पराहित्यरूपसाम्यमनन्तरश्लोकाभ्यामुच्यते। तथापि चित्तस्वाभाव्यात्कदा चित्संन्यासिनो रागोदये पाताशङ्कास्ति नेतरस्येति स एव श्रेयानिति भावः। यद्यप्येवं तथापि हि प्रसिद्धं निर्द्वन्द्वो द्वन्द्वं सत्यानृतयोरात्मानात्मनोर्मिथुनं परस्पराध्यासस्तद्रहितः सांख्यो रागाद्युदयहेतोरज्ञानस्यात्यन्तोच्छेदात्। सुखं कर्मकरणायासंविनापि बन्धात्संसारात्केवलज्ञानेनैव मुच्यते न कर्माण्यपेक्षते। यद्वा निर्द्वन्द्वोद्वन्द्वं वै मिथुनं तस्माद्वन्द्वान्मिथुनं प्रजायते इति श्रुतेर्द्वन्द्वं स्त्रीपुंसयोर्मिथुनं तद्रहितः स्त्र्यादित्यागी संन्यासी अनायासेन मुच्यते। रागादिजयस्योभयत्र तुल्यत्वात्। अत्रच कुटुम्बभरणवैयग्र्याभावात्सुखं मुच्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.3।।अथ श्रेयोरूपप्रश्नोत्तरमाह सर्वत्यागरूपम् ज्ञेय इति। यः सन्न्यासी सर्वत्यागवान् सर्वं त्यक्त्वैतयोर्मध्ये नैकं कमपि द्वेष्टि न चैकं कमप्याकाङ्क्षति स नित्यं ज्ञेयो ज्ञातुं योग्यः। मदीयत्वेनेति शेषः। हे महाबाहो सर्वकरणसमर्थ हि निश्चयेन निर्द्वन्द्वः कर्म सन्न्यासयोगयोर्मदाज्ञातिरेकेण भिन्नज्ञानरहितो बन्धात् तत्फलजात्सुखं प्रमुच्यते। मोक्षे प्रकर्षः मदाज्ञाकरणेऽहं प्रसन्नो भवामीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.3।। कुत इत्यपेक्षायां संन्यासित्वेन कर्मयोगं स्तुवन् तस्य श्रेष्ठत्वं दर्शयति ज्ञेय इति। रागद्वेषादिराहित्येन परमेश्वरार्थं कर्माणि योऽनुतिष्ठति स नित्यं कर्मानुष्ठानकालेऽपि संन्यासीत्येव ज्ञेयः। तत्र हेतुः निर्द्वन्द्वो रागद्वेषादिशून्यो हि शुद्धचित्तो ज्ञानद्वारा सुखमनायासेन संसारात्प्रमुच्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.3।।योगमार्गरीत्या कर्मकार्यपि विवक्ष्यमाणलक्षणश्चेन्नित्यसन्न्यास्येवेत्याह ज्ञेय इति। यो योगमार्गीयबुद्ध्या कर्मकर्त्ता निर्द्वन्द्वः लाभालाभादिजयाजयादिशून्यः। तदाह न द्वेष्टि काम्यं कर्म न च कर्ममात्रे फलं काङ्क्षति किन्तु करोत्येव तथा स द्वन्द्वसन्न्यसनान्नित्यसन्न्यासी भगवन्निष्ठतया करणाद्योग्यपि नित्यस्न्न्यास्येवेति तत्कर्मबन्धात्प्रमुक्त एव सुखं यथा भवति तथा इति। अतो महाबाहुभ्यां तथैव तवोचितमिति भावः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.3।।( कर्मयोग श्रेष्ठ ) कैसे है इसपर कहते हैं उस कर्मयोगीको सदा संन्यासी ही समझना चाहिये कि जो न तो द्वेष करता है और न किसी वस्तुकी आकाङ्क्षा ही करता है। अर्थात् जो सुख दुःख और उनके साधनोंमें उक्त प्रकारसे रागद्वेषरहित हो गया है वह कर्ममें बर्तता हुआ भी सदा संन्यासी ही है ऐसे समझना चाहिये। क्योंकि हे महाबाहो रागद्वेषादि द्वन्द्वोंसे रहित हुआ पुरुष सुखपूर्वक अनायास ही बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.3।। व्याख्या   महाबाहो महाबाहो सम्बोधनके दो अर्थ होते हैं एक तो जिसकी भुजाएँ बड़ी और बलवान् हों अर्थात् जो शूरवीर हो और दूसरा जिसके मित्र तथा भाई बड़े पुरुष हों। अर्जुनके मित्र थे प्राणिमात्रके सुहृद् भगवान् श्रीकृष्ण और भाई थे अजातशत्रु धर्मराज युधिष्ठिर। इसलिये यह सम्बोधन देकर भगवान् अर्जुनसे मानो यह कह रहे हैं कि कर्मयोगके अनुसार सबकी सेवा करनेका बल तुम्हारेमें है। अतः तुम सुगमतासे कर्मयोगका पालन कर सकते हो।यो न द्वेष्टि कर्मयोगी वह होता है जो किसी भी प्राणी पदार्थ परिस्थिति सिद्धान्त आदिसे द्वेष नहीं करता। कर्मयोगीका काम है सबकी सेवा करना सबको सुख पहुँचाना। यदि उसका किसीके भी साथ किञ्चिन्मात्र भी द्वेष होगा तो उसके द्वारा कर्मयोगका आचरण साङ्गोपाङ्ग नहीं हो सकेगा। अतः जिससे कुछ भी द्वेष हो उसकी सेवा कर्मयोगीको सर्वप्रथम करनी चाहिये।सबसे पहले न द्वेष्टि पद देनेका तात्पर्य यह है कि जो किसीको भी बुरा समझता है और किसीका भी बुरा चाहता है वह कर्मयोगके तत्त्वको समझ ही नहीं सकता।मार्मिक बात प्राणिमात्रके हितके उद्देश्यसे कर्मयोगीके लिये बुराईका त्याग करना जितना आवश्यक है उतना भलाई करना आवश्यक नहीं है। भलाई करनेसे केवल समाजका हित होता है परन्तु बुराईरहित होनेसे विश्वमात्रका हित होता है। कारण यह है कि भलाई करनेमें सीमित क्रियाओँ और पदार्थोंकी प्रधानता रहती है परन्तु बुराईरहित होनेमें भीतरका असीम भाव प्रधान रहता है। यदि भीतरसे बुरा भाव दूर न हुआ तो बाहरसे भलाई करें तो इससे अभिमान पैदा होगा जो आसुरी सम्पत्तिका मूल है। भलाई करनेका अभिमान तभी पैदा होता है जब भीतर कुछनकुछ बुराई हो। जहाँ अपूर्णता (कमी) होती है वहीं अभिमान पैदा होता है। परन्तु जहाँ पूर्णता है वहाँ अभिमानका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।गहराईसे देखा जाय तो नाशवान् वस्तुओंकी सहायताके बिना भलाई नहीं की जा सकती। जिन वस्तुओंसे हम भलाई करते हैं वे वस्तुएँ हमारी हैं ही नहीं प्रत्युत उन्हींकी हैं जिनकी हम भलाई करते हैं। फिर भी यदि भलाईका अभिमान होता है तो यह नाशवान्का सङ्ग है। जबतक नाशवान्का सङ्ग है तबतक योग की सिद्धि नहीं होती। मैंने भलाई की यह अभिमान बुराईसे भी अधिक भयंकर है क्योंकि यह भाव मैंपनमें बैठ जाता है। कर्म और फल तो मिट जाते हैं पर जबतक मैंपन रहता है तबतक मैंपनमें बैठा हुआ भलाईका अभिमान नहीं मिटता। दूसरी बात बुराईको तो हम बुराईरूपसे जानते ही हैं पर भलाईको बुराईरूपसे नहीं जानते। इसलिये भलाईके अभिमानका त्याग करना बहुत कठिन है जैसे लोहेकी हथकड़ीका तो त्याग कर सकते हैं पर सोनेकी हथकड़ीका त्याग नहीं कर सकते क्योंकि वह गहनारूपसे दीखती है। इसलिये बुराईरहित होकर ही भलाई करनी चाहिये। वास्तवमें बुराईका त्याग होनेपर विश्वमात्रकीभलाई अपनेआप होती है करनी नहीं पड़ती। इसलिये बुराईरहित महापुरुष अगर हिमालयकी एकान्त गुफामें भी बैठा हो तो भी उसके द्वारा विश्वका बहुत हित होता है।न काङ्क्षति कर्मयोगमें कामनाका त्याग मुख्य है। कर्मयोगी किसी भी प्राणी पदार्थ परिस्थिति आदिकी कामना नहीं करता। कामनात्याग और परहितमें परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध है। निष्काम होनेके लिये दूसरेका हित करना आवश्यक है। दूसरेका हित करनेसे कामनाके त्यागका बल आता है।कर्मयोगमें कर्ता निष्काम होता है कर्म नहीं क्योंकि जड होनेके कारण कर्म स्वयं निष्काम या सकाम नहीं हो सकते। कर्म कर्ताके अधीन होते हैं इसलिये कर्मोंकी अभिव्यक्ति कर्तासे ही होती है। निष्काम कर्ताके द्वारा ही निष्कामकर्म होते हैं जिसे कर्मयोग कहते हैं। अतः चाहे कर्मयोग कहें या निष्कामकर्म दोनोंका अर्थ एक ही होता है। सकाम कर्मयोग होता ही नहीं। निष्काम होनेसे कर्ता कर्मफलसे असङ्ग रहता है परन्तु जब कर्तामें सकामभाव आ जाता है तब वह कर्मफलसे बँध जाता है (गीता 5। 12)। सकामभाव तभी नष्ट होता है जब कर्ता कोई भी कर्म अपने लिये नहीं करता प्रत्युत सम्पूर्ण कर्म दूसरोंके हितके लिये ही करता है। इसलिये कर्ताका भाव नित्यनिरन्तर निष्काम रहना चाहिये। कर्तामें जितना निष्कामभाव होगा उतना ही कर्मयोगका सही आचरण होगा। कर्ताके सर्वथा निष्काम होनेपर कर्मयोग सिद्ध हो जाता है। ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी अर्जुनने युद्ध न करके भिक्षा माँगकर जीवननिर्वाह करनेकी इच्छा प्रकट की थी गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके (गीता 2। 5) अर्थात् गुरुजनोंको न मारकर संन्यास लेना ही श्रेष्ठ है। भगवान् उसी बातका उत्तर देते हुए मानो कह रहे हैं कि हे अर्जुन वह संन्यास तो गुरुजनोंके मर जानेके भयसे किया जानेवाला बाहरी संन्यास है पर कर्मयोगीका संन्यास रागद्वेषके त्यागसे होनेवाला नित्य संन्यास अर्थात् भीतरी एवं सच्चा संन्यास है।आगे छठे अध्यायके पहले श्लोकमें भी भगवान्ने केवल अग्निका त्याग करनेवाले अर्थात् संन्यासआश्रममात्र ग्रहण करनेवाले पुरुषको संन्यासी न कहकर भीतरसे संसारके आश्रयका त्याग करनेवाले कर्मयोगीको ही संन्यासी कहा है। इस प्रकार भगवान्के मतमें कर्मयोगी ही वास्तविक संन्यासी है।कर्म करते हुए भी कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखना ही संन्यास है। कर्मोंसे किसी प्रकारका सम्बन्ध न रखनेवालेको कर्मोंका फल कभी किसी अवस्थामें किञ्चिन्मात्र भी नहीं मिलता न तु संन्यासिनां क्वचित् (गीता 18। 12)। इसलिये शास्त्रविहित समस्त कर्म करते हुए भी कर्मयोगी सदा संन्यासी ही है।कर्मयोगका अनुष्ठान किये बिना सांख्ययोगका पालन करना कठिन है। इसलिये सांख्ययोगका साधक पहले कर्मयोगी होता है फिर संन्यासी (सांख्ययोगी) होता है। परन्तु कर्मयोगके साधकके लिये सांख्ययोगका अनुष्ठान करना आवश्यक नहीं है। इसलिये कर्मयोगी आरम्भसे ही संन्यासी है।जिसके रागद्वेषका अभाव हो गया है उसे संन्यासआश्रममें जानेकी आवश्यकता नहीं है। कोई भी व्यक्ति वस्तु शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि अपनी नहीं है और अपने लिये भी नहीं है ऐसा निश्चय होनेके बाद रागद्वेष मिटकर ऐसा ही यथार्थ अनुभव हो जाता है फिर व्यवहारमें संसारसे सम्बन्ध दीखनेपर भी भीतरसे (रागद्वेष न रहनेसे) सम्बन्ध होता ही नहीं। यही नित्यसंन्यास है। लौकिक अथवा पारलौकिक प्रत्येक कार्य करते समय कर्मयोगीका संसारसे सर्वथा संन्यास रहता है इसलिये वह नित्यसंन्यासी ही समझनेयोग्य है।संसारसे सम्बन्धविच्छेद अर्थात् लिप्तताका अभाव ही संन्यास है और कर्मयोगीमें रागद्वेष न रहनेसे संसारसे लिप्तता रहती ही नहीं। अतः कर्मयोगी नित्यसंन्यासी है।निर्द्वन्द्वो हि सुखं बन्धात्प्रमुच्यते (टिप्पणी प0 283) साधनाके आरम्भमें साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व रहता है। सत्सङ्ग स्वाध्याय विचार आदि करनेसे वह परमात्मप्राप्तिको अपना ध्येय तो मान लेता है पर उसके अपने कहलानेवाले मन इन्द्रियों आदिकी रुचि स्वाभाविक ही भोग भोगने तथा संग्रह करनेमें रहती है। इसलिये साधक कभी परमात्मतत्त्वको प्राप्त करना चाहता है और कभी भोग एवं संग्रहको। उसे जैसा सङ्ग मिलता है उसीके अनुसार उसके भावोंमें परिवर्तन होता रहता है। ऐसा होनेपर भी वह भोगोंको शान्तिसे नहीं भोग सकता क्योंकि सत्सङ्ग आदिके संस्कार उसके अन्तःकरणमें वैराग्य (भोगोंसे अरुचि) पैदा करते रहते हैं। इस प्रकार साधकके अन्तःकरणमें द्वन्द्व (भोग भोगूँ या साधन करूँ) चलता रहता है। इस द्वन्द्वपर ही अहंभाव टिका हुआ है। हमें सांसारिक भोग और संग्रहमें लगना ही नहीं है प्रत्युत एकमात्र परमात्मतत्त्वको ही प्राप्त करना है ऐसा दृढ़ निश्चय होनेपर द्वन्द्व नहीं रहता और अहंभाव परमात्मतत्त्वमें लीन हो जाता है।वास्तवमें संसारका महत्त्व अन्तःकरणमें अङ्कित हो जानेसे ही द्वन्द्व रहता है। भोग भोगते रहनेसे दूसरोंसे सुख चाहते रहनेसे संसारके प्राणीपदार्थोंका महत्त्व अन्तःकरणमें अङ्कित हो जाता है। उनसे सुख लेनेसे वह महत्त्व बढ़ता जाता है जिससे उनको प्राप्त करनेकी रुचि प्रबल हो जाती है। वह रुचि एक परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको स्थायी और दृढ़ नहीं होने देती। इससे साधकमें द्वन्द्व बना रहता है। उद्देश्यकी दृढ़ताके लिये साधकको यह पक्का विचार करना चाहिये कि कितना ही सुख आराम भोग क्यों न मिल जाय मुझे उसे लेना ही नहीं है प्रत्युत परहितके लिये उसका त्याग करना है। यह विचार जितना दृढ़ होगा उतना ही साधक निर्द्वन्द्व होगा।निर्द्वन्द्व होनेकी मुख्य बात इसी श्लोकमें न द्वेष्टि न काङ्क्षति पदोंसे कही गयी है जिसका तात्पर्य है रागद्वेषसे रहित होना। रागद्वेषको मिटानेके लिये यह विचार करना चाहिये कि अपने न चाहनेपर भी अनुकूलता और प्रतिकूलता आती ही है अर्थात् अपने चाहनेपर अनुकूलता आती हो ऐसी बात नहीं है और न चाहनेपर प्रतिकूलता न आती हो ऐसी बात भी नहीं है। अनुकूलताप्रतिकूलता तो प्रारब्धके फलस्वरूप आतीजाती रहती है फिर इसके आने अथवा जानेकी चाहना क्यों करें अनुकूलताके प्रति राग और प्रतिकूलताके प्रति द्वेष अपनी भूलसे होता है। इस प्रकार विचार करनेसे भूल मिटकर रागद्वेष सर्वथा समाप्त हो जाते हैं।दूसरी बात यह है कि अपनी (स्वयंकी) सत्ता स्वतन्त्र है किसी पदार्थ व्यक्ति क्रियाके अधीन नहीं है क्योंकि सुषुप्तिअवस्थामें जब हम संसारको भूल जाते हैं तब भी अपनी सत्ता बनी रहती है जाग्रत् और स्वप्नअवस्थामें भी हम प्राणी पदार्थके बिना रह सकते हैं। फिर (अपनी स्वतन्त्र सत्ता होते हुए भी) उनमें रागद्वेष करके हम उनके अधीन क्यों बनें इस प्रकार विचार करनेसे भी रागद्वेष मिट जाते हैं।संसारका राग उत्पन्न और नष्ट होनेवाला है। यह राग कभी स्थायी नहीं रहता किन्तु हम नयेनये प्राणी पदार्थोंमें राग करके इसे बनाये रखनेकी चेष्टा करते हैं। परन्तु परमात्माकी अभिलाषा उत्पन्न और नष्ट होनेवाली नहीं है क्योंकि परमात्माका ही अंश होनेके नाते जीवका परमात्मासे अखण्ड सम्बन्ध है। परमात्माकी अभिलाषा कभी घटतीब़ढ़ती भी नहीं। केवल संसारमें राग अधिक होनेपर वह घटती हुई और राग कम होनेपर वह बढ़ती हुई दीखती है। इसलिये मैं सदा जीता रहूँ मैं सब कुछ जान लूँ मैं सदा सुखी रहूँ इस रूपमें सत्चित्आनन्दस्वरूप परमात्माकी अभिलाषा जीवमात्रमें निरन्तर रहती है। जब संसारका राग मिट जाता है और एकमात्र परमात्माकी अभिलाषा रह जाती है तब द्वन्द्व नहीं रहता।कर्मयोग ज्ञानयोग और भक्तियोग तीनों ही योगमार्गोंमें निर्द्वन्द्व होना बहुत आवश्यक है। जबतक द्वन्द्व है तबतक मुक्ति नहीं होती (गीता 7। 27)। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें राग और द्वेष ये दो शत्रु हैं (गीता 3। 34)। निर्द्वन्द्व होनेसे ये दोनों मिट जाते हैं और इनके मिटनेसे सुखपूर्वक परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति हो जाती है।संसारमें उलझनेके दो ही कारण हैं राग और द्वेष। जितने भी साधन हैं सब रागद्वेषको मिटानेके लिये ही हैं (टिप्पणी प0 284)। रागद्वेषके मिटनेपर नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति स्वतःसिद्ध है। इसमें परिश्रम है ही नहीं। कारण कि परमात्मतत्त्वकी अनुभूति असत्के द्वारा नहीं होती प्रत्युत असत्के त्यागसे होती है। असत्की सत्ता रागद्वेषपर ही टिकी हुई है। असत् संसार तो स्वतः ही मिट रहा है पर अपनेमें रागद्वेषको पकड़नेसे संसार स्थिर दीखता है। अतः जो संसार निरन्तर मिट रहा है उसमें रागद्वेष न रहनेसे मुक्ति नहीं होगी तो क्या होगा इसलिये निर्द्वन्द्व अर्थात् रागद्वेषसे रहित पुरुष सुखपूर्वक संसारबन्धनसे मुक्त हो जाता है। सम्बन्ध   इस अध्यायके दूसरे श्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने ज्ञानयोग और कर्मयोग दोनोंको परम कल्याण करनेवाले बताया। उसकी व्याख्या अब आगेके दो श्लोकोंमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.3।।ज्ञेय इति। अतश्च स एव सार्वकालिकः संन्यासी येन मनसो अभिलाषप्रद्वेषौ संन्यस्तौ। यतोऽस्य द्वन्द्वेभ्यः

Chapter 5 (Part 3)

क्रोधमोहादिभ्यो निष्क्रान्ता धीः स सुखं प्रमुच्यत ( K omit प्र ) एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.3।।कर्म हि बन्धकारणं प्रसिद्धं तत्कथं निःश्रेयसकरं स्यादिति शङ्कते कस्मादिति। अकर्त्रात्मविज्ञानात्प्रागपि सर्वदासौ संन्यासी ज्ञेयो यो रागद्वेषौ क्वचिदपि न करोतीत्याह इत्याहेति। यथानुष्ठीयमानानि कर्माणि संन्यासिनं न निबध्नन्ति कृतानि च वैराग्येन्द्रियसंयमादिना निवर्तन्ते तथैवानभिसंहितफलानि नित्यनैमित्तिकानि योगिनमपि न निबध्नन्ति निवर्तयन्ति च संचितं दुरितमित्यभिप्रेत्याह निर्द्वन्द्वो हीति। कर्मयोगिनो नित्यसंन्यासित्वज्ञानमन्यथाज्ञानत्वान्मिथ्याज्ञानमित्याशङ्क्याह एवंविध इति। कर्मिणोऽपि रागद्वेषाभावेन संन्यासित्वं ज्ञातुमुचितमित्यर्थः। रागद्वेषरहितस्यानायासेन बन्धप्रध्वंससिद्धेश्च युक्तं तस्य संन्यासित्वमित्याह निर्द्वन्द्व इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.3।।ज्ञेयः इत्यस्यापव्याख्यानं दूषयन् तात्पर्यमाह सन्न्यासेति। अर्थान्तरस्याप्रतीतेरिति भावः। ननुयदृच्छालाभसन्तुष्टः 4।22 इत्यादिनोक्तं कामादिपरित्यागंसन्न्यासं कर्मणां 5।1 इत्यनूद्यार्जुनस्य प्रश्न इत्युक्तम्। ततश्च जानात्येवासौ सन्न्यासशब्दार्थमिति न तं प्रति स वक्तव्यः। तथा च पूर्वपक्ष्युत्प्रेक्षित एवास्यार्थ इत्यत आह सन्न्यासस्येति।सन्न्यासः कर्मयोगश्च निश्श्रेयसकरावुभौ 5।2 इति यत्सन्न्यासस्य निश्श्रेयसकरत्वमुक्तं तदुपपादयितुं ज्ञातमपि सन्न्यासशब्दार्थं स्मारयत्यनेन। द्वेषादिवर्जनं हि सन्न्यासः। तस्य च निश्श्रेयसकरत्वं श्रुत्यादिप्रसिद्धमेवेति। अतः सन्न्यासशब्दार्थकथन एव तात्पर्याभावान्नानुपपत्तिरित्यर्थः। ज्ञापकं चास्यार्थस्यास्तीत्याह ज्ञेय इतीति। ज्ञेयः स्मर्तव्य इत्यनेनोक्तमित्यर्थः। योगस्य तु निश्श्रेयसकरत्वमुत्तरवाक्य एव सेत्स्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.3।।सन्न्यासशब्दार्थमाह ज्ञेय इति। सन्न्यासस्य निश्श्रेयसकरत्वं ज्ञापयितुं तच्छब्दार्थ स्मारयति ज्ञेय इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.3।।यः कर्मयोगी तदन्तर्गतात्मानुभवतृप्तः तद्व्यतिरिक्तं किमपि न काङ्क्षति तत एव किमपि न द्वेष्टि तत एव द्वन्द्वसहः च स नित्यसंन्यासी नित्यज्ञाननिष्ठ इति ज्ञेयः। स हि सुकरकर्मयोगनिष्ठतया सुखं बन्धात् प्रमुच्यते।ज्ञानयोगकर्मयोगयोः आत्मप्राप्तिसाधनभावे अन्योन्यनैरपेक्ष्यम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.3।। ज्ञेयः ज्ञातव्यः स कर्मयोगी नित्यसंन्यासी इति यो न द्वेष्टि किञ्चित् न काङ्क्षति दुःखसुखे तत्साधने च। एवंविधो यः कर्मणि वर्तमानोऽपि स नित्यसंन्यासी इति ज्ञातव्यः इत्यर्थः। निर्द्वन्द्वः द्वन्द्ववर्जितः हि यस्मात् महाबाहो सुखं बन्धात् अनायासेन प्रमुच्यते।।संन्यासकर्मयोगयोः भिन्नपुरुषानुष्ठेययोः विरुद्धयोः फलेऽपि विरोधो युक्तः न तु उभयोः निःश्रेयसकरत्वमेव इति प्राप्ते इदम् उच्यते

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【 Verse 5.4 】

▸ Sanskrit Sloka: साङ्ख्ययोगौ पृथग्बाला: प्रवदन्ति न पण्डिता: | एकमप्यास्थित: सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् ||

▸ Transliteration: sāṅkhyayogau pṛthagbālāḥ pravadanti na paṇḍitāḥ | ekamapyāsthitaḥ samyag ubhayorvindate phalam ||

▸ Glossary: sāṁkhyayogau: sāṁkhya system and yoga; pṛthak: different; bālāḥ: less intelligent; pravadanti: say; na: not; paṇḍitāḥ: learned; ekaṁ: one; api: even; āsthitaḥ: situated; samyak: complete; ubhayoḥ: of both; vindate: enjoys; phalaṁ: result

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.4 Only the ignorant, not the wise, speaks of the path of action [karma-yoga] to be different from the path of renuncia- tion [sāṅkhya yoga]. Those who are actually learned say that one who is firmly established in either of the paths, achieves the fruit of both.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.4।।बेसमझ लोग सांख्ययोग और कर्मयोगको अलगअलग फलवाले कहते हैं न कि पण्डितजन क्योंकि इन दोनोंमेंसे एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित मनुष्य दोनोंके फलरूप परमात्माको प्राप्त कर लेता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.4।। बालक अर्थात् बालबुद्धि के लोग सांख्य (संन्यास) और योग को परस्पर भिन्न समझते हैं किसी एक में भी सम्यक् प्रकार से स्थित हुआ पुरुष दोनों के फल को प्राप्त कर लेता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.4 सांख्ययोगौ Sankhya (knowledge) and Yoga (Yoga of action or performance of action)? पृथक् distinct? बालाः children? प्रवदन्ति speak? न not? पण्डिताः the wise? एकम् one? अपि even? आस्थितः established in? सम्यक् truly? उभयोः of both? विन्दते obtains? फलम् fruit.Commentary Children the ignorant people who have no knowledge of the Self? and who have only a theoretical knowledge of the scriptures.Children or ignorant people only say that knowledge and the performance of action are different and produce distinct and opposite results. But the wise who have the knowledge of the Self say that they produce the same result only? viz.? Moksha or liberation. He who is duly established in,one? he who truly lives in one? Sankhya or Yoga? obtains the fruits of both. Therefore there is no diversity in the result or the fruit. This is the gist of this verse. (Cf.VI.2)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.4. The childish, and not the wise, proclaim the paths of knowledge and the Yoga as different. He, who has properly resorted to even one [of these two], gets the fruit of both.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.4 Only the unenlightened speak of wisdom and right action as separate, not the wise. If any man knows one, he enjoys the fruit of both.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.4 Children, not the learned, speak of Sankhya (Jnana Yoga) and Yoga (Karma Yoga) as distinct; he who is firmly set in one, attans the fruit of both.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.4 The fools, not the learned ones, speak of Sankhya (the path of Knowledge) and (Karma-) yoga as different. Any one who properly resorts to even one (of them) gets the result of both.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.4 Children, not the wise, speak of knowledge and the Yoga of action or the performance of action as though they are distinct and different; he who is truly established in one obtains the fruits of both.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.4 See Comment under 5.5

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.4 Those who say that Karma Yoga and Jnana Yoga are distinct because of the difference in results, are children, i.e., are persons with incomplete knowledge; they do not know the entire truth. The meaning is that they do not possess true knowledge, who say that Karma Yoga results in Jnana Yoga only and that Jnana Yoga alone results in the vision of the self and that the two are thus distinct because of the difference in their fruits. But on the contrary as both have only the vision of the self as the fruit, a person who is firmly set in one of them, wins that one fruit common to both.

Sri Krsna further expounds the same:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.4 Balah, the fools; na panditah, not the learned ones; pravadanti, speak of; sankhya-yogau, Sankhya [Sankhya, i.e. monasticism, is that which is suited for sankhya, Self-iniry.] (the Path of Knowledge) and (Karma-)yoga; as prthak, different, having opposite and different results. The learned ones, the wise, however, admit one, unconflicting result. How? Any one who samyak, properly; asthitah, resorts to, i.e. follows; ekam api, even one, between the Path of Knowledge and (Karma-) yoga; vindate, gets; phalam, the result; ubhayoh, of both. For, the result of both is that Liberation itself. Therefore there is no conflict with regard to the result. Objection: After beginning the topic with the words, 'renunciation' and '(Karma-) yoga', how is it that the Lord speaks of the identity of the results of the path of Knowledge and (Karma-) yoga, which is beside the point? Reply: This defect does not arise. Although the estion was put by Arjuna merely with regard to renunciation and Karma-yoga, yet the Lord, without actually avoiding them, and by adding something special which was intended by Him, gave the answer by expressing them through other words, 'Sankhya' and '(Karma-) yoga'. Those very 'renunciation and 'Karma-yoga', when they are (respectively) associated with Knowledge and such of Its means as eanimity etc., are meant by the words 'Sankhya' and 'yoga'. This is the Lord's veiw. Therefore there is no discussion out of the context. How can the result of both be attained by the proper performance of only one? The answer is:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.4।। किसी भी सामान्य कर्म को ईश्वर का पूजा में परिवर्तित करने के दो उपाय हैं। एक है सभी कर्मों में कर्तृत्व के अभिमान का त्याग और दूसरा है फलासक्ति के कारण उत्पन्न होने वाली चिंताओं का त्याग जिसे दूसरे शब्दों में कहेंगे भोक्तृत्व के अभिमान का त्याग। प्रथम उपाय को कहते हैं सांख्य तथा दूसरे को योग।सांख्य मार्ग का अनुसरण सबके लिए संभव नहीं होता है। अत्यन्त मेधावी पुरुष ही संपूर्ण विश्व में हो रहे कर्मों का अवलोकन कर इस कर्तृत्त्व के अभिमान को त्याग सकता है। जीवन में प्राप्त उपलब्धियों के लिए जगत् में कितने ही व्यक्तियों एवं नियमों की अपेक्षा होती है। इसे समझ कर ही हम अपने व्यक्तिगत योगदान की क्षुद्रता समझ सकते हैं और तभी हम अपने मिथ्या कर्तृत्त्व की धारणा को भी त्याग सकते हैं।केवल बालक अर्थात् अपरिपक्व विचार के लोग ही सांख्य और योग में विरोध देखते हैं जबकि बुद्धिमान पुरुष जो किसी एक मार्ग का अवलंबन दृढ़ता से करते हैं दोनों मार्गों के समान प्रभाव को जानते हैं। यदि साधक के रूप में हम कर्तृत्व अभिमान अथवा फलासक्ति को त्यागते हैं तो हमें एक ही लक्ष्य प्राप्त होता है।एक के ही सम्यक ् अनुष्ठान से दोनों के फल की प्राप्ति कैसे होगी उत्तर में कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.4।।ननूभयोर्निःश्रेयसकरत्वमेकफलकत्वं न युक्तं भिन्नपुरुषानुष्ठेययोः स्वरुपतोऽपि विरुद्धयोः फलतोऽपि विरोधस्योचितत्वात्। तस्मात्तयोर्यदेकं निःश्रेयसकरं तन्मे ब्रूहीत्यर्जुनाशङ्कामालक्ष्याह सांख्येति। यत्त्वेकत्र पाताशङ्का एकत्र कर्मश्रमस्तदनयोः पथोः कतरः श्रेयानित्याशङ्क्य द्वयोरपि फलतः साभ्यमित्याहेति तच्चिन्त्यम्। उभयोरप्यश्रेष्ठतां मन्यमानस्य कतरः श्रेयानिति प्रश्रस्यानुपपत्तेः। संख्या सभ्यगात्मबुद्धिस्तां वहतीति ज्ञानान्तरङ्गसाधनतया सांख्यः संन्यासः। एवं सांख्यशचब्दावाच्यः शमदमादिभिर्ज्ञानेन च संयुक्तः संन्यासोऽत्र विवक्षितः प्रस्तुतः। तथा प्रस्तुत एव कर्मयोगः ज्ञानोपायसमबुद्धित्वादिसंयुक्तः योगशब्दावाच्यः। तावेव संन्यासकर्मयोगौ ज्ञानतदुपायसमबुद्धित्वादियुक्तौ सांख्ययोगशब्दवाच्याविति भाष्यात्। एतेन सांख्यशब्देन ज्ञाननिष्ठावाचिना तदङ्ग संन्यासं लक्षयतीति लक्षणा परास्ता। बाला अविवेकिनः तौ पृथक् भिन्नफलौ प्रवदन्ति न तु पण्डिताः शास्त्रज्ञा विवेकिनः। तेतु एकमपि कर्मयोगं संन्यासं वा सभ्यक् चित्तशुद्धिसंपादकं शमदमादियुक्तं वाऽऽस्थितोऽनुष्ठितवानुभयोः फलं निःश्रेयसं मोक्षं परम्परया साक्षाद्वा विन्दते लभत इति प्रवदन्तीत्यर्थः। यत्तुसमित्येकीभाव इति यास्कः। एकीभावेनात्मानन्यत्वेन ख्यायते प्रकाश्यते वस्तुस्वरुपमनयेति संख्या स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चस्य निर्विकल्पे प्रत्यगात्मनि प्रविलापनेनोदिता चेतोवृत्तिस्तत्साधनभूतो यः सांख्यः संन्यासः सच दारादिबुद्य्धन्तानां पदार्थानामात्मन्येकीभावेन न्यसनं त्यागः प्रविलापनम् तथा योगोऽप्यग्निहोत्रसंध्योपासनादिनिर्विकल्पसमाध्यन्तमनुष्ठानं तत्र मुख्ययोगस्य लक्षणयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः इति। वृत्तयश्चप्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः। इति पञ्च। तावेतौ फलभूतौ सांख्ययोयौ उत साधनभूतौ संन्यासकर्मयोगाख्यौ। तत्रान्त्ययोः साम्यंज्ञेयः स नित्यसंन्यासी इत्यनेन सूचितमाद्ययोस्त्वैक्यमत्रोच्यते। आस्थितोऽनुतिष्ठन् फलं निर्विकल्पात्मनाऽवस्थितिरुपमित्यन्ये व्याचख्युस्तदर्जुनप्रश्नाननुगुणत्वेनोपेक्ष्यम्। संन्यासकर्मयोग्योः किं श्रेयस्करमिति तेनपृष्टत्वात्। अतएव भाष्यकृद्भिस्तत्रतत्र योगशब्दार्थः कर्मयोग इत्येव प्रदर्शितः। एतेन वृत्तेः पञ्चधात्ववर्णनमप्यप्रासङ्गिकत्वादपास्तम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.4।।ननु यः कर्मणि प्रवृत्तः स कथं संन्यासीति ज्ञातव्यः कर्मतत्त्यागयोः स्वरूपविरोधात्। फलैक्यात्तथेति चेत् न स्वरूपतो विरुद्धयोः फलेऽपि विरोधस्यौचित्यात्। तथाच निःश्रेयसकरावुभावित्यनुपपन्नमित्याशङ्क्याह संख्या सम्यगात्मबुद्धिस्तां वहतीति ज्ञानान्तरङ्गसाधनतया सांख्यः संन्यासः। योगः पूर्वोक्तः कर्मयोगः। तौ पृथग्विरुद्धफलौ बालाः शास्त्रार्थज्ञानविवेकशून्याः प्रवदन्ति न पण्डिताः। किं तर्हि पण्डितानां मतम्। उच्यते एकमपि संन्यासकर्मणोर्मध्ये सम्यगास्थितः स्वाधिकारानुरूपेण सम्यग्यथाशास्त्रं कृतवान्सन्नुभयोर्विन्दते फलं ज्ञानोत्पत्तिद्वारेण निःश्रेयसमेकमेव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.4।।नन्वेकत्र पाताशङ्का एकत्र कर्मश्रमस्तदनयोः पथोः कतरः श्रेयानित्याशङ्क्य द्वयोरपि फलतः साम्यमित्याह सांख्ययोगाविति। सांख्यंसमित्येकीभावे इति यास्कः। एकीभावेनात्मानन्यत्वेन ख्यायते प्रकाश्यते वस्तुस्वरूपमनयेति संख्या स्थूलसूक्ष्मकारणप्रपञ्चस्य निर्विकल्पे प्रत्यगात्मनि प्रविलापनेनोदिता चेतोवृत्तिस्तत्साधनभूतो यः सांख्यः संन्यासः सच दारादिबुद्ध्यन्तानां पदार्थानामात्मन्येकीभावेन न्यसनं त्यागः प्रविलापनं तथा योगोऽप्यग्निहोत्रसंध्योपासनादिनिर्विकल्पसमाध्यन्तमनुष्ठानं तत्र मुख्यस्य योगस्य लक्षणंयोगश्चित्तवृत्तिनिरोधः इति। वृत्तयश्चप्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः इति पञ्च। तत्र प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि तेषु प्रत्यक्षमिन्द्रियं तज्जा वृत्तिः शुक्त्यादिविषयं याथार्थ्येन ज्ञानम्। विपर्ययस्तु तत्रैव रजतादिविषयं भ्रान्तिरूपं ज्ञानम्। संशयोऽपि इयं शुक्तिर्वा रजतं वेत्यनिर्धारितान्यतरकोटिकं ज्ञानम्। स च विपर्यय एवान्तर्भवति। विकल्पस्तु शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः यथा पुरुषस्य चैतन्यं वन्ध्यापुत्र इति। नहि पुरुषचैतन्यतत्संबन्धानां पृथक्त्वमस्ति किंतु चैतन्यमेव हि शब्दत्रयेणोच्यते। नापि वन्ध्यासुतस्य स्वरूपमस्त्यथापि शब्देनाभिलप्यते। सोऽयं विकल्पः शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यः एकस्मिन्ननेकबुद्धिरसति स सद्बुद्धिरिति। निद्रास्मृति लोकप्रसिद्धे। एतासां निरोधेऽपि निर्विकल्पः प्रत्यगात्मैवावशिष्यते। तावेतौ फलभूतौ सांख्ययोगौ। साधनभूतौ तावेव संन्यासकर्मयोगाख्यौ। तत्रान्त्ययोः साम्यंज्ञेयः स नित्यसंन्यासी इत्यनेन सूचितम्। आद्ययोस्त्वैक्यमत्रोच्यते। आस्थितोऽनुतिष्ठन्। फलं निर्विकल्पात्मनावस्थितिरूपम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.4।।उभयोर्हेयोपादेयज्ञानिनो मत्स्वरूपाद्भिन्नज्ञानिनश्च मूर्खा इत्याह साङ्ख्ययोगाविति। साङ्ख्ययोगौ पृथक् भिन्नतयाऽनुष्ठेयाननुष्ठेयत्वेन मताविति बाला मूर्खाः प्रवदन्ति न पण्डिताः ज्ञानिन इत्यर्थः। अयं भावः साङ्ख्ययोगौ मत्कुण्डलात्मकौ तत्र हेयोपादेयज्ञानं मत्कुण्डलयोर्मदात्मकत्वात् भिन्नज्ञानं च ज्ञानमेवेति भावः। यतस्तथा ज्ञानमज्ञानमतः सम्यगास्थितो मत्स्वरूपपरो मदाज्ञया कुर्वन्नुभयोरप्येकं फलं मत्प्रसादरूपं विन्दते प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.4।।यस्मादेवमङ्गप्रधानत्वेनोभयोरवस्थाभेदेन क्रमसमुच्चयः। अतो विकल्पमङ्गीकृत्योभयोः कः श्रेष्ठ इति प्रश्नोऽज्ञानिनामेवोचितो न विवेकिनामित्याह सांख्ययोगाविति। सांख्यशब्देन ज्ञाननिष्ठावाचिना तदङ्गं संन्यासं लक्षयति। संन्यासकर्मयोगावेकफलौ सन्तौ पृथक्स्वतन्त्राविति बाला अज्ञा एव प्रवदन्ति नतु पण्डिताः। तत्र हेतुः अनयोरेकमपि सम्यगास्थित आश्रितः सन्नुभयोरपि फलं प्राप्नोति। तथाहि कर्मयोगं सम्यगनुतिष्ठन् शुद्धचित्तः सन् ज्ञानद्वारा यदुभयोः फलं कैवल्यं विन्दति। संन्यासं सम्यगास्थितोऽपि पूर्वमनुष्ठितस्य कर्मयोगस्यापि परम्परया ज्ञानद्वारा यदुभयोः फलं कैवल्यं तद्विन्दतीति न पृथक्फलत्वमनयोरित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.4।।ननु साङ्ख्ययोगयोरेक एवार्थः कथमुत्पाद्यते शास्त्रभेदात् इत्याशङ्क्य एकफलविषयत्वेनाभेदमुख्यैकार्थ्यमुपदिशति साङ्ख्येति। साङ्ख्ये हि कर्मणां सन्न्यासः योगे चोपादानमिति भेदेऽपि स्वकर्मणि द्वन्द्वसन्न्यासपूर्वकं करणमर्थमेकमप्यास्थित उभयोः फलं विन्दतीति। यद्वा उभयोर्मध्ये एकमप्यास्थितः सम्यक् फलं विन्दतीति स्वातन्त्र्येण मीमांसितयोः परमपुरुषार्थसाधकत्वमुक्तम्। ऐकार्थ्येनोपादाने तथेति भगवन्मतम्। तदग्रे स्पष्टीभविष्यति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.4।।भिन्न पुरुषोंद्वारा अनुष्ठान करनेयोग्य परस्परविरुद्ध कर्मसंन्यास और कर्मयोगके फलमें भी विरोध होना चाहिये दोनोंका कल्याणरूप एक ही फल कहना ठीक नहीं इस शङ्काके प्राप्त होनेपर यह कहा जाता है बालबुद्धिवाले ही सांख्य और योगइन दोनोंको अलगअलग विरुद्ध फलदायक बतलाते हैं पण्डित नहीं। ज्ञानी पण्डितजन तो दोनोंका अविरुद्ध और एक ही फल मानते हैं। क्योंकि सांख्य और योगइन दोनोंमेंसे एकका भी भलीभाँति अनुष्ठान कर लेनेवाला पुरुष दोनोंका फल पा लेता है। कारण दोनोंका वही ( एक ) कल्याणरूप ( परमपद ) फल है इसलिये फलमें विरोध नहीं है। पू0 संन्यास और कर्मयोग इन शब्दोंसे प्रकरण उठाकर फिर यहाँ प्रकरणविरुद्ध सांख्य और योगके फलकी एकता कैसे कहते हैं उ0 यह दोष नहीं है। यद्यपि अर्जुनने केवल संन्यास और कर्मयोगको पूछनेके अभिप्रायसे ही प्रश्न कियाथा परंतु भगवान्ने उसके अभिप्रायको न छोड़कर ही अपना विशेष अभिप्राय जोड़ते हुए सांख्य और योग ऐसे इन दूसरे शब्दोंसे उनका वर्णन करके उत्तर दिया है। क्योंकि वे संन्यास और कर्मयोग ही ( क्रमानुसार ) ज्ञानसे और उसके उपायरूप समबुद्धि आदि भावोंसे युक्त हो जानेपर सांख्य और योगके नामसे कहे जाते हैं यह भगवान्का मत है अतः यह वर्णन प्रकरणविरुद्ध नहीं है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।5.4।। व्याख्या   सांख्ययोगौ पृथग्बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः इसी अध्यायके पहले श्लोकमें अर्जुनने कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करके तत्त्वदर्शी महापुरुषके पास जाकर ज्ञान प्राप्त करनेके साधनको कर्मसंन्यास नामसे कहा है। भगवान्ने भी दूसरे श्लोकमें अपने सिद्धान्तकी मुख्यता रखते हुए उसे संन्यास और कर्मसंन्यास नामसे कहा है। अब उस साधनको भगवान् यहाँ सांख्य नामसे कहते हैं। भगवान् शरीरशरीरीके भेदविचार करके स्वरूपमें स्थित होनेको सांख्य कहते हैं। भगवान्के मतमें संन्यास और सांख्य पर्यायवाची हैं जिसमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी आवश्यकता नहीं है।अर्जुन जिसे कर्मसंन्यास नामसे कह रहे हैं वह भी निःसन्देह भगवान्के द्वारा कहे सांख्य का ही एक अवान्तर भेद है। कारण कि गुरुसे सुनकर भी साधक शरीरशरीरीके भेदका ही विचार करता है।बालाः पदसे भगवान् यह कहते हैं कि आयु और बुद्धिमें बड़े होकर भी जो सांख्ययोग और कर्मयोगको अलगअलग फलवाले मानते हैं वे बालक अर्थात् बेसमझ ही हैं।जिन महापुरुषोंने सांख्ययोग और कर्मयोगके तत्त्वको ठीकठीक समझा है वे ही पण्डित अर्थात् बुद्धिमान् हैं। वे लोग दोनोंको अलगअलग फलवाले नहीं कहते क्योंकि वे दोनों साधनोंकी प्रणालियोंको न देखकर उन दोनोंके वास्तविक परिणामको देखते हैं.साधनप्रणालीको देखते हुए स्वयं भगवान्ने तीसरे अध्यायके तीसरे श्लोकमें सांख्ययोग और कर्मयोगको दो प्रकारका साधन स्वीकार किया है। दोनोंकी साधनप्रणाली तो अलगअलग है पर साध्य अलगअलग नहीं है।एकमप्यास्थितः सम्यगुभयोर्विन्दते फलम् गीतामें जगहजगह सांख्ययोग और कर्मयोगका परमात्मप्राप्तिरूप फल एक ही बताया गया है। तेरहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें दोनों साधनोंसे अपनेआपमें परमात्मतत्त्वका अनुभव होना बताया गया है। तीसरे अध्यायके उन्नीसवें श्लोकमें कर्मयोगीके लिये परमात्माकी प्राप्ति बतायी गयी है और बारहवें अध्यायके चौथे श्लोकमें तथा तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें ज्ञानयोगीके लिये परमात्माकी प्राप्ति बतायी गयी है। इस प्रकार भगवान्के मतमें दोनों साधन एक ही फलवाले हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.4 5.5।।साँख्ययोगाविति। यत्सांख्यैरिति। इदं सांख्यं (S सांख्यज्ञानम्) अयं च योगः इति न भेदः। एतौ हि नित्यसंबद्धौ। ज्ञानं न योगेन विना योगोऽपि न तेन विनेति। अत एकत्वमनयोः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.4।।यदुक्तं संन्यासकर्मयोगयोर्निःश्रेयसकरत्वं तदाक्षिपति संन्यासेति। तत्रोत्तरत्वेनोत्तरश्लोकमवतारयति इति प्राप्त इति। विवेकिनस्तर्हि कथं वदन्तीत्याकाङ्क्षायामाह एकमिति। संख्यामात्मसमीक्षामर्हतीतिसांख्यं संन्यासो योगस्तु कर्मयोगस्तावुभावपि पृथगित्यस्यार्थमाह विरुद्धेति। शास्त्रार्थविवेकशून्यत्वं बालत्वम्। उत्तरार्धमवतारयितुं भूमिकां करोति पण्डितास्त्विति। ज्ञानिनो योगिनश्चेति शेषः। द्वयोरविरुद्धफलत्वमेव प्रश्नपूर्वकं प्रकटयति कथमित्यादिना। एकं साधनमनुष्ठितवतो द्वयोरपि फलं भवतीति विरुद्धमित्याशङ्क्याह उभयोरिति। सांख्ययोगयोः संन्यासकर्मानुष्ठानयोस्तत्त्वज्ञानद्वारा निःश्रेयसफलत्वान्न विरुद्धफलत्वशङ्केत्यर्थः। सांख्ययोगयोरेकफलत्ववचनं प्रकरणाननुगुणमिति शङ्कते नन्विति। अप्रकृतत्वमसिद्धमिति परिहरति नैष दोष इति। संन्यासं कर्मणामित्यादिना संन्यासं कर्मयोगं चाङ्गीकृत्य प्रश्ने संन्यासः कर्मयोगश्चेत्यादिना तथैव प्रतिवचने च कथं सांख्ययोगयोरेकफलत्वमप्रकृतं न भवतीत्युच्यते तत्राह यद्यपीति। प्रतिवचनमपि तदनुरूपमेव भगवता निरूपितमिति विशेषानुपपत्तिरित्याशङ्क्याह भगवांस्त्विति। तदपरित्यागेनेत्यत्र तत्पदेन प्रष्ट्रा प्रतिनिर्दिष्टौ कर्मसंन्यासकर्मयोगावुच्येते। सांख्ययोगाविति शब्दान्तरवाच्यतया तयोरेव संन्यासकर्मयोगयोरत्यागेन स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्य भगवान्प्रतिवचनं ददाविति योजना। यदुक्तं स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्येति तदेतद्व्यक्तीकरोति तावेवेति। समबुद्धित्वादीत्यादिशब्देन ज्ञानोपायभूतं शमादिरादीयते प्रकृतयोरेव संन्यासकर्मयोगयोरुपादाने फलितमाह अत इति। सांख्ययोगावित्यादिश्लोकव्याख्यानसमाप्तिरितिशब्दार्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.4।।सन्न्यासं गृहीत्वा योगं त्यक्ष्यामीत्याशयेन द्वयोः श्रेयसि पृष्टे द्वावपि निश्श्रेयसकरौ तत्रापि सन्न्यासाद्योगो विशिष्टोऽतो न युद्धं त्वया त्याज्यमिति परिहारो जातः किमर्थमिदानीं साङ्ख्ययोगावित्युच्यतेइत्यत आह सन्न्यासो हीति। हिशब्दो हेतौ। ज्ञानान्तरङ्गत्वेन ज्ञानोत्पत्तावत्यावश्यकत्वेन।न तस्य इत्यत्र विषयवैराग्याभावे ज्ञानानुत्पत्तिवचनेन तत एव तदुत्पत्तिरिति लभ्यते। एवं कर्मयोगस्तु ज्ञानविरोधित्वेनोक्तः।अग्निमुग्धः इत्यादावित्यपि ग्राह्यम्। अवमो योगात्। अनेन योगस्य निश्श्रेयसकरत्वमप्याक्षिप्तम्। ननु साङ्ख्यं ज्ञानं योगः कर्म तयोः कथमत्र पृथक्त्वाभाव उच्यते कथं चानेनोक्ताक्षेपपरिहारः इत्यत आह उभयोरपीति। न केवलं सन्न्यासस्य किन्तु योगस्यापीत्युभयोरपि ज्ञानान्तरङ्गत्वान्नोक्तो विरोध इत्यर्थः। अनेन साङ्ख्ययोगौ पृथक्साध्यसाधनभावहीनाविति न पण्डिता मन्यन्त इत्येवं व्याख्यातं भवति। ननु श्रुतिपुराणाभ्यां कर्मणो ज्ञानविरोधित्वमुच्यत इत्युक्तम् अतः कथमेवमभिधीयते इत्यत आह अग्नीति। अग्न्युपलक्षिते कर्मणि मुग्धः श्रेयस्करमिति भ्रान्तः। धूमतान्तो होमधूमेन तान्तो ग्लानः। धूमता धूमादित्वमेवान्तःपर्यवसानमस्येति वा। स्वं लोकं स्वीयमाश्रयं परमात्मानम्। यज्ञशालासनेन धूमोपलक्षितमार्गवतां वः पदव्योऽस्मदाश्रिता नेत्यर्थः। नन्वकाम्यमपि नित्यं नैमित्तिकं च कर्म प्रत्यवायपरिहारार्थमेव न ज्ञानान्तरङ्गमिति विद्वांस एव मन्यन्त इत्यत आह ये त्विति। बाला अविवेकिनः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.4।।सन्न्यासो हि ज्ञानान्तरङ्गत्वेनोक्तःन तस्य तत्त्वग्रहणाय भाग.5।11।3 इत्यादौ। अतः कथं सोऽवम् इत्यत आह साङ्खयोगाविति। उभयोरप्यन्तरङ्गत्वेनाविरोधः। अग्निमुग्धो ह वै धूमतान्तः स्वं लोकं न प्रत्यभिजानाति।मा वः पदव्यः पितरस्मदास्थिता या यज्ञशालासनधूमवर्त्मनाम् इत्यादि काम्यकर्मविषयमिति भावः। ये त्वन्यथा वदन्ति ते बालाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.4।।ज्ञानयोगकर्मयोगौ फलभेदात् पृथग्भूतौ ये प्रवदन्ति ते बालाः अनिष्पन्नज्ञानाः न पण्डिताः न तु कृत्स्नविदः। कर्मयोगो ज्ञानयोगम् एव साधयति ज्ञानयोगस्तु एक आत्मावलोकनं साधयति इति तयोः फलभेदेन पृथक्त्वं वदन्तो न पण्डिता इत्यर्थः।उभयोः आत्मावलोकनैकफलयोः एकफलत्वेन एकम् अपि आस्थितः तद् एव फलं लभते।एतद् एव विवृणोति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.4।। सांख्ययोगौ पृथक् विरुद्धभिन्नफलौ बालाः प्रवदन्ति न पण्डिताः। पण्डितास्तु ज्ञानिन एकं फलम् अविरुद्धम् इच्छन्ति। कथम् एकमपि सांख्ययोगयोः सम्यक् आस्थितः सम्यगनुष्ठितवान् इत्यर्थः उभयोः विन्दते फलम्। उभयोः तदेव हि निःश्रेयसं फलम् अतः न फले विरोधः अस्ति।।ननु संन्यासकर्मयोगशब्देन प्रस्तुत्य सांख्ययोगयोः फलैकत्वं कथम् इह अप्रकृतं ब्रवीति नैष दोषः यद्यपि अर्जुनेनसंन्यासं कर्मयोगं च केवलम् अभिप्रेत्य प्रश्नः कृतः भगवांस्तु तदपरित्यागेनैव स्वाभिप्रेतं च विशेषं संयोज्य शब्दान्तरवाच्यतया प्रतिवचनं ददौ सांख्ययोगौ इति। तौ एव संन्यासकर्मयोगौ ज्ञानतदुपायसमबुद्धित्वादिसंयुक्तौ सांख्ययोगशब्दवाच्यौ इति भगवतो मतम्। अतः न अप्रकृतप्रक्रियेति।।एकस्यापि सम्यगनुष्ठानात् कथम् उभयोः फलं विन्दते इति उच्यते

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【 Verse 5.5 】

▸ Sanskrit Sloka: यत्साङ्ख्यै: प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते | एकं साङ्ख्यं च योगं च य: पश्यति स पश्यति ||

▸ Transliteration: yat sāṅkhyaiḥ prāpyate sthānaṁ tad yogairapi gamyate | ekaṁ sāṅkhyaṁ ca yogaṁ ca yaḥ paśyati sa paśyati ||

▸ Glossary: yat: what; sāṅkhyaiḥ: by Sāṅkhya system; prāpyate: get; sthānaṁ: position; tat: that; yogaiḥ: by work in devotion; api: also; gamyate: can reach; ekam: one; sāṅkhyaṁ: Sāṅkhya system; ca: and; yogaṁ: work in devotion; ca: and; yaḥ: who; paśyati: sees; saḥ: he; paśyati: sees

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.5 He who knows, knows that the state reached by renuncia- tion [sāṅkhya] and action [karma] are one and the same. State reached by renunciation can also be achieved by action, know them to be at same level and see them as they are.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.5।।सांख्ययोगियोंके द्वारा जो तत्त्व प्राप्त किया जाता है कर्मयोगियोंके द्वारा भी वही प्राप्त किया जाता है। अतः जो मनुष्य सांख्ययोग और कर्मयोगको (फलरूपमें) एक देखता है वही ठीक देखता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.5।। जो स्थान ज्ञानियों द्वारा प्राप्त किया जाता है उसी स्थान पर कर्मयोगी भी पहुँचते हैं। इसलिए जो पुरुष सांख्य और योग को (फलरूप से) एक ही देखता है वही (वास्तव में) देखता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.5 यत् which? सांख्यैः by the Sankhyas? प्राप्यते is reached? स्थानम् place? तत् that? योगैः by the Yogis (Karma Yogis)? अपि also? गम्यते is reached? एकम् one? सांख्यम् the Sankhya (knowledge)? च and? योगम् Yoga (performance of action)? च and? यः who? पश्यति sees? सः he? पश्यति sees.Commentary Those who have renounced the world and are treading the path of Jnana Yoga or Vedanta are the Sankhyas. Through Sravana (hearing of the Srutis or Vedantic texts)? Manana (reflection on what is heard) and Nididhyasana (constant and profound meditation) they attain to Moksha or Kaivalya directly. Karma Yogis who do selfless service? who perform their duties without expectation of the fruits and who dedicate their actions as offerings unto the Lord also reach the same state as is attained by Sankhyas indirectly through the purification of their heart and renunciation and the conseent dawn of the knowledge of the Self. That man who sees that Sankhya and Yoga are one? as leading to the same result? sees rightly. (Cf.XIII.24?25V.2)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.5. What state is reached by men of knowledge-path the same is reached by men of Yoga subseently. [So] whosoever sees the knowledge-path and the Yoga to be one, he sees [correctly].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.5 The level which is reached by wisdom is attained through right action as well. He who perceives that the two are one, knows the truth.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.5 That state which is reached by the Sankhyans, the same is reached by the Yogins, i.e., the same state is attained also by those who are Karma Yogins. He alone is wise who sees that the Sankhya and the Yoga are one and the same because of their having the same result.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.5 The State [Sthana (State) is used in the derivative sense of 'the place in which one remains established, and from which one does not become relegated'.] that is reached by the Sankhyas, that is reached by the yogis as well. He sees who sees Sankhya and yoga as one.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.5 That place which is reached by the Sankhyas or the Jnanis is reached by the Yogis (Karma Yogis). He sees, who sees knowledge and the performance of action (Karma Yoga) as one.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.4-5 Samkhya-Yogau etc. Yat samkhyaih etc. There is nothing to differentiate as 'This is path of knowledge' [and] 'This is Yoga'. Indeed both these are ever inter-connected. Knowledge is not without Yoga; and Yoga also is not without knowledge. Hence the identity of these two.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.5 The fruit in the form of the vision of the self which is attained by the Sankhyans (i.e.) Jnana Yogins, the same is attained alone by those who are Karma Yogins. He alone is wise who sees that Sankhya and the Yoga are one and the same because of their having the same result.

Sri Krsna points out, if the aforesaid is the case, wherein the difference between them lies.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.5 Sthanam, the State called Liberation; yat prapyate, that is reached; sankhyaih, by the Sankhyas, by the monks steadfast in Knowledge; tat prapyate, that is reached; yogaih, by the yogis; api, as well. The yogis are those who, as a means to the attainment of Knowledge, undertake actions by dedicating them to God without seeking any result for themselves. The purport is that, by them also that Stated is reached through the process of aciring monasticism which is a result of the knowledge of the supreme Reality. Therefore, sah, he; pasyati, sees truly; yah, who; pasyati, sees; Sankhya and yoga as ekam, one, because of the identity of their results. This is the meaning. Objection: If this be so, then monasticism itself excels yoga! Why, then, is it said, 'Among the two, Karma-yoga, however, excels renunciation of actions'? Reply: Hear the reason for this: Having is veiw the mere giving up of actions and Karma-yoga, your estion was as to which one was better of the two. My answer was accordingly given that Karma-yoga excels renunciation of actions (resorted to) without Knowledge is Sankhya. This is what was meant by me. And that is indeed yoga in the highest sense. However, that which is the Vedic Karma-yoga is figuratively spoken of as yoga and renunciation since it leads to it (supreme Knowledge). How does it lead to that? The answer is:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.5।। यहाँ भगवान् का स्पष्ट वचन है कि सांख्य और योग दोनों का लक्ष्य एक ही है इसलिए एक के अनुष्ठान से दोनों के फल को प्राप्त होने की बात कही गयी है। इस प्रकार इन दोनों को फलरूप से एक समझने वाले पुरुष ही यथार्थ में वेदों में प्रतिपादित सत्य के ज्ञाता है।पश्यन्ति अर्थात् देखते हैं इस शब्द का प्रयोग उसके शास्त्रीय अर्थ में किया गया है जिसके कारण नेत्र इन्द्रिय के द्वारा किसी बाह्य वस्तु का दर्शन यहाँ अभिप्रेत नहीं हैं। अद्वैत तत्त्वज्ञान के सिद्धांतानुसार आत्मा के स्वयं द्रष्टा होने से उसका दृश्यरूप में दर्शन कभी नहीं हो सकता। द्रष्टा के द्वारा द्रष्टा का ही यह अनुभव है। देखते हैं शब्द का प्रयोग मात्र यह दर्शाने के लिए है कि इस आत्मतत्त्व का अनुभव उतना ही स्पष्ट और सन्देहरहित हो सकता है जितना कि बाह्य स्थूल पदार्थ का दर्शन।इस प्रकार इन दोनों के संश्लेषण करने का अर्थ यह नहीं है कि इनका मिश्रण किया गया हो। क्रम से योग तथा सांख्य का अनुष्ठान अपेक्षित है। इन दोनों को हम एक ही मान सकते हैं क्योंकि कर्मयोग से चित्तशुद्धि प्राप्त होकर सांख्य अर्थात् ध्यान के द्वारा हम परम तत्त्व का साक्षात् अनुभव कर सकते हैं। सभी साधकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि योग और सांख्य का अनुष्ठान क्रम से करना है न कि युगपत्।कर्मयोग का लक्ष्य संन्यास किस प्रकार है सुनो

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.5।।एकस्यापि सभ्यगनुष्ठानात्कथमुभयोः फलं लभन्त इत्यत आह यदिति। सांख्यैः ज्ञाननिष्ठैः संन्यासिभिः विशुद्धान्तःकरणैर्यन्मोक्षाख्यं स्थानं च्युतिवर्जितं प्राप्यते तत्त्वसाक्षात्कारमात्रेण लभ्यत इति विस्मृतग्रैवेयकलाभवल्लब्धस्यैव लाभः। तद्यौगैर्ज्ञानप्राप्त्युपायभूतानि ईश्वराराधनार्थानि फलाभिसंधिरहितानि शास्त्रीयाणि कर्माणि योगशब्दवाच्यानि तद्वद्भिः। अर्शआदित्वान्मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः। तदेव स्थानं परमार्थज्ञानं संन्यासप्राप्तिद्वारेण गम्यते प्राप्यत इत्यर्थः। आयुर्घृतमितिवत्साध्यसाधनयोरभेदाभिप्रायेण परमार्थज्ञानस्य मोक्षाभिन्नत्वात् मोक्षस्य तदभिन्नत्वाच्चैवमुक्तमित्यविरोधः। एतेन ननूभयोरेकं मोक्षाख्यं फलमस्तु नाम तत्साधनयोस्तु परस्परसापेक्षत्वं न युक्तं प्राप्यग्रामस्यैकत्वेऽपि मार्गाणामिवेत्याशङ्क्याह यत्सांख्यैरिति। अत्रेदं विकल्पनीयम्। किं व्यक्तिभेदमात्रेण सन्यासकर्मयोगयोरन्योन्यनिरपेक्षतां ब्रूषे किंवा अपेक्षणीयान्तरा भावात्। नाद्य इत्याह। बहुवचनेन यत्सांख्यैरिति संन्यासैस्तत्तत्कर्मत्यागरुपैरपि यथाऽन्योन्यसापेक्षैरेव फलं साध्यते तथा भिन्नाभ्यामेव संन्यासकर्मयोगाभ्यामन्योन्यसापेक्षाभ्यां भविष्यतीति भावः। नान्त्य इत्याह। यत्स्थानं प्राप्यत इति स्थानशब्देनात्र सोचकज्ञानमुच्यत इति प्रत्युक्तम्। पूर्वश्लोके परस्परसापेक्षत्वाप्रतिपादनात् कर्मयोगादिसाध्यात् ज्ञानान्निरपेक्षात्केवलान्मोक्ष इतिवत् शमदमादिविशिष्टस्य सन्यासस्य कर्मसाध्यत्वेऽपि तेन ज्ञाने जननीये कर्मापेक्षाया अभावादन्योन्यसापेक्षत्वासिद्धेः एकमित्यादेः स्थाने सांख्यं योगं च परस्परसापेक्षमिति वक्तव्यत्वापत्तेश्च। अतः साक्षात्परम्परया वा एकफलजनकत्वात् एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स सभ्यक्पश्यतीत्यर्थ एव रम्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.5।।एकस्यानुष्ठानात्कथमुभयोः फलं विन्दते तत्राह सांख्यैर्ज्ञाननिष्ठैः संन्यासिभिरैहिककर्मानुष्ठाशून्यत्वेऽपि प्राग्भवीयकर्मभिरेव संस्कृतान्तःकरणैः श्रवणादिपूर्विकया ज्ञाननिष्ठया यत्प्रसिद्धं स्थानं तिष्ठत्येवास्मिन्नतु कदापि च्यवत इति व्युत्पत्त्या मोक्षाख्यं प्राप्यते आवरणाभावमात्रेण लभ्यत इव नित्यप्राप्तत्वात्। योगैरपि भगवदर्पणबुद्ध्या फलाभिसंधिराहित्येन कृतानि कर्माणि शास्त्रीयाणि योगास्ते येषां सन्ति तेऽपि योगाः। अर्शआदित्वान्मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययः। तैर्योगिभिरपि सत्त्वशुद्ध्या संन्यासपूर्वकश्रवणादिपुरःसरया ज्ञाननिष्ठया वर्तमाने भविष्यति वा जन्मनि संपत्स्यमानया तत्स्थानं गम्यते। अत एकफलत्वादेकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स एव सभ्यक् पश्यति नान्यः। अयं भावः येषां संन्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठा दृश्यते तेषां तयैव लिङ्गेन प्राग्जन्मसु भगवदर्पितकर्मनिष्ठानुमीयते। कारणमन्तरेण कार्योत्पत्त्ययोगात्। तदुक्तम्यान्यतोऽन्यानि जन्मानि तेषु नूनं कृतं भवेत्। यत्कृत्यं पुरुषेणेह नान्यथा ब्रह्मणि स्थितिः।। इति। एवं येषां भगवदर्पितकर्मनिष्ठा दृश्यते तेषां तयैव लिङ्गेन भाविनी संन्यासपूर्वकज्ञाननिष्ठाऽनुमीयते सामग्र्याः कार्याव्यभिचारित्वात्। तस्मादज्ञेन मुमुक्षुणान्तःकरणशुद्धये प्रथमं कर्मयोगोऽनुष्ठेयो नतु संन्यासः। सतु वैराग्यतीव्रतायां स्वयमेव भविष्यतीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.5।।योगैर्योगिभिः। अर्शआद्यच्प्रत्ययान्तोऽयं योगशब्दः। स्थानं मोक्षाख्यम्। एकमभिन्नम्। स्पष्टा योजना श्लोकद्वयस्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.5।।एकफलत्वमेव विवेचयति यत्साङ्ख्यैरिति। यत्स्थानं मत्सामीप्यं साङ्ख्यैः साङ्ख्यनिष्ठैः प्राप्यते तत्स्थानं योगैरपि योगानुष्ठातृभिरपि गम्यते प्राप्यते। तथा चायं भावः उभयोः कुण्डलरूपत्वाद्यथास्थितस्वरूपज्ञानेनोभयनिष्ठानामपि भगवन्मुखसामीप्यमेव भविष्यति यतस्तयोरेकमेव स्थानम् अतो यः साङ्ख्यं योगं चैकं कुण्डलात्मकं पश्यति स मां पश्यतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.5।।एतदेव स्फुटयति यत्सांख्यैरिति। सांख्यैर्ज्ञाननिष्ठैः संन्यासिभिर्यत्स्थानं मोक्षाख्यं प्रकर्षेण साक्षादवाप्यते। योगैरित्यत्र अर्शआदित्वान्मत्वर्थीयोऽच्प्रत्ययो द्रष्टव्यः। तेन कर्मयोगिभिरपि तदेव ज्ञानद्वारेण गम्यते। अवाप्यत इत्यर्थः। अतः सांख्यं च योगं चैकफलत्वेनैकं यः पश्यति स एव सम्यक्पश्यति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.5।।एतदेव स्फुटयति यत्साङ्ख्यैरिति यन्मुक्तिस्थानं साङ्ख्यनिष्ठैः प्राप्यते तदेव योगैरित्यत्रार्श आदित्वेन मत्वर्थीयोऽच्। योगनिष्ठयाऽपि कर्म कुर्वद्भिरपि तत्प्राप्यते स्वातन्त्र्येण फलदत्वात्तयोरेकविषयत्वात्। अतः साङ्ख्ययोगं चैकफलत्वेनैकं यः पश्यति स सम्यग्दर्शनः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.5।।एकका भी भली प्रकार अनुष्ठान कर लेनेसे दोनोंका फल कैसे पा लेता है इसपर कहा जाता है सांख्योगियोंद्वारा अर्थात् ज्ञाननिष्ठायुक्त संन्यासियोंद्वारा जो मोक्ष नामक स्थान प्राप्त किया जाता है वही कर्मयोगियोंद्वारा भी ( प्राप्त किया जाता है )। जो पुरुष अपने लिये ( कर्मोंका ) फल न चाहकर सब कर्म ईश्वरमें अर्पण करके और उसे ज्ञानप्राप्तिका उपाय मानकर उनका अनुष्ठान करते हैं वे योगी हैं उनको भी परमार्थज्ञानरूप संन्यासप्राप्तिके द्वारा ( वही मोक्षरूप फल ) मिलता है। यह अभिप्राय है। इसलिये फलमें एकता होनेके कारण जो सांख्य और योगको एक देखता है वही यथार्थ देखता है। पू0 यदि ऐसा है तब तो कर्मयोगसे कर्मसंन्यास ही श्रेष्ठ है फिर यह कैसे कहा कि उन दोनोंमें कर्मसंन्यासकी अपेक्षा कर्मयोग श्रेष्ठ है उ0 उसमें जो कारण है सो सुनो तुमने केवल कर्मसंन्यास और केवल कर्मयोगके अभिप्रायसे पूछा था कि उन दोनोंमें कौनसा एक कल्याणकारक है उसीके अनुरूप मैंने यह उत्तर दिया कि ज्ञानरहित कर्मसंन्यासकी अपेक्षा तो कर्मयोग ही श्रेष्ठ है। क्योंकि ज्ञानसहित संन्यासको तो मैं सांख्य मानता हूँ और वही परमार्थयोग भी है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.5।। व्याख्या   यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते पूर्वश्लोकके उत्तरार्धमें भगवान्ने कहा था कि एक साधनमें भी अच्छी तरहसे स्थित होकर मनुष्य दोनों साधनोंके फलरूप परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। उसी बातकी पुष्टि भगवान् उपर्युक्त पदोंमें दूसरे ढंगसे कर रहे हैं कि जो तत्त्व सांख्ययोगी प्राप्तकरते हैं वही तत्त्व कर्मयोगी भी प्राप्त करते हैं।संसारमें जो यह मान्यता है कि कर्मयोगसे कल्याण नहीं होता कल्याण तो ज्ञानयोगसे ही होता है इस मान्यताको दूर करनेके लिये यहाँ अपि अव्ययका प्रयोग किया गया है।सांख्ययोगी और कर्मयोगी दोनोंका ही अन्तमें कर्मोंसे अर्थात् क्रियाशील प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद होता है। प्रकृतिसे सम्बन्धविच्छेद होनेपर दोनों ही योग एक हो जाते हैं। साधनकालमें भी सांख्ययोगका विवेक (जड़चेतनका सम्बन्धविच्छेद) कर्मयोगीको अपनाना पड़ता है और कर्मयोगकी प्रणाली (अपने लिये कर्म न करनेकी पद्धति) सांख्ययोगीको अपनानी पड़ती है। सांख्ययोगका विवेक प्रकृतिपुरुषका सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये होता है और कर्मयोगका कर्म संसारकी सेवाके लिये होता है। सिद्ध होनेपर सांख्ययोगी और कर्मयोगी दोनोंकी एक स्थिति होती है क्योंकि दोनों ही साधकोंकी अपनी निष्ठाएँ हैं (गीता 3। 3)।संसार विषम है। घनिष्ठसेघनिष्ठ सांसारिक सम्बन्धमें भी विषमता रहती है। परन्तु परमात्मा सम हैं। अतः समरूप परमात्माकी प्राप्ति संसारसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर ही होती है। संसारसे सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये दो योगमार्ग हैं ज्ञानयोग और कर्मयोग। मेरे सत्स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता जबकि कामनाआसक्ति अभावमें ही पैदा होती है ऐसा समझकर असङ्ग हो जाय यह ज्ञानयोग है। जिन वस्तुओंमें साधकका राग है उन वस्तुओंको दूसरोंकी सेवामें खर्च कर दे और जिन व्यक्तियोंमें राग है उनकी निःस्वार्थभावसे सेवा कर दे यह कर्मयोग है। इस प्रकार ज्ञानयोगमें विवेकविचारके द्वारा और कर्मयोगमें सेवाके द्वारा संसारसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है।एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति पूर्वश्लोकके पूर्वार्धमें भगवान्ने व्यतिरेक रीतिसे कहा था कि सांख्ययोग और कर्मयोगको बेसमझ लोग ही अलगअलग फल देनेवाले कहते हैं। उसी बातको अब अन्वय रीतिसे कहते हैं कि जो मनुष्य इन दोनों साधनोंको फलदृष्टिसे एक देखता है वही यथार्थरूपमें देखता है।इस प्रकार चौथे और पाँचवें श्लोकका सार यह है कि भगवान् सांख्ययोग और कर्मयोग दोनोंको स्वतन्त्र साधन मानते हैं और दोनोंका फल एक ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति मानते हैं। इस वास्तविकताको न जाननेवाले मनुष्यको भगवान् बेसमझ कहते हैं और इस जाननेवालेको भगवान् यथार्थ जाननेवाला (बुद्धिमान्) कहते हैं।विशेष बात किसी भी साधनकी पूर्णता होनेपर जीनेकी इच्छा मरनेका भय पानेका लालच और करनेका राग ये चारों सर्वथा मिट जाते हैं।जो निरन्तर मर रहा है अर्थात् जिसका निरन्तर अभाव हो रहा है उस शरीरमें मरनेका भय नहीं हो सकता और जो नित्यनिरन्तर रहता है उस स्वरूपमें जीनेकी इच्छा नहीं हो सकती तो फिर जीनेकी इच्छा और मरनेका भय किसे होता है जब स्वरूप शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता है तब उसमें जीनेकी इच्छा और मरनेका भय उत्पन्न हो जाता है। जीनेकी इच्छा और मरनेका भय ये दोनों ज्ञानयोग से (विवेकद्वारा) मिट जाते हैं।पानेकी इच्छा उसमें होती है जिसमें कोई अभाव होता है। अपना स्वरूप भावरूप है उसमें कभी अभाव नहीं हो सकता इसलिये स्वरूपमें कभी पानेकी इच्छा नहीं होती। पानेकी इच्छा न होनेसे उसमें कभी करनेका राग उत्पन्न नहीं होता। स्वयं भावरूप होते हुए भी जब स्वरूप अभावरूप शरीरके साथ तादात्म्य कर लेता हैतब उसे अपनेमें अभाव प्रतीत होने लग जाता है जिससे उसमें पानेकी इच्छा उत्पन्न हो जाती है और पानेकी इच्छासे करनेका राग उत्पन्न हो जाता है। पानेकी इच्छा और करनेका राग ये दोनों कर्मयोग से मिट जाते हैं।ज्ञानयोग और कर्मयोग इन दोनों साधनोंमेंसे किसी एक साधनकी पूर्णता होनेपर जीनेकी इच्छा मरनेका भय पानेका लालच और करनेका राग ये चारों सर्वथा मिट जाते हैं। सम्बन्ध   इसी अध्यायके दूसरे श्लोकमें भगवान्ने संन्यास(सांख्ययोग) की अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ बताया। अब उसी बातको दूसरे प्रकारसे कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.4 5.5।।साँख्ययोगाविति। यत्सांख्यैरिति। इदं सांख्यं (S सांख्यज्ञानम्) अयं च योगः इति न भेदः। एतौ हि नित्यसंबद्धौ। ज्ञानं न योगेन विना योगोऽपि न तेन विनेति। अत एकत्वमनयोः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.5।।प्रश्नपूर्वकं श्लोकान्तरमवतारयति एकस्यापीति। केचिदेव तयोरेकफलत्वं पश्यन्तीत्याशङ्क्य तेषामेव सम्यग्दर्शित्वं नेतरेषामित्याह एकमिति। तिष्ठत्यस्मिन्न च्यवते पुनरिति व्युत्पत्तिमाश्रित्याह मोक्षाख्यमिति। योगशब्दार्थमाह ज्ञानप्राप्तीति। ये हि जिज्ञासवः सर्वाणि कर्माणि भगवत्प्रीत्यर्थत्वेन तेषां फलाभिलाषमकृत्वा ज्ञानप्राप्तौ बुद्धिशुद्धिद्वारेणोपायत्वेनानुतिष्ठन्ति तेऽत्र योगा विवक्ष्यन्ते। अच्प्रत्ययस्य मत्वर्थत्वं गृहीत्वोक्तं योगिन इति। सर्वोऽपि द्वैतप्रपञ्चो न वस्तुभूतो मायाविलासत्वादात्मा त्वविक्रियोऽद्वितीयो वस्तुसन्निति प्रयोजकज्ञानं

Chapter 5 (Part 4)

परमार्थज्ञानं तत्पूर्वकसंन्यासद्वारेण कर्मिभिरपि तदेव स्थानं प्राप्यमित्येकफलत्वं संन्यासकर्मयोगयोरविरुद्धमित्याह तैरपीति। फलैकत्वे फलितमाह अत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.5।।योगस्य ज्ञानसाधनत्वे प्रमिते भवेदेतत् तदेव कथं इत्यत उक्तमेकमपीति तदनुपपन्नम् उभयोर्मध्ये सम्यगेकमप्यास्थितः फलं विन्दत इति योजनायां द्वयोः साफल्यमात्रमुच्यते। एकमपि सम्यगास्थितः उभयोः फलं विन्दत इति पक्षे तु द्वयं किञ्चित्फलं प्रति स्वतन्त्रं साधनमुच्यते। पक्षद्वयेऽपि न प्रकृतोपयोग इत्यत आह एकमपीति। एवमनुपयोगेऽपि भगवानेव स्ववाक्याभिप्रायमाह स ग्राह्य इत्यर्थः। अनेनापि योगस्य ज्ञानसाधनत्वे किं प्रमाणमुक्तं इत्यतो व्याचष्टे योगिभिरपीति। तरति शोकमात्मवित् छां.उ.7।1।3 इत्यादिना यज्ज्ञानफलं मोक्षाख्यं प्रमितं तत्तावद्योगिभिरपि प्राप्यत इत्युच्यते अपाम सोमम् ऋक्.6।4।11 इत्यादिना। तत्र विचार्यम् किं द्वयमपि स्वतन्त्रमुक्तिसाधनम् उत समुच्चितम् अथवैकं साक्षान्मोक्षसाधनम् अपरं तत्साधनत्वेनेति न प्रथमद्वितीयौ। नान्यः पन्थाः श्वे.उ.6।15 इत्यादिविरोधात्। तृतीयेऽपि चिन्त्यं किं कस्य साधनमिति। तत्र न तावज्ज्ञानं कर्मसाधनत्वेन मोक्षहेतुःन किञ्चिदन्तराधाय इत्यादिविरोधात्। अतः परिशेषाद्योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इति सिद्ध्यति। तथा च योगस्य ज्ञानसाधनत्वं सिद्धमित्यर्थः। अत्रयोगिभिः इति वदता योगशब्दो धर्मिणामुपलक्षकोऽयं आद्यजन्तो वेति सूचितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.5।।एकप्नपि 5।4 इत्यस्याभिप्रायमाह यत्साङ्ख्यैरिति। योगिभिरपि ज्ञानद्वारा ज्ञानफलं प्राप्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.5।।सांख्यैः ज्ञाननिष्ठैः यद् आत्मावलोकनरूपफलं प्राप्यते तद् एव कर्मयोगनिष्ठैः अपि प्राप्यते। एवम् एकफलत्वेन एकं वैकल्पिकं सांख्यं योगं च यः पश्यति स पश्यति स एव पण्डित इत्यर्थः।इयान् विशेष इत्याह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.5।। यत् सांख्यैः ज्ञाननिष्ठैः संन्यासिभिः प्राप्यते स्थानं मोक्षाख्यम् तत् योगैरपि ज्ञानप्राप्त्युपायत्वेन ईश्वरे समर्प्य कर्माणि आत्मनः फलम् अनभिसंधाय अनुतिष्ठन्ति ये ते योगाः योगिनः तैरपि परमार्थज्ञानसंन्यासप्राप्तिद्वारेण गम्यते इत्यभिप्रायः। अतः एकं साख्यं च योगं च यः पश्यति फलैकत्वात् स सम्यक् पश्यतीत्यर्थः।।एवं तर्हि योगात् संन्यास एव विशिष्यते कथं तर्हि इदमुक्तम् तयोस्तु कर्मसंन्यासात् कर्मयोगो विशिष्यते (गीता 5.2) इति श्रृणु तत्र कारणम् त्वया पृष्टं केवलं कर्मसंन्यासं कर्मयोगं च अभिप्रेत्य तयोः अन्यतरः कः श्रेयान् इति। तदनुरूपं प्रतिवचनं मया उक्तं कर्मसंन्यासात् कर्मयोगः विशिष्यते इति ज्ञानम् अनपेक्ष्य। ज्ञानापेक्षस्तु संन्यासः सांख्यमिति मया अभिप्रेतः। परमार्थयोगश्च स एव। यस्तु कर्मयोगः वैदिकः स च तादर्थ्यात् योगः संन्यास इति च उपचर्यते। कथं तादर्थ्यम् इति उच्यते

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【 Verse 5.6 】

▸ Sanskrit Sloka: संन्यासस्तु महाबाहो दु:खमाप्तुमयोगत: | योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति ||

▸ Transliteration: sannyāsastu mahābāho duḥkhamāptumayogataḥ | yogayukto munirbrahma na cireṇādhigacchati ||

▸ Glossary: sannyāsaḥ: renunciation; tu: but; mahābāho: mighty-armed one; duḥkham . : misery; āptuṁ: afflicts with; ayogataḥ: without devotion; yogayuktaḥ: en- gaged in devotion; muniḥ: wise; brahma: supreme; nacireṇa: without delay; adhigacchati: attains

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.6 Renunciation without devotional service afflicts one withmisery, Oh mighty-armed one. The wise person engaged in devotional service attains the Supreme without delay.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.6।।(टिप्पणी प0 286) परन्तु हे महाबाहो कर्मयोगके बिना संन्यास सिद्ध होना कठिन है। मननशील कर्मयोगी शीघ्र ही ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.6।। परन्तु हे महाबाहो योग के बिना संन्यास प्राप्त होना कठिन है योगयुक्त मननशील पुरुष परमात्मा को शीघ्र ही प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.6 संन्यासः renunciation? तु but? महाबाहो O mightyarmed? दुःखम् hard? आप्तुम् to attain? अयोगतः without Yoga? योगयुक्तः Yogaharmonised? मुनिः Muni? ब्रह्म to Brahman? नचिरेण ickly? अधिगच्छति goes.Commentary Muni is one who does Manana (meditation or reflection). Yoga is performance of action without selfish motive as an offering unto the Lord.Brahman here signifies renunciation or Sannyasa because renunciation consists in the knowledge of the Self. A Muni? the sage of meditation? the Yogaharmonised? i.e.? purified by the performance of action? ickly attains Brahman? the true renunciation which is devotion to the knowledge of the Self. Therefore Karma Yoga is better. It is easy for a beginner. It prepares him for the higher Yoga by purifying his mind.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.6. O mighty-armed (Arjuna) ! Renunciation is certainly hard to attain excepting through Yoga; the sage who is the master of Yoga attains the Brahman, before long.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.6 Without concentration, O Mighty Man, renunciation is difficult. But the sage who is always meditating on the Divine, before long shall attain the Absolute.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.6 But renunciation, O mighty-armed, is hard to attain without (following) Yoga. The contemplating sage who follows Yoga reaches the Brahman (the self or Atman) soon.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.6 But, O mighty-armed one, renunciation is hard to attain without (Karma-) yoga. The meditative man eipped with yoga attains Brahman without delay.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.6 But renunciation, O mighty-armed Arjuna, is hard to attain without Yoga; the Yoga-harmonised sage ickly goes to Brahman.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.6 Samnyasastu etc. [Here] the word tu is used in the sense of 'affirmation' and it is to be construed in a different order. [Hence the meaning is] : For a person without Yoga, it is certainly hard to attain renunciation. Because, as it has been already shown logically, it is difficult to renounce actions. But, it is certainly easy for men of Yoga to attain this. That has been said earlier.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.6 Renunciation, i.e., Jnana Yoga, cannot be attained without Yoga, i.e., Karma Yoga. A person following Yoga, i.e., following Karma Yoga, being himself a Muni, i.e., one engaged in the contemplation of self, after practising Karma Yoga reaches with ease the Brahman i.e., attains the self soon, i.e., in a short time. But one following Jnana Yoga by itself, completes Jnana Yoga with great difficulty only. On account of this great difficulty, he attains the self after a long period only.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.6 Tu, but, O mighty-armed one; sannyasah, renunciation, in the real sense; duhkham aptum, is hard to attain; ayogatah, without (Karma-) yoga. Munih, the meditative man-the word muni being derived in the sense of one who meditates on the real nature of God; yoga-yuktah, eipped with yoga, with Vedic Karma-yoga in the form of dedication to God without thought of results (for oneself); adhigacchati, attains; brahma, Brahman; na cirena, without delay, very ickly. Therefore it was said by Me, 'Karma-yoga excels'. [Karma-yoga leads to enlightenment through the stages of attenuation of attachment, withdrawal of the internal and external organs from their objects, and their inclination towards the indwelling Self. (Also see Commentary on 5.12).] The monasticism under discussion is called Brahman because it leads to knowledge of the supreme Self, as stated in the Upanisad, 'Nyasa (monasticism) is Brahman. Brahman is verily the supreme' (Ma. Na. 21.2) Brahman means monasticism in the real sense, consisting in steadfastness to the knowledge of the supreme Self.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.6।। आत्मज्ञान की साधना में कर्म के स्थान के विषय में प्राचीन ऋषिगण जिस निष्कर्ष पर पहुँचे थे भगवान् यहाँ उसका ही दृढ़ता से विशेष बल देकर प्रतिपादन कर रहे हैं। कर्मपालन के बिना वास्तविक कर्मसंन्यास असंभव है। किसी वस्तु को प्राप्त किये बिना उसका त्याग कैसे संभव होगा इच्छाओं के अतृप्त रहने से और महत्त्वाकांक्षाओं के धूलि में मिल जाने के कारण जो पुरुष सांसारिक जीवन का त्याग करता है उसका संन्यास वास्तविक नहीं कहा जा सकता।किसी धातु विशेष के बने पात्र पर मैल जम जाने पर उसे स्वच्छ एवं चमकीला बनाने के लिए एक विशेष रासायनिक घोल का प्रयोग किया जाता है। जंग (आक्साइड) की जो एक पर्त उस पात्र पर जमी होती है वह उस घोल में मिल जाती है। कुछ समय पश्चात् जब कपड़े से उसे स्वच्छ किया जाता है तब उस घोल के साथसाथ मैली पर्त भी दूर हो जाती है और फिर वहाँ स्वच्छ चमकीला और आकर्षक पात्र दिखाई देता है। मन के शुद्धिकरण की प्रक्रिया भी इसी प्रकार की है।कर्मयोग के पालन से जन्मजन्मान्तरों में अर्जित वासनाओं का कल्मष दूर हो जाता है और तब शुद्ध हुए मन द्वारा निदिध्यासन के अभ्यास से अकर्म आत्मा का अनुभव होता है और यही वास्तविक कर्मसंन्यास है। ध्यान के लिए आवश्यक इस पूर्व तैयारी के बिना यदि हम कर्मों का संन्यास करें तो शारीरिक दृष्टि से तो हम क्रियाहीन हो जायेंगे लेकिन मन की क्रियाशीलता बनी रहेगी। आंतरिक शुद्धि के लिए मन की बहिर्मुखता अनुकूल नहीं है। वास्तव में देखा जाय तो यह बहिर्मुखता ही वह कल्मष है जो हमारे दैवी सौंदर्य एवं सार्मथ्य को आच्छादित किये रहता है। प्राचीन काल के हिन्दू मनीषियों की आध्यात्मिक उन्नति के क्षेत्र में यह सबसे बड़ी खोज है।जहाँ भगवान् ने यह कहा कि कर्मयोग की भावना से कर्म किये बिना ध्यान की योग्यता अर्थात् चित्तशुद्धि नहीं प्राप्त होती वहीं वे यह आश्वासन भी देते हैं कि साधकगण उचित प्रयत्नों के द्वारा ध्यान के अनुकूल इस मनस्थिति को प्राप्त कर सकते हैं।योगयुक्त जो पुरुष सदा निरहंकार और निस्वार्थ भाव से कर्म करने में रत होता हैं उसे मन की समता तथा एकाग्रता प्राप्त होती है। साधक को ध्यानाभ्यास की योग्यता प्राप्त होने पर कर्म का प्रयोजन सिद्ध हो जाता है। ऐसे योग्यता सम्पन्न मुनि को आत्मानुभूति शीघ्र ही होती है।परमात्मा का अनुभव कब होगा इस विषय में कोई कालमर्यादा निश्चित नहीं की जा सकती। अचिरेण शब्द के प्रयोग से यही बात दर्शायी गई है।उपर्युक्त विवेचन से कर्मसंन्यास की अपेक्षा कर्म के आचरण को श्रेष्ठ कहने का कारण स्पष्ट हो जाता है।जब साधक पुरुष सम्यक् दर्शन के साधनभूत योग का आश्रय लेता है तब

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.6।।एवं तर्हि कर्मयोगात्संन्यास एव विशिष्यते कथमुक्तं तयोस्तु कर्मसन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते इत्याशङ्क्य ज्ञाननिष्ठारहितादशुद्धचित्तेन कृतात्केवलात्संन्यासात्कर्मत्यागाच्छुद्धिकरस्य सन्यासद्वारा ज्ञानप्राप्त्या मोक्षसंपादकस्य कर्मयोगस्य श्रैष्ठ्यं मया प्रतिपादितं नतु ज्ञाननिष्ठासहितात्सांख्यशब्दोदिताद्विशुद्धान्तःकरणेन कृतात्। तस्मात्तं प्रति साधनत्वात्कर्मयोगस्येत्याशयेनाह संन्यास इति। संन्यासस्तु ज्ञाननिष्ठासहितस्तु परमार्थसंन्यासः। अयोगतः योगेन विनाप्तुं प्राप्तुं दुःखं दुर्घटमित्यर्थः। योगेन वैदिकेन कर्मयोगेनेश्वरसमर्पितरुपेण निष्कामेन युक्तः मुनिः सगुणेश्वरस्वरुपमननशीलः ब्रह्म परमार्थसंन्यास परमात्मज्ञाननिष्ठालक्षणं नचिरेण क्षिप्रमेवाधिगच्छति प्राप्नोति। परमार्थज्ञानलक्षणत्वात्प्रकृतः संन्यासो ब्रह्मोच्यतेन्यास इति ब्रह्म। ब्रह्म हि परः इति श्रुतेः। अशुद्धचित्तेनापि संन्यास एव प्रथमं कुतो न क्रियते ज्ञाननिष्ठाहेतुत्वेन तस्यावश्यकत्वादितिचेत्तत्राह संन्यासस्त्विति। योगमन्तरेण हठादेव यः कृतः संन्यासः स तु दुःखमाप्तुमेव भवति। अशुद्धान्तःकरणत्वेन तत्फलस्य ज्ञाननिष्ठाया असंभवात्। शोधके च कर्मण्यनधिकारात् कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टत्वेन परमसंकटापत्तेः। यद्वाऽयोगत इति सप्तम्यर्थे तसिः। अयोगे तु संन्यासो दुःखमाप्तुमिति अयोगे योगाभावे प्रसिद्धसंन्यासाद्विलक्षणःप्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः। संन्याससिनोऽपि दृश्यन्ते दैवसंदूषिताशयाः।। इतिवार्तिककारोक्तः संन्यासः। दुखं नरकात्मकमाप्तुं भवतीति शेषः। नरकफलको नत्वनर्थनिवृत्त्यविनाभूतनिरतिशयानन्दरुपतापादक इति भावः। ननु तर्ह्यवश्याप्रेक्षिताद्योगादेवास्तु फलं नेत्याह। योगयुक्तः सत्त्वशुद्य्धा मुनिर्मननशीलः संन्यासी भूत्वा ब्रह्म सत्यज्ञानादिलक्षणं नचिरेणं शीघ्रमेवाधिगच्छति प्रतिबन्धकाभावात्। साक्षात्करोतीति तु सुगमत्वाद्भाष्यकारैरुपेक्षितम्। माहबाहो इति संबोधयन् महाबाहुसाध्ये युद्धरुपे कर्मण्येव तवाधिकारो न संन्यासे इति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.6।।अशुद्धान्तःकरणेनापि संन्यास एव प्रथमं कुतो न क्रियते ज्ञाननिष्ठाहेतुत्वेन तस्यावश्यकत्वादिति चेत्तत्राह अयोगतो योगमन्तःकरणशोधकं शास्त्रीयं कर्मान्तरेण हठादेव यः कृतः संन्यासः स तु दुःखमाप्तुमेव भवति। अशुद्धान्तःकरणत्वेन तत्फलस्य ज्ञाननिष्ठाया असंभवात् शोधके च कर्मण्यनधिकारात्कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टत्वेन परमसंकटापत्तेः। कर्मयोगयुक्तस्तु शुद्धान्तःकरणत्वान्मुनिर्मननशीलः संन्यासी भूत्वा ब्रह्म सत्यज्ञानादिलक्षणमात्मानं नचिरेण शीघ्रमेवाधिगच्छति साक्षात्करोति प्रतिबन्धकाभावात्। एतच्चोक्तं प्रागेवन कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते। नच संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति इति। अत एकफलत्वेऽपिकर्मसंन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यते इति यत्प्रागुक्तं तदुपपन्नम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.6।।नन्वेवं निर्विकल्पस्थानप्राप्तये द्वौ भागावुक्तौ स्यातां तच्चनान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय इति श्रुतिविरुद्धमित्याशङ्क्याह संन्यासस्त्विति। संन्यासो नैष्कर्म्यम्। अयोगतो योगिंविना अवाप्तुं दुःखं हे महाबाहो। अयमर्थः निर्विकल्पकसमाधिरपि तत्त्वमसीत्येतद्वाक्यार्थप्रतिपत्त्युपायभूत एव न स्वतः पुरुषार्थ इति द्वितीयमार्गस्याभावान्नोदाहृतश्रुतिविरोधः।शान्तो दान्त उपरतस्तितिक्षुः समाहितो भूत्वात्मन्येवात्मानं पश्यति इति श्रुत्यैव शमादिवत्समाधेरप्यात्मदर्शनार्थत्वस्य दर्शितत्वात्। तथा च समाहितपदं वार्तिककारैर्व्याख्यातम्।स्वातन्त्र्यं येषु कर्तुः स्यात्करणाकरणंप्रति। तान्येव तु निषिद्धानि कर्माणीह शमादिभिः। शमादिश्रुत्याअस्वातन्त्र्यं तु येषु स्यात्करणाकरणंप्रति। समाहितोक्याथेदानीं तन्निरोधो विधीयते। अस्वातन्त्र्यं गुरूपदेशापेक्षत्वम्। येषु मानमेयव्यवहारनिरोधेषु।पिण्डीकृत्येन्द्रियग्रामं बुद्धावारोप्य निश्चलम्। विषयांस्तत्स्मृतीस्त्यक्त्वा तिष्ठेच्चिदनुरोधतः। एषोऽभ्युपायः सर्वत्र वेदान्तेषु प्रतिष्ठितः। तत्त्वमस्यादिवाक्यार्थज्ञानोत्पत्त्यर्थमादरात्। इति। एवं व्यतिरेकमुक्त्वान्वयमाह योगयुक्त इति। मुनिः संन्यासी नचिरेण शीघ्रमेव ब्रह्माधिगच्छति वाक्यश्रवणमात्रेण नतु केवलसंन्यासी। यथोक्तंन च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति। इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.6।।ननूभयोरेकफलत्वे उभयरूपता किं इत्याशङ्कायामाह सन्न्यासस्त्विति। हे महाबाहो सन्न्यासस्तु अयोगतः योगं विना आप्तुं प्राप्तुं दुःखं दुःखरूपमित्यर्थः।अत्रायं भावः सन्न्यासस्य साङ्ख्यात्मकस्य विग्रयोगरूपत्वात् योगस्य संयोगात्मकत्वात् विप्रयोगस्य संयोगपूर्वत्वाद्योगं विना न तत्सिद्धिः स्यादत उभयरूपत्वेन कथनमित्यर्थः। किञ्च भगवतो रसरूपत्वाद्रसस्य च द्विरूपत्वादेकरूपत्वेनाकथनेऽपूर्ण एव स स्यादित्यर्थः। यतः संयोगं विना न द्वितीयसिद्धिरतो योगयुक्तः संयोगयुक्तो भूत्वा मुनिः विप्रयोगे मौनैकशरणो भूत्वा अचिरेण शीघ्रमेव ब्रह्म सर्वलीलाव्यापकमधिगच्छति प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.6।।यदि कर्मयोगिनोऽप्यन्ततः संन्यासेनैव ज्ञाननिष्ठास्तर्ह्यादित एव संन्यासः कर्तुं युक्त इति मन्वानं प्रत्याह संन्यास इति। अयोगतः कर्मयोगं विना संन्यासः प्राप्तुं दुःखहेतुः। अशक्य इत्यर्थः। चित्तशुद्ध्यभावेन ज्ञाननिष्ठाया असंभवात्। योगयुक्तस्तु शुद्धचित्ततया मुनिः संन्यासी भूत्वाऽचिरेणैव ब्रह्माधिगच्छत्यपरोक्षं जानाति। अतश्चित्तशुद्धेः प्राक्कर्मयोग एव संन्यासाद्विशिष्यत इति पूर्वोक्तं सिद्धम्। तदुक्तं वार्तिककृद्भिः प्रमादिनो बहिश्चित्ताः पिशुनाः कलहोत्सुकाः। संन्यासिनोऽपि दृश्यन्ते दैवसंदूषिताशयाः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.6।।किञ्च साङ्ख्यऽभिप्रेतं कर्म सन्न्यासं विनाऽपि योगेनेह हि सिद्धिर्भवति न तु योगं विना सन्न्यासिनो भवतीत्याशयेनाह सन्न्यासस्त्विति। हे महाबाहो कर्मसन्न्यासस्तु योगव्यतिरेकेणाप्तुं दुःखरूपः। समत्वं हि योगः तन्निष्ठया करणव्यतिरेकेण कस्य सन्न्यासः नह्यकृतस्य त्यागो युज्यते सिद्धत्वात्। साङ्खयीयो मुनिरपि योगयुक्तोऽचिरेण ब्रह्माधिगच्छति नान्यथेति मम मतम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.6।।जो वैदिक ( निष्काम ) कर्मयोग है वह तो उसी ज्ञानयोगका साधन होनेके कारण गौणरूपसे योग और संन्यास कहा जाने लगा है। वह उसीका साधन कैसे है सो कहते हैं बिना कर्मयोगके पारमार्थिक संन्यास प्राप्त होना कठिन है दुष्कर है। तथा फल न चाहकर ईश्वरसमर्पणके भावसे किये हुए वैदिक कर्मयोगसे युक्त हुआ ईश्वरके स्वरूपका मनन करनेवाला मुनि ब्रह्मको अर्थात् परमात्मज्ञाननिष्ठारूप पारमार्थिक संन्यासको शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है इसलिये मैंने कहा कि कर्मयोग श्रेष्ठ है। परमात्मज्ञानका सूचक होनेसे प्रकरणमें वर्णित संन्यास ही ब्रह्म नामसे कहा गया है तथा संन्यास ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही पर है इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.6।। व्याख्या   संन्यासस्तु महाबाहो दुःखमाप्तुमयोगतः सांख्ययोगकी सफलताके लिये कर्मयोगका साधन करना आवश्यक है क्योंकि उसके बिना सांख्ययोगकी सिद्धि कठिनतासे होती है। परन्तु कर्मयोगकी सिद्धिके लिये सांख्ययोगका साधन करनेकी आवश्यकता नहीं है। यही भाव यहाँ तु पदसे प्रकट किया गया है।सांख्ययोगीका लक्ष्य परमात्मतत्त्वका अनुभव करना होता है। परन्तु राग रहते हुए इस साधनके द्वारा परमात्मतत्त्वके अनुभवकी तो बात ही क्या है इस साधनका समझमें आना भी कठिन हैराग मिटानेका सुगम उपाय है कर्मयोगका अनुष्ठान करना। कर्मयोगमें प्रत्येक क्रिया दूसरोंके हितके लिये ही की जाती है। दूसरोंके हितका भाव होनेसे अपना राग स्वतः मिटता है। इसलिये कर्मयोगके आचरणद्वारा राग मिटाकर सांख्ययोगका साधन करना सुगम पड़ता है। कर्मयोगका साधन किये बिना सांख्ययोगका सिद्ध होना कठिन है।योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्म नचिरेणाधिगच्छति अपने निष्कामभावका और दूसरोंके हितका मनन करनेवाले कर्मयोगीको यहाँ मुनिः कहा गया है।कर्मयोगी छोटी या बड़ी प्रत्येक क्रियाको करते समय यह देखता रहता है कि मेरा भाव निष्काम है या सकाम सकामभाव आते ही वह उसे मिटा देता है क्योंकि सकामभाव आते ही वह क्रिया अपनी और अपने लिये हो जाती है।दूसरोंका हित कैसे हो इस प्रकार मनन करनेसे रागका त्याग सुगमतासे होता है।उपर्युक्त पदोंसे भगवान् कर्मयोगकी विशेषता बता रहे हैं कि कर्मयोगी शीघ्र ही परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर लेता है। परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिमें विलम्बका कारण है संसारका राग। निष्कामभावपूर्वक केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करते रहनेसे कर्मयोगीके रागका सर्वथा अभाव हो जाता है और रागका सर्वथा अभाव होनेपर स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है। इसी आशयको भगवान्ने चौथे अध्यायके अड़तीसवें श्लोकमें तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति पदोंसे बताया है कि योगसंसिद्ध होते ही अपनेआप तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति अवश्यमेव हो जाती है। इस साधनमे अन्य साधनकी अपेक्षा नहीं है। इसकी सिद्धिमें कठिनाई और विलम्ब भी नहीं है।दूसरा कारण यह है कि देहधारी देहाभिमानी मनुष्य सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग नहीं कर सकता पर जो कर्मफलका त्यागी है वह त्यागी कहलाता है (18। 11)। इससे यह ध्वनि निकलती है कि देहधारी कर्मोंका त्याग तो नहीं कर सकता पर कर्मफलका फलेच्छाका त्याग तो कर ही सकता है। इसलिये कर्मयोगमेंसुगमता है।कर्मयोगकी महिमामें भगवान् कहते हैं कि कर्मयोगीको तत्काल ही शान्ति प्राप्त हो जाती है त्यागाच्छान्तिरनन्तरम् (गीता 12। 12)। वह संसारबन्धनसे सुखपूर्वक मुक्त हो जाता है सुखं बन्धात्प्रमुच्यते (गीता 5। 3)। अतः कर्मयोगका साधन सुगम शीघ्र सिद्धिदायक और किसी अन्य साधनके बिना परमात्मप्राप्ति करानेवाला स्वतन्त्र साधन है। सम्बन्ध   अब भगवान् कर्मयोगीके लक्षणोंका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.6।।संन्यासस्त्विति। तु शब्दः अवधारणे भिन्नक्रमः। योगरहितस्य संन्यासमाप्तुं दुःखमेव प्राङ्नीत्या कर्मणां दुःखसंन्यासत्वात् (S N दुःसंन्यासत्वात्)। योगिभिस्तु सुलभमेवैतत् इत्युक्तं प्राक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.6।।यदि यथोक्तज्ञानपूर्वकसंन्यासद्वारा कर्मिणामपि श्रेयोवाप्तिरिष्टा तर्हि संन्यासस्यैव श्रेयस्त्वं प्राप्तमिति चोदयति एवं तर्हीति। संन्यासस्य श्रेष्ठत्वे कर्मयोगस्य प्रशस्यत्ववचनमनुचितमित्याह कथं तर्हीति। पूर्वोक्तमेवाभिप्रायं स्मारयन्परिहरति शृण्विति। कर्मयोगस्य विशिष्टत्ववचनं तत्रेति परामृष्टम्। तदेव कारणं कथयति त्वयेत्यादिना। केवलं विज्ञानरहितमिति यावत्। तयोरन्यतरः कः श्रेयानितीतिशब्दोऽध्याहर्तव्यः। त्वदीयं प्रश्नमनुसृत्य तदनुगुणं प्रतिवचनं ज्ञानमनपेक्ष्य तद्रहितात्केवलादेव संन्यासाद्योगस्य विशिष्टत्वमिति यथोक्तमित्याह तदनुरूपमिति। ज्ञानापेक्षः संन्यासस्तर्हि कीदृगित्याशङ्क्याह ज्ञानेति। तर्हि कर्मयोगे कथं योगशब्दः संन्यासशब्दो वा प्रयुज्यते तत्राह यस्त्विति। तादर्थ्यात्परमार्थज्ञानशेषत्वादिति यावत्। तदेव तादर्थ्यं प्रश्नपूर्वकं प्रसाधयति कथमित्यादिना। कर्मानुष्ठानाभावे बुद्धिशुद्ध्यभावात्परमार्थसंन्यासस्य सम्यग्ज्ञानात्मनो न प्राप्तिरिति व्यतिरेकमुपन्यस्यान्वयमुपन्यस्यति योगेति। पारमार्थिकः सम्यग्ज्ञानात्मकः। सामग्र्यभावे कार्यप्राप्तिरयुक्तेति मत्वाह दुःखमिति। योगयुक्तत्वं व्याचष्टे वैदिकेनेति। ईश्वरस्वरूपस्य सविशेषस्येति शेषः। ब्रह्मेति व्याख्येयं पदमुपादाय व्याचष्टे प्रकृत इति। तत्र ब्रह्मशब्दप्रयोगे हेतुमाह परमात्मेति। लक्षणशब्दो गमकविषयः। संन्यासे ब्रह्मशब्दप्रयोगे तैत्तिरीयकश्रुतिं प्रमाणयति न्यास इति। कथं संन्यासे हिरण्यगर्भवाची ब्रह्मशब्दः प्रयुज्यते द्वयोरपि परत्वाविशेषादित्याह ब्रह्म हीति। ब्रह्मशब्दस्य संन्यासविषयत्वे फलितं वाक्यार्थमाह ब्रह्मेत्यादिना। नद्याः स्रोतांसीव निम्नप्रवणानि कर्मभिरतितरां परिपक्वकषायस्य करणानि सर्वतो व्यापृतानि निरस्ताशेषकूटस्थप्रत्यगात्मान्वेषणप्रवणानि भवन्तीति। कर्मयोगस्य परमार्थसंन्यासप्राप्त्युपायत्वे फलितमाह अत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.6।।सन्न्यासस्त्वित्यस्य सङ्गतिमाह इतश्चेति। ननु प्राक् सन्न्यासाद्योगस्य वरत्वे न कोऽपि हेतुरुक्तः तत्कथमेवमुच्यते मैवम् सन्न्यासस्य योगावरत्वे बाधकं परिहृतम्। साधकमिदानीमुच्यते। बाधकाभावसहितमेव साधकं वस्तुनो व्यवस्थापकम्। तस्मादितश्चेति युक्तम्। पूर्वं सन्न्यासस्य निश्श्रेयसकरत्वमुक्तम् इदानीं कथं दुःखहेतुत्वमुच्यते किं वाऽनेन साधकमुक्तं इत्यतो व्याचष्टे योगेति। विष्ण्वर्पणबुद्ध्या करणाभावसन्न्यासमात्रेणेति शेषः। आदिपदेन ज्ञानं गृह्यते। तस्य केवलसन्न्यासिनः। योगाभावे सन्न्यासो निष्फल एवेत्येतन्न युज्यते मोक्षाद्यभावेऽपि तात्कालिकापमानादिदुःखाभावादेर्भावादित्यत आह मोक्षादीति। अत्र पुराणसम्मतिमाह तच्चेति। ननु मोक्षफलाभावेऽपि धान्यादिनैव कृष्यादिकं सफलमित्युच्यते। तत्कथमेवमभिहितमित्यत उक्तं विवृणोति यत्त्विति। महाफलं साधयितुं योग्यमित्यर्थः। मोक्षादिग्रहणं प्रकृतापेक्षयैव कृतमिति भावः। ननु सन्न्यासात् योगस्य वरत्वमनेन साधितं तत्किमुत्तराधन इत्यत आह महाफलश्चेति। महत्फलं यस्मात्स तथोक्तः। योगाङ्गत्वेन ततोऽवरत्वं सन्न्यासस्य सिसाधयिषितम्। तच्चान्वयव्यतिरेकाभ्यां सिद्ध्यति। तत्र पूर्वार्धेन व्यतिरेकमुक्त्वाऽनेनान्वयमाचष्टे इत्यर्थः। ननु योगोऽप्येवमेवेति चेत् सत्यम् तथापि चरमभावित्वेन विशेषः। नन्वत्र सन्न्यासवाचकं न श्रूयते तत्कथमेवमुच्यते इत्यत आह मुनिरिति। मुनिशब्दस्य कामवर्जनलक्षणसन्न्यासवचनत्वं कुतः इत्यत आह तच्चेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.6।।इतश्च सन्न्यासाद्योगो वर इत्याह सन्न्यासस्त्विति। योगाभावे मोक्षादिफलं न भवति अतः कामजयादिदुःखमेव तस्य मोक्षाद्येव हि फलम्। अन्यत्तत्फलमल्पत्वादफलमेवेत्याशयः। तच्चोक्तम् विना मोक्षफलं यत्तु न तत्फलमुदीर्यते इति पाद्मे। यत्तु महाफलयोग्यं तस्याल्पं फलमेव न भवति यथा पद्मरागस्य तण्डुलमुष्टिः। महाफलश्च योगयुक्तश्चेत्सन्न्यास इत्याहयोगयुक्त इति। मुनिः सन्न्यासी। तच्चोक्तम् स हि लोके मुनिर्नाम यः कामक्रोधवर्जितः इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.6।।संन्यासः ज्ञानयोगः तु अयोगतः कर्मयोगाद् ऋते प्राप्तुम् अशक्यः। योगयुक्तः कर्मयोगयुक्तः स्वयम् एव मुनिः आत्ममननशीलः सुखेन कर्मयोगं साधयित्वा न चिरेण एव अल्पकालेन एव ब्रह्म अधिगच्छति आत्मानं प्राप्नोति। ज्ञानयोगयुक्तः तु महता दुःखेन ज्ञानयोगं साधयति दुःखसाध्यत्वाद् दुःखप्राप्यत्वाद् आत्मानं चिरेण प्राप्नोति इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.6।। संन्यासस्तु पारमार्थिकः हे महाबाहो दुःखम् आप्तुं प्राप्तुम् अयोगतः योगेन विना। योगयुक्तः वैदिकेन कर्मयोगेन ईश्वरसमर्पितरूपेण फलनिरपेक्षेण युक्तः मुनिः मननात् ईश्वरस्वरूपस्य मुनिः ब्रह्म परमात्मज्ञाननिष्ठालक्षणत्वात् प्रकृतः संन्यासः ब्रह्म उच्यते न्यास इति ब्रह्मा ब्रह्मा हि परः (ना0 उ0 2.78) इति श्रुतेः ब्रह्म परमार्थसंन्यासं परमार्थज्ञाननिष्ठालक्षणं न चिरेण क्षिप्रमेव अधिगच्छति प्राप्नोति। अतः मया उक्तम् कर्मयोगो विशिष्यते इति।।यदा पुनः अयं सम्यग्ज्ञानप्राप्त्युपायत्वेन

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【 Verse 5.7 】

▸ Sanskrit Sloka: योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रिय: | सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ||

▸ Transliteration: yogayukto viśuddhātmā vijitātmā jitendriyaḥ | sarva-bhūtātma-bhūtātmā kurvannapi na lipyate ||

▸ Glossary: yogayuktaḥ: engaged in work with devotion; viśuddhātmā : a man of purified mind; vijita: self-controlled; atma: soul; jitendriyaḥ: conquered the senses; sarvabhūtātma: to all living beings; bhūtātma: compassionate; kurvan api: though engaged in work, na: never; lipyate: entangled

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.7 The person engaged in devoted service, beyond concepts pure and impure, self-controlled and who has conquered the senses is compassionate and loves everyone, although engaged in work, he is never entangled.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.7।।जिसकी इन्द्रियाँ अपने वशमें हैं जिसका अन्तःकरण निर्मल है जिसका शरीर अपने वशमें है और सम्पूर्ण प्राणियोंकी आत्मा ही जिसकी आत्मा है ऐसा कर्मयोगी कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.7।। जो पुरुष योगयुक्त विशुद्ध अन्तकरण वाला शरीर को वश में किये हुए जितेन्द्रिय तथा भूतमात्र में स्थित आत्मा के साथ एकत्व अनुभव किये हुए है वह कर्म करते हुए भी उनसे लिप्त नहीं होता।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.7 योगयुक्तः devoted to the path of action? विशुद्धात्मा a man of purified mind? विजितात्मा one who has conered the self? जितेन्द्रियः one who has subdued his senses? सर्वभूतात्मभूतात्मा one who realises his Self as the Self in all beings? कुर्वन् acting? अपि even? न not? लिप्यते is tainted.Commentary He who is harmonised by Yoga? i.e.? he who has purified his mind by devotion to the performance of action? who has conered the body and who has subjugated the senses? whose Self is the Self of all beings? he will not be bound by actions although he performs actions for the wellbeing or protection of the masses in orer to set an example to them. (Cf.XVIII.17)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.7. A master of Yoga, whose self (mind and intellect) is very pure and is fully subdued, the sense-organs controlled, and Soul is [realised to be] the Soul of all beings-he is not stained, eventhough he is a performer [of actions].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.7 He who is spiritual, who is pure, who has overcome his senses and his personal self, who has realised his highest Self as the Self of all, such a one, even though he acts, is not bound by his acts.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.7 He who follows the Yoga and is pure in self (mind), who has subdued his self and has conered his senses and whose self has become the self of all beings, even while he is acting, he is untainted.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.7 Endowed with yoga, [i.e. devoted to the performance of the nitya and naimittika duties.] pure in mind, controlled in body, a coneror of the organs, the Self of the selves of all beings-he does not become tainted even while performing actions. [The construction of the sentence is this: When this person resorts to nitya and naimittika rites and duties as a means to the achievement of fully Illumination, and thus becomes fully enlightened, then, even when he acts through the apparent functions of the mind, organs, etc., he does not become afflected.]

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.7 He who is devoted to the path of action, whose mind is ite pure, who has conered the self, who has subdued his senses and who realises his Self as the Self in all beings, though acting, is not tainted.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5৷৷7 See Comment under 5.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.7 But a Karma Yogin remains engaged in the performance of pure actions prescribed by the Sastras, which are of the nature of propitiation of the Supreme Person. By this, he becomes purified in mind. He thus subdues his self, i.e., subdues his mind easily, because his mind is engaged in the virtuous actions he has been performing before. Therefore his senses are subdued. His self is said to have become the self of all beings. Because of his being devoted to contemplation on the true nature of the self, he finds that his self is similar to the self of all beings like gods etc. One who contemplates on the true nature of the self understands that all selves are of the same form or nature. The distinctions obtaining among gods, men etc., cannot pertain to the form of the self, because those distinctions are founded on particular modifications of Prakrti i.e., the bodies of beings. Sri Krsna will teach: 'For the Brahman (an individual self), when untainted, is the same everywhere' (5.19). The meaning of this is that when dissociated from the Prakriti, i.e., the body, the self is of the same nature everywhere, i.e., in the bodies of gods, men etc. It is of the same form of knowledge. The meaning is that one, who has become enlightened in this way, active though he be, is not tainted on account of erroneously conceiving what is other than the self (the body) as the self. He is not at all associated therewith. Therefore, he attains the self without any delay.

As Karma Yoga is superior to Jnana Yoga because it is more easily pursued and is more rapidly efficacious in securing the fruits, listen to its reirement:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.7 When again, as a means to attain full enlightenment, this person becomes yoga-yuktah, endowed with yoga; visuddhatma, pure in mind; vijitatma, controlled in body; jitendriyah, a coneror of the organs; and sarva-bhutatma-bhutatma, the Self of the selves of all beings-one whose Self (atma), the inmost consciousness, has become the selves (atma) of all beings (sarva-bhuta) beginning from Brahma to a clump of grass-, i.e., fully illumined; (then,) thus continuing in that state, he na lipyate, does not become tainted; kurvan api, even while performing actions for preventing mankind from going astray. That is to say, he does not become bound by actions. And besides, this person does not act in the real sense. Hence,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.7।। पूर्व श्लोक में संक्षेप में वर्णन है कि कर्मयोग पालन करने पर चित्तशुद्धि प्राप्त होकर साधक ध्यानाभ्यास की सहायता से ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। वर्तमान की परिच्छिन्नता एवं बन्धनों को तोड़कर अनन्तस्वरूप की प्राप्ति के प्रयत्न में जो आन्तरिक परिवर्तन साधक में होता है उसका युक्तियुक्त विस्तृत विवेचन इस श्लोक में किया गया है।कर्मयोग से युक्त पुरुष अन्तकरण की शुद्धि प्राप्त करता है जिसका अर्थ है अधिकसेअधिक मन की आन्तरिक शान्ति। मन का कमसेकम क्षुब्ध होना उसकी शुद्धि का द्योतक है। इसे ही दूसरे शब्दों में कहते हैं वासनाओं का क्षीण होना। विक्षेप की कारणरूप वासनाओं का क्षय होने पर स्वाभाविक रूप से वह पुरुष संतुलित बन जाता है।ऐसे शुद्धान्तकरण सम्पन्न कर्मयोगी के लिए इन्द्रियों पर संयम रखना बच्चों का खेल बन जाता है। वह स्वेच्छा से इन्द्रियों को विषयों में प्रवृत्त कर सकता है और निवृत्त भी। जिस साधक को अपने शरीर मन एवं बुद्धि पर पूर्ण संयम है वह ध्यान की सर्वोच्च साधना के लिए योग्यतम है। निदिध्यासन में आने वाले मुख्य विघ्न ये ही हैं वैषयिक प्रवृत्ति मन के विक्षेप एवं अतृप्त इच्छाएं। एक बार इन शृंखलाओं को तोड़ देने पर ध्यान सहज और सुलभ बन जाता है फिर साधक को आत्मा का साक्षात् अनुभव तत्काल और उसकी सम्पूर्णता में होता है।आत्मानुभूति आंशिक रूप में नहीं हो सकती। यदि साधक केवल स्वयं को दिव्य और शुद्ध स्वरूप अनुभव करे और अन्यों को नहीं तो उसका अनुभव वास्तविक और प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता। सम्यक् दर्शन को प्राप्त हुये पुरुष के लिए तो शुद्ध आत्मा सर्वत्र एवं समस्त कालों में व्याप्त है। इस आध्यात्मिक दृष्टि से जगत् को देखने पर उसे सर्वत्र सम्पूर्ण प्राणियों में नित्य आत्मा का ही दर्शन होता है। ऐसे ज्ञानी पुरुष को ही यहाँ सर्वभूतात्मभूतात्मा कहा गया है जिसका अर्थ है वह पुरुष जिसकी आत्मा ही सर्वभूतों की आत्मा है।जब एक तरंग अपने वास्तविक समुद्र स्वरूप को पहचान लेती है तब ज्ञान में स्थित उस तरंग के लिए कोई भी अन्य तरंग समुद्र से भिन्न नहीं हो सकती।आत्मानुभूति में स्थित हुआ पुरुष जब जगत् में कर्म करता है तब वे कर्म वासना के रूप में प्रतिफल उत्पन्न नहीं करते। कर्मफलों का बन्धन केवल अहंकार को ही हो सकता है और ज्ञानी पुरुष में उसी का अभाव होने के कारण कर्म उसे किस प्रकार लिप्त कर सकते हैं प्रवाहित जल पर लिखने के समान ही ज्ञानी पुरुष के कर्म उसके चित्त पर वासनाएँ नहीं उत्पन्न करते।भगवान् श्रीकृष्ण कर्मयोग के सिद्धान्त का पुनपुन प्रतिपादन करते हैं। इस श्लोक से भी स्पष्ट होता है कि अहंकार और स्वार्थ से प्रेरित होकर किये गये कर्मं ही वासना उत्पन्न करके बुद्धि की विवेकशक्ति को धूमिल कर देते हैं जिसके कारण मनुष्य को अपने स्वयंसिद्ध शुद्ध दिव्य स्वरूप का अनुभव नहीं हो पाता।सर्वव्यापी परमात्मा के अनुभव में स्थित सिद्ध पुरुष का जीवन की ओर देखने का क्या दृष्टिकोण होगा भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.7।।कस्यचिच्चित्तशुद्य्धा श्रवणादिना कृतसाक्षात्कारस्य प्रारब्धवशात्कर्मणि स्थितस्य यथापूर्वमुपलभ्यमानानि कर्माणि बन्धकानि न भवन्तीत्यत आह योगयुक्त इति। योगेन पूर्वोक्तेन युक्तः अतएव विशुद्धान्तःकरणः एतए विजतदेहः अतएव विजितानि वागादीनि इन्द्रियाणि येन सः। एवंभूतोऽधिकारी लक्षणसंपन्नः सर्वेषां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां भूतानामात्मभूत आत्मा प्रत्यक्चेतनो यस्य सः। अखण्डात्मसाक्षात्कारवानित्यर्थः। यत्तु कैश्चिद्भाष्योक्तं विग्रहं सर्वभूतात्मेत्येतावतैवार्थलाभादात्मभूतेत्यधिकं स्यादित्यापत्त्या दूषयित्वा सर्वभूतो जडभूत आत्मभूतोऽजडभूतश्च आत्मा यस्येति च विग्रहः प्रदर्शितस्तत्प्रामादिकम्। कृत्स्त्रवाचिनः सर्वपदादेव जडाजडग्रहे सर्वभूतात्मेत्येतावतैवेष्टमाभे आधिक्यस्य तुल्यत्वात्। सर्वमचेतनमात्मानश्चेतनास्तद्भूत आत्मा यस्येति विगृह्य सर्वात्मभूतात्मेत्येतावतैवेष्टार्थे सिद्धे प्रथमभूतपदवैयर्थ्य प्रसङ्गाच्च। किंच भाष्यमते ब्रह्मादीनां प्रत्यगात्मभूत आत्मा यस्येति श्रुत्यैवात्मपरमात्मनोरैक्यमुच्यते। तव मते तु उपादानत्वलिङ्गेन जडसाधारण्येनात्मनः परमात्माभेदो गम्यत इत्यत आचार्योक्तमेव रमणीयम्। स लोकंसग्रहार्थं कुर्वन्नपि न लिप्यते। योगयुक्तो न कर्मभिर्बध्यत इत्यर्थः। युत्तु ननु योगयुक्तस्य सत्त्वशुद्धौ जातायामपि सर्वकर्मसंन्यासे कृते नित्याकरणजनितप्रत्यवायलक्षणो लेप आपद्येतेत्याशङ्क्याह योगयुक्त इति। अकुर्वन्नापि न लिप्यते। नित्याकरणोत्थेन दोषेणन स्पृश्यत इत्यर्थः। तत्र हेतुमाह। सर्वेषां ब्रह्मादिस्थावरान्तानां भूतानां योऽनुस्यूत आत्माऽसंङ्गोदासीनचिद्रूपस्तं भूतः प्राप्तस्तदैक्यज्ञानवानात्भान्तःकरणै यस्येति तदुपेक्ष्यम्।कतमसतः सज्जायत इति श्रुतिमनुरुध्याकरणादभावरुपाद्भावरुपस्य प्रत्यवायस्यानुत्पत्तेराचार्यैरसकृदुक्तत्वात्सर्वेत्यादेरार्जवेन भाष्योक्तमार्गेणोक्तार्थलाभे संभवति क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वात्। योगेन निर्विकल्पसमाधिना युक्त इत्याद्युपेक्ष्यं प्रकरणविरोधस्योक्तत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.7।।ननु कर्मणो बन्धहेतुत्वाद्योगयुक्तो मुनिर्ब्रह्माधिगच्छतीत्यनुपपन्नमित्यत आह भगवदर्पणफलाभिसंधिराहित्यादिगुणयुक्तं शास्त्रीयं कर्म योग इत्युच्यते। तेन योगेन युक्तः पुरुषः प्रथमं विशुद्धात्मा विशुद्धो रजस्तमोभ्यामकलुषित आत्मान्तःकरणरूपं सत्त्वं यस्य स तथा। निर्मलान्तःकरणः सन् विजितात्मा स्ववशीकृतदेहः। ततो जितेन्द्रियः स्ववशीकृतसर्वबाह्येन्द्रियः। एतेन मनूक्तस्त्रिदण्डी कथितःवाग्दण्डोऽथ मनोदण्डः कायदण्डस्तथैव च। यस्यैते नियता दण्डाः स त्रिदण्डीति कथ्यते।। इति। वागिति बाह्येन्द्रियोपलक्षणम्। एतादृशस्य तत्त्वज्ञानमवश्यं भवतीत्याह सर्वभूतात्मभूतात्मा सर्वभूत आत्मभूतश्चात्मा स्वरूपं यस्य स तथा। जडाजडात्मकं सर्वमात्ममात्रं पश्यन्नित्यर्थः। सर्वेषां भूतानामात्मभूत आत्मा यस्येति व्याख्याने तु सर्वभूतात्मेत्येतावतैवार्थलाभादात्मभूतेत्यधिकं स्यात्। सर्वात्मपदयोर्जडाजडपरत्वे तु समञ्जसम्। एतादृशः परमार्थदर्शी कुर्वन्नपि कर्माणि परदृष्ट्या न लिप्यते तैः कर्मभिः। स्वदृष्ट्या तदभावादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.7।।योगेति। योगेन निर्विकल्पसमाधिना युक्तो योगयुक्तः। अत एव विशुद्धात्मा वृत्तिसारूप्यदोषेण हीनः आत्मा प्रत्यक्चेतनो यस्य। निर्विकल्पावस्थायां केवल एव चेतनोऽस्ति नान्यदेत्युक्तं तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानं वृत्तिसारूप्यमितरत्रेति तदा वृत्त्यभावे इतरत्र वृत्तिकाले इति सौत्रपदद्वयार्थः। अत्र हेतुः। यतोऽयं विजितात्मा विजितचित्तो जितेन्द्रियश्च। एवं शुद्धस्त्वंपदार्थ उक्तस्तस्य तत्पदार्थाभेदमाह सर्वभूतात्मेति। सर्वेषां भूतानां ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तानां वियदादीनां च चेतनाचेतनानामात्मभूतः उपादानत्वेन स्वरूपभूतः कनकमिव कुण्डलादीनां स्वरूपभूतम्। कारणानन्यत्वात्कार्यस्य। सर्वभूतात्मभूत आत्मा प्रत्यक्चेतनो यस्य स सर्वभूतात्मभूतात्मा। यत्तु सर्वेषां भूतानामात्मभूत आत्मा यस्येति भाष्यं सर्वभूतात्मेत्येतावतैवार्थलाभादात्मभूत इत्यधिकमिति दूषितम्। स्वयं च सर्वभूत आत्मभूतश्चात्मा यस्येति विग्रहो दर्शितः तत्र संकोचे कारणाभावात्सर्वपदेनैव चिज्जडयोर्ग्रहे परस्याप्यात्मभूतेत्यधिकमेव। सर्वभूतश्चेतनाचेतनप्रपञ्चभूत आत्मा यस्येति तत्रापीष्टार्थलाभात् सर्वं च आत्मानश्च तद्भूत आत्मा यस्येति विगृह्य सर्वात्मभूतात्मेत्येतावतैव सिद्धे प्रथमभूतपदस्य वैयर्थ्यं च भाष्यमते ब्रह्मादीनां प्रत्यग्भूत आत्मा यस्येति श्रुत्यैव जीवेशाभेद उच्यते। परस्य तूपादानत्वलिङ्गेन जडसाधारण्येन जीवस्य ब्रह्माभेदोऽवगम्यत इति विद्वद्भिरविनयः क्षन्तव्यः। यतोऽयं सर्वेषां प्रत्यगात्मा अतोऽहमिव सोऽपि कुर्वन्नपि न लिप्यते असङ्गात्मज्ञानात्कर्त्रादेर्बाधितत्वाच्च। व्युत्थाने तत्प्रतीतावप्युत्खातदंष्ट्रोरगवदबाधकत्वाच्चेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.7।।ननु ब्रह्मप्राप्तिरेवोत्तमा तदा भक्त्यैव तत्सिद्धिरिति नियतस्वफलभोगकारककर्मकरणं किम्प्रयोजनकं इत्याशङ्क्याह योगयुक्त इति। योगयुक्तो मत्संयोगात्मवान्। विशुद्धात्मा विशेषेण शुद्ध आत्मा अन्तःकरणं कामादिभावरहितं यस्य। विजितात्मा विजितो वशीकृत आत्मा भगवत्स्वरूपं येन। जितेन्द्रियः जितानि इन्द्रियाणि स्वभोगादिरूपाणि येन। सर्वभूतात्मा सर्वभूतात्मरूपो भगवान् स एवात्मा स्वरूपं यस्य तादृशोमदाज्ञया लोकसङ्ग्रहार्थ कर्म कुर्वन्न लिप्यते तत्फलभोगेन न बध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.7।।कर्मयोगादिक्रमेण ब्रह्माधिगमे सत्यपि तदुपरितनेन कर्मणा बन्धः स्यादेवेत्याशङ्क्याह योगयुक्त इति। योगेन युक्तोऽतो विशुद्ध आत्मा चित्तं यस्यातएव विजित आत्मा शरीरं येन। अतएव विजितानीन्द्रियाणि येन। ततश्च सर्वेषां भूतानामात्मभूत आत्मा यस्य सः। लोकसंग्रहार्थं स्वाभाविकं वा कर्म कुर्वन्नपि न लिप्यते तैर्न बध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.7।।स्वमतस्फोरणार्थं तद्योगिनं लक्षयति त्रिभिः। त्रिगुणातीतत्वात्तस्येतिभावेन योगयुक्त इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.7।।जब यह पुरुष सम्यक् ज्ञानप्राप्तिके उपायरूप योगसे युक्त विशुद्ध अन्तःकरणवाला विजितात्मा शरीरविजयी जितेन्द्रिय और सब भूतोंमें अपने आत्माको देखनेवाला अर्थात् जिसका अन्तरात्मा ब्रह्मासे लेकर स्तम्बपर्यन्त सम्पूर्ण भूतोंका आत्मरूप हो गया हो ऐसा यथार्थ ज्ञानी हो जाता है। तब इस प्रकार स्थित हुआ वह पुरुष लोकसंग्रह के लिये कर्म करता हुआ भी उनसे लिप्त नहीं होता अर्थात् कर्मोंसे नहीं बँधता। वास्तवमें वह कुछ करता भी नहीं है इसलिये आत्माके यथार्थ स्वरूपका नाम तत्त्व है उसको जाननेवाला तत्त्वज्ञानी परमार्थदर्शी समाहित होकर ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.7।। व्याख्या   जितेन्द्रियः इन्द्रियाँ वशमें होनेका तात्पर्य है इन्द्रियोंका रागद्वेषसे रहित होना। रागद्वेषसे रहित होनेपर इन्द्रियोंमें मनको विचलित करनेकी शक्ति नहीं रहती (टिप्पणी प0 287.1)। साधक उनको अपने मनके अनुकूल चाहे जहाँ लगा सकता है।कर्मयोगके साधकके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना आवश्यक है। इसीलिये भगवान् कर्मयोगके प्रकरणमें इन्द्रियोंको वशमें करनेकी बात विशेषरूपसे कहते हैं जैसे यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्य (3। 7) तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य (3। 41)। कर्मयोगीका कर्मोंके साथ अधिक सम्बन्ध रहता है इसलिये इन्द्रियाँ वशमें न होनेसे उसके विचलित होनेकी सम्भावना रहती है। कर्मयोगके साधनमें दूसरोंके हितके लिये सेवारूपसे कर्तव्यकर्म करना आवश्यक है जिसके लिये इन्द्रियोंका वशमें होना बहुत जरूरी है। इन्द्रियाँ वशमें हुए बिना कर्मयोगका साधन होना कठिन है।विशुद्धात्मा अन्तःकरणकी मलिनतामें हेतु है सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व। जहाँ पदार्थोंका महत्त्व रहता है वहीं उनकी कामनाएँ रहती हैं। साधक निष्काम तभी होता है जब उसके अन्तःकरणमें सांसारिक पदार्थोंका महत्त्व नहीं रहता। जबतक पदार्थोंका महत्त्व है तबतक वह निष्काम नहीं हो सकता।एक परमात्मप्राप्तिका दृढ़ उद्देश्य होनेसे अन्तःकरणकी जितनी जल्दी और जैसी शुद्धि होती है उतनी जल्दी और वैसी शुद्धि दूसरे किसी अनुष्ठानसे नहीं होती। इसलिये कर्मयोगमें एक उद्देश्य होनेकी जितनी महिमा है उतनी किसीकी नहीं।विजितात्मा कर्मयोगमें शरीरके सुखआरामका त्याग करनेकी बड़ी भारी आवश्यकता है। अगर शरीरसे आलस्यप्रमाद होगा तो कर्मयोगका अनुष्ठान नहीं हो पायेगा। अतः यहाँ भगवान्ने शरीरको वशमें करनेकी बात कही है।सर्वभूतात्मभूतात्मा कर्मयोगीको सम्पूर्ण प्राणियोंके साथ अपनी एकताका अनुभव हो जाता है (टिप्पणी प0 287.2)। जैसे शरीरके किसी एक अङ्गमें चोट

Chapter 5 (Part 5)

लगनेसे दूसरा अङ्ग उसकी सेवा करनेके लिये सहजभावसे किसी अभिमानके बिना कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः लग जाता है ऐसे ही कर्मयोगीके द्वारा दूसरोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा सहजभावसे किसी अभिमान या कामनाके बिना कृतज्ञता चाहे बिना स्वतः होती है। वह सेवा करनेके लिये किसी भी प्राणीको अपनेसे अलग नहीं समझता सबको अपने ही अङ्ग मानता है।जैसे अपने शरीरमें भिन्नभिन्न अवयवोंसे भिन्नभिन्न व्यवहार होनेपर भी सब अवयवोंके साथ अपनापन समान (एक ही) रहता है ऐसे ही कर्मयोगीके द्वारा मर्यादाके अनुसार संसारमें यथायोग्य भिन्नभिन्न व्यवहार होनेपर भी सबके साथ अपनापन समान रहता है।अपना राग मिटानेके लिये सर्वभूतात्मभूतात्मा होना अर्थात् सब प्राणियोंके साथ अपनी एकता मानना बहुत आवश्यक है। कर्मयोगीका स्वभाव है उदारता। सर्वभूतात्मभूतात्मा हुए बिना उदारता नहीं आती।विशेष बातक्रिया और पदार्थके साथ हम निरन्तर नहीं रह सकते और वे हमारे साथ निरन्तर नहीं रह सकते। कारण यह है कि क्रिया और पदार्थमें निरन्तर परिवर्तन होता है पर हमारेमें (स्वरूपसे) कभी परिवर्तन नहीं होता। इसलिये क्रिया और पदार्थ निरन्तर हमारा त्याग कर रहे हैं। हम भी इनका त्याग करके ही मुक्ति पा सकते हैं परमशान्ति पा सकते हैं। इनके साथ रहकर हम मुक्ति परमशान्ति नहीं पा सकते क्योंकि इनके साथ रहनेका हमारा स्वभाव नहीं है और हमारे साथ रहनेका इनका स्वभाव नहीं है। इसलिये क्रिया और पदार्थको दूसरोंकी सेवामें लगाना है। दूसरोंकी सेवामें लगाना हमारी महत्ता नहीं है प्रत्युत वास्तविकता है। जो वास्तविकता होती है वह सहज होती है अर्थात् उसमें परिश्रम और अभिमान नहीं होता। अवास्तविकतामें ही परिश्रम और अभिमान होता है।क्रिया और पदार्थ दूसरोंकी सेवामें तभी लग सकते हैं जब हमारेमें उदारता आ जाय। यहाँ ध्यान देनेकी बात है कि उदारता हमारा स्वरूप है (टिप्पणी प0 288)। इसलिये उदारतामें न तो धन खर्च करनेकी आवश्यकता है और न परिश्रम करनेकी आवश्यकता है। आवश्यकता केवल इसी बातकी है कि हम सुखीको देखकर प्रसन्न हो जायँ और दुःखीको देखकर करुणित दयालु हो जायँ। हृदयमें यह करुणा पैदा हो जाय कि यह सुखी कैसे हो सुखीको देखकर ऐसा भाव हो जाय कि सभी सुखी हो जायँ और दुःखीको देखकर ऐसा भाव हो जाय कि कोई दुःखी न रहे।भगवान्ने भोग और संग्रहको साधनमें बाधक बताया है (गीता 2। 44)। सुखीको देखकर प्रसन्न होनेसे भोग भोगनेकी इच्छा मिट जाती है क्योंकि भोग भोगनेमें जो सुख मिलता है वह सुख हमें दूसरोंको सुखी देखकर विशेषतासे मिल जायगा तो हमें भोग भोगनेकी आवश्यकता नहीं रहेगी। दुःखीको देखकर दुःखी होनेसे संग्रह करनेकी इच्छा मिट जाती है क्योंकि अपना दुःख मिटानेके लिये जिन वस्तुओंका हम संग्रह करते हैं और व्यय करते हैं वे स्वतः दूसरोंका दुःख दूर करनेमें लग जायँगी। जैसे अपनेपर कोई दुःख आनेसे हम उसे दूर करनेकी चेष्टा करते हैं ऐसे ही दूसरोंको दुःखी देखकर अपनी शक्तिके अनुसार उनका दुःख दूर करनेकी चेष्टा होने लगेगी।प्रसन्नता और करुणामें एक विलक्षण रस है। वह रस क्रिया और पदार्थसे सम्बन्धविच्छेद करके जीवको परमात्मस्वरूप नित्य रसके साथ अभिन्न करा देता है।योगयुक्तः जितेन्द्रिय विशुद्धात्मा विजितात्मा और सर्वभूतात्मभूतात्मा इन चार पूर्वोक्त लक्षणोंसे युक्त जो कर्मयोगी है उसे ही यहाँ योगयुक्तः कहा गया है।साधनमें स्वाभाविक प्रवृत्ति न होनेमें कारण है उद्देश्य और रुचिमें भिन्नता। जबतक अन्तःकरणमें संसारका महत्त्व है तबतक उद्देश्य और रुचिका संघर्ष प्रायः मिटता नहीं। उद्देश्य अविनाशी परमात्माका होता है और रुचि प्रायः नाशवान् संसारके प्राणी पदार्थ परिस्थिति आदिकी होती है। उद्देश्य और रुचि अभिन्न हो जानेपर साधन स्वतः तेजीसे होने लगता है। यहाँ योगयुक्तः पद ऐसे कर्मयोगीके लिये आया है जिसका उद्देश्य और रुचि अभिन्न हो गयी है अर्थात् उद्देश्य और रुचि दोनों एक परमात्मामें ही हो गये हैं।उत्पन्न और नष्ट होनेवाला फल किञ्चिन्मात्र भी न चाहें तभी कर्मयोग होता है। फल और उद्देश्य दोनों भिन्नभिन्न होते हैं। कर्मयोगीमें फलकी इच्छा तो नहीं होती पर उद्देश्य अवश्य होता है। कर्मयोगीका उद्देश्यवही होता है जो सबको मिल सकता है और सदा साथ रहता है। जो किसीको मिलता है किसीको नहीं मिलता और कभी रहता है कभी नहीं रहता वह उसका उद्देश्य नहीं होता है। इस दृष्टिसे उद्देश्य सदा परमात्मतत्त्वका ही होता है। परमात्मतत्त्व किसी कर्म अभ्यास आदिका फल नहीं है। फल उत्पन्न और नष्ट होनेवाला होता है पर परमात्मा नित्य रहते हैं। उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुको कर्मयोगी चाहता ही नहीं क्योंकि उसकी चाहना ही परमात्मप्राप्तिमें बाधक है। एकमात्र परमात्माका ही उद्देश्य होनेसे कर्मयोगीको योगयुक्त कहा गया है।यहाँ जिसे योगयुक्तः कहा गया है उसे ही छठे अध्यायके चौथे श्लोकमें योगारूढः कहा गया है।कुर्वन्नपि न लिप्यते कर्मयोगी कर्म करते हुए भी कर्मोंसे नहीं बँधता। कर्मोंके बन्धनमें हेतु हैं कर्मोंके प्रति ममता कर्मोंके फलकी इच्छा कर्मजन्य सुखकी इच्छा तथा उसका भोग और कर्तृत्वाभिमान (टिप्पणी प0 289)। सारांशमें कर्मोंसे कुछनकुछ पानेकी इच्छा ही बन्धनमें कारण है। किञ्चिन्मात्र भी पानेकी इच्छा न होनेके कारण कर्मयोगी कर्म करते हुए भी उनसे बँधता नहीं अर्थात् उसके कर्म अकर्म हो जाते हैं।सांख्ययोगी तो गुणा गुणेषु वर्तन्ते (गीता 3। 28) गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा मानकर कर्मोंसे नहीं बँधता पर कर्मयोगी परहितके लिये कर्म करते हुए भी कर्मोंसे नहीं बँधता। केवल दूसरोंके लिये कर्म किये जानेसे उसके कर्म भी गुणा गुणेषु वर्तन्ते की तरह ही हो जाते हैं।यहाँ अपि पदमें एक भाव यह भी है कि कर्मयोगी कर्म करते समय तो निर्लिप्त है ही कर्म न करते समय भी वह निर्लिप्त है (गीता 4। 18)। उसका कर्म करने अथवा न करनेसे कोई प्रयोजन नहीं रहता (गीता 3। 18)। वह सदा ही निर्लिप्त रहता है।तात्पर्य है कि सांख्ययोगी जडताका त्याग करके चिन्मयताके साथ अपनी एकता मानता है और कर्मयोगी अपने कहलानेवाले शरीर मन इन्द्रियाँ आदिकी संसारके साथ एकता मानता है अर्थात् पदार्थ शरीर मन इन्द्रियाँ आदिको और उनकी क्रियाओंको अपनी नहीं मानता किन्तु उनको संसारकी और संसारके लिये ही मानता है। कर्मयोगी जब पदार्थ मन बुद्धि आदिको और उनकी क्रियाओंको केवल संसारकी ही मानता है तो फिर उनके द्वारा किसीका हित हो गया किसीको सुख पहुँचा किसीका उपकार हो गया तो वह मैंने किया मेरे द्वारा ऐसा हुआ ऐसा कैसे मान सकता है नहीं मान सकता। इसलिये वह कर्म करता हुआ भी कर्ता नहीं होता अर्थात् कर्मोंसे लिप्त नहीं होता। सम्बन्ध   कर्मोंके होनेके विषयमें कर्मयोगीकी बात कहकर अब भगवान् आगेके दो श्लोकोंमें सांख्ययोगके साधनकी बात कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.7 5.11।।योगयुक्त इत्यादि आत्मसिद्धये इत्यन्तम्। सर्वभूतानामात्मभूतः आत्मा यस्य स सर्वमपि कुर्वाणो न लिप्यते अकरणप्रतिषेधारूढत्वात्। अत एव दर्शनादीनि कुर्वन्नपि असौ एवं धारयति प्रतिपत्तिदार्ढ्येन निश्चिनुते चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां यदि स्वविषयेषु प्रवृत्तिः मम किमायातम् न हि अन्यस्य कृतेनापरस्य (S अन्यस्य कृतेनान्यस्य अन्यकृतेन परस्य) लेपः इति। तदेव ब्रह्मणि कर्मणां समर्पणम्। अत्र चिह्नम् अस्य गतसङ्गता। अतो न लिप्यते। योगिनश्च केवलैः सङ्गरहितैः परस्परानपेक्षिभिश्च कायादिभिः कुर्वन्ति कर्माणि सङ्गाभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.7।।ननु पारिव्राज्यं परिगृह्य श्रवणादिसाधनमसकृदनुतिष्ठतो लब्धसम्यग्बोधस्यापि यथापूर्वं कर्माण्युपलभ्यन्ते तानि च बन्धहेतवो भविष्यन्तीत्याशङ्क्य श्लोकान्तरमवतारयति यदा पुनरिति। सम्यग्दर्शनप्राप्त्युपायत्वेन यदा पुनरयं पुरुषो योगयुक्तत्वादिविशेषणः सम्यग्दर्शी संपद्यते तदा प्रातिभासिकीं प्रवृत्तिमनुसृत्य कुर्वन्नपि न लिप्यत इति योजना। योगेन नित्यनैमित्तिककर्मानुष्ठानेनेति यावत्। आदौनित्याद्यनुष्ठानवतो रजस्तमोमलाभ्यामकलुषितं सत्त्वं सिध्यतीत्याह विशुद्धेति। बुद्धिशुद्धौ कार्यकरणसंघातस्यापि स्वाधीनत्वं भवतीत्याह विजितेति। तस्य यथोक्तविशेषणवतो जायते सम्यग्दर्शित्वमित्याह सर्वभूतेति। सम्यग्दर्शिनस्तर्हि कर्मानुष्ठानं कुतस्त्यं तदनुष्ठाने वा कुतो बन्धविश्लेषसिद्धिरित्याशङ्क्याह स तत्रेति। सम्यग्दर्शनं सप्तम्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.7।।प्रकृतप्रमेयस्य समाप्तत्वादुत्तरस्य वैयर्थ्यमाशङ्क्याह एतदेवेति। योगयुक्तस्य सन्न्यासस्य महाफलत्वमेव। प्रपञ्चनं चयो न द्वेष्टि 5।3 इत्यत्रोक्तद्वेषादिवर्जनकारणोपन्यासेनब्रह्माधिगच्छति 5।6 इत्यत्रोक्तब्रह्मज्ञानावान्तरफलोपन्यासेन चेति ज्ञातव्यम्।सर्वभूतात्मभूतात्मा इत्यनेन जीवस्य परमात्मस्वरूपत्वमुच्यत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह सर्वेति। सर्वभूतानामात्मभूतः कथं इत्यत उक्तं यच्चेति। एतन्निर्वचनमाश्रित्य न स्वरूपत्वमित्यर्थः। स आत्मभूत इति सर्वभूतात्मभूत इत्युक्तस्यानुवादः।स्वसमीपंइत्यादिद्वितीयात्मशब्दस्यार्थः। एवं जानन्नत्र विवक्षितः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.7।।एतदेव प्रपञ्चयति योगयुक्त इति। सर्वभूतात्मभूतः परमेश्वरः। यच्चाप्नोतीत्यादेः। स आत्मभूतः स्वसमीपं प्रत्यादानादिकर्ता यस्य स सर्वभूतात्मभूतात्मा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.7।।कर्मयोगयुक्तः तु शास्त्रीये परमपुरुषाराधनरूपे विशुद्धे कर्मणि वर्तमानः तेन विशुद्धमनाः विजितात्मा स्वाभ्यस्ते कर्मणि व्याप्तमनस्त्वेन सुखेन विजितमनाः तत एवं जितेन्द्रियः कर्तुः आत्मनोयाथात्म्यानुसन्धाननिष्ठतया सर्वभूतात्मभूतात्मा।सर्वेषां देवादिभूतानाम् आत्मभूत आत्मा यस्य असौ सर्वभूतात्मभूतात्मा आत्मयाथात्म्यम् अनुसन्दधानस्य हि देवादीनां स्वस्य च एकाकार आत्मा देवादिभेदानां प्रकृतिपरिणामविशेषरूपतया आत्माकारत्वासंभवात्।प्रकृतिवियुक्तः सर्वत्र देवादिदेहेषु ज्ञानैकाकारतया समानाकार इतिनिर्दोषं हि समं ब्रह्म (गीता 5।19) इति अनन्तरमेव वक्ष्यते। स एवंभूतः कर्म कुर्वन् अपि अनात्मनि आत्माभिमानेन न लिप्यते न संबध्यते अतः अचिरेण आत्मानम् आप्नोति इत्यर्थः।यतः सौकर्यात् शैघ्र्याच्च कर्मयोग एव श्रेयान् अतः तदपेक्षितं श्रृणु

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.7।। योगेन युक्तः योगयुक्तः विशुद्धात्मा विशुद्धसत्त्वः विजितात्मा विजितदेहः जितेन्द्रियश्च सर्वभूतात्मभूतात्मा सर्वेषां ब्रह्मादीनां स्तम्बपर्यन्तानां भूतानाम् आत्मभूतः आत्मा प्रत्यक्चेतनो यस्य सः सर्वभूतात्मभूतात्मा सम्यग्दर्शीत्यर्थः स तत्रैवं वर्तमानः लोकसंग्रहाय कर्म कुर्वन्नपि न लिप्यते न कर्मभिः बध्यते इत्यर्थः।।न च असौ परमार्थतः करोतीत्यतः

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【 Verse 5.8 】

▸ Sanskrit Sloka: नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित् | पश्यञ्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपञ्श्वसन् ||

▸ Transliteration: naiva kiñcitkaromīti yukto manyeta tattvavit | paśyan śṛṇvan spṛśañ jighrann aśnan gacchan svapañ śvasan ||

▸ Glossary: na: never; eva: certainly; kiṁcit: anything; karomi: I do; iti: thus; yuktaḥ: en- gaged; manyeta: thinks; tattvavit: one who knows the truth; paśyan: seeing; śṛṇvan: hearing; spṛśan: touching; jighran: smelling; aśnan: eating; gacchan: going; svapan: dreaming; śvasan: breathing

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.8, 9 One who knows the truth, though engaged in seeing, hearing, touching, smelling, eating, going, dreaming, and breath- ing, always knows within himself that—’I never do anything at all.’ While talking, letting go, receiving, opening, closing, he considers that the senses are engaged with their sense objects.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.8 5.9।।तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता ग्रहण करता बोलता त्याग करता सोता श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं ऐसा समझकर मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा माने।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.8।। तत्त्ववित् युक्त पुरुष यह सोचेगा (अर्थात् जानता है) कि मैं किंचित् मात्र कर्म नहीं करता हूँ देखता हुआ सुनता हुआ स्पर्श करता हुआ सूंघता हुआ खाता हुआ चलता हुआ सोता हुआ श्वास लेता हुआ।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.8 न not? एव even? किञ्चित् anything? करोमि I do? इति thus? युक्तः centred (in the Self)? मन्येत should think? तत्त्ववित् the knower of Truth? पश्यन् seeing? श्रृण्वन् hearing? स्पृशन् touching? जिघ्रन् smelling? अश्नन् eating? गच्छन् going? स्वपन् sleeping? श्वसन् breathing.No Commentary.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.8. A master of Yoga, knowing the reality would think 'I do not perform any action at all'. For, he who, while seeing, hearing, touching, smelling, eating, going, sleeping and breathing;

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.8 Though the saint sees, hears, touches, smells, eats, moves, sleeps and breathes, yet he knows the Truth, and he knows that it is not he who acts.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.8 The knower of the truth, who is devoted to Yoga should think, 'I do not at all do anything' even though he is seeing, hearing, touching, smelling, eating, moving, sleeping, breathing;

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.8-5.9 Remaining absorbed in the Self, the knower of Reality should think, 'I certainly do not do anything', even while seeing, hearing, touching, smelling, eating, moving, sleeping, breathing, speaking, releasing, holding, opening and closing the eyes-remembering that the organs function in relation to the objects of the organs.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.8 "I do nothing at all," thus would the harmonised knower of Truth think seeing, hearing, touching, smelling, eating, going, sleeping, breathing.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.8 See Comment under 5.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.8 - 5.9 Thus he who knows the truth concerning the self should reflect in mind that the ear and the other organs of sensation (Jnanendriyas) as also organs of action (Karmendriyas) and the vital currents (the Pranas) are occupied with their own respective objects. Thus he should know, 'I do not do anything at all.' He should reflect, 'My intrinsic nature is one of knowledge. The sense of agency comes because of the association of the self with the senses and the Pranas which are rooted in Karma. It does not spring from my essential nature.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.8 Yuktah, remaining absorbed in the Self; tattva-vit, the knower of Reality-knower of the real nature of Truth, of the Self, i.e., the seer of the supreme Reality; manyeta, should think; 'na karomi eva, I certainly do not do; kincit, anything.' Having realized the Truth, when or how should he think? This is being answered; Api, even; pasyan, while seeing; srnvan, hearing; sprsan, touching; jighran, smelling; asnan, eating; gacchan, moving; svapan, sleeping; svasan, breathing; pralapan, speaking; visrjan, releasing; grhnan, holding; unmisan, opening; nimisan, closing the eyes. All these are to be connected with the above manyeta (should think). For the man who has known the Truth thus, who finds nothing but inaction in action-in all the movements of the body and organs-, and who has full realization, there is competence only for giving up all actions because of his realization of the nonexistence of actions. Indeed, one who proceeds to drink water in a mirage thinking that water is there, surely does not go there itself for drinking water even after knowing that no water exists there!

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.8।। See commentary under 5.9

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.8 5.9।। कुर्वन्नपि कुतो न लिप्यत इत्याशङ्क्य यतोऽसौ परमार्थतो न करोतीत्याह द्वाभ्याम् नैवेति। युक्तः समाहितः सन्नादौ कर्मयोगयुक्त इति वाऽयं पक्षोऽध्याहारसापेक्षत्वादाचार्यैरुपेक्षितिः। तत्त्ववित्परमार्थदर्शी नैव किंचित्करोमीति मन्येत मन्यते। कदेत्यपेक्षायामाह पश्यन्नित्यादि। अपेः सर्वत्र संबन्धः। पश्यन्नित्यादिज्ञानेन्द्रियाणां व्यापारान् गच्छन्निति पादयोर्व्यापारं स्वपन्निति बुद्धेः श्वसन्निति प्राणस्य प्रलपन्निति वाचः विसृजन्निति पायूपस्थयोः गृह्णन्निति हस्तयोः उन्मिषन्निमिषन्निति कूर्माख्यप्राणस्य कुर्वन्नपीन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते नाहमसङ्ग आत्मेति धारयन् बुद्य्धा निश्चयं कुर्वन् किंचित्सरोमीति तत्त्वविन्मन्यतेऽतो न लिप्यत इत्यर्थः। यद्वानन्वेवं कर्तृत्वाभिमानशून्य इन्द्रियैः प्रतिषिद्धमपि कुर्यादित्यत आह इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेष्विष्टेषु विषयेषु वर्तन्त इति हेतोरन्याय्यमपि कुर्युरित्य इन्द्रियाणि धारयन्त्त्स्वायत्तानि यथेष्टसंचारपराङ्भुखानि कुर्वन्निति। अस्मिन्पक्षे प्रकरणविरोधोऽनुषक्लेशश्च परिहर्तव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.8।।एतदेव विवृणोति द्वाभ्यां चक्षुरादिज्ञानेन्द्रियैर्वागादिकर्मेन्द्रियैः प्राणादिवायुभेदैरन्तःकरणचतुष्टयेन च तत्तच्चेष्टासु क्रियमाणासु इन्द्रियाणि इन्द्रियादीन्येवेन्द्रियार्थेषु स्वस्वविषयेषु वर्तन्ते प्रवर्तन्ते नत्वहमिति धारयन्नवधारयन् नैव किंचित्करोमीति मन्येत मन्यते। तत्त्ववित्परामार्थदर्शी युक्तः समाहितचित्तः। अथवा आदौ युक्तः कर्मयोगेन पश्चादन्तःकरणशुद्धिद्वारेण तत्त्वविद्भूत्वा नैव किंचित्करोमीति मन्यत इति संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.8 5.9।।न लिप्यत इत्येतदुपपादयति नैवेति द्वाभ्याम्। तत्त्ववित् अहं नैव किंचित्करोमीति मन्येत मन्यते। तत्र हेतुः। इन्द्रियाणि उपलक्षणमिदं प्राणादेरपि। इन्द्रियादय इन्द्रियार्थेषु स्वेषु विषयेषु वर्तन्ते इति धारयन्निश्चिन्वन्नत्वहं विषयेषु वर्ते इति मन्यते। धारयन्निति हेतौ शतृप्रत्ययः। अत्र दर्शनादयः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणां व्यापाराः। गमनविसर्गप्रलपनग्रहणानि कर्मेन्द्रियाणाम्। तानिच आनन्दस्योपलक्षणानि। श्वसन्निति प्राणस्य स्वपन्निति बुद्धेः उन्मेषणनिमेषणे कूर्माख्यप्राणस्येति विभागः। क्रमस्त्वविवक्षितः। एतानि कुर्वन्नप्यभिमानाभावान्न लिप्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.8।।ननु नियतफलस्य कर्मणः कृतस्य कथं न फलं इत्याशङ्क्याह नैव किञ्चिदित्यादित्रयेण। तत्त्ववित् भगवदिङ्गितज्ञः युक्तः मद्भावयुक्तः सन्नैव किञ्चित्करोमि अहं किञ्चिदपि न करोमि किन्तु भगवदिच्छया तदाज्ञया यथा स कारयति तथा वारिवशात्तृणादिचलनवत् कर्म किमपि मत्तो न भवति न त्वहं करोमि इति यो मन्येत स पापेन कर्मजफलेन न लिप्यते। एवंरूपस्य स्थितिमाह पश्यन्निति। भावात्मकेन मनसा स्थिरीकृतालौकिकेन्द्रियैश्चक्षुःप्रभृतिभिः पश्यन् भगवत्स्वरूपदर्शनं कुर्वन् शृण्वन् भगवत्कूजितवेण्वादिशब्दान् स्पृशन् भगवच्चरणारविन्दस्पर्श कुर्वन् जिघ्रन् भगवन्मुखामोदाद्याघ्राणं कुर्वन् अश्रन्৷৷. गच्छन् गोचारणादिलीलायां सङ्गे गच्छन् स्वपन् लीलादिसमये नेत्रमुद्रणं कुर्वन् श्वसन् विप्रयोगादिना श्वासविमोकं कुर्वन् प्रलपन् तद्भावेन मत्तावस्थायां भ्रमरवद्गानं कुर्वन् विसृजन् तदवस्थायामेव दूरे यच्छन् गृह्णन् तदवस्थयैवालिङ्गनादि चरणेषु कुर्वन् उन्मिषन् मत्तावस्थात्यागेन स्वरूपानुभवं कुर्वन् निमिषन् तत्सुखानुभवेन नेत्रनिमीलनं कुर्वन् इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेषु भगवदवयवेषु वर्तन्त इति धारयन्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.8 5.9।। कर्म कुर्वन्नपि न लिप्यत इत्येतद्विरुद्धमित्याशङ्क्य कर्तृत्वाभिमानाभावान्न विरुद्धमित्याह नैवेति द्वाभ्याम्। कर्मयोगेन युक्तः क्रमेण तत्त्वविद्भूत्वा दर्शनश्रवणादीनि कुर्वन्नपि इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्बुद्ध्या निश्चित्य किंचिदप्यहं न करोमीति मन्येत मन्यते। तत्र दर्शनश्रवणस्पर्शनावघ्राणाशनानि चक्षुरादिज्ञानेन्द्रियव्यापाराः गतिः पादयोः स्वापो बुद्धेः श्वासः प्राणस्य प्रलपनं वागिन्द्रियस्य विसर्गः पायूपस्थयोः ग्रहणं हस्तयोः उन्मेषणनिमेषणे कूर्माख्यप्राणस्येति विवेकः। एतानि कर्माणि कुर्वन्नप्यनभिमानाद्ब्रह्मविन्न लिप्यते। तथाच पारमर्षं सूत्रं तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.8 5.9।।कुर्वन्नपि न लिप्यते इत्येतद्विरुद्धमित्याशङ्क्य सर्वेन्द्रियव्यापारसत्वेऽपि कर्तृत्त्वाद्यभिमानाभावेन निर्द्वन्द्वत्वान्न विरुद्धमित्याह नैव किञ्चिदिति। मनस इन्द्रियाणां च व्यापाराःउन्मिषन्निमिषन्नपि इत्यन्तं निर्दिष्टाः। स्वविषयेषु हीमानीन्द्रियाणि प्रवर्त्तन्ते नाहमिति। साङ्ख्यवद्धारवन् न लिप्यते। तथा चोक्तं सूत्रकृतातदविगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ ब्र.सू.4।1।13 इति। कर्मभिर्न स बध्यते इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.8।।तत्त्वको समझकर कब और किस प्रकार ऐसे माने सो कहते हैं ( देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता सोता श्वास लेता बोलता त्याग करता ग्रहण करता तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयमें बर्त रही हैं ऐसे समझकर ) ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता। इस प्रकार इसका पहलेके आधे श्लोकसे सम्बन्ध है। जो इस प्रकार तत्त्वज्ञानी है अर्थात् सब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणोंकी चेष्टारूप कर्मोंमें अकर्म देखनेवाला है वह अपनेमें कर्मोंका अभाव देखता है इसलिये उस यथार्थ ज्ञानीका सर्वकर्मसंन्यासमें ही अधिकार है। क्योंकि मृगतृष्णिकामें जल समझकर उसको पीनेके लिये प्रवृत्त हुआ मनुष्य उसमें जलके अभावका ज्ञान हो जानेपर फिर भी वही जल पीनेके लिये प्रवृत्त नहीं होता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.8।। व्याख्या   तत्त्ववित् युक्तः यहाँ ये पद सांख्ययोगके विवेकशील साधकके वाचक हैं जो तत्त्ववित् महापुरुषकी तरह निर्भ्रान्त अनुभव करनेके लिये तत्पर रहता है। उसमें ऐसा विवेक जाग्रत् हो गया है कि सब क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं उन क्रियाओंका मेरे साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं।जो अपनेमें अर्थात् स्वरूपमें कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी क्रियाके कर्तापनको नहीं देखता वह तत्त्ववित् है। उसमें नित्यनिरन्तर स्वाभाविक ही यह सावधानी रहती है कि स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं। प्रकृतिके कार्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिके साथ वह कभी भी अपनी एकता स्वीकार नहीं करता इसलिये इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको वह अपनी क्रियाएँ मान ही कैसे सकता हैवास्तवमें उपर्युक्त स्थिति स्वरूपसे सभी मनुष्योंकी है परन्तु वे भूलसे स्वरूपको क्रियाओंका कर्ता मान लेते हैं (गीता 3। 27)। परमात्माकी जिस शक्तिसे समष्टि संसारकी क्रियाएँ हो रही हैं उसी शक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी हो रही हैं। परन्तु समष्टिके ही क्षुद्र अंश व्यष्टिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण मनुष्य व्यष्टिकी कुछ क्रियाओँको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है। इस मान्यताको हटानेके ही लिये भगवान् कहते हैं कि साधक अपनेको कभी कर्ता न माने। जबतक किसी भी अंशमें कर्तापनकी मान्यता है तबतक वह साधक कहा जाता है। जब अपनेमें कर्तापनकी मान्यताका सर्वथा अभाव होकर अपने स्वरूपका अनुभव हो जाता है तब वह तत्त्ववित् महापुरुष कहा जाता है। जैसे स्वप्नसे जगनेपर मनुष्यका स्वप्नसे बिलकुल सम्बन्ध नहीं रहता ऐसे ही तत्त्ववित् महापुरुषका शरीरादिसे होनेवाली क्रियाओंसे बिलकुल सम्बन्ध (कर्तापन) नहीं रहता।यहाँ तत्त्ववित् वही है जो प्रकृति और पुरुषके विभागको अर्थात् गुण और क्रिया सब प्रकृतिमें है प्रकृतिसे अतीत तत्त्वमें गुण और क्रिया नहीं है इसको ठीकठीक जानता है। प्रकृतिसे अतीत निर्विकार तत्त्व तो सबका प्रकाशक और आधार है। सबका प्रकाशक होता हुआ भी वह प्रकाश्यके अन्तर्गत ओतप्रोत है। प्रकाश्य (शरीर आदि) में घुलामिला रहनेपर भी प्रकाशक प्रकाशक ही है और प्रकाश्य प्रकाश्य ही है। ऐसे ही वह सबका आधार होता हुआ भी सबके (आधेयके) कणकणमें व्याप्त है पर वह कभी आधेय नहीं होता। कारण कि जो प्रकाशक और आधार है उसमें करना और होना नहीं है। करना और होनारूप परिवर्तन तो प्रकाश्य अथवा आधेयमें ही है। इस तरह प्रकाशक और प्रकाश्य आधार और आधेयके भेद(विभाग) को जो ठीक तरहसे जानता है वही तत्त्ववित् है। इसी प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष(क्षेत्रज्ञ) के विभागको जाननेकी बात भगवान्ने पहले दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें और आगे सातवें अध्यायके चौथेपाँचवें तथा तेरहवें अध्यायके दूसरे उन्नीसवें तेईसवें और चौंतीसवें श्लोकमें कही है।पश्यञ्शृण्वन्स्पृशन् ৷৷. उन्मिषन्निमिषन्नपि यहाँ देखना सुनना स्पर्श करना सूँघना और खाना ये पाँचों क्रियाएँ (क्रमशः नेत्र श्रोत्र त्वचा घ्राण और रसना इन पाँच) ज्ञानेन्द्रियोंकी हैं। चलना ग्रहण करना बोलना और मलमूत्रका त्याग करना ये चारों क्रियाएँ (क्रमशः पाद हस्त वाक् उपस्थ और गुदा इन पाँच) कर्मेन्द्रियोंकी हैं (टिप्पणी प0 290)। सोना यह एक क्रिया अन्तःकरणकी है। श्वास लेना यह एक क्रिया प्राणकी और आँखें खोलना तथा मूँदना ये दो क्रियाएँ कूर्म नामक उपप्राणकी हैं।उपर्युक्त तेरह क्रियाएँ देकर भगवान्ने ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ अन्तःकरण प्राण और उपप्राणसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओँका उल्लेख कर दिया है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके कार्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिके द्वारा ही होती हैं स्वयंके द्वारा नहीं। दूसरा एक भाव यह भी प्रतीत होता है कि सांख्ययोगीके द्वारा वर्ण आश्रम स्वभाव परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रविहित शरीरनिर्वाहकी क्रियाएँ खानपान व्यापार करना उपदेश देना लिखना पढ़ना सुनना सोचना आदि क्रियाएँ न होती हों ऐसी बात नहीं है। उसके द्वारा ये सब क्रियाएँ हो सकती हैं।मनुष्य अपनेको उन्हीं क्रियाओँका कर्ता मानता है जिनको वह जानकर अर्थात् मनबुद्धिपूर्वक करता है जैसे पढ़ना लिखना सोचना देखना भोजन करना आदि। परन्तु अनेक क्रियाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें मनुष्य जानकर नहीं करता जैसे श्वासका आनाजाना आँखोंका खुलना और बंद होना आदि। फिर इन क्रियाओंका कर्ता अपनेको न माननेकी बात इस श्लोकमें कैसे कही गयी इसका उत्तर यह है कि सामान्यरूपसे श्वासोंका आनाजाना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक होनेवाली हैं किन्तु प्राणायाम आदिमें मनुष्य श्वास लेना आदि क्रियाएँ जानकर करता है। ऐसे ही आँखोको खोलना और बंद करना भी जानकर किया जा सकता है। इसलिये इन क्रियाओंका कर्ता भी अपनेको न माननेके लिये कहा गया है। दूसरी बात जैसे मनुष्य श्वसन् उन्मिषन् निमिषन् (श्वास लेना आँखोंको खोलना और मूँदना) इन क्रियाओंको स्वाभाविक मानकर इनमें अपना कर्तापन नहीं मानता ऐसे ही अन्य क्रियाओंको भी स्वाभाविक मानकर उनमें अपना कर्तापन नहीं मानना चाहिये।यहाँ पश्यन् आदि जो तेरह क्रियाएँ बतायी हैं इनका बिना किसी आधारके होना सम्भव नहीं है। ये क्रियाएँ जिसके आश्रित होती हैं अर्थात् इन क्रियाओंका जो आधार है उसमें कभी कोई क्रिया नहीं होती। ऐसे ही प्रकाशित होनेवाली ये सम्पूर्ण क्रियाएँ बिना किसी प्रकाशके सिद्ध नहीं हो सकतीं। जिस प्रकाशसे ये क्रियाएँ प्रकाशित होती है जिस प्रकाशके अन्तर्गत होती हैं उस प्रकाशमें कभी कोई क्रिया हुई नहीं होती नहीं होगी नहीं हो सकती नहीं और होनी सम्भव भी नहीं। ऐसा वह तत्त्व सबका आधार प्रकाशक और स्वयं प्रकाशस्वरूप है। वह सबमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता। उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही उपर्युक्त इन तेरह क्रियाओँका तात्पर्य है।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् जब स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं तब क्रियाएँ कैसे और किसके द्वारा हो रही हैं इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् उपर्युक्त पदोंमें कहते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ इन्द्रियोंके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंमें ही हो रही हैं। यहाँ भगवान्का तात्पर्य इन्द्रियोंमें कर्तृत्व बतानेमें नहीं है प्रत्युत स्वरूपको कर्तृत्वरहित (निर्लिप्त) बतानेमें है।ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ अन्तःकरण प्राण उपप्राण आदि सबको यहाँ इन्द्रियाणि पदके अन्तर्गत लिया गया है। इन्द्रियोंके पाँच विषय हैं शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध। इन विषयोंमें ही इन्द्रियोंका बर्ताव होता है। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रकृतिका कार्य हैं। इसलिये इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं (1) प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। (गीता 3। 27)।(2) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। (गीता 13। 29) गुणोंका कार्य होनेसे इन्द्रियों और उनके विषयोंको गुण ही कहा जाता है। अतः गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं गुणा गुणेषु वर्तन्ते (गीता 3। 28)। गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति (गीता 14। 19)। तात्पर्य यह है कि क्रियामात्रको चाहे प्रकृतिसे होनेवाली कहें चाहे प्रकृतिके कार्य गुणोंके द्वारा होनेवाली कहें चाहे इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली कहें बात वास्तवमें एक ही है।क्रियाका तात्पर्य है परिवर्तन। परिवर्तनरूप क्रिया प्रकृतिमें ही होती है। स्वरूपमें परिवर्तनरूप क्रिया लेशमात्र भी नहीं है। कारण कि प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है और स्वरूप कर्तापनसे रहित है। प्रकृति कभी अक्रिय नहीं हो सकती और स्वरूपमें कभी क्रिया नहीं हो सकती। क्रियामात्र प्रकाश्य है और स्वरूप प्रकाशक है।नैव किञ्चित्करोमीति मन्येत यहाँ मैं (स्वरूपसे) कर्ता नहीं हूँ इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं (स्वरूप) पहले कर्ता था। स्वरूपमें कर्तापन न तो वर्तमानमें है न भूतमें था और न भविष्यमें ही होगा। क्रियामात्र प्रकृतिमें ही हो रही है क्योंकि प्रकृति सदा क्रियाशील है और पुरुष अर्थात् चेतनतत्त्व सदा क्रियारहित है। जब चेतन अनादि भूलसे प्रकृतिके कार्यके साथ तादात्म्य कर लेता है तब वह प्रकृतिकी क्रियाओँको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है और उन क्रियाओंका कर्ता स्वयं बन जाता है (गीता 3। 27)।जैसे एक मनुष्य चलती हुई रेलगाड़ीके डिब्बेमें बैठा हुआ है चल नहीं रहा है परन्तु रेलगाड़ीके चलनेके कारण उसके चले बिना ही चलना हो जाता है। रेलगाड़ीमें चढ़नेके कारण अब वह चलनेसे रहित नहीं हो सकता। ऐसे ही क्रियाशील प्रकृतिके कार्यरूप स्थूल सूक्ष्म और कारण किसी भी शरीरके साथ जब स्वयं अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है तब स्वयं कर्म न करते हुए भी वह उन शरीरोंसे होनेवाली क्रियाओँका कर्ता हुएबिना रह नहीं सकता।सांख्ययोगी शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदिके साथ कभी अपना सम्बन्ध नहीं मानता इसलिये वह कर्मोंका कर्तापन अपनेमें कभी अनुभव नहीं करता (गीता 5। 13)। जैसे शरीरका बालकसे युवा होना बालोंका कालेसे सफेद होना खाये हुए अन्नका पचना शरीरका सबल अथवा निर्बल होना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक (अपनेआप) होती हैं ऐसे ही दूसरी सम्पूर्ण क्रियाओंको भी सांख्ययोगी स्वाभाविक होनेवाली अनुभव करता है। तात्पर्य है कि वह अपनेको किसी भी क्रियाका कर्ता अनुभव नहीं करता।गीतामें स्वयंको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की गयी है (3। 27)। इसी प्रकार शुद्ध स्वरूपको कर्ता माननेवालेको मलिन अन्तःकरणवाला और दुर्मति कहा गया है (18। 16)। परन्तु स्वरूपको अकर्ता माननेवालेकी प्रशंसा की गयी है (13। 29)।एव पद देनेका तात्पर्य है कि साधक कभी किञ्चिन्मात्र भी अपनेमें कर्तापनकी मान्यता न करे अर्थात् कभी किसी भी अंशमें अपनेको किसी कर्मका कर्ता न माने। इस प्रकार जब अपनेमें कर्तापनका भाव नहीं रहता तब उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंकी संज्ञा कर्म नहीं रहती प्रत्युत क्रिया रहती है। उन्हें चेष्टामात्र कहा जाता है। इसी लक्ष्यसे तीसरे अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें ज्ञानी महापुरुषसे होनेवाली क्रियाको चेष्टते पदसे कहा गया है।यहाँ एव पद देनेका दूसरा तात्पर्य यह है कि स्वयंका शरीरके साथ तादात्म्य होनेपर भी शरीरके साथ कितना ही घुलमिल जानेपर भी और अपनेको मैं कर्ता हूँ ऐसे मान लेनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं और न कभी आ ही सकता है। किंतु प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके यह स्वयं अपनेमें कर्तृत्व मान लेता है क्योंकि इसमें मानने और न माननेकी सामर्थ्य है स्वतन्त्रता है इसलिये यह अपनेको कर्ता भी मान लेता है और जब यह अपनी तरफ देखता है तो अकर्तापन भी इसके अनुभवमें आता है। ये दोनों बाते (अपनेमें कर्तृत्व मानना और न मानना) होनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है शरीरमें रहता हुआ भी वह न करता है और न लिप्त ही होता है। भोक्ता तो प्रकृतिस्थ पुरुष ही बनता है (गीता 13। 21)। गुणोंका क्रियाफलका भोक्ता बननेपर भी वह वास्तवमें अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होता किन्तु अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि न रहनेसे अपनेमें लिप्तताका भाव पैदा होता है।यद्यपि पुरुष स्वयं स्वरूपसे निर्लिप्त है उसमें भोक्तापन है नहीं हो सकता नहीं तथापि सुखदुःखथका भोक्ता तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही बनता है अर्थात् सुखीदुःखी तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही होता है जड नहीं क्योंकि जडमें सुखीदुःखी होनेकी शक्ति और योग्यता नहीं है। तो फिर पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और सुखदुःखका भोक्ता पुरुष ही बनता है ये दोनों बातें कैसे भोगके समय जो भोगाकार सुखदुःखाकार वृत्ति बनती है वह तो प्रकृतिकी होती है और प्रकृतिमें ही होती है। परन्तु उस वृत्तिके साथ तादात्म्य होनेसे सुखीदुःखी होना अर्थात् मैं सुखी हूँ मैं दुःखी हूँ ऐसी मान्यता अपनेमें स्वयं पुरुष ही करता है। कारण कि यह मानना पुरुषके बिना नहीं होता अर्थात् यह मानना पुरुषमें ही हो सकता है जडमें नहीं इस दृष्टिसे पुरुष भोक्ता कहा गया है। सुखीदुःखी होना अपनेमें माननेपर भी अर्थात् सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी ऐसी मान्यता अपनेमें करनेपर भी पुरुष स्वयं अपने स्वरूपसे निर्लिप्त और सुखदुःखका प्रकाशकमात्र ही रहता है इस दृष्टिसे पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और हो सकता ही नहीं। कारण कि एकदेशीयपनसे ही भोक्तापन होता है और एकदेशीयपन अहंकारसे होता है। अहंकार प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति जड है अतः उसका कार्य भी जड ही होता है अर्थात् भोक्तापन भी जड ही होता है। इसलिये भोक्तापन पुरुष(चेतन) में नहीं है। अगर यह पुरुष सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होता तो इसका स्वरूप परिवर्तनशील ही होता क्योंकि सुखका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा दुःखकाभी आरम्भ और अन्त होता है। ऐसे ही यह पुरुष भी आरम्भ और अन्तवाला हो जाता जो कि सर्वथा अनुचित है। कारण कि गीताने इसको अक्षर अव्यय और निर्लिप्त कहा है और तत्त्वज्ञ पुरुषोंने इसका स्वरूप एकरस एकरूप माना है। अगर इस पुरुषको सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होनेवाला ही मानें तो फिर पुरुष सदा एकरस एकरूप रहता है ऐसा कैसे कह सकते हैं विशेष बाततीसरे अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते इसमें आये मन्यते पदसे जो बात आयी थी उसीका निषेध यहाँ नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् इसमें आये मन्येत पदसे किया गया है। मन्येत पदका अर्थ मानना नहीं है प्रत्युत अनुभव करना है क्योंकि स्वरूपमें क्रिया नहीं है यह अनुभव है मान्यता नहीं। कर्म करते समय अथवा न करते समय दोनों अवस्थाओंमें स्वरूपमें अकर्तापन ज्योंकात्यों है। इसलिये तत्त्ववित् पुरुष यह अनुभव करता है कि कर्म करते समय भी मैं वही था और कर्म न करते समय भी मैं वही रहा अतः कर्म करने अथवा न करनेसे अपने स्वरूप(अपनी सत्ता) में क्या फरक पड़ा अर्थात् स्वरूप तो अकर्ता ही रहा। इस प्रकार प्रकृतिके परिवर्तनका ज्ञान (अनुभव) तो सबको होता है पर अपने स्वरूपके परिवर्तनका ज्ञान किसीको नहीं होता। स्वरूप सम्पूर्ण क्रियाओंका निर्लिप्तरूपसे आश्रय आधार और प्रकाशक है। उसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तनकी सम्भावना नहीं है।स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता। जब वह प्रकृतिके साथ रागसे तादात्म्य मान लेता है तब उसे अपनेमें अभाव प्रतीत होने लग जाता है। उस अभावकी पूर्तिके लिये वह पदार्थोंकी कामना करने लग जाता है। कामनाकी पूर्तिके लिये उसमें कर्तापन आ जाता है क्योंकि कामना हुए बिना स्वरूपमें कर्तापन नहीं आता।प्रकृतिसे सम्बन्धके बिना स्वयं कोई क्रिया नहीं कर सकता। कारण कि जिन करणोंसे कर्म होते हैं वे करण प्रकृतिके ही हैं। कर्ता करणके अधीन होता है। जैसे कितना ही योग्य सुनार क्यों न हो पर वह अहरन हथौड़ा आदि औजारोंके बिना कार्य नहीं कर सकता ऐसे ही कर्ता करणोंके बिना कोई क्रिया नहीं कर सकता। इस प्रकार योग्यता सामर्थ्य और करण ये तीनों प्रकृतिमें ही हैं और प्रकृतिके सम्बन्धसे ही अपनेमें प्रतीत होते हैं। ये तीनों घटतेबढ़ते हैं और स्वरूप सदा ज्योंकात्यों रहता है। अतः इनका स्वरूपसे सम्बन्ध है ही नहीं। कर्तापन प्रकृतिके सम्बन्धसे है इसलिये अपनेको कर्ता मानना परधर्म है। स्वरूपमें कर्तापन नहीं है इसलिये अपनेको अकर्ता मानना स्वधर्म है। जैसे ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपन(मैं ब्राह्मण हूँ इस) में निरन्तर स्थित रहता है ऐसे ही तत्त्ववित् अपने अकर्तापन(स्वधर्म) में निरन्तर स्थित रहता है यही नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् पदोंका भाव है। सम्बन्ध   सातवें श्लोकमें कर्मयोगीकी और आठवेंनवें श्लोकोंमें सांख्ययोगीकी कर्मोसे निर्लिप्तता बताकर अब भगवान् भक्तियोगीकी कर्मोंसे निर्लिप्तता बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.7 5.11।।योगयुक्त इत्यादि आत्मसिद्धये इत्यन्तम्। सर्वभूतानामात्मभूतः आत्मा यस्य स सर्वमपि कुर्वाणो न लिप्यते अकरणप्रतिषेधारूढत्वात्। अत एव दर्शनादीनि कुर्वन्नपि असौ एवं धारयति प्रतिपत्तिदार्ढ्येन निश्चिनुते चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां यदि स्वविषयेषु प्रवृत्तिः मम किमायातम् न हि अन्यस्य कृतेनापरस्य (S अन्यस्य कृतेनान्यस्य अन्यकृतेन परस्य) लेपः इति। तदेव ब्रह्मणि कर्मणां समर्पणम्। अत्र चिह्नम् अस्य गतसङ्गता। अतो न लिप्यते। योगिनश्च केवलैः सङ्गरहितैः परस्परानपेक्षिभिश्च कायादिभिः कुर्वन्ति कर्माणि सङ्गाभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.8।।कर्माण्यङ्गीकृत्य तैरस्य विदुषो बन्धो नास्तीत्युक्तमिदानीं वस्तुतस्तस्य कर्माण्येव न सन्तीत्याह नचेति। लोकदृष्ट्या विदुषोऽपि कर्माणि सन्तीत्याशङ्क्य स्वदृष्ट्या तदभावमभिप्रेत्याह नैवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.8 5.9।।नैव किञ्चिदित्यादेः प्रतिपाद्यमाह सन्न्यासमिति।ज्ञेयः इत्यादिनाविशुद्धात्मा इत्यादिना च स्पष्टीकृतत्वात् पुनरिति। स्पष्टं च प्रागनुक्तसङ्कल्पत्यागस्याभिधानात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.8 5.9।।सन्न्यासं स्पष्टयति पुनः श्लोकद्वयेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.8।।एवम् आत्मतत्त्ववित् श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि वागादीनि कर्मेन्द्रियाणि प्राणाः च स्वस्य विषयेषु वर्तन्ते इति धारयन् अनुसन्दधानो न अहं किञ्चित् करोमि इति मन्येत। ज्ञानैकस्वभावस्य मम कर्ममूलेन्द्रियप्राणसम्बन्धकृतम् ईदृशं कर्तृत्वम् न स्वरूपप्रयुक्तम् इति मन्येत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.8 5.9।। नैव किञ्चित् करोमीति युक्तः समाहितः सन् मन्येत चिन्तयेत् तत्त्ववित् आत्मनो याथात्म्यं तत्त्वं वेत्तीति तत्त्ववित् परमार्थदर्शीत्यर्थः।।कदा कथं वा तत्त्वमवधारयन् मन्येत इति उच्यते पश्यन्निति। मन्येत इति पूर्वेण संबन्धः। यस्य एवं तत्त्वविदः सर्वकार्यकरणचेष्टासु कर्मसु अकर्मैव पश्यतः सम्यग्दर्शिनः तस्य सर्वकर्मसंन्यासे एव अधिकारः कर्मणः अभावदर्शनात्। न हि मृगतृष्णिकायाम् उदकबुद्ध्या पानाय प्रवृत्तः उदकाभावज्ञानेऽपि तत्रैव पानप्रयोजनाय प्रवर्तते।।यस्तु पुनः अतत्त्ववित् प्रवृत्तश्च कर्मयोगे

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【 Verse 5.9 】

▸ Sanskrit Sloka: प्रलपन्विसृजन्गृह्ण्न्नुन्मिषन्निमिषन्नपि | इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ||

▸ Transliteration: pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣannimiṣannapi | indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan ||

▸ Glossary: pralapan: talking; visṛjan: giving up; gṛihṇan: accepting; unmishan: opening;nimiṣan: closing; api: though; indriyāṇi: the senses; indriyārtheṣu: in gratifying senses; vartanta: are engaged; iti: thus; dhārayan: considering

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.8, 9 One who knows the truth, though engaged in seeing, hearing, touching, smelling, eating, going, dreaming, and breath- ing, always knows within himself that—’I never do anything at all.’ While talking, letting go, receiving, opening, closing, he considers that the senses are engaged with their sense objects.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.8 5.9।।तत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता ग्रहण करता बोलता त्याग करता सोता श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता हुआ भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं ऐसा समझकर मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ ऐसा माने।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.9।। बोलता हुआ त्यागता हुआ ग्रहण करता हुआ तथा आँखों को खोलता और बन्द करता हुआ (वह) निश्चयात्मक रूप से जानता है कि सब इन्द्रियाँ अपनेअपने विषयों में विचरण कर रही हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.9 प्रलपन् speaking? विसृजन् letting go? गृह्णन् seizing? उन्मिषन् opening (the eyes)? निमिषन् closing (the eyes)? अपि also? इन्द्रियाणि the senses? इन्द्रियार्थेषु amongst the senseobjects? वर्तन्ते move? इति thus? धारयन् being convinced.Commentary The liberated sage or a Jnani always remains as a witness of the activities of the senses as he identifies himself with the Self or Brahman. He thinks and says? I do not see the eyes perceive. I do not hear the ears hear. I do not smell? the nose smells? etc. He beholds,inaction in action as he has burnt his actions in the fire of wisdom. (Cf.XIV.1923)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.9. Taking, rejecting, receiving, opening and closing the eyes, bears in mind that the sense-organs are on their respective objects; and

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.9 Though he talks, though he gives and receives, though he opens his eyes and shuts them, he still knows that his senses are merely disporting themselves among the objects of perception.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.9 Speaking, discharging, grasping, opening, closing his eyes etc. He should always bear in mind that the senses operate among sense-objects.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.8-5.9 Remaining absorbed in the Self, the knower of Reality should think, 'I certainly do not do anything', even while seeing, hearing, touching, smelling, eating, moving, sleeping, breathing, speaking, releasing, holding, opening and closing the eyes-remembering that the organs function in relation to the objects of the organs.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.9 Speaking, letting go, seizing, opening and closing the eyes convinced that the senses move among the sense-objects.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.9 See Comment under 5.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.8 - 5.9 Thus he who knows the truth concerning the self should reflect in mind that the ear and the other organs of sensation (Jnanendriyas) as also organs of action (Karmendriyas) and the vital currents (the Pranas) are occupied with their own respective objects. Thus he should know, 'I do not do anything at all.' He should reflect, 'My intrinsic nature is one of knowledge. The sense of agency comes because of the association of the self with the senses and the Pranas which are rooted in Karma. It does not spring from my essential nature.'

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.9 Yuktah, remaining absorbed in the Self; tattva-vit, the knower of Reality-knower of the real nature of Truth, of the Self, i.e., the seer of the supreme Reality; manyeta, should think; 'na karomi eva, I certainly do not do; kincit, anything.' Having realized the Truth, when or how should he think? This is being answered; Api, even; pasyan, while seeing; srnvan, hearing; sprsan, touching; jighran, smelling; asnan, eating; gacchan, moving; svapan, sleeping; svasan, breathing; pralapan, speaking; visrjan, releasing; grhnan, holding; unmisan, opening; nimisan, closing the eyes. All these are to be connected with the above manyeta (should think). For the man who has known the Truth thus, who finds nothing but inaction in action-in all the movements of the body and organs-, and who has full realization, there is competence only for giving up all actions because of his realization of the nonexistence of actions. Indeed, one who proceeds to drink water in a mirage thinking that water is there, surely does not go there itself

Chapter 5 (Part 6)

for drinking water even after knowing that no water exists there!

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.9।। एक ज्ञानी सिद्ध पुरुष भी जगत् में औरों के समान ही कुशलतापूर्वक कर्म करते हुए रहता है न कि पाषाण की प्रतिमा के समान निष्क्रिय होकर। सर्व सामान्य और स्वाभाविक क्रियायों की एक सूची ही इन दो श्लोकों में दी हुई है जैसे देखता हुआ सुनता हुआ৷৷.आदि। भगवान् कहते हैं कि जीवन की इन अपरिहार्य क्रियायों में ज्ञानी पुरुष किसी प्रकार का कर्तृत्व अभिमान नहीं रखता।निद्रा अवस्था में अहंकार के अभाव में हमें अपनी श्वसन क्रिया का कोई भान नहीं रहता। इसी प्रकार अहंकार के नष्ट होने पर उपर्युक्त सभी क्रियाएँ अपने स्वाभाविक रूप से होती रहती हैं। परन्तु ज्ञानी पुरुष को सदा यह भान रहता है कि मैं किंचिन्मात्र कर्म नहीं करता हूँ। इसका अर्थ यह नहीं हुआ कि सिद्ध पुरुष उपचाररहित नींद में चलने वाला रोगी बन जाता है दोनों में मुख्य भेद यह है कि नींद में चलने वाले को किसी प्रकार का भान नहीं रहता जबकि ज्ञानी पुरुष अपने चैतन्य स्वरूप के प्रति सदा जागरूक रहता है।युक्त अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित इस शब्द के द्वारा यह सूचित करते हैं कि अहंकार का पूर्ण त्याग करना केवल आत्मज्ञानी के लिये ही संभव हो सकता है। इस युक्तता में साधक तथा सिद्ध पुरुषों के भेद से कुछ तारतम्य होता है। जहाँ साधकगण अध्ययन श्रवण मनन आदि की सहायता से बौद्धिक स्तर पर स्वस्वरूप के प्रति सजग रहने का प्रयत्न करते हैं वहाँ सिद्ध पुरुष के लिए तो स्वस्वरूपानुभूति सदा सहज रूप में बनी ही रहती है।अत अहंकार का त्याग करने के लिए हमको आत्मज्ञान प्राप्त करना चाहिए। जाग्रत अवस्था के अपने व्यक्तित्व का विस्मरण होने पर ही हम अपने ही बनाये स्वप्न के शिकार बन जाते हैं। स्वप्नावस्था के दुखों का अन्त तभी होगा जब हम पुन अपने जाग्रत अवस्था के स्वरूप का साक्षात्कार कर लेंगे।इसी प्रकार मैं कर्ता हूँ इस अविद्या जनित कर्तृत्व भाव की निवृत्ति आत्मस्वरूप के सम्यक् ज्ञान से ही होगी कि आत्मा अर्थात् मैं अकर्ता हूँ। इसी तथ्य को इस श्लोक में दर्शाया गया है कि ज्ञानी पुरुष जानता है कि इन्द्रियाँं अपनेअपने विषयों में विचरण करती हैं जबकि आत्मा सदा अकर्त्ता ही है।यदि समुद्र चेतन होता तो वह स्वयं में ही उत्पन्न और नष्ट होती हुई लहरों को देख सकता। आत्मस्वरूप में स्थित ज्ञानी पुरुष शरीरादि उपाधियों द्वारा किये जा रहे कर्मों को साक्षी भाव से देखता रहता है। टंकण (टाइप) करते हुए हम अपनी उँगलियों को कार्यरत देख सकते हैं और तब टाइप राइटर पर चलती उँगलियों की क्रिया एक क्रीड़ा बन जाती है। यही स्थिति है ज्ञानी पुरुष की। चिन्ता और विक्षेप से रहित हुआ आत्मानुभूति में स्थित पुरुष का यह निश्चयात्मक ज्ञान होता है कि मैं किंचिन्मात्र कर्म नहीं करता हूँ।परन्तु कर्म में ही प्रवृत्त अतत्त्ववित् पुरुष को किस प्रकार कर्म करने चाहिये भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.8 5.9।। कुर्वन्नपि कुतो न लिप्यत इत्याशङ्क्य यतोऽसौ परमार्थतो न करोतीत्याह द्वाभ्याम् नैवेति। युक्तः समाहितः सन्नादौ कर्मयोगयुक्त इति वाऽयं पक्षोऽध्याहारसापेक्षत्वादाचार्यैरुपेक्षितिः। तत्त्ववित्परमार्थदर्शी नैव किंचित्करोमीति मन्येत मन्यते। कदेत्यपेक्षायामाह पश्यन्नित्यादि। अपेः सर्वत्र संबन्धः। पश्यन्नित्यादिज्ञानेन्द्रियाणां व्यापारान् गच्छन्निति पादयोर्व्यापारं स्वपन्निति बुद्धेः श्वसन्निति प्राणस्य प्रलपन्निति वाचः विसृजन्निति पायूपस्थयोः गृह्णन्निति हस्तयोः उन्मिषन्निमिषन्निति कूर्माख्यप्राणस्य कुर्वन्नपीन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्ते नाहमसङ्ग आत्मेति धारयन् बुद्य्धा निश्चयं कुर्वन् किंचित्सरोमीति तत्त्वविन्मन्यतेऽतो न लिप्यत इत्यर्थः। यद्वानन्वेवं कर्तृत्वाभिमानशून्य इन्द्रियैः प्रतिषिद्धमपि कुर्यादित्यत आह इन्द्रियाणीति। इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेष्विष्टेषु विषयेषु वर्तन्त इति हेतोरन्याय्यमपि कुर्युरित्य इन्द्रियाणि धारयन्त्त्स्वायत्तानि यथेष्टसंचारपराङ्भुखानि कुर्वन्निति। अस्मिन्पक्षे प्रकरणविरोधोऽनुषक्लेशश्च परिहर्तव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.9।।तत्र दर्शनश्रवणस्पर्शनघ्राणाशनानि चक्षुःश्रोत्रत्वग्घ्राणरसनानां पञ्चज्ञानेन्द्रियाणां व्यापाराःपश्यन्शृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नित्युक्ताः। गतिः पादयोः प्रलापो वाचः विसर्गः पायुपस्थयोः ग्रहणं हस्तयोरिति पञ्च कर्मेन्द्रियव्यापाराः गच्छन्प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नित्युक्ताः। श्वसन्निति प्राणादिपञ्चकस्य व्यापारोपलक्षणम्। उन्मिषन्निमिषन्निति नागकूर्मादिपञ्चकस्य। स्वपन्नित्यन्तःकरणचतुष्टस्य। अर्थक्रमवशात्पाठक्रमं भंक्त्वा व्याख्याताविमौ श्लोकौ। यस्मात्सर्वव्यापारेष्वप्यात्मनोऽकर्तृत्वमेव पश्यति अतः कुर्वन्नपि न लिप्यत इति युक्तमेवोक्तमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.8 5.9।।न लिप्यत इत्येतदुपपादयति नैवेति द्वाभ्याम्। तत्त्ववित् अहं नैव किंचित्करोमीति मन्येत मन्यते। तत्र हेतुः। इन्द्रियाणि उपलक्षणमिदं प्राणादेरपि। इन्द्रियादय इन्द्रियार्थेषु स्वेषु विषयेषु वर्तन्ते इति धारयन्निश्चिन्वन्नत्वहं विषयेषु वर्ते इति मन्यते। धारयन्निति हेतौ शतृप्रत्ययः। अत्र दर्शनादयः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणां व्यापाराः। गमनविसर्गप्रलपनग्रहणानि कर्मेन्द्रियाणाम्। तानिच आनन्दस्योपलक्षणानि। श्वसन्निति प्राणस्य स्वपन्निति बुद्धेः उन्मेषणनिमेषणे कूर्माख्यप्राणस्येति विभागः। क्रमस्त्वविवक्षितः। एतानि कुर्वन्नप्यभिमानाभावान्नलिप्यत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।। 5.9 ननु नियतफलस्य कर्मणः कृतस्य कथं न फलं इत्याशङ्क्याह नैव किञ्चिदित्यादित्रयेण। तत्त्ववित् भगवदिङ्गितज्ञः युक्तः मद्भावयुक्तः सन्नैव किञ्चित्करोमि अहं किञ्चिदपि न करोमि किन्तु भगवदिच्छया तदाज्ञया यथा स कारयति तथा वारिवशात्तृणादिचलनवत् कर्म किमपि मत्तो न भवति न त्वहं करोमि इति यो मन्येत स पापेन कर्मजफलेन न लिप्यते। एवंरूपस्य स्थितिमाह पश्यन्निति। भावात्मकेन मनसा स्थिरीकृतालौकिकेन्द्रियैश्चक्षुःप्रभृतिभिः पश्यन् भगवत्स्वरूपदर्शनं कुर्वन् शृण्वन् भगवत्कूजितवेण्वादिशब्दान् स्पृशन् भगवच्चरणारविन्दस्पर्श कुर्वन् जिघ्रन् भगवन्मुखामोदाद्याघ्राणं कुर्वन् अश्रन्৷৷. गच्छन् गोचारणादिलीलायां सङ्गे गच्छन् स्वपन् लीलादिसमये नेत्रमुद्रणं कुर्वन् श्वसन् विप्रयोगादिना श्वासविमोकं कुर्वन् प्रलपन् तद्भावेन मत्तावस्थायां भ्रमरवद्गानं कुर्वन् विसृजन् तदवस्थायामेव दूरे यच्छन् गृह्णन् तदवस्थयैवालिङ्गनादि चरणेषु कुर्वन् उन्मिषन् मत्तावस्थात्यागेन स्वरूपानुभवं कुर्वन् निमिषन् तत्सुखानुभवेन नेत्रनिमीलनं कुर्वन् इन्द्रियाणि इन्द्रियार्थेषु भगवदवयवेषु वर्तन्त इति धारयन्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.8 5.9।। कर्म कुर्वन्नपि न लिप्यत इत्येतद्विरुद्धमित्याशङ्क्य कर्तृत्वाभिमानाभावान्न विरुद्धमित्याह नैवेति द्वाभ्याम्।कर्मयोगेन युक्तः क्रमेण तत्त्वविद्भूत्वा दर्शनश्रवणादीनि कुर्वन्नपि इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन्बुद्ध्या निश्चित्य किंचिदप्यहं न करोमीति मन्येत मन्यते। तत्र दर्शनश्रवणस्पर्शनावघ्राणाशनानि चक्षुरादिज्ञानेन्द्रियव्यापाराः गतिः पादयोः स्वापो बुद्धेः श्वासः प्राणस्य प्रलपनं वागिन्द्रियस्य विसर्गः पायूपस्थयोः ग्रहणं हस्तयोः उन्मेषणनिमेषणे कूर्माख्यप्राणस्येति विवेकः। एतानि कर्माणि कुर्वन्नप्यनभिमानाद्ब्रह्मविन्न लिप्यते। तथाच पारमर्षं सूत्रं तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ तद्व्यपदेशात इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.8 5.9।।कुर्वन्नपि न लिप्यते इत्येतद्विरुद्धमित्याशङ्क्य सर्वेन्द्रियव्यापारसत्वेऽपि कर्तृत्त्वाद्यभिमानाभावेन निर्द्वन्द्वत्वान्न विरुद्धमित्याह नैव किञ्चिदिति। मनस इन्द्रियाणां च व्यापाराःउन्मिषन्निमिषन्नपि इत्यन्तं निर्दिष्टाः। स्वविषयेषु हीमानीन्द्रियाणि प्रवर्त्तन्ते नाहमिति। साङ्ख्यवद्धारवन् न लिप्यते। तथा चोक्तं सूत्रकृतातदविगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेषविनाशौ ब्र.सू.4।1।13 इति। कर्मभिर्न स बध्यतेइति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.9।।तत्त्वको समझकर कब और किस प्रकार ऐसे माने सो कहते हैं ( देखता सुनता छूता सूँघता खाता चलता सोता श्वास लेता बोलता त्याग करता ग्रहण करता तथा आँखोंको खोलता और मूँदता हुआ भी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयमें बर्त रही हैं ऐसे समझकर ) ऐसे माने कि मैं कुछ भी नहीं करता। इस प्रकार इसका पहलेके आधे श्लोकसे सम्बन्ध है। जो इस प्रकार तत्त्वज्ञानी है अर्थात् सब इन्द्रियाँ और अन्तःकरणोंकी चेष्टारूप कर्मोंमें अकर्म देखनेवाला है वह अपनेमें कर्मोंका अभाव देखता है इसलिये उस यथार्थ ज्ञानीका सर्वकर्मसंन्यासमें ही अधिकार है। क्योंकि मृगतृष्णिकामें जल समझकर उसको पीनेके लिये प्रवृत्त हुआ मनुष्य उसमें जलके अभावका ज्ञान हो जानेपर फिर भी वही जल पीनेके लिये प्रवृत्त नहीं होता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.9।। व्याख्या   तत्त्ववित् युक्तः यहाँ ये पद सांख्ययोगके विवेकशील साधकके वाचक हैं जो तत्त्ववित् महापुरुषकी तरह निर्भ्रान्त अनुभव करनेके लिये तत्पर रहता है। उसमें ऐसा विवेक जाग्रत् हो गया है कि सब क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं उन क्रियाओंका मेरे साथ कोई सम्बन्ध है ही नहीं।जो अपनेमें अर्थात् स्वरूपमें कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी क्रियाके कर्तापनको नहीं देखता वह तत्त्ववित् है। उसमें नित्यनिरन्तर स्वाभाविक ही यह सावधानी रहती है कि स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं। प्रकृतिके कार्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिके साथ वह कभी भी अपनी एकता स्वीकार नहीं करता इसलिये इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंको वह अपनी क्रियाएँ मान ही कैसे सकता हैवास्तवमें उपर्युक्त स्थिति स्वरूपसे सभी मनुष्योंकी है परन्तु वे भूलसे स्वरूपको क्रियाओंका कर्ता मान लेते हैं (गीता 3। 27)। परमात्माकी जिस शक्तिसे समष्टि संसारकी क्रियाएँ हो रही हैं उसी शक्तिसे व्यष्टि शरीरकी क्रियाएँ भी हो रही हैं। परन्तु समष्टिके ही क्षुद्र अंश व्यष्टिके साथ अपना सम्बन्ध मान लेनेके कारण मनुष्य व्यष्टिकी कुछ क्रियाओँको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है। इस मान्यताको हटानेके ही लिये भगवान् कहते हैं कि साधक अपनेको कभी कर्ता न माने। जबतक किसी भी अंशमें कर्तापनकी मान्यता है तबतक वह साधक कहा जाता है। जब अपनेमें कर्तापनकी मान्यताका सर्वथा अभाव होकर अपने स्वरूपका अनुभव हो जाता है तब वह तत्त्ववित् महापुरुष कहा जाता है। जैसे स्वप्नसे जगनेपर मनुष्यका स्वप्नसे बिलकुल सम्बन्ध नहीं रहता ऐसे ही तत्त्ववित् महापुरुषका शरीरादिसे होनेवाली क्रियाओंसे बिलकुल सम्बन्ध (कर्तापन) नहीं रहता।यहाँ तत्त्ववित् वही है जो प्रकृति और पुरुषके विभागको अर्थात् गुण और क्रिया सब प्रकृतिमें है प्रकृतिसे अतीत तत्त्वमें गुण और क्रिया नहीं है इसको ठीकठीक जानता है। प्रकृतिसे अतीत निर्विकार तत्त्व तो सबका प्रकाशक और आधार है। सबका प्रकाशक होता हुआ भी वह प्रकाश्यके अन्तर्गत ओतप्रोत है। प्रकाश्य (शरीर आदि) में घुलामिला रहनेपर भी प्रकाशक प्रकाशक ही है और प्रकाश्य प्रकाश्य ही है। ऐसे ही वह सबका आधार होता हुआ भी सबके (आधेयके) कणकणमें व्याप्त है पर वह कभी आधेय नहीं होता। कारण कि जो प्रकाशक और आधार है उसमें करना और होना नहीं है। करना और होनारूप परिवर्तन तो प्रकाश्य अथवा आधेयमें ही है। इस तरह प्रकाशक और प्रकाश्य आधार और आधेयके भेद(विभाग) को जो ठीक तरहसे जानता है वही तत्त्ववित् है। इसी प्रकृति (क्षेत्र) और पुरुष(क्षेत्रज्ञ) के विभागको जाननेकी बात भगवान्ने पहले दूसरे अध्यायके सोलहवें श्लोकमें और आगे सातवें अध्यायके चौथेपाँचवें तथा तेरहवें अध्यायके दूसरे उन्नीसवें तेईसवें और चौंतीसवें श्लोकमें कही है।पश्यञ्शृण्वन्स्पृशन् ৷৷. उन्मिषन्निमिषन्नपि यहाँ देखना सुनना स्पर्श करना सूँघना और खाना ये पाँचों क्रियाएँ (क्रमशः नेत्र श्रोत्र त्वचा घ्राण और रसना इन पाँच) ज्ञानेन्द्रियोंकी हैं। चलना ग्रहण करना बोलना और मलमूत्रका त्याग करना ये चारों क्रियाएँ (क्रमशः पाद हस्त वाक् उपस्थ और गुदा इन पाँच) कर्मेन्द्रियोंकी हैं (टिप्पणी प0 290)। सोना यह एक क्रिया अन्तःकरणकी है। श्वास लेना यह एक क्रिया प्राणकी और आँखें खोलना तथा मूँदना ये दो क्रियाएँ कूर्म नामक उपप्राणकी हैं।उपर्युक्त तेरह क्रियाएँ देकर भगवान्ने ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ अन्तःकरण प्राण और उपप्राणसे होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाओँका उल्लेख कर दिया है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिके कार्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिके द्वारा ही होती हैं स्वयंके द्वारा नहीं। दूसरा एक भाव यह भी प्रतीत होता है कि सांख्ययोगीके द्वारा वर्ण आश्रम स्वभाव परिस्थिति आदिके अनुसार शास्त्रविहित शरीरनिर्वाहकी क्रियाएँ खानपान व्यापार करना उपदेश देना लिखना पढ़ना सुनना सोचना आदि क्रियाएँ न होती हों ऐसी बात नहीं है। उसके द्वारा ये सब क्रियाएँ हो सकती हैं।मनुष्य अपनेको उन्हीं क्रियाओँका कर्ता मानता है जिनको वह जानकर अर्थात् मनबुद्धिपूर्वक करता है जैसे पढ़ना लिखना सोचना देखना भोजन करना आदि। परन्तु अनेक क्रियाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें मनुष्य जानकर नहीं करता जैसे श्वासका आनाजाना आँखोंका खुलना और बंद होना आदि। फिर इन क्रियाओंका कर्ता अपनेको न माननेकी बात इस श्लोकमें कैसे कही गयी इसका उत्तर यह है कि सामान्यरूपसे श्वासोंका आनाजाना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक होनेवाली हैं किन्तु प्राणायाम आदिमें मनुष्य श्वास लेना आदि क्रियाएँ जानकर करता है। ऐसे ही आँखोको खोलना और बंद करना भी जानकर किया जा सकता है। इसलिये इन क्रियाओंका कर्ता भी अपनेको न माननेके लिये कहा गया है। दूसरी बात जैसे मनुष्य श्वसन् उन्मिषन् निमिषन् (श्वास लेना आँखोंको खोलना और मूँदना) इन क्रियाओंको स्वाभाविक मानकर इनमें अपना कर्तापन नहीं मानता ऐसे ही अन्य क्रियाओंको भी स्वाभाविक मानकर उनमें अपना कर्तापन नहीं मानना चाहिये।यहाँ पश्यन् आदि जो तेरह क्रियाएँ बतायी हैं इनका बिना किसी आधारके होना सम्भव नहीं है। ये क्रियाएँ जिसके आश्रित होती हैं अर्थात् इन क्रियाओंका जो आधार है उसमें कभी कोई क्रिया नहीं होती। ऐसे ही प्रकाशित होनेवाली ये सम्पूर्ण क्रियाएँ बिना किसी प्रकाशके सिद्ध नहीं हो सकतीं। जिस प्रकाशसे ये क्रियाएँ प्रकाशित होती है जिस प्रकाशके अन्तर्गत होती हैं उस प्रकाशमें कभी कोई क्रिया हुई नहीं होती नहीं होगी नहीं हो सकती नहीं और होनी सम्भव भी नहीं। ऐसा वह तत्त्व सबका आधार प्रकाशक और स्वयं प्रकाशस्वरूप है। वह सबमें रहता हुआ भी कुछ नहीं करता। उस तत्त्वकी तरफ लक्ष्य करानेमें ही उपर्युक्त इन तेरह क्रियाओँका तात्पर्य है।इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् जब स्वरूपमें कर्तापन है ही नहीं तब क्रियाएँ कैसे और किसके द्वारा हो रही हैं इस प्रश्नका उत्तर देते हुए भगवान् उपर्युक्त पदोंमें कहते हैं कि सम्पूर्ण क्रियाएँ इन्द्रियोंके द्वारा इन्द्रियोंके विषयोंमें ही हो रही हैं। यहाँ भगवान्का तात्पर्य इन्द्रियोंमें कर्तृत्व बतानेमें नहीं है प्रत्युत स्वरूपको कर्तृत्वरहित (निर्लिप्त) बतानेमें है।ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ अन्तःकरण प्राण उपप्राण आदि सबको यहाँ इन्द्रियाणि पदके अन्तर्गत लिया गया है। इन्द्रियोंके पाँच विषय हैं शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध। इन विषयोंमें ही इन्द्रियोंका बर्ताव होता है। सम्पूर्ण इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंके विषय प्रकृतिका कार्य हैं। इसलिये इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली सम्पूर्ण क्रियाएँ प्रकृतिमें ही हो रही हैं (1) प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः। (गीता 3। 27)।(2) प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः। (गीता 13। 29) गुणोंका कार्य होनेसे इन्द्रियों और उनके विषयोंको गुण ही कहा जाता है। अतः गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं गुणा गुणेषु वर्तन्ते (गीता 3। 28)। गुणोंके सिवाय दूसरा कोई कर्ता नहीं है नान्यं गुणेभ्यः कर्तारं यदा द्रष्टानुपश्यति (गीता 14। 19)। तात्पर्य यह है कि क्रियामात्रको चाहे प्रकृतिसे होनेवाली कहें चाहे प्रकृतिके कार्य गुणोंके द्वारा होनेवाली कहें चाहे इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली कहें बात वास्तवमें एक ही है।क्रियाका तात्पर्य है परिवर्तन। परिवर्तनरूप क्रिया प्रकृतिमें ही होती है। स्वरूपमें परिवर्तनरूप क्रिया लेशमात्र भी नहीं है। कारण कि प्रकृति निरन्तर क्रियाशील है और स्वरूप कर्तापनसे रहित है। प्रकृति कभी अक्रिय नहीं हो सकती और स्वरूपमें कभी क्रिया नहीं हो सकती। क्रियामात्र प्रकाश्य है और स्वरूप प्रकाशक है।नैव किञ्चित्करोमीति मन्येत यहाँ मैं (स्वरूपसे) कर्ता नहीं हूँ इसका तात्पर्य यह नहीं है कि मैं (स्वरूप) पहले कर्ता था। स्वरूपमें कर्तापन न तो वर्तमानमें है न भूतमें था और न भविष्यमें ही होगा। क्रियामात्र प्रकृतिमें ही हो रही है क्योंकि प्रकृति सदा क्रियाशील है और पुरुष अर्थात् चेतनतत्त्व सदा क्रियारहित है। जब चेतन अनादि भूलसे प्रकृतिके कार्यके साथ तादात्म्य कर लेता है तब वह प्रकृतिकी क्रियाओँको अपनी क्रियाएँ मानने लग जाता है और उन क्रियाओंका कर्ता स्वयं बन जाता है (गीता 3। 27)।जैसे एक मनुष्य चलती हुई रेलगाड़ीके डिब्बेमें बैठा हुआ है चल नहीं रहा है परन्तु रेलगाड़ीके चलनेके कारण उसके चले बिना ही चलना हो जाता है। रेलगाड़ीमें चढ़नेके कारण अब वह चलनेसे रहित नहीं हो सकता। ऐसे ही क्रियाशील प्रकृतिके कार्यरूप स्थूल सूक्ष्म और कारण किसी भी शरीरके साथ जब स्वयं अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है तब स्वयं कर्म न करते हुए भी वह उन शरीरोंसे होनेवाली क्रियाओँका कर्ता हुएबिना रह नहीं सकता।सांख्ययोगी शरीर इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदिके साथ कभी अपना सम्बन्ध नहीं मानता इसलिये वह कर्मोंका कर्तापन अपनेमें कभी अनुभव नहीं करता (गीता 5। 13)। जैसे शरीरका बालकसे युवा होना बालोंका कालेसे सफेद होना खाये हुए अन्नका पचना शरीरका सबल अथवा निर्बल होना आदि क्रियाएँ स्वाभाविक (अपनेआप) होती हैं ऐसे ही दूसरी सम्पूर्ण क्रियाओंको भी सांख्ययोगी स्वाभाविक होनेवाली अनुभव करता है। तात्पर्य है कि वह अपनेको किसी भी क्रियाका कर्ता अनुभव नहीं करता।गीतामें स्वयंको कर्ता माननेवालेकी निन्दा की गयी है (3। 27)। इसी प्रकार शुद्ध स्वरूपको कर्ता माननेवालेको मलिन अन्तःकरणवाला और दुर्मति कहा गया है (18। 16)। परन्तु स्वरूपको अकर्ता माननेवालेकी प्रशंसा की गयी है (13। 29)।एव पद देनेका तात्पर्य है कि साधक कभी किञ्चिन्मात्र भी अपनेमें कर्तापनकी मान्यता न करे अर्थात् कभी किसी भी अंशमें अपनेको किसी कर्मका कर्ता न माने। इस प्रकार जब अपनेमें कर्तापनका भाव नहीं रहता तब उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंकी संज्ञा कर्म नहीं रहती प्रत्युत क्रिया रहती है। उन्हें चेष्टामात्र कहा जाता है। इसी लक्ष्यसे तीसरे अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें ज्ञानी महापुरुषसे होनेवाली क्रियाको चेष्टते पदसे कहा गया है।यहाँ एव पद देनेका दूसरा तात्पर्य यह है कि स्वयंका शरीरके साथ तादात्म्य होनेपर भी शरीरके साथ कितना ही घुलमिल जानेपर भी और अपनेको मैं कर्ता हूँ ऐसे मान लेनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं और न कभी आ ही सकता है। किंतु प्रकृतिके साथ तादात्म्य करके यह स्वयं अपनेमें कर्तृत्व मान लेता है क्योंकि इसमें मानने और न माननेकी सामर्थ्य है स्वतन्त्रता है इसलिये यह अपनेको कर्ता भी मान लेता है और जब यह अपनी तरफ देखता है तो अकर्तापन भी इसके अनुभवमें आता है। ये दोनों बाते (अपनेमें कर्तृत्व मानना और न मानना) होनेपर भी स्वयंमें कभी कर्तृत्व आता ही नहीं। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भगवान्ने कहा है शरीरमें रहता हुआ भी वह न करता है और न लिप्त ही होता है। भोक्ता तो प्रकृतिस्थ पुरुष ही बनता है (गीता 13। 21)। गुणोंका क्रियाफलका भोक्ता बननेपर भी वह वास्तवमें अपने स्वरूपसे कभी च्युत नहीं होता किन्तु अपने स्वरूपकी तरफ दृष्टि न रहनेसे अपनेमें लिप्तताका भाव पैदा होता है।यद्यपि पुरुष स्वयं स्वरूपसे निर्लिप्त है उसमें भोक्तापन है नहीं हो सकता नहीं तथापि सुखदुःखथका भोक्ता तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही बनता है अर्थात् सुखीदुःखी तो स्वयं पुरुष (चेतन) ही होता है जड नहीं क्योंकि जडमें सुखीदुःखी होनेकी शक्ति और योग्यता नहीं है। तो फिर पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और सुखदुःखका भोक्ता पुरुष ही बनता है ये दोनों बातें कैसे भोगके समय जो भोगाकार सुखदुःखाकार वृत्ति बनती है वह तो प्रकृतिकी होती है और प्रकृतिमें ही होती है। परन्तु उस वृत्तिके साथ तादात्म्य होनेसे सुखीदुःखी होना अर्थात् मैं सुखी हूँ मैं दुःखी हूँ ऐसी मान्यता अपनेमें स्वयं पुरुष ही करता है। कारण कि यह मानना पुरुषके बिना नहीं होता अर्थात् यह मानना पुरुषमें ही हो सकता है जडमें नहीं इस दृष्टिसे पुरुष भोक्ता कहा गया है। सुखीदुःखी होना अपनेमें माननेपर भी अर्थात् सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी ऐसी मान्यता अपनेमें करनेपर भी पुरुष स्वयं अपने स्वरूपसे निर्लिप्त और सुखदुःखका प्रकाशकमात्र ही रहता है इस दृष्टिसे पुरुषमें भोक्तापन है नहीं और हो सकता ही नहीं। कारण कि एकदेशीयपनसे ही भोक्तापन होता है और एकदेशीयपन अहंकारसे होता है। अहंकार प्रकृतिका कार्य है और प्रकृति जड है अतः उसका कार्य भी जड ही होता है अर्थात् भोक्तापन भी जड ही होता है। इसलिये भोक्तापन पुरुष(चेतन) में नहीं है। अगर यह पुरुष सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होता तो इसका स्वरूप परिवर्तनशील ही होता क्योंकि सुखका भी आरम्भ और अन्त होता है तथा दुःखकाभी आरम्भ और अन्त होता है। ऐसे ही यह पुरुष भी आरम्भ और अन्तवाला हो जाता जो कि सर्वथा अनुचित है। कारण कि गीताने इसको अक्षर अव्यय और निर्लिप्त कहा है और तत्त्वज्ञ पुरुषोंने इसका स्वरूप एकरस एकरूप माना है। अगर इस पुरुषको सुखके समय सुखी और दुःखके समय दुःखी होनेवाला ही मानें तो फिर पुरुष सदा एकरस एकरूप रहता है ऐसा कैसे कह सकते हैं विशेष बाततीसरे अध्यायके सत्ताईसवें श्लोकमें अहंकारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते इसमें आये मन्यते पदसे जो बात आयी थी उसीका निषेध यहाँ नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् इसमें आये मन्येत पदसे किया गया है। मन्येत पदका अर्थ मानना नहीं है प्रत्युत अनुभव करना है क्योंकि स्वरूपमें क्रिया नहीं है यह अनुभव है मान्यता नहीं। कर्म करते समय अथवा न करते समय दोनों अवस्थाओंमें स्वरूपमें अकर्तापन ज्योंकात्यों है। इसलिये तत्त्ववित् पुरुष यह अनुभव करता है कि कर्म करते समय भी मैं वही था और कर्म न करते समय भी मैं वही रहा अतः कर्म करने अथवा न करनेसे अपने स्वरूप(अपनी सत्ता) में क्या फरक पड़ा अर्थात् स्वरूप तो अकर्ता ही रहा। इस प्रकार प्रकृतिके परिवर्तनका ज्ञान (अनुभव) तो सबको होता है पर अपने स्वरूपके परिवर्तनका ज्ञान किसीको नहीं होता। स्वरूप सम्पूर्ण क्रियाओंका निर्लिप्तरूपसे आश्रय आधार और प्रकाशक है। उसमें कभी किञ्चिन्मात्र भी परिवर्तनकी सम्भावना नहीं है।स्वरूपमें कभी अभाव नहीं होता। जब वह प्रकृतिके साथ रागसे तादात्म्य मान लेता है तब उसे अपनेमें अभाव प्रतीत होने लग जाता है। उस अभावकी पूर्तिके लिये वह पदार्थोंकी कामना करने लग जाता है। कामनाकी पूर्तिके लिये उसमें कर्तापन आ जाता है क्योंकि कामना हुए बिना स्वरूपमें कर्तापन नहीं आता।प्रकृतिसे सम्बन्धके बिना स्वयं कोई क्रिया नहीं कर सकता। कारण कि जिन करणोंसे कर्म होते हैं वे करण प्रकृतिके ही हैं। कर्ता करणके अधीन होता है। जैसे कितना ही योग्य सुनार क्यों न हो पर वह अहरन हथौड़ा आदि औजारोंके बिना कार्य नहीं कर सकता ऐसे ही कर्ता करणोंके बिना कोई क्रिया नहीं कर सकता। इस प्रकार योग्यता सामर्थ्य और करण ये तीनों प्रकृतिमें ही हैं और प्रकृतिके सम्बन्धसे ही अपनेमें प्रतीत होते हैं। ये तीनों घटतेबढ़ते हैं और स्वरूप सदा ज्योंकात्यों रहता है। अतः इनका स्वरूपसे सम्बन्ध है ही नहीं। कर्तापन प्रकृतिके सम्बन्धसे है इसलिये अपनेको कर्ता मानना परधर्म है। स्वरूपमें कर्तापन नहीं है इसलिये अपनेको अकर्ता मानना स्वधर्म है। जैसे ब्राह्मण अपने ब्राह्मणपन(मैं ब्राह्मण हूँ इस) में निरन्तर स्थित रहता है ऐसे ही तत्त्ववित् अपने अकर्तापन(स्वधर्म) में निरन्तर स्थित रहता है यही नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् पदोंका भाव है। सम्बन्ध   सातवें श्लोकमें कर्मयोगीकी और आठवेंनवें श्लोकोंमें सांख्ययोगीकी कर्मोसे निर्लिप्तता बताकर अब भगवान् भक्तियोगीकी कर्मोंसे निर्लिप्तता बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.7 5.11।।योगयुक्त इत्यादि आत्मसिद्धये इत्यन्तम्। सर्वभूतानामात्मभूतः आत्मा यस्य स सर्वमपि कुर्वाणो न लिप्यते अकरणप्रतिषेधारूढत्वात्। अत एव दर्शनादीनि कुर्वन्नपि असौ एवं धारयति प्रतिपत्तिदार्ढ्येन निश्चिनुते चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां यदि स्वविषयेषु प्रवृत्तिः मम किमायातम् न हि अन्यस्य कृतेनापरस्य (S अन्यस्य कृतेनान्यस्य अन्यकृतेन परस्य) लेपः इति। तदेव ब्रह्मणि कर्मणां समर्पणम्। अत्र चिह्नम् अस्य गतसङ्गता। अतो न लिप्यते। योगिनश्च केवलैः सङ्गरहितैः परस्परानपेक्षिभिश्च कायादिभिः कुर्वन्ति कर्माणि सङ्गाभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.9।।सार्धं समनन्तरश्लोकमाकाङ्क्षापूर्वकमुत्थापयति कदेत्यादिना। चक्षुरादिज्ञानेन्द्रियैर्वागादिकर्मेन्द्रियैः प्राणादिवायुभेदैरन्तःकरणचतुष्टयेन च तत्तच्चेष्टानिर्वर्तनावस्थायां तत्तदर्थेषु सर्वा प्रवृत्तिरिन्द्रियाणामेवेत्यनुसंदधानो नैव किंचित्करोमीति विद्वान्प्रतिपद्यत इत्यर्थः। यथोक्तस्य विदुषो विध्यभावेऽपि विद्यासामर्थ्यात्प्रतिपत्तिकर्मभूतं कर्मसंन्यासं फलात्मकमभिलषति यस्येति। अज्ञस्येव विदुषोऽपि कर्मसु प्रवृत्तिसंभवात्कुतः संन्यासेऽधिकारः स्यादित्याशङ्क्याह नहीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.8 5.9।।नैव किञ्चिदित्यादेः प्रतिपाद्यमाह सन्न्यासमिति।ज्ञेयः इत्यादिनाविशुद्धात्मा इत्यादिना च स्पष्टीकृतत्वात् पुनरिति। स्पष्टं च प्रागनुक्तसङ्कल्पत्यागस्याभिधानात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.8 5.9।।सन्न्यासं स्पष्टयति पुनः श्लोकद्वयेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.9।।एवम् आत्मतत्त्ववित् श्रोत्रादीनि ज्ञानेन्द्रियाणि वागादीनि कर्मेन्द्रियाणि प्राणाः च स्वस्य विषयेषु वर्तन्ते इति धारयन् अनुसन्दधानो न अहं किञ्चित् करोमि इति मन्येत। ज्ञानैकस्वभावस्य मम कर्ममूलेन्द्रियप्राणसम्बन्धकृतम् ईदृशं कर्तृत्वम् न स्वरूपप्रयुक्तम् इति मन्येत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.8 5.9।। नैव किञ्चित् करोमीति युक्तः समाहितः सन् मन्येत चिन्तयेत् तत्त्ववित् आत्मनो याथात्म्यं तत्त्वं वेत्तीति तत्त्ववित् परमार्थदर्शीत्यर्थः।।कदा कथं वा तत्त्वमवधारयन् मन्येत इति उच्यते पश्यन्निति। मन्येत इति पूर्वेण संबन्धः। यस्य एवं तत्त्वविदः सर्वकार्यकरणचेष्टासु कर्मसु अकर्मैव पश्यतः सम्यग्दर्शिनः तस्य सर्वकर्मसंन्यासे एव अधिकारः कर्मणः अभावदर्शनात्। न हि मृगतृष्णिकायाम् उदकबुद्ध्या पानाय प्रवृत्तः उदकाभावज्ञानेऽपि तत्रैव पानप्रयोजनाय प्रवर्तते।।यस्तु पुनः अतत्त्ववित् प्रवृत्तश्च कर्मयोगे

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【 Verse 5.10 】

▸ Sanskrit Sloka: ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति य: | लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ||

▸ Transliteration: brahmaṇy ādhāya karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā karoti yaḥ | lipyate na sa pāpena padma-patram ivāmbhasā ||

▸ Glossary: brahmaṇi: Eternal Consciousness; ādhāya: surrendering to; karmāṇi: actions; saṅgaṁ: attachment; tyaktvā : giving up; karoti: does; yaḥ: who; lipyate: af- fected; na: never; saḥ: he; pāpena: by sin; padma: lotus; patraṁ: leaf; iva: like; ambhasā: water

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.10 He, who acts without attachment, giving up and surrender- ing to the eternal consciousness, He is never affected by sin, in the same way that the lotus leaf is not affected by water.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.10।।जो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान्में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.10।। जो पुरुष सब कर्म ब्रह्म में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर करता है वह पुरुष कमल के पत्ते के सदृश पाप से लिप्त नहीं होता।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.10 ब्रह्मणि in Brahman? आधाय having placed? कर्माणि actions? सङ्गम् attachment? त्यक्त्वा having abandoned? करोति acts? यः who? लिप्यते is tainted? न not? सः he? पापेन by sin? पद्मपत्रम् lotusleaf? इव like? अम्भसा by water.Commentary Chapter IV verses 18? 20? 21? 22? 23? 37? 41 Chapter V verses 10? 11 and 12 all convey the one idea that the Yogi who does actions without egoism and attachment to results or fruits of the actions? which he regards as offerings unto the Lord? is not tainted by the actions (Karma). He has no attachment even for Moksha. He sees inaction in action. All his actions are burnt in the fire of wisdom. He escapes from the wheel of Samsara. He is freed from the round of births and deaths. He gets purity of heart and through purity of heart attains to the knowledge of the Self. Through the knowledge of the Self he is liberated. This is the gist of the above ten verses. (Cf.III.30)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.10. Who performs actions by offering them to the Brahman and giving up attachment-he is not stained by sin just as the lotus-leaf is [not stained] by water.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.10 He who dedicates his actions to the Spirit, without any personal attachment to them, he is no more tainted by sin than the water lily is wetted by water.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.10 He who acts without attachment, reposing all actions on Brahman (Prakrti), is untouched by evil, as a lotus-leaf by water.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.10 One who acts by dedicating actions to Brahman and by renouncing attachment, he does not become polluted by sin, just as a lotus leaf is not by water.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.10 He who does actions, offering them to Brahman, and abandoning attachment, is not tainted by sin, just as a lotus-leaf is not tainted by water.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.10 See Comment under 5.11

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.10 Here the term, Brahman denotes Prakrti. Later on Sri Krsna will say: 'The great Brahman is My womb' (14.3). Since Prakrti abides in the form of senses which are particular off-shoots of Prakrti, he who, as said in the passage beginning with 'Even though he is seeing, hearing ৷৷.' (5.8), understands that all actions proceed from Brahman (Prakrti); renounces all attachment while engaging himself in all actions, reflecting, 'I am doing nothing.' Such a person, though existing in contact with Prakrti, is not contaminated by sin which is the result of the wrong identification of the Atman with Prakrti and is the cause of bondage. Just as a lotus leaf is not wetted by water, actions do not affect or defile a person with sin, if he is free from such identification with the body.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.10 On the other hand, again, one who is ignorant of the Truth and is engaged in Karma-yoga, yah, who; karoti, acts; adhaya, by dedicating, by surrendering; all karmani, actions; brahmani, to Brahman, to God; with the idea, 'I am working for Him, as a servant does everything for his master', and tyaktva, by renouncing; sangam, attachment, even with regard to teh resulting Liberation; sah, he; na lipyate, does not get polluted, is not affected; papena, by sin; iva, just as; padma-patram, a lotus leaf; is not ambhasa, by water. The only result that will certainly accrue from such action will be the purification of the heart.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.10।। दो पूर्ववर्ती श्लोकों में वर्णित ज्ञान ब्रह्म स्वरूप में रमे हुए तत्त्ववित् पुरुषों के लिये सत्य हो सकता है परन्तु निरहंकार और अनासक्ति का जीवन सर्व सामान्य जनों के लिये सुलभ नहीं होता। पूर्णत्व के साधकों को यही कठिनाई आती है। जो साधकगण गीता ज्ञान को जीना चाहते हैं और न कि तत्प्रतिपादित सिद्धान्तों की केवल चर्चा करना उनकी यही समस्या होती है कि किस प्रकार वे अहंकार का त्याग करें। इस समस्या का निराकरण विचाराधीन श्लोक में किया गया है जिसके द्वारा कोई भी अनासक्त जीवन व्यतीत कर सकता है। ब्रह्म में अर्पण करके मन का पूर्णतया अनासक्त होना असंभव है और यही तथ्य साधक लोग नहीं जानते। जब तक मन का अस्तित्त्व रहेगा तब तक वह किसीनकिसी वस्तु के साथ आसक्त रहेगा। इसलिये परमार्थ सत्य को पहचान कर उसके साथ तादात्म्य रखने का प्रयत्न करना ही मिथ्या वस्तुओं के साथ की आसक्ति को त्यागने का एकमात्र उपाय है। इस मनोवैज्ञानिक सत्य को दर्शाते हुए भगवान् उपदेश देते हैं कि सभी साधकों को ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करने चाहिये। किसी आदर्श के निरन्तर स्मरण का अर्थ है मनुष्य का तत्स्वरूप ही बन जाना। जैसे अज्ञानदशा में हमें अहंकार का अखण्ड स्मरण बना रहता है वैसे ही ईश्वर का निरन्तर स्मरण रहने पर अहंकार का त्याग संभव हो सकता है। ईश्वर के अखण्ड चिन्तन से हम जीवभाव से ऊपर उठकर ईश्वर के साथ एकत्व का अनुभव कर सकते हैं।संक्षेप में आज हम जीवभाव में स्थित आत्मा हैं गीता का आह्वान है कि हम आत्मभाव में स्थित जीव बन जायें।एक बार अपने शुद्ध स्वरूप की पहचान हो जाने पर शरीर मन और बुद्धि के द्वारा किये गये कर्म किसी प्रकार की वासना उत्पन्न नहीं कर सकते। पाप और पुण्य कर्तृत्वाभिमानी जीव के लिये हैं आत्मा के लिये कदापि नहीं। दर्पण के कारण दिखाई दे रहे मेरे प्रतिबिम्ब की कुरूपता मेरी नहीं कही जा सकती। प्रतिबिम्ब का विकृत होना दर्पण की सतह के उत्तल या अवतल होने पर निर्भर करता है। इसी प्रकार पाप और पुण्य का बन्धन जीव को ही स्वकर्मानुसार होता है।आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् ज्ञानी पुरुष देहादि उपाधियों के साथ विषयों के मध्य उसी प्रकार रहता है जैसे कमल का पत्ता जल में। यद्यपि कमल की उत्पत्ति पोषण स्थिति और नाश भी जल में ही होता है तथापि कमल पत्र जल से सदा अस्पर्शित रहता है। जल उसे गीला नहीं कर पाता। उसी प्रकार ही एक ज्ञानी सन्त पुरुष अन्य मनुष्यों के समान जगत् में निवास करता हुआ समस्त व्यवहार करता है और फिर भी पाप पुण्य रागद्वेष सुन्दरता कुरूपता आदि से कभी भी लिप्त नहीं होता।सामान्य कर्म को कर्मयोग में परिवर्तित करने के दो उपाय हैं (1) कर्तृत्व का त्याग और (2) फलासक्ति का त्याग। यहां प्रथम उपाय का वर्णन किया गया है। यह कोई अपरिचित नवीन या विचित्र सिद्धांत नहीं है। इसका हमें अपने जीवन में अनेक अवसरों पर अनुभव भी होता है। एक चिकित्सक आसक्ति के कारण अपनी पत्नी की शल्य क्रिया (आपरेशन) करने में स्वयं को असमर्थ पाता है परन्तु वही चिकित्सक उसी दिन उसी शल्य क्रिया को किसी अन्य रोगी पर कुशलतापूर्वक कर सकता है क्योंकि उस रोगी के साथ उसकी कोई आसक्ति नहीं होती।यदि मनुष्य स्वयं को ईश्वर का प्रतिनिधि अथवा सेवक समझकर कार्य करे तो वह स्वयं में ही उस प्रचण्ड सार्मथ्य एवं कार्यकुशलता को पायेगा जिन्हें वह वर्तमान में कर्तृत्वाभिमान के कारण व्यर्थ में खोये दे रहा है।इसलिये

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.10।।एवं तत्त्वविदो लौकिककर्मणा मुधा चेष्टामात्रेण लेपो नास्तीत्युक्तं इदानीमतत्त्वविविदो मुमुक्षोः का गतिरित्यपेक्षायामाह ब्रह्मणीति। ब्रह्मणि परमेश्वरे भृत्यइव स्वामिने तदर्थं करोमीति समर्प्य मोक्षेऽपि फले सङ्गं त्यक्त्वा यः सर्वाणि कर्माणि करोति सोऽम्भसा पद्मपत्रमिव पापेन न संबध्यते। मुमुक्षुं प्रति पुण्यस्यापि प्रतिबन्धकत्वात्पापेनेत्युक्तं इतरे तु विद्वत्परत्वेनैवं श्लोकं योजयन्ति। तथाहि तत्त्वविदो यो लोपः स किंस्वाभाविकेन्द्रियशरीरचेष्टाजन्य उत वैधेन्द्रियादिचेष्टाजन्यः। आद्यंप्रति द्वाभ्यामुक्त्वा द्वितीयं प्रत्याह ब्रह्मणीति। स किंवा तत्तत्कर्मजन्यसुकृतापूर्वलक्षणः किंवातत्तत्कर्मोपयोग्यर्थप्रतिग्रहादिजन्यदुरितापूर्वलक्षणः। नाद्य प्रत्याह ब्रह्मणीत्यादि। ब्रह्मार्पणबुद्य्धा क्रियमाणेषु कर्मसु नापूर्वोत्पत्तिरिति भावः। न द्वितीय इत्याह सङगंत्यक्त्वेति। सङ्गमैहिकधनादिफलासङगं ततश्च न दुरितापूर्वोत्पत्तिरिति भावः। तद्विचार्यम्। बह्यार्पणबुद्य्धा कर्मकरणेऽतत्त्वविदो मुमुक्षोरेवाधिकारादन्यथानन्तरश्लोकेनासंगत्यापत्तेः। ननु कानि चेदृशानि कर्माणि यानि धनार्जनतया विनानुष्ठातुं शक्यानि सन्ति सत्त्वविशुद्धये भवन्तीत्याशङ्कां परिहरन् कर्मयोगानुष्ठाने शिष्टाचारं प्रमाणयति कायेनेतीति स्वपरग्रन्थविरोधाच्च। अवशिष्टं तु भाष्यानुरोधेनोपादेयं मोक्षफले सर्वफलानामन्तर्भावेन तदासक्तिवारणेन भाष्यकारैः सर्वफलासक्तेर्वारितत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.10।।तर्ह्यविद्वान्कर्तृत्वाभिमानाल्लिप्येतैव तथाच कथं तस्य संन्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठा स्यादिति तत्राह ब्रह्मणि परमेश्वरे आधाय समर्प्य सङ्गं फलाभिलाषं त्यक्त्वेश्वरार्थं भृत्यइव स्वाम्यर्थं स्वफलनिरपेक्षतया करोमीत्यभिप्रायेण कर्माणि लौकिकानि वैदिकानि च करोति यो लिप्यते न स पापेन पापपुण्यात्मकेन कर्मणेति यावत्। यथा पद्मपत्रमुपरि प्रक्षिप्तेनाम्भसा न लिप्यते तद्वद्भगवदर्पणबुद्ध्यानुष्ठितं कर्म बुद्धिशुद्धिफलमेव स्यात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.10।।ब्रह्मणीति। यतो विद्वानसङ्गत्वात्कुर्वन्नपि न लिप्यते तस्मादविद्वानपि ब्रह्मणि सर्वान्तर्यामिणि कर्माण्याधाय अयमेव कारयिता नत्वहं कर्तेति समर्प्य यः कर्माणि करोति सः पापेन न लिप्यतेऽम्भसा पद्मपत्रमिव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.10।।ब्रह्मणि पुरुषोत्तमे सङ्गं आधाय संयोगावस्थायां स्थित्वा सङ्गं त्यक्त्वा वा विप्रयोगावस्थायां स्थित्वा कर्माण्यपि यः करोति स तेन न लिप्यते। तत्र दृष्टान्तमाह पद्मपत्रमिवेति। अम्भसा पद्मपत्रमिव। जले तिष्ठन्नपि तद्यथा न लिप्तं भवति तथेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.10।।तर्हि यस्य करोमीत्यभिमानोऽस्ति तस्य कर्मलेपो दुर्वारः अविशुद्धचित्तत्वात्संन्यासोऽपि नास्तीति महत्संकटमापन्नमित्याशङ्क्याह ब्रह्मणीति। ब्रह्मण्याधाय परमेश्वरे समर्प्य तत्फले च सङ्गं त्यक्त्वा यः कर्माणि करोति असौ पापेन बन्धहेतुतया पापिष्ठेन पुण्यपापात्मकेन कर्मणा न लिप्यते। यथा पद्मपत्रमम्भसि स्थितमप्यम्भसा न लिप्यते तद्वत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.10।।न चायं मुनिः केवलं साङ्ख्यमार्गीयः कर्मसन्न्यासाभावात् किन्तु योगमार्गीयस्तत्त्ववित् कर्मकरणादिति विवेचयति ब्रह्मणीति। अत्र ब्रह्मपदं ब्रह्मयज्ञविषयबोधकं तत्रैव च कर्माणि स्वेनैव क्रियमाणानि अनुसन्धायेति क्रियाद्वैतभाव उक्तः। कर्मसु च सङ्गं फलाभिसन्धिं ममतां च त्यक्त्वा यो योगी करोति स तदधिगतः ब्रह्मवित् जीवन्मुक्तः पापेनाकरणप्रत्यवायेन नाश्लिष्टो भवति पद्मपत्रमिवाम्भसा।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.10।।परंतु जो तत्त्वज्ञानी नहीं है और कर्मयोगमें लगा हुआ है ( यानी ) जो स्वामीके लिये कर्म करनेवाले नौकरकी भाँति मैं ईश्वरके लिये करता हूँ इस भावसे सब कर्मोंको ईश्वरमें अर्पण करके यहाँतक कि मोक्षरूप फलकी भी आसक्ति छोड़कर कर्म करता है। वह जैसे कमलका पत्ता जलमें रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता वैसे ही पापोंसे लिप्त नहीं होता।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.10।। व्याख्या   ब्रह्मण्याधाय कर्माणि शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदि सब भगवान्के ही हैं अपने हैं ही नहीं अतः इनके द्वारा होनेवाली क्रियाओँको भक्तियोगी अपनी कैसे मान सकता है इसलिये उसका यह भाव रहता है कि मात्र क्रियाएँ भगवान्के द्वारा ही हो रही हैं और भगवान्के लिये ही हो रही हैं मैं तो निमित्तमात्र हूँ।भगवान् ही अपनी इन्द्रियोंके द्वारा आप ही सम्पूर्ण क्रियाएँ करते हैं इस बातको ठीकठीक धारण करके सम्पूर्ण क्रियाओंके कर्तापनको भगवान्में ही मानना यही उपर्युक्त पदोंका अर्थ है।शरीरादि वस्तुएँ अपनी हैं ही नहीं प्रत्युत मिली हुई हैं और बिछुड़ रही हैं। ये केवल भगवान्के नाते भगवत्प्रीत्यर्थ दूसरोंकी सेवा करनेके लिये मिली हैं। इन वस्तुओँपर हमारा स्वतन्त्र अधिकार नहीं है अर्थात् इनको अपने इच्छानुसार न तो रख सकते हैं न बदल सकते हैं और न मरनेपर साथ ही ले जा सकते हैं। इसलिये इन शरीरादिको तथा इनसे होनेवाली क्रियाओँको अपनी मानना ईमानदारी नहीं है। अतः मनुष्यको ईमानदारीके साथ जिसकी ये वस्तुएँ हैं उसीकी अर्थात् भगवान्की मान लेनी चाहिये।सम्पूर्ण क्रियाओँ और पदार्थोंको कर्मयोगी संसार के ज्ञानयोगी प्रकृति के और भक्तियोगी भगवान् के अर्पण करता है। प्रकृति और संसार दोनोंके ही स्वामी भगवान् हैं। अतः क्रियाओँ और पदार्थोंको भगवान्के अर्पण करना ही श्रेष्ठ है।सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः किसी भी प्राणी पदार्थ शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण क्रिया आदिमें किञ्चिन्मात्र भी राग खिंचाव आकर्षण लगाव महत्त्व ममता कामना आदिका न रहना ही आसक्तिका सर्वथा त्याग करना है।शास्त्रीय दृष्टिसे अज्ञान जन्ममरणका हेतु होते हुए भी साधनकी दृष्टिसे राग ही जन्ममरणका मुख्य हेतु है कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। रागपर ही अज्ञान टिका हुआ है इसलिये राग मिटनेपर अज्ञान भी मिट जाता है। इस राग या आसक्तिसे ही कामना पैदा होती है सङ्गात्संजायते कामः (गीता 2। 62)। कामना ही सम्पूर्ण पापोंकी जड़ है (गीता 3। 37)। इसलिये यहाँ पापोंके मूल कारण आसक्तिका त्याग करनेकी बात आयी है क्योंकि इसके रहते मनुष्य पापोंसे बच नहीं सकता और इसके न रहनेसे मनुष्य पापोंसे लिप्त नहीं होता।किसी भी क्रियाको करते समय क्रियाजन्य सुख लेनेसे तथा उसके फलमें आसक्त रहनेसे उस क्रियाका सम्बन्ध छूटता नहीं प्रत्युत छूटनेकी अपेक्षा और बढ़ता है। किसी भी छोटी या बड़ी क्रियाके फलरूपमें कोई वस्तु चाहना ही आसक्ति नहीं है प्रत्युत क्रिया करते समय भी अपनेमें महत्त्वका अच्छेपनका आरोप करना और दूसरोंसे अच्छा कहलवानेका भाव रखना भी आसक्ति ही है। इसलिये अपने लिये कुछ भी नहीं करना है। जिस कर्मसे अपने लिये किसी प्रकारका किञ्चिन्मात्र भी सुख पानेकी इच्छा है वह कर्म अपने लिये हो जाता है। अपनी सुखसुविधा और सम्मानकी इच्छाका सर्वथा त्याग करके कर्म करना ही उपर्युक्त पदोंका अभिप्राय है।लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा यह कितनी विशेष बात है कि भगवान्के सम्मुख होकर भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण भगवदर्थ कर्म करते हुए भी कर्मोंसे नहीं बँधता जैसे कमलका पत्ता जलमें उत्पन्न होकर और जलमें रहकर भी जलसे निर्लिप्त रहता है ऐसे ही भक्तियोगी संसारमें रहकर सम्पूर्ण क्रियाएँ करनेपर भी भगवान्के सम्मुख होनेके कारण संसारमें सर्वदासर्वथा निर्लिप्त रहता है।भगवान्से विमुख होकर संसारकी कामना करना ही सब पापोंका मुख्य हेतु है। कामना आसक्तिसे उत्पन्न होती है। आसक्तिका सर्वथा अभाव होनेसे कामना नहीं रह सकती इसलिये पाप होनेकी सम्भावना ही नहीं रहती।धुएँसे अग्निकी तरह सभी कर्म किसीनकिसी दोषसे युक्त होते हैं (गीता 18। 48)। परन्तु जिसने आशा कामना आसक्तिका त्याग कर दिया है उसे ये दोष नहीं लगते। आसक्तिरहित होकर भगवदर्थ कर्म करनेके प्रभावसे सम्पूर्ण संचित पाप विलीन हो जाते हैं (गीता 9। 27 28)। अतः भक्तियोगीका किसी प्रकारसे भी पापसे सम्बन्ध नहीं रहता।यहाँ पापेन पद कर्मोंसे होनेवाले उस पापपुण्यरूप फलका वाचक है जो आगामी जन्मारम्भमें कारण होता है। भक्तियोगी उस पापपुण्यरूप फलसे कभी लिप्त नहीं होता अर्थात् बँधता नहीं। इसी बातको नवें अध्यायके अट्ठाईसवें श्लोकमें शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः पदोंसे कहा गया है। सम्बन्ध   अब भगवान् कर्मयोगीके कर्म करनेकी शैली बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.7 5.11।।योगयुक्त इत्यादि आत्मसिद्धये इत्यन्तम्। सर्वभूतानामात्मभूतः आत्मा यस्य स सर्वमपि कुर्वाणो न लिप्यते अकरणप्रतिषेधारूढत्वात्। अत एव दर्शनादीनि कुर्वन्नपि असौ एवं धारयति प्रतिपत्तिदार्ढ्येन निश्चिनुते चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां यदि स्वविषयेषु प्रवृत्तिः मम किमायातम् न हि अन्यस्यकृतेनापरस्य (S अन्यस्य कृतेनान्यस्य अन्यकृतेन परस्य) लेपः इति। तदेव ब्रह्मणि कर्मणां समर्पणम्। अत्र चिह्नम् अस्य गतसङ्गता। अतो न लिप्यते। योगिनश्च केवलैः सङ्गरहितैः परस्परानपेक्षिभिश्च कायादिभिः कुर्वन्ति कर्माणि सङ्गाभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.10।।तर्हि विद्वानिवाविद्वानपि कर्मणि न प्रवर्तेत पापोपहतिसंभवादित्याशङ्क्याह यस्त्विति। यथा भृत्यः स्वाम्यर्थं कर्माणि करोति न स्वफलमपेक्षते तथैव यो विद्वान्मोक्षेऽपि सङ्गं त्यक्त्वा भगवदर्थमेव सर्वाणि कर्माणि करोति न स स्वकर्मणा बध्यते। नहि पद्मपत्रमम्भसा संबध्यते तद्वदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.10।।ननुयोगयुक्तः 7।5 इत्यनेन यत्सन्न्यासयोगयुक्तस्य कर्मालेपलक्षणं फलमुक्तं तदेव तस्यब्रह्मण्याधाय इति किमर्थं पुनरुच्यते इत्यत आह सन्न्यासेति। प्रागुक्तस्यैव नियमोऽत्र क्रियते। सिद्धे सत्यारम्भस्य नियमार्थत्वादिति भावः। योगविवरणं च किञ्चिदधिकमिति चार्थः। ननु सन्न्यासस्त्वित्यनेनैव सन्न्यासयोगौ मिलितावेव फलं साधयत इति नियमोऽपि लब्ध एव तत्किमर्थमिदं सन्न्यासयोगयुक्तस्यकुर्वन्नपि न

Chapter 5 (Part 7)

लिप्यते 5।7लिप्यते न स पापेन इति पुनः पुनः फलकथनं इत्यत आह साधनेति। साधननियमस्येति तदुक्तेरित्यर्थः। सन्न्यासयोगौ मिलितावेव फलसाधनमिति नियमोक्तेरुपचारत्वमपि सम्भवति लोकवत्। तन्निवृत्त्यर्थमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.10।।सन्न्यासयोगयुक्त एव च कर्मणा न लिप्यत इत्याह ब्रह्मणीति। साधननियमस्योपचारत्वव्यावृत्त्यर्थं पुनः पुनः फलकथनम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.10।।ब्रह्मशब्देन प्रकृतिः इह उच्यतेमम योनिर्महद्ब्रह्म (गीता 14।3) इति हि वक्ष्यते। इन्द्रियाणां प्रकृतिपरिणामविशेषरूपत्वेन इन्द्रियाकारेण अवस्थितायां प्रकृतौपश्यन् श्रृण्वन् इत्यादिना उक्तप्रकारेण कर्मणि आधाय फलसङ्गं त्यक्त्वानैव किञ्चित् करोमि इति यः कर्माणि करोति स प्रकृतिसंसृष्टतया वर्तमानः अपि प्रकृत्यात्माभिमानरूपेण सम्बन्धहेतुना पापेन न लिप्यते पद्मपत्रमिवाम्भसा यथा पद्मपत्रम् अम्भसा संसृष्टम् अपि न लिप्यते तथा न लिप्यते इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.10।। ब्रह्मणि ईश्वरे आधाय निक्षिप्य तदर्थं कर्म करोमि इति भृत्य इव स्वाम्यर्थं सर्वाणि कर्माणि मोक्षेऽपि फले सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः सर्वकर्माणि लिप्यते न स पापेन न संबध्यते पद्मपत्रमिव अम्भसा उदकेन। केवलं सत्त्वशुद्धिमात्रमेव फलं तस्य कर्मणः स्यात्।।यस्मात्

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【 Verse 5.11 】

▸ Sanskrit Sloka: कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि | योगिन: कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये ||

▸ Transliteration: kāyena manasā buddhyā kevalairindriyairapi | yoginaḥ karma kurvanti saṅgaṁ tyaktvātmaśuddhaye ||

▸ Glossary: kāyena: by the body; manasā: by the mind; buddhyā: by the intellect; kevalaiḥ: only; indriyaiḥ: by the senses; api also: yoginaḥ: yogis; karma: action; kurvanti: perform; saṅgaṁ: attachment; tyaktvā; having abandoned; ātmaśuddhaye: for the purification of the self

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.11 The yogis, giving up attachment, act with the body, mind, intelligence, even with the senses for the purpose of self-purification.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.11।।कर्मयोगी आसक्तिका त्याग करके केवल (ममतारहित) इन्द्रियाँशरीरमनबुद्धिके द्वारा अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये ही कर्म करते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.11।। योगीजन शरीर मन बुद्धि और इन्द्रियों द्वारा आसक्ति को त्याग कर आत्मशुद्धि (चित्तशुद्धि) के लिए कर्म करते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.11 कायेन by the body? मनसा by the mind? बुद्ध्या by the intellect? केवलैः only? इन्द्रियैः by the senses? अपि also? योगिनः Yogis? कर्म action? कुर्वन्ति perform? सङ्गम् attachment? त्यक्त्वा having abandoned? आत्मशुद्धये for the purification of the self. Commentary Yogis here means Karma Yogis who are devoted to the path of action? who are free from egoism and selfishness? who work for the purification of their hearts without the least attachment to the fruits or results of their actions? and who dedicate all actions to the Lord as their offerings.Kevalam only by (free from egoism and selfishness) applies to the body? mind? intellect and the senses.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.11. Having given up attachment, the men of Yoga perform action, just with the body, with the mind, with intellect and also with sense-organs, for attaining the Self.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.11 The sage performs his action dispassionately, using his body, mind and intellect, and even his senses, always as a means of purification.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.11 Merely witth the body, the mind, the intellect and the senses, Yogins do actions, renouncing attachment, for the purification of the self.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.11 By giving up attachment, the yogis undertake work merely through the body, mind, intellect and even the organs, for the purification of themselves.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.11 Yogis, having abandoned attachment, perform actions only by the body, mind, intellect, and even by the senses, for the purification of the self.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.7-11 Yogayuktah etc. upto atma-siddhaye. He, whose (by whom) Self is [realised to be] the Self of all beings, is not stained, eventhough he performs all [sorts of] actions. For, he has undertaken neither what is enjoined nor what is prohibited. Hence, even while performing actions such as seeing and the like, he bears in mind, -i.e., he resolves with [all] firmness of observation, - that 'If the sense-organs like eyes etc., function on their respective objects, what does it matter for me ? Indeed one is not stained by what another does'. This act is nothing but dedicating one's actions to the Brahman. In this regard the characteristic mark is his detachment. Due to that he is not stained. Because they do not have attachment, the men of Yoga perform actions only with their body etc., that are freed from attachment and do not depend on each other.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.11 Renouncing attachment to heaven etc., the Yogins perform actions accomplishable by the body, the mind and the intellect for the purification of themselves, i.e., for annulling the bonds of his previous Karma which have afected the self and which involve the self in Samsara.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.11 Since tyaktva, by giving up sangam, attachment with regard to results; yoginah, the yogis, men of action; kurvanti, undertake; karma, work; kevalaih, merely- this word is to be construed with each of the words, body etc., so as to deny the idea of ownership with regard to all actions-; kayena, through the body; manasa, through the mind; buddhya, through the intellect; and api, even; indriyaih, through the organs, which are devoid of the idea of ownership, which are unassociated with ownership thus: 'I act only for God, and not for my gain'; atmasudhaye, for the purification of themselves, i.e., for the purification of the heart, therefore you have competence only for that. So you undertake action alone. And also since,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.11।। कर्मयोगी का प्रयत्न यह होता है कि अपने स्वरूप में ही रहकर स्वयं के अन्तर्बाह्य घटित हो रही घटनाओं को उनके साथ तादात्म्य किये बिना केवल साक्षी भाव से देखे। कुछ काल तक इसका अभ्यास करने पर उसे यह स्पष्टतया ज्ञात होगा कि समस्त कर्म उपाधियों के द्वारा किये जाते हैं और साक्षी के साथ उनका कोई सम्बन्ध नहीं होता। तथापि उसको इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यह साक्षित्व अथवा साक्षी स्वयं पारमार्थिक सत्य नहीं है वरन् बुद्धि की खिड़की में से झांकता हुआ परम सत्य यह साक्षी है। हमारा अनुभव है कि हम स्वयं को कार्यरत देखते हैं तब हमें इस देखने वाले साक्षी का भी भान होता है। शुद्ध चैतन्यस्वरूप आत्मतत्त्व वह है जो इस उपर्युक्त द्रष्टा को भी प्रकाशित करता है यह उपनिषदों की घोषणा है।यदि परम सत्य साक्षित्व से भी परे है तो कर्मयोगी को इस साक्षीभाव का अभ्यास क्यों करना चाहिये इसका उत्तर है आत्मविशुद्धये अर्थात् अन्तकरण की शुद्धि के लिए। साक्षीभाव से कर्म करने पर स्वाभाविक ही अहंकार का त्याग होकर पूर्व संचित वासनाओं का क्षय हो जायेगा। जितनी अधिक मात्रा में वासना निवृत्ति होगी उतना ही शुद्ध और स्थिर अन्तकरण होगा जिसमें परमात्मा की अनुभूति स्पष्ट रूप से होगी।निम्नलिखित कारण से भी कर्मयोगी अनासक्त भाव से कर्म करता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.11।।यस्मात्कायेन केवलेनाहंभावममभाविवर्जितेन तथा केवलेन मनसा केवलया बुद्य्धा केवलैरिन्द्रियैरपि कर्मयोगिनः कर्म कुर्वन्ति। केवलैरितिपदं मनसेत्यनेन वचनस्य कायेन बुद्य्धेत्याभ्यां लिङ्गवचनयोर्व्यत्ययेन योजनीयम्। अत्रापरे केवलपदव्यावर्त्यं धनादि वर्णयन्ति। तथाहि केवलवाचालब्धधनादिलाभानपेक्षितता ततश्च केवलेन कायेन स्त्रानशौचद्विजोच्छिष्टमार्जनादीनि कर्माणि योगिनः कुर्वन्ति नतु तेषामतीतकालता नापि कदाचिद्धनापेक्षेति भावः। तथा केवलेन मनसा जगदीशध्यानं यथाशक्ति परोपकारसंकल्पनादीनि च कर्णाभ्यामुत्तमश्लेकजन्मकर्माकर्णनादीनि रसनया तीर्थनैवेद्यास्वादनादीनि घ्राणेन तदुपभुक्तमाल्यामोदग्रहणादीनि त्वचा पुण्यतीर्थोदकस्पर्शादीनि पद्य्भां तीर्थाटनादीनि हस्ताभ्यां परेशपूजादीनि वाचा स्तुत्यादीनि च कुर्वन्ति सङ्गं धनादिफलासङ्गं त्यक्त्वेति तैर्मानसादिकर्माणि धनाद्यपेक्षाऽप्रसक्तेस्तत्रापि स्वेन संबन्धितस्य केवलपदस्य वैयर्थ्य परिहर्तव्यम्। तस्मात्सर्वव्यापारेषु ममतावर्जिता योगिनः कर्म कुर्वन्ति। सङ्गं त्यक्त्वा फलविषयमात्मशुद्धये सत्त्वशुद्धय इत्यर्थ इति भाष्यमेव रमणीयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.11।।तदेव विवृणोति कायेन मनसा बुद्ध्येन्द्रियैरपि योगिनः कर्मिणः फलसङ्गं त्यक्त्त्वा कर्म कुर्वन्ति। कायादीनां सर्वेषां विशेषणं केवलैरिति। ईश्वरायैव करोमि न मम फलायेति ममताशून्यैरित्यर्थः। आत्मशुद्धये चित्तसत्त्वशुद्ध्यर्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.11।।कायेनेति। केवलैरिति विपरिणामेन सर्वत्र संबन्धनीयम्। केवलेन कायेन अहमयं ब्राह्मणो युवेत्यात्माध्यासशून्येन। एवमन्यत्रापि सङ्गं त्यक्त्वा देहादिभ्यो विविक्तेऽपि आत्मनि तार्किकादिवदहं करोमीत्यभिनिवेशं त्यक्त्वा योगिनः कर्म कुर्वन्ति। आत्मशुद्धये चित्तशुद्ध्यर्थम्। तस्मात्तवापि तत्रैवाधिकारोऽस्तीति तदेव त्वं कुरु।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.11।।नन्वेतत्सिद्धदशायामुक्तं साधनदशायां तत्करणे कथं न लेपः स्यात् इत्याशङ्क्याह कायेनेति। कायेन देहेन भावस्वरूपरहितेन अधिष्ठानात्मकेन तादृशेनैव मनसा केवलैरिन्द्रियैराध्यात्मिकैर्बुद्ध्यापि तत्प्राप्ति रूपेच्छया आत्मशुद्धये भावस्वरूपप्राप्त्यर्थं योगिनः संयोगात्मकसाधनवन्तः सङ्गं कर्मफलं त्यक्त्वा कर्म भगवदिच्छया कर्तव्यात्मकत्वेन कुर्वन्ति। साधनदशायामपि भगवदिच्छां ज्ञात्वा फलाभावेन कृतं कर्म न बन्धकं भवतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.11।।बन्धकत्वाभावमुक्त्वा मोक्षहेतुत्वं सदाचारेण दर्शयति कायेनेति। कायेन स्नानादि बुद्ध्या तत्त्वनिश्चयादि केवलैः कर्माभिनिवेशरहितैरिन्द्रियैश्च श्रवणकीर्तनादिलक्षणं कर्म फलसङ्गं त्यक्त्वा चित्तशुद्धये योगिनः कर्म कुर्वन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.11।।अत्र सदाचारं प्रमाणयति कायेनेति। कायेनाऽऽसनादिना मनसा ध्यानादिना बुद्ध्या तत्त्वनिश्चयादिना अभिनिवेशरहितैरिन्द्रियैः शुद्धं श्रवणदर्शनकीर्त्तनादिलक्षणं कर्म नारदादयः सङ्गं त्यक्त्वा आत्मनः शुद्धये समत्वाय कुर्वन्ति। अतो ये केवलं साङ्ख्यास्ते कर्मसन्न्यासं सिद्धान्ततयाऽभ्युपगच्छन्ति। ये च योगिनस्ते कर्मकरणमेवेति फलितम्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.11।।उसके कर्मोंका फल तो केवल अन्तःकरणकी शुद्धिमात्र ही होता है क्योंकि योगी लोग केवल यानी मैं सब कर्म ईश्वरके लिये ही करता हूँ अपने फलके लिये नहीं। इस भावसे जिनमें ममत्वबुद्धि नहीं रही है ऐसे शरीर मन बुद्धि और इन्द्रियोंसे फलविषयक आसक्तिको छोड़कर आत्मशुद्धिके लिये अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये कर्म करते हैं। सभी क्रियाओंमें ममताका निषेध करनेके लिये केवल शब्दका काया आदि सभी शब्दोंके साथ सम्बन्ध है। तेरा भी उसीमें अधिकार है इसलिये तू भी कर्म ही कर।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.11।। व्याख्या   योगिनः यहाँ योगिनः पद कर्मयोगीके लिये आया है। जो योगी भगवदर्पणबुद्धिसे कर्म करते हैं वे भक्तियोगी कहलाते हैं। परन्तु जो योगी केवल संसारकी सेवा के लिये निष्कामभावपूर्वक कर्म करते हैं वे कर्मयोगी कहलाते हैं। कर्मयोगी अपने कहलानेवाले शरीर इन्द्रियाँ मन आदिसे कर्म करते हुए भी उन्हें अपना नहीं मानता प्रत्युत संसारका ही मानता है। कारण कि शरीरादिकी संसारके साथ एकता है।कायेन मनसा बुद्ध्या केवलैरिन्द्रियैरपि जिनको साधारण मनुष्य अपनी मानते हैं वे शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धि वास्तवमें किसी भी दृष्टिसे अपनी नहीं हैं प्रत्युत अपनेको मिली हुई हैं और बिछुड़नेवाली हैं। इनको अपनी मानना सर्वथा भूल है। इन सबकी संसारके साथ स्वतःसिद्ध एकता है।विचारपूर्वक देखा जाय तो शरीरादि पदार्थ किसी भी दृष्टिसे अपने नहीं हैं। मालिककी दृष्टिसे देखें तो ये भगवान्के हैं कारणकी दृष्टिसे देखें तो ये प्रकृति हैं और कार्यकी दृष्टिसे देखें तो ये संसारके (संसारसे अभिन्न) हैं। इस प्रकार किसी भी दृष्टिसे इनको अपना मानना इनमें ममता रखना भूल है। ममताको सर्वथा मिटानेके लिये ही यहाँ केवलैः पद प्रयुक्त हुआ है।यहाँ केवलैः पद बहुवचन होनेसे इन्द्रियोंका ही विशेषण है परन्तु इन्द्रियोंसे ही ममता हटानेके लिये कहा जाय शरीरमनबुद्धिसे नहीं ऐसा सम्भव नहीं है। शरीरादिका सम्बन्ध समष्टि संसारके साथ है। व्यष्टि कभी समष्टिसे अलग नहीं हो सकती। इसलिये व्यष्टि(शरीरादि) से सम्बन्ध जोड़नेपर समष्टि(संसार) से स्वतः सम्बन्ध जुड़ जाता है। जैसे लड़कीसे विवाह होनेपर अर्थात् सम्बन्ध जुड़नेपर सास ससुर आदि ससुरालके सभी सम्बन्धियोंसे अपनेआप सम्बन्ध जुड़ जाता है ऐसे ही संसारकी किसी भी वस्तु(शरीरादि) से सम्बन्ध जुड़नेपर अर्थात् उसे अपनी माननेपर पूरे संसारसे अपनेआप सम्बन्ध जुड़ जाता है। अतः यहाँ केवलैः पद शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धि सबमें ही साधकको ममता हटानेकी प्रेरणा करता है (टिप्पणी प0 295.1)।वास्तवमें कर्ताका स्वयं निर्मम होना ही आवश्यक है। यदि कर्ता स्वयं निर्मम हो तो शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि सब जगहसे ममता सर्वथा मिट जाती है। कारण कि वास्तवमें शरीर इन्द्रियाँ आदि स्वरूपसे सर्वथा भिन्न हैं अतः इनमें ममता केवल मानी हुई है वास्तवमें है नहीं।कर्मयोगकी साधनामें फलकी इच्छाका त्याग मुख्य है। (गीता 5। 12)। साधारण लोग फलप्राप्तिके लिये कर्म करते हैं पर कर्मयोगी फलकी आसक्तिको मिटानेके लिये कर्म करता है। परन्तु जो शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिको अपना मानता रहता है वह फलकी इच्छाका त्याग कर ही नहीं सकता (टिप्पणी प0 295.2)। कारण कि उसका ऐसा भाव रहता है कि शरीरादि अपने हैं तो उनके द्वारा किये गये कर्मोंका फल भी अपनेको मिलना चाहिये। इस प्रकार शरीरादिको अपना माननेसे स्वतः फलकी इच्छा उत्पन्न होती है। इसलिये फलकी इच्छाको मिटानेके लिये शरीरादिको कभी भी अपना न मानना अत्यन्त आवश्यक है।केवलैः पदका तात्पर्य है कि जैसे वर्षा बरसती है और उससे लोगोंका हित होता है परन्तु उसमें ऐसा भाव नहीं होता कि मैं बरसती हूँ मेरी वर्षा है कि जिससे दूसरोंका हित होगा दूसरोंको सुख होगा। ऐसे हीइन्द्रियों आदिके द्वारा होनेवाले हितमें भी अपनापन मालूम न दे। परन्तु शरीर मन बुद्धि इन्द्रियोंके द्वारा किसीका अभीष्ट हो गया किसीकी मनचाही बात हो गयी इन क्रियाओँको लेकर अपने मनमें खुशी आती है तो मन बुद्धि आदिमें केवलपना नहीं रहा प्रत्युत उनके साथ सम्बन्ध जुड़ गया ममता हो गयी।सङ्गं त्यक्त्वात्मशुद्धये पीछे दसवें श्लोकमें भी सङ्गं त्यक्त्वा पद आये हैं अतः इनकी व्याख्या वहीं देखनी चाहिये।साधारणतः मल विक्षेप और आवरणदोषके दूर होनेको अन्तःकरणकी शुद्धि माना जाता है। परन्तु वास्तवमें अन्तःकरणकी शुद्धि है शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिसे ममताका सर्वथा मिट जाना। शरीरादि कभी नहीं कहते कि हम तुम्हारे हैं और तुम हमारे हो। हम ही उनको अपना मान लेते हैं। उनको अपना मानना ही अशुद्धि है ममता मल जरि जाइ (मानस 7। 117 क)। अतः शरीरादिके प्रति अहंताममतापूर्वक माने गये सम्बन्धका सर्वथा अभाव ही आत्मशुद्धि है।इस श्लोकमें आये केवलैः पदसे शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिको अपना न माननेकी बात आयी है अर्थात् वहाँ केवलैः पदमें अपनापन हटानेका उद्देश्य है और यहाँ आत्मशुद्धये पदमें अपनापन सर्वथा हटनेकी बात आयी है। तात्पर्य यह है कि अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये (अपनापन सर्वथा हटानेके उद्देश्यसे) शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिको अपना न माननेपर भी इनमें सूक्ष्म अपनापन रह जाता है। उस सूक्ष्म अपनेपनका सर्वथा मिटना ही आत्मशुद्धि अर्थात् अन्तःकरणकी शुद्धि है।अहंतामें भी ममता रहती है। ममता सर्वथा मिटनेपर जब अहंतामें भी ममता नहीं रहती तब सर्वथा शुद्धि हो जाती है।कर्म कुर्वन्ति शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिमें जो सूक्ष्म अपनापन रह जाता है उसे सर्वथा दूर करनेके लिये कर्मयोगी कर्म करते हैं।जबतक मनुष्य कर्म करते हुए अपने लिये किसी प्रकारका सुख चाहता है अर्थात् किसी फलकी इच्छा रखता है और शरीर इन्द्रियाँ मन आदि कर्मसामग्रीको अपनी मानता है तबतक वह कर्मबन्धनसे मुक्त नहीं हो सकता। इसलिये कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके और कर्मसामग्रीको अपनी न मानकर केवल दूसरोंके हितके लिये कर्म करता है। कारण कि योगारूढ़ होनेकी इच्छावाले मननशील योगीके लिये (दूसरोंके हितके लिये) कर्म करना ही हेतु कहा जाता है आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते (गीता 6। 3)। इस प्रकार दूसरोंके हितके लिये वह ज्योंज्यों कर्म करता है त्योंहीत्यों ममताआसक्ति मिटती चली जाती है और अन्तःकरणकी शुद्धि होती चली जाती है। सम्बन्ध   अब भगवान् आगेके श्लोकमें अन्वय और व्यतिरेकरीतिसे कर्मयोगकी महिमाका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.7 5.11।।योगयुक्त इत्यादि आत्मसिद्धये इत्यन्तम्। सर्वभूतानामात्मभूतः आत्मा यस्य स सर्वमपि कुर्वाणो न लिप्यते अकरणप्रतिषेधारूढत्वात्। अत एव दर्शनादीनि कुर्वन्नपि असौ एवं धारयति प्रतिपत्तिदार्ढ्येन निश्चिनुते चक्षुरादीनामिन्द्रियाणां यदि स्वविषयेषु प्रवृत्तिः मम किमायातम् न हि अन्यस्य कृतेनापरस्य (S अन्यस्य कृतेनान्यस्य अन्यकृतेन परस्य) लेपः इति। तदेव ब्रह्मणि कर्मणां समर्पणम्। अत्र चिह्नम् अस्य गतसङ्गता। अतो न लिप्यते। योगिनश्च केवलैः सङ्गरहितैः परस्परानपेक्षिभिश्च कायादिभिः कुर्वन्ति कर्माणि सङ्गाभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.11।।अविदुषस्तर्हि कृतेन कर्मणा किं स्यादित्याशङ्क्याह केवलमिति। अज्ञस्येश्वरार्पणबुद्ध्यानुष्ठितं कर्म बुद्धिशुद्धिफलमित्यत्रैव हेतुमाह यस्मादिति। केवलशब्दस्य प्रत्येकं संबन्धे प्रयोजनमाह सर्वव्यापारेष्विति। कर्मणश्चित्तशुद्धिफलत्वे तादर्थ्येन कर्मानुष्ठानमेव तव कर्तव्यमिति यस्मादित्यस्यापेक्षितं वदन्फलितमाह तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.11।।कायेनेत्यनेनापि सन्न्यासयोगयुक्तस्यात्मशुद्धिलक्षणः पापालेष उच्यत इत्यत आह एवं चेति। उभयसमुच्चयरूप एवेत्यर्थः। अन्यत्र तात्पर्यान्न पुनरुक्तिरिति भावः। आचारकथनमपि नियमसमर्थनार्थमिति ज्ञातव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.11।।एवं चाचार इत्याह कायेनेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.11।।कायमनोबुद्धीन्द्रियसाध्यं कर्म स्वर्गादिफलसङ्गं त्यक्त्वा योगिनः आत्मविशुद्धये कुर्वन्ति आत्मगतप्राचीनकर्मबन्धनविनाशाय कुर्वन्ति इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.11।। कायेन देहेन मनसा बुद्ध्या च केवलैः ममत्ववर्जितैः ईश्वरायैव कर्म करोमि न मम फलाय इति ममत्वबुद्धिशून्यैःइन्द्रियैरपि केवलशब्दः कायादिभिरपि प्रत्येकं संबध्यते सर्वव्यापारेषु ममतावर्जनाय। योगिनः कर्मिणः कर्म कुर्वन्ति सङ्गं त्यक्त्वा फलविषयम् आत्मशुद्धये सत्त्वशुद्धये इत्यर्थः। तस्मात् तत्रैव तव अधिकारः इति कुरु कर्मैव।।यस्माच्च

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【 Verse 5.12 】

▸ Sanskrit Sloka: युक्त: कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् | अयुक्त: कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ||

▸ Transliteration: yuktaḥ karmaphalaṁ tyaktvā śāntimāpnoti naiṣṭhikīm | ayuktaḥ kāma-kāreṇa phale sakto nibadhyate ||

▸ Glossary: yuktaḥ: one steadfast in devotion; karma: action; phalaṁ: fruit: tyaktvā: giving up; śāntiṁ: peace; āpnoti: achieves: naiṣṭhikīṁ: established; ayuktaḥ: one not steadfast in devotion; kāmakāreṇa: for enjoying the fruits of the action; phale: fruit; saktaḥ: attached; nibadhyate: becomes entangled

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.12 One who is engaged in devotion, gives up attachment to outcome of one’s actions and is centered, is at peace. One who is not engaged in devotion, attached to the outcome of one’s action becomes entangled.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.12।।कर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.12।। युक्त पुरुष कर्मफल का त्याग करके परम शान्ति को प्राप्त होता है और अयुक्त पुरुष फल में आसक्त हुआ कामना के द्वारा बँधता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.12 युक्तः the united one (the well poised)? कर्मफलम् fruit of action? त्यक्त्वा having abandoned? शान्तिम् peace? आप्नोति attains? नैष्ठिकीम् final? अयुक्तः the nonunited one? कामकारेण impelled by desire? फले in the fruit (of action)? सक्तः attached? निबध्यते is bound.Commentary Santim naishthikim is interpreted as peace born of devotion of steadfastness. The harmonious man who does actions for the sake of the Lord without expectation of the fruit and who says? I do actions for my Lord only? not for my personal gain or profit? attains to the peace born of devotion? through the following four stages? viz.? purity of mind? the attainment of knowledge? renunciation of actions? and steadiness in wisdom. But the unbalanced or the unharmonised man who is led by desire and who is attached to the fruits of the actions and who says? I have done such and such an action I will get such and such a fruit? is firmly bound.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.12. Having abandoned [the attachment for] the fruit of actions, the master of Yoga attains the highest Peace. [But] the person, other than the master of Yoga, attached to the fruit of action, is bound by his action born of desire.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.12 Having abandoned the fruit of action, he wins eternal peace. Others unacquainted with spirituality, led by desire and clinging to the benefit which they think will follow their actions, become entangled in them.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.12 A Yogin, renouncing the fruits of his actions, attains lasting peace. But the unsteady man who is attached to fruits of actions, being impelled by desire, is bound.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.12 Giving up the result of work by becoming resolute in faith, one attains Peace arising from steadfastness. One who is lacking in resolute faith, being attached to the result under the impulsion of desire, becomes bound.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.12 The united one (the well poised or the harmonised) having abandoned the fruit of action attains to the eternal peace: the non-united only (the unsteady or the unbalanced) impelled by desire, attached to the fruit, is bound.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.12 Yuktah etc. Highest : that from which there is no return.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.12 A Yogin is one who has no hankering for fruits other than the self, and who is exclusively devoted to the self. If a man renounces the fruits of actions and performs actions merely for the purification of himself, he attains lasting peace, i.e., he attains bliss which is of the form of lasting experience of the self. The unsteady person is one who is inclined towards fruits other than the self. He has turned himself away from the vision of the self. Being impelled by desire, he becomes attached to fruits of actions, and remains bound for ever by them. That is, he becomes a perpetual Samsarin or one involved in transmigratory cycle endlessly. What is said is this: Free of attachment for fruits and attributing one's actions to Prakrti which has developed into the form of senses, one should perform actions merely to free the self from bondage.

Next, the shifting of agency to Prakrti, from which the body has come into existence, is described:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.12 Tyaktva, giving up; karma-phalam, the result of work; yuktah, by becoming resolute in faith, by having this conviction thus-'Actions are for God, not for my gain'; apnoti, attains; santim, Peace, called Liberation; naisthikim arising from steadfastness. It is to be understood that he attains this through the stages of purification of the heart, acisition of Knowledge, renunciation of all actions, and steadfastness in Knowledge. On the other hand, however, he who is ayuktah, lacking in resolute faith; he, phale saktah, being attached to result; thinking, 'I am doing this work for my gain'; kama-karena, under the impulsion of desire-kara is the same as karana (action); the action of desire (kama-kara; under that impulsion of desire, i.e. being prompted by desire; nibadhyate, gets bound. Therefore you become resolute in faith. This is the idea. But one who has experienced the supreme Reality-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.12।। कर्मफल की प्राप्ति की चिन्ताओं से मुक्त होकर सम्यक् प्रकार से कर्माचरण के द्वारा कर्मयोगी को अनिर्वचनीय शान्ति प्राप्त होती है। यह शान्ति आर्थिक अथवा राजनैतिक परिस्थितियों द्वारा उत्पन्न की जाने वाली कोई वस्तु नहीं है। संविधान बनाने वाली संस्थाओं तथा अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों के द्वारा भी इस शान्ति को स्थापित नहीं किया जा सकता। यह तो मनुष्य के मन की वह स्थिति है जबकि उसका आन्तरिक संसार विक्षुब्ध करने वाले विचारों के मदोन्मत्त तूफानों से विचलित नहीं होता। शान्ति एक अखण्डानुभूति एवं एक संगठित व्यक्तित्व को सुरभि है। यज्ञ भावना से कर्म करते हुए इस शान्ति को प्राप्त करना ही यहां प्रतिपादित क्रांतिकारी सिद्धांत है। जब साधक कर्तृत्व के अभिमान और फल की आसक्ति का त्याग करके अपने कर्तव्य कर्म करता है तब उसे कर्मयोग निष्ठा की शान्ति शीघ्र ही प्राप्त होती है।इसी बात पर अधिक बल देने के लिये भगवान् कहते हैं कि कर्मयोगी के विपरीत जो अयुक्त पुरुष है वह अभिमान तथा फलासक्ति के कारण अपने ही कर्मों से बँधता है। जो औषधि कम मात्रा में उपचार का कार्य करती है उसी का अधिक मात्रा में सेवन मृत्यु का कारण बन सकता है जैसे नींद की गोलियाँ। जो शस्त्र आत्मरक्षण का साधन है वही आत्महनन का भी कारण बन सकता है।इसी प्रकार जगत् में अविवेक से कार्य करने पर संतोष और आनन्द के आलोक के मिलन के स्थान पर दृढ़तर बन्धन और अथाह अन्धकारमय जीवन प्राप्त होता है। इसका एकमात्र कारण है हमारी किसी फलविशेष के लिए कामना। भविष्य मे अपने मन के अनुकूल स्थिति को चाहने का नाम है कामना अथवा इच्छा। यदि एक मेंढक अपना विस्तार करता हुआ बैल के आकार का बनने का प्रयत्न करे तो उसका अन्त दुखपूर्ण ही होगा। एक परिच्छिन्न सार्मथ्य का जीव स्वयं के अनुकूल और इष्ट परिस्थिति का निर्माण करने में सर्वथा असमर्थ है। उसका प्रयत्न उस मेढक के समान ही होने के कारण अविवेकपूर्ण है। उसको यह समझना चाहिए कि कर्म करने में वह स्वतन्त्र है परन्तु कर्मफल अनेक नियमों के अनुसार प्राप्त होने के कारण फल प्राप्ति में वह परवश है। इसलिए किसी फलविशेष में आसक्त होकर उसका आग्रह रखना केवल अज्ञान के सिवाय और कुछ नहीं।परन्तु जो परमार्थदर्शी हैं उसके विषय में कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.12।।न केवलं सत्त्वशुद्य्धर्थमेव कर्माण्यनुष्ठेयान्यपितु परंपरया मोक्षायापीत्याह युक्त इति। युक्तः परमेश्वराय कर्माणि न मम फलायेत्येवं समाहितः सन् फर्मफलं परित्यज्य शान्तिं मोक्षाख्यां नैष्ठिकीं निष्ठायां भवां सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिसर्वकर्मसंन्यासज्ञाननिष्ठाक्रमेण प्राप्नोति। विपक्षे दोषमाह। यस्तु पुनरयुक्तोऽसमाहितः कामकारेण कामप्रेरणया फलार्थमिदं कर्म करोमीत्येवं फले सक्तः स निबध्यतेऽतस्त्वं युक्तः सन् कर्माणि कुर्वित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.12।।कर्तृत्वाभिमानसाम्येऽपि तेनैव कर्मणा कश्चिन्मुच्यते कश्चित्तु बध्यत इति वैषम्ये को हेतुरिति तत्राह युक्तः ईश्वरायैवैतानि कर्माणि न मभ फलायेत्येवमभिप्रायवान्कर्मफलं त्यक्त्वा कर्माणि कुर्वन् शान्तिं मोक्षाख्यामाप्नोति। नैष्ठिकीं सत्त्वशुद्धिं नित्यानित्यवस्तुविवेकसंन्यासज्ञाननिष्ठाक्रमेण जातामिति यावत्। यस्तु पुनरयुक्त ईश्वरायैवैतानि कर्माणि न मम फलायेत्यभिप्रायशून्यः स कामकारेण कामतः प्रवृत्त्या मम फलायैवेदं कर्म करोमीति फले सक्तो निबध्यते कर्मभिर्नितरां संसारबन्धं प्राप्नोति। यस्मादेवं तस्मात्त्वमपि युक्तः सन्कर्माणि कुर्विति वाक्यशेषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.12।।किंच युक्त इति। युक्तो ब्रह्मण्याधाय कर्माणीत्यादिनोक्तलक्षणः कर्मणां फलं त्यक्त्वा ईश्वरे समर्प्य शान्तिं कैवल्यं नैष्ठिकीं सत्वशुद्ध्यादिक्रमप्राप्तब्रह्मनिष्ठाफलभूतां प्राप्नोति। अयुक्तस्तद्विपरीतः कामकारेण स्वैरवृत्त्या फले सक्तः सन् नितरां बध्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.12।।ननु साधनदशायां फलत्यागेन कर्मकरणं किम्प्रयोजनकं इत्याशङ्क्याह युक्त इति। युक्तो भगवद्भजनैकनिष्ठः सन् कर्मफलं त्यक्त्वा भगवदाज्ञारूपत्वेन कर्म करोति स नैष्ठिकीं भगवत्तोपरूपां शान्तिं भगवदाज्ञाकरणाभावं तापरहितभगवदाज्ञाकरणतोपरूपां प्राप्नोतीत्यर्थः। अतः साधनदशायामपि भगवदाज्ञात्वेन कर्मकरणमुत्तममिति भावः। अभगवदीयस्तु फलाशया कर्मकरणेन बद्धो भवतीत्याह अयुक्त इति। अयुक्तः अभगवदीयः कामकारेण कामनया प्रवृत्तः फले सक्तः सन्निबध्यते नितरां बद्धो भवति। न भगवत्सम्बन्धं प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.12।।ननु तेनैव कर्मणा कश्चिन्मुच्यते कश्चिद्बध्यत इति व्यवस्था कथमत आह युक्त इति। युक्तः परमेश्वरैकनिष्ठः सन्कर्मणां फलं त्यक्त्वा कर्माणि कुर्वन्नात्यन्तिकीं शान्तिं मोक्षं प्राप्नोति। अयुक्तस्तु बहिर्मुखः कामकारेण कामतः प्रवृत्त्या फले आसक्तो नितरां बन्धं प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.12।।एवं च योगेन कर्मकरणे मोक्षं विपरीते बन्धनं चाह युक्त इति। शान्तिः फलं तत्र च बन्धः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.12।।क्योंकि सब कर्म ईश्वरके लिये ही हैं मेरे फलके लिये नहीं इस प्रकार निश्चयवाला योगी कर्मफलका त्याग करके ज्ञाननिष्ठामें होनेवाली मोक्षरूप परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है। यहाँ पहले अन्तःकरणकी शुद्धि फिर ज्ञानप्राप्ति फिर सर्वकर्मसंन्यासरूप ज्ञाननिष्ठाकी प्राप्ति इस प्रकार क्रमसे परम शान्तिको प्राप्त होता है इतना वाक्य अधिक समझ लेना चाहिये। परंतु जो अयुक्त है अर्थात् उपर्युक्त निश्चयवाला नहीं है वह कामकी प्रेरणासे अपने फलके लिये यह कर्म मैं करता हूँ इस प्रकार फलमें आसक्त होकर बँधता है। इसलिये तू युक्त हो अर्थात् उपर्युक्त निश्चयवाला हो यह अभिप्राय है। करणका नाम कार है कामके करणका नाम कामकार है उसमें तृतीया विभक्ति जो़ड़नेसे कामके कारणसे अर्थात् कामकी प्रेरणासे यह अर्थ हुआ।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.12।। व्याख्या   युक्तः इस पदका अर्थ प्रसङ्गके अनुसार लिया जाता है जैसे इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें अपनेको अकर्ता माननेवाले सांख्ययोगीके लिये युक्तः पद आया है ऐसे ही यहाँ कर्मफलका त्याग करनेवाले कर्मयोगीके लिये युक्तः पद आया है।जिनका उद्देश्य समता है वे सभी पुरुष युक्त अर्थात् योगी हैं। यहाँ कर्मयोगीका प्रकरण चल रहा है इसलिये यहाँ युक्तः पद ऐसे कर्मयोगीके लिये आया है जिसकी बुद्धि व्यवसायात्मिका होनेसे जिसमें सांसारिक कामनाओंका अभाव हो गया है।कर्मफलं त्यक्त्वा यहाँ कर्मफलका त्याग करनेका तात्पर्य फलकी इच्छा आसक्तिका त्याग करना है क्योंकि वास्तवमें त्याग कर्मफलका नहीं प्रत्युत कर्मफलकी इच्छाका होता है। कर्मफलकी इच्छाका त्याग करनेका अर्थ है किसी भी कर्म और कर्मफलसे अपने लिये कभी किञ्चिन्मात्र भी किसी प्रकारका सुख लेनेकी इच्छा न रखना। कर्म करनेसे एक तो तात्कालिक फल (सुख) मिलता है और दूसरा परिणाममें फल मिलता है इन दोनों ही फलोंकी इच्छाका त्याग करना है। अपना कुछ नहीं है अपने लिये कुछ नहीं करना है और अपनेको कुछ नहीं चाहिये इस प्रकार कर्ताके सर्वथा निष्काम होनेपर कर्मफलकी इच्छाका त्याग हो जाता है।संचितकर्मोंके अनुसार प्रारब्ध बनता है प्रारब्धके अनुसार मनुष्यका जन्म होता है और मनुष्यजन्ममें नये कर्म होनेसे नये कर्मसंस्कार संचित होते हैं। परन्तु कर्मफलकी आसक्तिका त्याग करके कर्म करनेसे कर्म भुने हुए बीजकी तरह संस्कार उत्पन्न करनेमें असमर्थ हो जाते हैं और उनकी संज्ञा अकर्म हो जाती है (गीता 4। 20)। वर्तमानमें निष्कामभावपूर्वक किये कर्मोंके प्रभावसे उसके पुराने कर्मसंस्कार (संचित कर्म) भी समाप्त हो जाते हैं (गीता 4। 23)। इस प्रकार उसके पुनर्जन्मका कारण ही समाप्त हो जाता है।कर्मफल चार प्रकारके होते हैं (1) दृष्ट कर्मफल वर्तमानमें किये जानेवाले नये कर्मोंका फल जो तत्काल प्रत्यक्ष मिलता हुआ दीखता है जैसे भोजन करनेसे तृप्ति होना आदि।(2) अदृष्ट कर्मफल वर्तमानमें किये जानेवाले नये कर्मोंका फल जो अभी तो संचितरूपसे संगृहीत होता है पर भविष्यमें इस लोक और परलोकमें अनुकूलता या प्रतिकूलताके रूपमें मिलेगा।(3) प्राप्त कर्मफल प्रारब्धके अनुसार वर्तमानमें मिले हुए शरीर जाति वर्ण धन सम्पत्ति अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति आदि।(4) अप्राप्त कर्मफल प्रारब्धकर्मके फलरूपमें जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थिति भविष्यमें मिलनेवाली है।उपर्युक्त चार प्रकारके कर्मफलोंमें दृष्ट और अदृष्ट कर्मफल क्रियमाणकर्म के अधीन हैं तथा प्राप्त और अप्राप्त कर्मफल प्रारब्धकर्म के अधीन हैं। कर्मफलका त्याग करनेका अर्थ है दृष्ट कर्मफलका आग्रह नहीं रखना तथा मिलनेपर प्रसन्न या अप्रसन्न न होना अदृष्ट कर्मफलकी आशा न रखना प्राप्त कर्मफलमें ममता न करना तथा मिलनेपर सुखी या दुःखी न होना और अप्राप्त कर्मफलकी कामना न करना कि मेरा दुःख मिट जाय और सुख हो जाय।साधारण मनुष्य किसीनकिसी कामनाको लेकर ही कर्मोंका आरम्भ करता है और कर्मोंकी समाप्तितक उस कामनाका चिन्तन करता रहता है। जैसे व्यापारी धनकी इच्छासे व्यापार आरम्भ करता है तो उसकी वृत्तियाँ धनके लाभ और हानिकी ओर ही रहती हैं कि लाभ हो जाय हानि न हो। धनका लाभ होनेपर वह प्रसन्न होता है और हानि होनेपर दुःखी होता है। इसी तरह सभी मनुष्य स्त्री पुत्र धन मान बड़ाई आदि कोईनकोई अनुकूल फलकी इच्छा रखकर ही कर्म करते हैं। परन्तु कर्मयोगी फलकी इच्छाका त्याग करके कर्म करता है।यहाँ स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि अगर कोई इच्छा ही न हो तो कर्म करें ही क्यों इसके उत्तरमें सबसे पहली बात तो यह है कि कोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें कर्मोंका सर्वथा त्याग नहीं कर सकता (गीता 3। 5)। यदि ऐसा मान भी लिया जाय कि मनुष्य बहुत अंशोंमें कर्मोंका स्वरूपसे त्याग कर सकता है तो भी मनुष्यके भीतर जबतक संसारके प्रति राग है तबतक वह शान्तिसे (कर्म किये बिना) नहीं बैठ सकता। उससे विषयोंका चिन्तन अवश्य होगा जो कि कर्म है। विषयोंका चिन्तन होनेसे वह क्रमशः पतनकी ओर चला जायगा (गीता 2। 62 63)। इसलिये जबतक रागका सर्वथा अभाव नहीं हो जाता तबतक मनुष्य कर्मोंसे छूट नहीं सकता। कर्म करनेसे पुराना राग मिटता है और निःस्वार्थभावसे केवल परहितके लिये कर्म करनेसे नया राग पैदा नहीं होता।विचारपूर्वक देखा जाय तो कर्मफलकी इच्छा रखकर कर्म करना बड़ी बेसमझी है। पहली बात तो यह है कि जब प्रत्येक कर्म आरम्भ और समाप्त होनेवाला है तब उसका फल नित्य कैसे होगा फल भी प्राप्त होकर नष्ट हो जाता है। तात्पर्य यह है कि कर्म और कर्मफल दोनों ही नाशवान् हैं। या तो फल नहीं रहेगा यह हमारा कहलानेवाला शरीर नहीं रहेगा। दूसरी बात इच्छा रखें या न रखें जो फल मिलनेवाला है वह तो मिलेगा ही। इच्छा करनेसे अधिक फल मिलता हो और इच्छा न करनेसे कम फल मिलता हो ऐसी बात नहीं है। अतः फलकी कामना करना बेसमझी ही हैनिष्कामभावसे अर्थात् फलकी कामना न रखकर लोकहितार्थ कर्म करनेसे कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है। कर्मयोगीके कर्म उद्देश्यहीन अर्थात् पागलके कर्मकी तरह नहीं होते प्रत्युत परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका महान् उद्देश्य रखकर ही वह लोकहितार्थ सब कर्म करता है। उसके कर्मोंका लक्ष्य परमात्मतत्त्व रहता है सांसारिक पदार्थ नहीं। शरीरमें ममता न रहनेसे उसमें आलस्य अकर्मण्यता आदि दोष नहीं आते प्रत्युत वह कर्मोंको सुचारुरूपसे और तत्परताके साथ करता है।मार्मिक बातजिन कर्मोंको करनेसे नाशवान् पदार्थोंकी प्राप्ति होती है वे ही कर्म निष्कामभावपूर्वक एकमात्र परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिका उद्देश्य रखकर लोकहितार्थ करनेसे नित्यसिद्ध परमात्मतत्त्वकी अनुभूतिमें हेतु बन सकते हैं। तीसरे अध्यायके बीसवें श्लोकमें कहा गया है कि कर्मोंके द्वारा ही जनकादि कर्मयोगियोंको परमात्मप्राप्तिरूप सिद्धि मिली और छठे अध्यायके तीसरे श्लोकमें कहा गया है कि योगमें आरूढ़ होनेके लिये कर्म करना आवश्यक है। इन सब बातोंसे यह अर्थ निकलता है कि परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर्मोंसे होती है। पार्वती मनुशतरूपा आदिको भी तपरूप कर्मसे भगवत्प्राप्ति हुई। यह बात भी आती है कि जप ध्यान सत्सङ्ग स्वाध्याय श्रवण मनन आदि साधनोंसे तत्त्वका साक्षात्कार हो जाता है। इसके विपरीत ऐसी बात भी आती है कि तप आदि कर्मोंसे भगवत्प्राप्ति नहीं होती (गीता 11। 53) परमात्मा किसी कर्मका फल नहीं हैं आदि। इन दोनों बातोंमें सामञ्जस्य कैसे होइसका समाधान है कि वास्तवमें परमात्माकी प्राप्ति किसी कर्मसे नहीं होती। वे किसी कर्मका फल नहीं हैं। परमात्मा प्रत्येक देश काल वस्तु व्यक्ति घटना परिस्थिति आदिमें सदासर्वदा विद्यमान हैं। वे सदासर्वदा सबको प्राप्त हैं और सभी प्राणियोंकी सदासर्वदा उन्हींमें स्थिति है। परमात्मासे कोई भी मनुष्य कभी अलग था नहीं है नहीं होगा नहीं और हो सकता भी नहीं। परन्तु जड प्रकृतिके कार्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदिसे अहंताममतापूर्वक अपना सम्बन्ध मानते रहनेसे मनुष्य परमात्मासे विमुख हो जाता है और जो वास्तवमें अपने हैं उन परमात्माको अपना न मानकर जो अपने हैं ही नहीं उन नाशवान् पदार्थोंको अपना मानने लग जाता है। अतः जड पदार्थोंके साथ जीवका जो रागयुक्त सम्बन्ध है उसे मिटानेमें ही सम्पूर्ण साधनोंकी सार्थकता है।जडतासे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होते ही नित्यप्राप्त परमात्माका अनुभव हो जाता है। अतः तप आदि साधन करतेकरते जब जडतासे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है तभी परमात्मप्राप्ति होती है। वही सम्बन्धविच्छेद तब बहुत सुगमतासे हो जाता है जब निष्कामभावसे केवल लोकहितके लिये कर्तव्यकर्म किये जायँ।परमात्मा किसी साधनसे खरीदे नहीं जा सकते क्योंकि प्रकृतिके सम्पूर्ण पदार्थ एक साथ मिलकर भी चिन्मय और अविनाशी परमात्माकी किञ्चिन्मात्र भी समानता नहीं कर सकते। दूसरी बात मूल्य देकर जो वस्तु मिलती है वह उस मूल्यसे कमजोर (कम मूल्यवाली) ही होती है। यदि कर्मोंसे परमात्मा मिल जायँ तो वे कर्मोंसे कमजोर ही सिद्ध होंगे।यहाँ एक मार्मिक बात समझनेकी है कि प्रायः साधक जिन शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिसे साधन करते हैं उनका सम्बन्ध महत्त्व और आश्रय रखते हुए ही साधन करते हैं। जबतक इन शरीरादिसे यत्किञ्चित् भी सम्बन्ध है तबतक जडतासे सम्बन्ध बना हुआ है। जडतासे सम्बन्ध रखते हुए परमात्मतत्त्वका अनुभव नहीं होता। परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति जडताके द्वारा नहीं होती प्रत्युत जडताके त्यागसे होती है।जिस जातिका संसार है उसी जातिके ये शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि हैं। अतः इन्हें संसारका ही मानकर संसारकी ही सेवामें लगा दे (जो कर्मयोग) है। परन्तु इन शरीरादिसे किञ्चिन्मात्र भी अपना सम्बन्ध न माने इन्हें महत्त्व न दे इनका आश्रय न रखे क्योंकि असत्से सम्बन्ध रखते हुए असत्की सर्वथा निवृत्ति नहीं हो सकती। असत्से सम्बन्धविच्छेद करनेके लिये निष्कामभावसे किये हुए सब कर्म (साधन) सहायक होते हैं। असत्से सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होते ही परमात्मासे जो विमुखता हो रही थी वह मिट जाती है और नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वकी अनुभूति हो जाती है। शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम् यह बात अनुभवसिद्ध है कि सांसारिक पदार्थोंकी कामना और ममताके त्यागसे शान्ति मिलती है। सुषुप्तिमें जब संसारकी विस्मृति हो जाती है तब उसमें भी शान्तिका अनुभव होता है। यदि जाग्रत्में ही संसारका सम्बन्धविच्छेद (कामनाममताका त्याग) हो जाय तो फिर कहना ही क्या है ऐसे ही नींद आने किसी कार्यके पूरा होने लड़कीका विवाह होने आदिसे भी एक शान्ति मिलती है। तात्पर्य है कि सांसारिक कामना ममता और आसक्तिका त्याग करते ही शान्ति प्राप्त होती है। परन्तु इस शान्तिका उपभोग करनेसे अर्थात् इसमें सुख लेनेसे और इसे ही लक्ष्य मान लेनेसे साधक इस शान्तिके फलस्वरूप मिलनेवाली नैष्ठिकी शान्ति (टिप्पणी प0 298) अर्थात् परमशान्तिसे वञ्चित रह जाता है। कारण कि यह शान्ति ध्येय नहीं है प्रत्युत परमशान्तिका कारण है योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते (गीता 6। 3)।संसारके सम्बन्धविच्छेदसे होनेवाली शान्ति सत्त्वगुणसे सम्बन्ध रखनेवाली सात्त्विकी शान्ति है। जबतक साधक इस शान्तिका भोग करता है और इस शान्तिसे मुझमें शान्ति है इस प्रकार अपना सम्बन्ध मानता है तबतक परिच्छिन्नता रहती है (गीता 14। 6) और जबतक परिच्छिन्नता रहती है तबतक अखण्ड एकरस रहनेवाली वास्तविक शान्तिका अनुभव नहीं होता।अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते जो कर्मयोगी नहीं है प्रत्युत कर्मी है ऐसे सकाम पुरुषके लिये यहाँ अयुक्तः पद आया है।सकाम पुरुष नयीनयी कामनाओंके कारण फलमें आसक्त होकर जन्ममरणरूप बन्धनमें पड़ जाता है। कामनामात्रसे कोई भी पदार्थ नहीं मिलता अगर मिलता भी है तो सदा साथ नहीं रहता ऐसी बात प्रत्यक्ष होनेपर भी पदार्थोंकी कामना रखना प्रमाद ही है। तुलसीदासजी महाराज कहते हैं अंतहुँ तोहि तजैंगे पामर तू न तजै अबही ते।। (विनयपत्रिका 198) इसका अर्थ यह नहीं कि पदार्थोंको स्वरूपसे छोड़ दें। अगर स्वरूपसे छोड़नेपर ही मुक्ति होती तो मरनेवाले (शरीर छोड़नेवाले) सभी मुक्त हो जाते पदार्थ तो अपनेआप ही स्वरूपसे छूटते चले जा रहे हैं। अतः वास्तवमें उन पदार्थोंमें जो कामना ममता और आसक्ति है उसीको छोड़ना है क्योंकि पदार्थोंसे कामनाममताआसक्तिपूर्वक माना हुआ सम्बन्ध ही जन्ममरणरूप बन्धनका कारण है। कर्मयोगके आचरणसे (कर्मोंका प्रवाह केवल परहितके लिये होनेसे) यह माना हुआ सम्बन्ध सुगमतासे छूट जाता है। सम्बन्ध   कर्मयोगका वर्णन करके अब भगवान् पुनः सांख्ययोगका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.12।।युक्त इति। नैष्ठिकीम् अपुनरावर्तिनीम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.12।।इतश्च सङ्गं त्यक्त्वा कर्मानुष्ठानं त्वया कर्तव्यमित्याह यस्माच्चेति। युक्तः सन्फलं त्यक्त्वा कर्म कुर्वन्मोक्षाख्यां शान्तिं यस्मादाप्नोति तस्माच्च त्वया सङ्गं त्यक्त्वा कर्म कर्तव्यमिति योजना। विपक्षे दोषमाह अयुक्त इति। युक्तत्वं व्याकरोति ईश्वरायेति। फलं परित्यज्य कर्म कुर्वन्निति शेषः। नैष्ठिकी शान्तिरित्येतदेव विशदयति सत्त्वेति। द्वितीयमर्धं विभजते यस्त्विति। असमाधाने दोषादर्जुनस्य नियोगं दर्शयति अतस्त्वमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.12।।तथापि युक्त इत्येतत् पुनरुक्तमित्यत आह पुनरिति। युक्तिर्योगः। आदिपदेन सन्न्यासः। युक्तायुक्तेत्युपलक्षणम्। सन्न्यास्यसन्न्यासीत्यपि ग्राह्यम्। प्राक् सन्न्यासयोगौ मिलितावेव फलं साधयतो नान्यतरपरित्यागेनान्यतर इति नियमज्ञापनार्थं तयोः फलमुक्तम्। इदानीं तु तावेव मोक्षसाधनम् न तु तदुभयत्यागेनान्यदिति नियमज्ञापनाय योगसन्न्यासवतस्तदुभयाभाववतश्च मुक्तिसंसारविस्तारलक्षणं फलमाहेत्यर्थः। युक्तशब्दस्य सहिताद्यर्थनिवारणायार्थमाह युक्त इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.12।।पुनर्युक्त्यादिनियमनार्थं युक्तायुक्तफलमाह युक्त इति। युक्तो योगयुक्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.12।।युक्तः आत्मव्यतिरिक्तफलेषु अचपलः आत्मैकप्रवणः कर्मफलं त्यक्त्वा केवलात्मशुद्धये कर्मानुष्ठाय नैष्ठिकीं शान्तिम् आप्नोति स्थिराम् आत्मानुभवरूपां निर्वृतिम्

Chapter 5 (Part 8)

आप्नोति। अयुक्तः आत्मव्यतिरिक्तफलेषु चपलः आत्मावलोकनविमुखः कामकारेण फले सक्तः कर्माणि कुर्वन् नित्यं कर्मभिः बध्यते नित्यसंसारी भवति। अतः फलसङ्गरहित इन्द्रियाकारेण परिणतायां प्रकृतौ कर्माणि संन्यस्य आत्मनो बन्धमोचनाय एव कर्माणि कुर्वीत इति उक्तं भवति।अथ देहाकारपरिणतायां प्रकृतौ कर्तृत्वसंन्यास उच्यते

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.12।। युक्तः ईश्वराय कर्माणि करोमि न मम फलाय इत्येवं समाहितः सन् कर्मफलं त्यक्त्वा परित्यज्य शान्तिं मोक्षाख्याम् आप्नोति नैष्ठिकीं निष्ठायां भवां सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिसर्वकर्मसंन्यासज्ञाननिष्ठाक्रमेणेति वाक्यशेषः। यस्तु पुनः अयुक्तः असमाहितः कामकारेण करणं कारः कामस्य कारः कामकारः तेन कामकारेण कामप्रेरिततयेत्यर्थः मम फलाय इदं करोमि कर्म इत्येवं फले सक्तः निबध्यते। अतः त्वं युक्तो भव इत्यर्थः।।यस्तु परमार्थदर्शी सः

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【 Verse 5.13 】

▸ Sanskrit Sloka: सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्यास्ते सुखं वशी | नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारयन् ||

▸ Transliteration: sarvakarmāṇi manasā sannyasyāste sukhaṁ vaśī | navadvāre pure dehī naiva kurvanna kārayan ||

▸ Glossary: sarva: all; karmāṇi: activities; manasā: by the mind; sannyasya: giving up; āste: remains; sukhaṁ: in happiness; vaśī : who is controlled; navadvāre: of nine gates; pure: in the city; dehī : body; na: never; eva: surely; kurvan: doing; na: never: kārayan: causing to be done

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.13 One who is controlled, giving up all the activities of the mind, surely remains in happiness in the city of nine gates (body), neither doing anything nor causing anything to be done.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.13।।जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं ऐसा देहधारी पुरुष नौ द्वारोंवाले शरीररूपी पुरमें सम्पूर्ण कर्मोंका विवेकपूर्वक मनसे त्याग करके निःसन्देह न करता हुआ और न करवाता हुआ सुखपूर्वक (अपने स्वरूपमें) स्थित रहता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.13।। सब कर्मों का मन से संन्यास करके संयमी पुरुष नवद्वार वाली शरीर रूप नगरी में सुख से रहता हुआ न कर्म करता है और न करवाता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.13 सर्वकर्माणि all actions? मनसा by the mind? संन्यस्य having renounced? आस्ते rests? सुखम् happily? वशी the selfcontrolled? नवद्वारे in the ninegated? पुरे in the city? देही the embodied? न not? एव even? कुर्वन् acting? न not? कारयन् causing to act.Commentary All actions -- (1) Nitya Karmas These are obligatory duties. Their performance does not produce any merit but their nonperformance produces demerit. Sandhyavandana? etc.? belong to this category.(2) Naimittika Karmas These Karmas are performed on the occurrence of some special events such as the birth of a son? eclipse? etc.(3) Kamya Karmas These are optional. They are intended for the attainment of some special ends (for getting rain? son? etc.)(4) Nishiddha Karmas These are forbidden actions such as theft? drinking liour? etc.(5) Prayaschitta Karmas Actions performed to neutralise the effects of evil actions or sins.The man who has controlled the senses renounces all actions by discrimination? by seeing inaction in action and rests happily in this body of nine openings (the ninegated city)? because he is free from cares? worries? anxieties and fear and his mind is ite calm and he enjoys the supreme peace of the Eternal. In this ninegated city the Self is the king. The senses? the mind? the subconscious mind? and the intellect are the inhabitants or subjects.The ignorant wordly man says? I am resting in the easychair. The man of wisdom who has realised that the Self is distinct from the body which is a product of the five elements? says? I am resting in this body. (Cf.XVIII.17?50)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.13. Having renounced all actions by mind, a man of self-control, dwells happily in his body, a nine-win-dowed mansion, neither performing, nor causing others to perform [actions].

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.13 Mentally renouncing all actions, the self-controlled soul enjoys bliss in this body, the city of the nine gates, neither doing anything himself nor causing anything to be done.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.13 The embodied self, mentally resigning all actions as belonging to the city of nine gates (i.e., the body) and becoming self-controlled, dwells happily, neither himself acting nor causing the body to act.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.13 The embodied man of self-control, having given up all actions mentally, continues happily in the town of nine gates, without doing or causing (others) to do anything at all.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.13 Mentally renouncing all actions and self-controlled, the embodied one rests happily in the nine-gated city, neither acting nor causing others (body and senses) to act.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.13 Sarva - etc. [He would view as] : 'Just as for a person within a house there is no connection with dilapidation etc., that are found in the house, in the same way for me too residing in the body-house beautified with nine windows in the form of openings like the eyes etc., there is no connection with its attributes.' For -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.13 The embodied self who is self-controlled, renounces all actions to the city of nine gates, i.e., the body with its sensory and motor functions which are nine in number. He discriminates that all actions are due to conjunction of the self with the body which is rooted in previous Karmas, and is not by Its own nature. [It means that the self merely rests in the body, without any identification with bodily activities.]

Sri Krsna now teaches the natural condition of the self as It is:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.13 Aste, he continues; sukham, happily; sannyasya, having given up; sarva-karmani, all actions-nitya, naimittika, kamya and nisiddha (prohibited actions); [See note on p. 128.-Tr.] manasa, mentally, through discriminating wisdom-i.e. having given up (all actions) by seeing inaction in action, etc. Freed from the activities of speech, mind and body, effortles, placid in mind, and devoid of all external wants which are different from the Self, he continues happily. This is what has been said. Where and how does the vasi, man of self-control, i.e. one who has his organs under control, remain? This is being answered: Nava-dvare pure, in the town with nine gates, of which seven [Two ears, two eyes nostrils, and mouth.] are in the head for one's own experiences, and two are below for urination and defecation. As possessed of those gates, it is called the 'town with nine gates'. Being like a town, the body is called a town with the Self as its only master. And it is inhabited by the organs, mind, intellect and objects, like citizens, as it were, which serve its needs and which are productive of many results and experience. Renouncing all actions, the dehi, embodied one, resides in that town with nine gates. Objection: What is the need of this specification? For all embodied beings, be they monks or not, reside in bodies to be sure! That being so, the specification is needless. The answer is: The embodied one, however, who is unenlightened, who perceives merely the aggregate of the body and organs as the Self, he, in his totality, thinks, 'I am in a house, on the ground, or on the seat.' For one who experiences the body alone as the Self, there can certainly be no such conviction as, 'I am in the body, like one's being in a house.' But, for one who realizes the Self as distinct from the aggregate of body etc. it becomes reasonable to have the conviction, 'I am in the bdoy. It is reasonable that as a result of knowledge in the form of discriminating wisdom, there can be a mental renunciation of the actions of others, which have been ignorantly superimposed on the supreme Self. Even in the case of one in whom has arisen discriminating wisdom and who has renounced all actions, there can be, like staying in a house, the continuance in the body itself-the town with nine gates-as a conseence of the persistence of the remnants of the results of past actions which have started bearing fruit, because the awareness of being distinct (from the body) arises while one is in the body itself. Form the point of veiw of the difference between the convictions of the enlightened and the unenlightened persons, the alifying words, 'He continues in the body itself', do have a purpose to serve. Although it has been stated that one continues (in the body) by relinishing actions of the body and organs ignorantly superimposed on the Self, still there may be the apprehesion that direct or indirect agentship inheres in the Self. Anticipating this, the Lord says: na eva kurvan, without himself doing anything at all; and na karayan, not causing (others) to do, (not) inducing the body and organs to activity. Objection: Is it that the direct or indirect agentship of the embodied one inheres in the Self and ceases to be after renunciation, as the movement of a traveller ceases with the stoppage of his movement? Or, is it that they do not exist owing to the very nature of the Self? As to this, the answer is: The Self by Its nature has neither direct nor indirect agentship. For it was stated, 'It is said that৷৷.This (Self) is unchangeable' (2.25). 'O son of Kunti, although existing in the body, It does not act, nor is It affected' (13.31). And it is also stated in the Upanisad, 'It seems to meditate, as it were; It seems to move, as it were' (Br. 4.3.7).

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.13।। जगत् से पलायन करना संन्यास नहीं है। मिथ्या धारणाओं एवं अविवेकपूर्ण आसक्तियों का त्याग ही वास्तविक संन्यास है। जिस पुरुष की सम्पूर्ण इन्द्रियाँ एवं मन की प्रवृत्तियाँ स्वयं के वश में हैं और जिसके कर्म अहंकार और स्वार्थ से रहित होते हैं उसे ही अनिर्वचनीय आनन्द परम संतोष प्राप्त होता है। तब वह सुखपूर्वक शरीर रूपी नवद्वार नगरी में निवास करता है।नवद्वारयुक्त नगरी का रूपक उपनिषदों में प्रसिद्ध है। शरीर को उस नगरी के समान माना गया है जो प्राचीन काल में किलों की प्राचीर के अन्दर बसायी गयी होता थी। इस शरीर रूपी नगरी के नवद्वार हैं दो आँखें दो नासिका छिद्र दो कान मुँह जननेन्द्रिय तथा गुदेन्द्रिय। इस शरीर में जीवन व्यापार सुचारु रूप से चलने के लिए इनमें से समस्त अथवा अधिकांश द्वारों का होना आवश्यक है। जैसे एक राजा किले में रहकर अपने मंत्रियों द्वारा शासन करता है तब उसकी परिस्थिति मात्र से अधिकारीगण प्रेरणाशक्ति और अनुमति प्राप्त कर अपनाअपना कार्य करते है इसी प्रकार चैतन्य आत्मा स्वयं अकर्ता रहते हुये भी उसके केवल सान्निध्य से समस्त ज्ञानेन्द्रयाँ एवं कर्मेन्द्रियां स्वव्यापार मे व्यस्त रहती हैं।इस प्रसिद्ध रूपक का प्रयोग करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि संयमी एवं तत्त्वदर्शी पुरुष शरीर में सुख से रहते हुए उपाधियों के कार्य देखता रहता है परन्तु स्वयं न कर्म करता है और न उपाधियों से करवाता है।और

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.13।।एवमशुद्धचित्तस्याविदुषः संन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यत इत्युपपादितम्। शुद्धचित्तः परमार्थदर्शी कथमास्त इत्यपेक्षायामाह सर्वेति। सर्वाणि नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं चेति तानि कर्माणि मनसा विवेकबुद्य्धा कर्मादावकर्मदर्शनेन संत्यज्य सुखमास्ते दुःखहेतुसर्वव्यापारोपरभात्। यतः वशी जितेन्द्रियः। क्व आस्त इत्यत आह। नवद्वारे पुरे। द्वे श्रोत्रे नेत्रे नासिके मुखं चेति सप्त शिरसि अवाक् द्वे मूत्रपुरीषविसर्गार्थे। एवं नवद्वारयुक्ते पुरे नगरस्थानीये आत्मेकस्वामिके इन्द्रियाणि परिचारकाः बुद्धिरमात्योऽहंकारो युवराजो मनःशिल्पीत्येवंरुपैरिन्द्रियादिभिः पौरेरधिष्ठिते आस्ते। यतो देही देहाद्य्वतिरिक्तात्मदर्शी। यस्त्वज्ञः सतु देहात्मदर्शी गेहादावास्तेऽतो युक्तं विशेषणम्। यद्यप्येवं तथाप्यात्मसमवायित्वेन कर्तृत्वकारयितृत्वे तस्य स्यातामित्यत आह। नैव कुर्वन्स्वयं न च कारयन् कार्यकरणानि क्रियासु प्रवर्तयन्नास्त इति संबन्धः। यत्तु वशी विवेकवैराग्यसंपन्नो नवद्वारे पुरे मानुषे शरीरे सुखमास्त इति संबन्धः। यद्यपि नवद्वारं श्वमार्जारादिशरीरमपि भवति तथापि वशिशब्दसंयोगान्मानुषमिति लभ्यते। सुखमिति क्रियाविशेषणम्। अनेनान्तःकरणस्य हर्षशोकादयः परिणामा निराकृताः। वशीत्यत्र वैराग्योक्त्या रागाद्यपरपर्यायकामतदवस्थाविशेषक्रोधरूपावन्तःकरणपरिणामौ वारितौ। विवेकोक्त्या चाहंकारतन्निबन्धनममकाराध्यासौ चिन्तनात्मकचित्तपरिणामं च निराकृत्य विशुद्धचिदाकारतया बुद्धेरवस्थानमुक्तम्। ततश्च विशुद्धचिदाकारबुद्धिपरिणाम एव निष्कृष्टो वशिशब्देनोक्तः। किं कृत्वेत्यत आह। मनसा सह सर्वकर्माणि संन्यस्य त्यागेन ज्ञानमप्युपलक्ष्यते। ततश्च संन्यस्यात्मानं ज्ञात्वा सुखमास्त इति ज्ञेयम्। वशिनं विशिनष्टि अदेहीति। देहो लिङ्गशरीरं तद्रहितः। अयमाशयः षोडशकलात्मा हि पुरुषः। तत्र भूतेन्द्रियप्राणाः प्रवर्त्याः। प्रवर्तकमन्तःकरणम्। तच्च बुद्धिसंकल्पकतया। सर्वो हि बुद्य्धा निश्चित्य मनसा संकल्प्य प्रवर्तते। तत्र मनस्त्यागेन विज्ञानकर्मत्यागः संभवतीति क्वेदानीं लिङ्गदेहः। नहि शिरसि च्छिन्ने कबन्धो देहतां प्रतिपद्यते इति मनसेत्युक्तम्। बुद्धिस्तु सर्वाकारपरित्यागेन चिन्मात्र उपसंक्रान्ताहंकारदीनां तु कथापि विवेकेनोमन्मूलितेतीतरे व्याचख्युः। तत्रेदं वक्तव्यम् वशिशब्दयोगं विनापि सर्वकर्माणीत्यादेर्योगात् प्रकरणाच्च मानुषशरीरमेवोपलभ्यते। सर्वकर्माणि संन्यस्येत्यनेन निषिद्धादिमननरुपमानसकर्मत्यागे मनस्त्यागसिद्य्धा त्यागकरणस्यापेक्षितत्वेन च सहशब्दध्याहृत्य पृथङ्यनस्त्यागवर्तनमसंगतम्। किंच विवेकयुक्तमेव मनस्त्यागोऽतो विवेकयुक्तेन मनसा सर्वकर्माणि संन्यस्येत्येव युक्तम्। एतेन वशिशब्देन विवेकवैराग्ययुक्तत्ववर्णनं प्रत्युक्तम्। वशिशब्दस्य स्वतन्त्रवाचि त्वेन जितेन्द्रियत्वप्रतीत्या इतरोक्तार्थस्यार्थिकार्थत्वात्। यदप्यदेही लिङ्गशरीररहित इति तदपि न। भेदबोधकेनिप्रत्येन देहादितरात्मदर्शीति वर्णनस्यैव नवद्वारे पुरे आस्ते इत्यस्य योगेन स्वारसिकत्वेन प्रश्लेषेण क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वात्। इमामेवारुचिं मनसि निधाय पक्षान्तरस्यैतद्य्वाख्यानकर्तृभिर्दर्शितत्वाच्चेति दिक्। यदप्यन्ते वशी जितचित्तः। समाधिस्थो योगी नवद्वारे नवैव पञ्च ज्ञानेन्द्रियाणि षष्ठः प्राणस्तेनैव तत्प्रवर्त्यानां कर्मेन्द्रियाणां संग्रहः। बुद्य्धहंकारचित्तानीति नवैतानि द्वाराणीव पुरपतेर्जीवस्य भोगार्थं विषयप्रवेशस्थानानि यस्मिन्नवद्वारे पुरे शरीराख्ये विचित्रवासनाकल्पितानन्तविषयवति अनेकैः कर्मसचिवैरधिष्ठिते सुखदुःखादिनानापण्यवति मनसा सर्वद्वारेद्धाटनकुञ्चिकया सह सर्वाणि कर्माणि पुरपतिरिव राज्यकार्याणि संन्यस्य सुखं निर्विकल्पसंविन्मात्ररुपेणास्ते इति तदपि असङ्गतमेव। चित्तस्य वृत्तिनिरोधरुपजयापेक्षया वस्त्रादित्यागवदितरत्यागाप्रसिद्य्धा मनसा सहेति सहशब्दाध्याहारेण वर्णनस्य पुनरुक्तिग्रस्तत्वात्। मृतशरीरस्य पुरस्य सत्त्वेऽपि परोक्तद्वाराणामभावेन नवद्वाराणि यस्मिन्नित्युक्तेरनुचितत्वात्। निर्विकल्पसमाधिस्थस्य भोगप्राप्तिद्वाराणां लयादहं देहाद्भिन्न इत्येतावन्मात्रभानस्याप्यभावात्। नवद्वारे पुरे आस्ते इत्यस्य वैयर्थ्यापत्तेश्चेतिदिक्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.13।।अशुद्धचित्तस्य केवलात्संन्यासात्कर्मयोगः श्रेयानिति पूर्वोक्तं प्रपञ्च्याधुना शुद्धचित्तस्य सर्वकर्मसंन्यास एव श्रेयानित्याह नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं चेति सर्वाणि कर्माणि मनसाकर्मण्यकर्म यः पश्येत् इत्यत्रोक्तेनाकर्त्रात्मस्वरूपसम्यग्दर्शनेन संन्यस्य परित्यज्य प्रारब्धकर्मवशादास्ते तिष्ठत्येव। किं दुःखेन नेत्याह सुखमनायासेन आयासहेतुकायवाङ्मनोव्यापारशून्यत्वात्। कायवाङ्मनांसि स्वच्छन्दानि कुतो न व्याप्रियन्ते तत्राह वशी स्ववशीकृतकार्यकरणसंघातः। क्वास्ते। नवद्वारे पुरे। द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके वागेकेति शिरसि सप्त द्वे पायूपस्थाख्ये अध इति नवद्वारविशिष्टे देहे। देही देहभिन्नात्मदर्शी प्रवासीव परगेहेतत्पूजापरिभवादिभिरप्रहृष्यन्नविषीदन्नहंकारममकारशून्यस्तिष्ठति। अज्ञो हि देहतादात्म्याभिमानाद्देह एव नतु देही। सच देहाधिकरणमेवात्मनोऽधिकरणं मन्यमानो गृहे भूमावासने वाहमास इत्यभिमन्यते नतु देहेऽहमास इति भेददर्शनाभावात्। संघातव्यतिरिक्तात्मदर्शी तु सर्वकर्मसंन्यासी भेददर्शनाद्देहेऽहमास इति प्रतिपद्यते। अतएव देहादिव्यापाराणामविद्ययात्मन्यक्रिये समारोपितानां विद्यया बाधएव सर्वकर्मसंन्यास इत्युच्यते। एतस्मादेवाज्ञवैलक्षण्याद्युक्तं विशेषणं नवद्वारे पुर आस्त इति। ननु देहादिव्यापाराणामात्मन्यारोपितानां नौव्यापाराणां तीरस्थवृक्ष इव विद्यया बाधेऽपि स्वव्यापारेणात्मनः कर्तृत्वं देहादिव्यापारेषु कारयितृत्वं च स्यादिति नेत्याह नैव कुर्वन्न कारयन् आस्त इति संबन्धः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.13।।एवमविद्वान्फलासक्त्यनासक्तिवशात्कर्मभिर्बध्यते न बध्यते चेत्युक्तम् विद्वांस्तु तद्विपरीत इत्याह सर्वकर्माणीति। वशी जितचित्तः समाधिस्थो योगी नवद्वारे नवैव पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि षष्ठः प्राणस्तेनैव तत्प्रवर्त्यानां कर्मेन्द्रियाणां संग्रहः। बुद्ध्यहंकारचित्तानीति नव। एतानि द्वाराणीव पुरपतेर्जीवस्य भोगार्थं विषयप्रवेशस्थानानि यस्मिन्नवद्वारे शरीराख्ये पुरे विचित्रवासनाकल्पितानन्तविषयवति अनेकैः कर्मसचिवैरधिष्ठिते सुखदुःखादिनानापण्यवति मनसा सर्वद्वारोद्धाटनकुञ्चिकया सह सर्वाणि कर्माणि पुरपतिरिव राजकार्याणि संन्यस्य सुखं निर्विकल्पसंविन्मात्ररूपेणास्ते। कर्माणि क्षेत्रस्यैव धर्मो नत्वात्मन इति क्षेत्रे त्यक्तुं शक्यान्येव। तथाच श्रुतिःशरीरे पाप्मनो हित्वा इति।यत्र सुहार्दः सुकृतो मदन्ते विहाय रोगं तन्वा्ँस्वायाम् इति च। देही सन् देहाभिमानकाले। व्युत्थानेऽपीत्यर्थः। तदापि नैव कुर्वन्नास्ते नापि कारयन्नास्ते राजेवामात्येषु निहितभारः। समाधौ क्षेत्रेण सहात्मनः संबन्धाभावदर्शनात्। यद्वा नवद्वाराणि चक्षुःश्रोत्रनासाबिलद्वन्द्वानि षट् सप्तमं मुखं अधस्तने द्वे इति। अस्मिन्पक्षे इन्द्रियाणि परिचारका बुद्धिरमात्योऽहंकारो युवराज इत्यादिकमूह्यम्। विदुषः कर्मसंबन्ध एव नास्ति दूरे तत्फलासक्त्यनासक्ती इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.13।।एवं भगवद्भक्तो भगवदाज्ञया कर्म कुर्वन् सुखमाप्नोति अयुक्तस्तु फलाशया कर्म कुर्वन् बद्धो भवतीत्युक्तं तत्र अभक्तस्य सर्वकर्मत्याग एवोत्तम इत्यर्जुनमनस्याभासं प्राप्य त्यागेऽपि भक्तानामेव सुखं नेतरेषामित्याह सर्वकर्माणीति। वशी भगवद्वशे स्थितः सर्वकर्माणि सन्नयस्य त्यक्त्वा नवद्वारे पुरे श्रवणादिकरणसमर्थे देहे देही भगवदर्थं देहाभिमानवान् सुखमास्ते तिष्ठति। मनसा नैव कुर्वन् स्वार्थाहङ्काराभावान्न किञ्चित्कुर्वन्। न वा ममताभावादन्येभ्यः৷৷৷৷৷৷৷৷. परोपकार उपदेशादिना कारयन् सुखमास्त इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.13।।एवं तावच्चित्तशुद्धिशून्यस्य संन्यासात्कर्मयोगो विशिष्यत इत्येतत्प्रपञ्चितम्। इदानीं शुद्धचित्तस्य संन्यासः श्रेष्ठ इत्याह सर्वकर्माणीति। वशी यतचित्तः। सर्वाणि कर्माणि विक्षेपकाणि मनसा विवेकयुक्तेन संन्यस्य सुखं यथा भवत्येवं ज्ञाननिष्ठः सन्नास्ते। क्वास्त इत्यत आह। नवद्वारे नेत्रे नासिके कर्णौ मुखं चेति सप्त शिरोगतानि अधोगते द्वे पायूपस्थरूपे इत्येवं नव द्वाराणि यस्मिंस्तस्मिन्पुरे पुरवदहंभावशून्ये देहे देही अवतिष्ठते। अहंकाराभावादेव स्वयं तेन देहेन नैव कुर्वन्ममकाराभावाच्च न कारयन्नित्यविशुद्धचित्ताद्ध्यावृत्तिरुक्ता। अविशुद्धचित्तो हि संन्यस्य पुनः करोति कारयति च। नत्वयं तथा। अतः सुखमास्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.13।।अतो योगे मनसैव कर्मत्यागः बाह्यतः कर्म करणं चाभिप्रेतम् अन्यथा मिथ्याचार इति तत्त्वं स्पष्टयति सर्वकर्माणीति। योगे समभूतेन मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं यथा भवति तथा स्वयं नैव कुर्वन्मनसा त्यागात् इन्द्रियैरपि न कारयन्निति साङ्ख्याद्भेदोऽपि सूचितः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.13।।परंतु जो यथार्थ ज्ञानी है वह ( वशी जितेन्द्रिय पुरुष ) समस्त कर्मोंको मनसे छोड़कर अर्थात् नित्य नैमित्तिक काम्य और निषिद्ध इन सब कर्मोंको कर्मादिमें अकर्मदर्शनरूप विवेकबुद्धिके द्वारा त्यागकर सुखपूर्वक स्थित हो जाता है। मन वाणी और शरीरकी चेष्टाको छोड़कर परिश्रमरहित प्रसन्नचित्त और आत्मासे अतिरिक्त अन्य सब बाह्य प्रयोजनोंसे निवृत्त हुआ ( वह ) सुखपूर्वक स्थित होता है ऐसे कहा जाता है। वशी जितेन्द्रिय पुरुष कहाँ और कैसे रहता है सो कहते हैं नौ द्वारवाले पुरमें रहता है। अभिप्राय यह कि दो कान दो नेत्र दो नासिका और एक मुख शब्दादि विषयोंको उपलब्ध करनेके ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं और मलमूत्रका त्याग करनेके लिये दो नीचेके अङ्गमें हैं इन नौ द्वारोंवाला शरीर पुर कहलाता है। शरीर भी एक पुरकी भाँति पुर है जिसका स्वामी आत्मा है उस आत्माके लिये ही जिनके सब प्रयोजन हैं एवं जो अनेक फल और विज्ञानके उत्पादक हैं उन इन्द्रिय मन बुद्धि और विषयरूप पुरवासियोंसे जो युक्त है उस नौ द्वारवाले पुरमें देही सब कर्मोंको छोड़कर रहता है। पू0 इस विशेषणसे क्या सिद्ध हुआ संन्यासी हो चाहे असंन्यासी सभी जीव शरीरमें ही रहते हैं। इस स्थलमें विशेषण देना व्यर्थ है। उ0 जो अज्ञानी जीव शरीर और इन्द्रियोंके संघातमात्रको आत्मा माननेवाले हैं। वे सब घरमें भूमिपर या आसनपर बैठता हूँ ऐसे ही माना करते हैं क्योंकि देहमात्रमें आत्मबुद्धियुक्त अज्ञानियोंको घरकी भाँति शरीरमें रहता हूँ यह ज्ञान होना सम्भव नहीं। परंतु देहादिसंघातसे आत्मा भिन्न है ऐसा जाननेवाले विवेकीको मैं शरीरमें रहता हूँ यह प्रतीति हो सकती है। तथा निर्लेप आत्मामें अविद्यासे आरोपित जो परकीय ( देहइन्द्रियादिके ) कर्म हैं उनका विवेकविज्ञानरूप विद्याद्वारा मनसे संन्यास होना भी सम्भव है। जिससे विवेकविज्ञान उत्पन्न हो गया है ऐसे सर्वकर्मसंन्यासीका भी घरमें रहनेकी भाँति नौ द्वारवाले शरीररूप पुरमें रहना प्रारब्धकर्मोंके अवशिष्ट संस्कारोंकी अनुवृत्तिसे बन सकता है क्योंकि शरीरमें ही प्रारब्धफलभोगका विशेष ज्ञान होना सम्भव है। अतः ज्ञानी और अज्ञानीकी प्रतीतिके भेदकी अपेक्षासे देहे एव आस्ते इस विशेषणका फल अवश्य ही है। यद्यपि कार्य करण और कर्म जो अविद्यासे आत्मामें आरोपित हैं उन्हें छोड़कर रहता है ऐसा कहा है तथापि आत्मासे नित्य सम्बन्ध रखनेवाले कर्तापन और करानेकी प्रेरकता ये दोनों भाव तो उस ( आत्मा ) में रहेंगे ही। इस शङ्कापर कहते हैं स्वयं न करता हुआ और शरीरइन्द्रियादिसे न करवाता हुआ अर्थात् उनको कर्मोंमें प्रवृत्त न करता हुआ ( रहता है )। पू0 जैसे गमन करनेवालेकी गति गमनरूप व्यापारका त्याग करनेसे नहीं रहती वैसे ही आत्मामें जो कर्तृत्व और कारयितृत्व हैं वह क्या आत्माके नित्य सम्बन्धी होते हुए ही संन्याससे नहीं रहते अथवा स्वभावसे ही आत्मामें नहीं हैं उ0 आत्मामें कर्तृत्व और कारयितृत्व स्वभावसे ही नहीं हैं क्योंकि यह आत्मा विकाररहित कहा जाता है। हे कौन्तेय यह आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है। ऐसा कह चुके हैं एवं ध्यान करता हुआसा क्रिया करता हुआसा। इस श्रुतिसे भी यही सिद्ध होता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.13।। व्याख्या   वशी देही इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिमें ममताआसक्ति होनेसे ही ये मनुष्यपर अपना अधिकार जमाते हैं। ममताआसक्ति न रहनेपर ये स्वतः अपने वशमें रहते हैं। सांख्ययोगीकी इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिमें ममताआसक्ति न रहनेसे ये सर्वथा उसके वशमें रहते हैं। इसलिये यहाँ उसे वशी कहा गया है।जबतक किसी भी मनुष्यका प्रकृतिके कार्य (शरीर इन्द्रियों आदि) के साथ किञ्चिन्मात्र भी कोई प्रयोजन रहता है तबतक वह प्रकृतिके अवश अर्थात् वशीभूत रहता है कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः (गीता 3। 5)। प्रकृति सदैव क्रियाशील रहती है। अतः प्रकृतिसे सम्बन्ध बना रहनेके कारण मनुष्य कर्मरहित हो ही नहीं सकता। परन्तु प्रकृतिके कार्य स्थूल सूक्ष्म और कारण तीनों शरीरोंसे ममताआसक्तिपूर्वक कोई सम्बन्ध न होनेसे सांख्ययोगी उनकी क्रियाओंका कर्ता नहीं बनता। यद्यपि सांख्ययोगीका शरीरके साथ किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं होता तथापि लोगोंकी दृष्टिमें वह शरीरधारी ही दीखता है। इसलिये उसे देही कहा गया है।नवद्वारे पुरे शब्दादि विषयोंका सेवन करनेके लिये दो कान दो नेत्र दो नासिकाछिद्र तथा एक मुख ये सात द्वार शरीरके ऊपरी भागमें हैं और मलमूत्रका त्याग करनेके लिये गुदा और उपस्थ ये दो द्वार शरीरके निचले भागमें हैं। इन नौ द्वारोंवाले शरीरको पुर अर्थात् नगर कहनेका तात्पर्य यह है कि जैसे नगर और उसमें रहनेवाला मनुष्य दोनों अलगअलग होते हैं ऐसे ही यह शरीर और इसमें रहनेका भाव रखनेवाला जीवात्मा दोनों अलगअलग हैं। जैसे नगरमें रहनेवाला मनुष्य नगरमें होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ नहीं मानता ऐसे ही सांख्ययोगी शरीरमें होनेवाली क्रियाओंको अपनी क्रियाएँ नहीं मानता।सर्वकर्माणि मनसा संन्यस्य इसी अध्यायके आठवेंनवें श्लोकोंमें शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि और प्राणोंके द्वारा होनेवाली जिन तेरह क्रियाओँका वर्णन हुआ है उन सब क्रियाओंका बोधक यहाँ सर्वकर्माणि पद है।यहाँ मनसा संन्यस्य पदोंका अभिप्राय है विवेकपूर्वक मनसे त्याग करना। यदि इन पदोंका अर्थ केवल मनसे त्याग करना माना जाय तो दोष आता है क्योंकि मनसे त्याग करना भी मनकी एक क्रिया है और गीता मनसे होनेवाली क्रियाको कर्म मानती है शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः (18। 15)। शरीरसे होनेवाली क्रियाओंके कर्तापनका मनसे त्याग करनेपर भी मनकी (त्यागरूप) क्रियाका कर्तापन तो रह ही गया अतः मनसा संन्यस्य पदोंका तात्पर्य है विवेकपूर्वक मनसे क्रियाओंके कर्तापनका त्याग करना अर्थात् कर्तापनसे माने हुए सम्बन्धका त्याग करना। जहाँसे कर्तापनका सम्बन्ध माना है वहींसे उस सम्बन्धका त्याग करना है। सांख्ययोगी अपनेमें कर्तापन न मानकर उसे शरीरमें ही छोड़ देता है अर्थात् कर्तापन शरीरमें ही है अपनेमें कभी नहीं।नैव कुर्वन्न कारयन् सांख्ययोगीमें कर्तृत्व और कारयितृत्व दोनों ही नहीं होते अर्थात् वह करनेवाला भी नहीं होता और करवानेवाला भी नहीं होता।शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिसे किञ्चिन्मात्र भी अहंताममताका सम्बन्ध न होनेके कारण सांख्ययोगीउनके द्वारा होनेवाली क्रियाओंका कर्ता अपनेको कैसे मान सकता है अर्थात् कभी नहीं मान सकता। इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें भी नैव किञ्चित् करोमि पदोंसे यही बात कही गयी है। तेरहवें अध्यायके इकतीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति पदोंसे कहा है कि शरीरमें रहते हुए भी यह अविनाशी आत्मा कुछ नहीं करता।यहाँ शङ्का होती है कि जीवात्मा स्वयं कोई कर्म नहीं करता किन्तु वह प्रेरक बनकर कर्म तो करवा सकता है इसका समाधान यह है कि जैसे सूर्यभगवान्का उदय होनेपर सम्पूर्ण जगत्में प्रकाश छा जाता है लोग अपनेअपने कामोंमें लग जाते हैं कोई खेती करता है कोई वेदपाठ करता है कोई व्यापार करता है आदि। परन्तु सूर्यभगवान् विहित या निषिद्ध किसी भी क्रियाके प्रेरक नहीं होते। उनसे सबको प्रकाश मिलता है पर उस प्रकाशका कोई सदुपयोग करे या दुरुपयोग इसमें सूर्यभगवान्की कोई प्रेरणा नहीं है। यदि उनकी प्रेरणा होती तो पाप या पुण्यकर्मोंका भागी भी उन्हींको होना पड़ता। ऐसे ही चेतनतत्त्वसे प्रकृतिको सत्ता और शक्ति तो प्राप्त होती है पर वह किसी क्रियाका प्रेरक नहीं होता। यही बात भगवान्ने यहाँ न कारयन् पदोंसे कही है।आस्ते सुखम् मनुष्यमात्रकी स्वरूपमें स्वाभाविक स्थिति है परन्तु वे अपनी स्थिति शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिमें मान लेते हैं जिससे उन्हें इस स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं होता। परन्तु सांख्ययोगीको निरन्तर स्वरूपमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव होता रहता है। स्वरूप सदासर्वदा सुखस्वरूप है। वह सुख अखण्ड एकरस और परिच्छिन्नतासे रहित है।एक वस्तुकी दूसरी वस्तुमें जैसी स्थिति होती है स्वरूपमें वैसी स्थिति नहीं होती। कारण कि स्वरूप ज्योंकात्यों विद्यमान रहता है। उस स्वरूपमें मनुष्यकी स्थिति स्वतःस्वाभाविक है अतः उसमें स्थित होनेमें कोई श्रम उद्योग नहीं है। स्वरूपको पहचाननेपर एक स्वरूपहीस्वरूप रह जाता है। पहचानमात्रको समझानेके लिये ही यहाँ आस्ते पदका प्रयोग हुआ है। इसे ही चौदहवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें स्वस्थः पदसे कहा गया है।यहाँ आस्ते क्रिया जिस तत्त्वकी सत्ताको प्रकट कर रही है वह सब आधारोंका आधार है। समस्त उत्पन्न तत्त्व उस अनुत्पन्न तत्त्वके आश्रित हैं। उस सर्वाधिष्ठानरूप तत्त्वको किसी आधारकी आवश्यकता ही क्या है उस स्वतःसिद्ध तत्त्वमें स्वाभाविक स्थितिको ही यहाँ आस्ते पदसे कहा गया है। इसे ही आगे बीसवें श्लोकमें ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः पदोंसे कहा गया है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें कहा गया कि सांख्ययोगी न तो कर्म करता है और न करवाता ही है किन्तु भगवान् तो कर्म करवाते होंगे इसके उत्तरमें आगेका श्लोक कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.13।।सर्वेति। यथा वेश्मान्तर्गतस्य पुंसो न गृहगतैर्जीर्णत्वादिभिः योगः एवं मम चक्षुरादिच्छिद्रगवाक्षनवकालंकृतदेहगेहगतस्य न तद्धर्मयोगः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.13।।तर्हि फले सक्तिं त्यक्त्वा सर्वैरपि कर्तव्यमिति कर्मसंन्यासस्य निरवकाशत्वमित्याशङ्क्याऽविदुषः सकाशाद्विदुषो विशेषं दर्शयति यस्त्विति। सर्वकर्मपरित्यागे प्राप्तं मरणं व्यावर्तयति आस्त इति। वृत्तिं लभमानोऽपि शरीरतापेनाध्यात्मिकादिना तप्यमानस्तिष्ठतीति चेन्नेत्याह सुखमिति। कार्यकरणसंघातपारवश्यं पर्युदस्यति वशीति। आसनस्यापेक्षितमधिकरणं निर्दिशति नवेति। देहसंबन्धाभिमानाभासवत्त्वमाह देहीति। मनसा सर्वकर्मसंन्यासेऽपि लोकसंग्रहार्थं बहिः सर्वं कर्म कर्तव्यमिति प्राप्तं प्रत्याह नैवेति। तान्येव सर्वाणि कर्माणि परित्याज्यानि विशिनष्टि नित्यमिति। तेषां परित्यागे हेतुमाह तानीति। यदुक्तं सुखमास्त इति तदुपपादयति त्यक्तेति। जितेन्द्रियत्वं कायवशीकारस्याप्युपलक्षणम् द्वे श्रोत्रे द्वे चक्षुषी द्वे नासिके वागेकेति सप्त शीर्षण्यानि शिरोगतानि शब्दाद्युपलब्धिद्वाराणि। अथापि कथं नवद्वारत्वमधोगताभ्यां पायूपस्थाभ्यां सहेत्याह अर्वागिति। शरीरस्य पुरसाम्यं स्वामिना पौरैश्चाधिष्ठितत्वेन दर्शयति आमेत्यादिना। यद्यपि देहे जीवनत्वाद्देहसंबन्धाभिमानाभासवानवतिष्ठते तथापि प्रवासीव परगेहे तत्पूजापरिभवादिभिरप्रहृष्यन्नविषीदन्व्यामोहादिरहितश्च तिष्ठतीति मत्वाह तस्मिन्निति। विशेषणमाक्षिपति किमिति। तदनुपपत्तिमेव दर्शयति सर्वो हीति। सर्वसाधारणे देहावस्थाने संन्यस्य देहे तिष्ठति विद्वानिति विशेषणमकिंचित्करमिति फलितमाह तत्रेति। विशेषणफलं दर्शयन्नुत्तरमाह उच्यत इति। किमविवेकिनं प्रति विशेषणानर्थक्यं चोद्यते किं वा विवेकिनं प्रतीति विकल्प्याद्यमङ्गीकरोति यस्त्विति। अज्ञत्वं देहित्वेहेतुः। तदेव देहित्वं स्फुटयति देहेति। संघातात्मदर्शिनोऽपि देहे स्थितिप्रतिभासः स्यादिति चेन्नेत्याह नहीति। द्वितीयं दूषयति देहादीति। गृहादिषु देहस्यावस्थानेनात्मावस्थानभ्रमव्यावृत्त्यर्थं देहे विद्वानास्त इति विशेषणमुपपद्यते विवेकवतो देहेऽवस्थानप्रतिभाससंभवादित्यर्थः। ननु विवेकिनो देहावस्थानप्रतिभानेऽपि वाङ्मनोदेहव्यापारात्मनां कर्मणां तस्मिन्प्रसङ्गाभावात्तत्त्यागेन कुतस्तस्य देहेऽवस्थानमुच्यते तत्राह परकर्मणां चेति। ननु विवेकिनो दिगाद्यनवच्छिन्नबाह्याभ्यन्तराविक्रियब्रह्मात्मतां मन्यमानस्य कुतो देहेऽवस्थानमास्थातुं शक्यते तत्राह उत्पन्नेति। तत्र हेतुमाह प्रारब्धेति। यदि प्रारब्धफलं धर्माधर्मात्मकं कर्म तस्योपभुक्तस्य शेषादनुपभुक्ताद्देहादिसंस्कारोऽनुवर्तते तदनुवृत्त्या च तत्रैव देहे विशेषविज्ञानमवस्थानविषयमुपपद्यतेऽतो विवेकवतः संन्यासिनो देहेऽवस्थानव्यपदेशः संभवतीत्यर्थः। अविद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणासंभवेऽपि विद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणमर्थवदित्युपसंहरति देह एवेति। देहे स्वावस्थानविषयो विद्वत्प्रत्ययस्तदविषयश्चाविद्वत्प्रत्ययस्तयोरेवं भेदे विद्वत्प्रत्ययापेक्षया विशेषणमर्थवदित्युपसंहरन्नेव हेतुं विशदयति विद्वदिति। आरोपितकर्तृत्वाद्यभावेऽपि स्वगतकर्तृत्वादि दुर्वारमित्याशङ्कामनूद्य दूषयति यद्यपीत्यादिना। क्रियासु प्रवर्तयन्नास्त इति पूर्वेण संबन्धः। पूर्वस्यापि शतुरेवमेव संबन्धः। कर्तृत्वं कारयितृत्वं चात्मनो नेत्यत्र विचारयति किमिति। यत्कर्तृत्वं कारयितृत्वं च तत्किं देहिनः स्वात्मसमवायि सदेव संन्यासान्न भवतीत्युच्यते यथा गच्छतो देवदत्तस्य स्वगतैव गतिस्तत्स्थित्या त्यागान्न भवत्यथ वा स्वारस्येन कर्तृत्वं कारयितृत्वं चात्मनो नास्तीति वक्तव्यमाद्ये सक्रियत्वं द्वितीये कूटस्थत्वमित्यर्थः। द्वितीयं पक्षमाश्रित्योत्तरमाह अत्रेति। उक्तेऽर्थे वाक्योपक्रममनुकूलयति उक्तं हीति। तत्रैव वाक्यशेषमपि संवादयति शरीरस्थोऽपीति। स्मृत्युक्तेऽर्थे श्रुतिमपि दर्शयति ध्यायतीवेति। उपाधिगतैव सर्वा विक्रिया नात्मनि स्वतोऽस्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.13।।सर्वकर्माणि इत्यस्य स्वरूपेण कर्मत्यागोऽर्थ इति प्रतीतिनिवारणाय प्रतिपाद्यमाह पुनरिति। प्राक्कर्तृत्वाभिमानत्याग उक्तः इदानीं तु कारयितृत्वाभिमानत्यागोऽपीति स्पष्टनम्। स्वरूपेण कर्मत्याग एवोच्यत इत्येतन्निराचष्टे मनसेति। अन्यथा तद्व्यर्थं स्यादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.13।।पुनः सन्न्यासशब्दार्थं स्पष्टयति सर्वकर्माणीति। मनसेति विशेषणादभिमानत्यागः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.13।।आत्मनः प्राचीनकर्ममूलदेहसम्बन्धप्रयुक्तम् इदं कर्मणां कर्तृत्वं न स्वरूपप्रयुक्तम् इति विवेकविषयेण मनसा सर्वाणि कर्माणि नवद्वारे पुरे सन्यस्य वशी देही स्वयं देहाधिष्ठानप्रयत्नम् अकुर्वन् देहेन न एव कारयन् सुखम् आस्ते।साक्षाद् आत्मनः स्वाभाविकरूपम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.13।। सर्वाणि कर्माणि सर्वकर्माणि संन्यस्य परित्यज्य नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रतिषिद्धं च तानि सर्वाणि कर्माणि मनसा विवेकबुद्ध्या कर्मादौ अकर्मसंदर्शनेन संत्यज्येत्यर्थः आस्ते तिष्ठति सुखम्। त्यक्तवाङ्मनःकायचेष्टः निरायासः प्रसन्नचित्तः आत्मनः अन्यत्र निवृत्तसर्वबाह्यप्रयोजनः इति सुखम् आस्ते इत्युच्यते। वशी जितेन्द्रिय इत्यर्थः। क्व कथम् आस्ते इति आह नवद्वारे पुरे। सप्त शीर्षण्यानि आत्मन उपलब्धिद्वाराणि अवाग् द्वे मूत्रपुरीषविसर्गार्थे तैः द्वारैः नवद्वारं पुरम् उच्यते शरीरम् पुरमिव पुरम् आत्मैकस्वामिकम् तदर्थप्रयोजनैश्च इन्द्रियमनोबुद्धिविषयैः अनेकफलविज्ञानस्य उत्पादकैः पौरैरिव अधिष्ठितम्। तस्मिन् नवद्वारे पुरे देही सर्वं कर्म संन्यस्य आस्ते किं विशेषणेन सर्वो हि देही संन्यासी असंन्यासी वा देहे एव आस्ते तत्र अनर्थकं विशेषणमिति। उच्यते यस्तु अज्ञः देही देहेन्द्रियसंघातमात्रात्मदर्शी स सर्वोऽपि गेहे भूमौ आसने वा आसे इति मन्यते। न हि देहमात्रात्मदर्शिनः गेहे इव देहे आसे इति प्रत्ययः संभवति। देहादिसंघातव्यतिरिक्तात्मदर्शिनस्तु देहे आसे इति प्रत्ययः उपपद्यते। परकर्मणां च परस्मिन् आत्मनि अविद्यया अध्यारोपितानां विद्यया विवेकज्ञानेन मनसा संन्यास उपपद्यते। उत्पन्नविवेकज्ञानस्य सर्वकर्मसंन्यासिनोऽपि गेहे इव देहे एव नवद्वारे पुरे आसनम् प्रारब्धफलकर्मसंस्कारशेषानुवृत्त्या देह एव विशेषविज्ञानोत्पत्तेः। देहे एव आस्ते इति अस्त्येव विशेषणफलम् विद्वदविद्वत्प्रत्ययभेदापेक्षत्वात्।।यद्यपि कार्यकरणकर्माणि अविद्यया आत्मनि अध्यारोपितानि संन्यस्यास्ते इत्युक्तम् तथापि आत्मसमवायि तु कर्तृत्वं कारयितृत्वं च स्यात् इति आशङ्क्य आह नैव कुर्वन् स्वयम् न च कार्यकरणानि कारयन् क्रियासु प्रवर्तयन्। किं यत् तत् कर्तृत्वं कारयितृत्वं च देहिनः स्वात्मसमवायि सत् संन्यासात् न संभवति यथा गच्छतो गतिः गमनव्यापारपरित्यागे न स्यात् तद्वत् किं वा स्वत एव आत्मनः न अस्ति इति अत्र उच्यते न अस्ति आत्मनः स्वतः कर्तृत्वं कारयितृत्वं च। उक्तं हि अविकार्योऽयमुच्यते (गीता 2.25) शरीरस्थोऽपि न करोति न लिप्यते (गीता 13.31) इति। ध्यायतीव लेलायतीव (बृ0 उ0 4.34) इति श्रुतेः।।किञ्च

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【 Verse 5.14 】

▸ Sanskrit Sloka: न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभु: | न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ||

▸ Transliteration: na kartṛtvaṁ na karmāṇi lokasya sṛjati prabhuḥ | na karmaphalasaṁyogaṁ svabhāvas tu pravartate ||

▸ Glossary: na: never; kartṛtvaṁ: of doing; na: not; karmāṇi: activities; lokasya: of the people; sṛjati: creates; prabhuḥ: master; na: not; karma: activities; phala: fruit; saṁyogaṁ: connection; svabhāvaḥ: nature; tu: but; pravartate: act

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.14 The master does not create activities nor makes people do nor connects with the outcome of the actions. All this is enacted by the material nature.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.14।।परमेश्वर मनुष्योंके न कर्तापनकी न कर्मोंकी और न कर्मफलके साथ संयोगकी रचना करते हैं किन्तु स्वभाव ही बरत रहा है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.14।। लोकमात्र के लिए प्रभु (ईश्वर) न कर्तृत्व न कर्म और न कर्मफल के संयोग को रचता है। परन्तु प्रकृति (सब कुछ) करती है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.14 न not? कर्तृत्वम् agency? न not? कर्माणि actions? लोकस्य for this world? सृजति creates? प्रभुः the Lord? न not? कर्मफलसंयोगम् union with the fruits of actions? स्वभावः nature? तु but? प्रवर्तते leads to action.Commentary The Lord does not create agency or doership. He does not press anyone to do actions. He never tells anyone? Do this or do that. He does not bring about the union with the fruit of actions. It is Prakritit or Nature that does everything. (Cf.III.33)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.14. The Lord (Self) acires neither the state of being a creator of the world, nor the actions, nor the connecting with the fruits of their actions. But it is the inherent nature [in It] that exerts.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.14 The Lord of this universe has not ordained activity, or any incentive thereto, or any relation between an act and its consequences. All this is the work of Nature.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.14 The lord of the body (the self i.e., the Jiva) does not create agency, nor actions, nor union with the fruits of actions in relation to the world of selves. It is only the inherent tendencies that function.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.14 The Self does not create agentship or any objects (of desire) for anyone; nor association with the results of actions. But it is Nature that acts.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.14 Neither agency nor actions does the Lord create for the world, nor union with the fruits of actions. But it is Nature that acts.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.14 Na kartrtvam etc. This Soul does not do anything for anything. But, Its exertion is only Its inherent nature and it is not due to any desire for results. For, the Bhagavat, the Conscious Energy Itself Whose ultimately true inherent nature is the Illumination-Bliss-Freedom-of-Will, and Which brings out, merely by Its own nature, the continuous series of creation, manitenance and withdrawl of all (the Universe); hence in It, there is never a departure, even to a little extent, from Its own inherent nature. Hence there is no such thing as a particular stage of being a creator i.e., a creatorhood separate [from Itself]. Because that does not exist, what actions can be there ? If actions are not there, the fruit is to be of what or for whom ? Then what connection could be three with the fruit of action ?

[Further], 'action' in this context is [only] the kriya-[sakti] or creative energy [which is nothing but His will], and 'result of action' too in only the fruit of this kriya. For example, the activity like rotating the [potter's] wheel by the stick is not [actually] different [from what is to be created i.e., the pot]. Nor the creator of the pot is different from it. For, all exist within the Conscious Energy. Therefore, it is only the Animate Sovereign Supreme Lord that manifests in this and that form. Therefore there exist no activity and its result etc., apart from That. This is demonstrated conclusion [of the scriptures]. So, if there is no activity or its result [as stated above], then even the result, ordained in [the scriptural] injunctions cannot have a status of being produced by the unseen [cause]. After saying this in the other first hemistich [of the following verse], the Lord justifies in the other hemistich the same statement with reference to the men of mundane life :-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.14 When the world of embodied selves exists in conjunction with the Prakrti in the form of gods, animals, men, immobile things etc., the master (Prabhu i.e., the Jiva who is the master of the body), who is not subject to Karma and is established in Its own essential nature, does not bring about: (i) the agency of gods, men etc. (ii) their manifold and particular actions and (iii) their connection with the fruits in the form of embodiment as gods etc., resulting from their actions. Who then brings about agency etc.? It is only the tendencies that act. A tendency (Svabhava) is subtle impressions (Vasanas) originating from Prakrti. The meaning is that agency, etc., do not originate from the natural or pristine condition of the self but are generated by the subtle impressions created by misconceiving those forms of Prakrti etc., as of the self. This is the result of the conjunction of the self with Prakrti in the form of gods, etc., which has been generated by the flow of previous Karmas brought about in beginningless time.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.14 Prabhuh, the Self; na srjati, does not create; lokasya, for anyone; kartrtvam, agentship, by saying 'Do this'; or even karmani, any objects-such objects as chariot, pot, palace, etc. which are intensely longed for; nor even karma-phala-samyogam, association with the results of actions-association of the creator of a chariot etc. with the result of his work. Objection: If the embodied one does not do anything himself, and does not make others do, then who is it that engages in work by doing and making others do? The answer is: Tu, but; it is svabhavah, Nature- one's own (sva) nature (bhava)-characterized as ignorance, Maya, which will be spoken of in, 'Since this divine Maya' (7.14); pravartate, that acts. But from the highest standpoint-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.14।। वेदों में ईश्वर के विषय में प्रतिपादन करते हुये कहा गया है कि वह सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् सर्वद्रष्टा कर्माध्यक्ष और कर्मफलदाता है जो समस्त जीवों को उनके कर्मों के अनुसार ही न्यायपूर्वक फल प्रदान करता है। यहाँ परमात्मा का वर्णन जगत् के साथ उसके सम्बन्ध को दिखाकर किया गया है।परमात्मा न कर्तृत्व को उत्पन्न करता है और न ही

Chapter 5 (Part 9)

कर्मों का अनुमोदन करता है। कर्म का फल के साथ संयोग कराना यह भी उसका कार्य नहीं।अनेक व्याख्याकारों के मतानुसार इस श्लोक में प्रभु शब्द से कर्माध्यक्ष कर्मफलदाता ईश्वर को सूचित किया गया है परन्तु भगवान् के कथन से उनके मत की पुष्टि नहीं होती। विचार करने पर कोई भी विद्यार्थी स्पष्ट रूप से समझ सकता है कि यहाँ भगवान अर्जुन को निरुपाधिक चैतन्य आत्मा का स्वरूप समझाने का प्रयत्न कर रहे हैं। यहाँ आत्मा का तीन शरीरों स्थूल सूक्ष्म और कारण के साथ सम्बन्ध बताया गया है।यदि श्रीकृष्ण के कथन के अनुसार आत्मा का कर्तृत्व कर्म और कर्मफल संयोग से कोई सम्बन्ध नहीं है तब हमारे जीवन का भी आत्मा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होना चाहिये क्योंकि कर्तृत्वादि से भिन्न हमारे जीवन का अस्तित्व ही नहीं है। तथापि आत्मा के अभाव में किसी भी वस्तु का न अस्तित्व है और न क्रियारूप व्यापार। इसलिये आत्मा और अनात्मा के बीच किसीनकिसी प्रकार का सम्बन्ध होना अनिवार्य है और उस विचित्र सम्बन्ध रहित सम्बन्ध का वर्णन यहाँ किया गया है।यह तो सर्वविदित है कि मनुष्य की नाक अपनी जगह पर सुस्थिर रहती है। उसमें स्वेच्छा से अथवा अनिच्छा से गति नहीं होती। और फिर भी यदि कोई व्यक्ति जल में अपने मुख को देखते हुये यह पाये कि उसकी नाक किसी कील पर लटकी हुयी वस्तु के समान हिल रही है तब वह क्या सोचेगा वह जानेगा कि नाक अपने स्थान पर सुस्थित है तथापि जल में वह उसे हिलती दिखाई दे रही है। स्पष्ट है कि चेहरे के प्रतिबिम्ब की स्थिति जल की स्थिति पर निर्भर करती है। आत्मा में न कर्तृत्व है और न क्रिया परन्तु उपाधियों में व्यक्त आत्मा जिसे जीव कहते हैं के लिए कर्तृत्व कर्म और फल संयोग प्राप्त हो जाते हैं।विद्युत स्वयं स्थिर शक्ति है। उसके उत्पादन के पश्चात् उसका वितरण करने पर अनेक प्रकार के उपकरणों के माध्यम से वह अनेक रूपों में व्यक्त होती है। चैतन्यस्वरूप आत्मा भी जड़ उपाधियों से परिच्छिन्नसा हुआ कर्तृत्वादि को प्राप्त होता है।कर्मों का कर्ता और भोक्ता जीव है आत्मा नहीं। स्वभाव अर्थात् त्रिगुणात्मिका माया के सम्बन्ध से ही आत्मा में कर्तृत्व और भोक्तृत्वादि गुण प्रतीत होते हैं।पारमार्थिक दृष्टि से आत्मा प्रकृति के गुणों से सर्वथा निर्लिप्त ही है। भगवान् कहते है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.14।।नैव कुर्वन्न कारयन्नित्युक्तं प्रपञ्चयति नेति। प्रभुरात्मा लोकस्य देहादेः कर्तृत्वं न सृजति न घटप्रासादादीनि कर्माणि नापि घटादिकृतवतस्तत्फलेन संयोगम्। अनेन भोजयितृत्वमप्यात्मनो वारितम्। उपलक्षणमेतत् भोक्तृत्वस्य। विविधनिषेधस्यापि तर्हि कस्य कर्तृत्वादिकमित्यपेक्षायामाह। स्वभावोऽविद्यालक्षणा प्रकृतिर्माया कुर्वन्कारयन्प्रवर्तते। यत्तु स्वस्मिन् भावस्यापि आरोपिता सत्ताऽस्येति स्वभावोऽन्तःकरणं तदेव प्रवर्तते कृत्यै मुक्त्यै वेत्यर्थ इति। तन्न अन्तःकरणस्यापि प्रकृत्यधीनप्रवृत्तिकत्वेन साकाङ्क्षायाः क्लिष्टकल्पनाया अन्याय्यत्वात्।नन्वेष साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष एवासाधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्योऽधो निनीषते इत्यादिश्रुतेःअज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः। ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा।। इतिस्मृतेश्च परमेश्वरेणैव शुभाशुभफलेषु कर्मसु कर्तृत्वेन प्रयुज्यमानः अस्वतन्त्रः पुरुषः कथं तानि कर्माणि त्यजेत। ईश्वरेणऐव ज्ञानमार्गे प्रयुज्यमानस्त्यक्ष्यतीति चेत्। एवंसतिवैषम्यनैर्घृण्याभ्यां प्रयोजककर्तृत्वादीश्वरस्यापि पुण्यपापसंबन्धः स्यादित्याशङ्क्याह नेति। द्वाभ्यामित्येवभुत्थाप्यायमपि श्लोको भाष्यकृद्भिरीश्वरत्वेन कुतो न व्याख्यात इति चेत् अतीतानन्तरश्लोकेन क्लिष्टकल्पनां विनैव संगतिसंभवमभिप्रेत्येति गृहाण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.14।।देवदत्तस्य स्वगतैव गतिर्यथा स्थितौ न भवति एवमात्मनोऽपि कर्तृत्वं कारयितृत्वं च स्वगतमेव सत्संन्यासे सति न भवति अथवा नभसि तलमलिनतादिवद्वस्तुवृत्त्या तत्र नास्त्येवेति संदेहापोहायाह लोकस्य देहादेः कर्तृत्वं प्रभुरात्मा स्वामी न सृजति त्वं कुर्विति नियोगेन तस्य कारयिता न भवतीत्यर्थः। नापि लोकस्य कर्माणीप्सिततमानि घटादीनि स्वयं सृजति कर्तापि न भवतीत्यर्थः। नापि लोकस्य कर्म कृतवतस्तत्फलसंबन्धं सृजति भोजयितापि भोक्तापि न भवतीत्यर्थः।स समानः सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव सुधीः इत्यादिश्रुतेः। अत्रापिशरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते इत्युक्तेः यदि किंचिदपि स्वतो न कारयति न करोति चात्मा कस्तर्हि कारयन्कुर्वंश्च प्रवर्तत इति तत्राह स्वभावस्तु अज्ञानात्मिका दैवी माया प्रकृतिः प्रवर्तते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.14।।नन्वेवं भृत्यवत्कर्तृत्वं स्वामिवत्कारयितृत्वं वास्य मास्तु। अयस्कान्तवदविकारस्यैव सतः कर्त्रादिधर्मकाहंकारादिप्रवर्तकत्वमस्त्वित्याशङ्क्याह न कर्तृत्वमिति। कर्तृत्वमहंकारस्य कर्माणीन्द्रियाणां वचनादानादीनि श्रवणदर्शनादीनि च। लोकस्य लोक्यते प्रकाश्यत इति लोको जडवर्गः प्रभुश्चिदात्मा सूर्य इवास्मदादीनां प्रकाशकोऽपि न कर्मादौ प्रवर्तकस्तद्वदस्य कर्मफलसंयोगं वा न सृजति किंतु यो यादृक् यस्य स्वभावः स तथा प्रवर्तते। यथा सूर्येऽभ्युदिते कमलानां विकसनं कुमुदानामुन्मुद्रणं चेति तद्वदेवमात्मनि प्रकाशमाने घटादयो न चेष्टन्ते मनुष्यादयस्तु चेष्टन्ते। नत्वात्मा कस्यचित्प्रवर्तको निवर्तको वा। लोहायस्कान्तयोरिव सत्यानृतयोरात्मानात्मनोः संबन्धाभावादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.14।।ननूपदेशादिना कारणे को दोषः इति चेत्तत्राह न कर्तृत्वमिति। प्रभुः ईश्वरः लोकस्य कर्तृत्वं न सृजति न कर्माणि सृजति न वा कर्मफलसंयोगं सृजति। अतः स्वयमपि किमिति तथोपदिशेदिति भावः। नन्वीश्वरोत्पादनाभावे लोकः कथं प्रवर्तते इत्यत आह स्वभावस्तु प्रवर्तत इति। जीवस्य स्वभावः प्रकृत्यात्मकः प्रवर्त्तते कर्तृत्वादिरूपेण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.14।।ननुएष एव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष एवासाधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्योऽधो निनीषते इत्यादिश्रुतेः परमेश्वरेणैव शुभाशुभफलेषु कर्मसु कर्तृत्वेन प्रयुज्यमानोऽस्वतन्त्रः पुरुषः कथं तानि कर्माणि त्यजेत्। ईश्वरेणैव ज्ञानमार्गे प्रयुज्यमानः शुभान्यशुभानि च त्यक्ष्यतीति चेत् एवं सति वैषम्यनैर्घृण्याभ्यां प्रयोजककर्तृत्वादीश्वरस्यापि पुण्यपापसंबन्धः स्यादित्याशङ्क्याह न कर्तृत्वमिति द्वाभ्याम्। प्रभुरीश्वरः जीवलोकस्य कर्तृत्वादिकं न सृजति किंतु जीवस्यैव स्वभावोऽविद्यैव कर्तृत्वादिरूपेण प्रवर्तते। अनाद्यविद्याकामवशात्प्रवृत्तिस्वभावं जीवलोकमीश्वरः कर्मसु नियुङ्क्ते न तु स्वयमेव कर्तृत्वादिकमुत्पादयतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.14।।किञ्चआत्मैव ह्यात्मनो बन्धुः 6।5 इत्युक्तत्वादात्मन एव निरोधे समत्वे सर्वं सेत्स्यतीति। अन्यथा कर्तृत्वाद्यहङ्कारादिना मिथ्याचरणमेव भविष्यति। तत्र च हेतुरात्मैव नान्यः सोऽपि प्राकृतस्वभावमय इति तन्निरोधं दृढयितुं सिद्धान्तमाह न कर्तृत्वमिति। प्रभुरीश्वरः परमात्मा लोकस्य प्राकृतशरीराभिमानिनः नानायोनिबीजाशयस्वभावकृतिकस्य कर्तृत्वं कर्माणि तत्फलसंयोगं च न सृजति। किन्तु तादृशः स्वभावो लोकनिष्ठः स्वत एव प्रवर्तते। अन्यथा परमात्मनो वैषम्यनैर्घृण्यप्रसङ्गः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.14।।देहादिका स्वामी आत्मा न तो तू अमुक कर्म कर इस प्रकार लोगोंके कर्तापनको उत्पन्न करता है और न रथ घट महल आदि कर्म जो अत्यन्त इष्ट हैं उनको रचता है तथा न रथादि बनानेवालेका उसके कर्मफलके साथ संयोग ही रचता है यदि यह देहादिका स्वामी आत्मा स्वयं कुछ भी नहीं करताकराता तो फिर यह सब कौन कर रहा और करा रहा है इसपर कहते हैं स्वभाव ही बर्तता है अर्थात् जो अपना भाव है अविद्या जिसका स्वरूप है जो दैवी हि इत्यादि श्लोकोंसे आगे कही जानेवाली है वह प्रकृति यानी माया ही सब कुछ कर रही है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.14।। व्याख्या   न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः सृष्टिकी रचनाका कार्य सगुण भगवान्का है इसलिये प्रभुः पद दिया है। भगवान् सर्वसमर्थ हैं और सबके शासक नियामक हैं। सृष्टिरचनाका कार्य करनेपर भी वे अकर्ता ही हैं (गीता 4। 13)।किसी भी कर्मके कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ नहीं है। मनुष्य स्वयं ही कर्मोंके कर्तापनकी रचना करता है। सम्पूर्ण कर्म प्रकृतिके द्वारा किये जाते हैं परन्तु मनुष्य अज्ञानवश प्रकृतिसे तादात्म्य कर लेता है और उसके द्वारा होनेवाले कर्मोंका कर्ता बन जाता है (गीता 3। 27)। यदि कर्तापनका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ होता तो भगवान् इसी अध्यायके आठवें श्लोकमें नैव किञ्चित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित् ऐसा कैसे कहते तात्पर्य यह है कि कर्तापन भगवान्का बनाया हुआ नहीं है अपितु जीवका अपना माना हुआ है। अतः जीव इसका त्याग कर सकता है।भगवान् ऐसा विधान भी नहीं करते कि अमुक जीवको अमुक शुभ अथवा अशुभ कर्म करना प़ड़ेगा। यदि ऐसा विधान भगवान् कर देते तो विधिनिषेध बतानेवाले शास्त्र गुरु शिक्षा आदि सब व्यर्थ हो जाते उनकी कोई सार्थकता ही नहीं रहती और कर्मोंका फल भी जीवको नहीं भोगना पड़ता। न कर्माणि पदोंसे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य कर्म करनेमें स्वतन्त्र है।न कर्मफलसंयोगम् जीव जैसा कर्म करता है वैसा फल उसे भोगना पड़ता है। जड होनेके कारण कर्म स्वयं अपना फल भुगतानेमें असमर्थ हैं। अतः कर्मोंके फलका विधान भगवान् करते हैं लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान् (गीता 7। 22)। भगवान् कर्मोंका फल तो देते हैं पर उस फलके साथ सम्बन्ध भगवान् नहीं जोड़ते प्रत्युत जीव स्वयं जोड़ता है। जीव अज्ञानवश कर्मोंका कर्ता बनकर और कर्मफलमें आसक्त होकर कर्मफलके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ लेता है और इसीसे सुखीदुःखी होता है। यदि वह कर्मफलके साथ स्वयं अपना सम्बन्ध न जोड़े तो वह कर्मफलके सम्बन्धसे मुक्त रह सकता है। ऐसे कर्मफलसे सम्बन्ध न जोड़नेवाले पुरुषोंके लिये अठारहवें अध्यायके बारहवें श्लोकमें संन्यासिनाम् पद आया है। उन्हें कर्मोंका फल इस लोक या परलोकमें कहीं नहीं मिलता। यदि कर्मफलका सम्बन्ध भगवान्ने जोड़ा होता तो जीव कभी कर्मफलसे मुक्त नहीं होता।दूसरे अध्यायके सैंतालीसवें श्लोकमें भगवान् कहते हैं मा कर्मफलहेतुर्भूः अर्थात् कर्मफलका हेतु भी मत बन। तात्पर्य हुआ कि सुखीदुःखी होना अथवा न होना और कर्मफलका हेतु बनना अथवा न बनना मनुष्यके हाथमें है। यदि कर्मफलका सम्बन्ध भगवान्का बनाया हुआ होता तो मनुष्य कभी सुखदुःखमें सम नहीं हो पाता और निष्कामभावसे कर्म भी नहीं कर पाता जिसे करनेकी बात भगवान्ने गीतामें जगहजगह कही है (जैसे 4। 20 5। 12 14। 24 आदि)। शङ्का   श्रुतिमें आता है कि भगवान् जिसकी ऊर्ध्वगति करना चाहते हैं उससे तो शुभकर्म करवाते हैं और जिसकी अधोगति करना चाहते हैं उससे अशुभकर्म करवाते हैं (टिप्पणी प0 301.1)। जब भगवान् ही शुभाशुभ कर्म करवाते हैं तो फिर भगवान् किसीके कर्तृत्व कर्म और कर्मफलसंयोगकी रचना नहीं करते ऐसा कहना तो श्रुतिके साथ विरोध हुआ समाधान   वास्तवमें श्रुतिके उपर्युक्त कथनका तात्पर्य शुभाशुभ कर्म करवाकर मनुष्यकी ऊर्ध्वगति और अधोगति करनेमें नहीं है प्रत्युत प्रारब्धके अनुसार कर्मफल भुगताकर उसे शुद्ध करनेमें है (टिप्पणी प0 301.2) अर्थात् मनुष्य शुभाशुभ कर्मोंका फल जैसे भोग सके भगवान् कृपापूर्वक उसे कर्मबन्धनसे मुक्त करके अपना वास्तविक प्रेम प्रदान करनेके लिये (उसके प्रारब्धके अनुसार) वैसी ही परिस्थिति और बुद्धि बना देते हैं। जैसे जिस मनुष्यको प्रारब्धके अनुसार धनकी प्राप्ति होनेवाली है उसे व्यापार आदिमें वैसी ही (खरीदने आदिकी) प्रेरणा कर देते हैं अर्थात् उस समय उसकी वैसी ही बुद्धि बन जाती है और जिसे प्रारब्धके अनुसार हानि होनेवाली है उसे व्यापार आदिमें वैसी ही प्रेरणा कर देते हैं। तात्पर्य यह है कि मनुष्य जिस प्रकारसे अपने शुभाशुभ कर्मोंका फल भोग सके भगवत्प्रेरणासे वैसी ही परिस्थिति और बुद्धि बन जाती है।यदि श्रुतिका यही अर्थ लिया जाय कि भगवान् जिसकी ऊर्ध्वगति और अधोगति करना चाहते हैं उससे शुभ और अशुभकर्म करवाते हैं तो मनुष्य कर्म करनेमें सर्वथा पराधीन हो जायगा और शास्त्रों सन्तमहात्माओं आदिका विधिनिषेध गुरुकी शिक्षा आदि सभी व्यर्थ हो जायँगे। अतः यहाँ श्रुतिका तात्पर्य कर्मोंका फल भुगताकर मनुष्यको शुद्ध करना ही है।स्वभावस्तु प्रवर्तते कर्तापन कर्म और कर्मफलका सम्बन्ध इन तीनोंको मनुष्य अपने स्वभावके वशमेंहोकर करता है। यहाँ स्वभावः पद व्यष्टि प्रकृति(आदत) का वाचक है जिसे स्वयं जीवने बनाया है। जबतक स्वभावमें रागद्वेष रहते हैं तबतक स्वभाव शुद्ध नहीं होता। जबतक स्वभाव शुद्ध नहीं होता तबतक जीव स्वभावके वशीभूत रहता है।तीसरे अध्यायके तैंतीसवें श्लोकमें प्रकृतिं यान्ति भूतानि पदोंसे भगवान्ने कहा है कि मनुष्योंको अपनी प्रकृति अर्थात् स्वभावके वशीभूत होकर कर्म करने पड़ते हैं। यही बात भगवान् यहाँ तु स्वभावः प्रवर्तते पदोंसे कह रहे हैं।जबतक प्रकृति अर्थात् स्वभावसे जीवका सम्बन्ध माना हुआ है तबतक कर्तापन कर्म और कर्मफलके साथ संयोग इन तीनोंमें जीवकी परतन्त्रता बनी रहेगी जो जीवकी ही बनायी हुई है।उपर्युक्त पदोंसे भगवान् यह कह रहे हैं कि कर्तृत्व कर्म और कर्मफलसंयोग (भोक्तृत्व) तीनों जीवके अपने बनाये हुए हैं इसलिये वह स्वयं इनका त्याग करके निर्लिप्तता अनुभव कर सकता है। सम्बन्ध   जब भगवान् किसीके कर्तृत्व कर्म और कर्मफलसंयोगकी रचना नहीं करते तो फिर वे किसीके कर्मोंके फलभागी कैसे हो सकते हैं इस बातको आगेके श्लोकमें स्पष्ट करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.14।।यतः न कर्तृत्वमिति। एष आत्मा न किंचित् कस्यचित् करोति प्रवृत्तिस्तु अस्य स्वभावमात्रं न फलेप्सया। तथाहि संवेदनात्मनो भगवतः प्रकाशानन्दस्वातन्त्र्यपरमार्थस्वभावस्य स्वभावमात्राक्षिप्तसमस्तसृष्टिस्थितिसंहृतिप्रबन्धस्य स्वस्वभावान्न मनागप्यपायो जातुचित् इति न कर्त्रवस्था अतिरिक्तं कर्तृत्वं किंचित्। तदभावात् कानि कर्माणि तदसत्वे कस्य फलम् को वा कर्मफलसंबन्धः कर्म अत्र क्रिया कर्मफलमपि (S क्रियाफलमपि च कर्म ) च क्रियाफलमेव। तथाहि दण्डचक्रपरिवर्तनादिक्रिया नान्या। न च सा घटनिष्पादिता संविदन्तवंर्त्तित्त्वात्। अस्माच्चेतनः (K तस्मात् omits अस्मात् सिद्धान्तः) स्वतन्त्रः परमेश्वर एव तथा तथा भाति इति न तद्व्यतिरिक्तं क्रिया तत्फलादिकमिति सिद्धान्तः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.14।।आत्मनो यदुक्तं कारयितृत्वं नास्तीति तत्प्रपञ्चयति नेत्यादिना। यद्यपि लोकस्य कर्तृत्वं न सृजतीति नास्ति कारयितृत्वं तथापि रथशकटादीनि कुर्वन्भवति कर्तेत्याशङ्क्याह न कर्माणीति। तथापि भोजयितृत्वेन विक्रियावत्त्वं दुष्परिहरमित्याशङ्क्याह न कर्मेति। कस्य तर्हि प्रवर्तकत्वं तदाह स्वभावस्त्विति। कुर्विति कर्तृत्वं लोकस्य न सृजत्यात्मेति संबन्धः। रथादीनां कर्मत्वं साधयति ईप्सितेति। आत्मनो देहादिस्वामित्वेन प्रभुत्वं रथादिकृतवतो लोकस्य रथादिफलेन संबन्धमपि न सृजत्यात्मेत्यात्मनो भोजयितृत्वं प्रत्याचष्टे नापीति। चतुर्थपादं शङ्कोत्तरत्वेनावतारयति यदीत्यादिना। स्वभाववादस्तर्हीत्याशङ्क्य व्याकरोति अविद्यालक्षणेति। प्रकृतेर्विद्याभावत्वं व्युदसितुं मायेत्युक्तं सा च सप्तमे वक्ष्यते तेन प्रधानविलक्षणेत्याह दैवी हीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.14।।ननु कर्तृत्वमित्येतत्प्रागुक्तान्न विशिष्यत इत्यत आह न चेति। दर्शनादिकं कुर्वन्नेव नैव किञ्चित्करोमीति मन्यत इत्युक्तम्। तर्हि मिथ्या ज्ञानी प्रसज्येतेत्याशङ्कानिरासाय परमेश्वरप्रेरितः कुर्वन् कारयन् वस्तुतः स्वातन्त्र्येण न करोति न कारयति चेत्यनेनाहेत्यर्थः। अस्य जीवविषयत्वे प्रभुरित्येतदसम्भवीत्यत आह प्रभुर्हीति। अनेन विभुरित्युपपादितप्रायम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.14।।न च करोति वस्तुत इत्याह न कर्तृत्वमिति। प्रभुर्हि जीवो जडमपेक्ष्य।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.14।।अस्य देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मना प्रकृतिसंसर्गेण वर्तमानस्य लोकस्य देवाद्यसाधारणं कर्तृत्वं तत्तदसाधारणानि कर्माणि तत्तत् कर्म जन्यदेवादिफलसंयोगं च अयं प्रभुः अकर्मवश्यः स्वाभाविकस्वरूपेण अवस्थित आत्मा न सृजति नोत्पादयति।कः तर्हि स्वभावः तु प्रवर्तते स्वभावः प्रकृतिवासना अनादिकालप्रवृत्तपूर्वपूर्वकर्मजनितदेवाद्याकारप्रकृतिसंसर्गकृततत्तदात्माभिमानजनितवासनाकृतम् ईदृशं कर्तृत्वादिकं सर्वम् न स्वरूपप्रयुक्तम् इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.14।। न कर्तृत्वं स्वतः कुरु इति नापि कर्माणि रथघटप्रासादादीनि ईप्सिततमानि लोकस्य सृजति उत्पादयति प्रभुः आत्मा। नापि रथादि कृतवतः तत्फलेन संयोगं न कर्मफलसंयोगम्। यदि किञ्चिदपि स्वतः न करोति न कारयति च देही कः तर्हि कुर्वन् कारयंश्च प्रवर्तते इति उच्यते स्वभावस्तु स्वो भावः स्वभावः अविद्यालक्षणा प्रकृतिः माया प्रवर्तते दैवी हि इत्यादिना वक्ष्यमाणा।।परमार्थतस्तु

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【 Verse 5.15 】

▸ Sanskrit Sloka: नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभु: | अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तव: ||

▸ Transliteration: nādatte kasyacitpāpaṁ na caiva sukṛtaṁ vibhuḥ | ajñānenāvṛtaṁ jñānaṁ tena muhyanti jantavaḥ ||

▸ Glossary: na: never; ādatte: accepts; kasyacit: anyone’s; pāpaṁ: sins; na: not; ca: and; eva: surely; sukṛtaṁ: good deeds; vibhuḥ: lord; ajñānena: by ignorance; āvṛtaṁ: covered; jñānaṁ: knowledge; tena: by that; muhyanti: are confused; jantavaḥ: living beings

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.15 The Lord, surely, neither accepts anyone’s sins nor good deeds. Living beings are confused by the ignorance that covers the knowledge.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.15।।सर्वव्यापी परमात्मा न किसीके पापकर्मको और न शुभकर्मको ही ग्रहण करता है किन्तु अज्ञानसे ज्ञान ढका हुआ है उसीसे सब जीव मोहित हो रहे हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.15।। विभु परमात्मा न किसी के पापकर्म को और न पुण्यकर्म को ही ग्रहण करता है (किन्तु) अज्ञान से ज्ञान ढका हुआ है इससे सब जीव मोहित होते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.15 न not? आदत्ते takes? कस्यचित् of anyone? पापम् demerit? न not? च and? एव even? सुकृतम् merit? विभुः the Lord? अज्ञानेन by ignorance? आवृतम् enveloped? ज्ञानम् knowledge? तेन by that? मुह्यन्ति are deluded? जन्तवः beings.Commentary Knowledge is enveloped by ignorance. Conseently man is deluded. He thinks? I act. I enjoy. I have done such and such a meritourious act. I will get such and such a fruit. I will enjoy in heaven. I will get a birth in a rich family.Of anyone even of His devotees.Man is bound when he is identifies himself with Nature and its effects -- body? mind? Prana or the lifeforce? and senses. He attains freedom or Moksha when he identifies himself with the immortal? actionless Self that dwells within his heart.When I does not act how can God accept good or evil deeds (Cf.V.29)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.15. The Omnimanifest (Soul) takes [upon Itself] neither sin nor merit [born] of any [action]. But, the perfect knowledge is clouded by Illusion and hence the creatures are deluded.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.15 The Lord does not accept responsibility for any man's sin or merit. Men are deluded because in them wisdom is submerged in ignorance.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.15 The all-pervading One takes away neither the sin nor the merit of any one. Knowledge is enveloped by ignorance. Creatures are thery deluded.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.15 The Omnipresent neither accepts anybody's sin nor even virtue. Knowledge remains covered by ignorance. Thery the creatures become deluded.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.15 The Lord takes neither the demerit nor even the merit of any; knowledge is enveloped by ignorance, thery beings are deluded.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.15 Nadatte etc. The sinful acts and the like have been effected not by the Soul; but they have been effected by the Illusion belonging to It, just as a poison is effected in the nectar by a doubt.

Therefore-

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.15 Because, It, the Atman is 'all-pervading', i.e., is not limited to particular area or space included in the bodies of gods, men etc.; It is not the relative or the enemy of any one. For this reason It does not take away or remove the evil or suffering of anyone such as a son who is related and therefore dear to one; nor does It take away, i.e., remove the happiness of anyone whom It deems with aversion. All this is the effect of Vasanas or subtle impressions of Prakrti.

How does do these contrary Vasanas originte in the case of one whose intrinsic nature is a described above? In answer it is said that knowledge is enveloped by the darkness of ignorance. The Atman's knowledge is enveloped, i.e., contracted by preceding Karmas which are opposed to knowledge, so that a person may be alified to experience the fruits of his own Karma. It is by this Karma, which contracts knowledge, and can join the Jiva with the bodies of gods etc., that the misconception that the bodies are the selves is produced. Conseently there will originate the Vasanas or the unconscious subtle impressions born of such misapprehension of the self and the inclination to undertake actions corresponding to them.

Sri Krsna now brings into proper seence what has been taught before in the following verses: 'You will completely cross over the sea of all your sins with the boat of knowledge' (4.36), and 'The fire of knowledge reduces all Karmas to ashes in the same way' (4.37), and 'For there is no purifier here eal to knowledge' (4.38).

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.15 Vibhuh, the Omnipresent; na adatte, neither accetps; kasyacit, anybody's-even a adevotee's; papam, sin; na ca eva, nor even; does He accept sukrtam, virtue offered by devotees. Why then are such virtuous acts as worship etc. as also sacrifices, charity, oblation, etc. worship etc. as also sacrifices, charity, oblation, etc. offered by devotees? To this the Lord says: Jnanam, knowledge, discriminating wisdom; remains avrtam, covered; ajnanena, by ignorance. Tena, thery; jantavah, the creatures, the non-discriminating people in the world; muhyanti, become deluded thus-'I do; I make others do; I eat; I make others eat.'

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.15।। विभु अर्थात् सर्वव्यापी परमात्मा न किसी के पापकर्म को ग्रहण करता है और न पुण्य कर्म को। यह कथन पुराणों में वर्णित देवताओं की कल्पना से भिन्न है क्योंकि वहाँ देवताओं को जीवों के पाप और पुण्य कर्मों का लेखाजोखा रखने वालों के रूप में वर्णन किया गया है। कथा प्रेमी भक्त लोगों को वेदान्त सिद्धांत उनके प्रेम को आघात पहुँचाने वाला प्रतीत होता है और इसलिये वे गीता के स्थान पर श्रीकृष्ण की लीलाओं का अध्ययन कर भाव विभोर होना अधिक पसन्द करते हैं। ईश्वर के विषय में यह धारणा है कि मेघों के ऊपर कहीं आकाश में बैठा विश्व भर के प्राणियों के शुभअशुभ कर्मों का निरीक्षण करते हुए उनका ख्याल रखता है जिससे प्र्ालय के पश्चात् न्याय के दिन जब समस्त जीव उसके पास पहुँचें तो वह उनका कर्मानुसार न्याय कर सके। यह रोचक धारणा केवल सामान्य जनों की ही हो सकती है जिनकी बुद्धि अधिक विकसित नहीं है।समस्त विश्व के अधिष्ठानस्वरूप परमात्मा को जीवन के कर्मों से कोई प्रयोजन हो या परिच्छिन्न वस्तुओं में उसकी कोई विशेष रुचि हो ऐसा हम नहीं मान सकते। परमार्थ की दृष्टि से तो परिच्छिन्न जगत् का आत्यन्तिक अभाव है। केवल आत्म विस्मृति के कारण ही उपाधियों में व्यक्त हुआ वह आत्मा कर्तृत्व कर्म फलभोग आदि से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। समतल काँच के माध्यम से निर्गत सूर्यप्रकाश में कोई विकार नहीं होता परन्तु यदि वही प्रकाश एक प्रिज्म (आयत) में से निकले तो सात रंगों में विभाजित हो जाता है। इसी प्रकार एकमेव अद्वितीय सर्वव्यापी परिपूर्ण परमात्मा शरीर मन और बुद्धि इन आविद्यक उपाधियों में व्यक्त होकर नानारूप जगदाभास के रूप में प्रतीत होता है।यहाँ ज्ञान और अज्ञान के सम्बन्ध का सुन्दर वर्णन किया गया है। अज्ञान ज्ञान नहीं हो सकता और न ज्ञान अज्ञान का एक अंश। परस्पर विरोधी स्वभाव के कारण इन दोनों का सह अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता हैं। परन्तु यहाँ कहा गया है कि अज्ञान के द्वारा ज्ञान आवृत हुआ है यह ऐसे ही है जैसे किसी जंगल में सर्वत्र व्याप्त अंधकार में दूर कहीं प्रकाश की किरण को देखकर कहा जा सकता है कि वह प्रकाश अंधकार से आवृत है। अगले श्लोक में अज्ञान आवरण को दूर करने के उपाय तथा उसकी निवृत्ति के फल को विस्तार से बताया गया है।सत्य के अनावरण की प्रक्रिया में अज्ञान की निवृत्ति मात्र अपेक्षित है न कि ज्ञान की उत्पत्ति। इसलिए सत्य की प्राप्ति वास्तव में सिद्ध वस्तु की ही प्राप्ति है और कोई नवीन उपलब्धि नहीं। इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.15।।ननु यः परमेश्वरैकशरणो ब्रह्मणि संन्यस्तसमस्तकर्मा यानि पुण्यपापानि करोति तानि क्व गच्छन्ति।लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा इत्यनेन तस्य लेपाभावोक्तेः। तथाच स्वस्य भक्तस्य पुण्यं च पापं च तदसुग्रहार्थ भगवानादत्ते इति चेत्तत्राह नेति। विभुः परमेश्वरः कस्यचित्स्वभक्तस्यापि पापं नादत्ते न गृह्णाति। तथा भक्तैः समर्पितं सुकृतं पूर्णकामत्वान्न चैवादत्ते। ननु परमार्थतो जीवस्यापीश्वराव्यतिरेकात्कर्तृत्वाद्यभावः ईश्वरस्य सुतरां अतः किमर्थमीश्वरात्स्वस्य भेदं प्रकल्प्य परमेश्वरो भजनीयोऽहं तस्य भक्तस्तदर्थं मया पूजायागदानहोमादिलक्षणं कर्मानुष्ठेयमिति बुद्य्धा परमेश्वरैकशरणैरन्यैश्चाहं कर्म करोमि कारयामि तस्य फलं भोक्ष्ये भोजयामीति बुद्य्धा कर्माण्यनुष्ठीयन्त इति चेत्तत्राह। अज्ञानेनावृतं कर्तृत्वादिविनिर्मुक्तोऽहमस्मीति विवेकज्ञानम्। वसिष्ठोऽप्याहविवेकमाच्छादयति जगन्ति जनयत्यलम् इति। पूर्वप्रस्तुताऽविद्या तेन जन्तवो मुह्यन्ति मोहं गच्छन्ति। यथा शुक्तिज्ञानं शुक्त्यज्ञानेनावृतं तेन रजतमिदमिति पुरुषाणां मोहस्तथाहमुपासक ईश्वरार्थं कर्म करोभ्यहं कर्ता कारयिता भोक्ता भोजयितेत्येवं मुह्यन्तीत्यर्थः। ज्ञानं जीवेश्वरजगद्भेदभ्रमाधिष्ठानभूतं स्वप्रकाशं सच्चिदानन्दरुपं परमार्थमिति तु लोकप्रसिद्धज्ञानपदार्थत्यागे बीजाभावमभिप्रेत्याचार्यैर्न व्याख्यातमिति बोध्यम्। एतेन ननु भक्ताननुगृह्णतोऽभक्तान्निगृह्णतश्च वैषम्योपलम्भात्कथमाप्तकामत्वमत आह अज्ञानेनेति। निग्रहोऽपि दण्डरुपोऽनुग्रह एवेत्येवमज्ञानेन सर्वत्र समः परमेश्वर इत्येवंभूतं ज्ञानमावृतं तेन हेतुना जन्तवो जीवा मुह्यन्ति। भगवति वैषम्यं मन्यन्त इत्यर्थ इति प्रत्युक्तम्। ज्ञानं प्रकाशयति। ज्ञाननिर्धूतकल्मषा इत्यत्राभिमततद्य्वतिरिक्तज्ञानपदार्थकल्पनानुपपतेश्च। यत्त्वितरैः स्वभावस्तु प्रवर्तत इत्यत्रान्तःकरणं प्रवर्तत इति व्याख्याय৷৷৷৷नन्वेवंसति देवदत्तः पापी यज्ञदत्तः सुकृतीत्यादिव्यवहाराणां का गतिरित्यत आह नादत्ते इति। चिच्चिदात्मा कस्य ज्ञानशक्तिक्रियाशक्त्याधारत्वगुणयोगात्कशब्दस्यान्तःकरणस्य पापं सुकृतं च नादत्ते नात्मसंबन्धि करोति। तत्र हेतुमाह विभुरिति। अपरिणामीत्यर्थः। कथंतर्ह्ययं लोकव्यवहारस्तत्राह अज्ञानेनेति। अज्ञानेनाज्ञानपरिणामरुपेणान्तःकरणेन ज्ञानं स्वरुपमावृतम्। अन्योन्यतादात्म्याध्यासविषयभावं गमितमित्यर्थः। तेन कारणेन जन्तवोऽज्ञामनुष्या मुह्यन्ति। आत्मगतत्वेन सुकृतदुष्कृतादिव्यवहरन्तीत्यर्थ इति व्याख्यातं तदुपेक्ष्यम्। मुख्यवृत्त्या सभ्यक् वाक्यार्थसंभवे गौण्यादिवृत्त्याश्रयणस्य क्लिष्टकल्पनायाश्चान्याय्यत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.15।।नन्वीश्वरः कारयिता जीवः कर्ता। तथाच श्रुतिःएष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते इत्यादिः। स्मृतिश्चअज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः। ईश्वरप्रेरितो गच्छेत्स्वर्गं वा श्वभ्रमेव वा।। इति। तथाच जीवेश्वरयोः कर्तृत्वकारयितृत्वाभ्यां भोक्तृत्वभोजयितृत्वाभ्यां चपापपुण्यलेपसंभवात्कथमुक्तं स्वभावस्तु प्रवर्तत इति तत्राह परमार्थतः विभुः परमेश्वरः कस्यचिज्जीवस्य पापं सुकृतं च नैवादत्ते परमार्थतो जीवस्य कर्तृत्वाभावात् परमेश्वरस्य च कारयितृत्वाभावात्। कथं तर्हि श्रुतिः स्मृतिर्लोकव्यवहारश्च तत्राह अज्ञानेनावरणविक्षेपशक्तिमता मायाख्येनानृतेन तमसा आवृतमाच्छादितं ज्ञानं जीवेश्वरजगद्भेदभ्रमाधिष्ठानभूतं नित्यं स्वप्रकाशं सच्चिदानन्दरूपमद्वितीयं परमार्थसत्यं तेन स्वरूपावरणेन मुह्यन्ति प्रमातृप्रमेयप्रमाणकर्तृकर्मकरणभोक्तृभोग्यभोगाख्यनवविधसंसाररूपं मोहमतस्मिंस्तदवभासरूपं विक्षेपं गच्छन्ति जन्तवो जननशीलाः संसारिणो वस्तुस्वरूपादर्शिनः। अकर्त्रभोक्तृपरमानन्दाद्वितीयात्मस्वरूपादर्शननिबन्धनो जीवेश्वरजगद्भेदभ्रमःप्रतीयमानो वर्तते मूढानाम्। तस्यां चावस्थायां मूढप्रत्ययानुवादिन्यावेते श्रुतिस्मृती वास्तवाद्वैतबोधिवाक्यशेषभूते इति न दोषः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.15।।ननुएष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते एष ह्येवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते इति श्रुत्या परमेश्वरे कारयितृत्वं बोध्यते। तत्कथमुच्यतेस्वभावस्तु प्रवर्तते इति तत्राह नादत्त इति। कस्यचित्कर्तुः पापमयं नादत्ते नापि सुकृतम्। कारयितृत्वाभावात्। यतो विभुर्व्यापकः। निष्क्रिय इति यावत्। सक्रियो ह्यन्यं प्रवर्तयति तदीयं पापं पुण्यं वा लभते। अयं तु न तथा किंतु सूर्यवत् प्रकाशत एव नतु स्वप्रकाश्यानां कर्त्रादीनां कर्मणा संबध्यते इति भावः। कारयितृत्वमप्यस्य सत्तामात्रेण सूर्यवत्। यथा घटः प्रकाशते सविता प्रकाशयतीति नोदाहृतश्रुतिविरोधः। कथं तर्हि ईश्वराराधनार्थं कर्माणि कुर्वन्ति तदकरणाच्च बिभ्यतीत्याशङ्क्याह अज्ञानेनेति। यथा हि महाराजस्य सार्वभौमस्याहं सर्वेश्वरो निर्वृतोऽस्मीति ज्ञानं अज्ञानेन सौषुप्तेनावृतं चेत्स तत्र विविधानि परचक्रादीनि महान्ति संकटशतानि पश्यति अहो अहं दीनोऽस्मिदुःख्यस्मीति च मुह्यति तद्वदेते जन्तवः स्वस्याहं ब्रह्मास्मीति प्रमाणेन ब्रह्मभावमजानन्त ईश्वरादात्मानं पृथङ्मन्यमाना ईशात्मनोः सेव्यसेवकभावं च पश्यन्तो मुह्यन्ति। तथाच श्रुतिःअथ योऽन्यां देवतामुपास्तेऽन्योऽसावन्योऽहमिति न स वेद यथा पशुरेव स देवानाम् इति। एष ह्येवेति श्रुतिरपि भ्रान्तजनव्यवहारविषयैवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.15।।यतः प्रभुर्न सृजत्यतः कस्यचित् पापपुण्यादिकमङ्गीकृत्य फलं न ददातीत्याह नादत्त इति। विभुः अनियम्यः स्वेच्छयैव सर्वफलदानसमर्थः कस्यचित् जीवस्य पापं पापरूपं कर्म न आदत्ते नाङ्गीकरोति तदङ्गीकृत्य नरकादिफलं न ददातीत्यर्थः। सुकृतं च नैवाङ्गीकरोति तदङ्गीकारेण स्वर्गादिसुखं न ददातीत्यर्थः। विभुत्वात् स्वक्रीडेच्छयैव यथासुखं करोतीति भावः। तर्हि एष एव तं ह्येवैनं साधु कर्म कारयति कौ.उ.3।9 इत्यादिश्रुतिभ्य ईश्वर एव तत्तत्कर्म कारयित्वा सर्वेभ्यः फलं ददातीति कथमुच्यते तत्राह अज्ञानेनेति। अज्ञानेन प्रकृत्युत्पन्नेन ज्ञानं भगवत्स्वरूपात्मकं श्रुत्यर्थरूपं वा तेन जन्तवः जीवा मुह्यन्ति मोहं प्राप्नुवन्ति अन्यथा वदन्तीत्यर्थः। श्रुतौ तु पूर्वं तादृक्फलदानेच्छां निरूप्य पश्चात् कर्मकारणत्वमुच्यते न तु कर्मफलत्वमागच्छति किन्तु विचित्रेच्छात्वमेवायातीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.15।।यस्मादेवं तस्मात् नादत्त इति। प्रयोजकोऽपि सन्प्रभुः कस्यचित्पापं सुकृतं च नैवादत्ते न भजते। तत्र हेतुःविभुः परिपूर्णः। आप्तकाम इत्यर्थः। यदि हि स्वार्थकामनया कारयेत्तर्हि तथा स्यात् नत्वेतदस्ति। आप्तकामस्यैवाचिन्त्यनिजमायया तत्तत्पूर्वकर्मानुसारेण प्रवर्तकत्वात्। ननु भक्ताननुगृह्णतोऽभक्तान्निगृह्णतश्च वैषम्योपलम्भात्कथमाप्तकामत्वमित्यत आह अज्ञानेनेति। निग्रहोऽपि दण्डरूपोऽनुग्रह एवेत्येवमज्ञानेन सर्वत्र समः परमेश्वर इत्येवंभूतं ज्ञानमावृतम्। तेन हेतुना जन्तवो जीवा मुह्यन्ति। भगवति वैषम्यं मन्यन्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.15।।यस्मादेवं तस्मान्नादत्ते न भजते पापं पुण्यं च कारयितृत्वं च तत्साधकतमविसर्जनादेवोपयुज्यते।बुद्धीन्द्रियमनःप्राणान् भाग.10।87।2 इत्यादिवाक्यात्तैर्भोगमोक्षोपायप्रवृत्तौ तदात्मैवेह हेतुरिति तत्त्वम्। अतः स्वभावकृतं सर्वम्। ननु तदेशभूता अपि एते आत्मनः कथं प्राकृतत्वभावेन सम्मुह्यन्ति स्वरूपाज्ञानादित्याह अज्ञानेनेति। तत्र ज्ञानं स्वरूपविषयकं अज्ञानेनाविद्यायाः प्रथमपर्वस्वरूपाज्ञानेनावृतं ततोऽन्यपर्वभिः प्राणान्तःकरणेन्द्रियदेहाध्यासैः वस्तुतस्तु विचित्ररिरंसावतो भगवतो नित्या आज्ञाकारिण्यो द्वादशशक्तयो मुख्याःगिरा पृष्ट्या इत्यादिना निरूपिता भागवते। तत्र मायाख्याया अशंद्वयं विद्याविद्येति। भगवदाज्ञयैव विद्यया आत्मनां स्वरूपगमकात्सत्त्वानुगुण्यात् अविद्यया च विपरीतस्वभावया कर्मजन्ममरणादिपर्यावर्तगम इतरानुगुण्यात् अन्यथा स्वरूपवैचित्र्यं न स्यादित्यज्ञानेनावृतमात्मनां स्वरूपज्ञानम्। उक्तं चविद्याविद्ये मम तनू विद्ध्युद्धव शरीरिणाम्। मोक्षबन्धकरी आद्ये मायया मे विनिर्मिते भाग.11।11।3 इति।पञ्चपर्वा त्वविद्येयं जीवगा मायया कृता इति। अतस्तेन जन्तवो भवन्तो मुह्यन्ति। स्वयमेवात्मनि कर्तृत्वादिस्वभावं सृजन्ति न परमात्मेति सिद्धान्तः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.15।।वास्तवमें तो विभु ( सर्वव्यापी परमात्मा ) किसी भक्तके पापको भी ग्रहण नहीं करता और भक्तोंद्वारा अर्पण किये हुए सुकृतको भी वह नहीं लेता। तो फिर भक्तोंद्वारा पूजा आदि अच्छे कर्म एवं यज्ञ दान होम आदि सुकृत कर्म किस लिये अर्पण किये जाते हैं इसपर कहते हैं जीवोंका विवेकविज्ञान अज्ञानसे ढका हुआ है। इस कारण अविवेकी संसारी जीव ही करता हूँ कराता हूँ खाता हूँ खिलाता हूँ इस प्रकार मोहको प्राप्त हो रहे हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.15।। व्याख्या   नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः पूर्वश्लोकमें जिसको प्रभुः पदसे कहा गया है उसी परमात्माको यहाँ विभुः पदसे कहा गया है।कर्मफलका भागी होना दो प्रकारसे होता है जो कर्म करता है वह भी कर्मफलका भागी होता है और जो दूसरेसे कर्म करवाता है वह भी कर्मफलका भागी होता है। परन्तु परमात्मा न तो किसीके कर्मको करनेवाला है और न कर्म करवानेवाला ही है अतः वह किसीके भी कर्मका फलभागी नहीं हो सकता।सूर्य सम्पूर्ण जगत्को प्रकाश देता है और उस प्रकाशके अन्तर्गत मनुष्य पाप और पुण्यकर्म करते हैं परन्तु उन कर्मोंसे सूर्यका किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। इसी प्रकार परमात्मतत्त्वसे प्रकृति सत्ता पाती है अर्थात् सम्पूर्ण संसार सत्ता पाता है। उसीकी सत्ता पाकर प्रकृति और उसका कार्य संसारशरीरादि क्रियाएँ करते हैं। उन शरीरादिसे होनेवाले पापपुण्योंका परमात्मतत्त्वसे किञ्चिन्मात्र भी सम्बन्ध नहीं है। कारण कि भगवान्ने मनुष्यमात्रको स्वतन्त्रता दे रखी है अतः मनुष्य उन कर्मोंका फलभागी अपनेको भी मान सकता है और भगवान्को भी मान सकता है अर्थात् सम्पूर्ण कर्मों और कर्मफलोंको भगवान्के अर्पण भी कर सकता है। जो भगवान्की दी हुई स्वतन्त्रताका दुरुपयोग करके कर्मोंका कर्ता और भोक्ता अपनेको मान लेता है वह बन्धनमें प़ड़ जाता है। उसके कर्म और कर्मफलको भगवान् ग्रहण नहीं करते। परन्तु जो मनुष्य उस स्वतन्त्रताका सदुपयोग करके कर्म और कर्मफल भगवान्के अर्पण करता है वह मुक्त हो जाता है। उसके कर्म और कर्मफलको भगवान् ग्रहण करते हैं।जैसे सातवें अध्यायके पचीसवें श्लोकमें सर्वस्य पदसे और छब्बीसवें श्लोकमें कश्चन पदसे सामान्य मनुष्योंकी बात कही गयी है ऐसे ही यहाँ कस्यचित् पदसे अपनेको कर्ता और भोक्ता मानकर कर्म करनेवाले सामान्य मनुष्योंकी बात कही गयी है न कि भक्तोंकी। कारण कि भावग्राही होनेसे भगवान् भक्तोंके द्वारा अर्पण किये हुए पत्र पुष्प आदि पदार्थोंको और सम्पूर्ण कर्मोंको ग्रहण करते हैं (गीता 9। 26 27)।अज्ञानेनावृतं ज्ञानम् स्वरूपका ज्ञान सभी मनुष्योंमें स्वतः सिद्ध है किन्तु अज्ञानके द्वारा यह ज्ञान ढका हुआ है। उस अज्ञानके कारण जीव मूढ़ताको प्राप्त हो रहे हैं। अपनेको कर्मोंका कर्ता मानना मूढ़ता है (गीता 3। 27)। भगवान्के द्वारा मनुष्यमात्रको विवेक दिया हुआ है जिसके द्वारा इस मूढ़ताका नाश किया जासकता है। इसलिये इस अध्यायके आठवें श्लोकमें कहा गया है कि सांख्ययोगी कभी भी अपनेको किसी कर्मका कर्ता न माने और तेरहवें श्लोकमें कहा गया है कि सम्पूर्ण कर्मोंके कर्तापनको विवेकपूर्वक मनसे छोड़ दे।शरीरादि सम्पूर्ण पदार्थोंमें निरन्तर परिवर्तन हो रहा है। स्वरूपमें कभी कोई परिवर्तन नहीं होता। स्वरूपसे अपरिवर्तनशील होनेपर भी अपनेको परिवर्तनशील पदार्थोंसे एक मान लेना अज्ञान है। शरीरादि सब पदार्थ बदल रहे हैं ऐसा जिसे अनुभव है वह स्वयं कभी नहीं बदलता। इसलिये स्वयंके बदलनेका अनुभव किसीको नहीं होता। अतः मैं बदलनेवाला नहीं हूँ इस प्रकार परिवर्तनशील पदार्थोंसे अपनी असङ्गताका अनुभव कर लेनेसे अज्ञान मिट जाता है और तत्त्वज्ञान स्वतः प्रकाशित हो जाता है। कारण कि प्रकृतिके कार्यसे अपना सम्बन्ध मानते रहनेसे ही तत्त्वज्ञान ढका रहता है।अज्ञान शब्दमें जो नञ् समास है वह ज्ञानके अभावका वाचक नहीं है प्रत्युत अल्पज्ञान अर्थात् अधूरे ज्ञानका वाचक है। कारण कि ज्ञानका अभाव कभी होता ही नहीं चाहे उसका अनुभव हो या न हो। इसलिये अधूरे ज्ञानको ही अज्ञान कहा जाता है। इन्द्रियोंका और बुद्धिका ज्ञान ही अधूरा ज्ञान है। इस अधूरे ज्ञानको महत्त्व देनेसे इसके प्रभावसे प्रभावित होनेसे वास्तविक ज्ञानकी ओर दृष्टि जाती ही नहीं यही अज्ञानके द्वारा ज्ञानका आवृत होना है। इन्द्रियोंका ज्ञान सीमित है। इन्द्रियोंके ज्ञानकी अपेक्षा बुद्धिका ज्ञान असीम है। परन्तु बुद्धिका ज्ञान मन और इन्द्रियोंके ज्ञान(जानने और न जानने) को ही प्रकाशित करता है अर्थात् बुद्धि अपने विषयपदार्थोंको ही प्रकाशित करती है। बुद्धि जिस प्रकृतिका कार्य है और जिस बुद्धिका कारण प्रकृति है उस प्रकृतिको बुद्धि प्रकाशित नहीं करती। बुद्धि जब प्रकृतिको भी प्रकाशित नही कर सकती तब प्रकृतिसे अतीत जो चेतनतत्त्व है उसे कैसे प्रकाशित कर सकती है इसलिये बुद्धिका ज्ञान अधूरा ज्ञान है।तेन मुह्यन्ति जन्तवः भगवान्ने जन्तवः पद देकर मानो मनुष्योंकी ताड़ना की है कि जो मनुष्य अपने विवेकको महत्त्व नहीं देते वे वास्तवमें जन्तु अर्थात् पशु ही हैं (टिप्पणी प0 303) क्योंकि उनके और पशुओंके ज्ञानमें कोई अन्तर नहीं है। आकृतिमात्रसे कोई मनुष्य नहीं होता। मनुष्य वही है जो अपने विवेकको महत्त्व देता है। इन्द्रियोंके द्वारा भोग तो पशु भी भोगते हैं पर उन भोगोंको भोगना मनुष्यजीवनका लक्ष्य नहीं है। मनुष्यजीवनका लक्ष्य सुखदुःखसे रहित तत्त्वको प्राप्त करना है। जिनको अपने कर्तव्य और अकर्तव्यका ठीकठीक ज्ञान है वे मनुष्य साधक कहलानेयोग्य हैं।अपनेको कर्मोंका कर्ता मान लेना तथा कर्मफलमें हेतु बनकर सुखीदुःखी होना ही अज्ञानसे मोहित होना है। पापपुण्य हमें करने पड़ते हैं इनसे हम कैसे छूट सकते हैं सुखीदुःखी होना हमारे कर्मोंका फल है इनसे हम अतीत कैसे हो सकते हैं इस प्रकारकी धारणा बना लेना ही अज्ञानसे मोहित होना है।जीव स्वरूपसे अकर्ता तथा सुखदुःखसे रहित है। केवल अपनी मूर्खताके कारण वह कर्ता बन जाता है और कर्मफलके साथ सम्बन्ध जोड़कर सुखीदुःखी होता है। इस मूढ़ता(अज्ञान) को ही यहाँ तेन पदसे कहा गया है। इस मूढ़तासे अज्ञानी मनुष्य सुखीदुःखी हो रहे हैं इस बातको यहाँ तेन मुह्यन्ति जन्तवः पदोंसे कहा गया है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया है कि अज्ञानके द्वारा ज्ञान ढका जानेके कारण सब जीव मोहित हो रहे हैं। अपने विवेकके द्वारा उस अज्ञानका नाश कर देनेपर जिस ज्ञानका उदय होता है उसकी महिमा आगेके श्लोकमें कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.15।।अत एव क्रियातत्फलयोरभावे विधिफलस्यापि नादृष्टकृतता काचित् इत्यर्धेन अभिधाय अर्धान्तरेण संसारिणः प्रति तत्समर्थनं कर्तुमाह नादत्ते इति। पापादीनि नैतत्कृतानि किं तु निजेन अज्ञानेन कृतानि शङ्कयेव अमृते विषयम् ( omits पापादीनि विषम्)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.15।।कर्तृत्वभोक्तृत्वैश्वर्याण्यात्मनोऽविद्याकृतानीत्युक्तमिदानीमीश्वरे संन्यस्तसमस्तव्यापारस्य तदेकशरणस्य दुरितं सुकृतं वा तदनुग्रहार्थं भगवानादत्ते मदेकशरणो मत्प्रीत्यर्थं कर्म कुर्वाणो दुष्कृताद्यनुमोदनेनानुग्राह्यो मयेति प्रत्ययभाक्त्वादित्याशङ्क्य सोऽपि परमार्थतो नास्यास्त्यविक्रियत्वादित्याह परमार्थतस्त्विति। पूर्वार्धगतान्यक्षराणि व्याख्यायाकाङ्क्षापूर्वकमुत्तरार्धमवतार्य व्याचष्टे किमर्थमित्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.15।।Sri Jayatirtha did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.15।।Sri Madhvacharya did not comment on this sloka.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.15।।कस्यचित् स्वसम्बन्धितया अभिमतस्य पुत्रादेः पापं दुःखं न आदत्ते न अपनुदति कस्यचित् प्रतिकूलतया अभिमतस्य सुकृतं सुखं च न आदत्ते न अपनुदति। यतः अयं विभुः न क्वाचित्कः न देवादिदेहाद्यसाधारणदेशः अत एव न कस्यचित् सम्बन्धी न कस्यचित् प्रतिकूलः च। सर्वम् इदं वासनाकृतम्।एवंस्वभावस्य कथम् इयं विपरीतवासना उत्पद्यते अज्ञानेन आवृतं ज्ञानम् ज्ञानविरोधिना पूर्वपूर्वकर्मणा स्वफलानुभवयोग्यत्वाय अस्य ज्ञानम् आवृतं संकुचितम् तेन ज्ञानावरणरूपेण कर्मणा देवादिदेहसंयोगः तत्तदात्माभिमानरूपमोहः च जायते। ततः च तथाविधात्माभिमानवासना तदुचितकर्मवासना च। वासनातो विपरीतात्माभिमानः कर्मारम्भश्च उपपद्यते।सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं संतरिष्यसि (गीता 4।36)ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा (गीता 4।37)न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रम् (गीता 4।38) इति पूर्वोक्तं स्वकाले संगमयति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.15।। न आदत्ते न च गृह्णाति भक्तस्यापि कस्यचित् पापम्। न चैव आदत्ते सुकृतं भक्तैः प्रयुक्तं विभुः। किमर्थं तर्हि भक्तैः पूजादिलक्षणं यागदानहोमादिकं च सुकृतं प्रयुज्यते इत्याह अज्ञानेन आवृतं ज्ञानं विवेकविज्ञानम् तेन मुह्यन्ति करोमि कारयामि भोक्ष्ये भोजयामि इत्येवं मोहं गच्छन्ति अविवेकिनः संसारिणो जन्तवः।।

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【 Verse 5.16 】

▸ Sanskrit Sloka: ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मन: | तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ||

▸ Transliteration: jñānena tu tadajñānaṁ yeṣāṁ nāśitamātmanaḥ | teṣāmādityavajjñānaṁ prakāśayati tatparam ||

▸ Glossary: jñānena: by knowledge; tu : but; tad: that; ajñānaṁ: ignorance; yeṣāṁ: whose; nāśitaṁ: destroyed; ātmanaḥ: of the self; teṣām: their; ādityavat: like the rising sun; jñānaṁ: knowledge; prakāśayati: throws light on; tat param: that supreme consciousness

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.16 Whose ignorance is destroyed by the knowledge, their knowledge, like the rising sun, throws light on the supreme consciousness.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.16।।परन्तु जिन्होंने अपने जिस ज्ञान(विवेक) के द्वारा उस अज्ञानका नाश कर दिया है उनका वह ज्ञान सूर्यकी तरह परमतत्त्व परमात्माको प्रकाशित कर देता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.16।। परन्तु जिनका वह अज्ञान आत्मज्ञान से नष्ट हो जाता है उनके लिए वह ज्ञान सूर्य के सदृश परमात्मा को प्रकाशित करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.16 ज्ञानेन by wisdom? तु but? तत् that? अज्ञानम् ignorance? येषाम् whose? नाशितम् is destroyed? आत्मनः of the Self? तेषाम् their? आदित्यवत् like the sun? ज्ञानम् knowledge? प्रकाशयति reveals? तत्परम् that Highest.Commentary When ignorance? the root cause of human sufferings? is annihilated by the knowledge of the Self? this knowledge illuminates the Supreme Brahman or that highest immortal Being? just as the sun illumines all the objects of this gross? physical universe.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.16. In the case of those whose Illusion has been, however, destroyed by the Self-knowledge, then for them that knowledge illumines itself, like the sun.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.16 Surely wisdom is like the sun, revealing the supreme truth to those whose ignorance is dispelled by the wisdom of the Self.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.16 But for those in whom this ignorance is destroyed by the knowledge of the self, that knowledge, in their case, is supreme and shines like the sun.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.16 But in the case of those of whom that ignorance of theirs becomes destroyed by the

Chapter 5 (Part 10)

knowledge (of the Self), their Knowledge, like the sun, reveals that supreme Reality.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.16 But to those whose ignorance is destroyed by the knowledge of the Self, like the sun, knowledge reveals the Supreme (Brahman).

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.16 Jnanena etc. When however the Illusion is destroyed by knowledge, then the natural capacity of knowledge, in illuminating itself and other things starts to work automatically just as the sun does when the darkness is lost. Indeed when the doubt [of poison] is completely rooted out, the nectar does the work of the nectar just automatically. But this is possible for those who have their intellect and mind gone to This [Self] and have abandoned [all] other activities. To make this idea clear [the Lord] says -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.16 While all these selves are thus deluded, in the case of enlightened souls, their delusive ignorance - which envelops knowledge and which is of the form of accumulated, beginningless and endless Karma - is destroyed by knowledge. As already described this knowledge is produced by the teachings of the scriptures about the real nature of the self, which are enriched by daily practice. The purity of this knowledge is unexcelled. And in the case of those selves who regain the knowledge that is natural to Them, it is found that it is unlimited and uncontracted and illumining everything like the sun.

Plurality of the selves in Their essence is expressly mentioned in the case of those whose ignorance is overcome, in the expression 'for those' in the text. What was stated at the commencement, 'There never was a time when I did not exist' (2.12) is expressed here with greater clarity. Moreover, this plurality is not due to limiting adjuncts imposed on a single universal self. For, as stated here, there cannot be any trace of such adjuncts for those whose ignorance is destroyed, and still They are described as a plurality. Hence knowledge is taught as an attribute inseparable from the essential nature of the self, because a difference between the self and its knowledge is made out in the statement, 'Knowledge, in their case illuminates like the sun'. By the illustration of the sun, the relation of the knower to his knowledge is brought out to be similar to the luminous object and its luminosity. Therefore, it is appropriate to understand that knowledge contracts by Karma in the stage of Samsara and expands in the stage of Moksa (release). [In this system the Atman has two forms of Jnana or Knowledge - Dharmi-Jnana (self-awareness) and Dharma-bhuta-Jnana (awareness of objects other than itself). It is the latter that is contracted by ignorance and expands by knowledge. See Intrdocution.]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.16 Tu, but; yesam, in the case of those creatures; of whom tat ajnanam, that ignorance; atmanah, of theirs-being covered by which ignorance creatures get deluded-; nasitam, becomes destroyed; jnanena, by knowledge, by discriminating knowledge concerning the Self; tesam, their; jnanam, knowledge; adityavat, like the sun; prakasayati, reveals, in the same way as the sun reveals all forms whatever; tat-param, that supreme Reality, the Reality which is the highest Goal, the totality of whatever is to be known.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.16।। शोक और मोह से ग्रस्त जीवों के लिए शुद्ध आत्मस्वरूप अविद्या से आवृत रहता है अर्थात् उन्हें आत्मा का उसके शुद्ध स्वरूप में अनुभव नहीं होता। ज्ञानी पुरुष के लिए अज्ञानावरण पूर्णतया निवृत्त हो जाता है। कितने ही दीर्घ काल से किसी स्थान पर स्थित अंधकार प्रकाश के आने पर तत्काल ही दूर हो जाता है न कि धीरेधीरे किसी विशेष क्रम से। इसी प्रकार से आत्मज्ञान का उदय होते ही अनादि अविद्या उसी क्षण निवृत्त हो जाती है। अविद्या से उत्पन्न होता है अहंकार जिसका अस्तित्व शरीर मन और बुद्धि के साथ हुए तादात्म्य के कारण बना रहता है। अज्ञान के नष्ट हो जाने पर अहंकार भी नष्ट हो जाता है।द्वैतवादियों को वेदान्त के इस सिद्धांत को समझने में कठिनाई होती है। वस्तुओं को जानने के लिए हमारे पास उपलब्ध साधन हैं इन्द्रियां मन और बुद्धि। अहंकार इनके माध्यम से देखता अनुभव करता और विचार करता है। द्वैतवादी यह समझने में असमर्थ हैं कि अहंकार इन्द्रियां मन और बुद्धि के अभाव में आत्मज्ञान कैसे सम्भव है। एक बुद्धिमान् विचारक में यह शंका आना स्वाभाविक है। इसका अनुमान लगाकर श्रीकृष्ण यह बताते है कि अहंकार नष्ट होने पर आत्मज्ञान स्वत हो जाता है।विचाररत बुद्धि को यह बात सरलता से नहीं समझायी जा सकती। इसलिए दूसरी पंक्ति में प्रभु एक दृष्टान्त देते हैं आदित्यवत्। हम सबका सामान्य अनुभव है कि प्रावृट् ऋतु में कई दिनों तक सूर्य नहीं दिखाई देता और हम जल्दी में कह देते हैं कि सूर्य बादलों से ढक गया है।इस वाक्य के अर्थ पर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि सूर्य बादल के छोटे से टुकड़े से ढक नहीं सकता। इस विश्व के मध्य में जहाँ सूर्य अकेला अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ विद्यमान है वहाँ से बादल बहुत दूर है। पृथ्वी तल पर खड़ा छोटा सा मनुष्य अपनी बिन्दु मात्र आँखों से देखता है कि बादल की एक टुकड़ी ने दैदीप्यमान आदित्य को ढक लिया है। यदि हम अपनी छोटी सी उँगली अपने नेत्र के सामने निकट ही लगा लें तो विशाल पर्वत भी ढक सकता है।इसी प्रकार जीव जब आत्मा पर दृष्टि डालता है तो उस अनन्त आत्मा को अविद्या से आवृत पाता है। यह अविद्या सत् स्वरूप आत्मा में नहीं है जैसे बादल सूर्य में कदापि नहीं है। अनन्त सत् की तुलना में सीमित अविद्या बहुत ही तुच्छ है। किन्तु आत्मस्वरूप की विस्मृति हमारे हृदय में उत्पन्न होकर अहंकार में यह मिथ्या धारणा उत्पन्न करती है कि आध्यात्मिक सत् अविद्या से प्रच्छन्न है। इस अज्ञान के नष्ट होने पर आत्मतत्त्व प्रकट हो जाता है जैसे मेघपट हटते ही सूर्य प्रकट हो जाता है।सूर्य को देखने के लिए किसी अन्य प्रकाश की आवश्यकता नहीं है आत्मानुभव के लिए भी किसी अन्य अनुभव की अपेक्षा नहीं है वह चित् स्वरूप है। चित् की चेतना के लिए किसी दूसरे चैतन्य की अपेक्षा नहीं है। ज्ञान का अन्तर्निहित तत्त्व चेतना ही है। अत अहंकार आत्मा को पाकर आत्मा ही हो जाता है।स्वप्न से जागने पर स्वप्नद्रष्टा अपनी स्वप्नावस्था से मुक्त होकर जाग्रत् पुरुष बन जाता है। वह जाग्रत् पुरुष को कभी भिन्न विषय के रूप में न देखता है और न अनुभव करता है बल्कि वह स्वयं ही जाग्रत् पुरुष बन जाता है। ठीक इसी प्रकार अहंकार भी अज्ञान से ऊपर उठकर स्वयं आत्मस्वरूप के साथ एकरूप हो जाता है। अहंकार और आत्मा का सम्बन्ध तथा आत्मानुभूति की प्रक्रिया का बड़ा ही सुन्दर वर्णन सूर्य के दृष्टान्त द्वारा किया गया है जिसके लक्ष्यार्थ पर सभी साधकों को मनन करना चाहिये।आत्मनिष्ठ पुरुष सदा के लिए जन्ममरण के चक्र से मुक्त हो जाता है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.16।।तर्हि सर्वेषामनादिभावरुपाज्ञानावृतज्ञानत्वाद्य्वामोहस्य निवृत्त्यभावात्संसारनिवृत्तिः कथं स्यादिति तत्राह ज्ञानेनेति। ज्ञानेन तु गुरुपदिष्टेन शास्त्रीयेण विवेकज्ञानेन स्वपरमार्थस्वरुपविषयेण तदज्ञानं कर्तृत्वादिविनिर्मुक्तं ब्रह्माहमस्मीति परमात्माभेदास्तित्वज्ञानावरकं येषां मुमुक्षूणां नाशितं तेषामादित्यवत् यथादित्योऽस्तित्वेन भान्तमपि घटादिवस्तु तद्गतसमस्तरुपा भानापादकं तमो निवर्त्य प्रकाशयति तथा गुरुपदिष्टं ज्ञानं भावनाप्रकर्षेण भानावरणमज्ञानमपि निवर्त्य तत् श्रुतिस्मृतीतिहासपुराणादौ प्रसिद्धं परं परमार्थतत्त्वं प्रकाशयति सच्चिदानन्दानन्तात्मकं ब्रह्माहमस्मीति साक्षाद्य्वक्तीकरोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.16।।तर्हि सर्वेषामनाद्यज्ञानावृत्वात्कथं संसारनिवृत्तिः स्यादत आह तदावरणविक्षेपशक्तिमदनाद्यनिर्वाच्यमनृतमनर्थव्रातमूलमज्ञानमात्माश्रयविषयमविद्यामायादिशब्दवाच्यमात्मनो ज्ञानेन गुरूपदिष्टवेदान्तमहावाक्यजन्येन श्रवणमनननिदिध्यासनपरिपाकनिर्मलान्तःकरणवृत्तिरूपेण निर्विकल्पकसाक्षात्कारेण शोधिततत्त्वंपदार्थाभेदरूपशुद्धसच्चिदानन्दाखण्डैकरसवस्तुमात्रविषयेण नाशितं बाधितं कालत्रयेऽप्यसदेवासत्तया ज्ञातमधिष्ठानचैतन्यमात्रतां प्रापितं शुक्ताविव रजतं शुक्तिज्ञानेन येषां श्रवणमननादिसाधनसंपन्नानां भगवदनुगृहीतानां मुमुक्षूणां तेषां तज्ज्ञानं कर्तृ आदित्यवत् यथादित्यः स्वोदयमात्रेणैव तमो निरवशेषं निवर्तयति नतु कंचित्सहायमपेक्षते तथा ब्रह्मज्ञानमपि शुद्धसत्त्वपरिणामत्वाद्व्यापकप्रकाशरूपं स्वोत्पत्तिमात्रेणैव सहकार्यन्तरनिरपेक्षतया सकार्यमज्ञानं निवर्तयत्परं सत्यज्ञानानन्तानन्दरूपमेकमेवाद्वितीयं परमात्मतत्त्वं प्रकाशयति प्रतिच्छायाग्रहणमात्रेणैव कर्मतान्तरेणाभिव्यनक्ति। अत्राज्ञानेनावृतं ज्ञानेन नाशितमित्यज्ञानस्यावरणत्वज्ञाननाश्यत्वाभ्यां ज्ञानाभावरूपत्वं व्यावर्तितम्। नह्यभावः किंचिदावृणोति न वा ज्ञानाभावो ज्ञानेन नाश्यते स्वभावनाशरूपत्वात्तस्य। तस्मादहमज्ञो मामन्यं च न जानामीत्यादिसाक्षिप्रत्यक्षसिद्धं भावरूपमेवाज्ञानमिति भगवतो मतम्। विस्तरस्त्वद्वैतसिद्धौ द्रष्टव्यः। येषामिति बहुवचनेनानियमो दर्शितः। तथाच श्रुतिःतद्यो यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत्तथर्षीणां तथा मनुष्याणां तदिदमप्येतर्हि य एवं वेदाहं ब्रह्मास्मीति स इदं सर्वं भवति इत्यादिर्यद्विषयं यदाश्रयमज्ञानं तद्विषयतदाश्रयप्रमाणज्ञानात्तन्निवृत्तिरिति न्यायप्राप्तनियमं दर्शयति। तत्राज्ञानगतमावरणं द्विविधम्। एकं सतोऽप्यसत्त्वापादकं अन्यत्तु भासतोऽप्यभानापादकम्। तत्राद्यं परोक्षापरोक्षसाधारणप्रमाणज्ञानमात्रान्निवर्तते। अनुमितेऽपि वह्न्यादौ पर्वते वह्निर्नास्तीत्यादिभ्रमादर्शनात्। तथासत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्मास्ति इति वाक्यात्परोक्षनिश्चयेऽपि ब्रह्म नास्तीति भ्रमो निवर्तत एव। अस्त्येव ब्रह्म किंतु मम न भातीत्येवं भ्रमजनकं द्वितीयमभानावरणं साक्षात्कारादेव निवर्तते। स च साक्षात्कारो वेदान्तवाक्येनैव जन्यते निर्विकल्पक इत्याद्यद्वैतसिद्धावनुसंधेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.16।।तदात्मन आवरकमज्ञानं येषां ज्ञानेन ब्रह्मास्मीति प्रमाणजेन नाशितं तेषां तज्ज्ञानं कर्तु आदित्यवदादित्यो यथा कृत्स्नं दृश्यं प्रकाशयति तद्वत्परं परमार्थवस्तु प्रकाशयति। अज्ञानजानर्थनिवृत्त्यर्थं ज्ञानमेष्टव्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.16।।येषां भगवता ज्ञानेनाज्ञानं नाशितं ते न मुह्यन्तीत्याह ज्ञानेनेति। तु पुनः। आत्मज्ञानेन भगवत्सम्बन्धिज्ञानेन ज्ञानात्मकभगवद्रूपेण येषां दुर्लभानां कृपापात्राणां तत्पूर्वोक्तमज्ञानं नाशितं तेषां तद्भगवदात्मकं ज्ञानं परं ब्रह्म प्रकाशयति प्रकटयतीत्यर्थः। आदित्यवत् यथा सूर्यस्तमो दूरीकृत्य स्वात्मसहितं सर्वं वस्तुमात्रं प्रकाशयति तथा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.16।।ज्ञानिनस्तु न मुह्यन्तीत्याह ज्ञानेनेति। आत्मनो भगवतो ज्ञानेन येषां तद्वैषम्योपलम्भकज्ञानं नाशितं तज्ज्ञानं तेषामज्ञानं नाशयित्वा तत्परं परिपूर्णमीश्वरस्वरूपं प्रकाशयति। यथा आदित्यस्तमो निरस्य समस्तं वस्तुजातं प्रकाशयति तद्वत्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.16।।भगवत्प्रदत्तात्मविद्यावन्तस्तु न मुह्यन्तीत्याह ज्ञानेनेति। येषां दयनीयानां साधनवतां वा आत्मज्ञानं यदक्षरात्मत्वज्ञानेन नाशितं तेषां तज्ज्ञानं कर्तृ आदित्यवत्परम् ब्रह्मविदाप्नोति परं तै.उ.2।1 इत्यत्र श्रुतं प्रकाशयति स्वयमेवेति भगवत्प्रदत्तत्वाद्भगवद्रूपं तदिति स्वतन्त्रकर्तृत्वं तस्योक्तम्। अन्यथा करणत्वे कर्तृत्वोक्तिर्व्याहता स्यात्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.16।।जिन जीवोंके अन्तःकरणका वह अज्ञान जिस अज्ञानसे आच्छादित हुए जीव मोहित होते हैं आत्मविषयक विवेकज्ञानद्वारा नष्ट हो जाता है उनका वह ज्ञान सूर्यकी भाँति उस परम परमार्थतत्त्वको प्रकाशित कर देता है। अर्थात् जैसे सूर्य समस्त रूपमात्रको प्रकाशित कर देता है वैसे ही उनका ज्ञान समस्त ज्ञेय वस्तुको प्रकाशित कर देता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.16।। व्याख्या   ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः पीछेके श्लोकमें कही बातसे विलक्षण बात बतानेके लिये यहाँ तु पदका प्रयोग किया गया है।पीछेके श्लोकमें जिसको अज्ञानेन पदसे कहा था उसको ही यहाँ तत् अज्ञानम् पदसे कहा गया है।अपनी सत्ताको और शरीरको अलगअलग मानना ज्ञान है और एक मानना अज्ञान है।उत्पत्तिविनाशशील संसारके किसी अंशमें तो हमने अपनेको रख लिया अर्थात् मैंपन (अहंता) कर लिया और किसी अंशको अपनेमें रख लिया अर्थात् मेरापन (ममता) कर लिया। अपनी सत्ताका तो निरन्तर अनुभव होता है और मैंमेरापन बदलता हुआ प्रत्यक्ष दीखता है जैसे पहले मैं बालक था और खिलौने आदि मेरे थे अब मैं युवा या वृद्ध हूँ और स्त्री पुत्र धन मकान आदि मेरे हैं। इस प्रकार मैंमेरेपनके परिवर्तनका ज्ञान हमें है पर अपनी सत्ताके परिवर्तनका ज्ञान हमें नहीं है यह ज्ञान अर्थात् विवेक है।मैंमेरेपनको जडके साथ न मिलाकर साधक अपनेविवेकको महत्त्व दे कि मैंमेरापन जिससे मिलाता हूँ वह सब बदलता है परन्तु मैंमेरा कहलानेवाला मैं (मेरी सत्ता) वही रहता हूँ। जडका बदलना और अभाव तो समझमें आता है पर स्वयंका बदलना और अभाव किसीकी समझमें नहीं आता क्योंकि स्वयंमें किञ्चित् भी परिवर्तन और अभाव कभी होता ही नहीं इस विवेकके द्वारा मैंमेरेपनका त्याग कर दे कि शरीर मैं नहीं और बदलनेवाली वस्तु मेरी नहीं। यही विवेकके द्वारा अज्ञानका नाश करना है। परिवर्तनशीलके साथ अपरिवर्तनशीलका सम्बन्ध अज्ञानसे अर्थात् विवेकको महत्त्व न देनेसे है। जिसने विवेकको जाग्रत् करके परिवर्तनशील मैंमेरेपनके सम्बन्धका विच्छेद कर दिया है उसका वह विवेक सच्चिदानन्दघन परमात्माको प्रकाशित कर देता है अर्थात् अनुभव करा देता है।तेषामादित्यव़ज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् विवेकके सर्वथा जाग्रत् होनेपर परिवर्तनशीलकी निवृत्ति हो जाती है। परिवर्तनशीलकी निवृत्ति होनेपर अपने स्वरूपका स्वच्छ बोध हो जाता है जिसके होते ही सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्व प्रकाशित हो जाता है अर्थात् उसके साथ अभिन्नताका अनुभव हो जाता है।यहाँ परम पद परमात्मतत्त्वके लिये प्रयुक्त हुआ है। दूसरे अध्यायके उनसठवें श्लोकमें तथा तेरहवें अध्यायके चौंतीसवें श्लोकमें भी परमात्मतत्त्वके लिये परम पद आया है।प्रकाशयति पदका तात्पर्य है कि सूर्यका उदय होनेपर नयी वस्तुका निर्माण नहीं होता प्रत्युत अन्धकारसे ढके जानेके कारण जो वस्तु दिखायी नहीं दे रही थी वह दीखने लग जाती है। इसी प्रकार परमात्मतत्त्व स्वतःसिद्ध है पर अज्ञानके कारण उसका अनुभव नहीं हो रहा था। विवेकके द्वारा अज्ञान मिटते ही उस स्वतःसिद्ध परमात्मतत्त्वका अनुभव होने लग जाता है। सम्बन्ध   जिस स्थितिमें सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है उस स्थितिकी प्राप्तिके लिये आगेके श्लोकमें साधन बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.16।।अत एव ज्ञानेन त्विति। ज्ञानेन तु अज्ञाने नाशिते ज्ञानस्य स्वपरप्रकाशकत्वं (K स्वप्रकाशकत्वं) स्वतःसिद्धम् यथा आदित्यस्य तमसि नष्टे विनिवर्तितायां ( निवर्तितायां) हि शङ्कायाम् अमृतं अमृतकार्य स्वयमेव करोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.16।।तर्हि सर्वेषामनाद्यज्ञानावृतज्ञानत्वाद्व्यामोहाभावाच्च कुतः संसारनिवृत्तिरिति तत्राह ज्ञानेनेति। सर्वमिति पूर्णत्वमुच्यते ज्ञेयस्यैव वस्तुनस्तत्परमिति विशेषणम्। तद्व्याचष्टे परमार्थतत्त्वमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.16।।ननु ज्ञानस्याज्ञाननाशकत्वमर्थप्रकाशकत्वं च प्रसिद्धमेव तत्किमर्थमुच्यते इत्यत आह ज्ञानमेवेति।अज्ञानेनावृतं ज्ञानं 5।15 इत्युक्तम्। एवं तर्हि तस्याविनाश एव स्यात्। तथा च न कदाचिद्ब्रह्मप्रकाशः। विनाशकान्तराङ्गीकारे च ज्ञानार्थयोः सन्न्यासयोगयोर्वैयर्थ्यमित्याशङ्क्यज्ञानमेवाज्ञाननाशकम् अतो नोक्तदोषः। किन्तु स्वरूपज्ञानमविद्ययाऽऽवृतम् वृत्तिज्ञानं त्वविद्यां शिथिलयति। ब्रह्म प्रकाशयतीत्येतदनेनाहेत्यर्थः। अत्र केचित् यथैक एवादित्योऽन्धकारं नाशयति भूमण्डलं च प्रकाशयति तथैकमेव ज्ञानमज्ञानं निवर्तयति परं च प्रकाशयति इति व्याचक्षतेतदसदिति भावेनाह प्रथमेति। तृतीयान्तपदोक्तम् द्वितीयमपरोक्षमिति शेषः। अन्यथा द्विर्ज्ञानग्रहणं व्यर्थं स्यादिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.16।।ज्ञानमेवाज्ञाननाशकमित्याह ज्ञानेनेति। प्रथमज्ञानं परोक्षम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.16।।एवं वर्तमानेषु सर्वात्मसु येषाम् आत्मनाम् उक्तलक्षणेन आत्मयाथात्म्योपदेशजनितेन आत्मविषयेण अहरहः अभ्यासाधेयातिशयेन निरतिशयपवित्रेण ज्ञानेन तदज्ञानावरणम् अनादिकालप्रवृत्तानन्तकर्मसंशयरूपाज्ञानं नाशितं तेषां तत् स्वाभाविकं परं ज्ञानं अपरिमितम् असंकुचितम् आदित्यवत् सर्वम् यथावस्थितं प्रकाशयति। तेषाम् इति विनष्टाज्ञानानां बहुत्वाभिधानाद् आत्मस्वरूपबहुत्वम् न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे (गीता 2।12) इति उपक्रमावगतम् अत्र स्पष्टतरम् उक्तम्।न च इदं बहुत्वम् उपाधिकृतं विनष्टाज्ञानानाम् उपाधिगन्धाभावात्।तेषाम् आदित्यवज्ज्ञानम् इति व्यतिरेकनिर्देशात् ज्ञानस्य स्वरूपानुबन्धित्वम् उक्तम् आदित्यदृष्टान्तेन च ज्ञातृज्ञानयोः प्रभाप्रभावतोः इव अवस्थानं च। तत एव संसारदशायां ज्ञानस्य कर्मणा संकोचः मोक्षदशायां विकासः च उपपन्नः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.16।। ज्ञानेन तु येन अज्ञानेन आवृताः मुह्यन्ति जन्तवः तत् अज्ञानं येषां जन्तूनां विवेकज्ञानेन आत्मविषयेण नाशितम् आत्मनः भवति तेषां जन्तूनाम् आदित्यवत् यथा आदित्यः समस्तं रूपजातम् अवभासयति तद्वत् ज्ञानं ज्ञेयं वस्तु सर्वं प्रकाशयति तत् परं परमार्थतत्त्वम्।।यत् परं ज्ञानं प्रकाशितम्

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【 Verse 5.17 】

▸ Sanskrit Sloka: तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणा: | गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषा: ||

▸ Transliteration: tadbuddhayas tad-ātmānas tan-niṣṭhās tat parāyaṇāḥ | gacchanty apunar-āvṛttiṁ jñāna-nirdhūta-kalmaṣāḥ ||

▸ Glossary: tad buddhyaḥ: one whose intelligence is in the supreme; tad ātmānaḥ: whose mind is in the supreme; tanniṣṭhāḥ: whose faith is in the supreme; tat parāyaṇāḥ: who has surrendered to the supreme; gacchanti : go; apunarāvṛit- tiṁ: liberation; jñāna: knowledge; nirdhūta: cleansed; kalmaṣāḥ: sins ||5/17 ||

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.17 One whose intelligence, mind, faith are in the Supreme and one who has surrendered to the Supreme, his misunder- standings are cleansed through knowledge and he goes towards liberation.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.17।।जिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है जिनका मन तदाकार हो रहा है जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.17।। जिनकी बुद्धि उस (परमात्मा) में स्थित है जिनका मन तद्रूप हुआ है उसमें ही जिनकी निष्ठा है वह (ब्रह्म) ही जिनका परम लक्ष्य है ज्ञान के द्वारा पापरहित पुरुष अपुनरावृत्ति को प्राप्त होते हैं अर्थात् उनका पुनर्जन्म नहीं होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.17 तद्बुद्धयः intellect absorbed in That? तदात्मानः their self being That? तन्निष्ठाः established in That? तत्परायणाः with That for their supreme goal? गच्छन्ति go? अपुनरावृत्तिम् not again returning? ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः,those whose sins have been dispelled by knowledge.Commentary They fix their intellects on Brahman or the Supreme Self. They feel and realise that Brahman is their self. By constant and protracted meditation? they get established in Brahman. The whole world of names and forms vanishes for them. They live in Brahman alone. They have Brahman alone as their supreme goal or sole refuge. They rejoice in the Self alone. They are satisfied in the Self alone. They are contented in the Self alone. Such men never come back to this Samsara? as their sins are dispelled by knowledge (BrahmaJnana). (Cf.IX.34)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.17. Those, who have their intellect and self (mind) gone to This; who have established themselves in This and have This [alone] as their supreme goal; and who have washed off their sins by means of [perfect] knowledge-they reach a state from which there is no more return.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.17 Meditating on the Divine, having faith in the Divine, concentrating on the Divine and losing themselves in the Divine, their sins dissolved in wisdom, they go whence there is no return.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.17 Those whose intellects pursue It (the self), whose minds think about It, who undergo discipline for It, and who hold It as their highest object, have their impurities cleansed by knowledge and go whence there is no return.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.17 Those who have their intellect absorbed in That, whose Self is That, who are steadfast in That, who have That as their supreme Goal-they attain the state of non-returning, their dirt having been removed by Knowledge.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.17 Their intellect absorbed in That, their self being That, established in That, with That for their supreme goal, they go whence there is no return, their sins dispelled by knowledge.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.17 Because it is only the inherent nature that exerts thus, therefore [the Lord] says that the men, who have destroyed their illusion would remain as follows -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.17 'Those whose intellects pursue It,' i.e., those who have determined to have the vision of the self in this way; 'those whose minds think about It,' i.e., those whose minds have the self for their aim, those who undergo discipline for It, i.e., those who are devoted to the practices for Its attainment; 'those who hold It as their highest object,' i.e., those who consider It as their highest goal - such persons, having their previous impurities cleansed by the knowledge which is practised in this way, attain the self as taught. 'From that state there is no return' - the state from which there is no return means the state of the self. The meaning is that they attain the self which rests in Its own nature.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.17 Tat-buddhayah, those who have their intellect absorbed in That, [Here Ast. reads 'tasmin brahmani, in that Brahman'.-Tr.] in the supreme Knowledge which has been revealed; tat-atmanah, whose Self is That, who have That (tat) supreme Brahman Itself as their Self (atma); tat-nisthah, who are steadfast in That-nistha is intentness, exclusive devotion; they are called tat-nisthah who become steadfast only in Brahman by renouncing all actions; and tat-parayanah, who have That as their supreme (para) Goal (ayana), who have That alone as their supreme Resort, i.e. who are devoted only to the Self; those who have got their ignorance destroyed by Knowledge-those who are of this kind-, they gacchanti, attain; apunaravrttim, the state of non-returning, non-association again with a body; jnana-nirdhuta-kalmasah, their dirt having been removed, destroyed, by Knowledge. Those whose dirt (kalmasa), the defect in the form of sin etc., which are the cause of transmigration, have been removed, destryed (nirdhuta), by the aforesaid Knowledge (jnana) are jnana-nirdhuta-kalmasah, i.e. the monks. How do those learned ones, whose ignorance regarding the Self has been destroyed by Knowledge, look upon Reality? That is being stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.17।। शास्त्रों के गहन अध्ययन के द्वारा साधक अपने व्यक्तित्व के सभी पक्षों के साथ आत्मयुक्त हो जाता है। बुद्धि आत्मस्वरूप का निश्चय करके उसमें ही स्थित हो जाती है और उसके मन की प्रत्येक भावना ईश्वर की ही स्तुति का गान करती है। अनन्त आनन्दस्वरूप को आत्मरूप से पहचान कर साधक की उसमें निष्ठा हो जाती है। ऐसे व्यक्ति के लिए अपरिच्छिन्न और अपरिच्छेद्य आत्मा के अतिरिक्त अन्य कोई परम लक्ष्य नहीं हो सकता।शास्त्राध्ययन के द्वारा जो व्यक्ति अपने सत्यात्मस्वरूप का ज्ञान प्राप्त कर लेता है उसके लिए पुन राग या द्वेष के बन्धन में आने का अवसर या कारण ही नहीं रह जाता। यही शास्त्राध्ययन का फल है। अध्ययन के पश्चात् आवश्यकता होती है उस ज्ञान के अनुसार जीवन जीने की अर्थात् उस ज्ञान के आचरण की। अध्ययन और आचरण से ही स्वस्वरूप में अवस्थान सम्भव हो सकता है।स्वरूप में अवस्थान प्राप्त पुरुष का पुनर्जन्म नहीं होता। इसका कारण क्या है हम कैसेे कह सकते हैं कि ज्ञान के उपरान्त पुन अहंकार उत्पन्न नहीं होगा ज्ञानी पुरुषों के लिए प्रयुक्त ज्ञाननिर्धूतकल्मषा इस विशेषण के द्वारा भगवान् श्रीकृष्ण उपर्युक्त प्रश्न का उत्तर देते हैं। कल्मष अर्थात् पाप से तात्पर्य वासनाओं से है। वासनाओं से उत्पन्न होता है अहंकार। वेदान्त में वासना को ही आत्मअज्ञान कहते हैं। अज्ञान के विरोधी आत्मज्ञान का उदय होने पर दुखदायक अज्ञान अंधकार का विनाश हो जाता है और उसके साथ ही तज्जनित अहंकार भी नष्ट हो जाता है। तत्पश्चात् अहंकार पुन जन्म नहीं ले सकता क्योंकि ज्ञान की उपस्थिति में अज्ञान लौटकर नहीं आ सकता। कारण के ही अभाव में कार्यरूप अहंकार कैसे उत्पन्न हो सकता है इस श्लोक में हमें विश्व के सबसे आशावादी तत्त्वज्ञान के दर्शन होते हैं जहाँ स्पष्ट घोषणा की गई है कि आत्मसाक्षात्कार जीव के विकास का चरम लक्ष्य है। परम तत्त्व की अनुभूति विकास के सोपान की अन्तिम सीढ़ी है जिसे प्राप्त करने के लिए ही जीव स्वनिर्मित विषयों के बन्धनों में यत्रतत्र भटकता रहता है।ज्ञान के द्वारा जिनका अज्ञान नष्ट हो जाता है वे ज्ञानी पुरुष किस प्रकार तत्त्व को देखते हैं उत्तर है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.17।।तत्परमार्थतत्त्वं ज्ञानप्रकाशितं तस्मिन्गता बुद्धिर्येषां ते। ननु ते किं तस्माद्य्वतिरिक्ता नेत्याह। तदेव परंब्रह्मात्मा स्वरुपं येषां ते। तत्र हेतुमाह। यतस्तस्मिन्ब्रह्मणि निष्ठा निदिध्यासनात्मकोऽभिनिवेशो येषां ते। तत्रापि हेतुमाह। यतस्तदेव परमयनं परा गतिर्येषां ते तदेव परां गतिं बुद्ध्वा इहामुत्रार्थभोगे विरज्य तत्छ्रवणतन्मननैकपरत्वेन तत्पराणा इत्यर्थः। एवंभूता अपुनरावृत्तिं मोक्षं गच्छन्ति। यतो ज्ञानेन ब्रह्मात्मसाक्षात्कारेण नितरां मूलोच्छेदेन धूतो नाशितः कल्मषः पुनरावृत्तिकारणीभूतो येषां ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.17।।ज्ञानेन परमात्मतत्त्वप्रकाशे सति तस्मिञ्ज्ञानप्रकाशिते परमात्मतत्त्वे सच्चिदानन्दघन एव बाह्यसर्वविषयपरित्यागेन साधनपरिपाकात्पर्यवसिता बुद्धिरन्तःकरणवृत्तिः साक्षात्कारलक्षणा येषां ते तद्बुद्धयः। सर्वदा निर्बीजसमाधिभाज इत्यर्थः। तत्किं बोद्धारो जीवा बोद्धव्यं ब्रह्मतत्त्वमिति बोद्धृबोद्धव्यलक्षणभेदोऽस्ति नेत्याह तदात्मानः तदेव परं ब्रह्म आत्मा येषां ते तथा। बोद्धृबोद्धव्यभावो हि मायाविजृम्भितो न वास्तवाभेदविरोधीति भावः। ननु तदात्मान इति विशेषणं व्यर्थं अविद्वद्व्यावर्तकं हि विद्वद्विशेषणम्। अज्ञा अपि हि वस्तुगत्या तदात्मान इति कथं तद्व्यावृरिति चेत्। न। इतरात्मत्वव्यावृत्तौ तात्पर्यात्। अज्ञा हि अनात्मभूते देहादावात्माभिमानिन इति न तदात्मान इति व्यपदिश्यन्ते। विज्ञास्तु निवृत्तदेहाद्यभिमाना इति विरोधिनिवृत्त्या तदात्मान इति व्यपदिश्यन्त इति युक्तं विशेषणम्। ननु कर्मानुष्ठानविक्षेपे सति कथं देहाद्यभिमाननिवृत्तिरिति तत्राह तन्निष्ठाः तस्मिन्नेव ब्रह्मणि सर्वकर्मानुष्ठानविक्षेपनिवृत्त्या निष्ठा स्थितिर्येषां ते तन्निष्ठाः। सर्वकर्मसंन्यासेन तदेकविचारपरा इत्यर्थः। फलरागे सति कथं तत्साधनभूतकर्मत्याग इति तत्राह तत्परायणाः। तदेव परमयनं प्राप्तव्यं येषां ते तत्परायणाः। सर्वतो विरक्ता इत्यर्थः। अत्र तद्बुद्धय इत्यनेन साक्षात्कार उक्तः। तदात्मान इत्यनात्माभिमानरूपविपरीतभावनानिवृत्तिफलको निदिध्यासनपरिपाकः। तन्निष्ठा इत्यनेन सर्वकर्मसंन्यासपूर्वकः प्रमाणप्रमेयगतासंभावनानिवृत्तिफलको वेदान्तविचारः श्रवणमननपरिपाकरूपः। तत्परायणा इत्यनेन वैराग्यप्रकर्ष इत्युत्तरोत्तरस्य पूर्वपूर्वहेतुत्वं द्रष्टव्यम्। उक्तविशेषणा यतयो गच्छन्त्यपुनरावृत्ति पुनर्देहसंबन्धाभावरूपां मुक्तिं प्राप्नुवन्ति। सकृन्मुक्तानामपि पुनर्देहसंबन्धः कुतो न स्यादिति तत्राह ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ज्ञानेन निर्धूतं समूलमुन्मूलितं पुनर्देहसंबन्धकारणं कल्मषं पुण्यपापात्मकं कर्म येषां ते तथा। ज्ञानेनानाद्यज्ञाननिवृत्त्या तत्कार्यकर्मक्षये तन्मूलकं पुनर्देहग्रहणं कथं भवेदिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.17।।तद्बुद्धय इति। यत् परं ब्रह्म प्रशान्तं तत्रैव बुद्धिरस्ति ब्रह्मेति निश्चयो येषामापाततः श्रुत्यर्थविदां ते तद्बुद्धयः तदेव आत्मा प्रत्यक्तत्त्वं येषां श्रवणमननात्मकविचारेण प्रमाणप्रमेयगतासंभावनाविहीनानां ते तदात्मानः तत्रैव निष्ठा विजातीयवृत्त्यनन्तरितसजातीयवृत्तिप्रवाहो येषां देहादावनात्मन्यात्मधीरूपविपरीतभावनारहितानां ते तन्निष्ठाः तदेव परमयनमज्ञानरूपोपाधिनिरासेन प्राप्यं येषामखण्डानन्दमग्नानां ते तत्परायणाः अपुनरावृत्तिं मोक्षं गच्छन्ति। यतो ज्ञानेन निर्धूतं कल्मषं मूलाज्ञानं संसारबीजभूतं येषां ते ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.17।।तत्प्रकाशात्फलं भवतीत्याह तद्बुद्धय इति। तस्मिन् ईश्वरे बुद्धिर्येषां ते तस्मिन् स एव वाऽत्मा येषाम् तस्मिन्नेव निष्ठा भावो येषाम् तस्मिन्नेव परायणाः तत्परास्तादृशाः ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः निरस्ताज्ञानाः अपुनरावृत्तिं मोक्षं गच्छन्ति प्राप्नुवन्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.17।।एवंभूतेश्वरोपासनाफलमाह तद्बुद्धय इति। तस्मिन्नेव बुद्धिर्निश्चयात्मिका येषाम् तस्मिन्नेवात्मा मनो येषाम् तस्मिन्नेव निष्ठा तात्पर्यं येषाम् तदेव परमयनमाश्रयो येषाम् ततश्च तत्प्रसादलब्धेनात्मज्ञानेन निर्धूतं निरस्तं कल्मषं येषांतेऽपुनरावृत्तिं मुक्तिं यान्ति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.17।।य एतादृशज्ञानिनस्ते मुक्ता इत्याह तद्बुद्धय इति। तत्प्रसादलब्धेन ज्ञानेन ब्रह्मस्वरूपविषयकेण निरस्तकल्मषा मुक्तिं यान्तीत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.17।।जो प्रकाशित हुआ परमज्ञान है उस परमार्थतत्त्वमें जिनकी बुद्धि जा पहुँची है वे तद्बुद्धि हैं वह परब्रह्म ही जिनका आत्मा है वे तदात्मा हैं उस ब्रह्ममें ही जिनकी निष्ठादृढ़ आत्मभावनातत्परता है अर्थात् जो सब कर्मोंका संन्यास करके ब्रह्ममें ही स्थित हो गये हैं वे तन्निष्ठ हैं। वह परब्रह्म ही जिनका परम अयनआश्रय परमगति है अर्थात् जो केवल आत्मामें ही रत हैं वे तत्परायण हैं ( इस प्रकार ) जिनके अन्तःकरणका अज्ञान ज्ञानद्वारा नष्ट हो गया है एवं उपर्युक्त ज्ञानद्वारा संसारके कारणरूप पापादि दोष जिनके नष्ट हो चुके हैं ऐसे ज्ञाननिर्धूतकल्मष संन्यासी अपुनरावृत्तिको अर्थात् जिस अवस्थाको प्राप्त कर लेनेपर फिर देहसे सम्बन्ध होना छूट जाता है ऐसी अवस्थाको प्राप्त होते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.17।। व्याख्या   परमात्मतत्त्वका अनुभव करनेके लिये दो प्रकारके साधन हैं एक तो विवेकके द्वारा असत्का त्याग करनेपर सत्में स्वरूपस्थिति स्वतः हो जाती है और दूसरा सत्का चिन्तन करतेकरते सत्की प्राप्ति हो जाती है। चिन्तनसे सत्की ही प्राप्ति होती है। असत्की प्राप्ति कर्मोंसे होती है चिन्तनसे नहीं। उत्पत्तिविनाशशील वस्तु कर्मसे मिलती है और नित्य परिपूर्ण तत्त्व चिन्तनसे मिलता है। चिन्तनसे परमात्मा कैसे प्राप्त होते हैं इसकी विधि इस श्लोकमें बताते हैं।तद्बुद्धयः निश्चय करनेवाली वृत्तिका नाम बुद्धि है। साधक पहले बुद्धिसे यह निश्चय करे कि सर्वत्र एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है। संसारके उत्पन्न होनेसे पहले भी परमात्मा थे और संसारके नष्ट होनेके बाद भी परमात्मा रहेंगे। बीचमें भी संसारका जो प्रवाह चल रहा है उसमें भी परमात्मा वैसेकेवैसे ही हैं। इस प्रकार परमात्माकी सत्ता(होनेपन) में अटल निश्चय होना ही तद्बुद्धयः पदका तात्पर्य है।तदात्मानः यहाँ आत्मा शब्द मनका वाचक है। जब बुद्धिमें एक परमात्मतत्त्वका निश्चय हो जाता है तब मनसे स्वतः स्वाभाविक परमात्माका ही चिन्तन होने लगता है। सब क्रियाएँ करते समय यह चिन्तन अखण्ड रहता है कि सत्तारूपसे सब जगह एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है। चिन्तनमें संसारकी सत्ता आती ही नहीं।तन्निष्ठाः जब साधकके मन और बुद्धि परमात्मामें लग जाते हैं तब वह हर समय परमात्मामें अपनी (स्वंयकी) स्वतःस्वाभाविक स्थितिका अनुभव करता है। जबतक मनबुद्धि परमात्मामें नहीं लगते अर्थात् मनसे परमात्माका चिन्तन और बुद्धिसे परमात्माका निश्चय नहीं होता तबतक परमात्मामें अपनी स्वाभाविक स्थिति होते हुए भी उसका अनुभव नहीं होता।तत्परायणाः परमात्मासे अलग अपनी सत्ता न रहना ही परमात्माके परायण होना है। परमात्मामें अपनी स्थितिका अनुभव करनेसे अपनी सत्ता परमात्माकी सत्तामें लीन हो जाती है और स्वयं परमात्मस्वरूप हो जाता है।जबतक साधक और साधनकी एकता नहीं होती तबतक साधन छूटता रहता है अखण्ड नहीं रहता। जब साधकपन अर्थात् अहंभाव मिट जाता है तब साधन साध्यरूप ही हो जाता है क्योंकि वास्तवमें साधन और साध्य दोनोंमें नित्य एकता है।ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ज्ञान अर्थात् सत्असत्के विवेककी वास्तविक जागृति होनेपर असत्की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है। असत्के सम्बन्धसे ही पापपुण्यरूप कल्मष होता है जिनसे मनुष्य बँधता है। असत्से सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर पापपुण्य मिट जाते हैं।गच्छन्त्यपुनरावृत्तिम् असत्का सङ्ग ही पुनरावृत्ति(पुनर्जन्म) का कारण है कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गीता 13। 21)। असत्का सङ्ग सर्वथा मिटनेपर पुनरावृत्तिका प्रश्न ही पैदा नहीं होता।जो वस्तु एकदेशीय होती है उसीका आनाजाना होता है। जो वस्तु सर्वत्र परिपूर्ण है वह कहाँसे आये और कहाँ जाय परमात्मा सम्पूर्ण देश काल वस्तु परिस्थिति आदिमें एकरस परिपूर्ण रहते हैं। उनका कहीं आनाजाना नहीं होता। इसलिये जो महापुरुष परमात्मस्वरूप ही हो जाते हैं उनका भी कहीं आनाजाना नहीं होता। श्रुति कहती है न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति(बृहदारण्यक0 4। 4। 6)उसके प्राणोंका उत्क्रमण नहीं होता वह ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है। उसके कहलानेवाले शरीरको लेकर ही यह कहा जाता है कि उसका पुनर्जन्म नहीं होता। वास्तवमें यहाँ गच्छन्ति पदका तात्पर्य है वास्तविक बोध होना जिसके होते ही नित्यप्राप्त परमात्मतत्त्वका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें वर्णित साधनद्वारा सिद्ध हुए महापुरुषका ज्ञान व्यवहारकालमें कैसा रहता है इसे आगेके श्लोकमें बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.17।।एतच्च (K तच्च) तद्गतबुद्धिमनसा त्यक्तान्यव्यापाराणां घटत इत्याशयं प्रकटयितुमाह (S तुमुक्तम्) यत एवं स्वभावस्तु प्रवर्तते इत्यतो ध्वस्ताज्ञानानामित्थं स्थितिरित्याह विद्येति। तथा च तेषां योगिना ब्राह्मणे न ईदृशी (N अनीदृशी) बुद्धिः अस्य शुश्रूषादिना अहं पुण्यवान् भविष्यामि इत्यादि गवि न पावनी इयम् इत्यादि हस्तिनि न अर्थादिधीः शुनि अपवित्रपापकारितादिनिश्चयः श्वपाके च न पापापवित्रादिधिषणा। अत एव समं पश्यन्ति इति न तुव्यवहरन्ति इति। तदुक्तम् (K यदुक्तम्) चिद्धर्मा सर्वदेहेषु विशेषो नास्ति कुत्रचित्।अतश्च तन्मयं सर्वं भावयन् भवजिज्जनः ( N भवभिज्जनः)।।इति। (V 100 )।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.17।।विदुषां विविदिषूणां चान्तरङ्गाणि विद्यापरिपाकसाधनानीत्युपदिदिक्षुरुत्तरश्लोकस्यापेक्षितं पूरयति यत्परमिति। तस्मिन्परमार्थतत्त्वे परस्मिन्ब्रह्मणि बाह्यं विषयमपोह्य गता प्रवृत्ता श्रवणमनननिदिध्यासनैरसकृदनुष्ठितैर्बुद्धिः साक्षात्कारलक्षणा येषां ते तथेति प्रथमविशेषणं विभजते तस्मिन्निति। तर्हि बोद्धा जीवो बोद्धव्यं ब्रह्मेति जीवब्रह्मभेदाभ्युपगमो नेत्याह तदात्मान इति। कल्पितं बोद्धृबोद्धव्यत्वं वस्तुतस्तु न भेदोऽस्तीत्यङ्गीकृत्य व्याचष्टे तदेवेति। ननु देहादावात्माभिमानमपनीय ब्रह्मण्येवाहमस्मीत्यवस्थानं तत्तदनुष्ठीयमानकर्मप्रतिबन्धान्न सिध्यतीत्याशङ्क्य विशेषणान्तरमादत्ते तन्निष्ठा इति। तत्र निष्ठाशब्दार्थं दर्शयन्विवक्षितमर्थमाह निष्ठेत्यादिना। तथापि पुरुषार्थान्तरापेक्षाप्रतिबन्धात्कथंयथोक्ते ब्रह्मण्येवावस्थानं सेद्धुं पारयति तत्राह तत्परायणाश्चेति। यथोक्तानामधिकारिणां परमपुरुषार्थस्योक्तब्रह्मानतिरेकान्नान्यत्रासक्तिरिति तात्पर्यार्थमाह केवलेति। ननु यथोक्तविशेषणवतां वर्तमानदेहपातेऽपि देहान्तरपरिग्रहव्यग्रतया कुतो यथोक्ते ब्रह्मण्यवस्थानमास्थातुं शक्यते तत्राह ते गच्छन्तीति। सति संसारकारणे दुरितादौ संसारप्रसरस्य दुर्वारत्वान्नापुनरावृत्तिसिद्धिरित्याशङ्क्याह ज्ञानेति। उक्तविशेषसंपत्त्या दर्शितफलशालित्वमाश्रमान्तरेष्वसंभावितमिति मन्वानो विशिनष्टि यतय इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.17।।तद्बुद्धित्वादिकं यद्यपुनरावृत्तिसाधनत्वेनोच्यते तदाऽपरोक्षज्ञानादेव मोक्ष इति गतः पक्षः। अथ तद्बुद्धयो ज्ञाननिर्धूतकल्मषा इति ज्ञानसाधनत्वेन। तदसत् ज्ञानेनेति परोक्षज्ञानस्यापरोक्षज्ञानसाधनत्वेनोक्तत्वादित्यत आह अपरोक्षेति। सत्यम् परोक्षज्ञानमपरोक्षज्ञानसाधनम् किन्तु व्यवहितम्। न हि श्रवणमननानन्तरमेवापरोक्षज्ञानमुत्पद्यते। इदं त्वव्यवहितसाधनमाहेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.17।।अपरोक्षज्ञानाव्यवहितसाधनमाह तद्बुद्धय इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.17।।तद्बुद्धयः तथाविधात्मदर्शनाध्यवसायाः तदात्मानः तद्विषयमनसः तन्निष्ठाः तदभ्यासनिरताः तत्परायणाः तद् एव परम् अयनं येषां ते एवमभ्यस्यमानेन ज्ञानेन निर्धूतप्राचीनकल्मषाः तथाविधम् आत्मानम् अपुनरावृत्तिं गच्छन्ति। यदवस्थाद् आत्मनः पुनरावृत्तिः न विद्यते स आत्मा अपुनरावृत्तिः स्वेन रूपेण अवस्थितः तम् आत्मानं गच्छन्ति इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.17।। तस्मिन् ब्रह्मणि गता बुद्धिः येषां ते तद्बुद्धयः तदात्मानः तदेव परं ब्रह्म आत्मा येषां ते तदात्मानः तन्निष्ठाः निष्ठा अभिनिवेशः तात्पर्यं सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य तस्मिन् ब्रह्मण्येव अवस्थानं येषां ते तन्निष्ठाः तत्परायणाश्च तदेव परम् अयनं परा गतिः येषां भवति ते तत्परायणाः केवलात्मरतय इत्यर्थः। येषां ज्ञानेन नाशितम् आत्मनः अज्ञानं ते गच्छन्ति एवंविधाः अपुनरावृत्तिम् अपुनर्देहसंबन्धं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः यथोक्तेन ज्ञानेन निर्धूतः नाशितः कल्मषः पापादिसंसारकारणदोषः येषां ते ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः यतयः इत्यर्थः।।येषां ज्ञानेन नाशितम् आत्मनः अज्ञानं ते पण्डिताः कथं तत्त्वं पश्यन्ति इत्युच्यते

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【 Verse 5.18 】

▸ Sanskrit Sloka: विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि | शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन: ||

▸ Transliteration: vidyā-vinaya-saṁpanne brāhmaṇe gavi hastini | śuni caiva śvapāke ca paṇḍitāḥ samadarśinaḥ ||

▸ Glossary: vidyā: knowledge; vinaya: compassion; saṁpanne: full with; brāhmaṇe: in the brahmana; gavi: in the cow; hastini: in the elephant; śuni: in the dog; ca: and; eva: surely; śvapāke: in the dog-eater; ca: and; paṇḍitāḥ: learned; sama: equal; darśinaḥ: see

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.18 One who is full of knowledge and compassion sees equally the learned brāhmaṇa, the cow, the elephant, the dog and the dog-eater.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.18।।ज्ञानी महापुरुष विद्याविनययुक्त ब्राह्मणमें और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें भी समरूप परमात्माको देखनेवाले होते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.18।। (ऐसे वे) ज्ञानीजन विद्या और विनय से सम्पन्न ब्राह्मण तथा गाय हाथी श्वान और चाण्डाल में भी सम तत्त्व को देखते हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.18 विद्याविनयसंपन्ने upon one endowed with learning and humility? ब्राह्मणे on a Brahmana? गवि on a cow? हस्तिनि on an elephant? शुनि on a dog? च and? एव even? श्वपाके on an outcaste? च and? पण्डिताः sages? समदर्शिनः eal seeing.Commentary The liberated sage or Jivanmukta or a Brahmana has eal vision as he beholds the Self only everywhere. This magnificent vision of a Jnani is beyond description. Atman or Brahman is not at all affected by the Upadhis or limiting adjuncts as He is extremely subtle? pure? formless and attributeless. The suns reflection falls on the river Ganga? on the ocean or on a dirty stream. The sun is not at all affected in any way. This makes no difference to the sun. So is the case with the Supreme Self. The Upadhis (limiting adjuncts) cannot affect Him. Just as the ether is not affected by the limiting adjuncts? viz.? a pot? the walls of a room? cloud? etc.? so also the Self is not affected by the Upadhis.The Brahmana is Sattvic. The cow is Rajasic. The elephant? the dog and the outcaste are Tamasic. The sge sees in all of them the one homogeneous immortal Self Who is not affected by the three Gunas and their tendencies. (Cf.VI.8?32XIV.24)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.18. The wise men look, by nature, eally upon a Brahmana, rich in learning and humility, on a cow, on an elephant, and on a mere dog and on a dog-cooker (an out-caste).

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.18 Sages look equally upon all, whether he be a minister of learning and humility, or an infidel, or whether it be a cow, an elephant or a dog.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.18 The sages look with an eal eye on one endowed with learning and humility, a Brahmana, a cow, an elephant, a dog and a dog-eater.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.18 The learned ones look with eanimity on a Brahmana endowed with learning and humality, a cow, an elephant and even a dog as well as an eater of dog's meat.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.18 Sages look with an eal eye on a Brahmana endowed with learning and humility, on a cow, on an elephant, and even on a dog and an outcaste.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.18 Vidya-etc. So, regarding a Brahmana these men of Yoga entertain no such veiw as 'I shall become a man of merit by serving him' and so on; regarding a cow, no [idea] like 'It is purifying and sacred' and so on; regarding an elephant, no thought of wealth and so on; regarding a dog, no conviction that it is impure, mischievous and so on; and with regard to a dog-cooker no opinion that he is a sinner, is impure and so on. That is why it is said that 'they look eally [upon these]' and not that 'they act eally [with them]. This has been said as -

The Self, which is of the nature of pure Consciousness, [shines] in he bodies of all; no discriminating factor exists anywhere. Hence, the person who has conered the cycle of birth-and-death, remains consdering all as fully absorbed in That (Consciousness) (VB, verse 100).

Here too nothing but this stream of thought has been mentioned by 'remains considering'. The proper mental disposition of a man of wisdom, says [the Lord], would be like this :

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.18 The sages are those who know the real

Chapter 5 (Part 11)

nature of the self in all beings. They see the selves to be of the same nature, though they are perceived in extremely dissimlar embodiments such as those of one endowed with learning and humility, a mere Brahmana, a cow, an elephant, a dog, a dog-eater etc., because they all have the same form of knowledge in their nature as the Atman. The dissimilarity of the forms observed is due to Prakrti (body) and not to any dissimilarity in the self; conseently they, the wise, perceive the self as the same everywhere, because all selves, though distinct, have the same form of knowledge.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.18 Panditah, the learned ones; sama-darsinah, look with equanimity; brahmane, on a Brahmana; vidya-vinayasampanne, endowed with learning and humility-vidya means knowledge of the Self, and vinaya means pridelessness-, on a Brahmana who has Self-knowledge and modesty; gavi, on a cow; hastini, on an elephant; ca eva, and even; suni, on a dog; ca, as well as; svapake, on an eater of dog's meat.Those learned ones who are habituated to see (equally) the unchanging, same and one Brahman, absolutely untouched by the qualities of sattva etc. and the tendencies created by it, as also by the tendencies born of rajas and tamas, in a Brahmana, who is endowed with Knowledge and tranquillity, who is possessed of good tendencies and the quality of sattva; in a cow, which is possessed of the middling quality of rajas and is not spiritually refined; and in an elephant etc., which are wholly and absolutely imbued with the quality of tamas-they are seers of equality.Objection: On the strength of the text, 'A sacrificer incurs sin by not adoring equally one who is an equal, and by adoring equally one who is an equal, to himself' (Gau. Sm. 17.20), are not they sinful, whose food should not be eaten?Reply: They are not open to the charge.Objection: How?

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.18।। अपने ज्ञानानुसार ही हमारी जगत् को देखने की दृष्टि होती है। आत्मज्ञानी पुरुष सर्वत्र समरूप विद्यमान दिव्य आत्मतत्त्व का ही दर्शन करता है। समुद्र मंे उठती हुई असंख्य लहरों के प्रति समुद्र की अलगअलग भावना नहीं हो सकती। मिट्टी की दृष्टि से मिट्टी से निर्मित सभी घट एक समान ही हैं। इसी प्रकार जिस अहंकार रहित पुरुष ने अपने ब्रह्मस्वरूप को पहचान लिया है उसकी नामरूपमय सृष्टि की ओर देखने की दृष्टि सम बन जाती है। दृष्टिगोचर सभी प्रकार के भेद केवल उपाधियों में ही हैं। मनुष्यमनुष्य में भेद शरीर के रूप और रंग में हो सकता है अथवा मन के स्वभाव या बुद्धि की प्रखरता में। परन्तु जीवन तत्त्व तो सबमें सदा एक ही होता है।इसलिए इस श्लोक में कहा गया है कि विद्याविनययुक्त ब्राह्मण गाय हाथी श्वान और चाण्डाल इन सबकी ओर आत्मप्रज्ञा प्राप्त पण्डित पुरुष समदृष्टि से देखता है। सब उपाधियों में एक ही परम सत्य विराजमान है।आत्मसाक्षात्कार का मुख्य लक्षण है समदर्शन। ज्ञानी पुरुष अपने व्यक्तिगत रागद्वेष के आधार पर भेद नहीं करता। आत्मरूप से अनुभव किये परम सत्य को ही विभिन्न नामरूपों में व्यक्त देखता है।इस श्लोक के सन्दर्भ में श्री शंकराचार्य गौतमस्मृति को उद्धृत करते हुए एक शंका उठाते हैं जिसका निराकरण अगले श्लोक में किया गया है। उस स्मृति ग्रन्थ के अनुसार जैसे पूजनीय व्यक्ति का अनादर करना दोषयुक्त है वैसे ही अनादरणीय व्यक्ति का सम्मान करने में भी उतना ही दोष है। स्मृति के इस कथन की दृष्टि से ब्राह्मण के असमान ही श्वान को आदर देना अथवा जो अनादर श्वान का किया जाता है उतना ही असम्मान एक श्रेष्ठ ब्राह्मण का करना ये दोनों ही पापपूर्ण कर्म होंगे। परन्तु समदर्शी पुरुष इस दोष से सर्वथा मुक्त होते हैं। उसका कारण यह है कि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.18।। येषां ज्ञानेन नाशितमात्मनोऽज्ञानं ते पण्डिता मोक्षगामिनः कथमात्मतत्त्वं पश्यन्तीति तत्राह विद्येति। विद्या आत्मबोधः विनय उपशम औद्धत्याद्यभावः। दैन्यवारणाय विद्यापदमौद्धत्यादिवारणाय विनयपदं ताभ्यां संपन्ने युक्ते उत्तमसंस्कारवति सात्त्विके ब्राह्मणे मध्यमायां राजस्यां गवि संस्काररहितायां अधमे केवलतामसे हस्तिनि गजे शुनि सारभेये श्वपाके चाण्डाले। तामसानां बहूनामुपादानं तु सात्त्विकराजसापेक्षया तेषां बाहुल्यसूचनार्थम्। समं सत्त्वादिगुणैस्तज्जन्यसंस्कारैश्चास्पृष्टमेकमविक्रियं गङ्गाजले तडागोदके मूत्रादावच्छिन्नाकाशमिव ब्रह्म द्रष्टुं शीलं येषां ते पण्डिताः समदर्शिन इत्यर्थः। यत्तु ननु ज्ञानसंन्याससंपन्नानामेव जीवे कोऽयमतिशयो यत्परैक्यं नाम। नहि मनुष्याणां लोके उत्तममध्यमतया व्यवह्नियमाणानां पशूनां वा तादृशानां न जीवोऽस्ति सन्वा न परैक्यं प्रतिपद्यते। इत्याशङ्क्याह विद्येति।अत्र गवि हस्तिनि शुनीति गोत्वादिजात्याधारपिण्डरुपोपाधी नाभुत्तममध्यमाधमानामुक्तत्वान्मानुषपिण्डानामप्यात्मोपाधीनामेवं विवेको ज्ञेयः। ब्राह्मणस्योत्तमस्य पृथगभिधानात्। विद्यासंपन्नाबशिष्टौ क्षत्रियवैश्यपिण्डौ। विनयसंपन्नस्त्रैवर्णिकसेवामात्रधर्मकः शूद्रपिण्डः। पिण्डसमुदायाभिप्रायं चैकवचनम्। तथोत्तमो ब्राह्मणः क्षत्रियवैश्यौ मध्यमौ ततः किंचिन्निकृष्टः शूद्रः सर्वथाधमः श्वपाकः। एतेषु मानुषपशूत्तममध्यमाधमेषु पिण्डेष्वात्मोपाधिषु सत्स्वप्यनुपहितं सर्वत्राविशेषत्वात् समं ब्रह्मैव तत्रतत्र प्रविष्टं पण्डिताः पश्यन्ति नत्वात्मानमेव ब्रह्मात्मकं पश्यन्तीत्यर्थ इतीतरे व्याचख्युः। तन्मन्दम्। सर्वभूतात्मभूतब्रह्मदर्शिन इत्येतावतैवोक्तार्थे सिद्धेऽमूलोक्तानामुपाधिभेदानां क्लिष्टकल्पनया प्रदर्शितानां समपदस्य च वैयर्थ्यप्रसङ्गात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.18।।देहपातादूर्ध्वं विदेहकैवल्यरूपं ज्ञानफलमुक्त्वा प्रारब्धकर्मवशात्सत्यपि देहे जीवन्मुक्तिरूपं तत्फलमाह विद्या वेदार्थपरिज्ञानं ब्रह्मविद्या वा विनयो निरहंकारत्वम् अनौद्धृत्यमिति यावत्। ताभ्यां संपन्ने ब्रह्मविदि विनीते च ब्राह्मणे सात्त्विकेसर्वोत्तमे। तथा गवि संस्कारहीनायां राजस्यां मध्यमायाम्। तथा हस्तिनि शुनि श्वपाके चात्यन्ततामसे सर्वाधर्मेऽपि सत्त्वादिगुणैस्तज्जैश्च संस्कारैरस्पृष्टमेव समं ब्रह्म द्रष्टुं शीलं येषां ते समदर्शिनः पण्डिता ज्ञानिनः। यथा गङ्गातोये तडागे सुरायां मूत्रे वा प्रतिबिम्बितस्यादित्यस्य न तद्गुणदोषसंबन्धस्तथा ब्रह्मणोऽपि चिदामासद्वारा प्रतिबिम्बितस्य नोपाधिगतगुणदोषसंबन्ध इति प्रतिसंदधानाः सर्वत्र समदृष्ट्यैव रागद्वेषराहित्येन परमानन्दस्फूर्त्या जीवन्मुक्तिमनुभवन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.18।।एतेषां जगति दृष्टिमाह विद्येति। उत्तमब्राह्मणे चण्डालादौ वा समं ब्रह्मैव सद्रूपेण स्फुरणरूपेण च भासमानं द्रष्टुं शीलं येषां ते समदर्शिनः। यथोक्तम्अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम्। आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम्। इति। चराचरं जगद्ब्रह्मदृष्ट्यैव पश्यन्तीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.18।।तेषां लक्षणमाह विद्येति। विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे श्वपाके शुनो यः पचति तस्िमँश्च गवि हस्तिनि शुनि च समदर्शिनः मदंशात्मज्ञानेन ते पण्डिता ज्ञानिनः ज्ञेया इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.18।।कीदृशास्ते ज्ञानिनो येऽपुनरावृत्तिं गच्छन्तीत्यपेक्षायामाह विद्याविनयसंपन्न इति। विषमेष्वपि समं ब्रह्मैव द्रष्टुं शीलं येषां ते। पण्डिताः ज्ञानिन इत्यर्थः। तत्र विद्याविनयाभ्यां युक्ते ब्राह्मणे च शुनो यः पचति तस्मिञ्श्वपाके चेति कर्मणा वैषम्यम्। गवि हस्तिनि शुनि चेति जातितो वैषम्यं दर्शितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.18।।कीदृशास्ते इति जिज्ञासायां तेषां स्वरूपमाह विद्येति। एतेषु विषमेषु गवादिष्वपि समं ब्रह्म द्रष्टुं शीलं येषां ते पण्डिता उक्तलक्षणाः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.18।।जिनके आत्माका अज्ञान ज्ञानद्वारा नष्ट हो चुका है वे पण्डितजन परमार्थतत्त्वको कैसे देखते हैं सो कहते हैं विद्या और विनययुक्त ब्राह्मणमें अर्थात् विद्याआत्मबोध और विनयउपरामता इन दोनों गुणोंसे सम्पन्न जो विद्वान् और विनीत ब्राह्मण है उस ब्राह्मणमें गौमें हाथीमें कुत्ते और चाण्डालमें भी पण्डितजन समभावसे देखनेवाले ( होते हैं )। अभिप्राय यह कि उत्तम प्राणी संस्कारयुक्त विद्याविनयसम्पन्न सात्त्विक ब्राह्मणमें मध्यम प्राणीसंस्काररहित रजोगुणयुक्त गौमें और ( कनिष्ठ प्राणी ) अतिशय मूढ़ केवल तमोगुणयुक्त हाथी आदिमें सत्त्वादि गुणोंसे और उनके संस्कारोंसे तथा राजस और तामस संस्कारोंसे सर्वथा ही निर्लेप रहनेवाले सम एक निर्विकार ब्रह्मको देखना ही जिनका स्वभाव है वे पण्डित समदर्शी हैं। पू0 वे ( इस प्रकार देखनेवाले ) दोषयुक्त हैं उनका अन्न भोजन करने योग्य नहीं क्योंकि यह स्मृतिका प्रमाण है कि समान गुणशीलवालोंकी विषम पूजा करनेसे और विषम गुणशीलवालोंकी सम पूजा करनेसे ( यजमान दोषी होता है )।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.18।। व्याख्या   विद्याविनयसम्पन्ने ৷৷. पण्डिताः समदर्शिनः यहाँ ब्राह्मणके लिये दो विशेषण दिये गये हैं विद्यायुक्त और विनययुक्त अर्थात् ऐसा ब्राह्मण जो विद्वान् भी है और विनम्र स्वभाववाला (ब्राह्मणपनेके अभिमानसे रहित) भी है। ब्राह्मण होनेसे वह जातिसे तो ऊँचा है ही साथहीसाथ विद्या और विनयसे भी सम्पन्न है यह ब्राह्मणत्वकी पूर्णता है। जहाँ पूर्णता होती है वहाँ अभिमान नहीं रहता। अभिमान वहीं रहता है जहाँ पूर्णता नहीं होती।ब्राह्मण और चाण्डालमें तथा गाय हाथी एवं कुत्तेमें व्यवहारकी विषमता अनिवार्य है। इनमें समान बर्ताव शास्त्र भी नहीं कहता उचित भी नहीं और कर सकते भी नहीं। जैसे पूजन विद्याविनययुक्त ब्राह्मणका ही हो सकता है न कि चाण्डालका दूध गायका ही पीया जाता है न कि कुतियाका सवारी हाथीकी ही हो सकती है न कि कुत्तेकी। इन पाँचों प्राणियोंका उदाहरण देकर भगवान् यह कह रहे हैं कि इनमें व्यवहारकी समता सम्भव न होनेपर भी तत्त्वतः सबमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण है। महापुरुषोंकी दृष्टि उस परमात्मतत्त्वपर ही सदासर्वदा रहती है। इसलिये उनकी दृष्टि कभी विषम नहीं होती।यहाँ एक शङ्का हो सकती है कि दृष्टि विषम हुए बिना व्यवहारमें भिन्नता कैसे होगी इसका समाधान यह है कि अपने शरीरके सब अङ्गों (मस्तक पैर हाथ गुदा आदि) में हमारी दृष्टि अर्थात् अपनेपन और हितकी भावना समान रहती है फिर भी हम उनके व्यवहारमें भेद रखते हैं जैसे किसीको पैर लग जाय तो क्षमायाचना करते हैं पर किसीको हाथ लग जाय तो क्षमायाचना नहीं करते। प्रणाम मस्तक और हाथोंसे करते हैं पैरोंसे नहीं। गुदासे हाथ लगनेपर हाथ धोते हैं हाथसे हाथ लगनेपर नहीं। इतना ही नहीं एक हाथकी अँगुलियोंमें भी व्यवहारमें भेद रहता है। किसीको तर्जनी अँगुली दिखाने और अँगूठा दिखानेका तो भेद तो सब जानते ही हैं। इस प्रकार शरीरके भिन्नभिन्न अङ्गोंके व्यवहारमें तो भेद होता है पर आत्मीयतामें भेद नहीं होता। इसलिये शरीरके किसी भी पीड़ित अङ्गकी उपेक्षा नहीं होती। व्यवहारमें भेद होनेपर भी पीड़ा मिटानेमें हम समानताका व्यवहार करते हैं। शरीरके सभी अङ्गोंके सुखदुःखमें हमारा एक ही भाव रहता है (गीता 6। 32)। इसी प्रकार प्राणियोंमें खानपान गुण आचरण जाति आदिका भेद होनेसे उनके साथ ज्ञानी महापुरुषोंके व्यवहारमें भी भेद होता है और होना भी चाहिये। परन्तु उन सब प्राणियोंमें एक ही परमात्मतत्त्व परिपूर्ण होनेके कारण महापुरुषकी दृष्टिमें भेद नहीं होता। उन प्राणियोंके प्रति महापुरुषकी आत्मीयता प्रेम हित दया आदिके भावमें कभी फरक नहीं पड़ता। उनके अन्तःकरणमें रागद्वेष ममता आसक्ति अभिमान पक्षपात विषमता आदिका सर्वथा अभाव होता है। जैसे अपने शरीरके किसी अङ्गका दुःख दूर करनेकी चेष्टा स्वाभाविक होती है ऐसे ही पता लगनेपर दूसरे प्राणीका दुःख दूर करनेकी और उसे सुख पहुँचानेकी चेष्टा भी उनके द्वारा स्वाभाविक होती है। यही कारण है कि भगवान्ने यहाँ महापुरुषोंको समदर्शी कहा है न कि समवर्ती। गीतामें दूसरी जगह भी सम देखनेकी या समबुद्धिकी ही बात आयी है जैसे समबुद्धिर्विशिष्यते (6। 9) सर्वत्र समदर्शनः (6। 29) आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति (6। 32) सर्वत्र समबुद्धयः (12। 4) समं सर्वेषु भूतेषु ৷৷. यः पश्यति स पश्यति (13। 27) और समं पश्यन् हि सर्वत्र (13। 28)।श्रीशङ्कराचार्यजी महाराज कहते हैं भावाद्वैतं सदा कुर्यात् क्रियाद्वैतं न कुत्रचित्।(तत्त्वोपदेश)भावमें ही सदा अद्वैत होना चाहिये क्रिया (व्यवहार) में कहीं नहीं।समतासम्बन्धी विशेष बात आजकल समतापर विशेष चर्चा चल रही है। सबके साथ समताका बर्ताव करो ऐसा प्रचार किया जा रहा है। परन्तु वास्तवमें समता किसे कहते हैं और वह कब आती है इसे समझनेकी बड़ी आवश्यकता है।समता कोई खेलतमाशा नहीं है प्रत्युत परमात्माका साक्षात् स्वरूप है। जिनका मन समतामें स्थित हो जाता है वे यहाँ जीतेजी ही संसारपर विजय प्राप्त कर लेते हैं और परब्रह्म परमात्माका अनुभव कर लेते हैं (गीता 5। 19)। यह समता तब आती है जब दूसरोंका दुःख अपना दुःख और दूसरोंका सुख अपना सुख हो जाता है। गीतामें भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन जो पुरुष अपने शरीरकी तरह सब जगह सम देखता है और सुख अथवा दुःखको भी सब जगह सम देखता है वह योगी परम श्रेष्ठ माना गया है (6। 12)। जैसे शरीरके किसी भी अङ्गमें पीड़ा होनेपर उसको दूर करनेकी लगन लग जाती है ऐसे ही किसी प्राणीको दुःख सन्ताप आदि होनेपर उसको दूर करनेकी लगन लग जाय तब समता आती है। सन्तोंके लक्षणोंमें भी आया है पर दुख दुख सुख सुख देखे पर (मानस 7। 38। 1)जबतक अपने सुखकी लालसा है तबतक चाहे जितना उद्योग कर लें समता नहीं आयेगी। परन्तु जब हृदयसे यह लगन लग जायगी कि दूसरोंको सुख कैसे पहुँचे उनको आराम कैसे हो उनको लाभ कैसे हो उनका कल्याण कैसे हो तब समता स्वतः आ जायगी। इसका आरम्भ सर्वप्रथम अपने घरसे करना चाहिये। हृदयमें ऐसा भाव हो कि किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख या कष्ट न पहुँचे किसीका कभी अनिष्ट न हो। चाहे मैं कितना ही कष्ट पाऊँ पर मेरे मातापिता स्त्रीपुत्र भाईभौजाई आदिको सुख होना चाहिये। घरवालोंको सुख पहुँचानेसे अपने हृदयमें शान्ति आयेगी ही। जहाँ अपने घरका भी सम्बन्ध नहीं है वहाँ सुख पहुँचायेंगे तो विशेष आनन्दकी लहरें आने लग जायँगी। परन्तु ममतापूर्वक सुख पहुँचानेसे हमारी उन्नति नहीं होगी। जहाँ हमारी ममता न हो वहाँ सुख पहुँचायें अथवा जहाँ हम ममतापूर्वक सुख पहुँचाते हैं वहाँसे अपनी ममता हटा लें दोनोंका परिणाम एक ही होगा।चित्रकूटमें लक्ष्मणजी भगवान् राम और सीताकी सेवा कैसे करते हैं यह बताते हुए गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि ।।(मानस 2। 142। 1)अर्थात् लक्ष्मणजी भगवान् राम और सीताजीकी वैसे ही सेवा करते हैं जैसे अज्ञानी मनुष्य अपने शरीरकी सेवा करता है। अपने शरीरकी सेवा करना उसे सुख पहुँचाना समझदारी नहीं है। अपने शरीरकी सेवा तो पशु भी करते हैं। जैसे बँदरीकी अपने बच्चेपर इतनी ममता रहती है कि उसके मरनेके बाद भी वह उसके शरीरको पकड़े हुए चलती है छोड़ती नहीं। परन्तु जब कोई वस्तु खानेके लिये मिल जाती है तब वह स्वयं तो खा लेती है पर बच्चेको नहीं खाने देती। बच्चा खानेकी चेष्टा करता है तो उसे ऐसी घुड़की मारती है कि वह चींचीं करते भाग जाता है। अतः ममताके रहते हुए समताका आना असम्भव है।जिससे हमें कुछ लेना नहीं है जिससे हमारा कोई स्वार्थ नहीं है ऐसे व्यक्तिके साथ भी हम प्रेमपूर्वकअच्छासेअच्छा बर्ताव करें जिससे उसका हित हो। कोई व्यक्ति मार्गमें भटक गया है उसे मार्गका पता नहीं है और वह हमसे पूछता है। हम उसे बड़ी प्रसन्नतासे मार्ग बतायें अथवा कुछ दूरतक उसके साथ चलें तो हमें हृदयमें प्रत्यक्ष सुखका शान्तिका अनुभव होगा। परन्तु यदि हम जानते हुए भी उसे मार्ग नहीं बतायेंगे तो हमारे हृदयमें सुख नहीं होगा। यह अनुभवकी बात है कोई करके देख ले। किसीको प्यास लगी है तो उसे बता दे कि भाई इधर आओ इधर ठण्डा जल है। फिर हम अपना हृदय देखें। हमारे हृदयमें प्रसन्नता आयेगी सुख आयेगा। यह सुख हमारा कल्याण करनेवाला है। दूसरा दुःख पाये पर मैं सुख ले लूँ यह सुख पतन करनेवाला है। इससे न तो व्यवहारमें हमारी उन्नति होगी और न परमार्थमें। हम सत्सङ्गका आयोजन करते हैं। उसमें आनेवाले व्यक्तियोंके बैठनेकी व्यवस्था करते हैं तो उनसे प्रेमपूर्वक कहें कि आइये यहाँ बैठिये। उन्हें वहाँ बैठायें जहाँसे वे ठीक तरहसे कैसे सुन सकें। वे आरामसे कैसे बैठ सकें ठीक तरहसे कैसे सुन सकें ऐसा भाव रखकर उनसे बर्ताव करें। ऐसा करनेसे हमारे हृदयमें प्रत्यक्ष शान्ति आयेगी। पर वहीं हुक्म चलायें कि क्या करते हो इधर बैठो इधर नहीं तो बात वही होनेपर भी हृदयमें शान्ति नहीं आयेगी। भीतरमें जो अभिमान है वह दूसरोंको चुभेगा बुरा लगेगा। ऐसा बर्ताव करें और चाहें कि समता आ जाय तो वह कभी आयेगी नहीं।सबके हितमें जिसकी प्रीति हो गयी है उन्हें भगवान् प्राप्त हो जाते हैं ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः (गीता 12। 4)। कारण कि भगवान् प्राणिमात्रके परम सुहृद् हैं (गीता 5। 29)। वे प्राणिमात्रका पालनपोषण करनेवाले हैं। आस्तिकसेआस्तिक हो अथवा नास्तिकसेनास्तिक दोनोंके लिये भगवान्का विधान बराबर है। एक व्यक्ति बड़ा आस्तिक है भगवान्को बहुत मानता है और उन्हें पानेके लिये साधनभजन करता है और एक व्यक्ति ऐसा नास्तिक है कि संसारसे भगवान्का खाता उठा देना चाहता है। भगवान्को माननेसे और भगवान्के कारण ही दुनिया दुःख पा रही है भगवान् नामकी कोई चीज है ही नहीं ऐसा उसके हृदयमें भाव है और ऐसा ही प्रचार करता है। ऐसे नास्तिकसेनास्तिक व्यक्तिकी भी प्यास जल मिटाता है और यही जल आस्तिकसेआस्तिक व्यक्तिकी भी प्यास मिटाता है। जलमें यह भेद नहीं है कि वह आस्तिककी प्यास ठीक तरहसे शान्ति करे और नास्तिककी प्यास शान्त न करे। वह समान रीतिसे सबकी प्यास मिटाता है। ऐसे ही सूर्य समान रीतिसे सबको प्रकाश देता है हवा समान रीतिसे सबको श्वास लेने देती है पृथ्वी समान रीतिसे सबको रहनेका स्थान देती है। इस प्रकार भगवान्की रची हुई प्रत्येक वस्तु सबको समान रीतिसे मिलती है।समताका अर्थ यह नहीं है कि समान रीतिसे सबके साथ रोटीबेटी (भोजन और विवाह) का बर्ताव करें। व्यवहारमें समता तो महान् पतन करनेवाली चीज है। समान बर्ताव यमराजका मौतका नाम है क्योंकि उसके बर्तावमें विषमता नहीं होती। चाहे महात्मा हो चाहे गृहस्थ हो चाहे साधु हो चाहे पशु हो चाहे देवता हो मौत सबकी बराबर होती है। इसलिये यमराजको समवर्ती (समान बर्ताव करनेवाला) कहा गया है (टिप्पणी प0 307)। अतः जो समान बर्ताव करते हैं वे भी यमराज हैं।पशुओंमें भी समान बर्ताव पाया जाता है। कुत्ता ब्राह्मणकी रसोईमें जाता है तो पैर धोकर नहीं जाता। ब्राह्मणकी रसोई हो अथवा हरिजनकी वह तो जैसा है वैसा ही चला जाता है क्योंकि यह उसकी समता है। पर मनुष्यके लिये यह समता नहीं है प्रत्युत महान् पशुता है। समता तो यह है कि दूसरेका दुःख कैसे मिटे दूसरेको सुख कैसे हो आराम कैसे हो ऐसी समता रखते हुए बर्तावमें पवित्रता निर्मलता रखनी चाहिये। बर्तावमें पवित्रता रखनेसे अन्तःकरण पवित्र निर्मल होता है। परन्तु बर्तावमें अपवित्रता रखनेसे खानपान आदि एक करनेसे अन्तःकरणमें अपवित्रता आती है जिससे अशान्ति बढ़ती है। केवल बाहरका बर्ताव समान रखना शास्त्र और समाजकी मर्यादाके विरुद्ध है। इससे समाजमें संघर्ष पैदा होता है।वर्णोंमें ब्राह्मण ऊँचे हैं और शूद्र नीचे हैं ऐसा शास्त्रोंका सिद्धान्त नहीं है। ब्राह्मण उपदेशके द्वारा क्षत्रिय रक्षाके द्वारा वैश्य धनसम्पत्ति आवश्यक वस्तुओँके द्वारा और शूद्र शरीरसे परिश्रम करके सभी वर्णोंकी सेवाकरे। इसका अर्थ यह नहीं है कि दूसरे अपने कर्तव्यपालनमें परिश्रम न करें प्रत्युत अपने कर्तव्यपालनमें समान रीतिसे सभी परिश्रम करें। जिसके पास जिस प्रकारकी शक्ति विद्या वस्तु कला आदि है उसके द्वारा चारों ही वर्ण चारों वर्णोंकी सेवा करें उनके कार्योंमें सहायक बनें। परन्तु चारों वर्णोंकी सेवा करनेमें भेदभाव न रखें।आजकल वर्णाश्रमको मिटाकर पार्टीबाजी हो रही है। आज वर्णाश्रममें इतनी लड़ाई नहीं है जितनी लड़ाई पार्टीबाजीमें हो रही है यह प्रत्यक्ष बात है। पहले लोग चारों वर्णों और आश्रमोंकी मर्यादामें चलते थे और सुखशान्तिपूर्वक रहते थे। आज वर्णाश्रमकी मर्यादाको मिटाकर अनेक पार्टियाँ बनायी जा रही हैं जिससे संघर्षको बढ़ावा मिल रहा है। गाँवोंमें सब लोगोंको पानी मिलना कठिन हो रहा है। जिनके अधिकारमें कुआँ है वे कहते हैं कि तुमने उस पार्टीको वोट दिया है इसलिये तुम यहाँसे पानी नहीं भर सकते। माँ बाप और बेटा तीनों अलगअलग पार्टियोंको वोट देते हैं और घरमें लड़ते हैं। भीतरमें वैर बाँध लिया कि तुम उस पार्टीके और हम इस पार्टीके। कितना महान् अनर्थ हो रहा हैयदि समता लानी हो तो दूसरा व्यक्ति किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय मत आदिका क्यों न हो उसे सुख देना है उसका दुःख दूर करना है और उसका वास्तविक हित करना है। उनमें यह भेद हो सकता है कि आप रामराम कहते हैं हम कृष्णकृष्ण कहेंगे आप वैष्णव हैं हम शैव हैं आप मुसलमान हैं हम हिन्दू हैं इत्यादि। परन्तु इससे कोई बाधा नहीं आती है। बाधा तब आती है जब यह भाव रहता है कि वे हमारी पार्टीके नहीं हैं इसलिये उनको चाहे दुःख होता रहे पर हमें और हमारी पार्टीवालोंको सुख हो जाय। यह भाव महान् पतन करनेवाला है। इसलिये कभी किसी वर्ण आदिके मनुष्योंको कष्ट हो तो उनके हितकी चिन्ता समान रीतिसे होनी चाहिये और उन्हें सुख हो तो उससे प्रसन्नता समान रीतिसे होनी चाहिये। जैसे ब्राह्मणों और हरिजनोंमें संघर्ष हुआ। उसमें हरिजनोंकी हार और ब्राह्मणोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें प्रसन्नता हो अथवा ब्राह्मणोंकी हार और हरिजनोंकी जीत होनेपर हमारे मनमें दुःख हो तो यह विषमता है जो बहुत हानिकारक है। ब्राह्मणों और हरिजनों दोनोंके प्रति ही हमारे मनमें हितकी समान भावना होनी चाहिये। किसीका भी अहित हमें सहन न हो। किसीका भी दुःख हमें समान रीतिसे खटकना चाहिये। यदि ब्राह्मण दुःखी है तो उसे सुख पहुँचायें और यदि हरिजन दुःखी है तो उसे सुख न पहुँचायें ऐसा पक्षपात नहीं होना चाहिये प्रत्युत हरिजनको सुख पहुँचानेकी विशेष चेष्टा होनी चाहिये। हरिजनोंको सुख पहुँचानेकी चेष्टा करते हुए भी ब्राह्मणोंके दुःखकी उपेक्षा नहीं होनी चाहिये। इस प्रकार किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय आदिको लेकर पक्षपात नहीं होना चाहिये। सभीके प्रति समान रीतिसे हितका बर्ताव होना चाहिये। यदि कोई निम्नवर्ग है और उसे हम ऊँचा उठाना चाहते हों तो उस वर्गके लोगोंके भावों और आचरणोंको शुद्ध और श्रेष्ठ बनाना चाहिये उनके पास वस्तुओंकी कमी हो तो उसकी पूर्ति करनी चाहिये परन्तु उन्हें उकसाकर उनके हृदयोंमें दूसरे वर्गके प्रति ईर्ष्या और द्वेषके भाव भर देना अत्यन्त ही अहितकर घातक है तथा लोकपरलोकमें पतन करनेवाला है। कारण कि ईर्ष्या द्वेष अभिमान आदि मनुष्यका महान् पतन करनेवाले हैं। यदि ऐसे भाव ब्राह्मणोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा और हरिजनोंमें हैं तो उनका भी पतन होगा। उत्थान तो सद्भावों सद्गुणों सदाचारोंसे ही होता है।भोजन वस्त्र मकान आदि निर्वाहकी वस्तुओंकी जिनके पास कमी है उन्हें ये वस्तुएँ विशेषतासे देनी चाहिये चाहे वे किसी भी वर्ण आश्रम धर्म सम्प्रदाय आदिके क्यों न हों। सबका जीवनयापन सुखपूर्वक होना चाहिये। सभी सुखी हों सभी नीरोग हों सभीका हित हो कभी किसीको किञ्चिन्मात्र भी दुःख न हो (टिप्पणी प0 308) ऐसा भाव रखते हुए यथायोग्य बर्ताव करना ही समता है जो सम्पूर्ण मनुष्योंके लिये हितकर है। सम्बन्ध   अब भगवान् पूर्वश्लोकमें वर्णित समताकी विशेष महिमा कहते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.18।।अत्रापि भावयन्निति ज्ञानस्यैवेयं धारा उक्ता।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.18।।यदपुनरावृत्तिसाधनं तत्त्वज्ञानं तदेव प्रश्नद्वारेण विवृणोति येषामित्यादिना। विद्या वेदार्थविज्ञानमित्यङ्गीकृत्य विनय व्याचष्टे विनय इति। उपशमो निरहंकारत्वमनौद्धत्यम्। पदार्थमेवमुक्त्वा वाक्यार्थं दर्शयति विद्वानिति। गवीत्याद्यनूद्य वाक्यार्थं कथयति विद्येति। हस्त्यादौ पण्डिताः समदर्शिन इत्युत्तरत्र संबन्धः। तत्र तत्र प्राणिभेदेषु तत्तद्गुणैस्तत्तन्निमित्तसंस्कारैश्च संस्पृष्टत्वसंभवान्न ब्रह्मणः समत्वमित्याशङ्क्याह सत्त्वादीति। तज्जैश्चेत्यत्र तच्छब्देन सत्त्वमेव गृह्यते। सात्त्विकसंस्कारैरिव राजससंस्कारैरपि सर्वथैवासंस्पृष्टं ब्रह्मेत्याह तथेति। राजसैरिव तामसैरपि संस्कारैर्ब्रह्मात्यन्तमेवास्पृष्टमित्याह तथा तामसैरिति। ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वं कूटस्थत्वमसङ्गत्वं चोक्तेऽर्थे हेतुरिति मत्वा समशब्दार्थमाह सममिति। समदर्शित्वमेव पाण्डित्यं तद्व्याचष्टे ब्रह्मेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.18।।विद्याविनयेत्यादिप्रकृतानुपयुक्तमयुक्तं च कथमुच्यते इत्यत आह परमेश्वरेति। सर्वत्र ब्राह्मणादिषु स्थितानां सर्वत्र गुणेषु दोषाभावेषु वा साम्यं तारतम्याभावः। तद्बुद्धित्वादिना सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। परमेश्वरविषयतानिर्दोषं हि 5।19 इत्युत्तरवाक्यगम्या अपरोक्षज्ञानसाधनता च प्रकरणगम्येत्यत आशयवानित्युक्तम्। पण्डितशब्दस्तु परोक्षज्ञानवचनः पाण्डित्यमागमज्ञानमिति वचनात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.18।।परमेश्वरस्वरूपाणां सर्वत्र साम्यदर्शनं चापरोक्षज्ञानसाधनमित्याशयवानाह विद्येति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.18।।विद्याविनयसंपन्ने ब्राह्मणो गोहस्तिश्वपचादिषु अत्यन्तविषमाकारतया प्रतीयमानेषु च आत्मसु पण्डिताः आत्मयाथात्म्यविदो ज्ञानैकाकारतया सर्वत्र समदर्शिनः। विषमाकारः तु प्रकृतेः न आत्मनःआत्मा तु सर्वत्र ज्ञानैकाकारतया समः इति पश्यन्ति इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.18।। विद्याविनयसंपन्ने विद्या च विनयश्च विद्याविनयौ विद्या आत्मनो बोधो विनयः उपशमः ताभ्यां विद्याविनयाभ्यां संपन्नः विद्याविनयसंपन्नः विद्वान् विनीतश्च यो ब्राह्मणः तस्मिन् ब्राह्मणे गवि हस्तिनि शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः। विद्याविनयसंपन्ने उत्तमसंस्कारवति ब्राह्मणे सात्त्विके मध्यमायां च राजस्यां गवि संस्कारहीनायाम् अत्यन्तमेव केवलतामसे हस्त्यादौ च सत्त्वादिगुणैः तज्जैश्च संस्कारैः तथा राजसैः तथा तामसैश्च संस्कारैः अत्यन्तमेव अस्पृष्टं समम् एकम् अविक्रियं तत् ब्रह्म द्रष्टुं शीलं येषां ते पण्डिताः समदर्शिनः।।ननु अभोज्यान्नाः ते दोषवन्तः समासमाभ्यां विषमसमे पूजातः (गौ0 स्म0 17.20) इति स्मृतेः। न ते दोषवन्तः। कथम्

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【 Verse 5.19 】

▸ Sanskrit Sloka: इहैव तैर्जित: सर्गो येषां साम्ये स्थितं मन: | निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिता: ||

▸ Transliteration: ihaiva tairjitaḥ sargo yeṣāṁ sāmye sthitaṁ manaḥ | nirdoṣaṁ hi samaṁ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ ||

▸ Glossary: iha: in this life; eva: surely; taiḥ: by them; jitaḥ: conquered; sargaḥ: birth and death; yeṣāṁ: of whose; sāmye: in equanimity; sthitaṁ: situated; manaḥ: mind; nir doṣaṁ: flawless; hi: surely; samaṁ: in equanimity; brahma: supreme; tasmāt: therefore; brahmaṇi: in the supreme; te: they; sthitāḥ: situated

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.19 In this life, surely, those whose minds are situated in equanimity have conquered birth and death. They are flawless like the Supreme and therefore, are situated in the Supreme.’

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.19।।जिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है उन्होंने इस जीवितअवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.19।। जिनका मन समत्वभाव में स्थित है उनके द्वारा यहीं पर यह सर्ग जीत लिया जाता है क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है इसलिये वे ब्रह्म में ही स्थित हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.19 इह here? एव even? तैः by them? जितः is conered? सर्गः rirth or creation? येषाम् of whom? साम्ये in eality? स्थितम् established? मनः mind? निर्दोषम् spotless? हि indeed? समम् eal? ब्रह्म Brahman? तस्मात् therefore? ब्रह्मणि in Brahman? ते they? स्थिताः are established.Commentary When the mind gets rooted in eanimity or evenness or eality? when it is always in a balanced state? one coners birth and death. Bondage is annihilated and freedom is attained by him. When the mind is in a perfectly balanced state he overcomes Brahman Himself? i.e.? realises Brahman.Brahman is ever pure and attributeless and so He is not affected even though He dwells in an outcaste? dog? etc. So He is spotless. He is homogeneous and one? as He dwells eally in all beings.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.19. The Brahman-knower, who is disillusioned, who is established in Brahman and has a firm intellect, would neither rejoice on meeting a friend nor get agitated on meeting a foe.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.19 Even in this world they conquer their earth-life whose minds, fixed on the Supreme, remain always balanced; for the Supreme has neither blemish nor bias.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.19 Here itself Samsara is overcome by those whose minds rest in ealness. For the Brahman (individual self), when uncontaminated by Prakrti, is the same everywhere. Therefore they abide in Brahman.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.19 Here [i.e. even while living in the body.] itself is rirth conered by them whose minds are established on sameness. Since Brahman is the same (in all) and free from defects, therefore they are established in Brahman.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.19 Even here (in this world) birth (everything) is overcome by those whose minds rest in eality; Brahman is spotless indeed and eal; therefore they are established in Brahman.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.19 This sloka does not exit in Gitartha sangraha of Abhinavagupta.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.19 By those whose minds rest in ealness with regard to all selves in the aforesaid manner, even here, i.e., even at the stage of executing the means, Samsara is overcome. For the Brahman is of the same nature everywhere when uncontaminated. The meaning is that the substance of self, when free from the contaminations resulting from contact with the Prakrti (body), is the same everywhere i.e., as the Brahman (the Atman). If they are fixed in the eality of all selves, they verily abide in Brahman. The abidance in the Brahman is verily the conest of Samsara. Those who contemplate on the sameness of all selves, because of their having the form of knowledge, they are liberated.

Sri Krsna now teaches that mode of life by following which the maturity of knowledge in the form of sameness of vision comes to a Karma Yogin.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.19 Iha eva, here itself, even while they are living; is sargah, rirth; jitah, conered, overcome; taih, by them, by the learned ones who see with eanimity; yesam, whose; manah, minds, the internal organs; are sthitam, established, made steadfast; samye, on sameness, in Brahman that exists as the same in all beings. It is nirdosam, free from defects. Because of Its existence in such mean objects as an eater of dog's meat, etc., though It is supposed by fools to be affected by the defects of those (objects), still It remains untouched by those blemishes, hi, because It is free from defects. Nor even is It differentiated by Its alities, since Consciousness is free from alifications. And the Lord will speak of desires etc. (cf. 13.6 etc.) as the attributes of the aggregate of body and organs, and will also say, 'Being without beginning and without alities' (13.31). Nor even are there the ultimate distinctions which can create differentiation in the Self, [According to the Vaisesikas, everything is possessed of not only alities but also of antya-visesa (ultimate distinction), which is a category like substance, ality, action, etc. This distinction makes every entity different from other entities. Thus, individual souls have their own ultimate distinctions by the very fact that they are individuals. Vedanta denies such a category. Besides, the Self is one and omnipresent. Therefore there is nothing else from which It can be distinguished.-Tr.] because there is nothing to prove that these ultimate distinctions exist in every body. Hence, samam brahma, Brahman is the same and one. Tasmat, therefore; te, they; sthitah, are established; brahmani, in Brahman Itself. As a result, not even a shade of defect touches them. For they have no self-identification in the form of perceiving the aggregate of body etc. as the Self. On the other hand, that statement (Gau. Sm. 17.20) refers to the man who has self-identification in the form of perceiving the aggregate of body, (organs) etc. as the Self, for that statement-'A sacrificer incurs sin by not adoring eally one who is an eal, and by adoring eally one who is not eal to himself, pointedly refers to persons who are the objects of adoration. It is indeed seen that in worship, charity, etc. the determining factors are the possession of such special alities as being 'a knower of Brahman', 'versed in the six auxiliary branches of Vedic learning', and 'versed in the four Vedas'. But Brahman is bereft of association with all alities and defects. This being so, it is logical that they are established in Brahman. And 'adoring an eal, ৷৷.an uneal,' etc. has reference to men of action. [Those engaged in actions with a sense of agentship, etc.-Tr.] But this subject under consideration, beginning from 'The embodied man৷৷.having given up all actions mentally' (13) to the end of the chapter, is concerning one who has given up all actions. Since the Self is Brahman which is without blemish and is the same (in all), therefore-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.19।। इस श्लोक में प्राय सम्पूर्ण शास्त्र को ही गागर में सागर की भाँति भर दिया गया है। प्रस्तुत प्रकरण के सन्दर्भ में सर्वप्रथम यह दर्शाना आवश्यक था कि पूर्व श्लोक में वर्णित समदर्शनरूप पूर्णत्व कोई ऐसा दैवी आदर्श नहीं जिसकी प्राप्ति या अनुभूति देहत्याग के पश्चात् स्वर्ग नामक किसी लोक विशेष में होगी। पुराणों तथा यहूदी धर्मों में धर्म साधना और जीवन का लक्ष्य स्वर्गप्राप्ति ही बताया गया है। एक बुद्धिमान् एवं विचारशील पुरुष को स्वर्ग का आश्वासन एक आकर्षक माया जाल से अधिक कुछ प्रतीत नहीं होता। ऐसे अस्पष्ट और अज्ञात लक्ष्य की प्राप्ति के लिये बुद्धिमान् पुरुष को प्रोत्साहित नहीं किया जा सकता। उसमें उस लक्ष्य के प्रति न उत्साह होगा और न लगन।स्वर्ग प्राप्ति के आश्वासन के विपरीत यहाँ वेदान्त में स्पष्ट घोषणा की गयी है कि जीव का संसार यहीं पर समाप्त होकर वह अपने अनन्तस्वरूप का साक्षात् अनुभव कर सकता है। आत्मानुभूति का यह लक्ष्य मृत्यु के पश्चात् प्राप्य नहीं वरन् इसी जीवन में इसी देह में और इसी लोक में प्राप्त करने योग्य है। जीवभाव की परिच्छिन्नताओं से ऊपर उठकर मनुष्य ईश्वरानुभूति में स्थित रह सकता है।जीवत्व से ईश्वरत्व तक आरोहण करने में कौन समर्थ है किस उपाय से संसार बन्धनों से मुक्ति पायी जा सकती है इस श्लोक में केवल जीवन के लक्ष्य का ही नहीं बल्कि तत्प्राप्ति के लिए साधन का भी संकेत किया गया है। भगवान् कहते हैं कि जिनका मन समत्व भाव में स्थित है वे ब्रह्म में स्थित हैं।पतंजलि मुनि इसी बात को दूसरे शब्दों में इस प्रकार कहते हैं कि योगश्चित्तवृत्तिनिरोध अर्थात् चित्तवृत्तियों के निरोध को योग कहते हैं। जहाँ मन की वृत्तियों का पूर्ण निरोध हुआ वहाँ मन का अस्तित्व ही समाप्त समझना चाहिए। मन ही वह उपाधि है जिसमें व्यक्त चैतन्य जीव या अहंकार के रूप में प्रकट होकर स्वयं को सम्पूर्ण जगत् से भिन्न मानता है। अत मन के नष्ट होने पर अहंकार और उसके संसार का भी नाश अवश्यंभावी है। सांसारिक दुखों से मुक्त जीव अनुभव करता है कि वह परमात्मस्वरूप से भिन्न नहीं। इस स्वरूपानुभूति के बिना पूर्व श्लोक में कथित समदर्शित्व प्राप्त नहीं हो सकता।भगवान् कहते हैं कि जिसने सर्ग (जन्मादिरूप संसार) को जीत लिया और जिसका मन समस्त परिस्थितिओं में समभाव में स्थित रहता है वह पुरुष निश्चय ही ब्रह्म में स्थित है। प्रथम बार में अध्ययन करने पर यह कथन अयुक्तिक प्रतीत हो सकता है। इसलिये भगवान् इसका कारण बताते हैं क्योंकि ब्रह्म निर्दोष और सम है।ब्रह्म सर्वत्र समानरूप से व्याप्त है। सब घटनाएं उसमें ही घटती हैं परन्तु उसको कोई विकार प्राप्त नहीं होता। सत्य सदैव नदी के तल के समान अपरिवर्तित रहता है जबकि उसका जल प्रवाह सदैव चंचल रहता है। अधिष्ठान सदा अविकारी रहता है परन्तु अध्यस्त (कल्पित) अथवा व्यक्त हुई सृष्टि का स्वभाव है नित्य परिवर्तनशीलता। जीव देहादि के साथ तादात्म्य करके इन परिवर्तनों का शिकार बन जाता है जबकि अधिष्ठानरूप आत्मा नित्य अपरिवर्तनशील और एक समान रहता है।जो व्यक्ति मनुष्य को विचलित कर देने वाली समस्त परिस्थितियों में अविचलित और समभाव रहता है उसने निश्चय ही अधिष्ठान में स्थिति प्राप्त कर ली है। समुद्र की लहरों पर बढ़ती हुई लकड़ी इतस्तत भटकती रह सकती है लेकिन दृढ़ चट्टानों पर निर्मित दीपस्तम्भ अविचल खड़ा रहता है। तूफान उसके चरणों से टकराकर अपना क्रोध शान्त करते हैं। इसलिए भगवान् का कथन युक्तियुक्त ही है कि समत्वभाव में स्थित पुरुष ब्रह्म में ही स्थित है।इसलिए

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.19।।ननु सात्त्विकादिषु समत्वदर्शनमनुचितंसमासमाभ्यां विषमसमे पूजातः इति तस्यान्नमभोज्यमित्युपक्रम्य स्मृत्या समदर्शिनोऽभोज्यान्नत्वप्रतिपादनात् समानामध्ययनादिभिस्तुल्यधर्मवतां वस्त्रालंकाररत्नादिदानपूर्वके विषमे पूजाविशेषे क्रियमाणे सति असमानां च कस्यचित् द्विवेदाध्ययनमपरस्यैकवेदाध्ययनमित्येवमध्यनादिभिरतुल्यधर्मवतां प्रागुक्ते समे पूजाविशेषे तस्याः पूजातो हेतोः पूजयिता पुरुषविशेषं ज्ञात्वा पूजाविशेषमकुर्वन्नभोज्यान्नो भवति धनाद्धर्माच्च हीयत इति स्मृतेरर्थः। तथाच सर्वसत्त्वेषु समत्वदर्शिनः दोषवत्त्वमित्याशङ्कायाः कार्यकरणसंघातात्मदर्शनाभिमानवत्कर्मठविषया तु गौतमस्मृतिः। पूजात इति पूजाविषयत्वेन विशेषणात्। इदं तु यः सर्वकर्मसंन्यासी निष्परिग्रहः पाकानधिकारी अभोज्यान्नो धनहीनो धर्मादिदत्तजलाञ्जलिः तत्त्ववित् तद्विषयमिति विषयभेदेनाविरोधमभिप्रेत्योत्तरमाह इहेति। इहैव जीवद्भिरेव तैर्जितो वशीकृतः अतिक्रान्तो जन्मादिलक्षणः संसारः। कैरित्यपैक्षायामाह। येषां सर्वसत्त्वेषु ब्राह्मणः समभावे स्थितं स्थिरीभूतं मनोऽन्तःकरणम्। हि यस्मान्मनः स्थितिविषयो ब्रह्म निर्दोषं तोषवत्सु चाण्डालादिषु स्थितमप्याकाशवत्तद्दोषैरस्पृष्टमतएव समं सदैव सर्वत्रैकरुपम्। तस्मादेतादृशे ब्रह्मणि ते पण्डिताः स्थिताः अतो न दोषगन्धमात्रमपि तान्स्पृशतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.19।।ननु सात्त्विकराजसतामसेषु स्वभावविषमेषु प्राणिषु समत्वदर्शनं धर्मशास्त्रनिषिद्धम्। तथाचतस्यान्नमभोज्यम्इत्युपक्रम्य गौतमः स्मरतिसमासमाभ्यां विषमसमे पूजातः इति। समासमाभ्यामिति चतुर्थीद्विवचनम्। विषमसमे इति द्वन्द्वैकवद्भावेन सप्तम्येकवचनम्। चतुर्वेदपारगाणामत्यन्तसदाचाराणां यादृशो वस्त्रालंकारान्नादिदानपुरःसरः पूजाविशेषः क्रियते तत्समायैवान्यस्मै चतुर्वेदपारगाय सदाचाराय विषमे तदपेक्षया न्यूने पूजाप्रकारे कृते तथाल्पवेदानां हीनाचाराणां यादृशो हीनसाधनः पूजाप्रकारः क्रियते तादृशायैवासमाय पूर्वोक्तवेदपारगसदाचारब्राह्मणापेक्षया हीनाय तादृशहीनपूजाधिके मुख्यपूजासमे पूजाप्रकारे कृते उत्तमस्य हीनतया हीनस्योत्तमतया पूजातो हेतोस्तस्य पूजयितुरन्नमभोज्यं भवतीत्यर्थः। पूजयिता प्रतिपत्तिविशेषमकुर्वन्धनाद्धर्माच्च हीयत इति च दोषान्तरम्। यद्यपि यतीनां निष्परिग्रहाणां पाकाभावाद्धनाभावाच्चाभोज्यान्नत्वं धनहीनत्वं च स्वतएव विद्यते तथापि धर्महानिर्दोषो भवत्येव। अभोज्यान्नत्वं चाशुचित्वेन पापोत्पत्त्युपलक्षणम्। तपोधनानां च तपएव धनमिति तद्धानिरपि दूषणं भवत्येवेति कथं समदर्शिनः पण्डिता जीवन्मुक्ता इति प्राप्ते परिहरति तैः समदर्शिभिः पण्डितैरिहैव जीवनदशायामेव जितोऽतिक्रान्तः सर्गः सृज्यत इति व्युत्पत्त्या द्वैतप्रपञ्चः। देहपातादूर्ध्वमतिक्रमितव्य इति किमु वक्तव्यम्। कैः। येषां साम्ये सर्वभूतेषु विषमेष्वपि वर्तमानस्य ब्रह्मणः समभावे स्थितं निश्चलं मनः। हि यम्मान्निर्दोषं समं सर्वविकारशून्यं कूटस्थनित्यमेकं च ब्रह्म तस्मात्ते समदर्शिनो ब्रह्मण्येव स्थिताः। अयं भावः दुष्टत्वं हि द्वेधा भवति अदुष्टस्यापि दुष्टसंबन्धात्स्वतो दुष्टत्वाद्वा। यथा गङ्गोदकस्य मूत्रगर्तपातात् स्वतएव वा यथा मूत्रादेः। तत्र दोषवस्तु श्वपाकादिषु स्थितं तद्दोषैर्दुष्यति ब्रह्मेति मूढैर्विभाव्यमानमपि सर्वदोषासंसृष्टमेव ब्रह्म व्योमवदसङ्गत्वात्।असङ्गो ह्ययं पुरुषःसूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषैर्बाह्यदोषैः। एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः इति श्रुतेः। नापि कामादिधर्मवत्तया स्वतएव कलुषितं कामादेरन्तःकरणधर्मत्वस्य श्रुतिस्मृतिसिद्धत्वात्। तस्मान्निर्दोषब्रह्मरूपा यतयो जीवन्मुक्ता अभोज्यान्नादिदोषदुष्टाश्चेति व्याहतम्। स्मृतिस्त्वविद्वद्गृहस्थविषयैवतस्यान्नमभोज्यम् इत्युपक्रमात् पूजात इति मध्ये निर्देशात्धनाद्धर्माच्च हीयते इत्युपसंहाराच्चेति द्रष्टव्यम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.19।।ननुसमासमाभ्यां विषमसमे पूजातः इति तुल्यश्रुतशीलाय ब्राह्मणद्वयाय विषमां पूजां प्रयुक्तवतः तथा अतुल्यश्रुतशीलाय ब्राह्मणद्वयाय समां पूजां प्रयुक्तवतश्चाभोज्यान्नत्वं गौतमेन स्मर्यते तत्कथं ब्राह्मणचण्डालयोः समदर्शित्वं युक्तमित्याशङ्क्याह इहैवेति। येषां मनः सर्वभूतेषु साम्ये ब्रह्मभावे स्थितं निश्चलं तैरिहैव जीवद्भिरेव सर्गो जन्म जितो वशीकृतः। हि यस्मान्निर्दोषं समं सर्वत्राविषमं ब्रह्मास्ति यथा हिरण्मययोर्देवतातत्पीठयोः स्वर्णदृक्साम्यं पश्यति पूजकस्तु आकारदृक्तारतम्यं पश्यति तद्वत्। पूजास्मृतिर्भ्रान्तिकृततारतम्यविषया। साम्यदृष्टिस्तु तत्त्वविषयेति भावः। यस्मादेवं ते साम्यं पश्यन्ति तस्माद्ब्रह्मण्यखण्डैकरसे ते द्रष्टारः स्थिता एकीभावेन समाप्तिं गताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.19।।य एतादृशास्त उत्तमा इत्याह इहैवेति। येषां मनः साम्ये समभावे स्थितं तैरिहैव सर्गो जितः।अत्रायं भावः भगवता स्वक्रीडार्थं जगदुत्पादितं तत्र यस्य यादृशेच्छया यो भाव उत्पादितः स तथैव करोति। स योग्यो भवति नवेति किमर्थं विचारणीयम् अतो येषां मनः साम्ये भगवत्क्री़डारूपे स्थितं तैरिहैव अधिष्ठानात्मकदेह एव सर्गः संसारो मायारूपो जितः। यतो ब्रह्म समं स्वक्रीडार्थरूपेषु निर्दोषं तेषु दोषादिरहितं तस्माद्येषां मनः साम्ये स्थितं ते ब्रह्मणि ब्रह्मभावे स्थिताः अतस्तैः संसारो जित इत्यर्थः। यद्वा सर्गः स्वोत्पत्तिर्जिता वशीकृता सफलीकृतेत्यर्थः। भगवता स्वमेवार्थमुत्पादितास्तत्कृतमिति भावः। यद्वा येषां मनः संयोगवियोगयोः साम्येन स्थितं तैरिहैव अधिकरणदेह एव सर्गः अलौकिकोऽग्रेभावी जितो वशीकृतः सर्वथैवालौकिकदेहो भावरूपो वशे जातो यतोऽयं यदैवेच्छति तदैव भावप्राकट्यं भवतीति भावः। हीति युक्तमेव। यतो ब्रह्म भगवान् स्वस्थायिरसात्मकत्वात् समानाद्यवस्थासु। निर्दोषं यथा रासे। यतो ब्रह्म तादृशं तस्मात् ते ब्रह्मणि ब्रह्मभावे निरोधरूपे स्थिता इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.19।। ननु विषमेषु समदर्शनं निषिद्धं कुर्वन्तोऽपि कथं ते पण्डिताः। यथाह गौतमःसमासमाभ्यां विषमसमे पूजातः इति। अस्यार्थःसमाय पूजाया विषमे प्रकारे कृते सति विषमाय च समे प्रकारे कृते सति स पूजक इह लोकात्परलोकाच्च हीयत इति। तत्राह इहैवेति। इहैव जीवद्भिरेव तैः सृज्यत इति सर्गः संसारो जितो निरस्तः। कैः। येषां मनः साम्ये समत्वे स्थितम्। तत्र हेतुः हि यस्मात् ब्रह्म समं निर्दोषं च तस्मात्ते समदर्शिनो ब्रह्मण्येव स्थिताः। ब्रह्मभावं प्राप्ता इत्यर्थः। गौतमोक्तस्तु दोषो ब्रह्मभावप्राप्तेः पूर्वमेव। पूजात इति पूजकावस्थाश्रवणात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.19।।अतो यद्यत्समं तद्ब्रह्मरूपमिति मन्तव्यं यदि मनोऽपि निरोधे समं स्यात्तदा ब्रह्मैव तादात्म्यात्सिद्ध्यसिद्धयो ৷৷. समत्वं योगः 2।48 इत्युक्तत्वात्। तद्विषयके मनसि ते ब्रह्मतादात्म्यापन्ना इत्याह इहैवेति। येषां साम्ये स्थितं मनस्तैः सर्गः प्रवाहमार्गो जितः।समदर्शिनः इत्यस्याथ त्वयमेव विवृणोति निर्दोष हि समं ब्रह्मेति। तस्मात्ते ब्रह्मणि स्थिता इत्यर्थो ज्ञातव्यः।

▸ Sri Shankaracharya's

Chapter 5 (Part 12)

Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.19।।उ0 वे दोषी नहीं हैं क्योंकि जिनका अन्तःकरण समतामें अर्थात् सब भूतोंके अन्तर्गत ब्रह्मरूप समभावमें स्थित यानी निश्चल हो गया है उन समदर्शी पण्डितोंने यहाँ जीवितावस्थामें ही सर्गको यानी जन्मको जीत लिया है अर्थात् उसे अपने अधीन कर लिया है। क्योंकि ब्रह्म निर्दोष ( और सम ) है। यद्यपि मूर्ख लोगोंको दोषयुक्त चाण्डालादिमें उनके दोषोंके कारण आत्मा दोषयुक्तसा प्रतीत होता है तो भी वास्तवमें वह ( आत्मा ) उनके दोषोंसे निर्लिप्त ही है। चेतन आत्मा निर्गुण होनेके कारण अपने गुणके भेदसे भी भिन्न नहीं है। भगवान् भी इच्छादिको क्षेत्रके ही धर्म बतलावेंगे तथा अनादि और निर्गुण होनेके कारण ( आत्मा लिप्त नहीं होता ) यह भी कहेंगे। ( वैशेषिक शास्त्रमें बतलाये हुए नित्य द्रव्यगत ) अन्त्य विशेष भी आत्मामें भेद उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं क्योंकि प्रत्येक शरीरमें उन अन्त्य विशेषोंके होनेका कोई प्रमाण सम्भव नहीं है। अतः ( यह सिद्ध हुआ कि ) ब्रह्म सम है और एक ही है। इसलिये वे समदर्शी पुरुष ब्रह्ममें ही स्थित हैं इसी कारण उनको दोषकी गन्ध भी स्पर्श नहीं कर पाती क्योंकि उनमेंसे देहादि संघातको आत्मारूपसे देखनेका अभिमान जाता रहा है।। समासमाभ्यां विषमसमे पूजातः यह सूत्र पूजाविषयक विशेषणसे युक्त होनेके कारण देहादि संघातमें आत्मदृष्टिके अभिमानवाले पुरुषोंके विषयमें है। क्योंकि पूजा दान आदि कर्मोंमें ( भेदबुद्धिका ) कारण ब्रह्मवेत्ता छओं अङ्गोंको जाननेवाला चारों वेदोंको जाननेवाला इत्यादि विशेष गुणोंका सम्बन्ध देखा जाता है। परंतु ब्रह्म सम्पूर्ण गुणदोषोंके सम्बन्धसे रहित है इसलिये यह ( कहना ) ठीक है कि वे ब्रह्ममें स्थित हैं। इसके अतिरिक्त समासमाभ्याम् इत्यादि कथन तो कर्मियोंके विषयमें है और यह सर्वकर्माणि मनसा इस श्लोकसे लेकर अध्यायसमाप्तितक सारा प्रकरण सर्वकर्मसंन्यासी के विषयमें है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.19।। व्याख्या   येषां साम्ये स्थितं मनः परमात्मतत्त्व अथवा स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिका अनुभव होनेपर जब मनबुद्धिमें रागद्वेष कामना विषमता आदिका सर्वथा अभाव हो जाता है तब मनबुद्धिमें स्वतःस्वाभाविक समता आ जाती है लानी नहीं पड़ती। बाहरसे देखनेपर महापुरुष और साधारण पुरुषमें खानापीना चलनाफिरना आदि व्यवहार एकसा ही दीखता है पर महापुरुषोंके अन्तःकरणमें निरन्तर समता निर्दोषता शान्ति आदि रहती है और साधारण पुरुषोंके अन्तःकरणमें विषमता दोष अशान्ति आदि रहती है।जैसे पूर्वमें और पश्चिममें दोनों ओर पर्वत हों तो पूर्वमें सूर्यका उदय होना नहीं दीखता परन्तु पश्चिममें स्थित पर्वतकी चोटीपर प्रकाश दीखनेसे सूर्यके उदय होनेमें कोई सन्देह नहीं रहता। कारण कि सूर्यका उदय हुए बिना पश्चिमके पर्वतपर प्रकाश दीखना सम्भव ही नहीं। ऐसे ही जिनके मनबुद्धिपर मानअपमान निन्दास्तुति सुखदुःख आदिका कोई असर नहीं पड़ता तथा जिनके मनबुद्धि रागद्वेष हर्षशोक आदि विकारोंसे सर्वथा रहित हैं उनकी स्वरूपमें स्वाभाविक स्थिति अवश्य होती है। कारण कि स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिके बिना मनबुद्धिमें अटल और एकरस समताका रहना सम्भव ही नहीं है।इहैव तैर्जितः सर्गः यहाँ तैः पदमें बहुवचन देनेका तात्पर्य यह है कि सभी मनुष्य परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति कर सकते हैं और सम्पूर्ण संसारपर विजय प्राप्त कर सकते हैं।इह एव पदोंका तात्पर्य है कि मनुष्य जीतेजी वर्तमानमें ही यहीं संसारको जीत सकता है अर्थात् संसारसे मुक्त हो सकता है।शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राणी पदार्थ घटना परिस्थिति आदि सब पर हैं और जो इनके अधीन रहता है उसे पराधीन कहते हैं। इन शरीरादि वस्तुओंमें महत्त्वबुद्धि होना तथा इनकी आवश्यकताका अनुभव करना अर्थात् इनकी कामना करना ही इनके अधीन होना है। पराधीन पुरुष ही वास्तवमें पराजित (हारा हुआ) है। जबतक पराधीनता नहीं छूटती तबतक वह पराजित ही रहता है।जिसके मनमें सांसारिक वस्तुओंकी कामना है वह मनुष्य अगर दूसरे प्राणी राज्य आदिपर विजय प्राप्त कर ले तो भी वह वास्तवमें पराजित ही है। कारण कि वह उन पदार्थोंमें महत्त्वबुद्धि रखता है और अपने जीवनको उनके अधीन मानता है। शरीरसे विजय तो पशु भी प्राप्त कर लेता है पर वास्तविक विजय हृदयसे वस्तुकी अधीनता दूर होनेपर ही प्राप्त होती है।पराजित व्यक्ति ही दूसरेको पराजित करना चाहता है दूसरेको अपने अधीन बनाना चाहता है। वास्तवमें अपनेको पराजित किये बिना कोई दूसरेको पराजित कर ही नहीं सकता जैसे कोई राजा या विद्वान् किसी दूसरेपर विजय प्राप्त करना चाहता है तो उसे सबसे पहले अपनी सेना सामर्थ्य बुद्धि विद्या आदिका सहारा लेना ही पड़ता है।कामना उत्पन्न होते ही मनुष्य पराधीन हो जाता है। यह पराधीनता कामनाकी पूर्ति न होनेपर अथवा पूर्ति होनेपर दोनों ही अवस्थाओंमें ज्योंकीत्यों रहती है। कामनाकी पूर्ति न होनेपर मनुष्य वस्तुके अभावके कारण पराधीनताका अनुभव करता है और कामनाकी पूर्ति होनेपर अर्थात् वस्तुके मिलनेपर वह उस वस्तुके पराधीन हो जाता है क्योंकि उत्पत्तिविनाशशील वस्तुमात्र पर है। कामनाकी पूर्ति न होनेपर तो मनुष्यको पराधीनताका अनुभव होता है पर कामनाकी पूर्ति होनेपर बुद्धिमें ऐसा अँधेरा छा जाता है कि पराधीन रहते हुए भी मनुष्यको पराधीनताका अनुभव नहीं होता प्रत्युत स्वाधीनताका अनुभव होता हैज्ञानी महापुरुषमें कामनाका सर्वथा अभाव होनेसे वह पूर्णतः स्वाधीन हो जाता है। स्वाधीन पुरुष ही विजयीहोता है। परन्तु स्वाधीन पुरुषके मनमें कभी किसीको पराजित करनेका भाव नहीं आता। वह संसारकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकताका अनुभव नहीं करता प्रत्युत संसार ही उसकी आवश्यकताका अनुभव करता है।जिसने संसारको जीत लिया है ऐसे समदर्शी महापुरुषको संसारका बड़ासेबड़ा सुख (प्रलोभन) भी आकृष्ट नहीं कर सकता और बड़ासेबड़ा दुःख भी विचलित नहीं कर सकता (गीता 6। 22)।उसके मनमें संसारके किसी भी प्राणी पदार्थ परिस्थिति आदिकी किञ्चिन्मात्र भी कामना वासना स्पृहा तृष्णा आदि नहीं रहती। यद्यपि उसे अनुकूलताप्रतिकूलताका ज्ञान होता है तथा उसके अनुसार यथोचित चेष्टा भी होती है तथापि अनुकूलताप्रतिकूलताका उसके अन्तःकरणपर कोई असर नहीं पड़ता।निर्दोषं हि समं ब्रह्म परमात्मतत्त्वमें दोष विकार या विषमता है ही नहीं। जितने भी दोष या विषमताएँ आती हैं वे सब प्रकृतिसे रागपूर्वक सम्बन्ध माननेसे ही आती हैं। परमात्मतत्त्व प्रकृतिके सम्बन्धसे सर्वथा निर्लिप्त है इसलिये उसमें किञ्चिन्मात्र भी दोष या विषमता नहीं है।तस्माद् ब्रह्मणि ते स्थिताः परमात्मतत्त्व निर्दोष और सम है इसलिये जिन महापुरुषोंका अन्तःकरण निर्दोष और सम हो गया है वे परमात्मतत्त्वमें ही स्थित हैं।असत्के सङ्गसे ही सम्पूर्ण दोषों और विषमताओंकी उत्पत्ति होती है। संसार असत् है। असत् उसे कहते हैं जो प्रतिक्षण परिवर्तनशील है और मूलमें जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है। असत्से सम्बन्ध (तादात्म्य) रहते हुए दोषों और विषमताओंसे बचना असम्भव है। महापुरुषोंके अन्तःकरणमें असत्का महत्त्व न रहनेसे उनपर असत्का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। असत्का कोई प्रभाव न पड़नेसे उनका अन्तःकरण निर्दोष और सम हो जाता है। निर्दोष और सम होनेसे उनकी परमात्मतत्त्वमें स्वतःस्वाभाविक स्थिति हो जाती है जो कि पहलेसे ही है। जैसे जहाँ धुआँ है वहाँ अग्नि अवश्य है क्योंकि अग्निके बिना धुआँ सम्भव ही नहीं ऐसे ही जिनके अन्तःकरणमें समता है वे अवश्य ही परमात्मतत्त्वमें स्थित हैं क्योंकि परमात्मतत्त्वमें स्थिति हुए बिना पूर्ण समता आनी सम्भव ही नहीं।अपनी (स्वयंकी) स्थिति परमात्मतत्त्वमें अथवा समतामें होनेके कारण ही अन्तःकरणमें समता आती है। इसलिये अन्तःकरणमें समता आनेपर ही उन महापुरुषोंकी यह पहचान होती है कि वे परमात्मतत्त्वमें अथवा समतामें स्थित हैं। इसी समताको गीताने योग कहा है समत्वं योग उच्यते (2। 48) और इसकी प्राप्तिको ही गीता मनुष्यजन्मकी पूर्णता मानती है।ज्ञानयोगका यह प्रकरण तेरहवें श्लोकसे चला है। पंद्रहवें श्लोकके अन्तमें आये जन्तवः पदसे बहुवचनका प्रयोग आरम्भ हुआ है जो इस उन्नीसवें श्लोकतक चला है। सबमें बहुवचन आनेका तात्पर्य है कि जो मनुष्य मोहित हो रहे थे वे सबकेसब परमात्मतत्त्वको प्राप्त कर सकते हैं। परन्तु प्रस्तुत श्लोकमें ब्रह्मणि पदमें एकवचन आया है जिसका तात्पर्य है कि सम्पूर्ण मनुष्योंको एक ही परमात्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है। मुक्ति चाहे ब्राह्मणकी हो अथवा चाण्डालकी दोनोंको एक ही तत्त्वकी प्राप्ति होती है। भेद केवल शरीरोंको लेकर है जो उपादेय है। तत्त्वको लेकर कोई भेद नहीं है। पहले जितने सनकादिक महात्मा हुए हैं उनको जो तत्त्व प्राप्त हुआ है वही तत्त्व आज भी प्राप्त होता है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें जिस स्थितिका वर्णन हुआ है उसकी प्राप्तिका साधन तथा सिद्धके लक्षणोंका वर्णन आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.19।।No commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.19।।सात्त्विकेषु राजसेषु तामसेषु च सत्वेषु समत्वदर्शनमनुचितमिति शङ्कते नन्विति। सर्वत्र समदर्शिनस्तच्छब्देन परामृश्यन्ते। तेषां दोषवत्त्वादभोज्यान्नत्वमित्यत्र प्रमाणमाह समासमाभ्यामिति। समानामध्ययनादिभिः। समानधर्मकाणां वस्त्रालंकारादिपूजया विषमे प्रतिपत्तिविशेषे क्रियमाणे सत्यसमानां चासमानधर्मकाणां कस्यचिदेकवेदत्वमपरस्य द्विवेदत्वमित्यादिधर्मवतां प्रागुक्ततया पूजया समे प्रतिपत्तिविशेषे पूजयिता पुरुषविशेषं ज्ञात्वा प्रतिपत्तिमकुर्वन्धनाद्धर्माच्च हीयते तेन सात्त्विके राजसतामसयोश्च समबुद्धिं कुर्वन्प्रत्यवैतीत्यर्थः। उत्तरत्वेनोत्तरश्लोकमवतारयति न ते दोषवन्त इति। स्मृत्यवष्टम्भेन सर्वसत्त्वेषु समत्वदर्शिनां दोषवत्त्वमुक्तं कथं नास्तीति प्रतिज्ञामात्रेण सिध्यतीति शङ्कते कथमिति। स्मृतेर्गतिमग्रे वदिष्यन्निर्दोषत्वं समत्वदर्शिनां विशदयति इहैवेति। सर्वेषां चेतनानां साम्ये प्रवणमनसां ब्रह्मलोकगमनमन्तरेण तस्मिन्नेव देहे परिभूतजन्मनामशेषदोषराहित्ये हेतुमाह निर्दोषं हीति। वर्तमानो देहः सप्तम्या परिगृह्यते। तानेव समदर्शिनो विशिनष्टि येषामिति। ननु ब्रह्मणो निर्दोषत्वमसिद्धं दोषवत्सु श्वपाकादिषु तद्दोषैर्दोषवत्त्वोपलम्भसंभवात्तत्राह यद्यपीति। यस्मात्तन्निर्दोषं तस्मात्तस्मिन्ब्रह्मणि स्थितैर्निर्दोषैः सर्गो जित इति संबन्धः। ब्रह्मणो गुणभूयस्त्वादल्पीयान्दोषोऽपि स्यादित्याशङ्क्याह नापीति। चेतनस्य स्वगुणविशेषविशिष्टत्वमनिष्टं निर्गुणत्वश्रवणादित्ययुक्तमिच्छादीनां परिशेषादात्मधर्मत्वस्य कैश्चिन्निश्चितत्वादित्याशङ्क्याह वक्ष्यति चेति। आत्मनो निर्गुणत्वे वाक्यशेषं प्रमाणयति अनादित्वादिति। चकारो वक्ष्यतीत्यनेन संबन्धार्थः। गुणदोषवशादात्मनो भेदाभावेऽपि भेदोऽन्त्यविशेषेभ्यो भविष्यतीत्यतिप्रसङ्गादाशङ्क्य दूषयति नापीति। प्रतिशरीरमात्मभेदसिद्धौ तद्धेतुत्वेन तेषां सत्त्वं तेषां च सत्त्वे प्रतिशरीरमात्मनो भेदसिद्धिरिति परस्पराश्रयत्वमभिप्रेत्य हेतुमाह प्रतिशरीरमिति। आत्मनो भेदकाभावे फलितमाह अत इति। समत्वमेव व्याकरोति एकं चेति। ब्रह्मणो निर्विशेषत्वेनैकत्वाज्जीवानां च भेदकाभावेनैकत्वस्योक्तत्वादेकलक्षणत्वादेकत्वं जीवब्रह्मणोरेष्टव्यमित्याह तस्मादिति। जीवब्रह्मणोरेकत्वे जीवानां ब्रह्मवन्निर्दोषत्वं सिध्यतीत्याह तस्मान्नेति। तच्छब्दार्थमेव स्फोरयति देहादीति। यदि सर्वसत्त्वेषु समत्वदर्शनमदुष्टमिष्टं तर्हि कथं गौतमसूत्रमित्याशङ्क्याह देहादिसंघातेति। सूत्रस्य यथोक्ताभिमानवद्विषयत्वे गमकमाह पूजेति। यदि वा चतुर्वेदानामेव सतां पूजया वैषम्यं यदि वा चतुर्वेदानां षडङ्गविदां च पूजया साम्यं तदा तेषामुक्तपूजाविषयाणां केषांचिन्मनोविकारसंभवे कर्ता प्रत्यवैतीत्यविद्वद्विषयत्वं सूत्रस्य प्रतिभातीत्यर्थः। तत्रैव चानुभवमनुकूलत्वेनोदाहरति दृश्यते हीति। देहादिसंघाताभिमानवतां गुणदोषसंबन्धसंभवात्तद्विषयं सूत्रमित्युक्तमिदानीं ब्रह्मात्मदर्शनाभिमानवतां गुणदोषासंबन्धान्न तद्विषयं सूत्रमित्यभिप्रेत्याह ब्रह्म त्विति। इतश्च नेदं सूत्रं ब्रह्मविद्विषयमित्याह कर्मीति। तत्रैव पूजापरिभवसंभवादित्यर्थः। ननु यत्र समत्वदर्शनं तत्रैव त्विदं सूत्रं नतु कर्मिण्यकर्मिणि वेति विभागोऽस्ति तत्राह इदं त्विति। समत्वदर्शनस्य संन्यासिविषयत्वेन प्रस्तुतत्वे हेतुमाह सर्वकर्माणीति। आऽध्यायपरिसमाप्तेःसर्वकर्माणीत्यारभ्य तत्र तत्र सर्वकर्मसंन्यासाभिधानात्तद्विषयमिदं समत्वदर्शनं गम्यते तत्र तन्निरहंकारे निरवकाशं सूत्रमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.19।।ननूत्तरवाक्ये साम्यदर्शनं मुक्तिसाधनमेवोच्यते तत्कथमुच्यते अपरोक्षज्ञानसाधनमिति प्राग्ज्ञानिनोऽपि जन्मान्तरसद्भाव उक्तः तत्कथमिहैवेति तद्देह एव मुक्तिरुक्तेत्यत आह तदेवेति। स्तुतावधिकोक्तिः सम्भवतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.19।।तदैव स्तौति इहैवेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.19।।इह एव साधनानुष्ठानदशायाम् एव तैः सर्गो जितः संसारो जितः येषाम् उक्तरीत्या सर्वेषु आत्मसु साम्ये स्थितं मनः निर्दोषं हि समं ब्रह्म प्रकृतिसंसर्गदोषवियुक्ततया समम् आत्मवस्तु हि ब्रह्म आत्मसाम्ये स्थिताः चेद् ब्रह्मणि स्थिता एव ते। ब्रह्मणि स्थितिः एव हि संसारजयः। आत्मसु ज्ञानैकाकारतया साम्यम् एव अनुसन्दधाना मुक्ता एव इत्यर्थः।येन प्रकारेण अवस्थितस्य कर्मयोगिनः समदर्शनरूपो ज्ञानविपाको भवति तं प्रकारम् उपदिशति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.19।। इह एव जीवद्भिरेव तैः समदर्शिभिः पण्डितैः जितः वशीकृतः सर्गः जन्म येषां साम्ये सर्वभूतेषु ब्रह्मणि समभावे स्थितं निश्चलीभूतं मनः अन्तःकरणम्। निर्दोषं यद्यपि दोषवत्सु श्वपाकादिषु मूढैः तद्दोषैः दोषवत् इव विभाव्यते तथापि तद्दोषैः अस्पृष्टम् इति निर्दोषं दोषवर्जितं हि यस्मात् नापि स्वगुणभेदभिन्नम् निर्गुणत्वात् चैतन्यस्य। वक्ष्यति च भगवान् इच्छादीनां क्षेत्रधर्मत्वम् अनादित्वान्निर्गुणत्वात् (गीता 13.31) इति च। नापि अन्त्या विशेषाः आत्मनो भेदकाः सन्ति प्रतिशरीरं तेषां सत्त्वे प्रमाणानुपपत्तेः। अतः समं ब्रह्म एकं च। तस्मात् ब्रह्मणि एव ते स्थिताः। तस्मात् न दोषगन्धमात्रमपि तान् स्पृशति देहादिसंघातात्मदर्शनाभिमानाभावात् तेषाम्। देहादिसंघातात्मदर्शनाभिमानवद्विषयं तु तत् सूत्रम् समासमाभ्यां विषमसमे पूजातः (गौ0 स्मृ0 17.20) इति पूजाविषयत्वेन विशेषणात्। दृश्यते हि ब्रह्मवित् षडङ्गवित् चतुर्वेदवित् इति पूजादानादौ गुणविशेषसंबन्धः कारणम्। ब्रह्म तु सर्वगुणदोषसंबन्धवर्जितमित्यतः ब्रह्मणि ते स्थिताः इति युक्तम्। कर्मविषयं च समासमाभ्याम् इत्यादि। इदं तु सर्वकर्मसंन्यासविषयं प्रस्तुतम् सर्वकर्माणि मनसा (गीता 5.13) इत्यारभ्य आध्यायपरिसमाप्तेः।।यस्मात् निर्दोषं समं ब्रह्म आत्मा तस्मात्

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【 Verse 5.20 】

▸ Sanskrit Sloka: न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् | स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थित: ||

▸ Transliteration: na prahṛṣyetpriyaṁ prāpya nodvijet prāpya cāpriyam | sthirabuddhir asaṁmūḍho brahmavid brahmaṇi sthitaḥ ||

▸ Glossary: na: never; prahṛṣyet: rejoice; priyaṁ: like; prāpya: achieving; no: not; udvijet: agitated; prāpya: achieving; ca: and; apriyaṁ: the unpleasant; sthirabuddhiḥ: steady intelligence; asaṁmūḍhaḥ: undeluded; brahmavid: one who knows the Supreme; brahmaṇi: in the Supreme; sthitaḥ: situated

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.20 One who does not rejoice at achieving something he likes nor gets agitated on getting something he does not like, who is of steady intelligence, who is not deluded, one who knows the Supreme, is situated in the Supreme.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.20।।जो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो वह स्थिर बुद्धिवाला मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.20।। जो स्थिरबुद्धि संमोहरहित ब्रह्मवित् पुरुष ब्रह्म में स्थित है वह प्रिय वस्तु को प्राप्त होकर हर्षित नहीं होता और अप्रिय को पाकर उद्विग्न नहीं होता।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.20 न not? प्रहृष्येत् should rejoice? प्रियम् the pleasant? प्राप्य having obtained? न not? उद्विजेत् should be troubled? प्राप्य having obtained? च and? अप्रियम् the unpleasant? स्थिरबुद्धिः one with steady intellect? असम्मूढः undeluded? ब्रह्मवित् knower of Brahman? ब्रह्मणि in Brahman? स्थितः established.Commentary This is the state of a Jivanmukta or a liberated sage or a Brahmana who identifies himself with the Self or Atman. He always has a balanced mind. He is never deluded. He has abandoned all actions as he rests in Brahman. He who has an unbalanced mind? who identifies himself with the body and mind feels pleasure and pain? exhilaration of spirits when he gets a pleasant object and grief when he obtains an unpleasant object. (Cf.VI.21?27?28XIII.12XIV.20)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.20. He who, with his self (mind) not attached to the external contacts, finds happiness in the Self-that person, with his self engaged in the Yoga, pervades easily, suffering no loss, the Brahman.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.20 He who knows and lives in the Absolute remains unmoved and unperturbed; he is not elated by pleasure or depressed by pain.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.20 He who knows Brahman (individual self) and abides in Brahman, whose mind is steadfastly on the self and undeluded by the body consciousness - he neither rejoices at gaining what is pleasant, nor grieves on obtaining what is unpleasant.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.20 A knower of Brahman, who is established in Brahman, should have his intellect steady and should not be deluded. He should not get delighted by getting what is desirable, nor become dejected by getting what is undesirable.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.20 Resting in Brahman, with steady intellect and undeluded, the knower of Brahman neither rejoiceth on obtaining what is pleasant nor grieveth on obtaining what is unpleasant.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.20 Na prahrsyet etc. In the case of this person, who habitually looks [upon all] alike, the classification of foes and friends is at the level of mundane business alone, and not internally, as he is firmly established in the Brahman.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.20 Whatever is experienced as pleasant by one staying in a body and remaining in a particular condition because of the subtle impressions of his old Karmas, and whatever is experienced as unpleasant - on attaining those two types of experiences, one should not feel joy or grief. How? By having the mind on that 'Which is steadfast' i.e., the self, 'Undeluded,' i.e., one must be free from the delusion of identity of the steadfast self with the transient body. And how can this be? He who knows Brahman and abides in Brahman, i.e., by becoming a knower of Brahman by instruction by the teachers - such a person abides steadily, engaged in the practices towards winning Brahman.

What is said is this: From the instructions received from the sages who know the truth, one should learn what has to be learnt about the self. Endeavouring to actualise the same, one does not consider the body as the sefl and remains fixed in the joyous experience of the vision of the steadfast self. Let him not rejoice and grieve when he experiences pleasant and unpleasant things, as such experiences result from the Prakrti and are transient.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.20 Brahmavit, a knower of Brahman, as described; sthitah, who is established; brahmani in Brahman- who is not a performer of actions, i.e. one who has renounced all actions; sthira-buddhih, should have his intellect steady-the man of steady intellect is one who has the unwavering, firm conviction of the existence of the one and the same taintless Self in all beings; and further, asammudhah, he should not be deluded, he should be free from delusion. Na prahrsyet, he should not get delighted; prapya, by getting; priyam, what is desirable; na ca udvijet, and surely, neither should he become dejected; prapya, by getting; apriyam, what is undesirable-because the acisition of the desirable and the undesirable are causes of [Ast.'s reading is 'horsa-visadau kurvate, cause happiness and sorrow' in place of 'harsa-visada-sthane, sources of happiness and sorrow', which (latter) reading occurs in G1. Pr. and A.A.-Tr.] happiness and sorrow for one who considers the body as the Self; not for the one who has realized the absolute Self, since in his case there can be no acisition of desirable and undesirable objects. Further, the one who is established in Brahman-

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.20।। एक कुशल चितेरा अपने सुन्दरतम चित्र को पूर्णता और सुन्दरता प्रदान करने के लिए चित्र पटल पर अपनी तूलिका से बारम्बार रेखायें बनाता है और थोड़ी दूर हटकर उनका अवलोकन करता है। इसी प्रकार एक कुशल और श्रेष्ठ चित्रकार के समान भगवान् श्रीकृष्ण मनुष्य के हृदय पटल पर ज्ञानी पुरुष का शब्द चित्र अंकित करते हुए उसमें ज्ञानी के मन के भावों का एवं गुणों का सुन्दर चित्रण करते हैं। अनेक श्लोकों के द्वारा ज्ञानी पुरुष का वर्णन करने में भगवान् का एक मात्र उद्देश्य यह है कि एक सामान्य पुरुष भी ज्ञानी के लक्षणों को स्पष्ट रूप से समझ सके। वे स्पष्ट करते हैं कि महात्मा पुरुष कोई गंगातट की निर्जीव पाषाणी प्रतिमा नहीं होता बल्कि वह ऐसा स्फूर्त समर्थ और कुशल व्यक्ति होता है जो अपनी पीढ़ी को प्रभावित करके उसका नवनिर्माण करता है।बाह्य जगत् में घटित होने वाली घटनाओं के कारण नहीं वरन् उनके साथ अपने सम्बन्धों के कारण मनुष्य हर्ष से उत्तेजित अथवा दुख से निराश होता है। महानगर में किसी एक व्यक्ति की मृत्यु से मनुष्य को दुख नहीं होता परन्तु उस मनुष्य के पिता की मृत्यु उसके लिए दुखदायी घटना बन जाती है। इससे स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति की मृत्युमात्र दुख का कारण नहीं बल्कि कारण तो मृत व्यक्ति के साथ का सम्बन्ध है। अपने मन के ऊपर विजय प्राप्त कर अनंतस्वरूप में स्थित ब्रह्मवित् पुरुष प्रिय या अप्रिय को प्राप्त कर सुख या दुख के आवेग में नहीं बह जाता। इसका अर्थ यह नहीं कि वह कोई लकड़ी के खिलौने या पत्थर की मूर्ति के समान जगत् में होने वाली घटनाओं को जानने में अथवा अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में समर्थ नहीं होता। इस श्लोक का अभिप्राय यह है कि ज्ञान के कारण उसे जो मन का समत्व प्राप्त होता है उसे ये घटनाएँ प्रभावित अथवा विचलित नहीं कर सकती हैं।तत्त्ववित् पुरुष की बुद्धि ज्ञान में स्थिर हो जाती है क्योंकि अहंकार और तज्जनित मिथ्या धारणाओं के विष का उसमें सर्वथा अभाव होता है। जिस क्रम से ज्ञानी पुरुष के विशेषण यहाँ बताये हैं उसका अध्ययन बड़ा रोचक है। प्रिय और अप्रिय वस्तुओं की उपस्थिति से जो विचलित रहता है वही स्थिरबुद्धि पुरुष है। स्थिर बुद्धि पुरुष संमोहरहित हो जाता है। जिसके मन में किसी प्रकार का मोह नहीं होता वही पुरुष ब्रह्मज्ञान का योग्य अधिकारी बनकर ब्रह्मवित् हो जाता है। और ब्रह्मवित् पुरुष ब्रह्म ही बनकर स्वस्वरूप में स्थित होकर इस जगत् में विचरण करता है।आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.20।।समे निर्दोषे ब्रह्मणि स्थितो जीवन्मुक्तिसुखार्थं कीदृशः स्यादित्याकाङ्क्षायामाह नेति। स्थिरा संशयवर्जिता सर्वभूतेष्वेकः समो निर्दोष आत्मेति बुद्धिर्यस्य। यतोऽसंमूढः संशयमूलभूतेन संमोहेन रहितः। यतस्तत्त्ववित् मोहनिवर्तकतत्तसाक्षात्कारवान्। तदपि कुतः। यतो ब्रह्मणि स्थितः सर्वं विक्षेपकारणं परित्यज्य श्रवणादिना तत्रैव स्थितः। तन्निष्ठ इतियावत्। एतादृशः प्रियः प्राप्य हर्षं न कुर्यात्। अप्रियं प्राप्योद्वेगं न कुर्यात्। एतादृशेनापि मनोनाशवासनाक्षयप्रयत्नेन हर्षविषादाभावत्वे यतितव्यं षष्ठ्यादिभूमिकायै इति सूचनार्थमुभयत्र लिङ्प्रयोगः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.20।।यस्मान्निर्दोषं समं ब्रह्म तस्मात्तद्रूपमात्मानं साक्षात्कुर्वन् दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः इत्यत्र व्याख्यातं पूर्वार्धम्। जीवन्मुक्तानां स्वाभाविकं चरितमेव मुमुक्षुभिः प्रयत्नपूर्वकमनुष्ठेयमिति वदितुं लिङ्प्रत्ययौ। अद्वितीयात्मदर्शनशीलस्य व्यतिरिक्तप्रियाप्रियप्राप्त्ययोगान्न तन्निमित्तौः हर्षविषादावित्यर्थः। अद्वितीयात्मदर्शनमेव विवृणोति स्थिरबुद्धिः स्थिरा निश्चला संन्यासपूर्वकवेदान्तवाक्यविचारपरिपाकेन सर्वसंशयशून्यत्वेन निर्विचिकित्सा निश्चिता ब्रह्मणि बुद्धिर्यस्य स तथा। लब्धश्रवणमननफल इति यावत्। एतादृशस्य सर्वासंभावनाशून्यत्वेऽपि विपरीतभावनाप्रतिबन्धात्साक्षात्कारो नोदेतीति निदिध्यासनमाह असंमूढः निदिध्यासनस्य विजातीयप्रत्ययानन्तरितसजातीयप्रत्ययप्रवाहस्य परिपाकेन विपरीतभावनाख्यसंमोहरहितः ततः सर्वप्रतिबन्धापगमाद्ब्रह्मविद्ब्रह्मसाक्षात्कारवान् ततश्च समाधिपरिपाकेन निर्दोषे समे ब्रह्मण्येव स्थितो नान्यत्रेति ब्रह्मणि स्थितो जीवन्मुक्तः स्थितप्रज्ञ इत्यर्थः। एतादृशस्य द्वैतदर्शनाभावात्प्रहर्षोद्वेगो न भवत इत्युचितमेव। साधकेन तु द्वैतदर्शने विद्यमानेऽपि विषयदोषदर्शनादिना प्रहर्षविषादौ त्याज्यावित्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.20।।न प्रहृष्येदिति। यस्मान्निर्दोषं समं ब्रह्म तस्मात् प्रियं पुत्रादिं प्राप्य न प्रहृष्येत्। अप्रियं शत्रुं दुःखदं प्राप्य नोद्विजेत्। बुद्धस्थितिरबुद्धेनानुष्ठेयति ज्ञापयितुमुभयत्र लिङ्प्रयोगः। स्थिरबुद्धिः प्रत्यगद्वैते श्रुतियुक्तिभ्यां स्थिरीकृतप्रज्ञः। असंमूढो ध्यानजसाक्षात्कारेण निर्गतमोहः। अतएव ब्रह्मविद्ब्रह्मभावस्य लब्धा। ब्रह्मभावं गत इत्यर्थः। ब्रह्मण्येव प्रत्यगद्वये व्युत्थानावस्थायामपि स्थितः। सर्वं ब्रह्मेत्येव पश्यन्नित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.20।।एवं साम्यस्थितस्य ब्रह्मभावापत्तिमुक्त्वा तद्भावापन्नस्य लक्षणमाह न प्रहृष्येदिति। प्रियं प्राप्य संयोगेन न प्रहृष्येत्। यतः प्रकृष्टहर्षेणाग्रे मानोत्पत्त्या दोषः स्यात्। च पुनः अप्रियं विप्रयोगं प्राप्य नोद्विजेदुद्वेगं न प्राप्नुयात् यतो भगवता विप्रयोगः परमसुखदानार्थं दत्तस्तत्रोद्वेगेऽग्रे न तत्प्राप्तिः स्यात्। एवमवस्थाद्वये स्थिरबुद्धिः स असम्मूढः ब्रह्मवित् मोहाभावेन ब्रह्मस्वरूपज्ञ इति भावः। ब्रह्मणि ब्रह्मभावे स्थितः स इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.20।।ब्रह्मप्राप्तस्य लक्षणमाह नेति। यो ब्रह्मविद्भूत्वा ब्रह्मण्येव स्थितः स प्रियं प्राप्य न प्रहृष्येन्न प्रहृष्टो हर्षवान्स्यात्। अप्रियं च प्राप्य नोद्विजेत्। न विषीदेदित्यर्थः। यतः स्थिरबुद्धिः स्थिरा निश्चला बुद्धिर्यस्य। तत्कुतः। यतोऽसंमूढो निवृत्तमोहः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.20 5.21।।तादृशस्य परमानन्दावाप्तिगमकं लक्षणमाह द्वाभ्यां न प्रहृष्येदिति। यतः स्थिरबुद्धिः सम्मोहस्यासुरत्वात्तद्रहितश्च बाह्यविषयेष्वसक्तात्मा स योगी यदात्मनि सुखं सात्विकं विन्दति स एवोपशमसुखी ब्रह्मणि योगेन युक्तस्तदैक्यं प्राप्त आत्मा यस्य तथाभूतः सन्नक्षयं ब्रह्मसुखमनुभवतीत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.20।।क्योंकि निर्दोष और सम ब्रह्म ही आत्मा है इसलिये प्रिय वस्तुको प्राप्त करके तो हर्षित न हो अर्थात् इष्टवस्तु पाकर तो हर्ष न माने और अप्रिय अनिष्ट पदार्थके मिलनेपर उद्वेग न करे। क्योंकि देहमात्रमें आत्मबुद्धिवाले पुरुषको ही प्रियकी प्राप्ति हर्ष देनेवाली और अप्रियकी प्राप्ति शोक उत्पन्न करनेवाली हुआ करती है केवल उपाधिरहित आत्माका साक्षात् करनेवाले पुरुषको नहीं। कारण उसके लिये ( वास्तवमें ) प्रिय और अप्रियकी प्राप्ति असम्भव है। सब भूतोंमें आत्मा एक है सम है और निर्दोष है ऐसी संशयरहित बुद्धि जिसकी स्थिर हो चुकी है और जो मोह अज्ञानसे रहित है वह स्थिरबुद्धि ब्रह्मज्ञानी ब्रह्ममें ही स्थित है। अर्थात् वह कर्म न करनेवाला सर्व कर्मोंका त्यागी ही है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.20।। व्याख्या   न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि सिद्धान्त सम्प्रदाय शास्त्र आदिके अनुकूल प्राणी पदार्थ घटना परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होना ही प्रिय को प्राप्त होना है।शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि सिद्धान्त सम्प्रदाय शास्त्र आदिके प्रतिकूल प्राणी पदार्थ घटना परिस्थिति आदिकी प्राप्ति होना ही अप्रिय को प्राप्त होना है।प्रिय और अप्रियको प्राप्त होनेपर भी साधकके अन्तःकरणमें हर्ष और शोक नहीं होने चाहिये। यहाँ प्रिय और अप्रियकी प्राप्तिका यह अर्थ नहीं है कि साधकके हृदयमें अनुकूल या प्रतिकूल प्राणीपदार्थोंके प्रति राग या द्वेष है प्रत्युत यहाँ उन प्राणीपदार्थोंकी प्राप्तिके ज्ञानको ही प्रिय और अप्रियकी प्राप्ति कहा गया है। प्रिय या अप्रियकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिका ज्ञान होनेमें कोई दोष नहीं है। अन्तःकरणमें उनकी प्राप्ति अथवा अप्राप्तिका असर पड़ना अर्थात् हर्षशोकादि विकार होना ही दोष है।प्रियता और अप्रियताका ज्ञान तो अन्तःकरणमें होता है पर हर्षित और उद्विग्न कर्ता होता है। अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला पुरुष प्रकृतिके करणोंद्वारा होनेवाली क्रियाओँको लेकर मैं कर्ता हूँ ऐसा मान लेता है तथा हर्षित और उद्विग्न होता रहता है। परन्तु जिसका मोह दूर हो गया है जो तत्त्ववेत्ता है वह गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं ऐसा जानकर अपनेमें (स्वरूपमें) वास्तविक अकर्तृत्वका अनुभव करता है (गीता 3। 28)। स्वरूपका हर्षित और उद्विग्न होना सम्भव ही नहीं है।स्थिरबुद्धिः स्वरूपका ज्ञान स्वयंके द्वारा ही स्वयंको होता है। इसमें ज्ञाता और ज्ञेयका भाव नहीं रहता। यह ज्ञान करणनिरपेक्ष होता है अर्थात् इसमें शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि किसी करणकी अपेक्षा नहीं होती। करणोंसे होनेवाला ज्ञान स्थिर तथा सन्देहरहित नहीं होता इसलिये वह अल्पज्ञान है। परन्तु स्वयं(अपने होनेपन) का ज्ञान स्वयंको ही होनेसे उसमें कभी परिवर्तन या सन्देह नहीं होता। जिस महापुरुषको ऐसे करणनिरपेक्ष ज्ञानका अनुभव हो गया है उसकी कही जानेवाली बुद्धिमें यह ज्ञान इतनी दृढ़तासे उतर आता है कि उसमें कभी विकल्प सन्देह विपरीत भावना असम्भावना आदि होती ही नहीं। इसलिये उसे स्थिरबुद्धिः कहा गया है।असम्मूढः जो परमात्मतत्त्व सदासर्वत्र विद्यमान है उसका अनुभव न होना और जिसकी स्वतन्त्र सत्ता नहीं है उस उत्पत्तिविनाशशील संसारको सत्य मानना ऐसी मूढ़ता साधारण मनुष्यमें रहती है। इस मूढ़ताका जिसमें सर्वथा अभाव हो गया है उसे ही यहाँ असम्मूढः कहा गया है।ब्रह्मवित् परमात्मासे अलग होकर परमात्माका अनुभव नहीं होता। परमात्माका अनुभव होनेमें अनुभविता अनुभव और अनुभाव्य यह त्रिपुटी नहीं रहती प्रत्युत त्रिपुटीरहित अनुभवमात्र (ज्ञानमात्र) रहता है। वास्तवमें ब्रह्मको जाननेवाला कौन है यह बताया नहीं जा सकता। कारण कि ब्रह्मको जाननेवाला ब्रह्मसे अभिन्न हो जाता है (टिप्पणी प0 311) इसलिये वह अपनेको ब्रह्मवित् मानता ही नहीं अर्थात् उसमें मैं ब्रह्मको जानता हूँ ऐसा अभिमान नहीं रहता।ब्रह्मणि स्थितः वास्तवमें सम्पूर्ण प्राणी तत्त्वसे नित्यनिरन्तर ब्रह्ममें ही स्थित हैं परन्तु भूलसे अपनी स्थिति शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिमें ही मानते रहनेके कारण मनुष्यको ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव नहीं होता। जिसे ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो गया है ऐसे महापुरुषके लिये यहाँ ब्रह्मणि स्थितः पदोंका प्रयोग हुआ है। ऐसे महापुरुषको प्रत्येक परिस्थितिमें नित्यनिरन्तर ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव होता रहता है।यद्यपि एक वस्तुकी दूसरी वस्तुमें स्थिति होती है तथापि ब्रह्ममें स्थिति इस प्रकारकी नहीं है। कारण कि ब्रह्मका अनुभव होनेपर सर्वत्र एक ब्रह्महीब्रह्म रह जाता है। उसमें स्थिति माननेवाला दूसरा कोई रहता ही नहीं। जबतक कोई ब्रह्ममें अपनी स्थिति मानता है तबतक ब्रह्मकी वास्तविक अनुभूतिमें कमी है परिच्छिन्नता है। सम्बन्ध   ब्रह्ममें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव किस प्रकार होता है इसका विवेचन आगेके श्लोकमें करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.20।।तस्य च इत्थं संभावना इत्याह न प्रहृष्येदिति। एतस्य समदर्शिनः शत्रुमित्रादिविभागोऽपि व्यवहारमात्र एव नान्तः ब्रह्मनिष्ठत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.20।।नन्विष्टानिष्टप्राप्तिभ्यां हर्षविषादौ विद्वानपि कुर्वन्निर्दोषे ब्रह्मणि कथं स्थितिं लभेतेत्याशङ्क्याकाङ्क्षितं पूरयन्नुत्तरश्लोकमुत्थापयति यस्मादिति। आत्मज्ञाननिष्ठावतो विदुषो हर्षविषादनिमित्ताभावान्न तावुचितावित्याह स्थिरबुद्धिरिति। ननु हर्षविषादनिमित्तत्वं प्रियाप्रिययोः सिद्धमिति कथं तत्प्राप्त्या हर्षोद्वेगौ न कर्तव्याविति नियुज्यते तत्राह देहेति। विदुषोऽपि प्रियाप्रियप्राप्तिसामर्थ्यादेव हर्षविषादौ दुर्वारावित्याशङ्क्याह न केवलेति। अद्वितीयात्मदर्शनशीलस्य व्यतिरिक्तप्रियाप्रियप्राप्त्ययोगान्न तन्निमित्तौ हर्षविषादावित्यर्थः। इत्यपि विदुषो हर्षविषादावसंभावितावित्याह किंचेति। निर्दोषे ब्रह्मणि प्रागुक्ते दृढप्रतिपत्तिः संमोहेन हर्षादिहेतुना रहितो यथोक्ते सर्वदोषरहिते ब्रह्मण्यहमस्मीति विद्यावानशेषदोषशून्ये तस्मिन्नेव ब्रह्मणि स्थितस्तदनुरोधात्कर्माण्यमृष्यमाणो नैव हर्षविषादभागी भवितुमलमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.20।।अत्र कश्चिदाध्यायपरिसमाप्तेः ज्ञानिनः कर्माभावः प्रतिपाद्यत इत्याह अपरस्तु ज्ञानस्वरूपं तत्सहकारिसाधनं च प्रतिपाद्यत इति। तदुभयमसत्। अप्रतीतेरिति भावेनाध्यायशेषप्रतिपाद्यमाह सन्न्यासेति। मिलित्वा मेलयित्वा शङ्कानुसारेणैव न तु प्रकरणभेदेनेत्यर्थः। पुनरुक्तिपरिहारार्थं प्रपञ्चयतीत्युक्तम्। सन्न्यासस्यादौ ग्रहणेनन प्रहृष्येत् इति सन्न्यासप्रपञ्चनमिति सूचितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.20।।सन्न्यासयोगज्ञानानि मिलित्वा प्रपञ्च्यत्यध्यायशेषेण।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.20।।यादृशदेहस्थस्य यदवस्थस्य प्राचीनकर्मवासनया यत् प्रियं यच्च अप्रियं तद् उभयं प्राप्य हर्षोद्वेगौ न कुर्यात्।कथम् स्थिरबुद्धिः स्थिरे आत्मनि बुद्धिः यस्य स स्थिरबुद्धिः। असंमूढः अस्थिरेण शरीरेण स्थिरम् आत्मानम् एकीकृत्य मोहः संमोहः तद्रहितः।तत् च कथम् ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः उपदेशेन ब्रह्मवित् सन् तस्मिन् ब्रह्मणि अभ्यासयुक्तः।एतद् उक्तं भवति तत्त्वविदाम् उपदेशेन आत्मयाथात्म्यविद् भूत्वा तत्र एव यतमानो देहाभिमानं परित्यज्य स्थिररूपात्मावलोकनप्रियानुभवे व्यवस्थितः अस्थिरे प्राकृतप्रियाप्रिये प्राप्य. हर्षोद्वेगौ न कुर्याद् इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.20।। न प्रहृष्येत् प्रहर्षं न कुर्यात् प्रियम् इष्टं प्राप्य लब्ध्वा। न उद्विजेत् प्राप्य च अप्रियम् अनिष्टं लब्ध्वा। देहमात्रात्मदर्शिनां हि प्रियाप्रियप्राप्ती हर्षविषादौ कुर्वाते न केवलात्मदर्शिनः तस्य प्रियाप्रियप्राप्त्यसंभवात्। किञ्च सर्वभूतेषु एकः समः निर्दोषः आत्मा इति स्थिरा निर्विचिकित्सा बुद्धिः यस्य सः स्थिरबुद्धिः असंमूढः संमोहवर्जितश्च स्यात् यथोक्तब्रह्मवित् ब्रह्मणि स्थितः अकर्मकृत् सर्वकर्मसंन्यासी इत्यर्थःकिञ्च ब्रह्मणि स्थितः

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【 Verse 5.21 】

▸ Sanskrit Sloka: बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् | स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ||

▸ Transliteration: bāhyasparśeṣvasaktātmā vindatyātmani yatsukham | sa brahma-yoga-yuktātmā sukhamakṣayamaśnute ||

▸ Glossary: bāhya: outer; sparśeṣu: sense pleasures; asaktātmā : not attached; vindati: enjoys; ātmani: in the Self; yat: that; sukhaṁ: happiness; saḥ: he; brahma yoga: engaged in the Supreme; yuktātmā: self-connected; sukhaṁ: happiness;akṣayaṁ: unlimited; aśnute: enjoys

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.21 One who is not attached to the outer world sense pleasures, who enjoys in the Self, in that happiness, he, having identified with his Self by engaging in the Supreme [brahma-yoga], enjoys unlimited happiness.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.21।।बाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित अन्तःकरणवाला साधक आत्मामें जो सुख है उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.21।। बाह्य विषयों में आसक्तिरहित अन्तकरण वाला पुरुष आत्मा में ही सुख प्राप्त करता है ब्रह्म के ध्यान में समाहित चित्त वाला पुरुष अक्षय सुख प्राप्त करता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.21 बाह्यस्पर्शेषु in external contacts? असक्तात्मा one whose mind is unattached? विन्दति finds? आत्मनि in,the Self? यत् (that) which? सुखम् happiness? सः he? ब्रह्मयोगयुक्तात्मा with the self engaged in the meditation of Brahman? सुखम् happiness? अक्षयम् endless? अश्नुते enjoys.Commentary When the mind is not attached to external objects of the senses? when one is deeply engaged in the contemplation of Brahman? he finds undecaying bliss in the Self within. If you want to enjoy the imperishable happiness of the Self within? you will have to withdraw the senses from their respective objects and plunge yourself in deep meditation on the Self within. This is the gist of this verse.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.21. The enjoyments that are born of contacts [with objects] are indeed nothing but sources of misery and have beginning and end. [Hence], an intelligent man does not get delighted in them, O son of Kunti !

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.21 He finds happiness in his own Self, and enjoys eternal bliss, whose heart does not yearn for the contacts of earth and whose Self is one with the Everlasting.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.21 He whose mind is detached from external contact, and finds happiness in the self - he has his mind engaged in the contemplation of Brahman and he enjoys undecaying bliss.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.21 With his heart unattached to external objects, he gets the bliss that is in the Self. With his heart absorbed in meditation on Brahman, he acires undecaying Bliss.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.21 With the self unattached to external contacts he finds happiness in the Self; with the self engaged in the meditation of Brahman he attains to the endless happiness.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.21 He, in whom there is no desire for the external touch viz., the object-he thinks says as follows the Bhagawat -

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.21 He who finds happiness in the self within himself, his mind detached from external contact in the manner already mentioned, i.e., from experience of objects other than the self - such a person abandoning the contemplation on Prakrti or bodily experiences, has his mind engaged in the contemplation on Brahman i.e., the Atman. Thus he attains everlasting bliss which consists in the experience of Brahman (the self).

Sri Krsna speaks of the abandonment of material pleasure as easy:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.21 Asakta-atma, with his heart, internal organ, unattached, bahya-sparsesu, to external objects-sparsah means objects that are contacted, viz sound etc.; bahya-sparsah means those things which are external (bahya) and are objects of contact; that person who thus has his heart unattached, who derives no happiness from objects; he vindati, gets that sukham, bliss; yat, which is; atmani, in the Self. Brahma-yoga-yukta-atma, with his heart absorbed in meditation on Brahman-meditation (yoga) on Brahman is brahma-yoga; one whose internal organ (atma) is absorbed in (yukta), engaged in, that meditation on Brahman is brahma-yoga-yukta-atma; he asnute, acires; aksayam, undecaying; sukham, Bliss. So, he who cherishes undecaying happiness in the Self should withdraw the organs from the momentary happiness in external objects. This is the meaning. For this reason also one should withdraw:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.21।। पूर्व श्लोक से यह धारणा बनने की संभावना है कि आध्यात्मिक जीवन वह गतिशून्य अस्तित्व है जिसमें एक शुष्क हृदय का व्यक्ति बाह्य जगत् की आकर्षक एवं उत्तेजक वस्तुओं के सम्पर्क में आने पर भी मन के अपरिवर्तित समत्व के अतिरिक्त कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं करता और न उसे कुछ विशेष अनुभव ही होता है। यदि र्वास्तविकता ऐसी होती तो अधिकांश साधकों ने आध्यात्मिकता से तत्काल ही विदा ले ली होती। बाह्य जगत् में विद्यमान परिच्छिन्नताओं एवं दोषों के होते हुए भी इस तथ्य को कौन नकार सकता है कि विषयोपभोग से क्षणिक ही सही आनन्द तो प्राप्त होता ही है क्यों कोई व्यक्ति स्वयं को असंख्य प्रकार के क्षणिक आनन्दों से वंचित रखकर पत्थर के समान अचल अभेद्य समत्व की कामना करे फिर आप उस स्थिति को चाहे परम शान्ति कहें या ईश्वरतत्त्व या और कुछ नाम परिवर्तन से स्वयं वस्तु परिवर्तित नहीं हो जाती यह शंका कोई अतिशयोक्ति नहीं है। वेदान्त के विद्यार्थी प्राय ऐसा प्रश्न करते हैं। कोई भी बुद्धिमान् व्यक्ति जिस किसी कार्य में प्रवृत्त होता है तो उसका प्रयोजन या उपयोगिता जानना चाहता ही है। कोई भी गुरु शिष्यों के इन प्रश्नों की उपेक्षा नहीं कर सकते। जगद्गुरु भगवान् श्रीकृष्ण भी इस शंका का निवारण करते हुए अर्जुन को आश्वस्त करते हैं।जो पुरुष बाह्य विषयों की आसक्ति से पूर्णतया मुक्त हो जाता है वह आत्मा के स्वरूपभूत आनन्द का साक्षात् अनुभव करता है। यद्यपि आत्मोन्नति की साधना में वैराग्य की प्रधानता है तथापि यह अनासक्ति हमें खोखली निर्रथक शून्यावस्था को नहीं प्राप्ति कराती। सभी मिथ्या वस्तुओं का त्याग करने पर परमार्थ सत्यस्वरूप पूर्ण परमात्मा को हम प्राप्त करते हैं। जब स्वप्नद्रष्टा स्वप्निल वस्तुओं तथा स्वप्न के व्यक्तित्व का त्याग कर देता है तब वह कोई अभावरूप नहीं बन जाता वरन् वह अपने अधिक शक्तिशाली जाग्रत अवस्था के व्यक्तित्व को प्राप्त कर लेता है।इसी प्रकार जब कभी हम शरीर मन और बुद्धि के साथ के अपने तादात्म्य से ऊपर उठ जाते हैं तब हमें आत्मानुभूति का आनन्द प्राप्त होता है। यदि साधक केवल ध्यानाभ्यास के समय भी विषयासक्ति को त्याग कर हृदय से ब्रह्म का ध्यान करता है तो वह अक्षय सुख का अनुभव करता है। हृदय का अर्थ है अन्तकरण।इस कारण से भी साधक को विषयोपभोग का त्याग करना चाहिए क्योंकि

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.21।।किंच विषयसुखस्य ब्रह्मानन्दापेक्षयातितुच्छत्वात् ब्रह्मणि स्थितः। स्पृश्यन्त इति स्पर्शाः शब्दादयो विषयाः तेष्वसक्तः प्रीतिवर्जितः आत्मान्तःकरणं यस्य स आत्मनि त्वंपदलक्ष्ये यत्सुखं तद्विन्दति लभते। स ब्रह्मणि तत्पदलक्ष्ये परमात्मनि योगः समाधिः त्वंपद लक्ष्यस्य तत्पदलक्ष्ये एकत्वापादनं तेन युक्त आत्मान्तः करणमखण्डसाक्षात्कारलक्षणान्तःकरणवृत्तिर्यस्य स सुखं ब्रह्मानन्दमक्षय्यमश्रुते व्याप्नोति तस्मादात्मनि जीवन्नेवाक्षयसुखार्थी क्षणिकाया विषयप्रीतेरिन्द्रियाणि निवर्तयेदित्याशयः। अत्रत्यभाष्यस्य सामान्यरुपतया न व्याख्यानान्तरैर्विरोध इति ध्येयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.21।।ननु बाह्यविषयप्रीतेरनेकजन्मानुभूतत्वेनातिप्रबलत्वात्तदासक्तचित्तस्य कथमलौकिके ब्रह्मणि दृष्टे सर्वसुखरहिते स्थितिः स्यात्। परमानन्दरूपत्वादिति चेत् न तदानन्दस्याननुभूतचरत्वेन चित्तस्थितिहेतुत्वाभावात्। तदुक्तं वार्तिकेअप्यानन्दः श्रुतः साक्षान्मानेनाविषयीकृतः। दृष्टानन्दाभिलाषं स न मन्दीकर्तुमप्यलम्।। इति। तत्राह इन्द्रियैः स्पृश्यन्त इति स्पर्शाः शब्दादयः। तेच बाह्या अनात्मधर्मत्वात्। तेष्वसक्तात्माऽनासक्तचित्तस्तृष्णाशून्यतया विरक्तः सन्नात्मनि अन्तःकरणएव बाह्यविषयनिरपेक्षं यदुपशमात्मकं सुखं तद्विन्दति लभते निर्मलसत्त्ववृत्त्या। तदुक्तं भारतेयच्च कामसुखं लोके यच्च दिव्यं महत्सुखम्। तृष्णाक्षयसुखस्यैते नार्हतः षोडशीं कलाम्।। इति। अथवा प्रत्यगात्मनि त्वंपदार्थे यत्सुखं

Chapter 5 (Part 13)

स्वरूपभूतं सुषुप्ताननुभूयमानं बाह्यविषयासक्तिप्रतिबन्धादलभ्यमानं तदेव तदभावाल्लभते। न केवलं त्वंपदार्थसुखमेव लभते किंतु तत्पदार्थैक्यानुभवेन पूर्णसुखमपीत्याह स तृष्णाशून्यो ब्रह्मणि परमात्मनि योगः समाधिस्तेन युक्तस्तस्मिन्व्यापृत आत्मान्तःकरणं यस्य स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा। अथवा ब्रह्मणि तत्पदार्थे योगेन वाक्यार्थानुभवरूपेण समाधिना युक्त ऐक्यं प्राप्त आत्मा त्वंपदार्थः स्वरूपं यस्य स तथा। सुखमक्षय्यमनन्तं स्वस्वरूपभूतमश्नुते व्याप्नोति। सुखानुभवरूप एव सर्वदा भवतीत्यर्थः। नित्येऽपि वस्तुन्यविद्यानिवृत्त्यभिप्रायेण धात्वर्थयोग औपचारिकः। तस्मादात्मन्यक्षयसुखानुभवार्थी सन्बाह्यविषयप्रीतेः क्षणिकाया महानरकानुबन्धिन्याः सकाशादिन्द्रियाणि निवर्तयेत्तावतैव च ब्रह्मणि स्थितिर्भवतीत्यभिप्रायः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.21।।नन्वननुभूतात्मसुखेप्सया प्रसिद्धं बाह्यं सुखं त्यक्तुमशक्यमतो न प्रहृष्येदित्यसंगतमत आह बाह्येति। बहिर्भवाः बाह्याः स्पर्शा विषयेन्द्रियसंबन्धास्तेषु असक्तात्माऽनासक्तचित्तः सन्नात्मनि प्रत्यगद्वयानन्दे सुषुप्तिकाले स्थित्वा यत्सुखं विन्दति लभते स तदेव सुखम्। विधेयापेक्षं पुंस्त्वम्। कस्तत्सुखम्। यो ब्रह्मयोगे ब्रह्मणि योगः समाधिस्तत्र युक्तो योजित आत्मा बुद्धिर्येन स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा। ब्रह्मविदित्यर्थः।ब्रह्मविद्ब्रह्मैव भवति इति श्रुतेः। ब्रह्मयोगयुक्तात्मा तदेव सुखं विन्दतीति वक्तव्ये ब्रह्मविदेव तत्सुखमिति तस्य सुखाभिन्नत्वविवक्षयेदमुक्तम्। ननूभयत्रैकमेव सुखं चेत्कः सुप्तसमाधिस्थयोर्विशेष इत्याशङ्क्याह सुखमिति। अक्षय्यं सुखं मोक्षस्तमश्नुते व्याप्नोति द्वैतादर्शनस्य तुल्यत्वादुभयत्रैकमेव सुखं तत्रापि योगी मूलाविद्याया नष्टत्वादक्षय्यं सुखमश्नुते न सुप्तः। अविद्यानुच्छेदात्। तथा च मोक्षसुखस्य मुख्यस्याप्यनुभूतत्वात्तदर्थं बाह्यं सुखं सुत्यजमित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.21।।नन्वनेन शरीरेण कथं तद्भावप्राप्तिः इत्याशङ्क्याह बाह्यस्पर्शेष्विति। बाह्यस्पर्शेषु लौकिकेन्द्रियविषयेष्वसक्त आत्मा अन्तःकरणं यस्य स आत्मनि भावात्मके स्वस्वरूपे यत्सुखं तद्विन्दति प्राप्नोतीत्यर्थः। योगो भावात्मकं सुखं तं जानाति। स ब्रह्मयोगे सद्भावात्मके युक्त आत्मा यस्य तादृशो भवति। अक्षयं तद्दास्यात्मकं सुखमश्नुते भुङ्क्त इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.21।।मोहनिवृत्त्या बुद्धिस्थैर्यहेतुमाह बाह्यस्पर्शेष्विति। इन्द्रियैः स्पृश्यन्त इति स्पर्शा विषयाः बाह्येन्द्रियविषयेष्वसक्तात्मानासक्तचित्तः आत्मन्यन्तःकरणे यदुपशमात्मकं सात्त्विकं सुखं तद्विन्दति लभते। स चोपशमात्मकं सुखं लब्ध्वा ब्रह्मणि योगेन समाधिना युक्तस्तदैक्यं प्राप्त आत्मा यस्य सोऽक्षय्यं सुखमश्नुते प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.20 5.21।।तादृशस्य परमानन्दावाप्तिगमकं लक्षणमाह द्वाभ्यां न प्रहृष्येदिति। यतः स्थिरबुद्धिः सम्मोहस्यासुरत्वात्तद्रहितश्च बाह्यविषयेष्वसक्तात्मा स योगी यदात्मनि सुखं सात्विकं विन्दति स एवोपशमसुखी ब्रह्मणि योगेन युक्तस्तदैक्यं प्राप्त आत्मा यस्य तथाभूतः सन्नक्षयं ब्रह्मसुखमनुभवतीत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.21।।और भी वह ब्रह्ममें स्थित हुआ पुरुष ( कैसा होता है सो बताते हैं ) जिनका इन्द्रियोंद्वारा स्पर्श ( ज्ञान ) किया जा सके वे स्पर्श हैं इस व्युत्पत्तिसे शब्दादि विषयोंका नाम स्पर्श है ( वे सब अपने भीतर नहीं हैं इसलिये बाह्य हैं ) उस बाह्य स्पर्शोंमें जिसका अन्तःकरण आसक्त नहीं है ऐसा विषयप्रीतिसे रहित पुरुष उस सुखको प्राप्त होता है जो अपने भीतर है। तथा वह ब्रह्मयोगयुक्तात्मा ब्रह्ममें जो समाधि है उसका नाम ब्रह्मयोग है उस ब्रह्मयोगसे जिसका अन्तःकरण युक्त है अच्छी प्रकार उसमें समाहित है लगा हुआ है ऐसा पुरुष अक्षय सुखको अनुभव करता है प्राप्त होता है। इसलिये अपनेआप अक्षय सुख चाहनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह क्षणिक बाह्य विषयोंकी प्रीतिसे इन्द्रियोंको हटा ले। यह अभिप्राय है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.21।। व्याख्या   बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा परमात्माके अतिरिक्त शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण आदिमें तथा शब्द स्पर्श आदि विषयोंके संयोगजन्य सुखमें जिसकी आसक्ति मिट गयी है ऐसे साधकके लिये यहाँ ये पद प्रयुक्त हुए हैं। जिन साधकोंकी आसक्ति अभी मिटी नहीं है पर जिनका उद्देश्य आसक्तिको मिटानेका हो गया है उन साधकोंको भी आसक्तिरहित मान लेना चाहिये। कारण कि उद्देश्यकी दृढ़ताके कारण वे भी शीघ्र ही आसक्तिसे छूट जाते हैं।पूर्वश्लोकमें वर्णित प्रियको प्राप्त होकर हर्षित और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न नहीं होना चाहिये ऐसी स्थितिको प्राप्त करनेके लिये बाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित होना आवश्यक है।उत्पत्तिविनाशशील वस्तुमात्रका नाम बाह्यस्पर्श है चाहे उसका सम्बन्ध बाहरसे हो या अन्तःकरणसे। जबतक बाह्यस्पर्शमें आसक्ति रहती है तबतक अपने स्वरूपका अनुभव नहीं होता। बाह्यस्पर्श निरन्तर बदलता रहता है पर आसक्तिके कारण उसके बदलनेपर दृष्टि नहीं जाती और उसमें सुखका अनुभव होता है। पदार्थोंको अपरिवर्तनशील स्थिर माननेसे ही मनुष्य उनसे सुख लेता है। परन्तु वास्तवमें उन पदार्थोंमें सुख नहीं है। सुख पदार्थोंके सम्बन्धविच्छेदसे ही होता है। इसीलिये सुषुप्तिमें जब पदार्थोंके सम्बन्धकी विस्मृति हो जाती है तब सुखका अनुभव होता है।वहम तो यह है कि पदार्थोंके बिना मनुष्य जी नहीं सकता पर वास्तवमें देखा जाय तो बाह्य पदार्थोंके वियोगके बिना मनुष्य जी ही नहीं सकता। इसीलिये वह नींद लेता है क्योंकि नींदमें पदार्थोंको भूल जाते हैं। पदार्थोंको भूलनेपर भी नींदसे जो सुख ताजगी बल नीरोगता निश्चिन्तता आदि मिलती है वह जाग्रत्में पदार्थोंके संयोगसे नहीं मिल सकती। इसलिये जाग्रत्में मनुष्यको विश्राम पानेकी प्राणीपदार्थोंसे अलग होनेकी इच्छा होती है। वह नींदको अत्यन्त आवश्यक समझता है क्योंकि वास्तवमें पदार्थोंके वियोगसे ही मनुष्यको जीवन मिलता है।नींद लेते समय दो बातें होती हैं एक तो मनुष्य बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेद करना चाहता है और दूसरी उसमें यह भाव रहता है कि नींद लेनेके बाद अमुक कार्य करना है। इन दोनों बातोंमें पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेद चाहना तो स्वयंकी इच्छा है जो सदा एक ही रहती है परन्तु कार्य करनेका भाव बदलता रहता है। कार्य करनेका भाव प्रबल रहनेके कारण मनुष्यकी दृष्टि पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेदकी तरफ नहीं जाती। वह पदार्थोंका सम्बन्ध रखते हुए ही नींद लेता है और जागता है।यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि सम्बन्धी तो नहीं रहता पर सम्बन्ध रह जाता है इसका कारण यह है कि स्वयं (अविनाशी चेतन) जिस सम्बन्धको अपनेमें मान लेता है वह मिटता नहीं। इस माने हुए सम्बन्धको मिटानेका उपाय है अपनेमें सम्बन्धको न माने। कारण कि प्राणीपदार्थोंसे सम्बन्ध वास्तवमें है नहीं केवल माना हुआ है। मानी हुई बात न माननेपर टिक नहीं सकती और मान्यताको पकड़े रहनेपर किसी अन्य साधनसे मिट नहीं सकती। इसलिये माने हुए सम्बन्धकी मान्यताको वर्तमानमें ही मिटा देना चाहिये। फिर मुक्ति स्वतःसिद्ध है।बाह्य पदार्थोंका सम्बन्ध अवास्तविक है पर परमात्माके साथ हमारा सम्बन्ध वास्तविक है। मनुष्य सुखकी इच्छासे बाह्य पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मान लेता है पर परिणाममें उसे दुःखहीदुख प्राप्त होता है (गीता 5। 22)। इस प्रकार अनुभव करनेसे बाह्य पदार्थोंकी आसक्ति मिट जाती है।विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् बाह्य पदार्थोंकी आसक्ति मिटनेपर अन्तःकरणमें सात्त्विक सुखका अनुभव हो जाता है। बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धसे होनेवाला सुख राजस होता है। जबतक मनुष्य राजस सुख लेता रहता है तबतक सात्त्विक सुखका अनुभव नहीं होता। राजस सुखमें आसक्तिरहित होनेसे ही सात्त्विक सुखका अनुभव होता है।स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा संसारसे राग मिटते ही ब्रह्ममें अभिन्न भावसे स्वतः स्थिति हो जाती है। जैसे अन्धकारका नाश होना और प्रकाश होना दोनों एक साथ ही होते हैं फिर भी पहले अन्धकारका नाश होना और फिर प्रकाश होना माना जाता है। ऐसे ही रागका मिटना और ब्रह्ममें स्थित होना दोनों एक साथ होनेपर भी पहले रागका नाश बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा और फिर ब्रह्ममें स्थिति ब्रह्मयोगयुक्तात्मा मानी जाती है। जैसे तेरहवें अध्यायके पहले श्लोकमें क्षेत्रज्ञ(जीवात्मा) के द्वारा अपनेको क्षेत्र(शरीर) से सर्वथा अलग अनुभव करनेकी बात आयी है और फिर दूसरे श्लोकमें क्षेत्रज्ञके द्वारा अपनेको परमात्मतत्त्वसे सर्वथा अभिन्न अनुभव करनेकी बात आयी है। ऐसे ही यहाँ पहले बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा पदसे शरीरसंसारसे अपनेको सर्वथा अलग अनुभव करनेकी बात बताकर फिर ब्रह्मयोगयुक्तात्मा पदसे अपनेको परमात्मतत्त्वसे सर्वथा अभिन्न अनुभव करनेकी बात बतायी गयी है।भोगोंसे विरक्ति होकर सात्त्विक सुख मिलनेके बाद मैं सुखी हूँ मैं ज्ञानी हूँ मैं निर्विकार हूँ मेरे लिये कोई कर्तव्य नहीं है इस प्रकार अहम् का सूक्ष्म अंश शेष रह जाता है। उसकी निवृत्तिके लिये एकमात्र परमात्मतत्त्वसे अभिन्नताका अनुभव करना आवश्यक है। कारण कि परमात्मतत्त्वसे सर्वथा एक हुए बिना अपनी सत्ता अपने व्यक्तित्व (परिच्छिन्नता या एकदेशीयता) का सर्वथा अभाव नहीं होता।सुखमक्षयमश्नुते जबतक साधक सात्त्विक सुखका उपभोग करता रहता है तबतक उसमें सूक्ष्म अहम् परिच्छिन्नता रहती है। सात्त्विक सुखका भी उपभोग न करनेसे अहम् का सर्वथा अभाव हो जाता है और साधकको परमात्मस्वरूप चिन्मय और नित्य एकरस रहनेवाले अविनाशी सुखका अनुभव हो जाता है। इसी अक्षय सुखको आत्यन्तिक सुख (6। 21) अत्यन्तसुख (6। 28) ऐकान्तिक सुख (14। 27) आदि नामोंसे कहा गया है। इसका अनुभव होनेपर उस परमात्मतत्त्वमें स्वाभाविक ही एक आकर्षण होता है जिसे प्रेम कहते हैं (गीता 18। 54)। इस प्रेममें कभी कमी नहीं आती प्रत्युत यह उत्तरोत्तर बढ़ता ही रहता है। उस तत्त्वका प्रसङ्ग चलनेपर उसपर विचार करनेपर पहलेसे कुछ नयापन दीखता है यही प्रेमका प्रतिक्षण बढ़ना है। इसमें एक समझनेकी बात यह है कि प्रेमके प्रतिक्षण बढ़नेपर भी यदि पहले कमी थी और अब पूर्ति हो गयी ऐसा प्रतीत होता है तो यह साधनअवस्था है यदि नयापन दीखनेपर भी पहले कमी थी और अब पूर्ति हो गयी ऐसा प्रतीत नहीं होता तो यह सिद्धअवस्था है। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने विषयोंसे विरक्त पुरुषको अक्षय सुखकी प्राप्ति बतायी। अब विषयोंसे विरक्ति कैसे हो इसका आगेके श्लोकमें विवेचन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.21।।बाह्यस्पर्शे विषयात्मनि सक्तिर्यस्य नास्ति स ह्येवं मन्यते इत्याह ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.21।।शब्दादिविषयप्रीतिप्रतिबन्धान्न कस्यचिदपि ब्रह्मणि स्थितिः सिध्येदित्याशङ्क्याह किंचेति। न केवलं पूर्वोक्तरीत्या ब्रह्मणि स्थितो हर्षविषादरहितः किंतु विद्यान्तरेणापीत्यर्थः। यावद्यावद्विषयेषु रागरूपमावरणं निवर्तते तावत्तावदात्मस्वरूपसुखमभिव्यक्तं भवतीत्याह बाह्ये। न केवलमसक्तात्मा शमवशादेव सुखं विन्दति किंतु ब्रह्मसमाधिना समाहितान्तःकरणः सुखमनन्तं प्राप्नोतीत्याह स ब्रह्मेति। तत्र पूर्वार्धं व्याचष्टे बाह्याश्चेति। समाधानाधीनसम्यग्ज्ञानद्वारा निरतिशयसुखप्राप्तिमुत्तरार्धव्याख्यानेन कथयति ब्रह्मणीत्यादिना। शब्दादिविषयविमुखस्यानन्तसुखाप्तिसंभवात्तदर्थिना प्रयत्नेन विषयवैमुख्यं कर्तव्यमिति शिष्यशिक्षार्थमाह तस्मादिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.21।।प्रकृतस्य सन्न्यासिन एवाक्षयसुखप्राप्तिरुच्यत इति परव्याख्यानमसदिति भावेनाह पुनरिति।सन्न्यासस्तु 5।6 इत्यादिना प्रागुक्तत्वात्पुनरिति आधिक्यसन्न्यासात्। प्राग्योगाभावे सन्न्यासस्य वैयर्थ्यमुक्तम्। तदसत्। कामाद्युपद्रवक्षये स्वरूपसुखस्याविर्भावादित्याशङ्कानिराकारणात्स्पष्टनम्। नैतदत्र प्रतीयत इत्यतो व्याचष्टे कामेति।बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा इत्यस्यार्थः कामरहित इति। आत्मस्वरूपस्यापि सुखस्य न निर्विशेषत्वमिति ज्ञापनायात्मनीत्युक्तम्। स एव कामरहित एव। तदेव आत्मसुखमेव। ब्रह्मणा योग इति प्रतीतिनिरासायाह ब्रह्मेति। कथमनेन सन्न्यासाद्योगस्याधिक्यं स्पष्टीकृतं इत्यतो ब्रह्मयोगशब्दार्थं विवृण्वन् तात्पर्यमाह ध्यानादीति। ज्ञानद्वारेति शेषः। अक्षयं पुनस्तिरोभावरहितम्। अन्यथा सन्न्यासमात्रेण तिरोभावोपेतं त्वल्पत्वादफलमेवेत्युक्तमेव 5।6। व्याख्यानान्तरे तु बहूनां पदानां वैयर्थ्यमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.21।।पुनर्योगस्याधिक्यं स्पष्टयति बाह्यस्पर्शेष्विति। कामरहित आत्मनि यत्सुखं विन्दति स एव ब्रह्मयोगयुक्तात्मा चेत्तदेवाक्षयं सुखं विन्दति। ब्रह्मविषयो योगो ब्रह्मयोगः ध्यानादियुक्तस्यैवात्मसुखमक्षयम्। अन्यथा नेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.21।।एवम् उक्तेन प्रकारेण बाह्यस्पर्शेषु आत्मव्यतिरिक्तविषयानुभावेषु असक्तमनाः अन्तरात्मनि एव यः सुखं विन्दति लभते स प्रकृत्यभ्यासं विहाय ब्रह्मयोगयुक्तात्मा ब्रह्माभ्यासयुक्तमना ब्रह्मानुभवरूपम् अक्षयं सुखं प्राप्नोति।प्राकृतस्य भोगस्य सुत्यजताम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.21।। बाह्यस्पर्शेषु बाह्याश्च ते स्पर्शाश्च बाह्यस्पर्शाः स्पृश्यन्ते इति स्पर्शाः शब्दादयो विषयाः तेषु बाह्यस्पर्शेषु असक्तः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः अयम् असक्तात्मा विषयेषु प्रीतिवर्जितः सन् विन्दति लभते आत्मनि यत् सुखं तत् विन्दति इत्येतत्। स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा ब्रह्मणि योगः समाधिः ब्रह्मयोगः तेन ब्रह्मयोगेन युक्तः समाहितः तस्मिन् व्यापृतः आत्मा अन्तःकरणं यस्य सः ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखम् अक्षयम् अश्नुते व्याप्नोति। तस्मात् बाह्यविषयप्रीतेः क्षणिकायाः इन्द्रियाणि निवर्तयेत् आत्मनि अक्षयसुखार्थी इत्यर्थः।।इतश्च निवर्तयेत्

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【 Verse 5.22 】

▸ Sanskrit Sloka: ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते | आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध: ||

▸ Transliteration: ye hi saṁsparśajā bhogā duḥkhayonaya eva te | ādyantavantaḥ kaunteya na teṣu ramate budhaḥ ||

▸ Glossary: ye: those; hi: surely; saṁsparśajāḥ: by contact with the senses; bhogāḥ: enjoy- ments; duḥkha: misery; yonayaḥ: sources of; eva: surely; te: they are; ādya: beginning; antavantaḥ: subject to end; kaunteya: son of Kuntī; na: not; teṣu: in those; ramate: enjoys; budhaḥ: intelligent person

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.22 The intelligent person surely does not enjoy the sense pleasures, enjoyments which are sources of misery and which are subject to beginning and end.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.22।।क्योंकि हे कुन्तीनन्दन जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं वे आदिअन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.22।। हे कौन्तेय (इन्द्रिय तथा विषयों के) संयोग से उत्पन्न होने वाले जो भोग हैं वे दुख के ही हेतु हैं क्योंकि वे आदिअन्त वाले हैं। बुद्धिमान् पुरुष उनमें नहीं रमता।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.22 ये which? हि verily? संस्पर्शजाः contactborn? भोगाः enjoyments? दुःखयोनयः generators of pain? एव only? ते they? आद्यन्तवन्तः having beginning and end? कौन्तेय O Kaunteya? न not? तेषु in those? रमते rejoices? बुधः the wise.Commentary Man goes in est of joy and searches in the external perishable objects for his happiness. He fails to get it but instead he carries a load of sorrow on his head.You should withdraw the senses from the senseobjects as there is no trace of happiness in them and fix the min on the immortal? blissful Self within. The senseobjects have a beginning and an end. Separation from the senseobjects gives you a lot of pain. During the interval between the origin and the end you experience a hollow? momentary? illusory pleasure. This fleeting pleasure is due to Avidya or ignorance. Even in the other world you will have the same experience. He who is endowed with discrimination or the knowledge of the Self will never rejoice in these sensual objects. Only ignorant persons who are passionate will rejoice in the senseobjects. (Cf.II.14?XVIII.38)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.22. Whosoever, right here, before abandoning the body, is capable of bearing the force sprung from desire and wrath-he is considered to be a man of Yoga and a happy man.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.22 The joys that spring from external associations bring pain; they have their beginning and their endings. The wise man does not rejoice in them.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.22 For those pleasures that are born of contact are wombs or pain. They have a beginning and an end, O Arjuna. The wise do not rejoice in them.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.22 Since enjoyments that result from contact (with objects) are verily the sources of sorrow and have a beginning and an end, (therefore) O son of Kunti, the wise one does not delight in them.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.22 The enjoyments that are born of contacts are only generators of pain, for they have a beginning and an end, O Arjuna; the wise man does not rejoice in them.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.22 Ye hi etc. He considers indeed as follows : 'All enjoyments born of the external objects are in the form of causes of misery; and even otherwise , they are impermanent'.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.22 Those pleasures which result from the contact of sense objects with the senses, are the wombs of pain, i.e., have pain as their ultimate fruit 'They have a beginning and an end,' i.e., they are seen to remain only for a brief period and the reaction that follows their cessation is painful. He who knows what they themselves are, i.e., know themselves as Atman, will not find pleasure in them.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.22 Hi, since; bhogah, enjoyments; ye samsparsajah, that result from contact with objects, that arise from contact between the objects and the organs; are eva, verily; duhkha-yonayah, sources of sorrow, because they are creations of ignorance. It is certainly a matter of experience that physical and other sorrows are created by that itself. By the use of the word eva (verily), it is understood that, as it happens here in this world, so does it even in the other world. Realizing that there is not the least trace of happiness in the world, one should withdraw the organs from the objects which are comparable to a mirage. Not only are they sources of sorrow, they also adi-antavantah, have a beginning and an end. Adi (beginning) of enjoyments consists in the contact between objects and senses, and their end (anta), indeed, is the loss of that contact. Hence, they have a beginning and an end, they are impermanent, being present in the intervening moment. This is the meaning. (Therefore) O son of Kunti, budhah, the wise one, the discriminating person who has realized the Reality which is the supreme Goal; na ramate, does not delight; tesu, in them, in enjoyments. For delight in objects is seen only in very foolish beings, as for instance in animals etc. This extremely painful evil, which is opposed to the path of Bliss and is the source of getting all miseries, is difficult to resist. Therefore one must make the utmost effort to avoid it. Hence the Lord says:;

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.22।। आत्मा के अनन्त आनन्द का अनुभव करने के लिए हम साधक लोग भी विषयासक्ति से मुक्त होने का प्रयत्न करते हैं। एक सामान्य स्तर का बुद्धिमान् पुरुष भी यदि जीवन के अनुभवों पर विचार करे तो वह समझ सकता है कि अनित्य विषयों में सुख की खोज करना कोई लाभदायक व्यापार नहीं है। हमारे सभी अनुभवों में उपयोगिता के ह्रास का नियम समान रूप से कार्य करता है। जो वस्तु प्रारम्भ में सुख देती है वही कुछ समय पश्चात् अत्यन्त दुखदायी भी बन जाती है। भूखे होने पर पहले और पच्चीसवें लड्डू को खाते समय हमारे क्या अनुभव होगें इसका प्रत्यक्ष प्रयोग करके देखा जा सकता है जो इस मूलभूत सत्य को प्रमाणित करेगा कि वैषयिक उपभोग सदा ही दुख के कारण होते हैं।इन्द्रियोपभोग की वस्तुएँ उतनी ही सुन्दर एवं सुखदायक हो सकती हैं जितनी कि कुष्ठ रोगिणी कोई वेश्या जो सौन्दर्य़ प्रसाधनों से सजधज कर किसी व्यापारिक नगरी की अंधेरी संकरी गली में स्थित अपने कोठेमें अनजाने लोगों को लुभाने का प्रयत्न करती खड़ी रहती है। श्रीकृष्ण इस तथ्य को सुन्दर शैली में समझाते हुए कहते हैं कि वैषयिक सुख अनित्य होने के कारण विवेकी पुरुष को मोहित नहीं कर सकते।बुद्धिमान् पुरुष पूर्णत्व प्राप्ति से ही सन्तुष्ट होता है। हम भौतिक परिच्छिन्न वस्तुओं के पीछे अधिक सन्तोष और आनन्द पाने की आशा में दौड़दौड़ कर स्वयं को थका लेते हैं और उस झूठी आशा में न जाने कितने हीन कर्म भी करते हैं। जबकि वास्तविक शुद्ध दिव्य और पूर्ण आनन्द केवल आत्मानुभूति के द्वारा ही प्राप्त हो सकता है।श्रेय मार्ग का एक और प्रतिपक्षी शत्रु है जो सब अनर्थों का कारण तथा दुर्जेय है इसलिये सबके परिहार के लिये प्रयत्नाधिक्य की आवश्यकता है। भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.22।।विषयेष्वसक्ततां संपादयेदित्युक्तं तत् भोगानां दुःखरुपत्वप्रतिपादनेन द्रढयति ये हीति। ये हि यस्माद्विषयेन्द्रियसंस्पर्शेभ्यो जाता भोगास्ते दुःखानामाध्यात्मिकादीनां योनयः कारणानि। अविद्यावृतत्वात्। एवकारात्संसारे सुखस्य गन्धमात्रमपि नास्तीति ज्ञात्वा शुक्तिरजतनिमेभ्यो भोगेभ्यो इन्द्रियाणि निवर्तयेत्। न केवलं दुःख योनय एवापि त्वाद्यन्तवन्तश्च आदिर्विषयेन्द्रियसंयोगो भोगानामन्तश्च एतद्वियोगएव। तस्माद्बुधो विवेकी दृग्दृश्यतत्त्ववित् तेषु भोगेषु न रमते। तदुक्तं वासिष्ठेसंपदः प्रमदाश्चैव तरङ्गोत्सङ्गभङ्गुराः। कस्तास्वहिफणाच्छत्रच्छायासु रमते बुधः इति। कौन्तेयेति संबोधयन् स्त्रीस्वभावोऽदीर्घदर्श्यत्यन्तमूढ एव भोगेषु रमते इति ध्वनयति। यद्वा विषयेषु रतिरहितायाः कुन्त्याः पुत्रस्त्वं तेषु रन्तुभयोग्योऽसीति सूचयति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.22।।ननु बाह्यविषयप्रीतिनिवृत्तावात्मन्यक्षयसुखानुभवस्तस्मिंश्च सति तत्प्रसादादेव बाह्यविषयप्रीतिनिवृत्तिरितीतरेतराश्रयवशान्नैकमपि सिध्येदित्याशङ्क्य विषयदोषदर्शनाभ्यासेनैव तत्प्रीतिनिवृत्तिर्भवतीति परिहारमाह हि यस्मात् ये संस्पर्शजा विषयेन्द्रियसंबन्धजा भोगाः क्षुद्रसुखलवानुभवाः इह वा परत्र वा रागद्वेषादिव्याप्तत्वेनदुःखयोनय एव ते ते सर्वेऽपि ब्रह्मलोकपर्यन्तं दुःखहेतव एव। तदुक्तं विष्णुपुराणेयावन्तः कुरुते जन्तुः संबन्धान्मनसः प्रियान्। तावन्तोऽस्य निखन्यन्ते हृदये शोकशङ्कवः।। इति। एतादृशा अपि न स्थिराः किंतु आद्यन्तवन्तः आदिर्विषयेन्द्रियसंयोगोऽन्तश्च तद्वियोग एव तौ विद्येते येषां ते। पूर्वापरयोरसत्त्वान्मध्ये स्वप्नवदाविर्भूताः क्षणिका मिथ्याभूताः। तदुक्तं गौडपादाचार्यैःआदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा इति। यस्मादेवं तस्मात्तेषु बुधो विवेकी न रमते प्रतिकूलवेदनीयत्वान्न प्रीतिमनुभवति। तदुक्तं भगवता पतञ्जलिनापरिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनःइति। सर्वमपि विषयसुखं दृढमानुश्रविकं च दुःखमेव प्रतिकूलवेदनीयत्वात्। विवेकिनः परिज्ञातेक्लेशादिस्वरूपस्य न त्वविवेकिनः। अक्षिपात्रकल्पो हि विद्वानत्यल्पदुःखलेशेनाप्युद्विजते यथोर्णातन्तुरतिसुकुमारोऽप्यक्षिपात्रे न्यस्तः स्पर्शेन दुःखयति नेतरेष्वङ्गेषु तद्वद्विवेकिन एव मधुविषसंपृक्तान्नभोजनवत्सर्वमपि भोगसाधनं कालत्रयेऽपि क्लेशानुविद्धत्वाद्दुःखं विवेकिनः न मूढस्य बहुविधदुःखसहिष्णोरित्यर्थः। तत्र परिणामतापसंस्कारदुःखैरिति भूतवर्तमानभविष्यत्कालेऽपि दुःखानुविद्धत्वादौपाधिकं दुःखत्वं विषयसुखस्योक्तम्। गुणवृत्तिविरोधाच्चेत्यनेन स्वरूपतोऽपि दुःखत्वं तत्र परिणामश्च तापश्च संस्कारश्च त एव दुःखानि तैरित्यर्थः। इत्यंभूतलक्षणे तृतीया। तथाहि रागानुविद्ध एव सर्वोऽपि सुखानुभवः। नहि तत्र न रज्यति तेन सुखी चेति संभवति। राग एव च पूर्वमुद्भूतः सन्विषयप्राप्त्या सुखरूपेण परिणमते। तस्य च प्रतिक्षणं वर्धमानत्वेन स्वविषयाप्राप्तिनिबन्धनदुःखस्यापरिहार्यत्वाद्दुःखरुपतैव। याहि भोगेष्विन्द्रियाणामुपशान्तिः परितृप्तत्वात्सुखम्। या लौल्यादनुपशान्तिस्तद्दुःखम्। नचेन्द्रियाणां भोगाभ्यासेन वैतृष्णयं कर्तुं शक्यम्। यतो भोगाभ्यासमनु विवर्धन्ते रागाः कौशलानि चेन्द्रियाणाम्। स्मृतिश्चन जातु कामः इत्यादिः। तस्माद्दुःखात्मकरागपरिणामत्वाद्विषयसुखमपि दुःखमेव कार्यकारणयोरभेदादिति परिणामदुःखत्वम्। तथा सुखानुभवकाले तत्प्रतिकूलानि दुःखसाधनानि द्वेष्टि। नानुपहत्य भूतान्युपभोगः संभवतीति भूतानि च हिनस्ति। द्वेषश्च सर्वाणि दुःखसाधनानि मे माभूवन्निति संकल्पविशेषः। नच तानि सर्वाणि कश्चिदपि परिहर्तुं शक्नोति। अतः सुखानुभवकालेऽपि तत्परिपन्थिनं प्रति द्वेषस्य सर्वदैवावस्थितत्वात्तापदुःखं दुष्परिहरमेव। तापो हि द्वेषः। एवंच दुःखसाधनानि परिहर्तुमशक्तो मुह्यति चेति मोहदुःखतापि व्याख्येया। तथाचोक्तं योगभाष्यकारैःसर्वस्य द्वेषानुविद्धश्चेतनाचेतनसाधनाधीनस्तापानुभवः इति। तत्रास्ति द्वेषजः कर्माशयः। सुखसाधनानि च प्रार्थयमानः कायेन वाचा मनसा च परिस्पन्दते। ततः परमनुगृह्णात्युपहन्ति चेति परानुग्रहपीडाभ्यां धर्माधर्मावुपचिनोति। स कर्माशयो लोभान्मोहाच्च भवतीत्येषा तापदुःखतोच्यते। यथा वर्तमानः सुखानुभवः स्वविनाशकाले संस्कारमाधत्ते। सच सुखस्मरणं तच्च रागं सच मनःकायवचनचेष्टां साच पुण्यापुण्यकर्माशयौ तौ च जन्मादीनि संस्कारदुःखता। एवं तापमोहयोरपि संस्कारौ व्याख्येयौ। एवं कालत्रयेऽपि दुःखानुवेधाद्विषयसुखं दुःखमेवेत्युक्त्वा स्वरूपतोऽपि दुःखतामाह गुणवृत्तिविरोधाच्च गुणाः सत्त्वरजस्तमांसि सुखदुःखमोहात्मकाः परस्परविरुद्धस्वभावा अपि तैलवर्त्यग्नय इव दीपं पुरुषभोगोपयुक्तत्वेन त्र्यात्मकमेकं कार्यमारभन्ते। तत्रैकस्य प्राधान्ये द्वयोर्गुणभावात्प्रधानमात्रव्यपदेशेन सात्त्विकं राजसं तामसमिति त्रिगुणमपि कार्यमेकेन गुणेन व्यपदिश्यते। तत्र सुखोपभोगरूपोऽपि प्रत्यय उद्भूतसत्त्वकार्यत्वेऽप्यनुद्भूतरजस्तमःकार्यत्वात्ित्रगुणात्मक एव। तथाच सुखात्मकत्ववद्दुःखात्मकत्वं विषादात्मकत्वं च तस्य ध्रुवमिति दुःखमेव सर्वं विवेकिनः। नचैतादृशोऽपि प्रत्ययः स्थिरः। यस्माच्चलं च गुणवृत्तमिति क्षिप्रपरिणामि चित्तमुक्तम्। नन्वेकः प्रत्ययः कथं परस्परविरुद्धसुखदुःखमोहत्वान्येकदा प्रतिपद्यत इति चेत् न। उद्भूतानुद्भूतयोर्विरोधाभावात्। समवृत्तिकानामेव हि गुणानां युगपद्विरोधो न विषमवृत्तिकानाम्। यथा धर्मज्ञानवैराग्यैश्वर्याणि लब्धवृत्तिकानि लब्धवृत्तिकैरेवाधर्माज्ञानावैराग्यानैश्वर्यैः सह विरुध्यन्ते नतु स्वरूपसद्भिः। प्रधानस्य प्रधानेन सह विरोधो नतु दुर्बलेनेति हि न्यायः। एवं सत्त्वरजस्तमांस्यपि परस्परं प्राधान्यमात्रं युगपन्न सहन्ते नतु सद्भावमपि। एतेन परिणामतापसंस्कारदुःखेष्वपि रागद्वेषमोहानां युगपत्सद्भावो व्याख्यातः प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाररूपेण क्लेशानां चतुरवस्थत्वात्। तथाहिअविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः पञ्च क्लेशाः। अविद्या क्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छन्नोदाराणाम्। अनित्याशुचिदुःखानामत्सु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या। दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतैवास्मिता। सुखानुशयी रागः। दुःखानुशयी द्वेषः। स्वरसवाही विदुषोऽपि तथा रूढोऽभिनिवेशः। ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः। ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः। क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः। सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः इति पातञ्जलानि सूत्राणि। तत्रातस्मिंस्तद्बुद्धिर्विपर्ययो मिथ्याज्ञानमविद्येति पर्यायाः। तत्राशेषसंसारनिदानम्। तत्रानित्ये नित्यबुद्धिर्यथा ध्रुवा पृथिवी ध्रुवा सचन्द्रतारका द्यौरमृता दिवौकस इति। अशुचौ परमबीभत्से काये शुचिबुद्धिर्यथा नवेव शशाङ्कलेखा कमनीयेयं कन्या मध्वमृतावयवनिर्मितेव चन्द्रं भित्त्वा निःसृतेव ज्ञायते नीलोत्पलपत्रायताक्षी हावगर्भाभ्यां लोचनाभ्यां जीवलोकमाश्वासयतीवेति कस्य केन संबन्धः स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्निष्यन्दान्निधनादपि। कायमाधेयशौचत्वात्पण्डिता ह्यशुचिं विदुः।। इति च वैयासकः श्लोकः। एतेनापुण्ये पुण्यप्रत्ययोऽनर्थे चार्थप्रत्ययो व्याख्यातः। दुःखे सुखख्यातिरुदाहृतापरिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः इति। अनात्मन्यात्मख्यातिर्यथा शरीरे मनुष्योऽहमित्यादिः। इयं चाविद्या सर्वक्लेशमूलभूता तम इत्युच्यते। बुद्धिपुरुषयोरभेदाभिमानोऽस्मिता मोहः। साधनरहितस्यापि सर्वं सुखजातीयं मे भूयादिति विपर्ययविशेषो रागः। सएव महामोहः। दुःखसाधने विद्यामानेऽपि किमपि दुःखं मे माभूदिति विपर्ययविशेषो द्वेषः। स तामिस्रः। आयुरभावेऽप्येतैः शरीरेन्द्रियादिभिरनित्यैरपि वियोगो मे माभूदित्यविद्वदङ्गनाबालं स्वाभाविकः सर्वप्राणिसाधरणो मरणत्रासरूपो विपर्ययविशेषोऽभिनिवेशः। सोऽन्धतामिस्रः। तदुक्तं पुराणेतमो मोहो महामोहस्तामिस्रो ह्यन्धसंज्ञितः। अविद्या पञ्चपर्वैषा प्रादुर्भूता महात्मनः।। इति। एते च क्लेशाश्चतुरवस्था भवन्ति। तत्रासतोऽनुत्पत्तेरनभिव्यक्तरूपेणावस्थानं सुप्तावस्था। अभिव्यक्तस्यापि सहकार्यलाभभावात्कार्याजनकत्वं तन्ववस्था। अभिव्यक्तस्य जनितकार्यस्यापि केनचिद्बलवताभिभवो विच्छेदावस्था। अभिव्यक्तस्य प्राप्तसहकारिसंपत्तेरप्रतिबन्धेन स्वकार्यकरत्वमुदारावस्था। एतादृगवस्थाचतुष्टयविशिष्टानामस्मितादीनां चतुर्णां विपर्ययरूपाणां क्लेशानामविद्यैव सामान्यरूपा क्षेत्रं प्रसवभूमिः। सर्वेषामपि विपर्ययरूपत्वस्य दर्शितत्वात्। तेनाविद्यानिवृत्त्यैव क्लेशानां निवृत्तिरित्यर्थः। ते च क्लेशाः प्रसुप्ता यथा प्रकृतिलीनानां तनवः प्रतिपक्षभावनया तनूकृता यथा योगिनाम्। त उभयेऽपि सूक्ष्माः प्रतिप्रसवेन मनोनिरोधेनैव निर्बीजसमाधिना हेयाः। ये तु सूक्ष्मवृत्तयस्तत्कार्यभूताः स्थूला विच्छिन्ना उदाराश्च विच्छिद्य विच्छिद्य तेन तेनात्मना पुनः प्रादुर्भवन्तीति विच्छिन्नाः। यथा रागकाले क्रोधो विद्यमानोऽपि न प्रादुर्भूत इति विच्छिन्न उच्यते। एवमेकस्यां स्त्रियां चैत्रो रक्त इति नान्यासु विरक्तः किंत्वेकस्यां रागो लब्धवृत्तिरन्यासु च भविष्यद्वृत्तिरिति स तदा विच्छिन्न उच्यते। ये यदा विषयेषु लब्धवृत्तयस्ते तदा सर्वात्मना प्रादुर्भूता उदारा उच्यन्ते। तत उभयेऽप्यतिस्थूलत्वाच्छुद्धसत्त्वमयेन भगवद्व्यानेन हेया न मनोनिरोधमपेक्षन्ते। निरोधहेयास्तु सूक्ष्मा एव। तथाच परिणामतापसंस्कारदुःखेषु प्रसुप्ततनुविच्छिन्नरूपेण सर्वे क्लेशाः सर्वदा सन्ति। उदारता तु कादाचित्की स्यादिति विशेषः। एते च बाधनालक्षणं दुःखमुपजनयन्तः क्लेशशब्दवाच्या भवन्ति। यतः कर्माशयो धर्माधर्माख्यः क्लेशमूलक एव। सति च मूलभूते क्लेशे तस्य कर्माशयस्य विपाकः फलं जन्मायुर्भोगश्चेति। सच कर्माशय इह परत्र च स्वविपाकारम्भकत्वेन दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः। एवं क्लेशसंततिर्घटीयन्त्रवदनिशमावर्तते। अतः समीचीनमुक्तंये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते। आद्यन्तवन्तः इति। दुःखयोनित्वं परिणामादिभिर्गुणवृत्तिविरोधाच्च आद्यन्तवत्त्वं गुणवृत्तस्य चलत्वादिति योगमते व्याख्या। औपनिषदानां तु अनादिभावरूपज्ञानमविद्या। अहंकारधर्म्यध्यासोऽस्मिता। रागद्वेषाभिनिवेशास्तद्वृत्तिविशेषा इत्यविद्यामूलत्वात्सर्वेऽप्यविद्यात्मकत्वेन मिथ्याभूता रज्जुभुजङ्गाध्यासवन्मिथ्यात्वेऽपि दुःखयोनयः स्वप्नादिवद्दृष्टिसृष्टिमात्रत्वेनाद्यन्तवन्तश्चेति बुधोऽधिष्ठानसाक्षात्कारेण निवृत्तभ्रमस्तेषु न रमते। मृगतृष्णिकास्वरूपज्ञानवानिव तत्रोदकार्थी न प्रवर्तते। न संसारे सुखस्य गन्धमात्रमप्यस्तीति बुद्ध्वा ततः सर्वाणीन्द्रियाणि निवर्तयेदित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.22।।ननु सुषुप्तितुल्यस्य मोक्षसुखस्यार्थे कः प्राप्तमेव बाह्यं दिव्यस्त्र्यन्नपानगीतवाद्यादिसुखं त्यजेदित्याशङ्क्य बाह्यसुखमनित्यत्वान्निन्दति ये हीति। संस्पर्शजा विषयसंबन्धजाः। दुःखयोनित्वे हेतुः आद्यन्तवन्त इति। जाते पुत्रे यत्सुखं तत्तस्मिन्नष्टे नश्यति दुःखं च महत्प्रयच्छतीति तेषु भोगेषु बुधः परिपाकदर्शी न रमते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.22।।ननु लौकिकरसभोगाभावेऽनुभवं विना कथमलौकिकरसज्ञानं स्यात् तदभावे च कथं तदनुभवःस्यात् इत्यत आह ये हि संस्पर्शजा इति। संस्पर्शजा भोगा विषयसम्बन्धिनो लौकिकार्थे भोगास्ते दुःखयोनयो भगवत्सम्बन्धाभावक्लेशकारणभूताः यत आद्यन्तवन्तः आदिमन्तः स्वभावेनैवोत्पन्नाः नतु भगवदिच्छया। अन्तवन्तः स्वमनोरथपूर्त्यैव पूर्णाः। यतस्त एव तादृशा अतो हे कौन्तेय मद्भावानुभवयोग्य हीति निश्चयेन। बुधः सर्वरसज्ञो भगवान् न रमते न रसदानं करोतीत्यर्थः। यतो भगवान् बुधः सर्वरसज्ञः अतस्तदिच्छया तद्भोगानुभवः सिद्ध एव भविष्यतीति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.22।।ननु प्रियविषयभोगानामपि निवृत्तेः कथं मोक्षः पुरुषार्थः स्यात्तत्राह ये हीति। संस्पृश्यन्त इति संस्पर्शा विषयास्तेभ्यो जाता ये भोगाः सुखानि ते हि वर्तमानकालेऽपि स्पर्धासूयादिव्याप्तत्वाद्दुःखस्यैव योनयः कारणभूतास्तथादिमन्तोऽन्तवन्तश्च। अतो वेकी तेषु न रमते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.22।।ननु सुखहेतुविषयाणामपि निवृत्तेः कथं श्रुतमात्रस्य मोक्षस्य ब्रह्मानन्दस्य पुरुषार्थता स्यात् तत्राह ये हीति। प्राकृतेन्द्रियजन्यानां विषयभोगानां आद्यन्तवत्त्वेन दुःखयोनित्वादपुरुषार्थत्वमनर्थत्वमर्थसिद्धं तेन तद्विपरीतत्वाद्ब्रह्मानन्दस्यैव पुरुषार्थत्वमिति विज्ञाय योगिनो बुधस्य तत्रैव प्रवृत्तिस्तदाह न तेषु रमते बुध इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.22।।इसलिये भी ( इन्द्रियोंको विषयोंसे ) हटा लेना चाहिये क्योंकि विषय और इन्द्रियोंके सम्बन्धसे उत्पन्न जो भोग हैं वे सब अविद्याजन्य होनेसे केवल दुःखके ही कारण हैं क्योंकि आध्यात्मिक आदि ( तीनों प्रकारके ) दुःख उनके ही निमित्तसे होते हुए देखे जाते हैं। एव शब्दसे यह भी प्रकट होता है कि ये जैसे इस लोकमें दुःखप्रद हैं वैसे ही परलोकमें भी दुःखद हैं। संसारमें सुखकी गन्धमात्र भी नहीं है यह समझकर विषयरूप मृगतृष्णिकासे इन्द्रियोंको हटा लेना चाहिये। ये विषयभोग केवल दुःखके कारण हैं इतना ही नहीं किंतु ये आदिअन्तवाले भी हैं विषय और इन्द्रियोंका संयोग होना भोगोंका आदि है और वियोग होना ही अन्त है। इसलिये जो आदिअन्तवाले हैं वे केवल बीचके क्षणमें ही प्रतीतिवाले होनेसे अनित्य हैं। हे कौन्तेय परमार्थतत्त्वको जाननेवाला विवेकशील बुद्धिमान् पुरुष उन भोगोंमें नहीं रमा करता। क्योंकि केवल अत्यन्त मूढ़ पुरुषोंकी ही पशु आदिकी भाँति विषयोंमें प्रीति देखी जाती है। कल्याणके मार्गका प्रतिपक्षी यह ( कामक्रोधका वेगरूप ) दोष ब़ड़ा दुःखदायक है सब अनर्थोंकी प्राप्तिका कारण है और निवारण करनेमें अति कठिन भी है। इसलिये भगवान् कहते हैं कि इसको नष्ट करनेके लिये खूब प्रयत्न करना चाहिये।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.22।। व्याख्या   ये हि संस्पर्शजा भोगाः शब्द स्पर्श रूप रस और गन्ध इन विषयोंसे इन्द्रियोंका रागपूर्वक सम्बन्ध होनेपर जो सुख प्रतीत होता है उसे भोग कहते हैं। सम्बन्धजन्य अर्थात् इन्द्रियजन्य भोगमें मनुष्य कभी स्वतन्त्र नहीं है। सुखसुविधा और मानबड़ाई मिलनेपर प्रसन्न होना भोग है। अपनी बुद्धिमें जिस सिद्धान्तका आदर है दूसरे व्यक्तिसे उसी सिद्धान्तकी प्रशंसा सुनकर जो प्रसन्नता होतीहै सुख होता है वह भी एक प्रकारका भोग ही है। तात्पर्य यह है कि परमात्माके सिवाय जितने भी प्रकृतिजन्य प्राणी पदार्थ परिस्थितियाँ अवस्थाएँ आदि हैं उनसे किसी भी प्रकृतिजन्य करणके द्वारा सुखकी अनुभूति करना भोग ही है।शास्त्रनिषिद्ध भोग तो सर्वथा त्याज्य हैं ही शास्त्रविहित भोग भी परमात्मप्राप्तिमें बाधक होनेसे त्याज्य ही हैं। कारण कि जडताके सम्बन्धके बिना भोग नहीं होता जब कि परमात्मप्राप्तिके लिये जडतासे सम्बन्धविच्छेद करना आवश्यक है।आद्यन्तवन्तः सम्पूर्ण भोग आनेजानेवाले हैं अनित्य हैं परिवर्तनशील हैं (गीता 2। 14)। ये कभी एकरूप रह सकते ही नहीं। तात्पर्य है कि इन भोगोंकी स्वयंके साथ किसी भी अंशमें एकता नहीं है। भोग आनेजानेवाले हैं और स्वयं सदा रहनेवाला है। भोग जड हैं और स्वयं चेतन है। भोग विकारी हैं और स्वयं निर्विकार है। भोग आदिअन्तवाले हैं और स्वयं आदिअन्तसे रहित है। इसलिये स्वयंको भोगोंसे कभी सुख नहीं मिल सकता। जीव परमात्माका अंश है ममैवांशो जीवलोके (गीता 15। 7) इसलिये उसे परमात्मासे ही अक्षय सुख मिल सकता है स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते (गीता 5। 21)।भोग आनेजानेवाले हैं इस तरफ ध्यान जाते ही सुखदुःखका प्रभाव कम हो जाता है। इसलिये आद्यन्तवन्तः पद भोगोंके प्रभावको मिटानेके लिये औषधरूप है।दुःखयोनय एव ते जितने भी सम्बन्धजन्य सुख हैं वे सब दुःखके उत्पत्तिस्थान हैं। सम्बन्धजन्य सुख दुःखसे ही उत्पन्न होता है और दुःखमें ही परिणत होता है। पहले वस्तुके अभावका दुःख होता है तभी उस वस्तुके मिलनेपर सुख होता है। वस्तुके अभावका दुःख जितनी मात्रामें होता है वस्तुके मिलनेका सुख भी उतनी ही मात्रामें होता है।भोगी व्यक्ति दुःखोंसे नहीं बच सकता। कारण कि भोग जडताके सम्बन्धसे होता है और जडताका सम्बन्ध ही जन्ममरणरूप महान् दुःखका कारण है।पातञ्जलयोगदर्शनमें कहा गया है परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः। (2। 15)परिणामदुःख तापदुःख और संस्कारदुःख ऐसे तीन प्रकारके दुःख सबमें विद्यमान रहनेके कारण तथा तीनों गुणोंकी वृत्तियोंमें परस्पर विरोध होनेके कारण विवेकी पुरुषके लिये सबकेसब भोग दुःखरूप ही हैं।सम्पूर्ण विषयभोग आरम्भमें सुखरूप प्रतीत होनेपर भी परिणाममें दुःख ही देनेवाले हैं (गीता 18। 38) क्योंकि भोगोंके परिणाममें अपनी शक्तिका ह्रास और भोग्यपदार्थका नाश होता है यह परिणामदुःख है।दूसरे व्यक्तियोंके पास अपनेसे अधिक भोग देखनेसे अपने इच्छानुसार पूरे भोग न मिलनेसे भीतर भोगोंकी आसक्ति होनेपर भी भोग भोगनेकी सामर्थ्य न होनेसे तथा प्राप्त भोगोंके बिछुड़ जानेकी आशङ्कासे भोगोंके पास रहते हुए भी हृदयमें सन्ताप रहता है यह तापदुःख है।किसी कारणवश भोगोंका वियोग हो जानेसे मनुष्य उन भोगोंको याद करकरके दुःखी होता है यह संस्कारदुःख है।भोगोंमें रुचि होनेके कारण मन उन भोगोंको भोगना चाहता है परन्तु विवेकके कारण बुद्धि उन्हें भोगनेसे रोकती है। ऐसे ही सत्सङ्ग करते समय तामसी वृत्तिके कारण नींद आने लगती है और नींदका सुख मनुष्यको अपनी ओर खींचता है परन्तु सात्त्विक वृत्तिके कारण उसे विचार आता है कि अभी सत्सङ्ग कर लें क्योंकि यह मौका बारबार मिलेगा नहीं यह गुणवृत्तिविरोध है जिससे साधकोंको बहुत दुःख होता है।भोगोंको प्राप्त करना अपने वशकी बात नहीं है क्योंकि इसमें प्रारब्धकी प्रधानता और अपनी परतन्त्रता है। परन्तु भगवान्की प्राप्ति प्रत्येक मनुष्य कर सकता है क्योंकि उनकी प्राप्तिके लिये ही मनुष्यशरीर मिला है। भोग दो मनुष्योंको भी समानरूपसे प्राप्त नहीं हो सकते पर भगवान् मनुष्यमात्रको समानरूपसे प्राप्त हो सकते हैं। सत्ययुग आदिमें बड़ेबड़े ऋषियोंको जो भगवान् प्राप्त हुए थे वही आज कलियुगमें भी सबको प्राप्त हो सकते हैं। भोगोंकी प्राप्ति सदाके लिये नहीं होती और सबके लिये नहीं होती। परन्तु भगवान्की प्राप्ति सदाके लिये होती है और सबके लिये होती है। तात्पर्य यह हुआ कि भोगों(जडता) की प्राप्तिमें तो विभिन्नता रहती ही है पर उनके त्यागमें सब एक हो जाते हैं।एव पदका तात्पर्य है कि भोग निःसन्देह और निश्चितरूपसे दुःखके कारण हैं। उनमें सुख प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें सुखका लेश भी नहीं है।न तेषु रमते बुधः साधारण मनुष्यको जिन भोगोंमें सुख प्रतीत होता है उन भोगोंको विवेकशील मनुष्य दुःखरूप ही समझता है। इसलिये वह उन भोगोंमें रमण नहीं करता उनके अधीन नहीं होता।विवेकी मनुष्यको इस बातका ज्ञान रहता है कि संसारके समस्त दुःख सन्ताप पाप नरक आदि संयोगजन्य सुखकी इच्छापर ही आधारित हैं। अपने इस ज्ञानको महत्त्व देनेसे ही वह बुद्धिमान् है। परन्तु जिसने यह जान लिया है कि भोग दुःखप्रद हैं फिर भी भोगोंकी कामना करता है और उनमें ही रमण करता है वह वास्तवमें अपने ज्ञानको पूर्णरूपसे महत्त्व न देनेके कारण बुद्धिमान् कहलानेका अधिकारी नहीं है। अपने ज्ञानको महत्त्व देनेवाला बुद्धिमान् मनुष्य भोगोंकी कामना और उनमें रमण कर ही नहीं सकता। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने बताया कि संयोगजन्य सुख भोगनेवाला दुःखोंसे नहीं बच सकता तो फिर सुख कौन होता है इसका उत्तर आगेके श्लोकमें देते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.22।।ये हीति। स ह्येवं भावयति बाह्यविषयजा भोगाः ( N बाह्यविषयभोगाः) सर्वे दुःखकारणरूपाः तथाविधा अपि अनित्याः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.22।।तत्रैव हेत्वन्तरपरत्वेनोत्तरश्लोकमुदाहरति इतश्चेति। विषयेभ्यः सकाशादिन्द्रियाणीति शेषः। वैराग्यार्थमेव वैषयिकाणि सुखानि दूषयति ये हीति। ननु विषयेन्द्रियसंप्रयोगसंप्रसूतेषु भोगेषु जन्तूनामभिरुचिदर्शनात्कुतस्तेषां दुःखयोनित्वमित्याशङ्क्याविवेकिनां तेष्वासङ्गेऽपि न विवेकिनामित्याह आद्यन्तवन्त इति। यस्मादाधिव्याधिजरामरणादिसहितेभ्यः समागमनादिक्लेशरूपभागिभ्यश्च विषयेन्द्रियसंबन्धेभ्यो भोगाः सुखलवानुभवा जायन्ते तस्मात्ते दुःखहेतवो भवन्तीति योजना। अविद्याकार्यत्वाद्दुःखानां कुतो भोगजन्यत्वमित्याशङ्क्य भोगानामविद्याप्रयुक्तत्वात्तन्निबन्धनत्वं दुःखानां युक्तमित्यभिप्रेत्याह अविद्येति। भोगानां दुःखयोनित्वे मानवमनुभवमुपन्यस्यति दृश्यन्ते हीति। ऐहिकानां भोगानां दुःखनिमित्तत्वेऽपि नामुष्मिकाणां तथात्वमनुभवाभावादित्याशङ्क्यावधारणसामर्थ्यसिद्धमर्थमाह यथेति। पूर्वार्धस्याक्षरार्थमुक्त्वा तात्पर्यार्थमाह नेत्यादिना। इतश्च विषयेभ्यः सकाशादिन्द्रियाणि निवर्तयितव्यानीत्याह न केवलमिति। आद्यन्तवत्त्वे मध्यक्षणवर्तित्वेन क्षणभङ्गुरत्वादुपेक्षणीयत्वं भोगानां सिध्यति। अस्ति हि तेषां क्षणभङ्गुरत्वं क्षणिकविषयाकारमनोवृत्तिव्यङ्ग्यत्वादिति मन्वानः सन्नाह अत इति। बुद्धिपूर्वकारिणां विवेकवतां भोगेषूपेक्षोपलब्धेश्च तेषामाभासत्वं प्रतिभातीत्याह न तेष्विति। प्रतीकोपादानमाद्यमिदं पुनर्व्याख्यानमिति न पुनरुक्तिः। ननु केषांचिद्भोगेष्वभिरुचिरुपलभ्यते तत्राह अत्यन्तेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.22।।ननूत्तरश्लोके सन्न्यासादित्रितयान्तर्गतं न किञ्चिदुच्यत इत्यत आह सन्न्यासार्थमिति। निन्दयतीति स्वार्थे णिच्। सन्न्यासार्थिनेति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.22।।सन्न्यासार्थं कामभोगं निन्दयति येहीति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.22।।विषयेन्द्रियस्पर्शजा ये भोगाः दुःखयोनयः ते दुःखोदर्का आद्यन्तवन्तः अल्पकालवर्तिनो हि उपलभ्यन्ते न तेषु तद्याथात्म्यविद् रमते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.22।। ये हि यस्मात् संस्पर्शजाः विषयेन्द्रियसंस्पर्शेभ्यो जाताः भोगा भुक्तयः दुःखयोनय एव ते अविद्याकृतत्वात्। दृश्यन्ते हि आध्यात्मिकादीनि दुःखानि तन्निमित्तान्येव। यथा इहलोके तथा परलोकेऽपि इति गम्यते एवशब्दात्। न संसारे सुखस्य गन्धमात्रमपि अस्ति इति बुद्ध्वा विषयमृगतृष्णिकाया इन्द्रियाणि निवर्तयेत्। न केवलं दुःखयोनय एव आद्यन्तवन्तश्च आदिः विषयेन्द्रियसंयोगो भोगानाम् अन्तश्च तद्वियोग एव अतः आद्यन्तवन्तः अनित्याः मध्यक्षणभावित्वात् इत्यर्थः। कौन्तेय न तेषु भोगेषु रमते बुधः विवेकी अवगतपरमार्थतत्त्वः अत्यन्तमूढानामेव हि विषयेषु रतिः दृश्यते यथा पशुप्रभृतीनाम्।।अयं च श्रेयोमार्गप्रतिपक्षी कष्टतमो दोषः सर्वानर्थप्राप्तिहेतुः दुर्निवारश्च इति तत्परिहारे यत्नाधिक्यं कर्तव्यम् इत्याह भगवान्

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【 Verse 5.23 】

▸ Sanskrit Sloka: शक्नोतीहैव य: सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् | कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्त: स सुखी नर: ||

▸ Transliteration: śaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prākśarīravimokṣaṇāt | kāma-krodhodbhavaṁ vegaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ ||

▸ Glossary: śaknoti: able to do; iha eva: in this body; yaḥ: one who; soḍhuṁ: tolerate; prāk: before; śarīra: body; vimokṣaṇāt: give up; kāma: desire; krodha: anger; udbhavaṁ: generated from; vegaṁ: urge; sa: he; yuktaḥ: well-situated; saḥ: he; sukhī : happy; naraḥ: man

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.23 Before leaving this present body, if one is able to tolerate the urges of material senses and check the force of desire and anger, he is well situated and he is happy in this world.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.23।।इस मनुष्यशरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही कामक्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है वह नर योगी है और वही सुखी है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.23।। जो मनुष्य इसी लोक में शरीर त्यागने के पूर्व ही काम और क्रोध से उत्पन्न हुए वेग को सहन करने में समर्थ है वह योगी (युक्त) और सुखी मनुष्य है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.23 शक्नोति is able? इह here (in this world)? एव even? यः who?

Chapter 5 (Part 14)

सोढुम् to withstand? प्राक् before? शरीरविमोक्षणात् liberation from the body? कामक्रोधोद्भवम् born out of desire and anger? वेगम् the impulse? सः he? युक्तः united? सः he? सुखी happy? नरः man.Commentary Yukta means harmonised or steadfast in Yoga or selfabiding.Desire and anger are powerful enemies of peace. It is very difficult to annihilate them. You will have to make very strong efforts to destroy these enemies.When the word Kama (desire) is used in a general sense it includes all sorts of desires. It means lust in a special sense.While still here means while yet living. The impulse of desire is the agitation of the mind which is indicated by hairs standing on end and cheerful face. The impulse of anger is agitation of the mind which is indicated by fiery eyes? perspiration? biting of the lips and trembling of the body. In this verse you will clearly understand that he who has controlled desire and anger is the most happy man in this world? nor he who has immense wealth? a beautiful wife and beautiful children. Therefore you must try your level best to eradicate desire and anger? the dreadful enemies of eternal bliss.Kama (desire) is longing for a pleasant and agreeable object which gives pleasure and which is seen? heard of? or remembered. Anger is aversion towards an unpleasant and disagreeable object which gives pain and which is seen? heard or? or remembered.A Yogi controls the impulse born of desire and anger? destroyes the currents of likes and dislikes,and attains to eanimity of the mind? by resting in the innermost Self? and so he is very happy.(Cf.VI.18)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.23. He, whose pleasure, delight and again light are just within-O son of Prtha ! he attains the supreme Yoga, himself becoming the Brahman.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.23 He who, before he leaves his body, learns to surmount the promptings of desire and anger is a saint and is happy.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.23 He who is able, even here, before he is released from the body, to bear the impulse generated by desire and wrath, he is a Yogin (competent for self-realisation); he is the happy man.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.23 One who can withstand here itself-before departing from the body-the impulse arising from desire and anger, that man is a yogi; he is happy.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.23 He who is able, while still here (in this world) to withstand, before the liberation from the body, the impulse born out of desire and anger he is a Yogi, he is a happy man.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.23 Saknoti etc. It is not easy to accomplish this; [for], if this force of wrath and desire, hard to bear is endured till the last moment of the body, not for a moment alone-then is the total Bliss achievement.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.23 When a man is able to withstand, i.e., to control the impulses of emotions like desire and anger by his longing for the experience of self, he is released 'here itself from the body,' i.e., even during the state when he is practising the means for release, he gains the capacity for experiencing the self. But he becomes blessed by the experience and gets immersed in the bliss of the self only after the fall of the body (at the end of his Prarabdha or operative Karma). [The implication is that in this system there is no Jivan-Mukti or complete liberation even when the body is alive. Only the state of Sthita-prajna or of 'one of steady wisdom' can be attained by an embodied Jiva.]

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.23 Yah saknoti, one who can, is able to; sodhum, withstand; iha eva, here itself, while alive; prak, before; sarira-vimoksanat, departing from the body, till death-. Death is put as a limit because the impulse of desire and anger is certanily inevitable for a living person. For this impulse has got infinite sources. One should not relax until his death. That is the idea. Kama, desire, is the hankering, thirst, with regard to a coveted object-of an earlier experience, and which is a source of pleasure-when it comes within the range of the senses, or is heard of or remembered. And krodha, anger, is that repulsion one has against what are adverse to oneself and are sources of sorrow, when they are seen, heard of or remembered. That impulse (veda) which has those desire and anger as its source (udbhava) is kama-krodha-udbhava-vegah. The impulse arising from desire is a kind of mental agitation, and has the signs of horripilation, joyful eyes, face, etc. The impulse of anger has the signs of trembling of body, perspiration, bitting of lips, red eyes, etc. He who is able to withstand that impulse arising from desire and anger, sah narah, that man; is yuktah, a yogi; and sukhi, is happy, in this world. What kind of a person, being established in Brahman, attains Brahman? The Lord says:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.23।। भगवान् स्वयं अनुभव करते हैं कि उनके द्वारा ज्ञानी पुरुष का कुछ अत्यधिक उत्साह से किया हुआ वर्णन साधकों को असम्भव सा प्रतीत हो सकता है। कारण यह है कि मनुष्य़ का वर्तमान जीवन इतना अधिक दुखपूर्ण और परावलम्बी है कि साधारण मनुष्य पूर्ण आनन्द के जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता। यदि कोई दर्शन ऐसा आदर्शवादी है जिसका हमारे व्यवहारिक जगत् से कोई सम्बन्ध ही न हो तो वह केवल एक मनोरंजक कल्पना तो हो सकता है परन्तु मनुष्य को श्रेष्ठतर बनाने की सार्मथ्य उसमें नहीं होगी।ऐसी त्रुटिपूर्ण धारणा को दूर करने के लिये श्रीकृष्ण सभी साधकों को यह कह कर आश्वस्त करते हैं कि आवश्यक प्रयत्नों के द्वारा इस आनन्दपूर्ण जीवन को इसी लोक में रहकर जिया जा सकता है।मेरे पितामह एक महान् वीणा वादक थे। आज तक उनकी वीणा घर में सुरक्षित रखी है। संगीत से मेरा भी प्रारम्भिक परिचय होने के कारण एक दिन अचानक मेरे मन में विचार आया कि क्यों न पितामह की वीणा का उपयोग कर रातोंरात महान् संगीतज्ञ बना जाय यह विचार करके यदि उस वीणा को मैं उसी स्थिति में बजाने का प्रयत्न करूँ तो उसमें से शुद्ध संगीत नहीं सुनाई पड़ सकता और हो सकता है कि उसके साथ अधिक खिलवाड़ करने से वह टूट ही जाय। उस वाद्य का उपयोग करने से पूर्व आवश्यकता है उसे स्वच्छ करने की उसके तार बदलने की और उसे स्वर में मिलाने की। इन सबके सुव्यवस्थित होने पर उसी वीणा पर मधुर संगीत सुना जा सकता है। ठीक इसी प्रकार अनादि काल से उपेक्षित हमारा अन्तकरण इस योग्य नहीं रहा है कि पूर्णत्व के गान को वह गा सके। अब हमको चाहिये कि साधनाभ्यास से उसे शुद्ध और सुव्यवस्थित करें जिससे उसमें पूर्ण आनन्द की अनुभूति हो और वह आनन्द उसके माध्यम से व्यक्त हो सके।अन्तकरण को पुर्नव्यवस्थित करने की विधि का वर्णन यहाँ भगवान् संक्षेप में किन्तु सुन्दर ढंग से कर रहे हैं। कभीकभी उनके कथन की संक्षिप्तता और सरलता ही उनके गम्भीर अभिप्राय को समझने में बाधक सी बन जाती है। उनके उपदेश में सरलता का आभास होता है परन्तु अर्थ गाम्भीर्य रहता है। काम और क्रोध के वेग को सहन करो और फिर वह व्यक्ति इसी जगत् और जीवन में योगी और सुखी है।सिगमण्ड फ्रायड के आधुनिक विद्यार्थियों तथा अन्य पुरुषों को भगवान् का कथन अवैज्ञानिक और रुक्ष उत्साह का प्रतीक प्रतीत हो सकता है। इसका कारण केवल यही है कि मानव व्यवहार तथा मनोविज्ञान की सतही बातों से उनके मन में अनेक धारणाएँ बन चुकी होती हैं पूर्वाग्रह दृढ़ हो गये होते हैं। परन्तु उक्त विचार की सम्यक् समीक्षा करने पर हम देखेंगे कि उसमें जीवन को सुखपूर्ण बनाने के लिए अत्यन्त उपयोगी सुझाव दिये गये हैं।बुद्धिरूपी पर्वत शृंग से नीचे की ओर तीव्रगति से सरकती हुई विचारों की हिमराशि का नाम है कामना जो हृदय रूपी घाटियों से गुजरती हुई बाह्य जगत् में स्थित प्रिय विषय की ओर अग्रसर होती है। जब विचाररूपी हिमराशि के फिसलन मार्ग पर शक्तिशाली अवरोधक लगा दिया जाता है तब उस अवरोधक तक शीघ्र ही पहुँचकर छिन्नभिन्न होकर वह आत्मविनाश का रूप धारण करती है जिसे कहते हैं क्रोध। काम और क्रोध यही दो वृत्तियां है जो साधारणत हमारे मन में अत्यन्त विक्षेप या क्षोभ उत्पन्न करती हैं। कामना की तीव्रता जितनी अधिक होती है उसमें विघ्न आने पर क्रोध का रूप भी उतना भयंकर होता है।मनुष्य विषयों की कामना केवल सुखप्राप्ति के लिये ही करता है। जिस व्यक्ति ने यह समझ लिया कि विषयों में सुख नहीं होता और आनन्द तो स्वयं का आत्मस्वरूप ही है वह व्यक्ति इन उपभोगों से विरक्त होकर स्वरूप में स्थित होने का प्रयत्न करेगा। ऐसे व्यक्ति के मन में विषयों की कामनाएँ नहीं होंगी और स्वाभाविक है कि उनके अभाव में क्रोध उत्पन्न होने के लिए कारण ही नहीं रह जायेगा। जिसने इन दो शक्तिशाली एवं दुर्जेय वृत्तियों को अपने वश में कर लिया है वही एक पुरुष इस जगत् के प्रलोभनों में स्वतन्त्ररूप से अप्रभावित रह सकता है। वही वास्तव में सुखी पुरुष है।अर्जुन के माध्यम से भगवान् का हम सबके लिये यही उपदेश है कि हमें काम और क्रोध को जीतने का प्रयत्न करना चाहिये। उनका आश्वासन है कि इन पर विजय प्राप्त करने पर हम इसी जगत् और जीवन में परमानन्द का अनुभव कर सकते हैं।किन गुणों से सम्पन्न व्यक्ति ब्रह्म में स्थित होता है भगवान् कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.23।।अयं च श्रयोमार्गप्रतिपक्षी कष्टतमो दोषः सर्वानर्थप्राप्तिहेतुः दुर्निवार्यश्चेति तत्परिहारे यत्नाधिक्यविधानायाह शक्नोतीति। यः इहैव जीवन्नेव इन्द्रियगोचरे प्राप्ते इष्टे विषये श्रुयमाणे स्मर्यमाणे वा सुखहेतौ या तृष्णा स कामः। क्रोधश्चैवंभूतेऽनिष्टे विषये द्वेषः। तौ कामक्रोधावुद्भवो यस्य स रोमाञ्चनहृष्टनेत्रवदनलिङ्गोऽन्तःकरणप्रक्षोभरुपः कामोद्भवो वेगः। गात्रप्रकम्पप्रस्वेदसंदष्टौष्ठपुटरक्तनेत्रवक्ततादिलिङग चित्तप्रक्षोभरुपः क्रोधोद्भवो वेगः। तं कामक्रोधोद्भवं शरीरविमोक्षणात्प्रागामरणात् सोढुं प्रसहितुं शक्नोति। मरणसीमाकरणं तु निमित्तानामनन्तत्वात् कामक्रोधोद्भवस्य वेगस्य जीवतोऽवश्यंभावित्वात् यावन्मरणं न विश्वसनीय इति कथनार्थं यः सोढुं श्कनोति स युक्तो योगी सुखी चेह लोके नरः स एव नर इति सूचनार्थ नरपदम्। यत्तु परे मरणादूर्ध्वंविलपन्तीभिर्युवतिभिरालिङ्ग्यमानोऽपि पुत्रादिभिर्दह्यमानोऽपि यथा प्राणाशून्यः कामक्रोधवेगं सहते तथा मरणात्प्राक् जीवन्नेव यः सहते स एव युक्तः सुखी चेत्यर्थः। तदुक्तं वसिष्ठेनप्राणे गते यथा देहः सुखं दुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणायुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत् इति तन्मन्दम्। प्राणशून्ये कामक्रोधोद्भववेगस्याभावादत्र तद्दृष्टान्तीकरणस्यानुचितत्वात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.23।।सर्वानर्थप्राप्तिहेतुर्दुर्निवारोऽयं श्रेयोमार्गप्रतिपक्षः कष्टतमो दोषो महता यत्नेन मुमुक्षुणा निवारणीय इति यत्नाधिक्यविधानाय पुनराह आत्मोऽनुकूलेषु सुखहेतुषु दृश्यमानेषु श्रूयमाणेषु स्मर्यमाणेषु वा तद्गुणानुसंधानाभ्यासेन यो रत्यात्मको गर्धोऽभिलाषस्तृष्णा लोभः स कामः। स्त्रीपुंसयोः परस्परव्यतिकराभिलाषे त्वत्यन्तनिरूढः कामशब्दः। एतदभिप्रायेणकामः क्रोधस्तथा लोभः इत्यत्र धनतृष्णा लोभः स्त्रीपुंसव्यतिकरस्तृष्णा कामः इति कामलोभौ पृथगुक्तौ। इह तु तृष्णासामान्याभिप्रायेण कामशब्दः प्रयुक्त इति लोभः पृथङ्नोक्तः। एवमात्मनः प्रतिकूलेषु दुःखहेतुषु दृश्यमानेषु श्रूयमाणेषु स्मर्यमाणेषु वा तत्तद्दोषानुसंधानाभ्यासेन यः प्रज्वलनात्मको द्वेषो मन्युः स क्रोधः। तयोरुत्कटावस्था लोकवेदविरोधप्रतिसंधानप्रतिबन्धकतया लोकवेदविरुद्धप्रवृत्त्युन्मुखत्वरूपा नदीवेगसाम्येन वेग इत्युच्यते। यथा हि नद्या वेगो वर्षास्वतिप्रबलतया लोकवेदविरोधप्रतिसंधानेनानिच्छन्तमपि गर्ते पातयित्वा मज्जयति चाधो नयति च तथा कामक्रोधयोरपि वेगो विषयाभिध्यानाभ्यासेन वर्षाकालस्थानीयेनातिप्रबलो लोकवेदविरोधप्रतिसंधानेनानिच्छन्तमपि विषयगर्ते पातयित्वा मज्जयति चाधो महानरकान्नयति चेति वेगपदप्रयोगेण सूचितम्। एतच्चाथ केन प्रयुक्तोऽयमित्यत्र विवृतम्। तमेतादृशं कामक्रोधोद्भवं वेगमन्तःकरणप्रक्षोभरूपं स्तम्भस्वेदाद्यनेकबाह्यविकारलिङ्गमाशरीरविमोक्षणाच्छरीरविमोक्षणपर्यन्तमनेकनिमित्तवशात्सर्वदा संभाव्यमानत्वेनाविस्रम्भणीयमन्तरुत्पन्नमात्रमिहैव बहिरिन्द्रियव्यापाररूपाद्गर्तपतनात्प्रागेव यो यतिर्धीरस्तिमिङ्गिल इव नदीवेगं विषयदोषदर्शनाभ्यासजेन वशीकारसंज्ञकवैराग्येण सोढुं तदनुरूपकार्यसंपादनेनानर्थकं कर्तुं शक्नोति समर्थो भवति स एव युक्तो योगी स एव सुखी स एव नरः पुमान्पुरुषार्थसंपादनात् तदितरस्त्वाहारनिद्राभयमैथुनादिपशुधर्ममात्ररतत्वेन मनुष्याकारः पशुरेवेति भावः। प्राक्शरीरविमोक्षणादित्यत्रान्यद्व्याख्यानं यथामरणादूर्ध्वं विलपन्तीभिर्युवतीभिरालिङ्ग्यमानोऽपि पुत्रादिभिर्दह्यमानोऽपि प्राणशून्यत्वात्कामक्रोधवेगं सहते तथा मरणात्प्रागपि जीवन्नेव यः सहते स युक्त इत्यादि। अत्र यदि मरणवज्जीवनेऽपि कामक्रोधानुत्पत्तिमात्रं ब्रूयात्तदैतद्युज्येत। यथोक्तं वसिष्ठेनप्राणे गते यथा देहः सुखं दुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत्।। इति। इह तूत्पन्नयोः कामक्रोधयोर्वेगसहने प्रस्तुते तयोरनुत्पत्तिमात्रं न दृष्टान्त इति किमतिनिर्बन्धेन।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.23।।कः पुनर्मुख्यः सुखीत्याह शक्नोतीति। इहैव जीवत्येव देहे प्राक्शरीरविमोक्षणाद्यावद्देहपातं मया कामक्रोधौ जिताविति विस्रम्भो न कर्तव्य इत्यर्थः। श्रुते दृष्टेऽनुमिते वा विषये यो गर्धस्तृष्णारूपोऽतृप्तिश्च स कामः क्रोधस्तादृशे एव विषये द्वेषस्तौ कामक्रोधावुद्भवो यस्य वेगस्य स रोमाञ्चहृष्टनेत्रवक्त्रलिङ्गोऽन्तःकरणप्रक्षोभरूपः कामोद्भवो वेगः। गात्रप्रकम्पप्रस्वेदसंदष्टौष्ठपुटरक्तनेत्रादिलिङ्गः क्रोधोद्भवो वेगस्तं कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं यः शक्नोति स एव युक्तो योगी मुख्यः सुखी च नान्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.23।।तस्माल्लौकिकभोगत्याग एव तत्सम्बन्धप्रापक इत्याह शक्नोतीति। यः शरीरविमोक्षणात् प्राक् अलौकिकदेहाप्तिकालात् पूर्वं कामक्रोधोद्भवं वेगं कामोद्भवं स्वेच्छाजनितरसभावाभावजं क्रोधोद्भवमन्येषु तदिच्छापूर्तिदर्शनक्षोभजं सोढुं शक्नोति स इहैव अस्मिन्नेव शरीरे युक्तो भावात्मरूपयुक्तः स सुखी नरः मद्भक्तः स्यादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.23।।तस्मान्मोक्ष एव परः पुरुषार्थस्तस्य च कामक्रोधवेगोऽतिप्रतिपक्षोऽतस्तत्सहनसमर्थ एव मोक्षभागित्याह शक्नोतीति। कामात्क्रोधाच्चोद्भवति यो वेगो मनोनेत्रादिक्षोभलक्षणस्तमिहैव तदुद्भवसमय एव यो नरः सोढुं प्रतिरोद्धुं शक्नोति। तदपि न क्षणमात्रं किंतु शरीरविमोक्षणात्प्राक्। यावद्देहपातमित्यर्थः। य एवंभूतः स एव मुक्तः समाहितः सुखी च भवति नान्यः। यद्वा मरणादूर्ध्वं विलपन्तीभिर्युवतीभिरालिङ्ग्यमानोऽपि पुत्रादिभिर्दह्यमानोऽपि यथा प्राणशून्यः कामक्रोधवेगं सहते तथा मरणात्प्रागपि जीवन्नेव यः सहेत स एव युक्तः सुखी चेत्यर्थः। तदुक्तं वसिष्ठेन प्राणे गते यथा देहः सुखं दुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रमे वसेत्।। इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.23।।अतो मोक्ष एव योगिनः पुरुषार्थः तत्र सर्वप्रतिपक्षसहनेनैव तल्लाभ इत्याह शक्नोतीहेति। शरीरत्यागात्प्रागेव कामक्रोधोद्भवं वेगं यः सोढुं शक्नोति सोद्वापि न मोक्षसाधनं त्यजति स ज्ञातव्यो योगी युक्तो ब्रह्मानन्दवांश्च अन्यथा तु गत शरीरे सिद्धमेवेति न पुरुषकारः स्यात्। एवमेवोक्तं वशिष्ठेन प्राणे गते यथा देही सुखं दुःखं न विन्दति। तथा चेत्प्राणयुक्तोऽपि स कैवल्याश्रयो भवेत् इति।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.23।।जो मनुष्य यहाँजीवितावस्थामें ही शरीर छूटनेसे पहलेपहले अर्थात् मरणपर्यन्त ( कामक्रोधसे उत्पन्न हुए वेगको ) सहन कर सकता है अर्थात् सहन करनेका उत्साह रखता है ( वही युक्त और सुखी है )। जीवित पुरुषके अन्तःकरणमें कामक्रोधका वेग अवश्य ही होता है इसलिये मरणपर्यन्तकी सीमा की गयी है क्योंकि वह कामक्रोधजनित वेग अनेक निमित्तोंसे प्रकट होनेवाला है अतः मरनेतक उसका विश्वास न करे। ( सदैव उससे सावधान रहे ) यह अभिप्राय है। किसी अनुभव किये हुए सुखदायक इष्टविषयके इन्द्रियगोचर हो जानेपर यानी सुन जानेपर या स्मरण हो जानेपर उसको पानेकी जो लालसा तृष्णा होती है उसका नाम काम है। वैसे ही अपने प्रतिकूल दुःखदायक विषयोंके दीखने सुनायी देने या स्मरण होनेपर उनमें जो द्वेष होता है उसका नाम क्रोध है। वे काम और क्रोध जिस वेगके उत्पादक होते हैं वह कामक्रोधसे उत्पन्न हुआ वेग कहलाता है। रोमाञ्च होना मुख और नेत्रोंका प्रफुल्लित होना इत्यादि चिह्नोंवाला जो अन्तःकरणका क्षोभ है वह कामसे उत्पन्न हुआ वेग है। तथा शरीरका काँपना पसीना आ जाना होठोंको चबाने लगना नेत्रोंका लाल हो जाना इत्यादि चिह्नोंवाला वेग क्रोधसे उत्पन्न हुआ वेग है। ऐसे काम और क्रोधके वेगको जो सहन कर सकता है उसको सहन करनेका उत्साह रखता है वह मनुष्य इस संसारमें योगी है और वही सुखी है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.23।। व्याख्या   शक्नोतीहैव यः ৷৷. कामक्रोधोद्भवं वेगम् प्राणिमात्रको एक अलौकिक विवेक प्राप्त है। यह विवेक पशुपक्षी आदि योनियोंमें प्रसुप्त रहता है। उनमें केवल अपनीअपनी योनिके अनुसार शरीरनिर्वाहमात्रका विवेक रहता है। देव आदि योनियोंमें यह विवेक ढका रहता है क्योंकि वे योनियाँ भोगोंके लिये मिलती हैं अतः उनमें भोगोंकी बहुलता तथा भोगोंका उद्देश्य रहता है। मनुष्ययोनिमें भी भोगी और संग्रही मनुष्यका विवेक ढका रहता है। ढके रहनेपर भी यह विवेक मनुष्यको समयसमयपर भोग और संग्रहमें दुःख एवं दोषका दर्शन कराता रहता है। परन्तु इसे महत्त्व न देनेके कारण मनुष्य भोग और संग्रहमें फँसा रहता है। अतः मनुष्यको चाहिये कि वह इस विवेकको महत्त्व देकर इसे स्थायी बना ले। इसकी उसे पूर्ण स्वतन्त्रता है। विवेकको स्थायी बनाकर वह रागद्वेष कामक्रोध आदि विकारोंको सर्वथा समाप्त कर सकता है। इसलिये भगवान् इह पदसे मनुष्यको सावधान करते हैं कि अभी उसे ऐसा दुर्लभ अवसर प्राप्त है जिसमें वह कामक्रोधपर विजय प्राप्त करके सदाके लिये सुखी हो सकता है।मनुष्यशरीर मुक्त होनेके लिये ही मिला है। इसलिये मनुष्यमात्र कामक्रोधका वेग सहन करनेमें योग्य अधिकारी और समर्थ है। इसमें किसी वर्ण आश्रम आदिकी उपेक्षा भी नहीं है।मृत्युका कुछ पता नहीं कि कब आ जाय अतः सबसे पहले कामक्रोधके वेगको सहन कर लेना चाहिये। कामक्रोधके वशीभूत नहीं होना है यह सावधानी जीवनभर रखनी है। यह कार्य मनुष्य स्वयं ही कर सकता है कोई दूसरा नहीं। इस कार्यको करनेका अवसर मनुष्यशरीरमें ही है दूसरे शरीरोंमें नहीं। इसलिये शरीर छूटनेसे पहलेपहले ही यह कार्य जरूर कर लेना चाहिये यही भाव इन पदोंमें है।उपर्युक्त पदोंसे एक भाव यह भी लिया जा सकता है कि कामक्रोधके वशीभूत होकर शरीर क्रिया करने लगे ऐसी स्थितिसे पहले ही उनके वेगको सह लेना चाहिये। कारण कि कामक्रोधके अनुसार क्रिया आरम्भ होनेके बाद शरीर और वृत्तियाँ अपने वशमें नहीं रहतीं।भोगोंको पानेकी इच्छासे पहले उनका संकल्प होता है। वह संकल्प होते ही सावधान हो जाना चाहिये कि मैं तो साधक हूँ मुझे भोगोंमें नहीं फँसना है क्योंकि यह साधकका काम नहीं है। इस तरह संकल्प उत्पन्न होते ही उसका त्याग कर देना चाहिये।पदार्थोंके प्रति राग (काम) रहनेके कारण अमुक पदार्थ सुन्दर और सुखप्रद हैं आदि संकल्प उत्पन्न होते हैं। संकल्प उत्पन्न होनेके बाद उन पदार्थोंको प्राप्त करनेकी कामना उत्पन्न हो जाती है और उनकी प्राप्तिमें बाधा देनेवालोंके प्रति क्रोध उत्पन्न होता है।कामक्रोधके वेगको सहन करनेका तात्पर्य है कामक्रोधके वेगको उत्पन्न ही न होने देना। कामक्रोधका संकल्प उत्पन्न होनेके बाद वेग आता है और वेग आनेके बाद कामक्रोधको रोकना कठिन हो जाता है इसलिये कामक्रोधके संकल्पको उत्पन्न न होने देनेमें ही उपर्युक्त पदोंका भाव प्रतीत होता है। कारण यह है कि कामक्रोधका संकल्प उत्पन्न होनेपर अन्तःकरणमें अशान्ति उत्तेजना संघर्ष आदि होने लग जाते हैं जिनके रहते हुए मनुष्य सुखी नहीं कहा जा सकता। परन्तु इसी श्लोकमें स सुखी पदोंसे कामक्रोधका वेग सहनेवाले मनुष्यको सुखी बताया गया है। दूसरी बात यह है कि कामक्रोधके वेगको मनुष्य अपनेसे शक्तिशाली पुरुषके सामने भयसे भी रोक सकता है अथवा व्यापारमें आमदनी होती देखकर लोभसे भी रोक सकता है। परन्तु इस प्रकार भय और लोभके कारण कामक्रोधका वेग सहनेसे वह सुखी नहीं हो जाता क्योंकि वह जैसे क्रोधमें फँसा था ऐसे ही भय और लोभमें फँस गया। तीसरी बात यह है कि इस श्लोकमें युक्तः पदसे कामक्रोधका वेग सहनेवाले व्यक्तिको योगी कहा गया है परन्तु संकल्पोंका त्याग किये बिना मनुष्य कोईसा भी योगी नहीं होता (गीता 6। 2)। इसलिये कामक्रोधके वेगको रोकना अच्छा होते हुए भी साधकके लिये इनके संकल्पको उत्पन्न न होने देना ही उचित है।कामक्रोधके संकल्पको रोकनेका उपाय है अपनेमें कामक्रोधको न मानना। कारण कि हम (स्वयं) रहनेवाले हैं और कामक्रोध आनेजानेवाले हैं। इसलिये वे हमारे साथ रहनेवाले नहीं हैं। दूसरी बात हम कामक्रोधको अपनेसे अलगरूपसे भी जानते हैं। जिस वस्तुको हम अलगरूपसे जानते हैं वह वस्तु अपनेमें नहीं होती। तीसरी बात कामक्रोधसे रहित हुआ जा सकता है कामक्रोधवियुक्तानाम् (गीता 5। 26) एतैर्विमुक्तः (गीता 16। 22)। इनसे रहित वही हो सकता है जो वास्तवमें पहलेसे ही इनसे रहित होता है। चौथी बात भगवान्ने कामक्रोधको (जो रागद्वेषके ही स्थूलरूप हैं) क्षेत्र अर्थात् प्रकृतिके विकार बताया है (गीता 13। 6)। अतः ये प्रकृतिमें ही होते हैं अपनेमें नहीं क्योंकि स्वरूप निर्विकार है। इससे सिद्ध होता है कि कामक्रोध अपनेमें नहीं हैं। इनको अपनेमें मानना मानो इनको निमन्त्रण देना है।स युक्तः नरः अज्ञानके द्वारा जिनका ज्ञान ढका हुआ है ऐसे मनुष्योंको भगवान्ने इसी अध्यायके पन्द्रहवें श्लोकमें जन्तु (जन्तवः) कहा है। यहाँ कामक्रोधका वेग सहनेमें समर्थ मनुष्यको नरः कहा है। भाव यह है कि जो कामक्रोधके वशमें हैं वे मनुष्य कहलानेयोग्य नहीं हैं। जिसने कामक्रोधपर विजय प्राप्त कर ली है वही वास्तवमें नर है शूरवीर है।समतामें स्थित मनुष्यको योगी कहते हैं। जो अपने विवेकको महत्त्व देकर कामक्रोधके वेगको उत्पन्न ही नहीं होने देता वही समतामें स्थित हो सकता है।स सुखी मनुष्य ही नहीं पशुपक्षी भी कामक्रोध उत्पन्न होनेपर सुखशान्तिसे नहीं रह सकते। इसलिये जिस मनुष्यने कामक्रोधके संकल्पको मिटा दिया है वही वास्तवमें सुखी है। कारण कि कामक्रोधका संकल्प उत्पन्न होते ही मनुष्यके अन्तःकरणमें अशान्ति चञ्चलता संघर्ष आदि दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इन दोषोंके रहते हुए वह सुखी कैसे कहा जा सकता है जब वह कामक्रोधके वेगके वशीभूत हो जाता है तब वह दुःखी हो ही जाता है। कारण कि उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंका आश्रय लेकर उनसे सम्बन्ध जोड़कर सुख चाहनेवाला मनुष्य कभी सुखी नहीं हो सकता यह नियम है। सम्बन्ध   बाह्य सम्बन्धसे होनेवाले सुखके अनर्थका वर्णन करके अब भगवान् आभ्यन्तर तत्त्वके सम्बन्धसे होनेवाले सुखकी महिमाका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.23।।शक्नोतीति। न चैतद्दुःशकम् शरीरान्तकालं यावत् क्रोधकामजो वेगः क्षणमात्रं यदि सह्यते तदा आत्यन्तिकी सुखप्राप्तिः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.23।।उत्तरश्लोकस्य तात्पर्यमाह अयं चेति। श्रेयोमार्गप्रतिपक्षत्वं कष्टतमत्वे हेतुस्तत्रैव हेत्वन्तरमाह सर्वेति। प्रयत्नाधिक्यस्य कर्तव्यत्वे हेतुं सूचयति दुर्निवार्य इति। प्रसिद्धं हि कामक्रोधोद्भवस्य वेगस्य दुर्निवारत्वं येन मातरमपि चाधिरोहति पितरमपि हन्ति तमवश्यं परिहर्तव्यं दर्शयति शक्नोतीति। यथोक्तं वेगं बहिरनर्थरूपेण परिणामात्प्रागेव देहान्तरुत्पन्नं यः सोढुं क्षमते तं स्तौति स युक्त इति। मरणसीमाकरणस्य तात्पर्यमाह मरणेति। प्रसिद्धौ हिशब्दः। तत्र हेतुमाह अनन्तेति। व्याध्युपहतानां वृद्धानां च कामादिवेगो न भवतीत्याशङ्क्याह यावदिति। कामक्रोधोद्भवं वेगं व्याख्यातुमादौ कामं मनोविकारविशेषत्वेन व्याचष्टे काम इति। कथमस्य मनोविकारविशेषत्वं तदाह इन्द्रियेति। कामो गर्धिस्तृष्णेति पर्यायाः सन्तः शब्दा मनोविकारविशेषे पर्यवस्यन्तीत्यर्थः। क्रोधश्च मनोविकारविशेषस्तद्वदित्याह क्रोधश्चेति। तमेव क्रोधं स्पष्टयति आत्मन इति। एवं कामक्रोधौ व्याख्याय तयोरुत्कटत्वावस्थात्मनो वेगस्य ताभ्यामुत्पत्तिमुपन्यस्यति ताविति। यथोक्तवेगावगमोपायमुपदिशति रोमाञ्चनहृष्टनेत्रेत्यादिना। उभयविधवेगं यो जीवन्नेव सोढुं शक्नोति तं पुरुषधौरेयत्वेन स्तौति तमित्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.23।।उत्तरश्लोकमप्यन्तर्भावयितुमाह तदिति। कामभोगपरित्यागं सन्न्यासार्थमिति वर्तते। इहैव शरीरविमोक्षणात् प्रागिति प्रशंसायामनुपयुक्तमिति भावेन तद्विहायान्यद्योजयति कामेति। वेगं मनसोऽनवस्थानम्। एवं तर्हिइहैव शरीरविमोक्षणात् प्राक् इति किमर्थमुक्तं इत्यतस्तदनूद्य तात्पर्य माह शरीरेति। इहैवेत्यनुवादे ग्राह्यं अस्मिन्नेव लोक इति। अत एवोक्तं मनुष्यशरीर इति। अतोऽत्रैव तत्सहनाय प्रयतितव्यमित्यभिप्रायशेषः। ननु ब्रह्मलोकादौ तत्सहनमत्यन्तसुशकम् तत्कथमेवमुच्यते इत्यत आह ब्रह्मेति। तथा चान्योन्याश्रय इति भावः। अन्यत्रेति पश्वादिशरीरं व्युदस्तमिति हृदयम्। एतेनात्र वाक्यभेदः कार्य इति सूचितम्। शरीरविमोक्षणपर्यन्तं न सकृदिति कश्चित्। तदसत् तथा सत्याशरीरविमोक्षणादिति स्यात्। इहैवेति च व्यर्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.23।।तत्परित्यागं प्रशंसति शक्नोतीति। कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं शक्नोति। शरीरविमोक्षणात्प्राक्। यथा मनुष्यशरीरे सोढुं सुशकः तथा नान्यत्रेति भावः। ब्रह्मलोकादिस्तु जितकामानामेव भवति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.23।।शरीरविमोक्षणात् प्राग् इह एव साधनानुष्ठानदशायाम् एव आत्मानुभवप्रीत्या कामक्रोधोद्भवं वेगं सोढुं निरोद्धुं यः शक्नोति स युक्तः आत्मानुभवाय अर्हः। शरीरमोक्षणोत्तरकालम् आत्मानुभवसुखः संपत्स्यते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.23।। शक्नोति उत्सहते इहैव जीवन्नेव यः सोढुं प्रसहितुं प्राक् पूर्वं शरीरविमोक्षणात् आ मरणात् इत्यर्थः। मरणसीमाकरणं जीवतोऽवश्यंभावि हि कामक्रोधोद्भवो वेगः अनन्तनिमित्तवान् हि सः इति यावत् मरणं तावत् न विश्रम्भणीय इत्यर्थः। कामः इन्द्रियगोचरप्राप्ते इष्टे विषये श्रूयमाणे स्मर्यमाणे वा अनुभूते सुखहेतौ या गर्धिः तृष्णा स कामः क्रोधश्च आत्मनः प्रतिकूलेषु दुःखहेतुषु दृश्यमानेषु श्रूयमाणेषु स्मर्यमाणेषु वा यो द्वेषः सः क्रोधः तौ कामक्रोधौ उद्भवो यस्य वेगस्य सः कामक्रोधोद्भवः वेगः। रोमाञ्चनप्रहृष्टनेत्रवदनादिलिङ्गः अन्तःकरणप्रक्षोभरूपः कामोद्भवो वेगः गात्रप्रकम्पप्रस्वेदसंदष्टोष्ठपुटरक्तनेत्रादिलिङ्गः क्रोधोद्भवो वेगः तं कामक्रोधोद्भवं वेगं यः उत्सहते प्रसहते सोढुं प्रसहितुम् सः युक्तः योगी सुखी च इह लोके नरः।।कथंभूतश्च ब्रह्मणि स्थितः ब्रह्म प्राप्नोति इति आह भगवान्

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【 Verse 5.24 】

▸ Sanskrit Sloka: योऽन्त:सुखोऽन्तरारामस्तथान्तज्र्योतिरेव य: । स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ||

▸ Transliteration: yo’ntaḥsukho’ntarārāmas tathāntar-jyotir eva yaḥ | sa yogī brahman-irvāṇaṁ brahmabhūto’dhigacchati ||

▸ Glossary: yaḥ: who; antaḥ sukhaḥ: happy from within; antarārāmaḥ: active within; tathā : as well as; antarjyotiḥ: illumined within; eva: surely; yaḥ: who; saḥ: he; yogī : mystic; brahma nirvāṇaṁ: liberated in the Supreme; brahma bhūtaḥ: self realized; adhigacchati: attains

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.24 One who is happy from within, active within as well as illumined within, surely, is a Yogi and he is liberated in the Supreme [brahma-nirvāṇa], is Self-realized and attains the Supreme.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.24।।जो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला है और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है वह ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करनेवाला सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.24।। जो पुरुष अन्तरात्मा में ही सुख वाला आत्मा में ही आराम वाला तथा आत्मा में ही ज्ञान वाला है वह योगी ब्रह्मरूप बनकर ब्रह्मनिर्वाण अर्थात् परम मोक्ष को प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.24 यः who? अन्तःसुखः one whose happiness is within? अन्तरारामः one who rejoices within? तथा also? अन्तर्ज्योतिः one who is illuminated within? एव even? यः who? सः that? योगी Yogi? ब्रह्मनिर्वाणम् absolute freedom or Moksha? ब्रह्मभूतः becoming Brahman? अधिगच्छति attains.Commentary Within meansin the Self. He attains Brahmanirvanam or liberation while living. He becomes a Jivanmukta.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.24. The seers, whose dirts have decayed; by whom dualities have been out off; whose self (mind) is controlled; and who are delighted in the welfare of all; they gain the Brahman, the Tranil One.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.24 He who is happy within his Self and has found Its peace, and in whom the inner light shines, that sage attains Eternal Bliss and becomes the Spirit Itself.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.24 He whose joy is within, pleasure is within, and similarly light is within - he is a Yogin, who having become the Brahman, attains the bliss of the Brahman.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.24 One who is happy within, whose pleasure is within, and who has his light only within, that yogi, having become Brahman, attains absorption in Brahman.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.24 He who is happy within, who rejoices within, and who is illuminated within, that Yogi attains absolute freedom or Moksha, himself becoming Brahman.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.24 Yo'ntah etc : Within : For him there is happiness nowhere but within and it does not depend on any external object ; there alone he rejoices; his lustre is there only. But, there is an apparent ignorance [of him] in his worldly dealings. That has been said as -

'[A man of realisation] would wander, like a fool, with no inclination for discussion.' (PS, 71)

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.24 He who, renouncing all the experiences of outside objects, 'finds joy within,' i.e., finds his sole joy in experiencing the self; 'who has his pleasure within,' i.e., whose pleasure-garden is the self; and with regard to whom the self increases his happiness by Its own alities like bliss, knowledge, sinlessness, etc.; 'whose light is within,' i.e., who lives, directing his knowledge solely on the self - a person of such a description is the Yogin, who 'having become the Brahman (the self), attains the bliss of the Brahman' i.e., the bliss of experiencing the self.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.24 Yah antah-sukhah, one who is happy within, in the indwelling Self; and so also antar-aramah, has pleasure within-he disports only in the Self within; similarly, antar-jyotih eva, has his light only within, has the indwelling Self alone as his light; [He has not to depend on the organs like ear etc. for aciring knowledge.] sah yogi, that yogi; yah, who is of this kind; brahma-bhutah, having become Brahman, even while he is still living; adhigacchati, attains; brahma-nirvanam, absorption in Brahman-gets Liberation. Besides,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.24।। सामान्यत मनुष्य तीन प्रकार के सुख जानता है शारीरिक उपभोगों का सुख तथा भावनाओं एवं विचारों का आनन्द। उपर्युक्त तीन श्लोकों से यह बात स्पष्ट होती है कि तत्त्ववित् पुरुष का आनन्द तो इनसे भिन्न स्वरूप में ही होता है। अत काम और क्रोध से मुक्त आत्मानन्द में स्थित पुरुष ही योगी है वही वास्तव में सुखी भी है।हम विश्वास नहीं कर पाते कि सामान्यतया सर्वविदित सुख के साधनों को त्यागने पर भी ज्ञानी की उपर्युक्त वर्णित स्थिति में कोई सुख या सन्तोष भी हो सकता है। सब प्रकार के भोजनों का त्याग करने पर भोजन का आनन्द कैसे प्राप्त हो सकता है यह भी बात तर्क और अनुभव के विरुद्ध है कि मनुष्य कभी अन्धकारमय शून्यावस्था मात्र से सन्तुष्ट हो सकता है। प्राणिमात्र दिनरात अपनेअपने कार्य क्षेत्रों में कार्यरत दिखाई देते हैं। किस वस्तु को प्राप्त करने के लिये उनका यह परिश्रम है उत्तर केवल एक है अधिकसेअधिक सुख और सन्तोष की प्राप्ति के लिए। सब दुखों के अभावमात्र की स्थिति भी जैसे निद्रावस्था आनन्द का शिखर नहीं कही जा सकती जिसे प्राप्त कर मनुष्य़ पूर्ण सन्तोष का अनुभव कर सकता है।इन कारणों से ज्ञानी के विषय में कहे हुये भगवान् के वचन को अतिशयोक्ति ही माना जायेगा। इस श्लोक में ऐसी ही विपरीत धारणा को दूर करने का प्रयत्न किया गया है। जब जीव मिथ्या और अनित्य वस्तुओं को त्यागकर आत्मस्वरूप को पहचानता है तब वह कोई शून्यावस्था नहीं बल्कि आत्मा के द्वारा आत्मा में ही आत्मानन्द की अनुभूति की स्थिति है।आध्यात्मिक साधना में उपदिष्ट विषयों से वैराग्य कोई दुख का कारण नहीं है वरन् उसके द्वारा साधक निश्चयात्मकरूप से सुखशान्ति प्राप्त करता है। यह स्वरूपानुभव का आन्तरिक आनन्द नित्य बना रहता है न कि वैषयिक सुखों के समान क्षणमात्र। आत्मोन्नति के मार्ग में अग्रसर साधक अन्तसुख और अन्तराराम बन जाता है। उसका आनन्द बाह्य विषय निरपेक्ष होता है। उसका हृदय सदैव चैतन्य के प्रकाश से आलोकित रहता है।आत्मानुभूति में स्थित यह पुरुष ब्रह्मवित् कहलाता है। ब्रह्म को जानकर वह स्वयं ब्रह्मस्वरूप बनकर परम मोक्ष को प्राप्त होता है।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.24।।न केवलं कामक्रोधोद्भववेगसहनमात्रेण जीवन्नेव मोक्षं प्राप्नोति अपितु योऽन्तरात्मनि सुखं यस्य स तथा अन्तरेवात्मन्यारमणं क्रीडा यस्य सः। यस्य च स्त्र्यादौ सुखबुद्धिः स तत्रैवारमते। अयं तु यतोऽन्तःसुखोऽतोन्तरारामः। यतोऽन्तरात्मैव प्रकाशो यस्य स आत्मैवैकोऽद्वितीयः। सर्वावस्थासु जाग्रदादिषु स्वप्रकाशः सत्योऽन्यत्सर्वमिन्द्रियविषयादिकं तत्र कल्पितमनृतमतः सुखहीनं दुःखरुपं क्रीडानास्पदमिति बोधवान्। यत्त्वन्तरेव ज्योतिर्द्दृष्टिर्यस्य न गीतनृत्यादिष्विति। तन्न अन्तःसुखोन्तराराम इत्यनयोरम्यतरेणाप्यस्यार्थस्य लाभात्। य एतादृशः स योगी ब्रह्मभूतः सन्नपि ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मनिर्वृतिं। ब्रह्मानन्दमिति यावत्। गच्छति प्राप्नोति प्राप्तमेव विस्मृतग्रैवेयकमिव प्राप्नोति।ब्रह्मैव सन्ब्राह्माप्येति इति श्रुतेःअवस्थितेरिति काशकृत्स्त्रः इतिन्यायाच्चास्यैव परमात्मनोऽनेनापि विज्ञानात्मभावेनावस्थानादुपपन्नमिदमभेदेनोपक्रमणमिति काशकृत्स्त्र आचार्यो मन्यते। तथाच ब्राह्मणंअनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरुपे व्याकरवाणि इति एवंजातीयकं परस्यैवात्मनो जीवभावेनावस्थानं दर्शयतीति तदर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.24।।कामक्रोधवेगसहनमात्रेणैव मुच्यत इति न किंतु अन्तर्बाह्यविषयनिरपेक्षमेव स्वरूपभूतं सुखं यस्य सोऽन्तःसुखः। बाह्यविषयजनितसुखशून्य इत्यर्थः। कुतो बाह्यसुखाभावस्तत्राह अन्तरात्मन्यैव नतु स्त्र्यादिविषये बाह्यसुखसाधने आराम आरमणं क्रीडा यस्य सोऽन्तरारामः। त्यक्तसर्वपरिग्रहत्वेन बाह्यसुखासाधनशून्य इत्यर्थः। ननु त्यक्तसंर्वपरिग्रहस्यापि यतेर्यदृच्छोपनतैः कोकिलादिमधुरशब्दश्रवणमन्दपवनस्पर्शनचन्द्रोदयमयूरनृत्यादिदर्शनातिमधुरशीतलगङ्गोदकपानकेतकीकुसुमसौरभाद्यवघ्राणादिभिर्ग्राम्यैः सुखोत्पत्तिसंभवात्कथं बाह्यसुखतत्साधनशून्यत्वमिति तत्राह तथान्तर्ज्योतिरेव यः। यथान्तरेव सुखं न बाह्यैर्विषयैस्तथान्तरेवात्मनि ज्योतिर्विज्ञानं न बाह्यैरिन्द्रियैर्यस्य सोऽन्तर्ज्योतिः श्रोत्रादिजन्यशब्दादिविषयविज्ञानरहितः। एवकारो विशेषणत्रयेऽपि संबध्यते। समाधिकाले शब्दादिप्रतिभासाभावात् व्युत्थानकाले तत्प्रतिभासेऽपि मिथ्यात्वनिश्चयान्न बाह्यविषयैस्तस्य सुखोत्पत्तिसंभव इत्यर्थः। य एवं यथोक्तविशेषणसंपन्नः स योगी समाहितो ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्म परमानन्दरूपं कल्पितद्वैतोपशमरूपत्वेन निर्वाणं तदेव कल्पिताभावस्याधिष्ठानात्मकत्वात् अविद्यावरणनिवृत्त्याधिगच्छति नित्यप्राप्तमेव प्राप्नोति। यतः सर्वदैव ब्रह्मभूतो नान्यःब्रह्मैव सन्ब्रह्माप्येति इति श्रुतेःअवस्थितेरिति काशकृत्स्नः इति न्यायाच्च।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.24।।कोऽसौ योगी यो मुख्यः सुखीत्युक्तं तत्राह य इति। सुखं विषयसङ्गजा प्रीतिः आरामः प्रीतिहेतुः स्त्र्यादिभिः सह क्रीडा ज्योतिः क्रीडोपकरणानां प्रकाशः तदेतत्त्र्यं यस्यान्तरेव सोऽन्तःसुखोऽन्तरारामोऽन्तर्ज्योतिश्च न त्विन्द्रियद्वारकमिति एवशब्दार्थः। य एवंभूतः स योगी किमतो यद्येवं ब्रह्मनिर्वाणं गत्यप्राप्यपरमानन्दं ब्रह्म इहैवाधिगच्छति। यतो ब्रह्मभूतो जीवन्नेव ब्रह्मदर्शने ब्रह्मभावं गतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.24।।ननु सुखावलम्बनाभावे कथं बाह्यदुःखसहनं न स्यात् इत्याशङ्क्याह योऽन्तस्सुख इति। योऽन्तस्सुखः भावात्मकस्वरूपसुखवान्। अन्तरारामः अन्तरेव भावात्मकस्वरूप एव भगवद्रमणकारणवान्। तथा अन्तर्ज्योतिः संयोगरससुखसमत्वेनैव वियोगतासुखानुभववान्। स योगी मत्संयोगरसयुक्तो भूत्वा ब्रह्मभूतः अलौकिकस्वरूपः सन् ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मवत् भगवन्निर्वाणं लयं लीलात्मकतामधिगच्छति प्राप्नोतीत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.24।। न केवलं कामक्रोधवेगसंहरणमात्रेण मोक्षं प्राप्नोति अपितु योऽन्तरिति। अन्तः आत्मन्येव सुखं यस्य न विषयेषु अन्तरेवारामः क्रीडा यस्य न बहिः अन्तरेव ज्योतिर्दृष्टिर्यस्य न गीतनृत्यादिषु स एव ब्रह्मणि भूतः स्थितः सन्ब्रह्मणि निर्वाणं लयमधिगच्छति प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.24।।न केवलं कामक्रोधवेगसहनमात्रेण मोक्षप्राप्तिः अपितु योऽन्तरिति। अन्तरात्मनि सुखादि यस्य स योगी ब्रह्मसुखं गतः जीवन्मुक्तः तस्यसंसारस्य लयो मुक्तौ न प्रपञ्चस्य कर्हिचित्।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.24।।ब्रह्ममें स्थित हुआ कैसा पुरुष ब्रह्मको प्राप्त होता है सो कहते हैं जो पुरुष अन्तरात्मामें सुखवाला है जिसको अन्तरात्मामें ही सुख है वह अन्तःसुखवाला है तथा जो अन्तरात्मामें रमण करनेवाला है जिसकी क्रीड़ा ( खेल ) अन्तरात्मामें ही होती है वह अन्तरारामी है और अन्तरात्मा ही जिसकी ज्योति प्रकाश है वह अन्तर्ज्योति है। जो ऐसा योगी है वह यहाँ जीवितावस्थामें ही ब्रह्मरूप हुआ ब्रह्ममें लीन होनारूप मोक्षको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.24।। व्याख्या   योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः जिसको प्रकृतिजन्य बाह्य पदार्थोंमें सुख प्रतीत नहीं होता प्रत्युत एकमात्र परमात्मामें ही सुख मिलता है ऐसे साधकको यहाँ अन्तःसुखः कहा गया है। परमात्मतत्त्वके सिवाय कहीं भी उसकी सुखबुद्धि नहीं रहती। परमात्मतत्त्वमें सुखका अनुभव उसे हर समय होता है क्योंकि उसके सुखका आधार बाह्य पदार्थोंका संयोग नहीं होता।स्वयं अपनी सत्तामें निरन्तर स्थित रहनेके लिये बाह्यकी किञ्चिन्मात्र भी आवश्यकता नहीं है। स्वयंको स्वयंसे दुःख नहीं होता स्वयंको स्वयंसे अरुचि नहीं होती यह अन्तःसुख है।जो सदाके लिये न मिले और सभीको न मिले वह बाह्य है। परन्तु जो सदाके लिये मिले और सभीको मिले वह आभ्यन्तर है।जो भोगोंमें रमण नहीं करता प्रत्युत केवल परमात्मतत्त्वमें ही रमण करता है और व्यवहारकालमें भी जिसका एकमात्र परमात्मतत्त्वमें ही व्यवहार हो रहा है ऐसे साधकको यहाँ अन्तरारामः कहा गया है।इन्द्रियजन्य ज्ञान बुद्धिजन्य ज्ञान आदि जितने भी सांसारिक ज्ञान कहे जाते हैं उन सबका प्रकाशक और आधार परमात्मतत्त्वका ज्ञान है। जिस साधकका यह ज्ञान हर समय जाग्रत् रहता है उसे यहाँ अन्तर्ज्योतिः कहा गया है।सांसारिक ज्ञानका तो आरम्भ और अन्त होता है पर उस परमात्मतत्त्वके ज्ञानका न आरम्भ होता है न अन्त। वह नित्यनिरन्तर रहता है। इसलिये सबमें एक परमात्मतत्त्व ही परिपूर्ण है ऐसा ज्ञान सांख्ययोगीमें नित्यनिरन्तर और स्वतःस्वाभाविक रहता है।स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति सांख्ययोगका ऊँचा साधक ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करता है जो परिच्छिन्नताका द्योतक है। कारण कि साधकमें मैं स्वाधीन हूँ मैं मुक्त हूँ मैं ब्रह्ममें स्थित हूँ इस प्रकार परिच्छिन्नताके संस्कार रहते हैं। ब्रह्मभूत साधकको अपनेमें परिच्छिन्नताका अनुभव नहीं होता। जबतक किञ्चिन्मात्र भी परिच्छिन्नता या व्यक्तित्व शेष है तबतक वह तत्त्वनिष्ठ नहीं हुआ है। इसलिये इस अवस्थामें सन्तोष नहीं करना चाहिये।ब्रह्मनिर्वाणम् पदका अर्थ है जिसमें कभी कोई हलचल हुई नहीं है नहीं होगी नहीं और हो सकतीभी नहीं ऐसा निर्वाण अर्थात् शान्त ब्रह्म।जब ब्रह्मभूत सांख्ययोगीका व्यक्तित्व निर्वाण ब्रह्ममें लीन हो जाता है तब एकमात्र निर्वाण ब्रह्म ही शेष रह जाता है अर्थात् साधक परमात्मतत्त्वके साथ अभिन्न हो जाता है तत्त्वनिष्ठ हो जाता है जो कि स्वतःसिद्ध है। ब्रह्मभूत अवस्थामें तो साधक ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करता है पर व्यक्तित्वका नाश होनेपर अनुभव करनेवाला कोई नहीं रहता। साधक ब्रह्म ही होकर ब्रह्मको प्राप्त होता है ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति (बृहदारण्यक0 4। 4। 6)। सम्बन्ध   पूर्वश्लोकमें भगवान्ने निवृत्तिपूर्वक सांख्ययोगकी साधना बतायी। अब आगेके श्लोकमें प्रवृत्तिपूर्वक सांख्ययोगकी साधना बताते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.24।।योऽन्तरिति। अन्तः तस्यान्तरेव बाह्यानपेक्षि ( omits बाह्यानपेक्षि to व्यवहारे तु) सुखं तत्रैव रमते तत्र चास्य प्रकाशः व्यवहारे तु मूढत्वमिव। उक्तं च जड इव विचरेदवादमतिः इति। ( PS 71 ) ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.24।।ज्ञानस्यात्यन्तमन्तरङ्गमात्मनिष्ठत्वं दर्शयन्प्रकृतं ब्रह्मविदमेव विशिनष्टि कथंभूतश्चेति। यथान्तरेव सुखं न बाह्यैर्विषयैस्तथान्तरेव ज्योतिर्न श्रोत्रादिभिरतो विषयान्तरविज्ञानरहित इत्याह तथेति। यथोक्तविशेषणसमाधिमा़ञ्जीवन्नेव मुक्तिमधिगच्छतीत्याह स योगीति। आत्मन्यन्तःसुखमिति बाह्यविषयनिरपेक्षत्वं विवक्षितमन्तरारामत्वं च स्त्र्यादिविषयापेक्षामन्तरेण क्रीडाप्रयुक्तफलभाक्त्वमभिमतमिन्द्रियादिजन्यप्रकाशशून्यत्वमात्मज्योतिष्ट्वमिष्टम्। यथोक्तविशेषणसंपन्नः समाहितश्च जीवन्नेव ब्रह्मभावं प्राप्नोति। ब्रह्मणि परिपूर्णे निर्वृत्तिं सर्वानर्थनिवृत्त्युपलक्षितां स्थितिमनतिशयानन्दाविर्भावलक्षणां प्राप्नोतीत्याह य ईदृश इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.24।।ननु योगिनो ब्रह्माधिगतिः प्रागुक्ता 2।70 तत्किं पुनरुच्यते इत्यत आह ज्ञानीति। द्वितीये कथितत्वात् प्रपञ्चयतीत्युक्तम्। यथा योगस्याधिक्यकथनं योगनिरूपणमेव। सन्न्यासार्थे निन्दास्तुती च सन्न्यासनिरूपणमेव तथा ज्ञानिलक्षणकथनं च ज्ञाननिरूपणमिति। आरामशब्दार्थं तावदाह आराम इति। इदानीमन्तरारामशब्दलब्धमर्थमाह अत्र त्विति। तत्सुखम्। एवं तर्ह्यन्तस्सुख इत्यनेनैव गतार्थमेतदित्याशङ्क्य सुखशब्दस्य तावदर्थभेदमाह सुखं त्विति। व्यक्तमात्मसुखमिति सम्बन्धः। तर्ह्यन्तस्सुख इति कथं इत्यतस्तल्लब्धार्थमाह अत्र त्विति। अनेनारामसुखशब्दार्थान्तर्गतयोः परोपद्रवक्षययोरन्तरित्येतत् सामर्थ्याद्विशेषणमित्युक्तं भवति। ज्योतिश्शब्दार्थं तावदाह स्वयमिति। ज्योतिष्ट्वमिति शेषः। यद्यपि ज्योतिश्शब्दः प्रकाशमात्रे प्रवर्तते तथापि भगवत एव परानपेक्ष्य प्रकाशत्वात् मुख्ये च सम्प्रत्ययात् स एव ज्योतिरित्यर्थः। इदानीमन्तर्ज्योतिश्शब्दार्थमाह तद्व्यक्तेरिति। तस्य भगवतोऽन्तर्हृदये व्यक्तेरित्यर्थः। नन्वन्तर्ज्योतिर्यस्यासावन्तर्ज्योतिः। व्यक्तेरिति तु कथं लभ्यते इत्यत आह सर्वेषामिति। शब्दतः प्राप्तमन्तर्ज्योतिष्ट्वं सर्वसाधारणम्। अत्र तु ज्ञानिनो विशेषणत्वेनोच्यते तत्सामर्थ्यादिदं लब्धमिति भावः। यद्वा तद्व्यक्तेरित्यध्याहारेण तात्पर्यमुक्तम्। अद्याहारस्येदानीं प्रयोजनमुच्यते। नन्वेवशब्दो यदि धर्मान्तरनिवृत्त्यर्थः तदाऽन्तस्सुखमित्यादि व्याहतम्।अथ वस्त्वन्तरदर्शननिवृत्त्यर्थः। तदाऽसम्भवित्वमित्यत आह असम्प्रज्ञातेति। बाह्यं भगवतोऽन्यत्। दर्शनेऽप्यन्यदेति शेषः।

Chapter 5 (Part 15)

अकिञ्चित्कराद्विक्षेपकरणाभावादित्यर्थः। एवशब्दः सम्भवदर्थ इति शेषः। एतेन लक्ष्यमेवेदं कथं लक्षणत्वेनोच्यत इति परिहृतम् व्यवच्छेदप्रधानत्वात्। एवशब्दस्य सामर्थ्याज्ज्योतिषा सम्बन्ध इति। आरामसुखशब्दयोरुक्तार्थत्वं कुतः इत्यत आह उक्तं चेति। न केवलं पुनरुक्तिबलादिति चार्थः। द्वन्द्वैकत्वादेकवचनम्। कामेत्युपद्रवोपलक्षणम्। उदितं व्यक्तम्। अन्तर्ज्योतिरित्यस्योक्तार्थत्वे प्रमाणमाह स्वेति। स स्थितो यस्मिन्निति तत्स्थितः। अन्तरेव ज्योतिर्दर्शनं यस्येत्येवं व्याख्यानेऽपि यद्यप्युक्तार्थो लभ्यते तथाप्यार्थिकाच्छाब्दं वरमित्येवं व्याख्यातम्। ब्रह्मैव भूत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासाय ब्रह्मभूतशब्दस्य विग्रहं दर्शयन् प्रकृतसङ्गतिमाह अन्तरिति। ब्रह्मणि भूत इत्येवं विग्रहः न तु ब्रह्मैव भूत इति प्रमाणविरोधात्। ननु ब्रह्मणि भूतत्वं साधकधर्मः तत्कथं ज्ञानिलक्षणत्वेनोच्यते मैवं यतोऽन्तस्सुखत्वादेः कारणत्वेनोच्यते। नन्वेवं सत्यर्थादिदं ज्ञानसाधनत्वेनोच्यते तच्चतद्बुद्धयः इत्यनेनैवोक्तम्। सत्यम्। तद्बुद्धित्वादिकं ब्रह्मणि भूतत्वं यस्य कारणं तद्वानेवंलक्षणक इत्येवं सङ्गतिसूचनार्थोऽयमनुवाद इति भावः। एवं चअधिगच्छति इत्यस्य जानातीत्यर्थो ज्ञातव्यः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.24।।ज्ञानिलक्षणं प्रपञ्चयत्युत्तरैः श्लोकैः। आरामः परदर्शनादिनिमित्तं सुखम्। अत्र तु परमात्मदर्शनादिनिमित्तं तत्। सुखं तूपद्रवक्षये व्यक्तम्। अत्र तु कामादिक्षये व्यक्तमात्मनः सुखम् स्वयञ्ज्योतिष्ट्वाद्भगवतः। तद्व्यक्तेरन्तर्ज्योतिः। सर्वेषामन्तर्ज्योतिष्ट्वेऽपि व्यक्तेर्विशेषः।असम्प्रज्ञातसमाधीनां बाह्यादर्शनात्। दर्शनेऽप्यकिंञ्चित्करत्वादेवशब्दः। उक्तं चैतत् दर्शनस्पर्शसम्भाषाद्यत्सुखं जायते नृणाम्। आरामः स तु विज्ञेयः सुखं कामक्षयोदितम् इति नारदीये।स्वज्योतिष्ट्वान्महाविष्णोरन्तर्ज्योतिस्तु तत्स्थितः इति च। अन्तस्सुखत्वादेः कारणमाह ब्रह्मणि भूत इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.24।।यो बाह्यविषयानुभवं सर्वं विहाय अन्तःसुखः आत्मानुभवैकसुखः अन्तरारामः आत्मैकाधीनः स्वगुणैः आत्मा एव सुखवर्धको यस्य स तथोक्तः तथा अन्तर्ज्योतिः आत्मैकज्ञानो यो वर्तते स ब्रह्मभूतो योगी ब्रह्मनिर्वाणम् आत्मानुभवसुखं प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.24।। यः अन्तःसुखः अन्तः आत्मनि सुखं यस्य सः अन्तःसुखः तथा अन्तरेव आत्मनि आरामः आरमणं क्रीडा यस्य सः अन्तरारामः तथा एव अन्तः एव आत्मन्येव ज्योतिः प्रकाशो यस्य सः अन्तर्ज्योतिरेव यः ईदृशः सः योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मणि निर्वृतिं मोक्षम् इह जीवन्नेव ब्रह्मभूतः सन् अधिगच्छति प्राप्नोति।।किञ्च

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【 Verse 5.25 】

▸ Sanskrit Sloka: लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषय: क्षीणकल्मषा: | छिन्नद्वैधा यतात्मान: सर्वभूतहिते रता: ||

▸ Transliteration: labhante brahma-nirvāṇam ṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ | chinn-advaidhā yatātmānaḥ sarvabhūtahite ratāḥ ||

▸ Glossary: labhante: achieve; brahma nirvāṇaṁ: liberation in the Supreme; ṛṣayaḥ: who are active within; kṣīṇakalmaṣāḥ: devoid of sins; chinna: torn off; dvaidāḥ: duality; yatātmānaḥ: engaged in self-realization; sarva: all; bhūta: living beings; hite: for the welfare; ratāḥ: engaged

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.25 Those, whose sins have been destroyed, who have dispelled the dualities arising from doubts, whose minds are engaged within, and who are working for the welfare of other beings, attain the eternal liberation in the Supreme [brahma-nirvāṇa].

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.25।।जिनका शरीर मनबुद्धिइन्द्रियोंसहित वशमें है जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.25।। वे ऋषिगण मोक्ष को प्राप्त होते हैं जिनके पाप नष्ट हो गये हैं जो छिन्नसंशय संयमी और भूतमात्र के हित में रमने वाले हैं।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.25 लभन्ते obtain? ब्रह्मनिर्वाणम् absolute freedom? ऋषयः the Rishis? क्षीणकल्मषाः those whose sins are destroyed? छिन्नद्वैधाः whose dualities are torn asunder? यतात्मानः those who are selfcontrolled? सर्वभूतहिते in the welfare of all beings? रताः rejoicing.Commentary Sins are destroyed by the performance of Agnihotra (a daily obligatoyr ritual) and other Yajnas (vide notes on verse III. 13) without expectation of their fruits and by other selfless services. The duties vanish by constant meditation on the nondual Brahman. He never hurts others in thought? word and deed? and he is devoted to the welfare of all beings as he feels that all beings are but his own Self. (Cf.XII.4)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.25. At all times there is the tranil Brahman for the ascetics who have severed their connection with desire and anger, who have controlled their mind and have realised their Self.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.25 Sages whose sins have been washed away, whose sense of separateness has vanished, who have subdued themselves, and seek only the welfare of all, come to the Eternal Spirit.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.25 The sages who are free from the pairs of opposites, whose minds are well subdued and who are devoted to the welfare of all beings, become cleansed of all impurities and attain the bliss of the Brahman.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.25 The seers whose sins have been attenuated, who are freed from doubt, whose organs are under control, who are engaged in doing good to all beings, attain absorption in Brahman.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.25 The sages (Rishis) obtain absolute freedom or Moksha they whose sins have been destroyed, whose dualities (perception of dualities or experience of the pairs of opposites) are torn asunder, who are self-controlled, and intent on the welfare of all beings.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.25 Labhante etc. This [goal] is however possible to attain for those in whom the double knots in the form of dualism and doubt have been cut off.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.25 The sages are seers who are devoted to the vision of the self. For them the pairs of opposites are annulled; i.e., they are freed from pairs of opposites like cold and heat, etc. 'They have their minds well subdued,' i.e., their minds are directed to the self. 'They are devoted to the welfare of all beings,' i.e., they are interested in the welfare of all beings like their own selves. Those persons who are like this have all their impurities, which are incompatible with the attainment of the self, annulled, and they attain to the bliss of the Brahman.

For those possessing the characteristics mentioned above, Sri Krsna now teaches that the Brahman is easy to attain.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.25 Rsayah, the seers, those who have full realization, the monks; ksina-kalmasah, whose sins, defects like sin etc., have been attenuated; chinna-dvaidhah, who are freed from doubt; yata-atmanah, whose organs are under control; ratah, who are engaged; sarvabhutahite, in doing good to all beings-favourably disposed towards all, i.e. harmless; labhante, attain; brahma-nirvanam, absorption in Brahman, Liberation. Further,

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.25।। जितेन्द्रिय होकर जब मनुष्य ध्यानभ्यास करता है तब वह अपने मन की सभी पापपूर्ण वासनाओं को धो डालता है जिन्होनें आत्मस्वरूप को आवृत्त कर रखा है और जिसके कारण सत्य के विषय में असंख्य संशय उत्पन्न होते हैं। मन के शुद्ध होने पर आत्मानुभव भी सहजसिद्ध हो जाता है। आत्मज्ञान का उदय होने के साथ ही आवरण और विक्षेप रूप अज्ञान की आत्यंतिक निवृत्ति होकर स्वरूप में अवस्थान प्राप्त हो जाता है।विकास के सर्वोच्च शिखरआत्मस्थिति को प्राप्त करने के पश्चात् देह त्याग तक ज्ञानी पुरुष का क्या कर्तव्य होता है इस विषय में सामान्य धारणा यह है कि वह जगत् में विक्षिप्त के समान अथवा पाषाण प्रतिमा के समान रहेगा दिन में कमसेकम एक बार भोजन करेगा और घूमता रहेगा। लोग ऐसे पुरुष को समाज पर भार समझते हैं। परन्तु वेदों में मनुष्य के लिए कोई जीवित प्रेत का लक्ष्य नहीं बताया गया है और न ऋषियों ने किसी ऐसे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए प्रयत्न किया है।आत्मसाक्षात्कार कोई दैवनिर्धारित शवगर्त की ओर धीरेधीरे बढ़ने वाला दुखद संचलन नहीं वरन् सत्य के राजप्रासाद तक पहँचने की सुखद यात्रा है। यह सत्य जीव का स्वयं सिद्ध स्वरूप ही है जिसके अज्ञान से वह अपने से ही दूर भटक गया था। आत्मानुभव में स्थित ज्ञानी पुरुष का सम्पूर्ण जीवन मनुष्यों का आत्म अज्ञान दूर करने और आत्मवैभव को प्रकट करने में समर्पित होता है। इसका संकेत भगवान् के शब्दों में सर्वभूत हिते रता के द्वारा किया गया है।यह लोक सेवा उसका स्वनिर्धारित कार्य और मनोरंजन दोनों ही है। उपाधियों के द्वारा सब की सेवा में अपने को समर्पित करते हुए ज्ञानी पुरुष स्वयं अपने शुद्ध स्वरूप में स्थित रहता है।भगवान् आगे कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.25।।ब्रह्मनिर्वाणप्राप्तिहेतोर्ज्ञानस्य साधनान्तराण्याह लभन्त इति। ऋषयः सूक्ष्मतत्त्वदर्शिनःदृश्यते त्वग्र्यया बुद्य्धा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः इति श्रुतेः। ब्रह्म निर्वाणं लभन्त इत्यन्वयः।ज्ञानमुत्पद्यते पुंसां क्षयात्पापस्य कर्मणः इचिवचनमनुरुध्याह। निष्कामकर्मणा ईश्वराराधनलक्षणेन क्षीणपापाःआत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यः इत्यात्मदर्शनसाधनं श्रवणादिकं कथयन्तीं श्रुतिमनुरुध्याह। श्रवणेन मननेन च च्छिन्नद्वैधाः च्छिन्नसंशयाः यतात्मानः संयतानि समनस्कानीन्द्रियाणि यैस्ते। अनेन विजातीयप्रत्ययतिरस्कारपुरःसरसजातीयप्रत्ययप्रवाहीकरणात्मकं निदिध्यासनमुक्तम्। एतादृशानां लक्षणमाह। सर्वेषां भूतानां हिते अनुकूले रताः। अहिंसका इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.25।।मुक्तिहेतोर्ज्ञानस्य साधनान्तराणि विवृण्वन्नाह प्रथमं यज्ञादिभिः क्षीणकल्मषाः ततोऽन्तःकरणशुद्ध्या ऋषयः सूक्ष्मवस्तुविवेचनसमर्थाः संन्यासिनः ततः श्रवणादिपरिपाकेन छिन्नद्वैधा निवृतसर्वसंशयाः ततो निदिध्यासनपरिपाकेन संयतात्मानः परमात्मन्येवैकाग्रचित्ताः एतादृशाश्च द्वैतादर्शित्वेन सर्वभूतहिते रता हिंसाशून्या ब्रह्मविदो ब्रह्मनिर्वाणं लभन्ते।यस्मिन्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः। तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः।। इति श्रुतेः। बहुवचनंतद्यो यो देवानाम् इत्यादिश्रुत्युक्तनियमप्रदर्शनार्थम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.25।।लभन्त इति। ऋषयः सम्यग्दर्शिनः। छिन्नद्वैधाश्छिन्नसंशयाः। यतात्मानो जितचित्ताः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.25।।ननु लीलात्मकता ऋषीणामपि दुर्लभा कथं केवलभाववतामेव सिद्ध्येत् इत्यत आह लभन्त इति। क्षीणकल्मषा भगवल्लीलानुभवफलेतरफलानभिलाषिण ऋषयः फलदर्शिनोऽग्निकुमारादितुल्याः ब्रह्मनिर्वाणं लीलात्मकत्वं लभन्ते। कीदृशाः छिन्नद्वैधाश्छिन्नसंशयाः एतत्फलेतरफलाज्ञानिनः। पुनः कीदृशाः यतात्मानः केवलं भगवदर्थैकनिष्ठात्मवन्तः। पुनः कीदृशाः सर्वभूतहिते भगवति रता अनुरागिणो ये ते लीलात्मकतां प्राप्नुवन्तीत्यर्थः। यद्वा भिन्नतया सर्व एव लभन्ते ऋषयः तत्र निदर्शनमग्निकुमाराः। छिन्नद्वैधाः श्रुतयो गोपीरूपाः। यतात्मानो वृन्दावने पक्ष्यादिरूपा मुनयः। सर्वभूतहिते रताः पुलिन्द्यः। एवं भाववन्तः सर्वेऽपि लभन्त इति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.25।।किंच लभन्त इति। ऋषयः सम्यग्दर्शिनः क्षीणं कल्मषं येषां छिन्नं द्वैधं संशयो येषां यत संयत आत्मा चित्तं येषां सर्वेषां भूतानां हिते रताः कृपालवस्ते ब्रह्मनिर्वाणं मोक्षं लभन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.25।।तत्र सतामाचरणं प्रमाणयति लभन्त इति। ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः सर्वज्ञा भूत्वा छिन्नसंशया यतात्मानो ब्रह्मानन्दं लभन्ते।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.25।।और भी जिनके पापादि दोष नष्ट हो गये हैं जिनके सब संशय क्षीण हो गये हैं जो जितेन्द्रिय हैं जो सब भूतोंके हितमें अर्थात् अनुकूल आचरणमें रत हैं अर्थात् अहिंसक हैं ऐसे ऋषिजन सम्यक् ज्ञानीसंन्यासी लोग ब्रह्मनिर्वाणको अर्थात् मोक्षको प्राप्त होते हैं।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.25।। व्याख्या   यतात्मानः नित्य सत्यतत्त्वकी प्राप्तिका दृढ़ लक्ष्य होनेके कारण साधकोंको शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धि वशमें करने नहीं पड़ते प्रत्युत ये स्वाभाविक ही सुगमतापूर्वक उनके वशमें हो जाते हैं। वशमें होनेके कारण इनमें रागद्वेषादि दोषोंका अभाव हो जाता है और इनके द्वारा होनेवाली प्रत्येक क्रिया दूसरोंका हित करनेवाली हो जाती है।शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिको अपने और अपने लिये मानते रहनेसे ही ये अपने वशमें नहीं होते और इनमें रागद्वेष कामक्रोध आदि दोष विद्यमान रहते हैं। ये दोष जबतक विद्यमान रहते हैं तबतक साधक स्वयं इनके वशमें रहता है। इसलिये साधकको चाहिये कि वह शरीरादिको कभी अपना और अपने लिये न माने। ऐसा माननेसे इनकी आग्रहकारिता समाप्त हो जाती है और ये वशमें हो जाते हैं। अतः जिनका शरीरइन्द्रियाँमनबुद्धिमें अपनेपनका भाव नहीं है तथा जो इन शरीरादिको कभी अपना स्वरूप नहीं मानते ऐसे सावधान साधकोंके लिये यहाँ यतात्मानः पद आया है।सर्वभूतहिते रताः सांख्ययोगकी सिद्धिमें व्यक्तित्वका अभिमान मुख्य बाधक है। इस व्यक्तित्वके अभिमानको मिटाकर तत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव करनेके लिये सम्पूर्ण प्राणियोंके हितका भाव होना आवश्यक है। सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें प्रीति ही उसके व्यक्तित्वको मिटानेका सुगम साधन है।जो सर्वत्र परिपूर्ण परमात्मतत्त्वके साथ अभिन्नताका अनुभव करना चाहते हैं उनके लिये प्राणिमात्रके हितमें प्रीति होनी आवश्यक है। जैसे अपने कहलानेवाले शरीरमें आकृति अवयव कार्य नाम आदि भिन्नभिन्न होते हुए भी ऐसा भाव रहता है कि सभी अङ्गोंको आराम पहुँचे किसी भी अङ्गको कष्ट न हो ऐसे ही वर्ण आश्रम सम्प्रदाय साधनपद्धति आदि भिन्नभिन्न होते हुए भी सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें स्वाभाविक ही रति होनी चाहिये कि सबको सुख पहुँचे सबका हित हो कभी किसीको किञ्चिन्मात्र भी कष्ट न हो। कारण कि बाहरसे भिन्नता रहनेपर भी भीतरसे एक परमात्मतत्त्व ही समानरूपसे सबमें परिपूर्ण है। अतः प्राणिमात्रके हितमें प्रीति होनेसे व्यक्तिगत स्वार्थभाव सुगमतासे नष्ट हो जाता है और परमात्मतत्त्वके साथ अपनी अभिन्नताका अनुभव हो जाता है।छिन्नद्वैधाः जबतक तत्त्वप्राप्तिका एक निश्चय दृढ़ नहीं होता तबतक अच्छेअच्छे साधकोंके अन्तःकरणमें भी कुछनकुछ दुविधा विद्यमान रहती है। दृढ़ निश्चय होनेपर साधकोंको अपनी साधनामें कोई संशय विकल्प भ्रम आदि नहीं रहता और वे असंदिग्धरूपसे तत्परतापूर्वक अपने साधनमें लग जाते हैं।क्षीणकल्मषाः प्रकृतिसे माना हुआ जो भी सम्बन्ध है वह सब कल्मष ही है क्योंकि प्रकृतिसे माना हुआ सम्बन्ध ही सम्पूर्ण कल्मषों अर्थात् पापों दोषों विकारोंका हेतु है। प्रकृति तथा उसके कार्य शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदिसे स्पष्टतया अपना अलग अनुभव करनेसे साधकमें निर्विकारता स्वतः आ जाती है।ऋषयः ऋष् धातुका अर्थ है ज्ञान। उस ज्ञान(विवेक) को महत्त्व देनेवाले ऋषि कहलाते हैं।प्राचीनकालमें ऋषियोंने गृहस्थमें रहते हुए भी परमात्मतत्त्वको प्राप्त किया था। इस श्लोकमें भी सांसारिक व्यवहार करते हुए विवेकपूर्वक परमात्मतत्त्वकी प्राप्तिके लिये साधन करनेवाले साधकोंका वर्णन है। अतः अपने विवेकको महत्त्व देनेवाले ये साधक भी ऋषि ही हैं।लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ब्रह्म तो सभीको सदासर्वदा प्राप्त है ही पर परिवर्तनशील शरीर आदिसे अपनी एकता मान लेनेके कारण मनुष्य ब्रह्मसे विमुख रहता है। जब शरीरादि उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंसे सम्बन्धविच्छेद हो जाता है तब सम्पूर्ण विकारों और संशयोंका नाश होकर सर्वत्र परिपूर्ण ब्रह्मका अनुभव हो जाता है।लभन्ते पदका तात्पर्य है कि जैसे लहरें समुद्रमें लीन हो जाती हैं ऐसे ही सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्ममें लीन हो जाते हैं। जैसे जलतत्त्वमें समुद्र और लहरें ये दो भेद नहीं हैं ऐसे ही निर्वाण ब्रह्ममें आत्मा और परमात्मा ये दो भेद नहीं हैं। सम्बन्ध   चौबीसवेंपचीसवें श्लोकोंमें भगवान्ने सांख्ययोगके साधकोंद्वारा निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त करनेकी बात कही। अब आगेके श्लोकमें यह बताते हैं कि निर्वाण ब्रह्मकी प्राप्ति होनेपर उसका कैसा अनुभव होता है

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.25।।लभन्ते इति। एतच्च तैः प्राप्यं येषां भेदसंशयरूपौ ग्रन्थी विनष्टौ।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.25।।मुक्तिहेतोर्ज्ञानस्य साधनान्तरमाह किंचेति। यज्ञादिनित्यकर्मानुष्ठानात्पापादिलक्षणं कल्मषं क्षीयते ततश्च श्रवणाद्यावृत्तेः सम्यग्दर्शनं जायते ततो मुक्तिरप्रयत्नेन भवतीत्याह लभन्त इति। ज्ञानप्राप्त्युपायान्तरं दर्शयति छिन्नेति। श्रवणादिना संशयनिरसनं कार्यकरणनियमनं च दयालुत्वेनाहिंसकत्वमित्येतदपि सम्यग्ज्ञानप्राप्तौ कारणमित्यर्थः। अक्षरव्याख्यानं स्पष्टत्वान्न व्याख्यायते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.25।।उत्तरश्लोके ज्ञानिनो ब्रह्मप्राप्तिः पुनः किमर्थमुच्यते इत्यत आह पापेति। ब्रह्मभूतत्वेन सहास्य समुच्चयार्थश्चशब्दः। एतदुक्तलक्षणं ज्ञानम्। अतो लभन्त इत्यस्योपलभन्त इत्यर्थः। कथं तर्हि ज्ञानिलक्षणप्रपञ्चार्थत्वं श्लोकत्रयस्योक्तं इति। उच्यते ज्ञानप्रतिबन्धकपापक्षयाख्यमसाधारणं कारणं कार्यस्य लक्षणं भवत्येवेति। अत्र कार्यकारणभावो न प्रतीयत इत्यत आह क्षीणेति। भवन्ति ततो ब्रह्मोपलभन्त इत्यर्थः। छिन्नद्वैधशब्दार्थं ज्ञापयन् द्वैधशब्दं व्याचष्टे द्वैधेति। विषयापेक्षयाऽन्यप्रकारत्वं अयथार्थत्वमिति यावत्। तेन च तद्वज्ज्ञानमुपलक्ष्यत इति भावेनाह संशय इति। वाशब्दश्चार्थे। अत्रैव प्रमाणमाह तच्चेति। अकृतात्मनामशुद्धबुद्धीनाम्। छिन्नेत्यादेः समासत्वमभिप्रेत्य विग्रहमाह छिन्नेति। आयतशब्दस्य आत्मशब्दस्य चानेकार्थत्वात् आयतात्मान इत्येतद्व्याचष्टे दीर्घेति। अणुनो मनसः कथं दीर्घत्वमित्यत आह सर्वज्ञा इति। बहुविषयत्वमुपलक्ष्यत इति भावः। श्रवणादिना विदितवेद्या इत्यर्थः। समासेनोक्तयोरप्यर्थयोर्बुद्ध्या विविक्तयोर्हेतुहेतुमद्भावोऽस्तीति भावेनाह तत एवेति। आयतात्मत्वादेव क्षीणकल्मषत्वायतात्मत्वछिन्नद्वैधत्वानां हेतुहेतुमद्भावे प्रमाणमाह तच्चेति। व्यस्ते एवैते पदे इत्याह छिन्नेति नियतमनस इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.25।।पापक्षयाच्चैतद्भवतीत्याह लभन्त इति। क्षीणकल्मषा भूत्वा छिन्नद्वैधा यतात्मानः। द्वेधा भावो द्वैधम् संशयो विपर्ययो वा। तच्चोक्तम् विपर्ययः संशयो वा यद्वैधं त्वकृतात्मनाम्। ज्ञानासिना तु तच्छित्त्वा मुक्तसङ्गः परिव्रजेत् इति च। छिन्नद्वैधास्त एवायतात्मानः दीर्घमनसः सर्वज्ञा इत्यर्थः। तत एव छिन्नद्वैधाः। तच्चोक्तम् क्षीणपापा महाज्ञाना जायन्ते गतसंशयाः इति।छिन्नद्वैधा यतात्मानः इति वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.25।।छिन्नद्वैधाः शीतोष्णादिद्वन्द्वैः विमुक्ताः यतात्मानः आत्मनि एव नियमितमनसः सर्वभूतहिते रताः आत्मवत् सर्वेषां भूतानां हितेषु निरताः ऋषयः द्रष्टारः आत्मावलोकनपरा ये एवंभूताः ते क्षीणाशेषात्मप्राप्तिविरोधिकल्मषाः ब्रह्मनिर्वाणं लभन्ते।उक्तगुणानां ब्रह्म अत्यन्तसुलभम् इत्याह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.25।। लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणं मोक्षम् ऋषयः सम्यग्दर्शिनः संन्यासिनः क्षीणकल्मषाः क्षीणपापाः निर्दोषाः छिन्नद्वैधाः छिन्नसंशयाः यतात्मानः संयतेन्द्रियाः सर्वभूतहिते रताः सर्वेषां भूतानां हिते आनुकूल्ये रताः अहिंसका इत्यर्थः।।किञ्च

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【 Verse 5.26 】

▸ Sanskrit Sloka: कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतचेतसाम् | अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् ||

▸ Transliteration: kāmakrodhaviyuktānāṁ yatīnāṁ yatacetasām | abhito brahmanirvāṇaṁ vartate viditātmanām ||

▸ Glossary: kāma: desire; krodha: anger; viyuktānāṁ; one freed from; yatīnāṁ; of the ascetics; yata cetasāṁ: with the thoughts controlled; abhitaḥ: on all sides; brahma nirvāṇaṁ: absolute freedom; vartate: exists; viditātmanāṁ: of those who have realized the Self

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.26 They who are free from lust and anger, who have subdued the mind and senses, and who have known the Self, easily attain liberation [brahma-nirvāṇa].

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.26।।कामक्रोधसे सर्वथा रहित जीते हुए मनवाले और स्वरूपका साक्षात्कार किये हुए सांख्ययोगियोंके लिये दोनों ओरसे शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद निर्वाण ब्रह्म परिपूर्ण है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.26।। काम और क्रोध से रहित संयतचित्त वाले तथा आत्मा को जानने वाले यतियों के लिए सब ओर मोक्ष (या ब्रह्मानन्द) विद्यमान रहता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.26 कामक्रोधवियुक्तानाम् of those who are free from desire and anger? यतीनाम् of the selfcontrolled ascetics? यतचेतसाम् of those who have controlled their thoughts? अभितः on all sides? ब्रह्मनिर्वाणम् absolute freedom? वर्तते exists? विदितात्मनाम् of those who have realised the Self.Commentary Those who renounce all actions and practise Sravana (hearing of the scriptures)? Manana (reflection) and Nididhyasana (meditation)? who are established in Brahman or who are steadily devoted to the knowledge of the Self attain liberation or Moksha instantaneously (Kaivalya Moksha). Karma Yoga leads to Moksha step by step (Krama Mukti). First comes purification of the mind? then knowledge? then renunciation of all actions and eventually Moksha.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.26. Warding off the external contacts outside; making the sense of sight in the middle of the two wandering ones; counter-balancing both the forward and backward moving forces that travel within what acts crookedly;

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.26 Saints who know their Selves, who control their minds, and feel neither desire nor anger, find Eternal Bliss everywhere.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.26 To those who are free from desire and wrath, who are wont to exert themselves, whose thought is controlled, and who have conered it - the beatitude of the Brahman is close at hand.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.26 To the monks who have control over their internal organ, who are free from desire and anger, who have known the Self, there is absorption in Brahman either way.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.26 Absolute freedom (or Brahmic bliss) exists on all sides for those self-controlled ascetics who are free from desire and anger, who have controlled their thoughts and who have realised the Self.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.26 Kama - etc. For them at all times i.e., at all stages, there is Brahman-Existence, the ultimately true one, and it does not look for the time of control [of the mind (mediation)]

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.26 To those who are free from desire and wrath; 'who are wont to exert themselves' i.e., who are practising self-control; whose 'thought is controlled,' i.e., whose minds are subdued; 'who have conered them,' i.e., whose minds are under their control - to such persons the beatitude of the Brahman is close at hand. The beatitude of the Brahman is already in hand to persons of this type.

Sri Krsna concludes the examination of Karma Yoga already stated, as reaching the highest point in the practice of mental concentration (Yoga) having for its object the vision of the self:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.26 Yatinam, to the monks; yata-cetasam, who have control over their internal organ; kama-krodha-viyuktanam, who are free from desire and anger; vidita-atmanam, who have known the Self, i.e. who have full realization; vartate, there is; brahma-nir-vanam, absorption in Brahman, Liberation; abhitah, either way, whether living or dead. Immediate Liberation of the monks who are steadfast in full realization has been stated. And the Lord has said, and will say, at every stage that Karma-yoga, undertaken as a dedication to Brahman, to God, by surrendering all activities [The activities of body, mind and organs] to God, leads to Liberation through the stages of purification of the heart, attainment of Knowledge, and renunciation of all actions. Thereafter, now, with the idea, 'I shall speak elaborately of the yoga of meditation which is the proximate discipline for full realization,' the Lord gave instruction through some verses in the form of aphorisms:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.26।। इस आसुरी युग में लोगों को दैवी जीवन जीने की प्रेरणा देने प्राणि मात्र के प्रति हृदय मे उमड़ते प्रेम के कारण वेश्या को पापमुक्त अथवा कोढ़ी को रोग मुक्त करने अंधकार को प्रकाशित करके अज्ञानियों का पथप्रदर्शन करने का समाज सेवा का कार्य करते हुए ज्ञानी पुरुष स्वयं अपने दिव्य स्वरूप में स्थित समाज की अशुद्धियों से लिप्त नहीं होता। जैसे एक चिकित्सक अस्वस्थ रोगियों का उपचार उनके मध्य रहकर करता हुआ भी उनके रोगें से अछूता रहता है या उनके दुखों से स्वयं भावावेश में नहीं आ जाता वैसे ही दुखार्त कामुक हीन वैषयिक प्रवृत्तियों के लोगों के मध्य रहकर भी ज्ञानी पुरुष को उनके अवगुणों का स्पर्श तक नहीं होता।किस प्रकार सिद्ध पुरुष जगत् के प्रलोभनों में अपने मन का समत्व बनाये रख पाता है भगवान् कहते हैं जो पुरुष अपने पुरुषार्थ के बल पर मन की काम और क्रोध की प्रवृत्तियों को विजित कर लेता है और शास्त्रों में उपदिष्ट दैवी जीवन के मार्ग का अनुसरण करता है वह आत्मज्ञान को प्राप्त करके इस समत्व को प्राप्त करता है जिसे कोई भी वस्तु या परिस्थिति विचलित नहीं कर पाती। वह इसी जीवन में तथा देह त्याग के पश्चात् भी ब्रह्मानन्द में ही स्थित रहता है।अब भगवान् सम्यक् दर्शन के साक्षात् अन्तरंग साधनध्यानयोग का वर्णन अगले दो सूत्ररूप श्लोकों में करते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.26।।पूर्वं कामक्रोधोद्भवो वेगः सोढव्य इत्युक्तं इदानीं तावेव त्याज्यवित्याह। कामक्रोधाभ्यां वियुक्तानां यतीनां संन्यासिनां संयतचित्तात्मनां विदितात्मतत्त्वानां ब्रह्मनिर्वाणमभितः उभयतो जीवतां मृतानां च वर्तते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.26।।पूर्वं कामक्रोधयोरुत्पन्नयोरपि वेगः सोढव्य इत्युक्तमधुना तु तयोरुत्पत्तिप्रतिबन्ध एव कर्तव्य इत्याह कामक्रोधयोर्वियोगस्तदनुत्पत्तिरेव तद्युक्तानां कामक्रोधवियुक्तानाम्। अतएव यतचेतसां संयतचित्तानां यतीनां यत्नशीलानां संन्यासिनां विदितात्मनां साक्षात्कृतपरमात्मनामभित उभयतो जीवतां मृतानां च तेषां ब्रह्मनिर्वाणं मोक्षो वर्तते नित्यत्वात् नतु भविष्यति साध्यत्वाभावात्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.26।।किञ्च कामेति। अभितो जीवतां मृतानां च विदितात्मनां ज्ञातात्मतत्त्वानाम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.26।।किञ्च कामक्रोधवियुक्तोनां पूर्वोक्तप्रकारेण कामक्रोधरहितानां यतीनां परमहंसानां भगवदर्थं सर्वपरित्यागेन स्थितानां वृन्दावनीयवृक्षादिवत् यतचेतसां भगवत्स्वरूपानुभवैकपरचित्तानां विदितात्मनां भगवत्स्वरूपज्ञानिनां अभितः सर्वजन्मसु सर्वदिक्षु वा ब्रह्मनिर्वाणं लीलात्मकत्वं वर्त्तते अनुवर्तत इत्यर्थः। यथा वृन्दावने वृक्षेषु तन्मूलेषु परितश्च क्री़डति तथेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.26।।किंच कामक्रोधवियुक्तानामिति। कामक्रोधाभ्यां वियुक्तानां यतीनां संन्यासिनां संयतचित्तानां ज्ञातात्मतत्त्वानां अभित उभयतो मृतानां जीवतां च न देहान्तर एव तेषां ब्रह्मणि लयः अपितु जीवतामपि वर्तत इत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.26।।किञ्च कामक्रोधवियुक्तानामिति। अभित उभयतः मृतानां जीवतां न देहान्तर एव तेषां ब्रह्मानन्दः अपितु जीवतामपि वर्त्तते इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.26।।तथा जो काम और क्रोध इन दोनों दोषोंसे रहित हो चुके हैं जिन्होंने अन्तःकरणको अपने वशमें कर लिया है जिन्होंने आत्माको जान लिया है ऐसे आत्मज्ञानी सम्यग्दर्शी यती संन्यासियोंको दोनों ओरसे अर्थात् जीवित रहते हुए भी और मरनेके पश्चात् भी दोनों अवस्थाओंमें ब्रह्मनिर्वाण यानी मोक्ष प्राप्त रहता है। यथार्थ ज्ञानमें निष्ठावाले संन्यासियोंके लिये सद्यः ( तुरंत ही होनेवाली ) मुक्ति बतलायी गयी है तथा सब प्रकार ईश्वरार्पितभावसे पूर्ण ब्रह्म परमात्मामें सब कर्मोंका त्याग करके किया हुआ कर्मयोग भी अन्तःकरणकी शुद्धि ज्ञानप्राप्ति और सर्वकर्मसंन्यासके क्रमसे मोक्षदायक है यह बात भगवान्ने पदपदपर कही है और (आगे भी ) कहेंगे।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.26।। व्याख्या   कामक्रोधवियुक्तानां यतीनाम् भगवान् उपर्युक्त पदोंसे यह स्पष्ट कह रहे हैं कि सिद्ध महापुरुषमें कामक्रोधादि दोषोंकी गन्ध भी नहीं रहती। कामक्रोधादि दोष उत्पत्तिविनाशशील असत् पदार्थों (शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि आदि) के सम्बन्धसे उत्पन्न होते हैं। सिद्ध महापुरुषको उत्पत्तिविनाशशील सत्तत्त्वमें अपनी स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो जाता है अतः उत्पत्तिविनाशरहित असत् पदार्थोंसे उसका सम्बन्ध सर्वथा नहीं रहता। उसके अनुभवमें अपने कहलानेवाले शरीर अन्तःकरणसहित सम्पूर्ण संसारके साथ अपने सम्बन्धका सर्वथा अभाव हो जाता है अतः उसमें कामक्रोध आदि विकार कैसे उत्पन्न हो सकते हैं यदि कामक्रोध सूक्ष्मरूपसे भी हों तो अपनेको जीवन्मुक्त मान लेना भ्रम ही है।उत्पत्तिविनाशशील वस्तुओंकी इच्छाको काम कहते हैं। काम अर्थात् कामना अभावमें पैदा होती है। अभाव सदैव असत्में रहता है। सत्स्वरूपमें अभाव है ही नहीं। परन्तु जब स्वरूप असत्से तादात्म्य कर लेता है तब असत्अंशके अभावको वह अपनेमें मान लेता है। अपनेमें अभाव माननेसे ही कामना पैदा होती है और कामनापूर्तिमें बाधा लगनेपर क्रोध आ जाता है। इस प्रकार स्वरूपमें कामना न होनेपर भी तादात्म्यके कारण अपनेमें कामनाकी प्रतीति होती है। परन्तु जिनका तादात्म्य नष्ट हो गया है और स्वरूपमें स्वाभाविक स्थितिका अनुभव हो गया है उन्हें स्वयंमें असत्के अभावका अनुभव हो ही कैसे सकता हैसाधन करनेसे कामक्रोध कम होते हैं ऐसा साधकोंका अनुभव है। जो चीज कम होनेवाली होती है वह मिटनेवाली होती है अतः जिस साधनसे ये कामक्रोध कम होते हैं उसी साधनसे ये मिट भी जाते हैं।साधन करनेवालोंको यह अनुभव होता है कि (1) कामक्रोध आदि दोष पहले जितनी जल्दी आते थे उतनी जल्दी अब नहीं आते। (2) पहले जितने वेगसे आते थे उतने वेगसे अब नहीं आते और (3) पहले जितनी देरतक ठहरते थे उतनी देरतक अब नहीं ठहरते। कभीकभी साधकको ऐसा भी प्रतीत होता है कि कामक्रोधका वेग पहलेसे भी अधिक आ गया। इसका कारण यह है कि (1) साधन करनेसे भोगासक्ति तो मिटती चली गयी और पूर्णावस्था प्राप्त हुई नहीं। (2) अन्तःकरण शुद्ध होनेसे थोड़े कामक्रोध भी साधकको अधिक प्रतीत होते हैं। (3) कोई मनके विरुद्ध कार्य करता है तो वह साधकको बुरा लगता है पर साधकउसकी परवाह नहीं करता। बुरा लगनेके भावका भीतर संग्रह होता रहता है। फिर अन्तमें थोड़ीसी बातपर भी जोरसे क्रोध आ जाता है क्योंकि भीतर जो संग्रह हुआ था वह एक साथ बाहर निकलता है। इससे दूसरे व्यक्तिको भी आश्चर्य होता है कि इतनी थोड़ीसी बातपर इसे इतना क्रोध आ गयाकभीकभी वृत्तियाँ ठीक होनेसे साधकको ऐसा प्रतीत होता है कि मेरी पूर्णावस्था हो गयी। परन्तु वास्तवमें जबतक पूर्णावस्थाका अनुभव करनेवाला है तबतक (व्यक्तित्व बना रहनेसे) पूर्णावस्था हुई नहीं।यतचेतसाम् जबतक असत्का सम्बन्ध रहता है तबतक मन वशमें नहीं होता। असत्का सम्बन्ध सर्वथा न रहनेसे महापुरुषोंका कहलानेवाला मन स्वतः वशमें रहता है।अभितो ब्रह्मनिर्वाणं वर्तते विदितात्मनाम् अपने स्वरूपका वास्तविक बोध हो जानेसे उन महापुरुषोंको यहाँ विदितात्मनाम् कहा गया है। तात्पर्य है कि जिस उद्देश्यको लेकर मनुष्यजन्म हुआ है और मनुष्यजन्मकी इतनी महिमा गायी गयी है उसको उन्होंने प्राप्त कर लिया है।शरीरके रहते हुए अथवा शरीर छूटनेके बाद नित्यनिरन्तर वे महापुरुष शान्त ब्रह्ममें ही स्थित रहते हैं। जैसे भिन्नभिन्न क्रियाओंको करते समय साधारण मनुष्योंकी शरीरमें स्थितिकी मान्यता निरन्तर रहती है ऐसे ही भिन्नभिन्न क्रियाओंको करते समय उन महापुरुषोंकी स्थिति निरन्तर एक ब्रह्ममें ही रहती है। उनकी इस स्वाभाविक स्थितिमें कभी थोड़ा भी अन्तर नहीं आता क्योंकि जिस विभागमें क्रियाएँ होती हैं उस विभाग(असत्) से उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं रहा। सम्बन्ध   अब आगेके दो श्लोकोंमें भगवान् यह बताते हैं कि जिस तत्त्वको ज्ञानयोगी और कर्मयोगी प्राप्त करता है उसी तत्त्वको ध्यानयोगी भी प्राप्त कर सकता है (टिप्पणी प0 319)।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.26।।कामेति। तेषां सर्वतः सर्वास्ववस्थासु ब्रह्मसत्ता पारमार्थिकी न निरोधकालमपेक्षते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.26।।पूर्वं कामक्रोधयोर्वेगः सोढव्यो दर्शितः संप्रति तावेव त्याज्यावित्याह किंचेति। ननु दर्शितविशेषणवतां मृतानामेव मोक्षो नतु जीवतामिति चेन्नेत्याह अभित इति। अस्मदादीनामपि तर्हि प्रभूतकामादिप्रभावविधुराणां किमिति मोक्षो न भवतीत्याशङ्क्य सम्यग्दर्शनवैशेष्याभावादित्याह विदितेति। उक्तेऽर्थे श्लोकाक्षराणामन्वयमाचष्टे कामक्रोधेत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.26।।यतीनां सर्वं ब्रह्मतयैव प्रतीयत इत्यन्यथाप्रतीतिनिरासायाह सुलभं चेति। न केवलं उक्तलक्षणा इति चार्थः। इदं चासाधारणधर्मत्वात् ज्ञानिलक्षणं भवत्येव। सौलभ्यवाचि किमप्यत्र न प्रतीयत इत्यतस्तदुपादाय व्याचष्टे अभित इति सर्वदेशकालेष्वित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.26।।सुलभं च तेषां ब्रह्मेत्याह कामक्रोधेति। अभितः सर्वतः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.26।।कामक्रोधवियुक्तानां यतीनां यतनशीलानां यतचेतसां नियमितमनसां विजितात्मनां विजितमनसां ब्रह्मनिर्वाणम् अभितो वर्तते। एवंभूतानां हस्तस्थं ब्रह्मनिर्वाणम् इत्यर्थः।उक्तं कर्मयोगं स्वलक्ष्यभूतयोगशिरस्कम् उपसंहरति

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.26।। कामक्रोधवियुक्तानां कामश्च क्रोधश्च कामक्रोधौ ताभ्यां वियुक्तानां यतीनां संन्यासिनां यतचेतसां संयतान्तःकरणानाम् अभितः उभयतः जीवतां मृतानां च ब्रह्मनिर्वाणं मोक्षो वर्तते विदितात्मनां विदितः ज्ञातः आत्मा येषां ते विदितात्मानः तेषां विदितात्मनां सम्यग्दर्शिनामित्यर्थः।।सम्यग्दर्शननिष्ठानां संन्यासिनां सद्यः मुक्तिः उक्ता। कर्मयोगश्च ईश्वरार्पितसर्वभावेन ईश्वरे ब्रह्मणि आधाय क्रियमाणः सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिसर्वकर्मसंन्यासक्रमेण मोक्षाय इति भगवान् पदे पदे अब्रवीत् वक्ष्यति च। अथ इदानीं ध्यानयोगं सम्यग्दर्शनस्य अन्तरङ्गं विस्तरेण वक्ष्यामि इति तस्य सूत्रस्थानीयान् श्लोकान् उपदिशति स्म

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【 Verse 5.27 】

▸ Sanskrit Sloka: स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवो: | प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ ||

▸ Transliteration: sparśān kṛtvā bahir bāhyāṁś cakṣuś caivāntare bhruvoḥ | prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantara-cāriṇau ||

▸ Glossary: sparśān: external sense objects; kṛtvā : keeping; bahiḥ: external; bāhyān: ex- ternal; cakṣuḥ: eyes; ca: and; eva: surely; antare: within; bhruvoḥ: eyebrows; prāṇāpānau: inward and outward breath; samau: suspending; kṛtvā : doing; nāsābhyantara: within the nostrils; cārinau: moving

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.27,28 Shutting out all external sense objects, keeping the eyes and vision concentrated between the two eyebrows, suspending the inward and outward breaths within the nostrils and thus controlling the mind, senses and intelligence, the transcendental who is aiming at liberation, becomes free from desire, fear and the by-product of desire and fear, anger all three. One who is always in this state is certainly liberated.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.27 5.28।।बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने वशमें हैं जो मोक्षपरायण है तथा जो इच्छा भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.27।। बाह्य विषयों को बाहर ही रखकर नेत्रों की दृष्टि को भृकुटि के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरने वाले प्राण और अपानवायु को सम करके।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.27 स्पर्शान् contacts? कृत्वा बहिः shutting out? बाह्यान् external? चक्षुः eye (gaze)? च and? एव even? अन्तरे in the middle? भ्रुवोः of the (two) eyrows? प्राणापानौ the outgoing and incoming breaths? समौ eal? कृत्वा having made? नासाभ्यन्तरचारिणौ moving inside the nostrils.Commentary The verses 27 and 28 deal with the Yoga of meditation (Dhyana). External objects or contacts are the sound and the other senseobjects. If the mind does not think of the external objects they are shut out from the mind. The senses are the doors or avenues through which sound and the other senseobjects enter the mind.If you fix the gaze between the eyrows the eyalls remain fixed and steady. Rhythmical breathing is described here. You will have to make the breath rhythmical. The mind becomes steady when the breath becomes rhythmical. When the breath becomes rhythmical there is perfect harmony in the mind and the whole system. (Cf.VI.10?14VIII.10)

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.27. The sage, who has controlled his sense-organs, mind and intellect; whose chief aim is emancipation; and from whom desire, fear and wrath have departed-he remains just free always.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.27 Excluding external objects, his gaze fixed between the eyebrows, the inward and outward breathings passing equally through his nostrils;

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.27 Shutting off outward contacts, fixing the gaze between the eye-brows, ealising inward and outward breaths moving in the nostrils;

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.27-5.28 Keeping the external objects outside, the eyes at the juncture of the eye-brows, and making eal the outgoing and incoming breaths that move through the nostrils, the contemplative who has control over his organs, mind and intellect should be fully intent on Liberation and free from desire, fear and anger. He who is ever is verily free.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.27 Shutting out (all) external contacts and fixing the gaze between the eyrow, ealising the outgoing and incoming breaths moving within the nostrils.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.27 See Comment under 5.28

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.27 - 5.28 'Shutting off all contact with outside objects,' i.e., stopping the outward functioning of the senses; seated with his trunk straightened in a posture fit for meditation (Yoga); 'fixing the gaze between the eye-brows,' i.e., at the root of the nose where the eye-brows meet; 'ealising inward and outward breaths,' i.e., making exhalatory and inhalatory breath move eally: making the senses, Manas and intellect no longer capable of anything except the vision of the self, conseently being free from 'desire, fear and wrath'; 'who is intent on release as his final goal,' i.e., having release as his only aim - the sage who is thus intent on the vision of the self 'is indeed liberated for ever,' i.e., he is almost a liberated person, as he would soon be in the ultimate stage of fruition.

Sri Krsna now says that Karma Yoga, described above, which is facilitated by the performance of obligatory and occasional rites and which culminates in meditation (Yoga), is easy to practise:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.27 Krtva, keeping; bahyan, the external; sparsan, objects-sound etc.; bahih, outside: To one who does not pay attention to the external objects like sound etc., brought to the intellect through the ear etc., the objects become verily kept outside. Having kept them out in this way, and (keeping) the caksuh, eyes; antare, at the juncture; bhruvoh, of the eye-brows (-the word 'keeping' has to be supplied-); and similarly, samau krtva, making eal; prana-apanau, the outgoing and the incoming breaths; nasa-abhyantara-carinau, that move through the nostrils; munih, the contemplative-derived (from the root man) in the sense of contemplating-, the monk; yata-indriya-mano-buddhih, who has control over his organs, mind and intellect; should be moksa-para-yanah, fully intent on Liberation-keeping his body is such a posture, the contemplative should have Liberation itself as the supreme Goal. He should be vigata-iccha-bhaya-krodhah, free from desire, fear and anger. The monk yah, who; sada, ever remains thus; sah, he; is muktah yah, who;sada, ever remains thus; sah, he; is muktah, ever, verily free. He has no other Liberation to seek after. What is there to be realized by one who has his mind thus concentrated? The answer this is beig stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.27।। No commentary.

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.27।।एवं तत्त्वज्ञाननिष्ठानां यतीनां सद्योमुक्तिरुक्त्वा कर्मयोगिनं च सत्त्वशुद्य्धादिक्रमेण। अथेदानीं ध्यानयोगस्य सम्यग्दर्शनान्तरङ्गासाधनस्य षष्ठाध्या ये विस्तरेण वक्ष्यमाणस्य सूत्रस्थानीयांस्त्रीन्श्लोकानाह। स्पर्शान् शब्दादीन्बाह्यानेव श्रोत्रादिद्वारेण अन्तर्बुद्धौ प्रविष्टन्विषयान् अचिन्तनेन बहिःकृत्वा चक्षुश्चैव भ्रुवोरन्तरे कृत्वा तथा प्राणपानौ नासाभ्यन्तरचारिणौ समौ कृत्वा।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.27 5.28।।पूर्वमीश्वरार्पितसर्वभावस्य कर्मयोगेनान्तःकरणशुद्धिस्ततः सर्वकर्मसंन्यासस्ततः श्रवणादिपरस्य तत्त्वज्ञानं मोक्षसाधनमुदेतीत्युक्तम् अधुनास योगी ब्रह्मनिर्वाणम् इत्यत्र सूचितं ध्यानयोगं सम्यग्दर्शनस्यान्तरङ्गसाधनं विस्तरेण वक्तुं सूत्रस्थानीयांस्त्रीञ्श्लोकानाह भगवान्। एतेषामेव वृत्तिस्थानीयः कृत्स्नः षष्ठोऽध्यायो भविष्यति। तत्रापि द्वाभ्यां संक्षेपेण योग उच्यते। तृतीयेन तु तत्फलं परमात्मज्ञानमिति विवेकः स्पर्शाञ्शब्दादीन्बाह्यान्बहिर्भवानपि श्रोत्रादिद्वारा तत्तदाकारान्तःकरणवृत्तिभिरन्तःप्रविष्टान्पुनर्बहिरेव कृत्वा परवैराग्यवशेन तत्तदाकारां वृत्तिमनुत्पाद्येत्यर्थः। यद्येते आन्तरा भवेयुस्तदोपायसहस्रेणामि बहिर्न स्युः स्वभावभङ्गप्रसङ्गात् बाह्यानां तु रागवशादन्तःप्रविष्टानां वैराग्येण बहिर्गमनं संभवतीति वदितुं बाह्यानिति विशेषणम्। तदनेन वैराग्यमुक्त्वाभ्यासमाह चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः कृत्वेत्यनुषज्यते। अत्यन्तनिमीलने

Chapter 5 (Part 16)

हि निद्राख्या लयात्मिका वृत्तिरेका भवेत्। प्रसारणे तु प्रमाणविपर्ययविकल्पस्मृतयश्चतस्रो विक्षेपात्मिका वृत्तयो भवेयुः। पञ्चापि तु वृत्तयो निरोद्धव्या इति अर्धनिमीलनेन भ्रूमध्ये चक्षुषो निधानम्। तथा प्राणापानौ समौ तुल्यावूर्ध्वाधोगतिविच्छेदेन नासाभ्यन्तरचारिणौ कुम्भकेन कृत्वा अनेनोपायेन यताः संयता इन्द्रियमनोबुद्धयो यस्य स तथा। मोक्षपरायणः सर्वविषयविरक्तो मुनिर्मननशीलो भवेत्। विगतेच्छाभयक्रोध इति वीतरागभयक्रोध इत्यत्र व्याख्यातम्। एतादृशो यः संन्यासी सदा भवति मुक्त एव सः। नतु मोक्षः तस्य कर्तव्योऽस्ति। अथवा य एतादृशः स सदा जीवन्नपि मुक्त एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.27।।एवं सम्यग्दर्शननिष्ठानां सद्योमुक्तिरुक्ता कर्मयोगश्च सङ्गफलत्यागेन ईश्वरप्रीत्यर्थमनुष्ठितः सत्त्वशुद्धिज्ञानप्राप्तिद्वारेण मोक्षाय भवतीत्यप्युक्तं अथेदानीं सम्यग्दर्शनस्यान्तरङ्गसाधनं ध्यानयोगं विस्तरेण वक्ष्यामीति तत्सूत्रभूतांस्त्रीन्श्लोकानुपदिशति स्पर्शानिति। अत्रोत्तरार्धेन प्राणायाम उक्तः स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यानिति प्रत्याहर उक्तः भ्रुवोरन्तरे चक्षुः कृत्वेति धारणोक्ता विगतेच्छाभयक्रोध इति साधनभूताः फलभूताश्च द्विविधा यमा नियमाश्चोक्ताः यतेन्द्रिय इति वितर्काख्यः संप्रज्ञातः यतमान इति विचाराख्यः यतबुद्धिरित्यानन्दास्मिताख्यौ मोक्षपरायण इत्यसंप्रज्ञात उक्तः शेषेण योगफलमिति विभागः। पाठक्रममनुरुध्यार्थक्रमेणाक्षरार्थः स्पष्टीक्रियते। तत्र विगतेच्छो विगतभयो विगतक्रोध इति संबन्धः। यो हि इच्छावान्स इष्टसिद्ध्यर्थं हिंसानृतस्तेयस्त्रीपरिग्रहानिच्छेत्। अतो विगतेच्छपदेन तद्विपर्ययान्अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः इति सूत्रोक्तान्यमाँल्लक्षयति। तथा भयं स्वोच्छेदशङ्का तया ह्युद्विग्नो नशौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः इति सूत्रोक्तान्नियमान्स्वीकर्तुमिच्छेदतो विगतभय इत्यनेन तेषां ग्रहणम्। तथा क्रोधाक्रान्तो मैत्र्यादीन्भावयितुमशक्तश्चित्तप्रसाधनं कर्तुं न शक्नोति। तच्चमैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसाधनं इति सूत्रितम्। तत्र विगतक्रोधः शान्तप्रकृतित्वात्सुखितेषु मैत्रीं परस्येष्टे न ममैवेष्टमिदं जातमिति भावयेत्। तथा दुःखितेषु करुणां पुण्यवत्सु मुदितां पापवत्सूपेक्षां च भावयेत्। नचैतेन प्रसाधनेन विना चित्तादर्शस्य नैर्मल्यं भवति एवं साधनावस्थायां यमनियमचित्तप्रसाधनानां सिद्ध्यर्थं विगतेच्छाभयक्रोधत्वमीप्सितम्। एवं फलावस्थायामपि तदीप्सितम्। तथाहि संप्रज्ञातसमाधिफलभूतायां मधुमत्यां योगभूमौ स्थितं योगिनं प्रति दिव्याः कामा उपतिष्ठन्ते तत्रापि विगतेच्छत्वमिष्टम्। तथाहिस्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात् इति सूत्रम्। स्थानिनो देवास्तैरुपनिमन्त्रणे इहास्यतां इमे रम्यावसथाः इमा रम्या रमाः इमानि जरामरणहराणि रसायनानि इमे वयं किंकराः स्वपुण्यार्जितमिदं स्थानं त्वया भुज्यतामिति प्रार्थनायां क्रियमाणायां सङ्गो लिप्सा तत्र न कर्तव्या नापि तल्लाभेनात्मनो महाभागत्वं देवप्रार्थ्यत्वं मत्वा गर्वोऽपि कर्तव्यस्तयोः सङ्गस्मययोर्भ्रंशहेतुत्वादिति सूत्रार्थः। तथा भयमपि द्विविधं योगान्तरायजं वितर्कजं च। तत्राद्यंव्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाःदुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासाविक्षेपसहभुवः इति सूत्राभ्यामुक्तं। स्त्यानं अकर्मण्यता अविरतिरवैराग्यं अङ्गमेजयत्वं कंपवायुः वितर्काहिंसादयस्तज्जं च भयं आद्यस्य निवारणं ईश्वरप्रणिधानेन। तथा च सूत्रिंतततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽन्तरायाभावश्च इति। तत ईश्वरप्रणिधानात् द्वितीयस्य प्रतिपक्षभावनेन। तथाच सूत्रितम्वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम् इति।वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदितालोभक्रोधमोहमूला मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम् इति च। आदिपदादनृतस्तेयादयः। हिंसादयः प्रत्येकं कृतकारितानुमोदितभेदेन त्रिविधाः। तेऽपि प्रत्येकं लोभादिमूलकत्वेन त्रिविधाः। तेऽपि मृदुमध्यमाधिमात्रभेदेन प्रत्येकं त्रिविधाः। ते च मूलभूता वितर्कास्त्रयश्चत्वारः पञ्च अधिका वा त्रिस्त्रिगुणिता एकाशीतिरष्टोत्तरशतं पञ्चत्रिंशदधिकं शतमधिका वा भवन्ति। शाखाप्रशाखाभेदेनानन्ताश्च। दुःखरूपमज्ञानरूपं चानन्तफलं येषां ते दुःखाज्ञानानन्तफला इत्यनया प्रतिपक्षभावनया ते निवर्तनीया इति। एवं यमनियमचित्तप्रसाधनप्रतिपक्षभावनैर्निरन्तरायं मृदूकृतचित्तो योगी विविक्ते देशेआसीनः संभवात् इति न्यायेन स्थिरसुखमासनमध्यासीत। तत्र देशासने श्रूयेतेसमे शुचौ शर्करवह्निवालुकाविवर्जिते शब्दजलाश्रयादिभिः। मनोनुकूले नतु चक्षुपीडने गुहानिवाताश्रयणे प्रयोजयेत्। त्रिरुन्नतं स्थाप्य समं शरीरं हृदीन्द्रियाणि मनसा संनिरुध्य। ब्रह्मोडुपेन प्रतरेत विद्वान्स्रोतांसि सर्वाणि भयावहानि। इति। चक्षुरित्यत्र विसर्गलोपश्छान्दसः। त्रिरुन्नतं कटिवक्षःकन्धराप्रदेशेषून्नतम्। ततो जितासनः प्राणायाममभ्यसेत्। तेन हि मन्दगतौ प्राणे सति तदनुसारि मनोऽपि चाञ्चल्यं त्यजति। नोचेद्वायुविक्षेपेण विक्षिप्यते। तत्र प्राणजयप्रमाणम्प्राणान्प्रपीड्येह सयुक्तचेष्टः क्षीणे प्राणे नासिकयोच्छ्वसीत इति श्रुत्युक्तमेव संगृह्णाति। प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ इति। प्राणापानौ समौ तुल्यावूर्ध्वाधोगतिविच्छेदेन नासाभ्यन्तरचारिणौ कुम्भकेन कृत्वा ततो बाह्यान्बहिर्भवान्स्पर्शान्विषयसंबन्धानिन्द्रियद्वारा नित्यमन्तर्बुद्धौ क्रियमाणान् योगीन्द्रियाणां प्रत्याहरणेन तान्बहिरेव कुर्यात्। ततो विषयेभ्यो व्यावृत्तेषु करणेषु स्वप्नकाले इवान्तर्मनोमात्रेणावतिष्ठत इत्यर्थः। इमं प्रत्याहारं कर्तुमशक्तस्याविरक्तस्य का गतिरित्यत आह चक्षुश्चैवान्तरेभ्रुवोरिति। चशब्दो वार्थे। चक्षुरेव वा भ्रुवोरन्तरे कुर्यात्। खेचरीं मुद्रामभ्यस्येदित्यर्थः। सा चोक्ता योगसारेलम्बिकोर्ध्वस्थिते गर्ते जिह्वां व्यावृत्य धारयेत्। दृढासनश्चिरं तिष्ठेन्मुद्रैषा खेचरी मता। भ्रूमध्यदृष्टिरप्येषा महादेवेन कीर्तिता इति। य एवं सर्वोऽपि बाह्ये विषये सूर्यादौ संयमो यथोक्तं प्रत्याहारमनुष्ठातुमशक्तान्प्रत्येवोपदिश्यत इति ज्ञेयम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.27।।ननु स्पर्शभावरूपा स्थितिरतिकठिना अतः स्पर्शसंयोगेऽपि या प्राप्तिः स्यात् स्पर्शजबन्धाभावे न तथा भवेदित्यभिप्रायेणाह स्पर्शानिति द्वयेन। बहिर्बाह्यान् स्पर्शान् कृत्वा बाह्याँल्लौकिकान् स्पर्शानिन्द्रियादिविषयभोगान् बहिः तेषूत्तमाद्यभावेन प्रारब्धकर्मभोगवत्। किञ्च पुनर्भ्रुवोः कालयमरूपयोरन्तरैव चक्षुः दृष्टिं कृत्वा कालयममध्ये मरणरूपोऽस्मीति दृष्ट्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानावूर्ध्वाधोगतिरूपौ संयोगविप्रयोगसुखानुभवाविव समौ कृत्वा मोक्षपरायणः विषयादित्यागपरो विगतेच्छाभयक्रोधो भूत्वा यतेन्द्रियमनोबुद्धिः सन् यः सदा मुनिर्मननशीलो भवति स स्पर्शादिभिर्मुक्त एव स्यादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.27।।स योगी ब्रह्मनिर्वाणमित्यादिषु योगी मोक्षमाप्नोतीत्युक्तं तमेव योगं संक्षेपेण दर्शयन्नाह स्पर्शानिति द्वाभ्याम्। बाह्या एव स्पर्शा रूपरसादयो विषयाश्चिन्तिताः सन्तोऽन्तः प्रविशन्ति तांस्तच्चिन्तात्यागेन बहिरेव कृत्वा चक्षुश्च भ्रुवोरन्तरे भ्रूमध्य एव कृत्वाऽत्यन्तं नेत्रयोर्निमीलने निद्रया मनो लीयते। उन्मीलनेन च बहिः प्रसरति। तदुभयदोषपरिहारार्थमर्धनिमीलनेन भ्रूमध्ये दृष्टिं निधायेत्यर्थः। उच्छ्वासनिःश्वासरूपेण नासिकयोरभ्यन्तरे च चरन्तौ प्राणापानावूर्ध्वाधोगतिनिरोधेन समौ कृत्वा। कुम्भयित्वेत्यर्थः। यद्वा प्राणो यथा बहिर्न निर्याति यथा चापानोऽन्तर्न प्रविशति किंतुनासामध्य एव द्वावपि यथा चरतः तथा मन्दाभ्यामुच्छ्वासनिःश्वासाभ्यां समौ कृत्वेति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.27 5.28।।स योगी ब्रह्मनिर्वाणं 5।24 इत्यादौ प्रोक्तं तमेव योगं समासेन दर्शयन्नाह द्वाभ्याम् स्पर्शानिति।ईश्वरालम्बनं योगो जनयित्वा तु तादृशम्। बहुजन्मविपाकेन भक्तिं जनयति ध्रुवम्। योगेन तु निषिद्धेन यदि देहः प्रसिद्ध्यति। तदा कल्पान्तपर्यन्तं भावनातस्तु तत्फलम्। इति निबन्धे ईश्वरालम्बनस्यैव योगस्य भक्तिजनकत्वमिति। योगेश्वरालम्बनतायाः स्वरूपमाह स्पर्शाः बाह्याः रूपरसादयो विषयाश्चिन्तितता एवान्तः प्रविशन्ति तांस्तच्चिन्तात्यागेन बहिरेव कृत्वा ज्ञानप्रधानं चक्षुश्च भ्रुवोरन्तरे कृत्वा अर्द्धोन्मीलितलोचनेनमन एकाग्रं कृत्वेत्यर्थः। तथोर्द्धाधोगतिकौ प्राणापानौ च समौ कृत्वा कुम्भयित्वा प्राणायामाभिनयेन तदाह नासाभ्यन्तरचारिणाविति। एतेनोपायेन यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्योगफलं न तत्र सिद्धिकामः स्यात् किन्तु मोक्षपरायणः मोक्षार्थं पर ईश्वरस्तदालम्बनो यः स सदा प्रपञ्च एवमुक्त एव जीवन्मुक्त इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.27।।अब सम्यक् ज्ञानके अन्तरङ्ग साधनरूप ध्यानयोगको विस्तारपूर्वक कहूँगा यह विचारकर उस ध्यानयोगके सूत्रस्थानीय श्लोकोंका उपदेश करते हैं शब्दादि बाह्य विषयोंको बाहर करके यानी जो शब्दादि विषय श्रोत्रादि इन्द्रियोंद्वारा अन्तःकरणके भीतर प्रविष्ट कर लिये गये हैं उनका चिन्तन न करना ही बाह्य विषयोंको निकाल बाहर करना है इस प्रकार उनको बाहर करके एवं दोनों नेत्रों ( की दृष्टि ) को भृकुटिके मध्यस्थानमें स्थित करके तथा नासिका ( और कण्ठादि आभ्यन्तर भागों ) के भीतर विचरनेवाले प्राण और अपानको समान करके।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.27।। व्याख्या   स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है।चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः यहाँ भ्रुवोः अन्तरे पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता 6। 13) ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ नासिकासे बाहर निकलनेवाली वायुको प्राण और नासिकाके भीतर जानेवाली वायुको अपान कहते हैं।प्राणवायुकी गति दीर्घ और अपानवायुकी गति लघु होती है। इन दोनोंको सम करनेके लिये पहले बायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर दायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। फिर दायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर बायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। इन सब क्रियाओंमें बराबर समय लगना चाहिये। इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहनेसे प्राण और अपानवायुकी गति सम शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिकाके बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्शका ज्ञान न हो तब समझना चाहिये कि प्राणअपानकी गति सम हो गयी है। इन दोनोंकी गति सम होनेपर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मनसे स्वाभाविक ही परमात्माका चिन्तन होने लगता है। ध्यानयोगमें इस प्राणायामकी आवश्यकता होनेसे ही इसका उपर्युक्त पदोंमें उल्लेख किया गया है।यतेन्द्रियमनोबुद्धिः प्रत्येक मनुष्यमें एक तो इन्द्रियोंका ज्ञान रहता है और एक बुद्धिका ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि दोनोंके बीचमें मनका निवास है। मनुष्यको देखना यह है कि उसके मनपर इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है या बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है अथवा आंशिकरूपसे दोनोंके ज्ञानका प्रभाव है। इन्द्रियोंके ज्ञानमें संयोग का प्रभाव पड़ता है और बुद्धिके ज्ञानमें परिणाम का। जिन मनुष्योंके मनपर केवल इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है वे संयोगजन्य सुखभोगमें ही लगे रहते हैं और जिनके मनपर बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है वे (परिणामकी ओर दृष्टि रहनेसे) सुखभोगका त्याग करनेमें समर्थ हो जाते हैं न तेषु रमते बुधः (गीता 5। 22)।प्रायः साधकोंके मनपर आंशिकरूपसे इन्द्रियों और बुद्धि दोनोंके ज्ञानका प्रभाव रहता है। उनके मनमें इन्द्रियों तथा बुद्धिके ज्ञानका द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिये वे अपने विवेकको महत्त्व नहीं दे पाते और जो करना चाहते हैं उसे कर भी नहीं पाते। यह द्वन्द्व ही ध्यानमें बाधक है। अतः यहाँ मन बुद्धि तथा इन्द्रियोंको वशमें करनेका तात्पर्य है कि मनपर केवल बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव रह जाय इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव सर्वथा मिट जाय।मुनिर्मोक्षपरायणः परमात्मप्राप्ति करना ही जिनका लक्ष्य है ऐसे परमात्मस्वरूपका मनन करनेवाले साधकको यहाँ मोक्षपरायणः कहा गया है। परमात्मतत्त्व सब देश काल आदिमें परिपूर्ण होनेके कारण सदासर्वदा सबको प्राप्त ही है। परन्तु दृढ़ उद्देश्य न होनेके कारण ऐसे नित्यप्राप्त तत्त्वकी अनुभूतिमें देरी हो रही है। यदि एक दृढ़ उद्देश्य बन जाय तो तत्त्वकी अनुभूतिमें देरीका काम नहीं है। वास्तवमें उद्देश्य पहलेसे ही बनाबनाया है क्योंकि परमात्मप्राप्तिके लिये ही यह मनुष्यशरीर मिला है। केवल इस उद्देश्यको पहचानना है। जब साधक इस उद्देश्यको पहचान लेता है तब उसमें परमात्मप्राप्तिकी लालसा उत्पन्न हो जाती है। यह लालसा संसारकी सब कामनाओंको मिटाकर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव करा देती है। अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको पहचाननेके लिये ही यहाँ मोक्षपरायणः पदका प्रयोग हुआ है।कर्मयोग सांख्ययोग ध्यानयोग भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्यकी बड़ी आवश्यकता है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधनसे सिद्धि कैसे मिलेगी इसलिये यहाँ मोक्षपरायणः पदसे ध्यानयोगमें दृढ़ निश्चयकी आवश्यकता बतायी गयी है।विगतेच्छाभयक्रोधो यः अपनी इच्छाकी पूर्तिमें बाधा देनेवाले प्राणीको अपनेसे सबल माननेपर उससे भय होता है कि निर्बल माननेसे उसपर क्रोध आता है। ऐसे ही जीनेकी इच्छा रहनेपर मृत्युसे भय होता है और दूसरोंसे अपनी इच्छापूर्ति करवाने तथा दूसरोंपर अपना अधिकार जमानेकी इच्छासे क्रोध होता है। अतः भय और क्रोध होनेमें इच्छा ही मुख्य है। यदि मनुष्यमें इच्छापूर्तिका उद्देश्य न रहे प्रत्युत एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रह जाय तो भयक्रोधसहित इच्छाका सर्वथा अभाव हो जाता है। इच्छाका सर्वथा अभाव होनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। कारण कि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छासे ही मनुष्य जन्ममरणरूप बन्धनमें पड़ताहै। साधकको गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि क्या वस्तुओंकी इच्छासे वस्तुएँ मिल जाती हैं और क्या जीनेकी इच्छासे मृत्युसे बच जाते हैं वास्तविकता तो यह है कि न तो वस्तुओंकी इच्छा पूरी कर सकते हैं और न मृत्युसे बच सकते हैं। इसलिये यदि साधकका यह दृढ़ निश्चय हो जाय कि मुझे एक परमात्मप्राप्तिके सिवाय कुछ नहीं चाहिये तो वह वर्तमानमें ही मुक्त हो सकता है। परन्तु यदि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छा रहेगी तो इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और मृत्युके भयसे भी बचाव नहीं होगा तथा क्रोधसे भी छुटकारा नहीं होगा। इसलिये मुक्त होनेके लिये इच्छारहित होना आवश्यक है।यदि वस्तु मिलनेवाली है तो इच्छा किये बिना भी मिलेगी और यदि वस्तु नहीं मिलनेवाली है तो इच्छा करनेपर भी नहीं मिलेगी। अतः वस्तुका मिलना या न मिलना इच्छाके अधीन नहीं है प्रत्युत किसी विधानके अधीन है। जो वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है उसकी इच्छाको छोड़नेमें क्या कठिनाई है यदि वस्तुकी इच्छा पूरी होती हो तो उसे पूरी करनेका प्रयत्न करते और यदि जीनेकी इच्छा पूरी होती हो तो मृत्युसे बचनेका प्रयत्न करते। परन्तु इच्छाके अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्युसे बचाव ही होता है। यदि वस्तुओंकी इच्छा न रहे तो जीवन आनन्दमय हो जाता है और यदि जीनेकी इच्छा न रहे तो मृत्यु भी आनन्दमयी हो जाती है। जीवन तभी कष्टमय होता है जब वस्तुओंकी इच्छा करते हैं और मृत्यु तभी कष्टमयी होती है जब जीनेकी इच्छा करते हैं। इसलिये जिसने वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दिया है वह जीतेजी मुक्त हो जाता है अमर हो जाता है।सदा मुक्त एव सः उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही बन्धन है। इस माने हुए सम्बन्धका सर्वथा त्याग करना ही मुक्ति है। जो मुक्त हो गया है उसपर किसी भी घटना परिस्थिति निन्दास्तुति अनुकूलताप्रतिकूलता जीवनमरण आदिका किञ्चिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।सदा मुक्त एव पदोंका तात्पर्य है कि वास्तवमें साधक स्वरूपसे सदा मुक्त ही है। केवल उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण उसे अपने मुक्त स्वरूपका अनुभव नहीं हो रहा है। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिटते ही स्वतःसिद्ध मुक्तिका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   भगवान्ने योगनिष्ठा और सांख्यनिष्ठाका वर्णन करके दोनोंके लिये उपयोगी ध्यानयोगका वर्णन किया। अब सुगमतापूर्वक कल्याण करनेवाली भगवन्निष्ठाका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.27 5.28।।स्पर्शानिति। यतेन्द्रियेति। बाह्यस्पर्शान् बहिः कृत्वा अनङ्गीकृत्य भ्रुवोः वामदक्षिणदृष्ट्योः क्रोधरागात्मकयोः अन्तरे तद्रहिते स्थानविशेषे चक्षुरुपलक्षितानि सर्वेन्द्रियाणि कृत्वा विधाय प्राणापानौ धर्माधर्मौ चित्तवृत्त्यभ्यन्तरे साम्येनावस्थाप्य आसीत (K omits आसीत)। नसते कौटिल्येन असाम्येन क्रोधादिवशात् व्यवहरति इति नासा चित्तवृत्तिः। एतदेव बाह्ये। एवंविधो योगी सर्वव्यवहारान् वर्तयन्नपि मुक्त एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.27।।वृत्तमनूद्योत्तरश्लोकत्रयस्य तात्पर्यार्थमाह सम्यग्दर्शनेति। ईश्वरार्पितसर्वभावेनेति। भगवति परस्मिन्नीश्वरे समर्पितः सर्वेषां देहेन्द्रियमनसां भावश्चेष्टाविशेषो न क्वचिदपि बहिस्तेषां व्यापारस्तेनेत्यर्थः। कर्मयोगस्य तत्फलस्य चाभिधानानन्तरमित्यथशब्दार्थः। स्वतो बाह्यानां विषयाणां कुतो बहिष्करणमित्याशङ्क्याह श्रोत्रादीति। तेषां बहिःकरणं कीदृगित्याशङ्क्याह तानिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.27 5.28।।ध्यायिनां मुक्तत्वं साक्षाच्चेत्प्रमाणविरोधः ज्ञानद्वारा चेत्पुनरुक्तिरित्यतः श्लोकद्वयतात्पर्यमाह ध्यानेति। मुक्त एव स इति स्तुतिरिति भावः। पदानां व्यवहितत्वादन्वयमाह बाह्यानिति। स्पृश्यन्त इति स्पर्शाः शब्दाद्याः। स्पर्शा बाह्या एव तेषां किं बहिष्करणं इत्यत आह श्रोत्रादीनीति। योगेन प्रत्याहारेण श्रोत्रादीनामनियमे पट्वभ्यासादरप्रत्ययवशाच्छब्दाद्या आन्तरा इव भवन्ति। तन्िनयमे तु बाह्या बहिष्कृताः स्युरिति भावः। कृत्वेत्यस्यानुवृत्त्या योजयति चक्षुरिति। दुर्घटमेतदित्यत आह भ्रुवोरिति। चक्षुर्वृत्तौ चक्षुश्शब्द इत्यर्थः।सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं 6।13 इति वक्ष्यमाणविरोध इत्यत आह उक्तं चेति। न्यूनाधिकभावराहित्यं समीकरणमित्यन्यथाप्रतीतिनिरासायानूद्य व्याचष्टे प्राणेति। कुम्भके प्राणायामे ततश्च समौ निर्विकारौ निश्चलावित्यर्थः। इतरत्समीकरणं कुम्भकार्थमेवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.27 5.28।।ध्यानप्रकारमाह स्पर्शानित्यादिना। बाह्यान्स्पर्शन्वहिः कृत्वा श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः। चक्षुर्भ्रुवोरन्तरं कृत्वा भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन्नित्यर्थः। उक्तं च नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये ध्यानी चक्षुर्निधापयेत् इति। प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थितत्वेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.27।।बाह्यान् विषयस्पर्शान् बहिः कृत्वा बाह्येन्द्रियव्यापारं सर्वम् उपसंहृत्य योगयोग्यासने ऋजुकाय उपविश्य चक्षुः भ्रुवोः अन्तरे नासाग्रे विन्यस्य नासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानौ समौ कृत्वा उच्छवासनिः श्वासौ समगति कृत्वा आत्मावलोकनाद् अन्यत्र प्रवृत्त्यनर्हेन्द्रियमनोबुद्धिः तत एव विगतेच्छाभयक्रोधो मोक्षपरायणो मोक्षैकप्रयोजनो मुनिः आत्मावलोकनशीलो यः सदा मुक्त एव साध्यदशायाम् इव साधनदशायाम् अपि मुक्त एव स इत्यर्थः।उक्तस्य नित्यनैमित्तिककर्मेति कर्तव्यताकस्य कर्मयोगस्य योगशिरस्कस्य सुशकताम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.27 5.28।। स्पर्शान् शब्दादीन् कृत्वा बहिः बाह्यान् श्रोत्रादिद्वारेण अन्तः बुद्धौ प्रवेशिताः शब्दादयः विषयाः तान् अचिन्तयतः शब्दादयो बाह्या बहिरेव कृताः भवन्ति तान् एवं बहिः कृत्वा चक्षुश्चैव अन्तरे भ्रुवोः कृत्वा इति अनुषज्यते। तथा प्राणापानौ नासाभ्यन्तरचारिणौ समौ कृत्वा यतेन्द्रियमनोबुद्धिः यतानि संयतानि इन्द्रियाणि मनः बुद्धिश्च यस्य सः यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मननात् मुनिः संन्यासी मोक्षपरायणः एवं देहसंस्थानात् मोक्षपरायणः मोक्ष एव परम् अयनं परा गतिः यस्य सः अयं मोक्षपरायणो मुनिः भवेत्। विगतेच्छाभयक्रोधः इच्छा च भयं च क्रोधश्च इच्छाभयक्रोधाः ते विगताः यस्मात् सः विगतेच्छाभयक्रोधः यः एवं वर्तते सदा संन्यासी मुक्त एव सः न तस्य मोक्षायान्यः कर्तव्योऽस्ति।।एवं समाहितचित्तेन किं विज्ञेयम् इति उच्यते भोक्तारं यज्ञतपसां यज्ञानां तपसां च कर्तृरूपेण देवतारूपेण च सर्वलोकमहेश्वरं सर्वेषां लोकानां महान्तम् ईश्वरं सुहृदं सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां प्रत्युपकारनिरपेक्षतया उपकारिणं सर्वभूतानां हृदयेशयं सर्वकर्मफलाध्यक्षं सर्वप्रत्ययसाक्षिणं मां नारायणं ज्ञात्वा शान्तिं सर्वसंसारोपरतिम् ऋच्छति प्राप्नोति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येपञ्चमोऽध्यायः।।

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【 Verse 5.28 】

▸ Sanskrit Sloka: यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्मुनिर्मोक्षपरायण: | विगतेच्छाभयक्रोधो य: सदा मुक्त एव स: ||

▸ Transliteration: yatendriya-mano-buddhir munir mokṣaparāyaṇaḥ | vigatecchā-bhaya-krodho yaḥ sadā mukta eva saḥ ||

▸ Glossary: yata: controlled; indriya: senses; mano: mind; buddhiḥ: intelligence; muniḥ: the sage; mokṣa: liberation; parāyaṇaḥ: aiming; vigata: free from; icchā: desires; bhaya: fear; krodah: anger; yaḥ: one who; sadā: always; muktaḥ: liberated; eva: certainly; saḥ: he is

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.27,28 Shutting out all external sense objects, keeping the eyes and vision concentrated between the two eyebrows, suspending the inward and outward breaths within the nostrils and thus controlling the mind, senses and intelligence, the transcendental who is aiming at liberation, becomes free from desire, fear and the by-product of desire and fear, anger all three. One who is always in this state is certainly liberated.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.27 5.28।।बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़कर और नेत्रोंकी दृष्टिको भौंहोंके बीचमें स्थित करके तथा नासिकामें विचरनेवाले प्राण और अपान वायुको सम करके जिसकी इन्द्रियाँ मन और बुद्धि अपने वशमें हैं जो मोक्षपरायण है तथा जो इच्छा भय और क्रोधसे सर्वथा रहित है वह मुनि सदा मुक्त ही है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.28।। जिस पुरुष की इन्द्रियाँ मन और बुद्धि संयत हैं ऐसा मोक्ष परायण मुनि इच्छा भय और क्रोध से रहित है वह सदा मुक्त ही है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.28 यतेन्द्रियमनोबुद्धिः with senses? mind and intellect (ever) controlled? मुनिः the sage? मोक्षपरायणः having liberation as his supreme goal? विगतेच्छाभयक्रोधः free from desire? fear and anger? यः who? सदा for ever? मुक्तः free? एव verily? सः he.Commentary If one is free from desire? fear and anger he enjoys perfect peace of mind. When the senses? the mind and the intellect are subjugated? the sage does constant contemplation and,attains for ever to the absolute freedom or Moksha.The mind becomes restless when the modifications of deisre? fear and anger arise in it. When one becomes desireless? the mind moves towards the Self spontaneously liberation or Moksha becomes his highest goal.Muni is one who does Manana or reflection and contemplation.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.28. Having known Me as the Enjoyer of [the fruits of] sacrifices and austerties, as the great Lord of all the worlds, and as the Friend of all beings, he (the man of Yoga) attains peace.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.28 Governing sense, mind and intellect, intent on liberation, free from desire, fear and anger, the sage is forever free.

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.28 The sage who has controlled his senses, mind and intellect, who is intent on release as his final goal, freed for ever from desire, fear and wrath - is indeed liberated forever.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.27-5.28 Keeping the external objects outside, the eyes at the juncture of the eye-brows, and making eal the outgoing and incoming breaths that move through the nostrils, the contemplative who has control over his organs, mind and intellect should be fully intent on Liberation and free from desire, fear and anger. He who is ever is verily free.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.28 With the senses, the mind and the intellect (ever) controlled, having liberation as his supreme goal, free from desire, fear and anger the sage is verily liberated for ever.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.27-28 Sparsan etc.; Yatendriya-etc. Warding off outside, i.e., not accepting, the external contacts (objects); establishing all the sense-organs - indicated by 'sense of sight' - in the middle place in between the two wandering ones, i.e., the right and the left views in the form of desire and wrath viz., in that particular place which is free from both these; he would remain fixing in eipoise (or making neutral) both the forward (upward) and backward (downward) moving forces viz., the pious and impious acts, within the mental modification. Nasa 'that which acts crookedly'. This is mental modification, because it behaves crookedly i.e., ineally due to anger etc. The same is in the external plane. A man of Yoga of this type is just free, though he transacts all mundane business.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.27 - 5.28 'Shutting off all contact with outside objects,' i.e., stopping the outward functioning of the senses; seated with his trunk straightened in a posture fit for meditation (Yoga); 'fixing the gaze between the eye-brows,' i.e., at the root of the nose where the eye-brows meet; 'ealising inward and outward breaths,' i.e., making exhalatory and inhalatory breath move eally: making the senses, Manas and intellect no longer capable of anything except the vision of the self, conseently being free from 'desire, fear and wrath'; 'who is intent on release as his final goal,' i.e., having release as his only aim - the sage who is thus intent on the vision of the self 'is indeed liberated for ever,' i.e., he is almost a liberated person, as he would soon be in the ultimate stage of fruition.

Sri Krsna now says that Karma Yoga, described above, which is facilitated by the performance of obligatory and occasional rites and which culminates in meditation (Yoga), is easy to practise:

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.28 Krtva, keeping; bahyan, the external; sparsan, objects-sound etc.; bahih, outside: To one who does not pay attention to the external objects like sound etc., brought to the intellect through the ear etc., the objects become verily kept outside. Having kept them out in this way, and (keeping) the caksuh, eyes; antare, at the juncture; bhruvoh, of the eye-brows (-the word 'keeping' has to be supplied-); and similarly, samau krtva, making eal; prana-apanau, the outgoing and the incoming breaths; nasa-abhyantara-carinau, that move through the nostrils; munih, the contemplative-derived (from the root man) in the sense of contemplating-, the monk; yata-indriya-mano-buddhih, who has control over his organs, mind and intellect; should be moksa-para-yanah, fully intent on Liberation-keeping his body is such a posture, the contemplative should have Liberation itself as the supreme Goal. He should be vigata-iccha-bhaya-krodhah, free from desire, fear and anger. The monk yah, who; sada, ever remains thus; sah, he; is muktah yah, who;sada, ever remains thus; sah, he; is muktah, ever, verily free. He has no other Liberation to seek after. What is there to be realized by one who has his mind thus concentrated? The answer this is beig stated:

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.28।। सूत्रस्थानीय इन श्लोकों में भगवान् ने ध्यानयोग का संक्षेप में संकेत किया है जिसका विस्तृत वर्णन अगले अध्याय में किया गया है। संस्कृत में ब्रह्मविद्या के ग्रन्थों की यह पारम्परिक शैली है कि प्राय उनमें एक अध्याय के अन्तिम श्लोकों में आगामी अध्याय के विषय की प्रस्तावना प्रस्तुत की जाती है।इन श्लोकों में ज्ञानी पुरुष के अर्थपूर्ण जीवन के सभी पक्षों का वर्णन मिलता है। वेदान्त के साधक पूर्णत्व का जीवन जीने के लिए सदैव उत्सुक एवं तत्पर रहते हैं। वे उन स्वप्नद्रष्टा पुरुषों के समान नहीं होते जो किसी आदर्शवादी कल्पना में रमना पसन्द करते हैं बल्कि वे तो अत्यन्त व्यवहारकुशल उपयोगी और प्रेरणा का जीवन जीना चाहते हैं। इसलिए उन्हें अव्यावहारिक एवं आदर्शवादी तत्त्वज्ञान का कोई आकर्षण नहीं होता।पूर्णरूप से मन का समत्व कैसे प्राप्त किया जाय यह शंका सभी साधकों के मन में उठती है। श्रीकृष्ण यहाँ संक्षेप में उस साधन क्रम का वर्णन करते हैं जिसके अभ्यास से सिद्ध पुरुष के सुसंगठित व्यक्तित्व को प्राप्त किया जा सकता है। इसी का विस्तार अगले अध्याय में है।बाह्य विषयों की स्वयं में यह सार्मथ्य नहीं है कि वे किसी व्यक्ति को क्षुब्ध या लुब्ध कर सकें। विक्षेप का होना तो उनके साथ हमारे सम्बन्ध पर निर्भर करता है। समुद्रतट पर खड़े होकर उसमें उत्ताल तरंगों को देखने मात्र से कोई समस्या उत्पन्न नहीं होती किन्तु समुद्र में कूद पड़ने पर तरंगों के द्वारा हमें इधरउधर फेंका जाना प्रारंभ होता है। शब्दस्पर्श रूप आदि ग्रहण करने पर विक्षेप तभी होता है जब हम अपने मन की परिवर्तनशील परिस्थितियों से तादात्म्य करते हैं। इसलिए यदि हम बाह्य विषयों को बाहर ही रख सकें तो निश्चय ही ध्यानाभ्यास के लिए आवश्यक मनशान्ति प्राप्त की जा सकती है। यहाँ विषयों को बाहर रखने का अर्थ यह नहीं कि हम अपनी इंद्रियों का उपयोग करना बंद कर दें। इसका तात्पर्य यह है कि हम विषयों का चिन्तन न करें। विचार द्वारा यह जानकर कि उनमें सुख नहीं होता उनसे विरक्त हो जायें।अनेक साधक गुरु के उपदेशों का शाब्दिक अर्थ लेकर विचित्र ध्यानाभ्यास करने लगते हैं। ध्यान के लिए वे नेत्रदृष्टि को भृकुटियों के मध्य स्थिर करने का प्रयत्न करते हैं। यह तो उपदेश का अतिप्रसंग ही कहा जायेगा। जैसा कि श्री शंकराचार्य बताते हैं यहाँ दृष्टि को मानो भृकुटियों के बीच स्थिर करना है वास्तव में नहीं। यह एक मनोवौज्ञानिक सत्य है कि भृकुटियों के बीच दृष्टि को स्थिर करने की कल्पना से 45 अंश का कोण बनता है और यह स्थिति ध्यान के लिए अत्यन्त अनुकूल होती है।हमारे श्वासोच्छ्वास की गति एवं मन की स्थिति के बीच अत्यन्त समीप का सम्बन्ध है। मन के क्षुब्ध होने पर श्वासोच्छ्वास की लय भी बिगड़कर असंयमित हो जाती है। यहाँ प्राणापान की गति को सम करने का उपदेश है क्योंकि प्राणायाम मन को शान्त करने में उपयोगी होता है।प्रथम तो शरीर तथा प्राण को सुव्ययवस्थित करने का उपदेश है और तत्पश्चात् मन और बुद्धि को। इन्द्रियों की भूख मन की चंचलता और बुद्धि की अस्थिरता इन सबको संयमित करने का एक मात्र उपाय है मोक्ष को अपने जीवन का परम लक्ष्य बनाना। लक्ष्य का निर्धारण करने पर समस्त कर्मों का उसी लक्ष्य के प्रति अर्पण करना चाहिए। बुद्धि पर संयम होने का अर्थ इच्छा भय और क्रोध से मुक्त हो जाना है।उपर्युक्त तीनों गुणों में निकट का सम्बन्ध है। किसी अप्राप्य वस्तु को प्राप्त करने की तीव्र लालसा को इच्छा कहते हैं। इच्छा के तीव्र होने पर वह वस्तु प्राप्त होगी अथवा नहीं इसका भय लगा रहता है और उसके प्राप्त हो जाने पर यह भय होता है कि कहीं खो न जाय। जब व्यक्ति इस प्रकार भयभीत होता है तब स्वाभाविक है कि उसके और वस्तु प्राप्ति के बीच कोई विघ्न आ जाये तब वह व्यक्ति क्रोधित हो जाता है। अत तीनों पर विजय पाना बुद्धि की सभी वृत्तियों को अपने वश में करना है। इस प्रकार इन दो श्लोकों में वर्णित गुणों से सम्पन्न व्यक्ति भगवान् के शब्दों में सदा मुक्त ही है।इन गुणों के होने पर मुक्ति दूर नहीं रहती इसलिए भगवान् यहाँ कहते हैं कि इच्छा भय और क्रोध से रहित व्यक्ति मुक्त ही है। व्यवहार में भी रोटी पकाना इस प्रकार की शब्दावली प्रचलित है। किन्तु वास्तव में गूंथे हुए आटे को पकाया जाता हैं और न कि रोटी को। परन्तु हम उस वाक्य के अभिप्राय को समझते हैं। ठीक वैसे ही यदि साधक सब साधन सम्पन्न होकर ध्यान का अभ्यास करे तो सब मिथ्या धारणाओं से मुक्त होकर वह शीघ्र ही नित्यमुक्त आत्मा का साक्षात् अनुभव करता है।इस प्रकार समाहित चित्त के पुरुष के लिए कौन सी वस्तु ज्ञेय और ध्येय है इस सम्बन्ध में कहते हैं

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.28।।यतानि संयतानि इन्द्रियादीनि येन स मुनिर्मननशीलः मोक्ष एव परमयनं परा गतिर्यस्य स मोक्षपरायणो मुमुक्षुः विगता इच्छादयो यस्मात्स य एवं वर्तते स मुमुक्षुरेव न तस्य मोक्षादन्यत्कर्तव्यमस्ति स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् मोक्षपरायण इत्यनेन वैराग्यान्मुमुक्षुरधिकारी कथितः। चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोरित्यनेनासनजयेन लयविक्षेपराहित्यमुक्तम्। प्राणेत्यादिना प्राणायामो निरुपितः। स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यानित्यनेनैवअहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः इतिसूत्रोक्ता यमाः।शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः इति सूत्रोक्ता नियमाश्च प्रदर्शिताः। यतेन्द्रिय इति प्रत्याहारः यतमना इति धारणाध्याने यतबुद्धिरिति समाधिकथितः विगतेच्छाभक्रोध इति मोक्षपरायणस्य योगिनः स्वरुपनिरुपणमिति विवेकः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.27 5.28।।पूर्वमीश्वरार्पितसर्वभावस्य कर्मयोगेनान्तःकरणशुद्धिस्ततः सर्वकर्मसंन्यासस्ततः श्रवणादिपरस्य तत्त्वज्ञानं मोक्षसाधनमुदेतीत्युक्तम् अधुनास योगी ब्रह्मनिर्वाणम् इत्यत्र सूचितं ध्यानयोगं सम्यग्दर्शनस्यान्तरङ्गसाधनं विस्तरेण वक्तुं सूत्रस्थानीयांस्त्रीञ्श्लोकानाह भगवान्। एतेषामेव वृत्तिस्थानीयः कृत्स्नः षष्ठोऽध्यायो भविष्यति। तत्रापि द्वाभ्यां संक्षेपेण योग उच्यते। तृतीयेन तु तत्फलं परमात्मज्ञानमिति विवेकः स्पर्शाञ्शब्दादीन्बाह्यान्बहिर्भवानपि श्रोत्रादिद्वारा तत्तदाकारान्तःकरणवृत्तिभिरन्तःप्रविष्टान्पुनर्बहिरेव कृत्वा परवैराग्यवशेन तत्तदाकारां वृत्तिमनुत्पाद्येत्यर्थः। यद्येते आन्तरा भवेयुस्तदोपायसहस्रेणामि बहिर्न स्युः स्वभावभङ्गप्रसङ्गात् बाह्यानां तु रागवशादन्तःप्रविष्टानां वैराग्येण बहिर्गमनं संभवतीति वदितुं बाह्यानिति विशेषणम्। तदनेन वैराग्यमुक्त्वाभ्यासमाह चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः कृत्वेत्यनुषज्यते। अत्यन्तनिमीलने हि निद्राख्या लयात्मिका वृत्तिरेका भवेत्। प्रसारणे तु प्रमाणविपर्ययविकल्पस्मृतयश्चतस्रो विक्षेपात्मिकावृत्तयो भवेयुः। पञ्चापि तु वृत्तयो निरोद्धव्या इति अर्धनिमीलनेन भ्रूमध्ये चक्षुषो निधानम्। तथा प्राणापानौ समौ तुल्यावूर्ध्वाधोगतिविच्छेदेन नासाभ्यन्तरचारिणौ कुम्भकेन कृत्वा अनेनोपायेन यताः संयता इन्द्रियमनोबुद्धयो यस्य स तथा। मोक्षपरायणः सर्वविषयविरक्तो मुनिर्मननशीलो भवेत्। विगतेच्छाभयक्रोध इति वीतरागभयक्रोध इत्यत्र व्याख्यातम्। एतादृशो यः संन्यासी सदा भवति मुक्त एव सः। नतु मोक्षः तस्य कर्तव्योऽस्ति। अथवा य एतादृशः स सदा जीवन्नपि मुक्त एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.28।।यतेन्द्रियेति। यस्मिन्कस्मिंश्चित्स्थूले विषये सूर्ये तद्रश्मिषु वा विष्णुप्रतिमायां वाऽनाहतध्वनौ वान्यत्र वा चक्षुराद्यन्यतमद्वारा मनो धारयेत्। तच्च मनस्तद्विषयाकारतां प्राप्तं तत्रैव स्थिराभ्यासेन विश्रान्तं स्वदेहमपि न पश्यति सेयं महाविदेहा नाम धारणा। अस्यां सिद्धायामिन्द्रियगणः स्वंस्वं विषयं न तु गृह्णाति। सोऽयं बहिर्विषयप्रत्याहारः पूर्वोक्तस्त्वान्तर इति भेदः। अतएव तयोस्तुल्यफलत्वं सूत्रितम्ततः क्षीयते प्रकाशावरणम् इति। ततः अभ्यन्तरप्रत्याहारत् तथा बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा तत्संयमात्प्रकाशावरणक्षय इति। यदा चित्तं देहमविस्मृत्यैव हठेन पुरःस्थितमूर्त्याद्याकारं क्रियते तदा सा चित्तस्य मूर्त्याकारतारूपा वृत्तिः कल्पिता। यदा तु निरवशेषेण देहं विस्मृत्य चेतः केवलं ध्येयाकारमात्रं भवति सदा सा महाविदेहा नाम धारणा। तस्या अपि फलं तदेव। तत्संयमात्तस्यां चेतसो निग्रहात्प्रकाशावरणक्षयो भवति सोयं बाह्यविषयः समाधिः। वितर्काख्यो द्विविधः सवितर्कनिर्वितर्कभेदात्। तत्राद्यस्य लक्षणं सूत्रितंशब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का इति। सवितर्का नाम समापत्तिः समाधिरित्यर्थः। यदा विष्णुप्रतिमादौ पूर्वापरानुसंधानेन शब्दार्थोल्लेखेन च भावना प्रवर्तते तदा सवितर्का समापत्तिः। अस्मिन्नेवालम्बने पूर्वापराननुसंधानेन शब्दार्थोल्लेखनमन्तरेण भावना प्रवर्तते तदा निर्वितर्का नाम समापत्तिः। तथा च सूत्रंस्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्ये वार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का। स्मृतेः शब्दार्थस्मरणस्य परिशुद्धौ वर्जने सति भावयितुः स्वरूपेण शून्या तदाहमिदं भावयामीत्येवमाकारा वृत्तिरपि भावयितुर्नास्तीवेति भाति। यतोऽर्थमात्रनिर्भासा ध्येयार्थमात्रमस्यां भासते नत्वन्यदिति सूत्रार्थः। अस्यां सिद्धायां योगी जितेन्द्रिय इत्युच्यते। जितमना इति आभ्यन्तरप्रत्याहारपूर्वकं यदा मनःकल्पिते सूक्ष्मे विषये पूर्ववच्छब्दार्थोल्लेखपूर्वकं तद्वर्जं च मनसो भावना प्रवर्तते तदा ते उभे समापत्ती सविचारनिर्विचाराख्ये भवतः। तथा च सूत्रंएतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता इति। अत्र सूक्ष्मविषयेति ग्रहणात्पूर्वस्यां स्थूलविषयत्वं गम्यते। एतयैव द्विविधवितर्कसमापत्त्यैव निर्विचारसमापत्तौ दृढायां योगी जितमना इत्युच्यते। यदा पुनश्चेतसो मूर्त्याकारतां परित्यज्य सत्त्वोद्रेकात्समष्टिमनोमयविषया अहमेवेदं सर्वोऽस्मीत्येवमाकारा भावनाप्रवर्तते सोऽयं सानन्दः समाधिः। यदा तु तामपि भावनां परित्यज्य विषयवेदनमन्तरेणास्मीत्येतावन्मात्राकारा भावना प्रवर्तते साऽस्मिता। अस्मिताहंकारयोर्भेदस्तु क्रमेण विषयवैमुख्यतदाभिमुख्यमात्रकृतः। यथैक एव पूर्वाभिमुखः पश्चिमाभिमुखश्चेति तद्वत्। अस्यामवस्थायां योगी बुद्धितो विविक्तस्य त्वंपदार्थस्य साक्षात्काराज्जितबुद्धिरित्युच्यते। तदेतदुक्तं यतेन्द्रियमनोबुद्धिरिति। एतान्येव प्रसाधनानि गुणपर्वाण्युच्यन्ते। तथा च सूत्रम्विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि इति। तत्र विशेषाः स्थूलभूतानि एकादशेन्द्रियाणि च। अविशेषाः पञ्चतन्मात्राणि अहंकारश्च। लिङ्गमात्रं महत्तत्वम्। अलिङ्गं प्रधानम्। तत्र विशेषादविशेषं प्रविविक्षितो योगिनो दैनंदिनलयाभ्यासात्समनस्कानीन्द्रियाणि लीयन्ते स लयः। बहिर्मुखान्येव वा भवन्ति स विक्षेपः। एवमविशेषेभ्यो लिङ्गमात्रं विविक्षतोऽपि लयविक्षेपौ स्तः। लिङ्गमात्रात्परं पुरुषं प्रविविक्षतोऽपि तौ स्तः। तावेतौ लयविक्षेपौ हेयौ श्रूयेतेलयविक्षेपरिहतं मनः कृत्वा सुनिश्चलम्। यदा यात्युन्मनीभावं तदा तत्परमं पदम्। इति। एतेषु त्रिषु लीनेष्वाद्यः सुप्त एव। द्वितीयो विगलितदेहाहंकारत्वाद्विदेहसंज्ञः। तृतीयः प्रकृतिलय इति। एतयोः समाधिर्गौणः। अतएव सूत्रितम्भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम् इति। भवप्रत्ययो जन्मान्तरहेतुरेषां समाधिर्भवति। यद्वा जन्मान्तरे एतेषां जन्मनैव समाधिसिद्धिः पक्षिणामाकाशगमनसिद्धिवद्भवतीति सूत्रार्थः। सर्वथापि तेषां सद्योमुक्तिर्नास्तीति सिद्धम्। यदातु अस्मितामात्रस्यापि निर्विकल्पे चिन्मात्रे लयो भवति तदायं विद्वान्कैवल्यं धर्ममेव समाध्याख्यमनुभवति। यमधिकृत्य श्रूयतेक्षणमेकं क्रतुशतस्य चतुःसप्तत्या यत्फलं तदवाप्नोति इति। अयमेव मोक्षाख्यः परमयनं प्राप्यं स्थानं यस्य स मुनिर्मोक्षपरायण इत्युच्यते। यतोऽस्यामेवावस्थायां योगी जीवन्मुक्त इत्युच्यते। विगतेच्छाभयक्रोध इति पादः प्रागेव व्याख्यातः। य एवंभूतः स सदा मुक्तः बन्धप्रतीतिकालेऽपि स मुक्त एवास्ति। अज्ञानमात्रव्यवधानान्मुक्तेः। एतेनाहंकारादेर्बन्धस्य कालत्रयेऽप्यसत्त्वोक्त्या मिथ्यात्वं दर्शितम्।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।। 5.28 ननु स्पर्शभावरूपा स्थितिरतिकठिना अतः स्पर्शसंयोगेऽपि या प्राप्तिः स्यात् स्पर्शजबन्धाभावे न तथा भवेदित्यभिप्रायेणाह स्पर्शानिति द्वयेन। बहिर्बाह्यान् स्पर्शान् कृत्वा बाह्याँल्लौकिकान् स्पर्शानिन्द्रियादिविषयभोगान् बहिः तेषूत्तमाद्यभावेन प्रारब्धकर्मभोगवत्। किञ्च पुनर्भ्रुवोः कालयमरूपयोरन्तरैव चक्षुः दृष्टिं कृत्वा कालयममध्ये मरणरूपोऽस्मीति दृष्ट्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानावूर्ध्वाधोगतिरूपौ संयोगविप्रयोगसुखानुभवाविव समौ कृत्वा मोक्षपरायणः विषयादित्यागपरो विगतेच्छाभयक्रोधो भूत्वा यतेन्द्रियमनोबुद्धिः सन् यः सदा मुनिर्मननशीलो भवति स स्पर्शादिभिर्मुक्त एव स्यादित्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.28।।यत इति। अनेनोपायेन यताः संयता इन्द्रियमनोबुद्धयो यस्य मोक्ष एव परमयनं प्राप्यं यस्य अतएव विगता इच्छाभयक्रोधा यस्य य एंवभूतो मुनिः स सदा जीवन्नपि मुक्त एवेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.27 5.28।।स योगी ब्रह्मनिर्वाणं 5।24 इत्यादौ प्रोक्तं तमेव योगं समासेन दर्शयन्नाह द्वाभ्याम् स्पर्शानिति।ईश्वरालम्बनं योगो जनयित्वा तु तादृशम्। बहुजन्मविपाकेन भक्तिं जनयति ध्रुवम्। योगेन तु निषिद्धेन यदि देहः प्रसिद्ध्यति। तदा कल्पान्तपर्यन्तं भावनातस्तु तत्फलम्। इति निबन्धे ईश्वरालम्बनस्यैव योगस्य भक्तिजनकत्वमिति। योगेश्वरालम्बनतायाः स्वरूपमाह स्पर्शाः बाह्याः रूपरसादयो विषयाश्चिन्तितता एवान्तः प्रविशन्ति तांस्तच्चिन्तात्यागेन बहिरेव कृत्वा ज्ञानप्रधानं चक्षुश्च भ्रुवोरन्तरे कृत्वा अर्द्धोन्मीलितलोचनेन मन एकाग्रं कृत्वेत्यर्थः। तथोर्द्धाधोगतिकौ प्राणापानौ च समौ कृत्वा कुम्भयित्वा प्राणायामाभिनयेन तदाह नासाभ्यन्तरचारिणाविति। एतेनोपायेन यतेन्द्रियमनोबुद्धिर्योगफलं न तत्र सिद्धिकामः स्यात् किन्तु मोक्षपरायणः मोक्षार्थं पर ईश्वरस्तदालम्बनो यः स सदा प्रपञ्च एवमुक्त एव जीवन्मुक्त इत्यर्थः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.28।।जिसके इन्द्रिय मन और बुद्धि वशमें किये हुए हैं जो ईश्वरके स्वरूपका मनन करनेसे मुनि यानी संन्यासी है जो शरीरमें रहता हुआ भी मोक्षपरायण है अर्थात् जो मोक्षको ही परम आश्रय परम गति समझनेवाला मुनि है तथा जो इच्छा भय और क्रोधसे रहित हो चुका है जिसके इच्छा भय और क्रोध चले गये हैं जो इस प्रकार बर्तता है वह संन्यासी सदा मुक्त ही है उसे कोई दूसरी मुक्ति प्राप्त नहीं करनी है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: 5.28।। व्याख्या   स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान् परमात्माके सिवाय सब पदार्थ बाह्य हैं। बाह्य पदार्थोंको बाहर ही छोड़ देनेका तात्पर्य है कि मनसे बाह्य विषयोंका चिन्तन न करे।बाह्य पदार्थोंके सम्बन्धका त्याग कर्मयोगमें सेवाके द्वारा और ज्ञानयोगमें विवेकके द्वारा किया जाता है। यहाँ भगवान् ध्यानयोगके द्वारा बाह्य पदार्थोंसे सम्बन्धविच्छेदकी बात कह रहे हैं। ध्यानयोगमें एकमात्र परमात्माका ही चिन्तन होनेसे बाह्य पदार्थोंसे विमुखता हो जाती है।वास्तवमें बाह्य पदार्थ बाधक नहीं हैं। बाधक है इनसे रागपूर्वक माना हुआ अपना सम्बन्ध। इस माने हुए सम्बन्धका त्याग करनेमें ही उपर्युक्त पदोंका तात्पर्य है।चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः यहाँ भ्रुवोः अन्तरे पदोंसे दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीचमें रखना अथवा दृष्टिको नासिकाके अग्रभागपर रखना (गीता 6। 13) ये दोनों ही अर्थ लिये जा सकते हैं।ध्यानकालमें नेत्रोंको सर्वथा बंद रखनेसे लयदोष अर्थात् निद्रा आनेकी सम्भावना रहती है और नेत्रोंको सर्वथा खुला रखनेसे (सामने दृश्य रहनेसे) विक्षेपदोष आनेकी सम्भावना रहती है। इन दोनों प्रकारके दोषोंको दूर करनेके लिये आधे मुँदे हुए नेत्रोंकी दृष्टिको दोनों भौंहोंके बीच स्थापित करनेके लिये कहा गया है।प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ नासिकासे बाहर निकलनेवाली वायुको प्राण और नासिकाके भीतर जानेवाली वायुको अपान कहते हैं।प्राणवायुकी गति दीर्घ और अपानवायुकी गति लघु होती है। इन दोनोंको सम करनेके लिये पहले बायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर दायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। फिर दायीं नासिकासे अपानवायुको भीतर ले जाकर बायीं नासिकासे प्राणवायुको बाहर निकाले। इन सब क्रियाओंमें बराबर समय लगना चाहिये। इस प्रकार लगातार अभ्यास करते रहनेसे प्राण और अपानवायुकी गति सम शान्त और सूक्ष्म हो जाती है। जब नासिकाके बाहर और भीतर तथा कण्ठादि देशमें वायुके स्पर्शका ज्ञान न हो तब समझना चाहिये कि प्राणअपानकी गति सम हो गयी है। इन दोनोंकी गति

Chapter 5 (Part 17)

सम होनेपर (लक्ष्य परमात्मा रहनेसे) मनसे स्वाभाविक ही परमात्माका चिन्तन होने लगता है। ध्यानयोगमें इस प्राणायामकी आवश्यकता होनेसे ही इसका उपर्युक्त पदोंमें उल्लेख किया गया है।यतेन्द्रियमनोबुद्धिः प्रत्येक मनुष्यमें एक तो इन्द्रियोंका ज्ञान रहता है और एक बुद्धिका ज्ञान। इन्द्रियाँ और बुद्धि दोनोंके बीचमें मनका निवास है। मनुष्यको देखना यह है कि उसके मनपर इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है या बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है अथवा आंशिकरूपसे दोनोंके ज्ञानका प्रभाव है। इन्द्रियोंके ज्ञानमें संयोग का प्रभाव पड़ता है और बुद्धिके ज्ञानमें परिणाम का। जिन मनुष्योंके मनपर केवल इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव है वे संयोगजन्य सुखभोगमें ही लगे रहते हैं और जिनके मनपर बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव है वे (परिणामकी ओर दृष्टि रहनेसे) सुखभोगका त्याग करनेमें समर्थ हो जाते हैं न तेषु रमते बुधः (गीता 5। 22)।प्रायः साधकोंके मनपर आंशिकरूपसे इन्द्रियों और बुद्धि दोनोंके ज्ञानका प्रभाव रहता है। उनके मनमें इन्द्रियों तथा बुद्धिके ज्ञानका द्वन्द्व चलता रहता है। इसलिये वे अपने विवेकको महत्त्व नहीं दे पाते और जो करना चाहते हैं उसे कर भी नहीं पाते। यह द्वन्द्व ही ध्यानमें बाधक है। अतः यहाँ मन बुद्धि तथा इन्द्रियोंको वशमें करनेका तात्पर्य है कि मनपर केवल बुद्धिके ज्ञानका प्रभाव रह जाय इन्द्रियोंके ज्ञानका प्रभाव सर्वथा मिट जाय।मुनिर्मोक्षपरायणः परमात्मप्राप्ति करना ही जिनका लक्ष्य है ऐसे परमात्मस्वरूपका मनन करनेवाले साधकको यहाँ मोक्षपरायणः कहा गया है। परमात्मतत्त्व सब देश काल आदिमें परिपूर्ण होनेके कारण सदासर्वदा सबको प्राप्त ही है। परन्तु दृढ़ उद्देश्य न होनेके कारण ऐसे नित्यप्राप्त तत्त्वकी अनुभूतिमें देरी हो रही है। यदि एक दृढ़ उद्देश्य बन जाय तो तत्त्वकी अनुभूतिमें देरीका काम नहीं है। वास्तवमें उद्देश्य पहलेसे ही बनाबनाया है क्योंकि परमात्मप्राप्तिके लिये ही यह मनुष्यशरीर मिला है। केवल इस उद्देश्यको पहचानना है। जब साधक इस उद्देश्यको पहचान लेता है तब उसमें परमात्मप्राप्तिकी लालसा उत्पन्न हो जाती है। यह लालसा संसारकी सब कामनाओंको मिटाकर साधकको परमात्मतत्त्वका अनुभव करा देती है। अतः परमात्मप्राप्तिके उद्देश्यको पहचाननेके लिये ही यहाँ मोक्षपरायणः पदका प्रयोग हुआ है।कर्मयोग सांख्ययोग ध्यानयोग भक्तियोग आदि सभी साधनोंमें एक दृढ़ निश्चय या उद्देश्यकी बड़ी आवश्यकता है। अगर अपने कल्याणका उद्देश्य ही दृढ़ नहीं होगा तो साधनसे सिद्धि कैसे मिलेगी इसलिये यहाँ मोक्षपरायणः पदसे ध्यानयोगमें दृढ़ निश्चयकी आवश्यकता बतायी गयी है।विगतेच्छाभयक्रोधो यः अपनी इच्छाकी पूर्तिमें बाधा देनेवाले प्राणीको अपनेसे सबल माननेपर उससे भय होता है कि निर्बल माननेसे उसपर क्रोध आता है। ऐसे ही जीनेकी इच्छा रहनेपर मृत्युसे भय होता है और दूसरोंसे अपनी इच्छापूर्ति करवाने तथा दूसरोंपर अपना अधिकार जमानेकी इच्छासे क्रोध होता है। अतः भय और क्रोध होनेमें इच्छा ही मुख्य है। यदि मनुष्यमें इच्छापूर्तिका उद्देश्य न रहे प्रत्युत एकमात्र परमात्मप्राप्तिका उद्देश्य रह जाय तो भयक्रोधसहित इच्छाका सर्वथा अभाव हो जाता है। इच्छाका सर्वथा अभाव होनेपर मनुष्य मुक्त हो जाता है। कारण कि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छासे ही मनुष्य जन्ममरणरूप बन्धनमें पड़ताहै। साधकको गम्भीरतापूर्वक विचार करना चाहिये कि क्या वस्तुओंकी इच्छासे वस्तुएँ मिल जाती हैं और क्या जीनेकी इच्छासे मृत्युसे बच जाते हैं वास्तविकता तो यह है कि न तो वस्तुओंकी इच्छा पूरी कर सकते हैं और न मृत्युसे बच सकते हैं। इसलिये यदि साधकका यह दृढ़ निश्चय हो जाय कि मुझे एक परमात्मप्राप्तिके सिवाय कुछ नहीं चाहिये तो वह वर्तमानमें ही मुक्त हो सकता है। परन्तु यदि वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छा रहेगी तो इच्छा कभी पूरी नहीं होगी और मृत्युके भयसे भी बचाव नहीं होगा तथा क्रोधसे भी छुटकारा नहीं होगा। इसलिये मुक्त होनेके लिये इच्छारहित होना आवश्यक है।यदि वस्तु मिलनेवाली है तो इच्छा किये बिना भी मिलेगी और यदि वस्तु नहीं मिलनेवाली है तो इच्छा करनेपर भी नहीं मिलेगी। अतः वस्तुका मिलना या न मिलना इच्छाके अधीन नहीं है प्रत्युत किसी विधानके अधीन है। जो वस्तु इच्छाके अधीन नहीं है उसकी इच्छाको छोड़नेमें क्या कठिनाई है यदि वस्तुकी इच्छा पूरी होती हो तो उसे पूरी करनेका प्रयत्न करते और यदि जीनेकी इच्छा पूरी होती हो तो मृत्युसे बचनेका प्रयत्न करते। परन्तु इच्छाके अनुसार न तो सब वस्तुएँ मिलती हैं और न मृत्युसे बचाव ही होता है। यदि वस्तुओंकी इच्छा न रहे तो जीवन आनन्दमय हो जाता है और यदि जीनेकी इच्छा न रहे तो मृत्यु भी आनन्दमयी हो जाती है। जीवन तभी कष्टमय होता है जब वस्तुओंकी इच्छा करते हैं और मृत्यु तभी कष्टमयी होती है जब जीनेकी इच्छा करते हैं। इसलिये जिसने वस्तुओंकी और जीनेकी इच्छाका सर्वथा त्याग कर दिया है वह जीतेजी मुक्त हो जाता है अमर हो जाता है।सदा मुक्त एव सः उत्पत्तिविनाशशील पदार्थोंके साथ अपना सम्बन्ध मानना ही बन्धन है। इस माने हुए सम्बन्धका सर्वथा त्याग करना ही मुक्ति है। जो मुक्त हो गया है उसपर किसी भी घटना परिस्थिति निन्दास्तुति अनुकूलताप्रतिकूलता जीवनमरण आदिका किञ्चिन्मात्र भी असर नहीं पड़ता।सदा मुक्त एव पदोंका तात्पर्य है कि वास्तवमें साधक स्वरूपसे सदा मुक्त ही है। केवल उत्पन्न और नष्ट होनेवाली वस्तुओंसे अपना सम्बन्ध माननेके कारण उसे अपने मुक्त स्वरूपका अनुभव नहीं हो रहा है। संसारसे माना हुआ सम्बन्ध मिटते ही स्वतःसिद्ध मुक्तिका अनुभव हो जाता है। सम्बन्ध   भगवान्ने योगनिष्ठा और सांख्यनिष्ठाका वर्णन करके दोनोंके लिये उपयोगी ध्यानयोगका वर्णन किया। अब सुगमतापूर्वक कल्याण करनेवाली भगवन्निष्ठाका वर्णन करते हैं।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.27 5.28।।स्पर्शानिति। यतेन्द्रियेति। बाह्यस्पर्शान् बहिः कृत्वा अनङ्गीकृत्य भ्रुवोः वामदक्षिणदृष्ट्योः क्रोधरागात्मकयोः अन्तरे तद्रहिते स्थानविशेषे चक्षुरुपलक्षितानि सर्वेन्द्रियाणि कृत्वा विधाय प्राणापानौ धर्माधर्मौ चित्तवृत्त्यभ्यन्तरे साम्येनावस्थाप्य आसीत (K omits आसीत)। नसते कौटिल्येन असाम्येन क्रोधादिवशात् व्यवहरति इति नासा चित्तवृत्तिः। एतदेव बाह्ये। एवंविधो योगी सर्वव्यवहारान्वर्तयन्नपि मुक्त एव।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.28।।विषयप्रावण्यं परित्यज्य चक्षुरपि भ्रुवोर्मध्ये विक्षेपपरिहारार्थं कृत्वा प्राणापानौ च नासाभ्यन्तरचरणशीलौ समौ न्यूनाधिकवर्जितौ कुम्भकेन निरुद्धौ कृत्वा करणानि सर्वाण्येवं संयम्य प्राणायामपरो भूत्वा किं कुर्यादित्यपेक्षायामाह यतेन्द्रियेति। इन्द्रियादिसंयमं कृत्वा मोक्षमेवापेक्षमाणो मननशीलः स्यादित्यर्थः। ज्ञानातिशयनिष्ठस्य सर्वदेच्छादिशून्यस्य संन्यासिनो मुक्तेरनायाससिद्धत्वान्न तस्य किंचिदपि कर्तव्यमस्तीत्याह विगतेति। पूर्वार्धाक्षराणि व्याकरोति यतेत्यादिना। द्वितीयार्धाक्षराणि व्याचष्टे विगतेत्यादिना।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.27 5.28।।ध्यायिनां मुक्तत्वं साक्षाच्चेत्प्रमाणविरोधः ज्ञानद्वारा चेत्पुनरुक्तिरित्यतः श्लोकद्वयतात्पर्यमाह ध्यानेति। मुक्त एव स इति स्तुतिरिति भावः। पदानां व्यवहितत्वादन्वयमाह बाह्यानिति। स्पृश्यन्त इति स्पर्शाः शब्दाद्याः। स्पर्शा बाह्या एव तेषां किं बहिष्करणं इत्यत आह श्रोत्रादीनीति। योगेन प्रत्याहारेण श्रोत्रादीनामनियमे पट्वभ्यासादरप्रत्ययवशाच्छब्दाद्या आन्तरा इव भवन्ति। तन्िनयमे तु बाह्या बहिष्कृताः स्युरिति भावः। कृत्वेत्यस्यानुवृत्त्या योजयति चक्षुरिति। दुर्घटमेतदित्यत आह भ्रुवोरिति। चक्षुर्वृत्तौ चक्षुश्शब्द इत्यर्थः।सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं 6।13 इति वक्ष्यमाणविरोध इत्यत आह उक्तं चेति। न्यूनाधिकभावराहित्यं समीकरणमित्यन्यथाप्रतीतिनिरासायानूद्य व्याचष्टे प्राणेति। कुम्भके प्राणायामे ततश्च समौ निर्विकारौ निश्चलावित्यर्थः। इतरत्समीकरणं कुम्भकार्थमेवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.27 5.28।।ध्यानप्रकारमाह स्पर्शानित्यादिना। बाह्यान्स्पर्शन्वहिः कृत्वा श्रोत्रादीनि योगेन नियम्येत्यर्थः। चक्षुर्भ्रुवोरन्तरं कृत्वा भ्रुवोर्मध्यमवलोकयन्नित्यर्थः। उक्तं च नासाग्रे वा भ्रुवोर्मध्ये ध्यानी चक्षुर्निधापयेत् इति। प्राणापानौ समौ कृत्वा कुम्भके स्थितत्वेत्यर्थः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.28।।बाह्यान् विषयस्पर्शान् बहिः कृत्वा बाह्येन्द्रियव्यापारं सर्वम् उपसंहृत्य योगयोग्यासने ऋजुकाय उपविश्य चक्षुः भ्रुवोः अन्तरे नासाग्रे विन्यस्य नासाभ्यन्तरचारिणौ प्राणापानौ समौ कृत्वा उच्छवासनिः श्वासौ समगति कृत्वा आत्मावलोकनाद् अन्यत्र प्रवृत्त्यनर्हेन्द्रियमनोबुद्धिः तत एव विगतेच्छाभयक्रोधो मोक्षपरायणो मोक्षैकप्रयोजनो मुनिः आत्मावलोकनशीलो यः सदा मुक्त एव साध्यदशायाम् इव साधनदशायाम् अपि मुक्त एव स इत्यर्थः।उक्तस्य नित्यनैमित्तिककर्मेति कर्तव्यताकस्य कर्मयोगस्य योगशिरस्कस्य सुशकताम् आह

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.27 5.28।। स्पर्शान् शब्दादीन् कृत्वा बहिः बाह्यान् श्रोत्रादिद्वारेण अन्तः बुद्धौ प्रवेशिताः शब्दादयः विषयाः तान् अचिन्तयतः शब्दादयो बाह्या बहिरेव कृताः भवन्ति तान् एवं बहिः कृत्वा चक्षुश्चैव अन्तरे भ्रुवोः कृत्वा इति अनुषज्यते। तथा प्राणापानौ नासाभ्यन्तरचारिणौ समौ कृत्वा यतेन्द्रियमनोबुद्धिः यतानि संयतानि इन्द्रियाणि मनः बुद्धिश्च यस्य सः यतेन्द्रियमनोबुद्धिः मननात् मुनिः संन्यासी मोक्षपरायणः एवं देहसंस्थानात् मोक्षपरायणः मोक्ष एव परम् अयनं परा गतिः यस्य सः अयं मोक्षपरायणो मुनिः भवेत्। विगतेच्छाभयक्रोधः इच्छा च भयं च क्रोधश्च इच्छाभयक्रोधाः ते विगताः यस्मात् सः विगतेच्छाभयक्रोधः यः एवं वर्तते सदा संन्यासी मुक्त एव सः न तस्य मोक्षायान्यः कर्तव्योऽस्ति।।एवं समाहितचित्तेन किं विज्ञेयम् इति उच्यते भोक्तारं यज्ञतपसां यज्ञानां तपसां च कर्तृरूपेण देवतारूपेण च सर्वलोकमहेश्वरं सर्वेषां लोकानां महान्तम् ईश्वरं सुहृदं सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां प्रत्युपकारनिरपेक्षतया उपकारिणं सर्वभूतानां हृदयेशयं सर्वकर्मफलाध्यक्षं सर्वप्रत्ययसाक्षिणं मां नारायणं ज्ञात्वा शान्तिं सर्वसंसारोपरतिम् ऋच्छति प्राप्नोति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येपञ्चमोऽध्यायः।।

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【 Verse 5.29 】

▸ Sanskrit Sloka: भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् | सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ||

▸ Transliteration: bhoktāraṁ yajñatapasāṁ sarva-loka-maheśvaram | suhṛdaṁ sarvabhūtānāṁ jñātvā māṁ śāntimṛcchati ||

▸ Glossary: bhoktāraṁ: one who enjoys; yajña: sacrifice; tapasāṁ: penance; sarva: all; loka: worlds; maheśvārāṁ: lord; suhṛdaṁ: benefactor; sarva: all; bhūtānāṁ: living beings; jñātvā: knowing; māṁ: me; śāntiṁ: peace; ṛcchati: achieves

▸ Translation by SPH JGM HDH Sri Nithyananda Paramashivam: 5.29 One who knowing Me as the purpose of sacrifice and penance, as the lord of all the worlds and the benefactor of all the living beings, achieves peace.

▸ BG - Hindi Translation By Swami Ramsukhdas: ।।5.29।।भक्त मुझे सब यज्ञों और तपोंका भोक्ता सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका सुहृद् (स्वार्थरहित दयालु और प्रेमी) जानकर शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Translation By Swami Tejomayananda: ।।5.29।। (साधक भक्त) मुझे यज्ञ और तपों का भोक्ता और सम्पूर्ण लोकों का महान् ईश्वर तथा भूतमात्र का सुहृद् (मित्र) जानकर शान्ति को प्राप्त होता है।।

▸ English Commentary By Swami Sivananda: 5.29 भोक्तारम् the enjoyer? यज्ञतपसाम् of sacrifices and austerities? सर्वलोकमहेश्वरम् the great Lord of all worlds? सुहृदम् friend? सर्वभूतानाम् of all beings? ज्ञात्वा having known? माम् Me? शान्तिम् peace? ऋच्छति attains.Commentary I am the Lord of all sacrifices and austerities. I am their author? goal and their God. I am the friend of all beings? the doer of good to them without expecting any return for it. I am the dispenser of the fruits of all actions and the silent witness of their minds? thoughts and actions as I dwell in their hearts. On knowing Me? they attain peace and liberation or Moksha (deliverance from the round of birth and death and all worldly miseries and sorrows). (Cf.V.15IX.24)Thus in the Upanishads of the glorious Bhagavad Gita? the science of the Eternal? the scripture of Yoga? the dialogue between Sri Krishna and Arjuna? ends the fifth discourse entitledThe Yoga of Renunciation of Action.

▸ English Translation By Dr. S. Sankaranarayan: 5.29. There is no such translation for this sloka.

▸ English Translation by Shri Purohit Swami: 5.29 Knowing me as Him who gladly receives all offerings of austerity and sacrifice, as the Might Ruler of all the Worlds and the Friend of all beings, he passes to Eternal Peace."

▸ English Translation By Swami Adidevananda: 5.29 Knowing Me as the enjoyer of all sacrifices and austerities, as the Supreme Lord of all the worlds, as the Friend of every being, he attains peace.

▸ English Translation By Swami Gambirananda: 5.29 One attains Peace by knowing Me who, as the great Lord of all the worlds, am the enjoyer of sacrifices and austerities, (and) who am the friend of all creatures.

▸ English Translation By Swami Sivananda: 5.29 He who knows Me as the enjoyer of sacrifices and austerities, the great Lord of all the worlds and the friend of all beings, attains to peace.

▸ English Translation of Abhinavgupta's Sanskrit Commentary By Dr. S. Sankaranarayan: 5.29 Bhokatram etc. [The Lord is deemed to be] the enjoyer in the caste of their fruit of the sacrifices. For, it is in favour of Him that the fruit is renounced. the same is with regard to the austerities. By knowing the nautre of the Lord as such, a man of Yoga is released, whatever way he may remain in.

▸ English Translation of Ramanuja's Sanskrit Commentary By Swami Adidevananda: 5.29 Knowing Me as the enjoyer of all sacrifices and austerities, as the Supreme Lord of all the worlds, and as the Friend of every being, he attains peace, i.e., wins happiness even while performing Karma Yoga. 'Him who is the Supreme Lord of all worlds' means 'Him who is the Lord of all the lords of the worlds.' For the Sruti says: 'Him who is the supreme mighty Lord of lords' (Sve. U., 6.7). The meaning is that knowing Me as the Supreme Lord of all the worlds and the 'friend' of all and considering Karma Yoga to be My worship, he becomes gladly engaged in it. All beings endeavour to please a 'friend'.

▸ English Translation Of Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Swami Gambirananda: 5.29 Rcchati, one attains; santim, Peace, complete cessation of transmigration; jnatva, by knowing; mam, Me who am Narayana; who, as the sarva-loka-mahesvaram, great Lord of all the worlds; am the bhoktaram, enjoyer (of the fruits); yajna-tapasam, of sacrifices and austerities, as the performer and the Deity of the sacrifices and austerities (respectively); (and) who am the suhrdam, friend; sarva-bhutanam, of all creatures-who am the Benefactor of all without consideration of return, who exist in the heart of all beings, who am the dispenser of the results of all works, who am the Witness of all perceptions.

▸ Hindi Commentary By Swami Chinmayananda: ।।5.29।। हमको सदैव इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि भगवान् श्रीकृष्ण जब कभी स्वयं के लिए मैं शब्द का प्रयोग करते हैं तब उनका अभिप्राय भूतमात्र के हृदय में वास करने वाली आत्मा से होता है और न कि देवकी पुत्र शरीरधारी श्रीकृष्ण से। अहंकार का मूलस्वरूप शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा है जो देहादि उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण कर्ता और भोक्ता के रूप में प्रतीत होता है। यज्ञ शब्द का अर्थ पहले भी बताया जा चुका है। गीता के अनुसार किसी भी कार्यक्षेत्र में निस्वार्थ भाव से विश्व कल्याण के लिए अर्पित किया गया कर्म यज्ञ कहलाता है। जिन शक्तियों का हम व्यर्थ में अपव्यय करते हैं उनका आत्मसंयम के द्वारा संचय करना तप है। फिर इस तप का उपयोग आत्म प्राप्ति के लिए किया जाना चाहिए।यह आत्मा वास्तव में सब देवों का देवमहेश्वर है। ज्ञान और कर्म के सम्पूर्ण व्यापारों के नियन्ता के अर्थ में यहाँ ईश्वर शब्द का प्रयोग किया गया है। शास्त्रों के अनुसार प्रत्येक कर्मेन्द्रिय तथा ज्ञानेन्द्रिय का एकएक अधिष्ठाता देवता है। नेत्र से रूपवर्ण श्रोत्र से शब्द और इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों के द्वारा भिन्नभिन्न विषयों का ज्ञान होता है। इन दस इन्द्रियों का शासक और नियन्ता हैचैतन्य आत्मा। अत श्रीकृष्ण यहाँ आत्मा को महेश्वर विशेषण देते हैं।इस श्लोक में हमारा अनुभव यह है कि किसी बड़े पद के शासकीय अधिकारी के पास पहुँचने में अत्यन्त कठिनाई का सामना करना पड़ता है और उसमें भी राजनीति सत्ता के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति की ओर तो सामान्य जन भयमिश्रित आदर के साथ देखते हैं। सामान्य मनुष्य में तो उसके समीप जाने का साहस ही नहीं होता। परन्तु सर्वलोक महेश्वर आत्मा के साथ यह बात नहीं है। भगवान् कहते हैं आत्मा सर्व प्राणियों का सुहृद (मित्र) है।मुझे (इस प्रकार) जानकर वह पुरुष शान्ति को प्राप्त होता है। यहाँ जानकर शब्द का अर्थ यह नहीं कि जैसे हम किसी फूल या फल को विषय रूप में उससे भिन्न रहकर जानते हैं वैसे ही श्रीकृष्ण को जानना है। ज्ञात्वा शब्द से तात्पर्य है श्रीकृष्ण को आत्मरूप से अनुभव करना। यज्ञ और तपों के भोक्ता महेश्वर और सुहृद भगवान् श्रीकृष्ण को आत्मरूप से साक्षात् अनुभव करके साधक परम शान्ति को प्राप्त होता है।Conclusionँ़ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मसंन्यासयोगो नाम पंचमोऽध्याय।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Dhanpati: ।।5.29।।एवं द्वाभ्यां ध्यानयोगं सूत्रयित्वाऽन्ते मुक्त एव स इत्युक्तं तत्किं साक्षाज्ज्ञानं विनैव मोक्षसाधनमुत ज्ञानद्वारेणेति संशयनिवृत्तयेतमेव विदित्वाति मृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनायज्ञानदेव तु कैवल्यंऋते ज्ञानान्न मोक्षः इत्यादिश्रुत्यनुरोधेन द्वितीयपक्षं सिद्धान्तयति। तृतीयेन भोक्तारं यज्ञानां तपसां च कर्तृरुपेण देवतारुपेण च सर्वेषां ब्रह्मादिस्थावरपर्यन्तानां महान्तरमीश्वरं सर्वभूतानां सुहृदं सर्वप्राणिनां प्रत्युपकार निरपेक्षतया उपकारिणं सर्वभूतानां हृदयस्थं मां नारायणमात्मत्वेन ज्ञात्वा शान्तिं सर्वसंसारोपरतिं मोक्षाख्यामृच्छति प्राप्नोति। यत्तु चतुर्विशतिश्लोकव्याख्यानानन्तरं एवं मुक्त उक्तः। मुमुक्षवस्त्रिविधाः श्रवणमनननिदिध्यासनरताः तेषु श्रवणनिरतो द्वितीयश्लोकेनोच्यते लभन्त इति अथ मनननिरतस्तृतीयश्लोकेनोच्यते कामेति अवशिष्टश्लोकद्वयेन निदिध्यासननिरत उच्यते स्पर्शानितीति वर्णयन्ति तच्चिन्त्यम्। लभन्ते ब्रह्म निर्वाणमिति मोक्षलाभस्य श्रवणमात्रेणानुपपत्तेः द्वारकल्पनाया गौणत्वकल्पनस्य च सतिसंभवेऽन्याय्यत्वात्। विदितात्मनामित्यस्य षष्ठाध्यायसूत्रस्थानीयस्य प्राणेत्यादिना स्पष्टतया प्रतीयमानस्य ध्यानयोगस्य च बाधकप्रसङ्गादितिदिक्। तदनेन पञ्चमाध्यायेनाशुद्धचित्तेन कृताज्ज्ञानिष्ठारहितात्संन्यासात्कर्मयोगस्य चित्तशुद्य्धादिसंपादकस्य श्रैष्ठ्यमुक्त्वा शुद्धचित्तस्य संन्यासिनाः शमदमादिसंपन्नस्य कामाद्युद्भवं वेगमिहैव सोढुं शक्तस्य योगाधिकृतस्य त्वंपदार्थाभिज्ञस्य परमात्मानं प्रत्यक्त्वेन जानतो मुक्तिरित्युक्तम्। इति श्रीपरमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीबालस्वामिश्रीपादशिष्यदत्तवंशावतंसरामकुमारसूनुधनपतिविदुषा विरचितायां श्रीगीताभाष्योत्कर्षदीपिकायां पञ्चमोऽध्यायः।।5।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhusudan Saraswati: ।।5.29।।एंव योगयुक्तः किं ज्ञात्वा मुच्यत इति तदाह सर्वेषां यज्ञानां तपसां च कर्तृरूपेण देवतारूपेण च भोक्तारं भोगकर्तारं पालकमिति वा।भुज पालनाभ्यवहारयोः इति धातुः। सर्वेषां लोकानां महान्तमीश्वरं हिरण्यगर्भादीनामपि नियन्तारं सर्वेषां प्राणिनां सुहृदं प्रत्युपकारनिरपेक्षतयोपकारिणं सर्वान्तर्यामिणं सर्वभासकं परिपूर्णसच्चिदानन्दैकरसं परमार्थसत्यं सर्वात्मानं नारायणं मां ज्ञात्वा आत्मत्वेन साक्षात्कृत्य शान्तिं सर्वसंसारोपरतिं मुक्तिमृच्छति प्राप्नोतीत्यर्थः। त्वां पश्यन्नपि कथं नाहं मुक्त इत्याशङ्कानिराकरणाय विशेषणानि। उक्तरूपेणैव मम ज्ञानं मुक्तिकारणमिति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Neelkanth: ।।5.29।।एवं समाहितचित्तेन किं विज्ञेयमित्युच्यते भोक्तारमिति। सोपाधिकेन रूपेण यज्ञानां तपसां च कर्तृरूपेण देवतारूपेण च भोक्तारम्। तथा सर्वेषां भूतानां हिरण्यगर्भादीनामपि महान्तं व्यापकमीश्वरमीशितारमन्तर्यामिणम्। सुहृदं सर्वभूतानां प्राणिनां प्रत्युपकारनिरपेक्षतयोपकारिणं सर्वप्रत्ययसाक्षिणं नारायणं मां प्रत्यगभेदेन ज्ञात्वा साक्षात्कृत्य तद्भावं प्राप्य शान्तिमनुपाध्यवस्थां निरुपाख्यां कैवल्यसंज्ञां ऋच्छति प्राप्नोति। एवं च सोपाधिब्रह्मभावप्राप्तिपूर्वकैव निरुपाधिप्राप्तिरिति गम्यते। यथोक्तं वार्तिकसारेसोपाधिर्निरुपाधिश्च द्वेधा ब्रह्मविदुच्यते। सोपाधिकः स्यात्सर्वात्मा निरुपाख्योऽनुपाधिकः। जक्षन्क्रीडन्रतिं प्राप्त इति सोपाधिकस्य तु। छान्दोग्ये सर्वकामाप्तिः सार्वात्म्यात्स्पष्टमीरिता। अहमन्नं तथान्नादः श्लोककार्यप्यहो अहम्। इति तत्त्वविदः सामगाने सर्वात्मता श्रुता। अत्रापि चक्रदृष्टान्तात्सोपाधिस्तत्त्वविच्छ्रुतः। अपूर्वानपराद्युक्त्या श्रोष्यते निरुपाधिकः। इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Purushottamji: ।।5.29।।ननु कथमेतावन्मात्रेण स्पर्शादिमोक्षः स्यात् इत्याशङ्क्याह भोक्तारमिति। यज्ञतपसां पुण्योपार्जिततापानां भोक्तारं तापोद्भूतरसभोक्तारं सर्वलोकमहेश्वरं स्वक्रीडार्थं जगत्कर्तारं सर्वभूतानां सुहृदं भक्तिमुक्तिस्वरूपरसादिदानेन। एतादृशं मां ज्ञात्वा लौकिकाच्छान्तिमृच्छतिं प्राप्नोति।सन्न्यासरूपकथनान्मनोवैकल्पिकं भ्रमम्। नाशयामास कौन्तेयप्रश्नव्याजान्नतोऽस्मि तम्।।5।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Sridhara Swami: ।।5.29।।नन्वेवमिन्द्रियादिसंयममात्रेण कथं मुक्तिः स्यान्न तावन्मात्रेण किंतु ज्ञानद्वारेणेत्याह भोक्तारमिति। यज्ञानां तपसां च मद्भक्तैः समर्पितानां यदृच्छया भोक्तारं पालकमिति वा सर्वेषां लोकानां महान्तमीश्वरं सर्वेषां भूतानां सुहृदं निरपेक्षोपकारिणमन्तर्यामिणं मां ज्ञात्वा मत्प्रसादेन शान्तिं मोक्षमृच्छति प्राप्नोति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Vallabhacharya: ।।5.29।।ननु एवमिन्द्रियादिसंयममात्रेण कथं मुक्तः त्यात् इत्याशङ्क्य न तावन्मात्रेण किन्तु भगवन्माहात्म्यज्ञानद्वारेणेत्याह भोक्तारमिति। यज्ञतपसां भोक्तृत्वेन ज्ञातः कर्मकाण्डतात्पर्यभूतः सर्वलोकमहेश्वर इत्युपासनातात्पर्यभूतः सर्वभूतानामात्मा चेति ज्ञानकाण्डतात्पर्यभूत इति मां ज्ञात्वा शान्तिमुक्तां श्रोतव्यश्रुतविषयां कर्मफलान्निर्वेदरूपां प्राप्नोति।विकल्पकल्पनां त्यक्त्वा येनैवं साङ्ख्ययोगयोः। एकोऽर्थ उक्तः पार्थाय तं सर्वज्ञं हरिं नुमः।

▸ Sri Shankaracharya's Sanskrit Commentary By Sri Harikrishnadas Goenka: ।।5.29।।इस प्रकार समाहितचित्त हुए पुरुषद्वारा जाननेयोग्य क्या है इसपर कहते हैं ( मनुष्य ) मुझ नारायणको कर्तारूपसे और देवरूपसे समस्त यज्ञों और तपोंका भोक्ता सर्वलोकमहेश्वर अर्थात् सब लोकोंका महान् ईश्वर समस्त प्राणियोंका सुहृद् प्रत्युपकार न चाहकर उनका उपकार करनेवाला सब भूतोंके हृदयमें स्थित सब कर्मोंके फलोंका स्वामी और सब संकल्पोंका साक्षी जानकर शान्तिको अर्थात् सब संसारसे उपरामताको प्राप्त हो जाता है।

▸ Hindi Commentary By Swami Ramsukhdas: ।।5.29।। व्याख्या   भोक्तारं यज्ञतपसाम् जब मनुष्य कोई शुभ कर्म करता है तब वह जिनसे शुभ कर्म करता है उन शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदिको अपना मानता है और जिसके लिये शुभ कर्म करता है उसे उस कर्मका भोक्ता मानता है जैसे किसी देवताकी पूजा की तो उस देवताको पूजारूप कर्मका भोक्ता मानता है किसीकी सेवा की तो उसे सेवारूप कर्मका भोक्ता मानता है किसी भूखे व्यक्तिको अन्न दिया तो उसे अन्नका भोक्ता मानता है आदि। इस मान्यताको दूर करनेके लिये भगवान् उपर्युक्त पदोंमें कहते हैं कि वास्तवमें सम्पूर्ण शुभ कर्मोंका भोक्ता मैं ही हूँ। कारण कि प्राणिमात्रके हृदयमें भगवान् ही विद्यमान हैं (टिप्पणी प0 321)। इसलिये किसीका पूजन करना किसीको अन्नजल देना किसीको मार्ग बताना आदि जितने भी शुभ कर्म हैं उन सबका भोक्ता भगवान्को ही मानना चाहिये। लक्ष्य भगवान्पर ही रहना चाहिये प्राणीपर नहीं।नवें अध्यायके चौबीसवें श्लोकमें भी भगवान्ने अपनेको सम्पूर्ण यज्ञोंका भोक्ता बताया है अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता।दूसरी बात यह है कि जिनसे शुभ कर्म किये जाते हैं वे शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि पदार्थ आदि अपने नहीं हैं प्रत्युत भगवान्के हैं। उनको अपना मानना भूल ही है। उनको अपना मानकर अपने लिये शुभ कर्मकरनेसे मनुष्य स्वयं उन कर्मोंका भोक्ता बन जाता है। अतः भगवान् कहते हैं कि तुम सम्पूर्ण शुभ कर्मोंको अपने लिये कभी मत करो केवल मेरे लिये ही करो। ऐसा करनेसे तुम उन कर्मोंके फलभागी नहीं बनोगे और तुम्हारा कर्मोंसे सम्बन्धविच्छेद हो जायगा।कामनासे ही सम्पूर्ण अशुभ कर्म होते हैं। कामनाका त्याग करके केवल भगवान्के लिये ही सब कर्म करनेसे अशुभ कर्म तो स्वरूपसे ही नहीं होते तथा शुभ कर्मोंसे अपना सम्बन्ध नहीं रहता। इस प्रकार सम्पूर्ण कर्मोंसे सर्वथा सम्बन्धविच्छेद होनेपर परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है।सर्वलोकमहेश्वरम् भिन्नभिन्न लोकोंके भिन्नभिन्न ईश्वर हो सकते हैं किन्तु वे भी भगवान्के अधीन ही हैं। भगवान् सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं इसलिये यहाँ सर्वलोकमहेश्वरम् पद दिया गया है। तात्पर्य यह है कि सम्पूर्ण सृष्टिके एकमात्र स्वामी भगवान् ही हैं फिर कोई ईमानदार व्यक्ति सृष्टिकी किसी भी वस्तुको अपनी कैसे मान सकता है शरीर इन्द्रियाँ मन बुद्धि प्राण स्त्री पुत्र धन जमीन मकान आदिको अपने मानते हुए प्रायः लोग कहा करते हैं कि भगवान् ही सारे संसारके मालिक हैं। परन्तु ऐसा कहना समझदारी नहीं है क्योंकि मनुष्य जबतक शरीर इन्द्रियाँ मन आदिको अपने मानता है तबतक भगवान्को सारे संसारका स्वामी कहना अपनेआपको धोखा देना ही है। कारण कि यदि सभी लोग शरीरादि पदार्थोंको अपनेअपने ही मानते रहें तो बाकी क्या रहा जिसके स्वामी भगवान् कहलायें अर्थात् भगवान्के हिस्सेमें कुछ नहीं बचा। इसलिये सब कुछ भगवान्का है ऐसा वही कह सकता है जो शरीरादि किसी भी पदार्थको अपना नहीं मानता। जो किसी भी वस्तुको अपनी मानता है वह वास्तवमें भगवान्को यथार्थरूपसे सर्वलोकमहेश्वर मानता ही नहीं। वह जितनी वस्तुओंको अपनी मानता है उतने अंशमें भगवान्को सर्वलोकमहेश्वर माननेमें कमी रहती है।मनुष्यको शरीरादि पदार्थोंका सदुपयोग करनेका ही अधिकार है अपने माननेका बिलकुल नहीं। इन पदार्थोंको अपने न मानकर केवल भगवान्के ही मानते हुए उन्हींकी सेवामें लगा देनेसे परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है।सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति जो सम्पूर्ण लोकोंके ईश्वरोंके भी ईश्वर हैं वे बिना कारण स्वाभाविक ही प्राणिमात्रका हित करनेवाले प्राणिमात्रकी रक्षा करनेवाले तथा प्राणिमात्रसे प्रेम करनेवाले हैं और ऐसा हितैषी रक्षक तथा प्रेमी दूसरा कोई नहीं है इस प्रकार जान (टिप्पणी प0 322.1) लेनेसे परमशान्ति प्राप्त हो जाती है क्योंकि वे वास्तवमें ऐसे ही हैं। महान् शक्तिशाली भगवान् बिना किसी प्रयोजनके हमारे परम सुहृद् हैं फिर भय चिन्ता उद्वेग अशान्ति आदि कैसे हो सकते हैं जीवमात्रका बिना कारण हित करनेवाले दो ही हैं भगवान् और उनके भक्त (टिप्पणी प0 322.2)। भगवान्को किसीसे कुछ भी पाना है ही नहीं नानवाप्तमवाप्तव्यम् (गीता 3। 22) इसलिये वे स्वाभाविक ही सबके सुहृद् हैं। भक्त भी अपने लिये किसीसे कुछ भी नहीं चाहता और सबका हित चाहता तथा हित करता है इसलिये वह भी सबका सुहृद् होता है सुहृदः सर्वदेहिनाम् (श्रीमद्भा0 3। 25। 21)। भक्तोंमें जो सुहृत्ता आती है वह भी मलूतः भगवान्से ही आती है।भगवान् सम्पूर्ण यज्ञों और तपोंके भोक्ता हैं सम्पूर्ण लोकोंके महान् ईश्वर हैं तथा हमारे परम सुहृद् हैं इन तीनों बातोंमेंसे अगर एक बात भी दृढ़तासे मान लें तो भगवत्प्राप्तिरूप परमशान्तिकी प्राप्ति हो जाती है फिर तीनों ही बातें मान लें तो कहना ही क्या हैअपने लिये कुछ भी चाहना किसी भी वस्तुको अपनी मानना और भगवान्को अपना न मानना ये तीनों बातें भगवत्प्राप्तिमें मुख्य बाधक है। भगवान् भोक्तारं यज्ञतपसाम् पदोंसे कहते हैं कि अपने लिये कुछ भी न चाहे और कुछ भी न करे सर्वलोकमहेश्वरम् पदसे कहते हैं कि अपना कुछ भी न माने अर्थात् सुखकी इच्छाका और वस्तुव्यक्तियोंके आधिपत्यका त्याग कर दे तथा सुहृदं सर्वभूतानाम् पदोंसे कहते हैं कि केवल मेरेको ही अपना माने अन्य किसी वस्तुव्यक्ति आदिको अपना न माने। इन तीनोंमेंसे एक बात भी मान लेनेसे शेष बातें स्वतः आ जाती हैं और भगवत्प्राप्ति हो जाती है।अपने लिये सुखकी इच्छाका त्याग तभी होता है जब मनुष्य किसी भी प्राणीपदार्थको अपना न माने। जबतक किसी भी पदार्थको अपना मानता है तबतक वह बदलेमें सुख चाहेगा ही। सुखकी इच्छाके त्यागसे ममताका त्याग और ममताके त्यागसे सुखकी इच्छाका त्याग होता है। जब सब वस्तुव्यक्तियोंमें ममताका त्याग हो जाता है तब एकमात्र भगवान् ही अपने रह जाते हैं। जो किसीको भी अपना मानता है वह वास्तवमें भगवान्को सर्वथा अपना नहीं मानता कहनेको चाहे कहता रहे कि भगवान् मेरे हैं। माने हुए सम्बन्धका अभाव होनेसे भगवान्से अपनी सच्ची आत्मीयता जाग्रत् हो जाती है। तात्पर्य यह निकला कि चाहे सुखकी इच्छाका त्याग हो जाय चाहे ममताका अभाव हो जाय और चाहे भगवान्में सच्ची आत्मीयता हो जाय इसके होते ही परमशान्तिका अनुभव हो जायगा। कारण कि एक भी भाव दृढ़ होनेपर अन्य भाव भी साथमें आ ही जाते हैं।एक तो कर्म करना चाहिये और दूसरा कर्म करनेकी विद्या आनी चाहिये। जब मनुष्य कर्म तो करता है पर कर्म करनेकी विद्या नहीं जानता अथवा कर्म करनेकी विद्या तो जानता है पर कर्म नहीं करता तब उसके द्वारा सुचारुरूपसे कर्म नहीं होते। इसलिये भगवान्ने तीसरे अध्यायमें कर्म करनेपर विशेष जोर दिया है पर साथमें कर्मोंको जाननेकी बात भी कही है और चौथे अध्यायमें कर्मोंका तत्त्व जाननेपर विशेष जोर दिया है और साथमें कर्म करनेकी बात भी कही है। पाँचवें अध्यायमें यद्यपि कर्मयोग और सांख्ययोग दोनोंके द्वारा कल्याण होनेकी बात आयी है तथापि भगवान्ने सांख्ययोगकी अपेक्षा कर्मयोगको श्रेष्ठ बताया है। इस अध्यायमें भगवान्ने क्रमपूर्वक कर्मयोग और सांख्ययोगका वर्णन करके फिर संक्षेपसे ध्यानयोगका वर्णन किया और अन्तमें संक्षेपसे भक्तियोगका वर्णन किया जो भगवान्का मुख्य ध्येय है।इस प्रकार ँ़ तत् सत् इन भगवन्नामोंके उच्चारणपूर्वक ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रमय श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद्रूप श्रीकृष्णार्जुनसंवादमें कर्मसंन्यासयोग नामक पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ।।5।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Abhinavgupta (Incomplete): ।।5.29।।भोक्तारमिति। यज्ञफलेषु भोक्ता त्यक्तफलत्वात् (NK ( n) भोक्तात्यन्तफलत्वात्)। एवं तपस्सु। ईदृशं भगवत्तत्त्वं विदन् यथातथावस्थितोऽपि मुच्यते (S यथा तथा विमुच्यते) इति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Anandgiri: ।।5.29।।अधिकारिणो यथोक्तस्य कर्तव्याभावे ज्ञातव्यमपि नास्तीत्याशङ्क्य परिहरति एवमित्यादिना। प्रसिद्धं भोक्तारं व्यवच्छिनत्ति सर्वलोकेति। ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययाविति न्यायेन सर्वफलदातृत्वं दर्शयति सुहृदमिति। उक्तेश्वरज्ञाने फलं कथयति ज्ञात्वेति। यज्ञेषु तपःसु च द्विधा भोक्तृत्वं व्यनक्ति कर्तृरूपेणेति। हिरण्यगर्भादिव्यवच्छेदार्थं विशिनष्टि महान्तमिति। स्वपरिकरोपकारिणं राजानं व्यावर्तयति प्रत्युपकारेति। ईश्वरस्य ताटस्थ्यं व्युदस्यति सर्वभूतानामिति। तर्हि तत्र तत्र व्यवस्थितकर्मतत्फलसंसर्गित्वं स्यादित्याशङ्क्याह सर्वकर्मेति। नच तस्य बुद्धितद्वृत्तिसंबन्धोऽपि वस्तुतोऽस्तीत्याह सर्वप्रत्ययेति। यथोक्तेश्वरपरिज्ञानफलमभिदधाति मां नारायणमिति। तदेवं कर्मयोगस्यामुख्यसंन्यासापेक्षया प्रशस्तत्वेऽपि ततो मुख्यसंन्यासस्याधिक्यात्तद्वतो बुद्धिशुद्ध्यादियुक्तस्य कामक्रोधोद्भवं वेगमिहैव सोढुं शक्तस्य शमदमादिमतो योगाधिकृतस्य त्वंपदार्थाभिज्ञस्य परमात्मानं प्रत्यक्त्वेन जानतो मुक्तिरिति सिद्धम्।इत्यानन्दगिरिकृतटीकायां पञ्चमोऽध्यायः।।5।।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Jayatritha: ।।5.29।।भगवज्ज्ञानस्य शान्तिसाधनत्वं पुनः किमर्थमुच्यते इत्यत आह ध्येयमिति। ततश्च ज्ञात्वेत्यस्य ध्यात्वेत्यर्थः। शान्तिसाधनज्ञानत्वमपि भोक्तृत्वादिवत् ध्येयविशेषणमेवेति भावः।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Madhavacharya: ।।5.29।।ध्येयमाह भोक्तारमिति।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Ramanuja (Incomplete): ।।5.29।।यज्ञतपसां भोक्तारं सर्वलोकमहेश्वरं सर्वभूतानां सुहृदं मां ज्ञात्वा शान्तिम् ऋच्छति कर्मयोगकरण एव सुखम् ऋच्छति।सर्वलोकमहेश्वरं सर्वेषां लोकेश्वराणाम् अपि ईश्वरम्तमीश्वराणां परमं महेश्वरम् (श्वेता0 उ0 6।7) इति हि श्रूयते। मां सर्वलोकमहेश्वरं सर्वसुहृदं ज्ञात्वा मदाराधनरूपः कर्मयोग इति सुखेन तत्र प्रवर्तते इत्यर्थः सुहृदाम्आराधनाय सर्वे प्रवर्तन्ते।

▸ Sanskrit Commentary By Sri Shankaracharya: ।।5.29।। एवं समाहितचित्तेन किं विज्ञेयम् इति उच्यते भोक्तारं यज्ञतपसां यज्ञानां तपसां च कर्तृरूपेण देवतारूपेण च सर्वलोकमहेश्वरं सर्वेषां लोकानां महान्तम् ईश्वरं सुहृदं सर्वभूतानां सर्वप्राणिनां प्रत्युपकारनिरपेक्षतया उपकारिणं सर्वभूतानां हृदयेशयं सर्वकर्मफलाध्यक्षं सर्वप्रत्ययसाक्षिणं मां नारायणं ज्ञात्वा शान्तिं सर्वसंसारोपरतिम् ऋच्छति प्राप्नोति।।इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्यश्रीमच्छंकरभगवतः कृतौ श्रीमद्भगवद्गीताभाष्येपञ्चमोऽध्यायः।।