Books / Bhartiya Natya Siddhanta Udbhava Aur Vikas Ramji Pandey (Hindi)

13. ५.०४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

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५.०४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

कभी-कभी अलग-अलग चलती हैं और कभी-कभी दो-दो, तीन-तीन एक साथ मिलकर। 'स्कन्दगुप्त' में छह कथासूत्र चलते हैं, तो 'चन्द्रगुप्त' में सात। परन्तु, अन्तिम नाटक 'ध्र वस्वामिनी' में कथानक की यह जटिलता मिट गई है और एक ही सूत्र में सम्पूर्ण कथानक गुँथा हुआ है। जटिल कथानकवाले नाटकों में भी प्रसादजी ने अपनी निपुणता का परिचय दिया है और भिन्न-भिन्न इतिवृत्तों को कलात्मक रीति से संगठित किया है। शास्त्रीय विवेचन करने पर ज्ञात होगा कि कई नाटकों में कार्यावस्थाओं, अर्थ-प्रकृतियों और सन्धियों का भी यथावत् निर्वाह हुआ है। नाट्य-सिद्धान्त में समन्वय : जयशंकर प्रसाद को भारतीय और यूरोपीय दोनों नाट्य-सिद्धान्तों तथा शिल्पों की विशेषताओं का पूर्ण ज्ञान था और वे दोनों का समन्वय करने के पक्षपाती थे। फलस्वरूप वे एक ओर हिन्दी-नाटकों के शिल्प की स्वतन्त्रता पर बल देते थे तथा मौलिकता का आग्रह करते थे और दूसरी ओर, भारतेन्दु के ही समान नवीन प्रभावों को ग्रहण करके उसे पूर्ण बनाने की भी इच्छा रखते थे। यही कारण है कि उन्होंने अपने नाटकों के शिल्प का ऐसा विधान किया, जिसमें भारतीय तथा यूरोपीय दोनों नाट्य-सिद्धान्तों एवं शिल्पों की प्रधान विशिष्टताओं का सुन्दर समन्वय हुआ। यूरोपीय नाट्यशास्त्री कथावस्तु में संघर्ष को बहुत महत्त्व देते हैं। 'स्कन्दगुप्त' में प्रसादजी ने संघर्ष का कुशलता से समावेश किया है, अन्य नाटकों में भी संघर्ष तथा अन्तर्द्वन्द्व को उचित स्थान दिया है। घटनाओं में आरोह तथा अवरोह होता है, जिससे कथावस्तु की धारा कभी तीव्र गति से और कभी मन्द गति से प्रवाहित होती है। इस प्रकार, प्रसादजी ने कथावस्तु के निर्माण में भारतीय पद्धति से लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उद्योग के साथ पाश्चात्त्य शैली से विरोध की चरम सीमा, निगति तथा समाप्ति का समन्वय किया है। प्रसादजी ने संस्कृत तथा हिन्दी के प्राचीन नाट्यशास्त्र में बताई रूढ़ियों का तिरस्कार करके अपने नाटकों से नान्दी, सूत्रधार, प्रस्तावना, भरत-वाक्य आदि जटिलताओं का बहिष्कार किया। इतना ही नहीं, उन्होंने संस्कृत-नाटकों तथा नाट्यशास्त्र के आदेश की अवहेलना करके हत्या, मृत्यु, युद्ध आदि के वर्जित दृश्यों को अपने नाटकों में स्थान दिया। पश्चिमी रोमाण्टिक नाटकों के अनुकरण पर उन्होंने अपने नाटकों में शील-वचित्य, संघर्ष, भावों के घात-प्रतिघात आदि के दृश्य दिखाये। उन्होंने कार्यावस्थाओं के विषय में भी भारतीय तथा पाश्चात्त्य पद्धतियों का समन्वय किया और उनका निर्वाह इस प्रकार किया कि दोनों पद्धतियों की मूल बातों की पूत्ति हो गई है। प्रसादजी ने दृश्य-योजना तथा अंक- विभाजन के सम्बन्ध में प्राचीन परिपाटी का त्याग कर पाश्चात्त्य प्रणाली का अनुसरण किया। इस प्रकार, उन्होंने ऐसे नाटकों का निर्माण किया, जिनका शिल्प-विधान भारतीस एवं पाश्चात्य मान्यताओं तथा विशेषताओं के मेल से गठित हुआ है।

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पात्र तथा चरित्र-चित्रण : प्रसादजी के कई नाटकों का विश्लेषण करने से स्पष्ट हो जाता है कि उन्होंने ऐतिहासिक पुरुष-पात्रों के साथ-साथ काल्पनिक स्त्री-पात्रों की सृष्टि की है। इस प्रकार, इतिहास का कल्पना से मेल करने से नाटकों में सरसता आ गई है। प्रायः सभी राज्य-संचालकों और प्रसिद्ध दार्शनिक नेताओं की सृष्टि ऐतिहासिक व्यक्तियों के आधार पर की गई है, परन्तु स्त्री-पात्रों की कल्पना प्रसादजी की मौलिक सृष्टि है। प्रसादजी के इतिहास-प्रसिद्ध पात्रों का व्यक्तित्व अनूठा है। चरित्र-चित्रण पर बल देने के कारण उन्होंने अपने पात्रों का व्यक्तित्व बहुत सावधानी से गढ़ा है। उनके समक्ष कई प्रश्न थे, इसीलिए नाटकों में द्वन्द्वात्मक स्थिति देखी जाती है। उन्हें मानव-मन का विश्लेषण करना था, इसीलिए इतिहास की रेखाओं में परिवर्तन करना पड़ा है। इतिहास चाणक्य को एक निर्मम राजनीतिज्ञ ही जानता है, परन्तु प्रसादजी ने उनके हृदय में प्रेम का बीजारोपण किया है। प्रसादजी के समस्त पुरुष-पात्रों को तीन कोटियों में रखा जा सकता है-देवता, दानव और मानव। उनके प्रत्येक नाटक में कोई-न-कोई ऐसा पात्र है, जो तत्कालीन तत्त्व- चिन्तन का प्रतीक है, वही देवता की कोटि में रखा जा सकता है। इन महात्माओं का चरित्र पूर्ण रूप से विकसित है और ये प्रथम दर्शन में ही प्रेक्षकों को मुग्ध कर लेते हैं। इनका चरित्र इतना विकसित है कि उसमें अधिक विकास सम्भव ही नहीं है। दाण्ड्यायन ऐसे चरित्र का उदाहरण है। दूसरी कोटि में दानव-पात्र आते हैं। इनमें से कुछ पूर्णतः दानव हैं और आदि से अन्त तक वैसे ही बने रहते हैं। दानव-कोटि में कुछ ऐसे भी पात्र हैं, जो पतनोन्मुख हैं और लगातार पतन की ओर बढ़ते जाते हैं। इनके जीवन में विकास का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ये अपनी वासनाजन्य प्रवृत्ति के अनुकूल परिस्थिति को ही बना लेते हैं। शान्तिभिक्षु ऐसे पात्र का अच्छा उदाहरण है। पात्रों की तीसरी कोटि इन दोनों के बीच में आती है। ये पात्र मानव हैं और इनके अन्तःकरण में सदा देव तथा दानव-प्रवृत्तियों का संघर्ष चलता रहता है। देवत्व तथा दानवत्व के इसी संघर्ष में इन्हें अपना विकास करना होता है। कभी देवत्व की विजय होती है और कभी दानवत्व की। परन्तु, जब अनुकूल परिस्थितियाँ आती हैं, तब दानव- प्रवृत्तियाँ तिरोहित हो जाती हैं और उनका उद्धार हो जाता है। इन पात्रों का अन्तर्द्वन्द्व प्रदर्शित करने में प्रसादजी को विशेष सफलता मिली है। ऐसे चरित्रों के उदाहरण अजातशत्ु, पुरगुप्त आदि हैं। इन तीन कोटियों के पात्रों के अतिरिक्त शेष पात्र भी मूलतः मानव ही हैं, परन्तु वे या तो देवप्राय हैं या दानवप्राय। विरुद्धक आदि ऐसे पात्र हैं, जिन्हें आरम्भ में विश्वासघात या हुत्या करने में कोई हिचक नहीं होती, परन्तु अनुकूल अवसर आने पर

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इनमें सुधार होने लगता है और अन्त में ये मानव-कोटि में आ जाते हैं। ऐसे चरित्रों को देखकर प्रेक्षक के मन में जीवन-विकास की आशा बँधती है। पहले निवेदन किया जा चुका है कि प्रसादजी के नारी-पात्र उनकी कल्पना की देन हैं। वस्तुतः, उन्होंने नारी-जीवन का चित्रण करने में व्यापक दृष्टि का परिचय दिया है और स्त्री-चरित्र के निर्माण में उसके शील-निर्देश का प्रयत्न किया है। प्रसाद के नारी- पात्र उनकी कल्पना तथा भावुकता के अधिक निकट हैं। इन नारियों की अतिशय भावुकता तथा कल्पना प्रसाद के व्यक्तिपरक दृष्टिकोण के उपयुक्त ही है। देवसेना का समर्पण तथा त्याग आदर्श की रेखाओं से बना है। इसमें यथार्थ कम ही है। कल्याणी, मालविका आदि के विषय में भी यही बात कही जा सकती है। चरित्र-चित्रण में यह उनकी शक्ति है, परन्तु अभिनय में दुर्बलता है। नाटकों में चरित्र-चित्रण का प्रवेश उनकी निजी विशेषता है। संवाद : प्रसादजी के तीन बड़े नाटकों-अजातशत्रु, स्कन्दगुप्त और चन्द्रगुप्त-के संवाद में कठिन शब्द, लम्बे समास और बृहद् भाषण कहीं-कहीं इस तरह आ गये हैं कि उनका अभिनय कठिन है। किन्तु, इसके प्रतिकूल उनके प्रथम ऐतिहासिक नाटक 'राज्यश्री' तथा अन्तिम नाटक 'ध्र वस्वामिनी' में यह दोष नहीं है। सम्भवतः, प्रसादजी ने इन नाटकों को अभिनेय बनाने के लिए विशेष यत्न किया। इन नाटकों के संवाद का शब्द-चयन और भाषण की लघुता व्यापाराश्रित है और जनता की योग्यता के अनुसार है। संवाद की भाषा : प्राचीन भारतीय नाट्याचार्यों ने संवाद की भाषा के विषय में नियम बनाया कि विद्वान्, ब्राह्मण, राजा तथा उच्च वर्ग के पुरुष संस्कृत का प्रयोग करें और शेष स्त्री-पुरुष विभिन्न प्राकृतों में वार्त्तालाप करें। हिन्दी-नाट्यकारों में महाराजा विश्वनाथ सिंह तथा भारतेन्दुजी ने विभिन्न पात्ों से विभिन्न प्रान्तीय अथवा जनपदीय भाषाओं का प्रयोग कराया है। प्रसादजी ने इन दोनों शैलियों में से किसी को नहीं अपनाया। उन्होंने सदा खड़ी- बोली हिन्दी का प्रयोग किया है। भाषा की शैली प्रान्त की विभिन्नता के कारण नहीं होती, वरन् विषय की गहनता के कारण होती है। नरदेव न्यायासन पर बैठकर व्यवहारोपयोगी सरल भाषा का प्रयोग करता है, परन्तु वही प्रव्रज्या ग्रहण कर लेने पर गहन दार्शनिक भाषा बोलता है। प्रसादजी ने कुछ ही अंशों में इस सिद्धान्त का अनुसरण किया है। यदि वे इस सिद्धान्त का पालन सभी नाटकों में करते, तो एक बहुत बड़े दोष से बच जाते। आलोचकों ने आक्षेप लगाया है कि उनके सभी पातों की भाषा में एकरूपता रहती है और उनके पात् कवि से लेकर दौवारिक तक प्रायः कवित्वमयी भाषा का प्रयोग करते हैं। परन्तु, यह आक्षेप अंशतः ही सत्य है। जशी बर हे

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स्वगत कथन : स्वगत कथन की व्यवस्था प्राचीन नाट्याचार्यों ने की है, परन्तु आजकल इसे अनावश्यक ही नहीं, दोष भी माना जाता है। किन्तु, प्रसादजी ने अपने नाटकों में यथास्थान इसका प्रयोग किया है। कुछ स्वगत कथन किसी घटना की सूचना-मात्र देते हैं, ये निश्चित रूप से नीरस और नाट्यकला के प्रतिकल पड़ते हैं। प्रसादजी के स्वगत कथन पात्र की अवस्था की सूचना देते हुए, भावी घटना की भूमिका भी तैयार करते हैं। ऐसे स्वगत भाषण कई नाटकों में देखे जा सकते हैं। स्वगत भाषण का तीसरा रूप वहाँ देखा जाता है, जहाँ कोई पात्र रंगमंच पर उपस्थित दूसरे पात्रों के सामने रहकर अपने मन की बातों को स्वगत रूप में और व्यवहार के उपयुक्त बातों को प्रकट रूप में व्यक्त करता है। स्वगत कथन का यह तीसरा रूप नाटक के लिए किसी प्रकार भी उपयोगी नहीं कहा जा सकता। संस्कृत की जनान्तिक शैली आजकल सर्वथा अस्वाभाविक समझी जाती है और आज का कोई अच्छा नाटककार इसका उपयोग करना अनुचित समझता है। प्रसादजी ने सिद्धान्त-रूप से स्वगत कथन को अस्वाभाविक मानकर इसपर व्यंग्य किया है। इस विषय में 'विशाख' की ये पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं-'जैसे नाटकों के पात्र स्वगत जो कहते हैं, दर्शक-समाज वा रंगमंच सुन लेता है, पर पास खड़ा पात्र नहीं सुन सकता, उसको भरत बाबा की शपथ है।" फिर भी विवश होकर कहीं-कहीं प्रसादजी ने स्वगत भाषण का सहारा लिया है। कोई भी नाटककार विवश होकर ही स्वगत कथन जैसे अस्वाभाविक उपाय की शरण लेता है।

नृत्य-गीत : भरत मुनि ने नाटक में गीत तथा नृत्य को आवश्यक माना, परन्तु परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने इनपर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। भारतेन्दुजी के अनुसरण पर प्रसादजी ने अपने पहले नाटक 'सज्जन' में गीतों की रचना की। उस समय हिन्दी-नाटकों में दो प्रकार के गीत रचे जा रहे थे-एक तो भारतेन्दुजी की शैली पर और दूसरे, पारसी रंगमंच के गीतों की शैली पर। विशेष रूप से पारसी रंगमंच के गीतों की धूम थी। इनमें से किसी शैली ने प्रसादजी को सन्तुष्ट नहीं किया। फिर, उनका ध्यान बँगला-नाटकों की ओर गया।

प्रसादजी ने अपने प्रत्येक नाटक में अनेक गीतों का समावेश किया। किसी-किसी नाटक में तो गीतों की भरमार हो गई है। उनके गीतों पर अनेक प्रकार के आक्षेप भी लगाये जाते हैं। गीतों को गानेवाली कोई नत्तकी है या कोई ऐसी पात्रा, जिसका अवतरण विशेषतः गीत गाने के लिए ही हुआ है। इससे कहा जा सकता है कि प्रसादजी अपने नाटकों के वस्तु-विन्यास में नृत्य-गीत को पर्याप्त महत्त्व प्रदान करते थे। उनके नाटकों में नृत्य का आयोजन केवल मनोरंजन के लिए नहीं, वरन् वातावरण-निर्माण तथा चरित्र के विकास के लिए भी किया गया है।

१. विशाख, प्रथम अंक, द्वितीय दृश्य, पृ० २३

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विदूषक : संस्कृत-नाटकों में विदूषक का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। यह नायक का सखा उसके प्रत्येक कार्य में साथ देता और मनोरंजन करता था। प्रसादजी ने विदूषक को अपने नाटकों से हटा दिया और उनमें हँसोड़ प्रकृति के किसी पात्र को स्थान देने लगे। इससे लाभ यह हुआ कि विदूषक का स्थानापन्न पात् अन्य नाटकीय व्यापार करता हुआ, दर्शकों का मनोरंजन भी कर लेता था। 'विशाख' में महापिंगल और 'स्कन्दगुप्त' में मुद्गल ऐसे ही विनोदी पात्र हैं। नाटक का अन्त : प्रसादजी के नाटकों में दुःखान्त या सुखान्त लेकर भ्रम फैला हुआ है। इसका कारण स्वयं उनके हृदय का अन्तर्द्वन्द्व है, जो पात्रों के माध्यम से प्रकट होता है। स्कन्दगुप्त नाटक के अन्त में यदि स्कन्दगुप्त और देवसेना का मिलन हो जाता, तो उसे सुखान्त माना ही जाता। परन्तु, नाटककार की प्रेम-कल्पना तथा जीवन-दृष्टि से एक अद्भुत कुतूहल की सृष्टि होती है। नाटक का यह अन्त प्रसादजी के जीवन-विषयक दृष्टिकोण से सम्बन्ध रखता है। इसीलिए, उनके नाटकों में दुःखान्त या सुखान्त ढूँढ़ना उनके प्रति अन्याय करना है। इन नाटकों में कवि की सुख-दुःख-विषयक विचारधारा काम करती है। इसीलिए, प्रसादजी अपने नाटकों में जीवन के कुछ प्रश्नों पर विचार करने में सफल हो सके हैं। उन्होंने अपने नाटकों को सुखान्त या दुःखान्त के चौखटों में बाँधकर नहीं लिखा है। अधिकांश नाटकों में बड़े-से-बड़े सुख के पीछे करुणा या उदासी की क्षीण धारा बहती रहती है, जो नियति द्वारा नियन्त्रित रहती है। कई आलोचकों ने उनके नाटकों को सुखान्त तथा दुःखान्त नहीं कहकर प्रसादान्त कहना अधिक पसन्द किया है। प्रसाद और रंगमंच : कहा जाता है कि प्रसादजी के अधिकांश नाटक अनभिनेय हैं। उनके समक्ष कोई रंगमंच नहीं था, जिसे ध्यान में रखकर वे नाटक लिखते, सम्भवतः इसीलिए उनके नाटक अभिनेय नहीं बन सके हैं। अन्य साहित्यिक विधाओं के ही समान प्रसादजी ने नाटक की भी रचना की है। कुछ स्वगत भाषण, क्लिष्ट भाषा, अतिशय भावुकता, गीतों का बाहुल्य, जटिल दृश्य-विधान आदि कुछ ऐसे दोष हैं, जिनके कारण उनके नाटक अभिनेय नहीं बन पाये हैं। रंगमंच की दृष्टि से उनमें कुछ सुधार भी हुआ। उन्होंने सम्भवतः अपनी त्ुटियाँ समझ ली थीं, इसलिए अपने अन्तिम नाटक 'ध्रुवस्वामिनी' में उन्हें दूर करने का प्रयास किया। अभिनय की दृष्टि से 'घ्र वस्वामिनी' प्रसाद की सर्वोत्तम कृति है। कुछ साधारण परिवर्तन कर देने से 'स्कन्दगुप्त' का भी अभिनय सफलता से किया जा सकता है। किन्तु, रंगमंच के सम्बन्ध में प्रसादजी का अपना दूसरा ही दृष्टिकोण है। काव्य के विकास से ही रंगमंच के विकास का भी दिशा-संकेत हुआ था। इतिहास के इस साक्ष्य के आधार पर उन्होंने घोषणा की-"प्रत्येक काल में काव्य अथवा नाटक के लिए ही रंगमंच होते हैं न कि रंगमंच के लिए नाटक अथवा काव्य।"१ इससे भी अधिक स्पष्ट रूप से

१. काव्यकला एवं अन्य निबन्ध ; प्रसाद; पृ० १०३

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उन्होंने अन्यत् कहा-"रंगमंच के सम्बन्ध में यह भारी भ्रम है कि नाटक रंगमंच के लिए लिखे जायँ। प्रयत्न तो यह होना चाहिए कि नाटक के लिए रंगमंच हो, जो व्यावहारिक हो।" प्रसादजी के दृष्टिकोण का अनिवार्य परिणाम यह हुआ कि उनके नाटक शिल्प- विधान की दृष्टि से न तो प्राचीन पद्धति में लिखे जान पड़ते हैं और न भविष्य के नाटकों के लिए शिल्प की भूमिका ही प्रस्तुत करने में समर्थ हुए। आलोचकों तथा पाठकों ने समझ लिया कि उनके नाटक पढ़ने के लिए हैं, खेलने के लिए नहीं। यही सोचकर उन लोगों ने सन्तोष कर लिया। नाटक और रंगमंच के इस भिन्न देशत्व को किसी भी प्रकार शुभ नहीं माना जा सकता। हरिकृष्ण प्रेमी श्रीहरिकृष्ण प्रेमी के नाट्य-सिद्धान्त का ज्ञान प्राप्त करने के लिए उनके नाटकों का विश्लेषण तथा उनके नाटकों की भूमिकाओं का अध्ययन उपयोगी है। इस दृष्टि से उनके नाटकों की विभिन्न विशेषताओं के आधार पर उनके नाट्य-सिद्धान्तों की कल्पना कर सकते हैं। उनके नाट्य-सिद्धान्त में साहित्य, कला तथा अभिनय का सुन्दर समन्वय है। उन्होंने किसी से भी पूर्णतः प्रभावित नहीं होकर भी सभी से लाभ उठाया। प्रेमीजी संस्कृत-नाट्य-सिद्धान्त के बन्धनों से मुक्त हैं और वर्त्तमान स्वाभाविक तथा स्वस्थ सिद्धान्तों के गुणों से युक्त हैं। प्रेमीजी यथार्थ को संयत रूप में प्रस्तुत करने के समर्थक हैं। उन्होंने साहित्य में लोकहित का समावेश करते हुए भी कुप्रवृत्तियों को प्रोत्साहन देनेवाले पात्रों का समावेश करना समाज के लिए अहितकर माना है। उनके प्रत्येक नाटक में आदर्शवाद का स्वर प्रमुख रहा है और किसी-न-किसी पात्र ने घटनाओं को आदर्श की ओर प्रेरित किया है। प्रेमीजी ने साहित्य में राष्ट्रीयता के समावेश पर भी पर्याप्त बल दिया है। उन्होंने अपने नाटकों की भूमिकाओं में स्थान-स्थान पर इस बात का संकेत किया है कि उनके नाटक देश की सामयिक आवश्यकताओं को दृष्टि में रखकर रचे गये हैं। इतना होने पर भी उनके नाटकों में सवथा सामयिक होने का आरोप करना उचित नहीं। सच तो यह है कि उनके नाटकों में सामयिकता की स्थिति अधिक प्रखर नहीं हो सकी है। उनमें गांधीवादी विचारधारा भी उपलब्ध होती है। जनता के हृदय में राष्ट्र-प्रेम की जागृति के लिए परतन्त्रता के विनाश के साथ हिन्दू-मुस्लिम एकता की आवश्यकता पर भी उन्होंने पर्याप्त बल दिया है। इस दृष्टि से 'रक्षाबन्धन', 'स्वप्नभंग' तथा 'शिवा-साधना' द्रष्टव्य हैं। कथानक : प्रेमीजी ने अपने नाटकों में कथा-तत्त्व को प्रभावोत्पादक रूप में प्रस्तुत किया है। उनके नाटक अधिकतर ऐतिहासिक हैं, अतः स्वभावतः प्रश्न उठता है कि

१. नाट्यकला एवं अन्य निबन्ध : प्रसाव: पृ० ११०

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उन्होंने अपने नाटकों में किस सीमा तक इतिहास का निर्वाह किया है। वस्तुतः, उन्होंने इतिहास में कल्पना का मधुर मिश्रण किया है। इस विषय में उनका मत है कि ऐतिहासिक नाटकों में कल्पना के मिश्रण के सहारे कथानक को सदा प्रवहमाण बनाने का प्रयत्न करना चाहिए। इस विषय में उनका एक वक्तव्य देखा जा सकता है-'नाटकों में इतिहास की अक्षरशः रक्षा करना कठिन कार्य होता है। नाटकों में दो-एक पात्रों का चरित्र सर्वथा काल्पनिक भी हो सकता है।" प्रेमीजी ने अपने नाटकों की कथावस्तु सदा संक्षिप्त रखी है, अनावश्यक विस्तार की प्रवृत्ति उनमें नहीं है। उन्होंने आधिकारिक कथावस्तु के अतिरिक्त अपने नाटकों में प्रासंगिक कथानकों का भी सफलता से निर्वाह किया है। देश-प्रेम की चेतना उनके सभी नाटकों में वर्त्तमान रही है। उनके नाटकों के कथानक पाठकों को सदा देश-प्रेम की प्रेरणा देने हैं। यह बात उनके ऐतिहासिक नाटकों में तो सत्य है ही, सामाजिक नाटकों में भी समान रूप से सत्य है। प्रेमीजी ने कहीं भी स्वगत भाषण का भद्दा प्रदर्शन नहीं किया। 'रक्षाबन्धन' उनका दूसरा ही नाटक है, फिर भी उनकी अत्यन्त विकसित कला का नमूना है, इसमें केवल चार स्वगत हैं। उनका 'स्वप्नभंग' अपवाद ही है, जिसमें स्वगत भाषण की अस्वाभाविक और अनावश्यक भरमार है-यद्यपि वह उनका छठा नाटक है। वस्तुतः, जैसे-जैसे उनकी कला का विकास होता गया, वे स्वगत भाषण कम करते गये। कार्य- व्यापार की दृष्टि से भी प्रेमीजी के सभी नाटक-'स्वप्नभंग' को छोड़कर -- श्रेष्ठ हैं। 'रक्षाबन्धन' के कई दृश्य कार्य-व्यापार तथा गतिशीलता में आदर्श हैं। 'शिवा-साधना' कार्य-व्यापार तथा घटनावली में अन्य सभी नाटकों से बढ़कर है। कथानक अत्यन्त गतिशील है; सभी घटनाएँ रंगमंच पर ही घटती हैं। कार्य-व्यापार की दृष्टि से 'स्वप्नभंग' सबसे शिथिल है। इसमें घटनाएँ पात्ों के मुह से सूचित की जाती हैं, रंगमंच पर नहीं घटित होती। यह इस नाटक का सबसे बड़ा दोष है। पात्र-योजना : प्रेमीजी ने अपने नाटकों में पात्र-योजना की ओर विशेष ध्यान दिया है। पात्रों की संख्या और उनके चरित्र का विकास नाट्यकला का महत्त्वपूर्ण अंग है। वे रचना-क्रम में ज्यों-ज्यों आगे बढ़ते गये, पात्रों की संख्या त्यों-त्यों कम होती गई और चारित्रिक विकास अधिक होता गया। पात्रों की संख्या की दृष्टि से 'शिवा-साधना' में सबसे अधिक भीड़ है। चरित्र का विकास 'रक्षाबन्धन' और 'स्वप्नभंग' में सर्वाधिक सुन्दर रीति से हुआ है। ऐतिहासिक होते हुए भी प्रेमीजी ने इन दोनों नाटकों में चरित्र का उद्घाटन करने में पूर्ण सफलता प्राप्त की है। यह सत्य है कि आदर्शवादी होने के कारण उन्होंने कुछ कुटिल पात्रों को छोड़कर अपने पात्रों को आदर्श प्रेमी रखने पर बल दिया है, फिर भी इस विषय में उन्होंने अतिवादिता का कहीं भी परिचय नहीं दिया है। उनके पात्र विशिष्ट गुणों से सम्पन्न होने पर भी अति मानवता से मुक्त ही हैं। १. शिवा-साधना, अपनी बात, पृ० द तथा १०

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संवाद : चरित्र-चित्रण को सजीवता प्रदान करने के लिए नाटककार को संवाद- योजना पर ध्यान देना आवश्यक होता है। प्रेमीजी ने इस तथ्य की उपयोगिता को ध्यान में रखकर नाटकीय संवादों से मानव-जीवन को उचित अभिव्यक्ति दी है। उन्होंने अपने संवादों में भाव-तत्त्व तथा विचार-तत्त्व दोनों का उचित समावेश किया है। संवादों को स्वाभाविक बनाने के लिए उन्हें संक्षिप्त बनाया गया है। उनमें अनावश्यक विस्तार कर देने से विषयान्तर होने का भय बना रहता है और नाटक में वर्णनात्मकता की प्रधानता हो जाती है। प्रेमीजी ने संवाद-योजना में इस तथ्य पर पर्याप्त ध्यान दिया है। उन्होंने निरर्थक संवादों की योजना नहीं की है और उनके संवाद अधिकांशतः उनके पात्रों का व्यक्तित्व प्रकाशित करनेवाले होते हैं। प्रेमीजी के संवादों की भाषा नाटकोचित, स्पष्ट और प्रभावमयी है। उनकी भाषा में सादगी के साथ शक्ति भी है। वह पात्रानुकूल परिवर्त्तित होती रहती है और वहीं क्लिष्ट हुई है, जहाँ गहन भावों की अभिव्यक्ति करती है। प्रेमीजी की भाषा की विशेषता इसमें भी है कि वह कृत्रिमता-रहित है और रंगमंच पर उच्चरित होने पर सामान्य श्रोता की भी पहुँच के बाहर नहीं होती। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने हिन्दी के सरल शब्दों के अतिरिक्त उर्दू तथा अँगरेजी के भी सरल शब्दों का व्यवहार किया है। मुसलमान पात्रों से सरल उर्दू का प्रयोग कराया गया है। इसका अपवाद केवल 'स्वप्नभंग' है; क्योंकि उस नाटक के प्रायः सभी पात्र मुसलमान हैं और यदि सभी उर्दू बोलते, तो नाटक पूर्णतः उर्दू का ही हो जाता। यह बात उन्होंने नाटक की भूमिका में स्पष्ट कर दी है। बातावरण तथा गीत : प्रेमीजी ने अपने नाटकों में वातावरण का भी पूरी तरह ध्यान रखा है। उन्होंने वातावरण-सम्बन्धी दृश्यों से नाटकीय लाभ उठाया है। आधुनिक युग में कई नाटककार गीत का प्रयोग उचित नहीं मानते, परन्तु प्रेमीजी ने गीत को नाटक का आवश्यक तत्त्व माना है। उन्होंने कहा है कि गीतों से अभिनय में सजीवता आ जाती है। उनके पहले प्रसादजी ने भी गीतों का सफल प्रयोग किया था, प्रेमीजी ने सम्भवतः उन्हीं से प्रेरणा लेकर गीतों की परम्परा को आगे बढ़ाया है। रंगमंच तथा अभिनय : प्रेमीजी ने अपने नाटकों की रचना करते समय इस बात का पूरा ध्यान रखा है कि नाटक रंगमंच के उपयुक्त हो। उनके द्वारा लिखे सभी नाटक अभिनय की विशेषताओं से पुष्ट रहे हैं। 'शिवा-साधना' जैसे कुछ नाटकों में पात्राधिक्य तथा शीघ्र दृश्य-परिवर्तन के कारण यद्यपि अभिनय में बाधा पहुँचती है, तथापि सामान्य रूप से कह सकते हैं कि उनके नाटकों में हिन्दी के अन्य नाटकों की अपेक्षा रंगमंच और अभिनय पर अधिक ध्यान दिया गया है। प्रेमीजी ने भूमिकाओं में हिन्दी-रंगमंच के अभाव की ओर संकेत करके अपने नाटकों की रंगमंचीय क्षमता का भी निर्देश किया है। इस दृष्टि से उनके 'प्रकाश-स्तम्भ', 'बादलों के पार', 'स्वप्नभंग' तथा 'विषपान' की भूमिकाएँ देखी जा सकती हैं। आलोचकों ने उनके

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नाटकों की अभिनेयता की चर्चा करते समय दो आरोप लगाये हैं: १. प्रेमीजी ने अपने नाटकों में गीतों की अतिशयता के कारण जीवन की वास्तविकता की कुछ अंशों में उपेक्षा की है; २. दृश्य-योजना में शिथिलता आ गई है। प्रेमीजी ने अपने नाटकों की भूमिकाओं में इन आरोपों का प्रतिवाद किया है। 'विषपान' की भूमिका में प्रथम आरोप का उत्तर देते हुए, उन्होंने संगीत को रस-सृष्टि में सहायक मानकर वातावरण के स्पष्टीकरण में सहायक माना है। दूसरे आरोप के उत्तर में प्रेमी ने कहा है कि रंग-सज्जा की योजना के लिए दृश्य- योजना को विशेष प्रकार से रखना नाटककार को आवश्यक हो जाता है-'जो नाटक रंगमंच को ध्यान में रखकर लिखा गया है, उसका पूर्ण सौन्दर्य रंगमंच पर ही देखा जा सकता है- या वह व्यक्ति देख सकता है, जो उसे पढ़ते समय रंगमंच की कल्पना अपने मस्तिष्क में रखता है।" शीघ्र दृश्य-परिवर्तन का दोष स्वीकार करके प्रेमीजी ने अपने बाद के नाटकों में उसे हटा दिया है। इस दृष्टि से उनका 'प्रकाश-स्तम्भ' देखने योग्य है, जिसकी भूमिका में उन्होंने लिखा है-'मेरे इस नाटक से पहले के प्रायः सभी नाटक पटों (पर्दों) की सहायता से खेले जानेवाले रहे हैं। सेट्स के हिसाब से वे नहीं लिखे गये। मेरा यह नाटक केवल दो सेटिंग्स पर खेला जा सकता है और दो दृश्यों की संख्या भी इसमें बहुत थोड़ी है।'२ इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि प्रेमीजी ने अपने नाटकों को रंगमंच के लिए उपयोगी बनाने का प्रयत्न किया है। अभिनय को सफल बनाने के लिए वे रंग-संकेत उपस्थित करने में सचेष्ट रहे हैं। निम्नलिखित पंक्तियों से उनके नाटकों का उद्देश्य स्पष्ट हो जाता है-'इतना प्रयत्न तो मैं करता हूँ कि नाटक रंगमंच के उपयुक्त रहें, जनसाधारण की पहुँच के बाहर न हों और उनमें रसानुभूति का अभाव न हो।'3 लक्ष्मीनारायण मिश्र किसी भी साहित्य-रूप में स्वभावतः एक प्रतिक्रिया होती है। प्रसादजी के भावना- प्रधान नाटकों की प्रतिक्रिया में लक्ष्मीनारायण मिश्र ने अपने बौद्धिकता-प्रधान नाटकों को प्रस्तुत किया है। नार्वे के फेबियन समाजवादी नाटककार इब्सन ने समाज की समस्याओं पर बौद्धिक दृष्टिकोण से विचार किया था। आगे चलकर जॉर्ज बर्नार्ड शाँ इस बौद्धिक क्रान्ति के नेता हुए। इन लेखकों ने समाज की रूढ़ियों तथा परम्पराओं का खुलकर विरोध किया और समाज के नग्न चित्र पाठकों के सामने रखे। मिश्रजी ने भी इसी पक्ष का समर्थन किया। हिन्दी-नाटक तथा नाट्य-सिद्धान्त के विकास में लक्ष्मीनारायण मिश्र का विशिष्ट स्थान है। नाटक-क्षेत्र में उनका आगमन नाट्य-कला तथा सिद्धान्त के विकास में एक १. विषपान, पुकार, पृ० १२-१३ २. प्रकाश-स्तम्भ, संकेत, पृ० ग ३. स्वप्नभंग, कुछ बातें, पृ० ३

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मोड़ है, उन्होंने हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त को एक दिशा दी है। प्रसाद के नाटकों में एलिजाबेथ (प्रथम)-काल के अॅगरेजी-नाटकों की प्रवृत्तियाँ द्विजेन्द्रलाल राय के नाटकों के प्रभाव के कारण आ गई थीं, उनका जमकर विरोध प्रसादोत्तर काल के नाटककारों ने किया। मिश्रजी इनमें अग्रगण्य हैं। उन्होंने द्विजेन्द्रलाल राय तथा प्रसादजी दोनों का विरोध किया। उनका कहना है कि प्रसाद के नाटकों में जो कथानक आये हैं, वे तो अवश्य भारतीय इतिहास के गौरव पर आधारित हैं, किन्तु उनके चरित्र के निर्माण में भारतीय जीवन-दर्शन की उपेक्षा की गई है। मिश्रजी के इस विरोध का कारण यह है कि प्रसादजी ने द्विजेन्द्र बाबू की कला का अनुकरण किया था और द्विजेन्द्र बाबू की कला शेक्सपियर की कला थी, जिसका पश्चिम में तिरस्कार किया गया था। तिरस्कार यह कहकर किया गया था कि यह मनोविज्ञान तथा यथार्थ के सर्वथा प्रतिकूल है। प्रसादजी जहाँ बँगला के माध्यम से शेक्सपियर के नाटकों से प्रभावित हैं, वहां मिश्रजी आधुनिक यूरोपीय नाटककारों-इन्सन और शॉ-से प्रभावित हैं। प्रसादजी में जहां भावनात्मकता मिलती है, वहाँ मिश्रजी में बौद्धिकता का प्राबल्य है। प्रसादजी के भावना- प्रधान नाटकों के प्रति मिश्रजी का असन्तोष इतना प्रबल है कि उन्हें अपने मत के समर्थन में चीखना-चिल्लाना भी पड़ा है। नाटकों की लम्बी भूमिकाएँ इसका प्रमाण हैं। इस प्रकार उनकी प्रतिभा का अपव्यय भी बहुत हुआ है।

मिश्रजी ने अनेक सांस्कृतिक तथा समस्या-नाटकों की रचना करके हिन्दी-नाट्य- भाण्डार को भरा है, हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त के विकास में योगदान किया है और अभी भी करते जा रहे हैं। उन्होंने अभिनेयता पर भी ध्यान दिया है और मूलतः नारी-जीवन की समस्याओं, प्रेम और यौन-सम्बन्ध का विशेष विवेचन किया है। मिश्रजी का ध्यान नीवन के अन्य पहलुओं की ओर भी गया है। उनकी कला यथार्थवादी है। जहां तक भावना की बात है, उसे यथार्थवादी से अधिक आदर्शवादी और पुनरुत्थानवादी ही कहना उपयुक्त होगा। उनकी सारी समस्याएँ मूलतः वैयक्तिक हैं और उनके नाटकों का स्वर वैयक्तिक ही है। उनमें व्यक्तियों की समस्या का मूलरूप से चित्रण हुआ है। मिश्रजी के नाटकों ने नारी-समस्या और विशेषतः यौन-समस्या का उद्घाटन किया है। किरणमयी, मालती, चम्पा, चन्द्रकला या बालविधवा मनोरमा सभी के द्वारा यौन-समस्या का अंकन किया गया है।

समस्या-नाटक की प्रेरणा : समस्या-नाटकों के आधुनिक जन्मदाता मिश्रजी माने जाते हैं। इस प्रकार का प्रथम नाटक 'संन्यासी' सन् १९२७ ई० में लिखा गया। इस नाटक की प्रेरणा के विषय में मिश्रजी ने कहा है कि कुछ पाश्चात्य लेखक जातीय भेद और विद्वष बढ़ा रहे थे, रंगीन जातियों को सब तरह से हीन कहने की चेष्टा कर रहे थे। इसी की प्रतिक्रिया के रूप में हिन्दी के प्रथम समस्या-नाटक 'संन्यासी' का जन्म हुआ। उसके पहले मिश्रजी छायावादी कवि थे। परन्तु, उन्होंने देख लिया कि "छायावादी हिन्दी

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कवियों के रूप में अँगरेजी-कवियों की लिरिक पोएट्री का जो प्रभाव चल रहा है, वह व्यक्ति की अतृप्त लालसा, वासना, परिताप, एकांगी स्वार्थ के उन्माद का फल है। इसमें जातीय जीवन और संस्कृति का ह्रास है।" अतः, छायावादी कविता छोड़कर मिश्रजी सदा के लिए नाटककार बन गये; क्योंकि नाटक में जीवन का सच्चा चित्रण करने का पर्याप्त अवसर है। कर्म-संश्रय से छुटकर गीतों में डूबे रहना उन्होंने पाप समझा। मिश्र के नाटक और पश्चिमी प्रभाव : मिश्रजी के समस्या-नाटकों के विषय में अनेक आलोचकों ने कहा है कि ये नाटक पश्चिम से प्रभावित हैं, इसलिए भारतीय मान्यताओं के विरुद्ध हैं। लेखक ने इस आरोप का तीव्र प्रतिरोध किया है। अपने नाटक 'मुक्ति का रहस्य' की भूमिका (मैं बुद्धिवादी क्यों हूँ ?) में उन्होने अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वे यूरोपीय बुद्धिवाद को उसी रूप में स्वीकार नहीं करना चाहते, प्रत्युत अपने बुद्धिवाद के समर्थन में उपनिषद् आदि भारतीय ग्रन्थों को उपस्थित करते हैं। वे यह पसन्द नहीं करते कि लोग उन्हें इब्सन और शॉ का हिन्दी- संस्करण कहें। वे अपने को भारतीय विचारकों की पंक्ति में रखना चाहते हैं। मिश्रजी का दावा है कि उनके नाटक मौलिक तथा स्वाभाविक हैं, वे भास तथा कालिदास की परम्परा में हैं और उनमें भारतीयता की पुर्ण प्रतिष्ठा हुई है। किन्तु, आचार्य शुक्ल ने बताया कि वे यूरोप का अनुकरण करते हैं।१ मिश्रजी इस आक्षेप से तिलमिला गये। उन्हें इस बात का कष्ट है कि शुक्लजी ने उनके साथ न्याय नहीं किया और उनका झुकाव प्रसादजी के ही पक्ष में रहा। पश्चिम के प्रभाववाले आरोप के उत्तर में मिश्रजी का कहना है कि यदि एक नाटक का संवाद, कथानक, व्यापार और परिणति पर ध्यानपूर्वक विचार किया जाय, तो निम्नलिखित तथ्य उपलब्ध होते हैं-"नर-नारी के प्रेम और आकर्षण के साथ-ही- साथ हमारे जीवन की जो अन्य समस्याएँ नाटकों में आई है, वे भारतीयता को और भी अधिक चमका देती हैं। नारी चाहे जिस रूप में पहली बार जिस पुरुष के राग का माध्यम बनती है, उसे जन्म-भर उसी के साथ रहना है। इस कठोर नियम और मान्यता में उसके निजी प्रेम को हारना ही पड़ता है।" अपने इस कथन की पुष्टि में मिश्रजी ने 'मुक्ति का रहस्य' की आशा देवी का उदाहरण दिया है, जो अपने प्रेम के देवता उमाशंकर को छोड़कर अपने पतन के साथी डॉक्टर की सहगामिनी बनती है। दूसरा उदाहरण 'सिन्दूर की होली' से दिया जा सकता है। बाल-विधवा मनोरमा अपने पति की मूति अपनी कल्पना की आँखों से सदा देखती रहती है। जिस स्त्री के हृदय में पति का रूप-यौवन का समस्त आकर्षण लेकर इस प्रकार बैठ गया हो, उसके लिए दूसरा कोई भी पुरुष सर्वथा हीन जँचेगा और उसकी तरफ वह आँख उठाकर देखना भी नहीं चाहेगी। भारतीयता का इससे बढ़कर स्वस्थ उदाहरण दूसरा क्या हो सकता है ? १. हिन्दी-साहित्य का इतिहास : शुक्लजी, पृ० ५५४

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मिश्रजी के सांस्कृतिक नाटक : अपने सारे बुद्धिवाद के बावजूद लक्ष्मीनारायण मिश्र स्वयं भावुकता से सवथा मुक्त नहीं हो सके हैं। उनके मन में एक द्वन्द्व दिखाई देता है। पहले उन्होंने समस्या-नाटकों की रचना की, परन्तु पीछे कई सांस्कृतिक नाटक लिखे। वस्तुतः, इस क्षेत्र में भी उनकी देन अमूल्य है। मिश्रजी ने 'अशोक' नाटक की रचना २३ वर्ष की अवस्था में की थी। यह सांस्कृतिक नाटकों की कोटि में आ सकता है, अतः यह उनका प्रथम सांस्कृतिक नाटक माना जायगा। इसे उन्होंने अपने प्रमाद का फल स्वीकार किया है। उन्होंने कहा है कि जब शेक्सपियर का भूत बंगाली नाटककार द्विजेन्द्रलाल राय के हृदय का देवता बन रहा था, उस समय देश की अनेक भाषाओं के नाटककारों ने उसकी अर्चना जाने- अनजाने की। उसी प्रभाव के कारण अशोक की रचना हुई। मिश्रजी का कहना है कि यदि शेक्सपियर से प्रभावित द्विजेन्द्रलाल के नाटक नहीं लिखे गये रहते, तो सभी नाटककार भास और कालिदास की परम्परामें चलते और भारतीय जीवन-दर्शन के प्रति निष्ठा दिखाते। उस समय यूरोप में इन्सन और शॉ का प्रभाव चल रहा था और शेक्सपियर के प्रति प्रतिक्रिया चल रही थी, परन्तु मिश्रजी का कहना है कि उस समय देश के दुर्भाग्य से शेक्सपियर के छोटे संस्करण के रूप में द्विजेन्द्र का जन्म बंगाल में हो गया। मिश्रजी ने कहा है कि प्रसादजी के ऐंतिहासिक नाटकों की प्रतित्रिया में भुझे ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक नाटकों की रचना करनी पड़ी। उनके मतानुसार प्रसादजी के नाटकों में रंगमंच पर जो आत्महत्याओं के दृश्य दिखाये जाते हैं, अस्वाभाविक संवाद उपस्थित किया जाता है और प्रेम प्रकट करने के लिए लम्बे भाषणों का प्रयोग किया जाता है, वे सब कुछ भारतीय नाट्य-पद्धति के विरुद्ध हैं। वैसे ही वे प्रसादजी के नाटकों में दोष बताते हैं कि उनमें कौमार्य को विवाह से श्रेष्ठ बताया गया है, जो भारतीय नाट्य-पद्धति तथा संस्कृति के विरुद्ध है। मिश्रजी ने इन त्रुटियों को अपने नाटकों से दूर रखने की बात कही है। मिश्रजी के सांस्कृतिक नाटकों की शैली : १. मिश्रजी के सभी सांस्कृतिक नाटकों में तीन अंक हैं और प्रत्येक अंक में कई दृश्य हैं। २. किसी नाटक में गीत का समावेश नहीं है। ३. उनके सांस्कृतिक नाटकों में भाव-चित्रण के साथ-साथ बौद्धिक विवेचन पर भी बल दिया गया है। वस्तुतः, उनके नाटकों में भावात्मकता से भी बढ़कर बौद्धिकता देखी जाती है। ४. उनके नाटकों में एक तुटि है कि अधिकांश घटनाओं को क्रिया या व्यापार के रूप में नहीं दिखाकर पात्ों के संवाद के द्वारा उनकी सूचना दी जाती है। घटनाओं को क्रिया द्वारा दिखाना अधिक अच्छा होता है।

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५. उनके सांस्कृतिक नाटकों में भी नान्दी, सूत्रधार आदि तो हैं ही नहीं, परन्तु 'नारद की वीणा', 'गरुड़ध्वज', 'वत्सराज' और 'दशाश्वमेध' में भरत-वाक्य के समान कुछ है। इन नाटकों में किसी-न-किसी पात्र ने मंगल और उत्कर्ष की बात कही है। ६. मिश्रजी के सांस्कृतिक नाटकों की भाषा काव्यमयी नहीं, वरन् सरल, स्वाभाविक, ओजस्वी और नाट्योपयोगी है। उनकी भाषा अन्तर्जगत का चित्रण करने में पूर्णतः समर्थ होती है। ७. कहा जाता है कि मिश्रजी की शैली का आधार भारतीय नाट्शास्त्र नहीं, प्रत्युत पाश्चात्त्य नाट्यकला है। परन्तु वे इस आरोप को भी स्वीकार नहीं करते। मिश्रजी का मूल्यांकन : लक्ष्मीनारायण मिश्र ने हिन्दी-नाटकों में बुद्धिवाद का प्रवेश कराया और सामाजिक नाटकों को अधिक ठोस यथार्थ की भावभूमि पर प्रतिष्ठित किया। कला की दृष्टि से भी उनका कार्य प्रशंसनीय है। पात्र-संशोधन तथा अंकों एवं दृश्यों की सन्तुलित योजना में उन्हें अवश्य सफलता मिली है। परन्तु, उन्हें नाट्यकला तथा रंगमंच का व्यावहारिक अनुभव नहीं रहने के कारण उनके सभी नाटक पूरी तरह अभिनेय नहीं बन सके हैं। मिश्रजी के संवाद छोटे-छोटे होते हैं, नाटकों में गतिशीलता भी है, परन्तु उनमें अपेक्षित चुस्ती, संक्षिप्तता, प्रभावान्विति एवं शिल्प का अर्थगत आकलन नहीं हो पाया है। मिश्रजी ने यथार्थ के नाम पर कहीं-कहीं अश्लीलता को भी स्थान दिया है। 'राक्षस का मन्दिर' और 'संन्यासी' में चुम्बन-आलिंगन की भरमार है। मिश्रजी एक अंक में एक ही दृश्य रखने के पक्षपाती हैं। 'मुक्ति का रहस्य' में तीन दृश्य और तीन अंक हैं। "बार-बार पर्दा गिराना और उठाना रंगमंच को अस्वाभाविक बना देता है। .... रंगमंच और हमारे स्वाभाविक निवास में कोई बहुत विशेष अन्तर नहीं होना चाहिए।"१ 'संन्यासी' में गीत रखे गये हैं, परन्तु 'राक्षस का मन्दिर', 'मुक्ति का रहस्य' आदि में नहीं। "मेरी राय में नाटक में गीत रखना कोई बहुत जरूरी नहीं है। कभी-कभी तो गीत समस्याओं के प्रदर्शन में बाधक हो उठते हैं। .... नाटक में गीत का पक्षपाती मैं वहीं तक हूँ, जहाँतक इसे जीवन में देख पाता हूँ।" मिश्रजी अभिनय के सम्बन्ध में स्वाभाविकता पर जोर देना चाहते हैं। "इसी कारण मैंने स्वगत की प्रणाली को अस्वाभाविक समझकर छोड़ दिया है। पात्रों की भीतरी भावनाओं और प्रवृत्तियों को व्यक्त करने में जितना सहायक मूक अभिनय होता है, उतना स्वगत नहीं। जहाँ कहीं स्वगत ऐसी चीज की जरूरत पड़ी है, मैंने मूक अभिनय से काम लिया है।"3 १. मुक्ति का रहस्य (मैं बुद्धिवादी क्यों हूँ ?), पृ० २४ २. वही, पृ० २५ ३. वही, पृ० २५-२६

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हिन्दी-नाटकों में बौद्धिक कलेवर देने के कारण साहित्य मिश्रजी का ऋणी है, किन्तु उनकी अपनी विवशताएँ तथा सीमाएँ भी हैं। आलोचना करते समय हमें उन विवशताओं पर भी दृष्टि रखनी है। सेठ गोविन्ददास

प्रभाव तथा प्रवृत्ति : सामाजिक यथार्थ के साथ राजनीति को लेकर नाटक लिखनेवालों में सेठ गोविन्ददास अग्रगण्य हैं। भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम से उनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध रहा है, अतः उनके नाटकों में यथार्थ की प्रमुखता है। सेठ गोविन्ददास के नाटक का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। उन्होंने राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक तथा समस्यामूलक नाटकों की रचना की है। उनके एकांकियों के कई संग्रह निकले हैं, स्वोक्ति-शैली पर भी उनके नाटक हैं। उन्होंने इब्सन की परम्परा के नये नाटकों से प्रेरणा ग्रहण की है और इस अर्थ में उन्हें इब्सन का अनुयायी कहा जा सकता है। सेठजी ने इंगलैण्ड के शॉ, स्वीडेन के स्ट्रिण्डबर्ग और अमेरिका के ओनील से भी पर्याप्त मात्रा में प्रेरणा ली है; भारतीय नाट्याचार्यों से तो उन्हें प्रेरणा मिली ही है। उन्होंने भारतीय तथा पाश्चात्त्य नाट्यशास्त्रों का समुचित अध्ययन किया। इसका बहुत बड़ा लाभ यह हुआ कि वे एक ओर भारतीय नाट्यशास्त्र की जटिलताओं को समझने में समर्थ हुए, तो दूसरी ओर पाश्चात्त्य नाट्यशास्त्र की उन विशेषताओं को अपना सके, जिन्हें हिन्दी-नाटक में लाकर उनका परिष्कार किया। सेठजी विचारों से पूर्णतः भारतीय हैं। अतः उनके भारतीय नाटक के व्यक्तित्व की रक्षा की आशा की जा सकती है। सेठजी ने भारतीय तथा यूरोपीय नाटकों तथा नाट्यशास्त्रों का गम्भीर अध्ययन करके नाट्यशास्त्र-सम्बन्धी अपने मत स्थिर किये और उन्हें 'नाट्यकला-मीमांसा' में ठोस रूप दिया। इब्सन ने अपने नाटकों में स्वाभाविकता लाने के प्रयत्न में नियत श्रव्य तथा अश्रव्य-दोनों प्रकार के स्वगत कथनों का बहिष्कार किया था। स्वभावतः इस कारण भी सेठजी उनकी ओर झुके। इब्सन की इस प्रवृत्ति की सार्थकता की ओर संकेत करते हुए सेठजी ने लिखा है-"स्वगत कथन से अधिक अस्वाभाविक बात नाटकों में कोई और नहीं हो सकती।"१ उन्होंने ऐसा इसलिए कहा कि वे भी नाटकों में स्वाभाविकता लाने के आग्रही हैं। IEEL सेठजी आलोचना को बुरा नहीं मानते, प्रत्युत प्रयोगशील कलाकार होने के कारण उस आलोचना के प्रकाश में अपने नाटकों में परिष्कार लाने का प्रयत्न करते हैं। उनके नाटकों के प्रकाशन के बाद डॉ० नगेन्द्र ने कहा कि उनके नाटकों में अन्तःसंघर्ष बड़ा दुर्बल होता है। इसके बाद सेठजी ने अपने नाटक 'गरीबी या अमीरी' में अपने नाट्य-सिद्धान्त पर फिर से विचार करके अपनी सम्पूर्ण मान्यताओं में संशोधन किया।

१ तीन नाट़क (प्राक्कथन), पृ० १९

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इस नाटक (गरीबी या अमीरी)) में उन्होंने स्वगत कथन का प्रयोग किया और यह भी कह दिया कि यदि नाटक सफल हुआ, तो इसका सारा श्रेय इसके स्वगत कथनों को प्राप्त होगा और यह कदाचित् असफल हुआ, तो उसके लिए स्वगत कथन ही उत्तरदायी होंगे।' नाट्य-सिद्धान्त-सम्बन्धी सेठजी के विचार : सेठजी ने अपनी पुस्तक 'तीन नाटक' की एक विस्तृत भूमिका लिखी थी, जो पीछे 'नाट्यकला-मीमांसा' नाम से पुस्तकाकार प्रकाशित हुई। इस पुस्तक से सेठजी के नाट्य-सिद्धान्त-सम्बन्धी विचार प्रकट होते हैं।

भारतेन्दुजी ने सन्धि आदि के विषय में विचार प्रकट किया था-'संस्कृत-नाटक की भाँति हिन्दी-नाटक में इनका (प्रकरी, सन्धि आदि का) अनुसन्धान करना या किसी नाटकांग में इनकी यत्नपूर्वक भरकर हिन्दी-नाटक लिखना व्यर्थ है।' भारतेन्दु से सेठजी बहुत दूर तक सहमत हैं, परन्तु इतना अवश्य मानते हैं कि 'प्राचीन पद्धति के मनन से आधुनिक काल में भी श्रेष्ठ नाटक के प्रणयन में बहुत सहायता मिलती है।'२ वे यह भी मानते हैं कि नाटककारों के लिए यूनानी पद्धति का भी ज्ञान आवश्यक है। यूरोप के आधुनिक नाटककारों ने इब्सन का बहुत अनुकरण किया और फिर अँगरेज नाटककारों ने इब्सन से प्रभावित शॉ तथा गाल्सवर्दी से प्रभाव ग्रहण किया है। सेठजी का मत है कि भारतीय परिस्थिति के अनुसार उचित परिवर्तन करके उसी पद्धति का अनुसरण भारतवर्ष में भी होना चाहिए। अनेक नाटककारों के समान सेठजी ने भी अपने नाटकों में यह प्रभाव ग्रहण किया है। भारत तथा पश्चिम के प्राचीन तथा नवीन विद्वानों का मत लेकर सेठजी किसी उत्तम नाटक में निम्नलिखित बातों का होना आवश्यक मानते हैं।

नाटक में सबसे पहले विचार या समस्या होना आवश्यक है। फिर उस विचार के विकास के लिए संघर्ष अनिवार्य है। संघर्ष बाह्य और आन्तरिक दोनों ही आवश्यक है। आन्तरिक संघर्ष में ही मनोविज्ञान को अपना कार्य करने का अवसर मिलता है। विचार तथा संघर्ष की सम्बद्धता तथा मनोरंजकता के लिए कथा की सृष्टि होती है। बिना पात्ों के कथा नहीं हो सकती, अतः पात्रों का प्रादुर्भाव और उनका चरित्र-चित्रण होता है। पात्रों की कृति और कथोपकथन उस कथा को रहने के साधन हैं। अतः सेटजी ने उत्तम नाटक के विषय में लिखा है-'जिस नाटक में जितना महान् विचार होगा, जितना तीव्र संघर्ष होगा, जितनी संगठित और मनोरंजक कथा होगी, जितना विशद चरित्र-चित्रण होगा और जितनी स्वाभाविक कृति एवं कथोपकथन होगे, वह उतना ही उत्तम तथा सफल होगा।'3

१. गरीबी या अमीरी, भूमिका, पृ० ८ २. नाटयकला-मीमांसा, पृ० १२ ३. वहो, प्रृ० १६

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सृष्टि की प्रत्येक वस्तु के समान नाटक का भी आरम्भ, विकास तथा अन्त होता है। किस स्थान पर नाटक का आरम्भ हो और विकास के उपरान्त कहाँ उसका अन्त हो, इस बात पर विशेष ध्यान देना आवश्यक है। फिर नाटक प्रदर्शन की वस्तु है, अतः क्षणमात्न के लिए भी उसमें शिथिलता नहीं होनी चाहिए। इसलिए, नाटक का आरम्भ संघर्ष से ही होना चाहिए। विकास के बाद नाटक का अन्त चरम सीमा पर होना चाहिए या यदि चरम सीमा के बाद उपसंहार के लिए कुछ कहना हो, तो उपसंहार के बाद अन्त होना चाहिए। इतना होने पर भी सेठजी का मत है कि यदि नाटक में रस का प्रादुर्भाव नहीं हुआ, तो वह कला का उत्तम उदाहरण नहीं कहा जा सकता। नाटक में स्वाभाविक्ता का रहना नितान्त आवश्यक है। पाश्चात्त्य नाटककारों ने इस विषय में बहुत उन्नति की है। नाटक में अंकों की संख्या, व्यवस्था और उनका बड़ा या छोटा होना कथानक पर निर्भर करता है। आजकल हिन्दी-नाटकों में तीन ही अंक रखकर सभी अंकों को बराबर बनाने का जो प्रयास हो रहा है, उससे अस्वाभाविकता बढ़ती है। बहुत अधिक पात्र भी रखना अस्वाभाविकता बढ़ाता है। नाटक में हास्य रस : हास्य की उत्पत्ति किसी असाधारण या विकृत रूप, वेश, संकेत, चरित्र, परिस्थिति अथवा शब्द या वाक्य देखने या सुनने से होती है। सेठजी अन्तिम दो से उत्पन्न हास्य को श्रेष्ठ मानते हैं। जब कोई व्यक्ति असाधारण या विकृत परिस्थिति देखता है अथवा असाधारण या विकृत शब्द या वाक्य सुनता है, तो उससे उत्तम हास्य उत्पन्न होता है। इन दोनों में भी वह हास्य अधिक अच्छा है, जो विकृत शब्द या वाक्य के सुनने से उत्पन्न होता है। जिन शब्दों या वाक्यों से हास्य उत्पन्न होता है, उन्हें व्यंग्य कहा जाता है। पश्चिमी साहित्यकारों ने इस व्यंग्य के तीन भेद किये हैं-सटायर, विट और ह्य मर। हास्यरस में इन तीनों का सुन्दर प्रयोग किया जा सकता है। सेठजी पारसी रंगमंच पर प्रदर्शित हास्य को अत्यन्त निम्नकोटि का और अश्लील मानते हैं। पात्ों की भाषा : पात्ों की भाषा के सम्बन्ध में सेठजी का मत है कि कुछ पात् उप भाषाओं का प्रयोग करें, तो स्वाभाविकता में वृद्धि ही होगी। अँगरेजी पढ़े-लिखे पात् अत्यन्त प्रचलित अँगरेजी-शब्दों का प्रयोग करें, तो स्वाभाविक लगेगा। बंगाली, पंजाबी, महाराष्ट्री आदि जैसी हिन्दी बोलते हैं, यदि रंगमंच पर वैसी भाषा बोलें तो स्वाभाविकता बढ़ेगी। हिन्दू, मुसलमान पात्रों के पारस्परिक वार्त्तालाप में हिन्दू-पात्रों का सरल हिन्दी में और मुसलमान-पात्रों का सरल उर्दू में ही बोलना उचित जान पड़ता है। रंगमंच : सेठजी का प्रस्ताव है कि रंगमंच की उन्नति के लिए विज्ञान से प्राप्य सुविधाओं से लाभ उठाना शेयस्कर होगा।' वे नहीं मानते कि चलचित्र के आविष्कार १. गरीबी या अमीरी (निवेदन), पृ० रू

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से नाटक की रचना निश्चित रूप से बाधित हो जायगी। वे तो अमेरिका के प्रभाव पर कहते हैं कि चलचित्र की उन्नति से नाटक का पुनरुद्धार हो सकता है। परन्तु, इसके लिए आवश्यक यह है कि रंगमंच वैज्ञानिक आविष्कारों से लाभ उठावें। संस्कृत-नाटकों में एक अंक में एक ही दृश्य रहता था, इसके अतिरिक्त किसी अंक के आरम्भ या अन्त में विष्कम्भक, प्रवेशक आदि का प्रयोग होता था। सेठजी ने भी अपने कई नाटकों में एक अंक में एक ही दृश्य की योजना की है, तथापि उन्हें यह प्रथा बहुत रुचिकर नहीं प्रतीत होती। उन्होंने इसके तीन कारण बताये हैं-१ पूरे अंक में एक ही दृश्य रखने से वह आकर्षण नहीं रह जाता, जो दृश्यों के परिवर्त्तन में रहता है; २. उसी एक दृश्य में कई पात्रों का प्रवेश, प्रस्थान तथा सम्भाषण होता है, जो नहीं होना चाहिए; ३. एक ही दृश्य रखने से समय के एकीकरण की कठिनाई का सामना करना होता है। एक दृश्य में एक ही समय की घटना का प्रदर्शन हो सकता है, पर दृश्य-परिवर्त्तन से यह कठिनाई दूर हो जाती है। एक अंक में दृश्यों की संख्या के विषय में कोई नियम नहीं हो सकता; क्योंकि यह कथानक आदि पर निर्भर करता है। पात्रों के प्रवेश तथा प्रस्थान की ओर भी नाटककार को ध्यान देना चाहिए। उदाहरणार्थ, यदि कोई पात्र एक दृश्य में किसी से बात कर रहा है या मूर्च्छित होकर गिरता है, तो वह उसके बादवाले दृश्य में बैठा हुआ नहीं दिखाया जाना चाहिए। फिर नाटककार को इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि पात्र किस प्रयोजन से प्रवेश या प्रस्थान कर रहे हैं। दृश्य, पात्र और वेशभूषा : जिस युग की कथा पर नाटक लिखा जा रहा है, उस युग के दृश्यों एवं वेशभूषा पर और जिस प्रकार के पात् हों, उसपर विचार करके नाटककार को दृश्यों, पात्रों और वेशभूषा का पूरा वर्णन कर देना चाहिए। इससे लाभ यह होता है कि यदि नाटक खेला जाय तो उसका अभिनय भ्रष्ट नहीं होगा और पढ़ते समय भी पाठक के नेत्रों के समक्ष सभी बातें चित्र के समान प्रकट हो जायेंगी। डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी नाट्यशास्त्र की परम्परा : डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने "नाट्यशास्त्र की भारतीय परम्परा और दशरूपक' शीर्षक अपनी पुस्तक की विस्तृत भूमिका में भारतीय नाट्यशास्त्र की परम्परा का विवेचन किया है। इसमें विशेषतः भरत के 'नाट्यशास्त्र' तथा धनंजय के 'दशरूपक' के आधार पर नाट्य-सिद्धान्त के महत्त्वपूर्ण तथ्यों का विश्लेषण हुआ है। नाट्यशास्त्र में वर्णित नाट्यवेद की उत्पत्ति-विषयक कथा का द्विवेदीजी ने एक नवीन अर्थ प्रस्तुत किया है। यह नाट्यवेद चारों वेदों से तथ्य ग्रहण करके भी स्वतन्त्र वेद है, जो सार्ववणिक है। उस समय भारत में बहुत-सी जातियों का प्रादुर्भाव हो चुका था। द्विवेदीजी ने इस बात का तर्कपूर्ण समर्थन किया है कि नाट्यवेद में ऋग्वेद से पाठ्य, यजुर्वेद से अभिनय, सामवेद से गीत-अंश और अथर्ववेद से रस लिये गये। नाट्यशास्त्र में

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'अभिनय' शब्द का प्रयोग बहुत व्यापक अर्थ में हुआ है। इसमें नाटक के प्रायः सभी तत्त्वों का समावेश हो जाता है। नाट्यशास्त्र में वर्जित कई कथाओं से द्विवेदीजी ने सिद्ध किया है कि नाट्यवेद में क्रमिक विकास और विस्तार होता गया। पहले नाटक में स्त्रियों का योग नहीं था, पीछे जब यह अनुभव किया गया कि स्त्रियों के विना नाटक की कुछ क्रियाएँ सम्भव नहीं हैं, तब स्त्रियों के प्रवेश का विधान हुआ। पूर्वरंग आदि तथा रूढ़ियाँ : भरत ने पूर्वरंग तथा रंगपूजन का विस्तृत विवरण दिया है, पीछे धनंजय ने संक्षेप में उनकी चर्चा-भर कर दी है, इससे अनुमान किया गया है कि बाद में इतने विस्तार और आडम्बर के साथ यह किया नहीं होती होगी। द्विवेदीजी का मत है कि ईसवी सन् के पहले और बहुत बाद भी इस प्रकार की विधि अवश्य रही है। आचार्य द्विवेदीजी ने नाट्यशास्त्र में वर्णित लोकधर्मी और नाट्यधर्मी रूढ़ियों का विश्लेषण किया है और निष्कर्ष निकाला है कि लोकधर्मी विधियों की कसौटी लोक- जीवन ही है। नाट्यशास्त्र के वर्त्तमान रूप के विषय में द्विवेदीजी का मत है कि यह अनेक परम्पराप्राप्त शास्त्रों का समन्वित रूप है। इसने ईसवी सन् की तीसरी शताब्दी तक वर्त्तमान रूप अवश्य ले लिया होगा; क्योंकि कालिदास जैसे नाटककार को नाट्यशास्त्र का लगभग ऐसा ही रूप प्राप्त था। रूपक-भेद : धनंजय ने कथावस्तु, नायक और रस को रूपकों का भेदक तत्त्व माना है। द्विवेदीजी का कथन है कि इस प्रकार रूपकों के भेद ३ (कथावस्तु) X ३ (नायक) X ८ (रस)= ७२ स्वीकार करने होंगे, परन्तु भरत व्यावहारिक नाट्य- प्रयोग के विवेचक थे, अतः उन्होंने १० ही रूपकों की विवेचना की है, जो उनके समय में प्रचलित थे। अर्थ-प्रकृति : अर्थ-प्रकृतियों को द्विवेदीजी ने विशेष प्रयत्न से स्पष्ट किया है। 'बिन्दु पात्ों की कवि-निबद्ध चेतन चेष्टाएँ हैं, पर कार्य अचेतन साधन, जैसे सैन्य-सामग्री, दुर्ग, कोश, धन आदि। किसी वृक्ष का उपमान लें, तो बीज बीज है, बिन्दु उसे सुरक्षित, पल्लवित, पुष्पित करने का सोद्देश्य प्रयत्न है, कार्य कुदाल, खाद आदि हैं, पताका किसी स्वार्थ-सिद्धि के प्रतिदान में नियुक्त माली है और प्रकरी, क्वचित्-कदाचित् अनायास उपस्थित होकर सहायता कर जानेवाला हितैषी।" द्विवेदीजी मानते हैं कि कवि या नाटककार का सबसे बड़ा कौशल बिन्दु की योजना में प्रकट होता है। इसी उपाय के द्वारा वह कथा को अवान्तर प्रसंगों में बहकने से रोकता है और नायक की प्रयत्नादि अवस्थाओं को जागरूक बनाये रखता है। जरूरत पड़ने पर वह अन्य अर्थ-प्रकृतियों का सहारा लेता है, परन्तु बिन्दु सर्वत्र आवश्यक होता है। वस्तुतः, 'अर्थ-प्रकृति कथा के उचित संघटन के उपाय हैं, अवस्थाएँ नाटक के नायक की फल-प्राप्तिजन्य क्रियाओं की १. नाट्य की भारतीय परम्परा और दशरूपक-भूमिका, पृ० ४०

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५२२] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अवस्थाएँ हैं और सन्धियाँ, इन अवस्थाओं को अनुकूल दिशाओं में ले जानेवाले उस घटना-चक्र के, जो अर्थ-प्रकृतियों से मिलकर पूरा इतिवृत्त या कथानक बन जाता है, विभिन्न अंग हैं।" धीरोद्धत में 'धीर' : द्विवेदीजी ने नायक के भेद धीरोद्धत आदि में 'धीर' शब्द की तर्क-सम्मत व्याख्या की है। वस्तुतः, जो 'धीर' होगा, वह 'उद्धत' कैसे हो सकता है ? उनका कथन है कि एक पुराना 'धीर' शब्द था, जो 'धी' से निकलता था। अतः, 'धीर' शब्द का अर्थ है सहज बुद्धिवाला, मनोभाव-सम्पन्न। नेता कथावस्तु का नियन्त्रण करता है। जिन रूपकों में धीरोद्धत नायक होते हैं, वे पूर्णांग नहीं होते। डिम, व्यायोग, समवकार और ईहामृग-इसी प्रकार के रूपक हैं। वीथी, उत्सृष्टिकांक आदि वस्तुतः तमाशे ही रहे होंगे, सही अर्थों में उन्हें रूपक नहीं कह सकते। इनपर अनुकार्य का आरोप स्पष्ट रूप से नहीं होता। ये अल्पोद्भिन्न रूपक ही कहे जा सकते हैं। रस : रस के विषय में चर्चा करते हुए आचार्य द्विवेदीजी ने इस मनोवैज्ञानिक सत्य की ओर ध्यान आकर्षित किया है कि शृंगार रस में चित्त का विकास और वीर रस में विस्तार होता है। इसीलिए, पूर्णांग रूपकों में इन्हीं दो रसों की प्रधानता रहती है। नाटक अन्य रसों में नहीं बनते। भारतीय नाट्यशास्त्रियों ने करुण रस को नाट्य रस मानते हुए भी शोकान्त नाटकों की कल्पना नहीं की। परन्तु, यदि नाटक में नायक या नायिका उसे माना जाय, जो सामाजिकों की सहानुभूति पा सके, तो ऐसे नायक भी सामाजिकों की सहानुभूति के पात्र हो सकते हैं, जो चरित्र-बल में उदात्त होते हुए भी किसी विशेष दुर्बलता के कारण कष्ट में पड़ जाते हैं। पाश्चात्य देशों में ऐंसी परिस्थिति के शिकार उदात्त तथा ललित कोटि के पात्र तासदी के नायक होते हैं। प्रत्येक अवस्था में उनका स्थायी भाव शोक ही नहीं होता, कई बार चित्त में उत्साह, रति आदि भाव भी प्रबल होते हैं, केवल परिणाम अनिष्टकारक होता है। यवन-प्रभाव : भारतीय नाट्य-परम्परा बहुत प्राचीन है। कई बार कुछ बाह्य साक्ष्यों के आधार पर यूरोपीय विद्वानों ने इसपर यावनी प्रभाव सिद्ध करने का प्रयास किया है। परन्तु, द्विवेदीजी का मत है कि यह कहना ठीक नहीं। भारतीय नाट्य- परम्परा का स्वतन्त्र विकास हुआ है। निस्सन्देह शिल्प तथा आदर्श की दृष्टि से भारतीय नाटक यूनानी नाटक से भिन्न है। यह तो नहीं माना जा सकता कि यूनानियों जैसी शक्तिशाली जाति के सम्पर्क में आने पर भारतीयों के विचारों तथा कल्पनाओं में परिवर्त्तन हुआ ही नहीं होगा, परन्तु जहाँतक नाटकीय सिद्धान्तों का प्रश्न है, भारत में इसकी बहुत प्राचीन तथा समृद्ध परम्परा विद्यमान थी। यहाँ के नाट्य-सिद्धान्तों पर बाह्य प्रभाव की बात केवल अटकल पर आधारित है। भारतीय नाट्यशास्त्र की परम्परा ईसा के जन्म से सैकड़ों वर्ष पुरानी है। १. नाट्य की भारतीय परम्परा और दशरूपक-भूमिका, पृ० ४३

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हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त का विकास [५२३

आचार्य सीताराम चतुर्वेदी नाटक की उत्पत्ति : आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने 'अभिनव नाट्यशास्त्र' नामक ग्रन्थ लिखकर नाट्य-सिद्धान्त का विवेचन किया है। प्रस्तुत ग्रन्थ में उनके सिद्धान्तों का उल्लेख विभिन्न अध्यायों में यथावसर किया गया है। नाटक की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रचलित सभी सिद्धान्तों की समीक्षा करके उन्होंने अपना मत दिया है कि नाटक की उत्पत्ति लोक-चिन्ता का शमन करने के लिए संगीत, कथा और अभिनय के संयोग से हुई। वे सुखान्त नाटक ही उचित मानते हैं, और गीतों का उपयोग भी स्वीकार करते हैं, परन्तु नाटक में अधिक गीतों का प्रयोग उचित नहीं मानते। उनके अनुसार थोड़े पात्रों तथा दृश्योंवाले नाटक श्लाध्य हैं। नाटक में एक ही इतिवृत्त होना चाहिए और वह निश्चित परिमाण का हो। पताकास्थानक और अर्थोपक्षेपकों का प्रयोग ठीक नहीं। पात् : चतुर्वेदीजी के अनुसार नाटकीय पात्र के तीन भेद होते हैं : सुबुद्धि, अबुद्धि और जड़। सुबुद्धि मनुष्य होता है और अबुद्धि पशु-पक्षी आदि। नाट्य-करिया जड़ भी कर सकते हैं, जैसे पुतली, कटा हाथ आदि। उन्होंने प्राचीन नाट्यशास्त्रियों द्वारा वर्णित पात्ों के अनेक भेदों का विवेचन करके सिद्ध किया है कि पुराने भेद युग-प्रभाव के कारण स्वयमेव लुप्त हो गये हैं। चतुर्वेदीजी ने अनेक दृष्टियों से पात्रों के अनेक भेद किये हैं। इस विषय में पाश्चात्त्य मनोवैज्ञानिकों के मतों की भी समीक्षा की गई है। संवाद तथा रस : चतुर्वेदीजी का सिद्धान्त है कि नाटक में प्रयुक्त संवाद स्वाभाविक हो और उतना ही हो, जितने से कथा का विस्तार तथा नाटकीय चरित्र का विकास हो। संवाद लोकबोध्य होना चाहिए। उन्होंने रस का अध्ययन आधुनिक मनोविज्ञान की पृष्ठभूमि में किया है। रस और स्थायी भाव की व्याख्या के बाद संचारी भाव का भी विश्लेषण किया गया है। उन्होंने भरत द्वारा गिनाये ३३ संचारियों में कई को छोड़कर कुछ नवीन संचारियों का भी विवेचन किया है और इस प्रकार सब मिलाकर संचारियों की संख्या ३२ मानी है। रूपक के भेद तथा रंग-निर्देश : चतुर्वेदीजी ने रूपकों तथा उपरूपकों के परम्परागत नाटकादि भेदों के अतिरिक्त कई नवीन भेद किये हैं; जैसे नाट्य, नृत्य, गीतिनाट्य, मूक नाट्य आदि। फिर उन्होंने विषय, रंगमंच, प्रदर्शन-विधि, प्रभाव, रचना, उद्दश्य, दर्शक तथा पात के आधार पर नाटक के अनेक भेद किये। अन्त में वर्त्तमान वर्गीकरण के अनुसार नाटक के कथा-प्रधान आदि छह भेद किये गये हैं। उन्होंने प्रस्तावना की प्राचीन प्रणाली के अतिरिक्त कई नवीन प्रणालियों का भी विवेचन किया है, जो वस्तुतः आधुनिक नाटकों में प्रयोग में लाई जा रही हैं। चतुर्वेदीजी ने अभिनेता, रंग-व्यवस्थापक, प्रकाश-व्यवस्थापक, संगीत-व्यवस्थापक तथा नेपथ्य-

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५२४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

व्यवस्थापक की दृष्टियों से रंग-निर्देश के भी महत्त्व का निरूपण किया है। उन्होंने केवल नाटक-लेखक की दृष्टि से ही नहीं, प्रत्युत अभिनेता तथा प्रयोक्ता की दृष्टियों से भी नाट्यशास्त्र का विवेचन किया है। उनके नाट्यशास्त्र में भारतीय नाट्यशास्त्रियों के अतिरिक्त विदेशी विद्वानों के भी सिद्धान्तों की समीक्षा हुई है, उन्होंने कई देशों के नाट्य- सिद्धान्तों की भी चर्चा की है। चतुर्वेदीजी केवल नाट्यशास्त्री ही नहीं, नाटक- लेखक भी हैं, अतः उन्हें नाट्यशास्त्र का व्यावहारिक ज्ञान है, जिसका उपयोग उन्होंने किया है।

अभिनव नाट्यशास्त्र का दूसरा भाग भारतीय तथा पाश्चात्त्य रंगमंच के नाम से निकला है, जिसमें रस, रंगमंच आदि विषयों पर सम्यक् रूप से विचार किया गया है।

डॉ० दशरथ शोझा नाट्य की भारतीय परम्परा : हिन्दी-साहित्य के आधुनिक नाट्य-शास्त्रियों में डॉ० दशरथ ओझा का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने साहित्यिक नाटकों के साथ लोक-नाट्य का भी सम्यक् अनुशीलन किया है; साथ ही नाटक के वैधानिक पक्ष तथा उसकी अभिनेयता आदि के विषय में भी पर्याप्त चिन्तन किया है। उनकी पुस्तक 'नाट्य-समीक्षा' में उनके कुछ ऐंसे निबन्धों का संग्रह हुआ है, जिनमें नाटक-सम्बन्धी सैद्धान्तिक तथा प्रक्रियागत विचार प्रकट हुए हैं। अँगरेजी राज्य में भारतीय विद्वानों की दृष्टि बहुलांश में पाश्चात्त्य नाट्य-समीक्षा-पद्धति से प्रभावित रहती थी। भारत की नाट्य-पद्धति हजारों वर्ष प्राचीन है, परन्तु यहाँ के आधुनिक विद्वानों की दृष्टि पश्चिम की नाट्य-पद्धति की चकाचौंध में अपनी परम्परा का तिरस्कार कर रही थी। डॉ० ओझा ने अपनी नाट्य- परम्परा और नाट्य-समीक्षा को नये परिवेश में देखने का प्रयास किया है। इस प्रयास में उन्होंने दक्षिण भारत की नाट्य-परम्परा पर भी पर्याप्त ध्यान दिया है। इस पुस्तक के प्रथम तीन निबन्धों में नाट्य-सिद्धान्त का क्रमिक विकास दिखाते हुए परम्परागत रूपकों तथा उपरूपकों का विवेचन नवीन रूप में प्रस्तुत किया गया है।

'रूपक' की व्याख्या : 'रूपक का स्वरूप' में डॉ० ओझा ने पहले 'रूपक' शब्द की व्युत्पत्ति बताकर इसके विभिन्न अर्थों पर प्रकाश डाला है। 'रूपक' शब्द का प्रयोग निम्नलिखित विभिन्न अर्थों में होता है :

१. रूपक नामक एक ताल है और उससे युक्त प्रबन्ध रूपक-प्रबन्ध कहलाता है। २. रूपक का दूसरा प्रयोग कथाकाव्य के रूप में होता है। हिन्दी में रूपक काव्य वही है, जो अँगरेजी में एलीगॉरी (allegory) कहा जाता है। हिन्दी और संस्कृत-साहित्य में रूपक-कथा के अनेक भेद देखे जाते हैं ;

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(क) वह कथा, जिसमें भावनाओं तथा विचारों आदि अशरीरी तत्त्वों को मानव के रूप में अभिव्यक्त किया जाता है, जैसे 'प्रबोधचन्द्रोदय'। (ख) कहीं-कहीं अशरीरी तत्त्व और मानव-पात्र दोनों दिखाये जाते हैं, जैसे पन्तजी का 'ज्योत्स्ना' नाटक। (ग) "रूपक नाटकों में तीसरे प्रकार के मानवेतर प्राणियों को, साथ-ही-साथ अभिधार्थ से चरित्रगत विशेषता को प्रकट करनेवाले मानव को पात्र के रूप में लाया जाता है।"१ जैसे 'एक घूट' नाटक में कुंज आदि प्रकृति के पदार्थ तथा मनोवृत्तियों का मानवीकरण किया गया है, तो झाड़वाला अपने नाम से ही चरित्र का द्योतक जान पड़ता है। (घ) चौथे प्रकार की रूपक-कथाओं में पात्र तो वास्तविक मानव होते हैं, परन्तु उन घटनाओं में एक गूढ़ अर्थ छिपा रहता है, जैसे 'कामायनी'। ३. रूपक का तीसरा अर्थ है-'रूपारोपात्तु रूपकम्'-रंगमंच पर किसी पात्र में राम या सीता आदि का आरोप करके जो अभिनय दिखाया जाता है, उस सम्पूर्ण क्रिया को रूपक का नाम दिया जाता है। नाट्यशास्त्र में यही अर्थ अभिप्रेत है। दशरूपक : दूसरे निबन्ध में भरतादि द्वारा निर्दिष्ट दस रूपकों का विवेचन हुआ है। पहले नाटक का विवेचन है और स्वभावतः यह अन्य रूपकों के विवेचन से अधिक विस्तृत है। 'नाटक' शब्द की व्युत्पत्ति के विषय में विभिन्न आचार्यों के मत की समीक्षा की गई है। लेखक का कथन है कि यद्यपि नाटक और रूपक दोनों पर्यायवाची शब्द हैं, फिर भी दोनों में सूक्ष्म अन्तर है। "नाट्य में अवस्थाओं की अनुकृति को प्रधानता दी जाती है, किन्तु रूपक में अवस्थाओं की अनुकृति के साथ-साथ रूप का आरोप भी आवश्यक है।"२ आगे नाटक के सम्बन्ध में भरत, सुबन्धु, रामचन्द्र-गुणचन्द्र, विश्वनाथ आदि संस्कृत के नाट्याचार्यों और भारतेन्दु, गुलाब राय आदि हिन्दी के आचार्यों के विचारों का विश्लेषण किया गया है। इस स्थल पर नाटक और नाटिका के सम्बन्ध का विश्लेषण एवं नाटिका के विषय में विभिन्न आचार्यों के मतों की समीक्षा हुई है। तदुपरान्त रूपक के प्रकरणादि भेदों का आलोचनात्मक विवेचन किया गया है। सभी के विषय में विभिन्न आचार्यों के मतों की समीक्षा प्रस्तुत की गई है। यथास्थान हिन्दी के आचार्यों- भारतेन्दु तथा डॉ० गुलाब राय के मत भी दिये गये हैं। स्थान-स्थान पर डॉ० राघवन् आदि विद्वानों के मतों की भी चर्चा की गई है।

१. नाट्य-समीक्षा, पृ० ३ २. वही, पृ० द

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५२६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

उपरूपक और रासक : तीसरा निबन्ध उपरूपक का स्वरूप' छोटा है। इसमें पहले रूपक तथा उपरूपक में अन्तर संक्षेप में बताया गया है। फिर अग्निपुराण, भावप्रकाशन तथा साहित्यदर्पण में वणित उपरूपकों का उल्लेख हुआ है। लेखक ने उपरूपकों के सृजन- काल के विषय में प्रचलित विभिन्न मतों की समीक्षा की है। 'रासक (उपरूपक) का विकास' में पहले रूपकों और उपरूपकों का अन्तर बताया गया है। उपरूपक नृत्य से विकसित होकर नाट्य की कोटि में पहुँचे हैं। नाट्यशास्त्र में ऐसे उद्धरण आये हैं, जिनके आधार पर उपरूपकों की बीजावस्था का अनुमान लगाया जाता है। 'रासक' नामक उपरूपक का तो अपना इतिहास है। दशरूपक की 'अवलोक' टीका में एक श्लोक आया है, जिससे डोम्बी आदि नृत्यों का पता लगता है। 'अभिनव- भारती' में भी इसका संकेत है। विश्वनाथ आदि विभिन्न आचार्यों ने रासक का लक्षण बताया है। डॉ० ओझा ने विवेचन करके निष्कर्ष निकाला है-"कालान्तर में रासक के दो रूप हो गये-एक तो मूल नृत्य के ही रूप में तद्वत् बना रहा, दूसरा विकसित होता हुआ उपरूपक की परिधि में विराजमान हो गया।"१ प्रेक्ष्य और पाठ्य नाटक : अगले निबन्ध 'नाटक : प्रेक्ष्य और पाठ्य' में प्रेक्ष्य तथा पाठ्य नाटकों के पृथक्करण की सैद्धान्तिक समस्या उठाई गई है। अभिनेय या प्रेक्ष्य नाटकों का तो महत्त्व है ही, परन्तु साथ ही पाठ्य नाटकों के महत्त्व की ओर से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। साहित्य की इस विधा का भी, अन्य विधाओं के समान, अपना महत्त्व है। डॉ० ओझा ने प्रेक्ष्य तथा पाठ्य नाटकों में निम्नलिखित विषयों में अन्लर दिखाया है-१. आकार, २. कथानक के प्रकार, ३. वस्तु-संघटन और ४. पात्रों की वक्तृता। 'यदि पाठ्य नाटकों की तुलना प्रेक्ष्य नाटक, काव्य या उपन्यास से की जाय तो यह कहा जा सकता है कि पाठ्य नाटकों का दृश्य-विधान एवं कथोपकथन तो प्रेक्ष्य नाटकों की पद्धति के अनुसार होता है, किन्तु उनका कथानक एवं घटना-विकास काव्य एवं उपन्यास की शैली के अधिक समीप पहुँचता है।" हमारे यहाँ जो नाटक अभिनेय नहीं होते, उन्हें सामान्यतः पाठ्य कह दिया जाता है, परन्तु पाश्चात्त्य देशों में पाठ्य नाटकों की स्वतन्त्र परम्परा तथा पृथक् विधा है। पाठ्य नाटकों की भी जान-बूझकर रचना की जाती है। डॉ० ओझा ने इन दोनों परम्पराओं की सुन्दर रीति से मीमांसा की है। नाटक में आरम्भिक गद्य : एक निबन्ध में लेखक ने नाटक में आरम्भिक गद्य- प्रयोग का विवरण दिया है। प्राचीन भारतीय नाट्यकला के मुख्यतः दो केन्द्र रहे हैं- १. राजप्रासाद और २. खुले रंगमंच। परन्तु, १५वीं शती में नाटककारों का एक तीसरा वर्ग भी था। इस वर्ग के विद्वान् महात्मा संस्कृत और लोक-प्रचलित नाट्य-पद्धतियों के मिश्रण से एक नवीन नाट्य-शैली का प्रयोग कर रहे थे। इनमें आसाम के शंकरदेव १. नाट्य-समीक्षा, पृ० ३४ २. वही, पृ० ४०

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प्रमुख थे। इन्हीं नाटककारों ने भाषा-नाटक में पहले-पहल गद्य का प्रयोग किया। अगले छोटे-से अध्याय में पद्य-नाटक की विशेषता बताई गई है। अँगरेजी-साहित्य में काव्य-नाटक और नाटकीय काव्य -- दो भिन्न-भिन्न काव्य-रूप माने गये हैं। लेखक ने इन दोनों विधाओं में स्पष्ट अन्तर बताया है। हिन्दी में गम्भीर पद्य-नाटकों की बहुत कमी है। इस अध्याय में ओझाजी का निष्कर्ष है कि कुछ विशेष प्रकार के विषय एवं प्रसंग की अभिव्यक्ति पद्य-नाटक के रूप में सफलतापूर्वक हो सकती है। लोक-नाट्य : एक अन्य निबन्ध में डॉ० ओझा ने हिन्दी-लोक-नाट्य की शिल्प- शैली का अनुसन्धानात्मक विवेचन किया है। इस निबन्ध के आरम्भ में ही लेखक ने बर्नार्ड शॉ का हवाला देकर बताया है कि नाटक मानव की दो उद्दाम वृत्तियों के मिलने से पैदा हुआ है-नृत्य देखने की प्रवृत्ति और कहानी सुनने की प्रवृत्ति। परन्तु, भारत के वातावरण में नृत्य तथा कहानी के साथ संगीत को भी जोड़ देना चाहिए। विद्वानों का मत है कि लोक-नाट्य में नृत्य की प्रवृत्ति ही आधार है। भिन्न-भिन्न देशों के नृत्यों के उदाहरण देकर ओझाजी ने यह सिद्ध किया है। भारत में भी नृत्य का बहुत प्राचीन इतिहास है। इसका सर्वप्रथम उल्लेख ऋग्वेद में पाया जाता है। हिन्दू-मन्दिरों में देवदासियों का नृत्य बहुत प्राचीन काल से चला आ रहा है। जनकवियों ने भी सामान्य जनता के लिए धार्मिक तथा सामाजिक आख्यानों को हृदयंगम कराने के लिए नृत्य को प्रधान साधन बनाया। भरतनाट्यम्, कथाकली, मणिपुरी तथा कत्थक-नृत्य में वे ही भाव अभिव्यक्त हो रहे हैं। डॉ० कीथ का मत है कि वैदिक यज्ञों के अवसर पर सम्पन्न होनेवाले नृत्य धीरे-धीरे यात्रा-नाटक, रास-नाटक, भरत-नाटक आदि के रूप में विकसित हो गये। डॉ० ओझा ने नृत्य, नृत्त तथा नाट्य में पारस्परिक अन्तर स्पष्ट किया है। उन्होंने बताया है कि उपरूपक नृत्य के अधिक समीप हैं और रूपक उपरूपकों के विकसित रूप हैं। रूपकों में नाटक सबसे अधिक विकसित रूप हैं और इसका स्थान सर्वोपरि है। राज्य का संरक्षण पाने के कारण नाटक में सभी गुणों का रहना आवश्यक था, परन्तु लोक-नाट्य में जन-जीवन की अभिव्यक्ति की भावना अधिक रही है। अतः, उसमें नाटक के सभी गुण ढूढ़ना उचित नहीं है। लोक-नाटक में नृत्य तथा संगीत को मुख्य स्थान मिला है। लेखक ने भारत में मध्यकाल में प्रचलित विभिन्न लोक-नृत्यों-यक्षगान, यात्रा, रामलीला, स्वांग, भवाई, गिद्धा आदि -- का विद्धत्तापूर्ण विवेचन किया है। समस्या-नाटक का मूल : समस्या-नाटक के उत्स और रूप पर गम्भीरता से विचार करते हुए डॉ० ओझा ने समस्या-नाटक के विभिन्न पहलुओं की विद्वत्तापूर्ण विवेचना की है। पाश्चात्त्य देशों में एक विशेष सामाजिक परिस्थिति में समस्या-नाटकों का निर्माण एवं विकास हुआ है। इसमें सन्देह नहीं कि इन समस्या-नाटकों ने नाट्य-क्षेत्र में नवीन शिल्प को जन्म दिया है, परन्तु इनसे नवीन समस्याएँ उठ खड़ी हुई हैं। समस्या-नाटक की

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५२८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास सबसे बड़ी समस्या है कि इन नाटकों को किस प्रकार मनोरंजक तथा ग्राह्य बनाया जाय। समस्या-नाटक की बहुत बड़ी कठिनाई यह है कि इसमें समस्या के निरूपण के साथ ही नाटकीय तत्त्वों का भी निर्वाह करना होता है। दोनों का निर्वाह और विकास कठिन होता है। वर्त्तमान युग के नाटकों की अतिशय बौद्धिकता के कारण भी उनसे विरक्ति हो जाती है। दूसरी कठिनाई यह भी है कि वर्त्तमान युग का पाठक बुद्धि- व्यवसायी भी है, साथ ही वह नाटक में रसात्मकता भी ढूँढ़ता है। वर्त्तमान नाटकों की यह बहुत बड़ी समस्या है। प्रसाद के नाटकों की अभिनेयता : नाटकों में अभिनेयता के विषय में लेखक का दृष्टिकोण बहुत उदार है। प्रसाद के नाटकों में अभिनेयता पर विचार करते हुए उन्होंने विश्वास प्रकट किया है कि प्रसाद के नाटकों में अभिनय की क्षमता है, परन्तु उनके अभिनय के साधन एकत्र करने का प्रयास नहीं हुआ है। अन्य देशों में राष्ट्रीय रंगमंच के निर्माण की दिशा में अतुल धन व्यय किया जाता है, परन्तु हिन्दी-साहित्य में विना सोचे-समझे प्रसादजी के नाटकों को अनभिनेय कहकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ ली जाती है। ऐसा करना प्रसादजी के प्रति अन्याय तो है ही, नाट्य-समीक्षा के प्रति भी कम अन्याय नहीं है। इस निबन्ध के निष्कर्ष-रूप में डॉ० ओझा ने लिखा है : 'प्रसाद के नाटकों के लिए रंगमंच तैयार करने की आवश्यकता नहीं, प्रेक्षक बनाने की आवश्यकता है। अतः, प्रसाद के नाटक समयोपयोगी होने के साथ-साथ शाश्वत धर्मसंयुक्त होने से अमर रहेंगे। यदि प्रसाद की इस परम्परा को त्याग दिया गया, तो हिन्दी में उच्च कोटि का अमर साहित्य कदाचित् ही बन पाये। अतः, प्रसाद के नाटकों के उपयुक्त रंगमंच बनाने के लिए प्रेक्षकों को यत्न करना चाहिए।" यक्ष-गान : डॉ० ओझा ने दक्षिण-भारत में प्रचलित यक्ष-गान का विवरण भी पुस्तक में दिया है। यक्ष-गान भारतीय नाट्य-साहित्य का एक अत्यन्त लोकप्रिय स्वरूप रहा है, परन्तु अब विस्मृत होता जा रहा है। उत्तर-भारत में प्रचलित नाट्य-परम्परा का विवेचन करने के बाद सम्पूर्ण दक्षिण-भारत में प्रचलित इस यक्ष-गान का परिचय देकर ओझाजी ने एक नवीन तथा महत्त्वपूर्ण कार्य किया है। इससे उत्तर और दक्षिण में और भी दृढ़ (भावनात्मक) एकता बढ़ाने में सहायता मिलेगी। डॉ० ओझा का शोध-प्रबन्ध 'हिन्दी-नाटक : उद्भव और विकास' एक प्रामाणिक ग्रन्थ के रूप में ख्याति प्राप्त कर चुका है। उपर्युक्त ग्रन्थ के प्रकाशन के बाद उन्होंने नाट्य-साहित्य-विषयक अनेक मौलिक अनुसन्धान किये हैं। 'रास और रासान्वयी काव्य' नामक अपने विशाल ग्रन्थ में ओझाजी ने रासक काव्यरूप के विकास का गम्भीर तथा प्रामाणिक अध्ययन प्रस्तुत किया है।

१. नाठ्य-समीक्षा, पृ० १३९

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डॉ० रामकुमार वर्मा R। रंगमंचीय नाटक : अपने नाटक 'विजय-पर्व' की भूमिका में डॉ० रामकुमार वर्मा ने रंगमंचीय नाटक के विषय में अपना दृष्टिकोण स्पष्ट किया है। वे मानते हैं कि नाटक साहित्य का सगुण रूप है। जैसे निराकार ब्रह्म अपने वैभव का ज्ञान, अवतार लेकर, भक्त को कराता है; वैसे ही साहित्य का सौन्दर्य रंगमंच पर नाटक के रूप में प्रकट होता है। नाटक के दो पार्श्व हैं-प्रथम, हृदय की वे सारी अनुभूतियाँ हैं, जो मनोविज्ञान या रस से भरकर जीवन के यथार्थ या आदर्श के रूप में दृष्टिगत होती हैं, और द्वितीय, काल की वे सभी रूपरेखाएँ, जो मंच, नृत्य, संगीत और अभिनय का माध्यम अपनाती हैं। नाटक में दोनों पार्श्व आवश्यक हैं। हिन्दी में जो नाटक लिखे गये, वे प्रायः सभी संस्कृत-नाट्यशास्त्र की परम्परा से, मुख्यतः रस-सिद्धान्त से प्रभावित हैं। परन्तु, इधर के कुछ नाटकों में पश्चिमी मनोविज्ञान के प्रभाव के कारण कुछ परिवर्त्तन हुए हैं। एक परिवर्त्तन यह है कि ये नाटक पाठ्य नाटक-मात्र रह गये हैं। पाश्चात्त्य प्रभाव के कारण हिन्दी के नाटकों ने मनोविज्ञान तथा चिन्तन की इतनी अधीनता स्वीर कर ली कि वे रंगमंच के योग्य नहीं रह गये। पाठ्य नाटक और रंगमंच के नाटक में अन्तर है। पाठ्य नाटक कथावस्तु के विन्यास में किसी प्रकार की सीमा स्वीकार नहीं करना चाहते। "पाट्य नाटक केवल अभिनय की शैली में उपन्यास ही हैं। कथा का वर्णन स्वयं लेखक न करके पात्ों के द्वारा करा देता है।" रंगमंच के नाटकों की दृष्टि मुख्यतः अभिनयात्मक साहित्य की रचना करना है। डॉ० वर्मा का विश्वास है कि "रंगमंच के नाटकों की सृष्टि उस समय तक नहीं हो सकती, जबतक कि अभिनय की कला साहित्य-कला का पथ-निर्देश न करे।"२ रंगमंच का नाटककार व्यंजना-शैली से बड़ी-से-बड़ी परिस्थिति को कम-से- कम शब्दों में स्पष्ट कर देगा। उससे कथावस्तु में अनावश्यक विस्तार नहीं होगा और अनावश्यक प्रसंगों से भी छुटकारा मिल जायगा। रंगमंच का नाटककार उपन्यासकार के समान छोटी-मोटी घटनाओं के मोह में नहीं पड़ता। वह कथा की पूरी परिधि में घूम भी नहीं सकता। वह तो परिधि के कुछ बिन्दुओं को चुन लेगा और उन्हीं बिन्दुओं के सहारे सम्पूर्ण वृत्त का रूप स्पष्ट कर देगा। रंगमंच के नाटकों में चरित्र-चित्रण का भी विशेष महत्त्व है। चरित्र-चित्रण का सम्बन्ध व्यक्तित्व से है और व्यक्तित्व मनोविज्ञान पर आधारित है। मनोविज्ञान के दो पक्ष हैं। पहले पक्ष का सम्बन्ध व्यक्ति के संस्कारों से है और ये संस्कार ही उसके स्वभाव का निर्माण करते हैं। ये संस्कार उत्तराधिकार में प्राप्त होते हैं और बड़ी १. विजय-पर्व (भूमिका); पृ० १३ २. वही, पृ० १३ UP ON .hE

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कठिनाई से बदलते हैं। संस्कार पात्र को अपनी स्थिति में बड़ी स्वाभाविकता प्रदान करते हैं। मनोविज्ञान के दूसरे पक्ष का सम्बन्ध परिस्थितियों के प्रभाव से है। पात्र के संस्कारों पर परिस्थितियों के प्रभाव पड़ने पर वे विकास करने लगते हैं। यदि यह प्रभाव संस्कार के प्रतिकूल पड़ता है, तो पात्र में अन्तर्द्वन्द्व का उदय होता है। "संस्कार और प्रभाव की उचित युति में चरित्र-चित्रण का सौन्दर्य है। जब यह सौन्दर्य अभिनय-कला के साँचे में ढलता है तो रंगमंच पर सच्चे जीवन का अवतरण होता है।" रंगमंच पर पात्र अपने मनोविज्ञान में इतना लीन हो जाय कि वह कार्य में अपने मन की दिशा बना ले। जब उसे भान होगा कि उसे कोई देख रहा है तो उसमें अस्वाभाविकता आ जायगी। उसे ऐंसा लगना चाहिए कि उसे कोई देख नहीं रहा है। "दर्शक जैसे पात् के अनजाने किसी दीवार के छिद्र से उसका कार्य-कलाप देख रहे हैं।"२ रंगमंचीय नाटकों के संवाद संक्षिप्त और चुभते हुए होना आवश्यक है। कम-से- कम शब्दों में अधिक-से-अधिक प्रभाव छोड़ने की क्षमता उसमें होनी चाहिए। प्रसादजी के पूर्व के नाटकों में प्रभाव डालने के ही उद्देश्य से संवाद में पद्य का प्रयोग होता था, परन्तु यह अस्वाभाविक है। अतः ब रंगमंच के नाटकों में पद्य का प्रयोग बिल्कुल छोड़ दिया गया है। स्वाभाविकता की माँग के ही कारण स्वगत कथन तथा आकाश- भाषित का भी त्याग किया जा चुका है। डॉ० वर्मा का विचार है कि कथोपकथन में भाव-तीव्रता के साथ मनोरंजन का भी स्थान है, परन्तु केवल मनोरंजन ही कथोपकथन का संचालन नहीं कर सकता। प्राचीन नाटकों में मनोरंजन के समावेश के लिए एक विशिष्ट पात्र विदूषक की अवतारणा होती थी। अब किसी नाटकीय पात्र के ही द्वारा मनोरंजन का समावेश कर लिया जाता है। "मेरी दृष्टि में रंगमंच के नाटक में विदूषक-जैसा पात्र तो अवश्य ही होना चाहिए, भले ही वह कथा के किसी सूत्र का विधायक बना दिया जाय।"3

संवाद की भाषा के विषय में दो मत प्रचलित हैं। पहले मत के अनुसार नाटक के संवाद में सर्वत्र एक-सी ही भाषा का प्रयोग होना चाहिए, जिससे कथावरतु की पूर्ण संवेदना सभी दर्शकों के पास एक ही रूप में प्रेषित की जा सके। प्रसादजी के नाटकों में यही सिद्धान्त अपनाया गया है। दूसरा मत है कि एक ही शैली विभिन्न पात्रों के व्यक्तित्व की स्वाभाविकता के प्रतिकूल है। रंगमंच पर स्वाभाविकता लाने के लिए आवश्यक है कि प्रत्येक पात्र के स्वभाव तथा व्यक्तित्व के अनुसार संवाद की शैली में परिवर्त्तन किया जाय। यदि नाटक में कोई विदेशी पात है, तो उसकी भाषा अपनी

१. विजय-पर्व (भूमिका), पृ० १५ २. वही, पृ० १६ ३. वही, पृ० १७

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विशेषता लिये हुए अन्य पात्ों की भाषा के अधिक-से-अधिक निकट होगी। रंगमंचीय नाटकों के लिए डॉ० वर्मा इसी दूसरे मत के समर्थक हैं। क कींप रंगमंच के नाटकों में व्यक्ति और समाज को उन्नत करने की शक्ति है। किसी प्रवचन या उपदेश के विना भी कथावस्तु के ही सहारे यह कार्य सम्पन्न हो सकता है। नाटक दृश्य तथा श्रव्य होने के कारण उपन्यासादि से अधिक प्रभावशाली है। "अतः, यदि नाटक साहित्य का सबसे विशिष्ट अंग होना चाहता है, तो उसे रंगमंच का आश्रय ग्रहण करना ही होगा। यदि नाटक प्राण है, तो रंगमंच उसका शरीर, विना शरीर के प्राण की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं हो सकती।"१ संस्कृत, मैथिली, बँगला और मराठी-नाटकों को रंगमंच मिले, परन्तु हिन्दी- नाटकों को रंगमंच नहीं प्राप्त हो सका। डॉ० वर्मा ने इसके दो कारण दिये हैं : १. विदेशी शासकों ने रंगमंच की व्यवस्था को धर्म के प्रतिकूल समझा, अतः रंगमंच के अंकुर को निर्मूल कर दिया; २. रंगमंच की व्यवस्था के लिए वातावरण में सुख-शान्ति का होना आवश्यक है, परन्तु विदेशी शासन में यह सम्भव नहीं था। अँगरेजों को भी डर था कि रंगमंच की व्यवस्था कहीं सांस्कृतिक जागरण का रूप न धारण कर ले। व्यावसायिक पारसी थिएट्रिकल कम्पनियाँ शहरों में घूमती रहीं। रामलीला और रास-लीला केवल धर्मप्रवण वर्गों तथा निम्नवर्गों तक रह गई। अP TN नवयुग के जागरण से साहित्य और संस्कृति को नई दृष्टि, नई दिशा मिली है। पश्चिम ने सवाक् चलचित्र के माध्यम से एक विशाल रंगमंच दिया है। शिक्षा-संस्थाओं में छात्रों द्वारा एकांकी नाटकों से एक प्रयोगात्मक रंगमंच हमें मिला है। आशा है कि निकट भविष्य में अभिनय-कला की भी शिक्षा की व्यवस्था होगी। अभिनय-कला में वेशभूषा का अध्ययन, संगीत, प्रकाश-व्यवस्था और अनेक भावों के प्रदर्शन की कला भी आजाती है। रंगमंच की पूरी जानकारी पा लेने पर ही रंगमंच के उपयुक्त नाटकों की रचना सम्भव है। साहित्य और रंगमंच के योग से ही वास्तविक नाटक प्राप्त किया जा सकता है। एकांकी के सिद्धान्त : डॉ० वर्मा ने 'रेशमी टाई' संग्रह की भूमिका में एकांकी नाट्क के तन्त्र के विषय में अपना सिद्धान्त प्रकट किया है। उन्होने बताया है कि नाटक की ही भाँति एकांकी में भी आन्तरिक अथवा बाह्य संघर्ष प्रधान वस्तु है। फिर, अन्य प्रकार के नाटकों से एकांकी की विशेषताओं का उल्लेख किया गया है। एकांकी नाटकों की कथावस्तु में एक ही घटना होती है और वह घटना नाटकीय कौशल से कुतूहल का संचय करती हुई चरम सीमा या क्लाइमेक्स तक पहुँच जाती है। उसमें कोई अप्रधान प्रसंग नहीं रहता, एक-एक शब्द आवश्यक रहता है। कथावसतु में स्पष्टता के साथ कुतूहल रहता है और उसमें वर्णनात्मक तत्त्व गौण, किन्तु अभिनयात्मक तत्त्व प्रधान १. विजय-पर्व (भूमिका), पृ० १९

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होता है। कथावस्तु में प्रारम्भ, विकास, चरम सीमा तथा अन्त का निर्वाह स्वाभाविक रीति से होता है और कहीं शिथिलता नहीं आने पाती। उसी स्थल पर वर्माजी ने बताया है कि एकांकी में पात् चार-पाँच ही होते हैं, जो नाटक की घटना से पूर्णतः सम्बद्ध रहते हैं। उसमें अनावश्यक पात्रों का किसी प्रकार भी समावेश नहीं हो सकता। प्रत्येक पात्र की रूपरेखा पूर्णतः स्पष्ट रहती है। विस्तार के अभाव में प्रत्येक घटना कली की तरह खिलकर पुष्प की भाँति विकसित हो उठती है। उसमें लता के समान फैलने की उच्छ खलता नहीं।' डॉ० वर्मा ने एकांकी के द्वन्द्व, घटना, पात्र तथा कथानक पर संक्षेप में प्रकाश डाला। वर्माजी ने विस्तार से लिखा है कि एकांकी की कथावस्तु कहाँ से ली जानी चाहिए। उन्होंने इस बात पर बहुत बल दिया है कि एकांकी की कथावस्तु बाहर से लेने की आवश्यकता नहीं। हमारे जीवन में चारों तरफ ऐसी घटनाएँ निरन्तर होती रहती हैं, जिनमें प्राणों के तत्त्वों के रहस्यमय संकेत मिलते हैं। नाटककार को उन्हें देख- कर उनकी व्यंजना में कथावस्तु का निर्माण करना चाहिए। उन घटनाओं को घनीभूत करके कार्य-कारण की शृंखला में कस देने में ही नाटककार की कथा-चातुरी निहित है। घटनाओं के चुनाव के सम्बन्ध में वर्माजी ने समकालीन प्रगतिशील लेखकों से अपना मत-वैभिन्न्य प्रदर्शित किया है। उनका कहना है कि प्रगतिशील लेखक जीवन की कुरूपता पर ही दृष्टिपात करते हैं, वे अश्लीलता के किनारे बैठकर साहित्य के नाम पर अपनी भावनाओं का नग्न नृत्य देखना पसन्द करते हैं। वर्माजी का विचार है कि नाटककार को अपने नाटक के लिए जीवन की ऐसी घटनाएँ चुननी चाहिए, जो हृदय की सहानुभूति प्राप्त कर सके। इस प्रकार, यद्यपि वे रंगमंच पर स्वाभाविकता के पोषक हैं, फिर भी उसमें जीवन के विकासशील भावों के चित्रण के समर्थक हैं। प्रगतिशील लेखकों से वर्माजी की एक और भी शिकायत है। वे लेखक मनुष्य को भूलकर वर्ग के पीछे पड़ जाते हैं और प्रतिहिंसा लेकर साहित्य की रचना करते हैं। वर्माजी का कथन है कि यदि कोई रचना प्रतिहिंसा लेकर होती है, तो वह सत्य तथा सौन्दर्य से दूर ही रहेगी। उनका यह विचार यूरोप के १९वीं शती के रोमाण्टिक लेखकों के बहुत निकट है। वे जीवन के बाह्य एवं सामयिक द्वन्द्वों की अपेक्षा मानव-हृदय के शाश्वत प्रश्नों की ओर संकेत करना अधिक अच्छा समझते हैं।

आधुनिक हिन्दी-नाटकों के भेद आधुनिक काल के हिन्दी-नाटकों की प्रवृत्तियों तथा नाट्य-सिद्धान्त के क्रमिक विकास को समझने के लिए उन विभिन्न रूपों की समझना लाभदायक होगा, जिनमें आधुनिक नाटक लिखे जा रहे हैं। प्रसाद के युग के बाद नाटक का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत तथा व्यापक हो गया और यह कई रूपों में लिखा जाने लगा। जो नाटक-नदी आरम्भ से

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एक ही धारा में प्रवाहित हो रही थी, वही मैदानी भाग में जाकर अनेक धाराओं में बहने लगी। आधुनिक नाटक का वर्गीकरण कई दृष्टियों से हो सकता है, परन्तु सुविधा की दृष्टि से निम्नलिखित वर्गीकरण समीचीन जान पड़ता है : १. नृत्त-नाटक, २. नृत्य-नाटक, ३. गीति-नाटक, ४. ऐतिहासिक नाटक, ५. सामाजिक नाटक, ६ धार्मिक तथा पौराणिक नाटक, ७. एकांकी, ८. स्वोक्ति-नाटक और ९. रेडियो-नाटक। नाटकों के वर्गीकरण का यह अन्तिम रूप नहीं कहा जा सकता। इसमें कुछ भेद घटाये या बढ़ाये जा सकते हैं। संस्कृति से सम्बन्ध रखनेवाले ऐंतिहासिक या पौराणिक नाटक सांस्कृतिक नाटकों की श्रेणी में रखे जाने लगे हैं। इसी प्रकार सामाजिक या राजनीतिक समस्याओं को विषय बनाकर लिखे जानेवाले समस्या-नाटकों की धूम मच गई है। समस्या-नाटकों का विशिष्ट शिल्प-विधान बन गया है। इनमें कुछ प्रमुख भेदों की प्रवृत्तियों तथा विशिष्टताओं का विश्लेषण किया जा रहा है। गीति-नाट्य कुछ भारतीय विद्वान् गीति-नाट्य को प्राचीन भारतीय नाट्य-शैली मानते हैं। गीति-नाट्य के विषय में डॉ० दशरथ ओझा का कथन है : "यह हमारी नितान्त मौलिक शैली न्यूनाधिक आठ सौ वर्षों से निरन्तर चली आ रही है।" परन्तु, कुछ अन्य विद्वान् मानते हैं कि यह आधुनिक युग की देन है। जिस प्रकार, आधुनिक हिन्दी-एकांकियों का मूल प्राचीन संस्कृत भाण, वीथी आदि एकांक नाटकों में ढूंढ़ना उचित नहीं, उसी प्रकार आधुनिक गीति-नाट्य का मूल रास-नाटकों में ढूँढ़ना लाभदायक नहीं होगा। प्राचीन रास-नाटकों तथा आधुनिक गीति-नाटकों में कुछ समानता अवश्य है, परन्तु दोनों में काफी अन्तर भी है। सन् १९२० ई० के बाद यूरोप में नाटक तथा रंगमंच के प्रति जनता के दृष्टिकोण में परिवर्तन आने लगा। यथार्थवादी नाटकों की प्रतिक्रिया और सिनेमा के बढ़ते हुए प्रभाव को रोकने की प्रवृत्ति के कारण यह परिवर्तन आया। नाटकों में इब्सन और शॉ की यथार्थवादी वृत्ति और बौद्धिकता अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच गई थी। परिणाम यह हुआ कि नाटक में नया मोड़ आया और गीति-नाट्यों की रचना होने लगी। अॅगरेजी के प्रसिद्ध कवियों-ईट्स, इलियट, स्टीफेन, स्पेण्डर आदि-ने इस दिशा में काम किया। गीति-नाट्य सामान्यतः भावनामय होता है, उसमें बाह्य संघर्षों की अपेक्षा अन्तस्संघर्ष प्रधान होता है, परन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि उसमें जीवन की ठोस वास्तविकता का सर्वथा तिरस्कार होता है। उसमें बाह्य द्वन्द्व और अन्तर्द्वन्द्व दोनों ही चलते हैं। वस्तुतः, गीति-नाट्य में बाह्य संघर्ष को प्रकट होने का अवकाश कठिनता से

१. हिन्दी-नाट़क : उद्भव और विकास, पृ० ४०६

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मिलता है। गीति-नाट्य की दूसरी विशेषता है कि इसका सम्पूर्ण कथानक गेय होता है और इसका अभिनय संगीतमय। नृत्त-नाटक (Ballet) में भी गेय पद रखे जाते हैं, परन्तु नृत्त-नाट्य से गीति-नाट्य भिन्न होता है। इसमें कविता का प्रभाव अन्य प्रभावों से विशेष महत्त्व रखता है, परन्तु नृत्त-नाट्य में पात्रों की वेश-भूषा, रंगमंच की साज-सज्जा और प्रकाश की सुन्दर व्यवस्था पर ही विशेष बल दिया जाता है। जयशंकर प्रसाद : गीति-नाट्य आधुनिक युग की देन है और हिन्दी में प्रथम गीति-नाट्य प्रस्तुत करने का श्रेय जयशंकर प्रसाद को है। संस्कृत-नाटकों में पद्य की बहुलता होने पर भी एक भी ऐसा नाटक नहीं है, जो गीति-नाट्य कहा जा सके। प्रसादजी को 'करुणालय' लिखने की प्रेरणा सम्भवतः बँगला गीति-नाट्यों से मिली। 'करुणालय' में छपी सूचना से विदित होता है कि उन्हें अँगरेजी के ब्लैंक वर्स और बँगला के अभियाक्षर छन्द से अवश्य प्रेरणा मिली थी। 'करुणालय' एक पौराणिक कथा के आधार पर रचा गया है। आगे चलकर प्रसादजी की रचनाओं में जिस आनन्दवाद, जीवन के प्रति एक दृढ़ आस्था, अमानुषिक आचार के प्रति घृणा, प्रेम की धवल ज्योति आदि के मनोहर चित्र प्राप्य हैं, उनका स्रोत इसी गीति-नाट्य में ढूँढ़ा जा सकता है। परन्तु, गीति-नाट्य का मूल तत्त्व मानसिक संघर्ष या अन्तर्दवन्द्व है, जिनका समुचित चित्रण इसमें नहीं हो सका है। इस कथानक में मानसिक संघर्ष दिखाने के लिए पर्या्ति स्थान था, परन्तु उसका पूरा उपयोग नहीं किया गया है। अन्य पात्रों की अपेक्षा रोहित के चरित्र में अन्तर्द्वन्द्व अधिक दिखाया गया है, परन्तु वह भी कुछ देर में समाप्त हो जाता है। एक और उसे अपने पिता की आज्ञा का पालन करना है, तो दूसरी ओर आत्मरक्षा का प्रश्न है। परन्तु, इन्द्र की प्रेरणा से उसे आत्मरक्षा का प्रयत्न अधिक श्रेयस्कर जान पड़ा। नाटक के अन्त में शुनःशेप के करुण कन्दन और अजीगर्त्त की क्षुधा से उत्पन्न पाशविक वृत्ति का जो संगम हुआ है, वह चरम विकास के लिए अच्छा अवसर था, परन्तु नाटककार से उसका उचित निर्वाह नहीं हो सका है। मैथिलीशरण गुप्त : मैथिलीशरण गुप्त का 'अनघ' शिल्प-विधान की दृष्टि से गीति-नाट्य है, परन्तु इसकी आत्मा संवाद-काव्य की ही है। गुप्तजी ने इस गीति- नाट्य को दृश्यों में नहीं बाँटकर स्थानों के नाम पर उनका निर्देश किया है। यह गांधीवादी जीवन-दर्शन के स्थूल आदर्शों तक ही रह गया है, उससे आगे बढ़कर अन्सर्द्वन्द्वों के सूक्ष्म स्तर तक जाने में असमर्थ ही रहा है। इसका नायक मध एक टाइप- मात्र है, उसे मानवीय व्यक्तित्व नहीं मिल पाया है। एक ही दृश्य में उसमें चोरों के साथ युद्ध में बाह्य संघर्ष और कुछ अंश में अन्तर्द्वन्द्व भी दिखाया गया है, जिससे इस गीति-नाट्य में गतिशीलता आ गई है। सुरभि में अन्तर्द्वन्द्व का आरोह-अवरोह है, किन्तु मध के सिद्धान्तों की छाया के कारण उसके व्यक्तित्व का विकास नहीं हो सका है। कथावस्तु भी बहुत-कुछ यान्त्रिक हो गई है।

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सियारामशरण गुप्त : सियारामशरण गुप्त ने भी 'उन्मुक्त' शीर्षक एक गीति-नाट्य लिखा। इस गीति-नाट्य में भी 'अनघ' के समान स्थान से ही दृश्य की सूचना मिलती है। रंगमंच के संकेत भी 'अनघ' के ही समान इसमें भी हैं। इसे सफल गीति-नाट्य मान सकते हैं। निराला : निरालाजी ने 'पंचवटी-प्रसंग' नामक गीति-नाट्य मुक्त छन्द में लिखा। इसमें गीतिमयता के साथ चरित्र-निर्माण की अपूर्व क्षमता है। यह उत्तम गीति-नाट्य है। प्रेमी : हरिकृष्ण प्रेमी ने 'स्वर्णविहान' नामक गीति-नाट्य लिखा, जिसमें अहिंसा की हिंसा पर विजय दिखाई गई है। इसमें कई स्थलों पर मानसिक संघर्ष भी सुन्दर रीति से दिखाया गया है। यह भी एक सफल गीति-नाट्य है। भगवतीचरण वर्मा : भगवतीचरण वर्मा के गीति-नाट्य 'तारा' में वही समस्या है, जो उनके उपन्यास चित्रलेखा में है। 'तारा' में उद्दाम वासना का वर्णन करते समय उसके सामाजिक परिवेश को भी ध्यान में रखा गया है। इस गीति-नाट्य में सामाजिक बन्धनों की अवहेलना करने के कारण बृहस्पति के अभिशाप से तारा और चन्द्रमा जड़ बन जाते हैं। यह घटना पौराणिक दृष्टि से युक्तियुक्त है, परन्तु मानवीय तथा नाटकीय दृष्टि से इसके महत्त्व का मूल्यांकन उचित नहीं। गीति-नाट्य का मूल तत्त्व अन्तर्द्वन्द्व, इसमें आदि से अन्त तक विद्यमान है। आजकल की मान्यताओं पर फ्रायड का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। मानव के व्यक्तित्व के कुछ तत्त्वों का विश्लेषण करके फ्रायड ने हमारी परम्परायुक्त मान्यताओं को झकझोर दिया है। इस पौराणिक आख्यान को इसी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखा गया है। वर्माजी ने इस गीति-नाट्य में जो समस्या उठाई है, वह बहुत विचारोत्तेजक है। उन्होंने समस्या का जो हल निकाला है, वह यद्यपि असामाजिक है, फिर भी उस परिस्थिति में वही सम्भव भी था। 'साधना की अतिशयता और जीवन के स्वाभाविक धर्मों की उपेक्षा की चरम परिणति इसी रूप में दिखाई पड़ती है।" उदयशंकर भट्ट: हिन्दी के गीति-नाट्यों में उदयशंकर भट्ट की देन अत्यन्त महत्त्व- पूर्ण है। उन्होंने अपने तीन गीति-नाट्यों-'मत्स्यगन्धा', 'विश्वामित्र' और 'राधा'-में जो भाव-सृष्टि की है, वह अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। उनके पौराणिक पाव् लेखक के व्यक्तित्व के कारण चमककर महत्त्वपूर्ण बन गये हैं। उन पात्रों का व्यक्तित्व पाठकों के लिए मूल्यवान् हो गया है; क्योंकि लेखक ने अपनी कल्पना से उन्हें सँवारा-सजाया है। भट्टृजी ने अपने तीनों गीति-नाट्यों में अन्तर्द्वन्द्व तथा मानसिक संघर्ष की सुन्दर अभिव्यक्ति की है। यह संघर्ष सबमें है-नारी में, पुरुष में और दोनों के पारस्परिक सम्बन्ध में भी। मत्स्यगन्धा, मेनका और राधा-तीनों प्रेम की अनुवर्त्तिनी हैं, यह प्रेम ही १. हिन्दी के गीतिनाट्य (डॉ० बच्चन सिंह)- आलोचना : नाटक-अंक, जुलाई, १९५६

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५३६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास नारी-जीवन का मधुर स्वप्न और सर्वस्व है। परन्तु, तीनों की यौवन-सुलभ अभिलाषा में गुणात्मक अन्तर है। मत्स्यगन्धा में यौवन की उद्दाम लालसा चरमसीमा तक पहुँच गई है। मेनका में नारी की सहज कोमलता, स्निग्धता तथा प्रेरणा है, परन्तु वह भी रूप की प्यास का आश्रय पुरुष में ढूँढ़ती है। राधा में यह अदम्य तथा असन्तुलित वासना सात्त्विक तथा प्रतिदानशून्य प्रेम में परिवत्तित हो गई है। यही प्रेम की सबसे ऊँची चोटी है। इस प्रकार, इन तीनों गीति-नाट्यों में एक ही भाव के विविध स्तर दिखाई देते हैं। 'मत्स्यगन्धा' नाटक में उन सघन क्षणों की अभिव्यक्ति सुन्दर रूप से हुई है, जिसके लिए गीति-नाट्य का आविर्भाव हुआ है। इस गीति-नाट्य का आरम्भ प्रकृति के सुरम्य प्रांगण में हुआ है, जिससे मत्स्यगन्धा जैसी यौवन-प्राणा नारी में प्रभावोत्पादकता और भी बढ़ जाती है। कवित्व की दृष्टि से इस स्थल का बहुत महत्त्व है। गीति-नाट्य में आवश्यक नहीं कि प्रत्येक कविता भावोन्मेषपूर्ण हो, परन्तु उसमें प्रयुक्त प्रत्येक पंक्ति का नाटकीय होना आवश्यक है। 'मत्स्यगन्धा' में प्रत्येक छोटे-छोटे वार्त्तालाप में नाटकीयत्व दिखाई देता है। प्रत्येक दृश्य के नाटकीय आरम्भ और अन्त करने में भट्टजी अत्यन्त निपुण हैं। भट्टजी के दूसरे गीति-नाट्य 'विश्वामित्र' में जीवन के स्वीकृत्यात्मक तथा निषेधात्मक मूल्यों में संघर्ष दिखाया गया है। विश्वामित्र जीवन के सुखोपभोग से विमुख, कठोर जीवन बितानेवाले निषेधात्मक पक्ष के प्रतीक हैं और मेनका प्रतीक है स्वीकृत्यात्मक मूल्यों का, जो लौकिक सुख में विश्वास करती है। इस प्रतीक का एक दूसरा पक्ष भी देखा जा सकता है। विश्वामित्र पुरुषत्व के चरम अहंकार तथा रुक्ष विवेक के प्रतिनिधि हैं और मेनका स्त्री-सुलभ कोमलता तथा स्फूति का प्रतिनिधित्व करती है। यहाँ नारी की मनोवृत्ति दो भिन्न रूपों में दिखाई गई है। उवशी की दृष्टि में पुरुष घृणा का पात्र है, परन्तु मेनका की दृष्टि में प्रेम का। विश्वामित्र, मेनका तथा उर्वशी की मानसिक स्थितियों और उनके अन्तर्द्वन्द्वों का सुन्दर विश्लेषण किया गया है। अभिनेयता की दृष्टि से 'मत्स्यगन्धा' की अपेक्षा 'विश्वामित्र' गीति-नाट्य अधिक सफल है। किन्तु, इसका आरम्भ तथा समापन 'मत्स्यगन्धा' की अपेक्षा कम नाटकीय तथा प्रभावोत्पादक है। इन दोनों गीति-रूपकों में कोरस के अभाव में गीत नहीं रखे जा सके। नर और नारी की चिरन्तन समस्या प्रेम है, जिसका समाधान भट्टजी को उपर्युक्त दोनों गीति-रूपकों में नहीं मिल पाया था, वह उन्हें 'राधा' नामक गीति-नाट्य में मिला। राधा उस प्रेम का प्रतीक है, जिसमें न उपचार होता है और न प्रतिपादन की आकांक्षा। राधा में मत्स्यगन्धा के समान न अतृप्त यौवन की उद्दाम लालसा है और न मेनका की अस्थिरता ही। उसमें निष्काम प्रेम-भावना है, जिसके आगे कृष्ण को भी झुकना पड़ता है।

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अनेक मध्यकालीन भक्तों ने राधा को परकीया-रूप में देखा है। वस्तुतः, भक्ति- भावना की जो सान्द्रता परकीया में दिखाई देती है, उतनी स्वकीया में नहीं। भटटजी ने भी राधा को परकीया-रूप में ही दिखाया है। राधा के गीतिमय व्यक्तित्व में भट्टजी की काव्य-प्रौढ़ता निखर उठी है। उसके प्रेम में उन्होंने क्रमिक सघनता लाने का सफल प्रयास किया है। शिल्प-विधान में कुछ अंश में मत्स्यगन्धा का अनुसरण इसमें किया गया है। उदाहरण के लिए प्राकृतिक सेटिंग और कोरस को ले सकते हैं। करुण वादन से समस्त वातावरण एक करुण अनुभूति से व्याप्त हो जाता है। मत्स्यगन्धा की अपेक्षा इस नाटक में नाटकीय आरोह-अवरोह का अवकाश कम है। अन्त में, कृष्ण ने जो लम्बा प्रवचन दिया है, उससे प्रभावान्विति क्षीण पड़ जाती है। सुमित्रानन्दन पन्त : सुमित्रानन्दन पन्त रेडियो में आने के बाद गीति-नाट्य लिखने में प्रवृत्त हुए हैं। उनके गीति-नाट्यों के संग्रह 'रजत-शिखर' में छह और 'शिल्पी' में तीन गीति-नाट्यों का संग्रह हुआ है। आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से इनका प्रसारण हो चुका है। इनके अधिकांश गीति-नाट्यों में वर्त्तमान संघर्ष को पृष्ठभूमि के रूप में ग्रहण किया गया है, परन्तु भविष्य की सुनहली कल्पना इससे कट गई है। पन्तजी दोनों में सम्बन्ध स्थापित करने में पूर्णतः सफल नहीं हो सके हैं। 'रजत-शिखर' संग्रह का पहला गीति-नाट्य 'रजत-शिखर' है, जो अन्तश्चेतना का उज्ज्वल प्रतीक है। इसमें मन की उच्च तथा समतल स्थितियों का समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया गया है। 'फूलों का देश' में अध्यात्मवाद-भौतिकवाद, आदर्शवाद-यथार्थवाद का समन्वय किया गया है। 'रजत-शिखर' के सभी गीति-नाट्य प्रतीकात्मक हैं। इसलिए, यह विचार संगत नहीं प्रतीत होता कि रंगमंच की दृष्टि से ये सफल हैं या असफल। पन्तजी के दूसरे संग्रह 'शिल्पी' में तीन गीति-रूपक संगृहीत हैं-'शिल्पी', 'धवंसशेष' और 'अप्सरा'। यह हमारे जीवन के अधिक पास है, इसलिए 'रजत-शिखर' की अपेक्षा कई अर्थों में अधिक सरल है। 'रजत-शिखर' पर पहुँचने के लिए अरविन्द का दर्शन समझने की आवश्यकता है, जो सामान्य मनुष्यों की शक्ति के बाहर है। परन्तु, 'रजत- शिखर' के ही समान 'शिल्पी' का काव्यत्व भी सन्देहास्पद ही है। इसमें लम्बे-लम्बे रूखे सैद्धान्तिक भाषण हैं। अन्तर्द्वन्द्व के अभाव के कारण इसमें नाटकीयता की कमी है। धर्मवीर भारती : धर्मवीर भारती के गीति-नाट्य 'अन्धायुग' का प्रकाशन गीति-नाट्यों की परम्परा में एक नया मोड़ प्रस्तुत करता है। इसके पहले जो गीति-नाट्य हिन्दी में लिखे गये थे, वे सभी एकांकी थे, परन्तु यह पूर्ण गीति-नाट्य है। इसमें पाँच अंक हैं। छन्द की दृष्टि से भी इसमें नवीनता है। पहले के गीति-नाट्य अतुकान्त

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छन्द में लिखे गये हैं, परन्तु इसमें मुक्त छन्द का प्रयोग किया गया है। मुक्त छन्द के ही कारण यह रंगमंच के उपयुक्त बन सका है और भावाभिव्यंजन में भी अधिक सक्षम है। पहले के गीति-नाट्यों में लघु-विस्तार के कारण छोटा ही कथानक लिया जा सकता था, परन्तु 'अन्धायुग' में कथानक अपेक्षाकृत विस्तृत है और अधिक प्रख्यात तथा मार्मिक है। परन्तु, पात्रों की भावाभिव्यंजना एवं कथा-विन्यास में लेखक की कल्पना की उर्वरता का परिचय मिलता है। महाभारत-युग में नैतिक स्तर काफी गिर चुका था। युद्ध में अनैतिकता सर्वत्र दिखाई देती है। युद्ध के अठारहवें दिन की संध्या से प्रभास तीर्थ में कृष्ण के शरीर- त्याग के दिन तक की कथा इस गीति-नाट्य का विषय है। कथावस्तु को गतिशील एवं अन्वितिपूर्ण बनाने के लिए भारती जी मुख्यतः दो उपाय काम में लाये हैं-कथा-गायन या कोरस और प्रसंगानुकूल बदलता हुआ टोन या लय। 'अन्धायुग' में कथा-गायन वस्तु- संघटन का एक आवश्यक उपादान है। गीति-नाट्यों की अभिनयात्मक सफलता बहुलांश में ध्वनि पर आश्रित रहती है। नाटककार संवादों के माध्यम से ध्वनि या टोन द्वारा भावनाओं का चित्र प्रस्तुत करता है। इससे नाटक की कड़ी जुड़ती है और पात्रों के चरित्र में भी विकास होता है। 'अन्धायुग' में इस प्रकार के विविध टोनों के प्रयोग के लिए उचित स्थल पर नाटकीय स्थितियाँ उपस्थित की गई हैं। वस्तुतः, 'अन्धायुग' हिन्दी-गीतिनाट्य-परम्परा को एक स्वस्थ मोड़ देता है। "कथानक की उत्कृष्टता, गीति-संवादों का नाटकीय निवहि, प्रभावान्विति, प्रतीक-योजना आदि पर विचार करते हुए यह श्रेष्ठ गीति-नाट्य में परिगणित होगा, इसमें सन्देह नहीं।"१ जानकीवल्लभ शास्त्री : जानकीवल्लभ शास्त्री के गीति-नाट्यीं का संग्रह 'पाषाणी' कुछ दिन पहले प्रकाशित हुआ। इसमें पाँच गीति-नाट्य संगृहीत हैं : 'गंगावतरण', 'उर्वशी', वासन्ती', 'पाषाणी' और 'मंजरी'। आकाशवाणी से इनका सफल प्रसारण हो चुका है और कुछ संशोधनों के साथ इनका अभिनय रंगमंच पर भी हो सकता है। 'गंगावतरण', 'उरवशी' तथा 'पाषाणी' के कथानक पौराणिक आख्यानों पर आधारित हैं। 'मंजरी' राजशेखर की 'कर्पूरमंजरी' की कथावस्तु से प्रेरित और प्रभावित है। परन्तु, लेखक ने इसमें प्राचीन चरित्रों का नवनिर्माण किया है। नव- निर्माग के क्रम में रसान्तर हो जाना भी स्वाभाविक ही है। 'वासम्ती' प्रतीकात्मक गीति-नाट्य है और इस दिशा में यह शास्त्रीजी का प्रथम प्रयास है। इसमें विश्वास, पतझड़, आशा आदि का मानवीकरण हुआ है। 'गंगावतरण' में पौराणिक वातावरण के लिए सूत्रधार की अवतारणा की गई है। १. हिन्दी के गीतिनाट्य (डॉ० बच्चन सिंह), आलोचना, जुलाई, १९५६ ई०

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जीवन की गम्भीर घटनाएँ, मार्मिक अनुभूतियाँ तथा तीव्र मानसिक संघर्ष लेकर लेखक ने अपने गीति-नाट्यों की रचना की है। कई स्थलों पर मानसिक संघर्ष का अच्छा चित्रण हो सका है, परन्तु अनेक स्थलों पर अन्तर्द्वन्द्व दिखाने का अवकाश रहने पर भी उचित रीति से नहीं दिखाया जा सका है। काव्य-नाट्य और गद्य-नाट्य की विषयवस्तु में स्पष्ट अन्तर होता है। कर्मयोगी भगीरथ को भावनिष्ठ काव्यात्मक चरित्र बनाया गया है और ब्रह्मा के साथ उनके संवाद में नाटकीय उत्कर्ष के प्रदर्शन की चेष्टा की गई है। क 'पाषाणी' गीति-नाट्य मूलतः मनोवैज्ञानिक है। पाषाणी की तृप्त अतृप्ति और ऋषि की अतृप्त तृप्ति का अन्तर्द्वन्द्व काव्य को तीव्र-तीक्ष्ण बनाने में समर्थ हुआ है। कवि का प्रयास रहा है कि तपोबल की प्राकृतिक सीमाओं में वाद्य और संगीत की कलात्मक सीमाएँ एकतान हो जायँ। पाषाणी के गीति-नाट्य काफी सफल हैं। उपसंहार : प्रसाद, उदयशंकर भट्ट आदि के गीति-नाट्य काव्य-नाटक के स्वरूप- विधान की सार्थकता सिद्ध नहीं करते। वे नाटक की अपेक्षा काव्य के अधिक निकट हैं। उनमें रंगमंच अथवा प्रदर्शन के किसी अन्य माध्यम का ध्यान नहीं रखा गया है। वास्तविक अर्थ में हिन्दी के गीति-नाट्य का विकास स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद ही हुआ है। आकाशवाणी के केन्द्रों के विस्तार के कारण काव्य-नाटक के प्रस्तुतीकरण का नवीन माध्यम भी मिला है। गिरिजाकुमार माथुर, भारतभूषण अग्रवाल, नरेश मेहता, केदारनाथ मिश्र 'प्रभात', सिद्धनाथ कुमार आदि ने रेडियों पर प्रसारण के लिए गीति- नाटकों की रचना की है, जिनमें वस्तु तथा शिल्प की विविधता मिलती है। इस युग में धर्मवीर भारती का 'अन्धायुग' काव्य-नाटक का नया चरण है। यह हिन्दी का पहला काव्य-नाटक है, जिसका रंगमंच पर अभिनय हुआ है। इस नाटक की एक विशेषता यह है कि इससे हिन्दी-नाटकों को विकास मिला है। नत्य-नाटय इटली में पान्तोभीम या मूक नाट्य की एक शैली का प्रचलन हुआ। कालान्तर में इस मूकाभिनय में नृत्य और संगीत का योग कर दिया गया। ये नृत्य-नाट्य या बैले फ्रांस में अत्यन्त लोकप्रिय हुए। पीछे चलकर इनमें गीतों के आधार पर मूक नाट्य और मूक नृत्य की योजना की जाने लगी। इस प्रकार, यूरोप में ओपेरा या डान्स-बैले के नाम से जिस नाट्य-प्रणाली का प्रचलन हुआ, उसमें पहले नृत्य के साथ कथा का नाट्य होता था। आरम्भ में उसमें गीत का अभाव रहता था, परन्तु पीछे गीत भी जोड़ दिया गया। भारत में 'इन्दर-सभा' नाम का संगीत-नाटक उर्दू में लिखा गया, परन्तु उसमें सुरुचि का अभाव था और नाट्य-तत्त्व की अपेक्षा गीत-तत्त्व की ही प्रधानता थी। बँगला

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में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने कुछ उच्च कोटि के संगीत-नाटकों की रचना की और स्वयं उनका सफल प्रयोग किया। यों तो उत्तरी भारत में यात्रा, स्वांग, रास और नौटंकी के रूप में संगीत-नाटकों या नृत्य-नाटकों का अपरिष्कृत रूप में प्रयोग बहुत पहले से होता रहा है, परन्तु परिष्कृत रूप में इनका प्रयोग आधुनिक काल में हुआ है। नृत्य-नाटक में एक भाव-नटी रंगमंच पर आकर नृत्य के सहारे कथा-भाव को समझाती है और रंगपीठ के एक ओर बैठे कुछ गायक-गायिकाओं के द्वारा उसका विवरण दिया जाता रहता है। पात्रों के जो संवाद होते हैं, उनमें पुरुषों के संवाद पुरुष गायक द्वारा गाये जाते हैं और स्त्रियों के संवाद गायिकाओं द्वारा। अभिनेतागण गाये जानेवाले शब्दों के साथ उन भावों के व्यंजक अभिनय करते जाते हैं। पीछे का पर्दा रंगदृश्य के भाव के अनुकूल होता है और रस तथा भाव के अनुकूल रागों का प्रयोग किया जाता है। नृत्य-नाटकों के गीतों में लाक्षणिकता तथा चमत्कारोक्ति का कोई स्थान नहीं होता। इसका कारण यह है कि नृत्य-नाटक का रूप कथात्मक तथा संवादात्मक होता है, अतः सरल होने पर ही इसका अभिनय सफलतापूर्वक किया जा सकता है। हिन्दी में सर्वप्रथम नृत्य-नाटक या डान्स-बैले, सम्भवतः आचार्य सीताराम चतुर्वेदी का 'सिद्धार्थ' है, जिसका अभिनय बम्बई में सन् १९४७ ई० में बहुत सफलतापूर्वक किया जाचुका है। इसमें भगवान् बुद्ध का जन्म से धर्मचक्र्क-प्रवर्तन तक का जीवन विभिन्न रागों के गीतों की सहायता से दिखाया गया है। बीच-बीच में नृत्य का भी प्रयोग किया गया है। रागों का प्रयोग भाव तथा रस के अनुकूल हुआ है।

समस्या-नाटक समस्या-नाटक की उत्पत्ति : यूरोप के समस्या-नाटकों के मूल में १९वीं शती के सामाजिक नवजागरण और बौद्धिक नवचेतना ही है। जॉन स्टुअर्ट मिल, मार्क्स, हीगेल, फ्रॉयड आदि के विचारों का प्रभाव साहित्य पर पड़ा। इस आन्दोलन का प्रभाव पहले शिक्षित वर्ग पर पड़ा, जिससे नाट्य-साहित्य की कटु आलोचना हुई। इसी समय नाट्य- साहित्य में नार्वे के प्रसिद्ध नाटककार इब्सन का आगमन हुआ और उन्होंने अपने नाटकों में नवीन मार्ग निकाला। उन्होंने अपने नाटकों में तीन बातों पर विशेष ध्यान दिया : १. युग-जीवन की अभिव्यक्ति, २. समाज के विकृत अंगों का चित्रण और सामाजिक ढोंग पर प्रहार, ३. प्राचीन रंगमंचीय विधाओं का त्याग और नवीन पद्धति का जन्म, जिससे सरलता तथा स्वाभाविकता का पालन हो। इसीलिए, इब्सन को तत्कालीन प्रवाह का नियामक माना गया है। यूरोपीय समस्या-नाटकों में इब्सन के बाद बर्नार्ड शॉ आये, जिन्होंने इब्सन की लीक को और भी प्रशस्त बनाया। विचारों की नवीनता से यूरोपीय समस्या-नाटक पूर्णतः बौद्धिक हो उठा है। हिन्दी-समस्या-नाटकों पर इनका पूर्ण प्रभाव दिखाई देता है।

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समस्या-नाटक का लेखक अपने युग तथा समाज की समस्याओं का घनिष्ठ परिचय पाता है। उसकी पारदर्शी दृष्टि समस्या की गहराई में देख लेती है। समस्या की गहराई में उसे यथार्थ का पता लगता है। इसके साथ ही वह समाज के नग्न चित्र उपस्थित रकता है, खोखले आदर्शों पर प्रहार करता है और सामाजिक रूढ़ियों का उपहास करता है। उसका उद्दश्य प्राचीन मान्यताओं के स्थान पर नवीन मान्यताओं की स्थापना करना है।

सन् १९२० ई० के आसपास हिन्दी-क्षेत्रों में विचारों की वह क्रान्ति दिखाई देन लगी, जो समस्या-नाटकों के मूल में थी। इस क्षेत्र में पहले से ब्रह्मसमाज, आर्यसमाज, थियोसॉफी आदि संस्थाएँ थीं, जो सामाजिक रूढियों पर प्रहार कर रही थीं। इसी समय असहयोग-आन्दोलन छिड़ा, जिससे राष्ट्रीय चिन्ताधारा में चेतना आई। यहाँ भी युग-जीवन तार्किक एवं बौद्धिक हो चला था। फलस्वरूप, साहित्यकार परम्परागत असंगतियों के प्रति व्यंग्य करने लगा। परन्तु, आशा के प्रतिकूल स्वस्थ परिणाम तथा समाधान नहीं मिल सका। नवीन साहित्यकार प्राचीन के स्थान पर कोई नया मार्ग प्रशस्त करने में असमर्थ रहे। इसीलिए, हिन्दी समस्या-नाटकों में तत्कालीन जीवन की व्याख्या मिलती है, परन्तु कोई स्वस्थ बौद्धिक समाधान नहीं मिलता।

सन् १९२० ई० के बाद भारत में, विशेषतः हिन्दी-क्षेत्रों में, समस्या-नाटकों के उपयुक्त वातावरण तैयार हो गया था। अछूतोद्धार, राजनीतिक विचार-परिवर्तन, अन्तर्जातीय विवाह, नारी के अधिकारों की चर्चा, विधवा-विवाह, बेमेल विवाह आदि विषयों पर वाद-विवाद होते रहते थे। इन सारी बातों ने समस्या-नाटक के लिए उपयुक्त भूमि तैयार कर दी थी। अनुमान किया जाता है कि यदि इब्सन और शॉ का आदर्श हमारे सम्मुख नहीं भी रहता, तो भी समस्या-नाटक लिखे जाते। किन्तु, यह कहना कठिन है कि ये नाटक 'ध्रुवस्वामिनी' का आदर्श लेकर चलते या 'सिन्दूर की होली' का। इतिहास की दृष्टि से लक्ष्मीनारायण मिश्र प्रथम समस्या-नाटक-लेखक हैं, परन्तु उनका व्यक्तित्व शॉ के समान प्रखर नहीं बन पाया। वे चिन्तनधारा के अभाव में इधर-उधर भटकते दिखाई देते हैं।

समस्या-नाटकों की लोकप्रियता का प्रधान कारण रहा है, बुद्धि-प्रधान युग। किन्तु, इनमें धीरे-धीरे अतिशय बौद्धिकता नष्ट होती जा रही है। शीघ्र ही लोग समझने लगे कि केवल बुद्धि ही सब कुछ नहीं है। समस्या-नाटकों में चित्रित जीवन भी एकांगी ही है। इसीलिए, अॅगरेजी में समस्या-नाटकों की प्रतित्रिया में गेय रूपकों की परम्परा चली। हिन्दी-समस्या-नाटकों में इनकी प्रतित्रिया स्वयं इनके जन्मदाता मिश्रजी में देखी जा सकती है। उन्होंने 'सिन्दूर की होली' की धारा में अब 'नारद की वीणा' और 'चत्रव्यूह' जैसे सांस्कृतिक नाटक लिखे हैं।

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बीसवीं शती में स्त्री-शिक्षा का प्रचार हुआ, राष्ट्रीय आन्दोलनों में भी स्त्रियाँ भाग लेने लगीं। फलस्वरूप भारत में पश्चिमी समाज के अनुकरण पर समाज का निर्माण होने लगा, परन्तु भारत में विवाह की प्रथा पुरानी ही थी। अतः, इस समय दाम्पत्य और उन्मुक्त प्रेम में एक प्रकार की प्रतिस्पर्द्धा में एक नवीन समस्या उत्पन्न हो गई। जो नाटककार समस्या-नाटक लिखने के उत्सुक थे, उनका ध्यान इस बात की ओर गया। उन्होंने इब्सन और बर्नार्ड शॉ के नाटकों में इस समस्या का समाधान ढूँढने का प्रयास किया। इब्सन के 'डॉल्स हाउस' में विचार मिला कि पुरुष स्त्री को किस सीमा तक स्वतन्त्रता दे सकता है, जिससे नारी के विकास में कोई बाधा नहीं पड़े। 'वाइल्ड डक' में भी ऐसी समस्या उठाई गई है। इब्सन के अन्य नाटक 'घोस्ट्स' में एक स्त्री की दुर्दशा का चित्रण किया गया है, जो अपने पति से अलग हो गई है। बर्नार्ड शॉ ने 'मैन ऐण्ड सुपरमैन' में वैवाहिक जीवन की समस्याओं की ओर ध्यान खींचा है। भारतेन्दु-कालीन तथा आधुनिक समस्या-नाटक : भारतेन्दु युग के नाटककारों ने भी समाज की अनेक समस्याएँ-बालविवाह, विधवा-विवाह, बहुविवाह, मद्य-निषेध आदि-लेकर नाटकों की रचना की थी। उस युग के लिए वे ही समस्य।मूलक नाटक थे, परन्तु आजकल समस्या-नाटक का रूप सर्वथा परिवततित हो गया है। आधुनिक समस्या- नाटकों में भावुकता का स्थान मनोविज्ञान ने ले लिया है। तात्पर्य यह कि आज के नाटकों में कोई पात्र भावुकता की धारा में बह नहीं जाता, वरन् अपने साथियों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करता है। इन नाटकों पर भारतेन्दु आदि से अधिक प्रभाव पाश्चात्त्य नाटककारों इब्सन और शॉ का पड़ा है। इनमें भारत के नाट्यशास्त्र के नियमों के पालन से अधिक उल्लंघन ही मिलेगा और यूरोप में प्रचलित नाट्य-कला का ही अधिक पालन दिखाई देता है। भारतेन्दु-काल के नाटककार समाज की बुराइयों के निदान के साथ चिकित्सा का भी प्रबन्ध करते थे, परन्तु आधुनिक समस्या-नाटककार समस्या का केवल निदान करते हैं, चिकित्सा का भार देश और समाज के कर्णधारों के ऊपर छोड़ देते हैं। भारतेन्दु युग के नाटककार नारी के अधिकारों तथा कर्त्तव्यों का सन्तुलन करते थे, परन्तु आजकल के समस्या-नाटकों में नारी के कर्त्तव्यों से अधिक अधिकारों पर बल दिया जाता है। नाट्य-शैली की तुलना : यदि आज के समस्या-नाटकों की शैली की तुलना भारतेन्दु- युगीन नाट्य-शैली से करें, तो हमें दोनों में बहुत अन्तर दिखाई देगा। १. आज के समस्या-नाटकों में नृत्य तथा गीत का सर्वथा बहिष्कार किया गया है। भारतेन्दु-काल के नाटकों में गीत तथा नृत्य का समावेश किया जाता था। २. पहले के नाटकों में स्वगत भाषण का प्रयोग किया जाता था। प्रसादजी ने भी स्वगत भाषण का काफी प्रयोग किया है, परन्तु आज के समस्या-नाटकों में इसका बहिष्कार कर दिया गया है। इसी प्रकार, आकाश-भाषित का भी बहिष्कार हुआ है।

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३. पहले के भारतीय-नाटकों में दृश्य का संकेत बहुत छोटा-प्रायः एक ही पंक्ति में-होता था। परन्तु, समस्या-नाटकों में दृश्य-संकेत काफी बड़ा होने लगा है। कहीं-कहीं दृश्य-संकेत दो-दो पृष्ठों का भी दिया गया है। ४. भारतेन्दु-काल के नाटककार राजा राममोहन राय और स्वामी दयानन्द से प्रेरणा प्राप्त करके सामाजिक कुरीतियों का विश्लेषण करते थे। परन्तु, आजकल समस्या- नाटकों के लेखक पश्चिम के मॉर्क्स और फ्रॉयड से प्रेरणा ग्रहण करते हैं। ५. पहले के नाटककार भास, कालिदास तथा भवभूति आदि के द्वारा प्रदर्शित मार्ग पर चलते थे, परन्तु आज का नाटककार इब्सन और शॉ के पथ का अनुगामी है। ६. समस्या-नाटकों में नायक की धारणा में भी बहुत परिवर्त्तन हो गया है। संस्कृत-नाटकों में नायक उच्च कुल-सम्भूत क्षत्रिय या राजा होता था और सम्पूर्ण नाटक में उसका महत्त्वपूर्ण अस्तित्व रहता था। वही कथानक को आगे बढ़ाता था। भारतेन्दु, प्रसाद और हरिकृष्ण प्रेमी के नाटकों में भी इसी परम्परा का पालन हुआ है। किन्तु, समस्या-नाटकों में नायक किसान, मजदूर, चोर, शराबी कुछ भी हो सकता है। सम्पूर्ण नाटक में उसकी विद्यमानता भी आवश्यक नहीं रह गई है। नाटक के थोड़े अंश में भी वह रह सकता है। 'सिन्दूर की होली' का नायक रजनीकान्त तो कभी रंगमंच पर आता ही नहीं। अन्त में, उसका शव ही रंगमंच पर लाया जाता है। शिल्प-विधान : समस्या-नाटक के शिल्प-विधान पर भी थोड़ा विचार कर लेना चाहिए। इसकी विशेषताओं को दो वर्गों में रखना अच्छा होगा -- (क) अन्तरंग और (ख) बहिरंग। (क) पहले अन्तरंग विशेषताओं पर ध्यान दिया जाय। १. समस्या-नाटक की पहली अन्तरंग विशेषता है-समस्या की प्रधानता। इसमें प्रधान समस्या एक ही होती है, परन्तु अन्य समस्याएँ भी उसके आसपास चक्कर काटती रहती हैं। ऐसे नाटककारों का मत है कि समस्याएँ केवल उठाई जायँ, उनका समाधान प्रस्तुत नहीं किया जाय। २. दूसरी अन्तरंग विशेषता है यथातथ्यवाद। इन लोगों का सिद्धान्त है-Draw life to life and the moral will come out itself. इस सम्बन्ध में भी मिश्रजी का कहना है- जो यथार्थ नहीं है, वह आदर्श नहीं हो सकता। कल्पना की रंगीनी और असंगति साहित्य का मापदण्ड नहीं बन सकतीं। कहने का अभिप्राय यह है कि समस्या-नाटककार समाज के गलित चित्रों का मात्र फोटो तैयार करता है। ३. समस्या-नाटक की तीसरी अन्तरंग विशेषता है अन्तर्मुखी प्रवृत्ति। प्रसादजी के नाटकों में एक दोष बताया जाता है-बाह्य कार्य-व्यापार की बहुलता। परन्तु, इन समस्या-नाटकों में कार्य-व्यापार की अत्यन्त कमी ही दोष है। इनमें घटना की अपेक्षा मानसिक संघर्ष तथा अन्तर्द्वन्द्व की अधिकता रहती है। अन्तर्दवन्द्व दोनों रूपों-व्यष्टिनिष्ठ और समष्टिनिष्ठमें पाया जाता है।

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५४४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास मिश्रजी के समस्या-नाटकों में व्यष्टिनिष्ठ अन्तर्द्वन्द्व की ही प्रधानता है। 'सिन्दूर की होली' के मनोजशंकर में यह बात देखी जा सकती है। ४. चौथी विशेषता है बौद्धिकता। समस्या-नाटकों में हृदय-पक्ष लगभग शून्य रहता है और बुद्धिमूलक व्यापार ही इनका प्राण है। इन नाटककारों ने मान लिया है कि आज की समस्याएँ बुद्धि से उत्पन्न हुई हैं और बुद्धि ही उनका समाधान भी करेगी। ५. समस्या-नाटकों की पाँचवीं अन्तरंग विशेषता है व्यंग्य। प्राचीन आदर्श, रूढ़ि, परम्परा आदि का मूलोच्छेद करने के लिए व्यंग्य का प्रहार किया जाता है। (ख) समस्या-नाटकों की बहिरंग विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-१. संघर्ष की प्रबलता, २. कार्य-व्यापार की अल्पता, ३. चरित्र-चित्रण की विशिष्ट मान्यता, ४. संवाद, ५. बाह्य उपधान-वर्णन, ६. स्वगत कथन का अभाव, ७. गीतों का अभाव। समस्या- नाटकों में पात्र नाटककार के हाथ की कठपुतली बन जाते हैं; उनका स्वाभाविक रूप नष्ट हो जाता है। पात्र रक्तहीन तथा अस्थिहीन प्रतिमा-मात्र बनकर रह जाते हैं। स्ट्रिण्डबर्ग ने तो अपने नाटक Paric में पात्रों का काम केवल X और y से लिया है। इसीलिए, आलोचकों ने समस्या-नाटकों के नायक को वितर्कवादी नायक (Reasoning Hero) ही कहना अच्छा समझा। इसके संवाद भी पुष्ट तथा स्वस्थ रूप में नहीं, विकृत रूप में ही रहते हैं। इनके संवादों का मुख्य उद्देश्य सिद्धान्त-प्रतिपादन और समस्या का दार्शनिक विवेचन ही होता है। समस्या-नाटकों में उपधान-वर्णन (भूमिका, दृश्य-वर्णन, रंगमंच-निर्देश आदि) विस्तृत रूप में रहता है। एक प्रकार से नाटक में ये पूरक के रूप में रहते हैं। इन नाटकों में स्वगत कथन और गीत का अभाव रहता है। कुछ समस्या- नाटकों में गीत भी पाये जाते हैं, परन्तु उनका स्थान गौण ही है। माना जाता है कि समस्या-नाटक का रंगमंच से घनिष्ठ सम्बन्ध है, परन्तु वास्तविकता की कसौटी पर देखने से यह धारणा सन्देहास्पद है। रंगमंच तथा अभिनय की दृष्टि से कार्य-व्यापार का उचित योग आवश्यक है, परन्तु समस्या-नाटकों में कार्य- व्यापार की कमी रहती है। आजकल नाटक पढ़ने से अधिक लोग देखना पसन्द करते हैं; अतः रंगमंच की दृष्टि से इन्हें सबल होना चाहिए। इसीलिए, ये नाटक संक्षिप्त, वैज्ञानिक और यथार्थवादी बनाये जाते हैं। दृश्य-परिवर्त्तन में भी कमी की जाती है। इन आधारों पर ये नाटक उचित जाँचते हैं, परन्तु इस वस्तु की अतिशयता अनुचित होती है। युग- जीवन का चित्रण होने के कारण ये नाटक विश्वास उत्पन्न करनेवाले होते हैं। यही कारण है कि कुतूहलवद्ध क नहीं होने पर भी ये हृदय को स्पर्श करते हैं। अभिनय की दृष्टि से अश्क, वर्माजी और सेठजी के नाटक मिश्रजी के नाटकों की अपेक्षा अधिक सफल हैं। प्रमुख समस्या-नाटककार : लक्ष्मीनारायण मिश्र समस्या-नाटक के जन्मदाता माने जाते हैं और समस्या-नाटककारों में इनका स्थान सर्वप्रमुख है। प्रसादजी की 'ध्रुवस्वामिनी' भी समस्या-नाटक है। इन दो नाटककारों के अतिरिक्त कई अन्य नाटककारों ने समस्या-

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नाटकों की रचना की है। निम्नलिखित नाटककार बहुत प्रख्यात हो चुके हैं- उपेन्द्रनाथ अश्क (स्वर्ग की झलक, छठा बेटा आदि), भगवतीचरण वर्मा (और रुपया तुम्हें खा गया), उग्र (डिक्टेटर, गंगा का बेटा, आवारा), उदयशंकर भट्ट (कमला, विद्रोहिणी अम्बा आदि), हरिकृष्ण प्रेमी (प्रतिशोध, छाया, बन्धन, मन्दिर आदि), सेठ गोविन्ददास (प्रकाश, सेवापथ, धीरे-धीरे आदि), गोविन्दवल्लभ पन्त (अंगूर की बेटी), वृन्दावनलाल वर्मा (खिलौने की खोज, पीले हाथ, बाँस की फाँस, लो भाई पंच लो), लक्ष्मीनारायण लाल (अन्धा कुँआ), भगवतीप्रसाद वाजपेयी (छलना), पृथ्वीनाथ शर्मा (दुविधा, अपराधी, शराबी), जगन्नाथप्रसाद मिलिन्द (समर्पण) आदि।

एकांकी नाटक लक्षण तथा तन्त्र : आज एकांकी नाटक की एक स्वतन्त्र तथा विकसित विधा है। डॉ० दशरथ ओझा के शब्दों में एकांकी का लक्षण निम्नलिखित रूप में दे सकते हैं : 'जिस नाटक में नायक जीवन के एक ही लक्ष्य को प्रमुखता देने के लिए उत्तेजक, सूचक तथा प्रभाव-व्यंजक पात्रों की सहायता से घटनाओं तथा भाव-विचारों की तहें खोलता हुआ, हमारी जिज्ञासा को उभारकर या तो सन्तुष्ट कर देता है अथवा किसी उलझन में ही छोड़ देता है, वह एक अंक में समाप्त होनेवाला नाटक एकांकी है।" एकांकी में एक ही कथावस्तु होती है, प्रासंगिक कथानक के लिए स्थान नहीं। एकांकी की परिधि विस्तृत नहीं होती। छोटी-सी परिधि में एक छोटी-सी घटना सम्बद्ध कर दी जाती है। एकता ही एकांकी का प्राण, आत्मा और सब कुछ है। एकता के अभाव में परिधि न बनकर एक वक्र रेखा बनकर रह जाती है। एकांकी की मुख्य कथावस्तु को सब ओर से छोटी-छोटी घटनाएँ योग दें, यही इसकी एकता है। छोटी घटनाएँ कथावस्तु को एक निश्चित लक्ष्य की ओर अग्रसर करायें, इसी में एकांकी की सफलता निहित है। यदि ये घटनाएँ मुख्य कथावस्तु से सहयोग नहीं करें, तो एकांकी का रस सूख जायगा। उदाहरणार्थ, डॉ० रामकुमार वर्मा के एकांकी '१८ जुलाई की शाम' में अशोक, राजेश्वरी और प्रमोद से सम्बद्ध कई छोटी-छोटी घटनाएँ एकरूप होकर मुख्य कथावस्तु को आगे बढ़ाती हैं। सभी घटनाओं का लक्ष्य है-उषा का हृदय-परिवर्त्तन। अधिक लम्बा एकांकी प्रभावोत्पादक नहीं होता। जो एकांकी अधिक-से-अधिक एक घण्टे में खेला जा सके, वह बहुत प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। बड़े नाटकों के समान इसमें पाँच अवस्थाएँ नहीं होतीं, वरन् केवल तीन -- प्रारम्भ, चरम सीमा और अन्त -- होती हैं। नाटकों के समान इसकी भी चरम सीमा बहुत प्रभावोत्पादक, उत्तेजक तथा आकर्षक होती है।

१. हिन्दी-नाटक : उद्भव और विकास, पृ० ४४७-/११ ०g उम-शशकp .१

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एकांकी एक दृश्य का भी हो सकता है और अनेक दृश्यों का भी। इसमें दृश्यों का विभाजन एकरसता का भारीपन कम करने के लिए किया जाता है। यदि अनेक दृश्य नहीं किये जायँ, तो दशकों के उकता जाने का भय रहता है। एकांकी की कथावस्तु की विभिन्न अवस्थाओं के विषय में प्रो० रामयतन सिंह 'भ्रमर' ने लिखा है : "एकांकी का क्षेत्र पढ़े-लिखे आदमी के उस छोटे-से कमरे के सदूश है, जिसमें स्थान की अत्यधिक न्यूनताहोने पर भी कमरे की चीजों को वह इस प्रकार सजाकर रखता है कि बँगले का रहनेवाला दाँतों-तले उँगली दबाता है। कमरे की एक-एक अंगुल जमीन का उपयोग करता है। दीवाल के कण-कण में सौन्दर्य बिखेर देता है। अतः, एकांकी का 'उद्घाटन' दर्शकों के ध्यान को आकर्षित करनेवाला, 'विकास' आकर्षण को बढ़ानेवाला, 'अवरुन्धन' आकर्षण को गतिशील करनेवाला तथा 'अन्त' आनन्द-मग्न कर देनेवाला होना चाहिए।" आधुनिक एकांकियों में उलझन (अवरुन्धन) तथा संशयात्मकता का विशेष महत्त्व है। नाटकीय समस्याओं का हल उलझा देना ही उलझन का काम है। उलझन से ही संशय की उत्पत्ति होती है। नाटक या एकांकी में अनिश्चय की भावना दर्शकों को आगे की घटना जानने को प्रेरित करती है। नाटक की अतीत की घटनाओं तथा कार्य-व्यापारों पर ही संशयात्मकता अवलम्बित रहती है। एकांकी में चरम सीमा का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। चरम सीमा पर ही नाटक की सभी घटनाएँ और समस्त कार्य-कलाप एक होकर नाटक की सम्पूर्णता में विलीन हो जाते हैं। यहीं पहुँचकर सभी समस्याओं का हल निकल जाता है, सभी प्रश्नों का सन्तोष- जनक उत्तर मिल जाता है। एकांकी की चरम सीमा उसकी समाप्ति के कुछ ही पहले आती है। यदि एकांकीकार भूल से उसका प्रादुर्भाव पहले ही कर दे, तो एकांकी वहीं समाप्त हो जाता है। परन्तु, आजकल ऐसे भी बहुत एकांकी लिखे जा रहे हैं, जिनमें चरम सीमा नहीं रहती। कुछ आलोचकों का मत है कि चरम सीमा के अभाव में भी उत्कृष्ट एकांकी की रचना हो सकती है। एकांकी का दूसरा तत्त्व उसके पात्रों से सम्बन्ध रखता है। मुख्य पात्रों के चरित्र में विस्तार नहीं होना चाहिए। चरित्र के विकास में आदि, मध्य और अन्त की अवस्थाएँ नहीं होतीं। एकाकी का काम पात्रों के सम्पूर्ण जीवन का चित्र उपस्थित करना नहीं, वरन् जीवन की एक घटना लेकर सम्पूर्ण जीवन की ओर संकेत-भर कर देना है। एकांकी के अन्य पात्रों की गतिविधि मुख्य पात्र के इर्द-गिर्द भाँवरियाँ देती रहती है। एक से अधिक मुख्य पात्र रहने से एकांकी प्रभावहीन बन जाता है। अतएव, अत्यधिक मुख्य या गौण पात्र एकांकी में निरर्थक हैं, पात्रों की अधिकता से एकांकी शिथिल पड़ जाता है। १. एकांकी-कला, पृ० ११६-११७

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नाटक या एकांकी को जीवन्त बनानेवाला तत्त्व उसका बाह्य या आन्तरिक द्वन्द्व है। यह नाटकीय संघर्ष या द्वन्द्व नाटक के पात्रों पर निर्भर करता है। पात्र ही नाटककार तथा दर्शक के विचार को अपने कन्धे पर ढोता है। वही दोनों को मिलाता है। अतः, एकांकी में पात्रों का चुनाव करने में बड़ी सावधानी से काम लेना होता है। "आधुनिक एकांकी में न तो धीरोदात्त या धीरललित नायक की आवश्यकता है, न द्विजेन्द्रलाल राय-कृत 'शाहजहाँ' के औरंगजेब ऐसे प्रतिनायक की। इन दोनों के अभाव में भी सुन्दर नाटक बन सकता है, बशत्ते नाटक की समस्या का दर्शक दो विभिन्न दृष्टिकोणों से निरीक्षण करे।"१ सेठ गोविन्ददास के 'ईद और होली' में न तो नायक है और न प्रतिनायक ही, फिर भी दर्शकों को इससे तृप्ति होती है। एकांकी में संवाद का विशेष महत्त्व है। घटना, परिस्थिति तथा पात्रों के चरित्र का विकास संवाद द्वारा ही सम्यक रूप से होता है। इसी के द्वारा एकांकीकार पात्रों को रंगमंच पर नचाता है और दर्शकों के मन में विश्वास उत्पन्न करता है। संवाद की उत्कृष्टता इस बात में है कि वह चुस्त, अर्थपूर्ण तथा पात्रानुकूल हो। लम्बे संवादों से एकांकी में शिथिलता उत्पन्न होती है। फिर भी, संवाद एकांकी का एक उपादान- मात्र है, साध्य नहीं हो सकता, केवल साधन है। इसीलिए, जो संवाद नाटकीय घटनाओं को चरम सीमा तक सफलतापूर्वक पहुँचा दे, वही उत्तम समझा जाता है। एकांकीकार को टेकनीक का ज्ञान होना चाहिए, परन्तु यदि वह प्रतिभाहीन तथा अदूरदर्शी है, तो टेकनीक उसे सफल नाटककार नहीं बना सकेगा। इससे उसका मार्ग-निर्देशन-मात्र होता है। एकांकी में टेकनीक का होना आवश्यक है, परन्तु टेकनीक के पीछे दौड़ लगाना उचित नहीं। एकांकी के जन्म एवं लोकप्रियता के कारण : वर्त्तमान युग में हिन्दी में एकाकी नाटक अत्यन्त लोकप्रिय हो रहे हैं। डॉ० भोलानाथ ने हिन्दी में एकांकी के जन्म और उसकी लोकप्रियता के लिए निम्नलिखित कारणों का निर्देश किया है : "(अ) हमारी शतधा 'अभिव्यक्त-अभिरुचि' (स्व० श्रीसूर्यकिरण पारीक)। (आ) किसी एक ही ओर अपने ध्यान को अधिक देर तक निरन्तर केन्द्रित किये रह सकनेवाली इच्छा और इच्छा-शक्ति का सामान्यतः ह्रास। (इ) संस्कृत, अँगरेजी और बँगला-साहित्य एवं उनके एकांकी-साहित्य से हमारा परिचय और उनके अनुकरण पर एकांकी लिखने की हमारी इच्छा का जन्म। (ई) हिन्दी-नाट्य-साहित्य के प्रणयन के पूर्व हिन्दी-जनता का जो अपना रंगमंच था, उसपर अभिनीत होनेवाली कृष्ण-चरित्र-सम्बन्धी एकांकी झाँकियाँ।

१. एकांकी-कला (प्रो. रा० य० सिंह), पृ० १३७

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(उ) कभी-कभी थोड़े समय के लिए खाली होने पर उतने थोड़े समय के लिए साहित्यिक मनोरंजन की हमारी माँग। (ऊ) बालचरों के कैम्प-फायर के लिए आवश्यक सरल एकांकी की माँग। (ए) विद्यालयों, महाविद्यालयों एवं विश्वविद्यालयों में विशेष-विशेष अवसरों पर विद्यार्थियों द्वारा खेले जाने के लिए सुरुचिपूर्ण एवं साहित्यिक नाटकों की आवश्यकता और ऐसे अवसरों पर एकांकियों की विशेष उपयुक्तता एवं उपयोगिता। (ऐ) रेडियो से हिन्दी-एकांकियों की माँग।" उपरिलिखित कारणों में से कुछ अनावश्यक विस्तार होने पर भी सामान्यतः यथार्थ हैं। एकांकी का उद्देश्य : आधुनिक कर्म-संकुल युग का व्यस्त मानव सब प्रकार से समय बचाना चाहता है, साथ ही मनोविनोद के साधन भी रखना चाहता है। उसका लक्ष्य अल्पकाल में अधिक-से-अधिक मनोरंजन करना और विचार ग्रहण करना हो गया है। अतः, इस युग में किसी मनुष्य को एकांकी नाटकों का आश्रय लेना पड़ता है। किन्तु, यह नहीं समझना चाहिए कि आज के एकांकी का एकमात्र उद्देश्य मनोरंजन ही करना है। आज एकांकी जीवन की गहन तथा जटिल समस्याओं को प्रत्यक्ष रूप में देखने का अभिलाषी है। अतएव, जो एकांकी वर्त्तमान जीवन की जटिलताओं को कम-से-कम समय में अत्यन्त आकर्षक रूप में प्रक्ट कर दे, वही सफल समझा जायगा। अभिप्राय यह है कि जो एकांकी मनोविनोद और उन्नति दोनों का समन्वय और सन्तुलन कर दे, वही सफल गिना जायगा। संस्कृत एकांकी और आधुनिक हिन्दी-एकांकी : संस्कृत में अनेक प्रकार के एकांकी लिखे गये। उनके वर्गीकरण के आधार थे-नायक का चरित, इतिवृत्त का प्रकार, रस की प्रधानता और वृत्तियों का विकास। कई दृष्टियों से आधुनिक हिन्दी-एकांकी भिन्न हैं। उनका अन्तर निम्नलिखित रूप में प्रकट कर सकते हैं :

१. आधुनिक हिन्दी-एकांकी में अन्तर्द्वन्द्व तथा संघर्ष की प्रधानता रहती है। मानसिक प्रक्रिया का सूक्ष्म विश्लेषण ही आधुनिक एकांकी का प्राण है। परन्तु, संस्कृत- एकांकियों में इस तत्त्व का अभाव ही पाया जाता है। २. आधुनिक युग का पाठक या दर्शक नाटक की घटनाओं को ही जानकर सन्तुष्ट नहीं हो जाता, उसे सन्तोष तब होता है, जब वह उनके कारणों को भी जान ले। परन्तु, भास के अतिरिक्त अन्य संस्कृत-एकांकीकार राजाओं के विलास तथा तत्कालीन

१. हिन्दी-एकांकी का विकास (डॉ० भोलानाथ), सेठ गोविन्ददास अभिनन्दन-ग्रन्थ (भारतीय नाट्य-साहित्य), पृ० ३७६

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परिस्थिति के चित्रण के अधिक प्रयास करते थे, कार्य-कारण-सम्बन्ध पर प्रकाश डालकर दर्शक या पाठक की जिज्ञासा शान्त करने की ओर उनका ध्यान विशेष नहीं रहता था। ३. आधुनिक एकांकीकार जीवन की वास्तविकता चित्रित करने में सचेष्ट है, इस विषय में उसकी दृष्टि बहुत पैनी है। परन्तु, संस्कृत-नाटककार की दृष्टि जीवन की वास्तविकता का चित्रण करने में उतनी पैनी नहीं दिखाई देती। आज जीवन की बड़ी-बड़ी घटनाओं का उतना मूल्य नहीं जितना दैनिक जीवन की छोटी-छोटी सामान्य घटनाओं के घात-प्रतिघात का है, जिनसे व्यक्तियों के चरित्र में विकास होता है। ४. संस्कृत के नाटककार विशेषतः राजा-महाराजा की ही परिस्थिति का प्रदर्शन करते थे, परन्तु आज का नाटककार साधारण तथा मध्यम वर्ग के दैनिक जीवन की सच्ची व्याख्या करना अपना कर्त्तव्य मानता है। ५. संस्कृत का नाटककार नायक की विजय का अटल सिद्धान्त लेकर आगे बढ़ता है, इसलिए कभी ऐसी घटनाओं का चित्रण नहीं करता, जिससे नायक मृत्यु या पराजय के मुख में पड़ जाय। वह ऐसी परिस्थितियों से कतरा कर निकल भागता है। परन्तु, आज का हिन्दी-एकांकीकार ऐसी परिस्थितियों का स्वागत करता है। अतः, आज के एकांकियों में चरम सीमा (Climax) अनिवार्य मानी जाती है, परन्तु संस्कृत-नाटककार इस चरम विकास की अवहेलना ही करते रहे। यदि हम कथानक, नायक, संवाद और जीवन-दर्शन की दृष्टि से विचार करें, तो आधुनिक हिन्दी-एकांकी संस्कृत-एकांकियों से सवथा भिन्न प्रतीत होंगे। अतः दोनों की अलग स्वतन्त्र धारा स्वीकार की जा सकती है। हिन्दी-एकां की का विकास भारतेन्दु-युग या प्रयोगकालीन युग : हिन्दी में वास्तविक एकांकी का प्रारम्भ प्रसादजी के 'एक घूंट' से माना जाता है, परन्तु तन्त्र तथा शिल्प-विधान की दृष्टि से इससे भी पूर्व कई नाटक उपलब्ध होते हैं, जो एकांकी की कोटि में गिने जा सकते हैं। भारतेन्दुजी ने अपने कुछ नाटकों को अंकों में विभाजित किया है, परन्तु यदि अंकों के स्थान पर दृश्य कर दिया जाय, तो वे एकांकी ही बन जायेंगे। 'वैदिकी हिंसा-हिंसा न भवति' तीन अंकों में बाँटा गया है, 'किन्तु प्रत्येक अंक में घटित होनेवाला व्यापार इतना सूक्ष्म है और घटनाएँ इतनी लघु तथा तीव्रगामिनी हैं कि इसे एकांकी कहना ही उचित है। इसी प्रकार, नीलदेवी को भी समालोचक एकांकी नाटक ही मानते हैं।" वस्तुतः हिन्दी-एकांकी का जन्म भारतेन्दु-युग में ही हो गया था। साहित्य के अन्य क्षेत्रों की तरह भारतेन्दुजी ने हिन्दी-एकांकी का प्रारम्भ किया था। उन्होंने पारसी रंगमंच से प्रभावित सस्ते रोमाण्टिक-नाटकों से जनता की रुचि हटाकर अपने साहित्यिक्क १, प्रो० ललिताप्रसाद सुकुल ; नीलदेवी की भूमिका

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नाटकों के माध्यम से उसमें परिष्कार किया। भारतेन्दु ने संस्कृत से नाट्यकला सीखी, परन्तु पाश्चात्त्य नाटकों का भी पर्याप्त प्रभाव उनपर पड़ा। संस्कृत के पुराने भारतीय आदर्शों पर ही उन्होंने अपने एकांकियों की रचना की। उन्होंने एकांकी के क्षेत्र में प्रहसन, ऑपेरा, व्यंग्य, गीति-रूपक, नाट्य-रासक, भाण इत्यादि विभिन्न प्रकारों के उदाहरण उपस्थित किये। अनूदित एकांकी नाटकों में 'भारत-जननी' एक ऑपेरा है। कवि कंचन-कृत व्यायोग के आधार पर भारतेन्दुजी ने सन् १८७३ ई० में 'धनंजय-विजय' नामक एकांकी की रचना प्राचीन संस्कृत-प्रणाली पर की। 'पाखण्ड-विडम्बन' रूपक 'प्रबोध-चन्द्रोदय' के तृतीय अंक का अनुवाद है। कथानक को अपने-आप में पूर्ण बनाया गया है। भारतेन्दुजी के मौलिक एकांकियों में 'प्रेमयोगिनी' (अपूर्ण, सन् १८७५ ई०), 'भारत- दुर्दशा' (सन् १८८० ई०), 'नीलदेवी' (सन् १८८१ ई०) प्रसिद्ध हैं। हिन्दी-एकांकियों में यथार्थवाद का आरम्भ 'प्रेमयोगिनी' से ही माना जा सकता है। 'माधुरी' में श्रीकृष्ण की प्रेमिका माधुरी का विरह-चित्रण है। यह कुछ अतिरंजित (Melodramatic) हो गया है। 'भारत-दुर्दशा' को भारतेन्दुजी ने नाट्य-रासक या लास्यरूपक कहा है। उपरूपक के १८ भेदों में नाट्य-रासक भी है। इसमें नान्दी नहीं है, परन्तु मंगलाचरण है। 'नीलदेवी' ऐतिहासिक गीति-रूपक है, जिसमें संगीत का सौन्दर्य पर्याप्त मात्रा में विद्यमान है। भारतेन्दुजी ने 'अंधेर नगरी', 'विषस्य विषमौषधम्' तथा 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति' नामक प्रहसन लिखे। इनका विषय मुख्यतः समाज-सुधार था। इनमें अतीत भारत के गौरव तथा वर्तमान की दुरवस्था का चित्रण किया गया है और भविष्य के कल्याण की कामना की गई है। निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि भारतेन्दुजी संस्कृत-नाट्यकला के पक्षपाती थे और संस्कृत के अध्ययन के साथ अपनी निजी मौलिकता भी उनमें प्रचुर परिमाण में विद्यमान थी। भारतेन्दु-युग में एकांकी की एक नवीन पद्धति चल निकली थी, जिस पर जन- नाटकों का अधिक प्रभाव पड़ा था। इस शैली के प्रवर्त्तन का श्रेय लाला श्रीनिवासदास को है। उन्होंने 'प्रह्लाद-चरित' नामक नाटक की रचना उस शैली पर की, जो रासलीला एवं स्वांग-मण्डलियों में प्रह्लाद-लीला नाम से सैकड़ों वर्ष पहले से चली आ रही थी। यदि इस नाटक के विभिन्न दृश्यों को हटा दें, तो यह सम्पूर्ण नाटक रास तथा स्वांग का नाटक बन जाता है। भारतेन्दु-युग के नाटककारों ने उपर्युक्त दोनों रूपों को ग्रहण किया। इस युग के एकांकीकारों में पं० बालकृष्ण भट्ट का विशेष स्थान है। इनके पाँच एकांकी प्रकाशित हुए थे, जिनके नाम हैं-'शिक्षा-दान', 'जैसा काम वैसा परिणाम', 'कलिराज की सभा', 'रेल का विकट खेल', 'बालविवाह'। भट्टजी ने अपने एकांकियों में तत्कालीन समाज पर गहरा व्यंग्य किया है। श्रीराधाचरण गोस्वामी एकांकी के क्षेत्र में हास्य और व्यंग्य

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के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके सात एकांकी उपलब्ध हैं। पं० प्रतापनारायण मिश्र के 'प्रेम-पुष्पावली', 'भारत-दुर्दशा रूपक', 'मन की लहर', 'शृंगार-विलास', 'जुआरी-खुआरी', 'कलि-कौतुक रूपक' शीर्षक एकांकी प्राप्य हैं। ये पुरानी संस्कृत-शैली पर ही रचे गये हैं। लाला श्रीनिवासदास के चार एकांकी उपलब्ध हैं। इनके कथनोपकथनों में अच्छी सजीवता है। पं० किशोरीलाल गोस्वामी के दो एकांकी मिलते हैं-'नाट्यसम्भव रूपक' और 'चौपट चपेट' (प्रहसन)। इनमें भी तत्कालीन सामाजिक दुरवस्था का चित्रण मिलता है। पं० रुद्रदत्त शर्मा ने निम्नलिखित एकांकी लिखे-'स्वर्ग में सब्जेक्ट कमिटी', 'पाखण्डमूति', 'अपूर्व संन्यासी' और 'कण्ठी-जनेऊ का विवाह'। श्रीराधाकृष्णदास ने 'दुःखिनी बाला' नामक एकांकी लिखा। इनके अतिरिक्त सर्वश्री देवकीनन्दन त्रिपाठी, बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन', कार्त्तिकप्रसाद खत्नी, अम्बिकादत्त व्यास आदि ने भी कुछ एकांकी लिखे। इससे हिन्दी-एकांकी की एक परम्परास्थापित हो जाती है। इस युग के एकांकियों पर संस्कृत का बहुत प्रभाव रहा है। द्विवेदी-युग : द्विवेदी-युग में एकांकी के टेकनीक में धरे-धीरे विकास हो रहा था। अँगरेजी के अध्ययन और द्विजेन्द्रलाल राय के नाटकों के अनुवाद से हिन्दी-एकांकीकार नये ढंग के एकांकियों की रचना कर रहे थे। इस युग के एकांकियों में शिल्प-विधि की दृष्टि से थोड़ा परिवर्तन दिखाई देता है। पश्चिमी कला का भी कुछ प्रभाव परिलक्षित होता है। फिर भी, शिल्प-विधि की अपेक्षा जीवन-दर्शन पर अधिक ध्यान दिया जारहा था। इस युग में समाज-सुधार की प्रवृत्ति प्रमुख रही और समाज की त्रुटियों पर तीखे व्यंग्य किये गये। जीर्ण-शीर्ण रूढ़ियों, देशवासियों की तुटियों तथा कमजोरियों के विरुद्ध इन एकांकीकारों ने आन्दोलन किया और देश तथा समाज के सम्मुख व्यावहारिक आदर्श उपस्थित किया। बालविवाह, वृद्ध-विवाह, बेमेल विवाह, अछूतोद्धार, मालिक और नौकर के झगड़े, शराबखोरी, जुआ, वेश्यावृत्ति, ऊँच-नीच का बनावटी भेद, रूढ़िवादी संस्थाओं की आलोचना, धार्मिक तथा सामाजिक पाखण्ड आदि मुख्य विषय थे, जिनका विश्लेषण इन एकांकीकारों ने किया। इस युग का मूल स्वर सुधारवाद था। सुधारवादी एकांकियों में हास्य-व्यंग्य का प्रचुर प्रयोग किया गया। शैली व्यंग्यात्मक थी। द्विवेदी-युग के एकांकियों को तीन धाराओं में बाँटा जा सकता है -- १. राष्ट्रीय नैतिक चेतना, २. साहित्यिक सुधारवादी धारा और ३. पौराणिक आदर्शवादी विचारधारा। टेकनीक में पारसी प्रणाली ही रही, परन्तु भाषा में साहित्यिकता का समावेश हुआ। गीतमय संवादों में कमी आई और पात्रों के अनुकूल भाषा का प्रयोग हुआ। इस युग के प्रमुख एकांकीकारों में पं० राधेश्याम कथावाचक, तुलसीदत्त शैदा, सियारामशरण गुप्त, आनन्दीप्रसाद श्रीवास्तव, हरिशंकर शर्मा, जी० पी० श्रीवास्तव, रूपनारायण पाण्डेय, प्रेमचन्द, उग्रजी, सुदर्शन, रामनरेश त्रिपाठी, मंगलप्रसाद विश्वकर्मा, रामसिंह वर्मा, व्रजलाल शास्त्री, सरयूप्रसाद बिन्दु आदि हैं।

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अन्य भाषाओं के कुछ एकांकियों का अनुवाद भी हुआ। इस प्रकार, द्विवेदी- युग में मौलिक तथा अनूदित एकांकियों की परम्परा चलती रही। संस्कृत के प्रभाव में कमी आगई, बँगला का प्रभाव अब भी था, परन्तु पाश्चात्य प्रभाव हिन्दी-एकांकी में तेजी से परिवर्त्तन ला रहा था। प्रसाद-युग (सन् १९२५-३८ ई०): प्रसादजी का 'एक घूँट' निकलने पर शीघ्र ही यह विवाद छिड़ गया कि इसे एकांकी कहा जाय या नहीं। प्रो० अमरनाथ गुप्त ने इसे संस्कृत-शैली का एकांकी मानकर आधुनिक एकांकियों से अलग ही रखा। परन्तु, प्रो० प्रकाशचन्द्र गुप्त, डॉ० नगेन्द्र, डॉ० सत्येन्द्र, डॉ० हरदेव बाहरी आदि ने इसे पूर्णतः आधुनिक एकांकी स्वीकार किया। उस समय जो भी विवाद रहा हो, परन्तु आज से काफी पहले ही इसे सर्वसम्मति से आधुनिक एकांकियों में गिना जाता है। बहुत लोग मानते हैं कि हिन्दी का सर्वप्रथम एकांकी 'एक घूँट' ही है। धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टियों से यह जागृति का युग था। शिक्षा के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व जागृति हुई। इस काल में अँगरेजी-नाट्य-शैलियों का विशेष रूप से अनुकरण हुआ। हिन्दी-एकांकीकारों में ऐसे व्यक्तियों की संख्या अधिक थी, जो सीधे अँगरेजी-साहित्य से प्रेरणा ग्रहण कर रहे थे। इस युग के एकांकीकारों में सर्वश्री डॉ० रामकुमार वर्मा, लक्ष्मीनारायण मिश्र और सेठ गोविन्ददास आदि ने अँगरेजी से प्रेरणा ली है। कृत्रिम तथा सस्ती भावुकता, जीवन का अतिरंजित स्वरूप, स्वगत कथन, काव्य का अधिक प्रयोग, दृश्यों की अधिकता और दूसरी अस्वाभाविकताओं के विरुद्ध यथार्थवादी क्रान्ति के चिह्न इस काल के एकांकियों में दृष्टिगत होने लगे। हिन्दी-एकांकीकारों ने अँगरेजी-एकांकियों की शैली पर रचना की। कुछ प्रयोगवादी एकांकीकारों ने स्वयं स्वीकार किया है कि उन्होंने नये ढंग के एकांकी लिखने की प्रेरणा अँगरेजी से ग्रहण की। कि पाश्चात्य शैली से प्रभावित एकांकीकारों की तीन श्रेणियाँ हैं : १. वे एकांकीकार, जिन पर बँगला या अँगरेजी का प्रभाव अभी तक नहीं पड़ा था। इनके कथानक ऐतिहासिक हैं और शिल्प-विधान में भी नवीनता लाने का कोई प्रयत्न नहीं है। इस श्रेणी के एकांकीकारों में सर्वश्री जैनेन्द्र कुमार, चन्द्रगुप्त विद्यालंकार, गोविन्दवल्लभ पन्त, चतुरसेन शास्त्री, वृन्दावनलाल वर्मा, प्रो० सद्गुरुशरण अवस्थी, डॉ० सत्येन्द्र आदि माने जाते हैं। २. द्वितीय श्रेणी में उन एकांकीकारों की गणना होती है, जिन्होंने शिल्प-विधान, विषय, विचार और समस्याएँ-सब कुछ पाश्चात्य एकांकियों से ग्रहण किया है। बर्नार्ड शा उन पाश्चात्य नाट्यकारों में प्रमुख हैं, जिनसे आधुनिक हिन्दी-एकांकीकार विशेष रूप से प्रभावित हैं। कुछ नाट्यकारों पर पश्चिम का इतना अधिक प्रभाव पड़ा है और उन्होंने पश्चिम का इतना अधिक अनुकरण किया है कि उनके एकांकियों में मौलिकता के लिए

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स्थान ही नहीं है। ऐसे एकांकीकारों में भुवनेश्वर प्रसाद सबसे अधिक प्रसिद्ध हैं। धर्मप्रकाश आनन्द और गणेशप्रसाद द्विवेदी भी लगभग इसी श्रेणी में हैं। द्विवेदीजी में यह शैली मँज-पचकर सामने आई है। ३. तृतीय श्रेणी में वे एकांकीकार आते हैं, जिन्होंने पाश्चात्त्य शिल्प-विधान और विचारधारा को पूरी तरह पचाकर भारतीय जीवन और समाज को एक नये ढंग से प्रस्तुत किया। उनके एकांकियों का शिल्प-विधान पाश्चात्त्य है, फिर भी उनके विचार, दर्शन, तर्क आदि मौलिक हैं। उनकी शैली पर पाश्चात्त्य प्रभाव है परन्तु विचार आदि भारतीय हैं शैली आदि केवल पोशाक का काम करती है। इस वर्ग के नेता डॉ० रामकुमार वर्मा हैं। इस वर्ग में अन्य कई श्रेष्ठ एकांकीकार हैं, जैसे सेठ गोविन्ददास, उपेन्द्रनाथ अश्क, उदयशंकर भट्ट, लक्ष्मीनारायण मिश्र, भगवतीचरण वर्मा आदि। इस वर्ग ने हिन्दी- एकांकी के विकास में बहुमूल्य योगदान किया है और शिल्प-विधान की दृष्टि से हिन्दी- एकांकी को बहुत आगे बढ़ाया है। आधुनिक अवस्था (सन् १९३८ से १९४७ ई० तक) : नवीन एकांकियों का मुख्य स्वर यथार्थवाद है। समाज अपनी अनेक कुरीतियों तथा विषमताओं के साथ यथार्थ रूप से चित्रित किया गया है। आर्थिक, सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं का चित्रण यथार्थवादी ढंग से हुआ है। झूठी कल्पना, अस्वाभाविक भावावेश या अतिरंजना का बहिष्कार करके यथार्थवादियों ने समाज का नग्न चित्रण किया। आज के एकांकीकार वर्त्तमान संघर्ष तथा उत्पीड़न के चित्रण में कोरी कल्पना या निरा आदर्शवाद अनावश्यक समझते हैं। कथानक के सम्बन्ध में भी पुरानी मान्यताएँ धराशायी हो चुकी हैं। आज का एकांकीकार समझता है कि सफल एकांकी छोटा होते हुए भी पूर्ण हो। वह पात्रों की संख्या कम ही रखता है। आधुनिक एकांकियों का संविधान रंगमंचीय है। इनकी भाषा सरल, स्वाभाविक तथा प्रवाहमयी है। स्वगत कथन का प्रयोग छोड़ दिया गया है। रंगमंच-निर्देश अत्यन्त व्यापक और विस्तृत दिये जाते हैं। इनकी सहायता से रंगमंच की सारी व्यवस्था, परिस्थिति तथा पात्रों की रूप-कल्पना तक स्पष्ट कर दी जाती है। इस नये युग के नेता सर्वश्री विष्णु प्रभाकर और सत्येन्द्र शरत् हैं। इनके अतिरिक्त प्रेमनारायण टण्डन, प्रभाकर माचवे, जयनारायण नलिन, विश्वम्भर मानव, डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल, जगदीशचन्द्र माथुर, आरसीप्रसाद सिंह, रामवृक्ष बेनीपुरी, डॉ० सुधीन्द्र, प्रो० इन्दुशेखर, हंसकुमार तिवारी, अनिलकुमार, भारतभूषण अग्रवाल, कृष्णकिशोर श्रीवास्तव, राजीव सक्सेना, विनोद रस्तोगी, राजेन्द्रकुमार शर्मा आदि हिन्दी-एकांकी को समृद्ध कर रहे हैं। स्वातन्त्र्योत्तर युग में एकांकी : स्वातन्त्र्योत्तर युग में हिन्दी-एकांकी नाटकों में बहुत विकास हुआ है। वस्तुतः संख्या की दृष्टि से इस अवधि में जितने एकांकी नाटकों की रचना हुई, उतने बड़े नाटकों की नहीं हो सकी है। एकांकी को विकास की प्रेरणा कई दिशाओं से प्राप्त हुई ;

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१. इस व्यस्त युग में लघु नाटकों के लिए उर्वर भूमि मिली है; र २. स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद देश में नई जागृति हुई है, जिसकी अभिव्यक्ति के लिए एकांकी बड़ा अच्छा साधन सिद्ध हुआ है; ३. अनेक प्रकार के नाट्य-समारोहों में जो प्रतियोगिताएँ होती हैं, उनसे एकांकी. लेखन को काफी प्रोत्साहन मिला है; ४. आकाशवाणी के केन्द्रों के विस्तार का भी स्वस्थ प्रभाव अत्याधुनिक हिन्दी- एकांकी पर पड़ा है। ठीक है कि रेडियो-नाटक रंगमंचीय नाटक से भिन्न होता है, परन्तु हिन्दी में प्रसारण के पश्चात् रेडियो-नाटक दृश्य-संकेतों के साथ इस प्रकार प्रकाशित किये गये हैं कि वे रंगमंचीय नाटक से भिन्न नहीं प्रतीत होते। सत्येन्द्र शरत्, लक्ष्मीनारायण लाल आदि एकांकीकारों की रचनाओं से स्पष्ट हो जाता है कि रंगमंच के प्रति सजगता के कारण एकांकी के शिल्प को विकास मिला है। "नये एकांकी की प्रवृत्ति कथानक के विस्तार की ओर नहीं, सघनता की ओर है, जीवन के मार्मिक क्षणों को चित्रित करने की ओर है, चरित्र के आकर्षक पहलुओं को प्रस्तुत करने की ओर है, अन्वितियों के निर्वाह की ओर है, अभिनेयता और प्रदर्शन की ओर तो है ही।" इस युग में एकांकियों पर रेडियो का गहरा प्रभाव पड़ा है। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद रेडियो के अधिकारियों का ध्यान एकांकी की ओर गया। इस धुम के एकांकियों में पूर्ववर्त्ती एकांकियों में प्राप्य तत्त्व तो है ही, रेडियो पर प्रसारित होनेवाले एकांकियों में कुछ नये तत्त्व भी आ गये हैं। उनमें कभी-कभी सूत्रधार या नैरेटर की भी आवश्यकता पड़ जाती है। रंगमंचीय प्रभाव उत्पन्न करने के लिए पृष्ठभूमि, संगीत और ग्रामोफोन-रिकार्डों का भी सहारा लिया जाता है। पात्र भी कम ही रखे जाते हैं। पुराने और नये लगभग सभी एकांकीकार रेडियो के लिए एकांकी लिख रहे हैं। हिन्दी-एकांकी-साहित्य आज अत्यन्त प्रौढ़ अवस्था में है। इसका भविष्य और भी उज्ज्वल है।

स्वोक्ति-नाटक सेठ गोविन्ददास : संस्कृत और अगरेजी में एकपात्रीय नाटक (Mono-drama) काफी संख्या में लिखे गये हैं। संस्कृत-नाट्यशास्त्र में भाण इसी शैली का रूपक होता है। भारतेन्दुजी का 'विषस्य विषभौषधम्' इसी शैली पर लिखा गया है। इधर हिन्दी में और भी स्वोक्ति-नाटकों की रचना हुई है। सेठ गोविन्ददास इस क्षेत्र में अग्रणी हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक 'चतुष्पथ' में ऐसे चार नाटकों का संग्रह किया है, १. डॉ० सिद्धनाथ कुमार (आलोचना-स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी-साहित्य-विशेषांक, अप्ैल, १९६६ ई०)

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जिनके शीर्षक हैं-'प्रलय और सृष्टि', 'अलबेला', 'शाप और वर' तथा 'सच्चा जीवन'। इन चारों नाटकों में चार विभिन्न पथों का अनुसरण किया गया है, जो अन्त में एक ही में मिल जाते हैं। 'प्रलय और सृष्टि' सम्पूर्ण नाटक में एक ही पात्र एक कमरे में एक समय बैठा हुआ भिन्न-भिन्न खिड़कियों से बाह्य प्रकृति को देखकर अपने मन में उठनेवाले विभिन्न उद्गार व्यक्त करता जाता है। पात् अधेड़ अवस्था का एक व्यक्ति है, जो अपने रंग-बिरंगे चश्मों, नोटबुक, कलम, लाइट हाउस-टावर, घण्टा, बिजली, बादल और पृथ्वी को देखकर अपने उद्गार व्यक्त करता है। जब वह एक विचार-शृंखला में रहता है तो नेपथ्य में कोई ध्वनि सुनता है और उसका ध्यान दूसरी ओर चला जाता है। यही सिलसिला चलता रहता है। 'अलबेला' नाटक में एक व्यक्ति अपने घोड़े से ही अपने उद्गार प्रकट करता है। 'शाप और वर' के दो भाग हैं। एक भाग में एक सम्पन्न पुरुष की उपेक्षिता स्त्री प्रसूति-गृह में मृत्यु के समय अपने उद्गार प्रकट करती है, जिसमें वह उसे शाप देती है। दूसरे भाग में एक निर्धन किसान की स्त्री अपनी मृत्यु के समय अपने पति से दूसरा विवाह कर लेने के लिए वर मागती है। 'सच्चा जीवन' नाटक में खादी का कुर्त्ता पहने एक व्यक्ति इस समस्या का हल निकालने में लगा है कि सच्चा जीवन क्या है? बहुत तर्क-वितर्क करने के बाद वह इस निर्णय पर पहुँचता है कि "सूर्य का जीवन ही सच्चा जीवन है। .... काले-काले बादल उसे आच्छादित कर लेते हैं, पर वह विघ्न-बाधाओं की परवाह नहीं करता। सबकी सेवा करता है ........ मैं भी ........ मैं भी .... ।"१ नाट्य-शैली : सेठजी ने 'चतुष्पथ' की भूमिका में स्वीकार किया है कि ये मोनोड्रामा ब्राउनिंग, स्ट्रिण्डबर्ग तथा ओनील जैसे नाटककारों के प्रभाव के कारण लिखे गये हैं। किन्तु, हमें देखना है कि भारत में ऐसे नाटक रचे गये थे या नहीं। सेठजी ने 'सच्चा जीवन' नाटक में संस्कृत-भाण की शैली का अनुसरण किया है, जिसमें एकाकी पात् आकाश-भाषित का प्रयोग करता है और पूछता है-कि ब्रवीसि ? (क्या कहते हो ?) स्पष्टतः इस प्रकार के रूपक संस्कृत-साहित्य में विद्यमान हैं। हिन्दी में भी भारतेन्दुजी ने 'विषस्य विषमौधम्' नामक भाण की रचना की थी। सेठजी के शेष तीन नाटकों में एक पात्र आदि से अन्त तक बोलता है और सामने उपस्थित दूसरा पात् चुपचाप सुनता रहता है। वह अनुभावों के द्वारा अपना भाव प्रकट करता चलता है। दूसरे पात्र के सवथा और सर्वदा मौन रहने का कारण सेठजी ने उस पात् की अत्यधिक भावुकता ही बताया है। प्रत्येक मोनोड्रामा में एक दृश्य है और १. चतुष्पथ : सेठ गोविन्ददास (सच्चा जीवन), पृ० ५१

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एक स्थान पर ही अभिनय सम्पन्न हो जाता है। केवल अभिनयकर्ता बोलता है, अन्य व्यक्ति के वार्त्तालाप का इसमें कोई स्थान नहीं है। इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि सेठ गोविन्ददास ने उपर्युक्त चार नाटकों की रचना पाश्चात्त्य मोनोड्रामा से प्रभावित होकर की है। परन्तु, यह समझना ठीक नहीं होगा कि भारतवर्ष में पहले ऐसा कोई रूपक नहीं होता था। वस्तुतः, सेठजी पाश्चात्त्य नाट्यकला से पूर्णतः प्रभावित हैं और उसी प्रेरणा तथा प्रभाव से उन्होंने अपने नाटकों की रचना की है। परन्तु, उन्होंने पाश्चात्त्य नाट्यकला का अन्धानुकरण नहीं किया है, प्रत्युत अपनी प्रतिभा का पूर्ण योग दिया है। रामवृक्ष बेनीपुरी : रामवृक्ष बेनीपुरी ने भी 'सीता की माँ' नामक स्वोक्ति-रूपक लिखा है। इस रूपक में एक ही पात्र द्वारा रामायण की लगभग सभी महत्त्वपूर्ण घटनाओं का वर्णन कर दिया गया है। नाटक में पाँच दृश्य हैं। सीता की माता सीता की उत्पत्ति से लेकर पृथ्वी में उसके लुप्त होने तक की कथा कह जाती है। इस नाटक का शिल्प-विधान सेठजी के स्वोक्ति-रूपकों से भिन्न है। इसमें नाटककार ने दृश्य-विधान इस प्रकार किया है कि पर्दे पर बने चित्र से घटना-स्थल का आभास मिल जाय। पर्दे की छाया-मूरत्तियों में से एक स्त्री की छाया-मूर्ति निकलती है, जो सभी घटनाओं का वर्णन करती है। बेनीपुरीजी ने रामायण की सम्पूर्ण कथा को पाँच दृश्यों में बाँट दिया है : १. सीतामढ़ी के निकट अटवी, २. जनकपुर की पुष्पवाटिका, ३. चित्रकूट का पहाड़ी अंचल, ४. लंका की अशोक-वाटिका और ५. अयोध्या का प्रान्तर। स्वोक्ति या एकपात्रीय नाटक की परम्परा : भाण-रूपकों में भी एक ही पात्र सम्पूर्ण नाटक का अभिनय करता है। इस प्रकार, सेठजी के स्वोक्ति-नाटक भाण की परम्परा में ही आते हैं, जिसमें आकाश-भाषित के द्वारा उक्ति-प्रत्युक्ति चलती है। परन्तु, बेनीपुरीजी की शैली नवीन जान पड़ती है। उनके रूपक 'सीता का माँ' में एक ही पात् अन्य पात्रों के संवाद अभिनय द्वारा इस प्रकार बोलता है, मानो वे पात्र बारी-बारी से बोल रहे हैं। परन्तु, डॉ० दशरथ ओझा का कहना है कि दिल्ली के आसपास 'निहाल दे' नामक जननाटक इसी शैली में खेला जाता है, जिसमें सम्पूर्ण नाटक एक ही पात्र गाता है। अतः, कहा जा सकता है कि बेनीपुरीजी की यह शैली जननाटक के रूप में उत्तरी भारत में शतियों से विद्यमान थी। फिर भी, साहित्यिक नाटक में इसका प्रयोग करने का बेनीपुरीजी का प्रयास सवथा सफल तथा प्रशंसनीय है। इस शैली का प्रथम प्रयोग करने का श्रेय बेनीपुरीजी को ही है। रेडियो-नाटक आधुनिक युग में नाटक के विकास में रेडियो का बहुत बड़ा हाथ है। आकाशवाणी के प्रत्येक केन्द्र से रेडियो-नाटकों का प्रसारण नियमतः होता है। बहुत-से नाटककार रेडियो के लिए नाटक लिख रहे हैं। रेडियो-नाटक हिन्दी-साहित्य की

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नवीनतम विधाओं में है। प्राचीन नाट्याचार्यों ने रूपक या नाटक को दृश्य काव्य कहा था, परन्तु विज्ञान के इस आविष्कार ने दृश्य काव्य को श्रव्य काव्य में परिणत कर दिया है। जो नाटक रंगमंच पर अभिनय के द्वारा दिखाया जाता है, वह आज रेडियो के स्टूडियो से प्रसारित किया जाता है और हजारों व्यक्ति अपने घर में बैठे उन्हें श्रवणेन्द्रिय के सहारे ही देखा करते हैं। पहले सामाजिक नाटक के पास जाते थे। आज स्वयं नाटक उनके पास पहुँचता है। आज दर्शक मात्र श्रोता हो गया है और रेडियो-सम्पन्न प्रत्येक घर नाटक का प्रेक्षागृह।'

रंगमंचीय नाटक और रेडियो-नाटक : माध्यम और साधनों में परिवर्तन हो जाने के कारण नाटक के शिल्प-विधान में भी बहुत परिवर्त्तन हो गया है। रंगमंच के नाटक और रेडियो-नाटक में यदि तुलना की जाय, तो स्पष्टतः कई प्रकार का अन्तर दिखाई देगा। पहले तो दिखाई देगा कि रेडियो-नाटक की अपेक्षा रंगमंचीय नाटक को कई सुविधाएँ हैं :

१. रंगमंच का नाटक एक साथ ही दृश्य भी है और श्रव्य भी, परन्तु रेडियो- नाटक केवल श्रव्य है। २. रंगमंचीय नाटक आंगिक अभिनय की भी कला है और वाचिक अभिनय की भी। वाद्य का भी समावेश करके वह अधिक सरस बनाया जा सकता है। ३. रंगमंचीय नाटक में वातावरण तथा परिस्थिति की सूचना देनेवाले दृश्य साधन होते हैं, पात्रों के व्यक्तित्व का संकेत देनेवाले परिधान, अलंकरण आदि उपलब्ध होते हैं; परन्तु रेडियो-नाटक में वे सुविधाएँ प्राप्त नहीं हैं। ४. रंगमंचीय नाटक में यदि कई पात्र एक साथ ही रंगमंच पर उपस्थित हो जायँ, तो उन पात्रों तथा उनके क्रिया-कलाप का परिचय देने में कोई असुविधा नहीं होती, परन्तु रेडियो-नाटक में यह सदा ध्यान में रखना होता है कि श्रोताओं को पात्रों का परिचय मिलने में कोई कठिनाई नहीं हो। स्पष्टतः रेडियो-नाटक में कई प्रकार की असुविधाएँ हैं, परन्तु यदि थोड़ा अधिक ध्यान दिया जाय तो विदित हो जायगा कि उसमें भी कई सुविधाएँ हैं, जो रंगमंचीय नाटक में नहीं हैं :

१. रंगमंचीय नाटक में कार्य या व्यापार, स्थान तथा काल की अन्वितियों का बन्धन किसी-न-किसी रूप में रहता है, परन्तु रेडियो-नाटक में ऐंसा कोई बन्धन नहीं। रेडियो-नाटक की घटनाएँ कालान्विति का अतिकरमण करके वैदिक काल से इस आणविक युग तक और स्थानान्विति का अतिकरमण करके उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव में भ्रमण कर

१. सिद्धनाथ कुमार, आलोचना -- नाटक-अंक, जुलाई १९५६ ई०

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५५८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास सकती हैं। केवल एक बात का ध्यान रखना होता है कि प्रभावान्विति में बाधा नहीं पड़नी चाहिए। २. रंगमंचीय नाटक में पात्रों के मन की गहराई में उतरने की उतनी सुविधा नहीं होती, परन्तु रेडियो-नाटक में मनोवैज्ञानिक चित्रण की अनेक सुविधाएँ हैं, जिससे पात्रों का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण सुविधापूर्वक किया जा सकता है। ३. रंगमंच की सीमाओं के फलस्वरूप रंगमंचीय नाटक केन्द्रमुखी होकर सघनता की ओर अग्रसर होता है, परन्तु रेडियो-नाटक विस्तार के साथ गहराई में भी प्रवेश कर सकता है। इसमें सामाजिक जीवन के अनेक यथार्थ चित्र भी अंकित हो सकते हैं और अन्तर्द्वन्द्व भी। ४. रंगमंच पर सभी प्रकार के गतिशील दृश्य उपस्थित नहीं किये जा सकते हैं, परन्तु रेडियो-नाटक में इनका संयोजन सुविधापूर्वक किया जा सकता है। ५. रंगमंच पर सभी प्रकार के दृश्य नहीं दिखाये जा सकते, परन्तु रेडियो-नाटक में समुद्र की ऊँची लहरों में डूबती-उतराती नौका का भी चित्रण हो सकता है और कारखानों में कार्यरत मजदूरों का भी। ६. जो प्रतीकात्मक पात्र और मानवीकृत विचार तथा भाव रंगमंच पर मानव- रूप में अस्वाभाविक लगते थे, वे ही रेडियो पर प्राणवन्त तथा स्वाभाविक लगने लगते हैं। प्रसादजी की 'कामना' तथा पन्तजी की 'ज्योत्स्ना' के प्रतीकात्मक पात्र रेडियो पर जितने स्वाभाविक लगते हैं, उतने रंगमंच पर नहीं। ७. रंगमंच पर स्वगत कथन अस्वाभाविक लगता है, परन्तु रेडियो पर उसमें स्वाभाविकता आ जाती है। कहने का अभिप्राय यह है कि दृश्य-साधनों के नहीं रहने के कारण रेडियो-नाटक में जहाँ अनेक प्रकार की असुविधाएँ हैं, वहीं उसमें कई प्रकार की सुविधाएँ भी उपलब्ध हैं। सुविधा और असुविधा की दृष्टि से पारस्परिक तुलना के अतिरिक्त रंगमंचीय और रेडियो- नाटक में कुछ मौलिक अन्तर हैं, जिनकी ओर हमारा ध्यान जाना आवश्यक है : १. रंगमंचीय-नाटक के दर्शक समूह में रहते हैं, परन्तु रेडियो-नाटक के श्रोता वैयक्तिक इकाइयों में रहते हैं। वे व्यक्तिगत रूप से छोटे-छोटे समूहों में भी रेडियो-नाटक सुन सकते हैं, परन्तु यह समूह कभी बहुत बड़ा नहीं हो सकता। रेडियो-नाटक के श्रोता की इकाई व्यक्ति ही है। २. दृश्यता के तत्त्व के अभाव के कारण रेडियो-नाटक वस्तुतः श्रोताओं की कल्पना में ही रहता है। इसके विपरीत रंगमंच पर या चलचित्रों के पर्दे पर नाटक का बाह्य अस्तित्व भी रहता है। इस प्रकार, रंगमंचीय नाटक में कहानी का प्रदर्शन होता है, परन्तु रेडियो-नाटक श्रोताओं को अपनी कल्पना में कहानी रखने को बाध्य करता है।

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३. रेडियो-नाटक का श्रीता पुस्तक के सामान्य पाठक (Arm-chair reader) के समान होता है। रंगमंचीय नाटक का दर्शक एक प्रकार से मनोवैज्ञानिक प्रतिबन्ध में रहता है, परन्तु रेडियो-नाटक के श्रोता पर ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। ४. रंगमंचीय नाटक में व्यापार सीमित क्षेत्र में होते हैं, परन्तु रेडियो-नाटक में ऐसा कोई बन्धन नहीं होता। रेडियो के दृश्य में कुछ व्यय नहीं होता और बहुत सरलता से परिवत्तित होता रहता है। रेडियो-नाटककार को इतनी स्वतन्त्रता है कि वह कहानी की आवश्यकता के अनुसार ही दृश्यों का निर्माण कर सकता है। रेडियो में श्रोता के मस्तिष्क तक पहुँचने के लिए कान ही मार्ग है। रेडियो-नाटक की मुख्य विशेषताएँ हैं-शीघ्र आरम्भ, सरल कथानक और कथावस्तु के तत्त्वों पर अभूतपूर्व एकाग्रचित्तता। रेडियो-नाटक और एकांकी : कुछ लोग रेडियो-नाटक को एकांकी समझ लेते हैं। सम्भवतः, इसका कारण यह है कि यह संक्षिप्त होता है और प्रायः १५-२० मिनट में प्रसारित कर दिया जाता है। परन्तु, ऐसा भ्रमवश ही समझा जाता है। वास्तविकता तो यह है कि रेडियो-नाटक में अंक का प्रश्न ही नहीं उठता, इसमें एक दृश्य भी रह सकता है और अनेक दृश्य भी। दृश्य दो पंक्तियों का भी हो सकता है और दो सौ पंक्तियों का भी। इस विषय में किसी प्रकार का बन्धन नहीं है। पाँच अंकवाला नाटक भी रेडियो-नाटक बनाकर प्रसारित किया जा सकता है। स्पष्टतः, रेडियो-नाटक को एकांकी कहना और उसे रेडियो-एकांकी या ध्वनि-एकांकी कहना ठीक नहीं। वस्तुतः, रेडियो विज्ञान का नया आविष्कार है, रंगमंच के समान नाट्य-प्रदर्शन का कोई प्राचीन माध्यम नहीं, जिसकी अपनी कोई परम्परा हो। अमेरिका और यूरोप के कई देशों में रेडियो की नाट्यकला विकसित हुई है, उसके अनुभवों के आधार पर रेडियो-नाटक के सम्बन्ध में कुछ नियम बनाये जा सकते हैं। पश्चिम में इस कला का विकास पहले हुआ और वहाँ इस विषय में कुछ नियम बनाये जा चुके हैं। भारत में भी थोड़े दिनों में ही रेडियो-नाटक का काफी विकास हुआ है, जिसके आधार पर यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि रेडियो-नाटक और एवांकी में काफी अन्तर है। ध्वनि का प्रयोजन : रेडियो-नाटक पूर्णतः श्रव्य होने के कारण ध्वनि ही उसका आधार है। रेडियो-नाटक में ध्वनि का उपयोग तीन रूपों में होता है-भाषा, ध्वनि-प्रभाव और संगीत। भाषा का वही रूप रेडियो-नाटक के काम में आता है, जो बोलने और सुनने के काम में लाया जाता है, पढ़ने-लिखनेवाला स्वरूप नहीं। भाषा का यही स्वरूप रेडियो-नाटक का वास्तविक आधार है। रंगमंचीय नाटकों का भी आधार भाषा ही है, परन्तु उसमें आंगिक अभिनय से भी भावाभिव्यक्ति में सहायता मिलती है, अतः उसमें यदि अपेक्षाकृत दुर्बल कथोपकथन भी रहा, तो किसी प्रकार काम चल जा सकता है। परन्तु, रेडियो-नाटक में तो कथोपकथन पर ही पूरा बल दिया जाता है।

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ध्वनि-प्रभाव का अभिप्राय उन सभी ध्वनियों से है, जिनका उपयोग नाटक के प्रसारण के समय किया जाता है। नाटक-प्रसारण के समय कभी रेलगाड़ी के दौड़ने की ध्वनि, कभी टेलीफोन की घण्टी, कभी तूफान का भीषण चीत्कार, कभी रथ की घड़घड़ाहट की ध्वनि का व्यवहार किया जाता है। ध्वनि-प्रभाव और संगीत की आवश्यकता कई बातों के लिए होती है। कभी-कभी पात्रों के विभिन्न व्यापारों को पृष्ठभूमि तथा वातावरण के निर्माण के लिए इनका उपयोग होता है, तो कभी भाव की अभिव्यक्ति के लिए, कभी दृश्य में परिवर्तन सूचित करने के लिए होता है, तो कभी देश-काल का परिचय देने के लिए। रेडियो-नाटक का लेखक नाटक लिखते समय सदा उस नाटक के प्रसारित रूप की कल्पना करता रहता है। रंगमंच का नाटक-लेखक नाटक लिखते समय रंगमंच की सीमाओं तथा सुविधाओं को ध्यान में रखकर नाटक की रचना करता है, उसी प्रकार रेडियो-नाटक का लेखक भी रेडियो की सीमाओं और सुविधाओं पर दृष्टि रखता है। रेडियो-नाटक का शिल्प : डॉ० दशरथ ओझा के अनुसार हिन्दी का प्रथम रेडियो- नाटक 'राधा कृष्ण' है। इसकी रचना के लिए रेडियो के स्टेशन-डाइरेक्टर, नाटककार और कई दूसरे कलाकारों की समिति संघटित की गई थी। उसके बाद आकाशवाणी के विभिन्न केन्द्रों से अनेक रेडियो-नाटक समय-समय पर प्रसारित किये जाते रहे हैं। वे नाटक भी बहुत-कुछ रंगमंच के ही नाटक थे। तीन-तीन घण्टे तक उनका प्रसारण होता था और उनमें रंगमंच के सभी ढंग अपनाये जाते थे। जिस प्रकार रंगमंच के नाटकों और फिल्मों में मध्यान्तर होता है, उसी प्रकार उन पुराने रेडियो-नाटकों में भी होता था। नैरेटर दृश्य-संकेतों को पढ़ दिया करता था। कथानक में भी ढीलापन होता था। संवादों में पारसी रंगमंच की शैली का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता था। इसका फल यह हुआ कि रेडियो के स्टूडियो में भी रंगमंच की कला का प्रवेश हो गयाऔर रेडियो के नाटककार तथा अभिनेता को उससे मुक्ति सहज ही नहीं मिल सकी। बहुत दिनों तक रेडियो-नाटककार रंगमंच की कला से रेडियो की कला में कोई अन्तर ही नहीं समझ सके। रंगमंच के साथ ही एकांकी नाटकों ने भी रेडियो-नाटकों के विकास को प्रभावित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि अधिकांश नाटककारों ने ऐसे ही नाटकों की रचना की, जो यद्यपि रंगमंच के लिए लिखे गये थे, परन्तु वे सरलतासे रेडियो पर भी प्रसारित किये जा सकते थे। केवल रेडियो को ध्यान में रखकर बहुत कम ही नाट्य-कृतियों की रचना हुई। फलतः, यद्यपि अधिकांश नाटक रेडियो से प्रसारित हो जायँ, फिर भी उन्हें शिल्प की दृष्टि से सफल रेडियो-नाटक कहने में हिचक होती है। सफल रेडियो-नाटक के लिए निम्नलिखित तत्त्वों की आवश्यकता है-(क) संश्लिष्ट तथा सुगठित कथानक, (ख) मूल समस्याया घटना या केन्द्र-बिन्दु, (ग) आरम्भ से अन्त तक द्वन्द्वात्मक स्थिति और (घ) उत्तर-प्रत्युत्तर के रूप में लिखे हुए सशक्त छोटे-छोटे

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हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त का विकास

संवाद। परन्तु, रेडियो-नाटक के नाम पर जो नाट्य-कृतियाँ लिखी जा रही हैं, उनमें इन तत्त्वों का अभाव ही रहता है। उनमें कोई द्वन्द्व-रहित या संघर्षविहीन और शृंखलाहीन कहानी कथोपकथन के रूप में कह दी जाती है।

इन अधिकांश असफल नाट्य-कृतियों के साथ ऐसे अनेक नाटक लिखे गये हैं और लिखे जा रहे हैं, जो रंगमंच के होकर भी रेडियो से समान सफलतापूर्वक प्रसारित किये जा रहे हैं। डॉ० रामकुमार वर्मा, उपेन्द्रनाथ अश्क, उदयशंकर भट्ट, जगदीशचन्द्र माथुर आदि के नाम इन सफल नाटककारों में ले सकते हैं। इनकी सफलता का कारण मुख्यतः इनका काव्यात्मक दृष्टिकोण है। वस्तुतः, रेडियो-नाटककार के लिए कवि का दृष्टिकोणवाला नाटककार जीवन की गहराई में उतरता है, उसके विस्तार में जाने की चिन्ता नहीं करता, घटनाओं के विस्तार में नहीं जाकर अपने नाटक के लिए जीवन की किसी एक मार्मिक घटना को आधार बनाता है। नाटककार के इस काव्यात्मक दृष्टिकोण से उसका शिल्प-विधान स्पष्ट रूप से प्रभावित होता है। काव्यात्मक दृष्टिकोण एक निश्चित दिशा में अग्रसर होता है, जिसका फल होता है कि नाटककार एक सुसंगठित तथा संश्लिष्ट नाटक की रचना करने में सफल होता है। जो सफल रंगमंचीय नाटक होते हैं, उनमें भी यह काव्यात्मक दृष्टिकोण आवश्यक होता है। इसीलिए, जो रंगमंचीय नाटक इस दृष्टिकोण से लिखे गये, रेडियो से उनका प्रसारण बड़ी सरलता से, थोड़े परिवर्तन के बाद, किया जा सका है।

रंगमंचवाले नाटक तो रेडियो पर प्रसारित होते ही रहे हैं, विशुद्ध रेडियो के लिए भी कई नाटककारों ने नाटक लिखे हैं। इस दिशा में कई नाटककार अग्रसर हुए हैं, रेडियो के नवीन माध्यम ने कई प्रतिभा-सम्पन्न नाटककारों को आकृष्ट किया है। विष्णु प्रभाकर के समान आज कई नाटककार स्पष्ट रूप से कह सकते हैं-'सच तो यह है कि अभीतक मैंने रेडियो के लिए ही लिखा है।' रेडियो के निकट-सम्पर्क में रहने के कारण ऐसे लेखक प्रसारण को दृष्टि से अधिक सफल नाटक लिखने में समर्थ हो सके हैं। ऐसे नाटककारों में प्रमुख हैं-विष्णु प्रभाकर, रेवतीशरण शर्मा, सआदत हसन मण्टो, अमृतलाल नागर, हरिश्चन्द्र खन्ना आदि। डॉ० रामकुमार वर्मा, उदयशंकर भट्ट, उपेन्द्रनाथ अश्क, जगदीशचन्द्र माथुर आदि ने भी रेडियो के लिए कई नाटक लिखे। डॉ० वर्मा के 'तैमूर ही हार', 'स्वर्णश्री', 'दुर्गावती' आदि; अश्कजी के 'शिकारी', 'लक्ष्मी का स्वागत', 'छठा बेटा', 'अंजो दीदी' आदि; विष्णु प्रभाकर के 'जहाँ दया पाप है', 'उपचेतना का छल', 'क्या वह दोषी था?'; रेवतीशरण शर्मा का 'अँधेरा-उजाला', 'दुश्मन' आदि सफल नाटक हैं। उदयकाल और अत्याधुनिक काल के रेडियो-नाटक: जिन नाटककारों के नाटक रेडियो से समय-समय पर प्रसारित होते हैं, उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं। लक्ष्मीनारायण लाल, प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त', रामचन्द्र तिवारी, राधाकृष्ण,

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५६२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

राधाकृष्ण प्रसाद, विश्वम्भर मानव, धर्मवीर भारती, देवेन्द्रनाथ शर्मा, भारतभूषण अग्रवाल, रामवृक्ष बेनीपुरी, सिद्धनाथ कुमार, हंसकुमार तिवारी, प्रभाकर माचवे, जयनाथ नलिन, सत्येन्द्र शरत्, शिवसागर मिश्र, विनोद रस्तोगी आदि। इनकी रचनाओं से स्पष्ट हो जाता है कि हिन्दी-रेडियो-नाटक के उदयकाल में लिखित नाटकों से आज के रेडियो-नाटकों में शिल्प की दृष्टि से कितना अन्तर आ गया है। रेडियो-नाटक के आरम्भिक काल में जो नाटक लिखे गये, उनमें रंगमंच का प्रभाव बहुत अधिक था, घटनाओं की प्रधानता थी और शैली में अतिरंजना होती थी। साथ ही, उन नाटकों में अलौकिकता, आकस्मिकता और संयोग को ही प्रमुख स्थान मिलता था। परन्तु, आज के रेडियो-नाटकों में इन त्ुटियों की बहुत कमी आ गई है। परन्तु, ऐसा भी कहना सत्य की उपेक्षा करना होगा कि अत्याधुनिक नाटकों में इन त्रुटियों का सर्वथा अभाव हो गया है। इतना तो कहा ही जा सकता है कि आज के रेडियो-नाटकों की प्रकृति अवश्य ही सरल, बोधगम्य घटना-क्रम की ओर है। उनमें कार्य-कारण से बँधे हुए घटना-क्म दिखाये जाते हैं। एक विशेष बात यह है कि आरम्भिक नाटककारों को ध्वनि-प्रभाव जैसी एक नवीन वस्तु मिली थी, जिसका उपयोग वे अत्यधिक मात्रा में करते थे, परन्तु वह जोश अब कम हो गया है और इसका उपयोग आवश्यकता के अनुसार ही किया जाता है। विषयवस्तु में अन्तर : यदि विषयवस्तु को ध्यान में रखकर तुलना करें, तो भी उदयकालीन हिन्दी-रेडियो-नाटकों से आज के रेडियो-नाटकों में अन्तर आ गया है। निम्नलिखित अन्तर पर हमारा ध्यान जाना स्वाभाविक है : १. स्वाधीनता-प्राप्ति के पूर्व रेडियो से प्रसारित नाटकों में बहुत अधिक संख्या ऐतिहासिक और रोमाण्टिक नाटकों की थी। घटना-वैचित्य से श्रोताओं को चमत्कृत कर देना ही उनका उद्देश्य था; मनोरंजन उनका प्रधान तत्त्व रहता था। मनोरंजन तो रेडियो-नाटक का आवश्यक अंग है ही और सदा रहेगा भी, अन्तर यही है कि पहले के नाटकों में इसे प्रधानता दी जाती थी, किन्तु आजकल नहीं दी जाती। आज भी मनोरंजन- प्रधान नाटकों का प्रसारण किया जाता है। अमृतलाल नागर, प्रफुल्लचन्द्र ओझा 'मुक्त' आदि के नाटक इस कोटि में रखे जा सकते हैं। २. आरम्भिक काल में ऐतिहासिक तथा पौरणिक कथानक भी केवल कथा कहने के उद्दश्य से लिये जाते थे, परन्तु आज जीवन की विभिन्न समस्याओं को लेकर यथार्थवादी नाटकों की रचना हो रही है। ३. स्वतन्त्रता-प्राप्ति के अनन्तर देश में नवजागरण हुआ, इससे भी रेडियो-नाटक प्रभावित हुआ। लेखकों की निजी दृष्टि के अतिरिक्त राष्ट्रीय सरकार ने समय-समय पर नवीन सामाजिक समस्याओं को लेकर नये-नये नाटक लिखवाये और रेडियो से प्रसारित कराये।

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४. अभी जो ऐतिहासिक तथा पौराणिक कथानकों के आधार पर नाटक लिखे जाते हैं, उनमें युग-भावना के अनुकूल प्राचीन कथाओं की व्यवस्था की जाती है। ५. आजकल कथा-साहित्य में स्थूलता से हटकर सूक्ष्मता को महत्त्व दिया जाता है। यह प्रवृत्ति रेडियो-नाटकों की कथावस्तु में भी दिखाई दे रही है। इसका दूसरा कारण यह है कि रेडियो के माइक्रोफोन का माध्यम स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म को या घटना की अपेक्षा भाव तथा वातावरण को अधिक सफलता से प्रेषित कर सकता है। फलस्वरूप आज अनेक नाटककार घटनाओं की अपेक्षा मन की गुत्थियों को सुलझाने का ही अधिक प्रयास करते हैं। उदाहरण-स्वरूप विष्णु प्रभाकर, उपेन्द्रनाथ अश्क, हरिश्चन्द्र खन्ना आदि के मनोवैज्ञानिक नाटक उपस्थित किये जा सकते हैं। रेडियो-नाटकों में हास्य को भी स्थान देने का प्रयास हो रहा है। हमारे साहित्य में शिष्ट हास्य का अभाव ही है, रेडियो में भी इसे उचित स्थान अभी नहीं मिल सका है। परन्तु, इस दिशा में जो प्रयास हो रहे हैं, वे आशाप्रद तथा प्रशंसनीय हैं। हास्य और व्यंग्य के लेखकों में प्रभाकर माचवे, अश्क, चिरंजीत आदि के नाम का उल्लेख किया जा सकता है। हास्य-प्रधान नाटकों के अतिरिक्त झलकियाँ, लहर, इन्द्रधनुष आदि नामों से छोटी-छोटी नाट्य-कृतियों का भी संकलन प्रसारित किया जाता है। ऐसे लेखकों में चिरंजीत, मदनमोहन खन्ना आदि के नाम लिये जा सकते हैं। रेडियो सरकारी नियन्त्रण में है, अतः उसपर राजनीतिक तथा साम्प्रदायिक विषयों का प्रसारण नहीं हो सकता। इस अच्छाई के साथ बुराई यह हो जाती है कि उसमें युग का स्वाधीन चिन्तन अभिव्यक्त नहीं हो पाता। फलस्वरूप साहित्य की अन्य विधाओं में युग-जीवन की जो विविधता दिखाई देती है, रेडियो-नाटक में उसका अभाव है, जो खटकनेवाली बात है। रेडियो-नाट्य के भेद : रेडियो-नाटक हमारे देश में पश्चिम से आया। पाश्चात्त्य देशों में तो इसका काफी विकास हो चुका है और इसकी नाट्यकला का निर्धारण किया जा बुका है। हमारे देश में भी विगत वर्षों में बहुत रेडियो-नाटकों की रचना हुई है और इसकी कला के निर्धारण के प्रयत्न हो रहे हैं। अभी रेडियो-नाटक का विवेचन हुआ है। रेडियो-नाटक के अतिरिक्त रेडियो-नाट्य के निम्नलिखित भेद किये जा सकते हैं : १. ध्वनि-गीतिरूपक या काव्य-नाटक: काव्य-नाटक या गीति-रूपक को भी रेडियो से बहुत प्रेरणा मिली है। रंगमंच पर प्रदर्शित होनेवाले गीति-रूपक भले ही अस्वाभाविक लगें, परन्तु रेडियो पर उनका प्रसारण अस्वाभाविक नहीं लगता। आजकल अनेक कवि रेडियो के लिए गीति-नाटक लिखने में संलग्न हैं। सुमित्रानन्दन पन्त, उदय शंकर भट्ट, गिरिजाकुमार माथुर, भगवतीचरण वर्मा, धर्मवीर भारती, सिद्धनाथ कुमार, नरेशकुमार मेहता आदि कवियों ने अनेक गीति-नाटकों की रचना की है। किन्तु,

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५६४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकारस अधिकांश गीति-नाटकों में काव्यत्व की ही प्रधानता है, उनमें नाटकत्व का अभाव ही है। नाटकत्व के अभाव के अतिरिक्त उनमें निम्नलिखित अन्य त्ुटियाँ भी दिखाई देती हैं : (क) सुसंगठित कथानक तथा केन्द्रीय भाव का अभाव, (ख) विचारों की पुनरुक्ति, (ग) लम्बे-लम्बे संवाद जो उबा देनेवाले होते हैं, (घ) कठिन भाषा का प्रयोग। परन्तु, आशा है कि समय बीतने के साथ लेखक इन तुटियों को दूर करते रहेंगे, और रेडियो-गीतिरूपक के साहित्य को सम्पन्न बनाने में समर्थ होंगे। रेडियो-गीतिरूपक के उदाहरण पन्तजी का 'शिल्पी', भगवतीचरण वर्मा का 'कर्ण' आदि हैं। २. संगीत-रूपक : रेडियो से संगीत-रूपक को भी काफी प्रेरणा मिली है। पर्व, ऋतु आदि से सम्बन्ध रखनेवाले अनेक संगीत-रूपक रेडियो से समय-समय पर प्रसारित किये जाते हैं। वे रूपक अपने छोटे-छोटे गीतों के कारण बहुत मनोरंजक होते हैं। परन्तु, इनमें से अधिकांश में यह तुटि है कि ये श्रोताओं पर कोई निश्चित प्रभाव डालने में असमर्थ होते हैं। इसका एकमात्र कारण यह है कि इनमें किसी केन्द्रीय भाव या विचार का अभाव रहता है। ३. स्वगत नाट्य या एकालाप : स्वगत नाट्य या मोनोलॉग की ओर आधुनिक लेखकों का ध्यान पर्याप्त रूप से नहीं गया। नाटक में कम-से-कम दो पात्र रहते हैं, परन्तु स्वगत नाट्य में एक ही पात्र सारी बातें कहता है। परन्तु, इसमें दो भावनाओं से द्वन्द्व का चित्रण किया जाता है। रेडियो-स्वोक्ति में कथानक का सुसम्बद्ध होना आवश्यक है, किन्तु रंगमंचीय स्वोक्ति में कथानक का सुसम्बद्ध होना उतना आवश्यक नहीं। हिन्दी में रेडियो-स्वगत नाट्य बहुत थोड़े ही लिखे गये हैं। विष्णु प्रभाकर के तीन स्वगत नाट्य 'सड़क', 'धुआ' और 'नहीं, नहीं, नहीं' अच्छे बन पड़े हैं। इस दिशा में कर्तार सिंह दुग्गल, भृंग तुपकरी आदि ने भी अच्छा प्रयास किया है ४. अतिकल्पना (फैटेसी) : फैंटेसी को उदयशंकर भट्ट ऋतु-सम्बन्धी नाटक मानते हैं और विष्णु प्रभाकर भाव-नाट्य कहते हैं। दूसरे लोग इसे अतिकल्पना नाम देना अच्छा समझते हैं। वस्तुतः, यह कल्पना-प्रधान रचना होती है, जो वास्तविकता की धरती पर खड़ी रहती है। रेडियो पर इसका प्रसारण बड़े प्रभावोत्पादक ढंग से हो सकता है। रेडियो पर ही यह रचना बहुत आकर्षक बन जाती है, रंगमंच पर इसका अभिनय न तो सम्भव ही होता है और न स्वाभाविक ही। परन्तु, हिन्दी में इस प्रकार के रेडियो-नाटक की ओर बहुत कम ही लेखकों का ध्यान गया है। गिरिजाकुमार माथुर, धर्मवीर भारती, रामचन्द्र तिवारी, सिद्धनाथ कुमार आदि लेखकों ने कुछ उत्कृष्ट अतिकल्पनाओं की रचना की है। ५. रेडियो-रूपक या फीचर : रेडियो-नाट्य के उपर्युक्त प्रकार साहित्य में पहले से विद्यमान विधाओं के रेडियो-रूप ही हैं। साहित्य में उपलब्ध विधाओं के रेडियो के नये माध्यम के लिए परिवर्त्तित रूप हैं। परन्तु, रेडियो-रूपक या फीचर रेडियो की विशेष

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देन है। कुछ लोगों की यह भ्रान्त धारणा है कि जिन रेडियो-रूपकों में नैरेटेर या प्रवक्ता होते हैं, वे ही रेडियो-रूपक हैं। किन्तु, वस्तुतः वास्तविकता के प्रस्तुतीकरण में ही रेडियो- रूपक का महत्त्व निहित है। इसमें वास्तविक घटनाओं को कलात्मक शैली में प्रस्तुत किया जाता है। रूपक का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत होता है। इसके सहारे किसी देश या भूभाग की सभ्यता-संस्कृति का परिचय दिया जा सकता है, किसी महापुरुष के जीवन पर प्रकाश डाला जा सकता है या किसी आविष्कार, संस्था आदि का इतिहास प्रस्तुत किया जा सकता है। हिन्दी में रेडियो-रूपक अनेक प्रकार के लिखे गये हैं और उनमें विभिन्न विषयों का समावेश किया गया है। स्वतन्त्रता-दिवस, गणतन्त्र-दिवस, भारतेन्दु-जयन्ती, कालिदास-जयनती आदि विशेष अवसरों के लिए रूपकों की रचना तो होती ही है; सर्वोदय, हिमालय, भागीरथी, वन-महोत्सव आदि अनेक प्रसंग रूपक के विषय बने हैं। स्वाधीन भारत के नवजागरण में विभिन्न स्वरूप रेडियो-रूपक के द्वारा श्रोताओं के समक्ष प्रकट हुए हैं। यदि शिल्प की दृष्टि से विचार किया जाय तो थोड़े ही रूपक सफल सिद्ध होते हैं, अधिकांश की असफलता के मुख्यतः दो कारण हैं-१. लेखक रेडियो-रूपक के शिल्प- विधान से पर्याप्त रूप से परिचित नहीं हैं, २. रूपक के समुचित प्रसारण के लिए रेडियो के सभी केन्द्रों पर आवश्यक व्यवस्था नहीं है। चलचित्र में फीचर भ्रान्ति तथा पलायन के द्वारा मनोरंजन प्रदान करता है। पत्रकारिता में फीचर का अर्थ समाचार तथा टिप्पणी के अतिरिक्त समस्त सामग्री से लिया जाता है। परन्तु, प्रसारण में इस शब्द का अर्थ कार्यक्रम के विस्तृत क्षेत्र से लिया जाता है, जो विशेषतः तथ्यात्मक तथा डॉकुमेण्टरी रहता है और जिसमें नाटकीयता एवं तथ्य-सम्पादन का विशेष उपयोग किया जाता है। रेडियो-रूपक अथवा फीचर तभी प्रभावोत्पादक होता है, जब इससे श्रोता कुछ सोचने को बाध्य होता है। इससे मनोरंजन प्राप्त करने का अर्थ तभी होता है, जब यह श्रोताओं का ध्यान केन्द्रीभूत करे ही, परन्तु साथ ही ज्ञानवर्द्धन भी करे। अच्छा रूपक- लेखक इस बात से लाभ उठाता है कि नाटकीकृत वक्तव्य बहुलांश जन-समुदाय के लिए सीधे-सादे वक्तव्य की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली होता है। वह तथ्यों को नाटकीय ढंग से प्रस्तुत करता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि रेडियो-रूपक में वार्तालाप की आधिकारिकता और नाटकीय वेग का सम्मिश्रण रहना चाहिए। कई अन्य बातों के अतिरिक्त अच्छे फीचर में विचार तथा अभिव्यक्ति का संगम आवश्यक है। फीचर में एक ही विचार की अभिव्यक्ति रहती है, चाहे उसका शिल्प जो हो। फीचर लिखने में भाषा का बहुत अधिक महत्त्व है। फीचर को मनोरंजक बनाने में अन्तर्वीक्षा (इण्टरव्यू) का बहुत बड़ा हाथ रहता है। किन्तु अन्तर्वीक्षा छोटी होनी चाहिए

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और एक ही शैली का बार-बार प्रयोग नहीं करना चाहिए, नहीं तो वह ऊब पैदा क रनेवाली हो जायगी। लॉरेन्स विलियम के शब्दों में "A radio feature is the most modern of techniques of the most ancient of arts, the art of telling a true story."9 अब हमें रेडियो-रूपक के साहित्यिक मूल्यों पर विचार करना चाहिए; क्योंकि रेडियो-नाटक को साहित्य की एक विशेष विधा मानकर उसकी चर्चा की जा रही है। जब हम हिन्दी के लिखित रेडियो-रूपक का साहित्यिक मूल्यांकन करते हैं तो हमें मुख्यतः निराशा ही हाथ लगती है। रेडियो-रूपकों से हमें प्रायः इतिहास और शिक्षा की ही सामग्री अधिक उपलब्ध होती है, मनोरंजकता की मात्रा तो अल्प है और साहित्यिकता तो अल्पतर ही। लिखित रेडियो-रूपक में साहित्यिकता के अभाव का प्रधान कारण यह है कि इसकी सम्भावनाओं की ओर पर्याप्त रूप से ध्यान नहीं दिया गया है। रूपक का लेखक अपनी सामग्री का संकलन इस प्रकार करता है कि श्रोता उसके प्रभाव से चमत्कृत हो जाय। वस्तुतः वास्तविकताओं पर आधारित रेडियो-रूपक को साहित्यिक कृति बनने में कोई बाधा नहीं। हिन्दी में प्रकाशित रूप में रेडियो-रूपकों का प्रायः अभाव ही है। 'ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया' डॉ० रामकुमार वर्मा का रेडियो-रूपक उदाहरण के लिए लिया जा सकता है। इस रूपक में कबीर का सम्पूर्ण जीवन-जन्म से मरण तक-एक ही दृश्य में दिखाया गया है। इसमें कबीर के जन्म के पूर्व ही उनका एक भजन गाया जाता है, जिसे रंगमंचीय नाटक की दृष्टि से बहुत बड़ा दोष माना जायगा। ९५ वर्ष की घटनाएँ रेडियो- रूपक में ही दिखाना सम्भव है। रंगमंच पर तो कबीर के जीवन की कोई एक ही घटना इतनी देर में दिखाई जा सकती थी। इस रूपक में नैरेटर सभी घटनाओं की कड़ी जोड़ता चलता है। अन्य नाट्यकारों ने भी रेडियो-रूपक में उसी पद्धति का अनुकरण किया है। उदयशंकर भट्ट के 'कालिदास' को देखने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। इस रूपक में कालिदास के सभी ग्रन्थों की रचना के उद्देश्य और प्रेरणा पर प्रकाश डाला गया है।

६. रेडियो-रूपान्तर : रेडियो से मौलिक नाटकों का प्रसारण तो होता ही है, प्रसिद्ध तथा महत्त्वपूर्ण नाटकों, उपन्यासों और कहानियों के रेडियो-रूपान्तर का भी प्रसारण होता रहता है। इन रेडियो-रूपान्तरों का प्रकाशित रूप हम नहीं देखते, परन्तु श्रोताओं के लिए इनका महत्त्व तो है ही। थोड़े समय में बड़ी-बड़ी रचनाओं का रसास्वादन करने का अवसर मिल जाता है। स्वातन्त्र्योत्तर नवजागरण के फलस्वरूप हमारा ध्यान अपने प्राचीन गौरव-ग्रन्थों की ओर गया है, प्रान्तीय भाषाओं के साहित्य की ओर भी गया है। परिणाम-रूप में रेडियो के भिन्न-भिन्न केन्द्रों से संस्कृत, हिन्दी तथा प्रान्तीय भाषाओं के ग्रन्थों के रेडियो-रूपान्तर प्रायः प्रसारित होते रहते हैं। १. श्रीरमेशचन्द्र द्वारा उद्धत -- Studjes in Broadcasting; Vol, V-19

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अँगरेजी में प्रसिद्ध उपन्यासों का रेडियो-रूपान्तर करने की कला बहुत पहले से है। सर क्विलर काउच ने इस कला का विशेष विकास किया। उन्होंने तीन प्रसिद्ध उपन्यासकारों की रचनाओं का नाटक में रूपान्तर किया। इस शैली में प्रेमचन्द के उपन्यासों का भी रेडियो-रूपान्तर हुआ है। ७. रिपोर्ताज : वास्तविकता पर आधारित रिपोर्ताज भी आधुनिक रेडियो- नाट्य-कृति बन गया है। इसका आविष्कार और विकास विगत द्वितीय विश्वयुद्ध के समय हुआ। युद्ध की भीषण, साथ ही महत्त्वपूर्ण, घटनाओं का समाचार जानने के लिए सारा संसार उत्सुक रहता था। सभी लोग समाचारपत्र और रेडियो की तरफ उत्सुकतापूर्वक उन्मुख रहते थे। युद्ध की घटनाएँ इस प्रकार तीव्र गति से घटित हो रही थीं कि कलाकार उन्हें सुन्दर तथा सुसज्जित शैली में जनता के समक्ष उपस्थित नहीं कर पाते थे। ऐसी असाधारण परिस्थिति में कलाकारों ने एक नवीन पद्धति को जन्म दिया, जिससे घटना, घटनाक्रम के इतिहास, उसके वातावरण, उसमें भाग लेनेवाली शक्तियों की गतिविधि, रीति-नीति पर समुचित रीति से प्रकाश डाल सके। युद्ध के भयानक परिणामों से कोई बच नहीं सकता था, अतः जनता उस संकट की घड़ी में घटनाओं के बाहरी कारणों और रूपों को जानकर भविष्य में होनेवाले उनके परिणामों से अभिज्ञ होने का प्रयास करती थी। ऐसी परिस्थिति में रिपोर्ताज का आविष्कार हुआ। इसमें कलाकार किसी घटना का इस प्रकार वर्णन करता है; जैसे कोई ऐसा व्यक्ति वर्णन कर रहा हो, जो सम्बद्ध घटना से सीधा सम्बन्ध रखता हो या उसका अंग बन गया हो। वह पाठकों की सहानुभूति का पात् बनकर उनके हृदयों में रागात्मक अनुभूति उत्पन्न करने की चेष्टा करता है। यह उसी दशा में सम्भव होता है जब कलाकार विवेक-दृष्टि से या दिव्य चक्षु से युद्ध के विभिन्न दृश्यों तथा भीषणताओं का वर्णन रागात्मक सहानुभूति से करे। रिपोर्ताज की कला का विकास रूस, अमेरिका आदि देशों में पर्याप्त रूप से हुआ है। भारत में भी स्वतन्त्रता-दिवस, गणतन्त्र-दिवस, क्रिकेट-मैच, किसी विशिष्ट अतिथि आदि का आगमन आदि विविध अवसरों तथा उत्सवों के समय इसी शैली में रेडियो से कार्यक्रम होते हैं। इसमें प्रस्तुत अवसर के वातावरण का समुचित वर्णन किया जाता है, साथ ही प्रसिद्ध व्यक्तियों के भाषण का अंश भी उन्हीं के मुख से सुनवाया जाता है। यद्यपि रिपोर्ताज का जन्म युद्ध की घटनाओं का वर्णन करने के लिए हुआ, परन्तु पीछे सांस्कृतिक रिपोर्ताज भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। हिन्दी में सबसे पहले रूसी लेखक लियोनिद लियोनोव का रिपोर्ताज 'हंस' के शान्ति-संस्कृति अंक में निकला।१ तब से विभिन्न पत्र-पत्निकाओं में समय-समय पर रिपोर्ताज प्रकाशित १. 'हंस', शान्ति-संस्कृति-अंक, वर्ष २२, अंक ६-७

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होते रहते हैं। जब रूस और अमेरिका में इस कला का इतना विकास हो सका है, तो कोई कारण नहीं कि हमारे देश में, और विशेषतः हिन्दी में, इसका समुचित विकास न हो।

८. ध्वनि-नाट्य : वाचिक अभिनय के आधार पर ही ध्वनि-नाट्य की रचना होती है। इसमें कथोपकथन की ही प्रधानता रहती है, इमीलिए इसे कुछ लोग अन्धों का सिनेमा कहते हैं। विष्णु प्रभाकर के 'बीमार' को ध्वनि-नाट्य के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

९ जन-नाटक : रेडियो से समय-समय पर जन-नाटक भी प्रसारित होते रहते हैं। उनको रेडियो ने काफी प्रोत्साहन दिया है। रास, स्वांग, नौटंकी, डोमकच, निहाल दे आदि ऐसे जन-नाट्य हैं, जिनका प्रसारण प्रायः होता रहता है। जन-नाटक ग्रामीण जनता का मनोरंजन करने के साथ-साथ उसकी बौद्धिक चेतना का विकास भी करता है। देश के संकट-काल में कृष्ण-रास, जैन-रास, रामलीला आदि जन-नाटकों ने इसकी संस्कृति को जीवित रखा। आधुनिक युग में हमारी संस्कृति अपने ही देश की सीमाओं में बद्ध नहीं है, प्रत्युत अन्तरराष्ट्रीय क्षेत्र में भी व्याप्त हो रही है। इसी दशा में दूसरे देशों की भी सांस्कृतिक विशेषताओं को हृदयंगम किया जा सकता है। इस प्रकार, ग्रामीण जनता में राष्ट्रीयता के साथ अन्तरराष्ट्रीय भावना का उद्रेक हो सकता है। १०. व्यंग्य : रेडियो से व्यंग्य-नाटक भी प्रसारित होते रहते हैं। हास्य और व्यंग्य में कुछ भिन्नता है। हास्य का उद्दश्य केवल विनोद होता है, परन्तु व्यंग्य में वाग्विदग्धता, कटाक्ष तथा वक्रोक्ति के कशाघात के द्वारा सामाजिक कुरीतियों तथा आडम्बरमय विधि-विधानों पर चोट की जाती है। इसमें हास्य से भी विचारों को उद्बुद्ध करने की क्षमता होती है। विष्णु प्रभाकर का 'काँगरेसमैन बनो', अश्क का 'अधिकार का रक्षक' और उदयशंकर भट्ट का 'दस हजार' सफल व्यंग्य-नाटक हैं। रेडियो-नाटक में विकास का अभाव और उसके कारण : विगत लगभग तीस वर्षों से रेडियो-नाटक लिखे जा रहे हैं और उनका प्रसारण हो रहा है। इतने समय में रेडियो-नाटक में काफी विकास हो जाना चाहिए था, परन्तु उचित मात्रा में विकास नहीं हो सका है। रेडियो-नाट्य-विशेषज्ञों का कहना है कि उन्हें प्रसारण के लिए प्रथम श्रेणी के नाटक नहीं मिलते। भारतवर्ष में रेडियो के बहुत केन्द्र हैं और उनसे प्रति सप्ताह कई नाटक प्रसारित होते हैं। संख्या की दृष्टि से रेडियो-नाटक कम नहीं लिखे जाते, परन्तु गुण की दृष्टि से उनमें प्रथम कोटि के बहुत कम ही होते हैं। इसके निम्नलिखित कारण दिये जा सकते हैं :

१. सफल रेडियो-नाटक लिखने के लिए लेखक को सहज प्रतिभा के साथ शिल्प- विधान के अध्ययन तथा चिन्तन की अत्यन्त आवश्यकता है। परन्तु, हिन्दी का रेडियो

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नाटक-लेखक शिल्पगत अध्ययन एवं चिन्तन की ओर ध्यान नहीं देता। फिर, केवल सहज प्रतिभा के ही बल पर सुन्दर नाटक की रचना की आशा कैसे की जाय ? २. सफल रेडियो-नाटक के अभाव के मूल में रंगमंच की हमारी असंगठित परम्परा भी है। हिन्दी-रंगमंच नहीं रहने के कारण हिन्दी में कुशल नाटककार, कुशल अभिनेता, कुशल निर्देशक तथा कुशल प्रोड्यूसर सभी का अभाव है। कई अच्छे नाटककार भी ऐसे नाटकों की रचना नहीं कर पाते, जिनका अभिनय रंगमंच पर हो सके। वे संकेत- निर्देश के स्थान पर कहानी ही लिखने लग जाते हैं। यह बात उन नाटककारों की कही जा रही है, जो अभिनेय नाटक लिखने के लिए प्रसिद्ध हैं, पाठ्य नाटकों के लेखक की बात नहीं। यदि रंगमंचीय नाटकों की यह दशा है, तो रेडियो-नाटक की चर्चा करना व्यर्थ है। रेडियो-नाटक में तो बहुत ही सशक्त स्थापत्य की आवश्यकता है। ३. रेडियो-नाटक के इतने वर्षों के इतिहास में ऐसी पुस्तकों का लगभग अभाव ही है, जिनमें रेडियो-नाटक की कला का विवेचन किया गया हो। इस विषय पर हरिश्चन्द्र खन्ना की पुस्तक 'रेडियो-नाटक' और डॉ० सिद्धनाथ कुमार की पुस्तक 'रेडियो- नाट्य-शिल्प' महत्त्वपूर्ण हैं। ४. भारतवर्ष में रेडियो सरकारी संस्था है। इसमें नाटक-प्रसारण का कार्य करनेवाले अधिकांश अधिकारी जीविकोपार्जन के विचार से नौकरी करते हैं, इस कार्य में किसी विशेष अभिरुचि के कारण नहीं। जब किसी अधिकारी की यह मनोवृत्ति है कि किसी निश्चित समय पर किसी निश्चित अवधि में नाट्य को किसी प्रकार प्रसारित कर दिया जाय, तो इस दशा में रेडियो-नाटक के स्वस्थ विकास की आशा करना व्यर्थ है। आज रेडियो हमारे जीवन का आवश्यक उपकरण बन गया है और रेडियो-नाटक का प्रसारण रेडियो का महत्त्वपूर्ण कार्यक्रम है। स्वभावतः सबका ध्यान रेडियो-नाटक की ओर गया है। हम आज न रेडियो की और न रेडियो-नाटक की ही उपेक्षा कर सकते हैं। भले ही रेडियो-नाटक का सर्वांगीण तथा समुचित विकास नहीं हुआ है, परन्तु यह कहना असत्य होगा कि अच्छे रेडियो-नाटक लिखे ही नहीं जा रहे हैं। आज हमें अनेक कलात्मक कृतियाँ उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर हम कह सकते हैं कि रेडियो-नाटक का भविष्य उज्ज्वल है। हम विश्वास के साथ कह सकते हैं कि निकट भविष्य में ही रेडियो-नाटक हमारी अभिव्यक्ति का एक अत्यन्त समर्थ माध्यम सिद्ध होगा। स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के युग में रेडियो-नाटक में पर्याप्त विकास हुआ है। हिन्दी-भाषी प्रान्तों में रेडियो-केन्द्रों की वृद्धि हुई है और नाट्य-लेखन-क्षेत्र में बहुत-से नये-नये लेखक आये हैं। रेडियो-नाटक एक स्वतन्त्र विधा के रूप में स्वीकृत हो चुका है। रेडियो-माध्यम की विशिष्टताओं को ध्यान में रखकर लिखनेवालों में विष्णु प्रभाकर, हरिश्चन्द्र खन्ना, भारतभूषण अग्रवाल, चिरंजीत, रेवतीशरण शर्मा आदि प्रमुख हैं। इस अवधि में रेडियो-नाटकों में विषय और शिल्प दोनों दृष्टियों से पहले के रेडियो-नाटकों

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से काफी अन्तर पड़ा है। पहले के नाटकों में विषय प्रायः ऐतिहासिक तथा रोमाण्टिक होते थे, परन्तु स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद रेडियो-नाटक सामाजिक विषयों पर भी लिखे जाने लगे हैं। परन्तु, रेडियो पर सरकारी नियन्त्रण रहने के कारण उसके लिए लिखे जानेवाले नाटकों में युग के स्वाधीन चिन्तन की अभिव्यक्ति का अवकाश कम ही रहता है। इधर रेडियो के लिए मनोवैज्ञानिक नाटकों की भी रचना होने लगी है। 'विविध भारती'- कार्यकम में हास्य तथा मनोरंजन के नाटक अधिक लिखे जाने लगे हैं, परन्तु उनमें सामाजिक विकृतियों पर व्यंग्य का अभाव ही रहता है। रेडियो-नाटक ने पर्याप्त विकास किया है और अनेक उत्कृष्ट रचनाएँ सामने आई हैं, फिर भी इस माध्यम का जितना उपयोग होना चाहिए था, उतना नहीं हो सका है।

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एकादश अध्याय परम्परा और आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त : नव्य रूपान्तर के कारण पृष्ठभूमि : आज से हजारों वर्ष पूर्व भारत की नाट्य-परम्परा निर्मित हुई। भरत मुनि ने एक अत्यन्त समृद्ध तथा सम्पन्न नाट्य-सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। उनका नाट्यशास्त्र निश्चय ही अनेक नाटकों के विश्लेषण के उपरान्त ही रचागया होगा; क्योंकि पहले काव्य-ग्रन्थ -- अनुशिष्ट ग्रन्थों का निर्माण होता है। फिर, भरत के नाट्यशास्त्र के पश्चात् अनेक ऐसे ग्रन्थ रचे गये, जिनमें नाट्य-सिद्धान्त का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया। उन ग्रन्थों का अनुशासन मानकर बहुत-से नाटकों की रचना होती रही। इस प्रकार, हमारे यहाँ नाट्य-सिद्धान्त की सुदीर्घ तथा अविच्छिन्न परम्परा स्थापित हो गई। परन्तु, आधुनिक युग में कई कारणों से उस परम्परा में कुछ अंशों में थोड़ा-बहुत परिवर्त्तन आ गया है। लगभग दो हजार वर्ष या इससे कुछ अधिक वर्षों में नाट्य-सिद्धान्त में जो दीर्घ परम्परा बन गई है, उसमें समय की संक्रमणशीलता, सभ्यता तथा संस्कृति में उलट-फेर के कारण काफी परिवर्त्तन हुआ। विदेशों के साहित्य के सम्पर्क में आने से भी परिवर्त्तन हुआ। आजकल हिन्दी तथा भारत की अन्य प्रान्तीय भाषाओं में जो नाटक लिखे जा रहे हैं, उनमें यह नव्य रूपान्तर स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। आगे इन्हीं नव्य रूपान्तरों पर प्रकाश डालने का प्रयास किया जा रहा है। नाट्य-रूढ़ियाँ-प्रस्तावना, रंगपूजा आदि : संस्कृत-नाटकों पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि सभी नाटककारों ने कुछ निश्चित रूढ़ियों का पालन नियमित रूप से किया है। नान्दी, प्रस्तावना, पूर्वरंग, सृत्रधार, नटी, नाटक-वस्तु तथा नाटक का परिचय और भरत-वाक्य ऐसी ही कुछ रूढ़ियाँ हैं। उसी प्रकार रंगमंच पर कुछ कार्यों का निषेध भी किया गया है। ये रूढ़ियाँ सभी नाटकों में समान रूप से दिखाई देती हैं। जिस प्रकार भारतीय नाटकों में पूर्वरंग, प्रस्तावना और भरत-वाक्य का विधान है, उसी प्रकार ग्रीक-नाटकों में पूर्वकथन (प्रोलाँग) तथा उपसंहार (एपीलॉग) का विधान था। परन्तु, ग्रीक-नाटकों के उपसंहार में वैसी लोक-मंगल की कामना नहीं पाई जाती है, जैसी हम भरत-वाक्य में देखते हैं। उसमें अपनी त्ुटियों के लिए केवल क्षमा-याचना की भावना रहती थी। भारतीय नाट्याचार्यों ने पूर्वरंग, प्रस्तावना और नान्दी को बहुत अधिक महत्त्व प्रदान किया है और इसे नाट्य का प्रमुख तथा महत्त्वपूर्ण अंग माना है। भारतीय

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नाटककारों ने अपने नाटकों की प्रस्तावना में प्रायः तीन बातों का परिचय दिया है -- अपना, नाटक की वस्तु का और नाटक खेलने के अवसर का। किसी-किसी नाटककार ने इसमें अपने कुल तथा गोत् का भी परिचय दे दिया है। इस प्रकार, प्रस्तावना के माध्यम से अनेक जिज्ञासाओं की तुष्टि हो जाती है, जिससे नाटक का विवेचन करनेवाले व्यक्तियों को बहुत सुविधा प्राप्त होती है। अब प्रश्न उठता है कि यह काम सूत्रधार-नटी से कराया जाय या किसी अन्य प्रस्तोता से कहला दिया जाय। सूत्रधार-नटी के पक्ष में निम्नलिखित तर्क दिये जा सकते हैं : १. नाटक के सभी पात्ों को रंगपीठ पर आकर अपनी कला दिखाने का अवसर मिलता है, परन्तु जो सूत्रधार सबको सिखाता है, उसकी कला देखने का अवसर दर्शक को नहीं प्राप्त होता है। २. सूत्रधार नाटक के अंग-प्रत्यंग और सूक्ष्म भेदों को जानता रहता है, वही नाटक का वास्तविक पारखी होता है, इसलिए उसे अधिकार भी है कि वह नाटक और नाटककार के विषय में अपना मत प्रकट करे। ३. नाटक खेलते समय सभी व्यक्ति अपने-अपने कार्यों में पूर्णरूप से लीन हो जाते हैं। किसी को भी इतना अवकाश नहीं रहता कि वह अपनी भूमिका भी सँभाले और रंगपीठ पर उपस्थित होकर प्रस्तावना भी प्रस्तुत करे। केवल सूत्रधार बच रहता है, जो यह कार्य सम्पन्न कर सकता है। ४. प्रत्येक नाटक के प्रयोग के पर्व अभिनेताओं को तैयार होने में प्रायः देर हो जाती है। इस दशा में एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता हो जाती है, जो तबतक के लिए दर्शकों का मनोरंजन भी करे और समय भी काटे। इसलिए, नटी का विधान है कि वह रंगपीठ पर आकर, नाच-गाकर और ऋतु-विषयक कुछ बातें कहकर दर्शकों को रिझावे और अभिनेताओं को तैयार होने का समय दे। ५. नाटक के दर्शक प्रायः इतने विज्ञ नहीं होते कि वे तुरन्त ही कथा का सूत्र पकड़ सकें। इसलिए, ऐसी प्रस्तावना होनी चाहिए, जिसके सहारे नाटक का कथा-सूत्र समझते चलने में सरलता हो। भरत के नाट्य-सिद्धान्त में पूर्वरंग या देवत-पूजा का जहाँतक प्रश्न है, वह तो प्रत्येक देश तथा समाज के अपने विश्वास तथा प्रचलन की बात है। पारसी रंगशाला में भी नाटक आरम्भ करने के पूर्व रंगपूजा तथा ईश्वर-स्तुति करने की प्रथा विद्यमान थी। कई अन्य देशों में भी ऐसी प्रथा है, यद्यपि यूरोप के देशों में इसका बहिष्कार किया गया है। यूरोप में सहसा नाटक आरम्भ कर दिया जाता है। इस विषय में कोई निश्चित मत देना कठिन है कि यह प्रथा स्वीकार्य है अथवा नहीं; क्योंकि प्रत्येक देश की अपनी संस्कृति तथा परम्परा भिन्न होती है। संस्कृत-नाटकों में प्रस्तावना अत्यन्त नाटकीय ढंग से समाप्त करके नाटक को प्रारम्भ किया जाता है। परन्तु, प्रस्तावना के सम्बन्ध में भी अधिक आग्रह नहीं किया जा सकता। जब नाटक का कथा-सूत्र सरल हो और दर्शक उसे स्वयं ही सरलता से समझ ले, तो उस दशा में प्रस्तावना के वविषय में आग्रह व्यर्थ ही होगा। प्रस्तावना देते समय इस बात का ध्यान

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रखना आवश्यक है कि नाटक और नाटककार के विषय में कहा जाय, परन्तु कथा और उसके परिणाम के विषय में कोई बात नहां बतानी चाहिए, नहीं तो सारा कुतूहल समाप्त हो जायगा। वस्तुतः, आजकल कोई भी नाटककार अपने नाटक में प्रस्तावना की अवतारणा नहीं करता है। यह प्रथा पुरानी और बासी हो चुकी है। इस परम्परा का त्याग किया जा चुका है और आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त में इसका कोई स्थान नहीं रह गया है। हिन्दी- नाटकों में भी आजकल कहीं भी प्रस्तावना नहीं रखी जाती। नान्दीपाठ, रंगपूजा और भरत-वाक्य छोड़े जा चुके हैं। भारतेन्दुजी ने अपने कुछ नाटकों में इनका विधान किया, परन्तु अपने पिछले नाटकों में उन्होंने भी इस प्रथा का परित्याग कर दिया। फिर, किसी हिन्दी-नाटककार ने इन पुरानी बातों को स्वीकार नहीं किया। आधुनिक भारतीय नाटकों पर अँगरेजी का प्रभाव बड़ी तेजी से पड़ रहा था। बँगला-नाटकों ने अँगरेजी-प्रभाव से नान्दी, प्रस्तावना आदि का परित्याग कर दिया। कुछ समय बाद हिन्दी-नाटकों ने भी इनका परित्याग किया। अँगरेजी-नाटकों में नान्दी, मंगलाचरण, प्रस्तावना आदि नहीं होते, उसी की देखा-देखी पहले बँगला-नाटकों में से ये हटाये गये। हिन्दी-नाटकों में भी यही हुआ, परन्तु धीरे-धीरे। भारतेन्दुजी ने भी अपने दो-तीन नाटकों में ऐंसा किया है, परन्तु मंगलाचरण के विचार से आरम्भ में मंगलगान के एकाध दृश्य रख दिये हैं, जैसे सती-प्रताप, नीलदेवी आदि के प्रथम दृश्य। प्रसादजी आदि नाटककारों ने इतना भी उचित नहीं समझा और नान्दी, मंगलाचरण आदि को बिल्कुल ही समाप्त कर दिया। कुछ आलोचकों का कथन है कि प्रसादजी के कुछ नाटकों के प्रथम दृश्य केवल परिचयात्मक हैं और प्रस्तावना का काम करते हैं, परन्तु ऐसा कहना यथार्थ नहीं है। वर्त्तमान युग में नाटकों की प्रस्तावना सवथा निरर्थक है; क्योंकि अभिनय के विज्ञापनों से तो अब नाटककार और नाटक के नाम-मात्र ही नहीं, वरन् सभी अभिनेताओं के नाम, कथावस्तु आदि की संक्षिप्त रूपरेखा दर्शकों को पहले से ही ज्ञात रहती है। आज के सवाक् चित्रपटों की तो बात ही दूसरी है। अतः, आज का कोई नाटककार नान्दी, मंगलाचरण तथा प्रस्तावना के झमेले में नहीं पड़ता। प्रस्तावना की अन्य रीतियाँ : आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने प्रस्तावना के अन्य प्रकारों का भी विवेचन किया है। संक्षेप में वे प्रकार निम्नलिखित हैं : १. नेपथ्य से ही कह देना। २. जिस स्थल से कथा का आरम्भ होनेवाला है, उसके पहले का सम्पूर्ण प्रसंग बताकर समाप्त कर देना। इस प्रकार, दर्शकों के मन में उत्सुकता पूरी तरह जगा दी जाती है।

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३. लेखक दो साधारण पात्ों को उपस्थित करके उनके वार्त्तालाप के द्वारा नाटकीय कथा की जिज्ञासा उत्पन्न कर देता है और उसी वार्त्तालाप के परिणाम-रूप में नाटक प्रारम्भ कर देता है। ४. यूरोप के नाटकों में प्रोलॉग (Prologue) के ढंग से रंगमंच पर एक विशेष प्रस्तोता को उपस्थित कराके उसी के द्वारा नाटक के विषय में समस्त ज्ञातव्य बातों का उल्लेख करा देना। ५. कभी-कभी नाटककार प्रस्तावना-रूप में एक ऐसी घटना प्रस्तुत करता है, जो नाटक के परिणाम का बोध कराती है। उदाहरणार्थ, एक साँड़ चीनी बरतनों की एक दूकान में घुसकर सामान तोड़-फोड़ डालता है। इस घटना से प्रेक्षकों को संकेत मिल जाता है कि नाटक का परिणाम इसी रूप में होगा कि कोई उद्धत व्यक्ति अपने पशुबल की सहायता से समाज का नाश करता है। परन्तु, यह ढंग अच्छा नहीं समझा जाता; क्योंकि इससे नाटक के परिणाम की सारी उत्सुकता शान्त हो जाती है। ६. सूत्रधार और नटीवाला ढंग तो बहुत प्रचलित हो चुका है। ७. कभी-कभी नाटककार कोई आकस्मिक घटना दिखाकर उसी के साथ नाटक आरम्भ कर देता है। ८. "प्रस्तावना में सम्पूर्ण नाटकीय पात्रों को उनके चरित्र के अनुरूप क्रियाओं में प्रस्तुत करके उनका इस प्रकार परिचय देना कि नाटकीय कथा के विषय का आभास मिल जाय, जैसा अभिनव भरत के 'देवता' नाटक में है।"१ नाटक का श्रारम्भ : प्रस्तावना आदि के उपरान्त मुख्य नाटक का आरम्भ होता है। मुख्य नाटक में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण बात फल की प्राप्ति है। उसे स्थिर करने में नाटककार को बहुत समझ-बूझ से काम लेना होता है। नाटक से मन-बहलाव और मनोरंजन तो प्राप्त होता ही है, पर यही एकमात्र नाटक का उद्देश्य नहीं है। इससे उच्च तथा उपकारी आदर्श की भी प्राप्ति होती है। नाटक जीवन की व्याख्या करता है, परन्तु उसे केवल यही नहीं बतलाना चाहिए कि जीवन कैसा होता है, परन्तु यह बताना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि जीवन कैसा होना चाहिए और उत्तम-से-उत्तम जीवन कैसा हो सकता है। इसीलिए, कहा गया है कि नाटक से धर्म, अर्थ और काम प्राप्त होते हैं। जब नाटककार फल को निश्चित कर लेता है, तो उसे अवस्थाओं, सन्धियों तथा अर्थ-प्रकृतियों के अनुसार नाटक की रचना करनी चाहिए। यदि किसी भी कारण से कथा-प्रवाह से ध्यान हट जाय, तो सम्पूर्ण कुतूहल शान्त हो जाता है और नाटक का अभिनय देखने से मन उचट जाता है। इसीलिए, प्रत्येक अंक की कथा को अपने में ही पूर्ण नहीं होना चाहिए। यह जानने की उत्सुकता १. अभिनव नाट्यशास्त्र (प्रथम संस्करण), पृ० ३९४

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बनी रहनी चाहिए कि देखें, आगे क्या होता है। जो पात्र वस्तु-व्यापार को आगे बढ़ाने में सहायक हों, केवल उन्हें ही रंगपीठ पर आने देना चाहिए, इससे अधिक को नहीं। अवस्था, अर्थ-प्रकृति, सन्धि, अर्थोपक्षेपकों को ध्यान में रखकर एक अंक के पश्चात् दूसरे अंक की रचना में प्रवृत्त होना चाहिए। कतिपय नाट्याचार्यों ने अंक के बीच में आनेवाले अंकों को गर्भांक नाम दिया है। उनका विचार है कि गर्भांक का प्रयोग रस, वस्तु और नायक का उत्कर्ष बढ़ाने के निमित्त किया जाना चाहिए। इसमें रंगद्वार तथा आमुख आदि अंग होते हैं और बीज तथा फल का स्पष्ट रूप से आभास पाया जाता है। ऐसा देखा जाता है कि किसी एक नाटक में दूसरा नाटक होता है, उसका गर्भांक में प्रदर्शन किया जाता है; जैसे उत्तर- रामचरित नाटक में वाल्मीकि ऋषि का राम-लक्ष्मण के सामने सीता के दूसरे वनवास की कथा अप्सराओं द्वारा दिखाना। कथावस्तु की रचना : नाटक की रचना करने के पहले कथावस्तु अथवा संविधानक की रचना निश्चित और स्पष्ट रूप से कर लेनी चाहिए। ऐसा करने से ज्ञात हो जाता है कि नाटककार नाटक की घटनाओं को किस रूप में रखना चाहता है, जिससे उसके अभीष्ट उद्दश्य की सिद्धि हो। नाटककार को अपने अभीष्ट उद्दश्य की सिद्धि के लिए या नाटक में वणित किसी पात्र के चरित्र के निर्वाह के लिए या परिणाम को अधिकाधिक प्रभावशाली बनाने के लिए कथानक की स्पष्ट रूपरेखा पहले ही तैयार कर लेना अत्यावश्यक होता है। ऐतिहासिक नाटकों में यह कार्य दुहरा हो जाता है। इसका कारण यह है कि इसमें ऐतिहासिक कथा तो पहले से रहती ही है और दूसरे नाटक की कथावस्तु की रचना उस परिवत्तित रूप में की जाती है, जिस रूप में नाटककार उसे प्रस्तुत करने की आवश्यकता समझता है। बहुत बार ऐसा भी होता है कि एक ही कथा कई पुराणों में कई रूपों में वर्णित मिलती है। ऐंसी दशा में नाटककार को सुविधा रहती है कि वह चाहे जो भी कथा ग्रहण करे; साथ ही उसे कठिनाई भी रहती है कि वह कौन-सी कथा ग्रहण करे। ऐसे अवसर पर उचित यह होता है कि वह उन समस्त घटनाओं को ग्रहण कर ले, जो उसके नाटक के निमित्त अथवा उस नाटक को प्रभावशाली बनाने के लिए आवश्यक प्रतीत हों। मौलिक नाटकों की कथावस्तु की रचना में नाटककार को इस बात का ध्यान रखना होता है कि कथा का कोई व्यापार या घटना असंगत अथवा असम्भाव्य नहीं हो। केवल ऐंसी ही घटनाओं की योजना की जानी चाहिए, जो नाटकीय कथा के देश, काल तथा पात्र की मर्यादा के सर्वांशतः अनुकूल हों। यदि इसमें कोई भी असावधानी हुई, तो नाटक में बहुत बड़ा दोष आ जायगा। यदि कथानक में भूत, प्रेत आदि अलौकिक तत्त्वों का समावेश करने की आवश्यकता प्रतीत हो, तो उनकी अवतारणा इस रीति से करनी चाहिए, जिससे वे देश, काल तथा पात् की भावना से भिन्न नहीं जान पड़ें।

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विषयवस्तु पर नवीन प्रभाव : आज के साहित्यिक नाटकों की विषयवस्तु में समयानुकूल परिवर्त्तन आ गया है। जनता की समस्याओं को जनता की ही भाषा में उपस्थित करने का प्रयास किया जा रहा है। आज की सामाजिक तथा राजनीतिक स्थिति का प्रभाव नाटक के विषय पर भी पड़ा है। भारत में स्वतन्त्रता प्राप्त होने के बाद पराधीनता के समय की उन हिंसात्मक घटनाओं का भी समावेश कथानक के रूप में किया जा रहा है, जिनकी चर्चा भी विदेशी शासन-काल में नहीं हो सकती थी। सन् १८५७ से १९४७ ई० तक नब्बे वर्ष की अवधि में अनेक देशप्रेमी क्रान्तिकारियों ने देश की स्वतन्त्रता के लिए निरन्तर संघर्ष किया। परन्तु, विदेशी शासन के वैधानिक बन्धन के कारण प्राणोत्सर्ग करनेवाले इन वीर देशभक्तों की कहानियाँ अन्धकार में पड़ी थीं। स्वातन्त्र्योत्तर नाट्य-साहित्य में इनकी कथाएँ नाटक के रूप में आने लगी हैं। इन लोमहर्षक घटनाओं के आधार पर कई नाटक हिन्दी तथा भारत की अन्य प्रान्तीय भाषाओं में लिखे गये। इन नाटकों से क्रान्तिकारियों की गति-विधि तथा रीति-नीति पर प्रकाश पड़ता है और यह पता चलता है कि स्वतन्त्रता-संग्राम में संलग्न अहिंसावादी महात्मा गांधी तथा इन हिंसावादी क्रान्तिकारियों के जीवन-दर्शन में कितना अन्तर था। आधुनिक नाटकों में एक अन्य नवीन प्रवृत्ति दिखाई दे रही है। सन्त विनोबा भावे ने देश में त्याग की भावना उत्पन्न कर दी है। इस महान् सन्त के प्रभाव से देश के जन-जन के मानस में आत्म-त्याग की भावना आ गई है। देश के सभी लोगों की आंखें विनोबा भावे और उनके भूदान-ग्रामदान-यज्ञ की ओर लगी हैं। कई नाटककारों पर विनोबाजी तथा उनके इस आन्दोलन का प्रभाव पड़ा है और उन्होंने तत्सम्बन्धी नाटक लिखे हैं। इस प्रकार, देश में एक बार फिर हिंसा पर अहिंसा की और लोभ तथा विलास पर त्याग की विजय दिखाई गई है। अतः, आधुनिक नाटककार जनता के अधिक निकट आ गया है और उसके सुख-दुःख का चित्रण अपने नाटकों में अधिक ईमानदारी से करने लगा है। आधुनिक नाटक जीवन का सच्चे अर्थ में दर्पण बनता जा रहा है। कुछ दिन पहले के नाटककार प्रेरणा के लिए पश्चिम के नाटककारों की ओर देखते थे, परन्तु आजकल का नाटककार अपने ही बीच के सुख-दुःख से प्रेरणा पा रहा है। सारांश-रूप में कहा जा सकता है कि आरम्भिक काल में हिन्दी-नाटक जन- जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर रहा था, बीच में इधर-उधर भटकता रहा, परन्तु आज फिर जन-जीवन में ही संश्लिष्ट हो गया है और वास्तविक अर्थ में समाज का दर्पण बन गया है। परन्तु, आरम्भिक काल और आधुनिक काल के हिन्दी-नाटकों में अन्तर है। आदिकाल का हिन्दी-नाटक जहाँ सरल, सुबोध, भावनायुक्त तथा संगीतमय था, वहाँ आज का नाटक जटिल, कठिन, बौद्धिक तथा गद्यमय बनता जा रहा है। तर्क की प्रधानता : अति आधुनिक काल के नाटकों में बुद्धिवाद की प्रधानता दिखाई दे रही है। अब नाटकों में भाव-व्यंजना, चरित्र-चितण तथा अन्तर्द्वन्द्व के स्थान

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पर तर्कवाद को प्रधानता मिल रही है। प्रत्येक स्थल पर हेतुवाद की प्रबलता दिखाई दे रही है। विशेषतः, आज के समस्या-नाटकों में हृदय-पक्ष से अधिक प्रबल बुद्धि-पक्ष हो रहा है। पताकास्थानक : संस्कृत-नाटककारों ने नाटकीय वस्तु में पताकास्थानक की सहायता से नाटकीय प्रभाव उत्पन्न करने का प्रयास किया है। परन्तु, यह बहुत पुराना और बासी उपाय समझा जाता है। आजकल नाटकीय प्रभाव उत्पन्न करने के अनेक कौशल निकल गये हैं, जिनसे कथा का चमत्कार तो बढ़ जाता है और कुतूहल में किसी प्रकार का व्यवधान नहीं पड़ता। किन्तु, पताकास्थानक से तुरन्त पता चल जाता है कि आगे क्या होनेवाला है, इससे कुतूहल की पूरी रक्षा नहीं हो पाती। उत्तररामचरित में ज्यों ही राम कहते हैं-'यदि परम सह्ास्तु विरहः'-त्यों ही प्रतिहारी आकर कहता है- 'देव, उअट्िदो।' इस पताकास्थानक के प्रयोग से तुरन्त ही स्पष्ट हो जाता है कि राम और सीता का शीघ्र ही वियोग होनेवाला है। इसका दुष्परिणाम यह होता है कि सारे कुतूहल की निवृत्ति हो जाती है और दर्शक उस घटना के लिए पहले से ही तैयार हो जाता है, जो अब शीघ्र ही होनेवाली है। पताकास्थानक रस में बाधा ही उत्पन्न करता है, सहायता तो करता ही नहीं। अतः, नाटकीय कुतूहल की रक्षा के विचार से पताकास्थानक का प्रयोग उचित नहीं। यह आज के नाटकों में छोड़ा जा चुका है। परन्तु, भारतेन्दुजी ने 'नीलदेवी' में पताकास्थानक का प्रयोग किया है, जिससे चमत्कार बढ़ गया है। अर्थोपक्षेपक की अनुपयुक्तता : अर्थोपक्षेपकों का मुख्य उद्दश्य है नीरस तथा अनुचित वस्तु को रंगमंच पर नहीं आने देकर उसकी मात्र सूचना दे देना। जहाँ तक नीरस तथा अनुचित वस्तु का प्रदर्शन नहीं करने का प्रश्न है, इसमें किसी प्रकार की आपत्ति किसी को भी नहीं हो सकती। किन्तु, पाँच अर्थोपक्षेपकों के द्वारा वस्तु को सूचित करने का जो विधान किया गया है, उसपर विचार करना आवश्यक प्रतीत होता है। नीच तथा मध्यम पात्रों के द्वारा आगे-पीछे की कथा की सूचना देना आधुनिक नाट्याचार के सर्वथा विरुद्ध है। यह सूचना रंगपीठ पर से कोई पात दे या नेपथ्य से, इसकी अस्वाभाविकता में कोई कमी नहीं हो पाती। आजकल कोई नाटककार इन अर्थोपक्षेपकों का सहारा नहीं लेता। आधुनिक नाटककार सभी सूच्य बातें अपने नाटक के दृश्य भागों में नाटक के पातों के द्वारा अवसर आने पर कहला देते हैं। फलस्वरूप वर्त्तमान युग के किसी नाटक में विष्कम्भक, प्रवेशक, चूलिका, अंकावतार तथा अंकमुख नहीं दिखाई देते। आज इनकी कोई आवश्यकता ही नहीं समझी जाती। अर्थ-प्रकृतियाँ तथा अवस्थाएँ स्वाभाविक तथा ग्राह्य हैं, परन्तु इतना तो अवश्य कहा जा सकता है कि उनके विना भी सरलता से काम चल जा सकता है और वे बिल्कुल अपरिहार्य नहीं हैं। किन्तु, सन्धियों के अंगों का बन्धन इतना कठोर है कि इसके कारण

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नाटककार की प्रतिभा पूर्णरूप से बद्ध हो जाती है और कला का समुचित विकास नहीं हो पाता। इस कठोर और जटिल बन्धन से नाटककार को मुक्ति मिल गई है। वज्य या निषिद्ध कार्य : नाट्य-रूढ़ियों में कुछ निषिद्ध कार्य का भी समावेश है। भरत आदि सभी नाट्याचार्यों ने रंगमंच पर कई कार्यों का निषेध कर दिया है। उन कार्यों को सामान्यतः तीन श्रेणियों में विभक्त कर सकते हैं। एक तो वे कार्य, जो साधारणतः लोक में भी सबके सामने नहीं किये जाते; जैसे शयन, भोजन, चुम्बन, नखच्छेद, मल-परित्याग आदि। दूसरे, वे कार्य जो भयंकर, बीभत्स अथवा लोमहर्षक होते हैं, जैसे हत्या, मृत्यु आदि। तीसरे प्रकार के वे कार्य हैं, जिन्हें रंगमंच पर दिखाना सम्भव नहीं है, जैसे नगरावरोध, राज्य-विप्लव, युद्ध आदि। विश्वनाथ ने दूराह्वान का भी निषेध किया है, परन्तु संस्कृत-नाटकों में दूराह्वान (दूर से पुकारना) के बहुत-से उदाहरण मिलते हैं। शारदातनय और धनंजय ने दूराध्वानम् (दूर का मार्ग दिखाना) का निषेध किया है, जो अधिक समीचीन प्रतीत होता है। लोकशील और लोक-मर्यादा को ध्यान में रखकर सभी देशों में यह माना जाता है कि रंगमंच पर स्नान, मलत्याग आदि कार्यों का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। परन्तु, यूरोप के कई देशों में रंगमंच पर भोजन और चुम्बन के दृश्य दिखाना अनुचित नहीं समझा जाता। इसका कारण यह है कि वहाँ भोजन सार्वजनिक रूप से किया जाता है और चुम्बन सामाजिक शिष्टाचार समझा जाता है। किन्तु, हमारे देश में ऐसे कर्म सार्वजनिक रूप से नहीं हुआ करते। परन्तु, आजकल हमारे देश में भी अब होटलों, जलपान-गृहों तथा सहभोजों में सामाजिक रूप से भोजन करने की प्रथा चल पड़ी है। युद्ध, नगरावरोध आदि के प्रदर्शन का निषेध सुविधा को ध्यान में रखकर किया गया है। इन दृश्यों को रंगमंच पर दिखाने के लिए इतने अधिक व्यय और परिश्रम की आवश्यकता है कि ऐसे दृश्य दुरूह हो जाते हैं। पूरा नगर रंगमंच पर लाना, हजारों- लाखों व्यक्तियों को रंगमंच पर दिखाना और सबकी चेष्टाओं का प्रदर्शन असम्भव है। युद्ध के साथ भी यही बात है। फिर युद्ध में वध और मृत्यु जैसे बीभत्स और भयानक दृश्य दिखाने की आवश्यकता पड़ जायगी। सारांश यह कि देश, काल और समाज के अनुकूल जो चेष्टा घृणित, बीभत्स, अश्लील और लज्जाजनक हो, रंगमंच पर जिन दृश्यों का प्रदर्शन सम्भव नहीं हो या अत्यन्त कष्टसाध्य हो और जिन दृश्यों में लोकहित के स्थान पर लोक का अहित होता हो, रंगपीठ पर उनका प्रदर्शन किसी भी दशा में नहीं होना चाहिए। परन्तु, आधुनिक नाटककार कुछ अश्लील दृश्यों को छोड़कर सब प्रकार के दृश्य रंगमंच पर दिखा रहे हैं। हिन्दी के अनेक नाटककारों ने अपने नाटकों में भोजन, शयन, विवाह, वध, मृत्यु, युद्ध आदि के असंख्य दृश्य दिखाये हैं। इस प्राचीन परम्परा का त्याग किया जा रहा है और आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त में ऐसे दृश्य ग्राह्य हो रहे हैं।

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नाटक में रंगमंच पर दिखलाने की अनुपयुक्तता ऐसे दृश्यों को वर्ज्य बनाने का प्रथम तथा प्रधान कारण थी, परन्तु आधुनिक युग में तो यह कारण उपेक्षणीय हो गया है। आज के सवाक् चलचित्रों में दो रेलगाड़ियों का टकराकर चकनाचूर हो जाना, तोपों से दुर्ग ढाहना आदि लोमहर्षक दृश्य तो दिखाये जा सकते हैं, किन्तु रंगमंच पर साधारण युद्ध, हत्या आदि का अभाव दर्शकों को खटकेगा। आज के दर्शक रोमांचकारी घटनाओं को देखने के अभ्यस्त हो गये हैं। प्रसादजी आदि कई नाटककारों ने ऐसे वर्ज्य दृश्यों को सहर्ष अपनाया है। आधुनिक युग के नाटककार ऐंसे दृश्य दिखाने में नहीं हिचकते। अंक तथा दृश्य-विभाजन : नाटककार कथानक का निर्माण कर लेने पर पात्रों को चुनता है और फिर उनका नामकरण करता है। तब उसे अपने कथानक को अंकों में विभाजित कर लेना आवश्यक होता है। अंक के विभाजन कर लेने पर नाटककार को यह देखना होता है कि प्रत्येक अंक में कार्य पूर्ण करनेवाली कौन-कौन-सी घटनाएँ हैं। नाटक की दृष्टि से ऐसी प्रमुख घटनाएँ तीन प्रकार की होती हैं : १. संवाद, २. द्रष्टव्य या दिखाई जानेवाली और ३. सूच्य या सूचित की जानेवाली। कहने का तात्पर्य यह है कि नाटककार को निश्चय कर लेना चाहिए कि इस अंक में पूर्ण होनेवाले कार्य में कितना अंश संवाद होगा, कितना अभिनय के द्वारा रंगमंच पर दिखाया जायगा और कितने अंश की केवल सूचना दे देनी होगी। रंगमंच पर जितनी घटनाओं का प्रदर्शन करना हो, वे जितने स्थलों या जितने विभिन्न कार्यों में हुई हों, उतने ही दृश्य उस अंक में बना लेने होते हैं। यदि एक ही स्थान पर दो घटनाएँ अलग-अलग समय पर हुई हों, तो नाटककार दो दृश्य रखता है और दोनों घटनाओं के बीच समय का व्यवधान दिखाने के लिए वह दोनों दृश्यों के बीच एक तीसरे दृश्य की अवतारणा करता है। इस बीचवाले दृश्य में ऐसी कल्पित घटना की योजना की जानी चाहिए, जो मूल कथा के साथ में संगत जान पड़े। सफल नाटक लिखने के लिए दृश्य का क्रम ठीक रखना होता है। इस स्थल पर यह भी समझ लेना ठीक होगा कि यदि एक अंक का कार्य एक ही स्थान पर अविच्छिन्न रूप से चलता हो, तो एक ही दृश्य एक अंक बन सकता है। संस्कृत- नाटककारों ने प्रायः एक स्थान पर होनेवाली सारी घटनाओं को एक ही दृश्य में रखा है। वस्तुतः, एक अंक में कई दृश्यों की योजना करने की प्रथा भारत में यूरोप से आई है, किन्तु यह न आवश्यक है और न प्रशंसनीय ही। यदि एक दृश्य से एक अंक का काम नहीं चलता हो, तभी अधिक दृश्यों की योजना करनी चाहिए, अन्यथा नहीं। दृश्य-विभाजन के विषय में दूसरा ध्यातव्य तथ्य यह है कि रंगमंच की सुविधा का ध्यान रखते हुए आगे का एक ऐसा दृश्य दिखाना उचित है, जिसमें रंगपीठ पर सजावट या हुटाई जानेवाली सामग्री नहीं हो और दूसरा दृश्य गहरा हो, जिसमें कुटिया, चौकी,

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आसन आदि सामग्री सजाई जा सके। आगे दिखाये जानेवाले दो दृश्यों की भी योजना की जा सकती है; क्योंकि इसमें कोई झमेला नहीं होता, किन्तु दो गहरे दृश्य अर्थात् सजावटवाले दृश्य नहीं दिखाये जाने चाहिए। इस विषय में ध्यान देने की तीसरी बात यह है कि लगातार दो या कई उत्तेजनापूर्ण दृश्यों की योजना नहीं करनी चाहिए। यदि ऐसे अनेक दृश्यों की लगातार योजना की जायगी, तो या तो दर्शक ऊब जायेंगे या उनके मानसिक भावों पर बहुत अधिक तनाव पड़ जायगा, जिसका फल उनके हृदय और मस्तिष्क पर बहुत भयंकर होता है। इसलिए, दृश्य की योजना करते समय ध्यान रखना चाहिए कि यदि एक दृश्य तनाव उत्पन्न करनेवाला हो, तो दूसरा दृश्य हल्का, विनोदपूर्ण और मनोरंजक हो, जिसके कारण भावों के तनाव में शिथिलता आ जाय। प्रसादजी ने नाटक के अंक-विभाग को अन्त तक माना है, परन्तु आगे चलकर अंकों के विभाग-दृश्य के नामकरण को नहीं माना है। प्रवेशक, विष्कम्भक आदि के दृश्य, जो कभी-कभी दो अकों के बीच शृंखला जुटाने के विचार से लाये जाते हैं, काम में नहीं लाये गये हैं, परन्तु इस प्रकार के दृश्य अवश्य हैं। उनका अलग नामकरण नहीं किया गया है। आजकल अंकों की संख्या भी कम हो गई है। प्राचीन नाटकों के समान अब ५, ७ या १० अंक नहीं रखे जाते। अंकों के अन्तर्गत दृश्यों की संख्या उसी रूप में बढ़ने लगी है। पहले नाटक में तीन अंक रखे जाते थे; क्योंकि अभिनय के समय दो इण्टर्वल रखे जाते थे। अबतक तीन से कम अंकों के नाटक देखने में नहीं आये हैं, परन्तु सिनेमा का प्रचार होने पर अब शायद दो ही अंकों के नाटक लिखे जायँ; क्योंकि उनमें एक ही इण्टर्वल होता है।

संवाद : आजकल के नाटककार स्वगत कथन, जनान्तिक, अपवारित और आकाश- भाषित को अस्वाभाविक मानते हैं। जनान्तिक, अपवारित तथा आकाश-भाषित तो प्रत्यक्ष रूप से अस्वाभाविक हैं ही, रंगमंच पर उपस्थित व्यक्तियों के समक्ष कोई बात कही जाय, जिसे सभी दर्शक और श्रोता सुन लें, परन्तु रंगमंच पर उपस्थित अभिनेता नहीं सुन सकें- यह स्वथा असंगत और असम्भव है। प्राचीनकाल में प्रतीकात्मक अभिनय किया जाता था। उस युग में जब कभी कोई अभिनेता त्रिपताका की मुद्रा में कोई बात कहता था, तो दर्शक समझ जाते थे कि यह बात हमारे लिए है, रंगमंच पर उपस्थित सभी अभिनेताओं के लिए नहीं। किन्तु, आजकल त्रिपताका का कोई विधान ही नहीं है, अतः जनान्तिक और अपवारित अनावश्यक हो गये हैं। स्वगत कथन के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। एक युग था, जब ये स्वगत कथन यूरोपीय रंगशाला में बहुत महत्त्वपूर्ण समझे जाते थे और उनमें से बहुत-से स्वगत कथन विश्व-साहित्य में अमर विभूति बन गये हैं। किन्तु, स्वाभाविकता की दृष्टि से विचार करने पर उनका महत्त्व नहीं रह जाता। मनुष्य जब कोई बात सोचता है, तो

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परम्परा और आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त : नव्य रूपान्तर के कारण [५८१ उस समय उसकी क्रिया मौन रहती है, सोची हुई बात वह चिल्लाकर नहीं कहता। सोचने की मानसिक क्रिया भी दर्शक के सम्मुख उपस्थित करनी चाहिए, जिससे वह पात् का चरित्र समझ सके। स्वगत कथन की सृष्टि में भी यही विचार काम कर रहा था, परन्तु इसकी मानसिक क्रिया की अभिव्यक्ति उसके कार्यों के द्वारा होनी चाहिए, शब्दों के द्वारा नहीं। कला की दृष्टि से भी कुतूहल की रक्षा के निमित्त भी स्वगत कथन का बहिष्कार होना चाहिए। आधुनिक युग के विदेशी नाटककारों ने इसी नीति को अपना- कर ऐसे ही नाटकों की रचना आरम्भ की है, जो सर्वश्राव्य संवादों के द्वारा ही नाटक की वस्तु का प्रसार करें। इसलिए नाटक में अश्राव्य और नियतश्राव्य संवादों का प्रयोग नहीं करना चाहिए। स्वगत कथन, जनान्तिक, अपवारित तथा आकाश-भाषित से संयुक्त संवाद सर्वथा अस्वाभाविक हैं। जिसका वर्णन करना हो उसे सर्वश्राव्य संवादों तथा व्यापारों के द्वारा ही अभिव्यक्त करना चाहिए था। स्वगत कथन के स्थान पर अति आधुनिक नाटककार कुछ अन्य उपायों का सहारा ले रहे हैं। कभी-कभी नाटककार नायक के किसी विश्वस्त व्यक्ति की अवतारण रंगमंच पर कर देता है, जिससे नायक या अभिनेता अपने मन की बातें कहता है। कभी-कभी स्वगत कथन के स्थान पर टेलीफोन का सहारा लिया जाता है। इन उपायों से स्वगत कथन का काम चल जाता है और अस्वाभाविकता भी नहीं आने पाती। आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त में नायक उच्च और अपराधी प्रकृति : आधुनिक नाट्यशास्त्रियों ने रंगशाला और चलचित्र दोनों की दृष्टि से दो प्रकार के मनुष्यों के विषय में बताया है। एक उच्च प्रकृति के मनुष्य होते हैं, जिनमें उन्नत, त्यागी, वीर, साहसी, दानी, दयालु, सिद्धान्तवादी, परोपकारी, लोक-सेवक, आशावादी, सदाचारी और धर्मभीरु को गिनाया गया है। दूसरे प्रकार के मनुष्य अपराधी प्रकार के होते हैं, जिनमें दूसरों को अकारण कष्ट देनेवाले, चुगली खानेवाले, घमण्डी, कामी, क्रोधी, अनुरक्त, उदासीन, कायर और हत्यारों की गिनती है। यह भी बताया गया है कि कभी ऐसी भी परिस्थिति आ सकती है, जब साधारण मनुष्य भी असाधारण कार्य करने को उद्यत हो जाता है। ये परिस्थितियाँ दो प्रकार की हो सकती हैं : १. धन, जन या प्रतिष्ठा की असह्य हानि होने पर, २. उस क्रोध में जो अपने पर होता है या अपने इष्ट पर संकट आने पर या कोई अप्रत्याशित घटना हो जाने पर होता है। इस प्रकार का वर्गीकरण यूरोपीय जीवन पर ध्यान रखकर ही किया गया है। किन्तु, यह वर्गीकरण व्यापक या सार्वभौम रूप से स्वीकार्य नहीं हो सकता। सृष्टि गुण और अवगुण के योग से ही बनी है। कोई भी व्यक्ति सर्वथा अच्छा या सर्वथा बुरा नहीं हो सकता। सृष्टि की रचना ही गुण और दोष के संयोग से हुई है।

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५८२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

बहुत-से मनुष्य स्वभाव और संस्कार से मृदुभाषी और कोमल स्वभाव के हैं, परन्तु ऐसा अवसर आ जाता है जब वे कठोरतापूर्ण आचरण कर देते हैं। ऐसा भी होता है कि एक मनुष्य किसी समय अच्छा व्यवहार करता है और दूसरे समय वही कठोर व्यवहार करता है। इस तरह स्पष्ट हो जाता है कि किसी मनुष्य का मूल्यांकन उसके आकस्मिक व्यवहार से नहीं किया जा सकता। मनुष्य परिस्थितियों का दास हुआ करता है और उसे वही करना पड़ता है, जो परिस्थितियाँ उसे करने को विवश करती हैं। ऐसे मनुष्य अंगुली पर गिनने-योग्य हैं, जो परिस्थितियों के स्वामी होते हैं और गुण, चरित्र तथा स्वभाव से परिस्थितियों को अपने अनुकूल बना लेते हैं या परिवरत्तित कर देते हैं। जब कर्त्ता का उद्देश्य प्रत्यक्ष होता है, तब उसके चरित्र का मूल्यांकन करने में कोई कठिनाई नहीं होती, परन्तु यदि कर्त्ता अपना उद्दश्य छिपाकर रखता है, तो उसकी नैतिकता में भ्रम उत्पन्न होना स्वाभाविक हो जाता है। कई बार ऐसा भी होता है कि कोई साधु व्यक्ति दूसरे की रक्षा करने के हेतु अपने ऊपर उसका सारा अपराध ले लेता है और अपने सर्वस्व-यहाँ तक कि मान, प्रतिष्ठा, यश, धन और प्राणों-की भी बाजी लगा देता है। साधारण जनता की धारणा हो जाती है कि वह दुष्ट तथा ढोंगी था, परन्तु अन्त तक कोई नहीं जान पाता कि वह कितनी उत्तम प्रकृति का महापुरुष था। नाटकीय दृष्टि से ऐसे चरित्रों की उपादेयता सन्दिग्ध है और जिन लोगों ने अपने नाटकों में ऐसे चरित्रों की अवतारणा की है, उन सबने किसी-न-किसी उपाय से भेद खोलकर उसका महत्त्व स्थापित करने का प्रयत्न भी किया है। नाटककार यदि ऐसा न करे, तो प्रेक्षक भी उस पात्र के प्रति घृणा का भाव लेकर रंगशाला से जाता है और इस प्रकार नाटक असत्य सिद्ध होता है। परन्तु, काव्य सत्य का स्थापक होता है और कवि को किसी भी विधि से सत्य की स्थापना करनी पड़ती है। यही सत्य-स्थापन ही काव्य-सत्य कहलाता है, जो विद्वानों के बीच विवाद का विषय रहा है। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य के आचरण के उद्दृश्य पर ही उसके चरित्र की परीक्षा निर्भर करती है। इसलिए, मनुष्यों का वर्गीकरण करते समय उनके आचरण पर कम ध्यान देना है और अधिक ध्यान देना है उनके उद्देश्य पर। निष्कर्ष : आधुनिक मनोविज्ञान-वेत्ताओं ने मनुष्य का जितने प्रकार से वर्गीकरण किया है, सबमें किसी-न-किसी प्रकार की तुटि है। भरत, धनंजय और शारदातनय ने दो प्रकार के मनुष्यों की प्रकृति का विश्लेषण किया है : १. उन व्यक्तियों की, जो संगीत और नाटक में सहायक होते हैं; जैसे नट, भरत, कुशीलव आदि; २. नाटकों में प्रयुक्त होनेवाले राजसी नायकों के परिजन, जिनका विस्तृत परिचय दिया गया है। प्रायः समस्त लक्षण-ग्रन्थों में नायक-नायिका का जो वर्गीकरण किया गया है, उसका सम्बन्ध शृंगार रस से है और वह इतना पुराना पड़ गया है कि उसके अनुकरण

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पर आधुनिक युग में नायक-नायिकाओं का भेद करना असंगत प्रतीत होता है। आजकल नायक-नायिकाओं की अनेक समस्याएँ स्वयमेव सुलझ गई हैं। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के शब्दों में कह सकते हैं : "रात को देर से लौटे हुए या दूसरे दिन प्रातःकाल आये हुए आजकल के किसी नायक के ओठ पर न तो किसी नायिका की आँख का काजल ही मिलता है और न उसके गले के हार की साट ही पड़ी दिखाई पड़ती है। यह सब बातें व्यवहारातीत हो गई हैं, इसलिए खण्डिता नायिका अब खण्डिता रह ही नहीं पाई है। इसी प्रकार, बिजली के इस युग में कृष्णा और शुक्लाभिसारिकाएँ भी व्यर्थ हो गई हैं। बड़े परिजनवाले वे राजा भी अब नहीं रहे, जिनके यहाँ चार-पाँच प्रकार की रानियाँ, विदूषक, विट और चेट हों। इस युग में न तो उनकी आवश्यकता है, न उनका प्रयोजन। हाँ, प्राचीन नाटकों के अध्ययन के लिए उनका विधान अवश्य सार्थक हो सकता है।" एक दूसरी बात है कि संस्कृत-नाटकों के युग में छोटे-बड़े राजाओं तथा सामन्तों का प्राबल्य था और नाटककारों ने उन्हें ही अपने नाटकों का नायक बनाया। किन्तु, आज के युग में नाटक का नायक कोई किसान, मजदूर, चोर या शराबी भी हो सकता है। अतः, आज चेट, विट, विदूषक आदि और उतने प्रकार के नायक-नायिका अनावश्यक हो गये हैं। उस युग में नायक को सर्वगुण-सम्पन्न होना आवश्यक समझा गया, परन्तु आजकल किसी नाटक का नायक चोर, शराबी या जुआड़ी भी हो सकता है। उस युग की आदर्शवादी तथा सामन्तवादी मान्यताएँ आज की यथार्थवादी तथा समाजवादी पृष्ठभूमि में धराशायी हो जाती हैं। यूरोप के मनोवैज्ञानिकों द्वारा किया हुआ वर्गीकरण भी अन्धाधुन्ध ही है। एक ओर कुछ विद्वानों का मत है कि मनुष्य की इच्छाशक्ति ही उसका चरित्र प्रकट करती है; दूसरी ओर एक मत है कि कुल-संस्कार तथा संगति का प्रभाव बहुत अधिक पड़ता है; और तीसरा मत है कि मनुष्य परिस्थितियों का दास होता है। ये तीनों मत परस्पर- विरोधी हैं। युंग ने मनुष्य की प्रकृति के अन्तर्मुखी तथा बहिमुखी नामक दो भेद किये। यह मत और भी भ्रामक है। ये भेद केवल अपवाद-रूप में स्थित प्रकृतिवालों के लिए ग्राह्य हो सकते हैं, परन्तु सामान्य मानव-समाज के लिए उनका आरोप नहीं किया जा सकता। अतः, उपर्युक्त कोई भी मत पूर्णतः ग्राह्य नहीं माना जा सकता। पात्रों का नामकरण : ऐतिहासिक नाटकों के पात्रों के नामकरण के विषय में भरत ने नाट्यशास्त्र के अध्याय १९, श्लोक २९-३६ में विस्तृत विवेचन दिया है। वहाँ उन्होंने ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, राजा, रानी, वेश्या, चेट आदि के नामकरण पर विचार किया है। ऐतिहासिक तथा पौराणिक नामों के लिए तो अधिकतर पुराण तथा इतिहास पर निर्भर करना पड़ता है, शेष नामों का प्रयोग उन देशों की नाम-प्रकृति के १. अभिनव नाट्यशास्त्र (प्रथम संस्करण), पृ० १४२

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५८४] पपा भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अनुसार करना होता है। किन्तु, नाटकीय पात्रों के नामकरण के विषय में कुछ सिद्धान्त आचार्य सीताराम चतुर्वेदी प्रभृति विद्वानों ने निश्चित किये हैं। १. उदात्त चरित्रवाले नायकों के नाम भी उदात्तता के बोधक होने चाहिए; जैसे राणा प्रताप, विक्रम सिंह आदि। ऐसे पात्रों के नाम बुलाकी सिंह या छोटराम उचित नहीं होते। २. प्रहसनों के लिए हास उत्पन्न करनेवाले नामों का विधान होना चाहिए; जैसे बुद्धू, घसीटा, लपेटू, चिथरू आदि। ३. दुष्ट तथा कूर व्यक्तियों के नाम दुष्टता तथा कूरता प्रकट करनेवाले रखने चाहिए; जैसे दुर्योधन, दुर्जन सिंह, काला पहाड़, विकराल जंग, भालामार सिंह आदि। ४. यदि नाटककार को व्यंग्य करना अभीष्ट हो, तो कुछ दुष्ट व्यक्तियों के अच्छे नाम भी रखे जा सकते हैं, जैसे किसी दुष्ट और कपटी व्यक्ति का नाम व्यंग्य के उद्दश्य से निर्मल प्रसाद रखा जाय। ५. सामान्य पात्रों के नामों के विषय में कोई नियम नहीं बनाया जा सकता। किन्तु, लेखक को चाहिए कि पात्र के गुण के अनुसार ही उसका नामकरण करे। शकुन्तला की दोनों सखियों के नाम अनसूया और प्रियम्वदा अत्यन्त सार्थक तथा साभिप्राय रखे गये हैं और उनका निर्वाह भी किया गया है। नाटकों का आधुनिक वर्गीकरण: नाटकों का निम्नलिखित दृष्टियों से वर्गीकरण हो सकता है : (क) विषय, (ख) प्रदर्शन-विधि, (ग) प्रभाव, (घ) रचना, (ङ) उद्देश्य, (च) सामाजिक या दर्शक, (छ) पात्र, (ज) रंगमंच। इतनी दृष्टियों से देखने से नाटक को बहुत वर्गों में रखा जा सकता है। फिर भी हम सभी नाटकों को निम्नलिखित कुछ वर्गों में रख सकते हैं : १. कथा-प्रधान : ऐसे नाटक जिनमें नाटककार का प्रधान उद्देश्य किसी प्रसिद्ध कथा को उपस्थित करना रहता है। २. चरित्र-प्रधान : चरित्र-प्रधान नाटक वे हैं, जिनमें नाटककार का उद्देश्य किसी विशिष्ट नायक अथवा नायिका के गुणों का विकास दिखाना हो या किसी व्यक्ति की निन्दा के माध्यम से उसके अवगुणों को समाज के सामने रखना हो। ३. व्यापार-प्रधान : व्यापार-प्रधान नाटक उनको कहते हैं, जिनमें घटनाओं तथा क्रियाओं का बाहुल्य हो और संवाद कम हों। ऐसे नाटकों में त्रियाओं के फलस्वरूप कोई विशेष स्वाभाविक एवं अनिवार्य फल प्राप्त होता है। इस प्रकार के मौलिक नाटकों की सर्वश्रेष्ठता स्वीकार की गई है। वास्तविक नाटकीयता तथा नाट्य-कौशल ऐसे ही नाटकों में परिलक्षिन होती है।

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४. संगीत-प्रधान : संगीत-प्रधान नाटकों में गीत, वाद्य, नृत्य आदि के माध्यम से ही नाट्य-व्यापार दिखाया जाता है। ५. उद्दश्य प्रधान : जिस नाटक में किसी उद्दश्य का प्रतिपादन किया जाय, उसे उद्दश्य-प्रधान नाटक कहा जाता है।

६. संवाद-प्रधान : संवाद-प्रधान नाटकों में संवाद के ही माध्यम से अधिकांश नाटकीय व्यापार सिद्ध होते हैं। ऐसे नाटकों में भाषा-शैली पर अधिक ध्यान दिया जाता है। ७. वातावरण-प्रधान : जिस नाटक में एक विशिष्ट वातावरण की सृष्टि की जाय, उसे वातावरण-प्रधान नाटक कहा जाता है। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने प्रथम छह प्रकार के नाटकों का विवेचन किया है, परन्तु अन्तिम प्रकार (वातावरण-प्रधान) के नाटकों का उल्लेख नहीं किया है। मैं समझता हूँ कि वातावरण-प्रधान नाटकों का एक विशेष वर्ग रखना अच्छा होगा। परन्तु, यदि सुविधा की दृष्टि से देखा जाय, तो निम्नलिखित भेदों में सभी का समन्वय हो जा सकता है : १. नृत्त-नाटक, २. नृत्य-नाटक, ३. गीति-नाटक, ४. ऐतिहासिक- नाटक, ५. सामाजिक नाटक, ६. धार्मिक तथा पौराणिक नाटक, ७. एकांकी, ८. स्वोक्ति- नाटक और ९. रेडियो-नाटक। विशेष प्रकार के रूपक : सामान्यतः प्रचलित रूपकों या नाटकों के अतिरिक्त कुछ विशेष प्रकार के नाटक होते हैं, जिनकी चर्चा आवश्यक प्रतीत होती है। उनका ग्रथन कुछ भिन्न प्रकार का होता है। १. नाट्य-नृत्य : नाट्य-नृत्य के रचना-विधान में निम्नलिखित दो अंग होते हैं : (क) कथा, (ख) नृत्य-संकेत। नाट्य-नृत्य में जो कथा दी जाती है, वह अत्यन्त काव्यमयी तथा प्रभावमयी होती है। यह बहुत स्पष्ट कथा सरल भाषा में लिखी जाती है, जिसे कोई चतुर सूत्रधार अथवा कोई विशेष व्यक्ति-स्थापक या प्रस्तोता-कहता है। इसके दूसरे अंक में नृत्य-नृत्त-संकेत, वाद्य-संकेत और ताल-संकेत दिये जाते हैं। उसमें यह बताया जाता है कि कथा की किस घटना को किस प्रकार के नृत्य के सहारे किस वाद्य के किस राग, ताल, गति आदि के द्वारा प्रस्तुत किया जाय। २. गीति-नाट्य : गीति-नाट्य के निम्नलिखित अंग स्वीकृत हैं : (क) प्रस्तावना, (ख) कथा, (ग) संवादाभिनय, (घ) गीत, (ङ) नर्त्तन। गीति-नाट्य में सब कुछ गीतों के ही सहारे होता है। ये गीत स्वयं अभिनेता नहीं गाते, प्रत्युत एक गायक-मण्डली के द्वारा गाये जाते हैं। गायक-मण्डली में प्रत्येक पात्र के

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गायक प्रतिनिधि होते हैं, जो उन पात्रों के संवाद या अंश गाते हैं। पात्र केवल गीत-भाव का अभिनय करता चलता है। कथा-भाग का जो अंश संवाद के अतिरिक्त रहता है, उसे व्यक्त करने के दो उपाय काम में लाये जाते हैं-१ या तो गायक-मण्डली उसे गीत के द्वारा व्यक्त करती है या २. भावनट या भावनटी आकर नृत्य द्वारा व्यक्त करती है। अभिप्राय यह है कि गीति-नाट्य को प्रस्तुत करने में तीन दल होते हैं-१. अभिनेता, २. भावनट या भावनटी अथवा कथाभिनेता, ३. गायक और वादक-मण्डली के दो दल, जिनमें से एक पात्र-प्रतिनिधि होता है और दूसरा दल समवेत गायक होता है। गीति-नाट्य की प्रस्तावना में केवल कथा-विषय दे दिया जाता है, अर्थात् मुख्य पात्र अथवा घटना का परिचय गीत और नृत्य में दे दिया जाता है। परिचय देने का यह कार्य भावनटी अपने नर्तन से सम्पन्न करती है। मुख्य गीति-नाट्य में कतिपय तत्त्व होते हैं-१. कुछ गीतिमय संवाद, २. विभिन्न दृश्यों के बीच की शृंखला जोड़ने के लिए कुछ कथा, ३. विशेष अवसरों के मानसिक आवेगों को प्रकट करनेवाले कुछ गीत, ४. कुछ गीत-रहित नृत्य। नाटककार उचित स्थान पर पद्यमय कथा-भाग देकर संकेत करता है कि इसे भावनटी नृत्य द्वारा प्रस्तुत करेगी, अथवा गायक ही गाकर समझा देंगे। गीति-नाट्य के संवाद भी गीतिमय होते हैं और गद्य-नाटक के ही समान इसमें पात्रों का उल्लेख होता है। जिस स्थल पर किसी पात्र का विशेष भावावेश अथवा मानसिक आवेग दिखाना अभीष्ट हो, वहाँ गीत की योजना की जाती है। जिस स्थल पर संवादहीन उत्सव आदि या विशेष उपद्रव आदि दिखाना अभीष्ट हो, वहाँ केवल नृत्य का संकेत होता है। जहाँ कहीं कोई विशेष रंग-निर्देश करना होता है (जैसे 'युद्ध होता है' या 'अमुक पात्र घोड़े पर चढ़ा प्रवेश करता है') वहाँ वह संकेत गद्य में ही किया जाता है। ध्यान इस बात पर विशेष रूप से देना है कि संवाद- विधान बहुत कम होना चाहिए। ३. मूक नाट्य : मूक नाट्य में दो अंग होते हैं-(क) कथा या प्रस्तावना; (ख) अभिनय। यदि कथा अप्रसिद्ध हो तो सारी कथा पहले ही दे देने से सुविधा होती है और यदि कथा प्रसिद्ध है तो उसके विषय में इतना अंश संकेत के रूप में दे देना आवश्यक है, जितने से कथा-प्रसंग समझने में आसानी हो। मूक नाट्य में गीत बिल्कुल ही नहीं रखा जाता। सभी पात्र कथा के क्रम के अनुसार रंगमंच पर प्रवेश करके बारी-बारी से कथा को कोमल आंगिक अभिनय से प्रकट करते हैं। अभिनय के बीच-बीच में यदि आवश्यकतानुसार नर्त्तन का प्रबन्ध हो, तो उसके साथ वाद्य का प्रयोग किया जाता है। ऐसे भी दीर्घ मौन की एकरसता दूर करने के लिए पक्ष-वाद्य, पृष्ठ-संगीत या वाद्य-ध्वनि सुनाई देती रहती है। सुविधा के लिए यह संकेत कर देना आवश्यक है कि कब-कब किस- किस राग और ताल में किन वाद्यों का प्रयोग किया जाय।

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परम्परा और आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त : नव्य रूपान्तर के कारण [५८७ ४. मूक संवाद-नाट्य : साधारण नाटक और मूक संवाद-नाट्य की रचना में कोई मौलिक अन्तर नहीं रहता, केवल उनके प्रस्तुत करने के ढंग में अन्तर हो जाता है। साधारण नाटक में तो अभिनेता ही संवाद और अभिनय दोनों-कार्य करते हैं, परन्तु मूक संवाद-नाट्य में ऐंसा नहीं होता। मूक संवाद-नाट्य में संवाद का पाठ तो नेपथ्य में प्रत्येक पात्र के प्रतिनिधि संवाद-पाठक करते हैं और रंगमंच पर पात्रों की भूमिका में जो व्यक्ति रहते हैं, वे केवल अभिनय करते हैं। इसे ही नेपथ्य-वाक् या Play back कहा जाता है। आजकल चलचित्र में इस Play back का प्रयोग गीत गाने में खूब होता है। संगीत-ज्ञान- रहित कोई अभिनेता रंगमंच पर केवल अभिनय करता है और उसके लिए दूसरा व्यक्ति अदृश्य रूप से गीत गा दिया करता है। ५. श्रव्य नाट्य (रेडियो-नाटक) : रेडियो-नाटक इस युग का नवीन आविष्कार तथा पश्चिम की देन है। हमारे देश पर भी पश्चिम का प्रभाव पड़ा है और रेडियो-नाटक लिखे जा रहे हैं। नाटक दृश्य और श्रव्य दोनों हो सकते हैं, परन्तु रेडियो पर जो नाटक खेले जाते हैं, वे तबतक श्रव्य ही रहेंगे जबतक टेलीविजन का पूरा प्रचार नहीं हो जाता। ऐसे श्रव्य नाटकों के चार अंग होते हैं -- १. सूचना, २. संवाद, ३. ध्वनियुक्त व्यापार- योजना और ४. संगीत (गीत, वाद्य तथा नृत्य)। इसकी रचना में सूचना का विशेष महत्त्व है। इसकी रचना करते समय संवाद को छोड़कर सभी कार्यों को सूचक के द्वारा अवसर के अनुसार सूचित कराते जाना आवश्यक हो जाता है। इसकी सूचना की भाषा अत्यन्त काव्यमय और प्रभावशाली, किन्तु साथ ही सरल, होनी चाहिए। सूचक उसे पढ़ते समय स्वर के उतार-चढ़ाव के सहारे उसका भाव स्पष्ट करता चलता है। श्रव्य नाटक में भी साधारण नाटक के ही समान रंग-निर्देश तथा संवाद-कार्य होता है, किन्तु इसमें संवाद इस प्रकार का बनाया जाता है कि अधिक-से-अधिक वाचिक अभिनय का अवसर मिले। किन्तु, इसका तीसराअंग-ध्वनियुक्त व्यापार-योजना -- सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तथा ध्यान देने का विषय है। साधारण दृश्य नाटकों में तो अभिनेता की सभी क्रियाएँ दर्शकों की आँखों के सामने होती रहती हैं, इसलिए वहाँ किसी प्रकार की असुविधा नहीं उपस्थित होती। किन्तु श्रव्य नाटक में पात्रों का उठना-बैठना, चलना-फिरना तो देखा नहीं जा सकता और सभी कार्यों की सूचना भी नहीं दी जा सकती। यदि सभी कार्यों की सूचना दी जाने लगे तो भावधारा पग-पग पर टूट जा सकती है। इसलिए, प्रायः ध्वनियुक्त व्यापारों की योजना करनी होती है, जिससे श्रोता उस व्यापार को सुनकर समझ सके। घोड़े की टाप, घड़ी की टिक-टिक ध्वनि, मोटर का भोंपा, किवाड़ की भड़भड़ाहट, कई जीवों की बोली, तलवारों की खनखनाहट, पिस्तौल और बन्दूक की आवाज, रेलगाड़ी और वायुयान की आवाज, बरतन माजना आदि ऐसी ध्वनियाँ हैं, जिन्हें श्रोता स्पष्ट रूप से सुन सकें।

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साधारण नाटकों के ही समान श्रव्य नाटकों में भी संगीत का आयोजन होता है। किन्तु, यह स्पष्ट रूप से संकेत रहता है कि कहाँ किस राग और ताल में किस लय में किस वाद्य के साथ नृत्य अथवा गीत हो, या केवल वाद्य अथवा केवल नृत्य हो। रेडियो- नाटक के फीचर आदि कई भेद हो गये हैं। नाटक में पद्य का प्रयोग : कतिपय नाट्याचार्यों का मत है कि नाटक में गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग वांछनीय है। संस्कृत-नाटकों के संवादों में गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग हुआ है। जहाँ कहीं नाटककार को प्रकृति का वर्णन या सौन्दर्य का वर्णन करना हुआ या कोई उपदेश देना हुआ या किसी भाव अथवा रस की अभिव्यक्ति करनी हुई, वहाँ स्वच्छन्दता से पद्य का प्रयोग किया गया है। केवल कुछ ही बातें गद्य में कही गई हैं; जैसे नमस्कार, आशीर्वाद, शिष्टाचार-वाक्य, आदेश, प्रस्ताव आदि। किसी-किसी नाटककार को तो पद्य का यह रोग इस सीमा तक लग गया है कि 'अपि च', 'तथाहि' आदि लिखकर पद्यों की संख्या इतनी अधिक कर दी गई है कि पाठक या दर्शक का मन ऊब जाता है और वह नीरसता का अनुभव करने लगता है। पारसी रंगमंच पर भी जो नाटक-प्रस्तुत किये गये, उनमें भी पग-पग पर पद्य का प्रयोग होता था। अमानत का नाटक इन्दर-सभा तो बिल्कुल पद्य में ही लिखा गया है, उसके सभी संवाद पद्य में ही हैं। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के पन्द्रहवें अध्याय के ११८-११९वें श्लोकों में तथा सत्रहवें अध्याय के अन्तिम कई श्लोकों में पद्य-प्रयोग का विधान किया है, पर उन्होंने यह नहीं बताया कि कितना तथा कौन-सा अंश पद्यमय हो और कितना गद्यमय हो। यह निर्णय करना नाटककार पर छोड़ दिया गया है। गद्य और पद्य के प्रयोग के विषय पर हमें दो दृष्टियों से विचार करना चाहिए। एक तो प्रभाव की दृष्टि है और दूसरी है स्वाभाविकता की दृष्टि। प्रभाव की दृष्टि से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि पद्य अधिक प्रभावकारी होता है। पद्य का प्रभाव इतना अधिक और व्यापक होता है कि इसे सुनकर श्रोता उल्लसित हो जाता है और पद्यबद्ध होने के कारण कोई उक्ति श्रोता या दर्शक की स्मृति पर चिरस्थायी भी हो जाती है। यह शक्ति गद्य में कभी नहीं आ सकती। नाटक का एक उद्दश्य उपदेश भी है-इस दृष्टि से आवश्यक है कि नाटक में जो बातें कही जायँ, वे इस शैली में कही जायँ कि लोग उन्हें सुविधापूर्वक स्मरण रख सकें और अवसर आने पर उनका उपयोग करके अपना तथा अन्य लोगों का भी कल्याण करने में समर्थ हों। संस्कृत-नाटकों के असंख्य पद्य आज भी पण्डितों के जिह्वाग्र पर हैं, जिनका उपयोग वे यथावसर किया करते हैं। किन्तु, स्वाभाविकता की दृष्टि से विचार करने पर मानना होगा कि पद्य का प्रयोग होना ही नहीं चाहिए। नाट्य यदि अवस्थानुकृति है, तो नाटक में पद्य सर्वथा अस्वाभाविक है; क्योंकि सामान्य जीवन में कहीं भी वार्त्तालाप या साधारण व्यवहार में मद्य का प्रयोग नहीं होता। हाँ, इतना अवश्य होता है कि वार्तालाप के प्रसंग में कभी

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कभी उदाहरण-रूप में किसी कवि की सूक्ति कह दी जाती है। यदि इस प्रकार से पद्य का प्रयोग किया जाय, तो उसे उचित और स्वाभाविक मान सकते हैं, परन्तु उसकी भी सीमा होनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति बात-बात में कवियों के पद्य उद्ध त नहीं करता रहता। कभी- कभी प्रसंगवश गद्यात्मक वार्त्तालाप में एक-आध पद्य कह दिया जाता है। अतः स्पष्ट है कि स्वाभाविकता की दृष्टि से नाटकीय संवाद में पद्य का प्रयोग सर्वथा अनुपयुक्त है। पद्य या गद्य के प्रयोग के विषय में लोकरुचि को भी ध्यान में रखना होता है। संस्कृत-नाटकों में पद्य का बाहुल्य देखकर अनुमान किया जाता है कि उस युग में जनता श्लोक अधिक पसन्द करती थी। यूनान और रोम के नाटकों में भी पद्य का बाहुल्य था; क्योंकि वहाँ के नाटक प्रायः गाकर ही अभिनीत होते थे। परन्तु, आज का युग गद्य का युग है और साथ ही स्वाभाविकता का युग है। आधुनिक युग के लोग नाटक में पद्य के प्रयोग को अनुचित, अस्वाभाविक और निरर्थक मानते हैं। इस मान्यता का उत्तरदायित्व, कुछ अंश में, वर्त्तमान स्वाभाविक अभिनय-कला पर भी है। जब अभिनेता पद्यमय संवादों में अभिनय करता था, तो उसे अतिनाट्य या अपनाट्य का आश्रय लेना ही पड़ता था। स्वाभाविक अभिनय में पद्यात्मक संवाद ठीक से बैठ ही नहीं सकते। अतः निष्कर्ष-रूप में कह सकते हैं कि नाटक में संवाद केवल गद्य में ही रखा जाना चाहिए। पद्य का प्रयोग उन्हीं स्थलों पर किया जाय, जब कोई उपदेश देना हो या कोई सिद्धान्त कहने की आवश्यकता हो, और उपदेश तथा सिद्धान्त भी इस रूप में कहे जायँ कि अस्वाभाविक नहीं जान पड़ें। हिन्दी के आधुनिक नाटककार अपने नाटकों के संवाद में कभी पद्य का प्रयोग नहीं करते। आरम्भ में भारतेन्दु-युग के नाटककारों ने पद् का प्रयोग विशेषतः वर्णन करने में किया। पारसी रंगमंच के नाटकों में संवाद में पद्य का प्रयोग बहुत किया गया। बाद के लेखकों-माखनलाल चतुर्वेदी, मैथिलीशरण गुप्त आदि-ने संवाद में भी कुछ अंश में पद्य का व्यवहार किया। परन्तु, आजकल के जितने भी नाटककार हैं, उनमें कोई भी अपने नाटकों के संवाद में पद्य का व्यवहार नहीं करता है। पद्य की परम्परा समाप्त हो गई है और आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त में पद्य अस्वाभाविक और निरर्थक समझा जाता है। गीत : नाटक के कथोपकथन में अब पद्य तो दिये ही नहीं जाते, परन्तु गाने योग्य पद्य अब भी दिये जाते हैं। नाटककार की रुचि पर ही निर्भर करता है कि वह गीत कम दे या अधिक। प्रसादजी के नाटकों में गीतों का आवश्यकता से अधिक प्रयोग किया गया है। साथ ही उन्होंने अपने कई नाटकों के अन्त में गीतों की स्वरलिपि भी दे दी है। ऐसे नाटककार शायद समझते हैं कि प्रत्येक पाठक गायक होगा और यदि स्वरलिपि नहीं दी जायगी, तो उसे यह खटकेगा। परन्तु, वस्तुस्थिति तो यह है कि

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कुशल गायक स्वर-लिपि के विना भी अपना काम चला लेता है, इसलिए स्वरलिपि देना अनावश्यक है। परन्तु, नाटक में अधिक गीत देना अस्वाभाविक तथा अनावश्यक है। भारतीय नाटकों में गीतों का एक विचित्न आडम्बर देखने को मिलता है। जब नाटक में कोई पात गीत गाता है, तो हमें देखना चाहिए कि क्या सचमुच ऐंसा व्यक्ति इस अवसर पर स्वाभाविक रूप में गीत गा सकता है? प्रायः ऐसा देखा जाता है कि प्रसादयुगीन नाटकों में अनुचित अवसर पर पात् गीत गाया करता है। आज का नाटककार ऐसा अस्वाभाविक समझकर इसे छोड़ चुका है। इस विषय में एक दूसरा प्रश्न यह होता है कि पात्र या अभिनेता जो गीत गायगा, वह तुरन्त अपना बनाया गीत कैसे गा लेगा ? स्वाभाविक जीवन में हम देखते हैं कि ऐसे अवसरों पर कोई व्यक्ति कोई पुराना ही गीत गाता या गुनगुनाता है। यह तुरन्त का बनाया गीत गाना नाटक में अस्वाभाविकता ला देता है। नाटक का परिमाण : आधुनिक नाटककार के सामने एक समस्या है कि नाटक कितना बड़ा हो। एक समय था जब नाटक देखने के लिए लोग रात-भर बैठे रह जाते थे, परन्तु आज का जीवन इतना व्यस्त हो गया है, जीवन-संग्राम इतना उग्र और जटिल हो गया है कि कोई भी व्यक्ति केवल मनोरंजन के नाम पर उतना समय नहीं व्यय कर सकता। चलचित्र के आविष्कार के कारण बहुत कम द्रव्य व्यय करके कोई भी व्यक्ति बहुत थोड़े समय में अपना मनोरंजन कर लेता है। इस दशा में अधिक पैसे और अधिक समय व्यय करके नाटक देखने में उसकी प्रवृत्ति किस प्रकार हो सकती है? घर-घर में रेडियो लग जाने के बाद तो घर बैठे नृत्य, गीत, काव्य, संवाद आदि सुनने को मिल जाते हैं और रेडियो-रूपकों के माध्यम से श्रव्य नाटक भी सुनने को मिल जाते हैं। इसलिए, नाटककारों के लिए आवश्यक हो जाता है कि सस्ते नाटक तैयार किये जायँ, साथ ही वे नाटक ऐसे हों कि कम ही समय में उनका अभिनय भी सम्पन्न हो जाय। इसके लिए आचार्य सीताराम चतर्वेदी ने तीन उपायों की ओर संकेत किया है। वे उपाय निम्नलिखित हैं : १. नाटक ढाई घण्टे में समाप्त किया जाय, अधिकतम समय चार घण्टे का दिया जा सकता है, इससे अधिक समय तो किसी भी प्रकार नहीं लगना चाहिए। २. नाटक में कम ही पात्रों का समावेश किया जाय, जिससे उनकी वेशभूषा, साज-सज्जा, शिक्षा आदि में कम ही सामग्री और समय व्यय हो। ३. नाटक में बहुत कम ही दृश्य रखे जायँ, जिससे दृश्य-विधान में कम ही द्रव्य व्यय हो। यदि इन तीन बातों की व्यवस्था हो जाती है, तो नाटक के प्रबन्धकों को नाटक खेलने में बहुत सुविधा होगी। वे बहुत सुगमता से अभिनेताओं का चुनाव कर सकेंगे और उन्हें उचित प्रशिक्षण बहुत मनोवेग से दे सकेंगे। एक लाभ यह भी होगा कि बहुत व्यस्त जीवनवाले व्यक्ति भी थोड़े समय में समाप्त होनेवाले नाटक देखने का समय

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निकाल सकेंगे और उसकी व्यवस्था करने में किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव नहीं होगा। एक बहुत बड़ा लाभ तो यह होगा कि चलचित्र के समान एक दिन में दो-दो या तीन-तीन खेल बहुत सुविधापूर्वक दिखाये जा सकेंगे। यूरोप में छोटे नाटक खेलने का आन्दोलन ही चल निकला है। उसका लक्ष्य है कि छोटे-छोटे रंगपीठ हों, जिन्हें सुविधापूर्वक एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जा सकें, उनपर खेले जानेवाले नाटक भी लघुकाय हों, उनमें पात्र भी कम ही हों और दृश्य- विधान अत्यन्त सरल तथा साधारण हों। नाट्यकला के सम्यक् उद्धार के लिए हमारे देश में भी ऐसे नाटकों की नितान्त आवश्यकता है। किन्तु, बड़े नगरों में बड़ी-बड़ी रंगशालाओं का निर्माण हुआ है या हो सकता है, उनके लिए बड़े नाटकों की रचना की जा सकती है। किन्तु, इस बात पर पूरा ध्यान रखना चाहिए कि अभिनय में लगनेवाला समय कम हो, दृश्य सरल हो और कम ही अभिनेताओं द्वारा नाटक खेला जा सके। इन बातों पर ध्यान रखकर ही किसी नाटक की रचना होनी चाहिए। नाटक का नामकरण : कथावस्त की रचना कर लेने पर नाटक का नाम रखा जाय या नाम रख लेने के बाद कथावस्तु की रचना की जाय-दोनों में अधिक अन्तर नहीं पड़ता। किन्तु, अधिक अच्छा यह होता है कि कथावस्तु की रचना कर लेने पर ही नाटक का नामकरण किया जाय। कथावस्त की रचना करते समय उसमें ऐसे व्यापार आसकते हैं, जिनके कारण नामकरण में सुविधा हो सकती है। ऐतिहासिक नाटकों में पात्र की भी प्रधानता होती है, परन्तु प्रायः ऐंसा होता है कि नाटक की प्रकृति उस पात्र के नाम से उतनी स्पष्ट नहीं होती, जितनी किसी विशेष घटना से होती है। उदाहरण के लिए 'उरुभंग' नाटक का प्रधान पात्र भीमसेन है और इस नाटक का नाम 'भीमसेन' भी हो सकता था, परन्तु उरुभंग ऐसी विशिष्ट घटना है, जिससे यही नाम सर्वाधिक उचित जान पड़ता है। इसी प्रकार, 'अभिज्ञान शाकुन्तल' का नाम दुष्यन्त या शकुन्तला कुछ नहीं रखा गया, प्रत्युत इसका नाम अँगूठी के कारण ही रखा गया; क्योंकि समस्त घटना के प्रवाह का आधार वही अँगूठी-रूपी अभिज्ञान है। नाटकों के नामकरण में निम्नलिखित सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जा सकता है : १. नायक-प्रधान या पात्र-प्रधान नाटकों का नामकरण नायक या पात्र के नाम पर होना चाहिए; जैसे चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त आदि। यदि किसी नाटक में नायक और नायिका दोनों ही प्रधान हों, तो दोनों के सम्मिलित नाम से नाटक का नाम रखा जाना चाहिए, जैसे विक्रमोर्वशीय, मालती-माधव आदि। २. व्यापार-प्रधान या घटना-प्रधान नाटकों का नामकरण मुख्य घटना के आधार पर करना चाहिए; जैसे वेणीसंहार, उरुभंग, सुभद्राहरण, मध्यम व्यायोग। प्रहसन या व्यंग्यात्मक नाटक में घटना के ही आधार पर नामकरण होना चाहिए; जैसे सूम के घर

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धूम, मत्तविलास-प्रहसन। किन्तु, भवभूति के महावीरचरित के समान नहीं होना चाहिए, जिसमें रामचन्द्र का सम्पूर्ण चरित आ जाय। ३. जिन नाटकों में पात्र और घटना -- दोनों की प्रधानता हो, उनका नामकरण पात्र और घटना, दोनों के आधार पर होना चाहिए; जैसे अभिज्ञान शाकुन्तल, स्वप्नवासवदत्ता। ४. यदि नाटक में समुदाय-विशेष या जाति-विशेष की कोई वृत्ति दिखाई गई हो तो उस समुदाय या जाति से सम्बद्ध नामकरण किया जा सकता है; जैसे कायस्थ-कौशल, नाई की करतूत, मर्चेण्ट ऑफ वेनिस। ५. उद्देश्य-प्रधान नाटकों का नामकरण उद्देश्य या परिणाम के अनुसार किया जाना चाहिए; जैसे विश्वास, बलिदान, परित्याग, मंगलप्रभात, सत्य की विजय आदि। ६. कभी-कभी वस्तु या स्थान के नाम पर नाटक का नामकरण होता है, क्योंकि वे ही वस्तु या स्थान नाटकीय पात्रों या घटनाओं के कार्यकलाप के आधार होते हैं-जैसे हीरे का हार, हाथी-दाँत का डब्बा, रूमाल। यदि ऐसा स्थान हो, जहाँ एक ही विशिष्ट घटना हुई हो तो उस स्थान के नामानुसार नाटक का नाम रखा जाना चाहिए; जैसे चित्रकूट, कुरुक्षेत्र, नन्दिग्राम। यदि किसी स्थान पर अनेक विशिष्ट घटनाएँ हुई हों, तो नाटक का नाम उस स्थान पर नहीं रखना चाहिए; क्योंकि पता नहीं चलेगा कि नाटक का सम्बन्ध किस घटना से है। वृन्दावन, मथुरा, अयोध्या आदि स्थान कृष्ण तथा राम के जीवन से सम्बद्ध हैं, परन्तु वहाँ अनेक घटनाएँ हुई हैं, अतः उनके नाम पर नाटक का नामकरण करने से स्पष्टता के स्थान पर भ्रान्ति ही होगी। ७. प्रतीकात्मक नाटक के नाम से उसके विषय की स्पष्ट ध्वनि होनी चाहिए, जैसे प्रबोधचन्द्रोदय। कहने का अभिप्राय यह है कि नाटक का नामकरण ऐसा होना चाहिए कि दर्शक को उसका नाम सुनने-मात्र से विषय का आभास हो जाय और वह उस नाटक को देखने के लिए उत्कण्ठित हो जाय। पौराणिक तथा ऐतिहासिक नाटकों के नाम तो प्रायः व्यक्तियों तथा स्थलों के नाम पर रखे जाते हैं, परन्तु मौलिक सामाजिक नाटकों में पात्र या स्थान के बदले घटना या परिणाम के अनुसार नाम रखना उचित तथा उपादेय सिद्ध होता है। इन नामों को इतना आकर्षक बनाने का प्रयत्न करना चाहिए कि दर्शक इन नाटकों को देखने के लिए स्वयं आकर्षित हो जाय। ऐसे कुछ नाम निम्नलिखित हैं- अंगद का पैर, राक्षस का पिता, हत्यारा, पिशाच, प्यार के आँसू, विश्वासघात, देवता, प्रतिहिंसा, अत्याचार, सती का शाप, आग की चिनगारी, हृदयमंथन, जीवित समाधि, स्वर्ग में नरक, नरक की आग आदि। खण्डित वाक्यों या पूर्ण वाक्यों में भी नाटक का नाम रखने की प्रथा चल पड़ी है; जैसे वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति, मैं तुम्हारा हूँ, जब तारे भी रोये थे, यह आपका पत्र है, ऊषा कब उदय होगी, चलो दिल्ली, बादल बरसेंगे आदि।

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आवेशपूर्ण तथा रोमांचकारी घटनाओं से भरे नाटकों के लिए इस प्रकार के नाम विशेष उपयुक्त जान पड़ते हैं। दृश्य-संकेत : संस्कृत के नाटकों में और हिन्दी के भी आरम्भिक नाटकों में दृश्य के आरम्भ में स्थान, समय एवं उपस्थित पात्ों की संक्षिप्त सूचना एक-दो पंक्तियों में दे दी जाती थी। परन्तु, आधुनिक नाटकों में यूरोपीय नाटकों के समान कई पृष्ठों तक के लम्बे विवरण दृश्यों के आरम्भ में दिये जाते हैं। ऐसे विवरणों में सभी बातों का विस्तृत वर्णन रहता है। कमरा, उपवन, दरबार, युद्धस्थल, दफ्तर आदि स्थानों की पूरी सजावट के साथ पात्रों की साज-सज्जा, शृंगार आदि का वर्णनात्मक विवरण दिया जाने लगा है। संस्कृत-नाटकों में सभी वस्तुएँ रंगमंच पर नहीं दिखाई जाती थीं; बहुत-कुछ कल्पना से काम लिया जाता था, परन्तु आजकल रंगमंच पर सभी दृश्य दिखाने का प्रयास किया जाता है। इसीलिए इतनी विस्तृत दृश्य-योजना की आवश्यकता पड़ती है। ऐसा यूरोप के प्रत्यक्ष प्रभाव के कारण हुआ है। नाटक में चतुर्थ आयाम (फोर्थ डाइमेन्सन) : प्राचीन तथा मध्यकाल के सभी भारतीय तथा पाश्चात्त्य नाटक दो आयामवाले होते थे। रंगमंच पर केवल दो आयाम- लम्बाई और चौड़ाई-होते थे, अर्थात् कोई पात्र रंगमंच पर चल, फिर, दौड़ सकता था। रंगमंच पर तीसरे आयाम-मोटाई या गहराई-का न कोई नाटक लिखा जाता था और न खेला जाता था, अर्थात् ऊपर चढ़ने या नीचे उतरने का कोई दृश्य नहीं दिखाया जाता था। यहाँ तक कि यूरोप की कठपुतलियाँ भी दो ही आयामों की बनाई जाती थीं। उनमें लम्बाई और चौड़ाई होती थी, परन्तु मोटाई नहीं होती थी। परन्तु, भारतवर्ष की कठपुतलियों में बहुत प्राचीन काल से ही मोटाई भी होती थी। आधुनिक युग में स्कैण्डेनेविया के कुछ नाटककारों ने आन्दोलन चलाया कि नाटक में तीसरे आयाम का भी समावेश होना चाहिए। जब सामान्य जीवन में हम सीढ़ी के सहारे मकान की ऊपरी मंजिल पर चढ़ते हैं और अन्यों को चढ़ते देखते हैं, पेड़ पर चढ़ते हैं, नीचे गहराई में उतरते हैं, तो फिर नाटक में इसका प्रदर्शन क्यों नहीं किया जाय? परिणामस्वरूप आधुनिक नाटककारों ने अपने नाटकों में ऐसे दृश्य दिखाना आरम्भ किया। भारतीय भाषाओं-विशेषतः हिन्दी-में भी ऐसे नाटक लिखे और खेले जाने लगे, जिनमें तीसरा आयाम भी दिखाया गया है। आधुनिक नाटकों में ऐसे दृश्य बहुतायत से दिखाये जाने लगे। किन्तु, आधुनिक नाटककारों को इतने से सन्तोष नहीं हुआ। ओनील ने चतुर्थ आयाम भी खोज निकाला और इसका प्रयोग भी किया। यह चतुर्थ आयाम मनोविज्ञान से सम्बन्ध रखता है। हम प्रायः देखते हैं कि कोई व्यक्ति बहुत प्रेमपूर्वक बातें कर रहा है, ऐसा भी होता है कि ऊपर से तो प्रेम की बातें करता है, परन्तु वह अपने मन में सोच रहा है कि अवसर मिले तो इस व्यक्ति को गोली मार दूँ। वह वही नहीं है, जो बाहर दीखता है; उसके मन में कुछ बात है, परन्तु बाहर दिखाता कुछ और है। यह उस चतुर्थ आयाम के ही कारण होता है।

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५९४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त। उद्भव और विकार्स इस चतुर्थ आयाम का अच्छा उदाहरण आचार्य सीताराम चतुर्वेदी का मनोवैज्ञानिक नाटक 'पाप की छाया' है, जिसमें इसके नायक कमलाकान्त के मन में उठनेवाले मानसिक द्वन्द्व का सुन्दर विश्लेषण कई स्थानों पर किया गया है। आजकल इस चतुर्थ आयामवाले कई नाटक हिन्दी में लिखे गये हैं और धड़ल्ले से लिखे जा रहे हैं। निष्कर्ष : इन सारे सिद्धान्तों तथा तथ्यों का विवेचन करने के अनन्तर हम निम्नलिखित निष्कर्षों पर पहुँचते हैं : १. नाटक में अभिनेयता अवश्य होनी चाहिए, अर्थात् वह अभिनय के योग्य, खेलने-लायक हो, केवल पढ़ने के योग्य नहीं। २. उसमें एक ही प्रधान कथा अथवा इतिवृत्त होना चाहिए। ३. उसका अन्त सुखमय अथवा प्रसादयुक्त होना चाहिए। ४. नाटक में ऐसे दृश्यों का विधान नहीं होना चाहिए, जो अश्लील, कुरुचि-उत्पादक अथवा विनाशात्मक हों। ५. उसमें संवाद गद्यमय हो, पुराने नाटकों के समान पद्यमय नहीं। ६. गीतों का प्रयोग केवल उपयुक्त स्थलों पर हो, यह नहीं कि सस्ते मनोरंजन के लिए अनुचित स्थलों पर भी गीतों को भर दिया जाय। ७. नाटक ऐसा होना चाहिए, जिसका प्रदर्शन सुविधापूर्वक किया जा सके, ऐसा नहीं कि रंग-व्यवस्थापक की शक्ति के बाहर उसका प्रदर्शन हो। ८. नाटक के सफलतापूर्ण प्रदर्शन के लिए आवश्यक है कि उसके पात्र और दृश्य कम हों। ९. सफल नाटक में स्वगत भाषण, जनान्तिक, अपवारित तथा आकाश-भाषित का प्रयोग नहीं होना चाहिए। सभी संवाद सर्वश्राव्य हों। १०. नाटक ऐसा होना चाहिए, जो थोड़े समय में खेला जा सके, जिसके प्रदर्शन में दर्शकों के धैर्य की कठिन परीक्षा नहीं हो जाय। ११. नाटक में आरम्भ से लेकर अन्त तक कुतूहल व्याप्त रहना चाहिए, यह नहीं कि किसी प्रकार परिणाम दर्शकों को पहले ही ज्ञात हो जाय। इन सारी बातों को ध्यान में रखकर जिन नाटकों की रचना होगी, वे सफल होंगे; उनसे राष्ट्र का भी कल्याण होगा और नाट्यकला की भी रक्षा होगी। नव्य रूपान्तर के कारण ऊपर दिखाया जा चुका है कि प्राचीन तथा मध्यकालीन नाट्य-सिद्धान्त और आधुनिक नाट्य-सिद्धान्त में पर्याप्त अन्तर आ गया है। भारत का नाट्य-सिद्धान्त बहुत उन्नत रहा है, किन्तु आज उसका नव्य रूपान्तर हो गया है। इस नव्य रूपान्तर के कई कारण हैं। नीचे उन कारणों का निर्देश किया जा रहा है। १. पाश्चात्य नाट्य-प्रणाली का प्रभाव : उन्नीसवीं शती के उत्तराद्ध में भारत में राष्ट्रीय नवचेतना के साथ साहित्यिक जागरण के युग का भी आरम्भ हुआ। अँगरेजी शिक्षा के कारण हमारी अनेक रूढ़ियाँ ध्वस्त हो गई, जिनमें साहित्यिक रूढ़ियाँ भी थीं। नवीन शिक्षा ने जीवन में भी नवीनता का समावेश किया। इसका प्रभाव साहित्य पर भी पड़ना अवश्यम्भावी था। देश की सभी विकासोन्मुख भारतीय भाषाओं के नाट्य-साहित्य ने इस नवीनता के कारण अपने में परिवर्त्तन लाने का प्रयत्न किया।

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हमारी नाट्य-परम्परा अत्यन्त सम्पन्न थी और उसमें परिवर्त्तन होने की सम्भावना नहीं प्रतीत होती थी, परन्तु अँगरेजी-नाटकों तथा नाटककारों के प्रभाव से वह परम्परा भी छिन्न-भिन्न हो गई। फलस्वरूप भरत मुनि के निर्देश की उपेक्षा करके प्रायः सभी भारतीय भाषाओं में दुःखान्त नाटकों की रचना होने लगी। प्रेम-पद्धति भी यूरोपीय ढंग की हो गई, उन्मुक्त प्रेम को प्रोत्साहन मिलने लगा। देशोद्धार के लिए भी नाटककार उपयुक्त उपकरण जुटाने लगे। इस प्रकार नाटक की एक नवीन परम्परा चली, जिस पर अँगरेजी तथा अन्य पाश्चात्त्य नाट्यशास्त्र का पूर्ण प्रभाव निश्चित रूप से पड़ा। वस्तुतः, अॅगरेजी-नाट्यशास्त्र ग्रीक विद्वान् अरस्तू का अनुसरण करता है जबकि भारतीय नाट्यशास्त्र के आदिव्याख्याता भरत मुनि हैं। यदि दोनों आचार्यों द्वारा किये गये नाटक के लक्षणों की तुलना की जाय, तो स्पष्ट हो जायगा कि भारतीय तथा पाश्चात्त्य नाट्यशास्त्रों का नाटक के उद्दश्य में एक मत नहीं है। भरत मुनि अनेक रसों से युक्त काव्य को नाटक संज्ञा देते हैं, परन्तु अरस्तू भावों के रेचन पर बल देते हैं। दोनों के दृष्टिकोणों में पर्याप्त अन्तर है। भारतीय नाटक का साध्य रस है और साधन हैं-संवाद, संगीत तथा अभिनय; निमित्त हैं नट; भोक्ता हैं दर्शक; आधार है कथा। इन सबका संयोग करनेवाले नाटककार तथा नाट्य-प्रयोक्ता हैं। पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्त का भी प्रभाव आधुनिक भारतीय नाट्य-सिद्धान्त पर पड़ा है। उ स २. आधुनिक युग का व्यस्त जीवन : भारतीय नाट्य-सिद्धान्त में नव्य रूपान्तर के कारणों में आधुनिक युग का व्यस्त जीवन भी है। आज के कर्म-संकुल जीवन की भाग-दौड़ में किसी को इतना अवकाश नहीं मिलता कि वह बड़े-बड़े नाटक देखने में अपने बहुमूल्य समय के कई घण्टे लगाये। अतः, छोटे-छोटे नाटकों और एकांकियों का विकास हुआ। आज के दर्शक को न इतना समय है और न इतना धैर्य कि वह घण्टों बैठकर पूरा नाटक देखता रहे। परिणामस्वरूप नाटक लिखने के तन्त्र में परिवर्त्तन हुआ और छोटे नाटकों में लेखक अपनी सारी कला-चातुरी का प्रदर्शन करने लगे। ३. स्वाभाविकता की रक्षा : प्राचीन काल के नाटकों में कुछ ऐसे दृश्य या व्यापार होते थे, जो आज के दर्शकों तथा पाठकों को अस्वाभाविक लगते हैं; जैसे स्वगत भाषण, आकाश-भाषित आदि। आज का नाटककार स्वाभाविकता की रक्षा के लिए इन सब बातों का प्रयोग नहीं करता। आज के नाटक तथा अभिनय को अधिक-से-अधिक स्वाभाविक बनाने की चेष्टा की जाती है। प्राचीन नाटकों में यदि फूल चुनने का दृश्य दिखाना होता था, तो अभिनेता केवल संकेत से फूल चुनने का अभिनय या नाट्य करता था; परन्तु आज का अभिनेता सचमुच फूल चुनेगा-ऐसा दृश्य दिखाया ही नहीं जायगा। प्राचीन काल में यदि नदी-नाला पार करने का दृश्य होता था तो अभिनेता केवल कपड़े उठाकर चलने से नदी पार करने का अभिनय करता था, परन्तु आज के चलचित्रों में सचमुच नदी पार करके दिखाया जाता है और नाटकों में नदी पार

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५९६ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासें करने का दृश्य अस्वाभाविक समझकर नाटककार ऐसे दृश्य की अवतारणा ही नहीं करता। इसी प्रकार, अन्य दृश्य, जो रंगमंच पर स्वाभाविक रूप से नहीं दिखाये जा सकते, नाटक में नियोजित नहीं किये जाते और इस प्रकार स्वाभाविकता की रक्षा की जाती है। नाटककार ऐसा भरपूर प्रयत्न करता है कि नाटक में ऐसा कोई दृश्य नहीं आने पाये, जो अस्वाभाविक लगे। स्वाभाविकता की रक्षा के लिए आधुनिक नाटककार निम्नलिखित प्रयोग करते हैं : (क) स्वगत कथन और विशेषतः जनान्तिक का परित्याग। (ख) नाटकों से पद्य, गीत तथा नृत्य का बहिष्कार। (ग) लम्बे भाषणों का यथासम्भव बहिष्कार। (घ) अंकों की संख्या अधिक नहीं रखते। (ङ) पात्र कम ही रखे जाते हैं। हनाटकों को स्वाभाविक बनाने के लिए पूर्ण उद्योग करना चाहिए, परन्तु स्वाभाविकता के पीछे इतना पागल नहीं हो जाना चाहिए कि नाटक का मुख्य उद्देश्य ही पूर्ण नहीं हो सके। ४. मनोविज्ञान : आधुनिक युग मनोविश्लेषण का है और नाटककार अपने नाटकों में वे ही दृश्य दिखाता है, जो मनोविज्ञान की कसौटी पर खरेउतरें। नाटक के प्रत्येक पात्र का कार्य-कलाप मनोविज्ञान की सुदृढ़ शिला पर आधारित रहता है, वह कोई भी ऐसा कार्य नहीं करता या कोई भी ऐंसी बात नहीं कहता, जो मनोविज्ञान के विरुद्ध पडे। आज का नाटककार पात्रों के हृदय में होनेवाले अन्तर्द्वन्द्व तथा भावों के घात-प्रतिघात का मार्मिक चित्रण करता है। पहले के नाटककार इन बातों पर विशेष ध्यान नहीं देते थे। इधर फ्रायड के मनोवैज्ञानिक अनुसन्धानों का प्रभाव नाटक पर बहुत अधिक पड़ा है। उन अनुसन्धानों से मनोविज्ञान के जगत् में एक प्रकार की क्रान्ति हो गई है। आधुनिक नाटककार अपने नाटकों में उन सारी वस्तुओं का उपयोग करता है। जो नाटक मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के प्रतिकूल पड़ते हैं या जिनमें मनोविज्ञान का आधार नहीं होता, वे निकृष्ट कोटि के समझे जाते हैं। पागल ५. आर्थिक कारण : भारतीय नाट्य-सिद्धान्त के नव्य रूपान्तर के कारणों में एक प्रमुख स्थान आर्थिक कारण का भी है। किसी नाटक का अभिनय प्रस्तुत करने में काफी द्रव्य व्यय होता है। अभिनेताओं के अन्य आवश्यक व्ययों के अतिरिक्त दृश्य बनाने में भी बहुत व्यय होता है। यदि बहुत बड़ा और जटिल दृश्य बनाया जाय, तो बहुत अधिक व्यय की सम्भावना होती है। इसलिए, जो नाटक रंगमंच के लिए लिखे जाते हैं, उनमें नाटककार यही प्रयत्न करता है कि सीधे-सादे दृश्यों में ही नाटक लिखे जायँ या एक ही दो दृश्य बना लिये जायँ, जिनपर सम्पूर्ण नाटक का अभिनय समाप्त हो जाय। यदि प्रत्येक दृश्य में एक नया ही दृश्य-विधान किया जाय, तो व्यय बहुत अधिक होगा, साथ ही प्रत्येक दृश्य के बाद नया दृश्य बदलने में प्रयोक्ताओं को कठिनाई

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होगी और दर्शकों को भी विलम्ब के कारण असन्तोष होगा। अतः, आधुनिक नाटककार यथासम्भव सीधे-सादे और कम ही दृश्यों की योजना करता है। दृश्य-योजना के अतिरिक्त पात्रों के प्रशिक्षण, साज-सज्जा, वेशभूषा में भी काफी द्रव्य व्यय होता है। यदि नाटक में अधिक पात्ों की योजना की जायगी, तो अन्य कठिनाइयों के साथ द्रव्य की भी कठिनाई होगी। अतः, आजकल जो नाटक रंगमंच के लिए लिखे जा रहे हैं, उनमें कम ही पात्रों की योजना की जाती है। इसी प्रकार, सामाजिक नाटकों की अपेक्षा ऐतिहासिक नाटकों में अभिनेताओं की साज-सज्जा पर अधिक व्यय होने की सम्भावना है। आधुनिक नाटककार इन सारी बातों का ध्यान रखता है। ६. रेडियो का आविष्कार : आधुनिक नाट्य-विधा में रेडियो का बहुत अधिक महत्त्व है। रेडियो के आविष्कार से इस दिशा में एक प्रकार से क्रान्ति आ गई है। पहले संकेत किया गया है कि आजकल रेडियो पर कितने प्रकार के नाटक प्रसारित किये जा रहे हैं, उन नाटकों में दृश्य कुछ भी नहीं होता, सब कुछ श्रव्य होता है; ध्वनि के सहारे सभी नाटक खेले जाते हैं। ऐसे नाटकों के अनेक प्रकार हो गये हैं। रेडियो-रूपक, रेडियो-फीचर, ध्वनि-नाट्य, रिपोर्ताज आदि कई नाट्य-भेद रेडियो के कारण उत्पन्न हुए हैं। रेडियो-नाटक काव्य के दोनों भेदों-दृश्य तथा श्रव्य-का मिश्रित रूप है। इसके बन्ध दृश्य काव्य के ही समान रहते हैं, परन्तु इसमें ऐसे दृश्य नहीं रहतै, जो नेत्र- पथ से मन तक पहुँच जायँ। इसमें शब्दों के ही द्वारा कल्पना की सहायता से मानसिक चित उपस्थित किये जाते हैं। रेडियो-नाटक के लिए रंगमंच, यवनिका, वेशभूषा या प्रेक्षागृह-किसी भी वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। एक माइक्रोफोन तथा फेडर की सहायता से स्टूडियो में बैठा अभिनेता अपनी भूमिका अदा करता है और सैकड़ों-हजारों मील पर स्थित श्रोता नाटक का रसास्वादन करते रहते हैं। पतलून और टाई पहनकर भी अभिनेता अकबर या अशोक, या विश्वामित्र का पार्ट अदा कर सकता है और श्रोता को किसी भी प्रकार रस में व्यवधान नहीं होता। यदि ध्वनि का रेकार्ड कर लिया जाय, तो स्वयं अभिनेता भी अपना पार्ट सुन सकता है, रसास्वादन में किसी प्रकार बाधा नहीं होती। रेडियो-नाटक की सम्पूर्ण कला ध्वनि पर आधारित है और इसका समस्त कौशल माइक तथा फेडर पर निर्भर करता है। अतः, बहुत कम ही साधनों के सहारे रेडियो-नाटक अत्यन्त विशाल जन-समुदाय तक पहुँच जाता है। आजकल रेडियो के लिए काफी संख्या में नाटक लिखे जा रहे हैं। ये नाटक बहुत कम साधनों के द्वारा, सुविधापूर्वक, अत्यन्त विशाल जन-समुदाय के पास पहुँचाये जा सकते हैं, इसीलिए रेडियो-नाटकों की लोकप्रियता स्वभावतः बहुत तेजी से बढ़ रही है। अतः, दृश्य नाटकों की अपेक्षा ये श्रव्य नाटक बहुत अधिक संख्या में लिखे जा रहे हैं। वस्तुतः, नाट्य-सिद्धान्त के नव्य रूपान्तर में रेडियो का बहुत बड़ा हाथ है।

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५९= ] PT भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

७. बिजली आदि का आविष्कार : आजकल नाट्य-प्रयोग का ढंग बदल गया है। मध्ययुग में नाटक का अभिनय किसी ऊँचे स्थान पर खुले मैदान में हो जाता था, परन्तु आजकल बिजली के प्रभाव से रंगमंच पर अनेक प्रकार के साधनों के बल पर अति साधारण नाटक को भी अत्यन्त मनोहर बना दिया जाता है। आधुनिक युग का नट नाटककार के ही सदृश यशस्वी कलाकार माना जाता है। नव्य रूपान्तर पर इस बात का भी प्रभाव पड़ा है। 5. स्वतन्त्रता की प्राप्ति तथा सामयिक समस्याएँ : भारत में स्वतन्त्रता की प्राप्ति तथा जनतन्त्र की स्थापना के बाद यहाँ हिन्दी तथा अन्य प्रान्तीय भाषाओं के नाटकों में विषयवस्तु की दृष्टि से काफी परिवर्त्तन हुआ है। क्रान्तिकारी देशभक्तों की कहानियाँ, जो अबतक विदेशी शासन के कारण प्रकाश में नहीं आ सकी थीं, स्वतन्त्रता की प्राप्ति के बाद नाटक का विषय बनकर आई और उस विषय में अनेक नाटक रचे गये। इन नाटकों में अभिव्यक्त हिंसावादी देशभक्तों तथा अहिंसावादी महात्मा गांधी के जीवन-दर्शन में स्पष्ट अन्तर दिखाई पड़ता है। सन्त विनोबा भावे के भूदान-यज्ञ के आन्दोलन से भी आधुनिक भारतीय नाटक बहुत प्रभावित हुआ है। इस विषय को भी लेकर नाटक लिखे गये हैं। आजकल की सामाजिक समस्याओं को भी लेकर नाटकों का निर्माण हो रहा है। इस प्रकार, आधुनिक नाटक जन-जीवन का यथार्थ प्रतिबिम्ब उपस्थित कर रहा है। परन्तु, ये नाटक अधिक जटिल, बौद्धिक तथा गद्यमय होते जा रहे हैं। स्वातन्त्र्योत्तर युग में देश की चेतना तथा व्यवस्था में काफी परिवर्तन हुआ है। देश में बहुमुखी विकास-योजनाओं का कार्यान्वयन हुआ है, परन्तु व्यक्तिगत स्वार्थ एवं भ्रष्टाचार के कारण उनका अपेक्षित फल नहीं प्राप्त हो रहा है। औद्योगिक विकास के साथ ही परम्परागत सामाजिक तथा पारिवारिक व्यवस्था में भी परिवर्त्तन होता ही रहा है। देश के विभिन्न भागों में साम्प्रदायिक, क्षेत्रीय तथा भाषागत समस्याएँ आये दिन विकराल रूप में उपस्थित होती रहती हैं। अभिप्राय यह है कि देश की विविध तथा जीवन्त समस्याओं से हिन्दी-नाट्य-साहित्य पर्याप्त मात्रा में जीवन-रस ग्रहण कर सकता है। इस दिशा में बहुत-कुछ नाटक लिखे भी गये हैं। उदयशंकर भट्ट और उपेन्द्रनाथ अश्क इस सम्बन्ध में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। चीनी आक्रमण की भी बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी। इस प्रतिक्रिया की अभिव्यक्ति साहित्य की अन्य विधाओं के समान नाटक में भी हुई। चीनी आक्रमण से उत्पन्न परिस्थितियों की प्रेरणा से लिखित नाटकों में निम्नलिखित अधिक महत्त्वपूर्ण हैं- 'घाटियाँ गूँजती हैं' (शिवप्रसाद सिंह), 'नेफा की एक शाम' (ज्ञानदेव अग्निहोत्री) और 'अपनी धरती' (रेवतीशरण शर्मा)।

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६००] भारतीय नाड्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

१. भरत-पूर्व नाट्याचार्य, जिनकी रचनाएँ अनुपलब्ध हैं, परन्तु जिनकी चर्चा भरत ने की है। २. भरत मुनि, जिनका नाट्यशास्त्र भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का आधार-ग्रन्थ है। ३. भरत के परवर्त्ती आचार्य, जिनका आधार-ग्रन्थ भरत-प्रणीत नाट्यशास्त्र है- जैसे धनंजय, शारदातनय आदि। कचहछी ४. वे आचार्य, जिनकी कृतियाँ अनुपलब्ध हैं, पर जिनके उद्धरण अन्य आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में दिये हैं। अभिनवगुप्त ने कोहल के और विश्वनाथ ने नखकुट्ट के उद्धरण दिये हैं। किक ५. वे आचार्य, जिनका केवल नामोल्लेख अन्य आचार्यों ने किया है; जैसे- शिलाली, कृशाश्व, सदाशिव, पद्मभू आदि। ६. भरत के नाट्यशास्त्र के भाष्यकार; जैसे-अभिनवगुप्त, शंकुक, कीत्तिधर आदि। ७. वे आचार्य, जिन्होंने काव्यशास्त्र के विभिन्न अंगों के विवेचन-क्रम में नाट्यशास्त्र का भी विवेचन किया है। इनमें राजा भोज तथा कविराज विश्वनाथ प्रमुख हैं। इन संस्कृत-नाट्याचार्यों के नाट्य-सिद्धान्तों के विकासक्रम में नया मोड़ तब आया जब पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्तों का प्रभाव हिन्दी के नाट्याचार्यों ने ग्रहण किया और भारतीय नाट्य-सिद्धान्त की विकसनशील परम्परा को युगानुरूप ढालने में योग दिया। ऐसे आचार्यों में भारतेन्दु, जयशंकर प्रसाद, डॉ० श्यामसुन्दर दास, लक्ष्मीनारायण मिश्र, सेठ गोविन्ददास, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ० दशरथ ओझा, आचार्य सीताराम चतुर्वेदी, डॉ० रामकुमार वर्मा, व्रजरत्न दास, डॉ० रघुवंश, डॉ० एस० पी० खत्नी आदि प्रमुख हैं। भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का विकास चौमुखी हुआ है। वस्तु, पात्र, रस, नाटक के युगानुरूप नवीन भेद आदि सभी दिशाओं में प्रचुर परिमाण में विकास के चिह्न परिलक्षित हो रहे हैं। भारतीय नाट्य-सिद्धान्त के विकास की परम्परा अति दीर्घ है। स्वभावतः, आज भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का स्वरूप मूल रूप से भरतकालीन नाट्य-सिद्धान्त रहते हुए भी स्पष्ट रूप से परिवर्तित दिखाई पड़ता है। वैसे भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का मूल स्रोत भरत का नाट्यशास्त्र ही है। किन्तु, परवर्त्ती आचार्यों ने उसके भाष्य, व्याख्या और स्वतन्त्र चिन्तन द्वारा उसका रूप विकसित करने में विलक्षण अन्तर्दृष्टि का परिचय दिया है। आचार्य विश्वनाथ के काल तक आते- आते भरत द्वारा निर्दिष्ट पूर्वरंग आदि की धारणा में पर्याप्त अन्तर आ गया था और आधुनिक हिन्दी-नाटकों में तो इनका लोप ही हो गया है। विश्वनाथ कविराज के काल

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निष्कर्ष १ ६०१

तक कथावस्तु के स्वरूप में भी पर्याप्त अन्तर आगया था; उसमें मनोरंजन के साथ ही सामाजिक उत्कर्ष की ओर भी संकेत होने लग गये थे। इस युग में आकर हिन्दी-नाटकों की कथावस्तु का क्षेत्र अत्यन्त विस्तृत हो गया है। कथावस्तु के निर्माण में भरत द्वारा निर्दिष्ट तथा अन्य आचार्यों द्वारा समर्थित सन्धियों तथा अर्थ-प्रकृतियों का पूर्णतः बहिष्कार किया जा चुका है। यही स्थिति पात्रों की भी है। भरत ने नायक और नायिकाओं के जो भेद किये थे, वे विश्वनाथ के काल तक पर्याप्त विकसित हो गये थे। भरत ने नायक और नायिका के चार-चार भेद किये थे। किन्तु, आगे चलकर शृंगार रस के नायकों के दक्षिण, शठ, धृष्ट और अनुकूल-ये चार भेद किये गये। फिर नायक के सहायक विट, चेट, विदूषक, पीठमर्द, शकार आदि में अनेक नाम शारदातनय, विश्वनाथ आदि ने जोड़े। विश्वनाथ ने अनेक प्रकार के दूतों की भी चर्चा की।

इसी भाँति भरत द्वारा प्रस्तुत नायिकाओं के दिव्या, नूपतिनी, कुलस्त्री और गणिका-जैसे चार भेदों को छोड़कर परवर्त्ती आचार्यों ने नायक-नायिका के पारस्परिक सम्बन्ध, नायिका की अवस्था, नायक के प्रतिकूल आचरण पर नायिका की प्रतिक्रिया तथा नायिका की प्रेम-दशाओं के आधार पर उनके ३८४ भेद, प्रभेद और उपभेद किये। धनंजय ने यह भेद नाटकीय पात्रों के सम्बन्ध में किया है, किन्तु विश्वनाथ ने रस के आलम्बन विभाव के पक्ष में यह विवरण दिया है। नायक-नायिका के भेदों का इतना सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक तथा गहन अध्ययन विश्व के किसी अन्य नाट्य-सिद्धान्त में नहीं किया गया। इसे भारतीय नाट्याचार्यों की गम्भीर पर्यवेक्षण-शक्ति और पारदशी अन्तर्दृष्टि का परिणाम ही माना जा सकता है। इसके साथ ही नायिकाओं के शरीरज, अयत्नज तथा स्वाभाविक अलंकारों की विवेचना कर इन आचार्यों ने अपनी तलस्पर्शी दृष्टि का ही परिचय दिया है। इन नाट्याचार्यों से प्रेरणा लेकर हिन्दी के रीतिकालीन कवियों तथा आचार्यों ने नायक-नायिका-भेद का अत्यन्त विस्तृत विवेचन किया, जिसके फलस्वरूप यह स्वतन्त्र शास्त्र के रूप में विकसित हुआ। परन्तु, रीतिकालीन कवियों का यह विवेचन नाट्यशास्त्र से नहीं, प्रत्युत काव्यशास्त्र से सम्बन्ध रखता था। किन्तु, आज का हिन्दी-नाटककार नायक-नायिका-भेद के पचड़े में नहीं पड़ता। सामन्तयुगीन वातावरण के तिरोधान तथा पाश्चात्त्य प्रभाव के कारण आज न धीरोदात्त नायक राजा आदि को स्थान दिया जाता है और न उसके विदूषक आदि सहायकों का ही उल्लेख होता। नायक-नायिका-भेद युग-प्रभाव के कारण स्वयमेव लुप्त हो गया है। आज नायक के लिए सर्वगुण-सम्पन्न होना आवश्यक नहीं। कोई भी व्यक्ति आधुनिक हिन्दी- नाटकों का नायक हो सकता है। सामन्त-युग की पिटी-पिटाई लकीर को छोड़कर आधुनिक नाटकों का नायक अनेक रूपों में और अनेक मार्गों से आता है। आज जीवन के किसी भी क्षेत्र का कोई भी व्यक्ति नाटक के नायक के पद पर प्रतिष्ठित हो सकता है।

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६०२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

रस के क्षेत्र में भी भरत से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक बड़ा सूक्ष्म विवेचन हुआ है, और न मात्र उसकी संख्या में विस्तार हुआ, वरन् उसके अलौकिकत्व, स्थिति तथा निष्पत्ति पर भी जितना गम्भीर विवेचन हुआ है, वह भारतीय आचार्यों की, छिलके से बीज तक जाने की प्रवृत्ति का ही सूचक है। भरत ने जहाँ रस. भावादि के विवेचन में रंगमंच को दृष्टि में रखकर व्यावहारिकता को अपनाया है, वहाँ अभिनवगुप्त आदि आचार्यों का मनोवैज्ञानिक तथा शास्त्रीय दृष्टिकोण है। इधर हिन्दी, बँगला, मराठी आदि भाषाओं के आचार्यों ने भी रस-सिद्धान्त पर गम्भीरता से विचार किया है। परम्परागत नव रस के अतिरिक्त देशभक्ति, प्रकृति आदि नवीन रसों की उद्भावना हुई है। हिन्दी में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ० गुलाबराय, डॉ० नगेन्द्र आदि विद्वानों का रस-सिद्धान्त के विवेचन में योगदान महत्त्वपूर्ण है। भारतीय नाट्य-सिद्धान्त में रस- सिद्धान्त का प्रमुख स्थान रहा है; क्योंकि प्राचीन नाटककारों ने नाटकों में अपना प्रधान उद्देश्य रस की निष्पत्ति माना था। परन्तु, आधुनिक नाटकों में रस का वह महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं रह गया है, जो प्राचीन नाटकों में था। संस्कृत-नाटकों में तो रस-निष्पत्ति को सर्वाधिक प्रधानता मिली, परन्तु आज के नाटकों में रस की उपेक्षा की गई है। आज के नाटककार का आकर्षण चरित्र के मनोवैज्ञानिक विवेचन के प्रति विशेष हो गया है। मनोविश्लेषण के युग में चरित्र के उत्थान-पतन, संघर्ष तथा अन्तर्द्वन्द्व ने नाटक में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर लिया है। प्राचीन काव्यशास्त्र में रस की संख्या का भी विस्तार हुआ। पिछले अध्याय में इस विषय का विवेचन किया गया है। धनंजय ने नाटक के लिए आठ ही रसों की व्यवस्था दी, शान्त रस को नाटक के लिए अनुपयुक्त माना। दूसरी ओर, अभिनवगुप्त ने शान्त रस को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान दिया और रसों की संख्या नौ मानी। इस ग्रन्थ में शान्त रस को नाटक के लिए निषिद्ध नहीं माना गया है। हिन्दी में 'महात्मा ईसा', 'बुद्ध', 'सिद्धार्थ', अमिताभ आदि कई ऐसे नाटक लिखे गये हैं, जिनमें शान्त रस की प्रधानता है। इस प्रबन्ध में देशभक्ति, प्रकृति आदि रसों को मान्यता नहीं दी गई है और नव रस की स्थापना की गई है। काव्य के लिए भक्ति तथा वात्सल्य को भी रस स्वीकार किया गया है। जीवन के अधिक जटिल होने, सामाजिक विसंगतियों के बढ़ने तथा पाश्चात्त्य साहित्य के सम्पर्क में आने के फलस्वरूप आज का भारतीय नाट्य-सिद्धान्त पारम्परिक भारतीय नाट्य-सिद्धान्त से प्रेरणा और प्रकाश लेकर भी अनेक अर्थों में संस्कार-मुक्त हो गया है। हिन्दी के आदिनाटककार महाराजा विश्वनाथ सिंह ने पारम्परिक नाट्य-सिद्धान्त की मर्यादा मानी, परन्तु भारतेन्दु ने संस्कृत-नाट्य-शैली को प्रमुखता देकर भी यूरोपीय

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निष्कर्ष [ ६०३ नाट्य-कला का भी आश्रय ग्रहण किया। यदि उन्होंने शिल्प के रूप में प्रस्तावना, मंगलाचरण, नान्दी, सूत्रधार, भरत-वाक्य आदि को स्थान दिया, तो कथानक के रूप में तत्कालीन सामाजिक तथा राजनीतिक समस्याओं को ही महत्त्व दिया। अब नाटक के नायक लोकोत्तर व्यक्ति ही नहीं, साधारण व्यक्ति भी होने लगे। भारतेन्दु-काल में जहाँ एक ओर कुछ नाटककार वेश्या का चरित्र दिखा रहे थे, वहीं दूसरी ओर, दूसरे नाटककार ऐसे पात्रों का नाम भी सुनना नहीं चाहते थे। प्रसादजी के आगमन से हिन्दी-नाटकों तथा नाट्य-सिद्धान्त में क्रान्तिकारी परिवर्त्तन हो गया। उनके नाटकों के कथानक क्रमशः जटिल होते गये। महाभारत से हर्ष के काल तक के पौराणिक तथा ऐतिहासिक पात् नाटकों में प्रस्तुत होने लगे। अब नान्दी, सूत्रधार, प्रस्तावना, भरत-वाक्य आदि की जटिलताएँ समाप्त हो गई। युद्ध, हत्या और मृत्यु के दृश्य रंगमंच पर अवतरित होने लगे तथा पाश्चात्त्य नाटकों की भाँति शील-वैचित्य, अन्तस्संघर्ष, भावों के घात-प्रतिघात और प्रेम की करुण अभिव्यंजना नाटकों में स्थान पाने लगीं। प्रसाद के नाटक न तो पारम्परिक संस्कृत-नाटकों की भाँति सुखान्त हैं, न पाश्चात्त्य नाटकों की भाँति पूर्ण दुःखान्त; बल्कि प्रसादान्त हैं। इस भांति प्रसाद के नाटकों की शैली पूर्वीय और पश्चिमीय नाट्य-शैलियों के समन्वय से गढ़ी गई भारतीय शैली बन गई। नाट्य-सिद्धान्त के सम्बन्ध में यत्र-तत्र व्यक्त किये गये प्रसाद के विचारों का बहुत मूल्य है। प्रेमीजी ने अपना क्षेत्र मुसलमान-कालीन भारत को चुना। इनके नाटकों में हिन्दू पात्रों के अतिरिक्त मुसलमान पात्र भी बहुलता से प्रस्तुत होने लगे। इन्होंने अपने इन ऐतिहासिक-सांस्कृतिक नाटकों में हिन्दू-मुसलमान-एकता पर सतत बल दिया है। इनके नाटकों में संवादों की भाषा पात्रानुकूल है। फिर भी इनके नाटकों तथा विचारों से हिन्दी- नाट्य-सिद्धान्त में कोई विशेष विकास नहीं हो सका। सेठ गोविन्ददास ने अनेक शैलियों में नाटक लिखे, जिनकी सूची लम्बी है। उन्होंने नाटक तथा नाट्य-सिद्धान्त में बहुमुखी विकास किया है। पाश्चात्य नाटककारों-इब्सन और शॉ-से प्रभावित होकर लक्ष्मीनारायण मिश्र ने समस्या-नाटकों की रचना की। फिर अनेक प्रतिभाशाली नाटककारों ने उनका अनुसरण किया। समस्या-नाटकों में परम्परागत भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का अधिकतर उल्लंघन ही हुआ है। कुछ समस्या-नाटककारों ने पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्तों का अन्धानुकरण किया है, परन्तु अधिकतर ने पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्त को पचाकर उसे भारतीय रूप में ढालकर प्रस्तुत किया है। कुछ आधुनिक नाट्यशास्त्रियों ने स्वतन्त्र पुस्तकें लिखकर या अन्य पुस्तकों की लम्बी भूमिकाएँ लिखकर नाट्य-सिद्धान्त के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र की पुस्तक 'नाटक' हिन्दी की इस प्रकार की पहली पुस्तक है। इसमें अत्यन्त संक्षेप में नाट्य-सिद्धान्त की चर्चा हुई है, परन्तु पूर्ण विवेचना का अभाव है।

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६०४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास डॉ० श्यामसुन्दर दास तथा डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल ने 'रूपक-रहस्य' मुख्यतः 'दशरूपक' के आधार पर लिखा, यद्यपि इसमें कुछ प्राचीन संस्कृत-ग्रन्थों और कुछ यूरोपीय विद्वानों की पुस्तकों से भी सहायता ली गई है। स्वतन्त्र विवेचन का अभाव होते हुए भी इसकी विशेषता यही है कि इसमें परम्परागत सभी बातें आ गई हैं। डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने 'दशरूपक' की विस्तृत भूमिका में नाट्य-सिद्धान्त का पाण्डित्यपूर्ण विवेचन किया है। डॉ० दशरथ ओझा के 'हिन्दी-नाटक : उद्भव और विकास', 'नाट्य-समीक्षा' तथा 'रास और रासान्वयी काव्य' नामक ग्रन्थों के द्वारा नाट्य- सिद्धान्त के विकास में अमूल्य सहायता मिली है। डॉ० रामकुमार वर्मा की नाट्य-कृतियों की भूमिकाओं से भी नाट्य-सिद्धान्त का महत्त्वपूर्ण विकास हुआ है। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के 'अभिनव नाट्यशास्त्र' का नाट्य-सिद्धान्त के विकास में महत्त्वपूर्ण स्थान है। आगे चलकर हिन्दी-नाटककारों ने नाटकों का दुःखान्त होना भी स्वीकार किया और ज्यों-ज्यों जीवन जटिल होता गया, विज्ञान का चमत्कार बढ़ता गया, उद्योगों ने प्रगति की तथा पाश्चात्त्य संस्कृति से भारतीय संस्कृति घुलने-मिलने लगी, त्यों-त्यों हमारे नाट्य-सिद्धान्त में भी परिवर्तन होते गये। अब नाटकों के पारम्परिक भेदों का परित्याग कर नये भेदों की स्थापना तथा उनमें रचना होने लगी। अब भाण, वीथी आदि के स्थान पर एकांकी, गीति-नाट्य, स्वोक्ति-नाटक आदि रूपकों के नये-नये भेद बन गये हैं। रेडियो के आविष्कार के फलस्वरूप उसपर नये-नये नाटकों का प्रसारण होने लगा। रेडियो-नाटक में भी रिपोर्ताज, फीचर, फैण्टेसी आदि कोटि के नाटकों की रचना होने लगी। नाटकों के सामाजिक, राजनीतिक, समस्यामूलक, सांस्कृतिक आदि कई भेद हुए। नाटकों में चमत्कार के स्थान पर मनोविज्ञान की प्रमुखता स्थापित हुई। भरत ने रंगमंच का अत्यन्त सूक्ष्म तथा विस्तृत विवरण दिया और उनकी दृष्टि से रंगमंच-सम्बन्धी छोटी-से-छोटी बात भी नहीं बच सकी। परन्तु, परवर्ती आचार्यों ने रंगमंच पर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया। आधुनिक काल में हिन्दी का अपना रंगमंच नहीं है, परन्तु बँगला, मराठी आदि को अपना पूर्ण विकसित तथा सम्पन्न रंगमंच है। हिन्दी-भाषी प्रान्तों में भी स्कूल-कॉलेजों में समय-समय पर उत्सवों के अवसरों पर नाटकों का अभिनय होता रहा है। परन्तु, इन अवसरों पर भरत के निर्देश के अनुसार रंगमंच का निर्माण नहीं होता। आजकल रंगमंच के निर्माण में बिजली आदि वैज्ञानिक आविष्कारों का पूरा लाभ उठाया जाता है। सेठ गोविन्ददास आदि नाटककारों तथा आचार्य सीताराम चतुर्वेदी आदि नाट्यशास्त्रियों का विचार है कि रंगमंच के निर्माण तथा सजावट में वैज्ञानिक आविष्कारों का पूर्ण तथा यथोचित लाभ उठाना चाहिए। हमने पूर्व ही निवेदन किया है कि भारतीय नाट्य-सिद्धान्त एक गतिशील अथच जीवन्त सिद्धान्त रहा है। औदार्य इसका धर्म रहा है तथा नव-नवीन सिद्धान्तों को ग्रहण एवं पाचन करने की क्षमता इसका सामर्थ्य। यही कारण है कि यह आज विश्व की

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निष्कर्ष

जटिलतम स्थितियों और व्यक्ति तथा समष्टि के गहनतम भावों को प्रस्तुत करने का मार्ग उपस्थित करता है। पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्त से बहुत-कुछ ग्रहण करने के पश्चात् भी भारतीय नाट्य-सिद्धान्त अपने मूल में भारतीय ही है। नये विचार इसकी परम्परा के पारावार में मात्र लघुतम ऊर्मियाँ बनकर अपनी सुषमा का अनूठापन दिखा देते हैं, पारावार में कोई विशेष परिवर्तन नहीं करा पाते। जिस प्रकार बाह्य वेश के ग्रहण से मनुष्य का निजी स्वरूप नहीं परिवत्तित होता है, उसी प्रकार पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्तों के रासायनिक मिश्रण से भी भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का व्यक्तित्व आहत नहीं होता। यही इसकी विलक्षणता तथा जीवन्तता का प्रमाण है। इस प्रकार नाट्य-सिद्धान्त के विकास-क्रम का अध्ययन करने पर हम सहज ही इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि शाश्वत विकासमान मानव-जीवन तथा समाज के नित परिवर्त्यमान मूल्यों, आचारों और संघर्षों के अनुसार ही भारतीय नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों में भी परिवर्तन और परिवद्धन होते रहे हैं। भरत से लेकर वर्त्तमान काल तक जिस एक सिद्धान्त में कोई परिवर्तन नहीं हो सका, वह यह है कि नाटक मूलतः मानव-जीवन और समाज की अन्तर्बा्य स्थितियों तथा छवियों की अनुकृति है। सभ्यता के विकास, वैज्ञानिक आविष्कार एवं औद्योगीकरण के कारण मानव-जीवन में जो जटिलताएँ और विविधताएँ आई हैं, उसकी अन्त्बह्यि स्थितियों में जो परिवर्तन हुए हैं तथा उसके वैयक्तिक एवं सामाजिक स्वरूप में जो क्रान्तियाँ हुई हैं, उनके अनुसार ही नाटकों के स्वरूप में भी विस्तार एवं नव्य रूपान्तर हुए हैं। समाज के साथ एकमेक भाव से चलनेवाला नाट्य-साहित्य जीवन की गद्यात्मकता से विमुख नहीं हो सकता। स्वभावतः नाट्य-सिद्धान्त में भी परिवर्त्तन और विकास होते रहे हैं। किन्तु, इन नाट्यशास्त्रीय सिद्धान्तों के विकास के मूल में जो भाव कार्य कर रहा है, वह है समाज के साथ उसकी आत्मनिष्ठता एवं शिवत्व की प्रतिष्ठा। और, भविष्य में भी बदलते हुए सामाजिक परिवेश तथा मानव-जीवन के साथ नाट्यशास्त्र के सिद्धान्त उसी भाँति एकमेक भाव से सम्बद्ध बने रहेंगे; जैसे प्रत्येक स्थिति में भगवती उमा के साथ सम्बद्ध रहते हैं भगवान् अद्धनारीश्वर सदाशिव। Bक0TE .OP

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सहायक ग्रन्थों की सूची संस्कृत 9. ऋग्वेद-संहिता : परोपकारिणी सभा, अजमेर, चतुर्थ आवृत्ति २. यजुर्वेद-संहिता : चौखम्बा संस्कृत सिरीज, बनारस ३. कृष्णयजुर्वेद : वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई ४. कौषीतकी ब्राह्मण ५. याज्ञवल्क्यस्मृति : निर्णयसागर प्रेस, बम्बई ६. नाट्यशास्त्र (भरत) : गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज, बड़ौदा ७. नाट्यशास्त्र ( ,,) : काव्यमाला सिरीज ८. नाट्यशास्त्र-हिन्दी-अनुवाद : डॉ० रघुवंश, मोतीलाल बनारसी दास ९. नाट्यशास्त्र (प्रथम तथा द्वितीय अध्याय)-हिन्दी-अनुवाद : श्रीरामगोविन्द शुक्ल, चौखम्बा संस्कृत सिरीज, बनारस १०. दशरूपक (धनंजय) : सम्पादक : डॉ० काशीनाथ पाण्डुरंग परब ११. दशरूपक (धनंजय) : सम्पादक : डॉ० भोलाशंकर व्यास, चौखम्बा विद्याभवन, बनारस १२. साहित्यदर्पण (कविराज विश्वनाथ) : टीकाकार : शालग्राम शास्त्री, प्र० श्रीकान्त शास्त्री, ऐंबट रोड, लखनऊ १३. भावप्रकाशन (शारदातनय) : सम्पादक : यदुगिरि यतिराज स्वामी; गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज, बड़ौदा १४. नाट्यदर्पण (रामचन्द्र-गुणचन्द्र), ओरियण्टल इन्स्टीच्यूट, बड़ौदा १५. अभिनवभारती (अभिनवगुप्त), गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज, बड़ौदा १६. काव्यप्रकाश (मम्मट) : सम्पादक-रघुनाथ दामोदर करमरकर, भण्डारकर ओरियण्टल इन्स्टीच्यूट, पूना १७. शृंगारप्रकाश (भोजदेव) १८. सरस्वती-कण्ठाभरण (भोजदेव) : सम्पादक : पं० केदारनाथ शर्मा १९. अष्टाध्यायी (पाणिनि) : खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेंकटेश्वर मुद्रणालय, बम्बईं २०. महाभाष्य (पतंजलि) : सम्पादक : शिवदत्त शर्मा : पाण्डुरंग जावजी; निर्णयसागर प्रेस, बम्बई २१. रसगंगाधर (पण्डितराज जगन्नाथ) : टीका-मथुरानाथ शास्त्री : पाण्डुरंग जावजी; निर्णयसागर प्रेस, बम्बई २२. ध्वन्यालोक (आनन्दवर्द्धन) : निर्णयसागर प्रेस, बम्बई २३. धवन्यालोकलोचन (अभिनवगुप्त) : हिन्दी-व्याख्याकार : आचार्य जगन्नाथ पाठक, चौखम्बा विद्या-भवन, बनारस

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सहायक ग्रन्थों की सूची ८६०७

२४. काव्यादर्श (दण्डी) : एस० के० बेलवलकर, ओरियण्टल बुक एजेन्सी, पूना २५. काव्य-मीमांसा (राजशेखर) : हिन्दी-व्याख्याकार : डॉ० गंगासागर राय, चौखम्बा विद्याभवन, बनारस २६. अमरकोश : प्रकाशक मोतीलाल बनारसीदास, बनारस २७. अग्निपुराण : मनसुख राय मोर, क्लाइव रो, कलकत्ता २८. काव्यालंकार-सारसंग्रह (उद्भट) २९. काव्यानुशासन (हेमचन्द्र), महावीर जैन विद्यालय, बम्बई ३०. व्यक्तिविवेक (महिमभट्ट) : टीका -- मधुसूदन शास्त्री, चौखम्बा संस्कृत सिरीज, बनारस ३१. संगीत-रत्नाकर (शाङ्गदेव), अड्यार लाइब्रेरी, मद्रास ३२. प्रतापरुद्र-यशोभूषण (विद्यानाथ), चौखम्बा संस्कृत सिरीज ३३. भक्तिरसामृतसिन्धु (रूपगोस्वामी) ३४. भगवद्भक्ति-रसायन (मधुसूदन सरस्वती) ३५. औचित्य-विचार-चर्चा (क्षेमेन्द्र) ३६. अभिनय-दर्पण (नन्दिकेश्वर) ३७. हिन्दी-अभिनव भारती (अनु० आचार्य विश्वेश्वर), हिन्दी-विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय ३८. हिन्दी-नाट्यदर्पण (अनु० आचार्य विश्वेश्वर) ३९. शृंगारतिलक (रुद्रभट्ट) ४०. नाटक-लक्षण-रत्नकोश (सागरनन्दी) : सम्पादक ढिलन, आ० यू० प्रेस, लन्दन ४१. रसार्णवसुधाकर (शिंगभूपाल) : सम्पादक : टी० गणपति शास्त्री ४२. विष्णुधर्मोत्तर पुराण, गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज, बड़ौदा ४३. अभिज्ञानशाकुन्तल : टीका-राघव भट्ट; निर्णयसागर प्रेस, बम्बई ४४. हिन्दी-रसगंगाधर (अनु० पुरुषोत्तम शर्मा चतुर्वेदी), इण्डियन प्रेस, प्रयाग ४५. वक्रोक्तिजीवितम् (कुन्तक) : टीका-सुशील कुमार दे, प्रकाशक -- एन० सी० पाल, कलकत्ता हिन्दी १. हिन्दी-नाटक : उद्भव और विकास (डॉ० दशरथ ओझा), द्वितीय संस्करण, राजपाल ऐण्ड सन्स, दिल्ली २. नाट्य-समीक्षा (डॉ० दशरथ ओझा), द्वितीय संस्करण, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली ३. रास और रासान्वयी काव्य (डॉ० दशरथ ओझा) ४. संस्कृत-साहित्य की रूपरेखा (चन्द्रशेखर पाण्डेय और नानूराम व्यास) ५. संस्कृत-साहित्य का इतिहास (आचार्य बलदेव उपाध्याय), शारदा-मन्दिर, काशी ६. समीक्षा-दर्शन (रामलाल सिंह), इण्डियन प्रेस, प्रयाग ७. नाटक की परख (डॉ० एस० पी० खत्री), प्रथम संस्करण, साहित्य-भवम, प्रयाग

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकांस

८. रस-सिद्धान्त (डॉ० नगेन्द्र) ९. अरस्तू का काव्यशास्त्र (डॉ० नगेन्द्र) १०. रीतिकाव्य की भूमिका (डॉ० नगेन्द्र), नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली ११. नाट्य-सिद्धान्त की भारतीय परम्परा और दशरूपक (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी और पृथ्वीनाथ द्विवेदी) १२. नाट्यकला (डॉ० रघुवंश), नेशनल पब्लिशिंग हाउस, दिल्ली १३. रस-मीमांसा (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल), नागरी-प्रचारिणी सभा, काशी १४. चिन्तामणि (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल) १५. हिन्दी-साहित्य का इतिहास (आचार्य रामचन्द्र शुक्ल), चतुर्थ संस्करण, नागरी- प्रचारिणी सभा, काशी १६. रूपक-रहस्य (डॉ० श्यामसुन्दरदास और डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल), इण्डियन प्रेस, प्रयाग १७. नाट्यकला-मीमांसा (सेठ गोविन्ददास), महाकोशल साहित्य-मन्दिर, जबलपुर १८. साहित्य के रूप और तत्त्व (डॉ० शिवनन्दन प्रसाद), पुस्तक-भण्डार, पटना १९. ब्रजभाषा-साहित्य का नायिका-भेद (प्रभुदयाल मीतल), अग्रवाल प्रेस, मथुरा २०. सिद्धान्त और अध्ययन (डॉ० गुलाबराय) २१. हिन्दी-नाट्य-विमर्श (डॉ० गुलाबराय) २२. काव्य के रूप (डॉ० गुलाबराय) २३. रसगंगाधर का शास्त्रीय अध्ययन (डॉ० प्रेमस्वरूप गुप्त) २४. अग्निपुराण का नाट्यशास्त्रीय भाग, हिन्दी-अनुसन्धान-परिषद्, दिल्ली विश्वविद्यालय २५. रसिकप्रिया (केशवदास) २६. भवानी-विलास (देव) २७. काव्यकला एवं अन्य निबन्ध (जयशंकर प्रसाद), भारती भण्डार, प्रयाग २८. नाटक (भारतेन्दु हरिश्चन्द्र) २९. भारतेन्दु-ग्रन्थावली ३०. हिन्दी-नाट्य-साहित्य (ब्रजरत्न दास), प्रथम संस्करण, हिन्दी-साहित्य-कुटीर, बनारस ३१. रेडियो-नाटक (हरिश्चन्द्र खन्ना) ३२ रेडियो-नाट्य-शिल्प (डॉ० सिद्धनाथ कुमार) ३३. हिन्दी-एकांकी की शिल्प-विधि का विकास (डॉ० सिद्धनाथ कुमार) ३४. एकांकी-कला (प्रो० रामयतन सिंह) ३५. हिन्दी-एकांकी (डॉ० सत्येन्द्र) ३६. आधुनिक हिन्दी-साहित्य की भूमिका (डॉ० लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय) ३७. प्रसाद के नाटकों का शास्त्रीय अध्ययन (डॉ० जगन्नाथ प्रसाद शर्मा), सरस्वती मन्दिर, बनारस

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fs सहायक ग्रन्थों की सूची । ३८. रस-सिद्धान्त : स्वरूप और विश्लेषण (आनन्दप्रसाद दीक्षित); राजकमल प्रकाशन, दिल्ली ३९. लोकधर्मी नाट्य-परम्परा ( श्याम परमार); हिन्दी-प्रचारक पुस्तकालय, काशी ४०. हमारी नाट्य-परम्परा (श्रीकृष्ण दास) ४१. हिन्दी के पौराणिक नाटक (देवषि सनाढ्य) ४३. हिन्दी-नाटक-साहित्य और रंगमंच (कुँवर चन्द्रप्रकाश सिंह) ४४. सेठ गोविन्ददास-अभिनन्दन-ग्रन्थ (भारतीय नाट्य-साहित्य), सम्पादक डॉ० नगेन्द्र ४५. हिन्दी-नाटककार (जयनाथ नलिन); आत्माराम एण्ड सन्स, दिल्ली ४६. आधुनिक साहित्य (नन्ददुलारे वाजपेयी); भारती भण्डार, प्रयाग ४७. भारतीय नाट्यशास्त्र में रंगशालाओं के रूप (रामगोविन्द चन्द्र) ४८. अभिनव नाट्यशास्त्र (सीताराम चतुर्वेदी); प्रथम संस्करण, अखिलभारतीय विक्रम परिषद्, काशी ५०. हिन्दी के समस्या-नाटक (डॉ० विनय कुमार), अप्रकाशित शोध-प्रबन्ध ५१. नाट्यशास्त्र को भरत की देन (डॉ० सुरेन्द्रनाथ दीक्षित), अप्रकाशित शोध-प्रबन्ध ५२. मनोविश्लेषण एवं फ्रायडवाद की रूपरेखा : डॉ० वाई० मसीह ५३. मुक्ति का रहस्य (मैं बुद्धिवादी क्यों हूँ ?) (लक्ष्मीनारायण मिश्र) ५४. तीन नाटक (प्राक्कथन) (सेठ गोविन्ददास) ५५. गरीबी या अमीरी (भूमिका) (सेठ गोविन्ददास) ५६. चारुमिता (भूमिका) (डॉ० रामकुमार वर्मा) ५७. रेशमी टाई (भूमिका) (डॉ० रामकुमार वर्मा) ५८. विजय-पर्व (भूमिका) (डॉ० रामकुमार वर्मा) ५९. शिवा-साधना (अपनी बात) (हरिकृष्ण प्रेमी) ६०. विषपान (पुकार) (हरिकृष्ण प्रेमी) ६१. प्रकाश-स्तम्भ (संकेत) (हरिकृष्ण प्रेमी) ६२. स्वप्न-भंग (कुछ बातें) (हरिकृष्ण प्रेमी) ६३. विशाख (जयशंकर प्रसाद) English 1. Sanskrit Drama (Dr. A.B. Keith) 2. A History of Sanskrit Literature (A.A. Macdonall) 3. A History of Sanskrit Literature (V. Varadachari) 4. A History of Sanskrit Literature (S.N. Dasgupta & S.K. De) 5. Dramas (H. H. Wilson); Chowkhamba Sanskrit Series, Benaras. 6. Aristotle's Poetics (Translated by S.H. Butcher) 7. The Theatre of the Hindus (H.H. Wilson, Raghavan, Resharow, Vidya- bhushana)

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६१० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

  1. The Natya Sastra of Bharat (Translated by Dr. M.M. Ghosh); Royal Asiatic Society of Bengal. 9. Selected Specimen of the Theatre of the Hindus (Vol. II), Calcutta, 1926-27. 10. History of Sanskrit Poetics (Dr. P. V. Kane) 11. The Number of Rasas (Dr. V. Raghavan); Adyar Library, Adyar, Madras. 12. Ancient Indian Theatre (D.R. Mankad) 13. Types of Sanskrit Drama (D.R. Mankad) 14. Aspects of Sanskrit Literature (S.K. De) 15. Classical Sanskrit Literature (Dr. A.B. Keith) 16. History of Sanskrit Poetics (S.K. De) 17. Indian Drama, Publication Division, New Delhi. 18. Natya Lakshana Kosh (Eng. Tra. V. Raghavan); The American Philosophical Society, Oriental Book Agency, Poona. 19. Theory of Rasa & Dhvani (A. Shankaran). 20. Contributions of Hindu Drama (Dr. M.M. Ghosh) 21. Upa-rupakas : Drama Seminar, Sangit Natak Academy, Delhi 22. Psychological Types (C. G. Jung) 23. An Outline of Psychology ( William MacDoougall ), Methuen & Co., London.

पत्र-पत्रिकाएं १. नई धारा, जनवरी, १९५२ ई० २. नई धारा, अप्रैल-मई, १९५२ ई० ३. नई धारा : रंगमंच-विशेषांक, सन् १९५२ ई० ४. नई धारा, जुलाई, १९५३ ई० ५. आलोचना, जनवरी, १९५६ ई० ६. आलोचना, अप्रल, १९५६ ई० ७. आलोचना, नाटक-अंक, जुलाई, १९५६ ई० ८. पाटल, अगस्त, १९५४ ई० ९. पाटल, नवम्बर, १९५४ ई० १०. पाटल, जनवरी-फरवरी, १९५५ ई० ११. हंस, शान्ति-संस्कृति-अंक, वर्ष २२, अंक ६,७ १२. आजकल, सितम्बर-अक्टूबर, १९५५ ई० १३. आजकल, फरवरी, १९५७ ई० १४. आजकल, सितम्बर, १९६२ ई०

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सहायक ग्रन्थों की सूची

१५. आजकल, अप्रैल, १९६३ ई० १६. आलोचना, जुलाई, १९६३ ई० १७. कल्पना, अगस्त, १९६१ ई० १८. कल्पना, जून, १९६२ ई० १९. कल्पना, सितम्बर, १९६३ ई० २०. नया पथ, नाटक-अंक, सन् १९५५ ई० २१. समालोचक, दिसम्बर, १९५८ ई० २२. साहित्य-सन्देश, जुलाई-अगस्त, १९५५ ई० (अन्तरप्रान्तीय नाटकांक) २३. आकाशवाणी-प्रसारिका, अक्टूबर-दिसम्बर, १९५७ ई० २४. आकाशवाणी-प्रसारिका, मार्च, १९५७ ई० २५. आकाशवाणी-विविधा, सन् १९५९ ई० २६. आकाशवाणी-विविधा, सन् १९६० ई० २७. हिन्दी-अनुशीलन, अगस्त, १९६५ ई० २८. हिन्दी-अनुशीलन, जनवरी-मार्च, १९६२ ई० 3 市 可 市 店 २९ हिन्दी-अनुशीलन : शोध-विशेषांक, सन् १९६२ ई० ३०. नागरी-प्रचारिणी पत्रिका, सन् १९६३ ई० ३१. आलोचना : स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी-विशेषांक, अप्रैल, १९६६ ई०

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शब्दानुक्रमणी

श्र अद्भुतार्णव : ४४५ अंक : ९५, ११०, १३६, १८८, १८९, अद्ध तवाद: ३३६ ४४२, ४५५, ४७७, ४७९, ४९६ अद्व तसिद्धान्त : ३८३ अंकमुख : १९२, १९३, १९४ अधिकार का रक्षक : ५६८ अंकावतार : १९२, १९४ अध्वर्युं : २८ अंकास्य : १९२, १९३, १९४ अनघ: ५३४, ५३५ अंकियानाट : ४३२ अनर्घराघव : १५७, १६७ अंगद का पैर : ५९२ अनिलकुमार : ५५३ अंगूर की बेटी : ५४५ अनुकरणवाद : ३२४ अंजोदीदी : ५६१ अनुकृतिवाद : ३२३ अँधेरा-उजाला : ५६१ 'अनुत्तर' तत्त्व : ७३ अगस्त्य (ऋषि) : २२ अनुभाव : २८७, २८८, २८९ अग्निपुराण : ६७, ९९, १०३, १०४ टि०, अनुमितिवाद : ७७, १०५, ३२३, ५०१ १०७, १५०, १५० टि०, २३५, अनुयोगद्वारसूत्र (जैन) : ३६८ २६०, २६० टि०, २८५, २८५ टि०, अन्धा कुआँ : ५४५ ३६५, ३७३, ३७७, ३७९, ३८२, अन्धायुग : ५३७, ५३८, ५३९ ४४३, ४५८, ४५६ टि०, ४५९, अन्धेर नगरी : ४९५, ४९६, ५५० ४६०, ५२६ अन्यदेव : ८९ अग्निपुराण का काव्यशास्त्रीय भाग : ३७३टि० अन्विति : ४०, २०२, २०३, २०७ अजयपाल : द४ अपनी धरती : ५९८ अजातशत्रु : ५०३, ५०६ अपराधी : ५४५ अजितापीड : ७७ अपवारित : ३८, १०१, १९८, १९९, अट्ठारह (१८) जुलाई की शाम : ५४५ ४४१, ५८१ अत्याचार : ५९२ अपूर्व संन्यासी : ५५१ अथर्वंवेद : ४, १४, १५, १७, २०, २३, २८, अप्सरा : ५३७ १२६, १३३, १४०, ३५५, ५२० अफलावून : ४८२

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शब्दानुकमणी [६१३

अभिज्ञान शाकुन्तल (शकुन्तला नाटक) : ३७८, ३७९, ३८०, ३८१, ३८२, ३९, ४०, ४१, ६५, १४०, १५२, ३८४, ३९६, ४००, ४०१, ४०२, १६१, १६७, १७७, १८१, १८३, ४०३, ४०७, ४०८, ४०९, ४१०, २०५,२०८, २१६,२२३, २४४, ४११, ४१२, ४१४, ४१६, ४१७, २४५, २५१, २५२, ३९९, ४३३, ४१९, ४२०, ४२१, ४२२, ४५८, ४४४, ४४५, ५९१, ५९२ ४६४, ४७०, ४७१, ४७२, ४९०, अभिधावादी : ७८, ८३, १०४ ५०१, ५९९, ६००, ६०२ 'अभिनय' : १८, १९, २१, ६७, ९१, अभिनवगुप्तपादाचार्य : ७८, ७९, ३३६ ११५, ११९, १२४, ५२१ अभिनव नाट्यशास्त्र : २५, २५ टि०, अभिनयदर्पण : ४, १५, १८, ६२ ४५ टि०, ११९ टि०, १६२ टि०, अभिनव (आचार्य) : ६६, ७५, ७६, ७९, २३७, ४३८ टि०, ५२३, ५७४ टि०, ८०, ८७, ९२, ९३, ९६, ९७, ५८३ टि०, ६०४ १०६, ११५, ३०१, ३३६, ३३७, अभिनव भरत : २३७, ५७४ ३४२, ३५९, ३६०, ३६५, ३८१, अभिनवभारती : ६०, ६१, ६२, ६३, ४०२, ४०३, ४०५, ४१० ६३ टि०, ६४, ६५, ६९ टि०, ७५, अभिनवगुप्त (आचार्य) : ८, २०, ५७, ७६, ७७, ७८, ७९, ८४, ९०, ९२, ५९, ६०, ६१, ६२, ६३, ६४, ९३, ११८ टि०, २७९, २८० टि०, ६५, ६६, ६९, ७२, ७३, ७४, २८२, २८२ टि०, ३१४, ३१४ टि०, ७५, ७६, ७७, ७८, ७९, ८०, ३१५, ३२०, ३२३, ३२५, ३३०, ८६, ८७, ८९, ९०, ९२, ९३, ३३३, ३४८ टि०, ४०६, ४१३, ९५, ९६, ९७, १०४, १०५, १०६, ४७२, ४७२ टि०, ५२६ १०९, ११२, ११३, ११४, ११७, 'अभिनेता' : ६९ ११८, १३३, १५८, १५९, २६१, अभिव्यक्तिवाद : १०५, ३२५, ३३३, २६२, २६३, २६४, २७०, २७९, ३३५, ३३६, ३३८, ३४२ २८०, २८१, २६२, २८३, २९८, अभ्यागार : २४८ २९९, ३००, ३०१, ३०२, ३११, अमरकोश : ५९, ५९ टि० ३१४, ३१५, ३१६, ३१९, ३२० अमरनाथ गुप्त (प्रो.) : ५५२ ३२४, ३२५, ३२९, २३०, ३३१, अमरसिंह : ५९ ३३२, ३३३, ३३४, ३३५, ३३६, अमानत (नाटककार) : ४३४, ५ूप ३३७, ३३८, ३३९, ३४०, ३४१, अमिताक्षर छन्द : ५३४ ३४२, ३४३, ३४४, ३४५, ३४६, अमिताभ (नाटक) : ६०२ ३४७, ३४८, ३४९, ३५३, ३५४, 'अमृत-मन्थन' : १४, ९८, १६०, ४८० ३५६, ३५८, ३५९, ३६०, ३६४, अमृतलाल नागर : ५६१, ५६२ ३६५, ३६६, ३६७, ३७३, ३७४, 'अमेचर ड्रामेटिक एसोसिएशन' : ४३६

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६१४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अम्बसालवन : ३, ५१ अवस्था : ८२, ९२, ९४, ९९, १००, १७४, अम्बिकादत्त व्यास : ५५१ १७५, १७६, १७७, १७८, १७९, अरस्तू : ८, ९, १०, ४०, ५६, १२०, १८०, १८१, १८४, ४४५, ४४६, १२१, १२२, १२३, १२४, १४०, ५७५, ५७७ १४१, १४२, १६१, १६३, १९९, अविमारक : १६९, २४९ २००, २०१, २०२, २०३, २०४, अशोक : ५२ २०६, २०७, २०८, २१०, २१४, अशोक (नाटक) : ५१५ २२७, ३११, ४४६, ४८१, ४८२, अपक (उपेन्द्रनाथ) : २११, ५६१, ५६३, ४८३, ४८४, ४८५, ४८६, ५९५ ५६८ अरिस्टोट्ल्स थ्योरी आव पोएट्री ऐण्ड फाइन अश्मकुट्ट : ५७, ६१, ८४ आर्ट्स: १२२ टि०, ४८५ टि०, अश्वघोष : ३६, ५०, ५४, ७१, २२३, ४८६ टि० ४४८ अरिस्टोट्ल्स पोयेटिक्स : १२० टि०, १२१ टि०, अश्वमेधयज्ञ : १२, १९, ४७ १९९ टि०, २०० टि०, २०२ टि०, अष्टाध्यायी : ४७, ५४, ५८ २०३ टि०, २०४ टि०, २२७ टि० 'असुर-पराजय' : १४, ९८ अर्थप्रकृति : ६७, ८२, ९२, ९४, ९९, अस्त्रगीत : ४६६ १००, १५५, १७१, १७२, १७३, प्रा १७४, १७८, १७९, १८०, १८१, आंजनेय : ५७, ६३ १८४, १८८, २१२, ४४५, ४४६, आकाशपुरुष : ४७३ ४५४, ५७५, ५७७, ६०१ आकाशभाषित : १०१, १९८, १९९, अर्थवृत्ति : १३२, १३३ ४४०, ४५५, ४९५, ५०२, ५५५, अर्थशास्त्र : ३९, ५३, ५३ टि० ५८१ अर्थोपक्षेपक : ८२, ९४, १००, १९०, आग की चिनगारी : ५९२ १९१, १९२, ४५४, ५००, ५२३, आगा हश्र काश्मीरी : ४३३ ५७५, ५७७ आचार्य विश्वेश्वर : ५९ टि०, ६० टि०, अ्द्ध नाटक : ३२ ६५ टि०, ७६, ११२, ११५, अलंकार-सम्प्रदाय : ३९०, ३९१, ३९२, २६१ टि०, २८० टि०, २८२ टि०, ३९३, ३९४, ३९६ २९९ टि०, ३०० टि०, ३०४ टि०, अलबेला : ५५५ ३१४ टि०, ३२० टि०, ३२५, टि०, अलाउद्दीन खिलजी : दप ३२८, ३४७ टि०, ३४८ टि०, अवदानशतक : ५० ३७५, ४०४, ४०९, ४१५, ४२०, अवन्तिवर्मा : ७८ ४२१, ४२२ अवलोकवृत्ति (अवलोक टीका) : ७७, ८०, आत्मवादी सम्प्रदाय : ३८९ र२, ८३, ८८, ९४, ९७, १७२, ५२६ आदर्शवाद: २१०

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६३० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

३६८, ३७२, ३७३, ३७४, ३७५, भाण्डद्वार : ४२० ३७८, ३८२, ३९९, ४००, ४०१, भानु (प्रो.) : ४१४, ४१६ ४०२, ४०४, ४०५, ४०६, ४०८, भानुदत्त : ८२, २३५, २३६, २५६, २८२, ४११, ४१२, ४१२टि०, ४१५, ४१६, २८९, ३६७, ३६९, ३७२, ३७३, ४१८, ४१९, ४२०, ४२१, ४२२, ३७४, ३७५, ३८४ ४२३, ४२४, ४२५, ४२६, ४२७, भामह : ५६, ३९२ ४२८, ४२९, ४३०, ४३९, ४४६, भारतजननी : ४९६, ४९७ ४४७, ४४८, ४५०, ४५१, ४५२, भारत-दुर्दशा : ४९५, ४९६, ४९७, ५५० ४५४, ४५५, ४५६, ४५८, ४५९, भारत-दुदशा (रूपक) : ५५१ ४६०, ४६२, ४७५, ४८०, ४९१, भारतभूषण अग्रवाल : ५३९, ५५३, ५६२, ५०१, ५०७, ५२०, ५८२, ५८३, ५६९ ५८८, ५९५, ५९९, ६००, ६०१, भारत व्याकुल-कम्पनी : ४३४ ६०२, ६०५ भारती (टीका) : ७२, ७४, ७५, ७८, ८० भरतनाटक : ५२७ भारती (वृत्ति) : ९३, ९५, १०९, ११०, भरतपुत्र : १४, २०, २१, ६०, ६१ १२५, १२६, १२७, १२८, १३२, भरतभाष्य : ७५, ७६, ९० १३३, १३४, १३५, १३६, १५०, भरतवाक्य : ५७३, ६०३ १५३, १५४, १५५, १९५, ३०४, भरतसूत् : ७३, ३१७ ३५७, ४५२, ४५५ भरताचार्य : ४५८ 'भारतीय नाट्य-साहित्य' (निबन्ध) : भरोत (गुज०) : २९ ५४८ टि० भर्त्तु हरि : २८४ भारतेन्दु (हरिश्चन्द्र) : १६५, १९९, २११, भवभूति : ४१, ४७, ४९, ७३, १६७, २१३, २१७, ३६९, ३७०, ४३३, १६८, १७८, १९१, २१२, २१८, ४३ ४, ४३५, ४३६, ४९२, ४९३, २२०, २२२, ३७७, ३७८, ३८१, ४९४, ४९५, ४९६, ४९७, ४९८, ३८३, ४४५, ५४३, ५९२ ४९९, ५०१, ५०२, ५०६, ५०७, भवाई : ५२७ ५१८, ५४२, ५४३, ५४९, ५५०, भवानीविलास : ३८० टि० ५५४, ५५५, ५७७, ६००, ६०२, भाण : ६०, ८५, ९५, ११०, १३६, १६८, ६०३ १७०, १८५, १९९, २२२, ४४२, 'भारतेन्दु के नाटक' (निबन्ध) : ४९७ टि० ४४९, ४५०, ४५२, ४५५, ४५७, भारतेन्दु-नाटकमण्डली : ४३५ ४६३, ४७२, ४७३, ४७६, ४७७, भारतेन्दु-युग : ४२९, ४३६, ५४२, ५४९ ४७९, ४९५, ४९६, ५५०, ५५४, भाव : १०४, १०५, २४०, २६७, २७०, ५५५, ६०४ २७२, २७३ भाणिका : ४७३, ४७४, ४८९ भावनढ़ : ५८६

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शब्दानुकमणी [६३१

भावनटी : ५८६ भुवनाभ्युदय (काव्य) : ७७ भावप्रकाशन : १, २ टि०, १५, ३०, भुवनेश्वर प्रसाद : ५५३ ३० टि०, ३३, ६० टि०, ६२, भृंग तुपकरी : ५६४ ६२ टि०, ६३, ६३ टि०, ६४, भोज (राजा) : ५७, ८१, ८५, ८६, ८७, ६४ टि०, ६५, ६६, ६६ टि०, ६८, ९०, ९६, ९७, २३५, २८५, २५८, ६८ टि०, ८१, ८२, ८५ ८५ टि०, ३४१, ३४२, ३६६, ३६९, ३७७, ८६, ८६ टि०, ८७, ८७ टि०, ९०, ३७९, ३८१, ३८२, ३८३, ३८९, ९६, ९७, ९९ टि०, १००, १०७, ४२९, ४४६, ४५५, ४५८, ४५९, ११८ टि०, १२७ टि०, १३३ टि०, ४६३, ४६४, ४६५, ४६६, ४६७, १३५ टि०, १४३ टि०, १५० टि०, ४६९, ४७१, ४७२, ४७३, ४७४, १५१ टि०, १५२ टि०, १५५ टि०, ६०० १५६ टि०, १५८ टि०, १६३, भोजचरित : ४४५ १६३ टि०, १६४ टि०, १६५ टि०, भोलानाथ (डॉ०) : ५४७, ५४८ टि० १७२ टि०, १७६, १८० टि०, भोलाशंकर व्यास (डॉ०) : १७२, १७८ १९३, २२१ टि०, २३१ टि०, ३४० टि०, ४५०, ४५० टि० २३४, २७८, २७८ टि०, २८१टि०, भ्रुकुंस : ४८, २५६ २८५, २८६ टि०, २८७, २८८, म ३५५, ३५६ टि०, ३९९, ४३०, मंगलप्रभात : ५९२ ४४३, ४४३ टि०, ४५३, ४५३ टि०, मंगलप्रसाद विश्वकर्मा : ५५१ ४५५ टि०, ४५६ टि०, ४५८, मंजरी (गीतिनाट्य) : ५३८ ४५८ टि०, ४६३ टि०, ४६४ टि०, मई-दिवस : ३५, ४८२ ४६५, ४६५ टि०, ४६६, ४६७, मणिकुल्या : ४७४ ४६९, ४७२, ४७२ टि०, ४७३, मण्डूकसूक्त : २३,२७ ४७४, ४७४ टि०, ४७६ टि०, मतिराम : २३६ ४९५. ५२६, ५८८ मत्तल्लिका : ४७१

भावमिश्र : ८२ मत्तवारण : ४१३, ४१४

भावविलास : ३६९ मत्तवारणी : ४१२, ४१३, ४१४, ४१५, भास : ३४, ४०, ४१, ४९, ५४, ७१,१२५, ४१६, ४१७, ४२१, ४२२, ४२३ १५६, १५८, १५९. १६७, १६९, मत्तवारिणी : ४१६ १९०, २१७, २२३, ४५४, ४८०, मत्तविलासप्रहसन : ५९२ ४९०, ४९१, ५१४, ५१५, ५४३ मत्स्यगन्धा : ५३५, ५३६

भिखारीदास : २३६ मथुरानाथ शास्त्री (पं०) : २८२ टि०, भुक्तिवाद : ७८, १०५, ३२५, ३३१. ३३३, २८५ टि०, २९८ टि०, ३०५ टि०, ३५३, ५०१ ३४४ टि०, ३६३ टि०, ३६5 टि०

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६३२ ] भारतीय नाड्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

मदनमोहन खन्ना : ५६३ महावंश : ५० मदलेखा : ४६३ महावीर (भगवान्) : ३, ५१ मधुसूदन सरस्वती : ३८१, ३८१ टि० महावीरचरित : १३१, १६७, १९१, मध्यमव्यायोग : ५९१ १९२, १९३, १९४, २१६, २१८, मनकद (डॉ०) : ४०४, ४०६, ४०७, ४०८, २२१, २२६, ४४५, ५९२ ४१२, ४१४ महावीरप्रसाद द्विवेदी (आचार्य : द्विवेदीजी) : मन की लहर : ५५१ ४९८, ४९९ मनमोहन घोष (डॉ० घोष) : ६९, ७१, महाव्रत : १२, १९, २०, ५०, ५१ ७६, ११५, १४६, ४११, ४१४, महिमभट्ट : ७८, ८५, २६१, ३३८, ३४०, ४२२, ४२७, ४९० ३४१, ३६५ मन्दिर : ५४५ महेन्द्रध्वजोत्सव : ३५, ३६ मन्धुल्लिका : ४७१ महेन्द्रप्रसाद : ४३६ मन्धुल्ली : ४७१ महेन्द्रराज : ७९ मम्मट (आचार्य) : ४, ७५, ७६, ७७, ८०, महेन्द्रविजयोत्सव : ४०० ८८, ९५, १०४, २६१, ३०५, माखनलाल चतुर्वेदी : ५८९ ३०६, ३११, ३१५, ३२०, ३२३, मागध : २४९ ३२९, ३३८, ३४२, ३६२, ३६३, माघ (कवि) : २३३ ३६४, ३७२ माणिक्यवल्लिका : ४७५ मय (शिल्पी) : २९ मातृगुप्त : ५७, ६५, ६६, ७५, ८३, ८६, मयूर (कवि) : ७७ ८७, ९६, ४४६, ४७५ मर्चेण्ट ऑव वेनिस : ५९२ मातृगुप्ताचार्य : ६५ मलधारी हेमचन्द्र : ३६८ माधव : १५६, ४६९ मल्लिका : ४७४, ४७५ माधव शुक्ल (पं०) : ४३५ महाचारी : १४५, १४८, १५५, ४०६, 'माधुरी' : ५५० ४०७, ४०८, ४०९ मानसार (शिल्पशास्त्र) : ४३० महात्मा ईसा (नाटक) : ६०२ मायाकापालिक : ४६८ महानाटक : ३२, ४४५, ४४७, ४७७ मारीचवंचित : ४४५ महाभारत : २९, ३१, ३३, ४५, ४६, ४७, मारुति (नाट्याचार्य) : ६६, ८६ ५१, ५२, ५४, १६७, १६९, २४४, मार्क्स : २११, ५४०, ५४२ २४५, ३६२, ४५२, ५९९, ६०३ मार्क्सवाद : २१२ महाभारत पूर्वाद्ध (नाटक) : ४३५ मालतीमाधव : ४०, ४१, १३०, १६८, महाभाष्य : ३५, ३६, ४५, ४८, ४५ टि०, १९३, २१७, २२१, २२३, २४९, ५ू८ २५६, ४२६, ४४७, ४४८, ४५५, महाराणा प्रताप : ४३५ ५९१

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शब्दानुक्रमणी

मालविका : ४५५ य मालविकाग्निमित्र : ३, ४९, १४०, १९२, यक्षगान : ५२७, ५२८ ३९९, ४५५ यजुर्वेद : ४, १४, १५, १७, १८, १९, २६, मि० डब्ल्यू० आर्चर : २१४ २८, १२६, १३३, १४०,३५५,५२० मिथ्याज्ञानविडम्बना (नाटक) : ४४५ यजुर्वेदसंहिता : १९, १९ टि० मिनान्दर : ३८ यथातथ्यवाद : ५४३ मुंज (राजा : वाक्पतिराज द्वितीय) : ८१ यथार्थवाद : २१०, २११ मुक्ति का रहस्य : २११, ५१४, ५१६, यमनिका : ३८, ३९ ५१६ टि० यम-यमी-संवाद : २२, २५ मुद्राराक्षस : ४०, ४१, १३१, १५१, १५९, यवनिका : ३८, ३९, ४४, ६५, ९५, ९८, १६०, १६७, १७८, १९९, २४५, १४४, १४५, १९२, ४०७, ४१०, ४४६ ४३०, ५९७ मुरारि : १६७ 'यह आपका पत्र है' (नाटक) : ५९२ मूक : २४८ याज्ञवल्क्यस्मृति : ६९, ६९ टि०, ७२ मूकनाट्य : ५८६ यात्रा : ३३, ३४, ४९, ५२, ३९९, ५२७ मूकसंवाद-नाट्य : ५८७ यात्रानाटक : ५२७ मूरे : ४८२ यादवोदय : ४६७ मुच्छकटिक : ३४, ४०, ४१, १६८, २१७, यास्क : २२, ७२ २२२, २२३, २५२, ४२७, ४२८, युवराज : ४५० ४४७, ४४८, ४९० यूरीपाइड : ३७ मेगास्थनीज : ३९ योहान्स हर्टेल : २६ मेघनादवध : २१७, २२९, २३१, २४९,२५१ र मेघप्रभाचार्य : ३२ रंगदैबत-पूजन : ९८ मेनका-नहुष : ४६३ रंगदैवत-पूजनविधि : २४ मे-पोल : ३५ रंगद्वार : १४५, १५८, ५७५ मे-पोल-उत्सव : ३५ रंगपीठ : ४०६, ४०७, ४०८, ४०९, ४१०,

मैकबेथ : १७९ ४११, ४१२, ४१३, ४१४, ४१५, मैक्डूगल (डॉ०) : २६८, २७४ ४१६, ४१७, ४२०, ४२१, ४२२, मैक्डोनल (प्रो०) : २१, २८, २९, ६९ ५७२, ५७५, ५७७, ५७८ मैक्समूलर (प्रो०): २३, २६ रंगपूजन : ५२१ मैं तुम्हारा हूँ (नाटक) : ५९२ रंगपूजा : १६०, ४२३, ५७१, ५७२, ५७३, मैथिलीशरण गुप्त : ५३४, ५८९ रंगमण्डप : ४०७, ४०९, ४११, ४१२, ४१३ मैन ऐण्ड सुपरमैन : ५४२ रंगशीर्ष : ४०६, ४०७, ४०८, ४१०, ४१३,

मोहनदास : ९० ४१७, ४२०, ४२१, ४२२

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६३४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

रंगावतरण : ३१ ३०१ टि०, ३०९ टि०, ३१० टि०, रक्षाबन्धन : १६७, ५०९ ३३४ टि०, ३४६, ३५३ टि०, रघुवंश (डॉ०) : ६९ टि०, १०३ टि०, ११५, ३९६, ३९७, ३९८ ११९, १६२, १९६, २१४ टि० रससूत्र : ७५, ७६, ७७, ७८, ८०, ९२, २५८ टि०, २५९ टि०, ३१२ टि०, १०३, १०४, १०५, २५९, २६३, ३१३ टि०, ६०० ३२०, ३२५, ३३५, ३४१ रघुवंश (महाकाव्य) : ६२ रसार्णवसुधाकर (रसार्णवसुधा) : ५७, ६०, रजतशिखर : ५३७ ८१, ८८, ८९, २८८ रत्नावली (नाटिका) : ३१, ३९, १३०, रसिकप्रिया : ३६९, ३७९ टि०, ३८० टि० १५१, १६५, १६६, १७१, १७२, राक्षस का पिता : ५९२ १७६, १७७, १८१, १८२, १८३, राक्षस का मन्दिर : ५१६ २२०, २३०, २४४, २५०, ४१७, राघवन (डॉ० वी०): ३६७, ३६८, ३६८ टि० ४६१, ४६५ ४०८, ४१७ रमानिवास : ३६९ राघवभट्ट : ६५, ६६, ८९ रमेशचन्द्र : ५६६ टि० राजतरंगिणी : ६५, ६६, ७७, ७७ टि० रविदास : ४४५ राजवर्मा : ४५० रवीन्द्रनाथ ठाकुर : ५४० राजशेखर : ३०, ६२, ६८, १२५, १५६, रसकलश : २३७ १९०, १९१, ४६३, ५३८ रसकलिका: ३०८ राजाचल : दद रसगंगाधर : २६४, २८२ टि०, २८५, राजा राममोहन राय : ५४३ २८५ टि०, २८६ टि०, २८८ टि०, राजीव सक्सेना : ५५३ २९८ टि०, ३०५ टि०, ३०६ टि०, राजेन्द्रकुमार शर्मा : ५५३ ३४४, ३४४ टि०, ३५० टि०, ३६३, राज्यश्री : १६४, ५०२, ५०३, ५०६ ३६३ टि०, ३६८ टि० राधा (गीतिनाट्य) : ५३५, ५३६ रसगंगाधर का शास्त्रीय अध्ययन : २९५ टि० राधाकृष्ण : ५६१ रसतरंगिणी : ८२, २३६, २८८, २८९, राधाकृष्ण (रेडियो-रूपक) : ५६० ३६७ टि०, ३७२ टि०, ३७४ टि० राधाकृष्ण दास : ५५१ रसमंजरी : ८२, २३५, २३६ राधाकृष्ण प्रसाद : ५६२ रसमीमांसा : २७५, २९२ टि०, २९४, राधाचरण गोस्वामी : ५५० ३०८ टि०, ३०९ टि०, ३५१ टि०, राधेश्याम कथावाचक (पं०) : ४३३, ५५१ ३७०, ३७० टि० रामकुमार वर्मा (डॉ० वर्मा) : ५२९, ५३०, रससरसी : ८२ ५३१, ५३२, ५४५, ५५२, ५५३, रस-सिद्धान्त : २६१ टि०, २६२ टि०, ५६१, ५६६, ६००, ६०४ २६३ टि०, २६९ टि०, ३०० टि०, रामकृष्ण कवि : ६१, ६४, ६९

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शब्दानुकमणी [६३५

रामचन्द्र : ८४ रायल एशियाटिक सोसाइटी : ३७ रामचन्द्र-गुणचन्द्र : ८, ५७, ८०, ८१, ८२, रास : ५६८ ८४, ९०, ९५, ९८, १००, १०४, रास और रासान्वयी काव्य : ५२८, ६०४ १०५, १०७, १०९, ११०, १६६, रासक : ४६४, ४६५, ४६६, ४६७, ४५०, १६८, १७२, १७३, १७४, १७६, ५२६, ५२८ १८०, १८३, १९४, २१२, २१५, रास-नाटक : ५२७, ५३३ २२४, २२६, २६२, २८१, २८२, रासलीला : ३३, ३४, ३९९, ४३१, ४३२, ३०६, ३०७, ३६२, ३६३, ३६७, ४३४, ५३१, ५५० ३७२, ३७५, ४४३, ४६०, ४६१, राहुल : ५७, ६४ ४६२, ४६३, ४६४, ४६५, ४६६, रिचर्ड्स: ३११ ४६७, ४६८, ४६९, ४७२, ५९९ रिजवे (प्रो.) : ३०, ३३, ३४, ४८१ रामचन्द्र तिवारी : ५६१, ५६४ रीति-सम्प्रदाय : ३९३, ३९४, ३९६ रामचन्द्र शुक्ल (आचार्य : पं० शुक्लजी) : रुचिपति : ६१ २६४, २६९, २७५ टि०, २७६, रुद्र : २९३ २९४, ३०८, ३०९, ३५०, ३५१, रुद्रट : ८६, ८७, ९६, १८७, २३१, २३५, ३५२, ३५३, ३५४, ३७०, ३७१, २८२, २९३, ३६१, ३६५, ३६९, ३८५, ५१४, ५१४ टि०, ६०२ ३७६, ३९२ रामचरित : १७२ रुद्रटाचार्य : २३४ रामचरितमानस : ३५५, ४३१, ४३२ रुद्रदत्त शर्मा (पं०) : ५५१ रामदहिन मिश्र (पं०) : ३०८, ३५३ रुद्रभट्ट : ३०८, ३६५ रामनरेश त्रिपाठी : ५५१ रुय्यक : ७८, ८५, २३५ रामयतन सिंह 'भ्रमर' (प्रो०) : ५४६, रूपक : १०, ११६, ११८, ११९, १२७, ५४७ टि० १३४, १३६, १३७, १३९, १८५, रामलाल सिंह : २६८ टि०, ३२८ टि० १८६, १८९, ४४२ रामलीला : १, ३३, ३४, ४९, ३९९, ४३१, रूपक-भेद : ४४२ ४३२, ४३४, ५२७, ५३१, ५६८ रूपक-रहस्य : १२५, १२५ टि०, ४९९, रामवृक्ष बेनीपुरी : २४५, ५५३, ५५६, ५६२ ४९९ टि०, ५०१, ६०४ रामसिंह (महाराज) : ३६९ रूपगोस्वामी : ५७, ८१, ८९, २८२, ३६८,

रामसिंह वर्मा : ५५१ ३८१

रामानन्द : ४६९ रूपनारायण पाण्डेय : ५५१

रामाभ्युदय : २५० 'रूमाल' (नाटक) : ५९२ रामायण : १, ४५, ४६, ४७, ४९, ५१, रेडियो-नाटक : ५५६, ५५७, ५५८, ५५९, ५२, ५४, १६४, १६७, १६८, ५६०, ५६१, ५६८, ५६९, ५७० १६९, २२१, २२३, ४५२, ५९९ रेड़ियो-नाटक (पुस्तक) : ५६९

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६३६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

रेडियो-नाट्यशिल्प : ५६९ रेडियो-रूपक : ५६४, ५६५ ३१६, ३१७, ३१९, ३२४, ३२९, ३३७, ३७६ रेल का विकट खेल (नाटक) : ५५० ल्यूडर्स (प्रो.) : ३१, ३२, ४८ रेवत-मदनिका : ४६४ व रेवतीरमण शर्मा : ५६१, ५६९ वक्रोक्तिजीवित : ३९४ टि०, ३९५ टि० रेवतीशरण शर्मा : ५९८ वक्रोक्ति-सम्प्रदाय : ३९४, ३९५, ३९६ रेशमी टाई (एकांकी) : ५३१ वत्सराज (नाटक) : २१७, ५१६ ल वन्दी : २४८ लक्ष्मण (शारदातनय के पितामह) : ८६ वरदाचारी (वी०) : ३३, ३८, ३८ टि०, लक्ष्मी का स्वागत (नाटक) : ५६१ ४२, ४२ टि०, ४८, ५५ लक्ष्मीनारायण मिश्र (मिश्रजी) : १६८, वर्त्तना : ४२४ २११, २१७, ५१२, ५१३, ५१४, वर्षवर: २४८ ५१५, ५१६, ५१७, ५४१, ५४४, वल्लभाचार्य : ४३१ ५५२, ५५३, ६००, ६०३ वशिष्टपुत्र-संवाद : २२ लक्ष्मीनारायण लाल (डॉ०) : ५४५, ५५३, वसन्तराज : ८९ ५५४, ५६१ वस्तु : ९९, १६१, १६२, १६३ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय (डॉ०) ४९२ वस्तुवादी सम्प्रदाय : ३९० लटकमेलक : ४५१ वाइल्ड डक : ५४२ ललितकुमार सिंह 'नटवर': ४३६ वाक्यपदीय : २८४ ललितविस्तर : ५० वाजसनेय संहिता : १९ ललिताप्रसाद सुकुल (प्रो.) : ५४९ टि० वाटवे (डा०) : ३८५ लॉरेन्स विलियम : ५६६ वात्स्य : ५७, ५९, ६०, ६१ लाला श्रीनिवासदास : ५५०, ५५१ वात्स्यायन : ५२, ५३ लास्य (नृत्य) : ३, १४, १५, ४९, ४५०, ४६८ वामन : ६२, ३९३ लास्य रूपक : ४९६ वाल्मीकि : ४६, ४७, ५६, ४८० लिंगोत्सव : ४५१ वासन्ती (गीतिनाट्य) : ५३८ लियोनिद लियोनोव : ५६७ वासवदत्ता (गद्यकाव्य) : ५७, ६६, ४१३ लीलामधुकर : ४४९ वासवराज : ४३० लुडविक : २४ वासुकि (आचार्य) : ६६, ८६ लेवी (प्रो०) : ३२, ७० विंडिश (प्रो.) : २१, ३६, ३७, ३८, ३९, लोचन (टीका) : ७९, ३४३ ४०, ४१, ४२ लोपामुद्रा : २२ विकासवाद-सिद्धान्त : २८ लो भाई पंच, लो (नाटक) : ५४५ विक्रमोर्वशीय (नाटक) : २१, ३९, ४१, ७० लोल्लट : ७५, ७६, ७७, ३०८, ३१५, ७१, १५८, १५९, २०८, ४४७,

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शब्दानुकमणी -ES1F FIEJW [ ६३७ ४६३, ४६४, ५९१ १४९, १५०, १५१, १५२, १५३, विजयपर्व : ५२९, ५२९ टि०, ५३० टि० १५५, १५६, १५७, १५९, १६४, विजेता (नाटक) : २४५ १६५, १६६, १६७, १६८, १७२, विट : ४०, ४१, ५०, १०२, २०६, २२१, १७३, १७६, १८०, १८२, १८३, २२२, २२६, ४४८, ४७०, ५८३ १८६, १८७, १९३, १९४, २१२, विण्टरनित्ज : २७ २१९, २२१, २२२, २२४, २२५, विदूषक : ४०, ४१, १०२, २०६, २२१, २२६, २२९, २३०, २३२, २३३, २२२, २२३, २२६, २५५, ४७०, २३४, २३५, २३६, २३७, २४१, ५८३ २४३, २४९, २५६, २५७, २७८, विद्धशालभंजिका : १९० २८०, २८२, २८३, २८४, २८५, विद्याधर : मप, ८९ २८८, २९१, ३००, ३०१, ३०५, विद्यानाथ : ५७, १, ८२, दद ३०६, ३११, ३१९, ३३८, ३४२, विद्यासुन्दर : ४९२ ३४३, ३४९, ३५०, ३५३, ३५४, विद्रोहिणी अम्बा : ५४५ ३६२, ३६७, ३७२, ३७४, ३८०, विनयपिटक : ५० ३८९, ४४२, ४४९, ४५०, ४५१, विनायिका : ४७० ४५५, ४५६, ४५७, ४५९, ४६२, विनोद रस्तोगी : ५५३, ५६२ ४६३, ४६४, ४६५, ४६६, ४६७, विभाव : २८४, २८५, २८६ ४६८, ४६९, ४७०, ४७१, ४७२, विलासवती : ४६६ ४७३, ४७४, ४७५, ४७६, ४७७, विलासिका : ४७०, ४८० ४८०, ५०१, ५२६, ५७८, ५९९, विल्सन (प्रो.) : ३२, १८७, ४५१, ६००, ६०१ ४८९ टि० विश्वनाथ सिंह (रीवांनरेश) : ४९२, ४९३, विशाख (नाटक) : २२१, ५०३, ५०७, ४९४, ५०६ ५०७ टि०, ५० विश्वम्भर मानव : ५५३, ५६२ विशाखदत्त (विशाखदेव) : ८४, १२५, विश्वामित्र : ५३५, ५३६ १६७, २४५ विश्वामित्र-नदी-संवाद : २२, २५ विशाखिल : ६२ विश्वास : ५९२ विश्वकर्मा : १४, ४०१ विश्वासघात : ५९२ विश्वनाथ (कविराज आचार्य) : ८, ५७, विषपान : ५१२, ५१२ टि० ६१, ८१, ८२, ८८, ८९, ९०, ९६, 'विषस्य विषमौषधम्' (नाटक) : १९९, XP ९७,P९८, १००, १०१, १०२, ४९५, ४९६, ५५०, ५५४, ५५५ ap १०३, १०४, १०६, १०७, १०९, विष्कम्भक : १९१, १९२, ४५१, ४५२, ११८, ११९, १२५, १२७, १२८, ५७८ १३०, १३१, १३५, १३७, १४४, विष्णु : ८१ यशव

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६३८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

विष्णुधर्मोत्तर (पुराण) : ६७, ४००, ४२९ व्यासदेव : २३५ विष्णु प्रभाकर : ५५३, ५६१, ५६३, ५६४, ब्रजलाल शास्त्री : ५५१ ५६८, ५६९ श वीणावती : ४७३ शंकर : ३४४ वीथी : ९५, ११०, १२७, १२८, १३६, शंकरदेव : ५२६ १५०, १५२, १५३, १५४, १७०, शंकरवर्मन : ७८ १८५, ४४२, ४५४, ४५५, ४५७, शंकराचार्य : ६९, २१७, ३४२ ४७७, ४७९, ४९६, ६०४ शंकराद्वत : ३४२, ३४४ वीथ्यंग : ४६५ शंकुक (श्रीशंकुक) : ५७, ६४, ७५, ७७, वीरराघव (टीकाकार) : ३७७ ७८, ८३, ८६, ९२, १०४, १०५, वृजचन्द्र : ४३५ २९९, ३१७, ३१८, ३१९, ३२०, वृत्ति : १०९, १२५, १२६, १३१, १३४, ३२१, ३२२, ३२३, ३२४, ३२५, १३५, १३६ ३२९, ३३०, ३३७, ३४१, ३४६, वृत्नासुर : २२ ४१९, ५०१, ६०० वृत्नोद्धरण : ४५३ शकलीगर्भ : ६४ वृद्धभरत : ६८, ६९ शकार : ४०, ४१, २२३, ४४८ वृन्दावनलाल वर्मा : ५४५, ५५२ शब्दकल्पद्रुम : ४१३ वृषाकपि : २२ शराबी (नाटक) : ५४५ वेंकटप्पा (राजा) : ४३० शर्मिष्ठा-ययाति : ४५६ वेणीसंहार : १५१, १६६, १७१, १८३, शाण्डिल्य : ५७, ५९, ६०, ६१ १८७, २१६, २२१, ४४५, ४८७, शातकर्णि : ६१, ६२ ४८८, ५९१ शातकर्णी : ५७, ६१, ६२ वेदान्तवागीश : ४४५ शाप और वर (नाटक) : ५५५ वेबर (प्रो० डॉ०) : ३६, ३९, ४८ शाम्याचार्य राहुल : ७५ वैतालिक : २४८ शारदातनय : १, २, ८, १५, ३०, ३३, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति : ४९६, ५४९, ५७, ६०, ६२, ६३, ६४, ६५, ५५०, ५९२ ६६, ६८, ८१, ६२, ८५, ६६, व्यक्तिविवेक : ८५, ३४० टि०, ३४१ टि० ८७, ९०, ९६, ९७, ९८, ९९, व्यंजनावाद : ८०, ९३, ३३६ १००, १०१, १०३, १०६, १०७, व्यामिश्रक: ४६ १०८, १०९, ११७, १२७, १३३, व्यायोग : ९५, ११०, १३६, १७०, १८५, १३४, १३५, १४३, १५०, १५१, २०६, २१७, ४४२, ४५३, ४७७, १५२, १५३, १५५, १५८, १६३, ४७९, ४९०, ४९६, ५२२ १६४, १६५, १७२, १७६, १८०, व्यास : ५६, ५७, ६३, ८६, १३४,३५५, ४८० १८२, १८३, १९३, २१२, २११,

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शब्दानुक्मणी [ ६३९

२३१, २३४, २४६, २४७, २४८, शृंगारतिलक : २९३, ३६१, ३६५, ४६६ २४९, २५६, २५७, २७८, २८०, शृंगारप्रकाश : ५७, ८१, ८५, ९०, ९७, २८१, २८६, २८८, २९१, २९३, ३४१, ३४२ टि०, ३६६, ४४६, ३४३, ३४४, ३५५, ३६१, ३९९, ४५८, ४६४, ४६६, ४६७, ४६८, ४००, ४३०, ४४३, ४४५, ४४६, ४६९, ४७१, ४७१ टि०, ४७२, ४४९, ४५१, ४५३, ४५४, ४५५, ४७२ टि०, ४७३, ४७४, ४७४ टि० ४५६, ४५७, ४५८, ४५९, ४६२, शृंगारभाषित : ४६७ ४६३, ४६४, ४६५, ४६६, ४६७, शृंगारविलास : ५५१ ४६८, ४६९, ४७०, ४७१, ४७२, शेक्सपियर: १७८, १७९, २०५, २०७, ४७३, ४७४, ४७५, ४७६, ४७७, २५२, २५६, ४२८, ४८७, ४८८, ४८०, ५७८, ५८२, ५९९, ६००, ५०१, ५०२, ५१३, ५१५ ६०१ शैण्ड : २६८ शारदातिलक : ४४९ शैलालिन् : ५८ शारदीय (ग्रन्थ) : ८७ शैलूष : १९, ४५, ५९, २४६ शारिपुत्र प्रकरण : ४४८ शैव आनन्दवाद : ३३६ शाङ्ग देव : ७५, ७६, ३६२ शैवाद्वत : ३४२, ३४४, ३८२ शारङ्ग धरपद्धति : ७७ शैवाद्वतवाद : ३४६ शालग्राम शास्त्री : द८ टि० शैवाद्वत-सिद्धान्त : ३३८ शालिकर्ण : ६१, ६२ शोभनिक : ४८ शालीकर्ण : ६१ शो (शौ) भिक : ३१, ४८, ५१, ५३, ५८ शाहजहाँ (नाटक) : ५४७ शौनक्य : २२ शिंगभूपाल : ५७, ८१, ८७,८८, ८९, ३६२ श्यामसुन्दरदास (डॉ०) : १२५, ३०८, शिकारी (नाटक) : ५६१ ४९९, ६००, ६०४ शिक्षादान : ५५० श्रव्यनाट्य : ५५७ शिलाली : ४७, ५४, ५७, ५८, ५९, ६०० श्रीगदित : ४४३, ४६९, ४७५, ४७६, ४८० शिल्पक : ४६९, ४७७ श्रीरामलीला-नाटकमण्डली : ४३५ शिल्पी (गीतिनाट्य) : ५३७, ५६४ श्रीशारदा-नाट्यसमिति : ४३६ शिवतत्त्वरत्नाकर : ४३० श्रीहर्ष (वात्तिककार) : ६४ शिवप्रसाद सिंह (डॉ०) : ५९८ श्रेडर (प्रो०): २३, २४, २५, २६, २७ शिवसागर मिश्र : ५६२ ष शिवा-साधना : ५०९ षट्त्रिशक भरतसूत्र : ७२ शुक्ल यजुर्वद : १९ षट्साहस्री संहिता : ६८, ७२ शूद्रक : ३४, ४९, १२५, १६८, १६९, षड्दारुक : ४१०, ४११ २०९, २१२ षाडव : ३१३, ३२०

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६४० j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

स सन्त विनोबा भावे : ५९८ संगीतचूडामणि : ४३० सन्धि : ८२, ९४, १००, १७९, १८०, संगीत-नाटक-अकादमी : ४३९ १८१, १८२, १८३, १८४, १८५, संगीतमकरन्द : ४००, ४३० १८८, ४४५, ४४६, ५७५ संगीतरत्नाकर : ७५, ७६, ३६२, सभामण्डप : ४०५ ३६२ टि०, ३६४, ३६४ टि०, सभासद : २४९ ४३० समर्पण (नाटक) : ५४५ संग्रहकारिका : ३६० समवकार : ९५, १०८, १३६, १७०, संचारी भाव : २९०, २९१, २९२, २९३, १८५, २०६, २१७, ४४२, ४५३, २९४, २९५, २९६, २९७, २९८, ४५४, ४७७, ४७९, ४८०, ५२२ ३१६ समस्यानाटक : ५४०, ५४१, ५४२, ५४३, संजीव : ४२६ ५४४ संन्यासी : १६८, २११, ५१३, ५१६ 'समाज' : ५२, ५३ संलापक : ४६८, ४६९, ४७८ समीक्षा-दर्शन : २६८ टि०, २९३ टि०, संवाद : २१, २२, २३, २४, २५, २६, २९४, ३२८ टि० २९, ३६, ४८, ५४, १३९, १९४, समुद्रगुप्त-प्रशस्ति : ७१ १९६, १९७, ५७८, ५७९, ५८९ समुद्रमन्थन : ४५३, ४५४ 'संस्कृत ड्रामा': २३, ४३ टि० सरमा (इन्द्रदूती): २२ सआदत हसन मण्टो : ५६१ सरयूप्रसाद बिन्दु : ५५१ सच्चा जीवन (नाटक) : ५५५ सरस्वतीकण्ठाभरण : ५७, ८१, ८५, २८५, सज्जन (नाटक) : ५०२ ५०७ २८५, टि०, २८६ हि०, २८८, सट्टक : ४५८, ४५९, ४६३, ४७८, ४९६ ३६६, ३६६ टि० सड़क (नाटक) : ५६४ सरस्वती हृदयालंकार : ९० सती-प्रताप : ४९६, ५७३ सल्लापक : ४६८, ४६९ सती का शाप : ५९२ सागरकौमुदी : ४५१ सत्तपसेणीयसुत्त : ३, ५१ सागरनन्दी : ५७, ६१, ६३, ६६, ८०, सत्यहरिश्चन्द्र (नाटक) : १९९, २१७, ८३, ८४, ९५ ३०९, ४९५ सात्त्वती (वृत्ति) : ९३, १०९, ११०, सत्य की विजय : ५९२ १२५, १२६, १३०, १३१, १३२, सत्येन्द्र (डॉ०) : ४९७, ५५२ १३३, १३४, १३५, १३६, ३५६, सत्येन्द्र शरत् : ५५४, ५६२ ३६०, ४५२, ४५५ सदाशिव : ५७, ६३, ८६, ६०० सामवेद : ४, १४, १५, १७, २०, २५, सद्गुरुशरण अवस्थी (प्रो.) : ५५२ २८, १२६, १३३, १४०, ३५५, सद्धर्मपुण्डरीक : ५० ५२०

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शब्दानुकमणी [ ६४१ सारमेयपुत्र : २२ सियारामशरण गुप्त : ५३५, ५५१ सारिपुत्तप्रकरण : ५४ 'सिलेक्ट इन्सक्रिप्शन्स': ६१ सॉल : २६५ 'सिलेक्ट स्पेसीमेन्स ऑव दि थियेटर ऑव साहित्यकौस्तुभ : २८९ दि हिन्दूज़ : ३२ साहित्यदर्पण : ५७, ६१, ८१, ८२, द5, सिल्वां लेवी (प्रो० लेवी) : २३, २६, ३६, कफ टि०, ८९, ९०, ९७, ११८, ३७, ३८, ३९, ४७, ५८, ६५, ८३ ११९ टि०, १२५, १२७ टि०, सीता की माँ : ५५६ १२८ टि०, १३० टि०, १३१ टि० सीताबेंगा-गुफा-नाट्यशाला : ४१, ५५ १३५ टि०, १३७, १३७ टि०, सीताराम चतुर्वेदी (आचार्य चतुर्वेदीजी) : १४४ ि०, १४९, १५४, १५५ टि०, २५, २७, २८, २९, ३३, ४४, ११९, १५६, १५६ टि०, १६४ टि० १६२, २३७, २९८, ४३८, ५२३, १६५ टि०, १६८ टि०, १८०, ५२४, ५४०, ५७३, ५८३, ५८५, १८२ टि०, १८७, १९३, २१९ टि०, ५९०, ५९४, ६००, ६०४ २२२टि०, २२५, २२६, २३५, २३६, सीय-स्वयंवर : ४३५ २४० टि०, २४१ टि०, २४३, सुग्रीवकेलन : ४६७ २७८ टि०, २८० टि०, २८३, सुदर्शन : ५५१ २८३ टि० २८५ टि०, २८८ टि०, सुधीन्द्र (डॉ०) : ५५३ २९१ टि०, ३०० टि०, ३०५ टि०, सुन्दरमिश्र : ६५, ८९ ३०६ टि०, ३१९ टि०, ३४२, सुपर्णाध्याय : २४ ३४३ टि०, ३४९ टि०, ३६७, सुबन्धु : ५७, ६६, ८६, ८७, ९६, १०८, ३६७ टि०, ३७२ टि०, ३७४, ४१३, ४४६ ३७४ टि०, ३८०, ३८० टि०, सुब्बाराव (प्रो०) : ४०४, ४१४, ४१५, ३८९ टि०, ४५७ टि०, ४६६, ४६७, ४१६ ५००, ५०१, ५२६ सुभद्राहरण : १५६, ४६९, ५९१ साहित्यरत्नाकर : २८३, २८६ सुमित्रानन्दन पन्त (पन्तजी) : ५३७, ५५६ू, साहित्यसार : २१७ ५६३, ५६४ सिकन्दर (नाटक) : ३७ सूक्तिमुक्तावली : ७७ सिद्धनाथ कुमार (डा०) : ५३९, ५५४ टि०, सूत : २४९ " ५५७टि०, ५६२, ५६३, ५६४,५६९ सूत्रधार : ३०, ६५, २४७ सिद्धराज : ८४ सिद्धान्त और अध्ययन : २९५ टि० सूम के घर धूम (नाटक) : ५९२ सिद्धार्थ (नृत्यनाटक) : ५४०, ६०२ सूरविजय नाटक-मण्डली : ४३४ सिन्दूर की होली : १६८, २११, ५१४, सूरसागर : ४३१ सूर्यकिरण पारीक : ५४७ ५४१, ५४३, ५४४ सूर्यािदेव : २, ५१

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६४२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

सेठ कन्हैयालाल पोद्दार : ३७० स्वर्णश्री : ५६१ सेठ गोविन्ददास (सेठजी) : ४३७, ४३८, स्वांग : ४१, ४२, ४८, ११३, ५२७, ५६८ ५१७, ५१८, ५१९, ५२०, ५४५, स्वोक्तिनाटक : ५५४, ५८५, ६०४ ५४७, ५५२, ५५३, ५५४, ५५५, ह ५५५ टि०, ५५६, ६००, ६०३, 'हंस' (शान्ति-संस्कृति-अंक) : ५६७, ५६७टि० ६०४ हंसकुमार तिवारी : ५५३, ५६२ सेठ गोविन्ददास-अभिनन्दन-ग्रन्थ : ४९७टि०, हजारीप्रसाद द्विवेदी (आचार्य : डॉ० ५४८ टि० द्विवेदीजी) : १७४ टि०, १८४टि०, सेठ पेस्टनजी फ्रामजी : ४३३ २१५, ३०८, ४१६, ५२०, ५२१,

सेवापथ (नाटक) : ५४५ ५२२, ६००, ६०४ सैरन्ध्रिका (नाटक) : ४५१ हत्यारा (नाटक) : ५९२ सोफोक्लीज : ३७, ५६, १२० हरदेव बाहरी (डॉ०) : ५५२ सोमपान : २२ हरप्रसाद शास्त्री : ३५, ७० ९ 1 सोमयज्ञ : २६, ५० हरिऔध : २३७, २३८ ६51-९ सोमशर्मा : ४६ हरिकृष्ण प्रेमी (प्रेमीजी) : ५०९, ५१०, सोमसूक्त : २४ ५११, ५१२, ५३५, ५४३, ५४५ सौन्दर्यवाद : ४८६ हरिदूत : ३२ स्कन्दगुप्त : १६७, २१६, ५०३, ५०४, हरिभक्तिरसामृतसिन्धु : ८९ ५०६, ५०८, ५९१ हरिवंश : ४४, ४६ स्टडीज इन ब्रॉडकास्टिंग : ५६६ टि० हरिशंकर शर्मा : ५५१

स्टाउट : २६८ हरिश्चन्द्र खन्ना : ५६१, ५६३, ५६९ स्ट्रिण्डबर्ग : ५१७, ५५५ हर्टेल (डॉ०) : २४, २६, २७

स्टीफेन : ५३३ हर्ष (नाटककार) : २१७, ४५७, ४६३, स्तम्भितरम्भक : ४६३ ४७५, ६०३

स्थापक : ३०, १५६, १६० हर्ष (वार्त्तिककार) : ४९, ६४, ६६, ८३,

स्पेण्डर : ५३३ ८६, ८७, ९६ स्वगत : १९७, १९९, ४४०, ४४१, ५८१ हर्षचरित : ७१

स्वगत-नाट्य : ५६४ हर्षवार्तिक : ६४, ६५, ७५ स्वप्नभंग : १६७, ५०९, ५१२ टि० हर्षविक्रम (वार्त्तिककार) : ६४ स्व नवासवदत्त : १६७, ४४६, ५९२ हर्षविक्रमादित्य : ६५, ६६ स्वगं की झलक (नाटक) : २११, ५४५ हल्लीश : ४७१, ४७२, ४८० स्वर्ग में नरक (नाटक) : ५९२ हल्लीसक : ४७१, ४७२ स्वर्ग में सब्जेक्ट कमिटी : ५५१ हाथीगुम्फा : ५२ स्वर्णविहान ; ५३५ हाथीदांत का डब्बा (नाटक) : ५९२

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शब्दानुकमणी [६४३

हाव: २४० हिन्दी-रंगमंच और नाट्यकला का विकास : हिन्दी-अभिनवभारती : ५९ टि०, ६० टि०, ४३७ टि० ६५ टि०, २६१ टि०, २९९ टि०, हिन्दी-साहित्य का इतिहास : ५१४ टि० ३०० टि०, ३०४ टि०, ३२० टि०, हिलेब्राण्ट (प्रो.): ३०, ५८ ३२५ टि०, ३४७ टि०, ३६५ टि०, हिस्ट्री ऑव संस्कृत लिटरेचर : २० टि०, ३६६ टि०, ३७३ टि०, ३७४ टि०, २१, ५९ टि० ३७८ टि०, ३७९ टि०, ४१५, हीरे का हार (नाटक) : ५९२ ४२१ टि०, ४२२ हृदयदर्पण : ७८, ३२८ टि०, ३३३ हिन्दी-एकांकी का विकास : ५४८ टि० हृदयमन्थन (नाटक) : ५९२ हिन्दी के गीतिनाट्य : ५३५ टि०, ५३८ टि० हे (ही) गेल : ३११, ४८४, ५४० हिन्दी-नाटक : उद्भव और विकास : हेमचन्द्र (आचार्य) : ८४, २८८, ३०६, १५ टि०, २३ टि०, ५२८ टि०, ३२०, ३६७, ३७२, ४५८ ५३३ टि०, ५४५ टि०, ६०४ हेराक्लीदई : ३७ हिन्दी-नाट्यदर्पण : ३०६ टि० हेला : २४०, २४१ हिन्दी-नाट्यपरिषद् : ४३५ हैमलेट : १७९ हिन्दी-नाट्य विमर्श : ४९२ टि० होता : २८ हिन्दी-नाट्यसमिति : ४३५ होमर : ५६, १२० हिन्दी-नाट्यसाहित्य : ४९२ टि०