12. पल Hड हारड : रंगमच [४१७
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पल Hड हारड : रंगमच [४१७
इस सम्बन्ध में डॉ० राघवन द्वारा डॉ० कीथ की आलोचना द्रष्टव्य है: In this connection, we may observe that Keith's connecting this diction of Bharata's that the hall should look like a cave with the Ramgarh hill cave, taken to have been once used for recitation etc. does not prove anything.' 'शैलगुहाकार' शब्द से स्पष्ट अर्थ निकलता है कि नाट्यशाला की छत समतल नहीं होती थी, वरन् बीच में ऊँची होती थी। उसकी यह बनावट अभिनय में प्रयुक्त ध्वनियों की दृष्टि से वैज्ञानिक है। इस प्रकार की छत से रंगमंच की ध्वनियाँ प्रतिध्वनित न होकर प्रेक्षक को अधिक स्पष्ट सुनाई देती होंगी।
अभिनवगुप्त ने द्विभूमि के विषय में अपने पूर्वाचार्यों के कई मत उद्धृत किये हैं। कुछ आचार्यों के अनुसार रंगपीठ में ही नीचे और ऊपर की दो भूमियाँ मान ली गई हैं। उनमें भी कुछ के अनुसार नेपथ्य तथा मत्तवारणियों से रंगपीठ का धरातल भिन्न ऊँचाई का होता था और कुछ के अनुसार रंगशीर्ष तथा रंगपीठ के धरातल में अन्तर होता था। 'रंगावतरण' शब्द के आधार पर यह कल्पना की गई है कि रंगस्थल नेपथ्य की अपेक्षा नीचा होता था। दूसरे आचार्यों के अनुसार मत्तवारणी मण्डप से जितनी बाहर निकली हो, उसी के बराबर दूसरी भित्ति बनाकर देव-मन्दिर की अट्टालिका के चारों ओर परिक्रमा करने के मार्ग के समान दूसरी भूमि बनाई जाती है। तीसरे आचार्यों का मत है कि मण्डप के ऊपर एक दूसरी मंजिल बनाई जाती है। जान पड़ता है कि प्राचीन काल में दो-मंजिले रंगमंच का भी विधान था। रत्नावली नाटिका में नाटककार ने ऐसी योजना की है। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे व्याख्याकार हैं, जो समतल भूमि को ही स्वीकार करते हैं। परन्तु, अभिनवगुप्त ने अपने गुरु भट्टतोत की वीप्सा-गर्भ-व्याख्या को ही प्रस्तुत किया है, जिसका अर्थ है क्रमशः नीची से ऊँची होती हुई भूमि। इस प्रकार, रंगपीठ के पास से लेकर द्वार तक रंगपीठ के समान ऊँचाई हो जाती है। ध्यान देने की बात है कि द्विभूमि का प्रयोग सम्पूर्ण नाट्य-मण्डप के लिए किया गया है और इस विचार से भट्टतोत की व्याख्या उपयुक्त प्रतीत होती है। स्वयं अभिनवगुप्त ने स्पष्ट किया है कि इस प्रकार बैठने की व्यवस्था करने से निम्नलिखित कई लाभ हैं : १. प्रेक्षक एक-दूसरे को आच्छादित नहीं करते, अर्थात् ढँक नहीं लेते; २. मण्डप का आकार पर्वत की गुफा के समान बन जाता है; ३. शब्दों में स्थिरता आ जाती है, अर्थात् शब्द अनुगुंजित नहीं होते। वातायनों की मन्दता उनमें जाली आदि लगाकर करनी चाहिए। अभिनवगुप्त की यह व्याख्या बहुत स्पष्ट दृष्टि उपस्थित करती है।
- The Theatre of the Hindus, p. 160.
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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास स्थापन-विधि भरत मुनि ने नाट्य-मण्डप के विधिपूर्वक शिलान्यास आदि कार्यों का विस्तृत निर्देश दिया है। नाट्य-मण्डप की भूमि का स्थूल विभाजन हो जाने पर शुभ नक्षत्र और मुहूर्त्त में मण्डप का शिलान्यास विशाल समारोह के साथ करना चाहिए। मंगल शंख, मृदंग आदि का वादन होना चाहिए और फूलों से शृंगार करना चाहिए। उस अवसर पर काषाय वस्त्रधारी संन्यासियों और विकलांगों को दूर हटा देना चाहिए। शिलान्यास करने के दिन रात्रि में अनेक प्रकार के भोजनों, सुगन्धित पुष्पों तथा फलों से सजावट करनी चाहिए। उस अवसर पर पूर्व दिशा में शुक्ल अन्न, दक्षिण में रक्त वर्ण के अन्न, पश्चिम में पीत वर्ण के अन्न तथा उत्तर में नील वर्ण के अन्नों से युक्त भाण्ड भित्ति के नीचे रखना चाहिए। नाट्य-मण्डप के शिलान्यास के अवसर पर भरत मुनि ने सब लोगों के लिए विशेष भोजन करने का विधान किया है। ब्राह्मणों को घृत मिश्रित खीर का विशेष भोजन देना चाहिए, राजा को मधुपर्क अर्थात् घृत तथा मधु मिश्रित दधि और नाट्य-मण्डप बनानेवाले कारीगरों को गुड़-भात देना चाहिए। रात्रि का शिलान्यास का कार्य सम्पन्न हो जाने पर दूसरे दिन शुभ सूर्योदय के अवसर पर भित्ति-निर्माण का कार्य आरम्भ करना चाहिए। स्तम्भ-स्थापन : इस प्रकार भित्ति-कर्म का प्रतिपादन करने के बाद भरत मुनि ने आगे स्तम्भ-विधि का प्रतिपादन किया है। इससे अनुमान होता है कि भित्ति-कर्म वहीं तक करना चाहिए, जहाँ से खम्भों का आरम्भ होता है। स्तम्भ की स्थापना का विधान अनेक धार्मिक अनुष्ठानों से पूर्ण है। स्तम्भ-स्थापना के तीन दिन पूर्व से आचार्य के लिए उपवास का विधान है। ईशान कोण (पूर्व-उत्तर के बीच) में स्थित प्रथम ब्राह्मण-स्तम्भ में धृत तथा सरसों से संस्कृत सभी शुक्ल पदार्थों से युक्त विधि करनी चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन के लिए खीर देनी चाहिए। इसके बाद आग्नेय कोण (पूर्व-दक्षिण के बीच) वाले क्षत्रिय- स्तम्भ में वस्त्र, माल्य, अनुलेपन आदि सब कुछ लाल रंग का देना चाहिए और द्विजों को गुड़-भात देना चाहिए। फिर नैऋत्य कोण (दक्षिण-पश्चिम के बीच) में स्थित वैश्य- स्तम्भ में वस्त्र, माल्य आदि सब कुछ पीले रंग का देना चाहिए और द्विजों को भोजन के लिए भात देना चाहिए। अन्त में, वायव्य कोण (पश्चिम-उत्तर के बीच) में स्थित शूद्र- स्तम्भ में प्रयत्नपूर्वक वस्त्र, माल्य आदि सब कुछ नीले रंग का देना चाहिए और द्विजों को खिचड़ी देनी चाहिए। इसके अतिरिक्त ब्राह्मण-स्तम्भ के मूल में सोना, क्षत्रिय-स्तम्भ के मूल में तांबा, वैश्य-स्तम्भ के मूल में चाँदी तथा शूद्र-स्तम्भ के मूल में लोहा रखने का विधान है। इसका अभिप्राय यह हो सकता है कि प्रेक्षकों की दीर्घा में विभिन्न बर्णों के लिए अलग-अलग स्थान निर्धारित थे, इसका संकेत विभिन्न वर्णों के स्तम्भों से मिलता था। भरत मुनि ने स्तम्भ-स्थापन के दोषों और फलों का विवेचन करके भोजन तथा दक्षिणा का निर्देश किया है। फिर सारी विधियाँ करके वाद्यों के बजाने के साथ शुद्ध-
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मक गा हमार रंगमंच [४१९ पवित्र होकर तथा अभिमन्त्रित करके स्तम्भ को उठाने का विधान किया है। स्तम्भ को उठाते समय एक प्रकार की प्रार्थना की जाती थी : यथाचलो गिरिर्मेरुहिमवांश्च महाबलः । जयावहो नरेन्द्रस्य तथा त्वमचलो भव ।।१ -अर्थात् जिस प्रकार मेरु पर्वत और महान् हिमालय अचल हैं, राजा के लिए जय का आवाहन करनेवाले, हे स्तम्भ ! उसी प्रकार तुम भी अचल हो। स्तम्भ की स्थापना करते समय बहुत सावधानी से कार्य करना होता था। यदि स्तम्भ हिल गया, खिसक गया या काँप गया, तो अनेक प्रकार के उपद्रवों की आशंका हो सकती है। रंगशाला की प्रत्येक क्रिया में किसी विघ्न का भय लगा रहता था। भित्ति- कर्म, नाप-जोख, चूना पोतना, चित्रकर्म, खम्भा गाड़ना, भूमि-शोधन आदि सभी कियाएँ बड़ी सावधानी से की जाती थीं। इसलिए पद-पद पर ब्राह्मण-भोजन, पूजा, प्रार्थना की आवश्यकता समझी जाती थी। चतुरस्र मण्डप में स्तम्भ-व्यवस्था : स्तम्भों की यह व्यवस्था भरत मुनि ने तीन बार में की है। उन्होंने एक श्लोक में दस स्तम्भों का विधान किया, फिर दूसरे श्लोक में छह स्तम्भों का और फिर अन्य श्लोक में आठ स्तम्भों का विधान किया। इस प्रकार १०+६+८=२४ स्तम्भों का निर्माण चतुरस्त्र मण्डप के भीतर होता है। विकृष्ट मण्डप के प्रसंग में मण्डप के बाहरी कोनों पर ब्राह्मण आदि के नाम पर चार स्तम्भों का विधान विस्तारपूर्वक पहले ही हो चुका है। उन्हें मिलाकर २८ स्तम्भ हो जाते हैं। मण्डप के भीतर लगनेवाले २४ स्तम्भों में कहाँ-कहाँ और कैसे लगाये जायँ, इस विषय को लेकर प्राचीन टीकाकारों में अनेक मत हैं। अभिनवगुप्त ने चार टीकाकारों या आचार्यों के मतों का उल्लेख किया है। वे हैं : १. श्रीशंकुक, २. 'अन्य' भट्ट लोल्लट आदि, ३. वार्त्तिककार तथा ४. उपाध्याय भट्टतोत। द्वार-विधि : अभी यह चतुरस्र मण्डप की रचना का प्रकरण चल रहा है। स्तम्भ- विधि का विवेचन करने के अनन्तर भरत मुनि तथा अभिनवगुप्त ने अत्यन्त संक्षेप में नेपथ्य- रचना का वर्णन किया है। रंगशीर्ष के पीछे बचे हुए, आठ हाथ चौड़े और बत्तीस हाथ लम्बे क्षेत्र में नेपथ्य-गृह की रचना करनी चाहिए। फिर वे द्वार-विधि का वर्णन करते हैं। भरत मुनि ने दो श्लोकों में द्वार-विधि का वर्णन किया है, परन्तु वे दोनों श्लोक अत्यन्त अस्पष्ट हैं। अभिनवगुप्त ने इनकी संगति लगाने का विशेष प्रयत्न किया है। भरत ने रंगपीठ पर प्रवेश करानेवाले एक द्वार का उल्लेख किया है : द्वारं चैंकं भवेत्तत्र रङ्गपीठप्रवेशनम् ।२ १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २, कारिका ६८ २. वही, अध्याय २, कारिका १०२ (काव्यमाला)
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४२० 1 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासे किन्तु, यह कथन भरत के दूसरे निम्नलिखित श्लोक के विपरीत पड़ता है: यतो मुखं भवेद् भाण्डद्वारं नेपथ्यकस्य च। सा मन्तव्या तु दिक् पूर्वा नाट्ययोगेन नित्यशः ॥' -अर्थात् जिस ओर नेपथ्यगृह का भाण्डद्वार (वाद्यों के रखने का द्वार) हो, नाट्य के प्रसंग में विद्वानों को उस दिशा को पूर्व दिशा समझना चाहिए। अभिनवगुप्त ने यह श्लोक उद्धृत भी किया है। उन्होंने पहले ही दो द्वारों का उल्लेख किया है, परन्तु यहाँ एक ही द्वार का वर्णन किया गया है। यह स्पष्ट रूप से विरोध है, जिसका परिहार करने के लिए अभिनव को अत्यधिक परिश्रम करना पड़ा है। उन्होंने 'द्वारं' एकवचन के प्रयोग का कारण 'जातावेकवचनं' लिखकर जाति में एकवचन माना है। उन्होंने अर्थ किया है कि एक प्रकार के दो द्वारों की रचना करनी चाहिए। परन्तु, एक दूसरी समस्या उपस्थित हो जाती है। भरत ने 'द्वारं चैक भवेत्तत्' में एक शब्द का भी स्पष्ट प्रयोग कर दिया है। 'द्वारं' में एकवचन से जाति का बोध करनेवाला मान लेने पर भी 'एक' पद दो द्वारों का बोध कभी नहीं करा सकता। इसकी संगति बैठाने के लिए अभिनव ने बहुत प्रयास किया है। यह अनुमान करना कठिन है कि भरत ने इस प्रकार का प्रयोग क्यों किया, जिसके लिए इस प्रकार के मानसिक व्यायाम की आवश्यकता पड़ गई। ये दोनों द्वार रंगशीर्ष और नेपथ्य के बीचवाली दीवार के मध्य बिन्दु से समान दूरी पर दोनों तरफ बनाये जाते थे। जैसा कि उपर्युक्त तेरहवें अध्याय के ११वें श्लोक से पता चलता है, इन दोनों के बीच में वाद्य रखे जाते थे। गायक तथा वादक इन्हीं के बीच में बैठते थे और नेपथ्य से रंगशीर्ष और रंगपीठ पर पात्रों का आना-जाना इन्हीं के द्वारा होता था। इन द्वारों से पात्ों के प्रवेश तथा प्रस्थान के विशेष नियमों का विस्तृत विवरण भरत मुनि ने दिया है।" इन नियमों के अनुसार अवन्ती तथा दाक्षिणात्या प्रकृति के पात्र उत्तर-द्वार से प्रवेश तथा प्रस्थान करते थे। पांचाली तथा औड़ मागधी प्रकृति के पात्र दक्षिण-द्वार से प्रवेश तथा प्रस्थान करते थे। इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि नेपथ्य से रंगपीठ पर प्रवेश करने के लिए एक द्वार नहीं, प्रत्युत दो द्वार होते थे। अतः 'द्वारं चैंक भवेत्तत्र रङ्गपीठ- प्रवेशनम्' पाठ के स्थान पर 'द्वारद्वयं भवेत्तत्र रङ्गपीठप्रवेशनम्' पाठ आचार्य विश्वेश्वर ने अधिक युक्तियुक्त तथा संगत माना है। जिस प्रकार, भारतीय रंगमंच पर प्रवेश के लिए विभिन्न प्रवृत्तिवाले व्यक्तियों के लिए नियम बने हैं, उसी से मिलती-जुलती व्यवस्था यूनानी तथा चीनी रंगमंचों के लिए भी १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १३, कारिका ११ (काव्यमाला) २. वही, अध्याय १३, श्लोक ५२-५४
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देखी जा सकती है। यूनानी रंगमंच पर निकट का पात्र दाहिनी ओर से और दूर का पात बाईं ओर से आता है। परन्तु, भारतीय नियम से इनमें भेद भी है। भारतीय रंगमंच पर जो पात्र दक्षिण-द्वार से प्रवेश करता है, वह चक्कर काटकर फिर उसी द्वार से प्रस्थान भी करता है। इसके प्रतिकूल चीनी तथा यूनानी रंगमंचों पर दाहिनी ओर से प्रवेश करनेवाला पात् बाई ओर से प्रस्थान करता है और बाई ओर से प्रवेश करनेवाला पात् दाहिनी ओर से प्रस्थान करता है। पूर्व और पश्चिम के दो द्वार : अभी जिन दो द्वारों का विवेचन किया गया, वे नेपथ्यगृह से रंगपीठ पर पात्रों के प्रवेश के लिए हैं। उनका उपयोग प्रेक्षागृह के बाहर से उसके भीतर प्रवेश करने की दृष्टि से कुछ नहीं है। प्रेक्षागृह के !बाहर से उसके भीतर प्रवेश करने के लिए दो अन्य द्वारों की आवश्यकता है। उनमें से एक द्वार रंगपीठ के सामने की ओर होना चाहिए, जिससे सामाजिक नाट्य-मण्डप में प्रवेश कर सकें। यही नाट्य-मण्डप का मुख्य द्वार है। दूसरा द्वार प्रेक्षागृह के पिछले भाग में होना चाहिए, जिससे नटजन अपने परिवार के साथ नेपथ्यगृह में प्रवेश करें। भरत मुनि ने इस स्थल पर कहा है : जनप्रवेशनं चान्यदाभिमुख्येन कारयेत्। रङ्गस्याभिमुखं कार्य द्वितीयं द्वारमेव तु।।' किन्तु, इससे पहलेवाले श्लोक में नेपथ्यगृह से सम्बद्ध दो द्वारों का वर्णन हो चुका है। तृतीय द्वार का प्रयोजन अभिनवगुप्त के अनुसार नटजन के परिवार का प्रवेश नाट्य-मण्डप में कराना है। यह भी नेपथ्यगृह से सम्बद्ध है। इसके बाद सामाजिकों के प्रवेश के लिए चतुर्थ द्वार का वर्णन होना चाहिए। तृतीय द्वार का स्थान नाट्य-मण्डप के पीछे की ओर अर्थात् नाट्य-मण्डप के पश्चिम भाग में होना चाहिए। कई बातों पर विचार करके आचार्य विश्वेश्वर ने उपर्युक्त श्लोक का निम्नलिखित पाठ शुद्ध माना है। नेपथ्याभिमुखं कार्य तृतीयं द्वारमेव तु। जनप्रवेशनं चान्यदाभिमुख्येन कारयेत्॥२ यदि ऐसा पाठ माना जाय तो श्लोक का अर्थ पूर्ण और स्पष्ट हो जाता है। शेष दो द्वार : ऊपर चार द्वारों की विवेचना हुई। छह द्वारों में से दो द्वारों के विषय में विवेचन करना अभी बच रहा है। अभिनवगुप्त ने इन शेष दो द्वारों के विषय में केवल इतना ही लिखा है कि प्रकाश के आने के निमित्त दो अन्य द्वारों की रचना पा्श्व में करनी चाहिए। प्रकाश की विशेष आवश्यकता रंगपीठ पर ही होती है, अतः रंगपीठ के दोनों बगल में जहाँ मत्तवारणी का निर्माण हुआ है, वहीं इन दोनों द्वारों को बनाना चाहिए। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २, श्लोक १०३ (काव्यमाला) २. हिन्दी-अभिनवभारती, पृ० ३८४
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पहले ही लिखा जा चुका है कि मत्तवारणी बरामदे का ही दूसरा नाम है। मुख्य भवन से बरामदे में आने के लिए द्वार होता ही है। अतः, ये दोनों द्वार मत्तवारणी के ही स्थान पर रहते हैं। इनसे रंगपीठ पर प्रकाश भी आयगा और बरामदे में जाने का रास्ता तो बनेगा ही। व्यस्र प्रेक्षागृह : भरत मुनि ने निर्देश दिया है कि त्यस्र नाट्यगृह त्रिकोणात्मक बनाना चाहिए, और उसके बीच में त्रिकोणात्मक ही रंगपीठ बनाना चाहिए। अभिनवगुप्त ने आगे बताया कि विकृष्ट तथा चतुरस्र दोनों प्रकार के मण्डपों से सम्बन्ध होने के कारण त्यस्र मण्डप दोनों प्रकार के परिमाणवाले हो सकते हैं, अर्थात् इस त्रिभुजाकार मण्डप की प्रत्येक भुजा विकृष्ट मण्डप के आकार के समान ६४ हाथ की भी हो सकती है और चतुरस्र मण्डप के परिमाण के अनुसार ३२ हाथ की भी। इस मण्डप में रंगपीठ, रंगशीर्ष तथा नेपथ्यगृह भी त्रिभुजाकार होने चाहिए।
डॉ० मनमोहन घोष ने त्यस्र प्रेक्षागृह का जो चित्र दिया है, उसमें केवल नेपथ्य- गृह त्रिभुजाकार बनाया गया है, परन्तु भरत मुनि ने रंगपीठ भी त्रिभुजाकार बनाने का विधान किया है। किन्तु, यह बात उस चित्र में नहीं होने के कारण यह भरत मुनि के अभिप्राय के अनुसार नहीं है। कु० गोदावरी केतकर ने भी त्यस्न मण्डप का चित्र दिया है, किन्तु उसमें रंगपीठ तथा नेपथ्यगृह में से एक भी त्रिभुजाकार नहीं बनाया गया है। उसकी स्थिति भी उलटी रखी गई है। अतएव, यह चित्र भी भरत मुनि तथा अभिनवगुप्त के अभिप्राय के अनुरूप नहीं है। आचार्य विश्वेश्वर ने हिन्दी-अभिनवभारती में व्यस्र नाट्यगृह के दो चित्र दिये हैं, जिनमें रंगपीठ, रंगशीर्ष तथा नेपथ्यगृह-तीनों ही त्रिभुजाकार बनाये गये हैं। सम्भव है, इनमें से कोई रचना भरत मुनि तथा अभिनवगुप्त को अभिप्रेत हो।
व्यस्र नाट्यगृह का द्वार भी विकृष्ट तथा चतुरस्र मण्डपों के सदृश बनाना चाहिए, अर्थात् मुख्य (जन-प्रवेशन) द्वार का निर्माण पूर्व की ओर करना चाहिए। पात्र- प्रवेशवाले द्वार के अतिरिक्त दूसरे प्रकार के-वाद्यवाले पूर्वोक्त द्वारों की रचना रंगपीठ के पीछे की ओर करनी चाहिए। अर्थात् नेपथ्य से आनेवाले पात्रों के प्रवेश के लिए रंगशीर्ष और नेपथ्यगृह के बीच में दो द्वारों का निर्माण करना चाहिए। अबतक की व्याख्या में व्यस्र नाट्य-गृह के पूर्व दिशा में बननेवाले मुख्य द्वार या जन-प्रवेशन द्वार और रंगशीर्ष में बननेवाले दोनों द्वारों को मिलाकर तीन द्वारों का वर्णन हो चुका है। अब 'द्वितीयं चंव कर्त्तव्यं' में चकार से बचे द्वारों का ही ग्रहण हो सकता है। नाट्य-मण्डप के द्वारों के विषय में 'चतुर्द्वारं नाट्यगृहम्' तथा 'षडद्वारं नाट्यगृहम्' दो मत पाये जाते हैं। अब 'चतुर्द्वारं' वाले मत से एक द्वार और 'षड़्द्वारं' वाले मत से तीन द्वार बच रहे हैं; क्योंकि तीन द्वारों का विधान किया ही जा चुका है। 'चकार' से इन्हीं बचे द्वारों का ग्रहण होता है। यहाँ वास्तव में, 'चकार' का अभिप्राय नेपथ्यग हएमें नटीं के
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प्रवेश के लिए बनाये जानेवाले पिछले द्वार से है। यह व्याख्या 'चतुर्द्वारं' पक्ष में हुई। यदि 'षड्द्वारं नाट्यगृहम्' वाला पक्ष लिया जाय, तो नेपथ्यगृहवाले द्वार के अतिरिक्त मत्तवारणियों में बनाये जानेवाले द्वारों को भी 'चकार' से ग्रहण करना होगा। रंगमंच की पूजा : प्रेक्षागृह का निर्माण भी एक महान् धार्मिक अनुष्ठान माना गया है, जिसकी पूजा में सभी देवी-देवताओं तथा चर-अचर सभी प्राणियों को सम्मिलित किया जाता है और नाट्य की सफलता के लिए सभी से प्रार्थना की जाती है। रंगपूजा का महत्त्व अत्यधिक है; वस्तुतः रंगपूजा के विना नाट्य-प्रयोग की सफलता की सम्भावना ही नहीं मानी जाती। अतः, भरत ने बहुत विस्तार से रंगपूजा का विधान किया है। नेपथ्यज विधि भरत मुनि ने अभिनय के स्थूल रूप से दो भेद किये-सामान्य अभिनय और आहार्य अभिनय। सामान्य अभिनय के तीन मुख्य भेद हैं-वाचिक, सात्त्विक और आगिक। इन अभिनयों का प्रत्यक्ष सम्बन्ध रंगमंच से न होकर पात्रों के अंगों से है। भरत मुनि ने इनका विवरण अनेक अध्यायों में दिया है। परन्तु, आहार्य अभिनय का सम्बन्ध रंगमंच से है; क्योंकि आहार्य अभिनय का विधान नेपथ्य में होता है और नेपथ्य रंगमंच का अभिन्न अंग है। भरत ने आहार्य अभिनय को नेपथ्यज विधि कहा है और नेपथ्य को नाट्य का अलंकार माना है। उन्होंने नेपथ्य को बहुत महत्त्व प्रदान किया है : आहार्याभिनयो नाम ज्ञेयो नेपथ्यजो विधिः। तत्र कार्य: प्रयत्नस्तु नाट्यस्य शुभमिच्छता।। नाट्यस्येह अलङ्कारो नेपथ्यं सम्प्रकीततितम्।' पुस्त : भरत ने आहार्य अभिनय अथवा नेपथ्यज विधि के चार भेद माने हैं-पुस्त, अलंकार, अंगरचना तथा संजीव। पुस्त के अन्तर्गत नाट्य की कुछ ऐसी विधियाँ आती हैं, जिनकी सहायता से वस्त्र, चमड़े या पत्ते आदि से अनुकरणात्मक रूप बनाकर रंगमंच पर अभिनय के लिए उतारा जा सकता है। पुस्त के भी तीन भेद माने गये हैं- सन्धिम, व्याजिम तथा चेष्टिम। सन्धिम में वस्त्र या चमड़े से रूप बनाते हैं। किन्तु व्याजिम अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है; क्योंकि इसमें यन्त्र आदि के सहारे रूप बनाकर रंगमंच पर उतारा जाता है। उज्जैन के राजा चतुर्सेन के यन्त्रमय गज की कथा कथासरित्सागर में आई है। वस्त्रादि से वेष्टित होकर जिस रूप की चेष्टा की जाती है, वह चेष्टिम पुस्त है। वस्तुतः, पुस्त-विधि की सहायता से नाटक में अधिक-से-अधिक स्वाभाविकता आती है। इसके द्वारा अधिक-से-अधिक स्वाभाविक दृश्य रंगमंच पर दिखाये जा सकते हैं, यहाँ तक कि पर्वत, महल, यान आदि का बहुत ही सफलता से अनुकरण किया जा सकता है। भरत ने कहा है : १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २१, श्लोक २-३ (काव्यमाला)
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शैलयानविमानानि चर्मवर्म ध्वजा: नगाः। यानि क्रियन्ते नाट्ये हिस पुस्त इति संज्ञितः ।' अलंकार : अलंकार भी आहार्य अभिनय के अन्तर्गत आता है। रंगमंच पर उतरने के पहले अभिनेता का शृंगार नेपथ्य में ही किया जाता है, जो रस, भाव, देश तथा काल के अनुरूप होता है। शृंगार के भी अनेक साधन हैं, जिनमें माला, आभूषण और वेशभूषा प्रधान हैं। माला के भी पाँच मुख्य भेद माने गये हैं। भरत ने इस बाता का विस्तृत वर्णन किया है कि किस प्रकार आभूषणों के द्वारा अभिनेताओं का शृंगार करना चाहिए। उन्होंने अनेक प्रकार के आभूषणों का वर्णन किया है और बताया है कि किस प्रकार उनका उपयोग देश तथा जाति के अनुसार पुरुष और स्त्री-पात्रों को करना उचित है। आभरण शृंगार के अन्तर्गत नेत्रों में अंजन लगाना, कपोलों पर तिलक तथा पत्ररेखा के चित्र, अधरों तथा दाँतों को रंजित करना आदि हैं। स्त्री-पात्रों के सभी अंगों के आभूषणों का विस्तृत विवरण मिलता है, परन्तु आभूषण धारण करते समय रस तथा भाव की अनुकूलता पर ध्यान देना आवश्यक है। भरत मुनि ने रंगमंच पर अभिनय करते समय अधिक आभूषणों का प्रयोग वांछनीय नहीं माना है; क्योंकि अधिक आभूषणों के भार के कारण पात्र स्वच्छन्दतापूर्वक भावों का अभिनय करने में असमर्थ हो जाता है। इसका फल होता है कि रस-निष्पत्ति में बाधा उत्पन्न होती है। यह भी विधान किया गया है कि स्वर्ण के स्थान पर अबरख या लाह के आभूषणों का प्रयोग रंगमंच पर करना चाहिए। ऐसे ही चमत्कारी और बनावटी आभूषण रंगमंच पर अधिक उपादेय सिद्ध होते हैं। तस्मान्न सम्यक् च कृतं सौवर्ण भूषणं भवेत्। जतुपूर्णाल्यरत्नं तु न खेदजननं भवेत् ॥२ वेश-रचना द्वारा शृंगार का वर्णन करते हुए भरत ने देवांगनाओं, अप्सराओं, यक्षिणियों के उपयुक्त वेश-भूषा का विवरण दिया है और भिन्न-भिन्न देश, भाव, वय आदि के अनुरूप मनुष्य-जाति के स्त्री-पुरुष पात्रों के वेश का वर्णन दिया है। अंग-रचना : किन्तु पात्रों की वेश-रचना के पहले अंग-रचना आवश्यक है। वेश- रचना और अंग-रचना के ही माध्यम से सामान्य व्यक्ति दुष्यन्त अथवा शकुन्तला के रूप का अनुकरण करके हृद्गत विशिष्ट भावों का भी अनुकरण करने में समर्थ होते हैं। यह अंग-रचना भिन्न रंगों की सहायता से होती है। भरत मुनि ने विभिन्न रंगों का वर्णन किया है और यह भी बताया है कि किन-किन रंगों के योग से कौन-से रंग बनते हैं। रंग द्वारा रूप-परिवर्तन की विधि को भरत ने शास्त्रीय नाम 'वर्तना' (Make up)
१. नाट्यशास्त्र, अध्याय २१, श्लोक ९ २. वही, श्लोक ५०
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दिया है। कोई अभिनेता अपना स्वभाव छोड़कर राम, दुष्यन्त आदि के स्वभाव का अनुकरण करता है और थोड़ी देर के लिए यही उसका स्वभाव बन जाता है, इसी तरह अंग-रचना के द्वारा थोड़े समय के लिए वही उसका प्रकृत रूप भी हो जाता है। अंग-रचना तथा वेश-रचना के द्वारा अभिनेता दुष्यन्तादि विशिष्ट व्यक्तियों का वेश धारण कर उन्हीं का प्रभाव उत्पन्न करने में समर्थ होता है। वर्णकैश्चापि वेषश्च छादितः पुरुषस्तथा। परप्रभावं कुरुते यस्य वेषसमाश्रयम्।' अंग-रचना के सन्दर्भ में भरत ने देश, जाति, वय, सामाजिक स्थिति आदि के अनुसार विभिन्न रंगों का विवरण दिया है। देवताओं की अंग-रचना गौर; नारायण का श्याम; समुद्र, हिमालय तथा गंगा का श्वेत और आकाश का नील रूप होना चाहिए। सातों द्वीपों के रहनेवाले मनुष्य-मात्र का रूप तप्त स्वर्ण के समान होना चाहिए। भारत के राजाओं का रूप देशकाल के अनुसार गौर, श्याम तथा पद्म वर्ण का होना चाहिए। सुखी मनुष्यों का रूप गौर वर्ण का; कुकर्मी, ग्रहग्रस्त, रोगी, कुजाति आदि का रंग काला और ऋषि, तपस्वियों का रंग बैग (बदर) के समान होना चाहिए। बर्बर, किरात, द्रविड़, आन्ध्र तथा दाक्षिणात्य काले रंग के; शक, यवन तथा उत्तरदेशवासी गौर वर्ण के होने चाहिए। अंग, बंग, कलिंग के निवासी श्याम; ब्राह्मण, क्षत्रिय गौर और वैश्य, शूद्र काले रंग के दिखाये जायँ। अंग-रचना के सिलसिले में वेश-रचना का भी विस्तृत विवरण दिया गया है। केवल मूँछ ही चार प्रकार की कही गई है-शुक्ल, श्याम, विचित्र तथा रोमश। देश, काल तथा अवस्था के अनुसार इनका प्रयोग होना चाहिए। भन्त्री, पुरोहित आदि की मूछ शुक्ल; दुःखी, विपत्तिग्रस्त, तपस्वी आदि की श्याम; राजा, राजकुमार तथा यौवनोन्मत्त पात्रों की मूछें विचित्र होने का विधान किया गया है। भरत मुनि ने वेश-रचना या 'परिधान-विधान' तीन प्रकार के बताये हैं-शुद्ध, विचित्र और मलिन। इनका उपयोग देश, काल तथा पात् के अनुसार होना चाहिए। विवाह आदि मंगलमय अवसरों पर स्त्री-पुरुषों का वेश शुद्ध शुक्ल होना चाहिए। राजा का वेश मंगलमय, पवित्र अनुष्ठानों के अतिरिक्त अन्य अवसरों पर सदा चित्र-चमत्कारी होना चाहिए। दरबारी, मन्त्री, पुरोहित, सेठ, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र तथा अन्य सभी मनुष्यों के लिए शुद्ध वेश उपादेय माना गया है। उन्मत्त, प्रमत्त तथा व्यसन-ग्रस्त मनुष्यों का वेश मलिन होना चाहिए। मुनि, तपस्वी आदि का वेश वल्कल, चमड़ा या वस्त्र का होना चाहिए। अन्तःपुर में रहनेवाले कंचुकी आदि काषाय वस्त्र या लम्बा झूल धारण करें। किसी भी योद्धा को धनुष, तरकस, कवच आदि धारण करना अनिवाय है। राजाओं के सिर पर मुकुट; युवराज और सेनापति के सिर पर आधा मुकुट; विद्याधर, चारण आदि के सिर पर केश-मुकुट; अमात्य, पुरोहित, सेठ़ आदि के सिर पर पगड़ी आदि १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २१, श्लोक रर ३े IT
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४२६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास धारण करने का विधान है। बालक का भी सिर नंगा नहीं रहना चाहिए। मुनियों और तपस्वियों की लम्बी जटाएँ लटकनी चाहिए। बौद्ध श्रमण, संन्यासी आदि के सिर मुँड़े रहने चाहिए। भरत ने पुरुष-पात्रों की वेश-रचना का विवरण देते समय स्त्री-पात्रों की भी वेश- रचना का वर्णन किया है। स्त्री-पात्रों में सिद्ध गन्धर्व, यक्ष की स्त्रियों और अप्सराओं की भी वेश-भूषा का वर्णन है। मनुष्य-जाति के स्त्री-पात्रों के देश, काल, अवस्था आदि पर यथार्थ ध्यान दिया गया है। यदि देशकाल के अनुसार वेश-रचना नहीं हो, तो वह उसी प्रकार हास्यास्पद हो जाती है, जिस प्रकार वक्षःस्थल पर मेखला धारण करना: अदेशजो हि वेषस्तु न शोभां जनयिष्यति। मेखलोरसि बन्धे च हास्यायवोपजायते ।' मुनि-कन्याओं की वेश-रचना वन के ही अनुरूप होनी चाहिए, वे कोई आभूषण नहीं धारण करें, उनके सिर पर एक चोटी होनी चाहिए। अवन्ति देश की युवतियों के केश घुघराले हों, और गौड़ की युवतियों के सिर पर एक ही वेणी होनी चाहिए। आभीर युवतियों के सिर पर दो वेणियाँ हों और उनके सिर नील परिधान से ढँके हों। पूर्व तथा उत्तर-भारत की स्त्रियाँ के सिरों पर केश-गुच्छों के समान बाँधकर उठाया जाय, साथ ही केश तक शरीर आच्छादित रहना चाहिए। वेश्या-पात्रों का शृंगार इच्छानुसार शोभापूर्ण हो। प्रोषितपतिका तथा विपत्तिग्रस्त स्त्रियों का वेश मलिन होना चाहिए तथा उनको एक ही वेणी बनानी चाहिए। वियोग में वेश सादा होना चाहिए और कोई आभूषण नहीं धारण करना चाहिए। स्त्री-पात्ों का अभिनय प्रायः अभिनेत्रियाँ ही करती थीं। इस विषय में श्री एच्० एच्० विल्सन की सम्मति है : Females were represented in general by females : but it appears not to have been uncommon for men or lads to personate female characters, especially those of a graver character, like the Baudho priestess in Malati and Madhava.₹ संजीव : आहार्य अभिनय के तीन भेदों-पुस्त, अलंकार तथा अंग-रचना-का विवेचन करने के उपरान्त भरत मुनि ने चतुर्थ भेद संजीव का विवरण दिया है। भरत ने संजीव शब्द अत्यन्त व्यापक अर्थ में ग्रहण किया है। अपद, द्विपद तथा चतुष्पद प्राणियों के रंगमंच पर प्रवेश-विधि को भरत ने संजीव संज्ञा दी है। इस प्रकार सभी प्राणियों को रंगमंच पर उपस्थित करने की अनुमति दे दी गई है। सर्प के अतिरिक्त अन्य सभी प्राणी रंगमंच पर प्रस्तुत किये जा सकते हैं। ऐसे प्राणियों को रंगमंच पर सचमुच उपस्थित १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २१, श्लोक ७१ २. The Theatre of the Hindus, p. 50
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किया जाता होगा। केवल कल्पना से काम नहीं चलता होगा। विशेष रूप से मृच्छकटिक में ऐसा किये बिना दृश्य ठीक तरह दिखाया नहीं जा सकता। युद्ध आदि के अभिनय में अनेक प्रकार के शस्त्रास्त्रों के प्रयोग का विधान किया गया है। ध्वजा, छत्र, चमर, स्वर्णभाण्ड आदि का भी उपयोग रगमंच पर यथावसर किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं, शिल्प-कला के द्वारा जितनी वस्तुओं का निर्माण किया जा सकता है, सबका उपयोग करने का विधान किया गया है। कहा नहीं जा सकता है कि देवताओं के आकाशगामी रथों के लिए क्या किया जाता था। परन्तु, भरत ने यह भी स्वीकार किया है कि रगमंच की अपनी सीमा है और संसार की बहुत बड़ी वस्तुओं को उसपर प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। अतः उनके अनुकरण के द्वारा ही प्रेक्षकों के हृदय में रस-निष्पत्ति के लिए प्रयत्न करना चाहिए। वस्तुतः लोक-धर्म से नाट्य-धर्म भिन्न हुआ करता है और इसीलिए वास्तविक शस्त्रास्त्रों के स्थान पर लाह, चमड़े, वस्त्र आदि के बने कृत्रिम अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग का विधान किया गया है। रंगमंच के उपकरणों का निर्माण, पत्थर, लोहा तथा अन्य धातुओं से नहीं होना चाहिए; क्योंकि ये भारी होंगे और रंगमंच पर इनके संचालन में कठिनाई होगी। कवच, ढाल, झण्डा, महल, पहाड़, गुफाएँ, हाथी, घोड़ा आदि का निर्माण बाँस की कमाचियों और रंगीन कागजों की सहायता से करना चाहिए। इतना ही नहीं, मुकट तथा आभूषणों के विषय में भी भरत ने इस बात का ध्यान रखा है। वे सब लाह, अबरख आदि से बनाये जाते थे। रगमंच पर शस्त्रों का प्रहार वर्जित है, केवल संकेत की आवश्यकता होती है। इस प्रकार, नाट्यशास्त्र के कतिपय अध्यायों का अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन भारतीय रगमंच पूर्णरूप से सुसज्जित था। हाँ, यह सत्य है कि संस्कृत रंगमंच अपने आदर्शों तथा परम्पराओं के कारण-जिसे नाट्यधर्मी का नाम दिया गया- एक सीमा से बाहर नहीं जा सकता था। इक्कीसवें अध्याय में वर्णित नेपथ्यज विधियों का विवरण अभी दिया जा चुका है। इसके अतिरिक्त ३५वें अध्याय के अन्त में ऐसे कलाकारों तथा कारीगरों का विवरण दिया गया है, जो रंगमंच के साथ स्थायी रूप से सम्बद्ध थे। मालाकार, स्वर्णकार, मुकुटकार, चित्रकार, रजक, बढ़ई आदि का उल्लेख किया गया है। प्राचीन काल में लोक-रंगमंच : डॉ० मनमोहन घोष ने लिखा है कि यद्यपि नाट्य- शास्त्र ने अनेक प्रकार की नाट्यशालाओं का वर्णन किया है और उनके विभिन्न अंगों का भी विस्तार से वर्णन हुआ, परन्तु किसी प्रमाण के अभाव में यह कहना कठिन है कि प्राचीन भारतीय नाटक कहाँ तक, विशेष रूप से सुनिर्मित रंगशालाओं में अभिनीत होते थे। सम्भव है कि केवल राजे तथा बहुत धनी व्यक्तियों के ही पास ऐसी रंगशालाएँ थी, जो नाट्यशास्त्र के आदेश के अनुसार बनाई जाती थीं। डॉ० घोष का विश्वास है कि सामान्य जनों के लिए जो नादक प्रदर्शित होते थे, वे खुले कमरों में खेले जाते थे, जिन्हें नाट्य-मन्दिर
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४२८] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्धव और विकास या नट-मन्दिर कहा जाता था। ये मन्दिरों के सामने या शामियाने में अस्थायी रूप से बनाई रंगशालाओं में खेले जाते थे, जो आजकल की बंगाली यात्राओं से मिलते-जुलते थे। नाट्यशास्त्र में जिन नाट्यगृहों का वर्णन किया गया है, उनमें एक विशेष बात ध्यान देने की यह है कि वे नितान्त सामान्य आयाम के होते थे। मानव के लिए बड़ी रंगशाला ६४ हाथ लम्बी और ३२ हाथ चौड़ी होती थी। ऐसी रंगशालाओं में लगभग ४०० दर्शक बैठ सकते हैं। ग्रीक रंगशालाओं से यह सवथा विपरीत है; क्योंकि ग्रीस की रंगशालाओं में पन्द्रह हजार दर्शक बैठ सकते थे। दृश्य-विधान : प्राचीन भारतीय रंगशालाओं के उस छोटे आयाम का मुख्य कारण इन नाटकों के प्रस्तुतीकरण का विचित्र शिल्प-विधान है। बड़ी नाट्यशालाओं में दर्शक उन छोटी और नाजुक बातों को नहीं सुन सकते थे, जिनपर नाटक के अभिनय का बहुत बड़ा अंश निर्भर करता था। ग्रीक रंगशालाओं का अत्यधिक बड़ा आयाम इससे प्रभावित नहीं होता था; क्योंकि वे नाटक दूसरे ही शिल्प-विधान पर अधिकतर निर्भर करते थे। प्राचीन भारतीय यह बात बहुलांश में जानते थे कि उनकी विभिन्न कलाएँ कुछ सीमाओं में बद्ध हैं, अतः विचित्र दृश्यों के द्वारा प्रभाव का उत्पादन उनकी रुचि के अनुकूल नहीं था। नाटकीय कथानक के काल और स्थान को प्रत्यक्ष कराने के लिए प्राचीन हिन्दुओं के पास एक दूसरा ही उपाय था। संस्कृत-नाटकों में दृश्यों के बहुत लम्बे और पूरे वर्णन गद्य-पद्य में सर्वत्र बिखरे पड़े हैं। इन्हीं से चित्रित दृश्यों का काम हो जाता था। यदि उचित रीति से पढ़ा या गाया जाय, तो ये गद्य-पद्य अंश बहुत स्पष्टता से देश-काल का प्रभाव उत्पन्न करते थे। मृच्छकटिक में वसन्तसेना के भव्य भवन का वर्णन पढने से आँखों के सामने सारे दृश्य नाच जाते हैं। वैसे ही उत्तररामचरित में दण्डक वन का शानदार वर्णन है। शेक्सपियर ने भी इस उपाय का सहारा लेकर अपने दृश्यों को जीता- जागता बनाया है। नाटकों में कहीं-कहीं ऐसे सुन्दर वर्णन मिलते हैं कि कलाकारों के द्वारा रंगमंच पर बनाये गये चित्र भी व्यर्थ-से लगते हैं। शेक्सपियर के रगमंच पर भी चित्रित दृश्य नहीं होते थे। भारतीय रंगमंच पर चित्रित दृश्य नहीं होने के कारण दर्शकों को अपनी कल्पना से बहुत काम लेना पड़ता था। रगमंच पर कक्षा-विभाग से भी स्पष्ट हो जाता है कि उस समय दर्शकों को अपनी कल्पना से कितना अधिक काम लेना पड़ता था। जन-नाट्यशाला : भरत ने नाट्यगृह का जो विवेचन प्रस्तुत किया है, उसमें कुछ व्याख्यागत मतभेदों के रहने पर भी एक समुन्नत नाट्यशाला की दृष्टि मिलती है। इससे यह भी स्पष्ट रूप से ज्ञात हो जाता है कि उस समय तक भारत में नाट्य-कला पूर्ण रूप से विकसित कला के रूप में स्वीकृत हो चुकी थी। इस समृद्ध युग के उपरान्त नाट्य अनेक शतियों तक ह्रासोन्मुख ही रहा। विगत १२-१३ शतियों में नाटक तथा उसका रगमंच लोक-जीवन से ही प्रेरणा प्राप्त करता रहा और उसी के सहारे जीवन्त भी रहा। आधुनिक
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युग में यूरोप के सीधे सम्पर्क में आने के फलस्वरूप यूरोपीय रंगमंच के अनुकरण पर भारत में भी रंगमंच का विकास करने के अनेक प्रयत्न किये गये। कुछ प्रान्तों को अपनी परम्परा के आधार पर नाट्य-कला एवं रंगमंच के विकास में कुछ अंश में सफलता मिली है। परन्तु, ये रंगमंच अपनी सफलता में भी यूरोपीय यथार्थवादी रंगमंच की ही ओर अधिक अग्रसर हुए हैं। हो सकता है कि आधुनिक नाट्यकला तथा रंगमंच उसकी नवीन उद्भावना और सम्भावना को आत्मसात् कर ले। प्राचीन भारत के नाटकों का अभिनय प्रायः राजभवन के नाट्यगृहों तथा रंगशालाओं में हुआ करता था, जिनमें सामन्तों, राजपुरुषों तथा विद्वद्वृन्द का ही प्रवेश हो सकता था, परन्तु जन-जीवन की स्वाभाविक प्रेरणा का परिणाम होने के कारण नाटक केवल राजप्रासादों तक ही सीमित नहीं रह सका। समाज के मध्यम तथा निम्नवर्गों ने भी अपने मनोरंजन के लिए अपनी रुचि के अनुसार अभिनय के साधन जुटा लिये। इसलिए, एक ओर देव-मन्दिरों, गुफाओं तथा सामूहिक रूप में निर्मित नाट्यशालाओं में रास, यात्रा आदि लोक-नाट्य विकास पाते रहे और दूसरी ओर, गेय लोक-नाट्यों से भी जनता अपना मनोरंजन करती रही। इसका परिणाम यह हुआ कि आचार्यों को दस प्रकार के रूपकों के अतिरिक्त १८ या २० प्रकार के उपरूपकों के भी अस्तित्व को मान्यता देनी पड़ी। जिन नाटकों का अभिनय विद्वन्मण्डली में हुआ करता था, उनके आधार पर आचार्यों ने नाट्य-रचना के विभिन्न अंगों का विवेचन किया। भरत मुनि ने नाटक में केवल ३६ अंगों का विवेचन किया, किन्तु राजा भोज का समय आते-आते यह संख्या २५६ तक पहुँच गई। प्राचीन भारत के सर्वोत्तम तथा सर्वप्रकारेण पूर्ण नाटकों का अभिनय इन्हीं विद्वन्मण्डलियों में हुआ। संस्कृत और प्राकृत की ये पद्धतियाँ हिन्दी में आई। संस्कृत के समान हिन्दी में भी एक पद्धति दूसरी को प्रभावित करती रही। अतः, भारतेन्दु-युग में इन तीनों पद्धतियों का विकास स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। रंगमंच-सम्बन्धी पुस्तकें भरत के नाट्यशास्त्र में रंगशाला के निर्माण की विधि का बहुत ही विस्तार से विवरण दिया गया है। उसमें छोटी-से-छोटी बातों पर भी काफी ध्यान दिया गया है। वैसा विस्तृत तथा सूक्ष्म विवेचन अन्यत्र नहीं प्राप्त हो सकता। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य प्राचीन ग्रन्थों में भी रंगमंच का वर्णन मिलता है। नीचे उनका संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण : विष्णुधर्मोत्तर पुराण में केवल दो प्रकार के रंगमंच का उल्लेख पाया जाता है। इसमें कहा गया है कि केवल प्रेक्षागृह में ही नाट्य प्रस्तुत करना चाहिए। प्रेक्षागृह दो प्रकार का हो सकता है- आयताकार और वर्गाकार।
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४३० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास वर्गाकार प्रेक्षागृह १६x१६ गज का होना चाहिए। नाट्यगृह न बहुत बड़ा होना चाहिए और न बहुत छोटा; क्योंकि छोटे नाट्यगृह में संकीर्णता के कारण श्वासावरोध की दशा हो सकती है और बड़े नाट्यगृह में नाट्य-प्रदर्शन अस्पष्ट हो जायगा। इस ग्रन्थ में त्रिभुजाकार नाट्यगृह का कोई उल्लेख नहीं है। संगीत-मकरंद : नारद लिखित संगीत-मकरन्द में केवल वर्गाकार नाट्यगृह का उल्लेख मिलता है। इसमें एक नई नाप दी गई है; क्योंकि इस ग्रन्थ के अनुसार नाट्य- गृह ४८ X४८ गज का वर्ग होना चाहिए। भावप्रकाशन : शारदातनय ने अपने भावप्रकाशन के १०वें अधिकार में बताया है कि राजा के प्रासाद में तीन प्रकार के नाट्यगृह रहने चाहिए। इन्होंने चतुरस्न, व्यस् तथा वृत्त-तीन प्रकार के रंगमंच का उल्लेख किया है। भरत द्वारा निर्दिष्ट विकृष्ट के स्थान पर इन्होंने वृत्त रंगमण्डप रखा है। शिवतत्त्व-रत्नाकर : वासवराज ने अपने ग्रन्थ शिवतत्त्व-रत्नाकर में लिखा है कि राजा घेंकटप्पा ने एक नाट्यगृह का निर्माण कराया था। ग्रन्थ में इस नाट्यगृह की भव्यता का वर्णन किया गया है। इसमें हाथी-दाँत और चन्दन का काम किया गया था और बहुमूल्य रत्न जड़े थे। संगीत-चूडामणि : संगीत-चूडामणि संगीतशास्त्र-विषयक एक अप्रकाशित ग्रन्थ है। जान पड़ता है कि इसमें नाट्यगृह का विवेचन किया गया है। काव्यशास्त्र-विषयक एक अन्य ग्रन्थ में इसके दो श्लोक उद्धत किये गये हैं, जिनमें यवनिका का वर्णन हुआ है। संगीतरत्नाकर : संगीतरत्नाकर में प्रेक्षागृह का जो वर्णन दिया गया है, वह वस्तुतः संगीत तथा नृत्य का प्रदर्शन करने के स्थान का वर्णन है, परन्तु निस्सन्देह इसी स्थान पर नाट्य का भी प्रदर्शन होता होगा। प्रेक्षक भी दोनों अवसरों पर समान ही रहते होंगे। उस वर्णन में बताया गया है कि संगीतशाला विशिष्ट रूप से अलंकृत रहती थी। यह पुष्पों, पताकाओं तथा मणिस्तम्भों से सुसज्जित रहती थी। जिस भवन में नृत्य के प्रदर्शन का आयोजन होता है, वह प्रशस्त होना चाहिए। संगीतरत्नाकर में नाट्यशाला में दर्शकों के बैठने की व्यवस्था से पता चलता है कि यह नाट्यशाला राजप्रासाद से सम्बद्ध है। ये दर्शक शिक्षित, संस्कृत तथा कलात्मक रुचि के हैं-जैसे राजा, रानियाँ, मन्त्री, राजकवि आदि। इस रंगशाला में बैठने की व्यवस्था से यह भी ज्ञात होता है कि सामने का स्थान रंगमंच के लिए रहता था, जिसके बाँयें गायक आदि के लिए स्थान था और बीच तथा दाहिनी ओर के स्थान का उपयोग नृत्य तथा अभिनय के लिए होता था। मानसार शिल्पशास्त्र : मानसार शिल्पशास्त्र में मन्दिर से सम्बद्ध नाट्यशाला का विवरण दिया गया है। ये नाट्यशालाएँ मन्दिर के खुले हुए प्रांगण के साथ सम्बद्ध
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होती थीं, और प्रायः मन्दिर के सरोवर या शाला और राजप्रासाद के मध्य में अवस्थित रहती थीं। मध्यकालीन रंगमंच : मध्यकाल में भारत का शासन-सूत्र मुसलमानों के हाथ में आ गया था। उन्होंने नाट्य को प्रोत्साहन नहीं दिया; क्योंकि वे किसी का रूप बनाना धर्म-विरुद्ध समझते थे। दूसरी ओर, राजाओं का आश्रय समाप्त हो जाने से रंगमंच की सुव्यवस्था जाती रही और जनता अपने मनोरंजन के लिए खुले मैदान में स्वांग आदि के रूप में नाटक खेलने लगी। ऐसे समय में जनता ने रामलीला, रासलीला आदि का आश्रय लेकर अपना मनोरंजन भी किया और धार्मिक वृत्ति भी जागरित की। रामलीला तथा रासलीला के रंगमंच का इतिहास काफी पुराना है और भक्ति- काव्य का जब ऊषाकाल था, उसी समय हिन्दी नाट्य-रचना और रंगमंच का भी सुनहला प्रभात था। दोनों को उसी विराट् वैष्णव आन्दोलन से प्रेरणा मिली, जिसने १३वीं शती से लेकर तीन शतियों तक उत्तर-भारत को अभिसिंचित किया। भक्ति-भाव को जाग्रत करने के लिए भगवान् की लीलाओं का नाटकीय प्रदर्शन अत्यन्त सफल तथा आकर्षक साधन सिद्ध हुआ। स्पष्टतः इस प्रकार एक आकर्षक और लोकप्रिय रंगमंच के लिए प्रचुर सामग्री प्रस्तुत हो गई। वैष्णव आन्दोलन के द्वारा धर्म के जिस रूप का विकास हुआ, वह लकाश्रयी था-जनसाधारण की प्रवृत्तियों की सहायता से ही उसका उत्कर्ष हुआ। फलतः, क्लिष्ट आध्यामिक सिद्धान्तों के माध्यम संस्कृत की अपेक्षा देशी भाषाओं में ही इस नवीन रंगमंच के लिए नाटकों की माँग हुई। अनेक देशी भाषाओं में भक्त- वत्सल भगवान् की लीलाओं का प्रदर्शन आरम्भ हुआ। उत्तरी भारत के पश्चिमी भाग में ब्रजभाषा, मध्य में अवधी और पूर्व में मैथिली भाषाओं में लीलाएँ प्रदर्शित की जाने लगीं। इस रंगमंच के दो क्षेत्र थे -मन्दिर और राजभवन। वैष्णव रंगमंच की पश्चिमी शाखा का विकास मन्दिरों या अन्य धार्मिक स्थानों में हुआ, परन्तु पूर्वी शाखा का विकास प्रायः राज- भवनों या दरबारों में हुआ। मन्दिरों में प्रचलित रंगमंच के मुख्य रूप थे रासलीला तथा रामलीला और ये दोनों रूप अभी धार्मिक लोक-रंगमंच की परम्परा को कायम रखे हुए हैं। ऐसा माना जाता है कि रासलीला का प्रथम आयोजन वल्लभाचार्य ने किया और रामलीला का श्रीगणेश स्वयं गोस्वामी तुलसीदास ने किया। यह दिखाया जा सकता है कि सूरसागर के अनेक पद संवाद-रूप में हैं, जिनका प्रयोग रासलीला में किया जाता था। रामचरितमानस के भी अनेक स्थल संवाद-रूप में हैं। उसके अनेक संवाद एक प्रकार से छोटे-छोटे एकांकी ही हैं, जिनका अभिनय रामलीला में सफलतापूर्वक किया जा सकता है। अयोध्याकाण्ड में घटनाओं का गुम्फन, चरित्र-विकास, आन्तरिक तथा बाह्य द्वन्द और करुण रस का पर्यवसान उसे यूनानी तासदियों की श्रेणी में ला देते हैं। रामलीला का रंगमंच यथार्थवादी रंगमंच और साथ ही वस्तु-विषय की महत्ता को भी प्रकट करनेवाला है। लोक-परम्परा से भी रामलीला के रंगमंच ने बहुत-कुछ प्राप्त किया, विशेषतः परिहास के
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प्रसंग और पात्र। किन्तु, रामचरितमानस इन अभिनयों का सदा ही प्राण रहा, और इसी कारण रामलीला में रंगमंच का साहित्यिक रूप सुरक्षित रहा और रामलीला तो सदा के लिए सुरक्षित रह ही गई। फिर भी, मानना पड़ेगा कि वैष्णव रगमंच की यह पश्चिमी शाखा नाटक के मौलिक रूप तथा विशेषताओं को अक्षुण्ण रखने में असमर्थ रही। समय बीतने पर व्रजमण्डल के गीत, नाट्य आदि भक्त गवैयों के गीत काव्य बनकर रह गये। रगमंच से उनका सम्बन्ध क्रमशः टूटता ही गया। इस प्रकार, एक महान् नाट्य-रचना-शैली की सभी सम्भावनाएँ विलुप्त हो गई। इसका कारण स्पष्ट ही है-राज्य-संरक्षण का अभाव। सुव्यवस्थित रंगमंच संरक्षण के ही सहारे संवरद्धित होता है; यही बात साहित्यिक नाट्य- लेखन के साथ भी लागू होती है। संरक्षण के अभाव में इनका पनपना कठिन है। सौभाग्य से वैष्णव रगमंच की पूर्वी शाखा को यह संरक्षण प्राप्त था। १५वीं से लेकर १८वीं शती के बाद तक मिथिला, नेपाल और आसाम में हिन्दी की समृद्ध उपभाषा मैथिली में ३५ से ऊपर उच्चकोटि के नाटककारों और कवियों ने १०६ से अधिक नाटकों की रचना की। ये सभी नाटक उस रमणीक तथा सुरम्य रगमंच पर अभिनीत हुए और शीघ्र ही हिन्दी तथा मैथिली-साहित्य की अमूल्य तथा अमर निधि बन गये। मिथिला के इन नाटकों को कीर्त्तनिया नाटक की संज्ञा दी गई है। मिथिला के इन कीर्तनिया नाटकों से मिलने-जुलते, किन्तु उनसे बहुत पहले आसाम में मैथिली-भाषा के 'अंकिया नाट' कहे जानेवाले वैष्णव नाटकों की रचना हुई। कीर्त्तनिया नाटक के रंगमंच की आवश्यकताएँ भी बदल गई। सूत्रधार एवं नटी प्रस्तावना समाप्त हो जाने के बाद भी पूरे अभिनय-भर रगमंच पर विद्यमान रहने लगे। दृश्य-परिवर्त्तन के लिए पर्दे आदि की सुविधा थी नहीं; इसीलिए सूत्रधार और नटी गीतों के बीच में कथा का सूत्र कायम रखते थे; उनका आशय दर्शकों को समझाते चलते थे और बीच-बीच में यथास्थान टिप्पणियाँ भी करते जाते थे। पीछे चलकर मैथिली में सूत्रधार के स्थान पर 'तटस्थ' कहलानेवाले पात्रों का प्रयोग होने लगा। इस प्रकार, साहित्यिक तथा साधन-सम्पन्न रंगमंच का रूप लोक-रंगमंच के रूप में बदलता गया। इस रंगमंच तथा नाटकों के लिए संगीत प्राण था। ऑकेस्ट्रा इसका अत्यन्त आवश्यक अंग था और लेखक, सूत्रधार, अभिनेता सभी को संगीत का पूरा मर्मज्ञ होना आवश्यक था। वास्तव में, कीर्तनिया नाटक और पाश्चात्त्य देशों के ओपेरा में थोड़ा ही अन्तर था। रामलीला, रासलीला आदि वैष्णव-नाटकों के लिए किसी विशेष रंगमंच की व्यवस्था नहीं होती थी, परन्तु पात्रों की सजावट की व्यवस्था होती थी। इसमें सामूहिक तथा व्यक्तिगत नृत्य का भी आयोजन होता था। प्रायः खुले मैदान में अभिनय होता था, जिसके कारण युद्ध, विवाह आदि के भी दृश्य दिखाये जाने लगे। भक्ति-भावना में वृद्धि हो जाने के कारण राम, कृष्ण आदि के जीवन से सम्बन्ध रखनेवाले ही अभिनय प्रायः
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जनता के सम्मुख प्रदर्शित किये जाते थे। पात्रों को अभिनय की शिक्षा भी नहीं दी जाती थी; निर्देशक जनता के सामने ही अभिनेताओं को बताता चलता था। दर्शकों के मनोरंजन के लिए साधारण ढंग के परिहास प्रस्तुत किये जाते थे। आधुनिक रगमंच : अँगरेजों के आगमन के बाद ही आधुनिक रगमंच की उत्पत्ति हुई। उन्होंने सन् १७४७ ई० में कलकत्ता के फोर्ट में रंगमंच की स्थापना की और सन् १७७५ ई० में उसका पुनर्निर्माण हुआ। परन्तु, इस रंगमंच पर केवल अँगरेजी-नाटकों का ही अभिनय होता था। उसके बाद धीरे-धीरे नाटक-कम्पनियाँ बनने लगीं। पारसी रंगमंच का विकास हुआ। सन् १८७० ई० में व्यावसायिक रंगमंच स्थापित हुआ। सेठ पेस्टनजी फ्रामजी ने ओरिजिनल थिएट्रिकल कम्पनी की स्थापना बम्बई में की। फ्रामजी की मृत्यु के उपरान्त यह कम्पनी भंग हो गई और अभिनेताओं ने बम्बई, कलकत्ता आदि नगरों में अपनी अलग- अलग कम्पनियाँ खोलीं। सभी नाटक-कम्पनियों में वेतनभोगी लेखक थे, जो लेखक कम और नौकर अधिक थे। उनमें प्रधान थे आगा हश्र काश्मीरी, राधेश्याम कथावाचक, नारायणप्रसाद 'बेताब' आदि। उस युग में दृश्य काव्य के रूप में जिन नाटकों का अभिनय पारसी रंगमंच पर होता था, वे निस्सन्देह दृश्य थे, परन्तु उन्हें काव्य की संज्ञा देना हास्यास्पद होगा। उनसे काव्य-गुणों की कोई आशा भी नहीं करता था। पैसा कमाने के लिए जनता के आकर्षण को अधिकाधिक उत्तेजित करना उनका मुख्य उद्देश्य था। नाटक की कथावस्तु, संशय आदि से अधिक महत्त्व दिया जाता था भड़कीली पोशाक और चमकीले पर्दे को। एक-एक दृश्य सजाने में काफी कारीगरी और पैसे खर्च किये जाते थे। पारसी रंगमंच पर चमत्कारपूर्ण दृश्य खूब दिये जाते थे और यही उसके विनाश का कारण भी हुआ। चलचित्रों में रंगमंच से कहीं अधिक चमत्कारपूर्ण दृश्य दिखाये जा सकते हैं, उनकी दृश्य- योजना बहुत ही उत्कृष्ट होती है, जिनके सामने पारसी रंगमंच के दृश्य ठहर नहीं सके। नाटककार रंगमंच पर जीवन के विराट् एवं मार्मिक सत्य उपस्थित करता है, पश्चिमवालों ने यही किया; परन्तु पारसी रंगमंचवालों ने जीवन को नहीं, अस्वाभाविकता को आधार बना लिया, जिसका परिणाम यह हुआ कि वह सदा के लिए मिट गया। उस समय भी शिक्षित वर्ग पारसी रंगमंच के अभिनयों से चिढ़ा हुआ था। सस्ते किस्म का मनोरंजन तो किसी प्रकार सहा भी जा सकता है, परन्तु सांस्कृतिक निधियों की मिट्टी पलीद होते देखकर बुद्धिमान् लोग स्वभावतः बुरा मानते थे। भारतेन्दुजी ने 'नाटक' शीषक निबन्ध में लिखा है : "काशी में पारसी नाटकवालों ने नाचघर में जब शकुन्तला नाटक खेला और उसमें धीरोदात्त नायक दुष्यन्त खेमटेवालियों की तरह कमर पर हाथ रखकर, मटक-मटककर नाचने और 'पतरी कमर बलखाय' यह गाने लगा, तो डॉक्टर थिबो और बाबू प्रमदादास मित्र प्रभूति विद्वान् यह कहकर उठ गये कि अब देखा नहीं जाता।
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VaY j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
ये लोग कालिदास के गले पर छुरी चला रहे हैं।" पं० बालकृष्ण भट्ट ने भी उनपर अपना क्रोध व्यक्त किया था। पारसी रंगमंच में भी कुछ ऐसी कम्पनियाँ थीं, जो साहित्य का तो नहीं, किन्तु सुरुचि पर कुछ ध्यान देती थीं। काठियावाड़ की 'सूर-विजय नाटक-मण्डली' तथा मेरठ की 'भारत-व्याकुल कम्पनी' ऐसी ही नाटक-मण्डलियाँ थीं। रामलीला तथा रासलीला के बाद उत्तरी भारत के कई भागों में नौटंकी की चाल चल निकली। १९वीं शती में इन निकृष्ट नौटंकियों से जनता का मन दूषित हो गया। फल यह हुआ कि इस नौटंकी से केवल निम्नकोटि के दर्शकों का मनोरंजन होने लगा। इसके वार्त्तालाप और गीत अत्यन्त भद्दे और अश्लील हुआ करते थे। ऐसी परिस्थिति में किसी पठनीय नाटक का अभिनय इसमें नहीं हो सकता था। हिन्दी का पहला रंगमंच लखनऊ के कैसरबाग में नवाब वाजिदअली शाह के समय में बना। अमानत-लिखित गीति-नाट्य 'इन्दर-सभा' का इसपर अभिनय हुआ। इसमें स्वयं वाजिदअली शाह ने इन्दर की भूमिका अदा की थी। १९वीं शती में भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के नेतृत्व में हिन्दी-रंगमंच का पुनर्गठन हुआ, परन्तु उसपर सीधा प्रभाव वैष्णव-रंगमंच की उपर्युक्त दोनों शाखाओं ने नहीं डाला। भारतेन्दु को शायद मैथिली-नाटक देखने का अवसर नहीं मिला था, और रामलीला तथा रासलीला के अभिनय को तत्कालीन रूप में उन्होंने भद्दा एवं कला-विहीन पाया होगा। उन्होंने एक दूसरी दिशा से प्रेरणा ग्रहण की होगी। श्रीजगदीशचन्द्र माथुर का अनुमान है कि उन्होंने बँगला-रंगमंच और नाटक से वास्तविक और प्रभावशाली प्रेरणा ली होगी। यात्राएँ कीर्त्तनिया नाटकों की ही लोकपक्षीय तथा बहुत-कुछ विकृत रूपाकृति थीं। यात्रा- रंगमंच का बहुत व्यापक तथा गम्भीर प्रभाव बँगला-रंगमंच तथा नाट्य-रचना पर पड़ा। इस प्रकार, उत्तरी भारत में प्रचलित वैष्णव-रंगमंच का अप्रत्यक्ष प्रभाव भारतेन्दु पर माना जा सकता है। भारतेन्दु ने वैष्णव नाट्य-शैली की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता को भी अपनाया, उन्होंने अंकों तथा दृश्यों के बीच-बीच में राग-रागिनियों में बँधे गीतों को स्थान दिया। परन्तु, परवर्त्ती नाटककारों ने गीतों की रुचिकर तथा मनोरंजक परम्परा को छोड़ दिया, जिसका फल यह हुआ कि हिन्दी-नाट्य-शैली नीरस हो गई और रंगमंच करमशः लोक-रुचि से दूर होता गया। भारतेन्दुजी की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उन्होंने अव्यावसायिक रंगमंच का सूत्रपात किया। यह अव्यावसायिक रंगमंच भारतेन्दु की हिन्दी और उत्तर-भारत को अनूठी और अमूल्य देन है। इसका जन्म व्यावसायिक रंगमंच के उत्तर में हुआ। पारसी रंगमंच अमानत की 'इन्दर-सभा' वाली परिपाटी का क्रमिक उत्कर्ष था। पारसी थिएट्रिकल कम्पनियों का विकास बहुत तेजी से हुआ, इसका एक मुख्य कारण यह था कि देश के जिस भू-भाग में इन नाटकों का प्रदर्शन किया गया, वहाँ शतियों के बाद एक रंगमंच जनता के सामने आया था। वहाँ सैकड़ों वर्षों से कोई रंगमंच था ही नहीं, और
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रंगमंच
सदियों की तृष्णा जगाकर इस रंगमंच ने उससे भरपूर लाभ उठाया। ध्यान देने की विशेष बात यह है कि मिथिला, असम, उड़ीसा आदि प्रदेशों में जहाँ पहले से अपना रंगमंच वर्त्तमान था, यह पारसी रंगमंच अपना कुछ भी प्रभाव नहीं जमा सका। जनसाधारण में रंगमंच के लिए बलवती तृष्णा तो थी ही, भारतेन्दुजी ने इसीलिए, पारसी कम्पनी के उत्तरस्वरूप अव्यावसायिक नाटक-मण्डलियों की स्थापना की। परन्तु, अव्यावसायिक रंगमंच व्यावसायिक रंगमंच का सामना करने में समर्थ नहीं हो सकता। यदि उस समय उत्तरी भारत में भारतेन्दुजी को कुछ ऐसे सेठ मिल जाते, जो आवश्यकतानुसार द्रव्य व्यय कर सकते, तो सम्भवतः आज हिन्दी-रंगमंच का इतिहास कुछ दूसरे ही रूप में रहता। फिर भी, यह मानना होगा कि अव्यावसायिक अभिनयों की परम्परा चलाकर भारतेन्दु ने साहित्यिक नाटकों के लिए, एक प्रकार से, प्रयोगशालाएँ उपस्थित कर दीं और इन्हीं प्रयोगशालाओं के सहारे हिन्दी-नाटक अपने अस्तित्व की रक्षा करने में समर्थ हुआ है। भारतेन्दु के बाद कानपुर में एक उत्साही नाटक-मण्डली की स्थापना हुई, प्रयाग में पं० माधव शुक्ल और उनके सहयोगियों के उद्योग से पहले 'श्रीरामलीला नाटक-मण्डली' (सन् १८९८ ई०) और पीछे 'हिन्दी-नाट्य-समिति' (सन् १९०८ ई०) का जन्म हुआ। इन मण्डलियों ने 'सीय-स्वयंवर', 'महाराणा प्रताप' और 'महाभारत पूर्वार्द्ध' जैसे नाटकों का अभिनय किया। काशी में सन् १९०९ ई० में भारतेन्दुजी के घराने के वृजचन्द्रजी और अन्य व्यक्तियों के उद्योग से 'भारतेन्दु नाटक-मण्डली' और 'काशी नागरी नाटक-मण्डली' की स्थापना हुई। ये मण्डलियाँ काफी दिनों तक गतिशील रहीं और न केवल भारतेन्दु के रूपकों का, प्रत्युत और भी अनेक नाटकों का अभिनय इन्होंने किया। पं० माधव शुक्ल ने कलकत्ता में 'हिन्दी-नाट्य-परिषद्' के नाम से एक अन्य अव्यावसायिक नाटक-मण्डली की स्थापना की, जिसमें कई वर्षों तक अनेक नाटक अभिनीत हुए और इससे उस मण्डली को पर्याप्त ख्याति प्राप्त हुई। इन अव्यावसायिक मण्डलियों पर भारतेन्दु के रंगमंच की शैली की छाप निरन्तर रही। पर्दे और मंच-विधान तो बहुलांश में पारसी शैली पर ही रहे, परन्तु चमत्कारपूर्ण दृश्यों के प्रदर्शन पर उतना बल नहीं दिया जाता था, जितना भाषा की शुद्धता, सुरुचिपूर्ण गीतों और आदर्शोन्मुखता पर। इन अभिनयों में अनेक सम्भ्रान्त व्यक्ति सक्रिय भाग लिया करते थे। आश्चर्य की बात यह है कि अव्यावसायिक रंगमंच का इस रूप में सन् १९२५ ई० के बाद से परिवर्तन होने लगा, वयस्क व्यक्तियों ने इसमें भाग लेना छोड़ दिया और अव्यावसायिक रंगमंच शनैः-शनैः छातों का क्षेत्र माना जाने लगा। इस परिवर्तन का फल यह हुआ कि कुछ दिनों के बाद यह रंगमंच अधिक प्रयोगशीलता और बुद्धिवादिता की ओर लगातार झुकता गया। किन्तु, कभी-कभी उत्साही युवकों के प्रयत्नों से अव्यावसायिक नाट्य-मण्डलियाँ स्थापित होती रहीं। सन् १९१८-१९ ई० में छपरा में कुछ सरकारी पदाधिकारियों तथा
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४३६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
उत्साही युवकों ने एक नाट्य-मण्डली की स्थापना की, जिसने कई नाटकों का सफलता से अभिनय किया। पीछे चलकर 'श्रीशारदा नाट्य-समिति' की स्थापना हुई। देशरत्न डॉ० राजेन्द्र प्रसाद के अग्रज श्रीमहेन्द्र प्रसाद ने इसमें प्रमुख भाग लिया। इस संस्था ने द्विजेन्द्र लाल राय के कई नाटकों का अभिनय किया। कुछ दिनों के बाद महेन्द्र बाबू के नेतृत्व में कुछ सदस्यों ने अलग होकर 'अमेचर ड्रामेटिक एसोसिएंशन' नाम की नई नाट्य-समिति की स्थापना की। इसी प्रकार, कई अन्य नगरों में भी अव्यावसायिक नाटक-मण्डलियाँ स्थापित की गई। इस प्रसंग में मुजफ्फरपुर के कलाकार श्रीललितकुमार सिंह 'नटवर' की सेवाओं को नहीं भुलाया जा सकता। परन्तु, सिनेमा के आगमन से सभी नाटक-मण्डलियाँ समाप्त हो गई। पारसी रंगमंच की मलिन होती हुई आभा सिनेमा की चकाचौंध में शीघ्र ही अपनी रही-सही चमक खो बैठी। हिन्दी का वह व्यावसायिक रंगमंच आधुनिकता के स्पर्श-मात्र से धराशायी हो गया। भारतेन्दु-युग के अव्यावसायिक रंगमंच इसके प्रभाव से कैसे बच सकते थे? कॉलेज की नाट्य-मण्डलियों ने समझ लिया कि जीवन का यथार्थ प्रदर्शन, स्वाभाविक कथोपकथन और हमारे जीवन के दैनिक क्रिया-कलाप-सभी रंगमंच के सीमा- क्षेत्र के अन्तर्गत समाविष्ट हो सकते हैं। अव्यावसायिक रंगमंच ने एकांकी को सहर्ष अंगीकृत किया; क्योंकि इसमें यह सुविधा है कि इसके अभिनय के लिए कम-से-कम साधनों की आवश्यकता होती है। सन् १९३५ ई० के बाद हिन्दी-रंगमंच के इतिहास में दो दिशाओं में विकास हुआ है, जिनका महत्त्व बहुत अधिक है। उनमें एक बात तो यह है कि भारतेन्दुजी ने जिस अव्यावसायिक रंगमंच की स्थापना की थी, उसका सम्बन्ध साहित्यिक नाटक से एकांकियों के माध्यम से फिर स्थापित हो गया। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह हुई कि बम्बई में प्रख्यात कलाकार श्रीपृथ्वीराज कपूर ने आर्थिक घाटा सहकर भी एक सुरुचिपूर्ण और नवीन सन्देश के वाहक व्यावसायिक रंगमंच की स्थापना की, परन्तु दुर्भाग्यवश वह अधिक दिनों तक नहीं चल सका। हिन्दी में आधुनिक एकांकी का काफी विकास हुआ है और उसका महत्त्व इसलिए भी माना जायगा कि वह एक परिवर्तनशील रंगमंच की माँग की पूर्ति करने के लिए रचा गया है और उस रंगमंच को पुनर्जीवन देने में उसका बड़ा भारी योगदान है। श्रीपृथ्वीराज कपूर ने जो महत्त्वपूर्ण कार्य अपने हाथ में लिया था, यदि हिन्दी- लेखक उसे आह्वान के रूप में स्वीकार करें, तो उनका आयोजन युगान्तरकारी आन्दोलन सिद्ध हो सकता है। इतिहास और परम्परा की उपेक्षा करके हम अपने भविष्य का निर्माण करने में किसी भी प्रकार समर्थ नहीं हो सकते। किन्तु, यह सोचना ठीक नहीं कि सम्पूर्ण भारतवर्ष में एक ही प्रकार का रंगमंच बनना चाहिए। एक ही प्रकार का रंगमंच सारे देश में
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रंगमंच [४३७
सर्वमान्य होना सम्भव नहीं, उचित भी नहीं कहा जा सकता। 'एलडोइस' निकल के शब्दों में "सजीव रंगमंच के लिए एक भौगोलिक केन्द्र, यथोचित स्वच्छन्दता, जनसाधारण और बुद्धिजीवियों दोनों ही के समर्थन, व्यावसायिक नाटककार के लिए सहारे का प्रबन्ध और युग-परिस्थितियों के अनुकूल रंगमंच-विधान-इन अवयवों की आवश्यकता होती है।"१ इतना तो स्पष्ट ही है कि भारतवर्ष जैसे विशाल देश में ये कतिपय अवयव भी और भी अनेक प्रकार के हो सकते हैं, और परिणामस्वरूप रंगमंच और नाट्य-रचना की शैली के भी अनेक रूप सम्भव हैं।
भारत-सरकार ने नई दिल्ली में एक कला-केन्द्र स्थापित किया है। उपर्युक्त प्रयत्नों से ऐसी आशा बँधती है कि भारतीय रंगमंच फिर अपनी उन्नतावस्था को पहुँचेगा।
रंगमंच के सम्बन्ध में प्रसादजी के विचार : रंगमंच के सम्बन्ध में जयशंकर प्रसाद का विचार सर्वथा वही नहीं है, जो इस विषय में परम्परा से आ रहा है और जो सामान्यतः सभी लोगों में प्रचलित है। यदि रंगमंच के विकास पर दृष्टिपात किया जाय, तो पता चलेगा कि पहले नाटक आदि दृश्य काव्य रचे गये, तब उनका अभिनय करने के लिए सुविधानुसार रंगमंच का निर्माण हुआ। प्रसादजी इतिहास के इसी साक्ष्य को आधार और प्रमाण मानते हैं। फलस्वरूप उन्होंने घोषणा की-"प्रत्येक काल में काव्य अथवा नाटक के लिए ही रंगमंच होते हैं, न कि रंगमंच के लिए नाटक अथवा काव्य।" इस विषय में विचार करते हुए उन्होंने दूसरे स्थल पर इससे भी अधिक स्पष्ट शब्दों में कहा- "रगमंच के सम्बन्ध में यह भारी भ्रम है कि नाट्य रंगमंच के लिए लिखे जाते हैं। प्रयत्न तो यह होना चाहिए कि नाटक के लिए रंगमंच हों।"3 प्रसादजी का विचार है कि नाटककार रंगमंच को ध्यान में रखकर नाटक नहीं लिखे। वह तो कथानक आदि अनेक बातों को ध्यान में रखकर नाटक लिख देता है, अब रंगमंच-व्यवस्थापक और नाट्य- प्रयोक्ता का काम है कि उस नाटक का सफल अभिनय करने के लिए उपयुक्त रगमंच का निर्माण करे।
सेठजी के विचार: रंगमंच के सम्बन्ध में सेठ गोविन्ददास के भी अपने विचार हैं। उनका कहना है-"जो नाटक पढ़ने योग्य होते हुए खेले जा सकें और साथ ही साहित्यिक दृष्टि से उच्चकोटि के हों, वे अधिक अच्छे हैं, इसमें मतभेद नहीं हो सकता। ऐसे नाटक लिखने के लिए नाटककार को लिखने की विधि के साथ ही रंगमंच-सम्बन्धी विधि की ओर भी लक्ष्य रखना आवश्यक है। रंगमंच-सम्बन्धी बातों में नाटककार को दृश्यों की
१. हिन्दी-रंगमंच और नाट्यकला का विकास : श्रीजगदीशचन्द्र माथुर, 'आलोचना', नाट्य-अंक, जुलाई १९५६ ई० २. काव्यकला एवं अन्य निबन्ध (प्रसाद), पृ० १०३ ३. वही, पृ० ११०
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४३८ ] भारतीय नाड्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास व्यवस्था, पात्रों की वेशभूषा तथा पात्रों के प्रवेश, प्रस्थान आदि बातों पर विशेष ध्यान रखना चाहिए।"१ आगे लेखक ने इन सभी विषयों (अंक तथा दृश्य, पात्रों की वेशभूषा और उनके प्रवेश-प्रस्थान) पर अपने विचार प्रकट किये हैं। पाश्चात्त्य नाटककारों ने रगमंच पर भोजन आदि का प्रबन्ध करके कथोपकथन की स्वाभाविकता बढ़ा दी है। इस विषय में सेठजी का मत है कि भोजन आदि की व्यवस्था से कथोपकथन की स्वाभाविकता में वृद्धि ही होती है। रंगमंच पर वैज्ञानिक आविष्कारों का प्रभाव: इधर वैज्ञानिक आविष्कारों के कारण रंगमंच के निर्माण तथा व्यवस्था पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। जिन दृश्यों को रंगमंच पर दिखाना कुछ समय पहले असम्भव या अत्यन्त कठिन था, वे अब विज्ञान के प्रभाव से सहज ही दिखाये जा सकते हैं। लकड़ी के बने भारी-भारी दृश्य अब यन्त्रों के द्वारा रंगमंच पर तुरन्त लगाये या हटाये जा सकते हैं। टेलीफोन के द्वारा स्वगत भाषण की अस्वाभाविकता दूर की जा सकती है और ऐसे अनेक कार्य किये जा सकते हैं, जिनके विषय में कुछ दिन पहले कोई नाटककार अपने नाटक में रखने को सोच भी नहीं सकता था। आजकल बिजली के द्वारा रंगमंच पर प्रकाश की पूर्ण व्यवस्था होती है। विभिन्न रंगों के प्रकाश से दृश्य में विशेष प्रकार का प्रभाव उत्पन्न किया जाता है। आवश्यकतानुसार कभी रंगमंच पर पूर्ण अन्धकार से अँधेरी रात का दृश्य और पूर्ण प्रकाश द्वारा चांदनी रात या दिन के दृश्य सुविधापूर्वक दिखाये जा सकते हैं। पहले प्रकाश-विधान में विविधता देने के लिए उपयुक्त साधन नहीं थे, अतः प्रकाश से नाटकीय प्रभाव उत्पन्न करने की बात नहीं सोची जाती थी, परन्तु अब बिजली के प्रयोग से प्रकाश-विधान भी रंगमंच का आवश्यक अंग माना जाने लगा है। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने बताया है कि आधुनिक नाटकों में प्रकाश-निर्देश तीन प्रकार से किया जाता है : १. समय-सूचना द्वारा (जैसे प्रातःकाल, सूर्योदय हो रहा है), २. विशिष्ट सूचनात्मक निर्देशों से (जैसे खुली चाँदनी, चन्द्रमा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ रहा है); ३. विस्तृत आलोक-विधान के निर्देश से, जो नवीन ढंग के हैं। तासदियों तथा गीति-नाट्यों या नृत्य-नाटकों में इस प्रकार के आलोक-विधान का अधिक प्रयोग किया जाता है। चतुर्वेदीजी ने रंगमंच पर दस प्रकार के प्रकाश का भी उल्लेख किया है।२ वैज्ञानिक आविष्कारों से रंगमंच में बहुत परिष्कार हुआ है, सुविधा और स्वाभाविकता में वृद्धि हुई है। इनसे रंगमंच की सम्भावनाएँ बहुत बढ़ गई हैं। १. नाट्यकला-मीमांसा, पृ० ३१ २. अभिनव नाट्यशास्त्र (प्रथम संस्करण), पृ० ३०७
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रंगमंच [४३९
स्वातन्त्र्योत्तर रंगमंच
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद के युग में रगमंच के विकास की दिशा में उत्साहवर्द्धक प्रगति हुई है। राष्ट्रीय सरकार ने कला एवं संस्कृति के विकास को अपनी योजना में स्थान दिया है और फलतः रंगमंच की स्थापना में योगदान किया है। सरकार ने रंगमंच के विकास तथा सफल अभिनेय नाटकों की रचना पर विशेष बल दिया है। प्राचीन भारत में भी कभी धर्म ने और कभी राज्य ने नाटक तथा रंगमंच को संरक्षण प्रदान किया था। राष्ट्रीय सरकार की संगीत-नाटक-अकादमी ने देश में रंगमंच के विकास एवं विभिन्न भारतीय भाषाओं में नाटक-लेखन तथा प्रदर्शन के लिए पुरस्कार देने की व्यवस्था की है। अकादमी ने अव्यावसायिक संस्थाओं को भी अनुदान देने का प्रबन्ध किया है। उत्तरप्रदेश, बिहार आदि कई राज्यों में भी इस प्रकार की कुछ संस्थाएँ ऐसे ही कार्य कर रही हैं। आरम्भ में 'पृथ्वी थिएटर' ने देश के अनेक भागों में अपने नाटकों का प्रदर्शन किया, परन्तु उसके टूटने के बाद हिन्दी-क्षेत्र में व्यावसायिक रंगमंच नहीं के बराबर हैं। किन्तु, स्वातन्त्र्योत्तर युग में देश में नव जागरण हुआ है और अनेक भागों में अव्यावसायिक रंगमंच का उदय हुआ है। प्रायः सभी बड़े तथा महत्त्वपूर्ण नगरों में अव्यावसायिक संस्थाओं की स्थापना हो चुकी है। रंगमंच के इस नवजागरण से हिन्दी-नाटकों के लेखन में भी गति आई है। हिन्दी के नाटककारों तथा आलोचकों ने भी रंगमंच के प्रति सजगता प्रदर्शित की है और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रंगमंच तथा नाट्य-प्रदर्शन-सम्बन्धी मूल्यवान् टिप्पणियाँ प्रकाशित होती रहती हैं।
रंगमंच की सीमाएँ और उनका भारतीय नाट्य-विधान पर प्रभाव
संसार में जितनी वस्तुओं का निर्माण शिल्प-कला द्वारा हुआ हो, उन सबका उपयोग रंगमंच पर करने की स्वतन्त्रता नाट्यशास्त्रियों ने दी है। परन्तु, भरत ने स्वीकार किया है कि संसार की बड़ी-बड़ी बस्तुएँ रंगमंच पर उपस्थित नहीं की जा सकती; क्योंकि रंगमंच की भी अपनी सीमा है। इसलिए, रंगमंच पर जब अभिनेता इन बड़ी वस्तुओं का अनुकरण करता है, तो प्रेक्षक को उसी के द्वारा हृदय में रस-निष्पत्ति के लिए चेष्टा करनी चाहिए। राजमहल, भवन, विभिन्न सवारियाँ आदि नाट्य के लिए उपकरण हैं, परन्तु ये सब मंच पर वास्तविक रूप में उपस्थित नहीं किये जा सकते :
यद् द्रव्यं जीवलोके तु नानालक्षणलक्षितम्। तस्यानुकृतिसंस्थानं नाट्योपकरणं भवेत्।। प्रासादगृहयानानि नाट्योपकरणानि च। न शक्यानि तथा कर्त्तु यथोक्तानीह लक्षणैः ।'
१. नाट्यशास्त्र, अध्याय २१, श्लोक १९१-१९२ (काव्यमाला)
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४४० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास वास्तव में, भरत ने लोकधर्म और नाट्यधर्म में स्पष्ट भेद कर दिया है। कुछ उपकरण लोकधर्मी होते हैं और कुछ नाट्यधर्मी। कोई पदार्थ अपने स्वाभाविक रूप में लोकधर्मी कहलाता है। यह लोक का शुद्ध तथा स्वाभाविक अनुकरण है। इसमें विभिन्न भावों का संकेत करनेवाली आंगिक अभिनय-भंगिमाओं को नहीं ग्रहण कर सकते (अंग लीला विवर्जितम्)। अत्यन्त सांकेतिक वाक्य और क्रियाएँ, लीला, अंगहार, नाट्योक्त रूढ़ियाँ-यथा जनान्तिक, स्वगत, आकाशभाषित आदि। पर्वत, रथ, विमान, ढाल, तलवार आदि के संकेत देनेवाली रूढ़ियाँ और सूक्ष्म भावों का संकेत देनेवाले अभिनय नाट्यधर्मी हैं। जो भी सुख-दुःख का क्रियात्मक अभिनय लोक का होता है, वह भी नाट्य- धर्मी है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि रंगमंच पर किये जानेवाले वे सभी संकेतात्मक आंगिक अभिनय नाट्यधर्मी हैं, जो साक्षात् रूप से अनुकरण का विषय नहीं हैं। नाट्य- धर्मी पदार्थ लोकधर्मी से भिन्नता रखता है : लोकधर्मी भवेत् कान्या नाट्यधर्मो तथापरा। स्वभावो लोकधर्मी तु विभावो नाट्यमेव हि।' यही कारण है कि लोहे या पत्थर के बने वास्तविक शस्त्र आदि उपकरणों का रंगमंच पर प्रयोग वर्जित है; क्योंकि इनसे अभिनेताओं को थकावट होती है, जिसके कारण नाटकीय प्रभाव उत्पन्न होने में बाधा पड़ती है। इनके स्थान पर लाह, चमड़, वस्त्रादि से बने कृत्रिम शस्त्रास्त्रों के प्रयोग का विधान किया गया है। यहाँ तक कि मुकुट आदि तथा विभिन्न आभूषण आदि के भी सम्बन्ध में भरत मुनि ने इस बात का ध्यान रखा है। उन्होंने पूर्ण विस्तार से बताया है कि मुकुट, आभूषण, शस्त्र आदि विभिन्न उपकरणों का निर्माण किन-किन विभिन्न वस्तुओं से करना चाहिए। रंगमंच पर शस्त्रों द्वारा प्रहार वर्जित है, उनका केवल संकेत होना चाहिए। रंगमंच की सीमा को सभी नाट्यशास्त्रियों ने मान्यता दी है। श्रव्य काव्य में वस्तु की सीमा का कोई बन्धन नहीं है। किन्तु, दृश्य काव्य रंगमंच पर दिखाया जाता है, अतः देश-काल की संकुचित सीमा में बँधा रहता है। यह सम्भव नहीं कि कुछ हाथ लम्बे और कुछ हाथ चौड़े रंगमंच पर किसी नायक के जीवन से सम्बद्ध सभी घटनाओं का सांगोपांग उसी रूप में प्रदर्शन किया जा सके और वह भी कुछ ही घण्टों की अवधि में। आजकल चलचित्रों में फोटोग्राफी आदि की सहायता से प्रायः सभी प्रकार के दृश्य दिखाये जा सकते हैं, परन्तु नाटककार रंगमंच पर अत्यन्त प्रयोजनवती घटनाओं को ही दिखाता है। वह अवान्तर गौण घटनाओं को पात्रों के वार्त्तालाप, नेपथ्य या किसी अन्य प्रकार से सूचित करता है। इतना ही नहीं, कई घटनाएँ ऐसी हैं, जिनका रंगमंच पर प्रदर्शन नाट्यशास्त्र के विरुद्ध माना जाता है। भारतीय परम्परा उनको रंगमंच पर नहीं दिखाकर उनकी सूचना ही देती है। इसलिए, भरत मुनि ने रंगमंच पर कुछ प्रकार के दृश्य नहीं दिखाने का आदेश दिया है। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २१, श्लोक १९३
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रंगमंच [४४१
युद्धं राज्यभ्रंशो मरणं नगरोपरोधनं चैव। प्रत्यक्षाणि तु नाङ्के प्रवेशकः संविधेयानि ॥१ युद्ध, राज्य-विप्लव, मृत्यु, नगर का घेरा आदि को अंक में प्रत्यक्ष नहीं दिखाकर प्रवेशक आदि से सूचित करना चाहिए। इस स्थल पर धनंजय ने लिखा है : नीरसोऽनुचितस्तव संसूच्यो वस्तुविस्तर:।२ वे वस्तुएँ, जो नीरस हैं, जिनमें रस-प्रवणता नहीं-जिनका रंगमंच पर दिखाया जाना नैतिकता आदि के योग्य नहीं, वे संसूच्य या सूच्य कही जाती हैं। विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि रंगमंच पर नहीं दिखाये जानेवाले दृश्यों को निम्नलिखित श्रेणियों में रख सकते हैं : १. युद्ध, राज्य-विप्लव, राज्य-भ्रंश, नगर का घेरा, दूर से पुकारना, दूर की यात्रा आदि के दृश्य, जो रंगमंच के संकीर्ण क्षेत्र में सम्भव नहीं। छोटे रंगमंच पर ऐसे दृश्य दिखाना अस्वाभाविक लगेगा। २. मृत्यु, वध, आत्महत्या आदि के दृश्य, जिनसे भय उत्पन्न होता है और हृदय पर बुरा प्रभाव पड़ता है। ३. चुम्बन, परिरम्भन आदि के अनैतिक दृश्य तथा स्नान, भोजन, विवाह आदि के व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्ध रखनेवाले दृश्य। इनमें से प्रथम कोटि के दृश्य रंगमंच की सीमा के कारण नहीं दिखाये जा सकते, शेष के अपने-अपने कारण हैं। इस विषय में पाश्चात्त्य परम्परा भारतीय परम्परा से सवथा भिन्न होने के कारण वहाँ के रंगमंच पर मृत्यु, वध, चुम्बन आदि के दृश्य दिखाये जाते हैं और भारतीय रंगमंच पर भी ऐसे दृश्य दिखाये जाने लगे हैं। नाट्यधर्मी रूढियों में अश्राव्य और नियत श्राव्य भी हैं। अश्राव्य स्वगत भाषण है और नियत श्राव्य दो प्रकार का होता है-जनान्तिक तथा अपवारित। इस विषय में भी रंगमंच की सीमा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है। श्राव्य काव्य में तो कवि को पूरी स्वतन्त्रता रहती है कि चाहे जिस रूप में वह वस्तु का विकास करे, परन्तु नाटक में नाटककार को ऐसी सुविधा नहीं रहती। वास्तव में, नाटककार विवश होकर ही स्वगत, जनान्तिक तथा अपवारित का प्रयोग करता है; क्योंकि ये सर्वथा अस्वाभाविक हैं।
१. नाट्यशास्त्र, अध्याय १८, श्लोक २१ (काव्यमाला) ३. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, श्लोक ५७
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नवम अध्याय रूपक के भेदोपभेद रूपक के भेद काव्य के दो भेद किये गये हैं-दृश्य और श्रव्य। दृश्य काव्य वह होता है, जिसका अभिनय हो सके और सामाजिकों के द्वारा देखा जा सके। दृश्य काव्य को रूपक भी कहते हैं; क्योंकि नट या अभिनेता में रामादिक नाटक के पात्रों का स्वरूप आरोपित किया जाता है। नट राम, सीता, दुष्यन्त, शकुन्तला आदि का रूप धारण करता है और सामाजिकों को ऐसा आरोपात्मक ज्ञान होता है कि 'यह राम है', 'यह सीता है।' अतः, रूप का ज्ञान होने के कारण दृश्य काव्य का दूसरा नाम रूपक है। धनंजय ने कहा है- 'रूपक तत्समारोपात्।" वही नाट्यरूप रूपक भी कहा जाता है; क्योंकि उसमें आरोप पाया जाता है। धनंजय ने कथावस्तु, नायक और रस को रूपकों का भेदक तत्त्व माना है। यदि इन भेदक तत्त्वों के आधार पर रूपकों के भेद की कल्पना करें, तो मोटे तौर पर बहत्तर भेद होंगे। इसका कारण यह है कि धनंजय के मत से कथावस्तु तीन प्रकार की होती है- (क) प्रख्यात, (ख) उत्पाद्य और (ग) मिश्र। नायक भी तीन प्रकार के कहे गये हैं- (क) उत्तम, (ख) मध्यम और (ग) नीच। रस आठ स्वीकृत हैं, वे शान्त रस को स्वीकार नहीं करते। इस प्रकार वस्तु, नायक और रस के भेद से ३x३X८=७२ भेद हो जाते हैं। परन्तु, भरत व्यावहारिक विवेचक थे। उन्होंने उन्हीं दस रूपकों की विवेचना की है, जो उनके समय में प्रचलित थे। भरत मुनि ने रूपक के दस भेद बताये-नाटक, प्रकरण, अंक, व्यायोग, भाण, समवकार, वीथी, प्रहसन, डिम और ईहामृग। नाट्यशास्त्र में उन्होंने इन रूपकों की गणना कराई है : नाटकं सप्रकरणमङ्डो व्यायोग एव च। भाण: समवकारश्च वीथी प्रहसनं डिमः ॥ ईहामगश्च विज्ञेयो दशमो नाट्यलक्षणे। एतेषां लक्षणमहं व्याख्यास्याम्यनुपूर्वशः ॥२ धनंजय तथा विश्वनाथ ने इन्हीं दस रूपकों की गणना अपनी पुस्तकों में दूसरे शब्दों में कराई है। साथ ही विश्वनाथ ने अठारह उपरूपकों को भी स्थान दिया है। १. दशरूपक : प्रथम प्रकाश, का० ७ २. नाट्यशास्त्र : अध्याय १८, का० २-३
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मक्ती आ रूपक के भेदोपभेद [४४३
धनंजय ने उन ग्रन्थकारों के मत का खण्डन किया है, जो मानते हैं कि 'जैसे नृत्य के डोम्बी, श्रीगदित, भाण, भाणी, प्रस्थान, रासक तथा काव्य-ये सात भेद होते हैं, वे भाण की तरह ही होते हैं, इस प्रकार दस के अतिरिक्त अन्य भी रूपक हो सकते हैं।' धनंजय का उत्तर है कि भावाश्रय नृत्यनाट्य से भिन्न होते हैं-अन्यद् भावाश्रयं नृत्यम्।१ रूपक रस पर आश्रित रहने के कारण नृत्य से सवथा भिन्न होता है, जो भाव पर आश्रित होता है। इस प्रकार, धनंजय ने श्रीगदित आदि को केवल नृत्य माना, रूपक नहीं। अतः, उनके भी मत से दस ही रूपक होते हैं। अग्निपुराण में दस रूपकों के साथ १७ उपरूपकों के भी नाम दिये गये हैं। शारदातनय ने भावप्रकाशन में भरतादि के मत से रूपकों का निर्धारण किया। उन्होंने, दशरूपक का ही श्लोक उद्धत करके दस रूपकों की गिनती कराई है, साथ ही तोटक, श्रीगदित आदि अन्य रूपकों का भी उल्लेख करके अन्त में लिख दिया : रसात्मका दशैतेषु विशद्भावात्मका मताः। तेषां रूपकसंज्ञापि प्रायो दृश्यतया क्वचित्॥ विशद्र पकभेदाश्च प्रकाश्यतेऽत्र लक्षणे: ।२ शारदातनय ने दोनों मतों का समन्वय करने का प्रयत्न किया है। वे मानते हैं कि दृश्यता के कारण ही तोटकादि बीस भावात्मक रूपकों को रूपक माना जाता है। किन्तु, सबका योगफल वे तीस मानते हैं। जैन आचार्य रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अपने ग्रन्थ नाट्यदर्पण में रूपकों की संख्या बारह मानी है। सर्वमान्य दस रूपकों में उन्होंने नाटिका तथा प्रकरणी नामक दो रूपक जोड़ दिये। उन्होंने नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में नाटक का तथा द्वितीय विवेक में अन्य ग्यारह रूपकों का विवेचन किया है। मूल ग्रन्थ में श्रीगदित आदि का उल्लेख नहीं है, परन्तु सविवरण पुस्तक के अन्त में उन्होंने लिखा है : 'अन्यानि च रूपकाणि दृश्यन्ते। यदाहुः' लिखकर १३ नृत्यों या उपरूपकों का उल्लेख किया है। अब रूपक के उपर्युक्त भेदों का संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है। नाट्य के विभिन्न तत्त्वों का जिस परिमाण में उपयोग किया जाता है, उसी करम में विभिन्न रूपकों का महत्त्व प्रतिपादित किया गया है। नाटक : सभी नाट्याचार्यों ने सर्वप्रथम नाटक का विवेचन किया है। रूपक के सभी भेदों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रसिद्ध यही भेद है। यहाँ तक कि आगे चलकर प्रान्तीय भाषाओं में रूपक के अन्य भेदों को लोग कम ही जानते हैं और सभी रूपकों को नाटक ही कहा जाने लगा। नाटक अपनी सर्वग्राहिणी प्रकृति के कारण रूपक का स्थानापन्न १. दशरूपक : प्रथम प्रकाश, का० ९ २. भावप्रकाशन : अष्टम अधिकार, पृ० २८१
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४४४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास बन गया है और सामान्य बोलचाल में 'नाटक' शब्द से दृश्यकाव्य के सभी भेदों का बोध हो जाता है। शास्त्रीय शब्द का यह अनुचित प्रयोग अत्यधिक प्रचलित हो गया है। नाटक को सभी रूपकों का प्रतिनिधि मान लेने में कोई बुराई नहीं है। नाट्यशास्त्र-विषयक सभी लक्षण नाटक में पाये जाते हैं और इसमें सभी रसों का समावेश भी हो सकता है, यद्यपि इसमें वीर अथवा शृंगार रस की ही प्रधानता होती है। यही कारण है कि नाट्याचार्यों ने नाटक को नाट्य-प्रकृति कहा है। धनंजय ने दशरूपक के तृतीय प्रकाश के प्रथम श्लोक में ही उन कारणों का निर्देश कर दिया है कि क्यों वे सर्वप्रथम नाटक का विवेचन दे रहे हैं : प्रकृतत्वादथान्येषां भूयो रसपरिग्रहात्। सम्पूर्णलक्षणत्वाच्च पूर्व नाटकमुच्यते ।।' धनंजय ने तीन कारणों का निर्देश किया है। पहला कारण है कि नाटक ही अन्य रूपक- भेदों की प्रकृति अथवा मूल है, अर्थात् नाटक में ही वस्तु, नेता अथवा रस में थोड़ा-बहुत परिवर्त्तन कर देने से प्रकरण आदि अन्य रूपक-भेदों की सृष्टि हो जाती है। दूसरा कारण है कि नाटक में ही रस का पूर्ण परिपाक होता है। यह रस-परिपाक अनेक रूपों में सम्भव है। नाटक में वीर या शृंगार कोई रस अंगी या प्रधान होता है और अन्य सभी रसों का भी सन्निवेश इसमें हो सकता है। तीसरा कारण है कि वस्तु, नेता और रस के सम्पूर्ण लक्षण नाटक में ही पाये जाते हैं। इन कारणों से नाटक सभी रूपकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए, इसका पहले विवेचन किया गया। नाटक का नायक प्रसिद्ध कुल में उत्पन्न राजर्षि या राजा होता है, जो सर्वगुण सम्पन्न भी होता है। वह धीरोदात्त प्रकृति का तथा प्रतापी होता है। यहाँ धीरोदात्त, धीरोद्धत तथा धीरललित का भी उपलक्षण है। वह यश-कामना करनेवाला, उत्साही तथा वेदों का रक्षक होता है। नाटक का नायक दिव्यपुरुष (जैसे श्रीकृष्ण), अथवा दिव्यादिव्य (जो दिव्य होने पर भी अपने को अदिव्य समझे, जैसे श्रीराम) पुरुष भी हो सकता है, जिसमें उपर्युक्त सभी गुण विद्यमान रहते हैं। उस नायक के विषय में इतिहास या पुराण में प्रसिद्ध कथावस्तु को ही नाटक में आधिकारिक कथावस्तु रखा जाता है। यदि कवि नायक के सम्बन्ध में किसी कल्पित कथा का सन्निवेश प्रसिद्ध कथावस्तु में करना चाहता है, तो उसे प्रासंगिक ही रूप देना होगा। सभी इतिवृत्त नाटक के उपयुक्त नहीं हो सकते; केवल वे ही हो सकते हैं, जिनमें इस प्रकार की विशेषताओं से युक्त कोई नायक वर्त्तमान हो। जैसे अभिज्ञानशाकुन्तल का नायक दुष्यन्त प्रसिद्ध कुलोत्पन्न राजर्षि है, कथानक भी प्रसिद्ध ही है। उत्तररामचरित के नायक श्रीरामचन्द्र भी धीरोदात्त राजर्षि हैं, अवतार होने से वे दिव्य व्यक्ति भी हैं। कथानक भी रामायण आदि में प्रख्यात ही है। १. दशरूपक, तृतीय प्रकाश, श्लोक १
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आकस प् रूपक के भेदोपभेद
यदि नायक के इतिवृत्त में कोई ऐसी बात पाई जाती हो, जो नायक की प्रकृति अथवा नाटक के प्रधान रस-वीर या शृंगार-के प्रतिकूल पड़ती हो, तो नाटककार को चाहिए कि उसमें ऐसा परिवर्तन कर दे, जिससे नायक के चरित्र का वह दोष नहीं रहे या रस का वह प्रतिकूल तत्त्व मिट जाय। कवि का अधिकार या कर्त्तव्य है कि वह उस अनुचित अंश को छोड़ दे या उसमें आवश्यक परिवर्तन ला दे। जैसे 'उदात्त राघव' के नाटककार ने राम के द्वारा छल से बालि-वध की घटना का कोई उल्लेख नहीं किया। भवभूति ने महावीरचरित में दिखाया है कि रावण की मित्रता के कारण बालि राम के वध के लिए आता है और तब राम उसका वध कर देते हैं। दूसरा उदाहरण अभिज्ञान- शाकुन्तल का लिया जाय। पद्मपुराण में शापवाली घटना का कोई उल्लेख नहीं किया गया। इस तरह अकारण ही शकुन्तला को भूल जाने से दुष्यन्त के चरित्र की कामुकता तथा लम्पटता सूचित होती है। इसीलिए, कालिदास ने धीरोदात्त नायक दुष्यन्त का चरित्र दोष- रहित और अकलुषित रखने के लिए दुर्वासा के शाप की घटना की कल्पना की है।।
जब नाटककार नायक या रस की दृष्टि से अनौचित्य का परिहार करके कथावस्तु को शुद्ध कर लेता है तब वह इस बात का विभाग कर लेता है कि कथावस्तु की कौन- कौन-सी बातें रंगमंच पर दिखाने की हैं और किनकी सूचना विष्कम्भकादि अर्थोपक्षेपकों के द्वारा देनी है। नाटक में कवि पाँचों अर्थ-प्रकृतियों, पाँचों अवस्थाओं और पाँचों सन्धियों तथा उनके अंगों की योजना करता है। अंक की व्यवस्था कार्य के आधार पर होती है। अंक में नायकादि का चरित प्रत्यक्ष रूप से दिखाया जाता है। नायक या तो स्वयं रंगमंच पर आता है या मंच पर घटित घटना उसके चरित्र से साक्षात् सम्बन्ध रखती है। अंक में कुछ बातों या घटनाओं को साक्षात् रूप से दिखाना वर्जित है। कुछ से हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है और कुछ व्यावहारिक दृष्टि से रंगमंच पर दिखाने के अनुपयुक्त हैं। यहाँ ध्यान देने की बात है कि पाश्चात्त्य नाट्याचार्य युद्ध, वध आदि के दृश्य रंगमंच पर दिखाना अनुचित नहीं मानते; बल्कि तासदी में इन्हें रंगमंच पर दिखाना आवश्यक माना जाता है।
नाटक में पाँच से दस अंक तक रहते हैं। यदि किसी नाटक में दस अंक हों और सभी अर्थ-प्रकृतियाँ तथा सन्धियाँ हों, तो उसे महानाटक कहते हैं। शारदातनय ने पाँच अंकवाले नाटक का उदाहरण मारीचवंचित, छह अंकों का उदाहरण वेणीसंहार, सात अंकों का अभिज्ञानशाकुन्तल, आठ अंकों का नलविक्रम, नौ अंकों का देवी-परिणय तथा दस अंकों का उदाहरण बालरामायण दिया है। इस नियम का प्रायः पालन होता रहा है, परन्तु डॉ० कीथ ने ऐसे परवर्त्ती नाटकों के उदाहरण दिये हैं, जो नाटक होते हुए भी इस नियम के अपवाद-स्वरूप हैं। उन्होंने एक अंक के नाटक का उदाहरण रविदास का मिथ्याज्ञान- विडम्बना और दो अंकों का उदाहरण वेदान्तवागीश का भोजचरित दिया है। तीन और चार अंकों के नाटकों की भी विद्यमानता उन्होंने बताई है। उन्होंने ऐसे महानाटक का भी उल्लेख किया है, जिसमें चौदह अंक हैं। कविभूषण के अद्भुतार्णव में बारह अंक हैं।
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४४६ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास नाटक में अंगी रस एक ही उपनिबद्ध होना चाहिए। अंगी रस या तो शृंगार हो या वीर। अन्य रसों का भी उपनिबन्धन हो सकता है, परन्तु वे सब अंगरूप में रहते हैं, अंगी रूप में नहीं। निर्वहण सन्धि में अद्भुत रस का उपनिबन्धन होना चाहिए। कवि को चाहिए कि वह अनुभाव, विभाव, व्यभिचारी भाव तथा स्थायी भाव के द्वारा अंगी रस को पुष्ट करे। नाटक में अंक पर आचार्यों ने पूरा ध्यान दिया है। जो कथा वर्ष-भर की हो, उसे एक वर्ष से कम की बना लेना चाहिए। जो कथा महीने-भर अथवा वर्ष-भर की हो, उसे अंकच्छेद के द्वारा कम समय की कर देना चाहिए। एक अंक के कथानक की योजना इस प्रकार करनी चाहिए कि वह एक ही दिन की घटना से सम्बद्ध हो। इसके साथ यह भी आवश्यक है कि वह एक ही प्रयोजन से सम्बद्ध हो। प्रायः सभी भारतीय नाट्याचार्य इस विषय में एक मत हैं। इस स्थल पर इस सिद्धान्त की तुलना ग्रीक विद्वान् अरस्तू के अन्विति-त्य से की जा सकती है। भारतीय नाट्यशास्त्र के अंक में एक ही दिन की घटना का, और विशेषतः एक ही प्रयोजन का, सन्निवेश क्रमशः कालान्विति और कार्यान्विति से सम्बन्ध रखता है। परन्तु, भारतीय नाटककारों ने स्थलान्विति पर कभी बल नहीं दिया। कालान्विति पर भी कोई विशेष बल नहीं है। परन्तु, प्रयोजन की एकता के कारण कार्यान्विति पर पूरा बल दिया गया है। अंक में मंच पर कभी पात्रों की भीड़ नहीं होनी चाहिए; केवल तीन या चार पात्ों का प्रवेश कराया जाय। अंक के अन्त में सभी पात् निष्कान्त हो जायँ। शारदातनय के अनुसार नाटक में जब ५ अर्थप्रकृतियाँ, ५ अवस्थाएँ, ६४ अंग, ४ वृत्तियाँ, ५ सन्धियाँ, २१ सन्ध्यन्तर, ३६ भूषण और ९० संगीतांग रहें, तभी वह पूर्ण होता है। इस दृष्टि से उन्होंने भोज के 'शृंगार-प्रकाश' का अनुसरण नहीं किया, जिसके अनुसार ६४ अंगों के ४ समूहों से नाटक में पूर्णता आती है। शारदातनय ने ६४ अलंकारों का उल्लेख किया है, जिनमें ५४ के लक्षण लिखे हैं। भरत के नाट्यशास्त्र के १६वें अध्याय में जिन ३६ भूषणों का उल्लेख हुआ है, उनमें से अधिकतर इनमें आ गये हैं, किन्तु शेष के मूल के विषय में कुछ ज्ञाता नहीं। नाटक के विषय में शारदातनय ने अधिकतर भरत और धनंजय का अनुसरण किया है और मतभेद के स्थलों पर कोहल और मातृ- गुप्त के मतों का भी उल्लेख किया है। शारदातनय ने नाटकों के वर्गीकरण के विषय में सुबन्धु का मत उद्धृत किया है। सुबन्धु ने नाटकों के पाँच प्रकार बताये हैं-पूर्ण, प्रशान्त, भास्वर, ललित और समग्र। प्रथम प्रकार पूर्ण के उदाहरण के रूप में उन्होंने 'कृत्यारावण' रखा है; क्योंकि इसमें पाँचों सन्धियों का पूर्ण विकास हुआ है। द्वितीय भेद प्रशान्त में मुखादि के स्थान पर न्यासादि पाँच नई सन्धियाँ रहती हैं। 'स्वप्नवासवदत्ता' ऐसे नाटक का उत्तम उदाहरण है। तृतीय भेद भास्वर नाटकों में दूसरी ही पाँच सन्धियाँ रहती हैं। बालरामायण का उदाहरण दिया गया है। प्रथम सन्धि 'माला' का उदाहरण देने के लिए मुद्राराक्षस की एक घटना उद्धृत की
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रूपक के भेदोपभेद
गई है, परन्तु प्रसंग के अनुरूप यह नहीं जान पड़ता। चतुर्थ भेद ललित नाटकों का उदाहरण विक्रमोर्वशीय दिया गया है। इस प्रकार के नाटकों की सन्धियों के उदाहरण देने के लिए वत्सराज, ययाति और राम की कथाओं की कुछ घटनाओं का उल्लेख किया गया है। पंचम भेद समग्र का उदाहरण महानाटक दिया गया है, जिसमें सभी वृत्तियों और लक्षणों की विशेषताएँ पाई जाती हैं। नाटक सुखान्त या प्रसादान्त होना चाहिए। दुःखान्त नाटकों का निषेध है, यद्यपि इस निषेध का कोई कारण नहीं बताया गया है। नाटक का गद्य सरल होना चाहिए, और उसमें लम्बे समास नहीं होने चाहिए। पद्य भी मधुर और स्पष्ट होना चाहिए। इसमें अनेक प्राकृतों का प्रयोग होना चाहिए और कैशिकी या सात्त्वती वृत्ति होनी चाहिए। नाटक का शीर्षक नायक के नाम अथवा विषयवस्तु पर होना चाहिए और यही प्रायः हुआ भी है। आचार्यों का कथन है कि नाटक के अंकों की रचना गो-पुच्छ के अग्रभाग के समान होनी चाहिए। कुछ आचार्य इसका अर्थ लगाते हैं कि नाटक के अंक उत्तरोत्तर छोटे होने चाहिए। कुछ लोगों का मत है कि गौ की पूँछ के कुछ बाल छोटे और कुछ बड़े होते हैं, उसी प्रकार कुछ कार्य मुखसन्धि में और कुछ आगे चलकर समाप्त हो जाने चाहिए। कुछ दूसरे विद्वान् इसका अर्थ यह करते हैं कि जैसे गौ की पूँछ के अग्रभाग में दो-ही-एक बाल सबसे बड़े दीखते हैं, उसी तरह नाटक का आरम्भ एकाध व्यापक बात से होना चाहिए और गाय की पूंछ के बालों के ही समान नाटक में क्रम से वृद्धि पाती हुई सभी कथाओं का उपसंहार समन्वय में हो जाना चाहिए। परन्तु, वास्तव में इसका तात्पर्य यह होना चाहिए कि थोड़े से आरम्भ करके मध्य भाग सर्वाधिक क्रिियाशील होना चाहिए और अन्त में इस प्रकार कार्य-कलाप कम हो जाय कि नाटक के उपसंहार में अधिक समस्याओं का समाधान नहीं करना पड़े। सभी रूपकों में नाटक सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। वस्तुतः रूपक की पूर्णता नाटक में ही होती है। भरत मुनि आदि सभी आचार्यों ने इसे बहुत अधिक महत्त्व प्रदान किया है। प्रकरण : महत्त्व की दृष्टि से नाटक के बाद प्रकरण का स्थान आता है। यह प्रायः सभी बातों में नाटक के ही समान होता है। प्रकरण का कथानक प्रख्यात नहीं होता, प्रत्युत उत्पाद्य या कवि-कल्पित होता है। इसमें राजा-रानी की कथा न होकर मध्यम वर्ग के सामान्य व्यक्ति की कथा होती है, अर्थात् प्रकरण में लोकसंश्रय इतिवृत्त होता है। इसका नायक ब्राह्मण, मन्त्री और वणिक में से कोई हो सकता है। ब्राह्मण नायक मृच्छकटिक में, अमात्य मालतीमाधव में और वैश्य पुष्षदूतिका में देख सकते हैं। नायक धीरप्रशान्त होता है और उसके कार्य की सफलता विघ्नों से युक्त होती है। वह कारणवश विपन्न हो गया रहता है और सम्पत्ति तथा प्रेम प्राप्त करने की चेष्टा करता है, जिसमें उसे अन्ततः
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४४८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास सफलता मिलती है। प्रकरण का नायक त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ, काम-में तत्पर रहता है। उदाहरणस्वरूप, मृच्छकटिक प्रकरण का कथानक कल्पित एवं लोक-संश्रय है। इसका नायक चारुदत्त ब्राह्मण है और धीरप्रशान्त कोटि में आता है। मालतीमाधव प्रकरण का भी कथानक उत्पाद्य और लोक-संश्रय है। इसका भी नायक ब्राह्मण तथा धीरप्रशान्त है। दोनों प्रकरणों में विपत्तियों को पार करने पर कार्य-सिद्धि होती है। मृच्छकटिक में शकार की दुष्टता के कारण विपत्तियाँ आती हैं और मालतीमाधव में मालती के पिता के वैर एवं भाग्य की विडम्बना के कारण। अन्त में, विपत्तियों का अन्त होता है और कार्य की सिद्धि होती है। प्रकरण के नायक की नायिका दो प्रकार की होती है-या तो वह कुलीन स्त्री होती है या गणिका। किसी प्रकरण में नायिक अकेली कुलीन स्त्री ही होती है, जैसे पुष्प- दूतिका प्रकरण में; किसी प्रकरण में अकेली वेश्या ही नायिका होती है, जैसे तरंगदत्त प्रकरण में, और कुछ प्रकरणों में एक ही साथ कुलीन स्त्री और वेश्या नायिका-रूप में पाई जा सकती है; जैसे मृच्छकटिक में चारुदत्त की स्त्री और गणिका वसन्तसेना दोनों ही नायिकाएँ हैं। कुल-स्त्री आभ्यन्तर नायिका होती है और गणिका बाह्य नायिका। इस प्रकार की नायिका या तो कुल-स्त्री, या गणिका या दोनों ही हो सकती है-इस विषय में कोई व्यतिकरम नहीं हो सकता। इस प्रकार, प्रकरण तीन तरह के हो जाते हैं-कुलजा- निष्ठ या शुद्ध, गणिका-निष्ठ या विकृत और उभयानिष्ठ या संकीर्ण। प्रकरण में विट, चेट, शकार, सार्थवाह तथा अनेक प्रकार के धूरत्तों का भी समावेश किया जा सकता है। ऐसा प्रकरण संकीर्ण या मिश्रित कहा जाता है। प्रकरण का मुख्य रस शृंगार होता है, यद्यपि धनंजय ने वीररस के भी समावेश की व्यवस्था दी है। इसमें नाटक की ही भांति सन्धियों आदि तथा प्रवेशक का समावेश हो सकता है। नाटक के ही समान अंकों की संख्या पाँच से दस तक होती है। नायक या नायिका या दोनों के नाम पर शीर्षक रखा जाता है; जैसे मालतीमाधव और अश्वघोष का शारिपुत्र प्रकरण। किन्तु, ध्यान देने की बात है कि मृच्छकटिक का नाम नायक आदि पर नहीं है और प्रतिज्ञा- यौगन्धरायण में चार ही अंक हैं, नियम के अनुसार पाँच अंक या अधिक नहीं। प्रकरण में कैशिकी वृत्ति होती है। शारदातनय ने प्रकरण के तीन लक्षण दिये हैं; पहले दो तो भरत और धनंजय- वाले हैं, किन्तु तीसरे के उद्भव का पता नहीं। इस लक्षण के अनुसार विष्कम्भक प्रकरण में रखा जा सकता है। उन्होंने प्रकरण का एक नया उदाहरण पद्मावती-परिणय दिया है। नाटक और प्रकरण : रूपकों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भेद नाटक है, परन्तु प्रकरण का महत्त्व बहुत अधिक है। नाटक के बाद प्रकरण ही सबसे प्रसिद्ध रूपक-भेद है। कवि नाटक के द्वारा लोकजीवन को प्रकृत रूप देने का प्रयास करता है। इसमें ख्यात कथा तथा ख्यात देश के साथ महत्तर उदात्त चरित्र की परिकल्पना विद्यमान रहती है। यह उदात्त
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निकही विवशाय रूपक के भेदोपभेद/ चरित्र आदर्श मनोवृत्ति का परिचायक रहता है। नाटक के द्वारा आदर्शोन्मुख जीवन को रूप देने की परम्परा का संकेत प्राप्त होता है। यही कारण है कि संस्कृत-नाटकों के नायक वे ही आदर्श पुरुष बनाये गये हैं, जिन्होंने इतिहास, धर्म तथा संस्कृति की धारा में प्रगति लाने का प्रयास किया है। उन आदर्श चरित्रों के द्वारा धर्म एवं संस्कृति को नया बल तथा नवीन प्रेरणा मिली है। नाट्यकला के उत्कर्ष की दृष्टि से प्रकरण की कल्पना नाटक की अपेक्षा अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसमें कवि की प्रतिभा के स्फुरण का अवकाश नाटक की अपेक्षा अधिक रहता है। यह सामान्य जीवन के स्वच्छ एवं तरल स्रोत से अनुप्राणित रहता है; अतएव भरत-कल्पित प्रकरण की भावना यथार्थोन्मुखी है, जबकि नाटक की भावना आदर्शोन्मुखी होती है। जहाँ तक सुख-दुःखात्मक दृष्टि का प्रश्न है, दोनों रूपक-भेदों में एक ही प्राणधारा का सरस स्पर्श रहता है। किन्तु, दो बातों में दोनों एक-दूसरे से भिन्न हैं-पहली बात है पात्रों का सामाजिक स्तर और दूसरी बात है कथा का स्रोत। पहले लिखा जा चुका है कि नाटक के पात्र उच्चवर्ग के राजा, मन्त्री, सेनापति आदि होते हैं, परन्तु प्रकरण के पात्र सामान्य जीवन से लिये जाते हैं। नाटक का कथास्रोत इतिहास, पुराण आदि हैं, परन्तु प्रकरण का कथानक कवि-कल्पित होता है। भाण : धूर्त्तों के चरित्र से युक्त, अनेक अवस्थाओं से व्याप्त, भाण एक अंक का रूपक होता है। इसमें कोई अत्यन्त चतुर एवं बुद्धिमान् विट अपने द्वारा अनुभूत अथवा अन्य व्यक्तियों द्वारा अनुभूत धूर्त्त, चोर, जुआरी आदि लोगों के चरित का वर्णन करता है। यहाँ विट ही अकेला पात्र होता है; रंगमंच पर कोई दूसरा पात्र नहीं होता। वही आकाश- भाषित के सहारे किसी से वार्त्तालाप या भाषण करता दिखाया जाता है। आकाश- भाषित के ही द्वारा वह सम्बोधन अथवा उक्ति-प्रत्युक्ति करता जाता है। इसमें कोई रस स्पष्ट रूप से प्रकट नहीं होता, अतः सौभाग्य और शौर्य के वर्णन के द्वारा क्मशः शृंगार तथा वीररस व्यक्त होते हैं। भाण में भारती वृत्ति की प्रधानता रहती है, परन्तु कहीं- कहीं कैशिकी वृत्ति भी रहती है। इतिवृत्त प्रख्यात नहीं होकर कवि-कल्पित होता है। इसमें पाँचों सन्धियों का समावेश नहीं हो सकता, अतः मुख तथा निर्वहण दो ही सन्धियों की योजना की जाती है। भाण में दस लक्ष्यांगों का समावेश होता है। शारदातनय ने एक नया अंग भाविक जोड़ दिया है, जिसका लक्षण भी उन्होंने दिया है। विश्वनाथ ने लीला- मधुकर का उदाहरण दिया है। शारदातिलक भी बहुत प्रसिद्ध है। शारदातनय ने धनंजय, भोज़ और कोहल के आधार पर भाण की परिभाषा दी है। जबतक कोहल की पुस्तक का पता नहीं चलता, तबतक यह कहना कठिन है कि यह कोहल का उद्धरण है या मात्र उनके विचारों का पद्यमय रूप। 3संक्षेप में भाण की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं : १. भाण का इतिवृत्त कवि-कल्पित होता है, नाटक के समान प्रख्यात नहीं। इसमें धूर्त्त-चरित रहता है।
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४५० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास कि २. इसका नायक विट होता है। दूसरा कोई पात्र नहीं होता। वह वार्त्तालाप आकाश-भाषित के सहारे करता है। ३. इसमें पाँचों सन्धियाँ नहीं हो सकती; केवल मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं। ४. इसमें भारती वृत्ति की प्रधानता रहती है, कहीं-कहीं कैशिकी वृत्ति भी रहती है। ५. इसमें स्पष्ट रूप से कोई रस नहीं रहता, परन्तु शृंगार तथा वीररस की सूचना होती है। ६. भाण में एक ही अंक होता है। डॉ० भोलाशंकर व्यास ने दशरूपक की टीका में भाण के विषय में लिखा है, उसे साभार उद्धत किया जा रहा है-'भाण कई अवस्थाओं में-पाश्चात्त्य पद्धति के एकाभिनय (मोनो-ऐक्टिंग) से मिलता है। उसमें भी इसी की तरह एक ही पात्र अभिनय करता है। संस्कृत-साहित्य के रूपक-साहित्य में भाण का विशेष स्थान रहा है। दवीं शती से १७वीं- १८वीं शती तक सैकड़ों भाण लिखे गये। वामन, भट्ट, बाण, युवराज, राजवर्मा आदि अनेकों ने भाण को एक सुन्दर साहित्यिक रूप दिया। भाण के द्वारा कवि सामाजिक कुरीतियों पर भी बड़ा गहरा व्यंग्य कसता है। सामाजिक कुरीतियों का पर्दाफाश करने के लिए कवि के पास भाण व प्रहसन-ये दो बड़े अस्त्र थे। किन्तु, दोनों की प्रणाली में गहरा भेद है। भाण की व्यंग्य-प्रणाली बड़ी गम्भीर व उद्धत होती है; प्रहसन की छिछली। यही कारण है कि भाण का रस हास्य नहीं होता है, प्रहसन का हास्य होता है। संस्कृत के भाणों में अधिकतर वेश्याओं के वर्णन, उनके बाजारों के वर्णन, उनसे सम्बद्ध दूसरे धूर्त्त व जुआरियों के वर्णन मिलेंगे। भाणों में सर्वत्र शृंगार की प्रधानता मिलती है, वीर की बहुत कम। इनके प्राकृतिक वर्णन भी शृंगार से प्रभावित होते हैं।" भाण के विषय में दस लास्यांगों का उल्लेख किया गया है। ये लास्यांग संगीत के भेद हैं। धनंजय, विश्वनाथ आदि ने लास्यांगों का वर्णन किया है। लास्य में निम्नलिखित दस अंगों की कल्पना की जाती है-गैय पद, स्थित पाठ्य, आसीन, पुष्प-गण्डिका, प्रच्छेदक, त्रिगूढ़, सैन्धव, द्विगूठक, उत्तमोत्तमक तथा उक्त-प्रत्युक्त। यहाँ इन सबका वर्णन करना अनावश्यक है। प्रहसन : प्रहसन का कथानक कवि-कल्पित तथा लोक-संश्रय होता है। इस बात का पर्याप्त संकेत मिलता है कि इसकी उत्पत्ति सामान्य जनता की रुचि के अनुसार हुई होगी। इसमें मुख्यतः निम्नकोटि के पात्रों के चरित्र या कारनामों का चित्रण रहता है। भाण के समान ही इसमें वस्तु, सन्धि (मुख तथा निर्वहण) सन्ध्यंग, लास्यांग आदि होते हैं। भाण के समान इसमें एक ही अंक होता है। प्रहसन में हास्य-रस प्रधान रहता है। भरत ने प्रहसन के दो भेद किये हैं-शुद्ध तथा संकीर्ण, किन्तु धनंजय ने तीन भेद किये- १. दशरूपक (टीका०-डॉ० भोलाशंकर व्यास), पृ० १७४
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शुद्ध, विकृत तथा संकर। भरत के अनुसार शुद्ध प्रहसन में तपस्वी, ब्राह्मण, कापुरुष आदि पात्रों के द्वारा परिहास-भाषण होता है और संकीर्ण प्रहसन में वेश्या, दास-दासी, नपुंसक, विट, धूर्त्त आदि अपनी विचित्र वेशभूषा और चेष्टाओं के द्वारा हास्य उत्पन्न करते हैं। धनंजय के अनुसार शुद्ध प्रहसन के पात्र पाखण्डी (बौद्ध और जैन भिक्षु), ब्राह्मण, दास-दासियाँ आदि हैं। इनकी वेशभूषा तथा भाषा के अनुरूप इनकी चेष्टाएँ होती हैं, और इनका कथोपकथन हास्ययुक्त होता है। विकृत प्रहसन वह कहा जाता है, जहाँ ऐसे नपुंसक कंचुकी या तपस्वी पात्र नियोजित किये जायँ, जो कामुकों के वचन तथा वेश का प्रयोग करें। संकीर्ण प्रहसन वह होता है, जिसके पात्र धूर्त्त व्यक्ति हों। संकीर्ण में वीथ्यंगों का मिश्रण होता है। इसमें केवल हास्य-रस का प्रयोग होता है और हास्य के स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अपहसित तथा अतिहसित-इन छह रूपों का सन्निवेश होता है। इस प्रकार, धनंजय के विकृत तथा संकर प्रहसनों का अन्तर्भाव भरत के संकीर्ण प्रहसन में हो जाता है। विश्वनाथ ने शुद्ध प्रहसन का उदाहरण 'कन्दर्पकेलि' दिया है। उन्होंने संकीर्ण प्रहसन में एक या अनेक धृष्टों की स्थिति स्वीकार की है। ऐसी दशा में प्रहसन में दो अंक भी हो सकते हैं, जैसे लटकमेलक। शारदातनय ने शुद्ध प्रहसन का उदाहरण सागरकौमुदी, विकृत का कलिकेलि और संकीर्ण का सैरन्ध्रिका दिये हैं। किन्तु, दुर्भाग्यवश ये सभी अप्राप्य हैं। प्रहसन में आरभटी और कैशिकी वृत्तियाँ नहीं होती; विष्कम्भक और प्रवेशक का भी सन्निवेश नहीं किया जाता। कुछ यूरोपीय विद्वानों का मत है कि प्रहसन की भी उत्पत्ति प्राचीन कामदी (old comedy) के ही समान लिंगोत्सव से हुई होगी। प्रहसन के विषय के सम्बन्ध में श्रीविल्सन का कथन है: "Unlike the Aristophanic comedy, however, it is not levelled at the many headed mob, but in general at the sanctified and previleged orders of the community, as ascetics, Brahmans, men of rank and wealth, and priests".' प्रहसनों में व्यंग्य का मुख्य लक्ष्य समाज का वह अंग होता था, जिसे धार्मिक या राजनीतिक या आर्थिक दृष्टि से विशेष प्रतिष्ठा प्राप्त थी। ब्राह्मण, संन्यासी, मन्त्री, सेनापति, राजकुमार, सेठ आदि पर मुख्य रूप से प्रहार होते थे। राजकुमार, मन्त्री, सेठ आदि पर अधिकार के दुरुपयोग के कारण नहीं, वरन् धन के दुरुपयोग के कारण अधिक व्यंग्य किया जाता था। व्यंग्य का कारण यह नहीं था कि वे अत्याचारी तथा निरंकुश थे, अपितु यह था कि वे निम्नकोटि के विलास में आकण्ठ निमग्न थे। ब्राह्मण तथा संन्यासी पर कामुकता तथा ढोंग के कारण व्यंग्य किया जाता था। श्रीविल्सन ने भारतीय प्रहसनों को यूनानी कामदियों से बहुत घटिया किस्म का माना है। १. The Theatre of the Hindus, p. 27.
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४५२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकांस
"It is their extreme indelicacy that they resemble although perhaps they scarcely equal, the Greek Comedy; but they have not its redeeming properties, exuberant gaiety and brilliant imagination; they have some causticity and humour, but they are deficient in the high merits of poetry and wit"." भाण और प्रहसन की तुलना : भाण और प्रहसन परस्पर मिलते-जुलते हैं। कई बातों में इनमें साम्य है और कुछ में वैषम्य। नीचे के कोष्ठ में तुलना की जा रही है : साम्य : १. दोनों का कथानक कवि-कल्पित और लोक-संश्रय रहता है। २. दोनों के सहारे कवि सामाजिक कुरीतियों और ढोंगों पर प्रहार करता है। ३. दोनों में धूर्त्त चरित्र रहते हैं। ४. दोनों में से किसी में भी पाँचों सन्धियाँ नहीं रहती, केवल मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ रहती हैं। ५. दोनों में एक ही अंक रहता है। ६. दोनों में समान वृत्तियाँ होती हैं। वैषम्य : १. भाण में एक ही पात्र रहता है, परन्तु प्रहसन में अनेक पात्र रहते हैं। २. भाण का नायक विट होता है, जो किसी कला में दक्ष रहता है। प्रहसन का नायक कोई भी निम्नकोटि का पात्र हो सकता है। ३. भाण में स्पष्ट रूप से कोई रस नहीं रहता; शृंगार या वीर की सूचना होती है। प्रहसन में हास्य-रस रहता है। डिम : डिम बहुत अल्पज्ञात रूपक है, यद्यपि नाट्यशास्त्र में भरत मुनि ने 'त्रिपुरदाह' नामक डिम का उल्लेख किया है। इसका इतिवृत्त रामायण, महाभारत, पुराण आदि से गृहीत एवं प्रख्यात तथा इतिहास-प्रसिद्ध होता है। इसमें कैशिकी वृत्ति वर्जित है, शेष सात्त्वती, आरभटी और भारती-तीन वृत्तियों का समावेश होता है। इसके नेता मनुष्येतर जाति के-देवता, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग आदि होने हैं और भूत, प्रेत, पिशाच आदि का भी समावेश डिम में हो सकता है। इसके पात्र बड़े उद्धत होते हैं और उनकी संख्या १६ होती है। इसमें शृंगार और हास्य रसों का समावेश नहीं होता, शेष वीर, रौद्र, बीभत्स, अद्भुत, करुण और भयानक रस पाये जाते हैं। किन्तु, प्रधान रस रौद्र ही होता है। डिम में माया, इन्द्रजाल, युद्ध, क्रोध, उद्भ्रान्ति आदि चेष्टाएँ वणित रहती हैं और सूर्य- ग्रहण तथा चन्द्रग्रहण के दृश्य प्रायः दिखाये जाते हैं। इसमें केवल चार अंक होते हैं और विमर्श सन्धि के अतिरिक्त शेष चार सन्धियों-मुख, प्रतिमुख, गर्भ तथा निर्वहण-का समावेश पाया जाता है। डिम में विष्कम्भक तथा प्रवेशक नहीं होते।
१. The Theatre of the Hindus, p. 27-28.
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रूपक के भेदोपभेद [ ४५३
स्पष्ट है कि अपर्याप्त सामग्री के ही आधार पर इस रूपक-भेद का वर्णन किया गया है। सम्भव है कि आरम्भ में सामान्य जनता के बीच इससे मनोरंजन होता रहा हो, परन्तु इसे पूर्ण मान्यता नहीं मिल सकी। धनिक ने इसकी उत्पत्ति डिम संघाते धातु से मानी है, जिसका अर्थ घात-प्रतिघात करना माना है, किन्तु अन्य विद्वानों (कीथ आदि) का कथन है कि ऐसी कोई धातु नहीं है। डिम के लक्षण के विषय में शारदातनय भरत तथा धनंजय से सहमत हैं। इस प्रसंग में एक बात ध्यातव्य है। डिम के लक्षण के विषय में धनिक ने दशरूपक की टीका दशरूपकावलोक में भरत का एक श्लोक उद्धृत किया है : इदं त्रिपुरदाहे तु लक्षणं ब्रह्मणोदितम्। ततस्त्रिपुरदाहश्च डिमसंज्ञः प्रयोजित: ।।' यह श्लोक नाट्यशास्त्र में नहीं मिलता, किन्तु इसका पूर्वार्द्ध भावप्रकाशन में मिलता है और उत्तरार्द्ध दूसरा ही है : इदं त्रिपुरदाहाख्ये लक्षणं ब्रह्मणोदितम्। उदाहरणमेतस्य वृत्नोद्धरणमुच्यते।।" इसका उत्तरार्द्ध भरत के नाट्यशास्त्र में मिलता है। इस श्लोक के अनुसार डिम का लक्षण आरम्भ में ब्रह्मा ने त्रिपुरदाह डिम में दिया था, जिसका अभिनय शिवजी के सामने हुआ था। शारदातनय ने डिम के दो उदाहरण वृत्नोद्धरण और तारकोद्धरण दिये हैं, परन्तु ये दोनों अप्राप्य हैं। व्यायोग : व्यायोग की कथावस्तु इतिहास-प्रसिद्ध होती है और इसमें किसी प्रसिद्ध उद्धत पौराणिक व्यक्ति या राजर्षि का चरित चित्रित रहता है। व्यायोग में स्त्रियाँ बहुत थोड़ी होती हैं, और पुरुषों का बाहुल्य रहता है। इसमें गर्भ तथा विमर्श सन्धियाँ नहीं होती, शेष मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहण नामक सन्धियाँ होती हैं। रसों की योजना डिम की ही तरह होती है, अर्थात् वीर, रौद्र, बीभत्स, अद्भुत, करुण तथा भयानक रस पाये जाते हैं। इसमें युद्ध का वर्णन रहता है, परन्तु वह युद्ध स्त्री-प्राप्ति के निमित्त नहीं होता, जैसे जामदग्न्य नामक व्यायोग में परशुराम का युद्ध व्णित है, जो स्त्री-प्राप्ति के लिए नहीं हुआ है। व्यायोग की कथा एक ही दिन की होती है और इसमें एक ही अंक होता है। इसमें कैशिकी वृत्ति नहीं होती। यह रूपक-भेद काफी पुराना है; क्योंकि भास ने भी व्यायोग की रचना की है। सांगन्धिकाहरण व्यायोग का उदाहरण है। समवकार : समवकार का वर्णन सम्भवतः एक ही रचना 'समुद्रमन्थन' के आधार पर किया गया है, जिसमें अमृत की प्राप्ति के लिए देवताओं और दानवों के द्वारा समुद्र के १. दशरूपक, तृतीय प्रकाश, पृ० ५९ २. भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २४८
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४५४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
मन्थन की कथा है। समवकार में भी नाटक की ही तरह आमुख की योजना की जानी चाहिए। इसका इतिवृत्त इतिहास और पुराण-प्रसिद्ध प्रख्यात होता है, जिसमें देवताओं और दैत्यों की कथा व्णित होती है। इसमें विमर्श के अतिरिक्त शेष चार सन्धियों की योजना होनी चाहिए और कैशिकी के अतिरिक्त शेष तीन वृत्तियाँ होती हैं। इसमें तीन अंक होते हैं। उनमें से प्रथम अंक में दो सन्धियाँ मुख तथा प्रतिमुख और द्वितीय तथा तृतीय अंकों में एक-एक सन्धि होती है। इसमें बारह उदात्त देवता तथा दानव पात्र निबद्ध होते हैं और सभी पात्रों का फल पृथक्-पृथक् होता है; जैसे समुद्रमन्थन में विष्णु आदि सभी पात्रों को लक्ष्मी आदि भिन्न-भिन्न फल प्राप्त होते हैं। ये सभी पात्र वीररस से पूर्ण होते हैं, फलस्वरूप समवकार का अंगी रस वीर होता है, शेष रस अंग होते हैं। समवकार में बिन्दु नामक अर्थ-प्रकृति तथा प्रवेशक नामक अर्थोपक्षेपक नहीं होते। प्रहसन के समान इसमें भी आवश्यकतानुसार तेरह वीथ्यंगों की योजना की जाती है। गायत्री, उष्णीक आदि अनेक प्रकार के छन्दों का इसमें प्रयोग किया जाता है। इसमें नगरावरोध तथा युद्ध, वात, अग्नि आदि उत्पातों के कारण विद्रव का वर्णन किया जाता है। प्रत्येक अंक में तीन बार कपट, तीन प्रकार का शृंगार तथा तीन बार पात्रों में विद्रव या भगदड़ की योजना की जानी चाहिए। इसके प्रथम अंक में १२ नालिका (२४ घड़ी), द्वितीय अंक में ४ नालिका (८ घड़ी), तृतीय अंक में २ नालिका (४ घड़ी) की कथा होनी चाहिए। नालिका का अर्थ दो घड़ी है। शृंगार तीन प्रकार का होता है-धर्मशृंगार, अर्थशृंगार तथा कामशृंगार। शास्त्र की मर्यादा का उल्लंघन नहीं करके जिस शृंगार में प्रवृत्त हुआ जाता है, उसे धर्म- शृंगार कहते हैं। धन के लिए जिस शृंगार में प्रवृत्ति होती है उसे अर्थशृंगार और जो काम के ही अनुगुण हो उसे कामशृंगार कहते हैं। कामशृंगार समवकार के प्रथम ही अंक में होता है, अन्य शृंगारों के लिए कोई विशेष नियम नहीं। स्वाभाविक, कृत्रिम और दैवज-तीन प्रकार का कपट होता है। चेतन, अचेतन और चेतनावचेतन के द्वारा किया हुआ तीन प्रकार का विद्रव होता है। चेतन मनुष्य आदि, अचेतन अग्नि आदि और जो कुछ चेतन तथा कुछ अचेतन हों, उन्हें चेतनाचेतन कहते हैं; जैसे हाथी आदि। समवकार का सर्वोत्तम उदाहरण समुद्र-मन्थन है। भास के पांचरात्र में भी ये लक्षण कुछ अंशों में लागू होते हैं। समवकार के विषय में भी शारदातनय ने भरत और धनंजय का अनुकरण किया है। केवल नालिका तथा कपट की परिभाषाओं में थोड़ा अन्तर है। शारदातनय ने कपट की दो परिभाषाएँ दो आचार्यों के आधार पर दी हैं, किन्तु दोनों में से कोई भी नाट्यशास्त्र या दशरूपक में नहीं है। बीथी : धनिक ने वीथी का अर्थ मार्ग बताया है और यह रूपक-भेद-वीथी-मार्ग के समान है, इसलिए इसे वीथी कहते हैं। परन्तु, डॉ० कीथ ने वीथी का अर्थ 'माला'
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रूपक के भेदोपभेदा लगाया है और उनका कथन है कि कोई भी आचार्य 'वीथी' नाम की व्याख्या नहीं कर सका है। कीथ अर्थ लगाते हैं कि इसमें कई रस माला की तरह गूँथे रहते हैं। इसीलिए, इसे वीथी (माला) कहते हैं। यह रूपक-भेद कई बातों में भाण से मिलता-जुलता है। इसमें भी एक ही अंक होता है, और आकाश-भाषित से अधिक काम लिया जाता है। इसमें भी दो ही सन्धियां-मुख और निर्वहण-होती हैं, परन्तु सभी अर्थप्रकृतियाँ रहती हैं। इसमें शृंगार रस होता है, किन्तु रस का पूर्ण परिपाक नहीं होने से वह सूच्य होता है। अन्य रसों का भी स्पर्श रहता है। शृंगार रस के ही कारण इसमें कैशिकी वृत्ति का विधान है। वीथी में एक या दो पात् रहते हैं और यह तेरह अंगों से युक्त होती है। वे अंग हैं- उद्घात्यक, अवलगित, प्रपंच, त्रिगत, छल, वाक्केलि, अधिवल, गण्ड, अवस्यन्दित, नालिका, असत्प्रलाप, व्याहार और मृदव। भरत और विश्वनाथ ने सबके विस्तार से लक्षण और उदाहरण दिये हैं। शारदातनय ने वीथी के विषय में लिखते समय लास्यांगों के विषय में भी लिखा है और इस प्रसंग में उन्होंने कोहल और भोजराज के मतों का उल्लेख किया है। कोहल का मत है कि लास्यांग केवल ऐच्छिक है, परन्तु भोजराज इन्हें अनिवार्य मानते हैं। विश्वनाथ ने वीथी का एकमात्र उदाहरण मालविका (मालविकाग्निमित् नहीं) दिया है। मालतीमाधव के प्रथम अंक का नाम बकुल वीथी दिया गया है, परन्तु यह वीथी का उदाहरण किसी भी प्रकार नहीं समझा जा सकता। अंक अथवा उत्सृष्टिकांक : अंक को उत्सृष्टिकांक भी कहा गया है। इसका कारण यह है कि नाटक या अन्य रूपकों में व्णित अंक से इसका अन्तर स्पष्ट हो जाय। दूसरे लोग कहते हैं कि इसमें सृष्टि उत्कान्त अर्थात् विपरीत रहती है, इसलिए इसे उत्सृष्टिकांक कहते हैं। अंक का कथानक इतिहास-प्रसिद्ध होता है, पर कवि अपनी कल्पना से उसे परिवर्त्तित या परिवद्धित कर देता है। इसके नेता और अन्य पात्र सामान्य व्यक्ति होते हैं। इसमें सन्धि, वृत्ति तथा अंक भाण के ही समान होते हैं। भाण के ही समान अंक में भी मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं। भरत ने अंक में केवल भारती वृत्ति को स्वीकार किया है और शेष तीनों वृत्तियों-कैशिकी, सात्त्वती तथा आरभटी-का निषेध किया है। धनंजय और विश्वनाथ ने भरत का ही अनुकरण किया, परन्तु शारदातनय ने केवल कैशिकी को अनावश्यक माना है। धनंजय, विश्वनाथ आदि ने अंक में एक ही अंक माना है, परन्तु शारदातनय ने लिखा है कि अंक या उत्सृष्टिकांक में भरत के अनुसार एक, कोहल के अनुसार दो और व्यास तथा आंजनेय के अनुसार तीन अंक होने चाहिए। अस्याङ्कमेकं भरतो द्वावङ्गाविति कोहलः। व्यासाञ्जनेयगुरव: प्राहुरङ्गत्यं यदा।!१ १. भावप्रकाशन, षष्ठ अधिकार, पृ० २५१
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४५६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास वर्तमान नाट्यशास्त्र में किसी संख्या का निर्देश नहीं है; इससे विद्वानों ने अनुमान लगाया है कि सम्भवतः किसी अन्य प्राचीनतर भरत का यह मत रहा होगा। इसका स्थायी रस करुण होता है और स्त्रियों के विलाप के साथ पात्रों में वाग्युद्ध तथा जय-पराजय की योजना की जाती है। परन्तु, ये सब रंगमंच पर प्रदर्शित नहीं किये जाते। इसमें निर्वेद के भी वचन होते हैं। विश्वनाथ ने अंक का उदाहरण 'शर्मिष्ठा-ययाति' दिया है। शारदातनय ने बताया है कि यद्यपि अंक में युद्ध, विलापादि की योजना होती है, परन्तु यह सदा सुखान्त होना चाहिए। भरत इस विषय में मौन हैं। प्राचीनकाल में दिव्य नायकों में जो युद्ध हुए हैं, उनका वर्णन भारतवर्ष में ही होना चाहिए; क्योंकि यही भूमि कर्मभूमि रही है: कस्माद् भारतमिष्टं वर्षेभ्यस्तस्य कर्मभूमित्वात् ।' रूपक के इस भेद के उदाहरण देने के लिए शारदातनय ने तीन उत्सृष्टिकांकों का उल्लेख किया है-शक्ति से लक्ष्मण की मृत्यु, नागानन्द में जीमूतवाहन का वध तथा चन्द्रापीड का मरण, जहाँ नायक पुनर्जीवित हो गये हैं और रूपक सुखान्त हो गये हैं। ईहामृग : ईहामृग का इतिवृत्त मिश्रित होता है, अर्थात् इतिहास-प्रसिद्ध, प्रख्यात और कल्पना का मिश्रण इसके कथानक में होता है। इसमें चार अंक होते हैं और मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहण-तीन सन्धियाँ होती हैं। इसके नायक तथा प्रतिनायक प्रख्यात इतिहास-प्रसिद्ध धीरोदात्त मनुष्य अथवा देवता होते हैं। प्रतिनायक ज्ञान की भ्रान्ति के कारण अनुचित कर्म करनेवाला वर्णित होता है अथवा वह प्रच्छन्न रीति से पापाचरण करता है। इसमें प्रतिनायक ऐसी दिव्य नारी का अपहरण करना चाहता है, जो उससे प्रेम नहीं करती; इस प्रकार कवि इसमें कुछ शृंगाराभास भी प्रदर्शित करता है। ईहामृग का मुख्य तथ्य यह है कि किसी दिव्य अथवा अदिव्य नायक के पास से प्रतिनायक उसकी प्रेमिका का अपहरण करना चाहता है, फलस्वरूप दोनों में संघर्ष होता है, परन्तु कभी वास्तविक युद्ध नहीं होता। नायक और प्रतिनायक के विरोध को पूर्णता तक पहुँचाकर किसी बहाने से युद्ध का निवारण कर दिया जाता है। अत्यन्त कोध उत्पन्न होकर युद्ध की पूरी तैयारी हो जाती है, परन्तु किसी बहाने वह टल जाता है। वध के अत्यन्त निकट होने पर प्रतिनायक का वध नहीं कराया जाता, अर्थात् प्रतिनायक का वध इतिहास-प्रसिद्ध होने पर भी ईहामृग में प्रदर्शित नहीं किया जाता। महात्मा लोग वध योग्य होने पर भी मारे नहीं जाते, छोड़ दिये जाते हैं। ईहामृग में कैशिकी वृत्ति के अतिरिक्त शेष तीन वृत्तियाँ रहती हैं। विश्वनाथ ने एक मत उद्धत किया है, जिसके अनुसार इसमें एक ही अंक रहता है, एक ही देवता नायक होता है; परन्तु अन्यों का मत है कि छह नायक होते हैं और दिव्य स्त्री के कारण युद्ध होता है : १. भावप्रकाशन, षष्ठ अधिकार, पृ० २५२ ४जजहीम क सशहाए ।
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कजकी अे रूपक के भेदोपभेद [४५७
एकाडूो देव एवात्र नेतेत्याहु: परे पुनः। स्त्रीदिव्यहेतुकं युद्धं नायका: षडितीतरे ।' विश्वनाथ ने ईहामृग का उदाहरण 'कुसुमशेखर-विजय' दिया है। धनंजय ने ईहामृग नाम का कारण बताया है। इसमें नायक मृग के समान किसी अलभ्य नायिका को प्राप्त करने की इच्छा करता है, इसीलिए इसका नाम ईहामृग रखा गया। नाटक और प्रकरण से अन्य आठ रूपक-भेदों में मुख्य अन्तर यही जान पड़ता है कि नाटक और प्रकरण में पाँचों सन्धियों की योजना अनिवार्य है, परन्तु अन्य रूपक-भेदों में नहीं। कभी-कभी तो इनमें से अधिकांश की योजना नहीं ही होती। भाण, प्रहसन, वीथी तथा उत्सृष्टिकांक छोटे रूपक हैं। भाण तथा प्रहसन में तो एक ही या दो पात्र रहते हैं और उनमें नायक स्वयं रंगमंच पर नहीं आता। जिन व्यक्तियों की चर्चा होती है, रंगमंच पर उनका रूप-विधान नहीं होता। लगभग ऐसी ही बात वीथी और उत्सृष्टिकांक के भी विषय में कही जा सकती है। वास्तव में ये अपने समय में तमाशे ही रहे होंगे। वास्तविक अर्थ में इन्हें रूपक कहने में हिचक होती है। अनुकार्य के रूप के आरोप से ही रूपक होता है, परन्तु इनमें अनुकार्य का आरोप स्पष्ट नहीं होता। जितना आरोप होता है, उतना तो काव्य-पाठक और कथा-वाचक पर भी होता है। उपरूपक आदिलेखक : परवर्त्ती आचार्यों ने अनेक उपरूपकों का भी उल्लेख किया है। दस प्रकार के रूपकों या प्रधान नाट्यों का मुख्य उद्दश्य सामाजिक या दर्शक के मन में रसों की जागृति है, किन्तु नाट्य के अन्य भेदों, अर्थात् उपरूपकों का मुख्य उद्देश्य दर्शक के मन में उचित भंगिमा द्वारा भावों को जागरित करना है, इसीलिए इन्हें नृत्य कहते हैं। वर्त्तमान नाट्यशास्त्र में इन उपरूपकों का कोई उल्लेख नहीं है, अतः इनकी उत्पत्ति के विषय में निश्चित रूप से कुछ कहना कठिन है। यद्यपि नाट्यशास्त्र में उल्लेख नहीं है, फिर भी कुछ ऐसे उद्धरण पाये जाते हैं, जिनसे उपरूपकों का कृतित्व, कुछ विद्वानों द्वारा, भरत को ही दिया जाता है, किन्तु वहाँ १५ ही नाम हैं और कुछ परिवर्त्तनों के साथ। नाट्यशास्त्र में कुछ ऐसी कारिकाएँ हैं, जिनसे अनुमान लगाया जा सकता है कि कोहल ने उपरूपकों की कल्पना की थी।२ वस्तुतः, कोहल और उनके अनुयायियों ने नाट्यवेद को नाट्यकारी के निकट पहुँचाने में बड़ा काम किया। उपरूपकों का एक भेद तोटक है, जिसका लक्षण हर्ष ने दिया है। इससे सिद्ध होता है कि हर्ष के समय के पूर्व ही उपरूपकों की स्थिति थी। शारदातनय ने हर्षकृत तोटक का यह लक्षण उद्धत किया है : १. साहित्यदर्पण, धष्ठ परिच्छेद, श्लोक २४९-५० २. नाट्यशास्त्र, अध्याय ३७, का० १८, २४, २५
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४५८ ] भारतीय नाड्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास दिव्यमानुषसंयोगे यत्राङ्करविदूषकंः। तदेव तोटकभेदो नाट्यस्येति च हर्षवाक्।' नाट्यशास्त्र के चतुर्थ अध्याय के अन्तिम अंश पर अभिनवगुप्त ने जो टीका लिखी है, उसमें उन्होंने उपरूपकों के साथ कोहल का सम्बन्ध बताया है। इससे इस कथन को बल मिलता है कि कोहल ही उपरूपकों के जन्मदाता रहे होंगे। को हेमचन्द्राचार्य ने काव्यानुशासन में इस मत की पुष्टि की है।" उपरूपकों और उनकी संख्या के विषय में एक संकेत 'दशरूपकावलोक' में धनिक द्वारा उद्धत किसी अज्ञात आचार्य के एक श्लोक में मिलता है, जिसमें उपरूपकों की संख्या ७ बताई गई है और इन्हें भाण की श्रेणी में रखा गया है : डोम्बी श्रीगदितं भाणो भाणी-प्रस्थानरासकाः। काव्यं च सप्त नृत्यस्य भेदा: स्युस्तेऽपि भाणवत्॥ इति रूपकान्तराणामपि।3 अग्निपुराण में कुछ नामों में परिवर्तन करके १७ उपरूपक गिनाये गये हैं।* तदुपरान्त अभिनवगुप्त ने नाट्यशास्त्र की अपनी टीका में उपरूपकों का उल्लेख किया है और 'तदुक्तं चिरन्तनैः' लिखकर किसी प्राचीन ग्रन्थ से बहुत-से उद्धरण दिये हैं। 'चिरन्तन' कहकर जिस सर्वप्रथम आचार्य के उद्धरण अभिनवगुप्त ने दिये हैं, उसका पता नहीं चलता; परन्तु वे ही श्लोक हेमचन्द्र और शारदातनय ने उद्धृत किये हैं।" कालक्रम से इनके बाद भोज के शृंगारप्रकाश का स्थान आता है, जिसमें १४ उपरूपकों के लक्षण पद्य में दिये गये हैं। वे सभी श्लोक भावप्रकाशन में भी पाये जाते हैं, जो शारदातनय के श्लोकों के साथ मिल-जुल गये हैं। उपरूपकों का विवेचन करने के पूर्व भोज ने १० रूपकों का विवेचन किया है और भरत के नाट्यशास्त्र के १८वें अध्याय में दिये गये श्लोक उद्धृत किये हैं। साथ ही उन्होंने यह भी लिख दिया है कि मैंने इस विषय में भरताचार्य का अनुसरण किया है। किन्तु, उपरूपकों के विषय में भोज ने किसी आचार्य का उल्लेख नहीं किया, जिसका उन्होंने अनुसरण किया हो। इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि भरत ने दस ही रूपकों का वर्णन किया और उपरूपक की कल्पना परवर्त्ती काल की है। तब भोज ने नाटिका और सट्टक का वर्णन किया है; क्योंकि ये नाटक और प्रकरण से प्रत्यक्ष रूप से निकले हैं। इन दो रूपकों के बाद बारह अन्य उपरूपकों का वर्णन हुआ है। इन १. भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २३८ २. काव्यानुशासन, पृ० ३२५-३२९ ३. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, कारिका ८ के बाद ४. अग्निपुराण, ३३७।२।४ ५. काव्यानुशासन, पृ० ३२७-२८; भावप्रकाशन, नवम अधिकार, पृ० २६५।२३, ६६, १४
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रूपक के भेदोपभेद [४५९
चौदह प्रकार के उपरूपकों के विषय में स्पष्ट है कि भोज ने किसी अज्ञात और प्राचीन आचार्य के श्लोक उद्धृत किये हैं, जो भरत के अतिरिक्त कोई अन्य व्यक्ति है। जिस प्रकार भोज ने दस रूपकों के विषय में भरत के श्लोक उद्धत किये, उसी प्रकार इन चौदह उपरूपकों के विषय में किसी अन्य आचार्य के श्लोक उद्धत किये, यद्यपि उन्होंने किसी आचार्य का नाम नहीं लिया है। अग्निपुराण में जिन (१७ या १८) उपरूपकों के नाम दिये गये हैं, वे भी बहुत प्राचीन नहीं माने जा सकते; क्योंकि उस पुराण में धवन्यालोक के उद्धरण हैं और भोज के शृंगाररस के सिद्धान्त के साथ उसकी सबल समता है। इन तथ्यों पर ध्यान देने से निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जिस काल में भरत ने नाट्यशास्त्र की रचना की थी, उस काल में इन उपरूपकों की कल्पना नहीं हुई थी, किन्तु धनिक के काल के पूर्व ही इनकी कल्पना हो गई थी; क्योंकि दशरूपक में नाटिका का वर्णन है और धनिक ने सात उपरूपकों का उल्लेख किया है। इनका समय वस्तुतः अनिश्चित है। सम्भवतः कोहल ने उपरूपकों की कल्पना की थी। विश्वनाथ ने १८ उपरूपकों का वर्णन किया है। धनिक से लेकर विश्वनाथ तक जितने आचार्यों ने उपरूपकों की सूची दी है, सम्भवतः शारदातनय की सूची सबसे लम्बी है, जिन्होंने २०-२० भेदों की दो सूचियाँ दी हैं। किन्तु, पहली सूची में सटटृक को स्वतन्त्न स्थान दिया गया है और भाण को छोड़ दिया गया है। दूसरी सूची में सट्टक के स्थान पर भाण का उल्लेख हुआ है और सट्टक को नाटिका में ही अन्त्हित कर लिया गया है। उपरूपक के भेद: कविराज विश्वनाथ ने उपरूपक के निम्नलिखित् १८ भेद माने हैं : १. नाटिका, २. तोटक, ३. गोष्ठी, ४. सट्टक, ५. नाट्यरासक, ६. प्रस्थानक, ७. उल्लास्य, ८. काव्य, ९. प्रेखण, १०. रासक, ११. संलापक, १२. श्रीगदित, १३. शिल्पक, १४. विलासिका, १५. दुर्मल्लिका, १६. प्रकरणिका, १७. हल्लीश और १८. भाणिका। शारदातनय ने उपरूपक के २० भेद स्वीकार किये, जो निम्नलिखित हैं : १. तोटक, २. नाटिका, ३. गोष्ठी, ४. सल्लापक, ५. शिल्पक, ६. डोम्बी, ७. श्रीगदित, ८. भाण, ९. भाणिका, १०. प्रस्थान, ११. काव्य, १२. प्रेखण, १३. रासक, १४. नाट्य-रासक, १५. उल्लोप्यक, १६. हल्लीसक, १७. दुर्मल्लिका, १८. मल्लिका, १९. कल्पवल्ली और २०. पारिजातक। आगे शारदातनय ने लिखा है कि इनमें से डोम्बी, श्रीगदित, भाण, भाणी, प्रस्थान, रासक, काव्य-ये सात कुछ विद्वानों के मत से भाण के समान नृत्य के भेद हैं और कुछ लोग सभी को नृत्यात्मक कहते हैं। इन दोनों सूचियों में १५ नाम एक ही या एक-से ही हैं। विश्वनाथ के तीन भेद सट्टक, विलासिका और प्रकरणिका नये हैं। शारदातनय के पाँच भेद-डोम्बी, भाण, मल्लिका, कल्पवल्ली और पारिजातक नये हैं। इस प्रकार दोनों आचार्यों की सूचियों को मिलाने से उपरूपक के भेद २३ हो जाते हैं।
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४६० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में दस रूपकों के साथ नाटिका और प्रकरणी का विवरण दिया है। इस प्रकार उनके मत से बारह रूपक हैं। अन्य रूपकों का उल्लेख मूल पुस्तक में नहीं है। पुस्तक समाप्त करने के बाद अन्त में लिखा है : अन्यान्यानि च रूपकाणि दृश्यन्ते। फिर उन्होंने निम्नलिखित उपरूपकों का संक्षिप्त विवरण दिया है : १. सट्टक, २. श्रीगदित, ३. दुर्मिलिता, ४. प्रस्थान, ५. गोष्ठी, ६. हल्लीसक, ७. प्रेक्षणक, ८. रासक, ९. नाट्यरासक, १०. काव्य, ११. भाण और १२. भाणिका। अग्निपुराण में १७ उपरूपकों को स्वीकार किया गया है : १. तोटक, २. नाटिका, ३. सटटक, ४. शिल्पक, ५. कर्णा, ६. दुर्मल्लिका, ७. प्रस्थान, ८. भाणिका, ९. भाणी, १०. गोष्ठी, ११. हल्लीशक, १२. काव्य, १३. श्रीगदित, १४. नाट्यरासक, १५. रासक, १६. उल्लाप्यक और १७. प्रेक्षण। 16 अब इनमें से प्रत्येक का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। नाटिका : भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नाटक और प्रकरण दोनों के लक्षण का निर्देश करने के पश्चात् उनके संकर का वर्णन किया है : अनयोश्च बन्धयोगादन्यो भेद: प्रयोक्तृभिः कार्यः। प्रख्यातस्त्वितरो वा नाटी संज्ञाश्रिते काव्ये।।' उनके अनुसार नाटक और प्रकरण का संकीर्ण भेद नाटी कहा जाता है। धनिक ने 'दश- रूपकावलोक' में भरत की यह कारिका उद्धत की है, परन्तु भरत का नाम नहीं देकर 'अत् केचित्' लिख दिया है। नाट्यशास्त्र के गायकवाड़वाले संस्करण में यह कारिका नहीं मिलती; क्योंकि इसे कुछ विद्वान् प्रक्षिप्त अंश मानते हैं। परन्तु, दूसरे संस्करणों में यह कारिका वर्त्तमान है। आगे की दो कारिकाओं में नाटिका का लक्षण लिखा गया है, जो सभी संस्करणों में है।२ इस विषय में धनंजय ने भरत का अनुसरण किया है। वे भी भरत के ही समान किसी उपरूपक का लक्षण नहीं बताते, परन्तु उस संकीर्ण भेद का लक्षण बताते हैं। वे भी भरत के ही समान नाटक और प्रकरण के लक्षण का निर्देश करने के शीघ्र ही बाद इस संकीण भेद-नाटिका का लक्षण बता देते हैं। नाटिका पर कुछ विशेष बल देने के ही अभिप्राय से भरत मुनि ने इसका लक्षण किया है। वैसे तो शुद्ध रूपकों-नाटक और प्रकरण-के लक्षणों के मिश्रण से भी नाटिका का लक्षण सिद्ध हो सकता था, परन्तु नाटिका का अलग से लक्षण देकर इसपर विशेष बल दिया गया है। नाटिका की कथावस्तु कवि-कल्पित या प्रख्यात हो सकती है। परवर्त्ती आचार्यों ने इसे कवि-कल्पित होना आवश्यक माना है; क्योंकि प्रकरण की कथावस्तु कवि-कल्पित होती है और नाटिका की कथावस्तु प्रकरण के ही समान होनी चाहिए। धनंजय ने स्पष्ट १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १८, का० १०९ २. वही, अध्याय १८, का० ११-१११
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रूपक के भेदोपभेद
शब्दों में निर्देश कर दिया है कि नाटिका की कथावस्तु प्रकरण से ली जाती है और नायक नाटक से लिया जाता है : तत्र वस्तुप्रकरणान्नाटका त्थको नृपः।' नाटिका का नायक प्रख्यात अथवा इतिहास-प्रसिद्ध होता है। वह प्रख्यात वंश में उत्पन्न धीर-ललित तथा राजा होता है। स्त्री-पात्रों की अधिकता नाटिका की विशेषता है। इसकी संज्ञा (नाटिका) में स्त्रीलिंग का प्रयोग इस बात का सूचक है कि इसमें स्त्रियों की प्रधानता होनी चाहिए। नाटिका में दो नायिकाएँ होती हैं। ज्येष्ठा देवी या महारानी राजवंश में उत्पन्न और प्रगल्भ प्रकृति की होती है। वह बहुत गम्भीर और मानिनी होती है। कनिष्ठा नायिका भी राजवंश में उत्पन्न होती है, परन्तु किसी दुर्घटनावश या किसी उपाय से वह निम्न श्रेणी की कन्या के रूप में अन्तःपुर में पहुँचा दी जाती है। अन्तःपुर से सम्बन्ध के कारण वह नायिका नायक के श्रुतिपथ या दृष्टि-पथ में आती है। उसे देखकर या उसके विषय में सुनकर नायक उससे प्रेम करने लगता है। यह अनुराग आरम्भ में नवीन होता है, पर पीछे परिपक्व हो जाता है। महादेवी के भय से राजा शंकित रहता है, फलतः वह छिप-छिपकर अनुराग-चेष्टा करता है। नायक और नायिका (प्रेमी और प्रेमिका) को महादेवी की ईर्ष्या से बचने का प्रयत्न करना होता है; क्योंकि नायक का प्रेम महादेवी के भय से शंकायुक्त होता है। अन्त में, महादेवी उनके विवाह की स्वीकृति दे देती है। वस्तुतः, नायक और नायिका का समागम महादेवी के ही अधीन रहता है। राजप्रासाद का वातावरण होने के कारण नाटिका में मनोविनोद के लिए गीत, संगीत तथा नृत्य की योजना करने का पर्याप्त अवसर रहता है। उदाहरण के लिए रत्नावली नाटिका का नायक राजा उदयन है। उसकी ज्येष्ठा नायिका वासवदत्ता राज- कुलोत्पन्न है। वह गम्भीर, प्रगल्भ तथा मानिनी है। उदयन और रत्नावली का समागम उसी के अधीन है। रत्नावली भी राजकुलोत्पन्न है, परन्तु वह उपायवश अन्तःपुर में आ गई है। वह मुग्धा तथा सुन्दरी है। नाटिका में चार अंक होते हैं, परन्तु धनंजय ने कम अंक की भी स्वीकृति दी है। नाटिका में अवमर्श नामक सन्धि बहुत अल्प होती है, अतः इसमें चार अंकों की योजना उचित जान पड़ती है। इसका अंगी रस शृंगार होता है। इसमें कैशिकी वृत्ति होती है और चारों अंकों में कैशिकी वृत्ति के चारों अंग नम, नम स्फिज, नरम स्फोट तथा नरमं- गर्म की योजना की जाती है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में देवी और कन्या (नवीन प्रेमिका) की प्रसिद्धि और अप्रसिद्धि के आधार पर नाटिका के चार भेद किये हैं : अख्याति-ख्याति: कन्यादेव्योर्नाटो चतुविधा।२ १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १८, का० १०९ २. दशरूपक, तृतीय प्रकाश, का० ४३
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४६२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास १. देवी सप्रसिद्धा कन्या प्रसिद्धा, २. देवी अप्रसिद्धा कन्या भी अप्रसिद्धा, ३. देवीं प्रसिद्धा कन्या अप्रसिद्धा, ४. देवी प्रसिद्धा कन्या भी प्रसिद्धा। परन्तु, इस प्रकार विभाग करना अनावश्यक है और यदि इस प्रकार के भेद किये जायँ, तो अनेक अन्य भेद भी हो जायेंगे। प्रकरणिका : जिस नाटिका में नायक सेठ आदि हो और नायिका उसकी सजातीय हो, उसे ही प्रकरणी या प्रकरणिका कहते हैं। वस्तुतः, नाटिका और प्रकरणिका एक ही है, अन्तर केवल यही है कि नाटिका में नायक राजवंश का धीरललित होता है और प्रकरणिका का नायक व्यापारी-वर्ग का व्यक्ति होता है। अन्य सभी बातें समान ही हैं। स्पष्टतः, प्रकरणिका की कल्पना एक संगति बैठाने की मिथ्या इच्छा से उत्पन्न हुई है; क्योंकि यदि वस्तु, नेता और रस-तीनों भेदकों की दृष्टि से देखें तो यह प्रकरण ही है। इसीलिए, धनिक ने इसे स्वीकार नहीं किया है। धनिक ने इस विषय पर विचार किया है। कुछ विद्वान् संकर या संकीर्ण उपरूपकों में नाटिका तथा प्रकरणिका दो भेद मानते हैं। इसके प्रमाण में वे भरत का वह श्लोक उद्धत करते हैं, जो अभी नाटिका के विवेचन के सम्बन्ध में उद्धत किया गया है। वे इस श्लोक का अर्थ इस प्रकार करते हैं-"नाटक और प्रकरण दोनों के योग से काव्य के दो भेद होते हैं; एक भेद प्रख्यात है-नाटिका, तथा दूसरा भेद अप्रसिद्ध है-प्रकरणिका। दोनों नाटी संज्ञा से जाने जाते हैं।" किन्तु, दशरूपक के वृत्तिकार यह मत स्वीकार नहीं करते। वे प्रकरणिका को अलग भेद मानने को तैयार नहीं। उनका कथन है कि भरत के उद्धत श्लोक में प्रकरणिका के नाम और लक्षण नहीं पाये जाते। इसका कारण यह है कि प्रकरण के समान ही प्रकरणिका में लक्षण पाये जाते हैं और इन दोनों में कोई भिन्नता नहीं है। वस्तुतः, प्रकरणिका की वस्तु, नायक और रस प्रकरण से अभिन्न होते हैं। भरत मुनि ने नाटिका का लक्षण उसपर केवल बल देने के लिए दिया है। नाटक, प्रकरण, नाटिका के अतिरिक्त वस्तु आदि के भेद के अभाव से प्रकरणिका कोई अलग भेद नहीं जान पड़ता। वैसे अंकों और पात्रों के भेद से ही यदि अलग भेद माना जाय, तो भेद-गणना असीम हो जायगी। इस प्रकार, रूपकों और उपरूपकों के अनन्त भेद हो जायेंगे। इन्हीं तर्कों के आधार पर धनिक ने प्रकरणिका को उपरूपक का कोई अलग भेद नहीं माना। शारदातनय ने यह भेद स्वीकार नहीं किया। विश्वनाथ ने यह भेद स्वीकार किया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भी अपने नाट्यदर्पण में प्रकरणी नामक भेद स्वीकार किया है। उन्होंने भरत और धनंजय के समान नाटक और प्रकरण के लक्षण लिखने के तुरन्त बाद नाटिका का लक्षण लिखा और उसके बाद प्रकरणी का लक्षण लिखा-'एवं प्रकरणी किन्तु नेता प्रकरणोदितः।" अर्थात् नाटिका के ही समान प्रकरणी होती है, परन्तु इसका नायक प्रकरण के समान होता है। १. नाट्यदर्पण, अध्याय २, का० द क ,कार एत ,कपप्ादक 5.
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रूपक के भेदोपभेद [४६३ किन्तु, यदि ध्यान से देखा जाय, तो प्रकरणिका या प्रकरणी नामक भेद करना सर्वथा अनावश्यक प्रतीत होता है। यदि इस प्रकार भेद किये जायँ, तो रूपक या उपरूपक के असंख्य भेद हो सकते हैं। इस विषय में धनिक का मत अधिक समीचीन जान पड़ता है। सट्टक : सट्टक का भी उल्लेख विश्वनाथ तथा रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने किया है। शारदातनय ने इसे नाटिका का भेद-मात्र माना है, स्वतन्त्र उपरूपक नहीं : सट्टकं नाटिकाभेदो नृत्यभेदात्मकं भवेत्।' यह भी नाटिका के ही समान होता है। नाटिका से मुख्य अन्तर यह है कि यह आदि से अन्त तक पूर्णरूप से प्राकृत में ही लिखा रहता है, इसमें संस्कृत का प्रयोग बिलकुल नहीं होता। भाण के विषय में शारदातनय ने दो मत उद्धूत किये हैं। एक मत से राजा प्राकृत नहीं बोलता है और दूसरे मत से राजा मागधी या शौरसेनी बोलता है। न वदेत् प्राकृतीं भाषां राजेति कतिचिज्जगुः । मागध्या शौरसेन्या वा वदेद्राजेति केचन ॥२ सट्टक में प्रवेशक तथा विष्कम्भक का भी अभाव रहता है और अद्भुत रस की प्रचुरता रहती है। इसके अंकों का नाम जवनिका होता है; अन्य सभी बातों में यह नाटिका के ही समान होता है। सट्टक नाम का एक नृत्य भी होता है और सम्भवतः इसमें उस प्रकार के नृत्य की अधिकता रहती होगी, इसीलिए इसका नाम सटटक पड़ा। राजशेखर की कर्पूर मञ्जरी सट्टक का उदाहरण है। व्रोटक या तोटक : विश्वनाथ ने 'तोटक' लिखा, परन्तु शारदातनय आदि ने 'तोटक' लिखा। यह नाटक से बहुत मिलता-जुलता है या नाटक का ही परिवर्त्तित रूप है; इसलिए शारदातनय ने नाटक आदि रूपकों के बाद सबसे पहले इसी का विवेचन किया। विश्वनाथ ने भी नाटिका के ही बाद इसका विवेचन किया। इसमें सात, आठ, नौ अथवा पाँच अंक होते हैं और यह देवता तथा मनुष्यों के आश्रित रहता है। इसके प्रत्येक अंक में विदूषक वर्त्तमान रहता है और इसका प्रधान रस शृंगार होता है; क्योंकि शृंगार में ही विदूषक की स्थिति रहती है। शारदातनय ने तोटक के तीन लक्षण लिखे हैं, जिनमें से पहला हर्ष का दिया हुआ है और शेष दो अज्ञात आचार्यों के हैं। विदूषक की योजना के विषय में तीनों आचार्यों में मतभेद है। हर्ष ने विदूषक की योजना आवश्यक मानी है और शेष दो आचार्य ऐसा नहीं मानते। भोज ने १४ उपरूपकों की अपनी सूची में तोटक की गणना नहीं की है। शारदातनय ने भिन्न-भिन्न संख्या के अंकोंवाले तोटकों के उदाहरण दिये हैं। तो अंकोंवाले तोटक का उदाहरण 'मेनका-नहुष', आठ अंकों का तोटक 'मदलेखा', सात अंकोंवाला 'स्तम्भित रम्भक' है। अन्तिम दो तोटकों में विदूषक की योजना नहीं है, पाँच अंकोंवाले तोटक का उदाहरण विक्रमोर्वशीय है। विश्वनाथ ने तोटक का उदाहरण १. भावप्रकाशन, नवम अधिकार, पृ० २६९ PSIF २. वही
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४६४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास विक्रमोर्वशीय दिया है। किन्तु, डॉ० कीथ ने लिखा है कि विक्रमोर्वशीय के केवल बँगला- संस्करण को यह नाम दिया गया है, जिसमें अपभ्रंश पद्य तथा उन्मत्त राजा के दृश्य दिये गये हैं। डॉ० कीथ ने लिखा है कि अन्य संस्करणों में इसे नाटक संज्ञा दी गई है। शारदातनय के दिये चार उदाहरणों में आजकल केवल विक्रमोर्वशीय उपलब्ध है। गोष्ठी : गोष्ठी का लक्षण विश्वनाथ और शारदातनय ने एक ही साथ दिया है। गोष्ठी में नौ या दस प्राकृत पुरुष-पात्र और रूप-सौन्दर्ययुक्त पाँच या छह स्त्री-पात् रहते हैं। इसमें उदात्त वचनों का प्रयोग नहीं होता और कैशिकी वृत्ति की प्रधानता रहती है। इसमें गर्भ और विमर्श सन्धियाँ नहीं होती, केवल मुख, प्रतिमुख और निर्वहण सन्धियों की योजना रहती है। गोष्ठी में एक ही अंक रहता है और काम शृंगार रहता है। इसका कथानक कवि-कल्पित होता है। शारदातनय ने गोष्ठी के लक्षण के प्रसंग में भोज के भी मत की ओर संकेत किया है : गोष्ठे यत्तु विहरतश्चेष्टितमिह कंटभद्विषः किञ्चित्। रिष्टासुरप्रमथनप्रभृति तदिच्छन्ति गोष्ठीति ॥' यही श्लोक रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में दिया है।२ शारदातनय की एक पंक्ति से तुलना की जा सकती है : गोपीपतेविहरतो गोपबालस्य चेष्टितम्।3 विश्वनाथ ने गोष्ठी का उदाहरण 'रेवतक-मदनिका' दिया है। रासक : रासक और नाट्यरासक के विषय में प्राचीन आचार्यों में पर्याप्त मतभेद है। दोनों वास्तव में भिन्न-भिन्न रीतियों के नृत्य हैं और उपरूपक पर लिखनेवाले चार आचार्यों-भोज, शारदातनय, विश्वनाथ और रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इनपर अलग-अलग लिखा है। इन दोनों प्रकार के नृत्यों के विषय में जितने भी श्लोक शृंगारप्रकाश में हैं, शारदातनय ने सभी को ग्रहण कर लिया है। इनके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र की टीका में अभिनवगुप्त ने जो श्लोक उद्धत किये हैं, उन्हें भी शारदातनय ने ग्रहण कर लिया है। अभिनवगुप्त द्वारा उद्धत लक्षण भोजादिक परवर्त्ती आचार्यों के द्वारा दिये गये लक्षणों से भिन्न हैं। भोज और शारदातनय के अनुसार रासक एक विशेष प्रकार का नृत्य है, जो १६, १२ या ८ स्त्रियों के दल द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह नृत्य चार रूपों-पिण्डी, शृंखला, मेधक और लता-में किया जाता है। रासक के अन्त में शुभ वचन कहा जाता है। अभिनवगुप्त ने किसी अज्ञात विद्वान् का श्लोक उद्धृत किया है, जिसमें कहा गया है कि १. शृं गारप्रकाश, पृ० १४५ २. नाट्यदर्पण, अन्तिम पृष्ठ ३. भावप्रकाशन, नवम अधिकार, पृ० २५६
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गोपियों के साथ कृष्ण का जैसा नृत्य भागवत में वणित है, वैसा ही नृत्य रासक होता है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने जो लक्षण दिया, वह भी भोज और शारदातनय के ही समान है : षोडश द्वादशाष्टौ वा यस्मिन् नृत्यन्ति नायिकाः। पिण्डीबन्धादिविन्यासैः रासकं तदुदाहृतम् ।' परन्तु, विश्वनाथ ने रासक को नृत्य नहीं मानकर अभिनयात्मक उपरूपक का एक भेद माना है। उनके मतानुसार रासक में पाँच पात्र होते हैं। इसमें मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं; कोई-कोई प्रतिमुख सन्धि भी मानते हैं। यह भाषा तथा विभाषा से व्याप्त और भारती तथा कैशिकी वृत्तियों से युक्त होता है। यहाँ नान्दी में श्लिष्टता होती है। इसमें सूत्रधार नहीं रहता और केवल एक अंक होता है। यह वीथ्यंग और कलाओं से युक्त होता है। रासक की नायिका प्रसिद्ध और नायक मूर्ख होता है। यह उत्तरोत्तर उदात्त भावों से पूर्ण होता है। शारदातनय ने भी भावप्रकाशन में इस मत का संकेत किया, जिसे विश्वनाथ ने अपनाया और इसका संकेत दूसरे का मत कहकर लिया है : एवं लक्षणमुद्दिष्टं रासकस्यात्न कैश्चन।" नाट्यरासक : भोज तथा शारदातनय के मतानुसार नाट्यरासक एक विशेष प्रकार का नृत्य है, जिसमें राजा के भी कार्य स्त्रियाँ ही विभिन्न मुद्राओं एवं भावभंगियों में प्रस्तुत करती हैं, साथ ही नृत्य भी करती हैं। भावप्रकाशन में नाट्यरासक के कई भेद व्णित हैं और 'रत्नावली' नाटिका में प्रयुक्त चर्चरी का भी समावेश इस कोटि में किया गया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने शारदातनय के समान विस्तार नहीं किया। एक ही श्लोक में उन्होंने नाट्यरासक का लक्षण कहा, परन्तु वह श्लोक अक्षरशः भावप्रकाशन में विद्यमान है। वह श्लोक निम्नलिखित है : कामिनीभिर्भुवो भर्त्तुः चेष्टितं यत्र नृत्यते। रागाद् वसन्तमासाद्य स ज्ञेयो नाट्यरासक: ॥3 परन्तु, विश्वनाथ ने नाट्यरासक को केवल नृत्य ही नहीं माना। उन्होंने इसमें नृत्य को गौण स्थान दिया है और मुख्य रूप से इसे अभिनयात्मक उपरूपक ही माना। विश्वनाथ के मतानुसार नाट्यरासक में एक ही अंक होता है और रूप तथा ताल की अधिकता होती है। इसका नायक उदात्त होता है और पीठमर्द उपनायक होता है। शृंगार- सहित हास्य-रस प्रधान रस होता है। इसमें नायिका वासकसज्जा होती है। नाट्यरासक में मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं, परन्तु कुछ विद्वानों के मतानुसार प्रतिमुख के अतिरिक्त शेष चारों सन्धियों की योजना इसमें होती है। इसमें दस लास्यांग भी रखे
१. नाट्यदर्पण, अन्तिम पृष्ठ २. भावप्रकाशन, नवम अधिकार, पृ० २६९ ३. वही, नवम अधिकार, पृ० २६४; नाट्यदर्पण, अन्तिम पृष्ठ
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जाते हैं। विश्वनाथ ने दो सन्धियोंवाले नाट्यरासक का उदाहरण 'नर्मवती' और चार सन्धियोंवाले का उदाहरण 'विलासवती' को प्रस्तुत किया है। परन्तु, ये ग्रन्थ आजकल उपलब्ध नहीं हैं। रासक के विषय में शारदातनय और विश्वनाथ का मत एक ही है, परन्तु नाट्यरासक के विषय में ऐसा नहीं है। प्रस्थान अथवा प्रस्थानक : अन्य कई उपरूपकों के समान प्रस्थान या प्रस्थानक के विषय में भी मतभेद है। शृंगारप्रकाश में भोज और नाट्यदर्पण में रामचन्द्र-गुणचन्द्र के दिये लक्षण मिलते-जुलते हैं। उनके मतानुसार प्रस्थानक में प्रचुर मात्रा में संगीत तथा नृत्त रहते हैं। इसमें प्रथमानुराग, मान, प्रवास-वर्णन तथा वसन्त-वर्णन आदि की विशेषता रहती है। परन्तु, साहित्यदर्पणकार ने प्रस्थान का सवथा भिन्न ही लक्षण दिया है। उनके मतानुसार इसमें नायक दास होता है और उपनायक उससे हीन होता है। दासी नायिका होती है। इसमें कैशिकी तथा भारती वृत्तियों की योजना की जाती है। मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं। मदिरा-पान के संयोग से उद्दिष्ट अर्थ की पूर्त्ति होती है। प्रस्थान में दो अंक होते हैं और लय, ताल, विलास आदि की अधिकता रहती है। इसका उदाहरण शृंगार- तिलक दिया गया है। शारदातनय ने भी यही उदाहरण दिया है। शारदातनय के भावप्रकाशन में इन दोनों लक्षणों का समावेश हुआ है। ध्यातव्य है कि जहाँ भोज तथा रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अनेक रूपकों में नृत्य और संगीत पर बल दिया है, वहाँ विश्वनाथ ने अभिनयात्मक उपरूपकों पर बल दिया है। यह बात रासक, नाट्यरासक तथा प्रस्थान में देखी जा सकती है। उल्लाप्य अथवा उल्लोप्यक : साहित्यदर्पण में इसका नाम उल्लाप्य दिया गया है, परन्तु भावप्रकाशन में उल्लोप्यक लिखा गया है। दोनों ग्रन्थों में लक्षण मिलते-जुलते हैं। सम्भवतः, विश्वनाथ और शारदातनय, दोनों ने किसी एक ही स्रोत से अपनी सामग्री ग्रहण की है। भोज ने शृंगारप्रकाश में उपरूपकों के अन्तर्गत इसे नहीं रखा है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भी इसका कोई उल्लेख नहीं किया है। शारदातनय ने इसमें विचित्र नाम का कारण बताया है कि इसमें एक विशेष प्रकार के गीत का प्रयोग होता है, जिसे उल्लोप्यक कहते हैं। उल्लाप्य अथवा उल्लोप्यक में नायक धीरोदात्त होता है और कथा दिव्य। इसमें एक ही अंक होता है और शिल्पक (एक उपरूपक, जिसका वर्णन आगे किया जायगा) के समान २७ अंग होते हैं। उल्लाप्य में हास्य, शृंगार और करुण रस होते हैं। इसमें संग्राम बहुत होता है, अस्त्रगीत भी होता है। अस्त्रगीत का लक्षण है : उत्तरोत्तररूपं यत्प्रस्तुतार्थपरिष्कृतम्। अन्तर्जवनिकं गीतमस्त्रगीतं तदुच्यते।। उल्लाप्य में चार नायिकाएँ होती हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इसमें तीन अंक होते हैं। विश्वनाथ ने उल्लाप्य का उदाहरण देवी महादेव दिया है। शारदातनय ने देवी महादेव के अतिरिक्त उदात्त कुंजर भी उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।
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काव्य : साहित्यदर्पण और भावप्रकाशन में दिये गये काव्य के वर्णनों में थोड़ा अन्तर है। भोज ने काव्य के दो भेद दिये-शुद्ध और चित्र। उन्हें भी शारदातनय ने रासक के शीर्षक में अन्त्हित कर लिया है। शारदातनय के भी विचार से काव्य के दो भेद होते हैं, एक का प्रतिनिधित्व 'गौड़विजय' करता है और दूसरे का 'सुग्रीवकेलन'। भोज और शारदातनय के मतों को मिला देने से काव्य के चार भेद हो जाते हैं। विश्वनाथ के मतानुसार काव्य आरभटी वृत्ति से रहित एक अंकवाला उपरूपक है। यह हास्य-रस से व्याप्त, खण्ड-मात्रा, द्विपदिक और भग्नताल नामक गीतों से पूर्ण, और वर्ण- मात्रा तथा छगणिकाख्य छन्दों से युक्त होता है। यह शृंगारभाषित से मनोहर होता है। इसमें नायक और नायिका दोनों ही उदात्त होते हैं। मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहण सन्धियों की योजना इसमें की जाती है। विश्वनाथ ने उदाहरण-स्वरूप 'यादवोदय' प्रस्तुत किया है। शारदातनय के दिये लक्षण में थोड़ा ही अन्तर है। उनके मतानुसार काव्य में हास्य के साथ शृंगार रस भी विद्यमान रहता है और इसमें चारों वृत्तियाँ रहती हैं, साहित्य- दर्पण में दिये लक्षण के समान आरभटी वृत्ति से रहित नहीं। भग्ननाल, द्विपदी और खण्ड- मात्रा नामक गीतों से युक्त तो होना ही है, साहित्यदर्पण में दिये लक्षण के समान ही मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहण सन्धियों से युक्त और एक अंक होना चाहिए। कहीं-कहीं लास्ययुक्त और विट-चेटी-समन्वित होता है। काव्य कुलांगनाओं और वेश्याओं से युक्त होता है और इसका नायक धीरललित तथा धीरोदात्त होता है। इस प्रकार के काव्य का उदाहरण 'गौड- विजय' है। दूसरे प्रकार के काव्य में नायक विप्र, अमात्य अथवा वणिक होता है; नायक तथा नायिका उज्जवल होते हैं और इसमें विट, चेटी आदि भी ग्रथित रहते हैं। इस प्रकार के काव्य का उदाहरण शारदातनय ने 'सुग्रीवकेलन' दिया है। नाट्यदर्पण में रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने काव्य का जो लक्षण दिया है, वह अति संक्षिप्त और अपूर्ण है : आक्षिप्तिकाऽथवर्णो मात्राध वकोऽप्यमग्नतालश्च। पद्धतिका छर्दनिका यत्र स्युस्तदिह काव्यमिति॥' प्रेंखण अथवा प्रेक्षणक : विश्वनाथ ने इस उपरूपक का नाम प्रेखण तथा शारदातनय ने प्रेक्षणक दिया है। भोज ने इसके दो भाग कर दिये हैं : नर्त्तनक तथा प्रेक्षणक। शारदातनय ने इस उपरूपक का विवेचन करते समय शृंगारप्रकाश में दिया हुआ लक्षण दुहराया है और नर्त्तनक तथा प्रेक्षणक का विवेचन एक ही शीर्षक के अन्तर्गत कर दिया है। शारदातनय ने दो विभिन्न मतों के दो प्राचीन आचार्यों के भी आधार पर प्रेक्षणक का विवेचन किया है और इनका वर्णन भोज के वर्णन से भी उत्तम है। साहित्यदर्पण में
१. नाट्यदर्पण, अन्तिम पृष्ठ
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विश्वनाथ ने जो वर्णन दिया है, वह शारदातनय के दिये इस दूसरे वर्णन से मिलता- जुलता है। शारदातनय का दिया पहला लक्षण वही है, जो शृंगारप्रकाश में है। अन्य आचार्यों के मतानुसार, जो लक्षण उन्होंने दिया है, वह निम्नलिखित है। प्रेक्षणक में गर्भ अथवा अवमर्श नामक सन्धियाँ नहीं होती, सभी वृत्तियाँ होती हैं। इसमें प्रचुर मात्रा में मागधी और शौरसेनी प्राकृतों का प्रयोग होता है। प्रेक्षणक में उत्तम तथा अधम नायक होते हैं। भारती और आरभटी वृत्तियाँ होती हैं और कहीं-कहीं सात्त्वती भी होती है। बालिवध और नृसिंहविजय उदाहरण-स्वरूप शारदातनय ने रखे हैं। फिर उन्होंने प्रेक्षणक का दूसरा उदाहरण दिया है। नान्दी का पाठ नेपथ्य में ही होता है। कहीं गर्भ और अवमर्श नामक सन्धियाँ होती हैं और कहीं चारों वृत्तियां रहती हैं। सूत्रधार कभी नहीं रहता। इसका उदाहरण 'त्रिपुरमर्दन' है। विश्वनाथ के मतानुसार प्रेखण में नायक हीन होता है और गर्भ तथा विमर्श सन्धियाँ नहीं रहती। इसमें सूत्रधार, विष्कम्भक तथा प्रवेशक नहीं होते और एक ही अंक होता है। इसमें सभी वृत्तियाँ होती हैं और युद्ध तथा सम्फेट की योजना की जाती है। नान्दी तथा प्ररोचना का पाठ नेपथ्य में ही होता है। विश्वनाथ ने उदाहरण-स्वरूप 'बालिवध' को प्रस्तुत किया है। वस्तुतः, भोज और विश्वनाथ के दिये हुए लक्षण एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न हैं। शारदातनय ने कई आचार्यों के दिये लक्षण उद्धृत किये हैं, जिससे स्पष्टता आ गई है। विश्वनाथ का दिया लक्षण स्पष्ट और सटीक है। शारदातनय ने तीन उदाहरण दिये : बालिवध, नृसिंहविजय और त्रिपुरमर्दन। विश्वनाथ ने केवल बालिवध का उदाहरण दिया। भोज ने कामदहन का उदाहरण दिया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने प्रेक्षणक के लक्षण के लिए भोज के शृंगारप्रकाश के उन दोनों श्लोकों को उद्धत किया है। उन्होंने भोज के अनुसार नर्त्तनक तथा प्रेक्षणक दो भेद किये हैं। यह भोज का उद्धरण-मात्र है, अतः इसमें कोई नवीनता या विशेषता नहीं। उन्होंने पहले श्लोक में प्रयुक्त कुछ शब्दों के अर्थ स्पष्ट किये, यथा किन्नरविषयं लास्यं नृत्तं शम्या। शृङ्गार- रसप्रधानं लास्यम्। शृङ्गारवीररौद्रादिप्रधानं छलितम्। संलापक अथवा सल्लापक : विश्वनाथ ने इस उपरूपक का नाम संलापक दिया है, किन्तु शारदातनय ने सल्लापक लिखा। दोनों के दिये लक्षण लगभग एक ही हैं। विश्वनाथ के मतानुसार संलापक में तीन या चार अंक होते हैं और नायक पाखण्डी होता है। शृंगार और करुण के अतिरिक्त अन्य रस रहते हैं। इसमें नगर-निरोध, छलयुक्त संग्राम और विद्रब की योजना रहती है, भारती और कैशिकी वृत्तियाँ नहीं होती, केवल सात्त्वती और आरभटी वृत्तियाँ रहती हैं। उन्होंने मायाकापालिक का उदाहरण दिया है। शारदातनय के मतानुसार सल्लापक का कथानक इतिहास-प्रसिद्ध भी हो सकता है, अथवा कवि-कल्पित भी या दोनों का मिश्रण भी। इसमें शृंगार और हास्यरस वर्जित हैं।
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वीर और रौद्र रस के साथ अन्य रस भी रह सकते हैं। नायक प्रायः पाखण्डी होता है। इसमें स्थान का अवरोध, कपट, युद्ध, विद्रव आदि की योजना होती है। सात्त्वती तथा आरभटी वृत्तियाँ रहती हैं। सल्लापक में तीन अंक होते हैं। प्रथम अंक में विद्रव, द्वितीय अंक में ताल की प्रचुरता तथा तृतीय अंक में कपट रहता है। प्रतिमुख को छोड़कर शेष चार सन्धियां रहती हैं।
संलापक के विषय का विवेचन विश्वनाथ से अधिक पूर्ण शारदातनय का ही है। विश्वनाथवाले लक्षण में सभी बातें नहीं आ सकी हैं, यद्यपि दोनों के दिये लक्षण मिलते- जुलते हैं। श्रीगदित : विश्वनाथ ने दो प्रकार के श्रीगदित का वर्णन किया है। प्रथम प्रकार का श्रीगदित अन्यत् कहीं नहीं मिलता, परन्तु द्वितीय प्रकार भोज के शृंगारप्रकाश में है। शृंगारप्रकाश के ही श्लोक रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में उद्धत कर दिये हैं। भाव- प्रकाशन में दोनों वर्णनों का मिश्रण है।
श्रीगदित नामक उपरूपक में कथानक प्रख्यात होता है और एक ही अंक होता है। इसका नायक प्रसिद्ध तथा धीरोदात्त होता है, नायिका भी प्रख्यात होती है। इसमें गर्भ तथा विमर्श सन्धियाँ नहीं होती, शेष तीन सन्धियाँ होती हैं। श्री शब्द और भारती वृत्ति की इसमें अधिकता होती है। विश्वनाथ के द्वारा दिया हुआ श्रीगदित का यह प्रथम भेद है। शारदातनय ने भी यह लक्षण दिया। विश्वनाथ ने इसका उदाहरण 'कीडा- रसातल' दिया है। विश्वनाथ ने श्रीगदित का दूसरा भी भेद बताया है। किन्तु, 'केचित् प्रचक्षते' लिखकर उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि यह मत किसी अन्य आचार्य का है, उनका नहीं। इस मत के अनुसार श्रीगदित में लक्ष्मी का रूप धारण करके नटी बैठकर कुछ गाती और पढ़ती है। इसमें भारती वृत्ति की प्रधानता रहती है, और एक अंक होता है। इसी से मिलता-जुलता लक्षण भोज और शारदातनय ने भी दिया है। श्रीगदित में कोई कुलांगना अपनी सखियों के आगे अपने पति के शौर्य, धैर्य आदि गुणों का बखान करती है या उपालम्भ देती है। वह विरहिणी अपने पति से समागम की आशा में बैठकर उत्कण्ठित होकर ललित पद पढ़ती या गाती है। शारदातनय ने श्रीगदित का उदाहरण 'रामानन्द' दिया है। विश्वनाथ ने दूसरे भेद का कोई उदाहरण नहीं दिया। डॉ० कीथ ने लिखा है कि इस नाम का एक ही उपरूपक ज्ञात है, वह है, सन् १६०० ई० के पहले का माधव का लिखा 'सुभद्राहरण', जो सामान्य रूपक के समान है, परन्तु इसमें एक आख्यानात्मक पद्य है, जिसका सम्बन्ध छाया-नाटक से जान पड़ता है। शिल्पक : शिल्पक का लक्षण विश्वनाथ और शारदातनय ने लगभग एक ही दिया है, परन्तु दोनों ने २७ अंगों के नाम गिनाये हैं। उनमें थोड़ा अन्तर है। यद्यपि विश्वनाथ
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४७० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास शारदातनय के परवर्ती हैं, फिर भी यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने शारदातनय का अनुसरण किया। इसका मुख्य प्रमाण यह है कि शारदातनय के द्वारा उल्लिखित दो अतिरिक्त उपरूपकों-कल्पवल्ली और पारिजातक-को उन्होंने अपने ग्रन्थ में स्थान नहीं दिया, परन्तु विलासिका नाम के सर्वथा भिन्न उपरूपक का उल्लेख किया। डोम्बी नामक उपरूपक को धनिक और अभिनवगुप्त भी जानते थे, शारदातनय ने भी उसका वर्णन किया, परन्तु विश्वनाथ ने उसका उल्लेख नहीं किया। किन्तु, यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि उन दोनों ने किसी आचार्य के एक ऐसे ग्रन्थ का अनुसरण किया, जो उन दोनों के पहले वर्त्तमान था, परन्तु अब वह ग्रन्थ अप्राप्य है। शिल्पक में चार अंक होते हैं और चारों वृत्तियाँ होती हैं। इसमें शान्त और हास्य के अतिरिक्त अन्य रस होते हैं। शिल्पक में ब्राह्मण नायक होता है, हीन पुरुष उपनायक होता है और श्मशानादि का वर्णन रहता है। इसमें २७ अंक होते हैं; यथा विश्वनाथ के अनुसार - १. आशंसा, २. तर्क, ३. सन्देह, ४. ताप, ५. उद्वग, ६. प्रसक्ति (आसक्ति), ७. प्रयत्न, ८. ग्रथन, ९. उत्कण्ठा, १०. अवहित्था, ११. प्रतिपत्ति, १२. विलास, १३. आलस्य, १४. वाष्प, १५. प्रदर्ष, १६. आश्वास, १७. मूढता, १८. साधनानुगम, १९. उच्छवास, २०. विस्मय, २१. प्राप्ति, २२. लाभ, २३. विस्मृति, २४. सम्फेट, २५. वैशारद्य, २६. प्रबोधन और २७. चमत्कृति। शारदातनय के अनुसार-१. उत्कण्ठा, २. अवहित्था, ३. प्रयत्न, ४. आशंसन, ५. तर्क, ६. संशय, ७. ताप, ८. उद्वग, ९. मौख्य, १०. आलस्य, ११. कम्प, १२. अनुगति, १३. विस्मय, १४. साधन, १५. उच्छुवास, १६. आतंक, १७. शून्यता, १८. प्रलोभन, १९. नाट्य, २०. सम्फेट, २१. आश्वास, २२. सन्तोषातिशय, २३. प्रमद, २४. प्रमाद, २५. युक्ति, २६. प्रलोचना, २७. प्रशस्ति। इस प्रकार दोनों सूचियों में थोड़ा अन्तर है। शिल्पक के उदाहरण के लिए कनकवती-माधव का उल्लेख किया गया है। विलासिका : विलासिका नामक उपरूपक का विवेचन केवल विश्वनाथ ने किया है, अन्य किसी ने नहीं। इसमें शृंगार रस की बहुलता रहती है और एक ही अंक होता है। यह उपरूपक दस लास्यांगों से युक्त होता है और इसमें विशेषता यह है कि इसमें नायक की सहायता के लिए विदूषक के अतिरिक्त विट और पीठमर्द भी होते हैं। इसमें गर्भ और विमर्श सन्धियों को छोड़कर शेष तीन सन्धियाँ होती हैं। विलासिका का नायक हीन गुणों से युक्त होता है और इसकी कथा थोड़ी होती है। इसमें सुन्दर वेशादि की योजना की जाती है। विश्वनाथ ने वृत्ति में लिखा है कि कुछ लोग विलासिका के स्थान पर विनायिका कहते हैं, परन्तु अन्य विद्वानों का मत है कि विनायिका का अन्तर्भाव दुर्मल्लिका में हो जाता है, विश्वनाथ ने इसका कोई उदाहरण नहीं दिया है। दुर्मल्लिका : दुर्मल्लिका का विवेचन करते समय शारदातनय ने प्राचीन आचार्यों के तीन विभिन्न मत उद्धत किये हैं। पहले मत के अनुसार दुर्मल्लिका में प्रौढ़ और नागर
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नायिका होती है, चार अंक होते हैं, और गर्भ सन्धि को छोड़कर शेष चार सन्धियां होती हैं। प्रथम अंक तीन नाली का और विट की क्रीड़ाओं से युक्त होता है। द्वितीय अंक पाँच नाली का और विदूषक की क्रीड़ा से युक्त होता है। तृतीय अंक सात नाली का (विश्वनाथ के मत से छह नाली का) और पीठमर्द के विलास से पूर्ण होता है। चतुर्थ अंक दस नाली का होता है और इसमें नागरिक पुरुषों की क्रीड़ा होती है। विश्वनाथ का भी यही मत है। उन्होंने केवल थोड़ा बढ़ा दिया है कि दुर्मल्लिका में कैशिकी और सात्त्वती वृत्तियाँ होती हैं, सभी नट-पात्र चतुर होते हैं, परन्तु नायक छोटी जाति का पुरुष होता है। दूसरे मत के अनुसार दुर्मल्लिका में एक दूतिका रहती है, जो नायक-नायिका की चौर्यरति का वर्णन रंगमंच पर ग्राम्य ढंग से करती है और दर्शकों से धन माँगती है, फिर धन पाकर भी बार-बार माँगती है। यह मत भोज के शृंगारप्रकाश में प्रकट किया गया है। वस्तुतः, शारदातनय ने भोज के ही दो श्लोक उद्धृत किये हैं। वे श्लोक निम्नलिखित हैं : चौर्यरतप्रतिभेदं यूनोरनुरागवर्णनं द्वापि। यत्र ग्राम्यकथाभिः कुरुते किल दूतिका रहसि ॥ मन्त्रयति च तद्विषयं न्यग्जातित्वेन याचते च वसु। लब्धवाऽपि लब्धुमिच्छति दुर्मिलिता नाम सा भवति ॥ शारदातनय ने अन्तिम चरण 'दुरमिलिता नाम सा भवति' के स्थान पर 'दुर्मल्लिका नाम्ना' कर दिया है। तीसरे मत के शारदातनय ने कुछ विचारकों का मत दिया है, जिन लोगों ने माना है कि इस उपरूपक को 'मत्तल्लिका' भी कहते हैं। इस सम्बन्ध में शारदातनय ने किसी प्राचीनतर ग्रन्थ से दो श्लोक उद्धृत करके दो वर्णन दिये हैं। जिस मत्तल्लिका का वहाँ वर्णन है, उसकी गणना भोज के शृंगारप्रकाश में २४ श्रव्य काव्यों के अन्तर्गत की गई है। वे दोनों श्लोक वहाँ थोड़े परिवर्त्तन के साथ उद्धृत हैं और उनका नाम मन्धुल्ली या मन्धुल्लिका है। यह स्पष्ट नहीं है कि इस प्रकार के श्रव्य काव्य को कुछ लेखकों ने उपरूपकों के अन्तर्गत क्यों रखा है। हल्लीश अथवा हल्लीसक : विश्वनाथ ने इस रूपक का नाम हल्लीश दिया है; भोज, शारदातनय आदि ने हल्लीसक लिखा है। इस उपरूपक के लक्षण के विषय में प्राचीनतर आचार्यों में मतभेद जान पड़ता है। पूर्ववर्त्ती आचार्य भोज तथा अभिनवगुप्त के दिये लक्षणों से परवर्ती आचार्य विश्वनाथ तथा शारदातनय के दिये लक्षण मेल नहीं खाते। भोज ने शृंगारप्रकाश में हल्लीसक का लक्षण दिया है : यन्मण्डलेन वृत्तं स्त्रीणां हल्लीसकं तु तत्प्राहुः। तत्रको नेता स्याद्गोपस्त्रीणामिव मुरारि: ॥२ १. शृंगारप्रकाश, पृ० १४५; नाट्यदर्पण, अन्तिम पृष्ठ २. वही
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और अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती में हल्लीसक के विषय में लिखा है : यन्मण्डलेन तु यन्नृत्तं हल्लीसकमिति स्मृतम्। एकस्तत्न तु नेता स्यात् गोपस्त्रीणां यथा हरिः ॥ रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भोजवाला ही लक्षण नाट्यदर्पण में उद्धत कर दिया है। इन आचार्यों के अनुसार हल्लीसक केवल एक प्रकार का नृत्य है, जिसमें अनेक स्त्रियाँ मण्डल बनाकर नाचती हैं और जिसमें एक नेता होता है; जैसे गोपियों के नृत्य में कृष्ण थे। किन्तु, विश्वनाथ ने सर्वथा भिन्न लक्षण दिया है। उनके मतानुसार हल्लीश में एक ही अंक होता है और सात, आठ या दस स्त्रियाँ रहती हैं। उदात्त वचन बोलनेवाला एक पुरुष होता है। इसमें कैशिकी वृत्ति और मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं। गाने में लय और ताल बहुत होते हैं। शारदातनय का दिया हुआ लक्षण विश्वनाथवाले ही लक्षण से मिलता है, परन्तु इन्होंने एक अंक के साथ दो अंकवाले भी हल्लीसक की स्वीकृति दी है। दो अंकवाले हल्लीसक में मुख और अवमर्श सन्धियाँ होती हैं। शारदातनय ने नायक के विषय में भी अधिक विस्तार किया है। विश्वनाथ और शारदातनय दोनों ने केलिरवतक का उदाहरण दिया है। भाण : भाण नामक उपरूपक का विवरण शारदातनय, भोज और रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने दिया, परन्तु विश्वनाथ ने इसका उल्लेख नहीं किया है। शारदातनय ने भाण का विवरण देते समय दो वर्णन दिये हैं, जो एक ही-से हैं। दूसरा वर्णन किसी भिन्न विचारधारा का है; जसा कि लेखक ने पुस्तक के अन्त में संकेत किया है : तेषां मतरभिन्नोऽपि भिन्नवत् प्रतिभाति सः।२ भावप्रकाशन में दिया हुआ पहला लक्षण वही है, जो शृंगारप्रकाश और नाट्यशास्त्र में दिया गया है, शब्द भी लगभग वे ही हैं। यथा : हरि-हर-भानु-भवानी-स्कन्द-प्रमथाधिप-स्तुति-निबद्धः । उद्धतकरणप्रायः स्त्रीवर्ज्यो वर्णनायुक्तः।3 आगे भी कई श्लोक अक्षरशः एक ही हैं। परन्तु, भावप्रकाशन में दिये गये दूसरे लक्षण का स्रोत अज्ञात है। गीत में प्रयुक्त भाषा के अन्तर के आधार पर भाण के तीन भेद किये गये हैं-शुद्ध, संकीर्ण तथा चित्र। यदि गीत की भाषा शुद्ध है तो वह शुद्ध भाण है, यदि भाषा संकर है तो भाण संकर है और यदि भाषा सभी भाषाओं से चित्रित है तो भाण भी चित्र कहा जाता है। १. अभिनवभारती, पृ० १८३ २. भावप्रकाशन, दशम अधिकार, पृ० ३१३ ३. वही, नवम अधिकार, पृ० २५२; नाट्यदर्पण, अन्तिम पृष्ठ, शृंगारप्काश
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रूपक के भेदोपभेद [४७३
गीत के उपरान्त आये हुए कथानक या कार्य के आधार पर भाण के तीन भेद होते हैं- उद्धत, ललित तथा ललितोद्धत। भाण का कार्य या अर्थ यदि उद्धत है, तो भाण उद्धत कहलाता है; यदि ललित है, तो वह ललित भाण कहा जाता है और यदि उद्धत तथा ललित दोनों हो, तो ललितोद्धत भाण कहा जाता है। फिर भोज और शारदातनय ने नन्दिमाली नाम के भाण के अन्य भेद को स्वीकार किया है और इस विषय में उन्होंने कहा है कि जो लोग इसे भिन्न उपरूपक मानते हैं, उन्हें भरत द्वारा निर्दिष्ट नियमों का सम्यक ज्ञान नहीं है। इन दोनों आचार्यों ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि भरत ने नन्दिमाली को स्वीकार किया है, परन्तु यह विचित्र बात है कि वर्त्तमान नाट्यशास्त्र इस विषय में सर्वथा मौन है। नन्दिमाली का वर्णन प्रधान रूपक के दस भेदों में से एक विशिष्ट भेद भाण के ही सदृश है। नन्दिमाली में आकाश-पुरुष को उद्देश्य करके कोई वस्तु कही या पढ़ी जाती है। इसमें प्रायः उद्धत क्रियाएँ की जाती हैं और कहीं-कहीं स्त्रियों का वर्णन वर्जित रहता है। भाणिका : भाणिका नामक उपरूपक का विवेचन इस विषय पर लिखनेवाले प्रायः सभी आचार्यों ने किया है। विश्वनाथ ने भाणिका का जो लक्षण दिया है, उसमें और शारदातनय के दिये हुए लक्षण में बहुत अन्तर है। शारदातनय ने इस विषय में दो विचार- धाराओं के मतों का निर्देश दिया है। प्रथम मत के अनुसार भाण का ही एक दूसरा रूप भाणिका है, यद्यपि इसका प्रधान अंश गीत तथा नृत्त से ही पूर्ण रहता है। भाणिका के प्रथम लक्षण से सम्बन्ध रखनेवाले जितने श्लोक भावप्रकाशन में है, वे सभी शृंगारप्रकाश में भी पाये जाते हैं। नाट्य-दर्पण में केवल पहला श्लोक उद्धृत किया गया है। भावप्रकाशन में दिया गया दूसरा मत भाणिका को एक अभिनयात्मक उपरूपक मानता है, जिसमें शृंगार-प्रधान रस होता है। इसमें मुख, प्रतिमुख, निर्वहण-तीन सन्धियाँ होती हैं और कथानक छोटा होता है। विट, पीठमर्द और विदूषक इसके पात होते हैं। इसमें दस लास्यांग होते हैं और पांचाली रीति होती है। इसकी नायिका सुन्दर वेशभूषा की होती है। उदाहरण के लिए शारदातनय ने वीणावती को प्रस्तुत किया है, परन्तु इसके विषय में कोई विशेष जानकारी प्राप्त नहीं है। विश्वनाथ के मतानुसार भाणिका में वेशादि की रचना सुन्दर होती है और मुख तथा निर्वहण सन्धियों की योजना की जाती है। इसमें एक ही अंक होता है और कैशिकी तथा भारती वृत्तियाँ पाई जाती हैं। इसका नायक मन्द होता है, परन्तु नायिका उदात्त होती है। इसमें सात अंग होते हैं, जिनके नाम हैं : उपन्यास, विन्यास, विबोध, साध्वस, समर्पण, निवृत्ति और संहार। किसी प्रसंग से कार्य का कथन उपन्यास कहा जाता है, निर्वेदपूर्ण वाक्यों का विस्तार करना विन्यास है, भ्रान्ति दूर करना विबोध होता है, मिथ्या कथन करना साध्वस कहा जाता है, कोप अथवा पीड़ा के कारण उपालम्भ वचन कहना समर्पण
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४७४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
कहा जाता है। दृष्टान्त-निरूपण को निवृत्ति कहते हैं और कार्य-समाप्ति को संहार कहा जाता है। विश्वनाथ ने भाणिका का उदाहरण 'कामदत्ता' दिया है, जो अब अप्राप्य है। डोम्बी : डोम्बी नामक उपरूपक का लक्षण सर्वप्रथम शारदातनय ने भावप्रकाशन में दिया। कुछ आचार्यों ने डोम्बी को ही भाणिका कहा है और वही बात भावप्रकाशन की निम्नलिखित पंक्ति में देखी जाती है : डोम्ब्येव भाणिकोदात्तनायिकंकाङ्गभूषिता।' विश्वनाथ ने यही सिद्धान्त अपनाया और भाणिका का विवेचन किया, जो शारदातनय की डोम्बी का ही लक्षण है। उन्होंने कामदत्ता का ही उदाहरण दिया, जो शारदातनय ने डोम्बी का उदाहरण दिया है। भोज और शारदातनय ने भाणिका के, जो लक्षण दिये, वे विश्वनाथ के दिये लक्षण से सवथा भिन्न हैं, यह ऊपर दिखलाया जा चुका है। शारदातनय के मतानुसार डोम्बी में एक अंक होता है और उदात्त नायिका होती है। इसमें कैशिकी तथा भारती वृत्तियाँ होती हैं और वीर तथा शृंगार रस होते हैं। इसका नायक मन्द होता है और वेशादि की रचना सुन्दर होती है। इसमें सात अंग होते हैं, यथा-विन्यास, उपन्यास, विबोध, साध्वस, अनुवृत्ति, संहार और समर्पण। द्रष्टव्य है कि ऊपर भाणिका का, जो लक्षण विश्वनाथ ने दिया है, वही लक्षण शारदातनय ने डोम्बी का दिया है। उदाहरण भी दोनों का एक ही है। मल्लिका : केवल भावप्रकाशन में ही मल्लिका को उपरूपकों में सम्मिलित किया गया है। पहली परिभाषा के अनुसार यह वस्तुतः दुर्मल्लिका ही है। भोज ने शृंगार- प्रकाश में जिस मणिकुल्या को २४ श्रव्य काव्यों में स्थान दिया है, उसे शारदातनय ने उपरूपक मल्लिका का एक दूसरा भेद माना है। उन्होंने थोड़े परिवर्त्तन के साथ वही श्लोक उद्धृत किया है, जो शृंगारप्रकाश में पाया जाता है। यथा शृंगारप्रकाश में : मणिकुल्यां जलमिव न लक्ष्यते यत्र पूर्वतो वस्तु। पश्चात् प्रकाशते सा मणिकुल्या मत्स्यहसितादि॥२ और भावप्रकाशन में : मणिकुल्यां जलमिव न लक्ष्यते यत्र पूर्वतो वस्तु। पश्चात् प्रकाशते या सा मणिकुल्यामपि मल्लिका ज्ञेया॥3 मल्लिका में सम्भोग शृंगार रस रहता है और कैशिकी वृत्ति होती है। इसमें एक या दो अंक रहते हैं। यह विदूषक तथा विट की क्रियाओं से युक्त होता है। इसमें गर्भ तथा
१. भावप्रकाशन, नवम अधिकार, पृ० २५७ २. शृं गारप्रकाश, पृ० १४७ ३. भावप्रकाशन, नवम अधिकार, पृ० २६८
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रूपक के भेदोपभेद [४७५
अवमर्श के अतिरिक्त शेष तीन सन्धियाँ मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहण की योजना होती है। शारदातनय ने मल्लिका का कोई उदाहरण नहीं दिया है। कल्पवल्ली : शारदातनय ने ही सर्वप्रथम कल्पवल्ली को उपरूपकों की सूची में गिनाया। कल्पवल्ली में वासकसज्जा अथवा अभिसारिका नायिका रहती है और नायक उदात्त होता है। इसमें हास्य अथवा शृंगार रस की प्रधानता रहती है और दस लास्यांगों तथा तीन लयों की योजना की जाती है। इसमें उपनायक पीठमर्द होता है। कल्पवल्ली में मुख, प्रतिमुख तथा निर्वहण सन्धियों की योजना होती है और यह उदात्त वर्णनों से युक्त होती है। उदाहरण के लिए 'माणिक्यवल्लिका' को प्रस्तुत किया गया। पारिजातक : पारिजातक को भी सर्वप्रथम शारदातनय ने ही उपरूपकों में रखा। इसमें देव या क्षत्रिय नायक रहता है और वीर या शृंगार रस की प्रधानता रहती है। इसमें एक अंक रहता है और मुख तथा निर्वहण सन्धियाँ होती हैं। नायक उदात्त होता है और नायिका कलहान्तरिता होती है। कहीं-कहीं पारिजातक विदूषक के हास-परिहास से समन्वित होता है। इसमें अनेक प्रकार के नृत्य की योजना की जाती है। उदाहरण-स्वरूप 'गंगातरंगिका' को प्रस्तुत किया गया है। कुछ लोग उसे 'पारिजात लता' भी कहते हैं। अन्त में विश्वनाथ ने उपसंहार किया है कि इन सब रूपक-उपरूपकों की प्रकृति यद्यपि नाटक की ही है, तथापि औचित्य के अनुसार यथासम्भव नाटक के अंगों का इनमें समावेश करना चाहिए। जहाँ नाटकोक्त अंगों का फिर कथन किया गया है, वहाँ उन अंगों की अवश्य कत्तव्यता जाननी चाहिए। उसमें वे सब अंग अवश्य होने चाहिए। इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि उपरूपकों के लक्षण के विषय में नाट्यशास्त्र के विभिन्न आचार्यों में पर्याप्त मतभेद रहा है। उपरूपकों का विवेचन करनेवाले सभी नाट्याचार्य भरत के परवर्त्ती और धनंजय के पूर्ववर्ती थे। उनमें कोहल, मातृगुप्त और हर्ष के अतिरिक्त अन्य आचार्य भी थे, जिनकी कृतियाँ अब उपलब्ध नहीं हैं। विश्वनाथ, शारदातनय आदि परवर्त्ती आचार्यों ने उन्हीं पूर्ववर्त्ती आचार्यों के आधार पर उपरूपक के अपने लक्षण दिये। यह भी निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि कोहलादि आचार्यों के पहले बड़ी संख्या में रूपक तथा उपरूपक विद्यमान थे, जिनको आधार मानकर इन आचार्यों ने अपने सिद्धान्त निर्धारित किये और अपने आलोचना-ग्रन्थ लिखे। वर्त्तमान युग में भी हमें कई प्रकार के नृत्य तथा अभिनय मिल जाते हैं, जो कृष्ण तथा अन्य नायकों के कृत्यों से सम्बन्ध रखते हैं। ये नृत्य तथा अभिनय संगीत के साथ जन-रंगमंच पर या विवाह तथा किसी अन्य उत्सव के अवसर पर राजाओं के दरबार में दिखाये जाते हैं और प्राचीन नाट्य- सिद्धान्त के नियमों के अनुसार होते हैं। किन्तु, दुर्भाग्यवश इस प्रकार का साहित्य, अधिकांशतः समाप्त हो चुका है। वर्गोकरण के आधार रूपक और उपरूपकों के वर्गीकरण के आधार : धनंजय और धनिक उपरूपकों को स्वीकार नहीं करते। उनके मतानुसार डोम्बी, श्रीगदित आदि सात भेद नृत्य ही हैं, उपरूपक
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नहीं। उन्होंने उन विद्वानों से अपनी असहमति प्रकट की है, जो इन्हें भाण की ही तरह अभिनयात्मक रूपक मानते हैं। धनंजय की मान्यता है कि नृत्य नाट्य से सर्वथा भिन्न होता है। रूपक और नृत्य में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि रूपक या नाट्य रसाश्रित होता है, परन्तु नृत्य भावाश्रित। नाट्य में पात्रों का सर्वांगीण चित्रण करते हुए, रस को परिपुष्ट किया जाता है, परन्तु नृत्य में केवल भावों की अभिव्यंजना करना उद्देश्य रहता है। फिर नाट्य में चारों प्रकार के- आंगिक, वाचिक, आहार्य तथा सात्त्विक-अभिनय होते हैं, परन्तु नृत्य में केवल आंगिक अभिनय होता है। दोनों में एक अन्तर यह भी है कि नाट्य में दृश्य के अतिरिक्त श्रवणीय भी बहुत रहता है, परन्तु नृत्य में सब कुछ दर्शनीय रहता है, श्रवणीय कुछ भी नहीं। इस प्रकार धनंजय-धनिक ने डोम्बी, श्रीगदित आदि को नृत्य ही माना, रूपक नहीं। इसके विपरीत कविराज विश्वनाथ ने दस रूपकों के अतिरिक्त १८ उपरूपकों की भी स्थिति स्पष्ट रूप से स्वीकार की। परन्तु, उन्होंने उपरूपक मानने का कोई कारण नहीं दिया और न रूपक तथा उपरूपक में अन्तर ही बताने का प्रयास किया है। शारदातनय में दोनों मतों का समन्वय है। उन्होंने दस रूपकों की गिनती कराने के बाद बीस उपरूपकों को भी स्वीकार किया। किन्तु, उन्होंने स्पष्ट कर दिया है कि नाटकादि दस रूपक रसात्मक हैं और तोटकादि बीस रूपक (या उपरूपक) भावात्मक; और दृश्यता के ही कारण इन्हें कुछ लोग रूपक कहते हैं : रसात्मका दशतेषु विशद् भावात्मका मताः। तेषां रूपकसंज्ञापि प्रायो दृश्यतया क्वचित्।' शारदातनय ने सब-रूपकों तथा उपरूपकों-का योगफल तीस ही माना है। इस दृष्टि से शारदातनय का दृष्टिकोण सर्वाधिक वैज्ञानिक तथा विश्लेषणात्मक है। वस्तुतः, उपरूपक नृत्य ही है, परन्तु उसमें अभिनयात्मक तत्त्व विद्यमान रहता है। फिर उपरूपक भाव पर आश्रित रहता है, जबकि रूपक रस पर। इस प्रकार रूपक और उपरूपक के वर्गीकरण के आधार दो हैं : १. रूपक में अभिनय का तत्त्व प्रमुख रहता है, परन्तु उपरूपक में नृत्य की प्रमुखता रहती है। २. रूपक रसात्मक होता है, अर्थात् रस पर आश्रित रहता है, परन्तु उपरूपक भावात्मक होता है, अर्थात् भाव पर आश्रित रहता है। विभिन्न रूपकों तथा उपरूपकों के वर्गीकरण के आधार : रूपकों का भी नाटक, प्रकरण आदि में वर्गीकरण किया गया है। वैसे ही उपरूपक का भी नाटिका, तोटक आदि १. भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २२१
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रूपक के भेदोपभेद [४७७
विश्वनाथ के मत से १८ तथा शारदातनय के मत से २० भेदों में वर्गीकरण हुआ है। इस वर्गीकरण के मुख्य आधार तीन हैं-वस्तु, विस्तार और रस। वस्तु : पहले निर्देश किया जा चुका है कि वस्तु तीन प्रकार की होती है- प्रख्यात (इतिहास-प्रसिद्ध), उत्पाद्य (कवि-कल्पित) तथा मिश्रित। रूपकों तथा उपरूपकों का वर्गीकरण करने में वस्तु के ये भेद सबल आधार होते हैं। रूपक तथा उपरूपक के कुछ भेदों की वस्तु प्रख्यात अथवा ऐतिहासिक होती है : जैसे नाटक, व्यायोग, समवकार आदि। कुछ रूपकों की कथावस्तु उत्पाद्य या कवि-कल्पित होती है : जैसे प्रकरण, भाण, प्रहसन आदि। ईहामृग की कथावस्तु मिश्रित होती है, अर्थात् इसका कुछ अंश इतिहास-पुराण-प्रसिद्ध होता है और कुछ अंश कवि-कल्पित होता है। इसी प्रकार उपरूपकों में भी कुछ भेदों की कथावस्तु ऐतिहासिक तथा कुछ की कवि-कल्पित होती है। नाटिका की कथा उत्पाद्य अथवा कवि-कल्पित होती है, परन्तु नायक प्रख्यात होता है। इस विवेचन से देखा जा सकता है कि रूपक-उपरूपक के वर्गीकरण में कथावस्तु का पर्याप्त महत्त्व है। वस्तु के आधार पर वर्गीकरण में सुविधा होती है। विस्तार : विस्तार के भी आधार पर रूपकों तथा उपरूपकों के विभिन्न वर्ग हुए हैं। सभी रूपकों का विस्तार बराबर नहीं होता, प्रत्युत न्यूनाधिक हुआ करता है। महानाटक दस अकों का होता है, तो भाण एक ही अंक का होता है। वैसे ही सभी रूपकों तथा उपरूपकों के विस्तार में अन्तर होता है। नाटक और प्रकरण पाँच अंकों से दस अंकों तक के होते हैं। नाटिका, शिल्पक, ईहामृग, डिम आदि में चार अंक होते हैं, समवकार में तीन अंक होते हैं, तो तोटक में सात, आठ, नौ अथवा पाँच अंक होते हैं। संलाप में तीन या चार अंक होते हैं और प्रहंस में दो ही अंक। इनके अतिरिक्त अनेक ऐसे रूपक तथा उपरूपक हैं, जिनमें एक ही अंक रहता है, जैसे भाण, प्रहसन, अंक, वीथी, व्यायोग आदि। इस प्रकार हम देखते हैं कि एक से दस तक अंक पाये जानेवाले रूपकों तथा उपरूपकों का निर्देश हमारे नाट्यचार्यों ने किया है। अतः, स्पष्ट हो जाता है कि रूपक और उपरूपक के भेदों के वर्गीकरण में विस्तार भी एक प्रमुख आधार है। रस : रूपक तथा उपरूपक के विभिन्न भेदों के वर्गीकरण में रस का भी प्रधान स्थान है। सभी रूपकों तथा उपरूपकों में किसी-न-किसी रस की प्रधानता रहती है, कुछ रस गौण या अंग-रूप में भी रह सकते हैं और कुछ रस वरजित हैं। नाट्यकार को नाट्य की रचना करते समय रस पर पर्याप्त ध्यान देना होता है। नाटक में वीर अथवा शृंगार रस की प्रधानता होती है, वसे सभी रस अंग-रूप में रहते हैं। प्रहसन में हास्य रस, समवकार में वीर रस, वीथी में शृंगार रस, अंक में करुण रस की प्रधानता रहती है। डिम और व्यायोग में शृंगार और हास्य जैसे कोमल रसों का समावेश नहीं होता, शेष वीर, रौद्र, बीभत्स, अद्भुत, करुण तथा भयानक रस रहते हैं, परन्तु प्रधान रस रौद्र ही होता है।
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४७८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
रस की यह विभिन्नता उपरूपकों में भी देखी जा सकती है। नाटिका, प्रकरणिका, सट्टक, गोष्ठी तथा तोटक में शृंगार रस प्रधान रहता है। उल्लाप्य में हास्य, शृंगार तथा करुण रस; काव्य में हास्य रस, प्रेखण में वीर तथा रौद्र रस और संलापक में शृंगार तथा करुण के अतिरिक्त अन्य सभी रस रह सकते हैं। इस प्रकार, प्रमाणित हो जाता है कि रूपकों तथा उपरूपकों के विविध भेदों के वर्गीकरण का आधार रस भी है। रस के आधार पर अनेक भेद किये गये हैं। युग की प्रेरक भावना : रूपकों के वर्गीकरण में युग की प्रेरक भावनाओं का भी सबल आधार रहा होगा। समाज के अनुरूप ही साहित्य की सृष्टि होती है। जिस प्रकार का समाज होगा, उसी के अनुकूल साहित्य का भी निर्माण होता है। तद्युगीन समाज का प्रभाव रूपक आदि किसी कलाकृति पर अवश्य पड़ता है। समाज की कला-भावना भी समय के साथ परिवत्तित होती रहती है। जनता की रुचि के आधार पर भी कलाकृति में समय- समय पर परिवर्त्तन तथा परिवर्द्धन, विकार तथा परिष्कार होता रहता है। यदि समाज में सुख-शान्ति है, सभी को जीवन-यापन के साधन प्रचुर परिमाण में उपलब्ध हैं, उस समय शृंगारिक नाटक, नाटिका आदि शृंगार-प्रधान रूपकों की सृष्टि अवश्य होगी। यदि समाज और देश में उपद्रव और अशान्ति चल रही है, तो वीररस के नाटक, डिम तथा व्यायोग की रचना हो सकती है। समाज में कुरीति, पाखण्ड आदि का साम्राज्य हो जाने पर भाण तथा प्रहसन के कशाघात की आवश्यकता होगी, जिससे उन कुरीतियों और पाखण्डों की जड़ हिल जाय। उस युग में ऐसे ही रूपकों की रचना होगी। जब-जब जैसा समय आयगा, उसी के अनुरूप रूपकों का भी निर्माण होना अवश्यम्भावी है। अतः रूपकों के वर्गीकरण का एक प्रबल आधार युग की प्रेरक भावना भी है। उक्त वर्गीकरण पर समाज की कला-भावना का भी प्रर्याप्त प्रभाव पड़ता है। एकांकी सवाक चलचित्र की प्रतिक्रिया के रूप में यूरोप में एकांकी नाटकों की रचना होने लगी; क्योंकि सवाक चलचित्र के आविष्कार में नवीनता तथा अल्पव्ययता तो थी ही, समय की भी काफी बचत होती थी। अतः कई उच्चकोटि के लेखकों का इस ओर आकृष्ट होना स्वाभाविक ही था। इन लेखकों के साथ बहुत बड़ी कठिनाई यह थी कि इन एकाकियों से रंगशालाएँ आरम्भ में सन्तुष्ट नहीं थीं और यद्यपि इनमें दृश्य-तत्त्व तथा अभिनय-तत्त्व वर्त्तमान थे, परन्तु इनमें कला-तत्त्व का पर्याप्त विकास नहीं पाया जाता था। फिर भी, इनमें धीरे-धीरे सुधार हुआ और लोग इनका महत्त्व समझने लगे। स्कूलों और कॉलेजों की छोटी रंगशालाओं ने थोड़े समय के लिए मनोरंजन का अच्छा साधन समझकर इन्हें अंगीकृत किया और इनका प्रचार भी किया। शीघ्र ही शिष्ट समुदाय ने भी इन्हें अधिक मान्यता दी और इनका प्रयोग सर्वत्र होने लगा।
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संस्कृत-साहित्य में एकांकी : स्थापत्य तथा प्रवृत्तियों की दृष्टि से आधुनिक साहित्य के कई अंग पाश्चात्त्य साहित्य से ही प्रभावित हैं। उनका मूल वेदों में ढूँढ़ना हास्यास्पद होगा। उदाहरणार्थ आधुनिक उपन्यास कादम्बरी की या आधुनिक छोटी कहानी पंचतन्त्र आदि की परम्परा की नहीं हैं। उसी प्रकार, आधुनिक एकांकी भी भास आदि से प्रभावित नहीं है। फिर भी यह कहना कि भारतीय नाट्य-साहित्य में एकांकी की कल्पना थी ही नहीं, पाश्चात्त्य साहित्य के प्रति अनावश्यक पक्षपात ही कहा जायगा। आधुनिक एकांकी का उत्स संस्कृत के एकांकी नाटकों में मिलता है और उनका प्रभाव भी कुछ अंश में हिन्दी-एकांकी पर पड़ा है। जिन व्यक्तियों ने संस्कृत-नाट्यशास्त्र या नाट्य-साहित्य का अध्ययन नहीं किया है, उनकी धारणा है कि एकांकी भी बीसवीं शती के वैज्ञानिक आविष्कारों के समान पश्चिमी देशों की देन है। ईसा के काफी पहले ही भास ने एकांकी नाटकों का आरम्भ कर दिया था। किन्तु, यह भी उतना ही सत्य है कि आज के एकांकी नाटक भास के एकांकी नाटकों के उत्तराधिकारी नहीं कहे जा सकते। यूरोप में भी छोटे, सम्बद्ध एवं कलात्मक नाटक नवीन आविष्कार के रूप में नहीं आये हैं। प्राचीन यूनान और इटली में छोटे प्रहसनों का स्वतन्त्र रूप से विकास हुआ था। यह ठीक है कि एकांकी नाम प्राच्य नामों से कोई सम्बन्ध नहीं रखता; क्योंकि यह अँगरेजी के one-act play के अनुकरण पर प्रचलित हुआ। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि एकांकी मूल रूप में भारतीय नाट्य-साहित्य में विद्यमान था, परन्तु आधुनिक साहित्य उससे प्रेरणा नहीं लेकर पाश्चात्त्य-साहित्य से अनुप्राणित हुआ। रूपक के दस भेदों में एक 'अंक' भी होता है, जिसमें एक ही अंक रहता है; यदि हम चाहें तो एकांकी के मूल शास्त्रीय रूप में उसे याद कर सकते हैं। हमारे यहाँ एकांकी नाम का कुछ नहीं है, परन्तु रूपक और उपरूपक के कई भेद एक अंक के होते हैं, जिन्हें एकांक नाटक या एकांक रूपक कह सकते हैं। इस स्थल पर हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारे यहां साहित्य के अंग-उपांग का वर्गीकरण पाश्चात्त्य वर्गीकरण से भिन्न प्रकार का है। यहाँ साहित्य को क्यों, कला-मात्र की आत्मा के रूप में रस को स्वीकार किया गया है। इसलिए हमारी विभाजन-प्रणाली रस के आस्वाद की प्रक्रिया पर ही सवथा निर्भर है। रसास्वाद ही भारत में साहित्य या कला का चरम अभिप्राय माना जाता रहा है। अतः एकांकी के भी वर्गीकरण तथा स्वरूप- निरूपण के मूल में रस ही है। पहले लिखा जा चुका है कि भरत मुनि, आचार्य धनंजय आदि नाट्याचार्यों ने रूपक के दस भेद माने-नाटक, प्रकरण, भाण, प्रहसन, डिम, व्यायोग, वीथी, अंक, समवकार तथा ईहामृग। इनमें पाँच एकांक हैं-भाण, प्रहसन, व्यायोग, वीथी और अंक। कुछ आलोचकों ने आधुनिक युग को कर्म-संकुल घोषित करके छोटी कहानी को उपन्यास का संक्षिप्त रूप सिद्ध करने का प्रयास किया। इसी प्रकार एकांकी को नाटक का
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४८० j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भंव और विकास संक्षिप्त रूप ही समझा गया। परन्तु, अब ये साहित्य के स्वतन्त्र अस्तित्व निर्विवाद रूप से प्रमाणित हो चुके हैं। परन्तु, संस्कृत-साहित्य का अध्ययन करने से पूर्वोक्त एकांकियों पर कर्मसंकुलता का तर्क किसी भी प्रकार लागू नहीं किया जा सकता। संस्कृत के श्रव्य काव्यों का आरम्भ जहाँ वेद, वाल्मीकि तथा व्यास से हुआ, वहाँ भरत मुनि ने दृश्य काव्य का उद्गम 'अमृतमन्थन' नामक समवकार और 'त्रिपुरदाह' नामक 'डिम' से बताया और ये दोनों एकांकी रूपकों से थोड़े ही बड़े आकार के होते हैं। भास ने भी नाट्यकला के उस आरम्भिक युग में पाँच-पाँच एकांकी या एकांक रूपक लिखे थे। इससे एकांकी की स्वतन्त्र सत्ता पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इससे प्रकट होता है कि एकांकी बड़े नाटक का संक्षिप्त रूप नहीं है, अपितु निर्वाह की दृष्टि से उसका कौशल नाटक से भी अधिक कठिन है और उसका क्मिक विकास अपने ढंग पर हुआ है। भास से कांचनाचार्य तक के एकांकियों में वैधानिकता एवं रसात्मकता की विदग्धता का हमें अनुभव होता है, जो १५ सौ वर्षों से सहृदयों के मानस पर अपना प्रभाव डालती आई है। उन एकांकियों ने युगोचित उपयोगिता का त्याग कर स्थायी आनन्द का वरण कर लिया है। अभी जिन पाँच प्रकार के एकांकियों का उल्लेख किया गया, वे दस रूपकों में से हैं। परन्तु इन दस रूपकों के अतिरिक्त विश्वनाथ ने १८ और शारदातनय ने २० उपरूपकों का भी विवेचन किया है। सौभाग्यवश इन उपरूपकों में से दस एकांकी हैं-गोष्ठी, नाट्यरासक, उल्लाप्य, काव्य, प्रेखण, रासक, श्रीगदित, विलासिका, हल्लीश और भाणिका। इस प्रकार पाँच रूपक और दस उपरूपक एकांकी होते हैं और ये पन्द्रह प्रकार पन्द्रह सौ वर्षों की परम्परा रखते हैं, आधुनिक युग का कोई आविष्कार नहीं है। एकांकी के व्यक्तित्व का विकास अपनी ही सीमा में हुआ है, उसमें पूर्ण नाटक के लक्षणों को आत्मसात् करने की कल्पना कभी नहीं की गई। एकांकी कभी भी जीवन की सम्पूर्णता का अंकन करने का प्रयास नहीं करता, प्रत्युत उसकी एक विशेष परिस्थिति की झाँकी देता है। इसीलिए, उसका प्रधान उद्देश्य एक विशेष स्थिति में ही जीवन को प्रस्तुत करना होता है। वास्तव में, एकांकी की कला के निर्वाह के लिए उपर्युक्त लक्ष्य की सीधी-सादी अभिव्यक्ति आवश्यक है। इसमें रूढ़ नाटकीय जटिलताओं के लिए अवकाश नहीं होता। परन्तु, साथ ही, यह भी स्मरण रखना चाहिए कि आज के एकांकी वही नहीं हैं, जो प्राचीन संस्कृत-साहित्य के एकांकी या एकांक रूपक थे। वस्तुतः, आधुनिक एकांकी संस्कृत- एकांकी का पूर्ण उत्तराधिकारी नहीं कहा जा सकता है। कला की दृष्टि से एकांकी अपने में पूर्ण होता है। यह एक अंक का भी होकर अनेकांकी नाटकों की अनेक जटिलताओं से युक्त होता है। यह अगस्त्य ऋषि के चुल्लू में समुद्र रखने की भांति ही एक ही अंक में सन्धियों, अन्वितियों आदि का निर्वाह करते हुए चरम उत्कर्ष पर पहुँचता है। यह फूलों का गुलदस्ता नहीं, एक कली है, जो स्वयं अपने में पूर्ण है।
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हिन्दी के एकांकी तथा नाटक के अन्य आधुनिक भेदों का निरूपण आगे के एक अध्याय में किया जायगा।
प्राचीन भारतीय नाटकों में त्रासदी का अभाव वासदी : यूनान में तासदी की रचना हुई और वहाँ की रंगशालाओं में इसका प्रदर्शन होता था। यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक और आलोचक अरस्तू ने अपनी पुस्तक पोएटिक्स में त्नासदी की परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में की है : "Tragedy is an imitation of an action that is serious, complete, and of a certain magnitude in language embellished with each kind of artistic ornament, the several kinds being found in separate parts of the play; in the form of action, not of narrative; through pity and fear effecting the proper katharsis of purgation of these emotions."1 इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि तासदी में भी, सभी ललित कलाओं के समान, अनुकरण ही है। आगे सुखान्त नाटकों या कामदियों से तासदी का अन्तर बताते हुए, अरस्तू ने बताया कि तासदी ऐसे कार्यों का अनुकरण है, जो न तो हास्यास्पद हैं और न नैतिक दृष्टि से तुच्छ हैं, प्रत्युत गम्भीर उद्दृश्य से सम्बद्ध हैं। वस्तुतः, यह मानव-भाग्य का चित्र है। महाकाव्य से तासदी का अन्तर बताया गया है कि यह महाकाव्य के समान विवरणात्मक नहीं होता, वरन् कार्यात्मक या नाट्यात्मक होता है। परिभाषा के शेषांश में त्नासदी के प्रभाव का उल्लेख है। तासदी में भय और करुणा के संचार से भावनाओं का शुद्धीकरण हो जाता है। अरस्तू द्वारा प्रयुक्त 'Katharsis' शब्द का संसार के अनेक देशों के असंख्य विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से अर्थ लगाया है। जर्मन दार्शनिक श्रीनीत्शे के मतानुसार तासदी ही नाटक का मूल स्वरूप है। नाटक के इस मूल स्वरूप-त्रासदी-में यूनान के दो विरोधी भावों का सामंजस्य है। एक है दायोनिसियस, जो कल्पना, आवेश, उद्वग और लालसा का प्रतीक है। दूसरा है एपोलो, जो सामंजस्य, सन्तोष, शालीनता, मर्यादा तथा प्रेम का प्रतीक है। इन दो विरोधी भावों के समन्वय से त्ासदी की रचना हुई है। दायोनिसियस की आत्मा उन्मत्तता तथा प्रलाप की आत्मा है और एपोलो की आत्मा स्वप्नलोक की उज्जवल आभा है। यूनामी कवियों ने इन दो विरोधी आत्माओं में अपनी कल्पना-शक्ति के सहारे एक समन्वय कर दिया। वस्तुतः, कल्पना और वास्तविकता, मर्यादा और प्रलाप, लालसा और प्रेम में सामंजस्य उपस्थित करना असाधारण काम था। प्रसिद्ध आलोचक रिजवे का अनुमान है कि प्राचीन काल में मनुष्यों की टोलियाँ ऋतु-परिवर्त्तन के अवसर पर प्रसन्न होकर नृत्य करती थीं, उस समय अपनी जाति- विशेष के वीरों का आह्वान कर उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अ्पित करती थीं। इस १. Poetics-translated by S. H. Butcher, p. 23
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४८२j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास श्रद्धांजलि में ही नाटक का बीज छिपा था। दायोनिसियस की पूजा के निमित्त जिस वेदी का निर्माण होता था, वस्तुतः वह बलिवेदी थी। वहाँ दायोनिसियस तथा अन्य जातीय वीरों की आत्मा की सन्तुष्टि के लिए बलिदान होते थे। इसी बलिदान के कार्यकम में तासदी का बीज निहित था। जब मनुष्यों की इन टोलियों के द्वारा दायोनिसियस की पूजा सम्पन्न की जाती थी, उस समय बहुत अशिष्ट एवं अश्लील रूप में नृत्य तथा गायन होते थे। उस समय के यूनानियों का विश्वास था कि दायोनिसियस के ही कारण खेती होती है तथा मनुष्यों को सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। उस समय के ये उत्सव यूरोप के मई-दिवस और भारत की होली की रँगरेलियों से मिलते-जुलते थे। नाट्यकला के आलोचक मूरे के मतानुसार भी तासदी का मूल दायोनिसियस की पूजा में छिपा था। दायोनिसियस की पूजा वसन्त तथा नववर्ष के आगमन की सूचना देती थी। प्रत्येक वर्ष का जीवन कभी गर्व से उन्नत होता था और कभी उस गर्व का पतन होता था। वसन्त में उस गर्व की पराकाष्ठा थी और शिशिर में उसी का पतन होता था। इन्हीं दो भावों-गर्व तथा उसका पतन-को लेकर तासदी की आत्मा की सृष्टि हुई। गर्व तथा उसके पतन का प्रतिवर्ष पुनरागमन होता रहता था और इसकी एक अविच्छिन्न शृंखला बँधी रहती। इस शृंखला में नाट्यकला का उद्भव हुआ। मध्ययुग के कलाकारों के लिए तासदी के अर्थ में थोड़ा परिवर्त्तन हुआ। उनके लिए किसी श्रेष्ठ तथा सम्पन्न व्यक्ति के भाग्य में आकस्मिक परिवर्त्तन ही तासदी का आधार हुआ। इस आकस्मिक भाग्य-परिवर्तन को देखकर किसी के मन में भय, करुणा और सहानुभूति-तीनों ही भावनाओं की जागृति होती है। वे लोग समझते हैं कि मनुष्य भाग्य या नियति के हाथ में खिलौना-मात्र है। भाग्य जैसा चाहे, मनुष्य को बना या बिगाड़ सकता है। भाग्य किसी को सदा सुखी नहीं देख सकता, वरन् कुछ ही देर तक उसे सुखी रखकर शीघ्र उसका पतन करा देता है। वस्तुतः मध्ययुग के कलाकारों के ये विचार निराशावादी हैं। पाश्चात्य दृष्टि में नाटक : सामान्यतः नाटक-रचना एक कला है। अरस्तू ने कला की परिभाषा देते समय कहा है कि समस्त कला अनुकरण-मात्र है। इस परिभाषा से अरस्तू का तात्पर्य यह था कि कलाकार की दृष्टि जीवन के विशद विस्तार की ओर रहती है। जीवन के कुछ अंग कलाकार को अपनी ओर आकर्षित करते हैं। वह अपने लेखनी या तूलिका के सहारे शब्दों या रंगों के प्रयोग से चित्र या कविता की रचना करता है। इस कविता या चित्र में कलाकार के द्वारा पहले देखे गये जीवन का प्रतिबिम्ब रहता है। दूसरे शब्दों में, वह कविता या चित्र जीवन का अनुकरण है। यूनान के एक दूसरे प्रसिद्ध आलोचक और दार्शनिक अफलातून (Plato) ने इस परिभाषा की आलोचना की। उनका कथन है कि जब सब कलाएँ अनुकरण-मात्र हैं तो वे झूठ या मिथ्यावाद का प्रचार करती हैं; अतः कलाकारों को सभ्य समाज से दूर ही रहना
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शकाने ज रूपक के भेदोपभेद [४८ ३
उचित है। उनका विचार था कि मूल रूप से सारी वस्तुएँ ईश्वर के मस्तिष्क में ही वर्त्तमान हैं और संसार की सभी वस्तुएँ उसी मूल रूप का प्रतिबिम्ब हैं। अब कलाकार सांसारिक जीवन का अनुकरण करता है, तो वह मूल रूप के प्रतिबिम्ब का अनुकरण-मात्र करता है। इस प्रकार, वह मूल रूप और भी दूर जा पड़ता है (Thrice removed from reality) I अरस्तू ने इस आलोचना का उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि यद्यपि कला अनुकरण- मात्र है, फिर भी यह अनुकरण मूल रूप से ही सम्बद्ध है, चाहे वह सम्बन्ध कितनी ही दूरी का क्यों न हो। अतः, कला और कलाकार को सभ्य समाज से हटने की आवश्यकता नहीं; उन्हें भी सभ्य समाज में रहने का पूर्ण अधिकार है। अरस्तू का कथन है कि कला में न निस्सारता है और न मिथ्यावाद। उसमें सत्य रहता है, परन्तु कला का सत्य इतिहास के सत्य से स्वथा भिन्न होता है। उसमें कल्पना-जगत् की सत्यता है। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि नाट्यकला एक कल्पनापूर्ण अनुकरण है, जो जीवन के सुन्दरतम अंगों का कल्पनात्मक अनुकरण करती है। फ्रांसीसी आलोचक ब्र नेवरे के मतानुसार दो इच्छा-शक्तियों के द्वन्द्व के ही आधार पर नाटक का निर्माण होता है। सम्भव है कि किसी एक ही व्यक्ति की दो इच्छाओं, अथवा दो व्यक्तियों की दो इच्छाओं अथवा किसी एक व्यक्ति की एक इच्छा और एक वर्ग या समूह की इच्छा में द्वन्द्व हो। द्वन्द्व का रहना आवश्यक है, तभी नाटक का जन्म होता है। कभी-कभी यह भी होता है कि एक ही व्यक्ति की इच्छा घटनाओं या बाधाओं से टकराकर द्वन्द्व उत्पन्न कर सकती है। यदि किसी प्रकार का द्वन्द्व नहीं होगा, तो नाटक का जन्म नहीं हो सकता। साहित्य में इस सिद्धान्त का बहुत आदर रहा है। कुछ आलोचकों का कथन है कि नाटक में द्वन्द्व तो रहना चाहिए, परन्तु वह द्वन्दव विस्तृत या विशाल न होकर एक केन्द्र पर स्थित रहना चाहिए। यदि वह द्वन्द्व घटनाओं या अड़चनों से सीमित रहेगा, तो वह अकर्षक या हृदयग्राही होगा। इसी के आधार पर कतिपय आलोचकों ने नाटक में आपत्काल (Crisis अथवा catastrophe) पर बल दिया है। जब द्वन्द्व एक ऐसे बिन्दु पर पहुँच जाता है, जब सम्भावना हो जाती है कि अब सारा खेल बना या बिगड़ा, तो उसी क्षण आपत्काल की सृष्टि होती है। यदि इस आपत्काल को नाटक झेल गया, तो उसकी सफलता हो गई और यदि आपत्काल को वह नहीं झेलकर हार गया, तो उसकी असफलता हो गई। इसी सफलता या असफलता के आधार पर नाटक कामदी या तासदी बनता है। इस विवेचन का निष्कर्ष यह हुआ कि नाटक एक अनुकरणात्मक कला है और इससे जीवन का कल्पनापूर्ण प्रतिबिम्ब प्रदर्शित होता है। इस प्रदर्शन में सीमित और केन्द्रीभूत इच्छा-शक्तियों के द्वन्द्व में नाटक की आत्मा प्रस्फुटित होती है। वासदी की आत्मा : प्राचीन यूनान और रोम में कई नाटककारों ने नाटक की रचना की, परन्तु उनमें किसी ने वासदियों की आत्मा का विश्लेषण करने का प्रयास नहीं
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४८४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास किया। परवर्त्ती दार्शनिकों तथा तत्त्ववेत्ताओं ने इस दिशा में प्रयास किया है। जब कोई व्यक्ति किसी दैवी घटना के द्वारा किसी मनुष्य को पीड़ित होते देखता है, तो उसमें अपनी हीनता की भावना जागरित होती है। इस दशा में वह अवाक् होकर दुर्घटनाएँ होते देखता है और ऐसी भावना में त्ासदी की आत्मा छिपी रहती है। जर्मन दार्शनिक हेगेल ने त्ासदी की आत्मा का विश्लेषण दो खण्डों में किया है। पहले खण्ड में धार्मिक दृष्टिकोण है और दूसरे में सौन्दर्य-कलात्मक है। हेगेल के मतानुसार तासदी दोष या अनैतिकता पर आधारित है और उसका सम्बन्ध मानव-आचरण से है। तनासदी की आत्मा उस दोष या अनैतिकता का समाधान निकालने का प्रयास करती है। इसी समाधान निकालने के प्रयास में हमें ईश्वर के आचरण का भी विवेचन करना पड़ता है और ईश्वर तथा मनुष्य के सम्बन्ध में हमें अपने विचार प्रकट करने पड़ते हैं। तासदी की आत्मा का प्रथम तत्त्व ईश्वर और मनुष्य के सम्बन्ध का अस्पष्ट रहस्य है। जब कभी हम तासदी देखते हैं, तो हमारे सम्मुख यही रहस्यपूर्ण समस्या उपस्थित हो जाती है। हम कर्त्ता का कारण से तथा घटनाओं से सम्बन्ध जानने की इच्छा करते हैं। हम कर्त्ता के कार्य का प्रत्येक रहस्य जानने को उत्सुक होते हैं, पर इसमें हमें सफलता नहीं प्राप्त होती। इसी रहस्य में तासदी की आत्मा विद्यमान रहती है। इसके साथ ही तासदी की आत्मा सिद्धान्त-रूप में मान लेती है कि संसार में नैतिकता है। मनुष्य में नैतिक आचरण वर्त्तमान रहता है और वह यह प्रयत्न करता रहता है कि वह अनैतिक आचरण से अलग रहकर अपना जीवन व्यतीत करे। जब इस नैतिक मनुष्य में कोई दोष या अवगुण आ जाता है, तो तासदी की आत्मा मानव के चरित्र में इस दोष या अवगुण की प्रगति देखती रहती है और उस दोष को दबाने और अवगुण पर विजय पाने की समस्या का समाधान करने का प्रयत्न करती है। सिद्धान्ततः, तासदी का मूल आधार मृत्यु है। मृत्यु के विना तासदी का निर्माण नहीं हो सकता। दोष या अवगुण पर विजय पाने का सर्वोत्तम साधन मृत्यु ही है और इस मृत्यु को किसी भी रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। यह मृत्यु शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक किसी भी रूप में हो सकती है। वासदी का प्रभाव : अरस्तू ने अपनी पुस्तक पोएतिका में तासदी के प्रभाव का भी मौलिक विवेचन किया है। तासदी का प्रभाव दर्शक पर कब और कैसे पड़ता है, इसका वैज्ञानिक विवेचन उन्होंने किया है। मानव-हृदय पर तासदी के प्रभाव को अरस्तू ने चिकित्साशास्त्र के आधार पर समझाया है। कोई कुशल चिकित्सक रेचक औषधियों के द्वारा किसी व्यक्ति के शरीर को शुद्ध कर देता है, उसके शरीर के अन्दर की गर्मी दूर करके शरीर को पूर्णतः नीरोग बना देता है। उसी प्रकार निपुण नाटककार दर्शक के अन्दर से विकार निकालकर उसकी शुद्धि भय और करुणा के संचार से करता है। अरस्तू ने कहा है :
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रूपक के भेदोपभेद [४८५
"In other words, tragedy is a form of Homoeopathic treatment curing emotion by means of emotion-like in kind, but not identical."9 इस भय तथा करुणा का संचार नायक की अन्तिम दशा के परिणाम-रूप में होता है। तासदी का मूलाधार नायक का पतन होता है। प्रत्येक तासदी का नायक चरित्रवान्, विचारशील, निश्छल, निष्कपट तथा नैतिक होता है, परन्तु इन गुणों के साथ ही उसमें कोई एक दोष भी रहता है। यह एकांकी-दोष नायक की चित्तवृत्ति में या नैतिक सिद्धान्त में, या विचार में, या आदर्श में-चाहे किसी भी समय प्रकट हो, उसकी कारुणिक दशा या शोचनीय पतन का मूल कारण होता है। इसी दोष के कारण वह अपना पतन तो कराता ही है, अपने मित्रों, सम्बन्धियों तथा सम्बद्ध व्यक्तियों को दुःख पहुँचाता है और कभी-कभी उनकी हत्या तक कर देता है। तासदी देख चुकने के बाद दर्शक के हृदय में स्वभावतः दो भावों का उदय होता है। पहला करुणा का भाव होता है और दूसरा भाव भय का होता है। मनोवैज्ञानिक कारणों से इन भावों की जागृति होती है। जब हम रंगमंच पर किसी चरित्रवान् निष्ठावान्, स्वस्थ, सुन्दर, तेजस्वी, विचारशील नायक का पतन देखते हैं, तो हममें घोर करुणा की भावना उत्पन्न होती है। स्वभावतः हमारे हृदय में करुणा की भावना रहती है और जब हममें करुणा की अत्यधिक भावना जग पड़ती है, तो हम दुःखी और उदास हो जाते हैं। किन्तु, रंगमंच पर किसी तासदी का अभिनय देखने पर, तो हमारे हृदय में विशेष मात्रा में करुणा का संचार हो जाता है और उसके साथ ही हमारे हृदय में स्थित स्वाभाविक करुणा की मात्रा सामंजस्य स्थापित करने की चेष्टा करती है। परिणाम-स्वरूप यदि हममें अधिक मात्रा में करुणा होगी, तो उसका परिमार्जन तथा संशोधन होगा और हममें उतनी ही मात्रा में रह जायगी, जो हमें दुःखी तथा उदास नहीं बना सकेगी। उसकी स्थिति उसी परिमाण में रह जायगी, जितनी हमको स्वाभाविक रूप में मानव बनाये रखने के लिए पर्याप्त होगी। जिस रूप में विरेचक औषधि से हमारे शरीर की शुद्धि होती है, उसी रूप में त्ासदी से हमारी करुणा का संशोधन और परिमार्जन होता है। तासदी देखने या पढ़ने से हममें करुणा के साथ ही भय का भी संचार होता है। अरस्तू ने कहा है : "We can now see that the essential tragic effect depends on main- taining the intimate alliance between pity and fear."? जब हम देखते हैं कि इतने गुणवान् और श्रेष्ठ नायक का पतन हो गया, तो हम सोचने लगते हैं कि पता नहीं, हमारा भी गर्व कब चूर्ण हो जाय। तासदी का अन्त देखते- देखते हमारे गर्व के अति का संशोधन हो जाता है। कुछ लेखकों का मत है कि इस संशोधन 9. Aristotle's Theory of Poetry, translated by S. H. Butcher, p. 248, २. Ibid, p.263.
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४८६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास में हमारी कायरता का भी परिमार्जन हो जाता है। जब तासदी हमें भयरूपी औषधि मात्रा में दे देता है, तो हमारे मूल भय की भावना में विद्रव हो जाता है और हमारे भय की भावना की अति का शमन हो जाता है। कुछ अन्य आलोचकों का मत है कि त्ासदी के फलस्वरूप हमारी केवल दो ही भावनाओं का संशोधन नहीं होता, वरन् हमारी सम्पूर्ण आत्मा का परिमार्जन हो जाता है और फलस्वरूप वह शुद्ध हो जाती है। आत्मा की शुद्धि के पश्चात् उसमें नैतिक तथा आध्यात्मिक सत्य सुदृढ़ स्थान बना लेता है। यदि अरस्तू के सिद्धान्तों का वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाय, तो उनमें साहित्यिक विचारों की सत्यता का ज्ञान हो जायगा। पहले तो अरस्तू ने कला को नैतिकता, आध्यात्मिकता तथा राजनीति-तीनों से सम्बद्ध कर दिया है। दूसरे, उनका चरित्र-संशोधन- सिद्धान्त वस्तुतः चिकित्साशास्त्र के रेचन-सिद्धान्त पर अवलम्बित है। परन्तु, साथ ही यह भी ज्ञातव्य है कि अरस्तू का अभिप्राय तासदी से आत्मिक अथवा आध्यात्मिक परिमार्जन न होकर केवल भावनाओं की अति का परिमार्जन है। "Tragedy, according to the definition, acts on the feeling, not on the will. It does not make men better, though it removes certain hindrances to virtue."9 सकी इसका एक विश्वस्त प्रमाण यूनानी जीवन-दर्शन से प्राप्त होता है। यूनानियों ने जीवन की सम्पूर्णता समझकर न केवल अध्यात्मावाद को ही ग्रहण किया और न सौन्दर्यवाद को ही लेकर जीवन व्यतीत किया, वरन् उन्होंने जीवन में दोनों का उचित मात्रा में सम्मिश्रण करने में ही जीवन की सार्थकता देखी। उन्होंने दायोनिसियस की उन्मत्तता और एपोलो की मर्यादा-प्रियता दोनों का स्वाभाविक सम्मिश्रण कर लिया। फलतः, इन दोनों की अति का परिमार्जन यूनानियों के साहित्य-सिद्धान्त का प्रधान लक्ष्य हो गया। यह संकेत यूनान के सभी लेखकों के तासदी में मिलता है और इसी संकेत से सभी यूनानी वासदियों का अन्त भी होता है। ऐसा अन्त दिखाने में लेखक की नैतिक कला निहित रहती है। रंगमंच पर किसी श्रेष्ठ पुरुष का दुःखमय अन्त देख लेने पर भी और नियति का कुटिल विधान पहचान लेने पर भी दर्शक जीवन से निराश नहीं होता। वह नास्तिक नहीं बनता, प्रत्युत ईश्वरीय विधान में अपनी आस्था बनाये रखता है; क्योंकि दर्शक जान लेता है कि नायक के चरित्र के किसी दोष के परिणामस्वरूप उसका पतन हुआ। उसके पतन में भाग्य का हाथ तो अवश्य था, परन्तु सबसे बड़ा हाथ उसके चरित्र के किसी अवगुण का था। यदि उसमें यह एकांगी अवगुण या दोष नहीं रहता, तो सम्भवतः भाग्यचक उसका कुछ अधिक नहीं बिगाड़ सकता था। वस्तुतः यूनान के त्ासदियों में उस देश के सामाजिक, नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक तथा व्यावहारिक विचारों का प्रतिविम्ब वर्त्तमान है। 9. Aristotle's Theory of Poetry, translated by S. H. Butcher. p. 263
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रूपक के भेदोपभेद [४८७
तासदी का विषय : यूनानी तासदी का विषय होता था किसी उच्च तथा सम्भ्रान्त कुल में उत्पन्न नायक का दुर्भाग्य तथा विनाश। नायक प्रायः असाधारण कोटि का व्यक्ति होता था और उसके पतन या दुर्भाग्य से दर्शकों या पाठकों के मन में क्षोभ और सहानुभूति का उद्रक होता था। किन्तु नायक बहुलांश में साधारण जनों के ही सदृश होता था, अतः उसके दुर्भाग्य से दर्शकों के मन में भय तथा आशंका का भी संचार होता था। नायक को तीव्र यातना भोगनी पड़ती थी और अन्त में उसका विनाश हो जाया करता था। इस दुःख तथा विनाश के कई कारण होते थे-१. कभी-कभी भाग्य-देवता अप्रसन्न रहते थे; २. कभी अभिशाप कार्य करता था; ३. कभी नायक उन विरोधी शक्तियों का शिकार बन जाता था, जिन पर न उसका कोई वश था और न जिनमें उसके लिए किसी प्रकार की दया थी। अपने कष्ट तथा मरण के लिए उसका थोड़ा-सा ही उत्तरदायित्व था। पर वह परिस्थितियों का उचित मूल्यांकन करने में असमर्थ होता था। कभी-कभी परिस्थितियों का उसका ज्ञान अपूर्ण ही होता था और उसी अज्ञान या तुटियुक्त दृष्टि के कारण उसे कठिन दण्ड भुगतान पड़ता था। शेक्सपियर के तासदियों में नायक अपने चरित्र की किसी भयानक त्ुटि के कारण यातना सहता है और अन्त में विनाश को प्राप्त करता है। किन्तु, यूनानी तासदियों में वैयक्तिक नैतिकता का यह आदर्श नहीं दिखाई देता। उनमें तो नायक अधिक-से-अधिक अपने अज्ञान अथवा तुटिपूर्ण दृष्टिकोण का ही दोषी है। यूनानी कवि और नाटककार अपने तासदियों के कथानक पाठकों अथवा दर्शकों के पूर्व-परिचित विख्यात वंशों के इतिहास से ग्रहण करते थे। इस प्रकार की कथाओं में मौलिकता का अभाव होता था और आधुनिक आलोचकों ने इसका उल्लेख दोष-रूप में किया है। परन्तु, इसमें एक लाभ था; कवि को स्वच्छन्द रूप से काव्यात्मक तथा नाटकीय विशेषताओं पर ध्यान देने का अवसर मिल जाता था। दर्शक जब रंगशाला में प्रवेश करता था, तो उसे कथावस्तु जानने की उत्सुकता नहीं होती थी, प्रत्युत उसका सम्पूर्ण ध्यान काव्य-कौशल देखने और उसका आस्वाद लेने में केन्द्रित रहता था। भारतीय नाट्य-साहित्य में त्रासदी के अभाव के कारण भारतवर्ष में तासदी लिखने की प्रथा नहीं चली। वस्तुतः पूर्वी देशों की सामाजिक आत्मा सदा इसके विरुद्ध रही। इसके कई कारण हैं : १. तासदी के कारण जनता में ईश्वर के विरुद्ध अश्रद्धा और अविश्वास तथा ईश्वरीय अनुशासन के प्रति घृणा उत्पन्न होने का भय था। इसीलिए बहुत-से संस्कृत- नाटक तासदी के अत्यन्त निकट पहुँचकर भी तासदी नहीं हुए; क्योंकि उन्होंने मृत्यु का आधार नहीं लिया। वेणीसंहार, नागानन्द और उत्तररामचरित आदि कई नाटक उदाहरण के लिए प्रस्तुत किये जा सकतेह हैं।
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४८८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
२. इन भारतीय लेखकों ने आध्यात्मिक दृष्टि से मृत्यु का महत्त्व बहुत-कुछ कम कर दिया था। उनके विचार से मृत्यु जीवन का अन्त नहीं करती, प्रत्युत आध्यात्मिक जीवन का द्वार खोलकर ईश्वर तक पहुँचाती है। फलस्वरूप, इस भावना की वर्त्तमानता में त्नासदी का निर्माण नहीं हो सकता और न हुआ। इस दृष्टि से यूनानी और भारतीय लेखकों के दृष्टिकोणों में पर्याप्त अन्तर था। ३. संस्कृत-नाटकों का एक उद्देश्य मनोरंजन भी रहा है। किसी दुःखी व्यक्ति के मनोरंजन के लिए कोई साधन चाहिए, किन्तु त्ासदी से तो दर्शक के मस्तिष्क का भारी बोझ और भी गुरुतर हो जायगा। ४. हिन्दू-नीतिशास्त्र का सिद्धान्त है कि पुण्य पाप पर विजय प्राप्त करता है; गुण दोष पर विजयी होता है। यह सिद्धान्त उदात्त गुणों से सम्पन्न नायक का पतन नहीं होने देता और उसे विपन्न नहीं बनने देता। कर्मफल के नियम के अनुसार यदि किसी व्यक्ति पर विपत्ति आती है, तो इससे किसी की सहानुभूति जागरित नहीं होती; क्योंकि वह व्यक्ति केवल अपने किये का फल पा रहा है। अतः, उसका पतन तासदी नहीं कहा जा सकता। तथापि संस्कृत के कई नाटक हैं, जो अत्यन्त कारुणिक हैं; उदाहरणार्थ, उत्तर- रामचरित, वेणीसंहार तथा नागानन्द में कई दृश्य ऐसे हैं, जो यदि नाटककार चाहते, तो बहुत सरलता से तासदी में परिवर्तित कर सकते, परन्तु उन्होंने अलौकिक शक्ति का उपयोग करके उन्हें सुखान्त बना दिया है। परन्तु, इसका अर्थ यह नहीं है कि भारतीय नाटक स्पष्ट विभागों-शुद्ध तासदी और शुद्ध कामदी या सुखान्त नाटकों में विभक्त हैं। किसी भी नाटक में दुःखान्त और सुखान्त स्वतन्त्रतापूर्वक मिश्रित किये गये हैं। हास्य-योजना विदूषक के द्वारा की जाती है। यूरोपीय तथा संस्कृत-नाटकों में एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि संस्कृत-नाटकों में तासदी और कामदी के अन्तर का नितान्त अभाव है। भारतीय नाटक अपने को न अपराधों में और न जीवन की विरूपता में ही सीमित कर लेते हैं। वे न कष्ट के भय में और न समृद्धि के आह्लाद में ही लीन हो जाते। इस दृष्टि से संस्कृत-नाटक अँगरेजी तथा स्पेनी नाटकों के समकक्ष सिद्ध होते हैं, जिनके विषय में 'तासदी' और 'कामदी' शब्द उस अर्थ में पूर्णरूप से लागू नहीं होते, जिस अर्थ में प्राचीनों ने इनका प्रयोग किया था। इन नाटकों में सुख तथा दुःख का अपूर्व मिश्रण होता है। वे कभी भी विपन्न अन्त प्रस्तुत नहीं करते, जैसा डॉ० जॉनसन ने कहा है कि शेक्सपियर के युग में तासदी के निर्माण के लिए यही पर्याप्त होता। यद्यपि संस्कृत-नाटक मानव-हृदय में उठनेवाले सभी भावों (जिनमें भय तथा करुणा भी हैं) का उद्रेक करने का प्रयत्न करते हैं तथापि वे कभी भी प्रेक्षकों के मस्तिष्क पर कष्टप्रद प्रभाव नहीं छोड़ते। वस्तुतः भारतीय नाटकों में तासदी है ही नहीं। इस तथ्य से यह सिद्धान्त खण्डित हो जाता है कि कामदी के पूर्व त्ासदी का विकास हुआ। यह समझना ठीक नहीं है कि भारतीय नाटकों में दुःखजनक अन्त केवल भूल से छूटता रहा है। सत्य तो यह है कि दुःखजनक अन्त का निवारण विशेष नियम के द्वारा
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रूपक के भेदोपभेद [४८९
किया गया है और नायक अथवा नायिका की मृत्यु की घोषणा कभी नहीं की जा सकती। इसीलिए, प्रेक्षकों की दृष्टि के सामने कभी मृत्यु नहीं दिखाई जा सकती है। संस्कृत-नाटक तथा ग्रीक तासदी : कई बातों में संस्कृत-नाटक और ग्रीक तासदी में तुलना की जा सकती है। अरस्तू ने तासदी के विषय में लिखा है : The imitation of a solemn and perfect action of adequate impor- tance, told in a pleasing language, exhibiting the several elements of dramatic composition in its different parts, represented through the instru- mentality of agents, not by narration and purifying the affections of human nature by the influence of pity and terror.9 संस्कृत-नाटकों तथा ग्रीक तासदियों-दोनों में नायक योग्य और उच्च व्यक्ति होते हैं। विषय की दृष्टि से भी दोनों में समानता है। परन्तु, दोनों में कुछ विभिन्नताएँ भी हैं, जिनकी ओर हमारा ध्यान जाना अनिवार्य है। नीचे कुछ तथ्य प्रस्तुत किये जा रहे हैं : १. संस्कृत-नाटक में ग्रीक तासदी में पाई जानेवाली तीनों अन्वितियों में से केवल कार्यान्विति को पूर्ण स्वीकृति मिली है। स्थानान्विति को संस्कृत-नाटक में कोई स्थान नहीं मिला है। ग्रीक रंगमंच बहुत विस्तार से सजाया जाता था, इसलिए उसे प्रत्येक स्थान के लिए बदलना कठिन था। फलस्वरूप आदि से अन्त तक एक ही स्थान का दृश्य रखा जाता था। इसके विपरीत भारतीय रंगमंच में उतनी सजावट नहीं करके कल्पना से ही अधिक काम लिया जाता था। अतः, स्थान-परिवर्त्तन करने में कोई विशेष कठिनाई नहीं होती थी। कालान्विति परिवर्त्तित रूप में भारतीय नाटकों में अंशतः पाई जाती थी। व्यवहार में नियम की अपेक्षा कम स्वतन्त्रता है और एक अंक की कथा प्रायः कार्य होने का ही समय लेती है या अधिक-से-अधिक सूर्य के एक दूसरे चक्कर-एक दिन का समय लेती है। किन्तु, उत्तररामचरित में बहुत अधिक समय लिया गया है और प्रथम तथा द्वितीय अंकों के बीच में पूरे बारह वर्ष का समय बीत जाता है। कथा के विषय के लिए ऐसा करना अनिवार्य था। २. संस्कृत-नाटक का अन्य देशों के नाटकों से दूसरा अन्तर यह है कि संस्कृत-नाटक में तासदी और कामदी के अन्तर का नितान्त अभाव है। उनमें दुःख की गम्भीरता तथा हास्य के हल्केपन का विचित्र मिश्रण रहता है। यद्यपि इन नाटकों का भी उद्दृश्य मानव- हृदय में सभी प्रकार के भावों-करुणा और भय-सहित-का उद्रेक करना होता है, फिर भी वे प्रेक्षक के हृदय पर कष्टदायक प्रभाव नहीं छोड़ना चाहते। वस्तुतः, भारतीय नाटकों में तासदी का अभाव ही है। भारतीय नाट्यशास्त्रियों ने नियम बनाकर रंगमंच पर नायक और नायिका की मृत्यु के प्रदर्शन पर रोक लगा दी थी।
१. श्रीविल्सन द्वारा उद्धत, 'द थियेटर ऑफ द हिन्दूज़', पेज १२
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४९०] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास 1 हि३. अन्य देशों के नाटकों से भारतीय नाटक का अन्तर विस्तार की दृष्टि से भी है। संस्कृत-नाटक कुछ अधिक लम्बे हैं। अकेला मृच्छकटिक सामान्य विस्तार के तीन ग्रीक तासदियों के बराबर है। किन्तु, वास्तविक प्रस्तुतीकरण में यूनानी प्रदर्शन की अपेक्षा भारतीय प्रदर्शन प्रेक्षक के धैर्य की कम ही परीक्षा करता था; क्योंकि यूनानी रंगमंच पर तीन तासदियों के साथ एक प्रहसन का भी एक ही बैठक में प्रदर्शन होता था। यदि भारतीय नाटक लम्बा होता था, तो एक बैठक में एक ही दिखाया भी जाता था। उपसंहार (क) रूपक के भेदों के विकास में नाटक-प्रकरण : (दस या बारह) रूपकों और अट्ठारह, बीस या बाईस उपरूपकों की गणना से कई महत्त्वपूर्ण तथ्य उपस्थित होते हैं। संस्कृत-नाट्य-साहित्य का मनन करने से स्पष्ट हो जाता है कि भास के पूर्व ही रूपक के विभिन्न भेदों की रचना होने लगी थी; क्योंकि स्वयं भास के ही नाट्य-साहित्य में रूपक के कई एकांकी, व्यायोग आदि पाये जाते हैं। रूपकों में भी कई ऐसे भेद हैं, जिनके उदाहरण स्वतन्त्र रूप से उपलब्ध नहीं होते, परन्तु उनका गठन देखने से स्पष्ट होता है कि उनकी रचना की प्रेरणा सर्वलक्षण-सम्पन्न नाटक से मिली होगी। अधिक सम्भव यही जान पड़ता है कि सबसे पहले नाटक की ही रचना हुई होगी, यद्यपि डॉ० मनमोहन घोष के अनुसार सबसे पहले एकांकी की ही रचना हुई और वे एकांकी को ही सबसे अधिक प्राचीन मानते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता गया, कुछ-कुछ विशेषताओं को लेकर प्रकरण आदि अन्य भेदों का विकास होता गया। उदाहरण के लिए नाटिका और प्रकरणी को ले सकते हैं। दोनों में मौलिक अन्तर यह है कि नाटक के समान नाटिका का नेता राजा होता है और प्रकरणी का नेता प्रकरण के समान ब्रह्मा, वणिक आदि। (ख) रूपक के रूप में ही विशुद्ध नाट्य की गणना : कुछ विद्वानों का मत है कि भरत के समय में ही उपरूपक के भेद प्रचलित थे और भरत ने जान-बूझकर ही उनकी पृथक् गणना नहीं की और रूपकों के अन्तर्गत उनका अन्तर्भाव भी नहीं किया। यह मत ठीक भी हो सकता है; क्योंकि दशरूपक के टीकाकार धनिक और अभिनवगुप्त के मत से उपरूपक गीत-नृत्य-प्रधान रूपक थे, नाट्य-प्रधान नहीं। आचार्य क्षेमेन्द्र ने तो इन्हें गेय श्रेणी में रखा ही है। कोहल ने एक और भी विभाजन प्रस्तुत किया है और नाम दिया है मार्ग और देशी। इस विभाजन के आधार पर सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि प्राचीन काल से ही रूपकों की दो परम्पराएँ प्रचलित थीं-एक थी साहित्यक परम्परा और दूसरी थी लोक-परम्परा। (ग) रूपक आभिजात्य कला एवं संस्कार से प्रभावित : रूपकों और उपरूपकों में एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि रूपकों पर आभिजात्य कला तथा संस्कार का पूर्ण प्रभाव परिलक्षित होता है; परन्तु उपरूपक ऐसे प्रभाव से अलग ही रहे। रूपक परिष्कृत तथा सुरुचिपूर्ण हैं और कला की दृष्टि से पूर्ण हैं; परन्तु देशी वे ही बने रहे, जिनमें आभिजात्य
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रूपक के भेदोपभेद [४९१
संस्कार का विकास नहीं हो सका और कला की दृष्टि से वे पूर्ण नहीं हो सके। उपरूपकों में केवल कुछ गीतों, नृत्यों या नृत्तों का प्रयोग करके मनोरंजन करने की थोड़ी-सी चेष्टा की जाती थी। रूपक के भेदों में भी नाटक तथा प्रकरण सर्वाधिक पूर्ण थे और इनमें सुख- दुःखात्मक जीवन-रस की जैसी मनोहर संवेदना, सौन्दर्य की जैसी जीवन्त सृष्टि तथा जीवन के ओज एवं उदात्तता का जैसा सजीव प्रतिफलन होता था, वैसा रूपक के अन्य भेदों में नहीं। अन्य रूपकों या उपरूपकों में भावों की यह उच्चता, विचारों की समृद्धि, हास्य एवं आनन्द का वह सम्मिलित प्रभाव कहाँ मिलने को, जैसा नाटक और प्रकरण में हम पाते हैं? अन्य रूपक या उपरूपक प्रायः एकांकी ही हैं। कुछ में रौद्र या वीर प्रधान है, तो दूसरे में शृंगार या हास्य और किसी अन्य में अश्लील हास्य या विनोद का ही प्राधान्य पाया जाता है। अतः, सम्भव है कि भेद की परम्परा का आरम्भ भरत से भी पूर्व का हो और भास का काल आते-आते यह परम्परा पर्याप्त रूप से स्पष्ट हो चुकी होगी। (घ) भेदों के मूल में सामाजिक कारण : रूपक के इन भेदों में सामाजिक कारण भी देखा जा सकता है। रूपक के विभिन्न भेदों में समाज के विभिन्न स्तर दिखाई देते हैं। नाटक में प्रायः सामन्ती समाज का चित्रण देखा जा सकता है, प्रकरण में मध्यम वर्ग के व्यक्तियों तथा उनकी समस्याओं का विवरण मिलता है और प्रहसन में समाज के निम्न वर्ग के पात्रों तथा उनके कार्य-कलाप के द्वारा समाज की कुरीतियों पर कशाघात किया जाता है। इसी प्रकार अन्य रूपक-भेदों में भी यह तथ्य दृष्टिगोचर होता है। (ङ) रूपकों के भेद में आर्यों की चिन्तन-समृद्धि का प्रतीक निहित : जब हम रूपक के विभिन्न भेदों का विश्लेषण करते हैं तो हमें ज्ञात होता है कि रूपकों के भेदों में आर्यों की चिन्तन समृद्धि का प्रतीक निहित है। हमारे प्राचीन आचार्य किसी विषय का गहन अध्ययन तथा मनन करके उसका सूक्ष्म विश्लेषण करते थे और फिर उसके विभिन्न भेद तथा उपभेद करते थे। रूपक के भी अनेक भेदों से स्पष्ट हो जाता है कि हमारे पूर्वज आर्यों का चिन्तन कितना समृद्ध था। जबतक चिन्तन की समृद्धि नहीं होगी, तबतक भेदोपभेदों में इतना सूक्ष्म अन्तर बताना असम्भव ही है। (च) भेदों के आधार में भरत की विचारधारा : नाट्यशास्त्र की अन्य बातों के समान रूपक के भेदों के विवेचन में भी भरत की विचारधारा दृष्टिगोचर होती है। उन्होंने कथावस्तु, विस्तार तथा रस को ध्यान में रखकर रूपक को दस भेदों में विभक्त किया और प्रत्येक के लिए कुछ नियम भी निर्धारित किये। भरत मुनि मौलिक चिन्तक थे और रूपक के भेदों के विश्लेषण में भी उनकी चिन्तन-पद्धति तथा विचारधारा का स्पष्ट प्रमाण उपलब्ध होता है।
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दशम अध्याय हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त का विकास पृष्ठभूमि : हिन्दी में नाट्य-सिद्धान्त विषयक ग्रन्थों की रचना काफी पीछे चलकर हुई। भारतेन्दुजी का 'नाटक' शीर्षक ग्रन्थ नाट्य-सिद्धान्त सम्बन्धी प्रथम पुस्तक है। नाट्य-सिद्धान्त-विषयक ग्रन्थ की रचना के बहुत पूर्व ही नाटकों की रचना होने लगी थी। इन नाटकों में संस्कृत-ग्रन्थों में निर्दिष्ट सिद्धान्त ही मुख्यतः अपनाये गये। उनमें कहीं-कहीं अँगरेजी तथा बँगला से प्रभाव ग्रहण करके नाट्य-सिद्धान्त में यथास्थान परिवर्त्तन किया गया। उन नाटकों में उनके लेखकों का नाट्य-सिद्धान्त अभिव्यक्त होता है। अतः, प्रमुख नाटककारों के नाट्य-सिद्धान्त का विश्लेषण उनके नाटकों के आधार पर करने का प्रयास किया जा रहा है। कुछ अन्य विद्वानों ने स्वतन्त्र पुस्तकें लिखकर नाट्य-सिद्धान्त का विवेचन किया है; उनके सिद्धान्तों का भी विकास दिखाने का प्रयत्न किया जायगा। हिन्दी का प्रथम नाटक रास के रूप में विक्रम की तेरहवीं शती में ही लिखा जा चुका था। परन्तु, भारतेन्दुजी ने अपनी 'नाटक' शीर्षक पुस्तक में हिन्दी के आरम्भिक नाटकों के रूप में 'देवमायाप्रपंच', 'प्रभावती' तथा 'आनन्द-रघुनन्दन' को माना है। परन्तु, इनमें नाटकीय नियमों का पूर्ण पालन नहीं है और ये छन्द में हैं, अतः भारतेन्दुजी ने इन्हें नाटक नहीं स्वीकार किया। उन्होंने अपने पिता गिरिधरदास के 'नहुष' को हिन्दी का सर्वप्रथम नाटक कहा है। परन्तु, 'विद्यासुन्दर' की द्वितीय आवृत्ति के उपक्म में उन्होंने 'आनन्द-रघुनन्दन' को हिन्दी का प्रथम नाटक स्वीकारा है। डॉ० गुलाबराय' और बाबू ब्रजरत्न दास२ रीवा-नरेश महाराज विश्वनाथ सिंह-रचित 'आनन्द-रघुनन्दन' को ही हिन्दी का प्रथम नाटक मानते हैं। डॉ० लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय भी इसे ही हिन्दी का पहला नाटक मानते हैं।3 कलकत्ता में नाट्य-गृह का निर्माण हो चुका था, जिसमें अँगरेजी-नाटकों का अभिनय होता था। इन अँगरेजी-नाटकों का अभिनय देखकर देशी भाषा-प्रेमी भारतीयों की आँखें खुली और प्रतिभाशाली विद्वानों का ध्यान देशी भाषाओं में नाटक रचने की ओर गया। इन लेखकों का ध्यान संस्कृत की प्रचुर नाट्य-सामग्री की ओर जाना स्वाभाविक ही था। ऐसे पुनरुत्थान के युग में लेखकों ने नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटक की रचना करना लाभदायक माना। १. हिन्दी-नाट्य-विमर्श, पृ० ७६ २. हिन्दी-नाट्य-साहित्य, पृ० ५८ ३. आधुनिक हिन्दी-साहित्य की भूमिका, पृ० ४९६
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हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त का विकास [४९३
अंब कुछ प्रमुख नाटककारों की नाट्य-रचनाओं में परिलक्षित और विशिष्ट नाट्यशास्त्रियों के ग्रन्थों में प्रतिपादित नाट्य-सिद्धान्त का विवेचन करें। विश्वनाथ सिंह रीवाँ-नरेश महाराज विश्वनाथ सिंह ने अपना नाटक 'आनन्द-रघुनन्दन' नवीन दृष्टिकोण से लिखा और नाट्य-लेखन में भरत के नाट्यशास्त्र के नियमों को परवर्त्ती संस्कृत-नाट्याचार्यों द्वारा संशोधित तथा परिवत्तित रूप में अपनाया। 'आनन्द-रघुनन्दन' में स्वीकृत नाट्य-सिद्धान्त : 'आनन्द-रघुनन्दन' नाटक में सात अंक हैं और प्रत्येक अंक में अनेक दृश्य हैं। दृश्य-परिवर्त्तन स्पष्ट रूप से नहीं लिखा गया है; परन्तु जहाँ 'सर्वे निष्कान्ताः' लिखा गया है, वहीं दृश्य-परिवर्त्तन समझ लेना चाहिए। इस तरह कथानक का एक अंश जिस स्थल पर समाप्त होता है, वहीं दृश्य- परिवर्त्तन हो जाता है और जब पाठक नाटक पढ़ता है, तो उसे कथानक की कड़ी जुड़ी हुई जान पड़ती है। नाटक में गद्य का सर्वप्रथम शास्त्रीय रीति से प्रयोग करने का श्रेय महाराज विश्वनाथ सिंह को ही है। उन्होंने नाटक में नान्दी, सूत्रधार, विष्कम्भक, भरतवाक्य आदि को स्थान दिया। चरित्र-चित्रण तथा संवाद-योजना में उन्हें पूर्ण सफलता मिली और उन्होंने भविष्य के नाटककारों का पथ-प्रदर्शन किया। शतियों की नाट्य-रचना के पश्चात् देश में ऐसा वातावरण उपस्थित हुआ कि विश्वनाथ सिंह ने संस्कृत की नाट्य-शैली को पूर्णतया अपनाया। उन्होंने नान्दी, सूत्रधार और प्रस्तावना का विधान संस्कृत से लिया और यह विधान परवर्त्ती नाटककारों ने स्वीकार किया। यह परम्परा भारतेन्दु-काल में तो चली ही, प्रसादजी के आरम्भिक नाटकों में भी इसे देख सकते हैं। विश्वनाथ सिंह ने अपने नाटक में भजन, पद आदि गेय पदों को स्थान दिया। नाटक में गीत देने की परम्परा चली, जिसे भारतेन्दुजी ने भी स्वीकार किया और आगे चलकर प्रसादजी आदि कई श्रेष्ठ नाटककारों ने भी यह शैली अपनाई। विश्वनाथ सिंह ने दृश्य-परिवर्तन की भी नवीन पद्धति चलाई, जिसका प्रभाव प्रसादजी के युग तक रहा। विष्कम्भक, आकाश-भाषित आदि का प्रयोग भारतेन्दुजी ने भी किया और प्रसादजी के पहले तक यह चलता रहा। स्पष्ट है कि नाटक के क्षेत्र में महाराज विश्वनाथ सिंह का प्रभाव लगभग एक शती तक अक्षुण्ण रहा। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र के बाल्यकाल में नाटक की निम्नलिखित शैलियों का प्रचलन था-१. ब्रज में रासलीला की शैली, २. उत्तर-भारत में रामलीला की शैली,
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४९४ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
३. बंगाल में यात्रा-नाटक की शैली, ४. स्वांग आदि जन-नाटकों की शैली और ५. महाराज विश्वनाथ सिंह द्वारा गृहीत 'आनन्द-रघुनन्दन' नाटक में नवीन शैली, जिसपर संस्कृत-नाटकों की पूरी छाप थी। भारतेन्दुजी के पिता गिरिधरदास ने 'नहुष' नाटक लिखा था, जिसमें तीन चौथाई भाग पद्य है, जो ब्रजभाषा में है। अभिप्राय यह है कि भारतेन्दुजी को बचपन में नाट्य-शैली के रूप में जो पैतृक सम्पत्ति मिली, वह ब्रजभाषा में पद्य-प्रधान थी। परन्तु, यह नाटक 'आनन्द-रघुनन्दन' की शैली पर है, जिसमें नान्दी, सूत्रधार तथा प्रस्तावना का समावेश है। भारतेन्दुजी ने अपने नाटकों में कई शैलियों का प्रयोग किया। उनके मौलिक नाटकों को देखने से पता चलेगा कि उन्होंने कितनी शैलियों में नाटक लिखे।
नाटकों में प्रयुक्त सिद्धान्त : भारतेन्दुजी ने अपने स्वर में नवीनता भरने का यथासम्भव प्रयास किया, परन्तु परम्परा से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सके। सम्भवतः वे अपने युग की सामाजिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों के बाह्य कलेवर में इस प्रकार आबद्ध हो गये कि उन्हें दूसरी बातों का ध्यान ही नहीं रहा। किसी संस्थापक के सामने कई विवशताएँ रहती हैं, भारतेन्दुजी के भी सामने विवशताएँ थीं, इसी कारण उनमें आधुनिकता का पूरा समावेश नहीं हो सका। उनकी उपलब्धि यही है कि उन्होंने अपने समय की बदलती हुई लोक-रुचि पर ध्यान देकर प्राचीन नाट्यशास्त्रीय नियमों की जटिलता दूर कर दी और उन नियमों में आवश्यक परिवर्त्तन करके उन्हें अपने नाटकों के शिल्प के रूप में स्वीकार किया। भारतेन्दुजी के नाट्य-सिद्धान्त में प्राचीन तथा नवीन का न्यूनाधिक मिश्रण है। उनकी धारणा थी कि अतीत तथा वर्त्तमान के आलोक में ही भविष्य की रूपरेखा खड़ी की जा सकती है; इसीलिए हमारे नाटकों को न तो अपनी परम्परा से मुँह मोड़ लेना चाहिए और न नवीन मान्यताओं को ग्रहण करते समय किसी प्रकार की दुविधा होनी चाहिए। भारतेन्दुजी ने परम्परागत संस्कृत-शैली को मुख्य रूप से अपनाया, परन्तु उसमें यूरोपीय नाट्य-कला का भी मिश्रण कर लिया। उन्होंने अपने आरम्भिक नाटकों में दोनों शैलियों का अलग-अलग प्रयोग किया और जिस कथानक के अनुकूल जो पद्धति जँची, उसे ही स्वीकार किया। रचना-शैली में उन्होंने मध्यम मार्ग का अवलम्बन किया। उन्होंने न अँगरेजी-नाटकों का अन्धानुकरण किया और न बँगला-नाटकों के समान भारतीय शैली की सवथा उपेक्षा की। साथ ही, उन्होंने यह भी ध्यान में रखा कि संस्कृत-नाट्य- शास्त्र में उनका नाट्य बुरी तरह उलझ न जाय। कहने का अभिप्राय यह है कि उन्होंने अपने को उन सभी बन्धनों से मुक्त रखा, जो नाटक में गतिरोध उत्पन्न करते हैं। उन्होंने अपने नाटकों का विषय जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से लिया, अतः उनके नाटकों में शृंगार, शोर्य, करुणा आदि सभी विषयों का समावेश हुआ। भारतेन्दु ने अपनी दृष्टि बहुत व्यापक रखी और संस्कृत, बँगला, अँगरेजी; जहाँ कहीं उन्हें उपयुक्त सामग्री मिली, निस्संकोच ग्रहण की।
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'अंधेर नगरी' नामक प्रहसन में एक ही अंक है, जो कई दृश्यों में विभक्त है। 'विषस्य विषमौषधम्' एक अंक का भाण है। भावप्रकाशन में वर्णित नौ प्रकार के भाणों में यह चित्र-जाति का है। इसमें भारतेन्दुजी ने मुहावरों का प्रचुर प्रयोग किया है। चित्र- जाति के भाण में अनेक भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। 'चन्द्रावली' नाटिका को उन्होंने पूर्वकाल से चली आ रही रास-शैली पर रचा है। इस नाटिका की रचना द्वारा उन्होंने रासलीला-नाटकों में एक नये विधान का संयोग करने का प्रयत्न किया। इस नाटिका में चार अंक तथा एक विष्कम्भक हैं। 'भारत-दुर्दशा' एक प्रतीकात्मक नाटक है। इसके आधे से कम पात्र वर्ग या समुदाय के प्रतिनिधि हैं और आधे से अधिक पात्र मानवीकृत रूप में हैं। परन्तु, भारतेन्दुजी की शैली पूर्ण परिपक्वता नहीं पा सकी। उनके नाटकों में प्रस्तावना, मंगलाचरण, नान्दीपाठ, सुत्रधार, नटी, भरतवाक्य आदि आये हैं। 'नीलदेवी' में पताकास्थानक का प्रयोग है और 'सत्यहरिश्चन्द्र' आदि कई नाटकों में आकाश-भाषित मिलता है। कहीं-कहीं स्वगत भाषण की अधिकता हो गई है। 'सत्यहरिश्चन्द्र' में श्मशान का वर्णन आवश्यकता से अधिक लम्बा हो गया है। इसमें चतुर्थ (अन्तिम) अंक भी बहुत दीर्घ है, जो संस्कृत-नाट्य-सिद्धान्त के विरुद्ध है। उन्होंने अपने नाटकों में पद्यों तथा गीतों का बाहुल्य रखा है। वस्तुतः, भारतेन्दु के सामने 'दृश्य काव्य' का उद्देश्य था, इसीलिए वे नाटकों को पद्य से मुक्त नहीं कर सके। उन्हें यह असुविधा इसलिए हुई कि गद्य और पद्य की भाषा भिन्न-भिन्न थी। वे अपने नाटकों को स्वाभाविकता के निकट लाने में असमर्थ ही रहे। एक समृद्ध रंगमंच के अभाव, जनता की विकृत रुचि तथा उनके असामयिक निधन ने उनके नाटकों को आधुनिकता से कुछ दूर ही रख दिया। इन कतिपय त्ुटियों के रहते भी हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त के विकास में भारतेन्दुजी का स्थान बहुत उच्च तथा महत्त्वपूर्ण है। 'नाटक' पुस्तक में नाट्य-सिद्धान्त : भारतेन्दुजी ने 'नाटक' शीर्षक अपनी पुख्तक में भरत द्वारा निर्दिष्ट सिद्धान्तों में युगानुरूप परिवर्त्तन करने का परामर्श दिया है-"नाट्य- कला-कौशल दिखाने को देश, काल और पात्रगण के प्रति विशेष रूप से दृष्टि रखनी उचित है। इसमें अब अलौकिक विषय का आश्रय करके नाटकादि दृश्य काव्य-प्रणयन करना उचित नहीं है। अब नाटक में कहीं 'आशी' प्रभूति नाट्यालंकार, कहीं 'प्रकरी', कहीं 'विलोचन', कहीं 'सम्फेट', कहीं 'पंचसन्धि' आदि ऐसे ही अन्य विषयों की कोई आवश्यकता नहीं रही। संस्कृत-नाटक की भाँति हिन्दी-नाटक में इनका अनुसन्धान करना, या किसी नाटकांग में इनको यत्नपूर्वक भरकर हिन्दी-नाटक लिखना व्यर्थ है।"१ फलस्वरूप भारतेन्दुजी ने रूपक तथा उपरूपक के कुछ प्राचीन भेदों को छोड़ दिया और कुछ नवीन भेद ग्रहण किये। उनके नाटकों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है। १. नाटक, पृ० १३-१४
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४९६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास भारतेन्दुजी ने नाटकों के दस प्रकार प्रस्तुत किये हैं। वे निम्नलिखित हैं। कुछ की परिभाषा उन्हीं के शब्दों में दी जा रही है। १. नाटक : 'काव्य के सर्वगुण संयुक्त खेल को नाटक कहते हैं। इसका नायक कोई महाराज (जैसा दुष्यन्त) वा ईश्वरांश (जैसा राम) वा प्रत्यक्ष परमेश्वर (जैसा श्रीकृष्ण) होना चाहिए। रस शृंगार वा वीर। अंक पाँच के ऊपर और दस के भीतर। आख्यान मनोहर और अत्यन्त उज्ज्वल होना चाहिए।" २. रूपक : भारतेन्दुजी ने रूपक की कोई परिभाषा नहीं दी। पाखण्ड-विडम्बन रूपक माना गया है। ३. प्रहसन (वैदिकी हिंसा, 'अन्धेर नगरी'), ४. व्यायोग (धनंजय-विजय), ५. नाटिका (चन्द्रावली), ६. भाण (विषस्य विषमौषधम्), ७. सट्टक (कर्पूरमंजरी), ८. नाट्यरासक या लास्य रूपक (भारत-दुर्दशा), ९. ऑपेरा: भारतेन्दुजी ने ऑपेरा के लिए 'संगीत-नाट्य' पर्याय दिया है (भारत-जननी), १०. गीतिरूपक : 'ये नवीन नाटक मुख्य दो भेदों में बँटे हैं-एक नाटक; दूसरा गीतिरूपक। जिसमें कथा-भाग विशेष और गीति न्यून हो, वह नाटक और जिसमें गीति विशेष हो वह गीतिरूपक।' उदाहरण नीलदेवी और सती-प्रताप। इस प्रकार भारतेन्दुजी ने मौलिक कृति तथा अनुवाद के रूप में दस प्रकार प्रस्तुत किये। इनमें से तीन-रूपक, ऑपेरा तथा गीतिरूपक-ऐसे हैं, जिनका उल्लेख प्राचीन नाट्यशास्त्र में नहीं है और सात प्राचीन शास्त्र के अनुकूल हैं। उन्होंने भारतीय नाट्य- शास्त्र के अन्य रूपों को क्यों नहीं प्रस्तुत किया ? भारतेन्दुजी ने अपने ग्रन्थ 'नाटक' में जिन प्राचीन रूपों का उल्लेख किया है, उनमें समवकार डिम, ईहामृग, अंक और वीथी के सम्बन्ध में लिखा है कि इनके उदाहरण नहीं मिलते। ऐसी स्थिति में केवल शास्त्र के ज्ञान पर इन रूपकों की रचना नहीं हो सकती थी। रूपकों में प्रकरण और उपरूपकों में तोटक-ये दो भेद ऐसे हैं, जिनके उदाहरणों से परिचित होते हुए भी भारतेन्दुजी ने उनकी रचना नहीं की। नाटक से प्रकरण की अत्यधिक समता होने के कारण शायद उन्होंने प्रकरण नहीं लिखा। शेष उपरूपकों के विषय में भारतेन्दुजी ने लिखा है-'यों ही थोड़े-थोड़े भेद में और भी शेष उपरूपक होते हैं। न तो इन उपरूपकों का काम ही विशेष पड़ता है। इससे सविस्तार वर्णन नहीं किया गया।'२ भारतेन्दुजी ने रूपक के उन्हीं भेदों की रचना की है, जिनका प्रायः काम पड़ता है। इससे उनके दृष्टिकोण का कुछ आभास मिलता है। १. नाटक, पृ० ७ २. वही, पृ० ११ ३. वही, पृ० १०
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नवीन नाटक-रचना के लिए भारतेन्दुजी ने पाँच मुख्य उद्देश्यों का निर्देश किया है- १. शृंगार, २. हास, ३. कौतुक, ४. समाज-संस्कार, ५. देश-वत्सल। उन्होंने कौतुक छोड़कर सभी प्रकार के नाटक लिखे। कौतुक के विषय में उन्होंने लिखा-'कौतुक विशिष्ट वह है, जिसमें लोगों के चित्त-विनोदार्थ किसी यन्त्र-विशेष द्वारा या और किसी प्रकार अद्भुत छटा दिखाई जाय।" भारतेन्दुजी ने सबसे अधिक समाज-संस्कार और देश-वत्सल नाटक लिखे। देश-वत्सल के विषय में उन्होंने लिखा है-'इन नाटकों का उद्देश्य पढ़ने- वालों वा देखनेवालों के हृदय में स्वदेशानुराग उत्पन्न करना है और ये करुण और वीर रस के होते हैं।'२ भारत-जननी, नीलदेवी, भारत-दुर्दशा आदि ऐसे ही नाटक हैं।
वस्तुतः, भारतेन्दुजी के विषय में डा० सत्येन्द्र का निम्नलिखित कथन सर्वथा उपयुक्त है-'भारतेन्दु ने समस्त भारतीय नाट्य-प्रणालियों को समझने की चेष्टा की और हिन्दी के लिए उपयोगी शैली निर्धारित की, जिसमें पूर्व का पूर्ण परित्याग न हो, पर नूतन का उचित आदर हो। वे वस्तुतः युग-प्रवर्त्तक हैं।'3
भारतेन्दुजी ने प्रस्तावना के उद्घातक आदि उन पाँच भेदों का उल्लेख किया है, जो प्राचीन नाट्यशास्त्रियों द्वारा उल्लिखित हैं। उन्होंने पुरानी परम्परा के अनुसार कैशिकी आदि चार वृत्तियों की चर्चा की है, परन्तु उनके समस्त उपभेदों का वर्णन नहीं करके केवल उपक्षेप तथा प्ररोचना का ही उल्लेख किया है। उन्होंने उपभेदों के विस्तार में जाना अनावश्यक समझा। इस विषय में उनका दृष्टिकोण नवीनता से प्रभावित है।
भारतेन्दुजी वस्तु तथा पात्र के विषय के विस्तार में बिल्कुल नहीं गये। अभिनय की चर्चा करते समय उन्होंने चार प्रकार के अभिनय का उल्लेख करके बीभत्साभिनय की भी चर्चा कर दी है-"एक पात्र द्वारा जब कथित अभिनय में से दो या तीन अथवा सब प्रदर्शित होते हैं, तो उसको बीभत्साभिनय कहते हैं।"४ अंक का लक्षण देने के बाद उन्होंने विरोधक में उन विषयों का उल्लेख किया है, जो रंगमंच पर निषिद्ध हैं। अरथोपक्षेकों में केवल विष्कम्भक की चर्चा की गई है, शेष प्रवेशक आदि की नहीं। विदूषक के विषय में भारतेन्दुजी का विचार है कि आवश्यकता पड़ने पर ही इस पात् की अवतारणा करनी चाहिए, "वीर अथवा करुणरस-प्रधान नाटक में विदूषक का प्रयोजन नहीं रहता। शृंगार की पुष्टि के हेतु विदूषक का प्रयोजन होता है, सो भी सब स्थलों पर नहीं।"५
१. नाटक, पृ० १२ २. वही, पृ० १२ ३. भारतेन्दु के नाटक : 'सेठ गोविन्द दास अभिनन्दन-प्रन्थ', पृ० २९० ४. नाटक, पृ० २६ ५. वही, पृ० ३६
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४९= ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकसि
नाटक-रचना-प्रणाली के अन्तर्गत लेखक ने पात्रानुकूल वार्त्तालाप, तथा अन्तर के भाव के चित्रण पर बल दिया है। उनका कथन है कि नाटक-रचना में शिथिलता का दोष कभी नहीं आने देना चाहिए। वेश और वाणी दोनों ही पात्रानुकूल होने चाहिए। लेखक ने बहुत संक्षेप में रसों का परिचय दिया है। परम्परागत नव रस के अतिरिक्त भक्ति वा दास्य, प्रेम वा माधुर्य, सख्य, वात्सल्य, प्रमोद वा आनन्द का भी उल्लेख हुआ है। अन्त में लिख दिया गया है कि वात्सल्य और प्रमोद के उदाहरण नहीं हैं। अभिनय-विषयक अन्यान्य स्फुट नियम के अन्तर्गत भारतेन्दुजी ने निम्नलिखित विषयों पर प्रकाश डाला है-नाटक की कथा, पात्रों के स्वर, पात्रों की दृष्टि, पात्रों के भाव, पात्रों का फिरना और पात्रों का परस्पर कथोपकथन। अन्त में नाटकों का इतिहास दिया गया है, जिसमें संस्कृत तथा हिन्दी के नाटकों के साथ यूरोप में नाटकों के प्रचार का भी विवरण है। भारतेन्दुजी की यह पुस्तक हिन्दी में लिखित नाट्यशास्त्र-विषयक पहली रचना है। यह अधिकांशतः परिचयात्मक है, सभी विषयों का मात्र परिचय दिया गया है। इसमें किसी विषय का विस्तृत तथा सम्यक् विवेचन ढूँढ़ने का प्रयास उचित नहीं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यही है कि यह हिन्दी में अपने विषय का प्रथम प्रयास है। दूसरी विशेषता यह है कि लेखक ने परम्परा का पालन करते हुए भी नवीन प्रभाव से मुख नहीं मोड़ा है। प्राचीन नाट्यशास्त्र के कई अप्रचलित विषयों को छोड़ दिया गया है और कई नई बातों का समावेश किया गया है। आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी ने हिन्दी-साहित्य के सभी क्षेत्रों की ओर ध्यान दिया और नाट्यशास्त्र पर भी उनकी दृष्टि गई। उन्होंने सन् १९०३ ई० में 'नाट्यशास्त्र' शीर्षक एक निबन्ध लिखा, जो सन् १९११ ई० में पुस्तकाकार प्रकाशित हुआ। यह बहुत छोटी पुस्तक है, परन्तु द्विवेदीजी ने इसमें नाट्यशास्त्र की प्रायः सभी आवश्यक विषयों की चर्चा की है। इसमें भारतीय नाट्य-साहित्य की प्राचीनता का विवरण देने के बाद रूपक तथा उपरूपक का परिचय दिया गया है। लेखक ने इस पुस्तिका में पात्र-योजना, वृत्ति, रचना-चातुर्य, भाषा आदि का भी संक्षेप में विवरण दिया है। द्विवेदीजी का मुख्य उद्देश्य हिन्दी के पाठकों को नाट्यशास्त्र की मुख्य बातों से परिचित कराना ही है, जिसमें वे बहुत अंश में सफल भी हुए हैं। उनके इस विवेचन का आधार मुख्यतः संस्कृत-ग्रन्थों में प्रतिपादित नाट्य-सिद्धान्त ही है। यद्यपि इस पुस्तिका से नाट्य-सिद्धान्त के विकास में कोई विशेष प्रगति नहीं हो सकी, फिर भी इसका ऐतिहासिक मूल्य बहुत अधिक है। इसके पहले इस विषय पर केवल एक ही रचना उपलब्ध थी-वह थी भारतेन्दुजी की 'नाटक'-शीर्षक निबन्ध-पुस्तक।
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भारतेन्दुजी की पुस्तक के पश्चात् द्विवेदीजी की इस पुस्तक का द्वितीय स्थान है। इसके बहुत दिनों बाद तक हिन्दी में इस विषय पर कोई अन्य पुस्तक नहीं लिखी गई। भारतीय नाट्य-सिद्धान्त के विकास में यह पुस्तक निश्चय ही एक मोड़ है। द्विवेदीजी ने पं० बलवन्त कमलाकर द्वारा लिखित नाट्यशास्त्र-प्रबन्ध के हिन्दी- अनुवाद की चर्चा की है। इसपर अनुवादक ने मूल लेखक का नामोल्लेख नहीं किया है। डॉ० श्यामसुन्दर दास तथा डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल सन् १९३१ ई० में डॉ० श्यामसुन्दर दास तथा डॉ० पीताम्बरदत्त बड़थ्वाल के सम्मिलित प्रयत्न से 'रूपक-रहस्य' नामक ग्रन्थ प्रकाशित हुआ। भूमिका में स्वीकार किया गया है कि इस पुस्तक का मूलाधार धनंजय-कृत 'दशरूपक' और उसपर धनिक-कृत टीका है। अनेक स्थलों पर कुछ अन्य पुस्तकों से भी सहायता ली गई है और कई स्थलों पर स्वतन्त्र विवेचन भी किया गया है। इस पुस्तक में नौ अध्याय हैं। पहले अध्याय का आधार 'दशरूपक' नहीं है। इसमें नाटक की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रचलित कई यूरोपीय तथा भारतीय सिद्धान्तों की समीक्षा की गई है। लेखकों ने नाटक के बीज-रूप में अनुकरण को स्वीकार किया है। नाट्य-साहित्य की उत्पत्ति के विषय में उनकी स्थापना है कि नृत्य तथा संगीत से नाटक की उत्पत्ति हुई, 'संसार की भिन्न-भिन्न जातियों के नाट्य-साहित्य का प्राचीन इतिहास भी यही बतलाता है कि नाट्य-साहित्य की उत्पत्ति वास्तव में नृत्य से, और उसके साथ-ही-साथ संगीत से भी हुई है।"१ भरत के नाट्यशास्त्र से कई उद्धरण देकर दिखाया गया है कि भारतीय नाट्य का आदर्श केवल मनोरंजन ही नहीं, प्रत्युत धर्म, आयु और यश की वृद्धि करना है। वे मानते हैं कि नाट्य- शास्त्र में वणित नाट्यवेद के पाठ्य आदि चार तत्त्व चार वेदों से लिये गये हैं। लेखकों ने कुछ यूरोपीय विद्वानों के इस कथन का खण्डन किया है कि भारतीय नाटक यूनानी नाटक से प्रभावित है : 'सारांश यह है कि कदाचित् एक भी बात ऐसी नहीं है, जो यूनानी और भारतीय नाटकों में समान रूप से पाई जाती हो।" यूनानी, रोमन, यूरोपीय, अँगरेजी, मिस्त्री तथा चीनी नाटकों के विकास का भी संक्षिप्त विवेचन किया गया है। वस्तुतः, एशिया में प्राचीनकाल में भारत तथा चीन दो ही देशों में नाटक का आरम्भ, प्रचार तथा विकास हुआ था। अध्याय के अन्त में आधुनिक भारतीय नाटकों का विकास दिखाया गया है। दूसरा अध्याय छोटा है। इसमें भरत द्वारा निर्दिष्ट अभिनय के आंगिक आदि चार भेदों का विवरण देकर नृत्त के भेद बताये गये हैं। फिर, रूपक के दस तथा उपरूपक के
१. रूपक-रहस्य, पृ० ४ २. वही, पृ० २७
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अट्ठारह भेद गिनाये गये हैं। अन्त में, धनंजय के अनुसार रूपक के तीन भेदक तत्त्वों-वस्तु, नेता और रस-का उल्लेख कर दिया गया है। तीसरा अध्याय वस्तु-विन्यास का है। इसमें पहले वस्तु के दो भेद आधिकारिक तथा प्रासंगिक बताकर साहित्यदर्पण के अनुसार पताकास्थानक के चार भेदों का विवरण दिया गया है। लेखकों ने अर्थ-प्रकृति के बीज आदि पाँच भेदों और कार्य की आरम्भ आदि पाँच अवस्थाओं का विवेचन किया है। इसके बाद नाटक-रचना के मुख आदि पाँच सन्धियों और उनके ६४ अंगों का विवरण दिया गया है। इसी अध्याय में वस्तु के दो विभाग-दृश्य और सूच्य-का विवेचन किया गया है। इसी प्रसंग में विष्कम्भक आदि पाँच अर्थोपक्षेपकों और नाटकीय वस्तु के अन्य तीन भेदों-श्राव्य, अश्राव्य तथा नियत-श्राव्य-को विवेचन हुआ है। इन सबके उदाहरण संस्कृत-नाटकों के हिन्दी-अनुवाद से दिये गये हैं। चौथे अध्याय का नाम 'पात्रों का प्रयोग' है। पहले धनंजय के अनुसार नायक के गुणों की गिनती कराई गई है। उसके बाद लेखकों ने स्वभाव-भेद से नायक के धीर, शान्त आदि चार भेदों का वर्णन किया है। फिर, अनुकूल आदि शृंगार रस के चार नायक-भेदों का विवरण दिया गया है। इसी स्थल पर नायक के आठ सात्त्विक गुणों का भी वर्णन हुआ है। लेखकों ने नायक के विट, विदूषक आदि अनेक सहायकों का भी उल्लेख किया है। तत्पश्चात् नायिका के स्वकीया, परकीया तथा सामान्या और फिर स्वकीया के मुग्धा, मध्या तथा प्रगल्भा और फिर इनके अनेक भेद संस्कृत-ग्रन्थों के अनुसार दिये गये हैं। इनके अतिरिक्त नायिका के व्यवहार और दशा-भेद के अनुसार स्वाधीनपतिका आदि आठ भेदों का विवेचन किया गया है। नायिका की दूतियों और उनके अलंकारों-अंगज, अयत्नज तथा स्वभावज-का विस्तार से वर्णन हुआ है। नायक, नायिका, अलंकार आदि के उदाहरण प्रायः ब्रजभाषा-काव्य से दिये गये हैं। पाँचवें अध्याय में लेखकों ने वृत्तियों की विवेचना की है। उन्होंने प्राचीन नाट्य- शास्त्रियों द्वारा निर्दिष्ट कैशिकी वृत्ति, सात्त्वती वृत्ति तथा आरभटी वृत्ति के चार-चार भेदों का विस्तृत विवेचन उपयुक्त उदाहरणों के साथ किया है। छठे अध्याय का शीर्षक है-'रूपक की रूप-रचना'। इसमें पूर्वरंग तथा प्रस्तावना का विवरण दिया गया है। इसी प्रसंग में भारती वृत्ति और उसके चार अंगों का परिचय दिया गया है। इसी स्थल पर लेखकों ने आमुख और प्रस्तावना का भी विस्तृत विवेचन किया है। फिर, वीथी तथा प्रहसन के अंगों का भी परिचय विस्तार से दिया गया है। यह सम्पूर्ण विवरण दशरूपक के आधार पर है। सातवें अध्याय में लेखकों ने रूपक के नाटक आदि दस भेदों का विवेचन किया है। यह विवेचन भी मुख्यतः दशरूपक को आधार मानकर किया गया है। तदुपरान्त उपरूपक के अट्ठारह भेदों का विश्लेषण हुआ है, जिसका आधार 'साहित्य-दर्पण' है। रूपकों तथा उपरूपकों के यथासम्भव उदाहरण भी दिये गये हैं।
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हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त का विकास आठवें अध्याय का नाम 'रसों का रहस्य' है। यह अध्याय अन्य अध्यायों की अपेक्षा अधिक विस्तृत है। भरत मुनि रस-सिद्धान्त के प्रवर्तक चाहे हों या न हों, परन्तु रस के सम्बन्ध में सदा उन्हीं का अनुसरण होता रहा है। इस ग्रन्थ में भी भरत मुनि के ही अनुसरण पर भाव, स्थायी भाव, संचारी भाव, विभाव, अनुभाव आदि का विवेचन किया गया है। भरत द्वारा गिनाये ३३ संचारी भावों को सभी प्राचीन आचार्यों ने स्वीकार किया और इस ग्रन्थ में भी वे ही संचारी भाव गिनाये गये हैं, किन्तु उदाहरण हिन्दी-काव्य-ग्रन्थों से खोज- खोजकर दिये गये हैं। रस-निष्पत्ति के सम्बन्ध में भरत के प्रसिद्ध रस-सूत्र की व्याख्या में भट्ट लोल्लट के उत्पत्तिवाद, श्रीशंकुक के अनुमितिवाद, भट्टनायक के भक्तिवाद और अभिनवगुप्त के अभिव्यक्तिवाद का विवेचन हुआ है। परवर्त्ती आचार्यों ने अभिनवगुप्त द्वारा दी गई व्याख्या को स्वीकार किया है। प्रस्तुत लेखकों ने अपूर्ण रस कहकर भावोदय, भावशान्ति, भावसन्धि तथा भाव-शबलता का भी उल्लेख किया है। तत्पश्चात् शान्त-सहित नव रस का विश्लेषण किया गया है; रसों के उपभेद भी उल्लिखित हैं। सभी के उदाहरण भी प्राचीन हिन्दी-काव्य-ग्रन्थों से प्रस्तुत किये गये हैं। नवें अध्याय में भारतीय रंगशाला का विवरण है। इसमें विशेष रूप से भरत के नाट्यशास्त्र से सहायता ली गई है। इस अध्याय में नाट्य, वेशभूषा आदि का भी उल्लेख किया गया है। प्रस्तुत ग्रन्थ में मौलिकता का स्थान अत्यन्त गौण है। प्राचीन नाट्यशास्त्रियों- विशेषतः धनंजय ने रूपक, रस, नायक-नायिका, कथावस्तु आदि का विवेचन किया, उसे ही लेखकों ने अपने ढंग से लिखा। कई स्थानों पर भरत के आधार पर विषय का प्रतिपादन किया गया है। उपरूपक के विषय में भरत तथा धनंजय ने कुछ नहीं लिखा, तो प्रस्तुत लेखकों ने इस विषय में विश्वनाथ कविराज के साहित्यदर्पण को अपना आधार बनाया। 'रूपक-रहस्य' की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि इसमें नाट्य-सम्बन्धी सभी आवश्यक विषयों का विवेचन हुआ है और यह उस समय लिखा गया था, जब इस विषय पर केवल दो ही छोटी-छोटी पुस्तिकाएँ वर्त्तमान थीं और उनमें भी सभी विषयों का समावेश नहीं हो सका था। श्रीजयशंकर प्रसाद हिन्दी में भारतेन्दुजी और उनके मण्डल के अन्य नाटककारों ने मौलिक नाटकों की जो तीव्र धारा प्रवाहित की थी, वह मन्द पड़ चुकी थी। अब विभिन्न भाषाओं से नाटकों का अनुवाद करके हिन्दी-नाट्य-साहित्य का कोश भरा जा रहा था और साथ ही नवीन शक्ति का संचार किया जा रहा था। शेक्सपियर के नाटकों के अनुवाद द्वारा हिन्दी में भावुकता आ रही थी। जहाँ पहले नाटकों का मुख्य उद्दश्य रस का प्रतिपादन था, अब वहाँ अन्तर्द्वन्द्व तथा क्लाइमेक्स पर अधिक बल दिया जाने लगा। द्विजेन्द्रलाल राय पर शेक्सपियर का गहरा प्रभाव पड़ रहा था, वही प्रभाव उनके नाटकों द्वारा हिन्दी-नाटकों पर
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पड़ने लगा। द्विजेन्द्रलाल राय के माध्यम से शेक्सपियर का प्रभाव हिन्दी-नाटकों पर आया। उनकी शैली के द्वारा भावोन्माद तथा करुणा को प्रमुख स्थान मिलने लगा। उनके नाटकों में हिन्दू-संस्कृति के प्रति एक विशेष मोह दिखाई देता है, नारी के प्रति आदर की भावना भी मिलती है। तत्कालीन हिन्दी-नाटक-लेखक तथा पाठक द्विजेन्द्र बाबू की ओर बहुत आकृष्ट हुए। प्रसादजी का जब आविर्भाव हुआ, उस समय एक ओर नवयुग-प्रवर्त्तक भारतेन्दुजी प्राचीन नाट्यशास्त्र के प्रतिनिधि के रूप में खड़े थे और दूसरी ओर, बँगला-नाटकों के माध्यम से शेक्सपियर का प्रभाव पड़ रहा था और पाश्चात्त्य नाटकों की अभिनय-कला अपना जादू डाल रही थी। ऐसे ही सन्धि-काल में प्रसादजी ने अपने साहित्यिक जीवन का आरम्भ किया। उन्होंने दोनों पश्चिमी और पूर्वी नाट्य-सिद्धान्तों का समन्वय करने का प्रयास किया; भारतीय रस-सिद्धान्त के साथ पाश्चात्त्य शील-वैचित्य का समन्वय किया। आरम्भिक नाटकों में नाट्य-सिद्धान्त : प्रसादजी ने अपने आरम्भिक नाटक 'सज्जन' में भारतेन्दु के चलाये मार्ग का अनुसरण करके नान्दी, सूत्रधार आदि को स्थान दिया और प्राचीन नाट्य-सिद्धान्त का पूर्ण निर्वाह किया। कथानक प्रख्यात तथा चिरपरिचित है। नाटक का आरम्भ नान्दी-पाठ से और अन्त भरत-वाक्य से होता है। संवाद में पद्यांशों का भी प्रयोग किया गया है, जो अस्वाभाविक प्रणाली है। इसपर पारसी थिएटरों का भी प्रभाव देखा जा सकता है। एक अन्य बात में भी भारतेन्दुजी का अनुसरण इसमें दिखाई देता है। इस एकांकी रूपक में गद्य तो खड़ीबोली में रखा गया है, परन्तु पद्य ब्रजभाषा में है। स्पष्टतः, प्रसादजी ने अपने प्रथम नाटक में भारतेन्दुजी का पूरा अनुकरण किया। प्रसादजी ने अपने दूसरे एकांकी रूपक 'प्रायश्चित्त' में नान्दीपाठ, सूत्रधार, प्रस्तावना और भरत-वाक्य को बिल्कुल हटा दिया है। संवाद-योजना में भी स्पष्ट परिवर्त्तन हुआ है, पद्यात्मक कथोपकथन का बहिष्कार हो गया है। इसमें नाटककार ने दो नई बातें रख दी हैं: १. आकाशभाषित और २. सामाजिक स्थिति के कारण पात्ों की भाषा में परिवर्त्तन। प्रसादजी का एक अन्य एकांकी नाटक 'कल्याणी-परिणय' है, जिसका कथानक प्रख्यात तथा सरल है। इसमें एक ही घटना सरल गति से आगे बढ़ती है। इस नाटक का आरम्भ नान्दी-पाठ से होता है और अन्त भरत-वाक्य से। इसमें पद्यात्मक संवाद की योजना हुई है। 'राज्यश्री' के आरम्भिक दो संस्करणों में पर्याप्त अन्तर है। प्रथम संस्करण आरम्भिक नाटकों के समान है, जिसमें नान्दीपाठ और भरत-वाक्य का प्रयोग किया गया है। इसमें दृश्य-विधान, कथानक-गठन आदि से सम्बन्ध रखनेवाली अनेक तुटियाँ दिखाई देती हैं। किन्तु, दूसरे संस्करण में इन तुटियों को दूर कर दिया गया है और नान्दी एवं भरत-वाक्य को भी हुटा दिया गया है।
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गाती हिन्दी-नाट्य-सिद्धान्त का विकास [५०३
'स्कन्दगुप्त' में प्रतिपादित नाट्य-सिद्धान्त : प्रसादजी के नाट्य-सिद्धान्त के क्रमिक विकास की दृष्टि से 'स्कन्दगुप्त' का विशेष महत्त्व है। इसमें उनके नाट्य-सिद्धान्तों का व्यावहारिक रूप चरमोत्कर्ष पर दिखाई देता है। इस नाटक में उन्होंने यूरोपीय तथा भारतीय नाट्य-सिद्धान्तों का सुन्दर समन्वय किया है। यूरोपीय नाटककार कथावस्तु में वैचित्य को प्रधानता देते हैं, प्रसादजी ने भी इस नाटक में कथा-वैचित्य का सुन्दर विधान किया है। कथा के प्रवाह में एक चक्रावर्त्त आ जाता है, जिसमें नायक स्कन्दगुप्त फँस जाता है। वह भट्टार्क के विश्वासघात के कारण कुभा की लहरों में बह जाता है। प्रेक्षक को ऐसा भान होने लगता है कि अँगरेजी के दुःखान्त नाटकों के समान 'स्कन्दगुप्त' का भी अन्त दुःख में होगा। यदि नाटक का अन्त यहीं हो जाता, तो यह पूर्णतः दुःखान्त होता। परन्तु, इससे भारतीय पद्धति का निर्वाह नहीं होता। इसीलिए, प्रसादजी ने और दो अंकों की योजना करके इसे सुखान्त बना दिया है। वास्तव में, यह नाटक पूर्णतः सुखान्त नहीं होकर करुण-सुखान्त (ट्रजी-कॉमेडी) है। इस में भारतीय नाट्य-सिद्धान्तों की भी योजना हुई है, नाटक की कार्यावस्था, अर्थ- प्रकृति तथा सन्धियों का समुचित रीति से निर्वाह हुआ है। नाटक के प्रथम दो अंक प्रारम्भ तथा प्रयत्न नामक कार्यावस्था हैं। अँगरेजी-शैली से ये प्रारम्भ तथा विकास की सूचना देते हैं। तीसरे अंक के समाप्त होने तक प्राप्त्याशा नामक कार्यावस्था होनी चाहिए, परन्तु प्रसादजी ने इसे अँगरेजी-शैली की चरम सीमा या क्लाइमेक्स बनाया है। इस स्थल पर नायक स्कन्दगुप्त कष्ट और विरोध के शिरोबिन्दु पर पहुँच गया है। चौथे अंक में नियताप्ति का निर्वाह प्रच्छन्न रूप से हुआ है, परन्तु अँगरेजी-शैली की निगति भारतीय नियताप्ति की अपेक्षा अधिक स्पष्ट है। पंचम अंक में सभी विरोधी शक्तिरयां नष्ट हो जाती हैं और भारत का अन्तर्विरोध और बाह्यविद्रोह शान्त हो जाता है। इस प्रकार, फलागम की अवस्था प्रभावोत्पादक रीति से सम्पन्न होती है। कहने का अभिप्राय यह है कि वस्तु-विन्यास की दृष्टि से 'स्कन्दगुप्त' नाटक में भारतीय तथा पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्तों का सुन्दर समन्वय पाया जाता है। प्रसाद के नाटकों में कथानक : प्रसादजी ने भारतीय इतिहास का गरिमामय युग अपने नाटकों का विषय बनाया। सभी नाटकों का विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि दो सूत्र इनमें आदि से अन्त तक साथ-साथ चलते हैं। एक सूत्र तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं को पिरोता चलता है और दूसरा, सांस्कृतिक विचारों को गूँथता चलता है। प्रसादजी के नाटकों का कथानक-पट इन दो तानों-बानों से बुना हुआ है। प्रसादजी के आरम्भिक नाटकों का कथानक उतना जटिल नहीं है, परन्तु क्रमशः यह जटिलता बढ़ती गई है। उनके नाटकों के कथानकों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जायगा। 'विशाख' में एक ही कथा-सूत्र है; 'राज्यश्री' में दो हैं। 'अजातशत्रु' में कथानक की यह जटिलता और भी बढ़ गई है। मगध, काशी, कोशल और कौशाम्बी की घटनाएँ