11. रस5F [३८९
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रस5F [३८९
भाव-सन्धि और भाव-शबलता सभी का अन्तर्भाव स्वीकार किया गया है। विश्वनाथ ने स्पष्ट शब्दों में इसकी घोषणा कर दी है : रसभावौ तदाभासौ भावस्य प्रशमोदयौ। सन्धिः शबलता चेति सर्वेऽपि रसनाद्रसाः॥' रस, भाव, रसाभास, भावाभास, भाव-प्रशम, भावोदय, भाव-सन्धि और भाव- शबलता --- ये सब आस्वादित होने के कारण रस कहलाते हैं। स्पष्ट है कि रस-सिद्धान्त भाव के ही आधार पर स्थित है। भावों की संख्या अत्यधिक होने के कारण उनकी गणना सम्भव भी नहीं है और आवश्यक भी नहीं। गम्भीर प्रकृति के काव्यशास्त्रियों ने रस-संख्या को अधिक महत्त्व भी नहीं प्रदान किया। इसलिए दो विरोधी-सी बातें एक साथ मिलती हैं-एक ओर सभी रसों का समाहार एक ही रस में करने के अनेक प्रयत्न किये गये और दूसरी ओर, भावों की अनन्तता को आधार मानकर रसों की भी अनन्तता सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया। इस स्थापना का एक प्रबल प्रमाण रस-संख्या के विषय में भोज का दृष्टिकोण है। उन्होंने दोनों विपरीत-सी दिशाओं में प्रयास किया है-रस एक (शृंगार) भी है और अनन्त भी है। अतः, रस-संख्या-विषयक उपर्युक्त विवेचन शास्त्रीय प्रतिपादन को पूर्णता प्रदान करने के उद्देश्य से ही किया गया है। साथ ही इससे रस-सम्बन्धी अनेक सूक्ष्म तत्त्व प्रकाश में आ गये हैं, यह भी इसकी सार्थकता है।
परवर्त्ती काव्यशास्त्र में रस का स्थान भारतीय काव्यशास्त्र में रस-सिद्धान्त का स्थान बहुत उच्च तथा प्रतिष्ठित है। यह सबसे प्राचीन तथा प्रधान काव्य-सिद्धान्त है। अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि तथा औचित्य-सिद्धान्तों का विकास रस-सिद्धान्त के ही सन्दर्भ में और उसके पश्चात् हुआ है। यदि काव्य के अन्तरंग और बहिरंग-आत्मा और देह के अनुसार वर्गीकरण किया जाय, तो अलंकार, रीति तथा वक्रोक्ति को देहवादी सम्प्रदाय और ध्वनि और औचित्य को आत्मवादी सम्प्रदाय कहा जा सकता है। ध्वनि और औचित्य-सम्प्रदायों की कल्पना, एक प्रकार से, रस के ही आधार पर की गई है, अतः इन आत्मवादी सम्प्रदायों का रस-सिद्धान्त से अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है। औचित्य-सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक क्षेमेन्द्र ने आरम्भ में स्पष्ट शब्दों में कह दिया है : औचित्यं रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम्।" वस्तुतः, आनन्दवर्द्धन के निम्नलिखित विख्यात वाक्य के ही आधार पर औचित्य=सिद्धान्त की परिकल्पना ही की गई :
१. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० २५९-२६० २. औचित्यविचारचर्चा (क्षेमेन्द्र), १-५
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३९० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
प्रसिद्धौचित्यबन्धस्तु रसस्योपनिषत् परा।' अब एक-एक काव्य-सिद्धान्त में रस का स्थान देखने का प्रयत्न किया जा रहा है। ध्वनि-सम्प्रदाय : यह ठीक है कि ध्वनि-सम्प्रदाय के प्रवर्तक आनन्दवर्धन ने काव्य की आत्मा ध्वनि को माना है, रस को नहीं; फिर भी ध्वनि-सिद्धान्त रस की भावना से पूर्णतः ओत-प्रोत है। आनन्दवर्द्धन तथा उनके सभी अनुयायी ध्वनिवादियों ने अनेक स्थलों पर रस के महत्त्व का वर्णन किया है और रसध्वनि को काव्य का सर्वश्रेष्ठ रूप मानते हुए यह प्रमाणित कर दिया है कि काव्य की आत्मा ध्वनि है और ध्वनि की भी आत्मा रस है। इस प्रकार, उन्होंने भी रस की महत्ता स्वीकार की है। वाच्य से चारुतर व्यंग्य को ध्वनि कहते हैं और चारुता रसात्मकता पर ही निर्भर करती है, इसलिए अ्वनि का शुद्ध रूप रस-ध्वनि ही ठहरता है। यही कारण है कि रस-सिद्धान्त और ध्वनि-सिद्धान्त लगभग एक ही रूप में हो गये और सामान्य रूप से आचार्यों ने इन दोनों में भेद नहीं किया। आज भी दोनों में भेद करना कठिन ही है। केवल बल देने पर ही भेद है; क्योंकि ध्वनि-सिद्धान्त भाव की व्यंजना-काव्यात्मक अभिव्यक्ति-पर बल देता है और रस- सिद्धान्त भाव-तत्त्व पर। इस प्रकार, काव्य में रस और ध्वनि का सहयोग वस्तुतः भावना और कल्पना का सहयोग है। किन्तु, न ध्वनिवादी भाव का तिरस्कार करता है और न रसवादी व्यंजना की अवमानना करता है। इस प्रकार, काव्य में रस और ध्वनि के सहयोग पर बल दिया गया है। केवल भाव या केवल ध्वनि के आधार पर काव्य का अस्तित्व सम्भव नहीं है। दोनों के पूर्ण सहयोग से ही काव्य की सृष्टि सम्भव है। किन्तु, यदि दोनों का तुलनात्मक महत्त्व आँकना पड़े, तो हमें कल्पना और भावना के ही सापेक्षिक महत्त्व के आधार पर निर्णय करना होगा। आधुनिक आलोचनाशास्त्र में यह सिद्ध हो चुका है कि कल्पना और भावना में भावना का ही महत्त्व अधिक है; क्योंकि काव्य का सम्बन्ध तो भाव से ही है, कल्पना तो उसके सम्प्रेषण का माध्यम है। इस प्रकार, रस और ध्वनि में रस की श्रेष्ठता सिद्ध हो जाती है। वस्तुवादी सम्प्रदाय : वस्तुवादी आचार्यों की दृष्टि में काव्य का बाह्य-सौन्दर्य अधिक महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि वे भी भाव की अपेक्षा नहीं करते, फिर भी उनके लिए वह गौण है। उनके मतानुसार कथन की चारुता का ही नाम कवित्व है। कथ्य, जिसमें भाव और विचार दोनों आ जाते हैं, कथन की चारुता का ही अवयव या उपकरण है। इन वस्तुवादी सिद्धान्तों के अनुसार रस या भाव-विभूति कविता का मुख्य तत्त्व नहीं, वरन् केवल उपकरण है। वस्तुवादी सम्प्रदायों में रस के स्थान का विवेचन नीचे किया जा रहा है। अलंकार-सम्प्रदाय : अलंकार-सिद्धान्त के अनुसार काव्य का सौन्दर्य अलंकार पर ही निर्भर करता है, कवित्व अलंकार में ही निहित है। अलंकार शब्दार्थ के विशेष १. ध्वन्यालोक, तृतीय उद्योत, पृ० ३६६ (चोखम्बा)
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धर्म हैं, जो शब्दार्थ में सौन्दर्य की सृष्टि करके उसे काव्य का रूप देते हैं। अलंकार के दो भेद माने गये हैं-सामान्य और विशेष। सामान्य के अन्तर्गत काव्य के वर्ण्य विषयों का विवेचन, उनकी वर्णन-शैली के विचार से, किया गया है। यहाँ भी वस्तु प्रधान नहीं है, अपितु उसकी वर्णन-शैली ही प्रधान है। इसलिए, दण्डी ने सामान्य अलंकारों में वर्ण्य विषयों के साथ कथा-शिल्प के अंगों को भी ग्रहण कर लिया है। वास्तव में, सामान्य अलंकारों का क्षेत्र प्रबन्ध-काव्य है। विशेष अलंकारों में अनुप्रास, यमक आदि शब्दा- लंकारों और उपमा, रूपक आदि अर्थालंकारों का समावेश किया गया है। इन अलंकारों के क्षेत्र की सीमा प्रायः उक्ति अथवा वाक्य तक ही है। यही कारण है कि कुन्तक ने अर्था- लंकारों का वर्णन वाक्य-वक्रता के अन्तर्गत किया है। कहने का अभिप्राय यह है कि सामान्य अलंकार प्रबन्ध-काव्य या कथा-काव्य से तथा विशेष अलंकार मुक्तक या सूक्ति- काव्य से सम्बद्ध हैं। आगे चलकर इनमें से विशेष अलंकार ही माने गये और रस तथा अलंकार के प्रतियोग के प्रसंग में अलंकार का अर्थ शब्दालंकार तथा अर्थालंकार लिया गया। अलंकार-सम्प्रदाय का जन्म ही इस धारणा के आधार पर हुआ कि रस का सम्बन्ध नाट्य से है, जहाँ विभाव आदि के उपस्थापन से रस की सिद्धि हो जाती है। इसी तर्क से काव्यार्थ-रूप काव्य से उसका प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं माना गया। इस तर्क के अनुसार काव्य का सार तो शब्दार्थ का सौन्दर्य-अलंकार ही हो सकता है; प्रबन्ध-काव्य के विस्तृत क्षेत्र में अलंकार से तात्पर्य वर्णन-शैली का सौन्दर्य है और मुक्तक या सूक्ति में उसका अर्थ उक्ति-चमत्कार है। फिर भी, सामान्य अलंकारों की कल्पना रस से बहुत हटकर नहीं है; क्योंकि उनका सम्बन्ध रस के विभाव-अनुभाव से प्रत्यक्ष ही है। इसका कारण यह है कि काव्य के जो वर्ण्य विषय हैं, वे ही रस के विभाव, अनुभाव भी हैं। जान पड़ता है कि प्राचीन अलंकारवादी आचार्य यह सम्बन्ध नहीं समझ सके और यही कारण है कि उन्होंने रस की उपेक्षा कर दी। विशेष अलंकार में चमत्कार प्रायः वाक्य ही तक रहता है, अलंकार- वादी इस शब्दार्थ के ही चमत्कार को काव्य का आधार मानता है, इसके द्वारा अभिव्यक्त किये हुए भाव तक वह नहीं जाता। उसकी मान्यता है कि काव्य का सौन्दर्य शब्दार्थ में निहित सादृश्य, विरोध, संगति आदि की चामत्कारिक कल्पना पर ही निर्भर है, इनके द्वारा व्यक्त भाव पर नहीं। अलंकारवादी यह नहीं मानता कि शब्दार्थ के चमत्कार से सहृदय के चित्त में किसी भाव-संस्कार का उदय होता है और उसके माध्यम से आनन्द की प्रतीति होती है। वह तो शब्दार्थ के चमत्कार से सीधे आनन्द की प्रतीति में विश्वास करता है। कवि की सर्जनात्मक कल्पना-शक्ति को तो वह स्वीकार करता है, परन्तु उसको प्रेरणा देनेवाले भाव-संस्कारों का कोई विशेष महत्त्व उसके लिए नहीं है। इसके विपरीत अलंकारवादी की धारणा है कि रस-सामग्री या भाव-सामग्री से अलंकार-सृष्टि में सहायता मिल सकती है। विभाव, अनुभाव आदि के वर्णन के द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से-प्रत्यक्ष रूप से नहीं-काव्य की सृष्टि हो सकती है; ये भी शब्दार्थ का उपकार करते हुए उसमें चमत्कार उत्पन्न करने में समर्थ होते हैं। दूसरे शब्दों में, रस भी अलंकार का ही अंग है।
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३९२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास जिस युग में अलंकार-सम्प्रदाय की स्थापना हुई, उसके बहुत पहले ही रस-सिद्धान्त िप्र का अत्यन्त विस्तृत विवेचन हो चुका था और रसपूर्ण काव्य का विपुल मात्रा में निर्माण भी हो चुका था, इसलिए अलंकारवादी भी रस की सर्वथा उपेक्षा नहीं कर सकते थे। अतः, उन्होंने रस और भाव को अपने सिद्धान्त में सम्मिलित करने के उद्देश्य से रसावत् तथा ऊर्जवि अलंकार की परिकल्पना की। इस प्रकार, सम्राट रस भाव-विभाव की अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ अलंकार के दरबार में एक सामान्य सामन्त के रूप में सम्मिलित हुआ। इतना होने पर भी रस के प्रति सभी अलंकारवादियों की दृष्टि समान ही नहीं थी-भामह और उद्भट की दृष्टि उदासीन थी, परन्तु रुद्रट तथा दण्डी की दृष्टि पर्याप्त रूप से उदार थी। उग्र अलंकारवादी जयदेव के काव्य-सिद्धान्त पर रस और ध्वनि का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। इससे निष्कर्ष निकलता है कि जबतक यह भ्रम फला रहा कि रस का सम्बन्ध नाट्य से है, तबतक अलंकार-सम्प्रदाय में रस की उपेक्षा होती रही; परन्तु इस भ्रम का निराकरण हो जाने पर रस और अलंकार के सम्बन्ध में मधुरता आती गई और शुद्ध अलंकारशास्त्र के ग्रन्थों में भी रस का विवेचन होने लगा। इसका अर्थ यह नहीं कि अलंकार का महत्त्व कम हो गया, वरन् यह कहा जाय कि रस का महत्त्व बढ़ गया; यहाँ तक कि परवर्त्ती अलंकारवादी जयदेव आदि को अलंकारवादी नहीं कहकर अलंकार-प्रेमी ही कहना अधिक उपयुक्त होगा। रस और अलंकार के सहयोग का जहाँ तक प्रश्न है, वहाँ तक विवाद का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। सादृश्य-मूलक अलंकारों के द्वारा विभाव का स्वरूप वैशद्य प्राप्त करता है और ग्राह्य बनता है। कई अलंकार ऐसे हैं, जिनसे कल्पना उद्दीप्त होती है, जिससे भाव में तीव्रता आती है। रस के विषय में अलंकार इससे भी बढ़कर काम करता है-अलंकार रस के केवल उपकारक ही नहीं, प्रत्युत रस की अभिव्यक्ति के महत्त्वपूर्ण माध्यम हैं। काव्य की भाषा अर्थात् रस की अभिव्यक्ति का माध्यम, व्यापक अर्थ में, अलंकृत ही हो सकती है; क्योंकि कोई भी यशस्वी कवि चमत्कार-रहित भाषा के सहारे सुन्दर अर्थ अथवा भाव का प्रतिपादन करने में समर्थ नहीं हो सकता। परन्तु, इससे आगे बढ़कर यदि कोई आलंकारिक भाव सौन्दर्य से वंचित शब्दार्थ के जिस चमत्कार या चित्रकाव्य की सर्जना करेगा, उससे किसी सहृदय की मनःतृप्ति नहीं हो सकती। यहीं रस और अलंकार के महत्त्व के न्यूनाधिक्य का निर्णय हो जाता है। आधुनिक आलोचना- शास्त्र में अलंकार या अप्रस्तुत-विधान या बिम्ब योजना-शरीर पर धारण किये जानेवाले सामान्य आभूषणों के समान नहीं है कि जब जी में आया उतारकर रख दिये गये, वरन उनका महत्त्व शरीर के रूप-रंग से कम नहीं है, तथापि उन्हें प्राण-तत्त्व के रूप में कभी नहीं स्वीकार किया गया। अलंकार को काव्य का प्राण-तत्त्व कभी मानना भी नहीं चाहिए; क्योंकि इस दशा में यह भी मानना पड़ेगा कि कला चमत्कार की सृष्टि के अतिरिक्त कुछ नहीं है; वह अनुभूति की संप्रेषणा नहीं है। तब कला के उदात्त एवं भव्य जद्देश्यों के बदले केवल कुतूहल की जागृति ही काव्य का लक्ष्य बनकर रह जायगी।
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रीति-सम्प्रदाय : अलंकार-सम्प्रदाय के ही समान रीति-सम्प्रदाय भी रस के बहुत अनुकूल नहीं है। वामन ने रीति को काव्य की आत्मा माना है और रस को रीति के आधारभूत बीस गुणों में से एक अर्थगुण कान्ति का मूल तत्त्व स्वीकार किया। इस प्रकार, रीति-सम्प्रदाय में रस का स्थान रीति के पोषक तत्त्वों में आता है। रस की सार्थकता यही है कि इसकी दीप्ति रीति की शोभा का पोषण करती है। रीति-सम्प्रदाय में रस का सीधा सम्बन्ध गुण से माना गया है और गुण शब्दार्थ-रूप काव्य का नित्य धर्म स्वीकार किया गया है। इस प्रकार रस का भी सम्बन्ध काव्य के नित्यधर्म के साथ जुट जाता है, किन्तु उसकी स्थिति केवल एक गुण में होने के कारण उसका मूल्य सीमित ही रह जाता है। दूसरी ओर, रस-सिद्धान्त में रस काव्य की आत्मा स्वीकार किया गया है और पद-संघटना रीति के अंग-संस्थान के रूप में मानी गई है। वर्ण-विन्यास तथा शब्द-विन्यास से रीति का निर्माण होता है और रीति का आधार गुण है। परन्तु, गुण रस के धर्म हैं, अतः गुण के साथ सम्बन्ध होने के कारण रीति भी रस से सम्बद्ध है। जिस प्रकार उक्ति- चमत्कार से रस-व्यंजना में सहायता मिलती है, फलतः अलंकार रस का उपकारक होता है, उसी प्रकार सुन्दर पद-रचना से भी रस-व्यंजना में सहायता मिलती है, फलतः रीति भी रस का उपकार करती है। शब्द तथा अर्थ के आश्रित रचना-चमत्कार को रीति कहते हैं और यह माधुर्य, ओज अथवा प्रसाद गुण के द्वारा चित्त को द्रवित, दीप्त तथा विशद करती है, जिसके फलस्वरूप रस-दशा तक पहुँचने में सहायता मिलती है। इस प्रकार, रस-सिद्धान्त में रीति के लिए एक विशिष्ट स्थान निश्चित है, जिसका उपयोग समुचित रूप में वह करता है। यदि रस और रीति के सापेक्षिक महत्त्व के प्रश्न पर विचार किया जाय, तो दोनों की स्थिति पूर्णतया स्पष्ट है। रीति शब्द के अर्थ से ही स्पष्ट हो जाता है कि वह तत्त्व नहीं, विधि-मात्र है। विधि का भी महत्त्व अपने स्थान पर बहुत होता है, फिर भी वह तत्त्व की बराबरी नहीं कर सकती, बढ़कर होने की तो बात ही नहीं। प्रश्न उठता है कि रमणीय शब्दावली के प्रयोग से अर्थ में रमणीयता आती है या रमणीय अर्थ के संसर्ग से शब्दावली चमत्कारपूर्ण हो जाती है ? इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर है कि अर्थ की रमणीयता के ही कारण शब्दावली चमत्कृत या रमणीय बन जाती है। कभी-कभी ऐसा भी जान पड़ता है कि रमणीय शब्द के प्रयोग से अर्थ में चमत्कार आ जाता है-एक शब्द के स्थान पर उसका पर्यायवाची दूसरे शब्द के प्रयोग से अथवा शब्दों के क्रम में थोड़ा परिवर्त्तन कर देने से अर्थ अत्यन्त रमणीय हो जाता है। परन्तु, वास्तव में ऐसा कभी होता नहीं, केवल प्रतीत होता है। ऐसी दशा में होता यह है कि पहले अभीष्ट भाव की अभिव्यक्ति के लिए मूल शब्द या मूल क्रम अनुपयुक्त था, इसलिए अर्थ की रमणीयता में बाधा पड़ रही थी और पीछे जब उपयुक्त शब्द या क्रम की व्यवस्था हो गई, तो अत्यन्त सहज रूप में इष्ट अर्थ की अभिव्यक्ति हो गई। अभीष्ट अर्थ ही वास्तव में रमणीय अर्थ है। सह कहना भ्रामक है कि विशिष्ट शब्द या शब्दों का विशिष्ट कम अपने-आप में रमणोग
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होता है। वस्तुतः, शब्द केवल प्रतीक हैं और जो रमणीयता उसपर आरोपित की जाती है, उसका आधार तो रमणीय अर्थ ही है। अर्थ की रमणीयता का आधार असन्दिग्ध रूप से भाव ही होता है। जो अर्थ हमारी बोधवृत्ति के साथ चित्तवृत्ति पर भी प्रभाव डाल सके, वही रमणीय कहा जा सकता है, इसके फलस्वरूप वह शब्द भी रमणीय माना जायगा, जो अर्थबोध के साथ भाव का भी उद्बोध करता हो। शब्द-विन्यास या शब्द- कम के साथ भी यही बात सत्य है। अतएव, यह निर्विवाद है कि शब्दार्थ तथा शब्द- विन्यास की चारुता, वास्तव में, भाव पर ही आधृत है। रीति-सिद्धान्त ने इस निमित्त- नैमित्तिक क्म को उलट दिया, जिसके परिणाम-स्वरूप उसका पतन हुआ। वकोक्ति-सम्प्रदाय : रस के विषय में वक्रोक्ति-सम्प्रदाय की दृष्टि अलंकार-सम्प्रदाय तथा रीति-सम्प्रदाय की अपेक्षा 'बहुत अधिक उदार थी। काव्य-लक्ष्य तथा प्रयोजन के अन्तर्गत कुन्तक ने रस के महत्त्व को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है। उन्होंने लक्षण में वक्र कवि-व्यापार के साथ तद्विदाह्लादकारिता को भी अनिवार्य माना और प्रयोजन के सम्बन्ध में स्पष्ट रूप से कह दिया : चतुर्वर्गफलास्वादमध्यतिक्रम्य तद्विदाम् । काव्यामृतरसेनान्तश्चमत्कारो वितन्यते ।।' -अर्थात् काव्यामृत का रस उसको समझनेवाले (सहृदयों) के अन्तःकरण में चतुर्वर्ग-रूप फल के आस्वाद से भी बढ़कर चमत्कार उत्पन्न करता है। और, तद्विद् का अर्थ कुन्तक की दृष्टि में केवल काव्य-मर्मज्ञ ही नहीं, वरन् 'सरसात्मा', 'आर्द्रचेता' और 'रसमर्मज्ञ' है। इसी प्रकार, उन्होंने काव्य-भेद, काव्य-वस्तु और काव्य-मार्ग में भी रस का स्थान प्रमुख माना है। वकोक्ति-सम्प्रदाय मानता है कि काव्य का सर्वश्रेष्ठ रूप प्रबन्ध है और प्रबन्ध का आधार-तत्त्व रस है कथा नहीं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि वक्रोक्ति-सम्प्रदाय काव्य के परम तत्त्व रस पर कितना बल देता है। कुन्तक ने काव्य-वस्तु या वर्ण्य विषय-वस्तु के दो भेद किये : १. स्वभाव- प्रधान तथा २. रस-प्रधान; और इन दोनों को रस-स्वरूप माना। इस वर्ण्य विषय-वस्तु के दो अन्य भी भेद हैं-चेतन तथा जड़। इनमें चेतन ही प्रधान है और उसके लिए रस आदि का पोषण आवश्यक है। जड़ का वर्णन भी काव्य का अंग है, परन्तु जड़ अर्थात् प्राकृतिक पदार्थों का यह वर्णन रस को उद्दीप्त करनेवाली अपनी शक्ति के कारण ही काव्य बनता है। तात्पर्य यह है कि वर्ण्य वस्तु को काव्य में केवल इसलिए ग्रहण किया जाता है कि उसमें रस-निर्भरता है। काव्य-मार्गों के विवेचन में भी रस का महत्त्व निश्चित रूप से सिद्ध होता है। सुकुमार और विचित्र दोनों मार्गों में रस का चमत्कार असन्दिग्ध रूप से वर्त्तमान है। तीसरा मार्ग-मध्यम मार्ग-भी इन दोनों का मिश्रित रूप रहने के कारण रस-पुष्ट होना चाहिए। १. वकोक्तिजीवितम्,१-५
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३९६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
क3ी निष्कर्ष : इस विवेचन से भारतीय काव्यशास्त्र के अन्य मूल सिद्धान्तों के साथ रस- सिद्धान्त का सम्बन्ध प्रकट हो जाता है। इस विषय में निम्नलिखित निष्कर्ष प्राप्त होते हैं : १. रस-सिद्धान्त भारतीय काव्यशास्त्र का सर्वाधिक प्राचीन, व्यापक, प्रतिष्ठित तथा बहुमान्य सिद्धान्त है। प्रारम्भ में ऐसे भ्रम की उत्पत्ति हो गई थी कि रस के उपकरण विभाव, अनुभाव आदि की स्थिति नाट्य में ही हो सकती है, अतः रस का वास्तविक क्षेत्र नाट्य ही है। इस भ्रम का परिणाम यह हुआ कि काव्य के क्षेत्र में शब्द और अर्थ की परिधि में रस से भिन्न किसी तत्त्व की खोज आरम्भ हुई, जिसे काव्य की आत्मा माना जा सके। इसी खोज के फलस्वरूप शब्दार्थगत चमत्कार के दो प्रधान रूप-अलंकार और रीति-काव्य-क्षेत्र में आये। किन्तु, सौभाग्यवश यह भ्रम अधिक दिनों तक नहीं रहा और शब्द तथा अर्थ के क्षेत्र में ही विभाव, अनुभाव आदि के प्रस्तुत होने की सम्भावना प्रकट हुई। आनन्दवर्द्धन ने ध्वनि की परिकल्पना के द्वारा शब्दार्थ में छिपी शक्तियों को प्रकट किया और विभावादि को उपस्थित करनेवाली नाट्य-सामग्री के अभाव की पूर्ति व्यंजना के द्वारा की। अभिनवगुप्त ने इस तथ्य को और भी स्पष्ट रूप से व्यक्त किया। काव्य के साथ रस के उचित सम्बन्ध की स्थापना हुई और शब्दार्थ के सन्दर्भ में ही रस-सिद्धान्त पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित हो गया। २. ध्वनि-सम्प्रदाय की स्थापना के पहले भी अलंकार-सम्प्रादय और रीति सम्प्रदाय में भी रस पूर्णतः उपेक्षित नहीं रहा। अलंकारवादियों ने रसवत् अलंकार की उद्भावना करके रस को अलंकार के एक भेद के रूप में स्वीकार किया और रीतिकार ने रीति के आधारभूत गुण के पोषक तत्त्व के रूप में काव्य का शोभावर्द्धक धर्म स्वीकार कर लिया था। ध्वनि-सिद्धान्त की पूर्ण प्रतिष्ठा हो जाने के बाद भी वक्रोक्ति-सिद्धान्त के रूप में इस चिन्ताधारा का अविर्भाव हुआ। यद्यपि कुन्तक ने वक्रोक्ति को ही काव्य का प्राण- तत्त्व स्वीकार किया, तथापि उनके मन में रस के प्रति प्रबल आकर्षण था, इसलिए उन्होंने माना कि रस ही वक्रोक्ति की समृद्धि का आधार है। लर ३. इस भारतीय काव्यशास्त्र में कलावाद अलंकार-सम्प्रदाय, रीति-सम्प्रदाय तथा वकोक्ति-सम्प्रदाय के रूप में प्रकट हुआ। वक्रोक्ति की उद्भावना में तो कलावाद का पूर्ण विकसित रूप हमारे सामने उपस्थित हुआ। इन सम्प्रदायों में काव्य को प्रमुखतः कला माना गया और अनुभूति को काव्य के पोषक तत्त्व के रूप में स्वीकार किया गया। क ४. दूसरी ओर, जब रस-सिद्धान्त पूर्ण रूप से प्रतिष्ठित हो गया, तो उसने भी अलंकार, रीति, वक्रोक्ति तथा कला के अन्य तत्त्वों का समुचित रीति से उपयोग किया। सामान्य रूप से अलंकार तथा रीति को करमशः आभूषण तथा अंग-संस्थान के सदृश माना गया, परन्तु यह स्थूल कल्पना मात्र थी। परन्तु, तत्त्व की दृष्टि से अलंकार, रीति, वक्रोक्ति आदि कला के उपकरणों की आवश्यकता इसलिए हुई कि उनके द्वारा विभावादि का साधारणोकरण हो जाय और फिर उससे भाव को व्यक्ति-संसर्ग से सर्वथा मुक्त करके
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आस्वाद के योग्य बनाया जाय। यदि शब्दार्थ का कलात्मक प्रयोग नहीं किया जाय, तो विभाव, अनुभाव आदि की उपस्थापना नहीं हो सकती और उनका साधारणीकरण भी सम्भव नहीं है। देश-काल की सीमा से मुक्त सर्वहृदय-गम्य रूप की कल्पना नहीं की जा सकती। ऐसा नहीं होने पर स्थायी भाव की विघ्न-रहित प्रतीति भी सम्भव नहीं हो सकती। अतएव अलंकार, रीति, बिम्ब-विधान, वक्रोक्ति आदि ऐसे उपकरण हैं, जिनसे रस- निष्पत्ति में सहायता मिलती है। रस की प्रतीति के लिए इन उपकरणों की आवश्यकता पड़ेगी ही।
५. आधुनिक आलोचनाशास्त्र की शब्दावली में काव्य के अन्तर्गत अनुभूति-तत्त्व के साथ कला-तत्त्व का जो सम्बन्ध है, वही सम्बन्ध रस के साथ अलंकार, रीति तथा वक्रोक्ति का है। दोनों का समन्वय होने पर ही काव्य बन सकता है। भाव-विभूति के साथ यदि कलात्मक अभिव्यक्ति का सहयोग नहीं हो, तो वह भाव-विभूति केवल अनुभव के विषय के अतिरिक्त और कुछ नहीं बन सकती और कला में भावना का संस्पर्श नहीं रहे, तो वह कला केवल कीड़ा बनकर रह जाती है। दोनों के अतिवाद से हानि ही होती रही है। कला-क्षेत्र में तो अतिवाद से महान् अनर्थ होते ही रहे हैं, रस-क्षेत्र में भी अतिवाद प्रशंस्य नहीं हो सकता। न तो भाव-रहित कला ही काव्य है और न केवल भावोद्गार ही काव्य है। भाव और कला दोनों में अन्योन्याश्रय-सम्बन्ध है। ६. रस और ध्वनि का सम्बन्ध और भी घनिष्ठ है; क्योंकि दोनों की उद्भावना सहृदय से ही सम्बन्ध रखती है। दोनों में केवल यही अन्तर है कि रस-सिद्धान्त काव्य का प्राण-तत्त्व कल्पनात्मक भावना को मानता है, परन्तु ध्वनि-सिद्धान्त भाव-रंजित कल्पना को काव्य का प्राण-तत्त्व स्वीकार करता है। यह अन्तर इतना सूक्ष्म है कि धीरे-धीरे यह भेद लुप्त ही हो गया। परन्तु, दोनों की स्वतन्त्र स्थिति स्वीकार करने के लिए इस अन्तर को तो ध्यान में रखना ही होगा। ७. औचित्य-सिद्धान्त तो रस-सिद्धान्त का एक प्रकार से अंग ही है; क्योंकि उसका विकास रस-सिद्धान्त से ही हुआ है। औचित्य की सत्ता रस की ही परिधि में है और उसकी सार्थकता भी इसी में है। 5. इस प्रकार रस-सिद्धान्त बहुत ही व्यापक सिद्धान्त है और उसका दृष्टिकोण सहिष्णुतापूर्ण है। यह सिद्धान्त अलंकार, रीति, गुण, वक्रता और ध्वनि सब सिद्धान्तों के साथ पूरा सहयोग करता है और उनका सहयोग पाता भी है। किन्तु, जहाँ शब्दार्थ के साथ भावना का सम्बन्ध नहीं होता, वहाँ रस काम नहीं करता। इस दृष्टि से धवनि-सिद्धान्त और भी उदार कहा जा सकता है। काव्य में विद्यमान अनेक तत्त्वों के महत्त्व के न्यूनाधिक्य का निर्णय बहुत कठिन नहीं है। वस्तुतः, काव्य में सभी तत्त्वों का महत्त्व है, परन्तु कोई भी तत्त्व भाव का
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समकक्ष नहीं हो सकता; क्योंकि सम्पूर्ण जीवन को प्रेरणा देनेवाला तत्त्व भाव ही है। भाव से ही जीवन में रस का संचार होता है और चारित्य की समृद्धि होती है। भाव पर ही जीवन के मूल्य आधृत हैं और आनन्द का जो रूप भाव के द्वारा सिद्ध होता है, वही सबल और गम्भीर होता है। जो कल्पना का चमत्कार, उक्ति अथवा शैली भाव से अछूती रहती है, उसका मूल्य कुतूहल से अधिक कुछ नहीं हो सकता। तर्क की बात छोड़कर यदि हम अनुभव के क्षेत्र में देखें, तो स्पष्ट हो जायगा कि काव्य के उसी तत्त्व का स्थायी मूल्य होता है, जो सहृदय के चित्त में रम जाता है और उसके संस्कार का अंश बन जाता है। वह तत्त्व निश्चय ही भाव-तत्त्व है। इस प्रकार, काव्य के सभी तत्त्वों में भाव का महत्त्व अक्षुण्ण है। उसी अनुपात में काव्य के भिन्न-भिन्न सम्प्रदायों तथा सिद्धान्तों की अपेक्षा रस-सिद्धान्त का भी महत्त्व अक्षुण्ण है।
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४०० j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासे तीस प्रकार के नाट्य देखने के बाद यह पुस्तक लिखी है। ये नाट्य दिवाकर द्वारा प्रस्तुत किये गये थे, जिनसे उन्होंने नाट्यवेद का अध्ययन किया था। शारदातनय का काल सन् ११७५-१२५० ई० माना जाता है। 'संगीतमकरन्द' नारद का लिखा हुआ संगीतशास्त्र विषयक एक ग्रन्थ है, जिसमें उन्होंने एक प्रकार की नाट्यशाला का वर्णन किया है। उन्होंने इसकी लम्बाई-चौड़ाई आदि की नाप का भी उल्लेख किया है। विष्णुधर्मोत्तर पुराण में दो प्रकार के नाट्य-गृहों का वर्णन मिलता है। fin TF परन्तु, इन सबसे बढ़कर भरत का नाट्यशास्त्र है। उन्होंने नाटक के प्रयोगात्मक सिद्धान्तों का जितनी गम्भीरता तथा सूक्ष्मता से विवेचन किया है, वह उनकी एकान्त निष्ठा एवं सतत साधना का असन्दिग्ध परिचायक है। भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में नाटक की सभी सैद्धान्तिक तथा प्रयोगात्मक समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। परन्तु, उन्होंने नाट्य की उत्पत्ति तथा रंगमंच की पूजा का इतना विस्तृत विधान दिया है कि उसकी विशालता में रंग-विधान की रूपरेखा कुछ-कुछ धुँधली हो गई है। फिर भी, उनके द्वारा वणित रंग-विधान अत्यन्त आश्चर्य का विषय है। भरत के नाट्यशास्त्र के सम्पूर्ण द्वितीय अध्याय में रंगमंच के विधान एवं निर्माण का वर्णन किया गया है। द्वितीय अध्याय की कुछ कारिकाएँ अस्पष्ट हैं, परन्तु आचार्य अभिनवगुप्त की टीका की सहायता से उन्हें समझने में बहुत सहायता मिलती है। डॉ० कीथ ने अपनी पुस्तक 'दि संस्कृत ड्रामा' के अन्त में एक छोटा अध्याय भरत के मतानुसार नाट्यगृह-निर्माण पर भी लिखा है। परन्तु, यह अत्यन्त संक्षिप्त है और कई स्थलों पर भ्रान्त भी है। गोदावरी केतकर ने मराठी-नाट्यशास्त्र पर एक अध्ययन प्रस्तुत किया है, जिसमें भरत द्वारा निर्दिष्ट नाट्य-गृहों के चित्र दिये गये हैं। इस विषय के जिज्ञासु के लिए यह पुस्तक अत्यन्त लाभदायक सिद्ध हो सकती है। भरत मुनि ने रंगमंच-निर्माण की पृष्ठभूमि में एक महत्त्वपूर्ण कथा का उल्लेख किया है। दानवों पर इन्द्र की विजय के उपलक्ष्य में भरत ने 'महेन्द्रविजयोत्सव' नामक नाट्य का अभिनय किया, जिसमें असुरों की निन्दा थी। इसपर दानवों ने अत्यन्त कुद्ध होकर उसका भयंकर विध्वंस किया। इस पर ब्रह्मा ने दानवों को शान्त करने के निमित्त नाट्य के महत्त्व का उपदेश दिया। नाट्य में सभी लोकों के सुख-दुःखात्मक भावों का अनुकरण होगा, जिसे देखने से दुःखी तथा परिश्रान्त व्यक्तियों का विनोद होगा; साथ ही जीवन-हित धर्म, यश और बुद्धि का अभ्युदय होगा। दुःखार्त्तानां श्रमार्त्तानां शोकार्त्तानां तपस्विनाम्। 5 शन विश्रान्तिजननं काले नाट्यमेतद् भविष्यति॥ धम्य यशस्यमायुष्यं हितं बुद्धिविवर्द्धनम्। ग्मा कि श लोकोपदेशजननं नाट्यमेतद् भविष्यति॥' १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, कारिका ११४-११५
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रंगमंच 1४०१
इतना ही नहीं, नाट्य में विश्व की समस्त विधा, कला तथा शिल्प का एकत् समन्वय होगा : न तज्ज्ञानं न तच्छिल्प न सा विद्या न सा कला। नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्र दृश्यते ।'
मुनियों ने भरत से नाट्यवेश्म के विषय में पूछा; क्योंकि नाट्य में सर्वप्रथम इसी की आवश्यकता होती है। भरत ने बताया कि ब्रह्मा की ही आज्ञा से विश्वकर्मा ने नाट्यवेश्म का निर्माण किया। भरत ने उसी नाट्यवेश्म या नाट्य-मण्डप के निर्माण का वर्णन नाट्यशास्त्र के द्वितीय अध्याय में किया है।
प्रेक्षागृहों के भेदोपभेद : विश्वकर्मा ने तीन प्रकार के नाट्यवेश्म का निर्माण किया- विकृष्ट (आयत), चतुरस्र (वर्ग) तथा व्यस्र (त्रिकोण)। डॉ० कीथ ने यह नहीं बताया कि विकृष्ट किसे कहते हैं, परन्तु भूल से चतुरस्त्र को आयताकार समझ लिया है। विकृष्ट देवताओं के लिए, चतुरस्र भूलोक के लिए तथा व्यस्र निम्नकोटि के दर्शकों के लिए है। देवताओं के बड़े रंगमंच के विषय में भरत ने कहा है कि हमें देवताओं से प्रतिस्पर्द्धा नहीं करनी चाहिए; क्योंकि जहाँ हमें परिश्रम करके बनाना होगा, वहाँ देवता इच्छा-मात्र से बना सकते हैं। विकृष्ट नाट्यगृह १०८ हाथ लम्बा होता है और अपनी अत्यधिक लम्बाई के कारण मनुष्यों के लिए अनुपयोगी है। अतः, भरत ने चतुरस्र मध्यम रंगमंच या नाट्य- मण्डप को ही मनुष्यों के लिए उत्तम माना है :
प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां प्रशस्तं मध्यमं स्मृतम्। तत्न पाठ्यं च गेयं च सुखश्राव्यतरं भवेत्।" और इससे बड़ा रंगमंच बनाने का निषेध किया है: अत ऊर्ध्व न कर्त्तव्यं कत्तृ भिः नाट्यमण्डपः । स वेश्मनः प्रकृष्टत्वात् व्रजेदव्यक्ततां परम्॥3
इस विषय में अभिनवगुप्त ने एक नई बात कही है और यह निर्णय करना कठिन है कि भरत का भी यही विचार था या नहीं। अभिनवगुप्त का कथन है कि भरत ने सबसे बड़ा रंगमंच देवताओं को दिया है, इसका अर्थ यह है कि यदि डिम आदि रूपकों का अभिनय करना हो, जिसमें देवताओं और असुरों का संग्राम दिखाया जाता है, तो सबसे बड़े रंगमंच का उपयोग करना चाहिए, जिसमें संग्राम आदि के लिए पर्याप्त स्थान मिल सके। यदि राजाओं के प्रणय-व्यापार आदि का प्रदर्शन करना हो, तो मध्यम कोटि का रंगमंच हमारे उद्देश्य के लिए पर्याप्त हो जायगा। यदि साधारण लौकिक जीवन की विकृतियों को
१. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, कारिका ११६ २. वही, अध्याय २, कारिका १२ (काव्यमाला) ३. वही, का० २१ (काव्यमाला)
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४०२ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास प्रदर्शित करनेवाले प्रहसन और भाण जैसे छोटे रूपकों का अभिनय करना हो, जिसमें सामान्य नर-नारी पात्र होते हैं, तो छोटे रंगमंच का उपयोग कर सकते हैं। रंगमंच के उपर्युक्त तीन भेद : विकृष्ट, चतुरस्र तथा त्यस्र-आकार के अनुसार होते हैं। इन तीनों के तीन-तीन भेद-ज्येष्ठ, मध्यम तथा कनिष्ठ-परिमाण के अनुसार होते हैं। इस प्रकार रंगमंच के नौ भेद हुए। फिर इन मण्डपों का परिमाण हाथ या दण्ड के आधार पर निश्चित किया गया है। एक दण्ड चार हाथ का होता है। अतः रंगमंच अठारह प्रकार के हो सकते हैं। एक सौ आठ हाथ (या दण्ड) की एक भुजावाला ज्येष्ठ, चौंसठ हाथ (या दण्ड) की एक भुजावाला मध्यम और बत्तीस हाथ (या दण्ड) वाला मण्डप कनिष्ठ या अवर समझा जाता है। उपर्युक्त भेद दो आधारों पर किये गये हैं-आकार और परिमाण। आकार की दृष्टि से नाट्य-मण्डप या प्रेक्षागृह तीन प्रकार से बनाये जा सकते हैं-विकृष्ट (आयताकार), चतुरस्र (वर्गाकार) तथा त्यस्र (त्रिभुजाकार)। परिमाण की दृष्टि से १०८ हाथ लम्बा, ६४ हाथ लम्बा तथा ३२ हाथ लम्बा-ये तीन प्रकार प्रेक्षागृह के माने गये हैं। इस प्रकार विकृष्ट आदि तीनों आकारवाले नाट्य-मण्डपों या प्रेक्षागृहों के परिमाण की दृष्टि से १०८ हाथ, ६४ हाथ और ३२ हाथ की लम्बाईवाले तीन-तीन भेद मिलकर कुल नौ भेद हुए। फिर मण्डपों की लम्बाई आदि का निश्चय हाथ या दण्ड-दो साधनों से कर सकते हैं। अतः, पूर्वोक्त नौ प्रकार के मण्डपों के हस्ताश्रित और दण्डाश्रित दो-दो भेद होकर मण्डप के अठारह भेद हो जाते हैं। अभिनवगुप्त ने 'एवं चाष्टावश भेदास्तावन्छास्त्रे' लिखकर इस बात का समर्थन किया है। हस्ताश्रित नौ भेदों को निम्नांकित सारणी में दिखाया जा रहा है : आकार प्रकार परिमाण उपयोग
१. विकृष्ट १. ज्येष्ठ १०८ गुणा ६४ हाथ देवतार्थ
विकृष्ट २. मध्यम ६४ गुणा ३२ हाथ नृपार्थ
विकृष्ट ३. अवर ३२ गुणा १६ हाथ लोकार्थ
२. चतुरस्र ४. ज्येष्ठ १०८ गुणा १०८ हाथ देवतार्थ
चतुरस्र ५. मध्यम ६४ गुणा ६४ हाथ नृपार्थ
चतुरस्र ६. अवर ३२ गुणा ३२ हाथ लोकार्थ
३. त्यस्न ७. ज्येष्ठ १०८ हाथ समत्िबाहु देवतार्थ
व्यस्र 5. मध्यम ६४ हाथ समत्रिबाहु नृपार्थ
व्यस्र ९. अधम ३२ हाथ समत्रिबाहु लोकार्थ अभिनव ने प्रेक्षागृहों के जो अठारह भेद कर दिये, उसके विषय में उन्होंने स्वयं माना है कि ये भेद अनुमानाश्रित हैं, व्यावहारिक नहीं। कदाचित् इनका उपयोग कभी किया जाता रहा हो। अभिनव का विश्वास है कि भरत ने अपने समय में प्रचलित प्रेक्षा- गृहों का वर्णन किया है। अभिनव ने हस्ताश्रित तथा दण्डाश्रित-दो नापों के आधार पर
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रंगमंच / ४ ० ३ जो दो भिन्न वर्ग माने, यह संगत नहीं जान पड़ता। भरत ने ६४ गुणा ३२ हाथ के बड़े आकार के मण्डपों का निषेध किया है और फिर इससे चौगुने आकार के मण्डपों की संगति कैसे बैठ सकती है? अभिनव ने अपनी व्याख्या में माना है कि जिन नाट्यों में देव तथा दानव नायक-प्रतिनायक के रूप में भाग लेते हों, और जिनमें आरभटी वृत्ति का प्रयोग होता हो, ऐसे डिम आदि रूपकों का अभिनय विस्तृत रंगमंच पर ही होता है। इनमें भाण्ड-वाद्यों की प्रधानता रहती है, परिभ्रमण आदि के लिए अधिक ऊँचे तथा लम्बे क्षेत्र की आवश्यकता होती है। इसलिए, उस अभिनय के भाव को स्पष्ट रूप से व्यक्त करने के लिए १०८ हाथ का मण्डप आवश्यक होता है। डिम नामक रूपक में प्राकृतिक घटनाओं (बिजली गिरना, उल्कापात, ग्रहण आदि), युद्ध या सम्फेट आदि का प्रदर्शन होता है। इसमें देवता, राक्षस, नाग, यक्ष, पिशाच आदि से युक्त सोलह प्रकार के नायक होते हैं। ऐसे रूपक के अभिनय के लिए ज्येष्ठ मण्डप की आवश्यकता होती है। अभिनवगुप्त ने कहा है कि मध्यम परिमाण के मण्डप के अतिरिक्त न्यून अथवा अधिक परिमाण के मण्डप का निर्माण नहीं करना चाहिए; क्योंकि ऐसे मण्डपों में नाट्य की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं हो सकती। उन्होंने अपनी व्याख्या में बड़े और छोटे परिमाण के प्रेक्षाग हों को नाट्याभिव्यक्ति के लिए निरन्तर अनुपयुक्त ही माना है। ज्येष्ठ परिमाणवाले प्रेक्षागृहों में ध्वनि का यथार्थ अनुमान लगाना कठिन है। इसमें निकटवत्तियों के लिए पाठ्य-अभिनय विस्वरत्व को प्राप्त होता है, अर्थात् स्वर के विभाग का उचित ज्ञान नहीं हो पाता। दूरवत्तियों के लिए पाठ्य-अभिनय विगत-स्वर हो जाता है और समुचित रूप से सुना नहीं जा सकता। इसके विपरीत अत्यन्त छोटे प्रेक्षागृह में उच्च स्वर में उच्चरित पाठ्य अपना माधुर्य खो देता है। साथ ही गीत-वाद्य के प्रयोग में भी स्वरहीनता आ जाती है। इसी प्रकार, अति विस्तीर्ण मण्डप में भावों की अभिव्यक्ति स्पष्ट नहीं हो पाती और छोटे मण्डप में भी अति निकटता के कारण भावों की अभिव्यक्ति अस्पष्ट रह जाती है। इन दोनों को अस्वीकार करके अभिनव ने मध्यम प्रेक्षागृह को महत्त्व प्रदान किया है। इसी आधार पर उन्होंने दण्ड-प्रमाण को भी व्यर्थ माना है। इस विवरण में एक असंगति : अभी प्रेक्षागृहों के भेदों का जो वर्णन दिया गया है, वह स्थूल दृष्टि से देखने पर ठीक है। परन्तु, सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर इसमें एक असंगति दिखाई देती है। यह असंगति विशेषतः 'प्रेक्षागृहाणां सर्वेषां तस्मान्मध्यममिष्यते" -इस मध्यम मण्डप के विधान के कारण सामने आती है। आगे भरत ने इसी अध्याय में ८६ से १०१ श्लोक-संख्या तक चतुरस्र मण्डप के निर्माण का वर्णन किया है, जिसमें उन्होंने चतुरस्र मण्डप का परिमाण चारों ओर ३२ हाथ का बताया है। ऊपर की सारणी में ३२ गुणा ३२ हाथ का जो चतुरस्र मण्डप दिखाया गया है, वह चतुरस्र श्रेणी का अवर मण्डप है। इसके पहले विकृष्ट मण्डप के निर्माण का विस्तृत वर्णन दिया गया है। उसका १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २, श्लोक २४
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परिमाण ६४ गुणा ३२ हाथ बताया गया है। ऊपर की सारणी में ६४ गुणा ३२ हाथ का विकृष्ट मण्डप उस श्रेणी का मध्यम मण्डप बनता है, जो मध्यम मण्डप के विधान के अनुकूल है। इसी तरह चतुरस्र वर्ग में भी मध्यम मण्डप का ही विवरण देना चाहिए था। परन्तु, ऊपर की सारणी के अनुसार ३२ गुणा ३२ हाथ का चतुरस्र मण्डप उस वर्ग का अवर मण्डप बनता है, मध्यम नहीं। इस विवरण में इस प्रकार यह असंगति दिखाई देती है। इस असंगति का निराकरण करने के उद्देश्य से डॉ० मनकद और प्रो० सुब्बाराव ने अपने-अपने ढंग से समाधान प्रस्तुत किये हैं, परन्तु उनके भी समाधान तुटि-रहित नहीं हैं। आचार्य विश्वेश्वर ने इसका बहुत सूक्ष्म विश्लेषण करके अपना समाधान उपस्थित किया है, जो सन्तोषप्रद है। समस्या का समाधान : इस समस्या की उत्पत्ति का प्रधान कारण यह है कि डॉ० मनकद और प्रो० सुब्बाराव ३२ गुणा ३२ हाथवाले चतुरस्र मण्डप को इस वर्ग का मध्यम मण्डप मानते रहे हैं। किन्तु, वस्तुतः यह चतुरस्र वर्ग का मध्यम नहीं, अवर मण्डप है। यदि यह बात समझ ली जाय, तो इन दोनों विद्वानों ने जो कुछ विवेचन किया है, उसकी आवश्यकता नहीं रह जाती। प्रश्न उठता है कि जब ३२ गुणा ३२ हाथवाला मण्डप चतुरस्र वर्ग का अवर मण्डप है, तो इन दोनों विद्वानों ने इसे मध्यम मण्डप सिद्ध करने का प्रयत्न ही क्यों किया? वस्तुतः, इन विद्वानों के सामने दो कारण हैं : १. सभी प्रकार के मण्डपों में मध्यम मण्डप की प्रशंसा की गई है, अतः यहाँ जिस चतुरस्र मण्डप का भरत मुनि ने इतना विस्तृत वर्णन किया है, वह प्रशंसित मध्यम मण्डप ही होना चाहिए, यही समझा गया। २, उनकी यह धारणा दूसरे इस कारण से पुष्ट होती है कि विकृष्ट आकारवाले मण्डप में ६४ गुणा ३२ हाथवाले जिस मण्डप का इस स्थान पर विस्तृत वर्णन किया गया है, वह उस वर्ग का मध्यम मण्डप ही है। यह समझ लिया गया कि उसी के उदाहरण से चतुरस्र वर्ग का यह ३२ गुणा ३२ हाथ का मण्डप भी मध्यम ही होना चाहिए। उस मध्यम मण्डप को छोड़कर अवर मण्डप का वर्णन क्यों किया गया, इस बात का कोई कारण वे नहीं समझ सके। इसीलिए, उन्होंने इसे ही मध्यम मण्डप सिद्ध करने का प्रयास किया है। यहाँ भरत मुनि ने मध्यम मण्डप छोड़कर अवर मण्डप का वर्णन क्यों किया, इसका कारण है। विकृष्ट मण्डप का विशेष वर्णन करते समय भरत मुनि ने ६४ गुणा ३२ हाथ के मध्यम मण्डप का ही वर्णन प्रस्तुत किया है। जिस स्थल पर यह परिमाण बतलाया गया है, उसके अगले ही श्लोक में भरत ने इससे बड़े आकार का मण्डप बनाने का स्पष्ट निषेध कर दिया है। इस निर्देश के अनुसार ६४ गुणा ३२ हाथ से बड़े मण्डप का निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। इसीलिए, चतुरस्र मध्यम आकार को छोड़कर अवर आकारवाले मण्डप के निर्माण पर इतना बल देना पड़ा। इससे सम्पूर्ण बात स्पष्ट हो जाती है।
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अब 'प्रेक्षागहाणां सर्वेषां तस्मान्मध्यममिष्यते' के द्वारा की गई मध्यम मण्डप की बात पर विचार करना शेष रह जाता है। परन्तु, इस प्रशंसा से इस अवर मण्डप के विषय में बाधा नहीं होती, अपितु सहायता ही मिलती है। ६४ गुणा ३२ हाथवाले मध्यम मण्डप की प्रशंसा करने का कारण यह है कि इससे बड़े आकार के मण्डप में नाट्य न ठीक से देखा ही जा सकता है और न सुना ही। अतः, इससे बड़ा प्रेक्षागृह नहीं बनाकर मध्यम परिमाण का ही प्रेक्षागृह बनाना उचित है, यह उस प्रसंग का तात्पर्य है। इसी तात्पर्य से यहाँ इस अवर मण्डप का समर्थन हो रहा है। यदि ३२ गुणा ३२ हाथ से बड़ा ६४ गुणा ६४ हाथ का मण्डप बनाया जाय, तो उसका क्षेत्रफल पूर्व-निर्धारित परिमाण से चौगुना हो जायगा, जिससे नाटक का अभिनय असफल हो जायगा। इसीलिए, इसका निषेध किया गया है। यही कारण है कि भरत मुनि ने ६४ गुणा ६४ हाथवाले मध्यम मण्डप को छोड़कर ३२ गुणा ३२ हाथवाले चतुरस्र मण्डप का विधान किया है। यह पूरी तरह समझ लेना चाहिए कि चतुरस्त्र वर्ग का अवर मण्डप है, मध्यम नहीं। इसे मध्यम मण्डप समझने का प्रयत्न उचित नहीं है। मण्डप-निर्माण की पूर्व-पीठिका : प्रयोजक को नाट्य-गृह के शिलान्यास के पूर्व भूमि की भलीभांति परीक्षा कर लेनी चाहिए। नाट्य-गृह या सभा-मण्डप की भूमि समतल, कठोर, काली या उजली होनी चाहिए। फिर शुभ्र वर्ण के बैलों से उस भूमि को हल से जोत- कर झाड़-झंखाड़, कील, हड्डी, कपाल, घास-फूस आदि को दूर करके शुद्ध कर देना चाहिए। अनुराधा, पुष्य आदि प्रशस्त नक्षत्रों में शुक्ल सूत्र से भूमि को नापना चाहिए। भरत ने उन सारी वस्तुओं के नाम गिना दिये हैं, जिनसे रस्सी बनाई जानी चाहिए। कपास, सन, मूज या वल्कल की रस्सी बनानी चाहिए। इन वस्तुओं के नाम गिनाने से स्पष्ट हो जाता है कि चमड़े के फीते का उपयोग नहीं करना चाहिए। यहाँ भरत ने रस्सी या सूत्र की दृढ़ता या मजबूती पर बहुत बल दिया है। टूटी हुई रस्सी का उपयोग कभी नहीं करे। बीच में से या आधे पर से रस्सी के टूट जाने पर स्वामी-राजा आदि प्रेक्षापति-की मृत्यु होती है, तिहाई भाग पर टूटने से राष्ट्र में विप्लव होता है, चौथाई भाग पर टूटने से नाट्याचार्य का नाश होता है और हाथ से छूट जाने पर कोई हानि होती है। अतः, रस्सी या मानसूत् दृढ़ता से पकड़ना चाहिए और सावधानी से भूमि की नाप करनी चाहिए। अनुकूल मुहर्त्त, अनुकूल तिथि तथा सुन्दर करण में ब्राह्मणों को भोजनादि से तृप्त करके मण्डप की दागवेल करानी चाहिए।
विकृष्ट आकार के मण्डप की रूपरेखा : पहले लिखा जा चुका है कि विकृष्ट, चतुरस्र तथा व्यस्र-तीनों आकार के मण्डपों में मध्यम मण्डप को ही भरत मुनि ने उत्तम माना है। अतः, उन्होंने सबसे पहले विकृष्ट आकार के ६४ गुणा ३२ हाथ के परिमाण- वाले मण्डप की रूपरेखा प्रस्तुत की है। विकृष्ट या आयताकार मध्यम परिमाण के मण्डप की लम्बाई ६४ हाथ और चौड़ाई ३२ हाथ की होती है। अभिनव ने स्पष्ट रूप से इसके
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४०६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास चार विभाग स्वीकार किये हैं। इसके बीच में सूत डालने से ३२ हाथ की भुजावाले दो वर्गाकार विभाग हो जायेंगे। इनमें से ३२ गुणा ३२ हाथ का आगेवाला भाग प्रेक्षकों के बैठने के लिए रखा गया। पिछले भाग को फिर चौड़ाई में दो भागों में विभक्त करने पर १६ गुणा ३२ हाथ के दो आयत निकलेंगे। इनमें सबसे पीछे के १६ गुणा ३२ हाथवाले स्थान में नेपथ्य-गृह रखा गया है, जहाँ वेश-भूषा आदि धारण की जाती है और आगेवाले १६ गुणा ३२ हाथ के स्थान को दो बराबर भागों में बाँटकर उनमें से ८ गुणा ३२ हाथ के दो भाग बनाने का विधान है। प्रेक्षकों के समीपवाले स्थान में मुख्य रंगपीठ और उसके पीछे नेपथ्य-गृह तथा मुख्य रंगपीठ के बीचवाले द गुणा ३२ हाथ के स्थान में रंगशीर्ष बनाया जाता है। नाट्य-मण्डप के विषय में डॉ० मनमोहन घोष का मत : कलकत्ता से प्रकाशित होनेवाली पत्रिका 'इण्डियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली' के सन् १९३२ ई० के तृतीय अंक में डॉ० डी० आर० मनकद ने भरत के नाट्यशास्त्र और अभिनवभारती के आधार पर एक लेख प्रकाशित कराया था, जिसका विषय नाट्य-मण्डप का निर्माण था। इसी लेख की आलोचना में सन् १९३३ ई० में 'इण्डियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली' में डॉ० मनमोहन घोष ने एक लेख लिखा। इस लेख में डॉ० घोष ने डॉ० मनकद से निम्नलिखित दो बातों पर मतभेद प्रकट किया : १. डॉ० घोष ने सिद्ध किया है कि नाट्य-मण्डप में रंगपीठ तथा रंगशीर्ष दो विभिन्न भाग नहीं, अपितु वे दोनों शब्द एक ही स्थान के वाचक पर्याय शब्द हैं; २. डॉ० मनकद ने नाट्य-मण्डप का जो चित्र बनाया है, उसमें आधा भाग रंगपीठ, रंगशीर्ष तथा नेपथ्य की रचना के लिए है और केवल आधा भाग प्रेक्षकों के बैठने के लिए दिया है। डॉ० घोष का कथन है कि यह उचित नहीं है। उनके मतानुसार तीन-चौथाई भाग प्रेक्षकों के बैठने के लिए और एक-चौथाई भाग में रंगपीठ, रंगशीर्ष तथा नेपथ्य-गृह की रचना होनी चाहिए। डॉ० घोष ने इन दो नवीन तथ्यों का समावेश अपने निबन्ध में किया है। इनमें प्रथम तथ्य को, अर्थात् रंगपीठ तथा रंगशीर्ष विभिन्न स्थान न होकर एक ही स्थान के विभिन्न नाम हैं, सिद्ध करने के लिए डॉ० घोष ने निम्नलिखित युक्तियाँ प्रस्तुत की हैं : (क) नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में कहा गया है कि नाट्य-मण्डप के विभिन्न स्थानों की रक्षा के निमित्त ब्रह्मा ने व्यवस्था की है, उसमें रंगपीठ का दो बार उल्लेख हुआ है, परन्तु रंगशीर्ष की कोई चर्चा नहीं हुई है। रंगपीठ का दो बार उल्लेख श्लोक- संख्या ९०-९१ में प्रस्तुत किया गया है। (ख) द्वितीय अध्याय के श्लोक ३२-३३ में नाट्य-मण्डप के विभिन्न भागों का निर्देश हुआ है। इन श्लोकों में केवल रंगशीर्ष का उल्लेख हुआ है, रंगपीठ का कोई उल्लेख नहीं। इससे पता चलता है कि प्रथम अध्याय में जिसे रंगपीठ कहा गया है, वही द्वितीय अध्याय में रंगशीर्ष नाम से उल्लिखित है।
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(ग) द्वितीय अध्याय के श्लोक ७२, ७३, ७५ में फिर केवल रंगशीर्ष का उल्लेख किया गया है। फिर इस स्थल पर भी रंगपीठ की कोई चर्चा नहीं है। इससे पता चलता है कि प्रथम अध्याय में जिस स्थान को रंगपीठ नाम दिया गया, उसी स्थान का निर्देश द्वितीय अध्याय के इन दोनों स्थलों पर रंगशीर्ष नाम से किया गया। इसके अतिरिक्त कुछ संस्करणों में 'रंगशीर्ष' प्रशस्यते' के स्थान पर 'रङ्गपीठं प्रशस्यते' पाठान्तर भी मिलता है। इससे अनुमान होता है कि प्राचीन काल में भी नाट्यशास्त्र के कुछ पाठक रंगपीठ तथा रंगशीर्ष को एक ही स्थान मानते थे। रंगशीर्ष का यह उल्लेख विकृष्ट मण्डप की रचना के प्रसंग में किया गया है। (घ) त्यस्र रंग-मण्डप की रचना का विवरण द्वितीय अध्याय के श्लोक १०२, १०३, १०४ में दिया गया है। इनमें भी केवल रंगपीठ का उल्लेख हुआ है, रंगशीर्ष का नहीं। इससे भी अनुमान लगाया जा सकता है कि रंगपीठ तथा रंगशीर्ष विभिन्न स्थान नहीं। (ङ) द्वितीय अध्याय के श्लोक 5 से १०१ तक चतुरस्र मण्डप की रचना का विवरण दिया गया है। यहाँ भी चार स्थानों पर रंगपीठ शब्द का और एक स्थान पर रंगशीर्ष का स्पष्ट प्रयोग किया गया है। इस एक स्थान पर भी पाठान्तर में रंगपीठ पाठ भी पाया जाता है। इससे भी सिद्ध होता है कि रंगपीठ और रंगशीर्ष वास्तव में एक ही स्थान के दो नाम हैं, अलग-अलग स्थान नहीं। डॉ० घोष के इस विवेचन से यवनिका या पर्दे के स्थान का भी प्रश्न उपस्थित हो गया है। नाट्यशास्त्र के द्वितीय अध्याय में, जहाँ नाट्य-मण्डप का विवरण है, यवनिका की कोई चर्चा नहीं है, परन्तु आगे चलकर अनेक स्थानों पर इसका उल्लेख किया गया है। यवनिका के स्थान का विवेचन करते समय अभिनवगुप्त ने स्पष्ट रूप से लिखा है : 'तत्न यवनिका रङ्गपीठ तच्छिरसोर्मध्ये'। इससे यवनिका का स्थान रंगपीठ तथा रंगशीर्ष के बीच में निर्धारित होता है। परन्तु, डॉ० मनमोहन घोष रंगपीठ तथा रंगशीर्ष को भिन्न नहीं मानते, अतः उन्होंने अभिनवगुप्त के इस स्पष्ट निर्देश की भी अवहेलना करके नेपथ्य-गृह के द्वारों पर पड़े पर्दों को यवनिका मान लिया है। इस प्रकार, डॉ० घोष ने अपने उस लेख में निम्नलिखित तीन सिद्धान्तों की स्थापना की है : १. रंगपीठ और रंगशी्ष अलग-अलग स्थान नहीं, प्रत्युत एक ही स्थान के दो नाम हैं, अर्थात् दोनों पर्यायवाची शब्द हैं। २. नाट्य-मण्डप का तीन-चौथाई भाग प्रेक्षकों के बैठने के लिए रहना चाहिए और एक-चौथाई भाग में रंगपीठ तथा नेपथ्य-गृह केवल दो भाग रहने चाहिए। ३. नेपथ्य-गृह के द्वारों पर पड़े पर्दों को ही यवनिका, पटी आदि कहते हैं। डॉ० मनकद द्वारा प्रत्यालोचना : डॉ० मनमोहन घोष के उपर्युक्त लेख की प्रत्या- लोचना डॉ० मनकद] ने 'इण्डियन हिस्टोरिकल क्वाटरली' के सन् १९३३ ई० के अंक में
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४०८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास की थी। कुछ अन्य श्लोकों का हवाला देकर उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि रंगपीठ तथा रंगशीर्ष की अलग-अलग स्थिति ही भरत मुनि को अभिप्रेत है। मुख्यतः निम्नलिखित श्लोकों के द्वारा उन्होंने यह बात सिद्ध करने का प्रयत्न किया है: १. समुन्नतं समं चैव रङ्गशीर्ष तु कारयेत्। विकृष्टे तून्नतं कार्य चतुरस्त्रे समं तथा।१ इस श्लोक में समुन्नत तथा सम दो प्रकार के रंगशीर्ष का उल्लेख किया गया है और बताया गया है कि विकृष्ट मण्डप में समुन्नत और चतुरस्र मण्डप में सम रंगशीर्ष बनाना चाहिए। यहाँ प्रश्न उठता है कि किसकी अपेक्षा समुन्नत अर्थात् अधिक ऊँचा रंगशीर्ष बनाना चाहिए। इसका उत्तर रंगपीठ में मिलता है। कहने का तात्पर्य यह हुआ कि विकृष्ट नाट्य-मण्डप में रंगपीठ की अपेक्षा रंगशीर्ष कुछ ऊँचा होना चाहिए और चतुरस्र मण्डप में रंगपीठ तथा रंगशीर्ष दोनों एक ही ऊँचाई के होने चाहिए। यही भरत मुनि का अभिप्राय है, जिसका समर्थन अभिनवगुप्त ने इस श्लोक की टीका में किया है। २. फिर रंगपीठ तथा रंगशीर्ष की भिन्नता सिद्ध करने के लिए उन्होंने निम्नलिखित दूसरा श्लोक भी उद्धृत किया है : रङ्गपीठं ततः कार्य विधिदृष्टेन कर्मणा। रङ्गशीर्ष तु कर्त्तव्यं षड्दारुकसमन्वितम् ॥२ इस श्लोक में रंगपीठ तथा रंगशीर्ष का अलग-अलग स्पष्ट उल्लेख किया गया है। इस आधार पर डॉ० मनकद ने डॉ० घोष के मत का खण्डन करके अपना पक्ष पुष्ट करने की चेष्टा की है। डॉ० राघवन द्वारा डॉ० घोष की आलोचना : 'इण्डियन हिस्टोरिकल क्वार्टरली' के सन् १९३३ ई० के उसी अंक में डॉ० वी० राघवन का भी लेख निकला, जिसमें डॉ० घोष के मत की आलोचना थी। उस लेख में उन्होंने 'अभिनवभारती' के कतिपय उद्धरण देकर रंगशीर्ष तथा रगपीठ को भिन्न-भिन्न सिद्ध करने का प्रयत्न किया है। अभिनवगुप्त ने स्पष्ट रूप से कई स्थलों पर इन दोनों को भिन्न प्रतिपादित किया है। डॉ० राघवन द्वारा दिये गये उद्धरण ये हैं : १. रङ्गपीठस्य यदुपरि शिरोरूपमित्यर्थः । तथा च रङ्गपीठापेक्षया रङ्गशिर उन्नतं वक्ष्यते। (पृ० ६९, प्रथम संस्करण)। २. समुन्नतमिति रङ्गपीठापेक्षया। (पृ० ७०, प्रथम संस्करT) १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २, श्लोक १०० २. वही, श्लोक ६७-६5
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३. तत्र रङ्गपीठरङ्गशिरसोर्वक्तव्यशेषं निरूपयति अष्टहस्तं त्विति। (पृ० १०२, प्रथम संस्करण ) इस प्रकार विद्वानों द्वारा उस लेख की आलोचना हुई थी। आचार्य विश्वेश्वर द्वारा डॉ० घोष की आलोचना : आचार्य विश्वेश्वर का मत है कि डॉ० घोष ने यह भूल इसलिए कर दी कि वे उन श्लोकों का अर्थ ठीक तरह से नहीं समझ सके हैं। इन श्लोकों में भरत मुनि ने ६४ गुणा ३२ हाथ के नाट्य-मण्डप को तीन बार बाँटकर चार विभाग किये हैं। यह सभी जानते हैं कि किसी क्षेत्र को तीन बार बाँटने से उसके चार भाग हो जाते हैं। भरत मुनि ने यहाँ १. द्विधा कुर्यात्, २ द्विधा भूतस्य तस्य तु और ३. सममर्द्धविभागेन-इस प्रकार तीन बार विभाजन का निर्देश किया है, जिससे इस क्षेत्र के चार विभाग बन जाते हैं। परन्तु, डॉ० घोष ने चार के स्थान पर तीन ही विभाग किये हैं, अतः उनका सिद्धान्त ठीक नहीं बैठता। उन्होंने रंगशीर्ष एवं नेपथ्य-इन दो ही भागों को देखा और तीसरा भाग प्रेक्षकों के बैठने के लिए मानकर तीन ही भाग समझ लिया। यदि 'रङ्गशीर्ष' इस एकवचन पाठ के स्थान पर उनके सामने 'रङ्गशीर्षे' यह द्विवचन पाठ रहता, तो सम्भवतः वे इस प्रकार भटक नहीं जाते। उस दशा में वे चार विभागों की बात ठीक से समझ जाते और उसके अलग-अलग नामों का भी ज्ञान हो जाता। उन्होंने रंगशीर्ष और रंगपीठ को अलग-अलग नहीं समझा, यही भूल है, जिसके कारण उपरिलिखित दो अन्य भी भूलें हुई हैं। यदि इस मौलिक भूल को सुधार लिया जाय, तो शेष दो भूलें भी स्वयं ही सुधर जायेंगी। यदि रंगपीठ तथा रंगशीर्ष की स्थिति अलग-अलग स्वीकार कर ली जाती है, तो जो अभिनवगुप्त के स्पष्ट निर्देश की अवहेलना करके नेपथ्य-गृह के पर्दे को यवनिका कहा गया है, वह भूल नहीं होती। फिर भी सहज ही समझा जा सकता था कि यवनिका का स्थान रंगशीर्ष तथा रंगपीठ के बीच में ही रहना चाहिए। इस प्रकार, आचार्य विश्वेश्वर के मतानुसार यह सारी गड़बड़ी इस पाठ-दोष के कारण हुई है। निष्कर्ष : निष्कर्ष-रूप में मेरा निवेदन है कि डॉ० मनमोहन घोष के उपर्युक्त तीनों ही सिद्धान्त मिथ्या तथा भ्रमपूर्ण हैं। अभिनवगुप्त के ही उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि रंगशीर्ष तथा रंगपीठ नाट्यमण्डप में दो भिन्न-भिन्न स्थान हैं। यह मान लेने पर डॉ० घोष की दूसरी स्थापना भी निराधार हो जाती है और यह भी स्पष्ट हो जाता है कि यवनिका नेपथ्य के द्वार पर लगा पर्दा नहीं है, प्रत्युत रंगपीठ तथा रंगशीर्ष के बीच में लगी रहती है। नेपथ्य-गृह : रंगशीष के पीछे १६ गुणा ३२ हाथ भाग को नेपथ्य-गृह बनाना चाहिए। यहाँ अभिनवगुप्त ने तीन आचार्यों के मत दिये हैं, जिनमें नेपथ्य-गृह, रंगशीर्ष तथा रंगपीठ की तीन प्रकार से माप दी गई है। स्वयं अभिनवगुप्त ने ६४ गुणा ६४ हाथ के वर्गाकार नाट्यमण्डप की नाप देकर चक्कर में डाल दिया है, जबकि भरत ने ६४
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४१० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास गुणा ३२ हाथ के आयताकार मण्डप का वर्णन इस स्थल पर किया है। नेपथ्य में दो द्वार होते हैं-एक उत्तर की ओर और दूसरा दक्षिण की ओर। ये द्वार अभिनव के बाद पात्रों के विश्राम के लिए तथा रंगमंच पर स्थित पात्रों पर समाजियों की एकाएक दृष्टि बचाने के लिए होते हैं। रंगशीर्ष : रंगशीर्ष की स्थिति नेपथ्य-गृह और रंगपीठ के बीच में मानी गई है। ६४ गुणा ३२ हाथ के मण्डप में यह ८ गुणा ३२ हाथ के परिमाण का होता है। यह थोड़ा ऊँचा होता है और यही पर अभिनेता के द्वारा नाटक के आरम्भ होने के पूर्व पूजा आदि का विस्तृत विधान है और यहीं वे वस्त्रादि से सज्जित होकर आगे के दृश्यों के लिए तैयारी करते थे। रंगपीठ और रंगशीर्ष के बीच एक पर्दा-मात्र का व्यवधान होता था। इस पर्दे को यवनिका कहते हैं। अभिनव ने कहा है कि यदि नाट्य-मण्डप उत्तान सोये मनुष्य के रूप में माना जाय, तो यह स्थान उसके सिर के समान लगेगा। रंगशीर्ष का अर्थ भी रगमंच का सिर है। रंगशीर्ष से नेपथ्य में आने-जाने के लिए दो द्वारों का भी विधान है। रंगशीर्ष का धरातल कछुए या मछली की पीठ के समान नहीं बनाना चाहिए, वरन् शुद्ध दर्पण के तल के समान एक-सा समतल होना चाहिए। समतल रंगशीर्ष ही अच्छा समझा जाता है। रंगशीर्ष में काष्ठ की कला भी आवश्यक है। षड्दारुक : रंगशीर्ष की रचना में षड्दारुक के प्रयोग की भी समस्या है। भरत ने रंगशीर्ष की रचना में षड्दारुक का विधान किया है : रङ्गशीर्ष' तु कर्त्तव्यं षड्दारुकसमन्वितम्।' अभिनवगुप्त ने मूल कारिका में प्रयुक्त षड्दारुक पद की तीन व्याख्याएँ दी हैं। प्रथम व्याख्या के अनुसार नेपथ्य-गृह की दीवाल के सामने उससे लगे हुए रंगशीर्ष और रंगपीठ की सीमा पर पहले काष्ठ के चार सुन्दर स्तम्भ खड़े किये जायँ। ये चार काष्ठ हो गये। उनके ऊपर और नीचे के दो काष्ठों को मिलाकर छह काष्ठ हो जाते हैं। इन काष्ठों पर सुन्दर कारीगरी रहनी चाहिए। इस तरह रंगशीर्ष 'षड्दारुकसमन्वित' हो जाता है। स्मरणीय है कि रंगशीर्ष के इस भाग की लम्बाई ३२ हाथ है। पहले दो स्तम्भ एक-दूसरे से आठ हाथ की दूरी पर खड़े किये जाते हैं; इस प्रकार दोनों ओर की अन्तिम दीवाल से १२-१२ हाथ की दूरी रहेगी। अब इन स्तम्भों से अपनी दीवालों की ओर चार हाथ हट- कर दो और स्तम्भ खड़े किये जायँ। इस प्रकार ये दोनों स्तम्भ अपनी ओर की दीवालों से द-८ हाथ की दूरी पर रहेंगे। इस हिसाब से रंगशीर्ष में दोनों किनारों पर दो द्वार और बीच में एक द्वार (कुल तीन द्वार) आठ-आठ हाथ की दूरी पर और दो द्वार चार-चार हाथ की दूरी पर बन जाते हैं। इन चार स्तम्भों के ऊपर और नीचे सरदल और देहरी के रूप में दो काष्ठ लगेंगे, जिससे षड्दारुक बन जाते हैं। इस प्रकार छह काष्ठों से पाँच द्वार बन जाते हैं, जिसके कारण रंगशीर्ष का सौन्दर्य बहुत बढ़ जाता है। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २, श्लोक ६द
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अभिनवगुप्त ने अपने कुछ पूर्ववर्त्ती आचार्यों के भी मत, इस प्रसंग में, उद्धृत किये हैं। कुछ आचार्यों के मतानुसार पहली व्याख्या के ही समान चार स्तम्भ लगाये जाते हैं, किन्तु उनकी स्थिति में थोड़ा अन्तर है। उसमें दोनों पार्श्वों, अर्थात् अगल-बगल की दोनों दीवालों के सहारे दो स्तम्भ-सदृश भाग बनेंगे। इन दोनों पार्श्वों के बीच में दो स्तम्भ खड़े किये जायेंगे। पाश्वों के दो स्तम्भ, बीच के दो स्तम्भ तथा ऊपर-नीचे के दो काष्ठों को मिलाकर षड्दारुक हो जाते हैं। इस मत के अनुसार तीन द्वार होंगे। षड्दारुक की तीसरी व्याख्या कुछ पारिभाषिक शब्दों पर आश्रित है, अतः दुरूह हो गई है। इसमें १. ऊह, २. प्रत्यूह, ३. निर्यूह, ४. संजवन, ५. अनुबन्ध और ६. कुहर-इन छह काष्ठों को षड्दारुक कहा गया है। ग्रन्थकार को इन छहों पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या देनी पड़ी है। स्तम्भ के सिर के ऊपर सबसे बाहर निकला हुआ पहला काष्ठ ऊह कहा जाता है। इसके ऊपर दूसरा काष्ठ-खण्ड रहता है, जो पहले से भी अधिक बाहर निकला रहता है। इसे प्रत्यूह या तुला कहा जाता है। तीसरा काष्ठ प्रत्यूह से बाहर दो स्तम्भों के बीच लगे हुए भित्ति-सदृश तख्तों में चौखटे के समान जो होता है, वह निर्यूह कहलाता है। इस निर्यूह चौखटे के भीतर भित्ति के समान जो तख्ता लगाया जाता है, उसे संजवन फलक कहा जाता है। स्तम्भों के ऊपर जो सिंह, सर्प आदि के चित्र उभरे हुए बने होते हैं, उन्हें अनुबन्ध कहते हैं। कुहर उस प्रकार की कारीगरी को कहते हैं, जो स्तम्भों पर भीतर की ओर गड्ठा करके बनाई रहती है। इस कारीगरी में पर्वत, वन, नगर, कुंज, गह्नर आदि का अंकन हो सकता है। यह जो छह प्रकार का दारुकर्म होता है, उसे ही यहाँ षड्दारुक कहा गया है। ये सब कार्य प्रत्येक दो स्तम्भों के बीच में हो सकते हैं। ऊह-प्रत्यूह आदि की कल्पना निराधार नहीं है, आगे भरत ने इनका वर्णन किया है। ऊह आदि के अतिरिक्त शालभंजिका का अर्थ उन्होंने काठ की पुतलियाँ माना है। विभिन्न आकारवाली वेदियों, विचित्न चौकोर एवं अठकोनोंवाली जालियों, गोल छेदवाले झरोखों, स्तम्भों के ऊपर सुन्दर पीठों, उनके ऊपर धारणियों, कबूतरों की पंक्तियों आदि का रचना- विधान भी दिया गया है। रंगपीठ : नाट्य-मण्डप या प्रेक्षागृह की रचना में रंगपीठ का स्थान सबसे प्रधान है। रंगपीठ वह स्थान है, जहाँ नाट्य का अभिनय होता है, इसलिए नाट्य-मण्डप की रचना में इसका महत्त्व सर्वाधिक है। वस्तुतः, सारे नाट्य-मण्डप की रचना का उद्देश्य अभिनय करना ही होता है, अतः अभिनय करने का स्थान रंगपीठ ही सभी प्रेक्षकों की दृष्टि का केन्द्र बना रहता है। इसकी रचना दो प्रकार से हो सकती है : १. इसे प्रेक्षकों के बैठने के स्थान से ऊँचा बनाया जाय और २. इसे प्रेक्षकों के बैठने के स्थान से नीचा बनाया जाय। डॉ० मनमोहन घोष ने नाट्यशास्त्र के अपने अँगरेजी-अनुवाद में रंगपीठ को प्रेक्षकों के बैठने के स्थान से नीचा बनाना उचित माना है। परन्तु, यह भ्रान्त धारणा है और यह भ्रम तत्सम्बन्धी श्लोक में 'रङ्गमण्डपम्' के अशुद्ध पाठ के कारण हुआ है।
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४१२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
रंगमण्डप के दो अर्थ हो सकते है; एक तो यह सम्पूर्ण नाट्य-मण्डप को सूचित कर सकता है और दूसरा अर्थ उस स्थान से है, जहाँ प्रेक्षक बैठते हैं। परन्तु, इन दोनों अर्थों में प्रेक्षकों के बैठनेवाला स्थान ही उचित तथा प्रमुख अर्थ है। इस अर्थ के अनुसार उक्त श्लोक का अभिप्राय होगा कि प्रेक्षकों के बैठने का स्थान ऊँचा रहना चाहिए, अर्थात् रंगपीठ या अभिनय करने का स्थान नीचा होना चाहिए। परन्तु, भरत तथा अभिनवगुप्त का अभिप्राय यह नहीं है। उनके मतानुसार रंगपीठ को प्रेक्षकों के बै ने के स्थान से डेढ़ हाथ ऊँचा बनाना चाहिए। इसका सामान्य कारण तो यह है कि रंगपीठ तथा रंगशीर्ष में 'पीठ' तथा 'शीर्ष' शब्द ऊँचे स्थान के ही द्योतक हैं। इन दोनों शब्दों से सूचना मिलती है कि प्रेक्षकों के बैठने के स्थान से अभिनय करने का स्थान अधिक ऊँचा होना चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि रंगपीठ नीचा बनाया जायगा, तो प्रकाश आदि की रुकावट से अभिनय ठीक से दिखाई ही नहीं देगा। अतः, उसको ऊँचा रखनेवाला ही पक्ष युक्तियुक्त प्रतीत होता है। डॉ० मनकद ने भी नीचा रखनेवाले ही पक्ष का समर्थन किया है, जो ठीक नहीं है। प्रेक्षकों के बैठने का स्थान : भरत ने प्रेक्षकों के बै ने के स्थान का भी सुन्दर निर्देश दिया है। प्रेक्षकों का यह स्थान सोपानाकृति में होना चाहिए। आसन लकड़ी के या ईं टों के बने रहने चाहिए। दीवालों पर अनेक प्रकार की कला-कृतियाँ होनी चाहिए, जिनमें विभिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों तथा लताओं की आकृतियाँ बनी रहनी चाहिए। प्रेक्षकों के बठने का स्थान ऐसा होना चाहिए कि बीच में एक भी स्तम्भ नहीं हो। बैठने का यह स्थान सीढ़ी के समान एक-एक हाथ भूमि से क्रमशः ऊँचा होता जाय, जिसमें दर्शक रंगपीठ के सब दृश्यों को अच्छी तरह देख सकें। मत्तवारणी : मत्तवारणी की समस्या नाट्यशास्त्र की सबसे अधिक जटिल, साथ ही सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण समस्या है। आधुनिक युग के भी कतिपय प्रसिद्ध विद्वानों ने इसके विषय में विचार-विमर्श करके तथ्य का निर्णय करने का यथासाध्य प्रयास किया है। परन्तु, वे किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने में असमर्थ ही रहे हैं। भरत ने नाट्यशास्त्र में मत्तवारणी के विषय में लिखा है : रङ्गपीठस्य पाश्वे तु कर्त्तव्या मत्तवारणी। चतुःस्तम्भसमायुक्ता रङ्गपीठप्रमाणतः॥' -अर्थात् रंगपीठ के दोनों ओर रंगपीठ की ही माप की और चार खम्भों से युक्त मत्तवारणियों की रचना करनी चाहिए। इसके आकार के विषय में दो मत दिये गये हैं। पहले मत के अनुसार मत्तवारणी वर्गाकार होती है और इसकी लम्बाई-चौड़ाई आठ-आठ हाथ होती है। अभिनवगुप्त का अपना मत यही है। किन्तु, दूसरे लोगों के मत से मत्तवारणी भी रंगपीठ के समान आयताकार बननी चाहिए। उनके मतानुसार इसकी लम्बाई सोलह हाथ तथा चौड़ाई आठ हाथ की होनी चाहिए। पहले मत के अनुसार १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २, श्लोक ६३
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रँगमंच [४१३ विकृष्ट रंग-मण्डप में केवल रंगपीठ के ही किनारों पर मत्तवारणी ८ गुणा ८ हाथ के वर्ग के आकार में होगी। दूसरे मतवाले इसकी लम्बाई १६ हाथ और चौड़ाई ८ हाथ मानते हैं। यह मत्तवारणी रंगपीठ तथा रंगशीर्ष दोनों के किनारों के साथ बनेगी। विकृष्ट मण्डपों में रंगपीठ और रंगशीर्ष-दोनों की चौड़ाई आठ-आठ हाथ होती है, अतः दोनों मिलकर चौड़ाई १६ हाथ की हो जाती है। इस प्रकार, दोनों भागों को मिलाकर उनके किनारों पर मत्तवारणी बनाने से १६ गुणा ८ हाथ की आयताकार मत्तवारणी बन जाती है। चतुरस्र मण्डप में रंगपीठ आठ हाथ चौड़ा और रंगशीर्ष चार हाथ चौड़ा, दोनों मिलकर १२ हाथ चौड़ा होता है। अतः, उसमें आयताकार मत्तवारणी १२ गुणा द हाथ की हो जा सकती है। उसे १६ गुणा हाथ की बनाने के निमित्त चार हाथ चौड़ा क्षेत्र नेपथ्यगृह के सामने से लेना होगा। विकृष्ट मण्डप में रंगपीठ तथा रंगशीर्ष दोनों आठ-आठ हाथ चौड़े होते हैं, अतः उसमें १६ गुणा 5 हाथ की आयताकार मत्तवारणी रंगपीठ तथा रंगशीर्ष के सामने सहज ही बन सकती है। मत्तवारणी की समस्याएँ : पहले लिखा जा चुका है कि मत्तवारणी की समस्या नाट्यशास्त्र की बहुत ही जटिल, साथ ही महत्त्वपूर्ण समस्या है। इस समस्या के कई भाग हैं-१. उसका ठीक शब्द या नाम क्या है? २. उसका वास्तविक अर्थ क्या है? ३. उसका ठीक स्थान क्या है ? ४. उसका आकार क्या है ? ५. उसकी संख्या कितनी है? ये सब प्रश्न इस मूल समस्या से सम्बद्ध बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रासंगिक प्रश्न हैं। नीचे इन प्रश्नों पर विचार करने का प्रयास किया जा रहा है। १. मूल नाट्यशास्त्र और अभिनवभारती में सर्वत्र 'मत्तवारणी' शब्द छपा है, इसलिए सभी विद्वानों ने इस शब्द का प्रयोग किया है। - परन्तु, यह शब्द सन्दिग्ध जान पड़ता है और इसकी अपेक्षा 'मत्तवारण' अधिक उपयुक्त जान पड़ता है। कोश और साहित्य - दोनों ही दृष्टियों से 'मत्तवारणी' शब्द उपयुक्त नहीं प्रतीत होता। कोश तथा साहित्य-कहीं भी 'मत्तवारणी' शब्द नहीं मिलता; इसके स्थान पर मत्तवारण शब्द ही मिलता है। 'शब्दकल्पद्रुम' में मत्तवारण ही मिलता है। 'कुट्टनीमतम्' नामक ग्रन्थ में 'मत्तवारण' ही मिलता है। महाकवि सुबन्धु की 'वासवदत्ता' में भी मत्तवारण का ही प्रयोग किया गया है। इन सभी ग्रन्थों में 'मत्तवारण' शब्द ही है। वस्तुतः, नाट्यशास्त्र के अतिरिक्त किसी अन्य ग्रन्थ में 'मत्तवारणी' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। इसलिए, ऐसा अनुमान होता है कि 'मत्तवारण' शब्द का ही प्रयोग 'मत्तवारणी' के रूप में कर दिया गया है। २. दूसरी समस्या 'मत्तवारणी' या 'मत्तवारण' शब्द के अर्थ की है। आधुनिक विद्वानों में इस शब्द के अर्थ को लेकर बड़ा मतभेद है। कोश में 'मत्तवारण' शब्द का अर्थ बरामदा है। शब्दकल्पद्रुम में 'मत्तं वारयतीति मततवारणः' व्युत्पत्ति करके 'प्रासादवीथीनां वरण्ड:' अर्थ किया गया है। 'कुट्टनीमतम्' के टीकाकार ने भी 'मत्तवारण' का अर्थ 'प्रासादवीथीनां वरण्डः' ही किया है। साहित्य और कोश के प्रमाणों से 'मत्तवारण' शब्द का
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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासे
अर्थ बरामदा ही होना चाहिए। आधुनिक विद्वानों में डॉ० मनकद, प्रो० सुब्बाराव, प्रो० भानु तथा श्रीमती गोदावरी केतकर ने 'मत्तवारणी' के भिन्न-भिन्न अर्थ किये हैं।
३. तीसरी समस्या नाट्य-मण्डप में 'मत्तवारणी' के स्थान-निर्धारण की है। आधुनिक विद्वानों में प्रो० सुब्बाराव को छोड़कर लगभग सभी ने एक ही रूप में 'मत्तवारणी' का स्थान निश्चित किया है। परन्तु, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उन सबका निर्णय प्रामाणिक माना जायगा। वास्तविक बात इसके सर्वथा विपरीत है। इन सबका निर्धारित किया हुआ स्थान अभिनवगुप्त के मत के विरुद्ध पड़ता है। अभिनवगुप्त द्वारा दी हुई व्याख्या से स्पष्ट हो जाता है कि मत्तवारणियों की रचना रंगपीठ के दोनों ओर होनी चाहिए। जब यह ज्ञात हो जाता है कि 'मत्तवारण' का अर्थ बरामदा है तब बहुत सरलता से यह बात समझ में आ जाती है कि इसकी रचना मण्डप के बाहर होनी चाहिए। बरामदा मुख्य भवन के सदा बाहर ही बनता है, भीतर नहीं। इसलिए, अभिनवगुप्त ने बहुत स्पष्ट शब्दों में मण्डप के बाहर ही इसकी रचना का विधान किया है। किन्तु, आधुनिक विद्वान् यह बात नहीं समझ सके हैं। डॉ० मनमोहन घोष और डॉ० मनकद ने मुख्य मण्डप के भीतर ही मत्तवारणी का स्थान निकालने का प्रयत्न किया है। यह अभिनवगुप्त के मत के विरुद्ध होने के कारण भूल है। इस भूल का एकमात्र कारण यही है कि वे लोग इस शब्द का यथार्थ अर्थ नहीं समझ सके हैं। वस्तुतः, रंगपीठ के दोनों ओर बनाई जानेवाली जिन मत्तवारणियों का विधान किया गया है, उनकी स्थिति भी रंगपीठ से लगी हुई, किन्तु उसके बाहर की ओर होती है। इसकी वास्तविक स्थिति यही है। इसलिए, अन्य लोगों ने मत्तवारणी की जो स्थिति दिखाई है, वह अभिनवगुप्त के सिद्धान्त के सर्वथा प्रतिकूल होने के कारण अनुपादेय तथा अग्राह्य है।
४. चौथी समस्या मत्तवारणी की संख्या की है। यह एक है या दो ? इसका उत्तर है कि रंगपीठ के दोनों ओर एक-एक मत्तवारणी या कुल दो मत्तवारणियों की रचना करनी चाहिए। नाट्यशास्त्र की कारिका में 'कर्त्तव्या मतवारणी' आदि में एकवचन का प्रयोग हुआ है, जिससे पता चलता है कि रंगपीठ के एक ही ओर एक ही मत्तवारणी की रचना होती है। परन्तु, अभिनव ने उसकी व्याख्या में द्विवचन 'भाविनोद्वयो: पार्श्वयोः' का प्रयोग किया है, अर्थात् दोनों किनारों पर मत्तवारणी का विधान माना है।
५. पाँचवीं समस्या मत्तवारणी के आकार की है। इसका विवेचन पहले किया जा चुका है।
इस सारी जटिलता का मुख्य कारण नाट्यशास्त्र के प्राचीन संस्करण मैं पाया जानेवाला पाठ-दोष है। वहाँ पाठ है : 'रङ्गपीठस्य पा्श्वे तु कर्त्तव्या मत्तवारणी'। किसी आरम्भिक लिपिकार की भूल से 'कर्त्तव्यौ मत्तवारिण्यौं' के स्थान पर 'कर्त्तव्या मत्तवारणी' पाठ आ गया। इसीसे सभी समस्याएँ उत्पन्न होती गई। यदि यह पाठ शुद्ध कर दिया
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रंगमंच [४१५
जाय, तो सारी समस्याओं का समाधान हो जायगा। आचार्य विश्वेश्वर ने उक्त श्लोक का उचित पाठ निम्नलिखित रूप में माना है :
पार्श्वयो रङ्गपीठस्य कर्त्तव्यौ मत्तवारणौ। चतुःस्तम्भसमायुक्तौ रङ्गपीठप्रमाणतः ।।'
'मत्तवारणी' के विषय में प्रो० मुब्बाराव की कल्पना : नाट्यशास्त्र के बड़ौदा से प्रकाशित द्वितीय संस्करण के अन्त में प्रेक्षागृह की रचना के सम्बन्ध में प्रो० सुब्बाराव का एक लेख प्रकाशित हुआ है। उस लेख में उन्होंने एक सवथा नवीन कल्पना 'मत्तवारणी' के विषय में रखी है। इस कल्पना का आधार नाट्यशास्त्र में प्रयुक्त 'पाश्वे', 'कर्त्तव्या' और 'मत्तवारणी' शब्दों का एकवचन में प्रयोग है। अभिनवगुप्त तथा आधुनिक विद्वानों ने रंगपीठ के दोनों ओर दो मत्तवारणियों के विधान का प्रतिपादन किया है, किन्तु प्रो० सुब्बाराव ने एक ही मत्तवारणी स्वीकार की है। उन्होंने 'मत्तवारणी' शब्द का अर्थ किया है : 'मत्तानां वारणानां श्रेणी मत्तवारणी' और रंगपीठ के सामने की ओर धरातल से डेढ़ हाथ उठे हुए भाग की दीवाल पर जो पलस्तर किया जाय, उसमें मत्त हाथियों के चित्र बनाये जायँ। उनका मत है कि पलस्तर में बनी मत्त हाथियों की यह श्रेणी ही मत्तवारणी है।
प्रो० सुब्बाराव ने अपनी इस विचित्न कल्पना के समर्थन में द्वितीय पंक्ति में आये हुए 'चतुःस्तम्भसमायुक्ता' में 'भ' के स्थान पर 'ब' करके 'चतुःस्तम्भसमायुक्ता' के स्थान पर 'चतुःस्तम्बसमायुक्ता' पाठ स्वीकार किया है। 'स्तम्भ' शब्द का अर्थ हाथियों को बाँधने का खम्भा या आलान है। प्रो० सुब्बाराव का कथन है कि 'स्तम्ब' पाठ ही मानना चाहिए। इस प्रकार चार स्तम्बों से युक्त मत्तवारणों की श्रेणी रंगपीठ के सामने, केवल एक ही भाग में, पलस्तर में चित्रित की जायगी। इसी का नाम मत्तवारणी है। इस कल्पना के आधार पर उन्होंने मत्तवारणी का चित्र भी प्रस्तुत किया है।
प्रो० सुब्बाराव की यह अपूर्व कल्पना स्थापत्य-कला की दृष्टि से भले ही उपयो- गिनी सिद्ध हो, परन्तु हमें तो इस बात की परीक्षा करनी है कि यह भरत मुनि के अभिप्राय के अनुकूल है या नहीं, और अभिनवगुप्त उसका समर्थन कर रहे हैं या नहीं। यदि यह कल्पना भरत के नाट्यमण्डप-सम्बन्धी विचार के अनुकूल पड़ जाती है तब तो उपादेय हो सकती है। यदि भरत के विचार से इसकी संगति नहीं बैठती है, तो स्थापत्य-कला की दृष्टि से कुछ भी उपयोगी होने पर भी हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते। प्रो० सुब्बाराव की कल्पना को इस कसौटी पर कसने पर वह संगत नहीं प्रतीत होती। भरत मुनि के प्रेक्षागृह में ऐसी मत्तवारणी का कोई स्थान नहीं है।
१ हिन्दी-अभिनवभारती, पृ० ३१२
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४१६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास प्रो० भानु का मत : 'मत्तवारणी' की व्याख्या के सम्बन्ध में प्रो० भानु का मत प्रो० सुब्बाराव आदि के मत से अधिक तर्कसंगत है। महाराष्ट्र के गण्यमान्य विद्वान् प्रो० भानु ने भरत के नाट्यशास्त्र का मराठी-भाषा में उत्कृष्ट अनुवाद प्रस्तुत किया है। इस अनुवाद में उन्होंने 'मत्तवारणी' की भी व्याख्या की है। 'मत्तवारणी' का सरल अर्थ है कि जो मत्तों का वारण करनेवाली हो। उन्होंने यही अर्थ ग्रहण किया है और इसकी उपयोगिता भी दिखा दी है। वे कहते हैं कि नाटक देखते समय कोई अत्यन्त भावपूर्ण दृश्य देखकर कुछ प्रेक्षक उन्मत्त-से हो जाते हैं और उस भावावेश में मंच पर अभिनय करनेवाले अभिनेताओं के निकट पहुँचने का प्रयत्न करते हैं। यदि ऐसे मत्त किसी प्रकार मंच पर पहुँचने में सफल हो जायँ, तो सारे नाटक का अन्त वहीं हो जायगा। अतः, उन लोगों को रोकने के विचार से रंगपीठ के सामने की ओर छोटी-सी दीवाल या कटहरा आदि लगा देने की आवश्यकता होती है। इस रुकावट के कारण मंच पर जाने से मत्त लोगों का वारण हो जाता है। अतः उस रुकावट को 'मत्तवारणी' कहा जाता है। निष्कर्ष : शब्द की अन्वर्थता तथा मत्तवारणी की उपयोगिता की दृष्टि से प्रो० भानु द्वारा दी गई व्याख्या सुन्दर एवं उपादेय प्रतीत होती है। परन्तु, यह व्याख्या अभिनवगुप्त के अभिप्राय के सर्वथा प्रतिकूल है। पहले ही लिखा जा चुका है कि अभिनवगुप्त ने रंगपीठ के दोनों पाश्वों में मत्तवारणी बनाने का विधान किया है। भरत मुनि का भी यही विधान है। ऐसी दशा में रंगपीठ के सामने की ओर मत्तवारणी बनाने का प्रश्न उठाना असंगत होगा। दूसरी बात है कि रंगपीठ के सामने रोक लगा देने से प्रेक्षकों को अभिनय देखने में बहुत बाधा उत्पन्न होगी। कुछ लोगों की दृष्टि में प्रो० भानु ने जिस अन्वर्थता के बल पर यह व्याख्या दी है, वह अन्वर्थता ही ठीक नहीं बन पाती है। 'मत्तान् वारयतीति मत्तवारणः' इस प्रकार 'मत्तवारण' शब्द पुँल्लिंग में बनेगा। उसके स्थान पर स्त्रीलिंग में 'मत्तवारिणी' शब्द बनना चाहिए, 'मत्तवारणी' नहीं। इसलिए, गोदावरी केतकर आदि ने 'मत्तवारिणी' पाठ माना है। किन्तु, यह कोई बड़ा दोष नहीं है। वस्तुतः, भरत मुनि तथा अभिनवगुप्त को वह अर्थ अभीष्ट नहीं जान पड़ता, जो प्रो० भानु ने ग्रहण किया है। फिर भी यह अर्थ अधिक तर्कसंगत प्रतीत होता है। डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने यही अर्थ ग्रहण किया है। मैं प्रो० भानु द्वारा दिया गया यह अर्थ ग्रहण करता हूँ। नाट्यमण्डप की रचना का प्रकार : मण्डप की रचना का प्रकार बताते हुए भरत मुनि ने लिखा है : कार्य: शैलगुहाकारो द्विभूमिर्नाट्यमण्डपः । मन्दवातायनोपेतो निर्वातो धीरशब्दवान्।' -अर्थात् नाट्य-मण्डप पर्वत-कन्दरा के आकार का तथा दो भूमियोंवाला (दो भिन्न स्तरों पर) होना चाहिए और ध्वनि को गम्भीर बनाने की दृष्टि से इसमें छोटी खिड़कियाँ होनी चाहिए तथा ऐसा हो, जिसमें वायु का प्रवेश न हो सके। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २, कारिका ८७ (काव्यमाला)