Books / Bhartiya Natya Siddhanta Udbhava Aur Vikas Ramji Pandey (Hindi)

10. शिकी सी काए रस FSF PIBFIA [२६७

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अनुभूति का बोध होता है, जिसमें प्रवृत्ति-उत्तेजन से चेष्टा के लिए तत्परता रहती है, जिसका साध्य किसी-न-किसी इच्छा या संकल्प की पूर्ति रहती है, जिसमें मन की ही नहीं, शरीर की भी एक विशिष्ट दशा हो जाती है।"१ उदाहरणार्थ, करोध एक भाव है, जिसकी उत्पत्ति अनिष्टकारी व्यक्ति अथवा दुःखदायी वस्तु के ज्ञान से होती है। करोध में दुःखात्मक कोटि की अनुभूति होती है। इसके उत्पन्न होने पर कई बाह्य चेष्टाएँ होती हैं। जैसे : दाँत पीसना, कठोर शब्द कहना, शस्त्र या हाथ तानना आदि। करोध का लक्ष्य रहता है, अपने विरोधी या आलम्बन का नाश या दमन कर देना। करोध उत्पन्न होने पर शरीर की दशा में भी विशेष प्रकार का परिव्त्तन हो जाता है। जैसे : आँखें लाल हो जाना, नथुने फड़कना, भौहे चढ़ जाना आदि। छF पाश्चात्त्य विद्वानों में भाव के विषय में बड़ा मतवभिन्न्य पाया जाता है और आज- कल ऐसे भी मनोवैज्ञानिक वर्त्तमान हैं, जो भाव की स्वतन्त्र सत्ता नहीं मानना चाहते। फिर भी, सामान्य जीवन में भाव की सत्ता सभी स्वाकीर करते हैं और मनोवैज्ञानिकों में भी कुछ अतिव्यवहारवादी वैज्ञानिकों को छोड़कर सभी ने इसे निश्चित रूप से स्वीकार किया है। भाव के स्वरूप के विषय में अब भी पर्याप्त मतभेद है। इतना होने पर भी ऐसे अनेक मनोविज्ञानी हैं, जो भाव के विशिष्ट रूप और भेद-प्रभेदों को स्वीकार करते हैं; शैण्ड, सॉल, स्टाउट और मैक्डूगल इसी कोटि के मनोविज्ञानी हैं। भाव की स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार कर लेने पर भी उसका उचित लक्षण बताना कठिन है। विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार से इसका लक्षण बताया है। डॉ० मैक्डूगल ने जो लक्षण दिया है, उसका सारांश दिया जाता है-जब हमारी कोई स्वाभाविक वृत्ति जग पड़ती है, तब उस वृत्ति के अनुकूल मांसपेशियों और स्नायुओं में ओज संचरित होने लगता है। ओज-संचरण की इस अवस्था में उत्तेजना होती है और उस उत्तेजना की प्रत्येक परिस्थिति में एक ऐसी विशिष्टता की स्थिति रहती है, जिसके कारण उसे भय, क्रोध, घृणा आदि के अलग-अलग नाम दिये जा सकते हैं। यहाँ स्वाभाविक वृत्ति की जागृति और उत्तेजना में निहित विशिष्टता दोनों भावों के मानसिक रूप का वर्णन करते हैं और स्नायु तथा पेशियों में ओज का संचरण शारीरिक रूप प्रकट करते हैं। इन शारीरिक तथा मानसिक रूपों के अतिरिक्त भाव के लिए कुछ स्थितियाँ भी आवश्यक हैं। ये भाव ही मानव-जीवन के सभी कार्यों का प्रवर्त्तन करते हैं-भले ही ये कार्य लोक की रक्षा के लिए हों या लोक के संहार के लिए, किन्तु सबकी प्रेरणा इन भावों से ही होती है। इन्हीं के सहारे मनुष्य भयंकर और विकट परिस्थितियों का भी सामना सफलता- पूर्वक कर सकता है और यदि इन भावों पर सम्यक् नियन्त्रण नहीं रहा, तो वह घोर एवं जटिल विपत्तियों तथा कष्टों में उलझ जाता है। यदि मनुष्य चाहे, तो अपनी विशेष वृत्तियों के सहारे इनका सदुपयोग कर सकता है या दुरुपयोग भी कर सकता है। यदि कोई व्यक्ति १. समीक्षा-दर्शन, द्वितीय भाग (श्रीरामलाल सिंह), पृ० १५५- स्ही मकी कग

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भाव की स्थिति को कभी प्राप्त नहीं होते। ये भाव भी, सहज प्रवृत्तियों के ही समान एक साथ या एक समय में आविर्भूत नहीं होते। भावों की विशेषताएँ स्पष्ट करने के लिए सहज प्रवृत्ति से उनकी तुलना करना आवश्यक प्रतीत होता है।'

सहज प्रवृत्ति भाव १. सहज प्रवृत्ति की प्रेरणा से होनेवाला १. भाव के अनुसार होनेवाला कार्य कोई कार्य एक निश्चित प्रणाली में अनेक रूपों में होता है। होता है। २. सहज प्रवृत्ति या संस्कार, किसी २. भाव कार्य-काल में ही लक्षित प्राणी में, कार्यकाल में ही नहीं, होता है, उसके पश्चात् प्रसुप्त काल अन्य काल में भी वर्त्तमान में सहज प्रवृत्ति का ही रूप ले रहता है। लेता है। ३. सहज प्रवृत्तियों की सभी प्रकार की ३. काव्य में वर्णित पात्रों के अधिकतर अभिव्यक्तियों की प्रतीति रस के भावों की प्रतीति रस-रूप में रूप में नहीं होती। होती है। ४. जीवन प्रयत्न से सहज प्रवृत्तियों ४ जीवन-प्रयत्न से भावों का प्रयत्न का सम्बन्ध प्रत्यक्ष परिलक्षित सीधा तथा प्रत्यक्ष नहीं होता। होता है। ५. सहज प्रवृत्तियों की करिया विषय- ५. भाव की क्रिया उसके स्थिर रहने सन्निकर्ष के समय में होती है। पर भी उसके पहले या पीछे होती रहती है।

प्राचीन आचार्यों के मतानुसार भाव भरत : भरतमुनि ने प्रश्न उठाया है कि भाव क्यों कहा जाता है? 'भवन्तीति भावा: कि वा भावयन्तीति भावाः।' पहले प्रश्न किया गया है कि स्थिति होने के कारण ये भाव कहलाते हैं या भावना कराने के कारण ? भाव चित्तवृत्ति के रूप में होते है, अतः दो प्रकार की व्युत्पत्ति की सम्भावना है। रति भाव के प्रकट होने की स्थिति को एक रूप में माना जा सकता है। उसमें भाव उत्तरोत्तर विकसित होता जाता है। भाव का अर्थ ही है कि वे अनुभव-ज्ञान की सहायता से चित्त-वृत्तियों को भावित करते हैं। इस प्रकार, हृदय में व्याप्त होकर ये भाव आस्वादनीय हो जाते हैं। इन दो सम्भावनाओं के ही कारण दो व्युत्पत्तियों के विषय में कहा गया है-'भवन्ति' तथा 'भावयन्ति'। भरत ने स्वयं इसका उत्तर दिया है-वाक्, अंग तथा सत्त्व से युक्त काव्यांगों को भावित करते हैं, अतः भाव कहे जाते हैं। वे कहते हैं : वागङगसत्वोपेतान्काव्यार्थान्भाव-

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यन्तीति भावा:। अभिनवगुप्त ने काव्यार्थ को रसरूप में ग्रहण किया है। काव्य के पद तथा वाक्यों में असाधारणता की प्रधानता के कारण अर्थ रसरूप ही होता है। इस प्रकार, वाक्य के अर्थरूप रस की भावना कराने का ही यहाँ तात्पर्य है। यह रसास्वाद सहृदय में पूर्वपरिचित भाव का प्रत्यक्ष होना है। वाचिक, आंगिक एवं सात्त्विक अभिनय के द्वारा ही यह काव्यार्थ या रसानुभाव अभिव्यक्त किया जाता है। भू धातु से करण अर्थ में घञन प्रत्यय लगने से भाव शब्द बना है। इसी से भावित शब्द बना है। अभिनवगुप्त का मत है कि वाचिक आदि अभिनय से सम्पादित अलौकिक चित्तवृत्तियाँ अपने मन में रहनेवाली केवल लौकिक दशा का आस्वादन नहीं करातीं, प्रत्युत रस रूप में भावित होती हैं, इसीलिए उन्हें भाव कहा जाता है। ये भाव अनुभावों के वाचिक, आंगिक, सात्त्विक तथा आहार्य-प्रदर्शन द्वारा नाट्य अथवा काव्य का अर्थ व्यंजित करते हैं। रंगमंच पर वाचिक आदि अभिनय के द्वारा देशकाल की विशेष स्थितियों को प्रस्तुत किया जाता है। पात्रों की भूमिका में नट अपनी चित्तवृत्तियों का प्रदर्शन करते हैं और सहृदय सामाजिक साधारणीकरण की प्रक्रिया द्वारा उन भावों का अनुभावन करते हैं। इनसे सामाजिक अपने ही भावों को भावित करते हैं। भाव के भावित होने का मुख्य अर्थ यही मानना चाहिए। भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में भाव शब्द का प्रयोग शास्त्रीय अर्थ में किया है। नाटक में लोकवार्त्ता का अनुकरण किया जाता है। कवि लोक के चरित की सृष्टि करता है और नट या अभिनेता अपनी शिक्षा के बल पर उस चरित के भाव को रंगमंच पर प्रस्तुत करता है। कवि उन भावों को अपने कौशल से अभिव्यक्त करता है और इन्हें देशकाल की सीमा से मुक्त करके साधारणीकृत रूप में आस्वादन के उपयुक्त बना देता है। अभिनेता इन्हें वाचिक, आंगिक, सात्त्विक तथा आहार्य अभिनय एवं मुखराग के द्वारा रंगमंच पर प्रस्तुत कर दर्शकों या सामाजिकों के मन को परिव्याप्त कर देता है। यह किया भावन या भावित करना है, इसीलिए ये भाव कहे गये हैं : वागङगमुखरागेण सत्त्वेनाभिनयेन च। कवेरन्तर्गतं भावं भावयन्भाव उच्यते ॥२ -अर्थात् वचन, अंग, मुखराग और सात्त्विक अभिनय के द्वारा कवि के अन्तर्हित भाव को भावित करने के कारण भाव कहा जाता है। फिर, अगली कारिका में भरत ने कहा है : नानाभिनयसम्बद्धान् भावयन्ति रसानिमान्।3 वस्तुतः, भाव का सम्बन्ध प्रकृत मनोभाव से है, परन्तु लौकिक अर्थ में यह मनोभाव न होकर प्रतिमा से सम्भव होता है। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ७, गद्य की आरम्भिक पंक्तियाँ २. नाट्यशास्त्र, अध्याय ७, का० २ ३. वही, का० ३

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भरत के अनुसार भाव के तीन अर्थ हमारे सामने उपस्थित होते हैं : १. भाव वह अर्थ है, जिसकी निष्पत्ति विभावों के द्वारा होती है। यह वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनय रूप अनुभावों के द्वारा प्रतीति-योग्य होता है। यहाँ भाव का तात्पर्य काव्यार्थ है। २. भाव वह है, जो चारों प्रकार के-वाचिक, आंगिक, सात्त्विक तथा आहार्य अभिनव द्वारा कवि के अन्तर्गत भावों को भावित करता है; दूसरे शब्दों में सहृदय व्यक्तियों के चित्त को व्याप्त करता है। यहाँ भाव का अर्थ है-कवि के भाव को सहृदय के मन में व्याप्त करनेवाला तत्त्व। FETPE३. ये भाव अनेक प्रकार के अभिनयों से सम्बन्ध रखनेवाले रसों या काव्यार्थों को भावित करते हैं-सहृदयों के चित्त में व्याप्त करते हैं। इसलिए, नाट्यकर्त्ता इन्हें भाव नाम देते हैं। यहाँ भाव का तात्पर्य उन तत्त्वों से है, जो काव्यार्थ को सहृदय के मन में व्याप्त करते हैं। भरत के भाव-विवेचन से स्पष्टः ज्ञात हो जाता है कि उन्होंने तीसरा ही अर्थ लिया है। भाव वे हैं, जो रस का भावन करें। अर्थात्, वे रसव्यंजक सम्पूर्ण सामग्री की भाव मानते हैं। इसके अन्तर्गत स्थायी भाव के साथ ही वे विभाव और अनुभाव को लेते हैं। किन्तु, आगे बढ़ने पर उन्होंने विभाव तथा अनुभाव को अलग कर दिया है और सम्पूर्ण भावों की संख्या ४९ (उनचास) मानी है-आठ स्थायी भाव, आठ सात्त्विक भाव और तैंतीस संचारी भाव। एवमेते काव्यरसाभिव्यक्तिहेतव एकोनपञ्चाशद् भावाः प्रत्यवगन्तव्याः। एभ्यश्च सामान्यगुणयोगेन रसा निष्पद्यन्ते।' 113 इस स्थल पर आकर भाव का अर्थ मनोवेगों या शारीरिक अनुभूतियों के काव्यगत रूप तक ही सीमित हो जाता है। उनके कारण और कार्य भाव के क्षेत्र से बाहर हो जाते हैं। परवर्ती आचार्यों ने बहुलांश में इसी मत का अनुसरण किया है। भरत से प्रेरणा लेकर एक अन्य रूप भी विकसित हुआ है। इस रूप में भाव अनुपचित स्थायी भाव या उपचित संचारी भाव ग्रहण किया जाता है। इस विवेचन से स्पष्ट है कि संस्कृत-काव्यशास्त्र में भाव का प्रयोग साधारणतः तीन अर्थों में होता रहा है : १. व्यापक रूप से रस की व्यंजना करनेवाली सम्पूर्ण सामग्री के अर्थ में, जिसमें विभाव, अनुभाव, स्थायी भाव, संचारी भाव सभी का समावेश हो जाता है। २. काव्यगत स्थायी भाव, संचारी भाव तथा सात्त्विक भाव, ४९ भावों के अर्थ में- अर्थात्, मानसिक तथा शारीरिक अनुभूतियों के अर्थ में। ३. अनुपचित स्थायी भाव तथा १. नाट्यशास्त्र, अध्याय, का० ६ के बाद गद्य

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उपचित संचारी भाव के अर्थ में। इनके अतिरिक्त, दो अन्य प्रयोग भी पाये जाते हैं : ४. सामान्य मनोवेग के अर्थ में और ५. कवि की रचनात्मक अनुभूति-भरत के शब्दों में 'कवेरन्तर्गतभावम्' के अर्थ में। परन्तु, इन दोनों में पहला सर्वथा लौकिक प्रयोग है, जो पारिभाषिक अर्थ में नहीं लिया जाता। दूसरा अर्थ व्यापक रूप से प्रचलित हो सका है और इनमें भी सात्त्विक भावों को अनुभावों के अन्तर्गत सम्मिलित कर लिया गया है। धनंजय : इस विषय में धनंजय ने कहा है : पृथग्भावा भवन्त्यन्येऽनुभावत्वेऽपि सात्विकाः ।' -अर्थात् यद्यपि सात्त्विक भावों में अनुभावत्व है, अनुभावों के ही समान वे आश्रय के विकार हैं, फिर भी सात्त्विक भाव अलग से ही भाव माने जाते हैं। धनंजय ने भाव का लक्षण लिखा है : सुखदुःखादिकर्भवैर्भववस्तद्भावभावनम्।२ -अर्थात् काव्य या नाटक में निबद्ध आश्रय के सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि भावों के द्वारा सामाजिक के हृदय का उसी भाव से भावित होना भाव कहा जाता है। नाटक में जिन व्यक्तियों का अनुकरण किया जाता है, वे राम, दुष्यन्त आदि वास्तविक व्यक्ति होते हैं। कवि अपनी प्रतिभा के बल पर इनमें सुख-दुःख आदि का उपनिबन्धन करता है और नट उनको रंगमंच पर प्रस्तुत करते हैं। इन अनुकार्य व्यक्तियों-राम, दुष्यन्त आदि-के सुख- दुःखादि भाव की भावना जब सहृदय व्यक्तियों के द्वारा होती है, तब इस भावना या वासना को 'भाव' कहते हैं। धनिक ने इस कारिका पर वृत्ति लिखते समय ऊपर उद्धत की गई भरत की कारिका 'कवेरन्तर्गत भावं भावयन्भाव' और 'रसान्भावयन्भावः' की भी चर्चा की है, यद्यपि उनका नामोल्लेख नहीं किया। इनका उत्तर देते हुए धनिक ने लिखा है कि ये व्युत्पत्तियाँ उस भाव की की गई हैं, जो अभिनय और काव्य का प्रवर्त्तक या बोधक है और इसका प्रयोग उन्हीं दोनों काव्यों से सम्बद्ध भाव के लिए है। धनिक ने जिस अर्थ में भाव की व्युत्पत्ति की है, वह रसिक के हृदय के भावित भाव की दृष्टि से की है। अतः, दोनों के विषय भिन्न होने के कारण प्राचीनों की व्युत्पत्ति से इस व्युत्पत्ति का विरोध नहीं होता। इस प्रकार, सामान्य रूप से भाव का प्रयोग स्थायी भाव तथा संचारी भाव के ही अर्थ में होता रहा है और आजकल भी होता है। धनिक ने भी लिखा है- ते च स्थायिनो व्यभिचारिणश्चेति वक्ष्यमाणा: ।3 निष्कर्ष : कवि जैसा अर्थ चाहता है, वैसा विभाव के द्वारा प्रकट करता है। पात्र जैसा भाव प्रकट करता है, अभिनेता उसे ही प्रतीति के योग्य बना देता है और अभिनेता, १. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ४ २. वही, ४-४ ३. वही, का० ३ की वृत्ति

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जो अर्थ प्रतीति के योग्य बनाता है सहृदय उसे ही भावना का विषय बनाता है। इस प्रकार कविनिबद्ध-पात्न-अनुकार्य के भाव अभिनेता (अनुकर्त्ता) के द्वारा प्रतीति-योग्य होकर सामाजिक के द्वारा भावित होते हैं। लौकिक मनोविकार में तीन बातें होती हैं-ज्ञान (सत्त्वगुण), इच्छा (रजोगुण) और क्रिया (तमोगुण)। मानव कुछ जानता है, कुछ चाहता है और कुछ करता है। सहृदय के मन में आते-आते इच्छा और क्रिया का अन्त हो जाता है और केवल ज्ञान शेष रह जाता है। इसे ही सत्त्वोद्रेक कहा गया है। यह सत्त्वोद्रेक भावों को प्रायः जानकारी के रूप में ला देता है और सहृदय रसानुभूति के योग्य बनता है। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया प्रेक्षक के अन्तरतर में व्याप्त उसके शुद्ध चैतन्य रूप को प्रकट करने में समर्थ होती है। शुद्ध चैतन्य का प्रकट होना ही आनन्द है। इसमें, नानात्व में सामान्य एक की प्राप्ति होती है। ऐसा भी होता है कि भाव रसानुभूति के स्तर पर नहीं पहुँचते और जानकारी के स्तर पर रहकर सहृदय के चित्त में केवल आंशिक आनन्द उत्पन्न करते हैं। कई रूपकों में रस की स्थिति मानी गई है, पर वस्तुतः वे भाव की ही स्थिति तक रह जाते हैं। पूर्णांग रूपकों में वीर और शृंगार रस ही हो सकते हैं। स्थायी भाव मनोवैज्ञानिक आधार : एक भाव-विधान के अन्तर्गत मूल रूप में एक या अनेक सहज प्रवृत्तियाँ रहती हैं, वैसे ही भाव-प्रणाली के अन्तर्गत आधार-रूप में किसी-न-किसी मूल भाव की स्थिति आवश्यक है, साथ ही कुछ गौण भाव तथा तद्भूत भाव भी उससे सन्नद्ध रहते हैं। प्राचीन रसाचार्यों में अभिनवगुप्त ने स्थायी भावों का उल्लेख कई नामों से किया है। कहीं उन्होंने इसे 'वासना' कहा, कहीं 'संविद्' और कहीं 'चित्तवृत्ति' नाम से अभिहित किया है। उनका मत है कि स्थायी भाव सभी प्राणियों में स्वयंसिद्ध रूप में वर्त्तमान रहते हैं, अतः प्राणियों के जीवन में जन्म से ही ये उनके मानसिक अंग बनकर अवतीर्ण होते हैं। इससे प्रतीत होता है कि जब अभिनवगुप्त ने स्थायी भाव का निरूपण किया, उस समय उनके मस्तिष्क में सहज प्रवृत्तियों की धारणा विद्यमान थी। अन्य भारतीय शास्त्रकारों ने भी स्थायी भाव को सहज जात के ही समान माना है। मंक्डूगल ने स्थायी वृत्तियों या स्थायी भावों को उपाजित माना है। व्यवहारवादी मानसशास्त्री तथा मार्क्सवादी भी स्थायी भावों को सर्वथा उपाजित ही मानते हैं। स्थायी भावों का अस्तित्व सार्वकालिक तथा सार्वभौमिक है, इस तथ्य को ध्यान में रखकर विचार करने पर प्रतीत होता है कि इनका मूल तत्त्व प्रकृति-प्रदत्त तथा जन्मजात है। साधित तथा गौण भावनाओं और उनकी अभिव्यंजना की प्रणाली को उपाजित माना जा सकता है; क्योंकि देश, काल तथा पात्र के अनुसार इनके स्वरूप में परिवर्त्तन होता रहता है। स्थायी भावों में प्राथमिक भाव और साधित भावों का सम्मिश्रण रहता है। साधित भाव तो अपने को प्राथमिक भावों में विलीन कर देते हैं, परन्तु प्राथमिक भाव अन्त तक विद्यमान रहते हैं।

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इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि स्थायी भाव में प्राथमिक भाव ही प्रधान रूप में वर्त्तमान रहते हैं। रसानुभूति के समय मुख्यतः, इसी प्राथमिक भाव का आस्वादन होता है। रसास्वादन में साधित भावनाओं का भी गौण रूप से आस्वादन होता है। स्मरणीय है कि स्थायी भाव ही रस-स्थिति को प्राप्त होते हैं, केवल भाव नहीं। स्थायी भाव में कुछ विशेषताएँ रहती हैं, जो अन्य प्रकार के भावों में नहीं पाई जातीं। उनमें से कुछ निम्नलिखित हैं : (क) स्थायी भाव में उदात्तीकरण की प्रवृत्ति का रहना आवश्यक है। (ख) इसमें अनुकूल तथा प्रतिकल-दोनों प्रकार की भावनाओं को अपने में ढक लेने की क्षमता रहती है, अर्थात् यह प्रतिकूल भावना से नष्ट नहीं होता। (ग) यह सहृदय के चित्त में बहुत देर तक टिकने की शक्ति रखता है। (घ) इसके आसपास साधित भावनाएँ इकट्ठी हो सकती हैं। इसमें व्यभिचारियों को अपने पास खींच लाने की क्षमता रहती है। 'स्थायी भाव में स्थायित्व का अर्थ किसी एक भाव का एक अवसर पर इस आधिपत्य के साथ रहना कि उसके उपस्थिति-काल में अन्य भाव या मनोवेग उसके शासन के भीतर प्रकट हों।" (ङ) 'स्थायी दशा में भाव का अधिकार बुद्धि पर भी हो जाता है। अर्थात् निश्चयात्मिका वृत्ति भी भाव के आदेश पर चलने लगती है।'२ भावों के भेद : परन्तु, कुछ आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भावों के सामान्यतः तीन भेद किये हैं : १. मौलिक मनोविकार या प्राथमिक भाव-जो स्वतन्त्र, अखण्ड तथा अमिश्र होता है; जैसे भय। २. व्युत्पन्न मनोविकार या साधित भावनाएँ-जो स्वतन्त्र नहीं होता, वरन् किसी अन्य मनोविकार का आश्रित रहता है; जैसे आशंका। ३. मनोवृत्ति एक स्थिर मनोदशा है, जो मनोविकारों के मिश्रण, उनकी पुनरावृत्ति और क्रमशः बौद्धिक तत्त्व के समावेश से बनती है; जैसे क्लैब्य। यदि हम विचार करें, तो पता चलेगा कि स्थायी भावों को सर्वथा शुद्ध तथा मौलिक मनोविकार नहीं कहा जा सकता। उदाहरणार्थ, निर्वेद या राग को लिया जाय। ये दोनों शुद्ध मनोविकार नहीं हैं, अपितु इनमें एक से अधिक मनोविकारों का सम्मिश्रण है और इनमें बौद्धिक तत्त्वों की प्रधानता है, अतः ये व्यवस्थित मनोदशाएँ हैं। अद्भुत रस का स्थायी भाव विस्मय भी स्पष्ट रूप से एक मिश्रित भाव है। व्युत्पन्न मनोविकारों में भी सभी १. रसमीमांसा (आचार्य शुक्लजी), पृ० १७२ २. वही, पृ० १८८

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व्युत्पन्न नहीं हैं, भय तथा क्रोध स्पष्ट रूप से मौलिक मनोविकार हैं। उपर्युक्त तीन मनोविकारों में अब मनोवृत्ति बच रही। कुछ बातों में मनोवृत्ति और स्थायी भावों में साम्य है, किन्तु अन्ततः दोनों भिन्न-भिन्न हैं। स्थायी भाव का स्वरूप : परम्परागत रूप में स्थायी भाव का स्वरूप आधुनिक मनोवैज्ञानिक परिभाषाओं में पूर्णतः खरा नहीं उतरता, फिर भी उसे अमनोवैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता। सम्भव है कि प्रारम्भिक अवस्था में प्राप्त साहित्य के आधार पर आचार्यों ने स्थायी भाव और संचारी भाव का वर्गीकरण किया हो, परन्तु परवर्ती आचार्यों ने योग, मीमांसा आदि के बल पर अतिव्याप्ति तथा अव्याप्ति दोषों को बचाकर अपने वर्गीकरण को दोष-रहित बनाने का प्रशंसनीय प्रयास किया है। उनकी स्थापनाओं का सारांश निम्नलिखित है : १. मनुष्य के हृदय में उठनेवाली तरंगों के संयोग से अनेक मनोविकारों का निर्माण होता है, जिनकी संख्या बयालीस निर्धारित की गई है। ये मनोविकार सभी प्रकार के होते हैं। इनमें केवल रति, हास, शोक, करोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय और निर्वेद ऐसे नौ मनोविकार हैं, जो अनेक मनोविकारों की अपेक्षा अधिक स्थायी, अधिक प्रभावशाली और पुष्ट होते हैं। इसलिए, ये रस-परिपाक के योग्य हैं, अतः इन्हें अधिक महत्त्व प्रदान किया गया है और पारिभाषिक पदावली में इन्हें स्थायी भाव कहा गया है। २. रस-रूप में परिणत होने के योग्य भाव साधारणतः नौ ही हैं। अन्य अनेक भाव इन्हीं के अन्तर्भूत हो जाते हैं। उदाहरण के लिए दानशीलता, धर्मप्रेम आदि भाव उत्साह में अन्तर्भूत हो जाते हैं। वर्त्तमान युग में देशभक्ति, राष्ट्रभावना आदि भाव भी उत्साह के ही अन्तर्गत आ जाते हैं। कई अन्य भाव रसदशा तक पहुँचने में असमर्थ रहने के कारण स्थायी भाव नहीं बन पाते। उदाहरणार्थ, वात्सल्य या देव-विषयक रति शास्त्रानुसार भाव ही हैं, स्थायी भाव के पद तक नहीं पहुँच पाते। यहाँ स्वभावतः यह प्रश्न उठता है कि क्या स्थायी भाव और संचारी भाव का यह भेद मनोविज्ञान की दृष्टि से उचित है? वस्तुतः, मनोविज्ञान में इस प्रकार का वर्ग- विभाजन नहीं मिलता। वहाँ दो ही प्रकार का वर्ग-विभाजन माना गया है- एक मौलिक तथा व्युत्पन्न मनोविकार का और दूसरा मनोविकार तथा मनोवृत्ति का। स्थायित्व, तीव्रता और प्रभाव के आधार पर मनोविज्ञान कोई वर्गीकरण स्वीकार नहीं करता। विज्ञान कई प्रकार के भेद-विभाजन नहीं मानता। फिर भी, जीवन में इस प्रकार का भेद और विभाजन तो है ही। भाव-क्षेत्र में भी एक भाव दूसरे की अपेक्षा अधिक स्वस्थ और कोमल है, या तीव्र तथा स्थायी है या अधिक प्रभावशाली है, यह सहज रूप में माना जा सकता है। भले ही मनोविज्ञान इसका विवेचन नहीं करे, परन्तु साहित्य के लिए इस प्रकार का वर्गीकरण बहुलांश में स्वाभाविक कहा जा सकता है; क्योंकि इसका सम्बन्ध भाव के जीवनगत उपयोग से है। आचार्य पं० रामचन्द्र शुक्ल ने नैतिक मूल्य के आधार पर

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स्थायी भावों के औचित्य का निरूपण किया है, किन्तु अधिक व्यापक दृष्टिकोण से भी इसका समाधान सम्भव है। उदाहरणार्थ, चिन्ता की अपेक्षा शोक अधिक तीव्र होता है-चिन्ता का अधिक-से-अधिक तीव्र चित्रण शोक के तीव्रतम चित्रण से क्षीण ही रहेगा। इसी प्रकार, चिन्ता की अपेक्षा शोक में स्थायित्व भी अधिक है। शोक में चिन्ता विलीन हो जाती है, परन्तु चिन्ता में शोक कभी विलीन नहीं हो सकता। इसी प्रकार, अन्य उदाहरण भी लिये जा सकते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान में इस प्रकार का विभाजन नहीं रहने पर भी इसे मिथ्या या अमनोवैज्ञानिक नहीं कहा जा सकता। कुछ मनोविकार नैसगिक, तीव्र एवं व्यापक हैं और वे जीवन के आधारभूत अंग हैं, वस्तुतः वे ही स्थायी भाव हैं। इन मनोविकारों का सम्बन्ध राग-द्वष से है, जो मानव-आत्मा के मूलभूत गुण हैं। उत्तम, सम और अधम के आधार पर राग, प्रेम और करुणा के रूप में परिणत हो जाता है। उसी प्रकार, द्वेष भी भय, कोध तथा घृणा में परिणत हो जाता है। डॉ० भगवानदास ने मौलिक ढंग से दिखाया है कि इन्हीं राग और द्वष के अन्दर संस्कृत-साहित्य के सभी स्थायी भावों का समावेश हो जाता है। रति, हास, उत्साह तथा विस्मय राग के अन्तर्गत आ जाते हैं; क्योंकि ये सामान्यतः अस्मिता के उपकारक हैं। शोक, कोध, भय तथा जुगुप्सा द्वष के अन्तर्गत आ जाते हैं; क्योंकि ये साधारणतः अस्मिता के अपकारक हैं। शम में दोनों का सामंजस्य हो जाता है; क्योंकि इसमें राग और द्वष दोनों की समरसता है। पहले चार मधुर भाव हैं और इनमें सुख की अभिव्यक्ति होती है। शम में दोनों का समन्वय है। यह विभाजन निर्दोष नहीं रहने पर भी बहुत-कुछ सन्तोषप्रद है। प्राचीन आचार्यों के मत : प्राचीन भारतीय रसाचार्यों ने स्थायी भाव तथा अन्य भावों का सम्यक विवेचन किया है। सभी भावों में यही स्थायी भाव ही प्रमुख है और यही रसत्व प्राप्त करता है। धनंजय ने स्थायी भाव का लक्षण निम्नलिखित कारिका में दिया है : विरुद्धरविरुद्वैर्वा भावैविच्छिद्ते न यः। आत्मभावं नयत्यन्यात् स स्थायी लवणाकर: ॥' स्थायी भाव को स्पष्ट करने के लिए धनंजय ने इसकी उपमा लवणाकर (समुद्र) से दी है। समुद्र में खारा या मीठा पानी मिलकर तद्रूप हो जाता है। समुद्र उसे आत्मसात् कर लेता है, फिर किसी पानी में अन्तर नहीं रह जाता। उसी प्रकार, स्थायी भाव भी सभी भावों को आत्मरूप बना लेता है। जो भाव (रति आदि) अपने से प्रतिकूल अथवा अनुकूल किसी भी प्रकार के भाव से विच्छिन्न नहीं होता तथा दूसरे किसी भी विरुद्ध अथवा अविरुद्ध-प्रतिकूल या अनुकूल-भाव को अपने समान बना लेता है, उसे ही स्थायी भाव कहते हैं। वह रत्यादि भाव, जो सजातीय या विजातीय अन्य भावों से तिरस्कृत नहीं होता, १. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ३४ ४ क गजमीक लाR तहाकान 5

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स्थायी भाव कहलाता है। धनिक ने इस कारिका की वृत्ति में बहुत विचार-विमर्श किया है। भरत मुनि ने स्थायी भाव की प्रधानता बताते समय इस प्रश्न का उत्तर दिया है कि क्यों स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त करते हैं। जैसे समान लक्षणवाले, समान हाथ, पैर, पेट तथा शरीरवाले, एक-से अंग-प्रत्यंगवाले पुरुष कुल-शील, विद्या, कर्म और शिल्प में विचक्षण होने के कारण राजा हो जाते हैं, और वहीं थोड़ी बुद्धिवाले उनके अनुचर हो जाते हैं, इसी प्रकार विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव स्थायी भाव के आश्रित होते हैं। स्थायी भाव स्वामी के रूप में है, अन्य भाव, विभाव, अनुभाव आदि स्थानीय अधिकारियों के समान हैं, व्यभिचारी भाव परिजनों के समान हैं। इस विषय में भरत मुनि ने एक परम्परागत श्लोक उद्धृत किया है :

यथा नराणां नृपतिः शिष्याणां च यथा गुरु:। एवं हि सर्वभावानां भाव: स्थायी महानिह ॥9

-अर्थात् जिस प्रकार मनुष्यों में राजा, शिष्यों में गुरु, उसी प्रकार सभी भावों में स्थायी भाव महान् होता है। कविराज विश्वनाथ ने स्थायी भाव का लक्षण निम्नलिखित श्लोक में दिया है : अविरुद्धा विरुद्धा वा यं तिरोधातुमक्षमाः। आस्वादाङकुरकन्दोऽसौ भावो स्थायीति सम्मतः ॥२

-अर्थात् जिसे विरुद्ध या अविरुद्ध (प्रतिकूल या अनुकूल) भाव छिपा न सके, उस आस्वाद के मूलभूत भाव को स्थायी भाव कहते हैं। ग्रन्थकार ने किसी आचार्य का श्लोक प्रमाण के रूप में उद्धृत किया है, जिसका तात्पर्य है कि जैसे माला के अनेक दानों में एक ही सूत्र या धागा अनुगत होता है, वैसे ही अन्य भावों में अनुगत होनेवाला स्थायी भाव किसी से तिरोहित नहीं होता, अपितु पुष्ट होता है। शारदातनय ने 'भावप्रकाशन' में स्थायी भाव का लक्षण निम्नलिखित शब्दों में दिया है :

अवस्थिताश्चिरं चित्ते सम्बन्धाच्चानुबन्धिभिः । र्वाद्धिता ये रसात्मान: ते स्मृता: स्थायिनो बुधः॥3 शारदातनय ने स्थायीभाव को चित्त में सदा अवस्थित रहनेवाला कहा है। रामचन्द्र- गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में स्थायी भाव को चित्त में वासना-रूप में चिरस्थित माना है। PT१. नाट्यशास्त्र, अध्याय ७, कारिका द २. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, श्लोक १७४ ३. भावप्रकाशन, प्रथम अधिकार, पृ० ४

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रस [२७९

यह 'प्रतिक्षणमुदयव्ययधर्मकेषु बहुष्वपि व्यभिचारिषु-उपयाचितयाऽवश्यं तिष्ठतीति स्थायी'; वासनात्मतया स्थिते हि स्थायिनं'२ आदि वाक्यों से स्पष्ट हो जाता है। इन आचार्यों के द्वारा दिये गये लक्षणों से स्थायी भाव के विषय में निम्नलिखित तथ्य निश्चित होते हैं : १. स्थायी भाव मानव के मन में वासनात्मक रूप में स्थित रहता है। २. यह सदा रहनेवाला होता है। अन्य भावों का उदय और विलय होता रहता है, परन्तु स्थायी भाव सदा स्थिर रहता है। ३. यह भावों में प्रधान होता है, जैसे मनुष्यों में राजा। ४. स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त होता है। अन्य भाव सहायक-मात्र होते हैं। ५. इसे अनुकूल या प्रतिकूल भाव तिरोहित नहीं कर सकते, बल्कि पुष्ट करते हैं। ६. यह अनुकूल या प्रतिकूल भाव को आत्मसात् एवं आत्मरूप कर लेता है। ७. यह आस्वाद का मूलभूत भाव है। स्थायी भावों की संख्या : प्रश्न उठता है कि स्थायी भावों की संख्या नौ ही हो सकती है या अधिक या कम भी हो सकती है ? स्थायी भावों की स्थिति जीवन के मूल मनोवेगों की स्थिति से भिन्न नहीं है और इस प्रकार के विभाजन का आधार मनोविज्ञान के प्रतिकूल नहीं है। यह सिद्धान्त स्वीकार कर लेने पर प्रश्न उठता है कि क्या जीवन के मूल मनोवेगों की संख्या नौ ही है ? यह प्रश्न संस्कृत-साहित्य के प्राचीन आचार्यों के मन में अनेक बार उठा है और फलस्वरूप कई बार स्थायी भावों को घटाने-बढ़ाने के प्रयत्न हुए और उनकी प्रधानता-अप्रधानता का भी कई बार विवेचन हुआ। परन्तु, अन्ततः परिणाम यही हुआ कि स्थायी भावों की संख्या नौ ही मानी गई। भरत : भरत मुनि ने स्थायी भावों की संख्या आठ मानी है। निम्नलिखित कारिका में उन्होंने उनके नाम गिनाये हैं : रतिर्हासिश्च शोकश्च कोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावाः प्रकीतिताः ॥3 इस कारिका में भरत मुनि ने रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा तथा विस्मय ये आठ स्थायी भाव माने हैं। उन्होंने न शान्त को रस माना और न उनके स्थायी भाव का ही उल्लेख किया। अभिनवगुप्त : अभिनवगुप्त ने अपनी 'अभिनवभारती' में शान्त रस को भी स्थान दिया और उपर्युक्त कारिका की टीका करते समय यथानिदिष्ट पंक्तियाँ लिखीं-"तत्र शान्तस्य १. नाट्यदर्पण, अध्याय ३, पृ० १४१ २. वही, पृ० १४४ ३. वही, अध्याय ६, कारिका १७

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२८० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

स्थायी 'विस्मयशमा' इति कश्चित् पठितः। उत्साह इवास्य स्थायीत्यन्ये। जुगुप्सेति केचित्। सर्व इत्येके। तत्त्वज्ञानजो निर्वेदोडस्य स्थायी। एतदर्थमेवोभयधर्मोपजीवित्वख्यापनाय मङ्गलभूतोऽप्यसौ पूर्व निर्दिष्टःव्यभिचारिषु।"१ -अर्थात् उन स्थायी भावों में कुछ लोग ('विस्मश्चेति' के स्थान पर) 'विस्मयशमा' ऐसा पाठ मानकर शम को शान्त रस का स्थायी भाव मानते हैं। दूसरे लोग उत्साह को ही शान्त रस का स्थायी भाव मानते हैं। कोई जुगुप्सा को बतलाते हैं और कुछ लोग सबको शान्त रस का स्थायी भाव मानते हैं। किन्तु, वस्तुतः तत्त्वज्ञान से उत्पन्न वैराग्य-निर्वेद ही रस का स्थायी भाव है। इसीलिए, निर्वेद में स्थायी भाव तथा व्यभिचारी भाव दोनों के धर्म रहते हैं। इस बात का द्योतन करने के लिए ही अमंगल-रूप होने पर भी व्यभिचारी भावों में इसका सबसे पहले पाठ किया गया है। परन्तु, आगे चलकर अभिनवगुप्त ने इस मत का भी खण्डन किया है और आत्मा या आत्मज्ञान को शान्त रस का स्थायी भाव माना है। इस प्रकार, अभिनवगुप्त ने स्थायी भावों की संख्या नौ मानी और शान्त रस का स्थायी भाव आत्मा या आत्मज्ञान को माना।

धनंजय : धनंजय आठ ही स्थायी भाव मानते हैं। उन्होंने यह भी लिख दिया है कि कुछ आचार्य शम नामक नवाँ स्थायी भाव मानते हैं, किन्तु इस भाव की पुष्टि नाट्य में नहीं होती। हमारे मतानुसार, यह भाव नाट्यानुकूल नहीं है। अतः, धनंजय के मतानुसार स्थायी भाव आठ ही हैं। शम जैसे नवें स्थायी भाव तथा उसके रस शान्त को अलग से मानना उन्हें स्वीकार नहीं। शममपि केचित् प्राहुः पुष्टिर्नाट्येषु नंतस्य।२

विश्वनाथ : कविराज विश्वनाथ ने आठ स्थायी भावों की गिनती कराकर फिर से नवें शम का भी उल्लेख कर दिया है और अन्त में नौ ही स्थायी भाव माने हैं :

रतिर्हासिश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयश्चेत्थमष्टी प्रोक्ताः शमोऽपि च॥3

शारदातनय : शारदातनय ने भी इस विषय में पर्याप्त विवेचन किया है। इस विषय में उन्होंने धनंजय का अनुसरण किया है और शम को शान्त रस का स्थायी भाव नहीं माना, केवल आठ ही स्थायी भाव माने। किन्तु, उन्होंने इस मत का समर्थन किया है कि केवल उन दशाओं में, जब एक भाव दूसरे भाव की सहायता से रस को उत्पन्न करता है, तब वह भाव उस उत्पन्न रस का स्थायी भाव कहा जा सकता है। इस दशा में निर्वेदादि १. अभिनवभारती, षष्ठ अध्याय, पृ० ४३३ (आचार्य विश्वेश्वर का अनुवाद) २. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ३५ ३. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, श्लोक १७५

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शामफे जी० हाराट : रस [२८१

कोई भाव यदि रस उत्पन्न करने में समर्थ होता है, तो वह स्थायी भावों के अन्तर्गत सम्मिलित किया जा सकता है। इस स्थल पर शारदातनय ने भरत का भी मत उद्धत किया है : अतो नाट्यविदामष्टावेवात स्थायिनो मताः। प्रकृष्यमाणो यो भावो रसतां प्रतिपद्यते॥ स एव भावः स्थायीति भरतादिभिरुच्यते।'

शारदातनय ने शम को स्थायी भाव रखने के विरुद्ध तर्क दिया है। शम में सभी व्यापार विलीन हो जाते हैं और उसे जहाँ स्थायी भाव रखा जायगा, वहाँ नाट्य में अनुभाव के अभाव में अभिनय नहीं हो सकता। विलीनसर्वव्यापार: शमः स्थायी भवैद्यतः । अतोऽनुभावराहित्यान्न नाट्येऽभिनयो भवेत् । तस्माद्वृद्धप्रयोगेण रसपोषो न जायते।२ रामचन्द्र-गुणचन्द्र : रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने शम को भी स्थायी भाव मानकर स्थायी भावों की संख्या नौ रखी है। रतिर्हासिश्च शोकश्च कोधोत्साहौ भयं तथा। जुगुप्सा विस्मयशमाः रसानां स्थायिनः करमात्॥3 यह भरत मुनि की ही कारिका है, केवल 'विस्मयश्चेति' के स्थान पर 'विस्मयशमाः' कर दिया गया है, जो प्रस्तुत ग्रन्थकारों-रामचन्द्र-गुणचन्द्र-के बहुत पहले ही अभिनवगुप्त के द्वारा कर दिया गया था। वस्तुतः, नाट्यशास्त्र की इस कारिका का (विस्मयशमाः) पाठ अभिनवगुप्त के पहले ही प्रचलित हो चुका था, जिसका उद्धरण 'नाट्यदर्पण' में दिया गया। मम्मट : मम्मट ने 'काव्यप्रकाश' में पहले आठ रस तथा उनके आठ स्थायी भाव स्वीकार किये और भरत की ही कारिका अक्षरशः उद्धृत कर दी। परन्तु आगे चलकर उन्होंने निर्वेद स्थायी भाववाले शान्त रस को मान्यता दी: निर्वेदस्थायिभावोडस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः।8 जगन्नाथ : पण्डितराज जगन्नाथ ने स्पष्ट रूप में नौ रसों और नौ स्थायी भावों को स्वीकार किया है। उन्होंने शान्त रस और निर्वेद स्थायी भाव के पक्ष में प्रबल तर्क दिये हैं। उनके अनुसार यथानिर्दिष्ट स्थायी भाव हैं : १. भावप्रकाशन, प्रथम अधिकार, पृ० २६ २. वही ३. नाट्यदर्पण, अध्याय ३, कारिका २४ ४. काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, सूत्र ४४

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i८२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

रतिः शोकश्च निर्वेदकोधोत्साहाश्च विस्मयः । हासो भयं जुगुप्सा च स्थायिभावा: क्रमादमी ।१ भरत ने आठ ही रस तथा आठ ही स्थायी भाव स्वीकार किये। इनमें भी चार स्थायी भावों-रति, उत्साह, कोध तथा जुगुप्सा-को प्रधान एवं मौलिक और हास, शोक, भय तथा विस्मय को गौण एवं व्युत्पन्न माना है। भरत का विचार है कि रति से हास, उत्साह से विस्मय, क्रोध से शोक और जुगुप्सा से भय उत्पन्न होते हैं। परन्तु, आगे चलकर आचार्यों ने यह मत ग्रहण नहीं किया। बाद में शम को स्वीकार किया गया और स्थायी भाव की संख्या नौ मानी गई। किन्तु, इस विषय में विचार-विमर्श चलता रहा और नवीन स्थायी भावों की उद्भावना होती रही। रुद्रट ने स्नेह की उद्भावना की, भोज ने उदात्त रस के स्थायी मति, उद्धत रस के स्थायी गर्व और आनन्द रस के स्थायी हर्ष की उद्भावना की। विश्वनाथ ने वात्सल्य रस के स्थायी वत्सल भाव की, भानुदत्त ने माया रस के स्थायी मिथ्याज्ञान की और कार्पण्य रस के स्थायी स्पृहा की कल्पना की। इसी प्रकार, रूपगोस्वामी आदि वैष्णव आचार्यों ने भक्ति या भगवद्विषयक रति को भक्ति रस का स्थायी माना। इनके अतिरिक्त, संस्कृत-काव्यशास्त्र में कई अन्य स्थायी भावों का भी उल्लेख पाया जाता है। उदाहरणार्थ, अभिनवगुप्त ने किसी पूर्ववर्त्ती आचार्य द्वारा स्वीकृत लौल्य रस के स्थायी भाव के रूप में गर्ध, अर्थात् अयुक्त-विषयतृष्णा का उल्लेख किया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने व्यसन रस के स्थायी आसक्ति, दुःख रस के स्थायी अरति और सुख रस के स्थायी सन्तोष का उल्लेख किया है। वस्तुतः, स्थायी भावों की संख्या के विषय में संस्कृत-साहित्य में आरम्भ से ही मतभेद चला आ रहा था। अभिनवगुप्त के संकेतों से स्पष्ट हो जाता है कि भट्टलोल्लट आदि कुछ विद्वान् स्थायी भावों की नौ की सीमा को नहीं मानते थे। यह अभिनव- भारती के निम्नलिखित उद्धरण से स्पष्ट हो जाता है : एतावन्त एव रसा इत्युक्तं पूर्व तेनानन्त्येऽपि पार्षदप्रसिद्धया एतावतां प्रयोज्यत्वमिति यद् भट्टलोल्लटेन निरूपितं तदवलेपेनापरामृश्य इत्यलम्।२ -अर्थात् इतने ही (आठ या शान्त को मिलाकर नौ) रस हैं, यह पहले वाह चुके हैं। इसलिए, भट्टलोल्लट ने जो यह कहा है कि (रसों के) अनन्त होने पर भी नटों में प्रसिद्ध होने के कारण (नाटकों में) इतने का (आठ रसों का) प्रयोग करना चाहिए, सो (उन्होंने) अभिमानवश विना विचारे कह दिया है (इसलिए उचित नहीं है), अतएव उसका अधिक खण्डन करने की आवश्यकता नहीं है। अन्त में, अधिकतर आचार्यों ने भरत मुनि का ही समर्थन किया और इन नवीन उद्भावनाओं को कोई अधिक महत्त्व नहीं मिल सका। अन्य प्रसंगों की ही तरह इस १. रसगंगाधर, प्रथम आनन, पृ० ३७ (मथुरानाथ शास्त्रो की टोका) २ अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ५२९ (आचार्य विश्वेश्वर का अनुवाद)

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शवही फ पल: रस1 [२८३

विषय में भी अभिनवगुप्त का ही मत मान्य रहा और स्थायी भावों की संख्या नौ ही मानी गई। इनके अतिरिक्त, दो भाव और थे, जो अंशतः स्थायीभावत्व के अधिकारी बन सके-वत्सल भाव और भगवद्विषयक रति। शेष भाव इनमें अन्तर्भूत हो गये या संचारी भाव बनकर रह गये। उपर्युक्त विवेचन का उद्देश्य संस्कृत-साहित्य के नौ रसों की सार्वभौमिकता प्रतिपादित करना नहीं, प्रत्युत यह दिखाना है कि आचार्यों द्वारा किया गया यह वर्गीकरण व्यर्थ और कपोल-कल्पित नहीं है। स्थायी भावों की स्थिति पूर्वीय या पश्चिमीय मनोविज्ञान के प्रतिकूल नहीं है और नौ की संख्या निश्चित करना भी बहुलांश में युक्ति- संगत ही है, यद्यपि इस बात को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि यह सर्वथा दोष-रहित भी नहीं है। परन्तु, किसी भी वर्गीकरण तथा संख्या-निर्धारण में दोष या तुटि की सम्भावना का निवारण नहीं हो सकता।

विभाव

सामान्य रूप से कहा जा सकता है कि चित्तवृत्तियों को उद्बुद्ध करने के कारण- रूप विषय को विभाव कहा जाता है। काव्य, नाटक या साधारण जीवन में जो सहृदय के मन में स्थायी भाव को जगाते हैं या जगे हुए भावों को उत्कर्ष की अवस्था में लाते हैं, उन्हें विभाव संज्ञा से अभिहित किया जाता है। इस विषय में विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में लिखा है : रत्यादयुद्बोधका लोके विभावा: काव्यनाट्ययो:।' 'साहित्यरत्नाकर' में लिखा है-'उद्दीपनं उत्कर्षहेतुः।' इन्हीं विभावों से स्थायी भाव आस्वाद्यमान बनता है। भरत मुनि ने विभाव का अर्थ विज्ञान माना है। उनके अनुसार कारण, निमित्त, हेतु आदि का पर्याय विभाव है। जिससे स्थायी भाव तथा संचारी भाव वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनयों के द्वारा विभावित, अर्थात् विशेष रूप से जाने जायँ, उसे विभाव कहते हैं। इस प्रकार, विभाव कारण या हेतु ही हुआ; क्योंकि इसी के द्वारा रस-प्रतीति सम्भव होती है। ध्यातव्य है कि रस-प्रसंग में कारण आदि के लिए विशिष्ट पद का प्रयोग किया गया है और नाटक में प्रयोग के अन्तर्गत विशेष दृष्टि से विभाव का उल्लेख हुआ है। भरत के पूर्व नाट्य की सुनिश्चित परम्परा रही है और उन्होंने अपने मत के समर्थन में, और कहीं-कहीं विरोध दिखाने के लिए, परम्परागत श्लोक उद्धृत किये हैं। विभाव के सम्बन्ध में भी अपने मत का समर्थन करने के लिए उन्होंने एक श्लोक उद्धृत किया है : १. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, वर्ग ४-४, का० २५

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२८४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

बहवोऽर्था विभाव्यन्ते वागङ्गाभिनयाश्रयाः। अनेन यस्मात्तेनायं विभाव इति संजञित: ।' -अर्थात् इसके द्वारा वाचिक तथा आंगिक अभिनय पर आश्रित अनेक पदार्थ विभावित होते हैं, इसलिए इन्हें विभाव नाम दिया जाता है। इस प्रकार, आलम्बन के रूप में नायिका तथा उद्दीपन के रूप में प्रकृति केवल रस-प्रतीति के कारण न होकर अभिनय की सहायता से स्थायी भावों को प्रतीति के योग्य बनाते हैं; इसलिए विभाव कहे जाते हैं। यदि विभाव शब्द की व्युत्पत्ति 'विभाव्यते इति विभावः' करें, तो इसका अर्थ होगा कि विभाव वह है, जिसका ज्ञान हो सके। विभाव उसे कहते हैं, जिसे विभावित करके सामाजिक रसास्वाद करता है। यह विभाव भाव या स्थायी भाव को पुष्ट करनेवाला या उसे रसरूप में परिणत करनेवाला है। धनंजय ने लिखा है : ज्ञायमानतया तत्र विभावो भावपोषकृत।२ श्रव्यकाव्य में व्णित अथवा दृश्यकाव्य में मंच पर प्रदर्शित राम-सीता आदि नायक-नायिका की भूमिका अदा करनेवाले नटों को दर्शक वैसा ही मान लेता है। काव्य में उपनिबद्ध राम-सीता आदि का व्यापार अतिशयोक्तिपूर्ण होने पर भी दर्शक या सामाजिक समझ लेता है कि राम-सीता आदि इसी रूप में हैं। इस तरह के विशिष्ट रूप में दर्शक के ज्ञान का विषय बनानेवाले, उनसे विभावित होनेवाले विभाव कहे जाते हैं। दर्शक या सामाजिक के द्वारा ज्ञायमान अर्थ ही विभाव का अर्थ है। जो बात लौकिक ज्ञान- रूप विषय में विभावों के सम्बन्ध में लागू होती है, वही काव्य में वणित विभावों के सम्बन्ध में लागू नहीं होती। लौकिक ज्ञान में उनके भौतिक तत्त्व या स्थूल रूप की आवश्यकता होती है; किन्तु काव्यगत विभावों का ज्ञान तो काव्य में प्रयुक्त शब्दों के द्वारा हो जाता है। दूसरी बात यह है कि लौकिक ज्ञान के विषय विशिष्ट होते हैं, किन्तु काव्यगत विभाव सामान्य रूप होते हैं। ये विभाव अपने-अपने रस की अनुकूलता में विभावित होते हैं और सहृदय व्यक्ति के मन में इस प्रकार घूमते हैं, जैसे उसे इनका प्रत्यक्ष ज्ञान मिल रहा हो। किन्तु, यह ठीक है कि सहृदय व्यक्ति के मन में इन विभावों के सामान्य रूप का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। जब हमें शब्दों के द्वारा किसी वस्तु का बौद्धिक ज्ञान प्राप्त हो जाता है, तब वह प्रत्यक्ष के समान ही हो जाता है। इस तथ्य की पुष्टि में धनिक और विश्वनाथ दोनों ने भत्तृ हरि के 'वाक्यपदीय' की यह कारिका उद्धत की है : शब्दोपहितरूपांस्तान्बुद्धेविषयतां गतान्। प्रत्यक्षमिव कंसादीन्साधनत्वेन मन्यते ॥ आल क शाकी

१. नाट्यशास्त्र, अध्याय ७, का० ४ २. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० २४

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काव्यानुशीलन के समय वाक्यादि में जब कंस आदि शब्दों का प्रयोग करते हैं, तब शब्द कहने के साथ ही कसादि को सहृदय पुरुष प्रत्यक्ष रूप के समान कर्म, नाटक आदि साधन के रूप में अथवा अपने दान के ज्ञापक के रूप में ग्रहण करते हैं। मनोविज्ञान की दृष्टि से विवेचन करने पर विभाव के विषय में कहा जा सकता है कि कोई भी चेतन प्राणी किसी विशेष परिस्थिति, वातावरण या व्यक्ति के सम्पर्क में किसी विशेष प्रकार का प्रत्युत्तर देता है। साहित्य में भी यह सिद्धान्त लागू होता है। जब कोई सहृदय व्यक्ति कोई काव्य पढ़ता या सुनता है अथवा कोई नाटक देखता है, तब उन परिस्थितियों तथा पात्रों के प्रति विशेष प्रकार की भावात्मक प्रतिक्रिया प्रदर्शित करता है। रसिकगत रसनिष्पत्ति के कारण इसे विभाव ही कहेंगे। इसीलिए, अनेक आचार्यों ने विभाव को रस का कारण या हेतु भी कहा है। ऊपर भरत मुनि का उद्धरण देकर इस बात की ओर संकेत किया जा चुका है। विभाव के भेद : भरत मुनि ने विभाव के भेद नहीं किये, परन्तु अन्य आचार्यों ने इसके दो भेद किये-आलम्बन तथा उद्दीपन। अग्निपुराण में लिखा है : विभावो नाम स द्वधालम्बनोद्दीपनात्मकः ।' धनंजय ने ये ही दो भेद किये : आलम्बनोद्दीपनत्वप्रभेदेन स च द्विधा।२ कविराज विश्वनाथ ने यह भेद स्वीकार किया: आलम्बनोद्दीपनाख्यौ तस्य भेवावुभौ स्मृतौ।3 इन आचार्यों ने अलग कारिकाओं में स्पष्ट रूप से भेद किये। इनके अतिरिक्त, रसगंगाधर, सरस्वतीकण्ठाभरण, भावप्रकाशन तथा नाट्यदर्पण आदि सभी ग्रन्थों में अलग कारिकाओं में भेद नहीं दिखाकर भी आलम्बन तथा उद्दीपन के कारण लिखे गये हैं। आलम्बन : भावों का प्रकृत आधार या विषय आलम्बन नाम से अभिहित होता है। पण्डितराज जगन्नाथ ने आलम्बन का लक्षण दिया : एवं यस्याश्चित्तवृत्तेर्यों विषयः स तस्या आलम्बनम्।४ कछ ये आलम्बन ज्ञान के प्रमुख कारण माने जाते हैं; क्योंकि इन्हीं को ध्यान में रखकर रति आदि भाव प्रवत्तित होते हैं। इस विषय में राजा भोज की उक्ति है : आलम्बनविभावः स कारणमुच्यते।५ १. अग्निपुराण, अध्याय ३३८, श्लोक ३६ २. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० २ ३. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० २९ ४. रसगंगाधर, प्रथमानन, पृ० ४० (पं० मथुरानाथ की टीका) ५. सरस्वतीकण्ठाभरण, परिच्छेद ५, का० ३६ गगगक सागर, सणताम

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२=६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास नाटक के दर्शक के लिए आलम्बन विभाव नायक और नायिका दोनों ही हैं। नायक के लिए नायिका आलम्बन है, नायिका के लिए नायक। किन्तु, सामान्यतः आलम्बन का विवेचन करते समय नायक को ही रस का आश्रय माना जाता है। अतः, उसके लिए आलम्बन नायिका होती है। उद्दीपन : सहृदय के हृदय में जागरित भावों में उत्कर्ष लानेवाले हेतु या कारण को उद्दीपन कहा जाता है। इस विषय में राजा भोज का कथन है : तत्प्रबोधाय मालर्तुश्चन्दनेन्दूदयादयः । उद्दीपना विभावास्ते स तैः स्मरति वाञ्छति ।' -अर्थात् जगे भावों को उद्दीप्त करने के हेतु माला, ऋतु, चन्दन, चन्द्रोदय आदि हैं। अतः, ये उद्दीपन विभाव हैं। पण्डितराज ने भी उद्दीपनों को भावों के उत्कर्ष का निमित्त माना है : कणा निमित्तानि चोद्दीपकानीति बोध्यम्।२ 'साहित्यरत्नाकर' के अनुसार उद्दीपन चार प्रकार का होता है-आलम्बन का गुण, आलम्बन की चेष्टा, आलम्बन का अलंकार तथा आलम्बन-तटस्थ उद्दीपन : उद्दीपनं तदुत्कर्षहेतुस्तत्तु चतुविधम्। आलम्बनगुणाश्चैव तच्चेष्टा तदलडकृति: ॥ तटस्थश्चेति विज्ञेयाश्चतुर्थोद्दीपनक्रमाः। आलम्बन-तटस्थ उद्दीपन के अन्तर्गत वन, पर्वत, ऋतु आदि प्रकृति के विभिन्न अवयवों का समावेश होता है। शरदातनय ने आठ प्रकार के उद्दीपन की चर्चा की है। ये आठ उद्दीपन आठ रसों से सम्बद्ध हैं। ललित शृंगार रस का उद्दीपन है। इसी प्रकार, ललिताभास हास्य रस का, स्थिर वीर रस का, चित्र अद्भुत रस का, स्वर रौद्र रस का, रूक्ष करुण रस का, विकृत भयानक रस का और निन्दित बीभत्स का उद्दीपन है। शारदातनय ने सब उद्दीपनों के लक्षण विस्तार से दिये हैं।3 उद्दीपन अधिकांश स्थलों पर रस या भाव को जागरित नहीं करता, अपितु उन्हें प्रदीप्त या उद्दीप्त ही करता है। वातावरण या परिवेश का समावेश विभाव में ही हो जाता है। इस प्रकार, इस सिद्धान्त में मनोविज्ञान के दो तत्त्व आ जाते हैं। सहृदय में आनुवंशिक रूप में वासनात्मक भाव मिले रहते हैं और वातावरण के तत्त्व आलम्बन और उद्दीपन उन्हें जगाकर तथा उत्कर्ष की स्थिति तक लाकर रसरूप में परिवततित कर देते हैं। १. सरस्वतीकण्ठाभरण, वही, का० ३७-३८ २. रसगंगाधर, प्रथम आनन, पृ० ४० ३. भावप्रकाशन, प्रथम अधिकार, पृ० ४-५

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कविकर्म में विभाव का बहुत महत्त्व होता है। कवि ऐसी वस्तुओं का चित्रण करता है, जो सहृदय के मन में भावों को उत्पन्न कर देती हैं या उत्पन्न भावों को संवद्धित कर देती हैं। इसे विभाव पक्ष कहते हैं। दूसरी ओर, कवि उन वस्तुओं के अनुरूप भावों के अनेक रूपों की अभिव्यंजना करता है। इसे भावपक्ष कहते हैं। दोनों पक्षों का अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है। एक के साथ दूसरा किसी-न-किसी रूप में अवश्य रहेगा। किन्तु, काव्य में विभाव-पक्ष का चित्रण अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। विभाव के चित्रण में ही कवि की कल्पना का पूर्ण उत्कर्ष दृष्टिगोचर होता है। केवल विभाव का ही चित्रण काव्य बनने का सामर्थ्य रखता है, इससे काव्य में विभाव का महत्त्व देखा जा सकता है। यदि कवि अपने काव्य में विभाव का सम्यक् वर्णन कर सकता है, तो स्वयमेव भाव की भी व्यंजना हो जा सकती है। अनुभाव भरत ने रस के प्रयोग में विभावादि के साथ अनुभाव का भी उल्लेख किया है। इन्हें आलम्बन, उद्दीपन-रूप कारणों से उत्पन्न भावों को प्रकाशित करनेवाला कार्यरूप माना गया है। भाव-प्रदर्शन में अनुभावों का क्षेत्र बहुत ही विस्तृत है। इसके अन्तर्गत आंगिक तथा वाचिक अभिनय तो आते ही हैं, मानसिक हर्ष-विषाद, आहार्य-सम्बन्धी वेश- रचना तथा सात्त्विक अनुभाव सभी आ जाते हैं। मन या शरीर पर उत्पन्न होनेवाले रत्यादि स्थायी भाव की सूचना करनेवाले विकार को अनुभाव कहते हैं। धनंजय ने अनुभाव का लक्षण निम्नलिखित शब्दों में दिया है : अनुभावो विकारस्तु भावसंसूचनात्मकः ।' अनुभाव शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार की जाती है। वे सामाजिकों को रत्यादि स्थायी भाव का अनुभव कराते हैं। ये अनुभाव भ्रूक्षेप, कटाक्षादि आश्रय के शारीरिक विकार हैं, जिनसे रस परिपुष्ट होता है। इन्हें देखकर सामाजिक को यह अनुभव हो जाता है कि पात्र में अमुक भाव का उद्रक हो गया। नाटक या काव्य में इन अनुभावों का साक्षात् अनुभव करनेवाले सामाजिकों के अनुभाव के विषय होते हैं, इसलिए इन्हें अनुभाव कहते हैं। इस सम्बन्ध में भरतमुनि की मान्यता है कि आन्तरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति- सूचक वाणी, शरीर एवं मन-सम्बन्धी करियाएँ अनुभाव कहलाती हैं : अनुभाव्यतेऽनेन वागङ्गसत्त्वकृतोऽभिनय इति। वागङ्गाभिनयेनेह यतस्त्वर्थोऽनुभाव्यते। शाखाङगोपाङ्गसंयुक्तस्त्वनुभावस्ततः स्मृतः ॥२ ए अनुभाव पद से ऐसी वाचिक एवं आंगिक चेष्टाओं का संकेत मिलता है, जिनसे आश्रय के हृदय में उद्बुद्ध भावों को व्यक्त रूप मिलता है और जिससे सामाजिक को भावविशेष १. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ३ २. नाट्यशास्त्र, अध्याय ७, का० ५

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास की प्रतीति होती है। विभाव के प्रति आश्रय में जो भी भाव व्यक्त किये जाते हैं, उनका प्रत्यक्षीकरण अनुभावों के द्वारा होता है। इस प्रकार, अभिनय में अनेक चेष्टाएँ और व्यापार हैं। भरत का दृष्टिकोण यही रहा है, परन्तु परवर्त्ती नाट्याचार्यों तथा काव्याचार्यों ने अनुभाव का व्युत्पत्तिपरक अर्थ भी ग्रहण किया है। जो रत्यादि स्थायी भाव के पीछे उत्पन्न होते हैं, वे अनुभाव कहलाते हैं : 'अनु पश्चात् भवन्तीति अनुभावाः।' इस रूप में ये स्थायी भावों के जागरित होने के पश्चात् कार्यरूप माने जायेंगे। इस विषय में कविराज विश्वनाथ का मत द्रष्टव्य है : उद्बुद्ध कारण: स्वै: स्वैबहिर्भावं प्रकाशयन्। लोके यः कार्यरूपः सोऽनुभावः काव्यनाट्ययो: ।9 सीता आदि आलम्बन और चन्द्रादि उद्दीपन-कारणों से रामादि आश्रय के हृदय में उद्बुद्ध रत्यादि स्थायी भावों को बाहर प्रकाशित करनेवाला, लोक में जो रति का कार्य कहा जाता है, वही काव्य और नाट्य में अनुभाव कहा जाता है। इस प्रकार, अनुभाव स्थायी भाव का कार्य हो जाता है। पण्डितराज जगन्नाथ भी अनुभाव को स्थायी भाव का कार्य ही मानते हैं : यानि च कार्यतया तान्यनुभावशब्देन।१1 विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव को स्थायी भाव का क्रमशः कारण, कार्य तथा सहकारी कारण माना जाता है। परन्तु, यह संगत दृष्टि नहीं है। अनुभावों की स्थिति भावों के बाद या भावों के कार्यरूप में नहीं मान सकते। वे भावों के साथ व्यक्त होते हैं और उन्हीं के साथ तिरोहित भी हो जाते हैं। भले ही भाव तथा अनुभाव में कार्य-कारण की स्थिति प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर हो, परन्तु वस्तुतः यह बात नहीं है। वास्तव में, सभी काव्य के कारण ही हैं; क्योंकि ये सभी रसपोष के सहायक होते हैं। काव्यानुशासनकार हेमचन्द्र के मतानुसार अनुभाव सामाजिकों को रस का अनुभव कराते हैं : स्थायित्यभिचारिलक्षणं चित्तवृत्तिविशेषं सामाजिकजनः अनुभवन् अनुभाव्यते साक्षात्कार्यते य: ते अनुभावा:।3 कुछ आचार्य अनुभाव के चार भेद मानते हैं और कुछ दो ही मानते हैं। अनुभाव के चार भेद माननेवाले ग्रन्थों में रसतरंगिणी, रसार्णवसुधा, सरस्वतीकण्ठाभरण तथा भावप्रकाशन हैं। इनके भीतर शरीर, वाणी, बुद्धि तथा मन के व्यापार आते हैं। शारदातनय ने भावप्रकाशन में राजा भोज के सरस्वतीकण्ठाभरण का अनुकरण किया है। यह इसलिए किया गया कि नायिका के भाव, हाव, लीला, विलास आदि बीस अलंकारों १. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० १३२-३३ सए २. रसगंगाधर, प्रथम आनन, पृ० ३९ (श्रीमथुरानाथ की टीका) ३. काव्यानुशासन, पृ० २६

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[२८९ और नायक के शोभा, विलास आदि आठ गुणों को मन-आरम्भ और गात्रारम्भ अनुभावों में अन्तर्भूत किया जा सके। भरत ने इन्हें सामान्य अभिनय कहा है और धनंजय ने नायक- नायिका के अलंकार कहा है। सात्त्विक भाव : 'साहित्यकौस्तुभ' के टीकाकार ने अनुभाव के दो ही भेद माने हैं- अनुभाव तथा सात्त्विक भाव। रस को प्रकाशित करनेवाला अन्तःकरण का विशेष धर्म सत्त्व कहा जाता है। ये भाव सत्त्व से उत्पन्न होते हैं, इसलिए सात्त्विक कहे जाते हैं। अन्य व्यक्तियों के दुःख, हर्ष आदि की भावना में जब भावक का अन्तःकरण अत्यधिक अनुकूल तथा एकरूप हो जाय, तब इसे सत्त्व कहते हैं। सत्त्व का अर्थ है मन से उत्पन्न; इस सत्त्व की उत्पत्ति मन की एकाग्रता से होती है। मन का सत्त्व इसी में है कि जब उसे हर्ष या विषाद होता है, तब अश्रु-रोमांच आदि स्वयं निकल पड़ते हैं। ये अश्रु, रोमांच आदि सत्त्व से निकलते हैं, इसलिए सात्त्विक भाव कहलाते हैं। दूसरी ओर, ये विकार-रूप भी हैं, अतः अनुभाव भी हैं। इस प्रकार, अश्रु आदि एक ओर सात्त्विक भाव हैं, तो दूसरी और विकार-रूप अनुभाव भी हैं। सात्त्विक भावों में अनुभावत्व है, वे अनुभावों के ही समान आश्रय के विकार हैं, फिर भी सात्त्विक भाव अलग से भाव माने जाते हैं। इन सात्त्विकों को भाव इसलिए कहा जाता है कि ये सत्त्व (मानसिक स्थिति) से उत्पन्न होते हैं। सत्त्व का अर्थ है-अनुकार्य राम आदि के दुःखादि भाव से भावक के चित्त का भावित होना। को सात्त्विक भावों का सम्बन्ध सूक्ष्म भावाभिव्यक्ति से है। इन अनुभावों की स्थिति न मात्र अन्तरावयव है और न विशुद्ध रूप से मानसिक ही है। यही कारण है कि इनका विवेचन सदा अलग ही होता रहा है। इनकी अभिव्यक्ति का सम्बन्ध विशेष मनोवेग से है और चित्तविक्षेप के साथ इनका प्रदर्शन नहीं किया जा सकता। सात्त्विक भावों की संख्या प्रमुखतः आठ मानी गई है-स्तम्भ, प्रलय, रोमांच, स्वेद, ववर्ण्य, वेपथु (कम्प), अश्रु और स्वरभंग। भानुदत्त ने 'रसतरंगिणी' में जुम्भा को भी सम्मिलित कर लिया है। चूँकि इन अनुभावों की स्थिति का आन्तरिक प्रक्रिया के साथ अधिक जटिल सम्बन्ध है, इसलिए इनका अभिनय शरीर और मन की अत्यधिक अनुरूपता पर निर्भर करता है। यह ठीक है कि इनके सहारे मानसिक संवेगों की स्थिति का प्रदर्शन अधिक व्यक्त होता है। अनुभाव तथा सात्त्विक भाव में अन्तर : नीचे की तालिका से अनुभाव तथा सात्त्विक भाव का अन्तर स्पष्ट हो जायगा। अनुभाव सातत्विक भाव १. अनुभावों का सम्बन्ध शरीर से 9. सात्त्विक भावों का सम्बन्ध मन से 111) होता है। ये सहेतुक होते हैं और साम होता है। अतः, ये बाह्य नहीं, आन्तर इनमें बुद्धिपूर्वक प्रयत्न होता है। धर्म हैं। भाव उत्पन्न होने पर ये स्वयमेव प्रकट हो जाते हैं। इनके लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता।

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२९० j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

२. जब अनुभाव उत्पन्न होता है, तब २. जब सात्त्विक भाव उत्पन्न होता है, शारीरिक आन्दोलन होता है; जैसे तब शरीर की मूल प्रकृति में लीला, विलास, केलि, कुट्टमित परिवर्त्तन हुआ करता है; अर्थात् आदि में देख सकते हैं। उस समय शरीर में कुछ विकृति आ गई रहती है। ३. अनुभाव में मन की तन्मयता की ३. सात्त्विक भाव में मन की तन्मयता वैसी कोई आवश्यकता नहीं रहती। की बहुत आवश्यकता है। उदाहरणार्थ, प्रलय नामक सात्त्विक भाव में मन इतना तन्मय हो जाता है कि शरीर जड़ के समान हो जाता है। ४. जब सामान्य भाव प्रकट होते हैं, ४. सात्त्विक भाव की उत्पत्ति तभी उसी अवस्था में अनुभाव प्रकट होती है, जब बहुत शक्तिशाली

होते हैं। भाव उत्पन्न होते हैं। उदाहरणार्थ, स्तम्भ, स्वेद, स्वरभंग, रोमांच, अश्रु, वेपथु, प्रलय आदि सात्त्विक भाव तभी प्रकट होते हैं, जब बहुत शक्तिशाली भाव प्रकट हो गये रहते हैं।

संचारी भाव संचारी भाव या व्यभिचारी भाव एक अल्पकालिक मानसिक स्थिति है। यह विभाव से जागरित होता है और अनुभावों से व्यक्त होकर स्थायी भावों का पोषण करता है और फिर उन्हीं में विलीन हो जाता है। यह एक अस्थायी मनोवृत्ति है। कुछ आचार्य इन्हें संचारी भाव कहते हैं; क्योंकि ये कई भावों में संचरण करते हैं। आचार्य मम्मट ने इन्हें सहकारी कहा है; क्योंकि ये स्थायी भाव की उत्पत्ति में सहायक होते हैं। उदाहरणार्थ, शत्रु पर विजय प्राप्त करने का जो उत्साह है, वह वीर रस का स्थायी भाव है। लेकिन, विजय की उत्सुकता, उद्देश्य-प्राप्ति पर हर्ष, गर्व आदि संचारी भाव हैं। संचारी भाव के विषय में आचार्यों के मत द्रष्टव्य हैं। भरत का मत है : विविधमाभिमुख्येन रसेषु चरन्तीति व्यभिचारिणः। वागङ्गसत्त्वोपेतप्रयोगे रसान्न- यन्तीति व्यभिचारिण: ।।' १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ७, का० २७ के बाद गद्य।

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  • अर्थात् विविध प्रकार से रसों में जो उनकी ओर उत्मुख होकर संचरणशील होते हैं, उनको व्यभिचारी भाव कहते हैं। वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अनुभावों से युक्त स्थायी रसों को व्यभिचारी प्रतीति-योग्य बनाते हैं। धनंजय ने संचारी भाव का लक्षण कुछ दूसरे ही ढंग से दिया है। वे समुद्र की लहर से इसकी तुलना करके कहते हैं : विशेषादाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिण: । स्थायिन्युन्मग्ननिर्भग्ना: कल्लोला इव वारिधौ।।१ -अर्थात् जो भाव विशेष रूप से-आभिमुख्य से-स्थायी भाव में कभी उठते और कभी गिरते रहते हैं, उन्हें व्यभिचारी भाव कहा जाता है। ये भाव स्थायी भाव में उसी प्रकार उन्मग्न एवं निमग्न होते हैं, जैसे समुद्र में लहरें उठती और विलीन होती हैं। समुद्र में लहरों के समान रत्यादि स्थायी भाव में निर्वदादि संचारी भाव आविर्भूत तथा तिरोहित होते रहते हैं। शारदातनय ने धनंजय की ही कारिका उद्धत की है और इसकी व्याख्या में कुछ अन्य श्लोक भी लिखे हैं। विश्वनाथ की भी कारिका लगभग ऐसी ही है : विशेषादाभिमुख्येन चरणाद्व्यभिचारिणः । स्थायिन्युन्मग्ननिर्मग्नास्त्रयस्त्रिशत्तु तदिभदाः ॥२

-अर्थात् स्थिरता से विद्यमान रत्यादि स्थायी भाव में उन्मग्न, निमग्न, अर्थात् आविर्भूत, तिरोभूत होकर भाव अनुकूलता में व्याप्त होते हैं। अतएव, विशेष रीति से आभिमुख्य आचरण के कारण इन्हें व्यभिचारी भाव कहते हैं। इस विषय में प्रायः सभी आचार्यों का मत मिलता-जुलता है। Th नीचे की तालिका में स्थायी भाव से संचारी भाव की तुलना की जा रही है, जिससे संचारी भाव स्पष्ट हो जाय। स्थायी भाव संचारी भाव

१. स्थायी भाव जन्मतः स्थिर प्रकार १. संचारी भाव जन्मतः अस्थिर की मनोदशा है। यह वासना के मनोदशा है। यह कारण के अभाव रूप में चित्त में वर्त्तमान रहता है। में निःशेष हो जाता है। कारण के अभाव में भी इसकी सत्ता वर्त्तमान रहती है। २. स्थायी भाव में स्वामी की प्रकृति २. संचारी भाव में सेवक की प्रकृति दिखाई देती है। दिखाई देती है।

१. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ७ २. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० १४०

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२९२ 1 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

३. स्थायी भाव की उपमा सागर से दे ३. संचारी भाव की तुलना तरंग से 3b सकते हैं, जो स्वतन्त्र, विशाल तथा कर सकते हैं, जो चंचल तथा गम्भीर होता है। क्षणिक होती है। जैसे तरंग सागर से उठकर सागर में ही विलीन हो ए जाती है, वैसे ही संचारी भाव स्थायी भाव से प्रवत्तित होकर फिर उसी में विलीन हो जाते हैं। ४. स्थायी भाव का आधार स्वतन्त्र ४. अधिकांश संचारियों का अपना

कव होता है और इसका आलम्बन सदा कोई आधार नहीं होता। प्रायः सामान्य कोटि का होता है। इनका आधार स्थायी का आलम्बन होता है। इसीलिए, इनका व्यापार सदा स्थायी के अनुकूल होता है। यदि कभी संचारी का आलम्बन स्वतन्त्र हुआ, तो उससे सहृदय का साधारणीकरण होना कठिन है; क्योंकि वह विशेष कोटि का होता है। शा गर्व, लज्जा और असूया को छोड़कर अन्य संचारियों के आलम्बन या तो प्रधान भाव के ही आलम्बन होते हैं, अथवा उनसे सम्बन्ध रखनेवाली वस्तुएँ।" ५. स्थायी भावों को व्यक्त होते देखकर ५. संचारी भावों को व्यक्त होते देखकर मपफी या सुनकर श्रोता या दर्शक उन्हीं या सुनकर श्रोता या दर्शक उसी भावों का अनुकरण कर सकते हैं। रूप में अनुभव नहीं कर सकते, केवल ये ही रसरूप में परिणत हो अर्थात् संचारी भाव रसरूप में सकते हैं; क्योंकि सहृदय के चित्त में परिणत नहीं हो सकते। वासना-रूप में विद्यमान रहने के कारण इन्हीं का साधारणीकरण होता है। ६. स्थायी भाव स्वतन्त्र रूप से आस्वाद्य- ६. संचारी भाव स्वतन्त्र रूप से मान होते हैं। आस्वाद्यमान नहीं होते, स्थायी के

कीकुर आस्वादन में केवल सहायता देते हैं। जब कभी ये स्वतन्त्र रूप से आते हैं, तब केवल भावस्थिति तक रह जाते हैं। १. रसमीमांसा, पृ० २३२

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७. स्थायी भावों का कोई स्वतन्त्र लक्ष्य ७. संचारी भावों का कोई स्वतन्त्र लक्ष्य रहता है, अतः वे इच्छा, संकल्प तथा नहीं रहता, अतः वे स्थायी भाव के प्रयत्न की ओर प्रवृत्त होते हैं। लक्ष्य की ओर ही प्रवृत्त करते हैं। 5. स्थायी भाव के अन्तर्गत नैसगिक 5. संचारी भावों के अन्तर्गत साधित प्रवत्तियों, प्राथमिक भावों तथा तथा सम्मिश्र भावनाओं के साधित भावनाओं का संघटन अतिरिक्त कुछ प्राथमिक भावनाएँ रहता है। भी आती हैं। . स्थायी भाव जीवन की मूल प्रवृत्तियों ९. संचारी भावों का सम्बन्ध जीवन की से सम्बद्ध हैं, अतः इनका सम्बन्ध मूल वृत्तियों से प्रत्यक्ष नहीं है। पुरुषार्थचतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम, अतः, इनका सम्बन्ध पुरुषार्थ- मोक्ष-से सहज ही स्थापित हो चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष- जाता है। अर्थात् जीवन में इनका से प्रत्यक्ष नहीं है। अधिक महत्त्व होता है। १०. स्थायी भाव अधिक प्रबल होता है। १०. संचारी भाव क्षण-क्षण में आविर्भूत अविरुद्ध और विरुद्धभाव उसका एवं तिरोहित होकर स्थायी भाव नाश नहीं कर सकते। का पोषण करते हैं। ध्यातव्य है कि एक भाव कभी स्थायी भाव हो सकता है, तो दूसरे स्थान पर व्यभिचारी भी हो सकता है। इसके दो कारण हैं। पहला कारण है विभाव की निर्बलता और दूसरा कारण है उस भाव की शक्तिहीनता। यदि विभाव निर्बल होगा या वह भाव शक्तिहीन होगा, तो वह स्थायी न होकर संचारी भाव होकर रह जायगा। वास्तव में, स्थायी और संचारी में नित्य भेद नहीं, वरन् नैमित्तिक भेद है। यहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिए कि स्थायी भाव तो संचारी भाव हो सकते हैं, परन्तु सभी संचारी भाव स्थायी भाव की स्थिति तक नहीं पहुँच सकते। 'अन्य स्थायी भाव किसी एक स्थायी भाव के या अपने विभाव के निर्बल पड़ने पर या प्रमुख हो जाने पर व्यभिचारी भाव हो सकते हैं; परन्तु 1. स्थायी व्यभिचारी भाव के अतिरिक्त अन्य व्यभिचारी भाव स्थायी भाव नहीं हो सकते।'१ शारदातनय ने तैंतीस व्यभिचारी भावों की विवेचना करने के पश्चात् 'काव्यालंकार' और 'शृंगारतिलक' में रुद्रट या रुद्र द्वारा प्रतिपादित इस मत की कटु आलोचना की है कि प्रत्येक व्यभिचारी भाव रस में परिणत हो सकता है। यह भी ध्यान देने की बात है कि किसी स्थायी भाव के भीतर उसके विरोधी भाव संचारी भाव के रूप में नहीं आ सकते। उदाहरणार्थ, शृंगार के भीतर बीभत्स, वीर के भीतर भयानक, रौद्र के भीतर करुण तथा अन्य सभी रसों के भीतर तितिक्षा व्यभिचारी भाव के रूप में नहीं आ सकते; क्योंकि ये विरोधी भाव हैं। जिसके प्रति शृंगार की भावना होगी, उसी के प्रति घृणा की भावना, विरोधी होने के कारण, नहीं हो सकती। उसी प्रकार, १. समीक्षादर्शन (द्वितीय भाव), पृ० १६९

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२९४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

सच्चा वीर अपने आलम्बन से भय नहीं कर सकता, इसलिए वीर रस के भीतर भयानक व्यभिचारी बनकर नहीं रह सकता। उत्साह के साथ भय का संचार सम्भव नहीं। क्रोधी व्यक्ति कोध के क्षणों में अपने आलम्बन के प्रति करुणा नहीं कर सकता, अतः रौद्र रस के भीतर करुण व्यभिचारी भाव सम्भव नहीं। संचारियों की संख्या : प्राचीन रसाचार्यों ने संचारी भावों की संख्या ३३ निर्धारित की है। प्रायः सभी परवर्त्ती आचार्यों ने भी यही संख्या स्वीकार की है। परन्तु, यह संख्या बढ़ सकती है। प्राचीन काल से वर्त्तमान काल तक बहुत-से कवियों, नाटककारों, उपन्यासकारों तथा कहानीकारों ने ऐसी अनेक अल्पकालिक मानसिक स्थितियों का चित्रण किया है, जिनको अभी तक नाम नहीं दिये जा सके हैं। अभी उनका सम्यक् विश्लेषण भी नहीं किया जा सका है। इसके अतिरिक्त, ऐसे बहुत-से मनोवेग या मानसिक तथा शारीरिक स्थितियाँ प्रायः घटित होती रहती हैं, जिनका अनुभव कवियों तथा साहित्यकारों को भी सम्भवतः नहीं होता होगा। भरत आदि आचार्यों तथा कालिदास आदि कवियों को यह अनुभव कैसे हो सकता था कि ट्रेन छूट जाने पर कैसा क्षोभ होता है या किसी दिन समाचार-पत्र नहीं आने पर कैसी बेचनी होती है। उस युग में ट्रेन या समाचार-पत्र नहीं होने से ऐसा अनुभव सम्भव नहीं था। ऐसी बहुत-सी मानसिक स्थितियों का अनुभव हमें आये दिन होता है, जिनका अनुभव उस युग में सवथा अज्ञात था। इन बातों पर विचार करने से हिन्दी के कुछ आचार्यों ने संचारी भावों की संख्या तैंतीस तक ही सीमित नहीं रखकर अधिक बढ़ा दी है। जैसे-जैसे इस विषय पर मनन एवं चिन्तन होता जाता है, वैसे-वैसे नवीन भाव-स्थितियाँ प्रकट होती जाती हैं। तात्पर्य यह कि संचारियों की संख्या ३३ से काफी अधिक हो सकती है। 'रसमीमांसा' में आचार्य रामचन्द्र शुक्लजी ने इस विषय का अच्छा विवेचन किया है। उनके अनुसार संचारियों के अन्तर्गत स्वतन्त्र विषययुक्त मनोविकार, मन के वेग, शारीरिक तथा मानसिक अवस्थाएँ और मन की वृत्तियाँ समाहित हैं। नीचे संचारियों की एक तालिका प्रस्तुत की जा रही है, जो उपर्युक्त विभाजन के आधार पर है और जिससे संचारियों के स्वरूप का ज्ञान हो जायगा। यह तालिका 'रसमीमांसा तथा 'समीक्षादर्शन' के आधार पर है। संचारी भाव स्वतन्त्र आलम्बन- मन के वेग अन्त:करण मानसिक शारीरिक अवस्थाएँ वाले भाव की वृत्तियाँ अवस्थाएँ गर्व, लज्जा, आवेग, अमर्ष, शंका, स्मृति, दन्य, मद, जडता, श्रम, अपस्मार, ईर्ष्या अवहित्था, मति, चिन्ता, उग्रता, मोह, स्वप्न, मरण, निद्रा, औत्सुक्य, त्ास, वितर्क, आशा, अलसता, उन्माद, विबोध, व्याधि हर्ष, विषाद नैराश्य, विस्मृति सन्तोष, चपलता, निर्वेद, मृदुलता, धैर्य, क्षमा, असन्तोष, ग्लानि

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विश्लेषण तथा विवेचन : भरत ने संचारियों का जो विवरण दिया है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि उनका ध्यान अभिनयात्मक पक्ष की ओर अधिक रहा है, मनोवैज्ञानिक पक्ष की ओर कम। फलस्वरूप, उन्होंने संचारी भावों में उन सभी शारीरिक एवं मानसिक अवस्थाओं का समावेश कर लिया है, जो सभी रसों में साधारणतः संचारित होती रहती हैं। मनोविज्ञान के विद्वानों में संचारियों के विषय में पर्याप्त मतवैभिन्न्य दृष्टिगोचर होता है। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने निम्नलिखित तथ्य सिद्ध किये हैं : (क) इन तैंतीस संचारियों में चौदह भाव या मनोविकार हैं-निर्वेद, शंका, हर्ष, दैन्य, चिन्ता, उग्रता, तास, असूया, अमर्ष, गर्व, व्रीडा, आवेग, विषाद, औत्सुक्य। (ख) इनमें चार मनोवेग नहीं हैं, प्रत्युत ज्ञानात्मक अनुभाव-मात्र हैं-धृति, मति, अवहिथा और वितर्क। (ग) इनमें पाँच शारीरिक संवेदन-मात्र हैं-ग्लानि, श्रम, आलस्य, मद और मोह।

(घ) इनमें दस मानसिक अनुभाव की श्रेणी में ही नहीं आते-स्मृति, स्वप्न, निद्रा, विबोध, जडता, चपलता, अपस्मार, व्याधि, उन्माद और मरण। डॉ० गुलाब राय१ ने इस विषय में कुछ शंकाएँ उपस्थित की हैं और फिर उनका समाधान भी प्रस्तुत किया है। शंकाएँ और उनके समाधान का सारांश निम्नलिखित हैं : (क) श्रम, स्वप्न, निद्रा, विबोध, अपस्मार, उत्माद और व्याधि का सम्बन्ध मन से नहीं है। इस शंका का समाधान उन्होंने यह दिया है कि इन सबकी भौतिक स्थिति तो अवश्य ही है, परन्तु साथ ही उसके अनुकूल मानसिक स्थिति भी वर्त्तमान है। (ख) तास, शंका, विषाद, अमर्ष आदि कुछ भावों का अपना कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। भय, शोक और करोध जैसे स्थायी भावों में ही वे अन्तर्भूत हो जाते हैं। इस शंका का उन्होंने समाधान प्रस्तुत किया है कि यद्यपि शंका और तास का भय से, अमर्ष का क्रोध से और विषाद का शोक से साम्य दृष्टिगत होता है, तथापि इनमें स्पष्ट रूप से अन्तर है। (ग) तीसरी शंका यह है कि धृति, मति और अवहित्था जैसे संचारी भाव वस्तुतः ज्ञानमूलक हैं। इस शंका का समाधान किया गया है कि यद्यपि ये ज्ञानमूलक हैं, तथापि इससे उनके भाव होने में कोई बाधा नहीं पड़ती। इसका कारण यह है कि प्रायः सभी भाव ज्ञानाश्रित होते हैं। दूसरी ओर, परम्पराभक्त अन्य विद्वानों ने२ यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि सभी तैंतीसों संचारी भाव चित्तवृत्ति-रूप हैं। जिन संचारियों में भौतिक स्थिति दिखाई १. सिद्धान्त और अध्ययन, द्वितीय संस्करण, पृ० १३२-१३४ २. रसगंगाधर का शास्त्रीय अध्ययन (डॉ० प्रेमस्वरूप गुप्त), पृ० २३९-२४०

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२९६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

देती है, उनमें भी चित्तवृत्ति-रूप भाव की स्थिति अवश्य ही वर्त्तमान रहती है। उदाहरण- स्वरूप, निद्रा में चित्त की, सम्मीलन की स्थिति, व्याधि में मनस्ताप की स्थिति तथा स्वप्न में ज्ञान की स्थिति वर्त्तमान रहती है। इसी प्रकार, जिन संचारियों में ज्ञानात्मक अनुभव रहता है, वे भी चित्तवृत्ति-रूप ही हैं; क्योंकि भारतीय दर्शन ज्ञान को चित्तवृत्ति से अलग स्वतन्त्र सत्ता स्वीकार नहीं करता। इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि संचारियों के औचित्य या अनौचित्य को लेकर तीन मत हो जाते हैं। (क) संचारी भाव होते हुए भी उस अर्थ में भाव नहीं है, जिस अर्थ में स्थायी हैं। भरत ने 'भाव' शब्द का प्रयोग संकुचित अर्थ में नहीं, वरन् व्यापक अर्थ में लिया है। अतः, उन्होंने संचारियों में केवल मनोविकारों को ही ग्रहण नहीं किया, अपितु उन सारी शारीरिक तथा मानसिक स्थितियों को भी सम्मिलित कर लिया, जिनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध आठ रसों के साथ है। इसमें भी भरत ने अभिनय-पक्ष पर अधिक बल दिया है। अतः, भरत द्वारा वणित संचारियों में सभी चित्तवृत्ति-रूप या शुद्ध भाव-रूप नहीं हैं।. भरत तथा धनंजय द्वारा व्णित शारीरिक अवस्थावाले संचारियों-व्याधि, उन्माद, अपस्मार, विबोध, निद्रा आदि के शारीरिक रूपों को ही अधिक प्रमुखता दी गई है। (ख) सबल मनोवैज्ञानिक तथा तार्किक आधार पर संचारियों का विवेचन नहीं किया गया है। फलस्वरूप, उसमें पूर्ण व्यवस्था नहीं दिखाई देती। आधे से भी कम संचारियों को भाव कह सकते हैं और उनमें अनेक ऐसे भी हैं, जिन्हें कुछ स्थायी भावों में सम्मिलित कर सकते हैं। अनेक ऐसे हैं, जिन्हें ज्ञानात्मक अनुभव या शारीरिक संवेदन-मात्र कह सकते हैं और कुछ को तो मानसिक अनुभव की भी श्रेणी में नहीं रख सकते। (ग) तीसरा मत पण्डितराज जगन्नाथ के सिद्धान्त पर आधृत है। यह निर्विवाद है कि सभी संचारी भाव वैसे शुद्ध भाव नहीं हैं; जैसे स्थायी भाव हैं, फिर भी उनमें किसी को भी चित्तवृत्ति मानने में सन्देह करना उचित नहीं है। उदाहरणार्थ, मरण संचारी भाव का अर्थ वास्तविक मृत्यु नहीं, अपितु उसके पहलेवाली मूच्छा ही है। जिन संचारियों में शारीरिक अथवा बौद्धिक चेतना की प्रधानता है, वे भी चित्तवृत्ति-रूप ही हैं। अतएव, यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं कि कई संचारी केवल बौद्धिक प्रक्रियाएँ या शारीरिक संवेदन-मात्र हैं; क्योंकि इनका भी रूप अनुभूतिमूलक होता है। उपर्युक्त तीन मतों में से प्रत्येक में कुछ-न-कुछ सत्य का अंश अवश्य वर्त्तमान है। भरत ने अपने रस-विवेचन में भाव शब्द का प्रयोग चित्तवृत्ति की अपेक्षा अधिक व्यापक एवं विस्तृत अर्थ में किया है। उनके मतानुसार, सभी संचारी विशुद्ध चित्तवृति नहीं हैं। भरत का मत है कि नाट्य लोक की अनुकृति है, अतः विभिन्न रसों से सम्बन्ध रखनेवाली सभी प्रमुख शारीरिक एवं मानसिक स्थितियों को-जो रसों के प्रसंग में अस्थायी रूप में संचरण

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आी सीर सकड़ : रस [२९७

करती हैं - संचारियों में सम्मिलित कर लेना चहिए। दूसरी ओर, पण्डितराज जगन्नाथ की भी यह स्थापना स्वीकार्य है कि प्रत्येक संचारी का अपना अनुभूतिमूलक रूप होता है- व्याधि, मरण आदि का भी, जिनमें शारीरिक विकार प्रधान हैं और धृति, मति आदि का भी, जिनमें बुद्धि-तत्त्व प्रमुख है। TATD परन्तु, इन तर्कों को स्वीकार कर लेने पर भी कुछ शंकाएँ रह जाती हैं, जिनका निराकरण नहीं होता। वे शंकाएँ निम्नलिखित हैं : q. यह मान भी लिया जाय कि भरत ने संचारियों के अन्तर्गत केवल शुद्ध भावों को ही नहीं गिनकर अनेक शारीरिक तथा बौद्धिक स्थितियों को भी माना, तो प्रश्न उठता है कि ऐसी तो और भी अनेक कियाएँ हैं। शारीरिक क्रियाएँ, व्याधि, अपस्मार, मद, मोह आदि तक ही क्यों सीमित रखें और बौद्धिक क्रियाएँ धृति, मति, वितर्क आदि तक ही क्यों रखें, जिनकी गणना भरत ने कराई है ? अपस्मार के अतिरिक्त अनेक व्याधियाँ हैं और धृति, मति के अतिरिक्त अनेक बौद्धिक स्थितियाँ हैं, फिर सबका उल्लेख नहीं करके कुछ का स्वतन्त्र रूप से क्यों उल्लेख किया गया है? तात्पर्य यह कि इस वर्गीकरण का कोई निश्चित तथा तर्कयुक्त आधार नहीं है। २. यह तर्क भी पूर्णतः युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता कि व्याधि, जड़ता आदि शारीरिक तथा वितर्क, मति आदि मानसिक स्थितियों का अपना-अपना अनुभूतिमूलक रूप होता है और इसलिए इन्हें भी चित्तवृत्तियों में रख लेना चाहिए। इस प्रकार, तो जीवन के सभी व्यापार चित्तवृत्ति मान लिये जा सकते हैं; क्योंकि जीवन के सभी व्यापारों का अनुभव अन्ततः मन से ही किया जाता है। ऐसी दशा में घटना और भाव, विषय और अनुभूति का अन्तर ही समाप्त हो जायगा। ३. फिर संख्या का भी प्रश्न है। किसी भी दृष्टि से विचार किया जाय, संचारियों की संख्या तैंतीस मात्र निर्धारित करना असम्भव है। यदि शुद्ध चित्तवृत्ति या मनोविकार को ही संचारी मानें, तो भी उनकी गणना कठिन है। आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें या दर्शन, काव्याशास्त्र, आचारशास्त्र में आये भावों का संकलन करें, उनकी संख्या कई गुनी हो जायगी और यदि बौद्धिक अनुभूतियों को भी सम्मिलित कर लें, तो फिर कहने की बात ही नहीं। संस्कृत के आचार्यों के सामने यह प्रश्न विकट रूप में आया है। भानुदत्त ने दस कामदशाओं को भी व्यभिचारी भावों में गिनाने का प्रयास किया है, और भोज आदि आचार्यों ने सात्विकों को भी इन्हीं में समेट लेने का प्रत्यन किया है। डॉ० भगवानदास ने ६४ मनोविकार गिनाये हैं, जिनमें कई मनोविकार संस्कृत-साहित्य- शास्त्र के तैंतीस या बयालीस संचारियों की सीमा के बाहर पड़ जाते हैं। वस्तुतः, मनोविकारों की गिनती करना असम्भव कार्य है; क्योंकि मनोविकार तो किसी वस्तु के प्रति मन की प्रतिक्रिया-मात्र है, जो प्रत्येक वस्तु के साथ परिवर्त्तित होती रहती है। मानव-मन में अनगिनत तरंगें उठती रहती हैं, जो एक-दूसरी से मिली रहती हैं और फलस्वरूप असंख्य मनोविकारों को जन्म देती रहती हैं।

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२९८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास इस विवेचन से यह निष्कर्ष अपरिहार्य है कि संचारी भावों की स्थिति उतनी पुष्ट नहीं है। पण्डितराज जगन्नाथ जैसे परम्परा-पालक आचार्य ने भी इसका अनुभव किया है और कहा है-अथ कथमस्य सडख्यानियमः ?' अर्थात् संचारियों की संख्या का नियम कैसे बनाया जा सकता है ? किन्तु, अन्त में उन्होंने मुनि-वचन के पालन का तर्क देकर परम्परा-पालन करना उचित समझा-'मुनिवचनानुपालनस्य सम्भव उच्छङ्कलताया अनौचित्यात्।'२ भरतादि प्राचीन आचार्यों की परम्परा के प्रति आदर-भाव दिखाते हुए भी आज का आलोचक इतना तो कह ही सकता है कि संचारियों का विवेचन, जैसा किया गया है, शत-प्रतिशत माना नहीं जा सकता है। नवीन संचारी भाव : आचार्य सीताराम चतुर्वेदी का मत है कि भरत द्वारा गिनाये गये सचारियों में श्रम, जड़ता, उग्रता, स्मृति, मरण, मद, स्वप्न, निद्रा, विबोध, अपस्मार, मोह, मति, आवेश, तर्क, अवहित्था, व्याधि, उन्माद और चपलता-भावानुगत शारीरिक अथवा बौद्धिक अवस्थाएँ या क्रियाएँ हैं। अतः, इन्हें संचारी भाव मानना उचित प्रतीत नहीं होता। इसलिए शेष पन्द्रह ही वास्तविक संचारी भाव हैं; यथा-निर्वेद, ग्लानि, शंका, धृति, हर्ष, दैन्य, चिन्ता, तास, असूया, अमर्ष, गर्व, ब्रीडा, आलस्य, विषाद और औत्सुक्य। चतुर्वेदीजी ने अपनी ओर से १७ संचारी भावों या पोषक भावों का सुझाव दिया है, जो निम्नलिखित हैं : लोक, ईर्ष्या, लालसा, कामना, आसक्ति, कुंतूहल, श्रद्धा, विश्वास, विनोद, प्रतिकार, प्रवंचना, आशा, निराशा, मान, उपेक्षा, स्पर्द्धा और विषय। इस प्रकार, उनके मत से १५ प्राचीन और १७ नवीन संचारी भाव मिलकर कुल ३२ संचारी भाव हो जाते हैं। रस का स्वरूप रस की परिभाषा के कम में बताया जा चुका है कि रस का स्वरूप दो प्रकार का है-१. विषयगत अर्थात् भाव की कलापूर्ण अभिव्यक्ति; दूसरे शब्दों में, भावमूलक काव्य-सौन्दर्य और २. विषयगत अर्थात् काव्य-सौन्दर्य का आस्वाद। इनमें से पहला रूप लुप्तप्राय हो गया है और केवल अनुभूतिमूलक रूप ही अवशिष्ट है। भरत ने रस का जो कुछ रूप रखा हो, परन्तु तथ्य यह है कि भारतीय साहित्य तथा साहित्यशास्त्र में अभिनवगुप्त ने जिस रूप का प्रतिपादन किया था, वही रूप सबने स्वीकार किया। अभिनवगुप्त द्वारा प्रतिपादित वह रूप काव्य का आस्वादपरक रूप है। भरत ने जिसे रस कहा, वह काव्य कहा जाने लगा, अर्थात् यह माना जाने लगा कि भाव की कलात्मक अभिव्यक्ति रस नहीं, वस्तुतः काव्य है और वास्तव में काव्य का आस्वाद ही रस है। भारतीय काव्यशास्त्र में रस का यही अर्थ सर्वमान्य हुआ-रस का परिनिष्ठित अर्थ यही हुआ। अभिनवगुप्त ने यह स्थापना की है कि रस स्थायी भाव से विलक्षण होता है। दोनों में अन्तर यह है कि स्थायी भाव व्यक्त या अव्यक्त रूप में सदा वर्त्तमान रहता है, १. रसगंगाघर, प्रथम आनन, पृ० ११८ (मथुरानाथ शास्त्री की टीका) २. वही

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रस [२९९

किन्तु रस तभीतक विद्यमान रहता है, जबतक उसकी प्रतीति होती रहती है। न तो प्रतीति के पूर्व उसकी स्थिति रहती है और न रसानुभूति समाप्त होने पर ही। इसी अर्थ में रस स्थायी भाव से विलक्षण होता है।' अगले अनुच्छेदों में अभिनवगुप्त ने भट्टलोल्लट तथा श्रीशंकुक के मतों के खण्डन का उपसंहार किया है।

अभिनवगुप्त के मतानुसार अलौकिक चमत्कार-स्वरूप रसास्वाद स्मृति, अनुमान, लौकिक प्रत्यक्षादि से भिन्न ही है : 'तेनालौकिकचमत्कारात्मा रसास्वादः स्मृति-अनुमान- लौकिक-स्वसंवेदनविलक्षण एव।'२ हेतु दो प्रकार के माने गये हैं-एक कारक हेतु और दूसरा ज्ञापक हेतु। कारक हेतु की स्थिति ही कार्योत्पत्ति में उपयोगी होती है, उसका ज्ञान आवश्यक नहीं होता। जैसे अंकुर का कारक हेतु बीज है, तो यदि किसी को उसका ज्ञान हो या न हो, बीज से अंकुर उत्पन्न हो ही जाता है। इसी प्रकार यदि विभावादि को रस का कारक हेतु मानें, तो उनके ज्ञान के विना भी रस की उत्पत्ति हो सकती थी, परन्तु विभावादि के ज्ञान के विना रस की उत्पत्ति नहीं होती है। अतएव, विभावादि को रस का कारक हेतु कहना उचित नहीं है। इसी बात को अभिनवगुप्त ने स्पष्ट किया है। 'इसीलिए विभावादि रस की उत्पत्ति के कारण (अर्थात् कारक हेतु) नहीं है। क्योंकि (यदि विभावादि को रस का कारक हेतु माना जाय तो) उसके ज्ञान के समाप्त हो जाने पर भी रस की उत्पत्ति सम्भव हो सकती है।'3

का अभी दिखलाया गया कि विभावादि रस के कारक हेतु नहीं हो सकते। तब यह पक्ष रह जाता है कि वे रस के ज्ञापक हेतु हो सकते हैं। परन्तु, अभिनवगुप्त को यह पक्ष भी अभीष्ट नहीं है। घटादि पदार्थ पहले से विद्यमान होने पर भी अन्धकार के कारण दिखाई नहीं देते, उनके लिए दीपक ज्ञापक हेतु होता है। परन्तु, रस तो केवल चर्वणा है, आस्वादन से पूर्व या पश्चात् उसकी सत्ता ही नहीं मानी जा सकती। अतः, विभावादि को रस का ज्ञापक हेतु भी नहीं मान सकते। इस बात को अभिनवगुप्त ने आगे स्पष्ट किया है। 'और न (विभावादि रस के) ज्ञापक हेतु हैं कि जिससे वे प्रमाणों में गिने जायँ; क्योंकि (पूर्वसिद्ध घटादि के समान) प्रमेयभूत किसी पूर्व से विद्यमान आदि की सत्ता नहीं है।'४

१. हिन्दी-अभिनव भारती (आचार्य विश्वेश्वर), पृ० ४८३ २. वही, पृ० ४८५ ३. वही, पृ० ४८६ ४. वही, पृ० ४८७

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३०० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास फिर प्रश्न उठता है कि विभावादि क्या है? इसका उत्तर अभिनवगुप्त ने दिया है कि चर्वणा में उपयोगी यह विभावादि व्यवहार अलौकिक है; अर्थात् लोकभाषा में उनकी ठीक स्थिति नहीं बतलाई जा सकती।9 अभिनवगुप्त द्वारा प्रस्तुत उपर्युक्त विवेचन का सारांश डॉ० नगेन्द्र ने निम्नलिखित शब्दों में उपस्थित किया है : १. लोक में रत्यादि भावों के जो कारण, द्योतक तथा पोषक होते हैं, वे काव्य, नाटकादि में विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के नाम से अभिहित किये जाते हैं। काव्य-निबद्ध हो जाने पर कारण-कार्यादि सम्बन्धों से मुक्त होकर इनका लौकिक रूप नष्ट हो जाता है और ये एक प्रकार का अलौकिक रूप धारण कर लेते हैं। २. सहृदय द्वारा इन अलौकिक विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के समवेत रूप का प्रत्यक्ष अथवा मनसा साक्षात्कार या चर्वण ही रस है। ३. यह रस चर्वण या आस्वादन से अभिन्न होता है-अर्थात् रस आस्वाद-रूप होता है; आस्वाद्य रूप या आस्वाद का विषय नहीं। इस प्रकार, स्थायी भाव रस नहीं है। ४. अलौकिक विषय का आस्वाद होने के कारण रस स्वयं भी अलौकिक अर्थात् स्मृति, अनुमान, प्रत्यक्ष, अनुभव आदि से भिन्न होता है। यह न कार्य है, न प्राप्य है, न सविकल्पक ज्ञान है और न निर्विकल्पक। ५. और, जैसाकि रस की परिभाषा के प्रसंग में स्पष्ट किया जा चुका है, चर्वणा की इस स्थिति में प्रमाता का चित्त देश, काल, स्व, पर, तटस्थ आदि की सीमाओं से मुक्त एकतान, आत्मविश्रान्ति-रूप हो जाता है; अर्थात् रस अनिवार्यतः आत्म-विश्रान्तिमयी आनन्द-चेतना है।२ कतिपय परवर्त्ती आचार्यों ने रस की इन्हीं विशेषताओं का वर्णन दूसरे ढंग से किया है। कविराज विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में रस-स्वरूप का विश्लेषण निम्नलिखित शब्दों में किया है : वेद्यान्तरस्पर्शशून्यो ब्रह्मास्वादसहोदर: ॥ लोकोत्तरचमत्कारप्राणः कश्चित्प्रमातृभिः । स्वाकारवदभिन्नत्वेनायमास्वाद्यते रस:।।3 अन्तःकरण में रजोगुण एवं तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण का सुन्दर स्वच्छ प्रकाश होने से रस का साक्षात्कार होता है। अखण्ड, अद्वितीय, स्वयंप्रकाश-स्वरूप आनन्दमय और १. हिन्दी-अभिनव भारती (आचार्य विश्वेश्वर), पृ० ४८७ २. रससिद्धान्त, पृ० ६७ ३. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० २-३

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रैंस

चिन्मय रस का स्वरूप है। रस के साक्षात्कार के समय अन्य वेद्य विषय का स्पर्श तक नहीं होता। यह ब्रह्मास्वाद-सहोदर है। विशिष्ट संस्कारवान् सहृदय जन लोकोत्तर चमत्कार प्राण रस का निज स्वरूप से अभिन्नतः आस्वादन करते हैं। आचार्य विश्वनाथ द्वारा दी गई इस परिभाषा का विश्लेषण करने पर रस-विषयक निम्नलिखित तथ्य दृष्टिगोचर होते हैं : १. रस आस्वादन का विषय है, किन्तु यह आस्वाद से अभिन्न है, अर्थात् रस आस्वाद-रूप है। २. रस का आविर्भाव तब होता है जब रजोगुण और तमोगुण दब जाते हैं और सतोगुण का उद्रक होता है। ३. रस अखण्ड है। ४. रस के साक्षात्कार के समय कोई अन्य ज्ञान नहीं रहता। ५ रस स्वप्रकाशानन्द है। ६. यह चिन्मय है। ७. यह लोकोत्तर चमत्कारमय है और ८. रस ब्रह्मानन्द-सहोदर है; अर्थात् ब्रह्मास्वाद के अत्यन्त निकट है। रस ब्रह्मानन्द का सहोदर है, फिर भी शुद्ध आत्मानन्द अथवा ब्रह्मानन्द नहीं है। इसका कारण यह है कि १. ब्रह्मानन्द स्थायी होता है, परन्तु रस अस्थायी होता है; २. रस में लौकिक विषय पूर्णरूपेण तिरोहित नहीं होते। वस्तुतः, काव्य का आस्वाद ही रस है। यह काव्यास्वाद आनन्दमय है। दूसरे शब्दों में, रस एक तरह की आनन्द-चेतना है। आनन्द-चेतना का अर्थ आत्मसाक्षात्कार है, जिसे अभिनव ने आत्मपरामर्श तथा भट्टनायक ने संविद् विश्रान्ति कहा है। फिर भी, यह आनन्द शुद्ध आत्मानन्द नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आत्मानन्द के समान यह न तो स्थायी होता है और न इसमें लौकिक विषय सर्वथा तिरोहित ही हो पाते। इस प्रकार, संस्कृत-काव्यशास्त्र के प्रधान आचार्यों के अनुसार रस की परिभाषा निम्नलिखित शब्दों में दी जा सकती है-शब्दार्थ के माध्यम से, विशुद्ध भाव-भूमिका में आत्मचंतन्य के (आनन्दमय) आस्वाद का नाम रस है।' परन्तु, आधुनिक युग में ये स्थापनाएँ विवादपूर्ण हैं। रस का जो स्वरूप ऊपर कहा जा चुका है, उसके विषय में तीन प्रश्न सामने आते हैं : १. भावानुभूति तथा रसानुभूति में क्या पारस्परिक सम्बन्ध है ? २. क्या रसानुभूति में अनिवार्य रूप से आनन्दमयी चेतना की स्थिति होती है ? ३. यदि आनन्दमयी चेतना होती है, तो इस आनन्द का रूप क्या है ? आधुनिक आलोचनाशास्त्र की दृष्टि से इनका विवेचन करने पर ही आधुनिक काव्य-जिज्ञासु को सन्तोष प्राप्त हो सकता है। अब इनका संक्षिप्त विवेचन किया जा रहा है। भावानुभूति तथा रसानुभूति का पारस्परिक सम्बन्ध : संस्कृत-काव्यशास्त्र के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि रस निश्चित रूप से भाव पर आश्रित है। इस विषय में काव्यशास्त्र में सभी वादों का मतैक्य है। अलंकारवादी रस को काव्य की आत्मा नहीं

१. रससिद्धान्त (डॉ० नगेन्द्र), पृ० ९०

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३०२ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासे मानते, प्रत्युत शब्दार्थ के चमत्कार का ही अंग मानते हैं। परन्तु, वे भी मानते हैं कि रस की निष्पत्ति विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के संयोग से होती है। अर्थात् उनके भी मत से रस भाव पर ही आश्रित रहता है। अतः सिद्ध हो जाता है कि रस और भाव का अविच्छिन्न सम्बन्ध है। नाट्यशास्त्रकार भरत मुनि का भी मत है कि रस भावहीन नहीं हो सकता और भाव भी रसवर्जित नहीं होता। न भावहीनोऽस्ति रसो न भावो रसवर्जितः।' किन्तु, रसानुभूति और भावानुभूति दोनों एक नहीं हो सकती। रस स्थायी भाव पर निर्भर करते हैं और आस्वाद की दृष्टि से स्थायी भाव दो प्रकार के होते हैं। लोक- जीवन में रति, उत्साह, विस्मय, हास तथा शम सुखद आस्वादवाले और शोक, क्रोध, जुगुप्सा तथा भय दुःखद आस्वादवाले स्थायी भाव हैं। यह स्वीकार किया गया है कि सभी रस आनन्दमय होते हैं, परन्तु स्थायी भावों में कुछ सुखात्मक तथा कुछ दुःखात्मक होते हैं। इससे सिद्ध हो जाता है कि रसानुभूति तथा भावानुभूति दोनों भिन्न हैं। करुण, बीभत्स, रौद्र तथा भयानक रसों की चेतना अन्ततः सुखद होती है, परन्तु इनके स्थायी भाव- शोक, कोध, जुगुप्सा तथा भय-की चेतना दुःखद होती है। इस प्रसंग में शृंगार, वीर, हास्य, अद्भुत तथा शान्त रसों के विषय में सन्देह नहीं हो सकता है; क्योंकि इनकी तथा स्थायी भावों की चेतना सुखद होती है। प्रश्न उठ़ता है कि तब क्या रस भाव का परोक्ष अनुभव है? शास्त्रकारों का स्पष्ट मत है कि नहीं, ऐसी बात नहीं है। रस स्वगत भावानुभूति भी नहीं है-न प्रत्यक्ष ही और न परोक्ष ही। तो क्या इसे परगत अनुभूति मान सकते हैं ? इसका भी उत्तर निषेधांत्मक ही है। वस्तुतः, स्वगत अनुभूति के समान ही परगत अनुभूति भी व्यक्ति की सीमाओं में आबद्ध है और वह राग-द्वष से परे नहीं हो सकता। अतः रस को परगत अनुभूति भी नहीं कह सकते। निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि भाव पर आश्रित होते हुए भी रस भावानुभूति से भिन्न है। भावानुभूति प्रत्यक्ष हो या परोक्ष, स्वगत हो या परगत, सुखद हो या दुःखद, रसानुभूति नहीं होकर उससे भिन्न ही है। इनमें से किसी भी रूप में भावानुभूति व्यक्तिगत राग-द्वष से मुक्त नहीं हो सकती; फलस्वरूप चित्त की मुक्तावस्था नहीं होती। चित्त की मुक्तावस्था के अभाव में आनन्द की अनुभूति में बाधा पड़ती है। यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि रस भाव पर आश्रित होते हुए भी भावानुभूति से भिन्न कैसे हो सकता है ? परन्तु, शास्त्र ने इस शंका का समाधान कर दिया है। वस्तुतः रस व्यक्तिगत भाव का आस्वाद नहीं होकर साधारणीकृत भाव का आस्वाद है। साधारणीकृत भाव राग-द्वष से मुक्त हो जाता है; अतः आनन्दमय ही होता है। क्या रस अनिवार्यतः आनन्दमयी चेतना है? : यह काव्यशास्त्र का बहुत ही महत्त्वपूर्ण, किन्तु साथ ही विवादास्पद प्रश्न है। इस विषय में कोई विवाद नहीं कि रस १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ३७

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रेस [३० ३

आनन्दमय ही होता है, किन्तु इस विषय में मतैक्य नहीं कि रस अनिवार्य रूप से आनन्दमय ही होता है। हम स्पष्ट ही देखते हैं कि शृंगार, हास्य, वीर, अद्भुत एवं शान्त रसों का आस्वाद आनन्दमय है, परन्तु करुण, रौद्र, बीभत्स तथा भयानक का भी आस्वाद आनन्दमय होता है कि नहीं, इस विषय में विवाद है। अधिकतर विद्वानों ने इन्हें भी आनन्दमय बताया है, परन्तु विरोधियों की भी संख्या पर्याप्त है। कुछ विद्वानों के मतों का विवेचन किया जाय। भरत : ऐतिहासिक क्रम से भरत मुनि के मत की सबसे पहले समीक्षा की जाय। इस सम्बन्ध में भरत का मत है : यथा हि नानाव्यञ्जनसंस्कृतमन्नं भुञ्जाना रसानास्वादयन्ति सुमनसः पुरुषा: हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति तथा नानाभावाभिनयव्यञ्जितान् वागङ्गसत्वोपेतान् स्थायिभावाना- स्वादयन्ति सुमनसः प्रेक्षका: हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति तस्मान्नाटयरसा इत्यभिव्याख्याताः। -अर्थात् जिस प्रकार नाना व्यंजनों से संस्कृत अन्न खाकर आस्वादन करते हुए सुमना पुरुष हर्षादि प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार अनेक प्रकार के भावों और अभिनयों द्वारा व्यक्त किये गये वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनयों से युक्त, स्थायी भाव का सहृदय प्रेक्षक आस्वाद करते हैं और हर्षादि प्राप्त करते हैं। अतः, नाट्य से अनुभूत होनेवाले इसे नाट्य रस कहते हैं। यहाँ भरत द्वारा प्रयुक्त 'हर्षादि' में 'आदि' शब्द के आधार पर कुछ विद्वान् यह सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं कि रस का आस्वाद केवल आनन्दमय ही नहीं होता, प्रत्युत स्थायी भाव के अनुरूप वह विपरीत भी हो सकता है। किन्तु, भरत का अभिप्राय यह नहीं जान पड़ता। दिये गये दृष्टान्त का विश्लेषण करने से यह स्पष्ट हो जाता है। जिस प्रकार कोई स्वस्थ पुरुष व्यंजनों से संस्कृत अन्न का आस्वादन करता है, उसी प्रकार सहृदय प्रेक्षक अभिनययुक्त स्थायी भाव का आस्वादन करता है, और जिस प्रकार अन्न के भोक्ता व्यक्ति को हर्षादि का अनुभव प्राप्त होता है, उसी प्रकार रस के भोक्ता प्रेक्षक को भी हर्षादि की प्राप्ति होती है। अर्थात् आस्वाद का अनुभूतिमूलक रूप दोनों को समान रूप से प्राप्त होता है। इस प्रकार, 'हर्षादि' का अर्थ स्पष्ट हो जाता है। 'हर्षादि' का अर्थ हर्ष या हर्ष की कोटि के अन्य विकार है, हर्ष के विपरीत दुःख, क्षोभ आदि अप्रीतिकर विकार नहीं। इस प्रकार, रसास्वाद का अर्थ अनुभूतिमूलक आस्वाद आनन्दमय ही हो सकता है, दुःख-क्षोभादि रूप न होता है और न हो सकता है। अतः, भरत के इस उद्धरण से सुख-दुःखात्मकता की न सिद्धि होती है और न आनन्दरूपता का निषेध ही होता है। उनके सम्पूर्ण रस-विवेचन में रस की आह्वादकता ही लक्षित होती है। अभिनवगुप्त : भरत के नाट्यशास्त्र के टीकाकार अभिनवगुप्त ने इसी मत का समर्थन किया है।

१. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ३१ के बाद गद्य।

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३०४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास "दूसरे (व्याख्याता) तो ( हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति ) इसमें आये हुए 'आदि' शब्द से शोकादि का यहाँ संग्रह होता है (यह कहते हैं)। परन्तु, वह (शोकादि का संग्रह) उचित नहीं है। क्योंकि, नाटक सामाजिकों को केवल आनन्द देनेवाला ही होना चाहिए, शोकादि उसके फल नहीं होने चाहिए। उस (नाटक के दुःखजनकत्व) में कोई प्रमाण (निमित्त) न होने से और (यदि नाटक से दुःख होता है-यह मान लिया जाय तो सामाजिक को) इस प्रकार का अनुभव प्राप्त होने लगेगा (जो कि अभीष्ट नहीं है, सभी आचार्य तथा सहृदय पुरुष करुणादि रसों में भी आनन्द का ही अनुभव करते हैं, दुःख का नहीं), ऐसा मानकर 'हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति' ऐसा पाठ मानते हैं।"१ अभिनवगुप्त स्थायी भावों में ही सुख-दुःखरूपता मानते हैं, रसों में नहीं मानते। रस की आनन्दरूपता के विषय में अपना मूल सिद्धान्त उन्होंने निम्नलिखित शब्दों में प्रकट किया है : 'अस्मन्मते तु संवेदनमेवानन्दघन आस्वाद्यते। तत्र का दुःखशङ्का ?' 'हमारे मत में तो आनन्दमय ज्ञानस्वरूप (आत्मा) का ही आस्वादन (रसरूप में) होता है। उसमें दुःख की शंका ही कैसे हो सकती है ?'२ भट्टनायक : भरत के नाट्यशास्त्र के टीकाकारों में भट्टनायक ने अभिनवगुप्त से भी पूर्व रस के इसी आनन्दमय स्वरूप का प्रतिपादन किया है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के उत्पत्ति और प्रतीति आदि सिद्धान्तों का खण्डन करने के लिए जो तर्क दिये हैं, उनमें से एक प्रधान तक यह भी है कि यदि रस की उत्पत्ति मान ली जाय, तो परिणाम यह होगा कि शोक से शोक उत्पन्न होगा, अर्थात् शोक का अभिनय देखकर प्रेक्षक को अभिनय के समय दुःख ही होगा। दूसरे शब्दों में, करुण रस का आस्वाद दुःखमय ही मानना होगा। अभिनवगुप्त ने अपनी भारती में भट्टनायक का मत उद्धत किया है: 'रसो न प्रतीयते नोत्पद्यते नाभिव्यज्यते। स्वगतत्वेन हि प्रतीतौ करुणे दुःखित्वं स्यात्। न च सा प्रतीतिर्युक्ता। सीतादेरविभावत्वात्। स्वकान्तास्मृत्यसंवेदनात्। 'रस की न प्रतीति होती है, न उत्पत्ति और न अभिव्यक्ति। स्वगत अर्थात् सामाजिक में रस की प्रतीति मानने पर करुण में दुःख की प्रतीति होनी चाहिए। किन्तु, यह प्रतीति ठीक नहीं है। (दुःख के मूल कारण वास्तविक) १. सीता आदि के विभाव (-रूप में उपस्थित) न होने से। २. अपनी स्त्री आदि की स्मृति (अभिनय-काल में) न होने से।'3 इस प्रकार, भट्टनायक की स्थापना है कि करुण रस में भी दुःखरूपता नहीं है। उन्होंने रस की सुखरूपता या आनन्दमयता निर्विवाद रूप से प्रतिपादित की है। क १. हिन्दी-अभिनव भारती (आचार्य विश्वेश्वर), पृ० ५०० २. वही, पृ० ५०७ पकी पशाछ ३. वही, पृ० ४६२

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16क1 सम्मट : प्रसिद्ध विद्वान् मम्मट ने रस को सकल-प्रयोजन-मौलिभूत कहा है और रसास्वाद को आनन्दरूप माना है: 'सकलप्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसास्वादन- समुद्भूतं विगलितवेद्यान्तरमानन्दम्।" धनिक : दशरूपक के वृत्तिकार धनिक ने भी रसों की सुखरूपता का समर्थन किया है। उनका कथन है कि लौकिक करुणादि से काव्यगत करुणादि भिन्न होते हैं। काव्यगत करुणादि दुःखपरक होने पर भी आनन्दात्मक हैं। इसका उदाहरण धनिक ने सुरत-प्रसंग का दिया है। साथ ही लौकिक करुण से काव्य का करुण रस भिन्न होता है, इसलिए रसिक लोग करुण काव्य के प्रति अत्यधिक प्रवृत्त होते हैं। अतः, करुण रस के काव्य भी आनन्दोत्पत्ति अवश्य करते हैं, यह सिद्ध है।२ विश्वनाथ : रसवादी कविराज विश्वनाथ का मत और भी स्पष्ट है। उन्होंने करुण रस में सुखात्मकता के प्रतिपादन के विषय में लिखा : करुणादावपि रसे जायते यत्परं सुखम्। सचेतसामनुभवः प्रमाणं तत्र केवलम्। यथा रामायणादीनां भविता दुःखहेतुता।3 करुण आदि रसों में भी जो परम आनन्द होता है, उसमें केवल सहृदयों का अनुभव ही प्रमाण है। यदि करुणादि रसों में दुःख होता, तो करुणादि रस-प्रधान काव्य, नाटकादि के श्रवण, दर्शन आदि में कोई भी प्रवृत्त नहीं हुआ करे। यदि करुण रस को दुःख का कारण माना जाय, तो करुण रस-प्रधान रामायणादि ग्रन्थ को भी दुःख का हेतु ही मानना पड़ेगा। जगन्नाथ : पण्डितराज जगन्नाथ ने भी रस को सर्वथा सुखात्मक ही माना है। उनका मत है : १. 'रसो वै सः, रसं ह्यवायं लब्धवानन्दीभवति' इति श्रुतिः, सकलसहृदय- प्रत्यक्षं चेति प्रमाणद्वयम्।४ रस सुखात्मक या आनन्दरूप होता है, इस तथ्य के दो प्रमाण हैं : पहला प्रमाण वेद के ये प्रमाण-वाक्य हैं: 'आत्मा रसरूप है', 'रस को प्राप्त कर ही यह आनन्दरूप होता है।' दूसरा प्रमाण है सम्पूर्ण सहृदय-समाज का प्रत्यक्ष अनुभव। २. जिस प्रकार शृंगार-प्रधान काव्यों से सुख का अनुभव होता है, उसी प्रकार करुण रस-प्रधान काव्यों से भी सुख का अनुभव होता है। यह तथ्य यदि सहृदय व्यक्तियों के हृदयों से प्रमाणित हो चुका है, तब 'कार्य के अनुरोध से कारण की कल्पना कर लेनी

१. काव्यप्रकाश, प्रथम उल्लास, श्लोक २ (वृत्ति) २. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ४४ की वृत्ति ०क ३. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० ४५ ४. रसगंगाधर (मथुरानाथ शास्त्री की टीका), प्रथम आनन, पृ० २७

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३०६j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासे

चाहिए'-इस नियम के अनुसार काव्य के लोकोत्तर व्यापार के भीतर ही आह्लादजनकता के साथ दुःख-प्रतिबन्धकता की भी कल्पना कर लेनी चाहिए।' इसके कुछ ही आगे पण्डितराज ने फिर लिखा है कि यदि करुण आदि रस-प्रधान काव्यों से दुःख-प्राप्ति की कल्पना करें, तो ऐसे काव्यों की रचना में कवि की और श्रवण में श्रोता की प्रवृत्ति क्यों हो ? क्योंकि, जब ऐसे काव्य अनिष्ट के साधन हैं, तब तो उनसे विमुख होना ही उचित है।२ मम्मट ने इसको 'ब्रह्मानन्दास्वादमिवानुभावयन्'3; हेमचन्द्र ने 'परब्रह्मास्वादसोदर'४ और विश्वनाथ ने 'ब्रह्मास्वादसहोदर' कहा है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत के प्रायः सभी प्रसिद्ध तथा प्रतिनिधि काव्याचार्यों ने रस को अनिवार्य रूप से आनन्दमय माना है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र : विरोधी पक्ष में जैन आचार्यद्वय रामचन्द्र-गुणचन्द्र सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। इन्होंने बहुत स्पष्ट रूप से रस की आनन्दरूपता का विरोध किया। इस विषय में इन्होंने अपने गुरु हेमचन्द्राचार्य से भी असहमति प्रकट की-'सुखदुःखात्मको रसः'। अर्थात् रस सुखात्मक तथा दुःखात्मक दोनों प्रकार के होते हैं।॥ इसी कारिका की व्याख्या करते हुए उन्होंने आगे लिखा है कि उनमें से इष्ट विभावादि के द्वारा स्वरूप-सम्पत्ति को प्रकाशित करनेवाले शृंगार, हास्य, वीर, अद्भुत और शान्त सुख-प्रधान रस हैं, और अनिष्ट विभावादि के द्वारा स्वरूप प्राप्त करनेवाले करुण, रौद्र, बीभत्स तथा भयानक-ये चार दुःखात्मक रस हैं।9 ये दोनों आचार्य यह स्वीकार नहीं करते कि सभी रस सुखात्मक ही होते हैं।" रामचन्द्र-गुणचन्द्र अपने मत के समर्थन में निम्नलिखित तर्क उपस्थित करते हैं : १. भयानक आदि रस सहृदयों को कष्ट-दशा में पहुँचा देते हैं। इनसे सामाजिकों को उद्ग ही मिलता है। सुखास्वाद से तो कोई व्यक्ति उद्विग्न नहीं होता। सीता के हरण, रोहिताश्व की मृत्यु आदि घटनाओं के अभिनय को देखकर किस सहृदय को सुखास्वाद का अनुभव होता है ? १. रसगंगाधर, प्रथम आनन, पृ० ३१ २. वही ३. काव्यप्रकाश, उल्लास ४ ४. काव्यानुशासन, अध्याय २ ५. साहित्यदर्पण, परिच्छेद ३ ६. नाट्यदर्पण, अध्याय २, का० ७ ७. वही, का० ७ की व्याख्या (अध्याय २) 5. हिन्दी-नाट्यदर्पण, पृ० २९१

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२. काव्य-नाटक में लौकिक आचार-व्यवहार का चित्रण यथार्थ रूप में ही होता है। नाटककार सांसारिक सुख का वर्णन सुखरूप में करता है और दुःख का वर्णन दुःख- रूप में ही। विरही रामादि अनुकार्यों की करुण दशाएँ निश्चित रूप से दुःखात्मक होती हैं, अतः यदि नाटकगत अनुकरण को सुखात्मक माना जाय, तो वह अनुकरण यथार्थ नहीं हो सकता; क्योंकि वह लौकिक वस्तु-स्थिति से भिन्न होगा। ३. जो लोग सभी रसों को सुखात्मक मानते हैं, वे कह सकते हैं कि जैसे लोक मैं विरही तथा शोकग्रस्त व्यक्तियों के सामने कारुणिक प्रसंगों का वर्णन अथवा अभिनय उन्हें सान्त्वना देता है, वैसे ही काव्य तथा नाटक में वणित करुण, भयानक आदि रस भी सुखात्मक ही हैं, दुःखात्मक नहीं। किन्तु, नाट्यदर्पणकार कहते हैं कि ऐसे अवसर पर दुःखी व्यक्तियों को जो सुखास्वाद मिलता प्रतीत होता है, वह वास्तव में दुःखास्वाद ही है। अतः, विपक्षियों का यह सहानुभूतिमूलक तर्क मान्य नहीं है। वास्तव में, करुण आदि रस दुःखात्मक हैं। ४. करुण, भयानक आदि रस दुःखात्मक ही हैं, फिर भी यदि सहृदय सामाजिक उनसे परम आनन्द प्राप्त करते हैं, तो केवल कवि तथा नट की कुशलता से चमत्कृत होकर ही। रामचन्द्र-गुणचन्द्र के तर्कों की समीक्षा : उपर्युक्त चार तर्कों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि पहला तर्क मन के उद्दग को ध्यान में रखकर उपस्थित किया गया है, और दूसरा तर्क लौकिक व्यवहार तथा काव्य-रचना की पारस्परिक अन्विति को ध्यान में रखकर। तीसरे तर्क का सम्बन्ध लौकिक सान्त्वना तथा सहानुभूति से है और चौथे तर्क का सम्बन्ध काव्यत्व तथा अभिनयजन्य बाह्य चमत्कार से। किन्तु, यदि थोड़ा ध्यान दिया जाय तो पता चलेगा कि इन चारों तर्कों के मूल में एक ही भ्रान्त धारणा काम करती है कि लौकिक व्यवहार और काव्यकृति में कोई अन्तर नहीं है और दोनों एक ही धरातल पर स्थित हैं। इसीलिए, पहले तर्क में सहृदय सामाजिक को भी करुण, भयानक आदि रसों द्वारा दैसा ही उद्विग्न समझ लिया गया है जैसा सामान्य व्यबहार में भयभीत या करुणाग्रस्त व्यक्तियों को समझा जाता है। परन्तु, तथ्य यह है कि लौकिक रति, शोक आदि भावों में तथा काव्यगत इन भावों में अन्तर विद्यमान रहता है। काव्यगत भाव लौकिक भावों के समान सीमित नहीं रहते। दूसरे तर्क में भी उपर्युक्त धारणा के ही आधार पर लौकिक घटनाओं तथा काव्यगत घटनाओं को भी समान मान लिया गया है। किन्तु, यह भ्रान्त धारणा है और इसे माना नहीं जा सकता। दोनों में अनेक प्रकार से अन्तर है। वस्तुतः, अनुकार्य रामादि के ही अनुरूप सहृदय के भी सुख-दुःख का निर्णय नहीं किया जा सकता। तीसरे तर्क की परीक्षा करने पर उसकी भी असत्यता सिद्ध हो जाती है। सामान्य जीवन में पुत्र-शोक में विह्वल माता के शोक में और ऐसी शोकमग्न माता को रंगमंच पर देखकर या काव्य में उसका वर्णन पढ़कर शोक-विह्वल सहृदय या पाठक के शोक में

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास स्पष्ट रूप से अन्तर है। सामान्य जीवन में इस शोक में कई स्थितियाँ हो सकती हैं, जैसे सान्त्वना से शोक घट सकता है या लुप्त हो सकता है या किसी अन्य कारण से शोक बढ़ भी सकता है। किन्तु, शोक स्थायी भाव से व्यग्र सहृदय सामाजिक के लिए सान्त्वना आदि का प्रश्न ही नहीं उठता। चतुर्थ तर्क में आंशिक या एकांगी सत्यता है। कवि के रचना-कौशल तथा नट के अभिनय-कौशल से उत्पन्न चमत्कार से सहृदय अवश्य प्रभावित होता है। कवि तथा नट के कौशल से उत्पन्न चमत्कार के महत्त्व को स्वीकार करना पड़ेगा। परन्तु, यह चमत्कार पूर्ववर्त्ती प्रभाव को केवल उद्दीप्त करता है, उसे उत्पन्न नहीं कर सकता। उदाहरणार्थ, शृंगार रस में यह कौशल सहृदय के हृदय में स्थित रति-भाव को उद्दीप्त करता है और करुण रस में उसके शोक को उद्दीप्त करता है। र्रभट्ट : लोल्लट : रस की आनन्दरूपता का जितना स्पष्ट तथा जोरदार विरोध इन दो जैनाचार्यों ने किया, उतना अन्य किसी आचार्य ने नहीं किया। रुद्रभट्ट ने अपनी रस-कलिका में एक स्थल पर रस की उभयात्मक प्रकृति-सुख-दुःखरूपता का निरूपण किया है। इस सम्बन्ध में कुछ अन्य आचार्यों का भी उल्लेख किया जा सकता है। भट्ट लोल्लट रस को सुख-दुःखात्मक रूप में स्वीकार करते थे; क्योंकि उनकी मान्यता है कि रस स्थायी भाव का उपचित रूप है। परन्तु, इससे रस-विषयक शास्त्रीय चिन्तन पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ा। आधुनिक आचार्य : संस्कृत-काव्यशास्त्र की परम्परा आधुनिक भारतीय भाषाओं में आई और विशेष रूप से हिन्दी में रस के विषय में बहुत-कुछ चिन्तान हुआ। रीति- काल में अनेक विद्वानों ने रस-सिद्धान्त का व्यापक विवेचन किया और एक विशाल वाङमय तैयार हो गया। परन्तु, यह सब-कुछ संस्कृत-काव्यशास्त्र पर ही आधारित है। रस के विषय में रीतिकाल के सभी आचार्यों ने इसे अलौकिक, आनन्दस्वरूप और ब्रह्मानन्द-सहोदर बताया है। आधुनिक आलोचकों में भी अधिकतर ने यही मत अपनाया। आचार्य केशवप्रसाद मिश्र, पं० रामदहिन मिश्र, डॉ० श्यामसुन्दर दास, डॉ० भगवान दास, डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी, डॉ० गुलाब राय, डॉ० नगेन्द्र आदि सभी विद्वान् रस को आनन्दरूप ही मानते हैं। पं० रामचन्द्र शुक्ल ही इस विषय में अपवाद हैं। इन्होंने भारतीय शास्त्र-परम्परा और विशेषतः रसवाद का विशिष्ट समर्थक होते हुए भी रस की आनन्दरूपता का खुले शब्दों में विरोध किया है। "यदि श्रोता के हृदय में भी प्रदर्शित भाव का उदय न हुआ-उस भाव की स्वानुभूति से भिन्न प्रकार का आनन्दरूप अनुभव हुआ, तो 'साधारणीकरण' कैसा? क्रोध, शोक, जुगुप्सा आदि के वर्णन यदि श्रोता के हृदय में आनन्द का संचार करें, तो या तो श्रोता सहृदय नहीं या कवि ने विना इन भावों का स्वयं अनुभव किये उनका रूप प्रदर्शित किया है।"१ १. रस-मीमांसा, पृ० ९९

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छाबी पe FRED - रस-F51F PIy1F [३०९

-16 "मेरी समझ में रसास्वादन का प्रकृत स्वरूप 'आनन्द' शब्द से व्यक्त नहीं होता। 'लोकोत्तर', 'अनिर्वचनीय' आदि विशेषणों से न तो उसके अवाचकत्व का परिहार होता है, न प्रयोग का प्रयश्चित्त। क्या क्रोध, शोक, जुगुप्सा आदि आनन्द का रूप धारण करके ही श्रोता के हृदय में प्रकट होते हैं, अपने प्रकृत रूप का सर्वथा विसर्जन कर देते हैं, उसे कुछ भी लगा नहीं रहने देते ? क्या 'विभावत्व' उनका स्वरूप हरकर उन्हें एक ही स्वरूप-सुख का-दे देता है ? क्या दुःख के भेद सुख के भेद-से प्रतीत होने लगते हैं ? क्या मृत पुत्र के लिए विलाप करती हुई शव्या से राजा हरिश्चन्द्र का कफन माँगना देख-सुनकर आँसू नहीं आ जाते, दाँत निकल पड़ते हैं ?"१ रस के आनन्द-सिद्धान्त पर आचार्य शुक्लजी का यह बहुत कठोर प्रहार है। परन्तु, डॉ० नगेन्द्र ने इसका निराकरण निम्नलिखित शब्दों में किया है : "माना कि 'सत्यहरिश्चन्द्र' का प्रेक्षण सहृदय 'दाँत निकालने के लिए' नहीं करता, पर क्या 'आँसू बहाने के लिए' वह समय और धन का व्यय कर रहा है ? शुक्लजी की दृष्टि एकांगी नहीं थी-यह शंका उनके मन में थी, अतः अपनी प्रतिज्ञा की सिद्धि के लिए उन्होंने रस के स्वरूप की, अपनी मान्यता के अनुकूल, नवीन व्याख्या प्रस्तुत की।"२ आगे डॉ० नगेन्द्र ने शुक्लजी का मत स्पष्ट करने के लिए चिन्तामणि से उद्धरण दिया है : "जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की मुक्तावस्था रस-दशा कहलाती है।"3 "तात्पर्य यह है कि रस-दशा में अपनी पृथक् सत्ता की भावना का परिहार हो जाता है अर्थात् काव्य में प्रस्तुत विषय को हम अपने व्यक्तित्व से सम्बद्ध रूप में नहीं देखते, अपनी योग-क्षेम-वासना की उपाधि से ग्रस्त हृदय द्वारा ग्रहण नहीं करते, बल्कि निर्विशेष शुद्ध और मुक्त हृदय द्वारा ग्रहण करते हैं। इसी को पाश्चात्त्य समीक्षा-पद्धति में अहं का विसर्जन और निस्संगता (Impersonality and detachment) कहते हैं। इसी को चाहे रस का लोकोत्तरत्व या ब्रह्मानन्द-सहोदरत्व कहिए, चाहे विभाव-व्यापार का अलौकिकत्व।"४ आचार्य शुक्ल के मत का निष्कर्ष डॉ० नगेन्द्र ने इन शब्दों में दिया है : १. रस आनन्दरूप नहीं है, २. उसमें अस्मिता का भोग न होकर उसका विसर्जन है, ३. वह प्रकृत भाव से मूलतः भिन्न न होते हुए भी परिणामतः भिन्न है, अर्थात् प्रकृत भाव का सामान्य

१. रस-मीमांसा, पृ० १०१ २ रस-सिद्धान्त, पृ० १०० ३. चिन्तामणि, भाग १, पृ० १४१ ४. चिन्तामणि, भाग १, पृ० २४७

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३१० ] भारतीय नाट्य-सद्धान्त : उद्भव और विकास

अनुभव जहाँ सुख दुःखमय होता है, वहाँ रस का अनुभव-शृंगार तथा करुण दोनों रूपों में- सुख और दुःख दोनों रूपों से 'अधिक उदात्त और अवदात' होता है।' निष्कर्ष : निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि रस की आनन्दरूपता के विरोध में जितने विकल्प उपस्थित किये गये हैं, सभी असिद्ध हो जाते हैं या किसी दूसरे प्रकार से आनन्द का ही समर्थन करते हैं। रस-प्रक्रिया में सहृदय के मन में अनेक स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। स्थायी भाव के स्वरूप के अनुसार सहृदय का मन सुख अथवा दुःख का अनुभव करता है। कला-तत्त्वों की अनुभूति से परितोष, आह्लाद, विस्मय आदि का जन्म होता है और अन्त में उन सबकी परिणति एक परितोषकारी मनोदशा में होती है। करुण रस के आस्वादन में सहृदय की चित्तवृत्ति शोक, त्रास की अनुभूति से थोड़े समय के लिए विक्षुब्ध होने पर भी अन्त में समंजित हो जाती है, जिससे एक सुखद स्थिति उत्पन्न होती है। इस प्रकार सहृदय को जो करुण रस का आस्वाद होता है, वह शोक, त्ास आदि का आस्वाद नहीं होता, प्रत्युत उनकी कलात्मक परिणति का आस्वाद होता है। इस प्रक्रिया में उसे कटु अनुभव होने पर भी अन्तिम परिणति आत्म-परितोष में ही होती है, जिससे सुख ही प्राप्त होता है। इसका स्पष्टीकरण निम्नलिखित शब्दों में दिया जा सकता है : १. कोई भी स्थायी भाव जब अपरिपक्व अवस्था में रहता है, तो लौकिक सुख या दुःख को उत्पन्न करता है, किन्तु वही परिपक्व अवस्था में अलौकिक सुख का ही कारण बनता है। २. करुण, भयानक आदि रसों में सामाजिक शोक, भय आदि से उत्पन्न दुःख का अनुभव करता है, किन्तु यह दुःख लौकिक ही होता है। वैसे ही वह शृंगार, हास्य आदि रसों में रति, हास आदि से उत्पन्न लौकिक सुख का ही अनुभव करता है। परन्तु, इस लौकिक सुख या दुःख की अवस्था के बाद ही रस-दशा आती है। ३. परन्तु, यह नहीं कहा जा सकता कि प्रत्येक सहृदय को इस प्रकार के लौकिक सुख तथा दुःख की अनुभूति अनिवार्य रूप से होती है; कुछ सहृदयों को ऐसी अनुभूति नहीं भी होती, यद्यपि ऐसों की संख्या बहुत कम होती है। किन्तु, यह निश्चित है कि दोनों प्रकार के रसों से सहृदयों को सुख की अनुभूति अनिवार्यतः होती है। ४. इसलिए, करुण आदि रसों को नित्यरूप से दुःखात्मक नहीं माना जा सकता और अधिकांशतः ऐसा मान भी लिया जाय, तो वह दुख लौकिक कोटि में ही आता है। वह दुःख अत्यन्त भावुक सहृदयों के अलौकिक सुख की अनुभूति के लिए उद्दीपक ही माना जा सकता है, अनिवार्य या सहायक साधक कभी भी नहीं माना जा सकता। अन्त में निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि करुण, भयानक आदि रस दुःखात्मक नहीं हैं, वरन् वे भी शृंगार, हास्य आदि के समान सुखात्मक ही हैं। १. रस-सिद्धान्त, पृ० १००

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15/ इस आनन्द का रूप क्या है ? : किन्तु रस के आनन्द का स्वरूप क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट करने पर ही रस के स्वरूप का विवेचन पूर्ण कहा जायगा। विभिन्न भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों ने काव्यानन्द के विषय में जो विवेचन किया है, उससे काव्यानन्द के स्वरूप के विषय में निम्नलिखित सिद्धान्त उपलब्ध होते हैं : 1819 (क) काव्यानन्द प्रत्यक्ष रूप से ऐन्द्रिय आनन्द है। प्राचीन काव्यशास्त्रियों में प्लेटो तथा नवीन विचारकों में मार्क्स एवं फ्रायड ने अपनी-अपनी रीति से इस बात का प्रतिपादन किया है। (ख) काव्यानन्द एक प्रकार से आत्मिक आनन्द है। संस्कृत के प्रमुख तथा प्रतिनिधि आचार्यों-जैसे अभिनवगुप्त, मम्मट, विश्वनाथ, जगन्नाथ आदि का यही मत है। पश्चिम के अध्यात्मवादी विद्वानों एवं विचारकों का भी यही मत है। (ग) काव्यानन्द कल्पना का आनन्द है। अरस्तू के विचारों से प्रेरणा प्राप्त कर १८वीं शती में एडिसन ने इस मत का प्रतिपादन किया। इस बीसवीं शती में क्रोचे ने इसी को सहजानुभूति माना है। (घ) काव्यानन्द सभी प्रकार के लौकिक तथा आध्यात्मिक अनुभावों से अलग एक तरह का विलक्षण आनन्द है। यह आनन्द सब प्रकार से निरपेक्ष होता है। यह सिद्धान्त बहुत प्राचीन है, परन्तु १९वीं शती के अन्त तथा बीसवीं शती के आरम्भ में ब्रडले, क्लाइव आदि अनेक पाश्चात्त्य विद्वानों और कलावादियों ने समुचित रीति से इसे प्रतिष्ठित किया है। रिचर्ड्स ने इसपर काण्ट और हेगेल का अप्रत्यक्ष प्रभाव माना है। काव्यानन्द या रस के स्वरूप का निर्णय करने के लिए इन चारों मन्तव्यों का परीक्षण आवश्यक और लाभदायक है। चौथा सिद्धान्त काव्यानन्द की विलक्षणता का है, जो बहुत सहज ही असिद्ध हो जाता है। तीसरा सिद्धान्त है कि काव्यानन्द कल्पना का आनन्द है। यह सिद्धान्त केवल अंशतः ठीक है। काव्यानन्द में भाव की भूमिका भी निश्चित रहती है, इस मत में इस महत्त्वपूर्ण तथ्य को ध्यान में नहीं रखा गया है। इस प्रकार, यह मत भी समीचीन नहीं जान पड़ता। दूसरा मत काव्यानन्द को आत्मानन्द का ही एक दूसरा रूप मानता है। प्राचीन भारतीय आचार्यों में अधिकतर ने यही मत माना है। वस्तुतः, ऐन्द्रिय आनन्द और आत्मिक आनन्द का भेद प्रकृति का नहीं, प्रत्युत गुण का है और विषयानन्द, काव्यानन्द तथा अत्मानन्द में शुद्धता की मात्रा का ही अन्तर बच जाता है। आत्मानन्द शुद्ध आत्मतत्त्व का भोग है, परन्तु काव्यानन्द में भौतिक जीवन का अंश अवश्य ही विद्यमान रहता है। काव्य का आनन्द प्रत्यक्ष स्थायी भाव का आस्वाद कदापि नहीं माना जा सकता, वरन् यह काव्य- निबद्ध स्थायी भाव का आस्वाद है। काव्य-निबद्ध स्थायी भाव के आस्वाद को आध्यात्मिक आनन्द कहना ठीक नहीं होगा। दूसरेशब्दों में, काव्यानन्द प्रचलित सामान्य अर्थ में

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३१२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

आत्मानन्द नहीं कहा जा सकता। यदि यह माना जाय कि प्रत्येक अनुभूति आत्मा की ही अनुभूति है और आनन्द के सभी भेद आत्मानन्द के ही विभिन्न रूप हैं, तब तो कोई भेद नहीं रह जाता। परन्तु, यदि आनन्द के भिन्न-भिन्न रूपों में भेद किया जाय, तो काव्यानन्द को अत्यन्त उच्च और उदात्त मानने पर भी उसे आत्मानन्द के रूप में नहीं मान सकते। अब पहला मत बच जाता है कि काव्यानन्द ऐन्द्रिय आनन्द है। प्लेटो ने इसे प्रत्यक्ष ऐन्द्रिय आनन्द माना। इस तथ्य को अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि काव्यानन्द प्रत्यक्ष लौकिक अनुभव नहीं होने पर भी लौकिक जीवन की अनुभूति है। भक्ति आदि कुछ विषय छोड़कर काव्य के प्रायः सभी विषय लौकिक ही होते हैं। उनके विभिन्न उपकरण भाव, कल्पना, बुद्धि आदि भी लौकिक ही हैं। उसके आस्वाद के माध्यम आँख, कान, मन, बुद्धि आदि भी लौकिक ही हैं। उसका आस्वादन करनेवाला भी योगी नहीं होता, बल्कि सामाजिक प्राणी ही होता है। ऐसी स्थिति में यह मानना ठीक होगा कि काव्यानन्द अतीन्द्रिय नहीं है। दूसरे शब्दों में, काव्यानन्द लौकिक अर्थात् ऐन्द्रिय-मानसिक अनुभूति ही है और इसका आधार भाव है।

कष रस-निष्पत्ति भारतीय काव्यशास्त्र में रस-निष्पत्ति का अत्यन्त अधिक महत्त्व है। रस के सम्पूर्ण विवेचन में रस-निष्पत्ति का बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान है। भरत मुनि ने भी मूल रूप से रस-निष्पत्ति का ही विवेचन किया है। रस-निष्पत्ति से सम्बन्ध रखनेवाला भरत का प्रसिद्ध सूत्र है : तत्र विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः' अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। भरत द्वारा व्याख्या : इस सूत्र में प्रयुक्त 'संयोग' तथा 'निष्पत्ति' शब्दों का अर्थ उतना स्पष्ट नहीं है और इन्हीं शब्दों की व्याख्या को लेकर परवर्त्ती आचार्यों के बीच हजारों वर्षों तक वाद-विवाद होता रहा है। स्वयं भरत ने इन शब्दों की व्याख्या की है। 'निष्पत्ति' शब्द की व्याख्या करते हुए भरत ने पूर्वोद्धृत पंक्तियाँ लिखी हैं-जिस प्रकार अनेक व्यंजनों तथा औषधि आदि के संयोग से रस की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार अनेक भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। जैसे गुड़ आदि द्रव्यों और व्यंजनों तथा औषधि आदि से षाडव (पानक) आदि रस उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अनेकानेक भावों के उपगत होने से स्थायी भाव रसत्व को प्राप्त होता है।२ यहाँ निष्पत्ति का अर्थ है 'बनना' या 'होना', स्वरूप को प्राप्त होना। यह सामान्य कोशार्थ है। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ३१ के बाद गद्य। ३. वही, पृ० ३१४.३१५ (श्रीरघुवंश का अनुवाद)

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कणक आगे के वाक्य में भरत ने 'संयोग' शब्द का अर्थ स्पष्ट किया है-जिस प्रकार नाना भांति के व्यंजनों से संस्कृत अन्न को खाकर रसास्वादन करते हुए सुमना पुरुष हर्ष को प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार अनेक प्रकार के भावों और अभिनयों द्वारा व्यक्त किये गये वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनयों से युक्त स्थायी भाव का सहृदय प्रेक्षक आस्वादन करते हैं और आनन्द प्राप्त करते हैं।' इस उद्धरण के आधार पर संयोग का अर्थ है स्थायी भावों के साथ सम्यक् योग अर्थात् संगम। इस प्रकार, स्वयं भरत के अनुसार इस सूत्र का अर्थ हुआ-विभाव, अनुभाव और संचारी भावों का स्थायी भाव के साथ संयोग या संसर्ग से रस की सिद्धि होती है। मूल या आधारभूत तत्त्व स्थायी भाव ही है और जब विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से उसका संयोग हो जाता है, तभी रस की सिद्धि होती है। इस प्रसंग में सिद्धि का अर्थ निर्मिति होना चाहिए। जब विद्यमान उपकरणों के संयोग से नवीन रचना होती है, जो आधार- भूत उपकरणों से उत्पन्न होने पर भी उससे भिन्न होती है, तो इस क्रिया को निर्मिति कहते हैं। भरत ने रस की निष्पत्ति का यही अर्थ लिया है। रस कोई ऐसा नवीन पदार्थ नहीं है, जिसका पहले सवथा अभाव रहा हो; विभाव आदि से उपगत होकर स्थायी भाव ही रस में परिणत हो जाता है। रस और स्थायी भाव एक ही नहीं हैं, वैसे ही जैसे अन्न और षाडवादि एक ही नहीं हैं। परन्तु, रस का आधार स्थायी ही है और यही स्थायी रस- रूप में परिणत हो जाता है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि रस के रूप में किसी नवीन पदार्थ की सृष्टि नहीं होती; विद्यमान स्थायी भाव ही कई अन्य उपकरणों के संयोग से एक नया रूप ग्रहण कर लेता है। भरत ने जो दृष्टान्त दिया है, उसके प्रसंग में निष्पत्ति का यही अर्थ बैठता है। भरत का नाट्यपरक दृष्टिकोण : रस-निष्पत्ति का प्रतिपादन करते समय भरत का सम्पूर्ण दृष्टिकोण नाट्यपरक रहा है, अर्थात् उन्होंने रंगमंच पर अभिनय की दृष्टि को प्रधानता दी है। इस प्रकरण का आरम्भ करते समय उन्होंने यही प्रश्न उठाया है कि नाट्यशास्त्रियों द्वारा गिनाये गये रस अपनी विशिष्टता कैसे प्राप्त करते हैं। इसकी काव्यगत व्याख्या का विकास आगे चलकर चाहे जिस ढंग से हुआ हो, परन्तु भरत ने उसे अभिनय के अनुरूप आस्वाद्य माना है। यह आस्वादन उसी रूप में बताया गया है, जिस रूप में नाना व्यंजनों से तैयार भोजन का रसास्वादन सुमनस पुरुष करते हैं। कुछ आगे चलकर भरत ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया है कि संस्कृत जन नाना भावों के वाचिक तथा आंगिक अभिनय और सात्त्विक अनुभावों के प्रदर्शन के सहारे स्थायी भावों का आस्वादन कर आनन्द प्राप्त करते हैं। काव्य के सन्दर्भ में रस की व्याख्या काव्य-सौन्दर्य के अर्थ में होने लगी है। इसका यह अर्थ नहीं समझना चाहिए कि नाट्य में रस का सम्बन्ध १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, पृ० ३१५ (श्रीरघुवंश का अनुवाद) $

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३१४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

सौन्दर्य से नहीं है। परन्तु, नाट्य में रस का सम्बन्ध रंगमंच पर स्थायी भावों के ऐसे प्रदर्शन से है, जिसमें कारणरूप विभाव और कार्यरूप अनुभाव का अभिनयात्मक संयोग नेत्रों के समक्ष प्रस्तुत हो। आगे भावों से रस की स्थिति सिद्ध मानी गई है : नानाभिनयसम्बद्धान् भावयन्ति रसानिमान्।' -अर्थात् अनेक प्रकार के नाटकीय अभिनय के प्रयोगों से भाव ही रसों को भावित करते हैं। नाट्य-प्रदर्शन से अनेक भावों से रसों की उत्पत्ति होती है, परन्तु वस्तुतः न कोई भाव रस से हीन हो सकता है और न रस से रहित कोई भाव ही हो सकता है। इसीलिए, नाट्य-प्रदर्शन में दोनों पारस्परिक सम्बन्ध से सिद्ध होते हैं। यहाँ इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि भरत ने जब रस की नाट्यपरक व्याख्या की, उस समय उन्होंने दर्शक-वर्ग के केवल आस्वाद्य पक्ष पर बल दिया है। उनका अभिप्राय यह नहीं है कि दर्शक इन भावों को अपने मन में इसी रूप में लेता है। इसी प्रकार भरत ने विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव की व्याख्या इसी दृष्टि से प्रस्तुत की है कि रंगमंच पर स्थायी भाव का प्रदर्शन किस प्रकार होता है और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह विचार करना असंगत लगता है कि ये वास्तव में संचारी भाव हैं या केवल शारीरिक अवस्थाएँ हैं? ये मानसिक स्थितियाँ हैं या केवल आंगिक परिस्थितियाँ ? जैसे परवर्त्ती आचार्यों ने सम्पूर्ण रस-सामग्री को काव्य-सौन्दर्य के अनुरूप सिद्ध करने की चेष्टा की है, वैसे ही आधुनिक विचारक रस-सामग्री की मनोवैज्ञानिक स्तर पर विवेचना करने पर तुले जान पड़ते हैं। परन्तु, वस्तुस्थिति यह है कि भरत ने जो कुछ विवेचन किया है, वह गतिशील तथा सक्रिय नाट्य की कल्पना लेकर ही किया है और उसमें अभिनय की दृष्टि की प्रधानता है। रस-सूत्र के व्याख्याकार : प्रस्तुत रस-सूत्र की व्याख्या परवर्त्ती काव्यशास्त्र में अनेक आचार्यों ने की। अभिनवगुप्त ने भी बहुत विस्तार से उसकी व्याख्या की है। उन्होंने इस विषय में अपने पूर्ववर्त्ती आचार्यों के मत प्रस्तुत करके उसकी समुचित समीक्षा की है। रस-मीमांसा में इन पूर्ववर्ती आचार्यों के मतों का बहुत अधिक महत्त्व है। इन पूर्ववर्त्ती आचार्यों के ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं; अभिनवभारती से ही उनका ज्ञान प्राप्त होता है। अब इन आचार्यों के मतों की समीक्षा का प्रयत्न किया जा रहा है। (क) भटटलोल्लट का उत्पत्तिवाद : भरत के रस-सूत्र के व्याख्याकारों में इससे पहले भट्टलोल्लट और उनकी रस-विषयक व्याख्या का उल्लेख अभिनवगुप्त ने अपनी अभिनवभारती में किया।२ फिर उन्होंने ही अपने ध्वन्यालोक-लोचन में उल्लेख किया।3

१. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ३५ २. अभिनवभारती (अनुवाद, आचार्य विश्वेश्वर), अध्याय ६, पृ० ४४२-४४३ ३. धवन्यालोकलोचन (चौखम्बा), पृ० १८४

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ये उद्धरण अत्यन्त संक्षिप्त हैं और सम्भव है, अभिनवगुप्त ने अपने दृष्टिकोण से ही कुछ उद्धरण दिया हो। अतः, उद्धरण अत्यन्त अपर्याप्त होने के साथ सम्भवतः, उतने प्रामाणिक भी शायद ही हों। इतना होने पर भी भट्टलोल्लट के मत का सबसे पहले आधार ये ही उद्धरण हैं। लोल्लट के मत का दूसरा आधार मम्मट के द्वारा काव्यप्रकाश में उद्धृत उनका मत है,१ जो और भी संक्षिप्त है और अभिनव के द्वारा उद्धृत मत से कुछ भिन्न भी है। इसके विषय में दो सम्भावनाएँ हैं-१. मम्मट ने स्वयं लोल्लट का ग्रन्थ देखा हो और उसी के आधार पर वह मत उद्धत किया हो और २. मम्मट का भी आधार अभिनवगुप्त के वे ही उद्धरण हों, परन्तु उनके समय तक रस-सिद्धान्त में जो कुछ विकास हुआ हो, उसके आधार पर अभिनवगुप्त द्वारा प्रस्तुत व्याख्या में यथास्थान संशोधन कर दिया हो। सब बातों पर विचार करने पर दूसरी सम्भावना ही अधिक समीचीन जान पड़ती है। सभी परवर्त्ती आचर्यों ने मम्मट द्वारा ही प्रस्तुत मन्तव्य की आवृत्ति की है। अभिनवगुप्त (अभिनवभारती और ध्वन्यालोकलोचन में) और मम्मट (काव्य- प्रकाश में) द्वारा दिये गये भट्टलोल्लट के उद्धरणों का विश्लेषण करने पर उनके रस-विषयक सिद्धान्त के सम्बन्ध में निम्नलिखित तथ्य उपलब्ध होते हैं : १. संयोग का अर्थ भरत द्वारा दिये गये अर्थ से भिन्न नहीं है अर्थात् स्थायी भाव का संयोग। २. स्थायी भाव का आश्रय अनुकार्य है; जैसे-राम, दुष्यन्त आदि। ३. सीता, शकुन्तला आदि आलम्बन उसे अनुकार्य आदि के चित्त में ही उत्पन्न करते हैं। इस सम्बन्ध में लोल्लट ने 'उत्पत्ति' शब्द का प्रयोग किया है। इस 'उत्पत्ति' शब्द का यहाँ क्या अर्थ है? 'अभाव में भाव की कल्पना' या 'उद्बुद्धि' मात्र ? यदि 'कस्यचिद्वासनात्मकता स्थायिवत्' लोल्लट के ही मत का अंश है, तब तो 'उत्पत्ति' का अर्थ 'उद्बुद्धि' ही ठीक है और तब उद्बुद्धि और अभिव्यक्ति में कोई अन्तर नहीं रह जाता; क्योंकि जब स्थायी भाव वासना-रूप में विद्यमान है, विभाव उसे उद्बुद्ध ही करता है। परन्तु, यदि यह अभिनवगुप्त की अपनी टिप्पणी है, तो उत्पत्ति का अर्थ 'अभाव में भाव' मानना ठीक होगा। ४. अनुभाव का अर्थ भावों के अनुवर्त्ती विकार है। अनुभाव केवल उपचित स्थायी भावों के ही नहीं, वरन् अनुपचित स्थायी भावों के तथा व्यभिचारी भावों के भी अनुवर्त्ती विकार हैं। लोल्लट के मत से अनुभाव शृंगार रस में विभोर राम आदि की चेष्टाएँ नहीं हैं। लोल्लट ने रस को उपचित स्थायी भाव माना, अतः उसके अनुवर्ती विकार तो कार्य ही हो सकते हैं, कारण नहीं। किन्तु अनुपचित स्थायी भाव के और व्यभिचारी भावों के अनुवर्त्ती विकार स्थायी भाव के उपचय के कारण होते हैं। १. काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, सू० ४३ के बाद गद्य।

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५. संचारी भाव स्थायी भाव के सहभावी माने गये हैं। किन्तु, नियम है कि मन में दो चेतनाएँ एक साथ नहीं रह सकती, इससे एक साथ स्थायी भाव और संचारी भाव की स्थिति में शंका की जा सकती है। इस शंका का समाधान इसे तरह किया जाता है कि संचारी भाव स्थायी भाव के साथ संस्कार-रूप में रहते हैं, युगपत् स्थिति में नहीं रहते। यदि स्थायी के विषय में वासनात्मकता सम्बन्धी धारणा स्वीकृत हो जाय तो भी दोनों का सहभाव सिद्ध हो जाता है। इस दशा में स्थायी भाव की स्थिति वासना-रूप में और संचारी भाव की स्थिति उद्बुद्ध रूप में मानी जायगी। ६. लोल्लट ने रस को मूलतः तथा मुख्यतः अनुकार्य-रामादि-में और गौण रूप से अनुसन्धान के बल से, नट में माना है। अभिनवगुप्त ने जो वाक्य उद्धत किये हैं, उनके अनुसार अनुसन्धानकर्त्ता नट ही है। अतः, अनुसन्धान के बल से नट में भी रस उत्पन्न हो जाता है। एक उदाहरण से लोल्लट द्वारा प्रतिपादित रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया समझी जाय। कण्व ऋषि के आश्रम के रमणीक वातावरण में दुष्यन्त अत्यन्त रूपवती शकुन्तला को देखता है और उसके मन में रतिभाव उत्पन्न होता है। यह रतिभाव दुष्यन्त के चित्त में पूर्व से ही वासना के रूप स्थित था, परन्तु इस समय कारणभूत शकुन्तला को देखने से और उसके सम्पर्क में आने से ही उदित हुआ, इसलिए रतिभाव की उत्पत्ति मानी जानी चाहिए। दुष्यन्त के चित्त में स्थित यह रति नामक स्थायी भाव आलम्बन-रूप शकुन्तला के अपूर्व सौन्दर्य से उस आश्रम की रमणीक पृष्ठभूमि में (उद्दीपन विभाव के द्वारा) और भी उद्दीप्त हो उठा। दुष्यन्त का शरीर रोमांचित हो गया (अनुभाव)। शकुन्तला के सौन्दर्य से एक ओर उसके मन में हर्ष का संचार हुआ, तो दूसरी ओर वरण आदि विषयों को लेकर उसके मन में चिन्ता आदि व्यभिचारी भाव आने लगे। इन अनुकूल तथा प्रतिकूल भावों से रतिभाव का क्षय नहीं होकर पोषण ही हुआ। इस तरह दुष्यन्त (आश्रय) के चित्त में शकुन्तला (आलम्बन) के द्वारा जो रतिभाव (स्थायी भाव) उत्पन्न हुआ और शकुन्तला की चेष्टाओं एवं वातावरण से उद्दीप्त हुआ था, वह दुष्यन्त के पुलक, रोमांच आदि (सात्त्विक) के द्वारा पुष्ट हुआ। इस प्रक्रिया से उस रति स्थायी भाव का पूर्ण परिपाक होकर वह रस रूप में परिणत हो गया। Pनाट्य में इसी प्रसंग का अनुकरण किया गया। नट तथा नटी ने दुष्यन्त-शकुन्तला आदि की भूमिका अदा की और अपनी शिक्षा तथा अभ्यास के द्वारा उन्होंने ठीक-ठीक दुष्यन्त-शकुन्तला के चरित्र का अभिनय किया। नट के चित्त में रतिभाव का उदय हो गया और शरीर में रोमांच आदि और चित्त में हर्ष, चिन्ता आदि भावों का संचार हुआ। इस प्रकार, सम्पूर्ण सामग्री यहाँ प्रस्तुत है-स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव हैं। यहाँ भी स्थायी भाव विभाव से उद्बुद्ध होकर अनुभावों द्वारा व्यक्त होकर तथा व्यभिचारी भावों द्वारा पुष्ट होकर रस में परिणत हो जाता है। अन्तर यही है कि

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पहले वास्तविक प्रसंग तथा दूसरा उसका काव्यगत अनुकरण-मात्र है। अतः, वास्तविक प्रसंग में दुष्यन्त के चित्त में जिस रस की निष्पत्ति हुई, वह मुख्य है और नाट्यवाले नट के चित्त में जिस रस की निष्पत्ति हुई, वह गौण है। यही भट्टलोल्लट की रस-निष्पत्ति है। भट्टलोल्लट के मत की विशेषताएँ : संस्कृत-काव्यशास्त्र में लोल्लट के मत की विस्तृत विवेचना हुई है, जिसमें उसकी सीमाओं या तुटियों का ही विश्लेषण किया गया है। किन्तु, उसकी विशेषताओं अथवा शक्तियों का उल्लेख किसी ने नहीं किया। डॉ० नगेन्द्र ने लोल्लट के मत की शक्तियों का भी विश्लेषण किया है। उनके अनुसार इस मत की निम्नलिखित विशेषताएँ हैं : १. भरतसूत्र की जितनी भी व्याख्याएँ हुई, उनमें यही मत मूल के सबसे अधिक निकट है। २. रस को अनुकार्यगत मानने का अर्थ यह हुआ कि नाट्य-सौन्दर्य का प्रत्यक्ष सम्बन्ध मूल पात्र के भाव से है। मूल पात्र के भावों तथा कार्यों से ही नाटक की विषय- वस्तु की रचना होती है, अतः यह सिद्ध होता है कि नाटक की विषयवस्तु में ही उसका मूल सौन्दर्य निहित रहता है। इस प्रकार, दूसरे ढंग से लोल्लट कला में वस्तु के महत्त्व का प्रतिपादन करते हैं। अनेक मत-मतान्तरों के रहने पर भी यह सिद्धान्त उपेक्षा के योग्य नहीं है। अनेक प्राचीन तथा नवीन आचार्यों ने इस सिद्धान्त को मान्यता दी है।

३. यहीं से रस की व्यक्तिपरक व्याख्या का आरम्भ होता है, रस कलात्मक स्थिति से आगे बढ़कर मनःस्थिति तक पहुँच जाता है। यह मनःस्थिति सहृदय की नहीं रहने पर भी इसमें व्यक्ति की सत्ता पूर्ण रूप से स्पष्ट हो जाती है। ४. अभिनेता द्वारा रसानुभूति होने के तथ्य का प्रतिपादन करके भट्टलोल्लट ने नाट्यकला के विकास में एक नया मोड़ ला दिया। लोल्लट के मत में त्रुटियाँ : संस्कृत-काव्यशास्त्र में भट्टलोल्लट के सिद्धान्त में जो त्रुटिया बताई गई हैं, वे सभी जानते हैं। श्रीशंकुक ने इस सिद्धन्त में आठ त्ुटियों का निर्देश किया है, जिनका उल्लेख अभिनवभारती में किया गया है। वे निम्नलिखित हैं : १. विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग होने पर ही रति आदि स्थायी भावों का साक्षात्कारात्मक ज्ञान होता है। जबतक विभाव नहीं उपस्थित हो तबतक स्थायी भावों का साक्षात्कारात्मक ज्ञान सम्भव नहीं। किन्तु, विभाव आदि का संयोग होने पर रति आदि का जो साक्षात्कारात्मक ज्ञान होता है, वह स्थायी भाव नहीं, प्रत्युत रस ही है। स्थायी भाव को ही रस नहीं कह सकते। रस तथा स्थायी भाव सर्वथा भिन्न होते हैं। २. विभाव आदि के संयोग से पहले जो रति आदि स्थायी भावों का ज्ञान होता है, उसे रस नहीं कहा जा सकता, वह तो शब्द द्वारा उनका केवल परोक्षात्मक ज्ञान होता है।

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अतः, विभाव आदि के योग से पहले स्थायी भावों की जो स्थिति रहती है, उसे रस मानना ठीक नहीं; क्योंकि उसका ज्ञान शब्दों के द्वारा परोक्ष रूप से ही सम्भव है। उसका रसनात्मक और साक्षात्कारात्मक ज्ञान नहीं होता। फिर विभाव आदि के संयोग के पश्चात् रति आदि की साक्षात्कारात्मक स्थिति होती है, उसे स्थायी भाव नहीं कह सकते। इसलिए, यह कहना भी संगत नहीं कि स्थायी भाव ही रस है। ३. रति आदि को ही रस मानने में भी श्रीशंकुक ने एक दोष यह भी बताया है कि विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के संयोग के पहले ही यदि रस की स्थिति मान ली जाय, तो फिर रस के अन्य लक्षण करने की क्या आवश्यकता रह जाती है। इसका कारण यह है कि विभाव आदि के संयोग के पहले ही रस की स्थिति विद्यमान मान ली गई है। ४. यदि रति आदि को ही रस मान लिया जाय, तो एक अन्य दोष उपस्थित हो जायगा। कभी रति आदि सामान्य या मन्द रूप में रहते हैं, तो कभी तीव्र और कभी मध्यम रूप में। उसी के अनुरूप रस में भी अनेक भेद होने लगेंगे। किन्तु, ऐसा कभी नहीं होता। रस में न्यूनाधिक्य का भेद नहीं होता। स्थायी भावों में न्यूनाधिक्य का मात्रा-भेद देखा जाता है। अतः, स्थायी भाव को ही रस नहीं माना जा सकता। ५. आगे चलकर भरत मुनि ने हास्य रस के ६ भेद किये हैं। स्मित, हसित, विहसित, उपहसित, अवहसित और अतिहसित। ये भेद स्थायी भाव के सम्भव हैं; क्योंकि स्थायी भाव में मात्रा का न्यूनाधिक्य हो सकता है। किन्तु, रस में न्यूनाधिक्य नहीं होने के कारण इसमें भेद सम्भव नहीं है। मुख्य रूप से स्थायी भाव की ही दृष्टि से भरत मुनि ने ये भेद किये हैं। ६. यदि मात्रा-भेद से ही रस के भेद माने जायँ, तो काम-दशा में जो दस अवस्थाएँ बताई गई हैं, उनमें मात्रा के भेद से असंख्य रस-भाव माने जाने लगेंगे। उस दशा में अकेले शृंगार के ही असंख्य भेद हो जायेंगे। ७. भट्टलोल्लट ने स्थायी भाव के उपचय को रस कहा है। किन्तु, शोक आदि स्थायी भावों का उपचय नहीं होता, प्रत्युत काल-क्र्म से उसका अपचय या ह्रास ही होता जाता है। सर्वप्रथम जब शोक उपस्थित होता है तो वह तीव्र होता है, परन्तु धीरे-धीरे उसका ह्रास ही होता जाता है। इस प्रकार, उसके उपचय का अवसर आने की सम्भावना ही नहीं होती। फिर शोक के उपचय के विना करुण रस की उत्पत्ति कैसे हो सकती है? ८. इसी प्रकार शृंगार रस के स्थायी भाव रति, रौद्र रस के स्थायी भाव क्रोध और वीर रस के स्थायी भाव उत्साह का भी यदि परिपोषण नहीं किया जाय, तो उनका उपचय नहीं, प्रत्युत ह्रास ही होता जायगा। किन्तु, रसानुभूति में न वृद्धि होती है और न ह्रास। अतः, उपचित स्थायी भाव को रस मानना ठीक नहीं है। इस प्रकार श्रीशंकुक ने भट्टलोल्लट तथा दण्डी के मत का तीव्र खण्डन किया है। इन आठ तर्कों में पहले छह तो इस सिद्धान्त का खण्डन करते हैं कि स्थायी ही रस है-

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स्थाय्येव रसः। अन्तिम दो तर्क इस सिद्धान्त का खण्डन करते हैं कि स्थायी भाव ही उपचित होकर रस बन जाता है-स्थाय्येव उपचितो रसः। श्रीशंकुक के ये आक्षेप कभी पूर्ण रूप से मान्य नहीं रहे। यह सिद्धान्त तो आरम्भ से अन्त तक मान्य रहा कि स्थायी भाव ही रस में परिणत होता है। भरत का भी यही मत है और परवर्त्ती रसवादियों ने भी इसी मत को स्वीकार किया। विश्वनाथ ने भी यही मत माना : रसतामेति रत्यादि: स्थायिभावः सचेतसाम्।' इन आचार्यों में स्थायी भाव के केवल अर्थ को लेकर अन्तर था। भरत ने अव्यक्तिगत स्थायी भाव को ग्रहण किया, परन्तु अभिनवगुप्त आदि आचार्यों को सहृदय का स्थायी भाव अभिप्रेत था। किन्तु, भट्टलोल्लट ने स्थायी भाव का एक तीसरा ही अर्थ ग्रहण किया। उनका अभिप्रेत अनुकार्य का स्थायी भाव था, किन्तु वे अनुकार्य के विषय में मूल ऐतिहासिक पात् तथा कवि-निबद्ध पात्र में अन्तर स्पष्ट नहीं कर सके। इसी बात में उनके मत की दुर्बलता निहित है और यहीं से उनके सिद्धान्त का खण्डन होने लगता है। इसी एक दोष से उनके मत में एक दूसरा दोष उत्पन्न हो जाता है। वह दूसरा दोष यह है कि रस की स्थिति प्रत्यक्ष ऐन्द्रिय मानसिक भाव से भिन्न नहीं रह जाती और इसलिए सुख-दुःखात्मक हो जाती है। किन्तु, यह स्थिति मान्य नहीं है। लोल्लट के मत में ये ही दो प्रधान दोष हैं। निष्कर्ष : भट्टलोल्लट के सिद्धान्तानुसार विभावादि कारण हैं और रस कार्य। रस का वास्तविक आनन्द नायक तथा नायिका को ही मिलता है और प्रेक्षक में रस की प्रतीति-मात्र होती है। उत्पत्तिवाद में रस वाच्य होता है, व्यंग्य नहीं होता। इसीलिए, उत्पत्तिवादी तात्पर्यवादी माने जाते हैं। ऊपर के विवेचन से निष्कर्ष-रूप में निम्नलिखित तथ्य उपलब्ध होते हैं-लोल्लट के सिद्धान्त के अनुसार निष्पत्ति का अर्थ उपचिति है; क्योंकि स्थायी भाव की उपचित अवस्था को ही रस कहते हैं। विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के योग से उपचिति नामक मिश्र क्रिया उत्पन्न होती है। (क) विभाव से स्थायी भाव की उद्बुद्धि होती है। इसी उद्बुद्धि को उत्पत्ति भी कहा गया है, किन्तु इस उत्पत्ति का अर्थ है अरूप को रूप देना। स्थायी भाव चित्त में वासना-रूप में स्थित था, उसकी साक्षात्कारात्मक प्रतीति नहीं थी और विभावों के ही कारण उसने रसनात्मक रूप प्राप्त किया। अतः, स्थायी भाव और विभाव में उत्पाद्य-उत्पादक भाव होता है। (ख) अनुभावों से उस स्थायी भाव की प्रतीति होती है। अतः, दोनों में संयोग का अर्थ है अनुमाप्य-अनुमापक सम्बन्ध। (ग) व्यभिचारी भावों से स्थायी भावों की पुष्टि होती है। अतः, स्थायी भावों और संचारी भावों में पोष्य-पोषक सम्बन्ध है। इस प्रकार उपचिति की प्रक्रिया में आरम्भ में १. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेव, का० १

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तीन क्रियाओं का योग रहता है। वे क्रियाएँ हैं-उद्बुद्धि या उत्पत्ति, प्रतीति और पुष्टि। अन्त में ये तीनों क्रियाएँ मिलकर उपचिति की प्रक्रिया पूर्ण करती हैं। वस्तुतः, भरत मुनि के समक्ष षाडवादि रस बनाने की प्रक्रिया रही है और भरत के अत्यन्त निकट रहने कारण लोल्लट के समक्ष यही क्रिया रही है। जिस प्रकार निमित्त कारण से निकला पदार्थ-विशेष कुछ अन्य द्रव्य तथा औषधियों के योग से षाडवादि रस के रूप में परिणत हो जाता है, उसी प्रकार विभावों से निकला स्थायी भाव, अनुभावों और संचारी भावों के संयोग से नाट्य रस में परिणत हो जाता है। यहाँ निष्पत्ति शब्द का अर्थ हुआ-बनना या निर्मिति। स्थायी भाव विभावादि के द्वारा उपचित होकर नवीन रूप धारण कर लेता है, इसीलिए 'उत्पत्ति' शब्द का प्रयोग किया जाता है। यहाँ रस के रूप में किसी अभूत पदार्थ की उत्पत्ति नहीं होती। संयोग शब्द का अर्थ निश्चित करने में अधिक कठिनाई नहीं है। संयोग का सरल अर्थ है विभावादि के साथ स्थायी भाव का संयोग। ये विभावादि स्थायी भाव का उपचय करके रस रूप में परिणत कर देते हैं, इसलिए विभावादि उपचायक हैं और स्थायी भाव उपचेय। अर्थात् स्थायी भाव और विभावादि में उपचेय-उपचायक सम्बन्ध है। इस दृष्टि से संयोग का अर्थ हुआ उपचेय-उपचायक सम्बन्ध। ऊपर निर्देश किया जा चुका है कि उपचय एक संयुक्त प्रक्रिया है, जिसमें उत्पत्ति, प्रतीति और पुष्टि-तीन विभिन्न क्रियाओं का मेल रहता है। ऊपर यह भी लिखा जा चुका है कि विभावों से स्थायी भाव की उत्पत्ति होती है, अतः दोनों में उत्पाद्य-उत्पादक सम्बन्ध है; अनुभावों से उसकी प्रतीति होती है, अतः अनुभावों से उसका सम्बन्ध अनुमाप्य-अनुमापक या गम्य-गमक सम्बन्ध है; संचारी भावों से उसकी पुष्टि होती है, अतः संचारी भावों से उसका पोष्य-पोषक सम्बन्ध है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि उत्पाद्य-उत्पादक, अनुमाप्य-अनुमापक (गम्य-गमक) और पोष्य-पोषक सम्बन्धों का समन्वय है उपचेय-उपचायक सम्बन्ध। अतः, डॉ० नगेन्द्र ने सूत्र बनाया-"संयोग=उपचेय-उपचायक सम्बन्ध=उत्पाद्य- उत्पादक +गम्य-गमक +पोष्य-पोषक सम्बन्ध। ह (ख) श्रीशंकुक का अनुमितिवाद : भरत मुनि के रससूत्र के दूसरे महत्त्वपूर्ण व्याख्याता श्रीशंकुक हैं। इनका भी कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। अभिनवगुप्त ने अभिनव- भारती में इनके मत का उल्लेख किया है और इनका उद्धरण भी दिया है।' उन्होंने ध्वन्यालोक-लोचन में भी श्रीशंकुक के मत का उल्लेख उनका नाम दिये विना ही किया है।२ मम्मट ने काव्यप्रकाश में एक उद्धरण दिया है।3 हेमचन्द्र और प्रदीपकार ने अपने रस-विवेचन में शंकुक का जो मत उद्धृत किया, वह भी इन्हीं पर आधृत है। १. हिन्दी-अभिनवभारती (आचार्य विश्वेश्वर), पृ० ४४६-४५० २. ध्वन्यालोकलोचन, द्वितीय उद्योत, पृ० १९६ (टीका : आचार्य जगन्नाथ पाठक) ३. काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, सू० ४३ के बाद गद्य।

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शंकुक के मत का स्पष्टीकरण : इन उद्धरणों के आधार पर शंकुक के सिद्धान्त के विषय में निम्नलिखित तथ्य प्राप्त होते हैं : १. अनुकार्य में स्थित स्थायी भाव का नट द्वारा अनुकृत रूप रस कहा जाता है। शंकुक के मत से स्थायी भाव वस्तुतः अनुकार्य रामादि में स्थित रहता है। नट अपने कौशल से उसका अनुकरण करता है और ऐसा जान पड़ता है कि वह भी स्थायी भाव का अनुभव कर रहा है। स्थायी भाव का यह अभिनयात्मक अनुकरण ही रस है। २. नाट्य में विभाव, अनुभाव और संचारी भाव विद्यमान रहते हैं, परन्तु स्थायी भाव नाट्य में उपस्थित नहीं रहता। शब्द आदि के द्वारा स्थायी भाव का केवल बोध हो सकता है, प्रतीति नहीं हो सकती। उसका उपस्थापन तो अभिनय के ही द्वारा सम्भव है। इसलिए, प्रेक्षक विभावादि से नट द्वारा अनुक्रियमाण रामादि के स्थायी भाव का अनुमान करता है। ३. नट द्वारा अनुकरण की प्रक्रिया निम्नलिखित है : (क) अनुकर्त्ता विभाव का अनुकरण काव्य के आधार पर करता है-अर्थात् कवि ने नाटक में विभाव का जैसा चित्रण किया है, अनुकर्त्ता उसी के अनुरूप आचरण करता है। (ख) अनुकर्त्ता अनुभावों का अनुकरण अभिनय-कला की शिक्षा और अभ्यास से करता है। (ग) अनुकर्त्ता संचारी भावों का अनुकरण अपने कृत्रिम अनुभावों के आधार पर करता है। वह लौकिक व्यवहार में चिन्ता, हर्ष आदि भावों में मनुष्य की जैसी मुद्राएँ देखता है, वैसी ही मुद्राएँ वह कृत्रिम रूप में बनाकर हर्ष, चिन्ता आदि भावों को अभिनय के द्वारा प्रकट करता है, यद्यपि उसे इन भावों का वास्तविक अनुभव नहीं होता। इस प्रकार, अनुकर्त्ता विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव का अभिनय ऐसी निपुणता से करता है कि वे वास्तविक लगते हैं, यद्यपि वे सर्वथा कृत्रिम होते हैं। इस विवेचन का महत्त्व अभिनय-कला की दृष्टि से तो है ही, परन्तु इससे भी बड़ा महत्त्व यह है कि अनुकार्य के वास्तविक स्वरूप का सम्भवतः सर्वप्रथम निर्धारण इसी में हुआ। यह स्पष्ट हो जाता है कि अनुकार्य वस्तुतः ऐतिहासिक राम आदि नहीं, प्रत्युत कवि-कल्पित राम आदि हैं। मूलरूप से अनुकार्य तो ऐतिहासिक रामादि ही हैं, परन्तु वे केवल कवि के ही अनुकार्य हैं, नट के अनुकार्य तो कवि-निबद्ध रामादि ही हो सकते हैं। ४. इस स्थल पर प्रश्न हो सकता है कि जब नटगत स्थायी भाव अवास्तविक है, तो सामाजिक जो उनका अनुमान करता है, वह भी तो मिथ्याज्ञान ही हुआ और इस

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३२२ 1 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास मिथ्याज्ञान पर सामाजिक का रसास्वादन वास्तविक कैसे माना जा सकता है? इस प्रश्ने का उत्तर दो प्रकार से दिया जा सकता है : डशा (क) नट में राम की जो प्रतीति होती है, वह केवल भ्रान्ति नहीं है; क्योंकि रंगमंच पर जब प्रेक्षक नट को राम की भूमिका में देखता है, तब वह न सन्देह का अनुभव करता है, न यथार्थता का और न भ्रान्ति का ही। ऐसा ही भान होता है कि वह नट राम है और ऐसा भी लगता है कि वह राम नहीं है। ऐसी परिस्थिति में नट में राम की प्रतीति एक विलक्षण प्रतीति है, जो सन्देह, यथार्थ ज्ञान, भ्रान्ति किसी भी वास्तविक ज्ञान के अनुकूल नहीं है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि नाट्य की प्रतीति एक विशेष कला- जन्य प्रतीति है, जिसे न तो शुद्ध भ्रान्ति ही मान सकते हैं और न मिथ्या ज्ञान ही। (ख) कला की इसी विलक्षण प्रतीति की श्रीशंकुक ने चित्रतुरगन्याय के सहारे प्रकट किया है। नट में राम की जो प्रतीति होती है, उसे सम्यक् अथवा यथार्थ नहीं कह सकते; क्योंकि नट यथार्थ में राम नहीं है, इसे मिथ्या ज्ञान भी नहीं कह सकते; क्योंकि नट पर राम का जो आरोप किया गया है, वह उसी प्रकार मिथ्या नहीं है, जिस प्रकार रज्जु में सर्प का भ्रम होता है। यह संशय ज्ञान भी नहीं कहा जा सकता, अर्थात् नाटक का अभिनय देखते समय प्रेक्षक के मन में यह संशय कभी नहीं उठता कि सामने रंगमंच पर नट है या राम; क्योंकि संशय-ग्रस्त मन कला का आनन्द नहीं प्राप्त कर सकता। फिर यह ज्ञान सादृश्य-ज्ञान भी नहीं कहा जा सकता, अर्थात् सामाजिक के मन में यह भाव नहीं उठता कि सामने रंगमंच पर है तो नट ही, परन्तु वह राम के सदृश है। अतः यह प्रतीति सामान्य नहीं, विलक्षण है। यह उसी प्रकार की प्रतीति है जैसी प्रतीति चित्र में बनाये घोड़े की होती है। यह कला की प्रतीति है, जो सभी साधारण प्रतीति-भेदों से भिन्न प्रकार की होती है। इस प्रकार श्रीशंकुक ने भी अपनी रीति से कलानुभूति की विलक्षणता का ही प्रतिपादन किया है। यद्यपि यह सर्वसम्मत नहीं है, फिर भी संसार के अनेक प्राचीन तथा नवीन काव्यशास्त्रियों ने इसे सौन्दर्यशास्त्र का महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त माना है। इस विवेचन का निष्कर्ष यह है कि काव्य, रंग, कौशल, अभिनय-कला आदि के सहारे नट-नटी जब राम-सीता आदि के रूप, व्यवहार आदि-विभाव, अनुभाव, संचारी भाव-का अभिनय करते हुए उनके प्रेम या रति स्थायी भाव का अभिनय करने में सफलीभूत हो जाते हैं, तो रस की निष्पत्ति हो जाती है। इस प्रकार, रस-निष्पत्ति का तात्पर्य हुआ-काव्य, रंग, कौशल आदि के सहारे अनुकर्त्ता या नट द्वारा स्थायी भाव की अनुकृति। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि नट द्वारा स्थायी भाव का अभिनय ही रस-निष्पत्ति है। स्पष्ट है कि शंकुक के मत से रस का आधार नट या अनुकर्ता है। रस भाव पर आधृत एक कलात्मक स्थिति है, जिसमें अभिनय-तत्त्व की प्रधा रा है। इस विचार से यह मत भी भरत-सम्मत अर्थ के निकट है; क्योंकि इसमें भी रस को अनुभूति-

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रस i ३२ ३ रूप नहीं, स्थिति-रूप ही माना गया है। भरत-सम्मत अर्थ और शंकुक के मत में अन्तर इतना ही है कि भरत ने काव्य और नाट्य-दोनों पर समान रूप से बल दिया है, परन्तु शंकुक की दृष्टि में अभिनय-तत्त्व प्रधान है। भट्टलोल्लट से शंकुक के मत में भेद यह है कि शंकुक जहाँ रस को स्थिति-रूप मानते हैं, वहाँ लोल्लट अनुभूति-रूप मानते हैं, यद्यपि यह अनुभूति सहृदय प्रेक्षक की नहीं, अनुकार्य अर्थात् मूल पात्र की ही है। सामाजिक से रस का क्या सम्बन्ध है? श्रीशंकुक के मतानुसार रंगमंच पर प्रदर्शित विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के द्वारा प्रेक्षक या सामाजिक, इस रस का अनुमान करता है। 'अभिनवभारती' में उद्धत श्रीशंकुक के मन्तव्य में इतना ही कहा गया है, परन्तु इससे यह अर्थ निकल ही जाता है कि इस प्रकार के अनुमान से प्रेक्षक को एक चमत्कार मिलता है, नहीं तो वह नाट्याभिनय देखने क्यों जायगा ? मम्मट ने प्रेक्षक की स्थिति को और भी अधिक स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने कहा है कि प्रेक्षक एक ओर वस्तु-सौन्दर्य और दूसरी ओर अपने हृदय में स्थित वासना के बल से इस रस का चर्वण करता है। मम्मट ने परवर्त्ती मान्यताओं के बल पर वासना को कारण-रूप में अन्तहित कर लिया है। प्रेक्षक विभावादि के द्वारा रस का अनुमान करता है, अतः उसकी दृष्टि में रस की अनुमिति होती है। इस प्रकार, 'निष्पत्ति' का अर्थ हो जाता है, 'अनुमिति' और 'संयोग' का अर्थ हो जाता है, गम्य-गमक भाव। निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि श्रीशंकुक की रस-व्याख्या में नट की स्थिति प्रमुख होने के कारण निष्पत्ति का प्रधान अर्थ अनुकृति ही है। अनुमिति प्रधान अर्थ नहीं, वरन् गौण एवं आक्षिप्त अर्थ है। शंकुक के सिद्धान्त की विशेषताएँ: श्रीशंकुक के सिद्धान्त अनुकृतिवाद या अनुमितिवाद की विशेषताओं को निम्नलिखित रूप में प्रकट कर सकते हैं : १. भट्टलोल्लट ने रस को अनुकार्य रामादि की प्रत्यक्ष अनुभूति माना, फलतः नाट्यगत भाव और प्रत्यक्ष भाव में भ्रान्ति पैदा हो गई। शंकुक ने अपने सिद्धान्त के द्वारा इस भ्रान्ति का निराकरण कर दिया। उन्होंने स्पष्ट रूप से बता दिया कि रस नाट्यगत भाव की प्रत्यक्ष अनुभूति नहीं है, प्रत्युत उसका अनुकरण अथवा कल्पनात्मक अनुभूति है। रस के स्वरूप-विश्लेषण में यह एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है। २. शंकुक ने ही अनुकार्य के वास्तविक रूप का स्पष्टीकरण किया। भट्टलोल्लट ने अनुकार्य के विषय में मूल ऐतिहासिक पात्र और कवि-निबद्ध पात्र में एक प्रकार का भ्रम उत्पन्न कर दिया था। इस भ्रम का निराकरण करके शंकुक ने स्पष्ट कर दिया कि नाट्य में अनुकार्य का अर्थ कवि-निबद्ध पात्र ही है, मूल पात्र नहीं। क ३. शंकुक ने इस सिद्धान्त की भी स्थापना की कि सामान्य प्रतीति से कला-प्रतीति विलक्षण होती है। इससे उनकी सूक्ष्म चिन्तन-शक्ति का परिचय मिलता है। कलाशास्त्र का यह सिद्धान्त विवादास्पद है, फिर भी बहुत प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण है और इस युग में भी इस सिद्धान्त के समर्थकों की संख्या पर्याप्त है।ह की समार कंवपष

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४. रस की घटना का जहाँतक सम्बन्ध है, शंकुक का प्रेक्षक लोल्लट के प्रेक्षक की तुलना में अधिक क्रियाशील है। शंकुक का प्रेक्षक नाट्य में उपस्थित विभावादि की सहायता से नट द्वारा अनुक्रियमाण स्थायी भाव-रस का अनुमान करता है। लोल्लट ने प्रेक्षक के विषय में कुछ नहीं कहा। लोल्लट द्वारा प्रक्षक की यह उपेक्षा खटकती है; क्योंकि नाट्य का सम्पूर्ण विधान प्रेक्षक के ही निमित्त होता है। शंकुक ने यह तथ्य समझा है और प्रेक्षक का पक्ष ग्रहण करके रस के प्रसंग में उसे उचित मान्यता दी है। इस प्रकार, रस की व्यक्तिपरक धारणा के विकास में शंकुक का विशेष योगदान है। हा ५. शंकुक ने ही सबसे पहले रस-विवेचन को एक दार्शनिक पृष्ठभूमि पर प्रतिष्ठित किया। उनके बाद रस के स्वरूप-विश्लेषण में दार्शनिक चिन्तन का निश्चित प्रवेश हो गया। इससे विचार का स्तर ऊँचा हुआ। इस सिद्धान्त की तुटिरयां : श्रीशंकुक के सिद्धान्त का विवेचन करने पर हमें स्पष्टतया विदित हो जाता है कि उसकी विशेषताओं की अपेक्षा तुटियाँ ही अधिक प्रबल हैं। अभिनवगुप्त ने उनके अनुकरणवाद की तुटियों का विवेचन पाण्डित्यपूर्ण रीति से किया है। शंकुक के अनुकरणवाद के दोष नीचे दिखाये जा रहे हैं: १. अनुकरणवाद पर किये गये आक्षेपों के मूल में 'अनुकरण' शब्द की असमर्थता है। शंकुक का अभीष्ट अर्थ यह है कि नट रामादि के कृत्यों का अनुकरण करता हुआ कल्पना के सहारे उनसे तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित करता है, फिर उनके रति आदि स्थायी भाव की भी कल्पनात्मक अनुभूति कर लेता है। यह कल्पनात्मक अनुभूति वास्तविक नहीं हो सकती, एक प्रकार की कृत्रिम अनुभूति है। 'अनुकरण' तथा 'कृत्रिम' शब्दों के असमर्थ रहने के कारण बात और भी उलझ गई है। २. इस सिद्धान्त का दूसरा दोष है-रस के अनुमान की कल्पना। अनुमान वस्तुतः बुद्धि की क्रिया है, जिसका परोक्ष होना अवश्यम्भावी है-प्रत्यक्ष तथा अस्वादात्मक होना सम्भव नहीं। शंकुक अपने सिद्धान्त की इस दुर्बलता से सम्भवतः अभिज्ञ थे, इसीलिए उन्होंने इसे सामान्य अनुमान से विलक्षण माना है। रस के अनुमान की कल्पना वस्तुतः भ्रान्त है और इसके कारण अनेक कठिनाइयाँ उपस्थित हो गई हैं। भाव का अनुमान हो सकता है, परन्तु वह परोक्ष-रूप ही रहता है, अनुभूति-रूप नहीं। इसके प्रतिकूल रस का आस्वाद साक्षात् और अनुभूति-रूप होता है। इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि रस के अनुमान की कल्पना अनुभव से असिद्ध है। ३. शंकुक के सिद्धान्त का तीसरा दोष यह है कि रस में अभिनय-तत्त्व की प्रधानता हो जाती है और काव्य-तत्त्व गौण हो जाता है। यह भारतीय चिन्तनधारा के प्रतिकूल पड़ जाता है। भारतीय काव्यशास्त्र में अभिनय की अपेक्षा काव्य अधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है। शंकुक ने रस को नट के द्वारा अनुकरण और काव्य को नट-कौशल का सहायक माना, जिससे परम्परागत कम उलट गया है॥ कि कििक के कनऊणी चह ि

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झकरी जी शाड: रस [३२५

(ग) सांख्यवादी व्याख्याकार : श्रीशंकुक के मत का खण्डन करने के पश्चात् अभिनवगुप्त ने किसी सांख्यवादी के मत का खण्डन किया है, परन्तु उस सांख्यवादी के नाम का उल्लेख नहीं किया है। उन्होंने अभिनवभारती में उस व्याख्याकार के सिद्धान्त का उद्धरण दिया है। समीक्षा : सांख्यवादी व्याख्याकार के इस मत में दोष इस स्पष्टता से प्रकट है कि अभिनवगुप्त ने उनका खण्डन करना भी आवश्यक नहीं समझा। रस के वस्तुपरक विवेचन का स्थूलतम रूप यहाँ दिखाई देता है। इस सिद्धान्त में रस रंगमंच पर उपस्थित बाह्य अभिनय के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। भाव-तत्त्व का नितान्त अभाव ही है और संचारी भाव भी अभिनय के द्वारा दृश्यरूप हो जाते हैं। भरत ने भी वस्तुपरक दृष्टिकोण अपनाया है, परन्तु उन्होंने रस को अनिवार्य रूप से स्थायी भाव पर आधृत किया है। व्याख्याकार का यह मत भरत के मत के प्रतिकूल होने के अतिरिक्त विवेक-बल से भी रहित है। इस मत के अनुसार प्रेक्षक सुन्दर नाट्याभिनय देखकर अपनी प्रकृति के अनुरूप सुख, दुःख अथवा मोह का अनुभव करता है। स्पष्टतः, प्रत्यक्ष जीवन के अनुभव और कला की अनुभूति में कोई अन्तर नहीं रह जाता। कलात्मक अनुभूति विशुद्ध रूप से ऐन्द्रिय अनुभूति बनकर रह जाती है।

(घ) भट्टनायक का भुक्तिवाद : भरत मुनि के प्रसिद्ध रससूत्र के तीसरे प्रमुख व्याख्याता भट्टनायक हैं। यद्यपि अभिनवगुप्त ने भट्टनायक के भुक्तिवाद का खण्डन ही किया है, फिर भी उन्होंने इनके मत का विवेचन अभिनवभारती और ध्वन्यालोक- लोचन२ में अधिक विस्तार और साथ ही सम्मान से किया है। इससे अधिक उपयोगी मम्मट द्वारा काव्यप्रकाश में दिया गया उद्धरण है। वह अत्यन्त संक्षिप्त होते हुए भी भट्टनायक का मत स्पष्ट करने में बहुत सहायक है।3 अभिनवभारती और काव्यप्रकाश के उद्धरणों में दो स्थलों पर अन्तर है, जो बहुत महत्त्वपूर्ण है। भट्टनायक के सिद्धान्त का सारांश : भट्टनायक के रस-सिद्धान्त के दो पक्ष हैं : निषेध-पक्ष और विधि-पक्ष।

निषेध-पक्ष : निषेध-पक्ष में भट्टनायक ने रस की प्रतीति, उत्पत्ति तथा अभिव्यक्ति का खण्डन किया है। प्रतीति तथा उत्पत्ति का सम्बन्ध भट्टलोल्लट के मत से है और दोनों का तात्पर्य प्रायः एक ही है। अभिव्यक्तिवाद का सम्बन्ध आनन्दवर्द्धन के ध्वनि-सिद्धान्त तथा व्यंजना-सिद्धान्त से है। भट्टनायक इन दोनों सिद्धान्तों को बिल्कुल नहीं मानते।

१. हिन्दी-अभिनवभारती (आचार्य विश्वेश्वर), अध्याय ६, पृ० ४६२-४६५ २. ध्वन्यालोकलोचन (टीका०-आचार्य जगन्नाथ पाठक), उद्योत, पृ० २९०-२९३ ३. काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, सू० ४३ के बाद गद्य

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१. पहले भट्टनायक ने प्रतीति पर विचार किया और फिर उसकी प्रक्रिया का निरूपण अपने अनुसार किया। प्रतीति के विषय में पहला प्रश्न यह है कि वह परगत होती है या स्वगत, अर्थात् सहृदय को रस का बोध अनुकार्य राम या अनुकर्त्ता नट में होता है या स्वयं अपने में। भट्टनायक के मत में दोनों में से किसी को भी स्वीकार करना उचित नहीं। इसके निम्नलिखित कारण हैं: अधगुन (क) यदि रस को परगत अर्थात् अनुकार्य राम या अनुकर्त्ता नट में मानते हैं तो सहृदय एक तटस्थ व्यक्ति बन जाता है, उसे रस से क्या वास्ता ? उसे क्या पड़ी है कि वह किसी दूसरे व्यक्ति के रस में आनन्द का अनुभव करे? म (ख) यदि रस स्वगत है अर्थात् यह माना जाय कि सहृदय को स्वयं ही रस की प्रतीति होती है, तो इसमें कई बाधाएँ उपस्थित हो जाती हैं। प्रतीति या तो प्रत्यक्ष हो सकती है या परोक्ष। यदि रस की प्रत्यक्ष प्रतीति मानी जाय, तो करुण रस में नायक- नायिका के शोक से सामाजिक को भी शोक का अनुभव होने लगेगा। दूसरी ओर, शृंगार रस में अन्य व्यक्तियों की प्रेम-क्रीड़ा देखकर सहृदय के चित्त में लज्जा, जुगुप्सा आदि का उदय होगा; जिससे चित्त की तन्मयता समाप्त हो जायगी; फलस्वरूप रसानुभूति में बाधा पड़ेगी। किन्तु, वास्तव में प्रेक्षक के हृदय में न शोक उत्पन्न होता है और न लज्जा, जुगुप्सा आदि। इसका कारण यह है कि प्रेक्षक ने वास्तविक राम-सीता को कभी देखा नहीं है, जिन्होंने दुःख या सम्भोग-सुख का अनुभव किया था। राम-सीता के कलात्मक रूप ही रस के विभाव हो सकते हैं, अतः प्रत्यक्ष प्रतीति का प्रश्न ही नहीं उठता, जिसमें दुःख से दुःख तथा रतिकीड़ा से लज्जा, जुगुप्सा आदि की उत्पत्ति होती है। राम और सीता तो रस के विभाव नहीं हैं, और रस जब उत्पन्न होगा तो विभाव से ही। जब कारण ही वास्तविक नहीं है तो फिर कार्य वास्तविक कैसे हो सकता है? कोई यह उत्तर दे सकता है कि ऐसी अवस्था में प्रेक्षक को अपनी प्रिया की स्मृति हो सकती है और इस दशा में स्वगत रस की उत्पत्ति सम्भव है। परन्तु, यह उत्तर भी संगत नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ऐसी स्थिति में भी चित्त की तन्मयता समाप्त हो जायगी, जो रसोत्पत्ति के लिए आवश्यक है। इसके अतिरिक्त काव्य के विभाव सीता, पार्वती आदि में सहृदय की पूज्य बुद्धि है। उनमें सामान्य कान्तात्व का आरोप नहीं किया जा सकता, जिससे सहज ही रतिभाव का उद्बोध हो जाय। दूसरे, यह भी नहीं होता कि प्रेक्षक तत्काल अपनी पत्नी का स्मरण करने लग जाय। फिर राम द्वारा समुद्र- बन्धन और हनुमान द्वारा समुद्र-लंघन जैसे अलौकिक कार्यों के विषय में क्या कहा जा सकता है ? इन असाधारण कार्यों की प्रतीति सहृदय प्रेक्षक को कसे ही सकती है; क्योंकि अलौकिक पात्रों का तो साधारणीकरण ही सम्भव नहीं है। इस प्रकार, साधारणीकरण के सम्भव नहीं होने के कारण स्वगत रूप से भी रस की प्रतीति सिद्ध नहीं होती। (ग) परोक्ष प्रतीति के भी दो रूप होते हैं : १ शब्दार्थ ज्ञान और २. स्मृति। इनमें शब्दार्थ ज्ञान से तो साक्षात्कारात्मक अनुभूति किसी भी प्रकार सम्भव नहीं है,

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क्योंकि अर्थ के ज्ञान-मात्र में आस्वाद कभी नहीं हो सकता। यदि काव्य-रूप शब्द से ही प्रतीति मानें, तब तो लोक में प्रत्यक्ष नायक-नायिका को देखकर ही द्रष्टा को रस उत्पन्न हो जाना चाहिए। स्मृति की कल्पना भी अर्थयुक्त नहीं है; क्योंकि हमें उसी का स्मरण होता है, जिसे हमने प्रत्यक्ष रूप से देखा है या जिसका अनुभव किया है। यदि राम के उत्साह के स्मरण को साधारणीकरण में सहायक मानते हैं तब भी पूर्व अनुभव नहीं रहने के कारण स्मरण भी नहीं बनता है। रावण के बन्दी-गृह में शोकमग्न सीता को या सीता के विरह में दुःखी राम को हमने नहीं देखा है, इसलिए उनका स्मरण करना हमारे लिए असम्भव है। इस प्रकार, रस की परोक्ष प्रतीति भी सिद्ध नहीं होती। २. सामाजिकों में रस की उत्पत्ति के सिद्धान्त के विरुद्ध भी उपर्युक्त सभी तर्क उपस्थित किये जा सकते हैं। उत्पत्ति मानने में एक और कठिनाई यह है कि करुण रस के उत्पन्न होने पर दुःखी हो जाने के कारण सामाजिक किसी प्रकार पुनः करुण रस की प्रेक्षा में प्रवृत्त नहीं होंगे। इन कारणों से सहृदय में रस की उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती। ३. रस की अभिव्यक्ति के सिद्धान्त के विरोध में भी पहले तो परगतत्व और स्वगतत्व का ही प्रश्न उठ खड़ा होता है। यदि पूर्व स्थित रस की अभिव्यक्ति परगत अर्थात् अनुकार्य रामादि या अनुकर्त्ता नट में मानी जाय, तो फिर वही प्रश्न होगा कि इससे सहृदय प्रेक्षक को क्या? यदि रस की अभिव्यक्ति स्वगत अर्थात् प्रेक्षक के चित्त में मानी जाय, तो विभावादि अभिव्यंजक कारणों के न्यूनाधिक्य से रसों की अभिव्यक्ति में भी न्यूनाधिक्य की कल्पना करनी होगी। जो शृंगार वासना के रूप में सहृदय के चित्त में विद्यमान रहता है, उसकी अभिव्यक्ति स्वीकार करने पर कान्ता आदि विभावों के तारतम्य की स्थिति में अभिव्यक्ति में भी तारतम्य होगा। जिस प्रकार, अभिव्यंजक दीपक अन्धकार में पड़ी वस्तु की अभिव्यक्ति अधिक-से-अधिक तभी कर सकता है, जब उससे अधिक-से-अधिक प्रखर आलोक विकीर्ण होगा, उसी प्रकार काव्य में भी अभिव्यंजक विभावादि की शक्ति के न्यूनाधिक्य से रस की अभिव्यक्ति में भी न्यूनाधिक्य सिद्ध हो जायगा। किन्तु, यह बात रस की अखण्डता में बाधक होने के कारण अमान्य है। इस प्रकार रस की अभिव्यक्ति का सिद्धान्त मान्य नहीं हो सकता। इस प्रकार, भट्टनायक काव्य से रस के प्रतीत, उत्पन्न अथवा अभिव्यक्त होने के सिद्धान्तों का खण्डन करके अपने मत की स्थापना करते हैं। विधिपक्ष : भट्टनायक के मतानुसार रस की भुक्ति होती है। चूँकि काव्यात्मक शब्द अन्य शब्दों से विलक्षण होते हैं, इसलिए उन्होंने शब्द के तीन व्यापार-अभिधा, भावकत्व तथा भोजकत्व-माने हैं। इनमें प्रथम अर्थ-विषयक व्यापार है, द्वितीय रस- विषयक तथा तृतीय सहृदय-विषयक व्यापार हैं। इसी को दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सहृदय को रस-अवस्था तक पहुँचने के लिए तीन मानसिक अवस्थाओं को पार करना पड़ता है।

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१. 'अभिधा' शब्द का सामान्य एवं प्रथम व्यापार है, जिससे काव्य के शब्द का अर्थ जाना जाता है। यह काव्य, शास्त्रादि सभी में एक ही रीति से व्याप्त रहता है। इस व्यापार की क्रिया से प्रेक्षक या पाठक शब्दों का साहित्यिक अभिप्राय और महत्त्व समझता है। अभिधा-शक्ति विभावादि के साधारणीकरण-रूप में कार्य करती है। अभिधा का यह रूप अत्यन्त प्रसिद्ध है, अतः भट्टनायक ने इसका कोई विस्तृत विवेचन नहीं किया। स्मरणीय है कि भट्टनायक ने अपनी अभिधा-शक्ति के अन्तर्गत लक्षणा को भी सम्मिलित कर लिया है : 'अमिधाधामता याते शब्दार्थालडकृतो ततः।"

२. दूसरा व्यापार भावकत्व है। केवल काव्य तथा नाटक में ही इसकी सत्ता मिलती है। काव्य में दोषाभाव तथा गुण एवं अलंकार की स्थिति और नाटक में चार प्रकार के अभिनय के कारण शास्त्रादि से भिन्न रीति के समार्थ्य उत्पन्न हो जाते हैं। शास्त्रादि में शब्द में अभिधा-शक्ति से केवल अर्थ का ज्ञान होता है, परन्तु काव्य में भावकत्व- व्यापार के कारण अनेक अन्य प्रकार की विशेषताएँ समाविष्ट हो जाती हैं; उदाहरणार्थ-

(क) सहृदय के चित्त से व्यक्तिगत राग-द्वष की भावना तिरोहित हो जाती है। उस समय उसके चित्त में अपने-पराये की भावना नहीं रहती। यही अपने-पराये की भावना आनन्दानुभूति में प्रमुख बाधा है। किन्तु, काव्य में भावकत्व के कारण सामाजिक अथवा पाठक कुछ समय के लिए अपनी भौतिकता तथा वैयक्तिकता को भूलकर निर्वयक्तिक अवस्था में पहुँच जाता है। इसलिए, वह अपने सम्बन्ध से परे काव्यगत पात्रों, अवस्थाओं, परिस्थितियों तथा वर्णनों को देखकर या पढ़कर तन्मय हो जाता है। इसी तन्मयता की अवस्था में आत्मविस्तार होता है, जिससे अन्त में साधारणीकरण हो जाता है। (ख) विभावादि का साधारणीकरण हो जाता है। यह साधारणीकरण भावकत्व- व्यापार का मूल गुण है। (ग) इस व्यापार की तीसरी विशेषता है कि रस भावित हो जाता है अर्थात् स्थायी भाव भावित होकर रस में परिवर्त्तित हो जाता है। यही रस की निष्पत्ति है। इस स्थल पर निष्पत्ति का अर्थ है स्थायी भाव का भावित हो जाना। यहाँ 'भावित' शब्द के अर्थ पर ध्यान देना चाहिए। आचार्य विश्वेश्वर ने काव्यप्रकाश की कई टीकाओं के आधार पर 'भावित' का अर्थ किया है 'साधारणीकृत'। परन्तु, डॉ० प्रेमस्वरूप गुप्त के अनुसार भट्टनायक का अभिप्राय साधारणीकरण नहीं, अपितु 'भावन' है। डॉ० नगेन्द्र ने 'भावन' शब्द की व्याख्या करके बताया है कि इसका अर्थ है 'कल्पनात्मक प्रतीति' और स्थायी भाव की कल्पनात्मक प्रतीति तथा साधारणीकरण में कोई अन्तर नहीं रह जाता। T18 इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि भावकत्व-व्यापार का कारण है-शब्दार्थ के दोष का अभाव तथा गुणालंकार की स्थिति या विद्यमानता, जिसे आधुनिक शब्दावली में कल्पना- १. हृदयदर्पण (समीक्षा-दर्शन में श्रीरामलाल सिंह द्वारा उद्धृत)

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तत्त्व का समावेश कह सकते हैं। भावकत्व-व्यापार का कार्य है काव्य-सामग्री का साधारणी- करण, जिसके परिणाम-स्वरूप सहृदय के चित्त की व्यक्तिगत संसर्गों से मुक्ति हो जाती है; दूसरे शब्दों में कहा जाय कि चित्त का विस्तार हो जाता है। अन्त में, इन दोनों करियाओं से सहृदय का स्थायी भाव, भावित होकर रस में परिणत हो जाता है। ३. तीसरा व्यापार भोजकत्व है। भावकत्व द्वारा सिद्ध रस का भोग सहृदय इसी भोजकत्व-व्यापार द्वारा करता है। यह भोग प्रत्यक्ष तथा परोक्ष-अनुभव तथा स्मृति से विलक्षण प्रकार का अनुभव है। भोग-व्यापार की प्रक्रिया में सहृदय के रजस् तथा तमस् गुण दब जाते हैं और सत्त्व गुण का प्राधान्य हो जाता है। मम्मट ने कहा है : येन रजस्तमसोस्तिरस्कार: आनन्दाकारावृत्ति: विषयान्तरतिरस्कारश्च स व्यापारो भोजकत्वमिति बोध्यम्।' इस समय सहृदय का चित्त सत्त्व का उद्रेक होने के कारण चैतन्य के प्रकाश से परिपूर्ण और आनन्दमग्न रहता है, तो भी रजस तथा तमस् के सम्मिश्रण की विचित्रता के प्रभाव से चित्त में द्रुति, विस्तार एवं विकास की भी स्थिति वर्त्तमान रहती है। इस स्थिति में संविद् (संकल्प) की विश्रान्ति के कारण आत्म-साक्षात्कार की अवस्था रहती है। यह भोग परब्रह्म के आस्वाद के समान विलक्षण होता है। ब्रह्मास्वाद के समान ही होता है, तद्रूप नहीं होता; क्योंकि इसमें रजोगुण तथा तमोगुण का भी थोड़ा मिश्रण रहता है। रसानन्द अपनी निवैयक्तिकता, सत्त्वोद्र कता, चिन्मयता, वेद्यान्तर स्पर्श-शून्यता तथा संविद् विश्रान्ति नाम की विशेषताओं के कारण ब्रह्मानन्द-सहोदर कहा जाता है। रस आस्वाद-रूप नहीं होता, प्रत्युत भोज्य अथवा आस्वाद्य होता है। सहृदय के चित्त में स्थित स्थायी भाव ही कल्पना का विषय बनकर-भावित बनकर-रसरूप में परिणत हो जाता है। तब सहृदय उसका भोग अथवा आनन्दमय आस्वादन करता है। रस सहृदय के स्थायी भाव की ही कल्पनात्मक प्रतीति है, फिर भी वह आनन्दमयी चेतना का रूप नहीं होकर केवल उसका विषय है। इस प्रकार, भट्टनायक की रस-कल्पना में भी वस्तु-तत्त्व या विषय-तत्त्व असन्दिग्ध रूप से वत्तंमान है। इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि भट्टनायक का दृष्टिकोण अपने पूर्ववर्ती आचार्यों-भरत, लोल्लट तथा शंकुक- की अपेक्षा अधिक आत्मपरक या व्यक्तिपरक है, फिर भी अभिनवगुप्त की अपेक्षा वस्तुपरक है। इस विवेचन के आधार पर निष्पत्ति का अर्थ हुआ भावित होना। रस की निष्पत्ति का अर्थ हुआ विभावादि के साथ संयोग होने से स्थायी भाव भावित होकर रसरूप में परिवर्त्तित हो जाता है। विभावादि भावक हैं, अर्थात् भावन-क्रिया के कारण-स्वरूप हैं। स्थायी भाव भाव्य हैं। इस प्रकार, संयोग का अर्थ हुआ भावक-भाव्य-सम्बन्ध। परम्परा से संयोग का अर्थ भोजक-भोज्य-सम्बन्ध माना जाता रहा है, परन्तु इस विवेचन से भोजक

१. काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास

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भोज्य-सम्बन्ध सिद्ध नहीं होता; क्योंकि इस सिद्धान्त के अनुसार रस की निष्पत्ति स्थायी भाव के भावित होने में ही है। रस के सिद्ध या निष्पन्न हो जाने के बाद ही सहृदय के द्वारा इसकी भुक्ति होती है। इस विवेचन से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि रस का स्थान सहृदय का चित्त ही है। कुछ विद्वानों की धारणा है कि भट्टनायक शब्दार्थ में ही रस की स्थिति मानते हैं, परन्तु अभिनवभारती में उद्धत भट्टनायक के सिद्धान्त के विश्लेषण तथा अभिनवगुप्त द्वारा उसके खण्डन से इस धारणा की निस्सारता सिद्ध हो जाती है। अभिनवभारती में भट्टनायक का जो मन्तव्य उद्धत किया गया है, उसके विश्लेषण से ज्ञात होता है कि भावकत्व और भोजकत्व शब्दार्थ के व्यापार हैं। भावकत्व से दो कार्य होते हैं : १. विभावादि का साधारणीकरण, २. सहृदय के चित्त का व्यक्ति-संसर्गों से मुक्त होकर विशद होना। इन दोनों कार्यों के फलस्वरूप स्थायी भाव भावित होकर रसरूप धारण करता है। इस विश्लेषण से हमें दो परिणाम प्राप्त होते हैं : १. शब्दार्थ भोग का विषय नहीं है वरन् वह केवल हेतु ही हो सकता है; क्योंकि शब्दार्थ के भावकत्व तथा भोजकत्व-व्यापार रस का भावन तथा भोग करनेवाले हैं। २. भोग का विषय रस है और रस भावित स्थायी भाव ही है; क्योंकि भट्टनायक के मतानुसार स्थायी भाव ही भावित होकर रसरूप में परिणत हो जाता है। इसलिए, अन्त में स्थायी भाव ही भोग का विषय है। स्थायी भाव की सत्ता शब्दार्थ में मानना भ्रम है; क्योंकि शब्दार्थ तो आधार नहीं हो सकता, केवल माध्यम या प्रतीक हो सकता है। स्थायी भाव की सत्ता व्यक्ति में ही सम्भव है। ऐसी अवस्था में रस का आधार शब्दार्थ या काव्य को नहीं माना जा सकता। काव्य में रस की स्थिति केवल उपचार के लिए है। अब यहाँ एक प्रश्न उठता है कि भट्टनायक स्थायी भाव का प्रयोग किस अर्थ में करते हैं? आखिर यह किसका स्थायी भाव है ? हम पहले देख चुके हैं कि भरत का अभिप्रेत स्थायी भाव लोक का स्थायी भाव है, भट्टलोल्लट का अभिप्राय अनुकार्य के स्थायी भाव से है और श्रीशंकुक का स्थायी भाव मूलतः अनुकार्यगत तथा प्रत्यक्ष रूप से नटगत स्थायी भाव है। इन तीन पूर्ववर्त्ती नाट्याचार्यों ने स्थायी भाव को तीन विभिन्न अर्थों में ग्रहण किया है। परन्तु, ये तीनों रूप सहृदय की दृष्टि से विषयगत ही हैं। भट्टनायक ने भी स्थायी भाव के भोग की चर्चा की है, परन्तु उनका स्थायी भाव विषयगत नहीं है। उनके अनुसार सहृदय का चित्त व्यक्तिगत राग-द्वेष से युक्त होकर स्थायी भाव का साधारणीकृत रूप में भोग करता है। इस प्रकार, हम देखते हैं कि भट्टनायक का आशय सहृदय के स्थायी भाव से है। सहृदय भावकत्व-व्यापार के द्वारा अपने स्थायी भाव का साधारणीकृत रूप में अनुभव करता है और इस प्रकार जो रस सिद्ध होता है, उसका भोजकत्व-व्यापार द्वारा भोग करता है। स्पष्टतः भट्टनायक के मतानुसार रस का स्थान शब्दार्थ नहीं, प्रत्युत सहृदय का चित्त ही है।

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रस [ ३३१

भुक्तिवाद की विशेषताएँ : रस-सिद्धान्त के विकास के इतिहास में भट्टनायक का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस दिशा में उनकी देन मौलिक तथा बहुमूल्य है। उनपर जो आक्षेप लगाये जाते हैं, उनमें अधिकतर तर्कशास्त्र की केवल युक्तियाँ हैं, परन्तु उनकी मौलिक उद्भावनाओं का महत्त्व भारतीय काव्यशास्त्र में, और विशेषतः रस-सिद्धान्त में, निराला है। भट्टनायक के सिद्धान्त भुक्तिवाद की महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ निम्नलिखित हैं : १. भट्टनायक ही सर्वप्रथम आचार्य हैं, जिन्होंने रसास्वाद के स्वरूप की तात्त्विक व्याख्या उपस्थित की। यह श्रेय सर्वांशतः उन्हें ही मिला। उनसे पहले काव्यास्वाद के लिए अनेक शब्दों का प्रयोग किया जाता था, परन्तु अभीतक किसी भी आचार्य ने रसास्वाद के स्वरूप का विश्लेषण नहीं किया था। पहली बार भट्टनायक ने ही इस विषय में प्रयत्न किया और उन्हें अच्छी सफलता भी मिली। उन्होंने बताया कि रसास्वाद या काव्यानन्द चित्त में विश्रान्ति को कहते हैं। यह विश्रान्ति सत्त्व गुण के उद्रेक की दशा में होती है, जब रजस् और तमस् का शमन तो हो गया रहता है, परन्तु उनका पूर्णतया अभाव नहीं होता। अतः, रसास्वाद शुद्ध आत्म-विश्रान्ति से निम्नतर कोटि का होता है, अर्थात् ब्रह्मास्वादविध होता है, ब्रह्मास्वाद नहीं। इस प्रकार, सबसे पहले भट्टनायक ने ही आत्मानन्द या ब्रह्मानन्द से काव्यास्वाद या रसास्वाद की समता और अन्तर बताते हुए उसका स्वरूप-निर्णय किया। भट्टनायक का यह मत अन्त तक उसी रूप में माना जाता रहा। २. भट्टनायक ने ही सबसे पहले रस की आनन्दरूपता का स्पष्ट तथा असन्दिग्ध विवेचन किया। आत्म-विश्रान्ति तथा साधारणीकरण के सिद्धान्तों से उन्होंने अत्यन्त प्रामाणिक ढंग से सिद्ध किया कि करुण आदि रस भी आनन्ददायक या आनन्दरूप होते हैं। ३. किन्तु, भट्टनायक की सबसे बड़ी उपलब्धि साधारणीकरणवाला उनका सिद्धान्त है। काव्यास्वादन के प्रसंग में एक बहुत मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह रहा है कि काव्य में कवि के या कवि-निबद्ध पात्र के भाव सहृदय के लिए आस्वाद्य किस प्रकार बन जाते हैं ? ये भाव एक ही सहृदय के नहीं, प्रत्युत समस्त सहृदय-समाज के कैसे बन जाते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर भट्टनायक ने अपने साधारणीकरण के सिद्धान्त की उद्भावना करके दिया। वस्तुतः, यह प्रश्न आलोचनाशास्त्र का एक मूल और महत्त्वपूर्ण आधार है और भट्टनायक ने इस प्रश्न का उत्तर देकर आलोचनाशास्त्र के इतिहास में अद्वितीय सफलता प्राप्त की। इस साधारणीकरण की उद्भावना के कारण भट्टनायक भारतीय आलोचनाशास्त्र के इतिहास में अमर हैं। इस सिद्धान्त के दोष : अभिनवगुप्त ने भट्टनायक के सिद्धान्त पर अनेक आक्षेप किये हैं, जो निम्नलिख़ित हैं :

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३३२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास १. अभिनवगुप्त रस तथा रस-भोग का अन्तर मानने को तैयार नहीं हैं। वे इस बात में आपत्ति नहीं करते कि भावित स्थायी भाव ही रस है। किन्तु, यह भाव अन्त में आस्वाद-रूप ही हो जाता है, इसलिए आस्वाद और आस्वाद्य अथवा रस और रस-भोग के जिस अन्तर की कल्पना भट्टनायक ने की है, वह अभिनवगुप्त के मत से असंगत है। २. प्रतीति और भुक्ति का जो भेद भट्टनायक ने किया है, वह ठीक नहीं है। वस्तुतः, मुक्ति की प्रतीति ही है; क्योंकि प्रतीति के बिना किसी प्रकार का व्यवहार नहीं हो सकता। इसलिए, रस-प्रतीति का खण्डन करके रस-भुक्ति की जो स्थापना की गई है, वह संगत नहीं है। ३. भट्टनायक ने भोग के स्वरूप की जो व्याख्या प्रस्तुत की है, वह तात्त्विक नहीं कही जा सकती। उनके अनुसार भोग का तात्पर्य है सत्त्वोद्रक की अवस्था में चित्त की विश्रान्ति, जो प्रकाशानन्दमयी तो होती ही है, परन्तु साथ ही जिसमें रजस तथा तमस् का भी सम्मिश्रण रहता है, जिसके कारण उस दशा में भी चित्त में द्रु ति-विस्तार तथा विकास की प्रवृत्तियाँ विद्यमान रहती हैं। अभिनवगुप्त रस-भोग में चित्त की इन तीन अवस्थाओं की स्थिति स्वीकार नहीं करते। इस प्रसंग में उनका तर्क है कि जितने भी रस होते हैं, उतनी रस-प्रवृत्तियाँ सम्भव हैं। केवल इतना ही नहीं, सत्त्व आदि गुणों के मात्रा-भेद से प्रत्येक भाव की अनुभूति में चित्त की भिन्न दशा सम्भव है। इसलिए, रसास्वादन में चित्त की तीन ही दशाएँ-द्र ति, विस्तार तथा विकास क्यों मानें? ४. यदि रस की उत्पत्ति और अभिव्यक्ति दोनों नहीं मानते हैं तो उसे या तो नित्य मान सकते हैं या असत्; क्योंकि जो नित्य है, उसकी उत्पत्ति नहीं होती और जो असत् है, उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती। दूसरे शब्दों में यह तर्क इस रूप में भी रखा जा सकता है : ऐसी कोई भी सत्ता नहीं हो सकती, जिसकी न उत्पत्ति होती है और न अभिव्यक्ति ही होती है। यदि वह सत्ता सत् है, तो उसकी अभिव्यक्ति होना आवश्यक है और यदि वह असत् है, तो उसकी उत्पत्ति होना आवश्यक है। विश्व में जितने भी तत्त्व हैं, उनकी सत्ता की कल्पना इन दोनों पद्धतियों में से किसी एक के माध्यम से अवश्य होती है। अतएव, रस की उत्पत्ति और अभिव्यक्ति दोनों को नहीं मानने का अर्थ रस की सत्ता को ही नहीं मानना है। ५. भट्टनायक ने भावकत्व और भोजकत्व नाम के दो व्यापारों की जो कल्पना की है, उसका कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं है। इन दोनों का ही काम व्यंजना से चल जाता है। भट्टनायक को भी इस व्यंजना-व्यापार का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ा है। यदि एक बार व्यंजना की सत्ता स्वीकार कर ली गई, तो फिर भावकत्व और भोजकत्व दो अतिरिक्त व्यापारों के मानने की कोई आवश्यकता ही कहाँ रह जाती है? ६. उपर्युक्त आक्षेपों के अतिरिक्त भट्टनायक के इस सिद्धान्त पर एक अन्य आक्षेप यह किया जाता है कि उन्होंने रस-प्रक्रिया के विवेचन में रसानन्द की तुलना ब्रह्मानन्द से करके काव्यानन्द के वैज्ञानिक विवेचन में गूढ़ता ला दी है। दर्शन जैसे विषय में अलौकिक

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तथा अनिवचनीय जैसे शब्दों का प्रयोग भले ही उपयुक्त हो, किन्तु सौन्दर्यशास्त्र के समान वैज्ञानिक विषय में ऐसे शब्दों का प्रयोग व्याख्या को और गूढ़ बना देता है। इससे उसका मौलिक तथा वस्तुगत स्वरूप उपस्थित नहीं हो पाता। T भट्टनायक का अन्य ग्रन्थ हृदय-दर्पण, जिसमें रस का विवेचन है, ध्वनि-ध्वंस कहा जाता है। यह ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु इसके उपलब्ध उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि इसकी रचना ध्वनिवाद के खण्डन के लिए ही की गई थी। इससे परोक्ष रूप से यह भी ज्ञात होता है कि भट्टनायक अपने समय में ध्वनि-विरोधी विद्वानों के नेता थे। इसीलिए उनका सिद्धान्त धवनिवाद के खण्डन की ओर ही सदा रहा, फलस्वरूप रस की प्रक्रिया तथा स्वरूप को प्रस्तुत करने में उनकी दृष्टि एकांगी रही। निष्कर्ष : उपर्युक्त कई दोषों के रहने पर भी भट्टनायक के विषय में कहना होगा कि उन्होंने रस-सिद्धान्त को एक निश्चित दिशा दी और रस-प्रक्रिया के अन्तिम आचार्य अभिनवगुप्त भी उनके बहुत आभारी हैं। अभिनवगुप्त के अभिव्यक्तिवाद के बहुत-से विचार भट्टनायक के भुक्तिवाद के विचारों पर आधारित हैं। कई स्थानों पर दोनों के विचार एक ही हैं, शब्दों में अन्तर जो हो। भट्टनायक का अभिधा-व्यापार तथा अभिनव-गुप्त की वाक्यार्थ-प्रतिपत्ति एक ही हैं। दोनों के साधारणीकरण का सिद्धान्त लगभग एक ही है। 'संविद्विश्रान्ति' को दोनों ही मानते हैं। भट्टनायक का रस-भोग अभिनव की रस-चर्वणा ही है। (ङ) अभिनवगुप्त का अभिव्यक्तिवाद : अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के सिद्धान्तों का सम्यक परीक्षण करने के पश्चात् अभिनवगुप्त ने अपने सिद्धान्त की स्थापना की है। इस प्रसंग में ध्यातव्य है कि उन्होंने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के सिद्धान्तों की आलोचना करते समय 'खण्डन' शब्द नहीं, प्रत्युत 'संशोधन' शब्द का ही प्रयोग किया है। उनका कहना है कि मैंने पूर्ववर्त्ती आचार्यों के विचारों का परीक्षण करने के उपरान्त संशोधन-मात्र किया है, खण्डन नहीं; क्योंकि पूर्ववर्त्ती आचार्यों द्वारा स्थापित सिद्धान्तों की ठीक से संगति लगा देने में भी मौलिक सिद्धान्तों की स्थापना का-सा ही फल मिलता है। अभिनवगुप्त का यह वक्तव्य काव्यशास्त्र के आचार्यों का मूल्य-निर्धारण करने के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। जिन आचार्यों ने काव्यशास्त्र के नवीन सिद्धान्तों का आविष्कार किया है, केवल वे ही उद्भावक आचार्य नहीं हैं, प्रत्युत पुनराख्यान करनेवाले विचारक भी उसी कोटि में आते हैं। अभिनवगुप्त के विषय में भी यही बात लागू होती है। उनके रस-विषयक विचार अभिनवभारती और ध्वन्यालोकलोचन दोनों ग्रन्थों में उपलब्ध होते हैं। उन्होंने अपने सिद्धान्त का विस्तृत विवेचन अभिनवभारती में किया है, परन्तु अपने सिद्धान्त का विवेचन ध्वन्यालोकलोचन में और भी स्पष्ट रीति से किया; क्योंकि ध्वनि के सन्दर्भ में उसे स्पष्ट करने का उन्हें अधिक अवसर मिला है। अभिनवगुप्त के सिद्धान्त का सारांश : १. जब रत्यादि भाव नाटक या काव्य के उपकरणों से साधारणीकृत हो जाते हैं और देश-काल, स्व-पर, व्यक्तिगत राग-द्वष आदि

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की चेतना से मुक्त हो जाते हैं, आस्वाद्य या सुखमय प्रतीति के योग्य बन जाते हैं। यह आस्वाद्य होने का भाव और उसकी सुखमय प्रतीति ही रस है। अभिनवगुप्त का सिद्धान्त शुद्ध अद्वंत-भावना से प्रेरित है। अतः उनके सिद्धान्त से वास्तव में सुखमय प्रतीति ही रस है। इस सुखमय प्रतीति का विषय साधारणीकृत भाव है और उसे ही रस कहा जा सकता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि 'सर्वथा आस्वादात्मक एवं निर्विघ्न प्रतीति से ग्राह्य भाव ही रस है।" S1 २. रसास्वादन की अवस्था में सहृदय तटस्थ द्रष्टा के रूप में माना गया है; वह नाट्यवस्तु में संलग्न है भी, और नहीं भी है। वह उस विभावादि के ऐसा उपेक्षाशील नहीं है कि ध्यान ही न दे और ऐसा संसक्त भी नहीं कि उसमें बह जाय। तात्पर्य यह कि रस की प्रतीति तो सहृदय की आत्मा के ही द्वारा होती है, परन्तु यह प्रतीति व्यक्तिगत नहीं हुआ करती। ३. यह साधारणीकरण व्यष्टि और समष्टि दोनों के धरातल पर होता है। आत्म- तत्त्व की अद्वतता के कारण सभी सामाजिक भाव की प्रतीति समान रूप से करते हैं। इससे साधारणीकरण-व्यापार बहुत पुष्ट हो जाता है। तात्पर्य यह कि व्यक्तिगत राग- द्वष से पूर्ण मुक्ति हो जाने से आस्वादन पूर्ण रूप से आनन्दमय हो जाता है। ४. स्थायी भाव वासना या संस्कार-रूप में प्रत्येक सहृदय के चित्त में स्वयंसिद्ध रूप में विद्यमान रहते हैं। संस्कार-रूप होने के कारण वे समान भी होते हैं। ५. सहृदय व्यक्ति को काव्यात्मक वाक्य से सामान्य अर्थ-ज्ञान के अतिरिक्त एक विशेष प्रतीति भी होती है। सामान्य अर्थज्ञान और इस विशेष प्रतीति में अन्तर यह है कि यह प्रतीति वाक्य में लिये गये काल आदि के विभाग से सर्वथा मुक्त या साधारणीकृत होती है और इससे कल्पना में एक चित्र-सा खिंच जाता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अर्थज्ञान धारणा-रूप होता है और यह प्रतीति बिम्ब-रूप होती है।

६. शब्दार्थ में गुणालंकार के समुचित समावेश के ही आधार पर यह विशिष्टता उत्पन्न होती है। भट्टनायक ने इसे भावकत्व-व्यापार के ही अन्तर्गत माना है। प्रत्येक व्यापार के तीन अंग माने गये हैं-करण, फल और इतिकर्त्तव्यता। अभिनवगुप्त के मतानुसार इस भावकत्व-व्यापार में फल है साधारणीकरण, इतिकर्त्तव्यता है उचित गुणालंकार का समावेश और करण है ध्वनन अर्थात् व्यंजना-शक्ति। इस प्रकार, अभिनवगुप्त का तर्क है कि जब भावकत्व-व्यापार का भी मूल तत्त्व व्यंजना-शक्ति ही है, तो इस भावकत्व-व्यापार की नवीन कल्पना की आवश्यकता ही क्या है ? ७. भोजकत्व तो चित्त की क्रिया है, अतः उसे शब्दार्थ में मानना उचित नहीं। वस्तुतः रसास्वादन और भोग दोनों एक ही हैं। शब्दार्थ इस क्रिया को मात्र प्रेरणा १. रस-सिद्धान्त (डॉ० नगेन्द्र), पृ० १७३

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देता है और यह शक्ति भी उसे व्यंजना-शक्ति से ही मिलती है। इसी के कारण विभावादि का साधारणीकरण हो जाने से सहृदय का चित्त भाव का भोग करने में समर्थ होता है। स्पष्टतः इस अलौकिक कार्य में भी व्यंजना-शक्ति ही मुख्य कारण है। इस प्रकार, भोजकत्व-व्यापार को कोई अलग व्यापार मानना ठीक नहीं है। रस को ध्वननीय मान लेने पर भोजकत्व स्वयं सिद्ध हो जाता है। ८. यह तथ्य अभिनवगुप्त ने भी स्वीकार किया कि रस ब्रह्मानन्द के समान है। ९. यह निश्चित मत है कि रस की अभिव्यक्ति ही होती है : आस्वादात्मक तथा विघ्न-रहित प्रतीति से ग्राह्य स्थायी भाव ही रस है। प्रत्येक सहृदय के चित्त में स्थायी भाव अनादि वासना के रूप में वर्त्तमान रहता है। नाट्य तथा काव्य में प्रस्तुत विभावादि के संसर्ग में आने से वही स्थायी भाव अभिव्यक्त होकर रस में परिणत हो जाता है। इस प्रकार, विभावादि व्यंजक हैं, स्थायी भाव व्यंग्य है; अर्थात् रस भी व्यंग्य है। अतः निष्पत्ति का अर्थ है अभिव्यक्ति और संयोग का अर्थ हुआ व्यंग्य-व्यंजक-सम्बन्ध।

१०. अभिनवगुप्त का दर्शन शैवाद्वत था। इस विषय को लेकर कोई विवाद नहीं है। प्रत्यभिज्ञादर्शन के प्रतिष्ठापकों में उनका स्थान बहुत ऊँचा है। विवेचन : अभिनवगुप्त भरत के रससूत्र के अन्तिम प्रसिद्ध व्याख्याता थे। पहले हम देख चुके हैं कि रससूत्र के प्रत्येक व्याख्याता ने अपने पूर्ववर्त्ती व्याख्याता की त्ुटियों का निराकरण करने के प्रयत्न में रस-प्रक्रिया की व्याख्या में स्पष्टता लाने का उत्तरोत्तर प्रयास किया। अभिनवगुप्त की व्याख्या सत्य के निकटतम है। भारतीय काव्यशास्त्र में अन्तिम रूप से उन्हीं का सिद्धान्त मान्य हुआ। उन्होंने भरत-सूत्र का अर्थ प्रायः उन्हीं के शब्दों में समझाने का प्रयत्न किया और इसी प्रसंग में उनके विचारों के साथ सामंजस्य रखते हुए अपने निजी विचार भी व्यक्त करने में समर्थ हुए। अभिनवगुप्त ने शैवाद्वत में प्रतिपादित आनन्दवाद की सुदृढ़ आधारशिला पर अपने आत्मानन्द रूप-रस की भव्य अट्टालिका का निर्माण किया। उनके सिद्धान्त ने रस-सिद्धान्त को पूर्णरूपेण आवेष्टित कर लिया। अभिनवगुप्त ने अपने पूर्ववर्त्ती आचार्यों के मतों का खण्डन करके व्यंजना-प्रक्रिया को रस-प्रक्रिया का वास्तविक स्वरूप बताकर अपने अभिव्यक्तिवाद को उपस्थित किया। उनके सिद्धान्त से भरत का मूल सिद्धान्त भी आच्छन्र हो गया और परवर्त्ती आचार्य भरत को भूलकर या भरत के ही नाम से, अभिनवगुप्त का ही मत उद्धत करने लगे। अभिनव का विवेचन असन्दिग्ध रूप से पुष्ट तथा प्रौढ़ है, परन्तु उसमें भी विशेषताओं के साथ तृटियाँ या दोष भी हैं।

अभिव्यक्तिवाद की विशेषताएँ: १. अभिनवगुप्त के रस-सिद्धान्त की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण विशेषता यही है कि उसका दार्शनिक आधार सभी पूर्ववर्त्ती आचार्यों के सिद्धान्तों की तुलना में बहुत ही गम्भीर तथा प्रामाणिक है। दार्शनिक सिद्धान्तों के इतिहास

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३३६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास की आवृत्ति रस-सिद्धान्ता में भी हुई। अधिकांश दार्शनिक मतवादों की परिणति अद्व तवाद में हुई, उसी प्रकार रस-सिद्धान्त की सभी मान्यताएँ भी आत्मास्वाद की कल्पना में अन्तहित हो गईं। २. सबसे पहले अभिनवगुप्त ने ही इस तथ्य का प्रतिपादन किया कि रस सर्वथा सहृदयनिष्ठ होता है। भट्टनायक ने भी रस को भोज्य ही माना, अर्थात् उनके मत में भी रस की वस्तुपरक सत्ता किसी रूप में बनी रही। परन्तु, अभिनवगुप्त ने ही सर्वप्रथम उसकी आस्वादरूपता का स्पष्ट शब्दों में प्रतिपादन किया। ३. रसास्वाद की आनन्दरूपता के प्रतिपादन का श्रेय तो भट्टनायक को ही प्राप्त है, परन्तु अभिनवगुप्त ने शैव आनन्दवाद का पुष्ट आधार देकर उसे पूर्णरूपेण प्रामाणिक सिद्ध कर दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि निरानन्दवादी जैन आदि आचार्यों ने जितने भी तर्क या विकल्प उपस्थित किये, सभी व्यर्थ प्रमाणित हुए। ४. अभिनवगुप्त ने अद्वतवाद के आत्मानन्द के साथ आनन्दवर्द्धन के व्यंजनावाद का समन्वय कर दिया। इस समन्वय के फलस्वरूप, अनुभूति तथा अभिव्यक्ति के संश्लिष्ट सिद्धान्त का प्रादुर्भाव हुआ। वस्तुतः, अद्वत तथा व्यंजना का पारस्परिक सम्बन्ध अविच्छिन्न है। अद्वत में एक ही तत्त्व (ब्रह्म) की सत्ता स्वीकार की गई है। उस दशा में यह समस्त विश्व-प्रपंच उसकी सृष्टि नहीं, अपितु अभिव्यक्ति ही है। अभिनवगुप्त ने इस तथ्य को हृदयंगम किया और दोनों का समन्वय कर दिया। इस क्रिया से उन्होंने रस-सिद्धान्त के अन्तरंग और बहिरंग-दोनों पक्षों को दृढ़ एवं पुष्ट आधार प्रदान किया। ५. अभिनवगुप्त के विवेचन का एक महत्त्वपूर्ण तथ्य है समष्टिगत रस की कल्पना। उनका दर्शन वस्तुतः और मूलतः व्यक्तिवादी है। परन्तु, उन्होंने अन्त में सामूहिक रस- चेतना में ही रस-चक्र को पूर्ण माना है। आज के युग में साम्यवाद एवं समाजवाद के प्रभाव के कारण जिस सामाजिक कलानुभूति का प्रतिपादन हुआ है, उसकी आश्चर्यंजनक व्याख्या अभिनवगुप्त ने अपनी विशेष रीति से की है। डॉ० प्रेमस्वरूप गुप्त ने तन्त्रालोक से उद्धरण देकर इस तथ्य को प्रमाणित कर दिया है। थ श्री अभिव्यक्तिवाद की त्रुटियाँ : भारतीय काव्यशास्त्र पर अभिनवगुप्तपादाचार्य का एकच्छत राज्य रहा है। अतः, इस विषय में उनकी प्रतिष्ठा अक्षुण्ण रही है और उनका महत्त्व सर्वमान्य रहा है। फिर भी, उनका रस-सिद्धान्त स्वथा दोष-रहित नहीं है। उनके अभिव्यक्तिवाद का सम्यक् विवेचन करने पर कुछ दोष निकल ही आते हैं, जिनका उल्लेख किया जा रहा है। अslh १. एक बहुत बड़ा और स्पष्ट दोष तो यह है कि अभिनवगुप्त ने भरत के सिद्धान्त को अपने रंग में इस प्रकार रँग दिया है कि परवर्त्ती काव्यशास्त्र में उसके वास्तविक रूप का जल्दी पता ही नहीं चलता। इस प्रसंग में दो बातें सम्भव हैं-(क) अभिनव ने अपने

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रस [३३७

सिद्धान्त के पूर्वग्रह के कारण भरत के विचार उनके वास्तविक रूप में प्रस्तुत नहीं किये; (ख) अभिनव ने अपनी मनोनुकूल रीति से भरत के सिद्धान्त का पुनराख्यान उपस्थित किया। इनमें दूसरी सम्भावना ही अधिक विश्वसनीय जान पड़ती है। फिर भी, मूल में अधिक परिवर्तन करके उसका रूप ही बदल देना वांछनीय विवेचन-शैली नहीं है। भरत के सूत्र के विभिन्न व्याख्याताओं के साथ भी लगभग ऐसा ही किया गया है; और यदि ठीक से देखा जाय, तो वे और भी दयनीय दशा में रख दिये गये हैं। भट्ट- लोल्लट का ही उदाहरण लिया जाय। अभिनव ने उनके बहुत थोड़े, और सम्भवतः अपने मनोनुकूल, उद्धरण दिये। उन थोड़े उद्धरणों के ही आधार पर यह सहज ही माना जा सकता है कि लोल्लट का मत भरत-मत के अत्यन्त निकट था। परन्तु, अभिनव ने उसे इस रूप में प्रस्तुत किया है कि वह पूर्णतः अग्राह्य बनकर रह गया है। श्रीशंकुक के साथ भी वे न्याय नहीं कर सके हैं। अभिनव ने शंकुक का जो उद्धरण दिया है, उससे संकेत मिलता है कि शंकुक ने कला का बहुमूल्य विवेचन किया होगा। किन्तु, अभिनव ने अपने गुरु भट्टतोत की सहायता से दर्शन के क्षेत्र में उनकी धज्जियाँ उड़ा दी हैं और उनके सभी गुण भस्मसात् हो गये हैं। भट्टनायक के साथ भी वे कोई अच्छा व्यवहार नहीं कर सके। भट्टनायक के सिद्धान्तों का सम्यक अध्ययन करने से पता चलता है कि वे सिद्धान्त अत्यन्त पुष्ट एवं गम्भीर हैं। भारतीय काव्यशास्त्र के विकास में उनका योगदान अत्यन्त मूल्यवान् है। स्वयं अभिनवगुप्त ने उनके कई सिद्धान्तों को उसी रूप में स्वीकार कर लिया है। इतना होने पर भी अभिनवगुप्त ने उनकी ऐसी आलोचना की कि भट्टनायक का महत्त्व प्रायः हजार वर्षों तक अत्यल्प रहा। २. अभिनवगुप्त के रस-सिद्धान्त में एक दूसरा दोष यह है कि इसमें काव्यास्वाद और आत्मास्वाद प्रायः एक ही हो जाते हैं। काव्यास्वाद और आत्मास्वाद की यह अभिन्नता कम-से-कम बुद्धि के गले नहीं उतरती। इसीलिए, रस पर अलौकिकता का इतना घना कुहासा छा गया कि अधुनिक युग के विचारकों की दृष्टि को रस तक पहुँचने में काफी समय लग गया। फलस्वरूप वे बहुत दिनों तक रस-सिद्धान्त की अवहेलना करते रहे। ३. अभिनवगुप्त के सिद्धान्त में रस का स्वरूप सर्वथा आत्मपरक माना गया, जिसके फलस्वरूप पूरा बल सहृदयता पर पड़ा और काव्य की सत्ता गौण हो गई। आत्यन्तिक रूप में यह तो मानना ही होगा कि रस की सत्ता व्यक्तिनिष्ठ है, किन्तु व्यक्ति के अन्तर्गत कवि को भी मानना होगा। केवल सहृदय को ही यदि प्रमाण माना जायगा तो काव्य के मूल्यांकन का ढंग ही छिन्न-भिन्न हो जायगा। ४. अभिनवगुप्त की प्रतिभा अत्यन्त प्रखर तथा स्वच्छ है, किन्तु उसकी तुलना में उनकी शैली अत्यन्त जटिल तथा आडम्बरपूर्ण। आनन्दवर्द्धन आदि आचार्यों से तुलना करने पर शैली की यह विषमता और भी स्पष्ट रूप से सामने आती है। ध्वन्यालोक की वृत्तियों पर भाष्य लिखते समय स्पष्ट हो जाता है कि जहाँ एक ओर वे दार्शनिक गुस्थियों को

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अपनी प्रतिभा के बल पर सहज ही सुलझा देते हैं, वहाँ दूसरी ओर, अपनी शैली की जटिलता के कारण कभी-कभी सामान्य तथ्यों को भी बुरी तरह उलझा देते हैं। ५. अभिनवगुप्त ने रस-सिद्धान्त के निरूपण में मनोव्यापार के साथ आध्यात्मिक व्यापार का भी सहारा लिया है। उन्होंने अपने दार्शनिक मत-शैवाद्व त-सिद्धान्त-के आधार पर कहीं-कहीं अपने रस-सिद्धान्त को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया है। ६. काव्य-वस्तुओं के ग्रहण या रसानुभूति की दशा में सहृदय के हृदय में वेद्यान्तर स्पर्श-शून्यता का समावेश हो जाता है। अभिनवगुप्त का यह सिद्धान्त भी सर्वत्र उपयोगी नहीं है। तन्मयता की अवस्था में सहृदय काव्यगत पात्रों, घटनाओं, दृश्यों एवं परिस्थितियों के सदृश अपने अनुभव में विगत समय में आये पात्रों, घटनाओं, दृश्यों एवं परिस्थितियों को अपनी स्मरण-शक्ति की सहायता से मन में लाता है। ऐसी दशा में वैद्यान्तर स्पर्श-शून्यता नहीं रह सकती है। ७. अभिनवगुप्त के सिद्धान्त के अनुसार साधारणीकरण की क्रिया के उपरान्त सहृदय के चित्त में विस्तार होता है। किन्तु, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इस कथन में कुछ त्रुटि है। वस्तुतः, सहृदय के चित्त के ही कारण साधारणीकरण की स्थिति आती है और विभावादि का साधारणीकृत रूप उपस्थित होता है। जबतक सहृदय के चित्त में विस्तार नहीं होगा, तबतक विभावादि का साधारणीकृत रूप नहीं हो सकता। जबतक चित्त में वैशद्य नहीं आयगा, तबतक काव्यगत वस्तुओं का विश्वजनीन रूप उसमें प्रवेश नहीं कर सकता। 5. अभिनवगुप्त ने सभी रसों की परिणति शान्त रस में सिद्ध की है और इसे ही सब रसों में प्रमुख सिद्ध करने का प्रयास किया है। किन्तु, यह सिद्धान्त दोषपूर्ण है। प्रवृत्तिमार्गी लौकिक जीवन में यदि शान्त रस को प्रधान माना जाता है, तो इसका अर्थ जीवन में निर्वेद को प्रधानता देना होगा। और, निर्वेद में सभी स्थायी भावों की परिणति करने का अर्थ है-सभी भावों के अन्दर निर्वेद की सत्ता स्वीकार करना। परन्तु, लोक के व्यावहारिक जीवन में ऐसा नहीं होता। प्रवृत्तिमार्गी लौकिक जीवन में रति और उत्साह की प्रधानता सम्भव है, निर्वेद की कदापि नहीं। अतः, सभी रसों में शान्त रस को प्रधान मानना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं जान पड़ता। ९. अभिनवगुप्त ने यह नहीं बताया कि किसी नाटक अथवा महाकाव्य में प्रतिनायक या उसके पक्ष के पात्रों के साथ तादात्म्य कैसे हो सकता है। निष्कर्ष : अभिनवगुप्त के रस-सिद्धान्त, अभिव्यक्तिवाद, में उपर्युक्त कुछ दोषों के रहते भी यह मानना होगा कि उनके द्वारा निरूपित रस-प्रक्रिया अत्यन्त मनोवैज्ञानिक है। संस्कृत-काव्यशास्त्र के सभी परवर्त्ती आचार्यों-धनंजय, महिमभट्ट, मम्मद; विश्वनाथ तथा पण्डितराज जगन्नाथ-ने इन्हीं के सिद्धान्त को आधार मानकर रस-विवेचन किया है।

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रस t ३३९ इनमें से कुछ आचार्यों ने बहुत ही विस्तार से रस का विवेचन किया है, परन्तु रस-प्रक्रिया का जहाँ तक सम्बन्ध है, वे कोई नवीनता लाने में सफल नहीं हो सके हैं। संस्कृत के काव्यशास्त्र में-विशेषतः रस-सिद्धान्त में-अभिनवगुप्त देदीप्यमान सूर्य के समान हैं। परवर्त्ती आचार्य आगे चलकर रस-सिद्धान्त के आचार्यों ने अभिनवगुप्त के ही सिद्धान्त का मूल तत्त्व स्वीकार कर लिया और उन्हीं का मत सर्वमान्य हो गया। किसी-किसी ने कुछ स्थलों पर थोड़ा शास्त्रीय विभेद कर दिया है, परन्तु मूल रूप से अभिनव के सिद्धान्त से कोई मतभेद नहीं है। धनंजय तथा धनिक : दशरूपककार धनंजय तथा वृत्तिकार धनिक ने रस की स्थिति सहृदय में ही मानी है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि सहृदय के चित्त में स्थित स्थायी भाव ही रसरूप में परिणत होता है : १. विभावरनुभावैश्च सात्त्विकर्व्यभिचारिभिः । आनीयमान: स्वाद्यत्वं स्थायिभावो रसः स्मृतः ।।' -विभाव, अनुभाव, सात्त्विक भाव तथा व्यभिचारियों के द्वारा जब रत्यादि स्थायी भाव आस्वाद्य-चर्वणा के योग्य-बना दिया जाता है, तो वही रस कहलाता है। २. क्रीडतां मृण्मयैर्यद्वद् बालानां द्विरदादिभिः ॥ स्वोत्साहः स्वदते तद्वच्छोतृणामर्जुनादिमिः॥२ -छोटे बच्चे मिट्टी के बने हुए हाथी, घोड़े आदि से खेलते हैं। वे उन्हें सच्चे हाथी, सच्चे घोड़े ही समझकर खेलते हैं तथा उनसे आनन्द प्राप्त करते हैं। ठीक इसी तरह काव्य के श्रोता सामाजिक भी अर्जुन आदि पात्रों के द्वारा उन पात्रों में उत्साह देखकर स्वयं उत्साह का आस्वाद करते हैं। यद्यपि अर्जुन आदि मृण्मय हाथी आदि की तरह अवास्तविक हैं, केवल प्रतिकृति-मात्र हैं, तथापि सामाजिकों को उनसे आनन्द की प्राप्ति होती है। धनंजय ने स्पष्ट शब्दों में बताया है कि रस सामाजिक में ही होता है; अनुकार्य रामादि में नहीं।3 "रत्यादि स्थायी भाव स्वाद्य होता है, सहृदय उसका आस्वाद करते हैं, इसलिए लौकिक स्वाद के विषय में 'रस' की भाँति यह भी रस कहलाता है। यह रस रसिक हृदय में ही पाया जाता है, अनुकार्य राम, दुष्यन्त, सीता या शकुन्तला में नहीं पाया जाता। रस का स्वाद, रस की चर्वणा, रसिकों को, दर्शक सामाजिकों को ही १. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० १ २. वही, का० ४१-४२ ३. वही, का० ३८-३९

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३४० 11 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास होती है, अनुकार्य पात्रों को नहीं। अनुकार्य पात्ों की तो केवल कथा-भर ली जाती है, काव्य का प्रयोजन सामाजिक को रसास्वाद कराना ही है। काव्य के अनुकार्य रामादि तो भूतकाल के हैं, उन्हें रस-चर्वणा हो ही कैसे सकती है ? वस्तुतः, रस-चर्वणा नाटकादि काव्य के द्रष्टा सामाजिक में ही मानी जा सकती है। यदि अनुकार्य रामादि में मानी जायगी, तो वे भी ठीक उसी तरह होंगे, जैसे हम आमतौर पर व्यावहारिक संसार-क्षेत्र में अपनी नायिका से युक्त किसी नायक को देखते हैं। किन्हीं दो प्रेमी-प्रेमिका को शृंगारी चेष्टा करते देख हमें रस-प्रतीति नहीं होती, हमें या तो लज्जा होगी, या ईर्ष्या, राग या द्वष। यदि अनुकार्य दुष्यन्तादि में रस मान लें, तो सामाजिकों को रसास्वाद नहीं हो सकेगा, प्रत्युत उनके हृदय में लज्जा, ईर्ष्या, राग या द्वष की उत्पत्ति होगी। शृंगारी चेष्टा देखकर बड़े लोगों को लज्जा होगी, दूसरे का ईर्ष्यादि। अतः, अनुकार्य नायकादि में रस मानने पर दोष आने के कारण सामाजिकों में ही रस-स्थिति माननी चाहिए।"१ परन्तु, धनंजय और धनिक ने व्यंजना-वृत्ति को स्वीकार नहीं किया, वरन् उन्होंने तात्पर्य-वृत्ति को स्वीकार किया। उन्हें रस का व्यंग्यत्व भी स्वीकार्य नहीं था। इसलिए, उन्होंने काव्य या उसमें वणित विभाव आदि के साथ रस का व्यंग्य-व्यजक सम्बन्ध नहीं माना। इस प्रसंग में उन्होंने अभिनवगुप्त का नहीं, प्रत्युत भट्टनायक का अनुसरण किया। भट्टनायक के समान उन्होंने विभावादि के साथ रस का भाव्य-भावक-सम्बन्ध ही माना। धनिक ने बहुत तर्क-वितर्क करने के उपरान्त निष्कर्ष-रूप में लिखा : अतो न रसादीनां हि भावकं, भाव्या रसादयः ।२ अतः यह सिद्ध हो गया है कि काव्य का रस के साथ व्यंग्य- व्यंजक सम्बन्ध नहीं है, न तो काव्य व्यंजक ही है और न रसादि व्यंग्य ही। तो फिर इन दोनों में क्या सम्बन्ध है ? काव्य तथा रस में परस्पर भाव्य-भावक भाव या भाव्य-भावक सम्बन्ध है। काव्य भावक है और रसादि भाव। इसका परिणाम यह है कि धनंजय और धनिक के मतानुसार संयोग का अर्थ है : भाव्य-भावक सम्बन्ध और निष्पत्ति का अर्थ है भावित होना या भाविति। भट्टनायक के मतानुसार भी संयोग और निष्पत्ति के ये ही अर्थ हैं। इस प्रकार धनंजय तथा धनिक के रस-सिद्धान्त में तीन बातें द्रष्टव्य हैं : १. रस व्यंग्य नहीं, काव्य का तात्पर्यार्थ है; २. रस की भावना होती है, विभावादि में तथा उसमें भाव्य-भावक भाव है; ३. नट आदि सामाजिक के लिए वैसे ही राम आदि बन जाते हैं, जैसे बच्चे के लिए मिट्टी के हाथी-घोड़े सच्चे हाथी-घोड़े बन जाते हैं। महिमभट्ट : महिमभट्ट भी रसवादी आचार्य थे और इन्होंने भी रस को ही काव्य की आत्मा माना : 'काव्यस्यात्मनि संजञिनि रसादिरूपे न कस्यचिद्विमतिः।'3 अभिनवगुप्त के १. दशरूपक (चतुर्थ प्रकाश) : (टीका० डॉ० भोलाशंकर व्यास), पृ० २५३-२५४ २. वही, पृ० २५१-२५२ ३. व्यक्तिविवेक (चौखम्बा संस्कृत-सीरीज), पृ० १०५

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रस [३४१

समान इन्होंने भी रस की स्थिति सहृदय में ही मानी है। स्थायी भावों का आस्वादन सहृदय ही रसरूप में करता है। परन्तु, अभिनवगुप्त से इनका मतभेद इस अर्थ में है कि ये मानते हैं कि स्थायी भाव न तो वास्तविक होते हैं और न वासना-रूप से चित्त में विद्यमान रहते हैं, वरन् रंगमंच पर नट द्वारा प्रदर्शित स्थायी भावों के प्रतिबिम्ब-रूप होते हैं : तैरेव करुणादिभि: कृत्रिर्मविभावाद्यभिधाने रसन्त एव रत्यादयः प्रतिबिम्बकल्पाः स्थायिभाव- व्यपदेशभाज: कविभिः प्रतिपतृप्रतीतिपथमुपनीयमाना हृदयसंवादादास्वाद्यत्वमुपयन्तः सन्तो रसा इत्युच्यन्ते ।' तात्पर्य यह कि रत्यादि स्थायी भावों की स्थिति प्रमाता में नहीं होती। वे केवल रंगमंच पर प्रदर्शित अथवा काव्य में वर्णित स्थायी भावों के प्रतिबिम्ब-मात्र होते हैं। कवि कृत्रिम कारण के रूप में विभावादि के द्वारा इन्हें प्रमाता की प्रतीति का विषय बनाता है। तब उस प्रमाता को सहृदयता के कारण आस्वाद्य होकर ये स्थायी भाव ही रस नाम प्राप्त करते हैं।

किन्तु, महिमभट्ट इस रस-प्रक्रिया में व्यंजना को आधार नहीं मानते, उन्होंने काव्यानुभूति का सिद्धान्त चलाया। उनके मतानुसार अनुमान से ही रस सिद्ध हो जाता है। इस प्रकार विभावादि गमक हैं और रत्यादि स्थायी भाव गम्य हैं। ये ही स्थायी भाव अन्त में रसरूप में परिणत हो जाते हैं। त एव हि लौकिका विभावादयो हेतुकार्यसहकारिरूपा गमकाः। त एव रत्यादयो- Sवस्थाविशेषरूपा भावा गम्या:।२ इस प्रकार, महिमभट्ट के रस-सिद्धान्त के अनुसार निष्पत्ति का अर्थ अनुमिति है और संयोग का अर्थ है अनुभाव्य-अनुभावक सम्बन्ध । इस विवेचन से स्पष्ट हो जाता है कि रस के स्वरूप के विषय में महिमभट्ट का मत अभिनवगुप्त के ही मत के अनुकूल है, परन्तु रस की प्रक्रिया के विषय में शंकुक के मत के अनुकूल ही उनका मत है। राजा भोज : राजा भोज ने शृंगारप्रकाश में इस सिद्धान्त का खण्डन किया कि स्थायी भाव ही विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के द्वारा पुष्ट होकर रसरूप में परिणत हो जाते हैं। उनका तर्क है कि यदि स्थायी भाव रस में परिणत हो जाते हैं, तो अन्य भाव भी क्यों नहीं रस में परिणत हो जाते ? उस दशा में रसों की संख्या आठ या नौ तक ही सीमित क्यों करेंगे, जैसा कि पूर्वाचार्यों ने किया है? भरत ने नाट्यशास्त्र और रससूत्र में भाव में विभिन्न भेद-स्थायी, सात्त्विक तथा व्यभिचारी-किये हैं; भोज ने इसकी भी आलोचना की है। उनकी दृष्टि में इन सब भावों को केवल भाव कहना चाहिए, १. व्यक्तिविवेक (चौखम्बा संस्कृत-सीरीज), पृ० ७९ ३. वही, परृ० ६६

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भिन्न-भिन्न नाम देना अच्छा नहीं। भोज के मतानुसार रस (शृंगार) से ही रत्यादि भाव की उत्पत्ति होती है : स शृङ्गारः सोडभिमानः स रसः तत एते रत्यादयो जायन्ते।'

मम्मट : मम्मट ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ काव्यप्रकाश में व्यंजना-विरोधी महिमभट्ट आदि आचार्यों को यथोचित उत्तर देते हुए अभिनवगुप्त के ही सिद्धान्त का समर्थन किया है। मम्मट मूलतः काव्यशास्त्री थे, दर्शनशास्त्री नहीं; अतः उन्होंने अपनी दृष्टि काव्यशास्त्र के ही विवेचन पर रखी, दर्शनशास्त्र की उलझनों में फँसना उचित नहीं समझा। उन्होंने यथास्थान आवश्यकतानुसार दार्शनिक विवेचन भी किया है, परन्तु दर्शनशास्त्र की सूक्ष्म विशेषताओं तथा गुत्थियों के चक्कर में वे नहीं पड़े। परिणाम-स्वरूप उनके ग्रन्थ में कोई विशेष मौलिक स्थापना नहीं की गई है। उन्होंने बहुत स्वच्छ रीति तथ्क स्पष्ट रूप से अभिनवगुप्त के रस-सिद्धान्त को ध्यान में रखकर रस-निष्पत्ति का विवेचन कर दिया है। अभिनव के ही समान मम्मट ने भी व्यंजना और ध्वनि पर बल दिया और संयोग का अर्थ वही व्यंग्य-व्यंजक सम्बन्ध एवं निष्पत्ति का अर्थ अभिव्यक्ति रखा। अभिनव से इनका अन्तर इस अर्थ में है कि भट्टलोल्लट आदि पूर्वाचार्यों के समान नटों को भी उन्होंने बहुत सहृदयतापूर्वक उपस्थित किया है।

मम्मट का काव्यप्रकाश बहुत लोकप्रिय ग्रन्थ हुआ और इसका इतना प्रचार हुआ कि अभिनवगुप्त का मूल सिद्धान्त भी इसके सामने रुक-सा गया। फलस्वरूप जिस शैवाद्वत के दर्शन के आधार पर अभिनवगुप्त ने अपना रस-सिद्धान्त प्रतिष्ठित किया था, उससे रस-प्रसंग क्रमशः पृथक होता गया। भारतवर्ष में शंकराचार्य के वेदान्त का प्रसार द्र तगति से बढ़ रहा था, जिससे इस देश के साहित्य और साहित्यशास्त्र अधिक प्रभावित हो रहे थे। रस-सिद्धान्त भी शंकराचार्य के प्रभाव से बच नहीं सका। शीघ्र ही इस पर से शैवाद्वत का प्रभाव कम होने लगा और शंकराद्वत का प्रभाव बढ़ने लगा। काव्य- प्रकाश एक साधारण गुण-सम्पन्न कृति है और परवर्त्ती आचार्यों के लिए इसने आदर्श ग्रन्थ का काम किया।

विश्वनाथ : ऊपर बताया जा चुका है कि अभिनवगुप्त के अभिव्यक्तिवाद का प्रभाव लगभग सभी परवर्ती साहित्यशास्त्रियों पर पड़ा, परन्तु उनके दार्शनिक सिद्धान्त शैवाद्वत का प्रभाव कम होकर शंकराद्वत का प्रभाव क्रमशः बढ़ने लगा था। विश्वनाथ के साहित्य- दर्पण पर भी इस प्रभाव के संकेत दृष्टिगोचर होते हैं, यद्यपि वे दार्शनिक की अपेक्षा साहित्य- रसिक ही अधिक थे। रस-प्रक्रिया के विषय में विश्वनाथ ने अभिनवगुप्त का ही मत दुहराया। इस प्रकरण के परिच्छेद की पहली कारिका है :

१. शृंगारप्रकाश, प्रकाश ११

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छ जा रस सत [ ३४३

विभावेनानुभावेन व्यक्तः सञ्चारिणा तथा।का रसतामेति रत्यादिः स्थायिभावः सचेतसाम् ॥ -अर्थात् सहृदय पुरुषों के चित्त में स्थित वासना-रूप रति आदि स्थायी भाव ही विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों के द्वारा अभिव्यक्त होकर रसरूप प्राप्त करते हैं। परन्तु, विश्वनाथ ने 'व्यक्त' शब्द का प्रयोग दध्यादिन्याय से 'रूपान्तर' के अर्थ में किया है-'व्यक्तो दध्यादिन्यायेन रूपान्तरपरिणतो व्यक्तोकृत एव रसः। न तु दीपेन घट इव पूर्वसिद्धो व्यज्यते।'२ अर्थात् व्यक्त पद का अर्थ है दूध से दही आदि के समान दूसरे रूप में परिणत होना; यह नहीं है कि जैसे दीपक से घट प्रकाशित होता है, उसी प्रकार पहले से स्थित रस व्यक्त होता है। तात्पर्य यह है कि विश्वनाथ निष्पत्ति का वास्तविक अर्थ परिणति ही मानते हैं, यद्यपि सदा 'व्यक्ति' तथा 'अभिव्यक्ति' शब्द का प्रयोग करते हैं, और अभिनवगुप्त के ही उद्धरण से अपना मत पुष्ट करते हैं -- तदुक्तं लोचनकारै :- रसा: प्रतीयन्त इति त्वोदनं पचतीतिवद व्यवहार इति।3 अर्थात् वही बात लोचनकार (धवन्यालोक के टीकारकार अभिनवगुप्त) ने कही है और रस प्रतीत होते हैं, यह ब्यवहार तो इसी प्रकार का है जैसे कहा जाता है कि भात पकाते हैं। अपनी कारिकाओं में विश्वनाथ ने स्पष्ट रूप से भट्टनायक की पदावली का ही प्रयोग किया है, जिसमें आवश्यकतानुसार अभिनवगुप्त के सिद्धान्त को दृष्टि में रखकर संशोधन कर दिये हैं। 'सत्त्वोद्रेक' की व्याख्या में यह संशोधन स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। भट्टनायक ने रस की स्थित में रजोगुण और तमोगुण की स्थिति भी कुछ अंश में स्वीकार की है, परन्तु विश्वनाथ ने इन्हें स्वथा अस्वीकार किया है और मन को अनिवार्य रूप से रजोगुण तथा तमोगुण के स्पर्श के अलग ही रखा है-रजस्तमोभ्यामस्पृष्टं मनः। फिर, स्वाकार वत् और 'अभिन्नत्वेन' पदों के प्रयोग से उन्होंने बताया है कि रसास्वाद आत्मास्वाद का ही रूप है। इसमें सन्देह नहीं कि विश्वनाथ ने ये संशोधन अभिनवगुप्त के मत के अनुसार ही किये हैं, उन्होंने 'चमत्कार' का अर्थ विस्मय किया है- यह भी एक स्पष्ट अन्तर है। विश्वनाथ ने अभिनवगुप्त की शैव-पदावली का त्याग करके सामान्य वेदान्ती पदावली का ही प्रयोग किया है। शारदातनय : शारदातनय अभिनवगुप्त के समान ही रसवादी थे। यद्यपि उन्होंने सामान्यतः अभिनवगुप्त का अनुसरण किया है, फिर भी सदा उनसे सहमत नहीं दिखाई देते, वरन कई स्थलों पर दोनों में तहुत मतभेद है। उदाहरणार्थ, वे अभिनव के समान यह नहीं मानते कि उत्तम काव्य में रस सदा व्यंग्य होना चाहिए, वाच्य नहीं। वे व्यंजना-वृत्ति को पृथक् अस्तित्व नहीं देना चाहते और ध्वनि को भी तात्पर्य-शक्ति के ही अन्तर्गत १. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० १ २. वही, कारिका १ की वृत्ति ३. वही, कारिका १ की वृत्ति

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मानते हैं। शारदातनय ने रस-प्रक्रिया के विषय में अभिनवगुप्त का अनुसरण नहीं करके धनिक द्वारा संशोधित तथा परिवरद्धित भट्टनायक के मत का अनुसरण किया। उन्होंने विभावादि का रस से सम्बद्ध भाव्य-भावक भाव माना, व्यंग्य-व्यंजक भाव नहीं। प्रेक्षक वृत्तियों की सहायता से काव्यार्थ समझता है और भावना-वृत्ति के माध्यम से रस का भोग प्राप्त करता है। रस ब्रह्मानन्द के समान है। इसी प्रकार काव्य और रस परस्पर कारण- कार्य के रूप में सम्बद्ध हैं; क्योंकि जब काव्य प्रेक्षक या सहृदय के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तब विभाव आदि सामाजिक के मन में आनन्द की सृष्टि करते हैं। पण्डितराज जगन्नाथ : संस्कृत के रस-सिद्धान्त के अन्तिम प्रसिद्ध आचार्य पण्डितराज जगन्नाथ हैं। उन्होंने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ रसगंगाधर के प्रथम आनन में रस-सम्बन्धी ग्यारह मतों का उल्लेख तथा विवेचन किया है। इस विवेचन से पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है ककि अभिनवगुप्त द्वारा प्रतिपादित रस-सिद्धान्त में उनकी पूरी आस्था है। अभिनवगुप्त का रस-सिद्धान्त प्रत्यभिज्ञादर्शन में प्रतिपादित शैवाद्वत पर आधारित है। पण्डितराज ने अभिनव के अद्वंत तथा उसके परिणामी आनन्द-सिद्धान्त को तो उसी रूप में स्वीकार कर लिया, परन्तु उसे शंकर के वेदान्त का रंग दे दिया है। स्वयं पण्डितराज ने इस अन्तर को स्पष्ट कर दिया है: Fasfisi इत्थं चाभिनवगुप्तमम्मटभट्टादिग्रन्थस्वारस्येन भग्नावरणा चिद्विशिष्टो रत्यादि: स्थायिभावो रस इति स्थितम्। वस्तुतस्तु वक्ष्यमाणश्रुतिस्वारस्येन रत्याद्यवच्छिन्ना भग्नावरणा चिदेव रस:।१ -अर्थात् इस प्रकार अभिनवगुप्त तथा मम्मट आदि के ग्रन्थों के अनुसार अज्ञानरूप आवरण से युक्त, शुद्ध चैतन्य का विषय बना हुआ रति आदि स्थायी भाव रस हैं-यह स्थिर हुआ। वास्तव में रति आदि स्थायी भाव जिसके विषय हों, ऐसे आवरण-मुक्त शुद्ध चैतन्य को ही रस कहना चाहिए न कि चैतन्य विषयीभूत रत्यादि को। रस के स्वरूप के विषय में दोनों मतों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है। दोनों मतों ने रस की स्वप्रकाश्यता तथा नित्यता स्वीकार की है। दोनों में अन्तर केवल शैवाद्व त तथा शंकराद्वत के दार्शनिक सिद्धान्तों के कारण है। शैवाद्वत प्रकृति के अंश रत्यादि स्थायी भावों में भी चैतन्य के प्रतिभास होने के कारण आनन्द की स्थिति मानता है, परन्तु शंकराद्वत केवल चैतन्य में ही आनन्द की सत्ता स्वीकार करता है। इस प्रकार पण्डितराज जगन्नाथ ने अभिनवगुप्त के सिद्धान्त को तत्त्वतः स्वीकार किया है, परन्तु उसकी व्याख्या में वेदान्त के अनुसार थोड़ा परिवर्तन और संशोधन कर दिया है। पण्डितराज ने दो अन्य नवीन मतों-'नव्यमत' में अपनी आस्था प्रकट की है। उन्होंने जिस आग्रह से इन मतों का मण्डन किया है, उससे उनके संकेत नहीं करने पर भी, १. रसगंगाधर, प्रथम आनन, पृ० २७ (ढीका० मथरानाथ शास्त्री)

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विद्वानों का अनुमान है कि ये नवीन मत उनके अपने ही मत हैं। इनमें से पहले मत के विषय में विद्वानों को अधिक विश्वास है कि यह पण्डितराज का ही मत है। इस मत के प्रमुख तथ्य निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किये जा सकते हैं : १. स्थायी भाव ही रसरूप में आस्वादन के योग्य बनता है। २. सहृदय को व्यंजना-व्यापार की ही सहायता से विभाव आदि के द्वारा स्थायी भाव की अवगति होती है। उपर्युक्त दोनों तथ्य अभिनवगुप्त के सिद्धान्त के सवथा अनुकूल हैं। ३. कारण के गुणों के कारण और सहृदय के अपने हृदय के गुणों के कारण भी उसके चित्त में एक विशेष भावना के रूप में एक दोष आविर्भूत हो जाता है। इस दोष के कारण सहृदय की आत्मा कल्पित रामत्व, दुष्यन्तत्व आदि से पूर्णतया आच्छन्न हो जाती है। दूसरे शब्दों में, आश्रय और उसमें तादात्म्य हो जाता है, दोनों में कोई भेद नहीं रह जाता। यहाँ दो सर्वथा नवीन तथ्य प्रकट हुए- (क) भावना-रूप दोष-कल्पना, और (ख) आश्रय के साथ तादात्म्य या अभेद की कल्पना। पण्डितराज द्वारा प्रस्तुत विवेचन के आधार पर निष्पत्ति के दो अर्थ हमारे सामने आते हैं। पहला अर्थ है अभिव्यक्ति या व्यक्ति, जिसका प्रतिपादन अभिनवगुप्त और मम्मट ने किया। किन्तु, पण्डितराज जगन्नाथ के अनुसार अभिव्यक्ति का अर्थ व्यंजना नहीं है, प्रत्युत व्यक्ति का अर्थ है आवरण से मुक्त चंतन्य का प्रकाशन-व्यक्तिश्च भग्नावरणा चित्। जब स्थायी भाव इसी शुद्ध चैतन्य का विषय बन जाता है, तो रस की निष्पत्ति हो जाती है। इस तरह स्पष्ट हो जाता है कि निष्पत्ति का अर्थ हुआ आवरण-मुक्त शुद्ध चैतन्य का विषय होना। यह अर्थ काव्यशास्त्र के साधारण अर्थ से भिन्न है और दार्शनिक भूमिका पर प्रतिष्ठित है। नवीन मत के अनुसार रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया के दो अवयव हैं-१. व्यंजना- व्यापार के द्वारा विभाव आदि से आलम्बन के प्रति आश्रय के स्थायी भाव का ज्ञान, जैसे दुष्यन्त शकुन्तला से प्रेम करता था; २. भावना-दोष के उदय से कल्पित दुष्यन्तत्व से आच्छन्न सहृदय की आत्मा द्वारा शकुन्तला-विषयक रति का आस्वादन। इस तरह पहले तो आश्रय में स्थित स्थायी भाव व्यंजना द्वारा प्रकट होता है और फिर तदात्मभूत सहृदय की आत्मा जब उसका आस्वादन करती है, तब रसरूप में परिणत हो जाता है। यहाँ भी निष्पत्ति के अर्थ में कोई विशेष अन्तर नहीं है। यहाँ भी उसका अर्थ अभिव्यक्ति या व्यक्ति ही है, जिसका तात्पर्य है चित्-शक्ति का विषय होना। केवल प्रक्रिया की दार्शनिक व्याख्या में थोड़ा भेद है। पण्डितराज जगन्नाथ के काव्यशास्त्र का मौलिक चिन्तन प्रायः समाप्त ही हो गया। उत्तर-भारत में रस-सिद्धान्त या काव्यशास्त्र का विवेचन हिन्दी के रीतिकालीन कवियों एवं आचार्यों के हिस्से में पड़ गया। वे रीति-आचार्य शतियों तक मूल छोड़कर शाखा-

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प्रशाखाओं के वर्णन तथा विवेचन में लगे रहे। इससे काव्यशास्त्र के विवेचन में कोई प्रगति नहीं हो सकी, पिष्ट-पेषण-मात्र होता रहा। अन्य भारतीय भाषाओं में संस्कृत के प्रायः अनुवाद ही होते रहे और वे अनुवाद भी संख्या में बहुत कम हुए। परिणामस्वरूप रस- विवेचन में कोई प्रगति नहीं हो सकी। इस बीसवीं शती में-विशेषतः सन् १९२५ ई० के बाद -- मुख्यतः हिन्दी और मराठी में शास्त्रीय परम्परा का पुनर्जागरण हुआ, फलतः प्राचीन सिद्धान्तों का विवेचन किया जाने लगा। रस-सिद्धान्त के भिन्न-भिन्न पक्षों-रस-स्वरूप, रस-निष्पत्ति आदि पर आधुनिक ज्ञान के आलोक में गम्भीर तथा तात्त्विक विचार-विमर्श किया जा रहा है। डॉ० नगेन्द्र ने अपनी पुस्तक 'रस-सिद्धान्त' में रस-निष्पत्ति का निम्नलिखित सार- चित्र दिया है, जो उक्त विषय का स्मरण रखने में उपादेय सिद्ध होगा। परम्परागत

आचार्य आधारभूत दर्शन निष्पत्ति का अर्थ संयोग का अर्थ

भट्टलोल्लट मीमांसा उत्पत्ति उत्पाद्य-उत्पादक सम्बन्ध

श्रीशंकुक न्याय। अनुमिति अनुमाप्य-अनुमापक सम्बन्ध

भट्टनायक सांख्य भुक्ति भोज्य-भोजक सम्बन्ध

अभिनवगुप्त वेदान्त अभिव्यक्ति व्यंग्य-व्यंजक सम्बन्ध

संशोधित

भट्टलोल्लट उपचिति उपचेय-उपचायक सम्बन्ध

श्रीशंकुक न्याय (बौद्ध) अनुकृति, सहृदय की अनुमाप्य-अनुमापक सम्बन्ध दृष्टि से अनुमिति

भट्टनायक शैवाद्व तवाद, मीमांसा भाविति भाव्य-भावक सम्बन्ध

अभिनवगुप्त शैवाद्व तवाद अभिव्यक्ति व्यंग्य-व्यंजक सम्बन्ध

साधारणीकरण रस-निष्पत्ति के साथ साधारणीकरण का भी सम्बन्ध है। काव्यशास्त्र का यह अत्यन्त मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण प्रश्न है कि काव्य तथा नाटक में जिन रामादि विशिष्ट पात्रों का वर्णन रहता है, उनके भाव सर्वसाधारण या कम-से-कम सहृदय व्यक्तियों के आस्वाद के विषय कैसे हो जाते हैं? बहुत प्राचीन काल से काव्य लिखा और पढ़ा जाता रहा है और वह मानव की आत्माभिव्यक्ति एवं आत्मास्वाद का उत्कृष्ट माध्यम रहा है। चिन्तनशील मानव ने जब काव्य के आस्वाद के विषय में विचार-विमर्श करना आरम्भ किया होगा, उसी समय उसके मस्तिष्क में यह प्रश्न उठा होगा कि काव्य में वणित राम, दुष्यन्त आदि से हमारा क्या सम्बन्ध है? जब हमारे और उनके बीच देश और काल का इतना बड़ा अन्तर उपस्थित है, तो फिर उनके भाव हमारे आस्वाद के विषय कैसे बन

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रस [३४७

जाते हैं ? साधारणीकरण का सिद्धान्त इसी महत्त्वपूर्ण प्रश्न का सर्वाधिक प्रामाणिक उत्तर है। साधारणीकरण बीजरूप में तो भरत के नाट्यशास्त्र में ही दृष्टिगत होता है : एभ्यश्च सामान्यगुणयोगेन रसा निष्पद्यन्ते।' -अर्थात् जब इन भावों को सामान्य रूप से प्रस्तुत किया जाता है, तो रसों की निष्पत्ति होती है। परन्तु, इसका निश्चित उल्लेख प्रथम बार भट्टनायक के उद्धरणों में प्राप्त होता है। भट्टनायक : भट्टनायक के उद्धरण में साधारणीकरण से सम्बन्ध रखनेवाला अंश यह है : विभावादिसाधारणोकरणात्मना .... भावकत्वव्यापारेण भाव्यमानो रस ..... भोगेन परं भुज्यत इति।२ -अर्थात् विभावादि के साधारणीकरण-रूप भावकत्व नामक व्यापार द्वारा भाव्यमान स्थायी भाव-रूप रस .... भोजकत्व व्यापार के द्वारा आस्वादित किया जाता है।

इसका विश्लेषण करने पर हमें नीचे लिखे तथ्य मिलते हैं :

१. साधारणीकरण विभाव आदि का होता है। २. वास्तव में यह साधारणीकरण ही भावकत्व-व्यापार की आत्मा है, अर्थात् दोनों अभिन्न हैं। ३. भावकत्व-व्यापार द्वारा भाव्यमान स्थायी भाव ही रसरूप में परिणत हो जाता है। काव्यप्रकाश के टीकाकारों ने भाव्यमान को साधारणीकृत का ही पर्याय माना है। ४. साधारणीकरण की प्रक्रिया रसास्वाद के पूर्व ही होती है। इस प्रक्रिया से रस के भिन्न-भिन्न अंग अपनी-अपनी विशिष्टताओं से मुक्त होकर आस्वाद्य रूप में प्रस्तुत हो जाते हैं। अभिनवगुप्त : अभिनवगुप्त ने भट्टनायक के साधारणीकरण-विषयक मत में कुछ संशोधन एवं परिवर्द्धन किया और उसे अपने ही विशेष ढंग से रखा। एतद्विषयक उनका उद्धरण निम्नलिखित है : तस्यां च यो मृगपोतकादिर्भाति तस्य विशेषरूपत्वाभावाद्भीत इति, वासकस्या- पारमार्थिकत्वाद् भयमेव परं देशकालाद्यनालिङ्गितम्।3 -अर्थात् काव्य की उस प्रतीति में जो मृगशावक आदि विषय रूप से भासता है, उसके विशेष रूप न होने से यह भीत है, यह ज्ञान तथा तासक (दुष्यन्त आदि) के वास्तविक न होने से, भय ही देश, काल आदि से पूर्णतः असम्बद्ध रूप में प्रतीत होता है। १. नाट्यशास्त्र (सम्पादक : पं० केदारनाथ), अध्याय ७, पृ० १०६ २. हिन्दी-अभिनवभारती (आचार्य विश्वेश्वर), अध्याय ६, पृ० ४६४-४६५ ३. वही, पृ० १७१

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अणITह इस उद्धरण का तात्पर्य यह है कि जब आश्रय और आलम्बन का साधारणीकरण हो जाता है, तब स्थायी भाव भी निर्बन्ध हो जाता है, अर्थात् देश-काल के बन्धन में नहीं रहता। इसी तथ्य को अभिनवगुप्त ने आगे की पंक्तियों में और भी स्पष्ट किया है : तत एव भीतोऽहं भीतोडयं शत्रुर्वयस्यो मध्यस्थो वा इत्यादिप्रत्ययेभ्यो दु.खसुखादि- कृतबुद्धयन्तरोदयनियमवत्तया विघ्नबहुलेभ्यो विलक्षणं निर्विघ्नप्रतीतिग्राह्य .... भयानको रसः।' -अर्थात् इसीलिए 'मैं भीत हूँ', 'यह भीत है' या 'शत्रु, मित्र अथवा तटस्थ भीत हैं इत्यादि सुख-दुःखकारी अन्य प्रत्ययों (ज्ञान) को नियमतः उत्पन्न करने के कारण विघ्न- बहुल प्रतीतियों से भिन्न, निर्विघ्न प्रतीति-रूप में ग्राह्य भय स्थायी भाव ही भयानक रस बन जाता है। अभिप्राय यह है कि काव्य में स्थायी भाव किसी प्रकार के व्यक्ति-संसर्ग से संदीप्त नहीं रहता, सर्वथा मुक्त रहता है। परिमिति के कारण इन व्यक्ति-संसगों से दुःखादि उत्पन्न होते हैं। इसलिए, जब इनसे मुक्ति हो जाती है, तब लौकिक सुख, दुःख आदि की चेतना से भी मुक्ति मिल जाती है। आगे अभिनवगुप्त ने बताया है कि यह साधारणत्व परिमित न होकर सर्वव्याप्त होता है-अनादि संस्कारों से चित्रित चित्तवाले समस्त सामाजिकों की एक-जैसी वासना होने के कारण सभी को एक-जैसी ही प्रतीति होती है। इन उद्धरणों के आधार पर साधारणीकरण के सम्बन्ध में अभिनवगुप्त के मत का सारांश निम्नलिखित शब्दों में व्यक्त किया जा सकता है : १. केवल विभावादि का ही नहीं, अपितु स्थायी भाव का भी साधारणीकरण होता है। जिस प्रकार विभाव आदि स्थायी भाव के कारण होते हैं, उसी प्रकार विभाव आदि का साधारणीकरण भी स्थायी भाव के साधारणीकरण का कारण होता है। २ स्थायी भाव के साधारणीकरण के द्वारा देश-काल के बन्धन, व्यक्ति-संसर्ग आदि से मुक्ति हो जाती है। व्यक्ति-संसर्ग की चेतना के कारण ही भाव की प्रतीति में सुखात्मकता तथा दुःखात्मकता आविर्भूत होती है, उसी प्रकार व्यक्ति-चेतना रहने पर ऐन्द्रिय सुख-दुःख की भावना का भी अन्त हो जाता है। ३. काव्य या नाटक के क्षेत्र में भाव का साधारणीकरण वैयक्तिक क्रिया नहीं है, प्रत्युत सामूहिक क्रिया है। एकमात्र सहृदय का ही भाव निर्विघ्न या मुक्त नहीं होता, अपितु सभी सामाजिक एकाग्रचित्त होकर सामूहिक रूप से मुक्त भाव का अनुभव करते हैं। ४. इस प्रकार स्थायी भाव का साधारणीकरण ही साधारणीकरण का मूल तत्त्व है। १. अभिनवभारती (आचार्य विश्वेश्वर), अध्याय ६, पृ० ४७१

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अभिनवगुप्त द्वारा इस संशोधन को दृष्टि में रखकर काव्यप्रकाश के टीकाकार गोविन्द ठाकुर ने भट्टनायक द्वारा प्रतिपादित साधारणीकरण-सिद्धान्त को स्पष्ट किया है, जिसका अनुवाद निम्नलिखित है : भावकत्व का अर्थ है साधारणीकरण। इस व्यापार के द्वारा विभावादि का और स्थायी भावों का साधारणीकरण होता है। साधारणीकरण से अभिप्राय है, सीतादि विशेष पात्ों का कामिनी आदि सामान्य रूपों में उपस्थित होना। स्थायी भाव और अनुभाव के साधारणीकरण का आशय है, विशिष्ट सम्बन्धों से मुक्ति।' इस व्याख्या से स्पष्ट हो जाता है कि विभाव-आश्रय, आलम्बन तथा उद्दीपन- अनुभाव, स्थायी भाव तथा संचारी भाव-सभी का साधारणीकरण होता है। संचारी भाव का उल्लेख नहीं किया गया है, परन्तु स्थायी भाव कहने से संचारी भाव का ग्रहण होता है। विश्वनाथ : परवर्त्ती रसशास्त्री इस मत को थोड़ा-बहुत परिवर्तन करके दुहराते रहे। केवल कविराज विश्वनाथ और पण्डितराज जगन्नाथ द्वारा प्रस्तुत विवेचन में विचित्रता अथवा नवीनता के कुछ संकेत मिलते हैं। विश्वनाथ ने भी विभावादि और स्थायी भाव-सभी का साधारणीकरण माना है।२ किन्तु अन्य आचार्यों से उनके विवेचन में अन्तर यह है कि उन्होंने आश्रय के साथ प्रमाता के तादात्म्य को अन्य आचार्यों की अपेक्षा अधिक महत्त्व प्रदान किया है। उनका कथन है कि यही साधारणीकरण विभावादिकों का विभावन नामक व्यापार है। इसी के प्रभाव से उस समय प्रमाता अपने को समुद्र में कूद जानेवाले हनुमान् आदि से अभिन्न समझने लगता है। यद्यपि समुद्र लाँघना मनुष्य से साध्य नहीं, तथापि हनुमान् आदि के साथ अभेद के बल से सामाजिकों के हृदय में भी वैसा उत्साह होने लगता है।3

इसका अभिप्राय यह है कि साधारणीकरण-व्यापार के कारण आश्रय के साथ प्रमाता का अभेद-सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। यह अभेद केवल सामान्य आश्रय के ही साथ नहीं, अपितु अलौकिक शक्तिवाले देवादि के साथ भी स्थापित होता है। उदाहरणार्थ साधारणतः सामान्य व्यक्ति में समुद्र-लंघन का उत्साह सम्भव नहीं है, किन्तु काव्य और नाटक में साधारणीकरण के कारण हनुमान के साथ उसका अभेद हो जाता है, जिसके फलस्वरूप उसमें समुद्र-लंघन जैसे अलौकिक उत्साह भी सहज रूप में सम्भव हो जाता है। यह प्रश्न भट्टनायक ने भी उठाया था, परन्तु अभावात्मक रूप में ही, किन्तु विश्वनाथ ने इसे भावात्मक रूप दिया और स्पष्ट रूप में प्रस्तुत किया।

१. काव्यप्रकाश (निर्णयसागर प्रेस), चतुर्थ उल्लास, पृ० ६६ २. साहित्यदर्पण, परिच्छेद ३, का० १२-१३ ३. वही, का० ९-११

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३५०j] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अ पण्डितराज : पण्डितराज जगन्नाथ ने भी अपने नव्यन्याय के प्रकाश में दूसरे ढंग से आश्रय के साथ प्रमाता के अभेद का ही समर्थन किया है। परन्तु, इस प्रसंग में उन्होंने 'दोष' शब्द का प्रयोग अधिक शुद्ध तथा उपयुक्त माना है। इस विषय में उनका विचार द्रष्टव्य है : "पहले तो हमें काव्य और नाटक में कवि तथा नट द्वारा प्रस्तुत विभावादि का ज्ञान होता है। फिर व्यंजना-व्यापार के द्वारा यह प्रतीति होती है कि दुष्यन्त शकुन्तला के प्रति अनुरक्त है। इसके उपरान्त सहृदयता के कारण हमारे चित्त में एक प्रकार की भावना उत्पन्न हो जाती है, अर्थात् हम अपनी सहृदयता के कारण दुष्यन्तादि के विषय में पुनः-पुनः अनुसन्धान करने लग जाते हैं। यह भावना एक ऐसा दोष है, जिससे हमारी आत्मा कल्पित दुष्यन्तत्व आदि से आच्छादित हो जाती है, अर्थात् उस समय हम अपने को दुष्यन्त समझने लगते हैं और जब हम अपने को दुष्यन्त समझ लेते हैं, तब हमें अपने को शकुन्तला का प्रेमी समझने में कोई बाधा नहीं रह जाती, अर्थात् उक्त दोष के कारण कल्पित दुष्यन्तत्व से आच्छन्न आत्मा में कल्पित शकुन्तला-विषयक रति भी भासित होने लगती है, जैसे दूरत्व आदि दोषों के कारण जब सीपी के टुकड़े अज्ञान से ढक जाते हैं- वास्तविक रूप में नहीं समझ पड़ते, तब उन टुकड़ों में ही चाकचिक्य-दोष से चाँदी के टुकड़े उत्पन्न हो जाते हैं-अर्थात् वे सीप के टुकड़े चाँदी के टुकड़े प्रतीत होने लगते हैं। यद्यपि न हममें शकुन्तला आदि की रति वास्तविक रूप में रहती है, न सीप के टुकड़ों में चाँदीपन, तथापि साक्षी आत्मा उनका भान करा देती है।"१ यहाँ पण्डितराज ने जो बात कही है, वही बात पहले विश्वनाथ भी कह चुके थे। उसी पर पण्डितराज ने दर्शन का रंग चढ़ा दिया है। उनके दार्शनिक विधान में साधारणीकरण के लिए कोई विशेष स्थान नहीं है, किन्तु दर्शन का पर्दा हटा देने पर स्पष्ट हो जायगा कि उन्होंने भी प्रमाता और आश्रय के तादात्म्य की ही बात कही है। रामचन्द्र शुक्ल : पण्डितराज जगन्नाथ के पश्चात् काव्यशास्त्र-विशेषतः रस- सिद्धान्त-के गम्भीर मनन और चिन्तन का क्रम समाप्त ही हो गया। हिन्दी के रीतिकालीन कवियों ने अपना प्रयत्न सरल प्रसंगों तक ही सीमित रखा और रस-सिद्धान्त तथा साधारणीकरण जैसे गम्भीर विषयों का विवेचन नहीं किया। अतः, काव्यशास्त्र का इतना गम्भीर तथा महत्त्वपूर्ण विषय उपेक्षित ही पड़ा रहा। लगभग तीन शतियों के उपरान्त आचार्य पण्डित रामचन्द्र शुवल ने अपने सुप्रसिद्ध निबन्ध 'साधारणीकरण और व्यक्ति- वैचित्यवाद' में इस विषय का पुनरुद्धार किया। इस विषय में आचार्य शुक्लजी की दृष्टि अतीत पर न होकर वर्त्तमान पर ही केन्द्रित है; क्योंकि यह भारतीय काव्यशास्त्र-विषयक अनुसन्धान का अंग नहीं, वरन् स्वतन्त्र चिन्तन का ही परिणाम है। इसलिए इस निबन्ध में

१. रसगंगाधर, प्रथम आनन (अनुवाद)

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साधारणीकरण-सिद्धान्त का विवेचन नहीं, अपितु पुनराख्यान ही प्रमुख है। अतः, उनकी स्थापनाओं के मूल्यांकन में यही दृष्टि अपेक्षित है। साधारणीकरण से सम्बद्ध आचार्य शुक्ल के उद्धरण निम्नलिखित हैं : १. जबतक किसी भाव का कोई विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यतः सबके उसी भाव का आलम्बन हो सके, तबतक उसमें रसोद्बोधन की पूरी शक्ति नहीं आती। इसी रूप में लाया जाना हमारे यहाँ साधारणीकरण कहलाता है।'

२. (क) काव्य का विषय सदा विशेष होता है, सामान्य नहीं; वह व्यक्ति सामने लाता है, जाति नहीं।

(ख) साधारणीकरण का अभिप्राय यह है कि पाठक या श्रोता के मन में जो व्यक्ति-विशेष या वस्तु-विशेष आती है, वह जैसे काव्य में वणित 'आश्रय' के भाव का आलम्बन होती है, वसे ही सब सहृदय पाठकों या श्रोताओं के भाव का आलम्बन हो जाती है।

(ग) जिस व्यक्ति-विशेष के प्रति किसी भाव की व्यंजना कवि या पात्र करता है, पाठक या श्रोता की कल्पना में वह व्यक्ति-विशेष ही उपस्थित रहता है।२

३. कल्पना में मूत्ति तो विशेष ही होगी, पर वह मूति ऐसी होगी, जो प्रस्तुत भाव का आलम्बन हो सके, जो उसी भाव को पाठक या श्रोता के मन में भी जगाये, जिसकी व्यंजना आश्रय अथवा कवि करता है। इससे सिद्ध हुआ कि साधारणीकरण आलम्बनत्व- धर्म का होता है।3

४. व्यक्ति तो विशेष ही रहता है, पर उसमें प्रतिष्ठा ऐसे सामान्य धर्म की रहती है, जिसके साक्षात्कार से सब श्रोताओं या पाठकों के मन में एक ही भाव का उदय थोड़ा-बहुत होता है। ........ 'विभावादि सामान्य रूप से प्रतीत होते हैं', इसका तात्पर्य यही है कि रसमग्न पाठक के मत में यह भेद-भाव नहीं रहता है कि यह आलम्बन मेरा है या दूसरे का। थोड़ी देर के लिए पाठक या श्रोता का हृदय लोक का सामान्य हृदय हो जाता है।४

५. साधारणीकरण के आलम्बन द्वारा भाव की अनुभूति प्रथम कवि में चाहिए, फिर उसके वर्णित पात्र में और फिर श्रोता या पाठक में। विभाव द्वारा जो साधारणीकरण कहा गया है, वह तभी चरितार्थ होता है।" १. चिन्तामणि, प्रथम भाग, पृ० २२७-२३० २. वही ३. वही ४. वही ५. रसमीमांसा, पृ० ९९

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३५२ 1 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

इन उद्धरणों का विश्लेषण करने पर कुछ तथ्य हमारे सामने आते हैं। आचार्य शुक्लजी मूलतः आलम्बन का साधारणीकरण मानते हैं। आलम्बन पहले कवि के भाव का विषय बनता है और तब सम्पूर्ण सहृदय-समाज के भाव का विषय बनता है। इसी प्रकार, आलम्बन का साधारणीकरण होता है। आलम्बन के साधारणीकरण का अभिप्राय यह नहीं कि उसके व्यवितित्व का ही लोप हो जाता है या वह व्यक्ति नहीं रहकर जाति बन जाता है। उसका व्यक्तित्व तो पूर्ववत् स्थिर रहता है, केवल उसमें कतिपय ऐसे गुणों का सामावेश हो जाता है कि वह सभी सहृदयों के उसी भाव का विषय बन जाता है। आलम्बन के साधारणीकरण का यह अर्थ नहीं कि सीता अपना व्यक्तित्व खोकर केवल कामिनी रह जाती है, प्रत्युत उसमें शील- सौन्दर्य आदि के कारण कुछ ऐसे गुण आ जाते हैं कि वह सभी सहृदयों के प्रेम का विषय बन जाती है। आलम्बन का व्यक्तित्व भी लुप्त नहीं हो और उसका साधारणीकरण हो जाय-ये दोनों विरोधी बातें जान पड़ती हैं, परन्तु शुक्लजी ने इसका भी समाधान किया है। इसके लिए उन्होंने अपनी मूल स्थापना में भी कुछ संशोधन किया है। इस विषय में उनका कथन है कि साधारणीकरण, वास्तव में, आलम्बन-धर्म का होता है; दूसरे शब्दों में, उन सामान्य गुणों का साधारणीकरण होता है, जिनके कारण सीता राम को प्रिय लगती है। किन्तु, यहां कई उलझनें पैदा हो जाती हैं। सीता केवल कामिनी नहीं है, वे एक व्यक्ति हैं। वे राम की प्रिया हैं, किन्तु उनपर राम का प्रेम, शील, सौन्दर्य आदि कई गुणों के कारण है, जो गुण वस्तुतः सम्पूर्ण सहृदय-समाज में रति उत्पन्न कर सकते हैं। सीता राम की प्रिया है, परन्तु सीता के सामान्य गुण के ही आधार पर राम का प्रेम है, अतः वे उन सभी गुणों के आधार पर सहृदय-समाज को भी प्रिय हो सकती हैं। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सहृदयों के प्रेम का विषय सीता का व्यक्तित्व नहीं, वरन् उनके शील-सौन्दर्य आदि सामान्य गुण ही हैं। वास्तव में, आचार्य शुक्लजी के सम्मुख यह समस्या है कि वे अपने दो सिद्धान्तों में कैसे सामंजस्य स्थापित करें। उनका पहला सिद्धान्त है कि काव्य का आलम्बन विशिष्ट होता है। दूसरा सिद्धान्त है कि काव्य का आस्वादन भाव की सामान्य पृष्ठभूमि पर होता है। इस समस्या का समाधान उन्होंने किया है कि कुशल कवि आलम्बन की विशिष्टता की रक्षा करते हुए सामान्य गुणों के आधार पर उसका साधारणीकरण कर लेते हैं। फलस्वरूप सीता के प्रति सहृदय का अनुराग हो जाता है, किन्तु उसके हृदय में यह भेद-भाव नहीं रहता कि सीता राम के प्रेम के आलम्बन-स्वरूप है या उसके प्रेम के। ऐसी दशा में सहृदय का चित्त व्यक्ति-चेतना से सर्वथा मुक्त रहता है। शुक्लजी के मतानुसार पहले कवि के हृदय में सीता के प्रति अनुराग उत्पन्न होता है, फिर वह आश्रय के माध्यम से उसे प्रकट करता है और अन्त में काव्य का आस्वादन करनेवाला सम्पूर्ण सहृदय-समाज उस भाव का अनुभव करता है। भट्टतोत का भी यही मत है। शुक्लजी के मत का सारांश सम्भवतः यही है।

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रस

डॉ० नगेन्द्र : इस प्रसंग में डॉ० नगेन्द्र का अभिमत द्रष्टव्य है-"साधारणीकरण का विवेचन करते समय भट्टनायक और अभिनवगुप्त के अभिमत शुक्लजी के सामने नहीं थे-केवल विश्वनाथ का ही मत उनके सामने था। उसका भी उन्होंने शास्त्रीय विवेचन न कर केवल स्वतन्त्र चिन्तन या अपने सिद्धान्त के अनुकूल प्रयोग-मात्र किया है। पहला तथ्य शुक्लजी की सामयिक परिसीमा का द्योतक है और दूसरा, उनकी मौलिक प्रतिभा का।"१ केशवप्रसाद मिश्र : किन्तु आचार्य शुक्लजी का यह मत स्वीकृत भारतीय काव्य- सिद्धान्त से कुछ भिन्न है। अतः, कतिपय संस्कृतज्ञ काव्यशास्त्रियों ने इसपर कुछ आक्षेप किये हैं। पण्डित केशवप्रसाद मिश्र ने शुक्लजी के इस मत को भ्रम कहा है। वे अभिनवगुप्त के अनुसरण पर साधारणीकरण का अभिप्राय चित्तवृत्तियों का साधारणीकरण मानते हैं। विभाव का साधारणीकरण एकांगी है और भाव का ही साधारणीकरण वास्तविक तथा पूर्ण होता है। विभाव पर बल देने से विषय का महत्त्व प्रतिपादित होता है और इससे द्वँत की प्रतिष्ठा होती है। किन्तु द्व तवादी रस-कल्पना मूल रूप से बौद्धिक तथा नैतिक आधार पर ही प्रतिष्ठित है। इस तर्क के आधार पर पं० केशवप्रसाद मिश्र आचार्य शुक्लजी की रस-दृष्टि को द्वतवादी भट्टनायक के भुक्तिवाद के सिद्धान्त से सम्बन्ध जोड़कर उसे भी अपूर्ण ही मानते हैं। अभिनवगुप्त ने रस को आध्यात्मिक प्रक्रिया माना है और केशवजी भी इसी आध्यात्मिक प्रक्रिया में रस की पूर्णता मानते हैं। उनका विवेचन बहुत ही सूक्ष्म तथा मार्मिक है। उन्होंने आचार्य शुक्लजी की विभावनिष्ठ दृष्टि को अभिनव के अद्वंत की अपेक्षा भट्टनायक के द्वूत-सिद्धान्त के अधिक निकट माना है। फिर भी, उनके सभी निष्कर्ष सर्वथा ग्राह्य नहीं हैं। यह ठीक है कि विषय की सत्ता की स्वीकृति तथा नैतिक आधार ऐसे दो तत्त्व शुक्लजी के रस-विवेचन में विद्यमान हैं, जो भट्टनायक के सिद्धान्त में भी हैं, किन्तु भट्टनायक और शुक्लजी के मतों में कुछ स्पष्ट भेद है: १. भट्टनायक ने आलम्बन पर बल नहीं देकर सभी का साधारणीकरण माना है; २. निजकान्ता-स्मृति की सत्ता को उन्होंने रसास्वाद की प्रक्रिया में अस्वीकृत कर दिया है, परन्तु शुक्लजी ने इसे विकल्प रूप में मान भी लिया है; ३. भट्टनायक ने करुण आदि सभी रसों को आनन्दमय माना है, परन्तु शुक्लजी ने रस-कल्पना को हृदय की मुक्तावस्था का पर्याय माना है, अर्थात् वह भट्टनायक के 'भावकत्व'-व्यापार तक ही समाप्त हो जाती है, भोग तक नहीं पहुँचती। पं० केशवप्रसाद मिश्र के बाद भी विवेचन का यह कम चलता रहा और डॉ० गुलाब राय तथा पं० रामदहिन मिश्र आदि ने रस का विवेचन किया, परन्तु उनके विवेचन में किसी नवीन सिद्धान्त की स्थापना नहीं होकर विषय की व्याख्या की ही प्रधानता है।

१. रस-सिद्धान्त, पृ० २०२

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३५४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

उण्ड कग सारांश : ऊपर के विवेचन से ज्ञात होता है कि साधारणीकरण के विषय में विभिन्न आचार्यों के विभिन्न मत हमारे समक्ष हैं। सबका सारांश नीचे दिया जाता है : १. भट्टनायक का मत : रस के सभी अंगों-विभाव, अनुभाव, स्थायी भाव और संचारी भाव का साधारणीकरण होता है। विभाव आदि का साधारणीकरण पहले होता है और इसके फलस्वरूप स्थायी भाव का साधारणीकरण बाद में होता है। इस प्रकार, साधारणीकरण की प्रक्रिया में अत्यल्प मात्रा में क्रम रहता है। इस मत में विषय और विषयी दोनों पक्षों का सन्तुलन है। २. अभिनवगुप्त का मत : रस के विभाव, अनुभाव, स्थायी भाव तथा संचारी भाव सभी अंगों का साधारणीकरण होता है। विभावादि के साधारणीकरण के ही फलस्वरूप स्थायी भाव का साधारणीकरण होता है, जिससे सहृदय की चेतना व्यक्ति-संसर्ग से सवथा मुक्त हो जाती है। परन्तु, स्थायी भाव का साधारणीकरण ही अन्त में मुख्य हो जाता है और शेष ज्ञान उसमें अन्तर्भूत हो जाते हैं। इस पक्ष में अन्ततः भाव तथा विषयी पक्ष की ही स्वीकृति है। आ३. भदटृतौत का मत : साधारणीकरण की प्रक्रिया में तीन बिन्दु हैं-कवि, नायक और श्रोता। जब इन तीनों के भाव का तादात्म्य हो जाता है तब साधारणीकरण पूर्णता को प्राप्त कर लेता है। आचार्य शुक्ल ने भी यह मत मान लिया है। ४. विश्वनाथ का मत : इस मत के अनुसार भी विभावादि सभी अंगों का साधारणीकरण होता है, किन्तु यहाँ साधारणीकरण की प्रक्रिया में आश्रय के साथ तादात्म्य अथवा अभेद पर बल दिया गया है। प्रमाता की चेतना विकसित होकर हनुमान् (विभाव) की चेतना के साथ तादात्म्य करके समुद्र-लंघन के समान अलौकिक कृत्यों में भी उत्साह का अनुभव करती है। इस रूप में विश्वनाथ का यह मत भट्टनायक तथा अभिनवगुप्त के मत से कुछ हटकर है। पण्डितराज जगन्नाथ ने भी दार्शनिक पदावली में इसी मत का प्रतिपादन किया है। उनके मत से भी आश्रय के साथ अभेद ही मुख्य है। ५. आचार्य शुक्ल का मत : इस मत से आलम्बन या आलम्बन-धर्म का साधारणी- करण होता है। आलम्बन अपनी विशिष्टता की रक्षा करते हुए भी अपने सामान्य गुणों के कारण सहृदयों के चित्त में वैसा ही भाव जगाता है, जैसा काव्य-प्रसंग के अन्तर्गत आश्रय के चित्त में जगता है। इस प्रकार शुक्लजी भाव के साधारणीकरण को भी स्वीकार करते हैं, परन्तु आलम्बन या आलम्बन-धर्म के साधारणीकरण पर ही बल देते हैं। गो विवेचन : मूल प्रश्न यह है कि उपरिलिखित में से कौन-सा विकल्प सत्य है, अर्थात् वास्तव में किसका साधारणीकरण होता है? इस प्रश्न का समाधान करने पर ही साधारणीकरण का वास्तविक महत्त्व स्पष्टतः बोधगम्य होगा।] कोई काव्य पढ़ते समय दो सत्ताएँ विद्यमान रहती हैं-पहली, वस्तु या विषय और दूसरी, प्रमाता या विषयी। विषय के अन्तर्गत विभाव-आलम्बन और उद्दीपन-

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रस

अनुभाव और संचारी भाव आते हैं; विषयी सहृदय या प्रमाता है। ऊपर देखा जा चुका है कि भट्टनायक के सिद्धान्त के अनुसार विषय के समस्त अवयवों-विषय (आलम्बन तथा उद्दीपन), अनुभाव और संचारी भाव का साधारणीकरण होता है और फलस्वरूप प्रमाता के स्थायी भाव का भी साधारणीकरण होता है। सर्वांग का साधारणीकरण : विश्लेषण करने पर देखा जा सकता है कि सभी संशोधनों का खण्डन हो जाता है। सभी विकल्पों के खण्डित हो जाने पर अन्त में हम भट्टनायक के इस मत पर आते हैं कि वास्तव में साधारणीकरण सभी अंगों का होता है। उदाहरण के लिए रामचरितमानस में व्णित जनकपुर-वाटिका का प्रसंग लिया जाय। वहाँ आश्रय राम, आलम्बन सीता, राम की चेष्टाएँ अनुभाव, वाटिका का रम्य तथा हृदयग्राही वातावरण उद्दीपन, आश्रय राम के चित्त में संचरण करनेवाले हर्ष, मति आदि संचारी भाव-सभी का साधारणीकरण हो जाता है। इसका फल यह होता है कि सहृदय की चेतना भी व्यक्ति-संसर्गों से मुक्त हो जाती है, अर्थात् उसका भी साधारणीकरण हो जाता है। निष्कर्ष : निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि साधारणीकरण कवि की अपनी अनुभूति या भावना का होता है। जब कोई व्यक्ति अपनी अनुभूति को इस ढंग से व्यक्त करता है कि वह अनुभूति सभी व्यक्तियों के चित्त में समान अनुभूति जागरित करने में समर्थ हो जाय, तो कहा जाता है कि उस व्यक्ति में साधारणीकरण की शक्ति विद्यमान है। यों अनुभूति सभी व्यक्तियों में विद्यमान रहती है और सभी उसे थोड़ा बहुत अभिव्यक्त भी कर लेते हैं, किन्तु साधारणीकरण करने की क्षमता सभी में नहीं रहती। यही कारण है कि अनुभूति और अभिव्यक्ति के विद्यमान रहने पर भी सभी कवि नहीं हो सकते। वही कवि होता है, जो अपनी अनुभूति का साधारणीकरण करने का सामर्थ्य रखता हो। विभिन्न रस उत्पादक रस : भरत मुनि ने चार रसों को शेष रसों की उत्पत्ति का हेतु माना है। वे हैं-शृंगार, रौद्र, वीर तथा बीभत्स। शृंगार से हास्य, रौद्र से करुण, वीर से अद्भुत और बीभत्स से भयानक रस की उत्पत्ति होती है। भरत ने इसका कोई पौराणिक कारण नहीं बताया है, परन्तु शारदातनय ने भावप्रकाशन में इस सम्बन्ध में दो मतों का उल्लेख किया है। प्रथम मत के अनुसार परमात्मा (ब्रह्मा) ने चार वेदों से चार रसों की रचना की। शृंगार सामवेद से, वीर ऋग्वेद से, रौद्र अथर्ववेद से और बीभत्स यजुर्वेद से निर्मित हुए। शारदातनय द्वारा उल्लिखित दूसरा मत व्यास का कहा गया है, जिन्होंने नारद को सिखाया और नारद से भरत को प्राप्त हुआ। भरत ने इसका प्रचार संसार में किया। इस मत के अनुसार विश्व के नाश के अनन्तर ब्रह्मा ने शिव के आदेशा- नुसार विश्व की सृष्टि की। फिर, ब्रह्मा ने त्रिपुरदाह नामक रूपक रचा और भरतों ने उसका

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३५६ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अभिनय उनके समक्ष किया। जब ब्रह्मा अभिनय में शिव का प्रेम, त्रिपुर तथा दक्ष-यज्ञ का विनाश तथा विश्व का प्रलय देख रहे थे, तब वे अत्यन्त प्रभावित हुए। फलस्वरूप उनके चार मुखों से चार वृत्तियाँ-कैशिकी, सात्त्वती, आरभटी तथा भारती-अनायास निस्सृत हुईं। इन्हीं चार वृत्तियों से चार रस क्रमशः शृंगार, वीर, रौद्र तथा बीभत्स उत्पन्न हुए। इन चार रसों से हास्य, अद्भुत, करुण तथा भयानक भी कैसे निकल सकते हैं, इस तथ्य का विवेचन व्यास ने उसी त्रिपुरदाह रूपक के आधार पर तर्कपूर्ण ढंग से किया है।' 5 इस प्रकार, चार रस-युग्मों की स्थिति हो जाती है-शृंगार-हास्य, वीर-अद्भुत, बीभत्स-भयानक, रौद्र-करुण। इनका सम्बन्ध मन की चार स्थितियों से जोड़ा जाता है। रसास्वाद के समय सामाजिक का मन या तो विकसित होता है या विस्तृत, या क्षुब्ध होता है या उसमें विक्षेप की क्रिया होती है। इस प्रकार, ये चार स्थितियाँ उपर्युक्त चार रस-युग्मों में देखी जाती हैं। शृंगार-हास्य में मानस में विकास होता है; वीर-अद्भुत में मानस में विस्तार होता है; बीभत्स-भयानक में उसमें क्षोभ होता है और रौद्र-करुण में उसमें विक्षेप की स्थिति रहती है। सामाजिक के चित्त में जब विकास तथा विस्तार होता है, तब उसे सुख मिलता है और जब क्षोभ तथा विक्षेप की स्थिति रहती है, तब दुःख का अनुभव होता है। इसलिए, कुछ आचार्य रस को सुख-दुःखात्मक मानते हैं, परन्तु अधिकतर आचार्य ऐसा नहीं मानते। उनका कथन है कि ये क्षोभ तथा विक्षेप लौकिक क्षोभ तथा विक्षेप से भिन्न होते हैं, अतः सर्वदा आनन्दजनक ही होते हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि शृंगार रस से चित्त में विकास तथा वीर रस से विस्तार होता है। इन दोनों रसों के नायक को सहज ही सामाजिक की सहानुभूति प्राप्त हो जाती है। इसलिए, पूर्णांग रूपकों में इन दो रसों की प्रधानता मिलती है। विकास और विस्तार को एक शब्द में विस्फार कहते हैं। विस्फार के कारण नाटक में शृंगार और वीर रसों की प्रधानता रहती है। शान्त रस : ऐसा प्रतीत होता है कि आरम्भ में शान्त रस का विवेचन नाट्य- शास्त्र में नहीं हुआ था। किन्तु, अभिनवगुप्त के समय तक यह रस स्थापित हो चुका था और इस विषय में पर्याप्त वाद-विवाद भी हो चुका था, जिसका उल्लेख अभिनवगुप्त ने भी किया है। शान्त रस शम स्थायिभावात्मक तथा मोक्ष में प्रवृत्त करनेवाला होता है। यह तत्त्वज्ञान, वैराग्य, चित्त-शुद्धि आदि विभावों से उत्पन्न होता है। इसका आश्रय उत्तम पात् होता है। अनित्यता, दुःखमयता आदि रूप से सम्पूर्ण संसार की असारता का ज्ञान अथवा परमात्मा का स्वरूप इस रस में आलम्बन होता है। ऋषि आदि का पवित्र आश्रम, पवित्र तीर्थ, रमणीय एकान्त वन तथा महात्माओं का सत्संग आदि शान्त रस के उद्दीपन हैं। यम, नियम, अध्यात्म-ज्ञान, ध्यान, धारणा, उपासना, प्राणिमात्र के प्रति दया, प्रव्रज्या-ग्रहण, १. भावप्रकाशन, तृतीय अधिकार, पृ० ५४-५६

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सक्ती ज कागाय: रस [३५७

रोमांच आदि इसके अनुभाव हैं। निर्वेद, स्मृति, धृति, सर्वाश्रम, शौच, हर्ष, स्मरण, मति आदि इसके संचारी भाव हैं। शान्त रस का स्थायी भाव : जो रसशास्त्री शान्त रस को नौवां रस मानते हैं, अभिनव ने पहले उनके मत का निरूपण किया है। इनमें से कुछ विद्वानों के मत से शान्त रस शम स्थायी भाव का स्वरूप है, जो तपस्या एवं योगियों के सम्पर्क आदि विभावों से उत्पन्न होता है। काम, क्रोध आदि के अभाव-रूप अनुभाव से इसका अभिनय होता है। दूसरी ओर, इसके विपक्षियों का तर्क है कि शम तथा शान्त समानार्थक शब्द हैं, इनमें से एक को स्थायी भाव और दूसरे को रस मानना कहाँ तक उचित माना जा सकता है? सब मिलाकर भावों की संख्या उनचास मानी गई है। शम के आ जाने से यह संख्या पचास हो जायगी, जिससे मान्य संख्या में अन्तर आ जायगा। काम आदि का अभाव इसका अनुभाव भी नहीं माना जा सकता; क्योंकि इनका अभाव शान्त रस के विपक्षी वीर आदि रसों में भी होता है। अतः, इस अभाव की स्थिति से शान्त रस का द्योतन नहीं हो सकता। ऐसी दशा में वीर आदि रसों से शान्त की भिन्नता स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देती। इस विषय में दूसरी बात यह है कि चेष्टाओं के अभाव का अभिनय सम्भव नहीं है, इसलिए नाट्य में इसका समावेश नहीं हो सकता। शम की निष्किय स्थिति का अभिनय नहीं हो सकता। इन कारणों से शान्त रस को स्वीकार नहीं किया जा सकता। अभिनव ने यह पक्ष उपस्थित करके समर्थन-पक्ष का प्रतिपादन किया है। संसार में धर्म, अर्थ और काम पुरुषार्थ माने गये हैं; इसी प्रकार शास्त्रों में मोक्ष भी चतुर्थ पुरुषार्थ माना गया है। काम आदि चित्तवृत्तियाँ रति आदि शब्दों के द्वारा निर्दिष्ट सहृदय सामाजिकों के लिए शृंगार आदि के रूप में आस्वाद्य बनाई जाकर रसत्व को प्राप्त होती हैं। उसी प्रकार, मोक्ष नामक पुरुषार्थ-रूप चित्तवृत्ति शान्त रस का स्थायी भाव मानी जा सकती है। यहाँ प्रश्न उठता है कि शान्त रस का स्थायी भाव क्या है? कुछ विद्वानों का मत है कि तत्त्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद ही इसका स्थायी भाव है। निर्धनता आदि से उत्पन्न निर्वेद शान्त रस के निर्वेद से भिन्न होता है। भरत ने इसे स्थायी भाव और संचारी भाव के बीच में रखा है। उन्होंने निर्वेद की गणना स्थायी भावों में नहीं की है, परन्तु संचारियों में इसे सर्वप्रथम रखा है। यदि भरत की दृष्टि में निर्वेद मोक्ष का साधन न होकर दरिद्रता आदि से सम्बद्ध होता तो वे इसे सर्वप्रथम स्थान नहीं देते; क्योंकि कहीं भी आरम्भ में मंगलमय शब्द का प्रयोग उचित है। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि भरत ने स्वयं निर्वेद को संचारी भावों में गिनाया है, तो फिर इसे स्थायी भाव मानने का क्या आधार हो सकता है? अभिनव ने इस शंका का समाधान किया है कि भरत ने बीभत्स के स्थायी भाव जुगुप्सा का शृंगार के व्यभिचारी रूप में निषेध करते समय सभी स्थायी भावों का स्थायी भावत्व तथा व्यभिचारी भावत्व स्वीकार करने की अनुमति दी है। कोई व्यभिचारी भाव स्थायी भाव भी हो सकता है। इस प्रकार, यह माना जा सकता है कि तत्त्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद शान्त रस का स्थायी भाव है।

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तत्त्वज्ञान से उत्पन्न निर्वेद को नहीं माननेवाले आचार्यों का कथन है कि तत्त्व- ज्ञान से निर्वेद की उत्पत्ति मान लेने पर भी शम का दूसरा नाम निर्वेद सिद्ध होता है। फिर, शम को ही शान्त रस का स्थायी भाव क्यों नहीं माना जाय ? यदि आपत्ति उठाई जाय कि 'शम' और 'शान्त' का एक ही अर्थ है, तो फिर 'हास्य' और 'हास' की स्थिति भी तो समान ही है। इस प्रकार, इस दोष का समाधान हो जाता है। स्थायी भाव लौकिक और रस अलौकिक होता है, सिद्ध साधनता के दोष का निराकरण हो जाता है। दोनों में साधारण तथा असाधारण का अन्तर रहने के कारण शम और शान्त में विलक्षणता बनी रहती है। अतः, निर्वेद को शान्त का स्थायी भाव नहीं मानकर शम को ही माना जाना चाहिए। कुछ अन्य आचार्यों के मतानुसार रति आदि आठ स्थायी भाव ही शृंगार आदि में प्रयुक्त विभावों से भिन्न आध्यात्मिक प्रसंग आदि अलौकिक विभावों के आश्रय से भिन्न रूप में प्रकट होते हैं। अभिप्राय यह है कि स्थायी भाव का अन्तर नहीं होकर शान्त रस- परक विभावों का अन्तर होता है। इन आठ स्थायी भावों में से कोई भी शान्त रस का स्थायी भाव हो सकता है। इस पक्ष के समर्थक अपना मत भरत के ही अनुकूल सिद्ध करते हैं। भरत ने विशिष्ट विभावों की गणना कराने के साथ 'आदि' शब्द का प्रयोग किया है और इस प्रकार अन्य विभावों का ही समाहार कर लिया है। इस दृष्टि से यह माना जा सकता है कि उन्होंने अलौकिक हेतुओं से रति आदि से भी मोक्ष की सिद्धि को स्वीकार किया है। अभिनवगुप्त ने इस स्थापना का खण्डन किया है। सभी स्थायी भावों को शान्त के स्थायी भाव के रूप में स्वीकार करनेवालों में किसी एक की स्थायी भाव के रूप में स्थिति सिद्ध नहीं होती। अनेक विभावों के भेद से भिन्न-भिन्न स्थायी भावों को शान्त रस के स्थायी भाव के रूप में मानना उपयुक्त भी नहीं है। यदि विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न स्थायी भावों की स्थिति मानी जाय, तो रस के अनन्त भेदों को स्वीकार करना पड़ेगा। यदि यह तर्क दिया जाय कि मोक्षरूप फल एक होने के कारण शान्त रस एक ही रूप होगा, तब इस दशा में वीर, रौद्र आदि सभी को एक ही रस मानना होगा; क्योंकि वे सभी आनन्दपरक हैं। इस विषय में एक अन्य मत भी है। इस मत के अनुसार पानक रस के आस्वाद के समान शान्त रस में सभी स्थायी भाव मिलकर स्थायी भाव का रूप लेते हैं। परन्तु, यह सम्भव नहीं; क्योंकि एक साथ कई चित्तवृत्तियों की स्थिति नहीं हो सकती। फिर, विरोधी भावों के रहने से यह स्थिति कभी भी सम्भव नहीं। अन्त में, अभिनव ने स्वयं प्रश्न उठाया है कि तब शान्त रस का स्थायी भाव किसे स्वीकार किया जाय ? इस प्रश्न के उत्तर में उन्होंने स्वीकार किया है कि पहली बात यह है कि तत्त्वज्ञान मोक्ष का साधन होता है, अतः उसे ही स्थायी भाव का साधन मानना उचित है। तत्त्वज्ञान, आत्मज्ञान का

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रस [ ३५९

ही नाम है और आत्मज्ञान ऐन्द्रिक ज्ञान से भिन्न होता है। इसलिए, अभिनव के अनुसार शान्त रस का स्थायी भाव आत्मा ही है। फिर, इस स्थापना के विरुद्ध प्रश्न उठता है कि यदि आत्मा को स्थायी भाव माना जाय, तो किसी दूसरे स्थायी भाव की क्या आवश्यकता रह जाती है ? परन्तु, इससे दूसरे स्थायी भावों का अस्थायित्व नहीं सिद्ध होता। इसका कारण यह है कि रति आदि स्थायी भाव अलग-अलग कारणों से उत्पन्न और विलीन होकर भी आत्मारूपी स्थायी के आश्रित स्थायी भाव कहे जाते हैं; इनका स्थायित्व सापेक्ष होता है। परन्तु, तत्त्वज्ञान के साथ ऐसी बात नहीं है; वह अन्य भावों का आश्रय है और दूसरे भावों की अपेक्षा अधिक स्थायी है। इसके सन्दर्भ में अन्य स्थायी भाव व्यभिचारी भाव के सहायक हो जाते हैं। इसीलिए, भरत ने इसे अलग से स्थायी भावों में नहीं गिनाया है। अतः, भावों की संख्या उनचास युक्ति-संगत है। भरत ने इस आत्म-स्वरूप अनुभव को 'शम' नाम नहीं दिया। किन्तु, कोई इस आत्म-स्वरूप को 'शम' अथवा 'निर्वेद' नाम से पुकारे, तो कोई अनुचित भी नहीं है। केवल इतना ही है कि 'शम' एक विशिष्ट चित्तवृत्ति है। यह निर्वेद भी दीनता आदि से उत्पन्न निर्वेद के सदृश नहीं है। यह निर्वेद या शम आत्मा का स्वरूप नहीं होकर चित्तवृत्ति- मात्र है। इसलिए, शान्त रस के स्थायी भाव के रूप में आत्मा को ही शमता या तत्त्वज्ञान कहा जायगा। इसके अलग-अलग विकारों से रति आदि भाव होते हैं। सभी लौकिक एवं अलौकिक चित्तवृत्तियाँ तत्त्वज्ञान-रूपी स्थायी भाव का व्यभिचारी रूप मानी जाती हैं। शान्त रस स्वभाव-रूप कहा जाता है, दूसरे रस तो विकार-रूप हैं। कि मनुष्य परोपकार करने के प्रयत्न में स्वयं को कृतकार्य अनुभव करता है, अतः यह इच्छा या प्रयत्न-रूप उत्साह, जिसे दूसरे शब्द में दया कहते हैं, शान्त रस का अन्तरंग होता है। इसीलिए, कतिपय विद्वान् इसे दयावीर या धर्मवीर भी कहते हैं। इन विद्वानों के मतानुसार दयावीर तथा धर्मवीर शान्त रस के ही अन्तर्गत चले आते हैं। परन्तु, अभिनव ने इस मत का खण्डन किया है। उनका तर्क है कि उत्साह अहंकार से प्रेरित होता है, किन्तु शान्त रस में अहंकार शिथिल हो जाता है; इसीलिए शान्त रस के विरुद्ध प्रकृतिवाला उत्साह शान्त रस का अंग कैसे बन सकता है ? इसके समाधान के रूप में कहा जा सकता है कि सर्वदा अनुकूल व्यभिचारियों का ही प्रयोग स्वीकार नहीं किया जा सकता; विरुद्ध भावों का व्यभिचारी के रूप में वर्णन अनुचित नहीं माना जा सकता। ऐसे प्रसंग में उत्साह शान्त रस के ही अन्तर्गत माना जायगा। सकही शान्त रस की स्थिति : शान्त रस की स्थिति सिद्ध करने के उपरान्त अभिनवगुप्त ने शास्त्रों का भी प्रमाण दिया है। इतिहास, पुराण तथा अभिधान-कोश आदि में नव रस का उल्लेख किया गया है। उन्होंने अपने गुरु के सिद्धान्तशास्त्र का प्रमाण प्रस्तुत किया है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि नव रस ही स्वीकार करना उचित है। शान्त रस के

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३६०] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

विभाव हैं-लोक के प्रति वैराग्य और संसार की भीति। निर्वेद, मति, धृति आदि इसके संचारी भाव हैं। अतः स्मृति, धृति तथा उत्साहपरक ईश्वर-भावमूला भक्ति तथा श्रद्धा शान्त रस के अंग-रूप हैं। इस स्थल पर अभिनवगुप्त ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया है कि भक्ति शान्त रस के अन्तर्भूत है। इसलिए इसे अलग रस नहीं माना गया है। इस बात के समर्थन में अभिनव ने संग्रहकारिका का प्रमाण प्रस्तुत किया है।

शान्त रस को अस्वीकार करनेवाले आचार्य अपने मत का समर्थन डिम के लक्षण से करते हैं। डिम में छह रसों की स्थिति मानी गई है और उसमें हास्य तथा शृंगार का निषेध किया गया है :

भृङ्गारहास्यवर्जेः शेषैरन्यः रसेः समायुक्तः। दीप्तरसकाव्ययोनिर्नानाभावोपसम्पन्नः =

परन्तु, शान्त रस के प्रबल समर्थक अभिनव ने इसका भी समाधान निकाल लिया है। उनका कथन है कि 'दीप्तरसकाव्ययोनि' आदि कहलानेवाले डिम से शान्त रस का निषेध नहीं, समर्थन ही होता है। रौद्ररस-प्रधान डिम में शान्त रस की सम्भावना ही नहीं हो सकती, तो फिर उसका निषेध ही क्यों किया जाय ? इसीलिए, शृंगार और हास्य के साथ शान्त का उल्लेख नहीं किया गया है। अभिनव का तर्क है कि डिम में रौद्र की प्रधानता रहने से ही शान्त की पृथक्ता का निर्देश हो जाता है। डिम को सात्त्वती तथा आरभटी वृत्तियों से युक्त कहा गया है, अतः इन वृत्तियों से रहित करुण तथा अद्भुत का स्वतः ही निषेध हो जाता है। शान्त रस में सात्त्वती वृत्ति का प्रयोग माना गया है, इसलिए उसकी पृथक्ता के लिए ऐसा कहना संगत हो सकता है। इस प्रकार, तर्क-बल से अभिनव शान्त रस की स्थापना करते हैं, जो वास्तव में भरत द्वारा स्वीकृत नहीं माना जा सकता। के ह अभिनव ने आगे बताया है कि डिम में बलपूर्वक उपभोग किये जानेवाले शृंगार का प्रयोग हो सकता है और हास्य उसके अंगरूप में स्वीकृत किया जा सकता है। इसीलिए, उनके निषेध की आवश्यकता समझी गई। शान्त मूलभूत रस, अर्थात् आत्मापरक है, अतः इसके रंग और देवता की कल्पना उचित है, परन्तु अन्य रसों की समानता के कारण ऐसा किया गया है। इस प्रकार, शान्त रस की सत्ता सभी रसों में प्रधान तथा सम्पूर्ण इतिहास में व्याप्त मानना उचित है। फिर अभिनव ने शान्त रस के आस्वादन की विधि पर भी विचार किया है। उत्साह, रति आदि स्थायी भाव आत्मा को आच्छादित किये रहते हैं, परन्तु यह आत्मतत्त्व इन भावों के बीच चमकता रहता है। जब यह आत्मभाव रति आदि सभी भावों के उस रूप में वर्त्तमान रहने पर भी आभासित हो जाता है, तब विषयों से पराङमुख होकर दुःखों से छुटकारा मिलता है और परम आनन्द की उपलब्धि होती है। शान्त रस के विषय में कुछ अन्य आचार्यों के मत द्रष्टव्य हैं : १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १८, का० १३७ (काव्यमाला)

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रस [३६१

धनंजय : धनंजय ने 'शम' नामक स्थायी भाव का निषेध करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा है :

रत्युत्साहजुगुप्सा: क्रोधो हास: स्मयो भयं शोक:। शममपि केचित्प्राहुः पुष्टिर्नाट्येषु नैतस्य ।' कुछ लोग शम को भी स्थायी भाव मानते हैं, परन्तु नाट्य में इसकी पुष्टि नहीं होती। इस कारिका की वृत्ति लिखते समय धनिक ने शम स्थायी भाव तथा शान्त रस को अस्वीकार करने के कारणों का विवेचन किया है। उन्होंने शम-विरोधी तीन मत प्रस्तुत किये हैं :

१. कुछ लोग शान्त रस को स्वीकार ही नहीं करते; क्योंकि भरत मुनि ने उनके विभावादि का प्रतिपादन नहीं किया और उनके लक्षण भी नहीं लिखे। २. कुछ लोग शान्त रस का निषेध इस कारण से करते हैं कि राग-द्वष अनादिकाल से आ रहे हैं और इनका नाश होना सम्भव नहीं है। ३. कुछ अन्य लोग शान्त रस का अन्तर्भाव वीर, बीभत्स आदि रसों में कर लेते हैं। धनंजय शम भाव या शान्त रस का निषेध केवल नाटकादि रूपकों में करते हैं। शम से सभी व्यापारों की समाप्ति हो जानी चाहिए, परन्तु व्यापारों की इस समाप्ति का अभिनय नहीं किया जा सकता। अतः अनभिनेय होने के कारण शान्त रस की स्थिति नाटकादि में अस्वीकृत ही करनी होगी। यहाँ एक प्रश्न उठता है कि बुद्ध, युधिष्ठिर, जीमूतवाहन आदि में शान्त रस की स्थिति लक्षित होती है। कुछ लोग इन्हें धीरप्रशान्त कोटि का नायक मान लेते हैं। नागानन्द नाटक में शान्त रस की स्थिति माननेवाले विद्वानों को धनिक ने उत्तर दिया है-नागानन्द का नायक जीमूतवाहन एक ओर मलयवती से प्रेम करता है और दूसरी ओर चक्रवर्त्ती-पद प्राप्त करता है। ये दोनों बातें शम भाव के विरुद्ध हैं। वास्तव में जीमूतवाहन दयावीर है तथा नागानन्द में वीररस ही प्रधान है। इस वीररस का मलयवती-प्रेम तथा विद्याधर-चक्र्वत्तित्व-लाभ से कोई विरोध नहीं दिखाई देता। इससे स्पष्ट हो जाता है कि नागानन्द नाटक में शान्त रस की स्थिति स्वीकार नहीं की जा सकती। शारदातनय : शारदातनय ने काव्यालंकार और शृंगारतिलक में व्यक्त रुद्रट के इस सिद्धान्त की तीव्र आलोचना की है कि प्रत्येक व्यभिचारी भाव रस का रूप धारण कर सकता है। इसी आधार पर उन्होंने इस स्थापना का विरोध किया है कि किसी व्यभिचारी भाव से शान्त रस उत्पन्न होता है। धनंजय का अनुसरण करते हुए शारदा- तनय ने 'शम' या 'निर्वेद' को शान्त रस के स्थायी भाव के रूप में स्वीकार नहीं किया।

१. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ३५

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३६२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास विश्वनाथ : कविराज विश्वनाथ ने शान्त रस को स्वीकार किया और इसका स्थायी भाव शम माना। इसका वर्ण कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमा आदि के समान शुक्ल और देवता लक्ष्मीनारायण हैं। शान्त की पुष्टि महाभारत में देखी जा सकती है। दयावीर या किसी भी वीर में शान्त रस का अन्तर्भाव नहीं हो सकता; क्योंकि वीरता में देहाभिमान अवश्य रहता है, परन्तु शान्त रस में अहंकार की गन्ध भी नहीं रहती। नागानन्द नाटक में जीमूतवाहन को विश्वनाथ ने भी दयावीर ही माना है, शान्त नहीं। प्रश्न उठता है: न यत्र दुःखं न सुखं न चिन्ता न द्वेषरागौ न च काचिविच्छा। रसः स शान्त: कथितो मुनीन्द्रः सर्वेषु भावेषु शमः प्रधानः॥ इसके अनुसार तो परमात्मस्वरूप मुक्ति-दशा में ही यथार्थ शान्त रस सम्भव है। परन्तु, उस समय तो इन संचारी आदिकों का होना सम्भव नहीं। फिर, काव्य आदि में विभाव, अनुभाव, संचारी भाव आदि के द्वारा शान्त रस की निष्पत्ति कैसे मानी जाय ? विश्वनाथ इसका उत्तर देते हैं कि युक्त, वियुक्त और युक्त-वियुक्त दशा में अवस्थित शम स्थायी ही शान्त रूप में परिणत होता है; मोक्ष-दशा का शम नहीं, अतः उक्त शम में संचारी आदि भावों की स्थिति विरुद्ध नहीं मानी जा सकती। शान्त दशा में जो सुख का अभाव कहा गया है, उसका अभिप्राय है कि उस समय विषयजन्य सुख नहीं होता। यह बात नहीं है कि उस समय किसी भी प्रकार का सुख होता ही नहीं। उत्तर मम्मट तथा शाङ्गदेव : मम्मट तथा संगीतरत्नाकर के लेखक शाङ्गदेव ने शान्त रस का स्थायी भाव निर्वेद माना है : निर्वेद: स्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रसः ।' क्योंकि, भरत ने व्यभिचारी भावों की गणना करते समय निर्वेद को प्रथम स्थान दिया है, यद्यपि यह अशुभ है। मम्मट का अनुमान है कि ऐसा करने में भरत का संकेत नवम रस शान्त का इसे स्थायी भाव बनाने की ओर ही है। नाट्यदर्पण के रचयिता रामचन्द्र- गुणचन्द्र निर्वेद को स्थायी भाव स्वीकार करने के पक्ष में नहीं हैं, और उनकी मान्यता है कि यह व्यभिचारी भाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। अयं च (निर्वेदः) रसेष्वनियतत्वात् कादाचित्कत्वाच्च व्यभिचारी, न स्थायी।२ संगीतरत्नाकर तथा शिंगभूपाल द्वारा लिखित उसकी वृत्ति में निर्वेद को शान्त रस का स्थायी भाव ग्रहण करने के विषय को लेकर मनोरंजक विचार-विमर्श किया गया है।" वृत्तिकार शिंगभूपाल ने संगीतरत्नाकर के कुछ शब्दों की व्याख्या करने के पश्चात् अन्त में टिप्पणी लिखी है कि ये सब मिलकर शान्त रस का स्थायी भाव बनते हैं। मम्मट ने १. काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, सू० ४७ २. नाट्यदर्पण, तृतीय विवेक, पृ० १५७ ३. संगीतरत्नाकर, पृ० ८१६ एकल ,शशाघ९

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शककी जी शका: रस Pजा गhमW [३६३

निर्वेद को व्यभिचारी भाव तथा स्थायी भाव दोनों स्वीकार किया, परन्तु दो अलग-अलग लक्षण नहीं दिये। 'प्रतापरुद्र-यशोभूषण' की टीका में कुमारस्वामी ने शम का लक्षण देते समय यहाँ तक कह दिया कि शम निर्वेद का पर्याय है : शमं लक्षयति। शम इति। अत्नादिशब्देनेश्वरानुग्रहसत्सङ्गमादिकं गृह्यते। विकारा विषयाभिलाषादयः । तद्रहितचित्तत्वं वैराग्यादिजन्यतृष्णाक्षयाद्यपरपर्यायो निर्वेदाख्यो मनोविकार: शम इत्यर्थः ।'

पण्डितराज : पण्डितराज जगन्नाथ ने रसगंगाधर में स्थायी भाव और व्यभिचारी भाव का अन्तर बताया है। ये भाव मानस के परिवर्त्तन हैं, अतः क्षणिक हैं। दोनों वासना-रूप में स्थित रहते हैं, अतः उनमें स्थायित्व नहीं रहता। जो भाव अनेक बार आता है, स्थायी भाव कहा जाता है और जो भाव एक ही बार बिजली की चमक के समान आता है, व्यभिचारी कहा जाता है।२ पण्डितराज ने शान्त रस की स्थिति स्वीकार की है और इसका स्थायी भाव शम माना है। मम्मट ने रस-दोषों का विवेचन करते समय एक उदाहरण देकर कहा है : अत् शृङ्गारे प्रतिकूलस्य शान्तस्यानित्यताप्रकाशनरूपो विभावस्तत्प्रकाशितो निर्वेदश्च व्यभिचारी उपात्तः।3 वहाँ शृंगार रस के विरोधी शान्त रस का विभाव अनित्यता और शान्त रस का व्यभिचारी निर्वेद से तात्पर्य है, जैसा विभाव द्वारा प्रकाशित है। रामचन्द्र- गुणचन्द्र ने इस विषय में मम्मट की आलोचना की है कि उन्होंने एक स्थल पर निर्वेद को शान्त रस का स्थायी भाव और दूसरे स्थल पर उसे शान्त रस का व्यभिचारी भाव कह- कर स्वयं अपना ही खण्डन किया है : मम्मटस्तु 'व्यभिचारिकथनप्रस्तावे निर्वेदस्य शान्तरसं प्रति स्थायितां प्रतिकूलविभावादिग्रह इत्यत्न तमेव प्रति व्यभिचारितां च ब्रुवाण: स्ववचन विरोधेन प्रतिहत इति।'४ निष्कर्ष : यदि हम देखें कि ये दो प्रकार के निर्वेद किस रीति से दो विभिन्न कार्य करते हैं, तो हमें पता चल जायगा कि रामचन्द्र-गुणचन्द्र द्वारा यह आलोचना कहाँ तक संगत है। मम्मट चाहते तो शान्त रस के स्थायी भाव का नाम बदल सकते थे, परन्तु भरत के प्रति आदर-भाव के कारण उन्होंने नहीं बदला। भरत ने व्यभिचारियों की सूची में निर्वेद को प्रथम स्थान दिया और इसलिए मम्मट ने निर्वेद को स्थायी रूप में स्वीकार किया। निर्वेद अशुभ माना जाता है, अतः इसे सूची में प्रथम स्थान नहीं मिलता।

१. प्रतापरुद्रयशोभूषण, पृ० २३६ २. रसगंगाधर, प्रथम आनन, पृ० ३७ (टीका० मथुरानाथ शास्त्री) ३. काव्यप्रकाश, सप्तम उल्लास, श्लोक ३२७ के बाद ४. नाट्यदर्पण, विवेक ३, पृ० १५७

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३६४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास इससे मम्मट ने अनुमान किया कि इसे शान्त रस का स्थायी भाव स्वीकार करना चाहिए, जिसका उल्लेख भरत ने नहीं किया। निर्वेदस्यामङ्गलप्रायस्य प्रथममनुपादेयत्वेऽप्युपादानं व्यभिचारित्वेऽपि स्थायिता भिधानार्थम्।' अतः, शान्त रस की स्थिति में कोई सन्देह नहीं रह जाता। शृंगार रस का स्थायी भाव, रति, अन्य रसों में व्यभिचारी का रूप धारण कर सकता है, इसी प्रकार प्रत्येक स्थायी विभिन्न रसों में व्यभिचारी बन सकता है। विभावों के अनुसार वे स्थायी या व्यभिचारी कहे जाते हैं। संगीतरत्नाकर में कहा गया है कि शम सभी रसों में होता है और स्थिरता आने पर इसके स्थायी हो जाने का भय रहता है। अन्य रसों की निष्पत्ति में आवश्यकता आने पर यह व्यभिचारी नहीं भी रह सकता है। यथा हि हास: शृङ्गारे रतिः शान्ते च दृश्यते। वीरे कोधो भयं शोके जुगुप्सा च भयानके।। उत्साहविस्मयौ सर्वरसेष व्यभिचारिणौ। शम: सर्वरसेष्वस्ति स्थर्यत्वेऽव्यभिचार्यसौ ॥२ रस-संख्या एतिहासिक विकास-क्र्म : भरत ने रसों की संख्या आठ ही मानी है : शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसा: स्मृताः॥3 इस आठवाली संख्या का निर्धारण भरत ने नहीं किया, प्रत्युत उनके पहले स्वयं ब्रह्मा ने (अथवा द्रुहिण नामक किसी ऋषि ने) किया था : एते ह्यष्टौ रसा: प्रोक्ता: द्रुहिणेन महात्मना।४ स्पष्ट है कि भरत के समय में रसों की संख्या आठ ही थी और संख्या प्राचीन परम्परा के आधार पर निश्चित की गई थी। आगे चलकर अभिनवगुप्त ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि भरत ने रसों की संख्या नौ मानी है और इसके प्रमाण में अभिनव ने नाट्य- शास्त्र के किसी पाठ का हवाला दिया है। वे लिखते हैं : ते च नव। शान्तापलापिन- स्त्वष्टाविति तत्र पठन्ति-अर्थात् वे रस नौ होते हैं। परन्तु, नाटक में शान्त रस को न १. काव्यप्रकाश ५, चतुर्थ उल्लास, सू० ४६ के बाद २. संगीतरत्नाकर, पृ० ८४० ३. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० १६ ४. वही, अध्याय ६, का० १७

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माननेवाले तो 'बीभत्साद्भुतशान्ताश्च नव नाट्यरसाः स्मृताः' के स्थान पर 'बीभत्साद्भुत- संज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्यरसा: स्मृता:'-ऐसा पाठ मानते हैं।' किन्तु, अभिनव का कथन ठीक नहीं है। भरत ने रस की संख्या के वर्णन में दो बार आठ रसों के विषय में कहा है। आगे भी कई स्थलों पर आठ ही रसों का स्पष्ट उल्लेख किया गया है।२ भावों के प्रसंग में भी भरत ने ४९ भावों की गणना दी है (८ स्थायी+८ सात्त्विक+३३ संचारी-४९)।3 इन स्थलों पर भी अभिनव ने पाठ- भेद दिया है, फिर भी यही विश्वास होता है कि भरत ने रसों की संख्या आठ ही मानी है और यह संख्या परम्परा से पूर्णतया पुष्ट थी। दण्डी तथा उद्भट : आगे चलकर दण्डी ने काव्यादर्श में आठ ही रस माने। किन्तु, कुछ समय के बाद उद्भट ने स्पष्ट रूप से नौ रसों का उल्लेख किया :

शृङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानका: बीभत्साद्भुतशान्ताश्च नव नाट्ये रसा: स्मृता: ॥४

कुछ विद्वानों का अनुमान है कि शान्त रस की उद्भावना उद्भट ने ही की, परन्तु जिस तरह बेधड़क उन्होंने शान्त रस का उल्लेख किया है, उससे प्रतीत होता है कि उन्होंने चलती आती परम्परा का पालन-मात्र किया है; अर्थात् उनके समय तक शान्त रस रस- शास्त्रियों में स्वीकृत हो चुका था। एक सम्भावना यह भी है कि उद्भट ने नाट्यशास्त्र का जो भाष्य लिखा था ( जो अब उपलब्ध नहीं है), उसमें शान्त रस की युक्तिसंगत स्थापना की हो। जो हो, वर्त्तमान स्थिति में इतना ही कहा जा सकता है कि उद्भट ने ही शान्त रस-सहित नौ रसों का उल्लेख सर्वप्रथम अपने ग्रन्थ काव्यालंकारसंग्रह में किया। वामन ने सभी रसों के नाम भी नहीं दिये और संख्या भी नहीं दी। रुद्रट ने उस संख्या में प्रेयान् नामक रस बढ़ा दिया। परन्तु, यह प्रचलित नहीं हो सका; क्योंकि उनके प्रायः समसामयिक रुद्रभट्ट ने 'शृंगारतिलक' में नौ ही रसों का वर्णन किया है। धनंजय : आनन्दवर्द्धन ने नौ ही रसों का उल्लेख किया है। इस काल में दो आचार्यों-धनंजय और अभिनवगुप्त-ने इस विषय का सम्यक विवेचन किया है। यों तो महिमभट्ट, अग्निपुराणकार आदि ने भी रस को पर्याप्त महत्त्व दिया है, परन्तु रस-संख्या के विषय में उन्होंने कोई बात नहीं कही। धनंजय ने रस-संख्या की समस्या का समाधान नये ढंग से किया। उनका समाधान है कि नाट्य में तो आठ ही रसों की सम्भावना है। कुछ विद्वान् शम स्थायी भाव और उसके परिपाक शान्त रस को भी स्वीकार करते हैं, परन्तु १. हिन्दी-अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ४२९ २. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ४०-४६ ३. वही, अध्याय ७, का० ६ के बाद गद्य ४. काव्यालङ्कारसंग्रह, ४-४

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास रूपकों में उसकी पुष्टि नहीं होती : शममपि केचित्प्राहुः पुष्टिर्नाट्येषु नैतस्य।' इसका अभिप्राय यह भी हो सकता है कि काव्य में नौ रस की स्थिति धनंजय को स्वीकार है, परन्तु उनका विवेच्य विषय रूपक होने के कारण वे शान्त रस का वर्णन उपादेय नहीं समझते। उन्होंने प्रेयान् और भक्ति-रसों का भी खण्डन किया है। किसी-किसी विद्वान् ने उस समय मृगया रस तथा अक्ष (द्यूत) रस का उल्लेख किया था; धनंजय ने सबका खण्डन किया है : प्रीतिभक्त्यादयो भावा मृगयाक्षादयो रसाः। हर्षोत्साहादिषु स्पष्टमन्तर्भावान्न कीतिताः ॥२ -अर्थात् कुछ लोग प्रीति, भक्ति आदि को स्थायी भाव मानते हैं तथा मृगया, जुआ आदि को रस मानते हैं। इनका समावेश हर्ष, उत्साह आदि स्थायी भावों में ही हो जाता है। अतः, इनका पृथक् विवेचन करना ठीक नहीं समझा गया है। अभिनवगुप्त : परन्तु, अभिनवगुप्त ने अत्यन्त बल देकर शान्त रस को काव्य और नाटक दोनों में प्रतिष्ठित किया है। वस्तुतः, उन्होंने इस प्रसंग में काव्य तथा नाटक में कोई अन्तर नहीं माना। इस प्रकार, उन्होंने अत्यन्त स्पष्ट शब्दों में घोषणा की कि रस नौ ही होते हैं: Tक एवं ते नवव रसाः । पुमर्थोपयोगित्वेन रञ्जनाधिक्येन वा इयतामेवोपदेश्यत्वात्। इस प्रकार, वे नौ ही रस होते हैं। क्योंकि, पुरुषार्थ में उपयोगी होने से अथवा रंजन की विशेषता (अधिकता) के कारण इतने ही रसों को मानने योग्य कहा जा सकता है।3 परन्तु, उन्होंने यह भी स्वीकार किया है कि कुछ विद्वान् इन नौ रसों के अतिरिक्त तीन अन्य रसों को भी मानते हैं-१. आर्द्रता-स्थायिक स्नेह-रस, २. गर्ध-स्थायिक लौल्य रस, ३. भक्ति-रस। परन्तु, इनका अलग अस्तित्व प्रमाणित नहीं होता।४ राजा भोज : रसों की संख्या सबसे अधिक बढ़ानेवाले राजा भोज हुए। उन्होंने, अपने ग्रन्थ सरस्वतीकण्ठाभरण और शृंगारप्रकाश में प्रायः सभी प्राप्त मतों का संकलन किया है। सरस्वतीकण्ठाभरण में उन्होंने प्रचलित नव रस के अतिरिक्त प्रेयान्, उदात्त और उद्धत रसों का उल्लेख किया है : शृङ्गारवीरकरुणरौद्राद्भुतभयानका: बीभत्सहास्यप्रेयांस: शान्तोदात्तोद्धता रसाः ॥।५ १. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ३५ २. वही, का० ८३ ३. हिन्दी-अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ६४० ४. हिन्दी-अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ६४१ स ५. सरस्वतीकण्ठाभरण, परिच्छेद ५, का० १६४ (काव्यमाला-संस्करण)

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रस [३६७

यह काव्यमाला-संस्करण का पाठ है। परन्तु, डॉ० राघवन का मत है कि शुद्ध पाठ 'शान्तोदात्तोद्वता रसाः' होना चाहिए और इन नये रसों की उद्भावना नायक-भेद के आधार पर की गई है; यथा प्रेयान्, धीरललित, शान्त, धीरप्रशान्त, उदात्त, धीरोदात्त, उद्धत, धीरोद्धत। इनके अतिरिक्त भोज ने स्वातन्त्र्य, आनन्द, प्रशम, पारवश्य, साध्वस, विलास, अनुराग, तथा संगम रसों की भी चर्चा की है। वास्तव में, उन्हें रसों की अनन्तता में विश्वास था।

जैन आचार्य : जैनाचार्य हेमचन्द्र ने अपने ग्रन्थ काव्यानुशासन में स्नेह, लौल्य तथा भक्ति रसों का उल्लेख करके उनका खण्डन कर दिया है। वे अभिनवगुप्त से बहुत प्रभावित जान पड़ते हैं। उनके शिष्य रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने प्रायः वैसी ही चर्चा की है, परन्तु उन्होंने तीन नये रसों के विषय में भी लिखा है। वे नये रस हैं-व्यसन, दुःख तथा सुख।' परन्तु, उन्होंने यह भी लिख दिया है कि कुछ लोग इन्हें रस तो मानते हैं, किन्तु इनका अन्तर्भाव पूर्वोक्त नौ रसों में ही कर लेते हैं। विश्वनाथ : कविराज विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में नव रस का विवेचन करके वत्सल रस को लगभग स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लिया है :

स्फुटं चमत्कारितया वत्सलं च रसं विदुः।२

प्रकट चमत्कारक होने के कारण कोई-कोई वत्सल रस भी मानते हैं। इसके बाद उन्होंने वात्सल्य रस के सभी अंगों-स्थायी भाव, विभाव आदि का विवेचन किया है। भानुदत्त : भानुदत्त ने और भी नवीन उद्भावना की है। पहले उन्होंने रस के दो मौलिक वर्ग माने हैं-लौकिक तथा अलौकिक। लौकिक रस छह इन्द्रियों के अनुसार छह होते हैं और अलौकिक रस ज्ञान के तीनों रूपों के अनुसार तीन होते हैं-१. स्वाप्निक, २. मानोरथिक, तथा ३. औपनायिक। इन अलौकिक रसों में स्वप्न में प्राप्त रस स्वाप्नायिक कहा जाता है और मनोरथ-विषयक रस मानोरथिक होता है। ये दोनों ही रस सुख- दुःखात्मक होते हैं। अलौकिक रस का तीसरा भेद काव्य के शब्दार्थ एवं नाट्य से सिद्ध होता है-अर्थात् अलौकिक रस-वर्ग के तीसरे भेद का नाम काव्यरस या नाट्यरस है। भानुदत्त ने काव्यरस के अन्तर्गत परम्परागत नव रस को स्वीकार कर लेने पर भी वात्सल्य, लौल्य तथा भक्ति के अतिरिक्त दो नये रसों-कार्पण्य तथा माया-का भी उल्लेख किया है।3 किन्तु, उन्होंने इनका उल्लेख-मात्र किया है। उन्हें वात्सल्य, लौल्य एवं भक्ति के साथ-साथ कार्पण्य को रस मानना स्वीकार नहीं है। इसका कारण यह है कि

१. नाट्यदर्पण, अध्याय ३, का० ९ की वृत्ति tw .p २. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० २५१ ३. रसतरंगिणी, पृ० १६१

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३६६] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास इनके स्थायी भाव आर्द्रता, अभिलाषा, श्रद्धा के समान ही स्पृहा भी व्यभिचारी भाव ही हैं, स्वतन्त्र रूप से स्थायी भाव नहीं। रूपगोस्वामी : इस विषय में वैष्णव-आचार्य रूपगोस्वामी का भी प्रयास द्रष्टव्य है। उन्होंने रसशास्त्रियों के इस निष्कर्ष का कलापूर्ण विरोध किया कि भक्ति केवल भाव है, रस नहीं। उन्होंने भक्ति को प्रधान एवं शास्त्रीय रसों को गौण निर्धारित किया। रूपगोस्वामी ने दो प्रकार के रस बताये :' १. मुख्य रस शान्त भक्तिरस शान्ति स्थायी प्रीत भक्तिरस प्रीति स्थायी प्रेयान् भक्तिरस सख्य स्थायी वत्सल भक्तिरस वात्सल्य स्थायी मधुर भक्तिरस मधुरा रति स्थायी

२. गौण रस हास्य भक्तिरस हास-रति स्थायी अद्भुत भक्तिरस विस्मय-रति स्थायी

वीर भक्तिरस उत्साह-रति स्थायी करुण भक्तिरस शोक-रति स्थायी

रौद्र भक्तिरस करोध-रति स्थायी

भयानक भक्तिरस भय-रति स्थायी बीभत्स भक्तिरस जुगुप्सा रति स्थायी इनके अतिरिक्त एक नये रस व्रीडनक रस का उल्लेख डॉ० राघवन ने जैनों के अनुयोगद्वारसूत्र के आधार पर किया है।२ व्रीडनक रस का स्थायी भाव व्रीडा या लज्जा है। भरत के काव्यशास्त्र में सूत्रकार तथा टीकाकार (मलधारी-हेमचन्द्र) दोनों में से किसी का भी कोई स्थान नहीं है। फिर भी, केवल नवीनता के कारण व्रीडनक रस का उल्लेख किया गया। पण्डितराज जगन्नाथ : संस्कृत-काव्यशास्त्र के अन्तिम आचार्य पण्डितराज जगन्नाथ ने इस विस्तार-प्रवृत्ति का प्रबल विरोध किया और परम्परागत रस-संख्या की फिर से प्रतिष्ठा करने पर बल दिया : रसाना नवत्वगणना च मुनिवचननियन्त्रिता भज्येत, इति यथाशास्त्रमेव ज्यायः।3 अर्थात् भक्ति आदि रसों का समावेश करने से मुनि द्वारा निर्धारित संख्या भंग हो जायगी, अतः शास्त्र का अनुसरण करना ही श्रेयस्कर है। को १. भक्तिरसामृतसिन्धु, पृ० ३०६ (डॉ० नगेन्द्र द्वारा उद्धूत) २. डॉ० राघवन : दि नम्बर ऑव रसास, पृ० १४१ ३. रसगंगाधर, प्रथम आनन, पृ० ५६ (टीका० मथुरानाथ शास्त्री)

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मध्ययुगोन तथा आधुनिक आचार्यों के मत

केशव तथा देव : मध्ययुग में भारत की विभिन्न भाषाओं में काव्यशास्त्र का विकास नहीं हो सका; केवल हिन्दी में रीतिकालीन कवियों तथा आचार्यों के प्रयत्न से दो शतियों तक काव्यशास्त्र का व्यापक विकास होता रहा। परन्तु, हिन्दी में भी जो कुछ कार्य हुआ, वह वर्णनात्मक ही था, उसमें समीक्षा का अभाव था। अतएव, हिन्दी के रीतिकालीन आचार्यों का यही श्रेय है कि उन्होंने संस्कृत की अत्यन्त विकसित रस-परम्परा का हिन्दी में अवतरण और कुछ अंशों में पोषण भी किया। रस-संख्या के विषय में इतना ही कहा जा सकता है कि केशव ने (रसिक-प्रिया में) और देव ने (भाव-विलास में) शृंगार रस के 'प्रच्छन्न' तथा 'प्रकाश' भेदों को मान्यता दी। देव ने रस के लौकिक तथा अलौकिक भेद माने और महाराज रामसिंह ने अपने काव्यशास्त्र-विषयक ग्रन्थ 'रमा-निवास' में रस के लौकिक-अलौकिक भेद तो किये ही, प्रत्येक रस के स्वनिष्ठ और परनिष्ठ भेदों का स्वतन्त्र वर्णन किया। परन्तु, इसमें नवीनता कुछ नहीं है। प्रच्छन्न और प्रकाश भेदों का उल्लेख रुद्रट एवं भोज बहुत पहले ही कर चुके थे। फिर लौकिक-अलौकिक तथा स्वनिष्ठ-परनिष्ठ भेदों की उद्भावना भानुदत्त ने की थी, जिसके आधार पर यहाँ भी किया गया। देव ने लौकिक-अलौकिक के भेद भानुदत्त से लिये, परन्तु व्याख्या में कुछ अन्तर कर दिया है। ऊपर लिखा जा चुका है कि भानुदत्त ने काव्य-रसों को अलौकिक रस के तीसरे भेद औपनायिक के उपभेद माना है, परन्तु देव ने इन्हें लौकिक रस के ही उपभेद माना है। फिर उन्होंने अलौकिक रस के तीनों भेदों-स्वाप्निक, मानोरथिक तथा औपनायिक के क्रमशः स्वप्न, मनोरथ एवं लीला के आधार पर हरि-रस की कल्पना की है। इस अन्तर का कारण क्या हो सकता है ? सम्भव है कि जब भक्ति-रस की सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक प्रतिष्ठा हो गई हो, तो देव ने भानुदत्त के मत में थोड़ा संशोधन कर दिया हो।

भारतेन्दु : मध्यकालीन आचार्यों ने जहाँ रस के उपभेदों पर बल दिया, वहाँ आधुनिक विद्वानों ने मूल रस-भेदों पर अपना ध्यान केन्द्रित रखा है। हिन्दी के विद्वानों में सर्वप्रथम भारतेन्दु बाबू हरिश्चन्द्र ने अपनी पुस्तक 'नाटक' में प्राचीन परम्परा के प्रति आदर-भाव प्रदर्शित करते हुए भी रसों के संख्या-निर्धारण अथवा परिसीमन का प्रबल विरोध किया है। उनका कथन है : 'इसके (रस के) मानने में प्राचीनों की कोई आवश्यकता नहीं, यदि अनुभव में आवे तो मानिए, न आवे तो न मानिए।"

प्राचीन आचार्यों ने जिन रसों को मान्यता दी है, उनमें भारतेन्दुजी ने भक्ति, वात्सल्य तथा सख्य को तो जोड़ा ही, इनके अतिरिक्त प्रमोद या आनन्द रस को भी जोड़ दिया। इनमें से प्रथम तीन-भक्ति, वात्सल्य तथा सख्य-की तो संस्कृत के अनेक काव्याचार्यों ने मान्यता दी थी और प्रमोद या आनन्द रस भी भारतेन्दु की मौलिक

१. कविवचन-सुधा, पृ० १७९ मन्प्रनी

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३७० j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासे उद्भावना न होकर मूलतः भोज की उद्भावना था। फिर भी भारतेन्दुजी ने बहुत विश्वास के साथ इन रसों को स्वतन्त्र रूप से प्रतिष्ठित किया। आधुनिक युग में सभी भारतीय भाषाओं में हिन्दी, मराठी तथा बँगला का रसशास्त्र अधिक समृद्ध माना जाता है। इन भाषाओं के रसशास्त्र में उपर्युक्त बारह रसों (स्वीकृत नव रस के साथ वात्सल्य, भक्ति तथा सख्य) के ही खण्डन-मण्डन की विशेष चर्चा है। वैसे भक्ति-रस की प्रतिष्ठा हिन्दी में सेठ कन्हैयालाल पोद्दार आदि विद्वानों ने बहुत आग्रह और प्रबल ढंग से की है। किन्तु, आज की सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि सम- सामयिक काव्य के आधार पर कुछ नवीन रसों की कल्पना की गई है। इनमें प्रधान रस हैं-प्रकृति-रस (उदात्त रस), देशभक्ति-रस, क्रान्ति-रस और प्रक्षोभ-रस। आचार्य शुक्ल और प्रकृति-रस : हिन्दी में प्रकृति-रस की प्रतिष्ठा करनेवाले आचार्य रामचन्द्र शुक्ल हैं। उन्होंने अत्यन्त प्रबल शब्दों में इस रस की स्थापना की है। उनकी स्थापना है कि प्रकृति के प्रत्यक्ष तथा काव्य-निबद्ध दोनों रूपों के आस्वाद में रस निहित है। रस-मीमांसा में उन्होंने लिखा है : १. जिस समय दूर तक फैले हरे-भरे टीलों के बीच से घूम-घूमकर बहते हुए स्वच्छ नालों, इधर-उधर उभरी हुई बेडौल चट्टानों और रंग-बिरंगे फूलों से गुछी हुई झाड़ियों की रमणीयता में हमारा मन रमा रहता है, उस समय स्वार्थमय जीवन की शुष्कता और विरसता से हमारा मन कितनी दूर रहता है। यह रस-दशा नहीं, तो क्या है ? २. जबकि प्राकृतिक दृश्य हमारे भावों के आलम्बन हैं, तब इस शंका के लिए कोई स्थान ही नहीं रहा कि प्राकृतिक दृश्यों के वर्णन में कौन-सा रस है?' भारतीय तथा पाश्चात्य साहित्य में ऐसी प्रचुर सामग्री प्राप्य है, जिसके आधार पर प्रकृति-वर्णन के रसात्मक रूप की स्थापना की जा सकती है। किन्तु, प्रत्यक्ष प्रकृति-रस की स्थापना आचार्य शुक्लजी की अपनी मौलिक उद्भावना है। यह उद्भावना अत्यन्त विवादग्रस्त विषय है; क्योंकि शास्त्र में प्रत्यक्ष अनुभव को रसानुभूति नहीं मानकर लौकिक भावानुभूति ही माना गया है, भले ही वह प्रत्यक्ष अनुभव अत्यन्त परिष्कृत अथवा उदात्त हो। अब इस प्रकृति-रस के अंगों का विश्लेषण किया जाय। इसका स्थायी भाव माना गया है रति। आचार्य शुक्लजी ने इसे साहचर्यजन्य मानते हुए भी वासनागत माना है; क्योंकि अपनी आदिम तथा चिरन्तन सहचरी के प्रति मनुष्य का प्रेम अब एक संस्कार के रूप में हो गया है। प्रकृति-रस में प्रकृति आलम्बन के रूप में चित्रित होती है, उद्दीपन- रूप में नहीं। जो लोग प्रकृति को मात्र उद्दीपन-रूप में ग्रहण करते हैं, उनके प्रति आचार्य शुक्ल ने व्यंग्य किया है। उनका तर्क है कि काव्य में प्रकृति-वर्णन पढ़कर पाठक अवश्य ही भावमय आनन्द में विभोर हो जाता है-यह भावमय आनन्द ही रस है, अतः प्रकृति-काव्य निश्चय ही रसात्मक होता है। इसके विरुद्ध यह तर्क संगत नहीं है कि 'आश्रय, आलम्बन १. रस-मीमांसा, पृ० १४३

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रस [३७१

आदि सम्पूर्ण रस-सामग्री प्रकृति-काव्य में नहीं मिलती; अथवा प्रकृति के प्रति रतिभाव एकांगी है, आलम्बन की प्रतिक्रिया से वह पुष्ट नहीं हो पाता।' क्योंकि, केवल आलम्बन- वर्णन से भी रस-परिपाक हो सकता है। प्रकृति-रस को मराठी विद्वानों ने उदात्त रस कहा है। गुलाब राय और देशभक्ति-रस : आधुनिक भारतीय काव्य में देशभक्ति-रस भी विकसित हुआ है। यह भी उन नवीन रसों में है, जिनका स्थान संस्कृत-काव्यशास्त्र की परम्परा में नहीं है। इसका विकास हिन्दी से भी अधिक मराठी में हुआ है। हिन्दी में डॉ० गुलाब राय ने देशभक्ति-रस को स्वतान्त्र मान्यता प्रदान की है। उन्होंने इस रस का स्थायी भाव देश-प्रेम माना है। इनके अतिरिक्त आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी देश- भक्ति का महत्त्व स्वीकार किया है। परन्तु, इन्होंने देशभक्ति को स्वतन्त्र रस नहीं स्वीकार किया, प्रत्युत प्रेम को व्यापक रूप देकर उसी के अन्तर्गत देशभक्ति को भी रख दिया है। अन्य नये रस : क्रान्ति, उद्वग, प्रक्षोभ-मराठी के कतिपय विद्वानों ने आधुनिक काव्य-प्रवृत्तियों को ध्यान में रखकर कुछ अन्य नवीन रसों की उद्भावना की है। इनमें क्रान्ति-रस, उद्वग-रस तथा प्रक्षोभ-रस की प्रधानता है। उन विद्वानों ने इन रसों का विश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत किया है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि भारतीय साहित्य की विभिन्न नवीन प्रवृत्तियों से ही नवीन रसों की उद्भावना की प्रेरणा प्राप्त हुई है। आधुनिक भारतीय साहित्य में जिन चेतनाओं का उदय हुआ है, वे बहुलांश में पाश्चात्त्य साहित्य के प्रभाव-स्वरूप तथा भारत में नव जागृति के परिणाम-स्वरूप हैं। स्वभावतः, वे प्राचीन परम्परा से कई रूपों में भिन्न तथा नवीन हैं। अतः, उनकी समीक्षा तथा मूल्यांकन करने के लिए काव्यशास्त्र के सिद्धान्तों में संशोधन तथा परिवर्द्धन करने की आवश्यकता हो गई है। उपर्युक्त नवीन रस-कल्पनाएँ काव्यशास्त्र के इसी संशोधन तथा पुनर्विचार का फल हैं। उपभेद-विस्तार : रस के भेदों तक ही विस्तार की इस प्रवृत्ति का अन्त नहीं हुआ। उपभेदों का भी बहुत विस्तार हुआ। भरत ने भी उपभेदों का बहुत विस्तार किया है। शृंगार रस के उपभेद : भरत ने अवस्थाओं के अनुसार शृंगार रस के दो भेद किये-१. सम्भोग और २. विप्रलम्भ। आगे चलकर भरत ने शृंगार के दो भिन्न दृष्टियों से तीन-तीन भेद किये हैं-१. अभिनय की दृष्टि से : (क) वाचनात्मक, (ख) वेशात्मक; (ग) क्रियात्मक१। २. पुरुषार्थों की दृष्टि से : (क) धर्म-शृंगार; (ख) अर्थ-शृंगार; (ग) काम- शृंगार। ये भेद बाद में लुप्त हो गये। इस प्रकार, दो ही भेद सम्भोग तथा विप्रलम्भ काव्य में प्रचलित हुए। भरत के बाद रुद्रट ने सम्भोग और विप्रलम्भ को उसी रूप में स्वीकार किया और विप्रलम्भ के चार भेदों-प्रथमानुराग, मान, प्रवास और करुण-का सम्भवतः

१. नाठ्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ७८ (काव्यमाला)

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३७२ 1 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास प्रथम बार स्पष्ट रूप से उल्लेख किया। उन्होंने शृंगार के दो अन्य भेद भी किये-प्रच्छन्न और प्रकाश, जिसका अनुकरण राजा भोज ने पीछे किया।हो कि हवार धनंजय ने भरत द्वारा निर्दिष्ट भेदों में थोड़ा परिवर्तन किया। उन्होंने दो भेदों के स्थान पर तीन भेदों -- अयोग, विप्रयोग तथा सम्भोग-की उद्भावना की। इस प्रकार, उन्होंने पूर्वराग अथवा अयोग को विप्रलम्भ का उपभेद नहीं मानकर एक स्वतन्त्र भेद मान लिया और विप्रयोग के अन्तर्गत करुण को स्थान नहीं दिया। अतः विप्रयोग के दो ही उपभेद बच गये-मान और प्रवास। इनके भी अलग-अलग उपभेद हैं। मान के दो उपभेद हैं-१. ईर्ष्यमान और २. प्रणयमान। प्रवास के तीन उपभेद हैं-१. कार्यजन्य (भूत, भविष्यत् तथा वर्त्तमान); २. सम्भ्रमजन्य-अर्थात् दैवी अथवा मानुषी विप्लव के कारण, और ३. शापजन्य।' मम्मट ने रस के न भेदों और न उपभेदों के विस्तार में अपनी रुचि दिखाई। शृंगार रस के विषय में उन्होंने केवल विप्रलम्भ के उपभेदों में थोड़ा अन्तर दिखाया। उन्होंने चार के स्थान पर पाँच उपभेद माने-१. अभिलाष-निमित्तिक (पूर्वराग), २. विरह-निमित्तिक, ३. ईर्ष्या-निमित्तिक (मान), ४. प्रवास-निमित्तिक और ५. शाप- निमित्तिक। इनमें विरह की नवीन उद्भावना है।२ हेमचन्द्र ने करुण विप्रलम्भ को शृंगार का भेद नहीं मानकर करुण रस के ही अन्तर्गत माना।3 कस रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने मम्मट द्वारा निर्दिष्ट पाँचों उपभेदों को उसी रूप में स्वीकार कर लिया।8 कTR कविराज विश्वनाथ ने विस्तार के प्रति अधिक अभिरुचि प्रदर्शित की है। उन्होंने पूर्वराग के भी तीन भेद कर दिये हैं-१. नीली राग, २. कुसुम्भ राग और ३. मंजिष्ठा राग।" भानुदत्त ने नवीनता दिखाने का असफल प्रयास किया है। उनके द्वारा निर्दिष्ट विप्रलम्भ के वे ही पाँच भेद हैं, जिन्हें मम्मट ने बताया है-केवल नामों में थोड़ा परिवर्तन कर दिया गया है। इनके अतिरिक्त भी उन्होंने तीन अन्य उपभेदों की चर्चा की है- समय-हेतुक, दैव-हेतुक और विडवरादि (उपद्रवादि)-हेतुक। किन्तु, उनका उल्लेख केवल प्रसंग से हुआ है, नियम से नहीं।१ क आगे के मानचित्र में शृंगार रस के भेदोपभेदों को स्पष्ट किया गया है। इनमें विभिन्न आचार्यों द्वारा दिये लगभग सभी उपभेद दिखाये गये हैं : धर्म-शृंगार, अर्थ-शृंगार, काम-शृंगार (वचनात्मक, वेशात्मक, क्रियात्मक); प्रच्छन्न और प्रकाश। १. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ५७-६६ २. काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, का० २९ के बाद गद्म ३. काव्यानुशासन, अध्याय २, सू० ६ 1)P ४. नाटयदर्पण, अध्याय ३, का० १० ५. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० १९५ ६. रसतरंगिणी, पृ० १४०-१४१

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रस [३७३

श्ृंगार

सम्भोग विप्रलम्भ hs TPR

पूर्वराग मान प्रवास विरह करुण

नीली कुसुम्भ मंजिष्ठा ईष्यमान प्रणयमान

कार्यज सम्भ्रमज शापज

भूत भविष्यत् वर्त्तमान

हास्य रस के उपभेद : भरत ने हास्य के मूल रूप से दो उपभेद माने हैं : १. आत्मस्थ और २. परस्थ।' अभिनवगुप्त ने आत्मस्थ का अर्थ लिया है ऐसा हास्य, जो स्वयं प्रमाता के चित्त में उत्पन्न होता है, अर्थात् स्वगत हास्य और परस्थ ऐसा हास्य माना है, जो दूसरों को हँसते देखकर उत्पन्न हो जाता है, अर्थात् अन्यत्र संक्रान्त हास्य।" आगे चलकर भरत ने प्रकृति-भेद से छह भेद किये हैं-उत्तम प्रकृति में १. स्मित तथा २. हसित; मध्यम प्रकृति में ३. विहसित तथा ४. उपहसित; अधम प्रकृति में ५. अपहसित तथा ६. अतिहसित।3 ये उपभेद हसन-क्रिया के मात्रा-भेद पर निर्भर करते हैं, फिर भी हास-भाव या रस के न्यूनाधिक्य से इनका कोई सम्बन्ध नहीं है, अभिनव ने यह बात स्पष्ट कर दी है। ये सभी भेद आत्मस्थ तथा परस्थ दोनों में होते हैं, अतः सब मिलाकर हास्य के बारह भेद हुए। अभिनय की दृष्टि से शृंगार की ही भाँति, तीन अतिरिक्त भेद होते हैं- वचनात्मक, वेशात्मक और क्रियात्मक। परवर्त्ती आचार्यों ने हास्य के अधिक भेद नहीं किये। आत्मस्थ तथा परस्थ का भी उल्लेख केवल धनंजय और भानुदत्त ने किया, अन्य आचार्यों ने नहीं। अग्निपुराण में तो अपहसित तथा अतिहसित को भी छोड़ दिया गया है।४

करुण रस के उपभेद : भरत ने करुण रस के तीन उपभेदों का उल्लेख किया है : १. धर्मोपघातज-धर्म-हानि से उत्पन्न, २. अर्थोपचयोद्भव-अर्थ-हानि से उत्पन्न और ३. शोक-

१. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, पृ० ९७ (काव्यमाला) २. हिन्दी-अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ५७३ ३. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ५४ ४. अग्निपुराण का काव्यशास्त्रीय भाग (ने० प० हाउस), प्ृ० ५६

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३७४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

वृत्त-स्वजनों की मृत्यु से उत्पन्न ।9 अग्निपुराण में एक अन्य उपभेद-चिन्ताग्लानिजन्य-का उल्लेख किया गया है। भानुदत्त ने इस प्रसंग में भी स्वनिष्ठ तथा परनिष्ठ के भेद किये हैं- अपने अनिष्ट से उत्पन्न करुण को स्वनिष्ठ और दूसरे के अनिष्ट से उत्पन्न करुण को परनिष्ठ कहा है। वीररस के उपभेद : भरत ने वीररस के तीन उपभेद किये हैं : १. दानवीर, २. धर्मवीर और ३. युद्धवीर ।२ धनंजय ने धर्मवीर के स्थान पर दयावीर को रखा है। उन्होंने इस प्रसंग के अन्त में इस बात का भी उल्लेख कर दिया है कि वीररस के प्रताप- वीर, गुणवीर, आजव-वीर आदि अन्य कई भेद कहे गये हैं, परन्तु वे आवश्यक नहीं हैं।3 परन्तु, साहित्यदर्पण में विश्वनाथ ने दयावीर के साथ धर्मवीर को रखकर चार स्पष्ट भेद कर दिये हैं।४ पण्डितराज जगन्नाथ ने सभी उपभेदों का निषेध किया है, परन्तु खण्डनात्मक तर्क के रूप में सत्यवीर तथा पाण्डित्यवीर का भी उल्लेख किया है। भयानक रस के उपभेद : भरत ने भयानक रस के तीन उपभेद माने हैं : १. व्याज- जन्य या कृत्रिम, २. अपराधजन्य और ३. वित्रासितक अर्थात् खतरे की शंका से उत्पन्न।4 परवर्त्ती आचार्यों में से किसी ने इस रस के अधिक भेद नहीं किये। केवल भानुदत्त ने अपने प्रिय स्वनिष्ठ तथा परनिष्ठ भेदों का आरोपण भयानक रस पर भी किया। उनके अनुसार जहाँ प्रत्यक्ष भय का स्वयं अनुभव हो, वहाँ स्वनिष्ठ भयानक और वहाँ दूसरे के भय से भय की संक्रामक प्रतीति हो, वहाँ परनिष्ठ भयानक रस होता है। बीभत्स रस के उपभेद : भरत ने बीभत्स रस के दो भेद किये हैं : १. रुधिर आदि से उत्पन्न होनेवाला शुद्ध अथवा क्षोभण और २. विष्टा, कृमि आदि से उत्पन्न होनेवाला अशुद्ध अथवा उद्दगी। अभिनवगुप्त ने इस श्लोक की व्याख्या करते हुए भट्टतोत के मतानुसार बताया है कि ये दोनों ही अशुद्ध बीभत्स के भेद हैं। शुद्ध बीभत्स तो वह होता है, जो संसार के प्रति जुगुप्सा उत्पन्न करके मोक्षदायक सिद्ध होता है। अतः, वस्तुतः बीभत्स के दो भेद हुए : १. शुद्ध और २. अशुद्ध। फिर अशुद्ध के दो भेद हुए : (क) क्षोभण और (ख) उद्वगी। अभिनवगुप्त के अनुसार ये ही तीन उपभेद हैं। धनंजय ने तीन १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ७९ (काव्यमाला) २. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ८० ३. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ७२ ४. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० २३४ ५. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ८१ ६. रसतरंगिणी, पृ० १५४ ७. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० द२ इ. हिन्दी-अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ६०स श्हश्हहयात क लाकरमेष४

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रस प्राम |३७५

उपभेद स्वीकार किये हैं : १ उद्वगी, २. क्षोभण, ३. शुद्ध, जो वैराग्य के कारण जघन, स्तन आदि के प्रति जुगुप्सा उत्पन्न करता है।२ रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने बीभत्स के उपभेदों की चर्चा नहीं की है, परन्तु विभावों में परश्लाघा, अर्थात् शत्रु की प्रशंसा का उल्लेख किया है। यहाँ बीभत्स के कारणों में घृणित व्यक्ति के मिथ्या गुण-कथन को भी उद्व गजनक बताया गया है। इस बात का महत्त्व इसलिए है कि इसमें बीभत्स के सवथा ऐन्द्रिय रूप के अतिरिक्त मानसिक रूप की ओर भी संकेत किया गया है। परवर्त्ती आचार्यों ने बीभत्स के उपभेद की ओर अधिक ध्यान नहीं दिया-केवल भानुदत्त ने यहाँ भी स्वनिष्ठ और परनिष्ठ का झमेला लगा दिया। अद्भुत रस के उपभेद : भरत के अनुसार अद्भुत रस के दो भेद होते हैं : १. दिव्य अर्थात् दैविक चमत्कार से उत्पन्न, २. आनन्दज अर्थात् मनोरथ की सिद्धि करनेवाली अप्रत्याशित घटनाओं से उत्पन्न।3 आनन्दज का अर्थ रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने 'अभीष्टसिद्धितः' लिखा है। आगे आचार्य विश्वेश्वर ने लिखा है कि अभीष्ट-सिद्धि का अभिप्राय आकस्मिक सिद्धि का ही है। इस रस का भेद-विस्तार नहीं हुआ, केवल भानुदत ने अपने प्रिय स्वनिष्ठ- परनिष्ठ सिद्धान्त का आरोपण कर दिया है। रौद्र रस के उपभेद : भरत ने शृंगार रस के उपभेदों का वर्णन करते समय रौद्र रस के तीन उपभेद बताये हैं।४ शृंगार के समान रौद्र के भी तीन भेद होते हैं : १ आंगिक या क्रियात्मक, २. वेशात्मक तथा ३. वचनात्मक। इसके बाद रौद्र रस का भेद-विस्तार नहीं हुआ। भरत ने इस प्रकार आठ रसों के उपभेदों का वर्णन किया और उन्हीं के अनुकरण पर परवर्त्ती काव्यशास्त्रियों ने भी विवेचन किया। केवल शान्त रस के भेद नहीं किये गये, परन्तु इस रस की कल्पना भरत के बाद ही हुई थी। सभी आचार्यों ने इन उपभेदों का अधिकाधिक विस्तार किया। इस प्रकार, शृंगार के ५२ उपभेद, हास्य के ३६, करुण के द, वीर के ९, भयानक के ६, बीभत्स के ६, अद्भुत के २, रौद्र के ३ =सबका योग १२२ उपभेद हुए। उपभेदों की कल्पना का आधार : अनेक आधारों पर उपभेदों की कल्पना की गई है। स्वयं भरत ने जो उपभेद किये, उनमें भी अनेक आधार दृष्टिगत होते हैं। कुछ आधार ये हैं : (क) चित्तवृत्ति, (ख) अवस्था या परिस्थिति, (ग) विभाव या प्रेरक कारण, (घ) अभिनय, (ङ) कहीं-कहीं इनमें एक से अधिक का मिश्रण किया गया है, (च) वर्ण्यं विषय से सम्बद्ध। काव्य-क्षेत्र के साथ आचार्य भिन्न-भिन्न रसों में वणित प्रसंगों के अनुसार

१. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ७३ २. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ८३ ३. वही, अध्याय ६, का० ७5

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३७६ ] भारतीय नाड्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

उपभेदों का विस्तार करते गये। आगे चलकर अन्य रसों के उपभेद तो भुला दिये गये, परन्तु नायिका-भेद के विस्तार और प्रसार के साथ-साथ शृंगार रस के उपभेद बढ़ते ही गये। विश्लेषण तथा निष्कर्ष : डॉ० नगेन्द्र ने रस-संख्या का सुन्दर विश्लेषण अपने ग्रन्थ रस-सिद्धान्त में किया है। मैं उनसे सहमत हूँ। इसका सारांश निम्नलिखिता है : ३. सभी प्रकार की कल्पनाओं तथा उद्भावनाओं को यदि मिलाया जाय, तो रस- भेदों का पूर्ण योग ३२ होता है। उनका विश्लेषण इस प्रकार होगा : (क) प्रायः सभी आचार्यों द्वारा स्वीकृत रस-शृंगार, हास्य, वीर, करुण, रौद्र, भयानक, बीभत्स, अद्भुत और शान्त=९ (ख) एक से अधिक आचार्यों द्वारा निश्चयपूर्वक स्वीकृत रस-प्रयान् (सख्य), वात्सल्य, भक्ति, आनन्द (प्रमोद), प्रकृति तथा देशभक्ति=६ (ग) किसी एक आचार्य द्वारा निश्चयपूर्वक स्वीकृत रस-उदात्त, उद्धत, माया, व्रीडनक (४ प्राचीन रस); क्रान्ति, उद्वग, प्रक्षोभ (३ नवीन रस)=प्राचीन और नवीन मिलकर ७ (सात)। (घ) ऐसे रस, जिनका उल्लेख केवल खण्डन के लिए किया गया है-लौल्य, अक्ष (द्यूत), मृगया, व्यसन, दुःख, सुख, कार्पण्य=७ (ङ) नाममात्र के लिए उल्लिखित रस-पारवश्य, साध्वस, विलास=३ =पूर्ण योग ३२। २. इन नवीन कल्पनाओं के मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन आधार हैं : (क) व्यावहारिक : यहाँ व्यावहारिक का अभिप्राय है नाट्यगत तथा काव्यगत वर्ण्य विषयों पर आश्रित। उदात्त, उद्धत, मृगया, अक्ष, व्यसन, देशभक्ति, क्रान्ति, प्रकृति आदि रसों की कल्पना प्रायः काव्य या नाटक के वर्ण्य विषयों के आधार पर ही की गई है। (ख) मनोवैज्ञानिक : आरम्भिक आठ रस-शृंगार आदि-के अतिरिक्त प्रेयान, वात्सल्य, लौल्य, सुख, दुःख, ब्रीडनक आदि का आधार मनोवैज्ञानिक ही है। (ग) दार्शनिक : आत्मा की प्रवृत्तियों पर आधारित-शान्त, भक्ति, माया आदि रसों की उद्भावना का आधार सामान्यतः दार्शनिक है। ३. मुख्य रूप से उन्हीं काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में विस्तार की प्रवृत्ति दिखाई देती है, जिनका विवेच्य विषय नाट्य है। इसका कारण यह है कि इसमें दृश्य ही प्रधान होता है, अतः इन ग्रन्थकारों का दृष्टिकोण स्वभावतः अधिक विषयपरक हो गया है। ४. अधिक आचार्यों ने रस-संख्या का अधिक विस्तार पसन्द नहीं किया। यह सत्य है कि बहुत-से आचार्यों को रस-संख्या के परिसीमन के विषय में स्पष्ट रूप से शंका हुई है। लोल्लट, रुद्रट आदि ने तो सभी संचारियों को रसत्व का अधिकारी मानकर

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रसों की कोई सीमा निर्धारित करना पसन्द नहीं किया, परन्तु उन्होंने परम्परा का अनुसरण ही उचित माना; क्योंकि उन्हें भय था कि यदि कोई भी अन्य संख्या निर्धारित की जायगी, तो उसपर भी विवाद होगा ही। ५. प्राचीन आचार्यों में से किसी ने भी स्वीकृत रसों में से एक का भी निषेध नहीं किया और आठ से कम संख्या नहीं मानी। केवल अनुयोग-द्वारसूत्र में भयानक का अन्तर्भाव रौद्र रस में करने का प्रयत्न किया गया है, परन्तु काव्यशास्त्र में उस सूत्र का कोई स्थान नहीं है। हिन्दी में भी किसी स्वीकृत रस का विरोध नहीं किया गया और प्राचीन परम्परा का ही पालन करने का प्रयत्न किया गया।

एक मूल रस की कल्पना : भारतीय काव्यशास्त्र के चिन्तकों की यह विशिष्टता है कि जहाँ एक ओर रसों की अनन्तता के सिद्धान्त का प्रतिपादन हो रहा था, वहाँ दूसरी ओर एक मूल रस में सभी रसों का समाहार करने के भी प्रयास किये जा रहे थे। भारतीय चिन्तनधारा के अध्येता को इस प्रयत्न में बहुत आश्चर्य नहीं होना चाहिए; क्योंकि भारतीय दृष्टि विस्तार-प्रिय होने पर भी अद्वत पर ही केन्द्रीभूत होती है, अनेकता में एकता के अनुसन्धान के प्रयत्न सदा होते रहे हैं। स्वभावतः रस-क्षेत्र में भी रसों के भेदोपभेदों के विस्तार के साथ ही एक रस में सभी का समाहार करने का उपक्म भी परस्पर-विरोधी नहीं कहा जा सकता। करुण रस : एको रस: करुण एव-इस दिशा में प्रथम प्रयास भवभूति का है। उन्होंने उत्तररामचरित में तमसा के मुख से कहलाया है : एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद् भिन्नः पृथक् पृथगिवाश्रयते विवर्तान्। आवर्त्तबुद्बुदतरङ्गमयान्विकारानम्भो यथा सलिलमेव तु तत्समग्रम्।।' एक ही करुण रस निमित्त भेद से विभिन्न रूप धारण करता है, जिस प्रकार आवर्त्त, बुदबुद और तरंग का रूप धारण करने पर भी जल अन्ततः जल ही रहता है। अधिकांश विद्वानों ने माना है कि यह भवभूति की सैद्धान्तिक मान्यता है, जिसे उन्होंने नाटकीय शैली में उपस्थित किया है। उत्तररामचरित के टीकाकार वीर राघव ने इसी मत का समर्थन किया है और भोज द्वारा प्रतिपादित शृंगार-सिद्धान्त के विरुद्ध करुण रस के पक्ष के समर्थन में दो तर्क दिये हैं : १. जीवन में करुणा की प्रचरता है और २. रागी और विरागी दोनों ही समान रूप से इसका अनुभव करते हैं (जबकि शृंगार का अनुभव केवल रागी ही करते हैं)।२ किन्तु, इस व्याख्या से भी अभीष्ट अर्थ प्राप्त नहीं होता; क्योंकि करुण रस का स्थायी भाव है शोक, जिसका आधार होता है इष्ट का नाश, इष्ट का वियोग नहीं। फिर, उत्तर- १. उत्तररामचरित, अंक ३, श्लोक ४७ ३. वही, (सं० एम० आर० काले), पृ० ९७

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३७८ भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास रामचरित का अंगी रस विप्रलम्भ शृंगार होना चाहिए, करुण नहीं। अर्थ-विस्तार करने पर यह अर्थ निकलता है कि भवभूति के करुण रस का स्थायी भाव शोक नहीं, करुणा है, जो व्यापक अर्थ में सहृदय की हृदय-द्रुति का बोध कराती है। इसी व्यापक या परिव्त्तित अर्थ में सुखान्त होने पर भी उत्तररामचरित का अंगी रस करुण माना जा सकता है। भवभूति के पहले, और बाद भी, किसी आचार्य ने करुण रस को मूल रस नहीं माना। भरत ने तो इसे मुख्य रस नहीं मानकर रौद्र से उत्पन्न गौण रस माना है और परवर्त्ती आचार्यों में अधिकांश ने इसे महाकाव्य का अंगी रस तक मानना स्वीकार नहीं किया। प्रश्न उठता है कि भवभूति ने इसे मूल रस क्यों माना ? इसका कारण निम्नलिखित में से कोई हो सकता है : १. भवभूति का अपना गम्भीर स्वभाव जीवन की कुण्ठाओं के कारण बहुत संवेदनशील हो गया था और इसलिए करुण का पक्षपाती था; २. उनके काव्य का मूल आधार रामकथा है, जो वास्तव में करुण कथा है; ३. करुण का करुणा-स्थायिक अर्थ भी भवभूति के समय में प्रसिद्ध था। इसलिए, करुण रस के प्रति उनका पक्षपात स्वाभाविक था। किन्तु, करुणा-स्थायिक करुण के ही प्रति, शोक-स्थायिक करुण के प्रति नहीं। शान्त रस-शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः। अभिनवगुप्त ने शान्त रस को मूल रस के रूप में प्रतिष्ठित किया है। शान्त रस के प्रति अभिनवगुप्त का अपना झुकाव तो है ही, इस प्रसंग में भी उन्होंने नाट्यशास्त्र के किसी पुराने संस्करण का हवाला देकर भरत को ही प्रमाण माना है। नाट्यशास्त्र के इस संस्करण में लिखा है : भावा विकारा रत्याद्याः शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः । विकार: प्रकृतेर्जातः पुनस्तत्रंव लीयते।। स्वं स्वं निमित्तमासाद्य शान्ताद् भावः प्रवर्त्तते। पुननिमित्तापाये च शान्त एवोपलीयते ।' रति आदि भाव विकार हैं और शान्त (शम) प्रकृति अर्थात् मूल है। विकार प्रकृति या स्वभाव से उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाते हैं। अपने-अपने अनुकूल (विभावादि) निमित्तों के प्राप्त होने पर शान्त से ही (रत्यादि) भाव उत्पन्न होते हैं और निमित्त का अभाव हो जाने पर फिर शान्त में ही लीन हो जाते हैं।२ यह विवेचन सम्भवतः प्रक्षिप्त है, किन्तु अभिनवगुप्त से पहले का ही है; क्योंकि उन्होंने इसे अपने मत के समर्थन में दिया है। अभिनवगुप्त ने अपनी ओर से निम्नलिखित तर्क प्रस्तुत किये हैं : १. शान्त रस का स्थायी भाव आत्मज्ञान है, जो विषय-भोग की भावना से सवथा मुक्त तथा शुद्ध आनन्दमय है। वास्तव में, रस का स्वरूप यही है; रति, १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, का० ८४ के पहले २. हिन्दी-अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ६१०

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शोक आदि भाव भी इसी आत्म-चैतन्य की अवस्था पाकर शृंगार, करुण आदि रसों में परिवर्त्ित होते हैं। अतः, जो आत्मास्वाद अन्य रसों के रसत्व का मूल आधार है, वही शान्त रस का स्थायी भाव है। २. शान्त रस का स्थायी भाव तत्त्वज्ञान अन्य सभी स्थायी भावों का आधार है, अतएव यही स्थायितम भाव है। यहाँ आकर अन्य सभी स्थायी भाव व्यभिचारित्व को प्राप्त कर लेते हैं। वास्तव में, उपर्युक्त विवेचन का अभिप्राय यह है कि शान्त रस के लिए अलग से स्थायी भाव की कल्पना की कोई आवश्यकता नहीं; आठ प्रसिद्ध भावों में से कोई भी अलौकिक विभाव के सन्दर्भ में उसका स्थायी हो सकता है।१ और, इसी कारण अभिनवगुप्त ने इसका खण्डन भी किया है। परन्तु, इसका एक दूसरा निष्कर्ष भी सम्भव है कि सभी प्रसिद्ध स्थायी भाव शान्त रस के प्रति उन्मुख हैं, अर्थात् शृंगार आदि अन्य सभी रस शान्त के रूपान्तर-मात्र हैं। शरृंगार रस: इसी समय के आसपास राजा भोज ने घोषणा की कि प्राचीन आचार्य दस रसों की कल्पना करते आये हैं, परन्तु आस्वादनीयता तो केवल शृंगार में है, अतः हम उसे ही रस मानते हैं। उन्होंने अपने मत की स्थापना निम्नलिखित रूप में की है :

हमारा अहंकार ही प्रतिकूल परिस्थितियों के नहीं रहने पर विभाव, अनुभाव, संचारी भाव के द्वारा आनन्द-रूप में संवेदना-योग्य बनकर रसत्व प्राप्त करता है। यह अहंकार आत्मा का विशिष्ट गुण है, यही अभिमान है, यही शृंगार है और यही रस है। रति, हास आदि भाव की उत्पत्ति इसी शृंगार से होती है। वे तो केवल भाव ही हैं, रसत्व को कभी प्राप्त नहीं होते और शृंगार की शोभा बढ़ाने के लिए ही हैं। शृंगार से चतुर्वर्ग की प्राप्ति होती है और वही रस है। अग्निपुराण का शृंगार-सिद्धान्त इसी का दूसरा रूप है। अग्निपुराण के रचना- काल के विषय में सभी विद्वान् एकमत नहीं हैं, फलतः यह निर्णय करना कठिन है कि भोज के सिद्धान्त और अग्निपुराण के सिद्धान्त में कौन किससे प्रभावित है। वस्तुतः, दोनों का सार प्रायः एक ही है। हिन्दी के रीतिकालीन कवियों ने भी शृंगार के महत्त्व का विस्तार किया है। केशव, चिन्तामणि, देव आदि आचार्य-कवियों ने सबल शब्दों में शृंगार को रसराज घोषित किया है। केशव और देव ने शृंगार को प्रधान रस के ही रूप में नहीं, अपितु मूल तथा एकमात्र रस के रूप में ही प्रतिष्ठित किया है : (क) सबको केशवदास हरि नायक है शृंगार। (ख) भाव-सहित सिंगार में नवरस झलक अजत्न ।|2 १. हिन्दी-अभिनवभारती, अध्याय ६, पृ० ६२१ २. केशव : रसिक-प्रिया (१-१६)

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३८० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास ज्यों कंकन मनि कनक को ताही में नवरत्न ।।' इन कवियों ने अपने मत के समर्थन में सिद्धान्त के साथ व्यवहार से भी काम लिया है। व्यावहारिक पक्ष में इन्होंने सभी रसों को-हास्यादि मित्र रसों को ही नहीं, रौद्र आदि अभिन्न रसों को भी-शृंगार में ही समाविष्ट कर दिया है। अपने सिद्धान्त के प्रतिपादन में केशव ने पौराणिक आधार ग्रहण करके कृष्ण के व्यक्तित्व में नौ रसों का समावेश करके आधार-भूमि प्रस्तुत की है। कृष्ण जिस प्रकार शृंगारमय होते हुए भी नव रस-रूप धारण करते हैं, उसी प्रकार शृंगार भी नव रस में परिणत हो सकता है।२ स्पष्ट है कि केशव और देव के प्रतिपादन का आधार शास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक से अधिक काव्यमय है। अद्भुत रस : सर्वत्र ह्यद्भुतो रसः। कविराज विश्वनाथ के वृद्धप्रपितामह नारायण पण्डित की स्थापना थी कि अद्भुत रस ही मूल और एकमात्र रस है। विश्वनाथ ने साहित्य-दर्पण के रस-प्रसंग में पूर्ववर्त्ती विद्वान् धर्मदत्त के आधार पर लिखा है कि सब रसों में चमत्कार साररूप से प्रतीत होता है और चमत्कार (विस्मय) के साररूप (स्थायी) होने से सर्वत्र अद्भुत रस ही प्रतीत होता है, अतः पण्डित नारायण केवल एक अद्भुत रस ही मानते हैं।3 इस सिद्धान्त का आधार चमत्कार है। चमत्कार भारतीय सौन्दर्यशास्त्र का अत्यन्त मौलिक तथा महत्त्वपूर्ण शब्द है। शैव-दर्शन से रसशास्त्र के अनेक शब्द आये हैं, जिनमें यह शब्द भी है। अभिनवगुप्त के अनुसार चमत्कार का अर्थ है, निर्विघ्न आत्म-प्रतीति- आत्मास्वाद या आनन्द। इसके साथ 'अलौकिक' विशेषण का प्रयोग किया जाता है; क्योंकि काव्य अथवा रस का आनन्द विषयजन्य आनन्द से भिन्न प्रकार का होता है। काव्य-सौन्दर्य तथा उससे उत्पन्न आनन्द को व्यक्त करने के लिए रस के ही प्रसंग में नहीं, अपितु अलंकार तथा वकोक्ति के भी प्रसंग में 'लोकोत्तर' आदि विशेषणों का प्रयोग बहुत प्राचीनकाल से होता रहा है। इसलिए, काव्य के आनन्द में 'अलौकिक' या 'असाधारण' तत्त्व मूलतः अन्तहित हो गया है। भक्ति-रस : स च रसो भगवद्भक्तिमय एव।४ जब भारतीय साहित्य में भक्ति- काव्य का पर्याप्त विकास हो गया, तब वैष्णव आचार्यों ने भक्ति-रस को प्रतिष्ठित ही नहीं किया, अपितु उसे ही मूल रस भी घोषित किया। उनका कथन है कि वास्तविक रस भक्ति- रस ही है; क्योंकि वही पूर्ण आनन्द से युक्त है, शृंगार आदि अन्य रस उसके समक्ष सर्वथा १. देव-भवानी-विलास २. केशव : रसिक-प्रिया (१-२) ३. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० ३ की वृत्ति ४, भक्तिरसामृत-सिन्धु, पृ० ७४

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मकी जीठ गनह ए रस पड़ात कग

नगण्य हैं। भक्ति-रस और शृंगारादि रसों में वही अन्तर है, जो सूर्य और खद्योतों में होता है : परिपूर्णरसा क्षुद्ररसेभ्यो भगवद्भक्ति:। खद्योतेभ्य इवादित्य प्रभेव बलवत्तरा॥१क इन आचार्यों के अनुसार भक्ति-रस में काव्य-रसों की स्थिति संचारियों के समान है। इसी तर्क के आधार पर रूपगोस्वामी ने हास आदि को हास-रति, विस्मय-रति कहा है और उन्हें मूल रति या भगवद्रति के केवल गौण भेद माना है। इस प्रकार रूपगोस्वामी, मधुसूदन सरस्वती आदि आचार्यों के अनुसार भक्ति-रस ही मूल रस है। भक्ति-रस के भेदों में मधुराभक्ति रस या उज्जवल रस ही प्रधान है। विश्लेषण : अब मूल रस बनने के लिए हमारे सम्मुख पाँच रस हैं-करुण, शान्त, शृंगार, अद्भुत और भक्ति। इनपर विचार करके सत्यासत्य का निर्णय करने का प्रयास किया जाय। सबसे पहले करुण रस है। भवभूति का करुण रसवाला सिद्धान्त इसी अर्थ में विचारणीय बनता है, जब हम करुण को शोक-स्थायिक नहीं मानकर करुणा-स्थायिक मानें और हृदय-दृति को उसके मूल धर्म के रूप में स्वीकार करें। इसमें भी कई प्रकार की आपत्तियां उठाई जा सकती हैं, परन्तु भवभूति के अभिमत को सिद्ध करने का इसके "अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है। अभिनवगुप्त का सिद्धान्त वस्तुतः उनके रस-स्वरूप विवेचन का स्वाभाविक परिणाम है, फलतः वह अधिक पुष्ट पृष्ठभूमि पर आधृत है। उन्होंने रस का अर्थ किया है- निर्विघ्न आत्म-प्रतीति और वस्तुतः शम की यही परिभाषा है। अतएव शान्त रस में सभी रसों का पर्यवसान स्वयमेव सिद्ध हो जाता है। वस्तुतः, जब अभिनव द्वारा दी गई उसकी परिभाषा को स्वीकार कर लेते हैं, तो इस स्थापना में किसी प्रकार की आपत्ति नहीं उठती कि-भावाः विकारा रत्याद्याः शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः। इस दशा में शान्त रस का भेद नहीं रह जाता, अपितु इसका पर्याय बन जाता है। परन्तु, वास्तविक समस्या तो अभिनवगुप्त 6 की आत्मवादी रस-कल्पना को उसी रूप में ग्रहण करने की है। ह0 की भोज का शृंगार-सिद्धान्त भी लगभग ऐसे ही तर्क पर आधारित है। उनके सिद्धान्त के अनुसार आत्मा की प्रथम प्रतीति को अहंकार कहते हैं, अतः यही रस है और इसी का पारिभाषिक नाम शृंगार है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि भोज के मत से भी रस का वास्तविक अर्थ आत्म-प्रतीति ही है और चूँकि शृंगार रस भी अहंकार या आत्म-प्रतीति 5का दूसरा नाम है, इसलिए शृंगार ही रस है। इस दृष्टि से भोज और अभिनवगुप्त के सिद्धान्तों में कोई मौलिक अन्तर नहीं है; क्योंकि आत्म-प्रतीति को ही अभिनव शान्त कहते हैं ९. मधुसूदन सरस्वती : भगवद्मक्ति-रसायन, २-७६१

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

और भोज शृंगार। दोनों ने माना है कि भावों के माध्यम से आत्मा के आस्वाद को ही रस कहते हैं। दोनों में भेद केवल विवरण का है। अभिनव अन्य रसों को मूल रस के रूपान्तर मानते हैं, किन्तु भोज उन्हें रस नहीं मानकर मूल रस से उत्पन्न केवल भाव मानते हैं। अग्निपुराण का रति-सिद्धान्त और भोज का शृंगार-सिद्धान्त प्रायः एक ही है। अद्भुत रस का पक्ष अन्य रसों की अपेक्षा बहुत दुर्बल है। धर्मदत्त के उपर्युक्त मत में चमत्कार का अर्थ निर्विघ्न आनन्द नहीं, विस्मय है। यही इसका सबसे बड़ा दोष है; क्योंकि रस का मुख्य तत्त्व विस्मय नहीं, अपितु आह्वाद है। यह आह्लाद कुछ अंशों में असाधारण होता है, तोभी यह अद्भुत रस के स्थायी भाव विस्मय का समानार्थक नहीं माना जा सकता। काव्यास्वाद में विस्मय स्थायी नहीं होता, केवल संचारी ही होता है। इसलिए, चमत्कार के गौण अर्थ को आधार मानकर अद्भुत को मूल रस मानना उचित नहीं है। आगे चलकर 'चमत्कार', 'लोकोत्तर' आदि का स्थूल अर्थ में आश्चर्यजनक तत्त्वों के लिए प्रयोग होने लगा। फिर, इन शब्दों के अर्थ में विकार आ जाने के कारण काव्य-मूल्यों में भी विकार आने लगा और 'चमत्कार' कुतूहल का पर्याय बन गया और अन्ततः काव्य-रसिकों के लिए लोभ का कारण बन गया। भक्ति-रस की स्थापना वैष्णव आचार्यों के द्वारा आध्यात्मिक तथा साम्प्रदायिक स्तर पर हुई है, इसलिए काव्यशास्त्रीय तथा मनोवैज्ञानिक कसौटी पर उसकी परीक्षा करना उपयुक्त नहीं है। जो वैष्णव भक्त कृष्ण के मधुर रूप के उपासक हैं, उनके लिए मधुर रस अवश्य ही रसराज तथा मूल रस है। जीवन की भिन्न-भिन्न भाव-वृत्तियों पर आधारित हास्य आदि रस भक्ति-रस के अंग-मात्र हैं या संचारी हैं। किन्तु, यह स्थापना आध्यात्मिक क्षेत्र में ही उपयोगी हो सकती है; काव्य-क्षेत्र में आध्यात्मिक तर्कों से काम नहीं लिया जाय तो अच्छा होगा। एक मूल रस की कल्पना का आरम्भ उस समय हुआ, जब रस-सिद्धान्त में दार्शनिक विवेचन का आरम्भ हुआ। भरत का दृष्टिकोण व्यावहारिक था, नाट्य उनके लिए लोक- जीवन की विविधता का अनुकरण था, अतः रस की विविधता वे स्वीकार करते थे। किन्तु, आगे चलकर अभिनवगुप्त के प्रभाव के कारण शैवाद्वत के आधार पर रस-सिद्धान्त की व्याख्या की गई, तो रस की अद्वतता भी अनिवार्य हो गई। प्रश्न उठा कि इस आत्मास्वाद-रूप को क्या नाम दिया जाय। वीतराग अभिनव ने अपनी प्रवृत्ति के अनुरूप ही आत्मज्ञान को महत्त्व देते हुए इसे शान्त नाम दिया और रागी राजा भोज ने आत्म-रति की प्रधानता मानते हुए इसे शृंगार कहा। किन्तु, यह भेद मुख्यतः नाम का ही रहा, स्वरूप का नहीं। शैवागम के आनन्द-सम्प्रदाय के अनुयायी रसवादियों ने शान्त और शृंगार का विवाद मिटाने के लिए आनन्द-रस कहा। श्रीजयशंकर प्रसाद के अनुसार 'अभिनवगुप्त ने नाट्य-रसों की व्याख्या में उसी आनन्दमय आनन्द-रस को

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पल्लवित किया है।"9 वैष्णव आचार्यों ने भी आनन्दवादी अद्वत-सिद्धान्त के कुछ तत्त्वों को स्वीकार करके द्वत की पृष्ठभूमि पर भक्तिरस की प्रतिष्ठा की। इनके अतिरिक्त एक मूल रस की स्थापना के दो अन्य प्रयत्न हुए; उनका आधार दार्शनिक से अधिक साहित्यिक था। भवभूति की दृष्टि में रस एक रागात्मक अनुभव है और राग का मूल रूप संवेदना है; इसलिए मूल रस वही हो सकता है, जो सबसे अधिक संवेदनात्मक हो अर्थात् करुण। नारायण पण्डित और उनके अनुयायी धर्मदत्त ने आलंकारिक दृष्टि से अद्भुत को मूल रंस माना। उन्होंने चमत्कार का आनन्दवाचक अर्थ नहीं ग्रहण करके वैचित्यवाचक ही ग्रहण किया। इस मत के अनुसार बूँकि प्रत्येक रस का परिपाक कल्पना के द्वारा होता है, अतः कल्पना से उत्पन्न चमत्कार ही रस का प्राण है और चूँकि इस चमत्कार से प्रमाता के मन में विस्मय होता है, अतः रसास्वाद का आधार विस्मय ही है, जो अद्भुत रस का स्थायी भाव है। इसलिए, अद्भुत रस ही मूल रस है। इस प्रकार, भवभूति राग को और नारायण पण्डित कल्पना को काव्य का प्राण- तत्त्व स्वीकार करने हैं। इस प्रकार रस की आत्मा के निर्धारण के प्रयास चलते रहे। दार्शनिकों ने आनन्द को रस का प्राण मानकर आत्मज्ञान-रूप शम या आत्मभोग-रूप शृंगार को मूल रस स्वीकार किया। भावुकों ने राग या संवेदना को रस की आत्मा मानकर करुण रस को मूल रस में प्रतिष्ठित किया। आलंकारिकों ने कल्पना-तत्त्व को रस की आत्मा मानकर अद्भुत रस को मूल रस घोषित किया। रस में इन तीनों तत्त्वों का समन्वय रहता है। चूकि, रस में तीनों-आनन्द, राग और कल्पना-का अंश बराबर नहीं होकर इसी क्रम से न्यूनाधिक रहता है-आनन्द का सर्वाधिक, राग का उससे कम और कल्पना का उससे भी कम-इसलिए उपर्युक्त स्थापनाओं में सत्य का अंश भी इसी क्रम से न्यूनाधिक मात्रा में मानना चाहिए-अर्थात् अभिनव और भोज का सिद्धान्त औरों की अपेक्षा अधिक मान्य हो सकता है, भवभूति का सिद्धान्त भी बहुत अंशों में ग्राह्य है, किन्तु नारायण पण्डिस का सिद्धान्त कुछ ही अंशों में ग्राह्य माना जा सकता है। विवेचन : रस-संख्या का निर्धारण करने के लिए रस के स्वरूप तथा उसके निष्पादक तत्त्वों को जान लेना आवश्यक है; क्योंकि इससे रस-निर्णय में सहायता मिलेगी। रस के स्वरूप के विषय में दो दृष्टिकोण हैं : १ वस्तुपरक, जिसके अनुसार रस भावमूलक कलात्मक स्थिति है, २. आत्मपरक, जिसके अनुसार रस भाव की पृष्ठभूमि में आत्मा का आस्वाद है। पहली परिभाषा के अनुसार रस की निष्पत्ति नाट्य में होती है। लोक-जीवन के अनुकरण का ही नाम नाट्य है। नाट्य में भावमूलक स्थितियों का कलात्मक प्रदर्शन किया जाता है। जीवन की इन भावमूलक स्थितियों की संख्या तो बहुत हो सकती है, परन्तु स्थायी भावों के आधार पर इनके साधारणतः आठ वर्ग किये जा १. काव्यकला तथा अन्य निबन्ध (चतुर्थ संस्करण), पृ० ७६

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास सकते हैं। शेष इन्हीं में अन्तर्भूत हो सकती हैं। दूसरी परिभाषा के अनुसार रस आत्मा का आस्वाद होने के कारण उसका मूलरूप तो एक ही है, परन्तु अनेक भावों की स्थिति होने के कारण रस के बाह्य रूप अनेक हो जाते हैं। इस दशा में भी रसों की संख्या स्थायी भावों की संख्या के अनुरूप होती है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि रस की वस्तुपरक परिभाषा मानें या आत्मपरक परिभाषा, रस-संख्या का निर्धारण स्थायी भावों की ही संख्या के आधार पर किया जा सकता है। इस तथ्य को ध्यान में रखने से शृंगार, हास्य, करुण, रौद्र, वीर, भयानक, बीभत्स और अद्भुत का रसत्व किसी प्रयास के विना ही सिद्ध हो जाता है। भरत ने जिन आठ रसों का प्रतिपादन किया है, उनके अतिरिक्त नवम रस शान्त को सभी ने स्वीकार कर लिया है और आधुनिक कसौटी पर इसका रसत्व भी सिद्ध हो जाता है। यह आक्षेप को भी अधिक मान्यता नहीं दी जा सकती कि शम का अनुभव केवल वीतराग व्यक्ति ही कर सकते हैं; क्योंकि चित्त की प्रकृतावस्था से कोई भी व्यक्ति वंचित नहीं हो सकता। इनके अतिरिक्त जिन विभिन्न रसों का उल्लेख विभिन्न आचार्यों ने किया है, उनमें बीस-बाईस और बच जाते हैं। यदि निरसन-पद्धति से काम लिया जाय, तो बहुत आसानी से इनका खण्डन हो सकता है। साध्वस, पारवश्य और विलास का केवल नामोल्लेख भोज ने किया है, इनकी स्थापना का प्रयास नहीं किया है। लौल्य, कार्पण्य, सुख, दुःख, मृगया, धूत और व्यसन का उल्लेख मात्र खण्डन करने के लिए किया गया है। व्रीडनक का उल्लेख किसी प्रतिष्ठित मान्य आचार्य ने नहीं किया, केवल जैनसूत्र में यह उल्लिखित है और व्रीडा नामक भाव में इसका अन्तर्भाव हो जाता है। उदात्त तथा उद्धत की कल्पना नायक के चार प्रकार के नायक-भेदों के साथ केवल संगति बैठाने के लिए की गई है और ये स्वयं अपने में नवीन रस की कल्पना के लिए अपर्याप्त हैं; क्योंकि औदात्त्य और औद्धत्य मात्र चारित्रिक वृत्तियाँ हैं, चित्तवृत्तियाँ नहीं। भानुदत्त ने माया की उद्भावना अभिनवगुप्त के शान्त रस के ढंग पर, उन्हीं के तर्कों के आधार पर की, पर वस्तुतः यह कोई स्वतन्त्र चित्तवृत्ति नहीं होकर सभी वासनाओं और भाव-वृत्तियों की मूल प्रेरणा है, जिसका अलग से आस्वाद्य रूप नहीं होता। कान्ति चित्तवृत्ति तो है, परन्तु उसका मनोवेगात्मक रूप उत्साह, क्रोध आदि से अलग नहीं होता। उद्वेग तथा प्रक्षोभ का बाहुल्य वर्त्तमान साहित्य में अवश्य मिलता है, परन्तु वे स्वतन्त्र रसरूप के अधिकारी नहीं माने जा सकते; क्योंकि इनमें करुणा, क्रोध, जुगुप्सा मिले रहते हैं, अतः कहीं करुणा की प्रधानता होने से करुण में अन्तर्भूत हो जाते हैं और कहीं अमर्ष की प्रधानता के कारण करोध में और कहीं क्षोभ आदि की प्रधानता के कारण भाव-दशा तक ही रह जाते हैं। अब कुछ एसे रस बच जाते हैं, जिनको एक से अधिक आचार्यों ने मान्यता दी है। प्रेयान् (सख्य), वात्सल्य तथा भक्ति को प्राचीन आचार्यों ने और प्रकृति तथा देशभक्ति को नवीन अचार्यों ने प्रतिष्ठित किया है। इनके विषय में एक विकल्प यह है कि शृंगार रस

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रस

के बदले में प्रेम-रस मान लिया जाय और ये सब उसी के भेद माने जायँ। इस स्थापना में तर्क यह है कि इन सभी के स्थायी भाव स्वतन्त्र रूप से नहीं होते, वरन् प्रेम ही आलम्बन-भेद से अनेक रूपों में प्रकट होता है। स्त्री-पुरुष का प्रेम शृंगार, मित्र के प्रति प्रेम सख्य या प्रेयान, सन्तान या सन्तान के समान व्यक्तियों के प्रति प्रेम वात्सल्य, इष्ट या देवता के प्रति प्रेम भक्ति, प्रकृति के प्रति प्रेम प्रकृति-प्रेम और देश के प्रति प्रेम देश-भक्ति का रूप धारण कर लेता है। चूँकि स्थायी भाव के ही भेद से रस-भेद होता है, आलम्बन- भेद से नहीं, इसलिए ये सभी प्रेम रस के ही अनेक भेद हुए, इतने विभिन्न रस नहीं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल तथा मराठी के डॉ० वाटवे का मत यही है। इस स्थापना से यह लाभ तो हुआ कि रसों के वर्गीकरण की समस्या सुलझ गई, परन्तु इससे किसी सहृदय को सन्तोष नहीं हो सकता; क्योंकि किसी भी सहृदय का हृदय यह स्वीकार करने को तैयार नहीं होगा कि काव्य-क्षेत्र में शृंगार तथा वात्सल्य, देश-भक्ति तथा प्रकृति-प्रेम की रसानुभूति सर्वप्रकारेण समान होती है। अतएव, इन रसों की स्वतन्त्र सत्ता के सम्बन्ध में विचार- विमर्श की आवश्यकता है। प्रेयान या सख्य का स्थायी भाव सख्य-भाव या मित्र-प्रेम है। काव्य या नाटक में जिन मैत्री-प्रसंगों का वर्णन किया गया है, यदि उनका विश्लेषण किया जाय, तो उनमें प्रेम, उत्साह, शोक आदि अनेक भावों का सम्मिश्रण दिखाई देता है। यह प्रेम काम- मूलक नहीं है, अतः शास्त्र-सम्मत शृंगार रस के अन्तर्गत नहीं आ सकता; क्योंकि स्पष्ट शब्दों में कहा गया है : 'शृङ्ग हि मन्मथोद्भेदः" (कामदेव के उद्भेद को शृंग कहते हैं)। फिर उत्साह, शोक आदि भाव भी यहाँ स्वतन्त्र नहीं, प्रेम से ही उत्पन्न हैं, इसलिए इसे वीर या करुण रस के भी अन्तर्गत नहीं रख सकते। फिर, प्रश्न है कि क्या इसमें इनकी प्रचण्ड आस्वाद्य मान्यता है कि इसे स्वतन्त्र रस माना जाय ? इसका उत्तर यह है कि वस्तुतः मित्नता मनोवेग न होकर मनोवृत्ति है और अपने स्वाभाविक रूप में इसका आस्वाद उतना प्रचण्ड नहीं हो सकता कि इसे भाव से बढ़कर रस की कोटि का मान लिया जाय। जहाँ कहीं इसमें उत्कटता या प्रचण्डता आती है, वहाँ उसका कारण मैत्री से उत्पन्न अन्य कोई प्रबल भाव, जैसे उत्साह, शोक आदि अवश्य रहता है। अतः, सख्य रस की स्वतन्त्र सत्ता मानना कठिन है। वात्सल्य का पक्ष सख्य की अपेक्षा अधिक ठोस आधार पर स्थित है। वत्सल भाव का मातृवृत्ति से घनिष्ठ सम्बन्ध है। पुत्र-प्राप्ति की इच्छा जीवन की प्रबलतम इच्छा है और इसका सम्बन्ध जीवन के दो पुरुषार्थों-धर्म और काम-से है। इसलिए वात्सल्य का निषेध नहीं किया जा सकता; फिर इसका अन्तर्भाव शृंगार आदि में सम्भव नहीं है, न इसे केवल भाव-कोटि में ही रख सकते हैं। फिर, प्रश्न उठता है कि भरत आदि प्राचीन आचार्यों ने इसे रसों में स्थान क्यों नहीं दिया? इसके कई कारण दिये जा सकते हैं। एक कारण यह भी हो सकता है कि भरत के लिए रस सीधे नाट्य से ही सम्बद्ध था और नाट्य में वात्सल्य के आलम्बन बालक और उद्दीपन रूप में उसकी विविध क्रीड़ाओं का

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३८६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

प्रस्तुतीकरण बहुत कठिन होता है। इसलिए नाट्य में वात्सल्य का व्यावहारिक दृष्टि से वैसे ही बहिष्कार कर दिया गया जैसे नाट्य में रंगमंच पर युद्ध, अभियान आदि वरजित कर दिये गये। इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि वात्सल्य को रस-कोटि में गिनना वांछनीय है, परन्तु इसे कविता में ही स्थान मिल सकता है, नाटक में नहीं। अब रही भक्ति। प्राचीन आचार्यों ने भक्ति अर्थात् भगवद्विषयक रति को रस नहीं मानकर केवल भाव माना है; क्योंकि उसका रस-रूप में पूर्ण परिपाक नहीं होता। दूसरी ओर, वैष्णव आचार्यों ने इसे मूल रस मानकर शृंगार आदि रसों को केवल भाव घोषित किया है।, भक्ति-रस के सम्बन्ध में सर्वप्रथम प्रश्न यह उठता है कि इसका आस्वादन करनेवाला कौन है-सहृदय या भक्त? दूसरे शब्दों में कहा जाय कि इसके रस-रूप का विचार, अन्य रसों के समान, सहृदय की दृष्टि से करना है या भक्त की दृष्टि से ? स्पष्ट है कि सहृदय की दृष्टि से करना है। भक्ति-रस की परीक्षा काव्य-रस की ही कसौटी पर करनी है। प्रश्न है कि क्या भगवद्रति भी रति, शोक आदि के समान स्थायी भाव है? अर्थात् प्रत्येक सहृदय के चित्त में वासना-रूप में वर्त्तमान रहती है? भक्त इसका स्वीकारात्मक उत्तर देगा, परन्तु आज इसे इसी रूप में स्वीकार करना कठिन ही है। परोक्ष सत्ता के जो रागात्मक भाव होंगे, वे संसर्ग तथा अभ्यास के द्वारा अजित ही होंगे, मौलिक तथा स्थायी नहीं हो सकते। भक्त के लिए यह प्रकृत भाव हो सकता है, परन्तु साधारण सहृदय के लिए, जो रस का वास्तविक अधिकारी होता है, अजित ही है। भक्ति का सीधा सम्बन्ध मोक्ष से है, जो चरम पुरुषार्थ है। इसलिए रस के अन्य तत्त्व-पुरुषार्थ के प्रतियोगित-के विषय में कोई शंका नहीं हो सकती। किन्तु, उत्कट आस्वाद्यमानता के विषय में शंका उठ खड़ी होती है। क्या सहृदय काव्यगत भक्ति का आस्वादन उसी उत्कट रूप में करता है, जिस रूप में वह रति, उत्साह आदि भावों का करता है ? केवल भक्त ही नहीं, प्रत्येक सहृदय भक्ति से पगी कविता का पूर्णतः आस्वादन करता है। किन्तु, भक्त और सहृदय का आस्वादन समान नहीं होता। भक्त की सहृदयता विशेष संस्कारों से प्रभावित होने के कारण शुद्ध नहीं कही जा सकती। इसलिए उसके अनुभव का साधारणीकरण केवल भक्त-वर्ग में ही होता है, साधारण सहृदय-वर्ग में नहीं। फिर सूर आदि भक्तकवियों के सरस प्रसंगों में जो आस्वाद्यता है, उसका क्या कारण है? विनय के पदों में पूर्ण रूप से आत्म-समर्पण व्यक्त किया गया है। सहृदय के चित्त में भी उस अज्ञात शक्ति के प्रति समर्पण की यह भावना वासना-रूप में स्थित रहती है और विनय के पदों में विभावादि का जो सजीव चित्रण रहता है, उससे जगकर रसत्व प्राप्त करती है। यह समर्पण-भाव स्थायी भाव है, किन्तु शुद्ध नहीं। शम, विस्मय और रति के समान यह समर्पण-भाव भी मिश्र भाव है। इस दृष्टि से देखने पर भक्ति का यह रूप रसत्व प्राप्त कर लेता है। रूप-माधुरी एवं शृंगार के पदों की रसनीयता का आधार रति है, किन्तु चूँकि इसका आलम्बन अलौकिक है, इसलिए यह सामान्य, लौकिक

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रस

रति न होकर उदात्त रूप की रति है। अतः, इस रति की आस्वाद्यता में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता। साधारण रस-प्रक्रिया में विभावों की लौकिकता विघ्न-रूप में रहती है और कवि को अपनी कल्पना का उपयोग करके उसका निराकरण करना पड़ता है, परन्तु इस प्रसंग में विभावादि की अलौकिकता के कारण यह विघ्न नहीं रहता और रस की सिद्धि बहुत सहज हो जाती है। इसलिए, भक्ति का स्थायी भाव चाहे समर्पण=भाव हो या उदात्तीकृत रति, उसकी आस्वाद्यता में कोई सन्देह नहीं किया जा सकता और परिणाम- स्वरूप उसका रसत्व भी स्वतः सिद्ध हो जाता है। भक्ति का अन्तर्भाव भी अन्य रसों में सम्भव नहीं है; क्योंकि भक्ति का स्थायी भाव न शुद्ध विस्मय है, न शुद्ध भय है, न शम है, और न शममूलक रति ही है। अतः, इसकी स्वतन्त्र सत्ता में सन्देह नहीं किया जा सकता। इस तरह व्यापक रूप में भक्ति-रस सिद्ध हो जाता है; क्योंकि इस रूप में वह सहृदय- गम्य है। किन्तु, यदि इसका सामुदायिक रूप लिया जाय, तो काव्यशास्त्रीय दृष्टि से यह सिद्ध नहीं होता; क्योंकि उस दशा में वह केवल भक्त-गम्य है, अतः उसका साधारणीकरण नहीं हो सकता है। आधुनिक युग में प्रकृति के सम्बन्ध में प्रचुर परिमाण में काव्य की रचना हो रही है, परिणाम-स्वरूप प्रकृति-रस की कल्पना की गई है। काव्य में अनेक रूपों में प्रकृति का वर्णन पाया जाता है-मानव के विभिन्न कार्यों की पृष्ठभूमि के रूप में, विभिन्न भावों के उद्दीपन के रूप में, विभिन्न अनुभूतियों के माध्यम या प्रतीक के रूप में, अलंकार के रूप में और फिर आलम्बन के रूप में। आलम्बन-रूप में प्रकृति से कवि का और पीछे पाठक का रागात्मक सम्बन्ध हो जाता है; क्योंकि इस रूप में वह भाव का विषय ही बन जाती है। प्रकृति-काव्य में अभिव्यक्त यह भाव निश्चित रूप से आस्वादन के योग्य होता है, किन्तु उतने उत्कट रूप में नहीं, जितने उत्कट रूप में रति, उत्साह आदि भाव होते हैं। इसलिए, उसकी रसनीयता सिद्ध हो जाती है और उसी आधार पर उसका रसत्व भी सिद्ध हो जाता है। किन्तु, प्रश्न उठता है कि क्या इस रस की स्वतन्त्र सत्ता है या किसी अन्य रस में इसका अन्तर्भाव हो जाता है ? इस प्रश्न का उत्तर देने के पहले यह निश्चित करना अच्छा होगा कि प्रकृति के प्रति कवि के भाव का क्या रूप है ? दूसरे शब्दों में-इस रस का स्थायी भाव क्या है ?

काव्य में प्रकृति का चित्रण प्रायः तीन प्रकार का देखा जाता है-मधुर, विराट् और भयानक या रौद्र। यह स्वाभाविक ही है कि दोनों रूपों के प्रति पाठक या सहृदय की प्रतिक्रिया एक रूप में नहीं हो सकती। मधुर रूप के प्रति पाठक के चित्त में रति-भाव जगता है तो विराट् रूप के प्रति ओज तथा विस्मय के भाव का उद्रेक होता है, किन्तु रौद्र या भयानक के प्रति भय का उदय होता है। इन तीन अवस्थाओं में रस का स्वरूप एक नहीं हो सकता, वरन् स्थायी भावों के अनुसार बदलता रहता है। अतः, प्रकृति रस का कोई एक विशेष रूप नहीं माना जा सकता और इस दशा में स्वतन्त्र रस की कल्पना

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास भी नहीं की जा सकती। अभिप्राय यह है कि प्रकृति-काव्य की रसनीयता तो निरविवाद है, परन्तु स्वतन्त्र प्रकृति-रस की उद्भावना अनावश्यक है। देशभक्ति-रस की भी कल्पना इस युग के आलोचकों ने भारतीय तथा पाश्चात्त्य साहित्य के प्रकाश में की है। किन्तु, देश-भक्ति एक मिश्र भाव है, जिसमें राग और उत्साह के भाव मिले रहते हैं। देश-भक्ति की अभिव्यक्ति किसी एक विशिष्ट रूप में नहीं, प्रत्युत अनेक रूपों में देखी जाती है। कहीं वह मातृभूमि के प्रति विशुद्ध रति-रूप में मिलती है, तो कहीं देशवासियों के प्रति प्रेम तथा सहानुभूति के रूप मैं, कहीं उसकी स्वतन्त्रता की रक्षा के निमित्त उत्साह-रूप में, तो कहीं विरोधी शक्तियों के प्रति अमर्ष- रूप में, कहीं प्राचीन गौरव के प्रति गर्वयुक्त अभिमान के रूप में, तो कहीं वर्त्तमानं अधोगति के कारण तीव्र करुणा अथवा क्षोभ के रूप में मिलती है। आज के भारतीय साहित्य में राष्ट्रीय तथा सांस्कृतिक कविता का प्रमुख स्थान है, जिसकी उत्कट रसनीयता में सन्देह नहीं किया जा सकता। परन्तु, प्रश्न उठता है कि क्या उसे स्वतन्त्र रस कह सकते हैं ? इसका उत्तर प्रकृति-रस के समान ही होगा। देश-भक्ति के मुख्य रूपों का अन्तर्भाव वीर, करुण आदि रसों में हो जाता है। शुद्ध रागात्मक रूप को या तो व्यापक प्रेम-रस में रख सकते हैं या उसे देश-विषयक रति-भाव मान सकते हैं। वस्तुतः, देशभक्ति- रस को स्वतन्त्र रस मानने के पर्याप्त और उचित कारण नहीं हैं। निष्कर्ष : उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन आचार्यों ने बहुत विचार-विमर्श करके यही निष्कर्ष निकाला है कि नवरस की कल्पना उपयुक्त तथा तर्क- संगत है। इसके दो अत्यन्त सबल कारण हैं : १. जीवन के मौलिक या आधारभूत मनोवेग आठ या (शम को लेकर) नौ हैं या वत्सल-भाव तथा भक्ति को मिलाकर दस या ग्यारह से अधिक नहीं हैं; २. यदि रसों की संख्या में वृद्धि करने का क्रम आरम्भ हो जाय, तो फिर यह निर्णय करना बहुत कठिन होगा कि कहाँ रुकना चाहिए। मौलिक या आधारभूत मनोवेगों को प्रमाण मान लेने से यह समस्या सुलझाने में बहुत सहायता मिलती है; क्योंकि वे ही मनोवेग उत्कट रूप से आस्वाद के योग्य होते हैं। इसके विपरीत जो मनोवेग आधारभूत नहीं है, अर्थात् जीवन की मूल वृत्तियों तथा पुरुषार्थों से जिनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं है, उनका आस्वाद समुचित रूप से उत्कट नहीं होता। दूसरी बात यह है कि संख्या सीमित हो जाने के कारण इस प्रकार के मनोवेगों के वर्गीकरण एवं संख्या- निर्धारण में विशेष कठिनाई नहीं होती। कT- उपसंहार : रस-संख्या के विषय में इतना विवेचन करने के बाद भी कहना चाहिए कि वस्तुतः यह प्रश्न रसशास्त्र का मौलिक प्रश्न नहीं है। अतः, यह महत्त्व भी नहीं रखता। इसका कारण यह है कि रस-सिद्धान्त का आधार केवल वे ही रस नहीं हैं, जो गिनाये गये हैं। वास्तव में, भाव ही आस्वाद का मूल है, इसीलिए 'रस' या 'रस- ध्वनि' में गिनाये गये रसों के अतिरिक्त भाव, रसाभास, भावाभास, भावोदय, भाव-शान्ति,