9. लकी अह पS : T नेता क आी5ाय [२४७
Page 272
लकी अह पS : T नेता क आी5ाय [२४७
दूसरों के वेश, कर्म, अवस्था तथा चेष्टा का अनुकरण भाषा, वर्ण तथा अन्य सामग्रियों के साथ करता है और नट किसी प्राचीन कथा वा रस तथा भाव के साथ अभिनय करता है। सूत्रधार : सूत्रधार नान्दी-पाठ के उपरान्त काव्य में प्रस्तुत वस्तु, नेताओं के चरित और रसों को एकत्र करके एक सूत्र में पिरो देता है, अर्थात् संक्षेप में कह देता है। शारदातनय ने सूत्रधार उसी को कहा है, जो रंगपीठ की समस्त कलाओं में चतुर हो और नेता, वस्तु तथा कवि का परिचय संक्षेप में दे सके। सूत्रधार चारों वाद्य (तत, अवनद्ध, घन तथा सुषिर) बजाने में निपुण होता है; वक्ता, मधुरभाषी, गीत-ताल-लय का ज्ञाता, और समझ-बूझकर सबका प्रयोग करनेवाला होता है। पारिपाश्विक : जो व्यक्ति भरत द्वारा अभिनय किये हुए अनेक रसों पर आधारित भावों का परिष्कार करता चलता है और सदा भरत के निकट विद्यमान रहता है, उसे पारिपाश्विक कहा जाता है। कुशीलव : कुशीलव वे लोग कहलाते हैं, जो अनेक प्रकार की भूमिकाओं में क्रिया, वाणी तथा आंगिक चेष्टाओं से नाट्य के पात्र की ठीक-ठीक प्रकृति का अभिनय करने में कुशल होते हैं। नटी : चारों प्रकार के वाद्यों का भेद जाननेवाली और वाद्यकला में निपुण, अभिनय करने में कुशल, सब भाषाओं की विदुषी, समस्त कार्यों में नट की आज्ञा माननेवाली नट की पत्नी को नटी कहते हैं। राजाओं की प्रकृति तीन प्रकार की समझी जाती है। एक में तो महिषी (पटरानी), महादेवी, देवी, सहभोगिनी, आश्रिता, नाटकीया, कामुका, शिल्पकारिका, अन्तःपुरिका, परिचारिका, शय्यापाली, छत्रपाली, चामरधारिणी, संवाहिका (पैर दबानेवाली), गन्ध- योक्त्री (सुगन्धित पदार्थ देनेवाली), माला और आभूषण सजानेवाली, अनुचारिका, अनेक विभागों की रक्षिका, उपवन की रक्षिका, मन्दिर, यज्ञ, कीड़ागार, रनिवास और भवन की रक्षा करनेवाली सेविकाएँ होती हैं। दूसरी में ताम्बूल-वाहिनी, चोबदारिन, असिधारिणी, आह्वायिका (लोगों को बुलाकर लानेवाली), प्रेक्षणिका (देख-भाल करनेवाली), यामिनिकी (रात की पहरेदारिन)-ये सब राजा की संचारिकाएँ और परिचारिकाएँ होती हैं। इनके अतिरिक्त तीसरी श्रेणी में महत्तरी, प्रतिहारी, वृद्धा, आयुक्तिका, कांचुकीया, वर्षवरा, किराता, कुब्जा, वामना, औपस्थापिकी, निर्मुण्डा, अभ्यागारा और मूकी हैं, जो अन्तःपुर में रहती हैं। शारदातनय ने सबके लक्षण विस्तार से दिये हैं। उनमें कुछ तो भरत द्वारा दिये गये विवरण के समान ही हैं, शेष के लक्षण निम्नलिखित प्रकार से हैं: कामुका : राजा के बैठने पर बैठनेवाली, चलने पर पीछे चलनेवाली, भोजन करने पर भोजन करनेवाली, सोने पर सोनेवाली, और देश तथा काल पर ध्यान देनेवाली को कामुका कहते हैं।
Page 273
२४८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
प्रतिहारी : जो पाँच वर्ष से बड़ी और दस वर्ष से कम अवस्थावाली कुमारियाँ राजकुमारियों की रक्षा के लिए नियुक्त की जाती हैं, वे प्रतिहारी कही जाती हैं। कुलजा : जो कुमारियाँ लगातार अन्तःपुर में रहनेवाली और अन्तःपुर के सुख-दुःख में समान रूप से भाग लेनेवाली होती हैं, कुमारियों को सब बातों बतानेवाली, कुमारियों के साथ रहनेवाली होती हैं, रति और सम्भोग के अनुभव से हीन होती हैं, एकान्त में रहनेवाली और अन्तःपुर में रहती हैं, वे कुलजा कहलाती हैं। पुरुष-पात्र : शारदातनय ने कई प्रकार के पुरुष-पात्रों का भी परिचय दिया है। इनमें से कुछ का परिचय भरत मुनि ने भी दिया है, जो पहले लिखा जा चुका है। शेष का परिचय यहाँ दिया जा रहा है। BB S कंचुकी : कंचुकी का परिचय पहले दिया जा चुका है। शारदातनय ने कुछ दूसरे ढंग से कंचुकी के विषय में लिखा है। जो ब्राह्मण कामना-हीन हो, ज्ञान और विज्ञान से सम्पन्न हो, कंचुक (अँगरखा), उष्णीष (पगड़ी) तथा बेंत धारण करता हो, वह कचुकी कहलाता है। कंचुकीय लोग अन्तःपुर में राजा के पास रहते हैं और किसी को भेजने-बुलाने के काम में तथा राजभवन के भीतरी कामों में लगाये जाते हैं। वर्षवर : अल्प शक्तिवाला, स्त्री-स्वभाववाला, नपुंसक, इच्छाहीन और जन्म तथा स्वभाव से वासनाहीन व्यक्ति वर्षवर कहा जाता है। यह गुप्त प्रेम करनेवाले राजाओं की प्रमलीला में सहायता करता है और रनिवास की स्त्रियों की नित्य कथा बताता है। किरात : जंगली फल-मूल खानेवाले, गाँव-पहाड़ों में रहनेवाले, विचित्र स्त्रियों- वाले, अच्छी तरह भाषा जाननेवाले और लम्बी ठुड्डीवाले किरात कहलाते हैं और इन्हें राजा लोग बलपूर्वक बार-बार नियुक्त करते हैं। रानियों के उपयोग में आनेवाले पात्, आभूषण तथा वस्त्रों की रखवाली और अन्तःपुर के लोगों को दण्ड देने के निमित्त किरात नियुक्त किये जाते थे। औपस्थापिक : बहरा, नपुंसक, बौना, बड़े-बड़े दाँतोंवाला, मोटा व्यक्ति, जो अन्तःपुर में काम करता हो, औपस्थापिक कहा जाता था। निर्मुण्ड : जिन्हें कामकीड़ा का ज्ञान न हो, लिंगहीन हों, उन्हें निर्मुण्ड कहा जाता था। राजा के पास रानियों को लाने का काम औपस्थापिक का था और उन्हें वापस पहुँचाने का काम निर्मुण्ड का। अभ्यागार: अभ्यागार वह व्यक्ति कहलाता है, जिसके पुरुष या स्त्री-चिह्न विलुप्त हों, छोटी-सी दाढ़ी और छोटे-छोटे स्तन हों। वे भीतरी भवन की देखभाल करते थे। इन्हें राजा लोग सदा काम में ला सकते थे। कि। मूक: मूकों का काम था अनेक प्रकार के कौतुक दिखाकर लोगों का मनोरंजन करना। स्त्रियों को हँसाने तथा उनका मनोरंजन करने के लिए काने और कुबड़े रखे जाते थे।
Page 274
नेता शीाड [ २४९
श सभासद : राजा, सेनापति, युवराज, पुरोहित, प्राश्निक, प्राड्विवाक, आयुक्त और सचिव-इतने सभासद होने चाहिए। शारदातनय ने सभासद होने के लिए कुछ विशेषताएँ आवश्यक मानी हैं। सभासद वे ही हो सकते हैं, जो अनेक कलाओं के ज्ञाता हों, अनेक भावों को जानते हों, शय्या, आसन, चित्र तथा अलंकार सजाने की कला से परिचित हों, परिहास के मर्मज्ञ हों, वाद्य बजाने में निपुण, गीत तथा वृत्त में कुशल, मनस्वी तथा मानी हों। सभासद के लिए यह भी आवश्यक माना गया कि वे रुपये-पैसे तथा स्त्रियों के विषय में सच्चे तथा पवित्र हों। यदा-कदा वैतालिक, मागध, सूत, वन्दी और नान्दी मंगल-पाठक भी सभासद होते थे। वैतालिक : समयानुकूल रागों में तथा उस समय के वर्णन को श्लोकों में उच्च स्वर में ठीक ताल में गानेवाला वैतालिक कहा जाता है। यह नेपथ्य में ही स्वयं भी गाता है और अन्य लोगों से भी गवाता है। वन्दी : जो तत्कालीन वन्दनीय स्वामी और राजा के वंश, पराक्रम, गुण आदि की स्तुतियों के साथ प्राचीन वन्दनीय राजाओं का गुणगान करता है, वह वन्दी कहा जाता है। नान्दी मंगल-पाठक : जो आशीर्वाद से युक्त तथा मांगलिक भावों को व्यक्त करनेवाले वाक्यों से सभी मंगलकारक देवों या वस्तुओं की प्रशंसा करता है, वह नान्दी मंगल-पाठक कहा जाता है। वह राजाओं को प्रसन्नतादायक और मंगलपूर्ण आनन्ददायक वाक्य भी पढ़ता है। सूत : राजाओं की सुखद निद्रा का ज्ञान रखनेवाले, सुप्रभात की प्रशंसा करनेवाले और स्नानादि दैनिक कृत्यों की सूचना देनेवाले लोग सूत कहे जाते हैं। मागध : सुन्दर मागधी गीतों में राजा तथा पुरजन का मंगल-गान करनेवाले मागध कहलाते हैं। पात्रों के नाम : नाट्यशास्त्र के कतिपय ग्रन्थों में पात्रों के नामादि के सम्बन्ध में संकेत किया गया है। आचार्यों ने कुछ अंशों में नियम बनाकर नामों में एकरूपता लाने की चेष्टा की है। धनंजय ने इस विषय में कुछ नहीं लिखा, परन्तु विश्वनाथ ने इस विषय का विवेचन किया है। भरत ने तो विवेचन किया ही है। नाटकों में वेश्याओं के नामों के अन्त में दत्ता, सिद्धा अथवा सेना रखना चाहिए, जैसे चारुदत्त तथा मृच्छकटिक प्रकरणों में गणिका वसन्तसेना। वैश्यों का नाम अधिकांशतः 'दत्त' शब्दान्त होना चाहिए, जैसे चारुदत्त, विष्णुदत्त। वसन्त आदि ऋतुओं में वर्णनीय वस्तुओं के नाम से चेट तथा चेटियों का नाम सम्बद्ध होना चाहिए, जैसे मालतीमाधव में चेट कलहंस तथा चेटी मन्दारिका के नाम। विदूषक का नाम वसन्त ऋतु अथवा फूलों के नाम पर रखना चाहिए, जैसे वसन्तक। किन्तु, अवमारक नाटक में विदूषक का नाम 'सन्तुष्ट' रखा गया है। कापालिक के नाम के अन्त में 'घण्ट' शब्द रखना चाहिए, जैसे मालतीमाधव में 'अघोरघण्ट'। परन्तु, हिन्दी आदि भाषाओं के नाटकों के लिए नामकरण का यह नियम सर्वथा व्यर्थ है। नाटक में
Page 275
२५० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
जिस बात का निर्देश प्रधानता से करना है, उसकी सूचना देनेवाला नाटक का नाम होना चाहिए, जैसे 'रामाभ्युदय'। इस नाटक में रामचन्द्रजी के अभ्युदय का प्रतिपादन किया गया है। नाटिका और सट्टक के नाम विशेषतः उनकी नायिकाओं के नाम पर रखने चाहिए, जैसे 'रल्नावली' नाटिका या 'कर्पूरमंजरी' सट्टक। पात्रों के सम्बोधन : नाटक के भिन्न-भिन्न पात्र आपस में एक-दूसरे को किस प्रकार सम्बोधित करें, इस शिष्टता का भी विवेचन नाट्यशास्त्र के ग्रन्थों में किया गया है। राजा को ऋषि-मुनि राजन् कहकर या अपत्यवाचक प्रत्यय लगाकर कैसे 'पौरव', 'दाशरथे' आदि कहकर पुकारते हैं; ब्राह्मण और सारथी उसे 'आयुष्मन्' कहते हैं; सामन्तादि 'देव' या 'स्वामिन्' कहते हैं तथा निम्नकोटि के पात्र उसे 'भट्ट' कहकर सम्बोधित करते हैं। युवराज को राजा के ही समान 'स्वामिन्' कहा जाता है और अन्य राजकुमारों को 'भद्रमुख' अथवा 'सौम्य'। देवता तथा ऋषि-मुनि 'भगवन्' नाम से सम्बोधित होते हैं और ब्राह्मण तथा अग्रज 'आर्य' नाम से पुकारे जाते हैं। विदूषक राजा या नायक को 'वयस्य' कहता है और नायक भी विदूषक को 'वयस्य' ही कहता है। पत्नी पति को 'आर्यपुत्र' कहकर सम्बोधित करती है। छोटे लोग अपने बड़ों को 'तात' कहते हैं और बड़े भी छोटों को 'तात' या 'वत्स' कहते हैं। राजकुमारियाँ 'भत्तृ दारिका' कही जाती हैं। विदूषक महादेवी तथा उसकी सखियों को 'भवती' कहता है। सेविकाएँ तथा चेटियाँ महादेवी और रानियों को 'भट्टिनी' या 'स्वामिनी' कहकर सम्बोधित करती हैं। पति पत्नी को 'आर्या' कहकर पुकारता है। मध्यम वर्ग के पुरुष आपस में 'हंहो' कहकर सम्बोधित करते हैं और निम्न वर्ग के लोग 'हंडे' कहकर। ब्राह्मण लोग परस्पर अपत्य प्रत्ययान्त शब्द से नाम लेकर पुकारते हैं, जैसे 'कौशिक', 'विश्वामित्र'। मन्त्री को ब्राह्मण लोग 'अमात्य' या 'सचिव' कहकर और अधम श्रेणी के लोग उसे 'आर्य' कहकर पुकारते हैं। शिष्य गुरु को, पुत्र पिता को, या अनुज अग्रज को 'सुगृहीत नामधेय' या 'सुगृहीतनामा' शब्द से सम्बोधित करता है। शिष्य गुरु को 'भगवन्' शब्द से भी पुकारता है। बौद्ध भिक्षु को 'भदन्त' और शक को 'भद्रमुख' कहा जाता है। गणिका को 'अंजुका', कुट्टनी या वृद्धा को 'अम्बा' कहा जाता है। इसी प्रकार माननीय वृद्धा स्त्रियों को भी 'अम्बा' कहकर पुकारते हैं। सखियाँ आपस में 'हला' शब्द से एक-दूसरी को सम्बोधित करती हैं और दासियों को 'हंजा' कहकर पुकारा जाता है। उत्तम श्रेणी के लोग तपोनिष्ठ तथा शान्तिनिष्ठ पुरुषों को 'साधो' कहकर सम्बोधित करते हैं। ज्येष्ठ, मध्यम तथा अधम पुरुष स्त्रियों को उसी प्रकार सम्बोधित करते हैं, जिस प्रकार उनके पतियों को करते हैं, जैसे ऋषियों को भगवन् कहते हैं, तो उनकी स्त्रियों को भगवती कहते हैं। पाषण्डी लोगों को उनके आचार के अनुसार सम्बोधित किया जाता है, जैसे 'कापालिक', 'अपणक' आदि। (पा धातु का अर्थ है पालन करना-वेदों की रक्षा करना; उसका जो खण्डन करे,
Page 276
अकरी जीड हन्: नेताF सी।p [ २५१
उसे पापण्ड या पापण्डी कहते हैं। अतः बौद्ध, जैन, कापालिक आदि वेद-विरोधी मतों को पाषण्ड कहते हैं और उनके अनुयायियों को पाषण्डी।) सूत्रधार और नटी परस्पर 'आर्य' तथा 'आर्या' शब्द का व्यवहार करते हैं। पारिपा्श्विक सूत्धार को 'भान' कह- कर और सूत्रधार उसे 'भारिष' कहकर पुकारते हैं। इस प्रकार नाट्याचार्यों ने नाटक के पात्रों के पारस्परिक सम्बोधन का विस्तृत विवेचन किया है। परन्तु, आजकल हिन्दी तथा अन्य आधुनिक भाषाओं के नाटकों में ऐसा कोई नियम नहीं है। ये सब नियम बहुत पहले ही समाप्त हो गये। आज के नाटकों में पात्र परस्पर में स्वाभाविक रीति से सम्बोधन करते हैं। नाटक में पात्ों की संख्या : किसी प्राचीन नाट्याचार्य ने यह निर्देश नहीं दिया है कि नाटक में पात्रों की संख्या कितनी होनी चाहिए। वस्तुतः, अभिज्ञानशाकुन्तल, मृच्छकटिक आदि नाटकों में पात्ों की संख्या बहुत अधिक है। कुछ नाटकों में थोड़े पात् भी रखे गये हैं। नाटक में थोड़े ही पात्रों की योजना करनी चाहिए। उनके कुल, वर्ग, देश, वृत्ति, मानसिक स्थिति, स्वास्थ्य, परिस्थिति, संगति, संस्कार आदि को ध्यान में रखकर उनकी सृष्टि करनी चाहिए। इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इन परिस्थितियों में पले हुए पात्र नाटकीय परिस्थितियों में पड़कर, अपने वातावरण से प्रभावित होकर स्वाभाविक रूप में कार्य करते हुए, नाटकीय व्यापार में उचित भाग लें और इस प्रकार नाटककार के उद्दिष्ट फलागम को सफल बनावें। यदि इस दृष्टिकोण से पात्रों की योजना की जाय, तो वे पात्र अधिक सरस और स्वाभाविक लगेंगे।
संस्कृत-नाटकों में चरित्र-चित्रण संस्कृत-नाटकों की यह विशेषता रही है कि वे रस तथा कविता के वातावरण से सर्वथा पुष्ट रहते हैं, जिससे नाटककार वस्तु के विन्यास और चरित्र के विकास की ओर अधिक ध्यान न देकर आदर्शवादी वातावरण प्रस्तुत करने की ओर ध्यान देता है। ललित कला-विशेषतः चित्रकला-का उद्देश्य चित्रित वस्तुओं की आकृति को यथार्थ रूप से अंकित करना नहीं रहता, अपितु दर्शकों के चित्त पर उदात्त चरित्र की सुन्दर छाप छोड़ना ही उसका अभीष्ट रहता है। यही बात बहुलांश में नाटक के साथ भी है। फलस्वरूप संस्कृत- नाटकों के भावाभिव्यंजक गीत्यात्मक पद्य ही उनके सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण अंश होते हैं। इन गीतों के ही सहारे नाटककार पात्ों की मानसिक वृत्तियों का पूर्ण चित्र उपस्थित करता है। भारतीय नाटकों में पाश्चात्त्य नाटकों के समान संवाद को सजाने का प्रयत्न नहीं किया जाता। इसका परिणाम यह होता है कि संस्कृत-नाटकों में चित्रित पात्र परम्परा- युक्त होते हैं और स्वभावतः अपने समाज के आदर्श प्रतिनिधि का काम करते हैं। संस्कृत का नाटककार यह प्रयत्न नहीं करता कि अपने पात्रों में वैयक्तिक विशिष्टता दिखाकर उन्हें
Page 277
२५२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास आधुनिक श्रेणी के पात्रों की कोटि में ला दे। परन्तु, इसका अर्थ यह नहीं होता कि संस्कृत-नाटकों में चरित्र वास्तविकता तथा यथार्थता से बहुत दूर केवल कल्पना से उत्पन्न होता है। परम्पराबद्ध होने के कारण उन पात्रों के चरित्र के विकास में कोई दोष नहीं आने पाता। नाटककार अपने पात्रों को संसार का सजीव प्राणी एवं विशिष्ट व्यक्ति बनावे से कभी विमुख नहीं होता। संस्कृत-नाटकों के कतिपय विशिष्ट चरित्रों पर दृष्टिपात करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है। मृच्छकंटिक का चारुदत्त परम्परायुक्त होने पर भी दीन-दुखियों का सहायक तथा रक्षक है। उसमें कुछ ऐसे उदात्त गुण दृष्टिगत होते हैं, जिससे वह कल्पना- जगत् का कोई वायव्य प्राणी नहीं होकर इस धरातल पर चलने-फिरनेवाला जीवन्ता प्राणी है। अभिज्ञानशाकुन्तल का नायक दुष्यन्त भारत का सम्राट् है, फिर भी कालिदास ने उसके जीवन में उत्थान-पतन की मार्मिक अभिव्यंजना की है, जिससे उसका चरित्र अविस्मरणीय बन जाता है; वह ठोस पृथ्वी पर चलनेवाला वास्तविक व्यक्ति बना रहता है। वस्तुस्थिति यह है कि संस्कृत-नाटकों में चित्रित पात्रों में उच्च व्यक्तित्व एवं जीवनी शक्ति का अपूर्व समावेश किया गया है और उनके अनुरूप व्यक्ति हमें संसार में आये दिन मिलते रहते हैं। संस्कृत-नाटकों के कुछ पात्र तो ऐसे हैं, जो अपनी मानवता की अभिव्यक्ति के कारण केवल भारतवर्ष में ही नहीं, विश्व के सभी कोनों में पाये जा सकते हैं, जिन्हें सर्वदेशीय या सार्वभौम कह सकते हैं। मृच्छकटिक प्रकरण में ऐसे कई पात्र हैं, जैसे सभिक, शकार तथा शर्विलक। चरित्र-चित्रण : चरित्र-चित्रण किसी भी नाटक की महत्ता का सर्वश्रेष्ठ तत्त्व है। संसार के श्रेष्ठ नाटककार अपने पात्रों के चरित्र-चित्रण के ही कारण विशिष्ट स्थान प्राप्त कर सके हैं। पात्रों के चरित्र-चित्रण की दृष्टि से उपन्यास और नाटक में बहुत अन्तर है। कुछ लोगों की यह भ्रान्त धारणा है कि नाटक में तो नाट्य या अभिनय की ही प्रधानता है, इसलिए उसमें चरित्र-चित्रण को विशेष महत्त्व देने की आवश्यकता नहीं है। किन्तु, वस्तु- स्थिति यह है कि नाटकों में उपन्यास के ही समान चरित्र-चित्रण का महत्त्व है। यदि किसी नाटक में केवल घटनाएँ ही सजा दी जायँ और चरित्र-चित्रण पर ध्यान नहीं दिया जाय, तो उस नाटक का कोई विशेष महत्त्व नहीं हो सकता। वस्तुतः, नाटक में चरित्र-चित्रण का अपना विशिष्ट स्थान है। चरित्र-चित्रण को ही लेकर शेक्सपियर, द्विजेन्द्रलाल राय प्रभूति नाटककारों का इतना उच्च तथा सम्मानित स्थान है। नाटक के दर्शकों पर चरित्र- चित्रण का अत्यन्त अधिक प्रभाव पड़ता है। साहित्यिक दृष्टि से भले ही ऐसे नाटक का आदर हो जाय, जिसमें वस्तु-विन्यास सुगठित हो और चरित्र-चित्रण की अवहेलना की गई हो, परन्तु रंगशाला में तो वही नाटक लोकप्रियता तथा आदर पा सकता है, जिसमें सुन्दर रीति से चरित्र-चित्रण किया गया हो।
Page 278
नेता [२५३ नाटक में चरित्र-चित्रण विस्तृत नहीं हो सकता, कथानक या वस्तु के सदृश इसे भी संक्षिप्त ही होना चाहिए। नाटककार को बहुत ही परिमित सीमा में कार्य करना पड़ता है; क्योंकि उसे थोड़े ही दृश्यों में चरित्र-चित्रण भी कर देना होता है और कथावस्तु को भी पूरा करना होता है। कथावस्तु के विकास में तो कथोपकथन का उपयोग किया ही जाता है, चरित्र-चित्रण में भी इसका बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। कथोपकथन का एक-एक शब्द विशेष महत्त्व का होता है। नाटक के प्रत्येक पात् का स्वरूप इस प्रकार का प्रस्तुत किया जाता है कि सम्पूर्ण कथावस्तु के परिवेश में वह सर्वथा उपयुक्त प्रतीत हो। नाटककार नायक तथा अन्य प्रधान पात्रों के चरित्र की उन्हीं विशिष्ट प्रवृत्तियों का उद्घाटन करता है, जो सम्पूर्ण नाटक को प्रभावित करती हैं। चरित्र-चित्रण में नाटककार को उपन्यासकार की अपेक्षा अधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उपन्यासकार तो स्थान-स्थान पर किसी चरित्र के विषय में अपनी ओर से कुछ टिप्पणी कर सकता है, परन्तु नाटककार अपनी ओर से कुछ भी नहीं कह सकता। नाटककार की यह कठिनाई उस स्थल पर और भी बढ़ जाती है, जब उसे अपने किसी पात्र-विशेष के किसी सूक्ष्म भाव का प्रदर्शन करना होता है। जिन स्थलों पर उपन्यासकार किसी पात्र के चरित्र के विषय में अपनी ओर से बहुत-कुछ कह देता है, उन स्थलों पर नाटककार अपनी कथावस्तु और कथोपकथन के द्वारा ही यह काम बहुलांश में कर लेता है और अपने पात्रों का रंग-ढंग दिखला देता है। उपन्यासकार को आवश्यकतानुसार टिप्पणी देकर स्पष्टीकरण की स्वतन्त्रता रहती है। वह विश्लेषात्मक या साक्षात् तथा अभिनयात्मक या परोक्ष-इन दोनों उपायों का अवलम्बन कर सकता है। परन्तु, नाटककार पहली प्रणाली-विश्लेषात्मक प्रणाली-का सहारा बिलकुल नहीं ले सकता, उसके लिए तो चरित्र-चित्रण का सहारा एकमात्र अभिनयात्मक या परोक्ष प्रणाली है। यही कारण है कि नाटक के चरित्र-चित्रण में उपन्यास के चरित्र-चित्रण की अपेक्षा अधिक योग्यता तथा निपुणता अपेक्षित है। चरित्र-चित्रण का मुख्य तत्त्व है कार्य। हम नाटक के पात्रों को उनके कार्यों के ही द्वारा जानते हैं। नाटक में अनेक अवसरों पर कथावस्तु के ही द्वारा पात्रों के नैतिक तथा मानसिक गुणों का परिचय पाठक तथा दर्शक को मिलता है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि कथावस्तु या उसकी घटनाएँ चरित्र के विकास का एक अन्य रूप ही है। अतः, चरित्र-चित्रण तथा घटना-क्रम का विन्यास कुछ इस प्रकार का होना चाहिए, जिससे दर्शकों को स्वयमेव सभी बातों का ज्ञान प्राप्त हो जाय और उन्हें कथोपकथन तथा अभिनय आदि का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं जान पड़े। दूसरे शब्दों में कहा जाय कि वस्तु और चरित्र-चित्रण ऐसा होना चाहिए कि यदि दर्शक पात्रों के कथोपकथन आदि पर पूर्ण ध्यान नहीं भी दे, तो भी उसे नाटक की सभी बातों का पता लग जाय और वह जान जाय कि किस पात्र की क्या- क्या विशेषताएँ हैं।
Page 279
२५४j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
चरित्रारोपण के विषय में कुछ पाश्चात्य सिद्धान्त : कतिपय पाश्चात्य नाट्याचार्यों ने नाटक में पातों का चरितारोपण करने के विषय में कुछ सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। इस विषय में कई बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। चरित्रारोपण के सम्बन्ध में निम्नलिखित चार मत हैं : १. दुष्ट को भयानक रूप में और सज्जन को देवता के रूप में चित्रित करना चाहिए। २. रंगशाला फोटो-कैमरे का लेन्स है। जो पदार्थ सामने पड़ें, उन सबको ग्रहण करके दिखाता है। ३. नाटककार को सुन्दर का चित्रण करना चाहिए; इससे असुन्दर अनायास ही स्वयं नष्ट हो जायगा। ४. नाटककार को दोषों का प्रदर्शन करना चाहिए। इसका सत्परिणाम यह होगा कि इन दोषों को देखकर मनुष्य स्वयमेव अपना सुधार कर लेगा। इनमें से पहले और तीसरे सिद्धान्तों को सुविधापूर्वक स्वीकार किया जा सकता है। दुष्ट के भयानक रूप में और सज्जन के देवता-रूप में चित्रण से किसी का मतवैभिन्न्य नहीं हो सकता, किसी को आपत्ति करने का अवकाश नहीं है। यदि दुष्ट में श्रेष्ठता का आरोप और सज्जन में दुष्टता का आरोप किया जाय तो यह नीति और समाज दोनों के विरुद्ध होगा। तीसरे सिद्धान्त के विषय में यही कहा जा सकता है। यदि नाटककार सुन्दर का अत्यन्त सुन्दर और प्रभावशाली ढंग से चित्रण करता है, तो इसका एक बहुत अच्छा परिणाम यह होगा कि उसके प्रभाव से असुन्दर का अपने-आप तिरोभाव हो जायगा। यह सामान्य ज्ञान है कि सुन्दर और उदात्त की ओर मानव का स्वाभाविक खिंचाव तथा झुकाव होता है और इससे ऊपर उठने की प्रेरणा होती है। दूसरा और चौथा सिद्धान्त यथार्थवाद से सम्बद्ध रखनेवाले हैं। पाश्चात्य नाट्याचार्यों ने पात्र चुनने और उनका चित्रण करने के विषय में तीन अन्य सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया है। ये तीनों सिद्धान्त-'है', 'होना चाहिए' और 'हो सकता है' के नाम से पुकारे जाते हैं। 'है' यथार्थवाद है; इसमें नाटककार उस सारे विषय का चित्रण करता है, जो उस समय में वर्त्तमान है। 'होना चाहिए' आदर्शवाद है; क्योंकि नाटककार का ध्यान उन विषयों का चित्रण करने की ओर रहता है, जो समाज में होने चाहिए। 'हो सकता है' देववाद कहलाता है; क्योंकि इसमें उस विषय का चित्रण रहता है, जो प्रायः होता नहीं है, परन्तु हो सकता है; उसके होने की सम्भावना (Probability) है। उदाहरण के लिए सुहराब और रुस्तम के यद्ध को लिया जाय। सुहराब रुस्तम से बार-बार पूछता है कि क्या तुम्हीं रुस्तम हो, परन्तु रुस्तम कोई उत्तर नहीं देता है। अन्त में, रुस्तम अपने ही पुत्र सुहराब की हत्या कर देता है। यही नाटकीय मोड़ है, जो हो सकता है, परन्तु प्रायः होता नहीं। यूरोपीय नाट्याचार्यों ने इसे ही सर्वोत्तम माना है। 1
Page 280
हिकली नीनकर नेता-पा पहए
परन्तु नाटककारों को वादों के झमेले में नहीं पड़कर इस प्रकार पात्ों में चरित्रारोपण करना चाहिए कि उनसे दर्शकों का मनोरंजन हो और उन्हें शान्ति मिले। पहले यह लिखा जा चुका है कि नाटक में कम ही पात्रों की योजना हो और उनके चरित्रों का विकास बहुलांश में उनके कार्यों के ही द्वारा प्रकट किया जाय। कुछ अंश में पात्रों के संवाद द्वारा तथा कुछ विभिन्न पात्रों के सम्बन्ध से भी उनका चरित्र प्रकट किया जा सकता है। यदि इस प्रकार पात्ों की योजना की जाय तो नाटक में रस का संचार हो सकता है। स्त्री-पुरुष पात्रों की भूमिका में विपर्यय यह तो स्वाभाविक ही है कि पुरुष-पात्र पुरुष की भूमिका निभाये और स्त्री-पात्र स्त्री की भूमिका अदा करे, परन्तु पुरुष-पात्र स्त्री की और स्त्री-पात्र पुरुष की भूमिका करे; यह विचित्र प्रयोग है, जो नाटकों में प्रायः होता रहा है। भरत मुनि ने बहुत संक्षेप में इस विषय की ओर संकेत किया है, फिर भी उसमें नाट्यशास्त्र का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण विचार- दर्शन निहित है। इस भूमिका-विपर्यय में दो बातें होती हैं-१. पर-प्रभाव-ग्रहण और २. आत्म-स्वभाव का परित्याग। पुरुष स्त्री की भूमिका में अपने स्वभाव का त्याग कर स्त्री का स्वभाव ग्रहण करता है, उसी प्रकार स्त्री पुरुष की भूमिका में अपने स्वभाव का परित्याग करके पुरुष का स्वभाव ग्रहण करती है। इस प्रकार, दोनों को अपनी भूमिका में सफलता प्राप्त होती है। पुरुष अपनी स्वाभाविक परुषता का त्याग करके स्त्री के स्वाभाविक सुकुमार भाव से सम्पन्न होता है और स्त्री भी अपनी जातिगंत सुकुमारता का परित्याग करके पुरुष के पुरुष-भावों से युक्त होकर अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वाह करती है। भरत ने इस विषय में लिखा है : स्त्री पुंसः प्रकृति कुर्यात् स्त्रीभावं पुरुषोऽपि च। धैर्यों दार्येण सत्त्वेन बुद्धया तद्वच्च कर्मणा॥ स्त्रीपुमांस त्वभिनयेद्व षवाक्यविचेष्टितः। स्त्रीवेषभाषितर्युक्त: प्रेक्षिताप्रेक्षितैस्तथा ॥' विपर्यय के दो प्रकार : यह भूमिका-विपर्यय दो प्रकार से सम्भव है : १. विपर्यय का एक रूप वह होता है जब नाटक में आया पुरुष-पात्र घटनाक्रम के कारण स्त्री की भूमिका ग्रहण करता है। देवीचन्द्रगुप्त तथा ध्रुवस्वामिनी नाटकों में चन्द्रगुप्त ध्रुवस्वामिनी की भूमिका में आया है। भरत ने इस विपर्यय के तीन कारणों का उल्लेख किया है : व्याजेन क्रीडया वापि तथा भूयश्च वञ्चनात्।२ व्याज (कार्य-साधन), कीड़ा (अनुरंजन) और वंचना-ये ही तीन कारण हैं, जिन्हें लेकर यह विपर्यय होता है। कथावस्तु के आग्रह से या कार्य साधन के लिए विदूषक चेटी के वेश में 3१. नाट्यशास्त्र, अध्याय १२, का० १९७-१९८ २. वही क क आगुर ज क
Page 281
२५६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास संकेत-स्थान पर जाता है। क्रीडावश या अनुरंजन के लिए नायिका अपने प्रियतम का वेश धारण करती है और विदूषक की वंचना के लिए चेट स्त्री-वेश धारण कर उपस्थित होता है। संस्कृत और हिन्दी के अनेक नाटकों में ऐसे विपर्यय-प्रयोग के अनेक अवसर देखे जाते हैं। अँगरेजी-नाटककार शेक्सपियर के कई नाटकों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ लड़कियाँ प्रयोजन-विशेष से पुरुषों के वेश में रहती हैं। २. विपर्यय का दूसरा रूप वह होता है जब नाटक का अभिनय करते समय स्त्री- पुरुष अभिनेताओं में ही विपर्यय हो जाय। यह भी दो प्रकार से सम्भव है। जा (क) पुरुष-अभिनेता स्त्री की भूमिका ग्रहण करे, जैसे आजकल के सामान्य नाटकों में देखा जाता है। स्कूल-कॉलेज या छोटे नगरों में जब नाटक खेला जाता है तो स्त्री- अभिनेत्रियों के अभाव में पुरुष ही स्त्री की भूमिका निभाते हैं। मालतीमाधव प्रकरण में सूत्रधार और पारिपार्श्वक कामन्दकी और अवलोकिता की भूमिका में आते हैं। (ख) स्त्री-अभिनेत्री पुरुष की भूमिका का निर्वाह करती है। बालिका-विद्यालयों या महिला-महाविद्यालयों में जब नाटक खेला जाता है तो लड़कियाँ ही पुरुषों की भूमिका में उतरती हैं। यदि एक लड़की शकुन्तला की भूमिका करती है, तो दूसरी लड़की पुरुष- वेश में दुष्यन्त की भूमिका करती है। भूमिका-विपर्यय का प्रयोग स्वयं अपने में ही नाट्य-प्रयोग की दृष्टि से चमत्कारपूर्ण है; परन्तु इससे भी अधिक इसका महत्त्व भारत के नाट्य-प्रयोग के उत्कर्ष की दृष्टि से है। भरत के ही युग में भारतीय नाट्य-प्रयोग का इतना विकास हो गया था कि नाट्य-प्रयोग में मनोविनोद तथा चमत्कार के लिए भूमिका-विपर्यय का प्रयोग किया जाता था। काफी प्राचीन साहित्य में भी इसका प्रयोग मिलता है। पातञ्जल महाभाष्य में इस बात का उल्लेख पाया जाता है कि स्त्नी की भूमिका में अभिनय करनेवाला पुरुष भ्रूकुंस के नाम से प्रसिद्ध था। इससे सिद्ध होता है कि भूमिका-विपर्यय की यह प्रथा बहुत प्राचीन है। निष्कर्ष : भरत द्वारा प्रतिपादित तथा धनंजय, विश्वनाथ आदि द्वारा समर्थित नायक-नायिका के विवेचन पर सामन्त-युग की स्पष्ट छाप है। उस युग में नाटक राजाओं तथा सामन्तों के लिए लिखे जाते थे और उन्हीं की रंगशालाओं में अभिनीत भी होते थे। दर्शक भी राजे, सामन्त, मन्त्री, सेनापति आदि होते थे। स्पष्टतः नाटककार अपने नाटक के रूप में ऐसे ही सामन्तों को रखता था और वैसे ही सभासदों, विदूषक, चेट आदि की अवतारणा करता था। फलस्वरूप, नाटकों में सामन्ती वातावरण का पूर्ण प्रतिबिम्ब आ जाता था, परन्तु सामान्य जीवन का प्रतिबिम्ब इसमें शायद ही कभी आया हो। सामन्त-युग का सबसे अधिक प्रभाव नायक-नायिक-भेद पर पड़ा। भरत ने नायक- नायिका-भेद का जितना विवेचन किया, उससे बहुत बढ़कर धनंजय, शारदातनय, विश्वनाथ, भानुदत्त आदि ने किया। संस्कृत-साहित्य के प्रायः सभी परवर्त्ती नाटक शृंगार रस के हैं और इन आचार्यों ने नायक तथा नायिका के अनेक भेद शृंगार रस के ही आधार
Page 282
नेता [२५७
पर किये। प्रत्येक परवर्त्ती आचार्य अपने पूर्ववर्ती आचार्य से नायिका के कुछ भेद बढ़ा देने में होड़ करने लगा। वय के अनुसार, नायक के व्यवहार के अनुसार, नायक से सम्बन्ध के अनुसार आदि कई दृष्टियों से नायिका के असंख्य नवीन भेदों की उद्भावना हुई। हिन्दी के रीतिकालीन कवि केशव, देव, पझ्माकर आदि भी एक-दूसरे से बढ़ जाने में होड़ करने लगे। नाट्यकार तथा नाट्यशास्त्री अपने नायकों को अधिक-से-अधिक गुण देने में प्रयत्नशील रहे। धनंजय, विश्वनाथ आदि ने नायक के गुणों की जो सूची दी है, उसमें शायद ही कोई गुण छूटा हो। उनके विचार से सामान्य श्रेणी का कोई भी व्यक्ति नाटक का नायक नहीं हो सकता था। प्रहसन आदि रूपकों में साधारण श्रेणी के व्यक्ति नायक होते थे, परन्तु नाटक के नायक के लिए सर्वगुणसम्पन्न व्यक्ति की आवश्यकता समझी गई। इन आचार्यों ने नायक-नायिका के वर्णन में बहुत अधिक पिष्टपेषण किया है। किसी नवीन विषय के अभाव में पिष्टपेषण अनिवार्य ही हो जाता है। भरत ने जो बात कह दी, उसी को कुछ बढ़ा-चढ़ाकर, प्रायः उन्हीं शब्दों में और कहीं-कहीं कुछ परिवर्त्तन करके धनंजय ने कहा और धनंजय के द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों का पिष्टपेषण शारदातनय, विश्वनाथ आदि ने किया। ये परवर्त्ती आचार्य कोई नवीन वस्तु या नवीन दृष्टि देने में असमर्थ ही रहे। किन्तु, बीसवीं शती के हिन्दी-नाटकों में नायक-नायिका की कल्पना में आमूल परिवर्त्तन हो गया है। कुछ दिन पहले ही सामन्त-युग समाप्त हो गया। अब नाटक सामन्तों के लिए नहीं लिखे जाते और न उन्हीं की रगशालाओं में अभिनीत ही होते हैं। आजकल नायक-नायिका के वे सब भेद व्यर्थ हो गये हैं। नायिका के खण्डिता, कलहान्तरिता आदि भेद स्वयमेव समाप्त हो गये हैं और उनकी समस्या अनायास ही सुलझ गई है। आधुनिक युग में खण्डिता नायिका नहीं मिल सकती; क्योंकि ऐसा कोई नायक नहीं मिलता, जो रात को देर से घर लौटा हो और उसके होठों पर अन्य नायिका की आँखों का काजल लगा हो और उसके गले पर हार की साट पड़ी दिखाई देती हो। इसी प्रकार, बिजली के इस युग में कृष्णाभिसारिका नायिकाएँ भी व्यर्थ हो गई हैं। बड़े परिजनवाले वे राजे भी नहीं रहे, जिनके कई रानियाँ और विदूषक, चेट आदि हों। आज के युग में नायक उच्चकुल-सम्भूत तथा सर्वगुणसम्पन्न कोई सामन्त नहीं होता। वह किसान, मजदूर की तरह सामान्य व्यक्ति भी होता है और उसमें गुण तथा अवगुण का समन्वय होता है। आज का नायक चोर और शराबी भी हो सकता है। अतः, स्पष्ट है कि आधुनिक युग के नाटकों में नायक-नायिका की कल्पना में मौलिक परिवर्त्तन हो गया है।
Page 283
सप्तम अध्याय रस परिभाषा भारतीय नाट्यशास्त्र में रस-विवेचन का बहुत ही महत्त्व है। दृश्यकाव्य में रस की स्थिति भरतमुनि से भी पहले मानी जा चुकी थी। दृश्यकाव्य के भेदकों में वस्तु तथा नेता के साथ रस को भी माना गया है। सामाजिकों या दर्शकों में रसोद्रेक करना दृश्य- काव्य का प्रधान उद्देश्य है। नटों तथा अभिनेताओं का यही प्रयत्न रहता है कि वे अपने अभिनय द्वारा दर्शकों में रस का उद्बोध या उद्रेक कर दें। रस क्या है ? रस शब्द की व्युत्पत्ति है 'रस्यते इति रसः'। इससे स्पष्ट हो जाता है कि रस आस्वादन की वस्तु है। रस का पारिभाषिक रूप सर्वप्रथम भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में देखने को मिलता है। उन्होंने रस की परिभाषा का प्रश्न उठाया है और स्वयं उत्तर दिया है : 'अव्ाह-रस इति कः पदार्थः । उच्यते-आस्वाद्यत्वात्।" भरतमुनि ने बताया है कि आस्वादनीय होने से रस कहा जाता है। स्वभावतः, फिर प्रश्न उठता है कि किसका आस्वादन होता है ? भरतमुनि ने उसी स्थान पर इस प्रश्न का भी उत्तर दिया है : यथा हि नानाव्यञ्जनसंस्कृतमन्नं भुञ्जाना रसानास्वादयन्ति सुमनसः पुरुषा: हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति तथा नानाभिनयव्यञ्जितान् वागङ्गसत्त्वोपेतान् स्थायिभावाना- स्वादयन्ति सुमनसः प्रेक्षका: हर्षादीश्चाधिगच्छन्ति।२ अर्थात्, जैसे नाना प्रकार के व्यंजनों से संस्कृत अन्न को खाकर रसास्वादन करते हुए सुमना पुरुष हर्ष प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार अनेक तरह के भावों और अभिनयों द्वारा व्यक्त किये गये वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनयों से युक्त स्थायी भाव का सहृदय दर्शक आस्वाद करते हैं और आनन्द प्राप्त करते हैं। अभी जो भरतमुनि का उद्धरण दिया गया, उसमें एक बात पर ध्यान देना आवश्यक है। सामाजिक या दर्शक की दृष्टि से व्यंजनों या भावों का भोग रस नहीं है, अपितु भोग से उत्पन्न होनेवाला आनन्द ही रस है। भक्तविद् व्यक्ति के विषय में भोजन की क्रिया से पृथक् भोजनोपरान्त का आनन्द है, उसी प्रकार नाटक के दर्शक के विषय में नाटक-दर्शन की क्रिया से उसके भावों के आस्वादन-विषयक कार्य से रसानुभूति भिन्न है। १. नाट्यशात्, षष्ठ अध्याय, पृ० ३१५ (श्रीरघुवंश का अनुवाद) २. वही
Page 284
रेस [२५९
दूसरे शब्दों में, सामाजिक की भावानुभूति के आस्वादन से उत्पन्न आनन्द ही रस कहा जा सकता है। रस केवल मनोवेग नहीं है और न केवल उसका आस्वादन ही है, अपितु उसके आस्वादन से उत्पन्न आनन्द रस है। फिर, प्रश्न उठता है कि इस आनन्द का भोक्ता कौन है ? भरत ने उसी स्थल पर इसका उत्तर दे दिया है : आस्वादयन्ति सुमनसः प्रेक्षकाः। अर्थात्, सुमना-सहृदय दर्शक या सामाजिक ही भावों का आस्वादन करते हैं। भरत ने रस की यह परिभाषा दृश्यकाव्य को ध्यान में रखकर दी है। रस दृश्य- काव्य तथा श्रव्यकाव्य दोनों में होता है। दोनों को ध्यान में रखकर रस की सीधी परिभाषा यह दी जा सकती है-काव्य के पठन, श्रवण अथवा दर्शन से जिस आनन्द की प्राप्ति होती है, उसी आनन्द को रस कहते हैं। स्थायी भाव प्रसुप्तावस्था में रहते हैं। आस्वादनार्थ उनको जगाना होता है। उन्हें जगानेवाले विभावादि हैं, उनके जगने का प्रमाण अनुभावादि की उत्पत्ति है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि सहृदय के हृदय में स्थित स्थायी भाव ही उचित वातावरण पाकर रस- रूप में परिणत हो जाते हैं। भरतमुनि की दृष्टि में रसिक के हृदय में संवाद से सम्बद्ध अर्थों का मूल भाव ही रस है। रस उत्पन्न करने के लिए उचित वातावरण की उत्पत्ति विभाव, अनुभाव और संचारी भाव के संयोग से होती है। भरत ने अपने प्रसिद्ध रससूत्र में यही तथ्य रखा है : तत्र विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगात् रसनिष्पत्तिः ।' अर्थात् विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव के संयोग से स्थायी भाव रस को प्राप्त होते हैं। भरत ने एक उदाहरण देकर इसे समझाया है। यथाहि-गुडादिभिद्र व्यर्व्यञ्जनरोषधिभिश्च षाडवादयो रसा निर्वरत्त्यन्ते तथा नानाभावोपगता अपि स्थायिनो भावा रसत्वमाप्नुवन्तीति।२ अर्थात्, जैसे गुड़ आदि द्रव्यों और व्यंजनों एवं ओषधि आदि से षाडव-प्रपानक-आदि रस उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार अनेक, भावों के उपगत होने से स्थायी भाव रसत्व प्राप्त करते हैं। अपने मत के समर्थन में भरतमुनि ने प्राचीन आचार्यों की सम्मति का उद्धरण दिया है : अत्नानुवंश्यौ श्लोकौ भवतः- यथा बहुद्रव्ययुलव्यञ्जनैर्बहुभियु तम्। आस्वादयन्ति भुञ्जाना भक्तं भक्तविदो जना: ॥। भावाभिनयसम्बद्धान्स्थायिभावांस्तथा बुधाः । आस्वादयन्ति मनसा तस्मान्नाट्यरसा: स्मृताः॥3
FT १. नाट्यशास्त्र, षष्ठ अध्याय, पृ० २७४ (श्रीरघुवंश द्वारा अनुवाद) २. वही, पृ० ३१५ (श्रीरघुवंश द्वारा अनुवाद) ३. वही, का० ३२-३३
Page 285
२६० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
ये दोनों श्लोंक भरत के वंशानुक्म से चले आनेवाले हैं। इनमें बताया गया है कि जिस प्रकार विशेषज्ञ अनेक द्रव्यों तथा व्यंजनों से युक्त भात खाते हुए उसका स्वाद ग्रहण करता है, उसी प्रकार अनेक भावों तथा अभिनय से सम्बद्ध स्थायी भावों को सहृदय व्यक्ति मन से आस्वादन करता है। इसलिए, इनको नाट्यरस जाना जाता है। सहृदय व्यक्तियों या सामाजिकों के हृदय में पहले से भाव छिपे रहते हैं। ये भाव अनुभव, शिक्षा, निरीक्षण आदि के कारण या भारतीय पण्डितों के अनुसार, पूर्वजन्म के संस्कार के कारण वासना-रूप में स्थित रहते हैं। आधुनिक मनोविज्ञान की भाषा में कहेंगे कि ये सब भाव मानव-मन के अर्द्धचेतन या अवचेतन भाग में छिपे रहते हैं। सामान्यतः ये भाव हमारे लौकिक या व्यावहारिक जीवन से उद्भूत होते हैं। हम अपने व्यावहारिक जीवन में किसी से प्रेम करते हैं; अत्याचार और अनाचार देखकर क्रोध करते हैं; साँप, बाघ आदि देखकर डरते हैं; कभी उत्साह प्रदर्शित करते हैं और किसी कोढ़ी के विकृत तथा गलित शरीर को देखकर जुगुप्सा का भाव प्रकट करते हैं। लौकिक या व्यावहारिक जीवन में जब हम बार-बार ये ही दृश्य देखते हैं, तब इसी प्रकार का अनुभव हमें अनेक बार होता है। तब हमारे चेतन मन पर इनका प्रभाव पड़ता है और धीरे-धीरे हमारे अचेतन मन के भीतर इसकी छाप अंकित हो जाती है। यह स्थायी भाव के रूप में हमारे मन के भीतर छिपा रहता है। जब कभी हम काव्य पढ़ते हैं या रंगमंच पर नाटक का अभिनय देखते हैं और उन भावों का चित्रण पाते हैं, तब हमारे अन्तर्मन का छिपा भाव हमारे चेतन मन पर लहराने लगता है। ये ही भाव काव्य में व्णित या रंगमंच पर कुशल अभिनेताओं के अभिनय के द्वारा प्रस्तुत किये गये उपयुक्त वातावरण पाकर उद्बुद्ध हो जाते हैं। इन्हीं उद्बुद्ध स्थायी भावों के आस्वादन से उत्पन्न आनन्द रस कहलाता है। चेतन और अचेतन मन कुछ समय के लिए एक हो जाते हैं; दोनों के बीच का परदा हट जाता है और हम मनोराज्य में विचरण करने लगते हैं, जहाँ केवल आनन्द है। भारतीय रसशास्त्री इसे रस कहते हैं। यह लौकिक होते हुए अलौकिक तथा दिव्य है। इसे ब्रह्मानन्दसहोदर भी कहा गया है। 'अग्निपुराण' में काव्य द्वारा उत्पन्न चैतन्य-चमत्कार को रस कहा गया है : अक्षरं परमं ब्रह्म सनातनमजं विभुं। वेदान्तेषु वदन्त्येकं चैतन्यं ज्योतिरीश्वरम्।। आनन्दः सहजस्तस्य व्यज्यते स कदाचन। व्यक्ति: सा तस्य चैतन्यचमत्काररसाह्नया॥' अर्थात्, वेदान्त आदि में जिस ब्रह्म को अक्षर, सनातन, अज, विभु, चैतन्य, ज्योति और ईश्वर कहा गया है, उसका सहज स्वरूप आनन्द है। उस आनन्द की अभिव्यक्ति चैतन्य- चमत्कार के रूप में होती है। इसी को रस की संज्ञा दी जाती है। दूसरे शब्दों में, काव्य १. अग्निपुराण, अध्याय ३३८, श्लोक १-२
Page 286
रस [ २६१
द्वारा चेतना का विस्तार ही रस का यथार्थ रूप है। रस के द्वारा चेतना का असीम विस्तार होता है, जिससे अलौकिक आनन्द की प्राप्ति होती है। इसी से रस का स्वरूप ब्रह्म के स्वरूप के सादृश्य के योग्य बनता है। इसीलिए, रस की अनुभूति ब्रह्मानन्द की अनुभूति के समान हो जाती है। इस तथ्य को अभिनवगुप्त ने और विस्तार दिया है। उनके मतानुसार, वासनात्मक रूप में स्थित रति आदि वृत्तियाँ ही साधारणीकरण के कारण निवैयक्तिक तथा भेद- रहित हो जाने पर आनन्दस्वरूप हो जाती हैं। उस समय इनका आनन्द ब्रह्मानन्द के समकक्ष हो जाता है। उस समय दुःख की कोई आशंका नहीं रह जाती। अभिनवगुप्त ने लिखा है : अस्मन्मते तु संवेदनमेवानन्दघनमास्वाद्यते। तत्र का दुखाशङ्का?' अर्थात्, हमारे मत में तो आनन्दमय ज्ञानस्वरूप (आत्मा) का ही आस्वादन रस-रूप में होता है। उसमें दुःख की आशंका ही कैसे हो सकती है ? भट्टनायक ने भी रस को परब्रह्म के सदृश माना है: सत्त्वोद्रेकप्रकाश।नन्दमयनिज- संविद्विश्रान्तिलक्षणेन परब्रह्मास्वादसविधेन भोगेन परं भुज्यते इति।२ अर्थात्, सत्त्व गुण की प्रधानता से प्रकाश तथा आनन्दमय साक्षात्कार में विश्रान्ति-रूप एवं परब्रह्म के आस्वाद के सदृश भोग-भोजकत्व व्यापार के द्वारा अनुभव या भोग किया जाता है। महिमभट्ट ने रस की परिभाषा देते समय दार्शनिक स्वरूप पर अधिक बल दिया है। ये नैयायिक थे और रस को ज्ञानस्वरूप मानते थे। मम्मट ने अपने 'काव्यप्रकाश' में रस के स्वरूप की व्याख्या करते समय इसी मत की पुष्टि की है : 'ब्रह्मास्वादमिवानुभावयन्'। तैत्तिरीय उपनिषद् में ब्रह्म को रसस्वरूप कहा गया है। सम्भवतः, इसी कथन को आधार मानकर परवर्त्ती आचार्यों ने रसास्वाद की तुलना ब्रह्मानन्द से की। डॉ० नगेन्द्र ने उपर्युक्त विवेचन का सारांश निम्नलिखित शब्दों में प्रस्तुत किया है।3 "१. रस आस्वाद नहीं, आस्वाद्य है, अर्थात् अनुभूति नहीं, अनुभूति का विषय है; नवीन शब्दावली में रस विषयिगत नहीं, विषयगत है। २. विविध भावों, अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव से संयुक्त एवं विविध अभिनयों द्वारा व्यंजित स्थायी भाव रस (या नाट्यरस) में परिणत हो जाता है।
१. हिन्दी अभिनवभारती, षष्ठ अध्याय (आचार्य विश्वेश्वर), पृ० ५०७ २. वही, पृ० ४६५ ३. रस-सिद्धान्त, पृ० ७९-८०
Page 287
२६२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
जिस प्रकार व्यंजन आदि से संस्कृत अन्न ही भोज्य रस (षाडवादि) का रूप धारण कर लेता है, उसी प्रकार नाट्य-सामग्री (विविध भाव-विविध अभिनय) द्वारा प्रस्तुत स्थायी भाव ही नाट्यरस बन जाता है। यहाँ स्थायी भाव अन्न के समकक्ष है और नाट्य सामग्री -व्यंजन, ओषधि (मसाले) आदि के। अभिनवगुप्त ने इस दृष्टान्त के अवयवों में ही संगति स्थापित करने का प्रयत्न किया है; किन्तु वह न अधिक समीचीन है और न आवश्यक ही; उससे मूल तथ्य उलझ जाता है, स्पष्ट नहीं होता। ३. स्थायी भाव रस नहीं है, परन्तु रस का आधार है; क्योंकि नाट्य-सामग्री में संयुक्त होकर वही तो 'रस' बन जाता है-जैसे कि अन्न रस नहीं है, किन्तु रस का आधार है; क्योंकि व्यंजन आदि से संस्कृत होकर वही रस बन जाता है। उदाहरण के लिए, रति स्थायी भाव अपने मूल रूप में शृंगार रस नहीं है, परन्तु नायक-नायिका, स्मिति-कटाक्ष, हर्ष- वितर्क आदि के प्रसंग में परिबद्ध होकर त्रिविध अभिनयों के द्वारा जब वह रंगमंच पर प्रस्तुत किया जाता है, तब शृंगार रस का रूप धारण कर लेता है। ४. यहाँ स्थायी भाव से अभिप्राय सहृदय कवि के स्थायी भाव का न होकर नायक के स्थायी भाव का है और नायक चूँकि लोक का प्रतिनिधि है, इसलिए, नायक के स्थायी भाव का अर्थ है, लोकसामान्य स्थायी भाव। ५. इस प्रकार, रस कला का आस्वाद नहीं है, स्वयं कला अथवा कलात्मक स्थिति है, जो आस्वाद का विषय है। ६. सहृदय इनका आस्वादन करता है, परन्तु उसका यह आस्वाद रस-रूप नहीं होता, हर्षादि रूप ही होता है। DIF ७. हर्षादि के दो अर्थ किये जाते हैं-एक तो यह कि रसास्वाद केवल आनन्दमय ही नहीं होता, विविध स्थायी भावों के अनुसार विभिन्न प्रकार का होता है, दूसरा यह कि भरत ने 'आदि' शब्द के द्वारा हर्षविरोधी, अर्थात्, कटु अनुभूतियों की व्यंजना नहीं की, वरन् कुतूहल आदि आनन्दमयी अनुभूतियों की ओर ही इंगित किया है। प्राचीनों में रामचन्द्र- गुणचन्द्र पहले मत के प्रवर्त्तक हैं और अभिनवगुप्त दूसरे मत के। आधुनिक विद्वानों का बहुमत धीरे-धीरे पहले अर्थ के ही पक्ष में होता जा रहा है, यद्यपि आनन्दवादी मत के समर्थकों की संख्या कम नहीं है, हम स्वयं इसी मत के समर्थक हैं।" विषयगत परिभाषा: इस प्रकार, भरत के मतानुसार, विभिन्न भावोपगत स्थायी भाव ही रस है। दूसरे शब्दों में-विभाव, अनुभाव तथा संचारी भावों से युक्त और वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनयों से व्यंजित स्थायी भाव ही रस है। तात्पर्य यह कि 'रस एक प्रकार की भावमूलक कलात्मक स्थिति है, जो कविनिबद्ध विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भावों के प्रसंग से नाट्य-सामग्री के द्वारा रंगमंच पर उपस्थित हो जाती है।" उदाहरणारथ, १. रस-सिद्धान्त, पृ० ८०
Page 288
रस [ २६३
सुन्दर तपोवन के दृश्यों से युक्त रंगमंच पर जब दुष्यन्त और शकुन्तला का अभिनय करनेवाले नट-नटी, वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनयों के सहारे अनुभाव, व्यभिचारी भाव आदि की अभिव्यक्ति करते हुए रति स्थायी भाव को अभिव्यक्त करते हैं, तब एक रम्य भावात्मक स्थिति प्रस्तुत हो जाती है, जिससे दर्शक के मन में हर्ष, कुतूहल आदि भावों की जागृति होती है। भरत ने इसी रम्यभावात्मक स्थिति को रस संज्ञा दी है। परन्तु, सहृदय की अनुभूति दूसरे ढंग की होती है-वह (रस) तो इसका आस्वाद है, जिसका अनुभव हर्ष, कुतूहल आदि के रूप में होता है। दूसरे शब्दों में-'नाट्यसौन्दर्य और काव्यसौन्दर्य के माध्यम से स्थायी भाव की उपस्थिति ही रस है।"
रस की यह परिभाषा विषयगत है और भरत के विवेचन पर आधृत है। इसे काव्यक्षेत्र में भी ग्रहण कर इसमें थोड़ा परिवर्त्तन किया गया-शब्द और अर्थ के सौन्दर्य के माध्यम से विभाव, अनुभाव और संचारियों से युक्त स्थायी भाव ही रस हो जाता है। काव्यादर्शकार ने कहा है :
प्राक्प्रीतिर्दशिता सेयं रतिः शृङ्गारतां गता। रूपबाहुल्ययोगेन तदिदं रसवद्वचः ॥२ अर्थात्, विभावादि से अपुष्ट रति केवल प्रीति नामक भाव ही होती है, किन्तु अनुभाव और संचारी भाव से पुष्ट होकर शृंगार रस में परिणत हो जाती है। यहाँ भी रस का स्वरूप विषयगत ही है, अर्थात् आस्वाद्य रूप है, आस्वाद नहीं। विषयिगत परिभाषा : भरत के रससूत्र के व्याख्याताओं ने जो विवेचन किया, उसका एक फल यह भी हुआ कि रस का स्वरूप धीरे-धीरे विषयिगत होता गया, अर्थात् जो रस पहले 'आस्वाद्य' था वह 'आस्वाद' बन गया। रस के इस अर्थ-परिवर्त्तन का मुख्य कारण अभिनवगुप्त का विवेचन था। उनके शैवाद्वत-सिद्धान्त के अनुसार रस का अर्थ आनन्द है और आनन्द विषयगत न होकर विषयिगत होता है। अतएव, रस नाट्यगत नहीं हो सकता। इस व्याख्या से रस के आनन्देतर रूप की कल्पना स्वयमेव समाप्त हो गई। अभिनवगुप्त से पण्डितराज जगन्नाथ तक सभी ने रस का यही रूप स्वीकार किया। व्याख्या के आधार में जहाँ-तहाँ कुछ परिवर्तन होता रहा, परन्तु सबका प्रतिपाद्य एक ही रहा। अभिनवगुप्त ने इस विषय का पूरा विवेचन किया है। उनके मत का सारांश है कि नाट्यादि के मनन से, भाव की पृष्ठभूमि में आत्मविश्रान्तिमयी आनन्द-चेतना को ही रस कहना चाहिए। अभिनवगुप्त के बाद पण्डितराज जगन्नाथ ने रस के इसी लक्षण की व्याख्या की और उन तक यह लक्षण स्वीकार किया जाता रहा। अन्तर यही हुआ कि पण्डितराज ने शैवदर्शन के स्थान पर न्याय और वेदान्त का सहारा लिया।
१. रस-सिद्धान्त, पृ० ८१ २. काव्यादर्श, २।१८१
Page 289
२६४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
जगन्नाथ पण्डितराज : पण्डितराज जगन्नाथ ने अपनी रस-परिभाषा में अभिनवगुप्त की रस-परिभाषा का दार्शनिक दृष्टि से थोड़ा परिष्कार किया है। अपने 'रसगंगाधर' में उन्होंने रस के विषय में लिखा है : भग्नावरणा चिद्विशिष्टो रत्यादिः स्थायीभावो रसः। हमारी चेतना पर स्वार्थ आदि के आवरण पड़ जाते हैं, जिन्हें विभावादि भग्न कर देते हैं। इस प्रकार, जब चेतना मुक्तावस्था में हो जाती है, तब रत्यादि स्थायी भाव अत्यन्त पवित्र रूप में प्रतिष्ठित होकर परमानन्द की सृष्टि करते हैं। यह रसानन्द सामान्य लौकिक आनन्द से भिन्न प्रकार का होता है; क्योंकि सामान्य लौकिक आनन्द में वैयक्तिक वृत्तियाँ सन्निहित रहती हैं, किन्तु रसानन्द सर्वथा शुद्ध चैतन्य-रूप होता है, साथ ही इसमें वैयक्तिक वृत्तियों का अभाव रहता है। रसानुभूति किसी विशेष प्रकार की वैयक्तिक अनुभूति से रहित रहती है। रसदशा में आत्मा अपने आनन्दस्वरूप को अधिकतम मात्रा में विकसित करती है। इसीलिए, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लोकहृदय में हृदय के लीन होने की दशा को रसदशा कहा है। रस स्थायी भाव से भिन्न होता है। इसीलिए, रस और स्थायी भाव अलग-अलग रखे गये हैं। स्थायी भाव में वैयक्तिकता का समावेश रहता है, परन्तु रस में नहीं। रस में भाव परिष्कृत होकर सात्त्विक रूप में आते हैं। रस में भावों का पूर्ण परिष्कार हो जाता है। साहित्य से रसानुभूति की उपलब्धि के लिए निम्नलिखित बातें अत्यन्त आवश्यक हैं : (क) काव्य-व्यापार तथा प्रक्रिया से साहित्यकार की रचना उत्पन्न हो।ी पान (ख) लौकिक जीवन का ही प्रतिबिम्ब आलम्बन में प्रतिफलित हो। (ग) पाठक तथा दर्शक में वास्तविक सहृदयता वर्त्तमान हो। मनोवैज्ञानिक आधार
रस के स्वरूप का सम्यक ज्ञान प्राप्त करने के लिए इसके विभिन्न तत्त्वों तथा उनके पारस्परिक सम्बन्ध को समझना चाहिए। विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के संयोग से स्थायी भाव रसत्व को प्राप्त करता है। तात्पर्य यह कि रस की निष्पत्ति में चार तत्त्वों की आवश्यकता है-स्थायीभाव, विभाव, अनुभाव और संचारी भाव। सर्वप्रथम स्थायी भाव पर विचार किया जाय। भारतीय आचार्यों ने स्थायी भाव में नैसगिक प्रवृत्तियों की विद्यमानता स्वीकार की है। वस्तुतः, स्थायी भाव में तीन तत्त्व होते हैं : १. नैसर्गिक प्रवृत्तियाँ, जो जन्मजात होती हैं; २. सहचर भावनाएँ, ये भी जन्मजात होती हैं और ३. स्थायी भाव के साथ गौण रूप से निबद्ध होनेवाली साधित भावनाएँ; जो उपारजित होती हैं। स्थायी भाव ऐसा भावचक्र है, जिसमें नैसगिक प्रवृत्तियों में से कोई अपनी सहचर भावना के साथ रहती है और उसके साथ कोई निबद्ध भावना जुड़ी रहती है। स्थायी भावों में केवल नैसगिक प्रवृत्तियाँ ही नहीं, विचार भी आते हैं, यद्यपि उन प्रवृत्तियों का प्रमुख स्थान है।
Page 291
२६६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
और उसे स्थायी भाव का रूप प्रदान करती हैं। तात्पर्य यह है कि प्राथमिक भावनाएँ ही प्रसुप्तावस्था में नैसगिक प्रवृत्ति के रूप में विद्यमान रहती हैं। किसी एक सहज या नैसगिक प्रवृत्ति के साथ एक या अनेक सहचर भावनाओं की उत्पत्ति हो सकती है। जब वे सहचर भावनाएँ अनेक तथा विरोधी होती है, तब उस अवस्था को भावशबलता कहते हैं। जब सहज प्रवृत्तियाँ अभिव्यक्त होती हैं, तब हमारे शरीर पर प्रकट हुए चिह्न देखकर द्रष्टा प्रभावित हुए विना नहीं रहता। जब नट और नटी किसी नाटक में नायक-नायिका का अभिनय करते हैं, तब उनके शरीर पर अभिव्यक्त सहज प्रवृत्तियों के चिह्नों को देखकर सामाजिक तदनुकूल उचित प्रत्युत्तर अवश्य देते हैं। यह सहज प्रवृत्ति केवल शारीरिक अथवा केवल मानसिक कोटि की ही नहीं होती, अपितु मानस-शरीरी कोटि की होती है, इसीलिए जब इसकी तृप्ति नहीं होती, तब शरीर और मन दोनों ही प्रभावित हुए विना नहीं रहते। जब सहज प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति में किसी प्रकार की बाधा पड़ती है, तब भावनाओं का झंझावात उपस्थित हो जाता है; अनेक मानसिक उलझनें उत्पन्न हो जाती हैं और शरीर तथा मन अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके विपरीत यदि उनकी तृप्ति होती रहती है, तो जीवन सभी ढंग से स्वस्थ बना रहता है। रस-निष्पत्ति की दशा में सहज प्रवृत्तियों की अभिव्यंजना का प्रभाव शरीर और मन दोनों पर परिलक्षित होता है। मानव-मन के तीन पक्ष होते हैं-ज्ञानात्मक, भावात्मक तथा इच्छात्मक। और फिर, सहज प्रवृत्तियों के रसात्मक व्यापार में तीनों पक्षों के व्यापार समाविष्ट रहते हैं। मन के ज्ञानात्मक पक्ष की प्रक्रिया से आलम्बन और उद्दीपन का ज्ञान होता है। आलम्बन और उद्दीपन के ज्ञान के पश्चात् भावना उत्पन्न होती है और यह मन के भावात्मक पक्ष का कार्य हुआ। मन के इच्छात्मक पक्ष की प्रक्रिया तब होती है, जब नैसगिक प्रवृत्तियों के जागरित होने पर आश्रय इच्छाशक्ति की सहायता से एक विशेष प्रकार से कार्य करता है। इससे नैसगिक प्रवृत्ति का कार्य रसावस्था में परिष्कृत अथवा उदात्त रूप धारण करके आविर्भूत होता है। रस-प्रक्रिया में सहज प्रवृत्तियाँ उदात्त हो जाती हैं, इसका प्रमाण रस- विषयक कार्य हैं। इसका अर्थ यह है कि जैसे-जैसे सामाजिक विकास की प्रगति होती जाती है, वैसे-वैसे नैसगिक प्रवृत्तियों की अभिव्यंजना के कार्य में परिमार्जन होता रहता है। भारतीय रसवाद के सिद्धान्त से यह तथ्य सिद्ध हो जाता है कि आदर्श प्राप्त करने के लिए मनुष्य सदा से सचेष्ट रहता है। रस-सिद्धान्त यह भी प्रमाणित करता है कि मनुष्य इस चेष्टा में प्रर्याप्त प्रगति कर चुका है। रसानुभूति के समय वह विश्वात्मा से तादात्म्य सम्बन्ध स्थापित कर लेता है। उस अनन्त सत्ता या विश्वात्मा के तीन पक्ष होते हैं -सत्यम्, शिवम् और सुन्दरम्। रस में तीनों पक्षों का समावेश है। रसानुभूति की दशा में किसी भी सहृदय में ये तीनों पक्ष अन्तर्भूत हो जाते हैं। यदि नैसगिक प्रवृत्तियों का प्रयोग नहीं किया जाय, तो वे सुषुप्त ही रह जायँ या अत्यन्त दुर्बल हो जायँ या कभी- कभी उनका आत्यन्तिक ह्रास हो जाता है। कुछ उदाहरण देखे जायँ। करुणा, काम, शम