Books / Bhartiya Natya Siddhanta Udbhava Aur Vikas Ramji Pandey (Hindi)

8. मिकी अ हर : नेती ही-पO1F पकिशा [२३९

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२४० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

नायिका के अलंकार I नायक के समान नायिका में भी यौवन में कुछ सात्त्विक या स्वाभाविक गुण माने गये हैं। नायिका के ये गुण भूषण या अलंकार कहे जाते हैं। गुण या अलंकार देने में नाट्याचार्यों ने नायिका के प्रति नायक से भी अधिक उदारता दिखाई है। इनमें तीन-भाव, हाव और हेला-शरीरज या शारीरिक गुण हैं, सात अयत्नज गुण हैं। सत्त्वज भाव वे अलंकार हैं, जो नायिकाओं में अयत्न रूप से ही प्राप्य हैं, अर्थात् इन्हें प्रकट करने में नायिका को कोई यत्न करने की आवश्यकता नहीं। दस स्वभावज गुण हैं। ये भाव या गुण स्वभाव से ही स्त्रियों में वर्त्तमान रहते हैं। शरीरज अलंकार : इनमें तीन शरीरज अलंकार-भाव, हाव और हेला-विशेष प्रसिद्ध तथा महत्त्वपूर्ण हैं। इस शास्त्रीय विषय से अनभिज्ञ व्यक्ति भी 'हाव-भाव' का प्रयोग करते हैं, भले ही इस पारिभाषिक अर्थ में नहीं। भाव : धनंजय ने भाव का लक्षण दिया है कि निर्विकारात्मक सत्त्व से जब विकार का सबसे पहले स्फुरण होता है, तो इसी प्रथम स्फुरण को भाव कहते हैं।

मानव-प्रकृति में तीन गुण होते हैं-सत्त्व, रजस् तथा तमस्। इन तीन गुणों में से सत्त्व का विशेष महत्त्व इसलिए है कि विकार उत्पन्न होने के कारणों के वर्त्तमान रहने पर भी सत्त्व के कारण मानव-हृदय में कोई विकार उत्पन्न नहीं होता। नायक के गुणों में गाम्भीय की गिनती की गई है, जो सत्त्व गुण की ही स्थिति के कारण होता है। सत्व की ही वर्त्तमानता के कारण व्यक्ति सर्वथा विकार-रहित रहता है। इस स्थिति के बाद जब व्यक्ति में थोड़ा विकार उत्पन्न होने लगता है, तो भाव की स्थिति आती है। भाव की स्थिति में विकार अस्पष्ट रूप में रहता है। यह विकार शरीर के अन्तस् में ही छिपा रहता है। इस प्रकार के अन्तस् में प्रकट होनेवाला विकार भाव कहा जाता है। धनंजय द्वारा दिये लक्षण से मिलता-जुलता लक्षण विश्वनाथ ने भी दिया है : निर्विकारात्मके चित्ते भावः प्रथमविक्रिया।२ फिर उन्होंने इसकी वृत्ति दी है : जन्मतः प्रभृति निर्विकारे मनसि उद्बुद्धमात्रो विकारो भावः । अर्थात्, जन्म से निर्विकार चित्त में उद्बुद्ध मात्र काम-विकार को भाव कहते हैं। हाव : भृकुटी तथा नेत्रादि की चेष्टाओं से सम्भोग की अभिलाषा की सूचना देनेवाला और मनोविकारों को थोड़ा व्यक्त करनेवाला भाव ही हाव कहा जाता है। धनंजय का मत है कि नायिका में बातचीत कम करने की अवस्था का तथा शृंगार का होना हाव कहलाता है। इस हाव से नेत्र, भृकुटी आदि कई निश्चित अंगों में विकार १. दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, का० ३३ २. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० ९३ lan2 otp

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उत्पन्न होता है। यह हाव भी स्वाभाविक तथा शरीरज अलंकार है। विश्वनाथ ने हाव का लक्षण निम्नलिखित शब्दों में दिया है : भ्रूनेत्रादिविकारंस्तु सम्भोगेच्छाप्रकाशकः । भाव एवाल्पसंलक्ष्यविकारो हाव उच्यते ।' हेला : यही हाव जब शृंगार रस को सुस्पष्ट रूप से प्रकट करने लगता है, तो हेला नामक अलंकार बन जाता है। हेला में नायिका के मनोविकार अति स्पष्टता से परिलक्षित होते हैं। अयत्नज अलंकार : धनंजय आदि आचार्यों ने अयत्नज अलंकार सात माने हैं। प्रत्येक का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। शोमा : रूप, विलास एवं यौवन के कारण जब नायिका के अंग अलंकृत हो जाते हैं, तो उस अलकार को शोभा नामक अयत्नज अलंकार कहा जाता है। शोभा अलंकार के समय नायिका में काम-विकार नहीं होता। कान्ति : जब काम के आविर्भाव के बाद नायिका की कान्ति में और भी वृद्धि हो जाती है, तो वही शोभा काम के उत्पन्न होने से सघन होने के कारण कान्ति नामक अलंकार कही जाती है। माधुर्य : नायिका में रमणीयता का होना माधुर्य नामक भाव कहा जाता है। भरत के अनुसार, प्रत्येक अवस्था में विशेषतः-दीप्ति और ललित में-नायिकाओं की चेष्टाएँ माधुर्य हैं। विश्वनाथ के अनुसार सभी दशाओं में रमणीय होना ही माधुर्य है। दोप्ति : जब कान्ति नामक भाव का विस्तार होता है, नायिका में कान्ति विशेष रूप से पाई जाती है, तो उसे दीप्ति नामक भाव कहा जाता है। प्रगल्भता : निर्भयता का नाम प्रगल्भता है। मन में क्षोभ आदि का नहीं पाया जाना प्रगल्भता या प्रागल्भ्य नामक भाव कहा जाता है। औदार्य : नायिका का सदा प्रेम से युक्त रहना, नायक के प्रति उसका सदा अनुकूल रहना औदार्य नामक भाव होता है। सदा विनय रखना ही औदार्य है। धर्य : आत्म-श्लाघा तथा चंचलता से रहित मनोवृत्ति को धैर्य नाम दिया जाता है। दूसरे शब्दों में चंचलता से हीन तथा अहंकार-शून्य सहज मानसिक स्थिति धैर्य कही जाती है। स्वाभाविक अलंकार: सात अयत्नज अलंकारों का विवेचन करने के पश्चात् नाट्याचार्यों ने दस स्वाभाविक भावों का उल्लेख किया है। नायिकाओं के मुग्धकारी प्रभाव को बढ़ानेवाले अलंकार, जिनसे विशेषतः संयोग की विभिन्न अवस्थाओं में आन्तरिक भावों १. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० ९४

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२४२ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकांस का प्रकाशन होता है, स्वभावज अलंकार कहे जाते हैं। ये स्वभावसिद्ध हैं, परन्तु कृति- साध्य होते हैं। इनका संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। लीला : अनुरागातिशय के कारण जब नायिका मधुर अंगों की चेष्टाओं के द्वारा प्रिय (नायक) के अंग, वेश, अलंकार, चेष्टा, वाणी आदि का शृंगारिक अनुकरण करती है, तो इसे लीला नामक भाव कहते हैं। विलास : प्रिय के दर्शन आदि के समय नायिका की गति, स्थिति, आसन आदि तथा मुख, नेत्रादि के व्यापारों की विशेषता को विलास नामक भाव कहा जाता है। विच्छित्ति : थोड़ी-सी भी वेषभूषा और साज-सज्जा जहाँ कान्ति को अधिक पुष्ट करती है, वहाँ विच्छित्ति नामक भाव होता है। माला, वस्त्राभूषण आदि को अस्त-व्यस्त रूप में धारण करने से सौन्दर्य-वृद्धि को विच्छित्ति ही कहा जाता है। विभ्रम : प्रियतम के आगमन आदि के समय हर्ष और प्रेम के कारण भूषण आदि को उलट-पलट पहन लेना विभ्रम कहलाता है। शब्द, चेष्टा आदि का विपर्यय तथा मद, काम और हर्ष से सत्त्व का उदय होना भी विभ्रम है। किलकिचित : अतिप्रिय वस्तु की प्राप्ति के कारण उत्पन्न हुए हर्ष से कुछ मुस्कराहट, कुछ शुष्करुदित अर्थात् अकारण रोदनाभास, कुछ हास, कुछ तास, कुछ कोध, कुछ श्रम आदि के विचित्र मिश्रण को किलकिचित कहा जाता है। मोट्टायित : प्रिय के कथा आदि के श्रवण-मनन आदि करते समय अनुराग से व्याप्तचित्त हो जाना और लीला, विलास आदि के माध्यम से प्रेम की अभिव्यक्ति करना मोट्टायित कहा जाता है। कुट्टमित : रति-करीड़ा में नायक के द्वारा केश तथा अधर को ग्रहण करने पर हृदय से प्रसन्न होने पर भी जब नायिका कृत्रिम क्रोध प्रकट करे, तो वह कुट्टमित भाव कहलाता है। बिब्बोक : जब नायिका अतिगर्व तथा अभिमान के कारण अभिलषित वस्तु के प्रति भी अनादर दिखाती है, तो उसे बिब्बोक नामक भाव कहा जाता है। ललित : नायिका के कोमल तथा स्निग्ध प्रकार से अंगों का विन्यास ललित नामक भाव कहलाता है। स्रिक विहृत : नायिका जहाँ प्रिय वचन सुनकर भी, और समय आने पर भी तदनुकूल वाक्य का प्रयोग लज्जावश, व्याज से अथवा सहज ही, नहीं कर पाती, वहाँ विहृत नाम का भाव माना जाता है। स्वाभाविक या स्वभावज अलंकार के इन दस भेदों के अतिरिक्त कविराज विश्वनाथ ने आठ नये अलंकारों का उल्लेख किया है। मद : सौभाग्य, यौवन आदि के घमण्ड से उत्पन्न विकार को मद कहा जाता है।

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तपन : प्रियतम के विरह में कामोद्वग की चेष्टाओं को तपन नाम दिया गया है। मौग्ध्य : जानी हुई वस्तु को भी प्रियतम के आगे अनजानेपन से पूछना मौगध्य कहा जाता है। विक्षेप: प्रियतम के निकट भूषणों की आधी रचना और विना कारण के ही इधर- उधर देखना तथा धीरे से कुछ रहस्य कहना विक्षेप कहलाता है। कुतूहल : रमणीय वस्तु को देखने के लिए चंचल होना कुतूहल कहलाता है। हसित : यौवन के उद्गम से उत्पन्न अकारण हँसी को हास या हसित नाम दिया गया है। चकित : प्रियतम के सामने बिना कारण के ही डरना और घबराना चकित कहा जाता है। केलि : कान्त के साथ विहार में कामिनी की कीड़ा को केलि नाम दिया गया है। दशरूपक तथा साहित्यदर्पण आदि ग्रन्थों में इस विषय का काफी विस्तार किया गया है। सभी के उपयुक्त उदाहरण दिये गये हैं। किसी-किसी के उदाहरण एक से अधिक हैं। विश्वनाथ ने बहुत विस्तार से विभिन्न प्रकार की नायिकाओं की अनुराग-चेष्टाओं का वर्णन किया है। कुछ नायिकाएँ बहुत सलज्जता से अपने अनुराग का प्रदर्शन करती हैं और अन्य नायिकाएँ अत्यन्त प्रगल्भता तथा निर्लज्जता से। इस विश्लेषण से भारतीय राजाओं के अन्तःपुर में प्रेम की बाह्य अभिव्यक्ति में सूक्ष्म अन्तर्दृष्टि का पता चलता है। लेखक ने तीन कारिकाओं में मुग्धा और कन्या नायिकाओं की अनुराग-चेष्टाओं का वर्णन किया है। फिर १४ कारिकाओं में उन्होंने सभी नायिकाओं की अनुराग-चेष्टाओं का विश्लेषण किया। अन्त में, निष्कर्ष-रूप में विश्वनाथ ने उपसंहार किया कि इनमें नवोढ़ा की चेष्टाएँ अधिक लज्जायुक्त होती हैं, मध्या की थोड़ी लज्जा से युक्त होती हैं और परकीया, प्रगल्भा तथा वेश्या की चेष्टाएँ निर्लज्जतापूर्ण होती हैं। कुछ चेष्टाओं के उदाहरण के रूप में ग्रन्थकार ने अपने ही लिखे श्लोक दिये हैं। साहित्यदर्पण के तृतीय परिच्छेद के १११ से ११७ ताक की संख्या के श्लोकों में इसी का विवेचन है। PIE

पात्र की व्याख्या : नाट्यकार अपने नाटक की रचना इस प्रकार करता है कि उसके आधार पर नाट्य-प्रयोक्ता अपने अभिनेताओं को वैसे ही रूप धारण कराकर उनसे चारों प्रकार के अभिनय कराते हैं। नाटक में वर्णित जिन चरित्रों की भूमिका ग्रहण करके या उनके रूप धारण करके अभिनेता अभिनय करते हैं, उन्हें पात्र कहा जाता है। अतः, पात्र कहने से केवल मनुष्य का ही बोध नहीं होता, प्रत्युत पशु-पक्षी, मानवीकृत भाव तथा जड पदाथ का भी बोध होता है, जो नाटक का कार्य करते हैं। भरत ने नाट्यशास्त्र के चौबीसवें अध्याय में पुरुषों और स्त्रियों के स्वभाव का विवेचन किया है, परन्तु उन्होंने अपने पात्ों को देवों और मनुष्यों तक ही सीमित कर दिया है। परन्तु, वस्तुतः जो नाटकीय अर्थ को दर्शकों तक पहुँचाने में सहायता करते हैं, वे

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२४४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास सभी अभिनेता ही हैं। नाट्य-साहित्य का अध्ययन करने से पता चलता है कि बहुत-से नाटककारों ने अन्य जीवों, भावों और जड पदार्थों को भी पात् के रूप में प्रदर्शित किया है। अभिज्ञानशाकुन्तल में कालिदास ने प्रदर्शित किया है कि मृग, भ्रमर, लता, वृक्ष, वन-देवता और कोकिल मानव के समान नाटकीय व्यापार में सहायता देते हैं। रत्नावली में सारिका और बालरामायण में पुत्तलिकाएँ भी अन्य पात्रों के ही सदृश नाटकीय व्यापार में योगदान करती हैं। आजकल भी नाटकों में वनमानुष, कुत्ता, सुग्गा आदि जानवरों को प्रशिक्षित करके उनसे नाटकीय व्यापार में काम लिया जाता है। प्रबोधचन्द्रोदय में मति, विवेक, सन्तोष, श्रद्धा, करुणा आदि भाव मानवीय रूप धारण करके रंगमंच पर उतरते हैं। प्रसादजी के नाटक 'कामना' में भी कामना, विलास आदि मानव-रूप धारण करते हैं। आजकल यन्त्र-चालित कटे हाथ, मानव की खोपड़ी और ठठरी आदि से भी कार्य कराया जाता है। इतना अन्तर अवश्य होता है कि मानव सात्त्विक अभिनय भी कर सकता है। परन्तु, ये जड पदार्थ तथा पशु-पक्षी ऐसा नहीं कर सकते। इससे यह निष्कर्ष निकला कि मनुष्य, पशु-पक्षी, जड पदार्थ-सभी अभिनय-कार्य में पात्र हो सकते हैं। कभी-कभी देवता, यक्ष, किन्नर, गन्धर्व, भूत-प्रेत आदि दिव्य या अलौकिक शक्तियों का भी प्रयोग पात्र के रूप में होता है। इस दृष्टि से पात्ों को पाँच श्रेणियों में विभाजित किया गया है : १ अलौकिक, २. मानव, ३. पशु-पक्षी, ४. जड पदार्थ, ५. भाव। इनमें से पशु-पक्षियों को उचित और आवश्यक प्रशिक्षण देकर तथा जड पदार्थों को यन्त्रों की सहायता से अभिनय के योग्य बनाया जा सकता है। अलौकिक चरित्रों तथा भावों को मानव के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, इसलिए मानव के विवेचन के साथ ही उनका विवेचन हो जायगा। अतः, प्रधान रूप से मनुष्य की ही प्रकृति का विवेचन करना प्रधान कार्य है। मूल पात् और नाटकीय पात्र : नाट्य के पात्रों के विषय में विचार करते समय मूल पात्र और नाटकीय पात्र के विषय में भी विचार कर लेना आवश्यक है। कवि या नाटककार अपने नाटक के लिए कुछ पात्रों की सृष्टि करता है, जो नाट्य के कार्यों का सम्पादन करते हैं। इनमें कुछ तो ऐतिहासिक या पौराणिक पात्र होते हैं, जिनका विवरण इतिहासों तथा पुराणों में मिलता है, इन्हीं को मूल पात्र कहा जाता है। ऐतिहासिक तथा पौराणिक पात्रों में भी नाटककार उनका सर्वाशतः वही रूप नहीं देता है, जो हम इतिहास में पाते हैं। नाटककार को इतनी स्वतन्त्रता रहती है कि वह उन पात्रों के चरित्रों में यथावसर स्वच्छन्दतापूर्वक परिवर्त्तन कर दे। बहुधा ऐसा होता है कि कवि-निबद्ध पात्र और ऐतिहासिक पात्र के चरित्र में बहुत अन्तर हो जाता है। नाटक में हमें इसी कवि-निबद्ध पात्र से मतलब रहता है, ऐतिहासिक पात्र से नहीं। उदाहरण के लिए दुष्यन्त को लिया जाय। महाभारत और पद्मपुराण में दुष्यन्त का चित्रण जिस किसी भी रूप में हुआ हो, परन्तु शकुन्तला नाटक पढ़ते या उसका अभिनय देखते समय हमें कालिदास द्वारा चित्रित दुष्यन्त से ही मतलब रहता है। महाभारत तथा

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पद्मपुराण में दुष्यन्त का जैसा भी चित्रण हुआ हो, परन्तु कालिदास ने अपने चरितनायक के चरित्र में स्वच्छन्दतापूर्वक परिवर्तन किया है। परिवर्तन का कारण मुख्यतः दुष्यन्त के चरित्र को उदात्त बनाना है। शकुन्तला नाटक के लिए नाटकीय पात्र कालिदास द्वारा चित्रित दुष्यन्त है, महाभारत या पद्मपुराण का दुष्यन्त मूल पात् है। दूसरा उदाहरण चाणक्य का लिया जाय। सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य के महामन्त्री चाणक्य वस्तुतः जैसे भी रहे हों, परन्तु कई नाटककारों ने भारत की अनेक भाषाओं में उनका चित्रण अपने-अपने ढंग से किया है। तुलना के लिए हम चार नाटकों को अभी ले लें। सबसे पहले विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस में चाणक्य का चित्रण किया। बँगला के प्रसिद्ध नाटककार द्विजेन्द्रलाल राय ने अपने नाटक 'चन्द्रगुप्त' में, हिन्दी के यशस्वी नाटककार जयशंकर प्रसाद ने अपने नाटक 'चन्द्रगुप्त मौर्य' में और रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने नाटक 'विजेता' में चाणक्य के चरित्र का चित्रण अपने-अपने ढंग से किया है। विशाखदत्त का चाणक्य कुटिल राजनीतिज्ञ तथा कूटनीतिज्ञ है, जो चन्द्रगुप्त को सबल बनाने के लिए अनेक प्रकार के षडयन्त्र करता है। जान पड़ता है कि उसके पास हृदय नाम की कोई चीज नहीं है। द्विजेन्द्रलाल राय का चाणक्य चन्द्रगुप्त के लिए प्रेरक शक्ति का काम करता है और उसकी स्थिति सुदृढ बनाता है। प्रसादजी के चाणक्य में राजनीति तथा कटनीति के साथ कोमल भावनाएं भी हैं। पाटलिपुत्र के अपने पुराने घर के खम्भों के साथ उसकी बचपन की सुखद स्मृतियाँ लिपटी हैं। बेनीपुरीजी के राजनीतिज्ञ चाणक्य की आँखें छलछला जाती हैं, जब वह संगीत सुनता है और विरह के ही कारण काला हो गया है। ऐतिहासिक चाणक्य तो कोई एक ही था, जिसके चरित्र के विषय में हम कम ही जानते हैं, परन्तु इन चारों नाटककारों ने चार चाणक्यों की सृष्टि की, जो मूलतः एक होते हुए भी एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। जब हम चाणक्य के मूल पात् की चर्चा करते हैं, तो हमारा तात्पर्य ऐतिहासिक चाणक्य से होता है और इन नाटकों में चित्रित कवि-निबद्ध चाणक्य नाटकीय पात्र है। जिस नाटक की चर्चा हम करते हैं, उसी के सन्दर्भ में चाणक्य नाटकीय पात्र होगा। नाटक में मूल पात्र के अतिरिक्त नाटकीय पात्र होता है। नाटकीय पात्र वह पात्र है, जो कवि के द्वारा नाटक में निबद्ध तथा चित्रित होता है। नाट्य में अनुकार्य कवि-निबद्ध या नाटकीय पात्र ही होता है, मूल पात्र नहीं। मूल पात जैसा भी हो, हमें नाटक में उससे तात्पर्य नहीं। हमें तो कवि-निबद्ध पात्र से ही मतलब है।

भरत के अनुसार भानव-प्रकृति के भेद : भरत ने पुरुष और स्त्री को स्वभाव या प्रकृति के अनुसार तीन श्रेणियों में रखा है-उत्तम, मध्यम और अधम। जो उत्तम प्रकृति के पुरुष होते हैं, वे सदाचारी, ज्ञानवान्, अनेक शास्त्रों में कुशल, सबको प्रसन्न करनेवाले, ऐश्वर्यशील, दीनों को ढाढ़स बँधानेवाले, गम्भीर, उदार, धीर और त्यागी होते हैं। मध्यम प्रकृति के पुरुष लोक व्यवहार में निपुण, शिल्पशास्त्र में प्रवीण, मनुष्य को

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पहचानकर व्यवहार करनेवाले और मधुर आचरण करनेवाले होते हैं। अधम प्रकृति के पुरुष वे होते हैं, जो रूखा बोलते हैं और दूसरों से बुरा व्यवहार करते हैं। वे दुष्ट, मन्द- बुद्धि, कोधी, हिंसक, मित्रघाती होते हैं और अनेक उपायों से प्राण लेते हैं। अधम पुरुष चुगली खानेवाले, घमण्डी, कृतघ्न, उद्दण्ड, आलसी, झगड़ालू और मान्य का अपमान करनेवाले होते हैं। वे स्त्रियों के पीछे घूमते हैं, पापी होते हैं और दूसरों का धन हरते हैं। आचरण की दृष्टि से स्त्रियाँ भी पुरुषों के ही समान तीन प्रकार की होती हैं। मृदु व्यवहार करनेवाली, शान्त, सदा प्रसन्न रहनेवाली, कोमल स्वभाव की, लज्जाशील, नम्र, सवको प्रिय लगनेवाले रूप तथा माधुर्यवाली, गम्भीर और धैर्य से युक्त स्त्री उत्तम प्रकृति की कही जाती है। जिस स्त्री में बहुत अच्छे गुण न हों, परन्तु अवगुण भी न हों, और कोई-कोई साधारण दोष भी हो, वह मध्यम प्रकृति की कही जाती है। वह स्त्री अधम प्रकृति की है, जिसमें अधम पुरुषों के लक्षण देखे जायँ। जो मिश्र और अधम हो, उसे नपुंसक समझा जाता है। चेटी आदि को भी मिश्र स्वभाव की समझा जाता है, अर्थात् जो कभी स्थिर हो और कभी अस्थिर हो। इसके अतिरिक्त द्विज, विदूषक और शकार को मिश्र प्रकृति का समझा जाता है। वियोग में राजा या नायक के साथ ऐसी प्रिय दासी रखनी चाहिए, जो सुन्दर तथा बातचीत करने में निपुण हो। भरत मुनि ने बताया है कि राजा के साथ ऐसी दासी रखनी चाहिए, जो स्वयं विपत्ति पड़ने पर दुःख भोग चुकी हो, इस प्रकार वह ढाढ़स बँधा सकती हो। दिव्यों की जातियाँ धीरललित, उदात्त तथा निभृत होती हैं। उदात्त तथा निभृत जातिवाली स्त्रियाँ कुलांगना होती हैं और ललित तथा उदात्त प्रकृतिवाली गणिका तथा शिल्पकारिका होती हैं। शारदातनय के अनुसार कुछ पात्रों का परिचय भरत : जोव्यक्ति अनेक स्वभाववाले संसार के भावों को वैसे-वैसे रूप धारण करके प्रकाशित करते हैं, जो व्यक्ति भाषा, वर्ण आदि सामग्रियों से विभिन्न प्रकृतिवालों के वेष, अवस्था, कर्म तथा चेष्टा करके प्रदर्शित करते हैं, उन्हें भरत कहा जाता है। नट : जो लोग रस तथा भाव से युक्त भूतकाल की कथा का स्वाभाविक रूप से अभिनय करते हैं, उन्हें नट कहा जाता है। जो तेजस्वी, रूपवान्, मेधावी, रंगशाला के सभी विधानों के ज्ञाता, अपने कामों में कुशल, सूत्रधार की सहायता करनेवाले होते हैं, वे नट बन सकते हैं। शैलूष : जो वर्त्तमान काल के लोगों के समान रूपक बनाकर भाव का प्रदर्शन करते हैं, उन्हें शैलूष कहा जाता है। सिना भरत, शैलूष और नट में पारस्परिक अन्तर यह है कि शैलूष विना किसी प्रकार का वेश आदि धारण किये ही केवल दूसरों के भावों का अनुकरण करता है; भरत केवल