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फकशी सीट हाकड : कनर नेता F जीमा [[ २३१
अन्या या परकीया : नायिका का दूसरा भेद अन्या या परकीया होता है। परकीया नायिका दो प्रकार के की हो सकती है : (१) वह किसी की अनूढा (अविवाहिता) कन्या हो सकती है या (२) किसी अन्य व्यक्ति की परिणीता पत्नी-अन्योढा। नाटकादि रूपकों में अंगी या प्रधान रस के आलम्बन के रूप में अन्योढा-दूसरे की परिणीता पत्नी-का वर्णन कभी नहीं करना चाहिए; क्योंकि दूसरे की विवाहिता पत्नी के प्रति प्रेम करना नीति- विरुद्ध तथा शास्त्रवर्जित है। किन्तु, संस्कृत के अनेक मुक्तक पद्यों में एसी नायिका के प्रति प्रेम का वर्णन मिलता है। अनूढा कन्या के प्रति प्रेम का वर्णन बहुत अधिक मिलता है; क्योंकि ऐसा प्रेम शास्त्र या नीति के विरुद्ध नहीं है। अनूढा कन्या का रूप हमें शकुन्तला, मालती, सागरिका आदि में देखने को मिलता है। कन्या के प्रति अनुराग अंगी रस तथा अंगरस का भी अंग हो सकता है। इसलिए कन्या के प्रति अनुराग का वर्णन करने में कोई दोष नहीं है। सामान्या या गणिका : नायिका का तीसरा भेद साधारणा, सामान्या या गणिका है। गणिका कलाचतुर, प्रगल्भा तथा धूर्त्त होती है। वह दूसरे के धन की ही इच्छा रखती है, उसे प्रेम से कोई सम्बन्ध नहीं। वह गुण-रहित व्यक्ति से भी द्वेष नहीं करती और गुणी से भी श्रेम नहीं करती। कई रूपकों में-विशेषतः प्रकरण, प्रकरणिका तथा भाण में गणिका का भी नायिका के रूप में चित्रण होता है। मृच्छकटिक तथा चारुदत्त प्रकरणों की नायिका वसन्तसेना गणिका ही है। प्रहसन के अतिरिक्त अन्य रूपकों में गणिका को नायक के प्रति अनुरक्त रूप में चित्रित किया जाता है। यदि नायक दिव्य कोटि का हो या राजा हो, तो रूपक में गणिका का अवतरण नहीं करना चाहिए। शारदातनय ने रुद्रट का मत उद्धृत किया है कि गणिका के प्रेम में शृंगार नहीं, वरन् शृंगाराभास होता है :
शृङ्गाराभास एव स्यान्न शृङ्गारः कदाचन। इति द्विषन्तमुद्दिश्य प्राह श्रीरुद्रटः कविः ॥१ दशा के आधार पर वर्गीकरण : नायिका का तीसरा वर्गीकरण उसकी दशा के अनुसार किया गया है। इसके अनुसार उपर्युक्त १६ प्रकार [स्वकीया १३+परकीया २ (अन्योढा और अनूढा) +साधारणा १] की नायिकाओं में से प्रत्येक आठ प्रकार की होती है। ये आठ भेद निम्नलिखित हैं : स्वाधीनपतिका : जिस नायिका का नायक उसके समीप रहकर उसके अधीन होता है, उसे स्वाधीनपतिका अथवा स्वाधीनभत्तृका कहते हैं। ऐसी नायिका नायक की समीपता के कारण सदा प्रसन्न रहती है, उसके रतिगुण से आकर्षित होकर प्रिय उसका संग कभी नहीं छोड़ता है। वासकसज्जा : जो नायिका प्रिय के आने के समय हर्ष से अपने-आपको सजाती है, उसे वासकसज्जा कहते हैं। वासकसज्जा को प्रिय के आगम का निश्चय रहता है और १. भावप्रकाशन, चतुर्थ अधिकार, पृ० ९५
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२३२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास सजाये हुए महल में सखियाँ उसे आभूषित करती हैं। ऐसी नायिका अपने-आपको सजाती ही है, अपने घर को भी सजाती है। विरहोत्कण्ठिता : जिस नायिका का प्रिय आने का निश्चय करके भी दैववश नहीं आ सके और इससे जो खिन्न रहती है, उसे विरहोत्कण्ठित कहते हैं। नायिका जानती रहती है कि उसका प्रिय अपराधी नहीं है, केवल विलम्ब करने के कारण वह उत्कण्ठित होकर नायक की प्रतीक्षा करती है। उसके हृदय में आशा और निराशा का संघर्ष होता रहता है।ै मए खण्डिता : जब नायक अन्य स्त्री के संसर्ग को प्रकट करनेवाले चिह्नों के साथ नायिका के पास जाय और नायिका को नायक के अपराध का पता लग जाय एवं नायिका इस अपराध के कारण ईर्ष्या से कलुषित हो जाय, तो वह खण्डिता कहलाती है। खण्डिता नायिका का नायक धृष्ट कहलाता है या यों कहा जा सकता है कि नायक के धृष्ट होने से ही नायिका खण्डिता होती है। कलहान्तरिता : कलहान्तरिता नायिका नायक के अपराध करने पर पहले उसका तिरस्कार कर देती है, नायक के प्रार्थना करने पर भी कोध के कारण उसका अनादर कर देती है, और फिर वियुक्त हो जाने के बाद अपने व्यवहार पर पश्चात्ताप करने लगती है। विप्रलब्धा : संकेत देकर भी प्रिय जिसके पास संकेत-स्थल तथा समय पर नहीं उपस्थित हो, अतः जो नायिका अपने-आपको अत्यन्त अपमानित समझती है, वह विप्रलब्धा कहलाती है। विप्रलब्धा नायिका संकेत-स्थल पर नायक से मिलने जाती है, परन्तु वहाँ नायक को नहीं पाकर क्षुब्ध होती है; क्योंकि वह नायक के द्वारा ठगी जाती है। प्रोषितप्रिया : जिस नायिका का प्रिय किसी कार्य में फँसकर दूर देश में चला जाता है, वह प्रोषितप्रिया या प्रोषितभत्तका कहलाती है। आगे चलकर भूत, वर्त्तमान और भावी-तीन प्रकार की प्रोषितप्रिया नायिका मानी गई। भूत प्रोषितप्रिया को प्रोषितपतिका, वर्त्तमान प्रोषितप्रिया को प्रवत्सत्पतिका और भावी प्रोषितप्रिया को प्रवत्स्यत्पतिका कहते हैं। अभिसतारिका : जो नायिका काम के वशीभूत होकर किसी संकेत-स्थल पर नायक को बुलावे या स्वयं जाय, वह अभिसारिका कहलाती है। कविराज विश्वनाथ ने कुलीन कामिनी, वेश्या तथा दासी के अभिसरण की अलग-अलग रीतियों पर प्रकाश डाला है। यदि कुलकामिनी अभिसरण करेगी तो भूषणों को निःशब्द करके दबे पाँव, घूंघट निकालकर जायगी। वेश्या सुन्दर वेश धारण करके नूपुर और कंकण झनकारती जायगी। दासी नशे में चूर उल्टी-सीधी बातें करती, विलास में प्रफुल्ल-नयन और बहकी चाल में अभिसरण करेगी। अभिसरण-स्थान खेत, बगीचा, टूटा मन्दिर, दूती का घर, निर्जन स्थान, जंगल, श्मशान या नदी-तट हुआ करते हैं। आगे चलकर आचार्यों ने
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अभिसारिका के दो भेद किये -दिवा-अभिसारिका और निशा-अभिसारिका। फिर, निशा-अभिसारिका के भी शुक्लाभिसारिका और कृष्णाभिसारिका दो भेद किये गये। नायिका की इन आठ अवस्थाओं में से किसी एक में दूसरी अवस्था का अन्तर्भांव नहीं हो सकता; क्योंकि वे आपस में सवथा भिन्न होती हैं। समयानुसार एक ही नायिका की सभी अवस्थाएँ हो सकती हैं, परन्तु कोई भी दो अवस्थाएँ एक साथ वर्त्तमान नहीं रहती हैं। उदाहरणार्थ, स्वाधीनपतिका वासकसज्जा नहीं हो सकती; क्योंकि वासकसज्जा का पति आनेवाला होता है, उसके पास नहीं रहता। इसी प्रकार, वासकसज्जा को स्वाधीनपतिका या प्रोषितपतिका नहीं मान सकते। स्वाधीनपतिका का पति उसके पास रहता है, इसलिए वह विरहोत्कण्टिता, कलहान्तरिता या विप्रलब्धा नहीं हो सकती। वह खण्डिता भी नहीं है; क्योंकि अपने पति का कोई अपराध नहीं जानती। वह अभिसारिका भी नहीं है; क्योंकि न पति को अपने पास बुलाने की आवश्यकता होती है और न स्वयं उसके समीप जाने की। इसी प्रकार, विरहोत्कण्ठिता वासकसज्जा से भिन्न है; क्योंकि उसके पति के आने की अवधि बीत गई रहती है। विप्रलब्धा का पति आने का वचन देकर भी उसे धोखा देने के उद्दश्य से नहीं जाता, अतः वह वासकसज्जा या विरहोत्कण्ठिता से भिन्न है। कलहान्तरिता में खण्डिता का अन्तर्भाव नहीं हो सकता; क्योंकि उसका प्रिय अनुनय-विनय करता है, जिसे वह अस्वीकार करके पीछे पछताती है। परकीया नायिका की ये आठ अवस्थाएँ नहीं होती। उनकी तीन ही अवस्थाएँ होती हैं, चाहे वह ऊढा हो या अनूढा। संकेत-स्थल पर जाने से पहले परकीया विरहोत्कण्ठिता होती है। जब वह विदूषक, दूती या किसी अन्य व्यक्ति के साथ प्रिय के पास जाती है, तो अभिसारिका हो जाती है। किन्तु, यदि उसका प्रिय संकेत-स्थल पर नहीं आया, तो वह विप्रलब्धा हो जाती है। परकीया की ये ही तीन अवस्थाएँ होती हैं, शेष पाँच नहीं होतीं। स्वकीया के प्रति नायक के प्रेम को परकीया खण्डित करती है। वस्तुतः, परकीया से सम्बन्ध हो जाने पर स्वकीया ही खण्डिता होती है; स्वकीया के सम्बन्ध से परकीया नहीं। इसी प्रकार, जब प्रिय विदेश चला जाता है, तो परकीया प्रोषितपतिका नहीं होती। मिलने के पहले नायिका और नायक के बीच देश का सदा व्यवधान बना रहता है। इसीलिए, वह मिलन के लिए उत्सुक केवल विरहोत्कण्ठिता ही हो सकती है। परकीया का प्रिय उसके अधीन नहीं होने के कारण उसकी तीन ही अवस्थाएँ होती हैं, अन्य अवस्थाएँ नहीं होतीं। धनिक का यह मत विश्वनाथ ने भी उद्धत किया है, परन्तु नाम नहीं देकर 'इतिकश्चित्' लिख दिया है। विश्वनाथ ने कहीं-कहीं इन भेदों का सांकर्य भी माना है। उदाहरण के लिए उन्होंने माघ के चार श्लोक उद्धृत किये हैं।* पा इस प्रकार, नायिकाओं के पूर्वोक्त सोलह भेदों को इन आठ भेदों से गुणा करने पर एक सौ अट्ठाईस (१x६८=१२८) भेद होते हैं। इन सभी नायिकाओं के उत्तम,
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मध्यम तथा अधम तीन-तीन भेद होते हैं। इस प्रकार नायिकाओं के १२८X३=३८४ भेद हुए। पुराने आचार्यों ने भी ये ३८४ भेद माने हैं। धनंजय, विश्वनाथ आदि ने तो ये भेद माने ही, शारदातनय ने रुद्रटाचार्य का मत भावप्रकाशन में उद्धत किया है। रुद्रट ने भी नायिकाओं के ये ३८४ भेद माने हैं। विश्वनाथ ने मुग्धा, मध्या तथा प्रगल्भा के अनेक भेद गिनाये हैं। यदि उन्हें लें तो यह संख्या बहुत अधिक हो जायगी। इत्थं शतत्रयं तासामशीतिश्चतुरूत्तरा। संख्येयं रुद्रटाचार्येरुपभोगाय दशिता।।' ह उपर्युक्त आठ नायिकाओं के सामान्य भूषणों का भी उल्लेख किया गया है। इनमें से आरम्भिक दो-स्वाधीनपतिका तथा वासकसज्जा-में करीड़ा, उज्जवलता एवं हर्ष विद्यमान रहते हैं। शेष छह विरहोत्कण्ठिता, खण्डिता, कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितपतिका तथा अभिसारिका नायिकाओं में चिन्ता, निःश्वास, स्वेद, अश्रु, वैवर्ण्य तथा ग्लानि-ये आभूषण पाये जाते हैं। PI निम्नलिखित कोष्ठक में नायिका के १६ भेद स्पष्ट किये गये हैं: नायिका
स्वकीया परकीया सामान्या
मुग्धा मध्या प्रगल्भा ऊढ़ा अनूढ़ा
धीरा अधीरा धीराधीरा
ज्येष्ठा कनिष्ठा धीरा अधीरा धीराधीरा
ज्येष्ठा कनिष्ठा ज्येष्ठा कनिष्ठा ज्येष्ठा कनिष्ठा
ज्येष्ठा कनिष्ठा ज्येष्ठा कनिष्ठा
TF IF नायिका-भेद की परम्परा : आचार्यों ने सभी लक्षण-ग्रन्थों में प्रायः विभाव की व्याख्या करते समय नायक-नायिका-भेद का विवेचन किया है। उन्होंने नायक और नायिका के अनेक भेद करके उनके गुणों का विस्तृत वर्णन किया है। धनंजय ने दशरूपक में जिस प्रकार पात्नों की योजना की है, उत्तरवर्ती आचार्यों में प्रायः सभी ने उसे स्वीकार किया। धनंजय ते
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साहित्यदर्पण और रसमंजरी में ही इस विषय की विशेष सामग्री प्राप्त होती है। इस प्रसंग में दशरूपक का महत्त्व इसलिए है कि भरत मुनि के शताब्दियों बाद इसी ग्रन्थ में सर्वप्रथम इस विषय का विस्तृत विवेचन मिलता है। धनंजय ने भी भरत मुनि के ही सदृश अभिनय को ही ध्यान में रखकर नायिका-भेद का वर्णन किया है। वस्तुतः, नायिका- भेद अभिनय के ही कारण उत्पन्न हुआ, काव्य में तो पीछे चलकर इसका समावेश हुआ। I धनंजय ने भरत मुनि द्वारा उल्लिखित स्वाधीनपतिका आदि आठ नायिकाओं के अतिरिक्त मुग्धा, मध्या और प्रगल्भा-ये तीन भेद किये हैं। फिर मुग्धा के वयोमुग्धा, काममुग्धा, रतिवामा और कोपमृदु-ये चार भेद; मध्या के यौवनवती और कामवती- ये दो भेद, और प्रगल्भा के गाढ़ यौवना, भाव-प्रगल्भा और रति-प्रगल्भा-ये तीन भेद किये हैं। बाद में व्रजभाषा-कवियों ने नायिका के जिन भेदों का वर्गीकरण किया है, वह धनंजय-कृत उपभेदों के अनुकूल नहीं है। संस्कृत-साहित्य में नायिका-भेद का विस्तृत विवेचन करनेवालों में भानुदत्त सबसे प्रधान हैं। उन्होंने अपने ग्रन्थों-रसतरंगिणी तथा रसमंजरी-में बहुत विस्तारपूर्वक विवेचन किया है। इस विषय में रसमंजरी का विशेष महत्त्व है। कविराज विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में काव्य के अन्य अंगों का तो विद्वत्तापूर्ण विवेचन किया ही है, नायिका-भेद की भी विस्तृत चर्चा की है। व्रजभाषा के आचार्यों ने नायिका-भेद के विवेचन में साहित्यदर्पण और रसमंजरी-दोनों ग्रन्थों से भरपूर सहायता ली है। फिर भी, उन्होंने साहित्यदर्पण से अधिक रसमंजरी को अपने विवेचन का आधार बनाया और उसी के आधार पर व्रजभाषा-काव्य के नायिका-भेद की परम्परा निश्चित की गई है। इन आचार्यों ने साहित्यदर्पण का भी पूर्ण उपयोग किया है; क्योंकि उक्त ग्रन्थ में एक ही स्थान पर सभी काव्यांगों का वर्णन किया गया है। रस-प्रकरण में साहित्यदर्पण का विशेष उपयोग किया गया, परन्तु नायिका-भेद में साहित्यदर्पण से भी अधिक रसमंजरी का आधार ग्रहण किया गया है। व्रजभाषा के आचार्यों ने रसमंजरी में व्णित नायिकाओं का क्रम तो ग्रहण किया ही, साथ ही उसके रस-कथन का ढंग भी अपना लिया। इन आचार्यों ने साहित्यदर्पण में वणित नायिकाओं के उपभेद नहीं स्वीकार किये और रसमंजरी में वर्णित उपभेद तथा अन्य नायिकाओं को उसी रूप में ग्रहण कर लिया। अतः, नायिका- भेद के विवेचन में साहित्यदर्पण की अपेक्षा रसमंजरी को ही आधार मानना युक्तिसंगत होगा। यदि साहित्यदर्पण तथा रसमंजरी की पारस्परिक तुलना की जाय, तो इस कथन की सत्यता और भी अधिक स्पष्ट हो जायगी। व्रजभाषा के आचार्य : व्रजभाषा के आचार्यों में केशवदास, मतिराम, देव, पद्माकर और भिखारीदास बहुत प्रसिद्ध हैं। इनके नायिका-भेद-वर्णन में कोई विशेष नवीनता नहीं है। सभी ने साहित्यदर्पण और रसमंज़री की ही बातों को थोड़ा घटा-बढ़ाकर
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कहा है। देव का विवेचन सबसे अधिक विस्तृत है; क्योंकि उन्होंने देशानुसार २६ प्रकार की अन्य नायिकओं का भी उल्लेख किया है। अन्य आचार्यों की अपेक्षा देव के विवेचन में कुछ नवीनता भी है। हरिऔध : इस बीसवीं शताब्दी में नायिका-भेद के विवेचन की परिपाटी को हरिऔधजी ने फिर से जीवित किया। उन्होंने अपने 'रसकलश' में जाति के अनुसार नायिकाओं के चार भेद किये-पद्मिनी, चित्रिणी, शंखिनी और हस्तिनी। इस वर्गीकरण में कोई नवीनता नहीं; क्योंकि यह कामशास्त्र के अनुसार है। प्रकृति-सम्बन्धी भेद करते हुए उन्होंने उत्तमा के आठ भेद किये हैं : पति-प्रेमिका, परिवार-प्रेमिका, जाति-प्रेमिका, देश-प्रेमिका, जन्मभूमि-प्रेमिका, निजतानुराग-प्रेमिका, लोक-सेविका और धर्म-प्रेमिका। मध्यमा के भी उन्होंने दो भेद किये हैं-व्यंग्यविदग्धा और मर्मपीडिता। उन्होंने शेष धर्म-सम्बन्धी और स्वभाव-सम्बन्धी वे ही भेद किये हैं, जो भेद अन्य आचार्यों के अनुसार हैं। इस बीसवीं शती में भी वे नायक के सखा के भेदों में पीठमर्द, विट और चेट को नहीं भूल सके हैं। अभिनव भरत : अभिनव नाट्यशास्त्र के रचयिता आचार्य सीताराम चतुर्वेदी 'अभिनव भरत' ने मनुष्यों का कई प्रकार से वर्गीकरण किया है। रंग की दृष्टि से, शरीर की दृष्टि से, आकृति की दृष्टि से, गुण की दृष्टि से, अनेक तरह से वर्गीकरण किया गया है। फिर तरुण पुरुष तीन प्रकार के बताये गये हैं। उन्होंने वय के अनुसार स्त्रियों के सात भेद बताये-शिशु, बाला, कुमारी, किशोरी, युवती, प्रौढ़ा और वृद्धा। फिर युवती स्त्रियों के चार भेद बताये। अभिनव भरत प्रौढ़ा स्त्रियों के प्रति विशेष कटु हैं। फिर उन्होंने सौत, विधवा, अपुत्ा, पुंश्चली, अपमानिता, ताडिता, पीडिता एवं कामार्त्ता स्त्रियों के स्वाभावों का विश्लेषण किया है। आगे चलकर उन्होंने वर्गगत स्वभाव का भी विश्लेषण किया है। उन्होंने वर्ण, देश, सामाजिक वर्ग, जाति, पेशा आदि के आधार पर वर्ग-स्वभाव का विवरण दिया है। इस वर्गोकरण की आलोचना : १. अभिनव भरत ने मनुष्यों का जो वर्गीकरण किया, उसमें नवीनता है। अभी तक सभी नाट्याचार्य धनंजय और विश्वनाथ द्वारा बताई लीक पर ही चलते रहे और प्रायः सभी द्वारा दिया वर्गीकरण लगभग समान ही है। परन्तु, अभिनव भरत ने सर्वथा नवीन दृष्टिकोण अपनाया है। २. यह वर्गीकरण आवश्यकता से अधिक विस्तृत है और कहीं-कहीं अनावश्यक भी लगता है। इतनी दृष्टियों से वर्गीकरण की आवश्यकता नहीं जान पड़ती। ३. प्रस्तुत नाट्याचार्य स्त्रियों के प्रति कुछ कटु हैं। माह ४. इनका वर्गीकरण शृंगार के सीमित क्षेत्र से निकलकर बहुत व्यापक क्षेत्र में हुआ है।
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२३८ 1 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अक यहाँ इस बात की ओर भी संकेत कर देना आवश्यक है कि व्रजभाषा के सभी आचार्यों और हरिऔवजी की दृष्टि, नायिका-भेद के विवेचन में, काव्य पर रही है, नाटक पर बिल्कुल नहीं। अन्तःपुर : नायक अथवा राजा के अन्तःपुर में अनेक नायिकाएँ रहती हैं। भरत मुनि ने कई नायिकाओं का उल्लेख किया है। नायिकाओं में नायक की पट्टरानी को महादेवी कहते हैं। वह अवस्था तथा प्रतिष्ठा में अपने पति के समकक्ष होती है। अन्य नायिका के प्रति पति के प्रेम से उसे क्लेश होता है। महादेवी उच्चकुलोत्पन्न, क्रोध-रहित, ईर्ष्या-रहित, राजा का स्वभाव समझनेवाली, पति की मंगल-कामना करनेवाली, पतिव्रता, समृद्धि में शान्त रहनेवाली, शान्त, पति के साथ रहनेवाली और क्षमायुक्त होती है। देवी वह नायिका है, जो लगभग इन गुणों से युक्त होती है, साथ ही वह राजपुत्री, गर्वित, सम्भोग-तत्पर, अल्पवयस्क, उज्ज्वल गुणों से युक्त, अपने गुणों पर इतरानेवाली, नित्य बनी-ठनी रहनेवाली, अपनी सौतों से जलनेवाली और यौवन के गुणों से उन्मत्त होती है। महादेवी मूर्धाभिषिक्त होती है और अन्तःपुर के हित में लीन रहती है, परन्तु देवी नायक के प्रेम का ही अधिक आनन्द उठाती है। उसे अन्तःपुर के कार्यों से कोई विशेष प्रयोजन नहीं रहता। स्वामिनी वह नायिका है, जो किसी अमात्य या सेनापति की पुत्री होती है। वह शील-रूप-गुण से युक्त और नायक की प्रेम-पात्री होती है। वह सुन्दर होती है तथा अपनी बुद्धि से आकर्षक बनती है और सभी उसका सम्मान करते हैं। सेनापति, अमात्य या अन्य राजसेवकों की जो कन्या बड़े प्रेम तथा सम्मान से पालित होती है, जो अपने शील, स्वभाव, रूप और गुण के कारण राजा की प्रिया बन जाती है और अपने गुणों के कारण उच्च पद प्राप्त कर लेती है, वह स्वामिनी कहलाती है। इनके अतिरिक्त नायक की कई अन्य उपपत्नियाँ होती हैं, जो प्रायः निम्न- कुलोत्पन्न होती हैं। स्थायिनी नायिका रूप-यौवन से सम्पन्न तथा कर्कश स्वभाव की होती है। वह रति-सम्भोग में कुशल, व्यावहारिक कार्यों में दक्ष और उदात्त होती है। वह ईर्ष्या-रहित तथा कोमल हृदय की नायिका रहती है। भोगिनी नायिका सुशील, अल्प सम्मानवाली, कोमल तथा मध्यस्थ होती है। अन्तःपुर में कई परिचारिकाएँ भी होती हैं, जिनके हाथ में किसी-न-किसी विभाग का कार्य रहता है। छत्धारिणी तथा चामरधारिणी परिचारिकाएँ रहती हैं। अंग-रक्षा के लिए यवनी रखी जाती है। महत्तरा कई कार्यों के अतिरिक्त धार्मिक अनुष्ठानों का सम्पादन कराती है। प्रतिहारी द्वार पर रहती है और सन्धि तथा विग्रह-जैसी महत्त्वपूर्ण राजनीतिक घटनाओं की सूचना राजा को देती है। सिछा भरत ने अन्तःपुर की कई अन्य प्रकार की स्त्रियों का विवरण दिया है। रूप- यौवन से युक्त, झगड़ालू, ऐठ में रहनेवाली, सम्भोग में अत्यन्त चतुर, सौतिया डाह रखनेवाली, पत्र लिखने और चित्र बनाने में चतुर, मधुर, सरल स्वभाव की, चिकनी-