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शक्ल प PIPU: नाट्य-लक्षण पकिशार [१४९
तथा गीत-विधि के बाद ही इसका प्रयोग बताया गया है, परन्तु चतुर्थकार का प्रवेश बहुत पीछे माना गया है। परिवर्तिनी ध्रुवा के प्रयोग के बाद चतुर्थकार के प्रवेश की चर्चा है, जो पुष्पों से कुतप, जर्जर तथा सूत्रधार की पूजा करता है। माना जा सकता है कि या तो चित्ररंग में पूर्वरंग के प्रसंग में परिवर्त्तन के सम्पादन में ही चारों परिवर्तनों का समाहार हो जाता है या बीच की अन्य विधियों को निकाल देने का ही अर्थ हो सकता है। चतुर्थकार के प्रयोग के बाद यहाँ गन्धर्वों या कुशल संगीतज्ञों के द्वारा उदात्त गानों के प्रयोग का उल्लेख है। सामने देवांगनाएँ अंगहारों के साथ नृत्य करें। नृत्त के प्रकरण में पिण्डी- बन्धों से युक्त, रेचक तथा अंगहारों के द्वारा न्यास और उपन्यास के प्रयोग-सहित ताण्डव- नृत्य की जो विधि बताई गई है, कुशल नाट्याचार्य उनका प्रयोग चित्र-पूर्वरंग में करते हैं। इस प्रकार, उचित रीति से शुद्ध या चित्र, जो भी पूर्वरंग प्रासंगिक हो, उसका उचित सम्पादन करना चाहिए। आ्रा उस समय सभी देवांगनाएँ (देवांगनाओं के वेश में नर्त्तकिरया) अन्त्हित हो जाती हैं। उन सभी नर्त्तकियों के निकल जाने पर पूर्वरंग के अन्य अंगों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार, विधानपूर्वक शुद्ध पूर्वरंग चित्र-पूर्वरंग में बदल जाता है। यहाँ नृत्त, गीत आदि। का असन्तुलित प्रयोग नहीं होना चाहिए, नहीं तो सामाजिकों का मन खिन्न हो जाता है जैसा भी पूर्वरंग प्रयुक्त हुआ हो, उसके समाप्त हो जाने पर सूत्रधार को अपने सहकारियों के साथ रंग से बाहर निकल जाना होता है। भरत ने पूर्वरंग के ही साथ स्थापक की भी चर्चा की है। इस प्रकार, उपर्युक्त विधि से पूर्वरंग के प्रयोग का सम्पादन होने के बाद वहाँ सूत्रधार के गुण तथा आकृतिवाला स्थापक प्रवेश करता है। उस समय देवता और ब्राह्मणों की प्रशंसा से गर्भित चारी का प्रयोग किया जाता है। अनेक प्रकार के भावों तथा रसों से युक्त मधुर श्लोकों से सामाजिकों को प्रसन्न करके कवि के नाम का कीर्तन किया जाता है। फिर, कथावस्तु का संकेत दिया जाता है। अन्त में, भरत मुनि ने पूर्वरंग का फल-कथन किया है। उन्होंने बताया है कि जो पूर्वरंग का विधिपूर्वक प्रयोग करता है, वह कुछ भी अशुभ नहीं प्राप्त करता है और स्वर्गलोक को जाता है। जो विधि की अवहेलना करके स्वच्छन्दतापूर्वक पूर्वरंग का प्रयोग करता है, वह पतन को प्राप्त करता है और तिर्यक योनि में जन्म धारण करता है। ऐसा विश्वास किया जाता था कि उपर्युक्त क्रियाओं से अप्सराएँ, गन्धर्व, दैत्य, दानव, राक्षस, गुह्यक, यक्ष तथा अन्य देवगण प्रसन्न होते हैं और नाटक निर्विघ्न समाप्त होता है। नाट्यशास्त्र के पश्चात् इस विषय पर जो पुस्तकें लिखी गई, उनमें इतना विस्तार नहीं किया गया है। दशरूपक तथा साहित्यदर्पण में बहुत संक्षेप में इसका केवल उल्लेख कर दिया गया है। इससे अनुमान होता है कि बाद में इतने आडम्बर से यह क्रिया नहीं होती होगी। साहित्यदर्पण से स्पष्ट आभास मिलता है कि विश्वनाथ के समय में इतनी लम्बी किया नहीं होती थी।
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प्रस्तावना भरत ने लिखा है कि रसों से समन्वित, सुन्दर वाक्योंवाले, मधुर श्लोकों से रंग (सामाजिक) को प्रसन्न करके कवि के नाम का कीर्तन किया जाता है। इसके बाद कथावस्तु के सन्दर्भ का संकेत देने के लिए उद्घातक का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार से प्रस्तावना करके प्रस्तावक रंगस्थल से निकल जाय। धनंजय आदि आचार्यों ने भारती वृत्ति के चार भेद बताये हैं-प्ररोचना, वीथी, प्रहसन तथा आमुख। वास्तव में, प्ररोचना तथा आमुख नाटक की भूमिका या प्रस्तावना- मात्र है और वीथी तथा प्रहसन रूपक के भेद हैं। परन्तु, नाट्याचार्य यह स्वीकार करते हैं कि वीथी के अंग नाटक के किसी भाग में, विशेषत; प्रथम सन्धि में, उपयुक्त होते हैं, अतः स्पष्ट रूप से वे वृत्ति के अविच्छिन्न अंग हैं। १. प्ररोचना : काव्यार्थ आदि की प्रशंसा के माध्यम से सामाजिकों को उसकी ओर आकृष्ट करना प्ररोचना कहलाता है। इसमें प्रस्तुत की प्रशंसा करके लोगों की उत्कण्ठा बढ़ाई जाती है। अपने सम्बन्ध में कवि अपनी प्रकृति के अनुरूप चार प्रकार से प्ररोचना का प्रयोग करता है। प्रकृति के अनुसार कवि भी चार प्रकार के होते हैं-उदात्त, उद्धत, प्रौढ एवं विनीत। उदात्त कवि मन में छिपे हुए अभिमान से भरी हुई उक्ति का प्रयोग करते हैं। उद्धत कवि दूसरे के अपवाद करने पर अपने उत्कर्ष का कथन करते हैं। प्रौढ़ कवि अपने उत्कर्ष का कथन किसी युक्ति से स्पष्ट करते हैं। विनीत कवि विनयपूर्वक अपने उत्कर्ष का वर्णन करते हैं। २. आमुख : जहाँ सूत्रधार नटी, मार्ष (पारिपाश्वक) या विदूषक के साथ वार्त्तालाप करते हुए विचित्र युक्ति से प्रस्तुत वस्तु का संकेत करते हुए अपने कार्य का वर्णन करें, उसे आमुख कहते हैं। आमुख के लक्षण में शारदातनय ने धनंजय का श्लोक लिखा है, किन्तु एक स्थान पर थोड़ा परिवर्त्तन कर दिया है। सूत्रधारो नटीं बूते मार्षं वाथ विदूषकम्। स्वकार्यं प्रस्तुताक्षेपि चित्रोक्त्या यत्तदामुखम्।।१ विश्वनाथ के भी वाक्य मिलते-जुलते हैं। उन्होंने कुछ विस्तार कर दिया है। शारदातनय ने भी कुछ अधिक पंक्तियाँ लिखी हैं, जो पूर्वोक्त कारिका की व्याख्या के रूप में हैं। आमुख को प्रस्तावना भी कहते हैं। धनंजय और शारदातनय ने आमुख के तीन अंग माने हैं- कथोद्घात, प्रवृत्तक तथा प्रयोगातिशय। अग्निपुराण भी तीन ही अंग मानता है : आमुखं तत्तु विज्ञेयं बुधैः प्रस्तावनादि सा। प्रवृत्तकं कथोद्घातः प्रयोगातिशयस्तथा॥२ १. दशरूपक, तृतीय प्रकाश, का० ७-८ । भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २२९ २. अग्निपुराण, अध्याय ३३७, श्लोक १३
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परन्तु, विश्वनाथ के अनुसार आमुख के पाँच अंग होते हैं-उद्घातक, कथोद्घात, प्रयोगातिशय, प्रवर्त्तक और अवलगित। (क) कथोद्घात : सूत्रधार के समान घटनावाले वाक्य अथवा वाक्यार्थ को लेकर उसी के अनुकूल उक्ति का प्रयोग करते हुए जब कोई नाटकीय पात्र प्रथम अंक में मंच पर प्रवेश करता है, तो उस आमुख या प्रस्तावना को कथोद्घात कहा जाता है। यह दो प्रकार का होता है-वाक्यमूलक और वाक्यार्थमूलक। वाक्यमूलक कथोद्घात का प्रसिद्ध उदाहरण 'रत्नावली' नाटिका में पाया जाता है, जहाँ सूत्रधार के वाक्य 'द्वीपादन्यस्मादपि' आदि का प्रयोग करता हुआ यौगन्धरायण रंगमंच पर प्रवेश करता है। वाक्यार्थमूलक कथोद्घात का उदाहरण 'वेणी-संहार' की प्रस्तावना में पाया जाता है। भीमसेन सूत्रधार द्वारा प्रथुक्त वाक्य का अर्थ लेकर उसी के अनुकूल उक्ति का प्रयोग करता हुआ प्रवेश करता है। कथोद्घात के लक्षण में शारदातनय ने धनंजय का श्लोक लिखा है : स्वेतिवृत्तं समं वाक्यमर्थ यत्र च सूत्रिणः । गृहीत्वा प्रविशेत्पात्रं कथोद्घातो द्विधैव सः ।'
शारदातनय ने 'द्विधव सः' के स्थान पर 'द्विधोच्यते' कर दिया है। (ख) उद्घातक : उद्घातक का उल्लेख धनंजय तथा शारदातनय ने नहीं किया, विश्वनाथ ने ही किया है। अप्रतीतार्थक पदों के अर्थ की प्रतीति कराने के लिए जहाँ और पद साथ में जोड़ दिये जायँ, वहाँ उद्घातक होता है। उदाहरण के लिए मुद्राराक्षस के आमुख का 'कूरग्रह' आदि वाक्य दिया गया है। यह वाक्य सूत्रधार ने नटी से ग्रहण लगने के विषय में कहा है कि 'क्ूरग्रह केतु यद्यपि पूर्णमण्डल चन्द्र का पराभव करना चाहता है'- इसी के आगे नेपथ्य से ध्वनि आई-'अरे, कौन यह मेरे जीते-जी चन्द्रगुप्त का पराभव करना चाहता है ?' यहाँ सूत्रधार का अभिप्राय चन्द्रगुप्त से नहीं है, परन्तु उस अर्थ की प्रतीति कराने के लिए नेपथ्य से चाणक्य के वाक्य में कुछ पद बढ़ाकर पहले जो अर्थ अप्रतीत था, उसकी प्रतीति कराई गई है। यहाँ सब पद अन्यार्थक हैं; क्योंकि सूत्रधार का तात्पर्य चन्द्रग्रहण से है, चन्द्रगुप्त के पराभव से नहीं; तथापि चाणक्य ने अपने हृदयस्थ अर्थ के अनुकूल उन्हें दूसरे अर्थ में संक्रान्त करके रंगमंच पर प्रवेश किया है। शारदातनय ने वाक्यार्थमूलक कथोद्घात का उदाहरण यही दिया है। (ग) प्रवृत्तक : आमुख का प्रवृत्तक नामक भेद वहाँ होता है, जहाँ वसन्त आदि ऋतुओं के वर्णन के साम्य के आधार पर श्लेष के द्वारा किसी पात्र के प्रवेश की सूचना दी जाय। धनिक ने इसके उदाहरण के लिए 'आसादितप्रकट निर्मलचन्द्रहासः' आदि श्लोक उद्धत किया है, जिसमें शरत् ऋतु का वर्णन करने के साथ ही श्लिष्ट पदों के सहारे समान गुणों का वर्णन करते हुए, रामचन्द्र के प्रवेश की सूचना दे दी गई है। १. दशरूपक, अध्याय ३३७, श्लोक ९-१०; भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २२९
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हाक (घ) प्रयोगातिशय : आमुख के प्रयोगातिशय नामक भेद के लक्षण में शारदातनय ने धनंजय द्वारा लिखित श्लोक उद्धत कर दिया है : एषोऽयमित्युपक्षेपात् सूत्रधारप्रयोगतः। पात्रप्रवेशो यत्रैव प्रयोगातिशयो मतः ॥ 'यह वह आ रहा है', इस प्रकार के वचन का प्रयोग करके जहाँ सूत्रधार किसी पात्र का प्रवेश कराता है, उस आमुख को प्रयोगातिशय कहते हैं। उदाहरण के लिए अभिज्ञान शाकुतल में 'एष राजेव दुष्यन्तः' आदि श्लोक से राजा दुष्यन्त के प्रवेश की सूचना दी गई है। यह प्रयोगातिशय नामक आमुख है। परन्तु, विश्वनाथ ने प्रयोगातिशय का जो लक्षण दिया है, वह कुछ भिन्न प्रकार का और अधिक चमत्कारयुक्त है। उनके अनुसार यदि एक ही प्रयोग में दूसरा प्रयोग आरम्भ हो जाय और उसी के द्वारा पात्र का प्रवेश हो, तो उसे प्रयोगातिशय कहा जाता है। उन्होंने अप्राप्य नाटक 'कुन्दमाला' का उदाहरण दिया है। 'इत इतः' इत्यादि नेपथ्य की ओर से सुनकर सूत्रधार ने 'कोऽ्यम्' इत्यादि कहा। सूत्रधार नटी को नृल्य करने के लिए बुलाना चाहता था, परन्तु उसी समय उसने 'इत इतः' सुनकर इस पद्य के द्वारा सीता तथा लक्ष्मण के प्रवेश की सूचना दी है, जिस सीता को वन में ले जाया जा रहा है। सूत्रधार स्वयं निकल गया। यहाँ अपने प्रयोग से उत्कृष्ट प्रयोग दिखाया गया है। (ङ) अवलगित : धनंजय ने जो उदाहरण प्रयोगातिशय का दिया है, उसे विश्वनाथ ने अवलगित का उदाहरण माना है। उनके अनुसार अभिज्ञान शाकुन्तल का श्लोक 'तवास्मि' आदि में अवलगित नामक आमुख हैं। उन्होंने इसका लक्षण दिया, जहाँ एक प्रयोग में सादृश्यादि के कारण समावेश करके किसी पात् का सूचन सिद्ध हो जाय, उसका नाम अवलगित है। उक्त श्लोक कहने के पश्चात् राजा का प्रवेश हुआ। ये ही विश्वनाथ के अनुसार पाँच और धनंजय तथा शारदातनय के अनुसार तीन आमुख या प्रस्तावना के भेद हैं। विश्वनाथ द्वारा निर्दिष्ट प्रस्तावना के दो अतिरिक्त भेद उद्धातक तथा अवलगित वीथी के १३ अंगों में गिनाये गये हैं। विश्वनाथ ने वीथी और प्रहसन को रूपक के भेद मानकर उनका यहाँ विवेचन नहीं किया। परन्तु, धनंजय और शारदातनय ने वीथी का भी इसी स्थल पर विवेचन किया है। ३. वीथी : आचार्यों ने वीथी के १३ अंगों का उल्लेख किया है। वे हैं- १. उद्घात्य-गूढ प्रश्नोत्तर, २. अवलगित-एक-दूसरे से सटे हुए कार्यों के सूचक वाक्य, ३. प्रपंच-हँसानेवाली पारस्परिक मिथ्या स्तुति, ४. त्रिगत- शब्द-साम्य से अनेक अर्थों की योजना, ५. छल-चिकनी-चुपड़ी बातों से बहकाना, ६. वाक्केली-आधा कहकर बाकी के लिए भाँप लेने के लिए छोड़ देना, ७. अधिबल-बढ़-बढ़कर बातें करना, ८. गण्ड-सम्बद्ध विषय से भिन्न अर्थ का उपस्थित हो जाना, ९. अवस्यन्दित-सरस बात
१. दशरूपक, तृतीय प्काश, का० ११; भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० ११९-१२०
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कहकर मुकरने का प्रयत्न, १०. नलिका-गूढ वचन, ११. असत् प्रलाप-ऊटपटांग या असम्बद्ध बात कहना, १२. व्याहार-हँसाने के लिए कुछ-का-कुछ कह देना और १३. मृदव-दोष को गुण और गुण को दोष बता देना। इनमें उद्घात्य तथा अवलगित के दो-दो भेद होते हैं। धनंजय और शारदातनय ने विस्तार के साथ इनके लक्षण तथा उदाहरण दिये हैं। किन्तु, यहाँ विस्तार में जाना अनावश्यक प्रतीत होता है। ४. प्रहसन : वीथी और प्रहसन-दोनों का उद्देश्य सामाजिकों की रुचि को अभिनय की ओर खींचना ही है। इसलिए, विश्वनाथ ने बताया है कि वीथी के अंग प्रहसन के भी अंग हो सकते हैं। दोनों में यही अन्तर है कि वीथी में इनकी योजना आवश्यक है, परन्तु प्रहसन में ऐच्छिक है। किन्तु, 'रसार्णवसुधाकर' में प्रहसन के अन्य भी दस अंग माने गये हैं। वे अंग निम्नांकित हैं-१. अवलगित-जिस आचार या व्यवहार को ग्रहण कर लिया गया हो, उसमें दोष निकालना या उसे छोड़ देना; २. अवस्कन्द-एक अयोग्य वस्तु में अनेक व्यक्तियों द्वारा अपनी योग्यता के अनुसार कथन; ३. व्यवहार-दो-तीन व्यक्तियों का हास्योत्पादक संवाद; ४. विप्रलम्भ- जहाँ भूत के बहाने से छल किया जाय; ५. उपपत्ति-जहाँ किसी प्रसिरद्ध बात को लोक-प्रसिद्ध युक्ति से हास्य का विषय बनाया जाय; ६. भय-नगर-रक्षकों आदि के द्वारा उत्पन्न डर; ७. अनृत-झूठी प्रशंसा करना; 5 विभ्रान्ति-वस्तु-साम्य से उत्पन्न मोह; ९. गद्गद वाक्-झूठे रोने से मिला कथन; १०. प्रलाप-अयोग्य का योग्यता से अनुमोदन करना। वीथी प्रहसन : प्रस्तावना के अंग या रूपक-भेद : प्राचीन नाट्याचार्यों ने भारती वृत्ति का सम्बन्ध केवल नटों से माना और यह बताया कि रंगमंच पर अन्य पात्रों के प्रवेश के पहले ही इसका प्रयोग हो जाना चाहिए। धनंजय ने स्पष्टतः लिख दिया है कि इन वीथ्यंगों के द्वारा अर्थ और पात्र का प्रस्ताव करके प्रस्तावना के अन्त में सूत्रधार चला जाय। परन्तु, अभी जो वीथ्यंगों तथा प्रहसन के अंगों का वर्णन किया गया, उससे ज्ञान पड़ता है कि नाटक के सभी अंगों में भारती वृत्ति का प्रवेश होने लगा था। यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इन प्रयोगों से हास्य रस का उद्रेक होता है और इनसे श्रोताओं का हृदय आनन्द से भर जाता है। ऐसा अनुमान होता है कि आरम्भ में प्रस्तावना के हास्य या आमोदपूर्ण उक्तियोंवाले अंश को वीथी या प्रहसन कहा जाता था, इनको देखने से दर्शकों का चित्त अभिनय की ओर आकर्षित होता था। कुछ दिन बीतने पर, नाटक के आरम्भ में ही नहीं, अन्य अंशों में भी दर्शकों की रुचि को आकर्षित करने की आवश्यकता समझी गई होगी, फलस्वरूप अन्य अंशों में भी इनका प्रयोग होने लगा। सम्भवतः इसीलिए भारती वृत्ति का लक्षण लिखते समय धनंजय ने जो 'नटाश्रय' लिखा था, उसे विश्वनाथ ने 'नराश्रय' में बदल दिया। इस स्थल पर स्वभावतः प्रश्न उसता है कि भारती वृत्ति में जो वीथी और ब्रहसन हैं, इनका सम्बन्ध इन्हीं नामों के रूपकों से है या नहीं? ऐसा जान पड़ता है,
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भारती वृत्ति के वीथी और प्रहसन से ही रूपक-भेद वीथी तथा प्रहसन का विकास हुआ। प्रस्तावना के अंग से विकसित होकर इन्होंने पूर्ण रूपक का स्थान ले लिया और मनुष्य की आमोद-विनोदी प्रकृति का लाभ उठाया। परन्तु, यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि पहले ये प्रस्तावना के अंग-मात्र थे। विवेचन : पूर्वरंग तथा प्रस्तावना के इस विवरण से स्पष्टतः कुछ कठिनाइयां उपस्थित हो जाती हैं। दशरूपक तथा साहित्यदर्पण में पूर्वरंग का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है और नाट्यशास्त्र में बताया गया है कि पूर्वरंग के पूर्ण रूप के अतिरिक्त उसका एक संक्षिप्त अथवा विस्तृत रूप भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त पूर्वरंग तथा नाटक के शेष अंश में अतिव्याप्ति भी हो जाती है; क्योंकि पूर्वरंग का अन्तिम तत्त्व- प्ररोचना में नाटक की वस्तु देना-वस्तुतः, नाटक के शेष अंश का ही तत्त्व है। साहित्य- दर्पण से स्पष्टतः ज्ञात होता है कि विश्वनाथ के समय में पूर्वरंग का पूर्ण विधान नहीं था। अतः, जब हम देखते हैं कि भास के नाटकों की प्रस्तावना में न लेखक और न नाटक के नाम का उल्लेख है, तब सहज ही अनुमान होता है कि प्ररोचना का सारांश पूर्वरंग से हटाकर नाटक के मुख्य अंग में रखने की पद्धति इनके बाद ही प्रचलित हुई। इस विषय में डॉ० कीथ का मत ध्यातव्य है : "The point would be of importance only if it meant that Bhasa dropped the Purva-ranga as part of the drama; nothing, however, even hints at this, as we have seen, his omission to name himself or his play in the prologue tells strongly in favour of the view that the old Prarocana was still in use."9 स्थापक : मंगलाचरण आदि सम्पन्न करके सूत्रधार वापस चला जाता है और उसी प्रकार का वेश धारण करके कोई दूसरा नट प्रवेश करता है, जो नाटक की कथावस्तु के कव्यार्थ की स्थापना करता है, या सूचना देता है। यह नट स्थापक कहा जाता है। सभी आचार्यों ने स्थापक का उल्लेख किया है और बताया है कि यह गुण और आकृति में सूत्रधार के समान होता है। काव्यार्थ की स्थापना करने के कारण यह नट स्थापक कहा जाता है। स्थापक कथावस्तु के अनुरूप ही वेशभूषा बनाकर प्रवेश करता है। यदि कथावस्तु दिव्य हो तो वह दिव्य वेश धारण कर प्रवेश करता है, यदि वह मत्य या मानव-सम्बन्धी हो तो वह नट मर्त्य- रूप धारण कर मंच पर आता है और यदि कथावस्तु मिश्र या दिव्यादिव्य हो तो स्थापक या तो दिव्य रूप में या मर्त्य-रूप में आ सकता है। ऐसी व्यवस्था लगभग सभी आचार्यों ने की है। उसके आने पर कोई उपयुक्त गीत गाया जाता है, वह चारी नृत्य करता है, देवता और ब्राह्मण की प्रशंसा करता है और नाटक तथा लेखक के नाम बतलाता है। स्थापक १. दि संस्कृत ड्रामा, पेज ३४२
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रंगमंच पर आकर काव्यार्थ की स्थापना करते समय रूपक की कथावस्तु, उसकी बीज नामक अर्थ-प्रकृति, मुख्य या प्रमुख पात्र की सूचना देता है। इस तरह सूच्य के भेद से काव्यार्थ की स्थापना चार प्रकार की हो जाती है। दशरूपक के वृत्तिकार धनिक ने इन चारों प्रकारों को विभिन्न नाटकों के स्थापना-प्रकारों के द्वारा दिखाया है। धनंजय तथा शारदातनय-दोनों आचार्यों ने विधान किया है कि स्थापक सबसे पहले काव्यार्थ की सूचना देनेवाले मधुर श्लोकों के द्वारा रंग में स्थित सामाजिकों को प्रसन्न कर किसी ऋतु का वर्णन करते हुए, भारती वृत्ति का प्रयोग करे : रङ्ग प्रसाद् मधुरैः श्लोकः काव्यार्थसूचकः। ऋतु कञ्चिदुपादाय भारतीं वृत्तिमाश्रयेत्॥' स्पष्टतः, शारदातनय ने धनंजय का ही श्लोक उद्धत कर दिया है। विश्वनाथ ने भी लगभग उन्हीं शब्दों में यही बात कही है, केवल निम्नलिखित एक पंक्ति अधिक लिखी है : रूपकस्य कवेराख्यां गोत्राद्यपि स कीर्त्तयेत।२ -अर्थात् रूपक नाटकादि का नाम तथा कवि के नाम-गोत्ादि का भी कीर्तन करता है। स्थापक के विषय में भरत ने लिखा है : प्रयुज्य विधिनैवं तु पूर्वरङ्ग प्रयोजयेत्। स्थापक: प्रविशेत्तत्र सूत्रधारगुणाकृतिः॥।3 -अर्थात् इस प्रकार कथित विधि से पूर्वरंग का प्रयोगानुसार सम्पादन होने के बाद वहाँ सूत्रधार के गुण तथा आकृतिवाला स्थापक प्रवेश करता है। यहाँ 'प्रयुज्य' पद के प्रयोग से ऐसा आभास मिलता है कि स्थापक के रूप में फिर सूत्रधार ही प्रवेश करता है। श्रीमनमोहन घोष ने यह पाठ तुटिपूर्ण मानकर स्थापक और सूत्रधार को भिन्न-भिन्न व्यक्ति माना है। उन्होंने परवर्त्ती आचार्यों के मत से भी अपनी इस मान्यता की पुष्टि की है। धनंजय ने दशरूपक में इस बात का स्पष्ट उल्लेख कर दिया है कि स्थापक सूत्रधार से भिन्न पात्र है : पूर्वरङ्ग विधायादौ सूत्रधारे विनिर्गते। प्रविश्य तद्वदपर: काव्यमास्थापयेन्नटः॥8 -अर्थात् जब सूत्रधार पूर्वरंग का विधान करने के बाद रंगमंच से चला जाता है, तो उसी की तरह की वेश-भूषावाला दूसरा नट रंगमंच पर प्रवेश कर काव्य की स्थापना करे। शारदातनय ने यही बात कही है : १. दशरूपक, तृतीय प्रकाश, का० ४; भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २२८ २. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० २८ ३. नाट्यशास्त्र, अध्याय ५, का० १६१-१६२ ४. दशरूपक, तृतीय प्रकाश, का० २
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१५६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकारी प्रयुज्य रङ्ग निष्काम्येत्सूत्रधार: सहानुगः । स्थापकः प्रविशेत्तत्र सूत्रधारगुणाफृतिः ॥ विश्वनाथ ने भी इसी मत का समर्थन किया है : पूर्वरङ्ग विधायव सूत्रधारो निवर्तते। प्रविश्य स्थापकस्तद्ृत् काव्यमास्थापयेत्ततः ।।' यह भी पता चलता है कि विश्वनाथ के समय में सूत्रधार वह सम्पूर्ण कार्य करता था, जिसे नाट्यशास्त्रियों ने सूत्रधार और स्थापक दोनों को दिया था। उन्होंने लिखा है : 'इदानीं पूर्वरङ्गस्य सम्यक् प्रयोगाभावादेक एव सूत्रधार: सर्व' प्रयोजयतीति व्यवहारः।'3 -अर्थात् आजकल पूर्वरंग का ठीक-ठीक प्रयोग नहीं होता, अतः एक ही सूत्रधार सब कुछ कर देता है। किन्तु यह कहना कठिन है कि यह बात कितने पीछे तक जाती है। राजशेखर के 'कर्पूरमंजरी' और माधव के 'सुभद्राहरण' जैसे नाटकों में केवल सूत्रधार का उल्लेख है। पिशेल का मत है कि भास ने स्थापक को हटा दिया। दशरूपक ने स्थापक की निश्चित रूप से स्थापना की है, किन्तु फिर उसे सूत्रधार कहना आरम्भ किया है। इस तरह एक प्रकार से समझौता हो जाता है कि स्थापक सूत्रधार के गुण तथा आकृतिवाला व्यक्ति होगा और इस प्रकार इस नाम के व्यवहार का कारण बताया जा सकता है। साहित्यदर्पण में स्थापक के कार्य सूत्रधार को दे दिये गये हैं, उससे भी इस मत की पुष्टि होती है। परन्तु, यह भी सम्भव है कि इस मत. का विकास नाट्यशास्त्र के बाद हुआ हो, जिसके लिए इसमें इतना आधार तो है ही कि स्थापक को सूत्रधार के गुण तथा आकृति में प्रवेश करना चाहिए। यदि दोनों एक ही व्यक्ति हैं, तो स्थापक को सूत्रधार के गुण तथा आकृति में प्रवेश करने का निर्देश करने की आवश्यकता ही क्या है? परन्तु ध्यान देने की बात यह है कि 'प्रयुज्य' का अन्य पाठ-भेद नहीं है और इस श्लोक के ऊपर कुछ प्रक्षिप्त पंक्तियाँ हैं, जिनसे स्थापक और सूत्रधार के एक व्यक्ति होने का समर्थन होता है। जहाँ तक गुण तथा आकृति की समस्या है, ऐसा कहा जा सकता है कि वास्तव में सूत्रधार ही अपने पूर्वरूप में स्थापक बनकर आ जाता है। एक ही नट पूर्वरंग में सूत्रधार और प्रस्तावना में स्थापक कहा जाता है। इस मत की पुष्टि अग्निपुराण से भी होती है-'सूत्रधार एव स्थापकः' । आगे चलकर एक ही व्यक्ति सूत्रधार तथा स्थापक दोनों के कार्य करने लगा। नान्दी : नाटक के आरम्भ में नान्दी बहुत महत्त्वपूर्ण, साथ ही उलझन पैदा करनेवाला विषय है। भरत आदि आचार्यों ने नान्दी का रहना आवश्यक माना है, इसे आवश्यक प्रयोग के रूप में स्वीकार किया है। भरत ने इसका लक्षण दिया है : १. भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २२८ २. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० २६ है, साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० २६-२७ की वृच्ति
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नाट्य-लक्षण /१५७
आशीर्वचनसंयुक्ता नित्यं यस्मात्प्रयुज्यते। तस्मान्नान्दीति संजञिता ।१ सूत्रधार मध्यम स्वर में बारह अथवा आठ पदोंवाली नान्दी का पाठ करता है: "सभी देवताओं को नमस्कार, द्विजातियों के लिए शुभ हो, राजा चन्द्र की विजय हो, गायों तथा ब्राह्मणों का मंगल हो, ब्राह्मणों के अतिरिक्त शेष प्रजा-वर्ग का भी मंगल हो, ब्राह्मणद्रोही नष्ट हो जायँ, महाराज इस ससागरा पृथ्वी का शासन करें। राष्ट्र की समृद्धि हो, यह रंग समृद्धि को प्राप्त हो और नाट्य के प्रस्तुतकर्ता को ब्रह्मज्ञानी के समान महान् धर्म का लाभ हो। नाटककार को यश का लाभ हो, उसके धर्म की अभिवृद्धि हो और इस प्रकार के भजन से देवता उससे सदा प्रसन्न रहें।" नान्दी के प्रत्येक पद के पाठ के बाद उसके दोनों पारिपार्श्वक कहते हैं : 'आर्य, ऐसा ही हो।' अवकृष्टा ध्रुवा के गान के पश्चात् नान्दी-पाठ का विधान है। भरत ने नान्दी के विषय में विस्तार से लिखा है। देवता, ब्राह्मण तथा राजा आदि के आशीर्वचनों से युक्त होने के कारण नान्दी अनिवार्य प्रयोग है। इसके बाद रंगद्वार नामक प्रयोग किया जाता है। इस स्थल से वाचिक तथा आंगिक अभिनय की प्रथमतः अवतारणा होती है, इसीलिए इस प्रयोग का नाम रंगद्वार है। यस्मादभिनय .... प्रथमं ह्यवतार्यते। रङ्गद्वारमतो ज्ञेयं वागङ्गाभिनयात्मकम् ॥२ विश्वनाथ का मत : विश्वनाथ ने भी रंगस्थल के विघ्नों के निवारण के लिए नान्दी को अत्यावश्यक माना है। इन्होंने नान्दी का जो लक्षण दिया है, वह भरत का ही दिया हुआ लक्षण है, केवल एक शब्द में अन्तर है। देवता, ब्राह्मण तथा राजादिकों की आशीर्वाद-युक्त स्तुति इससे की जाती है, इसलिए इसे नान्दी कहा जाता है। लोग इससे आनन्दित होते हैं, अतएव यह नान्दी है। विश्वनाथ ने 'अनर्धराघव' का 'निष्प्रत्यूहम्' आदि और अपने पिता द्वारा लिखित नाटक पुष्पमाला का 'शिरसि' आदि पद्य उद्धृत करके लिखा है कि ये पद्य किसी अन्य के मतानुसार नान्दी कह दिये गये हैं, परन्तु वास्तव में ये नान्दी नहीं, प्रत्युत पूर्वरंग का अंग रंगद्वार ही हैं। इसके प्रमाण के रूप में भरत का पूर्वोल्लिखित श्लोक दिया है।3 अभिनय का आरम्भ होने के कारण ही यह नाम दिया गया है। विश्वनाथ का तर्क है कि पूर्वोक्त लक्षणवाली नान्दी तो इस रंगद्वार के पहले ही नटों द्वारा की जाती है, इसलिए महर्षि (भरत) ने यहाँ उसका विशेष लक्षण नहीं किया। अभिप्राय यह है कि सभी नर्त्तक किसी रूप-रचना के विना ही मिलकर मंगल के लिए जो स्तुति आदि करते हैं, उसे नान्दी कहा जाता है। यह नटों का अपना कार्य है और सभी नाटकों में समान है। किसी नाटककार को अपने नाटक में इसके लिए कोई विशेष रचना / १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ५, का० २४ २. वही, अध्याय ५, का० २६ १. बही, अध्याय ५, का० २६
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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास करने की आवश्यकता नहीं, अतः यह नाटक का अंग नहीं। अतएव, नाटक-रचना के प्रसंग में भरत मुनि ने इसका निर्देश नहीं किया। इसके अतिरिक्त यदि नान्दी का पूर्वोक्त लक्षण मानें, तो कालिदास आदि के नाटकों में 'वेदान्तेषु' आदि (विक्रमोर्वशीयम्) श्लोक को अव्याप्ति ही कहना पड़ेगा। इस पद्य में नान्दी का पूर्वोक्त लक्षण लागू नहीं होता; क्योंकि न यह अष्टपदा है और न द्वादशपदा। अतः यह नान्दी नहीं, रंगद्वार ही है। अतः कहा गया है : रङ्द्वारमारभ्य कविः कुर्यात्': रंगद्वार से आरम्भ करके कवि को नाटक की रचना करनी चाहिए, इसीलिए प्राचीन पुस्तकों में 'नान्द्यन्ते सूत्रधारः' इस वाक्य के बाद 'वेदान्तेषु' आदि लिखा है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि यह नान्दी नहीं है, किन्तु नान्दी के अन्त में इसे सूत्रधार ने पढ़ा है। जहाँ यह वाक्य उक्त श्लोक के पीछे मिले, वहाँ समझना चाहिए कि नान्दी के पीछे सूत्रधार ने यह पद्य कहा। शारदातनय ने नान्दी का लक्षण दिया : या क्रिया नन्दते नाट्यारम्भे नान्दीति सा स्मृता।' -जो क्रिया नाटक के आरम्भ में आनन्दित करे, उसे नान्दी कहते हैं। फिर उन्होंने दूसरा भी लक्षण दिया : सभ्यान्नन्दयतीत्येवं सापि नान्दीति कीर्त्यते।२ उन्होंने नान्दी-पाठ विघ्न की शान्ति के लिए परम आवश्यक माना है। नान्दी के बीस अंग माने गये हैं। शारदातनय का मत : प्रत्येक नाटक के आरम्भ में 'नान्द्यन्ते सूत्रधारः' रहता है। शारदातनय ने इन शब्दों का अर्थ करने में काफी समय लगाया है। कुछ नाटकों में नान्दी-श्लोक के पीछे यह वाक्य रहता है और कुछ के पहले ही, और तब सूत्रधार नान्दी- पाठ करता है। यदि 'नान्द्यन्ते' का अर्थ नान्दी-पाठ के बाद है, तब तो भास आदि के नाटकों में यह वाक्य अनुपयुक्त होगा; क्योंकि उनमें सूत्रधार के प्रवेश के पश्चात् नान्दी का पाठ होता है। दोनों विरोधी मतों में समझौता कराने के विचार से शारदातनय ने इस वाक्य के दो अर्थ लगाये हैं-एक तत्पुरुष समास से और दूसरा बहुव्रीहि समास से। तत्पुरुषवाला अर्थ प्रथम श्रेणी के नाटकों के लिए उपयुक्त है और बहुव्रीहिवाला अर्थ द्वितीय श्रेणी के नाटकों के लिए। दूसरी श्रेणी के नाटकों के लिए 'नान्द्यन्ते' का अर्थ होगा : 'जब नान्दी के पहलेवाले अंग सम्पन्न हो जायँ।' इसी प्रकार कुछ नाटकों में प्रयुक्त 'नान्द्यन्ते सूत्रधारः' के पश्चात् सूत्रधार द्वारा नान्दी-पाठ को समुचित ठहराया जा सकता है। अभिनवगुप्त का मत : नान्दी के प्रयोग के विषय में चलनेवाली चर्चा का उल्लेख अभिनवगुप्त ने किया है। एक मत के अनुसार नान्दी पूर्वरंग (ना० शा०, अध्याय ५) के १. भावप्रकाशन, षष्ठ अधिकार, पृ० १९७ २. वही, पृ० १९७
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नाट्य-लक्षण
लिए उपलक्षण है। दूसरा मत है कि भरत केवल नान्दी के प्रयोग का उल्लेख कर रहे हैं। अभिनवगुप्त के उपाध्याय भट्टतोत का मत है कि दैत्यों के द्वारा विघ्न उपस्थित किये जाने पर ही पूर्वरंग की व्यवस्था की गई है, अतएव यहाँ केवल नान्दी के प्रयोग का भाव है। अभिनव ने पूर्वरंग का अवसर स्वीकार नहीं किया, प्रत्युत वेद-सम्मत होने के कारण मंगल-कामना की दृष्टि से नान्दी का प्रयोग माना है। परन्तु, इसे दूरारूढ़ कल्पना ही माना जायगा कि यहाँ भरत ने नाट्य-प्रयोग के दो अलग काल या रूप माने हैं-पहला जब केवल नान्दी का प्रयोग होता था, और दूसरा विघ्नों को दूर करने के विचार से पूर्वरंग का प्रयोग-नान्दी जिसका अंग हुआ। यह स्वीकार्य नहीं हो सका। सामान्य दृष्टि से यही सम्भव लगता है कि यहाँ भरत ने संक्षेप में केवल नान्दी का उल्लेख कर दिया है, जिसे केन्द्र मानकर चतुर्दिक पूर्वरंग का विकास हुआ है। नान्दी के प्रयोग में विभिन्नता है। कभी वाक्य में अथवा पदों (आठ या बारह) के भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रयोग हो सकते हैं। तिकोने या चौकोर रंगमंच के अनुसार आठ या बारह पदों की नान्दी का प्रयोग भी माना गया है। नान्दी का स्थान या अवसर : नाटक में नान्दी की समस्या काफी जटिल है। बहुसंख्यक संस्कृत-नाटकों का आरम्भ नान्दी के श्लोकों से होता है, जिसके पीछे प्रायः लिखा रहता है-'नान्दन्ते सूत्रधारः'। परन्तु, भास के नाटकों में, विक्रमोर्वशीय की प्राचीन हस्तलिखित प्रतियों में और कहीं-कहीं नागानन्द तथा मुद्राराक्षस जैसे नाटकों की दक्षिण भारतीय हस्तलिखित प्रतियों में और अन्य नवीनतर नाटकों में हम देखते हैं कि नाटक का प्रारम्भ इन शब्दों से होता है और पीछे पद्य रहता है। इस विषय में हमारे सामने विश्वनाथ का प्रत्यक्ष साक्ष्य है। जैसा ऊपर लिखा जा चुका है, उनका कथन है कि कुछ आचार्यों का मत था कि विक्रमोर्वशीय का प्रारम्भिक पद्य नान्दी नहीं है, यद्यपि इसे नान्दी ही समझा जाता है। विश्वनाथ के मतानुसार वस्तुतः यह रंगद्वार है, जिसके साथ नाट्यशास्त्र के मतानुसार, वास्तविक नाटक का आरम्भ होता है। उनका तक है कि नाट्यशास्त्र में दिये गये नान्दी के लक्षण के पूर्णतः अनुकूल यह पद्य नहीं है। अन्य विद्वानों ने अभिनवगुप्त के आधार पर इस आपत्ति का निराकरण कर दिया है। विश्वनाथ के मत से नान्दी पूर्वरंग का ही एक अंग है, जिसे कुछ भी संक्षिप्त किया जाय, रखना आवश्यक है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि धीरे-धीरे प्ररोचना के समान नान्दी को भी नाटककार ही अपने नाटक में रखने लगा। किन्तु, निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि कितने समय में यह प्रथा स्थिर हो सकी। दक्षिण-भारत में नान्दी को सूत्रधार पर छोड़ने की प्राचीनतर प्रणाली का पालन होता रहा। नान्दी-पाठ कौन करे : इस विषय को लेकर उलझन होती रही है कि कौन नट नान्दी-पाठ करता है। एक मत है, जिसे भरत का मत बताया जाता है कि एक विशेष नट, नान्दी, इसका पाठ करेगा अथवा सूत्रधार ही नान्दी-पाठ करेगा। दूसरा मत है कि सूत्रधार या अन्य कोई नट नान्दी-पाठ करेगा। इस नियम से समस्या और भी जटिल हो
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१६०] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकासी जाती है कि पूर्वरंग के पश्चात् रंगमंच से सूत्रधार का प्रस्थान और स्थापक का प्रवेश माना जाता है। किन्तु, संस्कृत-नाटकों में सामान्यतः सूत्रधार के प्रवेश के पश्चात् नान्दी- पाठ होता है। अतः, नाट्यशास्त्रियों के सिद्धान्त का तात्पर्य यह हुआ कि सूत्रधार या स्थापक (जो गुण और आकृति में समान होने के कारण सूत्रधार कहा जाता है) नान्दी-पाठ करेगा। वह नेपथ्य में से नान्दी-पाठ करता है और तत्पश्चात् रंगमंच पर प्रवेश करता है। नान्दी और मूलवस्तु : नाट्य-सिद्धान्त ने नाटक की मूलवस्तु और नान्दी में समरसता रखना आवश्यक माना है और वस्तुतः बहुलांश में इसका पालन भी हुआ है। उदाहरणार्थ, 'प्रबोधचन्द्रोदय' एक दार्शनिक नाटक है और उसका आरम्भ एकमात्र सत्य से हुआ है। राजनीतिक षड्यन्त्रों से पूर्ण नाटक 'मुद्राराक्षस' का आरम्भ चाणक्य की कूटनीति के समान जटिल पद्य से हुआ है। कई बार तो इस सीमा तक प्रयत्न हुए हैं कि नान्दी से ही नाटक के मुख्य पात्रों और महत्त्वपूर्ण घटनाओं में भी समरसता दिखाई जाय। इस विषय में डॉ० कीथ का मत ध्यातव्य है : 'It is a characteristic of the determination to carry matters to extremes which distinguishes Indian Theory that attempts are made to extract from the benediction not merely a general harmony with these them, but also a reference both to the main characters and the chief events.'1 नाट्यवेद में विकास : पूर्वरंग, प्रस्तावना आदि तक तो नाट्यवेद सीधा-सादा ही रहा। परन्तु, नाट्यशास्त्र के चतुर्थ अध्याय में इसमें एक दूसरी क्रिया जोड़ने की कथा दी गई है। चारों वेदों से पाठ्य, गीत, अभिनय और रस नाट्यवेद में लिये ही गये थे, ब्रह्मा ने इस नाट्यवेद में पहली बार इतिहास जोड़ा, दूसरी बार कैशिकी वृत्ति के साथ स्त्रियों का प्रवेश हुआ, तीसरी बार दैत्यों के द्वारा बाधा उपस्थित किये जाने पर, उसे दूर करने के उद्देश्य से रंगपूजा की विधि का समावेश किया गया। इतना सम्पन्न हो जाने पर भरत ने अमृत-मन्थन नामक समवकार का अभिनय किया। ब्रह्माजी के आदेश से फिर इसका अभिनय शिवजी के सामने हुआ। शिवजी इसे देखकर प्रसन्न हुए। उन्होंने ब्रह्माजी से कहा कि आपने जो इस नाट्य की रचना की है, वह शुभ और बुद्धिवर्द्धक है। परन्तु, मैंने सन्ध्याकाल में नृत्य करते समय नृत्त को स्मरण किया है, जो अनेक करणों और अगहारों से विभूषित है। आपकी पूर्वरंगवाली विधि शुद्ध है, उसमें इस नृत्त को जोड़ देने से वह 'चित्र' हो जायगा, अर्थात् उसमें विचित्रता का समावेश हो जायगा। फिर शिवजी ने करणों और अंगहारों की विधि का निर्देश किया और ब्रह्माजी मे नाटक में ताण्डव-नृत्य का भी समावेश कर दिया। यह चतुर्थ संस्कार था। भारतीय परम्परा मानती है कि इन चारों कक्षाओं का अतिकरमण करने के उपरान्त नाट्यशास्त्र पूर्णांग बन गया। इसे ऐतिहासिक विकास की संज्ञा दे सकते हैं। १. दि संस्कृत ड्रामा, पेज ३४४
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पंचेम अध्यारय
वस्तु वस्तु का महत्त्व : किसी भी नाट्यकृति में कथानक या कथावस्तु का रहना आवश्यक है। कथानक ही वह ढाँचा है, जिसके आधार पर नाटक की रचना होती है। कथावस्तु या वस्तु ही नाटक का शरीर है, जिसमें पात्र या चरित्र की प्राण-वायु मिलकर नाटक को जीवन्त सत्ता बनाती है। सभी नाट्यशास्त्रियों ने कथावस्तु के महत्त्व को समुचित मान्यता प्रदान की है और इसलिए नाटक के विभिन्न तत्त्वों में सर्वप्रथम इसी का विवेचन किया है। नाटककार कथावस्तु के ही द्वारा कौतूहल तथा मनोरंजन उत्पन्न करता है। यदि उसे कोई उपदेश देना होता है, तो कथावस्तु का ही सहारा लेता है और यदि कोई आदर्श स्थापित करना होता है तो उसे कथावस्तु की ही शरण में जाना पड़ता है। यदि कथावस्तु की ठोस आधार-शिला पर नाटक का निर्माण नहीं होगा तो पात्र आदि तत्त्व वायव्य पदार्थ होकर आकाश में उड़ते ही रह जाएँगे, उन्हें मूर्त रूप नहीं प्राप्त हो सकेगा। भारतीय नाट्याचार्यों के अतिरिक्त अरस्तू ने भी कथावस्तु को उचित महत्त्व दिया है। इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि नाटक में कथावस्तु ही सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। अतः सबसे पहले इसी का विवेचन वांछनीय है। कथा और कथानक : इतिवृत्त या कथा और कथानक या कथावस्तु दोनों एक ही नहीं हैं, अपितु दोनों में बहुत बड़ा भेद है। कथा किसी नाटक के लिए केवल आधार होती है, उसमें जितने पात्र होते हैं या जितनी घटनाएँ होती हैं, उतने ही पात्रों और उतनी ही घटनाओं से नाटक का काम नहीं चल सकता। अभिज्ञान शाकुन्तल की कथा को निम्नलिखित कुछ शब्दों में कह सकते हैं : आखेट के प्रसंग में राजा दुष्यन्त कण्व ऋषि के आश्रम में पहुँचे। वहाँ उन्होंने शकुन्तला को देखा और उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर उससे गान्धर्व विवाह कर लिया। जब कण्व को ज्ञात हुआ कि शकुन्तला का विवाह दुष्यन्त से हो चुका है, तो उन्होंने उसे पति के पास भेज दिया। किन्तु, राजा दुष्यन्त ने लोक-निन्दा के डर से शकुन्तला को स्वीकार नहीं किया। परन्तु, कुछ दिनों के बाद कुछ परिस्थितियों के कारण उनका मिलन हो गया। अभिज्ञान शाकुन्तल की कथा इतनी ही है, परन्तु महाकवि कालिदास ने कथानक को सात अंकों में सजाया है, जिसमें अनेक काल्पनिक पात्रों और घटनाओं की अवतारणा की है। कण्व ऋषि के आश्रम में राजा दुष्यन्त का आगमन, शकुन्तला और उसकी सखियों द्वारा उनका स्वागत-सत्कार, शकुन्तला के मुखमण्डल पर भौरे का मँडराना, परिचय और प्रेम, राजा दुष्यन्त की काम-पीड़ा, शकुन्तला की विरह-वेदना, फिर दोनों का मिलन और
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१६२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास विवाह, शकुन्तला को अँगूठी पहनाना, दुर्वासा ऋषि का शाप, शकुन्तला की विदाई, दुष्यन्त का उसे नहीं पहचानना, मछुओं द्वारा अँगूठी लाना, दुष्यन्त की व्यग्रता, मातलि के साथ दुष्यन्त का इन्द्र के पास जाना, लौटते समय कश्यप के आश्रम में दुष्यन्त का आगमन और अन्त में शकुन्तला से उनका मिलन आदि घटनाओं से सभी पात्रों के चरित्र का पूर्ण विकास हुआ है और नाटक में सभी नाटकीय गुणों का समावेश हुआ है। कथा और कथावस्तु के अन्तर को आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के शब्दों में इस प्रकार प्रकट कर सकते हैं : "अतः इतिवृत्त या कथा उस घटना-क्रम को कहते हैं, जिसमें किसी नायक के जीवन का एक चरित्र पूर्ण आ जाय। किन्तु, अंकों और दृश्यों के अनुसार घटनाओं की ऐसी सजावट को कथावस्तु कहते हैं, जिसमें नाटकीय कुतूहल आदि से अन्त तक बना रहे और साथ ही घटनाओं को आकर्षक, कुतूहलजनक तथा रसमय बनाने के लिए कल्पित घटनाओं और पात्रों का समावेश किया जा सके।"१ कथा में चार बातें रहती हैं-व्यक्ति, स्थान, घटना और परिणाम। परन्तु, कथानक में इन सारी बातों के रहते हुए भी बहुत-कुछ परिवर्त्तन हो सकता है। व्यक्तियों की संख्या में अधिकता या न्यूनता लाई जा सकती है, स्थान में स्वेच्छया परिवर्तन किया जा सकता है, घटनाओं को कम कर सकते हैं, अधिक कर सकते हैं, या उनमें इच्छानुसार परिवर्तन कर सकते हैं और परिणाम में भी आवश्यकतानुसार परिवर्त्तन किया जा सकता है। यदि किसी कथा में नायक कायर या स्त्रैण है, तो नाटककार कथावस्तु के निर्माण में अपने कौशल के बल पर कुछ ऐसा कर सकता है कि दर्शक और पाठक को नायक की स्त्रैणता पर श्रद्धा होने लगे या उसकी कायरता आवश्यक जान पड़ने लगे। कहने का तात्पर्य यह है कि कथानक की रचना ही नाटककार के कौशल का विषय है। यह रचना-कौशल कई तथ्यों पर निर्भर है। नायक या नायिका के प्रति नाटककार के अपने सिद्धान्त आदि कई तथ्यों पर कथानक की रचना निर्भर करती है। वस्तु का स्वरूप : नाटक जीवन से ही लिया जाता है। नाटक ही नहीं, साहित्य का विस्तृत क्षेत्र और ज्ञान की सारी वस्तुओं पर जीवन का ही व्यापक प्रभाव पड़ता है। साहित्य जीवन से प्रेरणा ग्रहण करता है और फिर उसे प्रेरित करता है। डॉ० रघुवंश ने काव्य और नाटक में अन्तर बताकर कथावस्तु के विषय में लिखा है : "काव्य जीवन के केन्द्र से स्फूरति ग्रहण करता है, नाटक जीवन की व्यापकता से। काव्य अपने विस्तार में केन्द्र से परिधि के विस्तार में फैलता है, नाटक अपने विकास में व्यापक जीवन की परिधि से केन्द्र की ओर एकाग्र होता है। इस प्रकार, नाटक अपनी कथावस्तु जीवन के व्यापक क्षेत्र से प्राप्त करता है। कथावस्तु एक ओर जीवन की क्रियाशीलता का रूप है तो दूसरी ओर चरित्र का विकास।"२ १. अभिनव नाट्यशास्त्र (प्रथम संस्करण), पृ० १०४ २. नाट्यकला, पृ० ३८-३९
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वस्तु [ १६३
यूरोप के विद्वानों में इस बात को लेकर काफी वाद-विवाद हुआ है कि नाटक के कार्य और चरित्र में किसका महत्त्व अधिक है। अरस्तू का मत है कि कार्य चरित्र से अधिक महत्त्वपूर्ण होता है; क्योंकि नाटक में अभिनय चरित्रों का प्रदर्शन करने के लिए नहीं होता। कथावस्तु ही तासदी का लक्ष्य और उद्देश्य है, और उद्देश्य ही प्रधान वस्तु है। इसके अतिरिक्त तासदी कार्य के विना असम्भव है, चरित्र के विना तो हो सकता है। कोई उपन्यासकार अपने उपन्यास का विस्तार मनमाने ढंग से कर सकता है, छोटे- से-छोटा और बड़े-से-बड़ा रूप दे सकता है। परन्तु, नाटककार को यह सुविधा प्राप्त नहीं है। वह न तो कथानक का मनमाना विस्तार कर सकता है और न मनमानी सामग्री का ही उपयोग कर सकता है। नाटककार को कुछ ऐसे नियमों का पालन करना आवश्यक होता है, जो नाट्य-साहित्य के निर्माण के प्रायः साथ ही बन जाते हैं। नाटक की वस्तु मर्यादित होती है; क्योंकि उसे देखने में अधिक समय नहीं लगना चाहिए। अधिक देर तक देखने से दर्शक ऊब जा सकता है और ऐसी दशा में अत्यन्त अच्छे दृश्य भी दर्शक का मनोरंजन नहीं कर सकते। इसलिए नाटक की रचना करते समय लेखक को यह ध्यान रखना आवश्यक होता है कि नाटक यथासाध्य संक्षिप्त हो और ऐसा हो, जिसके अभिनय में अधिक समय नहीं लगे। इसके लिए नाटककार को केवल नितान्त आवश्यक सामग्री ग्रहण करनी होती है और अनावश्यक अथवा कम आवश्यक सामग्री छोड़ देनी होती है। नाटक में वस्तु का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। भरत मुनि ने वस्तु अथवा इतिवृत्त को नाटक का शरीर माना है :
इतिवृत्तं तु नाट्यस्य शरीर परिकीत्तितम्। पञ्चभिः सन्धिभिस्तस्य विभाग: सम्प्रकल्पितः ।।१ यही बात शारदातनय ने भावप्रकाशन में दूसरे शब्दों में कही है : वस्तु तत्स्यात्प्रबन्धस्य शरीरं कविकल्पितम्। इतिवृत्तं तदेवाहुर्नाट्याभिनयकोविदाः ॥२ वस्तुतः, यदि नाटक का प्राण रस है, तो इतिवृत्त अथवा वस्तु को नाटक का शरीर कहना उपयुक्त ही है। नायकादि पात्रों के क्रिया-कलाप को इतिवृत्त कहते हैं। कथानक के भेद : भरत मुनि आदि नाट्याचार्यों ने कथानक या वस्तु के दो भेद किये हैं-आधिकारिक तथा प्रासंगिक। आधिकारिक इतिवृत्त मुख्य होता है तथा प्रासंगिक अंग या गौण। अधिकार का अर्थ फल या स्वामित्व पाना है और उस अधिकार को पानेवाला अधिकारी कहलाता है। उस फल-प्राप्ति तक निर्वाहित वृत्त आधिकारिक वस्तु कहलाता है। उदाहरणार्थ, रामकथा के आधार पर लिखित नाटकों में राक्षसवध,
१. नाट्यशास्त्र, अध्याय १९, कारिका १ २. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० २००
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१६४1 भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास सीता की प्राप्ति एवं राज्याभिषेक तक की सम्पूर्ण कथा आधिकारिक इतिवृत्त है। वस्तुतः, आधिकारिक कथावस्तु में नायक की कथा वणित रहती है। जो वृत्त आधिकारिक के प्रयोजन के लिए निर्मित रहता है, किन्तु प्रसंग से अपना भी फल सिद्ध हो जाता है, उसे प्रासंगिक वृत्त कहते हैं। प्रासंगिक कथावस्तु का उद्देश्य आधिकारिक कथावस्तु का सौन्दर्य बढ़ाना और मूल कार्य या व्यापार के विकास में सहायता प्रदान करना है। कविराज विश्वनाथ ने प्रासंगिक वृत्त का लक्षण लिखा है : अस्योपकरणार्थ तु प्रासङ्गिकमितीष्यते।' -अर्थात् इस प्रधान वृत्त के साधक इतिवृत्त को प्रासंगिक कहते हैं। शारदातनय ने आधिकारिक तथा प्रासंगिक वस्तु में अन्तर बताया है कि नायकादि के वृत्तान्त को आधिकारिक तथा उपनायक के वृत्तान्त को प्रासंगिक कहते हैं : वृत्तान्तो नायकादीनामत्र स्यादाधिकारिक:। उपनायकवृत्तान्तः प्रासङ्गिक उदाहृतः ॥२ वस्तुतः प्रासंगिक वस्तु का प्रधान उद्देश्य आधिकारिक वस्तु को फल-निर्वहणता में सहायता प्रदान करना होता है, किन्तु साथ ही उसका अपना भी फल होता है। रामकथा में सुग्रीव-कथा का प्रयोजन बालि-वध तथा राज्य की प्राप्ति है, साथ ही यह कथा आधिकारिक वृत्त को फल-निर्वहणता में सहायता प्रदान करती है। उसी प्रकार, विभीषण- कथा भी आधिकारिक कथा में सहायता देती ही है, साथ ही उसका अपना भी फल लंका की राज्य-प्राप्ति है। अतः सुग्रीव तथा विभीषण-कथा प्रासंगिक वस्तुएँ हैं। प्रसादजी के चन्द्रगुप्त नाटक में चन्द्रगुप्त की कथा आधिकारिक है तथा अलका-सिंहरण की कथा प्रासंगिक। 'राज्यश्री' नाटक में राज्यश्री, हर्ष आदि की भी कथा आधिकारिक है और शान्तिभिक्षु तथा सुरमा की कथा प्रासंगिक। प्रासंगिक वस्तु दो प्रकार से नाटकों में रखी जाती है-पताका-रूप में और प्रकरी-रूप में। जो प्रासंगिक वस्तु रूपक में काफी दूर तक चलती है और अनुबन्ध-युक्त होती है, उसे पताका कहते हैं और जो एक ही स्थान में सीमित रहती है, उसे प्रकरी। रामायण की कथा में सुग्रीव तथा विभीषण की कथाएँ पताका हैं; क्योंकि वे दूर तक चलती हैं और आधिकारिक वस्तु तथा नायक का पोषण करती हैं। वहाँ सुग्रीव तथा विभीषण पताका-नायक के रूप में व्णित हैं। 'चन्द्रगुप्त' नाटक में अलका-सिंहरण की कथा पताका-रूप में वर्णित है। रामायण के छोटे-मोटे प्रसंग प्रकरी हैं; उदाहरणार्थ, शबरी तथा जटायु की कथाएँ। 'चन्द्रगुप्त' नाटक में पर्वतेश्वर और कल्याणी की कथा प्रकरी-रूप में है। ध्यातव्य है कि इस स्थल पर शारदातनय ने अपनी पुस्तक में धनंजय का ही वाक्य उद्धृत कर दिया है : १. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० ४४ २. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० २०१
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सानुबन्धं पताकाख्यं प्रकरी च प्रदेशभाक्।' पताकास्थानक : शारदातनय ने प्रासंगिक वस्तु को नाटक में रखने के तीन उपाय बताये हैं। उन्होंने पताका और प्रकरी के समकक्ष पताकास्थानक को स्थान दिया है : प्रास्ङ्गिकाभिधं व स्तु नाटके भवति व्िधा। पताकाप्रकरीयुक्ता पताकास्थानकक्रमात् ॥२ धनंजय ने प्रासंगिक वस्तु के विषय में केवल पताका तथा प्रकरी का उल्लेख किया और पताकास्थानक का अलग से वर्णन किया है। कविराज विश्वनाथ ने प्रासंगिक वस्तु के सम्बन्ध में पताका तथा प्रकरी का उल्लेख नहीं किया। प्रासंगिक वस्तु का वर्णन करने के तुरन्त ही बाद पताकास्थानक का उल्लेख कर दिया : पताकास्थानकं योज्यं सुविचार्येह वस्तुनि।3 भरत मुनि ने पताका तथा प्रकरी का वर्णन करने के बाद पताकास्थानक का वर्णन किया। जहाँ प्रयोग करनेवाले पात्र का अन्य अर्थ अभीष्ट हो, परन्तु सादृश्यादि के कारण दूसरे ही अर्थ की सूचना हो जाय, उसे पताकास्थानक कहते हैं। कभी-कभी कवि भविष्य में घटित होनेवाली किसी घटना का संकेत रूपक में किसी स्थल पर कर देता है। यह संकेत पताका की तरह भावी घटना की सूचना दे देता है। इसीलिए, इसे पताकास्थानक कहते हैं। जैसे रत्नावली में-'यातोऽस्मि' इत्यादि। "हे पद्म के नयनवाली, मेरे जाने का समय हो गया है यह मैं जा रहा हूँ। प्रातःकाल में तुम्हें सोते से जगाऊँगा।" अस्ताचल के मस्तक पर अपनी अन्तिम किरणें रखे हुए सूर्य इस प्रकार पद्मिनी को विश्वास दिला रहा है। इस स्थल पर सूर्य-पद्मिनी के वर्णन के द्वारा भावी उदयन-रत्नावली-वृत्तान्त की सूचना मिलती है। अतः, यह पताकास्थानक ही है। भारतेन्दुजी ने अपने नाटक 'नीलदेवी' में भी पताकास्थानक का प्रयोग किया है। नीलदेवी नर्त्तकी का वेश धारण कर अमीर के दरबार में जाती है और अमीर की हत्या करती है। यह पताकास्थानक ही है। धनंजय-धनिक पताकास्थानक के दो भेद मानते हैं : १. तुल्येति वृत्त रूप और २. तुल्य-विशेष रूप। प्रथम में अन्योक्ति का आश्रय लिया जाता है और द्वितीय में समासोक्ति का। किन्तु, भरत मुनि ने पताकास्थानक के चार भेद किये हैं। शारदातनय ने धनंजय का अनुकरण कर दो ही भेद माने, परन्तु 'अन्ये' लिखकर भरत मुनि के श्लोकों को उद्धत करके उनका भी मत लिख दिया। कविराज विश्वनाथ ने भरत मुनि का अनुकरण किया और वे ही चार भेद माने और भरत के ही श्लोकों को, दो-एक स्थानों पर थोड़ा परिवर्त्तन १. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, का० १३; भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ०२०१ २. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० २०१ ३. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० ४४
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१६६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
करके, उद्धत कर दिया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने चार भेद माने। भरत के अनुसार पताकास्थानक के निम्नलिखित चार भेद हैं : १. जहाँ प्रेमानुकूल उपचार के कारण सहसा अर्थ-सम्पत्ति या प्रयोजन-सिद्धि हो, वह प्रथम पताकास्थानक होता है। २. जहाँ अनेक काव्य-बन्धों में आश्रित अतिशय श्लिष्ट वचन हो, वह द्वितीय पताका- स्थानक होता है। 7 ३. जहाँ वक्ता का अर्थ अव्यक्त, किन्तु निश्चययुक्त हो और श्लेषपूर्ण उत्तर से युक्त हो, उसे तृतीय पताकास्थानक कहते हैं। पता ४. जहाँ श्लिष्ट द्व यर्थक वचनों का विन्यास हो तथा वह प्रधानेतर अर्थ की प्रतीति कराये, वहाँ चतुर्थ पताकास्थानक होता है। कविराज विश्वनाथ ने इन चारों के निम्नलिखित उदाहरण दिये हैं : १. रत्नावली नाटिका में सागरिका वासवदत्ता का रूप धारण करके गई थी, परन्तु जब उसने देख लिया कि वासवदत्ता को मेरी बात का पता लग गया तो वह लतापाश के द्वारा मरने को उद्यत हो गई। इसी समय राजा वहाँ पहुँचकर उसे वासवदत्ता ही समझकर लतापाश से छुड़ाता है। तब सागरिका को पहचानकर राजा 'कथं प्रिया मे सागरिका' इत्यादि कहने लगा। वहाँ फल-प्राप्ति-रूप अर्थ सम्पत्ति है, जो पहले की अपेक्षा अधिक गुणवती है। २. वेणीसंहार में सूत्रधार के कथन 'रक्तप्रसाधितभुवः क्षतविग्रहाश्च स्वस्थाः भवन्तु कुरुराजसुता: सभृत्या:' में श्लिष्ट पदों के द्वारा नायक की मंगल-कामना की गई है। यहाँ 'रक्तादि' शब्दों का रुधिरादि भी अर्थ है और शरीरादि भी। अतः, श्लेष से बीजभूत अर्थ कौरवों के नाश-के साथ नायक की मंगलकामना की भी प्रतीति होती है। ३. वेणी-संहार में जब दुर्योधन अपनी पत्नी भानुमती से कहता है कि मेरी दोनों जाँघें ही तुम्हारे बैठने के लिए पर्याप्त हैं, तो इसी समय कंचुकी आकर कहता है : "देव, तोड़ डाला (देव, भग्नम् भग्नम्)।" इसपर सामाजिक के मन में जाँघों के तोड़ने की बात आ जाती है। आगे राजा पूछता है : 'किसने ?' तो कंचुकी उत्तर देता है, 'भीमसेन ने।' बाद में पता चलता है कि भीमसेन ने रथ तोड़ डाला है। इस प्रकार, यह तीसरा पताकास्थानक है। ४. विश्वनाथ ने चौथा उदाहरण वही दिया है, जो धनिक ने दशरूपक की वृत्ति में दूसरा उदाहरण दिया है। रत्नावली का पद्य 'उद्दाम' इत्यादि। यह राजा की उक्ति है : "आज मैं अन्य कामिनी के समान इस लता को देखता हुआ महादेवी का मुख लाल बना दूँगा, अर्थात् जब देवी इस लता को मुझे देखते देखेगी, तो उनका मुख क्रोध से लाल हो जायगा।" इस पद्य में कई विशेषण लता और कामिनी दोनों में श्लिष्ट हैं। यहाँ आगे आनेवाली बात-सागरिका से प्रीति-सूचित होती है।
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इस प्रकार, हम देखते हैं कि धनंजय और धनिक का दूसरा पताकास्थानक भरत और विश्वनाथ का चौथा पताकास्थानक है। किन्तु, उनका पहला पताकास्थानक भरत और विश्वनाथ के तीनों में से किसमें आयगा? पहले और तीसरे में तो नहीं आ सकता, शायद दूसरे में रखा जाय। परन्तु, भरत ने परिभाषा में 'अतिशय श्लिष्ट' विशेषण दिया है। उदाहृत पद्य 'यातोऽस्मि' आदि में अतिशय श्लिष्ट कुछ नहीं दिखाई देता। इसलिए, कुछ विद्वानों ने इसे दूसरे भेद में भी रखना उचित नहीं समझा। स्पष्टतः धनंजय का भेद अन्य प्रकार का है। आधुनिक हिन्दी-नाटकों में पताकास्थानक का प्रयोग नहीं होता। यह लकीर छोड़ी जा चुकी है। उत्पत्ति की दृष्टि से वस्तु के विभाग : नाट्यकार अपने रूपक के लिए स्वेच्छया कोई भी वृत्त ले सकता है। इस दृष्टि से वस्तु के तीन विभाग माने गये हैं : १. प्रख्यात, २. उत्पाद्य और ३. मिश्र। प्रख्यात इतिवृत्त इतिहास, पुराण, रामायण, महाभारत, बहत्कथा आदि से लिया जाता है। उदाहरणार्थ भवभूति के महावीरचरित तथा मुरारि के अनर्घराघव के वृत्त रामायण से लिये गये हैं। कालिदास के अभिज्ञानशाकुन्तल का स्रोत महाभारत तथा पद्मपुराण है। भास के स्वप्नवासवदत्तम् तथा विशाखदत्त के मुद्राराक्षस का सम्बन्ध ऐतिहासिक इतिवृत्तों से है। नाटक में तो ऐतिहासिक इतिवृत्त होना नितान्त आवश्यक है। जयशंकर प्रसाद के नाटक चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त आदि तथा प्रेमी के 'रक्षाबन्धन', 'स्वप्न-भंग' आदि के इतिवृत्त इतिहास-प्रसिद्ध, अतः प्रख्यात हैं। यदि कवि कोई प्रख्यात वृत्त चुनता है तो उसे छोटी-मोटी ही घटनाओं में परिवर्त्तन करने का अधिकार है। उसे बहुत ही सावधानी से अपनी घटनाओं का निर्माण करना होता है। वह प्रख्यात इतिवृत्त में मनमाना परिवर्त्तन करके सामाजिक के मन में बैठी धारणा में खलबली नहीं मचा सकता; इससे सामाजिक के मन में दुःख उत्पन्न होता है। दूसरी ओर, कभी-कभी नाटककार का अधिकार ही नहीं, कर्त्तव्य भी हो जाता है कि वह प्रख्यात कथानक में परिवर्त्तन कर दे। यदि प्रख्यात वस्तु में ऐसी कुछ बात हो कि नायक के धीरोदात्तत्व में बाधा पड़ती हो, तो ऐसी अवस्था में वस्तु के सम्बद्ध अंश में आवश्यक परिवर्तन करने का अधिकार कवि को है। महावीरचरित में बालि-वध वाली घटना में भवभूति ने रामचन्द्र के चरित्र के धीरोदात्तत्व की रक्षा के लिए परिवर्तन कर दिया है। भवभूति ने उस नाटक में दिखाया है कि बालि रावण का मित्र बनकर राम से लड़ने आया था और रामचन्द्र ने आत्म-रक्षा के लिए बालि को मार डाला था। मुरारि ने अनर्धराघव में इस घटना का कोई उल्लेख ही नहीं किया है। पद्मपुराण में वर्णन है कि विवाह के पश्चात् दुष्यन्त शकुन्तला को भूल गये थे; उसमें दुर्वासा के शाप- वाली घटना नहीं है। यदि कालिदास अपने नाटक में ऐसा ही दिखाते, तो निश्चय ही दुष्यन्त के चरित्र में कामुकता दृष्टिगोचर होती और उनके धीरोदात्तत्व में तुटि आती।
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१६८] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अतः, कालिदास ने दुर्वासा के शाप की घटना की कल्पना करके अपने चरित-नायक के चरित्र को ऊँचा उठा दिया। श्रव्य काव्य में कवि मनमाने ढंग से कुछ लिख सकता है, परन्तु दृश्य काव्य में कवि को बहुत सँभलकर चलना पड़ता है। इस विषय में कविराज विश्वनाथ और रामचन्द्र तथा गुणचन्द्र के मत स्पष्ट हैं। उन्होंने लिखा है कि जो रस-सम्बन्धी अथवा नायक-सम्बन्धी वस्तु अनुचित हो अथवा विरुद्ध हो, उसे नाटक आदि में छोड़ देना चाहिए या बदल देना चाहिए। विश्वनाथ का मत : यत्स्यादनुचितं वस्तु नायकस्य रसस्य वा। विरुद्धं तत्परित्याज्यमन्यथा वा प्रकल्पयेत् ।' रामचन्द्र-गुणचन्द्र का मत : अयुक्तं च विरुद्धं च नायकस्य रसस्य वा। वृत्तं यत् तत् परित्याज्यं प्रकल्प्यं वाजन्यथा .... ।२ उत्पाद्य वस्तु कवि के द्वारा कल्पित होती है-उत्पाद्यं कविकल्पितम्।3 प्रकरण, भाण आदि कई रूपकों में ऐसी वस्तु का प्रयोग होता है। भवभूति के मालतीमाधव तथा शूद्रक के मृच्छकटिक की कथावस्तु उत्पाद्य है। मिश्र वस्तु की पृष्ठभूमि प्रख्यात होती है, परन्तु उसमें कवि अपनी कल्पना से बहुत अंश मिला देता है। लक्ष्मीनारायण मिश्र के नाटकों-संन्यासी, सिन्दूर की होली आदि-की वस्तु उत्पाद्य है। नाटककार अपने नाटक की कथावस्तु चुनते समय ध्यान में रखता है कि वह प्रख्यात कथावस्तु ही चुने, जिससे रसास्वादन की प्रचुर सामग्री प्रस्तुत करके दर्शकों के हृदय को शीघ्र ही उल्लसित कर सके। अतः, कथावस्तु की कल्पना तथा विविधता की कमी की ओर आधुनिक आलोचकों का ध्यान जाना स्वाभाविक ही है। परन्तु, ऐसी आलोचना भारतीय नाटक की मूल प्रकृति का विश्लेषण नहीं करती। इसलिए उसे पूर्ण मान्यता नहीं दी जा सकती। भारतीय आलोचक मानते हैं कि वस्तु और रस दोनों के उन्मेष में किसी का भी अतिरेक वांछनीय नहीं। न तो अतिरस के द्वारा वस्तु को सर्वथा विच्छिन्न कर देना चाहिए और न वस्तु, अलंकार द्वारा रस को तिरोहित कर देना चाहिए। मध्यम मार्ग ही उचित है : न चातिरसतो वस्तु दूरं विच्छिन्नतां नयेत्। रसं वा न तिरोदध्यात् वस्त्वलङ्कारलक्षणैः ॥४ आधुनिक आलोचकों की दृष्टि में यह बात बहुत खटकती है कि संस्कृत-नाटकों में विषय की विभिन्नता का अभाव है। रामायण की कथा का आश्रय लेकर अनेक नाटक १. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० ५० २. नाट्यदर्पण, नाटक-निर्णय, १८ ३. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, का० १५ ४. वही, तृतीय प्रकाश, कारिका ३२
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लिखे गये हैं और उनमें यदि विचित्रता का अभाव और एकरूपता का आधिक्य है, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। राम का चरित्र ही ऐसा है कि उनसे बढ़कर नायक की कल्पना नहीं की जा सकती। फिर भी, रामकथा पर आश्रित नाटकों के कवियों ने अपने नाटक में घटना का वैचित्य दिखाने का यथासाध्य प्रयत्न किया है। इस पिटी लकीर को छोड़कर प्रकरण तथा प्रहसन के रचयिताओं ने मध्यम श्रेणी के पात्ों और उनसे सम्बन्ध रखनेवाली घटनाओं को प्रदर्शित करने की चेष्टा की है। नाटक की रचना की ओर कबि इस तरह झुके कि प्रकरण की रचना की ओर उनका उचित ध्यान नहीं गया। फिर भी, शूद्रक ने मध्यम श्रेणी के पात्रों की अवतारणा तथा उनके दैनिक जीवन की घटनाओं के चित्रण में अपूर्व सफलता प्राप्त की। प्राचीन भारतीय नाटककार मध्यम श्रेणी के व्यक्तियों की अभिरुचि, नैसगिक प्रवृत्ति तथा आवश्यक मनोरंजन के प्रति भी उदासीन नहीं हैं। यह तो ठीक ही है कि उच्च श्रेणी के व्यक्तियों में नाट्य- कला की ओर स्वाभाविक सम्मान की भावना के कारण उनका चरित्र विशेष रूप से चित्रित होता रहा है। प्राचीन भारतीय नाटककारों ने तीन प्रसिद्ध कथा-चक्रों के आख्यानों के प्रति अपनी विशेष रुचि प्रदर्शित की है : १. रामकथा, २. महाभारत-कथा तथा ३. उदयन-कथा। इनमें प्रथम दो तो भारत की राष्ट्रीय सम्पत्ति हैं। ये भारत के सांस्कृतिक जीवन के आधार- स्तम्भ हैं, अतः जनता के सामने इनका अनेक रूपों में प्रदर्शन होता है, तो इससे राष्ट्रीय गौरव की अभिवृद्धि होगी और जातीय चरित्र के निर्माण में अपरिमेय सहायता मिलेगी। राजा उदयन की कथा प्राचीनकाल की एक रोमांचक (रोमाण्टिक) प्रेम-कहानी है, जो अपने लालित्य तथा रोमाण्टिक वातावरण के कारण बहुत दिनों तक अनेक कवियों को अपनी ओर आकृष्ट करती रही है। प्राचीन नाटककारों का ध्यान लोककथा की ओर भी आकृष्ट हुआ है और उसका चित्रण करके उन्होंने नाटक के प्रभाव में वृद्धि करने का भरपूर प्रयत्न किया है। धनंजय ने बृहत्कथा को उपजीव्य कोटि में रखने का आदेश दिया है, इससे भी इस बात का संकेत मिलता है। भास ने अपने रूपक आविमारक की रचना एक प्राचीन लोककथा के आधार पर की है। प्रहसन में तो सामान्य रूप से मध्यम श्रेणी के ही पात्रों को चुना गया है। उसका कथानक सामान्य जनता के जीवन को छूता हुआ चला है।
इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि भारत के प्राचीन नाटकों में लोकवृत्त के अनेक रूपों को प्रदर्शित करने का पूर्ण और सफल उद्योग किया गया है। रामायण तथा महाभारत के अनेक प्रकार से चित्रण करने के कारण नाटकीय कथावस्तु में विचित्रता का आंशिक अभाव हो जाता है, फिर भी प्रकरण तथा प्रहसन की कथावस्तुओं के कारण उस अभाव की पूत्ति का यथेष्ट प्रयत्न किया गया है। इतिवृत्त की तीन श्रेणियों-प्रख्यात, उत्पाद्य तथा मिश्र-में विभाजन नाटककार के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। प्रख्यात कथानक में नाटककार बहुत-कुछ बन्धन में रहता है,
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किन्तु कल्पित या उत्पाद्य कथानक में ऐसा कोई बन्धन नहीं रहता। दोनों के निर्वाह के कौशल में बहुत अन्तर होता है। मिश्र कथानक में कुछ-कुछ बन्धन रहता ही है। निम्नलिखित सारणी में विभिन्न रूपकों की कथावस्तु का प्रकार दिखाया जा रहा है :
रूपक का नाम कथावस्तु का प्रकार
पिण्ड नाटक प्रख्यात
प्रकरण उत्पाद्य नाटिका कथा उत्पाद्य, परन्तु नायक प्रख्यात भाण उत्पाद्य
प्रहसन उत्पाद्य व्यायोग प्रख्यात
समवकार प्रख्यात वीथी उत्पाद्य उत्सृष्टिकांक प्रख्यात ईहामृग मिश्र आचार्यों ने इतिवृत्त का प्रयोजन भी बताया है। इसका फल धर्म, अर्थ तथा काम- रूप त्रिवर्ग है। यह फल इन तीनों में से कभी एक ही हो सकता है, कभी दो और कभी तीन हो सकता है। कवि-कल्पना का स्थान : कवि या नाटककार को उत्पाद्य कथावस्तु की रचना में तो पूरी स्वतन्त्रता रहती है, परन्तु प्रख्यात-ऐतिहासिक तथा पौराणिक कथाओं में उसपर कुछ प्रतिबन्ध रहता है। कतिपय नाटककारों ने स्वतन्त्रता की इस सीमा का अतिक्रमण कर दिया है और प्रख्यात कथा में भी कल्पना का आवश्यकता से अधिक उपयोग किया है। नाटककार को इतना ही अधिकार या कवि-कल्पना की इतनी ही छूट दी जा सकती है कि वह नायक के चरित्र के विकास के निमित्त सम्भावित पात्रों तथा घटनाओं की कल्पना कर ले। इतिहास में जिन बातों का संकेत-मात्र है, उनके लिए पात्रों एवं घटनाओं की योजना कर लेने का अधिकार कवि को दिया गया है। उदाहरणार्थ, यह ऐतिहासिक तथ्य है कि हल्दीघाटी के युद्ध के पश्चात् जब महाराणा प्रताप सिंह युद्ध-क्षेत्र से जा रहे थे, तो अकबर का दरबारी उनका छोटा भाई शक्त सिंह रास्ते में मिला और अपने अपराधों के लिए क्षमा माँगी। उसने अपना घोड़ा भी दिया। इस विषय को लेकर नाटककार कुछ छोटी-छोटी घटनाओं की अवतारणा कर सकता है और दोनों भाइयों के बीच हुए वार्त्तालाप को भी अपनी कल्पना से बना लेने का उसे अधिकार है। परन्तु, ऐसा दिखाना उसकी अधिकार-सीमा के बाहर की बात है कि महाराणा प्रताप सिंह का प्रताप और प्रभाव दिखाने के प्रलोभन में पड़कर नाटककार यह दिखावे कि राजा मानसिंह आकर महाराणा के पैरों पर गिर गये। अभिप्राय यह है कि कवि अपनी कल्पना से यही कर सकता है कि
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ऐतिहासिक या पौराणिक नाटकों के इतिवृत्त और चरित्र का निर्वाह करते हुए उनके गुणों का उत्कर्ष प्रदर्शित करे। यदि ऐसा कोई नाटककार दिखाता है कि मेघनाद के डर से लक्ष्मण भागे जा रहे हैं, या सीता के वियोग में राम छाती पीट-पीटकर रो रहे हैं, तो यह नाटककार के अधिकार के बाहर की बात है। हाँ, यदि इतिहासकार ने किसी चरित्र, घटना या व्यक्ति के विषय में भ्रमपूर्ण निर्णय दिया हो, तो नाटककार को यह अधिकार है कि वह प्रमाण देकर उस भ्रमात्मक निर्णय को उलट दे और सत्य की स्थापना कर दे। अर्थ-प्रकृति : भरत मुनि आदि सभी आचार्यों ने वस्तु में पाँच अन्य तत्त्वों का समावेश किया है, जिन्हें अर्थ-प्रकृति कहते हैं। अर्थ-प्रकृति का तात्पर्य उन तत्त्वों से है, जो प्रयोजन की सिद्धि के हेतु होते हैं। प्रयोजन या वस्तु के फल को अर्थ कहा गया है। इन पाँचों अर्थ-प्रकृतियों का सम्बन्ध उसी अर्थ की प्रकृति से है। रूपक में बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य नाम की पाँच अर्थ-प्रकृतियाँ होती हैं।
बीज : फल-सिद्धि का प्रथम हेतु बीज होता है। पहले जिसका अत्यल्प कथन किया जाय, परन्तु उसका विस्तार अनेक रूपों में हो, उसे बीज कहते हैं। बीज अल्प रूप में निर्दिष्ट हेतु है, जो फल का साधक होता है और वृक्ष के बीज के समान अंकुरित तथा पल्लवित होकर महान् वृक्ष का रूप धारण कर लेता है। 'रत्नावली' नाटिका में अनुकल दैव से युक्त मन्त्री यौगन्धरायण की चेष्टा बीज के रूप में रखी गई है। विष्कम्भक में यौगन्धरायण "कः सन्देहः । (द्वीपादन्यस्मात् इति पठति)" इत्यादि उक्ति बीज का संकेत है। इस नाटिका में उदयन तथा रत्नावली का मिलन करा देना वृत्त का कार्य या फल है, जो मन्त्री यौगन्धरायण का अभीष्ट है। 'वेणी-संहार' नाटक में द्रौपदी का केश- संयमन कार्य या फल है। इस फल का हेतु भीम के कोध से पुष्ट युधिष्ठिर का उत्साह है, और वही इस नाटक के वृत्त का बीज है। बिन्दु : अवान्तर कथा के विच्छिन्न हो जाने पर भी जो प्रधान कथा के अविच्छेद का हेतु है, उसे बिन्दु कहते हैं। जिस प्रकार तेल का बिन्दु पानी पर फैल जाता है, उसी प्रकार यह बिन्दु भी इतिवृत्त को आच्छादित कर देता है। विच्छिन्न हो गये कथा-प्रवाह को यह बिन्दु जोड़ता और आगे बढ़ाता है। रत्नावली नाटिका से इसका उदाहरण दिया जा सकता है। कामदेव की पूजा एक अवान्तर वृत्त है, जिसके समाप्त हो जाने पर कथा एक प्रकार से विच्छिन्न हो जाती है। कथा को शृंखलाबद्ध करने के उद्देश्य से नेपथ्य से चारण राजा उदयन के आगमन की सूचना देते हैं। इसपर सागरिका के रूप में वहाँ रहनेवाली रत्नावली कहती है : "क्या यही राजा उदयन हैं, जिनके लिए पिताजी ने मुझे दे दिया है ?" इससे वृत्त की शृंखला बँध जाती है। प्रश्न हो सकता है कि किसी रूपक की वस्तु में बिन्दु एक ही होता है या अनेक ? जहाँ कहीं कथा में विशृंखलता आ जाय, वहाँ उसे शृंखलाबद्ध करने के लिए बिन्दु रखा जाता है। बिन्दु के इस लक्षण के फलस्वरूप यदि कथा में कई स्थलों पर विश्रृंखलता हो
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जाय, तो कई बिन्दुओं की अवतारणा की जा सकती है। अतः, नाटक में अनेक बिन्दुओं की अवतारणा के विरुद्ध कोई उचित कारण नहीं दीखता। अर्थ-प्रकृतियों के विषय में भरत, धनंजय, धनिक तथा विश्वनाथ के मतों में कोई अन्तर नहीं। बहुधा उनके वाक्य भी मिलते-जुलते हैं और कहीं-कहीं एक ही हैं। शारदातनय ने बिन्दु के लक्षण में आचार्य कोहल का भी मत उद्धत किया है :
फले प्रधाने विच्छित्ने बीजस्यावान्तरै: फलैः । तस्याविच्छेदको हेतुः बिन्दुरित्याह कोहल: ।'
उन्होंने बिन्दु के दो रूप बताये-मानज तथा विपत्तिज। करोध से मानज बिन्दु होता है और शोक से विपत्तिज। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अपने नाट्यदर्पण में बीज के चार प्रयोग बताये। कार्य-जो प्रधान साध्य है, जिसके लिए सभी उपायों का आरम्भ किया गया है और जिसकी सिद्धि के लिए सब सामग्री एकत्र हुई है, उसे कार्य कहते हैं; जैसे रामचरित में रावण-वध और रत्नावली नाटिका में उदयन तथा रत्नावली का मिलन करा देना। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में कार्य का छोटा-सा लक्षण दिया है : साध्ये बीजसहकारी, कार्यम्।२ दशरूपक की वृत्ति 'अवलोक' में धनिक ने अर्थ-प्रकृति को स्पष्ट करते समय लिखा है कि ये अर्थ-प्रकृतियाँ प्रयोजन की सिद्धि के हेतु हैं-अर्थप्रकृतयः-प्रयोजनसिद्धि हेतवः। विश्वनाथ ने भी धनिक का ही अनुसरण किया है। परन्तु, यह परिभाषा आपत्ति-रहित नहीं है। पहली चार अर्थ-प्रकृतियाँ-बीज, बिन्दु, पताका तथा प्रकरी- निर्विवाद रूप से प्रयोजन की सिद्धि के हेतु हैं। परन्तु, पाँचवीं अर्थ-प्रकृति-कार्य-पर यह परिभाषा उचित नहीं जान पड़ती है। 'कार्य' तो स्वयं प्रयोजन है। इस दशा में प्रयोजन स्वयं उसी की सिद्धि का हेतु कैसे बन सकता है? यहाँ दो में से एक ही बात सम्भव है। या तो दोनों प्रयोजन भिन्न-भिन्न हों या चार ही अर्थ-प्रकृतियाँ प्रयोजन की सिद्धि के हेतु हों। इस प्रसंग में दशरूपक के व्याख्याकार डॉ० भोलाशंकर व्यास का मत उद्धृत करना समीचीन होगा : "इस समस्या को एक ढंग से सुलझाया जा सकता है। कार्य या प्रयोजन दो तरह के माने जाने चाहिए। एक प्रमुख कार्य, जो नाटक का खास कार्य है, जैसा रामकथा में रावण का वध। दूसरा अवान्तर कार्य, जैसे विभीषण का मिलना आदि। ऐसा मानने पर अवान्तर कार्य प्रमुख कार्यरूप प्रयोजन का सिद्धि-हेतु बन जायगा। पर
१. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० २०४ २. नाट्यदर्पण, नाटक-निर्णय, पृ० ३३०
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क्या धनंजय, धनिक तथा विश्वनाथ को यह अभीष्ट था ? यदि ऐसा हो तो उन्हें सकेत करना चाहिए था। इसके अभाव में हम इस मत को दुष्ट ही मानेंगे।" रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में अर्थ-प्रकृति को उपाय कहा है। इन पाँच उपायों में दो-बीज और कार्य-अचेतन हैं, और तीन-बिन्दु, पताका तथा प्रकरी- चेतन हैं। इन ग्रन्थकारों ने स्पष्टतः कहा है कि न तो ये इस क्रम से आते हैं, जिस क्रम से इन्हें गिनाया गया है और न अवश्यम्भावी या अपरिहार्य ही हैं। यथारुचि ही इनका प्रयोग करना चाहिए। ऐसे अनेक कथानक हो सकते हैं, जिनमें पताका या प्रकरी नहीं हों या ऐसे अनेक कथानक हो सकते हैं, जिनमें इनका क्रम उलटा हो। वास्तव में ये अर्थ- प्रकृतियाँ मात्र उपाय हैं और आरम्भ आदि अवस्थाएँ नायक के व्यापार हैं। निम्नलिखित सारणी से अर्थ-प्रकृतियों का स्वरूप समझने में सहायता मिलेगी।
अर्थ-प्रकृति -
चेतन अचेतन
- मुख्य अमुख्य मुख्य अमुख्य 1 बिन्दु बीज कार्य
पताका प्रकरी
इस प्रकार अर्थ-प्रकृतियाँ फल अर्थात् मुख्य साध्य के उपाय हैं। बीज नाटक के इतिवृत्त का उपाय है। यह मुख्य है; क्योंकि यही धीरे-धीरे अंकुरित तथा पल्लवित होकर फल का रूप धारण कर लेता है। आमुख में नट बीजभूत उक्तियों को प्रकट कर देता है और पीछे कथा का कोई मुख्य पात् उसे दुहराता है। यह सोच-विचार कर प्रयत्नपूर्वक किया हुआ किसी पात्र का कार्य नहीं है, अतः अचेतन माना गया है। इस बीज के पल्लवित- पुष्पित होने से फल उपस्थित होता है। बीज मुख्य है और फल अमुख्य। बिन्दु, पताका तथा प्रकरी नाटककार द्वारा सोच-समझकर संयोजित होते हैं, अतः चेतन प्रयत्न हैं। इनमें भी बिन्दु मुख्य माना जाता है। नाटक का घटना-प्रवाह जब कभी अभीष्ट दिशा से हटकर दूसरी ओर मुड़ने लगता है, तब नाटककार विभिन्न पात्रों की सहायता से उसे निश्चित दिशा की ओर ले चलने की चेष्टा करता है। यही कारण है कि सारे कथा-भाग में इसकी स्थिति रहती है। बिन्दु, पताका तथा प्रकरी कवि के अभीष्ट लक्ष्य तक ले जानेवाले साधन हैं, अतः इन्हें चेतन माना गया है। बिन्दु कथानक में अवश्य रहता है, परन्तु पताका और प्रकरी का रहना आवश्यक नहीं। वास्तव में बीज; बिन्दु और कार्य आवश्यक अर्थ-
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प्रकृतियाँ हैं। बीज पर कवि का नियन्त्रण नहीं रहता, परन्तु बिन्दु पर उसका यत्नपूर्वक नियन्त्रण रहता है। ये दो मुख्य अर्थ-प्रकृतियाँ हैं। "बिन्दु पात्रों की कवि-निबद्ध चेतन चेष्टाएँ हैं, पर कार्य अचेतन; जैसे सैन्य-सामग्री, दुर्ग, कोश, धन आदि। किसी वृक्ष का उपमान लें, तो बीज बीज है, बिन्दु उसे सुरक्षित, पल्लवित, पुष्पित करने का सोद्देश्य प्रयत्न है; कार्य कुदाल, खाद आदि हैं; पताका किसी स्वार्थ-सिद्धि के प्रतिदान में नियुक्त माली है और प्रकरी, क्वचित्-कदाचित् अनायास उपस्थित होकर सहायता कर जानेवाला हितैषी।" अर्थ-प्रकृति में 'अर्थ' शब्द का अभिप्राय है पूर्ण नाटकार्थ और 'प्रकृति' शब्द का तात्पर्य है प्रकार या उपाय। धनंजय की अपेक्षा रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इसे अधिक स्पष्टता से समझाया है।
अवस्था ! भरत ने नाटकों के शिल्प-विधान को बोधगम्य बनाने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण निर्देश दिये। वस्तु-निर्माण की प्रणाली का विश्लेषण इस शास्त्र की अमूल्य उपलब्धि है। वस्तु-गठन नाटकों में अत्यावश्यक है। वस्तु के आरम्भ, विकास तथा सोद्देश्य उपसंहार का ध्यान रखकर घटनाओं एवं पात्ों की रचना करना और लगातार विकासशील वस्तुओं का उचित अवसर पर परिवर्त्तन कर सकने की शक्ति नाटककार का ऐसा गुण है, जिसकी अपेक्षा की जाती है।
नाटक के इतिवृत्त के पूर्ण विकास में पाँच अवस्थाएँ मानी गई हैं। अवस्थाएँ नाटक के इतिवृत्त की गति को व्यक्त करनेवाली होती हैं। नाटक मानव-जीवन का दर्पण या प्रतिबिम्ब होता है और मानव-जीवन कभी भी एक सरल रेखा में नहीं चलता, वरन् अनेक उतार-चढ़ाव के बाद अपने लक्ष्य तक पहुंचता है। मानव-जीवन संघर्षपूर्ण होता है और इन संघर्षों से गति आती है। अतः, नाटक के इतिवृत्त में भी इसका प्रतिबिम्ब पड़ना आवश्यक ही है। पाँच अवस्थाएँ इसी गति की सूचित करती हैं। भरत ने अवस्थाओं को साधक के व्यापार की अवस्थाएँ कहा है :
ससाध्ये फलयोगे तु व्यापार: साधकस्य यः । तस्यानुपूर्व्या विज्ञेया: पञ्चावस्थाः प्रयोक्तृभिः ॥२
दूसरे आचार्य इन्हें नेता के चरित्र (वृत्त) की पाँच अवस्थाएँ मानते हैं। परन्तु, धनंजय ने भरत का अनुसरण करके फल की इच्छावाले नायक के द्वारा प्रारम्भ किये गये कार्य की पाँच अवस्थाएँ मानी हैं। वास्तव में, वृत्त और व्यापार में कोई विशेष अन्तर नहीं है। १. डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी : नाट्यशास्त्र की भारतीय परम्परा और दशरूपक (भूमिका), पृ० ४० २. नाट्यशास्त्र, अध्याय १९, का० ७
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पात्र जो कुछ व्यापार या कार्य करता है, वही उसका चरित है। नायक के व्यापार की ये पाँच अवस्थाएँ कथावस्तु से रूप प्राप्त करती हैं, स्वयं कथावस्तु नहीं हैं। ये अवस्थाएँ नाटक को विचित्र भावों तथा घटनाओं से समृद्ध करती हैं। नाटककार की निपुणता बिन्दु की योजना में सबसे अधिक स्पष्ट रूप से प्रकट होती है। इसी उपाय के द्वारा वह कथा को अभीष्ट मार्ग से बहकने से रोकता है और नायक की प्रयत्न आदि अवस्थाओं को जागरूक बनाने में समर्थ होता है। बिन्दु का निर्वाह बहुत कठिन कार्य है। यदि कथा कुछ भी निर्धारित मार्ग से भटक जाय, तो सँभालना कठिन हो जाता है। यदि आवश्यकता पड़ती है तो नाटककार पताका तथा प्रकरी-जैसे चेतन उपायों का सहारा लेता है और कार्य जैसे अचेतन उपादान-सैन्य, कोश आदि-से भी सहायता लेता है, परन्तु बिन्दु- विधान की सर्वत्र आवश्यकता होती है। यूरोपीय मत से अवस्थाएँ : पाश्चात्य नाटकों के कथानक के मूल में प्रायः किसी-न- किसी प्रकार का संघर्ष या विरोध दिखाया जाता है। नाटक में दो विरोधी दल, भाव या सिद्धान्त आदि प्रदर्शित होते हैं और उन्हीं के विरोध के कारण कथानक का विकास होता है। साधारण नाटकों में यह विरोध प्रायः व्यक्तिगत ही होता है। किसी महात्मा तथा दुरात्मा या सच्चे वीर तथा अत्याचारी का विरोध दिखलाकर अन्त में महात्मा या वीर की विजय दिखाई जाती है। किन्तु, अच्छे नाटकों में यह विरोध अनेक रूपों में प्रदर्शित किया जाता है। कहने का अभिप्राय यह है कि किसी प्रकार का विरोध या विपरीतता ही आधुनिक नाटकों का आधार है। नाटक में जिस स्थल पर से इस संघर्ष या विरोध का आरम्भ होता है, वहीं से कथावस्तु का भी आरम्भ समझना चाहिए और जहाँ संघर्ष का अन्त होता है, वहीं कथानक का भी अन्त हो जाता है। कथानक के आरम्भ में जो संघर्ष उत्पन्न होता है, वह एक निश्चित सीमा तक बढ़ता जाता है और उस सीमा के बाद किसी एक पक्ष की विजय होने लगती है और अन्त में किसी पक्ष की विजय हो जाती है। कभी- कभी ऐसा भी होता है कि विजय पानेवाला दल कुछ देर के लिए दब जाय, फिर भी अन्त में उसकी विजय में कोई बाधा नहीं पड़ती। इसलिए, आधुनिक पाश्चात्त्य साहित्यशास्त्रियों ने नाटक के कथानक को पाँच भागों में बाँटा है-१. आरम्भ, इसमें विरोध उत्पन्न करनेवाली कुछ घटनाओं का समावेश रहता है; २. विकास-इसमें विरोध और संघर्ष में वृद्धि होती है; ३. चरम सीमा-यहाँ से किसी एक पक्ष की जीत का आरम्भ होता है; ४. उतार या निगति-यहाँ विजयी पक्ष की विजय निश्चित हो जाती है; ५. अन्त या समाप्ति-यहाँ उस संघर्ष का अन्त हो जाता है। विरोध या संघर्ष आधुनिक सभ्यता की देन है। प्राचीन भारत में भी विरोध या झगड़े थे, किन्तु आधुनिक काल के समान प्रत्यक्ष या उग्र नहीं थे। इसलिए, रंगशालाओं में उनके अभिनय की आवश्यकता नहीं होती थी। हमारे यहाँ नाटक के अभिनय का उद्देश्य
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१७६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास पुरुषार्थ-चतुष्टय-धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-प्राप्त करना होता था, फलस्वरूप कथावस्तु का विकास भी उसी के अनुरूप होता था। भारतीय नाटकों की पाँच अवस्थाओं की तुलना पाश्चात्त्य नाटकों की पाँच अवस्थाओं से कर सकते हैं। भारतीय नाट्याचार्यों के अनुसार किसी प्रकार के फल की प्राप्ति उत्कण्ठा है और इसी उत्कण्ठा से नाटक का आरम्भ होता है। वास्तव में देखा जाय तो दोनों सिद्धान्तों में कोई विशेष अन्तर नहीं है, केवल विरोधवाले तत्त्व में अन्तर है। आरम्भ तथा अन्तवाली अवस्थाओं में तो कोई अन्तर नहीं है, शेष तीनों में भी कोई विशेष अन्तर नहीं है। पाश्चात्त्य पद्धति में जहाँ संघर्ष का विकास होता है, वहाँ भारतीय पद्धति में फलागम के लिए प्रयत्न होता है। एक में विजय- प्राप्ति का आरम्भ होने लगता है, तो दूसरे में फल-प्राप्ति का, एक में विजय निश्चित होती है, तो दूसरे में फल की प्राप्ति। अतः, दोनों पद्धतियों में केवल संघर्ष को लेकर अन्तर है। भारतीय मत से अवस्थाएँ : भरत मुनि ने वस्तु की पाँच अवस्थाओं का उल्लेख किया है-आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति तथा फलागम। परवर्ती आचार्यों ने, अन्य विषयों की भाँति इस विषय में भी भरत मुनि का अनुसरण किया। शारदातनय ने भावप्रकाशन में उनका मत उन्हीं के शब्दों में उद्धत कर दिया। धनंजय ने दूसरे शब्दों में उन्हीं पाँच अवस्थाओं का विवेचन किया। विश्वनाथ ने धनंजय का अनुसरण लगभग उन्हीं शब्दों में किया। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने उन्हीं बातों का निर्देश दूसरे शब्दों में किया। इन आचार्यों ने निम्नलिखित पाँच अवस्थाओं का विवेचन किया : आरम्भ : मुख्य फल की सिद्धि के लिए जो औत्सुक्य होता है, उसे आरम्भ कहते हैं। कोई भी फल प्राप्त करने के पूर्व नायकादि में उत्सुकता होती है, यह उत्सुकता- मात्र ही आरम्भ है। इस उत्सुकता का प्रदर्शन नायक भी कर सकता है अथवा कोई अन्य पात्र भी। उदाहरणार्थ, रत्नावली नाटिका में रत्नावली को उदयन के अन्तःपुर में रखने के लिए मन्त्री यौगन्धरायण की उत्कण्ठा उदयन के कार्यारम्भ की सूचना है। यौगन्धरायण की उक्ति से उदयन-रत्नावली के मिलन-रूप फल के प्रति उत्सुकता प्रकट होती है। प्रयत्न : उस फल की प्राप्ति नहीं होने पर, उसे प्राप्त करने के लिए, जो त्वरायुक्त व्यापार होता है, उसे प्रयत्न कहते हैं। इस अवस्था में नायक या नायिका अपने लक्ष्य अथवा अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करने की चेष्टा में यत्नशील रहते हैं। उदाहरणार्थ, रत्नावली नाटिका में नायिका सागरिका वत्सराज उदयन को प्राप्त करना चाहती है। इस फल की प्राप्ति के लिए वह उदयन का चित्र अंकित करती है। इससे प्रयत्न की सूचना मिलती है। प्राप्त्याशा : जहाँ प्राप्ति की आशा, उपाय तथा विघ्न की आशंकाओं से घिरी हो, फल-प्राप्ति के विषय में कोई निश्चय नहीं हो पाता; किन्तु प्राप्ति की सम्भावना हो, उस अवस्था को प्राप्त्याशा कहते हैं। उदाहरणार्थ, रत्नावली नाटिका के तीसरे अंक में, रत्नावली के वेश-परिवर्त्तन करके अभिसरण करनेवाले समागम के उपाय के होने पर भी,
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वस्तु [१७७
विदूषक की उक्ति से, वासवदत्ता के रूप-विघ्न की आशंका भी बनी है। यहाँ विदूषक की उक्ति से नायक तथा सामाजिक को फल-प्राप्ति में विघ्न हो जाने का सन्देह हो जाता है। अतः, समागम-रूप फल की प्राप्ति में अनिश्चय हो जाने से प्राप्त्याशा है। नियताप्ति : जब विघ्न के अभाव के कारण फल-प्राप्ति निश्चित हो जाती है, तो उस अवस्था को नियताप्ति कहते हैं। प्राप्त्याशा में नायक के मन में फल-प्राप्ति के विषय में सन्देह बना रहता है, कुछ निश्चित नहीं रहता, केवल फल-प्राप्ति की सम्भावना रहती है। परन्तु, नियताप्ति की अवस्था में फल-प्राप्ति का निश्चय हो जाता है, सन्देह का कोई स्थान नहीं रहता। उदाहरणार्थ रत्नावली नाटिका में रत्नावली के तहखाने में बन्द किये जाने पर विदूषक राजा से उसके छुटकारे का उपाय पूछता है। इसपर राजा कहता है-'वयस्य, देवीप्रसादनं मुक्त्वा नान्यमत्रोपायं पश्यामि।' वासवदत्ता के इस प्रसादन की भावना के कारण फल-प्राप्ति की निश्चित सूचना मिलती है। फलागम : जहाँ समस्त फल की प्राप्ति हो जाय, उस अवस्था को फलयोग अथवा फलागम कहते हैं। लक्षण में 'समस्त' विशेषण का प्रयोग इसलिए हुआ है कि अधूरे फल की प्राप्ति में फलागम की अवस्था नहीं होगी, प्रत्युत नियताप्ति ही होगी। रत्नावली नाटिका में वत्सराज उदयन को रत्नावली की तथा चक्रवत्तित्व की प्राप्ति फलागम है। शकुन्तला नाटक में कथावस्तु की ये पाँच अवस्थाएँ देख सकते हैं। 'असंशयं क्षत्र- परिग्रहक्षमा' आदि के द्वारा राजा दुष्यन्त में शकुन्तला को प्राप्त करने की इच्छा सूचित होती है, जिससे आरम्भ नाम की अवस्था प्रकट होती है। तत्पश्चात् राजा शकुन्तला को प्राप्त करने के लिए द्वितीय तथा तृतीय अंकों में यत्नशील दिखाई देता है। यह प्रयत्न अवस्था है। चतुर्थ अंक के आरम्भ में दुर्वासा का क्रोध-जनित शाप विघ्न-रूप में उपस्थित होता है, परन्तु तुरन्त हमें पता चल जाता है कि नायक दुष्यन्त को शकुन्तला की प्राप्ति हो जायगी। यही प्राप्त्याशा नामक अवस्था है। षष्ठ अंक में जब मुद्रिका मिल जाती है, तो शकुन्तला की प्राप्ति निश्चित हो जाती है। यह नियताप्ति है। सप्तम अंक में दुष्यन्त और शकुन्तला का मिलन हो जाता है। यहाँ फलयोग अथवा फलागम नामक अवस्था दिखाई देती है। भारतीय तथा यूरोपीय दृष्टिकोणों में भिन्नता : इस विषय में भारतीय तथा यूरोपीय दृष्टिकोणों की भिन्नता पर विचार कर लेना उचित जान पड़ता है। भारतीय सदा से प्रयत्न में विश्वास करते रहे हैं, परन्तु यूरोपीय संघर्ष में। भारतीय जीवन प्रयत्नमय रहा है जबकि यूरोपीय जीवन संघर्षरत रहा है। यह भेद दोनों की सभ्यता में देखा जा सकता है और दार्शनिक धरातल पर भी यह भेद परिलक्षित होता है। इसी प्रयत्न तथा संघर्ष के सिद्धान्त पर कथावस्तु का विकास अवलम्बित है। फिर भी, दोनों स्थानों के नाटक-साहित्य पर दृष्टिपात किया जाय, तो विदित होगा कि एक में दूसरे की भावना स्वीकृत हुई है; क्योंकि उनके सिद्धान्त जीवन के धरातल पर मात्र एकांगी सिद्ध होते हैं।
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१७८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास किन्तु, यहाँ व्यापक रूप से उनके दृष्टिकोण से भिन्नता बतानेवाले सिद्धान्त लिये गये हैं। कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं। शेक्सपियर के 'टेम्पेस्ट' नाटक में प्रोस्पेरो निश्चित कार्य की ओर प्रयत्न के सहारे अग्रसर होता है, उसमें किसी भी प्रकार से संघर्ष की भावना दिखाई नहीं देती। इसके विपरीत भवभूति के नाटक उत्तररामचरित में किसी प्रयत्न की कोई प्रेरणा नहीं मिलती, उसमें केवल परिस्थिति से उत्पन्न मानसिक संघर्ष ही पाया जाता है। मुद्राराक्षस में राक्षस का प्रयत्न केवल प्रयत्न नहीं रहकर संघर्ष की सीमा तक पहुँच जाता है, परन्तु चाणक्य की अतुल शक्ति के सामने उसका स्पष्ट रूप नहीं आ पाता। दोनों दृष्टिकोणों में अन्तर इस रूप में व्यक्त किया जा सकता है कि पाश्चात्त्य नाटकों का नायक अपनी परिस्थितियों में पूर्ण रूप से उलझ जाता है और निकल पाने के लिए प्रयत्न करता है, परन्तु भारतीय नाटकों का नायक अपने सामने एक निश्चित लक्ष्य रखकर उसे पूर्ण करने के लिए प्रयत्न करता है। इस प्रकार, भारतीय नाटकों के प्रयत्न में संघर्ष करने की शक्ति छिपी है और इच्छा-शक्ति के सहारे बाधाओं को परास्त करने की भी अमिट शक्ति। भारतीय कथावस्तु में चरम (Climax) के लिए कोई स्थान नहीं। कारण यह है कि हमारे सामने फलागम का लक्ष्य रहता है, जिसमें नायक अपना अधिकार प्राप्त करके सफलता के सिंहासन पर आसीन होता है। यही सफलता की भावना भारतीय नाटकों की प्राप्त्याशा को जीवन की आशा-निराशा से पूर्ण चरम तक नहीं पहुँचने देती। यह दूसरी बात है कि जैसे सिद्धान्त-रूप से प्रयत्न में संघर्ष और बाधाओं को भी सम्मिलित कर सकते हैं, वैसे ही प्राप्त्याशा में भी आशा-निराशा से युक्त चरम की स्थिति मान सकते हैं। भारतीय तथा यूरोपीय पद्धतियों के समन्वय की अवस्था में फल जय-पराजय दोनों ही अवस्थाओं में उपस्थित हो सकता है। अवस्था और अर्थ-प्रकृति : कथावस्तु में अर्थ-प्रकृति तथा अवस्था दोनों होती हैं, परन्तु दोनों का भेद स्पष्टतः प्रतीत नहीं होता। प्रश्न उठता है कि दोनों में क्या अन्तर है? प्रो० कान्तानाथ शास्त्री तैलंग ने दोनों का अन्तर स्पष्ट किया है। उनका मत है कि अर्थ-प्रकृति कथावस्तु का उपादान कारण है और जहाँ भी होगी, वस्तु का ढाँचा निर्मित हो जायगा। इसके विपरीत अवस्था नायक की मनोदशा से सम्बन्ध रखती है, यह बात उन अवस्थाओं की परिभाषा से स्पष्ट हो जाती है। इस प्रकार, पाँच अर्थ-प्रकृतियाँ नाटक की कथावस्तु का औपादानिक विभाजन हैं और पाँच अवस्थाएँ नायक की मनोदशा की दृष्टि से कथावस्तु का मनोवैज्ञानिक विभाजन हैं। डॉ० भोलाशंकर व्यास ने यह मत स्वीकार किया है। मैं भी इससे सहमत हूँ। यूनानी तासदियों में अवस्थाएँ-भारतीय नाटकों से तुलना : यूनान के दुःखान्त नाटकों या तासदियों की भी कथावस्तु में पाँच अवस्थाएँ मानी गई हैं और इस स्थान पर हमारी दृष्टि स्वभावतः उनपर पड़ती है। भारतीय नाटक दुःखान्त नहीं होते और
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१८० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
प्रयोजन से मिलानेवाला सन्धि वहलाता है। पाँच अर्थ-प्रकृतियों तथा पाँच अवस्थाओं के मिश्रण से बनने के कारण इन्हें सन्धि कहते हैं। धनंजय ने दशरूपक में लिखा है : अर्थप्रकृतयः पञ्च पञ्चावस्थासमन्विताः । यथासडख्येन जायन्ते मुखाद्या: पञ्चसन्धयः ।' -अर्थात् पाँचों अर्थ-प्रकृतियाँ पाँचों अवस्थाओं से समन्वित होकर क्रमशः पाँच सन्धियाँ बन जाती हैं। कविराज विश्वनाथ ने भी सन्धियों का वर्णन किया है। शारदातनय ने धनंजय का ही प्रायः अनुसरण किया है। निम्नलिखित कारिका तो उन्होंने दशरूपक से ही ले ली है : पञ्चावस्था: समेतार्थप्रफृतीनां यथाक्रमम्। तथासङख्येन जायन्ते मुखाद्या: पञ्चसन्धयः॥ अन्तरकार्थसम्बन्धः सन्धिरेकान्वये सति ॥ तीसरी पंक्ति 'अन्तरकार्थसम्बन्धः सन्धिरेकान्वये सति' तो साहित्यदर्पण में भी इसी रूप में वर्त्तमान है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में स्वतन्त्र ढंग से इस विषय का विवेचन किया है। सन्धि का विवेचन नाट्यदर्पण में सबसे अधिक विस्तृत है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने अनेक दुर्लभ तथा सुलभ रूपकों से सन्धि के सभी अंगों के उदाहरण दिये हैं। धनंजय की उपर्युक्त कारिका भ्रम उत्पन्न करनेवाली सिद्ध हुई है। अर्थ-प्रकृतियों का अवस्थाओं के साथ यथारूप सम्बन्ध ठीक नहीं पड़ता। पताका तथा प्रकरी अर्थ- प्रकृतियों में पताका के बाद प्रकरी को गिनाया गया है। पताका का उदाहरण रामायण में सुग्रीव की कथा है और प्रकरी का उदाहरण उसी काव्य में शबरी की कथा है। इस प्रकार, रामायण में प्रकरी पहले है और पताका पीछे आती है। इसमें वह क्रम तो नहीं रहा। उसी प्रकार, बिन्दु अर्थ-प्रकृति की स्थिति नाटक में सर्वत्र रहती है। उसे किसी एक अवस्था में बाँधना सम्भव नहीं है। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में ऐसा कुछ नहीं कहा। हाँ, सन्धियों को अवस्था का अनुगामी अवश्य कहा गया है। अर्थ-प्रकृतियों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं बताया गया है। वस्तुतः पताका में भी सन्धियाँ होती हैं और नाट्यदर्पण में उन्हें अनुसन्धि नाम दिया गया है, और धनंजय ने भी दूसरे स्थल पर उन्हें अनुसन्धि ही बताया है। इसलिए, धनंजय की उपर्युक्त कारिका, जिसमें अर्थ-प्रकृतियों और अवस्थाओं-दोनों से सन्धियों का सम्बन्ध जोड़ा गया है, भ्रम उत्पन्न करनेवाली है। भरत के मत को दृष्टि में रखकर उस कारिका की व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है- 'अर्थ-प्रकृतियाँ पाँच हैं और अवस्थाएँ भी पाँच हैं। इनके समन्वित रूप से इतिवृत्त बनता है। उसके पाँच विभाग होते हैं, जो सन्धि कहे जाते हैं। ये सन्धियाँ अवस्थाओं के क्रम से होती हैं।' परन्तु ऐसा अर्थ कष्ट-कल्पित है। १. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, का० २२ २. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० २०७
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परिभाषा तथा भेद-जब किसी एक प्रयोजन से परस्पर अन्वित या सम्बद्ध कथांश को किसी दूसरे प्रयोजन से अन्वित किया जाय, तो उस सम्बन्ध को सन्धि कहते हैं। कथांश का सम्बन्ध एक ओर, अर्थ-प्रकृति के रूप में कार्य से है; दूसरी ओर, अवस्था के रूप में फलागम से। दोनों को सम्बद्ध कर देने से सन्धि का निर्माण होता है। सन्धियाँ पाँच होती हैं-मुख, प्रतिमुख, गर्भ, अवमर्श या विमर्श तथा उपसंहृति या उपसंहार या निर्वहण। पाँचों अर्थ-प्रकृतियों, अवस्थाओं और सन्धियों में परस्पर एक- दूसरे से सम्बन्ध होता है। बीज तथा आरम्भ मिलकर मुख, बिन्दु तथा प्रयत्न मिलकर प्रतिमुख, पताका तथा प्राप्त्याशा मिलकर गर्भ, प्रकरी तथा नियताप्ति मिलकर विमर्श एवं कार्य तथा फलागम मिलकर उपसंहृति या निर्वहण उत्पन्न होते हैं। शकुन्तला नाटक के इतिवृत्त में पाँचों सन्धियों के उदाहरण देखे जा सकते हैं। प्रथम अंक से द्वितीय अंक के उस स्थल तक मुख-सन्धि है, जब सेनापति का प्रस्थान हो जाता है और राजा दुष्यन्त कहता है : 'विश्रामं लभतामिदं च शिथिलज्याबन्धमस्मद्नुः'। तृतीय अंक के अन्त तक प्रतिमुख-सन्धि है। चतुर्थ अंक से पंचम अंक के उस स्थल तक गर्भ सन्धि है, जब गौतमी शकुन्तला के मुख पर से अवगुंठन हटा देती है। पंचम अंक का अवशिष्टांश तथा सम्पूर्ण षष्ठ अंक विमर्श-सन्धि है। अन्त में, सप्तम अंक में निर्वहण-सन्धि मिलती है। मुख : जहाँ अनेक अर्थों और रसों के व्यंजक बीज की प्रारम्भक नामक दशा के साथ संयोग से उत्पत्ति हो, उसे मुख-सन्धि कहते हैं। मुख-सन्धि में विविध रसों को उत्पन्न करनेवाली बीजोत्पत्ति पाई जाती है। मुख-सन्धि में ही रूपक के बीज की सूचना मिल जाती है और इसी बीज से नाटक के विभिन्न रसों की उत्पत्ति होती है। दूसरे रूपकों में धर्म, अर्थ, काम में से कोई हेतु के रूप में होता है, परन्तु प्रहसन या भाण में से कोई पुरुषार्थ स्पष्ट रूप से हेतु नहीं जान पड़ता। किन्तु, वहाँ भी हास्य आदि रस तो उत्पन्न होते ही हैं, अतः रसोत्पत्ति का हेतु ही बीज माना जायगा। मुख-सन्धि का उदाहरण रत्नावली नाटिका में प्रथम अंक सम्पूर्ण और द्वितीय अंक में उस स्थल तक है, जब सागरिका वत्सराज उदयन का चित्र बनाने का उपक्रम करती है। प्रतिमुख : जहाँ मुख-सन्धि में निदेशित फल-प्रधान उपाय का कुछ लक्ष्य और कुछ अलक्ष्य विकास हो, वहाँ प्रतिमुख-सन्धि होती है। इस सन्धि में बिन्दु नाम की अर्थ-प्रकृति और प्रयत्न नाम की अवस्था का मिश्रण होता है। मुख-सन्धि में बीज बोया जाता है और अनुकूल अवसर पाकर वही बीज अंकुरित होता है। जिस प्रकार बीजांकुर पहले कुछ अस्पष्ट या अलक्ष्य रहता है, उसी प्रकार बीज का अंकुर कुछ अस्पष्ट रूप में प्रतिमुख-सन्धि में दिखाई देता है। रत्नावली नाटिका के प्रथम अंक में उदयन तथा सागरिका के मिलन के लिए जो अनुराग-बीज बोया गया है, द्वितीय अंक में उसे सुसंगता तथा विदूषक ने जान लिया, इसलिए वह कुछ-कुछ प्रकट हो गया। चित्र-फलक-वृत्तान्त से वासवदत्ता ने भी कुछ
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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अनुमान लगा लिया, अतः यह अलक्ष्य भी रहा। इस प्रकार, यह प्रतिमुख-सन्धि है। वेणी- संहार में भी भीष्मादि की मृत्यु से युधिष्ठिर का करोध लक्ष्य हो गया है, परन्तु अभी कर्णादि का वध नहीं होने के कारण अलक्ष्य भी है। यहाँ भी प्रतिमुख-सन्धि है। गर्भ : जब बीज दिखाई देकर फिर नष्ट हो जाता है और उसका बार-बार अन्वेषण किया जाता है तब वहाँ गर्भ-सन्धि होती है। साहित्यदर्पणकार का मत है कि पूर्वसन्धियों में कुछ-कुछ प्रकट हुए फल-प्रधान उपाय का जहाँ ह्रास और अन्वेषण से युक्त बार-बार विकास हो, उसे गर्भ-सन्धि कहते हैं। इसमें पताका नाम की अर्थ-प्रकृति तथा प्राप्त्याशा नाम की अवस्था का सम्मिश्रण रहता है। इसमें पताका का होना अनिवार्य नहीं है, परन्तु प्राप्त्याशा का होना अनिवार्य है। जिस बीज को प्रतिमुख-सन्धि में लक्ष्यालक्ष्य- रूप में देखा गया है, वही बीज गर्भ-सन्धि में विशेष रूप से विकसित हो जाता है। किन्तु, फल-लाभ विघ्न-रहित नहीं है, इसमें कभी तो विघ्न उपस्थित होता है, फिर उसका लाभ होता है, फिर विच्छेद हो जाता है। इस प्रकार, बार-बार अन्वेषण किया जाता है। इस गर्भ में प्राप्ति की सम्भावना-मात्र होती है; पूर्ण निश्चय नहीं। यह गर्भ-सन्धि की विशेष बात है। रत्नावली नाटिका के तृतीय अंक में उदयन की फल-प्राप्ति में वासवदत्ता से विघ्न उपस्थित होता है। परन्तु, सागरिका के अभिसरण के उपाय से नायक को फिर आशा हो जाती है। इसमें बार-बार विच्छेद होता है और बार-बार प्राप्ति की आशा होती है। फिर विघ्न के निवारण और फल-प्राप्ति के हेतु का अन्वेषण किया जाता है। इस अन्वेषण की अभिव्यक्ति नायक के इस कथन से होती है : 'नास्ति देवीप्रसादनं मुक्त्वान्य उपायः'-अब वासवदत्ता को मनाने के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है। अवमर्श या विमर्श : अवमर्श की परिभाषा के विषय में आचार्यों में थोड़ा मदभेद है। भरत की ही परिभाषा, कुछ शब्द बदलकर, धनंजय ने ले ली है। धनंजय ने अवमर्श का निम्नलिखित लक्षण दिया है : कोधेनावमशेद यद्यत व्यसनाद्वा विलोभनात्। गर्भनिभिन्नबीजार्थः सोऽवमर्श इति स्मृतः ॥' -अर्थात् जहाँ करोध से, व्यसन से या विलोभन से धन-प्राप्ति के सम्बन्ध में विचार किया जाय, तथा जहाँ गर्भ-सन्धि के द्वारा बीज को प्रकट कर दिया गया हो, वहाँ अवमर्श-सन्धि होती है। शारदातनय ने धनंजय के ही शब्दों को दुहराया है, अपनी ओर से भी दो पंक्तियाँ जोड़ दी हैं। किन्तु, विश्वनाथ ने जो परिभाषा दी, उसमें पर्याप्त अन्तर है। उन्होंने लिखा है : यत्र मुख्यफलोपाय उदि्भन्नो गर्भतोऽधिकः। शापाद्यैः सान्तरायश्च स विमर्श इति स्मृतः ॥२ १. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, का० ४३ २. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० ७९
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ककही जी नकह वस्तु [ १८३
-अर्थात् जहाँ मुख्य फल का उपाय गर्भ-सन्धि की अपेक्षा अधिक उदिभन्न अथवा प्रकट हो, किन्तु शापादि के कारण अन्तराय-युक्त (विघ्नयुक्त) हो, उसे विमर्श-सन्धि कहते हैं। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने एक छोटा-सा लक्षण दिया है, जिसमें दोनों का सामंजस्य हो जाता है : उदि्भन्नसाध्यविघ्नात्मा विमर्शो व्यसनादिभिः।' अवमर्श या विमर्श शब्द का अर्थ विवेचन, विचार या पर्यालोचन है। अवमर्श शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से धनंजयवाला लक्षण अधिक युक्तिसंगत है। फल-प्राप्ति का विमर्श या विवेचन क्रोध, व्यसन या विलोभन के द्वारा सम्भव है। फल-प्राप्ति के निश्चय का विवेचन जहाँ पाया जाय और जहाँ गर्भ-सन्धि से प्रकटित बीज से सम्बन्ध पाया जाय, वह पर्यालोचन विमर्श या अवमर्श कहा जाता है। उदाहरणार्थ, रत्नावली नाटिका के चतुर्थ अंक में यह सूचा कि रत्नावली की प्राप्ति देवी वासवदत्ता की प्रसन्नता से सम्भव है, अवमर्श है। यह अवमर्श अग्निदाह तथा उससे डरकर लोगों के भागने के वर्णन तक है। वेणीसंहार नाटक में भीमसेन दुर्योधन के रक्त से आप्लावित होकर आता है, उस वर्णन तक विमर्श या अवमर्श है। निर्वहण : निर्वहण की जो परिभाषा भरत मुनि ने दी, उससे मिलती-जुलती, किन्तु दूसरे शब्दों में धनंजय ने परिभाषा दी। धनंजय की ही कारिका विश्वनाथ और शारदातनय ने अपनी पुस्तकों में अक्षरशः रख दी। नाट्यदर्पण में वही लक्षण दूसरे शब्दों में दिया गया है। रूपक के इतिवृत्त के बीज से युक्त मुखादि सन्धियों में इधर-उधर बिखरे हुए अर्थ जब एक प्रयोजन के लिए एक साथ समन्वित किये जाते हैं या समेटे जाते हैं, तो वहाँ निर्वहण-सन्धि होती है; जैसे-रत्नावली नाटिका में सागरिका, वसुमती आदि के कार्य मुख-सन्धि आदि में बिखरे पड़े थे। उन कार्यों का समाहार वत्सराज के ही कार्य के लिए होता है। वसुभूति की इस उक्ति से यह बात स्पष्ट हो जाती है : वसुभूति (सागरिका को देखकर एक ओर) : 'वाभ्रव्य, यह तो राजपूत्री जैसी दिखाई पड़ती है।' अथवा अभिज्ञानशाकुन्तल के सप्तम अंक में शकुन्तला के परिज्ञान के बादवाली सम्पूर्ण कथा निर्वहण-सन्धि का उदाहरण है।
तीनों में पारस्परिक सम्बन्ध : कथानक की घटनाओं का विकास घात-प्रतिघात के सहारे आगे बढ़ता है। उसी का भारतीय रूप हमें नाटकीय सन्धियों में प्राप्त होता है। फिर भी मानना होगा कि नाटक-रचना के समन्वय को ध्यान में रखा जायगा, तो सन्धियों में घात-प्रतिघात से अधिक व्यापकता दिखाई देगी। परन्तु, समानता को ध्यान में रखकर देखें तो मुख-सन्धि में उत्सुकता, प्रतिमुख में कौतूहल, गर्भ में आशा-निराशावाली स्थिति, विमर्श में सन्देहात्मक स्थिति और निर्वहण में शमन मानना उचित प्रतीत होता है।
१. नाट्यदर्पण, नाट्य-निर्णय, का०३३९
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१८४] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्धव और विकास
संस्कृत-नाटकों में वस्तु-तत्त्व की अर्थ-प्रकृतियाँ, कार्य की अवस्थाएँ तथा सन्धियाँ नाटक-रचना के तीन आयामों को ध्यान में रखकर बाँटी गई हैं, ऐसा प्रतीत होता है। अर्थ-प्रकृतियाँ कथावस्तु की विविध वस्तुस्थितियों की, अवस्थाएँ अभिनयात्मक व्यापार की तथा सन्धियाँ रचनात्मक प्रभाव की अवतारणा करने में सहायता करती हैं। वस्तु-विभाग का दृष्टिकोण रचनात्मक, व्यापार की अवस्थाएँ अभिनयात्मक घटना-विकास सम्बन्धी और सन्धियाँ प्रभावात्मक धरातल को स्पर्श करती हैं। 'वास्तव में, अर्थ-प्रकृति कथा के उचित संघटन का उपाय है; अवस्थाएँ नाटक के नायक की फल-प्राप्तिजन्य क्रियाओं की अवस्थाएँ हैं और सन्धियाँ इन अवस्थाओं को अनुकूल दिशा में ले जानेवाले उस घटनाचक के, जो अर्थ-प्रकृतियों से मिलकर पूरा इतिवृत्त या कथानक बन जाता है, विभिन्न अंग हैं।" सन्धियों के अंग : पाँचों सन्धियों में से प्रत्येक के अनेक अंग माने गये हैं, जिनका सम्पूर्ण योग ६४ है। मुख-सन्धि के बारह अंग हैं-उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, विलोभन, युक्ति, प्राप्ति, समाधान, विधान, परिभावना, उद्भव, करण तथा भेद। मुख-सन्धि के बारह भेद बीज नामक अर्थ-प्रकृति तथा आरम्भ नामक अवस्था को व्यक्त करते हैं। आचार्यों का मत है कि इनका समावेश नाटक या रूपक में करना चाहिए। इनमें भी उपक्षेप, परिकर, परिन्यास, युक्ति, उद्भेद और समाधान नामक अंग का समावेश मुख- सन्धि में अत्यावश्यक माना गया है। प्रतिमुख-सन्धि के तेरह अंग माने गये हैं; यथा- विलास, परिसर्प, विधूत, शम, नर्म, नर्मद्युति, प्रगमन, निरोध, पर्युपासन, वज्, पुष्प, उपन्यास तथा वर्णसंहार। प्रतिमुख-सन्धि के तेरह अंगों का सम्पादन मुख-सन्धि के द्वारा डाले गये महाबीज तथा प्रयत्न नामक अवस्था के साथ किया जाना चाहिए। इन अंगों में भी परिसर्प, प्रशम, वज्र, उपन्यास तथा पुष्प अधिक आवश्यक हैं। शेष अंगों का भी यथासम्भव प्रयोग करना चाहिए। गर्भ-सन्धि के बारह अंग माने जाते हैं; यथा- अभूताहरण, मार्ग, रूप, उदाहरण, क्रम, संग्रह, अनुदान, तोटक, अधिबल, उद्वेग, सम्भ्रम तथा आक्षेप। गर्भ-सन्धि के इन बारह अंगों का संयोजन प्राप्त्याशा नामक अवस्था के पोषक के रूप में करना चाहिए। इनमें अभूताहरण, मार्ग, तोटक, अधिबल तथा आक्षेप विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। शेष का यथासम्भव प्रयोग करना चाहिए। अवमर्श-सन्धि के तेरह अंग माने गये हैं; यथा-अपवाद, संकट, विद्रव, द्रव, शक्ति, द्युति, प्रसंग, छलन, व्यवसाय, प्ररोचना, विरोधन, विचलन और आदान। इन तेरह अंगों में अपवाद, शक्ति, व्यवसाय, प्ररोचना और आदान प्रमुख हैं। शेष का भी यथासम्भव प्रयोग होना चाहिए। निर्वहण-सन्धि के चौदह अंग माने जाते हैं; यथा-सन्धि, विबोध, ग्रथन, निर्णय, परिभाषण, प्रसाद, आनन्द, समय, कृति, भाषा, उपगूहन, पूर्वभाव, उपसंहार तथा प्रशस्ति। १. डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी : नाट्यशास्त्र की भारतीय परम्परा और टशरूपक, भूमिका, पृ० ४३
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सन्धियों और सन्ध्यंगों के प्रयोजन : किसी रूपक में इन सभी सन्ध्यंगों का प्रयोग आवश्यक नहीं होता। भरत मुनि ने बताया है कि शायद ही सभी अंग एक ही रूपक में मिलें। कभी-कभी दो-चार से भी काम चल जाता है। कार्य और अवस्था को देखकर ही इन अंगों का प्रयोग किया जाता है। धनंजय ने यह महत्त्वपूर्ण बात नहीं कही है, फिर भी उन्होंने इन अंगों के प्रयोग के कुछ विशेष प्रयोजनों का निर्देश किया है। ये प्रयोजन छह हैं, जो इस प्रकार हैं : १. इष्ट अर्थ की चर्चा, २ गोपनीय अर्थ को छिपाना, ३. प्रकाश्य अर्थ को प्रकाशित करना, ४. अभिनेय में राग की वृद्धि, ५. उसमें चमत्कार का समावेश और ६. काव्य के इतिवृत्त का विस्तार। इन ६४ अंगों से ये ६ प्रयोजन सम्पादित होते हैं। इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि जहाँ आवश्यकता हो, वहीं इनका प्रयोग करना चाहिए। वास्तव में रस तथा नायक के स्वभाव के अनुकूल ही किसी रूपक के कथानक की योजना की जाती है। उदाहरण के लिए व्यायोग को लिया जाय। इसका नायक उद्धत स्वभाव का होता है। इसका लक्ष्य शृंगार रस नहीं होता प्रत्युत दीप्त रस इसमें होते हैं। उद्धत स्वभाव का होने के कारण यह नायक प्रारम्भ के बाद यत्न करता है और शीघ्र ही फल-प्राप्ति के लिए अधीर हो जाता है। बीच की अवस्थाओं-प्राप्त्याशा तथा नियताप्ति-की उलझनों में पड़ने के लिए उसे धैर्य नहीं होता। उसे अविलम्ब फलागम ही चाहिए। अतः इसके कथानक की योजना उसके इसी हड़बड़ीवाले स्वभाव को ध्यान में रखकर करनी चाहिए, नहीं तो रस में बाधा पड़ने की सम्भावना रहती है। इसीलिए, व्यायोग के कथानक में गर्भ और विमर्श सन्धियों का समावेश नहीं हो पाता। निम्नलिखित सारणी से स्पष्ट हो जायगा कि किस प्रकार के रूपक में किन अवस्थाओं और सन्धियों की आवश्यकता समझी जाती है और किन अवस्थाओं में नहीं। रूपकों के नाम कौन-कौन अवस्थाएँ कौन-कौन सन्धियाँ कौन-कौन सन्धियाँ होती हैं होती हैं नहीं होतीं
१. नाटक सभी पाँचों सभी पाँचों
२. प्रकरण " ३. नाटिका 11 ४. व्यायोग प्रारम्भ, यत्न, फलागम, मुख, प्रतिमुख, निर्वहण गर्भ, विमर्श
५. ईहामृग प्रारम्भ, यत्न, फलागम मुख, प्रतिमुख, निर्वहण गर्भ, विमर्श
६. समवकार प्रारम्भ, यत्न, मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श
प्राप्त्याशा, फलागम निर्वहण ७. डिम 5. भाण प्रारम्भ, फलागम मुख, निर्वहण प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श
९. प्रहसन 11 १०. उत्सृष्टिकांक 11 ११. वीथी 13
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Tg इन ६४ सन्ध्यंगों का विस्तृत विवेचन धनंजय-धनिक, विश्वनाथ तथा रामचन्द्र- गुणचन्द्र ने अपने ग्रन्थों में किया है। उन आचार्यों ने प्रत्येक सन्ध्यंग के लक्षण तथा उदाहरण दिये हैं। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने तो अनेक सन्ध्यंगों के एक से अधिक उदाहरण दिये हैं। किन्तु, यहाँ इनके विवेचन में अधिक समय लगाना अनावश्यक प्रतीत होता है। सन्धियों और सन्ध्यंगों की आवश्यकता या नहीं : नाटकीय इतिवृत्त के इस प्रकार के विभाजन के विषय में डॉ० कीथ सन्धियों के विभाजन को उचित मानते हैं; क्योंकि इनमें नाटकीय संघर्ष पर बल दिया जाता है और इनका लक्ष्य यह दिखाना है कि किस प्रकार नायक अनेक विघ्नों तथा विपत्तियों पर विजय प्राप्त कर फल-प्राप्ति की ओर अग्रसर होता है। किन्तु, वे सन्धियों का विभाजन कर लेने के बाद अर्थ-प्रकृतियों की कल्पना व्यर्थ समझते हैं; साथ ही पाँच सन्धियों का पाँच अर्थ-प्रकृतियों तथा पाँच अवस्थाओं से मेल मिलाने की योजना दोषपूर्ण मानते हैं। डॉ० कीथ के ही शब्दों में- "So far there is obviously force and reason in the analysis, which, if in needless elaboration, recognizes the essential need of a dramatic conflict, of obstacles to be overcome by the hero and heroine in their efforts to secure abiding union. The classification of elements of the plot is perhaps superfluous beside the junctures; its parallelism to the other two divisions is faulty, for it is admitted that the episode is not confined to the development, as it should be, but may extend into the pause and even into the conclusion."9
रूपक की कथावस्तु में सन्धियाँ आवश्यक हैं, विशेषतः नाटक की कथावस्तु में तो ये अत्यावश्यक हैं; क्योंकि उसे पंचसन्धि-समन्वित होना अनिवार्य है। नाटक के अतिरिक्त अन्य कई रूपकों में पाँच सन्धियों के स्थान पर कहीं-कहीं चार या तीन ही सन्धियाँ हो सकती हैं, यह दूसरी बात है। सन्धियों से अधिक विवादास्पद विषय उनके अंग हैं। कुछ विद्वान् सन्धियों के इस विशाल विभागीकरण का समर्थन करते हैं, तो दूसरे कुछ विद्वान् इसका विरोध करते हैं और इसे जटिल तथा अनावश्यक बताते हैं। डॉ० कीथ की मान्यता है कि नाटक की कथावस्तु में इस जटिल विभागीकरण का कोई वास्तविक मूल्य नहीं है। उनका कथन है : "But far more complex is the insistance on the subdivision of the five junctures into 64 members. The distinction, however, has no real value."?
- The Sanskrit Drama, p. 299, २. वही
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प्रो० विल्सन ने इस विभागीकरण को धैर्य समाप्त करनेवाला बताया है : "Each of these divisions in the Hindu System comprehends a number of subdivisions, Angas or members, to follow the description of which would be to exhaust any patience except Hindu."9
भरत मुनि अंगों का प्रयोग आवश्यक बताते हैं :
अङ्गहीनो नरो यद्वद् युद्धारम्भेऽक्षमो भवेत्। अङ्गहीनं तथा काव्यं न प्रयोगक्षमं भवेत् ॥२ उनके अनुसार अंगहीन काव्य अंगहीन मनुष्य के समान असमर्थ है। रुद्रट का मत है कि प्रत्येक सन्ध्यंग का प्रयोग अपनी ही सन्धि में उचित है। परन्तु, अन्य विद्वान् सन्ध्यंगों के विषय में ऐसा नियम आवश्यक नहीं समझते। यह भी आवश्यक नहीं है कि किसी नाटकादि में इन सभी ६४ सन्ध्यंगों का प्रयोग किया ही जाय। फिर भी, भट्टनारायण ने अपने नाटक वेणी-संहार में इन सभी सन्ध्यंगों का निर्वाह करने का प्रयत्न किया है। परन्तु, परिणाम सर्वथा उत्तम नहीं हो सका है। वेणी-संहार के द्वितीय अंक में भानुमती और दुर्योधन का प्रेमालाप कृत्रिम तथा परम्परा के लिए ही जान पड़ता है। इस प्रेमालाप से काव्य के रस में बाधा ही पड़ी है, साथ ही दुर्योधन का चरित्र भी सम्यक रूप से उपस्थित नहीं हो सका है। दुर्योधन का चरित्र उपस्थित करने में इससे बाधा ही पड़ी है। निष्कर्ष : निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि पाँच सन्धियों का विभाजन तो नाटक-रचना में आवश्यक और उपयोगी है। इनसे नाटक के इतिवृत्त के आवश्यक मोड़ों का पता चलता है और कवि की कथानक-गटन की कुशलता प्रकट होती है। परन्तु, सन्धियों का ६४ अंगों में विभाजन अनावश्यक है। इससे जटिलता बढ़ाने के अतिरिक्त कोई लाभ नहीं। सभी अंग जो तत्तत् सन्धियों में कहे गये हैं, व्यावहारिक दृष्टि से अनावश्यक हैं। धनंजय ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि अमुक-अमुक सन्धियों में अमुक- अमुक अंग आवश्यक हैं और शेष आवश्यक नहीं हैं। परन्तु, बहुधा देखा जाता है कि नाटक में आवश्यक बताते हुए भी अंगों का प्रयोग प्रायः नहीं हुआ है। जब हम धनिक द्वारा दिये हुए उदाहरणों पर दृष्टि डालते हैं, तो पाते हैं कि अनेक स्थलों पर सन्ध्यंगों का व्युत्क्म हुआ है। साहित्यदर्पण में विश्वनाथ द्वारा दिये गये उदाहरणों में भी ऐसी तुटि मिलती है। इस प्रकार, नाटक के व्यावहारिक रूप में प्रयोगवाली योजना उपयुक्त नहीं जान पड़ती। यदि कोई कवि सभी सन्ध्यंगों का समावेश अपने नाटक में करने पर तुल जाय, तो उसका नाटक उदाहरणों का संग्रहालय बनकर रह जायगा, नाटक तो नहीं ही होगा। उसमें स्वाभाविकता तथा नाटकीयता का सर्वथा अभाव ही रहेगा। ₹. Dramas : H. N. Wilson, p. 47. २. नाट्यशास्त्र, अध्याय १९, का० ५१
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अतः, सन्ध्यंगों के जटिल विधान से बचना ही श्रेयस्कर है। इससे पाठक के धैर्य की ही परीक्षा होगी, नाटककार की प्रतिभा की नहीं। हिन्दी-नाटक और सन्धि तथा अर्थ-प्रकृति : आजकल हिन्दी-नाटकों में कोई नाटककार सन्धियों और अर्थ-प्रकृतियों की योजना करने का प्रयत्न नहीं करता। हिन्दी- नाटकों में इसका निर्वाह कठिन तो समझा ही जाता है, साथ ही अनावश्यक भी समझा जाता है। अवस्थाओं का निर्वाह किया जा रहा है। परन्तु, आज के समस्या-नाटककार पश्चिम के प्रभाव के कारण पाश्चात्त्य नाटकों की ही पाँच अवस्थाओं की योजना करते हैं, भारतीय आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट अवस्थाओं की नहीं। आज का नाटककार चरम सीमा (Climax) को महत्त्व दे रहा है। अंक : श्रव्य काव्य में कवि को पूर्ण स्वतन्त्रता तथा सुविधा रहती है कि वह घटनाओं को जैसा चाहे विस्तार दे दे; उसे वस्तु की सीमा का बन्धन नहीं। परन्तु, दृश्य काव्य में ऐसा नहीं हो सकता। नाटककार को देश-काल की सीमा का बन्धन रहता है। नाटक की कथावस्तु को रंगमंच पर दिखाना होता है। इसीलिए, नायक के जीवन से सम्बद्ध सारी घटनाएँ सांगोपांग रूप से उसी तरह रंगमंच पर नहीं दिखाई जा सकती, जिस तारह श्रव्य काव्य में वणित हो सकती हैं। बहुत बड़ी कथा रंगमंच पर थोड़े ही समय में दिखानी होती है। सभी प्रसंग मार्मिक नहीं होते, परन्तु यदि दर्शक को सभी बातें नहीं बताई जाएँ तो कथानक उसकी समझ में नहीं आयगा। फलस्वरूप नाटककार कुछ अत्यन्त महत्त्वपूर्ण घटनाओं का प्रदर्शन रंगमंच पर करा देता है, शेष गौण घटनाओं को पात्रों के वार्त्तालाप, नेपथ्य या किसी अन्य उपाय से सूचित करता है। इस प्रकार, रूपक की समस्त कथावस्तु के दो विभाग किये जाते हैं-दृश्य और सूच्य। कथावस्तु का वह अंश दृश्य कहलाता है, जो रंगमंच पर दिखाया जाता है और सुना भी जा सकता है। मधुर, उदात्त, रस तथा भाव से पूर्ण वस्तु का वह अंश, जो रंगमंच पर दिखाकर नाटक में नाटककार प्रभावोत्पादकता तथा रसमयता लाना चाहता है, दृश्य कहा जाता है। दृश्य का विधान अंक कहा जाता है। 'अंक' शब्द के प्रयोग का कारण केवल अनुमान का विषय है। संस्कृत में इस शब्द का प्रयोग संख्या, चिह्न, गोद आदि अनेक अर्थों में होता है। परन्तु, नाटक में इन भावों से कोई सम्बन्ध नहीं जान पड़ता। भरत के अनुसार यह रूढ शब्द है। भाव और अर्थों के द्वारा नाना विधानयुक्त होकर अर्थों का आरोप कराता है, इसलिए इसे अंक कहते हैं। इसका एक पुराना अर्थ उतार-चढ़ाव प्रकट करनेवाला घुमाव भी है। सम्भवतः, नाटकीय घटनाओं के आरोह-अवरोह प्रकट करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता रहा होगा। भारतीय नाटक अंकों में विभाजित रहते हैं, जो ५ से १० तक रह सकते हैं। रूपक के अन्य भेदों में भी अंकों की संख्या निर्धारित है। ये अंक आजकल के नाटकों के समान दृश्य के समूह-मात्र नहीं हैं। भारतीय नाटक का अंक कई न्यूनाधिक विशृंखल दृश्यों से युक्त होता है। इसकी आगे दी गई कतिपय विशेषताएँ हैं :
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(क) रूपक के नाटक नामक भेद में केवल राजा (नायक), उसकी रानी, उसका मन्त्री या ऐसे ही महत्त्वपूर्ण व्यक्ति को महत्त्व मिलता है, किसी सामान्य पात् को नहीं। इस तथ्य का तात्पर्य प्रभाव की अन्विति लाना जान पड़ता है। (ख) इसमें वे ही घटनाएँ आती हैं, जो एक ही दिन में सम्पन्न हो जायँ। यदि ऐसा हो कि एक दिन की सभी घटनाओं का समावेश नहीं हो सके तो इन अतिरिक्त घटनाओं का संकेत प्रवेशक में किया जाता है। दो अंकों के बीच की घटनाओं की भी सूचना देने के लिए इसी विधि का व्यवहार किया जाता है। स्पष्टतः, प्रवेशक आदि का उतना महत्त्व नहीं हो सकता। किन्तु, नाट्यशास्त्र के अनुसार ये घटनाएँ एक वर्ष से अधिक की नहीं होनी चाहिए। (ग) अंक में कुछ विशेष प्रकार की घटनाओं और दृश्यों का प्रदर्शन नहीं होना चाहिए। भरत मुनि ने रंगमंच पर कुछ प्रकार के दृश्य नहीं दिखाने का आदेश दिया है :
युद्धं राज्यभ्रंशो मरणं नगरावरोधनं चैव। प्रत्यक्षाणि तु नाङ्के प्रवेशकः संविधेयानि ॥ -अर्थात् युद्ध, राज्य-विप्लव, मृत्यु, नगर का घेरा आदि को अंक में प्रत्यक्ष नहीं दिखाकर प्रवेशक आदि से सूचित करना चाहिए। विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि निम्नलिखित कई प्रकार के विषय हैं, जिन्हें रंगमंच पर नहीं दिखाया जाना चाहिए : १. युद्ध, राज्य-विप्लव, राज्य-भ्रंश, नगर का घेरा आदि दृश्य, जो राजनीतिक दृष्टि से गोपनीय या क्षोभपूर्ण हैं। २. दूर से पुकारना, दूर की यात्रा आदि के दृश्य अव्यावहारिक तथा अस्वाभाविक होने के कारण रंगमंच के उपयुक्त नहीं हैं। ३. मृत्यु, वध, आत्महत्या आदि के दृश्य, जिनसे भय उत्पन्न होता है और हृदय पर बुरा प्रभाव पड़ता है। किन्तु, यदि मृत व्यक्ति पुनः जीवित हो जाता है, तो यह दृश्य दिखाने में नाटककार को संकोच नहीं करना चाहिए; जैसे नागानन्द नाटक में। ४. चुम्बन, परिरम्भन, रतिकीड़ा, नखच्छद, दन्तच्छद आदि के दृश्य, जिनका रंगमंच पर दिखाना भारतीय नैतिकता के विरुद्ध है। ५. शयन, भोजन, विवाह, स्नान, अनुलेपन, वस्त्र पहनने का व्यापार आदि के दृश्य, जो व्यक्तिगत जीवन से सम्बन्ध रखते हैं। ६. मलोत्सर्ग जैसे ब्रीड़ाजनक दृश्य। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १८, का० २१
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इनमें से कुछ दृश्य रंगमंच की सीमा के कारण नहीं दिखाये जा सकते। कुछ के मार्ग में भारतीय नैतिकता है और कुछ अन्य दृश्य दिखाने से प्रेक्षक का ध्यान मुख्य रस से हट जाने का भय रहता है, जिसका फल यह होगा कि नाटक जो प्रभाव उत्पन्न करना चाहता है, वह नहीं उत्पन्न हो सकता; उसमें बाधा पड़ जायगी।
इस विषय के बहुत थोड़े अपवाद संस्कृत-नाट्य-साहित्य में पाये जाते हैं। राजशेखर के नाटक 'विद्धशालभंजिका' के तीसरे अंक में विवाह-संस्कार दिखाया गया है। दूसरा उदाहरण 'पार्वती-परिणय' नाटक का है, जिसका विषय ही शिव-पार्वती का विवाह है। भास के 'उरुभंग' में दुर्योधन की मृत्यु का दृश्य दिखाया गया है। वस्तुतः भारतीय नाटक आनन्द या रस की पवित्र साधना है। यहाँ केवल नग्न यथार्थ का चित्रण अभीष्ट नहीं। जिन व्यापारों में हृदयग्राही कला का स्थान है, उन्हीं का प्रदर्शन उचित माना गया है। स्नान-भोजनादि के प्रदर्शन में कला का स्थान कहां? पाश्चात्य प्रदर्शनों का अनुकरण करके हमारे यहाँ फिल्मों में जो अर्धनग्न दृश्य दिखाये जाते हैं, उनमें कामोत्तेजना के द्वारा भ्रष्टाचार के प्रचार के अतिरिक्त क्या लाभ है? अर्थोपक्षेपक : वस्तु के वे अंश, जो नीरस हैं तथा रंगमंच पर जिनका दिखाया जाना रस-प्रवणता तथा नैतिकता के विरुद्ध है, सूच्य कहलाते हैं। इस स्थल पर धनंजय ने लिखा है :
नीरसोऽनुचितस्तत्न संसूच्यो वस्तुविस्तरः।'
-वे वस्तुएँ जो नीरस हैं, जिनमें रस-प्रवणता नहीं-जिनका मंच पर दिखाया जाना नैतिकता आदि के योग्य नहीं, वे संसूच्य या सूच्य कही जाती हैं। राष्ट्रीय विपत्ति, नगरावरोध, राजा का पतन, युद्ध, मृत्यु, हत्या आदि सामाजिक के मन को खिन्न कर देते हैं, इसलिए रंगमंच पर इनका दिखाना वर्जित है। उसी तरह अनेक प्रकार के दृश्य वजित हैं। लम्बी यात्रा या दूर से पुकारने के दृश्य अस्वाभाविकता के कारण वर्जित हैं। इन घटनाओं तथा वस्तु के अंशों की सूचना अर्थोपक्षेपकों से दी जाती है। जो कथा दो दिनों से लेकर एक वर्ष तक की हो अथवा और भी विस्तृत हो, उसे भी अर्थोपक्षेपकों के द्वारा सूचित करना चाहिए। जो कथा एक वर्ष से अधिक की हो, उसे एक वर्ष से कम की बना लेना चाहिए। भरत मुनि का प्रमाण है कि जो कथा मास- भर की है या वर्ष-भर की है, उसे अंकच्छेद के द्वारा सूचित करना चाहिए। कथा को एक वर्ष से अधिक की कभी न करें: अङ्कच्छेदे कार्य मासवृत्त वर्षसञ्चितं वापि। तत्सवं कर्त्तव्यं वर्षादूर्ध्व न तु कदाचित् ।। १. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, कारिका ५७
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इसीलिए, श्रीरामचन्द्रजी ने यद्यपि १५ वर्ष के वनवास में अनेक राक्षसों का वध किया था, किन्तु भवभूति ने महावीरचरित में तथा राजशेखर ने बालरामायण में ये घटनाएँ थोड़े समय में ही दिखा दीं। जो घटनाएँ सूच्य हैं-रंगमंच पर दिखाई नहीं जा सकतीं-उनकी सूचना पात्रों के संवाद के द्वारा दी जाती है। सूचना देनेवाले पात् प्रायः अप्रधान होते हैं। कभी-कभी कथा-सूत्रों की सूचना यवनिका के पीछे से भी दी जाती है। इन कथा-सूत्रों के सूचना- प्रकार अर्थोपक्षेपक कहे जाते हैं। अर्थोपक्षेपक के पांच भेद होते हैं। विष्कम्भक : भूत तथा भविष्य की कथाओं की सूचना देनेवाला, कथा का संक्षेप करनेवाला अंक विष्कम्भक कहा जाता है। यह अंक के आरम्भ में रहता है तथा एक या दो मध्यम पात्रों के वार्त्तालाप के द्वारा कथांशों की सूचना देता है। विष्कम्भक दो प्रकार का होता है-शुद्ध और संकीर्ण। एक अथवा दो मध्यम श्रेणी के पात्रोंवाला विष्कम्भक शुद्ध कहा जाता है। मध्यम श्रेणी के तथा अधम श्रेणी के पात्रोंवाला विष्कम्भक संकीर्ण या मिश्र कहा जाता है। ध्यान देने की बात है कि विष्कम्भक में कम-से-कम एक पात्र मध्यम श्रेणी का होना आवश्यक है। यदि दोनों पात्र अधम श्रेणी के ही रहेंगे, तो वह विष्कम्भक नहीं रहकर प्रवेशक हो जायगा। ककी नाटक के पात्र तीन प्रकार के माने गये हैं- उत्तम, मध्यम तथा अधम। राजा, मन्त्री, पुरोहित आदि उत्तम पात्र हैं; चोर, सेवक, सेविका, सिपाही आदि अधम पात्र हैं। शेष पात् मध्यम श्रेणी के हैं। मध्यम श्रेणी के शिक्षित पुरुष संस्कृत बोलते हैं और अशिक्षित पात्र प्राकृत का कोई भेद बोलते हैं। विष्कम्भक का उदाहरण शकुन्तला नाटक के तृतीय अंक के आरम्भ में है, जहाँ कण्व ऋषि का एक शिष्य संस्कृत में बोलकर आश्रम में राजा के ठहरने के विषय में सूचना देता है। चतुर्थ अंक के भी आरम्भ में शकुन्तला की दो सखियों के द्वारा दुर्वासा के शाप की सूचना दी जाती है। प्रवेशक : विष्कम्भक के समान प्रवेशक भी भूत तथा भविष्य के कथांशों की सूचना देता है। इसमें अधम पात्रों का प्रयोग किया जाता है, जो प्राकृत भाषाएँ बोलते हैं। इनकी प्राकृंत भी विशिष्ट-शौरसेनी आदि-न होकर मागधी, शकारी आदि होती है। प्रवेशक की योजना अंक के आरम्भ में नहीं, प्रत्युत दो अंकों के बीच में की जाती है। नीचे विष्कम्भक तथा प्रवेशक का अन्तर दिखाया जा रहा है। विष्कम्भक प्रवेशक १. यह भूत तथा भविष्य के कथांशों की १. यह भी भूत तथा भविष्य के कथांशों की सूचना देता है। ीसूचना देता है। २. इसमें एक या दो मध्यम पात्र, एक २. इसमें एक या दो अधम पात्रों का प्रयोग मध्यम तथा दूसरा अधम पात्र का प्रयोग किया जाता है। किया जाता है।
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३. इसमें संस्कृत तथा शिष्ट (शौरसेनी ३. इसमें संस्कृत का प्रयोग कभी नहीं आदि) प्राकृत भाषाएँ प्रयोग में लाई होता। प्राकृत भी शिष्ट नहीं, वरन् जाती हैं। मागधी, शकारी आदि व्यवहार में आती हैं। ४. इसका प्रयोग रूपक के प्रथम अंक के भी ४. इसका प्रयोग कभी भी रूपक के पहले हो सकता है और दो अंकों के आरम्भ में नहीं होता, सदा दो अंकों के बीच में भी। विष्कम्भक का अच्छा बीच में होता है। प्रवेशक का अच्छा उदाहरण शकुन्तला नाटक के चतुर्थ उदाहरण शकुन्तला नाटक के षष्ठ अंक का है। अंक में है।
चूलिका : जहाँ कथांश की सूचना यवनिका के उस ओर स्थित पात्रों के द्वारा दी जाय, वहाँ चूलिका नामक अर्थोपक्षेपक होता है। चूलिका में नेपथ्य-स्थित पात्र के ही द्वारा सूचना दी जाती है। उदाहरणार्थ, उत्तररामचरित के द्वितीय अंक के आरम्भ में आत्रेयी के आगमन पर वनदेवी नेपथ्य से उसका स्वागत करती है-(नेपथ्ये) स्वागतं तपोधनायाः (तत्र प्रविशति तपोधना)। महावीरचरित में भी चतुर्थ अंक के आरम्भ में नेपथ्य-स्थित पात्र के द्वारा सूचना दे दी गई है कि राम ने परशुराम को जीत लिया है। अंकावतार : जहाँ पूर्व अंक के अन्त में उसकी कथा का विच्छेद किये विना उसी के पात्रों के द्वारा अगले अंक की वस्तु चले, वहाँ अंकावतार होता है। ऐसे स्थलों पर विष्कम्भक अथवा प्रवेशक नहीं होता, अंकावतार ही होता है। उदाहरणार्थ, मालविकाग्निमित्र के प्रथम अंक के अन्त में विदूषक अगले अंक के कथांश की सूचना इस वाक्य से देता है-"तो तुम दोनों देवी के नाट्यगृह में जाकर संगीत की साज-सज्जा ठीक कर पूज्य मित्र के पास दूत भेज देना, अथवा मृदंग का शब्द ही इन्हें यहाँ से उठा देगा।" तत्पश्चात् मृदंग का शब्द सुनने पर दूसरे अंक के आरम्भ में सभी पात्र, प्रथम अंक में वर्णित पात्रों के शिष्य-शिक्षा-क्रम देखते हैं। इस प्रकार, पूर्व अंक की कथावस्तु अगले अंक में भी अविच्छिन्न रूप में अवतरित हुई है। इसलिए यह अंकावतार है। अंकमुख : अंकमुख अथवा अंकास्य के विषय में विभिन्न आचार्यों में पर्याप्त मतभेद दिखाई देता है। भरत मुनि का मत है कि जहाँ किसी स्त्री या पुरुष के द्वारा किसी अंक की कथा का संक्षेप आरम्भ में ही कर दिया जाय, वहाँ अंकमुख होता है। इस सम्बन्ध में उनकी कारिका है : विश्लिष्टमुखमङ्गस्य स्त्रिया वा पुरुषेण वा। यत्र संडिक्षप्यते पूर्व तदङ्गमुखमीष्यते।'
१. नाठयशास्त्र, अध्याय १९, का० ११६
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परन्तु धनंजय ने अंकास्य का दूसरा लक्षण लिखा। उनका मत है कि जहाँ एक अंक की समाप्ति के समय उस अंक के किसी पात् के द्वारा किसी छुटे हुए अर्थ की सूचना दी जाय, वहाँ अंकास्य होता है। अर्थात् अंकान्तपात्र के द्वारा अगले अंक में आनेवाली कथावस्तु की सूचना जहाँ दी जाय, उसे अंकास्य कहते हैं। इसका उदाहरण धनिक ने महावीरचरित के द्वितीय अंक के अन्त से दिया है, जहाँ सुमन्त्र आकर जनक तथा शतानन्द की कथा का विच्छेद करते हैं, और वशिष्ठ, विश्वामित्र तथा परशुराम के आगमन की सूचना देते हैं। इस प्रकार, अगले अंक के आरम्भ की सूचना हो जाती है। तदनन्तर अगले अंक में वशिष्ठ, विश्वामित्र तथा परशुराम बैठे हुए प्रवेश करते हैं और अंक आरम्भ होता है। धनंजय ने अंकास्य का लक्षण लिखा है :
-अर्थात् जहाँ एक अंक की समाप्ति के समय उस अंक में प्रयुक्त पात्रों के द्वारा किसी छूटे हुए अर्थ की सूचना दी जाय, वहाँ अंकास्य कहलाता है। साहित्यदर्पणकार ने जो मत उपस्थित किया है, वह भरत मुनि के मत पर आधृत है। उनका कथन है कि जहाँ एक ही अंक में सब अंकों की सूचना दी जाय और वह बीजभूत अर्थ का सूचक हो, उसे अंकमुख कहते हैं :
यत्र स्यादङ् एकस्मिन्नाड्कानां सूचनाखिला। तदङ्गमुखमित्याहुर्बीजार्थख्यापकं च तत्।।२
-अर्थात् जहाँ एक ही अंक में सब अंकों की अविकल सूचना की जाय और जो बीजभूत अर्थ का सूचक हो, उसे अंकमुख कहते हैं। उदाहरण के लिए उन्होंने मालतीमाधव का प्रथम अंक लिया है, जहाँ अंक के आरम्भ में कामन्दकी और अवलोकिता ने आगे होनेवाली सभी बातों की सूचना दे दी है। विश्वनाथ ने अंकमुख के लक्षण में धनंजय का मत भी उद्धत किया है। धनिक का दिया हुआ उदाहरण भी महावीरचरित के द्वितीय अंक का दिया है। शारदातनय ने भी भावप्रकाशन में वही कारिका रख दी है : अङ्कान्तपात्रैरङ्गास्यं छिन्नाङ्गस्यार्थसूचनात्।3 शारदातनय ने अंकास्य का वही लक्षण दिया, जो धनंजय ने दिया और उदाहरण भी धनिक का दिया हुआ महावीरचरित के द्वितीय अंक से है। उन्होंने अंकमुख का दूसरा भी लक्षण दिया है, जो विश्वनाथ ने भी दिया है। उदाहरण भी विश्वनाथ ने वही दिया है, जो मालतीमाधव से लिया गया है।
१. दशरूपक, प्रथम प्रकाशन, का० ६२ २. साहित्यदर्पण, परिच्छेद ६, का० ५९ ३. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० ६०
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१९४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भी नाट्यदर्पण में वही लक्षण दिया है, जो धनंजय नें दशरूपक में दिया। लक्षण के शब्द भी मिलते-जुलते हैं : अङ्कास्यमन्तपात्रेण छिन्नाङ्गमुखयोजनम्।' उन्होंने भी धनंजय के समान अंकास्य कहा, अंकमुख नहीं। उन्होंने उदाहरण भी वही महावीरचरित के द्वितीय अंक के अन्तवाला दिया है, जो धनिक ने दशरूपक की टीका में दिया है। डॉ० कीथ ने भी धनंजय के ही मत का समर्थन किया है और विश्वनाथ का मत दोषपूर्ण बताया है। विश्वनाथ का दिया हुआ अंकमुख का लक्षण भरत मुनि की कारिका पर आधृत है और उससे भी अधिक स्पष्ट है। भरत के ही समान विश्वनाथ ने भी अंकमुख कहा है, अंकास्य नहीं। भरत ने अंकमुख का वर्णन अंकावतार के बाद किया है; यही क्रम विश्वनाथ ने भी रखा। विश्वनाथ ने धनंजय के अनुकरण पर अंकास्य का वर्णन किया और वे ही लक्षण और उदाहरण भी रख दिये। परन्तु, वे धनंजय के मत से पूर्ण सहमत नहीं दिखाई देते और इसीलिए धनंजय की कारिका उद्धृत करके वृत्ति भी लिख देते हैं : 'एतच्च धनिकमतानुसारेणोक्तम्। अन्ये तु अङ्कावतारेणैवेद गतार्थम् इत्याहुः।' जान पड़ता है कि विश्वनाथ को धनंजय-धनिक का मत पसन्द नहीं था; धनिक-विरोधी मत ही उन्हें पसन्द था, परन्तु वे 'अन्ये' शब्द लिखकर अपने ऊपर यह विरोध का श्रेय नहीं रखना चाहते। वस्तुतः, धनंजय-धनिक की अपेक्षा विश्वनाथ का मत अधिक पुष्ट जान पड़ता है। संवाद या कथोपकथन : हमारे प्राचीन नाट्याचार्यों ने संवाद या कथोपकथन को भी वस्तु के ही अन्तर्गत रखा है। उन्होंने इसे कोई स्वतन्त्र तत्त्व नहीं माना। परन्तु, इससे संवाद के महत्त्व में किसी प्रकार की कमी नहीं आती। संवाद नाटक के लिए अत्यन्त महत्त्वपूर्ण होता है। संवाद से नाटक की अनेक सूक्ष्म बातें समझने में दर्शक को सहायता मिलती है। इससे कथानक में विकास तो होता ही है, पात्रों के विचारों, भावों, प्रवृत्तियों आदि के विकास का भी पता चलता है। नाटकों में कुछ ऐसी बातें हैं, जिनका सम्बन्ध प्रत्यक्ष अभिनय से नहीं होता, वहाँ संवाद के ही द्वारा वे बातें सूचित की जाती हैं। उस दशा में संवाद अभिनय का एक अंग बन जाता है। इस प्रकार, संवाद का महत्त्व बहुत अधिक हो जाता है; क्योंकि कथावस्तु के विकास के साथ उसकी व्याख्या भी इसी पर अवलम्बित हो जाती है। संवाद या कथोपकथन से चरित्र-चित्रण में भी बहुत सहायता ली जाती है। जब कई पात् आपस में वार्त्तालाप करते हैं तो उनके चरित्र पर प्रकाश पड़ता है और फिर जब वे किसी अन्य पात्र के विषय में कुछ कहते हैं तब भी उस अन्य पात्र के चरित्र के १. नाट्यदर्पण, नाटक-निर्णय, का० २६
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वस्तु [१९५ विषय में अनेक तत्त्व ज्ञात होते हैं। जो नाटककार अपने नाटक की रचना या पात्रों का चरित्र-चित्रण मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर करते हैं, वे कथोपकथन को ही अपना प्रधान आधार बनाते हैं। नाटककारों को इस बात का ध्यान रखना होता है कि संवाद अत्यधिक विस्तृत होकर ऊब पैदा करनेवाला न बन जाय, साथ ही अस्वाभाविकता से बचा रहे। यदि किसी पात्र से स्वयं उसी के विषय में कुछ कहलाने की आवश्यकता पड़े, तो इस प्रकार कहलाने की व्यवस्था की जानी चाहिए कि उसमें कहीं भी कोई अस्वाभाविकता नहीं आने पावे। कुशल नाटककार ऐसा प्रयत्न करते हैं कि प्रधान पात्रों के विशेष गुणों का स्पष्ट ज्ञान उनके कथोपकथन के द्वारा दर्शक को शीघ्र ही हो जाय। यदि कोई नाटककार अपने किसी पात्र का कोई विशेष गुण पहले छिपाकर और पीछे प्रकट करके दर्शक के मन में आश्चर्य उत्पन्न करना चाहता है तो वह आरम्भ में ऐसा प्रबन्ध करता है कि पात्र का यथार्थ रूप प्रकट होने पर दर्शक को आश्चर्य के साथ असीम आनन्द की भी प्राप्ति हो। कथोपकथन के द्वारा किसी पात्र का चरित्र-चित्रण करते समय नाटककार को ध्यान रखना होता है कि उस पात्र के विषय में अन्य पात्रों के द्वारा कहे गये वाक्य परस्पर विरोधी नहीं हों और सभी कथनों का लगभग एक साथ ही अभिप्राय हो। यह दूसरी बात है कि किसी पात्र के विरोधी या शत्रु के द्वारा दूसरे प्रकार की भी बातें कहलाई जायँ। नाटककार अभिव्यक्ति के लिए कथोपकथन का सहारा लेता है और भावात्मक प्रभाव के कारण दर्शकों में रस की निष्पत्ति होती है। भारतीय नाट्यशास्त्रियों ने जिन तीन तत्त्वों को नाटक के लिए आवश्यक माना है, उनमें कथोपकथन का उल्लेख नहीं किया है, परन्तु भारती वृत्ति और वाचिक अभिनय का विवेचन करते समय कथोपकथन की चर्चा विस्तार से की है। यदि विचार किया जाय तो जान पड़ेगा कि कथोपकथन का समावेश रचनागत शैली और अभिनय में होता है। नाटक में भाषा की अभिव्यक्ति कथोपकथन के अनेक रूपों में ही दिखाई देती है। नाटक का विकास घटना और चरित्र के सहारे होता है और उसका अधिकतर रूप दर्शक के सम्मुख कथोपकथन में ही आता है, जो अभिनय के समय प्रकट होता है। कथोपकथन में जीवन की वास्तविकता को भी ध्यान में रखना आवश्यक है और कलात्मक समन्वय की भी अवहेलना नहीं की जा सकती। प्राचीन नाटकों में पद्यात्मक सवाद मिलता है। आज के युग में वह अनुपयुक्त है, परन्तु प्राचीन काल की परिस्थिति में उसका उपयोग अवांछनीय नहीं माना जा सकता। वैसे पद्यात्मक संवाद के द्वारा नाटककार एक ओर तो नाटकीय वातावरण उपस्थित करता था और दूसरी ओर उसे भावों में अनुरूपता लाने में सुविधा होती थी। परन्तु, आज गद्य का ही उपयोग अधिक उचित है; क्योंकि इससे तरक के द्वारा विचारात्मक भाव का उद्रेक करके प्रेक्षक में अनुभूति के लिए आधार का निर्माण किया जाता है।
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गद्य की इस समन्वयशील शैली के प्रयोग से आधुनिक नाटककार की प्रतिभा की जाँच होती है। उसे एक-एक शब्द को तौलकर प्रयोग में लाना होता है, उसे देखना होता है कि प्रत्येक शब्द अपने प्रयोग से कार्य और चरित्र की किस विशेषता को अभिव्यक्त करता है। 'आधुनिक कथोपकथनों में भावना और मनोवेगों के उद्रेक के साथ शब्दों का प्रयोग नहीं होता, वरन् उनके प्रयोग से भावना और विचारों के गम्भीर-से-गम्भीर और अव्यक्त-से-अव्यक्त सत्य का संकेत मिलता है।"
प्राचीन नाटकों में पूर्वीय तथा पश्चिमीय देशों में कथोपकथन के सम्बन्ध में लगभग एक ही स्थिति है। उनमें नाटककार भावात्मक पद्यशैली से चरित्र के विकास तथा कार्य की घटनाओं के स्वरूप का संकेत देता है। संवाद-योजना के कुछ सिद्धान्त : नाटक में संवाद-योजना के लिए नाटककार को कुछ सिद्धान्तों को ध्यान में रखना लाभप्रद सिद्ध हो सकता है। वे सिद्धान्त निम्नलिखित हैं : १. संवाद स्वाभाविक होना चाहिए, अर्थात् पात्र की प्रकृति के अनुरूप ही संवाद की योजना करनी चाहिए। २. संवाद की परिमिति पर भी ध्यान देना चाहिए। यह उतना ही होना चाहिए, जिससे कथा के विस्तार और नाटकीय चरित्र के विकास में सहायता मिले। ३. संवाद की भाषा दर्शकों की समझ में आने के योग्य होनी चाहिए। इसमें दार्शनिक तथा पारिभाषिक पदावली का प्रयोग नहीं होना चाहिए और न ऐसे विषयों का विवेचन ही होना चाहिए। ४. संवादों में एक स्तर से उत्तर-प्रत्युत्तर की योजना होनी चाहिए, जिससे वे संवाद सजीव हो जायँ। ऐसा नहीं होना चाहिए कि एक ही व्यक्ति या अनेक व्यक्ति लम्बे भाषण देते रहें। ५. संवाद लम्बा नहीं होना चाहिए, केवल उतना ही लम्बा होना चाहिए जितना लम्बा उस परिस्थिति में आवश्यक और स्वाभाविक हो। ६. छोटे-छोटे और चुभते वाक्यों का संवाद बहुत प्रभावशाली होता है, इसके विपरीत लम्बे-लम्बे और पेचीदे वाक्योंवाला नीरस और प्रभावहीन होता है। इन सिद्धान्तों के अतिरिक्त नाटककार को कुछ नाट्य-परिस्थितियों का भी पालन करना आवश्यक होता है। वे परिस्थितियाँ निम्नलिखित शब्दों में रखी जा सकती हैं : १. दो या तीन व्यक्तियों के ही बीच में संवाद लगातार नहीं चलना चाहिए। थोड़े- थोड़े समय पर उनमें कुछ नये पात्रों का आगमन और कुछ पुराने पात्रों का निष्कमण होते १. नाट्यकला, डॉ० रघुवंश, पृ० ८६
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रहना चाहिए। फिर नीरसता दूर करने के विचार से पात्रों को कुछ आंगिक व्यापार भी करते रहना चाहिए; जैसे उठना-बैठना, फल-फूल चुनना, घूमना, कुछ उठाना और रखना आदि। २. संवाद केवल वाचिक नहीं होना चाहिए प्रत्युत उसमें सात्त्विक और आंगिक अभिनय के लिए भी पूर्ण अवकाश होना चाहिए। संवाद के भेद : भारतीय प्राचीन नाट्याचार्यों ने वस्तु के तीन विभाग किये हैं- सर्वश्राव्य, जो सभी के सुनने के योग्य हो; नियतश्राव्य, जो कुछ ही लोगों के सुनने के योग्य हो और अश्राव्य, जो किसी के सुनने के योग्य नहीं हो। सर्वश्राव्य को प्रकाश कहते हैं; क्योंकि यह रंगमंच पर उपस्थित सभी पात्ों के सुनने के लिए कहा जाता है। स्वगत : अश्राव्य को स्वगत या आत्मगत कहते हैं; क्योंकि यह रंगमंच पर उपस्थित किसी भी पात्र के सुनने के लिए नहीं कहा जाता है। वक्ता अपने ही मन में कहता है या इस ढंग से कहता है कि जान पड़ता है कि वह अपने मन में कुछ कह रहा है; उसे रंगमंच पर के किसी पात्र को सुनाना अभीष्ट नहीं है। जहाँ उपन्यास-लेखक अपनी ओर से प्रत्यक्ष रूप में टीका-टिप्पणी करता है, वहाँ नाटककार स्वगत भाषण का उपयोग करता है। नाटककार स्वगत भाषण से पात्र के उन विचारों आदि की ओर संकेत करता है, जिन्हें वह प्रत्यक्ष संवाद में नहीं प्रकट कर सकता। किसी व्यक्ति का इस प्रकार अपने-आप बोलना अस्वाभाविक लगता है, परन्तु नाटक की कुछ विशेष परिस्थितियों में पात्र को स्वयं अपने से बात करने की आवश्यता पड़ती है। यदि कोई पात्र किसी अन्य पात्र का कोई अनिष्ट करने जा रहा है और किसी अन्य पात्र को अपना विचार जानने नहीं देना चाहता, तो दर्शकों को इस बात की जानकारी देने के लिए नाटककार को स्वगतकथन के अतिरिक्त और कोई अन्य साधन नहीं रह जाता। स्वगतकथन में पात्र मानों कुछ सोचता रहता है और शब्द अनायास ही उसके मुख से निकलते जाते हैं। यदि कोई दूसरा पात्र वे शब्द सुन लें, तो बोलकर सोचने- वाले पात्र के सभी उद्देश्य निष्फल हो जायँ। स्वगतों का स्वरूप मनोभावों के स्वरूप को दर्शकों के सामने लाने के लिए किया जाता था। कुछ स्वगत भाषण संसार की सुन्दरतम कविता के उदाहरण के रूप में उपस्थित किये जा सकते हैं। परन्तु, जो कुछ हो, नाटककार को स्वगत कथन का कम-से-कम उपयोग करना चाहिए; क्योंकि इसके उपयोग से नाटक में अस्वाभाविकता आ जाती है। पाश्चात्त्य देशों के नाट्यशास्त्री और आलोचक इसे पुरानी और अनुचित पद्धति मानने लगे हैं। कुछ नाटककार इससे बचने के लिए आवश्यकतानुसार एक नये उपाय का आश्रय लेने लगे हैं। जहाँ किसी पात्र को ऐसी आवश्यकता आ पड़ती है, वहाँ नाटककार रंगमंच पर एक ऐसे पात् का प्रवेश करा देता है, जो उस पात् का विश्वसनीय होता है। इस दशा में
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वह पात्र अपनी सारी बातें उस विश्वसनीय व्यक्ति से कह देता है। कुछ आधुनिक नाटककार ऐसे अवसरों पर टेलीफोन आदि का भी उपयोग करते हैं। नियतश्राव्य : नियतश्राव्य को रंगमंच-स्थित सभी पात्र नहीं सुन सकते। यह स्वगत के समान भी नहीं होता; क्योंकि स्वगत को रंगमंच-स्थित कोई भी पात्र नहीं सुन सकता। नियतश्राव्य रंगमंच पर उपस्थित कुछ ही पात्रों के सुनने के योग्य होता है। इसके दो भेद होते हैं : १. जनान्त या जनान्तिक और २. अपवारित। जनान्तिक : रंगमंच पर अन्य पात्रों के रहते भी, जहाँ दो पात्र आपस में इस प्रकार मन्त्रणा करें कि उन्हें अपनी बात दूसरों को सुनाना अभीष्ट नहीं हो, वहाँ जनान्तिक होता है। ऐसे वार्त्तालाप के समय अन्य पात्रों की और त्रिपताकाकर से हाथ से संकेत करके इस बात की सूचना दी जाती है कि उन पात्ों को सुनने से मना किया जा रहा है। दर्शक भी समझ जाता है कि दो ही पात्र आपस में बातें कर रहे हैं और अन्य पात्र नहीं सुन रहे हैं। त्रिपताकाकर का लक्षण बताया गया है। रंगमंच पर जिस पात्र को कोई विशेष बात सुनाना अभीष्ट नहीं हो, उसकी ओर हाथ की सभी अंगुलियाँ ऊँची करके अनामिका अंगुली टेढ़ी रखना त्रिपताका कहा जाता है और इस ढंग से हाथ करना त्रिपताकाकर कहा जाता है। इस ढंग से अन्य पात्रों का वारण करके दो पात्रों का वार्त्तालाप करना जनान्तिक कहा जाता है। अपवारित : जहाँ मुँह दूसरी ओर करके कोई पात्र रंगमंच पर किसी दूसरे पात्र से गुप्त बात कहता है, उसे अपवारित कहते हैं। अपवारित में कोई पात्र किसी अन्य एक ही पात्र को अपनी बात सुनाना चाहता है। सामाजिक के लिए तो ये सारे प्रकाश, नियतश्राव्य और अश्राव्य संवाद श्राव्य ही होते हैं। अपवारित और जनान्तिक कथोपकथनों में अभिनय का तत्त्व सम्मिलित है। इससे घटनाओं के गुप्त रूप का भी संकेत मिलता है। पाश्चात्त्य नाटकों में नियतश्राव्य के प्रयोग से सामाजिक को विचारों और कार्यों में अन्तर की सूचना मिलती है। कभी-कभी पात्र के विचार सुनकर दर्शक के मन में हँसी का संचार होता है। आकाशभाषित : रंगमंच पर कभी-कभी आकाशभाषित का भी सहारा लिया जाता है। कोई पात् 'क्या कहते हो ?' आदि कहता हुआ किसी अन्य पात्र के विना ही वार्त्तालाप करता है, जैसे वह सचमुच किसी से वार्त्तालाप करता हो, और दूसरे के विना कहे भी वार्त्तालाप करता जाता है। इस एकाकी वार्त्तालाप को आकाशभाषित कहते हैं। यह श्राव्य कथोपकथन की एक विशेष प्रणाली है। इसमें रंगमंच पर स्थित पात्र अदृश्य व्यक्ति से वार्त्तालाप करता है। एक ही व्यक्ति प्रश्न उपस्थित करके उसका उत्तर देता है। इसमें पात्र ऐसा अभिनय करता है कि दर्शक को जान पड़ता है कि कोई व्यक्ति उससे पूछ रहा है और वह उसका उत्तर दे रहा है। कभी-कभी इस प्रकार का कथन बहुत मनोरंजक तथा लाभप्रद सिद्ध होता है और इससे दृश्य की सुन्दरता में वृद्धि हो जाती है।
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एक पात्रवाले भाण आदि रूपकों में आकाशभाषित का बहुत प्रयोग होता है। आधुनिक युग के एकाभिनय में इस आकाशभाषित का अस्तित्व देख सकते हैं। आकाश- भाषित का अच्छा उदाहरण 'सत्यहरिश्चन्द्र नाटक' के उस दृश्य में मिलता है, जब राजा हरिश्चन्द्र बिकने के लिए काशी की गलियों में घूम रहे हैं। वे उस समय 'क्या कहा ?' कहकर कई प्रश्नों के उत्तर देते जाते हैं। मुद्राराक्षस के द्वितीय अंक के आरम्भ में सँपेरा आकर कहने लगता है-'महाराज, क्या कहा ? तू कौन है ?' आदि। भारतेन्दुजी का भाण 'विषस्य विषमौषधम्' में आकाशभाषित का बहुत प्रयोग किया गया है। स्वगत, नियतश्राव्य, आकाशभाषित, नेपथ्य से भाषण आदि को आधुनिक नाटककार और आलोचक अस्वाभाविक मानते हैं। जनान्तिक, अपवारित और आकाश- भाषित तो प्रत्यक्ष रूप से अस्वाभाविक हैं ही। यह सर्वथा असम्भव तथा असंगत है कि रंगमंच पर उपस्थित व्यक्तियों के सामने वार्त्तालाप हो, जिसे सभी दर्शक सुन लें, परन्तु रंगमंच पर स्थित पात्रों में से कुछ लोग सुनें, किन्तु शेष कोई न सुन सके। स्वगत के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। एक युग था जब यूरोपीय रंगशालाओं में स्वगत का बहुत महत्त्व था और बहुत-से स्वगत भाषण विश्व-साहित्य की अमर विभूति बन गये हैं। परन्तु, आज के नाटककार स्वगत भाषण का यथासम्भव बहिष्कार कर रहे हैं। भारतीय तथा विदेशी नाटकों में सर्वश्राव्य संवाद को ही मान्यता दी जा रही है। इसलिए, नाटक में अश्राव्य और नियतश्रव्य संवादों का प्रयोग नहीं होना चाहिए। ऐसे संवाद सर्वथा अस्वाभाविक हैं। स्वगत, नियतश्राव्य, आकाशभाषित, नेपथ्य से भाषण-सबका उद्देश्य घटना और पात्र की अनावश्यक उपस्थिति से वस्तु-प्रवाह की रक्षा ही है। कुछ अंश में आधुनिक रंगमंच पर भी इनका उपयोग आवश्यक होता है। कभी-कभी ऐसा होता है कि हमारे मनोवेगों का उद्वेग वाणी से स्वगत निकल पड़ता है। परन्तु, नाटक में ऐसा प्रयोग बहुत ही संक्षिप्त तथा व्यजंक होना चाहिए। अरस्तू और कथावस्तु : ग्रीक काव्यशास्त्री अरस्तू ने तासदी को और वस्तुतः समस्त नाट्य को, अनुकरणात्मक माना है। उन्होंने कथावस्तु को कार्य का अनुकरण माना है-"Hence the plot is the imitation of action; by the plot I here mean the arrangement of action."9 अरस्तू ने कथावस्तु के निर्माण को सर्वाधिक महत्त्व दिया है : "For tragedy is an imitation, not of men, but of an action and of life, and life consists in action, and its end is a mode of action, not of a quality."? q. Aristotle's Poetics, translated by S. H. Butcher, p. 25 २. वही, पृ० २७
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चरित्र से मनुष्य के गुणों का पता चलता है, परन्तु अपने कार्यों के ही फलस्वरूप मनुष्य सुखी या दुःखी होता है; अतः नाटकीय कार्य चरित्र के प्रस्तुतीकरण के लिए नहीं होता, प्रत्युत कार्य के प्रस्तुतीकरण में चरित्र गौण रूप से आ जाता है। अतः, अरस्तू का विचार है कि घटनाएँ तथा कथावस्तु ही किसी त्रासदी का मुख्य उद्देश्य है और उद्देश्य की ही प्रधानता होती है। फिर कार्य के विना तासदी का अस्तित्व ही नहीं होता, भले ही उसमें चरित्र का अभाव हो जाय। यदि चरित्र को द्योतित करनेवाले और विचारपूर्ण कुछ भाषण या वक्तव्य एकत्र कर लिये जायँ तो उससे अभीष्ट तासद प्रभाव उस मात्रा में उत्पन्न नहीं हो सकता, जिस मात्रा में उस नाटक से हो सकता है, जिसमें इन गुणों में अपूर्ण रहने पर भी घटनाओं से कलात्मक रूप से सुसज्जित कथावस्तु हो। इसका प्रमाण यह है कि नवीन तथा अपरिपक्व नाटककार शैली तथा चरित्रांकन में पहले सफलता प्राप्त कर लेते हैं, परन्तु कथावस्तु के निर्माण में उन्हें विलम्ब से सफलता मिलती है। प्रायः सभी नाटककारों की प्रारम्भिक रचनाओं में यह बात देखी जा सकती है। अतः, त्रासदी में कथावस्तु को प्रथम तथा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त है और यही किसी तासदी की, एक प्रकार से, आत्मा है। कथावस्तु के विषय में अरस्तू ने अपने काव्यशास्त्र में अनेक सारभूत वस्तुओं का उल्लेख किया है। तासदी की कथावस्तु का विस्तार विशद होना चाहिए। यदि विस्तार अत्यल्प हो जाय तो उचित गौरव का अनुभव नहीं हो सकता और यदि विस्तार अत्यधिक हो जाय तो पूरे कथानक को एक साथ ग्रहण करना कठिन हो जायगा। अतः, आवश्यकता को ध्यान में रखकर कथानक का विस्तार अधिक-से-अधिक होना चाहिए। विस्तार के अभाव में नायक के भाग्य-परिवर्त्तन का उचित चित्रण होना कठिन है और उससे रोचकता की कमी हो जाती है; क्योंकि तासदी वास्तव में नायक के जीवन में उसी की भूल के कारण सफलता से असफलता या सौभाग्य से दुर्भाग्य के परिवर्तन की अभिव्यक्ति है। क्रियान्विति के विषय में निर्दिष्ट नियमों के पालन से, तासदी की कथावस्तु में एकाग्रता तथा सुडौलपन का आविर्भाव होता है। अरस्तू ने इस बात पर विशेष आग्रह किया है कि आख्यानों को केवल एक साथ रख देने से ही त्ासदी की कथावस्तु का उचित निर्माण नहीं हो जाता, वरन् उपयुक्त रीति से उनकी व्यवस्था करनी होती है। इसी प्रकार किसी व्यक्ति-विशेष से सम्बद्ध घटनाओं एवं तथ्यों को एक साथ रख देने से ही प्रभावान्विति की सृष्टि नहीं हो जाती। अरस्तू ने कथावस्तु के ही सन्दर्भ में तासदी के प्रभाव अथवा उद्देश्य का भी विवेचन किया है। तासदी का उद्देश्य है-दया और भय के भावों को प्रभावित करके उनका शोधन करना। यही कथरसिस या रेचन का प्रसिद्ध सिद्धान्त है, जिसके विषय में १६वीं शती से अबतक निरन्तर वाद-विवाद होते रहे हैं। वस्तुतः, अरस्तू ने इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्लेटो के उत्तर में किया था। प्लेटो ने कविता पर यह आरोप लगाया था कि इससे भावों का संतुलन नष्ट हो जाता है और मानसिक दुर्बलता बढ़ती है। इसके विपरीता अरस्तू ने
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स्पष्टतः कहा है कि तासदी की प्रेरणा द्वारा मानसिक तथा रागात्मक विकार नष्ट होते हैं और मन में शान्ति तथा स्थिरता का उदय होता है। रेचन की प्रक्रिया के विषय में समय-समय पर अनेक शंकाएँ उठाई गई हैं। उत्तर के रूप में कहा गया है कि कथारसिस की कल्पना चिकित्सात्मक है और इसका सम्बन्ध उस सिद्धान्त से है, जिसके अनुसार आधुनिक होमियोपैथ रोगों के उग्र रूप के शमन के लिए औषधियों द्वारा उन्हीं रोगों के अनुग्र लक्षण उत्पन्न करते हैं। अरस्तू द्वारा दी गई परिभाषा के अनुसार तासदी ऐसे कार्य का अनुकरण है, जो पूर्ण तथा एक विशेष आयाम से युक्त होता है। पूर्ण वह है, जिसमें आदि, मध्य तथा अन्त होते हैं। अरस्तू ने आदि, मध्य तथा अन्त की परिभाषा दी है : 'A beginning is that which does not itself follow anything by casual necessity, but after which something naturally is or comes to be. An end on the contrary, is that which itself naturally follows something, either by necessity, or as a rule, but has nothing following it. A middle is that which follows something as something follows it."9
अतः, एक सुगठित कथावस्तु का न तो आरम्भ ही और न अन्त ही अव्यवस्थित रूप से होता है, प्रत्युत इन सिद्धान्तों के अनुकूल होता है। नाटककार की अधिक सफलता कथावस्तु को संयत करने में है। उसे कथावस्तु को काफी काट-छाँटकर थोड़े समय में खेलने-योग्य बनाना पड़ता है। इसलिए, नाटककार को आवश्यक हो जाता है कि वह एक पंक्ति को क्या, एक शब्द को भी अधिक नहीं लिखे। चुस्ती नाटक की कथावस्तु का सर्वश्रेष्ठ गुण है। नाटककार की कथावस्तु-सम्बन्धी इन्हीं समस्याओं के कारण बर्नार्ड शॉ ने लिखा है : "Plot has always been the curse of serious drama and indeed of serious literature of any kind.' अरस्तू ने नाटक की दीर्घता या परिमाण के विषय में कोई निश्चित नियम देने का प्रयास नहीं किया। उनके अनुसार नाटक को एक निश्चित परिमाण की आवश्यकता होती है-ऐसा परिमाण जो स्मरण-शक्ति के लिए सहज ग्राह्य हो। परिमाण की सीमा कला-सिद्धान्त का कोई अंग नहीं है। किन्तु, नाटक की प्रकृति द्वारा ही निश्चित सीमा निम्नलिखित है : परिमाण जितना बड़ा होगा, नाट्य-कृति उतनी ही सुन्दर होगी, बशर्त्ते कि सम्पूर्ण सुबोध तथा स्पष्ट हो। यदि मोटे तौर पर इसकी परिभाषा की जाय तो हम कह सकते हैं कि ऐसी सीमाओं का क्रम, सम्भाषण या आवश्यकता के सिद्धान्त के अनुसार दुर्भाग्य से सौभाग्य और सौभाग्य से दुर्भाग्य में परिवर्तन भी स्वीकार कर सकता है। 9. Aristotle : Poetics, translated by S. H. Butcher, p. 31.
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२०२] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
यह बताना कवि का काम नहीं है कि क्या घटनाएँ हो चुकी हैं, प्रत्युत यह बताना कि क्या होने की सम्भावना है-सम्भावना या आवश्यकता के नियम के अनुसार क्या सम्भव है। कवि और इतिहासकार में अन्तर यह नहीं है कि एक पद्य में लिखता है और दूसरा गद्य में। किसी इतिहासकार की रचना यदि पद्य में भी हो, तो भी वह इतिहास ही है। वास्तविक अन्तर यह है कि इतिहास बताता है कि क्या घटना हुई है और कवि बताता है कि क्या घटना होने की सम्भावना है। अतः, कविता इतिहास की अपेक्षा अधिक दार्शनिक तथा उच्चतर वस्तु है। अन्वितियाँ या संकलन-त्रय प्रसिद्ध यूनानी दार्शनिक और काव्यशास्त्री अरस्तू ने वासदी में अन्वितियों पर बल दिया है। अन्वितियाँ तीन मानी गई हैं-कार्यान्विति (Unity of action), कालान्विति (Unity of time) और स्थानान्विति (Unity of place)। तासदियों में कथानक का ऐसा निर्माण होना चाहिए कि कार्यों में कोई विशृंखलता नहीं, वरन् एकता तथा गठन रहे। इसी प्रकार काल तथा स्थान में भी एकता रहे। ऐसा नहीं होना चाहिए कि कथानक की घटना घटित होने में वर्षों का समय लग जाय तथा घटना-स्थलों में सैकड़ों-हजारों मील का अन्तर पड़ जाय। प्राचीन ग्रीक नाटकों में इन अन्वितियों का प्रधान स्थान होता था। परन्तु आधुनिक युग में फ्रांसीसी नाटकों के अतिरिक्त ये अन्यत्र कहीं दिखाई नहीं देती, फिर भी इनका विवेचन करना आवश्यक है। भारतीय नाटकों पर बहुधा आक्षेप किया जाता है कि इनमें अन्वितियों या संकलन-त्रय पर ध्यान नहीं दिया जाता। भारतीय नाटकों में इनका स्थान दिखलाने का यहाँ प्रयत्न किया जायगा। ग्रीकों ने यह सिद्धान्त बनाया था कि आरम्भ से अन्त तक सम्पूर्ण नाटक किसी एक ही कृत्य के विषय में हो, किसी एक ही स्थान का हो और एक ही दिन का हो। दूसरे शब्दों में कहा जाय कि एक दिन में और एक स्थान पर जो कुछ कार्य हुआ हो, उसी का अभिनय एक बार में होने का नियम बनाया गया। अरस्तू ने अपनी पुस्तक Poetics के आठवें परिच्छेद के आरम्भ में लिख दिया है कि वस्तु की अन्विति का अर्थ नायक की अन्विति नहीं है; क्योंकि एक ही मनुष्य के जीवन में असंख्य घटनाएँ घटित होती रहती हैं, जिन्हें एक घटना में परिणत नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार एक मनुष्य के अनेक कार्य होते हैं, जिन्हें एक कार्य बना देना सम्भव नहीं है। इस स्थल पर अरस्तू ने लिखा है : 'Unity of plot does not, as some persons think, consist in the unity of the hero, for infinitely various are the incidents in the man's life which cannot be reduced to unity; and so, too, there are many actions of cne man out of which we cannot make one action.'9 9. Aristotle's Poetics, translated by S. H. Butcher, p. 33.
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कावका आवहकड रुग वस्तु शा [२०३
कार्यान्विति : तासदी में प्रथम आवश्यक वस्तु कार्यान्विति है। अरस्तू के मतानुसार अन्विति एक प्रकार की सीमा है, जिसके विना कथानक अनिश्चित और आकस्मिक बन जाता है। अन्विति के कारण कथावस्तु विशिष्ट व्यक्तित्व-सम्पन्न तथा बोगम्य हो जाती है। अन्विति जितनी ही अधिक होगी, कथावस्तु में उतनी ही पूर्णता एवं व्यक्तित्व का समावेश होगा। अरस्तू ने ऐसा कोई नियम बनाने का प्रयास नहीं किया कि नाटक का विस्तार कितना किया जा सकता है। इस विषय में उन्होंने जो कुछ कहा है, बहुत संयम और विचार से कहा है। उन्होंने रंगमंचीय प्रस्तुति के किसी बाह्य प्रसंग को अकलात्मक बताकर अस्वीकृत कर दिया है। इस सम्बन्ध में अरस्तू ने लिखा है : 'The limit of length in relation to dramatic competition and sensuous presentment, is no part of artistic theory. For had it been the rule for a hundred tragedies to compete together, the performance would have been regulated by the water-clock,-as indeed we are to'd was formerly done.'9 उनका कथन है कि सम्पूर्ण नाटक का विस्तार इतना ही होना चाहिए जितना स्मृति या मानस-नेत्र धारण कर सके। नाटक का विस्तार इस परिमाण में होना चाहिए कि कथानक के स्वाभाविक विकास के लिए पर्याप्त स्थान मिल सके। कार्य का स्वतः पूर्ण विकास होना चाहिए और भाग्य का निर्णयात्मक परिवर्त्तन घटनाओं का स्वाभाविक तथा हेतुक परिणाम हो। अन्वितियों में केवल कार्यान्विति को अरस्तू ने आवश्यक माना है। यह विचित्न बात है कि एक बार अन्विति-त्रय की परम्परा स्थापित हो गई, तो हम अभी भी सामान्यतः लेखों में पाते हैं कि अरस्तू के ग्रन्थ में ही इसका विधान है। प्राचीन ग्रीक-नाटक बहुत सादे होते थे और उनमें तीन या पाँच पात्रों की आवश्यकता होती थी, अतः उनमें अन्विति-विषयक इन नियमों का सुविधापूर्वक पालन हो जाता था। किन्तु, आधुनिक युग के नाटकों तथा रंगमंचों की अवस्था उस युग से सर्वथा भिन्न है। फलस्वरूप इनमें उन नियमों का पालन करने की आवश्यकता नहीं है और आज के जटिल नाटकों में उनका पालन सम्भव भी नहीं है। यदि आज का लेखक उन नियमों के पालन का प्रयास करे, तो अपनी पूर्ण सामग्री का उपयोग भी नहीं कर सकेगा और उसके नाटक में अस्वाभाविकता आदि दोषों के आने की सम्भावना बढ़ जायगी। कार्यान्विति के विषय में इसी बात का ध्यान रखना चाहिए कि आरम्भ से अन्त तक कथा का निर्वाह समान भाव से हो। नाटक में आदि से अन्त तक एक ही कथावस्तु और एक ही प्रधान सिद्धान्त रखा जाय। यदि कुछ गौण कथावस्तुओं तथा सिद्धान्तों का 9. Aristotle's Poetics, translated by S. H. Butcher, p. 33.
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समावेश किया जाय, तो इस प्रकार से कि वे मुख्य कथावस्तु तथा सिद्धान्त में पूर्णतः एकात्म हो जायँ और किसी भी तरह जोड़े हुए-से नहीं प्रतीत हों। हमारे प्राचीन आचार्यों ने इस प्रकार की प्रासंगिक कथावस्तु का विधान किया है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि प्रासंगिक कथावस्तु के कारण आधिकारिक कथावस्तु में किसी प्रकार की बाधा पड़े; क्योंकि आधिकारिक कथावस्तु के सौन्दर्य में वृद्धि करने के लिए ही गौण या प्रासंगिक कथावस्तु की उद्भावना की जाती है। प्रासंगिक कथावस्तु का विस्तार आनुपातिक सीमा में रहना चाहिए; ऐसा नहीं होना चाहिए कि उसके कारण आधिकारिक कथावस्तु की तुलना में प्रासंगिक कथावस्तु की ही प्रधानता प्रतीत होने लगे। कालान्विति : कालान्विति का सिद्धान्त पोएतिका के केवल एक अनुच्छेद पर आधारित है। तासदी और महाकाव्य में अन्तर बताते समय अरस्तू ने लिखा : 'They ( Epic poetry and tragedy ) differ, again, in their length; for tragedy endeavours, as far as possible, to confine itself to a single revolution of the sun, or but slightly to exceed this limit; whereas the epic has no limits of time.'9 यहाँ यूनानी रगमंच की सामान्य परम्परा का आभास दिया गया है। नाटकीय कार्य का काल्पनिक समय एक दिन या २४ घण्टे में सीमित किया गया है। किन्तु, यह सिद्धान्त सदा काम में नहीं लाया जाता था। वासदी के आरम्भिक दिनों में, महाकाव्य और तासदी, दोनों में काल-सीमा की प्रायः अवहेलना की जाती थी। अरस्तू ने २४ घण्टे के वृत्त का समावेश नाटक में करने की व्यवस्था दी है, किन्तु पीछे यह अर्थ लगाया गया कि जो कृत्य करने में जितना समय लगा हो, उसका अभिनय उतने ही समय में होना उचित है। इस नियम का सच्चे अर्थ में पालन भले ही प्राचीन यूनानी नाटकों में सम्भव हुआ हो, परन्तु अन्यत्र किसी समय में ऐसा सम्भव नहीं हो सका है। अरस्तू ने तो २४ घण्टे के कृत्य के समावेश का नियम बनाया, परन्तु पीछे एक फ्रांसीसी विद्वान् ने ३० घण्टे के कृत्य का समावेश करने की बात कही। किसी नाटक का अभिनय प्रायः तीन-चार घण्टे में समाप्त हो जाता है, तो फिर इन तीन-चार दण्टों में चौबीस घण्टों के कृत्यों का अभिनय किया जाय या एक वर्ष अथवा ६ महीनों का, उसमें कुछ विशेष अन्तर नहीं होता। स्पष्टतः, यूनान में यह नियम उस समय बना था, जब नाटक की आरम्भिक अवस्था थी और इसका पूर्ण विकास नहीं हुआ था। प्रश्न उपस्थित होता है कि काल की अन्विति का कहाँ तक ध्यान रखा जाय ? उचित तो यह जान पड़ता है कि नाटक की घटनाएँ चाहे जितने समय की हों, परन्तु कालान्विति को उसमें किसी रूप में बाधा नहीं डालनी चाहिए। यदि कालान्विति का वही यूनानी अथवा फ्रांसीसी ढंग रखा जाय, तो शायद किसी भी सुन्दर तथा सफल 9. Arislotles' Poetics, translated by S. H. Butcher, p. 22-23,
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वैस्तु [२०५
नाटक की रचना असम्भव ही हो जायगी। किन्तु, इस विषय में निम्नलिखित कतिपय बातों पर ध्यान रखना आवश्यक है : १. घटनाओं के पूर्वापर सम्बन्ध पर ध्यान दिया जाना चाहिए, अर्थात् ऐसा नहीं हो कि पहले होनेवाली घटनाओं का उल्लेख पीछे होनेवाली घटनाओं के बाद में किया जाय। २. ध्यान देने की दूसरी बात यह है कि नाटककार को ऐसा उपाय करना चाहिए कि दो घटनाओं के बीच में जो समय व्यतीत हुआ है, उसपर दर्शकों का ध्यान नहीं जा सके। एक दृश्य में जो घटना दिखाई गई हो, उसके तीन-चार महीने बाद की घटना यदि दिखानी हो, तो तुरन्त बाद के दृश्य में उसे नहीं दिखना चाहिए। ऐसे अवसर पर नाटककार को उचित है कि दोनों दृश्यों के बीच में कई छोटे-छोटे दृश्य दिखा दें या किसी प्रासंगिक कथावस्तु का समावेश कर दें। यदि ऐसा कोई उपाय काम में नहीं लाया गया, तो इतने व्यवधान की घटनाएँ देखकर सामान्यतः दर्शकों के मन में समस्या उठ खड़ी होगी कि इतना समय कैसे व्यतीत हो गया या इस अवधि की अन्य घटनाएँ क्या हो गईं। परन्तु, यदि दोनों घटनाओं के बीच में कुछ अन्य दृश्य रख दिये जायँ, तो अस्वाभाविकता दूर हो जायगी और मध्यवर्त्ती काल की ओर दर्शकों का ध्यान कभी नहीं जायगा। दर्शकों के मन में यह काल-भ्रान्ति (Time illusion) होना आवश्यक है। उदाहरणार्थ, शेक्सपियर के The Merchant of Venice में प्रथम और द्वितीय अंकों के बीच में तीन महीने का समय बिताने के उद्देश्य से बीच में कुछ छोटे दृश्यों का आयोजन किया गया है, जिससे दर्शकों को Time illusion हो जाता है। ३. सामान्य रूप से नाटकों में दो-चार वर्षों की घटनाएँ किसी विशेष प्रयास के विना ही खप जाती हैं, किन्तु एक ही नाटक में इससे अधिक समय की घटनाएँ दिखाने के लिए नाटककार को विशेष कौशल की आवश्यकता होती है। नाटककार की निपुणता इस बात में है कि मध्यवर्त्ती समय पर दर्शक का ध्यान नहीं जा सके और यह भी बताने की आवश्यकता नहीं पड़े कि दोनों दृश्यों के बीच में इतना समय बीत गया है। घटनाओं का कम ऐसा होना चाहिए कि दर्शक दो दृश्यों के बीच का अन्तर स्वयं समझ ले और उसे यह नहीं कहना पड़े कि कालान्विति के नियम का व्यतिक्रम हुआ है। तात्पर्य यह कि नाटककार को कालान्विति का यही अर्थ ग्रहण करना चाहिए, जो सामान्य दर्शक ग्रहण करते हैं। शकुन्तला नाटक में प्रथम अंक में दुष्यन्त और शकुन्तला की भेंट होती है, फिर तृतीय अंक के आरम्भ में दोनों का मिलाप होने के बाद दोनों वियुक्त हो जाते हैं। तृतीय अंक के अन्त और सप्तम अंक के आरम्भ की अवधि में दर्शक का ध्यान विशेष रूप से नहीं जाता है। सप्तम अंक में दुष्यन्त अपने पुत्र को सिंह के बच्चे के साथ कीड़ा करते हुए देखता है। इसमें कहीं कोई बेढंगापन नहीं है; क्योंकि दर्शक नाटक देखते समय रस में
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पूर्णतः मग्न हो जाता है। एक अंक की समाप्ति पर दूसरे अंक का आरम्भ होता है और दर्शक समझ जाता है कि नाटक की कथावस्तु के नये काल का आरम्भ हुआ। अतः, दर्शक को इसमें कोई आश्चर्य नहीं होता, वरन् केवल आनन्द ही मिलता है। उपर्युक्त उदाहरण से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन भारतीय नाटककार कालान्विति का महत्त्व समझते थे और यथासम्भव उसका ध्यान भी रखते थे। रूपकों के अनेक भेदों को देखने से ज्ञात होता है कि कालान्विति का कई दृष्टियों से ध्यान रखना होता था। रूपक के एक भेद व्यायोग के विषय में नियम है कि इसमें एक ही अंक रहना चाहिए और एक ही दिन का कृत्य भी कथावस्तु के रूप में रहना चाहिए। एक अन्य भेद समवकार में तीन अंक होते हैं। इसके प्रथम अंक में बारह घड़ियों का वृत्तान्त, द्वितीय अंक में चार घड़ियों का, किन्तु मतान्तर से तीन घड़ियों का वृत्तान्त और तृतीय अंक में दो घड़ियों का वृत्तान्त होना चाहिए। इस प्रकार, समवकार में १७ या १८ घड़ियों का वृत्तान्त रहता है। यह बात उपरूपक के एक भेद दुर्मल्लिका में भी देखी जा सकती है। इसके चार अंकों में से प्रथम अंक में विट की क्रीड़ा तीन घड़ी की, द्वितीय अंक में विदूषक का विलास पाँच घड़ी का, तृतीय अंक में पीठमर्द का विलास छह घड़ी का और चतुर्थ अंक में नायक की कीड़ा दस घड़ी की होती है। इस प्रकार, सब मिलकर दुर्मल्लिका में २४ घड़ियों का वृत्तान्त रहना चाहिए। इन नियमों से प्रमाणित हो जाता है कि प्राचीन भारतीय नाटककारों ने कालान्विति पर ध्यान दिया। स्थानान्विति : स्थानान्विति का भी सिद्धान्त रंगमंच से ही सम्बन्ध रखता था। यूनानी नाटकों में सामान्यतः इसका पालन किया जाता था, परन्तु कभी-कभी, और विशेषतः सुखान्त नाटकों में, इसकी अवहेलना भी की जाती थी। अरस्तू ने पोएतिका में कहीं इसकी ओर संकेत भी नहीं किया है और कला के नियम के रूप में आलोचकों ने कालान्विति से ही सम्बन्ध जोड़कर इसका विधान किया। वस्तुतः, स्थानान्विति कालान्विति के ही उपनियम या अनुमान (corollary) के रूप में निकली। यूनानी नाट्याचार्यों की स्थानान्विति का अभिप्राय है कि रंगशाला का दृश्य आदि से अन्त तक एक ही रहना चाहिए, उसमें कोई परिवर्त्तन वांछनीय नहीं, अर्थात् नाटक इस प्रकार रचा जाय कि इसका अभिनय एक ही स्थान पर तथा एक ही दृश्य में किया जा सके। अभिनय करते समय रंगमंच पर किसी प्रकार का परिवर्त्तन नहीं किया जा सकता। यह नियम बनाने का कारण यह था कि यूनानी नाटक के गानेवाले रंगभूमि पर सदा विद्यमान रहते थे और आवश्यकता आ जाने पर बीच-बीच में गाना आरम्भ कर देते थे। नाटकों में अंक तथा गर्भांक नहीं रहने के कारण बीच में विश्राम भी नहीं होता था। रंगमंच पर गीत होते समय थोड़ी देर के लिए दर्शकों को विश्राम मिल जाता था। परन्तु, रंगशाला में कोई परिवर्त्तन नहीं होता था। दूसरी बात यह थी कि उनके नाटकों की रचना भी बहुत ही सीधी-सादी होती थी, जिससे उनके स्थान में परिवर्त्तन करने की
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आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी। यदि उत्तम नाटककार अपने नाटक में सौन्दर्य की वृद्धि के लिए दृश्य बदलने की आवश्यकता अनुभव भी करता था, तो स्थानान्विति के इस नियम के कारण अपना लोभ संवरण कर लेता था। यूनानी तासदियों में स्थानान्विति तथा कालान्विति को मानने के कई स्पष्ट कारण हैं। यूनानी वासदियों की गति में स्थान-परिवर्त्तन या दृश्यों के बीच में व्यवधान करना कठिन था। इस प्रकार के व्यवधान से नाटक के पूर्ण प्रभाव में बाधा पड़ने की सम्भावना थी। इस विषय में यूरोप के विद्वानों में शतियों तक वाद-विवाद होता रहा है। वस्तुतः, कार्यान्विति की ही प्रमुखता है। यदि कार्यान्विति की रक्षा कर ली जाती है, तो अन्य अन्वितियाँ स्वयं अपनी रक्षा कर लेंगी। काल और स्थान के व्यवधान से कार्यान्विति में भी बाधा पड़ने की आशंका है। एस० एच्० बुचर ने कुछ स्पेनिश नाटकों का हवाला दिया है, जिनमें प्रथम अंक में नायक का जन्म होता है और नाटक का अन्त होते-होते वह वृद्ध रूप में दिखाया जाता है। बीच के समय में इस बात का विवरण देने का अनाटकीय उपाय किया जाता है कि इस व्यवधान में क्या-क्या घटनाएँ हुईं। आधुनिक रंगमंच की सफलताओं और विफलताओं ने समान रूप से अरस्तू के इस सिद्धान्त को प्रमाणित कर दिया है कि कार्यान्विति का नियम उच्चतर और अधिक आवश्यक है। श्री बूचर का कथन है कि कालान्विति और स्थानान्विति कलात्मक महत्त्व की दृष्टि से निम्नतर हैं। निष्कर्ष : कुछ विचार किया जाय तो स्पष्ट हो जाता है कि संकलन-त्रय का यह नियम बहुत भद्दा तथा दूषित है। दो हजार वर्ष पहले यूनानी नाटकों तथा रंगमंच के लिए इसकी जो कुछ उपादेयता रही हो, परन्तु आधुनिक युग तथा आज की रंगशालाओं में ऐसे नाटकों का प्रदर्शन कोई भी पसन्द नहीं करेगा। कहने का तात्पर्य यह नहीं कि इन अन्वितियों की सर्वथा अवहेलना की जाय। यथासम्भव इनका पालन होना चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं होना चाहिए कि अन्वितियों का निर्वाह करने के लिए कला का गला घोंट दिया जाय। शेक्सपियर ने अपने नाटकों में संकलन-त्रय का इच्छानुसार उल्लंघन किया है। उसके प्रायः सभी नाटकों में अनेक स्थानों और अनेक वर्षों की घटनाओं का समावेश किया गया है। प्राचीन काल के सीधे-सादे यूनानी नाटकों में इनका पालन भले ही हो जाता हो, परन्तु आधुनिक युग के जटिल नाटकों तथा रंगशालाओं में इन नियमों का पालन होना बहुत कठिन है। संस्कृत-नाटकों में अन्वितियाँ : यूनानी नाट्यशास्त्र की अन्वितियों से भारतीय नाट्यशास्त्र या नाटकों का कोई सम्बन्ध नहीं रहा है। वैसे नाटक तथा रंगमंच की दृष्टि से भारतीय नाट्यशास्त्रियों ने अपने लिए कुछ नियम बना लिये थे। संस्कृत-नाटकों में तीनों अन्वितियों-कार्यान्विति, स्थानान्विति तथा कालान्विति-का कड़ाई से पालन नहीं होता। इस नियम का पालन नहीं होता कि नाटक के प्रस्तुतीकरण में उतना ही समय लगना
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[चाहिए, जितना समय नाटक के दृश्यों में दिखाई गई घटनाओं के घटने में वास्तविक जीवन में लगता है। यह भी नियम है कि नाटक के दो अंकों के बीच में कम-से-कम एक रात का समय बीतना चाहिए। किन्तु, इसका भी पालन नहीं होता। कभी-कभी यह भी पाया जाता है कि अगला अंक पहले अंक का ही विस्तार है और बीच में समय का व्यवधान नहीं किया गया है। अभिज्ञानशाकुन्तल, विक्रमोर्वशीय, उत्तररामचरित आदि कई नाटकों की घटनाओं में कई वर्ष लग जाते हैं। उत्तररामचरित के प्रथम तथा द्वितीय अंकों के बीच में १२ वर्ष का व्यवधान है। भरत मुनि ने नियम बनाया कि एक अंक में एक ही दिन की कथा होनी चाहिए : एकदिवसप्रवृत्तः कार्यस्त्वङ्कोऽथ बीजमाश्रित्य। आवश्यककार्याणामविरोधेन प्रयोगेषु ।। एकाड्रून कदाचिद्बहूनि कार्याणि योजयेद्धीमान्। आवश्यकाविरोधेन तत्र काव्यानि कार्याणि॥' उधर अरस्तू ने भी नाटक या तासदी की काल-सीमा एक ही दिन तक मानी है। परन्तु, भरत ने सम्पूर्ण नाटक की नहीं, केवल एक अंक की सीमा एक दिन मानी। इस दृष्टि से कुछ अंशों में दोनों में साम्य है, परन्तु न भारतीय और न यूनानी नाटककारों ने इस नियम का पूर्णतः पालन किया। कुछ ही अंश में दोनों देशों के नाटककारों ने इस नियम का पालन किया। स्थानान्विति का भी पालन संस्कृत-नाटकों में नहीं पाया जाता। संस्कृत-नाटकों में प्रायः जो कथानक चुने गये हैं, उनमें मानव के कार्यों में देवता, गन्धर्व आदि अतिमानव प्राणियों का हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। इस विश्वास से कार्यों के स्थानों में परिवर्तन करना पड़ता था, जिसके विना दर्शकों को दृश्यों का यथार्थ चित्र नहीं दिया जा सकता था। अभिज्ञानशाकुन्तल और विक्रमोरवंशीय के दृश्य कुछ अंश में पृथ्वी पर और कुछ अंश में स्वर्ग में होते हैं। कभी-कभी एक ही अंक में स्थान बदल जाता है। ग्रीक-नाटकों में दृश्य बहुत विस्तार से सजाया जाता था, जिसे स्थान के परिवर्तन के कारण परिवरत्तित करना कठिन था। फलस्वरूप आदि से अन्त तक दृश्य एक ही रह जाता था। परन्तु, भारतीय नाटकों में दृश्य की सजावट पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता था और अधिकतर बातें कल्पना पर ही छोड़ दी जाती थीं। जितनी सुविधा से एक दृश्य की कल्पना की जाती, उतनी ही सुविधा से दूसरे दृश्य की भी कल्पना की जा सकती थी, चाहे वह राजमहल का दृश्य हो या उपवन का। अतः संस्कृत-नाटकों में स्थानान्विति-जैसी कोई वस्तु नहीं है। परन्तु, संस्कृत-नाटकों में कार्यान्विति को पूर्ण महत्त्व दिया गया है। भरत मुनि ने भी इसे मान्यता दी है। परन्तु, इस नियम का पूर्ण पालन कुछ ही नाटककार-जैसे १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १८, का० २४-२५
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कालिदास, शूद्रक आदि-कर सके हैं। वस्तुतः, संस्कृत-नाटकों में अन्विति का कोई नियम नहीं था; रंगमंच पर प्रस्तुत करने के विचार से नाटक लिखे जाते थे। उसी प्रसंग में सुविधा की दृष्टि से कुछ बातें रख दी गई, जो अन्विति से साम्य रखती हैं। उद्दश्य और कथानक
पाश्चात्य विद्वानों ने नाटक में उद्देश्य का विशेष महत्त्व देने के लिए उसे एक स्वतन्त्र तत्त्व माना। परन्तु, भारतीय आचार्य इसे वस्तु या रस के ही अन्तर्गत रखना अधिक पसन्द करते हैं। वस्तु ऐसा भेदक तत्त्व है, जिसमें उद्देश्य पर भी विचार किया जाना चाहिए; क्योंकि कथानक या कथावस्तु के ही सहारे नाटककार अपने नाटक का उद्देश्य व्यक्त करता है।
नाटककार अपने नाटक के संकुचित क्षेत्र में जीवन की व्याख्या करने का प्रयास करता है। वह अपना उद्देश्य स्वयं नहीं कह सकता, अतः किसी पात्र के माध्यम से कहता है। तब दर्शक का काम रह जाता है कि वह सभी पात्रों की बातें सुनकर निर्णय करे कि नाटककार का उद्देश्य क्या है। यदि दर्शक किसी विशेष पात्र से सहानुभूति रखता है और दूसरे से नहीं रखता, तो उसे चाहिए कि वह दोनों पात्रों के उद्गारों की तुलना करे। तभी वह नाटककार का वास्तविक उद्देश्य समझने में सफल हो सकता है, अन्थया भ्रम में पड़ने की सम्भावना है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि जिस पात्र से दर्शक की सहानुभूति नहीं हो, उसके उद्गार से भी नाटक का उद्देश्य और जीवन की व्याख्या समझने में सहायता मिलती है। नाटककार की रचना से ही हम समझ सकते हैं कि वह जीवन को किस दृष्टि से देखता है या जीवन के प्रति उसकी क्या धारणाएँ हैं। प्राचीन भारतीय नाटकों ने जीवन की व्याख्या पर बहुत बल दिया है, इसलिए उनका इतना अधिक महत्त्व है। हमारे नाटक सर्वश्रेष्ठ नैतिक आदर्श उपस्थित करते रहे हैं। भारतीय आचार्यों ने बताया है कि कथावस्तु का फल अथवा कार्य, धर्म, अर्थ तथा काम की सिद्धि है। नाटक के माध्यम से इन तीनों में से कम-से-कम दो या एक की भी सिद्धि करना आवश्यक है। जिस नाटक के माध्यम से इनमें से एक की भी सिद्धि नहीं हो सके, वह व्यर्थ है। एक अन्य बात भी है, जिससे भारतीय तथा यूरोपीय नाटकों में विभिन्नता हो जाती है। भारतीय नाटकों का उद्देश्य आदर्श चरित्र उपस्थित करना है। परन्तु, पाश्चात्य नाटककारों का उद्देश्य वास्तविक स्थिति का परिचय देना होता है। दूसरे शब्दों में कहा जाय कि भारतीय नाटककार यह दिखाना चाहता है कि जीवन कैसा होना चाहिए, परन्तु पाश्चात्त्य नाटककार यह प्रदर्शित करना चाहता है कि जीवन कैसा है। इसी बात को लेकर कई वादों का जन्म हुआ है। उनका संक्षिप्त परिचय आगे दिया जा रहा है।
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३१०j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
आदर्शवाद : आदर्शवाद और यथार्थवाद की धारणाएँ भी प्रायः साथ ही उपस्थित होती हैं। ये दोनों वाद भी आरम्भ में एक-दूसरे के विरोधी के रूप में, बाद में पूरक के रूप में आये। आदर्शवाद के अनुसार काव्य या कला अनिवार्य रूप में आत्मपरक होती है। कतिपय कलाकार जीवन में यथार्थ चित्रण का दम भरते हैं, किन्तु वास्तव में कला में जीवन का यथार्थ चित्रण सम्भव ही नहीं हो सकता। अरस्तू ने लिखा है कि कवि इतिहासकार से भिन्न होता है; क्योंकि वह वस्तुओं का उसी रूप में चित्रण नहीं करता जैसी वे रहती हैं; अपितु उस रूप में चित्रण करता है जैसी वे हो सकती हैं या जैसी उन्हें होना चाहिए। अरस्तू के इन शब्दों में आदर्शवाद की कल्पना का बीज छिपा है। एक ओर उन्होंने कला को अनुकरण कहकर उसे जीवन की ठोस पृष्ठभूमि पर रखा है, तो दूसरी ओर जैसी वे हो सकती हैं और जैसी उन्हें होना चाहिए, जैसे वाक्यांशों के द्वारा कला का आत्म- तात्त्व स्वीकार करके उसपर आधृत आदर्शवादी कला-दर्शन को भी प्रकाश में ला दिया है। आत्मपरक चित्रण कई प्रकार से सम्भव है-पदार्थों का वैसा चित्रण १. जैसे वे कलाकार को प्रतीत होते हैं, इसमें कलाकार के स्वभाव की स्वीकृति है; २. जैसे वे हो सकते हैं, इसमें कलाकार की कल्पना की स्वीकृति है; ३. जैसे उन्हें कलाकार के विचार या दृष्टिकोण के अनुसार होना चाहिए; इसमें कलाकार की इच्छा या भावना और नैतिक मान्यता की स्वीकृति है। तात्पर्य यह कि आदर्शवाद के मूल में केवल नैतिकता ही नहीं, भावना तथा कल्पना की प्रचुरता भी है, परन्तु धीरे-धीरे उसमें नैतिक तत्त्व की ही प्रधानता होती गई। दर्शन के क्षेत्र में काण्ट और हीगेल ने आदर्शवाद का दार्शनिक निरूपण किया है। इस प्रकार आदर्श में राग और कल्पना के तत्त्व नीति के पोषक बन गये हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आदर्शवाद कल्याणकारी मूल्यों पर आधारित भावपरक कला- दर्शन है। प्राचीन काल के नाटकों की प्रवृत्ति आदर्शवादी रही है। विशेष रूप से भारतीय नाटकों के नायकों का रूप आदर्शवादी चित्रित किया गया है। नायक की निश्चित विजय में यह आदर्शवाद विशेष रूप से शिक्षात्मक था। यूरोपीय नाटकों में इस रूप का आदर्शवाद तो नहीं मिलता, परन्तु नायक के चरित्र आदि की महत्ता-विषयक दृष्टि और कथावस्तु की योजना आदर्शवादी रही है। भारतीय नाटक आदर्श के बन्धन से छुटकारा नहीं पा सके, यद्यपि रूपकों के कुछ भेदों में सामाजिक कुरीतियों का भी वर्णन हुआ है। जयशंकर प्रसाद के नाटक चन्द्रगुप्त, स्कन्दगुप्त आदि; भारतेन्दुजी का सत्यहरिश्चन्द्र आदि नाटक आदर्शवादी हैं। संस्कृत में तो आदर्शवादी ही नाटक लिखे गये। यथार्थवाद : यथार्थवाद की कल्पना आदर्शवाद से बहुत भिन्न है। वास्तव में, अथार्थवाद वस्तुपरक दृष्टिकोण है-कला के क्षेत्र में यह जगत् तथा जीवन के उसी रूप के चित्रण पर बल देता है। यथार्थवादी अपने को तटस्थ द्रष्टा मानकर चलता है
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वस्तुशा [२११ और अपने निजी विचारों तथा कल्पनाओं को अलग रखकर वस्तु पर ही ध्यान रखता है। उसका विश्वास है कि तथ्य को उसी रूप में ग्रहण करना ही कला तथा चिन्तन की वास्तविक सिद्धि है। यथार्थवाद जीवन को उसके यथार्थ रूप में स्वीकार करके चलता है और उसे उसी रूप में प्रस्तुत करना उसका उद्देश्य रहता है। यथार्थवाद पर विज्ञान का बहुत प्रभाव है-यहाँ तक कि आलोचकों ने इसे विज्ञान का कलात्मक प्रतिरूप नाम दिया है। यद्यपि यथार्थवाद अनुकरण-सिद्धान्त के ही बराबर पुराना है, तथापि उन्नीसवीं शती में यह यूरोप-भर में एक आन्दोलन के रूप फैल गया था। शती के उत्तरार्द्ध में यथार्थवाद से प्रकृतवाद का जन्म हुआ, जो वस्तुतः यथार्थवाद का ही अतिरंजित रूप था। यथार्थवाद जीवन के भौतिक-विशेषतः सामाजिक-रूपों पर ध्यान देता था, किन्तु प्रकृतवाद मानव की सहज वृत्तियों-वासनाओं-के चित्रण को ही यथार्थ मानने लगा। इन सहज वृत्तियों में काम की ही प्रमुखता रही और इस प्रकार प्रकृतवाद ने नग्न यथार्थवाद का रूप धारण कर लिया।
यूरोप के साहित्य में नायक की भूल तथा जीवन के दुःखद पक्ष के आधार पर नाटक यथार्थवादी प्रवृत्ति की ओर विकसित हुआ। आज के युग में कला का रूप परिवत्तित हो चुका है। आधुनिक नाटककार अपने चारों ओर के वातावरण से, समाज की परिस्थितियों से और समस्याओं से अनुभूति ग्रहण करता है। नाटक का सम्पूर्ण ढाँचा सामाजिक परिस्थितियों से प्रभावित हुआ। भारतेन्दुजी का नाटक प्रेमयोगिनी, लक्ष्मी नारायण मिश्र के संन्यासी, मुक्ति का रहस्य, सिन्दूर की होली; अश्क का छठा बेटा, स्वर्ग की झलक यथार्थवादी नाटक हैं।
प्रगतिवाद : कुछ समय बाद मार्क्स-दर्शन के बढ़ते प्रभाव के कारण यथार्थवाद में सामाजिक तत्त्व की विशेष प्रधानता हुई, जिसकी परिणति सामाजिक यथार्थवाद या प्रगतिवाद में हुई। प्रगतिवाद वस्तुतः कला तथा साहित्य के प्रति मार्क्सवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। मार्क्स के दर्शन का आधारभूत सिद्धान्त है द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद, जिसके अनुसार संसार में केवल पदार्थ का ही अस्तित्व है; दूसरी ज्ञानेन्द्रियों के समान मस्तिष्क- चेतना आदि का भी स्वरूप भौतिक ही है। परन्तु, यह पदार्थ जड़ तथा निष्किय नहीं, वरन् स्वभावतः गतिशील है और इस गति की प्रेरणा पदार्थ में छिपे दो परस्पर विरोधी अन्तस्तत्त्व से मिलती है, जिनमें एक विकास की ओर तथा दूसरा विनाश की ओर उनमुख है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद का दर्शन जीवन में एक ऐसी प्रगतिशील भौतिक वास्तविकता देखता है, जिसके मूल में दो विरोधी शक्तियों का संघर्ष चलता रहता है-एक शक्ति विकास के मार्ग पर चलती है, तो दूसरी विनाश के मार्ग पर। चेतन मस्तिष्क प्रगतिशील शक्तियों को प्रोत्साहन देता है और विनाश की ओर बढ़नेवाली शक्तियों का नाश करता है। इस तरह संसार का एकमात्र सत्य भौतिक जीवन ही है, जिसका प्रतिनिधि है समाज और समाज का आधार अर्थ तथा उसके उत्पादन की प्रणाली है।
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३१२ / भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकांस
कला तथा साहित्य समाज से ही उत्पन्न होते हैं। सामाजिक परिस्थितियाँ एवं उनकी आधारभूत आर्थिक प्रणालियाँ जिस प्रकार जीवन के अन्य रूपों की उत्पत्ति तथा विकास का नियन्त्रण करती हैं, उसी प्रकार साहित्य तथा कला की भी उत्पत्ति तथा विकास का नियन्त्रण करती हैं। कला तथा साहित्य की भी सार्थकता इसी में है कि ये समाज और उसको गति देनेवाले वर्ग-संघर्षयुक्त जन-जीवन के विकास में सहायता करें। सारांश रूप में मार्क्सवादी दृष्टि से प्रगतिशील साहित्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं : १. यह साहित्य जनता के लिए है। २. यह मार्क्सवाद का समर्थन करता है। ३. प्रगतिशील साहित्य विश्व के शोषित वर्ग की एकता का समर्थक है। ४. यह संघर्षशील सहित्य है। इस संघर्ष का लक्ष्य है-राष्ट्रीय स्वाधीनता तथा जनतन्त्र की स्थापना। यह साम्राज्यवाद तथा सामन्तवाद की संस्कृति का उन्मूलन करके शान्ति स्थापित करना चाहता है। शान्ति की स्थापना के लिए उपर्युक्त परिस्थितियाँ अनिवार्य हैं। ५. प्रगतिवाद का दृष्टिकोण वैज्ञानिक है। ६. इस प्रकार, प्रगतिशील साहित्य 'जनता की सांस्कृतिक विरासत का ऐतिहासिक विकास है।' निष्कर्ष : प्राचीन भारतीय नाट्यशास्त्रियों का वस्तु-विवेचन अत्यन्त विस्तृत तथा जटिल है। भरत मुनि द्वारा प्रतिपादित वस्तु के आधिकारिक तथा प्रासंगिक नामक दो विभाग तो युक्तिसंगत हैं और प्राचीन तथा अर्वाचीन, पूर्वीय तथा पश्चिमीय नाटकों में इनकी योजना की जाती रही है। परन्तु, आद्य नाट्याचार्य भरत ने ही पाँच अर्थ-प्रकृतियों, पाँच कायावस्थाओं, पाँच सन्धियों तथा उनके ६४ अंगों की कल्पना की। नाट्यवस्तु का यह विधान स्वयं अपने में अत्यन्त जटिल है। परवर्त्ती नाट्याचार्यों- धनंजय आदि ने इन्हें यथावत् स्वीकार करके अपने ग्रन्थों में स्थान दिया और अनेक नाटकों से ढूँढ़कर इनके उदाहरण उपस्थित किये। इन परवर्ती नाट्यशास्त्रियों ने भरत का ही पिष्टपेषण किया और अपनी ओर से कोई नवीन उद्भावना नहीं की। जब इन नाट्यशास्त्रियों ने अपने ग्रन्थों का निर्माण किया, उस समय तक संस्कृत-साहित्य में पर्याप्त ह्रास हो चुका था। कालिदास, भवभूति तथा शूद्रक की प्रतिभा का कोई नाटककार परवर्त्ती संस्कृत-साहित्य में उत्पन्न नहीं हुआ, किन्तु धनंजय, शारदातनय, रामचन्द्र-गुणचन्द्र और विश्वनाथ कविराज जैसे नाट्यशास्त्रियों का उद्भव हुआ। इनपर सामन्तयुगीन प्रभाव पूर्णरूप से पड़ा था, अतः ये वस्तु-विधान में नवीन उद्भावना करने में असमर्थ ही सिद्ध हुए। वस्तु के सम्बन्ध में भरत मुनि ने जो कुछ लिख दिया, उसे ही सभी नाट्याचार्य सहस्रों वर्षों तक एक के बाद दूसरे दुहराते रहे।
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वस्तु [ २१३
हिन्दी के आदिकाल तथा मध्यकाल नाटक के लिए लगभग शून्य ही रहे। कविता के कारण नायक-नायिका-भेद तथा रस-सिद्धान्त में रीतिकालीन कवि-आचार्यों ने कार्य तो किया, परन्तु नाटक के अभाव के कारण कथावस्तु के क्षेत्र में कोई विकास नहीं हो सका। भारतेन्दुजी ने अपने नाटकों के द्वारा कथावस्तु में विकास दिखाया, परन्तु वे भी प्राचीन परम्परा से पूर्णतः मुक्त नहीं हो सके। परन्तु, बीसवीं शती में हिन्दी में नाटक का काफी विकास हुआ है और तदनुसार कथावस्तु के विधान में भी आवश्यकतानुसार परिवर्त्तन हुए हैं। अब आधुनिक नाटककार अर्थ-प्रकृतियों तथा पंच- सन्धियाँ की कोई चिन्ता नहीं करता। सन्ध्यंग तो बहुत पहले ही छोड़े जा चुके थे। कार्यावस्थाओं का समावेश अवश्य किया जाता है, परन्तु ये अवस्थाएँ प्राचीन भारतीय नाट्याचार्यों द्वारा प्रतिपादित अवस्थाएँ नहीं हैं, अपितु पाश्चात्त्य विद्वानों द्वारा प्रतिपादित हैं, जिनमें चरम सीमा (climax) को बहुत महत्त्व दिया जाता है। आधुनिक हिन्दी- नाटकों में से अर्थोपक्षेपकों का भी बहिष्कार किया जा चुका है; स्वगत कथन तथा जनान्तिक आदि भी निकाले जा चुके हैं। पाश्चात्त्य प्रभाव, राष्ट्रीयता का विकास, स्वतन्त्रता की भावना आदि के कारण नाटक की विषयवस्तु में प्राचीन नाटकों से बहुत परिवर्त्तन आ गये हैं। कई नये वादों का विकास हुआ है, जिसके कारण आधुनिक हिन्दी-नाटकों के उद्देश्य में अन्तर आ गया है। जहाँ प्राचीन नाटकों का उद्दश्य रस-निष्पत्ति था, वहाँ आधुनिक नाटकों का उद्दश्य मुख्यतः आज के सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक समस्याओं का समाधान हो गया है। आजकल नाटक की वस्तु का सर्वांगीण विकास हुआ है।
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षष्ठ अध्याय
नेता
नायक का अर्थ : पात के अन्तर्गत भारत के प्राचीन आचार्यों ने नायक और नायिका का विशेष विवेचन किया है। उनके मतानुसार नाटक या रूपक के प्रधान पाव को नायक या नेता कहते हैं। इसका कारण यह है कि नायक ही नाटकीय कथा की शृंखला को अग्रसर करके अन्त तक ले जाता है। नेता अथवा नायक 'नी' धातु से बना है, जिसका अर्थ 'ले चलना' होता है। नेता कथानक को फलागम तक ले जाता है। वही वह केन्द्र-बिन्दु है, जिसके चारों ओर सभी घटनाएँ चक्कर काटती रहती हैं। जब संस्कृत- नाटक में रूपक के दूसरे भेदक के रूप में नेता का विवरण होता है, उस समय नेता में उसका सारा परिकर अन्तर्भूत हो जाता है। नेता के साथ नायिका, नायक के सभी साथी, नायिका की सहेलियाँ, प्रतिनायक और उसके साथी आदि सभी नेता के अंगभूत माने गये हैं। इस प्रकार रूपक में नेता के दो अर्थ होते हैं : १. नाटक या रूपक का मुख्य पात्र, २. सामान्य रूप से रूपक के सभी पात्र।
प्रसिद्ध यूनानी विद्वान् तथा दार्शनिक अरस्तू ने तासदी में चरित्र से अधिक महत्त्व कार्य या कथावस्तु को दिया है। उनका प्रधान तर्क यह है कि चरित्र के विना भी तासदी का निर्माण हो सकता है, किन्तु कार्य या कथावस्तु के विना नहीं। इस आधार पर कथावस्तु को अधिक महत्त्व दिया जाता है, जो उचित भी जँचता है। परन्तु, इस महत्त्व की एक सीमा है और चरित्र का भी अपना विशिष्ट महत्त्व है। कथावस्तु की घटनाओं में चरित्र का तो संकेत रहता ही है, उसके विना घटनाओं का कोई विशेष महत्त्व नहीं रह सकता। मानव-जीवन के लिए शरीर का तो बहुत ही महत्त्व है, परन्तु प्राण के विना शरीर का क्या महत्त्व हो सकता है ? अरस्तू का कथन उन नाटकों के विषय में उचित हो सकता है, जो घटना-प्रधान हैं और मनोवेग के भावातिरेक-स्वरूप को उपस्थित करते हैं। इस विषय में मि० डब्ल्यू० आर्चर का मत द्रव्टव्य है-'कार्यरूप घटनाओं की स्थिति चरित्र के लिए होनी चाहिए। जब यह सम्बन्ध उलटा हो जाता है, नाटक विचित्रतापूर्ण खिलौना कहा जा सकता है, सजीव कला की वस्तु नहीं।" भारत के संस्कृत-नाटकों में घटना और चरित्र को एक समान महत्त्व प्रदान किया गया है। नायक के गुण या योग्यता : भारतीय नाट्य-सिद्धान्त के अनुसार किसी नाटक का नायक सर्वगुण-सम्पन्न होना चाहिए। धनंजय ने नायक के गुणों की जो सूची दी है, उसमें शायद ही कोई गुण छूटा हो। भरत मुनि के अनुसार जो बहुत-से पुरुषों का अग्रणी हो, १. 'नाट्यकला' में डॉ० रघुवंश द्वारा उद्धत, पृ० ३९
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उसे नायक कहते हैं; उनमें भी जो नायक विपत्ति और अभ्युदय में सुख का अनुभव करता हो और दोनों अवस्थाओं में अपनी श्रेष्टता बनाये रखता हो, वही नायक कहा जा सकता है। धनंजय तथा अन्य आचार्यों ने नायक में पाये जानेवाले गुणों की गणना कराई है। नाटक के नायक को : १. विनीत, २. मधुर, ३. त्यागी, ४. दक्ष, ५. प्रियंवद, ६. शुचि, ७. रक्तलोक, ८. वाग्मी, ९ रूढवंश, १०. स्थिर, ११. युवा, १२. बुद्धिमान, १३. प्रज्ञावान्, १४. स्मृति-सम्पन्न, १५. उत्साही, १६. कलावान, १७. शास्त्र-चक्षु, १८. आत्म-सम्मानी, १९. शूर, २०. दृढ़, २१. तेजस्वी और २२. धार्मिक होना चाहिए। इस प्रकार भारतीय नाट्य-सिद्धान्त के अनुसार उसे सर्वगुण-सम्पन्न, सभी गुणों का आधार होना चाहिए। किन्तु, साथ ही, यह भी आवश्यक है कि सभी गुण उचित सीमा के भीतर हों।
नायक के भेद : भरत मुनि ने नायकों के चार भेद बताये हैं-धीरोद्धत, धीरललित, धीरोदात्त और धीरप्रशान्त। परवर्त्ती आचार्यों ने भरत का ही अनुसरण किया है और केवल नामों के क्रम में परिवर्त्तन कर दिया है। धीर की व्याख्या : स्मरणीय है कि भारतीय नाटकों के नायकों में धैर्य होना परमावश्यक है। प्रत्येक नायक में धैर्य होना ही चाहिए। इसीलिए, नायक के सभी भेदों के साथ 'धीर' शब्द जुड़ा हुआ है। धैर्य के अतिरिक्त इन नायकों में अपनी-अपनी प्रकृतिगत विशेषता पाई जाती है। वस्तुतः, नायकों का भेद नायक की प्रकृति के आधार पर किया गया है। डॉ० हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि कुछ विद्वानों ने धीरोदात्त आदि में 'धीर' शब्द का दूसरा ही अर्थ लिया है। उनका तर्क है कि जो उद्धत है, वह धीर कैसे हो सकता है ? उद्धत तो स्वभावतः चपल तथा चण्ड होता है। फिर कोई धीरोद्धत कैसे हो सकता है? यहाँ 'धीर' शब्द भ्रम उत्पन्न करनेवाला है। एक पुराना शब्द 'धीर' था, जो 'धी' (सहजबुद्धि या मनोभाव) से निकला है। इस धी से बने शब्द का अर्थ होता है सहजबुद्धि या मनोभाव-सम्पन्न। नाट्य-परम्परा में यह शब्द अभी तक बच रहा है। 'धीर' शब्द का अर्थ है, स्वाभाविक बोध-सम्पन्न। अतः धीरोद्धत का अर्थ हुआ स्वभावतः उद्धत। भरत मुनि ने बताया कि देवता धीरोद्धत, राजे धीरललित, सेनापति तथा मन्त्री धीरोदात्त और ब्राह्मण तथा वणिक धीरप्रशान्त नायक होते हैं : देवा धीरोद्वता ज्ञेया: स्युधीरललिता नृपाः । सेनापतिरमात्याश्च धीरोदात्ता: प्रकीत्तिता: । ब्राह्मणा वणिजश्चव प्रोक्ता धीरप्रशान्तकाः ।' रामचन्द्र-गुणचन्द्र आदि आचार्यों ने यही बात अपने शब्दों में कही है। अब चारों प्रकार के नायकों का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २४, कारिका ४-५
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धीरोदात्त : धीरोदात्त नायक प्रायः राजा या राजकुलोत्पन्न होता है। वह अभिमान- रहित, अत्यन्त गम्भीर, स्थिर, अविकल्पन, क्षमायुक्त, महासत्त्व, गम्भीर और दृढव्रत होता है। वस्तुतः धीरोदात्त नायक, नायक के सभी गुणों एवं आदर्शों से युक्त होता है। नाटक का नायक प्रायः धीरोदात्त ही चुना जाता है। उत्तररामचरित और महावीरचरित के नायक श्रीरामचन्द्र, अभिज्ञानशाकुन्तल के दुष्यन्त तथा नागानन्द के जीमूतवाहन धीरोदात्त नायक हैं। जीमूतवाहन के धीरोदात्तत्व में कुछ विज्ञानों ने शंका उठाई है। उनका तर्क है कि धीरोदात्त नायक में उदात्तता की विद्यमानता आवश्यक है और दूसरों से उत्कृष्ट हो जाने की वृत्ति को उदात्तता कहते हैं। जब नायक में दूसरों को जीतने की इच्छा वर्त्तमान हो, तभी उसमें उदात्तता समझनी चाहिए। किन्तु जीमूतवाहन में यह दूसरों को जीतने की इच्छा नहीं पाई जाती। इसके विपरीत उसमें विरक्ता तथा शान्ति की प्रधानता दिखाई देती है। साथ ही इस प्रकार के विकारहीन तथा शान्त प्रकृति के नायक में आगे चलकर मलयवती के प्रति अनुराग का वर्णन करना अनुचित प्रतीत होता है। अतः, उन विद्वानों की सम्मति में जीमूतवाहन को धीरप्रशान्त कोटि में मानना उचित है। धनिक ने इस तर्क का उत्तर दिया है। उनका कथन है कि दूसरों को जीतने की इच्छा-विजिगीषुता-कई प्रकार की हो सकती है। विजिगीषु उसे कहते हैं, जो शौर्य, त्यागादि गुणों के कारण दूसरों से बढ़ जाता है। जो व्यक्ति दूसरों का धन छीन ले या उन्हें कष्ट पहुँचावे, उसे वस्तुतः विजिगीषु नहीं कह सकते। राम आदि धीरोदात्त नायकों में जन-कल्याण और संसार के पालन का गुण पाया जाता है; क्योंकि वे दुष्टों को दण्ड देते हैं। जब रामादि दुष्टों को दण्ड देने और संसार का पालन करने के कारण उदात्त हैं तो जीमूतवाहन क्यों नहीं उदात्त है, जो अपने प्राणों को भी न्योछावर करके परोपकार में दत्तचित्त रहता है ? अतः, वह उदात्त ही नहीं, उदात्ततम है। मलयवती के प्रति अनुराग के निबन्धन के विषय में धनिक ने कहा कि मलयवती के अनुराग का वर्णन, जो शान्त रस के उपयुक्त नहीं है, इस बात का द्योतक है कि नायक शान्त नहीं है। यह वर्णन जीमूतवाहन की धीरप्रशान्तता का निषेध करता है। जहाँ बुद्ध की करुणा निष्काम है, वहाँ जीमूतवाहन की करुणा सकाम है। अतः, जीमूतवाहन धीरोदात्तनायक है। जयशंकर प्रसाद के 'चन्द्रगुप्त' तथा 'स्कन्दगुप्त' नाटकों में क्रमशः चन्द्रगुप्त और स्कन्दगुप्त धीरोदात्त नायक हैं। धीरोद्धत : धीरोद्धत नायक दर्प और ईर्ष्या से पूर्ण, मायावी, प्रचण्ड, घमण्डी, चंचल, कोधी, शूर और आत्म-श्लाघी होता है। मायावी उस व्यक्ति को कहते हैं, जो मन्त्र-बल से झूठी वस्तुएँ प्रकट कर देता है। महावीरचरित के परशुराम धीरोद्धत नायक हैं, जो अपने-आपको कैलास के उठाने तथा तीनों लोकों को जीतने में समर्थ मानते हैं। रावण अपने को 'जिसकी भुजाएँ तीनों लोकों के ऐश्वर्य की लक्ष्मी को हठ से अपहृत करने में समर्थ' कहता है। 'वेणीसंहार' का भीमसेन भी धीरोद्धत नायक है। उद्धत
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नायक बहुत कम देखे जाते हैं। रावण को सम्भवतः किसी नाटककार ने अपने नाटक का नायक बनाने का प्रयास नहीं किया। किन्तु, 'मेघनादवध' काव्य में मेघनाद को नायक बनाया गया है। 'साहित्यसार' में तो उद्धत नामक नायक माना ही नहीं गया। हाँ, गौण पात्ों में उद्धतता के लक्षण मिलते हैं। जिन रूपकों में नायक धीरोद्धत होते हैं, वे पूर्णांग नहीं बन सकते। डिम, व्यायोग, समवकार और ईहामृग ऐसे ही रूपक हैं। भारतेन्दु के सत्यहरिश्चन्द्र नाटक में विश्वामित्र धीरोद्धत हैं। धीरललित : धीरललित नायक सर्वथा निश्चिन्त रहता है; अति कोमल स्वभाववाला, सदा गीत, नृत्यादि ललित कलाओं में आसक्त रहता है। धीरललित नायक के राजकार्य की चिन्ता उसके मन्त्री करते रहते हैं; अतः वह उन कार्यों से निश्चिन्त रहता है। फलस्वरूप वह अपना सारा समय नृत्य, गीतादि कलाओं तथा भोग-विलास में व्यय करता है। शृंगार रस की प्रधानता के कारण वह अत्यन्त कोमल स्वभाव का होता है। जान पड़ता है कि धीरललित नायक का एकमात्र कार्य किसी नवीन सुन्दरी का संयोग प्राप्त करना है। उसकी पहली रानी स्वाभाविक ईर्ष्यावश जो बाधाएँ उपस्थित करती है, उन्हें किसी प्रकार पार कर नायक नई प्रेमिका से संयोग प्राप्त कर ही लेता है। धीर- ललित नायक का अच्छा उदाहरण भास और हर्ष के नाटकों का नायक वत्सराज उदयन है। नाटिका के प्रायः सभी नायक धीरललित ही होते हैं। हिन्दी में लक्ष्मीनारायण मिश्र के 'वत्सराज' नाटक का नायक वत्सराज उदयन धीरललित नायक माना जा सकता है। धीरप्रशान्त : धीरप्रशान्त नायक में त्याग, कृतीत्व आदि वे सभी गुण सामान्यतः रहते हैं, जो नायक के लिए कहे गये हैं। यह ब्राह्मण, मन्त्रिपुत्र, वैश्य आदि होता है। प्रकरण का नायक धीरप्रशान्त ही होता है। यह ध्यातव्य है कि यद्यपि प्रकरण के नायक में निश्चिन्तता, कला-प्रेम आदि गुण धीरललित नायक के भी होते हैं, फिर भी उसे धीरप्रशान्त ही मानना होगा; क्योंकि ब्राह्मणादि की प्रकृति ही शान्त होती है। 'मालतीमाधव' प्रकरण का नायक माधव, 'मृच्छकटिक' तथा 'दरिद्रचारुदत्त' का नायक चारुदत्त धीरप्रशान्त नायक हैं। लक्ष्मीनारायण मिश्र के नाटक 'जगद्गुरु' के नायक शंकराचार्य धीरप्रशान्त कोटि के हैं। आचार्यों ने नायक के चार भेद बताये। उसके सम्बन्ध में एक भ्रम उत्पन्न हो सकता है कि नायक का सम्पूर्ण जीवन-वृत्त इन चार में से सदा किसी एक कोटि का होगा। इस प्रकार दुष्यन्त यदि धीरोदात्त नायक है, तो उसमें कला-प्रेम और रागमयता आदि गुण उचित नहीं प्रतीत होंगे; क्योंकि उक्त गुण धीरललित नायक में होते हैं। वस्तुतः, यथार्थ यह है कि एक ही नायक में कभी धीरललित की, कभी धीरप्रशान्त की, कभी धीरोदात्त की तथा कभी धीरोद्धत की अवस्था यथावसर दिखाई देती है। किन्तु, जिसकी प्रधानता रहती है, नायक उसी अवस्था अथवा गुण से अभिहित होता है। अनेक महाकवियों ने अपने नाटकों और काव्यों के एक ही नायक को अनेक रूपों में चित्रित किया है, जो देखने से परस्पर विरोधी प्रतीत होता है। परन्तु, यह विरोध वास्तविक नहीं है; क्योंकि एक
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ही व्यक्ति में विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न गुणों की स्थिति सम्भव है। अतः, एक ही नायक में भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में परस्पर विरोधी गुणों का पाया जाना किसी प्रकाद असंगत नहीं कहा जा सकता। उदाहरणार्थ भवभूति के 'महवीरचरित' नाटक के परशुराम को देखा जा सकता है। उस नाटक के परशुराम के चरित्र में कई गुण विभिन्न अवसरों पर दिखाये गये हैं। रावण को सन्देश भेजने में उनका धीरोदात्तत्व परिलक्षित होता है। राम के प्रति कुछ उक्तियों में उनका धीरोद्धत रूप दिखाई देता है और कुछ स्थलों पर धीरप्रशान्त रूप प्रकट होता है। इस प्रकार, विभिन्न रूपों में परशुराम का चित्रण अनुचित अथवा असंगत नहीं कहा जा सकता। महावीरचरित में प्रधान नायक राम हैं और परशुराम उनके अंगभूत नायक हैं। अंगभूत नायक में प्रधान नायक की अपेक्षा महासत्त्वादि गुण कुछ कम और अव्यवस्थित होते ही हैं। अतः, परशुराम जैसे अंगभूत नायक में विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न गुणों से युक्त चरित्र-चित्रण उचित ही है। किन्तु, प्रधान नायक में इस प्रकार का चित्रण उचित नहीं होगा। उदाहरणार्थ राम जैसे धीरोदात्त नायक के लिए छिपकर कपट से बालि का वध करना उनके धीरोदात्तत्व के प्रतिकूल पड़ता है। इससे उनके महासत्त्वादि में दोष आ जाता है। ऐसे-ऐसे स्थलों पर कुशल नाटककार कुछ परिवर्त्तन करके कथावस्तु को प्रस्तुत करता है, जिससे नायक के धीरोदात्तत्व में किसी प्रकार की त्रुटि न आने पावे। नाटक का प्रधान नायक धीरोद्धत को नहीं बनाया जाता, सदा धीरोदात्त को ही बनाया जाता है। महावीरचरित में राम प्रधान नायक तथा परशुराम अंगभूत नायक के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं। नायिका के प्रति व्यवहार की दृष्टि से नायक के भेद : संस्कृत-नाटकों का विषय सामान्यतः प्रेम रहता है। अतः नायिका के प्रति नायक के व्यवहार या दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर आचार्यों ने नायक के अन्य चार विभाग किये हैं। जब नायक किसी नवीन नायिका के प्रेम के वशीभूत हो जाता है, तो वह पहली नायिका के प्रति जो व्यवहार करता है, उसके आधार पर नायक के तीन भेद किये गये हैं-दक्षिण, शठ और धृष्ट। कुछ नायक पहली नायिका में ही सदा अनुरक्त रहते हैं, और फलस्वरूप किसी नवीन नायिका के प्रेम में पड़ते ही नहीं। वे अनुकूल कहे जाते हैं। इस प्रकार, नायिका के प्रति व्यवहार की दृष्टि से नायक के चार भेद होते हैं। पहले नायक के चार भेद धीरोदात्त आदि बताये गये और अब उपर्युक्त चारों के चार-चार भेद हुए। अर्थात् उपर्युक्त चार भेदों में से प्रत्येक नायक दक्षिण, शठ, धृष्ट या अनुकूल हो सकता है। इस प्रकार नायक के १६ भेद हुए। दक्षिण : दक्षिण नायक नवीन नायिका से प्रेम हो जाने पर भी पूर्व नायिका के प्रति अपने व्यवहार में कोई अन्तर नहीं आने देत।। वह पूर्व नायिका को अपने प्रति उदासीनता का अनुभव नहीं होने देता। दक्षिण नायक ज्येष्ठा नायिका के प्रति भी सहृदयता का व्यवहार करता है। नाटिकाओं के नायक प्रायः दक्षिण होते हैं, जैसे वत्सराज उदयन।
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शठ : शठ नायक ज्येष्ठा का अनिष्ट तो करता ही है, परन्तु छिप-छिपकर प्रकाश्य रूप से वह ज्येष्ठा से प्रेम ही दिखाता है। नवीन नायिका के प्रेम-पाश में पड़कर शठ नायक उससे छिपकर प्रेम-चेष्टाएँ करता है। दक्षिण नायक और शठ नायक में इस अर्थ में समानता है कि दोनों ज्येष्ठा से छिपाकर नवीन नायिका से प्रेम करते हैं, दोनों ही ज्येष्ठा का अनिष्ट करते हैं; क्योंकि ज्येष्ठा नायिका कदापि नहीं पसन्द करेगी कि नायक किसी दूसरी नायिका से प्रेम-व्यापार करे, भले ही उसका व्यवहार बहुत सहृदयतापूर्ण हो। दोनों प्रकार के नायकों में ज्येष्ठा नायिका के प्रति विप्रकारित्व समान रूप से पाया जाता है। फिर भी दोनों में स्पष्ट अन्तर है। दक्षिण नायक में ज्येष्ठा के प्रति सहृदयता पाई जाती है, वह कभी भी उसके हृदय को चोट पहुँचना नहीं चाहता। इसके विपरीत शठ नायक भले ही बाहर से मीठी-मीठी बातें करे, परन्तु उसका हृदय साफ नहीं रहता, उसमें ज्येष्ठा के प्रति सहृदयता नहीं रहती। धृष्ट : नायक कभी-कभी छिपकर नवीन नायिका के साथ शृंगार-चेष्टाएँ या प्रेम-व्यापार करता है और इन चेष्टाओं के चिह्न प्रायः उसके शरीर पर लग जाते हैं। इसी रूप में नायक ज्येष्ठा नायिका के सामने जाता है और उसके ये सारे अंग-विकार ज्येष्ठा नायिका के सामने प्रकट हो जाते हैं। उसे यह भान हो जाता है कि नायक ने छिपकर नवीन नायिका के साथ शृंगार-चेष्टाएँ की हैं। ऐसा नायक धृष्ट कहा जाता है। धृष्ट नायक इतना ढीठ होता है कि उन अंग-विकारों से युक्त होकर भी ज्येष्ठा नायिका के सामने जाने में उसे कोई हिचक नहीं होती। शठ नायक जहाँ कनिष्ठा नायिका से छिप-छिपकर शृंगार-चेष्टाएँ करता है, परन्तु ज्येष्ठा से भी मीठी-मीठी बातें करता है, वहाँ धृष्ट नायक कनिष्ठा नायिका के प्रति अपना प्रेम छिपाने की भी चेष्टा नहीं करता और अंग-विकारों से युक्त होकर भी ज्येष्ठा के सामने जाने में नहीं हिचकता। धृष्ट नायक ज्येष्ठा के प्रति अपराध करके भी निःशंक रहता है, झिड़कियाँ खाने पर भी लज्जित नहीं होता और दोष दीख जाने पर भी झूठ बोलता जाता है। वह धोखेबाज होता है और ज्येष्ठा नायिका की परवाह नहीं करता। कभी-कभी वह प्रकाश्य रूप से कनिष्ठा के साथ प्रेम-व्यापार करता है। धनंजय ने घृष्ट नायक का लक्षण अन्य नायकों की तरह, छोटा दिया है : व्यक्ताङगवैकृतो धृष्टः। परन्तु, विश्वनाथ ने कुछ लम्बा लक्षण दिया :
कृतागा अपि निःशङ्कस्तजितोऽपि न लज्जितः । दृष्ट दोषोऽपि मिथ्यावाक्कथितो धृष्टनायकः ॥२ अनुकूल : जो नायक एक ही नायिका में सदा आसक्त रहता है, वह अनुकूल कहा जाता है। वह किसी भी दशा में दूसरी नायिका से प्रेम करने की बात नहीं सोचता।
१. दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, का० ७ २. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, श्लोक ३६
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अनुकूल नायक के उत्कृष्ट उदाहरण रामचन्द्र हैं। भवभूति ने उत्तररामचरित में रामचन्द्र का जो चरित्र प्रस्तुत किया है, वह अनुकूल नायक का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है। उपर्युक्त सोलह प्रकार के नायकों में से प्रत्येक के तीन-तीन भेद होते हैं-उत्तम, मध्यम और अधम। इस प्रकार नायक के अड़तालीस (१६x३=४८) भेद होते हैं। इन अड़तालीस के भी दिव्य, अदिव्य और दिव्यादिव्य-तीन-तीन भेद और भी माने जाते हैं। दिव्य देवता, अदिव्य मनुष्य और मनुष्य का रूप धारण किये देवता दिव्यादिव्य कहलाते हैं। इस प्रकार सब मिलाकर नायक के एक सौ चौवालीस (४८X३-१४४) भेद होते हैं। ऊपर लिखा जा चुका है कि प्रधान नायक में विभिन्न अवस्थाओं में विभिन्न गुण- उदात्तत्व, उद्धत्व, ललितत्व और प्रशान्तत्व-नहीं दिखाये जा सकते, किन्तु किसी अंगभूत नायक में ये चारों गुण अवस्था-भेद से दिखाये जा सकते हैं। किन्तु इन चारों गुणों- अनुकूलत्व, दक्षिणत्व, शठत्व तथा धृष्टत्व का चित्रण किसी एक ही नायक में भी भिन्न-भिन्न अवस्थाओं में अनुचित या असंगत नहीं है। नायक प्रधान हो या अंगभूत, विभिन्न अवस्थाओं में उसका चित्रण अनुकूल, दक्षिण, शठ और धृष्ट रूप में हो सकता है। एक अवस्था के पश्चात् दूसरी अवस्था में इन गुणों का आश्रय लिया जा सकता है; क्योंकि ये अवस्थाएँ परस्पर सापेक्ष हैं। जैसे एक ही नायक पहले ज्येष्ठा नायिका के प्रति सहृदय रहता है, अतः दक्षिण नायक रहता है। फिर वही छिप-छिपकर कनिष्ठा से प्रेम-व्यापार करता है, फलस्वरूप शठ नायक हो जाता है। कुछ कालोपरान्त उसकी ऐसी चेष्टा स्पष्ट रूप से ज्येष्ठा को विदित हो जाती है और वह नायक को भला-बुरा कहती है, अतः वह धृष्ट नायक की श्रेणी में आ जाता है। इस प्रकार अवस्था-भेद के अनुसार प्रधान नायक में भी दाक्षिण्य आदि भेदों का समावेश कराना असंगत या अनुचित नहीं है। अब प्रश्न उपस्थित होता है कि रत्नावली आदि नाटिका के नायक वत्सराज उदयन आदि को किस श्रेणी में रखें; क्योंकि वत्सराज में कभी दक्षिणत्व, कभी शठत्व और कभी धृष्टत्व का समावेश पाया जाता है। एक ही नायक में विभिन्न अवस्थाएँ देखने से यह प्रश्न उठना स्वाभाविक ही है। दशरूपक के वृत्तिकार धनिक ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है। रत्नावली नाटिका का नायक वत्सराज उदयन जबतक दूसरी नायिका से प्रेम नहीं करता, तबतक उसे अनुकूल नायक मानना चाहिए। इस प्रकार कामदेव-पूजा तक वत्सराज अनुकूल नायक हैं। नवीन नायिका से प्रेम हो जाने पर वह दक्षिण नायक की कोटि में आ जाता है। यद्यपि वत्सराज सागरिका से छिप-छिपकर प्रेम करके ज्येष्ठा नायिका वासवदत्ता के प्रति अपराध करता है तथापि वह सदा वासवदत्ता के प्रति सहृदय बना रहता है, अतः उसे दक्षिण-कोटि का ही नायक माना जायगा, शठ अथवा धृष्ट कोटि का नहीं। दोनों नायिकाओं से समान रूप से प्रेम करने में धनिक ने कोई अस्वाभाविकता नहीं देखी; क्योंकि कई महाकवियों ने अपने काव्यों में दक्षिण नायक का समान और पक्षपातशून्य प्रेम कई नायिकाओं के साथ चित्रित किया है।
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प्रतिनायक : नायक की फल-प्राप्ति में विघ्न उपस्थित करनेवाला, नायक का शत्रु प्रतिनायक कहा जाता है। प्रतिनायक लोभी, धीरोद्धत, घमण्डी, पापी तथा व्यसनी होता है। जैसे महावीरचरित में रावण तथा वेणीसंहार में दुर्योधन प्रतिनायक हैं। रावण राम की फल-प्राप्ति में तथा दुर्योधन युधिष्ठिर की फल-प्राप्ति में बाधक है। जयशंकर प्रसाद के नाटक 'विशाख' में राजा नरदेव प्रतिनायक के रूप में चित्रित किया गया है।
नायक के सहायक काव्य और नाटक में नायक के कुछ साथी और सहायक संयोजित किये जाते हैं। ये सहायक कथावस्तु को आगे बढ़ाते हैं और नायक को सहायता करते हैं। नायक के सहायक कई श्रेणियों में विभक्त किये जा सकते हैं। सबसे प्रमुख शृंगार-सहायक हैं, जिनमें निम्नलिखित हैं : १. विट, २. चेट, ३. विदूषक, ४. मालाकार, ५. रजक, ६. तमोली, ७. गन्धी। पीठमर्द : नायक के सहायकों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण पताका नायक होता है, जिसे पीठमर्द भी कहते हैं। पताका नायक प्रधान नायक का भक्त तथा अनुचर होता है और इसमें प्रधान नायक की अपेक्षा कुछ कम गुण होते हैं। प्रधान कथावस्तु का नायक प्रधान नायक होता है और प्रासंगिक कथावस्तु के भेद पताका का नायक पीठमर्द होता है। 'मालतीमाधव' में मकरन्द पीठमर्द है और प्रधान नायक माधव का सहायक है। रामायण में सुग्रीव प्रधान नायक रामचन्द्र का सहायक है, जो पताका नायक तथा पीठमर्द है। मकरन्द और सुग्रीव दोनों रामचन्द्र और माधव से गुणों में न्यून हैं और उनके सुदूरवर्त्ती चरित में सहायक हैं।
विट : धनंजय ने विट का लक्षण लिखा है : 'एकविद्यो विटः"१ अर्थात् विट वह है, जो एक विद्या में निपुण होता है। नाटक के लिए उपयोगी नृत्य, गीत आदि विद्याओं में से किसी एक विद्या का ज्ञाता विट कहा जाता है। शारदातनय ने इस लक्षण में थोड़ा विस्तार किया है। उनके अनुसार विट एक विद्या का ज्ञाता होने के साथ कामतन्त्र में कुशल होता है : एकविद्यो विटस्तस्य कामतन्त्रेषु कौशलम्।' विश्वनाथ ने विट का लक्षण अधिक विस्तार से लिखा है। भोग-विलास में अपनी सम्पत्ति खो चुकनेवाला, धूर्त्त, नृत्य-गीतादि कलाओं के एक अंश का ज्ञाता, वेश्याओं का आदर- सत्कार करने में कुशल, बातचीत में चतुर, मधुरभाषी तथा गोष्ठी में आदर पानेवाला व्यक्ति विट कहा जाता है :
१. दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, का० ९ PaोiतP २. भावप्रकाशन, चतुर्थ अधिकार, पृ० ९४
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२२२ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
सम्भोगहीनसम्पद्विटस्तु धूर्त्तः कलैकदेशज्ञः । वेशोपचारकुशलो वाग्मी मधुरोऽथ बहुमती गोष्ठ्याम्। यह धूर्त्त होता है और सम्भोग-विषयों में अनजान समझा जाता है, पर वेशोपचार में निपुण और वाचाल होता है। विट का चरित्र बहुत सरलता से नहीं समझा जा सकता। वह किसी पुरुष या स्त्री के सहचर के रूप में प्रस्तुत होता है। यदि वह किसी स्त्री का सहायक होता है, तो वह स्त्री वेश्या ही रहती है। वह प्रायः अपने साथी से घनिष्ठ दिखाया जाता है, परन्तु उसका आश्रित रहता है। वह प्रायः किसी धनी व्यक्ति के पास किसी कला के शिक्षक और सहचर के रूपों में रखा जाता है, परन्तु उस कला की शिक्षा देता हुआ प्रायः नहीं दिखाया जाता। भाण में विट आवश्यक पात्र होता है, जो अपने घूर्त्ततापूर्ण अनुभवों का वर्णन करता है। किन्तु, दूसरे प्रकार के रूपकों में उसका कोई विशेष महत्त्व नहीं रहता। कालिदास और भवभूति ने अपने नाटकों में उसका अवतरण नहीं किया। मृच्छकटिक में ही वह पूर्णता को प्राप्त हुआ है। धनिक ने विट के उदाहरण के रूप में नागानन्द नाटक के शेखरक को रखा है। विदूषक : नाटक में विदूषक हास्यकारी पात्र होता है। विदूषक के विचित्न और बेढंगे वेश, विकृत अंग और वचन से हास्य उत्पन्न होता है। वह दूसरों को लड़ाने में प्रसन्न रहता है और अपने मतलब का पूरा होता है, अपने खाने-पीने की बात कभी नहीं भूलता। विश्वनाथ ने विदूषक का लक्षण देते समय बताया है कि उसका नाम किसी फूल अथवा वसन्तादिक ऋतु पर होता है। कुसुमवसन्ताद्यभिध: कर्मवपुर्वेषभाषाद्य:। हास्यकर: कलहरतिविदूषकः स्यात्स्वकर्मज्ञः ॥२ #i संस्कृत-नाटक में विदूषक का बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान है। नाटक में वह हास्य- व्यंग्य उत्पन्न करके मनोरंजन का साधन तो बनता ही है, परन्तु उसका कार्य इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। वह राजा या नायक का अन्तरंग सखा होता है, साथ ही राजा के अन्तःपुर का आलोचक भी। वैसे वह मूर्ख दिखाई देता है, परन्तु कभी-कभी ऐसी बातें करता है, जिससे उसकी बुद्धिमत्ता का पर्याप्त परिचय मिलता है। वह जाति का ब्राह्मण होता है। संस्कृत-नाटकों में वह अपने पेटूपन और मोदक-प्रेम के लिए ख्यात या कुख्यात है। उसकी प्रत्येक क्रिया, चाल-ढाल, बातचीत, वेश-भूषा हास्यजनक होती है। वह नाटा, कुबड़ा, खल्वाट् और दन्तुल होता है। उसके केश और नेत्र पिंगल होते हैं। वह जाति का ब्राह्मण होकर भी प्राकृत भाषा का ही व्यवहार करता है। भरत मुनि ने विदूषक की बाह्याकृति का वर्णन दिया है : १. साहित्यदर्पण, तृतीय परिच्छेद, का० ४१ २. वही, का० ४५
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वामनो दन्तुरः कुब्जो द्विजन्मा विकृताननः। खलतिः पिङ्गलाक्षश्च स विज्ञेयो विदूषकः ॥
नाटक के सभी पात्र विदूषक से दिल्लगी करते हैं। परन्तु, वह सदा राजा का समर्थन करता है। वह राजा या नायक का विश्वासपात्र होता है और राजा उससे अपनी गुप्त प्रेम-मन्त्रणा भी खोल देता है। वह प्रायः राजा के गुप्त प्रेम-व्यापार में सहायता भी प्रदान करता है। अभिज्ञानशाकुन्तल नाटक का विदूषक और मृच्छकटिक का मैत्नेय उदाहरण के रूप में रखे जा सकते हैं। मृच्छकटिक में विदूषक अपनी नैतिकता तथा मित्र के प्रति निष्ठा के कारण विशेष स्थान प्राप्त कर लेता है। यह पात्र सदा चंचल या कार्यव्यस्त रहता है और इसमें कभी-कभी वाग्विदधता भी रहती है। आचार्यों ने इसका कोई कारण नहीं बताया कि क्यों वह ब्राह्मण होकर भी इस प्रकार हास्यास्पद तथा बेढंगा पात्र बनाया गया है। अश्वघोष और भास ने भी अपने नाटकों में विदूषक का अवतरण किया है और प्रायः सभी परवर्त्ती नाटकों में यह पात्र रखा गया है। रामायण आदि के कथानक पर जो नाटक लिखे गये, केवल उन्हीं में विदूषक नहीं रखा गया। मालतीमाधव में विदूषक अलग से कोई पात्र नहीं है, परन्तु नायक माधव का मित्र ही विदूषक का कार्य सम्पन्न करता है। वास्तव में यह बुद्धिमान् ब्राह्मण होता है और मनोरंजन के लिए नियुक्त होने के कारण इसे ऐसा आचरण करना पड़ता है। भरत मुनि ने बताया है कि देवताओं के विदूषक लिंगी (संन्यासी), राजाओं के विदूषक ब्राह्मण, सेनापति और अमात्य के विदूषक राजपुरुष और ब्राह्मण, नायकों के विदूषक उनके शिष्य होते हैं। विदूषक के विषय में श्री एच्० एच्० विल्सन ने लिखा है : "He bears more affinity to sancho Panza, perhaps than any other character in Western fiction, imitating him in his combination of shrewd- ness and sinccrity, his fondness for good living ard his love of ease. In the dramas of intrigue, he exhibits some of the talents of mercury, but with less activity and ingenuity, and occasionally suffers by his interference. "? शकार: मदान्ध, नीच कुलोत्पन्न, घमंडी, मूर्ख, सम्पत्तिशाली, राजा की अविवाहिता स्त्री का भाई शकार कहा जाता है। वह शीघ्र ही करुद्ध और शीघ्र ही प्रसन्न होता है। उसे अपने पद का अभिमान रहता है, परन्तु अयोग्यता तथा भ्रष्टाचार के कारण वह अपने पद का निर्वाह नहीं कर पाता। मृच्छकटिक और चारुदत्त प्रकरणों में शकार का महत्त्वपूर्ण स्थान है। अभिज्ञानशाकुन्तल में भी शकार को स्थान दिया गया है, परन्तु धीरे- धीरे संस्कृत-नाटकों से इसका लोप हो गया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि आरम्भिक १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २४, का० १०३ २. दि थियेटर ऑव दि हिन्दूज, पृ० ३१
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२२४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास नाटकों में ही शकार का प्रयोग होता था। शकार 'श' अक्षर का प्रयोग अधिक करता था; क्योंकि शकारी भाषा में 'श' का प्रयोग अधिक है। सम्भवतः इसीलिए उसे 'शकार' कहा जाता था। चेट : भरत मुनि ने चेट में कुछ विशेष गुणों का संकेत किया है। उसे कलाप्रिय तथा मान्यामान्य विशेषज्ञ भी बताया गया है। नाट्यशास्त्र में चेट के विषय में लिखा है : कलाप्रियो बहुकथो विरूपो गन्धसेवकः। मान्यामान्यविशेषज्ञश्चेटो ह्यं वंविधः स्मृतः ।' परन्तु, विश्वनाथ ने चेट का केवल नाम गिनाकर छोड़ दिया है; वृत्ति में इतना ही लिखा है : 'चेटः प्रसिद्ध एव।' नायक के अन्य सहायक ऊपर नायक के शृंगार-सहायकों का विवरण दिया गया। इनके अतिरिक्त नायक के निम्नलिखित अन्य सहायक भी होते हैं : १. अर्थचिन्ता-सहायक, २. धर्म-सहायक, ३. दण्ड-सहायक, ४. अन्तःपुर-सहायक और ५. संवाद-सहायक। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र के चौबीसवें अध्याय में नायक के सहायकों का विस्तार से वर्णन किया है। परवर्त्ती आचार्यों ने उसी को थोड़ा-बहुत संक्षेप करके अपने ग्रन्थों में स्थान दिया है। कई व्यक्ति अन्तःपुर के सहायक होते हैं। अनेक वर्षधर या वर्षवर (हिजड़े), निर्मुण्ड तथा उपस्थामिक अन्तःपुर में नियुक्त किये जाते हैं। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इनके कार्यों का बँटवारा भी कर दिया है : शुद्धान्ते कारुको द्वाःस्थ: कञ्चुकी शुभकर्मणि। वर्षवरस्तु रक्षायां निर्मुण्डिः प्रेषणे स्त्रियाः॥२ भरत मुनि ने विस्तार से सबके लक्षण दिये हैं। इनके अतिरिक्त विश्वनाथ ने अन्तःपुर के अन्य सहायक बताये हैं : कुबड़े, गूगे, बौने, म्लेच्छ, चेट, किरात, अहिर, माली, तमोली, गन्धी आदि। प्रेमिकाओं के पास भेजने के लिए या अन्तःपुर में रखने के लिए ऐसे ही व्यक्तियों को चुना जाता है, जिन्होंने ब्रह्मचर्य-व्रत धारण किया है या जो ऐसी शक्ति से वंचित हों कि उन्हें अन्तःपुर में रखा जा सके। स्थानक वह ब्राह्मण होता है, जिसने धार्मिक ग्रन्थों का अध्ययन समाप्त कर लिया है और जो धार्मिक तथा सामाजिक कृत्यों का ज्ञाता है। वह राजप्रासाद में ही निवास करता है। कंचुकी : कंचुकी वृद्ध ब्राह्मण होता है। उसका पूरा जीवन राजा की सेवा में ही बीता रहता है, परन्तु शरीर से वृद्ध होने पर भी मन और बुद्धि से कार्य-तत्पर रहता है। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २४, कारिका १०३ २. नाट्यदर्पण, खण्ड ४, का० १७
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वह राजाज्ञा अन्तःपुर में पहुँचाने में चतुर होता है। विद्या-सत्य-सम्पन्न तथा काम-दोषविवर्जित होना कंचुकी के विशेष गुण हैं।
दूत : दूत किसी कार्य की सिद्धि के लिए या सन्देश लेकर भेजे जाते हैं। राजा को अपने प्रेम-व्यापार में तथा अन्य गम्भीर कार्य में भी दूत की सहायता की आवश्यकता होती है। दूत को कई गुणों से सम्पन्न होना आवश्यक है : जैसे वफादारी, साहस, शक्ति, अच्छी स्मरण-शक्ति आदि। साहित्यदर्पण में दूत के तीन भेद बताये गये हैं। कभी-कभी दूत को किसी विशेष अवसर पर कार्य करने का पूर्ण अधिकार रहता है। ऐसे दूत को निःसृष्टार्थ कहते हैं। ऐसा दूत भेजनेवाले के और जिसके पास भेजा जाय उसके मनोभावों को जानता है और स्वयं ही उसका उत्तर-प्रत्युत्तर देकर उत्तम प्रकार के कार्य की सिद्धि करता है। कभी-कभी दूत को परिमित कार्य का अधिकार रहता है, उसे मितार्थ दूत कहते हैं। ऐसा दूत थोड़ा ही बोलता है और कार्य की सिद्धि कर देता है। कभी-कभी दूत केवल सन्देशवाहक ही रहता है, जिसे सन्देशहारक कहते हैं। वह उतनी ही बात कहता है जितनी उससे कही जाती है।
राजकार्य या दण्ड-सहायक : भरत मुनि ने नायक या राजा के राजकार्य के सहायकों का वर्णन किया है। मन्त्री या अमात्य उच्च कुलोत्पन्न, बुद्धि-सम्पन्न कर्मचारी होता है। वह श्रुतिनीति-विशारद, पराक्रमी, प्रियभाषी, अर्थशास्त्र में कुशल, राजा का हितैषी, स्वदेशानुरागी, पवित्र तथा धार्मिक होता है। सेनापति भी कुलीन, दोष-रहित, शीलवान्, युद्ध के सैद्धान्तिक तथा व्यावहारिक पक्षों का ज्ञाता और प्रियभाषी होता है। वह शत्रु की दुर्बलता पूर्ण रूप से जानता है और उचित अवसर पर शत्रु पर आक्रमण करता है। प्राड्- विवाक, बुद्धिमान्, विद्वान्, धार्मिक, समदर्शी, शान्त तथा निष्पक्ष होता है। लोकाचार तथा अर्थशास्त्र के सब तत्त्वों को जाननेवाला, क्षमाशील, जितेन्द्रिय, कर्त्तव्य तथा अकर्तव्य समझनेवाला और क्रोध पर विजय पानेवाला होता है। दण्ड-सहायक दुष्टों का दमन करने में सहायता प्रदान करते हैं। वे सुहृद् (मित्र), कुमार, आटविक (सीमा-रक्षक), सामन्त और सैनिक आदि होते हैं।
क अर्थचिन्ता-सहायक : नाटकों में नायक विशेष रूप से राजा ही होते हैं, जिन्हें अपनी अर्थ-व्यवस्था के लिए मन्त्री और कोषाध्यक्ष पर निर्भर रहना आवश्यक होता है। धीर- ललित नायक को अपनी अर्थसिद्धि के लिए मन्त्री आदि पर विशेष रूप से निर्भर रहना पड़ता है और धीरप्रशान्त नायक को धन की कोई विशेष चिन्ता रहती ही नहीं। दण्ड- सहायक और अर्थचिन्ता-सहायक राज्य-व्यवस्था के लिए नियुक्त किये जाते हैं। धर्म-सहायक : विश्वनाथ ने धर्मकार्य में भी सहायकों का वर्णन किया है। धर्म- कार्य में नायक के सहायक हैं : ऋत्विक (यज्ञ करामेवाले), पुरोहित (कुलगुरु), तपस्वी, ब्रह्मवादी (आत्मज्ञानी), वेदवेत्ता आदि।
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२२६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास कली इनमें पीठमर्द, मन्त्री, पुरोहित आदि उत्तम कोटि के, विट तथा विदूषक मध्यम कोटि के और चेट, शकार, तमोली, गन्धी आदि अधम कोटि के सहायक माने जाते हैं। नायक के सात्त्विक गुण : पहले नायक के गुणों का वर्णन किया जा चुका है। उनमें शायद ही कोई गुण छूटा हो, परन्तु आचार्यों को जैसे उतने से ही सन्तोष नहीं हुआ। उन्होंने नायक में आठ सात्त्विक गुणों का फिर समावेश किया। धनंजय के अनुसार वे सात्त्विक गुण हैं : शोभा विलासो माधुर्य गाम्भीर्य स्थैर्यतेजसी। ललितौदार्यमित्यष्टौ सात्विका: पौरुषा गुणाः ।१ विश्वनाथ ने धनंजय का ही श्लोक अपने साहित्यदर्पण में रख लिया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में वे ही गुण दूसरे ढंग से गिनाये हैं : तेजो विलासो माधुर्य' शोभा स्थर्य गभीरता। औदार्य ललितं चाष्टौ गुणा नेतरि सत्त्वजा: ॥२ रस-प्रकरण में स्वेदादि सात्त्विक गुणों का उल्लेख होगा, परन्तु वे स्त्री-पुरुष में साधारण हैं। किन्तु, प्रस्तुत गुण केवल पुरुषों में ही पाये जाते है, स्त्रियों में नहीं। ऊपर गिनाये गये सातत्विक गुणों का परिचय दिया जा रहा है। शोभा : शोभा नामक सात्त्विक गुण वहाँ देखा जाता है, जहाँ शूरता तथा दक्षता पाई जाती हो। शोभा में दो बातों का समावेश होता है : (क) नीचता के प्रति घृणा, और (ख) अधिक के प्रति स्पर्द्धा। नीचता के प्रति घृणा : शोभा का यह उपादान प्राचीन सदर्प उच्चकुल में उत्पन्न होने के भाव का अवशेष है। इस घृणा का कार्य केवल दूसरों से जुगुप्सा ही नहीं कराता है, वरन् दया भी दिखाता है। दया के आधार पर ही यह घृणा स्थित है। धनिक ने दशरूपक की टीका में इसका उदाहरण महावीरचरित से उपस्थित किया है : उत्ताल-ताडकोत्पात-दर्शनेऽप्यप्रकम्पितः । नियुक्तस्तत्प्रमाथाय स्त्रैणेन विचिकित्सति॥ -अर्थात् भयंकर ताडका का रूप देखकर जो डरा नहीं, वह उसे स्त्री समझकर मारने में संकोच कर रहा है। किन्तु, यदि ध्यान से देखा जाय तो प्रतीत होगा कि इस विचिकित्सा के मूल में नीच कर्म है, नीच व्यक्ति नहीं। राम के मन में ताडका के लिए घृणा नहीं है, वरन् वे उसे मारने से घृणा करते हैं। इसका कारण यह है कि ताडका स्त्री है और स्त्री पर अस्त्र-प्रहार करना वीरों के लिए उचित नहीं। स्त्री अबला समझी जाती है और अपने उत्पातों के बावजूद वह स्त्री ही है। परन्तु, उच्चकुल में उत्पन्न होने की भावना दुर्बलता १. दशरूपक, द्वितीय प्रकाशन, का० १० २. नाट्यदर्पण, भाषा ४, का० द
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नेता i२२७ की भी गणना नीचता में करती है। पर, सामान्य अर्थ में घृणा कभी भी शोभा का कारण नहीं बन सकती। अधिक के प्रति स्पर्द्धा : जो बढ़ा हुआ है, उससे भी बढ़ जाने की इच्छा स्पर्द्धा है। इसी स्पर्द्धा की भावना के कारण महान् व्यक्ति बहुत बड़े-बड़े कार्य कर देते हैं। शोभा दो प्रकार की मानी गई है: शौर्यशोभा और दक्षशोभा। शौर्यशोभा में वीरता की प्रमुखता रहती है और दक्षशोभा में क्षिप्रकारिता तथा कौशल की। विलास : नायक में विलास नामक सात्त्विक गुण वहाँ पाया जाता है, जहाँ उसमें धर्ययुक्त दृष्टि तथा धर्ययुक्त गति पाई जाय और उसकी वाणी स्मृतियुक्त हो। माधुर्य : बहुत बड़े क्षोभ का कारण उपस्थित होने पर भी यदि नायक में घबराहट नहीं हो या अल्प हो, तो माधुर्य नाम का सात्त्विक गुण होता है। गाम्भीर्य : जब विकार के बहुत बड़ा हेतु होने पर भी उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता, कुछ भी विकार नहीं दिखाई पड़ता, तो गाम्भीर्य नामक सात्त्विक गुण होता है स्थर्य : स्थैर्य वह सात्त्विक गुण है, जब नायक अनेक विध्नों के उपस्थित होने पर भी उनसे विचलित नहीं होता, अपने मार्ग पर डटा रहता है। तेज : किसी के द्वारा किये हुए आक्षेप और अपमानादि का प्राण जाने पर भी सहन नहीं करना, तेज नामक सात्त्विक गुण कहा जाता है। ललित : स्वाभाविक कोमलता से पूर्ण शृंगारपरक चेष्टाओं का पाया जाना ललित कहा जाता है। औदार्य : जहाँ प्रिय वचनों के द्वारा नायक प्राण तक न्यौछावर करने को तैयार हो तथा सज्जनों को अपने आचरण के बल पर अनुकूल बना ले, वहाँ उसमें औदार्य नामक सात्त्विक गुण समझा जाना चाहिए। धनिक तथा विश्वनाथ ने इन सभी गुणों के उपयुक्त उदाहरण दिये हैं। यूनानी त्रासदियों के नायकों के गुणों से तुलना : यहाँ यूनानी तासदियों के नायकों के गुणों से तुलना की जा सकती है। अरस्तू ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'पोएतिका' में त्नासदी के नायक के गुणों का वर्णन किया है। पहले उन्होंने बताया है कि किन-किन गुणों- वाला व्यक्ति तासदी का नायक नहीं हो सकता। फिर अन्त में उन्होंने नायक के गुणों का निर्देश किया है : "There remains, then, the character between these two extremes- that of a man who is not eminently good and just, yet whose misfortune is brought about not by vice and depravity, but by some error or frailty. He must be one who is highly renowned and prosperous."9 अरस्तू के मतानुसार तासदी का नायक नैतिक दृष्टि से दोनों छोरों के मध्य में स्थित होता है। वह सर्वथा उत्तम ही नहीं होता, यद्यपि उत्तमता की ओर झुका रहता है। # 9. Aristotle's Poetics, translated by S. H. Butcher, p. 47. TF TFT1TF
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२२८j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास वह विपद्ग्रस्त हो जाता है, इसलिए नहीं कि वह पापी या अनैतिक है, प्रत्युत इसलिए कि उसके चरित्र में कहीं कोई त्ुटि है या अपने आचरण में भंयकर भूल कर देता है। वह धन या पद की दृष्टि से महान् होता है। इसकी आवश्यकता इसलिए समझी गई है कि विपद् (catastrophe) स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो जाय। पूर्णतः दोष-रहित चरित्र तासदी के नायक के लिए अयोग्य समझा गया है। क्योंकि, सर्वथा अकारण कष्टों से करुणा तथा भय के स्थान पर विकर्षण की भावना उत्पन्न होगी। त्ासदी में करुणा तथा भय की भावनाओं का संचार आवश्यक है। सुखान्त नाटकों में दिखाया जाता है कि सज्जन व्यक्ति दुःख की अवस्था से निकल- कर सुख प्राप्त करता है। ग्रीक तथा अन्य नाट्य-साहित्य में सुखान्त नाटकों की भी योजना की गई है, जिनमें सज्जनों को सुख-प्राप्ति तथा दुर्जनों को दुःख-प्राप्ति दिखाई जाती है। ऐसे नाटकों में सभी झगड़े समाप्त हो जाते हैं, शत्रु विदा होते समय मित्र हो गये रहते हैं, कोई न मरता है और न मारा जाता है। संस्कृत के नाट्याचार्यों ने नायक के चुनाव में भी कतिपय प्रतिबन्धों का विधान किया है। नायक सर्वगुण-सम्पन्न होता था और उसमें किसी प्रकार की तुटि नहीं रहती थी। वह वीरता तथा साहस का प्रतीक हुआ करता था तथा सामान्य जनता के लिए आदर्श होता था। परन्तु, यूनानी और अँगरेजी-नाटककारों ने ऐसा कोई प्रतिबन्ध नहीं लगाया। उनका विचार था कि सर्वगुण-सम्पन्न कोई भी व्यक्ति नहीं हो सकता, अतः नायक ढूँढ़ना या बनाना असम्भब ही है। यदि संयोग से ऐसा व्यक्ति मिल भी जाय तो वह आदमी नहीं, देवता भले ही होगा। इसके साथ ही उनका विश्वास था कि मनुष्य की महत्ता के लिए उसमें कुछ तुटियों या अवगुणों का रहना आवश्यक है, नहीं तो अवगुण- विहीन मनुष्य सांसारिक जीवन में किसी काम का नहीं रहता। मनुष्य में मनुष्यता रहने के लिए अवगुण का रहना नितान्त आवश्यक है। इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखकर यूनानी और अगरेज नाटककारों ने संस्कृत-नाटककारों के समान श्रेष्ठ वीरों, राजाओं को नायक बनाकर भी उनमें किसी-न-किसी तुटि का समावेश कर दिया है और इस प्रकार उन्हें मनुष्य बनाये रखने का प्रयास किया है। उन सभी श्रेष्ठ नायकों में एकांगी दोष रहता है। एकांगी दोष से तात्पर्य ऐसे दोष से है, जो उन्हें किसी विशेष प्रकार से सोचने या कार्य करने या कल्पना करने को विवश करता है। इसी एकांगी दोष के कारण वह अपना कार्य करते-करते रह जाता है और वह या तो आत्महत्या कर लेता है या कोई अन्य पात् उसकी हत्या कर देता है। नायिका अभी नायकों का विवेचन हुआ। नायक की प्रिया या पत्नी नायिका कही जाती है। परन्तु, आधुनिक पाश्चात्त्य नाट्य-सिद्धान्त में यह बिल्कुल आवश्यक नहीं कि नायिका नायक की प्रिया या पत्नी ही हो। पाश्चात्त्य विद्वान् मानते हैं कि कथा-प्रवाह में
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जिस स्त्री का मुख्य भाग रहता है, वही नायिका होती है, भले ही वह नायक की प्रिया या पत्नी नहीं हो। किन्तु, भारतीय नाट्याचार्य नायक की प्रिया को ही नायिका मानते हैं। संस्कृत-नाटकों या अन्य रूपकों में नायक के ही समान नायिका का भी महत्त्व है, विशेषतः शृंगार-प्रधान रूपकों में। नाटिका में तो नायिका का महत्त्व नायक से भी अधिक होता है। अतः, नायिका का विवेचन तथा वर्गीकरण नाट्याचार्यों का प्रिय विषय रहा है। नायिका नायक के समान गुणों से युक्त मानी जाती है। वर्गीकरण : भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नायिकाओं के चार भेद बताये हैं- दिव्या, नृपतिनी, कुलस्त्री और गणिका। परन्तु, परवर्त्ती आचार्यों ने इस वर्गीकरण को मान्यता नहीं दी। उन लोगों ने इस विषय का विवेचन दूसरे ही प्रकार से किया है। नायिका का वर्गीकरण तीन प्रकार से किया गया है। पहले प्रकार के वर्गीकरण का आधार नायक और नायिका का परस्पर सम्बन्ध है। वर्गीकरण का दूसरा आधार एक ओर नायिका की अवस्था है और दूसरी ओर, नायक के प्रतिकूल आचरण करने पर उसके प्रति नायिका की प्रतिक्रिया है। तीसरे प्रकार के वर्गीकरण का आधार नायिका की प्रेमगत दशा का वर्णन है। नायक-नायिका-सम्बन्ध के आधार पर वर्गीकरण : नायक-नायिका के पारस्परिक सम्बन्ध के आधार पर नायिका के मुख्य विभाग तीन हैं-स्वकीया या स्वीया, अन्या या परकीया तथा साधारण स्त्री। स्वकीया नायक की विवाहिता पत्नी होती है। इसका उदाहरण उत्तररामचरित की सीता है। अन्या या परकीया नायक की विवाहिता पत्नी नहीं होती है। वह या तो किसी दूसरे की पत्नी रहती है या अनूढा कन्या। साधारण स्त्री या गणिका का उदाहरण मृच्छकटिक की वसन्तसेना है। परकीया नायिका का वर्णन काव्य या नाटक में मुख्य रस के आलम्बन में नहीं किया जाता, परन्तु संस्कृत के बहुत-से मुक्तकों में इसका वर्णन किया गया है। स्वकीया : स्वकीया नायिका प्रतिव्रता, सच्चरित्र, सरल स्वभाव की तथा लज्जायुक्त और पति के साथ व्यवहार में कुशल होती है। अवस्था के अनुसार स्वीया या स्वकीया नायिका के तीन विभाग किये गये हैं-मुग्धा, मध्या और प्रगल्भा। मुग्धा नायिका प्राप्त-यौवना होती है, वह अवस्था तथा काम-वासना दोनों में नई रहती है, बड़ी भोली-भाली तथा प्रेम-कलाओं से अनभिज्ञ; प्रेम-क्रीड़ा से डरी रहती है। वह नायक के समीप जाने पर अकेली रहने से डरती है और नायक के प्रतिकूल आचरण करने पर उससे क्रोध नहीं करती, केवल अश्रू-विसर्जन करती रहती है। वह मान करने पर भी कोमल ही रहती है और सरलतापूर्वक प्रसन्न की जा सकती है। कविराज विश्वनाथ ने मुग्धा नायिका के पाँच भेद किये हैं : १. प्रथमावतीर्ण यौवना (जिसमें नवीन यौवन की छटा पहले-पहल विकसित हुई हो); २. प्रथमावतीर्ण मदन- विकारा (जिसमें काम-कलाओं के विलास पहुले-पहल आविर्भूत हुए हों); ३ रतिवामा
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२३०] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास (जो रति में झिझके और संकोच करे); ४. मानमृदु (जिसका मान चिरस्थायी नहीं हो सके); ५. समधिक लज्जावती (जो अत्यन्त लज्जा करे)। परन्तु, मेरे विचार से ये विभाग अनावश्यक हैं। यदि ऐसे विभाग किये जायँ तो उनका अन्त नहीं होगा। अन्य आचार्यों ने ऐसा कोई विभाग नहीं किया। धनिक ने मुग्धा के अनेक उदाहरण अवश्य दिये, जिनसे मुग्धा नायिका की कई दशाएँ स्पष्ट होती हैं। स्वकीया नायिका का दूसरा भेद मध्या है। मध्या में यौवन पूर्ण रूप से आ गया रहता है तथा वह काम-वासना प्राप्त कर चुकी होती है। यौवन तथा काम-वासना दोनों की दृष्टि से उसमें पूर्णता आ गई रहती है। विश्वनाथ ने मध्या नायिका के पाँच भेद गिनाये हैं : १. विचित्रसुरता, २. प्ररूढसमरा, ३. प्ररूढयौवना, ४. ईषत् प्रगल्भवचना, ५. मध्यमव्रीडिता। नायक के प्रतिकूल आचरण करने पर मध्या नायिका कुद्ध होती है। ऐसी अवस्था में उसके तीन रूप होते हैं : १. धीरा, २. अधीरा और ३. धीराधीरा। नायक के प्रतिकूल आचरण करने पर, अर्थात् अन्य नायिका से प्रेम करने पर, धीरा मध्या ताने सुनाकर या उपालम्भ देकर नायक का दिल दुःखाती है। अधीरा मध्या नायक को कटु शब्द भी सुनाती है और रोती भी है। धीराधीरा मध्या एक ओर रोती है और दूसरी ओर नायक को ताने भी देती है। प्रगल्भा को कुछ नाट्याचार्य प्रौढा भी कहते हैं। प्रगल्भा नायिका में यौवन का इतना तीव्र प्रवाह रहता है कि वह उस प्रवाह में बह-सी जाती है। काम-सम्बन्धी भावों के आधिक्य के कारण वह पागल-सी हो जाती है। वह बड़ी ढीठ तथा लज्जा-रहित होती है। प्रेम-कीड़ा में वह कई प्रकार के अनुभव करती है। विश्वनाथ ने प्रगल्भा के छह भेद बताये हैं :: १. स्मरान्धा, २. गाढतारुण्या, ३. समस्तरतकोविदा, ४. भावोन्नता, ५. दरव्रीडा, ६. आकान्तनायका। परन्तु, ये सब भेद बताकर व्यर्थ विस्तार किया गया है। नायक के प्रतिकूल आचरण करने पर मध्या की तरह प्रगल्भा का भी आचरण तीन प्रकार का होता है, अतः उसके भी तीन भेद होते हैं : १. धीरा, २. अधीरा और ३. धीराधीरा। धीरा प्रगल्भा अपराध करनेवाले नायक के प्रति अपना क्रोध दो तरह से प्रकट करती है, या तो नायक का आवश्यकता से अधिक आदर करके उसे लज्जित करती है या उसके प्रति उदासीनता दिखाती है। अधीरा प्रौढा कोध में आकर नायक को डराती-धमकाती और यहाँ तक कि उसे मारती-पीटती भी है। धीराधीरा प्रौढा धीराधीरा मध्या की भाँति ही नायक के प्रति व्यंग्योक्ति और ताने का प्रयोग करती है। इसके साथ ही मध्या तथा प्रगल्भा के तीन भेदों-धीरा, अधीरा और धीराधीरा- के फिर दो-दो भेद किये गये हैं : ज्येष्ठा तथा कनिष्ठा। नायक की पहली पत्नी को ज्येष्ठा तथा उसकी नई प्रेमिका को कनिष्ठा कहते हैं। उदाहरणार्थ रत्नावली नाटिका में वासवदत्ता ज्येष्ठा नायिका है और सागरिका है कनिष्ठा। इस तरह मध्या नायिका के छह भेद और प्रगल्भा के छह भेद हुए। मुग्धा एक ही प्रकार की मानी गई है। मुग्धा को भी मिला दिया जाय तो इस वर्गीकरण के अनुसार स्वकीया के १३ भेद हुए।