Books / Bhartiya Natya Siddhanta Udbhava Aur Vikas Ramji Pandey (Hindi)

5. नाट्य-लक्षण:1DTH [ १३७

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नाट्य-लक्षण:1DTH [ १३७

नाट्य या रूपक के तत्त्व काव्य के दो भेद किये गये हैं-दृश्य तथा श्रव्य। दृश्य काव्य को नट रंगमंच पर चारों प्रकार के अभिनय के द्वारा प्रदर्शित करते हैं। रंगमंच पर अभिनय के द्वारा दिखाई जानेवाली रचना को रूपक कहते हैं; क्योंकि उस रचना में आये पात्रों का आरोप नटों में करके उसे प्रदर्शित किया जाता है। कविराज विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में ऐसे काव्य को दृश्य या रूपक कहा है : दृश्यं तव्राभिनेयं स्याद्रूपारोपात्तु रूपकम्।' इसका अभिनय करके दिखाया जाता है, इसलिए इसे दृश्य कहते हैं और इसके अनुसार अभिनेताओं में विभिन्न पातों-रामादि-का आरोप होता है, इसलिए इसे रूपक कहते हैं। इस नाट्य या रूपक में तीनों लोकों के भावों का अनुकीर्त्तन होता है और उत्तम, मध्यम तथा अधम मनुष्यों के कार्यों का प्रदर्शन किया जाता है। इसमें संसार-भर के लोगों की सभी अवस्थाओं तथा कार्यों का अनुकरण होता है। नाट्य का बहुत अधिक महत्त्व है; क्योंकि इसमें सभी विषयों का समावेश रहता है। ज्ञान, शिल्प, कला, इतिहास, आख्यान, योग, कर्म, शास्त्र, वेद, स्मृति आदि सभी विषय इस नाट्य में पाये जा सकते हैं। यह सभी वर्गों के मनुष्यों को आनन्द, सुख और मनोरंजन प्रदान करनेवाला क्ीडनीयक है। यह करीडनीयक सार्वव्णिक है। इसका अभिप्राय हुआ कि रूपक को खेलने योग्य बनाया जाय और इसमें अनेक विषयों का समावेश किया जाय, जिसके कारण सभी लोग इससे विनोद के साथ विश्रान्ति प्राप्त कर सकें। जब दर्शक नाट्य में पूरी तरह मग्न होकर रस लेने लगे, तभी यह सम्भव होगा। तात्पर्य यह है कि नाटक में एक विशिष्ट कथा होनी चाहिए, जिसमें कुछ पात्रों की आंगिक, वाचिक तथा सात्त्विक क्रियाएँ हों, जिनके आधार पर नट या अभिनेता उन पात्रों का अनुकरण करके आंगिक, वाचिक, सातत्विक तथा आहार्य अभिनय करें और उसका अभिनय रंगमंच पर दिखाया जा सके। इससे स्पष्ट होता है कि वाचिक अभिनय के लिए संवाद होना आवश्यक है और आंगिक, सात्त्विक तथा आहार्य अभिनय के लिए और दृश्य-विधान के लिए रंग-निर्देश होना चाहिए। इस विचार से नाटक में निम्नलिखित तत्त्व आवश्यक हैं और इन्हीं पर किसी नाट्य की स्थिति सम्भव है। १. कथा : इसमें किसी नायक के जीवन के इतिवृत्त से सम्बन्ध रखनेवाली घटनाओं का वर्णन हो। २. नायक या पात्र : नायक या पात्र का रहना आवश्यक है; क्योंकि उसी के जीवन से सम्बद्ध घटनाओं का वर्णन होता है। ३. संवाद : संवाद के अन्तर्गत कथा में आये अनेक पात्रों का पारस्परिक वार्त्तालाप रहता है। इस वार्त्तालाप से कथा के विकास के साथ पातों के चरित्र का भी विकास होता है। १. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० १

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१३८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

४. रंग-निर्देश : रंग-निर्देश के अन्तर्गत रंग-व्यवस्थापक तथा अभिनेताओं के लिए निर्देश दिये रहते हैं। कोई कार्य होता है, तो वह किसी-न-किसी स्थान पर और किसी-न- किसी समय पर होता है। साथ ही उसमें कोई-न-कोई व्यापार होता है। नाटककार रंग-निर्देश के अन्तर्गत इन्हीं तीन बातों-स्थान, समय तथा व्यापार का निर्देश करता है, जिससे रंग-निर्देशक तथा अभिनेता को अभिनय में सहायता मिलती है। ५. रस : नाटककार कथावस्तु तथा पात्रों की सहायता से कोई-न-कोई रस प्रकट करना चाहता है। भारतीय नाट्याचार्यों ने रस पर बहुत बल दिया है। पाश्चात्य मत : बहुत-से विद्वानों- विशेषतः पाश्चात्त्य तथा आधुनिक भारतीय विद्वानों-ने नाटक में निम्नलिखित छह तत्त्वों को स्वीकार किया है-कथावस्तु, पात्र, कथोपकथन, शैली, देशकाल और उद्देश्य। कुछ विद्वानों ने इनमें पात्र के स्थान पर चरित्र- चित्रण कर दिया है और देशकाल के स्थान पर कुतूहल, घात-प्रतिघात अर्थात् द्वन्द और अभिनयशीलता-ये तीन तत्त्व जोड़ दिये हैं। परन्तु इन सबको तत्त्व कहना उचित नहीं है। जब हम किसी वस्तु के किसी तत्त्व का उल्लेख करते हैं, तो हमारा अभिप्राय यह रहता है कि यदि उनमें से एक भी तत्त्व निकाल दिया जाय, तो वह वस्तु व्यर्थ हो जाय। तत्त्वों पर किसी वस्तु का अस्तित्व निर्भर करता है। तत्त्व शब्द की व्युत्पत्ति में बताया गया है- तनोति सवं इति तत्। तस्य भाव: तत्त्वम। अर्थात् सबमें व्याप्त होने के भाव को तत्त्व कहते हैं। रूपक-रचना में उपर्युक्त पाँच ही तत्त्व वर्त्तमान रहते हैं। इनमें से एक भी तत्त्व नहीं रहने पर रूपक का अस्तित्व सन्देहास्पद हो जायगा। यहाँ एक आपत्ति हो सकती है कि आजकल कुछ नाटक ऐसे लिखे जा रहे हैं, जिनमें केवल क्रिया होती है, संवाद नहीं रहते। इन मूकाभिनयों में संवाद-तत्त्व नहीं रहता। परन्तु, ये विशेष प्रकार के दृश्य- विनोद हैं, जो नाटकीय होकर भी नाटक की परिभाषा में नहीं आ सकते।

यहाँ रूपक-रचना की दृष्टि से तत्त्वों का विवेचन किया जा रहा है। रूपक में सबसे पहले कथा की ही आवश्यकता पड़ती है, जिसके आधार पर रूपक की घटनाओं तथा पात्ों की योजना की जा सके। फिर पात्र या नायक भी रूपक के आवश्यक तत्त्व हैं; क्योंकि ये ही सारे कार्य-कलाप सम्पन्न करते हैं, घटनाओं के विभिन्न व्यापार करना पात्रों पर ही निर्भर रहता है। ये ही नाटक को परिणाम तक पहुँचाते हैं। कथा या नाट्य वस्तु का विवेचन करने में हमें इस विषय की समीक्षा करनी होगी कि कौन-कौन-सी घटनाएँ नाटक के योग्य होती हैं और उन्हें किस ढंग या क्रम से रखने के फलस्वरूप रस की निष्पत्ति हो सकती है। हमें यह भी देखना होगा कि कौन-कौन-से पात्र किस समय और किस ढंग से प्रस्तुत किये जायँ, जिससे दर्शकों का अधिक-से-अधिक मनोरंजन हो और वे नाटक का रस ग्रहण कर सकें। इसी को रचना-कौशल कहा गया है। नाटक की कथावस्तु की रचना करते समय नाटककार को यह देखना आवश्यक होता है कि सम्पूर्ण रथावस्तु को कितने भागों या अंकों में रवा जाय, किती बातें।

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सूक्ष्म हों, अर्थात् कितनी बातों को रंगमंच पर नहीं दिखाकर किसी दूसरे उपाय से मात्र उनकी सूचना दी जाय, कितनी बातें श्रव्य हों और कितनी बातें रंगमंच पर आंगिक चेष्टाओं के द्वारा दिखाई जायँ या दृश्य हों। इसका अर्थ यह हुआ कि रंग-निर्देश बहुत आवश्यक है; क्योंकि रंग-निर्देश के ही द्वारा नाटककार बताता है कि जो बातें सूच्य तथा श्राव्य हों, उन्हें संवाद के द्वारा प्रकट किया जाय और जो बातें दृश्य हों, उन्हें रंगमंच पर प्रत्यक्ष आंगिक, सात्त्विक तथा आहार्य अभिनय के द्वारा दिखाया जाय। इस प्रकार, रूपक- रचना के लिए कथावस्तु तथा पात्र के अतिरिक्त दो अन्य तत्त्व सिद्ध हुए-एक संवाद और दूसरा रंग-निर्देश। भारतीय नाट्यशास्त्र के लिए रस तो आवश्यक तत्त्व है ही; क्योंकि नाटककार कथानक आदि के द्वारा दर्शक के मन में रस का उद्रेक करना अपना प्रथम कर्त्तव्य समझता है। सभी रूपकों में कोई-न-कोई रस रहना अत्यावश्यक है। नाटककार इन्हीं पाँच तत्त्वों के आधार पर नाट्य की रचना करता है। अतः, नाटक के ये ही पाँच तत्त्व हैं-कथावस्तु, पात्र, संवाद, रंग-निर्देश तथा रस।

विभिन्न देशों के नाट्याचार्यों ने रंग-निर्देश के विषय में कुछ नहीं लिखा, इसपर बल देने की तो बात ही दूर रही। परन्तु, नाटक में रंग-निर्देश बहुत आवश्यक तत्त्व है। नाटक में दो ही प्रकार से कथा का विकास दिखाया जा सकता है-एक तो संवाद के द्वारा और दूसरे, क्रियाओं के द्वारा। संवाद-तत्त्व के विषय में कहा ही गया है, परन्तु क्रियाएँ तो रंग-निर्देश के ही द्वारा सम्पन्न होंगी। यदि नाटककार रंग-निर्देश नहीं करे तो पता ही नहीं चलेगा कि किस पात्र का कब प्रवेश होता है, कब प्रस्थान होता है, वह कौन-सी क्रिया करता है, कौन-सा भाव प्रकट करता है और पात्र आपस में कैसा व्यवहार करते हैं। अतः, रंग-निर्देश नाटक के लिए बहुत आवश्यक तत्त्व है। रंग-निर्देश ही स्थान, समय और व्यापार की सूचना देता है। ऊपर कहा गया है कि कुछ आधुनिक विद्वानों ने रूपक में निम्नलिखित छह तत्त्वों को स्वीकार किया है-वस्तु, पात्र, कथोपकथन, शैली, देश-काल और उद्देश्य। किन्तु, ऐसा मानना युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता। वस्तु, पात्र और कथोपकथन या संवाद को यहाँ स्वीकार किया ही जा रहा है। शैली को अलग तत्त्व मानना ठीक नहीं; क्योंकि उसका समावेश संवाद में हो जाता है। संवाद और शैली को भिन्न तत्त्व मानना उचित नहीं लगता। देश तथा काल को पृथक् तत्त्व नहीं मानना चाहिए; क्योंकि यह कथावस्तु और पात्र दोनों में निहित है। इसका कारण यह है कि कोई घटना पात्-विशेष, देश और काल से अवश्य ही सम्बद्ध होगी और उसका विवरण कथा देगी ही। अतः, देश-काल वस्तु के ही अंग हैं और रंग-निर्देश में उनका विवरण दिया जाता है। इन्हें भिन्न तत्त्व स्वीकार करना युक्तिसंगत नहीं जान पड़ता। अब उद्देश्य की समस्या रह जाती है। उद्देश्य को तत्त्व नहीं मानने के दो तर्क दिये जा सकते हैं। पहला तक है कि उद्देश्य ही साध्य है, वह तत्त्व कैसे हो सकता है ? जो साध्य है, वह कभी तत्त्व नहीं हो सकता। दूसरा तर्क है कि

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१४० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

भारतीय आचार्यों ने नाटक का उद्देश्य रस ही माना है। कोई भी नाटककार अपनी नाट्य- कृति से दर्शक के हृदय में किसी-न-किसी विशिष्ट रस की उत्पत्ति करना ही अपने नाटक का उद्देश्य मानता है। अतः, प्राचीन भारतीय नाट्याचार्यों ने कभी उद्देश्य को तत्त्व मानकर इसका विवेचन नहीं किया। सभी ने रस को ही नाट्य का साध्य माना। भरत आदि नाट्याचार्यों ने रस को ही किसी काव्य की आत्मा स्वीकार किया है। FP भरत मुनि ने नाट्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में बताया कि नाट्य की रचना करते समय ब्रह्मा ने किस वेद से क्या लिया :

जग्राह पाठ्यमृग्वेदात्सासभ्यो गीतमेव घ। यजुर्वेदादभिनयान् रसानाथर्वणादपि ॥१ ब्रह्मा ने पाठ ऋग्वेद से, गीत सामवेद से, अभिनय यजुर्वेद से और रसों को अथर्ववेद से ग्रहण किया। इससे स्पष्ट होता है कि भरत ने नाट्य के चार तत्त्वों को स्वीकार किया- पाठ्य, गीत, अभिनय और रस। पाठ्य में कथावस्तु और संवाद का अन्तर्भाव हो जाता है, अभिनय में पात्र (अभिनेता) और रंग-निर्देश गतार्थ हो जाते हैं, रस तो स्वतन्त्र तत्त्व हैं ही। विशेष बात यह है कि भरत ने गीत को आवश्यक तत्त्व माना, जिसकी सभी परवर्ती आचार्यों ने उपेक्षा की। संस्कृत के नाट्य-साहित्य में न किसी नाट्याचार्य ने गीत को नाट्य का तत्त्व माना और न किसी नाटककार ने अपने नाटक में इसे उचित स्थान दिया। कालिदास ने मालविकाग्निमित्र में और अभिज्ञानशाकुन्तल के आरम्भ में गीत की अवतारणा की है, परन्तु किसी अन्य नाटककार ने ऐसा नहीं किया। संस्कृत-नाटकों में पद्य हैं और बहुत अधिक हैं, परन्तु गीत नहीं। आधुनिक भारतीय भाषाओं के नाट्याचार्यों ने गीत को नाटक का तत्त्व नहीं माना, यद्यपि श्रीजयशंकर प्रसाद आदि नाटककारों ने अपने नाटकों में गीतों की भरमार कर दी है। फिर अति आधुनिक हिन्दी- नाटकों में गीतों की बहुत कमी हो गई है। परन्तु, भरत के बाद किसी भारतीय नाट्याचार्य ने गीत को नाटक का तत्त्व नहीं स्वीकार किया।

अरस्तू का मत : अरस्तू के मत से प्रत्येक तासदी में ६ अंग होते हैं: १. इतिवृत्त, २. चरित्र, ३. वर्णन-शैली, ४. विचार, ५. दृश्य और ६. गीत। इनमें प्रथम दो- इतिवृत्त तथा चरित्र-अनुकरण के साधन हैं, तीसरा (वर्णन-शैली) अनुकरण का ढंग है और शेष तीन अनुकरण के आधार हैं। उनका कहना है कि तासदी में दृश्यात्मक तत्त्व भी रहते हैं तथा इतिवृत्त, चरित्र, वर्णन-शैली, गीत और विचार-ये तत्त्व भी रहते हैं। तासदी में सबसे महत्त्वपूर्ण बात घटनाओं का गुम्फन है। तासदी वस्तुतः व्यक्तियों का नहीं, बल्कि कार्य और जीवन का, सुख-दुःख का ही अनुकरण करता है। मानव के सभी सुख-दुःख कार्य का रूप धारण करते हैं। कार्य और इतिवृत्त ही तासदी के १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, का० १७

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भारतीय नट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अरस्तू के बताये तत्त्वों में एक गीत ही ऐसा तत्त्व बच जाता है, जिसे हम स्वीकार नहीं कर सकते। वह यूनानी रंगमंच की अपनी विशेषता है। भरत ने भी गीत को बहुत अधिक महत्त्व दिया, परन्तु किसी भी परवर्त्ती नाट्याचार्य ने इसे नाटक के तत्त्वों में नहीं माना। उस युग में यूनानी तासदियों का आधार ही गीत था, इसीलिए अरस्तू ने इसे तासदी के सौन्दर्यवर्द्धक तत्त्वों में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। यूनान का समस्त अभिनय उस युग में, गीतों के ही आधार पर चलता था और नाटक भी गीतमय ही था, परन्तु वह परम्परा बहुत पहले ही समाप्त हो गई। आजकल भारतीय नाटकों में आवश्यकतानुसार गीतों का प्रयोग किया जाता है, परन्तु इसे नाटक का तत्त्व नहीं स्वीकार किया जा सकता। इस प्रकार, अरस्तू द्वारा निर्दिष्ट तत्त्वों की समीक्षा करने से स्पष्ट हो जाता है कि उनके तत्त्वों को भी पाँच तत्त्वों में रख सकते हैं-१. कथावस्तु (इतिवृत्त), २. नायक या पात्र (चरित्र और विचार), ३. संवाद (वर्णन-शैली), ४. रंग-निर्देश (दृश्य) और ५. गीत। धनंजय का मत : धनंजय ने रूपक तथा उपरूपक के भेदक तत्त्वों का उल्लेख करते हुए लिखा है-वस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः'-अर्थात् इन रूपकों को एक दूसरे से भिन्न करनेवाले तीन तत्त्व हैं -- वस्तु, नेता (नायक) और रस। तात्पर्य यह कि वस्तु-भेद, नायक-भेद तथा रस-भेद की दृष्टि से ही इनमें परस्पर भेद हैं। इस कारिका के आधार पर बहुत-से विद्वानों ने वस्तु, नेता और रस को नाटक के तत्त्व मानने की भूल की है। धनंजय ने नाटक के तत्त्व के रूप में इनका उल्लेख नहीं किया, प्रत्युत यह बताया कि रूपकों और उपरूपकों के भेद के ये ही आधार हैं। रूपकों तथा उपरूपकों के विभिन्न भेदों में या तो किसी विशेष प्रकार की वस्तु है, या किसी विशेष प्रकार का नायक है, या किसी विशेष प्रकार का रस है। उदाहरण के लिए नाटक का नायक धीरोदात्त होता है, प्रकरण का नायक धीरप्रशान्त होता है, प्रकरण की कथावस्तु उत्पाद्य या कवि-कल्पित होती है, अंक में करुण रस की प्रधानता रहती है, नाटक में वीर या शृंगार रस की प्रधानता रहती है। इसलिए वस्तु, नेता और रस को नाट्य का तत्त्व मानना भ्रान्त धारणा है। इनका उद्देश्य केवल रूपकों तथा उपरूपकों के विभिन्न भेदों में पारस्परिक अन्तर बताना है। धनंजय का वास्तविक तात्पर्य नहीं समझने से ही यह भूल होती है। निष्कर्ष : निष्कर्ष-रूप में कहा जा सकता है कि जहाँ तक रूपक या नाट्य की रचना का सम्बन्ध है, इसमें पाँच तत्त्व माने जाने चाहिए। वे तत्त्व निम्नलिखित हैं : १. कथावस्तु-जिसके अन्दर घटनाओं का समावेश रहता है, २. नायक या पात्र-जो नाटकीय व्यापार को आगे बढ़ाते हैं, ३. संवाद-जिसके अन्तर्गत नाटक का श्रव्य अंश १. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, का० ११

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नाट्य-लक्षण 1१४३े आता है, ४. रंग-निर्देश-जिसके अन्तर्गत वे सब संकेत आते हैं, जो अभिनेताओं के आंगिक, सात्त्विक तथा आहार्य अभिनय के लिए और रंग-व्यवस्था, प्रकाश-व्यवस्था तथा नेपथ्य- व्यवस्था के लिए उपयोगी तथा आवश्यक होते हैं, ५. रस-जिसके अन्तर्गत वे भाव तथा रस आते हैं, जो नाटककार प्रेक्षक के हृदय में जगाना चाहता है। यूरोपीय नाट्यशास्त्रियों द्वारा निर्दिष्ट उद्देश्य का भी समावेश रस के ही अन्तर्गत हो जाता है; क्योंकि भारतीय नाट्यशास्त्रियों का उद्देश्य नाटक के द्वारा सामाजिक के मन में रस की जागृति ही है। पूर्वरंग भरत मुनि ने अपने नाट्यशास्त्र में पूर्वरंग का विस्तृत विवरण दिया है। वास्तविक नाटक आरम्भ करने के पूर्व यह पूर्वरंग अवश्य सम्पन्न हो जाना चाहिए। इसका उद्देश्य अभिनय को निर्विघ्न समाप्ति के लिए दैवी कृपा को प्राप्त करना है। पूर्वरंग की सारी क्रियाएँ उस प्राचीन नाटक की याद दिलाती हैं, जिसमें गीत, संगीत तथा नृत्य का मिश्रण रहा करता था। रंगभूमि में अभिनय के पूर्व इसका प्रयोग होता है, इसलिए इसे पूर्वरंग कहा जाता है : यस्माद्रङ्ग प्रयोगोऽयं पूर्वमेव प्रयुज्यते। तस्मादयं पूर्वरङ्गो विज्ञेयो द्विजसत्तमाः ॥' धनिक ने पूर्वरंग का लक्षण दिया है : पूर्व रज्यतेऽस्मिन्निति पूर्वरङ्गो नाट्यशाला। जिसमें सामाजिकों को पहले आनन्द मिले। इस प्रकार, पूर्वरंग का अभिप्राय नाट्यशाला से है। नाट्यशाला में नाटक आदि रूपक के आरम्भ में जो औपचारिक क्रियाएँ-मंगलाचरण, देवता-स्तवन आदि-की जाती हैं, उन्हें पूर्वरंगता कहते हैं, जिसका अर्थ हुआ पूर्वरंग का काम। शारदातनय ने भी पूर्वरंग का इससे मिलता-जुलता लक्षण दिया है : नटी नटाश्च मोदन्ते यत्रान्योन्यानुरञ्जनात्। अतो रङ्ग इति ज्ञेय: पूर्व यत्स प्रकल्प्यते। तस्मादयं पूर्वरङ्ग इति विद्वदिभरुच्यते। कलापाता: पादभागा: परिवर्त्ताश्च सूरिभि: ॥ पूर्व क्रियते यद्रङ्ग पूर्वरङ्गो भवेदतः।3 जहाँ नट-नटी आदि परस्पर एक-दूसरे का रंजन करते हुए आनन्द प्राप्त करते हैं, उसे रंग कहते हैं और जो रंग के पहले किया जाता है, उसे पूर्वरंग कहते हैं। शारदातनय ने इसके बाईस अंगों का निर्देश किया है। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ५, का० ७ कॉ २. दशरूपक, तृतीय प्रकाशन, का० २ की वृत्ति ३. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० १९४ ,अका

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१४४ भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास विश्वनाथ के अनुसार नाटक में पहले पूर्वरंग होना चाहिए, तत्पश्चात् पूजा। इसके बाद कवि और नाटक की संज्ञा आदि और इसके अनन्तर आमुख होना चाहिए। नाट्यवस्तु के पूर्वरंग नाट्यशाला के विघ्नों को दूर करने के लिए नर्त्तक लोग जो कुछ करते हैं उसे पूर्वरंग कहा जाता है : यन्नाट्यवस्तुनः पूर्व' रङ्गविघ्नोपशान्तये। कुशीलवाः प्रकुर्वन्ति पूर्वरङ्ग: स उच्यते ॥' स्पष्टतः, विश्वनाथ द्वारा दिया गया पूर्वरंग का लक्षण भरतवाला ही लक्षण है। भरत और विश्वनाथ ने नाटक का अभिनय आरम्भ होने के पूर्व अभिनय की निर्विघ्न समाप्ति के हेतु दैवी कृपा प्राप्त करने के लिए पूर्वरंग की व्यवस्था दी है। यह रंगमंच पर नर्त्तकों का प्रथम कर्त्तव्य है। जिस विस्तार से भरत ने पूर्वरंग का विवेचन किया, उस विस्तार से किसी अन्य आचार्य ने नहीं किया। पूर्वरंग के भाण्ड तथा तन्त्री-वाद्यों का संयोग और पाठ्य- योग आदि जो प्रयोग-सम्बन्धी अंग हैं, उनका सम्यक् सम्पादन किया जाना चाहिए। भरत का कथन है कि पूर्वरंग के इन सम्पूर्ण विधानों की योजना क्रमशः की जानी चाहिए। इसमें यवनिका के भीतर होनेवाले प्रत्याहार आदि तथा आसारित के प्रयोग आ जाते हैं। फिर बाहर के प्ररोचन आदि दस पाद-भागों से उपलक्षित गीतों की योजना भी है। अंगों के प्रयोंग के न्यून अथवा अधिक होने के कारण पूर्वरंग के भेद माने गये हैं। वार्त्तिक के अनुसार ६ प्रकार के रंगभेद माने गये हैं। यह प्रयोग प्रत्याहार से क्रमशः नहीं माना जाता, अपितु रंगद्वार से माना जाता है और फिर पादभागों से आरम्भ होता है। सबकी सम्भावना पूर्वरंग में होने के कारण इससे सम्बद्ध कार्यों को इसी नाम से पुकारा जाता है। यवनिका के अन्तर्गत नाट्य-प्रयोग करनेवाले अभिनेता एवं अन्य वंशीवादक आदि के द्वारा प्रत्याहार का प्रयोग होता है। पुनः, यवनिका के अपसारित होने पर गीतक तथा पिण्डीबन्ध के साथ वर्द्धमान आदि गीतों का प्रयोग किया जाता है। आगे भरत ने पूर्वरंग के निर्दिष्ट ६ अंगों का उल्लेख किया है। वे अंग हैं- १. प्रत्याहार, २. अवतरण, ३. आरम्भ, ४. आश्रावणा, ५. वक्त्रपाणि और ६. परवाहन। इस क्रम में विभिन्न वाद्यों तथा गायन-सम्बन्धी योजना के बाद पाणि-विभाग के लिए संघोटना और तन्त्री तथा भाण्ड-वाद्यों के संयोग के रूप में मार्गासारित की चर्चा की गई है। बाद में भरत ने इन सबकी विवेचना की है। तत्पश्चात् आसारित गीतों के तीन प्रकारों-ज्येष्ठ, मध्य तथा कनिष्ठ का प्रयोग स्वीकार किया गया है। उपर्युक्त सभी प्रयोग यवनिका के भीतर सम्पादित किये जाते हैं। आगे भरत ने धवनिका के बाहर किये जानेवाले प्रयोगों का विवेचन किया है। उत्थापन यवनिका के बाहर १. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० २२०९ शक्ती फकMडजर

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का पहला प्रयोग है। नान्दी-पाठ करनेवाले इसी से रंग में पहले अभिनय का उत्थापन या प्रारम्भ करते हैं, इसलिए कुछ लोग उत्थापन को अभिनय का प्रारम्भ मानते हैं। अभिनव के अनुसार यवनिका के हटाये जाने के साथ उत्थापन-अंग के बीच में एक कल का पाठ- सहित प्रयोग माना गया है, इसीलिए इसका नाम भी उत्थापन कहा गया है। नाट्यकर्त्ता, सूत्रधार आदि चारों दिशाओं में घूम-घूमकर लोकपालों की वन्दना करते हैं, इसलिए इस प्रयोग को परिवर्त्तन कहते हैं। यह प्रयोग अपने अर्थ से बहुत अंशों में सम्बद्ध है। उत्थापन- विधि के बाद ही इस प्रयोग को माना गया है।

नान्दी : देवता, ब्राह्मण तथा राजा आदि के आशीर्वचनों से युक्त प्रयोग है। इस प्रयोग को अनिवार्य स्वीकार किया गया है। अभिनव के अनुसार 'नित्य' शब्द से इस भाव की व्यंजना होती है। उत्थापन आदि अन्य पाठ्यों का प्रयोग भिन्न रूपों में ही हो सकता है, परन्तु नान्दीपाठ के सम्बन्ध में ऐसा नहीं होता। शुष्कावकृष्टा प्रयोग-विधि में अवकृष्टा ध्रवा शुष्काक्षरों से संयोजित की जाती है। शुष्काक्षर से तात्पर्य उन अर्थहीन ध्वनियो से है, जिनसे ताल या मात्रा आदि की पूति की जाती है। अवकृष्टा ध्रुवा गीत का भेद मानी गई है। इस ध्रवा गीत में जर्जर-सम्बन्धी श्लोक का निर्देश प्राप्त होता है।

रंगद्वार नामक प्रयोग से वाचिक तथा आंगिक अभिनय की प्रथमतः अवतारणा होती है, इसलिए इसे रंगद्वार कहा जाता है। इसी स्थल से नाट्य-कथावस्तु के अभिनय का आरम्भ माना जाता है। जिस रूपक-विशेष का अभिनय करना इष्ट होता है, उसका आरम्भ किया जाता है। रंगद्वार में वस्तु को उत्थापित किया जाता है। अबतक के सभी प्रयोगों से भिन्न पूर्वरंग के प्रयोग में वस्तु का निश्चय होने लगता है। इसके बाद चारी और महाचारी का भेद स्पष्ट करते हुए उसके प्रयोग का निर्देश किया गया है। जिस नृत्य की गति में शृंगाररस की व्यंजना निहित हो, वह चारी है और जिसमें रौद्ररस की अभिव्यंजना हो, वह महाचारी है। स्पष्ट है कि शृंगाररस से सम्बन्ध रहने के कारण चारी कोमल नृत्य है और रौद्ररस से सम्बद्ध होने के कारण महाचारी परुष है। जिन चारियों तथा अंगहारों से शिव और पार्वती के शृंगार-प्रधान चरित्र की अभिव्यक्ति होती है, उस प्रदर्शन को चारी माना गया है। इस समय के गेय नाट्य में भगवान् शकर और भगवती उमा की शृंगारिक स्तुति की प्रधानता रहती है। इस प्रकार, शंकर के त्रिपुर- वध से सम्बद्ध रौद्ररस-प्रधान चरित्र का वर्णन जिस काव्य में किया जाय, उसका जब उद्धत अंगहारों से प्रदर्शन किया जाता है, तो उसे महाचारी कहा जाता है।

जहाँ सूत्रधार, विदूषक तथा पारिपाश्वक आपस में वार्त्तालाप करते है, उस प्रयोग- बिधि को व्रिगत नाम दिया जाता है। यह प्रयोग भी पूर्वरंग के ही अन्तगंत है। विदूषक भी एक पारिपाश्वक ही है, जो अपनी वेशभूषा के कारण विदूषक का अभिनय करने के लिए प्रस्तुत रहता है। इस वार्त्तालाप के अन्तर्गत नाट्य-वस्तु के विषय में होनेवाले विषय की सूचना मिलती है। सूत्रधार जब कारण और तर्कना द्वारा नाट्य-वस्तु के उपक्षेप

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१४६] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास (आरम्भ) से आमन्त्रित करता है, तो वह प्ररोचन नाम की विधि कही जाती है। काव्यवस्तु के उपस्थापन के साथ प्रयोजन तथा उद्देश्य से समाश्रित नाट्य-प्रयोक्ता के द्वारा अभिनेय वस्तु को देखने के लिए सामाजिकों का आमन्त्रण प्ररोचना नाम से अभिहित होता है। जो देवता जिस प्रकार सन्तुष्ट होता है और जिसके मन में जो प्रिय है, उसका उसी रूप में वर्णन किया जाता है। पूर्वरंग का यह प्रवर्त्तन आयु, धर्म तथा यश की वृद्धि करने- वाला है; क्योंकि इसमें सभी देवताओं का पूजन किया जाता है और यह सभी से प्रशंसित है। समस्त देव, दैत्य तथा दानवों की सन्तुष्टि के लिए गीत-सहित पूर्वरंगीय निर्गीत का प्रयोग किया जाता है। पूर्वरंग के प्रयोग के दो मुख्य उद्देश्य स्वीकार किये गये हैं-पहला यह है कि समस्त देवता इसकी प्रशंसा करते हैं और दूसरा यह कि इसमें देवताओं का पूजन हो जाता है। इस प्रकार, इन प्रयोगों से धर्म, आयु तथा यश-सभी की अभिवृद्धि मानी गई है। देव-पूजा का उपलक्ष्य हो जाने के कारण प्रेक्षापति तथा नाट्याचार्य का इससे कल्याण होना स्वीकार किया गया है। इस स्थल पर यह तथ्य भी दुहराया गया है कि सम्पूर्ण पूर्वरंग का विधान, चाहे संगीत हो या निर्गीत, उन सबका प्रयोग दैत्य, दानव तथा देवता के सन्तोष के लिए किया जाता है। रंगमंच पर जब उत्थापिनी ध्रवा की प्रथम आवृत्ति समाप्त हो जाय, तो दूसरी आवृत्ति में मध्य लय का प्रयोग करना चाहिए। इतने प्रयोगों के सम्पन्न हो जाने के अनन्तर नाट्य-प्रयोग करनेवाले के द्वारा सूत्रधार के प्रवेश का आयोजन करना चाहिए। यहाँ सूत्रधार को नाटक के व्यवस्थापक से भिन्न व्यक्ति माना गया है। सूत्रधार के साथ दो सहायकों का भी संकेत किया गया है। उनमें एक विदूषक तथा दूसरा पारिपाश्वक होता है। ये तीनों एक साथ अंजलि में पुष्प लेकर प्रवेश करते हैं। डॉ० मनमोहन घोष ने वस्त्रों के साथ उसके द्वारा गृहीत पुष्पों का भी रंग श्वेत माना है। विघ्नों से रक्षा के लिए तथा मंगलकामना की दृष्टि से ये तीनों अभिमन्त्रित हैं। इनका प्रवेश प्रसन्न मुद्रा में माना गया है। ये अद्भुत दृष्टि तथा चेष्टा से युक्त रहते हैं। वस्तुतः, यहाँ वैष्णव स्थान (खड़े होने की चेष्टा) का निर्देश किया गया है, परन्तु उसकी एक प्रमुख विशेषता अंग की सौष्ठव- चेष्टा के साथ उसे स्वीकार किया गया है। सौष्ठव-स्थिति एक विशेष चेष्टा है। सूत्रधार के दोनों पारिपाश्वकों में विदूषक भू गार (एक घड़ा) धारण करता है और दूसरा जर्जर। इन्हें धारण करके ही वे सूत्रधार के साथ, उसके दोनों पाश्वों में प्रवेश करते हैं और इसी स्थिति में वह रंगमंच के मध्य में पाँच डग चलता है। नाट्य के आदिदेवता ब्रह्मा के पूजन के भाव से ऐसा किया जाता है। तीन ताल की दूरी पर चरण को धीरे- धीरे रखना होता है, पुनः दोनों पाश्वों में उठाकर उठे हुए चरणों को उसके मध्य में गिराना अपेक्षित है। इस प्रकार, अपने सहयोगियों के साथ सूत्रधार पाँच डग चलकर बायें पैर से चारी का सम्पादन करता है और दाहिने पैर को विक्षेप-क्रिया से रखता है। तत्पश्चात्

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नाट्य-लक्षण

ब्रह्मा के मण्डल में पुष्पांजलि दी जानी चाहिए। रंगपीठ के मध्य भाग में ब्रह्मा प्रतिष्ठित माने जाते हैं। इसके बाद ललित हस्त-चेष्टा की प्रक्रिया से युक्त हाथों से ब्रह्मा का अभिनन्दन करके पृथ्वी-तल पर तीन बार हाथ से स्पर्श करके अभिवादन किया जाता है। इसी प्रकार की कुछ और क्रियाएँ करने के बाद भृगार धारण करनेवाले सहायक को बुलाकर शौच-करिया उचित ढंग से करनी होती है। सूत्रधार को आचमन तथा प्रोक्षण करना अपेक्षित है। शौच-करिया करने के बाद सूत्रधार जर्जर धारण कर लेता है। वैसे पहले भृ गार विदूषक के द्वारा लाया जाता है, परन्तु आचमन आदि के लिए सूत्रधार उससे ले लेता है। वह अब जर्जर भी पारिपाश्वक से ले लेता है। सूत्रधार द्वारा सम्पादित इस समय की सभी क्रियाएँ शुभ तथा मंगल के लिए हैं, उसके द्वारा जर्जर-ग्रहण विध्नों के नाश के उद्देश्य से है। तदनन्तर कई करियाएँ करने के बाद वह कुंतप की ओर पाँच पग चलता है। फिर हाथ से भूमि को तीन बार स्पर्श करके वन्दना करता है। उसके बाद परिवर्त्तिनी ध्रुवा का विधान किया गया है। इसके बाद अतिकान्त चारी की चरण-प्रक्रिया से पाँच पग चलने का विधान है, फिर दिशाओं के अनुसार देवताओं का अभिवादन करना होता है। सर्वप्रथम इन्द्र द्वारा अधिष्ठित पूर्व दिशा की ओर प्रणाम करना है। फिर क्रमशः यम द्वारा अधिष्ठित दक्षिण दिशा, वरुण द्वारा अधिष्ठित पश्चिम दिशा और धनद कुबेर द्वारा अधिष्ठित उत्तर दिशा की ओर प्रणाम करना अपेक्षित है। पुनः, सूत्रधार को पूर्व की ओर मुह करके स्त्री, पुरुष तथा नपुंसक प्रकार के चरणों के न्यास से त्िपदी करके रुद्र, ब्रह्मा तथा विष्णु का अभिवादन करना होता है। यहाँ दक्षिण चरण पुरुष, बायाँ चरण स्त्री कहा गया है और जो अधिक उठा न हो, ऐसा दाहिना चरण नपुंसक कहा गया है। पुरुष-चरण से स्थित होकर शिव की, स्त्री-चरण से विष्णु की तथा नपुंसक-चरण से स्थित होकर ब्रह्मा की वन्दना होनी चाहिए। इसके अन्त में परिवर्त्तन की क्रिया सम्पन्न होती है। फिर चतुर्थकार विधिपूर्वक फूलों को लेकर प्रवेश करता है। इसके द्वारा जर्जर, कुतप तथा सूत्रधार का सम्यक् रीति से पूजन होता है। इस पूजा के पश्चात् चतुर्थकार चला जाता है। तब अवकृष्टा ध्रुवा गायी जाती है। तत्पश्चात् सूत्रधार मध्यम स्वर में बारह अथवा आठ पदों में अलंकृत नान्दी का पाठ करता है, जिसमें अनेक देवताओं को प्रणाम करके राजा को आशीर्वाद दिया जाता है और नाट्य के प्रस्तुतकर्त्ता के प्रति शुभकामना प्रकट की जाती है। नान्दी के प्रत्येक पद के पाठ के बाद उसके दोनों पारिपाश्वक कहते हैं-'आर्य, ऐसा ही हो।' नान्दी-पाठ तक की क्रिया बहुत विस्तृत है। इस नान्दी-पाठ को नाट्यशास्त्र बहुत महत्त्व देता है। नान्दी-पाठ के पश्चात् जर्जर के यश को प्रकाशित करनेवाले शुष्कावकृष्टा ध्रुवा का प्रयोग किया जाता है। तब जिस देवता का पूजन अभीष्ट हो, उसकी स्तुति में एक श्लोक पढ़ना चाहिए, तदनन्तर राजा और ब्राह्मण के प्रति भक्तिभाव दिखानेवाला श्लोक पढ़ना

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अपेक्षित है। रंगद्वार के अन्तर्गत जिसके पाठ का विधान है, उस जर्जर श्लोक का पाठ करने के पश्चात् फिर जर्जर का यश प्रकाशित करनेवाला अन्य श्लोक पढ़ा जाता है। तदनन्तर जर्जर का नमन कर चारी का प्रयोग करने का विधान है। इस स्थिति में पारिपार्श्वकों को पीछे की ओर हट जाना होता है और यहाँ मध्यम लय से युक्त अड्डिता ध्रुवा का प्रयोग किया जाता है। इसके बाद भरत ने चारी-पाठ का विस्तृत निर्देश दिया है। अनन्तर पारिपार्श्वक के हाथ में उत्तम जर्जर को रखकर विधिवत् महाचारी का प्रयोग उसी प्रकार किया जाना अपेक्षित है। इसके बाद वह भाण्ड-यन्त्रों की ओर उन्मुख होकर चरण का निक्षेप करता है, फिर सूची चारी का सम्पादन करके निक्षेप- पूर्वक परिक्रमण करना अपेक्षित है। कुछ करियाएँ करने के बाद रौद्ररस का श्लोक पढ़ा जाता है और अन्त में तीन पग चलकर पारिपाश्वकों को बुलाना होता है। उनसे नर्कुटक ध्रुवा का गान कराया जाता है तथा भारती वृत्ति के भेद में त्रिगत का प्रयोग किया जाना उचित है। तत्पश्चात् इसके अन्तर्गत विदूषक एक पदवाली और सूत्रधार को हँसानेवाली प्रायः असम्बद्ध कथा-प्रसंगवाली बातचीत करता है। इसमें नाट्य-वस्तु की ओर अग्रसर करने- वाले प्रश्नों का प्रयोग किया जाता है। पारिपार्श्वक ठीक तरह से चर्चा करता है, विदूषक हँसी करता है और सूत्रधार नाट्य-वस्तु की स्थापना करता है। इस प्रकार, त्रिगत का प्रयोग किया जाता है। तब फल-कथन द्वारा सामाजिकों को निमन्त्रण दिये जाने की प्ररोचना-विधि का सम्पादन करना होता है। फिर, रंग की सफलता की दृष्टि से नाटक की वस्तु का निरीक्षण करना अपेक्षित है। इन सभी विधियों का सम्पादन करके सूची चारी के प्रयोग के साथ तीनों को आविद्ध चारी के अतिरिक्त चरणों की चेष्टा से बाहर निकल जाना चाहिए। इस प्रकार, चतुरश्र चमक रंगपीठ के पूर्वरंग की प्रयोग-विधि की जाती है। व्यश्र रंगपीठ में भी ऐसा ही प्रयोग होता है, इसके इतने ही अंग भी होते हैं, केवल ताल के प्रमाण का संक्षिप्त होना चतुरश्र से इसे विशेषता देता है। इस प्रकार के संक्षिप्त प्रमाण को कला, ताल तथा लय से युक्त त्यश्र रंगपीठ पर पूर्वरंग का प्रयोग किया जाता है, जिसके अन्दर उत्थापन आदि प्रयोग भी आते हैं, नृत्तवेत्ताओं को व्यश्र के पूर्वरंग में वाद्य-प्रयोग, गति-संचालन, ध्रुवा तथा ताल आदि के प्रयोगों को संक्षिप्त कर देना चाहिए। वाद्य और गीत-प्रयोग के प्रमाण के अनुपात से नृत्त के अन्तर्गत अंगाभिनय करना अपेक्षित है। इस प्रकार, विस्तीर्ण तथा संक्षिप्त दो प्रकार के पूर्वरंग का नियोजन किया गया है। यहाँ तक शुद्ध पूर्वरंग का विवरण दिया गया, आगे भरत ने चित्ररंग का वर्णन किया है। वस्तुतः, चतुरश्र तथा त्यश्र पूर्वरंगों में केवल प्रमाण का अन्तर बतलाया गया है। परन्तु, चित्ररंग उनका मिश्रिता रूप है। यहाँ उत्थापन और परिवर्तन के प्रयोग के बाद ही चतुर्थकार के द्वारा पुष्पों से अलंकृत दिये जाने की चर्चा है। आसारित