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राकपी ीर हार : नाट्य-लक्षणविRाE [१२१
सभी प्राणियों में सर्वाधिक अनुकरणशील होता है और अनुकरण के ही सहारे सबसे पहले कुछ सीखता है। किसी वस्तु का अनुकरण करने पर आनन्द की उपलब्धि भी सर्वत्र होती है।, इसका प्रमाण हमें अनुभव से मिल जाता है। इस प्रकार, अनुकरण हमारी प्रकृति की एक नैसगिक शक्ति है।
कॉमेडी (कामदी) में निम्नकोटि के पात्रों का अनुकरण रहता है, जिन्हें निकृष्ट नहीं कहकर विरूप या बेढंगा कहना अधिक उपयुक्त होगा। इसमें कुछ तुटि या कुरूपता रहती है, जो कष्टदायक या विनाशक नहीं होती।
अरस्तू ने कॉमेडी से अधिक महत्त्व तासदी को दिया है और इसे गम्भीर, पूर्ण तथा महत्त्वपूर्ण कार्य का अनुकरण माना है: "Tragedy, then, is an imitation of an action that is serious, complete and of a certain magnitude; in language embellished with such kind of artistic ornament, the several kinds being found in separate parts of the play; in the form of action, not of narra- tion; through pity and fear effecting the proper purgation of these emotions."9
फिर तासदी किसी कार्य का अनुकरण है और कार्य के लिए कुछ व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जिनमें चरित्र तथा विचार के कुछ विशिष्ट गुण अवश्य होते हैं। इन्हीं दो स्वाभाविक कारणों-विचार तथा चरित्र-से कार्य उत्पन्न होते हैं और कार्य पर ही सफलता या असफलता निर्भर करती है। अतः कथावस्तु कार्य का अनुकरण है। कथावस्तु का तात्पर्य घटनाओं की व्यवस्था है। प्रत्येक तासदी में छह तत्त्व आवश्यक होते हैं-कथावस्तु, पात्र या चरित्र, वर्णन-शैली, विचार, दृश्य और गीत।, इनमें से दो अनुकरण के माध्यम हैं, एक रीति है और तीन अनुकरण की वस्तुएँ हैं। कविता जिस संसार की सृष्टि करती है, उसके विषय में अरस्तू ने कहीं भी स्पष्ट शब्दों में नहीं कहा है कि वह मूल के सदृश होगा, किन्तु उनकी सम्पूर्ण पुस्तक से इसका आभास मिलता है। मनुष्य के कार्य और चरित्र ही वह मूल है, जिसका प्रतिफलन कविता करती है। किसी अन्य कला की विषयवस्तु का इतना विस्तार नहीं है और न कोई अन्य कला अपने मूल का इतना पूर्ण तथा सन्तोषप्रद चित्र ही उपस्थित कर सकती है। नाटक में जीवन का काव्यात्मक अनुकरण पूर्णता प्राप्त कर लेता है। किन्तु, यहीं अनुकरण का भाव स्पष्ट हो जाता है। नाटक में ही बोली का अनुकरण बोली से किया जाता है और यदि नाटक रंगमंच पर दिखाया जाता है, तो कार्य का अनुकरण कार्य से होता है। कविता के सन्दर्भ में जो अनुकरण शब्द का प्रयोग हुआ, वह सम्भवतः नाटकात्मक काव्य के लिए ही हुआ। इस प्रसंग में श्रीबूचर का कथन है : "Indeed the term imitation, as popularly applied to poetry, was probably suggested to the Greeks by 9. Aristotle's Poetics : Translated by S. H. Butcher; p. 23,
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these dramatic forms of poetry in which acting or recitation produced an impression allied to that of mimicry."9 विवेचन : कुछ विद्वान् अरस्तू द्वारा दी गई व्याख्या में उचित स्पष्टता तथा व्यापकता का अभाव पाते हैं और उनके अनुकरण-सम्बन्धी सिद्धान्त को लेकर अभी तक विद्वानों के बीच वाद-विवाद चलता है। अभी आज तक विद्वन्मण्डली इस विषय में किसी पूर्ण निश्चय पर नहीं पहुँच सकी है। अनुकरण को आधार-रूप में स्वीकार कर सिसिरो ने कहा है : 'नाटक जीवन का दर्पण और रीतियों का दर्पण है।' इस कथन में नाटक की सम्पूर्ण रूपरेखा समझने का प्रयत्न बहुत दिनों तक किया जाता रहा है। १९वीं शती के यथार्थवादियों ने इसे कला के सिद्धान्त-रूप में ग्रहण किया। उन्होंने जीवन के अनुकरण के साथ यथार्थ का सम्बन्ध स्थापित किया और कला के सम्पूर्ण क्षेत्र को सत्य के अनुकरण और उसकी पूर्णता की सीमा के अन्दर रखने की चेष्टा की। नाटक जनता के निकट है, इसलिए उसमें उनके जीवन की अनुरूपता नाटक के कलात्मक आदर्श की सीमा स्वीकृत की गई। यह सिद्धान्त बहुत दिनों तक यूरोप में नाटक के आदर्श के रूप में स्वीकृत रहा है और आज भी इसका काफी मान है। परन्तु, इसमें नाटक-विषयक एकांगी सत्य की ही चर्चा है। इसमें नाटक की अभिनयात्मकता पर ही बल दिया गया है, परन्तु रचनात्मक तथा भावात्मक पक्षों पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है। यदि इस सिद्धान्त के आधार पर नाटक की रूपरेखा पर विचार किया जाय तो इससे नाटक का पूरा रूप सामने नहीं आ सकता। एक तो इसमें दर्शकों का मनोविज्ञान समझने में भूल की गई है; दूसरे, नाटक- रचना में जिस सामंजस्य-बुद्धि की आवश्यकता अनिवार्य है, इस सिद्धान्त में उसकी उपेक्षा की गई है। नाटक के रचनात्मक पक्ष को ध्यान में रखकर जिन विद्वानों ने विचार किया है, उनमें से अधिकतर ने रंगमंच और दर्शकों की उपेक्षा की है। किन्तु, कुछ आधुनिक नाट्यशास्त्रियों ने नाटक के तीनों आयामों को कला के रूप में ही मानकर विचार किया है। नाटक के रचनात्मक, अभिनयात्मक और रसात्मक पक्षों का विवेचन करने पर ही नांटक की पूर्ण व्याख्या हो सकती है। भरत के नाट्यशास्त्र में जहाँ-कहीं नाट्य की सामान्य परिभाषा की चर्चा हुई है, वहाँ नाट्य के इन तीन आयामों की कल्पना भी दिखाई देती है। प्रथम अध्याय में ब्रह्मा दैत्यों को समझाने के प्रसंग में कहते हैं कि यह नाट्यवेद आपके तथा देवताओं के-दोनों के शुभ और अशुभ को निर्धारित करनेवाला और दोनों के ही कार्यों तथा भावनाओं के अनुकरण की अपेक्षा रखनेवाला है। इसी अवसर पर ब्रह्मा नाटक की परिभाषा कहते हैं:
- Aristotle's Theory of Poetry & Fine Arts : S.H. Butcher; p. 138.
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लक्ती सीट हकर: नाट्य-लक्षण पका [१२३
नानाभावोपसम्पन्नं नानावस्थान्तरात्मकम्। लोकवृत्तानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम्।' इस परिभाषा में एक तरफ नाट्य की वस्तु का वर्णन है : "यह विविध अवस्थाओं से युक्त, अनेक प्रकार के भावों से सम्पन्न, लोकवृत्त का अनुकरण करनेवाला नाट्य मैंने रचा है।" यहाँ वस्तु के विषय में अवस्थाएँ, जीवन की विभिन्न स्थितियाँ, भाव और वृत्त का अनुकरण जीवन के यथार्थ को प्रस्तुत करता है। परन्तु, दूसरी तरफ, इसी व्याख्या के अन्तर्गत नाट्य-रचना के प्रसंग में अवस्थानुरूप घटनाओं, लोकवृत्त के अनुकरण के रूप में अभिनय और भावसम्पन्नता को दर्शकों की रसानुभूति के अर्थ में ग्रहण कर सकते हैं। इन्द्र आदि देवताओं ने ब्रह्मा से ऐसे ही क्रीडनीयक की याचना की थी, जो दृश्य और श्रव्य दोनों हो। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि आरम्भ से ही नाट्यशास्त्र में दृश्यमानता को प्रधानता दी गई है। वास्तव में, नाट्यशास्त्र नाट्यकला के इन तीन आयामों की विवेचना प्रस्तुत करता है। निष्कर्ष : इस प्रकार हम देखते हैं कि लगभग सभी प्राचीन भारतीय नाट्याचार्यों तथा प्राचीन ग्रीक विद्वान् अरस्तू ने नाट्य का लक्षण देते समय अनुकरण की अनिवार्यता स्वीकार की है। वस्तुतः नाट्य में मानव के उन सारे क्रिया-कलाप का अनुकरण रहता है, जिनका सम्पादन वह अपने दैनिक जीवन में करता रहता है। यह तो ठीक ही है कि सम्पूर्ण क्रिया-कलाप रंगमंच पर नहीं प्रदर्शित किये जा सकते, अतः उनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण कार्य ही रंगमंच की सीमा और मर्यादा के अनुरूप चुन लिये जाते हैं और उनका ही प्रदर्शन होता है। मनुष्य की अवस्थाओं का अनुकरण ही नाट्य होता है। अतः धनंजय द्वारा दिये गये लक्षण में, संक्षेपतः, नाट्य का यथार्थ लक्षण आ जाता है। इसलिए, धनंजय का दिया हुआ : अवस्थानुकृतिर्नाट्यं रूपं दृश्यतयोच्यते। रूपकं तत्समारोपात् दशघंव रसाश्रयम् ।२ उचित तथा यथार्थ लक्षण है। इसमें धनंजय ने बहुत सूक्ष्म शैली में तीन नाटकीय आयामों का संकेत कर दिया है। जीवन की विभिन्न अवस्थाएँ ही कथावस्तु हैं, अनुकृति ही समारोप से अभिनय का मूल सिद्धान्त है और समारोप से जिस रस की अनुभूति होती है, वह प्रेक्षकों के मन में ही है। 'अवस्थानुकृतिर्नाट्यम्' किसी भी अवस्था के अनुकरण को नाट्य कहते हैं। इसका तात्पर्य यह हुआ कि संसार में जो घटनाएँ पहले हो चुकी हैं या हो रही हैं, उन्हें उसी रूप में ज्यों-का-त्यों दिखाना ही नाट्य कहा जाता है। इसमें निम्नांकित पाँच बातों का समावेश हो सकता है : १. जिस स्थान पर या जिस समय में वह घटना हुई हो, वह १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, का० ११२ २. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, का० ५
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स्थान या समय दिखाना; २. उन घटनाओं में भाग लेनेवाले व्यक्तियों या जीवों के अनुरूप वेश धारण करना; ३. उन व्यक्तियों के अनुरूप बोलना; ४. उनके समान आंगिक चेष्टाएँ करना और ५. उनके अनुरूप मानसिक भाव व्यक्त करना। भारतीय नाट्यशास्त्र में स्थान के प्रदर्शन की कोई सूचना नहीं मिलती। अन्य चार बातों के अनुकरण को पारिभाषिक शब्दावली में आहार्य, वाचिक, आंगिक तथा सात्त्विक अभिनय कहा गया है। इसका अभिप्राय हुआ कि नाटक में मुख्यतः दो कार्य होते हैं; एक तो यह है कि अतीत घटनाओं के अनुरूप लोग रूप धारण करते हैं और दूसरे, उन रूपों के अनुरूप चेष्टा या अभिनय करते हैं। अनुकरण और वास्तविकता : नाट्यशास्त्र ने विस्तृत नियम बनाया है कि किस प्रकार नाट्य मनुष्यों, देवताओं तथा दिव्यादिव्यों के कार्यों का अनुकरण कर सकता है। रंगमंच पर प्रदर्शन के कारण परवर्त्ती आचार्यों ने नाटक को दृश्य काव्य की संज्ञा दी। इस संज्ञा के द्वारा श्रव्य काव्य, आख्यायिका इत्यादि का नाट्य से अन्तर स्पष्ट हो जाता है, जो नाट्य वस्तुतः मनुष्य, देवता आदि के कार्यों का अनुकरण है। इस स्थल पर प्रश्न हो सकता है कि भारतीय नाट्यशास्त्रियों के द्वारा प्रयुक्त 'अनुकरण' शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है, क्या इस शब्द का अर्थ वास्तविकता का पूर्ण प्रस्तुतीकरण है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए भारतीय नाटकों की परम्परा की ओर ध्यान देना होगा। नाटकीय परम्परा या नाट्यधर्मी : भारतीय नाट्यशास्त्रियों ने बहुत पहले ही नाटकीय प्रदर्शन या प्रस्तुतीकरण की ओर ध्यान दिया और वास्तविकता या यथार्थता के उपयुक्त यथार्थ स्थान के विषय में छानबीन की। यह बात इस तथ्य से स्पष्ट हो जाती है कि उन्होंने इसे लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी-दो भागों में बाँट देने की बुद्धिमानी दिखाई। लोक- धर्मी प्रयोग के द्वारा नाट्यशास्त्र का तात्पर्य नर और नारी के स्वाभाविक व्यवहार तथा अन्य स्वाभाविक व्यवहार का रंगमंच पर प्रस्तुतीकरण है।' किन्तु, विभिन्न पात्रों के नृत्य, गीत, मुद्रा आदि की विभिन्न परम्पराओं के विस्तृत वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीनकाल से ही भारतीय रंगमंच ने कुछ अंश में कृत्रिमता को भी स्थान दिया था, तभी सच्ची कला उत्कर्ष प्राप्त कर सकती है। इस परम्परागत प्रयोग का एक बहुत स्पष्ट तथा प्रसिद्ध उदाहरण रंगमंच पर का स्वगत भाषण है। अति यथार्थवादी इसे अस्वाभाविक बताकर दोषपूर्ण कह सकते हैं और दोषारोपण को अनुचित भी नहीं कहा जा सकता। परन्तु, यदि नाट्य की रचना और रंगमंच पर उसके प्रदर्शन पर अधिक गम्भीरता से विचार किया जाय, तो हम देखेंगे कि यदि दर्शक बहुत कठोरता से वास्तविकता की माँग करेगा, तो कोई भी महत्त्वपूर्ण नाटकीय प्रदर्शन सम्भव नहीं हो सकता। प्राचीन भारतीय नाटकों के आलोचकों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए और नाटक के प्रस्तुतीकरण की विभिन्न परम्पराओं को ध्यान से नहीं हटाना चाहिए, १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १४, का० ६२-७६; अध्याय २३, का० १८७-पर
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तभी वे कालिदास, भास, शूद्रक, विशाखदत्त जैसे नाटककारों की कृतियों का वास्तविक मूल्यांकन कर सकेंगे। वृत्तियाँ धनंजय ने वृत्तियों को नाटक के व्यापार के अनुकूल बताया है, इसीलिए उन्होंने नायक का वर्णन करने के तुरन्त ही बाद वृत्तियों का भी विवेचन किया है। वस्तुतः वृत्ति का अभिप्राय नायक का वह व्यवहार अथवा स्वभाव है, जो किसी विशेष दिशा में प्रवृत्त करता है। कविराज विश्वनाथ ने भी नायक-नायिका आदि के व्यापार-विशेष को ही नाटकीय वृत्ति कहा है। T डॉ० श्यामसुन्दर दास ने 'रूपक-रहस्य' में वृत्ति के विषय में निम्नलिखित शब्द लिखे हैं: "वृत्ति' शब्द का साधारण अर्थ है बरताव, काम अथवा ढंग। नाट्यशास्त्र में नायक-नायिका आदि के विशेष प्रकार के बरताव अथवा ढंग को वृत्ति कहते हैं। प्रवृत्ति, वृत्ति तथा रीति-ये तीन साहित्य-विद्या के अंग माने गये हैं।" आगे उन्होंने राजशेखर की काव्य- मीमांसा का उद्धरण देकर प्रवृत्ति, वृत्ति तथा रीति में अन्तर बताया है। विशेष प्रकार की वेष-रचना को प्रवृत्ति, विलास-प्रदर्शन को वृत्ति और वचन-चातुरी को रीति कहते हैं। साहित्यदर्पण के टीकाकार तर्कवागीशजी ने वृत्ति का व्युत्पत्तिजन्य अर्थ बताया है : 'वर्त्तते रसोऽनयेति वृत्तिः' : जिसके कारण रस वर्त्तमान हो, अर्थात् जो रसास्वादन का प्रधान कारण है, वह वृत्ति है। डॉ० श्यामसुन्दर दास के निम्नलिखित शब्दों में वृत्ति का लक्षण दिया जा सकता है : "नाट्य में यथार्थता और उसके द्वारा सजीवता लाने का प्रयत्न करते हुए नट और नटी सभी पात्रों के वाचिक, आंगिक, आहार्य और सात्त्विक-चारों प्रकार के अभिनय की ओर प्रसंगानुकूल दृश्यों के प्रदर्शन की उस विशेषता को वृत्ति कहते हैं, जो नाटकीय रस की अनुभूति में मुख्य सहायक हो।"२ भरत मुनि ने वृत्तियों को नाट्य की माताएँ कहा है : एवमेता बुधेर्ज्ञैया वृत्तयो नाट्यमातरः । इन वृत्तियों की संख्या चार मानी गई है-भारती, कैशिकी, सात्त्वती तथा आरभटी। इन्हीं वृत्तियों के आधार पर विभिन्न प्रकार के नाटकों की रचना होती है। कुछ नाटकों में हमें गीत, नृत्य तथा शृंगारी चेष्टाओं का बाहुल्य मिलता है। कुछ नाटकों में हम लड़ाई, झगड़ा, युद्ध, मार-काट, इन्द्रजाल आदि का प्रयोग पाते हैं। कुछ में संवाद की ही प्रधानता पाते हैं। किसी में नायक के उदात्त गुण ही विस्तार से दिखाये जाते हैं। हमारे प्राचीन नाट्याचार्यों ने इन्हीं के आधार पर नाटकों के भेद १. रूपक-रहस्य, पाँचवाँ अध्याय, पृ० १२९ २. वही, पृ० १३०
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१२६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास निर्धारित किये हैं। परन्तु, विदेशी नाटकों का अध्ययन करने से पता चलता है कि कई अन्य शैलियों में भी नाटक की रचना हो सकती है। यूनान में तासदी और कॉमेडी नामों से जो दो भेद लिखे जाने लगे, वे वस्तुतः दो वृत्तियों के आधार पर ही लिखे गये। यूरोप के रहस्यवादी नाटक या नीतिवादी नाटक भी वस्तुतः नाट्य-वृत्तियाँ ही हैं। इन्हीं वृत्ति-भेदों के आधार पर सभी देशों में विभिन्न प्रकार के भेद-उपभेदों के साथ अनेक नाटकों की रचना हुई। मूलतः ये वृत्तियाँ विभिन्न जातियों से ली गई जान पड़ती हैं। भारती भरतों की वृत्ति मानी गई है। भरत लोगों का व्यवसाय नाटक खेलना था। सात्त्वत जाति तो प्रसिद्ध ही है। भाव-प्रवणता एवं भक्ति-भावना में इस जाति का कई स्थलों पर उल्लेख मिलता है। ऐसा भी कहा जाता है कि भागवत-सम्प्रदाय इन्हीं की देन है। केशिक जाति सम्भवतः कास्पियन-तट की जाति है। आरभट शायद ग्रीक लेखकों द्वारा उल्लिखित आर्विटस जाति है। यह जाति सिन्धु-घाटी में रहती थी। उपर्युक्त चार वृत्तियों में से भारती शब्द-वृत्ति तथा शेष तीन अर्थ-वृत्तियाँ मानी गई हैं। भारती को शब्द-वृत्ति कहने का कारण यह है कि इसमें वाचिक अभिनय की ही अधिकता रहती है; इसकी योजना करने के लिए किसी विशेष दृश्य की अवतारणा आवश्यक नहीं होती। अन्य तीन वृत्तियों में नृत्य, गीत, वाद्य तथा रसों के अनुरूप भावों तथा दृश्यों का प्रदर्शन होता है। भारती वृत्ति की उत्पत्ति ऋग्वेद से, सात्त्वती की यजुर्वेद से, कैशिकी की सामवेद से तथा आरभटी की अथर्ववेद से मानी गई है। ऋग्वेद के कई सूक्तों में ऐसे संलाप के प्रसंग पाये जाते हैं, जिनमें नाटक के बीज निहित हैं। इससे सिद्ध होता है कि वाचिक अभिनय-बहुल भारती वृत्ति की उत्पत्ति ऋग्वेद से हुई। इसी प्रकार सत्त्व, शौर्य, दया आदि भावों से सम्बन्ध रखनेवाली सात्त्वती वृत्ति यज्ञ के मन्त्रों से पूर्ण यजुर्वेद से सम्बन्ध रखती है। नृत्य, गीत-बहुल कैशिकी वृत्ति का सम्बन्ध संगीतमय सामवेद से और बन्ध, वध, संग्राम, करोध, इन्द्रजाल, माया आदि उद्धत तथा भीषण भावों से युक्त आरभटी वृत्ति का सम्बन्ध मारण, मोहन, उच्चाटन आदि आभिचारिक क्रियाओं के वर्णन से भरे अथर्ववेद से मानना उचित ही लगता है। अब इन वृत्तियों का परिचय दिया जा रहा है। १. भारती वृत्ति : भरत मुनि ने भारती वृत्ति का लक्षण दिया है : या वाकप्रधाना पुरुषप्रयोज्या स्त्रीवर्जिता संस्कृतपाठ्ययुक्ता। स्वनामधेयैर्भरते प्रयोज्या सा भारती नाम भवेत्तु वृत्ति: ॥' स्त्रियाँ इस भारती वृत्ति का प्रयोग नहीं कर सकती; पुरुष भी केवल संस्कृत का ही प्रयोग कर सकते हैं। नट भरत कहे जाते हैं और उनके द्वारा प्रयुक्त होने के कारण इसे भारती वृत्ति कहते हैं। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २०, का० २५
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धनंजय ने भारती वृत्ति का लक्षण निम्नांकित शब्दों में में दिया है : भारती संस्कृतप्रायो वाग्व्यापारो नटाश्रयः ।' नट के द्वारा प्रयुक्त संस्कृत-भाषावाला वागव्यापार भारती वृत्ति कहलाता है। विश्वनाथ ने धनंजय का ही वाक्य रखा, परन्तु 'नटाश्रयः' के स्थान पर 'नराश्रयः' कर दिया है : भारती संस्कृतप्रायो वाग्व्यापारो नराश्रयः ।२ -अर्थात् संस्कृत-बहुल वाग्व्यापार जो नर के ही आश्रित हो, नारी के नहीं, उसे भारती वृत्ति कहते हैं। जान पड़ता है कि भरत के 'पुरुषप्रयोज्या स्त्रीवजिता' के प्रभाव के कारण उन्होंने धनंजय के 'नटाश्रयः' में यह परिवर्तन कर दिया है। दशरूपक और साहित्यदर्पण में दिये गये लक्षणों में नटाश्रय और नराश्रय में जो अन्तर हुआ है, उसके कारण का एक अन्य अनुमान किया जा सकता है। जान पड़ता है कि नट लोग आरम्भ में दर्शकों को प्रसन्न करने तथा उनका मन नाटक की ओर आकृष्ट करने के लिए मुख्य वस्तु के पहले ही इसका प्रयोग करते थे। कुछ दिनों के बाद नाटक के अन्य अंशों में भी इसके प्रयोग का विधान किया जाने लगा, जिसके फलस्वरूप 'नटाश्रय' के स्थान पर 'नराश्रय' हो गया। शारदातनय ने पहले धनंजय की पंक्ति3 और फिर भरत की भी कारिका४े उद्धृत कर दी है। उपर्युक्त लक्षणों को देखने से स्पष्ट हो जाता है कि भारती वृत्ति उस रूपक-रचना की शैली अथवा भाषा-प्रयोग की विशेषता को कहते हैं, जिसका प्रयोग भरत या नट करते हैं-नटियाँ नहीं-और जिसमें संस्कृत-वाक्यों का बाहुल्य रहता है।
भारती वृत्ति के चार भेद बताये गये हैं-प्ररोचना, वीथी, प्रहसन तथा आमुख। प्रस्तुत विषय की प्रशंसा करके दर्शकों की उत्कण्ठा बढ़ाने के कार्य को प्ररोचना कहते हैं और पारस्परिक वार्त्तालाप के द्वारा मुख्य नाटकीय वस्तु को आरम्भ करने के कार्य को आमुख कहते हैं। वास्तव में, प्ररोचना और आमुख नाटक की प्रस्तावना से सम्बन्ध रखते हैं और इनका विवेचन प्रस्तावना के प्रसंग में अन्यत्न किया गया है। वीथी तथा प्रहसन रूपक के भेद-मात्र हैं। परन्तु, आचार्यों ने यह स्पष्ट रूप से नहीं बताया कि भारती वृत्ति का सम्बन्ध वीथी और प्रहसन से किस प्रकार का है। नाट्याचार्यों ने स्वीकार किया है कि वीथी के १३ अंग नाटक के किसी भाग, विशेषतः प्रथम सन्धि, में उपयुक्त होते हैं। इनका सम्बन्ध पूर्वरंग से उतना नहीं है जितना स्वयं रूपक के कथानक से है।
१. दशरूपक, तृतीय प्रकाश, का० ५ २. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० २९ ३. भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृo २८, पं० १६ ४. वही, पृ० २८, पं० १७-१८
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१२८] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अनुमान है कि आरम्भ में प्रहसन और वीथी प्रस्तावना के मात्र अंग थे। हास्य रस की बातें कहकर या शृंगार रस से युक्त और उक्ति-प्रत्युक्तिपूर्ण किसी कल्पित पात्र के आश्रय से प्रेक्षकों का मनोरंजन किया जाता था। जान पड़ता है कि प्रस्तावना के समय अनेक उपायों से दर्शकों का मन नाटक की ओर आकर्षित या उन्मुख करना नटों का विशेष कर्त्तव्य समझा जाता था। आगे चलकर प्रहसन और वीथी ने स्वतन्त्र रूप धारण कर लिया और वे रूपक के भेद माने जाने लगे। यह भी अनुमान लगाया जाता है कि आमुख तथा प्ररोचना नाटक के प्रति आकर्षित करने के लिए प्रयुक्त होते थे और वीथी तथा प्रहसन मध्य या अन्त में दर्शकों की रुचि को सजीव रखने के लिए काम में लाये जाते थे। भारती वृत्ति में स्त्रियों का पात्रत्व वर्जित है। इसके दो कारण जान पड़ते हैं- पहला तो यह कि भारती वृत्ति संस्कृत-प्रधान होती है और भारतीय नाट्यशास्त्र में स्त्रियों को प्राकृत में ही बोलने का आदेश है; दूसरा कारण यह है कि इसमें हँसी-मजाक या मसखरेपन की बात होती है, परन्तु स्त्रियों के साथ बढ़-बढ़कर मजाक करना हिन्दू-समाज की शिष्टता के विरुद्ध है। धनंजय ने तीन वृत्तियों को सची या क्रिया-वृत्ति माना है, भारती वृत्ति को नहीं। नाटकीय व्यापार से भारती वृत्ति का कोई सम्बन्ध नहीं है, यह मात्र वाचिक वृत्ति है। २. कैशिकी वृत्ति : विश्वनाथ ने कैशिकी वृत्ति का वही लक्षण दिया है, जो भरत ने दिया है। दोनों के शब्दों में थोड़ा ही अन्तर है। भरत : या श्लक्ष्णनेपथ्यविशेषचित्रा स्त्रीसंयुता या बहुनृत्तगीता। कामोपभोगप्रभवोपचारा तां कैशिकीं वृत्तिमुदाहरन्ति ॥' और विश्वनाथ द्वारा दिया लक्षण है : या श्लक्ष्णनेपथ्यविशेषचित्रा स्त्रीसंकुला पुष्कलनूत्तगीता। कामोपभोगप्रभवोपचारा सा कैशिकी चारुविलासयुक्ता ॥२ -अर्थात् जो मनोरंजन नेपथ्य-नायकादि की वेष-रचना-से विशेष चमत्कारिणी हो, स्त्रीगण से व्याप्त और नृत्य-गीत से परिपूर्ण हो तथा जिसका उपचार काम-सुख-भोग को उत्पन्न करनेवाला हो, अर्थात् जिसके अंगों से शृंगार रस की अभिव्यक्ति होती हो, वह रमणीय विलासों से युक्त वृत्ति कैशिकी कही जाती है। धनंजय के भी अनुसार कैशिकी वृत्ति में नृत्य, गीत, विलास, काम-कीड़ा आदि से युक्त कोमल एवं शृंगारी व्यापार होते हैं, जिनका फल काम (पुरुषार्थ) है। कैशिकी वृत्ति में पुरुष-स्त्री दोनों प्रकार के पात्र काम करते हैं और इसमें प्रेम, साहस और आमोद-प्रमोद का वर्णन रहता है। कैशिकी वृत्ति के निम्नलिखित चार अंग माने गये हैं : १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २०, का० ४६ २. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० १२४
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(क) नर्म : प्रिय (नायक या नायिका) के चित्त को प्रसन्न करनेवाला विलासपूर्ण व्यापार नर्म कहा जाता है। वस्तुतः, नर्म संज्ञा उस परिहास को दी जाती है, जो प्रिय जन के चित्त को प्रसन्न करनेवाला, सभ्यतापूर्ण अथवा अग्राम्य व्यवहार होता है। नम का प्रमुख तत्त्व हास्य है, इसलिए यह हास्य तीनों रूपों में पाया जाता है-कभी केवल रूप में, कभी शृंगार से युक्त होकर और कभी भय से युक्त होकर। इस प्रकार नर्म के तीन भेद होते हैं : १. हास्य से युक्त नर्म, २. शृंगार से युक्त नर्म तथा ३. भय से युक्त नर्म।
इनमें शृंगारयुक्त नर्म तीन प्रकार का होता है-१. आत्मोपक्षेपपरक या स्वानुराग- निवेदन-जहाँ नायक या नायिका स्वयं अपना प्रेम प्रकट करते हैं; २. सम्भोगपरक या सम्भोगेच्छा-प्रकाशन-जहाँ सम्भोग की इच्छा प्रकट की जाती है; ३. मानपरक-जहाँ प्रिय जब अनिष्ट करता है, तो नायिका मान करती है। भययुक्त नर्म भी दो प्रकार का होता है : १. शुद्ध और २. अंग या रसान्तरांग (किसी दूसरे रस का अंगभूत होकर)। इस प्रकार हास्य से युक्त या शुद्ध नर्म का एक भेद, शृंगार से युक्त नर्म के तीन भेद और भययुक्त नर्म के दो भेद मिलकर कुल छह भेद हुए। नर्म को प्रकाशित करनेवाले साधन तीन हैं : १. वाणी, २. वेशभूषा तथा ३. चेष्टा । इस प्रकार, इनके आधार पर नर्म के भेद ३४६= १८ हो जाते हैं। दशरूपक आदि ग्रन्थों में सबके उपयुक्त उदाहरण दिये गये हैं।
निम्न कोष्ठक से नर्म के सभी भेद स्पष्ट हो जाते हैं। नर्म
हास्ययुक्त शृंगारयुक्त भययुक्त.FFE
वाणी-प्रकाश्य वेश-प्रकाश्य चेष्टा-प्रकाश्य शुद्ध अंग
भाव्योपक्षेपपरक सम्भोगपरक मानपरक
वाणी-प्र० वेश-प्र० चेष्टा-प्र०
वाणी-प्र० वेश-प्र० चेष्टा-प्र०
वाणी-प्र० वेश-प्र० चेष्टा-प्र० वाणी-प्र० वेश-प्र० चेष्टा-प्र०
वाणी-प्र० वेश-प्र० चेष्टा-प्र०
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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास
(ख) नर्म स्फिज : नर्म स्फिज उसे कहा जाता है, जहाँ नायक और नायिक को प्रथम समागम के समय पहले तो सुख प्राप्त होता है, परन्तु कुछ देर बाद भय होता है कि कहीं कोई-पिता आदि या देवी आदि-उसके भेद न पा जायँ। विश्वनाथ ने इसका नाम 'नर्म स्फूज' दिया है। (ग) नर्मस्फोट : नर्मस्फोट वह है, जहाँ सात्त्विक आदि भावों के लेशमात्र से रस की सूचना कर दी जाय। (घ) नर्म गर्भ उसे कहते हैं, जहाँ किसी प्रयोजन के लिए नायक प्रच्छन्न रूप से- छिपकर-प्रवेश करें। कैशिकी वृत्ति के ये अंग हास्ययुक्त तथा हास्य-रहित-दोनों ढंग के हो सकते हैं। धनंजय आदि आचार्यों ने सभी के उपयुक्त उदाहरण रत्नावली, मालतीमाधव आदि नाटकों से दिये हैं। ३. सात्त्वती वृत्ति : जहाँ नायक का व्यापार शोकहीन होता है और उसमें सत्त्व, शौर्य, त्याग, हर्ष, दया, कोमलता, आत्मत्याग, साहस आदि भावों की स्थिति होती है, वह सात्त्वती वृत्ति है। विश्वनाथ सात्त्वती वृत्ति में इन गुणों के अतिरिक्त यत्किचित् शृंगार और अद्भुत रसों की प्रधानता भी मानते हैं। सात्त्वती वृत्ति के विषय में भरत, धनंजय, विश्वनाथ आदि आचार्यों में कोई विशेष मतभेद नहीं है। तीनों आचार्यों के द्वारा दिये लक्षणों पर ध्यान देने से यह स्पष्ट हो जायगा। भरत ने निम्नांकित लक्षण दिया है : या सात्त्वतेनेह गुणेन युक्ता न्यायेन वृत्तेन समन्विता च। हर्षोत्कटा संहृतशोकभावा सा सात्त्वती नाम भवेत्तु वृत्ति: ।१ धनंजय ने लिखा : विशोका सात्वती सत्त्वशौर्यत्यागदयार्जवैः।२ विश्वनाथ का दिया लक्षण : सात्त्वतीबहुला सत्त्वशौर्यत्यागदयार्जवैः। सहर्षा क्षुद्रशृङ्गारा विशोका साद्भुता तथा॥3 इस वृत्ति के चार अंग होते हैं। ये अंग सभी आचार्य स्वीकार करते हैं। (क) संलाप अथवा संलापक : जहाँ पात्रों में परस्पर विभिन्न भाव तथा रसयुक्त गम्भीर उक्ति पाई जाती है, वहाँ सात्वती वृत्ति का संलाप या संलापक अंग होता है। (ख) उत्थापक : सात्त्वती वृत्ति का उत्थापक नामक अंग वहाँ होता है, जहाँ एक पात्र दूसरे पात्र को युद्ध के लिए उत्थापित या उत्तेजित करे। दूसरे शब्दों में, शत्रु को उत्तेजना देनेवाली वाणी को 'उत्थापक' कहते हैं। १. नाट्यशास्त्र, अध्याय २०, का० ३७ 81-१ २. दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, का० ५३ ३. साहित्यदर्पण, षषठ परिच्छेद, का० १२८-२९
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नाट्य-लक्षण
(ग) साघात्य : जहाँ शत्रु या प्रतिनायक के संघ का भेदन मन्त्रशक्ति, अर्थशक्ति, देव-शक्ति आदि की सहायता से किया जाय, वहाँ सात्त्वती वृत्ति का सांघात्य नामक अंग होता है। सांघात्य में देखा जाता है कि नायक या नाटक के साथी कुछ शक्तियों के सहारे प्रतिनायक के सहयोगियों को फोड़कर उसकी शक्ति क्षीण कर देते हैं। जहाँ नायक मन्त्रणा या बुद्धि-बल के सहारे प्रतिनायक के साथियों को फोड़ ले, वह भेदन मन्त्रशक्ति के द्वारा होता है। अर्थ या द्रव्यादि के आधार पर जहाँ फोड़ा जाता है, उसे अर्थशक्ति के आधार पर भेदन कहा जाता है। कहीं-कहीं देव-शक्ति के आधार पर भेदन होता है। (घ) परिवर्त्तक : सात्त्वती वृत्ति का परिवर्त्तक नामक अंग वहाँ होता है, जहाँ आरम्भ किये हुए किसी एक कार्य को छोड़कर दूसरा ही कार्य किया जाय। धनंजय ने सात्त्वती वृत्ति के सभी अंगों के उपयुक्त उदाहरण 'महावीरचरित' और 'मुद्राराक्षस' नाटकों से दिये हैं। ४. आरभटी वृत्ति : आरभटी वृत्ति में माया, इन्द्रजाल, संग्राम, करोध, उद्भ्रान्त चेष्टाएँ, वध तथा बन्धनादि पाये जाते हैं। यह उद्धत वृत्ति है। इसका लक्षण सभी आचार्यों ने प्रायः समान शब्दों में दिया है। भरत मुनि ने निम्नांकित लक्षण दिया है : प्रस्तावपातप्लुतलङिघतानि चान्यानि मायाकृतमिन्द्रजालम्। चित्राणि युक्तानि च यत्र नित्यं तां तादृशामारभटीं वदन्ति ।' इसी से मिलते-जुलते शब्द धनंजय के भी हैं : ....... आरभटी पुनः ।
विश्वनाथ ने लगभग इन्हीं शब्दों में आरभटी वृत्ति का लक्षण दिया है : मायेन्द्रजालसडग्राम क्रोधोद्भ्रान्तादिचेष्टितैः । संयुक्ता वधबन्धादयरुद्वतारभटी मता ॥3 धनिक ने अपनी वृत्ति में माया और इन्द्रजाल का पारस्परिक अन्तर स्पष्ट किया है। माया में अवास्तविक वस्तु को मन्त्रबल से प्रकाशित किया जाता है, परन्तु यही कार्य जब तन्त्नबल से किया जाता है तो 'इन्द्रजाल' कहा जाता है। आरभटी वृत्ति के भी चार अंग होते हैं, जिनका विवरण दिया जा रहा है : (क) संक्षिप्तिका : संक्षिप्तिका में नाटककार शिल्प के प्रयोग से संक्षिप्त वस्तु का निर्माण करता है। मिट्टी, बाँस, चमड़े, पत्ते आदि से किसी भवन या किसी अन्य वस्तु का
१. नाठ्यशास्त्र, अध्याय २०, का० ५६ २. दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, का० ५६ की ३. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, का० १३२-३३
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निर्माण 'संक्षिप्तिका' कहा जाता है। कुछ लोगों का मत है कि जहाँ पहला नायक निवृत्त हो जाय और दूसरा नायक आवे, या नायक की एक अवस्था छोड़कर दूसरी अवस्था ग्रहण की जाय, वहाँ संक्षिप्तिका होती है। दोनों में से किसी भी अवस्था में केवल सहकारी नायक में परिवर्त्तन दिखाया जाता है, नहीं तो नाटक की एकता या समग्रता में बाधा पड़ेगी। (ख) सम्फेट : जहाँ दो क्रोधित पात्रों का परस्पर समाघात या एक-दूसरे का अधिक्षेप पाया जाता है, वहाँ आरभटी वृत्ति का सम्फेट नामक अंग होता है। (ग) वस्तूत्थापन : मन्त्रबल की सहायता से माया के द्वारा किसी वस्तु की उत्थापना करने को वस्तूत्थापन कहते हैं। रक (घ) अवपात : किसी भी पात्रादि के रंगमंच पर प्रवेश करने से या रंगमंच से चले जाने से दूसरे पात्रों में जो भय और भगदड़ मच जाती है, उसे 'अवपात' कहा जाता है। आचार्यों ने सभी भेदों के उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। वृत्तियों की संख्या : वृत्तियों की संख्या के विषय में आचार्यों के बीच थोड़ा मतभेद पाया जाता है। भरत के अनुसार आरम्भ में वृत्तियाँ वस्तुतः तीन ही थी-भारती, सात्त्वती तथा आरभटी। परन्तु, ब्रह्मा ने भरत को कैशिकी वृत्ति भी सम्मिलित कर लेने का आदेश दिया। तदनुसार भरत ने कैशिकी को भी वृत्तियों में सम्मिलित कर लिया। चूँकि यह वृत्ति स्त्रियों की सहायता के विना केवल पुरुषों के द्वारा भलीभाँति प्रयोग में नहीं लाई जा सकती, इसलिए ब्रह्मा ने अपने मन से अप्सराओं की सृष्टि की:क किसी कै छिड भारतीं सात्वतीं चैव वृत्तिमारभटीं तथा। समाश्रिता: प्रयोगास्तु प्रयुक्तो वं मया द्विजाः ॥ X X X अशक्या ... पुरुषः प्रयोक्तुं स्त्रीजनादृते। ततोऽसृजन् महातेजा मनसाप्सरसो विभुः ॥3 किन्तु, धनंजय ने तीन ही अर्थवृत्तियाँ मानी हैं-कैशिकी, सात्त्वती तथा आरभटी। उनका मत है कि इनके अतिरिक्त कोई चौथी अर्थवृत्ति नहीं होती। भारती वृत्ति का अर्थ- रूपरस में कहीं भी सन्निवेश नहीं होता, वह रसों में नहीं मिलती। हास्य आदि भारती- परक होते हैं, और कोई भी शब्दार्थ रस-रहित नहीं होता। इसलिए सभी काव्यार्थों का समावेश उपर्युक्त कैशिकी आदि तीन वृत्तियों में सरलतापूर्वक हो जाता है। वास्तव में, भारती वृत्ति नाटक के आमुख या प्रस्तावना का अंग है, इसलिए लक्षण में पाये जाने के कारण शब्द-वृत्ति है। अतः धनंजय ने अर्थ-वृत्तियों का विवेचन करते समय भारती वृत्ति का विवेचन नहीं किया है, प्रत्युत नाटक के लक्षण का विवेचन करते समय किया है। किन्तु, वे भारती को चौथी वृत्ति स्वीकार करते हैंीकाल.9 १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, का० ४१, ४६
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शाकले ज्ीव ह्ाहव : नाट्य-लक्षण उफिगा [ १३३
चतुर्थो भारती सापि वाच्या नाटकलक्षणे।' और, पठन्तः पञ्चमीं वृत्तिमौद्भटाः प्रतिजानते।२ -अर्थात् उद्भट के अनुयायी एक पाँचवीं अर्थवृत्ति मानते हैं। परन्तु, धनंजय इस पाँचवीं वृत्ति को स्वीकार नहीं करते। शारदातनय ने चार वृत्तियों को स्वीकार किया और उनकी उत्पत्ति चार वेदों से मानी : वृत्तिश्चतुविध्ा ऋग्यजुस्सामाथर्वसम्भवा। भारती सात्त्वती चैव कैशिक्यारभटीति च। औद्भटाः पञ्चमीमर्थवृत्ति च प्रतिजानते।3 वृत्ति के विषय में अभिनवगुप्त का दृष्टिकोण अभिनयपरक है। वाचिक, मानसिक तथा शारीरिक सामान्य व्यापारों से सम्बद्ध क्रमशः भारती, सात्त्वती तथा आरभटी वृत्तियाँ हैं। कैशिकी वृत्ति में अद्भुत लालित्य एवं आकर्षण का समावेश स्वीकार किया गया है। वास्तव में, अभिनव ने माना है कि अभिनय का सम्पूर्ण काव्य-व्यापार वृत्तियों के कारण सौन्दर्ययुक्त होता है। भारती वाणी का व्यापार है, सात्त्वती सत्त्व से सम्बन्ध रखने- वाला मनोविकार-रूप है और आरभटी का सम्बन्ध उत्साहपूर्ण एवं आलस्य-रहित शारीरिक व्यापारों से है। कैशिकी वृत्ति की जो व्याख्या दी गई है, वह मनोरंजक है। केश सिर पर रहकर शोभा में वृद्धि करते हैं, उनसे कोई विशेष कार्य सम्पन्न नहीं होता। उन्हीं के समान नाट्य में केवल शोभा में उपयोगी होने के कारण इसे कैशिकी वृत्ति कहा गया है। भरत ने शिव के नृत्य में कोमल, सुन्दर तथा सुकुमार वृत्ति को देखा था। सुकुमारता से अंगों के संचालन में इसका सम्पादन किया जाता है। आनन्दपूर्ण शरीर तथा हृदय से नृत्य करते हुए शंकर में कैशिकी वृत्ति की व्यंजना स्वीकार की गई है। शृंगार रस में तो इसका प्रयोग अनिवार्य ही है, किन्तु अन्य रसों में भी इसका प्रयोग अपेक्षित है। स्त्रियों के विना प्रयोग नहीं हो सकने के विषय में अभिनव का कथन है कि यह सामान्य लोगों के विषय में ठीक माना जाना चाहिए। शिव और विष्णु के विषय में ऐसे कहना उचित नहीं। विष्णु के केशों से कैशिकी वृत्ति की उत्पत्ति मानी गई है। नाट्य-सिद्धान्त के कई अन्य विषयों के समान वृत्तियाँ भी वेदों से उत्पन्न बताई गई हैं। भारती वृत्ति ऋग्वेद से, सात्त्वती यजुर्वेद से, कैशिकी सामवेद से और आरभटी अथर्ववेद से गृहीत मानी गई हैं : १. दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, का० ६० २. वही, का० ६१ ३. भावप्रकाशन, प्रथम अधिकार, पृ० १२
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ऋग्वेदाद् भारती वृत्तिर्यजुर्वेदातु सात्त्वती। कैशिकी सामवेदाच्च शेषा चाथर्वणातथा।१
वृत्ियों की उत्पत्ति : शारदातनय ने वृत्तियों की उत्पत्ति के विषय में दो मतों का उल्लेख किया है। उनमें एक मत व्यास का है और दूसरा भरत का। व्यास का मत- ब्रह्मा ने 'त्रिपुरदाह' नामक रूपक रचा और भरतों ने उनके सम्मुख उसका अभिनय किया। जब ब्रह्मा शिव का प्रेम, त्रिपुर का नाश, दक्ष के यज्ञ का विध्वंस आदि का अभिनय देख रहे थे, तब वे अत्यन्त प्रभावित तथा द्रवित हुए। फलस्वरूप उनके चारों मुखों से कैशिकी, सात्त्वती, आरभटी तथा भारती नामक वृत्तियाँ अकस्मात् निकल गईं। उन्हीं से शृंगारादि चार रस निकले। व्यास ने बताया है कि शृंगारादि से हास्यादि चार रसों के निकलने की बात समझी जा सकती है।
भरत ने वृत्तियों की उत्पत्ति के विषय में एक दूसरी ही कथा कही है। मधु और कैटभ नामक असुरों ने दर्पोन्माद में विष्णु को ललकारा और कठोर वचनों का प्रयोग किया। उनके कठोर गर्जन-तर्जन को सुनकर ब्रह्मा ने कुछ विचलित होकर पूछा-'क्या यह भारती वृत्ति है, जिसका आरम्भ शब्दों से हुआ है और उत्तरोत्तर बढ़ती जाती है? दोनों को मार डालिए।'
किमियं भारती वत्तिर्वाग्भिरेव प्रवर्त्तते। उत्तरोत्तरसंवृद्धां नन्विमां निधनं नय ।।
इसपर विष्णु ने उत्तर दिया, 'हाँ, मैंने अपने उद्देश्य के लिए भारती वृत्ति का ही निर्माण किया है। वक्ता की इस वृत्ति में शब्दों की ही प्रधानता रहेगी' : भाष्यतो वाक्यभूयिष्ठा भारतीयं भविष्यति।3 इसी अवसर पर विष्णु ने अत्यधिक सत्त्व से पूर्ण धनुष का टंकार किया, जिससे सात्त्वती वृत्ति उत्पन्न हुई : वल्गितैः शाडर्गधनुषस्तीवैर्दीप्तिकरैरथ। सत्त्वाधिकैरसम्भ्रान्तैः सात्त्वती तत्र निर्मिता॥४ विष्णु ने अपने केशों से कैशिकी वृत्ति को उत्पन्न किया। उन्होंने जब वैचित्य के साथ अंगहार सम्पादित करते हुए, सुकुमारता के साथ अपने केशपाश को बाँधा, तब कैशिकी की रचना हुई
१. नाटयशास्त्र, अध्याय २०, का० २४ २. वही, अध्याय २०, का० ७ ३. वही, अध्याय २०, का० ९ ४. वही, अध्याय २०, का० १२
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विचित्रैरङ्गहारस्तु दवो लीलासमुद्भवैः। बबन्ध यच्छिखापाशं केशिकी तत्र निर्मिता॥' तब विविध आवेग और संरम्भ के साथ युद्ध हुआ, जिससे आरभटी वृत्ति निकली : संरम्भावेगबहुलैर्नानाचारीसमुत्थितैः । नियुद्ध कर णैश्चितैनिर्मितारभटी ततः॥२ इस प्रकार, हमारे प्राचीन नाट्याचार्यों ने वृत्तियों को दैवी उत्पत्ति प्रदान कर दी। वृत्ति और रस : नायक के व्यापार से ही वृत्ति का सम्बन्ध माना गया है, अतः रसपरक होने के कारण यह बताना आवश्यक समझा गया कि उनका प्रयोग किन रसों में होता है। आचार्यों ने कैशिकी का प्रयोग शृंगार रस में, सात्त्वती का वीररस में और आरभटी का रौद्र तथा बीभत्स रसों में करने का विधान किया है। शब्द-वृत्ति होने के कारण भारती वृत्ति का प्रयोग सभी रसों में होता है। इस विषय में विश्वनाथ और शारदातनय ने धनंजय का ही श्लोक उद्धत किया है : शृङ्गारे कैशिकी वीरे सात्त्वत्यारभटी पुनः । रसे रौद्रे च बीभत्से वृत्तिः सर्वत्र भारती॥3 यहाँ चार ही प्रमुख रसों का उल्लेख किया गया है, किन्तु शृंगार से हास्य, वीर से अद्भुत, रौद्र से करुण तथा बीभत्स से भयानक रसों का तत्तत्प्रकरण में भाव लिया जाना चाहिए। वास्तव में, हास्यादि रस शृंगारादि रसों से निकले बताये गये हैं, अतः उनसे घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं। परन्तु, भरत का मत इन आचार्यों से थोड़ा भिन्न है। उनके अनुसार शृंगार तथा हास्य में कैशिकी; वीर, रौद्र तथा अद्भुत में सात्त्वती; भयानक, बीभत्स तथा रौद्र में आरभटी और करुण तथा अद्भुत रसों में भारती वृत्ति का प्रयोग होता है।४ वस्तुतः शृंगार रस में ही कैशिकी वृत्ति का सर्वोत्तम प्रयोग होता है। सात्त्वती वृत्ति वीर, अद्भुत तथा रौद्र रसों में सुन्दरतम रूप में प्रयुक्त होती है और कुछ अंशों में करुण तथा शृंगार में प्रयुक्त होती है। आरभटी वृत्ति रौद्र तथा भयानक में सबसे अधिक उपयुक्त होती है। भारती वृत्ति का सभी रसों में प्रयोग होता है, या भरत के मत से केवल वीर, अद्भुत तथा रौद्र रसों में ही इसका प्रयोग सुन्दर होता है।
१. नाट्यशास्त्र, अध्याय २०, का०. १३ २. वही, अध्याय २०, का० १४ ३. दशरूपक, द्वितीय प्रकाश, का० ६३; साहित्यदर्पण, परिच्छेद ६, का० १२२; भावप्रकाशन, प्रथम अधिकार, पृ० १२ ४. नाट्यशास्त्र, अध्याय २०, का० ६२-६३
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वृत्ति और रूपक-भेद : भरत विभिन्न रूपक-भेदों का विवरण देते समय बताते गये हैं कि किस रूपक में किस वृत्ति का उपयोग होता है। धनंजय का कथन है कि भारती वृत्ति क्रिया-वृत्ति नहीं है और इसीलिए इस वृत्ति के नाटकों में यह भय बना रहता है कि वाग्व्यापार या संवाद सजाने के उत्साह में नाटककार अपने नाटक की अभिनेयता ही नहीं नष्ट कर दे। इस दशा में उसका नाटक दृश्य काव्य के स्थान पर श्रव्य काव्य या पाठ्य बनकर रह जायगा। इस तरह के कई नाटकों के उदाहरण दिये जा सकते हैं। शेष वृत्तियों में कैशिकी वृत्ति के नाटक में नृत्य, गीत, विलास, शृंगार-चेष्टा आदि के अधिक व्यापार होते हैं। सात्त्वती वृत्ति के नाटक में किसी नायक के उदात्त गुणों का पूर्ण विकास प्रदर्शित किया जाता है। आरभटी वृत्ति के नाटक में मार-काट, युद्ध, कलह, इन्द्रजाल आदि से पूर्ण भयंकर रोमांचकारी घटनाएँ दिखाई जाती हैं। 茶 新 इन नाट्य-वृत्तियों के अनुसार नाटक के मुख्यतः निन्नांकित भेद किये जा सकते हैं : १. संवाद-प्रधान नाटक, २. संगीत-प्रधान नाटक, ३. व्यक्ति-प्रधान नाटक और ४. संघर्ष- प्रधान नाटक। किन्तु, उनके-अतिरिक्त भी अन्य दृष्टियों से नाटक के भेद और उपभेद किये जा सकते हैं। नाट्यशास्त्र में रूपक के विभिन्न भेदों का जो विवरण दिया गया है, उसका विश्लेषण करने पर पता चलता है कि नाटक, प्रकरण, समवकार और ईहामृग में सभी वृत्तियों का समावेश हो सकता है। किन्तु डिम, व्यायोग, प्रहसन, अंक, भाण और वीथी में इनमें से कुछ का ही प्रयोग सम्भव है। अतः वृत्तियों के चार विभाग बनाने के विषय में शंका उत्पन्न की जा सकती है। किन्तु, यद्यपि यह विभागीकरण तार्किक दृष्टि से दोषपूर्ण दिखाई दे, तथापि इससे रूपक के अभिनय के स्वरूप को समझने में सहायता मिलती है जब रूपक एक या दो वृत्तियों को स्वीकार करके किसी को प्रमुखता प्रदान करता है। इन्हीं पर बल देने में अन्तर के कारण कोई रूपक नाटक, कोई ओपेरा या बैले बन जाता है। इस दृष्टि से देखने पर नाटक, प्रकरण, समवकार और ईहामृग अपने प्रत्येक अंक में ओपेरा या बैले की विशेषताओं से युक्त दिखाई देंगे। प्रहसन जो एकांकी होता है और जिसमें भिन्न-भिन्न वेशभूषाओं तथा नृत्य का प्रयोग होता है, कुछ अंश में बैले कहा जा सकता है। डिम, वीथी, भाण, अंक तथा व्यायोग सीधे-सादे नाट्य हैं, जिनमें नृत्य या चमकीली वेशभूषा नहीं रहती। शास्त्रीय दृष्टि से वृत्तियों पर विचार करने पर पता चलेगा कि केवल नाटक, प्रकरण और नाटिका ही पूर्णांग रूपक हैं। डिम, व्यायोग, समवकार और ईहामृग में तीन ही वृत्तियों का प्रयोग होता है, अतः ये अपूर्ण हैं। भाण, प्रहसन, वीथी और अंक में तीनों का प्रयोग तो होता है, परन्तु मुख्य वृत्ति भारती ही है। अतः ये और भी विकलांग हैं। इस प्रकार स्पष्ट होता है कि इन रूपकों में तीन-नाटक, प्रकरण तथा नाटिका-उत्तम श्रेणी के हैं; चार-डिम, ईहामृग, समवकार तथा व्यायोग-मध्यम श्रेणी के हैं और शेष अवर श्रेणी के हैं।