Books / Bhartiya Natya Siddhanta Udbhava Aur Vikas Ramji Pandey (Hindi)

3. DकH TT VIE नाट्य-लक्षण [ ११७

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DकH TT VIE नाट्य-लक्षण [ ११७

नाट्य नृत्य i २. नाट्य में चारों प्रकार के-वाचिक, २. नृत्य में आंगिक अभिनय की आंगिक, सात्विक और आहार्य- बहुलता होती है। क5 अभिनय पाये जाते हैं। ३. नाट्य में कथनोपकथन आवश्यक ३. नृत्य में कथनोपकथन नहीं होता। होता है। ४. नाट्य करनेवाला नट कहलाता है। ४. नृत्य-कला-विशारद नर्त्तक कहलाता है। ५. नाट्य में देखने के अतिरिक्त सुनने ५. नृत्य में केवल देखने-भर की को भी बहुत-कुछ रहता है। वस्तु है, वहाँ सुनने को कुछ नहीं होता।

नृत्य तथा नृत्त में अन्तर : नृत्त में नृत्य के ही समान अंग-विक्षेप पाया जाता है। परन्तु, दोनों में अन्तर है। नृत्य में अनुकरण पाया जाता है, परन्तु नृत्त में नहीं। नृत्त ताल तथा लय पर आश्रित होता है-नृत्तं ताललयाश्रयम्।१ नृत्त में केवल अंग-विक्षेप पाया जाता है, उसमें अभिनय का सवथा अभाव रहता है। यह नृत्त ताल के आधार पर मात्रा का अनुसरण करता है और लय के आधार पर गति का आश्रय लेता है। नृत्त में अभिनय का अस्तित्व नहीं रहता, केवल अंग-विक्षेप रहता है, जो ताल तथा लय के नियमों के अनुसार होता है। स्थापना : धनंजय ने अवस्था के अनुकरण को ही नाट्य कहा है। दशरूपक में निम्नलिखित कारिका के द्वारा उन्होंने नाट्य का लक्षण दिया है : अवस्थानुकृतिर्नाटयं रूपं दृश्यतयोच्यते। रूपकं तत्समारोपात् दशधव रसाश्रयम्।।" -अर्थात् अवस्था के अनुकरण को ही नाटय कहते हैं। यही नाट्य रूप भी कहलाता है; वही नाट्य-रूप रूपक भी कहलाता है; क्योंकि उसमें आरोप पाया जाता है। रसों पर आश्रित यह नाट्य दस ही प्रकार का होता है। नाट्य के लक्षण में धनंजय ने अवस्था के अनुकरण पर सर्वाधिक बल दिया है। स्पष्टतः नाट्य में अनुकरण का तत्त्व सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। शारदातनय का मत : नाट्य के लक्षण के विषय में शारदातनय धनंजय और अभिनवगुप्त दोनों से प्रभावित हैं। एक ओर उन्होंने धनंजय के द्वारा दिया गया लक्षण स्वीकार करके उसे थोड़े परिवर्त्तन के साथ लिखा है और दूसरी ओर अभिनवगुप्त का दिया हुआ लक्षण दूसरे शब्दों में दिया है। १. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, कारिका ९ शम्मोर मिला रुमाकाल १. वही, कारिका ७

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

धनंजय के ही समान शारदातनय ने भी अवस्था के अनुकरण को नाट्य माना है और इसे नाट्य का सामान्य लक्षण कहा है : अवस्थानुकृतिर्नाट्यमिति सामान्यलक्षणम् ।' फिर, धनंजय के समान शारदातनय मानते हैं कि नट में राम आदि का आरोप कर दिया जाता है, इसलिए नाट्य को रूपक कहते हैं, जिस प्रकार मुख में चन्द्र का आरोप किया जाता है। प्रेक्षक इसका अभिनय रंगमंच पर देख सकते हैं, इसलिए इसे रूप भी कहते हैं। रूपक तद्भवेद्रपं दृश्यत्वात्प्रेक्षकेरिदम् ।

कि रूपकत्वं तदारोपात् कमलारोपवन्मुखे॥२ शारदातनय ने नाट्य का लक्षण देते समय अभिनवगुप्त द्वारा दिये गये लक्षण का भी सहारा लिया है। अभिनवगुप्त ने नाट्य का लक्षण बताया है-नट में राम आदि पात्र के साक्षात्कार के प्रभाव को नाट्य कहते हैं : नाट्यं नाम नटगताभिनयप्रभावसाक्षात्काराय मानकधनमानसनिश्चलाध्यवसाय इव।3 इसीसे मिलता-जुलता, किन्तु सरल लक्षण शारदातनय ने भी दिया है : रामादितादात्म्यापत्तिर्नटे या नाट्यमुच्यते।४ -अर्थात् नट में रामादि पात्ों के तादात्म्य की भावना को नाट्य कहते हैं। धनंजय के समान शारदातनय ने भी नृत्य तथा नृत्त का विवेचन किया है, परन्तु इस स्थल पर दोनों में थोड़ा अन्तर है। दोनों नृत्य को भावाश्रय मानते हैं, परन्तु जहाँ धनंजय नृत्त को ताल और लय पर आश्रित मानते हैं, वहाँ शारदातनय इसे रस पर आश्रित मानते हैं : नृत्यं भावाश्रयं नृत्तं रसाश्रयमुदाहृतम् ।५ स्पष्टतः, नाट्य के लक्षण के लिए शारदातनय धनंजय के ऋणी हैं। धनंजय के ही समान शारदातनय भी नाट्य को लोक की अनुकृति या अनुकरण मानते हैं। अतः इनके मत के अनुसार भी नाट्य में अनुकरण का तत्त्व बहुत महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक है। विश्वनाथ का मतः साहित्यदर्पणकार कविराज विश्वनाथ ने दृश्य काव्य को अभिनेय बताया है और इसी दृश्य काव्य को रूपक कहा है। रूपक कहने का कारण यह है कि इसमें नट में रामादिक अनुकार्य का स्वरूप आरोपित किया जाता है। नट राम, सीता, दुष्यन्त आदि के रूप धारण करता है और सामाजिक को उसमें आरोपात्मक ज्ञान होता है

१. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० १८० २. वही, स० अ०, पृ० १८० ३. अभिनवभारती, पृ० २६८ ४. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० १८0 ५. वही, प्ृ० १८१

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नाट्य-लक्षण [११९

कि यह राम है। अतएव, रूप का आरोप होने के कारण इस दृश्य काव्य को रूपक कहा जाता है : दृश्यं तत्राभिनेयं तद्रूपारोपातु रूपकम्।' दृश्य काव्य या रूपक में अभिनय आवश्यक तत्त्व है और विश्वनाथ ने अभिनय का लक्षण किया है : 'भवेदभिनयोऽवस्थानुकारः'। -अर्थात् अवस्था के अनुकरण को अभिनय कहते हैं। इसकी वृत्ति में उन्होंने लिखा है : 'नटैरङगादिभी रामयुधिष्ठिरादीना- मवस्थानुकरणमभिनयः' -अर्थात् अंग, वचचन आदि से राम, युधिष्ठिर आदि की अवस्था का नटों के द्वारा जो अनुकरण किया जाता है, उसे अभिनय कहा जाता है। नटों के द्वारा अवस्था का अनुकरण ही अभिनय है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि अपने पूर्ववर्त्ती नाट्यशास्त्रियों के समान कविराज विश्वनाथ ने भी दृश्य काव्य या नाट्य में अनुकरण को आवश्यक तत्त्व माना है। अनुकरण से ही अभिनय होता है और अभिनय नाट्य में अनिवार्य है, अतः नाट्य अनुकरण पर ही अवलम्बित है। आचार्य सीताराम चतुर्वेदी : आधुनिक नाट्यशास्त्रियों में आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने नाटक का लक्षण निम्नलिखित शब्दों में दिया है : "किसी प्रसिद्ध या कल्पित कथा के आधार पर नाटककार द्वारा रचित रचना के अनुसार नाट्य-प्रयोक्ता द्वारा सिखाये हुए नट जब अभिनय तथा संगीतादि के द्वारा रस उत्पन्न करके प्रेक्षकों का विनोद करते हैं, तथा उन्हें उपदेश और मनःशान्ति प्रदान करते हैं, तब उस प्रयोग को नाटक या रूपक कहते हैं।"3 भारतीय नाट्याचार्यों ने हमारे समक्ष नाटक की जो रूपरेखा उपस्थित की, वह पूर्ण है, अतः सर्वथा स्वीकार्य है। इन आचार्यों ने अनुकरण को स्वीकार किया, परन्तु ऐसे संकुचित अर्थ में नहीं, जो अपनी अभिनयात्मकता में निर्जीव हो; फिर यह मानसिक अनुकरण के रूप में मात्र एक रचना से सम्बन्धित भी नहीं हुआ। इसी प्रकार, यह भी द्रष्टव्य है कि रस-सिद्धान्त को कभी भावातिरेक के रूप में स्वीकार नहीं किया गया। परन्तु, डॉ० रघुवंश का कथन है :, "परन्तु यह सब होते हुए भी संस्कृत-आचार्यों की विवेचना आधुनिक युग की दृष्टि से हमारी परिस्थितियों को देखते हुए पूर्ण नहीं है। आज के वैज्ञानिक युग में नाटक-रचना और प्रदर्शन का रूप बिलकुल बदल चुका है, इस कारण केवल उनके आधारभूत सिद्धान्त ही हमारे प्रयोजन के हैं।"४ १. साहित्यदर्पण, षष्ठ परिच्छेद, कारिका १ २. वही, कारिका २ ३. अभिनव नाट्यशास्त्र, पृ० ४८ ४. नाट्यकला, पृ० ९

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१२० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अरस्तू का मत : प्राचीन ग्रीक आचार्य अरस्तू ने सभी कलाकृतियों को अनुकरण माना है। महाकाव्य, तासदी, कामदी (कॉमेडी), अन्य प्रकार का काव्य, वंशी तथा वीणा का संगीत आदि सभी सामान्य रूप से अनुकरणमूलक ही होते हैं। किन्तु, उनका पारस्परिक भेद तीन बातों को लेकर होता है-माध्यम, वस्तु और गीति। प्रत्येक कलाकृति में ये तीनों भिन्न-भिन्न होते हैं। इन कलाओं में अनेक के अनुकरण का माध्यम रंग, ध्वनि, गति, ताल, लय, भाषा आदि हैं। एक कला ऐसी है, जिसके अनुकरण का माध्यम भाषा है। भाषा भी गद्यमय हो सकती है या पद्यमय। कुछ कलाएँ ऐसी भी हैं, जिनमें सभी माध्यमों-लय, सुर तथा छन्द- का उपयोग किया जाता है। इन्हीं कलाओं में तासदी तथा कामदी भी हैं। कार्यशील मनुष्य ही अनुकरण की वस्तु हैं। ये मनुष्य निश्चय ही या तो उच्चतर या निम्नतर प्रकार के होंगे। फलस्वरूप कलाकार मनुष्य को वास्तविक जीवन से उत्कृष्ट या निकृष्ट या यथावत् चित्रित करेगा। यही अन्तर तासदी और कॉमेडी में देखा जा सकता है, क्योंकि कॉमेडी में मनुष्य को वास्तविक जीवन से निकृष्ट तथा तासदी में उत्कृष्ट चित्रित करने का लक्ष्य रहता है। इस विषय में अरस्तू ने कहा है : "The same distinction marks off Tragedy from Comedy; for Comedy aims at representing men as worse, Tragedy as better than in actual life."9 अरस्तू ने तीसरा अन्तर बताया है-इन वस्तुओं के अनुकरण की रीति। इसका कारण यह है कि माध्यम और वस्तु वहीं रहने पर भी कवि विवरण (Narration) के द्वारा अनुकरण कर सकता है या अपने सभी पात्रों को हमारे सामने जीते-जागते और चलते-फिरते रूप में प्रस्तुत कर सकता है। ये ही तीन तत्त्व-माध्यम, वस्तु और रीति-कलात्मक अनुकृतियों में अन्तर स्पष्ट करते हैं। अतः एक दृष्टिकोण से सोफोक्लीज होमर की ही कोटि का अनुकरणकर्त्ता है; क्योंकि दोनों ही उच्चतर प्रकार के चरित्रों का अनुकरण करते हैं। परन्तु, दूसरे दृष्टिकोण से सोफोक्लीज एरिस्टोफोनीस की कोटि का अनुकरणकर्त्ता है; क्योंकि दोनों ऐसे व्यक्तियों का अनुकरण करते हैं, जो कार्यशील होते हैं। इसलिए, कार्य का चित्रण करनेवाली कविता को कुछ लोग नाट्य कहते हैं : "Hence, some say, the name of 'drama' is given to such poems, as representing action." सामान्य रूप से कविता दो कारणों से उत्पन्न हुई जान पड़ती है। ये दोनों कारण मानव की प्रकृति में बहुत गहराई में हैं। इनमें से एक अनुकरण की नैसगिक शक्ति है और दूसरी है समस्वर (Harmony) की नैसर्गिक शक्ति। अनुकरण की नैसगिक शक्ति मानव में शैशव से ही जड़ जमाये रहती है। अन्य प्राणियों से मानव का यही अन्तर है कि यह 9. Aristotle's Poetics : Translated by S. H. Butcher; p. 13, R. Tbid,