Books / Bhartiya Natya Siddhanta Udbhava Aur Vikas Ramji Pandey (Hindi)

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अर्थ लिया जाता था, जिससे पर्दा बनाया जाता था। प्रो० सिल्वां लेवी का मत है कि शायद फारस से कोई वस्त्र यूनानी लोग यूनानी जहाजों पर लाते थे। 'यवनिका' शब्द से नाटक के पर्दे से कोई विशेष अर्थ नहीं लिया जाता था, अतः यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि नाटक का यह पदार्थ-विशेष यूनानी नाटक से लिया गया। वस्तुतः, जैसा कीथ ने कहा है, उस समय ग्रीस में रंगमंच पर पर्दे की तरह की कोई वस्तु रहती भी नहीं थी। उस समय यूनानी नाटक खुले मैदान में खेले जाते थे, उनमें पर्दा होता ही नहीं था। फिर भी विडिश का कथन है कि ग्रीक रंगमंच के पीछे जो दृश्यावली होती थी, उसे ही भारतीय रंगमंच पर पर्दे से दिखाया जाता होगा, इसीलिए उसे यवनिका कहा गया। अनेक यूरोपीय विद्वानों ने इस विचित्र तर्क की निस्सारता सिद्ध की है। फिर भी 'यवनिका' शब्द से भ्रान्त धारणा बनी है और अच्छे-अच्छे भारतीय विद्वान् भी यह तर्क देते हैं। इस प्रकार, यवनिका के लिए भारतीय नाटकों को यूनानी नाटकों का ऋणी होने का संकेत ढूँढना निष्फल प्रयास होगा। इस मत के प्रतिष्ठापक डॉ० वेवर का खण्डन डॉ० कीथ ने कर दिया है। यदि हमारे पास पर्दे के लिए पटी, तिरस्करिणी, प्रतिशिरा, यहाँ तक कि यमनिका आदि देशीय तथा उपयुक्त शब्द नहीं भी होते, तो भी इस तर्क में कोई शक्ति नहीं रहती।

संस्कृत-नाटकों में राजाओं की अंग-रक्षिकाएँ प्रायः यवनियाँ या यवन-कुमारियाँ दिखाई गई हैं और कुछ लोग इसे यूनानी नाटकों का प्रभाव मानते हैं। परन्तु यह तर्क भी निस्सार है; क्योंकि यूनानी नाटकों में राजाओं की अंग-रक्षिकाएँ कुमारियाँ नहीं मिलतीं। इससे तो केवल यही सिद्ध होता है कि तत्कालीन राजाओं को यूनानी कुमारियों के प्रति विशेष आकर्षण था। कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा मेगास्थनीज आदि के लेखों से इसका अनुमान किया जा सकता है। यूनानी व्यापारी भी सुन्दर कुमारियों का व्यापार करके बहुत अधिक लाभ उठाने के इच्छुक थे।

F F5 भारतीय तथा यूनानी नाटकों के कथानक में सादृश्य द्रष्टव्य है। नाटिका और नवसुखान्त नाटक नव कॉमेडी (New Comedy) की विषय-वस्तु में कुछ समानता दिखाई देती है। नाटिका में राजा नायिका से प्रेम करता है, मार्ग में कई बाधाएँ आती हैं और अन्त में राजा उस कुमारी से विवाह करने में सफल होता है; क्योंकि वह नायिका वास्तव में राजकुमारी रहती है और कारणवश उसका परिचय छिपाया रहता है। नव कॉमेडी के कथानक में भी लगभग ऐसी ही बात रहती है और अन्त में नायिका किसी चिह्न या अभिज्ञान के द्वारा पहचानी जाती है। निश्चय ही पहचानने के लिए कोई चिह्न भारतीय और यूनानी-दोनों ही नाटकों में समान रूप से पाया जाता है। अभिज्ञानशाकुन्तल में मुद्रिका है, विक्रमोर्वशीय में संगम-मणि है, जिसके कारण पुरूरवा लता में परिवर्तित उर्वशी को पहचान लेता है। रत्नावली में हार है, जिसके कारण नायिका पहचानी जाती है। नागानन्द में वह रतू है, जो आकाश से गिरकर राजकुमार के भाग्य के विषय में बता

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देता है। मालतीमाधव में माला है, मृच्छकटिक में मिट्टी की गाड़ी है, जिसमें आभूषण रखे गये हैं। इसी प्रकार, मुद्राराक्षस में राक्षस की मुद्रा है, जिसका उपयोग चाणक्य करता है। नव कॉमेडी के भी कुछ नाटकों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं। इन तथ्यों का उत्तर दिया जा सकता है कि संस्कृत-नाटकों के पूर्व साहित्य के अन्य अंगों में ऐसी बातें थीं और विकसित होते-होते संस्कृत-नाटकों में आई। यह स्वाभाविक विकास है। विडिश ने मृच्छकटिक के आधार पर ग्रीक-नाटकों का प्रभाव सिद्ध करने का प्रयास किया है। उन्हें इसमें बहुत प्राचीनता के चिह्न दिखाई दिये और एक ग्रीक-नाटक से निकट साम्य जान पड़ा। शीर्षक की तुलना उन्होंने Cistellaria (little cart) या Anluria (little pot) से की। इसी प्रकार उन्होंने मृच्छकटिक का पूर्ण विश्लेषण करके एक-एक अवयव की तुलना ग्रीक-नाटकों से की। परन्तु विंडिश जिस प्रकार मृच्छकटिक को प्राचीन भारतीय नाटक का प्रतिनिधि मानते हैं, वह बात नहीं है। यह भास के नाटक चारुदत्त पर आधारित है, यद्यपि चारुदत्त में राजनीतिक षड्यन्त्र के साथ प्रेम-व्यापार का मिश्रण नहीं है। मृच्छकटिक का जो शीर्षक दिया गया है, वह केवल प्राचीन नाटक से अन्तर दिखाने के उद्देश्य से है। इसी प्रकार विडिश द्वारा बताये गये तुलनात्मक तथ्यों के विषय में डॉ० कीथ ने स्पष्टतया सिद्ध कर दिया है कि उनका सम्बन्ध किसी ग्रीक-नाटक से बिल्कुल नहीं है। मृच्छकटिक में कुछ नवीनता अवश्य है। संस्कृत-नाटकों के लिए नियम बनाया गया कि एक अंक की घटना एक दिन से अधिक की नहीं होनी चाहिए। नाटकों में यथासम्भव इसका पालन भी होता रहा है। अरस्तू ने भी ऐसा ही नियम बनाया। इस बात को लेकर कुछ विद्वान् मानते हैं कि इस नियम पर अरस्तू के ही नियम का प्रभाव पड़ा है। परन्तु, इसे अधिक महत्त्व नहीं दिया जा सकता। वस्तुतः संस्कृत-नाटकों में एक दिन से लेकर एक वर्ष तक के समय की अनुमति दी गई है। वास्तविकता लाने के लिए इस नियम की नैतिक आवश्यकता प्रतीत हुई होगी, जिसके कारण किसी बाह्य प्रभाव के विना ही यह नियम बना होगा। ग्रीक-नाटकों में तीन अन्वितियों-कालान्विति, कार्यान्विति तथा स्थानान्विति का पालन होता है, परन्तु भारतीय नाटकों में इनका पालन नहीं होता। कहा जा सकता है कि संस्कृत-नाटक के लिए यह विषय अज्ञात था। नाटक के पात्रों की भी तुलना करने से संस्कृत-नाटकों पर ग्रीक-नाटकों का प्रभाव सिद्ध नहीं होता। विंडिश ने तीन पात्रों पर विशेष बल दिया है। उन्होंने विट, विदूषक और शकार की तुलना ग्रीक-नाटकों के क्रमशः Parasite, Servas Currens और Milas Gloriosus से की है। सूत्रधार और परिपाश्विक के साथ ही तीनों मिलकर पाँच पुरुष- पात्र हो जाते हैं, जिनका उल्लेख भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में किया है, और ग्रीक-नाटकों में भी इन पाँचों के समकक्ष मिल जाते हैं। यह भी सत्य है कि अभिज्ञानशाकुन्तल, चारुदत्त और मृच्छकटिक-जैसे प्राचीन नाटक में शकार आया है, परन्तु परवर्त्ती नाटकों सें

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उसका कोई उल्लेख नहीं; विट भी निर्जीव हो जाता है। इससे निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ग्रीक-नाटकों से लिये गये इन पाँचों की पीछे आवश्यकता नहीं समझी गई और ये अनायास लुप्त होते गये। परन्तु, ग्रीक-नाटकों से उधार लेनेवाली बात सिद्ध करने के लिए जो तर्क दिया गया, वह अपर्याप्त है। उदाहृत सभी पात्रों में विट ही ऐसा पात्र है, जो ग्रीक-नाटक के Parasite से सर्वाधिक मिलता-जुलता है, परन्तु Parasite विट के समान सुरुचिपूर्ण और सुसंस्कृत नहीं होता। विदूषक का उद्भव सम्भवतः धार्मिक नाटकों में हुआ, उसके उद्भव के विषय में प्रकट किये गये अन्य मत अविश्वसनीय हैं। शकार ग्रीक-नाटक के Milas Gloriosus से निश्चय ही सादृश्य रखता है, परन्तु उधार लेनेवाले तर्क का निराकरण इस तथ्य से हो जाता है कि भास और मृच्छकटिक के युग में वास्तविक भारतीय जीवन में ऐसे व्यक्ति पाये जा सकते थे। उस युग में कुछ वेतनभोगी और द्रव्य-लोलुप सैनिकों के काले कारनामों से भारतीय जनता पूर्ण परिचित रही होगी। भारतीय और ग्रीक-नाटकों की पात्र-संख्या में बिल्कुल साम्य नहीं है। केवल भास के ही नाटकों में अत्यधिक पात्र नहीं हैं, नहीं तो शकुन्तला में तीस, मृच्छकटिक में उनतीस, विक्रमोर्वशीय में अट्ठारह और मुद्राराक्षस में चौबीस पात हैं। उत्तरवर्ती नाटककार भवभूति के मालतीमाधव में तेरह और उत्तररामचरित में ग्यारह पात्र हैं। दोनों, भारतीय और ग्रीक, नाटकों की प्रस्तावना में नई बातों की जानकारी दी जाती है, जैसे नाटककार का नाम, नाटक का शीर्षक आदि; परन्तु भारतीय नाटक प्रारम्भिक बातों की ओर अधिक ध्यान देता है। भारतीय नाटंक की प्रस्तावना में सूत्रधार और उसकी पत्नी नटी के बीच वार्त्तालाप चलता है, उससे उसका स्वतन्त्र तथा निश्चित व्यक्तित्व स्पष्ट हो जाता है। अतः, यह कहना स्वथा भ्रामक है कि भारतीय नाटक प्रस्तावना को लेकर ग्रीक-नाटक का ऋणी है। विंडिश ने स्वीकार किया था कि नाट्यशाला के विषय में दोनों देशों में किसी प्रकार की तुलना सम्भव नहीं है; क्योंकि भारतीय नाट्यशाला स्थायी नहीं होती थी। ब्लौच (Bloch) ने यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि सीताबेंगा गुफा-नाट्यशाला ग्रीक- नाट्यशाला के समान है। किन्तु, यह प्रयास निष्फल सिद्ध हुआ है। सीताबेंगा की नाट्यशाला चट्टानों को काटकर बनाई गई थोड़े दर्शकों के लिए छोटी-सी नाट्यशाला है और यूनान के किसी युग की नाट्यशाला से उसकी कोई विशेष तुलना नहीं हो सकती। हपी विडिश के कुछ परवर्त्ती विद्वानों ने, जो भारतीय नाटक पर ग्रीक-प्रभाव सिद्ध करने की चेष्टा करते हैं, यह प्रमाणित करने की प्रवृत्ति दिखाई है कि स्वांग (Mime) ने भारतीय नाटक को प्रभावित किया है। इन लोगों ने विडिश द्वारा दिये गये तर्कों को नया रूप और नया बल दिया है। भारतीय नाटक के कई अवयवों की तुलना ग्रीक और रोमन स्वांगों से करके यह दिखाने का प्रयत्न किया गया है कि भारतीय नाटक वास्तव में ग्रीक-

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स्वांगों के ऋणी हैं। किन्तु अन्य पाश्चात्त्य विद्वानों ने इस स्थापना का जोरदार खण्डन किया है। वस्तुतः इस बात का हमारे पास कोई सन्तोषप्रद प्रमाण नहीं है कि बहुत प्राचीन काल में भारत में स्वांग की तरह कोई वस्तु थी या नहीं; क्योंकि स्वांग केवल नट की करामात ही नहीं, वरन् उससे बहुत बढ़कर चीज है। इस स्थापना का खण्डन करने के लिए पर्याप्त तर्क है। यह कहना असंगत है कि ग्रीक-स्वांग से ही भारतीय नाटककारों ने विभिन्न उपभाषाओं का प्रयोग सीखा। अधिक संख्या में अभिनेताओं का उपयोग दोनों देशों में स्वाभाविक है। हमारे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि ग्रीक-स्वांग में पर्दे का उपयोग होता था या नहीं, फिर वहाँ से भारतीय नाटक में पर्दा उधार लेने की चर्चा ही व्यर्थ है। अतः इन उत्तरवर्त्ती पाश्चात्त्य विद्वानों की यह स्थापना पूर्ववर्त्ती विडिश की स्थापना के ही समान महत्त्वहीन सिद्ध होती है। तासदी की उत्पत्ति ग्रीस में हुई और यह उस देश के नाटक की मुख्य विशेषता है। परन्तु भारतीय नाटकों में तासदी का सर्वथा अभाव है। इन तर्कों के आधार पर श्रीवरदाचारी ने संस्कृत-नाटक की उत्पत्ति ग्रीक-नाटक से नहीं मानी, परन्तु उसका प्रभाव मानने को तैयार हैं। उनका कथन है : "Therefore, it must be admitted that the Sanskrit drama arose and developed independently in India and that it might have been influenced by the Greeks or by some other foreigners."9 कुछ यूरोपीय पण्डितों ने केवल बाह्य साक्ष्यों पर निर्भर नहीं रहकर अन्तः- साक्ष्य या विषय-वस्तु तथा चरित्र-चित्रण की दृष्टि से भारतीय और ग्रीक-रोमन नाटकों की तुलना की है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला है कि भारतीय नाटक में जो प्रकार-विशेष (Type) की प्रधानता है, इससे प्रमाणित होता है कि वे आरम्भ में अनुकरणमूलक रहे होंगे और पीछे ग्रीक तथा रोमन-प्रभाव के कारण उन्होंने नया रूप ग्रहण किया होगा। उनका मत है कि पुराने टाइपों के रह जाने से रोमन कॉमेडियों से उनके प्रभावित होने का लक्षण है। यह सिद्ध करता है कि कुछ नया तो आ गया, परन्तु पुराना गया नहीं। डॉ० कीथ के निम्नलिखित उद्धरण से इस बात की निराधारता प्रकट हो जाती है: "The similarity of types is not at all convincing, the borrowing of the idea of using different dialects from the mime is really absurd and large number of actors is equally natural in either case ?"R अर्थात्, टाइपों की समानता बिल्कुल मानने योग्य बात नहीं है और विभिन्न बोलियों के प्रयोग के सम्बन्ध में स्वांग से उधार लेनेवाला विचार निरर्थक तर्क है तथा अधिक संख्या में अभिनेताओं का होना दोनों देशों के नाटकों में समान रूप से सम्भव है।

  1. A History of Sanskrit Literature by V. Verdachari; p. 132. २. The Sanskrit Drama, pp. 67-68.

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TRpडॉ० कीथ ने बलपूर्वक कहा है कि ग्रीक तथा रोमन कॉमेडियों में टाइप की ही प्रधानता है और संस्कृत-नाटकों में पात्र की वैयक्तिक विशेषताओं के फलस्वरूप कथानक में जो विकास हो जाता है, वह उसमें सर्वथा अप्राप्य है। छकी डॉ० कीथ ने यूरोपीय विद्वानों के इस दावे का विद्वत्तापूर्ण ढंग से खण्डन किया है कि भारतीय नाटक ग्रीक-नाटक से उत्पन्न या प्रभावित है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि भारतीय नाटक ग्रीक-नाटक से प्रभावित नहीं है। परन्तु, उन्होंने अन्त में बताया है कि कुछ छोटी-मोटी बातों में भारतीय नाटक ग्रीक-नाटक से मिलता जुलता है और यदि इसने कुछ उधार भी लिया, तो उसे पूर्णरूप से आत्मसात् भी कर लिया। वे लिखते हैं : FIFF"India has a strange genius for converting what it borrows and assimilating it, as it did in the case of the image of the Buddha which it fabricated from Greek models."9 डॉ० कीथ के मत के अतिरिक्त भी अनेक ऐसे प्रमाण हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि ग्रीक-नाटक से भारतीय नाटक प्रभावित नहीं है। इसके लिए ग्रीक-नाटक तथा रंगमंच की निम्नलिखित विशेषताओं पर ध्यान देना आवश्यक है : १. यूनानी नाटक में कोरस या समवेत गान की प्रधानता पाई जाती है। २. अभिनेताओं का क्रम एक से बढ़कर धीरे-धीरे अनेक तक पहुँचा था। ३. ग्रीक अभिनेता मुख पर मुखौटा लगाकर तथा पैर में ऊँची खड़ाऊँ बाँधकर रंगमंच पर आते थे। ४ ग्रीक-रंगशाला में पीछे भित्ति होती थी। ५. ग्रीक-रंगशाला किसी पहाड़ी की अधित्यका या उपत्यका में बनी होती थी और यह गोल, ढालुआ तथा सीढ़ीदार होती थी। ६. ग्रीक-नाटक या तो तासात्मक होते थे, जिनमें भय तथा करुणा भरी रहती थी या परिहासात्मक होते थे, जिनमें फूहड़ तथा भद्दे गीत या व्यंग्य भरे रहते थे। ७. यूनान में निश्चित उत्सव के अवसर पर ही नाटक खेले जाते थे और दो-तीन दिनों तक चलते रहते थे। उपर्युक्त सात बातों में से एक बात भी भारतीय नाटक और रंगमंच के साथ लागू नहीं होती। भरत के अनुसार, भारतीय रंगशाला तीन प्रकार की होती है-त्यस्त्र, चतुरस्र तथा विकृष्ट। परन्तु, इन तीनों में से किसी का रूप या विस्तार यूनानी रंगशाला से नहीं मिलता। एक बहुत बड़ा अन्तर यह है कि हमारे नाटकों में आठ रस हुआ करते थे, परन्तु यूनानी नाटकों में केवल तीन रस-भयानक, करुण तथा हास्य ही हुआ करते थे। क9. Sanskrit Drama, p. 68.

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भारतीय नाटकों में विभिन्न पात्रों के लिए विभिन्न भाषाओं का विधान पाया जाता है, परन्तु ग्रीक-नाटकों में ऐसी कोई बात नहीं मिलती। उन्हें अभिनेताओं के मुख पर अनेक रंग पोतने की बात तथा कला ज्ञात नहीं थी, परन्तु नाटकीय रंगों का वे पूरा उपयोग जानते और करते थे। गीत तथा नृत्य का भी विधान भारतीय शास्त्रकारों ने जिस रूप में किया है, उस रूप में ग्रीस में विधान नहीं था। हमारे नाटकों के समान ग्रीक-नाटकों में पूर्वरंग, नान्दी तथा प्रस्तावना का प्रयोग नहीं होता था। वहाँ के नाटकों में प्रोलोग (Prologue) के रूप में प्रस्तावना का जो विधान है, वह नाटकीय वस्तु की केवल भूमिका है। नाट्यशास्त्र के पंचम अध्याय में भरत ने पूर्वरंग के विषय में जो कुछ लिखा है, उससे स्पष्ट हो जाता है कि पूर्वरंग की कुछ क्रिया पर्दे के पीछे से होती थी और कुछ पर्दे के बाहर आकर होती थी। यूनानी गीत-वाद्य का कुछ अंश रंगमंच के सामनेवाले घेरे में होता था, जिसे ऑरकेस्ट्रा नाम दिया गया है। इसके विपरीत भारतीय रंगशाला में प्रदर्शन से सम्बद्ध सभी कार्य रंगमंच पर ही सम्पादित किये जाते थे। ध्यान देने की एक और बात यह है कि भारतीय रंगमंच का पर्दा बीच में से फटा रहता था, जिससे उसके दोनों पल्ले ऊपर उठाये जा सकें। यूनान और रोम की नाट्यशालाओं में कहीं भी यवनिका के प्रयोग का प्रमाण नहीं मिलता। उन देशों में मंच के पीछे चित्रित दीवार के दोनों ओर द्वार बने रहते थे, जिनसे पात्र आते-जाते थे। अतः, यह कहना नितान्त भ्रामक है कि भरत ने अपनी नाट्य-कला यूनान से सीखी है या भारतीय नाटकों पर यूनानी नाटक का प्रभाव है। यह मानना शायद उचित नहीं होगा कि ग्रीकों के समान शक्तिशाली जाति के सम्पर्क में आने पर भारतीयों के समान प्रबल कल्पनाशील जाति के विचारों तथा कल्पना- शक्ति में किसी प्रकार का परिवर्त्तन हुआ ही न होगा। परन्तु, जहाँ तक नाटकीय सिद्धान्त का प्रश्न है, इसकी अत्यन्त प्राचीन तथा गौरवपूर्ण परम्परा भारत में वर्त्तमान थी। यह भी समझना उचित नहीं कि ग्रीक-साहित्य और विचारधारा ने भारत के सम्पर्क में आकर यहाँ से कुछ ग्रहण करने में किसी प्रकार की अनिच्छा दिखलाई। दोनों जातियों में पारस्परिक सम्पर्क के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान अवश्य हुआ होगा, परन्तु उसे नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों की देन कहना युक्तिसंगत नहीं है। भारत की किसी भी साहित्यिक, सांस्कृतिक, कलात्मक या शास्त्रीय समृद्धि में यूनानी बीज ढूँढ़ना या यूनानी प्रभाव देखना पाश्चात्य विद्वानों का प्रधान और मनोरंजक उद्देश्य रहा है। वे समझते हैं कि जैसे यूरोप की सभ्यता, संस्कृति, कला और कविता पर यूनान का प्रभाव पड़ा है, वैसे ही भारत की सभ्यता आदि पर भी पड़ा है। डॉ० कीथ आदि कुछ पाश्चात्त्य विद्वानों ने इस सिद्धान्त का खण्डन कर दिया है। मनोविनोद का सिद्धान्त : आचार्य सीताराम चतुर्वेदी ने सभी प्रचलित मतों का खण्डन करके अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन किया है। उनका मत है कि प्रत्येक व्यक्ति

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अपने दैनिक व्यवसाय और घर-बाहर की चिन्ताओं से मुक्ति पाकर कुछ देर ऐसे वायुमण्डल में विचरण करना चाहता है, जिसमें तन्मय होने पर उसे व्यवहार, परिवार तथा अन्य किसी भी प्रकार की चिन्ता नहीं रह जाए। इस प्रयत्न में सफलता पाने के निमित्त मानव ने संगीत, अभिनय तथा कथा-इन तीन सार्वजनिक मनोविनोदों को जन्म दिया और किसी समय किसी आचार्य ने इन तीनों का समन्वय करके नाट्य की सृष्टि कर दी। "अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि लोगों को चिन्तामुक्त करने के लिए संगीत, कथा और अभिनय के संयोग से मनोविनोद और उपदेश के उद्देश्य से विशेष पर्वों और उत्सवों पर प्रयोग करने के लिए नाट्य की उत्पत्ति हुई।"१ वेदोत्तर साहित्य महाकाव्यों में नाटक : नाटक के उद्गम की सम्भावना महाकाव्यों और आख्या- यिकाओं में ढूँढ़ना अधिक महत्त्वपूर्ण है, यद्यपि इस दिशा में तिथियों की कठिनाई उपस्थित हो जाती है। कुछ संस्कृत-नाटकों में काव्यत्व और नाटकीयता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, परन्तु यह बात सर्वत्र सत्य नहीं है। भारत के सबसे बड़े महाकाव्य महाभारत में स्पष्ट रूप से कहीं भी नाटक का उल्लेख नहीं है। अतः, यह नहीं कहा जा सकता कि उस युग में नाटक की स्थिति थी या नहीं। हाँ, विराट-पर्व में रंगशाला का उल्लेख मिलता है, जिससे नाटक की ओर संकेत होता है। नट, शैलूष आदि शब्द अवश्य ही आये हैं और नट का अर्थ यदि अभिनेता है तो नाटक की भी स्थिति सिद्ध हो जायगी; परन्तु इसका अर्थ सामान्य खेल-तमाशा दिखानेवाला भी हो सकता है। नाटक की खोज में हमें हरिवंश की ओर जाना होता है। हरिवंश वस्तुतः महाभारत की ही शृंखला में है। हरिवंश में दिये गये वर्णन से स्पष्ट हो जाता है कि आरम्भ में नाटक का सम्बन्ध कृष्ण-भक्ति से था। महाभाष्य से भी इस बात की पुष्टि होती है। अन्धक के मरणोपरान्त यादवों ने उत्सव मनाया, जिसमें स्त्रियों ने नृत्य किया और गीत गाये। इस उत्सव में कृष्ण ने स्वर्ग की अप्सराओं को नृत्य-गान के लिए बुलाया। अप्सराओं ने कंस और प्रलम्ब की मृत्यु, रंगभवन में चाणूर के पतन तथा कृष्ण के अन्य चरित्रों को, सम्भवतः नृत्य द्वारा, प्रस्तुत किया। उनके अभिनय के बाद देवर्षि नारद ने अनेक व्यक्तियों की नकल उतारकर दर्शकों का मनोरंजन किया। उन्होंने सत्यभामा, केशव, अर्जुन, बलदेव जैसे महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की चाल-ढाल, हँसी आदि का अनुकरण किया, जिससे दर्शकों का अत्यन्त मनोरंजन हुआ। इससे हमें नाटक में विदूषक के अभिनय की याद आ जाती है। हरिवंश में हमें स्पष्ट प्रमाण मिलता है; क्योंकि उसमें ऐसे अभिनेताओं का उल्लेख है, जिन्होंने रामायण की कथा पर नाटक खेला था। वज्रनाभ नामक दैत्य का वध करने के १. अभिनव नाट्यशास्त्र (प्र० सं०), पृ० ४२

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निमित्त श्रीकृष्ण तथा अन्य यादवों ने कपट-नटों का वेश धारण कर उसके नगर में रामायण पर आधारित नाटक खेला। रामायण के अतिरिक्त उन्होंने 'कौवेर रम्भाभिसार' नाटक भी खेला। नाटक का अभिनय इतना सुन्दर हुआ कि दैत्यों और उनकी स्त्रियों ने अपने शरीर पर के सुवर्ण के आभूषण खोल-खोलकर नटों को दिये। तत्पश्चात् प्रद्युम्न ने वज्नाभ का वध करके उसकी कन्या प्रभावती से अपना विवाह सम्पन्न किया। इस घटना से संकेत मिलता है कि हरिवंश या महाभारत के काल में नाटक का सर्वांगीण रूप वर्त्तमान था। किन्तु, डॉ० कीथ का विश्वास है कि इससे नाटक की किसी निश्चित तिथि का पता नहीं मिल सकता; क्योंकि हरिवंश की ही तिथि निश्चित नहीं है। वे हरिवंश को ईसा की दूसरी या तीसरी शती से पहले का मानने को तैयार नहीं हैं। वे कहते हैं : "But this is of no importance for the purpose of determining the date of drama, the Harivansha is of uncertain date, but in all probability, as we have it, it cannot be placed earlier than the second or the third century A.D."9 रामायण से भी नाटक की कोई प्राचीन तिथि निश्चित करने में विशेष सहायता नहीं मिलती। हमलोग उत्सवों और समाजों के विषय में सुनते हैं, जिनमें नट और नर्त्तक आनन्दोपभोग करते पाये जाते हैं। रामायण के आरम्भ में ही अयोध्या के वर्णन में वाल्मीकि ने बताया है कि वहाँ नाटक-मण्डलियाँ तथा वेश्याएँ थी-वधू नाटकसडघश्च संयुक्तम्। राम के अभिषेक के समय भी रामायण में नटों, नर्त्तकों आदि के उपस्थित होने तथा अपनी कला-कुशलता से लोगों को प्रसन्न करने का उल्लेख है : नटनर्त्तकसडघानां गायकानां च संघ्नताम्। यतः कर्णसुखा वाचः शुश्राव जनता ततः ॥ अन्यत्न हम 'व्यामिश्रक' शब्द पाते हैं, जिसका अर्थ टीकाकारों ने ऐसा नाटक बताया है, जो मिश्रित भाषा में लिखा गया हो। किन्तु, डॉ० कीथ इन संकेतों से भी नाटक की कोई प्राचीन तिथि मानना पसन्द नहीं करते। किन्तु, यह यथार्थ नहीं जान पड़ता। अयोध्याकाण्ड में एक श्लोक पाया जाता है, जिसमें नाटक की ओर संकेत है। किन्तु, यद्यपि महाकाव्यों में नाटक की स्थिति का कोई विशेष प्रमाण नहीं मिलता, फिर भी इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि किस प्रकार महाकाव्यों के शंसन से नाटक के विकास पर प्रबल प्रभाव पड़ा। साहित्य के साक्ष्य से पता चलता है कि महाकाव्यों का शंसन कितने दीर्घकाल तक लोकप्रिय रहा। ईसा की सातवीं शती के आरम्भ में सोमशर्मा नामक एक ब्राह्मण ने, जो कम्बोडिया के राजवंश से सम्बद्ध था, भारतीय सभ्यता के उस सुदूर प्रदेश में एक मन्दिर को महाभारत की एक पूर्ण प्रति समर्पित की, इसलिए कि इसका q. The Sanskrit Drama, p. 28.

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नाटक की उत्पत्ति [४७ नियमित शंसन होता रहे। लगभग इसी समय बाण ने कादम्बरी में वर्णन किया कि रानी महाभारत का शंसन सुनने मन्दिर में जा रही है। रामायण के कवि वाल्मीकि ने सीता के बच्चों-कुश और लव-को रामायण पढ़ाई। जब राम अश्वमेध-यज्ञ करने जा रहे हैं, उसी समय कुश और लव अयोध्या में प्रवेश करते हैं और राम की भी उत्सुकता को जागरित करते हैं। वे अपने ही कार्यों का विवरण सुनते हैं। तदनन्तर राम पहचान जाते हैं कि कुश और लव मेरे ही पुत्र हैं। उत्तररामचरित में भवभूति ने स्पष्ट रूप से अपने को इस बात से अभिज्ञ प्रद्शित किया है कि किस प्रकार नाटक महाकाव्यों का ऋणी है। भास के नाटकों में सबसे अधिक स्पष्ट प्रमाण मिलता है कि किस प्रकार वे महाकाव्यों के ऋणी हैं। 'कुशीलव' शब्द का अर्थ नट या अभिनेता होता है। यह शब्द रामायण के कुश और लव से बना जान पड़ता है। इस शब्द में समास बनाने का ढंग विचित्र है। सम्भव है कि इसका नाम आरम्भ में कुश और लव से लिया गया हो और पीछे 'कुशीलव' (कु+शील) में परिवर्तित कर दिया गया हो। यह नटों की नैतिकता पर आघात रहा होगा; क्योंकि सभी लोग मानते थे कि नटों का आचरण अच्छा नहीं था। व्याकरण-ग्रन्थ : वैयाकरण पाणिनि ने अष्टाध्यायी के सूत्रों में शिलाली तथा कृशाश्व के नटसूत्रों का उल्लेख स्पष्ट रूप से किया है : पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयो: (४।३।११०) कर्मन्दकृशाश्वादिभि: (४।३।१११) । इससे शिलाली और कृशाश्व नामक दो आचार्यों के नट-सूत्रों के विषय में ज्ञात होता है। इन दोनों आचार्यों की कृतियाँ अब उपलब्ध नहीं हैं। यदि उनके ग्रन्थ मिल सकते, तो सम्भव था कि नाट्यशास्त्र और नाटक के विषय में कितनी नई बातों का पता चलता। प्रो० सिल्वा लेवी ने इन दोनों नामों के विचित्र अर्थ लगाये हैं। उनके अनुसार शिलाली का अर्थ है, 'जिसके पास शिला की ही शय्या है और कोई वस्तु सोने को नहीं', और कृशाश्व का अर्थ है, 'जिसके घोड़े दुबले-पतले हैं।' डॉ० कीथ इन्हीं कोरे मन-गढ़न्त अर्थों के साक्ष्य पर इन दोनों शब्दों में व्यंग्य मानकर इन्हें नाट्याचार्यों के नाम मानने को तैयार नहीं हैं। डॉ० कीथ यह भी संकेत करते हैं कि पाणिनि की अष्टाध्यायी में 'नट' शब्द के पाये जाने से पुत्तलिका-नृत्य की पुष्टि हो सकती है। वे पाणिनि का काल चौथी शती ई० पू० मानते हैं और उनके व्याकरण-ग्रन्थ में 'नाटक' शब्द के अभाव को इस काल में भारतीय नाटकों की अविद्यमानता का प्रमाण मानते हैं : "The conclusion is important, for Panini's date is most probably the fourth century B.C., and the fact that he has no term certainly denoting drama is of significance."9 ह किन्तु वस्तुतः नट-सूत्र किन्हीं सैद्धान्तिक सूत्रों की ओर संकेत करता है, जिनमें नटों के कला-कौशल और क्रिया-कलाप का विवेचन किया गया होगा। स्पष्ट है कि पाणिनि के 9. The Sanskrit Drama, p. 31.

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४= j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास समय में या उनके पूर्व अनेक नाट्य-ग्रन्थों की रचना हो गई होगी, जिनके आधार पर नट-सूत्रों का निर्माण हुआ। वस्तुतः लक्ष्य-ग्रन्थों की रचना के उपरान्त ही लक्षण-ग्रन्थों की रचना होती है। भारतीय विद्वान् (वी० वरदाचारी आदि) पाणिनि का समय दवीं शती ई० पू० मानते हैं। इस प्रकार, इन नट-सूत्रों का समय डॉ० कीथ के बताये समय से ४०० वर्ष पहले हो जाता है। महाभाष्यकार : पतंजलि का समय निश्चित है। वे १४० ई० पू० के आसपास वर्त्तमान थे। वे शुंगवंशीय राजा पुष्यमित्र के गुरु और पुरोहित थे। उनके ग्रन्थ में नाटक की स्थिति के सम्बन्ध में स्पष्ट और निश्चित प्रमाण मिलता है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती वयाकरण कात्यायन के एक वार्त्तिक की आलोचना करते समय 'कंसवध' तथा 'बलिबन्धन'- इन दो कथाओं से सम्बद्ध नाटकों का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि कंस पहले मारा जा चुका है और बलि का बन्धन अतीत काल में हो चुका है, किन्तु ये नट वर्त्तमान काल में ही हमारी आँखों के सामने कंस को मारते हैं तथा बलि को बाँधते हैं : इह तु कथं वर्त्तमानकालता कंसं घातयति बाल बन्धयतीति चिरंहते कंसे चिरं बद्धे च बलौ। अत्ापि युक्ता । कथम्। ये तावदेते शोभनिका (शौभिका) नामैते प्रत्यक्ष कंसं घातयन्ति, प्रत्यक्षं च बल बन्धयन्तीति।' किन्तु, प्रो० वेबर तथा प्रो० ल्यूडर्स ने पतंजलि के इस अति स्पष्ट संकेत का भी बहुत बेढंगा अर्थ लगाया है। वेवर ने अर्थ लगाया है कि पतंजलि का संकेत पुत्तलिका-रूप में कंसवध तथा बलिबन्धन की ओर है। प्रो० ल्यूडर्स के मत के अनुसार 'शौभिकाः' या 'शोभनिकाः' शब्द इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि ये नट विना किसी संवाद या वार्त्तालाप के कंसवध या बलि-बन्धन का स्वांग रचते थे। बाद के साहित्य में संवाद का प्रयोग करनेवालों के लिए 'ग्रन्थिक' शब्द का प्रयोग पाया जाता है। डॉ० कीथ ने इन मतों की सम्यक आलोचना की है। महर्षि पतंजलि ने अपनी पंक्तियों के द्वारा नाट्याभिनय की ओर स्पष्ट संकेत किया है। फिर इसमें खींच-तान व्यर्थ ही है। महाभाष्य से हमें पता लगता है कि उस समय रंगमंच था, जिसमें नाटक के सभी तत्त्व वर्त्तमान थे। हम अभिनय भी पाते हैं और दो दलों के बीच में शंसन भी पाते हैं। नट भी मिलते हैं, जो शंसन करने के साथ गायन भी कर सकते हैं। महाभाष्य के काल में हम पाते हैं कि नट की भूख मयूर के नृत्य के समान विख्यात हो गई थी और कभी-कभी उसे मार भी खानी पड़ती थी। उस समय एक विशेष शब्द भ्रुकुंस ऐसे पुरुषों के लिए प्रचलित हो गया था, जो स्त्री की वेशभूषा में स्त्री की भूमिका करते थे। ऐसा जान पड़ता है कि महाभाष्य ने नर्त्तकी और गायिका के अतिरिक्त अन्य स्त्री को मान्यता नहीं दी. अत; यह स्पष्ट हो जाता है कि नाट्यकला के शैशव में स्त्रियों की भूमिका पुरुषों को ही १. महाभाष्य, ३।१।२६।

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मिलती थी, यद्यपि बाद के नाटकों में ऐसी बात नहीं थी। परन्तु डॉ० कीथ मानते हैं कि पतंजलि के समय में नाटक अभी प्रारम्भिक रूप में ही था।' धर्म और नाटक : विद्वानों का मत है कि नाटक का प्रारम्भिक रूप धार्मिक ही था। डॉ० कीथ ने कंसवध की कथा को हेमन्त और ग्रीष्म के संघर्ष का प्रतीक माना है। धर्म के साथ नाटक के सम्बन्ध में और भी प्रमाण मिलते हैं। रंगमंच में जनता के समक्ष कृष्ण पहले अपने मामा कंस के योद्धाओं को पराजित करते हैं और अन्त में उस अत्याचारी कंस का वध करते हैं। वसुदेव, देवकी आदि सभी वहाँ उपस्थित रहते हैं, अप्सराएँ गीत गाती हैं और दर्शक सारी रात यह मनोहर दृश्य देखते रहते हैं, फिर कृष्ण और गोपियों का प्रेम दिखाया जाता है और रास-मण्डल का नृत्य होता है। इस सम्बन्ध में यात्रा की लोकप्रियता का महत्त्व देखा जा सकता है। संस्कृत-नाटक का लिखा जाना और खेला जाना बन्द भी हो गया, परन्तु अभी भी यात्रा का महत्त्व बना हुआ है। कृष्ण-भक्ति का एक बहुत अधिक महत्त्व एक अन्य बात में भी देखा जा सकता है। संस्कृत-नाटक के गद्य की सामान्य भाषा शौरसेनी प्राकृत है और हमलोग सामान्यतया यही मान सकते हैं कि इसका कारण यही है कि जिन लोगों के बीच नाटक का रूप सबसे पहले निश्चित हुआ, उनकी भाषा शौरसेनी प्राकृत ही थी। आगे भी चलकर हम देखते हैं कि मुसलमानी आक्रमण के उपरान्त कृष्ण-भक्ति का पुनर्जागरण हुआ तो व्रजभाषा में ही हुआ। प्राचीन शौरसेनी के स्थान की मध्यकालीन भाषा व्रजभाषा है और कृष्ण-भक्ति के प्रचार के साथ इसका प्रचार अपनी सीमाओं से बहुत आगे बढ़कर हुआ। नाटक के इतिहास में कृष्ण के साथ शिव का भी बहुत अधिक महत्त्व है। शिव ने ताण्डव-नृत्य दिया और उनकी पत्नी पार्वती ने लास्य-नृत्य। नाटक में इन नृत्यों का बहुत अधिक महत्त्व है। वैदिक काल में शिव सभी काम-धन्धोंवाले मनुष्यों के संरक्षक- रूप में विख्यात रहे हैं, परन्तु अब कलाकारों के विशेष संरक्षक माने गये। परन्तु, सम्भवतः नाटक में शिव का यह महत्त्व कृष्ण के बाद ही हुआ। भास वैष्णव थे और उनके नाटकों की प्रस्तावना में कृष्ण की वन्दना है। किन्तु, कालिदास, शूद्रक, भवभूति और हर्ष के नाटकों की प्रस्तावनाओं में शिव की वन्दना की गई है। ज्ञातव्य है कि भास इन सभी नाटककारों के पूर्ववर्ती हैं। कालिदास के मालविकाग्निमित्र में नृत्य को शिव की सृष्टि कहा गया है और शिव के साथ नृत्य का सम्बन्ध बताया गया है। पाशुपतों के पूजा-विधान और तान्त्रिकों के कृत्यों में भी नृत्य, गान, शिव, शक्ति आदि से काफी सम्बन्ध है। नाटक के विकास में राम का स्थान कृष्ण से कम महत्त्वपूर्ण नहीं है; क्योंकि देश- भर में रामायण का शंसन लोकप्रिय था और आजकल भी प्रचलन में है। रामलीला और दशहरा से राम-कथा की लोकप्रियता पूर्णतः सिद्ध हो जाती है। ऐसे अवसरों पर तीर्थ- यात्रियों और अन्य लोगों के समक्ष लड़के ही राम, लक्ष्मण, सीता आदि की भूमिका 9. The Sanskrit Drama, p. 37.

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निभाते हैं। सभी दर्शक राम-कथा से पूर्णतया परिचित रहते हैं, अतः उन अभिनेताओं के नहीं बोलने पर भी वे राम के जीवन की सभी घटनाएँ-वनवास, सीता के अन्वेषण और राम की रावण पर विजय-आदि समझते जाते हैं। वस्तुतः, रामायण महाकाव्य का पूर्ण प्रभाव नाटक पर दृष्टिगोचर होता है। नाटक की धार्मिक उत्पत्ति के विषय में विदूषक पात्र को भी प्रस्तुत किया जाता है। विदूषक नाटक के नायक राजा का विश्वस्त सखा और सहचर होता है। नाटक में ऐसा बहुधा देखा जाता है कि देवी की किसी सेविका और विदूषक में वाद-विवाद होता है और उसमें हार प्रायः विदूषक की ही होती है। डॉ० कीथ का कथन है कि ऐसे अवसर पर महाव्रत में वणित ब्राह्मण और गणिका के वाद-विवाद (या गाली-गलौज) को नहीं भुलाया जा सकता। अनुमान लगाया जाता है कि विदूषक के पात्र में दूसरा धार्मिक तत्त्व उस शूद्र की स्मृति है, जो सोमयज्ञ में सोम-क्रय के अनन्तर पीटा जाता है। सम्भवतः, इसीलिए विदूषक का आकार-प्रकार बेढंगा बताया गया है। विदूषक ब्राह्मण होता है, इसी बात से यह सिद्ध होता है कि उसके चरित्र का दूषित भाग ही अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसीलिए, यह प्राकृत का व्यवहार करता है; क्योंकि यह सोचा भी नहीं जा सकता है कि कोई ब्राह्मण गाली-गलौजवाला वाद-विवाद संस्कृत-जैसी पवित्र भाषा में करेगा। महाव्रत की गणिका-जैसी निम्न सामाजिक स्थिति की स्त्री प्राकृत ही समझ सकती है। करिलार बौद्धधर्म और नाटक : नाटक का धार्मिक महत्त्व इसके प्रति बौद्धों के दृष्टिकोण में भी परिलक्षित होता है। नाटक के बहुत प्राचीन अंश भी, जो छिट-पुट रूप में पाये गये हैं, अश्वघोष के बौद्ध नाटक हैं। नाटक को स्वीकार कर लेने पर 'ललितविस्तर' यह भी कहता है कि बुद्ध को नाटक का भी ज्ञान प्राप्त था। कहा जाता है कि बुद्ध के समय में भी नाटक थे; क्योंकि राजा बिम्बिसार ने दो नाग-राजाओं के सम्मान में एक नाटक का प्रदर्शन कराया था। 'अवदानशतक' के अनुसार तो नाटक बहुत प्राचीन काल में ही वर्त्तमान थे। इन नाटकों की छाप सद्धर्मपुण्डरीक पर पड़ी है, जो ललितविस्तर के समान महाकाव्य नहीं है, वरन् संवाद-शृंखला के समान है। इसमें अतिमानव बुद्ध प्रमुख हैं, किन्तु अन्य व्यक्ति भी वक्ता हैं। सिंहल में राजवंश के एक राजकुमार के द्वारा स्तूप के शिलान्यास के समय गीत, संगीत, नृत्य और कुछ दृश्य-प्रदर्शन के द्वारा ऐसे ही कलात्मक प्रभाव लाने का प्रयास किया गया। महावंश का कथन है कि ऐसे अवसरों पर नाटक भी खेले गये थे। अजन्ता की चित्रकारियों से पता चलता है कि उस युग में गीत, संगीत और नृत्य का कितना सम्मान था। तिब्बत में भी पुराने धार्मिक नाटकों के अवशेष पाये जाते हैं, जो सामान्य जनता के द्वारा खेले जाते थे। विनयपिटक से प्रमाणित होता है कि नाटक का प्रचार भारत-व्यापी था। विनय- पिटक के 'चुल्लबग्ग' में यह कथा मिलती है कि एक बार अश्वजित् और पुनर्वसु नामक दो भिक्षु कीटागिरि की रंगशाला में नाटक देखने गये। नाटक समाप्त हो जाने पर दोनों भिक्षु संघाटी फैलाकर नाचनेवाली नर्त्तकी से मधुर वार्त्तालाप करते रहे। जब

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विहार के महास्थविर को इसकी सूचना मिली तो उन्होंने उन भिक्षुओं को तुरन्त विहार से निर्वासित कर दिया। जैनधर्म और नाटक : जैसा बौद्धधर्म के साथ है, वैसा ही जैनधर्म के भी साथ है। बौद्ध-मत के समान जैन-मत में भी नाटक से सम्बन्ध रखनेवाले आनन्दोपभोगों की निन्दा है, परन्तु साथ ही धर्म-सिद्धान्तों में गीत, संगीत, नृत्य और दृश्य-प्रदर्शन को मान्यता भी दी गई है। परन्तु, यह पता नहीं चलता कि उन धर्म-सिद्धान्तों का संग्रह कब हुआ, इसलिए नाटक की तिथि निश्चित करने में कठिनाई है। बौद्ध-मत के ही समान जैन-मत ने भी अपने धर्म के प्रचार के लिए नाटक को भी अपना माध्यम बनाया। जैनियों का 'सत्तपसेणीय सुत्त' नामक धार्मिक ग्रन्थ है। इसकी एक कथा से जान पड़ता है कि भगवान् महावीर नाटक देखकर प्रसन्न हुए थे। भगवान् महावीर भ्रमण करते आमल- कप्पा नगरी में पहुँचे और अम्बसालवन में एक शिला पर आसीन हुए। उसी समय सूर्याभदेव स्वर्ग से आकर उपस्थित हुए। भगवान् महावीर का अभिनन्दन करने के लिए अनेक वाद्यों और संगीत के साथ सूर्याभदेव ने अभिनन्दनात्मक नाटक भी दिखाया। अभिनय-कला में वे इतने कुशल थे कि उन्होंने अपनी अभिनय-कला से महावीर को प्रसन्न कर दिया। धर्म और राज्याश्रय से नाटक को प्रेरणा-प्रोत्साहन : धर्म और नाटक के घनिष्ठ सम्बन्ध के विषय में पुष्ट प्रमाण है और यह भी स्पष्ट जान पड़ता है कि धर्म से ही नाटक-रचना की निर्णयात्मक प्रेरणा मिली। महाकाव्यों का महत्त्व निस्सन्देह बहुत अधिक है, किन्तु महाकाव्यों के मात्र शंसन से, नाटक के अत्यधिक निकट पहुँचने पर भी, इसकी रचना नहीं हो सकती थी। नाटकीय संघर्षवाले तत्त्व की आवश्यकता थी, जिसकी पूर्त्ि महाव्रत के धार्मिक कृत्य से हुई। पीछे कृष्ण और कंस का आख्यान प्रचलित हुआ। फिर महाभाष्य में बताया गया कि कृष्ण और कंस की कथा को ग्रन्थिक भी प्रस्तुत कर सकते हैं, जो अपने चेहरे रँग लेते थे और जिन लोगों का अभिनय करते थे, उनकी भावनाओं को भी प्रस्तुत करते थे; शौभिक मूक अभिनय के द्वारा प्रस्तुत करते थे। पतंजलि द्वारा व्णित नट केवल नर्त्तक ही नहीं, वरन् इससे कहीं अधिक थे। प्राचीनकाल में सामान्य जनता अपनी साधारण बोली में ही नाटक प्रस्तुत करती थी। परन्तु यह सदा ध्यान में रखना चाहिए कि यह धार्मिक कृत्य का ही एक अंग होता था। सर्वसाधारण के समक्ष नाटक यात्रा के ही रूप में प्रस्तुत किया जाता था और यह शब्द सूचित करता है कि नाटक धार्मिक कृत्य का ही एक अंग था; क्योंकि यात्रा का सम्बन्ध किसी देवी या देवता के सम्मान में किये गये समारोह से था। आज भी जनता के सामने प्रदर्शित किये गये अनेक नाटकों के कथानक रामायण, महाभारत या किसी देवी- देवता की पूजा की कथा से लिये गये रहते हैं। जब नाटक के अभिनय में शासक दिलचस्पी लेने लगे, तो नाटक गुण की दृष्टि से शीघ्र विकसित हुआ और रंगमंच पर संस्कृत भाषा का प्रयोग होने लगा। वसन्तोत्सव

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आदि विशेष अवसरों पर शासकों के महलों में नाटक का अभिनय लगभग अनिवार्य ही हो गया और राजकवि नाटक लिखने लगे। किन्तु, साधारण जनता के लिए नाटक खुले मैदानों में यात्रा के रूप में खेले जाते रहे। TBi TSE SO HEFE Tिसी लोग रंगमंच के नाटकों को राज्य के प्रभाव के विस्तार का साधन मानते थे। शासक भी रंगमंच को जनता की शिक्षा का माध्यम मानकर इसे सहायता देते थे। नासिक में गुफा की दीवारों और हाथीगुम्फा में पाये गये शिलालेखों में भी नाटक का संकेत मिलता है। F TBITकाल-निर्धारण : निश्चित रूप से यह कहना कठिन है कि संस्कृत-नाटक कब से लिखा जाने लगा। आजकल नाटक के जो नमूने मिलते हैं, वे उस समय के हैं, जब नाट्य- कला का कुछ विकास हो चुका था। किन्तु, नाट्यकला के शैशव का कोई नाटक नहीं मिलता। फी डॉ० कीथ संस्कृत-नाटक की प्राचीनता के बहुत प्रमाण देने के बाद भी इसकी उत्पत्ति ई० पू० द्वितीय शती से पूर्व नहीं मानते।१ किन्तु, ऊपर दिखाया जा चुका है कि रामायण, महाभारत, वौद्धधर्म तथा जैनधर्म- ग्रन्थों में भी नाटक के संकेत मिलते हैं, जिनसे सिद्ध हो जाता है कि डॉ० कीथ द्वारा निर्दिष्ट तिथि के बहुत पहले ही संस्कृत में नाटक लिखे जाने लगे थे। अशोक के शिलालेख तृतीय शती ई० पू० के हैं। उनमें 'समाज' शब्द का प्रयोग किया गया है। प्रथम शिलालेख में 'समाज' शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया गया है। गिरनार के शिलालेख में 'समाज' शब्द दो बार प्रयुक्त हुआ है। डॉ० डी० आर० भण्डारकर और श्री एम० जी० मजुमदार ने अनेक उदाहरण देकर स्पष्ट कर दिया है कि 'समाज' शब्द के दो अर्थ हैं। अशोक के उपर्युक्त शिलालेख में प्रयुक्त पहले 'समाज' का अर्थ ऐसा स्थान है, जहाँ लोगों का मनोरंजन नृत्य, गीत आदि से किया जाय। श्रीमजुमदार ने इस अर्थ का समर्थन किया है। उन्होंने बताया है कि वात्स्यायन ने अपने कामसूत्र में 'समाज' शब्द का प्रयोग नाटक के अभिनय के सन्दर्भ में किया है। ईसा की दूसरी शती पूर्व के बहुत पहले नाटक की स्थिति नहीं माननेवाले पाश्चात्त्य विद्वानों के सामने वात्स्यायन के कामसूत्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ उद्धत की जा सकती हैं कुशीलवाश्चागन्तवः प्रेक्षणकमेषां दद्युः। द्वितीयेऽहनि तेभ्यः पूजानियतं लभेरन् ॥ ततो यथाश्रद्धमेषां दर्शनमुत्सर्गो वा। व्यसनोत्सवेषु चैषां परस्परस्यककार्यता।।* 9. The Sanskrit Drama, p. 45 TUTS २. कामसूत्र, ११४, २८-३१

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शकली पीट नाटक की उत्पत्ति [५३ - अर्थात् बाहर से आये हुए नट पहले दिन नागरिकों को नाटक दिखाकर उसका पारिश्रमिक या पूजा दूसरे दिन लें। यदि लोग देखना चाहें, तो फिर देखें, नहीं तो नटों को विदा कर दें। नगर के नटों और आगन्तुक नटों-दोनों को एक-दूसरे के कष्ट तथा आनन्द में परस्पर सहयोग देना चाहिए। फिर, कामसूत्र में अन्यत्न लिखा है : कृड पक्षस्य मासस्य वा प्रख्यातेऽहनि सरस्वत्या भवने नियुक्तो नित्यं समाजः। -अर्थात् पखवारे या महीने के निश्चित या प्रसिद्ध पर्व के दिनों पर सरस्वती के मन्दिर में राजा की ओर से नियुक्त नाटक या उत्सव हो। वात्स्यायन के प्रयोग से स्पष्ट हो जाता है कि समाज नाटक का एक रूप है, जिसका सम्बन्ध धर्म से है। बौद्ध-जातकों से भी स्पष्ट होता है कि 'समाज' का प्रयोग रंगमंच के नाटकों के अर्थ में होता था।। ककस्मरणीय है कि वात्स्यायन का समय डॉ० कीथ द्वारा नाटक की उत्पत्ति के लिए निर्दिष्ट समय-दूसरी शती ई० पू०-से बहुत पहले (सम्भवतः चतुर्थ शती ई० पू०) है। अतः, डॉ० कीथ द्वारा दिया गया समय भ्रामक है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में भी इस बात का प्रमाण मिलता है कि उस समय नट, नर्त्तक, गायक, वादक, कथा सुनाकर जीविका चलानेवाले कुशीलव (नृत्य के साथ गानेवाले), प्लवक (रस्सी पर खेल दिखानेवाले), शौभिक (ऐन्द्रजालिक), चारण आदि वर्त्तमान थे। इतना ही नहीं, प्रत्येक मण्डली को कुछ निश्चित राजकर देना पड़ता था। यदि नटों की कोई मण्डली खेल दिखाने के लिए बाहर से आती थी, तो प्रत्येक खेल के लिए पाँच पग राजा को कर के रूप में देना पड़ता था-एतेन नटनर्त्तकगायकवादक-वाग्जीवनकुशीलव- प्लवकशौभिकचारणानां स्त्रीव्यवहारिणां स्त्रियो मूढाजीवाश्च व्याख्याताः। तेषां तूर्यकामन्तुक पञ्च पणं प्रेक्षावेतनं वद्यात्।१ कौटिल्य का समय भी चतुर्थ शती ई० पू० कुछ विद्वान् मानते हैं। उस समय नाटक की विद्यमानता सिद्ध होती है। FPR मई, १९१० ई० में दक्षिण-भारत के प्रसिद्ध विद्वान् श्रीगणपति शास्त्री को तावणकोर के एक प्राचीन पुस्तकालय में १० हस्तलिखित पुस्तकें मिलीं, जिनमें भास के नाटकों के कुछ अंश हैं। उसी प्रकार की कुछ और भी हस्तलिखित पुस्तकें आगे चलकर मिलीं। इन नाटकों से पता चलता है कि नाटककार को नाट्यशास्त्र के विषयों से कोई परिचय नहीं था। उनके काल का निश्चय अभी नहीं हो सका है। कुछ लोग उन्हें प्रथम शती और दूसरे लोग प्रथम शती ई० पूर्व का मानते हैं। किन्तु, अन्य साक्ष्यों को छोड़कर भाषा का ही साक्ष्य यदि ग्रहण किया जाय, तो पता चलेगा कि वे ईसा के कम-से-कम तीन या चार 13 B १. कौटिल्य अर्थशास्त्र ; अध्यक्ष, प्रचार-अधिकरण, २७वाँ अधि० ।

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शती पूर्व रचे गये होंगे। उनके द्वारा प्रयुक्त शब्दों से सिद्ध होता है कि वे पाणिनि के नियमों से परिचित नहीं थे। हमें पता नहीं कि भारत का सर्वप्रथम नाटक कौन था या कैसा था। परन्तु, भास के पहले का कोई नाटक उपलब्ध नहीं है।

मध्यएशिया में बौद्ध-काल के कुछ नाटक मिले हैं। उनमें कोई भी पूर्ण नहीं है। ताल-पत्र पर लिखे गये प्राप्त अंश केवल हस्तलिखित नाटकों के खण्ड-मात्र हैं। वे कुषाण- काल के हैं। तूर्फान में पाया गया एक अंश कुषाण राजा कनिष्क के राजकवि अश्वघोष द्वारा लिखे गये नौ अंकों के नाटक सारिपुत्त-प्रकरण का खण्ड है। इससे पहले इस नाटक के अस्तित्व के विषय में कोई नहीं जानता था। इस प्रकरण में नाट्यशास्त्र के नियमों का पालन किया गया है। विदूषक के सम्बन्ध में भी नाट्यशास्त्र के नियमों का पालन हुआ है। इससे सिद्ध होता है कि अश्वघोष के समय के पूर्व ही नाट्यशास्त्र की रचना हो गई थी और नाटककार इसके नियमों का पालन करते थे। छो निष्कर्ष : अभी नाट्य की उत्पत्ति के सम्बन्ध में प्रचलित विभिन्न सिद्धान्तों का विवेचन किया गया। अपने सिद्धान्तों का प्रतिपादन करनेवाले विद्वानों में प्रायः सभी यूरोपीय ही हैं, जिन्होंने भारत की परम्परा, प्रकृति तथा प्रवृत्ति से अधिकांशतः अनभिज्ञ रहने के कारण अंशतः भ्रान्त मतों की स्थापना कर दी है। किन्तु, यह तो मानना ही होगा कि भारतीय साहित्य के अनुसन्धान तथा अनुशीलन में उन्होंने जो प्रयत्न किये हैं, वे स्वथा स्तुत्य तथा श्लाध्य हैं। प्रस्तुत समीक्षा से यह स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय नाटक अपने क्रमिक विकास में अनेक विषयों तथा ग्रन्थों का ऋणी रहा है। उसने कुछ तत्त्व वैदिक साहित्य से लिये, कुछ रामायण तथा महाभारत महाकाव्यों से लिये, कुछ इतिहास-पुराणों से और कुछ लोकगीतों से लिये। उसे धार्मिक तथा सामाजिक उत्सवों से भी पर्याप्त प्रेरणा मिली। नाट्य का बीज वस्तुतः ऋग्वेद के संवाद में ही पाया जाता है, जो पीछे पल्लवित और पुष्पित होकर नाटक के रूप में विकसित हुआ। यह भी निश्चित है कि मनोविनोद के लिए नाटक की रचना हुई। मानव संसार और परिवार की चिन्ताओं से ग्रस्त होकर दुःख पाने लगता है। और नहीं तो वह अपने दैनिक व्यवसाय से ऊबकर कुछ क्षण मुक्त वातावरण में विचरण कर अपना मनोविनोद करना चाहता है। इस उद्देश्य से उसने नृत्य, संगीत तथा अभिनय का निर्माण किया। पीछे इन तीनों का समन्वय करके नाट्य की सृष्टि कर ली गई। पाणिनि के समय तक कुछ नाटक लिखे जा चुके होंगे; क्योंकि उन्होंने अष्टाध्यायी में दो नाट्य-सूत्रकारों शिलाली और कृशाश्व का उल्लेख किया है। इन सूत्रकारों के सूत्र कुछ नाटकों के ही आधार पर रचे गये होंगे। भरत के समय तक तो नाटक का पर्याप्त विकास हो गया होगा, जिसके आधार पर उन्होंने नाट्यशास्त्र की रचना की। लक्ष्य- सन्थों की रचना पहले होती है और उन्हीं को ध्यान में रखकर लक्षण-ग्रन्थ निर्मित

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होते हैं। अतः, भारतीय नाट्य-साहित्य काफी प्राचीन है। श्रीवरदाचारी ने सीताबेंगा गुफा-नाट्यशाला के साक्ष्य के आधार पर सिद्ध किया है कि नाटक की उत्पत्ति महाकाव्यों के समय में हुई होगी। सीताबेंगा की गुफा-नाट्यशाला का समय ३०० ई० पूर्व माना गया है। पतंजलि के समय में तो नाटक के विकसित रूप का अभिनय होने लगा था, जैसा कि ऊपर दिखाया जा चुका है। पाणिनि का समय यूरोपीय विद्वानों ने ई० पूर्व चौथी शती माना है। भारतीय विद्वान् उनका समय ई० पूर्व दवीं शती मानते हैं। इस प्रकार सिद्ध हो जाता है कि भारतीय नाटक की उत्पत्ति ईसा के ४०० वर्ष पहले अवश्य हो गई होगी। इस प्रकार, भारतीय नाटक का पूर्ण विकास कई शतियों में हुआ और उसकी उत्पत्ति तथा विकास में अनेक तत्त्वों एवं उपादानों का उपयोग हुआ।

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तृतीय अध्याय भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय लक्षण-प्रन्थ : साहित्य में लक्षण-ग्रन्थों और लक्ष्य-ग्रन्थों का बहुत घनिष्ठ सम्बन्ध है। पहले लक्ष्य-ग्रन्थों-काव्य, नाटक आदि-की रचना होती है और फिर उन्हें नियन्त्रण में रखने के लिए लक्षण-ग्रन्थों की। इस प्रकार लक्षण-ग्रन्थ लक्ष्य-ग्रन्थों को जहाँ एक ओर प्रोत्साहित करते हैं, वहाँ दूसरी ओर उनका नियन्त्रण भी करते हैं। लक्ष्य-ग्रन्थों के रचयिता-कवि, नाटककार आदि-की उच्छ खलता पर नियन्त्रण रखने के लिए लक्षण- ग्रन्थों की अनिवार्यता सर्वमान्य है। लक्षण-ग्रं्थों की भी रचना पूर्वरचित लक्ष्य-ग्रन्थों को ही आदर्श मानकर होती है, किन्तु फिर ये ही लक्षण-ग्रन्थ परवर्त्ती लक्ष्य-ग्रन्थों के आदर्श और नियामक बन जाते हैं। वाल्मीकि, व्यास आदि महर्षियों की रचनाओं को ही देखकर भामह ने अलंकार-विभाजन किया, परन्तु परवर्त्ती कवियों के लिए भामह का ग्रन्थ नियामक सिद्ध हुआ। यदि पूर्ववर्त्ती कवियों के काव्य-ग्रन्थ नहीं होते, तो भामह के लिए अलंकारशास्त्र पर ग्रन्थ लिखना असम्भव ही होता। वैसे ही, अरस्तू अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'पोएतिका' (Poetics) तभी लिख सके जब उनके सामने होमर के 'इलियड' और 'ओडेसी' नामक काव्य-ग्रन्थ और सोफोक्लीज के नाटक वर्त्तमान थे। यह बाता नाट्यशास्त्र के सम्बन्ध में भी लागू होती है। संस्कृत-नाट्यशास्त्र की परम्परा बहुत ही प्राचीन है, साथ ही गौरवपूर्ण भी। ई० पू० चौथी-पाँचवीं शती से लेकर ईसा के बाद १५वीं शती तक अनेक प्रतिभा-सम्पन्न आचार्यों ने अपनी प्रतिभा के योग से इस परम्परा को शक्तिशाली बनाया। संस्कृत में नाट्यशास्त्र के इतने ग्रन्थ लिखे गये, यह इस बात का प्रमाण है कि संस्कृत में नाटक प्रचुर संख्या में विद्यमान थे। भरत का नाट्य- शास्त्र बहुत प्राचीन है और परवर्त्ती आचार्यों के लिए यह ग्रन्थ आद्य उपजीव्य माना गया। भरत के नाट्यशास्त्र के बहुत पहले अवश्य ही पर्याप्त संख्या में नाटक लिखे गये होंगे, जो आज काल-कवलित हो गये और फलस्वरूप अब अप्राप्य हैं। नाट्याचार्यों की कोटियाँ : यदि नाट्यशास्त्र-विषयक सम्पूर्ण उपलब्ध तथा अनुपलब्ध साहित्य का वर्गीकरण किया जाय, तो प्रमुख नाट्याचार्यों को निम्नलिखित सात श्रेणियों में बाँट सकते हैं : १. भरत के पूर्ववर्त्ती आचार्य, जिनकी रचनाएँ अनुपलब्ध हैं और जिनकी रचनाओं को भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में ग्रहण कर लिया है। नाट्यशास्त्र में इसके असंख्य प्रमाण मिलते हैं। २. आचार्य भरत मुनि, जिनका नाट्यशास्त्र सभी परवर्त्ती नाट्याचार्यों का कई शतियों तक उपजीव्य रहा है।

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हाकली भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [५७

क 1०३. भरत के अनुवर्ती आचार्य, जिन्होंने भरत के नाट्यशास्त्र को अपने ग्रन्थ का आधार बनाया। इन्होंने अपने ग्रन्थ में भरत के ही मत का स्पष्टीकरण किया। इस श्रेणी के आचार्यों में प्रधान हैं-धनंजय, सागरनन्दी, रामचन्द्र-गुणचन्द्र शारदातनय, नन्दिकेश्वर आदि। ४. वे आचार्य, जिनकी सम्पूर्ण रचनाएँ तो अप्राप्य हैं, परन्तु परवर्ती आचार्यों ने अपनी रचनाओं में जिनके उद्धरण दिये हैं। उदाहरणार्थ, अभिनवगुप्त ने कोहल का उद्धरण दिया है, जिससे पता चलता है कि उन्हें कोहल की कोई रचना उपलब्ध थी। इसके अतिरिक्त उन्होंने दत्तिलाचार्य के श्लोकों को चौदह बार उद्धृत किया है। सागरनन्दी के 'नाट्यलक्षण-रत्नकोश' में अश्मकुट्ट तथा वादरायण के कई उद्धरण दिये गये हैं। इसी ग्रन्थ में शातकर्णी के भी उद्धरण मिलते हैं। अभिनवगुप्त ने तुम्बुरु तथा कात्यायन के भी उद्धरण दिये हैं। उन्होंने राहुल के भी मत का उद्धरण दिया है। विश्वनाथ ने साहित्य- दर्पण में नखकुट्ट की रचनाओं के उद्धरण दिये हैं। इस श्रेणी के प्रमुख आचार्य हैं : मातृगुप्त, दत्तिल, शातकर्णी, तुम्बुरु, अश्मकुट्ट, नखकुट्ट, वादरायण, कात्यायन, राहुल आदि। ए ५. पाँचवीं श्रेणी में उन आचार्यो की गणना होगी, जिनकी न कोई रचना मिलती है और न किसी श्लोक का उद्धरण ही मिलता है, केवल उनका नामोल्लेख ही पाया जाता है। ऐसे आचार्यों में भरत के पूर्ववर्त्ती हैं : शिलाली, कृशाश्व, धूरत्तिल, शाण्डिल्य, वात्स्य। अभिनवगुप्त, धनंजय ताथा शारदातनय ने सदाशिव, पद्मभू, द्रोहिणि, व्यास, आंजनेय नामक आचार्यों का नामोल्लेख किया है, परन्तु इनकी किसी रचना का उद्धरण नहीं मिलता। शारदातनय ने सुबन्धु का भी उल्लेख किया है। किन्तु, यह कहना कठिन है कि ये सुबन्धु वासवदत्ता के रचयिता हैं या अन्य कोई। ६. छठी श्रेणी में उन आचार्यों की गणना होगी, जिन्होंने किसी स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना नहीं करके भरत के नाट्यशास्त्र का भाष्य लिखा है। ऐसे भाष्यकारों में अभिनव- गुप्त, श्रीशंकुक, कीत्तिधर, नान्यदेव, भट्ट उद्भट, भट्ट यन्त्र, भट्ट लोल्लट आदि प्रख्यात हैं। ७. सातवीं श्रेणी में वे आचार्य आते हैं, जिन्होंने अपने ग्रन्थों में काव्यशास्त्र के सभी अंगों का विवेचन करके किसी अध्याय में नाट्यशास्त्र का भी विवेचन किया है। ऐसे आचार्यों में शिंगभूपाल, रूपगोस्वामी, विद्यानाथ, राजा भोज और विश्वनाथ के नाम लिये जा सकते हैं। राजा भोज ने शृंगारप्रकाश के १२वें अध्याय में नाटक का विवेचन किया और शेष में साहित्य के सभी अंगों का वर्णन किया। उन्होंने अपने 'सरस्वती-कण्ठाभरण' के पाँचवें परिच्छेद में नाट्यशास्त्र का विवेचन किया और शेष में काव्यशास्त्र के सभी अंगों का। विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण के छठे परिच्छेद में और विद्यानाथ ने प्रताप-रुद्र- यशोभूषण के तीसरे प्रकरण में नाटक का विवेचन किया। शिंगभूपाल ने अपने ग्रन्थ रसार्णव-सुधाकर में नाट्य-विषय को लेकर नाटक-परिभाषा की रचना की और इस ग्रन्थ के अन्तिम भाग में काव्य के अन्य विषयों के साथ नाट्यशास्त्र का भी विवेचन किया।

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५८ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

इन सभी आचार्यों ने भरत के नाट्यशास्त्र और धनंजय के दशरूपक को अपनी रचना का आधार बनाया। अब यहाँ नाट्य-सिद्धान्त के रचनाकारों और उनकी रचनाओं पर प्रकाश डाला जा रहा है। सुविधा के लिए कालक्मानुसार उनके तीन भाग कर सकते हैं : १. भरत के पूर्ववर्त्ती आचार्य, २. मध्यवर्त्ती आचार्य और ३. उत्तरवर्ती आचार्य। भरत के पूर्ववर्त्ती आचार्य नाट्य-सिद्धान्त पर लिखे गये ग्रन्थों में सबसे प्राचीन ग्रन्थ भरत का नाट्यशास्त्र ही उपलब्ध है, परन्तु जिस प्रकार पाणिनि की अष्टाध्यायी के पहले भी व्याकरण के कई ग्रन्थ थे, और जिनका उल्लेख पाणिनि ने अपने ग्रन्थ में किया है, उसी प्रकार भरत के पहले भी कई नाट्याचार्य हो गये हैं, जिनका उल्लेख भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में किया है। भरत के उल्लेख के अतिरिक्त भी कुछ ऐसे प्रमाण हैं, जिनसे सिद्ध होता है कि उनके पूर्व भी नाट्य-विषयक ग्रन्थों के कई प्रणेता थे। शिलाली तथा कृशाश्व : पाणिनि ने अपने व्याकरण-ग्रन्थ में शिलाली तथा कृशाश्व नामक नटसूत्रों के रचयिता दो नाट्याचार्यों का उल्लेख किया है। वे नटसूत्र हैं : पाराशर्यशिलालिभ्यां भिक्षुनटसूत्रयो: (४।३।११०) और कर्मन्दकृशाश्वादिनि: (४।३।१११)। ये नट-सूत्र नाट्यशास्त्र पर लिखे गये मौलिक सूत्र रहे होंगे, परन्तु भरत का नाट्य- शास्त्र बन जाने पर उनका लोप हो गया होगा। प्रो० हिलेब्राण्ट ने भी माना है कि नाट्यशास्त्र पर भारत में सबसे प्राचीन ग्रन्थ इसे ही माना जाना चाहिए और यह अभिनेताओं के लिए लिखा गया था। सिल्वाँ लेवी भी यही मानते हैं। किन्तु, डॉ० कीथ का मत है कि ये नियम केवल नर्त्तकों एवं नटों के लिए बनाये गये होंगे और पाणिनि के समय में नाटक की विद्यमानता का कोई अन्य प्रमाण नहीं मिलता। उन्होंने 'नट' शब्द का अर्थ मौन अभिनय या मुद्रा-निरूपण स्वीकार किया है। उनका मत है कि इन सूत्रों का सम्बन्ध नाट्यशास्त्र से नहीं है। कोनो का कथन है कि इन दोनों के ग्रन्थों का अन्तर्भाव नाट्यशास्त्र में हो गया होगा। किन्तु, नटविद्या और बाजीगरी के लिए सूत्रों में रचने की कल्पना संगत नहीं जान पड़ती। वस्तुतः, यहाँ नट का अर्थ अभिनेता है। पाणिनि के प्रयोग से जान पड़ता है कि शैलालिन तथा कृशाश्विन् दो प्रकार के सम्प्रदाय के लोग थे, जो अपने आचार्यों के नाम पर पुकारे जाते थे; अर्थात् ये दोनों नाट्य-सम्प्रदाय थे। वस्तुतः, कृशाश्व तथा शिलाली दोनों आचार्यों ने अपने अलग-अलग संस्थान स्थापित किये, जहाँ नाट्यशास्त्र की शिक्षा प्रदान की जाती थी। इन संस्थानों में शिक्षा प्राप्त कर अभिनेता होते थे, शौभिक या निर्देशक होते थे। ऐसे ही शौभिक का उल्लेख पतंजलि ने अपने महाभाष्य में किया है, जो अपने एक अभिनेता को घायल कंस का अनुकरण करने का दंग सिखाता है। िशन क फगत कै गह उलेक की

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [५९

ऊपर लिखा जा चुका है कि डॉ० कीथ ने नट-सूत्रों को अवाक् अभिनय के अर्थ में ग्रहण किया है और उनके मत से इन्हें नाटक के अन्तर्गत गिनना उचित नहीं। किन्तु, यह मत असिद्ध हो जाता है। पतंजलि ने पाणिनि के एक सूत्र (१४।८९) का भाष्य करते हुए लिखा है : 'नटस्य शृणोति' अर्थात् अभिनेता की कही हुई बात श्रोता या दर्शक सुनता है। इसे ध्यान में रखकर डॉ० एस्० एम्० दासगुप्त का निष्कर्ष है कि दर्शक रंगशालाओं में स्पष्टतः वार्त्तालाप सुनने जाते थे, मुद्राभिनय देखने नहीं। इस तर्क के बल पर माना जा सकता है कि ई० पूर्व तीसरी शती में इस देश में रंगशालाएँ वर्त्तमान थी, जिनमें पौराणिक आख्यानों के आधार पर अभिनय होते थे और अभिनेता सम्भाषण का भी प्रयोग करते थे।' साथ ही यह भी कहना ठीक होगा कि शिलाली और कृशाश्व के नट-सूत्रों की रचना उस समय हुई जब इस प्रकार के अभिनय पर्याप्त रूप से लोकप्रिय थे। आगे चलकर अमरकोश में इन दोनों के नाम भरत के साथ नट के पर्याय-रूप में माने गये हैं। अमरसिंह ने अपने कोश में सम्भवतः चार परम्पराओं का उल्लेख किया है- शिलाली द्वारा प्रवत्तित नट-सूत्र, जिसके आधार पर अभिनय करनेवाले शैलूष कहे जाते थे; कृशाश्व द्वारा प्रवत्तित नट-सूत्र, जिनके आधार पर जायाजीव अभिनय करते थे; भरत द्वारा रचित नाट्यशास्त्र, जिसके आधार पर नट अभिनय करते थे, एवं लोकगाथाओं के गानेवाले कुशीलव।२ इनके ग्रन्थों और सूत्रों के विषय में हम अन्धकार में हैं, अतः नहीं कहा जा सकता कि इनका समय कब रहा होगा। कोहल : कोहल भी भरत के पूर्ववर्त्ती नाट्याचार्य हैं। आजकल इनका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है, परन्तु भरत, अभिनवगुप्त, शारदातनय आदि ने इनका और इनके मत का उल्लेख अनेक स्थानों पर किया है। भरत के नाट्यशास्त्र के अन्तिम अध्याय में कोहल, वात्स्य, शाण्डिल्य और धूर्त्तिल-इन चार प्राचीन नाट्याचार्यों का एक ही श्लोक में उल्लेख हुआ है : कोहलादिभिरेतैर्वा वात्स्यशाण्डित्यधूतिल: । एतच्छास्त्रं प्रयुक्तं तु नराणां बुद्धिवर्द्धनम् ॥3 अभिनवगुप्त ने अपनी टीका में अनेक स्थलों पर कोहल के मत का स्पष्ट उल्लेख किया है; जैसे प्रथम अध्याय में नान्दी का विवेचन करते समय 'इत्येषापि भारतीयत्वेन प्रसिद्धा कोहलप्रदर्शिता नान्दयुपपत्ना भवति।"४ षष्ठ अध्याय के दशम श्लोक में रस, भाव आदि ग्यारह अंगों का उल्लेख किया गया है। अभिनवगुप्त का मत है कि ये अंग भरत के मत से नहीं, वरन् कोहल के मत से हैं। इस प्रसंग में उन्होंने लिखा है : १. हिस्ट्री ऑव संस्कृत लिटरेचर; दासगुप्त एण्ड डे; पृ० ६४० २. अमरकोश, १०११२ ३. नाट्यशास्त्र, अध्याय ३६, श्लोक ७१ ४. हिन्दी-अभिनवभारती (आचार्य विश्वेश्वर), पृ० १३७

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६०] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अनेन तु श्लोकेन कोहलमतेन एकादशाङ्गत्वमुच्यते। न तु भरते।' इसी तरह कतिपय अन्य स्थलों पर भी अभिनवगुप्त ने भरत मुनि के मत से अन्तर दिखाते हुए कोहल के मत का उल्लेख किया है। इससे सिद्ध होता है कि भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के पहले कोहल का कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ प्रसिद्ध था, जिसके आधार पर अभिनवगुप्त ने उनके मत का स्पष्ट उल्लेख अपने ग्रन्थ में किया है। आंं केवल यही बात नहीं है कि अभिनवगुप्त ने कोहल के मत का उल्लेख अपने शब्दों में किया, प्रत्युत कई स्थलों पर उन्होंने कोहल के ही श्लोक उद्धृत किये हैं। चतुर्थ अध्याय (बड़ौदा-संस्करण, पृ० १८०) 'तदुक्तं कोहलेन' लिखकर-दो श्लोक, फिर अगले पृ० १८१ पर 'तदुक्तं चिरन्तनैः' से फिर आठ श्लोक और अगले पृ० १८२ पर 'यथोक्तं कोहलेन' लिखकर एक श्लोक स्पष्ट रूप से कोहल के नाम से उद्धत है। इस प्रकार, नाट्यशास्त्र और अभिनवभारती मिलाकर आठ स्थानों पर कोहल का उल्लेख किया गया है। परवर्त्ती आचार्यों में शारदातनय ने अपने ग्रन्थ 'भावप्रकाशन' में अनेक प्रसिद्ध एवं अप्रसिद्ध नाट्याचार्यों के मतों का स्पष्ट उल्लेख किया है। उन्होंने कोहल और उनके मत का स्पष्ट उल्लेख किया है। सप्तम अधिकार में बीज के विषय में कोहल का मत उद्धृत है : तस्याविच्छेदको हेतु: बिन्दुरित्याह कोहल:।2 पताका के विषय में कोहल का उल्लेख : तस्मात्पताका स्यान्नोति विकल्पं प्राह कोहलः।3 अष्टम अधिकार में अंक- कार्यकाल के विषय में कोहल का उल्लेख : प्रयुज्यते यदि भवेत्तत्राङ्क इति कोहलः।४ भाण के लक्षण में कोहल का मत : कोहलाविभिराचार्येरुक्तं भाणस्य लक्षणम्।4 सन्धि के विषय में कोहल का मत : मुखनिर्बहणे सन्धिरिति कोहलभाषितम्।६ 'कुट्टनीमत' में कोहल को भरत के साथ नृत्य का आचार्य माना गया है। 'रसार्णव-सुधाकर' में कोहल को भरतपुत्रों में स्मरण किया गया है। इससे स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि कोहल प्रसिद्ध नाट्याचार्य थे। उन्होंने नाट्य के विविध अंगों, नृत्य तथा संगीत पर अधिकृत रूप से लिखा था और नाट्याचार्य के रूप में उनकी प्रतिष्ठा रही है। किन्तु, अब उनका ग्रन्थ अप्राप्य है। धूरत्िल, शाण्डिल्य और वात्स्य : नाट्यशास्त्र के अन्तिम अध्याय का सूत्र ऊपर उद्धृत किया गया है, जिसमें कोहल के साथ धूर्त्तिल, शाण्डिल्य और वात्स्य का भी उल्लेख १. हिन्दी-अभिनवभारती (आचार्य विश्वेश्वर), पृ० ४१६ २. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० २०४ ३. वही, पृ० २१० ४. वही, अष्टम अधिकार, पृ० २३६ ५. वही, पृ० २४५ ६. वही, पृ० २५१

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भारतीय नाट्य-सिद्धांन्त का परिचय

भरत के श्लोक में किया गया है। इससे जान पड़ता है कि ये तीनों आचार्य पूर्ववर्ती हैं, यद्यपि ये तथा अनेक अन्य आचार्य भी भरत के पुत्रों में गिनाये गये हैं। अभिनवगुप्त ने दत्तिल का भी उल्लेख कोहल के ही समान अपने ग्रन्थ में किया है। संगीतवाले अध्याय में दत्तिल के मत का उल्लेख लगभग १४ बार किया है और उनके उद्धरण भी दिये हैं। 'कामसूत' में संकेत मिलता है कि पाटलिपुत्र की गणिकाओं के अनुरोध से उनके दैसिक भाग की रचना दत्तकाचार्य (दत्तिलाचार्य) ने की। रामकृष्ण कवि ने उनके ग्रन्थ 'गान्धर्ववेदसार' का उल्लेख किया है, जो अब अप्राप्य है। इससे सिद्ध हो जाता है कि कोहल के समान दत्तिल भी नाट्यशास्त्र के आचार्य हैं, जो भरत के पहले हो चुके हैं। ऊपर उद्धृत किये गये भरत मुनि के श्लोक में वात्स्य और शाण्डिल्य के भी नाम आये हैं। परन्तु, अभिनवगुप्त ने उनका कोई उद्धरण नहीं दिया। इसलिए, यह स्पष्ट रूप से कहना कठिन है कि उन्होंने कोई ग्रन्थ लिखा या नहीं। नखकुट्ट और अश्मकुट्ट : नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में नखकुट्ट तथा अश्मकुट्ट को भी भरत के सौ पुत्रों (या शिष्यों) में गिनाया गया। उसी प्रकार कोहल, दत्तिल, शाण्डिल्य और वात्स्य को भी पुत्रों में गिनाया गया है। परन्तु, जिस प्रकार कोहल और दत्तिल के उद्धरण अभिनवभारती आदि ग्रन्थों में पाये जाते हैं, उसी प्रकार नखकुट्ट और अश्मकुट्ट के भी उद्धरण अन्य ग्रन्थों में पाये जाते हैं। ये दोनों आचार्य समकालीन जान पड़ते हैं और यह भी जान पड़ता है कि दोनों एक ही स्थान के निवासी थे। विश्वनाथ ने साहित्य-दर्पण में नखकुट्ट का उद्धरण दिया है। सागरनन्दी ने अपने ग्रन्थ 'नाट्यलक्षण-रत्नकोश' में अश्मकुट्ट के अनेक उद्धरण दिये हैं। इससे सिद्ध होता है कि उनके समय तक इन दोनों आचार्यों की रचनाएँ वर्त्तमान थीं। स्पष्ट है कि ये दोनों नाट्यशास्त्र के प्राचीन आचार्य हैं। बादरायण : भरत-पुत्रों की सूची में बादरायण का भी नाम आया है।२ सागरननदी ने 'नाट्यलक्षण-रत्नकोश' में दो स्थलों पर बादरायण या बादरि के नाम से उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। उनके अनुसार बादरायण भी नाट्य पर विचार करनेवाले आचार्य हैं। इन उद्धरणों से जान पड़ता है कि बादरायण या बादरि ने नाट्यशास्त्र पर कोई ग्रन्थ लिखा होगा, जो आजकल उपलब्ध नहीं है। काह शातकर्णों या शालिकर्ण : शालीकर्ण, शालिकर्ण, शातकर्णी और शातकणि सम्भवतः एक ही व्यक्ति के नाम हैं। सिलेक्ट 'इन्सक्रिप्शन्स' (Select Inscriptions) के पृo १९१-२०७ के अनुसार विक्रम-पूर्व प्रथम शती से लेकर विक्रम-पश्चात् प्रथम शती के शिलालेखों में शातकर्णी का नाम देखा जाता है। सागरनन्दी के ग्रन्थ 'नाट्यलक्षण रत्नकोश' और रुचिपति-कृत टीका में शातकर्णी के उद्धरण मिलते हैं। शिलालेखों पर नाम होने से १. नाट्यशास्त्र, प्रथम अध्याय, श्लोक ३३ २. वही, श्लोक ३२

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६२ j भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अनुमान होता है कि ये राजा या राजपुरुष थे और इन्होंने नाट्यशास्त्र पर कोई ग्रन्थ लिखा होगा और ये कोई प्राचीन नाट्याचार्य रहे होंगे। इनका समय बहुत सुविधापूर्वक निश्चित किया जा सकता है; क्योंकि कुछ निश्चित समय के शिलालेखों में इनके नाम का उल्लेख मिलता है। कालिदास ने रघुवंश के त्रयोदश सर्ग के ३८-४० संख्या के श्लोकों में शातरकणि मुनि के विषय में लिखा है। ये मुनि इन्द्र की भेजी हुई अप्सराओं के मोह-जाल में फँस गये थे। रामचन्द्र जब पुष्पक विमान में बठकर लंका से अयोध्या लौट रहे थे, इनके आश्रम से उठी हुई संगीत-ध्वनि पुष्पक विमान तक पहुँच रही थी। भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय, श्लोक-संख्या २८ में शालिकर्ण नाम लिखित है। सम्भव है कि शातकर्णी और शालिकर्ण एक ही व्यक्ति के नाम हों। विशाखिल : काणे ने विशाखिल को भी एक पूर्ववर्त्ती नाट्याचार्य माना है। उनकी इस मान्यता का आधार वामन की काव्यालंकार-सूत्रवृत्ति (१; ३;७), कुट्टनीयत (५; १२३) और जभिनवभारती का साक्ष्य है। मध्यवर्त्ती नाट्याचार्य नन्दी (नन्दिकेश्वर) : नन्दी, नन्दि या नन्दिकेश्वर नामक नाट्याचार्य का उल्लेख अभिनवगुप्त और शारदातनय ने किया है। अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती के चतुर्थ अध्याय में नन्दिमत का स्पष्ट उल्लेख किया है, जिससे जान पड़ता है कि वे नन्दिकेश्वर से अवश्य परिचित थे। शारदातनय ने भावप्रकाशन में नन्दिकेश्वर और नन्दी का उल्लेख किया है : इति चिन्तापरे तस्मिन्नभ्यगान्नन्दिकेश्वरः।' उवाच वाक्यं ब्रह्माणं नन्दी तच्चिन्तितार्थवित् ।" शारदातनय ने नन्दिकेश्वर को भरत का गुरु बताया है। नन्दिकेश्वर ने भरत को नाट्यशास्त्र पढ़ाया और इसका प्रचार भारतों में करने की आज्ञा दी। नन्दिकेश्वर का नाम राजशेखर ने काव्यमीमांसा में लिया है और रसाधिकरण का आचार्य माना है: रूपकनिरूपणं भरतः रसाधिकरणं नन्दिकेश्वरः। इस प्रकार, यदि नन्दिकेश्वर भरत के गुरु नहीं तो समान कोटि के आचार्य ज्ञात होते हैं। ३३४ श्लोकों के उनके ग्रन्थ अभिनयदर्पण में भरत का नाम कई स्थानों पर आया है और नाट्यवेद-विषयक प्रसिद्ध कथा का भी उल्लेख है, जिसमें बताया गया है कि ब्रह्मा ने नाट्यवेद भरत को सौंपा था। इससे स्पष्ट होता है कि अभिनयदर्पण भरत के बाद की कृति है। १. भावप्रकाशन, तृतीय अधिकार, पृ० ५६ २. वही।

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय ८६३

B तुम्बुरु और चारायण : अभिनवगुप्त ने 'तुम्बुरेणेदमुक्तम्' लिखकर आगे तुम्बुरु का उद्धरण दिया है। सागरनन्दी ने 'नाट्यलक्षणरत्नकोश' में एक स्थल पर (श्लोक-संख्या २६२-६३ में) चारायण आचार्य का उल्लेख किया है। इन उद्धरणों से जान पड़ता है कि ये दोनों मध्यकालीन नाट्याचार्य थे और सम्भवतः इन्होंने ग्रन्थ-रचना भी की थी। सदाशिव : शारदातनय, धनंजय और अभिनवगुप्त ने अपने ग्रन्थों में सदाशिव का उल्लेख किया है। शारदातनय ने भावप्रकाशन में रस-स्वरूप के प्रसंग में लिखा है : प्रोक्तः सदाशिवेनास्य स्वरूपाश्रयनिर्णयः ।१ और इसके बाद सदाशिव का उद्धरण दिया है। इसी प्रकार, दशरूपक में भी सदाशिव के मत का उल्लेख किया गया है। अभिनवभारती में ब्रह्म और भरत के साथ सदाशिव का भी उल्लेख है। पद्मभू, द्रोहिणि, व्यास और आंजनेय : शारदातनय ने भावप्रकाशन में पद्मभू (पृ० ४७), द्रोहिणि (पृ० २३९), व्यास (पृ० २५१) और आंजनेय (पृ० २५१) का भी उल्लेख नाट्यकार के रूप में किया है। Tफनाह Fक तस्मान्नाट्यस्य रसा अष्टाविति पद्मभुवो मतम्।२ सात्त्वती वृत्तिरत्र स्यादिति द्रौहिणिरब्रवीत्।3 व्यासाञ्जनेयगुरवः प्राहुरङ्गत्नयं यदा।४

परन्तु, भावप्रकाशन में उनके केवल नाम का ही उल्लेख है, कोई उद्धरण नहीं दिया गया है। अतः यह कहना कठिन है कि इन आचार्यों ने किसी ग्रन्थ की भी रचना की थी या नहीं। कात्यायन : अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती के १४वें अध्याय में 'यथोक्तं कात्यायनेन' लिखकर: वीरस्य भुजदण्डानां वर्णने स्रग्धरा भवेत्। नायिकावर्णने कार्य वसन्ततिलकादिकम् ॥ शार्दूललीला प्राच्येष मन्दाक्रान्ता च दक्षिणे। इत्यादि। यह कात्यायन का उद्धरण दिया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि कात्यायन नाट्य- शास्त्र तथा छन्दःशास्त्र के किसी ग्रन्थ के रचयिता हैं। सागरनन्दी के 'नाट्यलक्षण- रत्नकोश' में भी कात्यायन उल्लिखित हैं। १. भावप्रकाशन, षष्ठ अधिकार, पृ० १५२।। २. वही, द्वितीय अधिकार, पृ० ४७ ३. वही, अष्टम अधिकार, पृ० २३९ ४. वही, पृ० २५१ ५. अभिनवभारती : अध्याय १४, पृ० २४५-४६

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

कराहुल तथा गर्ग : अभिनवभारती के चतुर्थ अध्याय (पृ० १३३ पर) अभिनव- गुप्त ने राहुल का उद्धरण दिया है और आगे (पृ० १७० पर) 'यथोक्तं राहुलेन' तथा 'ते च यथाह राहुलः' लिखकर उद्धरण दिये हैं। इन पंक्तियों तथा उद्धरणों से स्पष्ट हो जाता है कि राहुल ने भी नाट्यशास्त्र पर कोई ग्रन्थ लिखा होगा। इस बात की पुष्टि सागरनन्दी के द्वारा हो जाती है; क्योंकि उन्होंने भी 'नाट्यलक्षणरत्नकोश' में राहुल का उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट होता है कि राहुल ने नाट्य-सिद्धान्त पर कोई ग्रन्थ लिखा होगा। सागरनन्दी ने गर्ग का भी उल्लेख किया है, परन्तु इनका कोई उद्धरण प्रस्तुत नहीं किया है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इन्होंने किसी ग्रन्थ की रचना नहीं की होगी। शकलीगर्भ तथा घण्टक : अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती के द्वितीय अध्याय में शकलीगर्भ नामक नाट्याचार्य का उल्लेख किया है। फिर उसी अध्याय में अन्यत्न 'घण्टकाद- परत्वाहुः लिखा है जिसमें घण्टक नामक किसी दूसरे नाट्याचार्य का उल्लेख हो जाता है। इससे जान पड़ता है कि मध्यकाल के नाट्याचार्यों में शकलीगर्भ तथा घण्टक नामक आचार्यों ने भी नाट्य-सम्बन्धी ग्रन्थों की रचना की थी। घण्टक श्रीशंकुक के समसामयिक जान पड़ते हैं, परन्तु शकलीगर्भ के समय के विषय में कुछ निश्चित रूप से कहना कठिन है। वात्तिककार हर्ष : अभिनवभारती के अनेक स्थलों पर अभिनवगुप्त ने वार्त्तिककार का उल्लेख किया है। प्रथम भाग के पृ० १७० पर 'वार्त्िककृताप्युक्तम्', पृ० १७२ पर 'यद्वात्िककार', पृ० २०९ पर 'श्रीहर्षस्तु', पृ० २१०, उक्तं च वात्तिके' आदि शब्दों में वार्त्तिककार का स्पष्ट उल्लेख अनेक प्रकार के हुआ है। सागरनन्दी ने नाट्यलक्षण- रत्नकोश में (श्लोक ३२२५) हर्ष विक्रम वार्त्तिककार का उल्लेख किया है। शारदातनय ने भावप्रकाशन में 'तदेव तोटकं भेदो नाटकस्येति हर्षवाक्" लिखकर हर्ष का उल्लेख किया। इससे जान पड़ता है कि हर्ष या हर्षविक्रम नाम के किसी आचार्य ने इस वार्तिक की रचना की। यह वात्तिक सम्भवतः नाट्यशास्त्र पर ही लिखा गया था। परन्तु, कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि वार्त्तिक नाट्यशास्त्र की व्याख्या के रूप में नहीं था, प्रत्युत कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ रहा होगा। काणे के मतानुसार हर्ष-वार्त्तिक में नाटक-सम्न्बधी सभी प्रकार की सामग्री प्राप्त होने की सम्भावना है। अनुमान है कि यह सम्पूर्ण ग्रन्थ आर्या छन्द में रचा गया था; बीच में गद्य-भाग और नाट्य-साहित्य के उद्धरण भी दिखाई देते हैं। रामकृष्ण कवि ने अंगहारों के वात्तिक के एक अंश के प्राप्त होने की सूचना गायकवाड़ ओरियण्टल सिरीज द्वारा प्रकाशित नाट्यशास्त्र के द्वितीय भाग की भूमिका में दी है: "The following Vartika on Sthira hasta (first Angahara) may be compared with our commentator's observations on the same (Vol. 1, Page 140). इत्येवं करणग्रामः सम्यग्योजनया कृतः।ाठैफ निर्वर्त्तत्यङ्गहारः १ भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २३८ २. नाट्यशास्त्र, द्वितीय भाग, भूमिका।

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [६५ ) राजतरंगिणी में हर्ष विकरमादित्य नामक राजा का वर्णन मिलता है, जिनके द्वारा मातृगुप्त नामक कवि को राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित किये जाने का उल्लेख है। अनुमान लगाया जाता है कि हर्षवात्तिक की रचना करनेवाले ये ही हर्ष विकमादित्य रहे होंगे। इसी प्रकार, अभिनवगुप्त ने अभिनव भारती के द्वितीय अध्याय, पृ० ४३६ पर संग्रह और संग्रहकार का उल्लेख किया है। भरत ने भी नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय, कारिका ३ और १० में संग्रह की चर्चा की है। ऐसा प्रतीत होता है कि भरत के समय में कोई संग्रह विद्यमान था, जिसे अभिनवगुप्त भी जानते थे। सम्भवतः, इसमें सभी पूर्वाचार्यों के मतों का संग्रह था और यह भी सम्भव जान पड़ता है कि इसी के आधार पर भरत ने भी अपने ग्रन्थ की योजना बनाई हो। संग्रहकर्त्ता का नाम अज्ञात ही है, किन्तु यह भी सम्भव है कि स्वयं भरत ने यह कार्य किया हो और इसलिए यह ग्रन्थ आगे चलकर आदिभरत के नाम से विख्यात हो गया हो। मातृगुप्त : इस मध्ययुग के नाट्यकारों में मातृगुप्त का भी नाम सम्मान से लिया जाता है। सिल्वाँ लेवी ने इन्हें नाट्यशास्त्र का व्याख्याकार माना है, किन्तु कतिपय अन्य व्याख्याकारों ने उनके जो उद्धरण प्रस्तुत किये हैं, उनसे प्रतीत होता है कि इन्होंने इस विषय में किसी स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना की थी। यह सम्भव है कि इन्होंने स्थान-स्थान पर नाट्यशास्त्र के मत की व्याख्या गद्य में की हो। काश्मीर के राजा हर्ष विक्रमादित्य के साथ मातृगुप्त का नाम राजतरंगिणी में मिलता है। राघव भट्ट ने अभिज्ञानशाकुन्तल की टीका में मातृगुप्ताचार्य के नाम से कई पद्य उद्धृत किये हैं। यह पद्य नाटक के पारिभाषिक शब्दों की व्याख्या के रूप में प्रस्तुत हुए हैं; जैसे नान्दी, सूत्रधार, नाटक तथा यवनिका के लक्षण देते समय राघव भट्ट ने मातृगुप्ताचार्य के ही पद्य प्रस्तुत किये हैं। उन्होंने पृ० १५ पर भरत के आरम्भ और बीज से सम्बद्ध पद्य उद्धृत करते समय लिखा है : अत्न विशेषो क्वचित् कारणमात्रन्तु क्वचिच्च फलदर्शनम्।' इन उद्धरणों से अनुमान लगाने का कारण है कि मातृगुप्त ने नाट्यशास्त्र पर कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखा था। शारदातनय ने भी भावप्रकाशन के पृ० २३४ पर मातृगुप्त का मत उद्धृत किया है। सन् १६१३ ई० में सुन्दर मिश्र ने 'नाट्यप्रदीप' नामक ग्रन्थ की रचना की। इसमें उन्होंने भरत के नाट्यशास्त्र के पंचम अध्याय के २५ तथा २८ संख्या के दो श्लोकों के अनुसार नान्दी का लक्षण दिया है। उस पद्य की व्याख्या करते समय मातृगुप्त के मत का उल्लेख इन शब्दों में वणित है : अस्य व्याख्याने मातृगुप्ताचार्ये: बोडशाङिघ्रपदापीयमुदाहता।२ १. आचार्य विश्वेश्वर द्वारा उद्धत, हिन्दी-अभिनवभारती, भूमिका, पृ० १२ २. वही, भूमिका, पृ० १३

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६६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास इस उद्धरण से जान पड़ता है कि मातृगुप्त भरत के नाट्यशास्त्र के व्याख्याता तथा टीकाकार हैं, परन्तु राघव भट्ट द्वारा प्रस्तुत उद्धरणों से स्पष्टतः प्रतीत होता है कि इन्होंने किसी स्वतन्त्र ग्रन्थ की रचना की थी। कुछ लोग कालिदास के साथ मातृगुप्त का कोई सम्बन्ध जोड़ते हैं और कुछ लोग दोनों को एक ही मानते हैं। यह कथा भी प्रचलित है कि थोड़े समय के लिए मातृगुप्त काश्मीर के राजा भी हुए थे। परन्तु, आधुनिक विद्वान् इसका कोई उल्लेख नहीं करते। इनके समय के विषय में निश्चित रूप से कुछ भी कहना कठिन है। अभिनव ने इनका उद्धरण दिया है, अतः ये अभिनव के पूर्ववर्ती हैं। इसके अतिरिक्त सागरनन्दी ने, जो अभिनवगुप्त के पूर्ववर्ती हैं, मातृगुप्त का नामोल्लेख किया है। यदि वात्तिककार हर्ष राजतरंगिणी में वर्णित काश्मीर के महाराजा हर्ष विक्रमादित्य ही हैं और यदि ये मातृगुप्त उस ग्रन्थ में व्णित उनके समकालीन मातृगुप्त ही हैं, तो इनका समय चतुर्थ शती के अन्त और पंचम शती के आरम्भ में माना जा सकता है। उनके ग्रन्थ के उद्धरणों से पता चलता है कि उन्होंने नाट्यशास्त्र-सिद्धान्त तथा संगीतशास्त्र पर लिखा था। सुबन्धु : शारदातनय ने भावप्रकाशन में सबन्धु का उल्लेख निम्नलिखित पंक्ति में किया है : सुबन्धुर्नाटकस्यापि लक्षणं प्राह पञ्चधा।' तदनन्तर उन्होंने सुबन्धु के मतानुसार नाटक के पाँच भेदों का विवेचन किया है। यह निश्चित रूप से कहना कठिन है कि ये सुबन्धु कौन थे। यह भी कहना कठिन है कि ये नाट्याचार्य सुबन्धु और प्रख्यात गद्यकाव्य वासवदत्ता के रचयिता सुबन्धु एक ही व्यक्ति हैं या भिन्न-भिन्न व्यक्ति। यदि वासवदत्ता के रचयिता से शारदातनय का अभिप्राय है तो इनका समय पंचम शती में माना जाना चाहिए। मारुति : शारदातनय ने भावप्रकाशन में नायिका-भेद के प्रसंग में मारुति नामक किसी नाट्याचार्य का उल्लेख निम्नलिखित पंक्ति में किया है : साधारणास्ते सर्वासां स्त्रीणामित्याह मारुतिः ।२ किन्तु, अन्य विद्वानों ने इनके विषय में कुछ नहीं लिखा। अतः, इनके विषय में कुछ कहना कठिन है। सम्भवतः, इन्होंने भी नाट्यशास्त्र पर कोई ग्रन्थ लिखा हो। वासुकि : शारदातनय ने भावप्रकाशन में रसोत्पत्ति के प्रसंग में वासुकि का मत बहुत विस्तार से उद्धृत किया है; नामोल्लेख-मात्र नहीं किया है : इति वासुकिनाष्युक्तो भावेभ्यो रससम्भवः।3

१. भावप्रकाशन, अष्टम अधिकार, पृ० २३८ २. वही, पंचम अधिकार, पृ० ११४ ड्रिग ३. वही, द्वितीय अधिकार, पृ० ३७ FP

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [६७ सम्भवतः इन्होंने भी नाट्य-सम्बन्धी कोई ग्रन्थ लिखा है। अन्य ग्रन्थकारों ने इनका भी नामोल्लेख नहीं किया है। अग्निपुराण तथा विष्णुधर्मोत्तर-अग्निपुराण में नाट्य, नृत्य, रस आदि का बहुत विस्तृत विवेचन उपलब्ध होता है। इसमें ३३७ से ३४१ तक के अध्याय नाट्यकला पर हैं। ३३७वें अध्याय में नाटकों के भेद, प्रस्तावना, अर्थ-प्रकृति तथा पंच सन्धियों, ३३८वें में रस, स्थायीभाव, अनुभावादि एवं नायक-नायिका के विवरण हैं। ३३९वें में चार रीतियों तथा चार वृत्तियों का, ३४०वें में नृत्यकला के अंग-विक्षेप और ३४१वें में अभिनय का विवेचन किया गया है। अग्निपुराण का समय दण्डी के बाद सप्तम शती में माना जाता है। इसी तरह विष्णुधर्मोत्तर में भी नाट्य, नृत्य आदि का विचार काफी विस्तार से किया गया है। किन्तु, यह सम्पूर्ण विवेचन भरत मुनि के नाट्यशास्त्र के ही आधार पर हुआ है। अनेक स्थलों पर भरत की ही कारिकाएँ उद्धृत कर दी गई हैं। अतः, इन्हें स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं कहा जा सकता। भरत मुनि : भरत मुनि के नाट्यशास्त्र का भारतीय साहित्य में विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान है। इस अकेले ग्रन्थ में नाट्य का जितना पूर्ण विवेचन मिलता है, उतना पूर्ण और सांगोपांग वर्णन संसार के किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं। इसके अतिरिक्त इसमें अनेक शास्त्रों, शिल्पों आदि का विवेचन है। स्वयं भरत मुनि ने इस ओर संकेत किया है : न तज्ज्ञानं न तच्छिल्पं न सा विद्या न सा कला। नासौ योगो न तत्कर्म नाट्येऽस्मिन् यन्र विद्यते।। वस्तुतः, नाट्यशास्त्र में अनेक शास्त्रों, अनेक कलाओं, अनेक शिल्पों और अनेक विद्याओं का विवेचन किया गया है। प्राचीन भारत के तत्सम्बन्धी ज्ञान का इसे कोश ही कहा जा सकता है। नाटकों के मूल तत्त्वों, रंगमंच तथा अन्य आवश्यक उपकरणों के विस्तृत एवं सूक्ष्म वर्णन के साथ ही तत्कालीन समाज की मनोवृत्तियों और विशिष्टताओं का अद्भुत चित्रण इस ग्रन्थ में देखा जा सकता है। ऋषियों के प्रश्न के उत्तर में भरत ने बताया कि चूँकि वेद शूद्रों द्वारा नहीं पढ़े जा सकते, अतः इस सार्ववर्णिक वेद की रचना हुई। इस विशाल ग्रन्थ में कला-सम्बन्धी किसी भी पक्ष का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरण प्राप्त किया जा सकता है। भाषा, अलंकारशास्त्र, संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगसाजी, स्थापत्य तथा मूत्तिकला का एक स्थान पर इतना विस्तृत विवेचन विश्व के किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं मिल सकता। प्राचीन भारतीय सभ्यता तथा संस्कृति का यह उपजीव्य ग्रन्थ है, जिसने हजारों वर्षों तक मनुष्यों के मानस पर प्रभाव डाला है।

१. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, कारिका ११६ शम्बोद गाम,लाककात

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास भारत में नाट्यशास्त्र का सबसे प्राचीन ग्रन्थ भरत का नाट्यशास्त्र है। साहित्यिक मान्यताओं और परवर्ती आचार्यों की रचनाओं में दिये गये संकेत से पता चलता है कि भरत प्रथम नाट्याचार्य थे। परवर्त्ती आचार्य धनंजय ने दशरूपक में भरत की वन्दना आद्याचार्य के रूप में की है (१-२)। धनंजय के समय तक (सन् ९७४-९९५ ई०) भरत को आद्याचार्य का गौरव प्राप्त था। राजशेखर ने 'काव्यमोमांसा' में रूपक का आचार्य भरत को बताया है : 'रूपकनिरूपणं भरतः'। इस प्रकार कई प्रमाण मिलते हैं, जो भरत को नाट्यशास्त्र का प्रथम आचार्य घोषित करते हैं। किन्तु, वर्त्तमान नाट्यशास्त्र को देखकर इसे संस्कृत-नाट्य-समीक्षा की परिणति मानना अधिक समीचीन होगा, आदि स्थापना या व्यवस्था का प्रयत्न मानना अपेक्षाकृत कम। प्रश्न उठता है कि यह किस भरत का लिखा ग्रन्थ है। यह थोड़ा जटिल और विवादास्पद प्रश्न है। इसमें तो सन्देह नहीं कि भरत मुनि इसके रचयिता हैं, परन्तु भरत मुनि के विषय में निश्चित रूप से कहना कठिन है। भारतीय परम्परा में कतिपय व्यक्ति भरत नाम के पाये जाते हैं। रामचन्द्र के छोटे भाई भरत या दुष्यन्त के पुत्र भरत या मान्धाता के पौत्र भरत नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत मुनि नहीं हो सकते; क्योंकि वे राजपुत्र थे, मुनि नहीं। भरत नाम के इन तीन व्यक्तियों के अतिरिक्त आदिभरत, वृद्धभरत तथा जड भरत नाम के तीन भरतों का उल्लेख संस्कृत-साहित्य में प्राप्य है। इन्हीं में एक, दो या तीनों को नाट्यशास्त्र का प्रणेता माना जा सकता है। नाट्यशास्त्र का जो रूप आज उपलब्ध है, वह मूल रूप में नहीं है। कई बार इसका सम्पादन हो चुका है। अतः, माना जा सकता है कि तीनों भरत किसी-न-किसी रूप में नाट्यशास्त्र के निर्माता थे। भावप्रकाशन में शारदातनय ने नाट्यशास्त्र के दो संस्करणों का स्पष्ट उल्लेख किया है। इनमें प्रथम संस्करण का रचयिता आदिभरत या वृद्धभरत को और द्वितीय संस्करण का रचयिता भरत को माना जाता है। आदिभरत या वृद्धभरत ने जो नाट्यशास्त्र लिखा था, वह कलेवर और आकार में वर्त्तमान नाट्यशास्त्र से दूना बड़ा था। उसमें बारह हजार श्लोक थे, इसलिए उसे द्वादशसाहस्री संहिता कहते हैं। वर्त्तमान नाट्यशास्त्र में छह हजार श्लोक हैं, अतः इसे षट्साहस्त्री संहिता कहते हैं। पहलेवाले दीर्घकाय नाट्यशास्त्र का संक्षिप्त रूप छह हजार श्लोकों का लघुरूप भरत ने बनाया। इन दोनों संहिताओं में यही भेद है। दोनों संहिताओं का उल्लेख शारदातनय ने निम्नलिखित श्लोक में किया है : एकं द्वादशसाहस्त्रः श्लोकरेक तदर्द्धतः। षड्भि: श्लोकसहस्त्रेभ्यो नाट्यवेदस्य सङग्रहः ।' इससे सहज अनुमान हो सकता है कि जिन्होंने द्वादशसाहस्री संहिता की रचना की थी, उन्हें भरत या वृद्धभरत की संज्ञा से याद किया गया और जिन्होंने षट्साहसत्री संहिता का निर्माण किया, उन्हें केवल भरत कहा गया। १. भावप्रकाशन, दशम अधिकार, पृ० २८७

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [६९ यह बहुत जटिल तथा विवादास्पद प्रश्न रहा है कि दोनों रचनाओं में कौन रचना पूर्व की है। पिशेल तथा मैक्डोनल विस्तृत रचना को प्राचीन मानते हैं, परन्तु लक्ष्मणस्वरूप लघु रचना को प्राचीन मानने के पक्ष में हैं। रामकृष्ण कवि विस्तृत रचना को प्राचीन मानने के पक्ष में हैं। यह निर्विवाद है कि १०वीं शती तक दोनों रचनाओं का प्रचार हो चुका था। बहुरूप मिश्र ने दशरूपक की टीका में विस्तृत और लघु दोनों से उद्धत किया है। धनंजय ने दशरूपक में लघुपाठ से उद्धृत किया, तो भोज ने बृहत् पाठ से उद्धृत किया। अभिनवगुप्त ने लघुपाठ को अपना आधार बनाया। मनमोहन घोष ने रामकृष्ण कवि का मत स्वीकार किया और इसके पक्ष में अन्य तर्क भी दिये हैं। किन्तु, ऐसा जान पड़ता है कि दोनों पाठों या रचनाओं में रचना-विस्तार के अन्तर के अतिरिक्त कोई तात्त्विक अन्तर नहीं है। "ऐसी स्थिति में यह कल्पना भी की जा सकती है कि पूर्ववर्त्ती रचयिताओं के नाट्यसूत्रों का संकलन वृद्धभरत के नाम से बाद में प्रसिद्ध हुआ, जबकि भरत ने अपने पूर्ववर्त्ती समस्त नाट्य-सामग्री का निरीक्षण करके उसके आधार पर नाट्यशास्त्र की एक व्यवस्थित ग्रन्थ के रूप में रचना की। उन्होंने अपने से पूर्ववर्त्ती आचार्यों की सामग्री का उपयोग किया, उनके मतों को प्रस्तुत किया और उनपर विचार करके अपना मत भी निर्धारित किया।"१ आचार्य अभिनवगुप्त ने भी स्वीकार किया है कि नाट्यशास्त्र में कई स्थानों पर पूर्वाचार्यों के ऐसे मत मिलते हैं, जिनको मुनि ने यथास्थान निवेशित किया है।२ दोनों संहिताओं के निर्माता भरत ही हैं, इससे यह अनुमान किया जा सकता है कि नाट्यशास्त्र के रचयिता के रूप में जिस भरत का उल्लेख होता है, वह एक व्यक्ति का नाम नहीं, अपितु एक उपाधि-विशेष है। ऐसा प्रतीत होता है कि कदाचित् भरत नाम की कोई उपाधि रही हो, जो अपने समय के प्रधान नाट्याचार्य को दी जाती हो। इसलिए, कुछ विद्वानों का मत है कि भरत वास्तविक नहीं, वरन् कल्पित नाम है। मेरा मत है कि पीछे भले ही यह कल्पित नाम हो गया हो, परन्तु आरम्भ में भरत नाम के कोई नाट्याचार्य अवश्य रहे होंगे और परवर्त्ती नाट्याचार्यों को यह नाम दे दिया जाता हो; जैसे आदि शंकराचार्य नामक संन्यासी विद्वान् हुए, परन्तु बाद में शंकराचार्य द्वारा स्थापित सभी मठों की गद्दी पर बैठनेवालों को शंकराचार्य की पदवी दे दी गई। नाट्यशास्त्र में 'भरत' शब्द का प्रयोग अभिनेता के अर्थ में हुआ है : षष्ठे कृत्वा कुतपं नाट्यं युक्ते यतो मुखं भरतः।3 नाट्यशास्त्र की अपेक्षा प्राचीन ग्रन्थ याज्ञवल्क्यस्मृति को माना जाता है। उसमें 'भरत' और 'अभिनेता' दोनों शब्दों का प्रयोग एक ही अर्थ में हुआ है, ऐसा जान पड़ता है : यथा हि भरतो वर्णेर्वणयत्यात्मनस्तनुम्।४ इस प्रकार, अभिनेता के अर्थ में 'भरत' शब्द के १. नाट्यशास्त्र : अनुवादक डॉ० रघुवंश, भूमिका। २. अभिनवभारती, भाग १, पृ० ३२८ ३. नाट्यशास्त्र, अध्याय १३, कारिका ६६ ४. याज्ञवल्क्यस्मृति, ३।१६३

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७० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

प्रयोग से दो अनुमानों को स्थान मिलता है। पहला तो यह कि अभिनेताओं या भरतों ने अपने पेशे को महत्त्व प्रदान करने के निमित्त भरत नामक कल्पित ऋषि के नाम पर इस नाट्यशास्त्र की रचना की; दूसरा अनुमान है कि भरत कोई वास्तविक मुनि नाट्याचार्य अवश्य थे, जिनके नाम पर नाट्यकला के ज्ञाता भरत कहे गये। डॉ० काणे ने पहले अनुमान को युक्तिपूर्ण मानकर स्वीकार किया है। नाट्यशास्त्र का समय : नाट्यशास्त्र अत्यन्त प्राचीन ग्रन्थ है। प्रश्न उठता है कि इसके रचयिता भरत मुनि का समय क्या है ? इस सम्बन्ध में विद्वानों के अनेक मत हैं। कुछ विद्वान् भरत मुनि का समय ईसा के पूर्व दूसरी शती और अन्य कुछ विद्वान् पंचम शती ई० पू० मानते हैं। कुछ अन्य विद्वान् ईसा की दूसरी शती और दूसरे विद्वान् इससे भी बाद का समय मानते हैं। कुछ ऐसे भी विद्वान् हैं, जो भरत का तो समय ईसा की तीसरी या चौथी शती मानते हैं, परन्तु नाट्यशास्त्र के वर्त्तमान रूप को उस काल का नहीं मानते। डॉ० एस्० के० दे के मतानुसार नाट्यशास्त्र के संगीतवाले अध्याय चौथी शती के हैं, परन्तु नाट्यशास्त्र के रूप में निरन्तर परिवर्त्तन होते रहे और अनुमान है कि उसका वर्त्तमान उपलब्ध संस्करण आठवीं शती के अन्त तक का है। इतना तो निर्विवाद है कि आज हमें अलंकारशास्त्र, रसशास्त्र तथा नाट्यशास्त्र से सम्बन्ध रखनेवाले जितने भी ग्रन्थ उपलब्ध हैं, उनमें भरत का नाट्यशास्त्र प्राचीनतम है। भरत के समय के निर्धारण में सहायक रूप में कुछ बाह्य साक्ष्य और अन्तस्साक्ष्य हमें प्राप्य हैं। पहले बाह्य साक्ष्य पर ध्यान दें। कालिदास के विक्रमोर्वशीय नाटक के एक स्थल (२।१८) पर भरत का संकेत मिलता है। उस समय तक भरत इतने प्रख्यात हो चुके थे कि कालिदास इन्द्र के सम्मुख भरत के अभिनय की ओर संकेत करते हैं। उस समय तक भरत केवल नाट्याचार्य ही नहीं रह गये थे, प्रत्युत पौराणिक व्यक्तित्व प्राप्त कर चुके थे। वे मुनि थे और ब्रह्मा से उन्होंने नाट्यवेद की शिक्षा ग्रहण की थी। नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में भरत ने नाटक की उत्पत्ति की कथा बताई है, इसका संकेत कालिदास के पद्य में मिलता है। विक्रमोर्वशीय नाटक के प्रथम अंक का वह पद्य निम्नांकित है : मुनिना भरतेन यः प्रयोगो भवतीष्वष्टरसाश्रयो निबद्धः। ललिताभिनयं तमद्य भर्त्ता मरुतां द्वष्टुमना: स लोकपाल:॥ इससे स्पष्ट हो जाता है कि भरत का समय कालिदास से काफी पहले, लगभग २०० वर्ष पहले, है। हरप्रसाद शास्त्री ने नाट्यशास्त्र का रचना-काल ईसा-पूर्व दूसरी शती माना है। लेवी ने कुछ शब्दों-जैसे स्वामी, सुगृहीतनामन् और भद्रमुख-के प्रयोग के आधार पर नाट्यशास्त्र का रचनाकाल क्षत्रपों का शासन-काल माना है; क्योंकि उनके अभिलेखों में इन शब्दों का प्रयोग पाया जाता है। किन्तु, काणे ने इस मत का युक्तिपूर्ण खण्डन कर दिया है। डॉ० कीथ ने इसका रचना-काल ईसा की तीसरी शती स्वीकार किया है, इससे

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय

पहले का समय मानने को वे तैयार नहीं। इस ग्रन्थ के तिथि-निर्धारण के सन्दर्भ में डॉ० कीथ ने एक प्रमाण यह भी दिया है कि भरत के नाट्यशास्त्र के लक्षण अश्वघोष के नाटकों में अन्तर्निहित विषयों से मेल नहीं खाते। जैसे भरत द्वारा अनुमोदित प्राकृत अश्वघोष के नाटकों में नहीं मिलती जबकि भास के नाटकों में प्रयुक्त प्राकृत बहुलांश में इससे साम्य रखती है; यद्यपि भास के नाटकों को देखने से यह भी ज्ञात होता है कि ईसा की तीसरी शती तक भरत के नाट्यशास्त्र की नियामकता सर्वमान्य नहीं हो सकी थी; क्योंकि भास के नाटकों में भरत के सभी नियम स्वीकृत नहीं हुए थे। मनमोहन घोष ने अनेक दृष्टियों से परीक्षा करके तथा अभिलेखों के आधार पर सिद्ध किया है कि नाट्यशास्त्र का वर्त्तमान रूप ईसा की दूसरी शती में विद्यमान था। कालिदास ने नाट्यशास्त्र के अनेक नियमों का पालन नहीं किया है, इससे यह सिद्ध नहीं होता कि वे नाट्यशास्त्र के पूर्व के कवि हैं। कालिदास ने अनेक ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है, जिनसे सिद्ध हो जाता है कि वे नाट्यशास्त्र से पूर्ण परिचित थे। विक्रमोर्वशीय के पद्य का उल्लेख ऊपर किया जा चुका है। कुछ अभिलेखों में उल्लिखित शक, यवन आदि जातियों का उल्लेख नाट्यशास्त्र में भी है। इन सब साक्ष्यों के आधार पर नाट्यशास्त्र का समय ईसा की दूसरी शती के आसपास माना जाता है। डॉ० घोष ने इस मत का भी खण्डन किया है कि चूँकि भास के नाटकों में नाट्यशास्त्र के नियमों का उल्लंघन है, इसलिए वे भरत के पूर्ववर्ती हैं। भास के नाटकों में ऐसे अनेक प्रयोग मिलते हैं, जिनसे सिद्ध हो जाता है कि वे नाट्यशास्त्र से परिचित थे; उदाहरणार्थ विदूषक का प्रयोग, प्रस्तावना, सूत्रधार, प्रेक्षक, चारी, गति, भद्रमुख, हाव, भाव, मारिष आदि को प्रस्तुत कर सकते हैं। उपर्यक्त साक्ष्यों के आधार पर डॉ० मनमोहन घोष नाट्यशास्त्र का समय भास के पूर्व दूसरी शती के लगभग मानते हैं। डी० सी० सरकार ने नाट्यशास्त्र में महाराष्ट्र तथा नेपाल के उल्लेख के आधार पर उसका समय दूसरी शतो के बहुत बाद का माना है; क्योंकि नेपाल का प्रथम उल्लेख समुद्रगुप्त की प्रशस्ति में चौथी शती में और महाराष्ट्र का उल्लेख महावंश, पाँचवी शती, में है। काणे ने इस मत का खण्डन इस तर्क पर किया है कि क्यों न माना जाय कि नेपाल और महाराष्ट्र का प्रथम उल्लेख नाट्यशास्त्र में ही हुआ है। काणे का मत है कि नाट्य- शास्त्र का समय ईसवी सन् के आरम्भ के बहुत पहले नहीं माना जा सकता, परन्तु उनके अनुसार बाद की तिथि अधिक निश्चय से निर्धारित की जा सकती है। सन् ४५० ई० के पहले कालिदास के विक्रमोर्वशीय (२।१८) से पता चलता है कि उस समय तक भरत को नाट्यशास्त्र का अधिष्ठाता स्वीकार किया जा चुका था और उसमें आठ ही रसों की चर्चा है। 'कुट्टनीमत' में नाट्यशास्त्र के विभिन्न अध्यायों की सामग्री उपलब्ध होती है, जिससे स्पष्ट होता है कि दवीं शती तक इसके सभी प्रमुख अध्याय अपनी वर्त्तमान स्थिति में थे। बाण ने कादम्बरी और हर्षचरित में भरत द्वारा प्रवत्तित संगीत का उल्लेख किया है। इससे सिद्ध हो जाता है कि छठी शती तक नाट्यशास्त्र का वर्त्तमान पाठ

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स्थिर हो चुका था। दूसरी ओर, याज्ञवल्क्यस्मृति में नाट्यशास्त्र की सामग्री ग्रहण की गई है और गाथा सत्तसई में नाट्यशास्त्र के पूर्वरंग-सम्बन्धी मत की चर्चा है। अतः, दूसरी शती तक इसकी पूर्व तिथि पहुँच जाती है। इसी प्रकार, भरत के नाट्यशास्त्र में कुछ ऐसे अन्तस्साक्ष्य वर्त्तमान हैं, जिनसे उसकी प्राचीनता का आभास मिलता है। नाट्यशास्त्र में ऐन्द्र व्याकरण और यास्क के निरुक्त के कुछ उद्धरण मिलते हैं, परन्तु पाणिनि के नहीं मिलते। इससे अनुमान होता है कि नाट्य- शास्त्र उस काल की कृति है, जब पाणिनि के व्याकरण का बहुत बोलबाला नहीं था या कम-से-कम उसके सामने ऐन्द्र व्याकरण का महत्त्व अभी कम नहीं हो पाया था। नाट्यशास्त्र में अनेक स्थलों पर बहुत प्राचीन सूत्रों और श्लोकों के उद्धरण पाये जाते हैं : 'अव्ानुवंश्ये आर्ये भवतः', 'तत्र श्लोकः' आदि। यदि नाट्यशास्त्र की भाषा या उसकी प्रतिपादन-शैली पर ध्यान दें, तो स्पष्ट हो जायगा कि यह बहुत प्राचीन ग्रन्थ है। प्राचीनता के कारण भरत भी भरत मुनि के नाम से प्रख्यात हो गये हैं। प्राचीनकाल में बहुत-से ग्रन्थ सूत्र-परिपाटी में लिखे जाते थे। नाट्यशास्त्र भी अनेक स्थलों पर सूत्र- परिपाटी में लिखा गया है। कई टीकाकारों ने भरत की रचना को सूत कहा है और भरत को सूत्रकृत् की संज्ञा दी है। नान्यदेव ने भरत को सूत्रकृत के नाम से स्मरण किया- 'कलानामानि सूत्रकृदुक्तानि यथा'-अभिनवगुप्त ने भी भरत के नाट्यशास्त्र को भरत- सूत्र कहा है : 'षटतिशकं भरतसूत्रमिदं विवृण्वन्-' इन प्रमाणों के आधार पर अनुमान किया जाता है कि भरत का समय कालिदास के समय से कम-से-कम दो शती पूर्व का है। किन्तु, स्वयं कालिदास का समय विवाद का विषय है। कुछ विद्वान् कालिदास का समय ईसा की चौथी शती मानते हैं, उस दशा में भरत का समय ईसा की दूसरी शती होगा। नाट्यशास्त्र का विस्तार तथा विषय : ऊपर लिखा जा चुका है कि प्राचीन ग्रन्थों में नाट्यशास्त्र की द्वादशसाहस्त्री और षट्साहस्री दो संहिताओं का उल्लेख पाया जाता है, परन्तु आजकल द्वादशसाहस्री संहिता उपलब्ध नहीं है, केवल पट्साहस्री संहिता ही प्राप्य है। तात्पर्य यह कि आजकल के नाट्यशास्त्र में केवल छह हजार श्लोक हैं। आजकल नाट्यशास्त्र के दो संस्करण मिलते हैं-एक में ३६ अध्याय हैं और दूसरे में ३७ अध्याय। अभिनवगुप्त ३६ ही अध्याय मानते हैं, जैसा कि षट्त्िशक भरत-सूत्र नाम से स्पष्ट होता है। परन्तु इसके साथ ही उन्होंने ३७वें अध्याय पर भी अपनी भारती लिखी है। साथ ही, उन्होंने इस ३७वें अध्याय का अलग से मंगलाचरण लिखा है, जिससे प्रतीत होता है कि वे ३६ अध्याय की परम्परागत मान्यता स्वीकार करते हुए भी इस अध्याय की व्याख्या कर रहे हैं। नाट्यशास्त्र की जो प्रतियाँ उत्तर और दक्षिण में मिली हैं, उनमें भी यह भेद दिखाई देता है। उत्तर की प्रतियों में ३७ अध्याय हैं, परन्तु दक्षिण की प्रतियों में

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३६वाँ और ३७वाँ दोनों अध्याय एक ही साथ ३६वें अध्याय में कर दिये गये हैं। वस्तुतः जहाँ ३७ अध्याय हैं, वहाँ भी कोई अन्तर नहीं; क्योंकि ३६वें अध्याय के ही दो भाग करके ३६वें और ३७वें अध्याय में करके रख दिये गये हैं। इस दृष्टि से दोनों में कोई अन्तर नहीं है। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि अभिनवगुप्त ने ही ३६वें अध्याय को दो भागों में बाँटकर ३७वाँ अध्याय भी बना दिया है। ३७वाँ अध्याय बनाना उन्हें ही अभीष्ट था, तथापि ३६ अध्यायवाली परम्परा को सर्वथा भंग करना उन्हें अभीष्ट नहीं था। वे अपने शैव-सिद्धान्तों का मेल शैव-सिद्धान्त के ३६ तत्त्वों से करना चाहते थे। इन तत्त्वों से परस्थित 'अनुत्तर' तत्त्व का संकेत करने के लिए उन्होंने ३६वें अध्याय में ३७वें अध्याय का निर्माण कर दिया है। प्रस्तुत नाट्यशास्त्र की रचना-शैली, प्रयोग आदि के आधार पर ऐसा अनुमान किया जाता है कि इसकी रचना अनेक विद्वानों ने विभिन्न समय पर की है; क्योंकि इसमें अनेक स्तर हैं। नाट्यशास्त्र में गद्य का भी प्रयोग मिलता है और षष्ठ तथा सप्तम अध्यायों में तो गद्य का पर्याप्त प्रयोग हुआ है। बहुत श्लोक तथा आर्याएँ आनुवंश्य हैं, बहुत श्लोक तथा आर्याएँ 'सूत्रानुबद्ध' भवतः, लिखकर उद्धृत हैं। लगभग १०० छन्द 'भवन्ति चात् श्लोकः', 'अतार्ये भवतः', 'अत श्लोकाः' के रूप में उद्धृत किये गये हैं। शेष ग्रन्थ की रचना श्लोक, आर्या, उपजाति आदि वृत्तों में हुई है। इस ग्रन्थ में सूत्र, भाष्य, संग्रह, कारिका, निरुक्ति आदि अनेक शैलियों और पद्धतियों का प्रयोग किया गया है। नाट्यशास्त्र में गद्य का भी पर्याप्त प्रयोग हुआ है, इससे प्रतीत होता है कि यह सूत्र- ग्रन्थ होगा। भवभूति और अभिनवगुप्त के उल्लेखों से भी इसकी पुष्टि होती है। परन्तु, नाट्यशास्त्र में प्रयुक्त गद्य में सूत्र और भाष्य दोनों ही हैं। यह धारणा भी भ्रामक है कि सूत्र केवल गद्य में ही होते हैं। गृह्यसूत्र, धर्मसूत्र आदि ग्रन्थों में गद्य के साथ पद्य का भी प्रयोग हुआ है। अतः, नाट्यशास्त्र की मूल रचना में गद्य और पद्य दोनों का प्रयोग सम्भव है। अभिनवगुप्त ने प्रस्तुत नाट्यशास्त्र को भरत-सूत्र नाम दिया है। आनुवंश्य श्लोकों के विषय में कहा जा सकता है कि भरत ने इन श्लोकों और आर्याओं को वंश-परम्परा-पितृ या गुरु- से लिया है। जिन श्लोकों और आर्याओं को भरत ने 'सूत्रानुविद्धे आर्ये भवतः' कहकर लिखा है, उन्हें अभिनवगुप्त भरत-कृत मानते हैं, परन्तु इन श्लोकों को प्राचीन आर्या के रूप मानना उचित है, जिस प्रकार 'अवार्याः', 'अतार्ये भवतः' कहकर उल्लिखित श्लोकों को मानते हैं। अभिनवगुप्त ने माना है कि ये श्लोक प्राचीन आचार्यों के संग्रहों से भरत ने उद्धृत किये हैं। इस विषय में यह स्पष्ट रूप से स्वीकारकिया जाना चाहिए कि भरत ने अपने पूर्ववर्त्ती आचार्यों के मतों को उद्धत किया है-कहीं उनका समर्थन किया है और कहीं उनसे असहमति प्रकट की है। ऐसा उन्होंने अपने मूल ग्रन्थ में भी किया है। वास्तव में योजना, विषय-प्रतिपादन आदि दृष्टियों से देखा जाय तो नाट्यशास्त्र बहुत ही व्यवस्थित, सुनियोजित तथा सुसम्पादित ग्रन्थ है। कुछ लोग कहते हैं कि जैसे व्यासों की परम्परा ने पुरागों की रचना की, वैसे ही भरतों की परम्परा ने नाट्यशास्त्र की

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रचना की। परन्तु, ध्यान देने पर यह कथन युक्तियुक्त नहीं प्रतीत होता। नाट्यशास्त्र में सुनियोजित रीति से विषय का प्रतिपादन किया गया है, इससे इसकी रचना की एकता और संघटना सिद्ध होती है। भरत के पूर्व जितने नाट्याचार्य हुए, सबके विचारों और मान्यताओं के आधार पर उन्होंने व्यवस्थित और संगठित रूप से अपने ग्रन्थ की रचना की। ग्रन्थ-रचना के समय उन्होंने स्वतन्त्रतापूर्वक अपने पूर्ववर्त्ती आचार्यों के मतों तथा सामग्री का उपयोग किया है। नाट्यशास्त्र के सम्बन्ध में एक और बात ध्यान देने की है। कुछ लोगों का कथन है कि यह ग्रन्थ भरत मुनि का लिखा हुआ नहीं है, प्रत्युत उनके किसी शिष्य का लिखा हुआ है। जान पड़ता है कि यह मत अभिनवगुप्त के समय में भी प्रचलित था। अभिनव- गुप्त ने इस मत का पूरा खण्डन किया है और सिद्ध किया है कि नाट्यशास्त्र भरत मुनि की ही रचना है, दूसरे की नहीं। अपने खण्डन को समाप्त करते समय उन्होंने भारती में निम्नलिखित पंक्तियाँ लिखी हैं : एतेन सदाशिवब्रह्मभरतमतत्रयविवेचनेन ब्रह्ममत- सारताप्रतिपादनाय मतत्रयं सारासार विवेचनं प्रक्षेपेण विहितमिदं शास्त्रं न तु मुनिरचितमिति त्वाहुर्नास्तिकधुर्योपाध्यायास्तत्प्रयुक्तम्। नाट्यशास्त्र की धार्मिक प्रेरणा : धर्म नाट्यशास्त्र की मुख्य प्रेरणा और शक्ति है। भारतीय साहित्य में धर्म और नैतिकता घनिष्ठ रूप से सम्बद्ध हैं। वैदिक साहित्य में धर्म का एक उदार रूप दृष्टिगत होता है, किन्तु परवर्त्ती साहित्य में धर्म का रूप क्रमशः जटिल होता गया और आचार तथा नैतिकता पर अत्यधिक बल देने के कारण जीवन में नीरसता बढ़ती गई। नाट्यशास्त्र ने एक ओर धर्म के आतंक को कम करने का प्रयास किया है, तो दूसरी ओर उसके सर्वव्यापी प्रभाव को मान्यता दी है। भरत ने नाट्यशास्त्र को पंचम वेद की संज्ञा दी, इससे ध्वनित होता है कि चारों वेदों के अतिरिक्त एक पंचम वेद की भी आवश्यकता का अनुभव किया गया था। इस पंचम वेद में उन बातों का समावेश किया गया है, जो चारो वेदों में नहीं हैं और यह उन लोगों के लिए है, जो उन वेदों के पढ़ने के अधिकारी नहीं हैं। यह सार्वर्वणिक वेद है। 20. इस प्रकार, नाट्यवेद हिन्दूधर्म की रूढिवादिता का विरोधी दिखाई देता है, परन्तु दूसरी ओर इसमें धर्म का प्रभाव भी दिखाई देगा, जिसके कारण भरत को स्मृतिकारों के समान मुनि स्वीकार कर लिया गया है। नाट्यशास्त्र को वेद कहा गया और इसके सम्यक प्रयोग से देवताओं की प्रसन्नता तथा मोक्ष आदि माहात्म्य रूप में बताये गये। नाट्यशास्त्र ने जिन कार्यावस्थाओं का निर्देश किया, उनमें भारतीय धर्म और आदर्श की प्रेरणा स्पष्टतया देखी जा सकती है। वास्तविक जीवन में असफलता भी होती है, निराशा भी मिलती है, परन्तु नाट्यशास्त्र फलागम को अनिवार्य मानता है। जीवन-यात्रा का मुख्य उद्देश्य आनन्द प्राप्त करना है; अतः कष्ट पड़ सकते हैं, परन्तु फलागम होगा ही, इसमें सन्देह नहीं। इस सिद्धान्त का ऐसा प्रभाव पड़ा कि सभी भारतीय नाटककारों ने सुखान्त नाटकों की रचना की, क्योंकि दुःखान्त नाटक भारतीय दर्शन के फलागम के सिद्धान्त के विरुद्ध पड़ते हैं।

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नाट्यशास्त्र ने वर्णाश्रम-धर्म के अनुसार भारतीय समाज के गठन के अनुरूप सामाजिक व्यवहारों की व्यवस्था दी। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्त्तव्यों-व्यवहारों, भाषा-शब्दावली, सम्बोधन आदि की व्यवस्था पूर्णरूप से स्मृति के नियमों के अनुसार की गई। सम्भवतः, शूद्र नाटक में सर्वाधिक भाग लेते थे, इसलिए शूद्र अभिनेताओं को शापित भरत-पुत्रों का वंशज कहा गया। भरत के नाट्यशास्त्र के व्याख्याता : आगे चलकर भरत के नाट्यशास्त्र जैसे महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ पर स्वभावतः अनेक टीकाएँ और व्याख्याएँ लिखी गईं। भरत द्वारा स्थापित सिद्धान्तों को इस अमूल्य ग्रन्थ के भाष्यकारों ने और भी विकसित तथा पल्लवित किया। उन टीकाओं तथा व्याख्याओं में कुछ ही आजकल उपलब्ध हैं। इनसे नाट्यशास्त्र के विकास में बहुत सहायता मिलती है। कई टीकाएँ आजकल प्राप्य नहीं हैं; जैसे हर्षकृत वार्तिक, शाम्याचार्य राहुल-कृत कारिकाएँ, मातृगुप्त-टीका, कीत्तिधर-टीका। इनमें से कुछ के उद्धरण अभिनवगुप्त ने अपनी भारती में दिये हैं। शाङ्गदेव ने अपने संगीतरत्नाकर में लोल्लट, उद्भट, शंकुक, अभिनवगुप्त और कीतिधर का उल्लेख किया है : व्याख्यातारो भारतीये लोल्लटोट्भटशङकुकाः। महाभिनवगुप्तश्च श्रीमत्कीत्तिधरोऽपरः ॥

इनके अतिरिक्त अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती में भट्टोद्भट, भट्ट यन्त्र तथा भट्ट नायक का उल्लेख किया है। अभिनवगुप्त ने कीत्तिधर का एक बार उल्लेख किया है और इन्हें आचार्य कहा है, इसलिए जान पड़ता है कि ये प्राचीन टीकाकारों में थे। अभिनव ने नान्यदेव को भरत-भाष्य का लेखक माना है, अतः ये भी प्राचीन टीकाकार होंगे। आजकल भरत के नाट्यशास्त्र पर अभिनवभारती को छोड़कर कोई अन्य टीका या व्याख्या प्राप्य नहीं है, किन्तु इनके पूर्व ही भट्टलोल्लट, श्रीशंकुक, भट्टनायक आदि विद्वानों ने टीकाएँ लिखी थीं। अभिनवभारती के ही साक्ष्य पर यह कहा जा सकता है। मम्मट ने काव्यप्रकाश में भरत के रससूत्र की जो व्याख्या दी है, उसमें भी उन्होंने उद्भट, लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्त-इन पाँच टीकाकारों के मतों का उल्लेख किया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि नाट्यशास्त्र पर कम-से-कम पाँच टीकाएँ अवश्य लिखी गई थीं। अब इन व्याख्याताओं का संक्षिप्त परिचय दिया जा रहा है। आचार्य कीत्िधर : कीतिधर का उल्लेख अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती में केवल एक बार चतुर्थ अध्याय के अन्त में किया है। परन्तु, इनके नाम के साथ अभिनवगुप्त ने विशेष सम्मान-सूचक आचार्य शब्द का प्रयोग किया है : इति कीतिधराचार्याः । इस प्रकार, विशेष सम्मान देने के कारण जान पड़ता है कि ये कदाचित् सबसे प्राचीन और प्रतिष्ठित

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व्याख्याकार या टीकाकार थे। यदि कीतिधर सबसे प्राचीन टीकाकार थे, और उद्भट के पूर्ववर्त्ती थे, तो इनका काल सप्तम शती में मानना चाहिए। भाष्यकार नान्यदेव : अभिनवगुप्त ने नान्यदेव को भरत-भाष्य का लेखक माना है। अतः ये भी एक आरम्भिक टीकाकार माने जा सकते हैं। नान्यदेव नाम के एक राजा मिथिला में हो चुके हैं, परन्तु राजा नान्यदेव भाष्यकार नान्यदेव से अवश्य ही भिन्न होंगे। राजा नान्यदेव का समय १२वीं शती में अर्थात् अभिनवगुप्त के बाद पड़ता है। अतः, उनका उल्लेख अभिनवगुप्त नहीं कर सकते थे। भाष्यकार नान्यदेव निश्चय ही कोई भिन्न व्यक्ति हैं। अभिनवगुप्त ने नान्यदेव को भरत के भाष्यकार के रूप में निम्नलिखित शब्दों में स्मरण किया है : 'उक्त नान्यदेवेन एव भरतभाष्ये।'

भट्ट उद्भट : अभिनवगुप्त ने भट्ट उद्भट के मत को कई बार (मनमोहन घोष के अनुसार तीन बार) उद्धृत किया है। आचार्य मम्मट ने भी रससूत्र की व्याख्या करते समय उद्भट को रससूत्र का व्याख्याकार माना है और उनका मत उद्धत किया है। शार्ङ गदेव ने अपने संगीतरत्नाकर में उद्भट का उल्लेख नाट्यशास्त्र के व्याख्याताओं में किया है। इन प्रमाणों से स्पष्ट हो जाता है कि भट्ट उद्भट नाट्यशास्त्र के टीकाकार और व्याख्याकार हैं। अभिनव ने यह भी बताया है कि भट्टलोल्लट ने भट्ट उद्भट की आलोचना की है और उनके मत से अपनी असहमति प्रकट की है। अभिनवभारती के षष्ठ अध्याय की दशम कारिका की व्याख्या में अभिनव ने उद्भट का उल्लेख इस प्रकार किया : 'निर्देशे चैतत् क्रमव्यत्ययादित्योद्भटः।' उसी स्थल पर उन्होंने यह भी लिखा : 'नैतदिति भट्ट- लोल्लट:।' इस विवरण से प्रतीत होता है कि भट्टलोल्लट ने भट्ट उद्भट की व्याख्या का खण्डन किया है। अतः, भट्ट उद्भट को भट्ट लोल्लट का पूर्ववर्त्ती माना जाना चाहिए। विद्वानों ने भट्ट लोल्लट का काल सप्तम शती का अन्तिम भाग या अष्टम शती का आरम्भिक भाग माना है। इसलिए, उद्भट का समय लोल्लट के कुछ पहले सप्तम शती का मध्यकाल माना जाना चाहिए। भट्टलोल्लट : अभिनवगुप्त ने भट्टलोल्लट को भी कई बार (आचार्य विश्वेश्वर के अनुसार दस बार और मनमोहन घोष के अनुसार ग्यारह बार) उद्धत किया है। इनका समय दवीं शती का आरम्भिक भाग माना जाता है। सम्भवतः, भट्टलोल्लट ने भरत के नाट्यशास्त्र पर कोई व्याख्या लिखी थी, जो आज अप्राप्य है। उन्होंने भरत के रससूत्र 'विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः' की व्याख्या की, जिसमें उन्होंने संयोग से कार्यकारण-भावरूप सम्बन्ध और 'निष्पत्ति' से 'उत्पत्ति' अर्थ ग्रहण किया। लोल्लट ने रस की स्थिति नटों और सामाजिकों में नहीं मानी, प्रत्युत रामादि अनुकार्यों में ही मानी। रस के प्रसंग में उनका सिद्धान्त उत्पत्तिवाद है। वे मीमांसक थे और साथ ही व्यंजना- विरोधी भी। वे अभिधा-शक्ति को ही सभी काव्यार्थ का साधन मानते थे। उनका मत था कि शब्द के प्रत्येक अर्थ की प्रतिपत्ति अभिधा-शक्ति से उसी प्रकार हो जाती है,

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कफे भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय जिस प्रकार बाण कवच को छेदकर और शरीर में प्रवेश कर प्राणों का अपहरण कर लेता है। इसी मत को मम्मट ने इन शब्दों में व्यक्त किया है : सोयऽमिषोरिव दीर्घ- दीर्घतरोऽभिधाव्यापारः। उनके अनुसार दीर्घदीर्घतर अभिधा-व्यापार से ही व्यंग्य कहे जानेवाले अर्थ की प्रतीति हो जाती है। भट्टलोल्लट के मत का प्रभाव कुछ अंश में दशरूपककार धनंजय और दशरूपक की टीका अवलोकवृत्ति के लेखक धनिक पर पड़ा है। लोल्लट नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि वे काश्मीरी थे। श्रीशंकुक : अभिनवगुप्त ने अभिनवभारती में श्रीशंकुक का १५ बार उल्लेख किया है। रस-प्रसंग से ज्ञात होता है कि वे भरत के नाट्यशास्त्र के टीकाकार और व्याख्याता थे। किन्तु, उनकी लिखी टीका अब अप्राप्य है, और अभिनवगुप्त तथा मम्मट के उल्लेखों से ही उनकी व्याख्या के विषय में ज्ञात होता है। उनके समय के विषय में हम निश्चय के साथ अनुमान कर सकते हैं। सम्भवतः, भुवनाभ्युदय नामक काव्य के रचयिता वही हैं, जो काश्मीर के राजा अजितापीड के समय में लिखा गया था। उनका काल सन् ८१३ ई० के आसपास है। अतः इनका काल नवीं शती का पूर्वार्द्ध है। राजतरंगिणी में अजितापीड के वर्णन के सिलसिले में इनका भी नाम निम्नांकित श्लोक में आया है : कविर्बुधमनःसिन्धुः शशाङ्क: शङकुकाभिधः। यमुदि्दिश्याकरोत् काव्यं भुवनाभ्युदयाभिधम् ।१ इस श्लोक से स्पष्ट हो जाता है कि श्रीशंकुक ने अजितापीड की प्रशंसा में भुवनाभ्युदय नामक काव्य-ग्रन्थ लिखा था। शार्ङ्गधर-पद्धति और सूक्ति-मुक्तावली में श्रीशंकुक को मयूर का पुत्र बताया गया है। पर ये मयूर कौन हैं ? क्या सूर्यशतक के रचयिता? यदि यह सत्य है, तो श्रीशंकुक का समय सातवीं शती के आसपास होगा। किन्तु, हमारे नाट्यशास्त्री श्रीशंकुक को इस काल का नहीं माना जा सकता। स्पष्टतः, दोनों शंकुक भिन्न-भिन्न हैं। भरत के व्याख्याकार और भुवनाभ्युदय काव्य के रचयिता एक ही हैं और उनका समय नवीं शती मान सकते हैं। श्रीशंकुक भी काश्मीरी ही थे। श्रीशंकुक ने भरत के रससूत्र की जो व्याख्या की, उसे अनुमितिवाद की संज्ञा दी गई। वे नैयायिक थे और उन्होंने विभावादिक साधनों और रसरूप साध्य में अनुमाप्य-अनुमापक भाव की कल्पना की। इस प्रकार, उनकी दृष्टि में रस अनुमेय या अनुमिति-गम्य है। इसके अतिरिक्त उन्होंने चित्र-तुरंग न्याय की नई कल्पना की है। इस कल्पना के अनुसार अनुकर्त्ता नट सच्चे अनुकार्य रामादि नहीं हैं, बल्कि वे चित्र में लिखे घोड़े की तरह राम हैं। यह कल्पना दशरूपककार धनंजय को भी मान्य है। श्रीशंकुक ने रस की स्थिति उसी प्रकार सहृदयों या सामाजिकों में मानी है, जैसे घोड़े के चित्र को देखकर अनुभव होता है। उन्होंने ही सबसे पहले भट्टलोल्लट के उत्पत्तिवाद का १. राजतरंगिणी, ४।७०४

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खण्डन किया। जो लोग मानते थे कि सहृदय में रस की स्थिति नहीं है, उनका भी खण्डन शंकुक ने किया। भट्टनायक : भरत के नाट्यशास्त्र के व्याख्याताओं तथा टीकाकारों में भट्टनायक का भी प्रमुख स्थान है। अभिनवगुप्त ने भारती में उनका उल्लेख छह बार किया है। अभिनवगुप्त के अतिरिक्त जयरथ, महिमभट्ट तथा रुय्यक ने भी उनके मत का उल्लेख किया है। इनलोगों ने भट्टनायक की रचना हृदय-दर्पण का भी निर्देश किया है। हृदय- दर्पण भट्टनायक का स्वतन्त्र ग्रन्थ था या भरत के नाट्यशास्त्र पर टीका, इस विषय में विद्वानों में दो मत हैं। डॉ० एस० के० दे का मत है कि हृदय-दर्पण नाट्यशास्त्र का टीका-ग्रन्थ नहीं, वरन् अलंकारशास्त्र का स्वतन्त्र ग्रन्थ था। आजकल हृदय-दर्पण उपलब्ध नहीं है, परन्तु दक्षिण में एक प्रति थी, जिससे पता चलता है कि यह नाट्यशास्त्र की टीका के ही रूप में लिखा गया था। आजकल यह भी प्रति प्राप्य नहीं है। भट्टनायक ध्वनिकार आनन्दवर्द्धन के ही समकालीन थे। सम्भवतः, ये भी आनन्दवर्द्धन के आश्रयदाता काश्मीर- राज अवन्तिवर्मा के ही राजकवि थे। अवन्तिवर्मा का समय सन् ८५५-८८४ ई० है। अतः भट्ट नायक का समय नवीं शती का उत्तरार्द्ध तथा दसवीं शती का पूर्वार्द्ध होता है। डॉ० कीथ ने भट्टनायक को शंकर वर्मन के समय का विद्वान् माना है। शंकर वर्मन का समय सन् ८३३-९०२ ई० है। भट्टनायक भी भट्टलोल्लट, श्रीशंकुक, महिमभट्ट तथा कुन्तक के समान अभिधावादी तथा व्यंजना-विरोधी हैं। वे व्यंजनावृत्ति अथवा ध्वनि की कल्पना नहीं मानते। रससूत्र की व्याख्या में उनका सिद्धान्त भुक्तिवाद कहा जाता है। भट्टनायक सांख्य मत के अनुयायी हैं और रस-सिद्धान्त में भी वे सांख्य मत का ही अनुकरण करते हैं। उनके भुक्तिवाद के सिद्धान्त के अनुसार काव्य में भावकत्व और भोजकत्व-दो व्यापारों की कल्पना है। रससूत्र में आये संयोग का अर्थ वे भाव्य-भावक-सम्बन्ध मानते हैं और निष्पत्ति से भुक्ति या आस्वाद का अर्थ लेते हैं। वे रस की स्थिति सहृदय में ही मानते हैं। भट्टनायक ने ही साधारणीकरण के सिद्धान्त का प्रवर्त्तन किया, जिसका विस्तार अभिनवगुप्त ने किया। धनंजय और धनिक पर भी भट्टनायक के सिद्धान्त का प्रभाव पड़ा। भट्टयन्त्न : अभिनवगुप्त ने भट्टयन्त्र का केवल एक बार उल्लेख किया है, जिससे ज्ञात होता है कि वे भी नाट्यशास्त्र के व्याख्याता थे। इनके विषय में विशेष कुछ भी ज्ञात नहीं है। केवल इतना ही ज्ञात है कि ये अभिनवगुप्त के कुछ पहले हुए। अभिनवगुप्तपादाचार्य : भरत के नाट्यशास्त्र पर लिखित टीकाओं और व्याख्याओं में सर्वाधिक पूर्ण, प्रसिद्ध एवं महत्त्वपूर्ण टीका अभिनवगुप्त की अभिनवभारती या नाट्यवेद- विवृति है। यही टीका उपलब्ध भी है। १०वीं शती के मध्य में अभिनवगुप्त ने भरत के नाट्यशास्त्र की व्याख्या लिखकर मध्यकाल के व्यवधान में होनेवाले परिवर्त्तनों को ध्यान में रखते हुए, नाट्यशास्त्र के विकास की नवीन दिशा का संकेत किया। अभिनवगुप्त का

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय

समय १०वीं शती का अन्त और ११वीं शती का आरम्भ है। ७वीं शती से १४वीं शती तक काश्मीर में नाट्यशास्त्र तथा काव्यशास्त्र के अनेक प्रसिद्ध आचार्य हुए हैं। यहाँ काव्यशास्त्र और साहित्य के गम्भीर चिन्तन एवं अनुशीलन की गौरवपूर्ण परम्परा रही है। वस्तुतः, कश्मीर शतियों तक संस्कृत-विद्या-विशेषतः काव्यशास्त्र-का प्रसिद्ध तथा प्रतिष्ठित केन्द्र रहा है। काव्यशास्त्र के साथ ही प्रत्यभिज्ञान शैव-सिद्धान्त का निरूपण काश्मीर में इसी युग में हुआ, जिसे काश्मीरी शैवमत कहा जाता है। यहाँ के काव्याचार्यों एवं अलंकार- शास्त्रियों ने काव्य-सौन्दर्य की समुचित व्याख्या के लिए इस शैवमत का सहारा लिया है। इस युग के काश्मीरी काव्यशास्त्री, नाट्यशास्त्री तथा संगीतशास्त्रियों ने सौन्दर्यानुभूति की व्याख्या का आधार इस शैवमत के दर्शन को बनाया है। ा इन्हीं काश्मीरी पण्डितों की गौरवमयी परम्परा में अभिनवगुप्तपादाचार्य एक देदीप्यमान नक्षत्र हैं। अभिनव ने अपने माता-पिता, कुल, गुरु तथा समय के विषय में स्वयं अपने ग्रन्थों में संकेत किया है। उनके पिता का नाम नरसिंहगुप्त या चुखुलक था: तस्यात्मजश्चुखुलकेति जने प्रसिद्धश्चन्द्रावदातधिषणो नरसिंहगुप्तः। यं सर्वशास्त्ररसमज्जनशुभ्नचित्तं माहेश्वरी परमलङकुरुते स्म भक्ति:॥ अभिनवगुप्त के गुरु महेन्द्रराज तथा भट्टतौत थे-उनके गुरुओं की सूची बहुत लम्बी है। उन्होंने सात गुरुओं के नामों के साथ उन शास्त्रों के नाम दिये, जो उन्होंने उनसे पढ़े। फिर तेरह गुरुओं के नाम दिये हैं, परन्तु उनके साथ शास्त्रों का उल्लेख नहीं है। गुरु महेन्द्रराज स्वयं कवि भी थे; क्योंकि अभिनवगुप्त ने अपने लोचन में उनके पद्यों के उद्धरण दिये हैं। साहित्यशास्त्र उन्होंने महेन्द्रराज से पढ़ा। भट्टतौत प्रसिद्ध मीमांसक थे और सम्भवतः अभिनव ने उनसे मीमांसाशास्त्र का अध्ययन किया था। उनके पिता स्वयं शैव-आगम के प्रसिद्ध विद्वान् और शिवभक्त थे। अभिनव ने अपने पिता से व्याकरण पढ़ा। कि.B अभिनवगुप्त ध्वनि-सम्प्रदाय के संस्थापक आचार्य हैं, साथ ही नाट्यशास्त्र के भी प्रख्यात आचार्य। इसके अतिरिक्त उनके व्यक्तित्व में शैव-दर्शन का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है। उन्होंने धवनिवाद और नाट्यशास्त्र पर कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं लिखा, टीकाएँ ही लिखीं। ध्वनि-सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक आनन्दवर्द्धन के ध्वन्यालोक पर अभिनव ने लोचन नाम का टीका-ग्रन्थ लिखा और भरत के नाट्यशास्त्र पर अभिनवभारती लिखी। दोनों ग्रन्थ अमूल्य हैं। स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं होते हुए भी विद्वत्समाज में इनका आदर किसी आकर- ग्रन्थ से कम नहीं है। वस्तुतः ये दोनों टीका-ग्रन्थ अलंकारशास्त्र तथा रसशास्त्र के मूर्धन्य ग्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त तन्त्रशास्त्र और शैव-आगम पर अभिनव ने अनेक ग्रन्थ लिखे। उन्होंने अन्तिम पुस्तक सन् १०१५ ई० में लिखी थी। ऐसा जान पड़ता है कि अभिनव ने काव्यशास्त्र पर एक तीसरी भी पुस्तक लिखी थी। उनकी यह तीसरी साहित्यशास्त्रीय

१. तन्त्रालोक, ३७

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

पुस्तक काव्य-कौतुक-विवरण थी, जो अब अप्राप्य है। सब मिलाकर अभिनव ने ४०-४१ ग्रन्थों की रचना की थी। अभिनवगुप्त शैव दार्शनिक के साथ ही साहित्य में ध्वनिवादी और व्यंजनावादी भी थे। अतः, उनके रसपरक सिद्धान्त का आधार व्यंजनावाद और शैवदर्शन दोनों ही हैं। वे रस को व्यंग्य मानते हैं, और भरत के प्रसिद्ध रससूत्र में आये शब्द 'संयोग' का अर्थ 'व्यंग्य-व्यंजक भावरूप' और 'निष्पत्ति' का अर्थ 'अभिव्यक्ति' करते हैं। उनकी स्थापना है कि रस की स्थिति सहृदय सामाजिक में होती है, अनुकर्ता नट या अनुकार्य रामादि में नहीं। जान पड़ता है कि वे रस-दशा को शैवों की विमर्श-दशा से जोड़ते हैं। यह कहना कठिन है कि धनंजय और धनिक अभिनवगुप्त के सिद्धान्तों से परिचित थे या नहीं; क्योंकि वे दोनों अभिनव के ही समय के थे। पर जान पड़ता है कि वे आनन्दवर्द्धन के व्यक्तिवादी मत और रस-सम्बन्धी मत से पूर्ण परिचित थे, जो अभिनव से भी पहले रस में व्यंग्यत्व स्थापित कर चुके थे। तभी उन्होंने दशरूपककारिका तथा अवलोकवृत्ति में व्यंजना की कल्पना का तथा रस के व्यंग्यत्व का प्रचण्ड विरोध किया है। रस-निष्पत्ति के अतिरिक्त अभिनवगुप्त की एक अन्य नई स्थापना है। यह शान्त रस की स्थापना है। भरत ने नाट्यशास्त्र में आठ ही रसों की स्थापना की है, परन्तु अभिनव ने नाट्यशास्त्र के ही आधार पर भारती में शान्त रस जैसे नवम रस की स्थापना की है। यह शान्त रस अभिनव के शैवदर्शन वाले सिद्धान्त के सर्वथा अनुकूल है। अभिनवगुप्त का रचनाकाल ११वीं शती के आरम्भ तक है। उनकी 'ईश्वर- प्रत्यभिज्ञाविमर्शिणी' की रचना सन् १०१५ ई० में हुई थी, इसका संकेत स्वयं उन्होंने एक पद्य में दिया है, जिसके अनुसार इस ग्रन्थ का रचनाकाल कलिसंवत् ४०९० अर्थात् सन् १०१५ ई० है। अभिनवगुप्त की सर्वश्रेष्ठ देन है रस-सिद्धान्त की पूर्ण व्याख्या। उन्होंने रस को व्यंग्य माना। उन्होंने रससूत्र की जो व्याख्या की और जिस रस-सिद्धान्त की स्थापना की, वह मम्मट से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक मान्य रहा है। संस्कृत के नाट्यशास्त्र तथा काव्यशास्त्र के विद्वानों में अभिनवगुप्त का स्थान अन्यतम है। उत्तरवर्त्ती नाट्य-साहित्यकार अबतक नाट्यशास्त्र के पूर्वाचार्यों का परिचय दिया गया, फिर मध्यवर्त्ती ग्रन्थकारों का और फिर भरत के नाट्यशास्त्र के टीकाकारों तथा व्याख्याकारों का परिचय संक्षेप में दिया गया। अब नाट्यशास्त्र के परवर्त्ती आचार्यों का परिचय दिया जा रहा है। यद्यपि इन आचार्यों ने अपने स्वतन्त्र ग्रन्थों की रचना की, फिर भी बहुलांश में वे नाट्यशास्त्र के आभारी हैं। नाट्यशास्त्र के ही किसी अंश-विशेष के आधार पर उन्होंने अपने ग्रन्थों का निर्माण किया है। धनंजय का दशरूपक, सागरनन्दी का नाट्यलक्षणरत्नकोश, रामचन्द्र

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय

गुणचन्द्र का 'नाट्यदर्पण', शारदातनय का 'भावप्रकाशन', शिंगभूपाल की 'नाटक-परिभाषा' तथा रूपगीस्वामी की 'नाटकचन्द्रिका' ऐसे ग्रन्थ हैं, जिनमें केवल नाट्य-सम्बन्धी विवेचन किया गया है। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे भी ग्रन्थ लिखे गये, जिनका विषय केवल नाट्य- साहित्य ही नहीं है, परन्तु उनके एक भाग में नाट्य-सम्बन्धी विवेचन भी किया गया है। ऐसे ग्रन्थों में भोज के 'शृंगारप्रकाश' और 'सरस्वतीकण्ठाभरण', विद्यानाथ का 'प्रताप- रुद्रीय यशोभूषण', विश्वनाथ का 'साहित्यदर्पण' तथा शिंगभूपाल का 'रसार्णवसुधाकर' हैं। इन ग्रन्थकारों का संक्षिप्त परिचय देने का प्रयास किया जा रहा है। धनंजय : अबतक नाट्यशास्त्र पर लिखे गये जिन ग्रन्थों की तथा ग्रन्थकारों की चर्चा की गई है, उनके विषय में हमें निश्चित तथा समुचित ज्ञान नहीं है। उनके ग्रन्थों के उल्लेखों और सन्दर्भों के ही आधार पर उनके विषय में कुछ लिखा गया है। परन्तु, १०वीं शती से नाट्यशास्त्र पर लिखे गये कई ग्रन्थ मिलने लगते हैं। इनमें धनंजय के दशरूपक का स्थान अन्यतम है। स्वतन्त्र रूप में नाट्य-विवेचन पर लिखे गये ग्रन्थों में दशरूपक सबसे अधिक प्रसिद्ध एवं प्रचलित है। वस्तुतः, भरत के बाद नाटक पर व्यवस्थित ढंग से . लिखनेवाले आचार्य के रूप में धनंजय की ख्याति सर्वमान्य है।

दशरूपक के रचयिता धनंजय के पिता का नाम विष्णु था। धनंजय मालवा के परमार-वंशीय राजा मुंज (वाक्पतिराज द्वितीय) के राजकवि थे। मुंज का समय सन् ९७४-९९५ ई० माना गया है। स्पष्टतः दशरूपक १०वीं शती के अन्तिम चतुर्थांश में लिखा गया। धनंजय ने पुस्तक के अन्त में अपने पिता तथा आश्रयदाता का निर्देश निम्नांकित श्लोक में दिया है : विष्णोः सुतेनापि धनञ्जयेन विद्वन्मनोरागनिबन्धहेतुः। आविष्कृत मुञ्जमहीशगोष्ठी वैदग्ध्यभाजा दशरूपमेतत् ॥। धनंजय ने नाट्यशास्त्र के ही आधार पर दशरूपक की रचना की, किन्तु उन्होंने अन्य विषयों को छोड़कर केवल नाट्य से सम्बन्ध रखनेवाले विषयों को ही अपने ग्रन्थ का विषय चुना है और उनका ही विवेचन किया है। नाट्यशास्त्र के ही सिद्धान्तों का संक्षिप्त रूप दशरूपक की कारिकाओं में दिया गया है। इसमें किया गया विवेचन संक्षिप्त, किन्तु पूर्ण है। ग्रन्थ के आरम्भ में ही धनंजय ने लिख दिया है : नाट्यानां किन्तु किञ्चित् प्रगुणरचनया लक्षणं सडिक्षपामि।' इसीलिए उन्होंने दो-एक विषयों को छोड़कर सम्पूर्ण ग्रन्थ में भरत के मत का आश्रय लिया है। धनंजय ने नायिका-भेद और शृंगाररस के विषय में भरत का अनुकरण नहीं किया। किन्तु, उन्होंने आंगिक, वाचिक और आहार्य अभिनय का उतना विशद और विस्तृत वर्णन नहीं किया है, जितना विस्तृत वर्णन नाट्यशास्त्र में मिलता है। धनंजय का १. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, श्लोक ४

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास मुख्य उद्देश्य वस्तु, नेता, रस तथा रूपकों के मुख्य दस भेदों का ही विवेचन करने तक ही सीमित है। दशरूपक कारिका रूप में ही लिखा गया है। इसमें चार प्रकाश हैं। प्रथम प्रकाश में वस्तु-विभाग, अर्थ-प्रकृतियों, अवस्थाओं, सन्धियों, अर्थोपक्षेपकों आदि का वर्णन है। द्वितीय प्रकाश में नायक-नायिका-भेद का विवेचन मनोवैज्ञानिक आधार पर किया गया है और फिर उनके सहकारियों का वर्णन है। तृतीय प्रकाश में रूपक के दस भेदों का और चतुर्थ प्रकाश में रस-निरूपण का सुन्दर ढंग से विवेचन किया गया है। नाट्यशास्त्र का कोई भी अध्येता सरलता से समझ सकता है कि धनंजय ने भरत की बातें संक्षेप में शृंखलाबद्ध रीति से कही हैं। उन्होंने इतना संक्षेप कर दिया है कि बहुत-सी महत्त्वपूर्ण बातें छूट गई हैं। उन्होंने नाटक के साहित्यिक रूप पर ही अधिक बल दिया है, साज- सज्जा तथा अन्य प्राविधिक बातों का उल्लेख नहीं किया है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि उस युग में भारत की कलात्मक या सौन्दर्यात्मक संस्कृति का काफी पतन हो गया था। उन्होंने भरत के नाट्यशास्त्र के विषयों के प्रति श्रद्धा प्रदर्शित की है, किन्तु जान पड़ता है कि वे लेखक के उद्देश्य ठीक तरह से समझ नहीं सके हैं। वस्तुतः, भरत ने नाट्य लेखकों, अभिनेताओं, सामाजिकों और नाट्य-प्रस्तुतकर्त्ताओं के लिए लिखा था। धनंजय के इस ग्रन्थ से स्पष्टतया परिलक्षित हो जाता है कि १०वीं शती तक नाट्य की कल्पना किस प्रकार संकुचित और अव्यावहारिक हो चुकी थी। धनंजयकृत दशरूपक तथा उनके भाई धनिक के द्वारा उसके कारिका-भाग पर 'अवलोक' नाम की वृत्ति का बहुत अधिक प्रभाव उत्तरवर्त्ती नाट्याचार्यों और अलंकार- शास्त्रियों पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। वस्तुतः, दशरूपक और अवलोक की ही प्रधानता हो गई; क्योंकि समय बीतते जाने पर नाट्यशास्त्र को लोग भूलते गये और वह अप्राप्य होता गया। दशरूपक के समक्ष सभी पूर्ववर्त्ती ग्रन्थ फीके पड़ गये और नाट्यशास्त्र को छोड़कर यह सबसे अधिक प्रसिद्ध हो गया और परवर्त्ती आचार्यों ने इस विषय के ग्रन्थ लिखने में इसका बहुत अधिक सहारा लिया। इस विषय पर लिखे गये परवर्त्ती ग्रन्थों को देखने से दशरूपक के महत्त्व का अनुमान हो सकता है। विद्यानाथ के 'प्रतापरुद्रीययशोभूषण' का नायिका-भेद स्पष्ट रूप से दशरूपक का ऋणी है। विश्वनाथकृत साहित्यदर्पण के तृतीय परिच्छेद में व्णित नायिका-भेद और षष्ठ परिच्छेद के दृश्यकाव्य-वर्णन पर दशरूपक का स्पष्ट प्रभाव है। भानुदत्त की 'रसमंजरी', 'रसतरंगिणी', भावमिश्र की 'रससरसी' आदि ग्रन्थ, जो रस और नायिका-भेद का विवेचन करते हैं, दशरूपक के प्रभाव से दूर नहीं जा सके हैं। १२वीं शती में रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण की रचना नाट्यशास्त्र पर की। उन्होंने भी दशरूपक से बहुत सहायता ली है। शारदातनय का भावप्रकाशन भी दशरूपक का बहुत ऋणी है। दशरूपक पर निम्नलिखित विद्वानों ने टीकाएँ लिखी हैं-धनिक, बहुरूप भट्ट, नृसिंह भट्ट, देवपाणि, क्षोणीधर मिश्र त्था कूरवी राम। इनमें सर्वाधिक प्रसिद्ध धनिक की 'अवलोक' नाम की वृत्ति है।

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धनिक : धनंजय के छोटे भाई धनिक ने दशरूपक पर 'दशरूपकावलोक' नाम की उच्च कोटि की टीका या वृत्ति लिखी है। धनंजय ने दशरूपक को इतने संक्षेप में लिखा कि यदि धनिक की अवलोक-वृत्ति नहीं रहती तो उसके बहुत स्थल ठीक से बोधगम्य नहीं होते। अवलोक के प्रत्येक प्रकाश के अन्त में दी गई पुष्पिका से स्पष्ट हो जाता है कि ये विष्णु के पुत्र थे; जैसे चतुर्थ प्रकाश के अन्त की पुष्पिका है : इति श्रीविष्णुसूनोर्धनिकस्य कृतौ दशरूपकावलोके रसविचारो नाम चतुर्थः प्रकाशः समाप्तः । कुछ आलोचकों का विश्वास है कि दशरूपक का कारिका-भाग तथा वृत्तिभाग एक ही व्यक्ति की रचनाएँ हैं। काव्यशास्त्र के कुछ ग्रन्थों में दशरूपक को धनिक का ही ग्रन्थ बताया गया है। इसीलिए यह भ्रामक मत प्रचलित हो गया कि कारिकाकार तथा वृत्तिकार एक ही व्यक्ति हैं। किन्तु, अवलोक में कुछ स्थल ऐसे ही हैं, जो कारिकाकार धनंजय और वृत्तिकार धनिक को दो भिन्न व्यक्ति होने की ओर संकेत करते हैं। धनिक ने अवलोकवृत्ति के अतिरिक्त काव्यनिर्णय नामक एक दूसरे ग्रन्थ की रचना की थी, जो साहित्यशास्त्र पर है। धनिक ने अपनी वृत्तियों के चतुर्थ प्रकाश में स्वयं इस ग्रन्थ का उल्लेख किया है और उससे सात कारिकाएँ उद्धृत की हैं : यथाऽवोचाम काव्यनिर्णये। सम्भवतः यह ग्रन्थ कारिकाओं में लिखा गया था। धनिक कवि भी थे; उन्होंने वृत्ति में कई स्थलों पर अपनी कविता के उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। धनिक भी धनंजय की ही तरह पक्के अभिधावादी तथा व्यंजना-विरोधी थे। रस के विषय में वे भट्टनायक के मत के समर्थक थे, यद्यपि उस मत में उन्होंने भट्टलोल्लट तथा श्रीशंकुक के मतों का भी कुछ अंशों में सम्मिश्रण कर लिया है। उन्होंने शान्तरस को नाटक में स्थान नहीं दिया। सागरनन्दी : सागरनन्दी धनंजय के समसामयिक हैं या कुछ ही पहले हुए। कुछ ही वर्ष पहले तक इनके ग्रन्थ 'नाट्यलक्षणरत्नकोश' के विषय में हमारा ज्ञान यत्र-तत्र कुछ उद्धरणों तक ही सीमित था। सर्वप्रथम सिल्वां लेवी ने सन् १९२२ ई० में 'नाट्यलक्षण- रत्नकोश' की पाण्डुलिपि नेपाल में प्राप्त की और उसका विवरण जरनल एशियाटिक में प्रकाशित कराया। इससे पता चला कि सागरनन्दी ने नाट्य-विषयक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ लिखा है। इसके पूर्व विभिन्न ग्रन्थों में विभिन्न उद्धरण मिलते थे, परन्तु मूल ग्रन्थ अप्राप्य था। इसके बाद सन् १९३७ ई० में एम० डिलन ने लन्दन से इस ग्रन्थ का सुसम्पादित संस्करण प्रकाशित कराया। धनंजय के समान सागरनन्दी ने भी अपने ग्रन्थ में नाटक के विभिन्न विषयों का विवेचन किया है और यत्र-तत्न नाट्य के अभिनय-सम्बन्धी अचयवों की चर्चा की है। परन्तु, धनंजय के विपरीत उन्होंने केवल नाट्य-सिद्धान्त का ही विवेचन नहीं किया, वरन् आवश्यकतानुसार कहीं-कहीं अभिनय का भी वर्णन किया है। सागरनन्दी ने 'नाट्यलक्षणरत्नकोश' में सात पूर्वाचार्यों का भी उल्लेख किया है और उनके उद्धरण दिये हैं। वे आचार्य हैं-भरत मुनि, वार्त्तिककार हर्ष, मातृगुप्त, गर्ग,

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अश्मकुट्ट, नखकुट्ट और बादरि। इससे स्पष्ट होता है कि सागरनन्दी ने इन सात आचार्यों के ग्रन्थों को आधार मानकर अपने ग्रन्थ का निर्माण किया। परन्तु, ग्रन्थकार इनमें सर्वाधिक ऋणी भरत के नाट्यशास्त्र का है। वस्तुतः, नाट्यशास्त्र पर ही यह ग्रन्थ आधारित है। अनेक स्थलों पर सागरनन्दी ने भरत मुनि के श्लोकों को उसी रूप में अपने ग्रन्थ में रख दिया है। यह ग्रन्थ भी दशरूपक के समान कारिका-रूप में लिखा गया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र : काल की दृष्टि से धनंजय और सागरनन्दी के बाद तीसरा स्थान रामचन्द्र-गुणचन्द्र का है। ये दोनों प्रसिद्ध जैन दार्शनिक हेमचन्द्राचार्य के शिष्य थे। रामचन्द्र और गुणचन्द्र दो भिन्न व्यक्ति हैं। इन दोनों ने मिलकर एक नाट्य-विषयक ग्रन्थ लिखा, जिसका नाम नाट्यदर्पण है। नाट्यदर्पण की रचना कारिका-पद्धति पर हुई है, परन्तु इन दोनों ने उसपर अपनी वृत्ति भी लिख दी है। इन दानों में रामचन्द्र अधिक प्रसिद्ध विद्वान् हैं। उन्होंने लगभग १०० ग्रन्थों की रचना की है, जिनमें अधिकतर नाटक हैं। उनमें अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं। गुणचन्द्र के किसी अलग स्वतन्त्र ग्रन्थ का पता नहीं। उनके विषय में इतना ही ज्ञात है कि वे हेमचन्द्राचार्य के शिष्य थे। आाक्ालट नाट्यदर्पण में इन विद्वानों ने भरत के नाट्यशास्त्र और उसपर प्रसिद्ध टीका 'अभिनवभारती' का पूर्ण उपयोग किया है। नाट्यशास्त्र का उपयोग कारिका-भाग में तो पर्याप्त रूप में है ही, वृत्ति-भाग में तो और भी अधिक है। अभिनव की व्याख्या का भी पूर्ण उपयोग किया गया है। नाट्यदर्पण अनुष्टुप छन्द में लिखा गया है। अपनी संक्षिप्तता में इसकी तुलना दशरूपक से की जा सकती है। संक्षेप होने के कारण कई स्थलों पर कारिकाएँ पूर्ण रूप से समझ में नहीं आती। सौभाग्य से इन्हीं लोगों ने अपने ग्रन्थ की बहुत ही स्पष्ट वृत्ति लिख दी है। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती आचार्यों के मतों का खण्डन किया है; उनमें दशरूपककार धनंजय के मत की विशेष आलोचना स्थान-स्थान पर की गई है। नाट्यदर्पण में कम-से-कम २१ स्थल ऐसे हैं, जहाँ दशरूपक से वर्त्तमान लेखक सहमत हैं, परन्तु दशरूपक या धनंजय के नाम का उल्लेख नहीं हुआ है। सर्वत्र 'अन्ये', 'अपरे', 'केचित्' का प्रयोग किया गया है। इस ग्रन्थ का भी मुख्य विषय नाटक- रचना ही है, नाट्य के अन्य अंगों के विवेचन की ओर ध्यान नहीं दिया गया है। नाट्यदर्पण का महत्त्व एक अन्य दृष्टि से भी बहुत है। इस ग्रन्थ में कई अप्राप्य काव्यों तथा नाटकों के उद्धरण पाये जाते हैं। विशाखदत्त या विशाखदेव के 'देवीचन्द्रगुप्तम्' जैसे महत्त्वपूर्ण तथा अनुपलब्ध नाटक का पता इसी ग्रन्थ से लगता है। इन सब बातों से नाट्यदर्पण अमूल्य ग्रन्थ हो जाता है और कुछ अर्थों में इसका मूल्य दशरूपक से भी अधिक हो जाता है। नाट्यदर्पण में चार अध्याय या विवेक हैं : १ नाटकनिर्णय, २. प्रकरणाद्व कादश रूपनिर्णय, ३. वृत्तिरस-भावाभिनय-विचार और ४. सर्वरूपक साधारण लक्षण-निर्णय। रामचन्द्र का समय १२वीं शती है। वे गुजरात के राजाओं-सिद्धराज (सन् १०९३- ११४३ ई०), कुमारपाल (सन् ११४३-११७२ ई०) और अजयपाल (सन् ११७२-

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११७५ ई०) के समकालीन थे। अनुमान से उनका समय सन् ११००-११७५ ई० माना गया है। सम्भावना है कि वे गुजरात के निवासी थे। रुथ्यक : कई अन्य साहित्यशास्त्रियों के समान रुथ्यक भी काश्मीरी विद्वान् थे। उन्होंने महिमभट्ट के 'व्यक्तिविवेक' नामक ग्रन्थ पर बहुत विद्वत्तापूर्ण टीका-ग्रन्थ लिखा। उसी टीका से ज्ञात होता है कि उन्होंने नाट्य-साहित्य पर भी कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखा था, जिसका नाम 'नाटक-मीमांसा' है। किन्तु, आजकल यह ग्रन्थ प्राप्य नहीं है। राजा भोज : साहित्यशास्त्र के ग्रन्थकारों में राजा भोज का भी नाम आदर से लिया जाता है। वे मालवा के प्रसिद्ध परमार-वंशी राजा थे। उनका राज्यकाल सन् ९९५ से १०५० ई० है। उनका शृंगार-प्रकाश ग्रन्थ भारतीय साहित्यशास्त्र का सम्भवतः सर्वाधिक विशाल ग्रन्थ है। इसमें ३६ प्रकाश या अध्याय हैं, किन्तु अभी तक ३६वाँ प्रकाश नहीं मिल सका है। इसके १२वें प्रकाश में नाट्य का विवेचन किया गया है। अन्य प्रकाशों में साहित्यशास्त्र के अन्य विषयों का विवेचन है। राजा भोज का दूसरा ग्रन्थ 'सरस्वतीकण्ठाभरण' है, जिसके पंचम परिच्छेद में नाट्य-सम्बन्धी विषयों का विवेचन हुआ है। शारदातनय ने अपने 'भावप्रकाशन' में कई स्थानों पर भोज का उल्लेख किया है और अनेक स्थलों पर उनका मत भी उद्धत किया है। संय्यंग के सम्बन्ध में लिखते समय शारदातनय ने भोज का मत दिया है : निबन्ध: कार्य इत्येव निर्णयो भोजभूभुजः ।' विष्कम्भक के विषय में शारदातनय ने लिखा : इति प्रकरणे शुद्धविष्कम्भो भोजनिर्मितः।" शारदातनय ने भाण के लक्षण के सम्बन्ध में भी भोज का उल्लेख किया है : भाणस्य लक्षणं चेदृग्भोजेनापि प्रकाशितम्।3 आगे भोज के मत से भाण का लक्षण प्रस्तुत किया गया है। इस प्रकार शारदातनय ने राजा भोज का उल्लेख कई स्थलों पर किया है और उनके उद्धरण भी दिये हैं। शारदातनय : नाट्य-सिद्धान्त पर ग्रन्थ लिखनेवालों में शारदातनय का विशिष्ट स्थान है। उनका प्रसिद्ध ग्रन्थ भावप्रकाशन है, जिसमें दशरूपक तथा नाट्यदर्पण की अपेक्षा अधिक विस्तार से नाट्य-निरूपण किया गया है। आकार में भी यह ग्रन्थ दशरूपक तथा नाट्यदर्पण से बहुत बड़ा है और नाट्यशास्त्र से थोड़ा ही छोटा है। इनमें नाट्य- सम्बन्धी सभी विषयों का विस्तृत विवेचन किया गया है। भावप्रकाशन श्लोकबद्ध १. भावप्रकाशन; सप्तम अधिकार, पृ० २१४ २. वहो, अष्टम अधिकार, पृ० २४२ ३. वही, पृ० २४५

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ग्रन्थ है। दस अधिकारों या अध्यायों में ग्रन्थ विभक्त है, जिनमें रूपकों और उपरूपकों का विवेचन किया गया है और यथास्थान उदाहरण भी दिये गये हैं। इस ग्रन्थ पर टीका भी लिखी गई थी। परन्तु, आजकल वह उपलब्ध नहीं है। इसमें बहुत-से नाटकों के नाम आये हैं, जिनमें से अनेक आजकल अप्राप्य हैं। शारदातनय ने भाव-प्रकाशन की आरम्भिक पंक्तियों में अपने पूर्वजों के विषय में लिखा है। वे काश्यप गोत्र के ब्राह्मण थे और उनके पितामह का नाम लक्ष्मण था, जो धार्मिक प्रवृत्ति के विद्वान् थे। शारदातनय के पिता भट्टगोपाल थे, जिन्होंने शारदादेवी की उपासना करके एक पुत्र पाया, जिसका नाम उन्होंने शारदातनय रखा। उन्होंने अपने गुरु का नाम दिवाकर बताया है और जान पड़ता है कि दिवाकर स्वयं एक नाट्यशाला के निर्देशक थे : दृष्टवा स देवीं वरदां नाट्यवेदमयाचत। नाट्यशालापतिः कश्चिहिवाकर इति द्विजः ।। तयैव नाट्यवेदस्य नियुक्तोऽध्यापने तदा।' इनके गुरु एक नाट्यशाला के निर्देशक थे, इसका फल यह हुआ कि भाव-प्रकाशन का आधार अधिक व्यावहारिक है। जिस ढंग से उन्होंने विभिन्न विषयों का प्रतिपादन किया है, वह बहुत महत्त्वपूर्ण है। किसी विषय का प्रतिपादन करते समय उन्होंने सभी पूर्ववर्त्ती आचार्यों के मतों का उल्लेख किया है और सावधानीपूर्वक सभी में अन्तर बताया है। उन्होंने सभी का आधार स्वीकार किया है, परन्तु किसी भी विषय में उनकी मौलिक दृष्टि भी है। भाव-प्रकाशन में निर्दिष्ट आचार्यों में निम्नांकित हैं : भरत, वासुकि, पद्मभू, नारद, शंकुक,भट्टनायक, व्यास, नन्दिकेश्वर, रुद्रट, मारुति, भोज, सदाशिव, अभिनवगुप्त, कोहल, मातृगुप्त, सुबन्धु, हर्ष तथा ध्वनिकार। इनमें कुछ नाट्याचार्यों के मतों के उद्धरण दिये गये हैं और कुछ का नामोल्लख-मात्र है। भरत का आधार तो उन्होंने स्वीकार ही किया है। भावप्रकाशन में शारदातनय ने नाट्य का विषय भाव के आधार पर ग्रहण किया है; क्योंकि नाट्य में भावों का ही प्रकाशन माना गया है। भरत के अनुसार भावों की उचित अभिव्यक्ति से ही रस की उत्पत्ति होती है। इसीलिए, शारदातनय ने अपने ग्रन्थ का आरम्भ भाव के प्रकाशन तथा इससे सम्बद्ध बातों से किया है, तब रस को ग्रहण किया है। फिर लेखक ने नायक-नायिका विवेचन किया है; क्योंकि ये ही रस के मुख्य आधार हैं। लेखक तत्पश्चात् नाटक-रचना पर आया है और फिर कथावस्तु के विभाजन का प्रसंग उठाया है। लेखक ने रूपक के प्रधान रस-भेदों का विवरण देने के बाद उपरूपक के बीस भेदों का विस्तृत विवेचन किया है। तब शारदातनय ने नाटक और रंगमंच से सम्बद्ध कतिपय विषयों पर विचार किया है। यहाँ सबका विस्तृत विवरण १. भावप्रकाशन; प्रथम अधिकार, पृ० २

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उनकी भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय

देना कठिन है; क्योंकि उन्होंने नाट्य-सम्बन्धी अनेक विषयों को स्पर्श किया है। यही कहना पर्याप्त होगा कि शारदातनय द्वारा दिया गया विवरण दशरूपक, नाट्यलक्षण- रत्नकोश और नाट्यदर्पण के विवरण से अधिक विस्तृत है। यह विश्वास तथा निश्चय से कहा जा सकता है कि शारदातनय के पहले कई ग्रन्थ वर्त्तमान थे, जिनमें उपरूपकों का विवेचन हुआ था। यह इस बात से स्पष्ट हो जाता है कि धनिक, भोज और अभिनवगुप्त ने इन पूर्ववर्त्ती ग्रन्थों से अनेक उद्धरण दिये हैं। रूपक और उपरूपक का विवेचन करने के बाद शारदातनय ने अभिनय-सम्बन्धी अन्य विषयों का प्रतिपादन किया है। स्पष्ट है कि भाव-प्रकाशन में शारदातनय ने समसामायिक तद्विषयक सभी ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक विस्तार किया है। उन्होंने नाट्यशास्त्र तथा उससे भी पूर्व के लेखकों-कोहल, मातृगुप्त, हर्ष तथा सुबन्धु-के ग्रन्थों का हवाला दिया है। इनके अतिरिक्त उन्होंने ध्वनिकार, रुद्रट, धनिक, अभिनव, भोज आदि का उल्लेख किया है। कभी-कभी उन्होंने उनके मत की आलोचना भी की है। इन बातों से उनके ग्रन्थ का और भी मूल्य बढ़ जाता है। रस के विषय में शारदातनय ने अभिनवगुप्त के ही समान माना है कि रस ही काव्य की आत्मा है और अलंकार, गुण, रीति आदि काव्य का केवल सौन्दर्य बढ़ाते हैं। परन्तु, कई स्थलों पर शारदातनय ने अभिनवगुप्त से मतभेद भी दिखाया है; उदाहरणार्थ, शारदातनय अभिनवगुप्त के समान यह नहीं मानते कि उत्तम काव्य में रस सदा व्यंग्य होता है, वाच्य नहीं। इस स्थल पर वे दशरूंपककार धनंजय के मतानुयायी हैं। शारदातनय नाट्यशास्त्र के प्रमुख आचार्य हैं, परन्तु यह भी कह देना चाहिए कि वे अपने युग की प्रवृत्ति के अपवाद नहीं हैं। उन्होंने भी नाट्य के सम्पूर्ण अंगों का विवेचन प्रसंग-मात्र से ही किया है। उनका मूल प्रतिपाद्य विषय नाटक की रचना और रस- प्रकरण ही है। शारदातनय ने 'शारदीय' नाम का कोई अन्य ग्रन्थ भी लिखा था, जिसकी चर्चा उन्होंने निम्नांकित पंक्ति में की है : मयापि शारदीयाख्ये प्रबन्धे सुष्ठु दशितम्।' उन्हीं के लिखने से जान पड़ता है कि यह संगीत-विषयक ग्रन्थ था। परन्तु, यह ग्रन्थ अप्राप्य है। कुछ लोगों का कथन है कि उन्होंने काव्य-प्रकाश की कोई टीका लिखी थी, परन्तु इसका कोई आधार नहीं दिखाई देता। 15 भावप्रकाशन का रचना-काल सन् ११७५ और १२५० ई० के बीच माना गया है। जान पड़ता है कि शारदातनय दक्षिण-भारतीय थे। शिंगभूपाल : लगता है कि मध्य युग में धीरे-धीरे नाट्यकला का ह्रास होता गया। नाट्यशालाएँ नहीं रह गई थीं, जिनमें नाट्य-प्रदर्शन हो सके। फलस्वरूप नाटक की उत्कृष्ट परम्परा भी समाप्त प्राय हो गई थी। ऐसी परिस्थिति में नाट्यशास्त्र पर १. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० १९४

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास स्वतन्त्र ग्रन्थों के निर्माण को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा था। नाट्यशास्त्र भी काव्यशास्त्र में सम्मिलित कर लिया जाता था, फलस्वरूप उसकी चरम परिणति नायक-नायिका-भेद के निरूपण में ही हो गई। शिंगभूपाल का समय १४वीं शती है। उनके दो ग्रन्थ हैं : १. 'नाटक-परिभाषा' और २. 'रसार्णव-सुधाकर'। नाम से ही स्पष्ट हो जाता है कि नाटक-परिभाषा की रचना मुख्यतः नाटक के विषय के प्रतिपादन के लिए हुई। 'रसार्णव-सुधाकर' में मुख्य रूप से नाटक का विवय नहीं लिया गया है, प्रत्युत यह साहित्यशास्त्र का ग्रन्थ है। किन्तु, इसके अन्तिम भाग में नाटक का भी विवेचन किया गया है। शिंग भूपाल विन्ध्य और श्रीशैल के मध्यवर्त्ती प्रदेश 'राजाचल' के राजा थे और उनका समय सन् १३३० ई० के आसपास है। उन्होंने विद्याधर का उल्लेख किया है। विद्यानाथ : शिंगभूपाल के समान विद्यानाथ भी १४वीं शती के विद्वान् हैं। उन्होंने वारंगल के काकतीय वंशीय राजा प्रतापरुद्र की प्रशंसा में 'प्रतापरुद्रीययशोभूषण' या 'प्रतापरुद्रीय' नाम का ग्रन्थ लिखा। प्रतापरुद्र उनके आश्रयदाता थे। 'प्रतापरुद्रीययशोभूषण' धनंजय के दशरूपक और मम्मट के काव्य-प्रकाश के आधार पर लिखा गया साधारण कोटि का ग्रन्थ है, जिसमें काव्यशास्त्र का सम्पूर्ण क्षेत्र समाहित है। इसमें ९ प्रकरण हैं। तीसरे प्रकरण में नाट्य-विषय का विवेचन है। लक्षणों के उदाहरण प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने आश्रयदाता की स्तुति में 'प्रतापरुद्रकल्याण' नाम का अति साधारण कोटि का नाटक लिखा। प्रतापरुद्र का समय शिलालेखों के अनुसार सन् १२९८ से १३१४ ई० तक है। अतः, विद्यानाथ का समय १४वीं शती माना गया है। विश्वनाथ कविराज : कविराज विश्वनाथ साहित्यशास्त्र के अत्यन्त सम्मानित विद्वान् हैं और उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ 'साहित्यदर्पण' की बहुत प्रतिष्ठा है। इसके छठे परिच्छेद में नाट्य-सिद्धान्त का विवेचन किया गया है, जो भरत के नाट्यशास्त्र के कुछ अध्यायों पर मुख्य रूप से आधारित है। इसमें दशरूपक और अवलोक से भी बहुत सहायता ली गई है। प्राचीन परम्परागत सिद्धान्तों की व्याख्या के लिए साहित्यदर्पण का विशेष महत्त्व है। इसके छठे परिच्छेद पर ही प्राचीन भारतीय नाटकों का विवेचन करने- वाले पाश्चात्त्य विद्वान् अधिक निर्भर रहे हैं। ीविश्वनाथ ने अपने पूर्वजों और ग्रन्थों के विषय में पर्याप्त मात्रा में लिखा है, परन्तु उनके समय के विषय में निश्चित प्रमाण यह है कि उनके ग्रन्थ की एक हस्तलिखित प्रति जम्मू के पुस्तकालय में मिली है। अनुमान है कि इसकी तिथि रुन् १३८३ ई० है। साहित्यदर्पण में जिन पद्यों के उदाहरण दिये गये हैं, उनमें से एक में अलाउद्दीन का उल्लेख मिलता है। सम्भवतः यह अलाउद्दीन खिलजी है : सन्धौ सर्वस्वहरणं विग्रहे प्राणनिग्रहः। अलावदीननपतौ न सन्धिर्न च विग्रहः ।।' १. साहित्यदर्पण, चतुर्य परिच्छेद, शालग्राम शास्त्री की टीका, पृ० २१२

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय

अतः, कविराज विश्वनाथ का समय १४वीं शती माना गया है। कविराज विश्वनाथ महापात्र चन्द्रशेखर के पुत्र थे, जो कलिंगराज के सन्धि- विग्रहिक थे। ग्रन्थकार ने ग्रन्थ के अन्त में अपना परिचय दे दिया है। साहित्यदर्पण में दस परिच्छेद हैं। उन्होंने कई काव्य-नाटकादि की रचना की थी, जिनका उल्लेख साहित्य- दर्पण में हुआ है। विश्वनाथ रस के विषय में अभिनवगुप्त के अनुयायी हैं; इतना अन्तर अवश्य है कि उन्होंने दसवें रस-वात्सल्य रस-को मान्यता दी है। वे भी व्यंजनावादी हैं। डॉ० काणे ने विश्वनाथ के नाट्य-विवेचन की महत्ता स्वीकार करते हुए लिखा है कि भरत, धनंजय और विश्वनाथ संस्कृत-नाट्यशास्त्र के तीन सर्वश्रेष्ठ आचार्य हैं। परन्तु, विश्वनाथ के इस विवेचन में कोई नवीन तथ्य नहीं मिलता। हाँ, रसों के विवेचन में कुछ नवीनता दृष्टिगत होती है। रूपगोस्वामी : रूपगोस्वामी प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य हैं। उनका समय १५वीं शती माना गया है, परन्तु डॉ० कीथ ने १६वीं शती का आरम्भ माना है। नाट्य-सिद्धान्त पर उनका ग्रन्थ 'नाटक-चन्द्रिका' है, जो भरत के नाट्यशास्त्र और शिंगभूपाल के 'रसार्णव- सुधाकर' के आधार पर लिखा गया है। विश्वनाथ के साहित्यदर्पण से भी उन्होंने बहुत सामग्री ग्रहण की है। साहित्यदर्पण की ही तुटियों की आलोचना को आधार बनाकर इस ग्रन्थ की रचना हुई, परन्तु वे अपने ग्रन्थ को साहित्यदर्पण से अच्छा नहीं बना सके। इसमें मुख्यतः नाटक-सम्बन्धी विषयों का विवेचन हुआ है। इस ग्रन्थ की एक विशेषता यह है कि इसमें प्रायः वैष्णव-ग्रन्थों से ही उदाहरण लिये गये हैं। रूपगोस्वामी चैतन्य महाप्रभु के शिष्य थे और यह ग्रन्थ लिखने का उनका मुख्य उद्देश्य उन्हीं की स्तुति करना था। रूपगोस्वामी का दूसरा ग्रन्थ 'हरिभक्तिरसामृत-सिन्धु' है, जो 'नाटक- चन्द्रिका' से अधिक प्रसिद्ध है। विद्याधर : विद्याधर ने भी 'एकावली' नामक नाट्य-ग्रन्थ लिखा। वे उत्कल के राजा नरसिंह द्वितीय के राजकवि थे, जिनका समय सम्भवतः सन् १२८०-१३१४ ई० है। विद्यानाथ के ही समान विद्याधर ने भी अपने ग्रन्थ में जो उदाहरण दिये, वे अपने आश्रयदाता की स्तुति के थे। कविता की दृष्टि से इन उदाहरणों को विशेष महत्त्व नहीं दिया जा सकता, परन्तु नाट्यशास्त्री की दृष्टि से उन्होंने विशेष योग्यता का प्रदर्शन किया है। उनका समय तेरहवीं शती का अन्तिम भाग और चौदहवीं शती का आरम्भिक भाग है। सुन्दरमिश्र : सुन्दरमिश्र ने 'नाट्य-प्रदीप' नामक नाट्य-ग्रन्थ सन् १६१३ ई० में लिखा। उन्होंने भी अपने ग्रन्थ का आधार धनंजय के दशरूपक और विश्वनाथ के साहित्य-दर्पण को बनाया। इनके अतिरिक्त राघवभट्ट का 'नाट्यप्रदीप', व्रिलोचनादित्य का 'नाट्यालोचन', वसन्तराज का 'नाट्यशास्त्र' आदि भरत की 'नाट्यसर्वस्व-दीपिका', अन्यदेव का

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९० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास 'भरतभाष्य', या 'सरस्वतीहृदयालंकार', मोहनदास का 'नाटकावतार' (रसोदधि) आदि नाट्य-सिद्धान्त पर लिखे ग्रन्थ हैं। हरास का युग : परवर्त्ती आचार्यों में ऐसा कोई विद्वान् नहीं था, जो भरत के समान अन्तर्व्यापिनी दृष्टि रखे और जिसने समाज का पूर्ण अध्ययन किया हो। सम्भवतः, यह काल भारतीय रंगमंच के ह्रास का काल था। दसवीं शती के बाद मुसलमानों के निरन्तर आक्रमण होते रहे, जिससे समाज क्षत-विक्षत हो रहा था। ऐसे समाज में संगठित मनोरंजन की न शक्ति रह गई थी और न साहस ही था। ऐसी दशा में नाटकों की प्रयोगात्मक व्याख्या नहीं हो सकती थी। ये आचार्य मौखिक शास्त्रालोचन के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पा रहे थे। परवर्त्ती आचार्यों के ग्रन्थों को देखने से पता चलता है कि ये ग्रन्थ रसों की संख्या, नायिकाओं के भेदोपभेद आदि तक ही सीमित थे। इस युग में मुसलमानों के प्रबल आक्रमणों के बाद सामाजिक विशृंखलता उत्पन्न हो गई, फलस्वरूप रंगमंच नष्ट हो गये। अब नाटक या रास आदि मठ-मन्दिरों में होने लगे, जिनका मुख्य उद्देश्य हरिकीर्त्तन हुआ करता था। संस्कृत-नाट्यशास्त्र के आरम्भ और विकास की यही संक्षिप्त कहानी है। १३वीं शती के उपरान्त इसका ह्रास हो गया। इस ह्रास का प्रधान कारण समाज का विघटन था। मुसलमानों के प्रचण्ड आक्रमणों के फलस्वरूप नाटक जीवित कला नहीं रह सका, रंगमंच का विनाश हुआ, इसके साथ ही नाट्यशास्त्र के अध्ययन और अध्यापन की शृंखला समाप्त हो गई। राजाश्रय प्राप्त कर ही प्रायः संस्कृत-नाटक का विकास हुआ था। भारतीय राज्य-शक्ति के नष्ट होते ही राजाश्रय भी समाप्त हो गया। परिणाम- स्वरूप नाट्य-कला शनैः-शनैः नष्ट होती गई। प्रमुख ग्रन्थ और उनके मूल सिद्धान्त ऊपर नाट्य-सिद्धान्त-सम्बन्धी जितने ग्रन्थों का उल्लेख हुआ है, उनमें निम्नलिखित ग्रन्थ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं-भरत का नाट्यशास्त्र, अभिनवगुप्त की अभिनवभारती, धनंजय का दशरूपक, राजा भोज का शृंगारप्रकाश, रामचन्द्र-गुणचन्द्र का नाट्यदर्पण, शारदातनय का भावप्रकाशन और कविराज विश्वनाथ का साहित्यदर्पण। साहित्यदर्पण का छठा परिच्छेद नाट्य से सम्बन्ध रखता है। परवर्त्ती ग्रन्थों में नाटक के सम्पूर्ण अंगों का विवेचन कम ही हुआ है, अधिक ध्यान रस और भाव पर दिया गया है। यह बात अभिनवभारती में भी देखी जा सकती है और प्रायः अन्य सभी ग्रन्थों में भी। भावप्रकाशन का आधार अन्य ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक व्यावहारिक है, परन्तु यह ग्रन्थ भी अपने युग की प्रवृत्ति का अपवाद नहीं हो सका है। इसमें भी नाट्य के अन्य सभी अंगों का विवेचन प्रासंगिक ही रहा है। इसका मूल प्रतिपाद्य विषय नाटक की रचना और रस-प्रकरण ही है।

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नाट्यशास्त्र में नाट्य के अभिनय-पक्ष या व्यावहारिक-पक्ष पर पूरा ध्यान दिया गया है। इसमें चारों प्रकार के अभिनय-वाचिक, आंगिक, सात्त्विक और आहार्य- का भी विस्तृत विवेचन हुआ है। रंगमंच के निर्माण और पूजन का भी विशद वर्णन है। परन्तु, परवर्त्ती ग्रन्थों में से किसी ने भी इस विषय पर यथेष्ट ध्यान नहीं दिया। आंगिक और आहार्य अभिनय तो इन ग्रन्थों में अछूते ही रह गये। ककी अब कुछ प्रमुख ग्रन्थों के मूल सिद्धान्तों का विश्लेषण किया जा रहा है। भरत के नाट्यशास्त्र के प्रमुख सिद्धान्तों का विवरण देने के बाद अन्य ग्रन्थों के उन्हीं सिद्धान्तों की समीक्षा की जायगी, जहाँ नाट्यशास्त्र से उनका मतभेद है। शेष प्रायः सभी सिद्धान्त नाट्यशास्त्र के ही हैं। नाट्यशास्त्र : नाटकों के मूल तत्त्वों, रंगमंच तथा अन्य उपकरणों का विस्तृत तथा सूक्ष्म वर्णन भरत के नाट्यशास्त्र में देखा जा सकता है। इसमें कला-सम्बन्धी किसी भी पक्ष का अत्यन्त सूक्ष्म वर्णन प्राप्य है। भाषा, अलंकारशास्त्र, संगीत, नृत्य, चित्रकला, रंगसाजी, स्थापत्य तथा मूर्त्तिकला का एक स्थान पर वर्णन नाट्यशास्त्र में ही मिलता है। नाट्य-सिद्धान्त पर जितने ग्रन्थ आज उपलब्ध हैं, सभी भरत के नाट्यशास्त्र पर ही आधारित हैं। युग के परिवर्त्तन तथा स्वतन्त्र चिन्तन के कारण कुछ आचार्यों ने कहीं-कहीं थोड़ा परिवर्त्तन कर दिया है। नाट्यशास्त्र के पहले अध्याय में नाटक तथा नाट्यवेद की उत्पत्ति का विवरण दिया गया है। दूसरे तथा तीसरे अध्यायों में रंगभूमि और रंगमंच का विस्तृत विवरण है, फिर विभिन्न देवताओं के पूजन का विधान है। चौथे अध्याय में ताण्डवनृत्य का विस्तृत विवरण है। पाँचवें अध्याय में पूर्वरंग-विधान का वर्णन किया गया है। तदनन्तर चार प्रकार के अभिनय का वर्णन है। नाट्यशास्त्र के अनुसार अभिनय चार प्रकार का होता है : तात्त्विक, आंगिक, वाचिक तथा आहार्य। छठे एवं सातवें अध्यायों में सात्त्विक अभिनय का विवेचन किया गया है। सात्त्विक अभिनय के अन्तर्गत भावाभिव्यक्ति आती है। छठे अध्याय में रसों का तथा सातवें अध्याय में भावों का विवेचन हुआ है। साहित्यिक दृष्टि से ये दो अध्याय अत्यन्त मूल्यवान् हैं। आठवें से तेरहवें अध्यायों में आंगिक अभिनय का वर्णन है और १४वें से १६वॅ अध्यायों में वाचिक अभिनय का। वाचिक अभिनय के अन्तर्गत छन्दोविधान, काव्य के गुण- दोष, अलंकार, भाषा आदि का विवेचन है। १८वें अध्याय में नाटक आदि दशरूपक का विवेचन किया गया है। १९वें अध्याय में वृत्ति, सन्धि, अवस्था, अर्थ-प्रकृति आदि का विस्तृत वर्णन है। २०वें अध्याय में सात्त्वती, भारती, केशिकी तथा आरभटी-इन चार वृत्तियों का विवरण दिया गया है। २१वे से २७वें अध्यायों में आहार्य अभिनय तथा उससे सम्बद्ध विषयों का वर्णन है। २८वें से ३३वें अध्यायों का विषय संगीतशास्त्र है। ३४वें अध्याय में स्त्री-पुरुष पात्रों की प्रकृति तथा ३५वें अध्याय में सूत्रधार, पारिपाश्वक आदि का विवेचन है। ३६वाँ अध्याय उपसंहारात्मक है।

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९२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

अपने विषय का विस्तृत विवेचन करने के पूर्व भरत ने छठे अध्याय के आरम्भ के ही एक श्लोक में अपने विषय का संकेत दे दिया है: रसा भावा ह्यभिनया धर्मी वृत्तिप्रवृत्तयः। सिद्धिः स्वरास्तथातोद्यं गानं रङ्गश्च सडग्रहः ।।9 भरत के अनुसार ये ११ सिद्धान्त मिलकर नाट्य की प्रकृति का निर्माण करते हैं। इनमें प्रधान प्रथम सिद्धान्त रस ही है। शेष भाव से रंग तक १० तत्त्व रस की ही उत्पत्ति के लिए साधन माने गये हैं। उन्होंने अपने प्रसिद्ध रससूत्र में रस की उत्पत्ति तथा प्रकृति के विषय में संकेत किया है। भरत के अनुसार रस केवल आठ होते हैं। जब कुशल नट दस रूपकों का अभिनय करते हैं, तो प्रेक्षक का चित्त ऐसी स्थिति में आ जाता है कि वह देश, काल, व्यक्ति में अन्तर भूल जाता है और उसे अलौकिक आनन्द की प्राप्ति होती है, जिसे रस कहा गया है। इसके साथ स्थायी भाव, विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव का भी विवेचन किया गया है। रस के विवेचन में भरत का दृष्टिकोण मनोवैज्ञानिक से अधिक अभिनय-परक है। भरत ने दस ही रूपकों को स्वीकार किया, साथ ही संकर-रूप नाटिका को भी स्थान दिया। नाट्यशास्त्र में उपरूपकों का कोई उल्लेख नहीं है। वस्तु के अन्तर्गत कथानक के भेद, पाँच अर्थ-प्रकृतियों, पाँच अवस्थाओं तथा पाँच सन्धियों का विवेचन किया गया है। संवाद के अन्तर्गत प्रकाश, स्वगत, अपवारित तथा जनान्तिक का विवरण दिया गया है। फिर नेता या नायक और नायिका का विश्लेषण करके इसके कई भेदों का वर्णन हुआ है। तत्पश्चात् नायक और नायिका के सहायकों का विवेचन है। परवर्त्ती आचार्यों ने भी इन विषयों का वर्णन किया। उनके वर्णन में कहीं-कहीं स्वतन्त्र उद्भावना है, किन्तु अधिकतर स्थानों पर भरत के ही मत का समर्थन हुआ है। अभिनवभारती : भरत के नाट्यशास्त्र पर आचार्य अभिनवगुप्त ने एक टीका लिखी, जिसका नाम अभिनवभारती है। यह अत्यन्त प्रसिद्ध ग्रन्थ है। अभिनवभारती की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है कि इसके द्वारा हम रस-सिद्धान्त, नाट्य-सिद्धान्त संगीत आदि विषयों पर लिखनेवाले प्राचीनतम आचार्यों के सम्बन्ध में संकेत पाते हैं। भरत के प्रसिद्ध रससूत्र के तीन प्रमुख व्याख्याकार भट्टतोत, श्रीशंकुक तथा भट्टनायक के रस- निष्पत्ति पर विचार हम सर्वप्रथम इसी ग्रन्थ में पाते हैं। इसमें इन आचार्यों के सिद्धान्तों का सारांश देकर उनकी आलोचना की गई है। रस-निष्पत्ति के सम्बन्ध में एक नया सिद्धान्त अभिनवगुप्त ने बनाया, जो वास्तव में भट्टनायक के सिद्धान्त में परिष्कार तथा संशोधन करके स्थापित किया गया था। प्रायः सभी परवर्ती आचार्यों ने इसे स्वीकार किया। अभिनव ने ध्वनि और रस दोनों का प्रबल समर्थन किया। आनन्दवर्द्धन ने ही इस सिद्धान्त का सूत्रपात किया था, परन्तु विरोधियों की तीव्र आलोचना के कारण इसकी १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, श्लोक १०

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जड़ हिल गई थी। अभिनवगुप्त ने अपने सबल समर्थन से इसे फिर दृढ़ किया। फिर, तो परवर्त्ती आचार्यों ने उनके सिद्धान्तों को बहुत आदर से ग्रहण किया। उनके अनुसार रस- ध्वनि ही काव्य की आत्मा है और गुण, वृत्ति आदि उसके सौन्दर्य में वृद्धि करते हैं। अभिनवभारती में व्यंजनावाद का समर्थन है, अतः इसमें रस-सिद्धान्त, शैवदर्शन तथा व्यंजनावाद की आधारशिला पर स्थापित है। अभिनवभारती में रस को व्यंग्य माना गया है और इसकी स्थिति सहृदय में स्वीकार की गई है, अनुकर्त्ता नट या अनुकार्य राम-दुष्यन्त में नहीं। रस की चर्वणा तथा निष्पत्ति के मत के अतिरिक्त अभिनवभारती में एक नई स्थापना की गई है, वह शान्तरस की स्थापना है। नाट्यशास्त्र में आठ ही रसों का उल्लेख है, परन्तु उसी के आधार पर अभिनवभारती में शान्तरस जैसे नवम रस की स्थापना हुई है। अभिनव ने न केवल शान्तरस की स्थिति सिद्ध की, वरन् यह भी सिद्ध कर दिया कि काव्य के सभी रूपों में इसका विकास किया जा सकता है। उन्होंने इसे अन्य रसों में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। अभिनव का सिद्धान्त है कि लोक के प्रसंग में स्थायीभाव सुख तथा दुःख-रूपात्मक होते हैं, परन्तु नाट्य-प्रयोग में काल्पनिक अनुभव प्रत्यक्ष के समान होने पर भी लोक के सत्य तथा असत्य से विलक्षण होता है। जो अर्थ लौकिक यथार्थ के समान प्रतीत होता है, वह साधारणीकरण-व्यापार से आस्वाद्य होकर नाट्य का अनुभव माना जाता है। रति, ह्रास, उत्साह तथा विस्मय सुखात्मक होते हैं, परन्तु अवस्था-विशेष में इनमें भी दुःख का संयोग होता है। इसके विपरीत क्रोध, भय, शोक तथा जुगुप्सा दुःखात्मक माने गये हैं, परन्तु अवस्था-विशेष में इनमें भी सुख का मिश्रण हो जाता है। परन्तु, निर्वेद सदा सुखमय है। अभिनव ने नान्दी के प्रयोग के विषय में चलनेवाली चर्चा का उल्लेख किया है। विद्वानों का एक दल कहता है कि नान्दी पूर्वरंग का उपलक्षण है। दूसरे विद्वान् कहते हैं कि भरत ने केवल नान्दी के प्रयोग का उल्लेख किया है। अभिनव के उपाध्याय भट्टतोत के अनुसार यहाँ केवल नान्दी के प्रयोग का भाव है। अभिनव ने भी पूर्वरंग का अवसर नहीं माना प्रत्युत मंगल-कामना की दृष्टि से नान्दी का प्रयोग स्वीकार किया है। उकक वृत्ति के सम्बन्ध में अभिनव का विचार अभिनय को ध्यान में रखकर निर्धारित हुआ है। वाचिक, मानसिक तथा शारीरिक सामान्य व्यापारों से सम्बद्ध क्रमशः भारती, सात्त्वती तथा आरभटी वृत्तियाँ हैं। केशिकी वृत्ति में किसी अपूर्व लालित्य का समावेश माना गया है। वास्तव में, अभिनव मानते हैं कि अभिनय का समस्त कार्य व्यापार वृत्तियों के कारण सुन्दर होता है। भरत ने उपरूपकों का विवेचन नहीं किया, टीकाकार अभिनव ने भी उपरूपकों का कोई विवेचन नहीं किया, परन्तु अभिनवभारती में उपरूपकों का उल्लेख कई स्थलों पर पाया जाता है। उसमें कई पूर्ववर्त्ती ग्रन्थों का उल्लेख है, जिनमें उपरूपकों का विवेचन किया गया था।

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

दशरूपक : नाट्य-विवेचन पर स्वतन्त्र रूप से लिखे गये ग्रन्थों में दशरूपक सार्वधिक प्रसिद्ध तथा प्रचलित है। इसके रचयिता धनंजय हैं और इसपर अवलोक नाम की टीका लिखनेवाले उनके छोटे भाई धनिक। उत्तरवर्त्ती नाट्य-सिद्धान्त पर दशरूपक का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा है। इसमें चार प्रकाश हैं, जिनमें वस्तु-विभाग, अर्थ-प्रकृति, अवस्थाओं तथा सन्धियों के अंगों का विभाजन, अर्थोपक्षेपकों का वर्णन, नायक-नायिकाओं के वर्गीकरण के आधार का विवेचन, रस-प्रसंग आदि विषय हैं। दशरूपक की कारिकाएँ भरत के नाट्यशास्त्र के ही सिद्धान्तों का संक्षेप हैं। इसीलिए विशेषतः नायिका-भेद तथा शृंगाररस के भेद-जैसे कुछ विषयों को छोड़कर दशरूपक में नाट्यशास्त्र का ही आश्रय लिया गया है। वैसे नाट्यशास्त्र में जिस प्रकार से आंगिक, वाचिक तथा आहार्य अभिनयों का विस्तृत वर्णन है, वैसा दशरूपक में नहीं है। नाट्यशास्त्र के सारे व्यापक विषयों को छोड़कर केवल नाटय से सम्बद्ध विषय लिये गये हैं। दशरूपक का प्रमुख उद्देश्य रूपक के तीन भेदक तत्त्वों-वस्तु, नेता तथा रस के विश्लेषण एवं रूपकों के मुख्य दस भेदों के वर्णन तक ही सीमित है। दशरूपक में रूपक के स्पष्ट रूप से तीन भेदक तत्त्व माने गये हैं : वस्तु, नेता और रस। यह दशरूपक की मौलिक देन है। दशरूपक अभिधा का समर्थन तथा व्यंजना का विरोध करता है। रस के सम्बन्ध में यह भट्टनायक का सिद्धान्त मानता है। दशरूपक ने नाटक में शान्तरस को स्थान नहीं दिया। दशरूपक की मान्यताओं को निम्नलिखित शब्दों में रख सकते हैं : १. दशरूपक में व्यंजना-वृत्ति का निषेध किया गया है। धनंजय तथा धनिक अभिधा, लक्षणा तथा तात्पर्य-वृत्ति को ही मानते हैं, व्यंजना अथवा तुरीया वृत्ति उन्हें मान्य नहीं। उनका विश्वास है कि स्थायीभाव (रस भी) विभावादि के द्वारा प्रतीत वाक्यार्थ ही है। २. रस के सम्बन्ध में दशरूपक के सिद्धान्त को निम्नांकित रूप में कहा जा सकता है : (क) रस वाक्य का तात्पर्य अर्थ ही है, व्यंग्य नहीं। (ख) रस की विभावना होती है, विभावादि तथा रस में परस्पर भाव्य-भावक भाव है। (ग) सामाजिक के लिए नट उसी प्रकार राम, दुष्यन्त आदि बन जाते हैं, जिस प्रकार बच्चे के लिए मिट्टी के हाथी, घोड़े वास्तविक हाथी, घोड़े बन जाते हैं। ३. नाटक में शान्तरस का निषेध-दशरूपक में शम स्थायीभाव तथा शान्त रस का निषेध किया गया है। ग्रम्थकार का तर्क है कि शम भाव या शान्तरस में समस्त

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय

व्यापारों की समाप्ति होनी चाहिए, किन्तु इस व्यापार-समाप्ति का अभिनय नहीं हो सकता। अतः अनभिनेय होने के कारण नाटक में शान्तरस की स्थिति नहीं मानी जा सकती। परन्तु, शान्तरस का निषेध केवल नाटकादि रूपकों में ही किया गया है। नाट्यदर्पण : जैन आचार्यद्वय रामचन्द्र-गुणचन्द्र का नाट्यदर्पण भी बहुत प्रसिद्ध ग्रन्थ है। ये दोनों आचार्य नाट्यशास्त्र के निर्भीक रचयिता थे। उन्होंने अपने सभी पूर्ववर्त्ती आचार्यों के मतों की यथावसर आलोचना की है। उन्होंने धनंजय, सागरनन्दी आदि का ही विरोध नहीं किया, वरन् अवसर आने पर भरत मुनि का भी विरोध किया। नाट्यशास्त्र के परवर्त्ती ग्रन्थों में, मौलिकता की दृष्टि से, नाट्यदर्पण का विशिष्ट स्थान है। प्ररोचना के विषय में नाट्यदर्पण का मत नाट्यशास्त्र से भिन्न है। नाट्यशास्त्र में पूर्वरंग के १९ अंगों का विधान है, जिनमें ९ यवनिका के भीतर और ९ बाहर किये जाते हैं। नाट्यदर्पण ने इनमें से केवल एक प्ररोचना को स्वीकार किया और शेष को छोड़ दिया। दूसरा अन्तर भारती वृत्ति के विवेचन में है। ग्रन्थकारों ने भरत मुनि के भारती वृत्ति के विवेचन में 'वदतो व्याघात' दोष दिखाया है। भरत ने रूपक के १० भेद किये, परन्तु नाट्यदर्पणकार ने जैनधर्म के कुछ सिद्धान्तों के अनुसार १२ भेद किये और मंगलाचरण में ही इसकी ओर संकेत कर दिया है। भरत के १० रूपक-भेदों में से नाटिका और प्रकरणी अधिक मानकर नाट्य- दर्पण में नवीन पद्धति से १२ भेदों का वर्गीकरण किया गया है। नाट्यदर्पण में तेरह उपरूपकों का उल्लेख है। इस ग्रन्थ में नाटक, प्रकरण, नाटिका तथा प्रकरणी में सात्त्वती, केशिकी, आरभटी तथा भारती वृत्तियाँ मानी गई हैं, किन्तु व्यायोग, समवकार, भाण, प्रहसन, डिम, अंक, ईहामृग तथा वीथी में केशिकी-रहित केवल तीन वृत्तियाँ मानी गई हैं। इस प्रकार, वृत्तियों के आधार पर रूपकों का वर्गीकरण नाट्यदर्पण की मौलिक देन है। नाट्यदर्पण में रस-विवेचन भी पूर्वाचार्यों से कुछ भिन्न प्रकार का है। इसमें यथास्थान मम्मट तथा अभिनवगुप्त के भी मतों का खण्डन किया गया है। रामचन्द्र- गुणचन्द्र का रस-विवेचन मौलिक अवश्य है, भले ही सवथा मान्य नहीं हो। उनके मतानुसार शृंगार, हास्य, वीर, अद्भुत और शान्त सुखात्मक रस हैं, परन्तु करुण, भयानक, बीभत्स और रौद्र रस दुःखात्मक हैं। इस ग्रन्थ में रस के मूलतः नौ भेद माने गये हैं, परन्तु इनके अतिरिक्त तृष्णा को स्थायी मानकर लौल्य रस, आद्रता को स्थायी मानकर स्नेहरस, आसक्ति को स्थायी मानकर व्यसनरस, अरति को स्थायी मानकर दुःखरस और संतोष को स्थायी मानकर सुखरस की अनुभूति स्वीकार की गई है। इस प्रकार, ग्रन्थकारों ने स्वतन्त्र रूप से रस की

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास विवेचना की। परन्तु, आगामी आचार्यों ने उनके मत को मान्यता नहीं दी और विश्वनाथ आदि आचार्यों ने उनके मत की सर्वथा अवहेलना की। नाट्यदर्पण के अनुसार रसानुभूति के पाँच आधार होते हैं : १. लौकिक रूप में स्थित पुरुष; २. नट; ३. काव्य-नाटक के श्रोता; ४. काव्य-नाटक के अनुसन्धाता अर्थात् कवि एवं नाटककार; ५. सामाजिक। अनुकार्य, अनुकर्त्ता, श्रोता तथा अनुसन्धाता को तो प्रत्यक्ष रूप में रसानुभूति होती है, किन्तु सामाजिक को परोक्ष रूप में। नाट्यदर्पण के अनुसार प्रेक्षक आदि में रहनेवाला रस लोकोत्तर है और शेष लौकिक। भावप्रकाशन : शारदातनय का भावप्रकाशन भी नाट्य-सिद्धान्त-सम्बन्धी एक प्रख्यात ग्रन्थ है। इसमें दशरूपक तथा नाट्यदर्पण की अपेक्षा अधिक विस्तार है। इसमें दस अधिकारों में नाट्य-सम्बन्धी सभी विषयों का विस्तार से वर्णन किया गया है। भाव- प्रकाशन का आधार अपेक्षाकृत अधिक व्यावहारिक है; क्योंकि शारदातनय के गुरु दिवाकर स्वयं एक नाट्यशाला के निर्देशक थे। भावप्रकाशन में अधिक पूर्ववर्त्ती ग्रन्थों का आधार है, परन्तु विषय के सम्बन्ध में इसकी अपनी मौलिक दृष्टि भी है। इसमें नाट्य के विषय को भाव के आधार पर ग्रहण किया गया है; क्योंकि नाट्य से भावों का ही प्रकाशन होता है, इसीलिए ग्रन्थ का नाम भावप्रकाशन रखा गया है। यही कारण है कि ग्रन्थ का आरम्भ भाव तथा रस से किया गया है। इस ग्रन्थ में नायक-नायिका, नाटक-रचना और कथावस्तु के विभाजन का विवेचन करके रूपक के प्रकारों की चर्चा की गई है। दस रूपकों के बाद बीस उपरूपकों का विवरण दिया गया है। वस्तुतः, इतने अधिक उपरूपकों का विवेचन किसी अन्य ग्रन्थ में नहीं मिलता। शारदातनय ने उपरूपकों के लक्षण के विषय में अनेक आचार्यों के मत दिये हैं, इससे सिद्ध होता है कि इस विषय पर कई ग्रन्थ वर्त्तमान थे। फिर अन्य अभिनय आदिक नाट्य-प्रसंगों का संक्षेप में विवेचन किया गया है। इस ग्रन्थ में तद्विषयक अन्य समसामयिक ग्रन्थों की अपेक्षा अधिक विस्तार है और लेखक ने अपने पूर्ववर्ती कोहल, मातृगुप्त, हर्ष, सुबन्धु आदि के उद्धरण दिये हैं, नाट्यशास्त्र का आधार तो उन्होंने स्वीकार किया ही है। साथ ही, रुद्रट, अभिनव, भोज, धनिक आदि का उल्लेख कई स्थानों पर हुआ है। फिर भी, इसमें नाट्य के समस्त अंगों का विवेचन नाममात् के लिए ही है, नाटक की रचना तथा रस-प्रकरण ही इसके मूल प्रतिपाद्य विषय हैं। शारदातनय ने भरत के नाट्यशास्त्र का मुख्य रूप से अनुसरण किया है, परन्तु जहाँ-कहीं महत्त्वपूर्णक लेखकों ने भरत से मतभेद प्रकट किया है, वहाँ उन्होंने उनकी भी सम्मति दे दी है। रस के विषय में शारदातनय ने अभिनवगुप्त का अनुसरण करके स्वीकार किया है कि रस ही काव्य की आत्मा है और अलंकार, रीति, गुण आदि काव्य का केवल महत्त्व बढ़ाते हैं। यद्यपि वे अभिनवगुप्त से सामान्यतः सहमत हैं, फिर भी कई स्थलों पर मतभेद प्रदर्शित करते हैं।

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उदाहरणार्थ वे अभिनव के समान यह नहीं मानते कि उत्तम काव्य में रस सदा व्यंग्य होता है, वाच्य नहीं। इस स्थल पर शारदातनय ने दशरूपक का अनुसरण करके एक नवीन मार्ग निकाला है कि रस वाच्य हो या व्यंग्य, सदा काव्य की आत्मा होता है। इसी प्रकार, उन्होंने शब्दों की व्यंजना-वृत्ति को तात्पर्य-वृत्ति से पृथक् अस्तित्व नहीं दिया और ध्वनि को भी तात्पर्य-वृत्ति में अन्तर्भूत कर लिया है। दो अन्य स्थलों पर भी शारदातनय ने अभिनवगुप्त से मतभेद प्रकट किया है। रस- निष्पत्ति के विषय में प्राय सभी रसाचार्यों ने अभिनव का अनुसरण किया, परन्तु शारदातनय ने भट्टनायक के द्वारा प्रवत्तित तथा धनिक के द्वारा संशोधित् सिद्धान्त को स्वीकार किया। उन्होंने काव्य तथा रस में भाव्य-भावक भाव माना, व्यंग्य-व्यंजक भाव नहीं। दूसरा स्थल वह है, जहाँ शारदातनय ने अभिनवगुप्त आदि की आलोचना शान्त रस की स्थिति के विषय में की है। इस विषय में शारदातनय ने धनंजय का अनुसरण किया है और कहा है कि रंगमंच पर शान्त रस का अभिनय नहीं हो सकता, परन्तु उन्होंने स्वीकार किया है कि शान्त रस बहुत महत्त्वपूर्ण रस है और नाटक के अतिरिक्त अन्य काव्य में इसकी स्थिति होती है। इस प्रकार, भावप्रकाशन में लेखक का उद्देश्य भरत के पूर्ववर्ती तथा परवर्त्ती नाट्यशास्त्र के सभी सिद्धान्तों का संग्रह करके और उनकी परीक्षा करके उन्हें संशोधित रूप में रखना है। रस-सिद्धान्त में शारदातनय का पूर्ण विश्वास है और उन्होंने भोज के 'शृंगारप्रकाश' के आधार पर मुख्यतः शृंगार रस का विकास किया है। साहित्यदर्पण : कविराज विश्वनाथ के प्रसिद्ध ग्रन्थ साहित्यदर्पण का स्थान संस्कृत- साहित्यशास्त्र में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इस ग्रन्थ की बहुत प्रतिष्ठा है। इसके छठे परिच्छेद में नाट्य-सिद्धान्त का विवेचन किया गया है, जो मुख्यतः भरत के नाट्यशास्त्र के कुछ अध्यायों पर आधारित है। इसमें दशरूपक और उसकी टीका 'अवलोक' से भी पर्याप्त सहायता ली गई है। प्राचीन परम्परागत सिद्धान्तों की व्याख्या के प्रसंग में साहित्यदर्पण महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। प्राचीन भारतीय नाटकों का विवेचन करनेवाले पाश्चात्त्य विद्वान् इसके छठे परिच्छेद पर बहुत निर्भर करते हैं। इसके तीसरे परिच्छेद में रस का तथा उसके आलम्बन-रूप नायक-नायिका का विवेचन किया गया है। D रस के विषय में साहित्यदर्पण में अभिनवगुप्त का अनुसरण किया गया है; इतना अन्तर अवश्य है कि इसमें दसवें रस के रूप में 'वात्सल्य' को मान्यता दी गई है। विश्वनाथ भी व्यंजनावादी हैं। साहित्यदर्पण में भी रस को ही काव्य की आत्मा स्वीकार किया गया है। रस सदा सुखात्मक तथा ब्रह्मानन्द-सहोदर माना गया है। इस ग्रन्थ में रूपक के दस भेदों के अतिरिक्त १८ भेद उपरूपक के भी माने गये और इसी के आधार पर परवर्त्ती साहित्यकारों तथा पाश्चात्त्य विद्वानों ने उपरूपक के १८ भेद माने। शृंगार रस, नायक के दूत आदि के कुछ नवीन उपभेद किये गये हैं। फिर भी, साहित्यदर्पण में विषय का जो प्रतिपादन किया गया है, उसमें कोई नवीनता नहीं है।

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास भरत के नाट्य-सिद्धान्त का परवर्त्ती आचार्यों पर प्रभाव भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का मूल स्रोत भरत का नाट्यशास्त्र ही है। पहले संकेत किया जा चुका है कि भरत के भी पूर्व अनेक नाट्याचार्यों ने नाट्य-सिद्धान्त के विकास में योगदान किया है, परन्तु उनमें से किसी का भी ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। यत्र-तत्न उन ग्रन्थों या उनके सिद्धान्तों का उल्लेख ही पाया जाता है। भरत का नाट्यशास्त्र सुनियोजित ढंग पर लिखा गया है और उसमें नाट्य-सिद्धान्त के सभी अंगों का समुचित रीति से विवेचन किया गया है। सभी परवर्त्ती नाट्याचार्य भरत से निश्चित रूप से प्रभावित हैं। किसी-किसी आचार्य ने भरत से जहाँ-तहाँ किसी-किसी विषय में मतभेद प्रदर्शित किया है। उन नाट्याचार्यों पर भरत का प्रभाव दिखाने का प्रयत्न किया जा रहा है। यह भी दिखाने की चेष्टा की जा रही है कि भरत के मत से उनके सिद्धान्त में क्या अन्तर है। पूर्वरंग, प्रस्तावना आदि : भरत ने पूर्वरंग और दैवत-पूजन का बहुत विस्तृत विवेचन दिया है, परन्तु सभी परवर्त्ती आचार्यों ने इतने विस्तार में नहीं जाकर बहुत संक्षेप में ही इसका उल्लेख किया है। इन आचार्यों ने इतने विस्तार की आवश्यकता नहीं समझी। जहाँ तक पूर्वरंग के लक्षण का सम्बन्ध है, धनंजय, धनिक, शारदातनय, विश्वनाथ आदि सभी आचार्यों ने भरत का ही अनुकरण किया है। इस विषय में भरत ने विधान किया है कि भाण्ड तथा तन्त्री-वाद्यों का संयोग और पाठ्य-योग आदि जो प्रयोग- सम्बन्धी अंग हैं, उन सबका सम्यक् सम्पादन होना चाहिए। उन्होंने पूर्वरंग में १९ अंगों का विधान किया है, जिनमें ९ यवनिका के भीतर और १० यवनिका के बाहर किये जाते हैं। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने इनमें केवल प्ररोचना को ग्रहण किया है, शेष को छोड़ दिया है। परन्तु, अन्य आचार्यों ने इन्हें अनावश्यक समझकर इनका कोई उल्लेख नहीं किया। वस्तुतः, भरत के समय में इतने विस्तृत पूर्वरंग का जो महत्त्व रहा हो, परन्तु धनंजय का समय आते-आते इतना विस्तार अनावश्यक ही माना जाता था, इसीलिए इन उत्तरवर्त्ती आचार्यों ने पूर्वरंग का इतना विस्तार नहीं किया। भरत ने रंगदवत-पूजन का इतना विस्तार क्यों किया? जान पड़ता है कि 'असुर-पराजय' और 'अमृत-मन्थन' नामक रूपकों का अभिनय करते समय असुरों (आर्यों के विरोधी अनारयों) ने जो उत्पात और विघ्न उपस्थित किये, उसी के कारण भरत ने देवताओं को प्रसन्न करके अभिनय की निर्विघ्न समाप्ति के लिए इतने पूजन का विधान किया। परन्तु, आगे चलकर धनंजय आदि आचार्यों के युग में अनार्यों की ओर से किसी उत्पात की आशंका नहीं रह गई थी; अतः उन आचार्यों ने इतना विस्तृत विधान नहीं किया। रंगदैवत-पूजन के पीछे तत्कालीन परिस्थिति का हाथ जान पड़ता है। प्रस्तावना के विषय में भरत ने बहुत कम ही लिखा और परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने उसका विस्तृत विवेचन किया। भरत ने लिखा है कि अनेक प्रकार के भावों तथा रसों से

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समन्वित, सुन्दर वाक्योंवाले मधुर श्लोकों से रंग (सामाजिकों) को प्रसन्न करके कवि के नाम का कीर्तन या वर्णन किया जाता है। इसके बाद कथावस्तु के सन्दर्भ का संकेत देने के लिए उद्घातक का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार, प्रस्तावना करके प्रस्तावक रंग- स्थल से निकल जाय। स्पष्टतः, भरत ने विषय का विस्तार नहीं किया। परन्तु, आगे चलकर धनंजय, शारदातनय तथा अग्निपुराणकार ने आमुख या प्रस्तावना के तीन अंग स्वीकार किये-कथोद्घात, प्रवृत्तक तथा प्रयोगातिशय। विश्वनाथ ने और भी विस्तार किया और प्रस्तावना के पाँच अंग माने-उद्घातक, कथोद्घात, प्रयोगातिशय, प्रवर्त्तक तथा अवलगित। नान्दी का लक्षण भरत ने दिया और नाटक में इसका प्रयोग अनिवार्य माना। लगभग सभी परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने नान्दी को उसी रूप में स्वीकार किया और नाटक में अनिवार्य रूप से इसके प्रयोग का विधान किया। वस्तु : वस्तु के सम्बन्ध में भी भरत मुनि ने जो नियम बनाये, उन्हें सभी नाट्याचार्यों ने स्वीकार किया। उन्होंने वस्तु को बहुत महत्त्व प्रदान किया और इसे नाटक का शरीर माना : इतिवृत्तं तु नाट्यस्य शरीर परिकीतितम । ' शारदातनय ने भी यही भाव दूसरे शब्दों में व्यक्त किया है : वस्तु तत्स्यात्प्रबन्धस्य शरीरं कविकल्पितम्।२ इससे स्पष्ट हो जाता है कि इन आचार्यों की दृष्टि में वस्तु का कितना महत्त्व है।। भरत मुनि ने कथानक के दो भेद किये : आधिकारिक और प्रासंगिक। धनंजय आदि सभी परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने यह भेद इसी रूप में स्वीकार किया। किसी ने भी भरत से मतभेद दिखाने का प्रयत्न नहीं किया। उत्पत्ति की दृष्टि से भरत ने कथानक या वस्तु के तीन विभाग किये : प्रख्यात, उपपाद्य तथा मिश्र। सभी नाट्याचार्यों ने इस प्रकार का विभाग स्वीकार किया। भरत ने अपने नाट्यशास्त्र में वस्तु की पाँच अर्थ-प्रकृतियों का उल्लेख किया है : बीज, बिन्दु, पताका, प्रकरी और कार्य। ये अर्थ-प्रकृतियाँ सभी नाट्याचार्यों को मान्य हुई और किसी ने भी इनका विरोध करना उचित नहीं समझा। अर्थ-प्रकृति का तात्पर्य उन तत्त्वों से है, जो प्रयोजन की सिद्धि में सहायक होते हैं। सभी आचार्यों ने इनको उचित महत्त्व प्रदान किया। नाट्यशास्त्र ने नाटक के इतिवृत्त के सम्यक् विकास में पाँच अवस्थाएँ स्वीकार की हैं। ये अवस्थाएँ नाटक के इतिवृत्त की गति को प्रकट करनेवाली होती हैं। ये १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १९, का० १ २. भावप्रकाशन, सप्तम अधिकार, पृ० २००

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१०० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास उक्त अवस्थाएँ हैं : आरम्भ, प्रयत्न, प्राप्त्याशा, नियताप्ति और फलागम। परवर्त्ती आचार्यों ने अन्य विषयों की ही तरह इस विषय में भी भरत का अनुसरण किया। शारदातनय ने उनका मत उन्हीं के शब्दों में भावप्रकाशन में उद्धृत किया। धनंजय, विश्वनाथ, रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने दूसरे शब्दों में वही बात व्यक्त की। भरत ने नाटक के इतिवृत्त में अर्थ-प्रकृतियों तथा अवस्थाओं के अतिरिक्त सन्धियों को भी स्थान दिया और उनका विशद विवेचन किया। उनके अनुसार सन्धियाँ पाँच हैं : मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श तथा निर्वहण। आगे चलकर धनंजय, शारदातनय, विश्वनाथ, रामचन्द्र-गुणचन्द्र आदि ने भरत का अनुसरण करके सन्धियों का विवेचन किया। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाट्यदर्पण में सन्धि का विवेचन बहुत विस्तार से किया है। उन्होंने अपने ढंग से इस विषय का विवेचन किया है। भरत ने इन पाँच सन्धियों के ६४ अंगों का उल्लेख किया है। इस विषय में भी सभी नाट्याचार्यों ने भरत मुनि का अनुसरण करके उन अंगों का पूर्ण विवेचन किया है। भरत मुनि ने वस्तु के फिर दो विभाग किये-दृश्य तथा सूच्य। धनंजय आदि आचार्यों ने इस विषय में भी भरत का अनुसरण किया। भरत ने सूच्य अंश की सूचना देने के लिए पाँच अर्थोपक्षेपकों का विधान किया है-विष्कम्भक, प्रवेशक, चूलिका, अंकावतार तथा अंकमुख। सभी परवर्त्ती नाट्याचार्य इस विषय में भी भरत से पूर्णतः प्रभावित हैं। अंकमुख या अंकास्य के लक्षण में धनजय ने भरत मुनि से मतभेद दिखाया है। विश्वनाथ ने इस विषय में भरत का और शारदातनय ने धनंजय का अनुसरण किया। शारदातनय ने विश्वनाथ के दिये लक्षण तथा उदाहरण भी दिये। परन्तु, इस बात में सन्देह नहीं कि अर्थोपक्षेपकों के विषय में भी भरत का प्रभाव अन्य आचार्यों पर पर्याप्त रूप से पड़ा। जान पड़ता है कि अंकमुख के विषय में विश्वनाथ को धनंजय का मत पसन्द नहीं था, धनिक-विरोधी ही मत उन्हें अधिक पसन्द था, परन्तु वे अपने ऊपर विरोध का यह श्रेय नहीं लेना चाहते थे। इसलिए उन्होंने वृत्ति में लिख दिया : एतच्च धनिक- मतानुसारेणोक्तम्। अन्ये तु अङ्कावतारेणैवेदं गतार्थम् इत्याहुः ॥ भरत मुनि ने वस्तु के गठन में पताका-स्थानक का विधान करके चार भेदों का उल्लेख किया। विश्वनाथ ने भरत का ही अनुकरण करके चार प्रकार के पताका-स्थानक का उल्लेख किया। विश्वनाथ की परिभाषाएँ भरत के ही अनुकरण पर हैं और उन्हीं के श्लोकों में एक-आध शब्दों में परिवर्त्तन कर दिया गया है। किन्तु, धनंजय-धनिक ने दो ही प्रकार के पताका-स्थानक स्वीकार किये। शारदातनय ने धनंजय के अनुकरण पर दो ही भेद माने, परन्तु 'अन्ये' लिखकर भरत मुनि के भी श्लोकों को उद्धृत करके उनका भी मत लिख दिया। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भरत मुनि से प्रभावित होकर पताका-स्थानक के चार भेद माने। इस विषय में सभी नाट्याचार्यों ने भरत से प्रभाव ग्रहण किया, केवल धनंजय ने पताका-स्थानक का सिद्धान्त भरत से ग्रहण करके भी कुछ नवीनता दिखाई।

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भरत ने वस्तु के फिर तीन विभाग किये-सर्वशाव्य या प्रकाश, नियतश्राव्य और अश्राव्य या स्वगत। फिर उन्होंने नियतश्राव्य के दो भेद किये-जनान्तिक और अपवारित। धनंजय, विश्वनाथ आदि सभी नाट्याचार्यों ने इस विषय में भी भरत से प्रभाव ग्रहण किया और अपने ग्रन्थों में इन्हें स्थान दिया। सभी ने आकाश-भाषित को भी उसी रूप में ग्रहण किया। पात्र : नायक-भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में नायक या राजा में सभी गुणों का समावेश कर दिया है। शायद ही कोई गुण छूटा हो, जिसकी सम्भावना उन्होंने नायक में नहीं की हो। धनंजय आदि सभी परवर्त्ती आचार्यों ने भी राजा को ही नायक स्वीकार किया और उसमें सभी गुणों का समावेश माना। धनंजय ने दो श्लोकों में उन सारे गुणों का विवरण दिया है। विश्वनाथ ने एक ही श्लोक में नायक के सभी प्रमुख गुणों का उल्लेख किया है। इन आचार्यों की दृष्टि में किसी नाटक के नायक को सर्वगुण-सम्पन्न होना आवश्यक है। संस्कृत-नाटकों का नायक वही व्यक्ति हो सकता है, जो सभी गुणों से युक्त हो। स्पष्टतः नाट्यशास्त्र में जो परम्परा चलाई गई, उसी का प्रभाव सभी परवर्त्ती नाट्याचार्यों पर पड़ा। भरत ने नायक के चार भेद माने-धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित और धीर- प्रशान्त। उनके बादवाले सभी नाट्याचार्यों ने इन भेदों को स्वीकार किया। नाट्यशास्त्र में बताया गया कि देवता धीरोद्धत, राजे धीरललित, सेनापति तथा मन्त्री धीरोदात्त और ब्राह्मण तथा वणिक धीरप्रशान्त नायक होते हैं। परन्तु, परवर्त्ती आचार्यों में ऐसा कोई आग्रह नहीं दिखाई देता। उनमें से किसी ने भी इस बात का उल्लेख नहीं किया। परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने नायक के विषय में एक नवीन उद्भावना की है, जो भरत के नाट्यशास्त्र में नहीं है। धनंजय ने नायिका के प्रति व्यवहार की दृष्टि से नायक के चार भेद किये-अनुकूल, दक्षिण, शठ तथा धृष्ट। यह विभाग शृंगार रस के नायकों में माना गया है। शारदातनय, विश्वनाथ आदि नाट्याचार्यों ने यह विभाग स्वीकार किया है। धनंजय का समय आते-आते शृंगार रस के अधिक नाटक लिखे जाने लगे थे। जान पड़ता है कि इसीलिए इस नवीन उद्भावना की आवश्यकता प्रतीत हुई। सहायक-भरत ने नाटक में नायक के अतिरिक्त कई अन्य पात्रों का विवरण दिया है। वे सभी किसी-न-किसी रूप से नायक के सहायक होते हैं। ये सहायक दो प्रकार के हैं : १. अन्तःपुर के सहायक, जैसे-स्नातक, कंचुकीय, वर्षधर, औपस्थानिक और निर्मण्ड। ये नायक को उसके अन्तःपुर के कार्यों में सहायता पहुँचाते हैं। २. दूसरे प्रकार के सहायक राजा या नायक के बाह्य कार्यों में सहायता करते हैं; जैसे-राजा या मित्र, सेनापति, कुमार, मन्त्री, सचिव और प्राङविवाक। इसके बाद उन्होंने प्रयोक्ताओं का विवरण दिया है, जिनमें सूत्रधार, पारिपार्श्वक, विट, शकार, विदूषक और चेट हैं। भरत ने इन पात्रों के गुणों का विस्तार से वर्णन किया है।

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परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने इस विषय में भी भरत द्वारा निर्दिष्ट मार्ग का अनुसरण किया, परन्तु कहीं-कहीं थोड़ा परिवर्त्तन भी कर दिया। धनंजय ने नायक के सहायकों में पीठमर्द, विट और विदूषक का उल्लेख किया और संक्षेप में उनके लक्षण लिखे। ये राजा के शृंगारी सहायक हैं। इनके अतिरिक्त अन्य कार्यों में भी उसके कुछ सहायक होते हैं। अनेक कार्यों में मन्त्री सहायक होता है। नायक के धर्माचरण में ऋत्विक, पुरोहित, तपस्वी तथा ब्रह्मज्ञानी महात्मा सहायक होते हैं। नायक के राजा होने पर उसके दण्ड-विधान में सहायता करनेवाले मित्र (राजा), युवराज, आटविक, सामन्त तथा सैनिक होते हैं। नायक के अन्तःपुर में वर्षधर, किरात, गूँगे, बौने आदि का समावेश किया गया है। इनके अतिरिक्त म्लेच्छ, शकार और आभीर अपने-अपने कार्य में राजा के सहायक होते हैं। इस विषय में विश्वनाथ ने धनंजय का ही अधिक अनुसरण किया है। उन्होंने भी नायक का मुख्य सहायक पीठमर्द को ही माना और शृंगार के सहायकों में विट, चेट तथा विदूषक को रखा। फिर उन्होंने राज्य की चिन्ता में नायक का अर्थ-विषयक सहायक मन्त्री को माना। अन्तःपुर के सहायकों में विश्वनाथ ने बौने, नपुंसक, किरात, म्लेच्छ, आभीर, कुबड़ा, शकार आदि को माना। फिर दण्ड के सहायकों में मित्र, कुमार, आटविक, अधीनस्थ राजा तथा सैनिक गिनाये गये हैं। धर्म कार्य में ऋत्विक, पुरोहित, ब्रह्मज्ञानी, तपस्वी आदि माने गये हैं। भरत ने पातों में दूत को भी रखा है। विश्वनाथ ने इसका विस्तार करके तीन प्रकार के दूतों का वर्णन किया है। इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि भरत ने नायक के सहायकों का जो विवेचन किया, उसी के आधार पर धनंजय ने भी अपना विवेचन प्रस्तुत किया, परन्तु उसमें आवश्यकतानुसार थोड़ा परिवर्त्तन भी कर दिया। विश्वनाथ ने इस विषय में भरत की अपेक्षा धनंजय का ही अधिक अनुसरण किया और उन्हीं के आधार पर अपना विवेचन प्रस्तुत किया। नायिका : भरत ने नाट्यशास्त्र में नायिका के चार भेदों का उल्लेख किया : दिव्या, नृपतिनी, कुलस्त्री तथा गणिका। परन्तु, परवर्त्ती नाट्याचार्यों को यह वर्गीकरण मान्य नहीं हुआ। उन लोगों ने दूसरी ही रीति से नायिका का वर्गीकरण किया। भरत ने दूसरी दृष्टि से नायिका के आठ भेद किये : स्वाधीनपतिका, वासकसज्जा, विरहोत्कण्टिता, खण्डिता, कलहान्तरिता, विप्रलब्धा, प्रोषितप्रिया और अभिसारिका। धनंजय ने इन भेदों को स्वीकार किया और इनके अतिरिक्त स्वकीया, परकीया तथा सामान्याभेद किये। फिर इनके अनेक भेदोपभेद हुए। विश्वनाथ ने इस विषय का और भी विस्तार किया। भानुदत्त ने भी इस विषय में स्वतन्त्र विवेचन किया। इन भेदोपभेदों के लक्षण भी सभी ने एक से ही दिये। काये स्पष्टतः नायिका-भेद के विषय में भरत का विशेष प्रभाव परवर्ती आचार्यों पर नहीं पड़ा। नायिका-भेद परवर्त्ती नाट्याचार्यों तथा काव्याचार्यों का प्रिय विषय रहा है और सभी ने भरत का स्वल्प आधार लेकर नवीन उद्भावनाएँ की। व्रजभाषा के कवियों ने भी

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नायिक-भेद का विस्तृत विवेचन किया। इस विषय में नाट्यशास्त्र का थोड़ा ही प्रभाव माना जायगा। वस्तुतः, संस्कृत के पूरवर्त्ती काव्यशास्त्रियों तथा ब्रजभाषा के कवि-आचार्यों का नायक-नायिका-भेद-वर्णन काव्य को ध्यान में रखकर हुआ है, नाटक को नहीं।ापा भरत ने अन्तःपुर की अनेक स्त्रियों का वर्णन किया है; जैसे-महादेवी, देवी, स्वामिनी, स्थायिनी एवं भोगिनी। फिर कई सहायिकाओं का भी विवरण दिया गया है; जैसे-शिल्पकारी, नर्त्तकी, आयुक्ता, परिचारिका, महत्तरा, प्रतिहारी, कुमारी, स्थविरा आदि। उन्होंने सबके विस्तृत लक्षण दिये। धनंजय ने इनका तो विवरण नहीं दिया, परन्तु नायिकाओं से नायक का समागम करानेवाली कुछ स्त्रियों का विवेचन किया है। विश्वनाथ ने भी धनंजय के अनुकरण पर दूतियों का ही वर्णन किया और दूतियों के कई भेद भी बताये। शारदातनय का भी नायिका-भेद-वर्णन धनंजय के ही अनुकरण पर है। रस : परिभाषा या लक्षण-रस की परिभाषा सबसे पहले हम भरत के नाट्यशास्त्र में पाते हैं। उन्होंने प्रश्न उठाया है और स्वयं उत्तर दिया है : अव्ाह-रस इति कः पदार्थः । उच्यते -- आस्वाद्यत्वात्।9 भरत मुनि का कथन है कि आस्वादनीय होने से रस कहा जाता है। स्वभावतः प्रश्न उठता है कि किसका आस्वादन होता है ? भरत मुनि ने उसी स्थान पर इसका भी उत्तर दिया है कि जैसे नाना प्रकार के व्यंजनों से संस्कृत अन्न को खाकर रसास्वादन करते हुए सुमनापुरुष हर्ष प्राप्त करते हैं, उसी प्रकार अनेक तरह के भावों और अभिनयों से युक्त स्थायीभाव का सहृदय दर्शक आस्वाद करते हैं और आनन्द प्राप्त करते हैं। इस परिभाषा से स्पष्ट हो जाता है कि सामाजिक की दृष्टि से भावों का भोग रस नहीं है, वरन् भोग से उत्पन्न होनेवाला आनन्द ही रस है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि सामाजिक की भावानुभूति के आस्वाद से उत्पन्न आनन्द ही रस कहा जा सकता है। भरत मुनि के मत से सहृदय के हृदय में स्थित स्थायीभाव ही उचित वातावरण पाकर रस-रूप में परिणत हो जाते हैं और रस उत्पन्न करने के लिए उचित वातावरण की उत्पत्ति विभाव, अनुभाव और संचारीभाव के संयोग से होती है। उन्होंने अपने रससूत्र में यही तथ्य रखा है : 'तत्न विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाढ् रसनिष्पत्तिः।' अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारी भाव के संयोग से स्थायीभाव रस को प्राप्त होते हैं। भरत ने एक उदाहरण देकर यह समझाया है। जैसे गुड़ आदि द्रव्यों और व्यंजनों एवं औषधि आदि से षाडव या प्रपानक आदि से रस उत्पन्न होता है, उसी प्रकार अनेक भावों के उपगत होने से स्थायीभाव रसत्व प्राप्त करते हैं। ककी आगे चलकर रसशास्त्रियों ने इस रस या आनन्द को आध्यात्मिक रूप दे दिया। तैत्तिरीय उपनिषद् के वाक्य 'रसो वै सः' के आधार पर इन आचार्यों ने इसे ब्रह्मानन्द- सहोदर भी कहा है। यह रस लौकिक होते हुए भी अलौकिक तथा दिव्य है। अग्निपुराण १. नाट्यशास्त्र, अध्याय ६, पृ० ३१५ (डॉ० रघुवंश द्वारा अनुवाद) .

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१०४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास में काव्य द्वारा उत्पन्न चैतन्य चमत्कार को रस कहा गया है। उक्त पुराण में वहा गया है कि वेदान्त आदि में जिस ब्रह्म को अक्षर, सनातन, अज, विभु, चैतन्य, ज्योति, ईश्वर कहा गया है, उसका सहज स्वरूप आनन्द है। उस आनन्द की प्राप्ति चैतन्य चमत्कार के रूप में होती है। इसी को रस की संज्ञा दी जाती है।' इस तथ्य को अभिनवगुप्त ने और विस्तार दिया। उनका कथन है कि वासना के रूप में रहनेवाली रति आदि वृत्तियाँ ही साधारणीकरण के कारण निरवैयक्तिक हो जाने पर आनन्दस्वरूप हो जाती हैं। उस समय इनका आनन्द ब्रह्मानन्द के समकक्ष हो जाता है। भट्टनायक ने भी रस को परब्रह्म के सदृश माना है। मम्मट, विश्वनाथ, पण्डितराज जगन्नाथ आदि आचार्यों ने इसी मत की पुष्टि की है। अभिवनगुप्त आदि आचार्य व्यंजना- वादी थे और इन लोगों ने रस को व्यंग्य माना है। परन्तु, भरत के मत के अधिक निकट मीमांसक भट्टलोल्लट जान पड़ते हैं। ये अभिधावादी थे और इनके मत का प्रभाव धनंजय और धनिक पर पड़ा जान पड़ता है। धनंजय का मत है कि विभाव, अनुभाव, सात्त्विक भाव एवं व्यभिचारियों के द्वारा जब रत्यादि स्थायीभाव आस्वाद्य-चर्वणा के योग्य-बना दिया जाता है, तो वही रस कहलाता है। उन्होंने अन्य आचार्यों के समान रस को ब्रह्मानन्द या ब्रह्मानन्द-सहोदर नहीं माना। धनंजय-धनिक का मत भरत के अधिक निकट प्रतीत होता है। स्मरणीय है कि भरत मुनि के प्रसिद्ध रससूत्र को सभी परवर्त्ती आचार्यों ने स्वीकार किया और भट्टलोल्लट, शंकुक, भट्टनायक तथा अभिनवगुप्त आदि ने अपने-अपने दार्शनिक मतों के अनुसार उसकी व्याख्याएँ प्रस्तुत की, जिससे सभी में कुछ अन्तर दिखाई देता है। बाद के रसाचार्यों ने अभिनवगुप्त द्वारा दी गई व्याख्या स्वीकार कर ली। अतः, रसवाद के सभी आचार्यों पर भरत का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र का रस-विवेचन पूर्वाचार्यों से कुछ भिन्न है। ग्रन्थकारों ने अपने पूर्वाचार्य अभिनवगुप्त तथा मम्मट का निस्संकोच रूप से खण्डन किया है। उन्होंने रस को सुख-दुःखात्मक दोनों माना है। उनके अनुसार शृंगार, हास्य, वीर, अद्भुत तथा शान्त सुखात्मक हैं, किन्तु करुण, रौद्र, भयानक तथा बीभत्स रस दुःखात्मक हैं। वे काव्य और नाटक में सामान्य-विषयक तथा विशेष-विषयक दो प्रकार के रसों की स्थिति मानते हैं। अन्य आचार्य लोक में होनेवाली स्त्री-पुरुष की रति को रस नहीं मानते, परन्तु ये आचार्य लौकिक स्त्री-पुरुष को भी विभावादि शब्दों से और उनकी रति को रस शब्द से निर्दिष्ट करते हैं। भाव : अभिनवगुप्त का मत है कि वाचिक आदि अभिनय से सम्पादित अलौकिक चित्तवृत्तियाँ अपने मन में रहनेवाली केवल बौद्धिक दशा का आस्वादन नहीं करती, वरन् रसरूप में भावित होती हैं, इसीलिए उन्हें भाव कहा जाता है। ये भाव अनुभावों के १. अग्निपुराण, अध्याय ३३८, श्लोक १-२

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [१०५

वाचिक, आंगिक, सास्विक तथा आहार्य प्रदर्शन द्वारा नाट्य अथवा काव्य का अर्थ व्यंजित करते हैं। धनंजय ने भाव का लक्षण लिखा है : 'सुखदुःखादिकर्भावैर्भावस्तद्भावभावनम्।" अर्थात् काव्य या नाटक में निबद्ध आश्रय के सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि भावों के द्वारा सामाजिक के हृदय का उसी भाव से भावित होना कहा जाता है। नाटक में जिन व्यक्तियों का अनुकरण किया जाता है, वे वास्तविक व्यक्ति होते हैं। कवि अपनी प्रतिभा के बल पर उनमें सुख-दुःख आदि का उपनिबन्धन करता है और नट उनको रंगमंच पर प्रस्तुत करते हैं। इन अनुकार्य व्यक्तियों के सुख-दुःख-भाव की भावना जब सहृदय व्यक्तियों के द्वारा होती है, तो इस भावना या वासना को भाव कहते हैं। स्पष्ट है कि कुछ अन्तर रहने पर भी भाव के विषय में भरत मुनि की जो धारणा है, उसे लगभग सभी परवर्ती काव्याचार्यों ने स्वीकार किया और सभी पर भरत का स्पष्ट प्रभाव पड़ा है। रस-निष्पत्ति : रस-निष्पत्ति का मूल आधार भरत का प्रसिद्ध रससूत्र- 'विभावानुभाव व्यभिचारिसंयोगाद् रसनिष्पत्तिः' है। उसी सूत्र की व्याख्या विभिन्न आचार्यों ने अपने दार्शनिक सिद्धान्त के आधार पर की, जिसके परिणाम-स्वरूप रस-सम्बन्धी कई वाद बन गये। भट्टलोल्लट का मीमांसादर्शन के आधार पर उत्पत्तिवाद, श्रीशंकुक का न्यायदर्शन के आधार पर अनुमितिवाद, भट्टनायक का सांख्यदर्शन के आधार पर भुक्तिवाद और अभिनवगुप्त का वेदान्तदर्शन के आधार पर अभिव्यक्तिवाद इसी रससूत्र की विभिन्न व्याख्याओं के फल हैं। सूत्र में आये 'संयोग' और 'निष्पत्ति' पदों की विभिन्न व्याख्याओं के कारण ही अनेक वादों का आविर्भाव हुआ। इस विषय में भरत का प्रभाव स्पष्ट ही है। विभिन्न रस : भरत मुनि ने आठ रसों का विवरण दिया। परवर्त्ती आचार्यों ने इन रसों को पूर्णतः स्वीकार किया और किसी-किसी ने कुछ नवीन रसों की उद्भावना की। अभिनवगुप्त ने शान्त रस की उद्भावना की, परन्तु उन्होंने भरत को ही इसका आदि स्रोत माना। भरत की ही कारिका में पाठान्तर मान या करके उन्होंने शान्त रस की स्थापना की। परवर्त्ती आचार्यों ने भक्ति, वात्सल्य आदि रसों की उद्भावना की। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने मूलतः नौ रस माने। परन्तु, इनके अतिरिक्त तृष्णा को स्थायी मानकर लौल्यरस, आर्द्रता को स्थायी मानकर स्नेहरस, आसक्ति को स्थायी मानकर व्यसनरस, अरति को स्थायी मानकर दुःखरस और सन्तोष को स्थायी मानकर सुख- रस की अनुभूति उन्होंने स्वीकार की है। ये सारी उद्भावनाएँ भरत से स्वतन्त्र हैं और इनपर भरत का कोई प्रभाव नहीं माना जा सकता। १. दशरूपक, चतुर्थ प्रकाश, का० ४

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१०६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

ऊरी भरत ने शृंगार रस के दो भेद किये : सम्भोग तथा विप्रलम्भ। विश्वनाथ आदि आचार्यों ने इसे इसी रूप में स्वीकार किया, परन्तु धनंजय ने थोड़ी नवीनता ला दी। उनके अनुसार शृंगार के तीन भेद हैं : अयोग, विप्रयोग तथा संयोग। उन्होंने विप्रलम्भ के दो भाग-अयोग तथा विप्रयोग-कर दिये। भरत ने विप्रलम्भ के दो भेद नहीं किये, परन्तु परवर्त्तीआचार्यों ने इसके चार भेद किये-पूर्वराग, मान, प्रवास तथा करुण। भरत ने हास्य रस के दो भेद किये-आत्मस्थ तथा परस्थ। फिर हास की मात्रा के न्यूनाधिक्य के कारण हास्य रस के छह भेद किये-स्मित तथा हसित उत्तम प्रकृति में, विहसित तथा उपहसित मध्यम प्रकृति में और अपहसित तथा अतिहसित अधम प्रकृति में होते हैं। परवर्त्ती आचार्यों ने इन उपभेदों को इसी रूप में स्वीकार किया। भरत मुनि ने वीर रस के तीन भेद किये-दानवीर, धर्मवीर तथा युद्धवीर। परवर्त्ती आचार्यों ने इन भेदों को किसी-न-किसी रूप में स्वीकार किया। धनंजय ने भी वीर रस के तीन ही भेद स्वीकार किये, परन्तु धर्मवीर के स्थान पर दानवीर कर दिया। विश्वनाथ ने दोनों पूर्ववर्त्ती आचार्यों का समन्वय करके वीर रस के चार भेद कर दिये-दानवीर, युद्धवीर, दयावीर और धर्मवीर। शारदातनय ने धनंजय द्वारा दिये गये तीन भेदों को स्वीकार किया। भरत ने बीभत्स रस के दो भेद माने-क्षोभज अथवा शुद्ध और उद्वगी अथवा अशुद्ध। किन्तु, अभिनव के गुरु भट्टतोत तथा धनंजय ने बीभत्स रस के तीन भेद स्वीकार किये : १. उद्व गी बीभत्स-कीड़े, दुर्गन्ध आदि विभावों से उत्पन्न; २. क्षोभज बीभत्स-रक्त, हड्डियों, चर्बी आदि से उत्पन्न; ३. शुद्ध बीभत्स-जघन, स्तन आदि अंगों के प्रति वैराग्य के कारण उत्पन्न। रस के उपभेदों के इस विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि इस विषय में भी परवर्त्ती आचार्यों पर भरत का पूरा प्रभाव पड़ा है। धनंजय आदि कुछ आचार्यों ने कहीं-कहीं थोड़ी नवीनता दिखाई है, परन्तु उनका भी आधार भरत का विवेचन ही है। रस-विवेचन के सम्बन्ध में एक बात ध्यान देने की है कि भरत का दृष्टिकोण सदा व्यावहारिक रहा है और उन्होंने अभिनय की दृष्टि से रस का विवेचन किया है। इसीलिए, उन्होंने अनुभावों पर इतना ध्यान दिया है। अभिनवगुप्त आदि आचार्यों ने रस के मनोवैज्ञानिक तथा शास्त्रीय पक्ष पर अधिक बल दिया है। परवर्त्ती अलंकार-शास्त्रियों पर भरत के रस-सिद्धान्त का इतना प्रभाव पड़ा कि उन्होंने अलंकार की श्रेष्ठता प्रतिपादित करते भी रस से सम्बन्ध रखनेवाले रसवत् आदि अलंकारों का विधान किया। रूपक-भेद : भरत मुनि ने रूपक के दस भेद माने, उपरूपक का कोई उल्लेख नहीं किया। फिर भी, उन्होंने दस रूपकों के अतिरिक्त नाटिका का वर्णन किया। अन्य सभी आचार्यों ने दस रूपकों का विवरण दिया। धनंजय ने इस विषय में भरत का पूर्ण अनुकरण किया। उन्होंने भी भरत के ही समान दस ही रूपकों को मान्यता देने पर भी नाटिका

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साककी भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [१०७

का भी वर्णन कर दिया। धनंजय ने उन ग्रन्थकारों के मत का खण्डन किया है, जो मानते हैं कि 'जैसे नृत्य के तोटक, श्रीगदित, भाण, भाणी, प्रस्थान, रासक तथा काव्य-ये सात भेद होते हैं, वे भाण की तरह ही होते हैं, इस प्रकार दस के अतिरिक्त अन्य भी रूपक हो सकते हैं।' धनंजय का उत्तर है कि नृत्य नाट्य से भिन्न होते हैं। इस प्रकार, धनंजय ने श्रीगदित आदि को नृत्य माना, रूपक नहीं। अतः, उनके मत से दस ही रूपक होते हैं। दस ही रूपकों का विवेचन करने के कारण उन्होंने अपने ग्रन्थ का नाम 'दशरूपक' रखा। अग्निपुराण में दस रूपकों के अतिरिक्त १७ उपरूपकों के भी नाम गिनाये गये हैं। विश्वनाथ ने भी भरत द्वारा निर्दिष्ट दस रूपकों की गणना अपनी पुस्तक में कराई है। परन्तु, इसके साथ ही उन्होंने अट्ठारह उपरूपकों को भी स्थान दिया है। शारदातनय ने भावप्रकाशन में भरत आदि के मत से रूपकों का निर्धारण किया। उन्होंने दशरूपक का ही श्लोक उद्धत करके दस रूपकों की गणना कराई है, परन्तु साथ ही तोटक, श्रीगदित आदि बीस उपरूपकों का उल्लेख करके अन्त में लिख दिया है कि दस रूपक तो रसात्मक होते हैं और बीस भावात्मक; किन्तु दृश्य होने के कारण उन्हें भी रूपक संज्ञा दी जाती है। इस प्रकार रूपकों की कुल संख्या तीस हो जाती है। जैन आचार्यद्वय रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने रूपकों की संख्या बारह मानी है और जैन- धर्म के प्रभाव के कारण मंगलाचरण में ही इसकी ओर संकेत कर दिया है। उन्होंने प्रसिद्ध दस रूपकों में नाटिका तथा प्रकरणी नामक दो रूपक जोड़ दिये। इन आचार्यों ने अपने ग्रन्थ नाट्यदर्पण के प्रथम विवेक में केवल नाटक का वर्णन किया और द्वितीय विवेक में शेष ग्यारह रूपकों का। मूल ग्रन्थ में श्रीगदित आदि का कोई उल्लेख नहीं है, परन्तु पुस्तक के अन्त में उन्होंने 'अन्यानि च रूपकाणि दृश्यन्ते। यदाहुः'-लिखकर १३ नृत्यों या उपरूपकों का विवरण दिया है। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि रूपकों की संख्या के विषय में सभी परवर्त्ती आचार्यों ने भरत का ही अनुसरण किया। जिन आचार्यों ने दस के स्थान पर ग्यारह या बारह रूपकों का विवरण दिया, वह भी भरत के ही अनुकरण पर; क्योंकि स्वयं भरत ने दस रूपकों के साथ नाटिका का भी विवरण दिया है। वर्त्तमान नाट्यशास्त्र में उपरूपकों का कोई उल्लेख नहीं है, परन्तु कुछ ऐसे उद्धरण पाये जाते हैं, जिनसे उपरूपकों का भी कृतित्व कुछ लोग भरत को ही देते हैं। किन्तु, वहाँ कुछ परिवर्तन के साथ १५ ही नाम पाये जाते हैं। परन्तु सम्भव है कि उपरूपकों की उद्भावना में भरत का हाथ नहीं ही रहा हो। कई विद्वान् उपरूपकों की उद्भावना का श्रेय कोहल को देते हैं। यदि यही सत्य हो तो उपरूपकों के विवरण पर भरत का प्रभाव ढूँढना व्यर्थ होगा। रूपकों के विवेचन में भी सभी परवर्त्ती नाट्याचार्यों पर भरत का प्रभाव पड़ा है। भरत ने सभी रूपकों में नाटक को प्रधान स्थान दिया और इसी का विवेचन सबसे पहले

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9०८] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास और सबसे अधिक विस्तार से किया। सभी परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने यही किया। नाट्य- दर्पण में तो पूरा प्रथम विवेक नाटक के ही विवेचन में लगाया गया है। धनंजय ने तो नाटक के सर्वप्रथम विवेचन के कारणों का भी निर्देश किया है। उनके अनुसार नाटक का सबसे पहले विवेचन करने के तीन कारण हैं : १. नाटक ही अन्य रूपक-भेदों की प्रकृति अथवा मूल है, अर्थात् नाटक में ही वस्तु, नेता तथा रस में थोड़ा परिवर्त्तन कर देने से प्रकरण आदि अन्य रूपक-भेद हो जाते हैं; २. नाटक में ही रस का पूरा परिपाक होता है; ३. वस्तु, नेता और रस के सम्पूर्ण लक्षण नाटक में ही पाये जाते हैं। भरत ने नाटक का जो विवेचन दिया, उसी के अनुरूप सभी आचार्यों ने भी विवरण दिया। जहाँ-तहाँ बहुत थोड़े ही परिवर्त्तन दिखाई देते हैं। शारदातनय ने नाटक के वर्गीकरण के विषय में सुबन्धु का मत उद्धत किया है। सुबन्धु ने नाटकों के पाँच प्रकार बताये हैं-पूर्ण, प्रशान्त, भास्वर, ललित और समग्र। इस प्रकार का कोई वर्गीकरण भरत ने नहीं किया, अतः यह सुबन्धु की स्वतन्त्र उद्भावना है। इसी तरह की कुछ छोटी-मोटी बातें हैं, जो भरत के प्रभाव से बाहर हैं। रूपक के प्रकरण आदि अन्य भेदों में भी प्रायः सभी नाट्याचार्यों ने कहीं-कहीं थोड़ा विस्तार कर दिया है या यथास्थान कुछ परिवर्त्तन कर दिया है, फिर भी सर्वत्र भरत का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भरत का नाट्यशास्त्र वह केन्द्र-बिन्दु है, जिसके चारों तरफ सभी नाट्याचार्य घूमते हैं। वस्तुतः, नाट्यशास्त्र समस्त नाट्यशास्त्रियों का उपजीव्य रहा है और इसी के आधार पर सभी नाट्याचार्यों ने अपने ग्रन्थों की रचना की। परवर्त्ती आचार्यों की कृतियों में यत्र-तत्र कुछ परिवर्त्तन के अतिरिक्त भरत के नाट्यशास्त्र से कोई स्पष्ट विकास नहीं दिखाई देता है। उन्होंने नाट्यशास्त्र की स्थापनाओं की प्रायः पुनरुक्ति की है और कहीं-कहीं तो विना समझे ही डिम, समवकार, ईहामृग रूपक-भेदों के लक्षणों को दुहराया है। यद्यपि ये उल्लिखित रूपक-भेद काफी पहले अप्रचलित हो चुके थे। अनेक आचार्यों ने भरत द्वारा लिखित कोई-कोई बात छोड़ दी है या कहीं-कहीं विस्तार देने में थोड़ा परिवर्त्तन कर दिया है। कहीं-कहीं नाट्यशास्त्र में पाठान्तर के कारण ही इन आचार्यों की अपनी कृतियों में परिवर्तन हो गया है और कहीं-कहीं इसलिए परिवर्त्तन हुआ है कि जो उक्तियाँ भरत की कही जाती हैं, वे वर्त्तमान नाट्यशास्त्र में नहीं मिलतीं। नृत्य, संगीत एवं रंगमंच : नाट्यशास्त्र के विवेचन में भरत का दृष्टिकोण सदा प्रयोगात्मक रहा है। इसीलिए, उन्होंने नाट्य के केवल सैद्धान्तिक पक्ष का ही विवेचन नहीं किया, वरन् इसके प्रयोगात्मक पक्ष का भी सम्यक् विश्लेषण किया। एक ओर जहाँ उन्होंने नाट्य के वस्तु, पात्र, रस आदि विषयों पर विचार-विमर्श किया, वहाँ दूसरी ओर गीत, संगीत तथा रंगमंच आदि का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने रंगमंच के

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भारतीय नाट्य-सिद्धान्त का परिचय [१०९ विषय में बहुत विस्तार से लिखा है, यहाँ तक कि छोटी-सी-छोटी बातों की ओर भी उनका ध्यान गया है और तत्सम्बन्धी कोई भी बात उनसे छूटी नहीं है। रंगमंच के लिए उपयुक्त स्थान की पैमाइश, नाप-जोख, उजले बैलों की जोड़ी से उस स्थान को हल से जुतवाना, नापने के लिए सूत कैसा हो, स्तम्भ स्थापन आदि के समय किसको क्या भोजन दिया जाय आदि ऐसे विषय हैं, जिनकी और ध्यान जाना असामान्य बात है। नृत्य, संगीत तथा वाद्य का भी भरत ने सूक्ष्म एवं विस्तृत विवेचन किया है। किस अवसर पर कौन-सा वाद्य बजाया जायगा या कैसा गीत गाया जायगा या कौन-सा नृत्य होगा-इन बातों का विस्तृत विवरण भरत मुनि ने प्रस्तुत किया। एक पूरा अध्याय ताण्डव-नृत्य का विवरण देने में लगा है। विभिन्न करणों, अंगहारों तथा मुद्राओं का विवेचन किया गया है। परन्तु, परवर्त्ती नाट्याचार्यों ने इस व्यावहारिक तथा प्रयोगात्मक पक्ष की ओर बिलकुल ध्यान नहीं दिया। अभिनवगुप्त, धनंजय, विश्वनाथ, शारदातनय आदि सभी नाट्याचार्यों ने केवल रस, नायक, वस्तु, भेदोपभेद आदि सैद्धान्तिक पक्षों का ही विवेचन किया। इन आचार्यों ने व्यावहारिक पक्ष को अपना विषय-क्षेत्र कभी नहीं समझा। यह दूसरी बात है कि केवल अभिनय से सम्बन्ध रखनेवाले अभिनय-दर्पण आदि कुछ ग्रन्थ लिखे गये, जिनमें व्यावहारिक पक्ष का ही विवेचन हुआ है। परन्तु, अभिनवगुप्त, धनंजय आदि नाट्याचार्यों पर इस विषय में भरत का कोई प्रभाव नहीं पड़ सका। अनेक आचार्यों ने तो नाट्यशास्त्र से रस, गुण, दोष आदि लेकर पृथक् काव्यशास्त्र की रचना की, जिसमें नाट्य-सम्बन्धी कोई विशेष बात (वस्तु, पात्र, रूपक-भेद आदि) नहीं रखी गई। वस्तुतः भरत का नाट्यशास्त्र ऐसा ग्रन्थ है, जिसमें अनेक शास्त्रों का समावेश है और पीछे चलकर अनेक शास्त्र स्वतन्त्र रूप से इससे विकसित हुए। वृत्ति: भरत ने नाटक में चार वृत्तियों का विधान किया है। उनके मतानुसार वृत्तियाँ हैं-भारती, केशिकी, सात्त्वती तथा आरभटी। सभी परवर्ती आचार्यों ने इन चार वृत्तियों को उसी रूप में स्वीकार किया। परन्तु, धनंजय ने सात्त्वती, केशिकी तथा आरभटी के अर्थवृत्ति और भारती को शब्दवृत्ति माना है। भरत ने वृत्तियों को नाट्य की मात्राएँ कहा है : एवमेता बुद्धेर्ज्ञेया वृत्तय: नाट्यमातरः। इसी से नाट्य में वृत्तियों का महत्त्व समझा जा सकता है। सभी आचार्यों ने इनका महत्त्व समझकर इन्हें उचित स्थान दिया है। उद्भट के अनुयायी एक पाँचवीं अर्थवृत्ति भी मानते हैं, किन्तु अन्य आचार्यों ने इसे स्वीकार नहीं किया। परन्तु, नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने भारती वृत्ति का जो विवेचन किया है, वह भरत द्वारा किये गये विवेचन से काफी भिन्न है। वृत्तियों के निरूपण के प्रसंग में नाट्यशास्त्र में लिखा गया है

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११० ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास

रौद्रे भयानके चैव विज्ञेयारभटी बुधैः। बीभत्से करुणे चैव भारती सम्प्रकीतिता ॥' इस श्लोक से जान पड़ता है कि भरत मुनि केवल बीभत्स और करुण रसों में भारती वृत्ति उचित मानते हैं। परन्तु, इसी २०वें अध्याय में इसके पूर्व ४४वें श्लोक में लिखा गया है : भेदास्तस्यास्तु विज्ञेयाश्चत्वारोऽङ्गत्व .... । प्ररोचना मुखं चैव वीथी प्रहसनं तथा॥ इस श्लोक में प्ररोचना, आमुख आदि को भारती वृत्ति का भेद बताया गया है। परन्तु, प्ररोचना, आमुख आदि का तो बीभत्स और करुण रस के अतिरिक्त दूसरे रसों से भी सम्बन्ध है। अतः भरत के इन वचनों में विरोध प्रतीत होता है। इसकी आलोचना करते समय नाट्य दर्पणकार ने लिखा है : ये तु भारत्यां बीभत्सकरुणौ प्रपन्नाः, ते सर्वरसवीथीप्रधान- शृङ्गारवीरभाणप्रधानहास्यप्रहसनानि स्वयमेव भारत्यामेव वृत्तौ नियन्त्रितानि नावेक्षितानि।२ उन्होंने भरत मुनि की भारती वृत्ति के विवेचन में 'वदतोव्याघात' दोष दिखाया है। रामचन्द्र-गुणचन्द्र ने नाटक, प्रकरण, नाटिका और प्रकरणी में केशिकी, सात्त्वती, आरभटी तथा भारती वृत्तियाँ मानी हैं, किन्तु व्यायोग, भाण, प्रहसन, डिम, अंक, ईहामृग तथा वीथी में केशिकी-रहित केवल तीन वृत्तियाँ मानी। इस प्रकार, वृत्तियों के आधार पर रूपकों का वर्गीकरण रामचन्द्र-गुणचन्द्र की मौलिक सूझ है।

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१. नाट्यशास्त्र, अध्याय २०, का० ६४ २. नाट्यदर्पण, द्वितीय विवेक, का० १०४ के बाद वृत्ति

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चतुर्थ अध्याय नाट्य-लक्षण नाट्य के तत्त्व एवं वृत्तियाँ भारतीय आचार्यों के विविध मत आरम्भ : भारतीय नाट्याचार्यों की दृष्टि विश्लेषणात्मक वर्गीकरण की ओर बहुत अधिक रही है। परन्तु, इसके साथ यह भी द्रष्टव्य है कि संश्लेषणात्मक व्यापक विवेचन करने में भी ये आचार्य अद्वितीय हैं। एक ओर उन्होंने रूपों के विभेद उपस्थित करने में अपनी सूक्ष्म पर्यवेक्षण शक्ति दिखाई है, तो दूसरी ओर रूपक की व्याख्या और रूपरेखा भी प्रस्तुत करने में अपनी योग्यता का सम्यक प्रदर्शन किया है। इतना तो स्पष्टताया परिलक्षित होता है कि हमारे नाट्याचार्यों के सामने नाटक अपने समन्वित कलात्मक रूप में था। उन्होंने नाटक के जो लक्षण दिये हैं, उनके आधार पर नाटक का आधुनिकतम प्रतिपादन भी सत्य प्रमाणित हो सकता है। नाटक के रचनात्मक, अभिनयात्मक और रसात्मक पक्षों की अभित्यक्ति रचयिता, अभिनेता और दर्शक के सन्दर्भ में होती है। नाटककार को इन्हीं तीनों स्थितियों को कुछ विद्वानों ने नाटकीय आयामों के रूप में स्वीकार किया है। पाश्चात्त्य विचारधारा को देखने से प्रतीत होता है कि उन विद्वानों ने नाटक की विवेचना एकांगी की है-इन तीनों आयामों को ध्यान में रखकर नहीं। आधुनिक नाट्यशास्त्रियों ने इन तीनों आयामों को ध्यान में रखकर नाटक का विवेचन किया है। विभिन्न आचार्यों ने नाट्य के विभिन्न लक्षण दिये हैं। उन लक्षणों का विवेचन करना आवश्यक है। अब प्रमुख नाट्याचार्यों द्वारा दिये गये लक्षणों का विवेचन प्रस्तुत किया जा रहा है। फिका भरत मुनि का मत: भरत के नाट्यशास्त्र में नाटक के तीनों आयामों-रचना, अभिनय और प्रभाव-की विस्तृत विवेचना की गई है। कथावस्तु आदि के रूप में रचनात्मक, शारीरिक तथा भावात्मक प्रदर्शन को लेकर अभिनयात्मक और रस-सिद्धान्त में प्रभावात्मक विवेचना हुई है। इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि एक ही शास्त्र-ग्रन्थ में तीनों आयामों पर विचार किया गया है। किन्तु, नाटक के संश्लिष्ट रूप का व्यापक दृष्टिकोण भरत के एक ही श्लोक में दे दिया है : नानाभावोपसम्पन्नं नानावस्थान्तरात्मकम्। F) लोकवृत्तानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम्।' १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, श्लोक ११२

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११२ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास अर्थात् नाना प्रकार से भावों से युक्त और नाना प्रकार की अवस्थाओंवाला लोक- व्यवहार का अनुकरण करनेवाला यह नाट्य मैंने बनाया है। भरत मुनि ने नाट्य में अनुकरण की ही प्रधानता मानी है। जब देवों और दैत्यों के चरित पर आधारित नाट्य प्रस्तुत किया गया, तो दैत्य लोग बहुत क्रुद्ध हुए। इसपर ब्रह्माजी ने समझाया कि इसमें केवल आपलोगों के और देवों के ही चरित प्रदर्शित नहीं किये गये हैं, अपितु नाट्य में वस्तुतः इस समस्त विश्व के भावों का प्रदर्शन कराया गया है : नैकान्तोऽत्न भवतां देवानां चानुभावनम्। त्रैलोकस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्त्तनम् ।' नाटक में अनुकार्य रामादि का जो अभिनय किया जाता है, उसमें अभिनय करनेवाले नट ही होते हैं, राम आदि स्वयं अभिनय करने नहीं आते। अभिनय करनेवाले उन नटों में ही राम आदि अनुकार्य की प्रतीति होती है। प्रतीति निम्नांकित दस प्रकार की हो सकती है : १. सत्य, २. मिथ्या, ३. सादृश्यमूलक (चन्द्र के समान मुख), ४. आरोपमूलक (मुखचन्द्र), ५. अध्यवसाय-मूलक (गौर्वाहीक-वाहीक देश का निवासी बैल के समान मूर्ख है), ६. उत्प्रेक्षामूलक (मुख में चन्द्र की उत्प्रेक्षा के समान), ७. प्रतिकृतिमूलक (चित्र या खिलौने के समान), ८. अनुकरणमूलक (गुरु-शिष्य- व्याख्यान के समान), ९. तात्कालिक निर्माण-मूलक (जैसे इन्द्रजाल), १०. युक्तिविरचित (हस्तलाघव या माया के समान)। यह प्रतीति इनमें से किसी के समान नहीं होकर विलक्षण प्रकार की होती है। इसलिए, राम आदि किसी भी अनुकार्य का किसी भी लौकिक रूप में अनुभव नाटक में नहीं होता। वहाँ जो कुछ अनुभव होता है, वह अलौकिक ही है। प्रेक्षक को उसमें तादात्म्य का अनुभव होता है। अजकही अभिनवगुप्त और अनुकरण: अभिनवगुप्त ने नाट्य को अनुकरण-रूप नहीं माना है। भरत ने अपनी उपर्युक्त कारिका में नाट्य के स्वरूप का निर्धारण करने का प्रयत्न किया है। उसमें 'अनुभावन' तथा 'अनुकीर्त्तन'-रूप दो पक्ष प्रस्तुत किये गये हैं। भरत ने अनुभावन- पक्ष का खण्डन करने के बाद अनुकीर्तन-पक्ष का प्रतिपादन किया है। परन्तु, इन दोनों पक्षों का भेद समझना कठिन है। अभिनवगुप्त ने भी अपनी वृत्ति में इनका अर्थ समझाने का प्रयत्न नहीं किया है। आचार्य विश्वेश्वर ने 'अनुभावन' का अर्थ 'पदार्थ के प्रत्यक्ष दिखाई देनेवाले विशेष स्वरूप का ग्रहण' किया है। 'अनुभावन' शब्द का सम्बन्ध अनुभव से है। अनुभव या प्रत्यक्ष वर्त्तमान वस्तु का ही होता है। सीता/राम आदि अनुकार्य वर्त्तमान नहीं हैं, अतः नाट्य में उनका अनुभावन नहीं हो सकता। उनका 'अनुकीर्तन' अर्थात् शब्द द्वारा कथन ही हो सकता है। भरत के मतानुसार सीता/राम आदि के विशेष रूप नहीं लिये जाते, वरन् साधारणीकृत रूप ही लिये जाते हैं। इसीलिए नाट्य अनुभावन- १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, श्लोक १०७

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रूप नहीं होकर अनुकीर्त्तन-रूप ही होते हैं। यही कारण है कि भरत मुनि ने 'नाट्यं भावानु- कीर्तनम्' लिखा। भरत मुनि ने उक्त कारिका में अनुभावन एवं अनुकीर्त्तन-रूप दो ही पक्ष उपस्थित किये, किन्तु अभिनवगुप्त ने इसकी वृत्ति में अनुकरण-रूप तीसरे पक्ष की भी चर्चा की है। भरत के कतिपय पूर्ववर्त्ती टीकाकारों ने भरत द्वारा 'अनुकीर्त्तन' शब्द को अनुकरणपरक मानकर नाटक को अनुकरण-रूप सिद्ध करने की चेष्टा की है। अभिनव ने इसी के आधार पर अनुकरण की चर्चा की और इससे अपनी असहमति प्रकट की। उन्होंने इस पक्ष का विस्तारपूर्वक खण्डन किया है। उनका कथन है कि अनुकीत्तन को अनुकरण कहना भ्रमात्मक है। इसके लिए उन्होंने दो युक्तियाँ उपस्थित की हैं : १. अनुकरण का अर्थ नकल है। नकल या स्वांग भी अभिनय का एक प्रकार होता है, परन्तु यह अत्यन्त निम्नकोटि की चीज है। किसी का उपहास करने के ही उद्देश्य से नकल की जाती है। अनुकार्य व्यक्ति का अनुकरण या स्वांग करके दर्शकों में निम्नकोटि का हास उत्पन्न किया जाता है और साथ ही अनुकार्य व्यक्ति में क्रोध तथा द्वष के भाव उत्पन्न होते हैं। परन्तु नाट्य में यह बात नहीं होती। यह किसी का स्वांग करके उसका अपमान नहीं करता। इसलिए, नाट्य से किसी अनुकार्य तथा उसके मित्रों में क्रोध तथा द्वेष उत्पन्न नहीं होते। इससे प्रेक्षकों को अलौकिक आनन्द की उपलब्धि होती है। नाट्य का अनुकरण या स्वांग से यही मुख्य अन्तर है। २. अनुकरण-पक्ष का खण्डन करने के लिए अभिनव ने इसके बाद उसके दो अवान्तर पक्ष बनाये हैं-नियतानुकार तथा अनियतानुकार। उन्होंने इन दोनों पक्षों का खण्डन करके सिद्ध कर दिया है कि नाट्य न नियतानुकार-रूप हो सकता है और न अनियतानुकार-रूप ही। अतः, नाट्य को किसी भी रूप में अनुकरणात्मक नहीं कहा जा सकता। नियतानुकार किसी विशेष व्यक्ति के अनुकरण को कहते हैं। इसका खण्डन करने के लिए अभिनव ने तर्क दिया है कि सीता, राम आदि किसी विशेष व्यक्ति का अनुकरण सम्भव ही नहीं है। 'अनुकरण' शब्द का अर्थ सदृश करिया है; राम आदि विभाव यदि क्रिया- रूप में होते, तो उनका सदृश क्रियारूप अनुकरण हो सकता था; किन्तु वे तो करियारूप नहीं होकर द्रक्ष्य रूप हैं, अतः उनका क्रियारूप अनुकरण नहीं हो सकता। यह उदाहरण देकर अभिनव ने विभाव-मात्र के अनुकरण का खण्डन कर दिया है। नाटक में जिनको विभाव- रूप में प्रतिपादित किया जाता है, उनमें किसी का भी अनुकरण नहीं किया जा सकता। पूर्व व्याख्याकारों का खण्डन : नाट्यशास्त्र के कुछ पूर्ववर्त्ती व्याख्याकारों ने नाट्य को अनुकरण-रूप मानकर शंका उठाई थी कि लोक में तो सर्वत्र नृत्य, गीत आदि का प्रयोग नहीं होता, फिर नाट्य में इनका इतना अधिक प्रयोग क्यों होता है, जब नाट्य जीवन का अनुकरण है? इस शंका का समाधान उन्होंने स्वयं उपस्थित किया कि लोक में भी स्नान, भोजन आदि के पहले बाद्य आदि का प्रयोग देखा जाता है। इसलिए नाट्य में

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११४ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकांस भी इनका प्रयोग अनुचित नहीं कहा जा सकता। किन्तु, अभिनवगुप्त का तर्क है कि जब नाट्य की अनुकरणात्मकता का ही खण्डन हो गया तो यह शंका और इसका यह समाधान दोनों ही व्यर्थ हैं। अभिनवगुप्त का मत : इस प्रकार, भरत के नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय की १०७वी कारिका की विस्तृत व्याख्या अभिनवगुप्त ने की है और 'तैलोक्यस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्त्तनम्' की व्याख्या अपने ढंग से प्रस्तुत की है। उनके सिद्धान्त के अनुसार नाट्य किसी विशेष व्यक्ति के चरित्रादि का अनुभावन अर्थात् प्रत्यक्ष करानेवाला नहीं है। फिर यह उसका अनुकरण-रूप भी नहीं है। नाट्य वस्तुतः साधारणीकरण-व्यापार द्वारा साधारणीकृत रूप से सम्पूर्ण संसार के भावों का अनुकीर्त्तन-रूप है। इस मत का खण्डन : परन्तु यद्यपि अभिनवगुप्त ने नाट्य के अनुकरणमूलक सिद्धान्त का विरोध किया है और १०७वीं कारिका में भरत द्वारा प्रयुक्त 'अनुकीर्त्तन' शब्द का अर्थ अनुकरण नहीं स्वीकार किया है, फिर भी मेरा विश्वास है कि भरत ने 'अनुकीर्तन' शब्द का प्रयोग अनुकरण के ही अर्थ में किया। अनुकीर्त्तन शब्द की ऊपर जो व्याख्या प्रस्तुत की गई है, वह क्लिष्ट कल्पना लगती है। 'त्ैलोक्यस्यास्य सर्वस्य नाट्यं भावानुकीर्त्तनम्' का अर्थ यही, होना चाहिए कि नाट्य इस सम्पूर्ण तैलोक्य के भावों का अनुकरण है। आगे की एक कारिका से स्पष्ट हो जाता है कि भरत ने इस स्थल पर अनुकीर्त्तन का अर्थ अनुकरण ही रखा है : नानाभावोपसम्पन्नं नानावस्थान्तरात्मकम् । लोकवृत्तानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम्। -अर्थात् नाना प्रकार के भावों से युक्त और नाना प्रकार की अवस्थाओं वाले लोक-व्यवहार का अनुकरण करनेवाला यह नाट्य मैंने बनाया है। इस कारिका में 'लोकवृत्तानुकरणम्' अर्थात् लोक-व्यवहार का अनुकरण करनेवाला कहा गया है और १०७वीं कारिका में 'भावानुकीर्त्तनम्' अर्थात् भाव का अनुकरण करनेवाला कहा गया है। और भी आगे बढ़ने पर एक अन्य कारिका में भरत ने नाट्य को 'सप्तद्वीपानुकरणम्' (सातो द्वीपों का अनुकरण) कहा है : तन्नात्र मन्युः कर्त्तव्यो भवद्भरमरान् प्रति। सप्तद्वीपानुकरणं नाट्यमेतद् भविष्यति॥२ -अर्थात् अतः इस विषय में आप (असुरों) को देवताओं के प्रति कोध नहीं करना चाहिए क्योंकि मेरे द्वारा रचित नाट्य में सातों द्वीपोंवाले लोक का अनुकरण ही नियम है। इस १ नाट्यशास्त्र, अध्याय १, का० ११२ २. वही, अध्याय १, का० ११७

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कारिका में भी भरत ने नाट्य को लोकचरित का अनुकरण ही माना है। इस प्रकार, स्पष्ट हो जाता है कि भरत ने नाट्य में लोक-व्यवहार के अनुकरण को ही प्रधान माना है। नाट्य में अनुकरण-तत्त्व अत्यन्त महत्त्वपूर्ण तथा आवश्यक है। इसलिए, १०७वीं कारिका में प्रयुक्त 'भावानुकीर्त्तनम्' का अर्थ 'भावों का अनुकरण' ही होना चाहिए। अभिनव ने इस कारिका की व्याख्या दूसरे ही ढंग से की है। उनका अभिप्राय है कि रंगमंच पर दिखलाये जानेवाले प्राकृतिक दृश्यादि जैसे कल्पित तथा अवास्तविक होते हैं, वसे ही देवता, दैत्यादि भी वास्तविक नहीं हैं। उनको वास्तविक समझकर क्षुब्ध नहीं होना चाहिए। परन्तु, मुझे यह व्याख्या दूरारूढ लगती है। 'सप्तद्वीपानुकरणम्' का अर्थ यही होना चाहिए कि इस नाट्य में सातो द्वीपों (सम्पूर्ण संसार) के लोक-व्यवहार तथा भावों का अनुकरण रहता है। डॉ० रघुवंश, डॉ० मनमोहन घोष, आचार्य विश्वेश्वर आदि विद्वानों ने यही अर्थ किया है। भरत ने बताया है कि नाट्य में लोक की सभी श्रेणियों के व्यक्तियों के चरित का प्रदर्शन रहता है : देवानामसुराणां च राज्ञामथ कुटुम्बिनाम्। महर्षीणां च विज्ञेयं नाट्यं वृत्तान्तदर्शकम् ।' -अर्थात् नाटक को देवताओं, असुरों, राजाओं, पारिवारिकों तथा महर्षियों के चरितों का प्रदर्शन समझना चाहिए। संसार के सुख-दुःख के व्यवहार को ही रंगमंच पर नाट्य के रूप में दिखाया जाता है: योऽयं स्वभावो लोकस्य सुखदुःखसमन्वितः । सोऽङगाद्भिनयोपेतो नाट्यमित्यभिधीयते॥२ -अर्थात् सुख-दुःख से युक्त जो स्वभाव है, आङिगकादि चतुविध अभिनयों के साथ मिल जाने पर वही नाट्य कहलाता है। धनंजय का मत : दशरूपककार धनंजय ने लिखा है : अवस्थानुकृतिर्नाट्यम् ।3 अवस्था के अनुकरण को ही नाट्य कहते हैं। अपनी वृत्ति में धनिक ने इसे स्पष्ट किया है- जहाँ काव्य में निबद्ध या व्णित धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीरललित तथा धीरप्रशान्त प्रकृति के नायकों तथा तत्तत्प्रकृतिगत नायिकाओं एवं अन्य पात्रों का आंगिक, वाचिक, आहार्य तथा सात्विक-इन चार प्रकार के अभिनयों के द्वारा अवस्था का अनुकरण किया जाता है, वह नाट्य है। अवस्था के अनुकरण का अभिप्राय यह है कि चाल-ढाल, वेष-भूषा, वार्त्तालाप आदि के द्वारा पात्रों की सभी अवस्थाओं का अनुकरण इस प्रकार किया जाय कि नटों में पात्रों का तादात्म्य अनुभव होने लगे। यह राम या दुष्यन्त की सभी अवस्थाओं १. नाट्यशास्त्र, अध्याय १, का० ११६ २. वही, अध्याय १, का० ११९ ३. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, का० ७ > फजीर रकड आाना का्काक .P

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११६ ] भारतीय नाट्य-सिद्धान्त : उद्भव और विकास का अनुकरण इस प्रकार करे कि प्रेक्षक उसे राम या दुष्यन्त ही समझ ले। जिस समय नाट्य का अभिनय होता रहे, प्रेक्षक यही समझे कि मैं राम या दुष्यन्त के ही कार्य-कलाप देख रहा हूँ। नट और राम या दुष्यन्त में अभेद स्थापित हो जाय। नाट्य केवल श्रव्य काव्य न होकर रंगमंच पर अभिनय के रूप में देखा भी जाता है। देखे जाने के योग्य होने के कारण यह दृश्य कहा जाता है। जैसे हम अनेक रंग तथा दृश्य देखते हैं और हमारी नेत्रेन्द्रिय के विषय को रूप कहते हैं, उसी प्रकार नेत्र- ग्राह्य होने के कारण नाट्य रूप भी कहा जाता है। इसलिए, धनंजय ने उसी स्थल पर आगे कहा है : 'रूपं दृश्यतयोच्यते।' यही नाट्य रूप भी कहलाता है। उसी कारिका में आगे धनंजय ने नाट्य को रूपक भी कहा है: 'रूपक तत्समारोपात्।" वही नाट्य-रूप रूपक भी कहा जाता है; क्योंकि उसमें आरोप किया जाता है। हम रूपक अलंकार में देखते हैं कि मुख में चन्द्रमा का आरोप कर दिया जाता है-मुखचन्द्र, वैसे ही नाट्य में नट पर रामादि पात्रों की अवस्था का आरोप किया जाता है; इसलिए इसे रूपक भी कहा जाता है। एक ही अर्थ में नाट्य, रूप तथा र्पक-तीनों शब्दों का प्रयोग होता है। तीनों पर्यायवाची शब्द हैं। नाट्य और नृत्य में अन्तर : रूपक के नाटक आदि दस भेदों का निर्देश करने के पश्चात् धनंजय ने प्रश्न उठाया है कि डोम्बी, श्रीगदित आदि नामक नृत्य के भी सात भेद होते हैं। उनकी भी गणना रूपक के भेदों में होनी चाहिए। फिर रूपक के दस ही भेद क्यों किये गये हैं? इस शंका का समाधान करते हुए धनंजय ने नाट्य और नृत्य में अन्तर बताया है। दोनों में मुख्य अन्तर यह है कि नाट्य रसाश्रय होता है, परन्तु नृत्य भावाश्रय होता है: 'अन्यद् भावाश्रयं नृत्यम्।" नाट्य रस पर आश्रित रहता है, परन्तु नृत्य भाव पर। अतः दोनों स्पष्ट रूप से भिन्न हैं। 'नृत्य' शब्द की व्युत्पत्ति नृत् धातु से हुई है, जिसका अर्थ गात्र-विक्षेप होता है और जिसमें आंगिक अभिनय की बहुलता होती है। 'नाट्य' शब्द की व्युत्पत्ति 'नट् अवस्पन्दने' धातु से हुई है। नट् धातु का अर्थ अवस्पन्दन या कुछ-कुछ चंचलता है; इसलिए नाट्य में सात्त्विक अभिनय की अधिकता होती है। नाट्य- कला का विशारद नट कहलाता है। नीचे की तालिका से नाट्य और नृत्य का भेद स्पष्ट हो जाता है।

नाट्य नृत्य hieTte १ नाट्य रस पर आश्रित होता है, १. नृत्य भाव पर आश्रित होता है। जो भाव की चरम परिपोषक इसमें केवल भावों की अभिव्यंजना सीमा है। होती है।

१. दशरूपक, प्रथम प्रकाश, कारिका ९