Books / Jabala Upanishad

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यथाजातरूपधरो निर्द्वन्द्वो निष्परिग्रहस्तत्तत्त्वब्रह्ममार्गे सम्यक्संपन्नः शुद्धमानसः प्राणसंधारणार्थं यथोक्तकाले विमुक्तो भैक्षमाचरन्नुदरपात्रेण लाभालाभौ समौ भूत्वा शून्यागारदेवगृहतृणकूटवल्मीकवृक्षमूलकुलालशालाग्निहोत्रशालानदीपुलिन गिरिकुहरक-न्दरकोटरनिर्झरस्थण्डिलेष्वनिकेतवास्यप्रयत्नो निर्ममः शुक्लध्यानपरायणोऽध्यात्मनिष्ठः शुभाशुभकर्मनिर्मूलनपरः संन्यासेन देहत्यागं करोति स परमहंसो नाम स परमहंसो नामेति ॥ ||३||

yathājātarūpadharo nirdvandvo niṣparigrahastattattvabrahmamārge samyaksaṃpannaḥ śuddhamānasaḥ prāṇasaṃdhāraṇārthaṃ yathoktakāle vimukto bhaikṣamācarannudarapātreṇa lābhālābhau samau bhūtvā śūnyāgāradevagṛhatṛṇakūṭavalmīkavṛkṣamūlakulālaśālāgnihotraśālānadīpulina girikuharaka-ndarakoṭaranirjharasthaṇḍileṣvaniketavāsyaprayatno nirmamaḥ śukladhyānaparāyaṇo'dhyātmaniṣṭhaḥ śubhāśubhakarmanirmūlanaparaḥ saṃnyāsena dehatyāgaṃ karoti sa paramahaṃso nāma sa paramahaṃso nāmeti ॥

संन्यासी (परमहंस) यथा जातरूप धारण करने वाला अर्थात् निश्छल-नि:स्पृह होता है। वह निर्द्वन्द्व, अपरिग्रही, तत्त्व ब्रह्म मार्ग में निरन्तर गतिमान् तथा शुद्ध मन वाला होता है। जीवन्मुक्त होने पर भी वह प्राण । धारणार्थ भिक्षा आदि के द्वारा आहार को उचित समय पर ‘उदर’ रूपी पात्र में डाल देता है। उसे किसी प्रकार के लाभ और अलाभ की चिन्ता नहीं होती ; अत: उन्हें समान समझता है। वह शून्य स्थल, देवगृह, तिनकों के समूह, सर्प की बाँबी (बिल), वृक्ष के मूल, कुम्हार के घर, अग्निहोत्र स्थल, नदी तट, पर्वत, खाई या गुफा, खोह और निर्झर आदि विशुद्ध प्रदेश में पूर्व घर का ध्यान न रख, ममता रहित होकर रहता है। वह सतत शुक्ल (सात्त्विक) ध्यान में तल्लीन रहकर अध्यात्मनिष्ठ होकर शुभ और अशुभ कर्मों को निर्मूल करता रहता है, ऐसा (संन्यास धर्म का पालन)करते हुए जो संन्यासी देह का परित्याग कर देता है, वह परमहंस कहलाता है ॥