Books / Kaushitaki-Brahmana Upanishad

4. चतुर्थोऽध्यायः

चतुर्थोऽध्यायः

Verse १

अथ गार्ग्यो ह वै बालाकिरनूचान:संस्पृष्ट आस सोऽवददुशीनरेषु स वसन्मत्स्येषु कुरुपञ्चालेषु काशिविदेहेष्विति स हाजातशत्रुं काश्यमेत्योवाच ।ब्रह्म ते ब्रवाणीति तं होवाचाजातशत्रुः ।सहस्त्रं दद्मस्त इत्येतस्यां वाचि जनको जनक इति वा उ जना धावन्तीति ।।

atha gārgyo ha vai bālākiranūcāna:saṃspṛṣṭa āsa so'vadaduśīnareṣu sa vasanmatsyeṣu kurupañcāleṣu kāśivideheṣviti sa hājātaśatruṃ kāśyametyovāca ।brahma te bravāṇīti taṃ hovācājātaśatruḥ ।sahastraṃ dadmasta ityetasyāṃ vāci janako janaka iti vā u janā dhāvantīti ।।

In the sun the great, in the moon the food, in the lightning truth, in thunder sound, in wind Indra Vaikuntha, in space the plenum, in fire the Vanquisher, in water brilliance - thus with reference to the divinities. Now, with reference to the self; in the mirror the reflection; in the shadow the double, in the echo life, in sound death, in sleep Yama (the Lord of Death), in the body Prajapati, in the right eye speech, in the left eye truth.

गर्ग गोत्र में प्रादुर्भूत बलाका ऋषि के पुत्र एवं गाय के नाम से प्रख्यात एक ब्राह्मण ऋषि थे। उन्होंने चारों वेदों का पूर्ण अध्ययन किया था, साथ ही वेदों के अच्छे प्रख्यात वक्ता भी थे। उस समय जगत् में उनकी बड़ी ख्याति थी। उनका निवास उशीनर प्रदेश में था, किन्तु सतत गतिशील रहने के कारण, वे कभी मत्स्यदेश, तो कभी कुरु-पाञ्चाल में रहा करते थे। इस भाँति वे प्रख्यात गार्ग्य एक काशी के विद्वान् राजा अजातशत्रु के समीप में पहुँचे और अहंकार से युक्त वाणी में बोले-‘हे राजन् ! मैं आपके लिए ब्रह्मतत्त्व का उपदेश करूंगा।' गार्ग्य के इस तरह से कहने पर उन प्रसिद्ध काशी नरेश ने कहा- ‘हे ब्रह्मन्! आपकी इस बात पर हम आपको एक सहस्त्र गौएँ प्रदान करते हैं। अवश्य ही आज-कल लोग प्रायः जनक- जनक कहते हुए ही उनके पास में दौड़ जाते हैं (अर्थात् राजा जनक ही इस ब्रह्मविद्या के श्रोता एवं दानी हैं, इस प्रकार कहकर प्रायः लोग उन्हीं के समीप में जाते हैं, आज आप हमारे पास आकर विदेहराज जनक की भाँति हमारा गौरव बढ़ाया है, इसलिए हम आपको सहर्ष एक सहस्त्र गौएँ प्रदान करते हैं) ॥


Verse २

स होवाच बालाकिर्य एवैष आदित्ये पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः।बृहन्माण्डरवासा अतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्तेऽतिष्ठाः सर्वेषां भूतानां मूर्धा भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa āditye puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāḥ।bṛhanmāṇḍaravāsā atiṣṭhāḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ mūrdheti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste'tiṣṭhāḥ sarveṣāṃ bhūtānāṃ mūrdhā bhavati ॥

Then said Balaki: Him who is this person in the sun, on him I indeed meditate. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! As the great, the white-robed, the Supreme, the head of all beings - thus verily do I meditate on him. He who meditates on him thus becomes indeed the supreme, the head of all beings.

तब वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र विप्रवर गार्ग्य जी कहने लगे-‘हे राजन्! यह जो सूर्यमण्डल में अन्तर्यामी परमेश्वर स्थित है, मैं उसी की ब्रह्मबुद्धि से साधना करता हूँ।’ ऐसा सुनकर उन श्रेष्ठ ऋषि से काशी नरेश अजातशत्रु बोले-‘ हे ब्रह्मन्! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। अवश्य ही यह शुक्लवस्त्रधारी सभी से महान् है । यह सभी को अतिक्रमण करता हुआ सबसे उच्च स्थिति में केन्द्रित है, यह सबका शीश है। इस तरह से मैं इसकी उपासना करता हूँ, जो मनुष्य सूर्य मण्डल में स्थित उस विराट् पुरुष की इस तरह से उपासना करता है, वह सभी का अतिक्रमण कर सबसे उच्च स्थिति में पहुँचता है एवं समस्त भूत-प्राणियों का शीश माना जाता है ॥


Verse ३

स होवाच बालाकिर्य एवैष चन्द्रमसि पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः सोमो राजाऽन्नस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो मेवमुपास्तेऽन्नस्यात्मा भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa candramasi puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāḥ somo rājā'nnasyātmeti vā ahametamupāsa iti sa yo mevamupāste'nnasyātmā bhavati ॥

Then said Balaki: 'him who is the person in the moon, on him indeed do I meditate'. To him then Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him asking Soma, as the self of food. He who meditates on him thus becomes indeed the self of food.

उन सुप्रसिद्ध कलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा- ‘हे राजन् ! चन्द्रमण्डल में जो यह अन्तर्यामी विराट् पुरुष है, मैं इसी को ब्रह्मरूप में मानकर उपासना करता हूँ।’ ऐसा सुन करके उन (गार्ग्य) से राजा अजातशत्रु ने कहा- ‘हे ब्रह्मन् ! नहीं-नहीं, इस विषय में आप कुछ भी न कहें। यह सोम ही राजा है एवं अन्न का आत्मा भी यही है। इस प्रकार से मैं इसकी उपासना करता हूँ।’ इसी तरह वह भी, जो इसे प्रसिद्ध चन्द्र मण्डल के अन्तर्गत इस पुरुष की ब्रह्म रूप में उपासना करता है, वह निश्चय ही अन्न की आत्मा हो जाता है अर्थात् अन्न | राशि से युक्त हो जाता है ॥


Verse ४

स होवाच बालाकिर्य एवैष विद्युति पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठास्तेजस आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते तेजस आत्मा भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa vidyuti puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāstejasa ātmeti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste tejasa ātmā bhavati ॥

Then said Balaki: 'I meditate on the person, indeed, who is the person in the lightning'. To him then Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the self of truth. He who meditates on him thus becomes indeed the self of truth (of brilliance)

तब वे विप्रश्रेष्ठ गार्ग्य मुनि कहने लगे-‘हे राजन्! विद्युत् मण्डल के अन्तर्गत जो यह अन्तर्यामी विराट् परब्रह्म है, मैं उसी का उपासक हूँ।’ ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु तुरन्त बोले-‘हे ब्रह्मन् ! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। मैं इस (विद्युत् को प्रकाश को आत्मा मानकर उसको उपासना काता हूँ।’ इस प्रकार जो भी मनुष्य विद्युत्-मण्डल में स्थित ब्रह्म की उपासना करता है, वह प्रकाश स्वरूप आत्मा ही हो जाता है ॥


Verse ५

स होवाच बालाकिर्य एवैष स्तनयित्नौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः शब्दस्यात्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते शब्दस्यात्मा भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa stanayitnau puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāḥ śabdasyātmeti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste śabdasyātmā bhavati ॥

Then said Balaki: I meditate on the person in the Thunder'. To him then Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the self of sound. He who meditates on him thus becomes indeed the self of sound.

तदुपरान्त बलाका-तनय गार्ग्य ने पुनः कहना प्रारम्भ किया- ‘हे राजन! मेघमण्डल में गर्जना रूप में विद्यमान उस अन्तर्यामी अविनाशी परम ईश्वर को मैं साक्षात् परम ब्रह्म मानकर उपासना करता हूँ। ऐसा सुनकर उन प्रख्यात नरेश अजातशत्रु ने उत्तर देते हुए कहा- हे ब्रह्मन्! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहे। मैं इसे शब्द की आत्मा समझकर इस श्रेष्ठ तत्त्व की उपासना करता हूँ। इस भाँति से जो भी मनुष्य इस मेघमण्डल में विद्यमान परब्रह्म को शब्द की आत्मा मानकर उपासना करता है, वह मनुष्य स्वयं ही शब्द को आत्मा के रूप में परिणत हो जाता है ॥


Verse ६

स होवाच बालाकिर्य एवैष आकाशे पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः पूर्णमप्रवर्ति ब्रह्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते पूर्यते प्रजया पशुभिः ।नो एव स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रवर्तते ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa ākāśe puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāḥ pūrṇamapravarti brahmeti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste pūryate prajayā paśubhiḥ ।no eva svayaṃ nāsya prajā purā kālātpravartate ॥

Then said Balaki: I meditate on the person in wind'. To him then Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as Indra Vaikuntha or as the unconquered army. He who meditates on him thus becomes indeed the triumphant, the unconquerable, a conqueror of adversaries.

तत्पश्चात् पुनः बलाका-नन्दन गार्ग्य ऋषि ने कहा-‘हे राजन्! आकाश मण्डल में प्रतिष्ठित परब्रह्म परमेश्वर की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।’ इस पर राजा अजातशत्र ने कहा-‘हे ब्रह्मन्! आपको इस सन्दर्भ में कुछ भी नहीं कहना चाहिए।’ यह तो पूर्ण, प्रवृत्ति रहित (क्रिया रहित) एवं ब्रह्म अर्थात्, सभी से विशाल है। अवश्य ही इसी रूप में मैं इसकी उपासना करता हूँ। इसी तरह की भी मनुष्य इस प्रसिद्ध आकाश मण्डल के अन्तर्गत स्थित पुरुष की इस रूप में उपासना करता हूँ, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त, न तो स्वयं वह और न उसकी संतान ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं ॥


Verse ७

स होवाच बालाकिर्य एवैष वायौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा इन्द्रो वैकुण्ठोऽपराजिता सेनेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते।जिष्णुर्ह वापराजयिष्णुरन्यतस्त्यजायी भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa vāyau puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhā indro vaikuṇṭho'parājitā seneti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste।jiṣṇurha vāparājayiṣṇuranyatastyajāyī bhavati ॥

Then said Balaki: I meditate on the person in space'. To him then Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the full moon-active Brahman. He who meditates on him thus becomes filled with offspring, cattle, fame, the radiance of sanctity and the heavenly world, he reaches the full term of life.

वे प्रसिद्ध कलाका-पुत्र गार्ग्य पुनः कहने लगे-‘हे राजन्! यह जो वायुमण्डल में स्थित विराट् पुरुष है, मैं (गार्ग्य) अविनाशी ब्रह्म के रूप में इसकी उपासना करता हूँ।’ गार्ग्य से ऐसा सुनने पर उन प्रसिद्ध नरेश अजातशत्रु ने कहा- ‘हे ब्रह्मन्! आपको इस विषय में कुछ भी नहीं कहना चाहिए; यह इन्द्र अर्थात् श्रेष्ठ ऐश्वर्य से युक्त, वैकुण्ठ अर्थात् कहीं भी कुण्ठाग्रस्त न रहने वाला तथा कहीं भी न हारने वाली सेना है। अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना से उपासना करता हूँ; इसी तरह से जो भी मनुष्य इस वायु मण्डल के मध्य में स्थित विराट् पुरुष को इस रूप में उपासना करता है, वह मनुष्य निश्चित हो सदा विजयी रहने वाला, दूसरों से कभी भी न हारने वाला एवं अपने को पराक्रम के द्वारा वश में करने वाला होता है॥


Verse ८

स होवाच बालाकिर्य एवैषोऽग्नौ पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिसंवादयिष्ठा विषासहिरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विषासहिहैंवान्वेष भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣo'gnau puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasmisaṃvādayiṣṭhā viṣāsahiriti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste viṣāsahihaiṃvānveṣa bhavati ॥

Then said Balaki: I meditate on the person in fire'. To him then Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the Vanquisher. He who meditates on him thus become verily a vanquisher of others.

तदनन्तर उन सुप्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा-‘हे राजन्! यह जो अग्नि मण्डल के मध्य में अन्तर्यामी विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी को मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ। इस प्रकार को जाने पर वे राजा अजातशत्रु गार्ग्य ऋषि से कहने लगे- हे ब्रह्मन् ! इस सन्दर्भ में आप कृपा करके कुछ भी संवाद न करें। यह ‘‘विषासहि’ अर्थात् दूसरों के प्रहार को सहन करने की सामर्थ्य वाला है। अवश्य ही इसी भावना से मैं इस तत्व की उपासना करता हूँ’ इसी तरह से जो भी मनुष्य इस प्रसिद्ध अग्नि के मध्य में स्थित विराट् पुरुष की उपासना करता है, वह इस उपासना के बाद दूसरों का आवेग सहन करने में समर्थ हो जाता है ॥


Verse ९

स होवाच बालाकिर्य एवैषोऽप्सु पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा नाम्न आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नाम्न आत्मा भवतीत्यधिदैवतमथाध्यात्मम्॥

sa hovāca bālākirya evaiṣo'psu puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhā nāmna ātmeti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste nāmna ātmā bhavatītyadhidaivatamathādhyātmam॥

Then said Balaki: I meditate on the person in water'. To him then Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the Self of Brilliance of name. Thus with reference to the divinities..

उन ख्याति प्राप्त बलाका-पुत्र गार्ग्य जी ने कहा-'हे राजन् ! जो यह जल मण्डल के मध्य में अन्तर्यामी विराट् पुरुष स्थित है, इसकी ही मैं ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' ऐसा सुनकर उन (गार्ग्य ऋषि) से राजा अजातशत्रु ने कहा-' हे ब्रह्मन्! इस विषय में कृपा करके आप कुछ भी न करें। यह नामधारी जीवात्मा है, ऐसा जानकर ही मैं इसकी उपासना करता हूँ।' जो मनुष्य इसी भाव से इसकी उपासना करता है, वह नामधारी समस्त प्राणिमात्र की आत्मा हो जाता है। इसे आधिदैवत उपासना कहा जाता है। आगे अब अध्यात्म उपासना का वर्णन करते हैं ॥


Verse १०

स होवाच बालाकिर्य एवैष आदर्श पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः प्रतिरूप इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रतिरूपो हैवास्य प्रजायामाजायते नाप्रतिरूपः ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa ādarśa puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāḥ pratirūpa iti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste pratirūpo haivāsya prajāyāmājāyate nāpratirūpaḥ ॥

Now, with reference to self. Then said Balaki: I meditate indeed on the person in the mirror'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as (the reflected) likeness. He, then, who meditates on him thus, a very likeness of him is born in his offspring, not an unlikeness.

उन प्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य जी ने कहा- 'हे राजन् ! जो यह दर्पण में विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी | की मैं अविनाशी ब्रह्म के रूप में उपासना करता हूँ।' यह सुनकर उन गार्ग्य मुनि से राजा अजातशत्रु ने कहा’ हे मुने ! इसके सन्दर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह प्रतिरूप (रूप का ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब) है, अवश्य ही मैं इसकी इसी भावना से उपासना करता हूँ।' इसी तरह से वह मनुष्य भी यदि इस दर्पण के मध्य में विराट् पुरुष की इस रूप में उपासना करता है, तो वह उस प्रतिरूप गुण से विभूषित हो जाता है। उसकी संताने उसके अनुरूप ही होती हैं। प्रतिकूल रूप व स्वभाव वाली नहीं होती ॥


Verse ११

स होवाच बालाकिर्य एवैष प्रतिश्रुत्कायां पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते विन्दते द्वितीयाद्वितीयवान्भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa pratiśrutkāyāṃ puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhā dvitīyo'napaga iti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste vindate dvitīyādvitīyavānbhavati ॥

Then said Balaki: I meditate indeed on the person in the shadow'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the inseparable Double. He, then, who meditates on him thus obtains from his second and becomes possessed of his double.

वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य फिर बोले- ‘हे राजन्! जो यह विराट् पुरुष प्रतिध्वनि में स्थित है, इसकी | मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ। इस प्रकार उन गार्ग्य ऋषि से राजा अजातशत्रु ने कहा-हे ब्रह्मन्! आप इस सन्दर्भ में कुछ भी न कहें। यह ‘द्वितीय’ एवं ‘अनपग’ (एक ध्वनि के पुनरावृत्ति एवं प्रतिध्वनि में गति का अभाव) है। अवश्य ही मैं इसको इसी भावना के साथ उपासना करता हूँ।’ ऐसे ही जो भी उपासक इस प्रतिध्वनिगत विराट् पुरुष को इस ब्रह्म के रूप में उपासना करता है, वह अपने अतिरिक्त दूसरे अर्थात् स्त्री-पुत्रादि को प्राप्त कर लेता है और सदा द्वितीयवान् रहता है अर्थात् स्त्री-पुत्रादि से वह वियोग को नहीं प्राप्त होता ॥


Verse १२

स होवाच बालाकिर्य एवैष शब्दः पुरुषमन्वेति तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एवं स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालासंमोहमेति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa śabdaḥ puruṣamanveti tamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhā asuriti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste no evaṃ svayaṃ nāsya prajā purā kālāsaṃmohameti ॥

Then said Balaki: I meditate indeed on the person in the echo'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as life. He, then, who meditates on him thus passes not into unconsciousness before his time.

वे प्रसिद्ध बलाका-पुत्र गार्ग्य पुनः बोले- ‘हे राजन् ! जो यह गमन करते हुए विराट् पुरुष के पीछे ध्वन्यात्मक शब्द उसका अनुसरण करता है, उसी अविनाशो परमात्मा की मैं ब्रह्म रूप से उपासना करता हूँ।’ ऐसा सुनकर प्रसिद्ध राजा अजातशत्रु ने कहा- ‘है ब्रह्मन् ! इस संदर्भ में आप कुछ भी न करें। यह प्राण स्वरूप है, इसलिए निश्चित रूप से इसी भाव से मैं इसकी उपासना करता हूँ।’ जो भी उपासक इस श्रेष्ठ तत्व की इस रूप में उपासना करता है, वह पूर्ण आयु के पहले मृत्यु को नहीं प्राप्त होता है और न ही उसकी सन्तान ही पूर्ण आयु के पूर्व मृत्यु को प्राप्त होती है ॥


Verse १३

स होवाच बालाकिर्य एवैष छायापुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिसंवादयिष्ठा मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते नो एवं स्वयं नास्य प्रजा पुरा कालात्प्रमीयते ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa chāyāpuruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasmisaṃvādayiṣṭhā mṛtyuriti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste no evaṃ svayaṃ nāsya prajā purā kālātpramīyate ॥

Then said Balaki: I meditate indeed on the person in sound'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as Death. He, then, who meditates on him thus does not die before his time.

सुप्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य जी पुनः कहने लगे-‘हे राजन् ! शरीरधारी के साथ जो छाया विचरण करती है, मैं उसी छायारूप विराट् पुरुष की उपासना करता हूँ।’ ऐसा सुनकर उन गार्ग्य ऋषि से सुप्रसिद्ध राजा अजातशत्रु ने कहा-‘ हे ब्रह्मन्! आप इस विषय में कुछ भी न कहें। यह छाया तो मृत्युरूप है, मैं इसकी उसी भाव से उपासना करता हूँ।’ जो उपासक उस विराट् ब्रह्म को इस रूप में उपासना करता है, वह समय से पहले मृत्यु को नहीं प्राप्त होता है और न ही उसके पुत्र ही समय से पूर्व मृत्यु को प्राप्त होते हैं॥


Verse १४

स होवाच बालाकिर्य एवैष शारीरः पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः प्रजापतिरिति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्ते प्रजायते प्रजया पशुभिः ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa śārīraḥ puruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāḥ prajāpatiriti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāste prajāyate prajayā paśubhiḥ ॥

Then said Balaki: I meditate indeed on the person who, while asleep, moves about in dream'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as King Yama! He, then, who meditates on him thus, to his supremacy everything here is subdued.

गार्ग्य जी ने आगे कहा- ‘हे राजन् ! यह जो विराट् पुरुष शरीर में स्थित है, उसे मैं साक्षात् ब्रह्म का स्वरूप मानकर उपासना करता हूँ’ ऐसा सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा- ‘हे ब्रह्मन्! आप इस विषय में कुछ भी न करें। यह प्रजापति स्वरूप है, इसी भाव से मैं इसकी उपासना करता हूँ। जो भी मनुष्य इस शरीर में निवास करने वाले पुरुष की प्रजापति भाव से उपासना करता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त हो जाता है ॥


Verse १५

स होवाच बालाकिर्य एवैष प्राज्ञ आत्मा येनैतत्पुरुषः सुतः स्वप्यया चरति तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा यमो राजेति वा अहमेतमुपास इति से यो हैतमेवमुपास्ते सर्वं हास्मा इदं श्रैष्ट्याय यम्यते ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa prājña ātmā yenaitatpuruṣaḥ sutaḥ svapyayā carati tamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhā yamo rājeti vā ahametamupāsa iti se yo haitamevamupāste sarvaṃ hāsmā idaṃ śraiṣṭyāya yamyate ॥

Then said Balaki: I meditate on the person who is in this body'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as Prajapati. He then who meditates on him thus is augmented with offspring, cattle, fame, the lustre of sanctity, the heavenly world; he reaches the full term of life.

गार्ग्य जी पुनः बोले-‘हे राजन्! यह जो प्रज्ञा से नित्य-युक्त प्राण स्वरूप आत्मा है, जिससे एकता को प्राप्त करके यह सोया हुआ विराट् पुरुष स्वप्न मार्ग से विचरण करता है (अर्थात् विभिन्न तरह के स्वप्नों के अनुभव करता है), उसी की मैं ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ। यह सुनकर राजा अजातशत्र ने कहा-‘हे ब्रह्मन्! इस सन्दर्भ में आप कुछ भी न कहें। यह यम राजा है, ऐसा जानकर मैं इसी भाव से इसकी उपासना करता हूँ। जो मनुष्य इसको इसी तरह से उपासना करता है, उस उपासक की श्रेष्ठता-अभिवर्धन हेतु यह समस्त संसार नियमपूर्वक चेष्टा करता है॥


Verse १६

स होवाच बालाकिर्य एवैष दक्षिणेऽक्षन्युरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचा-जातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठा नाम्न आत्माऽग्नेरात्मा ज्योतिष आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्त एतेषां सर्वेषामात्मा भवति ॥

sa hovāca bālākirya evaiṣa dakṣiṇe'kṣanyuruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācā-jātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhā nāmna ātmā'gnerātmā jyotiṣa ātmeti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāsta eteṣāṃ sarveṣāmātmā bhavati ॥

Then said Balaki: I meditate on the person in the right eye'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the self of speech, the self of fire, the self of light. He then who meditates on him thus becomes the self of all these.

पुनः गार्ग्य जी ने कहा-‘हे राजन् ! जो यह दाहिने नेत्र में विराट् पुरुष स्थित है, मैं उसी की ब्रह्मरूप में उपासना करता हूँ।’ ऐसा गार्ग्य ऋषि से सुनकर राजा अजातशत्रु ने कहा- ‘हे ब्रह्मन्! कृपया आप इस विषय में कुछ भी न करें।’ यह नाम, अग्नि एवं ज्योति की आत्मा है। इसको मैं इसी भावना के अनुसार उपासना करता हूँ। इसी तरह से जो भी उपासक इसकी उपासना करता है, वह इन सभी की आत्मा के समान हो जाता है।।


Verse १७

स होवाच बालाकिर्य एवैष सव्येऽक्षन्पुरुषस्तमेवाहमुपास इति तं होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवादयिष्ठाः सत्यस्यात्मा विद्युत आत्मा तेजस आत्मेति वा अहमेतमुपास इति स यो हैतमेवमुपास्त एतेषां सर्वेषामात्मा भवतीति

sa hovāca bālākirya evaiṣa savye'kṣanpuruṣastamevāhamupāsa iti taṃ hovācājātaśatrurmā maitasminsaṃvādayiṣṭhāḥ satyasyātmā vidyuta ātmā tejasa ātmeti vā ahametamupāsa iti sa yo haitamevamupāsta eteṣāṃ sarveṣāmātmā bhavatīti

Then said Balaki: I meditate on the person in the right eye'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the self of speech, the self of fire, the self of light. He then who meditates on him thus becomes the self of all these.

तब गार्ग्य पुनः बोले-‘हे राजन् ! यह जो बायें नेत्र में विराट् पुरुष विद्यमान है, इसी श्रेष्ठ पुरुष की मै ब्रह्मरूप से उपासना करता हूँ।’ ऐसा सुनकर उन (गार्ग्य ऋषि) से राजा अजातशत्र ने कहा- ‘हे ब्रह्मन्! आप इस विषय में कुछ भी न करें। यह सत्य का, विद्युत् का एवं तेज का आत्मा है। इसकी मैं इसी भाव से उपासना करता हूँ।’जो भी उपासक इसकी इस भाव से उपासना करता है, वह सभी की आत्मा हो जाता है।।


Verse १८

तत उह बालाकिस्तूष्णीमास तं होवाचाजातशत्रुः । एतावन्नु बालाका ३ इ इत्येतावद्धीति होवाच बालाकिस्तं होवाचाजातशत्रुर्मृषा वै किल मा समवादयिष्ठा ब्रह्म ते प्रवाणीति ।स होवाच।यो वै बालाक एतेषां पुरुषाणां कर्ता यस्य वैतत्कर्म स वै वेदितव्य इति तत उ ह बालाकिः समित्पाणिः प्रतिचक्रम उपायानीति तं होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमरूपमेव तस्याद्यत्क्षत्रियो ब्राह्मणमुपनयेत्। एहि व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति तं ह पाणावभिपद्य प्रवद्व्राज तो ह सुप्तं पुरुषमाजग्मतुस्तं हाजातशत्रुरामन्त्रयांचके।बृहन्याण्डरवासः सोमराजन्निति ।स ह तूष्णीमेव शिश्ये।तत उ हैनं यष्टयाविचिक्षेप स तत एव समुत्तस्थौ तं होवाचाजातशत्रुः ।क्वैष एतद्वालाके पुरुषोऽशयिष्टक्वैतदभूत्कुत एतदागा३इदिति ।तत उ ह वालाकिर्न विजज्ञौ ॥

tata uha bālākistūṣṇīmāsa taṃ hovācājātaśatruḥ । etāvannu bālākā 3 i ityetāvaddhīti hovāca bālākistaṃ hovācājātaśatrurmṛṣā vai kila mā samavādayiṣṭhā brahma te pravāṇīti ।sa hovāca।yo vai bālāka eteṣāṃ puruṣāṇāṃ kartā yasya vaitatkarma sa vai veditavya iti tata u ha bālākiḥ samitpāṇiḥ praticakrama upāyānīti taṃ hovācājātaśatruḥ pratilomarūpameva tasyādyatkṣatriyo brāhmaṇamupanayet। ehi vyeva tvā jñapayiṣyāmīti taṃ ha pāṇāvabhipadya pravadvrāja to ha suptaṃ puruṣamājagmatustaṃ hājātaśatrurāmantrayāṃcake।bṛhanyāṇḍaravāsaḥ somarājanniti ।sa ha tūṣṇīmeva śiśye।tata u hainaṃ yaṣṭayāvicikṣepa sa tata eva samuttasthau taṃ hovācājātaśatruḥ ।kvaiṣa etadvālāke puruṣo'śayiṣṭakvaitadabhūtkuta etadāgā3iditi ।tata u ha vālākirna vijajñau ॥

Then said Balaki: I meditate on the person in the left eye'. To him Ajatasatru said: Make me not to converse on him! I meditate on him as the self of truth, the self of lightning, the self of brightness. He then who meditates on him thus becomes the self of all these.

राजा अजातशत्रु के इस तरह से कहने के पश्चात् वे बलाका-तनय गार्ग्य जी मौन हो गये । तदनन्तर उन (गार्ग्य जी) से राजा अजातशत्रु ने कहा-हे बलाके! क्या इतना ही आपका ब्रह्मज्ञान है?' इस प्रश्न पर बलाका-पुत्र गार्ग्य ने कहा- हाँ, इतना ही है।’ तब राजा अजातशत्रु ने कहा-‘हे ब्रह्मन् ! तब तो व्यर्थ ही आपने यह कहा कि तुम्हारे लिए ब्रह्म का उपदेश करूँगा।’ निश्चय हो जो आपके द्वारा कहे हुए इन सभी सोपाधिक पुरुषों का कर्ता है- वही जानने योग्य है। उन श्रेष्ठ राजा अजातशत्रु के इस तरह कहने पर वे प्रसिद्ध बलाका-तनय गार्ग्य हाथ में समिधा ग्रहण कर उनके पास जाकर कहने लगे-‘हे राजन्! मैं आपको गुरु बनाने के लिए आपके पास आया हूँ।’ ऐसा सुनकर राजा ने कहा-‘यह विपरीत बात हो जायेगी, यदि क्षत्रिय ब्राह्मण को शिष्य बनाने के लिए अपने पास बुलाये। अत: आप आर्ये (एकान्त स्थान की ओर चलें), वहाँ आपको निश्चय ही मैं स्वयं विराट् ब्रह्म का बोध कराऊँगा।’ ऐसा कहकर राजा (अजातशत्रु) बलाका-तनय गार्ग्य का हाथ पकड़ करके वहाँ से चल दिये। वे दोनों (राजा एवं गार्ग्य) एक सोये हुए व्यक्ति के पास आये। वहाँ पर राजा अजातशत्रु ने उस सोये हुए व्यक्ति को जगाने का प्रयास करते हुए बुलाया-‘हे ब्रह्मन् ! हे पाण्डरवास ! हे सोम राजन्! इस तरह से सम्बोधन करने पर भी जब वह व्यक्ति सोया ही रहा, तब उस व्यक्ति के शरीर में छड़ी से प्रहार किया। जैसे ही उसके शरीर में प्रहार किया गया, वह सोया हुआ व्यक्ति उस छड़ी की चोट से उठकर खड़ा हो गया। ऐसा दृश्य देखकर बलाका-पुत्र गार्ग्य से राजा अजातशत्रु ने कहा-‘हे बलाके ! यह व्यक्ति इस तरह अचेत सा रहकर कहाँ शयन करता था? किस प्रदेश में इसका शयन हुआ था ? तथा इस जाग्रत्-अवस्था में यह कहाँ से आ गया है?’ ॥


Verse १९

तं होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्वालाके पुरुषोऽशयिष्ट यत्रैतदभूद्यत एतदागादिति ।हिता नाम हृदयस्य नाड्यो हृदयात्पुरीततमभिप्रतन्वन्ति तद्यथा सहस्त्रधा केशो विपाटितस्तावदण्व्यः पिङ्गलस्याणिम्ना तिष्ठन्ति। शुक्लस्य कृष्णस्य पीतस्य लोहितस्येति तासु तदा भवति ।यदा सुप्तः स्वप्नं न कंचन पश्यत्यस्मिन्प्राण एवैकधा भवति तदैनं वाक्सर्वैर्नामभिः सहाप्येति चक्षुः सर्वै रूपैः सहाप्येति श्रोत्रं सर्वैः शब्दैः सहाप्येति मनः सर्वैर्ध्यानैः सहाप्येति स यदा प्रतिबुध्यते यथाऽग्नेर्वलतः सर्वा दिशो विस्फुलिङ्गा विप्रतिष्ठेरनैवमेवैतस्मादात्मनः प्राणा यथायतनं विप्रतिष्ठन्ते प्राणेभ्यो देवा देवेभ्यो लोकाः तद्यथा क्षुरः क्षुरधानेऽवहितः स्यात्।विश्वंभरो वा विश्वंभरकुलाय एवमेवैष प्रज्ञ आत्मेदं शरीरमात्मानमनुप्रविष्ट आलोमध्य आनखेभ्यः

taṃ hovācājātaśatruryatraiṣa etatvālāke puruṣo'śayiṣṭa yatraitadabhūdyata etadāgāditi ।hitā nāma hṛdayasya nāḍyo hṛdayātpurītatamabhipratanvanti tadyathā sahastradhā keśo vipāṭitastāvadaṇvyaḥ piṅgalasyāṇimnā tiṣṭhanti। śuklasya kṛṣṇasya pītasya lohitasyeti tāsu tadā bhavati ।yadā suptaḥ svapnaṃ na kaṃcana paśyatyasminprāṇa evaikadhā bhavati tadainaṃ vāksarvairnāmabhiḥ sahāpyeti cakṣuḥ sarvai rūpaiḥ sahāpyeti śrotraṃ sarvaiḥ śabdaiḥ sahāpyeti manaḥ sarvairdhyānaiḥ sahāpyeti sa yadā pratibudhyate yathā'gnervalataḥ sarvā diśo visphuliṅgā vipratiṣṭheranaivamevaitasmādātmanaḥ prāṇā yathāyatanaṃ vipratiṣṭhante prāṇebhyo devā devebhyo lokāḥ tadyathā kṣuraḥ kṣuradhāne'vahitaḥ syāt।viśvaṃbharo vā viśvaṃbharakulāya evamevaiṣa prajña ātmedaṃ śarīramātmānamanupraviṣṭa ālomadhya ānakhebhyaḥ

Thereupon Balaki was silent. To him then Ajatasatru said: So much only Balaki? 'So much only' replied Balaki. To him, then, Ajatasatru said: In vain, indeed, did you make to converse saying 'Let me declare Brahman to you'. He, indeed. Balaki, who is the maker of these persons, of whom verily this is the work, he alone is to be known. Thereupon Balaki, fuel in hand, approached saying, 'Receive me as a pupil'. To him then Ajatasatru said: 'This I deem a form (of conduct) contrary to nature that a Kshatriya should receive a Brahmana as pupil. (But come). I shall make you understand'. Then taking him by the hand, he went forth. The two then came upon a person asleep. The Ajatasatru called him (saying) 'O Great, White-robed King, Soma!' But he just lay silent. Then he pushed him with a stick. He got up at once. To him then Ajatasatru said: Where in this case, O Balaki, has this person lain? What has become of him here? Whence has he returned here? Thereupon Balaki understood not. To him then Ajatasatru said: Where in this case, O Balaki has this person lain, what has become of him here, whence he has returned here as I asked is the arteries of a person (of the heart) called Hita (the beneficent). From the heart they spread forth to the pericardium. Now they are as minute as a hair divided a thousand-fold. They consist of a minute essence, reddish-brown, white, black, yellow and red. In these one remains while asleep; he sees no dream whatsoever.

गार्ग्य इस रहस्य को न समझ पाये, तब पुनः उनसे राजा अजातशत्रु ने कहा-‘ हे बलाका-तनय ! यह पुरुष इस तरह से अचेत-सा होकर जहाँ सोता था, जहाँ शयन करता था और इस जाग्रत्-अवस्था में इसका जहाँ से आगमन हुआ है, वह स्थान इस प्रकार से जाना जाता है। ‘हिता’ नाम से प्रसिद्ध बहुत-सी नाड़ियाँ हैं, जो कि हदय-कमल से सम्बन्ध रखने वाली हैं। वे (नाड़ियाँ) हृदय-- कमल से निकलकर सम्पूर्ण शरीर में विस्तृत होकर फैली हुई हैं। इन नाड़ियों का परिमाण इस तरह से है-एक बाल के हजारवें भाग के बराबर ही सूक्ष्मातिसूक्ष्म वे सभी नाड़ियाँ हैं। पिङ्गल अर्थात् विभिन्न तरह के रंगों का जो अति सूक्ष्मतम रस है, इससे वे पूर्ण है। शुक्ल, कृष्ण, पोत एवं रक्त आदि इन सभी रंगों के सूक्ष्मातिसूक्ष्म अंशों से ये सम्पन्न हैं। उन्हीं समस्त नाड़ियों में यह पुरुष सुषुप्तावस्था के समय विद्यमान रहता है।जिस समय यह सोया हुआ पुरुष किसी भी तरह का स्वप्न नहीं देखता, तब उस समय यह इस मुख्य प्राण तत्व में ही एकात्मभाव को प्राप्त कर लेता है। उस समय वाणी अपने समस्त नामों सहित इस प्राणतत्त्व में विलीन हो जाती है। चक्षु भी अपने सभी रूपों के साथ इस प्राण में ही मिल जाता है । कर्णेन्द्रिय अपने सभी शब्दों के साथ इस प्राण में विलीन हो जाती है और मन भी सभी चिन्तनयुक्त विषयों के सहित इस प्राण-तत्त्व में विलीन हो जाता है। यह पुरुष जब जाग जाता है, तब उस समय जैसे जलती हुई अग्नि से सभी दिशाओं की तरफ चिनगारियाँ प्रस्फुटित होती हैं, वैसे ही इस प्राण स्वरूप आत्मा से सभी वाणी आदि प्राणतत्त्व बहिर्गमनका अपने-अपने भोग्य-स्थल की तरफ गमन कर जाते हैं। तत्पश्चात् प्राणों से उनके अधिष्ठाता अग्नि आदि | देवों का प्रादुर्भाव होता है एवं साथ ही देवताओं से लोक अर्थात् नाम आदि विषयों का प्राकट्य होता है। उस श्रेष्ठ आत्मा की प्राप्ति का उदाहरण इस तरह से है-जैसे क्षुरधान (अर्थात् छुरा रखने हेतु निर्मित की हुयी चर्मयुक्त पेटी) में छुरा रखा रहता है, वैसे ही शरीर के अन्दर हृदय-कमल में अङ्गुष्ठ- मात्र पुरुष के रूप में परमात्म सत्ता को स्थिति होती है एवं जिस तरह अग्नि अपने नीड- भूत अरणी आदि काष्ट में सभी जगह फैली रहती है, उसी प्रकार यह प्रज्ञावान् आत्मा इस ‘आत्मा’ नाम से सम्बोधित किये जाने वाले शरीर में नख से शिखा तक व्याप्त है ॥


Verse २०

तमेतमात्मामेनत आत्मानोऽन्ववस्यन्ति यथा श्रेष्ठिनं स्वाः ।तद्यथा श्रेष्ठी स्वर्भुङ्न्क्ते यथा वा स्वाः श्रेष्ठिनं भुञ्जन्त्येवमेवैष प्रज्ञात्मैतैरात्मभिर्भुङ्न्क्ते।एवं वै तमात्मानमेत आत्मानो। भुञ्जन्ति ।स यावद्ध वा इन्द्र एतमात्मानं न विजज्ञे तावदेनमसूरा अभिबभूवु।स यदा विजज्ञेऽथ हत्वाऽसुरान्विजित्य सर्वेषां देवानां श्रेष्ठयं स्वाराज्यमाधिपत्यं परीयाय तथो एवैवं विद्वान्सर्वान्पाप्मनोऽपहत्य सर्वेषां भूतानां श्रेष्ठयं स्वाराज्यमाधिपत्यं पर्येति य एवं वेद य एवं वेद ॥

tametamātmāmenata ātmāno'nvavasyanti yathā śreṣṭhinaṃ svāḥ ।tadyathā śreṣṭhī svarbhuṅnkte yathā vā svāḥ śreṣṭhinaṃ bhuñjantyevamevaiṣa prajñātmaitairātmabhirbhuṅnkte।evaṃ vai tamātmānameta ātmāno। bhuñjanti ।sa yāvaddha vā indra etamātmānaṃ na vijajñe tāvadenamasūrā abhibabhūvu।sa yadā vijajñe'tha hatvā'surānvijitya sarveṣāṃ devānāṃ śreṣṭhayaṃ svārājyamādhipatyaṃ parīyāya tatho evaivaṃ vidvānsarvānpāpmano'pahatya sarveṣāṃ bhūtānāṃ śreṣṭhayaṃ svārājyamādhipatyaṃ paryeti ya evaṃ veda ya evaṃ veda ॥

Then he becomes unitary in this vital breath. Then speech together with all names goes to it; the eye together with all forms goes to it; the ear together with all sounds goes to it; the mind together with all thoughts goes to it. When he awakes, as from a blazing fire sparks proceed in all directions, even so from this Self the vital breaths proceed to their respective stations; from the vital breaths, the gods (the sense faculties); from the sense faculties the worlds. This very vital breath, even this Self of intelligence, has entered this bodily self up to the hair and the fingernail. Just as a razor might be hidden in a razor-case or as fire in the fireplace, even so this self of intelligence has entered this bodily self upto the very hairs and nails. On that self these other selves depend as upon a chief his own (men) or as his own (men) are of service to a chief, even so these other selves are of service to that self of (intelligence). Verily as long as Indra did not understand this Self, so long the Asuras overcame him. When he understood this, striking down and conquering the Asuras, he attained pre-eminence among all gods and all beings, sovereignty and overlordship. Likewise also he who knows this, striking off all evils, attains pre-eminence, sovereignty and overlordship over all beings - he who knows this, yea, he who knows this. Om! May my speech be based on (i.e. accord with) the mind; May my mind be based on speech. O Self-effulgent One, reveal Thyself to me. May you both (speech and mind) be the carriers of the Veda to me. May not all that I have heard depart from me. I shall join together (i.e. obliterate the difference of) day And night through this study. I shall utter what is verbally true; I shall utter what is mentally true. May that (Brahman) protect me; May That protect the speaker (i.e. the teacher), may That protect me; May that protect the speaker - may That protect the speaker. Om! Let there be Peace in me! Let there be Peace in my environment! Let there be Peace in the forces that act on me! Here ends the Kaushitaki-Brahmana Upanishad, as contained in the Rig-Veda.

उसी साक्षीरूप आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा (इन्द्रियाँ) अनुगत सेवक की भाँति ठीक वैसे ही अनुसरण करती हैं, जैसे श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न धनी का, उसके आश्रय में जीवन-व्यतीत करने वाले स्वजन अनुवर्तन करते हैं। जिस तरह धनी अपने आत्मीय जनों के साथ भोजन करता है और स्वजन जैसे उस धनी का ही उपभोग करते हैं, उसी प्रकार यह प्रज्ञा सम्पन्न आत्मा इन वाणी आदि आत्माओं के सहित उपभोग करता है और अवश्य ही इस आत्मा का ये वाणी आदि आत्मा उपभोग करते हैं।वे प्रख्यात देवराज इन्द्र जब तक इस आत्मा को नहीं जान पाये थे, तब तक उन्हें समस्त दैत्य समूह पराजित करते रहते थे, किन्तु जैसे ही उन्होंने अपनी आत्मा को जाना, वैसे ही देवराज इन्द्र ने उन समस्त दैत्यों को विनष्ट का, उन्हें परास्त करके सम्पूर्ण देवों में श्रेष्ठता का पद, स्वर्ग का राज्य एवं त्रिलोकी का अधिकार प्राप्त कर लिया। इसी प्रकार आत्मा को जानने वाला ज्ञानी अपने समस्त पापों को मिटाकर सभी भूत-प्राणियों में श्रेष्ठ होकर स्वाराज्य और प्रभुता को प्राप्त कर सभी का स्वामी बन जाता है। जो भी उपासक इस प्रकार से उसे जानता है, उसे ऊपर कहे हुए सम्पूर्ण फलों की प्राप्ति हो जाती है॥