5. पञ्चमोऽध्यायः
पञ्चमोऽध्यायः (part 1)
Verse १
अथापरं प्रवक्ष्यामि शृणु तात यथायथम्। अज्ञानभूः सप्तपदा ज्ञभूः सप्तपदैव हि ॥
athāparaṃ pravakṣyāmi śṛṇu tāta yathāyatham। ajñānabhūḥ saptapadā jñabhūḥ saptapadaiva hi ॥
V-161. In large groups he behold bygone orders of (cosmic) manifestation. Next he recollected them all in the due order of all their attributes.
पुनः महर्षि ऋभु ने कहा-हे पुत्र! मेरे द्वारा कहे वचनों को भली प्रकार सुनो। अज्ञान और ज्ञान इन दोनों की सात-सात भूमिकायें हैं। इनके बीच में अनेक दूसरी भूमिकायें उत्पन्न होती हैं। अहंभाव ही मूल स्वरूप से पृथक करने वाला है। स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है। शुद्ध सत्तारूप बोध ही आत्मा का रूप है, जो उस बोध की अवस्था से हटते नहीं, ऐसे साधकों को अज्ञान से पैदा हुए राग-द्वेषादि दूषित विकार प्रभावित नहीं कर पाते । आत्मस्वरूप से हटकर वासनात्मक स्वरूप में जो चित् का डूबना है, इससे अधिक मोहग्रस्त होना दूसरा नहीं कहा जाएगा और न हो सकता है। एक विषय से दूसरे विषय में प्रवेश करते हुए जो मध्य में मन की अवस्था होती है, उसे ‘ध्वस्तमनन' के स्वरूप वाली स्थिति समझा जाता है, लेकिन सभी संकल्पों के पत्थर की शिला के समान भली प्रकार शान्त हो जाने पर निश्चेष्ट अवस्था जिसमें जाग्रत् और स्वप्नावस्था भी प्रायः चेष्टारहित होती है, वही परास्वरूप स्थिति कहलाती हैं। अहं भाव के क्षीण हो जाने पर शान्त, चेतन तथा भेदभाव से रहित चित्त की स्थिति ही स्वरूप अवस्था कहलाती है ।।
Verse २
पदान्तराण्यसंख्यानि प्रभवन्त्यन्यथैतयोः । स्वरूपावस्थितिर्मुक्तिस्तभ्रंशोऽहंत्ववेदनम् ॥
padāntarāṇyasaṃkhyāni prabhavantyanyathaitayoḥ । svarūpāvasthitirmuktistabhraṃśo'haṃtvavedanam ॥
V-162. (Then) sportively he fashioned, by (sheer) imagination, variegated living beings with their unique patterns of behaviour - the whole constituting, as it were, a city in the sky.
पुनः महर्षि ऋभु ने कहा-हे पुत्र! मेरे द्वारा कहे वचनों को भली प्रकार सुनो। अज्ञान और ज्ञान इन दोनों की सात-सात भूमिकायें हैं। इनके बीच में अनेक दूसरी भूमिकायें उत्पन्न होती हैं। अहंभाव ही मूल स्वरूप से पृथक करने वाला है। स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है। शुद्ध सत्तारूप बोध ही आत्मा का रूप है, जो उस बोध की अवस्था से हटते नहीं, ऐसे साधकों को अज्ञान से पैदा हुए राग-द्वेषादि दूषित विकार प्रभावित नहीं कर पाते । आत्मस्वरूप से हटकर वासनात्मक स्वरूप में जो चित् का डूबना है, इससे अधिक मोहग्रस्त होना दूसरा नहीं कहा जाएगा और न हो सकता है। एक विषय से दूसरे विषय में प्रवेश करते हुए जो मध्य में मन की अवस्था होती है, उसे ‘ध्वस्तमनन' के स्वरूप वाली स्थिति समझा जाता है, लेकिन सभी संकल्पों के पत्थर की शिला के समान भली प्रकार शान्त हो जाने पर निश्चेष्ट अवस्था जिसमें जाग्रत् और स्वप्नावस्था भी प्रायः चेष्टारहित होती है, वही परास्वरूप स्थिति कहलाती हैं। अहं भाव के क्षीण हो जाने पर शान्त, चेतन तथा भेदभाव से रहित चित्त की स्थिति ही स्वरूप अवस्था कहलाती है ।।
Verse ३
शुद्धसन्मात्रसंवत्तेः स्वरूपान्न चलन्ति ये । रागद्वेषादयो भावास्तेषां'नाज्ञत्वसंभवः ॥
śuddhasanmātrasaṃvatteḥ svarūpānna calanti ye । rāgadveṣādayo bhāvāsteṣāṃ'nājñatvasaṃbhavaḥ ॥
V-163. For securing their happy state as well as liberation, for attaining righteousness, love and wealth, he set up Shastras endless and varied.
पुनः महर्षि ऋभु ने कहा-हे पुत्र! मेरे द्वारा कहे वचनों को भली प्रकार सुनो। अज्ञान और ज्ञान इन दोनों की सात-सात भूमिकायें हैं। इनके बीच में अनेक दूसरी भूमिकायें उत्पन्न होती हैं। अहंभाव ही मूल स्वरूप से पृथक करने वाला है। स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है। शुद्ध सत्तारूप बोध ही आत्मा का रूप है, जो उस बोध की अवस्था से हटते नहीं, ऐसे साधकों को अज्ञान से पैदा हुए राग-द्वेषादि दूषित विकार प्रभावित नहीं कर पाते । आत्मस्वरूप से हटकर वासनात्मक स्वरूप में जो चित् का डूबना है, इससे अधिक मोहग्रस्त होना दूसरा नहीं कहा जाएगा और न हो सकता है। एक विषय से दूसरे विषय में प्रवेश करते हुए जो मध्य में मन की अवस्था होती है, उसे ‘ध्वस्तमनन' के स्वरूप वाली स्थिति समझा जाता है, लेकिन सभी संकल्पों के पत्थर की शिला के समान भली प्रकार शान्त हो जाने पर निश्चेष्ट अवस्था जिसमें जाग्रत् और स्वप्नावस्था भी प्रायः चेष्टारहित होती है, वही परास्वरूप स्थिति कहलाती हैं। अहं भाव के क्षीण हो जाने पर शान्त, चेतन तथा भेदभाव से रहित चित्त की स्थिति ही स्वरूप अवस्था कहलाती है ।।
Verse ४
स्वरूपपरिभ्रंशश्चैत्यार्थे चितिमज्जनम्। एतस्मादपरो मोहो न भूतो न भविष्यति ॥
svarūpaparibhraṃśaścaityārthe citimajjanam। etasmādaparo moho na bhūto na bhaviṣyati ॥
V-164. As the existence of the world has been set up by mind in the form of Brahma, it lasts only as long as Brahma; with his destruction, the world too perishes.
पुनः महर्षि ऋभु ने कहा-हे पुत्र! मेरे द्वारा कहे वचनों को भली प्रकार सुनो। अज्ञान और ज्ञान इन दोनों की सात-सात भूमिकायें हैं। इनके बीच में अनेक दूसरी भूमिकायें उत्पन्न होती हैं। अहंभाव ही मूल स्वरूप से पृथक करने वाला है। स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है। शुद्ध सत्तारूप बोध ही आत्मा का रूप है, जो उस बोध की अवस्था से हटते नहीं, ऐसे साधकों को अज्ञान से पैदा हुए राग-द्वेषादि दूषित विकार प्रभावित नहीं कर पाते । आत्मस्वरूप से हटकर वासनात्मक स्वरूप में जो चित् का डूबना है, इससे अधिक मोहग्रस्त होना दूसरा नहीं कहा जाएगा और न हो सकता है। एक विषय से दूसरे विषय में प्रवेश करते हुए जो मध्य में मन की अवस्था होती है, उसे ‘ध्वस्तमनन' के स्वरूप वाली स्थिति समझा जाता है, लेकिन सभी संकल्पों के पत्थर की शिला के समान भली प्रकार शान्त हो जाने पर निश्चेष्ट अवस्था जिसमें जाग्रत् और स्वप्नावस्था भी प्रायः चेष्टारहित होती है, वही परास्वरूप स्थिति कहलाती हैं। अहं भाव के क्षीण हो जाने पर शान्त, चेतन तथा भेदभाव से रहित चित्त की स्थिति ही स्वरूप अवस्था कहलाती है ।।
Verse ५
अर्थादर्थान्तरं चित्ते याति मध्ये तु या स्थितिः ।सा ध्वस्तमननाकारा स्वरूपस्थितिरुच्यते ॥
arthādarthāntaraṃ citte yāti madhye tu yā sthitiḥ ।sā dhvastamananākārā svarūpasthitirucyate ॥
V-165. O best of Brahmins, in reality nothing anywhere, at any time, is born or is destroyed. All that is seen is unreal (neither is nor is not).
पुनः महर्षि ऋभु ने कहा-हे पुत्र! मेरे द्वारा कहे वचनों को भली प्रकार सुनो। अज्ञान और ज्ञान इन दोनों की सात-सात भूमिकायें हैं। इनके बीच में अनेक दूसरी भूमिकायें उत्पन्न होती हैं। अहंभाव ही मूल स्वरूप से पृथक करने वाला है। स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है। शुद्ध सत्तारूप बोध ही आत्मा का रूप है, जो उस बोध की अवस्था से हटते नहीं, ऐसे साधकों को अज्ञान से पैदा हुए राग-द्वेषादि दूषित विकार प्रभावित नहीं कर पाते । आत्मस्वरूप से हटकर वासनात्मक स्वरूप में जो चित् का डूबना है, इससे अधिक मोहग्रस्त होना दूसरा नहीं कहा जाएगा और न हो सकता है। एक विषय से दूसरे विषय में प्रवेश करते हुए जो मध्य में मन की अवस्था होती है, उसे ‘ध्वस्तमनन' के स्वरूप वाली स्थिति समझा जाता है, लेकिन सभी संकल्पों के पत्थर की शिला के समान भली प्रकार शान्त हो जाने पर निश्चेष्ट अवस्था जिसमें जाग्रत् और स्वप्नावस्था भी प्रायः चेष्टारहित होती है, वही परास्वरूप स्थिति कहलाती हैं। अहं भाव के क्षीण हो जाने पर शान्त, चेतन तथा भेदभाव से रहित चित्त की स्थिति ही स्वरूप अवस्था कहलाती है ।।
Verse ६
संशान्तसर्वसंकल्पा या शिलावदवस्थितिः ।जाग्रन्निद्राविनिर्मुक्ता सा स्वरूपस्थितिः परा ॥
saṃśāntasarvasaṃkalpā yā śilāvadavasthitiḥ ।jāgrannidrāvinirmuktā sā svarūpasthitiḥ parā ॥
V-166. Give up the idle show of empirical life, a very pit of the serpents of cravings. Knowing this to be unreal, reduce them all to the status of their ground.
पुनः महर्षि ऋभु ने कहा-हे पुत्र! मेरे द्वारा कहे वचनों को भली प्रकार सुनो। अज्ञान और ज्ञान इन दोनों की सात-सात भूमिकायें हैं। इनके बीच में अनेक दूसरी भूमिकायें उत्पन्न होती हैं। अहंभाव ही मूल स्वरूप से पृथक करने वाला है। स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है। शुद्ध सत्तारूप बोध ही आत्मा का रूप है, जो उस बोध की अवस्था से हटते नहीं, ऐसे साधकों को अज्ञान से पैदा हुए राग-द्वेषादि दूषित विकार प्रभावित नहीं कर पाते । आत्मस्वरूप से हटकर वासनात्मक स्वरूप में जो चित् का डूबना है, इससे अधिक मोहग्रस्त होना दूसरा नहीं कहा जाएगा और न हो सकता है। एक विषय से दूसरे विषय में प्रवेश करते हुए जो मध्य में मन की अवस्था होती है, उसे ‘ध्वस्तमनन' के स्वरूप वाली स्थिति समझा जाता है, लेकिन सभी संकल्पों के पत्थर की शिला के समान भली प्रकार शान्त हो जाने पर निश्चेष्ट अवस्था जिसमें जाग्रत् और स्वप्नावस्था भी प्रायः चेष्टारहित होती है, वही परास्वरूप स्थिति कहलाती हैं। अहं भाव के क्षीण हो जाने पर शान्त, चेतन तथा भेदभाव से रहित चित्त की स्थिति ही स्वरूप अवस्था कहलाती है ।।
Verse ७
अहन्तांशे क्षते शान्ते भेदनिष्पन्दचित्तता।अजडा या प्रचलति तत्स्वरूपमितीरितम् ॥
ahantāṃśe kṣate śānte bhedaniṣpandacittatā।ajaḍā yā pracalati tatsvarūpamitīritam ॥
V-167. Vis-a-vis 'the city in the sky', whether adorned or not, or the parts of its constitutive case (the nescience), progeny etc., what rationale is there for pleasures and pains?
पुनः महर्षि ऋभु ने कहा-हे पुत्र! मेरे द्वारा कहे वचनों को भली प्रकार सुनो। अज्ञान और ज्ञान इन दोनों की सात-सात भूमिकायें हैं। इनके बीच में अनेक दूसरी भूमिकायें उत्पन्न होती हैं। अहंभाव ही मूल स्वरूप से पृथक करने वाला है। स्वरूप में अवस्थित होना ही मुक्ति है। शुद्ध सत्तारूप बोध ही आत्मा का रूप है, जो उस बोध की अवस्था से हटते नहीं, ऐसे साधकों को अज्ञान से पैदा हुए राग-द्वेषादि दूषित विकार प्रभावित नहीं कर पाते । आत्मस्वरूप से हटकर वासनात्मक स्वरूप में जो चित् का डूबना है, इससे अधिक मोहग्रस्त होना दूसरा नहीं कहा जाएगा और न हो सकता है। एक विषय से दूसरे विषय में प्रवेश करते हुए जो मध्य में मन की अवस्था होती है, उसे ‘ध्वस्तमनन' के स्वरूप वाली स्थिति समझा जाता है, लेकिन सभी संकल्पों के पत्थर की शिला के समान भली प्रकार शान्त हो जाने पर निश्चेष्ट अवस्था जिसमें जाग्रत् और स्वप्नावस्था भी प्रायः चेष्टारहित होती है, वही परास्वरूप स्थिति कहलाती हैं। अहं भाव के क्षीण हो जाने पर शान्त, चेतन तथा भेदभाव से रहित चित्त की स्थिति ही स्वरूप अवस्था कहलाती है ।।
Verse ८
बीजजाग्रत्तथा जाग्रन्महाजाग्रत्तथैव च। जाग्रत्स्वप्नस्तथा स्वप्नः स्वप्नजाग्रत्सुषुप्तिकम् ॥
bījajāgrattathā jāgranmahājāgrattathaiva ca। jāgratsvapnastathā svapnaḥ svapnajāgratsuṣuptikam ॥
V-168. Sorrow - and not a sense of gratification - is in order as regards wealth and spouse in their nourishing state. Who can have a sense of reassurance here as the nescience of delusion gets more and more entrenched?
मोह के सात प्रकार कहे गये हैं, जो इस प्रकार हैं-१. बीज जाग्रत् अवस्था, २. जाग्रत् अवस्था, ३. महाशाग्रत् अवस्था ४, जाग्रतूस्वप्नावस्था ५. स्वप्नावस्था ६. स्वप्न जाग्रत् अवस्था, ७, सुषुप्तावस्था। तत्पश्चात् यही परस्पर मिलकर असंख्य रूप धारण कर लेते हैं। अब इन सबके अलग-अलग लक्षण सुनें ॥
Verse ९
इति सप्तविधो मोहः पुनरेष परस्परम् ।श्लिष्टो भवत्यनेकाग्रयं शृणु लक्षणमस्य तु ॥
iti saptavidho mohaḥ punareṣa parasparam ।śliṣṭo bhavatyanekāgrayaṃ śṛṇu lakṣaṇamasya tu ॥
V-169. Those very (empirical) experiences which, in their abundance, cause a fool to get attached (to this world) are the source, in the case of a wise man, of his dispassion.
मोह के सात प्रकार कहे गये हैं, जो इस प्रकार हैं-१. बीज जाग्रत् अवस्था, २. जाग्रत् अवस्था, ३. महाशाग्रत् अवस्था ४, जाग्रतूस्वप्नावस्था ५. स्वप्नावस्था ६. स्वप्न जाग्रत् अवस्था, ७, सुषुप्तावस्था। तत्पश्चात् यही परस्पर मिलकर असंख्य रूप धारण कर लेते हैं। अब इन सबके अलग-अलग लक्षण सुनें ॥
Verse १०
प्रथमं चेतनं यत्स्यादनाख्यं निर्मलं चितः । भविष्यच्चित्तजीवादिनामशब्दार्थभाजनम्॥
prathamaṃ cetanaṃ yatsyādanākhyaṃ nirmalaṃ citaḥ । bhaviṣyaccittajīvādināmaśabdārthabhājanam॥
V-170. Therefore, Nidagha, with your awareness of Truth, cultivate indifference to whatever has perished among the activities of empirical life and accept whatever offers itself.
प्रथम ‘बीज जाग्रत् अवस्था' वह है, जो नामरहित शुद्धचेतन की भविष्यत् में घटित होने वाली,चित्तजीव आदि नाम के शब्दार्थरूप सम्बोधन से युक्त अवस्था है। वह बीजरूप में स्थित जाग्रत्-अवस्था बीज जाग्रत् नाम से प्रसिद्ध है। यह ज्ञाता की नूतन अवस्था है। अब आप जाग्रत् अवस्था की यथार्थ स्थिति सुनें ॥
Verse ११
बीजरूपस्थितं जाग्रद्बीजजाग्रत्तदुच्यते ।एषा ज्ञप्तेर्नवावस्था त्वं जाग्रत्संस्थितिं शृणु॥
bījarūpasthitaṃ jāgradbījajāgrattaducyate ।eṣā jñapternavāvasthā tvaṃ jāgratsaṃsthitiṃ śṛṇu॥
V-171. The marks of a man of discrimination are spontaneous indifference to experiences that do not come of their own accord and hearty acceptance of those that do.
प्रथम ‘बीज जाग्रत् अवस्था' वह है, जो नामरहित शुद्धचेतन की भविष्यत् में घटित होने वाली,चित्तजीव आदि नाम के शब्दार्थरूप सम्बोधन से युक्त अवस्था है। वह बीजरूप में स्थित जाग्रत्-अवस्था बीज जाग्रत् नाम से प्रसिद्ध है। यह ज्ञाता की नूतन अवस्था है। अब आप जाग्रत् अवस्था की यथार्थ स्थिति सुनें ॥
Verse १२
नवप्रसूतस्य परादयं चाहमिदं मम ।इति यः प्रत्ययः स्वस्थस्तज्जाग्रत्प्रागभावनात्॥
navaprasūtasya parādayaṃ cāhamidaṃ mama ।iti yaḥ pratyayaḥ svasthastajjāgratprāgabhāvanāt॥
V-172. Knowing and resorting to the untarnished middle status between the real and the unreal, neither cling to nor fly from the objective realm, external or internal.
नवजात जीव के अन्तरंग में ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है' अर्थात् मैं और मेरेपन के भावों की स्थिति ही मोह को दूसरी ‘जाग्रत् अवस्था' कही जाती है; क्योंकि उससे पूर्व यह भावना नहीं थी। ‘महाजाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें ‘यह वह व्यक्ति है, यह मैं हूँ, वह मेरी चीज है' आदि भावनाएँ पूर्वजन्गों के संस्कार सहित विदित होती है। अप्रचलित (अरूढ़) अथवा प्रचलित (रूढ़) एवं तन्मय होकर जो मन की काल्पनिक रचना जाग्रत् अवस्था में होती है, वह ‘जाग्रत्-स्वप्न' कही गयी है। एक चन्द्रमा की जगह दो चन्द्रमाओं का, सीप में चाँदी का तथा मृग-मरीचिका में (बालू में) जल का आभास होना इत्यादि (जाग्रत् अवस्था में) अभ्यास को प्राप्त हुए जाग्रत्-स्वप्न के विभिन्न प्रकार हैं ॥
Verse १३
अयं सोऽहमिदं तन्म इति जन्मान्तरोदितः । पीवरः प्रत्ययः प्रोक्तो महाजाग्रदिति स्फुटम् ॥
ayaṃ so'hamidaṃ tanma iti janmāntaroditaḥ । pīvaraḥ pratyayaḥ prokto mahājāgraditi sphuṭam ॥
V-173. The intelligence of a wise and active man, free from attachment and aversion, remains untarnished like a lotus leaf un-moistened by water.
नवजात जीव के अन्तरंग में ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है' अर्थात् मैं और मेरेपन के भावों की स्थिति ही मोह को दूसरी ‘जाग्रत् अवस्था' कही जाती है; क्योंकि उससे पूर्व यह भावना नहीं थी। ‘महाजाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें ‘यह वह व्यक्ति है, यह मैं हूँ, वह मेरी चीज है' आदि भावनाएँ पूर्वजन्गों के संस्कार सहित विदित होती है। अप्रचलित (अरूढ़) अथवा प्रचलित (रूढ़) एवं तन्मय होकर जो मन की काल्पनिक रचना जाग्रत् अवस्था में होती है, वह ‘जाग्रत्-स्वप्न' कही गयी है। एक चन्द्रमा की जगह दो चन्द्रमाओं का, सीप में चाँदी का तथा मृग-मरीचिका में (बालू में) जल का आभास होना इत्यादि (जाग्रत् अवस्था में) अभ्यास को प्राप्त हुए जाग्रत्-स्वप्न के विभिन्न प्रकार हैं ॥
Verse १४
अरूढमथवा रूढं सर्वथा तन्मयात्मकम्। यज्जाग्रतो मनोराज्यं यज्जाग्रत्स्वप्न उच्यते ॥
arūḍhamathavā rūḍhaṃ sarvathā tanmayātmakam। yajjāgrato manorājyaṃ yajjāgratsvapna ucyate ॥
-174. O twice-born (sage), if the glamour of objects charms not your heart, then, having grasped what ought to be known (achieved true wisdom), you have crossed the sea of empirical life.
नवजात जीव के अन्तरंग में ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है' अर्थात् मैं और मेरेपन के भावों की स्थिति ही मोह को दूसरी ‘जाग्रत् अवस्था' कही जाती है; क्योंकि उससे पूर्व यह भावना नहीं थी। ‘महाजाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें ‘यह वह व्यक्ति है, यह मैं हूँ, वह मेरी चीज है' आदि भावनाएँ पूर्वजन्गों के संस्कार सहित विदित होती है। अप्रचलित (अरूढ़) अथवा प्रचलित (रूढ़) एवं तन्मय होकर जो मन की काल्पनिक रचना जाग्रत् अवस्था में होती है, वह ‘जाग्रत्-स्वप्न' कही गयी है। एक चन्द्रमा की जगह दो चन्द्रमाओं का, सीप में चाँदी का तथा मृग-मरीचिका में (बालू में) जल का आभास होना इत्यादि (जाग्रत् अवस्था में) अभ्यास को प्राप्त हुए जाग्रत्-स्वप्न के विभिन्न प्रकार हैं ॥
Verse १५
द्विचन्द्रशुक्तिकारूप्यमृगतृष्णादिभेदतः । अभ्यास प्राप्य जाग्रत्तत्स्वप्नो नानाविधो भवेत्॥
dvicandraśuktikārūpyamṛgatṛṣṇādibhedataḥ । abhyāsa prāpya jāgrattatsvapno nānāvidho bhavet॥
V-175. In order to win the pre-eminent Status separate, by means of supreme wisdom, the functioning mind from (all) latent impressions as one does a strong scent from the flower.
नवजात जीव के अन्तरंग में ‘यह मैं हूँ, यह मेरा है' अर्थात् मैं और मेरेपन के भावों की स्थिति ही मोह को दूसरी ‘जाग्रत् अवस्था' कही जाती है; क्योंकि उससे पूर्व यह भावना नहीं थी। ‘महाजाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें ‘यह वह व्यक्ति है, यह मैं हूँ, वह मेरी चीज है' आदि भावनाएँ पूर्वजन्गों के संस्कार सहित विदित होती है। अप्रचलित (अरूढ़) अथवा प्रचलित (रूढ़) एवं तन्मय होकर जो मन की काल्पनिक रचना जाग्रत् अवस्था में होती है, वह ‘जाग्रत्-स्वप्न' कही गयी है। एक चन्द्रमा की जगह दो चन्द्रमाओं का, सीप में चाँदी का तथा मृग-मरीचिका में (बालू में) जल का आभास होना इत्यादि (जाग्रत् अवस्था में) अभ्यास को प्राप्त हुए जाग्रत्-स्वप्न के विभिन्न प्रकार हैं ॥
Verse १६
अल्पकालं मया दृष्टमेतन्नोदेति यत्र हि । परामर्शः प्रबुद्धस्य स स्वप्न इति कथ्यते ॥
alpakālaṃ mayā dṛṣṭametannodeti yatra hi । parāmarśaḥ prabuddhasya sa svapna iti kathyate ॥
V-176. The superior men of discrimination who board the Ship of Wisdom cross this sea of empirical life full of the waters of latent impressions.
‘स्वप्नावस्था' वह कहलाती है, जिसमें कुछ समय पूर्व देखा गया दृश्य पुनः दृष्टिगोचर न हो और जागने पर उस दृश्य की मनुष्य को स्मृति मात्र शेष रहे। इसके पश्चात् ‘स्वप्न जाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें पूरे विकास को न प्राप्त हुआ स्वप्न जो अनेक क्रिया-कलापों द्वारा देर तक टिके तथा जो जाग्रत् की तरह ही उत्पन्न हो अथवा जागते हुए भी स्वप्न दिखाई दे। इन छ: अवस्थाओं को पारकर जब जीव की जड़ात्मक स्थिति में प्रतिष्ठापना होती है, उस बीते हुए दु:खबोध से युक्त अवस्था को ही ‘सुषुप्ति' कहा गया है। उस स्थिति में यह संसार आन्तरिक अंधकार में विलीन हो जाता है ॥
Verse १७
चिरं संदर्शनाभावादप्रफुल्लं बृहद्वचः । चिरकालानुवृत्तिस्तु स्वप्नो जाग्रदिवोदितः ॥
ciraṃ saṃdarśanābhāvādapraphullaṃ bṛhadvacaḥ । cirakālānuvṛttistu svapno jāgradivoditaḥ ॥
V-177. Those men who know this world as well as what is beyond conform to all things. They neither shun nor seek the ways of the world.
‘स्वप्नावस्था' वह कहलाती है, जिसमें कुछ समय पूर्व देखा गया दृश्य पुनः दृष्टिगोचर न हो और जागने पर उस दृश्य की मनुष्य को स्मृति मात्र शेष रहे। इसके पश्चात् ‘स्वप्न जाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें पूरे विकास को न प्राप्त हुआ स्वप्न जो अनेक क्रिया-कलापों द्वारा देर तक टिके तथा जो जाग्रत् की तरह ही उत्पन्न हो अथवा जागते हुए भी स्वप्न दिखाई दे। इन छ: अवस्थाओं को पारकर जब जीव की जड़ात्मक स्थिति में प्रतिष्ठापना होती है, उस बीते हुए दु:खबोध से युक्त अवस्था को ही ‘सुषुप्ति' कहा गया है। उस स्थिति में यह संसार आन्तरिक अंधकार में विलीन हो जाता है ॥
Verse १८
स्वप्नजाग्रदिति प्रोक्तं जाग्रत्यपि परिस्फुरत् । षडवस्थापरित्यागे जडा जीवस्य या स्थितिः ॥
svapnajāgraditi proktaṃ jāgratyapi parisphurat । ṣaḍavasthāparityāge jaḍā jīvasya yā sthitiḥ ॥
V-178. The sprouting of mental construction consists in Spirits' proneness to objects ('knowables') - the Spirit that is infinite, that is the Truth of the Self, and that is Universal Being.
‘स्वप्नावस्था' वह कहलाती है, जिसमें कुछ समय पूर्व देखा गया दृश्य पुनः दृष्टिगोचर न हो और जागने पर उस दृश्य की मनुष्य को स्मृति मात्र शेष रहे। इसके पश्चात् ‘स्वप्न जाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें पूरे विकास को न प्राप्त हुआ स्वप्न जो अनेक क्रिया-कलापों द्वारा देर तक टिके तथा जो जाग्रत् की तरह ही उत्पन्न हो अथवा जागते हुए भी स्वप्न दिखाई दे। इन छ: अवस्थाओं को पारकर जब जीव की जड़ात्मक स्थिति में प्रतिष्ठापना होती है, उस बीते हुए दु:खबोध से युक्त अवस्था को ही ‘सुषुप्ति' कहा गया है। उस स्थिति में यह संसार आन्तरिक अंधकार में विलीन हो जाता है ॥
Verse १९
भविष्यद्दुःखबोधाढ्य सौषुप्तिः सोच्यते गतिः।जगत्तस्यामवस्थायामन्तस्तमसि लीयते ॥
bhaviṣyadduḥkhabodhāḍhya sauṣuptiḥ socyate gatiḥ।jagattasyāmavasthāyāmantastamasi līyate ॥
V-179. That very sprouting having lightly come into being gradually fills out, developing into the mind; then it promotes inertness like a cloud
‘स्वप्नावस्था' वह कहलाती है, जिसमें कुछ समय पूर्व देखा गया दृश्य पुनः दृष्टिगोचर न हो और जागने पर उस दृश्य की मनुष्य को स्मृति मात्र शेष रहे। इसके पश्चात् ‘स्वप्न जाग्रत्' अवस्था वह है, जिसमें पूरे विकास को न प्राप्त हुआ स्वप्न जो अनेक क्रिया-कलापों द्वारा देर तक टिके तथा जो जाग्रत् की तरह ही उत्पन्न हो अथवा जागते हुए भी स्वप्न दिखाई दे। इन छ: अवस्थाओं को पारकर जब जीव की जड़ात्मक स्थिति में प्रतिष्ठापना होती है, उस बीते हुए दु:खबोध से युक्त अवस्था को ही ‘सुषुप्ति' कहा गया है। उस स्थिति में यह संसार आन्तरिक अंधकार में विलीन हो जाता है ॥
Verse २०
सप्तावस्था इमाः प्रोक्ता मया ज्ञानस्य वै द्विज।एकैका शतसंख्यात्र नानाविभवरूपिणी ॥
saptāvasthā imāḥ proktā mayā jñānasya vai dvija।ekaikā śatasaṃkhyātra nānāvibhavarūpiṇī ॥
V-180. Imagining objects as other than the Self, as it were, the Spirit is transformed into a constructive process, as it were; just as a seed is into a sprout.
हे ब्रह्मन् मैंने तुम्हारे प्रति अज्ञानजनित मोह को सात भूमिकाओं को बतलाया। इसमें से प्रत्येक भूमिका विभिन्न ऐश्वर्ययुक्त, विभिन्न अवस्थाओं के रूप में विविध रूप धारण करने वाली है । हे निष्पाप पुत्र! अब मैं तुम्हें ज्ञान की जो सात भूमिकायें हैं, उन्हें सुनाता हूँ, जिन्हें जान लेने पर मनुष्य मोहपङ्क में नहीं फँसता ।।
Verse २१
इमां सप्तपदां ज्ञानभूमिमाकर्णयानघ ।नानया ज्ञातया भूयो मोहपङ्के निमज्जति ॥
imāṃ saptapadāṃ jñānabhūmimākarṇayānagha ।nānayā jñātayā bhūyo mohapaṅke nimajjati ॥
V-181. (Mental) construction is indeed the process of putting together (of constituents); it comes automatically into being and waxes fast unto pain, never unto delight.
हे ब्रह्मन् मैंने तुम्हारे प्रति अज्ञानजनित मोह को सात भूमिकाओं को बतलाया। इसमें से प्रत्येक भूमिका विभिन्न ऐश्वर्ययुक्त, विभिन्न अवस्थाओं के रूप में विविध रूप धारण करने वाली है । हे निष्पाप पुत्र! अब मैं तुम्हें ज्ञान की जो सात भूमिकायें हैं, उन्हें सुनाता हूँ, जिन्हें जान लेने पर मनुष्य मोहपङ्क में नहीं फँसता ।।
Verse २२
वदन्ति बहुभेदेन वादिनो योगभूमिकाः ।मम त्वभिमता नूनमिमा एवं शुभप्रदाः ॥
vadanti bahubhedena vādino yogabhūmikāḥ ।mama tvabhimatā nūnamimā evaṃ śubhapradāḥ ॥
V-182. Indulge not in mental construction; in a state of stability, dwell not on positive existence. Persevere in stopping mental construction. Thus one never again pursues the trail of construction.
ज्ञानीजनों ने योग भूमिकाओं के बहुविध भेद बतलाये हैं, परन्तु मैं तो इन सात भूमिकाओं को ही विशेष लाभप्रद मानता हूँ। इस प्रकार इन सात भूमिकाओं द्वारा उत्पन्न होने वाला अवबोध ही ‘ज्ञान' कहलाता है। इन सात भूमिकाओं के अन्तर्गत होने वाली मुक्ति 'ज्ञेय' कही जाती है ॥
Verse २३
अवबोधं विदुर्ज्ञानं तदिदं साप्तभूमिकम् । मुक्तिस्तु ज्ञेयमित्युक्ता भूमिकासप्तकात्परम् ॥
avabodhaṃ vidurjñānaṃ tadidaṃ sāptabhūmikam । muktistu jñeyamityuktā bhūmikāsaptakātparam ॥
V-183. By the mere absence of imagination, (the process of) mental construction dwindles automatically. (One act of) construction leads to another. Mind battens on itself, O sage!
ज्ञानीजनों ने योग भूमिकाओं के बहुविध भेद बतलाये हैं, परन्तु मैं तो इन सात भूमिकाओं को ही विशेष लाभप्रद मानता हूँ। इस प्रकार इन सात भूमिकाओं द्वारा उत्पन्न होने वाला अवबोध ही ‘ज्ञान' कहलाता है। इन सात भूमिकाओं के अन्तर्गत होने वाली मुक्ति 'ज्ञेय' कही जाती है ॥
Verse २४
ज्ञानभूमिः शुभेच्छाख्या प्रथमा समुदाहृता। विचारणा द्वितीया तु तृतीया तनुमानसी ॥
jñānabhūmiḥ śubhecchākhyā prathamā samudāhṛtā। vicāraṇā dvitīyā tu tṛtīyā tanumānasī ॥
V-184. Getting (off construction) abide in the Self. Once this is done, what can prove difficult? Just as this sky is empty, so is the entire cosmos
पहली ज्ञान भूमिका को ‘शुभेच्छा' नाम दिया गया है। दूसरी ‘विचारणा', तीसरी ‘तनुमानसी', चौथी ‘सत्यापत्ति', पाँची ‘असंसक्ति', छठवीं ‘पदार्थभावना' तथा सातवीं ‘तुर्यगा' है। इन भूमिकाओं में पुनः शोकाकुल न होने देने वाली मुक्ति निहित है। अब तुम इन भूमिकाओं का विस्तार सुनो ॥
Verse २५
सत्त्वापत्तिश्चतुर्थी स्यात्ततोऽसंसक्तिनामिका। पदार्थभावना षष्ठी सप्तमी तुर्यगा स्मृता ।।
sattvāpattiścaturthī syāttato'saṃsaktināmikā। padārthabhāvanā ṣaṣṭhī saptamī turyagā smṛtā ।।
V-185. Wise Brahmin! Just as a paddy husk or the black coating on copper, through effort, is destroyed so also may the mental impurities of man.
पहली ज्ञान भूमिका को ‘शुभेच्छा' नाम दिया गया है। दूसरी ‘विचारणा', तीसरी ‘तनुमानसी', चौथी ‘सत्यापत्ति', पाँची ‘असंसक्ति', छठवीं ‘पदार्थभावना' तथा सातवीं ‘तुर्यगा' है। इन भूमिकाओं में पुनः शोकाकुल न होने देने वाली मुक्ति निहित है। अब तुम इन भूमिकाओं का विस्तार सुनो ॥
Verse २६
आसामन्तःस्थिता मुक्तिर्यस्यां भूयो न शोचति।एतासां भूमिकानां त्वमिदं निर्वचनं शृणु॥
āsāmantaḥsthitā muktiryasyāṃ bhūyo na śocati।etāsāṃ bhūmikānāṃ tvamidaṃ nirvacanaṃ śṛṇu॥
V-186. As a grain of paddy, the innate impurity of a Jiva, too, can be destroyed in ample measure. There is no doubt in that. Therefore, strive.
पहली ज्ञान भूमिका को ‘शुभेच्छा' नाम दिया गया है। दूसरी ‘विचारणा', तीसरी ‘तनुमानसी', चौथी ‘सत्यापत्ति', पाँची ‘असंसक्ति', छठवीं ‘पदार्थभावना' तथा सातवीं ‘तुर्यगा' है। इन भूमिकाओं में पुनः शोकाकुल न होने देने वाली मुक्ति निहित है। अब तुम इन भूमिकाओं का विस्तार सुनो ॥
Verse २७
स्थितः किं मूढ एवास्मि प्रेक्षेऽहं शास्त्रसज्जनैः।वैराग्यपूर्वमिच्छेति शुभेच्छेत्युच्यते बुधैः ॥
sthitaḥ kiṃ mūḍha evāsmi prekṣe'haṃ śāstrasajjanaiḥ।vairāgyapūrvamiccheti śubhecchetyucyate budhaiḥ ॥
VI-1. Giving up the deeply felt and seductive glamour, consisting in imagination, of empirical life, you remain what you (really) are; O sinless one! Sportively roam the world.
मैं भ्रमितमति क्यों हूँ? शास्त्र तथा श्रेष्ठ जनों से मैं इस सम्बन्ध में चर्चा करूँगा-इस प्रकार से वैराग्य धारण करने से पूर्व जो अभिलाषा जागती है, उसे ज्ञानियों ने ‘शुभेच्छा' नाम दिया है । इसके बाद शास्त्र तथा श्रेष्ठ जनों के सान्निध्य लाभ से अध्ययन आदि के द्वारा अभ्यास एवं वैराग्य भावना से सदाचार की प्रवृत्तियों का प्राकट्य होता है, उसे ही ‘विचारणा' नाम दिया है ॥
Verse २८
शास्त्रसज्जनसंपर्कवैराग्याभ्यासपूर्वकम् । सदाचारप्रवृत्तिर्या प्रोच्यते सा विचारणा॥
śāstrasajjanasaṃparkavairāgyābhyāsapūrvakam । sadācārapravṛttiryā procyate sā vicāraṇā॥
VI-2. By means of the trenchant and creative thought, "I am a non-agent in all contexts", there remains but the (perception of) sameness, called, "supreme immortality".
मैं भ्रमितमति क्यों हूँ? शास्त्र तथा श्रेष्ठ जनों से मैं इस सम्बन्ध में चर्चा करूँगा-इस प्रकार से वैराग्य धारण करने से पूर्व जो अभिलाषा जागती है, उसे ज्ञानियों ने ‘शुभेच्छा' नाम दिया है । इसके बाद शास्त्र तथा श्रेष्ठ जनों के सान्निध्य लाभ से अध्ययन आदि के द्वारा अभ्यास एवं वैराग्य भावना से सदाचार की प्रवृत्तियों का प्राकट्य होता है, उसे ही ‘विचारणा' नाम दिया है ॥
Verse २९
विचारणाशुभेच्छाभ्यामिन्द्रियार्थेषु रक्तता।यत्र सा तनुतामेति प्रोच्यते तनुमानसी ॥
vicāraṇāśubhecchābhyāmindriyārtheṣu raktatā।yatra sā tanutāmeti procyate tanumānasī ॥
VI-3. In regard to all elaborations of pain due solely to one's sense of agency, (finally) there remains but sameness when one's mental constructions dwindle away.
शुभेच्छा और विचारणा द्वारा इन्द्रिय-विषयों के प्रति आसक्ति जय क्षीण हो जाती है, ऐसी अवस्था को ‘तनुमानसी' कहा गया है। इन तीन भूमिकाओं के अभ्यास द्वारा वैराग्य भाव के प्राबल्य से जब चित्त निर्मल सत्त्वरूप में स्थित होता है, इसी अवस्था को ‘सत्वापत्ति' कहते हैं ॥
Verse ३०
भूमिकात्रियाभ्यासाच्चित्ते तु विरतेर्वशात् । सत्त्वात्मनि स्थिते शुद्धे सत्त्वापत्तिरुदाहृता ॥
bhūmikātriyābhyāsāccitte tu viratervaśāt । sattvātmani sthite śuddhe sattvāpattirudāhṛtā ॥
VI-4. This sameness, amidst all emotional moods, is the status grounded in Truth. Anchored in it the mind is no more reborn.
शुभेच्छा और विचारणा द्वारा इन्द्रिय-विषयों के प्रति आसक्ति जय क्षीण हो जाती है, ऐसी अवस्था को ‘तनुमानसी' कहा गया है। इन तीन भूमिकाओं के अभ्यास द्वारा वैराग्य भाव के प्राबल्य से जब चित्त निर्मल सत्त्वरूप में स्थित होता है, इसी अवस्था को ‘सत्वापत्ति' कहते हैं ॥
Verse ३१
दशाचतुष्टयाभ्यासादसंसर्गकला तु या। रूढसत्त्वचमत्कारा प्रोक्ताऽसंसक्तिनामिका॥
daśācatuṣṭayābhyāsādasaṃsargakalā tu yā। rūḍhasattvacamatkārā proktā'saṃsaktināmikā॥
VI-5. O, sage! Renouncing all forms of agency and non-agency and abolishing the mind, you remain what you (really) are; be steadfast.
इन सभी भूमिकाओं का अभ्यास हो जाने पर चमकने वाली संसर्गहीन कला सत्त्वारुढ़ होती है, वही ‘असंसक्ति' कहलाती है। इन पाँचों भूमिकाओं के अभ्यास के फलस्वरूप अपनी चेतना में ही रमते रहने तथा बाह्याभ्यन्तर पदार्थों की भावना के नष्ट होने पर ‘पदार्थ भावना' नामक छठी भूमिका में पदार्पण होता है ।।
Verse ३२
भूमिकापञ्चकाभ्यासात्स्वात्मारामतया दृढम्।आभ्यन्तराणां बाह्यानां पदार्थानामभावनात्॥
bhūmikāpañcakābhyāsātsvātmārāmatayā dṛḍham।ābhyantarāṇāṃ bāhyānāṃ padārthānāmabhāvanāt॥
VI-6-7. Stead-fast in the final stability, give up the very tendency to renunciation. Giving up everything together with its cause - the dichotomy between Spirit and mind, light and darkness, etc.; the latent impressions and what generates them - as well as the vibrations of vital breath, (be you) sky-like with a stilled intellect.
इन सभी भूमिकाओं का अभ्यास हो जाने पर चमकने वाली संसर्गहीन कला सत्त्वारुढ़ होती है, वही ‘असंसक्ति' कहलाती है। इन पाँचों भूमिकाओं के अभ्यास के फलस्वरूप अपनी चेतना में ही रमते रहने तथा बाह्याभ्यन्तर पदार्थों की भावना के नष्ट होने पर ‘पदार्थ भावना' नामक छठी भूमिका में पदार्पण होता है ।।
Verse ३३
परप्रयुक्तेन चिरं प्रयत्नेनावबोधनम् । पदार्थभावना नाम षष्ठी भवति भूमिका ॥
paraprayuktena ciraṃ prayatnenāvabodhanam । padārthabhāvanā nāma ṣaṣṭhī bhavati bhūmikā ॥
VI-8. Having totally wiped out from the heart the massed rows of latent impression, one who remains free from all anxiety is the liberated, is the supreme Deity.
इन सभी भूमिकाओं का अभ्यास हो जाने पर चमकने वाली संसर्गहीन कला सत्त्वारुढ़ होती है, वही ‘असंसक्ति' कहलाती है। इन पाँचों भूमिकाओं के अभ्यास के फलस्वरूप अपनी चेतना में ही रमते रहने तथा बाह्याभ्यन्तर पदार्थों की भावना के नष्ट होने पर ‘पदार्थ भावना' नामक छठी भूमिका में पदार्पण होता है ।।
Verse ३४
भूमिषट्कचिराभ्यासाद्भेदस्यानुपलम्भनात् । यत्स्वभावैकनिष्ठत्वं सा ज्ञेया तुर्यगा गतिः ॥
bhūmiṣaṭkacirābhyāsādbhedasyānupalambhanāt । yatsvabhāvaikaniṣṭhatvaṃ sā jñeyā turyagā gatiḥ ॥
VI-9. I have seen all that is worth seeing; through delusion have I wandered in all the ten directions of space. For the ignorant who roams, through reasoning, (the regions of) empirical existence, the latter shrinks into the dimensions of a cow's hoof.
इन छ: भूमियों के परिपक्व हो जाने पर भेद-बुद्धि का क्षय हो जाता है और आरम-भाव में ही साधक की दृढ़निष्ठा हो जाती है, यही ‘तुर्यगा' अवस्था कही गयी है। इस तुर्यावस्था को जीवन्मुक्त पुरुष ही उपलब्ध कर पाते हैं। इसके बाद तुर्यातीत अवस्था हैं, जो विदेह मुक्ति का विषय है ।।
Verse ३५
एषा हि जीवन्मुक्तेषु तुर्यावस्थेति विद्यते । विदेहमुक्तिविषयं तुर्यातीतमतः परम् ॥
eṣā hi jīvanmukteṣu turyāvastheti vidyate । videhamuktiviṣayaṃ turyātītamataḥ param ॥
VI-10. In the body with its ins and outs, up and down, in the regions between, here and there, there is the Self; there is no world that is not the Self through and through.
इन छ: भूमियों के परिपक्व हो जाने पर भेद-बुद्धि का क्षय हो जाता है और आरम-भाव में ही साधक की दृढ़निष्ठा हो जाती है, यही ‘तुर्यगा' अवस्था कही गयी है। इस तुर्यावस्था को जीवन्मुक्त पुरुष ही उपलब्ध कर पाते हैं। इसके बाद तुर्यातीत अवस्था हैं, जो विदेह मुक्ति का विषय है ।।
Verse ३६
ये निदाघ महाभागाः सप्तमीं भूमिमाश्रिताः । आत्मारामा महात्मानस्ते महत्पदमागताः ।।
ye nidāgha mahābhāgāḥ saptamīṃ bhūmimāśritāḥ । ātmārāmā mahātmānaste mahatpadamāgatāḥ ।।
I-11. There is nothing in which I am not; there is nothing which is not That, through and through. What more do I want? All things are essentially Being and Spirit, pervaded by That.
हे निष्पाप ! जो अति भाग्यवान् पुरुष सप्तमी तुर्यगावस्था को प्राप्त कर लेते हैं, वे आत्मा में रमणशील महात्मा महत्पद (परमपद) को ग्रहण कर चुके हैं। ऐसी जीवन्मुक्त आत्मायें सुख-दुःख के अनुभवों से सर्वथा निर्लिप्त रहती हैं। वे कर्तव्य कर्मो में संलग्न रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होतीं ॥
Verse ३७
जीवन्मुक्ता न मज्जन्ति सुखदुःखरसस्थिते । प्रकृतेनाथ कार्येण किंचित्कुर्वन्ति वा न वा ।।
jīvanmuktā na majjanti sukhaduḥkharasasthite । prakṛtenātha kāryeṇa kiṃcitkurvanti vā na vā ।।
VI-12. All this is indeed Brahman; all this extended reality is the Self. I am one and this is another - give up this delusion, O sinless one!
हे निष्पाप ! जो अति भाग्यवान् पुरुष सप्तमी तुर्यगावस्था को प्राप्त कर लेते हैं, वे आत्मा में रमणशील महात्मा महत्पद (परमपद) को ग्रहण कर चुके हैं। ऐसी जीवन्मुक्त आत्मायें सुख-दुःख के अनुभवों से सर्वथा निर्लिप्त रहती हैं। वे कर्तव्य कर्मो में संलग्न रहकर भी उनसे लिप्त नहीं होतीं ॥
Verse ३८
पार्श्वस्थबोधिताः सन्तः पूर्वाचारक्रमागतम्। आचारमाचरन्त्येव सुप्तबुद्धवदुत्थिताः ॥
pārśvasthabodhitāḥ santaḥ pūrvācārakramāgatam। ācāramācarantyeva suptabuddhavadutthitāḥ ॥
VI-13. The superimposed (objects) cannot possibly be in the eternal, extended and undivided Brahman. There is neither sorrow, delusion, old age nor birth.
अपने निकटस्थ परिजनों के सचेत किये जाने पर जैसे मनुष्य सोते से जाग पड़ता है, वैसे ही वे ज्ञानीजन सरकर्मो में संलग्न रहकर सनातन आचरण की परम्परा निभाते हैं। इन सात भूमिकाओं को यदि पशु और म्लेच्छ आदि भी जान लें, तो वे भी देह रहते या देहत्याग के पश्चात् मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं, इसमें सन्देह की गुंजायश नहीं । हृदय-ग्रन्थियों का खुल जाना ही ज्ञान है और ज्ञान प्राप्ति हो जाने पर मुक्ति सुनिश्चित है ॥
Verse ३९
भूमिकासप्तकं चैतद्धीमतामेव गोचरम्।प्राप्य ज्ञानदशामेतां पशुम्लेच्छादयोऽपि ये॥
bhūmikāsaptakaṃ caitaddhīmatāmeva gocaram।prāpya jñānadaśāmetāṃ paśumlecchādayo'pi ye॥
VI-14. What (in reality) is here only That exists. Always be calm, experiencing things as they occur and entertaining no desire whatsoever.
अपने निकटस्थ परिजनों के सचेत किये जाने पर जैसे मनुष्य सोते से जाग पड़ता है, वैसे ही वे ज्ञानीजन सरकर्मो में संलग्न रहकर सनातन आचरण की परम्परा निभाते हैं। इन सात भूमिकाओं को यदि पशु और म्लेच्छ आदि भी जान लें, तो वे भी देह रहते या देहत्याग के पश्चात् मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं, इसमें सन्देह की गुंजायश नहीं । हृदय-ग्रन्थियों का खुल जाना ही ज्ञान है और ज्ञान प्राप्ति हो जाने पर मुक्ति सुनिश्चित है ॥
Verse ४०
सदेहा वाप्यदेहा वा ते मुक्ता नात्र संशयः।ज्ञप्तिर्हि ग्रन्थिविच्छेदस्तस्मिन्सति विमुक्तता।।
sadehā vāpyadehā vā te muktā nātra saṃśayaḥ।jñaptirhi granthivicchedastasminsati vimuktatā।।
VI-15(a). Neither shunning nor grasping, be always calm.
अपने निकटस्थ परिजनों के सचेत किये जाने पर जैसे मनुष्य सोते से जाग पड़ता है, वैसे ही वे ज्ञानीजन सरकर्मो में संलग्न रहकर सनातन आचरण की परम्परा निभाते हैं। इन सात भूमिकाओं को यदि पशु और म्लेच्छ आदि भी जान लें, तो वे भी देह रहते या देहत्याग के पश्चात् मुक्ति के अधिकारी हो जाते हैं, इसमें सन्देह की गुंजायश नहीं । हृदय-ग्रन्थियों का खुल जाना ही ज्ञान है और ज्ञान प्राप्ति हो जाने पर मुक्ति सुनिश्चित है ॥
पञ्चमोऽध्यायः (part 2)
Verse ४१
मृगतृष्णाम्बुबुद्धयादिशान्तिमात्रात्मकस्त्वसौ। ये तु मोहार्णवात्तीर्णास्तैः प्राप्तं परमं पदम् ॥
mṛgatṛṣṇāmbubuddhayādiśāntimātrātmakastvasau। ye tu mohārṇavāttīrṇāstaiḥ prāptaṃ paramaṃ padam ॥
VI-15(b)-16. Magnanimous one! Flawless cognitions swiftly fly to him who finds himself in his last birth, just as pure pearls lodge themselves in the best bamboo. This example has been offered to suit best those who develop dispassion.
जैसे मृग-तृष्णा में जल की भ्रान्ति होती है, इसे ही अविद्या कहा गया है, अविद्या का नाश ही मुक्ति है। परमपद के अधिकारी वही हैं, जो मोहरूपी सागर से पार हो चुके हैं। आत्मसाक्षात्कार के प्रयत्नों में संलग्न पुरुष ही इन भूमिकाओं में प्रतिष्ठित होते हैं। मन की पूर्णतया शान्ति के साधन को योग कहा गया है ॥
Verse ४२
ते स्थिती भूमिकास्वासु स्वात्मलाभपरायणाः । मनः प्रशमनोपायो योग इत्यभिधीयते ॥
te sthitī bhūmikāsvāsu svātmalābhaparāyaṇāḥ । manaḥ praśamanopāyo yoga ityabhidhīyate ॥
VI-17. The certitude of the joy of cognition (results from) intimate contact of the perceiver and the object. We duly meditate on that stable Self, manifest in the truth of one's self (the source of the joy of cognition
जैसे मृग-तृष्णा में जल की भ्रान्ति होती है, इसे ही अविद्या कहा गया है, अविद्या का नाश ही मुक्ति है। परमपद के अधिकारी वही हैं, जो मोहरूपी सागर से पार हो चुके हैं। आत्मसाक्षात्कार के प्रयत्नों में संलग्न पुरुष ही इन भूमिकाओं में प्रतिष्ठित होते हैं। मन की पूर्णतया शान्ति के साधन को योग कहा गया है ॥
Verse ४३
सप्तभूमिः स विज्ञेयः कथितास्ताश्च भूमिकाः । एतासां भूमिकानां तु गम्यं ब्रह्माभिधं पदम् ॥
saptabhūmiḥ sa vijñeyaḥ kathitāstāśca bhūmikāḥ । etāsāṃ bhūmikānāṃ tu gamyaṃ brahmābhidhaṃ padam ॥
VI-18. Giving up the seer's perception and the object together with latent impressions, we duly meditate on the Self that manifests Itself first as perception.
योग की इन सात भूमिकाओं को ज्ञानभूमि के अन्तर्गत ऊपर बतलाया जा चुका है। इन भूमिकाओं का लक्ष्य है—ब्रह्मपद की प्राप्ति । जहाँ तेरा-मेरा और अपने-परायेपन का संकीर्ण भाव मिट जाता है, उस समय न तो भावात्मक बुद्धि अवशेष रहती है और न ही भाव-अभाव का चिन्तन हो पाता है; क्योंकि जागतिक वस्तुओं की सत्ता आत्मसंवेदन मात्र है, इससे अतिरिक्त कुछ नहीं। सर्वथा शान्त, आलम्बन रहित, आकाशस्वरूप, शाश्वत, शिव, दोषरहित, भासमान रहित, अनिर्वचनीय, कारणरहित, न सत्, न असत्, न मध्य, सम्पूर्णतारहित और सम्पूर्ण भी, मन-वाणी से अग्राह्य, पूर्ण से पूर्ण, सुख से सुखतरस्यरूप, संवेदन की पहुँच से परे, पूर्ण शान्त, आत्मानुभूतिरूप तथा व्यापकता यह ब्रह्म का स्वरूप हैं। सभी पदार्थों की सत्ता के अतिरिक्त यह चैतन्य भिन्न नहीं है और इसकी प्राप्ति का आधार एक मात्र सम्यक् अनुभूति है ॥
Verse ४४
त्वत्ताऽहन्तात्मता यत्र परता नास्ति काचन।न क्वचिद्भावकलना न भावाभावगोचरा॥
tvattā'hantātmatā yatra paratā nāsti kācana।na kvacidbhāvakalanā na bhāvābhāvagocarā॥
VI-19. We duly meditate on the eternal Self, the illumination of all lights, that occupies the middle ground between the "is" and the "is not".
योग की इन सात भूमिकाओं को ज्ञानभूमि के अन्तर्गत ऊपर बतलाया जा चुका है। इन भूमिकाओं का लक्ष्य है—ब्रह्मपद की प्राप्ति । जहाँ तेरा-मेरा और अपने-परायेपन का संकीर्ण भाव मिट जाता है, उस समय न तो भावात्मक बुद्धि अवशेष रहती है और न ही भाव-अभाव का चिन्तन हो पाता है; क्योंकि जागतिक वस्तुओं की सत्ता आत्मसंवेदन मात्र है, इससे अतिरिक्त कुछ नहीं। सर्वथा शान्त, आलम्बन रहित, आकाशस्वरूप, शाश्वत, शिव, दोषरहित, भासमान रहित, अनिर्वचनीय, कारणरहित, न सत्, न असत्, न मध्य, सम्पूर्णतारहित और सम्पूर्ण भी, मन-वाणी से अग्राह्य, पूर्ण से पूर्ण, सुख से सुखतरस्यरूप, संवेदन की पहुँच से परे, पूर्ण शान्त, आत्मानुभूतिरूप तथा व्यापकता यह ब्रह्म का स्वरूप हैं। सभी पदार्थों की सत्ता के अतिरिक्त यह चैतन्य भिन्न नहीं है और इसकी प्राप्ति का आधार एक मात्र सम्यक् अनुभूति है ॥
Verse ४५
सर्वं शान्तं निरालम्बं व्योमस्थं शाश्वतं शिवम्। अनामयमनाभासमनामकमकारणम् ॥
sarvaṃ śāntaṃ nirālambaṃ vyomasthaṃ śāśvataṃ śivam। anāmayamanābhāsamanāmakamakāraṇam ॥
VI-20. Discarding the Lord who reigns in the heart, those who run after (some other) God are in fact seeking a gem after casting away the Kaustubha already in their possession.
योग की इन सात भूमिकाओं को ज्ञानभूमि के अन्तर्गत ऊपर बतलाया जा चुका है। इन भूमिकाओं का लक्ष्य है—ब्रह्मपद की प्राप्ति । जहाँ तेरा-मेरा और अपने-परायेपन का संकीर्ण भाव मिट जाता है, उस समय न तो भावात्मक बुद्धि अवशेष रहती है और न ही भाव-अभाव का चिन्तन हो पाता है; क्योंकि जागतिक वस्तुओं की सत्ता आत्मसंवेदन मात्र है, इससे अतिरिक्त कुछ नहीं। सर्वथा शान्त, आलम्बन रहित, आकाशस्वरूप, शाश्वत, शिव, दोषरहित, भासमान रहित, अनिर्वचनीय, कारणरहित, न सत्, न असत्, न मध्य, सम्पूर्णतारहित और सम्पूर्ण भी, मन-वाणी से अग्राह्य, पूर्ण से पूर्ण, सुख से सुखतरस्यरूप, संवेदन की पहुँच से परे, पूर्ण शान्त, आत्मानुभूतिरूप तथा व्यापकता यह ब्रह्म का स्वरूप हैं। सभी पदार्थों की सत्ता के अतिरिक्त यह चैतन्य भिन्न नहीं है और इसकी प्राप्ति का आधार एक मात्र सम्यक् अनुभूति है ॥
Verse ४६
न सन्नासन्न मध्यं तं न सर्वं सर्वमेव च। मनोवचोभिरग्राह्यं पूर्णात्पूर्णं सुखात्सुखम् ॥
na sannāsanna madhyaṃ taṃ na sarvaṃ sarvameva ca। manovacobhiragrāhyaṃ pūrṇātpūrṇaṃ sukhātsukham ॥
VI-21. As Indra smites mountain peaks with his thunder-bolt, so should one strike, with the rod of discrimination, these adversaries in the form of sense-organs, both active and passive.
योग की इन सात भूमिकाओं को ज्ञानभूमि के अन्तर्गत ऊपर बतलाया जा चुका है। इन भूमिकाओं का लक्ष्य है—ब्रह्मपद की प्राप्ति । जहाँ तेरा-मेरा और अपने-परायेपन का संकीर्ण भाव मिट जाता है, उस समय न तो भावात्मक बुद्धि अवशेष रहती है और न ही भाव-अभाव का चिन्तन हो पाता है; क्योंकि जागतिक वस्तुओं की सत्ता आत्मसंवेदन मात्र है, इससे अतिरिक्त कुछ नहीं। सर्वथा शान्त, आलम्बन रहित, आकाशस्वरूप, शाश्वत, शिव, दोषरहित, भासमान रहित, अनिर्वचनीय, कारणरहित, न सत्, न असत्, न मध्य, सम्पूर्णतारहित और सम्पूर्ण भी, मन-वाणी से अग्राह्य, पूर्ण से पूर्ण, सुख से सुखतरस्यरूप, संवेदन की पहुँच से परे, पूर्ण शान्त, आत्मानुभूतिरूप तथा व्यापकता यह ब्रह्म का स्वरूप हैं। सभी पदार्थों की सत्ता के अतिरिक्त यह चैतन्य भिन्न नहीं है और इसकी प्राप्ति का आधार एक मात्र सम्यक् अनुभूति है ॥
Verse ४७
असंवेदनमाशान्तमात्मवेदनमाततम् ।सत्ता सर्वपदार्थानां नान्या संवेदनादृते ।।
asaṃvedanamāśāntamātmavedanamātatam ।sattā sarvapadārthānāṃ nānyā saṃvedanādṛte ।।
VI-22. In the evil dream (seen) in the night of empirical life - in this empty illusion of the body - everything experienced (as the extended) delusion of empirical) life is impure.
योग की इन सात भूमिकाओं को ज्ञानभूमि के अन्तर्गत ऊपर बतलाया जा चुका है। इन भूमिकाओं का लक्ष्य है—ब्रह्मपद की प्राप्ति । जहाँ तेरा-मेरा और अपने-परायेपन का संकीर्ण भाव मिट जाता है, उस समय न तो भावात्मक बुद्धि अवशेष रहती है और न ही भाव-अभाव का चिन्तन हो पाता है; क्योंकि जागतिक वस्तुओं की सत्ता आत्मसंवेदन मात्र है, इससे अतिरिक्त कुछ नहीं। सर्वथा शान्त, आलम्बन रहित, आकाशस्वरूप, शाश्वत, शिव, दोषरहित, भासमान रहित, अनिर्वचनीय, कारणरहित, न सत्, न असत्, न मध्य, सम्पूर्णतारहित और सम्पूर्ण भी, मन-वाणी से अग्राह्य, पूर्ण से पूर्ण, सुख से सुखतरस्यरूप, संवेदन की पहुँच से परे, पूर्ण शान्त, आत्मानुभूतिरूप तथा व्यापकता यह ब्रह्म का स्वरूप हैं। सभी पदार्थों की सत्ता के अतिरिक्त यह चैतन्य भिन्न नहीं है और इसकी प्राप्ति का आधार एक मात्र सम्यक् अनुभूति है ॥
Verse ४८
संबन्थे द्रष्टुदश्यानां मध्ये दृष्टिहिं यद्वपुः । द्रष्टृदर्शनदृश्यादिवर्जितं तदिदं पदम् ॥
saṃbanthe draṣṭudaśyānāṃ madhye dṛṣṭihiṃ yadvapuḥ । draṣṭṛdarśanadṛśyādivarjitaṃ tadidaṃ padam ॥
VI-23. In childhood one is stupefied by ignorance; in youth one in vanquished by woman. In the period that remains one is worried by one's wife. What can one - the meanest of men - accomplish?
द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध हो जाने पर मध्य में दृष्टि का जो स्वरूप परिलक्षित होता है, वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन से भिन्न साक्षात्काररूप स्थिति ही है। चित्त के एक देश से दूसरे में प्रवेश करने के मध्य जो अवस्था होती है, उस जड़तारहित चेतनरूप चिन्तन में निरन्तर तन्मय रहना चाहिए। जाग्रत् -स्वप्न और सुषुप्ति से परे जड़-चेतन विहीन जो सनातनरूप है, उसी में हमेशा स्थित रहो । जड़ता ही हृदयं की पाषाणवत् स्थिति है, उसका परित्याग करने पर जो अमनस्क अवस्था है, उसी में सदैव लीन रहो । चित्त को दूर से ही त्यागकर जिस अवस्था में हो, उसी में स्थिर रहो। परमात्म तत्व से सर्वप्रथम मन की उत्पत्ति हुई, पश्चात् उसी मन से विकल्पजलरूप यह संसार उत्पन्न हुआ। हे विप्न! शून्य से भी शून्य की उत्पत्ति होती है, जैसे- आकाश शून्य है, परन्तु इसी से मनोहर दिखलाई पड़ने वाली नीलिमा प्रकट होती है ॥
Verse ४९
देशाद्देशं गते चित्ते मध्ये यच्चेतसो वपुः । अजाड्यसंविन्मननं तन्मयो भव सर्वदा॥
deśāddeśaṃ gate citte madhye yaccetaso vapuḥ । ajāḍyasaṃvinmananaṃ tanmayo bhava sarvadā॥
VI-24. (But wail as follows): Unreality rides on the top of existence; ugliness on the top of things lovely; pains ride on the top of pleasures. What single entity may I resort to
द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध हो जाने पर मध्य में दृष्टि का जो स्वरूप परिलक्षित होता है, वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन से भिन्न साक्षात्काररूप स्थिति ही है। चित्त के एक देश से दूसरे में प्रवेश करने के मध्य जो अवस्था होती है, उस जड़तारहित चेतनरूप चिन्तन में निरन्तर तन्मय रहना चाहिए। जाग्रत् -स्वप्न और सुषुप्ति से परे जड़-चेतन विहीन जो सनातनरूप है, उसी में हमेशा स्थित रहो । जड़ता ही हृदयं की पाषाणवत् स्थिति है, उसका परित्याग करने पर जो अमनस्क अवस्था है, उसी में सदैव लीन रहो । चित्त को दूर से ही त्यागकर जिस अवस्था में हो, उसी में स्थिर रहो। परमात्म तत्व से सर्वप्रथम मन की उत्पत्ति हुई, पश्चात् उसी मन से विकल्पजलरूप यह संसार उत्पन्न हुआ। हे विप्न! शून्य से भी शून्य की उत्पत्ति होती है, जैसे- आकाश शून्य है, परन्तु इसी से मनोहर दिखलाई पड़ने वाली नीलिमा प्रकट होती है ॥
Verse ५०
अजाग्रत्स्वप्ननिद्रस्य यत्ते रूपं सनातनम्। अचेतनं चाजडं च तन्मयो भव सर्वदा ॥
ajāgratsvapnanidrasya yatte rūpaṃ sanātanam। acetanaṃ cājaḍaṃ ca tanmayo bhava sarvadā ॥
VI-25. Even those men pass away on the closing and opening of whose eyes depends world's disaster or prosperity. Of what account are folk like my (humble) self?
द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध हो जाने पर मध्य में दृष्टि का जो स्वरूप परिलक्षित होता है, वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन से भिन्न साक्षात्काररूप स्थिति ही है। चित्त के एक देश से दूसरे में प्रवेश करने के मध्य जो अवस्था होती है, उस जड़तारहित चेतनरूप चिन्तन में निरन्तर तन्मय रहना चाहिए। जाग्रत् -स्वप्न और सुषुप्ति से परे जड़-चेतन विहीन जो सनातनरूप है, उसी में हमेशा स्थित रहो । जड़ता ही हृदयं की पाषाणवत् स्थिति है, उसका परित्याग करने पर जो अमनस्क अवस्था है, उसी में सदैव लीन रहो । चित्त को दूर से ही त्यागकर जिस अवस्था में हो, उसी में स्थिर रहो। परमात्म तत्व से सर्वप्रथम मन की उत्पत्ति हुई, पश्चात् उसी मन से विकल्पजलरूप यह संसार उत्पन्न हुआ। हे विप्न! शून्य से भी शून्य की उत्पत्ति होती है, जैसे- आकाश शून्य है, परन्तु इसी से मनोहर दिखलाई पड़ने वाली नीलिमा प्रकट होती है ॥
Verse ५१
जडतां वर्जयित्वैकां शिलाया हृदयं हि तत् । अमनस्कस्वरूपं यत्तन्मयो भव सर्वदा ।चित्तं दूरे परित्यज्य योऽसि सोऽसि स्थिरो भव ॥
jaḍatāṃ varjayitvaikāṃ śilāyā hṛdayaṃ hi tat । amanaskasvarūpaṃ yattanmayo bhava sarvadā ।cittaṃ dūre parityajya yo'si so'si sthiro bhava ॥
VI-26. Empirical life is said to be the very limit of sufferings. When (one's) body has slipped into its depths, how can pleasure be won?
द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध हो जाने पर मध्य में दृष्टि का जो स्वरूप परिलक्षित होता है, वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन से भिन्न साक्षात्काररूप स्थिति ही है। चित्त के एक देश से दूसरे में प्रवेश करने के मध्य जो अवस्था होती है, उस जड़तारहित चेतनरूप चिन्तन में निरन्तर तन्मय रहना चाहिए। जाग्रत् -स्वप्न और सुषुप्ति से परे जड़-चेतन विहीन जो सनातनरूप है, उसी में हमेशा स्थित रहो । जड़ता ही हृदयं की पाषाणवत् स्थिति है, उसका परित्याग करने पर जो अमनस्क अवस्था है, उसी में सदैव लीन रहो । चित्त को दूर से ही त्यागकर जिस अवस्था में हो, उसी में स्थिर रहो। परमात्म तत्व से सर्वप्रथम मन की उत्पत्ति हुई, पश्चात् उसी मन से विकल्पजलरूप यह संसार उत्पन्न हुआ। हे विप्न! शून्य से भी शून्य की उत्पत्ति होती है, जैसे- आकाश शून्य है, परन्तु इसी से मनोहर दिखलाई पड़ने वाली नीलिमा प्रकट होती है ॥
Verse ५२
पूर्वं मनः समुदितं परमात्मतत्त्वात्तेनाततं जगदिदं सविकल्पजालम्।शून्येन शून्यमपि विप्र यथाम्बरेण नीलत्वमुल्लसति चारुतराभिधानम्॥
pūrvaṃ manaḥ samuditaṃ paramātmatattvāttenātataṃ jagadidaṃ savikalpajālam।śūnyena śūnyamapi vipra yathāmbareṇa nīlatvamullasati cārutarābhidhānam॥
VI-27. I am awake! I am awake!! Here is the wicked thief (who has been pestering me, viz.,) the mind. I shall destroy him; I have long been under his assault.
द्रष्टा और दृश्य का सम्बन्ध हो जाने पर मध्य में दृष्टि का जो स्वरूप परिलक्षित होता है, वह द्रष्टा, दृश्य और दर्शन से भिन्न साक्षात्काररूप स्थिति ही है। चित्त के एक देश से दूसरे में प्रवेश करने के मध्य जो अवस्था होती है, उस जड़तारहित चेतनरूप चिन्तन में निरन्तर तन्मय रहना चाहिए। जाग्रत् -स्वप्न और सुषुप्ति से परे जड़-चेतन विहीन जो सनातनरूप है, उसी में हमेशा स्थित रहो । जड़ता ही हृदयं की पाषाणवत् स्थिति है, उसका परित्याग करने पर जो अमनस्क अवस्था है, उसी में सदैव लीन रहो । चित्त को दूर से ही त्यागकर जिस अवस्था में हो, उसी में स्थिर रहो। परमात्म तत्व से सर्वप्रथम मन की उत्पत्ति हुई, पश्चात् उसी मन से विकल्पजलरूप यह संसार उत्पन्न हुआ। हे विप्न! शून्य से भी शून्य की उत्पत्ति होती है, जैसे- आकाश शून्य है, परन्तु इसी से मनोहर दिखलाई पड़ने वाली नीलिमा प्रकट होती है ॥
Verse ५३
संकल्पसंक्षयवशाद्गलिते तु चित्ते संसारमोहमिहिका गलिता भवन्ति। स्वच्छं विभाति शरदीव खमागतायां चिन्मात्रमेकमजमाद्यमनन्तमन्तः ॥
saṃkalpasaṃkṣayavaśādgalite tu citte saṃsāramohamihikā galitā bhavanti। svacchaṃ vibhāti śaradīva khamāgatāyāṃ cinmātramekamajamādyamanantamantaḥ ॥
VI-28. Don't be depressed. Seek not to seize what is fit only to be eschewed. Giving up (ideas of both) rejection and seizure, remain rooted in what is neither to be rejected nor seized; be wholly firm.
संकल्प के विनष्ट हो जाने पर चित्तवृत्तियाँ गल जाती हैं और इसी के साथ संसार का मोहरूपी कुहरा भी छँट जाता है। ऐसे में शरद्ऋतु के आगमन पर स्वच्छ आसमान की तरह वह अजन्मा, आद्य, अनन्त, एक, चिन्मात्ररूप ब्रह्म ही अन्तिम रूप से सुशोभित होता है ।।
Verse ५४
अकर्तृकमरङ्गं च गगने चित्रमुत्थितम् । अद्रष्टृकं स्वानुभवमनिद्रस्वप्नदर्शनम् ॥
akartṛkamaraṅgaṃ ca gagane citramutthitam । adraṣṭṛkaṃ svānubhavamanidrasvapnadarśanam ॥
VI-29-30. The Knower rid of things to be rejected or seized has, without latent impressions, qualities (such as): freedom from desire and fear, conation and action; eternity, equality, wisdom, gentleness, certitude, steadfastness, amiability, contentment, charity and soft-spokenness.
बिना कर्ता और रङ्ग के आकाश चित्रित सा प्रतीत होता है। बिना द्रष्टा के स्वयं अनुभूत निद्राहीन स्वप्न दिखलाई देता है। यह चिदात्मा साक्षिरूप, सम (सबके प्रति समान रहने वाला), स्वच्छ, निर्विकल्प तथा दर्पणवत् है, उसमें बिना किसी आकांक्षा के तीनों लोक प्रतिबिम्बित हो रहे हैं ॥
Verse ५५
साक्षिभूते समे स्वच्छे निर्विकल्पे चिदात्मनि।निरिच्छे प्रतिबिम्बन्ति जगन्ति मुकरे यथा ॥
sākṣibhūte same svacche nirvikalpe cidātmani।niricche pratibimbanti jaganti mukare yathā ॥
VI-29-30. The Knower rid of things to be rejected or seized has, without latent impressions, qualities (such as): freedom from desire and fear, conation and action; eternity, equality, wisdom, gentleness, certitude, steadfastness, amiability, contentment, charity and soft-spokenness.
बिना कर्ता और रङ्ग के आकाश चित्रित सा प्रतीत होता है। बिना द्रष्टा के स्वयं अनुभूत निद्राहीन स्वप्न दिखलाई देता है। यह चिदात्मा साक्षिरूप, सम (सबके प्रति समान रहने वाला), स्वच्छ, निर्विकल्प तथा दर्पणवत् है, उसमें बिना किसी आकांक्षा के तीनों लोक प्रतिबिम्बित हो रहे हैं ॥
Verse ५६
एकं ब्रह्म चिदाकाशं सर्वात्मकमखण्डितम्।इति भावय यत्नेन चेतश्चाञ्चल्यशान्तये ॥
ekaṃ brahma cidākāśaṃ sarvātmakamakhaṇḍitam।iti bhāvaya yatnena cetaścāñcalyaśāntaye ॥
VI-31-32. With the sharp needle of (penetrating) intelligence, tear up the nest cast by the fisher-woman of Craving in the waters of transmigratory life - a net made of the cords of (variegated) thoughts, even as a strong wind scatters (the vast) net of clouds. Then abide in the vast status (as immutable Brahman).
सर्वस्वरूप, चिदाकाशरूप और अखण्डित ब्रह्म एक है, चित्त को चपलता शान्त करने के लिए प्रयत्नपूर्वक ऐसी भावना करनी चाहिए। तीनों लोकों से युक्त ब्रह्म के दर्शन उसी प्रकार करने चाहिए, जैसे एक मोटी पत्थरशिला पर रेखायें-उपरेखाएँ खिंची होती हैं॥
Verse ५७
रेखोपरेखावलिता यथैका पीवरी शिला।तथा त्रैलोक्यवलितं ब्रहमौकमिह दृश्यताम्॥
rekhoparekhāvalitā yathaikā pīvarī śilā।tathā trailokyavalitaṃ brahamaukamiha dṛśyatām॥
VI-31-32. With the sharp needle of (penetrating) intelligence, tear up the nest cast by the fisher-woman of Craving in the waters of transmigratory life - a net made of the cords of (variegated) thoughts, even as a strong wind scatters (the vast) net of clouds. Then abide in the vast status (as immutable Brahman).
सर्वस्वरूप, चिदाकाशरूप और अखण्डित ब्रह्म एक है, चित्त को चपलता शान्त करने के लिए प्रयत्नपूर्वक ऐसी भावना करनी चाहिए। तीनों लोकों से युक्त ब्रह्म के दर्शन उसी प्रकार करने चाहिए, जैसे एक मोटी पत्थरशिला पर रेखायें-उपरेखाएँ खिंची होती हैं॥
Verse ५८
द्वितीयकारणाभावादनुत्पन्नमिदं जगत्।ज्ञातं ज्ञातव्यमधुना दृष्टं द्रष्टव्यमद्भुतम् ॥
dvitīyakāraṇābhāvādanutpannamidaṃ jagat।jñātaṃ jñātavyamadhunā dṛṣṭaṃ draṣṭavyamadbhutam ॥
VI-33. Cleaving the mind with the mind itself as one does a tree with an axe, and attaining the holy status, at once, be steadfast.
ब्रह्म से भिन्न किसी अन्य कारण के न होने पर इस जगत को उत्पत्ति नहीं हुई (खरगोश के सींग की तरह यह त्रिकालबाधित है)। इस प्रकार मैंने (ऋभु का आत्मकथन) जो ज्ञातव्य था, उसे जान लिया, जो विलक्षणता देखनी थी, उसे देख लिया और चिरकाल से थका मैं अब विश्रान्ति को प्राप्त हो चुका हूँ। (हे। निदाघ!) इस सम्पूर्ण जागतिक माया से विमुक्त होकर तथा संशयविहीन होकर तुम चिन्मात्र के दर्शन करो। चिन्मात्र के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, ऐसा समझो ॥
Verse ५९
विश्रान्तोऽस्मि चिरं श्रान्तश्चिन्मात्रान्नास्ति किंचन।पश्य विश्रान्तसंदेहं विगताशेषकौतुकम्॥
viśrānto'smi ciraṃ śrāntaścinmātrānnāsti kiṃcana।paśya viśrāntasaṃdehaṃ vigatāśeṣakautukam॥
VI-34. Standing or moving, sleeping or walking, dwelling in a place, flying aloft or falling down, inwardly sure that (all) this is but unreal, eschew (all) clinging.
ब्रह्म से भिन्न किसी अन्य कारण के न होने पर इस जगत को उत्पत्ति नहीं हुई (खरगोश के सींग की तरह यह त्रिकालबाधित है)। इस प्रकार मैंने (ऋभु का आत्मकथन) जो ज्ञातव्य था, उसे जान लिया, जो विलक्षणता देखनी थी, उसे देख लिया और चिरकाल से थका मैं अब विश्रान्ति को प्राप्त हो चुका हूँ। (हे। निदाघ!) इस सम्पूर्ण जागतिक माया से विमुक्त होकर तथा संशयविहीन होकर तुम चिन्मात्र के दर्शन करो। चिन्मात्र के अतिरिक्त कुछ है ही नहीं, ऐसा समझो ॥
Verse ६०
निरस्तकल्पनाजालमचित्तत्वं परं पदम्।त एव भूमतां प्राप्ताः संशान्ताशेषकिल्बिषाः ।।
nirastakalpanājālamacittatvaṃ paraṃ padam।ta eva bhūmatāṃ prāptāḥ saṃśāntāśeṣakilbiṣāḥ ।।
VI-35. If you depend on this objective (world), you have a mind and are in bondage. If you reject the objective (world), you have no mind; you are liberated.
जिन्होंने संकल्प-बन्धन को काट दिया है, जो चित्तत्वरहित महान् पद पा चुके हैं, ऐसे ही साधक निष्पाप होकर ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मन को वश में करके जो विमनस्क हो गये हैं, शान्तचित्तता उनकी प्रखर मेधा की परिचायिका है। वेदान्त के विषय में चिन्तनशील मनुष्य, जिनकी चित्तवृत्तियों का क्षय हो चुका है और मानसिक संकल्पों के त्याग में अभ्यस्त होने से जिनका मन सुस्थिर हो चुका है। जो मुमुक्षु पुरुष हेय और उपादेय दोनों तरह के दृश्यों का परित्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मज्ञान के साक्षात्कार में संलग्न तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्च को न देखने वाले हैं, जो ज्ञातव्य परमतत्त्व में विशेषरूप से जागरुक रहकर जीवन यापन करते हैं, जो रसयुक्त तथा रसहीन इन सभी पदार्थों के प्रति अति सुस्थिर वैराग्य भाव से सघन मोहात्मक संसार पथ में सोये हुए हैं। वैराग्य की प्रबल भावना से चूहे द्वारा काटे गये पक्षी के पाश की तरह जिनकी सांसारिक वासना-तृष्णा का पाश कट चुका है और हृदय की ग्रन्थियाँ ढीली पड़ गई है, ऐसे साधकों का स्वभाव विशिष्ट ज्ञान से उसी प्रकार परिष्कृत-निर्मल हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फल से जल निर्मल हो जाता है॥
Verse ६१
महाधियः शान्तधियो ये याता विमनस्कताम् । जन्तोः कृतविचारस्य विगलद्वृत्तिचेतसः ।।
mahādhiyaḥ śāntadhiyo ye yātā vimanaskatām । jantoḥ kṛtavicārasya vigaladvṛtticetasaḥ ।।
VI-36. "Neither am I nor is this real" - so thinking remain absolutely immovable, in the intervals of subjective and objective awareness.
जिन्होंने संकल्प-बन्धन को काट दिया है, जो चित्तत्वरहित महान् पद पा चुके हैं, ऐसे ही साधक निष्पाप होकर ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मन को वश में करके जो विमनस्क हो गये हैं, शान्तचित्तता उनकी प्रखर मेधा की परिचायिका है। वेदान्त के विषय में चिन्तनशील मनुष्य, जिनकी चित्तवृत्तियों का क्षय हो चुका है और मानसिक संकल्पों के त्याग में अभ्यस्त होने से जिनका मन सुस्थिर हो चुका है। जो मुमुक्षु पुरुष हेय और उपादेय दोनों तरह के दृश्यों का परित्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मज्ञान के साक्षात्कार में संलग्न तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्च को न देखने वाले हैं, जो ज्ञातव्य परमतत्त्व में विशेषरूप से जागरुक रहकर जीवन यापन करते हैं, जो रसयुक्त तथा रसहीन इन सभी पदार्थों के प्रति अति सुस्थिर वैराग्य भाव से सघन मोहात्मक संसार पथ में सोये हुए हैं। वैराग्य की प्रबल भावना से चूहे द्वारा काटे गये पक्षी के पाश की तरह जिनकी सांसारिक वासना-तृष्णा का पाश कट चुका है और हृदय की ग्रन्थियाँ ढीली पड़ गई है, ऐसे साधकों का स्वभाव विशिष्ट ज्ञान से उसी प्रकार परिष्कृत-निर्मल हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फल से जल निर्मल हो जाता है॥
Verse ६२
मननं त्यजतो नित्यं किंचित्परिणतं मनः ।दृश्यं संत्यजतो हेयमुपादेयमुपेयुषः ।।
mananaṃ tyajato nityaṃ kiṃcitpariṇataṃ manaḥ ।dṛśyaṃ saṃtyajato heyamupādeyamupeyuṣaḥ ।।
VI-37. Rid of what enjoys and what is enjoyed, set in the middle ground between the object and its enjoyer, be ever given to the contemplation of your Self as (pure) awareness.
जिन्होंने संकल्प-बन्धन को काट दिया है, जो चित्तत्वरहित महान् पद पा चुके हैं, ऐसे ही साधक निष्पाप होकर ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मन को वश में करके जो विमनस्क हो गये हैं, शान्तचित्तता उनकी प्रखर मेधा की परिचायिका है। वेदान्त के विषय में चिन्तनशील मनुष्य, जिनकी चित्तवृत्तियों का क्षय हो चुका है और मानसिक संकल्पों के त्याग में अभ्यस्त होने से जिनका मन सुस्थिर हो चुका है। जो मुमुक्षु पुरुष हेय और उपादेय दोनों तरह के दृश्यों का परित्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मज्ञान के साक्षात्कार में संलग्न तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्च को न देखने वाले हैं, जो ज्ञातव्य परमतत्त्व में विशेषरूप से जागरुक रहकर जीवन यापन करते हैं, जो रसयुक्त तथा रसहीन इन सभी पदार्थों के प्रति अति सुस्थिर वैराग्य भाव से सघन मोहात्मक संसार पथ में सोये हुए हैं। वैराग्य की प्रबल भावना से चूहे द्वारा काटे गये पक्षी के पाश की तरह जिनकी सांसारिक वासना-तृष्णा का पाश कट चुका है और हृदय की ग्रन्थियाँ ढीली पड़ गई है, ऐसे साधकों का स्वभाव विशिष्ट ज्ञान से उसी प्रकार परिष्कृत-निर्मल हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फल से जल निर्मल हो जाता है॥
Verse ६३
द्रष्टारं पश्यतो नित्यमद्रष्टारमपश्यतः । विज्ञातव्ये परे तत्त्वे जागरूकस्य जीवतः ॥
draṣṭāraṃ paśyato nityamadraṣṭāramapaśyataḥ । vijñātavye pare tattve jāgarūkasya jīvataḥ ॥
VI-38. Dwelling on "the taste", be filled with the supreme Self; resorting to the propless, steady yourself off and on.
जिन्होंने संकल्प-बन्धन को काट दिया है, जो चित्तत्वरहित महान् पद पा चुके हैं, ऐसे ही साधक निष्पाप होकर ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मन को वश में करके जो विमनस्क हो गये हैं, शान्तचित्तता उनकी प्रखर मेधा की परिचायिका है। वेदान्त के विषय में चिन्तनशील मनुष्य, जिनकी चित्तवृत्तियों का क्षय हो चुका है और मानसिक संकल्पों के त्याग में अभ्यस्त होने से जिनका मन सुस्थिर हो चुका है। जो मुमुक्षु पुरुष हेय और उपादेय दोनों तरह के दृश्यों का परित्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मज्ञान के साक्षात्कार में संलग्न तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्च को न देखने वाले हैं, जो ज्ञातव्य परमतत्त्व में विशेषरूप से जागरुक रहकर जीवन यापन करते हैं, जो रसयुक्त तथा रसहीन इन सभी पदार्थों के प्रति अति सुस्थिर वैराग्य भाव से सघन मोहात्मक संसार पथ में सोये हुए हैं। वैराग्य की प्रबल भावना से चूहे द्वारा काटे गये पक्षी के पाश की तरह जिनकी सांसारिक वासना-तृष्णा का पाश कट चुका है और हृदय की ग्रन्थियाँ ढीली पड़ गई है, ऐसे साधकों का स्वभाव विशिष्ट ज्ञान से उसी प्रकार परिष्कृत-निर्मल हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फल से जल निर्मल हो जाता है॥
Verse ६४
सुप्तस्य घनसंमोहमये संसारवर्त्मनि। अत्यन्तपकववैराग्यादरसेषु रसेष्वपि ॥
suptasya ghanasaṃmohamaye saṃsāravartmani। atyantapakavavairāgyādaraseṣu raseṣvapi ॥
VI-39. Those who are bound by ropes are released: (but) none in the grip of craving may be released by anyone. Therefore, Nidagha, shed craving by renouncing all mental constructions.
जिन्होंने संकल्प-बन्धन को काट दिया है, जो चित्तत्वरहित महान् पद पा चुके हैं, ऐसे ही साधक निष्पाप होकर ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मन को वश में करके जो विमनस्क हो गये हैं, शान्तचित्तता उनकी प्रखर मेधा की परिचायिका है। वेदान्त के विषय में चिन्तनशील मनुष्य, जिनकी चित्तवृत्तियों का क्षय हो चुका है और मानसिक संकल्पों के त्याग में अभ्यस्त होने से जिनका मन सुस्थिर हो चुका है। जो मुमुक्षु पुरुष हेय और उपादेय दोनों तरह के दृश्यों का परित्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मज्ञान के साक्षात्कार में संलग्न तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्च को न देखने वाले हैं, जो ज्ञातव्य परमतत्त्व में विशेषरूप से जागरुक रहकर जीवन यापन करते हैं, जो रसयुक्त तथा रसहीन इन सभी पदार्थों के प्रति अति सुस्थिर वैराग्य भाव से सघन मोहात्मक संसार पथ में सोये हुए हैं। वैराग्य की प्रबल भावना से चूहे द्वारा काटे गये पक्षी के पाश की तरह जिनकी सांसारिक वासना-तृष्णा का पाश कट चुका है और हृदय की ग्रन्थियाँ ढीली पड़ गई है, ऐसे साधकों का स्वभाव विशिष्ट ज्ञान से उसी प्रकार परिष्कृत-निर्मल हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फल से जल निर्मल हो जाता है॥
Verse ६५
संसारवासनाजाले खगजाल इवाधुना ।त्रोटिते हृदयग्रन्थौ श्लथे वैराग्यरंहसा ॥
saṃsāravāsanājāle khagajāla ivādhunā ।troṭite hṛdayagranthau ślathe vairāgyaraṃhasā ॥
VI-40. Cutting through this innate and sinful craving whose essence is egoism with the needle of self-abnegation, be stationed in the border land of the future and the present, entirely quelling all fear whatsoever.
जिन्होंने संकल्प-बन्धन को काट दिया है, जो चित्तत्वरहित महान् पद पा चुके हैं, ऐसे ही साधक निष्पाप होकर ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मन को वश में करके जो विमनस्क हो गये हैं, शान्तचित्तता उनकी प्रखर मेधा की परिचायिका है। वेदान्त के विषय में चिन्तनशील मनुष्य, जिनकी चित्तवृत्तियों का क्षय हो चुका है और मानसिक संकल्पों के त्याग में अभ्यस्त होने से जिनका मन सुस्थिर हो चुका है। जो मुमुक्षु पुरुष हेय और उपादेय दोनों तरह के दृश्यों का परित्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मज्ञान के साक्षात्कार में संलग्न तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्च को न देखने वाले हैं, जो ज्ञातव्य परमतत्त्व में विशेषरूप से जागरुक रहकर जीवन यापन करते हैं, जो रसयुक्त तथा रसहीन इन सभी पदार्थों के प्रति अति सुस्थिर वैराग्य भाव से सघन मोहात्मक संसार पथ में सोये हुए हैं। वैराग्य की प्रबल भावना से चूहे द्वारा काटे गये पक्षी के पाश की तरह जिनकी सांसारिक वासना-तृष्णा का पाश कट चुका है और हृदय की ग्रन्थियाँ ढीली पड़ गई है, ऐसे साधकों का स्वभाव विशिष्ट ज्ञान से उसी प्रकार परिष्कृत-निर्मल हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फल से जल निर्मल हो जाता है॥
Verse ६६
कातकं फलमासाद्य यथा वारि प्रसीदति ।तथा विज्ञानवशतः स्वभावः संप्रसीदति ॥
kātakaṃ phalamāsādya yathā vāri prasīdati ।tathā vijñānavaśataḥ svabhāvaḥ saṃprasīdati ॥
VI-41-43. Rejecting the inveterate idea. "I am (the very) life of these objects and these objects are my (very) life!" "without these I am nothing and they are nothing without me" and reflecting, "I do not belong to (any) object and no object belongs to me", the intellect becomes tranquillized and the actions are performed in a sporting spirit. Latent impression (of such an agent) stand renounced. This renunciation, O Brahmin, is extolled as worthy of profound meditation!
जिन्होंने संकल्प-बन्धन को काट दिया है, जो चित्तत्वरहित महान् पद पा चुके हैं, ऐसे ही साधक निष्पाप होकर ब्रह्म को प्राप्त करते हैं। मन को वश में करके जो विमनस्क हो गये हैं, शान्तचित्तता उनकी प्रखर मेधा की परिचायिका है। वेदान्त के विषय में चिन्तनशील मनुष्य, जिनकी चित्तवृत्तियों का क्षय हो चुका है और मानसिक संकल्पों के त्याग में अभ्यस्त होने से जिनका मन सुस्थिर हो चुका है। जो मुमुक्षु पुरुष हेय और उपादेय दोनों तरह के दृश्यों का परित्याग कर रहे हैं, जो नित्य द्रष्टा अर्थात् आत्मज्ञान के साक्षात्कार में संलग्न तथा अद्रष्टा अर्थात् प्रपञ्च को न देखने वाले हैं, जो ज्ञातव्य परमतत्त्व में विशेषरूप से जागरुक रहकर जीवन यापन करते हैं, जो रसयुक्त तथा रसहीन इन सभी पदार्थों के प्रति अति सुस्थिर वैराग्य भाव से सघन मोहात्मक संसार पथ में सोये हुए हैं। वैराग्य की प्रबल भावना से चूहे द्वारा काटे गये पक्षी के पाश की तरह जिनकी सांसारिक वासना-तृष्णा का पाश कट चुका है और हृदय की ग्रन्थियाँ ढीली पड़ गई है, ऐसे साधकों का स्वभाव विशिष्ट ज्ञान से उसी प्रकार परिष्कृत-निर्मल हो जाता है, जिस प्रकार कातक (निर्मली) फल से जल निर्मल हो जाता है॥
Verse ६७
नीरागं निरुपासङगं निर्द्वन्दवं निरुपाश्रयम्। विनिर्याति मनो मोहाद्विहङ्गः पञ्जरादिव॥
nīrāgaṃ nirupāsaṅagaṃ nirdvandavaṃ nirupāśrayam। viniryāti mano mohādvihaṅgaḥ pañjarādiva॥
VI-44. Due to the equilibrium of the intellect, total obliteration of latent impressions is acquired. That (indeed) should be deemed the obliteration of latent impressions, having won which one gives up (even) the body as one is free from all sense of possessions.
मन के रागरहित, अनासक्त, द्वन्दव से रहित तथा निरालम्ब हो जाने पर पिंजड़े से मुक्त हुए पक्षी की तरह ही मोह-बन्धन से मन को मुक्ति हो जाती है। संयरूप दुरात्मभावना जिनको शान्त हो चुकी है, जो प्रपञ्च कौतुक से विमुक्त हैं, उनका चित्त पूर्णमासी के चन्द्र के समान विशेष शोभा पाता है॥
Verse ६८
शान्तसंदेहदौरात्म्यं गतकौतुकविभ्रमम् । परिपूर्णान्तरं चेतः पूर्णेन्दुरिव राजते ॥
śāntasaṃdehadaurātmyaṃ gatakautukavibhramam । paripūrṇāntaraṃ cetaḥ pūrṇenduriva rājate ॥
VI-45. He is called the Jivanmukta (Liberated-in-life) who lives after giving up all conceivable objects; for he has recreatively given up all latent egoistic impressions.
मन के रागरहित, अनासक्त, द्वन्दव से रहित तथा निरालम्ब हो जाने पर पिंजड़े से मुक्त हुए पक्षी की तरह ही मोह-बन्धन से मन को मुक्ति हो जाती है। संयरूप दुरात्मभावना जिनको शान्त हो चुकी है, जो प्रपञ्च कौतुक से विमुक्त हैं, उनका चित्त पूर्णमासी के चन्द्र के समान विशेष शोभा पाता है॥
Verse ६९
नाहं न चान्यदस्तीह ब्रहमौवास्मि निरामयम् । इत्थं सदसतोर्मध्याद्यः पश्यति स पश्यति ॥
nāhaṃ na cānyadastīha brahamauvāsmi nirāmayam । itthaṃ sadasatormadhyādyaḥ paśyati sa paśyati ॥
VI-46. Having given up all baseless (mental) constructions and the latent impressions, he who has won tranquility is the best among the Knowers of Brahman; he is the liberated. His renunciation may only be deduced.
न मैं स्वयं और न अन्य कुछ ही यहाँ है, मैं तो सभी दोषों से रहित मात्र ब्रह्म हूँ, जिसकी दृष्टि सत्-असत्, के मध्य इस प्रकार की है, वहीं वास्तव में ब्रह्म साक्षात्कार करने वाला है। जिस प्रकार दर्शनीय दृश्यों की तरफ मन स्वाभाविक रूप से बिना आसक्ति के ही खिंच जाता है, उसी प्रकार धीमति पुरुष कर्तव्य कर्मों के निर्वाह में संलग्न रहते हैं। भली प्रकार सोच-समझकर भोगा गया भोग उसी तरह संतुष्टि का निमित्त बनता है, जिस तरह जान-बूझकर सेवा में संलग्न चोर चौर्यकार्य को छोड़कर मित्रता ही निभाता है॥
Verse ७०
अयत्नोपनतेष्वक्षिदृग्दृश्येषु यथा मनः। नीरागमेव पतति तद्वकार्येषु धीरधीः ॥
ayatnopanateṣvakṣidṛgdṛśyeṣu yathā manaḥ। nīrāgameva patati tadvakāryeṣu dhīradhīḥ ॥
VI-47-48. These two fearless ones, unconcerned about pleasures and pains that occur in the due course of time, have achieved the status as Brahman - the (passive) renouncer and (the active) Yogin, both of whom are self-disciplined and tranquillized. O Lord of sages! For they neither strive for nor reject anything amidst the inner, mental modifications.
न मैं स्वयं और न अन्य कुछ ही यहाँ है, मैं तो सभी दोषों से रहित मात्र ब्रह्म हूँ, जिसकी दृष्टि सत्-असत्, के मध्य इस प्रकार की है, वहीं वास्तव में ब्रह्म साक्षात्कार करने वाला है। जिस प्रकार दर्शनीय दृश्यों की तरफ मन स्वाभाविक रूप से बिना आसक्ति के ही खिंच जाता है, उसी प्रकार धीमति पुरुष कर्तव्य कर्मों के निर्वाह में संलग्न रहते हैं। भली प्रकार सोच-समझकर भोगा गया भोग उसी तरह संतुष्टि का निमित्त बनता है, जिस तरह जान-बूझकर सेवा में संलग्न चोर चौर्यकार्य को छोड़कर मित्रता ही निभाता है॥
Verse ७१
परिज्ञायोपभुक्तो हि भोगो भवति तुष्टये।विज्ञाय सेवितश्चोरो मैत्रीमेति न चोरताम्॥
parijñāyopabhukto hi bhogo bhavati tuṣṭaye।vijñāya sevitaścoro maitrīmeti na coratām॥
VI-49-50(a). He is called the Jivanmukta who lives as one in dreamless sleep, who is neither lifted up nor depressed by the emotions of joy, intolerance, fear, anger, lust and helplessness and who is free from all objective pre-occupations.
न मैं स्वयं और न अन्य कुछ ही यहाँ है, मैं तो सभी दोषों से रहित मात्र ब्रह्म हूँ, जिसकी दृष्टि सत्-असत्, के मध्य इस प्रकार की है, वहीं वास्तव में ब्रह्म साक्षात्कार करने वाला है। जिस प्रकार दर्शनीय दृश्यों की तरफ मन स्वाभाविक रूप से बिना आसक्ति के ही खिंच जाता है, उसी प्रकार धीमति पुरुष कर्तव्य कर्मों के निर्वाह में संलग्न रहते हैं। भली प्रकार सोच-समझकर भोगा गया भोग उसी तरह संतुष्टि का निमित्त बनता है, जिस तरह जान-बूझकर सेवा में संलग्न चोर चौर्यकार्य को छोड़कर मित्रता ही निभाता है॥
Verse ७२
अशङ्कितापि संप्राप्त ग्रामयात्रा यथाऽध्वगैः । प्रेक्ष्यते तद्वदेव ज्ञैर्भोगश्रीरवलोक्यते ॥
aśaṅkitāpi saṃprāpta grāmayātrā yathā'dhvagaiḥ । prekṣyate tadvadeva jñairbhogaśrīravalokyate ॥
VI-49-50(a). He is called the Jivanmukta who lives as one in dreamless sleep, who is neither lifted up nor depressed by the emotions of joy, intolerance, fear, anger, lust and helplessness and who is free from all objective pre-occupations.
जिस ग्राम में जाने का मन में कभी विचार भी नहीं था, ऐसे ग्राम में अचानक आ जाने पर यात्री जिस आश्चर्य भरी दृष्टि से उसे देखता है,उसी दृष्टि से ज्ञानीपुरुष भोग-ऐश्वर्यों पर दृष्टिपात करता है। बिना श्रम से उपलब्ध हुई स्वल्पमात्र भोग सामग्री को नियन्त्रित मन वाला साधक बहुत अधिक समझते हुए कष्टदायी मानकर त्याग देता है। शत्रु के बन्धन से मुक्त होने पर जो राजा -भोजन के एक ग्राम से सन्तुष्ट हो जाता है.वही राजा शत्रु द्वारा आक्रान्त और आबद्ध न किये जाने पर राज्य के विशाल वैभव को भी तुच्छ ही मानता है ॥
पञ्चमोऽध्यायः (part 3)
Verse ७३
मनसो निगृहीतस्य लीलाभोगोऽल्पकोऽपि यः । तमेवालब्धविस्तारं क्लिष्टत्वाद्बहु मन्यते ॥
manaso nigṛhītasya līlābhogo'lpako'pi yaḥ । tamevālabdhavistāraṃ kliṣṭatvādbahu manyate ॥
VI-50(b). The craving born of latent impressions, oriented towards external objects, is said to be bound.
जिस ग्राम में जाने का मन में कभी विचार भी नहीं था, ऐसे ग्राम में अचानक आ जाने पर यात्री जिस आश्चर्य भरी दृष्टि से उसे देखता है,उसी दृष्टि से ज्ञानीपुरुष भोग-ऐश्वर्यों पर दृष्टिपात करता है। बिना श्रम से उपलब्ध हुई स्वल्पमात्र भोग सामग्री को नियन्त्रित मन वाला साधक बहुत अधिक समझते हुए कष्टदायी मानकर त्याग देता है। शत्रु के बन्धन से मुक्त होने पर जो राजा -भोजन के एक ग्राम से सन्तुष्ट हो जाता है.वही राजा शत्रु द्वारा आक्रान्त और आबद्ध न किये जाने पर राज्य के विशाल वैभव को भी तुच्छ ही मानता है ॥
Verse ७४
बद्धमुक्तो महीपालो ग्रासमात्रेण तुष्यति । परैरबद्धो नाक्रान्तो ने राष्ट्रं बहु मन्यते ।।
baddhamukto mahīpālo grāsamātreṇa tuṣyati । parairabaddho nākrānto ne rāṣṭraṃ bahu manyate ।।
VI-51-52(a). The same freed from latent impressions bound up with objects, as such, is said to be liberated. Know that the desire culminating in the prayerful thought, "let this be mind", to be a strong chain that spawns suffering, birth and fear.
जिस ग्राम में जाने का मन में कभी विचार भी नहीं था, ऐसे ग्राम में अचानक आ जाने पर यात्री जिस आश्चर्य भरी दृष्टि से उसे देखता है,उसी दृष्टि से ज्ञानीपुरुष भोग-ऐश्वर्यों पर दृष्टिपात करता है। बिना श्रम से उपलब्ध हुई स्वल्पमात्र भोग सामग्री को नियन्त्रित मन वाला साधक बहुत अधिक समझते हुए कष्टदायी मानकर त्याग देता है। शत्रु के बन्धन से मुक्त होने पर जो राजा -भोजन के एक ग्राम से सन्तुष्ट हो जाता है.वही राजा शत्रु द्वारा आक्रान्त और आबद्ध न किये जाने पर राज्य के विशाल वैभव को भी तुच्छ ही मानता है ॥
Verse ७५
हस्तं हस्तेन संपीड्य दन्तैर्दन्तान्विचूर्ण्य च। अङ्गान्यङ्गैरिवाक्रम्य जयेदादौ स्वकं मनः ॥
hastaṃ hastena saṃpīḍya dantairdantānvicūrṇya ca। aṅgānyaṅgairivākramya jayedādau svakaṃ manaḥ ॥
VI-51-52(a). The same freed from latent impressions bound up with objects, as such, is said to be liberated. Know that the desire culminating in the prayerful thought, "let this be mind", to be a strong chain that spawns suffering, birth and fear.
हाथ से हाथ को मलकर, दाँत से दाँत को पीसकर तथा अङ्गों से अङ्गों को दबाकर अर्थात् स्वकीय सम्पूर्ण पराक्रम और साहस द्वारा मन को जीतने का प्रयास करे। इस संसार सागर में मन पर विजय पाने से बढ़कर अन्य उपाय नहीं है। इस भयंकर नरक रूपी साम्राज्य में दुष्कृत रूपी मतवाले हाथी भ्रमण करते हैं। आशारूपी बाणों और कटारों से सुसज्जित इन्द्रियरूपी वैरियों को जीतना अत्यन्त मुश्किल है ।।
Verse ७६
मनसो विजयान्नान्या गतिरस्ति भवार्णवे।महानरकसाम्राज्ये मत्तदुष्कृतवारणाः । आशाशरशला-काढ्या दुर्जया हीन्द्रियारयः ॥
manaso vijayānnānyā gatirasti bhavārṇave।mahānarakasāmrājye mattaduṣkṛtavāraṇāḥ । āśāśaraśalā-kāḍhyā durjayā hīndriyārayaḥ ॥
VI-52(b)-53(a). The magnanimous man renounces (this enchaining desire) vis-a-vis objects both real and unreal and wins the status that is sublime.
हाथ से हाथ को मलकर, दाँत से दाँत को पीसकर तथा अङ्गों से अङ्गों को दबाकर अर्थात् स्वकीय सम्पूर्ण पराक्रम और साहस द्वारा मन को जीतने का प्रयास करे। इस संसार सागर में मन पर विजय पाने से बढ़कर अन्य उपाय नहीं है। इस भयंकर नरक रूपी साम्राज्य में दुष्कृत रूपी मतवाले हाथी भ्रमण करते हैं। आशारूपी बाणों और कटारों से सुसज्जित इन्द्रियरूपी वैरियों को जीतना अत्यन्त मुश्किल है ।।
Verse ७७
प्रक्षीणचित्तदर्पस्य निगृहीतेन्द्रियद्विषः। पद्मिन्य इव हेमन्ते क्षीयन्ते भोगवासनाः ॥
prakṣīṇacittadarpasya nigṛhītendriyadviṣaḥ। padminya iva hemante kṣīyante bhogavāsanāḥ ॥
I-53(b)-54(a). Then outgrowing the attachment both to bondage and liberation and the states of pain and pleasure - attachment both to the real and unreal - remains unshaken like the unagitated ocean.
जो इन्द्रियरूपी वैरियों को अपने वशीभूत कर चुके हैं तथा जिन्होंने चित्त के अहंभाव को विनष्ट कर दिया है, उनकी भोग लिप्साएँ उसी प्रकार समाप्त हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतु में कमल का पौधा सूख जाता है। एकत्व के दृढ़ अभ्यास द्वारा जब तक मन को नियन्त्रित नहीं कर लिया जाता, तब तक ही रात्रि में बेताल की तरह हृदय में वासना टिकी हुई रहती है । विवेकशील व्यक्ति अपने मन को अभीष्ट सिद्धि के लिए सेवक के समान सभी प्रयोजनों की पूर्ति के लिए मन्त्रीरूप तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों को स्वनियन्त्रित करने के लिए सामन्तरूप बना लेते हैं, ऐसा मेरा विचार है ।।
Verse ७८
तावन्निशीव वेताला वसन्ति ह्यदि वासनाः । एकतत्त्वदृढाभ्यासाद्यान्न विजितं मनः ॥
tāvanniśīva vetālā vasanti hyadi vāsanāḥ । ekatattvadṛḍhābhyāsādyānna vijitaṃ manaḥ ॥
VI-54(b). Good Sir, man may have a four-fold certitude.
जो इन्द्रियरूपी वैरियों को अपने वशीभूत कर चुके हैं तथा जिन्होंने चित्त के अहंभाव को विनष्ट कर दिया है, उनकी भोग लिप्साएँ उसी प्रकार समाप्त हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतु में कमल का पौधा सूख जाता है। एकत्व के दृढ़ अभ्यास द्वारा जब तक मन को नियन्त्रित नहीं कर लिया जाता, तब तक ही रात्रि में बेताल की तरह हृदय में वासना टिकी हुई रहती है । विवेकशील व्यक्ति अपने मन को अभीष्ट सिद्धि के लिए सेवक के समान सभी प्रयोजनों की पूर्ति के लिए मन्त्रीरूप तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों को स्वनियन्त्रित करने के लिए सामन्तरूप बना लेते हैं, ऐसा मेरा विचार है ।।
Verse ७९
भृत्योऽभिमतकर्तृत्वान्मन्त्री सर्वार्थकारणात्। सामन्तश्चेन्द्रियाक्रान्तेर्मनो मन्ये विवेकिनः ॥
bhṛtyo'bhimatakartṛtvānmantrī sarvārthakāraṇāt। sāmantaścendriyākrāntermano manye vivekinaḥ ॥
VI-55. Engendered by (my) mother and father, I am (the body) from the foot to the head. This particular certitude, O Brahmin, results from the observation of the worries of bondage!
जो इन्द्रियरूपी वैरियों को अपने वशीभूत कर चुके हैं तथा जिन्होंने चित्त के अहंभाव को विनष्ट कर दिया है, उनकी भोग लिप्साएँ उसी प्रकार समाप्त हो जाती हैं, जैसे हेमन्त ऋतु में कमल का पौधा सूख जाता है। एकत्व के दृढ़ अभ्यास द्वारा जब तक मन को नियन्त्रित नहीं कर लिया जाता, तब तक ही रात्रि में बेताल की तरह हृदय में वासना टिकी हुई रहती है । विवेकशील व्यक्ति अपने मन को अभीष्ट सिद्धि के लिए सेवक के समान सभी प्रयोजनों की पूर्ति के लिए मन्त्रीरूप तथा सम्पूर्ण इन्द्रियों को स्वनियन्त्रित करने के लिए सामन्तरूप बना लेते हैं, ऐसा मेरा विचार है ।।
Verse ८०
लालनात्स्निग्धललना पालनात्यालकः पिता । सुहृदुत्तमविन्यासान्मनो मन्ये मनीषिणः ॥
lālanātsnigdhalalanā pālanātyālakaḥ pitā । suhṛduttamavinyāsānmano manye manīṣiṇaḥ ॥
VI-56. Good men have second kind of certitude that promotes liberation - viz.: "I am beyond all objects and beings; I am subtler than the tip of a hair".
मेरे विचार से मनीषी का मन लालन करने के फलस्वरूप स्नेहमयी ललना-स्वरूप और पालन करने से पितृतुल्य है। शास्त्रानुकूल आचरण से, स्वयं के एकत्रित अनुभवजन्य ज्ञान प्रकाश से तथा विवेक बुद्धि से मरूपी पिता परमसिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। अति हृष्ट-पुष्ट, सुदृढ़, निर्मल, स्वशीभूत, भली प्रकार चैतन्य तथा आत्मिक सद्गुणों से प्रखर-तेजस्विता युक्त सुन्दर मनरूपी मणि हृदय में विराजमान है। हे ब्रह्मन् । बहुविध वासना-तृष्णा के कीचड़ से सने इस मनरूपी मणि को विवेक रूपी जल से निर्मल करके साधन-सिद्धि के लिए चमकदार (परिष्कृत) बनायें ।।
Verse ८१
स्वालोकतः शास्त्रदृशा स्वबुद्धया स्वानुभावतः ।प्रयच्छति परां सिद्धिं त्यक्त्वात्मानं मन:पिता॥
svālokataḥ śāstradṛśā svabuddhayā svānubhāvataḥ ।prayacchati parāṃ siddhiṃ tyaktvātmānaṃ mana:pitā॥
VI-57. Best of Brahmins, a third kind of certitude has been affirmed promotive of liberation alone (consisting in the thought) " All this objective world, the entire indestructible universe, is but myself".
मेरे विचार से मनीषी का मन लालन करने के फलस्वरूप स्नेहमयी ललना-स्वरूप और पालन करने से पितृतुल्य है। शास्त्रानुकूल आचरण से, स्वयं के एकत्रित अनुभवजन्य ज्ञान प्रकाश से तथा विवेक बुद्धि से मरूपी पिता परमसिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। अति हृष्ट-पुष्ट, सुदृढ़, निर्मल, स्वशीभूत, भली प्रकार चैतन्य तथा आत्मिक सद्गुणों से प्रखर-तेजस्विता युक्त सुन्दर मनरूपी मणि हृदय में विराजमान है। हे ब्रह्मन् । बहुविध वासना-तृष्णा के कीचड़ से सने इस मनरूपी मणि को विवेक रूपी जल से निर्मल करके साधन-सिद्धि के लिए चमकदार (परिष्कृत) बनायें ।।
Verse ८२
सुहृष्टः सुदृढः स्वच्छः सुक्रान्तः सुप्रबोधितः ।स्वगुणेनोर्जितो भाति हृदि हृद्यो मनोमणिः ॥
suhṛṣṭaḥ sudṛḍhaḥ svacchaḥ sukrāntaḥ suprabodhitaḥ ।svaguṇenorjito bhāti hṛdi hṛdyo manomaṇiḥ ॥
VI-58. Also there is a fourth certitude, yielding liberation (that consists of the assertion) "I and the entire world are empty and sky-like at all times".
मेरे विचार से मनीषी का मन लालन करने के फलस्वरूप स्नेहमयी ललना-स्वरूप और पालन करने से पितृतुल्य है। शास्त्रानुकूल आचरण से, स्वयं के एकत्रित अनुभवजन्य ज्ञान प्रकाश से तथा विवेक बुद्धि से मरूपी पिता परमसिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। अति हृष्ट-पुष्ट, सुदृढ़, निर्मल, स्वशीभूत, भली प्रकार चैतन्य तथा आत्मिक सद्गुणों से प्रखर-तेजस्विता युक्त सुन्दर मनरूपी मणि हृदय में विराजमान है। हे ब्रह्मन् । बहुविध वासना-तृष्णा के कीचड़ से सने इस मनरूपी मणि को विवेक रूपी जल से निर्मल करके साधन-सिद्धि के लिए चमकदार (परिष्कृत) बनायें ।।
Verse ८३
एनं मनोमणिं ब्रह्मन्बहुपङ्कलङ्कितम् । विवेकवारिणा सिद्धयै प्रक्षाल्यालोकवान्भव।।
enaṃ manomaṇiṃ brahmanbahupaṅkalaṅkitam । vivekavāriṇā siddhayai prakṣālyālokavānbhava।।
VI-59. Of these the first is said (to result from) the craving that earns bondage. Those having the last three are sportive, extremely pure and are liberated in this (very) life. Their cravings have been (wholly) purified.
मेरे विचार से मनीषी का मन लालन करने के फलस्वरूप स्नेहमयी ललना-स्वरूप और पालन करने से पितृतुल्य है। शास्त्रानुकूल आचरण से, स्वयं के एकत्रित अनुभवजन्य ज्ञान प्रकाश से तथा विवेक बुद्धि से मरूपी पिता परमसिद्धि का मार्ग प्रशस्त करता है। अति हृष्ट-पुष्ट, सुदृढ़, निर्मल, स्वशीभूत, भली प्रकार चैतन्य तथा आत्मिक सद्गुणों से प्रखर-तेजस्विता युक्त सुन्दर मनरूपी मणि हृदय में विराजमान है। हे ब्रह्मन् । बहुविध वासना-तृष्णा के कीचड़ से सने इस मनरूपी मणि को विवेक रूपी जल से निर्मल करके साधन-सिद्धि के लिए चमकदार (परिष्कृत) बनायें ।।
Verse ८४
विवेकं परमाश्रित्य बुद्ध्या सत्यमवेक्ष्य च । इन्द्रियारीनलं छित्त्वा तीर्णो भव भवार्णवात्॥
vivekaṃ paramāśritya buddhyā satyamavekṣya ca । indriyārīnalaṃ chittvā tīrṇo bhava bhavārṇavāt॥
VI-60. Great-souled (sage), the mind seized with the certitude "I am everything" is never born again to taste of sorrow!
सद्विवेक का अवलम्बन लेकर, बुद्धि से यथार्थ सत्य का अनुसन्धान करके इन्द्रियरुपी वैरियों को तुम छिन्न-भिन्न कर पाओगे, इसी से संसार रूपी भवसागर से तुम पार उतरने में सक्षम हो सकोगे ।।
Verse ८५
आस्थामात्रमनन्तानां दुःखानामाकरं विदुः । अनास्थामात्रमभितः सुखानामालयं विदुः ।।
āsthāmātramanantānāṃ duḥkhānāmākaraṃ viduḥ । anāsthāmātramabhitaḥ sukhānāmālayaṃ viduḥ ।।
VI-61. That Brahman has been (identified with) emptiness, Prakriti, Maya and also consciousness. It has also been said to be "Shiva, pure Spirit, the Lord, the eternal and the self".
संसार में मात्र आस्था (आशा) ही अनेक कष्टों की उत्पत्ति का कारण है और अनास्था (आशा-अपेक्षारहित जीवन) ही सुख का घर समझना चाहिए। वासनाओं के सूत्र से बँधा हुआ यह संसार पुनः- पुनः उत्पन्न होता है। वह प्रख्यात वासना अति कष्टदायिनी बनकर समस्त सुखों का पूरी तरह से उच्छेदन करने के लिए आती है। जंजीर से सिंह के बाँधने के समान वासना के मोहपाश में धीर, कुलीन, अति बहुश्रुत तथा महान् व्यक्ति भी बँध जाते हैं। शास्त्रानुकूल आचरण करता हुआ, परम पुरुषार्थ का अवलम्बन लेकर और श्रेष्ठ उद्यम करते हुए कौन सिद्धि को प्राप्त नहीं करता ? ॥
Verse ८६
वासनातन्तुबद्धोऽयं लोको विपरिवर्तते ।सा प्रसिद्धातिदुःखाय सुखायोच्छेदमागता ॥
vāsanātantubaddho'yaṃ loko viparivartate ।sā prasiddhātiduḥkhāya sukhāyocchedamāgatā ॥
VI-62. There flourishes but the non-dual Power that is the supreme Self through and through; it sportively builds up the universe with (factors) born of (both) duality and non-duality.
संसार में मात्र आस्था (आशा) ही अनेक कष्टों की उत्पत्ति का कारण है और अनास्था (आशा-अपेक्षारहित जीवन) ही सुख का घर समझना चाहिए। वासनाओं के सूत्र से बँधा हुआ यह संसार पुनः- पुनः उत्पन्न होता है। वह प्रख्यात वासना अति कष्टदायिनी बनकर समस्त सुखों का पूरी तरह से उच्छेदन करने के लिए आती है। जंजीर से सिंह के बाँधने के समान वासना के मोहपाश में धीर, कुलीन, अति बहुश्रुत तथा महान् व्यक्ति भी बँध जाते हैं। शास्त्रानुकूल आचरण करता हुआ, परम पुरुषार्थ का अवलम्बन लेकर और श्रेष्ठ उद्यम करते हुए कौन सिद्धि को प्राप्त नहीं करता ? ॥
Verse ८७
धीरोऽप्यतिबहुज्ञोऽपि कुलजोऽपि महानपि । तृष्णया बध्यते जन्तुः सिंहः शृङ्खलया यथा ॥
dhīro'pyatibahujño'pi kulajo'pi mahānapi । tṛṣṇayā badhyate jantuḥ siṃhaḥ śṛṅkhalayā yathā ॥
VI-63. He who resorts to the status beyond all objects, who is through and through the Spirit that is perfect, who is neither agitated, nor complacent, never suffers in this empirical life.
संसार में मात्र आस्था (आशा) ही अनेक कष्टों की उत्पत्ति का कारण है और अनास्था (आशा-अपेक्षारहित जीवन) ही सुख का घर समझना चाहिए। वासनाओं के सूत्र से बँधा हुआ यह संसार पुनः- पुनः उत्पन्न होता है। वह प्रख्यात वासना अति कष्टदायिनी बनकर समस्त सुखों का पूरी तरह से उच्छेदन करने के लिए आती है। जंजीर से सिंह के बाँधने के समान वासना के मोहपाश में धीर, कुलीन, अति बहुश्रुत तथा महान् व्यक्ति भी बँध जाते हैं। शास्त्रानुकूल आचरण करता हुआ, परम पुरुषार्थ का अवलम्बन लेकर और श्रेष्ठ उद्यम करते हुए कौन सिद्धि को प्राप्त नहीं करता ? ॥
Verse ८८
परमं पौरुषं यत्नमास्थायादाय सूद्यमम्। यथाशास्त्रमनुद्वेगमाचरन्को न सिद्धिभाक् ॥
paramaṃ pauruṣaṃ yatnamāsthāyādāya sūdyamam। yathāśāstramanudvegamācaranko na siddhibhāk ॥
VI-64. Who performs the actions that fall to his lot, ever viewing foe and friend alike, who is liberated from both likes and dislikes is neither sad nor hopeful
संसार में मात्र आस्था (आशा) ही अनेक कष्टों की उत्पत्ति का कारण है और अनास्था (आशा-अपेक्षारहित जीवन) ही सुख का घर समझना चाहिए। वासनाओं के सूत्र से बँधा हुआ यह संसार पुनः- पुनः उत्पन्न होता है। वह प्रख्यात वासना अति कष्टदायिनी बनकर समस्त सुखों का पूरी तरह से उच्छेदन करने के लिए आती है। जंजीर से सिंह के बाँधने के समान वासना के मोहपाश में धीर, कुलीन, अति बहुश्रुत तथा महान् व्यक्ति भी बँध जाते हैं। शास्त्रानुकूल आचरण करता हुआ, परम पुरुषार्थ का अवलम्बन लेकर और श्रेष्ठ उद्यम करते हुए कौन सिद्धि को प्राप्त नहीं करता ? ॥
Verse ८९
अहं सर्वमिदं विश्वं परमात्माहमच्युतः । नान्यदस्तीति संवित्त्या परमा सा ह्यहंकृतिः ।।
ahaṃ sarvamidaṃ viśvaṃ paramātmāhamacyutaḥ । nānyadastīti saṃvittyā paramā sā hyahaṃkṛtiḥ ।।
VI-65. Who utters what pleases all; speaks pleasantly when asked; and who is conversant with the thoughts of all beings never suffers in this empirical life.
मैं समस्त विश्वरूप हूँ, मैं अच्युत परमात्मस्वरूप हूँ, मेरे अतिरिक्त शेष कुछ भी नहीं-इस तरह के बोधात्मक अहं भाव को उत्तम माना गया है। ‘मैं सभी प्रपञ्च से भिन्न हूँ,'मैं बाल के अग्रभाग से कहीं अधिक सूक्ष्म हूँ-इस प्रकार का दूसरा अहं भाव मोक्ष को देने वाला है, बन्धन में फँसाने वाला नहीं। जीवन्मुक्त आत्मायें ही ऐसे अहंभाव से युक्त होती हैं।।
Verse ९०
सर्वस्माद्वयतिरिक्तोऽहं वालाग्रादप्यहं तनुः । इति या संविदो ब्रह्मन्दिवतीयाहंकृतिः शुभा॥
sarvasmādvayatirikto'haṃ vālāgrādapyahaṃ tanuḥ । iti yā saṃvido brahmandivatīyāhaṃkṛtiḥ śubhā॥
VI-66. Resorting to the primeval vision (of Reality) marked by the renunciation of all objects and Self-established, fearlessly roam the world, as a (veritable) Jivanmukta.
मैं समस्त विश्वरूप हूँ, मैं अच्युत परमात्मस्वरूप हूँ, मेरे अतिरिक्त शेष कुछ भी नहीं-इस तरह के बोधात्मक अहं भाव को उत्तम माना गया है। ‘मैं सभी प्रपञ्च से भिन्न हूँ,'मैं बाल के अग्रभाग से कहीं अधिक सूक्ष्म हूँ-इस प्रकार का दूसरा अहं भाव मोक्ष को देने वाला है, बन्धन में फँसाने वाला नहीं। जीवन्मुक्त आत्मायें ही ऐसे अहंभाव से युक्त होती हैं।।
Verse ९१
मोक्षायैषा न बन्धाय जीवन्मुक्तस्य विद्यते ॥
mokṣāyaiṣā na bandhāya jīvanmuktasya vidyate ॥
VI-67. Inwardly shedding all cravings, free from attachment, rid of a(all) latent impressions, (but) externally conforming to established patterns of conduct, fearlessly roam the world.
मैं समस्त विश्वरूप हूँ, मैं अच्युत परमात्मस्वरूप हूँ, मेरे अतिरिक्त शेष कुछ भी नहीं-इस तरह के बोधात्मक अहं भाव को उत्तम माना गया है। ‘मैं सभी प्रपञ्च से भिन्न हूँ,'मैं बाल के अग्रभाग से कहीं अधिक सूक्ष्म हूँ-इस प्रकार का दूसरा अहं भाव मोक्ष को देने वाला है, बन्धन में फँसाने वाला नहीं। जीवन्मुक्त आत्मायें ही ऐसे अहंभाव से युक्त होती हैं।।
Verse ९२
पाणिपादादिमात्रोऽयममित्येष निश्चयः । अहंकारस्तृतीयोऽसौ लौकिकस्तुच्छ एव सः ।।
pāṇipādādimātro'yamamityeṣa niścayaḥ । ahaṃkārastṛtīyo'sau laukikastuccha eva saḥ ।।
VI-68. Externally simulating enthusiastic activity, but, at heart, free from it all, apparently an agent (but) really a non-agent, roam the world with a purified understanding.
मैं हाथ-पैर वाला मात्र स्थूल शरीरधारी हूँ- इस प्रकार की मान्यता जो तीसरे लौकिक अहंकार में होती है, उसे अत्यन्त निकृष्ट कहा गया है। अहंकार से युक्त दुरात्मा प्राणी ही कष्टमय संसार रूपी वृक्ष का मूल कारण है। इससे प्रताड़ित प्राणी निरन्तर पतन की ओर बढ़ता है। इस तृतीय दुःखमय अहंभाव का परित्याग करके लम्बे समय से शुभ अहंभाव में संलग्न प्राणी शान्तचित्त होकर मुक्ति प्राप्त करते हैं ।।
Verse ९३
जीव एव दुरात्मासौ कन्दः संसारदुस्तरोः । अनेनाभिहतो जन्तुरधोऽधः परिधावति ॥
jīva eva durātmāsau kandaḥ saṃsāradustaroḥ । anenābhihato janturadho'dhaḥ paridhāvati ॥
VI-69. Renouncing egoism, with an apparent reason, shining like the sky, untarnished, roam the world with a purified understanding.
मैं हाथ-पैर वाला मात्र स्थूल शरीरधारी हूँ- इस प्रकार की मान्यता जो तीसरे लौकिक अहंकार में होती है, उसे अत्यन्त निकृष्ट कहा गया है। अहंकार से युक्त दुरात्मा प्राणी ही कष्टमय संसार रूपी वृक्ष का मूल कारण है। इससे प्रताड़ित प्राणी निरन्तर पतन की ओर बढ़ता है। इस तृतीय दुःखमय अहंभाव का परित्याग करके लम्बे समय से शुभ अहंभाव में संलग्न प्राणी शान्तचित्त होकर मुक्ति प्राप्त करते हैं ।।
Verse ९४
अनया दुरहंकृत्या भावासंत्यक्तयाचिरम्।शिष्टाहंकारवाञ्जन्तुः शमवान्याति मुक्तताम्॥
anayā durahaṃkṛtyā bhāvāsaṃtyaktayāciram।śiṣṭāhaṃkāravāñjantuḥ śamavānyāti muktatām॥
VI-70. Elevated, clean of conduct, conforming to established norms of conduct, free from all inner clinging, leading, as it were, an empirical life.
मैं हाथ-पैर वाला मात्र स्थूल शरीरधारी हूँ- इस प्रकार की मान्यता जो तीसरे लौकिक अहंकार में होती है, उसे अत्यन्त निकृष्ट कहा गया है। अहंकार से युक्त दुरात्मा प्राणी ही कष्टमय संसार रूपी वृक्ष का मूल कारण है। इससे प्रताड़ित प्राणी निरन्तर पतन की ओर बढ़ता है। इस तृतीय दुःखमय अहंभाव का परित्याग करके लम्बे समय से शुभ अहंभाव में संलग्न प्राणी शान्तचित्त होकर मुक्ति प्राप्त करते हैं ।।
Verse ९५
प्रथमौ द्वावहंकारावड़ीकृत्य त्वलौकिकौ। तृतीयाहंकृतिस्त्याच्या लौकिकी दु:खदायिनी ॥
prathamau dvāvahaṃkārāvaḍa़īkṛtya tvalaukikau। tṛtīyāhaṃkṛtistyācyā laukikī du:khadāyinī ॥
VI-71. Resorting to the inner Spirit of renunciation, apparently he acts to achieve (some) aim (or other). Only small men discriminate saying: One is a relative; the other is a stranger.
प्रारम्भिक दो अलौकिक अहंकारों को स्वीकार करके तीसरे दुःखप्रद लौकिक अहंकार को त्याग दे। साधन शक्ति की वृद्धि पर इन सब प्रकार के अहंकारों को त्यागकर निरहंकारिता ग्रहण करे, उसी से उत्तमपद को प्राप्ति सम्भव है॥
Verse ९६
अथ ते अपि संत्यज्य सर्वाहंकृतिवर्जितः ।स तिष्ठति तथात्युच्चैः परमेवाधिरोहति ॥
atha te api saṃtyajya sarvāhaṃkṛtivarjitaḥ ।sa tiṣṭhati tathātyuccaiḥ paramevādhirohati ॥
VI-72-73(a). For those who live magnanimously the entire world constitutes but a family. Resort to the status free from all considerations of empirical life, beyond old age and death, who are all mental constructions are extinguished and where no attachments finds lodgement.
प्रारम्भिक दो अलौकिक अहंकारों को स्वीकार करके तीसरे दुःखप्रद लौकिक अहंकार को त्याग दे। साधन शक्ति की वृद्धि पर इन सब प्रकार के अहंकारों को त्यागकर निरहंकारिता ग्रहण करे, उसी से उत्तमपद को प्राप्ति सम्भव है॥
Verse ९७
भोगेच्छामात्रको बन्धस्तत्त्यागो मोक्ष उच्यते।मनसोऽभ्युदयो नाशो मनोनाशो महोदयः।ज्ञमनो नाशमभ्येति मनोऽज्ञस्य हि शृङ्खला ॥
bhogecchāmātrako bandhastattyāgo mokṣa ucyate।manaso'bhyudayo nāśo manonāśo mahodayaḥ।jñamano nāśamabhyeti mano'jñasya hi śṛṅkhalā ॥
VI-72-73(a). For those who live magnanimously the entire world constitutes but a family. Resort to the status free from all considerations of empirical life, beyond old age and death, who are all mental constructions are extinguished and where no attachments finds lodgement.
भोगेच्छा हो बन्धन कही गयी है और उसका परित्याग ही मोक्ष कहलाता है। मन की प्रगति का कारण इसका नष्ट होना है। मन का नाश सौभाग्यवान् पुरुषों की पहचान है। ज्ञानी पुरुषों के मन का नाश हो जाता है। अज्ञानी के लिए मन बन्धन का कारण है। ज्ञानी पुरुषों के लिए मन न तो आनन्द रूप है और न ही आनन्दरहित है। उनके लिए वह चल, अचल, स्थिर, सत्, असत् भी नहीं है अथवा इसके मध्य की स्थिति वाला भी नहीं है। अखण्ड चेतनसत्ता सर्वव्यापक होते हुए भी उसी प्रकार दृष्टिगोचर नहीं होती, जिस प्रकार चित्त में आलोकित होने वाला आकाश सूक्ष्मता के कारण दिखाई नहीं देता ॥
Verse ९८
नानन्दं न निरानन्दं न चलं नाचलं स्थिरम्।न सन्नासन्न चैतेषां मध्यंज्ञानिमनो विदुः ॥
nānandaṃ na nirānandaṃ na calaṃ nācalaṃ sthiram।na sannāsanna caiteṣāṃ madhyaṃjñānimano viduḥ ॥
VI-73(b). This is the status of Brahman, absolutely pure, beyond all cravings and sufferings.
भोगेच्छा हो बन्धन कही गयी है और उसका परित्याग ही मोक्ष कहलाता है। मन की प्रगति का कारण इसका नष्ट होना है। मन का नाश सौभाग्यवान् पुरुषों की पहचान है। ज्ञानी पुरुषों के मन का नाश हो जाता है। अज्ञानी के लिए मन बन्धन का कारण है। ज्ञानी पुरुषों के लिए मन न तो आनन्द रूप है और न ही आनन्दरहित है। उनके लिए वह चल, अचल, स्थिर, सत्, असत् भी नहीं है अथवा इसके मध्य की स्थिति वाला भी नहीं है। अखण्ड चेतनसत्ता सर्वव्यापक होते हुए भी उसी प्रकार दृष्टिगोचर नहीं होती, जिस प्रकार चित्त में आलोकित होने वाला आकाश सूक्ष्मता के कारण दिखाई नहीं देता ॥
Verse ९९
यथा सौक्ष्म्याच्चिदाभास्य आकाशो नोपलक्ष्यते।तथा निरंशश्चिद्भावः सर्वगोऽपि न लक्ष्यते ॥
yathā saukṣmyāccidābhāsya ākāśo nopalakṣyate।tathā niraṃśaścidbhāvaḥ sarvago'pi na lakṣyate ॥
VI-74(a). Equipped thus and roaming (the earth), one is not vanquished by crisis.
भोगेच्छा हो बन्धन कही गयी है और उसका परित्याग ही मोक्ष कहलाता है। मन की प्रगति का कारण इसका नष्ट होना है। मन का नाश सौभाग्यवान् पुरुषों की पहचान है। ज्ञानी पुरुषों के मन का नाश हो जाता है। अज्ञानी के लिए मन बन्धन का कारण है। ज्ञानी पुरुषों के लिए मन न तो आनन्द रूप है और न ही आनन्दरहित है। उनके लिए वह चल, अचल, स्थिर, सत्, असत् भी नहीं है अथवा इसके मध्य की स्थिति वाला भी नहीं है। अखण्ड चेतनसत्ता सर्वव्यापक होते हुए भी उसी प्रकार दृष्टिगोचर नहीं होती, जिस प्रकार चित्त में आलोकित होने वाला आकाश सूक्ष्मता के कारण दिखाई नहीं देता ॥
Verse १००
सर्वसंकल्परहिता सर्वसंज्ञाविवर्जिता।सैषा चिदविनाशात्मा स्वात्मेत्यादिकृताभिधा॥
sarvasaṃkalparahitā sarvasaṃjñāvivarjitā।saiṣā cidavināśātmā svātmetyādikṛtābhidhā॥
VI-74(b)-75. By the prop of detachment and excellences like magnanimity, lift up your mind yourself perseveringly in order to enjoy the fruit of Brahmic freedom. Through detachment, it achieves perfection along the path of negation (of the object).
सभी संज्ञाओं से रहित और संकल्पों से रहित यह चिदात्मा अविनाशी तथा स्वात्मा आदि नामों से जाना जाता है। वह समस्त निर्मल संसार के रूप में एकमात्र स्वयं को ही दर्शाता है। ज्ञानियों की दृष्टि में वह आकाश से भी सौ गुना स्वच्छ, निर्मल तथा निष्कलरूप है। वह चेतनासत्ता न तो कभी उदय होती है और न ही अस्त होती है, वह गमन-आगमन से रहित, न उठती और न स्थिर बैठी ही रहती है। यह न तो यहाँ और न ही वहाँ ही है ॥
Verse १०१
आकाशशतभागाच्छा ज्ञेषु निष्कलरूपिणी । सकलामलसंसारस्वरूपैकात्मदर्शिनी॥
ākāśaśatabhāgācchā jñeṣu niṣkalarūpiṇī । sakalāmalasaṃsārasvarūpaikātmadarśinī॥
VI-74(b)-75. By the prop of detachment and excellences like magnanimity, lift up your mind yourself perseveringly in order to enjoy the fruit of Brahmic freedom. Through detachment, it achieves perfection along the path of negation (of the object).
सभी संज्ञाओं से रहित और संकल्पों से रहित यह चिदात्मा अविनाशी तथा स्वात्मा आदि नामों से जाना जाता है। वह समस्त निर्मल संसार के रूप में एकमात्र स्वयं को ही दर्शाता है। ज्ञानियों की दृष्टि में वह आकाश से भी सौ गुना स्वच्छ, निर्मल तथा निष्कलरूप है। वह चेतनासत्ता न तो कभी उदय होती है और न ही अस्त होती है, वह गमन-आगमन से रहित, न उठती और न स्थिर बैठी ही रहती है। यह न तो यहाँ और न ही वहाँ ही है ॥
Verse १०२
नास्तमेति न चोदेति नोत्तिष्ठति न तिष्ठति ।नच याति न चायाति न च नेह न चेह चित्॥
nāstameti na codeti nottiṣṭhati na tiṣṭhati ।naca yāti na cāyāti na ca neha na ceha cit॥
VI-76-77(a). (The mind, then) is emptied of all cravings as the pure lake is (of water) in the season of autumn. Why is not an intelligent man ashamed of clinging to the same dry routine of insipid actions, day after day?
सभी संज्ञाओं से रहित और संकल्पों से रहित यह चिदात्मा अविनाशी तथा स्वात्मा आदि नामों से जाना जाता है। वह समस्त निर्मल संसार के रूप में एकमात्र स्वयं को ही दर्शाता है। ज्ञानियों की दृष्टि में वह आकाश से भी सौ गुना स्वच्छ, निर्मल तथा निष्कलरूप है। वह चेतनासत्ता न तो कभी उदय होती है और न ही अस्त होती है, वह गमन-आगमन से रहित, न उठती और न स्थिर बैठी ही रहती है। यह न तो यहाँ और न ही वहाँ ही है ॥
Verse १०३
सैषा चिदमलाकारा निर्विकल्पा निरास्पदा॥
saiṣā cidamalākārā nirvikalpā nirāspadā॥
VI-76-77(a). (The mind, then) is emptied of all cravings as the pure lake is (of water) in the season of autumn. Why is not an intelligent man ashamed of clinging to the same dry routine of insipid actions, day after day?
वह चिदात्मा आश्रयहीन, विकल्परहित और शुद्धस्वरूप है। प्रारम्भ में शम-दम आदि गुणों द्वारा शिष्य के अन्तः का परिष्कार करना गुरु के लिए आवश्यक है, तत्पश्चात् उसे बोधस्वरूप यह ब्रह्मज्ञान प्रदान करे-यह सभी कुछ ब्रह्मरूप है और तुम निर्मल ब्रह्मरूप हो। अपरिपक्व बुद्धिवाले और अज्ञानी के समक्ष सब कुछ ब्रह्ममय है, ऐसा कहना उसे मानो घोर नरक में धकेलने की तरह है ॥ [ऋषि कहते हैं कि प्रारम्भ में शिष्य-साधक को अभेद का उपदेश नहीं करना चाहिए। इसे पहले वाञ्छित-अवांञ्छित का भेद बताकर शम-दम आदि द्वारा वित्त शुद्धि करानी चाहिए।जब तक चित्त शुद्ध नहीं हो जाता, तब तक अभेद समझाने के प्रयास में वह अवाञ्छित का त्याग कर पाता।आज के उपदेशक ऐसी को कुपथ्य दे बैठते हैं।]
Verse १०४
आदौ शमदमप्रायैर्गुणैः शिष्यं विशोधयेत्। पश्चात्सर्वमिदं ब्रह्म शुद्धस्त्वमिति बोधयेत् ॥
ādau śamadamaprāyairguṇaiḥ śiṣyaṃ viśodhayet। paścātsarvamidaṃ brahma śuddhastvamiti bodhayet ॥
VI-77(b). Bondage is fashioned by consciousness (as subject) and its objects; once free from these, liberation follows.
वह चिदात्मा आश्रयहीन, विकल्परहित और शुद्धस्वरूप है। प्रारम्भ में शम-दम आदि गुणों द्वारा शिष्य के अन्तः का परिष्कार करना गुरु के लिए आवश्यक है, तत्पश्चात् उसे बोधस्वरूप यह ब्रह्मज्ञान प्रदान करे-यह सभी कुछ ब्रह्मरूप है और तुम निर्मल ब्रह्मरूप हो। अपरिपक्व बुद्धिवाले और अज्ञानी के समक्ष सब कुछ ब्रह्ममय है, ऐसा कहना उसे मानो घोर नरक में धकेलने की तरह है ॥ [ऋषि कहते हैं कि प्रारम्भ में शिष्य-साधक को अभेद का उपदेश नहीं करना चाहिए। इसे पहले वाञ्छित-अवांञ्छित का भेद बताकर शम-दम आदि द्वारा वित्त शुद्धि करानी चाहिए।जब तक चित्त शुद्ध नहीं हो जाता, तब तक अभेद समझाने के प्रयास में वह अवाञ्छित का त्याग कर पाता।आज के उपदेशक ऐसी को कुपथ्य दे बैठते हैं।]
Verse १०५
अज्ञस्यार्थप्रबुद्धस्य सर्वं ब्रह्मेति यो वदेत्। महानरकजालेषु स तेन विनियोजितः।।
ajñasyārthaprabuddhasya sarvaṃ brahmeti yo vadet। mahānarakajāleṣu sa tena viniyojitaḥ।।
VI-78. "Consciousness (Spirit) is never an object; all is Self" - this is the essence of all Vedantic doctrines. Resorting to this sure doctrine, behold (the world), intellectually and freely.
वह चिदात्मा आश्रयहीन, विकल्परहित और शुद्धस्वरूप है। प्रारम्भ में शम-दम आदि गुणों द्वारा शिष्य के अन्तः का परिष्कार करना गुरु के लिए आवश्यक है, तत्पश्चात् उसे बोधस्वरूप यह ब्रह्मज्ञान प्रदान करे-यह सभी कुछ ब्रह्मरूप है और तुम निर्मल ब्रह्मरूप हो। अपरिपक्व बुद्धिवाले और अज्ञानी के समक्ष सब कुछ ब्रह्ममय है, ऐसा कहना उसे मानो घोर नरक में धकेलने की तरह है ॥ [ऋषि कहते हैं कि प्रारम्भ में शिष्य-साधक को अभेद का उपदेश नहीं करना चाहिए। इसे पहले वाञ्छित-अवांञ्छित का भेद बताकर शम-दम आदि द्वारा वित्त शुद्धि करानी चाहिए।जब तक चित्त शुद्ध नहीं हो जाता, तब तक अभेद समझाने के प्रयास में वह अवाञ्छित का त्याग कर पाता।आज के उपदेशक ऐसी को कुपथ्य दे बैठते हैं।]
Verse १०६
प्रबुद्धबुद्धेः प्रक्षीणभोगेच्छस्य निराशिषः । नास्त्यविद्यामलमिति प्राज्ञस्तूपदिशेद्गुरुः ।
prabuddhabuddheḥ prakṣīṇabhogecchasya nirāśiṣaḥ । nāstyavidyāmalamiti prājñastūpadiśedguruḥ ।
VI-79. "You will independently achieve the Self, the status of bliss (holding): I am Spirit, these worlds are Spirit, the directions (in Space) are Spirit; these manifested beings are Spirit".
जिसको भोग कामनाएँ क्षीण हो चुकी हैं, आकांक्षाएँ समाप्तप्राय हैं तथा बुद्धि जागरुक है, उसी को वेदान्त का उपदेश प्राज्ञ गुरु प्रदान करे। अविद्यारूपी विकार का कोई अस्तित्व नहीं। जैसे सूर्योदय होने पर दिवस, दीपक से प्रकाश तथा पुष्य से सुगन्धि की स्थिति का होना निश्चित है, वैसे ही चैतन्य पर संसार विद्यमान है ॥
Verse १०७
सति दीप इवालोकः सत्यर्क इव वासरः ।सति पुष्प इवामोदश्चिति सत्यं जगत्तथा ॥
sati dīpa ivālokaḥ satyarka iva vāsaraḥ ।sati puṣpa ivāmodaściti satyaṃ jagattathā ॥
VI-80-81. "I am the glory (mahas), devoid of objects and perceptions, wholly pure of form, eternally manifest, rid of all appearances, seer, witness, spirit, free from all objects, the full-orbed light in essence, for which no knowables exist, Knowledge pure and simple".
जिसको भोग कामनाएँ क्षीण हो चुकी हैं, आकांक्षाएँ समाप्तप्राय हैं तथा बुद्धि जागरुक है, उसी को वेदान्त का उपदेश प्राज्ञ गुरु प्रदान करे। अविद्यारूपी विकार का कोई अस्तित्व नहीं। जैसे सूर्योदय होने पर दिवस, दीपक से प्रकाश तथा पुष्य से सुगन्धि की स्थिति का होना निश्चित है, वैसे ही चैतन्य पर संसार विद्यमान है ॥
Verse १०८
प्रतिभासत एवेदं न जगत्परमार्थतः।ज्ञानदृष्टौ प्रसन्नायां प्रबोधविततोदये ॥
pratibhāsata evedaṃ na jagatparamārthataḥ।jñānadṛṣṭau prasannāyāṃ prabodhavitatodaye ॥
VI-80-81. "I am the glory (mahas), devoid of objects and perceptions, wholly pure of form, eternally manifest, rid of all appearances, seer, witness, spirit, free from all objects, the full-orbed light in essence, for which no knowables exist, Knowledge pure and simple".
वास्तव में यह संसार अस्तित्व रहित है, यह तो मात्र आभासित होता है। अब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि आवरण शून्य हो जायेगी और ज्ञान के प्रकाश से ओत-प्रोत होगी, ऐसे में तुम स्वयमेव अपने स्वरूप में स्थित हो जाओगे। तभी तों में उपदेश की सत्यता का भली प्रकार बोध होगा। हे ब्रह्मन्! सब दोषों को दूर करने वाली विद्या की प्राप्ति स्वार्थ भावना को विनष्ट करने के लिए प्रयत्नशील अविद्या द्वारा ही सम्भव होती है। अस्त्र द्वारा अस्त्र को निस्तेज किया जाता है और मल द्वारा मल धुलता है। विष द्वारा विष का शमन तथा शत्रु द्वारा शत्रु का हनन होता है। यह भूतमाया भी इसी प्रकार की है, जो अपने क्षय पर स्वयं हर्षित होती है ॥
Verse १०९
यथावज्ज्ञास्यसि स्वस्थो मद्वाग्वृष्टिबलाबलम्।अविद्ययैवोत्तमया स्वार्थनाशोधमार्थया॥
yathāvajjñāsyasi svastho madvāgvṛṣṭibalābalam।avidyayaivottamayā svārthanāśodhamārthayā॥
VI-82. "King of sages! With all mental constructions wiped out, all yearnings abolished, resort to the status of certitude and be self-established in the Self."
वास्तव में यह संसार अस्तित्व रहित है, यह तो मात्र आभासित होता है। अब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि आवरण शून्य हो जायेगी और ज्ञान के प्रकाश से ओत-प्रोत होगी, ऐसे में तुम स्वयमेव अपने स्वरूप में स्थित हो जाओगे। तभी तों में उपदेश की सत्यता का भली प्रकार बोध होगा। हे ब्रह्मन्! सब दोषों को दूर करने वाली विद्या की प्राप्ति स्वार्थ भावना को विनष्ट करने के लिए प्रयत्नशील अविद्या द्वारा ही सम्भव होती है। अस्त्र द्वारा अस्त्र को निस्तेज किया जाता है और मल द्वारा मल धुलता है। विष द्वारा विष का शमन तथा शत्रु द्वारा शत्रु का हनन होता है। यह भूतमाया भी इसी प्रकार की है, जो अपने क्षय पर स्वयं हर्षित होती है ॥
Verse ११०
विद्या संप्राप्यते ब्रह्मन्सर्वदोषापहारिणी। शाम्यति ह्यस्त्रमस्त्रेण मलेन क्षाल्यते मलम् ॥
vidyā saṃprāpyate brahmansarvadoṣāpahāriṇī। śāmyati hyastramastreṇa malena kṣālyate malam ॥
VI-83. The Brahmin seeker after Truth who dwells upon the Mahopanishad becomes a well versed Vedic scholar. (If) uninitiated, he becomes initiated; he becomes purified by fire, by air, by the sun, by the moon, by Truth, by all agents of purification. He becomes known to all gods; is cleaned (as if he has dipped) in all sacred waters. He dwells in the thoughts of all gods. He has (as it were) performed all sacrifices. To him accrue the fruits of having repeated the Gayatri sixty thousand times; of having repeated Itihasa and Puranas and Srirudra a Lac of times; of having repeated Omkara ten thousand times. He hollows the rows (of living beings) as far as the eye reaches; and seven generations both in the past and in the future. So declares Hiranyagarbha. 'Through repetition of sacred utterances one wins immortality' - this is the Mahopanishad.
वास्तव में यह संसार अस्तित्व रहित है, यह तो मात्र आभासित होता है। अब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि आवरण शून्य हो जायेगी और ज्ञान के प्रकाश से ओत-प्रोत होगी, ऐसे में तुम स्वयमेव अपने स्वरूप में स्थित हो जाओगे। तभी तों में उपदेश की सत्यता का भली प्रकार बोध होगा। हे ब्रह्मन्! सब दोषों को दूर करने वाली विद्या की प्राप्ति स्वार्थ भावना को विनष्ट करने के लिए प्रयत्नशील अविद्या द्वारा ही सम्भव होती है। अस्त्र द्वारा अस्त्र को निस्तेज किया जाता है और मल द्वारा मल धुलता है। विष द्वारा विष का शमन तथा शत्रु द्वारा शत्रु का हनन होता है। यह भूतमाया भी इसी प्रकार की है, जो अपने क्षय पर स्वयं हर्षित होती है ॥
Verse १११
शमं विषं विषेणैति रिपुणा हन्यते रिपुः ।ईदृशी भूतमायेयं या स्वनाशेन हर्षदा ॥
śamaṃ viṣaṃ viṣeṇaiti ripuṇā hanyate ripuḥ ।īdṛśī bhūtamāyeyaṃ yā svanāśena harṣadā ॥
unavailable
वास्तव में यह संसार अस्तित्व रहित है, यह तो मात्र आभासित होता है। अब तुम्हारी ज्ञान-दृष्टि आवरण शून्य हो जायेगी और ज्ञान के प्रकाश से ओत-प्रोत होगी, ऐसे में तुम स्वयमेव अपने स्वरूप में स्थित हो जाओगे। तभी तों में उपदेश की सत्यता का भली प्रकार बोध होगा। हे ब्रह्मन्! सब दोषों को दूर करने वाली विद्या की प्राप्ति स्वार्थ भावना को विनष्ट करने के लिए प्रयत्नशील अविद्या द्वारा ही सम्भव होती है। अस्त्र द्वारा अस्त्र को निस्तेज किया जाता है और मल द्वारा मल धुलता है। विष द्वारा विष का शमन तथा शत्रु द्वारा शत्रु का हनन होता है। यह भूतमाया भी इसी प्रकार की है, जो अपने क्षय पर स्वयं हर्षित होती है ॥
Verse ११२
न लक्ष्यते स्वभावोऽस्या वीक्ष्यमाणैव नश्यति । नास्त्येषा परमार्थेनेत्येवं भावनयेद्धया ॥
na lakṣyate svabhāvo'syā vīkṣyamāṇaiva naśyati । nāstyeṣā paramārthenetyevaṃ bhāvanayeddhayā ॥
unavailable
आसानी से इसका स्वरूप देखने में नहीं आता, परन्तु दिखाई देते ही यह नाश को प्राप्त होती है। भेद दृष्टि का होना ही अविद्या है, इसका सर्वथा त्याग करना ही कल्याणप्रद है। वस्तुतः माया का अस्तित्व है ही नहीं- सख कुछ ब्रह्ममय है, ऐसी दृढ़ निश्चय से की गई आन्तरिक भावना ही मोक्षप्राप्ति का उपाय है।।
पञ्चमोऽध्यायः (part 4)
Verse ११३
सर्वं ब्रहोति यस्यान्तर्भावना सा हि मुक्तिदा। भेददृष्टिरविद्येयं सर्वथा तां विसर्जयेत् ॥
sarvaṃ brahoti yasyāntarbhāvanā sā hi muktidā। bhedadṛṣṭiravidyeyaṃ sarvathā tāṃ visarjayet ॥
unavailable
आसानी से इसका स्वरूप देखने में नहीं आता, परन्तु दिखाई देते ही यह नाश को प्राप्त होती है। भेद दृष्टि का होना ही अविद्या है, इसका सर्वथा त्याग करना ही कल्याणप्रद है। वस्तुतः माया का अस्तित्व है ही नहीं- सख कुछ ब्रह्ममय है, ऐसी दृढ़ निश्चय से की गई आन्तरिक भावना ही मोक्षप्राप्ति का उपाय है।।
Verse ११४
मुने नासाद्यते तद्धि पदमक्षयमुच्यते ।कुतो जातेयमिति ते द्विज मास्तु विचारणा ॥
mune nāsādyate taddhi padamakṣayamucyate ।kuto jāteyamiti te dvija māstu vicāraṇā ॥
unavailable
हे मुनि श्रेष्ठ ! माया द्वारा जो नहीं पाया जाता, वह अक्षय पद के नाम से जाना जाता है। हे द्विज! इस माया की उत्पत्ति किससे हुई, इसके बारे में तुम्हें विचार नहीं करना चाहिए: अपितु विचार यही रहे कि किस प्रकार इसे नष्ट करूँ? इसके क्षीण होकर विनष्ट हो जाने पर तुम क्षयरहित पद को पा सकोगे। इसके प्रकट होने का लक्षण इसका स्वरूप और इसके नष्ट करने के उपाय पर विचार करते हुए इस रोग के मूलकारण के निदान का प्रयास करना चाहिए ॥
Verse ११५
इमां कथमहं हन्मीत्येषा तेऽस्तु विचारणा ।अस्तं गतायां क्षीणायामस्यां ज्ञास्यसि तत्पदम्॥
imāṃ kathamahaṃ hanmītyeṣā te'stu vicāraṇā ।astaṃ gatāyāṃ kṣīṇāyāmasyāṃ jñāsyasi tatpadam॥
unavailable
हे मुनि श्रेष्ठ ! माया द्वारा जो नहीं पाया जाता, वह अक्षय पद के नाम से जाना जाता है। हे द्विज! इस माया की उत्पत्ति किससे हुई, इसके बारे में तुम्हें विचार नहीं करना चाहिए: अपितु विचार यही रहे कि किस प्रकार इसे नष्ट करूँ? इसके क्षीण होकर विनष्ट हो जाने पर तुम क्षयरहित पद को पा सकोगे। इसके प्रकट होने का लक्षण इसका स्वरूप और इसके नष्ट करने के उपाय पर विचार करते हुए इस रोग के मूलकारण के निदान का प्रयास करना चाहिए ॥
Verse ११६
चत एषा यथा चैषा यथा नष्टेत्यखण्डितम् । तदस्या रोगशालाया यत्नं कुरु चिकित्सने ॥
cata eṣā yathā caiṣā yathā naṣṭetyakhaṇḍitam । tadasyā rogaśālāyā yatnaṃ kuru cikitsane ॥
unavailable
हे मुनि श्रेष्ठ ! माया द्वारा जो नहीं पाया जाता, वह अक्षय पद के नाम से जाना जाता है। हे द्विज! इस माया की उत्पत्ति किससे हुई, इसके बारे में तुम्हें विचार नहीं करना चाहिए: अपितु विचार यही रहे कि किस प्रकार इसे नष्ट करूँ? इसके क्षीण होकर विनष्ट हो जाने पर तुम क्षयरहित पद को पा सकोगे। इसके प्रकट होने का लक्षण इसका स्वरूप और इसके नष्ट करने के उपाय पर विचार करते हुए इस रोग के मूलकारण के निदान का प्रयास करना चाहिए ॥
Verse ११७
यसैषा जन्मदुःखेषु न भूयस्त्वां नियोक्ष्यति । स्वात्मनि स्वपरिस्पन्दैः स्फुरत्यच्छैश्चिदर्णवः ॥
yasaiṣā janmaduḥkheṣu na bhūyastvāṃ niyokṣyati । svātmani svaparispandaiḥ sphuratyacchaiścidarṇavaḥ ॥
unavailable
जिससे यह तुम्हें आवागमन के जन्मचक्र में बारम्बार न डाले और चित् रूपी समुद्र निर्मल आत्म - स्पन्दन से विभासित हो सके। यह चिदात्मा अविभाजित रूप वाली है, अपने भीतर इस प्रकार का दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यह चिदात्मा चिन्मय सागर में कुछ क्षोभयुक्त हो रही है। सागर में लहरों । तरफ निर्मल चिन्मय लहरें उठ रही हैं। आकाश सरोवर में जिस प्रकार वायु स्वयमेव लहराती है, उसी प्रकार अपनी आत्मा में आत्मबल से आत्मा तरंगित होती है। सर्वशक्तिमान् सत्ता द्वारा इस प्रकार की दैवी स्फुरणा क्षण मात्र के लिए होती है।।
Verse ११८
एकात्मकमखण्डं तदित्यन्तर्भाव्यतां दृढम्।किंचित्क्षुभितरूपा सा चिच्छक्तिश्चिन्मयार्णवे ॥
ekātmakamakhaṇḍaṃ tadityantarbhāvyatāṃ dṛḍham।kiṃcitkṣubhitarūpā sā cicchaktiścinmayārṇave ॥
unavailable
जिससे यह तुम्हें आवागमन के जन्मचक्र में बारम्बार न डाले और चित् रूपी समुद्र निर्मल आत्म - स्पन्दन से विभासित हो सके। यह चिदात्मा अविभाजित रूप वाली है, अपने भीतर इस प्रकार का दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यह चिदात्मा चिन्मय सागर में कुछ क्षोभयुक्त हो रही है। सागर में लहरों । तरफ निर्मल चिन्मय लहरें उठ रही हैं। आकाश सरोवर में जिस प्रकार वायु स्वयमेव लहराती है, उसी प्रकार अपनी आत्मा में आत्मबल से आत्मा तरंगित होती है। सर्वशक्तिमान् सत्ता द्वारा इस प्रकार की दैवी स्फुरणा क्षण मात्र के लिए होती है।।
Verse ११९
तन्मयैव स्फुरत्यच्छा तत्रैवोर्मिरिवार्णवे। आत्मन्येवात्मना व्योग्नि यथा सरसि मारुतः ॥
tanmayaiva sphuratyacchā tatraivormirivārṇave। ātmanyevātmanā vyogni yathā sarasi mārutaḥ ॥
unavailable
जिससे यह तुम्हें आवागमन के जन्मचक्र में बारम्बार न डाले और चित् रूपी समुद्र निर्मल आत्म - स्पन्दन से विभासित हो सके। यह चिदात्मा अविभाजित रूप वाली है, अपने भीतर इस प्रकार का दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यह चिदात्मा चिन्मय सागर में कुछ क्षोभयुक्त हो रही है। सागर में लहरों । तरफ निर्मल चिन्मय लहरें उठ रही हैं। आकाश सरोवर में जिस प्रकार वायु स्वयमेव लहराती है, उसी प्रकार अपनी आत्मा में आत्मबल से आत्मा तरंगित होती है। सर्वशक्तिमान् सत्ता द्वारा इस प्रकार की दैवी स्फुरणा क्षण मात्र के लिए होती है।।
Verse १२०
तथैवात्मात्मशक्त्यैव स्वात्मन्येवैति लोलताम्।क्षणं स्फुरति सा दैवी सर्वशक्तितया तथा ॥
tathaivātmātmaśaktyaiva svātmanyevaiti lolatām।kṣaṇaṃ sphurati sā daivī sarvaśaktitayā tathā ॥
unavailable
जिससे यह तुम्हें आवागमन के जन्मचक्र में बारम्बार न डाले और चित् रूपी समुद्र निर्मल आत्म - स्पन्दन से विभासित हो सके। यह चिदात्मा अविभाजित रूप वाली है, अपने भीतर इस प्रकार का दृढ़ निश्चय करना चाहिए। यह चिदात्मा चिन्मय सागर में कुछ क्षोभयुक्त हो रही है। सागर में लहरों । तरफ निर्मल चिन्मय लहरें उठ रही हैं। आकाश सरोवर में जिस प्रकार वायु स्वयमेव लहराती है, उसी प्रकार अपनी आत्मा में आत्मबल से आत्मा तरंगित होती है। सर्वशक्तिमान् सत्ता द्वारा इस प्रकार की दैवी स्फुरणा क्षण मात्र के लिए होती है।।
Verse १२१
देशकालक्रियाशक्तिर्न यस्याः संप्रकर्षणे।स्वस्वभावं विदित्वोच्चैरप्यनन्तपदे स्थिता ॥
deśakālakriyāśaktirna yasyāḥ saṃprakarṣaṇe।svasvabhāvaṃ viditvoccairapyanantapade sthitā ॥
unavailable
जिस चेतनशक्ति को देश, काल और क्रियाशक्ति चलायमान करने में अक्षम है, वही चेतनशक्ति अपनी स्वाभाविक स्थिति को जानकर उच्च अनन्त पद पर प्रतिष्ठित है ॥
Verse १२२
रूपं परिमितेनासौ भावयत्यविभाविता।यदैवं भावितं रूपं तया परमकान्तया ॥
rūpaṃ parimitenāsau bhāvayatyavibhāvitā।yadaivaṃ bhāvitaṃ rūpaṃ tayā paramakāntayā ॥
unavailable
यह चेतन शक्ति अज्ञान स्थिति में सीमित सी होकर रूप भावना वाली होती है । उस विलक्षण परमसत्ता में जब रूप की भावना समाविष्ट होती है। उस समय उसके साथ नाम और संख्या आदि उपाधियाँ जुड़ जाती हैं ।।
Verse १२३
तदैवैनामनुगता नामसंख्यादिका दृशः । विकल्पकलिताकारं देशकालक्रियास्पदम् ॥
tadaivaināmanugatā nāmasaṃkhyādikā dṛśaḥ । vikalpakalitākāraṃ deśakālakriyāspadam ॥
unavailable
यह चेतन शक्ति अज्ञान स्थिति में सीमित सी होकर रूप भावना वाली होती है । उस विलक्षण परमसत्ता में जब रूप की भावना समाविष्ट होती है। उस समय उसके साथ नाम और संख्या आदि उपाधियाँ जुड़ जाती हैं ।।
Verse १२४
चितो रूपमिदं ब्रह्मक्षेत्रज्ञ इति कथ्यते ।वासनाः कल्पयन्सोऽपि यात्यहंकारतां पुनः ।।
cito rūpamidaṃ brahmakṣetrajña iti kathyate ।vāsanāḥ kalpayanso'pi yātyahaṃkāratāṃ punaḥ ।।
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हे ब्रह्मन्! चेतनशक्ति का वह रूप जो देश, काल और क्रिया का आश्रयरूप है तथा विकल्परूप को ग्रहण करने वाला है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है । पुनः वही वासनात्मक चिन्तन से अहंकाररूप कहा जाता है। जब अहंकार भी निश्चयात्मक और दोषपूर्ण हो जाता है, तो बुद्धि कहलाता है। बुद्धि भी जब संकल्परूप में परिणत हो जाती है, तो मननशील मन का रूप धारण करती है ॥
Verse १२५
अहंकारो विनिर्णेता कलङ्की बुद्धिरुच्यते । बुद्धिः संकल्पिताकारा प्रयाति मननास्पदम् ॥
ahaṃkāro vinirṇetā kalaṅkī buddhirucyate । buddhiḥ saṃkalpitākārā prayāti mananāspadam ॥
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हे ब्रह्मन्! चेतनशक्ति का वह रूप जो देश, काल और क्रिया का आश्रयरूप है तथा विकल्परूप को ग्रहण करने वाला है, वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है । पुनः वही वासनात्मक चिन्तन से अहंकाररूप कहा जाता है। जब अहंकार भी निश्चयात्मक और दोषपूर्ण हो जाता है, तो बुद्धि कहलाता है। बुद्धि भी जब संकल्परूप में परिणत हो जाती है, तो मननशील मन का रूप धारण करती है ॥
Verse १२६
मनो घनविकल्पं तु गच्छतीन्द्रियतां शनैः । पाणिपादमयं देहमिन्द्रियाणि विदुर्बुधाः ।।
mano ghanavikalpaṃ tu gacchatīndriyatāṃ śanaiḥ । pāṇipādamayaṃ dehamindriyāṇi vidurbudhāḥ ।।
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मन के गहरे विकल्प में डूबने पर धीरे-धीरे इन्द्रियस्वरूप की झलक मिलती है। मेधावी पुरुष हस्तपाद युक्त स्थूल शरीर को ही इन्द्रिय मानते हैं।।
Verse १२७
एवं जीवो हि संकल्पवासनारज्जुवेष्टितः।दुःखजालपरीतात्मा क्रमादायाति नीचताम् ॥
evaṃ jīvo hi saṃkalpavāsanārajjuveṣṭitaḥ।duḥkhajālaparītātmā kramādāyāti nīcatām ॥
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संकल्प और वासना की रस्सी से बँधा हुआ जीव दुःख-जाल में फँसकर निरन्तर दुर्गति की ओर बढ़ता है। रेशम बनाने वाले कीड़े की तरह शक्तिमय चित् घनीभूत अहंभाव को प्राप्त करके स्वेच्छा से बन्धन में बँधता है ॥
Verse १२८
इति शक्तिमयं चेतो घनाहंकारतां गतम्। कोशकारक्रिमिरिव स्वेच्छया याति बन्धनम्॥
iti śaktimayaṃ ceto ghanāhaṃkāratāṃ gatam। kośakārakrimiriva svecchayā yāti bandhanam॥
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संकल्प और वासना की रस्सी से बँधा हुआ जीव दुःख-जाल में फँसकर निरन्तर दुर्गति की ओर बढ़ता है। रेशम बनाने वाले कीड़े की तरह शक्तिमय चित् घनीभूत अहंभाव को प्राप्त करके स्वेच्छा से बन्धन में बँधता है ॥
Verse १२९
स्वयं कल्पिततन्मात्राजालाभ्यन्तरवर्ति च।परां विवशतामेति शृङ्खलाबद्धसिंहवत्॥
svayaṃ kalpitatanmātrājālābhyantaravarti ca।parāṃ vivaśatāmeti śṛṅkhalābaddhasiṃhavat॥
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चितृशक्ति अपने ही द्वारा संकल्पित तन्मात्रा रूपी पाश में जकड़कर जंजीर से बँधे हुए सिंह के समान अत्यन्त लाचार हो जाती है ॥
Verse १३०
क्वचिन्मनः क्वचिदबुद्धिः क्वचिज्ज्ञानं क्वचित्क्रिया।क्वचिदेतदहंकारः क्वचिच्चित्तमिति स्मृतम्॥
kvacinmanaḥ kvacidabuddhiḥ kvacijjñānaṃ kvacitkriyā।kvacidetadahaṃkāraḥ kvaciccittamiti smṛtam॥
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इसी आत्मा को कहीं मन, कहीं बुद्धि, कहीं ज्ञान, कहीं क्रिया, कहीं अहंकार और कहीं चित्तरूप में जाना जाता है। यही कहीं प्रकृति और कहीं माया कहलाती है। कहीं बन्धन तो कहीं पुर्यष्टक (सूक्ष्मशरीर) कहा जाता है। इसे कहीं अविद्या और कहीं इच्छा नाम से जाना जाता है॥
Verse १३१
क्वचित्प्रकृतिरित्युक्तं क्वचिन्मायेति कल्पितम्।क्वचिन्मलमिति प्रोक्तं क्वचित्कर्मेति संस्मृतम्॥
kvacitprakṛtirityuktaṃ kvacinmāyeti kalpitam।kvacinmalamiti proktaṃ kvacitkarmeti saṃsmṛtam॥
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इसी आत्मा को कहीं मन, कहीं बुद्धि, कहीं ज्ञान, कहीं क्रिया, कहीं अहंकार और कहीं चित्तरूप में जाना जाता है। यही कहीं प्रकृति और कहीं माया कहलाती है। कहीं बन्धन तो कहीं पुर्यष्टक (सूक्ष्मशरीर) कहा जाता है। इसे कहीं अविद्या और कहीं इच्छा नाम से जाना जाता है॥
Verse १३२
क्वचिद्बन्ध इति ख्यातं क्वचित्पुर्यष्टकं स्मृतम्।प्रोक्तं क्वचिदविद्येति क्वचिदिच्छेति संमतम् ॥
kvacidbandha iti khyātaṃ kvacitpuryaṣṭakaṃ smṛtam।proktaṃ kvacidavidyeti kvacidiccheti saṃmatam ॥
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इसी आत्मा को कहीं मन, कहीं बुद्धि, कहीं ज्ञान, कहीं क्रिया, कहीं अहंकार और कहीं चित्तरूप में जाना जाता है। यही कहीं प्रकृति और कहीं माया कहलाती है। कहीं बन्धन तो कहीं पुर्यष्टक (सूक्ष्मशरीर) कहा जाता है। इसे कहीं अविद्या और कहीं इच्छा नाम से जाना जाता है॥
Verse १३३
इमं संसारमखिलमाशापाशविधायकम् । दधदन्त:फलैर्हीनं वटधाना वटं यथा ॥
imaṃ saṃsāramakhilamāśāpāśavidhāyakam । dadhadanta:phalairhīnaṃ vaṭadhānā vaṭaṃ yathā ॥
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यह आशा रूपी जाल का रचयिता सम्पूर्ण विश्व को वैसे ही धारण करता है, जैसे फलरहित वट का बीज वटवृक्ष को धारण करता है ॥
Verse १३४
चिन्तानलशिखादग्धं कोपाजगरचर्वितम्।कामाब्धिकल्लोलरतं विस्मृतात्मपितामहम्॥
cintānalaśikhādagdhaṃ kopājagaracarvitam।kāmābdhikallolarataṃ vismṛtātmapitāmaham॥
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यह मन चिन्तारूपी अग्निज्वाला से दग्ध हुआ, क्रोधरूपी अजगर द्वारा काटा गया और कामरूपी सागर के भंवर में फँसा हुआ है, यह अपने पितामह आत्मा को विस्मृत कर चुका है ॥
Verse १३५
समुद्धर मनो ब्रह्मन्मातङ्गमिव कर्दमात्।एवं जीवाश्रिता भावा भवभावनयाहिताः ॥
samuddhara mano brahmanmātaṅgamiva kardamāt।evaṃ jīvāśritā bhāvā bhavabhāvanayāhitāḥ ॥
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हे ब्रह्मन् ! कीचड़ (दल-दल) में फँसे हाथी के समान ही इस मन का उद्धार करो। जीव के आश्रित भाव ब्रह्म द्वारा लाखों; करोड़ों तथा असंख्य रूपों में कल्पित होकर पहले भी पैदा हो चुके हैं और आज भी पैदा हो रहे हैं तथा निर्झर से जलबिन्दुओं की उत्पत्ति के समान और भी उत्पन्न होते रहेंगे। कुछ प्रथम बार, कुछ सौ से अधिक बार, कुछ असंख्य बार जन्म धारण कर चुके हैं और किन्हीं के तो दो-तीन ही जन्म हुए हैं। कोई किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर एवं नागरूप में उत्पन्न हैं ।।
Verse १३६
ब्रह्मणा कल्पिताकारा लक्षशोऽप्यथ कोटिशः।संख्यातीताः पुरा जाता जायन्तेऽद्यापि चाभितः ।।
brahmaṇā kalpitākārā lakṣaśo'pyatha koṭiśaḥ।saṃkhyātītāḥ purā jātā jāyante'dyāpi cābhitaḥ ।।
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हे ब्रह्मन् ! कीचड़ (दल-दल) में फँसे हाथी के समान ही इस मन का उद्धार करो। जीव के आश्रित भाव ब्रह्म द्वारा लाखों; करोड़ों तथा असंख्य रूपों में कल्पित होकर पहले भी पैदा हो चुके हैं और आज भी पैदा हो रहे हैं तथा निर्झर से जलबिन्दुओं की उत्पत्ति के समान और भी उत्पन्न होते रहेंगे। कुछ प्रथम बार, कुछ सौ से अधिक बार, कुछ असंख्य बार जन्म धारण कर चुके हैं और किन्हीं के तो दो-तीन ही जन्म हुए हैं। कोई किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर एवं नागरूप में उत्पन्न हैं ।।
Verse १३७
उत्पत्स्यन्तेऽपि चैवान्ये कणौघा इव निर्झरात्। केचित्प्रथमजन्मानः केचिज्जन्मशताधिकाः ॥
utpatsyante'pi caivānye kaṇaughā iva nirjharāt। kecitprathamajanmānaḥ kecijjanmaśatādhikāḥ ॥
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हे ब्रह्मन् ! कीचड़ (दल-दल) में फँसे हाथी के समान ही इस मन का उद्धार करो। जीव के आश्रित भाव ब्रह्म द्वारा लाखों; करोड़ों तथा असंख्य रूपों में कल्पित होकर पहले भी पैदा हो चुके हैं और आज भी पैदा हो रहे हैं तथा निर्झर से जलबिन्दुओं की उत्पत्ति के समान और भी उत्पन्न होते रहेंगे। कुछ प्रथम बार, कुछ सौ से अधिक बार, कुछ असंख्य बार जन्म धारण कर चुके हैं और किन्हीं के तो दो-तीन ही जन्म हुए हैं। कोई किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर एवं नागरूप में उत्पन्न हैं ।।
Verse १३८
केचिच्यासंख्यजन्मानः केचिद्वित्रिभवान्तराः । केचित्किन्नरगन्धर्वविद्याधरमहोरगाः ।।
kecicyāsaṃkhyajanmānaḥ kecidvitribhavāntarāḥ । kecitkinnaragandharvavidyādharamahoragāḥ ।।
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हे ब्रह्मन् ! कीचड़ (दल-दल) में फँसे हाथी के समान ही इस मन का उद्धार करो। जीव के आश्रित भाव ब्रह्म द्वारा लाखों; करोड़ों तथा असंख्य रूपों में कल्पित होकर पहले भी पैदा हो चुके हैं और आज भी पैदा हो रहे हैं तथा निर्झर से जलबिन्दुओं की उत्पत्ति के समान और भी उत्पन्न होते रहेंगे। कुछ प्रथम बार, कुछ सौ से अधिक बार, कुछ असंख्य बार जन्म धारण कर चुके हैं और किन्हीं के तो दो-तीन ही जन्म हुए हैं। कोई किन्नर, गन्धर्व, विद्याधर एवं नागरूप में उत्पन्न हैं ।।
Verse १३९
केचिदर्केन्दुवरुणास्त्र्यक्षाधोक्षजपद्मजाः । केचिद्ब्राह्मणभूपालवैश्यशूद्रगणाः स्थिताः ।।
kecidarkenduvaruṇāstryakṣādhokṣajapadmajāḥ । kecidbrāhmaṇabhūpālavaiśyaśūdragaṇāḥ sthitāḥ ।।
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कोई सूर्य, चन्द्र, वरुण, हरि, शिव एवं ब्रह्मरूप धारण किये हुए हैं। कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि रूप में स्थित हैं। कोई औषधि, तृण, वृक्ष, फल, मूल एवं पत्ते के रूप में हैं। तो कोई जम्बीर (नींबू), कदम्ब, आम, ताड़ तथा तमाल पेड़ के रूप में हैं। कुछ महेन्द्र, मलय, सह्य, मन्दर, मेरु आदि पर्वतों के रूप में विद्यमान हैं। कोई खारे सागर, कोई दूध, घृत, गन्ने के रस तथा जलराशि के रूप में स्थित हैं ॥
Verse १४०
केचित्तृणौषधीवृक्षफलमूलपतङ्गकाः । केचित्कदम्बजम्बीरसालतालतमालकाः ॥
kecittṛṇauṣadhīvṛkṣaphalamūlapataṅgakāḥ । kecitkadambajambīrasālatālatamālakāḥ ॥
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कोई सूर्य, चन्द्र, वरुण, हरि, शिव एवं ब्रह्मरूप धारण किये हुए हैं। कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि रूप में स्थित हैं। कोई औषधि, तृण, वृक्ष, फल, मूल एवं पत्ते के रूप में हैं। तो कोई जम्बीर (नींबू), कदम्ब, आम, ताड़ तथा तमाल पेड़ के रूप में हैं। कुछ महेन्द्र, मलय, सह्य, मन्दर, मेरु आदि पर्वतों के रूप में विद्यमान हैं। कोई खारे सागर, कोई दूध, घृत, गन्ने के रस तथा जलराशि के रूप में स्थित हैं ॥
Verse १४१
केचिन्महेन्द्रमलयसह्यमन्दरमेरवः । केचित्क्षारोदधिक्षीरघृतेक्षुजलराशयः ॥
kecinmahendramalayasahyamandarameravaḥ । kecitkṣārodadhikṣīraghṛtekṣujalarāśayaḥ ॥
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कोई सूर्य, चन्द्र, वरुण, हरि, शिव एवं ब्रह्मरूप धारण किये हुए हैं। कुछ ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आदि रूप में स्थित हैं। कोई औषधि, तृण, वृक्ष, फल, मूल एवं पत्ते के रूप में हैं। तो कोई जम्बीर (नींबू), कदम्ब, आम, ताड़ तथा तमाल पेड़ के रूप में हैं। कुछ महेन्द्र, मलय, सह्य, मन्दर, मेरु आदि पर्वतों के रूप में विद्यमान हैं। कोई खारे सागर, कोई दूध, घृत, गन्ने के रस तथा जलराशि के रूप में स्थित हैं ॥
Verse १४२
केचिद्विशालाः ककुभः केचिन्नद्यो महारयाः विहरन्त्युच्चकैः केचिन्निपतन्त्युत्पतन्ति च ॥
kecidviśālāḥ kakubhaḥ kecinnadyo mahārayāḥ viharantyuccakaiḥ kecinnipatantyutpatanti ca ॥
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कोई द्रुतवेग वाली नदियों के रूप में प्रवाहित हैं, तो कोई विस्तृत दिशाओं का रूप धारण किये हुए हैं। कुछ ऊपर उठते हैं.कुछ नीचे गिरते हैं तथा कुछ पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। हाथ से गेंद को बार-बार गिराने- उछालने के समान कुछ मृत्यु द्वारा ताड़ित होकर आसमान में उठते और गिरते रहते हैं। अनेक ऐसे हैं जो विवेकवान् होकर भी शुभकर्म करते और हजारों जन्म ग्रहण कर लेने पर भी उनका संसार सागर से आवागमन नहीं मिटता । दिशा और काल से अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व जब अपनी सामर्थ्य से शरीर धारण करता है, तब यही जीव वासना के वशीभूत होकर संकल्प को ओर जाने वाले चञ्चल मन का रूप ग्रहण कर लेता है। वह संकल्प से युक्त मन:शक्ति क्षणमात्र में ही स्वच्छ करा की भावना करती है, उसमें शब्दबीज अंकुरित होने लगते हैं। तत्पश्चात् वही मन अधिक सघन होकर घने स्पन्दन के क्रम से वायुस्पन्दन की भावना में लीन होता है।।
Verse १४३
कन्दुका इव हस्तेन मृत्युनाऽविरतं हताः।भुक्त्वा जन्मसहस्त्राणि भूयः संसारसंकटे॥
kandukā iva hastena mṛtyunā'virataṃ hatāḥ।bhuktvā janmasahastrāṇi bhūyaḥ saṃsārasaṃkaṭe॥
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कोई द्रुतवेग वाली नदियों के रूप में प्रवाहित हैं, तो कोई विस्तृत दिशाओं का रूप धारण किये हुए हैं। कुछ ऊपर उठते हैं.कुछ नीचे गिरते हैं तथा कुछ पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। हाथ से गेंद को बार-बार गिराने- उछालने के समान कुछ मृत्यु द्वारा ताड़ित होकर आसमान में उठते और गिरते रहते हैं। अनेक ऐसे हैं जो विवेकवान् होकर भी शुभकर्म करते और हजारों जन्म ग्रहण कर लेने पर भी उनका संसार सागर से आवागमन नहीं मिटता । दिशा और काल से अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व जब अपनी सामर्थ्य से शरीर धारण करता है, तब यही जीव वासना के वशीभूत होकर संकल्प को ओर जाने वाले चञ्चल मन का रूप ग्रहण कर लेता है। वह संकल्प से युक्त मन:शक्ति क्षणमात्र में ही स्वच्छ करा की भावना करती है, उसमें शब्दबीज अंकुरित होने लगते हैं। तत्पश्चात् वही मन अधिक सघन होकर घने स्पन्दन के क्रम से वायुस्पन्दन की भावना में लीन होता है।।
Verse १४४
पतन्ति केचिदबुधाः संप्राप्यापि विवेकताम्। दिक्कालाद्यनवच्छिन्नमात्मतत्त्वं स्वशक्तितः ॥
patanti kecidabudhāḥ saṃprāpyāpi vivekatām। dikkālādyanavacchinnamātmatattvaṃ svaśaktitaḥ ॥
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कोई द्रुतवेग वाली नदियों के रूप में प्रवाहित हैं, तो कोई विस्तृत दिशाओं का रूप धारण किये हुए हैं। कुछ ऊपर उठते हैं.कुछ नीचे गिरते हैं तथा कुछ पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। हाथ से गेंद को बार-बार गिराने- उछालने के समान कुछ मृत्यु द्वारा ताड़ित होकर आसमान में उठते और गिरते रहते हैं। अनेक ऐसे हैं जो विवेकवान् होकर भी शुभकर्म करते और हजारों जन्म ग्रहण कर लेने पर भी उनका संसार सागर से आवागमन नहीं मिटता । दिशा और काल से अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व जब अपनी सामर्थ्य से शरीर धारण करता है, तब यही जीव वासना के वशीभूत होकर संकल्प को ओर जाने वाले चञ्चल मन का रूप ग्रहण कर लेता है। वह संकल्प से युक्त मन:शक्ति क्षणमात्र में ही स्वच्छ करा की भावना करती है, उसमें शब्दबीज अंकुरित होने लगते हैं। तत्पश्चात् वही मन अधिक सघन होकर घने स्पन्दन के क्रम से वायुस्पन्दन की भावना में लीन होता है।।
Verse १४५
लीलयैव यदादत्ते दिक्कालकलितं वपुः ।तदेव जीवपर्यायवासनावेशतः परम्॥
līlayaiva yadādatte dikkālakalitaṃ vapuḥ ।tadeva jīvaparyāyavāsanāveśataḥ param॥
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कोई द्रुतवेग वाली नदियों के रूप में प्रवाहित हैं, तो कोई विस्तृत दिशाओं का रूप धारण किये हुए हैं। कुछ ऊपर उठते हैं.कुछ नीचे गिरते हैं तथा कुछ पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। हाथ से गेंद को बार-बार गिराने- उछालने के समान कुछ मृत्यु द्वारा ताड़ित होकर आसमान में उठते और गिरते रहते हैं। अनेक ऐसे हैं जो विवेकवान् होकर भी शुभकर्म करते और हजारों जन्म ग्रहण कर लेने पर भी उनका संसार सागर से आवागमन नहीं मिटता । दिशा और काल से अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व जब अपनी सामर्थ्य से शरीर धारण करता है, तब यही जीव वासना के वशीभूत होकर संकल्प को ओर जाने वाले चञ्चल मन का रूप ग्रहण कर लेता है। वह संकल्प से युक्त मन:शक्ति क्षणमात्र में ही स्वच्छ करा की भावना करती है, उसमें शब्दबीज अंकुरित होने लगते हैं। तत्पश्चात् वही मन अधिक सघन होकर घने स्पन्दन के क्रम से वायुस्पन्दन की भावना में लीन होता है।।
Verse १४६
मनः संपद्यते लोलं कलनाकलनोन्मुखम्। कलयन्ती मन:शक्तिरादौ भावयति क्षणात्॥
manaḥ saṃpadyate lolaṃ kalanākalanonmukham। kalayantī mana:śaktirādau bhāvayati kṣaṇāt॥
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कोई द्रुतवेग वाली नदियों के रूप में प्रवाहित हैं, तो कोई विस्तृत दिशाओं का रूप धारण किये हुए हैं। कुछ ऊपर उठते हैं.कुछ नीचे गिरते हैं तथा कुछ पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। हाथ से गेंद को बार-बार गिराने- उछालने के समान कुछ मृत्यु द्वारा ताड़ित होकर आसमान में उठते और गिरते रहते हैं। अनेक ऐसे हैं जो विवेकवान् होकर भी शुभकर्म करते और हजारों जन्म ग्रहण कर लेने पर भी उनका संसार सागर से आवागमन नहीं मिटता । दिशा और काल से अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व जब अपनी सामर्थ्य से शरीर धारण करता है, तब यही जीव वासना के वशीभूत होकर संकल्प को ओर जाने वाले चञ्चल मन का रूप ग्रहण कर लेता है। वह संकल्प से युक्त मन:शक्ति क्षणमात्र में ही स्वच्छ करा की भावना करती है, उसमें शब्दबीज अंकुरित होने लगते हैं। तत्पश्चात् वही मन अधिक सघन होकर घने स्पन्दन के क्रम से वायुस्पन्दन की भावना में लीन होता है।।
Verse १४७
आकाशभावनामच्छां शब्दबीजरसोन्मुखीम् । ततस्तनद्घनतां यातं घनस्पन्दक्रमान्मनः ॥
ākāśabhāvanāmacchāṃ śabdabījarasonmukhīm । tatastanadghanatāṃ yātaṃ ghanaspandakramānmanaḥ ॥
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कोई द्रुतवेग वाली नदियों के रूप में प्रवाहित हैं, तो कोई विस्तृत दिशाओं का रूप धारण किये हुए हैं। कुछ ऊपर उठते हैं.कुछ नीचे गिरते हैं तथा कुछ पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। हाथ से गेंद को बार-बार गिराने- उछालने के समान कुछ मृत्यु द्वारा ताड़ित होकर आसमान में उठते और गिरते रहते हैं। अनेक ऐसे हैं जो विवेकवान् होकर भी शुभकर्म करते और हजारों जन्म ग्रहण कर लेने पर भी उनका संसार सागर से आवागमन नहीं मिटता । दिशा और काल से अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व जब अपनी सामर्थ्य से शरीर धारण करता है, तब यही जीव वासना के वशीभूत होकर संकल्प को ओर जाने वाले चञ्चल मन का रूप ग्रहण कर लेता है। वह संकल्प से युक्त मन:शक्ति क्षणमात्र में ही स्वच्छ करा की भावना करती है, उसमें शब्दबीज अंकुरित होने लगते हैं। तत्पश्चात् वही मन अधिक सघन होकर घने स्पन्दन के क्रम से वायुस्पन्दन की भावना में लीन होता है।।
Verse १४८
भावयत्यनिलस्पन्दं स्पर्शबीजरसोन्मुखम् । ताभ्यामाकाशवाताभ्यां दृढाभ्यासवशात्ततः ॥
bhāvayatyanilaspandaṃ sparśabījarasonmukham । tābhyāmākāśavātābhyāṃ dṛḍhābhyāsavaśāttataḥ ॥
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कोई द्रुतवेग वाली नदियों के रूप में प्रवाहित हैं, तो कोई विस्तृत दिशाओं का रूप धारण किये हुए हैं। कुछ ऊपर उठते हैं.कुछ नीचे गिरते हैं तथा कुछ पुनः ऊर्ध्वगमन करते हैं। हाथ से गेंद को बार-बार गिराने- उछालने के समान कुछ मृत्यु द्वारा ताड़ित होकर आसमान में उठते और गिरते रहते हैं। अनेक ऐसे हैं जो विवेकवान् होकर भी शुभकर्म करते और हजारों जन्म ग्रहण कर लेने पर भी उनका संसार सागर से आवागमन नहीं मिटता । दिशा और काल से अनवच्छिन्न आत्मतत्त्व जब अपनी सामर्थ्य से शरीर धारण करता है, तब यही जीव वासना के वशीभूत होकर संकल्प को ओर जाने वाले चञ्चल मन का रूप ग्रहण कर लेता है। वह संकल्प से युक्त मन:शक्ति क्षणमात्र में ही स्वच्छ करा की भावना करती है, उसमें शब्दबीज अंकुरित होने लगते हैं। तत्पश्चात् वही मन अधिक सघन होकर घने स्पन्दन के क्रम से वायुस्पन्दन की भावना में लीन होता है।।
Verse १४९
शब्दस्पर्शस्वरूपाभ्यां संघर्षाज्जन्यतेऽनलः। रूपतन्मात्रसहितं त्रिभिस्तैः सह संमितम्॥
śabdasparśasvarūpābhyāṃ saṃgharṣājjanyate'nalaḥ। rūpatanmātrasahitaṃ tribhistaiḥ saha saṃmitam॥
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उसमें स्पर्शरूप बीज के अंकुर फूटते हैं। उसके बाद दृढ़ अभ्यास द्वारा शब्द-स्पर्श रूप आकाश एवं वायु के टकराने से अग्नि उत्पन्न होती है। तीनों गुणों से ओत-प्रोत मन रस तन्मात्रा की अनुभूति करता हुआ क्षण भर में जल की ठण्डक का विचार करता है, इससे उसे जल का अनुभव होता है ॥[आकाश में वायु की गतिशीलता से जो घर्षण क्रिया होती है। उससे विद्युत् विभव ( इलैक्ट्रिकल चार्ज) के रूप में अग्नि का उद्भव होता है। वायु के घटकों (हाइड्रोजन+आक्सीजन) को अग्नि संयुक्त करके जल रूप देता है। विज्ञान वह क्रिया स्थूल पदार्थ रूप में ही समझ पाता है, ऋषि इसे सूक्ष्म तन्मात्राओं के रूप में भी अनुभव करते हैं।]
Verse १५०
मनस्तादृग्गुणगतं रसतन्मात्रवेदनम् । क्षणाच्चेतत्यपां शैत्यं जलसंवित्ततो भवेत्॥
manastādṛgguṇagataṃ rasatanmātravedanam । kṣaṇāccetatyapāṃ śaityaṃ jalasaṃvittato bhavet॥
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उसमें स्पर्शरूप बीज के अंकुर फूटते हैं। उसके बाद दृढ़ अभ्यास द्वारा शब्द-स्पर्श रूप आकाश एवं वायु के टकराने से अग्नि उत्पन्न होती है। तीनों गुणों से ओत-प्रोत मन रस तन्मात्रा की अनुभूति करता हुआ क्षण भर में जल की ठण्डक का विचार करता है, इससे उसे जल का अनुभव होता है ॥[आकाश में वायु की गतिशीलता से जो घर्षण क्रिया होती है। उससे विद्युत् विभव ( इलैक्ट्रिकल चार्ज) के रूप में अग्नि का उद्भव होता है। वायु के घटकों (हाइड्रोजन+आक्सीजन) को अग्नि संयुक्त करके जल रूप देता है। विज्ञान वह क्रिया स्थूल पदार्थ रूप में ही समझ पाता है, ऋषि इसे सूक्ष्म तन्मात्राओं के रूप में भी अनुभव करते हैं।]
Verse १५१
ततस्तादृग्गुणगतं मनो भावयति क्षणात्। गन्धतन्मात्रमेतस्माद्भूमिसंवित्ततो भवेत् ॥
tatastādṛgguṇagataṃ mano bhāvayati kṣaṇāt। gandhatanmātrametasmādbhūmisaṃvittato bhavet ॥
unavailable
फिर चार गुणों से संयुक्त होकर मन अगले ही क्षण गन्ध तन्मात्रा का भाव कर लेता है, इससे उसे पृथ्वी का अनुभव होने लगता है। इस प्रकार पाँच तन्मात्राओं से युक्त होकर वह मन अपनी सूक्ष्मता त्यागकर आसमान में अग्निकणों की शक्ल में स्फुरित होते हुए शरीर का दर्शन करता है ॥[ऋषि सूक्ष्म से क्रमशः स्थूल के विकास का चित्रण कर रहे हैं। यहाँ सूक्ष्म मनोमय से अपेक्षाकृत स्थूल अग्निकणों के रूप में प्राणमय कोश के विकास का क्रम बतलाया गया है। यह प्राणमय ही परिपक्व होकर स्थल काया का रूप लेता है। आप इस क्रिया की उपमा स्वर्णकणों को गलाकर वाञ्छित आकार में डालने की क्रिया से दे रहे हैं।]
Verse १५२
अर्थत्थंभूततन्मात्रवेष्टितं तनुतां जहत् । वपुर्वह्निकणाकारं स्फुरितं व्योम्नि पश्यति ।।
arthatthaṃbhūtatanmātraveṣṭitaṃ tanutāṃ jahat । vapurvahnikaṇākāraṃ sphuritaṃ vyomni paśyati ।।
unavailable
फिर चार गुणों से संयुक्त होकर मन अगले ही क्षण गन्ध तन्मात्रा का भाव कर लेता है, इससे उसे पृथ्वी का अनुभव होने लगता है। इस प्रकार पाँच तन्मात्राओं से युक्त होकर वह मन अपनी सूक्ष्मता त्यागकर आसमान में अग्निकणों की शक्ल में स्फुरित होते हुए शरीर का दर्शन करता है ॥[ऋषि सूक्ष्म से क्रमशः स्थूल के विकास का चित्रण कर रहे हैं। यहाँ सूक्ष्म मनोमय से अपेक्षाकृत स्थूल अग्निकणों के रूप में प्राणमय कोश के विकास का क्रम बतलाया गया है। यह प्राणमय ही परिपक्व होकर स्थल काया का रूप लेता है। आप इस क्रिया की उपमा स्वर्णकणों को गलाकर वाञ्छित आकार में डालने की क्रिया से दे रहे हैं।]
Verse १५३
अहंकारकलायुक्तं बुद्धिबीजसमन्वितम्। तत्पुर्यष्टकमित्युक्तं भूतहृत्पद्मषट्पदम् ॥
ahaṃkārakalāyuktaṃ buddhibījasamanvitam। tatpuryaṣṭakamityuktaṃ bhūtahṛtpadmaṣaṭpadam ॥
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वह शरीर ही अहंकार कलाओं से युक्त और बुद्धि बीज से संयुक्त ‘पुर्यष्टक' नाम से जाना जाता है, जो प्राणियों के हृदय कमल में मँडराने वाले भौरे के सदृश है। पाक (परिपूर्णावस्था) की स्थिति में बिल्वफल की तरह ही तीव्र संवेगात्मक तेजस्वी शरीर की भावना किये जाने पर, मन स्थूल हो जाता है।।
Verse १५४
तस्मिंस्तु तीव्रसंवेगाद्भावयद्भासुरं वपुः । स्थूलतामेति पाकेन मनो बिल्वफलं यथा ॥
tasmiṃstu tīvrasaṃvegādbhāvayadbhāsuraṃ vapuḥ । sthūlatāmeti pākena mano bilvaphalaṃ yathā ॥
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वह शरीर ही अहंकार कलाओं से युक्त और बुद्धि बीज से संयुक्त ‘पुर्यष्टक' नाम से जाना जाता है, जो प्राणियों के हृदय कमल में मँडराने वाले भौरे के सदृश है। पाक (परिपूर्णावस्था) की स्थिति में बिल्वफल की तरह ही तीव्र संवेगात्मक तेजस्वी शरीर की भावना किये जाने पर, मन स्थूल हो जाता है।।
Verse १५५
मूषास्थद्रुतहेमाभं स्फुरितं विमलाम्बरे। संनिवेशमथादत्ते तत्तेजः स्वस्वभावतः ॥
mūṣāsthadrutahemābhaṃ sphuritaṃ vimalāmbare। saṃniveśamathādatte tattejaḥ svasvabhāvataḥ ॥
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निर्मल आकाश में वह तेज, मूषा (सोना गलाने के पात्र) में पिघले हुए स्वर्ण के समान स्फुरित होकर अपनी प्रकृति के अनुसार गठित होने लगता है। ऊपर से वह सिर की तरह, नीचे से पैरों की तरह, पार्श्वो में भुजाओं की तरह तथा मध्य में उदर की तरह समय आने पर अभिव्यक्ति को प्राप्त होकर पूर्ण शरीर के आकार को प्राप्त हो जाता है। बुद्धि, वीर्य, बल, उत्साह, विज्ञान और वैभव से सम्पन्न हो जाता है।।
Verse १५६
ऊर्ध्वं शिरः पिण्डमयमधः पादमयं तथा। पार्श्वयोर्हस्तसंस्थान मध्ये चोदरधर्मिणम्॥
ūrdhvaṃ śiraḥ piṇḍamayamadhaḥ pādamayaṃ tathā। pārśvayorhastasaṃsthāna madhye codaradharmiṇam॥
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निर्मल आकाश में वह तेज, मूषा (सोना गलाने के पात्र) में पिघले हुए स्वर्ण के समान स्फुरित होकर अपनी प्रकृति के अनुसार गठित होने लगता है। ऊपर से वह सिर की तरह, नीचे से पैरों की तरह, पार्श्वो में भुजाओं की तरह तथा मध्य में उदर की तरह समय आने पर अभिव्यक्ति को प्राप्त होकर पूर्ण शरीर के आकार को प्राप्त हो जाता है। बुद्धि, वीर्य, बल, उत्साह, विज्ञान और वैभव से सम्पन्न हो जाता है।।
Verse १५७
कालेन स्फुटतामेत्य भवत्यमलविग्रहम्। बुद्धिसत्त्वबलोत्साहविज्ञानैश्वर्यसंस्थितः ॥
kālena sphuṭatāmetya bhavatyamalavigraham। buddhisattvabalotsāhavijñānaiśvaryasaṃsthitaḥ ॥
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निर्मल आकाश में वह तेज, मूषा (सोना गलाने के पात्र) में पिघले हुए स्वर्ण के समान स्फुरित होकर अपनी प्रकृति के अनुसार गठित होने लगता है। ऊपर से वह सिर की तरह, नीचे से पैरों की तरह, पार्श्वो में भुजाओं की तरह तथा मध्य में उदर की तरह समय आने पर अभिव्यक्ति को प्राप्त होकर पूर्ण शरीर के आकार को प्राप्त हो जाता है। बुद्धि, वीर्य, बल, उत्साह, विज्ञान और वैभव से सम्पन्न हो जाता है।।
Verse १५८
स एव भगवान्ब्रह्मा सर्वलोकपितामहः । अवलोक्य वपुर्ब्रह्मा कान्तमात्मीयमुत्तमम्॥
sa eva bhagavānbrahmā sarvalokapitāmahaḥ । avalokya vapurbrahmā kāntamātmīyamuttamam॥
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वही शरीर सब लोकों का पितामह भगवान् ब्रह्मा बन जाता है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान के प्रत्यक्ष द्रष्टा भगवान् ब्रह्माजी ने अपनी उत्तम और मनोहर छबि को निहारकर विचार किया कि इस चिन्मात्र आत्मरूपी परमाकाश का कोई आदि-अन्त दृष्टिगोचर नहीं होता। सर्वप्रथम क्या होना चाहिए? इस प्रकार का विचार करते ही तत्काल उन्हें पवित्र आत्मदृष्टि प्राप्त हुई ॥
Verse १५९
चिन्तामभ्येत्य भगवांस्त्रिकालामलदर्शनः। एतस्मिन्परमाकाशे चिन्मात्रैकात्मरूपिंणि॥
cintāmabhyetya bhagavāṃstrikālāmaladarśanaḥ। etasminparamākāśe cinmātraikātmarūpiṃṇi॥
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वही शरीर सब लोकों का पितामह भगवान् ब्रह्मा बन जाता है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान के प्रत्यक्ष द्रष्टा भगवान् ब्रह्माजी ने अपनी उत्तम और मनोहर छबि को निहारकर विचार किया कि इस चिन्मात्र आत्मरूपी परमाकाश का कोई आदि-अन्त दृष्टिगोचर नहीं होता। सर्वप्रथम क्या होना चाहिए? इस प्रकार का विचार करते ही तत्काल उन्हें पवित्र आत्मदृष्टि प्राप्त हुई ॥
Verse १६०
अदृष्टापारपर्यन्ते प्रथमं किं भवेदिति ।इति चिन्तितवान्ब्रह्मा सद्योजातामलात्मदृक् ॥
adṛṣṭāpāraparyante prathamaṃ kiṃ bhavediti ।iti cintitavānbrahmā sadyojātāmalātmadṛk ॥
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वही शरीर सब लोकों का पितामह भगवान् ब्रह्मा बन जाता है। भूत, भविष्यत् और वर्तमान के प्रत्यक्ष द्रष्टा भगवान् ब्रह्माजी ने अपनी उत्तम और मनोहर छबि को निहारकर विचार किया कि इस चिन्मात्र आत्मरूपी परमाकाश का कोई आदि-अन्त दृष्टिगोचर नहीं होता। सर्वप्रथम क्या होना चाहिए? इस प्रकार का विचार करते ही तत्काल उन्हें पवित्र आत्मदृष्टि प्राप्त हुई ॥
Verse १६१
अपश्यत्सर्गवृन्दानि समतीतान्यनेकशः । स्मरत्यथो से सकलान्सर्वधर्मगुणक्रमात् ॥
apaśyatsargavṛndāni samatītānyanekaśaḥ । smaratyatho se sakalānsarvadharmaguṇakramāt ॥
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उन्हें अतीतकाल में हुई सृष्टि के असंख्य सर्ग दिखाई दिये, इससे समस्त धर्मों एवं गुणों के क्रम उनके स्मृति पटल पर उभर आये। उन्होंने माया से ही विभिन्न प्रकार के आचारों से समन्वित अनेक रूप-रंग की प्रजा को अन्तरिक्ष में गन्धर्वलोक के समान ही संकल्प-शक्ति से प्रादुर्भूत कर दिया। उनके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए उन्होंने अनेक चित्र-विचित्र शास्त्रों और स्वर्ग-नरकादि की कल्पना(रचना) कर दी ॥
Verse १६२
लीलया कल्पयामास चित्राः संकल्पतः प्रजाः ।नानाचारसमारम्भा गन्धर्वनगरं यथा ।।
līlayā kalpayāmāsa citrāḥ saṃkalpataḥ prajāḥ ।nānācārasamārambhā gandharvanagaraṃ yathā ।।
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उन्हें अतीतकाल में हुई सृष्टि के असंख्य सर्ग दिखाई दिये, इससे समस्त धर्मों एवं गुणों के क्रम उनके स्मृति पटल पर उभर आये। उन्होंने माया से ही विभिन्न प्रकार के आचारों से समन्वित अनेक रूप-रंग की प्रजा को अन्तरिक्ष में गन्धर्वलोक के समान ही संकल्प-शक्ति से प्रादुर्भूत कर दिया। उनके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए उन्होंने अनेक चित्र-विचित्र शास्त्रों और स्वर्ग-नरकादि की कल्पना(रचना) कर दी ॥
Verse १६३
तासां स्वर्गापवर्गार्थं धर्मकामार्थसिद्धये। अनन्तानि विचित्राणि शास्त्राणि समकल्पयत्।।
tāsāṃ svargāpavargārthaṃ dharmakāmārthasiddhaye। anantāni vicitrāṇi śāstrāṇi samakalpayat।।
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उन्हें अतीतकाल में हुई सृष्टि के असंख्य सर्ग दिखाई दिये, इससे समस्त धर्मों एवं गुणों के क्रम उनके स्मृति पटल पर उभर आये। उन्होंने माया से ही विभिन्न प्रकार के आचारों से समन्वित अनेक रूप-रंग की प्रजा को अन्तरिक्ष में गन्धर्वलोक के समान ही संकल्प-शक्ति से प्रादुर्भूत कर दिया। उनके धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए उन्होंने अनेक चित्र-विचित्र शास्त्रों और स्वर्ग-नरकादि की कल्पना(रचना) कर दी ॥
Verse १६४
विरञ्चिरूपान्मनसः कल्पितत्वाज्जगत्स्थितेः । तावस्थितिरियं प्रोक्ता तन्नाशे नाशमाप्नुयात् ॥
virañcirūpānmanasaḥ kalpitatvājjagatsthiteḥ । tāvasthitiriyaṃ proktā tannāśe nāśamāpnuyāt ॥
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ब्रह्मारुपी मन की कल्पना द्वारा संसार की स्थिति होने से ब्रह्मा के जीवन के साथ इसका (मन का) जीवन है। ब्रह्माजी के आयुष्य समाप्ति के साथ इस मन की भी समाप्ति है । हे द्विज श्रेष्ठ | वास्तव में न तो कोई कहीं जन्म हीं ग्रहण करता है और न अवसान को ही प्राप्त होता है । यह सब मिथ्या है, जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है। यह प्रपंचात्मक संसार आशारूपी सर्पिणियों की पिटारी है, इसे त्यागना ही उचित है । इसे ‘असत्' मानकर मातृभाव में स्थिर होना श्रेयस्कर है ।।
Verse १६५
न जायते न म्रियते क्वचित्किचित्कदाचन। परमार्थेन विप्रेन्द्र मिथ्या सर्वं तु दृश्यते ॥
na jāyate na mriyate kvacitkicitkadācana। paramārthena viprendra mithyā sarvaṃ tu dṛśyate ॥
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ब्रह्मारुपी मन की कल्पना द्वारा संसार की स्थिति होने से ब्रह्मा के जीवन के साथ इसका (मन का) जीवन है। ब्रह्माजी के आयुष्य समाप्ति के साथ इस मन की भी समाप्ति है । हे द्विज श्रेष्ठ | वास्तव में न तो कोई कहीं जन्म हीं ग्रहण करता है और न अवसान को ही प्राप्त होता है । यह सब मिथ्या है, जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है। यह प्रपंचात्मक संसार आशारूपी सर्पिणियों की पिटारी है, इसे त्यागना ही उचित है । इसे ‘असत्' मानकर मातृभाव में स्थिर होना श्रेयस्कर है ।।
Verse १६६
कोशमाशाभुजङ्गानां संसाराडम्बरं त्यज। असदेतदिति ज्ञात्वा मातृभावं निवेशय ॥
kośamāśābhujaṅgānāṃ saṃsārāḍambaraṃ tyaja। asadetaditi jñātvā mātṛbhāvaṃ niveśaya ॥
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ब्रह्मारुपी मन की कल्पना द्वारा संसार की स्थिति होने से ब्रह्मा के जीवन के साथ इसका (मन का) जीवन है। ब्रह्माजी के आयुष्य समाप्ति के साथ इस मन की भी समाप्ति है । हे द्विज श्रेष्ठ | वास्तव में न तो कोई कहीं जन्म हीं ग्रहण करता है और न अवसान को ही प्राप्त होता है । यह सब मिथ्या है, जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है। यह प्रपंचात्मक संसार आशारूपी सर्पिणियों की पिटारी है, इसे त्यागना ही उचित है । इसे ‘असत्' मानकर मातृभाव में स्थिर होना श्रेयस्कर है ।।
पञ्चमोऽध्यायः (part 5)
Verse १६७
गन्धर्वनगरस्यार्थे भूषितेऽभूषिते तथा।अविद्यांशे सुतादौ वा कः क्रमः सुखदुःखयोः ॥
gandharvanagarasyārthe bhūṣite'bhūṣite tathā।avidyāṃśe sutādau vā kaḥ kramaḥ sukhaduḥkhayoḥ ॥
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गन्धर्व नगर चाहे सुसज्जित हो या असुसज्जित, वह कैसा भी क्यों न दिखाई दे, वह तुच्छ ही है। उसी तरह अविद्या के अंशरूप ये पुत्र आदि भी प्रपंचरूप हैं, इनके प्रति आसक्ति होना दुःख का कारण है। धन-स्त्री आदि की वृद्धि के प्रति सुख-दुःख का भाव रखना निरर्थक है। इसमें सन्तोष मानने की कहीं गुंजायश नहीं। मोह-माया की वृद्धि होने पर इस लोक में कौन सुख-शान्ति का अधिकारी बना है। जिन पदार्थों की बहुतायत से अज्ञानी जन सुख अनुभव करते हैं, उन्हीं से ज्ञानी पुरुष विरक्त रहते हैं ॥
Verse १६८
धनदारेषु वृद्धेषु दुःखयुक्तं न तुष्टता।वृद्धायां मोहमायायां कः समाश्वासवानिह ॥
dhanadāreṣu vṛddheṣu duḥkhayuktaṃ na tuṣṭatā।vṛddhāyāṃ mohamāyāyāṃ kaḥ samāśvāsavāniha ॥
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गन्धर्व नगर चाहे सुसज्जित हो या असुसज्जित, वह कैसा भी क्यों न दिखाई दे, वह तुच्छ ही है। उसी तरह अविद्या के अंशरूप ये पुत्र आदि भी प्रपंचरूप हैं, इनके प्रति आसक्ति होना दुःख का कारण है। धन-स्त्री आदि की वृद्धि के प्रति सुख-दुःख का भाव रखना निरर्थक है। इसमें सन्तोष मानने की कहीं गुंजायश नहीं। मोह-माया की वृद्धि होने पर इस लोक में कौन सुख-शान्ति का अधिकारी बना है। जिन पदार्थों की बहुतायत से अज्ञानी जन सुख अनुभव करते हैं, उन्हीं से ज्ञानी पुरुष विरक्त रहते हैं ॥
Verse १६९
यैरेव जायते रागो मूर्खस्याधिकतां गतैः ।तैरेव भागैः प्राज्ञस्य विराग उपजायते ।।
yaireva jāyate rāgo mūrkhasyādhikatāṃ gataiḥ ।taireva bhāgaiḥ prājñasya virāga upajāyate ।।
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गन्धर्व नगर चाहे सुसज्जित हो या असुसज्जित, वह कैसा भी क्यों न दिखाई दे, वह तुच्छ ही है। उसी तरह अविद्या के अंशरूप ये पुत्र आदि भी प्रपंचरूप हैं, इनके प्रति आसक्ति होना दुःख का कारण है। धन-स्त्री आदि की वृद्धि के प्रति सुख-दुःख का भाव रखना निरर्थक है। इसमें सन्तोष मानने की कहीं गुंजायश नहीं। मोह-माया की वृद्धि होने पर इस लोक में कौन सुख-शान्ति का अधिकारी बना है। जिन पदार्थों की बहुतायत से अज्ञानी जन सुख अनुभव करते हैं, उन्हीं से ज्ञानी पुरुष विरक्त रहते हैं ॥
Verse १७०
अतो निदाघ तत्त्वज्ञ व्यवहारेषु संसृतेः ।नष्टं नष्टमुपेक्षस्व प्राप्तं प्राप्तमुपाहर ॥
ato nidāgha tattvajña vyavahāreṣu saṃsṛteḥ ।naṣṭaṃ naṣṭamupekṣasva prāptaṃ prāptamupāhara ॥
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हे तत्त्वज्ञानी निदाघ! सांसारिक व्यवहार में जिस-जिसका अभाव होता जाए, उसकी इच्छा न करे और जो-जो सहजता से उपलब्ध हो, उसे स्वीकार करे। अप्राप्त की इच्छा न करना और प्राप्त उपभोग्य सामग्री का उपयोग करना यही पण्डित्य है। सत् और असत् के बीच शुद्ध पद को जानकर, उसका अवलम्बन ग्रहण का के बाह्याभ्यन्तरिक दृश्यों को न तो ग्रहण करे और न ही त्यागे।।
Verse १७१
अनागतानां भोगानामवाञ्छनमकृत्रिमम् । आगतानां च संभोग इति पण्डितलक्षणम्॥
anāgatānāṃ bhogānāmavāñchanamakṛtrimam । āgatānāṃ ca saṃbhoga iti paṇḍitalakṣaṇam॥
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हे तत्त्वज्ञानी निदाघ! सांसारिक व्यवहार में जिस-जिसका अभाव होता जाए, उसकी इच्छा न करे और जो-जो सहजता से उपलब्ध हो, उसे स्वीकार करे। अप्राप्त की इच्छा न करना और प्राप्त उपभोग्य सामग्री का उपयोग करना यही पण्डित्य है। सत् और असत् के बीच शुद्ध पद को जानकर, उसका अवलम्बन ग्रहण का के बाह्याभ्यन्तरिक दृश्यों को न तो ग्रहण करे और न ही त्यागे।।
Verse १७२
शुद्ध सदसतोर्मध्यं पदं बुद्धवावलम्ब्य च।सबाह्याभ्यन्तरं दृश्यं मा गृहाण विमुञ्च मा॥
śuddha sadasatormadhyaṃ padaṃ buddhavāvalambya ca।sabāhyābhyantaraṃ dṛśyaṃ mā gṛhāṇa vimuñca mā॥
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हे तत्त्वज्ञानी निदाघ! सांसारिक व्यवहार में जिस-जिसका अभाव होता जाए, उसकी इच्छा न करे और जो-जो सहजता से उपलब्ध हो, उसे स्वीकार करे। अप्राप्त की इच्छा न करना और प्राप्त उपभोग्य सामग्री का उपयोग करना यही पण्डित्य है। सत् और असत् के बीच शुद्ध पद को जानकर, उसका अवलम्बन ग्रहण का के बाह्याभ्यन्तरिक दृश्यों को न तो ग्रहण करे और न ही त्यागे।।
Verse १७३
यस्य चेच्छा तथाऽनिच्छा ज्ञस्य कर्मणि तिष्ठतः।न तस्य लिप्यते प्रज्ञा पद्मपत्रमिवाम्बुभिः ॥
yasya cecchā tathā'nicchā jñasya karmaṇi tiṣṭhataḥ।na tasya lipyate prajñā padmapatramivāmbubhiḥ ॥
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इच्छा और अनिच्छा को समान मानने वाले ज्ञानी पुरुष कर्म करते हुए भी उसमें उसी प्रकार लिप्त नहीं होते, जैसे कीचड़ में कमलपत्र पड़ा रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता। हे द्विज! यदि आपके हृदय में इन्द्रियजन्य विषय हलचल पैदा नहीं करते, तो आप ज्ञातव्य पदार्थ का ज्ञान प्राप्त कर संसार रूपी समुद्र से पार हो गये। विशिष्ट ज्ञानयुक्त होकर वासनारूपी फूलों की सुगन्ध से अपनी चित्तवृत्ति को जल्दी ही दूर कर लिया जाए, तो महान् पद की प्राप्ति हो सकती है ॥
Verse १७४
यदि ते नेन्द्रियार्थश्रीः स्पन्दते हृदि वै द्विज। तदा विज्ञातविज्ञेयः समुत्तीर्णो भवार्णवात् ॥
yadi te nendriyārthaśrīḥ spandate hṛdi vai dvija। tadā vijñātavijñeyaḥ samuttīrṇo bhavārṇavāt ॥
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इच्छा और अनिच्छा को समान मानने वाले ज्ञानी पुरुष कर्म करते हुए भी उसमें उसी प्रकार लिप्त नहीं होते, जैसे कीचड़ में कमलपत्र पड़ा रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता। हे द्विज! यदि आपके हृदय में इन्द्रियजन्य विषय हलचल पैदा नहीं करते, तो आप ज्ञातव्य पदार्थ का ज्ञान प्राप्त कर संसार रूपी समुद्र से पार हो गये। विशिष्ट ज्ञानयुक्त होकर वासनारूपी फूलों की सुगन्ध से अपनी चित्तवृत्ति को जल्दी ही दूर कर लिया जाए, तो महान् पद की प्राप्ति हो सकती है ॥
Verse १७५
उच्चै:पदाय परया प्रज्ञया वासनागणात् । पुष्पाद्ग्न्धमपोह्यारं चेतोवृत्तिं पृथक्कुरु ॥
uccai:padāya parayā prajñayā vāsanāgaṇāt । puṣpādgndhamapohyāraṃ cetovṛttiṃ pṛthakkuru ॥
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इच्छा और अनिच्छा को समान मानने वाले ज्ञानी पुरुष कर्म करते हुए भी उसमें उसी प्रकार लिप्त नहीं होते, जैसे कीचड़ में कमलपत्र पड़ा रहकर भी उससे लिप्त नहीं होता। हे द्विज! यदि आपके हृदय में इन्द्रियजन्य विषय हलचल पैदा नहीं करते, तो आप ज्ञातव्य पदार्थ का ज्ञान प्राप्त कर संसार रूपी समुद्र से पार हो गये। विशिष्ट ज्ञानयुक्त होकर वासनारूपी फूलों की सुगन्ध से अपनी चित्तवृत्ति को जल्दी ही दूर कर लिया जाए, तो महान् पद की प्राप्ति हो सकती है ॥
Verse १७६
संसाराम्बुनिधावस्मिन्वासनाम्बुपरिप्लुते ।ये प्रज्ञानावमारूढास्ते तीर्णाः पण्डिताः परे॥
saṃsārāmbunidhāvasminvāsanāmbupariplute ।ye prajñānāvamārūḍhāste tīrṇāḥ paṇḍitāḥ pare॥
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Verse १७७
न त्यजन्ति न वाञ्छन्ति व्यवहारं जगद्गतम्। सर्वमेवानुवर्तन्ते पारावारविदो जनाः ॥
na tyajanti na vāñchanti vyavahāraṃ jagadgatam। sarvamevānuvartante pārāvāravido janāḥ ॥
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Verse १७८
अनन्तस्यात्मतत्त्वस्य सत्तासामान्यरूपिणः।चितश्चेत्योन्मुखत्वं यत्तत्संकल्पाङ्कुरं विदुः ॥
anantasyātmatattvasya sattāsāmānyarūpiṇaḥ।citaścetyonmukhatvaṃ yattatsaṃkalpāṅkuraṃ viduḥ ॥
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Verse १७९
लेशतः प्राप्तसत्ताकः स एव घनतां शनैः।याति चित्तत्वमापूर्य दृढं जाड्याय मेघवत्॥
leśataḥ prāptasattākaḥ sa eva ghanatāṃ śanaiḥ।yāti cittatvamāpūrya dṛḍhaṃ jāḍyāya meghavat॥
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वासनारूपी जल से युक्त इस संसार-सागर में जो सद्ज्ञान रूपी नौका पर आरूढ़ हैं, वे ज्ञानीजन इससे पार हो गये। सांसारिक प्रपञ्च के जानकार पुरुष सांसारिक व्यवहार का न तो परित्याग करते हैं और न ही उसकी कामना करते हैं; अपितु वे उनके प्रति अनासक्ति का ही व्यवहार करते हैं, ज्ञानियों ने संकल्प का अंकुरित होना ही अनन्त आत्मतत्त्वरूप चेतन का विषयास होना माना है। वही संकल्प अल्पमात्र स्थान प्राप्त करके धीरे-धीरे सघन होते हैं; तत्पश्चात् वे मेघ की तरह सुदृढ़ होकर चित्ताकाश को ढककर जड़त्व भाव का संचार करते हैं॥ १७६-१७९॥
Verse १८०
भावयन्ति चितिश्चैत्यं व्यतिरिक्तमिवात्मनः। संकल्पतामिवायाति बीजमङ्कुरतामिव॥
bhāvayanti citiścaityaṃ vyatiriktamivātmanaḥ। saṃkalpatāmivāyāti bījamaṅkuratāmiva॥
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बीज के अंकुरावस्था को प्राप्त करने के समान ही चेतन विषयों को स्वयं से अलग-सा मानते हुए वह संकल्पावस्था को प्राप्त होता है। संकल्प से उसकी क्रिया अपने आप ही प्रकट होती है और स्वयं ही शीघ्रातिशीघ्र वृद्धि को प्राप्त होती है। लेकिन वह दुःख का ही कारण बनती है, सुख देने वाली नहीं होती। चित्त में उत्पन्न होने वाली संकल्प क्रिया को रोके। उसमें पदार्थ भावना न करे, जिसने संकल्प को विनष्ट करने का निश्चय किया है, उसे पुन: उसका अनुगमन करना उचित नहीं ॥
Verse १८१
संकल्पनं हि संकल्पः स्वयमेव प्रजायते ।वर्धते स्वयमेवाशु दु:खाय न सुखाय यत्॥
saṃkalpanaṃ hi saṃkalpaḥ svayameva prajāyate ।vardhate svayamevāśu du:khāya na sukhāya yat॥
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बीज के अंकुरावस्था को प्राप्त करने के समान ही चेतन विषयों को स्वयं से अलग-सा मानते हुए वह संकल्पावस्था को प्राप्त होता है। संकल्प से उसकी क्रिया अपने आप ही प्रकट होती है और स्वयं ही शीघ्रातिशीघ्र वृद्धि को प्राप्त होती है। लेकिन वह दुःख का ही कारण बनती है, सुख देने वाली नहीं होती। चित्त में उत्पन्न होने वाली संकल्प क्रिया को रोके। उसमें पदार्थ भावना न करे, जिसने संकल्प को विनष्ट करने का निश्चय किया है, उसे पुन: उसका अनुगमन करना उचित नहीं ॥
Verse १८२
मा संकल्पय संकल्पं मा भावं भावयस्थितौ । संकल्पनाशने यत्तो न भूयोऽननुगच्छति ॥
mā saṃkalpaya saṃkalpaṃ mā bhāvaṃ bhāvayasthitau । saṃkalpanāśane yatto na bhūyo'nanugacchati ॥
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बीज के अंकुरावस्था को प्राप्त करने के समान ही चेतन विषयों को स्वयं से अलग-सा मानते हुए वह संकल्पावस्था को प्राप्त होता है। संकल्प से उसकी क्रिया अपने आप ही प्रकट होती है और स्वयं ही शीघ्रातिशीघ्र वृद्धि को प्राप्त होती है। लेकिन वह दुःख का ही कारण बनती है, सुख देने वाली नहीं होती। चित्त में उत्पन्न होने वाली संकल्प क्रिया को रोके। उसमें पदार्थ भावना न करे, जिसने संकल्प को विनष्ट करने का निश्चय किया है, उसे पुन: उसका अनुगमन करना उचित नहीं ॥
Verse १८३
भावनाऽभावमात्रेण संकल्पः क्षीयते स्वयम्। संकल्पेनैव संकल्पं मनसैव मनो मुने ॥
bhāvanā'bhāvamātreṇa saṃkalpaḥ kṣīyate svayam। saṃkalpenaiva saṃkalpaṃ manasaiva mano mune ॥
unavailable
भावना का अभाव होते ही संकल्प स्वयमेव समाप्त हो जाता है। हे मुनिश्रेष्ठ! संकल्प द्वारा संकल्प को और मन द्वारा मन को नष्ट कर डाले। आकाश की तरह ही यह जगत् भी शून्य है। हे विप्र ! जिस तरह ताँबे को कालिमा और धान का छिलका प्रयत्नपूर्वक क्रिया विशेष से नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार पुरुष का विकार रुपी दोष प्रयत्न से दूर हो जाता है, धान के छिलके के समान जीव पर मल-विकाररूपी दोष प्रकृतिगत हैं, तो भी उनका नष्ट होना निश्चित है-इसमें रत्तीभर सन्देह नहीं। अतएव आत्मस्वरूप में स्थित होकर उद्योगी पुरुष बनने का प्रयत करो, इसमें असम्भव जैसी स्थिति है ही नहीं ॥[चेतन के ऊपर चढ़े विकार की तुलना धान के छिलके से की गई है। विकार हटाये बिना चावल सेवन करने योग्य नहीं होता और पुनः फलित होने के लिए छिलका-विकार आवश्यक है। छिलका-विकार हटते ही वह ज्ञानी के लिए सेव्य है तथा पुनर्जन्म के चक्र की संभावना भी समाप्त हो जाती है।]
Verse १८४
छित्त्वा स्वात्मनि तिष्ठ त्वं किमेतावति दुष्करम्।यथैवेदं नभः शून्यं जगच्छून्यं तथैव हि ॥
chittvā svātmani tiṣṭha tvaṃ kimetāvati duṣkaram।yathaivedaṃ nabhaḥ śūnyaṃ jagacchūnyaṃ tathaiva hi ॥
unavailable
भावना का अभाव होते ही संकल्प स्वयमेव समाप्त हो जाता है। हे मुनिश्रेष्ठ! संकल्प द्वारा संकल्प को और मन द्वारा मन को नष्ट कर डाले। आकाश की तरह ही यह जगत् भी शून्य है। हे विप्र ! जिस तरह ताँबे को कालिमा और धान का छिलका प्रयत्नपूर्वक क्रिया विशेष से नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार पुरुष का विकार रुपी दोष प्रयत्न से दूर हो जाता है, धान के छिलके के समान जीव पर मल-विकाररूपी दोष प्रकृतिगत हैं, तो भी उनका नष्ट होना निश्चित है-इसमें रत्तीभर सन्देह नहीं। अतएव आत्मस्वरूप में स्थित होकर उद्योगी पुरुष बनने का प्रयत करो, इसमें असम्भव जैसी स्थिति है ही नहीं ॥[चेतन के ऊपर चढ़े विकार की तुलना धान के छिलके से की गई है। विकार हटाये बिना चावल सेवन करने योग्य नहीं होता और पुनः फलित होने के लिए छिलका-विकार आवश्यक है। छिलका-विकार हटते ही वह ज्ञानी के लिए सेव्य है तथा पुनर्जन्म के चक्र की संभावना भी समाप्त हो जाती है।]
Verse १८५
तण्डुलस्य यथा चर्म यथा ताम्रस्य कालिमा। नश्यति क्रियया विप्र पुरुषस्य तथा मलम्॥
taṇḍulasya yathā carma yathā tāmrasya kālimā। naśyati kriyayā vipra puruṣasya tathā malam॥
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भावना का अभाव होते ही संकल्प स्वयमेव समाप्त हो जाता है। हे मुनिश्रेष्ठ! संकल्प द्वारा संकल्प को और मन द्वारा मन को नष्ट कर डाले। आकाश की तरह ही यह जगत् भी शून्य है। हे विप्र ! जिस तरह ताँबे को कालिमा और धान का छिलका प्रयत्नपूर्वक क्रिया विशेष से नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार पुरुष का विकार रुपी दोष प्रयत्न से दूर हो जाता है, धान के छिलके के समान जीव पर मल-विकाररूपी दोष प्रकृतिगत हैं, तो भी उनका नष्ट होना निश्चित है-इसमें रत्तीभर सन्देह नहीं। अतएव आत्मस्वरूप में स्थित होकर उद्योगी पुरुष बनने का प्रयत करो, इसमें असम्भव जैसी स्थिति है ही नहीं ॥[चेतन के ऊपर चढ़े विकार की तुलना धान के छिलके से की गई है। विकार हटाये बिना चावल सेवन करने योग्य नहीं होता और पुनः फलित होने के लिए छिलका-विकार आवश्यक है। छिलका-विकार हटते ही वह ज्ञानी के लिए सेव्य है तथा पुनर्जन्म के चक्र की संभावना भी समाप्त हो जाती है।]
Verse १८६
जीवस्य तण्डुलस्येव मलं सहजमप्यलम्। नश्यत्येव न संदेहस्तस्मादुद्योगवान्भवेत्॥
jīvasya taṇḍulasyeva malaṃ sahajamapyalam। naśyatyeva na saṃdehastasmādudyogavānbhavet॥
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भावना का अभाव होते ही संकल्प स्वयमेव समाप्त हो जाता है। हे मुनिश्रेष्ठ! संकल्प द्वारा संकल्प को और मन द्वारा मन को नष्ट कर डाले। आकाश की तरह ही यह जगत् भी शून्य है। हे विप्र ! जिस तरह ताँबे को कालिमा और धान का छिलका प्रयत्नपूर्वक क्रिया विशेष से नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार पुरुष का विकार रुपी दोष प्रयत्न से दूर हो जाता है, धान के छिलके के समान जीव पर मल-विकाररूपी दोष प्रकृतिगत हैं, तो भी उनका नष्ट होना निश्चित है-इसमें रत्तीभर सन्देह नहीं। अतएव आत्मस्वरूप में स्थित होकर उद्योगी पुरुष बनने का प्रयत करो, इसमें असम्भव जैसी स्थिति है ही नहीं ॥[चेतन के ऊपर चढ़े विकार की तुलना धान के छिलके से की गई है। विकार हटाये बिना चावल सेवन करने योग्य नहीं होता और पुनः फलित होने के लिए छिलका-विकार आवश्यक है। छिलका-विकार हटते ही वह ज्ञानी के लिए सेव्य है तथा पुनर्जन्म के चक्र की संभावना भी समाप्त हो जाती है।]