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4. चतुर्थोऽध्यायः

चतुर्थोऽध्यायः (part 1)

Verse १

निदाघ तव नास्त्यन्यज्ज्ञेयं ज्ञानवतां वर।प्रज्ञया त्वं विजानासि ईश्वरानुगृहीतया। चित्तमालिन्यसंजातं मार्जयामि भ्रमं मुने ॥

nidāgha tava nāstyanyajjñeyaṃ jñānavatāṃ vara।prajñayā tvaṃ vijānāsi īśvarānugṛhītayā। cittamālinyasaṃjātaṃ mārjayāmi bhramaṃ mune ॥

The dream-waking state: the inert condition of Jiva, giving up the six conditions.

अपने पुत्र निदाघ मुनि की सभी बातें सुनकर ऋषिवर ऋभु ने कहा-हे प्रभु! तुम ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ हो । अब तुम्हारे लिए कुछ भी जानकारी के योग्य शेष नहीं रह गया है। तुम ईश्वर की महती कृपा से अपनी ही प्रज्ञा-बुद्धि के द्वारा सभी कुछ समझ गये हो। फिर भी हे मुने! तुम्हारे चित्त में मलिनता के द्वारा जो भी भ्रम प्रादुर्भूत हुआ है, उसका मैं निवारण करूँगा। शम (मनोनिग्रह), विचार, संतोष एवं सत्संग ही मोक्षद्वार के चार द्वारपाल के रूप में कहे गये हैं। यदि इनमें से किसी एक का भी आश्रय प्राप्त कर लिया जाये, तो शेष तीनों द्वारपाल सहजतापूर्वक स्वयमेव ही अपने वश में हो जाते हैं॥


Verse २

मोक्षद्वारे द्वारपालाश्चत्वारः परिकीर्तिताः । शमो विचारः संतोषश्चतुर्थः साधुसङ्गमः ॥

mokṣadvāre dvārapālāścatvāraḥ parikīrtitāḥ । śamo vicāraḥ saṃtoṣaścaturthaḥ sādhusaṅgamaḥ ॥

The deep sleep is filled with the future misery - in which condition the world is merged in darkness.

अपने पुत्र निदाघ मुनि की सभी बातें सुनकर ऋषिवर ऋभु ने कहा-हे प्रभु! तुम ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ हो । अब तुम्हारे लिए कुछ भी जानकारी के योग्य शेष नहीं रह गया है। तुम ईश्वर की महती कृपा से अपनी ही प्रज्ञा-बुद्धि के द्वारा सभी कुछ समझ गये हो। फिर भी हे मुने! तुम्हारे चित्त में मलिनता के द्वारा जो भी भ्रम प्रादुर्भूत हुआ है, उसका मैं निवारण करूँगा। शम (मनोनिग्रह), विचार, संतोष एवं सत्संग ही मोक्षद्वार के चार द्वारपाल के रूप में कहे गये हैं। यदि इनमें से किसी एक का भी आश्रय प्राप्त कर लिया जाये, तो शेष तीनों द्वारपाल सहजतापूर्वक स्वयमेव ही अपने वश में हो जाते हैं॥


Verse ३

एकं वा सर्वयत्नेन सर्वमुत्सृज्य संश्रयेत्।एकस्मिन्वशगे यान्ति चत्वारोऽपि वशं गताः ॥

ekaṃ vā sarvayatnena sarvamutsṛjya saṃśrayet।ekasminvaśage yānti catvāro'pi vaśaṃ gatāḥ ॥

The seven stages have been spoken by me of ignorance - each of these has hundreds of varieties with various splendours.

अपने पुत्र निदाघ मुनि की सभी बातें सुनकर ऋषिवर ऋभु ने कहा-हे प्रभु! तुम ज्ञानियों में सर्वश्रेष्ठ हो । अब तुम्हारे लिए कुछ भी जानकारी के योग्य शेष नहीं रह गया है। तुम ईश्वर की महती कृपा से अपनी ही प्रज्ञा-बुद्धि के द्वारा सभी कुछ समझ गये हो। फिर भी हे मुने! तुम्हारे चित्त में मलिनता के द्वारा जो भी भ्रम प्रादुर्भूत हुआ है, उसका मैं निवारण करूँगा। शम (मनोनिग्रह), विचार, संतोष एवं सत्संग ही मोक्षद्वार के चार द्वारपाल के रूप में कहे गये हैं। यदि इनमें से किसी एक का भी आश्रय प्राप्त कर लिया जाये, तो शेष तीनों द्वारपाल सहजतापूर्वक स्वयमेव ही अपने वश में हो जाते हैं॥


Verse ४

शास्त्रैः सज्जनसंपर्कपूर्वकैश्च तपोदमैः।आदौ संसारमुक्त्यर्थं प्रज्ञामेवाभिवर्धयेत् ॥

śāstraiḥ sajjanasaṃparkapūrvakaiśca tapodamaiḥ।ādau saṃsāramuktyarthaṃ prajñāmevābhivardhayet ॥

V-21-35. By knowing the seven stages of knowledge, one will not be sub-merged in the mire of illusions. Many schools speak variously of the stages of Yoga but only the following are acceptable to me: liberation follows after the seven stages

सर्वप्रथम इस नश्वर जगत् से मोक्ष प्राप्त करने के लिए तप, दम (इन्द्रिय निग्रह), शास्त्र एवं सत्संग के द्वारा अपने सद्ज्ञान को बढ़ाया जाना चाहिए। अपनी आत्मा के अनुभव, शास्त्रों एवं गुरु के वचनों के उपदेश से सतत अभ्यास द्वारा आत्मचिन्तन करना चाहिए ॥


Verse ५

स्वानुभूतेश्च शास्त्रस्य गुरोश्चैवैकवाक्यता । यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥

svānubhūteśca śāstrasya guroścaivaikavākyatā । yasyābhyāsena tenātmā satataṃ cāvalokyate ॥

The first stage of knowledge - is auspicious desire, the second is reflection, the third is thinning of the mind, the fourth is attainment of Sattva, then detachment, the sixth is reflection on objects and the seventh is of the Turiya.

सर्वप्रथम इस नश्वर जगत् से मोक्ष प्राप्त करने के लिए तप, दम (इन्द्रिय निग्रह), शास्त्र एवं सत्संग के द्वारा अपने सद्ज्ञान को बढ़ाया जाना चाहिए। अपनी आत्मा के अनुभव, शास्त्रों एवं गुरु के वचनों के उपदेश से सतत अभ्यास द्वारा आत्मचिन्तन करना चाहिए ॥


Verse ६

संकल्पाशानुसंधानवर्जनं चेत्प्रतिक्षणम्।करोषि तदचित्तत्वं प्राप्त एवासि पावनम्॥

saṃkalpāśānusaṃdhānavarjanaṃ cetpratikṣaṇam।karoṣi tadacittatvaṃ prāpta evāsi pāvanam॥

Their explanation: The wise say that the auspicious desire is the desire following detachment -meditation 'why do I remain like a fool, being looked upon by good people?'

यदि तुमने सदैव के लिए संकल्प एवं आशा के अनुसन्धान का परित्याग कर दिया है, तो तुम्हें वह कैवल्य की प्राप्ति हो ही गयी होगी। जो चित्त का अकर्तृत्व है, वही चित्त-वृत्तियों का निरोध अर्थात् समाधि कही गयी है। यही कैवल्यावस्था एवं परम कल्याणस्वरूपा परम शान्ति कहलाती है। इस जगत् के सम्पूर्ण पदार्थों में आत्म भावना का सम्यक् रूप से त्याग करके संसार में गूँगे, अंधे एवं बधिरों के समान तुम्हारे रहने से ही यह संभव है। सभी कुछ प्रशान्त है, एक है, जन्महित है, केवल अनुभवगम्य है, चित्तरहित है आदि जो शब्दरूप दृष्टि है, वह व्यर्थ ही है। आत्मबोध में बाधास्वरूप है। जो कुछ भी प्रपञ्च में दृष्टिगोचर होता है तत्त्वत: वही प्रणवरूप है। यहाँ पर जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है- वही दृश्य चिद्-जगत् में भी दृष्टिगोचर होते हैं, वह चित् के निष्पन्द का एक अंशरूप ही है। अतः चित् से (चैतन्य से) अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तुम ऐसी ही भावना करो । सांसारिक कार्यों को सतत करते हुए भी नित्य प्रबुद्धचित्त होकर आत्मा के एकत्व को जानकर प्रशान्त रहने वाले महासागर के सदृश निश्चल एवं स्थिरचित्त बने रहो। ऐसे ही कार्य करने में कल्याण की सम्भावनायें हैं ॥


Verse ७

चेतसो यदकर्तृत्वं तत्समाधानमीरितम् ।तदेव केवलीभावं सा शुभा निर्वृतिः परा॥

cetaso yadakartṛtvaṃ tatsamādhānamīritam ।tadeva kevalībhāvaṃ sā śubhā nirvṛtiḥ parā॥

Reflection is good activity (tendency) after the practice of detachment and contact with scriptures and good people.

यदि तुमने सदैव के लिए संकल्प एवं आशा के अनुसन्धान का परित्याग कर दिया है, तो तुम्हें वह कैवल्य की प्राप्ति हो ही गयी होगी। जो चित्त का अकर्तृत्व है, वही चित्त-वृत्तियों का निरोध अर्थात् समाधि कही गयी है। यही कैवल्यावस्था एवं परम कल्याणस्वरूपा परम शान्ति कहलाती है। इस जगत् के सम्पूर्ण पदार्थों में आत्म भावना का सम्यक् रूप से त्याग करके संसार में गूँगे, अंधे एवं बधिरों के समान तुम्हारे रहने से ही यह संभव है। सभी कुछ प्रशान्त है, एक है, जन्महित है, केवल अनुभवगम्य है, चित्तरहित है आदि जो शब्दरूप दृष्टि है, वह व्यर्थ ही है। आत्मबोध में बाधास्वरूप है। जो कुछ भी प्रपञ्च में दृष्टिगोचर होता है तत्त्वत: वही प्रणवरूप है। यहाँ पर जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है- वही दृश्य चिद्-जगत् में भी दृष्टिगोचर होते हैं, वह चित् के निष्पन्द का एक अंशरूप ही है। अतः चित् से (चैतन्य से) अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तुम ऐसी ही भावना करो । सांसारिक कार्यों को सतत करते हुए भी नित्य प्रबुद्धचित्त होकर आत्मा के एकत्व को जानकर प्रशान्त रहने वाले महासागर के सदृश निश्चल एवं स्थिरचित्त बने रहो। ऐसे ही कार्य करने में कल्याण की सम्भावनायें हैं ॥


Verse ८

चेतसा संपरित्यज्य सर्वभावात्मभावनाम्।यथा तिष्ठसि तिष्ठ त्वं मूकान्धबधिरोपमः ॥

cetasā saṃparityajya sarvabhāvātmabhāvanām।yathā tiṣṭhasi tiṣṭha tvaṃ mūkāndhabadhiropamaḥ ॥

Thinning of the Mind is the condition where the attachment to sense-objects is reduced by means of auspicious desire and reflection.

यदि तुमने सदैव के लिए संकल्प एवं आशा के अनुसन्धान का परित्याग कर दिया है, तो तुम्हें वह कैवल्य की प्राप्ति हो ही गयी होगी। जो चित्त का अकर्तृत्व है, वही चित्त-वृत्तियों का निरोध अर्थात् समाधि कही गयी है। यही कैवल्यावस्था एवं परम कल्याणस्वरूपा परम शान्ति कहलाती है। इस जगत् के सम्पूर्ण पदार्थों में आत्म भावना का सम्यक् रूप से त्याग करके संसार में गूँगे, अंधे एवं बधिरों के समान तुम्हारे रहने से ही यह संभव है। सभी कुछ प्रशान्त है, एक है, जन्महित है, केवल अनुभवगम्य है, चित्तरहित है आदि जो शब्दरूप दृष्टि है, वह व्यर्थ ही है। आत्मबोध में बाधास्वरूप है। जो कुछ भी प्रपञ्च में दृष्टिगोचर होता है तत्त्वत: वही प्रणवरूप है। यहाँ पर जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है- वही दृश्य चिद्-जगत् में भी दृष्टिगोचर होते हैं, वह चित् के निष्पन्द का एक अंशरूप ही है। अतः चित् से (चैतन्य से) अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तुम ऐसी ही भावना करो । सांसारिक कार्यों को सतत करते हुए भी नित्य प्रबुद्धचित्त होकर आत्मा के एकत्व को जानकर प्रशान्त रहने वाले महासागर के सदृश निश्चल एवं स्थिरचित्त बने रहो। ऐसे ही कार्य करने में कल्याण की सम्भावनायें हैं ॥


Verse ९

सर्वं प्रशान्तमजमेकमनादिमध्यमाभास्वरं स्यदनमात्रमचैत्यचिह्नम्।सर्वं प्रशान्तमिति शब्दमयी च दृष्टिर्बाधार्थमेव हि मुधैव तदोमितीदम्॥

sarvaṃ praśāntamajamekamanādimadhyamābhāsvaraṃ syadanamātramacaityacihnam।sarvaṃ praśāntamiti śabdamayī ca dṛṣṭirbādhārthameva hi mudhaiva tadomitīdam॥

Sattvapatti is the mind in the pure Sattva condition by the practice of the above three stages.

यदि तुमने सदैव के लिए संकल्प एवं आशा के अनुसन्धान का परित्याग कर दिया है, तो तुम्हें वह कैवल्य की प्राप्ति हो ही गयी होगी। जो चित्त का अकर्तृत्व है, वही चित्त-वृत्तियों का निरोध अर्थात् समाधि कही गयी है। यही कैवल्यावस्था एवं परम कल्याणस्वरूपा परम शान्ति कहलाती है। इस जगत् के सम्पूर्ण पदार्थों में आत्म भावना का सम्यक् रूप से त्याग करके संसार में गूँगे, अंधे एवं बधिरों के समान तुम्हारे रहने से ही यह संभव है। सभी कुछ प्रशान्त है, एक है, जन्महित है, केवल अनुभवगम्य है, चित्तरहित है आदि जो शब्दरूप दृष्टि है, वह व्यर्थ ही है। आत्मबोध में बाधास्वरूप है। जो कुछ भी प्रपञ्च में दृष्टिगोचर होता है तत्त्वत: वही प्रणवरूप है। यहाँ पर जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है- वही दृश्य चिद्-जगत् में भी दृष्टिगोचर होते हैं, वह चित् के निष्पन्द का एक अंशरूप ही है। अतः चित् से (चैतन्य से) अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तुम ऐसी ही भावना करो । सांसारिक कार्यों को सतत करते हुए भी नित्य प्रबुद्धचित्त होकर आत्मा के एकत्व को जानकर प्रशान्त रहने वाले महासागर के सदृश निश्चल एवं स्थिरचित्त बने रहो। ऐसे ही कार्य करने में कल्याण की सम्भावनायें हैं ॥


Verse १०

सर्वं किंचिदिदं दृश्यं दृश्यते चिज्जगद्गतम्। चिन्निष्पन्दांशमात्रं तन्नान्यदस्तीति भावय॥

sarvaṃ kiṃcididaṃ dṛśyaṃ dṛśyate cijjagadgatam। cinniṣpandāṃśamātraṃ tannānyadastīti bhāvaya॥

The Asamsakti stage is the developed condition, without even a trace of involvement, by means of the practice of the four stages.

यदि तुमने सदैव के लिए संकल्प एवं आशा के अनुसन्धान का परित्याग कर दिया है, तो तुम्हें वह कैवल्य की प्राप्ति हो ही गयी होगी। जो चित्त का अकर्तृत्व है, वही चित्त-वृत्तियों का निरोध अर्थात् समाधि कही गयी है। यही कैवल्यावस्था एवं परम कल्याणस्वरूपा परम शान्ति कहलाती है। इस जगत् के सम्पूर्ण पदार्थों में आत्म भावना का सम्यक् रूप से त्याग करके संसार में गूँगे, अंधे एवं बधिरों के समान तुम्हारे रहने से ही यह संभव है। सभी कुछ प्रशान्त है, एक है, जन्महित है, केवल अनुभवगम्य है, चित्तरहित है आदि जो शब्दरूप दृष्टि है, वह व्यर्थ ही है। आत्मबोध में बाधास्वरूप है। जो कुछ भी प्रपञ्च में दृष्टिगोचर होता है तत्त्वत: वही प्रणवरूप है। यहाँ पर जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है- वही दृश्य चिद्-जगत् में भी दृष्टिगोचर होते हैं, वह चित् के निष्पन्द का एक अंशरूप ही है। अतः चित् से (चैतन्य से) अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तुम ऐसी ही भावना करो । सांसारिक कार्यों को सतत करते हुए भी नित्य प्रबुद्धचित्त होकर आत्मा के एकत्व को जानकर प्रशान्त रहने वाले महासागर के सदृश निश्चल एवं स्थिरचित्त बने रहो। ऐसे ही कार्य करने में कल्याण की सम्भावनायें हैं ॥


Verse ११

नित्यप्रबुद्धचित्तस्त्वं कुर्वन्वापि जगत्क्रियाम्। आत्मैकत्वं विदित्वा त्वं तिष्ठाक्षुब्धमहाब्धिवत् ॥

nityaprabuddhacittastvaṃ kurvanvāpi jagatkriyām। ātmaikatvaṃ viditvā tvaṃ tiṣṭhākṣubdhamahābdhivat ॥

Padarthabhavana is the sixth stage resulting from the five stages, delighting in the spirit firmly by the non-contemplation of objects internal and external.

यदि तुमने सदैव के लिए संकल्प एवं आशा के अनुसन्धान का परित्याग कर दिया है, तो तुम्हें वह कैवल्य की प्राप्ति हो ही गयी होगी। जो चित्त का अकर्तृत्व है, वही चित्त-वृत्तियों का निरोध अर्थात् समाधि कही गयी है। यही कैवल्यावस्था एवं परम कल्याणस्वरूपा परम शान्ति कहलाती है। इस जगत् के सम्पूर्ण पदार्थों में आत्म भावना का सम्यक् रूप से त्याग करके संसार में गूँगे, अंधे एवं बधिरों के समान तुम्हारे रहने से ही यह संभव है। सभी कुछ प्रशान्त है, एक है, जन्महित है, केवल अनुभवगम्य है, चित्तरहित है आदि जो शब्दरूप दृष्टि है, वह व्यर्थ ही है। आत्मबोध में बाधास्वरूप है। जो कुछ भी प्रपञ्च में दृष्टिगोचर होता है तत्त्वत: वही प्रणवरूप है। यहाँ पर जो कुछ भी दृष्टिगोचर होता है- वही दृश्य चिद्-जगत् में भी दृष्टिगोचर होते हैं, वह चित् के निष्पन्द का एक अंशरूप ही है। अतः चित् से (चैतन्य से) अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है, तुम ऐसी ही भावना करो । सांसारिक कार्यों को सतत करते हुए भी नित्य प्रबुद्धचित्त होकर आत्मा के एकत्व को जानकर प्रशान्त रहने वाले महासागर के सदृश निश्चल एवं स्थिरचित्त बने रहो। ऐसे ही कार्य करने में कल्याण की सम्भावनायें हैं ॥


Verse १२

तत्त्वाववोध एवासौ वासनातृणपावकः ।प्रोक्तः समाधिशब्देन न तु तूष्णीमवस्थितिः ॥

tattvāvavodha evāsau vāsanātṛṇapāvakaḥ ।proktaḥ samādhiśabdena na tu tūṣṇīmavasthitiḥ ॥

The 'Fourth' (Transcendental) condition (here the seventh) is concentration on one's nature, seeing no real difference, by the long practice of the six stages - this is the stage of Jivanmukti.

यह आत्मज्ञान वासनारूपी तृण को दग्ध कर देने वाले अग्नि के सदृश है। इसे ही समाधि कहते हैं। केवल मौन रहकर बैठे रहना ही समाधि नहीं है। जैसे रत्न के इच्छारहित होकर पड़े रहने पर भी मनुष्य उसकी तरफ आकृष्ट होते ही हैं, वैसे ही मात्र सत्तारूप में विद्यमान परमात्म तत्व की ओर भी सम्पूर्ण विध आकृष्ट होता है। अतः हे पुत्र! इस आत्मा में ही कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व दोनों ही स्थित हैं। कामनाविहीन रहने पर ही आत्मा अकरर्ता है और सन्निधि मात्र से वह कर्ता बन जाता है। हे मुने ! कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व इन दोनों को ही निवास अविनाशी परमात्मा में है। तुम्हें यह चमत्कार जिसमें भी परिलक्षित हो, उसी में प्रतिष्ठित हो जाओ ।‘मैं नित्य ही अकर्ता हूँ' ऐसी भाषा करने पर केवल परमअमृत नामक सत्ता ही शेष रह जाती है ॥


Verse १३

निरिच्छे संस्थिते रत्ने यथा लोकः प्रवर्तते । सत्तामात्रे परे तत्त्वे तथैवायं जगद्गणः ॥

niricche saṃsthite ratne yathā lokaḥ pravartate । sattāmātre pare tattve tathaivāyaṃ jagadgaṇaḥ ॥

The stage 'Beyond the Fourth' is the stage of liberation without the body.

यह आत्मज्ञान वासनारूपी तृण को दग्ध कर देने वाले अग्नि के सदृश है। इसे ही समाधि कहते हैं। केवल मौन रहकर बैठे रहना ही समाधि नहीं है। जैसे रत्न के इच्छारहित होकर पड़े रहने पर भी मनुष्य उसकी तरफ आकृष्ट होते ही हैं, वैसे ही मात्र सत्तारूप में विद्यमान परमात्म तत्व की ओर भी सम्पूर्ण विध आकृष्ट होता है। अतः हे पुत्र! इस आत्मा में ही कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व दोनों ही स्थित हैं। कामनाविहीन रहने पर ही आत्मा अकरर्ता है और सन्निधि मात्र से वह कर्ता बन जाता है। हे मुने ! कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व इन दोनों को ही निवास अविनाशी परमात्मा में है। तुम्हें यह चमत्कार जिसमें भी परिलक्षित हो, उसी में प्रतिष्ठित हो जाओ ।‘मैं नित्य ही अकर्ता हूँ' ऐसी भाषा करने पर केवल परमअमृत नामक सत्ता ही शेष रह जाती है ॥


Verse १४

अतश्चात्मनि कर्तृत्वमकर्तृत्वं च वै मुने । निरिच्छत्वादकर्तासौ कर्ता संनिधिमात्रतः ॥

ataścātmani kartṛtvamakartṛtvaṃ ca vai mune । niricchatvādakartāsau kartā saṃnidhimātrataḥ ॥

V-36-40. Nidagha, those who have reached the seventh stage, delight in the spirit - they do not drown in pleasure and pain. They do (or not do) whatever is only relevant and minimal. They perform actions following the past, awakened (impelled) by those nearby, like one waking from sleep.

यह आत्मज्ञान वासनारूपी तृण को दग्ध कर देने वाले अग्नि के सदृश है। इसे ही समाधि कहते हैं। केवल मौन रहकर बैठे रहना ही समाधि नहीं है। जैसे रत्न के इच्छारहित होकर पड़े रहने पर भी मनुष्य उसकी तरफ आकृष्ट होते ही हैं, वैसे ही मात्र सत्तारूप में विद्यमान परमात्म तत्व की ओर भी सम्पूर्ण विध आकृष्ट होता है। अतः हे पुत्र! इस आत्मा में ही कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व दोनों ही स्थित हैं। कामनाविहीन रहने पर ही आत्मा अकरर्ता है और सन्निधि मात्र से वह कर्ता बन जाता है। हे मुने ! कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व इन दोनों को ही निवास अविनाशी परमात्मा में है। तुम्हें यह चमत्कार जिसमें भी परिलक्षित हो, उसी में प्रतिष्ठित हो जाओ ।‘मैं नित्य ही अकर्ता हूँ' ऐसी भाषा करने पर केवल परमअमृत नामक सत्ता ही शेष रह जाती है ॥


Verse १५

ते द्वे ब्रह्मणि विन्देत कर्तृताकर्तृते मुने।यत्रैवैष चमत्कारस्तमाश्रित्य स्थिरो भव ॥

te dve brahmaṇi vindeta kartṛtākartṛte mune।yatraivaiṣa camatkārastamāśritya sthiro bhava ॥

These seven stages can be known only by the enlightened - reaching which condition, even animals, barbarians etc., are liberated with or without the body surely.

यह आत्मज्ञान वासनारूपी तृण को दग्ध कर देने वाले अग्नि के सदृश है। इसे ही समाधि कहते हैं। केवल मौन रहकर बैठे रहना ही समाधि नहीं है। जैसे रत्न के इच्छारहित होकर पड़े रहने पर भी मनुष्य उसकी तरफ आकृष्ट होते ही हैं, वैसे ही मात्र सत्तारूप में विद्यमान परमात्म तत्व की ओर भी सम्पूर्ण विध आकृष्ट होता है। अतः हे पुत्र! इस आत्मा में ही कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व दोनों ही स्थित हैं। कामनाविहीन रहने पर ही आत्मा अकरर्ता है और सन्निधि मात्र से वह कर्ता बन जाता है। हे मुने ! कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व इन दोनों को ही निवास अविनाशी परमात्मा में है। तुम्हें यह चमत्कार जिसमें भी परिलक्षित हो, उसी में प्रतिष्ठित हो जाओ ।‘मैं नित्य ही अकर्ता हूँ' ऐसी भाषा करने पर केवल परमअमृत नामक सत्ता ही शेष रह जाती है ॥


Verse १६

तस्मान्नित्यमकर्ताहमिति भावनयेद्धया । परमामृतनाम्नी सा समतैवावशिष्यते ॥

tasmānnityamakartāhamiti bhāvanayeddhayā । paramāmṛtanāmnī sā samataivāvaśiṣyate ॥

Wisdom indeed is the breaking of the knot and the liberation - the dying of the illusion of mirage.

यह आत्मज्ञान वासनारूपी तृण को दग्ध कर देने वाले अग्नि के सदृश है। इसे ही समाधि कहते हैं। केवल मौन रहकर बैठे रहना ही समाधि नहीं है। जैसे रत्न के इच्छारहित होकर पड़े रहने पर भी मनुष्य उसकी तरफ आकृष्ट होते ही हैं, वैसे ही मात्र सत्तारूप में विद्यमान परमात्म तत्व की ओर भी सम्पूर्ण विध आकृष्ट होता है। अतः हे पुत्र! इस आत्मा में ही कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व दोनों ही स्थित हैं। कामनाविहीन रहने पर ही आत्मा अकरर्ता है और सन्निधि मात्र से वह कर्ता बन जाता है। हे मुने ! कर्तृत्व एवं अकर्तृत्व इन दोनों को ही निवास अविनाशी परमात्मा में है। तुम्हें यह चमत्कार जिसमें भी परिलक्षित हो, उसी में प्रतिष्ठित हो जाओ ।‘मैं नित्य ही अकर्ता हूँ' ऐसी भाषा करने पर केवल परमअमृत नामक सत्ता ही शेष रह जाती है ॥


Verse १७

निदाघ शृणु सत्त्वस्था जाता भुवि महागुणाः ।ते नित्यमेवाभ्युदिता मुदिताः ख इवेन्दवः ॥

nidāgha śṛṇu sattvasthā jātā bhuvi mahāguṇāḥ ।te nityamevābhyuditā muditāḥ kha ivendavaḥ ॥

V-41. But those who have crossed the ocean of illusion - they have reached the high position.

अतः हे निदाघ! जो प्राणी सत्व में स्थित होकर इस लोक में प्रकट हुए हैं, वे ही महान् गुणवान् हैं । वे ही सदा उन्नतिशील होते हुए आकाश में स्थित चन्द्रमा के समान हर्षित होते रहते हैं। सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य स्वर्णिम कमल की भाँति रात्रिकालरूप आपत्तियों में कुम्हलाते नहीं हैं। वे प्राप्त भोगों के अतिरिक्त अन्य पदार्थों की इच्छा नहीं करते, वरन् शास्त्रोक्त मार्ग में ही भ्रमण करते रहते हैं। वे स्वतः अपने मन के अनुकूल रहकर ही मैत्री, करुणा, मुदिता एवं उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित होते रहते हैं । हे सौम्य ! वे समान भाव में रहते हुए सतत साधु वृत्ति में एकरस बने रहते हैं । मर्यादा से परे होकर भी वे समुद्र के समान विशाल हृदय वाले हो जाते हैं। वे भगवान् भास्कर की भाँति अपने नियत-पथ पर हमेशा गमन करते रहते हैं॥


Verse १८

नापदि ग्लानिमायान्ति निशि हेमाम्बुजं यथा। नेहन्ते प्रकृतादन्यद्रमन्ते शिष्टवर्मनि ॥

nāpadi glānimāyānti niśi hemāmbujaṃ yathā। nehante prakṛtādanyadramante śiṣṭavarmani ॥

V-42-43. The means of calming the mind is said to be Yoga. This is to be known as having seven stages which lead to the status of Brahman.

अतः हे निदाघ! जो प्राणी सत्व में स्थित होकर इस लोक में प्रकट हुए हैं, वे ही महान् गुणवान् हैं । वे ही सदा उन्नतिशील होते हुए आकाश में स्थित चन्द्रमा के समान हर्षित होते रहते हैं। सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य स्वर्णिम कमल की भाँति रात्रिकालरूप आपत्तियों में कुम्हलाते नहीं हैं। वे प्राप्त भोगों के अतिरिक्त अन्य पदार्थों की इच्छा नहीं करते, वरन् शास्त्रोक्त मार्ग में ही भ्रमण करते रहते हैं। वे स्वतः अपने मन के अनुकूल रहकर ही मैत्री, करुणा, मुदिता एवं उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित होते रहते हैं । हे सौम्य ! वे समान भाव में रहते हुए सतत साधु वृत्ति में एकरस बने रहते हैं । मर्यादा से परे होकर भी वे समुद्र के समान विशाल हृदय वाले हो जाते हैं। वे भगवान् भास्कर की भाँति अपने नियत-पथ पर हमेशा गमन करते रहते हैं॥


Verse १९

आकृत्यैव विराजते मैत्र्यादिगुणवृत्तिभिः ।समाः समरसाः सौम्य सततं साधुवृत्तयः ॥

ākṛtyaiva virājate maitryādiguṇavṛttibhiḥ ।samāḥ samarasāḥ saumya satataṃ sādhuvṛttayaḥ ॥

V-44. There, there is no feeling of 'you' and 'I', one's own and another, nor the perception of existence or non-existence.

अतः हे निदाघ! जो प्राणी सत्व में स्थित होकर इस लोक में प्रकट हुए हैं, वे ही महान् गुणवान् हैं । वे ही सदा उन्नतिशील होते हुए आकाश में स्थित चन्द्रमा के समान हर्षित होते रहते हैं। सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य स्वर्णिम कमल की भाँति रात्रिकालरूप आपत्तियों में कुम्हलाते नहीं हैं। वे प्राप्त भोगों के अतिरिक्त अन्य पदार्थों की इच्छा नहीं करते, वरन् शास्त्रोक्त मार्ग में ही भ्रमण करते रहते हैं। वे स्वतः अपने मन के अनुकूल रहकर ही मैत्री, करुणा, मुदिता एवं उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित होते रहते हैं । हे सौम्य ! वे समान भाव में रहते हुए सतत साधु वृत्ति में एकरस बने रहते हैं । मर्यादा से परे होकर भी वे समुद्र के समान विशाल हृदय वाले हो जाते हैं। वे भगवान् भास्कर की भाँति अपने नियत-पथ पर हमेशा गमन करते रहते हैं॥


Verse २०

अब्धिवद्धृतमर्यादा भवन्ति विशदाशयाः ।नियतिं न विमुञ्चन्ति माहान्तो भास्करा इव ॥

abdhivaddhṛtamaryādā bhavanti viśadāśayāḥ ।niyatiṃ na vimuñcanti māhānto bhāskarā iva ॥

V-45. All is calm (needing) no support, existing in the ether (of the heart), eternal, auspicious, devoid of ailment and illusion, name and cause.

अतः हे निदाघ! जो प्राणी सत्व में स्थित होकर इस लोक में प्रकट हुए हैं, वे ही महान् गुणवान् हैं । वे ही सदा उन्नतिशील होते हुए आकाश में स्थित चन्द्रमा के समान हर्षित होते रहते हैं। सत्त्वगुण में स्थित मनुष्य स्वर्णिम कमल की भाँति रात्रिकालरूप आपत्तियों में कुम्हलाते नहीं हैं। वे प्राप्त भोगों के अतिरिक्त अन्य पदार्थों की इच्छा नहीं करते, वरन् शास्त्रोक्त मार्ग में ही भ्रमण करते रहते हैं। वे स्वतः अपने मन के अनुकूल रहकर ही मैत्री, करुणा, मुदिता एवं उपेक्षा आदि गुणों से विभूषित होते रहते हैं । हे सौम्य ! वे समान भाव में रहते हुए सतत साधु वृत्ति में एकरस बने रहते हैं । मर्यादा से परे होकर भी वे समुद्र के समान विशाल हृदय वाले हो जाते हैं। वे भगवान् भास्कर की भाँति अपने नियत-पथ पर हमेशा गमन करते रहते हैं॥


Verse २१

कोऽहं कथमिदं चेति संसारमलमाततम् । प्रविचार्यं प्रयत्नेन प्राज्ञेन सह साधुना ॥

ko'haṃ kathamidaṃ ceti saṃsāramalamātatam । pravicāryaṃ prayatnena prājñena saha sādhunā ॥

V-46. Neither existent nor-existent, nor in between, nor the negation of all; beyond the grasp of mind and words, fuller than the fullest, more joyful than joy.

प्राज्ञों, संतजनों के साथ प्रयत्नपूर्वक यह चिन्तन करना चाहिए कि ‘मैं कौन हूँ?' यह विराट् विश्व-प्रपञ्च किस प्रकार प्रादुर्भूत हुआ ? कभी निरर्थक कार्यों में न लगा रहे तथा अनार्य पुरुष के संग से सदैव अपने को बचाता रहे। सभी को संघारक, मृत्यु के प्रति उपेक्षा भाव से न देखे। यदि उपेक्षा करनी ही है, तो शरीर, अस्थि, मांस एवं रक्त आदि को घृणास्पद जानकर उनकी उपेक्षा करनी चाहिए। जिस प्रकार मोती की लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, उसी प्रकार प्राणियों में पिरोये हुए परमपिता परमात्मा पर ही दृष्टि रखे। उपयोगी वस्तु की ओर भागना एवं अनुपयोगी वस्तु का सदैव के लिए त्याग कर देना ही मन का स्वभाव है। वह बाह्य है, आन्तरिक नहीं, इसे जानना चाहिए। परमात्मतत्त्व के विषय में गुरु एवं शास्त्र के अनुसार बताये हुए मार्ग से तथा स्वानुभूति से ‘मैं ही ब्रह्म हूँ', ऐसा जानकर शोक-रहित हो जाए ॥


Verse २२

नाकर्मसु नियोक्तव्यं नानार्येण सहावसेत् । द्रष्टव्यः सर्वसंहर्ता न मृत्युरवहेलया ॥

nākarmasu niyoktavyaṃ nānāryeṇa sahāvaset । draṣṭavyaḥ sarvasaṃhartā na mṛtyuravahelayā ॥

V-47. Beyond (worldly) perception, the limit of one's hope (horizon) extensive, there is no existence of any thing other than pure cognition.

प्राज्ञों, संतजनों के साथ प्रयत्नपूर्वक यह चिन्तन करना चाहिए कि ‘मैं कौन हूँ?' यह विराट् विश्व-प्रपञ्च किस प्रकार प्रादुर्भूत हुआ ? कभी निरर्थक कार्यों में न लगा रहे तथा अनार्य पुरुष के संग से सदैव अपने को बचाता रहे। सभी को संघारक, मृत्यु के प्रति उपेक्षा भाव से न देखे। यदि उपेक्षा करनी ही है, तो शरीर, अस्थि, मांस एवं रक्त आदि को घृणास्पद जानकर उनकी उपेक्षा करनी चाहिए। जिस प्रकार मोती की लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, उसी प्रकार प्राणियों में पिरोये हुए परमपिता परमात्मा पर ही दृष्टि रखे। उपयोगी वस्तु की ओर भागना एवं अनुपयोगी वस्तु का सदैव के लिए त्याग कर देना ही मन का स्वभाव है। वह बाह्य है, आन्तरिक नहीं, इसे जानना चाहिए। परमात्मतत्त्व के विषय में गुरु एवं शास्त्र के अनुसार बताये हुए मार्ग से तथा स्वानुभूति से ‘मैं ही ब्रह्म हूँ', ऐसा जानकर शोक-रहित हो जाए ॥


Verse २३

शरीरमस्थि मांसं च त्यक्त्वा रक्ताद्यशोभनम्। भूतमुक्तावलीतन्तुं चिन्मात्रमवलोकयेत्॥

śarīramasthi māṃsaṃ ca tyaktvā raktādyaśobhanam। bhūtamuktāvalītantuṃ cinmātramavalokayet॥

V-48. The body exists only when there is the relationship of the perceiver, the perceived and the vision connecting them, whereas this position (of liberation) is devoid of such relation (of the distinct) Perceiver, Perception and object.

प्राज्ञों, संतजनों के साथ प्रयत्नपूर्वक यह चिन्तन करना चाहिए कि ‘मैं कौन हूँ?' यह विराट् विश्व-प्रपञ्च किस प्रकार प्रादुर्भूत हुआ ? कभी निरर्थक कार्यों में न लगा रहे तथा अनार्य पुरुष के संग से सदैव अपने को बचाता रहे। सभी को संघारक, मृत्यु के प्रति उपेक्षा भाव से न देखे। यदि उपेक्षा करनी ही है, तो शरीर, अस्थि, मांस एवं रक्त आदि को घृणास्पद जानकर उनकी उपेक्षा करनी चाहिए। जिस प्रकार मोती की लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, उसी प्रकार प्राणियों में पिरोये हुए परमपिता परमात्मा पर ही दृष्टि रखे। उपयोगी वस्तु की ओर भागना एवं अनुपयोगी वस्तु का सदैव के लिए त्याग कर देना ही मन का स्वभाव है। वह बाह्य है, आन्तरिक नहीं, इसे जानना चाहिए। परमात्मतत्त्व के विषय में गुरु एवं शास्त्र के अनुसार बताये हुए मार्ग से तथा स्वानुभूति से ‘मैं ही ब्रह्म हूँ', ऐसा जानकर शोक-रहित हो जाए ॥


Verse २४

उपादेयानुपतनं हेयैकान्तविसर्जनम्। यदेतन्मनसो रूपं तद्ब्राह्यं विद्धि नेतरत्॥

upādeyānupatanaṃ heyaikāntavisarjanam। yadetanmanaso rūpaṃ tadbrāhyaṃ viddhi netarat॥

V-49. In between the movement of the mind from object to object there is the unqualified essence of intelligence. This is immaterial perception, reflection; always identify yourself with That.

प्राज्ञों, संतजनों के साथ प्रयत्नपूर्वक यह चिन्तन करना चाहिए कि ‘मैं कौन हूँ?' यह विराट् विश्व-प्रपञ्च किस प्रकार प्रादुर्भूत हुआ ? कभी निरर्थक कार्यों में न लगा रहे तथा अनार्य पुरुष के संग से सदैव अपने को बचाता रहे। सभी को संघारक, मृत्यु के प्रति उपेक्षा भाव से न देखे। यदि उपेक्षा करनी ही है, तो शरीर, अस्थि, मांस एवं रक्त आदि को घृणास्पद जानकर उनकी उपेक्षा करनी चाहिए। जिस प्रकार मोती की लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, उसी प्रकार प्राणियों में पिरोये हुए परमपिता परमात्मा पर ही दृष्टि रखे। उपयोगी वस्तु की ओर भागना एवं अनुपयोगी वस्तु का सदैव के लिए त्याग कर देना ही मन का स्वभाव है। वह बाह्य है, आन्तरिक नहीं, इसे जानना चाहिए। परमात्मतत्त्व के विषय में गुरु एवं शास्त्र के अनुसार बताये हुए मार्ग से तथा स्वानुभूति से ‘मैं ही ब्रह्म हूँ', ऐसा जानकर शोक-रहित हो जाए ॥


Verse २५

गुरुशास्त्रोक्तमार्गेण स्वानुभूत्याच चिद्घने । ब्रह्मैवाहमिति ज्ञात्वा वीतशोको भवेन्मुनिः ।।

guruśāstroktamārgeṇa svānubhūtyāca cidghane । brahmaivāhamiti jñātvā vītaśoko bhavenmuniḥ ।।

V-50. Your eternal essence (is), devoid of states like wakefulness, dream and deep sleep or Equalities like intelligence and inertness; always identify yourself with that.

प्राज्ञों, संतजनों के साथ प्रयत्नपूर्वक यह चिन्तन करना चाहिए कि ‘मैं कौन हूँ?' यह विराट् विश्व-प्रपञ्च किस प्रकार प्रादुर्भूत हुआ ? कभी निरर्थक कार्यों में न लगा रहे तथा अनार्य पुरुष के संग से सदैव अपने को बचाता रहे। सभी को संघारक, मृत्यु के प्रति उपेक्षा भाव से न देखे। यदि उपेक्षा करनी ही है, तो शरीर, अस्थि, मांस एवं रक्त आदि को घृणास्पद जानकर उनकी उपेक्षा करनी चाहिए। जिस प्रकार मोती की लड़ियों में सूत्र पिरोया जाता है, उसी प्रकार प्राणियों में पिरोये हुए परमपिता परमात्मा पर ही दृष्टि रखे। उपयोगी वस्तु की ओर भागना एवं अनुपयोगी वस्तु का सदैव के लिए त्याग कर देना ही मन का स्वभाव है। वह बाह्य है, आन्तरिक नहीं, इसे जानना चाहिए। परमात्मतत्त्व के विषय में गुरु एवं शास्त्र के अनुसार बताये हुए मार्ग से तथा स्वानुभूति से ‘मैं ही ब्रह्म हूँ', ऐसा जानकर शोक-रहित हो जाए ॥


Verse २६

यत्र निशितासिशतपातनमुत्पलताडनवत्सोढव्यमग्निदाहो हिमसेचनमिवाङ्गारावर्तनं चन्दनचर्चेव निरवधिनाराचविकिरपातो निदाघविनोदनधारागृहशीकरवर्षणमिव स्वशिरश्छेदः सुखनिद्रेव मूकीकरणमाननमुद्रेव बाधिर्यं महानुपचय इवेदं नावहेलनया भवितव्यमेवं दृढवैराग्याद्बोधो भवति । गुरुवाक्यसमुद्भूतस्वानुभूत्यादिशुद्धया।यस्याभ्यासेन तेनात्मा सततं चावलोक्यते ॥

yatra niśitāsiśatapātanamutpalatāḍanavatsoḍhavyamagnidāho himasecanamivāṅgārāvartanaṃ candanacarceva niravadhinārācavikirapāto nidāghavinodanadhārāgṛhaśīkaravarṣaṇamiva svaśiraśchedaḥ sukhanidreva mūkīkaraṇamānanamudreva bādhiryaṃ mahānupacaya ivedaṃ nāvahelanayā bhavitavyamevaṃ dṛḍhavairāgyādbodho bhavati । guruvākyasamudbhūtasvānubhūtyādiśuddhayā।yasyābhyāsena tenātmā satataṃ cāvalokyate ॥

V-51. Excluding that heart of stone, inertness, always identify yourself with that which is beyond the mind. Discarding the mind in the far distance (you see) you are that which is; be established as That.

ऐसी अवस्था में खड्ग जैसा कठोर आघात, कमल के कोमल अधिात के सदृश तथा अग्नि द्वारा दग्ध किये जाने का प्रभाव, शीतल जल में स्नान करने की भाँति सहन करने योग्य हो जाता है। आग के दहफते अंगारों पर लेटना, चन्दन के लेप के समान शीतल प्रतीत होता है। शरीर पर सतत बाणों के समूह का आघात, गर्मी को शान्त करने वाले फव्वारे के जलकणों की वर्षा के सदृश बन जाता है। सिर का काटा जाना, सुखप्रदायिनी निद्रा के समान; (जिह्वा आदि काटकर) गूँगा हो जाना, मौनावलम्बन के समान;बधिर हो जाना, उन्नति के समान सुख प्रदायी होता है; लेकिन यह अवस्था उपेक्षा करने से नहीं मिलती । इसकी प्राप्ति दृढ़निश्चयी होकर वैराग्यजनित आत्मज्ञान से ही सम्भव है। गुरु एवं शास्त्र वचनों के अनुसार तथा अन्तः अनुभूति के माध्यम आदि से ओ अन्तः की शुद्धि होती है, उसी के सतत अभ्यास से आत्म-साक्षात्कार किया जा सकता है ।।


Verse २७

विनष्टदिग्भ्रमस्यापि यथापूर्व विभाति दिक् । तथा विज्ञानविध्वस्तं जगन्नास्तीति भावय ॥

vinaṣṭadigbhramasyāpi yathāpūrva vibhāti dik । tathā vijñānavidhvastaṃ jagannāstīti bhāvaya ॥

V-52. First the mind was formed from the principle of the supreme Self; by the mind has this world, with its multitudinous details, been spread out. Wise men! The nihil, alluringly named, shines forth from the nihil as the blue does from the sky.

जैसे दिशा-भ्रम नष्ट हो जाने से पूर्व की भाँति ही दिशाबोध होने लगता है, वैसे ही विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान)के द्वारा अज्ञान नष्ट हो जाने पर जगत् की स्थिति नहीं रहती, ऐसी भावना करनी चाहिए । मनुष्य का उपकार न धन से,न मित्रों से, न बान्धयों से; न शारीरिक क्लेश के नष्ट होने से और न ही तीर्थ-स्थल में निवास करने से ही मनुष्य लाभान्वित होता है; वह तो चिन्मात्र में विलीन होकर ही परमपद प्राप्त कर सकता है ॥


Verse २८

न धनान्युपकुर्वन्ति न मित्राणि न बान्धवाः।न कायक्लेशवैधुर्यं न तीर्थायतनाश्रयः।केवलं तन्मनोमात्रमयेनासाद्यते पदम् ॥

na dhanānyupakurvanti na mitrāṇi na bāndhavāḥ।na kāyakleśavaidhuryaṃ na tīrthāyatanāśrayaḥ।kevalaṃ tanmanomātramayenāsādyate padam ॥

V-53. When the mind is dissolved, through the attenuation of mental constructions, the mist of cosmic fancies will stand dissolved. The one, infinite, unborn, pristine and pure Spirit shines forth within as the cloudless sky in autumn.

जैसे दिशा-भ्रम नष्ट हो जाने से पूर्व की भाँति ही दिशाबोध होने लगता है, वैसे ही विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान)के द्वारा अज्ञान नष्ट हो जाने पर जगत् की स्थिति नहीं रहती, ऐसी भावना करनी चाहिए । मनुष्य का उपकार न धन से,न मित्रों से, न बान्धयों से; न शारीरिक क्लेश के नष्ट होने से और न ही तीर्थ-स्थल में निवास करने से ही मनुष्य लाभान्वित होता है; वह तो चिन्मात्र में विलीन होकर ही परमपद प्राप्त कर सकता है ॥


Verse २९

यानि दुःखानि या तृष्णा दुःसहा ये दुराधयः । शान्तचेतःसु तत्सर्वं तमोऽर्केष्विव नश्यति ॥

yāni duḥkhāni yā tṛṣṇā duḥsahā ye durādhayaḥ । śāntacetaḥsu tatsarvaṃ tamo'rkeṣviva naśyati ॥

V-55. In the conscious Self that is the witness, common, transparent and indisputable, as a mirror, are reflected all the worlds without willing (of any kind).


Verse ३०

मातरीव परं यान्ति विषमाणि मृदूनि च। विश्वासमिह भूतानि सर्वाणि शमशालिनि ॥

mātarīva paraṃ yānti viṣamāṇi mṛdūni ca। viśvāsamiha bhūtāni sarvāṇi śamaśālini ॥

V-56. For curing the mind of its fickleness, deliberately reflect that the one Brahman is the Sky of the Spirit, the impartite Self of the cosmos.


Verse ३१

न रसायनपानेन न लक्ष्म्यालिङ्गितेन च।न तथा सुखमाप्नोति शमेनान्तर्यथा जनः ।।

na rasāyanapānena na lakṣmyāliṅgitena ca।na tathā sukhamāpnoti śamenāntaryathā janaḥ ।।

V-57. As an immense rock, covered with main lines and sub-lines, learn to regard the one Brahman with the three worlds superposed on It.


Verse ३२

श्रुत्वा स्पृष्ट्वा च भुक्त्वा च दृष्ट्वा ज्ञात्वा शुभाशुभम्।न हृष्यति ग्लायति यः स शान्त इति कथ्यते ॥

śrutvā spṛṣṭvā ca bhuktvā ca dṛṣṭvā jñātvā śubhāśubham।na hṛṣyati glāyati yaḥ sa śānta iti kathyate ॥

V-59. Long agitated (as I have been, now) I am at rest; there is nothing other than pure Spirit. Laying aside all doubts, discarding all sense of wonder, behold!


Verse ३३

तुषारकरबिम्बाच्छं मनो यस्य निराकुलम्। मरणोत्सवयुद्धेषु स शान्त इति कथ्यते ॥

tuṣārakarabimbācchaṃ mano yasya nirākulam। maraṇotsavayuddheṣu sa śānta iti kathyate ॥

V-59. Long agitated (as I have been, now) I am at rest; there is nothing other than pure Spirit. Laying aside all doubts, discarding all sense of wonder, behold!


Verse ३४

तपस्विषु बहुज्ञेषु याजकेषु नृपेषु च।वनवत्सु गुणाढ्येषु शमवानेव राजते ॥

tapasviṣu bahujñeṣu yājakeṣu nṛpeṣu ca।vanavatsu guṇāḍhyeṣu śamavāneva rājate ॥

V-61(a). Those (sages) whose intellects are great and tranquil and who have risen above the mind.

स्थिर शान्तचित्त वाले व्यक्तियों के जितने भी दु:ख, तृष्णायें एवं दु:सह दुश्चिन्तायें हैं, वे और समस्त विकार ठीक वैसे ही विनष्ट हो जाते हैं, जैसे कि सूर्य की किरणों से अन्धकार विनष्ट हो जाता है। इस नश्वर जगत् में शम (मनोनिग्रह) से युक्त मनुष्य का कठोर एवं मृदु स्वभाव के समस्त प्राणी-जन वैसे ही विश्वास करते हैं, जैसा माता पर उसके पुत्र विश्वास करते हैं। अमृत-पान एवं लक्ष्मी के आलिङ्गन से वैसा सुख नहीं प्राप्त होता, जैसा सुख व्यक्ति अपने मन को शान्ति से प्राप्त करता है। शुभ एवं अशुभ के श्रवण से, भोजन से, स्पर्श से, दर्शन से एवं जानने से, जिस मनुष्य को न तो प्रसन्नता होती है और न ही दु:ख होता है, वही मनुष्य शान्त कहलाता | है। चन्द्रमा के मण्डल की भाँति जिसका मन सदा स्वच्छ रहता है एवं मरण-काल, मांगलिक उत्सव तथा युद्ध में जिसका मन व्यग्र नहीं होता, वही मनुष्य शान्त कहलाता है। वह (शम प्रधान) पुरुष तपस्वी जनों में, बहुश्रुतों में, याज्ञिकों में राजाओं में, वन में वास करने वालों में एवं गुणज्ञों में भी शोभायमान होता है ॥

चतुर्थोऽध्यायः (part 2)

Verse ३५

संतोषामृतपानेन ये शान्तास्तृप्तिमागताः । आत्मारामा महात्मानस्ते महापदमागताः ॥

saṃtoṣāmṛtapānena ye śāntāstṛptimāgatāḥ । ātmārāmā mahātmānaste mahāpadamāgatāḥ ॥

V-61(b)-62. One who has reasoned out (the nature of things according to the Vedanta), the modifications of whose mind (objectively induced) have ceased, who has given up all reasoning (vis-a-vis objects), who has dismissed the objective realm, empty of values but has seized on what alone has eternal value, has a mind that conforms to the eternal Reality.

जो सन्तोषरूपी अमृत को पीकर शान्त एवं सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे ही ज्ञानीजन आत्मा में रमण करते हुए ‘महापद (परमात्मपद) को प्राप्त करते हैं। जो प्राप्त न होने वाली वस्तु के प्रति चिन्तित नहीं होता और प्राप्त होने वाली वस्तु के प्रति समान (हर्ष रहित) रहता है, जिसने सुख एवं दुःख का अवलोकन नहीं किया, वास्तव में वही सन्तुष्ट कहा जाता है । जो अप्राप्त वस्तु की कभी आकांक्षा नहीं करता तथा उपलब्ध वस्तु का आवश्यकतानुसार ही उपभोग करता है, वही सौम्य एवं समभाव से श्रेष्ठ आचरण करने वाला व्यक्ति सन्तुष्ट कहा जाता है । अन्त:पुर के प्राङ्गण में जिस तरह साध्वी पत्नी प्रसन्न रहती है, वैसे ही सहज क्रम में प्राप्त वस्तु में जब बुद्धि रमण करने लगती है, तभी वह स्वरूपानंद प्रदायी जीवन्मुक्त स्थिति कहलाती है।।


Verse ३६

अप्राप्तं हि परित्यज्य संप्राप्ते समतां गतः। अदृष्टखेदाखेदो यः संतुष्ट इति कथ्यते ॥

aprāptaṃ hi parityajya saṃprāpte samatāṃ gataḥ। adṛṣṭakhedākhedo yaḥ saṃtuṣṭa iti kathyate ॥

V-63-66. When the net of deep-seated impressions of empirical life is split as a fowler's net by a rat, when, due to dispassion's power, the knots of the heart are loosened, one's nature as Brahman becomes crystal clear owing to the experiential Knowledge (of Brahman) even as muddy water treated with the Kataka-powder. Now one experiences the eternal Witness; no longer one beholds the inert (non-Seen). While (yet) living one is awakened to the supreme Truth that alone is to be realized. One is totally oblivious of the ways of the world, shrouded in the thick gloom of delusion; and due to an eminent degree of mature dispassion, one ceases to have any relish for even the so-called delectables that are (in fact) dry and tasteless.

जो सन्तोषरूपी अमृत को पीकर शान्त एवं सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे ही ज्ञानीजन आत्मा में रमण करते हुए ‘महापद (परमात्मपद) को प्राप्त करते हैं। जो प्राप्त न होने वाली वस्तु के प्रति चिन्तित नहीं होता और प्राप्त होने वाली वस्तु के प्रति समान (हर्ष रहित) रहता है, जिसने सुख एवं दुःख का अवलोकन नहीं किया, वास्तव में वही सन्तुष्ट कहा जाता है । जो अप्राप्त वस्तु की कभी आकांक्षा नहीं करता तथा उपलब्ध वस्तु का आवश्यकतानुसार ही उपभोग करता है, वही सौम्य एवं समभाव से श्रेष्ठ आचरण करने वाला व्यक्ति सन्तुष्ट कहा जाता है । अन्त:पुर के प्राङ्गण में जिस तरह साध्वी पत्नी प्रसन्न रहती है, वैसे ही सहज क्रम में प्राप्त वस्तु में जब बुद्धि रमण करने लगती है, तभी वह स्वरूपानंद प्रदायी जीवन्मुक्त स्थिति कहलाती है।।


Verse ३७

नाभिनन्दत्यसंप्राप्त प्राप्तं भुङ्क्ते यथेप्सितम्। यः स सौम्यसमाचारः संतुष्ट इति कथ्यते ॥

nābhinandatyasaṃprāpta prāptaṃ bhuṅkte yathepsitam। yaḥ sa saumyasamācāraḥ saṃtuṣṭa iti kathyate ॥

V-67. Like a bird from its cage, from delusions flies forth the mind devoid of attachments, frailties, dualities and props.

जो सन्तोषरूपी अमृत को पीकर शान्त एवं सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे ही ज्ञानीजन आत्मा में रमण करते हुए ‘महापद (परमात्मपद) को प्राप्त करते हैं। जो प्राप्त न होने वाली वस्तु के प्रति चिन्तित नहीं होता और प्राप्त होने वाली वस्तु के प्रति समान (हर्ष रहित) रहता है, जिसने सुख एवं दुःख का अवलोकन नहीं किया, वास्तव में वही सन्तुष्ट कहा जाता है । जो अप्राप्त वस्तु की कभी आकांक्षा नहीं करता तथा उपलब्ध वस्तु का आवश्यकतानुसार ही उपभोग करता है, वही सौम्य एवं समभाव से श्रेष्ठ आचरण करने वाला व्यक्ति सन्तुष्ट कहा जाता है । अन्त:पुर के प्राङ्गण में जिस तरह साध्वी पत्नी प्रसन्न रहती है, वैसे ही सहज क्रम में प्राप्त वस्तु में जब बुद्धि रमण करने लगती है, तभी वह स्वरूपानंद प्रदायी जीवन्मुक्त स्थिति कहलाती है।।


Verse ३८

रमते धीर्यथाप्राप्ते साध्वीवाऽन्तःपुराजिरे।सा जीवन्मुक्ततोदेति स्वरूपानन्ददायिनी ।।

ramate dhīryathāprāpte sādhvīvā'ntaḥpurājire।sā jīvanmuktatodeti svarūpānandadāyinī ।।

V-68. The mind filled with (Truth) shines like the full-moon vanquishing all meanness born of perplexities and dismissing all dilemmas due to (idle) curiosities.

जो सन्तोषरूपी अमृत को पीकर शान्त एवं सन्तुष्ट हो जाते हैं, वे ही ज्ञानीजन आत्मा में रमण करते हुए ‘महापद (परमात्मपद) को प्राप्त करते हैं। जो प्राप्त न होने वाली वस्तु के प्रति चिन्तित नहीं होता और प्राप्त होने वाली वस्तु के प्रति समान (हर्ष रहित) रहता है, जिसने सुख एवं दुःख का अवलोकन नहीं किया, वास्तव में वही सन्तुष्ट कहा जाता है । जो अप्राप्त वस्तु की कभी आकांक्षा नहीं करता तथा उपलब्ध वस्तु का आवश्यकतानुसार ही उपभोग करता है, वही सौम्य एवं समभाव से श्रेष्ठ आचरण करने वाला व्यक्ति सन्तुष्ट कहा जाता है । अन्त:पुर के प्राङ्गण में जिस तरह साध्वी पत्नी प्रसन्न रहती है, वैसे ही सहज क्रम में प्राप्त वस्तु में जब बुद्धि रमण करने लगती है, तभी वह स्वरूपानंद प्रदायी जीवन्मुक्त स्थिति कहलाती है।।


Verse ३९

यथाक्षणं यथाशास्त्रं यथादेशं यथासुखम् । यथासंभवसत्सङ्गमिमं मोक्षपथक्रमम् । तावद्विचारयेत्प्राज्ञो यावद्विश्रान्तिमात्मनि ॥

yathākṣaṇaṃ yathāśāstraṃ yathādeśaṃ yathāsukham । yathāsaṃbhavasatsaṅgamimaṃ mokṣapathakramam । tāvadvicārayetprājño yāvadviśrāntimātmani ॥

V-69. Neither I nor aught else exists here; I am but Brahman that is Peace' - thus perceives he who beholds the link between the existent and the non-existent.

समय एवं देश के अनुसार शास्त्रानुकूल आनन्दपूर्वक यथाशक्ति सत्संग में ही विचरण करते हुए इस मोक्षपथ के क्रम का तब तक ज्ञानीजन चिन्तन करते रहें, जब तक कि उन्हें आत्मिक विश्रान्ति न मिल जाये। सदगृहस्थ हो अथवा संन्यासी, जो भी व्यक्ति तुरीयावस्था की विश्रान्ति से सम्पन्न है एवं इस संसार सागर से निवृत्त हो गया है, वह चाहे सांसारिक जीवन में व्यस्त रहे अथवा न रहे, उसे कोई भी कार्य करने या न करने से कोई मतलब नहीं है। उसे श्रुति-स्मृति के भ्रमजाल में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। वह तो मन्दराचल से विहीन (शान्त) सागर की भाँति आत्म-स्थित रहते हुए सभी कुछ प्राप्त कर लेता है ॥


Verse ४०

तुर्यविश्रान्तियुक्तस्य निवृत्तस्य भवार्णवात्। जीवतोऽजीवतश्चैव गृहस्थस्याथवा यतेः ।।

turyaviśrāntiyuktasya nivṛttasya bhavārṇavāt। jīvato'jīvataścaiva gṛhasthasyāthavā yateḥ ।।

V-70. As the mind indifferently contacts objects of the senses of sight, etc.; when encountered by chance, so does the man of steadfast intellect regard (courses of) action (in his daily life).

समय एवं देश के अनुसार शास्त्रानुकूल आनन्दपूर्वक यथाशक्ति सत्संग में ही विचरण करते हुए इस मोक्षपथ के क्रम का तब तक ज्ञानीजन चिन्तन करते रहें, जब तक कि उन्हें आत्मिक विश्रान्ति न मिल जाये। सदगृहस्थ हो अथवा संन्यासी, जो भी व्यक्ति तुरीयावस्था की विश्रान्ति से सम्पन्न है एवं इस संसार सागर से निवृत्त हो गया है, वह चाहे सांसारिक जीवन में व्यस्त रहे अथवा न रहे, उसे कोई भी कार्य करने या न करने से कोई मतलब नहीं है। उसे श्रुति-स्मृति के भ्रमजाल में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। वह तो मन्दराचल से विहीन (शान्त) सागर की भाँति आत्म-स्थित रहते हुए सभी कुछ प्राप्त कर लेता है ॥


Verse ४१

नाकृतेन कृतेनार्थो न श्रुतिस्मृतिविभ्रमैः। निर्मन्दर इवाम्भोधिः स तिष्ठति यथास्थितः॥

nākṛtena kṛtenārtho na śrutismṛtivibhramaiḥ। nirmandara ivāmbhodhiḥ sa tiṣṭhati yathāsthitaḥ॥

V-71. Experience lived through Knowledgeably alone proves satisfactory. The thief recognised and befriended is no longer a thief but turns out to be a friend.

समय एवं देश के अनुसार शास्त्रानुकूल आनन्दपूर्वक यथाशक्ति सत्संग में ही विचरण करते हुए इस मोक्षपथ के क्रम का तब तक ज्ञानीजन चिन्तन करते रहें, जब तक कि उन्हें आत्मिक विश्रान्ति न मिल जाये। सदगृहस्थ हो अथवा संन्यासी, जो भी व्यक्ति तुरीयावस्था की विश्रान्ति से सम्पन्न है एवं इस संसार सागर से निवृत्त हो गया है, वह चाहे सांसारिक जीवन में व्यस्त रहे अथवा न रहे, उसे कोई भी कार्य करने या न करने से कोई मतलब नहीं है। उसे श्रुति-स्मृति के भ्रमजाल में पड़ने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। वह तो मन्दराचल से विहीन (शान्त) सागर की भाँति आत्म-स्थित रहते हुए सभी कुछ प्राप्त कर लेता है ॥


Verse ४२

सर्वात्मवेदनं शुद्धं यदोदेति तदात्मकम्।भाति प्रसृतिदिक्कालबाह्यं चिद्रूपदेहकम्॥

sarvātmavedanaṃ śuddhaṃ yadodeti tadātmakam।bhāti prasṛtidikkālabāhyaṃ cidrūpadehakam॥

V-72. As an unplanned journey to a village, when accomplished, is treated (without) elation) by the travelers, so is the splendour of enjoyment (that may fall to their lot) deemed by those who know.

जब सभी के प्रति शुद्ध आत्मतत्त्व की अनुभूति की तदात्मक (एकत्व) वृत्ति का उदय हो जाता है, तब दिशा एवं काल में विस्तीर्ण हुआ सम्पूर्ण बाह्य जगत्, चिद्रूपात्मक ही प्रतीत होता है। इस तरह आत्मा जहाँ जिस रूप में उल्लास को प्राप्त होता है, वहाँ शीघ्र ही उसी रूप में वह अवस्थित हो जाता है एवं तदनुरूप ही विराजमान हो जाता है ॥


Verse ४३

एवमात्मा यथा यत्र समुल्लासमुपागतः । तिष्ठत्याशु तथा तत्र तद्रूपश्च विराजते ॥

evamātmā yathā yatra samullāsamupāgataḥ । tiṣṭhatyāśu tathā tatra tadrūpaśca virājate ॥

V-73. Even a little diversion of the well-controlled mind is reckoned quite ample; no elaboration of it is sought as such (elaboration) is a source of (future) afflictions.

जब सभी के प्रति शुद्ध आत्मतत्त्व की अनुभूति की तदात्मक (एकत्व) वृत्ति का उदय हो जाता है, तब दिशा एवं काल में विस्तीर्ण हुआ सम्पूर्ण बाह्य जगत्, चिद्रूपात्मक ही प्रतीत होता है। इस तरह आत्मा जहाँ जिस रूप में उल्लास को प्राप्त होता है, वहाँ शीघ्र ही उसी रूप में वह अवस्थित हो जाता है एवं तदनुरूप ही विराजमान हो जाता है ॥


Verse ४४

यदिदं दृश्यते सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम्। तत्सुषुप्ताविव स्वप्नः कल्पान्ते प्रविनश्यति ॥

yadidaṃ dṛśyate sarvaṃ jagatsthāvarajaṅgamam। tatsuṣuptāviva svapnaḥ kalpānte pravinaśyati ॥

V-74. A King liberated from detention is glad to eat (but) a morsel. One un-attacked and un-detained hardly cares for his (entire) kingdom.

जो भी कुछ स्थावर एवं जंगम दृश्यरूप यह सम्पूर्ण जगत् परिलक्षित होता है, वह प्रलय के समय में ठीक वैसे ही विनष्ट हो जाता है, जैसे सुषुप्तावस्था में स्वप्न अदृश्य हो जाता है। यह आत्मा ऋत (आदिकारण) रूप है, परब्रह्म परमेश्वर है। वह सत्यरूप है। ये समस्त संज्ञायें विद्वज्जन एवं महान् आत्माओं ने व्यवहार के लिए कल्पित की हैं। जैसे कङ्कण (हाथ का आभूषण) शब्द एवं उसका अर्थ स्वर्ण से अलग अस्तित्व नहीं रखता और कङ्कण से प्रतिष्ठित स्वर्ण कङ्कण से अलग अपना अस्तित्व नहीं रखता, ठीक वैसे ही ‘जगत्' शब्द का तात्पर्य भी परब्रह्म ही होता है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं॥


Verse ४५

ऋतमात्मा परं ब्रह्म सत्यमित्यादिका बुधैः । कल्पिता व्यवहारार्थं यस्य संज्ञा महात्मनः ॥

ṛtamātmā paraṃ brahma satyamityādikā budhaiḥ । kalpitā vyavahārārthaṃ yasya saṃjñā mahātmanaḥ ॥

V-75. Locking one arm in the other, setting one row of teeth on the other and putting some limbs against others, conquer the mind.

जो भी कुछ स्थावर एवं जंगम दृश्यरूप यह सम्पूर्ण जगत् परिलक्षित होता है, वह प्रलय के समय में ठीक वैसे ही विनष्ट हो जाता है, जैसे सुषुप्तावस्था में स्वप्न अदृश्य हो जाता है। यह आत्मा ऋत (आदिकारण) रूप है, परब्रह्म परमेश्वर है। वह सत्यरूप है। ये समस्त संज्ञायें विद्वज्जन एवं महान् आत्माओं ने व्यवहार के लिए कल्पित की हैं। जैसे कङ्कण (हाथ का आभूषण) शब्द एवं उसका अर्थ स्वर्ण से अलग अस्तित्व नहीं रखता और कङ्कण से प्रतिष्ठित स्वर्ण कङ्कण से अलग अपना अस्तित्व नहीं रखता, ठीक वैसे ही ‘जगत्' शब्द का तात्पर्य भी परब्रह्म ही होता है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं॥


Verse ४६

यथा कटकशब्दार्थः पृथग्भावो न काञ्चनात्।न हेम कटकात्तद्वज्जगच्छब्दार्थता परा॥

yathā kaṭakaśabdārthaḥ pṛthagbhāvo na kāñcanāt।na hema kaṭakāttadvajjagacchabdārthatā parā॥

V-76. From this sea of empirical life there is no way out except victory over the mind. In this vast empire of hell, hard to subdue are one's and adversaries - the sense-organs - who ride on the unruly elephants, the sins, and are armed with the long arrows of cravings.

जो भी कुछ स्थावर एवं जंगम दृश्यरूप यह सम्पूर्ण जगत् परिलक्षित होता है, वह प्रलय के समय में ठीक वैसे ही विनष्ट हो जाता है, जैसे सुषुप्तावस्था में स्वप्न अदृश्य हो जाता है। यह आत्मा ऋत (आदिकारण) रूप है, परब्रह्म परमेश्वर है। वह सत्यरूप है। ये समस्त संज्ञायें विद्वज्जन एवं महान् आत्माओं ने व्यवहार के लिए कल्पित की हैं। जैसे कङ्कण (हाथ का आभूषण) शब्द एवं उसका अर्थ स्वर्ण से अलग अस्तित्व नहीं रखता और कङ्कण से प्रतिष्ठित स्वर्ण कङ्कण से अलग अपना अस्तित्व नहीं रखता, ठीक वैसे ही ‘जगत्' शब्द का तात्पर्य भी परब्रह्म ही होता है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं॥


Verse ४७

तेनेयमिन्द्रजालश्रीर्जगति प्रवितन्यते । द्रष्टुर्दश्यस्य सत्तान्तर्बन्ध इत्यभिधीयते ॥

teneyamindrajālaśrīrjagati pravitanyate । draṣṭurdaśyasya sattāntarbandha ityabhidhīyate ॥

V-77. In the case of one whose egoistic vigour has been attenuated and who has vanquished his foes, the sense-organs, latent impressions, intent on enjoyments, wear off as lotuses do in winter.

उस अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर ने जगत् के रूप में यह इन्द्रजाल विस्तीर्ण किया है। द्रष्टा का दृश्य श्री सत्ता से अन्त: सम्बद्ध होना ‘बन्ध' कहा जाता है। दृश्य के वशीभूत होकर ही द्रष्टा बन्धन में पड़ता है और दृश्य के अभाव में ही वह मोक्ष प्राप्त करता है। यह जगात्, ‘मेरा-तेरा’ रूप भाव वाली सृष्टि, दृश्य कहलाती है। इस संसार में प्रपञ्चरूपी इन्द्रजाल मन के द्वारा ही प्रबुद्ध होता है। जब तक मन की यह कल्पना समाप्त नहीं होती, तब तक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता नहीं दिखलाई पड़ता ॥


Verse ४८

द्रष्टा दृश्यवशाद्बद्धो दृश्याभावे विमुच्यते। जगत्त्वमहमित्यादिसर्गात्मा दृश्यमुच्यते ॥

draṣṭā dṛśyavaśādbaddho dṛśyābhāve vimucyate। jagattvamahamityādisargātmā dṛśyamucyate ॥

V-78. Like no eternal spirits; latent impressions cut capers only as long as the mind remains unvanquished for lack of intense cultivation of the non-dual truth.

उस अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर ने जगत् के रूप में यह इन्द्रजाल विस्तीर्ण किया है। द्रष्टा का दृश्य श्री सत्ता से अन्त: सम्बद्ध होना ‘बन्ध' कहा जाता है। दृश्य के वशीभूत होकर ही द्रष्टा बन्धन में पड़ता है और दृश्य के अभाव में ही वह मोक्ष प्राप्त करता है। यह जगात्, ‘मेरा-तेरा’ रूप भाव वाली सृष्टि, दृश्य कहलाती है। इस संसार में प्रपञ्चरूपी इन्द्रजाल मन के द्वारा ही प्रबुद्ध होता है। जब तक मन की यह कल्पना समाप्त नहीं होती, तब तक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता नहीं दिखलाई पड़ता ॥


Verse ४९

मनसैवेन्द्रजालश्रीर्जगति प्रवितन्यते । यावदेतत्संभवति तावन्मोक्षो न विद्यते ॥

manasaivendrajālaśrīrjagati pravitanyate । yāvadetatsaṃbhavati tāvanmokṣo na vidyate ॥

V-80. The mind of the wise, I deem, is a loving spouse as it pleases; a protective parent as it guards and a friend as it marshals the best (arguments)

उस अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर ने जगत् के रूप में यह इन्द्रजाल विस्तीर्ण किया है। द्रष्टा का दृश्य श्री सत्ता से अन्त: सम्बद्ध होना ‘बन्ध' कहा जाता है। दृश्य के वशीभूत होकर ही द्रष्टा बन्धन में पड़ता है और दृश्य के अभाव में ही वह मोक्ष प्राप्त करता है। यह जगात्, ‘मेरा-तेरा’ रूप भाव वाली सृष्टि, दृश्य कहलाती है। इस संसार में प्रपञ्चरूपी इन्द्रजाल मन के द्वारा ही प्रबुद्ध होता है। जब तक मन की यह कल्पना समाप्त नहीं होती, तब तक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त होता नहीं दिखलाई पड़ता ॥


Verse ५०

ब्रह्मणा तन्यते विश्वं मनसैव स्वयंभुवा। मनोमयमतो विश्व यन्नाम परिदृश्यते ॥

brahmaṇā tanyate viśvaṃ manasaiva svayaṃbhuvā। manomayamato viśva yannāma paridṛśyate ॥

V-81. The paternal mind, well studied with the eye of the Shastras and realized in (the light of) one's own reason; abolishes itself in yielding supreme perfection.

यह संसार स्वयंभू ब्रह्मा जी को मानसिक सृष्टि है, अत: दृष्टिगोचर होने वाले इस विश्व को मनोमय ही समझना चाहिए । ब्रह्म अथवा अन्तःकरण में कहाँ पर भी यह मन सरूप में अवस्थित नहीं है। विषय वस्तुओं का बोध ही मन कहलाता है। संकल्प-विकल्प होना ही मन का स्वभाव है; क्योंकि वह संकल्प में ही रमण कर रहा है। अतः जो संकल्प है, वही मन है, ऐसा जानना चाहिए। आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक् नहीं कर सका। समस्त संकल्पों के विनष्ट हो जाने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है॥


Verse ५१

न बाह्ये नापि हृदये सद्रूपं विद्यते मनः।यदर्थं प्रतिभानं तन्मन इत्यभिधीयते ।।

na bāhye nāpi hṛdaye sadrūpaṃ vidyate manaḥ।yadarthaṃ pratibhānaṃ tanmana ityabhidhīyate ।।

V-82. Extremely perverse and inveterate (in itself), (once) well-awakened and controlled and purged, the delightful mind-gem shines (in one's heart) powered by its own virtues.

यह संसार स्वयंभू ब्रह्मा जी को मानसिक सृष्टि है, अत: दृष्टिगोचर होने वाले इस विश्व को मनोमय ही समझना चाहिए । ब्रह्म अथवा अन्तःकरण में कहाँ पर भी यह मन सरूप में अवस्थित नहीं है। विषय वस्तुओं का बोध ही मन कहलाता है। संकल्प-विकल्प होना ही मन का स्वभाव है; क्योंकि वह संकल्प में ही रमण कर रहा है। अतः जो संकल्प है, वही मन है, ऐसा जानना चाहिए। आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक् नहीं कर सका। समस्त संकल्पों के विनष्ट हो जाने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है॥


Verse ५२

संकल्पनं मनो विद्धि संकल्पस्तत्र विद्यते ।यत्र संकल्पनं तत्र मनोऽस्तीत्यवगम्यताम्॥

saṃkalpanaṃ mano viddhi saṃkalpastatra vidyate ।yatra saṃkalpanaṃ tatra mano'stītyavagamyatām॥

V-83. O Brahmin! To win perfection be luminous after washing clean, in the waters of discrimination, the mind-gem steeped in the mire of many flaws.

यह संसार स्वयंभू ब्रह्मा जी को मानसिक सृष्टि है, अत: दृष्टिगोचर होने वाले इस विश्व को मनोमय ही समझना चाहिए । ब्रह्म अथवा अन्तःकरण में कहाँ पर भी यह मन सरूप में अवस्थित नहीं है। विषय वस्तुओं का बोध ही मन कहलाता है। संकल्प-विकल्प होना ही मन का स्वभाव है; क्योंकि वह संकल्प में ही रमण कर रहा है। अतः जो संकल्प है, वही मन है, ऐसा जानना चाहिए। आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक् नहीं कर सका। समस्त संकल्पों के विनष्ट हो जाने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है॥


Verse ५३

संकल्पमनसी भिन्ने न कदाचन केनचित्। संकल्पजाते गलिते स्वरूपमवशिष्यते ॥

saṃkalpamanasī bhinne na kadācana kenacit। saṃkalpajāte galite svarūpamavaśiṣyate ॥

V-84. By wholly overcoming the inimical senses, resorting to sovereign discrimination, and beholding the Truth with the intellect, cross the sea of empirical existence.

यह संसार स्वयंभू ब्रह्मा जी को मानसिक सृष्टि है, अत: दृष्टिगोचर होने वाले इस विश्व को मनोमय ही समझना चाहिए । ब्रह्म अथवा अन्तःकरण में कहाँ पर भी यह मन सरूप में अवस्थित नहीं है। विषय वस्तुओं का बोध ही मन कहलाता है। संकल्प-विकल्प होना ही मन का स्वभाव है; क्योंकि वह संकल्प में ही रमण कर रहा है। अतः जो संकल्प है, वही मन है, ऐसा जानना चाहिए। आज तक कोई भी संकल्प और मन को पृथक् नहीं कर सका। समस्त संकल्पों के विनष्ट हो जाने पर आत्मस्वरूप ही शेष रहता है॥


Verse ५४

अहं त्वं जगदित्यादौ प्रशान्ते दृश्यसंभ्रमे। स्यात्तादृशी केवलता दृश्ये सत्तामुपागते ॥

ahaṃ tvaṃ jagadityādau praśānte dṛśyasaṃbhrame। syāttādṛśī kevalatā dṛśye sattāmupāgate ॥

V-85. The wise know that concern, as such, is the abode of endless pains; they also know that un-concern is the home of joys, both here and hereafter.

‘मेरा-तेरा' एवं इस जगत् आदि दृश्य प्रपञ्च (इद्रजाल) के शान्त हो जाने पर दृश्य जय सत्ता को अर्थात् परमतत्व को प्राप्त कर लेता है, तब तदनुरूप ही वह कैवल्यावस्था को प्राप्त कर लेता है। महाप्रलय की स्थिति आने पर जब सम्पूर्ण दृश्य जगत् अस्तित्व रहित हो जाता है, तब उस समय सृष्टि के पूर्वकाल में केवल प्रशान्त आत्मा मात्र ही शेष रहता है। जो आत्मारूपी सूर्य (सविता) कभी अस्ताचल की ओर गमन नहीं करता, जो अजन्मा एवं सर्वदोषरहित देव है, सदैव सर्वकर्ता तथा सर्वरूप है; जहाँ वाक्शक्ति जाकर वापस आ जाती है; जिसे मुक्त पुरुष ही जानते हैं और जिसकी आत्मा आदि संज्ञाएँ कल्पना मात्र हैं, स्वाभाविक नहीं है: (वे ही अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर कहे जाते हैं)।।


Verse ५५

महाप्रलयसंपत्तौ ह्यसत्तां समुपागते ।अशेषदृश्ये सर्गादौ शान्तमेवावशिष्यते ॥

mahāpralayasaṃpattau hyasattāṃ samupāgate ।aśeṣadṛśye sargādau śāntamevāvaśiṣyate ॥

V-86. Bound by the cords of latent impressions this world revolves (constituting empirical life). In manifestation, they agonise; when obliterated they make for well-being.

‘मेरा-तेरा' एवं इस जगत् आदि दृश्य प्रपञ्च (इद्रजाल) के शान्त हो जाने पर दृश्य जय सत्ता को अर्थात् परमतत्व को प्राप्त कर लेता है, तब तदनुरूप ही वह कैवल्यावस्था को प्राप्त कर लेता है। महाप्रलय की स्थिति आने पर जब सम्पूर्ण दृश्य जगत् अस्तित्व रहित हो जाता है, तब उस समय सृष्टि के पूर्वकाल में केवल प्रशान्त आत्मा मात्र ही शेष रहता है। जो आत्मारूपी सूर्य (सविता) कभी अस्ताचल की ओर गमन नहीं करता, जो अजन्मा एवं सर्वदोषरहित देव है, सदैव सर्वकर्ता तथा सर्वरूप है; जहाँ वाक्शक्ति जाकर वापस आ जाती है; जिसे मुक्त पुरुष ही जानते हैं और जिसकी आत्मा आदि संज्ञाएँ कल्पना मात्र हैं, स्वाभाविक नहीं है: (वे ही अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर कहे जाते हैं)।।


Verse ५६

अस्त्यनस्तमितो भास्वानजो देवो निरामयः। सर्वदा सर्वकृत्सर्वः परमात्मेत्युदाहृतः ॥

astyanastamito bhāsvānajo devo nirāmayaḥ। sarvadā sarvakṛtsarvaḥ paramātmetyudāhṛtaḥ ॥

V-87. Though intellectual, though extremely and variously learned, though high-born and eminent, one is bound by cravings as a lion is with a chain.

‘मेरा-तेरा' एवं इस जगत् आदि दृश्य प्रपञ्च (इद्रजाल) के शान्त हो जाने पर दृश्य जय सत्ता को अर्थात् परमतत्व को प्राप्त कर लेता है, तब तदनुरूप ही वह कैवल्यावस्था को प्राप्त कर लेता है। महाप्रलय की स्थिति आने पर जब सम्पूर्ण दृश्य जगत् अस्तित्व रहित हो जाता है, तब उस समय सृष्टि के पूर्वकाल में केवल प्रशान्त आत्मा मात्र ही शेष रहता है। जो आत्मारूपी सूर्य (सविता) कभी अस्ताचल की ओर गमन नहीं करता, जो अजन्मा एवं सर्वदोषरहित देव है, सदैव सर्वकर्ता तथा सर्वरूप है; जहाँ वाक्शक्ति जाकर वापस आ जाती है; जिसे मुक्त पुरुष ही जानते हैं और जिसकी आत्मा आदि संज्ञाएँ कल्पना मात्र हैं, स्वाभाविक नहीं है: (वे ही अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर कहे जाते हैं)।।


Verse ५७

यतो वाचो निवर्तन्ते यो मुक्तैरवगम्यते ।यस्य चात्मादिकाः संज्ञाः कल्पिता न स्वभावतः ।।

yato vāco nivartante yo muktairavagamyate ।yasya cātmādikāḥ saṃjñāḥ kalpitā na svabhāvataḥ ।।

V-88. resorting to supreme personal endeavour and perseverance and conforming to Shastraic conduct unwaveringly, who may not win perfection?

‘मेरा-तेरा' एवं इस जगत् आदि दृश्य प्रपञ्च (इद्रजाल) के शान्त हो जाने पर दृश्य जय सत्ता को अर्थात् परमतत्व को प्राप्त कर लेता है, तब तदनुरूप ही वह कैवल्यावस्था को प्राप्त कर लेता है। महाप्रलय की स्थिति आने पर जब सम्पूर्ण दृश्य जगत् अस्तित्व रहित हो जाता है, तब उस समय सृष्टि के पूर्वकाल में केवल प्रशान्त आत्मा मात्र ही शेष रहता है। जो आत्मारूपी सूर्य (सविता) कभी अस्ताचल की ओर गमन नहीं करता, जो अजन्मा एवं सर्वदोषरहित देव है, सदैव सर्वकर्ता तथा सर्वरूप है; जहाँ वाक्शक्ति जाकर वापस आ जाती है; जिसे मुक्त पुरुष ही जानते हैं और जिसकी आत्मा आदि संज्ञाएँ कल्पना मात्र हैं, स्वाभाविक नहीं है: (वे ही अविनाशी परब्रह्म परमेश्वर कहे जाते हैं)।।


Verse ५८

चित्ताकाशं चिदाकाशमाकाशं च तृतीयकम्।द्वाभ्यां शून्यतरं विद्धि चिदाकाशं महामुने।।

cittākāśaṃ cidākāśamākāśaṃ ca tṛtīyakam।dvābhyāṃ śūnyataraṃ viddhi cidākāśaṃ mahāmune।।

V-89. I am this entire cosmos; I am the supreme Self that lapses not. Nothing other than me is - this vision is the supreme assertion of the Self as 'I' (or, the first level of self-assertion).

‘चित्ताकाश, चिदाकाश एवं (भौतिक) आकाश—ये ही तीन आकाश कहे गये हैं। हे मुने! इन तीनों में से चिदाकाश अति सूक्ष्म बतलाया गया है । हे मुनिश्रेष्ठ ! एक देश (विषय) से दूसरे देश (विषय) में गमन करते समय निमेष भर का (वृत्तिशून्य) मध्यकाल आता है, वही चिदाकाश है— ऐसा जानना चाहिए। यदि तुम उस अतिश्रेष्ठ चिदाकाश में सभी संकल्पों को छोड़कर प्रतिष्ठित होते हो, तो निश्चय ही सर्वात्मक शान्त पद को प्राप्त करोगे । चिदाकाश की स्थिति तक पहुँच जाने के बाद जिस सुन्दर, उदार एवं वैराग्यरस से ओत-प्रोत आनन्दमय अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे ही सहज समाधि कहा जाता है। जब यह बोध हो जाता है कि दृश्य पदार्थों की सत्ता है ही नहीं और राग-द्वेष आदि समस्त दोषों की समाप्ति हो जाती है; तब उस समय अभ्यास बल के द्वारा जो एकाग्र-रति (भानन्द) प्रादुर्भूत होती है, उसे ही समाधि कहा जाता है । दृश्य जगत् की सत्ता का अभाव अब अन्त:करण में बोधरूप में आता है, तभी वह संशयरहित ज्ञान का स्वरूप कहलाता है। वह ही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही आत्म कैवल्य रूप है, इसके सिवाय अन्य सभी कुछ असत्य है ।।


Verse ५९

देशाद्देशान्तरप्राप्तौ संविदो मध्यमेव यत्। निमेषेण चिदाकाशं तद्विद्धि मुनिपुङ्गव॥

deśāddeśāntaraprāptau saṃvido madhyameva yat। nimeṣeṇa cidākāśaṃ tadviddhi munipuṅgava॥

V-90. I transcend all; I am subtler than a hair's tip' - such, O Brahmin, is the second and beneficent mode of self -assertion.

‘चित्ताकाश, चिदाकाश एवं (भौतिक) आकाश—ये ही तीन आकाश कहे गये हैं। हे मुने! इन तीनों में से चिदाकाश अति सूक्ष्म बतलाया गया है । हे मुनिश्रेष्ठ ! एक देश (विषय) से दूसरे देश (विषय) में गमन करते समय निमेष भर का (वृत्तिशून्य) मध्यकाल आता है, वही चिदाकाश है— ऐसा जानना चाहिए। यदि तुम उस अतिश्रेष्ठ चिदाकाश में सभी संकल्पों को छोड़कर प्रतिष्ठित होते हो, तो निश्चय ही सर्वात्मक शान्त पद को प्राप्त करोगे । चिदाकाश की स्थिति तक पहुँच जाने के बाद जिस सुन्दर, उदार एवं वैराग्यरस से ओत-प्रोत आनन्दमय अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे ही सहज समाधि कहा जाता है। जब यह बोध हो जाता है कि दृश्य पदार्थों की सत्ता है ही नहीं और राग-द्वेष आदि समस्त दोषों की समाप्ति हो जाती है; तब उस समय अभ्यास बल के द्वारा जो एकाग्र-रति (भानन्द) प्रादुर्भूत होती है, उसे ही समाधि कहा जाता है । दृश्य जगत् की सत्ता का अभाव अब अन्त:करण में बोधरूप में आता है, तभी वह संशयरहित ज्ञान का स्वरूप कहलाता है। वह ही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही आत्म कैवल्य रूप है, इसके सिवाय अन्य सभी कुछ असत्य है ।।


Verse ६०

तस्मिन्निरस्तनि:शेषसंकल्पस्थितिमेषि चेत् । सर्वात्मकं पदं शान्तं तदा प्राप्नोष्यसंशयः ।।

tasminnirastani:śeṣasaṃkalpasthitimeṣi cet । sarvātmakaṃ padaṃ śāntaṃ tadā prāpnoṣyasaṃśayaḥ ।।

V-91. This (mode) promotes liberation and not bondage. (Witness) the case of the Liberated in-life.

‘चित्ताकाश, चिदाकाश एवं (भौतिक) आकाश—ये ही तीन आकाश कहे गये हैं। हे मुने! इन तीनों में से चिदाकाश अति सूक्ष्म बतलाया गया है । हे मुनिश्रेष्ठ ! एक देश (विषय) से दूसरे देश (विषय) में गमन करते समय निमेष भर का (वृत्तिशून्य) मध्यकाल आता है, वही चिदाकाश है— ऐसा जानना चाहिए। यदि तुम उस अतिश्रेष्ठ चिदाकाश में सभी संकल्पों को छोड़कर प्रतिष्ठित होते हो, तो निश्चय ही सर्वात्मक शान्त पद को प्राप्त करोगे । चिदाकाश की स्थिति तक पहुँच जाने के बाद जिस सुन्दर, उदार एवं वैराग्यरस से ओत-प्रोत आनन्दमय अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे ही सहज समाधि कहा जाता है। जब यह बोध हो जाता है कि दृश्य पदार्थों की सत्ता है ही नहीं और राग-द्वेष आदि समस्त दोषों की समाप्ति हो जाती है; तब उस समय अभ्यास बल के द्वारा जो एकाग्र-रति (भानन्द) प्रादुर्भूत होती है, उसे ही समाधि कहा जाता है । दृश्य जगत् की सत्ता का अभाव अब अन्त:करण में बोधरूप में आता है, तभी वह संशयरहित ज्ञान का स्वरूप कहलाता है। वह ही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही आत्म कैवल्य रूप है, इसके सिवाय अन्य सभी कुछ असत्य है ।।


Verse ६१

उदितौदार्यसौन्दर्यवैराग्यरसगर्भिणी। आनन्दस्यन्दिनी यैषा समाधिरभिधीयते ।।

uditaudāryasaundaryavairāgyarasagarbhiṇī। ānandasyandinī yaiṣā samādhirabhidhīyate ।।

V-92. The conviction that I am no more than a bundle of parts like hands, feet, etc.; is the third mode of self-assertion - it is empirical and petty.

‘चित्ताकाश, चिदाकाश एवं (भौतिक) आकाश—ये ही तीन आकाश कहे गये हैं। हे मुने! इन तीनों में से चिदाकाश अति सूक्ष्म बतलाया गया है । हे मुनिश्रेष्ठ ! एक देश (विषय) से दूसरे देश (विषय) में गमन करते समय निमेष भर का (वृत्तिशून्य) मध्यकाल आता है, वही चिदाकाश है— ऐसा जानना चाहिए। यदि तुम उस अतिश्रेष्ठ चिदाकाश में सभी संकल्पों को छोड़कर प्रतिष्ठित होते हो, तो निश्चय ही सर्वात्मक शान्त पद को प्राप्त करोगे । चिदाकाश की स्थिति तक पहुँच जाने के बाद जिस सुन्दर, उदार एवं वैराग्यरस से ओत-प्रोत आनन्दमय अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे ही सहज समाधि कहा जाता है। जब यह बोध हो जाता है कि दृश्य पदार्थों की सत्ता है ही नहीं और राग-द्वेष आदि समस्त दोषों की समाप्ति हो जाती है; तब उस समय अभ्यास बल के द्वारा जो एकाग्र-रति (भानन्द) प्रादुर्भूत होती है, उसे ही समाधि कहा जाता है । दृश्य जगत् की सत्ता का अभाव अब अन्त:करण में बोधरूप में आता है, तभी वह संशयरहित ज्ञान का स्वरूप कहलाता है। वह ही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही आत्म कैवल्य रूप है, इसके सिवाय अन्य सभी कुछ असत्य है ।।


Verse ६२

दृश्यासंभवबोधेन रागद्वेषादितानवे। रतिर्बलोदिता यासौ समाधिरभिधीयते ।।

dṛśyāsaṃbhavabodhena rāgadveṣāditānave। ratirbaloditā yāsau samādhirabhidhīyate ।।

V-93. This root of the evil tree of empirical life is wicked and must be renounced. Smitten by this, the worldly man rapidly falls ever lower.

‘चित्ताकाश, चिदाकाश एवं (भौतिक) आकाश——ये ही तीन आकाश कहे गये हैं। हे मुने! इन तीनों में से चिदाकाश अति सूक्ष्म बतलाया गया है । हे मुनिश्रेष्ठ ! एक देश (विषय) से दूसरे देश (विषय) में गमन करते समय निमेष भर का (वृत्तिशून्य) मध्यकाल आता है, वही चिदाकाश है—— ऐसा जानना चाहिए। यदि तुम उस अतिश्रेष्ठ चिदाकाश में सभी संकल्पों को छोड़कर प्रतिष्ठित होते हो, तो निश्चय ही सर्वात्मक शान्त पद को प्राप्त करोगे । चिदाकाश की स्थिति तक पहुँच जाने के बाद जिस सुन्दर, उदार एवं वैराग्यरस से ओत-प्रोत आनन्दमय अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे ही सहज समाधि कहा जाता है। जब यह बोध हो जाता है कि दृश्य पदार्थों की सत्ता है ही नहीं और राग-द्वेष आदि समस्त दोषों की समाप्ति हो जाती है; तब उस समय अभ्यास बल के द्वारा जो एकाग्र-रति (भानन्द) प्रादुर्भूत होती है, उसे ही समाधि कहा जाता है । दृश्य जगत् की सत्ता का अभाव अब अन्त:करण में बोधरूप में आता है, तभी वह संशयरहित ज्ञान का स्वरूप कहलाता है। वह ही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही आत्म कैवल्य रूप है, इसके सिवाय अन्य सभी कुछ असत्य है ।।


Verse ६३

दृश्यासंभवबोधो हि ज्ञानं ज्ञेयं चिदात्मकम् । तदेव केवलीभावं ततोऽन्यत्सकले मृषा ॥

dṛśyāsaṃbhavabodho hi jñānaṃ jñeyaṃ cidātmakam । tadeva kevalībhāvaṃ tato'nyatsakale mṛṣā ॥

V-94. Discarding this wicked mode of self-assertion from one's life, in due course, by virtue of the beneficent mode, one achieves liberation in peace.

‘चित्ताकाश, चिदाकाश एवं (भौतिक) आकाश——ये ही तीन आकाश कहे गये हैं। हे मुने! इन तीनों में से चिदाकाश अति सूक्ष्म बतलाया गया है । हे मुनिश्रेष्ठ ! एक देश (विषय) से दूसरे देश (विषय) में गमन करते समय निमेष भर का (वृत्तिशून्य) मध्यकाल आता है, वही चिदाकाश है—— ऐसा जानना चाहिए। यदि तुम उस अतिश्रेष्ठ चिदाकाश में सभी संकल्पों को छोड़कर प्रतिष्ठित होते हो, तो निश्चय ही सर्वात्मक शान्त पद को प्राप्त करोगे । चिदाकाश की स्थिति तक पहुँच जाने के बाद जिस सुन्दर, उदार एवं वैराग्यरस से ओत-प्रोत आनन्दमय अवस्था की प्राप्ति होती है, उसे ही सहज समाधि कहा जाता है। जब यह बोध हो जाता है कि दृश्य पदार्थों की सत्ता है ही नहीं और राग-द्वेष आदि समस्त दोषों की समाप्ति हो जाती है; तब उस समय अभ्यास बल के द्वारा जो एकाग्र-रति (भानन्द) प्रादुर्भूत होती है, उसे ही समाधि कहा जाता है । दृश्य जगत् की सत्ता का अभाव अब अन्त:करण में बोधरूप में आता है, तभी वह संशयरहित ज्ञान का स्वरूप कहलाता है। वह ही चिदात्मक ज्ञेयतत्त्व है, वही आत्म कैवल्य रूप है, इसके सिवाय अन्य सभी कुछ असत्य है ।।


Verse ६४

मत्त ऐरावतो बद्धः सर्षपीकोणकोटरे ।मशकेन कृतं युद्धं सिंहौधैरेणुकोटरे ॥

matta airāvato baddhaḥ sarṣapīkoṇakoṭare ।maśakena kṛtaṃ yuddhaṃ siṃhaudhaireṇukoṭare ॥

V-95. Resorting to the first two non-worldly modes of self-assertion, the third worldly mode that occasions pain must be renounced.

जिस प्रकार मदोन्मत्त ऐरावत हाथी का सरसों के एक किनारे के छिद्र में बाँधा जाना असंभव है, एक धूलिकण के बिल में मच्छरों का सिंहों के साथ युद्ध करना शक्य नही है और कमल की पंखुडी में प्रतिष्ठित सुमेरुपर्वत को भ्रमर के बच्चे द्वारा निगले जाने की कथा मिथ्या है। उसी प्रकार यह विश्व भी अस्तित्व में नहीं जा सकता। अतः हे निदाघ । तुम्हें इसकी सत्ता को भ्रमात्मक ही जानना चाहिए ॥


Verse ६५

पद्माक्षे स्थापितो मेरुर्निगीर्णो भृङ्गसूनुना। निदाघ विद्धि तादृक्त्वं जगदेतद्भ्रमात्मकम्॥

padmākṣe sthāpito merurnigīrṇo bhṛṅgasūnunā। nidāgha viddhi tādṛktvaṃ jagadetadbhramātmakam॥

V-96. Next discarding even the first two, one becomes free from all modes of self-assertion and thus ascends to the transcendent status (of freedom).

जिस प्रकार मदोन्मत्त ऐरावत हाथी का सरसों के एक किनारे के छिद्र में बाँधा जाना असंभव है, एक धूलिकण के बिल में मच्छरों का सिंहों के साथ युद्ध करना शक्य नही है और कमल की पंखुडी में प्रतिष्ठित सुमेरुपर्वत को भ्रमर के बच्चे द्वारा निगले जाने की कथा मिथ्या है। उसी प्रकार यह विश्व भी अस्तित्व में नहीं जा सकता। अतः हे निदाघ । तुम्हें इसकी सत्ता को भ्रमात्मक ही जानना चाहिए ॥


Verse ६६

चित्तमेव हि संसारो रागादिक्लेशदूषितम्।तदेव तैर्विनिर्मुक्तं भवान्त इति कथ्यते ।।

cittameva hi saṃsāro rāgādikleśadūṣitam।tadeva tairvinirmuktaṃ bhavānta iti kathyate ।।

V-97. Bondage is nothing but craving for objective enjoyment; its renunciation is said to be liberation. Mind's affirmation is perilous; its negation is great good fortune. The mind of the Knower tends to negation; the mind of the ignorant is the chain (of bondage).

राग-द्वेष आदि के विकारों से दूषित चित्त ही जगत् है। वही चित्त समस्त दोषों से मुक्त हो जाता है, तभी इसे जगत् का अन्त यानी मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है। मन के द्वारा शरीर की भावना किये जाने पर ही आत्मा देहात्मक बनती है। जब वह शारीरिक वासनाओं से मुक्त होती है, तभी वह (मन) शरीर के धर्मों में लिप्त नहीं होती। यह मन ही कल्प को क्षण बना देता है और क्षण में कल्पत्व भर देता है। अतः मेरी समझ में यह जगत् केवल मनोविलास अर्थात् मन का खेल मात्र ही है। जो मनुष्य दुश्चरित्रता से विलग नहीं हुआ है, एकाग्रचित्त नहीं है और जिसका चित्त अभी शान्त नहीं हुआ है, ऐसे पुरुष को आत्मसाक्षात्कार नहीं होता ॥


Verse ६७

मनसा भाव्यमानो हि देहतां याति देहकः । देवासनया मुक्तो देहधर्मेनं लिप्यते ॥

manasā bhāvyamāno hi dehatāṃ yāti dehakaḥ । devāsanayā mukto dehadharmenaṃ lipyate ॥

. The (timeless) mind of the Knower is either blissful nor blissless; neither fickle nor stirless. It neither is nor is not. Nor does it occupy a mind position among all these - so maintain the wise

राग-द्वेष आदि के विकारों से दूषित चित्त ही जगत् है। वही चित्त समस्त दोषों से मुक्त हो जाता है, तभी इसे जगत् का अन्त यानी मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है। मन के द्वारा शरीर की भावना किये जाने पर ही आत्मा देहात्मक बनती है। जब वह शारीरिक वासनाओं से मुक्त होती है, तभी वह (मन) शरीर के धर्मों में लिप्त नहीं होती। यह मन ही कल्प को क्षण बना देता है और क्षण में कल्पत्व भर देता है। अतः मेरी समझ में यह जगत् केवल मनोविलास अर्थात् मन का खेल मात्र ही है। जो मनुष्य दुश्चरित्रता से विलग नहीं हुआ है, एकाग्रचित्त नहीं है और जिसका चित्त अभी शान्त नहीं हुआ है, ऐसे पुरुष को आत्मसाक्षात्कार नहीं होता ॥


Verse ६८

कल्पं क्षणीकरोत्यन्तः क्षणं नयति कल्पताम् । मनोविलाससंसार इति में निश्चिता मतिः ।।

kalpaṃ kṣaṇīkarotyantaḥ kṣaṇaṃ nayati kalpatām । manovilāsasaṃsāra iti meṃ niścitā matiḥ ।।

V-99. Just as, due to subtlety ether, illumined by the Spirit, is not (objectively) perceived, so the impartite Spirit, though all perceiving, is not observed.

राग-द्वेष आदि के विकारों से दूषित चित्त ही जगत् है। वही चित्त समस्त दोषों से मुक्त हो जाता है, तभी इसे जगत् का अन्त यानी मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है। मन के द्वारा शरीर की भावना किये जाने पर ही आत्मा देहात्मक बनती है। जब वह शारीरिक वासनाओं से मुक्त होती है, तभी वह (मन) शरीर के धर्मों में लिप्त नहीं होती। यह मन ही कल्प को क्षण बना देता है और क्षण में कल्पत्व भर देता है। अतः मेरी समझ में यह जगत् केवल मनोविलास अर्थात् मन का खेल मात्र ही है। जो मनुष्य दुश्चरित्रता से विलग नहीं हुआ है, एकाग्रचित्त नहीं है और जिसका चित्त अभी शान्त नहीं हुआ है, ऐसे पुरुष को आत्मसाक्षात्कार नहीं होता ॥

चतुर्थोऽध्यायः (part 3)

Verse ६९

नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमनसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥

nāvirato duścaritānnāśānto nāsamāhitaḥ । nāśāntamanaso vāpi prajñānenainamāpnuyāt ॥

V-100. The imperishable Spirit, free from all imaginings and beyond nomenclature, has been assigned designations like one's Self, etc.

राग-द्वेष आदि के विकारों से दूषित चित्त ही जगत् है। वही चित्त समस्त दोषों से मुक्त हो जाता है, तभी इसे जगत् का अन्त यानी मोक्ष की प्राप्ति होना कहा जाता है। मन के द्वारा शरीर की भावना किये जाने पर ही आत्मा देहात्मक बनती है। जब वह शारीरिक वासनाओं से मुक्त होती है, तभी वह (मन) शरीर के धर्मों में लिप्त नहीं होती। यह मन ही कल्प को क्षण बना देता है और क्षण में कल्पत्व भर देता है। अतः मेरी समझ में यह जगत् केवल मनोविलास अर्थात् मन का खेल मात्र ही है। जो मनुष्य दुश्चरित्रता से विलग नहीं हुआ है, एकाग्रचित्त नहीं है और जिसका चित्त अभी शान्त नहीं हुआ है, ऐसे पुरुष को आत्मसाक्षात्कार नहीं होता ॥


Verse ७०

तद्ब्रह्मानन्दमद्वन्द्व निर्गुणं सत्यचिद्धनम्। विदित्वा स्वात्मनो रूपं न बिभेति कदाचन ॥

tadbrahmānandamadvandva nirguṇaṃ satyaciddhanam। viditvā svātmano rūpaṃ na bibheti kadācana ॥

V-101-102. Transparent like a hundredth part of ether, partless as manifested in those who know, ever aware of the sole Self of all that is pure in empirical life, this Spirit neither sets nor rises; neither rises up nor lies (low); neither goes nor returns; it is neither present nor absent here.

उस आनन्द स्वरूप, द्वन्द्वों से परे, गुणरहित (गुणों से परे), सत् स्वरूप, चिद्घन परब्रह्म को अपना-निज स्वरूप जान लेने के पश्चात् मनुष्य को किञ्चित् भी भय नहीं होता। जो महान् से महानतम एवं श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम, तेज:स्वरूप, शाश्वत, कल्याण-प्रद, सर्वज्ञ, पुराणपुरुष, सनातन, सर्वेश्वर तथा सभी देवगणों के द्वारा सम्पूजित एवं उपास्य है, वह अविनाशी ब्रह्म मैं हूँ- ऐसा निश्चय महात्माओं के लिए मुक्ति का माध्यम होता है । बन्धन एवं मोक्ष के दो ही कारण बनते हैं, जिनमें प्रथम है-ममता एवं द्वितीय ममतारहित होना । ममता के द्वारा जीव धन में पढ़ता है और ममता से रहित हो जाने के पश्चात् वह (जीव) मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।।


Verse ७१

परात्परं यन्महतो महान्तं स्वरूपतेजोमयशाश्वतं शिवम्।कविं पुराणं पुरुषं सनातनं सर्वेश्वर सर्वदेवैरुपास्यम् ॥

parātparaṃ yanmahato mahāntaṃ svarūpatejomayaśāśvataṃ śivam।kaviṃ purāṇaṃ puruṣaṃ sanātanaṃ sarveśvara sarvadevairupāsyam ॥

V-101-102. Transparent like a hundredth part of ether, partless as manifested in those who know, ever aware of the sole Self of all that is pure in empirical life, this Spirit neither sets nor rises; neither rises up nor lies (low); neither goes nor returns; it is neither present nor absent here.

उस आनन्द स्वरूप, द्वन्द्वों से परे, गुणरहित (गुणों से परे), सत् स्वरूप, चिद्घन परब्रह्म को अपना-निज स्वरूप जान लेने के पश्चात् मनुष्य को किञ्चित् भी भय नहीं होता। जो महान् से महानतम एवं श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम, तेज:स्वरूप, शाश्वत, कल्याण-प्रद, सर्वज्ञ, पुराणपुरुष, सनातन, सर्वेश्वर तथा सभी देवगणों के द्वारा सम्पूजित एवं उपास्य है, वह अविनाशी ब्रह्म मैं हूँ- ऐसा निश्चय महात्माओं के लिए मुक्ति का माध्यम होता है । बन्धन एवं मोक्ष के दो ही कारण बनते हैं, जिनमें प्रथम है-ममता एवं द्वितीय ममतारहित होना । ममता के द्वारा जीव धन में पढ़ता है और ममता से रहित हो जाने के पश्चात् वह (जीव) मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।।


Verse ७२

अहं ब्रह्मेति नियतं मोक्षहेतुर्महात्मनाम् ।द्वे पदे बन्धमोक्षाय निर्ममेति ममेति च।ममेति बध्यते जन्तुर्निर्ममेति विमुच्यते ।।

ahaṃ brahmeti niyataṃ mokṣaheturmahātmanām ।dve pade bandhamokṣāya nirmameti mameti ca।mameti badhyate janturnirmameti vimucyate ।।

V-103. This Spirit has a flawless mode (of its own), indubitable and propless.

उस आनन्द स्वरूप, द्वन्द्वों से परे, गुणरहित (गुणों से परे), सत् स्वरूप, चिद्घन परब्रह्म को अपना-निज स्वरूप जान लेने के पश्चात् मनुष्य को किञ्चित् भी भय नहीं होता। जो महान् से महानतम एवं श्रेष्ठ से श्रेष्ठतम, तेज:स्वरूप, शाश्वत, कल्याण-प्रद, सर्वज्ञ, पुराणपुरुष, सनातन, सर्वेश्वर तथा सभी देवगणों के द्वारा सम्पूजित एवं उपास्य है, वह अविनाशी ब्रह्म मैं हूँ- ऐसा निश्चय महात्माओं के लिए मुक्ति का माध्यम होता है । बन्धन एवं मोक्ष के दो ही कारण बनते हैं, जिनमें प्रथम है-ममता एवं द्वितीय ममतारहित होना । ममता के द्वारा जीव धन में पढ़ता है और ममता से रहित हो जाने के पश्चात् वह (जीव) मोक्ष को प्राप्त कर लेता है ।।


Verse ७३

जीवेश्वरादिरूपेण चेतनाचेतनात्मकम्। ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशेन कल्पिता। जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकल्पितः ॥

jīveśvarādirūpeṇa cetanācetanātmakam। īkṣaṇādipraveśāntā sṛṣṭirīśena kalpitā। jāgradādivimokṣāntaḥ saṃsāro jīvakalpitaḥ ॥

V-104. At the very outset, purify the disciple through excellence such as mind's tranquility, restraint of sense-organs, etc. Next impart to him the teaching that all this (world) is Brahman, viz., the purified Thou.

जीव रूप एवं ईश्वररूप से ईक्षण अर्थात् ब्रह्म के संकल्प से प्रारम्भ होकर तथा ब्रह्म में प्रवेश के अन्त वाले इस सम्पूर्ण जड़-चेतनात्मक सृष्टि की कल्पना ईश्वर के द्वारा ही की गई है। जाग्रत् अवस्था से लेकर मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् जीव के द्वारा ही कल्पित है। कठोपनिषद् के अन्तर्गत त्रिणाचिकेताग्नि से लेकर श्वेताश्वतर का योगपर्यन्त ज्ञान ईश्वरीय भ्रान्ति के आश्रित है। चार्वाक मत से लेकर कपिल के सांख्यसिद्धान्त तक का दार्शनिक ज्ञान (सांख्य आदि दर्शनों में प्रतिपादित ज्ञान) जीव भ्रान्ति का आधार है। अतः जो पुरुष मुक्ति की आकांक्षा करता है, वह जीव तथा ईश्वर के वाद-विवाद में बुद्धि को भ्रमित न करे, वरन् उसे दृढ़तापूर्वक ब्रह्मतत्त्व का ही निरन्तर चिन्तन करना चाहिए।।


Verse ७४

त्रिणाचिकादियोगान्ता ईश्वरभ्रान्तिमाश्रिताः । लोकायतादिसांख्यान्ता जीवविभ्रान्तिमाश्रिताः ॥

triṇācikādiyogāntā īśvarabhrāntimāśritāḥ । lokāyatādisāṃkhyāntā jīvavibhrāntimāśritāḥ ॥

V-105. One who teaches an ignoramus or half-awakened (disciple) that 'all this is Brahman' will (in effect) plunge him in an endless series of hells.

जीव रूप एवं ईश्वररूप से ईक्षण अर्थात् ब्रह्म के संकल्प से प्रारम्भ होकर तथा ब्रह्म में प्रवेश के अन्त वाले इस सम्पूर्ण जड़-चेतनात्मक सृष्टि की कल्पना ईश्वर के द्वारा ही की गई है। जाग्रत् अवस्था से लेकर मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् जीव के द्वारा ही कल्पित है। कठोपनिषद् के अन्तर्गत त्रिणाचिकेताग्नि से लेकर श्वेताश्वतर का योगपर्यन्त ज्ञान ईश्वरीय भ्रान्ति के आश्रित है। चार्वाक मत से लेकर कपिल के सांख्यसिद्धान्त तक का दार्शनिक ज्ञान (सांख्य आदि दर्शनों में प्रतिपादित ज्ञान) जीव भ्रान्ति का आधार है। अतः जो पुरुष मुक्ति की आकांक्षा करता है, वह जीव तथा ईश्वर के वाद-विवाद में बुद्धि को भ्रमित न करे, वरन् उसे दृढ़तापूर्वक ब्रह्मतत्त्व का ही निरन्तर चिन्तन करना चाहिए।।


Verse ७५

तस्मान्मुमुक्षुभिर्नैव मतिर्जीवेशवादयोः । कार्या किंतु ब्रह्मतत्त्वं निश्चलेन विचार्यताम्॥

tasmānmumukṣubhirnaiva matirjīveśavādayoḥ । kāryā kiṃtu brahmatattvaṃ niścalena vicāryatām॥

V-106. But a disciple whose intellect has been well-awakened, whose craving for objective enjoyments has been extinguished, and who is free from all 'expectations' is rid of all impurities born of nescience; the wise teacher may instruct him.

जीव रूप एवं ईश्वररूप से ईक्षण अर्थात् ब्रह्म के संकल्प से प्रारम्भ होकर तथा ब्रह्म में प्रवेश के अन्त वाले इस सम्पूर्ण जड़-चेतनात्मक सृष्टि की कल्पना ईश्वर के द्वारा ही की गई है। जाग्रत् अवस्था से लेकर मोक्ष प्राप्ति पर्यन्त सम्पूर्ण जगत् जीव के द्वारा ही कल्पित है। कठोपनिषद् के अन्तर्गत त्रिणाचिकेताग्नि से लेकर श्वेताश्वतर का योगपर्यन्त ज्ञान ईश्वरीय भ्रान्ति के आश्रित है। चार्वाक मत से लेकर कपिल के सांख्यसिद्धान्त तक का दार्शनिक ज्ञान (सांख्य आदि दर्शनों में प्रतिपादित ज्ञान) जीव भ्रान्ति का आधार है। अतः जो पुरुष मुक्ति की आकांक्षा करता है, वह जीव तथा ईश्वर के वाद-विवाद में बुद्धि को भ्रमित न करे, वरन् उसे दृढ़तापूर्वक ब्रह्मतत्त्व का ही निरन्तर चिन्तन करना चाहिए।।


Verse ७६

अविशेषेण सर्वं तु यः पश्यति चिदन्वयात् ।स एव साक्षाद्विज्ञानी स शिवः स हरिर्विधिः ।।

aviśeṣeṇa sarvaṃ tu yaḥ paśyati cidanvayāt ।sa eva sākṣādvijñānī sa śivaḥ sa harirvidhiḥ ।।

V-107. Like its effulgence where there is light, like the day where there is the sun, like the fragrance where there is a flower, so is there a world where there is the Spirit.

ज्ञानवान् पुरुष वही है, जो सम्पूर्ण दृश्य-जगत् को निर्विशेष चित् रूप मानता हो । वही (कल्याणकारी) शिव है, वही ब्रह्मा एवं विष्णु भी वही है। विषय वासनाओं का त्याग अत्यन्त दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान को प्राप्त करना भी अत्यन्त कठिन है और सदगुरु की अनुकम्पा के बिना सहजावस्था को प्राप्त करना भी अत्यधिक दुःसाध्य है। जिसने अपनी बोधात्मिका शक्ति को जाग्रत् कर लिया है और अपने समस्त कर्मों का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी स्वयमेव सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है; जब तक व्यक्ति को इसमें थोड़ा भी अन्तर मालूम पड़ता है, तब तक उसके लिए भय है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। सर्वरूप-परब्रह्म परमेश्वर को ज्ञान के नेत्रों से देखा जा सकता है, जिसके पास ज्ञान के नेत्रों का अभाव है, वह अविनाशी ब्रह्म को ठीक वैसे ही नहीं देख सकता, जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को प्रकाशमान सूर्य (सवितादेवता) के दर्शन नहीं होते। वह ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है। सत्य ही प्रज्ञान का लक्षण है। अतः ब्रह्म के परिज्ञान से ही मर्त्य जीव अमरत्व को प्राप्त करता है। उस कार्यकारण स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही मनुष्य के हृदय की गाँठे खुल जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और समस्त कर्म (प्रारब्धादि) क्षीणता को प्राप्त हो जाते हैं।।


Verse ७७

दुर्लभो विषयत्यागो दुर्लभं तत्त्वदर्शनम्।दुर्लभा सहजावस्था सद्गुरोः करुणां विना॥

durlabho viṣayatyāgo durlabhaṃ tattvadarśanam।durlabhā sahajāvasthā sadguroḥ karuṇāṃ vinā॥

V-108. When the view-point of Knowledge is purged, when (the dawn of) awakening spreads vastly, this very world will cease to appear as real.

ज्ञानवान् पुरुष वही है, जो सम्पूर्ण दृश्य-जगत् को निर्विशेष चित् रूप मानता हो । वही (कल्याणकारी) शिव है, वही ब्रह्मा एवं विष्णु भी वही है। विषय वासनाओं का त्याग अत्यन्त दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान को प्राप्त करना भी अत्यन्त कठिन है और सदगुरु की अनुकम्पा के बिना सहजावस्था को प्राप्त करना भी अत्यधिक दुःसाध्य है। जिसने अपनी बोधात्मिका शक्ति को जाग्रत् कर लिया है और अपने समस्त कर्मों का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी स्वयमेव सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है; जब तक व्यक्ति को इसमें थोड़ा भी अन्तर मालूम पड़ता है, तब तक उसके लिए भय है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। सर्वरूप-परब्रह्म परमेश्वर को ज्ञान के नेत्रों से देखा जा सकता है, जिसके पास ज्ञान के नेत्रों का अभाव है, वह अविनाशी ब्रह्म को ठीक वैसे ही नहीं देख सकता, जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को प्रकाशमान सूर्य (सवितादेवता) के दर्शन नहीं होते। वह ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है। सत्य ही प्रज्ञान का लक्षण है। अतः ब्रह्म के परिज्ञान से ही मर्त्य जीव अमरत्व को प्राप्त करता है। उस कार्यकारण स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही मनुष्य के हृदय की गाँठे खुल जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और समस्त कर्म (प्रारब्धादि) क्षीणता को प्राप्त हो जाते हैं।।


Verse ७८

उत्पन्नशक्तिबोधस्य त्यक्तनि:शेषकर्मणः। योगिनः सहजावस्था स्वयमेवोपजायते ॥

utpannaśaktibodhasya tyaktani:śeṣakarmaṇaḥ। yoginaḥ sahajāvasthā svayamevopajāyate ॥

V-109. Established in yourself, you will realize aright the strength and weakness of the flood of my words (of instruction) - (you will realize it) by the highest mode of nescience that spurs the effort to wipe out the sphere of the petty Self.

ज्ञानवान् पुरुष वही है, जो सम्पूर्ण दृश्य-जगत् को निर्विशेष चित् रूप मानता हो । वही (कल्याणकारी) शिव है, वही ब्रह्मा एवं विष्णु भी वही है। विषय वासनाओं का त्याग अत्यन्त दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान को प्राप्त करना भी अत्यन्त कठिन है और सदगुरु की अनुकम्पा के बिना सहजावस्था को प्राप्त करना भी अत्यधिक दुःसाध्य है। जिसने अपनी बोधात्मिका शक्ति को जाग्रत् कर लिया है और अपने समस्त कर्मों का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी स्वयमेव सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है; जब तक व्यक्ति को इसमें थोड़ा भी अन्तर मालूम पड़ता है, तब तक उसके लिए भय है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। सर्वरूप-परब्रह्म परमेश्वर को ज्ञान के नेत्रों से देखा जा सकता है, जिसके पास ज्ञान के नेत्रों का अभाव है, वह अविनाशी ब्रह्म को ठीक वैसे ही नहीं देख सकता, जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को प्रकाशमान सूर्य (सवितादेवता) के दर्शन नहीं होते। वह ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है। सत्य ही प्रज्ञान का लक्षण है। अतः ब्रह्म के परिज्ञान से ही मर्त्य जीव अमरत्व को प्राप्त करता है। उस कार्यकारण स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही मनुष्य के हृदय की गाँठे खुल जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और समस्त कर्म (प्रारब्धादि) क्षीणता को प्राप्त हो जाते हैं।।


Verse ७९

यदा ह्येवैष एतस्मिन्नल्पमप्यन्तरं नरः । विजानाति तदा तस्य भयं स्यान्नात्र संशयः ॥

yadā hyevaiṣa etasminnalpamapyantaraṃ naraḥ । vijānāti tadā tasya bhayaṃ syānnātra saṃśayaḥ ॥

V-100. By it (the highest mode of nescience) is won the knowledge that consumes all errors, O Brahmin! One missile puts another out of action; one flaw destroys its opposite.

ज्ञानवान् पुरुष वही है, जो सम्पूर्ण दृश्य-जगत् को निर्विशेष चित् रूप मानता हो । वही (कल्याणकारी) शिव है, वही ब्रह्मा एवं विष्णु भी वही है। विषय वासनाओं का त्याग अत्यन्त दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान को प्राप्त करना भी अत्यन्त कठिन है और सदगुरु की अनुकम्पा के बिना सहजावस्था को प्राप्त करना भी अत्यधिक दुःसाध्य है। जिसने अपनी बोधात्मिका शक्ति को जाग्रत् कर लिया है और अपने समस्त कर्मों का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी स्वयमेव सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है; जब तक व्यक्ति को इसमें थोड़ा भी अन्तर मालूम पड़ता है, तब तक उसके लिए भय है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। सर्वरूप-परब्रह्म परमेश्वर को ज्ञान के नेत्रों से देखा जा सकता है, जिसके पास ज्ञान के नेत्रों का अभाव है, वह अविनाशी ब्रह्म को ठीक वैसे ही नहीं देख सकता, जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को प्रकाशमान सूर्य (सवितादेवता) के दर्शन नहीं होते। वह ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है। सत्य ही प्रज्ञान का लक्षण है। अतः ब्रह्म के परिज्ञान से ही मर्त्य जीव अमरत्व को प्राप्त करता है। उस कार्यकारण स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही मनुष्य के हृदय की गाँठे खुल जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और समस्त कर्म (प्रारब्धादि) क्षीणता को प्राप्त हो जाते हैं।।


Verse ८०

सर्वगं सच्चिदानन्दं ज्ञानचक्षुर्निरीक्षते । अज्ञानचक्षुर्नेक्षेत भास्वन्तं भानुमन्धवत् ॥

sarvagaṃ saccidānandaṃ jñānacakṣurnirīkṣate । ajñānacakṣurnekṣeta bhāsvantaṃ bhānumandhavat ॥

V-111. One poison may be neutralised by another; an enemy may destroy another. Such is the wonderful riddle of elements that pleases through self-destruction!

ज्ञानवान् पुरुष वही है, जो सम्पूर्ण दृश्य-जगत् को निर्विशेष चित् रूप मानता हो । वही (कल्याणकारी) शिव है, वही ब्रह्मा एवं विष्णु भी वही है। विषय वासनाओं का त्याग अत्यन्त दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान को प्राप्त करना भी अत्यन्त कठिन है और सदगुरु की अनुकम्पा के बिना सहजावस्था को प्राप्त करना भी अत्यधिक दुःसाध्य है। जिसने अपनी बोधात्मिका शक्ति को जाग्रत् कर लिया है और अपने समस्त कर्मों का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी स्वयमेव सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है; जब तक व्यक्ति को इसमें थोड़ा भी अन्तर मालूम पड़ता है, तब तक उसके लिए भय है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। सर्वरूप-परब्रह्म परमेश्वर को ज्ञान के नेत्रों से देखा जा सकता है, जिसके पास ज्ञान के नेत्रों का अभाव है, वह अविनाशी ब्रह्म को ठीक वैसे ही नहीं देख सकता, जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को प्रकाशमान सूर्य (सवितादेवता) के दर्शन नहीं होते। वह ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है। सत्य ही प्रज्ञान का लक्षण है। अतः ब्रह्म के परिज्ञान से ही मर्त्य जीव अमरत्व को प्राप्त करता है। उस कार्यकारण स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही मनुष्य के हृदय की गाँठे खुल जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और समस्त कर्म (प्रारब्धादि) क्षीणता को प्राप्त हो जाते हैं।।


Verse ८१

प्रज्ञानमेव तद्ब्रह्म सत्यं प्रज्ञानलक्षणम् ।एवं ब्रह्मपरिज्ञानादेव मर्योऽमृतो भवेत् ॥

prajñānameva tadbrahma satyaṃ prajñānalakṣaṇam ।evaṃ brahmaparijñānādeva maryo'mṛto bhavet ॥

V-112. The real nature of this riddle is not perceived. As it is observed, it perishes - observed with the flaming imagination whose content is: 'in Truth it exists not at all'.

ज्ञानवान् पुरुष वही है, जो सम्पूर्ण दृश्य-जगत् को निर्विशेष चित् रूप मानता हो । वही (कल्याणकारी) शिव है, वही ब्रह्मा एवं विष्णु भी वही है। विषय वासनाओं का त्याग अत्यन्त दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान को प्राप्त करना भी अत्यन्त कठिन है और सदगुरु की अनुकम्पा के बिना सहजावस्था को प्राप्त करना भी अत्यधिक दुःसाध्य है। जिसने अपनी बोधात्मिका शक्ति को जाग्रत् कर लिया है और अपने समस्त कर्मों का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी स्वयमेव सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है; जब तक व्यक्ति को इसमें थोड़ा भी अन्तर मालूम पड़ता है, तब तक उसके लिए भय है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। सर्वरूप-परब्रह्म परमेश्वर को ज्ञान के नेत्रों से देखा जा सकता है, जिसके पास ज्ञान के नेत्रों का अभाव है, वह अविनाशी ब्रह्म को ठीक वैसे ही नहीं देख सकता, जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को प्रकाशमान सूर्य (सवितादेवता) के दर्शन नहीं होते। वह ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है। सत्य ही प्रज्ञान का लक्षण है। अतः ब्रह्म के परिज्ञान से ही मर्त्य जीव अमरत्व को प्राप्त करता है। उस कार्यकारण स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही मनुष्य के हृदय की गाँठे खुल जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और समस्त कर्म (प्रारब्धादि) क्षीणता को प्राप्त हो जाते हैं।।


Verse ८२

भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे॥

bhidyate hṛdayagranthiśchidyante sarvasaṃśayāḥ । kṣīyante cāsya karmāṇi tasmindṛṣṭe parāvare॥

V-113. He who cherishes with the (creative) and liberating imagination (the thought that) all this is spirit, that the perception of difference is nescience, should renounce this (nescience) in all possible ways.

ज्ञानवान् पुरुष वही है, जो सम्पूर्ण दृश्य-जगत् को निर्विशेष चित् रूप मानता हो । वही (कल्याणकारी) शिव है, वही ब्रह्मा एवं विष्णु भी वही है। विषय वासनाओं का त्याग अत्यन्त दुर्लभ है, तत्त्वज्ञान को प्राप्त करना भी अत्यन्त कठिन है और सदगुरु की अनुकम्पा के बिना सहजावस्था को प्राप्त करना भी अत्यधिक दुःसाध्य है। जिसने अपनी बोधात्मिका शक्ति को जाग्रत् कर लिया है और अपने समस्त कर्मों का परित्याग कर दिया है, ऐसा योगी स्वयमेव सहजावस्था को प्राप्त कर लेता है; जब तक व्यक्ति को इसमें थोड़ा भी अन्तर मालूम पड़ता है, तब तक उसके लिए भय है, इसमें कुछ भी संशय नहीं है। सर्वरूप-परब्रह्म परमेश्वर को ज्ञान के नेत्रों से देखा जा सकता है, जिसके पास ज्ञान के नेत्रों का अभाव है, वह अविनाशी ब्रह्म को ठीक वैसे ही नहीं देख सकता, जिस प्रकार अंधे व्यक्ति को प्रकाशमान सूर्य (सवितादेवता) के दर्शन नहीं होते। वह ब्रह्म प्रज्ञान स्वरूप है। सत्य ही प्रज्ञान का लक्षण है। अतः ब्रह्म के परिज्ञान से ही मर्त्य जीव अमरत्व को प्राप्त करता है। उस कार्यकारण स्वरूप ब्रह्म का साक्षात्कार होते ही मनुष्य के हृदय की गाँठे खुल जाती हैं, सभी संशय समाप्त हो जाते हैं और समस्त कर्म (प्रारब्धादि) क्षीणता को प्राप्त हो जाते हैं।।


Verse ८३

अनात्मतां परित्यज्य निर्विकारो जगत्स्थितौ । एकनिष्ठतयान्तःस्थः संविन्मात्रपरो भव ॥

anātmatāṃ parityajya nirvikāro jagatsthitau । ekaniṣṭhatayāntaḥsthaḥ saṃvinmātraparo bhava ॥

V-114. Sage! That ultimate Status which is said to be imperishable is (in truth) not won. Twice-born sage! Speculate not as to whence this (nescience) has arisen.

हे पुत्र निदाघ! अनात्म भाव को त्यागकर, सांसारिक स्थिति में विकाररहित होकर अनन्य निष्ठापूर्वकअन्त में प्रतिष्ठित होकर आत्म-चैतन्य में ही रमण करते रहो। जिस प्रकार मरुभूमि में भ्रम से दिखाई देने वाला जल मरुस्थल मात्र ही रहता है, उसी प्रकार जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्तावस्था से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् आत्मविचार से ही चिन्मय जानना चाहिए। जो लक्ष्य एवं अलक्ष्य बुद्धि का परित्याग करके केवल आत्मनिष्ठ हो जाता है, वही श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी एवं स्वयं साक्षात् शिवरूप है। इस जगत् का अधिष्ठान अद्वितीय है, वाणी एवं मन की पहुँच से परे है। नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अव्यय स्वरूप से युक्त है। यह विश्व सर्वशक्तिमान् भगवान् महाशिव का मनोविलास मात्र ही है। संयम (धारणा, ध्यान, समाधि) एवं असंयम (सहज ज्ञान) के द्वारा ये सभी सांसारिक प्रपञ्च शान्ति को प्राप्त होते हैं ॥


Verse ८४

मरुभूमौ जलं सर्वं मरुभूमात्रमेव तत्। जगत्त्रयमिदं सर्वं चिन्मात्रं स्वविचारतः ॥

marubhūmau jalaṃ sarvaṃ marubhūmātrameva tat। jagattrayamidaṃ sarvaṃ cinmātraṃ svavicārataḥ ॥

V-115. Speculate rather on: 'how shall I destroy it? Once it is dissipated and dispelled you will (renunciation) cognise that status.'

हे पुत्र निदाघ! अनात्म भाव को त्यागकर, सांसारिक स्थिति में विकाररहित होकर अनन्य निष्ठापूर्वकअन्त में प्रतिष्ठित होकर आत्म-चैतन्य में ही रमण करते रहो। जिस प्रकार मरुभूमि में भ्रम से दिखाई देने वाला जल मरुस्थल मात्र ही रहता है, उसी प्रकार जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्तावस्था से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् आत्मविचार से ही चिन्मय जानना चाहिए। जो लक्ष्य एवं अलक्ष्य बुद्धि का परित्याग करके केवल आत्मनिष्ठ हो जाता है, वही श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी एवं स्वयं साक्षात् शिवरूप है। इस जगत् का अधिष्ठान अद्वितीय है, वाणी एवं मन की पहुँच से परे है। नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अव्यय स्वरूप से युक्त है। यह विश्व सर्वशक्तिमान् भगवान् महाशिव का मनोविलास मात्र ही है। संयम (धारणा, ध्यान, समाधि) एवं असंयम (सहज ज्ञान) के द्वारा ये सभी सांसारिक प्रपञ्च शान्ति को प्राप्त होते हैं ॥


Verse ८५

लक्ष्यालक्ष्यमतिं त्यक्त्वा यस्तिष्ठेत्केवलात्मना।शिव एवं स्वयं साक्षादयं ब्रह्मविदुत्तमः ।।

lakṣyālakṣyamatiṃ tyaktvā yastiṣṭhetkevalātmanā।śiva evaṃ svayaṃ sākṣādayaṃ brahmaviduttamaḥ ।।

V-116. That integral status (includes the knowledge) 'Whence this Maya has come and how it has perished. Therefore try to treat (with remedies) this abode of diseases (i.e. Maya).'

हे पुत्र निदाघ! अनात्म भाव को त्यागकर, सांसारिक स्थिति में विकाररहित होकर अनन्य निष्ठापूर्वकअन्त में प्रतिष्ठित होकर आत्म-चैतन्य में ही रमण करते रहो। जिस प्रकार मरुभूमि में भ्रम से दिखाई देने वाला जल मरुस्थल मात्र ही रहता है, उसी प्रकार जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्तावस्था से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् आत्मविचार से ही चिन्मय जानना चाहिए। जो लक्ष्य एवं अलक्ष्य बुद्धि का परित्याग करके केवल आत्मनिष्ठ हो जाता है, वही श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी एवं स्वयं साक्षात् शिवरूप है। इस जगत् का अधिष्ठान अद्वितीय है, वाणी एवं मन की पहुँच से परे है। नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अव्यय स्वरूप से युक्त है। यह विश्व सर्वशक्तिमान् भगवान् महाशिव का मनोविलास मात्र ही है। संयम (धारणा, ध्यान, समाधि) एवं असंयम (सहज ज्ञान) के द्वारा ये सभी सांसारिक प्रपञ्च शान्ति को प्राप्त होते हैं ॥


Verse ८६

अधिष्ठानमनौपम्यामवाड्मनसगोचरम्।नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं च तदव्ययम् ॥

adhiṣṭhānamanaupamyāmavāḍmanasagocaram।nityaṃ vibhuṃ sarvagataṃ susūkṣmaṃ ca tadavyayam ॥

-117-118(a). So that she may not subject you again to the sufferings of birth (etc.,). The sea of the Spirit shines forth in one's Self with its splendid inner vibrations. With certitude meditate inwardly that is homogeneous and infinite.

हे पुत्र निदाघ! अनात्म भाव को त्यागकर, सांसारिक स्थिति में विकाररहित होकर अनन्य निष्ठापूर्वकअन्त में प्रतिष्ठित होकर आत्म-चैतन्य में ही रमण करते रहो। जिस प्रकार मरुभूमि में भ्रम से दिखाई देने वाला जल मरुस्थल मात्र ही रहता है, उसी प्रकार जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्तावस्था से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् आत्मविचार से ही चिन्मय जानना चाहिए। जो लक्ष्य एवं अलक्ष्य बुद्धि का परित्याग करके केवल आत्मनिष्ठ हो जाता है, वही श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी एवं स्वयं साक्षात् शिवरूप है। इस जगत् का अधिष्ठान अद्वितीय है, वाणी एवं मन की पहुँच से परे है। नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अव्यय स्वरूप से युक्त है। यह विश्व सर्वशक्तिमान् भगवान् महाशिव का मनोविलास मात्र ही है। संयम (धारणा, ध्यान, समाधि) एवं असंयम (सहज ज्ञान) के द्वारा ये सभी सांसारिक प्रपञ्च शान्ति को प्राप्त होते हैं ॥


Verse ८७

सर्वशक्तेर्महेशस्य विलासो हि मनो जगत्। संयमासंयमाभ्यां च संसारः शान्तिमन्वगात् ॥

sarvaśaktermaheśasya vilāso hi mano jagat। saṃyamāsaṃyamābhyāṃ ca saṃsāraḥ śāntimanvagāt ॥

V-118(b). The power of the Spirit in the sea of the Spirit is a slightly agitated state of the latter.

हे पुत्र निदाघ! अनात्म भाव को त्यागकर, सांसारिक स्थिति में विकाररहित होकर अनन्य निष्ठापूर्वकअन्त में प्रतिष्ठित होकर आत्म-चैतन्य में ही रमण करते रहो। जिस प्रकार मरुभूमि में भ्रम से दिखाई देने वाला जल मरुस्थल मात्र ही रहता है, उसी प्रकार जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्तावस्था से युक्त यह सम्पूर्ण जगत् आत्मविचार से ही चिन्मय जानना चाहिए। जो लक्ष्य एवं अलक्ष्य बुद्धि का परित्याग करके केवल आत्मनिष्ठ हो जाता है, वही श्रेष्ठ ब्रह्मज्ञानी एवं स्वयं साक्षात् शिवरूप है। इस जगत् का अधिष्ठान अद्वितीय है, वाणी एवं मन की पहुँच से परे है। नित्य, विभु, सर्वगत, सूक्ष्मातिसूक्ष्म एवं अव्यय स्वरूप से युक्त है। यह विश्व सर्वशक्तिमान् भगवान् महाशिव का मनोविलास मात्र ही है। संयम (धारणा, ध्यान, समाधि) एवं असंयम (सहज ज्ञान) के द्वारा ये सभी सांसारिक प्रपञ्च शान्ति को प्राप्त होते हैं ॥


Verse ८८

मनोव्याधेश्चिकित्सार्थमुपायं कथयामि ते। यद्यत्स्वाभिमतं वस्तु तत्त्वजन्मोक्षमश्नुते ॥

manovyādheścikitsārthamupāyaṃ kathayāmi te। yadyatsvābhimataṃ vastu tattvajanmokṣamaśnute ॥

V-119. Like a wave in the sea, that pure Power shines forth there, just as the wind automatically blows in the sky.

हे निदाघ मुने! मैं तुम्हारे मन में प्रादुर्भूत होते हुए विकारों की चिकित्सा के लिए उपाय बतलाता हुँ। जिन-जिन इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए मन चंचल हो, उन पदार्थों का त्याग ही मानव के मोक्ष-प्राप्ति का साधन है। जिसके लिए अभिलषित सांसारिक पदार्थों के त्याग की भावना, एकान्त प्रिय होना एवं आत्मा की अधीनता दुष्कर हो जाती है, ऐसे उस मनुष्य रूपी कीट (कीड़े) को धिक्कार है। अपनी इच्छित वस्तुओं एवं पदार्थों का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना ही वास्तविक मन की शान्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य दूसरी गति नहीं है। सङ्कल्पशून्यता रूपी शस्त्रास्त्रों से जब इस चित्त का कर्तन कर दिया जाता है, तब सर्वस्वरूप सर्वान्तर्यामी, शान्तिरूप ब्रह्म की उपलब्धि होती है। इसलिए प्रपञ्च की भावना से रहित होकर प्रज्ञासम्पन्न होकर तथा चित्त को नियन्त्रित करके चिन्मात्र में प्रतिष्ठित हो जाओ।।


Verse ८९

स्वायत्तमेकान्तहितं स्वेप्सितत्यागवेदनम्।यस्य दुष्करतां यातं धिक्तं पुरुषकीटकम् ॥

svāyattamekāntahitaṃ svepsitatyāgavedanam।yasya duṣkaratāṃ yātaṃ dhiktaṃ puruṣakīṭakam ॥

V-120. In the same way, the Self in itself, by its own power, becomes mobile. That omnipotent Deity flashes forth for a moment.

हे निदाघ मुने! मैं तुम्हारे मन में प्रादुर्भूत होते हुए विकारों की चिकित्सा के लिए उपाय बतलाता हुँ। जिन-जिन इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए मन चंचल हो, उन पदार्थों का त्याग ही मानव के मोक्ष-प्राप्ति का साधन है। जिसके लिए अभिलषित सांसारिक पदार्थों के त्याग की भावना, एकान्त प्रिय होना एवं आत्मा की अधीनता दुष्कर हो जाती है, ऐसे उस मनुष्य रूपी कीट (कीड़े) को धिक्कार है। अपनी इच्छित वस्तुओं एवं पदार्थों का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना ही वास्तविक मन की शान्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य दूसरी गति नहीं है। सङ्कल्पशून्यता रूपी शस्त्रास्त्रों से जब इस चित्त का कर्तन कर दिया जाता है, तब सर्वस्वरूप सर्वान्तर्यामी, शान्तिरूप ब्रह्म की उपलब्धि होती है। इसलिए प्रपञ्च की भावना से रहित होकर प्रज्ञासम्पन्न होकर तथा चित्त को नियन्त्रित करके चिन्मात्र में प्रतिष्ठित हो जाओ।।


Verse ९०

स्वपौरुषैकसाध्येन स्वेप्सितत्यागरूपिणा।मनः प्रशममात्रेण विना नास्ति शुभा गतिः ।।

svapauruṣaikasādhyena svepsitatyāgarūpiṇā।manaḥ praśamamātreṇa vinā nāsti śubhā gatiḥ ।।

V-121. Whose potencies of space, time and action are not enhanced (by any means); who is pre-eminently established in her infinitude, being fully conscious of her own essential nature.

हे निदाघ मुने! मैं तुम्हारे मन में प्रादुर्भूत होते हुए विकारों की चिकित्सा के लिए उपाय बतलाता हुँ। जिन-जिन इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए मन चंचल हो, उन पदार्थों का त्याग ही मानव के मोक्ष-प्राप्ति का साधन है। जिसके लिए अभिलषित सांसारिक पदार्थों के त्याग की भावना, एकान्त प्रिय होना एवं आत्मा की अधीनता दुष्कर हो जाती है, ऐसे उस मनुष्य रूपी कीट (कीड़े) को धिक्कार है। अपनी इच्छित वस्तुओं एवं पदार्थों का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना ही वास्तविक मन की शान्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य दूसरी गति नहीं है। सङ्कल्पशून्यता रूपी शस्त्रास्त्रों से जब इस चित्त का कर्तन कर दिया जाता है, तब सर्वस्वरूप सर्वान्तर्यामी, शान्तिरूप ब्रह्म की उपलब्धि होती है। इसलिए प्रपञ्च की भावना से रहित होकर प्रज्ञासम्पन्न होकर तथा चित्त को नियन्त्रित करके चिन्मात्र में प्रतिष्ठित हो जाओ।।


Verse ९१

असंकल्पनशस्त्रेण छिन्नं चित्तमिदं यदा।सर्वं सर्वगतं शान्तं ब्रह्म संपद्यते तदा।।

asaṃkalpanaśastreṇa chinnaṃ cittamidaṃ yadā।sarvaṃ sarvagataṃ śāntaṃ brahma saṃpadyate tadā।।

V-122. Un-comprehended, She brings into being a finite form. When that supremely enchanting Deity brings forth that (finite) form.

हे निदाघ मुने! मैं तुम्हारे मन में प्रादुर्भूत होते हुए विकारों की चिकित्सा के लिए उपाय बतलाता हुँ। जिन-जिन इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए मन चंचल हो, उन पदार्थों का त्याग ही मानव के मोक्ष-प्राप्ति का साधन है। जिसके लिए अभिलषित सांसारिक पदार्थों के त्याग की भावना, एकान्त प्रिय होना एवं आत्मा की अधीनता दुष्कर हो जाती है, ऐसे उस मनुष्य रूपी कीट (कीड़े) को धिक्कार है। अपनी इच्छित वस्तुओं एवं पदार्थों का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना ही वास्तविक मन की शान्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य दूसरी गति नहीं है। सङ्कल्पशून्यता रूपी शस्त्रास्त्रों से जब इस चित्त का कर्तन कर दिया जाता है, तब सर्वस्वरूप सर्वान्तर्यामी, शान्तिरूप ब्रह्म की उपलब्धि होती है। इसलिए प्रपञ्च की भावना से रहित होकर प्रज्ञासम्पन्न होकर तथा चित्त को नियन्त्रित करके चिन्मात्र में प्रतिष्ठित हो जाओ।।


Verse ९२

भव भावनया मुक्तो मुक्तः परमया धिया। धारयात्मानमव्यग्रो ग्रस्तचित्तं चितः पदम् ॥

bhava bhāvanayā mukto muktaḥ paramayā dhiyā। dhārayātmānamavyagro grastacittaṃ citaḥ padam ॥

V-123-124(a). Other ideas (views), names, number, etc.; follow her. The individual self ('Knower of the field') is the designation of this form of the Spirit, O Brahmin; it is the basis of space, time and activity, and its forms are rooted in manifold (mental) constructions.

हे निदाघ मुने! मैं तुम्हारे मन में प्रादुर्भूत होते हुए विकारों की चिकित्सा के लिए उपाय बतलाता हुँ। जिन-जिन इच्छित वस्तुओं की प्राप्ति के लिए मन चंचल हो, उन पदार्थों का त्याग ही मानव के मोक्ष-प्राप्ति का साधन है। जिसके लिए अभिलषित सांसारिक पदार्थों के त्याग की भावना, एकान्त प्रिय होना एवं आत्मा की अधीनता दुष्कर हो जाती है, ऐसे उस मनुष्य रूपी कीट (कीड़े) को धिक्कार है। अपनी इच्छित वस्तुओं एवं पदार्थों का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना ही वास्तविक मन की शान्ति का श्रेष्ठ मार्ग है। इसके अतिरिक्त कोई अन्य दूसरी गति नहीं है। सङ्कल्पशून्यता रूपी शस्त्रास्त्रों से जब इस चित्त का कर्तन कर दिया जाता है, तब सर्वस्वरूप सर्वान्तर्यामी, शान्तिरूप ब्रह्म की उपलब्धि होती है। इसलिए प्रपञ्च की भावना से रहित होकर प्रज्ञासम्पन्न होकर तथा चित्त को नियन्त्रित करके चिन्मात्र में प्रतिष्ठित हो जाओ।।


Verse ९३

परं पौरुषमाश्रित्य नीत्वा चित्तमचित्तताम्। ध्यानतो हृदयाकाशे चिति चिच्चक्रधारया।मनो मारय निःशङ्कं त्वां प्रबधन्ति नारयः ॥

paraṃ pauruṣamāśritya nītvā cittamacittatām। dhyānato hṛdayākāśe citi ciccakradhārayā।mano māraya niḥśaṅkaṃ tvāṃ prabadhanti nārayaḥ ॥

V-124(b). He ('the Knower of the field') generating latent impressions, again, assumes the form of egoism.

श्रेष्ठ पौरुष रूप अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके तथा चित्त को अधितावस्था में ले जाकर आकाश रूपी हृदय में चिन्तन करते हुए बराबर चैतन्य तत्व में लगे हुए चित्त रूपी चक्र की तीक्ष्ण धार से मन का दमन कर देना चाहिए: ऐसा करते ही तुम्हारी सभी शंकायें निर्मूल हो जायेंगी तथा कामादिरूप शत्रु, बन्धन में न बाँध सकेंगे। यह वह है, मैं यह हुँ, वे समस्त पदार्थ मेरे हैं, यह भवना ही मन है।इन्हीं भावनाओं के त्याग से मन को (काटने के उपकरण द्वारा काटने की तरह) विनष्ट किया जा सकता है। जैसे शरत्-काल के आकाश में छिन्न-भिन्न हुर बादलों के समूह वायु की ठोकरों से विलीन हो जाते हैं, वैसे ही सद्विचारों के द्वारा ही मन अन्तर्हित हो जाता है। चाहे प्रलयंकारी उनचास पवन एक साथ प्रवाहित हों अथवा सभी सागर एक साथ सम्मिलित होकर एकार्णवरूप हो जायें। चाहे द्वादश आदित्य भी एक साथ मिलकर क्यों न तपने लगे; किन्तु फिर भी मन से विहीन मनुष्य को किसी प्रकार को क्षति नहीं हो सकती। केवल संकल्पहीनता रूपी एक साध्य ही सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति का साधन है। अतः तत्पद का आश्रय ग्रहण करके संकल्पहीनता के विस्तृत साम्राज्य में प्रतिष्ठित हो जाओ ॥


Verse ९४

अयं सोऽहमिदं तन्म एतावन्मात्रकं मनः । तदभावनमात्रेण दात्रेणेव विलीयते ॥

ayaṃ so'hamidaṃ tanma etāvanmātrakaṃ manaḥ । tadabhāvanamātreṇa dātreṇeva vilīyate ॥

V-125. The tainted egoism, as determiner, is called intellect, which, imagining forms, becomes the base for cogitation (or mind).

श्रेष्ठ पौरुष रूप अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके तथा चित्त को अधितावस्था में ले जाकर आकाश रूपी हृदय में चिन्तन करते हुए बराबर चैतन्य तत्व में लगे हुए चित्त रूपी चक्र की तीक्ष्ण धार से मन का दमन कर देना चाहिए: ऐसा करते ही तुम्हारी सभी शंकायें निर्मूल हो जायेंगी तथा कामादिरूप शत्रु, बन्धन में न बाँध सकेंगे। यह वह है, मैं यह हुँ, वे समस्त पदार्थ मेरे हैं, यह भवना ही मन है।इन्हीं भावनाओं के त्याग से मन को (काटने के उपकरण द्वारा काटने की तरह) विनष्ट किया जा सकता है। जैसे शरत्-काल के आकाश में छिन्न-भिन्न हुर बादलों के समूह वायु की ठोकरों से विलीन हो जाते हैं, वैसे ही सद्विचारों के द्वारा ही मन अन्तर्हित हो जाता है। चाहे प्रलयंकारी उनचास पवन एक साथ प्रवाहित हों अथवा सभी सागर एक साथ सम्मिलित होकर एकार्णवरूप हो जायें। चाहे द्वादश आदित्य भी एक साथ मिलकर क्यों न तपने लगे; किन्तु फिर भी मन से विहीन मनुष्य को किसी प्रकार को क्षति नहीं हो सकती। केवल संकल्पहीनता रूपी एक साध्य ही सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति का साधन है। अतः तत्पद का आश्रय ग्रहण करके संकल्पहीनता के विस्तृत साम्राज्य में प्रतिष्ठित हो जाओ ॥


Verse ९५

छिन्नाभ्रमण्डलं व्योम्नि यथा शरदि धूयते । वातेन कल्पकेनैव तथान्तर्भूयते मनः ॥

chinnābhramaṇḍalaṃ vyomni yathā śaradi dhūyate । vātena kalpakenaiva tathāntarbhūyate manaḥ ॥

V-126. With its profuse imaginings the mind slowly is (transmuted into) sense-organs. The wise deem the body with its hands and feet (nothing but) the senses.

श्रेष्ठ पौरुष रूप अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके तथा चित्त को अधितावस्था में ले जाकर आकाश रूपी हृदय में चिन्तन करते हुए बराबर चैतन्य तत्व में लगे हुए चित्त रूपी चक्र की तीक्ष्ण धार से मन का दमन कर देना चाहिए: ऐसा करते ही तुम्हारी सभी शंकायें निर्मूल हो जायेंगी तथा कामादिरूप शत्रु, बन्धन में न बाँध सकेंगे। यह वह है, मैं यह हुँ, वे समस्त पदार्थ मेरे हैं, यह भवना ही मन है।इन्हीं भावनाओं के त्याग से मन को (काटने के उपकरण द्वारा काटने की तरह) विनष्ट किया जा सकता है। जैसे शरत्-काल के आकाश में छिन्न-भिन्न हुर बादलों के समूह वायु की ठोकरों से विलीन हो जाते हैं, वैसे ही सद्विचारों के द्वारा ही मन अन्तर्हित हो जाता है। चाहे प्रलयंकारी उनचास पवन एक साथ प्रवाहित हों अथवा सभी सागर एक साथ सम्मिलित होकर एकार्णवरूप हो जायें। चाहे द्वादश आदित्य भी एक साथ मिलकर क्यों न तपने लगे; किन्तु फिर भी मन से विहीन मनुष्य को किसी प्रकार को क्षति नहीं हो सकती। केवल संकल्पहीनता रूपी एक साध्य ही सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति का साधन है। अतः तत्पद का आश्रय ग्रहण करके संकल्पहीनता के विस्तृत साम्राज्य में प्रतिष्ठित हो जाओ ॥

चतुर्थोऽध्यायः (part 4)

Verse ९६

कल्पान्तपवना वान्तु यान्तु चैकत्वमर्णवाः । तपन्तु द्वादशादित्या नास्ति निर्मनसः क्षतिः॥

kalpāntapavanā vāntu yāntu caikatvamarṇavāḥ । tapantu dvādaśādityā nāsti nirmanasaḥ kṣatiḥ॥

V-127. Thus, indeed, in stages descends the Jiva, bound by the cords of imaginings and impressions, and encompassed by a multitude of sufferings.

श्रेष्ठ पौरुष रूप अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके तथा चित्त को अधितावस्था में ले जाकर आकाश रूपी हृदय में चिन्तन करते हुए बराबर चैतन्य तत्व में लगे हुए चित्त रूपी चक्र की तीक्ष्ण धार से मन का दमन कर देना चाहिए: ऐसा करते ही तुम्हारी सभी शंकायें निर्मूल हो जायेंगी तथा कामादिरूप शत्रु, बन्धन में न बाँध सकेंगे। यह वह है, मैं यह हुँ, वे समस्त पदार्थ मेरे हैं, यह भवना ही मन है।इन्हीं भावनाओं के त्याग से मन को (काटने के उपकरण द्वारा काटने की तरह) विनष्ट किया जा सकता है। जैसे शरत्-काल के आकाश में छिन्न-भिन्न हुर बादलों के समूह वायु की ठोकरों से विलीन हो जाते हैं, वैसे ही सद्विचारों के द्वारा ही मन अन्तर्हित हो जाता है। चाहे प्रलयंकारी उनचास पवन एक साथ प्रवाहित हों अथवा सभी सागर एक साथ सम्मिलित होकर एकार्णवरूप हो जायें। चाहे द्वादश आदित्य भी एक साथ मिलकर क्यों न तपने लगे; किन्तु फिर भी मन से विहीन मनुष्य को किसी प्रकार को क्षति नहीं हो सकती। केवल संकल्पहीनता रूपी एक साध्य ही सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति का साधन है। अतः तत्पद का आश्रय ग्रहण करके संकल्पहीनता के विस्तृत साम्राज्य में प्रतिष्ठित हो जाओ ॥


Verse ९७

असंकल्पनमात्रैकसाध्ये सकलसिद्धिदे। असंकल्पातिसाम्राज्ये तिष्ठावष्टब्धतत्पदः ॥

asaṃkalpanamātraikasādhye sakalasiddhide। asaṃkalpātisāmrājye tiṣṭhāvaṣṭabdhatatpadaḥ ॥

V-128. The potent Spirit, thus degenerating into dense egoism, passes voluntarily into bondage as a silk-worm in its cocoon.

श्रेष्ठ पौरुष रूप अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके तथा चित्त को अधितावस्था में ले जाकर आकाश रूपी हृदय में चिन्तन करते हुए बराबर चैतन्य तत्व में लगे हुए चित्त रूपी चक्र की तीक्ष्ण धार से मन का दमन कर देना चाहिए: ऐसा करते ही तुम्हारी सभी शंकायें निर्मूल हो जायेंगी तथा कामादिरूप शत्रु, बन्धन में न बाँध सकेंगे। यह वह है, मैं यह हुँ, वे समस्त पदार्थ मेरे हैं, यह भवना ही मन है।इन्हीं भावनाओं के त्याग से मन को (काटने के उपकरण द्वारा काटने की तरह) विनष्ट किया जा सकता है। जैसे शरत्-काल के आकाश में छिन्न-भिन्न हुर बादलों के समूह वायु की ठोकरों से विलीन हो जाते हैं, वैसे ही सद्विचारों के द्वारा ही मन अन्तर्हित हो जाता है। चाहे प्रलयंकारी उनचास पवन एक साथ प्रवाहित हों अथवा सभी सागर एक साथ सम्मिलित होकर एकार्णवरूप हो जायें। चाहे द्वादश आदित्य भी एक साथ मिलकर क्यों न तपने लगे; किन्तु फिर भी मन से विहीन मनुष्य को किसी प्रकार को क्षति नहीं हो सकती। केवल संकल्पहीनता रूपी एक साध्य ही सम्पूर्ण सिद्धियों की प्राप्ति का साधन है। अतः तत्पद का आश्रय ग्रहण करके संकल्पहीनता के विस्तृत साम्राज्य में प्रतिष्ठित हो जाओ ॥


Verse ९८

न हि चञ्चलताहीनं मनः क्वचन दृश्यते । चञ्चलत्वं मनोधर्मो वह्नेर्धर्मो यथोष्णता ॥

na hi cañcalatāhīnaṃ manaḥ kvacana dṛśyate । cañcalatvaṃ manodharmo vahnerdharmo yathoṣṇatā ॥

V-129. And, like a lion in chains, becomes totally dependent finding itself within a net of its own imaginings and nothing more.

अचञ्चल मन कहीं पर नहीं दीखता, चञ्चलता मन का सहज धर्म है, जैसे अग्नि का सहज धर्म गर्मी प्रदान करना है। यही चन्चल स्वभाव वाली स्पन्दन शक्ति चित्त का स्वाभाषिक धर्म है। इसी मानसिक शक्ति को सांसारिक प्रपञ्च का सहजस्वरूप जानना चाहिए। जो मन अचञ्चल हो जाता है, वही अमृतस्वरूप कहा जाता है, वही तप है। उसे ही शास्त्रीय-सिद्धान्त की दृष्टि से मोक्ष कहते हैं। मन की चञ्चलता ही अविद्या है और वासना उसका स्वरुप है। शरूपी धासना को सदविचारों के द्वारा काट देना चाहिए ॥


Verse ९९

एषा हि चञ्चला स्पन्दशक्तिश्चित्तत्वसंस्थिता। तां विद्धि मानसीं शक्तिं जगदाडम्बरात्मिकाम्॥

eṣā hi cañcalā spandaśaktiścittatvasaṃsthitā। tāṃ viddhi mānasīṃ śaktiṃ jagadāḍambarātmikām॥

V-130. Sometimes (it operates as) mind, sometimes as intellect; sometimes as cognition; sometimes as (pure) action. Sometimes it is egoism and sometimes it is held to be what is thought.

अचञ्चल मन कहीं पर नहीं दीखता, चञ्चलता मन का सहज धर्म है, जैसे अग्नि का सहज धर्म गर्मी प्रदान करना है। यही चन्चल स्वभाव वाली स्पन्दन शक्ति चित्त का स्वाभाषिक धर्म है। इसी मानसिक शक्ति को सांसारिक प्रपञ्च का सहजस्वरूप जानना चाहिए। जो मन अचञ्चल हो जाता है, वही अमृतस्वरूप कहा जाता है, वही तप है। उसे ही शास्त्रीय-सिद्धान्त की दृष्टि से मोक्ष कहते हैं। मन की चञ्चलता ही अविद्या है और वासना उसका स्वरुप है। शरूपी धासना को सदविचारों के द्वारा काट देना चाहिए ॥


Verse १००

यतु चञ्चलताहीनं तन्मनोऽमृतमुच्यते ।तदेव च तपः शास्त्रसिद्धान्ते मोक्ष उच्यते ॥

yatu cañcalatāhīnaṃ tanmano'mṛtamucyate ।tadeva ca tapaḥ śāstrasiddhānte mokṣa ucyate ॥

V-131. Sometimes it is called Prakriti and sometimes it is held to be Maya. Sometimes it is designated a 'flaw' and sometimes referred to as 'action'.

अचञ्चल मन कहीं पर नहीं दीखता, चञ्चलता मन का सहज धर्म है, जैसे अग्नि का सहज धर्म गर्मी प्रदान करना है। यही चन्चल स्वभाव वाली स्पन्दन शक्ति चित्त का स्वाभाषिक धर्म है। इसी मानसिक शक्ति को सांसारिक प्रपञ्च का सहजस्वरूप जानना चाहिए। जो मन अचञ्चल हो जाता है, वही अमृतस्वरूप कहा जाता है, वही तप है। उसे ही शास्त्रीय-सिद्धान्त की दृष्टि से मोक्ष कहते हैं। मन की चञ्चलता ही अविद्या है और वासना उसका स्वरुप है। शरूपी धासना को सदविचारों के द्वारा काट देना चाहिए ॥


Verse १०१

तस्य चञ्चलता यैषा त्वविद्या वासनात्मिका।वासनाऽपरनाम्नीं तां विचारेण विनाशय ॥

tasya cañcalatā yaiṣā tvavidyā vāsanātmikā।vāsanā'paranāmnīṃ tāṃ vicāreṇa vināśaya ॥

V-132. Sometimes it is proclaimed as bondage and sometimes accounted the 'eight-fold case'. Sometimes it is said to be avidya and sometimes it is identified with 'desire'.

अचञ्चल मन कहीं पर नहीं दीखता, चञ्चलता मन का सहज धर्म है, जैसे अग्नि का सहज धर्म गर्मी प्रदान करना है। यही चन्चल स्वभाव वाली स्पन्दन शक्ति चित्त का स्वाभाषिक धर्म है। इसी मानसिक शक्ति को सांसारिक प्रपञ्च का सहजस्वरूप जानना चाहिए। जो मन अचञ्चल हो जाता है, वही अमृतस्वरूप कहा जाता है, वही तप है। उसे ही शास्त्रीय-सिद्धान्त की दृष्टि से मोक्ष कहते हैं। मन की चञ्चलता ही अविद्या है और वासना उसका स्वरुप है। शरूपी धासना को सदविचारों के द्वारा काट देना चाहिए ॥


Verse १०२

पौरुषेण प्रयत्नेन यस्मिन्नेव पदे मनः।योज्यते तत्पदं प्राप्य निर्विकल्पो भवानघ॥

pauruṣeṇa prayatnena yasminneva pade manaḥ।yojyate tatpadaṃ prāpya nirvikalpo bhavānagha॥

-133. Bearing within itself, as its seeds the fig-tree, this entire empirical sphere that fashions the cords of cravings, the Jiva is verily a tree sans fruits.

हे निष्पाप मुने! मन को पुरुषार्थ के द्वारा जिस उद्देश्य में स्थिर करो, उसे प्राप्त करके निर्विकल्प समाधि को अर्जित करो। अतएव प्रयासपूर्वक चित्त को चित्त से वशीभूत करके शोकरहित अवस्था के आश्रय से, आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो । विषय विकारों से रहित मन ही मन का पूर्णरूपेण निरोध करने में समर्थ हो सकता है। किसी राजा को पराजित करने में कोई राजा ही समर्थ होता है। जो तृष्णारूपी ग्राह के द्वारा ग्रसित किये जा चुके हैं, जो संसार-सागर में गिरकर भँवरों के जाल में फँसकर अपने लक्ष्य से दूर भटक गये हैं, उन्हें बचाने के लिए विषय-विकारों से रहित मन ही समर्थ है, वही नौका का रूप धारण करके पार लगा सकता है। है मुने! इस प्रकार के विकार-रहित मन के द्वारा इस विशाल बन्धनरूपी जाल को विनष्ट कर दो। स्वयमेव संसार-सागर से पार हो जाओ। अन्य और किसी के द्वारा यह संसार रूप सागर नहीं पार किया जा सकता।।


Verse १०३

अतः पौरुषमाश्रित्य चित्तमाक्रम्य चेतसा । विशोकं पदमालम्बय निरातङ्कः स्थिरो भव ॥

ataḥ pauruṣamāśritya cittamākramya cetasā । viśokaṃ padamālambaya nirātaṅkaḥ sthiro bhava ॥

V-134-135(a). O Brahmin! Like an elephant stuck in the morass, is the mind consumed in the flames of worries, crushed by the python of rage, attached to the waves of the sea of lust, and oblivious of its own grand progenitor (the Spirit): -- rescue it.

हे निष्पाप मुने! मन को पुरुषार्थ के द्वारा जिस उद्देश्य में स्थिर करो, उसे प्राप्त करके निर्विकल्प समाधि को अर्जित करो। अतएव प्रयासपूर्वक चित्त को चित्त से वशीभूत करके शोकरहित अवस्था के आश्रय से, आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो । विषय विकारों से रहित मन ही मन का पूर्णरूपेण निरोध करने में समर्थ हो सकता है। किसी राजा को पराजित करने में कोई राजा ही समर्थ होता है। जो तृष्णारूपी ग्राह के द्वारा ग्रसित किये जा चुके हैं, जो संसार-सागर में गिरकर भँवरों के जाल में फँसकर अपने लक्ष्य से दूर भटक गये हैं, उन्हें बचाने के लिए विषय-विकारों से रहित मन ही समर्थ है, वही नौका का रूप धारण करके पार लगा सकता है। है मुने! इस प्रकार के विकार-रहित मन के द्वारा इस विशाल बन्धनरूपी जाल को विनष्ट कर दो। स्वयमेव संसार-सागर से पार हो जाओ। अन्य और किसी के द्वारा यह संसार रूप सागर नहीं पार किया जा सकता।।


Verse १०४

मन एव समर्थं हि मनसो दृढनिग्रहे।अराज्ञा कः समर्थः स्याद्राज्ञो निग्रहकर्मणि॥

mana eva samarthaṃ hi manaso dṛḍhanigrahe।arājñā kaḥ samarthaḥ syādrājño nigrahakarmaṇi॥

V-135(b)-136. Thus are the Jivas (living beings) phases of the Spirit and established through bringing the empirical sphere into being. Their forms, in lakhs and Crores, have been assigned by Brahma. Numberless (Jivas) were born in the past and even now are being brought forth on all sides.

हे निष्पाप मुने! मन को पुरुषार्थ के द्वारा जिस उद्देश्य में स्थिर करो, उसे प्राप्त करके निर्विकल्प समाधि को अर्जित करो। अतएव प्रयासपूर्वक चित्त को चित्त से वशीभूत करके शोकरहित अवस्था के आश्रय से, आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो । विषय विकारों से रहित मन ही मन का पूर्णरूपेण निरोध करने में समर्थ हो सकता है। किसी राजा को पराजित करने में कोई राजा ही समर्थ होता है। जो तृष्णारूपी ग्राह के द्वारा ग्रसित किये जा चुके हैं, जो संसार-सागर में गिरकर भँवरों के जाल में फँसकर अपने लक्ष्य से दूर भटक गये हैं, उन्हें बचाने के लिए विषय-विकारों से रहित मन ही समर्थ है, वही नौका का रूप धारण करके पार लगा सकता है। है मुने! इस प्रकार के विकार-रहित मन के द्वारा इस विशाल बन्धनरूपी जाल को विनष्ट कर दो। स्वयमेव संसार-सागर से पार हो जाओ। अन्य और किसी के द्वारा यह संसार रूप सागर नहीं पार किया जा सकता।।


Verse १०५

तृष्णाग्राहगृहीतानां संसारार्णवपातिनाम् । आवर्तरूह्यमानानां दूरं स्वमन एव नौः ।।

tṛṣṇāgrāhagṛhītānāṃ saṃsārārṇavapātinām । āvartarūhyamānānāṃ dūraṃ svamana eva nauḥ ।।

-137. Others also will be born like multitudes of water-drops from a water-fall. Some of them are in their first birth; others have (already) had more than a hundred births.

हे निष्पाप मुने! मन को पुरुषार्थ के द्वारा जिस उद्देश्य में स्थिर करो, उसे प्राप्त करके निर्विकल्प समाधि को अर्जित करो। अतएव प्रयासपूर्वक चित्त को चित्त से वशीभूत करके शोकरहित अवस्था के आश्रय से, आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो । विषय विकारों से रहित मन ही मन का पूर्णरूपेण निरोध करने में समर्थ हो सकता है। किसी राजा को पराजित करने में कोई राजा ही समर्थ होता है। जो तृष्णारूपी ग्राह के द्वारा ग्रसित किये जा चुके हैं, जो संसार-सागर में गिरकर भँवरों के जाल में फँसकर अपने लक्ष्य से दूर भटक गये हैं, उन्हें बचाने के लिए विषय-विकारों से रहित मन ही समर्थ है, वही नौका का रूप धारण करके पार लगा सकता है। है मुने! इस प्रकार के विकार-रहित मन के द्वारा इस विशाल बन्धनरूपी जाल को विनष्ट कर दो। स्वयमेव संसार-सागर से पार हो जाओ। अन्य और किसी के द्वारा यह संसार रूप सागर नहीं पार किया जा सकता।।


Verse १०६

मनसैव मनश्छित्वा पाशं परमवन्धनम् । भवादुत्तारयात्मानं नासावन्येन तार्यते ॥

manasaiva manaśchitvā pāśaṃ paramavandhanam । bhavāduttārayātmānaṃ nāsāvanyena tāryate ॥

V-138. Yet others have (already) had countless births. Some will have two or more births, besides. Some are born as sub-human and super-human beings, gifted with music and Knowledge; some as mighty reptiles.

हे निष्पाप मुने! मन को पुरुषार्थ के द्वारा जिस उद्देश्य में स्थिर करो, उसे प्राप्त करके निर्विकल्प समाधि को अर्जित करो। अतएव प्रयासपूर्वक चित्त को चित्त से वशीभूत करके शोकरहित अवस्था के आश्रय से, आतंक से दूर रहकर शान्ति प्राप्त करो । विषय विकारों से रहित मन ही मन का पूर्णरूपेण निरोध करने में समर्थ हो सकता है। किसी राजा को पराजित करने में कोई राजा ही समर्थ होता है। जो तृष्णारूपी ग्राह के द्वारा ग्रसित किये जा चुके हैं, जो संसार-सागर में गिरकर भँवरों के जाल में फँसकर अपने लक्ष्य से दूर भटक गये हैं, उन्हें बचाने के लिए विषय-विकारों से रहित मन ही समर्थ है, वही नौका का रूप धारण करके पार लगा सकता है। है मुने! इस प्रकार के विकार-रहित मन के द्वारा इस विशाल बन्धनरूपी जाल को विनष्ट कर दो। स्वयमेव संसार-सागर से पार हो जाओ। अन्य और किसी के द्वारा यह संसार रूप सागर नहीं पार किया जा सकता।।


Verse १०७

या योदेति मनोनाम्नी वासना वासितान्तरा।तां तां परिहरेत्प्राज्ञस्ततोऽविद्याक्षयो भवेत्॥

yā yodeti manonāmnī vāsanā vāsitāntarā।tāṃ tāṃ pariharetprājñastato'vidyākṣayo bhavet॥

V-139. Some of (these living beings) are (to be identified with) the sun, the moon and the lord of waters; others with Shiva, Vishnu and Brahma. Some divided themselves as Brahmins, Kshatriyas, Vaishyas, Sudras.

जब-जब अन्त:करण को आच्छादित करने वाली मनरूपी वासना का प्राकट्य हो, तब-तब उसका परित्याग करना ज्ञानी मनुष्य का परम कर्तव्य हो जाता है क्योंकि ऐसा करने से अविद्या का विनाश हो जाता है। सर्वप्रथम भोगरूपी वासना का त्याग करो, फिर भेदरूपी वासना का त्याग करो,उसके पश्चात् भाव-अभाव दोनों का ही त्याग करके निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखी हो जाओ। मन का विनाश हौ अविद्या का विनाश कहा गया है। मन द्वारा जो कुछ भी अनुभूति में आता हो, उस-उसमें आस्था कदापि न होने दो। आस्था का परित्याग करना ही निर्माण है और आरथा के आश्रित रहना ही दु:ख है। जो प्रज्ञा से रहित है,उन्हीं में अविद्या प्रतिष्ठित रहती है। सम्यक् प्रज्ञासम्पन्न मनुष्य नाम मात्र के लिए भी कहीं अविद्या को स्वीकार नहीं करते ॥


Verse १०८

भोगैकवासनां त्यक्त्वा त्यज त्वं भेदवासनाम् भावाभावौ ततस्त्यक्त्वा निर्विकल्पः सुखी भव॥

bhogaikavāsanāṃ tyaktvā tyaja tvaṃ bhedavāsanām bhāvābhāvau tatastyaktvā nirvikalpaḥ sukhī bhava॥

V-140. Others with grass, herbs, trees, with their fruits, roots and winged insects. Jivas are (also to be identified with) trees like the Kadamba, the Jambira, the Sama, Tala and Tamala.

जब-जब अन्त:करण को आच्छादित करने वाली मनरूपी वासना का प्राकट्य हो, तब-तब उसका परित्याग करना ज्ञानी मनुष्य का परम कर्तव्य हो जाता है क्योंकि ऐसा करने से अविद्या का विनाश हो जाता है। सर्वप्रथम भोगरूपी वासना का त्याग करो, फिर भेदरूपी वासना का त्याग करो,उसके पश्चात् भाव-अभाव दोनों का ही त्याग करके निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखी हो जाओ। मन का विनाश हौ अविद्या का विनाश कहा गया है। मन द्वारा जो कुछ भी अनुभूति में आता हो, उस-उसमें आस्था कदापि न होने दो। आस्था का परित्याग करना ही निर्माण है और आरथा के आश्रित रहना ही दु:ख है। जो प्रज्ञा से रहित है,उन्हीं में अविद्या प्रतिष्ठित रहती है। सम्यक् प्रज्ञासम्पन्न मनुष्य नाम मात्र के लिए भी कहीं अविद्या को स्वीकार नहीं करते ॥


Verse १०९

एष एव मनोनाशस्त्वविद्यानाश एव च।यत्तत्संवेद्यते किंचित्तत्रास्थापरिवर्जनम्।अनास्थैव हि निर्वाणं दुःखमास्थापरिग्रहः ॥

eṣa eva manonāśastvavidyānāśa eva ca।yattatsaṃvedyate kiṃcittatrāsthāparivarjanam।anāsthaiva hi nirvāṇaṃ duḥkhamāsthāparigrahaḥ ॥

V-141. And with mounts like Mahendra, Malaya, Sahya, Mandara and Meru; and with the seas of salt water, milk, ghee and sugarcane-juice.

जब-जब अन्त:करण को आच्छादित करने वाली मनरूपी वासना का प्राकट्य हो, तब-तब उसका परित्याग करना ज्ञानी मनुष्य का परम कर्तव्य हो जाता है क्योंकि ऐसा करने से अविद्या का विनाश हो जाता है। सर्वप्रथम भोगरूपी वासना का त्याग करो, फिर भेदरूपी वासना का त्याग करो,उसके पश्चात् भाव-अभाव दोनों का ही त्याग करके निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखी हो जाओ। मन का विनाश हौ अविद्या का विनाश कहा गया है। मन द्वारा जो कुछ भी अनुभूति में आता हो, उस-उसमें आस्था कदापि न होने दो। आस्था का परित्याग करना ही निर्माण है और आरथा के आश्रित रहना ही दु:ख है। जो प्रज्ञा से रहित है,उन्हीं में अविद्या प्रतिष्ठित रहती है। सम्यक् प्रज्ञासम्पन्न मनुष्य नाम मात्र के लिए भी कहीं अविद्या को स्वीकार नहीं करते ॥


Verse ११०

अविद्या विद्यमानैव नष्टप्रज्ञेषु दृश्यते। नाम्नैवाङ्गीकृताकारा सम्यक्प्रज्ञस्य सा कुतः ॥

avidyā vidyamānaiva naṣṭaprajñeṣu dṛśyate। nāmnaivāṅgīkṛtākārā samyakprajñasya sā kutaḥ ॥

V-142. And with the vast quarters, and fast-running rivers; some of these sport high above (the earth); some descend and again fly upwards.

जब-जब अन्त:करण को आच्छादित करने वाली मनरूपी वासना का प्राकट्य हो, तब-तब उसका परित्याग करना ज्ञानी मनुष्य का परम कर्तव्य हो जाता है क्योंकि ऐसा करने से अविद्या का विनाश हो जाता है। सर्वप्रथम भोगरूपी वासना का त्याग करो, फिर भेदरूपी वासना का त्याग करो,उसके पश्चात् भाव-अभाव दोनों का ही त्याग करके निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखी हो जाओ। मन का विनाश हौ अविद्या का विनाश कहा गया है। मन द्वारा जो कुछ भी अनुभूति में आता हो, उस-उसमें आस्था कदापि न होने दो। आस्था का परित्याग करना ही निर्माण है और आरथा के आश्रित रहना ही दु:ख है। जो प्रज्ञा से रहित है,उन्हीं में अविद्या प्रतिष्ठित रहती है। सम्यक् प्रज्ञासम्पन्न मनुष्य नाम मात्र के लिए भी कहीं अविद्या को स्वीकार नहीं करते ॥


Verse १११

तावत्संसारभृगुषु स्वात्मना सह देहिनम्। आन्दोलयति नीरन्धं दुःखकण्टकशालिषु ॥

tāvatsaṃsārabhṛguṣu svātmanā saha dehinam। āndolayati nīrandhaṃ duḥkhakaṇṭakaśāliṣu ॥

V-143-144(a). Hit ceaselessly by death, as though they are balls hit by the hands, these Jivas are ceaselessly struck down by death as balls are by the hand. Having undergone thousands of births, again, some unwise ones despite (a degree of) discrimination, fall into the turmoils of worldly life.

इस दुःखरूपी कंटक से ओत-प्रोत संसार रूपी भ्रमजाल में तभी तक अविद्या अपने साथ देहधारी को निरन्तर भ्रमाती है, जब तक इसको विनष्ट करने वाली मोहनाशिनी आत्मसाक्षात्कार की आकांक्षा स्वयं ही उत्पन्न नहीं होती। यह अविद्या जब परमात्मतत्व की ओर देखती है, तब इसका स्वयं ही नाश हो जाता है। सर्वात्मिबोध के दर्शन होते ही अविद्या स्वयं ही लुप्त हो जाती है। केवल इच्छा मात्र ही अविद्या का स्वरूप है और इच्छा का पूरी तरह से नष्ट होना ही मोक्ष कहा गया है । हे मुने! किन्तु इच्छा तभी समाप्त होती है, जब संकल्प को पूर्णरूपेण विनाश हो जाये, अन्यथा इच्छा का नाश असम्भव है। चित् रूपी सूर्य के प्रकाश से कलिरूपी अन्धकार क्षीण हो जाता है ॥


Verse ११२

अविद्या यावदस्यास्तु नोत्पन्ना क्षयकारिणी।स्वयमात्मावलोकेच्छा मोहसंक्षयकारिणी ।।

avidyā yāvadasyāstu notpannā kṣayakāriṇī।svayamātmāvalokecchā mohasaṃkṣayakāriṇī ।।

V-143-144(a). Hit ceaselessly by death, as though they are balls hit by the hands, these Jivas are ceaselessly struck down by death as balls are by the hand. Having undergone thousands of births, again, some unwise ones despite (a degree of) discrimination, fall into the turmoils of worldly life.

इस दुःखरूपी कंटक से ओत-प्रोत संसार रूपी भ्रमजाल में तभी तक अविद्या अपने साथ देहधारी को निरन्तर भ्रमाती है, जब तक इसको विनष्ट करने वाली मोहनाशिनी आत्मसाक्षात्कार की आकांक्षा स्वयं ही उत्पन्न नहीं होती। यह अविद्या जब परमात्मतत्व की ओर देखती है, तब इसका स्वयं ही नाश हो जाता है। सर्वात्मिबोध के दर्शन होते ही अविद्या स्वयं ही लुप्त हो जाती है। केवल इच्छा मात्र ही अविद्या का स्वरूप है और इच्छा का पूरी तरह से नष्ट होना ही मोक्ष कहा गया है । हे मुने! किन्तु इच्छा तभी समाप्त होती है, जब संकल्प को पूर्णरूपेण विनाश हो जाये, अन्यथा इच्छा का नाश असम्भव है। चित् रूपी सूर्य के प्रकाश से कलिरूपी अन्धकार क्षीण हो जाता है ॥


Verse ११३

अस्याः परं प्रपश्यन्त्याः स्वात्मनाशः प्रजायते । दृष्टे सर्वगते बोधे स्वयं ह्येषा विलीयते ॥

asyāḥ paraṃ prapaśyantyāḥ svātmanāśaḥ prajāyate । dṛṣṭe sarvagate bodhe svayaṃ hyeṣā vilīyate ॥

V-144(b)-145. The principle of the Self, undetermined by space, time, etc.; by virtue of Its power, just sportively assumes a body spatial and temporal. Possessed of innate tendencies (to manifest) various orders of living beings, Itself is the supreme (Lord and Creator) that becomes the mind, that is unstable and inclined to construction and dissolution.

इस दुःखरूपी कंटक से ओत-प्रोत संसार रूपी भ्रमजाल में तभी तक अविद्या अपने साथ देहधारी को निरन्तर भ्रमाती है, जब तक इसको विनष्ट करने वाली मोहनाशिनी आत्मसाक्षात्कार की आकांक्षा स्वयं ही उत्पन्न नहीं होती। यह अविद्या जब परमात्मतत्व की ओर देखती है, तब इसका स्वयं ही नाश हो जाता है। सर्वात्मिबोध के दर्शन होते ही अविद्या स्वयं ही लुप्त हो जाती है। केवल इच्छा मात्र ही अविद्या का स्वरूप है और इच्छा का पूरी तरह से नष्ट होना ही मोक्ष कहा गया है । हे मुने! किन्तु इच्छा तभी समाप्त होती है, जब संकल्प को पूर्णरूपेण विनाश हो जाये, अन्यथा इच्छा का नाश असम्भव है। चित् रूपी सूर्य के प्रकाश से कलिरूपी अन्धकार क्षीण हो जाता है ॥


Verse ११४

इच्छा मात्रमविद्येयं तन्नाशो मोक्ष उच्यते ।स चासंकल्पमात्रेण सिद्धो भवति वै मुने ॥

icchā mātramavidyeyaṃ tannāśo mokṣa ucyate ।sa cāsaṃkalpamātreṇa siddho bhavati vai mune ॥

V-144(b)-145. The principle of the Self, undetermined by space, time, etc.; by virtue of Its power, just sportively assumes a body spatial and temporal. Possessed of innate tendencies (to manifest) various orders of living beings, Itself is the supreme (Lord and Creator) that becomes the mind, that is unstable and inclined to construction and dissolution.

इस दुःखरूपी कंटक से ओत-प्रोत संसार रूपी भ्रमजाल में तभी तक अविद्या अपने साथ देहधारी को निरन्तर भ्रमाती है, जब तक इसको विनष्ट करने वाली मोहनाशिनी आत्मसाक्षात्कार की आकांक्षा स्वयं ही उत्पन्न नहीं होती। यह अविद्या जब परमात्मतत्व की ओर देखती है, तब इसका स्वयं ही नाश हो जाता है। सर्वात्मिबोध के दर्शन होते ही अविद्या स्वयं ही लुप्त हो जाती है। केवल इच्छा मात्र ही अविद्या का स्वरूप है और इच्छा का पूरी तरह से नष्ट होना ही मोक्ष कहा गया है । हे मुने! किन्तु इच्छा तभी समाप्त होती है, जब संकल्प को पूर्णरूपेण विनाश हो जाये, अन्यथा इच्छा का नाश असम्भव है। चित् रूपी सूर्य के प्रकाश से कलिरूपी अन्धकार क्षीण हो जाता है ॥


Verse ११५

मनागपि मनोव्योम्नि वासनारजनीक्षये। कलिका तनुतामेति चिदादित्यप्रकाशनात्॥

manāgapi manovyomni vāsanārajanīkṣaye। kalikā tanutāmeti cidādityaprakāśanāt॥

V-146-148(a). In the beginning in a moment, the Constructive Power of the Mind fashions the transparent (image of) space inclined to own, as its essence, the seed of sound. Then, becoming dense, by the process of gross vibrations, that mind brings forth the vibrations of air inclined to own the seed of touch.

इस दुःखरूपी कंटक से ओत-प्रोत संसार रूपी भ्रमजाल में तभी तक अविद्या अपने साथ देहधारी को निरन्तर भ्रमाती है, जब तक इसको विनष्ट करने वाली मोहनाशिनी आत्मसाक्षात्कार की आकांक्षा स्वयं ही उत्पन्न नहीं होती। यह अविद्या जब परमात्मतत्व की ओर देखती है, तब इसका स्वयं ही नाश हो जाता है। सर्वात्मिबोध के दर्शन होते ही अविद्या स्वयं ही लुप्त हो जाती है। केवल इच्छा मात्र ही अविद्या का स्वरूप है और इच्छा का पूरी तरह से नष्ट होना ही मोक्ष कहा गया है । हे मुने! किन्तु इच्छा तभी समाप्त होती है, जब संकल्प को पूर्णरूपेण विनाश हो जाये, अन्यथा इच्छा का नाश असम्भव है। चित् रूपी सूर्य के प्रकाश से कलिरूपी अन्धकार क्षीण हो जाता है ॥


Verse ११६

चैत्यानुपातरहितं सामान्येन च सर्वगम्। यच्चित्तत्वमनाख्येयं स आत्मा परमेश्वरः ।।

caityānupātarahitaṃ sāmānyena ca sarvagam। yaccittatvamanākhyeyaṃ sa ātmā parameśvaraḥ ।।

V-146-148(a). In the beginning in a moment, the Constructive Power of the Mind fashions the transparent (image of) space inclined to own, as its essence, the seed of sound. Then, becoming dense, by the process of gross vibrations, that mind brings forth the vibrations of air inclined to own the seed of touch.

जब चित्त विषय वासनाओं का त्याग कर देता है तथा सर्वत्र गमन करने वाला बन जाता है, तब उसकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही आत्मा एवं परमात्मा के नाम से अभिहित होती है। अवश्य ही यह सभी कुछ ब्रह्म है। वह नित्य एवं चिद्मनस्वरूप है। वही अव्यय है। इसके अतिरिक्त जो अन्य मन नाम की कल्पना की जाती है, उसका कहीं पर भी अस्तित्व नहीं है। वह तो मात्र भ्रम ही है। इन तीनों लोकों में न तो किसी का जन्म होता है और न ही मृत्यु । ये जो भी भाव-विकार दृष्टिगोचर होते हैं, ये सभी अस्तित्वहीन हैं । एकमात्र केवलाभासरूप, सर्वव्यापी, अव्यय तथा चित्त के विषयों का अनुगमन न करने वाले केवल चिन्मात्र की ही सत्ता यहाँ विद्यमान है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चिन्मात्र, उपद्रव-रहित, शान्तस्वरूप एवं शमरूप में स्थित विकाररहित चिदात्मा में स्वयंचित्त ही स्वभावानुसार संकल्पपूर्वक गमन करता है, चित्त की यही संकल्परूप अवस्था स्वयं निर्दोष होते हुए भी मनन करने के कारण मन कही जाती है।।


Verse ११७

सर्वं च खल्विदं ब्रह्म नित्यचिद्धनमक्षतम्।कल्पनान्या मनोनाम्नी विद्यते नहि काचन ।।

sarvaṃ ca khalvidaṃ brahma nityaciddhanamakṣatam।kalpanānyā manonāmnī vidyate nahi kācana ।।

V-146-148(a). In the beginning in a moment, the Constructive Power of the Mind fashions the transparent (image of) space inclined to own, as its essence, the seed of sound. Then, becoming dense, by the process of gross vibrations, that mind brings forth the vibrations of air inclined to own the seed of touch.

जब चित्त विषय वासनाओं का त्याग कर देता है तथा सर्वत्र गमन करने वाला बन जाता है, तब उसकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही आत्मा एवं परमात्मा के नाम से अभिहित होती है। अवश्य ही यह सभी कुछ ब्रह्म है। वह नित्य एवं चिद्मनस्वरूप है। वही अव्यय है। इसके अतिरिक्त जो अन्य मन नाम की कल्पना की जाती है, उसका कहीं पर भी अस्तित्व नहीं है। वह तो मात्र भ्रम ही है। इन तीनों लोकों में न तो किसी का जन्म होता है और न ही मृत्यु । ये जो भी भाव-विकार दृष्टिगोचर होते हैं, ये सभी अस्तित्वहीन हैं । एकमात्र केवलाभासरूप, सर्वव्यापी, अव्यय तथा चित्त के विषयों का अनुगमन न करने वाले केवल चिन्मात्र की ही सत्ता यहाँ विद्यमान है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चिन्मात्र, उपद्रव-रहित, शान्तस्वरूप एवं शमरूप में स्थित विकाररहित चिदात्मा में स्वयंचित्त ही स्वभावानुसार संकल्पपूर्वक गमन करता है, चित्त की यही संकल्परूप अवस्था स्वयं निर्दोष होते हुए भी मनन करने के कारण मन कही जाती है।।


Verse ११८

न जायते न म्रियते किंचिदत्र जगत्त्रये।न च भावविकाराणां सत्ता क्वचन विद्यते ॥

na jāyate na mriyate kiṃcidatra jagattraye।na ca bhāvavikārāṇāṃ sattā kvacana vidyate ॥

V-148(b)-149(a). Of these two space and air, the bases of sound and touch, by intense repetitive frictions, is generated the fire.

जब चित्त विषय वासनाओं का त्याग कर देता है तथा सर्वत्र गमन करने वाला बन जाता है, तब उसकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही आत्मा एवं परमात्मा के नाम से अभिहित होती है। अवश्य ही यह सभी कुछ ब्रह्म है। वह नित्य एवं चिद्मनस्वरूप है। वही अव्यय है। इसके अतिरिक्त जो अन्य मन नाम की कल्पना की जाती है, उसका कहीं पर भी अस्तित्व नहीं है। वह तो मात्र भ्रम ही है। इन तीनों लोकों में न तो किसी का जन्म होता है और न ही मृत्यु । ये जो भी भाव-विकार दृष्टिगोचर होते हैं, ये सभी अस्तित्वहीन हैं । एकमात्र केवलाभासरूप, सर्वव्यापी, अव्यय तथा चित्त के विषयों का अनुगमन न करने वाले केवल चिन्मात्र की ही सत्ता यहाँ विद्यमान है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चिन्मात्र, उपद्रव-रहित, शान्तस्वरूप एवं शमरूप में स्थित विकाररहित चिदात्मा में स्वयंचित्त ही स्वभावानुसार संकल्पपूर्वक गमन करता है, चित्त की यही संकल्परूप अवस्था स्वयं निर्दोष होते हुए भी मनन करने के कारण मन कही जाती है।।


Verse ११९

केवलं केवलाभासं सर्वसामान्यमक्षतम्। चैत्यानुपातरहितं चिन्मात्रमिह विद्यते ॥

kevalaṃ kevalābhāsaṃ sarvasāmānyamakṣatam। caityānupātarahitaṃ cinmātramiha vidyate ॥

V-149(b)-150. Then the mind enriched by these three including rudimentary form proceeds to the notion of pure liquidity and, instantaneously, becomes aware of the coolness of water followed by the perception of water.

जब चित्त विषय वासनाओं का त्याग कर देता है तथा सर्वत्र गमन करने वाला बन जाता है, तब उसकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही आत्मा एवं परमात्मा के नाम से अभिहित होती है। अवश्य ही यह सभी कुछ ब्रह्म है। वह नित्य एवं चिद्मनस्वरूप है। वही अव्यय है। इसके अतिरिक्त जो अन्य मन नाम की कल्पना की जाती है, उसका कहीं पर भी अस्तित्व नहीं है। वह तो मात्र भ्रम ही है। इन तीनों लोकों में न तो किसी का जन्म होता है और न ही मृत्यु । ये जो भी भाव-विकार दृष्टिगोचर होते हैं, ये सभी अस्तित्वहीन हैं । एकमात्र केवलाभासरूप, सर्वव्यापी, अव्यय तथा चित्त के विषयों का अनुगमन न करने वाले केवल चिन्मात्र की ही सत्ता यहाँ विद्यमान है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चिन्मात्र, उपद्रव-रहित, शान्तस्वरूप एवं शमरूप में स्थित विकाररहित चिदात्मा में स्वयंचित्त ही स्वभावानुसार संकल्पपूर्वक गमन करता है, चित्त की यही संकल्परूप अवस्था स्वयं निर्दोष होते हुए भी मनन करने के कारण मन कही जाती है।।


Verse १२०

तस्मिन्नित्ये तते शुद्धे चिन्मात्रे निरुपद्रवे। शान्ते शमसमाभोगे निर्विकारे चिदात्मनि ॥

tasminnitye tate śuddhe cinmātre nirupadrave। śānte śamasamābhoge nirvikāre cidātmani ॥

V-149(b)-150. Then the mind enriched by these three including rudimentary form proceeds to the notion of pure liquidity and, instantaneously, becomes aware of the coolness of water followed by the perception of water.

जब चित्त विषय वासनाओं का त्याग कर देता है तथा सर्वत्र गमन करने वाला बन जाता है, तब उसकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही आत्मा एवं परमात्मा के नाम से अभिहित होती है। अवश्य ही यह सभी कुछ ब्रह्म है। वह नित्य एवं चिद्मनस्वरूप है। वही अव्यय है। इसके अतिरिक्त जो अन्य मन नाम की कल्पना की जाती है, उसका कहीं पर भी अस्तित्व नहीं है। वह तो मात्र भ्रम ही है। इन तीनों लोकों में न तो किसी का जन्म होता है और न ही मृत्यु । ये जो भी भाव-विकार दृष्टिगोचर होते हैं, ये सभी अस्तित्वहीन हैं । एकमात्र केवलाभासरूप, सर्वव्यापी, अव्यय तथा चित्त के विषयों का अनुगमन न करने वाले केवल चिन्मात्र की ही सत्ता यहाँ विद्यमान है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चिन्मात्र, उपद्रव-रहित, शान्तस्वरूप एवं शमरूप में स्थित विकाररहित चिदात्मा में स्वयंचित्त ही स्वभावानुसार संकल्पपूर्वक गमन करता है, चित्त की यही संकल्परूप अवस्था स्वयं निर्दोष होते हुए भी मनन करने के कारण मन कही जाती है।।


Verse १२१

यैषा स्वभावाभिमतं स्वयं संकल्प्य धावति ।चिच्चैत्यं स्वयमम्लानं मननान्मन उच्यते ॥

yaiṣā svabhāvābhimataṃ svayaṃ saṃkalpya dhāvati ।ciccaityaṃ svayamamlānaṃ mananānmana ucyate ॥

V-152. Next this body encompassed by the rudimentary elements discards its subtleness beholding in the sky a flash like a spark of fire.

जब चित्त विषय वासनाओं का त्याग कर देता है तथा सर्वत्र गमन करने वाला बन जाता है, तब उसकी ऐसी अनिर्वचनीय अवस्था ही आत्मा एवं परमात्मा के नाम से अभिहित होती है। अवश्य ही यह सभी कुछ ब्रह्म है। वह नित्य एवं चिद्मनस्वरूप है। वही अव्यय है। इसके अतिरिक्त जो अन्य मन नाम की कल्पना की जाती है, उसका कहीं पर भी अस्तित्व नहीं है। वह तो मात्र भ्रम ही है। इन तीनों लोकों में न तो किसी का जन्म होता है और न ही मृत्यु । ये जो भी भाव-विकार दृष्टिगोचर होते हैं, ये सभी अस्तित्वहीन हैं । एकमात्र केवलाभासरूप, सर्वव्यापी, अव्यय तथा चित्त के विषयों का अनुगमन न करने वाले केवल चिन्मात्र की ही सत्ता यहाँ विद्यमान है। उस नित्य, सर्वव्यापी, शुद्ध, चिन्मात्र, उपद्रव-रहित, शान्तस्वरूप एवं शमरूप में स्थित विकाररहित चिदात्मा में स्वयंचित्त ही स्वभावानुसार संकल्पपूर्वक गमन करता है, चित्त की यही संकल्परूप अवस्था स्वयं निर्दोष होते हुए भी मनन करने के कारण मन कही जाती है।।


Verse १२२

अतः संकल्पसिद्धेयं संकल्पेनैव नश्यति ।नाहं ब्रह्मेति संकल्पात्सुदृढाद्बध्यते मनः।सर्वं ब्रह्मेति संकल्पात्सदढान्मुच्यते मनः ।।

ataḥ saṃkalpasiddheyaṃ saṃkalpenaiva naśyati ।nāhaṃ brahmeti saṃkalpātsudṛḍhādbadhyate manaḥ।sarvaṃ brahmeti saṃkalpātsadaḍhānmucyate manaḥ ।।

V-153. Conjoined to the element of egoism and the seed of the intellect, this bee in the lotus of the elemental heart is (now) styled the Puryashtaka.

इस कारण संकल्प के द्वारा सिद्ध मन संकल्प द्वारा ही विनष्ट हो जाता है ‘मैं ब्रह्म नहीं हूँ' ऐसा सुदृढ़ संकल्प हो जाने से मन बन्धन-ग्रस्त नहीं होता और ‘यह सभी कुछ ब्रह्म ही है', ऐसा दृढ़ निश्चयी संकल्प हो जाने पर मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं क्षीणकाय हूँ, दुःखों से ग्रस्त हूँ, मैं हाथ पैर से युक्त हूँ, इस प्रकार के भावानुकूल व्यवहार से प्राणी बन्धनग्रस्त हो जाता है। मैं दु:खी नहीं हूँ, मेरा शरीर नहीं, आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित मुझमें बन्धन कहाँ?' इस प्रकार के व्यावहारिक जीवन से ओत-प्रोत मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं मांस नहीं हूँ', अस्थि नहीं हूँ, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर जिसके अन्तस् से अविद्या नष्ट हो गयी है, वही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ।।


Verse १२३

कृशोऽहं दुःखबद्धोऽहं हस्तपादादिमानहम्।इति भावानुरूपेण व्यवहारेण बध्यते ॥

kṛśo'haṃ duḥkhabaddho'haṃ hastapādādimānaham।iti bhāvānurūpeṇa vyavahāreṇa badhyate ॥

V-154. Due to intensity of yearning in it, by meditating on a resplendent embodiment, the mind grows grosser as a Bilva-fruit does through the process of ripening.

इस कारण संकल्प के द्वारा सिद्ध मन संकल्प द्वारा ही विनष्ट हो जाता है ‘मैं ब्रह्म नहीं हूँ' ऐसा सुदृढ़ संकल्प हो जाने से मन बन्धन-ग्रस्त नहीं होता और ‘यह सभी कुछ ब्रह्म ही है', ऐसा दृढ़ निश्चयी संकल्प हो जाने पर मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं क्षीणकाय हूँ, दुःखों से ग्रस्त हूँ, मैं हाथ पैर से युक्त हूँ, इस प्रकार के भावानुकूल व्यवहार से प्राणी बन्धनग्रस्त हो जाता है। मैं दु:खी नहीं हूँ, मेरा शरीर नहीं, आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित मुझमें बन्धन कहाँ?' इस प्रकार के व्यावहारिक जीवन से ओत-प्रोत मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं मांस नहीं हूँ', अस्थि नहीं हूँ, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर जिसके अन्तस् से अविद्या नष्ट हो गयी है, वही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ।।


Verse १२४

नाहं दुःखी न मे देहो बन्धः कोऽस्यात्मनि स्थितः।इति भावानुरूपेण व्यवहारेण मुच्यते ॥

nāhaṃ duḥkhī na me deho bandhaḥ ko'syātmani sthitaḥ।iti bhāvānurūpeṇa vyavahāreṇa mucyate ॥

V-155. That effulgence in the sky, shining like liquid gold in a crucible, assumes a form with definite contours by virtue of its inherent nature.

इस कारण संकल्प के द्वारा सिद्ध मन संकल्प द्वारा ही विनष्ट हो जाता है ‘मैं ब्रह्म नहीं हूँ' ऐसा सुदृढ़ संकल्प हो जाने से मन बन्धन-ग्रस्त नहीं होता और ‘यह सभी कुछ ब्रह्म ही है', ऐसा दृढ़ निश्चयी संकल्प हो जाने पर मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं क्षीणकाय हूँ, दुःखों से ग्रस्त हूँ, मैं हाथ पैर से युक्त हूँ, इस प्रकार के भावानुकूल व्यवहार से प्राणी बन्धनग्रस्त हो जाता है। मैं दु:खी नहीं हूँ, मेरा शरीर नहीं, आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित मुझमें बन्धन कहाँ?' इस प्रकार के व्यावहारिक जीवन से ओत-प्रोत मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं मांस नहीं हूँ', अस्थि नहीं हूँ, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर जिसके अन्तस् से अविद्या नष्ट हो गयी है, वही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ।।


Verse १२५

नाहं मांसं न चास्थीनि देहादन्यः परोऽस्म्यहम्। इति निश्चितवानन्तः क्षीणाविद्यो विमुच्यते ॥

nāhaṃ māṃsaṃ na cāsthīni dehādanyaḥ paro'smyaham। iti niścitavānantaḥ kṣīṇāvidyo vimucyate ॥

V-156. Upwards is the round head; downwards the feet. Of the two sides are the hands and in the middle what functions as the belly.

इस कारण संकल्प के द्वारा सिद्ध मन संकल्प द्वारा ही विनष्ट हो जाता है ‘मैं ब्रह्म नहीं हूँ' ऐसा सुदृढ़ संकल्प हो जाने से मन बन्धन-ग्रस्त नहीं होता और ‘यह सभी कुछ ब्रह्म ही है', ऐसा दृढ़ निश्चयी संकल्प हो जाने पर मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं क्षीणकाय हूँ, दुःखों से ग्रस्त हूँ, मैं हाथ पैर से युक्त हूँ, इस प्रकार के भावानुकूल व्यवहार से प्राणी बन्धनग्रस्त हो जाता है। मैं दु:खी नहीं हूँ, मेरा शरीर नहीं, आत्मतत्त्व में प्रतिष्ठित मुझमें बन्धन कहाँ?' इस प्रकार के व्यावहारिक जीवन से ओत-प्रोत मन मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। ‘मैं मांस नहीं हूँ', अस्थि नहीं हूँ, ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर जिसके अन्तस् से अविद्या नष्ट हो गयी है, वही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है ।।

चतुर्थोऽध्यायः (part 5)

Verse १२६

कल्पितेयमविद्येयमनात्मन्यात्मभावनात्।परं पौरुषमाश्रित्य यत्नात्परमया धिया।भोगेच्छा दूरतस्त्यक्त्वा निर्विकल्पः सुखी भव ॥

kalpiteyamavidyeyamanātmanyātmabhāvanāt।paraṃ pauruṣamāśritya yatnātparamayā dhiyā।bhogecchā dūratastyaktvā nirvikalpaḥ sukhī bhava ॥

V-157(a). In course of time the body (indwelt by the mind) gets fully developed and becomes flawless.

आत्म-रहित पदार्थों में आत्मभावना होना ही अविद्या जनित कल्पना है। अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके बुद्धिमत्तापूर्वक यत्न से भोग की आकांक्षा को दूर से ही छोड़कर, निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करो। यह ‘मेरा पुत्र’ ‘मेरा धन' ‘मैं यह हूँ' ‘मैं वह हूँ', ‘यह मेरा है' आदि समस्त वासनायें ही प्रपञ्च फैलाकर भिन्न-भिन्न क्रीड़ा कर रही हैं। तुम अज्ञानी मत बनो, ज्ञानवान् बनो, समस्त सांसारिक भावनाओं को विनष्ट कर दो। अनात्म विषयों में आत्मभावना से युक्त होकर मूर्खो की तरह क्यों रो रहे हो? यह मांस का पिण्ड, अशुद्ध, मूक, जड़ शरीर तुम्हारा कौन है, जिसके लिए बलपूर्वक दुःख-सुख से अभिभूत हो रहे हो ? अरे! कितना महान् आश्चर्य है कि जो अविनाशी ब्रह्म सत्य है, उसे मनुष्य ने विस्मृत कर दिया है। तुम अपने कर्तव्य-कर्मों में सदा लगे रहो। मन को अविद्यादि कर्मों में लिप्त न होने दो। अरे! कितने आश्चर्य की बात है। कि कमलनाल के तन्तुओं को रस्सी मानकर उनसे पर्वत आबद्ध कर दिये गये हैं। जो अविद्या अस्तित्व रहित है, उसी के द्वारा यह विविध रूपात्मक जगत् अभिभूत हो रहा है। इस अविद्या के प्रभाव से तृणवत् तुच्छ, जाग्रत्, सुषुप्तावस्था आदि तीनों जगत् वज्र के समान दृढ़ परिलक्षित हो रहे हैं ।।


Verse १२७

मम पुत्रो मम धनमहं सोऽयमिदं मम। इतीयमिन्द्रजालेन वासनैव विवल्गति ॥

mama putro mama dhanamahaṃ so'yamidaṃ mama। itīyamindrajālena vāsanaiva vivalgati ॥

V-157(b)-158(a). That same divine Brahma, the grandfather of the entire world, gets established in intelligence, purity, strength, energy, forms of knowledge and lordship.

आत्म-रहित पदार्थों में आत्मभावना होना ही अविद्या जनित कल्पना है। अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके बुद्धिमत्तापूर्वक यत्न से भोग की आकांक्षा को दूर से ही छोड़कर, निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करो। यह ‘मेरा पुत्र’ ‘मेरा धन' ‘मैं यह हूँ' ‘मैं वह हूँ', ‘यह मेरा है' आदि समस्त वासनायें ही प्रपञ्च फैलाकर भिन्न-भिन्न क्रीड़ा कर रही हैं। तुम अज्ञानी मत बनो, ज्ञानवान् बनो, समस्त सांसारिक भावनाओं को विनष्ट कर दो। अनात्म विषयों में आत्मभावना से युक्त होकर मूर्खो की तरह क्यों रो रहे हो? यह मांस का पिण्ड, अशुद्ध, मूक, जड़ शरीर तुम्हारा कौन है, जिसके लिए बलपूर्वक दुःख-सुख से अभिभूत हो रहे हो ? अरे! कितना महान् आश्चर्य है कि जो अविनाशी ब्रह्म सत्य है, उसे मनुष्य ने विस्मृत कर दिया है। तुम अपने कर्तव्य-कर्मों में सदा लगे रहो। मन को अविद्यादि कर्मों में लिप्त न होने दो। अरे! कितने आश्चर्य की बात है। कि कमलनाल के तन्तुओं को रस्सी मानकर उनसे पर्वत आबद्ध कर दिये गये हैं। जो अविद्या अस्तित्व रहित है, उसी के द्वारा यह विविध रूपात्मक जगत् अभिभूत हो रहा है। इस अविद्या के प्रभाव से तृणवत् तुच्छ, जाग्रत्, सुषुप्तावस्था आदि तीनों जगत् वज्र के समान दृढ़ परिलक्षित हो रहे हैं ।।


Verse १२८

मा भवाज्ञो भव ज्ञस्त्वं जहि संसारभावनाम्। अनात्मन्यात्मभावेन किमज्ञ इव रोदिषि ॥

mā bhavājño bhava jñastvaṃ jahi saṃsārabhāvanām। anātmanyātmabhāvena kimajña iva rodiṣi ॥

V-157(b)-158(a). That same divine Brahma, the grandfather of the entire world, gets established in intelligence, purity, strength, energy, forms of knowledge and lordship.

आत्म-रहित पदार्थों में आत्मभावना होना ही अविद्या जनित कल्पना है। अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके बुद्धिमत्तापूर्वक यत्न से भोग की आकांक्षा को दूर से ही छोड़कर, निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करो। यह ‘मेरा पुत्र’ ‘मेरा धन' ‘मैं यह हूँ' ‘मैं वह हूँ', ‘यह मेरा है' आदि समस्त वासनायें ही प्रपञ्च फैलाकर भिन्न-भिन्न क्रीड़ा कर रही हैं। तुम अज्ञानी मत बनो, ज्ञानवान् बनो, समस्त सांसारिक भावनाओं को विनष्ट कर दो। अनात्म विषयों में आत्मभावना से युक्त होकर मूर्खो की तरह क्यों रो रहे हो? यह मांस का पिण्ड, अशुद्ध, मूक, जड़ शरीर तुम्हारा कौन है, जिसके लिए बलपूर्वक दुःख-सुख से अभिभूत हो रहे हो ? अरे! कितना महान् आश्चर्य है कि जो अविनाशी ब्रह्म सत्य है, उसे मनुष्य ने विस्मृत कर दिया है। तुम अपने कर्तव्य-कर्मों में सदा लगे रहो। मन को अविद्यादि कर्मों में लिप्त न होने दो। अरे! कितने आश्चर्य की बात है। कि कमलनाल के तन्तुओं को रस्सी मानकर उनसे पर्वत आबद्ध कर दिये गये हैं। जो अविद्या अस्तित्व रहित है, उसी के द्वारा यह विविध रूपात्मक जगत् अभिभूत हो रहा है। इस अविद्या के प्रभाव से तृणवत् तुच्छ, जाग्रत्, सुषुप्तावस्था आदि तीनों जगत् वज्र के समान दृढ़ परिलक्षित हो रहे हैं ।।


Verse १२९

कस्तवायं जडो मूको देहो मांसमयोऽशुचिः।यदर्थं सुखदुःखाभ्यामवशः परिभूयसे॥

kastavāyaṃ jaḍo mūko deho māṃsamayo'śuciḥ।yadarthaṃ sukhaduḥkhābhyāmavaśaḥ paribhūyase॥

V-158(b)-160(a). Beholding his own attractive and pre-eminent body, the blessed Lord, the range of whose perception embraces all the three divisions of time, wondered what first would make its appearance in this supreme space whose essence is pure Spirit and whose limits are nowhere.

आत्म-रहित पदार्थों में आत्मभावना होना ही अविद्या जनित कल्पना है। अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके बुद्धिमत्तापूर्वक यत्न से भोग की आकांक्षा को दूर से ही छोड़कर, निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करो। यह ‘मेरा पुत्र’ ‘मेरा धन' ‘मैं यह हूँ' ‘मैं वह हूँ', ‘यह मेरा है' आदि समस्त वासनायें ही प्रपञ्च फैलाकर भिन्न-भिन्न क्रीड़ा कर रही हैं। तुम अज्ञानी मत बनो, ज्ञानवान् बनो, समस्त सांसारिक भावनाओं को विनष्ट कर दो। अनात्म विषयों में आत्मभावना से युक्त होकर मूर्खो की तरह क्यों रो रहे हो? यह मांस का पिण्ड, अशुद्ध, मूक, जड़ शरीर तुम्हारा कौन है, जिसके लिए बलपूर्वक दुःख-सुख से अभिभूत हो रहे हो ? अरे! कितना महान् आश्चर्य है कि जो अविनाशी ब्रह्म सत्य है, उसे मनुष्य ने विस्मृत कर दिया है। तुम अपने कर्तव्य-कर्मों में सदा लगे रहो। मन को अविद्यादि कर्मों में लिप्त न होने दो। अरे! कितने आश्चर्य की बात है। कि कमलनाल के तन्तुओं को रस्सी मानकर उनसे पर्वत आबद्ध कर दिये गये हैं। जो अविद्या अस्तित्व रहित है, उसी के द्वारा यह विविध रूपात्मक जगत् अभिभूत हो रहा है। इस अविद्या के प्रभाव से तृणवत् तुच्छ, जाग्रत्, सुषुप्तावस्था आदि तीनों जगत् वज्र के समान दृढ़ परिलक्षित हो रहे हैं ।।


Verse १३०

अहो नु चित्रं यत्सत्यं ब्रह्म तद्विस्मृतं नृणाम्। तिष्ठतस्तव कार्येषु मास्तु रागानुरञ्जना॥

aho nu citraṃ yatsatyaṃ brahma tadvismṛtaṃ nṛṇām। tiṣṭhatastava kāryeṣu māstu rāgānurañjanā॥

V-158(b)-160(a). Beholding his own attractive and pre-eminent body, the blessed Lord, the range of whose perception embraces all the three divisions of time, wondered what first would make its appearance in this supreme space whose essence is pure Spirit and whose limits are nowhere.

आत्म-रहित पदार्थों में आत्मभावना होना ही अविद्या जनित कल्पना है। अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके बुद्धिमत्तापूर्वक यत्न से भोग की आकांक्षा को दूर से ही छोड़कर, निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करो। यह ‘मेरा पुत्र’ ‘मेरा धन' ‘मैं यह हूँ' ‘मैं वह हूँ', ‘यह मेरा है' आदि समस्त वासनायें ही प्रपञ्च फैलाकर भिन्न-भिन्न क्रीड़ा कर रही हैं। तुम अज्ञानी मत बनो, ज्ञानवान् बनो, समस्त सांसारिक भावनाओं को विनष्ट कर दो। अनात्म विषयों में आत्मभावना से युक्त होकर मूर्खो की तरह क्यों रो रहे हो? यह मांस का पिण्ड, अशुद्ध, मूक, जड़ शरीर तुम्हारा कौन है, जिसके लिए बलपूर्वक दुःख-सुख से अभिभूत हो रहे हो ? अरे! कितना महान् आश्चर्य है कि जो अविनाशी ब्रह्म सत्य है, उसे मनुष्य ने विस्मृत कर दिया है। तुम अपने कर्तव्य-कर्मों में सदा लगे रहो। मन को अविद्यादि कर्मों में लिप्त न होने दो। अरे! कितने आश्चर्य की बात है। कि कमलनाल के तन्तुओं को रस्सी मानकर उनसे पर्वत आबद्ध कर दिये गये हैं। जो अविद्या अस्तित्व रहित है, उसी के द्वारा यह विविध रूपात्मक जगत् अभिभूत हो रहा है। इस अविद्या के प्रभाव से तृणवत् तुच्छ, जाग्रत्, सुषुप्तावस्था आदि तीनों जगत् वज्र के समान दृढ़ परिलक्षित हो रहे हैं ।।


Verse १३१

अहो नु चित्रं पद्मोत्थैर्बद्धास्तन्तुभिरद्रयः । अविद्यमाना या विद्या तया विश्वं खिलीकृतम्। इदं तद्वज्रतां यातं तृणमात्रं जगत्त्रयम् ॥

aho nu citraṃ padmotthairbaddhāstantubhiradrayaḥ । avidyamānā yā vidyā tayā viśvaṃ khilīkṛtam। idaṃ tadvajratāṃ yātaṃ tṛṇamātraṃ jagattrayam ॥

V-160(b). Thus wondered Brahma whose vision was as flawless as that of Shiva.

आत्म-रहित पदार्थों में आत्मभावना होना ही अविद्या जनित कल्पना है। अभ्यास एवं वैराग्य का आश्रय प्राप्त करके बुद्धिमत्तापूर्वक यत्न से भोग की आकांक्षा को दूर से ही छोड़कर, निर्विकल्प होकर पूर्ण सुखमय जीवन व्यतीत करो। यह ‘मेरा पुत्र’ ‘मेरा धन' ‘मैं यह हूँ' ‘मैं वह हूँ', ‘यह मेरा है' आदि समस्त वासनायें ही प्रपञ्च फैलाकर भिन्न-भिन्न क्रीड़ा कर रही हैं। तुम अज्ञानी मत बनो, ज्ञानवान् बनो, समस्त सांसारिक भावनाओं को विनष्ट कर दो। अनात्म विषयों में आत्मभावना से युक्त होकर मूर्खो की तरह क्यों रो रहे हो? यह मांस का पिण्ड, अशुद्ध, मूक, जड़ शरीर तुम्हारा कौन है, जिसके लिए बलपूर्वक दुःख-सुख से अभिभूत हो रहे हो ? अरे! कितना महान् आश्चर्य है कि जो अविनाशी ब्रह्म सत्य है, उसे मनुष्य ने विस्मृत कर दिया है। तुम अपने कर्तव्य-कर्मों में सदा लगे रहो। मन को अविद्यादि कर्मों में लिप्त न होने दो। अरे! कितने आश्चर्य की बात है। कि कमलनाल के तन्तुओं को रस्सी मानकर उनसे पर्वत आबद्ध कर दिये गये हैं। जो अविद्या अस्तित्व रहित है, उसी के द्वारा यह विविध रूपात्मक जगत् अभिभूत हो रहा है। इस अविद्या के प्रभाव से तृणवत् तुच्छ, जाग्रत्, सुषुप्तावस्था आदि तीनों जगत् वज्र के समान दृढ़ परिलक्षित हो रहे हैं ।।