3. तृतीयोऽध्यायः
तृतीयोऽध्यायः (part 1)
Verse १
निदाघो नाम मुनिराट् प्राप्तविद्यश्च बालकः। विहृतस्तीर्थयात्रार्थं पित्रानुज्ञातवान्स्वयम्॥
nidāgho nāma munirāṭ prāptavidyaśca bālakaḥ। vihṛtastīrthayātrārthaṃ pitrānujñātavānsvayam॥
V-39-43. The wise person should reflect about the path to liberation, every moment, in the manner of the Shastras, according to the place, convenience and contact with good people, until he achieves repose in the spirit. A person having repose in the fourth state (liberation) and released from the ocean of worldly life, whether he lives or not, be he house-holder or recluse, has no purpose (meaning) in what is done or not done, nor by the delusion of Veda and Smriti; he remains in his pristine condition like the ocean without being churned by the mountain (he is in a transcendental state).
अपने पिता (ऋभु) से अनुमति लेकर निदाघ नामक श्रेष्ठ मुनिपुत्र एकाकी ही तीर्थयात्रा के लिए चल पड़े। साढ़े तीन करोड़ तीर्थ-स्थलों में स्नान आदि सम्पन्न कर लेने के पश्चात् वे श्रेष्ठ मुनि अपने घर वापस लौट आए। उन महान् यशस्वी मुनि ने घर आकर अपने पिता ऋभुमुनि से अपनी समस्त यात्रा का वृत्तान्त कह सुनाया। उन्होंने कहा- हे पिताजी ! साढ़े तीन करोड़ तीर्थस्थलों में स्नान करने के पश्चात् जो पुण्य-फल प्राप्त हुआ है, उसके प्रतिफल स्वरूप हमारे अन्त:करण में इस तरह के श्रेष्ठ विचार प्रादुर्भूत हो रहे हैं॥
Verse २
सार्धत्रिकोटितीर्थेषु स्न्नात्वा गृहमुपागतः । स्वोदन्तं कथयामास ऋभु नत्वा महायशाः ॥
sārdhatrikoṭitīrtheṣu snnātvā gṛhamupāgataḥ । svodantaṃ kathayāmāsa ṛbhu natvā mahāyaśāḥ ॥
When there arises the pure realization of all as the spirit, then shines the 'body' in the form of the consciousness, beyond origin, space and time.
अपने पिता (ऋभु) से अनुमति लेकर निदाघ नामक श्रेष्ठ मुनिपुत्र एकाकी ही तीर्थयात्रा के लिए चल पड़े। साढ़े तीन करोड़ तीर्थ-स्थलों में स्नान आदि सम्पन्न कर लेने के पश्चात् वे श्रेष्ठ मुनि अपने घर वापस लौट आए। उन महान् यशस्वी मुनि ने घर आकर अपने पिता ऋभुमुनि से अपनी समस्त यात्रा का वृत्तान्त कह सुनाया। उन्होंने कहा- हे पिताजी ! साढ़े तीन करोड़ तीर्थस्थलों में स्नान करने के पश्चात् जो पुण्य-फल प्राप्त हुआ है, उसके प्रतिफल स्वरूप हमारे अन्त:करण में इस तरह के श्रेष्ठ विचार प्रादुर्भूत हो रहे हैं॥
Verse ३
साधंत्रिकोटितीर्थेषु स्नानपुण्यप्रभावतः । प्रादुर्भूतो मनसि मे विचारः सोऽयमीदृशः ॥
sādhaṃtrikoṭitīrtheṣu snānapuṇyaprabhāvataḥ । prādurbhūto manasi me vicāraḥ so'yamīdṛśaḥ ॥
IV-44-49. The visible cosmos of un-moving and moving things melts away like dream in a (dreamless) sleep. The wise people have attributed, for empirical purposes, names for the supreme Being, such as, Rita Atma, Para Brahma, Truth etc. Just as armlets etc., are only words and meanings, not different from gold, so also is the magical illusion of the cosmos extended by the supreme being.
अपने पिता (ऋभु) से अनुमति लेकर निदाघ नामक श्रेष्ठ मुनिपुत्र एकाकी ही तीर्थयात्रा के लिए चल पड़े। साढ़े तीन करोड़ तीर्थ-स्थलों में स्नान आदि सम्पन्न कर लेने के पश्चात् वे श्रेष्ठ मुनि अपने घर वापस लौट आए। उन महान् यशस्वी मुनि ने घर आकर अपने पिता ऋभुमुनि से अपनी समस्त यात्रा का वृत्तान्त कह सुनाया। उन्होंने कहा- हे पिताजी ! साढ़े तीन करोड़ तीर्थस्थलों में स्नान करने के पश्चात् जो पुण्य-फल प्राप्त हुआ है, उसके प्रतिफल स्वरूप हमारे अन्त:करण में इस तरह के श्रेष्ठ विचार प्रादुर्भूत हो रहे हैं॥
Verse ४
जायते मृतये लोको म्रियते जननाय च।अस्थिराः सर्व एवेमे सचराचरचेष्टिताः ॥
jāyate mṛtaye loko mriyate jananāya ca।asthirāḥ sarva eveme sacarācaraceṣṭitāḥ ॥
The perceived being inside the visible world is called bondage, in the absence (dissolution) of the visible, he is realized. What is called the visible is the projection like, 'The universe is you, and I'. The illusion of the world is spread only by the mind - as long as it happens, this is no liberation.
यह जगत् उत्पन्न होता है मरने (विनष्ट होने) के लिए, पुनः मरता है जन्मने के लिए। समस्त चराचर प्राणियों की चेष्टा के साथ यह सारा प्रपञ्च (जगत्) अस्थिर एवं क्षणिक है । ऐश्वर्य की भूमि में प्रकट होने वाले ये समस्त पदार्थ आपत्तियों के मूलभूत कारण हैं। ये सभी पदार्थ लौह शलाका के सदृश परस्पर पृथक् रहते हुए मानसिक कल्पना रूपी चुम्बक द्वारा एकत्रित होते रहते हैं जिस तरह मार्ग में गमन करने वाला व्यक्ति मरुस्थल में चलते-चलते (कष्ट के कारण) विरक्त हो जाता है, उसी तरह मैं भी इन सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो रहा हूँ: क्योंकि ये सांसारिक भोग-पदार्थ मुझे दुःखदायी प्रतीत होने लगे हैं। अब इन समस्त दु:खों का शमन किस प्रकार होगा, ऐसा सोचकर मेरा हृदय अत्यधिक संतप्त हो रहा है। ये ऐश्वर्य रूपी धन-जिनके पीछे चिन्ताओं के समूह चक्र की भाँति घूमते रहते हैं, मुझे आनन्दप्रद नहीं लग रहे हैं। स्त्री-पुत्रादि समस्त स्वजन सम्बन्धी मानो उग्र आपदाओं के घर हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् में उदारता को प्रतिमूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी ये श्रीलक्ष्मी जी भी परम मोह को उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही इनके द्वारा जीव को आनन्द नहीं मिल सकता। जिस प्रकार पल्लव के अग्रभाग में जल कनिका बुँदरूप में लटकती हैं. वह क्षणिक है। उसी प्रकार मनुष्य की आयु भी जल की बूंद के सदृश क्षणभंगुर है। इस नाशवान् शरीर को असमय ही छोड़कर उन्मत्त की भाँति मुझे प्रस्थान करना ही पड़ेगा। जिनका चित्त विषय-वासना रूपी सर्प के सङ्ग से जर्जर हो गया है तथा जिन्हें प्रौढ़ आत्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है, उनका जीवन कष्ट का ही हेतु बना है॥
Verse ५
सर्वापदां पदं पापा भावा विभवभूमयः। अयःशलाकासदृशाः परस्परमसङ्गिनः । श्लिष्यन्ते केवला भावा मन:कल्पनयानया॥
sarvāpadāṃ padaṃ pāpā bhāvā vibhavabhūmayaḥ। ayaḥśalākāsadṛśāḥ parasparamasaṅginaḥ । śliṣyante kevalā bhāvā mana:kalpanayānayā॥
IV-50-57. The cosmos is spread (generated) through the mind by the self-born supreme being. So the visible cosmos is mental in nature. There is no real mind; it is only the flash of things. Know the mind to be only ideation. Understand that where there is ideation there is Mind. Mind and ideation are never different - when the mass of ideations slips away only the (pristine) nature remains.
यह जगत् उत्पन्न होता है मरने (विनष्ट होने) के लिए, पुनः मरता है जन्मने के लिए। समस्त चराचर प्राणियों की चेष्टा के साथ यह सारा प्रपञ्च (जगत्) अस्थिर एवं क्षणिक है । ऐश्वर्य की भूमि में प्रकट होने वाले ये समस्त पदार्थ आपत्तियों के मूलभूत कारण हैं। ये सभी पदार्थ लौह शलाका के सदृश परस्पर पृथक् रहते हुए मानसिक कल्पना रूपी चुम्बक द्वारा एकत्रित होते रहते हैं जिस तरह मार्ग में गमन करने वाला व्यक्ति मरुस्थल में चलते-चलते (कष्ट के कारण) विरक्त हो जाता है, उसी तरह मैं भी इन सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो रहा हूँ: क्योंकि ये सांसारिक भोग-पदार्थ मुझे दुःखदायी प्रतीत होने लगे हैं। अब इन समस्त दु:खों का शमन किस प्रकार होगा, ऐसा सोचकर मेरा हृदय अत्यधिक संतप्त हो रहा है। ये ऐश्वर्य रूपी धन-जिनके पीछे चिन्ताओं के समूह चक्र की भाँति घूमते रहते हैं, मुझे आनन्दप्रद नहीं लग रहे हैं। स्त्री-पुत्रादि समस्त स्वजन सम्बन्धी मानो उग्र आपदाओं के घर हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् में उदारता को प्रतिमूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी ये श्रीलक्ष्मी जी भी परम मोह को उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही इनके द्वारा जीव को आनन्द नहीं मिल सकता। जिस प्रकार पल्लव के अग्रभाग में जल कनिका बुँदरूप में लटकती हैं. वह क्षणिक है। उसी प्रकार मनुष्य की आयु भी जल की बूंद के सदृश क्षणभंगुर है। इस नाशवान् शरीर को असमय ही छोड़कर उन्मत्त की भाँति मुझे प्रस्थान करना ही पड़ेगा। जिनका चित्त विषय-वासना रूपी सर्प के सङ्ग से जर्जर हो गया है तथा जिन्हें प्रौढ़ आत्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है, उनका जीवन कष्ट का ही हेतु बना है॥
Verse ६
भावेष्वरतिरायाता पथिकस्य मरुष्विव।शाम्यतीदं कथं दुःख-मिति तप्तोऽस्मि चेतसा ॥
bhāveṣvaratirāyātā pathikasya maruṣviva।śāmyatīdaṃ kathaṃ duḥkha-miti tapto'smi cetasā ॥
When the excitement of the visible, viz., 'I and you are the cosmos' dies down, only the sole condition (pristineness) remains. At the achievement of the great dissolution, when all the visible creation etc., become (i.e. known to be) non-existent, only tranquility remains. There exists the unborn, divine un-ailing, shining being, the unsetting sun, forever, the maker of all, declared to be the supreme self. From whom words turn away (un-reaching), who is realized (only) by the liberated person, whose names like (individual) selves are assumed, not natural.
यह जगत् उत्पन्न होता है मरने (विनष्ट होने) के लिए, पुनः मरता है जन्मने के लिए। समस्त चराचर प्राणियों की चेष्टा के साथ यह सारा प्रपञ्च (जगत्) अस्थिर एवं क्षणिक है । ऐश्वर्य की भूमि में प्रकट होने वाले ये समस्त पदार्थ आपत्तियों के मूलभूत कारण हैं। ये सभी पदार्थ लौह शलाका के सदृश परस्पर पृथक् रहते हुए मानसिक कल्पना रूपी चुम्बक द्वारा एकत्रित होते रहते हैं जिस तरह मार्ग में गमन करने वाला व्यक्ति मरुस्थल में चलते-चलते (कष्ट के कारण) विरक्त हो जाता है, उसी तरह मैं भी इन सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो रहा हूँ: क्योंकि ये सांसारिक भोग-पदार्थ मुझे दुःखदायी प्रतीत होने लगे हैं। अब इन समस्त दु:खों का शमन किस प्रकार होगा, ऐसा सोचकर मेरा हृदय अत्यधिक संतप्त हो रहा है। ये ऐश्वर्य रूपी धन-जिनके पीछे चिन्ताओं के समूह चक्र की भाँति घूमते रहते हैं, मुझे आनन्दप्रद नहीं लग रहे हैं। स्त्री-पुत्रादि समस्त स्वजन सम्बन्धी मानो उग्र आपदाओं के घर हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् में उदारता को प्रतिमूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी ये श्रीलक्ष्मी जी भी परम मोह को उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही इनके द्वारा जीव को आनन्द नहीं मिल सकता। जिस प्रकार पल्लव के अग्रभाग में जल कनिका बुँदरूप में लटकती हैं. वह क्षणिक है। उसी प्रकार मनुष्य की आयु भी जल की बूंद के सदृश क्षणभंगुर है। इस नाशवान् शरीर को असमय ही छोड़कर उन्मत्त की भाँति मुझे प्रस्थान करना ही पड़ेगा। जिनका चित्त विषय-वासना रूपी सर्प के सङ्ग से जर्जर हो गया है तथा जिन्हें प्रौढ़ आत्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है, उनका जीवन कष्ट का ही हेतु बना है॥
Verse ७
चिन्तानिचयचक्राणि नानन्दाय धनानि मे। संप्रसूतकलत्राणि गृहाण्युग्रापदामिव॥
cintānicayacakrāṇi nānandāya dhanāni me। saṃprasūtakalatrāṇi gṛhāṇyugrāpadāmiva॥
IV-58-63. O great sage, of the three kinds of ether (space) namely the mental, spiritual and gross, know the spiritual one to be (emptier) subtler than the other two. When the perception passes from one place to another, the interval is to be known as the spiritual region in a moment when you reach the stage where all ideations are rejected, then surely you will reach the state of All Quiet.
यह जगत् उत्पन्न होता है मरने (विनष्ट होने) के लिए, पुनः मरता है जन्मने के लिए। समस्त चराचर प्राणियों की चेष्टा के साथ यह सारा प्रपञ्च (जगत्) अस्थिर एवं क्षणिक है । ऐश्वर्य की भूमि में प्रकट होने वाले ये समस्त पदार्थ आपत्तियों के मूलभूत कारण हैं। ये सभी पदार्थ लौह शलाका के सदृश परस्पर पृथक् रहते हुए मानसिक कल्पना रूपी चुम्बक द्वारा एकत्रित होते रहते हैं जिस तरह मार्ग में गमन करने वाला व्यक्ति मरुस्थल में चलते-चलते (कष्ट के कारण) विरक्त हो जाता है, उसी तरह मैं भी इन सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो रहा हूँ: क्योंकि ये सांसारिक भोग-पदार्थ मुझे दुःखदायी प्रतीत होने लगे हैं। अब इन समस्त दु:खों का शमन किस प्रकार होगा, ऐसा सोचकर मेरा हृदय अत्यधिक संतप्त हो रहा है। ये ऐश्वर्य रूपी धन-जिनके पीछे चिन्ताओं के समूह चक्र की भाँति घूमते रहते हैं, मुझे आनन्दप्रद नहीं लग रहे हैं। स्त्री-पुत्रादि समस्त स्वजन सम्बन्धी मानो उग्र आपदाओं के घर हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् में उदारता को प्रतिमूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी ये श्रीलक्ष्मी जी भी परम मोह को उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही इनके द्वारा जीव को आनन्द नहीं मिल सकता। जिस प्रकार पल्लव के अग्रभाग में जल कनिका बुँदरूप में लटकती हैं. वह क्षणिक है। उसी प्रकार मनुष्य की आयु भी जल की बूंद के सदृश क्षणभंगुर है। इस नाशवान् शरीर को असमय ही छोड़कर उन्मत्त की भाँति मुझे प्रस्थान करना ही पड़ेगा। जिनका चित्त विषय-वासना रूपी सर्प के सङ्ग से जर्जर हो गया है तथा जिन्हें प्रौढ़ आत्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है, उनका जीवन कष्ट का ही हेतु बना है॥
Verse ८
इयमस्मिन् स्थितोदारा संसारे परिपेलवा। श्रीर्मुने परिमोहाय सापि नूनं न शर्मदा ॥
iyamasmin sthitodārā saṃsāre paripelavā। śrīrmune parimohāya sāpi nūnaṃ na śarmadā ॥
That condition (state) is Samadhi which excludes bliss and contains the essence of detachment of Nobility and Beauty - when joy arises strongly by the realization of the falseness of the visible world and like and dislike thin away.
यह जगत् उत्पन्न होता है मरने (विनष्ट होने) के लिए, पुनः मरता है जन्मने के लिए। समस्त चराचर प्राणियों की चेष्टा के साथ यह सारा प्रपञ्च (जगत्) अस्थिर एवं क्षणिक है । ऐश्वर्य की भूमि में प्रकट होने वाले ये समस्त पदार्थ आपत्तियों के मूलभूत कारण हैं। ये सभी पदार्थ लौह शलाका के सदृश परस्पर पृथक् रहते हुए मानसिक कल्पना रूपी चुम्बक द्वारा एकत्रित होते रहते हैं जिस तरह मार्ग में गमन करने वाला व्यक्ति मरुस्थल में चलते-चलते (कष्ट के कारण) विरक्त हो जाता है, उसी तरह मैं भी इन सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो रहा हूँ: क्योंकि ये सांसारिक भोग-पदार्थ मुझे दुःखदायी प्रतीत होने लगे हैं। अब इन समस्त दु:खों का शमन किस प्रकार होगा, ऐसा सोचकर मेरा हृदय अत्यधिक संतप्त हो रहा है। ये ऐश्वर्य रूपी धन-जिनके पीछे चिन्ताओं के समूह चक्र की भाँति घूमते रहते हैं, मुझे आनन्दप्रद नहीं लग रहे हैं। स्त्री-पुत्रादि समस्त स्वजन सम्बन्धी मानो उग्र आपदाओं के घर हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् में उदारता को प्रतिमूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी ये श्रीलक्ष्मी जी भी परम मोह को उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही इनके द्वारा जीव को आनन्द नहीं मिल सकता। जिस प्रकार पल्लव के अग्रभाग में जल कनिका बुँदरूप में लटकती हैं. वह क्षणिक है। उसी प्रकार मनुष्य की आयु भी जल की बूंद के सदृश क्षणभंगुर है। इस नाशवान् शरीर को असमय ही छोड़कर उन्मत्त की भाँति मुझे प्रस्थान करना ही पड़ेगा। जिनका चित्त विषय-वासना रूपी सर्प के सङ्ग से जर्जर हो गया है तथा जिन्हें प्रौढ़ आत्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है, उनका जीवन कष्ट का ही हेतु बना है॥
Verse ९
आयुःपल्लवकोणाग्रलम्बाम्बुकणभङ्गुरम्।उन्मत्त इव संत्यज्य याम्यकाण्डे शरीरकम् ॥
āyuḥpallavakoṇāgralambāmbukaṇabhaṅguram।unmatta iva saṃtyajya yāmyakāṇḍe śarīrakam ॥
This realization is indeed the knowledge and its object, spiritual in nature - only that is the sole state - all else is false.
यह जगत् उत्पन्न होता है मरने (विनष्ट होने) के लिए, पुनः मरता है जन्मने के लिए। समस्त चराचर प्राणियों की चेष्टा के साथ यह सारा प्रपञ्च (जगत्) अस्थिर एवं क्षणिक है । ऐश्वर्य की भूमि में प्रकट होने वाले ये समस्त पदार्थ आपत्तियों के मूलभूत कारण हैं। ये सभी पदार्थ लौह शलाका के सदृश परस्पर पृथक् रहते हुए मानसिक कल्पना रूपी चुम्बक द्वारा एकत्रित होते रहते हैं जिस तरह मार्ग में गमन करने वाला व्यक्ति मरुस्थल में चलते-चलते (कष्ट के कारण) विरक्त हो जाता है, उसी तरह मैं भी इन सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो रहा हूँ: क्योंकि ये सांसारिक भोग-पदार्थ मुझे दुःखदायी प्रतीत होने लगे हैं। अब इन समस्त दु:खों का शमन किस प्रकार होगा, ऐसा सोचकर मेरा हृदय अत्यधिक संतप्त हो रहा है। ये ऐश्वर्य रूपी धन-जिनके पीछे चिन्ताओं के समूह चक्र की भाँति घूमते रहते हैं, मुझे आनन्दप्रद नहीं लग रहे हैं। स्त्री-पुत्रादि समस्त स्वजन सम्बन्धी मानो उग्र आपदाओं के घर हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् में उदारता को प्रतिमूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी ये श्रीलक्ष्मी जी भी परम मोह को उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही इनके द्वारा जीव को आनन्द नहीं मिल सकता। जिस प्रकार पल्लव के अग्रभाग में जल कनिका बुँदरूप में लटकती हैं. वह क्षणिक है। उसी प्रकार मनुष्य की आयु भी जल की बूंद के सदृश क्षणभंगुर है। इस नाशवान् शरीर को असमय ही छोड़कर उन्मत्त की भाँति मुझे प्रस्थान करना ही पड़ेगा। जिनका चित्त विषय-वासना रूपी सर्प के सङ्ग से जर्जर हो गया है तथा जिन्हें प्रौढ़ आत्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है, उनका जीवन कष्ट का ही हेतु बना है॥
Verse १०
विषयाशीविषासङ्गपरिजर्जरचेतसाम्। अप्रौढात्मविवेकानामायुरायास-कारणम्॥
viṣayāśīviṣāsaṅgaparijarjaracetasām। aprauḍhātmavivekānāmāyurāyāsa-kāraṇam॥
IV-64-69. Nidagha, know the world to be an illusion, Airavata in rut is confined to a corner of a mustard, a mosquito fights with groups of lions inside an atom, Meru put inside a lotus is pat out by a bee.
यह जगत् उत्पन्न होता है मरने (विनष्ट होने) के लिए, पुनः मरता है जन्मने के लिए। समस्त चराचर प्राणियों की चेष्टा के साथ यह सारा प्रपञ्च (जगत्) अस्थिर एवं क्षणिक है । ऐश्वर्य की भूमि में प्रकट होने वाले ये समस्त पदार्थ आपत्तियों के मूलभूत कारण हैं। ये सभी पदार्थ लौह शलाका के सदृश परस्पर पृथक् रहते हुए मानसिक कल्पना रूपी चुम्बक द्वारा एकत्रित होते रहते हैं जिस तरह मार्ग में गमन करने वाला व्यक्ति मरुस्थल में चलते-चलते (कष्ट के कारण) विरक्त हो जाता है, उसी तरह मैं भी इन सांसारिक पदार्थों से विरक्त हो रहा हूँ: क्योंकि ये सांसारिक भोग-पदार्थ मुझे दुःखदायी प्रतीत होने लगे हैं। अब इन समस्त दु:खों का शमन किस प्रकार होगा, ऐसा सोचकर मेरा हृदय अत्यधिक संतप्त हो रहा है। ये ऐश्वर्य रूपी धन-जिनके पीछे चिन्ताओं के समूह चक्र की भाँति घूमते रहते हैं, मुझे आनन्दप्रद नहीं लग रहे हैं। स्त्री-पुत्रादि समस्त स्वजन सम्बन्धी मानो उग्र आपदाओं के घर हैं। हे मुनीश्वर ! इस जगत् में उदारता को प्रतिमूर्ति, अत्यन्त कोमलांगी ये श्रीलक्ष्मी जी भी परम मोह को उत्पन्न करने वाली हैं। निश्चय ही इनके द्वारा जीव को आनन्द नहीं मिल सकता। जिस प्रकार पल्लव के अग्रभाग में जल कनिका बुँदरूप में लटकती हैं. वह क्षणिक है। उसी प्रकार मनुष्य की आयु भी जल की बूंद के सदृश क्षणभंगुर है। इस नाशवान् शरीर को असमय ही छोड़कर उन्मत्त की भाँति मुझे प्रस्थान करना ही पड़ेगा। जिनका चित्त विषय-वासना रूपी सर्प के सङ्ग से जर्जर हो गया है तथा जिन्हें प्रौढ़ आत्मिक ज्ञान नहीं प्राप्त हुआ है, उनका जीवन कष्ट का ही हेतु बना है॥
Verse ११
युज्यते वेष्टनं वायोराकाशस्य च खण्डनम् । ग्रन्थनं च तरङ्गाणामास्था नायुषियुज्यते ॥
yujyate veṣṭanaṃ vāyorākāśasya ca khaṇḍanam । granthanaṃ ca taraṅgāṇāmāsthā nāyuṣiyujyate ॥
Only the mind made impure by involvement etc., is worldly life. The same mind is said to be the end of (worldly) existence when freed from them. An embodied being attained that condition being brooded over by the mind - freed from bodily tendencies, it (he) is not smeared (affected) by the body's attributes.
वायु का लपेटना, आकाश को खण्ड-खण्ड करना एवं जल की लहरों का गुन्धन भले ही सम्भव हो जाए, किन्तु जीवन में आस्था एवं विश्वास रखना सम्भव नहीं हो पाता। जिसके द्वारा प्राप्त करने योग्य वस्तु को (सम्यक् रूप से) प्राप्त कर लिया जाता है, जिसके कारण शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति की उपलब्धि हो जाए, वही तो वास्तविक जीवन कहलाता है। यों तो वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी जीवन धारण किये रहते हैं; किन्तु यथार्थ में वही जीवित है, जिसका मन निरन्तर आत्मचिन्तन में लीन रहता है। इस नश्वर जगत् में उत्पन्न हुए उन्हीं प्राणियों का जीवन उत्कृष्ट है, जिन्हें पुनः आवागमन के चक्र में नहीं पड़ना पड़ता है। इससे भिन्न तो जरावस्था को प्राप्त गधे के सदृश हैं, जो कि अशक्त होते हुए भी भार ढोने के लिए विवश हैं । ज्ञानवान् मनुष्य के लिए शास्त्र, भार होने के सदृश है। राग-द्वेष में लिप्त मनुष्य के लिए ज्ञान भारस्वरूप है, अशान्त मनुष्य का मन तो स्वयं में ही भारस्वरूप होता है तथा जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, उनके लिए यह शरीर भी बोझा ढोने के सदृश ही है ॥
Verse १२
प्राप्यं संप्राप्यते येन भूयो येन न शोच्यते।पराया निर्वृतेः स्थानं यत्तज्जीवितमुच्यते ॥
prāpyaṃ saṃprāpyate yena bhūyo yena na śocyate।parāyā nirvṛteḥ sthānaṃ yattajjīvitamucyate ॥
I am that (the mind) which turns an aeon into a moment and vice versa. One cannot attain (realize) (truth) without desisting from bad conduct, without calmness and concentration but only through Enlightenment
वायु का लपेटना, आकाश को खण्ड-खण्ड करना एवं जल की लहरों का गुन्धन भले ही सम्भव हो जाए, किन्तु जीवन में आस्था एवं विश्वास रखना सम्भव नहीं हो पाता। जिसके द्वारा प्राप्त करने योग्य वस्तु को (सम्यक् रूप से) प्राप्त कर लिया जाता है, जिसके कारण शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति की उपलब्धि हो जाए, वही तो वास्तविक जीवन कहलाता है। यों तो वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी जीवन धारण किये रहते हैं; किन्तु यथार्थ में वही जीवित है, जिसका मन निरन्तर आत्मचिन्तन में लीन रहता है। इस नश्वर जगत् में उत्पन्न हुए उन्हीं प्राणियों का जीवन उत्कृष्ट है, जिन्हें पुनः आवागमन के चक्र में नहीं पड़ना पड़ता है। इससे भिन्न तो जरावस्था को प्राप्त गधे के सदृश हैं, जो कि अशक्त होते हुए भी भार ढोने के लिए विवश हैं । ज्ञानवान् मनुष्य के लिए शास्त्र, भार होने के सदृश है। राग-द्वेष में लिप्त मनुष्य के लिए ज्ञान भारस्वरूप है, अशान्त मनुष्य का मन तो स्वयं में ही भारस्वरूप होता है तथा जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, उनके लिए यह शरीर भी बोझा ढोने के सदृश ही है ॥
Verse १३
तरवोऽपि हि जीवन्ति जीवन्ति मृगपक्षिणः ।स जीवति मनो यस्य मननेनोपजीवति ॥
taravo'pi hi jīvanti jīvanti mṛgapakṣiṇaḥ ।sa jīvati mano yasya mananenopajīvati ॥
V-70-72. One fears never (and from nothing) on knowing the nature of the self as Bliss unequalled, attributeless and one mass of truth and consciousness. That is beyond all that is beyond, greater than the greatest, lustrous and eternal in nature, wise, ancient Being, worshipped by all gods. As a rule 'I (am) Brahman' these two words are for the liberation of the great. Whereas 'Not Mine' and 'Mine' give liberation and bondage (respectively).
वायु का लपेटना, आकाश को खण्ड-खण्ड करना एवं जल की लहरों का गुन्धन भले ही सम्भव हो जाए, किन्तु जीवन में आस्था एवं विश्वास रखना सम्भव नहीं हो पाता। जिसके द्वारा प्राप्त करने योग्य वस्तु को (सम्यक् रूप से) प्राप्त कर लिया जाता है, जिसके कारण शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति की उपलब्धि हो जाए, वही तो वास्तविक जीवन कहलाता है। यों तो वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी जीवन धारण किये रहते हैं; किन्तु यथार्थ में वही जीवित है, जिसका मन निरन्तर आत्मचिन्तन में लीन रहता है। इस नश्वर जगत् में उत्पन्न हुए उन्हीं प्राणियों का जीवन उत्कृष्ट है, जिन्हें पुनः आवागमन के चक्र में नहीं पड़ना पड़ता है। इससे भिन्न तो जरावस्था को प्राप्त गधे के सदृश हैं, जो कि अशक्त होते हुए भी भार ढोने के लिए विवश हैं । ज्ञानवान् मनुष्य के लिए शास्त्र, भार होने के सदृश है। राग-द्वेष में लिप्त मनुष्य के लिए ज्ञान भारस्वरूप है, अशान्त मनुष्य का मन तो स्वयं में ही भारस्वरूप होता है तथा जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, उनके लिए यह शरीर भी बोझा ढोने के सदृश ही है ॥
Verse १४
जातास्त एवं जगति जन्तवः साधुजीविताः ।ये पुनर्नेह जायन्ते शेषा जरठगर्दभाः ।।
jātāsta evaṃ jagati jantavaḥ sādhujīvitāḥ ।ye punarneha jāyante śeṣā jaraṭhagardabhāḥ ।।
V-70-72. One fears never (and from nothing) on knowing the nature of the self as Bliss unequalled, attributeless and one mass of truth and consciousness. That is beyond all that is beyond, greater than the greatest, lustrous and eternal in nature, wise, ancient Being, worshipped by all gods. As a rule 'I (am) Brahman' these two words are for the liberation of the great. Whereas 'Not Mine' and 'Mine' give liberation and bondage (respectively).
वायु का लपेटना, आकाश को खण्ड-खण्ड करना एवं जल की लहरों का गुन्धन भले ही सम्भव हो जाए, किन्तु जीवन में आस्था एवं विश्वास रखना सम्भव नहीं हो पाता। जिसके द्वारा प्राप्त करने योग्य वस्तु को (सम्यक् रूप से) प्राप्त कर लिया जाता है, जिसके कारण शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति की उपलब्धि हो जाए, वही तो वास्तविक जीवन कहलाता है। यों तो वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी जीवन धारण किये रहते हैं; किन्तु यथार्थ में वही जीवित है, जिसका मन निरन्तर आत्मचिन्तन में लीन रहता है। इस नश्वर जगत् में उत्पन्न हुए उन्हीं प्राणियों का जीवन उत्कृष्ट है, जिन्हें पुनः आवागमन के चक्र में नहीं पड़ना पड़ता है। इससे भिन्न तो जरावस्था को प्राप्त गधे के सदृश हैं, जो कि अशक्त होते हुए भी भार ढोने के लिए विवश हैं । ज्ञानवान् मनुष्य के लिए शास्त्र, भार होने के सदृश है। राग-द्वेष में लिप्त मनुष्य के लिए ज्ञान भारस्वरूप है, अशान्त मनुष्य का मन तो स्वयं में ही भारस्वरूप होता है तथा जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, उनके लिए यह शरीर भी बोझा ढोने के सदृश ही है ॥
Verse १५
भारो विवेकिनः शास्त्रं भारो ज्ञानं च रागिणः । अशान्तस्य मनो भारो भारोऽनात्मविदो वपुः ।।
bhāro vivekinaḥ śāstraṃ bhāro jñānaṃ ca rāgiṇaḥ । aśāntasya mano bhāro bhāro'nātmavido vapuḥ ।।
V-73-75. The creation (of the world) is assumed (projected) by God starting from the vision and ending with Entry (from Generation to Dissolution) in the form of Jiva, Ishvara etc. The nature of the animate and the inanimate worldly life from waking to liberation is projected by Jiva.
वायु का लपेटना, आकाश को खण्ड-खण्ड करना एवं जल की लहरों का गुन्धन भले ही सम्भव हो जाए, किन्तु जीवन में आस्था एवं विश्वास रखना सम्भव नहीं हो पाता। जिसके द्वारा प्राप्त करने योग्य वस्तु को (सम्यक् रूप से) प्राप्त कर लिया जाता है, जिसके कारण शोक न करना पड़े और जिसमें परम शान्ति की उपलब्धि हो जाए, वही तो वास्तविक जीवन कहलाता है। यों तो वृक्ष, मृग एवं पक्षी भी जीवन धारण किये रहते हैं; किन्तु यथार्थ में वही जीवित है, जिसका मन निरन्तर आत्मचिन्तन में लीन रहता है। इस नश्वर जगत् में उत्पन्न हुए उन्हीं प्राणियों का जीवन उत्कृष्ट है, जिन्हें पुनः आवागमन के चक्र में नहीं पड़ना पड़ता है। इससे भिन्न तो जरावस्था को प्राप्त गधे के सदृश हैं, जो कि अशक्त होते हुए भी भार ढोने के लिए विवश हैं । ज्ञानवान् मनुष्य के लिए शास्त्र, भार होने के सदृश है। राग-द्वेष में लिप्त मनुष्य के लिए ज्ञान भारस्वरूप है, अशान्त मनुष्य का मन तो स्वयं में ही भारस्वरूप होता है तथा जो आत्मज्ञानी नहीं हैं, उनके लिए यह शरीर भी बोझा ढोने के सदृश ही है ॥
Verse १६
अहंकारवशादापदहंकाराद्दुराधयः । अहंकारवशादीहा नाहंकारात्परो रिपुः ॥
ahaṃkāravaśādāpadahaṃkārāddurādhayaḥ । ahaṃkāravaśādīhā nāhaṃkārātparo ripuḥ ॥
V-73-75. The creation (of the world) is assumed (projected) by God starting from the vision and ending with Entry (from Generation to Dissolution) in the form of Jiva, Ishvara etc. The nature of the animate and the inanimate worldly life from waking to liberation is projected by Jiva.
अहंकार ही समस्त विपत्तियों के आगमन का हेतु है। इसी से मनोविकार उत्पन्न होते हैं और तरह-तरह की इच्छा-आकांक्षाओं का प्रादुर्भाव होता है। इस कारण मनुष्य का अहंकार से बढ़कर और कोई भी शत्रु नहीं है। अंहकार के वशीभूत होकर मैंने चराचर रूप जिन-जिन भोगों का उपभोग किया है, वे सभी मिथ्या, भ्रमरूप थे। अहंकार का शून्य होना ही जीवन की यथार्थता है । वस्तु तो मात्र अहंकार शून्यता ही है। यह मन व्यर्थ ही परेशान होकर यत्र-तत्र दौड़ता रहता है। व्यर्थ ही दूर-दूर तक भ्रमण करता रहता है। इसका स्वभाव गाँव में इधर-उधर घूमने वाले कुत्ते की तरह है। मैं भी तृष्णारूपी कुतिया के पीछे-पीछे कुत्ते की भाँति भटकता हुआ इस प्रकार क्रूर मन के वशीभूत होकर जड़वत् हो गया था। हे ब्रह्मन् ! अब मैं उसके प्रभाव से पूर्णरूपेण मुक्त हो गया हूँ। हे ब्रह्मन्! चित्त को नियंत्रित करना, समुद्र को पूरी तरह पीने से भी कठिन है, सुमेरु पर्वत को उखाड़ फेंकने से भी कठिन है और अग्नि के भक्षण से भी कठिन है। यह चित्त बाह्य एवं अन्त:करण में विषय भोगों को ग्रहण करने वाला है, उसके आधार पर ही जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं से युक्त संसार की स्थिति निर्भर है। चित्त के नष्ट होने पर यह जगत् नष्ट हो जाता है। अतः प्रयासपूर्वक चित्त की ही चिकित्सा करनी चाहिए ॥
Verse १७
अहंकारवशाद्यद्यन्मया भुक्तं चराचरम् । तत्तत्सर्वमवस्त्वेव वस्त्वहंकाररिक्तता ॥
ahaṃkāravaśādyadyanmayā bhuktaṃ carācaram । tattatsarvamavastveva vastvahaṃkārariktatā ॥
Schools from the Trinachiketa to the Yoga depend on Ishvara's illusion (on the still lower level); from the Lokayata to Sankhya the schools depend on Jiva's illusion. Hence, the aspirants to liberation should not consider these schools (being illusory) but the (essential) truth about Brahman is to be considered with steadiness.
अहंकार ही समस्त विपत्तियों के आगमन का हेतु है। इसी से मनोविकार उत्पन्न होते हैं और तरह-तरह की इच्छा-आकांक्षाओं का प्रादुर्भाव होता है। इस कारण मनुष्य का अहंकार से बढ़कर और कोई भी शत्रु नहीं है। अंहकार के वशीभूत होकर मैंने चराचर रूप जिन-जिन भोगों का उपभोग किया है, वे सभी मिथ्या, भ्रमरूप थे। अहंकार का शून्य होना ही जीवन की यथार्थता है । वस्तु तो मात्र अहंकार शून्यता ही है। यह मन व्यर्थ ही परेशान होकर यत्र-तत्र दौड़ता रहता है। व्यर्थ ही दूर-दूर तक भ्रमण करता रहता है। इसका स्वभाव गाँव में इधर-उधर घूमने वाले कुत्ते की तरह है। मैं भी तृष्णारूपी कुतिया के पीछे-पीछे कुत्ते की भाँति भटकता हुआ इस प्रकार क्रूर मन के वशीभूत होकर जड़वत् हो गया था। हे ब्रह्मन् ! अब मैं उसके प्रभाव से पूर्णरूपेण मुक्त हो गया हूँ। हे ब्रह्मन्! चित्त को नियंत्रित करना, समुद्र को पूरी तरह पीने से भी कठिन है, सुमेरु पर्वत को उखाड़ फेंकने से भी कठिन है और अग्नि के भक्षण से भी कठिन है। यह चित्त बाह्य एवं अन्त:करण में विषय भोगों को ग्रहण करने वाला है, उसके आधार पर ही जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं से युक्त संसार की स्थिति निर्भर है। चित्त के नष्ट होने पर यह जगत् नष्ट हो जाता है। अतः प्रयासपूर्वक चित्त की ही चिकित्सा करनी चाहिए ॥
Verse १८
इतश्चेतश्च सुव्यग्रं व्यर्थमेवाभिधावति ।मनो दूरतरं याति ग्रामे कौलेयको यथा ।।
itaścetaśca suvyagraṃ vyarthamevābhidhāvati ।mano dūrataraṃ yāti grāme kauleyako yathā ।।
V-76-82. Only one who looks upon everything in relation to consciousness is the knower proper, Shiva, Vishnu and Brahma. Without a good preceptor's grace it is hard to give up objects, to see truth and (to realize) the pristine state. The pristine state is naturally realized by a Yogin who has power generated in him and has given up all (worldly) activity.
अहंकार ही समस्त विपत्तियों के आगमन का हेतु है। इसी से मनोविकार उत्पन्न होते हैं और तरह-तरह की इच्छा-आकांक्षाओं का प्रादुर्भाव होता है। इस कारण मनुष्य का अहंकार से बढ़कर और कोई भी शत्रु नहीं है। अंहकार के वशीभूत होकर मैंने चराचर रूप जिन-जिन भोगों का उपभोग किया है, वे सभी मिथ्या, भ्रमरूप थे। अहंकार का शून्य होना ही जीवन की यथार्थता है । वस्तु तो मात्र अहंकार शून्यता ही है। यह मन व्यर्थ ही परेशान होकर यत्र-तत्र दौड़ता रहता है। व्यर्थ ही दूर-दूर तक भ्रमण करता रहता है। इसका स्वभाव गाँव में इधर-उधर घूमने वाले कुत्ते की तरह है। मैं भी तृष्णारूपी कुतिया के पीछे-पीछे कुत्ते की भाँति भटकता हुआ इस प्रकार क्रूर मन के वशीभूत होकर जड़वत् हो गया था। हे ब्रह्मन् ! अब मैं उसके प्रभाव से पूर्णरूपेण मुक्त हो गया हूँ। हे ब्रह्मन्! चित्त को नियंत्रित करना, समुद्र को पूरी तरह पीने से भी कठिन है, सुमेरु पर्वत को उखाड़ फेंकने से भी कठिन है और अग्नि के भक्षण से भी कठिन है। यह चित्त बाह्य एवं अन्त:करण में विषय भोगों को ग्रहण करने वाला है, उसके आधार पर ही जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं से युक्त संसार की स्थिति निर्भर है। चित्त के नष्ट होने पर यह जगत् नष्ट हो जाता है। अतः प्रयासपूर्वक चित्त की ही चिकित्सा करनी चाहिए ॥
Verse १९
क्रूरेण जडतां याता तृष्णाभार्यानुगामिना ।वशः कौलेयकेनैव ब्रह्मन्मुक्तोऽस्मि चेतसा ॥
krūreṇa jaḍatāṃ yātā tṛṣṇābhāryānugāminā ।vaśaḥ kauleyakenaiva brahmanmukto'smi cetasā ॥
When a man perceives even a little difference (between these) then, there will be fear for him, doubtless. A person with wisdom as the eye sees the supreme as present everywhere - one without wisdom does not, like a blind man, the sun.
अहंकार ही समस्त विपत्तियों के आगमन का हेतु है। इसी से मनोविकार उत्पन्न होते हैं और तरह-तरह की इच्छा-आकांक्षाओं का प्रादुर्भाव होता है। इस कारण मनुष्य का अहंकार से बढ़कर और कोई भी शत्रु नहीं है। अंहकार के वशीभूत होकर मैंने चराचर रूप जिन-जिन भोगों का उपभोग किया है, वे सभी मिथ्या, भ्रमरूप थे। अहंकार का शून्य होना ही जीवन की यथार्थता है । वस्तु तो मात्र अहंकार शून्यता ही है। यह मन व्यर्थ ही परेशान होकर यत्र-तत्र दौड़ता रहता है। व्यर्थ ही दूर-दूर तक भ्रमण करता रहता है। इसका स्वभाव गाँव में इधर-उधर घूमने वाले कुत्ते की तरह है। मैं भी तृष्णारूपी कुतिया के पीछे-पीछे कुत्ते की भाँति भटकता हुआ इस प्रकार क्रूर मन के वशीभूत होकर जड़वत् हो गया था। हे ब्रह्मन् ! अब मैं उसके प्रभाव से पूर्णरूपेण मुक्त हो गया हूँ। हे ब्रह्मन्! चित्त को नियंत्रित करना, समुद्र को पूरी तरह पीने से भी कठिन है, सुमेरु पर्वत को उखाड़ फेंकने से भी कठिन है और अग्नि के भक्षण से भी कठिन है। यह चित्त बाह्य एवं अन्त:करण में विषय भोगों को ग्रहण करने वाला है, उसके आधार पर ही जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं से युक्त संसार की स्थिति निर्भर है। चित्त के नष्ट होने पर यह जगत् नष्ट हो जाता है। अतः प्रयासपूर्वक चित्त की ही चिकित्सा करनी चाहिए ॥
Verse २०
अप्यब्धिपानान्महतः सुमेरून्मूलनादपि ।अपि वह्नयशनाद्ब्रह्मन्विषमश्चित्तनिग्रहः ॥
apyabdhipānānmahataḥ sumerūnmūlanādapi ।api vahnayaśanādbrahmanviṣamaścittanigrahaḥ ॥
The supreme being is knowledge alone - so a mortal becomes immortal only by vision of Brahman. When the Great beyond is seen, the knot of the heart snaps, all doubts are smashed and all (worldly) actions die away.
अहंकार ही समस्त विपत्तियों के आगमन का हेतु है। इसी से मनोविकार उत्पन्न होते हैं और तरह-तरह की इच्छा-आकांक्षाओं का प्रादुर्भाव होता है। इस कारण मनुष्य का अहंकार से बढ़कर और कोई भी शत्रु नहीं है। अंहकार के वशीभूत होकर मैंने चराचर रूप जिन-जिन भोगों का उपभोग किया है, वे सभी मिथ्या, भ्रमरूप थे। अहंकार का शून्य होना ही जीवन की यथार्थता है । वस्तु तो मात्र अहंकार शून्यता ही है। यह मन व्यर्थ ही परेशान होकर यत्र-तत्र दौड़ता रहता है। व्यर्थ ही दूर-दूर तक भ्रमण करता रहता है। इसका स्वभाव गाँव में इधर-उधर घूमने वाले कुत्ते की तरह है। मैं भी तृष्णारूपी कुतिया के पीछे-पीछे कुत्ते की भाँति भटकता हुआ इस प्रकार क्रूर मन के वशीभूत होकर जड़वत् हो गया था। हे ब्रह्मन् ! अब मैं उसके प्रभाव से पूर्णरूपेण मुक्त हो गया हूँ। हे ब्रह्मन्! चित्त को नियंत्रित करना, समुद्र को पूरी तरह पीने से भी कठिन है, सुमेरु पर्वत को उखाड़ फेंकने से भी कठिन है और अग्नि के भक्षण से भी कठिन है। यह चित्त बाह्य एवं अन्त:करण में विषय भोगों को ग्रहण करने वाला है, उसके आधार पर ही जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं से युक्त संसार की स्थिति निर्भर है। चित्त के नष्ट होने पर यह जगत् नष्ट हो जाता है। अतः प्रयासपूर्वक चित्त की ही चिकित्सा करनी चाहिए ॥
Verse २१
चित्तं कारणमर्थानां तस्मिन्सति जगत्त्रयम्। तस्मिन्क्षीणे जगत्क्षीणं तच्चिकित्स्यं प्रयत्नतः ।।
cittaṃ kāraṇamarthānāṃ tasminsati jagattrayam। tasminkṣīṇe jagatkṣīṇaṃ taccikitsyaṃ prayatnataḥ ।।
IV-83-87. Be devoted to Samvid, with single attention, giving up the non-spiritual attitude and unaffected by the condition of the world. In a desert all the water (in mirages) is an illusion - only the desert is real; (similarly) on reflection all the three worlds are nothing more than chit.
अहंकार ही समस्त विपत्तियों के आगमन का हेतु है। इसी से मनोविकार उत्पन्न होते हैं और तरह-तरह की इच्छा-आकांक्षाओं का प्रादुर्भाव होता है। इस कारण मनुष्य का अहंकार से बढ़कर और कोई भी शत्रु नहीं है। अंहकार के वशीभूत होकर मैंने चराचर रूप जिन-जिन भोगों का उपभोग किया है, वे सभी मिथ्या, भ्रमरूप थे। अहंकार का शून्य होना ही जीवन की यथार्थता है । वस्तु तो मात्र अहंकार शून्यता ही है। यह मन व्यर्थ ही परेशान होकर यत्र-तत्र दौड़ता रहता है। व्यर्थ ही दूर-दूर तक भ्रमण करता रहता है। इसका स्वभाव गाँव में इधर-उधर घूमने वाले कुत्ते की तरह है। मैं भी तृष्णारूपी कुतिया के पीछे-पीछे कुत्ते की भाँति भटकता हुआ इस प्रकार क्रूर मन के वशीभूत होकर जड़वत् हो गया था। हे ब्रह्मन् ! अब मैं उसके प्रभाव से पूर्णरूपेण मुक्त हो गया हूँ। हे ब्रह्मन्! चित्त को नियंत्रित करना, समुद्र को पूरी तरह पीने से भी कठिन है, सुमेरु पर्वत को उखाड़ फेंकने से भी कठिन है और अग्नि के भक्षण से भी कठिन है। यह चित्त बाह्य एवं अन्त:करण में विषय भोगों को ग्रहण करने वाला है, उसके आधार पर ही जाग्रत्, स्वप्न एवं सुषुप्ति रूप तीनों अवस्थाओं से युक्त संसार की स्थिति निर्भर है। चित्त के नष्ट होने पर यह जगत् नष्ट हो जाता है। अतः प्रयासपूर्वक चित्त की ही चिकित्सा करनी चाहिए ॥
तृतीयोऽध्यायः (part 2)
Verse २२
यां यामहं मुनिश्रेष्ठ संश्रयामि गुणश्रियम् ।तां तां कृन्तति मे तृष्णा तन्त्रीमिव कुमूषिका ॥
yāṃ yāmahaṃ muniśreṣṭha saṃśrayāmi guṇaśriyam ।tāṃ tāṃ kṛntati me tṛṣṇā tantrīmiva kumūṣikā ॥
IV-83-87. Be devoted to Samvid, with single attention, giving up the non-spiritual attitude and unaffected by the condition of the world. In a desert all the water (in mirages) is an illusion - only the desert is real; (similarly) on reflection all the three worlds are nothing more than chit.
हे श्रेष्ठ मुने! मैं जिन श्रेष्ठ सद्गुणों का आश्रय प्राप्त करता हूँ, मेरी तृष्णा उन श्रेष्ठ गुणों को ठीक वैसे ही काट देती है, जैसे कि दुष्ट मूषिका (चुहिया) वीणा के तारों को काट देती है। यह तृष्णा चञ्चल बँदरिया के समान है, जो न लाँघने योग्य स्थान पर भी अपना पैर टिकाना चाहती है। वह तृप्त होने पर भी भिन्न-भिन्न फलों की इच्छा करती रहती है। एक जगह पर लम्बे समय तक नहीं रुकती। क्षणमात्र में ही वह आकाश एवं पाताल की सैर कर डालती है, क्षण मात्र में ही दिशारूपी कुञ्जों में भ्रमण करने लगती है। यह तृष्णा हृदय कमल में विचरण करने वाली भ्रमरी के समान है। यह तृष्णा ही इस नश्वर जगत् के समस्त दुःखों में दीर्घ काल तक दु:ख देने वाली है, जो अन्त:पुर में निवास करने वालों को भी महान् संकट में डाल देती है। यह तृष्णा एक महामारी-हैजा है। इसे वही श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट कर सकता है, जिसने चिन्ता का पूरी तरह से परित्याग कर दिया है। यदि चिन्ता का थोड़ा भी परित्याग कर दिया जाए, तो अत्यधिक आनन्द की प्राप्ति होती है। यदि थोड़ी-सी भी चिन्ता मन में शेष रही, तो उससे असीम दु:ख की प्राप्ति होती है ॥
Verse २३
पदं करोत्यलङ् घ्येऽपि तृप्ता विफलमीहते ।चिरं तिष्ठति नैकत्र तृष्णा चपलमर्कटी ॥
padaṃ karotyalaṅ ghye'pi tṛptā viphalamīhate ।ciraṃ tiṣṭhati naikatra tṛṣṇā capalamarkaṭī ॥
IV-83-87. Be devoted to Samvid, with single attention, giving up the non-spiritual attitude and unaffected by the condition of the world. In a desert all the water (in mirages) is an illusion - only the desert is real; (similarly) on reflection all the three worlds are nothing more than chit.
हे श्रेष्ठ मुने! मैं जिन श्रेष्ठ सद्गुणों का आश्रय प्राप्त करता हूँ, मेरी तृष्णा उन श्रेष्ठ गुणों को ठीक वैसे ही काट देती है, जैसे कि दुष्ट मूषिका (चुहिया) वीणा के तारों को काट देती है। यह तृष्णा चञ्चल बँदरिया के समान है, जो न लाँघने योग्य स्थान पर भी अपना पैर टिकाना चाहती है। वह तृप्त होने पर भी भिन्न-भिन्न फलों की इच्छा करती रहती है। एक जगह पर लम्बे समय तक नहीं रुकती। क्षणमात्र में ही वह आकाश एवं पाताल की सैर कर डालती है, क्षण मात्र में ही दिशारूपी कुञ्जों में भ्रमण करने लगती है। यह तृष्णा हृदय कमल में विचरण करने वाली भ्रमरी के समान है। यह तृष्णा ही इस नश्वर जगत् के समस्त दुःखों में दीर्घ काल तक दु:ख देने वाली है, जो अन्त:पुर में निवास करने वालों को भी महान् संकट में डाल देती है। यह तृष्णा एक महामारी-हैजा है। इसे वही श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट कर सकता है, जिसने चिन्ता का पूरी तरह से परित्याग कर दिया है। यदि चिन्ता का थोड़ा भी परित्याग कर दिया जाए, तो अत्यधिक आनन्द की प्राप्ति होती है। यदि थोड़ी-सी भी चिन्ता मन में शेष रही, तो उससे असीम दु:ख की प्राप्ति होती है ॥
Verse २४
क्षणमायाति पातालं क्षणं याति नभ:स्थलम् । क्षणं भ्रमति दिक्कुञ्जे तृष्णा हृत्पद्मषट्पदी ॥
kṣaṇamāyāti pātālaṃ kṣaṇaṃ yāti nabha:sthalam । kṣaṇaṃ bhramati dikkuñje tṛṣṇā hṛtpadmaṣaṭpadī ॥
He who remains giving up what is implied and expressed is Shiva himself, the best of the Brahman-Knowers. That un-decaying being is the substratum (of all), without comparison beyond words and mind, eternal, omnipotent, omnipresent and subtle.
हे श्रेष्ठ मुने! मैं जिन श्रेष्ठ सद्गुणों का आश्रय प्राप्त करता हूँ, मेरी तृष्णा उन श्रेष्ठ गुणों को ठीक वैसे ही काट देती है, जैसे कि दुष्ट मूषिका (चुहिया) वीणा के तारों को काट देती है। यह तृष्णा चञ्चल बँदरिया के समान है, जो न लाँघने योग्य स्थान पर भी अपना पैर टिकाना चाहती है। वह तृप्त होने पर भी भिन्न-भिन्न फलों की इच्छा करती रहती है। एक जगह पर लम्बे समय तक नहीं रुकती। क्षणमात्र में ही वह आकाश एवं पाताल की सैर कर डालती है, क्षण मात्र में ही दिशारूपी कुञ्जों में भ्रमण करने लगती है। यह तृष्णा हृदय कमल में विचरण करने वाली भ्रमरी के समान है। यह तृष्णा ही इस नश्वर जगत् के समस्त दुःखों में दीर्घ काल तक दु:ख देने वाली है, जो अन्त:पुर में निवास करने वालों को भी महान् संकट में डाल देती है। यह तृष्णा एक महामारी-हैजा है। इसे वही श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट कर सकता है, जिसने चिन्ता का पूरी तरह से परित्याग कर दिया है। यदि चिन्ता का थोड़ा भी परित्याग कर दिया जाए, तो अत्यधिक आनन्द की प्राप्ति होती है। यदि थोड़ी-सी भी चिन्ता मन में शेष रही, तो उससे असीम दु:ख की प्राप्ति होती है ॥
Verse २५
सर्वसंसारदुःखानां तृष्णैका दीर्घदुःखदा। अन्तःपुरस्थमपि या योजयत्यतिसंकटे ॥
sarvasaṃsāraduḥkhānāṃ tṛṣṇaikā dīrghaduḥkhadā। antaḥpurasthamapi yā yojayatyatisaṃkaṭe ॥
The mind and the world are (only) the blooming of the supreme being; worldly life is reduced by the restraint (of the mind) and non-restraint (of the spirit).
हे श्रेष्ठ मुने! मैं जिन श्रेष्ठ सद्गुणों का आश्रय प्राप्त करता हूँ, मेरी तृष्णा उन श्रेष्ठ गुणों को ठीक वैसे ही काट देती है, जैसे कि दुष्ट मूषिका (चुहिया) वीणा के तारों को काट देती है। यह तृष्णा चञ्चल बँदरिया के समान है, जो न लाँघने योग्य स्थान पर भी अपना पैर टिकाना चाहती है। वह तृप्त होने पर भी भिन्न-भिन्न फलों की इच्छा करती रहती है। एक जगह पर लम्बे समय तक नहीं रुकती। क्षणमात्र में ही वह आकाश एवं पाताल की सैर कर डालती है, क्षण मात्र में ही दिशारूपी कुञ्जों में भ्रमण करने लगती है। यह तृष्णा हृदय कमल में विचरण करने वाली भ्रमरी के समान है। यह तृष्णा ही इस नश्वर जगत् के समस्त दुःखों में दीर्घ काल तक दु:ख देने वाली है, जो अन्त:पुर में निवास करने वालों को भी महान् संकट में डाल देती है। यह तृष्णा एक महामारी-हैजा है। इसे वही श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट कर सकता है, जिसने चिन्ता का पूरी तरह से परित्याग कर दिया है। यदि चिन्ता का थोड़ा भी परित्याग कर दिया जाए, तो अत्यधिक आनन्द की प्राप्ति होती है। यदि थोड़ी-सी भी चिन्ता मन में शेष रही, तो उससे असीम दु:ख की प्राप्ति होती है ॥
Verse २६
तृष्णाविषूचिकामन्त्रश्चिन्तात्यागो हि स द्विज।स्तोकेनानन्दमायाति स्तोकेनायाति खेदताम्॥
tṛṣṇāviṣūcikāmantraścintātyāgo hi sa dvija।stokenānandamāyāti stokenāyāti khedatām॥
IV-88-106. I shall tell you the means of curing mental ills - giving up whatever object is attractive, one attains liberation. Pity that worm of a man who cannot do this giving up which is absolutely good and dependent on oneself.
हे श्रेष्ठ मुने! मैं जिन श्रेष्ठ सद्गुणों का आश्रय प्राप्त करता हूँ, मेरी तृष्णा उन श्रेष्ठ गुणों को ठीक वैसे ही काट देती है, जैसे कि दुष्ट मूषिका (चुहिया) वीणा के तारों को काट देती है। यह तृष्णा चञ्चल बँदरिया के समान है, जो न लाँघने योग्य स्थान पर भी अपना पैर टिकाना चाहती है। वह तृप्त होने पर भी भिन्न-भिन्न फलों की इच्छा करती रहती है। एक जगह पर लम्बे समय तक नहीं रुकती। क्षणमात्र में ही वह आकाश एवं पाताल की सैर कर डालती है, क्षण मात्र में ही दिशारूपी कुञ्जों में भ्रमण करने लगती है। यह तृष्णा हृदय कमल में विचरण करने वाली भ्रमरी के समान है। यह तृष्णा ही इस नश्वर जगत् के समस्त दुःखों में दीर्घ काल तक दु:ख देने वाली है, जो अन्त:पुर में निवास करने वालों को भी महान् संकट में डाल देती है। यह तृष्णा एक महामारी-हैजा है। इसे वही श्रेष्ठ ब्राह्मण नष्ट कर सकता है, जिसने चिन्ता का पूरी तरह से परित्याग कर दिया है। यदि चिन्ता का थोड़ा भी परित्याग कर दिया जाए, तो अत्यधिक आनन्द की प्राप्ति होती है। यदि थोड़ी-सी भी चिन्ता मन में शेष रही, तो उससे असीम दु:ख की प्राप्ति होती है ॥
Verse २७
नास्ति देहसमः शोच्यो नीचो गुणविवर्जितः ॥
nāsti dehasamaḥ śocyo nīco guṇavivarjitaḥ ॥
The auspicious path cannot be got without subduing the mind which is giving up desires and which can be achieved by one's own effort. When the mind is cut by the weapon of non-projection, then is achieved (realized) the Brahman, omnipresent and tranquil. Hold yourself, un-excited, released from thought of worldly existence, having great wisdom - the swallowed (controlled) mind is the place of knowledge.
देह के सदृश तुच्छ, गुणरहित तथा शोक करने योग्य अन्य दूसरा कोई नहीं । इस शरीर रूपी विशाल गृह में अहंकाररूपी गृहस्थ निवास करता है । यह शरीर चाहे दीर्घकाल तक रहे अथवा शीघ्र ही नष्ट हो जाए, उसकी मुझे किञ्चित् मात्र भी चिन्ता नहीं हैं। जिस शरीर रूपी घर में इन्द्रियरूपी पशु पंक्तिवत् खड़े हैं तथा जिसके प्रांगण में तृष्णा रूपी बँदरी विचरण करती रहती है, जिसमें चित्त-वृत्तिरूप भृत्यों का समावेश है। ऐसा शरीर रूपी पर मुझे अभीष्ट नहीं है । जिह्वा रूपी बँदरी से पीड़ित हुआ यह मुख रूपी द्वार इतना भयभीत हो गया है कि आरम्भ में ही दन्तरूपी हड्डियाँ दिखाई पड़ रही हैं। ऐसा यह शरीररूपी घर मुझे प्रिय नहीं लगता है ॥
Verse २८
कलेवरमहंकारगृहस्थस्य महागृहम् । लुठत्वभ्येतु वा स्थैर्यं किमनेन गुरो मम॥
kalevaramahaṃkāragṛhasthasya mahāgṛham । luṭhatvabhyetu vā sthairyaṃ kimanena guro mama॥
Resorting to great effort, making the mind non-mind, meditating in the heart, with the edge of the wheel of consciousness. Kill the mind without hesitation; your (internal) enemies will not bind you.
देह के सदृश तुच्छ, गुणरहित तथा शोक करने योग्य अन्य दूसरा कोई नहीं । इस शरीर रूपी विशाल गृह में अहंकाररूपी गृहस्थ निवास करता है । यह शरीर चाहे दीर्घकाल तक रहे अथवा शीघ्र ही नष्ट हो जाए, उसकी मुझे किञ्चित् मात्र भी चिन्ता नहीं हैं। जिस शरीर रूपी घर में इन्द्रियरूपी पशु पंक्तिवत् खड़े हैं तथा जिसके प्रांगण में तृष्णा रूपी बँदरी विचरण करती रहती है, जिसमें चित्त-वृत्तिरूप भृत्यों का समावेश है। ऐसा शरीर रूपी पर मुझे अभीष्ट नहीं है । जिह्वा रूपी बँदरी से पीड़ित हुआ यह मुख रूपी द्वार इतना भयभीत हो गया है कि आरम्भ में ही दन्तरूपी हड्डियाँ दिखाई पड़ रही हैं। ऐसा यह शरीररूपी घर मुझे प्रिय नहीं लगता है ॥
Verse २९
पङ्क्तिबद्धेन्द्रियपशुं वल्गत्तृष्णागृहाङ्गणम्। चित्तभृत्यजनाकीर्णं नेष्टं देहगृहं मम॥
paṅktibaddhendriyapaśuṃ valgattṛṣṇāgṛhāṅgaṇam। cittabhṛtyajanākīrṇaṃ neṣṭaṃ dehagṛhaṃ mama॥
I am he, this is mine', the mind is only so much - this is cut down by the knife of non-projection. The mind is blown away only by the wind of non-projection, like the bank of clouds in the autumn sky. Let the winds of deluge blow, let the oceans become one (to destroy the world), let all the twelve suns blaze; the mind is not affected.
देह के सदृश तुच्छ, गुणरहित तथा शोक करने योग्य अन्य दूसरा कोई नहीं । इस शरीर रूपी विशाल गृह में अहंकाररूपी गृहस्थ निवास करता है । यह शरीर चाहे दीर्घकाल तक रहे अथवा शीघ्र ही नष्ट हो जाए, उसकी मुझे किञ्चित् मात्र भी चिन्ता नहीं हैं। जिस शरीर रूपी घर में इन्द्रियरूपी पशु पंक्तिवत् खड़े हैं तथा जिसके प्रांगण में तृष्णा रूपी बँदरी विचरण करती रहती है, जिसमें चित्त-वृत्तिरूप भृत्यों का समावेश है। ऐसा शरीर रूपी पर मुझे अभीष्ट नहीं है । जिह्वा रूपी बँदरी से पीड़ित हुआ यह मुख रूपी द्वार इतना भयभीत हो गया है कि आरम्भ में ही दन्तरूपी हड्डियाँ दिखाई पड़ रही हैं। ऐसा यह शरीररूपी घर मुझे प्रिय नहीं लगता है ॥
Verse ३०
जिह्वामर्कटिकाक्रान्तवदनद्वारभीषणम् । दृष्टदन्तास्थिशकलं नेष्टं देहगृहं मम ॥
jihvāmarkaṭikākrāntavadanadvārabhīṣaṇam । dṛṣṭadantāsthiśakalaṃ neṣṭaṃ dehagṛhaṃ mama ॥
You remain intent upon that state of the empire of truth which can only be non-projection and which gives all success.
देह के सदृश तुच्छ, गुणरहित तथा शोक करने योग्य अन्य दूसरा कोई नहीं । इस शरीर रूपी विशाल गृह में अहंकाररूपी गृहस्थ निवास करता है । यह शरीर चाहे दीर्घकाल तक रहे अथवा शीघ्र ही नष्ट हो जाए, उसकी मुझे किञ्चित् मात्र भी चिन्ता नहीं हैं। जिस शरीर रूपी घर में इन्द्रियरूपी पशु पंक्तिवत् खड़े हैं तथा जिसके प्रांगण में तृष्णा रूपी बँदरी विचरण करती रहती है, जिसमें चित्त-वृत्तिरूप भृत्यों का समावेश है। ऐसा शरीर रूपी पर मुझे अभीष्ट नहीं है । जिह्वा रूपी बँदरी से पीड़ित हुआ यह मुख रूपी द्वार इतना भयभीत हो गया है कि आरम्भ में ही दन्तरूपी हड्डियाँ दिखाई पड़ रही हैं। ऐसा यह शरीररूपी घर मुझे प्रिय नहीं लगता है ॥
Verse ३१
रक्तमांसमयस्यास्य सबाह्याभ्यन्तरे मुने। नाशैकधर्मिणो ब्रूहि कैव कायस्य रम्यता ॥
raktamāṃsamayasyāsya sabāhyābhyantare mune। nāśaikadharmiṇo brūhi kaiva kāyasya ramyatā ॥
Nowhere is the mind seen to be without fickleness - it is the nature of mind, just as heat is that of fire. This power of pulsation existing as mind - know this to be the power which is the ostentatious world. The mind without wavering is said to be Amrita. The same is said to be liberation in the Shastraic doctrine.
हे मुनीश्वर ! यह शरीर बाहर एवं अन्दर रक्त एवं मांसादि से संव्याप्त है, तो इस नश्वर शरीर में रमणीयता कहाँ से आई? यदि किसी ने शरत्कालीन बादलों की विद्युत् में एवं गन्धर्व की नगरी में स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस नश्वर देह की स्थिरता में विश्वास कर सकता है। बाल्यकाल में गुरु से, माता-पिता से, लोगों से, अयु में बड़े लड़कों से एवं अन्य दूसरे लोगों से भी भय लगता है, अत: यह बाल्यावस्था भय का ही घर है। युवावस्था के आने पर अपने ही चित्त रूपी गुफा में निवास करने वाले, भिन्न-भिन्न तरह के भ्रमों में फँसाने वाले इस काम रुपी पिशाच से बलपूर्वक विवश होकर व्यक्ति पराजय को प्राप्त हो जाता है। वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर उन्मत की भाँति काँपते हुए व्यक्ति को देखकर दास, पुत्र-पुत्रियाँ, स्त्रियाँ एवं बन्धु-बान्धव भी हँसी करते हैं। वृद्धावस्था में शरीर असमर्थ हो जाने पर इच्छा-आकांक्षाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं। यह वृद्धावस्था हृदय में दाह प्रदान करने वाली सारी आपत्तियों की प्रिय सहेली है ॥
Verse ३२
तडित्सु शरदभ्रेषु गन्धर्वनगरेषु च ।स्थैर्यं येन विनिर्णीतं स विश्वसितु विग्रहे ॥
taḍitsu śaradabhreṣu gandharvanagareṣu ca ।sthairyaṃ yena vinirṇītaṃ sa viśvasitu vigrahe ॥
This wavering which is another name for ignorance - destroy this with reflection. Sinless one, be free from projections (vikalpas) attaining that position with which the mind becomes united by means of human effort
हे मुनीश्वर ! यह शरीर बाहर एवं अन्दर रक्त एवं मांसादि से संव्याप्त है, तो इस नश्वर शरीर में रमणीयता कहाँ से आई? यदि किसी ने शरत्कालीन बादलों की विद्युत् में एवं गन्धर्व की नगरी में स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस नश्वर देह की स्थिरता में विश्वास कर सकता है। बाल्यकाल में गुरु से, माता-पिता से, लोगों से, अयु में बड़े लड़कों से एवं अन्य दूसरे लोगों से भी भय लगता है, अत: यह बाल्यावस्था भय का ही घर है। युवावस्था के आने पर अपने ही चित्त रूपी गुफा में निवास करने वाले, भिन्न-भिन्न तरह के भ्रमों में फँसाने वाले इस काम रुपी पिशाच से बलपूर्वक विवश होकर व्यक्ति पराजय को प्राप्त हो जाता है। वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर उन्मत की भाँति काँपते हुए व्यक्ति को देखकर दास, पुत्र-पुत्रियाँ, स्त्रियाँ एवं बन्धु-बान्धव भी हँसी करते हैं। वृद्धावस्था में शरीर असमर्थ हो जाने पर इच्छा-आकांक्षाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं। यह वृद्धावस्था हृदय में दाह प्रदान करने वाली सारी आपत्तियों की प्रिय सहेली है ॥
Verse ३३
शैशवे गुरुतो भीतिर्मातृतः पितृतस्तथा।जनतो ज्येष्ठबालाच्च शैशवं भयमन्दिरम्॥
śaiśave guruto bhītirmātṛtaḥ pitṛtastathā।janato jyeṣṭhabālācca śaiśavaṃ bhayamandiram॥
Hence, resorting to (human) effort, possessing (i.e. Controlling) the mind with the mind, be form and free from anxiety, in the place without grief. Only the mind can control the mind firmly - who can control a king except another king?
हे मुनीश्वर ! यह शरीर बाहर एवं अन्दर रक्त एवं मांसादि से संव्याप्त है, तो इस नश्वर शरीर में रमणीयता कहाँ से आई? यदि किसी ने शरत्कालीन बादलों की विद्युत् में एवं गन्धर्व की नगरी में स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस नश्वर देह की स्थिरता में विश्वास कर सकता है। बाल्यकाल में गुरु से, माता-पिता से, लोगों से, अयु में बड़े लड़कों से एवं अन्य दूसरे लोगों से भी भय लगता है, अत: यह बाल्यावस्था भय का ही घर है। युवावस्था के आने पर अपने ही चित्त रूपी गुफा में निवास करने वाले, भिन्न-भिन्न तरह के भ्रमों में फँसाने वाले इस काम रुपी पिशाच से बलपूर्वक विवश होकर व्यक्ति पराजय को प्राप्त हो जाता है। वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर उन्मत की भाँति काँपते हुए व्यक्ति को देखकर दास, पुत्र-पुत्रियाँ, स्त्रियाँ एवं बन्धु-बान्धव भी हँसी करते हैं। वृद्धावस्था में शरीर असमर्थ हो जाने पर इच्छा-आकांक्षाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं। यह वृद्धावस्था हृदय में दाह प्रदान करने वाली सारी आपत्तियों की प्रिय सहेली है ॥
Verse ३४
स्वचित्तविलसंस्थेन नानाविभ्रमकारिणा । बलात्कामपिशाचेन विवश: परिभूयते ॥
svacittavilasaṃsthena nānāvibhramakāriṇā । balātkāmapiśācena vivaśa: paribhūyate ॥
For those grasped by the crocodile of desire and fallen into the ocean of worldly life and carried away (tossed about) by the whirlpools, only the mind is the life-boat. Break the mind, with the mind, the rope, uplift yourself from worldly life - which cannot be crossed by another.
हे मुनीश्वर ! यह शरीर बाहर एवं अन्दर रक्त एवं मांसादि से संव्याप्त है, तो इस नश्वर शरीर में रमणीयता कहाँ से आई? यदि किसी ने शरत्कालीन बादलों की विद्युत् में एवं गन्धर्व की नगरी में स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस नश्वर देह की स्थिरता में विश्वास कर सकता है। बाल्यकाल में गुरु से, माता-पिता से, लोगों से, अयु में बड़े लड़कों से एवं अन्य दूसरे लोगों से भी भय लगता है, अत: यह बाल्यावस्था भय का ही घर है। युवावस्था के आने पर अपने ही चित्त रूपी गुफा में निवास करने वाले, भिन्न-भिन्न तरह के भ्रमों में फँसाने वाले इस काम रुपी पिशाच से बलपूर्वक विवश होकर व्यक्ति पराजय को प्राप्त हो जाता है। वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर उन्मत की भाँति काँपते हुए व्यक्ति को देखकर दास, पुत्र-पुत्रियाँ, स्त्रियाँ एवं बन्धु-बान्धव भी हँसी करते हैं। वृद्धावस्था में शरीर असमर्थ हो जाने पर इच्छा-आकांक्षाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं। यह वृद्धावस्था हृदय में दाह प्रदान करने वाली सारी आपत्तियों की प्रिय सहेली है ॥
Verse ३५
दासाः पुत्राः स्त्रियश्चैव बान्धवाः सुहृदस्तथा। हसन्त्युन्मत्तकमिव नरं वार्धककम्पितम् ॥
dāsāḥ putrāḥ striyaścaiva bāndhavāḥ suhṛdastathā। hasantyunmattakamiva naraṃ vārdhakakampitam ॥
V-117-115. Whatever propensity called the mind arises from previous (other) impulses, these a wise one is to avoid and from this there will be reduction of ignorance. Give up the tendency to differentiate; giving up the instinct for (worldly) enjoyment - then giving up both positive and negative (tendencies), be blissful without mental projection.
हे मुनीश्वर ! यह शरीर बाहर एवं अन्दर रक्त एवं मांसादि से संव्याप्त है, तो इस नश्वर शरीर में रमणीयता कहाँ से आई? यदि किसी ने शरत्कालीन बादलों की विद्युत् में एवं गन्धर्व की नगरी में स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस नश्वर देह की स्थिरता में विश्वास कर सकता है। बाल्यकाल में गुरु से, माता-पिता से, लोगों से, अयु में बड़े लड़कों से एवं अन्य दूसरे लोगों से भी भय लगता है, अत: यह बाल्यावस्था भय का ही घर है। युवावस्था के आने पर अपने ही चित्त रूपी गुफा में निवास करने वाले, भिन्न-भिन्न तरह के भ्रमों में फँसाने वाले इस काम रुपी पिशाच से बलपूर्वक विवश होकर व्यक्ति पराजय को प्राप्त हो जाता है। वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर उन्मत की भाँति काँपते हुए व्यक्ति को देखकर दास, पुत्र-पुत्रियाँ, स्त्रियाँ एवं बन्धु-बान्धव भी हँसी करते हैं। वृद्धावस्था में शरीर असमर्थ हो जाने पर इच्छा-आकांक्षाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं। यह वृद्धावस्था हृदय में दाह प्रदान करने वाली सारी आपत्तियों की प्रिय सहेली है ॥
Verse ३६
दैन्यदोषमयी दीर्घा वर्धते वार्धके स्पृहा। सर्वापदामेकसखी हृयदि दाहप्रदायिनी ॥
dainyadoṣamayī dīrghā vardhate vārdhake spṛhā। sarvāpadāmekasakhī hṛyadi dāhapradāyinī ॥
The avoidance of desire towards whatever is seen is the destruction of the mind, of ignorance. Freedom from desire is extinction (liberation), acceptance of desire is misery.
हे मुनीश्वर ! यह शरीर बाहर एवं अन्दर रक्त एवं मांसादि से संव्याप्त है, तो इस नश्वर शरीर में रमणीयता कहाँ से आई? यदि किसी ने शरत्कालीन बादलों की विद्युत् में एवं गन्धर्व की नगरी में स्थिरता निश्चित की है, तो वह इस नश्वर देह की स्थिरता में विश्वास कर सकता है। बाल्यकाल में गुरु से, माता-पिता से, लोगों से, अयु में बड़े लड़कों से एवं अन्य दूसरे लोगों से भी भय लगता है, अत: यह बाल्यावस्था भय का ही घर है। युवावस्था के आने पर अपने ही चित्त रूपी गुफा में निवास करने वाले, भिन्न-भिन्न तरह के भ्रमों में फँसाने वाले इस काम रुपी पिशाच से बलपूर्वक विवश होकर व्यक्ति पराजय को प्राप्त हो जाता है। वृद्धावस्था के प्राप्त होने पर उन्मत की भाँति काँपते हुए व्यक्ति को देखकर दास, पुत्र-पुत्रियाँ, स्त्रियाँ एवं बन्धु-बान्धव भी हँसी करते हैं। वृद्धावस्था में शरीर असमर्थ हो जाने पर इच्छा-आकांक्षाएँ अत्यधिक बढ़ जाती हैं। यह वृद्धावस्था हृदय में दाह प्रदान करने वाली सारी आपत्तियों की प्रिय सहेली है ॥
Verse ३७
क्वचिद्वा विद्यते यैषा संसारे सुखभावना।आयुः स्तम्बमिवासाद्य कालस्तामपि कृन्तति
kvacidvā vidyate yaiṣā saṃsāre sukhabhāvanā।āyuḥ stambamivāsādya kālastāmapi kṛntati
In the un-enlightened people ignorance is seen to exist. How can it exist in a person of sound wisdom, being accepted only in name. Ignorance swings a person on the steep rocks of samsara, having the thorny bushes of misery, not when ignorance dies away leading to the desire for perception of the self, reducing delusions. When everything is seen, this desire too melts away.
इस नश्वर जगत् में रहने वाले सांसारिक प्राणी जिस सुख की भावना करते हैं, आखिर वह कहाँ है? काल आयु को तृण के सदृश काटता ही जा रहा है। वह काल छोटे से तृण एवं रजःकण को महेन्द्र एवं स्वर्णमय सुमेरु जैसे विशाल पर्वतों को भी सरसों के समान बना देने में समर्थ है। यह सभी का संहार करने में सक्षम तथा अपनी उदरपूर्ति के लिए सभी को आत्मसात् करने को उद्यत है। इस काल के द्वारा तीनों लोक आक्रान्त हैं।।
Verse ३८
तृणं पांसुं महेन्द्रं च सुवर्णं मेरुसर्षपम्। आत्मंभरितया सर्वमात्मसात्कर्तुमुद्यतः । कालोऽयं सर्वसंहारी तेनाक्रान्तं जगत्त्रयम् ॥
tṛṇaṃ pāṃsuṃ mahendraṃ ca suvarṇaṃ merusarṣapam। ātmaṃbharitayā sarvamātmasātkartumudyataḥ । kālo'yaṃ sarvasaṃhārī tenākrāntaṃ jagattrayam ॥
This ignorance is only desire, its destruction is said to be liberation - this results by the destruction of projections. The intense darkness, ignorance, is reduced when, in the sky of the mind, the night of propensities fades away, by the sight of the sun of consciousness.
इस नश्वर जगत् में रहने वाले सांसारिक प्राणी जिस सुख की भावना करते हैं, आखिर वह कहाँ है? काल आयु को तृण के सदृश काटता ही जा रहा है। वह काल छोटे से तृण एवं रजःकण को महेन्द्र एवं स्वर्णमय सुमेरु जैसे विशाल पर्वतों को भी सरसों के समान बना देने में समर्थ है। यह सभी का संहार करने में सक्षम तथा अपनी उदरपूर्ति के लिए सभी को आत्मसात् करने को उद्यत है। इस काल के द्वारा तीनों लोक आक्रान्त हैं।।
Verse ३९
मांसपाञ्चालिकायास्तु यन्त्रलोलेऽङ्गपञ्जरे। स्नाय्वस्थिग्रन्थिशालिन्याः स्त्रियः किमिव शोभनम् ॥
māṃsapāñcālikāyāstu yantralole'ṅgapañjare। snāyvasthigranthiśālinyāḥ striyaḥ kimiva śobhanam ॥
V-116-121. The supreme lord is the ineffable conscious principle present every where and devoid of mental misery. All this (cosmos) is Brahman, eternally conscious, un-decaying. The other thing namely mental projections, does not really exist.
यंत्रवत् चञ्चल अङ्गरूपी पिंजड़े में मांस की पुतली की भाँति, स्न्नायु एवं हड्डियों की ग्रन्थि से बनी हुई इस स्त्रीदेह में ऐसी कौन सी-वस्तु है, जो शोभनीय कही जा सकती है ? आँखों में स्थित त्वचा, मांस, रक्त एवं अश्रु आदि इन सबको अलग-अलग करके अवलोकन करो; इनमें कौन सी वस्तु आकर्षक प्रतीत होती यदि कोई भी वस्तु आकर्षक नहीं, तो फिर व्यर्थ में मोह करने से क्या लाभ है ? हे मुने। जो नारी सुमेरु पर की चोटियों से उल्लसित होने वाली भगवती माँ गंगा की चञ्चल गति की भाँति है; जो मुक्ताहार से पूर्णरूपेण शुशोभित देखी गई है; कालचक्र के समीप आने पर उसी नारी के मांस पिण्डरूप स्तन को श्मशान में कुत्ते भक्षण करते हैं। जो नारियों केश एवं काजल धारण करने वाली तथा देखने में प्रिय लगने वाली होने पर भी न जिनका स्पर्श दुःख देने वाला होता है, वे ही विधाता की दुष्कृति रूप अग्नि की ज्वाला के समान दग्ध कर देने वाली नारियाँ पुरुष को तिनके की भाँति जला डालती हैं ॥
Verse ४०
त्वङमांसरक्तबाष्पाम्बु पृथक्कृत्वा विलोचने। समालोकय रम्यं चेत्किं मुधा परिमुसि ।।
tvaṅamāṃsaraktabāṣpāmbu pṛthakkṛtvā vilocane। samālokaya ramyaṃ cetkiṃ mudhā parimusi ।।
Nothing is really born, dies in this triad of worlds, nor is there any reality in various stages of things; only Pure Consciousness is real, which is aloof, shining by itself common to all and free from mental torment.
यंत्रवत् चञ्चल अङ्गरूपी पिंजड़े में मांस की पुतली की भाँति, स्न्नायु एवं हड्डियों की ग्रन्थि से बनी हुई इस स्त्रीदेह में ऐसी कौन सी-वस्तु है, जो शोभनीय कही जा सकती है ? आँखों में स्थित त्वचा, मांस, रक्त एवं अश्रु आदि इन सबको अलग-अलग करके अवलोकन करो; इनमें कौन सी वस्तु आकर्षक प्रतीत होती यदि कोई भी वस्तु आकर्षक नहीं, तो फिर व्यर्थ में मोह करने से क्या लाभ है ? हे मुने। जो नारी सुमेरु पर की चोटियों से उल्लसित होने वाली भगवती माँ गंगा की चञ्चल गति की भाँति है; जो मुक्ताहार से पूर्णरूपेण शुशोभित देखी गई है; कालचक्र के समीप आने पर उसी नारी के मांस पिण्डरूप स्तन को श्मशान में कुत्ते भक्षण करते हैं। जो नारियों केश एवं काजल धारण करने वाली तथा देखने में प्रिय लगने वाली होने पर भी न जिनका स्पर्श दुःख देने वाला होता है, वे ही विधाता की दुष्कृति रूप अग्नि की ज्वाला के समान दग्ध कर देने वाली नारियाँ पुरुष को तिनके की भाँति जला डालती हैं ॥
Verse ४१
मेरुशृङ्गटोल्लासिगङ्गाचलरयोपमा ।दृष्टा यस्मिन्मुने मुक्ताहारस्योल्लासशालिता ॥
meruśṛṅgaṭollāsigaṅgācalarayopamā ।dṛṣṭā yasminmune muktāhārasyollāsaśālitā ॥
When this is ever realized as pure, untroubled, serene, calm and unchanging, this mind realizes through reflection - the mind is called so because of reflection.
यंत्रवत् चञ्चल अङ्गरूपी पिंजड़े में मांस की पुतली की भाँति, स्न्नायु एवं हड्डियों की ग्रन्थि से बनी हुई इस स्त्रीदेह में ऐसी कौन सी-वस्तु है, जो शोभनीय कही जा सकती है ? आँखों में स्थित त्वचा, मांस, रक्त एवं अश्रु आदि इन सबको अलग-अलग करके अवलोकन करो; इनमें कौन सी वस्तु आकर्षक प्रतीत होती यदि कोई भी वस्तु आकर्षक नहीं, तो फिर व्यर्थ में मोह करने से क्या लाभ है ? हे मुने। जो नारी सुमेरु पर की चोटियों से उल्लसित होने वाली भगवती माँ गंगा की चञ्चल गति की भाँति है; जो मुक्ताहार से पूर्णरूपेण शुशोभित देखी गई है; कालचक्र के समीप आने पर उसी नारी के मांस पिण्डरूप स्तन को श्मशान में कुत्ते भक्षण करते हैं। जो नारियों केश एवं काजल धारण करने वाली तथा देखने में प्रिय लगने वाली होने पर भी न जिनका स्पर्श दुःख देने वाला होता है, वे ही विधाता की दुष्कृति रूप अग्नि की ज्वाला के समान दग्ध कर देने वाली नारियाँ पुरुष को तिनके की भाँति जला डालती हैं ॥
Verse ४२
शमशानेषु दिगन्तेषु स एव ललनास्तनः । श्वभिरास्वाद्यते काले लघुपिण्ड इवान्धसः ।।
śamaśāneṣu diganteṣu sa eva lalanāstanaḥ । śvabhirāsvādyate kāle laghupiṇḍa ivāndhasaḥ ।।
IV-122-125. So, this thought caused by force, is destroyed by resolution. The mind is bound strongly by the resolution 'I am not Brahman'; it is released by the resolve 'I am Brahman'; it is bound by the concept in keeping with the thought 'I am, lean, bound by misery; I have hands, feet etc.' Whereas, it is released by the conviction following the thought 'I am not miserable, I have no body, the soul is not bound'. One is liberated when ignorance dies away, by the internal conviction. 'I am not the flesh, the bones; I am beyond the body'.
यंत्रवत् चञ्चल अङ्गरूपी पिंजड़े में मांस की पुतली की भाँति, स्न्नायु एवं हड्डियों की ग्रन्थि से बनी हुई इस स्त्रीदेह में ऐसी कौन सी-वस्तु है, जो शोभनीय कही जा सकती है ? आँखों में स्थित त्वचा, मांस, रक्त एवं अश्रु आदि इन सबको अलग-अलग करके अवलोकन करो; इनमें कौन सी वस्तु आकर्षक प्रतीत होती यदि कोई भी वस्तु आकर्षक नहीं, तो फिर व्यर्थ में मोह करने से क्या लाभ है ? हे मुने। जो नारी सुमेरु पर की चोटियों से उल्लसित होने वाली भगवती माँ गंगा की चञ्चल गति की भाँति है; जो मुक्ताहार से पूर्णरूपेण शुशोभित देखी गई है; कालचक्र के समीप आने पर उसी नारी के मांस पिण्डरूप स्तन को श्मशान में कुत्ते भक्षण करते हैं। जो नारियों केश एवं काजल धारण करने वाली तथा देखने में प्रिय लगने वाली होने पर भी न जिनका स्पर्श दुःख देने वाला होता है, वे ही विधाता की दुष्कृति रूप अग्नि की ज्वाला के समान दग्ध कर देने वाली नारियाँ पुरुष को तिनके की भाँति जला डालती हैं ॥
Verse ४३
केशकज्जलधारिण्यो दुःस्पर्शा लोचनप्रियाः । दुष्कृताग्निशिखा नार्यो दहन्ति तृणवन्नरम्॥
keśakajjaladhāriṇyo duḥsparśā locanapriyāḥ । duṣkṛtāgniśikhā nāryo dahanti tṛṇavannaram॥
IV-126-131. This ignorance is due to imagination, by conceiving the non-spirit as spirit. Resorting to great effort, with supreme resolve, and abandoning desire at a distance, be blissful without fancy.
यंत्रवत् चञ्चल अङ्गरूपी पिंजड़े में मांस की पुतली की भाँति, स्न्नायु एवं हड्डियों की ग्रन्थि से बनी हुई इस स्त्रीदेह में ऐसी कौन सी-वस्तु है, जो शोभनीय कही जा सकती है ? आँखों में स्थित त्वचा, मांस, रक्त एवं अश्रु आदि इन सबको अलग-अलग करके अवलोकन करो; इनमें कौन सी वस्तु आकर्षक प्रतीत होती यदि कोई भी वस्तु आकर्षक नहीं, तो फिर व्यर्थ में मोह करने से क्या लाभ है ? हे मुने। जो नारी सुमेरु पर की चोटियों से उल्लसित होने वाली भगवती माँ गंगा की चञ्चल गति की भाँति है; जो मुक्ताहार से पूर्णरूपेण शुशोभित देखी गई है; कालचक्र के समीप आने पर उसी नारी के मांस पिण्डरूप स्तन को श्मशान में कुत्ते भक्षण करते हैं। जो नारियों केश एवं काजल धारण करने वाली तथा देखने में प्रिय लगने वाली होने पर भी न जिनका स्पर्श दुःख देने वाला होता है, वे ही विधाता की दुष्कृति रूप अग्नि की ज्वाला के समान दग्ध कर देने वाली नारियाँ पुरुष को तिनके की भाँति जला डालती हैं ॥
Verse ४४
ज्वलतामतिदूरेऽपि सरसा अपि नीरसाः ।स्त्रियो हि नरकाग्नीनामिन्धनं चारु दारुणम्॥
jvalatāmatidūre'pi sarasā api nīrasāḥ ।striyo hi narakāgnīnāmindhanaṃ cāru dāruṇam॥
My son, my wealth, he is mine - such propensity leaps about by the tangle of senses. Do not be ignorant, be wise; give up involvement is samsara - why do you wail like an ignorant person by such attachment? What is this body of yours, dull, dumb, impure lump of flesh, for which you are overpowered by worldly pleasure and pain?
ये दूरस्थ प्रज्वलित नरकाग्नियों की तरह अशोभनीय एवं दुःखदायी ईंधनस्वरूपा हैं। ये रसयुक्त प्रतीत होने पर भी वस्तुतः रसहीन हैं। काम नामक किरात ने पुरुष रूपी मृगों को आबद्ध कर लेने के लिए स्त्री रूपी पाश को विस्तृत कर रखा है। ये पुरुष जीवनरूपी तलैया के मत्स्य हैं, जो चित्तरूपी कीचड़ में सतत विचरते रहते हैं। इन मास्यरूपी पुरुषों को अपने बाहुपाश में फँसाने के लिए नारी दुर्वासना रूपी रस्सरी में बँधी पिण्डिका अर्थात् चारे की भाँति है। यह नारी समस्त दोषरूपी रत्नों को प्रकट करने वाले सागर की भाँति है। यह दु:खों की जंजीर सदैव हमसे दूर रहे। जिस पुरुष के पास नारी है, उसे भोग की इच्छा प्रादुर्भूत होती है और जिसके पास नारी नहीं है, उसके लिए भोग का कोई कारण ही नहीं है। जिसने स्त्री का परित्याग कर दिया, उसका संसार छूट गया और वास्तव में इस नश्वर जगत् का परित्याग करके ही मनुष्य सुख को प्राप्त कर सकता है, वही सचमुच सुखी हो सकता है ॥
Verse ४५
कामनाम्ना किरातेन विकीर्णा मुग्धचेतसः । नार्यो नरविहङ्गानामङ्गबन्धनवागुराः ॥
kāmanāmnā kirātena vikīrṇā mugdhacetasaḥ । nāryo naravihaṅgānāmaṅgabandhanavāgurāḥ ॥
It is strange that the true Brahman is forgotten by people! May you not be smeared by attachment when you are active.
ये दूरस्थ प्रज्वलित नरकाग्नियों की तरह अशोभनीय एवं दुःखदायी ईंधनस्वरूपा हैं। ये रसयुक्त प्रतीत होने पर भी वस्तुतः रसहीन हैं। काम नामक किरात ने पुरुष रूपी मृगों को आबद्ध कर लेने के लिए स्त्री रूपी पाश को विस्तृत कर रखा है। ये पुरुष जीवनरूपी तलैया के मत्स्य हैं, जो चित्तरूपी कीचड़ में सतत विचरते रहते हैं। इन मास्यरूपी पुरुषों को अपने बाहुपाश में फँसाने के लिए नारी दुर्वासना रूपी रस्सरी में बँधी पिण्डिका अर्थात् चारे की भाँति है। यह नारी समस्त दोषरूपी रत्नों को प्रकट करने वाले सागर की भाँति है। यह दु:खों की जंजीर सदैव हमसे दूर रहे। जिस पुरुष के पास नारी है, उसे भोग की इच्छा प्रादुर्भूत होती है और जिसके पास नारी नहीं है, उसके लिए भोग का कोई कारण ही नहीं है। जिसने स्त्री का परित्याग कर दिया, उसका संसार छूट गया और वास्तव में इस नश्वर जगत् का परित्याग करके ही मनुष्य सुख को प्राप्त कर सकता है, वही सचमुच सुखी हो सकता है ॥
Verse ४६
जन्मपल्वलमत्स्यानां चित्तकर्दमचारिणाम्।पुंसां दुर्वासनारज्जुर्नारी बडिशपिण्डिका॥
janmapalvalamatsyānāṃ cittakardamacāriṇām।puṃsāṃ durvāsanārajjurnārī baḍiśapiṇḍikā॥
Strange also that mountains are bound by lotus fiber! This universe is perturbed by the ignorance which is non-existent! Mere grass has become adamant!
ये दूरस्थ प्रज्वलित नरकाग्नियों की तरह अशोभनीय एवं दुःखदायी ईंधनस्वरूपा हैं। ये रसयुक्त प्रतीत होने पर भी वस्तुतः रसहीन हैं। काम नामक किरात ने पुरुष रूपी मृगों को आबद्ध कर लेने के लिए स्त्री रूपी पाश को विस्तृत कर रखा है। ये पुरुष जीवनरूपी तलैया के मत्स्य हैं, जो चित्तरूपी कीचड़ में सतत विचरते रहते हैं। इन मास्यरूपी पुरुषों को अपने बाहुपाश में फँसाने के लिए नारी दुर्वासना रूपी रस्सरी में बँधी पिण्डिका अर्थात् चारे की भाँति है। यह नारी समस्त दोषरूपी रत्नों को प्रकट करने वाले सागर की भाँति है। यह दु:खों की जंजीर सदैव हमसे दूर रहे। जिस पुरुष के पास नारी है, उसे भोग की इच्छा प्रादुर्भूत होती है और जिसके पास नारी नहीं है, उसके लिए भोग का कोई कारण ही नहीं है। जिसने स्त्री का परित्याग कर दिया, उसका संसार छूट गया और वास्तव में इस नश्वर जगत् का परित्याग करके ही मनुष्य सुख को प्राप्त कर सकता है, वही सचमुच सुखी हो सकता है ॥
Verse ४७
सर्वेषां दोषरत्नानां सुसमुद्गिकयानया । दुःखशृङ्खलया नित्यमलमस्तु मम स्त्रिया ॥
sarveṣāṃ doṣaratnānāṃ susamudgikayānayā । duḥkhaśṛṅkhalayā nityamalamastu mama striyā ॥
V-1-7. Then I shall speak truly of the seven steps of ignorance, seven of wisdom. The stages between are countless and produced otherwise.
ये दूरस्थ प्रज्वलित नरकाग्नियों की तरह अशोभनीय एवं दुःखदायी ईंधनस्वरूपा हैं। ये रसयुक्त प्रतीत होने पर भी वस्तुतः रसहीन हैं। काम नामक किरात ने पुरुष रूपी मृगों को आबद्ध कर लेने के लिए स्त्री रूपी पाश को विस्तृत कर रखा है। ये पुरुष जीवनरूपी तलैया के मत्स्य हैं, जो चित्तरूपी कीचड़ में सतत विचरते रहते हैं। इन मास्यरूपी पुरुषों को अपने बाहुपाश में फँसाने के लिए नारी दुर्वासना रूपी रस्सरी में बँधी पिण्डिका अर्थात् चारे की भाँति है। यह नारी समस्त दोषरूपी रत्नों को प्रकट करने वाले सागर की भाँति है। यह दु:खों की जंजीर सदैव हमसे दूर रहे। जिस पुरुष के पास नारी है, उसे भोग की इच्छा प्रादुर्भूत होती है और जिसके पास नारी नहीं है, उसके लिए भोग का कोई कारण ही नहीं है। जिसने स्त्री का परित्याग कर दिया, उसका संसार छूट गया और वास्तव में इस नश्वर जगत् का परित्याग करके ही मनुष्य सुख को प्राप्त कर सकता है, वही सचमुच सुखी हो सकता है ॥
Verse ४८
यस्य स्त्री तस्य भोगेच्छा नि:स्त्रीकस्य क्व भोगभूः ।स्त्रियं त्यक्त्वा जगत्त्यक्तं जगत्त्यक्त्वा सुखी भवेत् ॥
yasya strī tasya bhogecchā ni:strīkasya kva bhogabhūḥ ।striyaṃ tyaktvā jagattyaktaṃ jagattyaktvā sukhī bhavet ॥
Liberation is existence in natural (spiritual) condition; lapse from it is the concept of 'I' - attributes like desire and hate, born of ignorance, are not for those who do not swerve from their nature as a result of the realization of pure consciousness.
ये दूरस्थ प्रज्वलित नरकाग्नियों की तरह अशोभनीय एवं दुःखदायी ईंधनस्वरूपा हैं। ये रसयुक्त प्रतीत होने पर भी वस्तुतः रसहीन हैं। काम नामक किरात ने पुरुष रूपी मृगों को आबद्ध कर लेने के लिए स्त्री रूपी पाश को विस्तृत कर रखा है। ये पुरुष जीवनरूपी तलैया के मत्स्य हैं, जो चित्तरूपी कीचड़ में सतत विचरते रहते हैं। इन मास्यरूपी पुरुषों को अपने बाहुपाश में फँसाने के लिए नारी दुर्वासना रूपी रस्सरी में बँधी पिण्डिका अर्थात् चारे की भाँति है। यह नारी समस्त दोषरूपी रत्नों को प्रकट करने वाले सागर की भाँति है। यह दु:खों की जंजीर सदैव हमसे दूर रहे। जिस पुरुष के पास नारी है, उसे भोग की इच्छा प्रादुर्भूत होती है और जिसके पास नारी नहीं है, उसके लिए भोग का कोई कारण ही नहीं है। जिसने स्त्री का परित्याग कर दिया, उसका संसार छूट गया और वास्तव में इस नश्वर जगत् का परित्याग करके ही मनुष्य सुख को प्राप्त कर सकता है, वही सचमुच सुखी हो सकता है ॥
तृतीयोऽध्यायः (part 3)
Verse ४९
दिशोऽपि न हि दृश्यन्ते देशोऽप्यन्योपदेशकृत्। शैला अपि विशीर्यन्ते शीर्यन्ते तारका अपि ।।
diśo'pi na hi dṛśyante deśo'pyanyopadeśakṛt। śailā api viśīryante śīryante tārakā api ।।
The fall from spiritual nature, the drowning of consciousness in mental matters; there is no other delusion, now or in future, than this
(यह जगत् नश्वर है, जब यह अव्यक्त स्थिति में चला जाता है, तब) दिशाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, देश भी दूसरों के लिए उपदेश-प्रद बन जाते हैं अर्थात् काल के गाल में विलीन हो जाते हैं, पर्वत भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं तथा तारागण भी टूक-दूक होकर गिर जाते हैं, ध्रुव-नक्षत्रादि का जीवन भी अस्थिर हो जाता है। सिद्धयोगी जन भी विनष्ट हो जाते हैं, दानवादि भी जराग्रस्त शक्तिरहित होकर नष्ट हो जाते हैं। दीर्घकाल तक स्थायी रूप से निवास करने वाले पितामह ब्रह्मा जी एवं जन्मरहित भगवान् विष्णु भी अन्तर्धान हो जाते हैं, स्मस्त भाव अभाव में परिणत हो जाते हैं, दिशाओं के अधिपति भी जरा-जीर्ण हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवगण एवं समस्त प्राणिसमूह वैसे ही विनाश की ओर दौड़ते चले जाते हैं, जिस प्रकार सागरों का जल बड़वानल की ओर दौड़ता चला जा रहा है। आपत्तियाँ क्षणभर में विपत्तिग्रस्त बना देती हैं, तो क्षणभर में समस्त वैभवसम्पदाएँ समीप में एकत्रित हो जाती हैं। क्षणभर में मृत्यु एवं क्षणभर में जन्म हो जाता है। ये सभी प्रपञ्च नश्वर हैं । इस जगत् में कायर पुरुषों के द्वारा शूरवीरों का संहार होता है, कभी-कभी एक के द्वारा सैकड़ों-हजारों का विनाश हो जाता है । विषय- भोगों के द्वारा चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विषरूप है । प्रत्यक्ष षिष इतना भीषण विष नहीं कहा जाता; क्योंकि वह विष तो मात्र एक ही जन्म को नष्ट करता है और विषय-भोग तो जन्म-जन्मान्तर को ही विनष्ट कर देते हैं। अतः इस समय दोषरूपी दावानल से जला मेरा चित्त ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।।
Verse ५०
शुष्यन्त्यपि समुद्राश्च ध्रुवोप्यधुवजीवनः । सिद्धा अपि विनश्यन्ति जीर्यन्तो दानवादयः ।।
śuṣyantyapi samudrāśca dhruvopyadhuvajīvanaḥ । siddhā api vinaśyanti jīryanto dānavādayaḥ ।।
The existence in spiritual nature is said to be the destruction of mental activity, being in the middle (unaffected), when the mind goes from object to object. The existence-supreme in nature is remaining like stone, all ideation dying out, free from waking and sleep.
(यह जगत् नश्वर है, जब यह अव्यक्त स्थिति में चला जाता है, तब) दिशाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, देश भी दूसरों के लिए उपदेश-प्रद बन जाते हैं अर्थात् काल के गाल में विलीन हो जाते हैं, पर्वत भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं तथा तारागण भी टूक-दूक होकर गिर जाते हैं, ध्रुव-नक्षत्रादि का जीवन भी अस्थिर हो जाता है। सिद्धयोगी जन भी विनष्ट हो जाते हैं, दानवादि भी जराग्रस्त शक्तिरहित होकर नष्ट हो जाते हैं। दीर्घकाल तक स्थायी रूप से निवास करने वाले पितामह ब्रह्मा जी एवं जन्मरहित भगवान् विष्णु भी अन्तर्धान हो जाते हैं, स्मस्त भाव अभाव में परिणत हो जाते हैं, दिशाओं के अधिपति भी जरा-जीर्ण हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवगण एवं समस्त प्राणिसमूह वैसे ही विनाश की ओर दौड़ते चले जाते हैं, जिस प्रकार सागरों का जल बड़वानल की ओर दौड़ता चला जा रहा है। आपत्तियाँ क्षणभर में विपत्तिग्रस्त बना देती हैं, तो क्षणभर में समस्त वैभवसम्पदाएँ समीप में एकत्रित हो जाती हैं। क्षणभर में मृत्यु एवं क्षणभर में जन्म हो जाता है। ये सभी प्रपञ्च नश्वर हैं । इस जगत् में कायर पुरुषों के द्वारा शूरवीरों का संहार होता है, कभी-कभी एक के द्वारा सैकड़ों-हजारों का विनाश हो जाता है । विषय- भोगों के द्वारा चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विषरूप है । प्रत्यक्ष षिष इतना भीषण विष नहीं कहा जाता; क्योंकि वह विष तो मात्र एक ही जन्म को नष्ट करता है और विषय-भोग तो जन्म-जन्मान्तर को ही विनष्ट कर देते हैं। अतः इस समय दोषरूपी दावानल से जला मेरा चित्त ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।।
Verse ५१
परमेष्ठयपि निष्ठावान्हीयते हरिरप्यजः । भावोऽप्यभावमायाति जीर्यन्ते वै दिगीश्वराः ॥
parameṣṭhayapi niṣṭhāvānhīyate harirapyajaḥ । bhāvo'pyabhāvamāyāti jīryante vai digīśvarāḥ ॥
That is one's own (spiritual) nature which is not inert, the non-pulsating (placid) mind, when the ego-aspect is dead.
(यह जगत् नश्वर है, जब यह अव्यक्त स्थिति में चला जाता है, तब) दिशाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, देश भी दूसरों के लिए उपदेश-प्रद बन जाते हैं अर्थात् काल के गाल में विलीन हो जाते हैं, पर्वत भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं तथा तारागण भी टूक-दूक होकर गिर जाते हैं, ध्रुव-नक्षत्रादि का जीवन भी अस्थिर हो जाता है। सिद्धयोगी जन भी विनष्ट हो जाते हैं, दानवादि भी जराग्रस्त शक्तिरहित होकर नष्ट हो जाते हैं। दीर्घकाल तक स्थायी रूप से निवास करने वाले पितामह ब्रह्मा जी एवं जन्मरहित भगवान् विष्णु भी अन्तर्धान हो जाते हैं, स्मस्त भाव अभाव में परिणत हो जाते हैं, दिशाओं के अधिपति भी जरा-जीर्ण हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवगण एवं समस्त प्राणिसमूह वैसे ही विनाश की ओर दौड़ते चले जाते हैं, जिस प्रकार सागरों का जल बड़वानल की ओर दौड़ता चला जा रहा है। आपत्तियाँ क्षणभर में विपत्तिग्रस्त बना देती हैं, तो क्षणभर में समस्त वैभवसम्पदाएँ समीप में एकत्रित हो जाती हैं। क्षणभर में मृत्यु एवं क्षणभर में जन्म हो जाता है। ये सभी प्रपञ्च नश्वर हैं । इस जगत् में कायर पुरुषों के द्वारा शूरवीरों का संहार होता है, कभी-कभी एक के द्वारा सैकड़ों-हजारों का विनाश हो जाता है । विषय- भोगों के द्वारा चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विषरूप है । प्रत्यक्ष षिष इतना भीषण विष नहीं कहा जाता; क्योंकि वह विष तो मात्र एक ही जन्म को नष्ट करता है और विषय-भोग तो जन्म-जन्मान्तर को ही विनष्ट कर देते हैं। अतः इस समय दोषरूपी दावानल से जला मेरा चित्त ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।।
Verse ५२
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च सर्वा वा भूतजातयः । नाशमेवानुधावन्ति सलिलानीव वाडवम् ॥
brahmā viṣṇuśca rudraśca sarvā vā bhūtajātayaḥ । nāśamevānudhāvanti salilānīva vāḍavam ॥
V-8-20. Waking in seed state, (simple) waking, great waking, etc., the seven-fold delusion -when these combine among themselves, they become manifold; hear of its nature.
(यह जगत् नश्वर है, जब यह अव्यक्त स्थिति में चला जाता है, तब) दिशाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, देश भी दूसरों के लिए उपदेश-प्रद बन जाते हैं अर्थात् काल के गाल में विलीन हो जाते हैं, पर्वत भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं तथा तारागण भी टूक-दूक होकर गिर जाते हैं, ध्रुव-नक्षत्रादि का जीवन भी अस्थिर हो जाता है। सिद्धयोगी जन भी विनष्ट हो जाते हैं, दानवादि भी जराग्रस्त शक्तिरहित होकर नष्ट हो जाते हैं। दीर्घकाल तक स्थायी रूप से निवास करने वाले पितामह ब्रह्मा जी एवं जन्मरहित भगवान् विष्णु भी अन्तर्धान हो जाते हैं, स्मस्त भाव अभाव में परिणत हो जाते हैं, दिशाओं के अधिपति भी जरा-जीर्ण हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवगण एवं समस्त प्राणिसमूह वैसे ही विनाश की ओर दौड़ते चले जाते हैं, जिस प्रकार सागरों का जल बड़वानल की ओर दौड़ता चला जा रहा है। आपत्तियाँ क्षणभर में विपत्तिग्रस्त बना देती हैं, तो क्षणभर में समस्त वैभवसम्पदाएँ समीप में एकत्रित हो जाती हैं। क्षणभर में मृत्यु एवं क्षणभर में जन्म हो जाता है। ये सभी प्रपञ्च नश्वर हैं । इस जगत् में कायर पुरुषों के द्वारा शूरवीरों का संहार होता है, कभी-कभी एक के द्वारा सैकड़ों-हजारों का विनाश हो जाता है । विषय- भोगों के द्वारा चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विषरूप है । प्रत्यक्ष षिष इतना भीषण विष नहीं कहा जाता; क्योंकि वह विष तो मात्र एक ही जन्म को नष्ट करता है और विषय-भोग तो जन्म-जन्मान्तर को ही विनष्ट कर देते हैं। अतः इस समय दोषरूपी दावानल से जला मेरा चित्त ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।।
Verse ५३
आपदः क्षणमायान्ति क्षणमायान्ति संपदः ।क्षणं जन्माथ मरणं सर्वं नश्वरमेव तत्॥
āpadaḥ kṣaṇamāyānti kṣaṇamāyānti saṃpadaḥ ।kṣaṇaṃ janmātha maraṇaṃ sarvaṃ naśvarameva tat॥
The first stage is the consciousness undesirable, pure condition, taking the name of mind, Jiva etc., which will come into existence. Waking existing as seed (potential) is said to be waking-in-seed - this is the new or first condition of consciousness.
(यह जगत् नश्वर है, जब यह अव्यक्त स्थिति में चला जाता है, तब) दिशाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, देश भी दूसरों के लिए उपदेश-प्रद बन जाते हैं अर्थात् काल के गाल में विलीन हो जाते हैं, पर्वत भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं तथा तारागण भी टूक-दूक होकर गिर जाते हैं, ध्रुव-नक्षत्रादि का जीवन भी अस्थिर हो जाता है। सिद्धयोगी जन भी विनष्ट हो जाते हैं, दानवादि भी जराग्रस्त शक्तिरहित होकर नष्ट हो जाते हैं। दीर्घकाल तक स्थायी रूप से निवास करने वाले पितामह ब्रह्मा जी एवं जन्मरहित भगवान् विष्णु भी अन्तर्धान हो जाते हैं, स्मस्त भाव अभाव में परिणत हो जाते हैं, दिशाओं के अधिपति भी जरा-जीर्ण हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवगण एवं समस्त प्राणिसमूह वैसे ही विनाश की ओर दौड़ते चले जाते हैं, जिस प्रकार सागरों का जल बड़वानल की ओर दौड़ता चला जा रहा है। आपत्तियाँ क्षणभर में विपत्तिग्रस्त बना देती हैं, तो क्षणभर में समस्त वैभवसम्पदाएँ समीप में एकत्रित हो जाती हैं। क्षणभर में मृत्यु एवं क्षणभर में जन्म हो जाता है। ये सभी प्रपञ्च नश्वर हैं । इस जगत् में कायर पुरुषों के द्वारा शूरवीरों का संहार होता है, कभी-कभी एक के द्वारा सैकड़ों-हजारों का विनाश हो जाता है । विषय- भोगों के द्वारा चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विषरूप है । प्रत्यक्ष षिष इतना भीषण विष नहीं कहा जाता; क्योंकि वह विष तो मात्र एक ही जन्म को नष्ट करता है और विषय-भोग तो जन्म-जन्मान्तर को ही विनष्ट कर देते हैं। अतः इस समय दोषरूपी दावानल से जला मेरा चित्त ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।।
Verse ५४
अशूरेण हताः शूरा एकेनापि शतं हतम्।विषं विषयवैषम्यं न विषं विषमुच्यते ॥
aśūreṇa hatāḥ śūrā ekenāpi śataṃ hatam।viṣaṃ viṣayavaiṣamyaṃ na viṣaṃ viṣamucyate ॥
The waking state (second): after the new stage, the (subtle) concept 'I', 'Mine' arising purely - this is waking, non-existent earlier.
(यह जगत् नश्वर है, जब यह अव्यक्त स्थिति में चला जाता है, तब) दिशाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, देश भी दूसरों के लिए उपदेश-प्रद बन जाते हैं अर्थात् काल के गाल में विलीन हो जाते हैं, पर्वत भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं तथा तारागण भी टूक-दूक होकर गिर जाते हैं, ध्रुव-नक्षत्रादि का जीवन भी अस्थिर हो जाता है। सिद्धयोगी जन भी विनष्ट हो जाते हैं, दानवादि भी जराग्रस्त शक्तिरहित होकर नष्ट हो जाते हैं। दीर्घकाल तक स्थायी रूप से निवास करने वाले पितामह ब्रह्मा जी एवं जन्मरहित भगवान् विष्णु भी अन्तर्धान हो जाते हैं, स्मस्त भाव अभाव में परिणत हो जाते हैं, दिशाओं के अधिपति भी जरा-जीर्ण हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवगण एवं समस्त प्राणिसमूह वैसे ही विनाश की ओर दौड़ते चले जाते हैं, जिस प्रकार सागरों का जल बड़वानल की ओर दौड़ता चला जा रहा है। आपत्तियाँ क्षणभर में विपत्तिग्रस्त बना देती हैं, तो क्षणभर में समस्त वैभवसम्पदाएँ समीप में एकत्रित हो जाती हैं। क्षणभर में मृत्यु एवं क्षणभर में जन्म हो जाता है। ये सभी प्रपञ्च नश्वर हैं । इस जगत् में कायर पुरुषों के द्वारा शूरवीरों का संहार होता है, कभी-कभी एक के द्वारा सैकड़ों-हजारों का विनाश हो जाता है । विषय- भोगों के द्वारा चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विषरूप है । प्रत्यक्ष षिष इतना भीषण विष नहीं कहा जाता; क्योंकि वह विष तो मात्र एक ही जन्म को नष्ट करता है और विषय-भोग तो जन्म-जन्मान्तर को ही विनष्ट कर देते हैं। अतः इस समय दोषरूपी दावानल से जला मेरा चित्त ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।।
Verse ५५
जन्मान्तरघ्ना विषया एकजन्महरं विषम् ।इति मे दोषदावाग्निदग्धे संप्रति चेतसि ॥
janmāntaraghnā viṣayā ekajanmaharaṃ viṣam ।iti me doṣadāvāgnidagdhe saṃprati cetasi ॥
The great waking: the broad (gross) concept arising in a previous birth as 'I' and 'Mine'.
(यह जगत् नश्वर है, जब यह अव्यक्त स्थिति में चला जाता है, तब) दिशाएँ भी अदृश्य हो जाती हैं, देश भी दूसरों के लिए उपदेश-प्रद बन जाते हैं अर्थात् काल के गाल में विलीन हो जाते हैं, पर्वत भी खण्ड-खण्ड हो जाते हैं तथा तारागण भी टूक-दूक होकर गिर जाते हैं, ध्रुव-नक्षत्रादि का जीवन भी अस्थिर हो जाता है। सिद्धयोगी जन भी विनष्ट हो जाते हैं, दानवादि भी जराग्रस्त शक्तिरहित होकर नष्ट हो जाते हैं। दीर्घकाल तक स्थायी रूप से निवास करने वाले पितामह ब्रह्मा जी एवं जन्मरहित भगवान् विष्णु भी अन्तर्धान हो जाते हैं, स्मस्त भाव अभाव में परिणत हो जाते हैं, दिशाओं के अधिपति भी जरा-जीर्ण हो जाते हैं। बड़े-बड़े देवगण एवं समस्त प्राणिसमूह वैसे ही विनाश की ओर दौड़ते चले जाते हैं, जिस प्रकार सागरों का जल बड़वानल की ओर दौड़ता चला जा रहा है। आपत्तियाँ क्षणभर में विपत्तिग्रस्त बना देती हैं, तो क्षणभर में समस्त वैभवसम्पदाएँ समीप में एकत्रित हो जाती हैं। क्षणभर में मृत्यु एवं क्षणभर में जन्म हो जाता है। ये सभी प्रपञ्च नश्वर हैं । इस जगत् में कायर पुरुषों के द्वारा शूरवीरों का संहार होता है, कभी-कभी एक के द्वारा सैकड़ों-हजारों का विनाश हो जाता है । विषय- भोगों के द्वारा चित्त में जो विषमता आ जाती है, वही विषरूप है । प्रत्यक्ष षिष इतना भीषण विष नहीं कहा जाता; क्योंकि वह विष तो मात्र एक ही जन्म को नष्ट करता है और विषय-भोग तो जन्म-जन्मान्तर को ही विनष्ट कर देते हैं। अतः इस समय दोषरूपी दावानल से जला मेरा चित्त ऐसा ही प्रतीत हो रहा है ।।
Verse ५६
स्फुरन्ति हि न भोगाशा मृगतृष्णासर:स्वपि । अतो मां बोधयाशु त्वं तत्त्वज्ञानेन वै गुरो ।।
sphuranti hi na bhogāśā mṛgatṛṣṇāsara:svapi । ato māṃ bodhayāśu tvaṃ tattvajñānena vai guro ।।
The Waking-Dream: The 'kingdom' of the mind, which has developed or not, as identifying one's self with these.
मृगमरीचिका (तृष्णा) के सरोवर में खड़े होने के बाद भी मुझमें भोग-लिप्सा की स्फुरणा नहीं हो रही है। अतः हे पिता, हे गुरु! आप मुझे तत्त्वज्ञानात्मक बोध शीघ्रातिशीघ्र प्रदान करने की कृपा करें। अन्यथा मैं मान एवं मत्सर का परित्याग कर अपने चित्त में भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए चित्रलिखित की तरह से मौनव्रत स्वीकार कर लूँगा ॥
Verse ५७
नो चेन्मौनं समास्थाय निर्मानो गतमत्सरः । भावयन्मनसा विष्णु लिपिकर्मार्पितोपमः ॥
no cenmaunaṃ samāsthāya nirmāno gatamatsaraḥ । bhāvayanmanasā viṣṇu lipikarmārpitopamaḥ ॥
The dream state: it is of many kinds arising from the waking state, in the form of two-moons, shell-silver, mirage etc. The reflection by the awakened person 'this was seen only a short time, it will not arise - Because of not seeing for long, it is like the working state.'
मृगमरीचिका (तृष्णा) के सरोवर में खड़े होने के बाद भी मुझमें भोग-लिप्सा की स्फुरणा नहीं हो रही है। अतः हे पिता, हे गुरु! आप मुझे तत्त्वज्ञानात्मक बोध शीघ्रातिशीघ्र प्रदान करने की कृपा करें। अन्यथा मैं मान एवं मत्सर का परित्याग कर अपने चित्त में भगवान् विष्णु का ध्यान करते हुए चित्रलिखित की तरह से मौनव्रत स्वीकार कर लूँगा ॥