Books / Maha Upanishad

2. द्वितीयोऽध्यायः

द्वितीयोऽध्यायः (part 1)

Verse १

शुको नाम महातेजाः स्वरूपानन्दतत्परः । जातमात्रेण मुनिराड् यत्सत्यं तदवाप्तवान् ॥

śuko nāma mahātejāḥ svarūpānandatatparaḥ । jātamātreṇa munirāḍ yatsatyaṃ tadavāptavān ॥

I myself knew this already; the same was told to me by my father; also by you, most eloquent speaker; this is also the matter seen in the Shastras. The mass of mental fancies dies away by the death of the fancies; worldly life is also buried away - this is certain. So great-armed Janaka, pray tell me the truth, firmly - the world gets peace for the reeling mind from you'.

शुक नामक महातेजस् सम्पन्न एक मुनीश्वर सतत आत्मा के आस्वादन में संलग्न रहते थे। जन्म के तुरन्त बाद ही उन्हें सत्य एवं तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो गई थी। इस कारण से उन्होंने अपने विवेक से स्वयं ही चिरकाल तक चिन्तन-मनन करने के पशात् आत्मा के स्वरूप को जानने की निश्चित धारणा बनाई ॥


Verse २

तेनासौ स्वविवेकेन स्वयमेव महामनाः ।प्रविचार्य चिरं साधु स्वात्मनिश्चयमाप्तवान्॥

tenāsau svavivekena svayameva mahāmanāḥ ।pravicārya ciraṃ sādhu svātmaniścayamāptavān॥

Janaka) replied): 'O Suka, listen to what I speak, the details of knowledge, the essence of wisdom, by knowing which one can get the status of Liberation in life'.

शुक नामक महातेजस् सम्पन्न एक मुनीश्वर सतत आत्मा के आस्वादन में संलग्न रहते थे। जन्म के तुरन्त बाद ही उन्हें सत्य एवं तत्त्वज्ञान की प्राप्ति हो गई थी। इस कारण से उन्होंने अपने विवेक से स्वयं ही चिरकाल तक चिन्तन-मनन करने के पशात् आत्मा के स्वरूप को जानने की निश्चित धारणा बनाई ॥


Verse ३

अनाख्यत्वादगम्यत्वान्मनः षष्ठेन्द्रियस्थितेः । चिन्मात्रमेवमात्माणुराकाशादपि सूक्ष्मकः ।।

anākhyatvādagamyatvānmanaḥ ṣaṣṭhendriyasthiteḥ । cinmātramevamātmāṇurākāśādapi sūkṣmakaḥ ।।

When there is generated a wiping away of visible phenomena by the mind realizing that there is no (real) visible object, then arises the great joy of Nirvana (Extinction - Liberation).

वचनों से परे होने के कारण, अगम्य होने के कारण तथा मन रूपी छठी इन्द्रिय में प्रतिष्ठित होने के कारण यह आत्मा अणु के आकार वाला, चिन्मात्र एवं आकाश से भी अतिसूक्ष्म है। इस परम् चिदरूप अणु के अन्दर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड रूपी रेणुकाएँ शक्ति क्रमानुसार प्रकट एवं प्रतिष्ठित होकर विलीन होती रहती हैं। आत्मा बाह्य शून्यता के कारण आकाशरूप है और चिद्रूपता के कारण अनाकाशरूप है। इसके रूप का वर्णन न हो सकने के कारण यह वस्तुरूप नहीं है, किन्तु सत्ता होने से वस्तुरूप है। प्रकाशरूप होने के कारण वह चेतन है तथा वेदना का विषय न होने से वह शिला के सदृश (जड़) है। अपने अन्त में स्थित आत्माकाश में वह चित्र-विचित्र विभिन्न प्रकार के जगत् का उन्मेष (सृजन) करता है ॥


Verse ४

चिदणोः परमस्यान्तःकोटिब्रह्माण्डरेणवः । उत्पत्तिस्थितिमभ्येत्य लीयन्ते शक्तिपर्ययात्॥

cidaṇoḥ paramasyāntaḥkoṭibrahmāṇḍareṇavaḥ । utpattisthitimabhyetya līyante śaktiparyayāt॥

The best, total abjuration of mental impressions (tendencies) is said by the good (people) to be liberation - it is a pure procedure (whereas) those people whose tendencies are (not given up but) purified, not subject to the danger of re-birth - these wise ones are said to be the enlightened, Liberated-in-life. Strong (intense) brooding over objects is said to be bondage; its thinning out is, Oh Brahman, liberation.

वचनों से परे होने के कारण, अगम्य होने के कारण तथा मन रूपी छठी इन्द्रिय में प्रतिष्ठित होने के कारण यह आत्मा अणु के आकार वाला, चिन्मात्र एवं आकाश से भी अतिसूक्ष्म है। इस परम् चिदरूप अणु के अन्दर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड रूपी रेणुकाएँ शक्ति क्रमानुसार प्रकट एवं प्रतिष्ठित होकर विलीन होती रहती हैं। आत्मा बाह्य शून्यता के कारण आकाशरूप है और चिद्रूपता के कारण अनाकाशरूप है। इसके रूप का वर्णन न हो सकने के कारण यह वस्तुरूप नहीं है, किन्तु सत्ता होने से वस्तुरूप है। प्रकाशरूप होने के कारण वह चेतन है तथा वेदना का विषय न होने से वह शिला के सदृश (जड़) है। अपने अन्त में स्थित आत्माकाश में वह चित्र-विचित्र विभिन्न प्रकार के जगत् का उन्मेष (सृजन) करता है ॥


Verse ५

आकाशं बाह्यशून्यत्वादनाकाशं तु चित्त्वतः ।न किंचिदयदनिर्देश्यं वस्तु सत्तेति किंचन ॥

ākāśaṃ bāhyaśūnyatvādanākāśaṃ tu cittvataḥ ।na kiṃcidayadanirdeśyaṃ vastu satteti kiṃcana ॥

II-42-62. He is said to be 'Liberated while living' who has lost taste for enjoyment by means of penance etc., and no other cause.

वचनों से परे होने के कारण, अगम्य होने के कारण तथा मन रूपी छठी इन्द्रिय में प्रतिष्ठित होने के कारण यह आत्मा अणु के आकार वाला, चिन्मात्र एवं आकाश से भी अतिसूक्ष्म है। इस परम् चिदरूप अणु के अन्दर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड रूपी रेणुकाएँ शक्ति क्रमानुसार प्रकट एवं प्रतिष्ठित होकर विलीन होती रहती हैं। आत्मा बाह्य शून्यता के कारण आकाशरूप है और चिद्रूपता के कारण अनाकाशरूप है। इसके रूप का वर्णन न हो सकने के कारण यह वस्तुरूप नहीं है, किन्तु सत्ता होने से वस्तुरूप है। प्रकाशरूप होने के कारण वह चेतन है तथा वेदना का विषय न होने से वह शिला के सदृश (जड़) है। अपने अन्त में स्थित आत्माकाश में वह चित्र-विचित्र विभिन्न प्रकार के जगत् का उन्मेष (सृजन) करता है ॥


Verse ६

चेतनोऽसौ प्रकाशत्वाद्वैद्याभावाच्छिलोपमः । स्वात्मनि व्योमनि स्वस्थे जगन्मेषचित्रकृत् ॥

cetano'sau prakāśatvādvaidyābhāvācchilopamaḥ । svātmani vyomani svasthe jaganmeṣacitrakṛt ॥

Who does not rejoice, nor languish, being detached when joy and grief befall (him) according to time (destiny);

वचनों से परे होने के कारण, अगम्य होने के कारण तथा मन रूपी छठी इन्द्रिय में प्रतिष्ठित होने के कारण यह आत्मा अणु के आकार वाला, चिन्मात्र एवं आकाश से भी अतिसूक्ष्म है। इस परम् चिदरूप अणु के अन्दर कोटि-कोटि ब्रह्माण्ड रूपी रेणुकाएँ शक्ति क्रमानुसार प्रकट एवं प्रतिष्ठित होकर विलीन होती रहती हैं। आत्मा बाह्य शून्यता के कारण आकाशरूप है और चिद्रूपता के कारण अनाकाशरूप है। इसके रूप का वर्णन न हो सकने के कारण यह वस्तुरूप नहीं है, किन्तु सत्ता होने से वस्तुरूप है। प्रकाशरूप होने के कारण वह चेतन है तथा वेदना का विषय न होने से वह शिला के सदृश (जड़) है। अपने अन्त में स्थित आत्माकाश में वह चित्र-विचित्र विभिन्न प्रकार के जगत् का उन्मेष (सृजन) करता है ॥


Verse ७

तद्भामात्रमिदं विश्वमिति न स्यात्ततः पृथक् । जगद्भेदोऽपि तद्भानमिति भेदोऽपि तन्मयः ।।

tadbhāmātramidaṃ viśvamiti na syāttataḥ pṛthak । jagadbhedo'pi tadbhānamiti bhedo'pi tanmayaḥ ।।

Who is untouched in the mind, by exaltation, anger, fear, lust and meanness;

यह विश्व उसी आत्मा का प्रकाशमात्र होने के कारण उस आत्मतत्त्व से पृथक् नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में दृष्टिगोचर होता है, वह भी उस आत्मा से अलग नहीं है । सभी से सम्बद्ध होने से उस आत्मा की गति यत्र-तत्र सर्वत्र है; किन्तु उसमें गति न होने के कारण वह चलायमान नहीं है। वह आत्मा आश्रयरहित होने से नास्ति रूप है; किन्तु सत्स्वरूप होने के कारण वह अस्तिरूप है। वही धन-प्रदाता (दानी ) की परमगति है। जो ब्रह्मानन्दमय और विज्ञानमय है तथा चित्त द्वारा सारे संकल्पों का परित्याग ही जिसका ग्रहण है। जाग्रत् अवस्था की प्रतीति के अभाव को ही ज्ञानीजन जिसकी प्रतीति बताते हैं, जिसके संकोच एवं विकास से जगत् का विनाश एवं सृजन होता है। जो वेदान्त-वाक्यों की निष्ठास्वरूप तथा वाणी के लिए अकथनीय है, मैं वही सत्चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा ब्रह्म हूँ और अन्य दूसरा कुछ भी नहीं हूँ॥


Verse ८

सर्वगः सर्वसंबन्धो गत्यभावान्न गच्छति । नास्त्यसावाश्रयाभावात्सद्रूपत्वादथास्ति च ॥

sarvagaḥ sarvasaṃbandho gatyabhāvānna gacchati । nāstyasāvāśrayābhāvātsadrūpatvādathāsti ca ॥

Who gives up (as if) playfully, the egotist tendency and remains giving up brooding;

यह विश्व उसी आत्मा का प्रकाशमात्र होने के कारण उस आत्मतत्त्व से पृथक् नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में दृष्टिगोचर होता है, वह भी उस आत्मा से अलग नहीं है । सभी से सम्बद्ध होने से उस आत्मा की गति यत्र-तत्र सर्वत्र है; किन्तु उसमें गति न होने के कारण वह चलायमान नहीं है। वह आत्मा आश्रयरहित होने से नास्ति रूप है; किन्तु सत्स्वरूप होने के कारण वह अस्तिरूप है। वही धन-प्रदाता (दानी ) की परमगति है। जो ब्रह्मानन्दमय और विज्ञानमय है तथा चित्त द्वारा सारे संकल्पों का परित्याग ही जिसका ग्रहण है। जाग्रत् अवस्था की प्रतीति के अभाव को ही ज्ञानीजन जिसकी प्रतीति बताते हैं, जिसके संकोच एवं विकास से जगत् का विनाश एवं सृजन होता है। जो वेदान्त-वाक्यों की निष्ठास्वरूप तथा वाणी के लिए अकथनीय है, मैं वही सत्चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा ब्रह्म हूँ और अन्य दूसरा कुछ भी नहीं हूँ॥


Verse ९

विज्ञानमानन्दं ब्रह्म रातेर्दतुः परायणम् । सर्वसंकल्पसंन्यासचेतसा यत्परिग्रहः ॥

vijñānamānandaṃ brahma rāterdatuḥ parāyaṇam । sarvasaṃkalpasaṃnyāsacetasā yatparigrahaḥ ॥

Who is free from desire and non-desire as he is introvert and behaves as in deep sleep;

यह विश्व उसी आत्मा का प्रकाशमात्र होने के कारण उस आत्मतत्त्व से पृथक् नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में दृष्टिगोचर होता है, वह भी उस आत्मा से अलग नहीं है । सभी से सम्बद्ध होने से उस आत्मा की गति यत्र-तत्र सर्वत्र है; किन्तु उसमें गति न होने के कारण वह चलायमान नहीं है। वह आत्मा आश्रयरहित होने से नास्ति रूप है; किन्तु सत्स्वरूप होने के कारण वह अस्तिरूप है। वही धन-प्रदाता (दानी ) की परमगति है। जो ब्रह्मानन्दमय और विज्ञानमय है तथा चित्त द्वारा सारे संकल्पों का परित्याग ही जिसका ग्रहण है। जाग्रत् अवस्था की प्रतीति के अभाव को ही ज्ञानीजन जिसकी प्रतीति बताते हैं, जिसके संकोच एवं विकास से जगत् का विनाश एवं सृजन होता है। जो वेदान्त-वाक्यों की निष्ठास्वरूप तथा वाणी के लिए अकथनीय है, मैं वही सत्चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा ब्रह्म हूँ और अन्य दूसरा कुछ भी नहीं हूँ॥


Verse १०

जाग्रतः प्रत्ययाभावं यस्याहुः प्रत्ययं बुधाः । यत्संकोचविकासाभ्यां जगत्प्रलयसृष्टयः ॥

jāgrataḥ pratyayābhāvaṃ yasyāhuḥ pratyayaṃ budhāḥ । yatsaṃkocavikāsābhyāṃ jagatpralayasṛṣṭayaḥ ॥

Who is seated delighting in the spirit, replete, pure in mind having got excellent repose and desires nothing in the material world and lives without unction;

यह विश्व उसी आत्मा का प्रकाशमात्र होने के कारण उस आत्मतत्त्व से पृथक् नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में दृष्टिगोचर होता है, वह भी उस आत्मा से अलग नहीं है । सभी से सम्बद्ध होने से उस आत्मा की गति यत्र-तत्र सर्वत्र है; किन्तु उसमें गति न होने के कारण वह चलायमान नहीं है। वह आत्मा आश्रयरहित होने से नास्ति रूप है; किन्तु सत्स्वरूप होने के कारण वह अस्तिरूप है। वही धन-प्रदाता (दानी ) की परमगति है। जो ब्रह्मानन्दमय और विज्ञानमय है तथा चित्त द्वारा सारे संकल्पों का परित्याग ही जिसका ग्रहण है। जाग्रत् अवस्था की प्रतीति के अभाव को ही ज्ञानीजन जिसकी प्रतीति बताते हैं, जिसके संकोच एवं विकास से जगत् का विनाश एवं सृजन होता है। जो वेदान्त-वाक्यों की निष्ठास्वरूप तथा वाणी के लिए अकथनीय है, मैं वही सत्चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा ब्रह्म हूँ और अन्य दूसरा कुछ भी नहीं हूँ॥


Verse ११

निष्ठा वेदान्तवाक्यानामथ वाचामगोचरः ।अहं सच्चित्परानन्दब्रह्मैवास्मि न चेतरः ॥

niṣṭhā vedāntavākyānāmatha vācāmagocaraḥ ।ahaṃ saccitparānandabrahmaivāsmi na cetaraḥ ॥

Who is un-smeared in the region of the heart with (objects of) knowledge and whose consciousness is not inert;

यह विश्व उसी आत्मा का प्रकाशमात्र होने के कारण उस आत्मतत्त्व से पृथक् नहीं है। जो विश्वभेद आत्मा में दृष्टिगोचर होता है, वह भी उस आत्मा से अलग नहीं है । सभी से सम्बद्ध होने से उस आत्मा की गति यत्र-तत्र सर्वत्र है; किन्तु उसमें गति न होने के कारण वह चलायमान नहीं है। वह आत्मा आश्रयरहित होने से नास्ति रूप है; किन्तु सत्स्वरूप होने के कारण वह अस्तिरूप है। वही धन-प्रदाता (दानी ) की परमगति है। जो ब्रह्मानन्दमय और विज्ञानमय है तथा चित्त द्वारा सारे संकल्पों का परित्याग ही जिसका ग्रहण है। जाग्रत् अवस्था की प्रतीति के अभाव को ही ज्ञानीजन जिसकी प्रतीति बताते हैं, जिसके संकोच एवं विकास से जगत् का विनाश एवं सृजन होता है। जो वेदान्त-वाक्यों की निष्ठास्वरूप तथा वाणी के लिए अकथनीय है, मैं वही सत्चित्-आनन्द स्वरूप परमात्मा ब्रह्म हूँ और अन्य दूसरा कुछ भी नहीं हूँ॥


Verse १२

स्वयैव सूक्ष्मया बुद्ध्या सर्वं विज्ञातवाञ्छुकः । स्वयं प्राप्ते परे वस्तुन्यविश्रान्तमनाः स्थितः ॥

svayaiva sūkṣmayā buddhyā sarvaṃ vijñātavāñchukaḥ । svayaṃ prāpte pare vastunyaviśrāntamanāḥ sthitaḥ ॥

Who performs without expectation, likes and dislikes (actions) (acts of) joy and grief, virtue and vice, success and failure;

इस प्रकार अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा श्री शुकदेव मुनि ने सभी कुछ जान लिया तथा स्वयं प्राप्त हुए परमात्मतत्व में वे अविश्रान्त सतत लगे रहने वाले मन से प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार का विश्वास उनकी आत्मा में प्राप्त हो गया कि ‘यही वस्तु है', इससे भिन्न और कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार जलद के धारा प्रपात से सन्तुष्ट हुए चातक की चंचलता दूर हो जाती है, उसी प्रकार शुकदेव जी का चित्त विभिन्न तरह के भोगों से प्रादुर्भूत विषय-चापल्य से विरत होकर कैवल्यावस्था को प्राप्त हो गया ॥


Verse १३

इदं वस्त्विति विश्वास नासावात्मन्युपाययौ । केवलं विररामास्य चेतो विषयचापलम्।भोगेभ्यो भूरिभङ्गेभ्यो धाराभ्य इव चातकः ॥

idaṃ vastviti viśvāsa nāsāvātmanyupāyayau । kevalaṃ virarāmāsya ceto viṣayacāpalam।bhogebhyo bhūribhaṅgebhyo dhārābhya iva cātakaḥ ॥

Who is silent, egoless, prideless, avoiding jealousy and does actions without agitation;

इस प्रकार अपनी सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा श्री शुकदेव मुनि ने सभी कुछ जान लिया तथा स्वयं प्राप्त हुए परमात्मतत्व में वे अविश्रान्त सतत लगे रहने वाले मन से प्रतिष्ठित हुए। इस प्रकार का विश्वास उनकी आत्मा में प्राप्त हो गया कि ‘यही वस्तु है', इससे भिन्न और कुछ भी नहीं है। जिस प्रकार जलद के धारा प्रपात से सन्तुष्ट हुए चातक की चंचलता दूर हो जाती है, उसी प्रकार शुकदेव जी का चित्त विभिन्न तरह के भोगों से प्रादुर्भूत विषय-चापल्य से विरत होकर कैवल्यावस्था को प्राप्त हो गया ॥


Verse १४

एकदा सोऽमलप्रज्ञो मेरावेकान्तसंस्थितः।पप्रच्छ पितरं भक्त्या कृष्णद्वैपायनं मुनिम्॥

ekadā so'malaprajño merāvekāntasaṃsthitaḥ।papraccha pitaraṃ bhaktyā kṛṣṇadvaipāyanaṃ munim॥

Who exists like a detached onlooker and functions without attachment and desire everywhere;

एक बार उन प्रज्ञावान् मनीषी श्री शुकदेव जी ने मेरु-पर्वत पर एकान्त में प्रतिष्ठित अपने पिता श्रीकृष्ण द्वैपायन मुनि के आश्रम में जाकर भक्तिपूर्वक अर्चना करके पूछा-हे श्रेष्ठ मुने! इस जगत् रूप प्रपञ्च का प्राकट्य किस प्रकार हुआ और इसका विनाश कैसे होता है? यह क्या है? किसका है और इसकी उत्पत्ति कब हुई ? यह सभी कुछ कृपापूर्वक हमें बताने का अनुग्रह करें ॥


Verse १५

संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं मुने।कथं च प्रशमं याति किं यत्कस्य कदा वद ॥

saṃsārāḍambaramidaṃ kathamabhyutthitaṃ mune।kathaṃ ca praśamaṃ yāti kiṃ yatkasya kadā vada ॥

Who has given up internally all of Dharma and Adharma, thought and desire;

एक बार उन प्रज्ञावान् मनीषी श्री शुकदेव जी ने मेरु-पर्वत पर एकान्त में प्रतिष्ठित अपने पिता श्रीकृष्ण द्वैपायन मुनि के आश्रम में जाकर भक्तिपूर्वक अर्चना करके पूछा-हे श्रेष्ठ मुने! इस जगत् रूप प्रपञ्च का प्राकट्य किस प्रकार हुआ और इसका विनाश कैसे होता है? यह क्या है? किसका है और इसकी उत्पत्ति कब हुई ? यह सभी कुछ कृपापूर्वक हमें बताने का अनुग्रह करें ॥


Verse १६

एवं पृष्टेन मुनिना व्यासेनाखिलमात्मजे। यथावदखिलं प्रोक्तं वक्तव्यं विदितात्मना।।

evaṃ pṛṣṭena muninā vyāsenākhilamātmaje। yathāvadakhilaṃ proktaṃ vaktavyaṃ viditātmanā।।

Who has given up fully the (worldly) view;

शुकदेव जी के इस प्रकार पूछे जाने पर आत्मज्ञानी व्यासजी ने उन्हें सभी बातें यथावत् याला दीं, लेकिन ये सभी बातें तो दीर्घकाल से ही मालूम हैं, ऐसा जानकर शुकदेव जी ने अपने पिता श्रीव्यास जी की बातों को अपनी बुद्धि से वैसा विशेष सम्मान नहीं दिया। शुकदेव जी के इस भाव को व्यास जी समझकर बोले-हे पुत्र । मैं तुम्हारी इन सभी बातों को तत्वत: नहीं जानता हूँ। अत: यदि इस विषय की विशेष जानकारी चाहते हो, तो मिथिलापुरी में ‘जनक' नाम के एक राजा राज्य करते हैं, वे तुम्हारी इन सभी बातों को अच्छी तरह से जानते हैं। ‘हे पुत्र! तुम उनसे सभी कुछ प्राप्त कर सकते हो। ‘पिता के द्वारा ऐसा कहे जाने पर शुकदेव जी सुमेरु-पर्वत से उतर कर समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक के द्वारा संरक्षित मिथिलापुरी में प्रविष्ट हुए ॥


Verse १७

अज्ञासिषं पूर्वमेवमहमित्यथ तत्पितुः ।स शुकः स्वकया बुद्धया न वाक्यं बहु मन्यते ॥

ajñāsiṣaṃ pūrvamevamahamityatha tatpituḥ ।sa śukaḥ svakayā buddhayā na vākyaṃ bahu manyate ॥

Who eats with equal detachment what is bitter, sour, salty, astringent, seasoned and unseasoned;

शुकदेव जी के इस प्रकार पूछे जाने पर आत्मज्ञानी व्यासजी ने उन्हें सभी बातें यथावत् याला दीं, लेकिन ये सभी बातें तो दीर्घकाल से ही मालूम हैं, ऐसा जानकर शुकदेव जी ने अपने पिता श्रीव्यास जी की बातों को अपनी बुद्धि से वैसा विशेष सम्मान नहीं दिया। शुकदेव जी के इस भाव को व्यास जी समझकर बोले-हे पुत्र । मैं तुम्हारी इन सभी बातों को तत्वत: नहीं जानता हूँ। अत: यदि इस विषय की विशेष जानकारी चाहते हो, तो मिथिलापुरी में ‘जनक' नाम के एक राजा राज्य करते हैं, वे तुम्हारी इन सभी बातों को अच्छी तरह से जानते हैं। ‘हे पुत्र! तुम उनसे सभी कुछ प्राप्त कर सकते हो। ‘पिता के द्वारा ऐसा कहे जाने पर शुकदेव जी सुमेरु-पर्वत से उतर कर समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक के द्वारा संरक्षित मिथिलापुरी में प्रविष्ट हुए ॥


Verse १८

व्यासोऽपि भगवान्बुद्ध्वा पुत्राभिप्रायमीदृशम् । प्रत्युवाच पुनः पुत्रं नाहं जानामि तत्त्वतः ॥

vyāso'pi bhagavānbuddhvā putrābhiprāyamīdṛśam । pratyuvāca punaḥ putraṃ nāhaṃ jānāmi tattvataḥ ॥

Who has given up Dharma and Adharma, joy and grief, death and birth;

शुकदेव जी के इस प्रकार पूछे जाने पर आत्मज्ञानी व्यासजी ने उन्हें सभी बातें यथावत् याला दीं, लेकिन ये सभी बातें तो दीर्घकाल से ही मालूम हैं, ऐसा जानकर शुकदेव जी ने अपने पिता श्रीव्यास जी की बातों को अपनी बुद्धि से वैसा विशेष सम्मान नहीं दिया। शुकदेव जी के इस भाव को व्यास जी समझकर बोले-हे पुत्र । मैं तुम्हारी इन सभी बातों को तत्वत: नहीं जानता हूँ। अत: यदि इस विषय की विशेष जानकारी चाहते हो, तो मिथिलापुरी में ‘जनक' नाम के एक राजा राज्य करते हैं, वे तुम्हारी इन सभी बातों को अच्छी तरह से जानते हैं। ‘हे पुत्र! तुम उनसे सभी कुछ प्राप्त कर सकते हो। ‘पिता के द्वारा ऐसा कहे जाने पर शुकदेव जी सुमेरु-पर्वत से उतर कर समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक के द्वारा संरक्षित मिथिलापुरी में प्रविष्ट हुए ॥


Verse १९

जनको नाम भूपालो विद्यते मिथिलापुरे। यथावद्वेत्त्यसौ वेद्यं तस्मात्सर्वमवाप्स्यसि ॥

janako nāma bhūpālo vidyate mithilāpure। yathāvadvettyasau vedyaṃ tasmātsarvamavāpsyasi ॥

Who, free from tension and joy, does not get depressed or elated, with a pure intellect;

शुकदेव जी के इस प्रकार पूछे जाने पर आत्मज्ञानी व्यासजी ने उन्हें सभी बातें यथावत् याला दीं, लेकिन ये सभी बातें तो दीर्घकाल से ही मालूम हैं, ऐसा जानकर शुकदेव जी ने अपने पिता श्रीव्यास जी की बातों को अपनी बुद्धि से वैसा विशेष सम्मान नहीं दिया। शुकदेव जी के इस भाव को व्यास जी समझकर बोले-हे पुत्र । मैं तुम्हारी इन सभी बातों को तत्वत: नहीं जानता हूँ। अत: यदि इस विषय की विशेष जानकारी चाहते हो, तो मिथिलापुरी में ‘जनक' नाम के एक राजा राज्य करते हैं, वे तुम्हारी इन सभी बातों को अच्छी तरह से जानते हैं। ‘हे पुत्र! तुम उनसे सभी कुछ प्राप्त कर सकते हो। ‘पिता के द्वारा ऐसा कहे जाने पर शुकदेव जी सुमेरु-पर्वत से उतर कर समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक के द्वारा संरक्षित मिथिलापुरी में प्रविष्ट हुए ॥


Verse २०

पित्रेत्युक्तः शुकः प्रायात्सुमेरोर्वसुधातलम् । विदेहनगरी प्राप जनकेनाभिपालिताम्॥

pitretyuktaḥ śukaḥ prāyātsumerorvasudhātalam । videhanagarī prāpa janakenābhipālitām॥

Who has given up all desires, all doubts, all conation, all rigid thoughts;

शुकदेव जी के इस प्रकार पूछे जाने पर आत्मज्ञानी व्यासजी ने उन्हें सभी बातें यथावत् याला दीं, लेकिन ये सभी बातें तो दीर्घकाल से ही मालूम हैं, ऐसा जानकर शुकदेव जी ने अपने पिता श्रीव्यास जी की बातों को अपनी बुद्धि से वैसा विशेष सम्मान नहीं दिया। शुकदेव जी के इस भाव को व्यास जी समझकर बोले-हे पुत्र । मैं तुम्हारी इन सभी बातों को तत्वत: नहीं जानता हूँ। अत: यदि इस विषय की विशेष जानकारी चाहते हो, तो मिथिलापुरी में ‘जनक' नाम के एक राजा राज्य करते हैं, वे तुम्हारी इन सभी बातों को अच्छी तरह से जानते हैं। ‘हे पुत्र! तुम उनसे सभी कुछ प्राप्त कर सकते हो। ‘पिता के द्वारा ऐसा कहे जाने पर शुकदेव जी सुमेरु-पर्वत से उतर कर समतल भूखण्ड पर आये और महाराज जनक के द्वारा संरक्षित मिथिलापुरी में प्रविष्ट हुए ॥


Verse २१

आवेदितोऽसौ याष्टीकैर्जनकाय महात्मने ।द्वारि व्याससुतो राजञ्छुकोऽत्र स्थितवानिति ॥

āvedito'sau yāṣṭīkairjanakāya mahātmane ।dvāri vyāsasuto rājañchuko'tra sthitavāniti ॥

Who is equal towards birth, existence and death, rise and fall.

तदनन्तर शुकदेव मुनि को आया हुआ देखकर द्वारपालों ने राजा जनक को यह संदेश दिया कि हे राजन् ! राजद्वार पर व्यास जी के पुत्र श्रीशुकदेव जी आपसे मिलने के लिए आये हैं, उन (शुकदेव) मुनि की परीक्षा के लिए महाराज जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो कि ‘वे वहीं पर रुकें', इतना कहने के उपरान्त राजा सात दिनों तक पूरी तरह से शान्त रहे । इसके पश्चात् उन्होंने शुकदेव मुनि को अपने राज-प्राङ्गण में आमन्त्रित किया और वहाँ भी वे सात दिनों तक उसी तरह शान्त रहे। इसके अनन्तर राजा ने उन्हें अपने अन्तःपुर के आँगन में ससम्मान बुलवाया तथा वहाँ पर भी सात दिनों तक वे उनके समक्ष नहीं आये । विदेहरा जनक ने अन्त:पुर में युवती स्त्रियों, विभिन्न तरह के सुस्वादु पकवान एवं भोज्य पक्वा, सहित उन श्रेष्ठ मुनि शुकदेव जी का स्वागत-सत्कार किया। वे समस्त भोग एवं भोज्य सामग्री उन व्यास पुत्र शुकदेव जी के मन को ठीक वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे कि मन्द-मन्द प्रवाहित पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए पर्वत को गतिशील नहीं कर सकता। वहाँ उस अन्त:पुर में ज्ञानी शुकदेव जी असङ्ग, समभाव वाले, निर्मल एवं पूर्णचन्द्र के सदृश प्रतिष्ठित बने रहे ॥


Verse २२

जिज्ञासार्थं शुकस्यासावास्तामेवेत्यवज्ञया। उक्त्वा बभूव जनकस्तूष्णीं सप्त दिनान्यथ ॥

jijñāsārthaṃ śukasyāsāvāstāmevetyavajñayā। uktvā babhūva janakastūṣṇīṃ sapta dinānyatha ॥

Who does not dislike or hanker after anything and enjoys incidental pleasure.

तदनन्तर शुकदेव मुनि को आया हुआ देखकर द्वारपालों ने राजा जनक को यह संदेश दिया कि हे राजन् ! राजद्वार पर व्यास जी के पुत्र श्रीशुकदेव जी आपसे मिलने के लिए आये हैं, उन (शुकदेव) मुनि की परीक्षा के लिए महाराज जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो कि ‘वे वहीं पर रुकें', इतना कहने के उपरान्त राजा सात दिनों तक पूरी तरह से शान्त रहे । इसके पश्चात् उन्होंने शुकदेव मुनि को अपने राज-प्राङ्गण में आमन्त्रित किया और वहाँ भी वे सात दिनों तक उसी तरह शान्त रहे। इसके अनन्तर राजा ने उन्हें अपने अन्तःपुर के आँगन में ससम्मान बुलवाया तथा वहाँ पर भी सात दिनों तक वे उनके समक्ष नहीं आये । विदेहरा जनक ने अन्त:पुर में युवती स्त्रियों, विभिन्न तरह के सुस्वादु पकवान एवं भोज्य पक्वा, सहित उन श्रेष्ठ मुनि शुकदेव जी का स्वागत-सत्कार किया। वे समस्त भोग एवं भोज्य सामग्री उन व्यास पुत्र शुकदेव जी के मन को ठीक वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे कि मन्द-मन्द प्रवाहित पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए पर्वत को गतिशील नहीं कर सकता। वहाँ उस अन्त:पुर में ज्ञानी शुकदेव जी असङ्ग, समभाव वाले, निर्मल एवं पूर्णचन्द्र के सदृश प्रतिष्ठित बने रहे ॥


Verse २३

ततः प्रवेशयामास जनकः शुकमङ्गणे। तात्राहानि स सप्तैव तथैवावसदुन्मनाः ॥

tataḥ praveśayāmāsa janakaḥ śukamaṅgaṇe। tātrāhāni sa saptaiva tathaivāvasadunmanāḥ ॥

Whose thought of worldly life has quietened down, who has aspects and yet is aspect-less, having mind - yet mindless.

तदनन्तर शुकदेव मुनि को आया हुआ देखकर द्वारपालों ने राजा जनक को यह संदेश दिया कि हे राजन् ! राजद्वार पर व्यास जी के पुत्र श्रीशुकदेव जी आपसे मिलने के लिए आये हैं, उन (शुकदेव) मुनि की परीक्षा के लिए महाराज जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो कि ‘वे वहीं पर रुकें', इतना कहने के उपरान्त राजा सात दिनों तक पूरी तरह से शान्त रहे । इसके पश्चात् उन्होंने शुकदेव मुनि को अपने राज-प्राङ्गण में आमन्त्रित किया और वहाँ भी वे सात दिनों तक उसी तरह शान्त रहे। इसके अनन्तर राजा ने उन्हें अपने अन्तःपुर के आँगन में ससम्मान बुलवाया तथा वहाँ पर भी सात दिनों तक वे उनके समक्ष नहीं आये । विदेहरा जनक ने अन्त:पुर में युवती स्त्रियों, विभिन्न तरह के सुस्वादु पकवान एवं भोज्य पक्वा, सहित उन श्रेष्ठ मुनि शुकदेव जी का स्वागत-सत्कार किया। वे समस्त भोग एवं भोज्य सामग्री उन व्यास पुत्र शुकदेव जी के मन को ठीक वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे कि मन्द-मन्द प्रवाहित पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए पर्वत को गतिशील नहीं कर सकता। वहाँ उस अन्त:पुर में ज्ञानी शुकदेव जी असङ्ग, समभाव वाले, निर्मल एवं पूर्णचन्द्र के सदृश प्रतिष्ठित बने रहे ॥


Verse २४

ततः प्रवेशयामास जनकोऽन्तःपुराजिरे।राजा न दृश्यते तावदिति सप्त दिनानि तम्॥

tataḥ praveśayāmāsa janako'ntaḥpurājire।rājā na dṛśyate tāvaditi sapta dināni tam॥

Who is active towards all objects, yet is desireless as if they are alien objects, is full in spirit.

तदनन्तर शुकदेव मुनि को आया हुआ देखकर द्वारपालों ने राजा जनक को यह संदेश दिया कि हे राजन् ! राजद्वार पर व्यास जी के पुत्र श्रीशुकदेव जी आपसे मिलने के लिए आये हैं, उन (शुकदेव) मुनि की परीक्षा के लिए महाराज जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो कि ‘वे वहीं पर रुकें', इतना कहने के उपरान्त राजा सात दिनों तक पूरी तरह से शान्त रहे । इसके पश्चात् उन्होंने शुकदेव मुनि को अपने राज-प्राङ्गण में आमन्त्रित किया और वहाँ भी वे सात दिनों तक उसी तरह शान्त रहे। इसके अनन्तर राजा ने उन्हें अपने अन्तःपुर के आँगन में ससम्मान बुलवाया तथा वहाँ पर भी सात दिनों तक वे उनके समक्ष नहीं आये । विदेहरा जनक ने अन्त:पुर में युवती स्त्रियों, विभिन्न तरह के सुस्वादु पकवान एवं भोज्य पक्वा, सहित उन श्रेष्ठ मुनि शुकदेव जी का स्वागत-सत्कार किया। वे समस्त भोग एवं भोज्य सामग्री उन व्यास पुत्र शुकदेव जी के मन को ठीक वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे कि मन्द-मन्द प्रवाहित पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए पर्वत को गतिशील नहीं कर सकता। वहाँ उस अन्त:पुर में ज्ञानी शुकदेव जी असङ्ग, समभाव वाले, निर्मल एवं पूर्णचन्द्र के सदृश प्रतिष्ठित बने रहे ॥


Verse २५

तत्रोन्मदाभिः कान्ताभिर्भोजनैर्भोगसंचयैः ।जनको लालयामास शुकं शशिनिभाननम् ॥

tatronmadābhiḥ kāntābhirbhojanairbhogasaṃcayaiḥ ।janako lālayāmāsa śukaṃ śaśinibhānanam ॥

II-63-69. He gives up the state of Jivanmukta when this body is consigned to time (death) and enters the state of Adehamukta (liberated without body), like wind which does not move.

तदनन्तर शुकदेव मुनि को आया हुआ देखकर द्वारपालों ने राजा जनक को यह संदेश दिया कि हे राजन् ! राजद्वार पर व्यास जी के पुत्र श्रीशुकदेव जी आपसे मिलने के लिए आये हैं, उन (शुकदेव) मुनि की परीक्षा के लिए महाराज जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो कि ‘वे वहीं पर रुकें', इतना कहने के उपरान्त राजा सात दिनों तक पूरी तरह से शान्त रहे । इसके पश्चात् उन्होंने शुकदेव मुनि को अपने राज-प्राङ्गण में आमन्त्रित किया और वहाँ भी वे सात दिनों तक उसी तरह शान्त रहे। इसके अनन्तर राजा ने उन्हें अपने अन्तःपुर के आँगन में ससम्मान बुलवाया तथा वहाँ पर भी सात दिनों तक वे उनके समक्ष नहीं आये । विदेहरा जनक ने अन्त:पुर में युवती स्त्रियों, विभिन्न तरह के सुस्वादु पकवान एवं भोज्य पक्वा, सहित उन श्रेष्ठ मुनि शुकदेव जी का स्वागत-सत्कार किया। वे समस्त भोग एवं भोज्य सामग्री उन व्यास पुत्र शुकदेव जी के मन को ठीक वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे कि मन्द-मन्द प्रवाहित पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए पर्वत को गतिशील नहीं कर सकता। वहाँ उस अन्त:पुर में ज्ञानी शुकदेव जी असङ्ग, समभाव वाले, निर्मल एवं पूर्णचन्द्र के सदृश प्रतिष्ठित बने रहे ॥


Verse २६

ते भोगास्तानि भोज्यानि व्यासपुत्रस्य तन्मनः । नाजह्रुर्मन्दपवनो वद्धपीठमिवाचलम् ॥

te bhogāstāni bhojyāni vyāsaputrasya tanmanaḥ । nājahrurmandapavano vaddhapīṭhamivācalam ॥

Such a person does not rise or set, is neither real nor unreal, nor is he far away, nor 'I' nor 'another'. Other, than him, there is no lustrous nor darkness which is steady and profound, ineffable and unmanifest. Not empty vacuum, not having form, neither visible nor vision; nor a mass of creations but existing infinitely.

तदनन्तर शुकदेव मुनि को आया हुआ देखकर द्वारपालों ने राजा जनक को यह संदेश दिया कि हे राजन् ! राजद्वार पर व्यास जी के पुत्र श्रीशुकदेव जी आपसे मिलने के लिए आये हैं, उन (शुकदेव) मुनि की परीक्षा के लिए महाराज जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो कि ‘वे वहीं पर रुकें', इतना कहने के उपरान्त राजा सात दिनों तक पूरी तरह से शान्त रहे । इसके पश्चात् उन्होंने शुकदेव मुनि को अपने राज-प्राङ्गण में आमन्त्रित किया और वहाँ भी वे सात दिनों तक उसी तरह शान्त रहे। इसके अनन्तर राजा ने उन्हें अपने अन्तःपुर के आँगन में ससम्मान बुलवाया तथा वहाँ पर भी सात दिनों तक वे उनके समक्ष नहीं आये । विदेहरा जनक ने अन्त:पुर में युवती स्त्रियों, विभिन्न तरह के सुस्वादु पकवान एवं भोज्य पक्वा, सहित उन श्रेष्ठ मुनि शुकदेव जी का स्वागत-सत्कार किया। वे समस्त भोग एवं भोज्य सामग्री उन व्यास पुत्र शुकदेव जी के मन को ठीक वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे कि मन्द-मन्द प्रवाहित पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए पर्वत को गतिशील नहीं कर सकता। वहाँ उस अन्त:पुर में ज्ञानी शुकदेव जी असङ्ग, समभाव वाले, निर्मल एवं पूर्णचन्द्र के सदृश प्रतिष्ठित बने रहे ॥


Verse २७

केवलं सुसमः स्वच्छो मौनी मुदितमानसः। संपूर्ण इव शीतांशुरतिष्ठदमलः शुकः ॥

kevalaṃ susamaḥ svaccho maunī muditamānasaḥ। saṃpūrṇa iva śītāṃśuratiṣṭhadamalaḥ śukaḥ ॥

Undesignated in nature, fuller than the fullest, neither real nor unreal, neither being nor coming into being, pure consciousness; not the Chaitya (world created by mind), endless, ageless, auspicious, having no beginning, middle or end, having no ailment in mind or body. That which is considered as the vision amidst the seer, seeing and object of seeing. O sage, there is surely nothing beyond this.

तदनन्तर शुकदेव मुनि को आया हुआ देखकर द्वारपालों ने राजा जनक को यह संदेश दिया कि हे राजन् ! राजद्वार पर व्यास जी के पुत्र श्रीशुकदेव जी आपसे मिलने के लिए आये हैं, उन (शुकदेव) मुनि की परीक्षा के लिए महाराज जनक ने अवज्ञापूर्वक मात्र इतना ही कहा कि उनसे कहो कि ‘वे वहीं पर रुकें', इतना कहने के उपरान्त राजा सात दिनों तक पूरी तरह से शान्त रहे । इसके पश्चात् उन्होंने शुकदेव मुनि को अपने राज-प्राङ्गण में आमन्त्रित किया और वहाँ भी वे सात दिनों तक उसी तरह शान्त रहे। इसके अनन्तर राजा ने उन्हें अपने अन्तःपुर के आँगन में ससम्मान बुलवाया तथा वहाँ पर भी सात दिनों तक वे उनके समक्ष नहीं आये । विदेहरा जनक ने अन्त:पुर में युवती स्त्रियों, विभिन्न तरह के सुस्वादु पकवान एवं भोज्य पक्वा, सहित उन श्रेष्ठ मुनि शुकदेव जी का स्वागत-सत्कार किया। वे समस्त भोग एवं भोज्य सामग्री उन व्यास पुत्र शुकदेव जी के मन को ठीक वैसे ही नहीं डिगा सके, जैसे कि मन्द-मन्द प्रवाहित पवन दृढ़तापूर्वक प्रतिष्ठित हुए पर्वत को गतिशील नहीं कर सकता। वहाँ उस अन्त:पुर में ज्ञानी शुकदेव जी असङ्ग, समभाव वाले, निर्मल एवं पूर्णचन्द्र के सदृश प्रतिष्ठित बने रहे ॥


Verse २८

परिज्ञातस्वभावं तं शुकं स जनको नृपः।आनीय मुदितात्मानमवलोक्य ननाम ह॥

parijñātasvabhāvaṃ taṃ śukaṃ sa janako nṛpaḥ।ānīya muditātmānamavalokya nanāma ha॥

II-70-73. It is known by yourself as well as heard from a preceptor: - one is bound by one's own fancy and released by being rid of it - detachment towards enjoyment of all visible (external) objects has arisen (in you); all that is to be got has been got by you with a perfect mind; you feel (erred) in regard to your own nature but now being liberated, give up error; you see that you are Brahman itself beyond what is external and internal - you see but you do not see; you are the sole and perfect onlooker (un-involved).

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।


Verse २९

निःशेषितजगत्कार्यः प्राप्ताखिलमनोरथः । किमीप्सितं तवेत्याह कृतस्वागतमाह तम्॥

niḥśeṣitajagatkāryaḥ prāptākhilamanorathaḥ । kimīpsitaṃ tavetyāha kṛtasvāgatamāha tam॥

II-74-77. Suka, reposed silently (passively) in the Supreme Being in the own normal state, devoid of grief, fear and strain. Then he went to the peak of Meru mountain, unimpeded, for trance. There, for thousands of years he remained in 'unqualified trance' and attained rest in himself, like a flame without oil.

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।


Verse ३०

संसाराडम्बरमिदं कथमभ्युत्थितं गुरो।कथं प्रशममायाति यथावत्कथयाशु मे ॥

saṃsārāḍambaramidaṃ kathamabhyutthitaṃ guro।kathaṃ praśamamāyāti yathāvatkathayāśu me ॥

Purified of the blemish of manifold thought, in the pristine and pure condition, he became one, with all (worldly) tendencies melting away like water-drop in the ocean.

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।

द्वितीयोऽध्यायः (part 2)

Verse ३१

यथावदखिलं प्रोक्तं जनकेन महात्मना।तदेव यत्पुरा प्रोक्तं तस्य पित्रा महाधिया ॥

yathāvadakhilaṃ proktaṃ janakena mahātmanā।tadeva yatpurā proktaṃ tasya pitrā mahādhiyā ॥

III-1-15. A lad, Nidagha, prince of seers and enlightened, permitted by his father to go on a pilgrimage, had ablution in three and a half Crores of sacred places, then told Ribhu about himself. 'After bathing in so many places an enquiry (question) has arisen there in my mind:

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।


Verse ३२

स्वयमेव मया पूर्वमभिज्ञातं विशेषतः ।एतदेव हि पृष्टेन पित्रा में समुदाहृतम् ॥

svayameva mayā pūrvamabhijñātaṃ viśeṣataḥ ।etadeva hi pṛṣṭena pitrā meṃ samudāhṛtam ॥

The world is born only to die and dies only to be reborn - all the actions of the moving and unmoving things are ephemeral; Things such are sources of splendour are sinful and give place to all calamities; unconnected with each other, like iron-stakes, they come together, only by mental fancy. I have lost taste in various things, like a traveler in deserts my mind is tormented as to how this suffering will die down; riches please me not but give only cycles of worries just as houses with children and women cause danger.

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।


Verse ३३

भवताप्येष एवार्थः कथितो वाग्विद वर ।एष एव हि वाक्यार्थः शास्त्रेषु परिदृश्यते ॥

bhavatāpyeṣa evārthaḥ kathito vāgvida vara ।eṣa eva hi vākyārthaḥ śāstreṣu paridṛśyate ॥

This (material) glory in the world is delicate, cause only delusion, does not give happiness. Life is unsteady like a drop of water hanging on to the top of a tender leaf; like an insane person it goes away, leaving the body suddenly. Life causes strain to those whose mind is shattered by contact with the poison from the snake of worldly objects and who lack mature discrimination of the self.

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।


Verse ३४

मनोविकल्पसंजातं तद्विकल्पपरिक्षयात् । क्षीयते दग्धसंसारो निःसार इति निश्चितः ॥

manovikalpasaṃjātaṃ tadvikalpaparikṣayāt । kṣīyate dagdhasaṃsāro niḥsāra iti niścitaḥ ॥

It is (possible) reasonable to envelop wind and to cut into (empty) space, to string together watery waves but not give up attachment to (worldly) life.

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।


Verse ३५

तत्किमेतन्महाभाग सत्यं ब्रूहि ममाचलम्।त्वत्तो विश्रममाप्नोति चेतसा भ्रमता जगत् ॥

tatkimetanmahābhāga satyaṃ brūhi mamācalam।tvatto viśramamāpnoti cetasā bhramatā jagat ॥

(In contrast) by attaining Brahman, what is to be got is got, which causes no grief; it is the place of highest joy.

इस प्रकार जब राजा जनक ने श्रीशुकदेवजी के चरित्र की भली-भाँति परीक्षा ले ली, तब उन्हें अपने समीप बुलाया। उन्हें प्रसन्नचित्त देखकर राजा ने प्रणाम किया और उनका सत्कार करते हुए बोले- हे शुकदेव जी! आपने अपने सांसारिक कृत्यों को समाप्त कर दिया है तथा आपको सभी मनोरथ प्राप्त हैं, कृपया बताने का अनुग्रह करें कि अब आपकी क्या अभिलाषा है? श्रीशुकदेव जी ने जिज्ञासा भाव से कहा-हे गुरुवर! कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि यह सांसारिक प्रपञ्च कैसे प्रादुर्भूत हुआ है तथा किस तरह से विलय को प्राप्त होता है? तब महान् ज्ञानी राजा जनक ने श्रीशुकदेव जी को सभी बातें तत्त्वत: बतला दी, इन्हीं बातों को उनके परम ज्ञानवान् पिता श्रीव्यास जी पहले ही बता चुके थे। इस पर श्रीशुकदेव जी ने कहा-हे गुरुश्रेष्ठ! हमने स्वयं ही इसकी विशेष रूप से जानकारी प्राप्त की थी, पूछने पर हमारे पिता श्रीव्यास जी ने भी यही बातें बतलायी थी। आपने भी यही बातें हमें बतायी हैं तथा ठीक ऐसा ही शास्त्रों का भी मत है। मन के विकल्प से ही प्रपञ्च की उत्पत्ति होती है और उस विकल्प के विनष्ट हो जाने पर इस (प्रपञ्च) का भी विनाश हो जाता है। यह जगत् निन्दनीय एवं सार-रहित है, ऐसा निश्चित है, तब हे महान् ज्ञानी राजन् । यह सब (जीवन आदि) क्या है? कृपा करके मुझे यथार्थ रूप से समझाने की कृपा करें। मेरा यह चित्त जगत् के विषय में दिग्भ्रान्त हो रहा है, अत: आपके सदुपदेश से ही शान्ति मिल सकती है।।


Verse ३६

शृणु तावदिदानीं त्वं कथ्यमानमिदं मया। श्रीशुक ज्ञानविस्तारं बुद्धिसारान्तरान्तरम्॥

śṛṇu tāvadidānīṃ tvaṃ kathyamānamidaṃ mayā। śrīśuka jñānavistāraṃ buddhisārāntarāntaram॥

Even trees live, so do animals and birds - only he (really) lives, whose mind is sustained by contemplation; the others who have no (spiritual) rebirth are only old donkeys.

इसके पश्चात् राजा जनक ने कहा-हे शुकदेव जी! अब मैं आपके प्रति सम्पूर्ण ज्ञान को विस्तारपूर्वक कहता हूँ- सुनो, यह ज्ञान समस्त ज्ञानों का सार एवं सभी रहस्यों का रहस्य है, अत: इसके जान लेने से वह पुरुष अतिशीघ्र मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। विदेहराज ने कहा कि यह दृश्य जगत् है ही नहीं, ऐसा पूर्ण बोध जब हो जाता है, तब दृश्य विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। तब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है और तभी उसे निर्वाण रूपी परम शान्ति मिल जाती है। जो वासनाओं का नि:शेष परित्याग कर देता है, वही वास्तविक श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्धावस्था को ज्ञानीजनों ने मोक्ष कहा है। पुनः जो शुद्ध वासनाओं से युक्त हैं, जो अनर्थ शून्य जीवन वाले हैं और जो ज्ञेय तत्त्व के ज्ञाता हैं, हे महान् ज्ञानी शुकदेव जी ! वे ही मनुष्य पूर्ण जीवन्मुक्त कहे जाते हैं। पदार्थों की भावनात्मक दृढ़ता को ही बन्धन और वासनाओं की क्षीणता को ही मोक्ष कहा गया है ।।


Verse ३७

यद्विज्ञानात्पुमान्सद्यो जीवन्मुक्तत्वमाप्नुयात् ॥

yadvijñānātpumānsadyo jīvanmuktatvamāpnuyāt ॥

Shastra is a burden to one who lacks (spiritual) discrimination, knowledge is a burden to one attached (to life); mind is a burden to one without security, body is a burden to one ignorant of the self.

इसके पश्चात् राजा जनक ने कहा-हे शुकदेव जी! अब मैं आपके प्रति सम्पूर्ण ज्ञान को विस्तारपूर्वक कहता हूँ- सुनो, यह ज्ञान समस्त ज्ञानों का सार एवं सभी रहस्यों का रहस्य है, अत: इसके जान लेने से वह पुरुष अतिशीघ्र मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। विदेहराज ने कहा कि यह दृश्य जगत् है ही नहीं, ऐसा पूर्ण बोध जब हो जाता है, तब दृश्य विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। तब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है और तभी उसे निर्वाण रूपी परम शान्ति मिल जाती है। जो वासनाओं का नि:शेष परित्याग कर देता है, वही वास्तविक श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्धावस्था को ज्ञानीजनों ने मोक्ष कहा है। पुनः जो शुद्ध वासनाओं से युक्त हैं, जो अनर्थ शून्य जीवन वाले हैं और जो ज्ञेय तत्त्व के ज्ञाता हैं, हे महान् ज्ञानी शुकदेव जी ! वे ही मनुष्य पूर्ण जीवन्मुक्त कहे जाते हैं। पदार्थों की भावनात्मक दृढ़ता को ही बन्धन और वासनाओं की क्षीणता को ही मोक्ष कहा गया है ।।


Verse ३८

दृश्यं नास्तीति बोधेन मनसो दृश्यमार्जनम्। संपन्नं चेत्तदुत्पन्ना परा निर्वाणनिर्वृतिः ॥

dṛśyaṃ nāstīti bodhena manaso dṛśyamārjanam। saṃpannaṃ cettadutpannā parā nirvāṇanirvṛtiḥ ॥

III-16-26. From ego does danger arise, so do bad mental ailments and desire - there is no enemy more dangerous than Ego; whatever in the moving and unmoving world was enjoyed by Ego - all that is unreal; only freedom from Ego is real. The mind runs hither and thither, in vain and with zeal, like a dog in the village. O Brahman, I have been made inert by the pursuit of thirst and eaten by my mind as by a dog.

इसके पश्चात् राजा जनक ने कहा-हे शुकदेव जी! अब मैं आपके प्रति सम्पूर्ण ज्ञान को विस्तारपूर्वक कहता हूँ- सुनो, यह ज्ञान समस्त ज्ञानों का सार एवं सभी रहस्यों का रहस्य है, अत: इसके जान लेने से वह पुरुष अतिशीघ्र मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। विदेहराज ने कहा कि यह दृश्य जगत् है ही नहीं, ऐसा पूर्ण बोध जब हो जाता है, तब दृश्य विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। तब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है और तभी उसे निर्वाण रूपी परम शान्ति मिल जाती है। जो वासनाओं का नि:शेष परित्याग कर देता है, वही वास्तविक श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्धावस्था को ज्ञानीजनों ने मोक्ष कहा है। पुनः जो शुद्ध वासनाओं से युक्त हैं, जो अनर्थ शून्य जीवन वाले हैं और जो ज्ञेय तत्त्व के ज्ञाता हैं, हे महान् ज्ञानी शुकदेव जी ! वे ही मनुष्य पूर्ण जीवन्मुक्त कहे जाते हैं। पदार्थों की भावनात्मक दृढ़ता को ही बन्धन और वासनाओं की क्षीणता को ही मोक्ष कहा गया है ।।


Verse ३९

अशेषेण परित्यागो वासनाया य उत्तमः ।मोक्ष इत्युच्यते सद्भिः ¬स एव विमलक्रमः ॥

aśeṣeṇa parityāgo vāsanāyā ya uttamaḥ ।mokṣa ityucyate sadbhiḥ ¬sa eva vimalakramaḥ ॥

Containment of the mind is impossible even by drinking up the ocean uprooting Meru and eating fire. Mind is the cause of objects; when it exists, the three worlds exist; when it does not, so do they, so it should be cured with effort.

इसके पश्चात् राजा जनक ने कहा-हे शुकदेव जी! अब मैं आपके प्रति सम्पूर्ण ज्ञान को विस्तारपूर्वक कहता हूँ- सुनो, यह ज्ञान समस्त ज्ञानों का सार एवं सभी रहस्यों का रहस्य है, अत: इसके जान लेने से वह पुरुष अतिशीघ्र मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। विदेहराज ने कहा कि यह दृश्य जगत् है ही नहीं, ऐसा पूर्ण बोध जब हो जाता है, तब दृश्य विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। तब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है और तभी उसे निर्वाण रूपी परम शान्ति मिल जाती है। जो वासनाओं का नि:शेष परित्याग कर देता है, वही वास्तविक श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्धावस्था को ज्ञानीजनों ने मोक्ष कहा है। पुनः जो शुद्ध वासनाओं से युक्त हैं, जो अनर्थ शून्य जीवन वाले हैं और जो ज्ञेय तत्त्व के ज्ञाता हैं, हे महान् ज्ञानी शुकदेव जी ! वे ही मनुष्य पूर्ण जीवन्मुक्त कहे जाते हैं। पदार्थों की भावनात्मक दृढ़ता को ही बन्धन और वासनाओं की क्षीणता को ही मोक्ष कहा गया है ।।


Verse ४०

ये शुद्धवासना भूयो न जन्मानर्थभागिनः। ज्ञातज्ञेयास्त उच्यन्ते जीवन्मुक्ता महाधियः ॥

ye śuddhavāsanā bhūyo na janmānarthabhāginaḥ। jñātajñeyāsta ucyante jīvanmuktā mahādhiyaḥ ॥

Whatever wealth of merit I acquire, that Thirst cuts down, like a mouse cutting a string. Thirst is a fickle monkey - it sets foot in impassable places, hankers after fruits even when filled with them; never rests long in a place.

इसके पश्चात् राजा जनक ने कहा-हे शुकदेव जी! अब मैं आपके प्रति सम्पूर्ण ज्ञान को विस्तारपूर्वक कहता हूँ- सुनो, यह ज्ञान समस्त ज्ञानों का सार एवं सभी रहस्यों का रहस्य है, अत: इसके जान लेने से वह पुरुष अतिशीघ्र मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। विदेहराज ने कहा कि यह दृश्य जगत् है ही नहीं, ऐसा पूर्ण बोध जब हो जाता है, तब दृश्य विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। तब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है और तभी उसे निर्वाण रूपी परम शान्ति मिल जाती है। जो वासनाओं का नि:शेष परित्याग कर देता है, वही वास्तविक श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्धावस्था को ज्ञानीजनों ने मोक्ष कहा है। पुनः जो शुद्ध वासनाओं से युक्त हैं, जो अनर्थ शून्य जीवन वाले हैं और जो ज्ञेय तत्त्व के ज्ञाता हैं, हे महान् ज्ञानी शुकदेव जी ! वे ही मनुष्य पूर्ण जीवन्मुक्त कहे जाते हैं। पदार्थों की भावनात्मक दृढ़ता को ही बन्धन और वासनाओं की क्षीणता को ही मोक्ष कहा गया है ।।


Verse ४१

पदार्यभावनादाढर्यं बन्ध इत्यभिधीयते । वासनातनवं ब्रह्मन्मोक्ष इत्यभिधीयते ॥

padāryabhāvanādāḍharyaṃ bandha ityabhidhīyate । vāsanātanavaṃ brahmanmokṣa ityabhidhīyate ॥

Throat is a bee in the lotus-heart. One moment, it goes to Patala; another, the sky; and another, it hovers in the bush of space; of all the griefs of worldly life, only thirst gives the longest grief; a person (well-guarded) in the harem it involves in great trouble.

इसके पश्चात् राजा जनक ने कहा-हे शुकदेव जी! अब मैं आपके प्रति सम्पूर्ण ज्ञान को विस्तारपूर्वक कहता हूँ- सुनो, यह ज्ञान समस्त ज्ञानों का सार एवं सभी रहस्यों का रहस्य है, अत: इसके जान लेने से वह पुरुष अतिशीघ्र मुक्ति को प्राप्त कर लेता है। विदेहराज ने कहा कि यह दृश्य जगत् है ही नहीं, ऐसा पूर्ण बोध जब हो जाता है, तब दृश्य विषय से मन की शुद्धि हो जाती है। तब यह ज्ञान पूर्ण हो जाता है और तभी उसे निर्वाण रूपी परम शान्ति मिल जाती है। जो वासनाओं का नि:शेष परित्याग कर देता है, वही वास्तविक श्रेष्ठ त्याग है, उसी विशुद्धावस्था को ज्ञानीजनों ने मोक्ष कहा है। पुनः जो शुद्ध वासनाओं से युक्त हैं, जो अनर्थ शून्य जीवन वाले हैं और जो ज्ञेय तत्त्व के ज्ञाता हैं, हे महान् ज्ञानी शुकदेव जी ! वे ही मनुष्य पूर्ण जीवन्मुक्त कहे जाते हैं। पदार्थों की भावनात्मक दृढ़ता को ही बन्धन और वासनाओं की क्षीणता को ही मोक्ष कहा गया है ।।


Verse ४२

तपःप्रभृतिना यस्मै हेतुनैव विना पुनः ।भोगा इह न रोचन्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ।।

tapaḥprabhṛtinā yasmai hetunaiva vinā punaḥ ।bhogā iha na rocante sa jīvanmukta ucyate ।।

Abandonment of brooding is the (preventive) chant for the cholera of Thirst.

जिसे तप आदि साधनों के अभाव में स्वभाववश ही सांसारिक भोग अछे नहीं लगते,वही पुरुषजीवन्मुक्त कहलाता है। जो प्रतिपल प्रा होने वाले सुखों या दुःखों में आसक्त नहीं होता था जो न हर्षित होता है और न ही दुःखी होता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है । जो हर्ष, अमर्ष, भय,काम, क्रोध एवं शोक आदि विकारों से मुक्त रहता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंकार युक्त वासना को अति सहजता से त्याग देता है तथा चित्त के अवलम्बन में जो शम्यक् रूप से त्याग भाव रखता है, वही वास्तव में जीवन्मुक्त कहलाता है ।।


Verse ४३

आपतत्सु यथाकालं सुखदुःखेष्वनारतः ।न हृष्यति ग्लायति यः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

āpatatsu yathākālaṃ sukhaduḥkheṣvanārataḥ ।na hṛṣyati glāyati yaḥ sa jīvanmukta ucyate ॥

III-27-38. There is nothing as pitiable as the body, low and meritless; it exults over a little and suffers over a little. The body is the great abode of the house-holder i.e. the Ego. Let it roll about or be steady - what is it to me, O Preceptor!

जिसे तप आदि साधनों के अभाव में स्वभाववश ही सांसारिक भोग अछे नहीं लगते,वही पुरुषजीवन्मुक्त कहलाता है। जो प्रतिपल प्रा होने वाले सुखों या दुःखों में आसक्त नहीं होता था जो न हर्षित होता है और न ही दुःखी होता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है । जो हर्ष, अमर्ष, भय,काम, क्रोध एवं शोक आदि विकारों से मुक्त रहता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंकार युक्त वासना को अति सहजता से त्याग देता है तथा चित्त के अवलम्बन में जो शम्यक् रूप से त्याग भाव रखता है, वही वास्तव में जीवन्मुक्त कहलाता है ।।


Verse ४४

हर्षामर्षभयक्रोधकामकार्पण्यदृष्टिभिः ।न परामृश्यते योऽन्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ।।

harṣāmarṣabhayakrodhakāmakārpaṇyadṛṣṭibhiḥ ।na parāmṛśyate yo'ntaḥ sa jīvanmukta ucyate ।।

This body pleases me not - the senses (animals) are bound by six ropes (vices) - in its yard, Ego leaps about, it is crowded with the servants - the mind. It is frightening with the entrance held by the monkey (tongue) - in it are seen the (bared) teeth and bones. Tell me, what is attractive in the body which is made of blood and flesh, in and out, and which is only to perish - let him trust the body, who sees steadiness in lightnings, autumn clouds, and cities in the sky (illusions). Childhood is the abode of fear from the teacher, mother, father, other people and older children.

जिसे तप आदि साधनों के अभाव में स्वभाववश ही सांसारिक भोग अछे नहीं लगते,वही पुरुषजीवन्मुक्त कहलाता है। जो प्रतिपल प्रा होने वाले सुखों या दुःखों में आसक्त नहीं होता था जो न हर्षित होता है और न ही दुःखी होता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है । जो हर्ष, अमर्ष, भय,काम, क्रोध एवं शोक आदि विकारों से मुक्त रहता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंकार युक्त वासना को अति सहजता से त्याग देता है तथा चित्त के अवलम्बन में जो शम्यक् रूप से त्याग भाव रखता है, वही वास्तव में जीवन्मुक्त कहलाता है ।।


Verse ४५

अहंकारमयीं त्यक्त्वा वासनां लीलयैव यः । तिष्ठति ध्येयसंत्यागी स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

ahaṃkāramayīṃ tyaktvā vāsanāṃ līlayaiva yaḥ । tiṣṭhati dhyeyasaṃtyāgī sa jīvanmukta ucyate ॥

One is overwhelmed by the goblin of lust which exists in the cave of one's mind and causes many delusions. Slaves, sons, women, relatives and friends laugh at a man shaken by old age as at a mad man. Desire is full of the defect of helplessness, grows long in old age, the sole friend of all danger and confuse foment is the heart.

जिसे तप आदि साधनों के अभाव में स्वभाववश ही सांसारिक भोग अछे नहीं लगते,वही पुरुषजीवन्मुक्त कहलाता है। जो प्रतिपल प्रा होने वाले सुखों या दुःखों में आसक्त नहीं होता था जो न हर्षित होता है और न ही दुःखी होता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है । जो हर्ष, अमर्ष, भय,काम, क्रोध एवं शोक आदि विकारों से मुक्त रहता है,वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंकार युक्त वासना को अति सहजता से त्याग देता है तथा चित्त के अवलम्बन में जो शम्यक् रूप से त्याग भाव रखता है, वही वास्तव में जीवन्मुक्त कहलाता है ।।


Verse ४६

ईप्सितानीप्सिते न स्तो यस्यान्तर्वर्तिदृष्टिषु । सुषुप्तिवद्यश्चरति स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

īpsitānīpsite na sto yasyāntarvartidṛṣṭiṣu । suṣuptivadyaścarati sa jīvanmukta ucyate ॥

The attribution of happiness to worldly life - even this is cut by time like grass by a rat. Time tries to possess selfishly (every thing from) grass and dust (to) Indra and gold, which is the dust of Meru - destroys all and all the three worlds are occupied by it.

जो सदैव अन्तर्मुखी दृष्टिवाला, पदार्थ की आकांक्षा से रहित और किसी भी वस्तु की अपेक्षा अथवा कामना से रहित सुषुप्ति के समान अवस्था में विचरण करता रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सदैव आत्मा में लीन रहता है, जिसका मन पूर्ण एवं पवित्र है, अत्यन्त श्रेष्ठ एवं शान्त स्वभाव को प्राप्त कर जो इस नश्वर संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता, जो किसी के प्रति आसक्ति न रखता हुआ उदासीन भाव से भ्रमण करता रहता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका हृदय किसी भी पदार्थ में लिप्त नहीं होता तथा जो चेतन संवित्( सद्ज्ञानमुक्त)स्वरूप वाला है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष राग-द्वेष, सुख-दु:ख, मान-अपमान, धर्म-अधर्म एवं फलाफल की इच्छा-आकांक्षा न रखता हुआ सदैव अपने कार्यों में व्यस्त रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंभाव को त्याग करके, मान एवं मत्सर से रहित, उद्वेगरहित तथा संकल्पविहीन रहकर कर्म करता रहता है,उसी पुरुष को ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं।।


Verse ४७

अध्यात्मरतिरासीनः पूर्णः पावनमानसः । प्राप्तानुत्तमविश्रान्तिर्नं किंचिदिह वाञ्छति ।यो जीवति गतस्त्रेहः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

adhyātmaratirāsīnaḥ pūrṇaḥ pāvanamānasaḥ । prāptānuttamaviśrāntirnaṃ kiṃcidiha vāñchati ।yo jīvati gatastrehaḥ sa jīvanmukta ucyate ॥

III-39-48. What is auspicious about woman - a puppet of flesh - moved by a machine in the cage of the body - having nerves, bones and knots?

जो सदैव अन्तर्मुखी दृष्टिवाला, पदार्थ की आकांक्षा से रहित और किसी भी वस्तु की अपेक्षा अथवा कामना से रहित सुषुप्ति के समान अवस्था में विचरण करता रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सदैव आत्मा में लीन रहता है, जिसका मन पूर्ण एवं पवित्र है, अत्यन्त श्रेष्ठ एवं शान्त स्वभाव को प्राप्त कर जो इस नश्वर संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता, जो किसी के प्रति आसक्ति न रखता हुआ उदासीन भाव से भ्रमण करता रहता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका हृदय किसी भी पदार्थ में लिप्त नहीं होता तथा जो चेतन संवित्( सद्ज्ञानमुक्त)स्वरूप वाला है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष राग-द्वेष, सुख-दु:ख, मान-अपमान, धर्म-अधर्म एवं फलाफल की इच्छा-आकांक्षा न रखता हुआ सदैव अपने कार्यों में व्यस्त रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंभाव को त्याग करके, मान एवं मत्सर से रहित, उद्वेगरहित तथा संकल्पविहीन रहकर कर्म करता रहता है,उसी पुरुष को ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं।।


Verse ४८

संवेद्येन हृदाकाशे मनागपि न लिप्यते । यस्यासावजडा संवित्स जीवन्मुक्त उच्यते ।।

saṃvedyena hṛdākāśe manāgapi na lipyate । yasyāsāvajaḍā saṃvitsa jīvanmukta ucyate ।।

Why are you deluded; separate the skin, flesh, blood and tears and then look at the body. Is it attractive?

जो सदैव अन्तर्मुखी दृष्टिवाला, पदार्थ की आकांक्षा से रहित और किसी भी वस्तु की अपेक्षा अथवा कामना से रहित सुषुप्ति के समान अवस्था में विचरण करता रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सदैव आत्मा में लीन रहता है, जिसका मन पूर्ण एवं पवित्र है, अत्यन्त श्रेष्ठ एवं शान्त स्वभाव को प्राप्त कर जो इस नश्वर संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता, जो किसी के प्रति आसक्ति न रखता हुआ उदासीन भाव से भ्रमण करता रहता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका हृदय किसी भी पदार्थ में लिप्त नहीं होता तथा जो चेतन संवित्( सद्ज्ञानमुक्त)स्वरूप वाला है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष राग-द्वेष, सुख-दु:ख, मान-अपमान, धर्म-अधर्म एवं फलाफल की इच्छा-आकांक्षा न रखता हुआ सदैव अपने कार्यों में व्यस्त रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंभाव को त्याग करके, मान एवं मत्सर से रहित, उद्वेगरहित तथा संकल्पविहीन रहकर कर्म करता रहता है,उसी पुरुष को ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं।।


Verse ४९

रागद्वेषौ सुखं दुःखं धर्माधर्मौ फलाफले ।यः करोत्यनपेक्ष्यैव स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

rāgadveṣau sukhaṃ duḥkhaṃ dharmādharmau phalāphale ।yaḥ karotyanapekṣyaiva sa jīvanmukta ucyate ॥

The pearl necklace on the breast is like the current of Ganga on Meru (fleeting and ephemeral) - the same breast is eaten by dogs at the due time like a lump of food, in the cemetery and corners of the directions.

जो सदैव अन्तर्मुखी दृष्टिवाला, पदार्थ की आकांक्षा से रहित और किसी भी वस्तु की अपेक्षा अथवा कामना से रहित सुषुप्ति के समान अवस्था में विचरण करता रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सदैव आत्मा में लीन रहता है, जिसका मन पूर्ण एवं पवित्र है, अत्यन्त श्रेष्ठ एवं शान्त स्वभाव को प्राप्त कर जो इस नश्वर संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता, जो किसी के प्रति आसक्ति न रखता हुआ उदासीन भाव से भ्रमण करता रहता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका हृदय किसी भी पदार्थ में लिप्त नहीं होता तथा जो चेतन संवित्( सद्ज्ञानमुक्त)स्वरूप वाला है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष राग-द्वेष, सुख-दु:ख, मान-अपमान, धर्म-अधर्म एवं फलाफल की इच्छा-आकांक्षा न रखता हुआ सदैव अपने कार्यों में व्यस्त रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंभाव को त्याग करके, मान एवं मत्सर से रहित, उद्वेगरहित तथा संकल्पविहीन रहकर कर्म करता रहता है,उसी पुरुष को ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं।।


Verse ५०

मौनवान्निरहुंभावो निर्मानो मुक्तमत्सरः ।यः करोति गतोदेगः से जीवन्मुक्त उच्यते ॥

maunavānnirahuṃbhāvo nirmāno muktamatsaraḥ ।yaḥ karoti gatodegaḥ se jīvanmukta ucyate ॥

Women are the flame of sin, have the soot of hair, pleasing to the eye but not to be touched; they burn man like grass.

जो सदैव अन्तर्मुखी दृष्टिवाला, पदार्थ की आकांक्षा से रहित और किसी भी वस्तु की अपेक्षा अथवा कामना से रहित सुषुप्ति के समान अवस्था में विचरण करता रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो सदैव आत्मा में लीन रहता है, जिसका मन पूर्ण एवं पवित्र है, अत्यन्त श्रेष्ठ एवं शान्त स्वभाव को प्राप्त कर जो इस नश्वर संसार में किसी वस्तु की इच्छा नहीं रखता, जो किसी के प्रति आसक्ति न रखता हुआ उदासीन भाव से भ्रमण करता रहता है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसका हृदय किसी भी पदार्थ में लिप्त नहीं होता तथा जो चेतन संवित्( सद्ज्ञानयुक्त)स्वरूप वाला है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष राग-द्वेष, सुख-दु:ख, मान-अपमान, धर्म-अधर्म एवं फलाफल की इच्छा-आकांक्षा न रखता हुआ सदैव अपने कार्यों में व्यस्त रहता है, वही मनुष्य जीवन्मुक्त कहलाता है। जो अहंभाव को त्याग करके, मान एवं मत्सर से रहित, उद्वेगरहित तथा संकल्पविहीन रहकर कर्म करता रहता है,उसी पुरुष को ज्ञानीजन जीवन्मुक्त कहते हैं।।


Verse ५१

सर्वत्र विगतलेहो यः साक्षिवदवस्थितः । निरिच्छो वर्तते कार्यं स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

sarvatra vigataleho yaḥ sākṣivadavasthitaḥ । niriccho vartate kāryaṃ sa jīvanmukta ucyate ॥

Women are the fuel lovely, yet harmful, of the fires of all blazing at a distance whether they have taste (attachment) or not.

जो सर्वत्र मोहरहित होकर साक्षी भाव से जीवनयापन करता है तथा बिना किसी फल की कामना किये ही अपने कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म-अधर्म का, सांसारिक विषय के चिन्तन का तथा सभी तरह की कामनाओं का परित्याग कर दिया है, उसे ही जीवन्मुक्त कहा गया है। यह समस्या दृश्य प्रपञ्च जो दृष्टिगोचर हो रहा है, उसका जिसने पूरी तरह से परित्याग कर दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।जो ज्ञानी पुरुष खट्टे, चरपरे, कड़वे, नमकीन, स्वादयुक्त एवं अस्वाद को एक जैसा मानकर भोजन ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जरा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य एवं दारिद्रय आदि में से जो समान भाव रखते हुए हर स्थिति में सन्तुष्ट रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने धर्म-अधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म-मृत्यु आदि का अपने हृदय से पूर्णरूपेण परित्याग कर दिया है, वही वास्तव में जीपमुक्त कहलाता है ॥


Verse ५२

येन धर्ममधर्मं च मनोमननमीहितम् ।सर्वमन्तः परित्यक्तं स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

yena dharmamadharmaṃ ca manomananamīhitam ।sarvamantaḥ parityaktaṃ sa jīvanmukta ucyate ॥

Women are the traps to catch the birds - men, spread by the hunter, Manmatha, the lump of bait, the string of wickedness to men who are the fish in the pond of birth (life) and moving in the mud of mind.

जो सर्वत्र मोहरहित होकर साक्षी भाव से जीवनयापन करता है तथा बिना किसी फल की कामना किये ही अपने कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म-अधर्म का, सांसारिक विषय के चिन्तन का तथा सभी तरह की कामनाओं का परित्याग कर दिया है, उसे ही जीवन्मुक्त कहा गया है। यह समस्या दृश्य प्रपञ्च जो दृष्टिगोचर हो रहा है, उसका जिसने पूरी तरह से परित्याग कर दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।जो ज्ञानी पुरुष खट्टे, चरपरे, कड़वे, नमकीन, स्वादयुक्त एवं अस्वाद को एक जैसा मानकर भोजन ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जरा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य एवं दारिद्रय आदि में से जो समान भाव रखते हुए हर स्थिति में सन्तुष्ट रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने धर्म-अधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म-मृत्यु आदि का अपने हृदय से पूर्णरूपेण परित्याग कर दिया है, वही वास्तव में जीपमुक्त कहलाता है ॥


Verse ५३

यावती दृश्यकलना सकलेयं विलोक्यते ।सा येन सुष्ठु संत्यक्ता स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

yāvatī dṛśyakalanā sakaleyaṃ vilokyate ।sā yena suṣṭhu saṃtyaktā sa jīvanmukta ucyate ॥

I will have none of this woman who is the basket of all defects - gems - the chain of misery. Only he with a woman has desire for enjoyment; where is enjoyment for one who has no woman? Giving up women means giving up the world; by this one shall be happy.

जो सर्वत्र मोहरहित होकर साक्षी भाव से जीवनयापन करता है तथा बिना किसी फल की कामना किये ही अपने कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म-अधर्म का, सांसारिक विषय के चिन्तन का तथा सभी तरह की कामनाओं का परित्याग कर दिया है, उसे ही जीवन्मुक्त कहा गया है। यह समस्या दृश्य प्रपञ्च जो दृष्टिगोचर हो रहा है, उसका जिसने पूरी तरह से परित्याग कर दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।जो ज्ञानी पुरुष खट्टे, चरपरे, कड़वे, नमकीन, स्वादयुक्त एवं अस्वाद को एक जैसा मानकर भोजन ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जरा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य एवं दारिद्रय आदि में से जो समान भाव रखते हुए हर स्थिति में सन्तुष्ट रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने धर्म-अधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म-मृत्यु आदि का अपने हृदय से पूर्णरूपेण परित्याग कर दिया है, वही वास्तव में जीपमुक्त कहलाता है ॥


Verse ५४

कट्वम्ललवणं तिक्तममृष्टं मृष्टमेव च। सममेव च यो भुङ्क्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

kaṭvamlalavaṇaṃ tiktamamṛṣṭaṃ mṛṣṭameva ca। samameva ca yo bhuṅkte sa jīvanmukta ucyate ॥

III-49-54. Even the Quarters (like North) are not seen, regions give other (wrong) instruction; even the oceans and the stars dry up, even the permanent becomes impermanent, even Yogins (Siddhas) perish, demons and others decay; Brahma is reduced (to nothing), the unborn Vishnu too; Shiva becomes non-existent, the lords of the quarters decay. Brahma, Vishnu, Rudra and all classes of creatures run towards destruction, like water-streams towards the marine fire. Dangers come for a moment, so does wealth; birth and death are only for a moment - everything dies. The brave ones are killed by those not brave - a hundred are killed by one. Poison changes its scope (effect) - poison is not poison!

जो सर्वत्र मोहरहित होकर साक्षी भाव से जीवनयापन करता है तथा बिना किसी फल की कामना किये ही अपने कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म-अधर्म का, सांसारिक विषय के चिन्तन का तथा सभी तरह की कामनाओं का परित्याग कर दिया है, उसे ही जीवन्मुक्त कहा गया है। यह समस्या दृश्य प्रपञ्च जो दृष्टिगोचर हो रहा है, उसका जिसने पूरी तरह से परित्याग कर दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।जो ज्ञानी पुरुष खट्टे, चरपरे, कड़वे, नमकीन, स्वादयुक्त एवं अस्वाद को एक जैसा मानकर भोजन ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जरा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य एवं दारिद्रय आदि में से जो समान भाव रखते हुए हर स्थिति में सन्तुष्ट रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने धर्म-अधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म-मृत्यु आदि का अपने हृदय से पूर्णरूपेण परित्याग कर दिया है, वही वास्तव में जीपमुक्त कहलाता है ॥


Verse ५५

जरामरणमापच्च राज्यं दारिद्रयमेव च। रम्यमित्येव यो भुङ्क्ते स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

jarāmaraṇamāpacca rājyaṃ dāridrayameva ca। ramyamityeva yo bhuṅkte sa jīvanmukta ucyate ॥

III-55-57. Objects (of the world) destroy (only) one more birth, poison destroys life only once; it is time my mind is burnt in the forest fire of defects. Desires for enjoyment do not flash even in the illusory fatamorgana; so, oh preceptor, waken me quickly with the knowledge of truth. If you do not, I shall take to silence, without pride and jealousy, contemplating Vishnu with the mind like one turned into a painting.

जो सर्वत्र मोहरहित होकर साक्षी भाव से जीवनयापन करता है तथा बिना किसी फल की कामना किये ही अपने कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म-अधर्म का, सांसारिक विषय के चिन्तन का तथा सभी तरह की कामनाओं का परित्याग कर दिया है, उसे ही जीवन्मुक्त कहा गया है। यह समस्या दृश्य प्रपञ्च जो दृष्टिगोचर हो रहा है, उसका जिसने पूरी तरह से परित्याग कर दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।जो ज्ञानी पुरुष खट्टे, चरपरे, कड़वे, नमकीन, स्वादयुक्त एवं अस्वाद को एक जैसा मानकर भोजन ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जरा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य एवं दारिद्रय आदि में से जो समान भाव रखते हुए हर स्थिति में सन्तुष्ट रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने धर्म-अधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म-मृत्यु आदि का अपने हृदय से पूर्णरूपेण परित्याग कर दिया है, वही वास्तव में जीपमुक्त कहलाता है ॥

द्वितीयोऽध्यायः (part 3)

Verse ५६

धर्माधर्मौ सुखं दुःखं तथा मरणजन्मनी ।धिया येन सुसंत्यतं स जीवन्मुक्त उच्यते ।।

dharmādharmau sukhaṃ duḥkhaṃ tathā maraṇajanmanī ।dhiyā yena susaṃtyataṃ sa jīvanmukta ucyate ।।

IV-1-24. Nidagha, there is nothing else to be known by you, you are the best of the of the enlightened - you know by your intellect, with God's grace - I shall wipe away the error caused by the impurity of the mind:

जो सर्वत्र मोहरहित होकर साक्षी भाव से जीवनयापन करता है तथा बिना किसी फल की कामना किये ही अपने कर्तव्य कर्म में रत रहता है, वही जीवन्मुक्त है। जिसने धर्म-अधर्म का, सांसारिक विषय के चिन्तन का तथा सभी तरह की कामनाओं का परित्याग कर दिया है, उसे ही जीवन्मुक्त कहा गया है। यह समस्या दृश्य प्रपञ्च जो दृष्टिगोचर हो रहा है, उसका जिसने पूरी तरह से परित्याग कर दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है।जो ज्ञानी पुरुष खट्टे, चरपरे, कड़वे, नमकीन, स्वादयुक्त एवं अस्वाद को एक जैसा मानकर भोजन ग्रहण करता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जरा, मृत्यु, विपत्ति, राज्य एवं दारिद्रय आदि में से जो समान भाव रखते हुए हर स्थिति में सन्तुष्ट रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने धर्म-अधर्म, सुख-दुःख एवं जन्म-मृत्यु आदि का अपने हृदय से पूर्णरूपेण परित्याग कर दिया है, वही वास्तव में जीपमुक्त कहलाता है ॥


Verse ५७

उद्वेगानन्दरहितः समया स्वच्छया धिया।न शोचते ने चोदेति स जीवन्मुक्त उच्यते ।।

udvegānandarahitaḥ samayā svacchayā dhiyā।na śocate ne codeti sa jīvanmukta ucyate ।।

Control of inner and outer senses, enquiry, contentment and the fourth, contact with good people - resort to one at least of these giving up everything, with all effort - when one is achieved, the others also are achieved.

जो मनुष्य उद्वेग एवं आनन्द से रहित है तथा शोक और हर्षोल्लास में समान भाव एवं परिष्कृत बुद्धि से सम्पन्न है। सभी तरह की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं, कामनाओं तथा सारे निश्चयों को जिसने मन से पूर्णत: त्याग दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अवस्था में तथा प्रगति और अवनति में जिस पुरुष का मन समान रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो किसी के प्रति ईष्र्या-द्वेष आदि के भाव नहीं रखता है, जो न किसी की इच्छा-आकांक्षा करता है। जो केवल प्रारब्धवश प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने सांसारिक विषयों की प्राप्ति की कामना को त्याग दिया है, जो थित्त में रहते हुए भी चित्तरहित हो गया है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष जगत् के सम्पूर्ण अर्थ जाल के बीच में प्रतिष्ठित होकर भी उससे पराये धन से अलग रहने वाले धर्मात्मा के सदृश अनासक्त रहता है, निश्चय ही वह आत्मा में ही परमात्मतत्त्व की अनुभूति करने वाला महान् पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है ॥


Verse ५८

सर्वेच्छाः सकलाः शङ्का सर्वेहाः सर्वनिश्चयाः ।धिया येन परित्यक्ताः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

sarvecchāḥ sakalāḥ śaṅkā sarvehāḥ sarvaniścayāḥ ।dhiyā yena parityaktāḥ sa jīvanmukta ucyate ॥

One shall develop wisdom only at first; first liberation from worldly life, by means of scripture, contact with good people, penance and self-control. One's own experience (of the self), Shastra and the preceptor form one statement (they yield a single purpose) by practicing (the teachings of) which the self is ever looked at (realized).

जो मनुष्य उद्वेग एवं आनन्द से रहित है तथा शोक और हर्षोल्लास में समान भाव एवं परिष्कृत बुद्धि से सम्पन्न है। सभी तरह की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं, कामनाओं तथा सारे निश्चयों को जिसने मन से पूर्णत: त्याग दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अवस्था में तथा प्रगति और अवनति में जिस पुरुष का मन समान रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो किसी के प्रति ईष्र्या-द्वेष आदि के भाव नहीं रखता है, जो न किसी की इच्छा-आकांक्षा करता है। जो केवल प्रारब्धवश प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने सांसारिक विषयों की प्राप्ति की कामना को त्याग दिया है, जो थित्त में रहते हुए भी चित्तरहित हो गया है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष जगत् के सम्पूर्ण अर्थ जाल के बीच में प्रतिष्ठित होकर भी उससे पराये धन से अलग रहने वाले धर्मात्मा के सदृश अनासक्त रहता है, निश्चय ही वह आत्मा में ही परमात्मतत्त्व की अनुभूति करने वाला महान् पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है ॥


Verse ५९

जन्मस्थितिविनाशेषु सोदयास्तमयेषु च । सममेव मनो यस्य स जीवन्मुक्त उच्यते ।।

janmasthitivināśeṣu sodayāstamayeṣu ca । samameva mano yasya sa jīvanmukta ucyate ।।

If you do (achieve) every moment, the avoidance of the sustained fancy and desire, then you will have reached the sacred, mindless state. Samadhi is said to be the freedom of the mind from agency (activity). That itself is oneness, that is the highest and auspicious joy.

जो मनुष्य उद्वेग एवं आनन्द से रहित है तथा शोक और हर्षोल्लास में समान भाव एवं परिष्कृत बुद्धि से सम्पन्न है। सभी तरह की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं, कामनाओं तथा सारे निश्चयों को जिसने मन से पूर्णत: त्याग दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अवस्था में तथा प्रगति और अवनति में जिस पुरुष का मन समान रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो किसी के प्रति ईष्र्या-द्वेष आदि के भाव नहीं रखता है, जो न किसी की इच्छा-आकांक्षा करता है। जो केवल प्रारब्धवश प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने सांसारिक विषयों की प्राप्ति की कामना को त्याग दिया है, जो थित्त में रहते हुए भी चित्तरहित हो गया है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष जगत् के सम्पूर्ण अर्थ जाल के बीच में प्रतिष्ठित होकर भी उससे पराये धन से अलग रहने वाले धर्मात्मा के सदृश अनासक्त रहता है, निश्चय ही वह आत्मा में ही परमात्मतत्त्व की अनुभूति करने वाला महान् पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है ॥


Verse ६०

न किंचन द्वेष्टि तथा न किंचिदपि काङ्क्षति । भुङ्क्ते यः प्रकृतान्भोगान्स जीवन्मुक्त उच्यते ।।

na kiṃcana dveṣṭi tathā na kiṃcidapi kāṅkṣati । bhuṅkte yaḥ prakṛtānbhogānsa jīvanmukta ucyate ।।

You should remain, like a dumb, blind and deaf person, giving up with your mind, the thought of all things as the self.

जो मनुष्य उद्वेग एवं आनन्द से रहित है तथा शोक और हर्षोल्लास में समान भाव एवं परिष्कृत बुद्धि से सम्पन्न है। सभी तरह की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं, कामनाओं तथा सारे निश्चयों को जिसने मन से पूर्णत: त्याग दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अवस्था में तथा प्रगति और अवनति में जिस पुरुष का मन समान रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो किसी के प्रति ईष्र्या-द्वेष आदि के भाव नहीं रखता है, जो न किसी की इच्छा-आकांक्षा करता है। जो केवल प्रारब्धवश प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने सांसारिक विषयों की प्राप्ति की कामना को त्याग दिया है, जो थित्त में रहते हुए भी चित्तरहित हो गया है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष जगत् के सम्पूर्ण अर्थ जाल के बीच में प्रतिष्ठित होकर भी उससे पराये धन से अलग रहने वाले धर्मात्मा के सदृश अनासक्त रहता है, निश्चय ही वह आत्मा में ही परमात्मतत्त्व की अनुभूति करने वाला महान् पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है ॥


Verse ६१

शान्तसंसारकलनः कलावानपि निष्कलः ।यः सचित्तोऽपि निश्चित्तः स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

śāntasaṃsārakalanaḥ kalāvānapi niṣkalaḥ ।yaḥ sacitto'pi niścittaḥ sa jīvanmukta ucyate ॥

The vision got through words of (Vedanta) that you are composed, unborn, beginningless and endless, shining, taste (bliss) alone, devoid of symptoms of mind - all this is for the (lower) knowledge and wasteful - only Om is real.

जो मनुष्य उद्वेग एवं आनन्द से रहित है तथा शोक और हर्षोल्लास में समान भाव एवं परिष्कृत बुद्धि से सम्पन्न है। सभी तरह की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं, कामनाओं तथा सारे निश्चयों को जिसने मन से पूर्णत: त्याग दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अवस्था में तथा प्रगति और अवनति में जिस पुरुष का मन समान रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो किसी के प्रति ईष्र्या-द्वेष आदि के भाव नहीं रखता है, जो न किसी की इच्छा-आकांक्षा करता है। जो केवल प्रारब्धवश प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने सांसारिक विषयों की प्राप्ति की कामना को त्याग दिया है, जो थित्त में रहते हुए भी चित्तरहित हो गया है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष जगत् के सम्पूर्ण अर्थ जाल के बीच में प्रतिष्ठित होकर भी उससे पराये धन से अलग रहने वाले धर्मात्मा के सदृश अनासक्त रहता है, निश्चय ही वह आत्मा में ही परमात्मतत्त्व की अनुभूति करने वाला महान् पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है ॥


Verse ६२

यः समस्तार्थजालेषु व्यवहार्यपि नि:स्पृहः । परार्थेष्विव पूर्णात्मा स जीवन्मुक्त उच्यते ॥

yaḥ samastārthajāleṣu vyavahāryapi ni:spṛhaḥ । parārtheṣviva pūrṇātmā sa jīvanmukta ucyate ॥

All the visible things in the world are nothing more than the consciousness without vibration - contemplate this.

जो मनुष्य उद्वेग एवं आनन्द से रहित है तथा शोक और हर्षोल्लास में समान भाव एवं परिष्कृत बुद्धि से सम्पन्न है। सभी तरह की इच्छाओं एवं आकांक्षाओं, कामनाओं तथा सारे निश्चयों को जिसने मन से पूर्णत: त्याग दिया है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। उत्पत्ति, पालन एवं प्रलय की अवस्था में तथा प्रगति और अवनति में जिस पुरुष का मन समान रहता है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जो किसी के प्रति ईष्र्या-द्वेष आदि के भाव नहीं रखता है, जो न किसी की इच्छा-आकांक्षा करता है। जो केवल प्रारब्धवश प्राप्त भोगों का उपभोग करने वाला है, वही जीवन्मुक्त कहलाता है। जिसने सांसारिक विषयों की प्राप्ति की कामना को त्याग दिया है, जो थित्त में रहते हुए भी चित्तरहित हो गया है, वही पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है। जो पुरुष जगत् के सम्पूर्ण अर्थ जाल के बीच में प्रतिष्ठित होकर भी उससे पराये धन से अलग रहने वाले धर्मात्मा के सदृश अनासक्त रहता है, निश्चय ही वह आत्मा में ही परमात्मतत्त्व की अनुभूति करने वाला महान् पुरुष जीवन्मुक्त कहलाता है ॥


Verse ६३

जीवन्मुक्तपदं त्यक्त्वा स्वदेहे कालसात्कृते। विशत्यदेहमुक्तत्वं पवनोऽस्पन्दतामिव ॥

jīvanmuktapadaṃ tyaktvā svadehe kālasātkṛte। viśatyadehamuktatvaṃ pavano'spandatāmiva ॥

Or, with mind ever enlightened and performing worldly functions, you remain knowing the oneness of the self, like the calm ocean.

वह पुरुष अपने शरीर के काल-कवलित हो जाने के पश्चात् जीवन्मुक्त स्थिति का परित्याग करके गतिहीन पवन के सदृश विदेहमुक्त स्थिति को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में जीव की न तो उन्नति होती है। और न ही अवनति तथा उसका विनाश भी नहीं होता। उसकी वह अवस्था सत्-असत् से परे होती है और वह किसी के दूरस्थ-समीपस्थ भी नहीं होता ।।


Verse ६४

विदेहमुक्तो नोदेति नास्तमेति न शाम्यति ।न सन्नासन्न दूरस्थो न चाहं न च नेतरः ॥

videhamukto nodeti nāstameti na śāmyati ।na sannāsanna dūrastho na cāhaṃ na ca netaraḥ ॥

Only the knowledge of Truth is the fire to the grass of mental impressions - this is said to be Samadhi, not mere silence.

वह पुरुष अपने शरीर के काल-कवलित हो जाने के पश्चात् जीवन्मुक्त स्थिति का परित्याग करके गतिहीन पवन के सदृश विदेहमुक्त स्थिति को प्राप्त कर लेता है। इस अवस्था में जीव की न तो उन्नति होती है। और न ही अवनति तथा उसका विनाश भी नहीं होता। उसकी वह अवस्था सत्-असत् से परे होती है और वह किसी के दूरस्थ-समीपस्थ भी नहीं होता ।।


Verse ६५

ततः स्तिमितगम्भीरं न तेजो न तमस्ततम्। अनाख्यमनभिव्यक्तं सत्किचिदवशिष्यते ॥

tataḥ stimitagambhīraṃ na tejo na tamastatam। anākhyamanabhivyaktaṃ satkicidavaśiṣyate ॥

Just as the world is active when the much desired sun has arisen (Mani - gem of the day, the sun), so also do the creatures of the world, when the supreme reality is present. So, oh sage, the agentship and non-agentship in the self arise: - the spirit is a non-agent when there is no desire - an agent by his mere presence.

विदेहमुक्ति गम्भीर एवं स्तब्ध अवस्था को कहते हैं। इस अवस्था में न सर्वत्र प्रकाश व्याप्त होता है और न ही अन्धकार । उसमें नामविहीन एवं अभिव्यक्त न होने वाला एक तरह का सत् तत्त्व अवशिष्ट रहता है। वह शून्य एवं साकार भी नहीं होता है। दृश्य एवं दर्शन रूप भी नहीं होता है। उसमें ये भूत एवं पदार्थ- समूह भी नहीं होते हैं। केवल वह सत् अन्तरहित स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। वह ऐसा आश्चर्ययुक्त तत्त्व होता है कि जिसके रूप का निर्देशन नहीं किया जा सकता है। उसकी आकृति एवं प्रकृति पूर्ण से भी पूर्णतर होती है। वह न सत् होता है और न असत् तथा सत्-असत् दोनों भी नहीं होता। वह भाव एवं भावना से परे होता है। वह मात्र चैतन्य ही होता है; किन्तु चित्तविहीन एवं अनन्त भी होता है। वह जरारहित, शिवस्वरूप एवं आत्मकल्याण - प्रद होता है। उसका आदि, मध्य एवं अन्त भी नहीं होता। वह अनादि एवं दोषरहित होता है ॥


Verse ६६

न शुन्यं नापि चाकारि न दृश्यं नापि दर्शनम्।न च भूतपदार्थोघसदनन्ततया स्थितम् ॥

na śunyaṃ nāpi cākāri na dṛśyaṃ nāpi darśanam।na ca bhūtapadārthoghasadanantatayā sthitam ॥

These two exist in the Supreme Being - agency and non-agency - Resort to it firmly which is the (ultimate) cause of the two. So, by the thoughts, well kindled, that I am always a non-agent, the remains only the state of equality called the supreme immortality.

विदेहमुक्ति गम्भीर एवं स्तब्ध अवस्था को कहते हैं। इस अवस्था में न सर्वत्र प्रकाश व्याप्त होता है और न ही अन्धकार । उसमें नामविहीन एवं अभिव्यक्त न होने वाला एक तरह का सत् तत्त्व अवशिष्ट रहता है। वह शून्य एवं साकार भी नहीं होता है। दृश्य एवं दर्शन रूप भी नहीं होता है। उसमें ये भूत एवं पदार्थ- समूह भी नहीं होते हैं। केवल वह सत् अन्तरहित स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। वह ऐसा आश्चर्ययुक्त तत्त्व होता है कि जिसके रूप का निर्देशन नहीं किया जा सकता है। उसकी आकृति एवं प्रकृति पूर्ण से भी पूर्णतर होती है। वह न सत् होता है और न असत् तथा सत्-असत् दोनों भी नहीं होता। वह भाव एवं भावना से परे होता है। वह मात्र चैतन्य ही होता है; किन्तु चित्तविहीन एवं अनन्त भी होता है। वह जरारहित, शिवस्वरूप एवं आत्मकल्याण - प्रद होता है। उसका आदि, मध्य एवं अन्त भी नहीं होता। वह अनादि एवं दोषरहित होता है ॥


Verse ६७

किमप्यव्यपदेशात्मा पूर्णात्पूर्णतराकृतिः।न सन्नासन्न सदसन्न भावो भावनं न च ॥

kimapyavyapadeśātmā pūrṇātpūrṇatarākṛtiḥ।na sannāsanna sadasanna bhāvo bhāvanaṃ na ca ॥

Listen, O Nidagha, there are born in the world, men of noble qualities in the Nirvikalpa Samadhi, ever in the ascendant and happy like (autumnal) moons in the sky; not depressed during danger, like a gold lotus at night, nor aspiring beyond what is destined, delighting in the path of the good people. They shine through this firm (personality) with merits in the friendship; even-minded and reconciled, pleasing, ever good in conduct. They are within limits like the ocean, placid in mind, do not give up discipline, like the sun.

विदेहमुक्ति गम्भीर एवं स्तब्ध अवस्था को कहते हैं। इस अवस्था में न सर्वत्र प्रकाश व्याप्त होता है और न ही अन्धकार । उसमें नामविहीन एवं अभिव्यक्त न होने वाला एक तरह का सत् तत्त्व अवशिष्ट रहता है। वह शून्य एवं साकार भी नहीं होता है। दृश्य एवं दर्शन रूप भी नहीं होता है। उसमें ये भूत एवं पदार्थ- समूह भी नहीं होते हैं। केवल वह सत् अन्तरहित स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। वह ऐसा आश्चर्ययुक्त तत्त्व होता है कि जिसके रूप का निर्देशन नहीं किया जा सकता है। उसकी आकृति एवं प्रकृति पूर्ण से भी पूर्णतर होती है। वह न सत् होता है और न असत् तथा सत्-असत् दोनों भी नहीं होता। वह भाव एवं भावना से परे होता है। वह मात्र चैतन्य ही होता है; किन्तु चित्तविहीन एवं अनन्त भी होता है। वह जरारहित, शिवस्वरूप एवं आत्मकल्याण - प्रद होता है। उसका आदि, मध्य एवं अन्त भी नहीं होता। वह अनादि एवं दोषरहित होता है ॥


Verse ६८

चिन्मात्रं चैत्यरहितमनन्तमजरं शिवम् । अनादिमध्यपर्यन्तं यदनादि निरामयम् ॥

cinmātraṃ caityarahitamanantamajaraṃ śivam । anādimadhyaparyantaṃ yadanādi nirāmayam ॥

IV-25. Enlightenment arises in the state of detachment wherein the fall of a hundred sharp swords is borne like strokes with lilies, burning with fire like drenching with snow, charcoal like sandalwood, endless fall of arrows like a fall of cool water to relieve summer heat, cutting one's own head like happy sleep, the deprivation of speech like silence, deafness like a blessing.

विदेहमुक्ति गम्भीर एवं स्तब्ध अवस्था को कहते हैं। इस अवस्था में न सर्वत्र प्रकाश व्याप्त होता है और न ही अन्धकार । उसमें नामविहीन एवं अभिव्यक्त न होने वाला एक तरह का सत् तत्त्व अवशिष्ट रहता है। वह शून्य एवं साकार भी नहीं होता है। दृश्य एवं दर्शन रूप भी नहीं होता है। उसमें ये भूत एवं पदार्थ- समूह भी नहीं होते हैं। केवल वह सत् अन्तरहित स्वरूप में प्रतिष्ठित होता है। वह ऐसा आश्चर्ययुक्त तत्त्व होता है कि जिसके रूप का निर्देशन नहीं किया जा सकता है। उसकी आकृति एवं प्रकृति पूर्ण से भी पूर्णतर होती है। वह न सत् होता है और न असत् तथा सत्-असत् दोनों भी नहीं होता। वह भाव एवं भावना से परे होता है। वह मात्र चैतन्य ही होता है; किन्तु चित्तविहीन एवं अनन्त भी होता है। वह जरारहित, शिवस्वरूप एवं आत्मकल्याण - प्रद होता है। उसका आदि, मध्य एवं अन्त भी नहीं होता। वह अनादि एवं दोषरहित होता है ॥


Verse ६९

द्रष्ट्रदर्शनदृश्यानां मध्ये यद्दर्शनं स्मृतम्।नातः परतरं किंचिन्निश्चयोऽस्त्यपरो मुने ॥

draṣṭradarśanadṛśyānāṃ madhye yaddarśanaṃ smṛtam।nātaḥ parataraṃ kiṃcinniścayo'styaparo mune ॥

IV-26-27. The self as always observed by the practice of realization which arises from the instruction of the preceptor. Just as the directions once again as before the delusion, so the world - delusion goes away destroyed by knowledge - consider this.

द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन की त्रिपुटी के मध्य में मात्र वह दर्शन स्वरूप ही कहा गया है । हे श्रीशुकदेव जी । इस सन्दर्भ में इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा निश्चय नहीं किया जा सकता। आपने इस तत्त्वज्ञान को स्वयमेव समझ लिया है और अपने पिता श्रीव्यास जी से भी श्रवण कर लिया है कि जीव अपनी संकल्प शक्ति से ही बन्धन में पड़ता है और संकल्प से ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। अतः आपने स्वयं ही उस तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लिया है, जिसे जानने के पश्चात् इस नश्वर जगत् में साधुजनों को सभी दृश्यों से अथवा भोगों से विरक्ति पैदा हो जाती है। अपने पूर्ण चैतन्यावस्था में पहुँच कर सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को भी प्राप्त कर लिया है। आप तप:श्वरूप में स्थित हैं। हे ब्रह्मन्! आप मुक्तावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, अतः भ्रान्ति का परित्याग कर दें। हे शुकदेव जी ! बाय एवं अति बाह्य, अन्त: में एवं उसके भी अन्तरंग को देखते हुए भी आप नहीं देखते हैं।आप सर्वदा पूर्ण कैवल्यावस्था में साक्षी भाव से विद्यमान हैं॥


Verse ७०

स्वयमेव त्वया ज्ञातं गुरुतश्च पुनः श्रुतम् । स्वसंकल्पवशाद्बद्धो निःसंकल्पाद्विमुच्यते ॥

svayameva tvayā jñātaṃ gurutaśca punaḥ śrutam । svasaṃkalpavaśādbaddho niḥsaṃkalpādvimucyate ॥

IV-28. Riches do not help, nor friends nor kinsmen, nor the strain of the body, nor resorting to sacred waters and temples, but only through the conquest of the mind is that condition reached.

द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन की त्रिपुटी के मध्य में मात्र वह दर्शन स्वरूप ही कहा गया है । हे श्रीशुकदेव जी । इस सन्दर्भ में इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा निश्चय नहीं किया जा सकता। आपने इस तत्त्वज्ञान को स्वयमेव समझ लिया है और अपने पिता श्रीव्यास जी से भी श्रवण कर लिया है कि जीव अपनी संकल्प शक्ति से ही बन्धन में पड़ता है और संकल्प से ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। अतः आपने स्वयं ही उस तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लिया है, जिसे जानने के पश्चात् इस नश्वर जगत् में साधुजनों को सभी दृश्यों से अथवा भोगों से विरक्ति पैदा हो जाती है। अपने पूर्ण चैतन्यावस्था में पहुँच कर सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को भी प्राप्त कर लिया है। आप तप:श्वरूप में स्थित हैं। हे ब्रह्मन्! आप मुक्तावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, अतः भ्रान्ति का परित्याग कर दें। हे शुकदेव जी ! बाय एवं अति बाह्य, अन्त: में एवं उसके भी अन्तरंग को देखते हुए भी आप नहीं देखते हैं।आप सर्वदा पूर्ण कैवल्यावस्था में साक्षी भाव से विद्यमान हैं॥


Verse ७१

तेन स्वयं त्वया ज्ञातं ज्ञेयं यस्य महात्मनः। भोगेभ्यो ह्यरतिर्जाता दृश्याद्वा सकलादिह ।।

tena svayaṃ tvayā jñātaṃ jñeyaṃ yasya mahātmanaḥ। bhogebhyo hyaratirjātā dṛśyādvā sakalādiha ।।

V-29-38. All the miseries, hankerings, unbearable mental pain are lost in people with a calm mind, like darkness in the sun. All creatures subside (attain calmness) in a serene person like children mischievous or soft, in their mother.

द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन की त्रिपुटी के मध्य में मात्र वह दर्शन स्वरूप ही कहा गया है । हे श्रीशुकदेव जी । इस सन्दर्भ में इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा निश्चय नहीं किया जा सकता। आपने इस तत्त्वज्ञान को स्वयमेव समझ लिया है और अपने पिता श्रीव्यास जी से भी श्रवण कर लिया है कि जीव अपनी संकल्प शक्ति से ही बन्धन में पड़ता है और संकल्प से ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। अतः आपने स्वयं ही उस तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लिया है, जिसे जानने के पश्चात् इस नश्वर जगत् में साधुजनों को सभी दृश्यों से अथवा भोगों से विरक्ति पैदा हो जाती है। अपने पूर्ण चैतन्यावस्था में पहुँच कर सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को भी प्राप्त कर लिया है। आप तप:श्वरूप में स्थित हैं। हे ब्रह्मन्! आप मुक्तावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, अतः भ्रान्ति का परित्याग कर दें। हे शुकदेव जी ! बाय एवं अति बाह्य, अन्त: में एवं उसके भी अन्तरंग को देखते हुए भी आप नहीं देखते हैं।आप सर्वदा पूर्ण कैवल्यावस्था में साक्षी भाव से विद्यमान हैं॥


Verse ७२

प्राप्तं प्राप्तव्यमखिलं भवता पूर्णचेतसा।स्वरूपे तपसि ब्रह्मन्मुक्तस्त्वं भ्रान्तिमुत्सृज।।

prāptaṃ prāptavyamakhilaṃ bhavatā pūrṇacetasā।svarūpe tapasi brahmanmuktastvaṃ bhrāntimutsṛja।।

Not by drinking elixirs, nor by the embrace of wealth does a person get so much joy as by inner peace.

द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन की त्रिपुटी के मध्य में मात्र वह दर्शन स्वरूप ही कहा गया है । हे श्रीशुकदेव जी । इस सन्दर्भ में इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा निश्चय नहीं किया जा सकता। आपने इस तत्त्वज्ञान को स्वयमेव समझ लिया है और अपने पिता श्रीव्यास जी से भी श्रवण कर लिया है कि जीव अपनी संकल्प शक्ति से ही बन्धन में पड़ता है और संकल्प से ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। अतः आपने स्वयं ही उस तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लिया है, जिसे जानने के पश्चात् इस नश्वर जगत् में साधुजनों को सभी दृश्यों से अथवा भोगों से विरक्ति पैदा हो जाती है। अपने पूर्ण चैतन्यावस्था में पहुँच कर सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को भी प्राप्त कर लिया है। आप तप:श्वरूप में स्थित हैं। हे ब्रह्मन्! आप मुक्तावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, अतः भ्रान्ति का परित्याग कर दें। हे शुकदेव जी ! बाय एवं अति बाह्य, अन्त: में एवं उसके भी अन्तरंग को देखते हुए भी आप नहीं देखते हैं।आप सर्वदा पूर्ण कैवल्यावस्था में साक्षी भाव से विद्यमान हैं॥


Verse ७३

अतिबाह्य तथा बाह्यमन्तराभ्यन्तरं धियः । शुक पश्यन्न पश्येस्त्वं साक्षी संपूर्णकेवलः ।।

atibāhya tathā bāhyamantarābhyantaraṃ dhiyaḥ । śuka paśyanna paśyestvaṃ sākṣī saṃpūrṇakevalaḥ ।।

He is said to be a serene person, who does not exult or feel depressed on hearing, touching, eating, seeing and knowing the good or the bad. Whose mind is not agitated, clear like the moon's disc, in death, festival as well as in battle.

द्रष्टा, दृश्य एवं दर्शन की त्रिपुटी के मध्य में मात्र वह दर्शन स्वरूप ही कहा गया है । हे श्रीशुकदेव जी । इस सन्दर्भ में इसके अतिरिक्त अन्य कोई दूसरा निश्चय नहीं किया जा सकता। आपने इस तत्त्वज्ञान को स्वयमेव समझ लिया है और अपने पिता श्रीव्यास जी से भी श्रवण कर लिया है कि जीव अपनी संकल्प शक्ति से ही बन्धन में पड़ता है और संकल्प से ही मोक्ष को प्राप्त कर लेता है। अतः आपने स्वयं ही उस तत्त्वज्ञान को प्राप्त कर लिया है, जिसे जानने के पश्चात् इस नश्वर जगत् में साधुजनों को सभी दृश्यों से अथवा भोगों से विरक्ति पैदा हो जाती है। अपने पूर्ण चैतन्यावस्था में पहुँच कर सभी प्राप्त होने वाले पदार्थों को भी प्राप्त कर लिया है। आप तप:श्वरूप में स्थित हैं। हे ब्रह्मन्! आप मुक्तावस्था को प्राप्त हो चुके हैं, अतः भ्रान्ति का परित्याग कर दें। हे शुकदेव जी ! बाय एवं अति बाह्य, अन्त: में एवं उसके भी अन्तरंग को देखते हुए भी आप नहीं देखते हैं।आप सर्वदा पूर्ण कैवल्यावस्था में साक्षी भाव से विद्यमान हैं॥


Verse ७४

विशश्राम शुकस्तूष्णीं स्वस्थे परमवस्तुनि । वीतशोकभयायासो निरीहश्छिन्नसंशयः ॥

viśaśrāma śukastūṣṇīṃ svasthe paramavastuni । vītaśokabhayāyāso nirīhaśchinnasaṃśayaḥ ॥

Only the serene person shines among ascetics, knowers, sacrificers, kings, men of strength and of virtue.

विदेहराज जनक के इस तत्त्वदर्शन को सुनने के पश्चात् त्रीशुकदेव शोक, भय एवं श्रमविहीन होकर, संशयरहित और कामनारहित होकर परमतत्त्वरूप आत्मा में स्थित होकर शान्त भाव से विश्राम को प्राप्त हुए। अखण्ड समाधि हेतु वे सुमेरु पर्वत की चोटी की ओर वापस चले गये। वहाँ सहस्रो वर्षों तक स्न्नेहरहित दीपक के सदृश उन शुकदेव मुनि ने अन्तर्मुखी होकर निर्विकल्प समाधि द्वारा परमशान्ति लाभ प्राप्त किया। संकल्प रूपी दोषों से मुक्त, शुद्ध स्वरूप, पवित्र,निर्मल एवं वासना रहित होकर वे महान् ज्ञानी शुकदेव जी अपने आत्मपद में वैसे ही एकाकार हुए, जैसे कि जलकण महासागर में विलीन होकर समुद्र रूप हो जाते हैं ।।


Verse ७५

जगाम शिखरं मेरोः समाध्यर्थमखण्डितम् ॥

jagāma śikharaṃ meroḥ samādhyarthamakhaṇḍitam ॥

The calm persons are great who have attained contentment with the drink of Amrita and delight in the self.

विदेहराज जनक के इस तत्त्वदर्शन को सुनने के पश्चात् त्रीशुकदेव शोक, भय एवं श्रमविहीन होकर, संशयरहित और कामनारहित होकर परमतत्त्वरूप आत्मा में स्थित होकर शान्त भाव से विश्राम को प्राप्त हुए। अखण्ड समाधि हेतु वे सुमेरु पर्वत की चोटी की ओर वापस चले गये। वहाँ सहस्रो वर्षों तक स्न्नेहरहित दीपक के सदृश उन शुकदेव मुनि ने अन्तर्मुखी होकर निर्विकल्प समाधि द्वारा परमशान्ति लाभ प्राप्त किया। संकल्प रूपी दोषों से मुक्त, शुद्ध स्वरूप, पवित्र,निर्मल एवं वासना रहित होकर वे महान् ज्ञानी शुकदेव जी अपने आत्मपद में वैसे ही एकाकार हुए, जैसे कि जलकण महासागर में विलीन होकर समुद्र रूप हो जाते हैं ।।


Verse ७६

तत्र वर्षसहस्त्राणि निर्विकल्पसमाधिना। देशे स्थित्वा शशामासावात्मन्यस्त्रेहदीपवत्॥

tatra varṣasahastrāṇi nirvikalpasamādhinā। deśe sthitvā śaśāmāsāvātmanyastrehadīpavat॥

He is the contented one who gives up (longing for) what is not got and is even towards what is got, not seeing (i.e. ignoring) grief and joy, who does not admire what is not got, enjoys according to desire what is (actually) got and is benign in his conduct.

विदेहराज जनक के इस तत्त्वदर्शन को सुनने के पश्चात् त्रीशुकदेव शोक, भय एवं श्रमविहीन होकर, संशयरहित और कामनारहित होकर परमतत्त्वरूप आत्मा में स्थित होकर शान्त भाव से विश्राम को प्राप्त हुए। अखण्ड समाधि हेतु वे सुमेरु पर्वत की चोटी की ओर वापस चले गये। वहाँ सहस्रो वर्षों तक स्न्नेहरहित दीपक के सदृश उन शुकदेव मुनि ने अन्तर्मुखी होकर निर्विकल्प समाधि द्वारा परमशान्ति लाभ प्राप्त किया। संकल्प रूपी दोषों से मुक्त, शुद्ध स्वरूप, पवित्र,निर्मल एवं वासना रहित होकर वे महान् ज्ञानी शुकदेव जी अपने आत्मपद में वैसे ही एकाकार हुए, जैसे कि जलकण महासागर में विलीन होकर समुद्र रूप हो जाते हैं ।।


Verse ७७

व्यपगतकलनाकलङ्कशुद्धः स्वयममलात्मनि पावने पदेऽसौ ।सलिलकण इवाम्बुधौ महात्मा विगलितवासनमेकतां जगाम ॥

vyapagatakalanākalaṅkaśuddhaḥ svayamamalātmani pāvane pade'sau ।salilakaṇa ivāmbudhau mahātmā vigalitavāsanamekatāṃ jagāma ॥

Liberation while alive arises when the thought delights in what is got, like a good woman in a harem and this gives the joy of the spirit's own nature.

विदेहराज जनक के इस तत्त्वदर्शन को सुनने के पश्चात् त्रीशुकदेव शोक, भय एवं श्रमविहीन होकर, संशयरहित और कामनारहित होकर परमतत्त्वरूप आत्मा में स्थित होकर शान्त भाव से विश्राम को प्राप्त हुए। अखण्ड समाधि हेतु वे सुमेरु पर्वत की चोटी की ओर वापस चले गये। वहाँ सहस्रो वर्षों तक स्न्नेहरहित दीपक के सदृश उन शुकदेव मुनि ने अन्तर्मुखी होकर निर्विकल्प समाधि द्वारा परमशान्ति लाभ प्राप्त किया। संकल्प रूपी दोषों से मुक्त, शुद्ध स्वरूप, पवित्र,निर्मल एवं वासना रहित होकर वे महान् ज्ञानी शुकदेव जी अपने आत्मपद में वैसे ही एकाकार हुए, जैसे कि जलकण महासागर में विलीन होकर समुद्र रूप हो जाते हैं ।।