Books / Mudgala Upanishad

1. प्रथमःखण्डः

प्रथमःखण्डः

Verse १

सहस्रशीर्षेत्यत्र सशब्दोऽनन्तवाचकः।अनन्तयोजनं प्राह दशाङ्गुलवचस्तथा ।।

sahasraśīrṣetyatra saśabdo'nantavācakaḥ।anantayojanaṃ prāha daśāṅgulavacastathā ।।

‘पुरुष सूक्त’ में प्रयुक्त ‘सहस्र’ शब्द अनन्त का बोध कराता है। इसी प्रकार यह ‘दशाङ्गुलम्’ पद भी अनन्त योजनों (दूरी) की सूचना प्रदान करता है॥ [यहाँ प्रयुक्त ‘सशब्दों’ के स्थान पर ‘सहस्र’ पाठ भी उपलब्ध होता है, जो अधिक समीचीन है।]


Verse २

तस्य प्रथमया विष्णोर्देशतो व्याप्तिरीरिता।द्वितीयया चास्य विष्णो: कालतो व्याप्तिरुच्यते॥

tasya prathamayā viṣṇordeśato vyāptirīritā।dvitīyayā cāsya viṣṇo: kālato vyāptirucyate॥

‘पुरुष सूक्त’ के इस प्रथम मन्त्र ‘सहरुलशीर्षा०’ में भगवान् विष्णु की सर्वव्यापी विभुता का विशद वर्णन किया गया है। पुरुष सूक्त का द्वितीय मन्त्र (पुरुषऽएवेदं०) इन्हीं लोकनायक विष्णु की शाश्वत व्याप्ति का संकेत करता है। वे सर्व-कालव्यापी हैं। हर समय विद्यमान रहते हैं॥


Verse ३

विष्णोर्मोक्षप्रदत्वं च कथितं तु तृतीयया।एतावानिति मन्त्रेण वैभवं कथितं हरेः॥

viṣṇormokṣapradatvaṃ ca kathitaṃ tu tṛtīyayā।etāvāniti mantreṇa vaibhavaṃ kathitaṃ hareḥ॥

‘पुरुषसूक्त’ का तृतीय मन्त्र उन विराट् पुरुष भगवान् विष्णु को मोक्ष प्रदान करने वाला बतलाता है।‘एतानस्य’ इस तृतीय मन्त्र में भगवान् श्री हरि के वैभव का -उनकी सामर्थ्य का विस्तार से वर्णन किया गया है।।


Verse ४

एतेनैव च मन्त्रेण चतुर्व्यूहो विभाषितः।त्रिपादित्यनया प्रोक्तमनिरुद्धस्य वैभवम्॥

etenaiva ca mantreṇa caturvyūho vibhāṣitaḥ।tripādityanayā proktamaniruddhasya vaibhavam॥

तीन मन्त्रों के इस समूह में भगवान् के चतुर्व्यूह से सम्बन्धित स्वरूप का उल्लेख है। ‘त्रिपाद्’ इस चतुर्थ मंत्र में चतुर्व्यूह के अनिरुद्ध स्वरूप का विस्तृत वैभव वर्णित किया गया है।।


Verse ५

तस्माद्विराडित्यनया पादनारायणाद्धरेः।प्रकृतेः पुरुषस्यापि समुत्पत्तिःप्रदर्शिता॥

tasmādvirāḍityanayā pādanārāyaṇāddhareḥ।prakṛteḥ puruṣasyāpi samutpattiḥpradarśitā॥

‘पुरुष सूक्त’ के इस पञ्चम मंत्र ‘तस्माद्विराड्०’ में पाद विभूति रूप भगवान् नारायण द्वारा श्री हरि की आश्रयभूता प्रकृति (माया) और पुरुष (जीव) का प्राकट्य दर्शाया गया है॥


Verse ६

यत्पुरुषेणेत्यनया सृष्टियज्ञः समीरितः।सप्तास्यासन्परिधयःसमिधश्च समीरिताः॥

yatpuruṣeṇetyanayā sṛṣṭiyajñaḥ samīritaḥ।saptāsyāsanparidhayaḥsamidhaśca samīritāḥ॥

इसी सूक्त के ‘यत्पुरुषेण०’ मन्त्र के द्वारा सृष्टि स्वरूप यज्ञ का प्रतिपादन किया गया है एवं ‘सप्तास्यासन् परिधय:०’ द्वारा उस सृष्टि रूप यज्ञ कार्य में प्रयुक्त समिधा का विवेचन किया गया है॥


Verse ७

तं यज्ञमिति मन्त्रेण सृष्टियज्ञःसमीरितः।अनेनैव च मन्त्रेण मोक्षश्च समुदीरितः॥

taṃ yajñamiti mantreṇa sṛṣṭiyajñaḥsamīritaḥ।anenaiva ca mantreṇa mokṣaśca samudīritaḥ॥

यही सृष्टियज्ञ इसी सूक्त के अगले मन्त्र ‘तं यज्ञम्०’ के द्वारा प्रतिपादित किया गया है। साथ ही मोक्ष का वर्णन भी इसी मन्त्र के द्वारा किया गया है॥


Verse ८

तस्मादिति च मन्त्रेण जगत्सृष्टिः समीरिता।वेदाहमिति मन्त्राभ्यां वैभवं कथितं हरेः॥

tasmāditi ca mantreṇa jagatsṛṣṭiḥ samīritā।vedāhamiti mantrābhyāṃ vaibhavaṃ kathitaṃ hareḥ॥

‘पुरुष सूक्त’ के ‘तस्माद्०’ आदि सात मन्त्रों द्वारा इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति का उल्लेख किया गया है। ‘वेदाहम्०’ इत्यादि दो मन्त्रों के द्वारा भगवान् श्री हरि के वैभव (कीर्ति) का विशेष वर्णन प्राप्त होता है॥


Verse ९

यज्ञेनेत्युपसंहारःसृष्टेर्मोक्षस्य चेरितः।य एवमेतज्जानाति स हि मुक्तो भवेदिति॥

yajñenetyupasaṃhāraḥsṛṣṭermokṣasya ceritaḥ।ya evametajjānāti sa hi mukto bhavediti॥

‘यज्ञेन यज्ञमयजन्त०’ मन्त्र के द्वारा सृष्टि एवं मोक्ष का उपसंहारात्मक वर्णन किया गया है।इस भाँति जो भी ‘पुरुष सूक्त’ को ज्ञान के द्वारा आत्मसात् करता है, वह अवश्य ही मुक्ति को प्राप्त कर लेता है॥