Books / Mudgala Upanishad

2. द्वितीयःखण्डः

द्वितीयःखण्डः

Verse १

अथ तथा मुद्गलोपनिषदि पुरुषसूक्तस्य वैभवं विस्तरेण प्रतिपादितम्।वासुदेव इन्द्राय भगवज्ज्ञानमुपदिश्य पुनरपि सूक्ष्मश्रवणाय प्रणतायेन्द्राय परमरहस्यभूतं पुरुषसूक्ताभ्यां खण्डद्वयाभ्यामुपादिशत्॥

atha tathā mudgalopaniṣadi puruṣasūktasya vaibhavaṃ vistareṇa pratipāditam।vāsudeva indrāya bhagavajjñānamupadiśya punarapi sūkṣmaśravaṇāya praṇatāyendrāya paramarahasyabhūtaṃ puruṣasūktābhyāṃ khaṇḍadvayābhyāmupādiśat॥

इस प्रकार मुद्गलोपनिषद् (के प्रथम खण्ड के) द्वारा ‘पुरुषसूक्त’ के जिस विशिष्ट वैभव का प्रतिपादन हुआ है, उस विशेष भगवद्ज्ञान का उपदेश भगवान् श्री वासुदेव ने इन्द्र को प्रदान किया था। उस सूक्ष्म तत्त्वज्ञान को पुनः श्रवण करने के लिए इन्द्रदेव नतमस्तक होकर भगवान् वासुदेव की शरण में उपस्थित हुए। भगवान् ने उस परम कल्याणकारी रहस्य का ज्ञान पुरुषसूक्त के दो खण्डों में इन्द्रदेव को प्रदान किया॥


Verse २

द्वौ खण्डावुच्यते।योऽयमुक्तः स पुरुषो नामरूपज्ञानागोचरं संसारिणामतिदुर्ज्ञेयं विषयं विहाय क्लेशादिभिःसंक्लिष्टदेवादिजिहीर्षया सहस्रकलावयवकल्याणं दृष्टमात्रेण मोक्षदं वेषमाददे।तेन वेषेण भूम्यादिलोकं व्याप्यानन्तयोजनमत्यतिष्ठत्॥

dvau khaṇḍāvucyate।yo'yamuktaḥ sa puruṣo nāmarūpajñānāgocaraṃ saṃsāriṇāmatidurjñeyaṃ viṣayaṃ vihāya kleśādibhiḥsaṃkliṣṭadevādijihīrṣayā sahasrakalāvayavakalyāṇaṃ dṛṣṭamātreṇa mokṣadaṃ veṣamādade।tena veṣeṇa bhūmyādilokaṃ vyāpyānantayojanamatyatiṣṭhat॥

‘पुरुष सूक्त’ के दो खण्ड निर्धारित किये गये हैं। इस सूक्त में जिस विराट् पुरुष का उल्लेख किया गया है, वह नाम-रूप एवं ज्ञान से परे होने के कारण विश्व के समस्त जीवों (प्राणियों) के लिए अगम्य है। अतः अपने इस अगम्य रूप को त्याग कर क्लेशादि में पड़े हुए देवादि विशिष्ट प्राणियों के उद्धार एवं समस्त जीवों के कल्याण की इच्छा से उन्होंने अनन्त कलाओं वाले रूप को धारण किया। यह रूप दर्शन मात्र से ही मोक्ष प्रदान करने वाला है। उसी रूप (वेष) से पृथिवी आदि लोकों में व्याप्त होकर उन्होंने अपना विस्तार अनन्त योजनों तक कर लिया॥


Verse ३

पुरुषो नारायणो भूतं भव्यं भविष्यच्चासीत्।स एष सर्वेषां मोक्षदशचासीत्।स च।सर्वस्मान्महिम्नो ज्यायान्।तस्मान्न कोऽपि न्यायान्॥

puruṣo nārāyaṇo bhūtaṃ bhavyaṃ bhaviṣyaccāsīt।sa eṣa sarveṣāṃ mokṣadaśacāsīt।sa ca।sarvasmānmahimno jyāyān।tasmānna ko'pi nyāyān॥

सृष्टि रचना के पहले पूर्ण पुरुष भगवान् श्रीनारायण ही भूत, वर्तमान और भविष्यत् तीन कालों के रूप में विद्यमान थे। वे (नारायण) ही इन समस्त प्राणियों को मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।वे ही महान् शक्तिशाली जनों में विशिष्ट हैं।उन (विराट् पुरुष) से अधिक विशिष्ट अन्य कोई भी नहीं है। वही सर्व शक्तिमान् हैं॥


Verse ४

महापुरुष आत्मानं चतुर्धा कृत्वा त्रिपादेन परमे व्योम्नि चासीत्।इतरेण चतुर्थेनानिरुद्धनारायणेन विश्वान्यासन्॥

mahāpuruṣa ātmānaṃ caturdhā kṛtvā tripādena parame vyomni cāsīt।itareṇa caturthenāniruddhanārāyaṇena viśvānyāsan॥

उन परम पुरुष (परमात्मा) ने स्वयं को चार भागों में विभक्त करके चतुर्व्यूहों के रूप में उत्पन्न किया। उनमें से तीन अंशों (वासुदेव, प्रद्युम्न और सङ्कर्षण रूप) का निवास परमधाम वैकुण्ठ में है। चतुर्थ अंश व्यूह स्वरूप अनिरुद्ध नाम से प्रसिद्ध भगवान् श्रीनारायण के द्वारा ही सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि हुई॥ [उस विराट् पुरुष के तीन चरण उच्च लोकों में ही निरुद्ध (नियंत्रित-रोके हुए) रहते हैं। एक चरण अनिरुद्ध (जिसे व्यक्त होने से रोका नहीं गया) होता है। उसी व्यक्त चरण से यह सृष्टि उपजी है। शेष तीन नाम मन्त्र में व्यक्त नहीं हैं, फिर भी अनिरुद्ध के आधार पर भगवान् के इन नामों को विद्वानों ने मान्य किया है। ये चरण वासुदेव सबको वास देने वाले, प्रद्युम्न- विशेष रूप से प्रकाशमान तथा संकर्षण-आकर्षण करने वाले हैं, फिर भी अव्यक्त हैं।]


Verse ५

स च पादनारायणो जगत्स्रष्टुं प्रकृतिमजनयत्।स समृद्धकायः सन्सृष्टिकर्म न जज्ञिवान्।सोऽनिरुद्धनारायणस्तस्मै सृष्टिमुपादिशत्।ब्रह्मंस्तवेन्द्रियाणि याजकानि ध्यात्वा कोशभूतं दृढं ग्रन्थिकलेवरं हविर्ध्यात्वा मां हविर्भुजं ध्यात्वा वसन्तकालमाज्यं ध्यात्वा ग्रीष्ममिध्मं ध्यात्वा शरदृतुं रसं ध्यात्वैवमग्नौ हुत्वाङ्गस्पर्शात्कलेवरो वज्रं हीष्यते।ततः स्वकार्यान्सर्वप्राणिजीवान्सृष्ट्वा पश्चाद्याःप्रादुर्भविष्यन्ति।ततः स्थावरजङ्गमात्मकं जगद्भविष्यति॥

sa ca pādanārāyaṇo jagatsraṣṭuṃ prakṛtimajanayat।sa samṛddhakāyaḥ sansṛṣṭikarma na jajñivān।so'niruddhanārāyaṇastasmai sṛṣṭimupādiśat।brahmaṃstavendriyāṇi yājakāni dhyātvā kośabhūtaṃ dṛḍhaṃ granthikalevaraṃ havirdhyātvā māṃ havirbhujaṃ dhyātvā vasantakālamājyaṃ dhyātvā grīṣmamidhmaṃ dhyātvā śaradṛtuṃ rasaṃ dhyātvaivamagnau hutvāṅgasparśātkalevaro vajraṃ hīṣyate।tataḥ svakāryānsarvaprāṇijīvānsṛṣṭvā paścādyāḥprādurbhaviṣyanti।tataḥ sthāvarajaṅgamātmakaṃ jagadbhaviṣyati॥

उन चतुर्थपादात्मक नारायण ने विश्व की रचना के निमित्त प्रकृति को प्रादुर्भूत किया। (प्रकृतिरूप) ब्रह्मा जी शरीर प्राप्त करने के उपरान्त भी सृष्टि रचना के रहस्य को नहीं समझ सके। तदनन्तर उन अनिरुद्ध स्वरूप नारायण ने ब्रह्माजी को सृष्टि संरचना का उपदेश दिया। उन्होंने कहा- हे ब्रह्मन्! आप अपनी वागादि सभी इन्द्रियों को यज्ञकर्त्ताओं के रूप में माने। कमलकोश से प्रकट, सुदृढ़ शक्ति सम्पन्न अपने शरीर को हवि रूप में जानें ।वसन्त ऋतु को घृत, ग्रीष्म ऋतु को समिधा तथा शरद् ऋतु को रसरूप में अनुभव करें। इस तरह से अग्नि में यज्ञ करने के उपरान्त आपका शरीर अत्यन्त शक्ति-सम्पन्न हो जाएगा।और इस शरीर के स्पर्श से वज्र भी कुण्ठित हो जायेगा।तत्पश्चात् इस यज्ञकर्म के प्रतिफल स्वरूप समस्त प्राणि -समुदाय प्रकट होंगे। इस प्रकार सभी स्थावर-जङ्गम से परिपूर्ण यह समस्त विश्व दृष्टिगोचर होने लगेगा॥


Verse ६

एतेन जीवात्मनोर्योगेन मोक्षप्रकारश्च कथित इत्यनुसंधेयम्॥

etena jīvātmanoryogena mokṣaprakāraśca kathita ityanusaṃdheyam॥

इस प्रकार जीव और आत्मा के मिलन द्वारा मोक्ष की प्राप्ति का वर्णन किया गया है।।


Verse ७

य इमं सृष्टियज्ञं जानाति मोक्षप्रकारं च सर्वमायुरेति।।

ya imaṃ sṛṣṭiyajñaṃ jānāti mokṣaprakāraṃ ca sarvamāyureti।।

जो भी साधक इस सृष्टि-यज्ञ और मोक्ष की विधि को समझता है, वह व्यक्ति पूर्ण आयुष्य प्राप्त करने में समर्थ होता है॥