Books / Rasa Siddhant Ka Samajik Mulyanka Durga Dixit

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शास्त्रीय सिद्धान्त और सामाजिक दृष्टि ९

इस प्रकार की विभिन्नता के बावजूद भी यह मान्य करना पडता है कि मानवी मावनाओं और विचारोंसहित व्यक्तित्व की अभिव्यक्ति का एकमात्र स्थल समाज है। समाज के रंगमंचपर व्यक्ति अपने संपूर्ण व्यक्तित्व के साथ उपस्थित होता है और अपने भावों या विचारों को अभिव्यक्ति देता है। यहाँ दुहरी प्रतिक्रिया घटित होती है। समाजान्तर्गत वातावरण, घटना, स्थिति, विभिन्न अनुभावादि मनुष्य पर अत्यधिक प्रभाव डालते हैं और उन्हें प्रेरणारूप में ग्रहण करके प्रतिक्रियात्मक अभिव्यक्ति किसी न किसी रूप में होती रहती है। समाज के बिना उसके भावों, विचारों और विभिन्न अनुभूतियों की अभिव्यक्ति संभव नहीं होती। समाज बनाया उसीने है, परंतु वही स्वयं समाज से प्रभावित होकर, उसके उत्तरदायित्वों को निमाता हुआ व्यवहार करता है; भाषा, भावों, संकेतों आदि के माध्यम से अपने को व्यक्त करता है। समाज- जीवन के कारण ही परिवार, नगर, राष्ट्र आदि जीवन की व्यापक बनती जानेवाली सीमाएँ उसे व्यष्टिजीवन से समष्टि जीवनतक पहुँचाती हैं। उसका जीवन, व्यवहार बाह्य सामाजिक स्थितियों से प्रेरणा पाकर उसीमें अभिव्यक्ति पाता है। समाज न हो तो उसका स्व कहाँ अमिव्यक्ति पायेगा? अतः समाज और व्यक्ति का यह सम्बन्ध अन्यो- न्याश्रित है, जो सभ्यता और संस्कृति की विरासत पर जीवित है और परस्पर को प्रेरित करता है। समाज का सदस्य होने के नाते मानव की क्रियाप्रतिक्रियाओं पर समाज का अप्रत्यक्षतः नियंत्रण ( social control) रहता है और सामाजिक इकाई ( social intigrated whole) के सदस्य के नाते सभ्यता और संस्कृति के परिवर्तन के फलस्वरूप उसके जीवन में अंतर आता रहता है। युग के अनुरूप सामाजिक स्थित्यंतर होते हैं और वे व्यक्तिजीवन के आदर्श उत्तरदायित्वों (obli- gations) तथा मूल्यों को बदल देते हैं।

सभ्यताविकास और सामाजिक स्थित्यंतर के फलस्वरूप व्यक्ति का सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन अधिकाधिक जटिल बनता जा रहा है। आरंभिक स्थिति में मानवजीवन इतना जटिल (complex) नहीं, वरन् अत्यंत सरल स्थूल तथा सीमित था। समाजविकास के साथ सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, व्यावहारिक और राजनीतिक आदि क्षेत्रों में मानव के पारस्परिक सम्बन्धों में वृद्धि हुई और युग की सापेक्षता में समाज की स्थिति में अंतर आया। मानव के जीवनमूल्यों, आचार- विचारों और नीति-अनीति की कल्पनाओं तथा अभिरुचि आदि में निरंतर प्रवहमान अनुकूलन प्रक्रिया के कारण अंतर आता गया है। यह अंतर उसके जीवनमूल्यों को परिवर्तित कर देता है और साथ ही जीवनविषयक दृष्टि भी कुछ बदल जाती है।

मूल्य समाजसंस्कृति का सारतत्त्व है। मानवनिर्मित होते हुए भी मूल्यों का नियंत्रण मानवजीवन पर रहता अवश्य है। व्यक्तिनिष्ठता की संकीर्ण सीमाओं को

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१० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

लाँघकर ससाजजीवन का सदस्य बनते ही अपने जीवन के समाजसापेक्ष आदर्श स्थापित करते हुए मानव ने कुछ कसौटियाँ या मूल्य (values) निर्धारित किये। मूल्य वस्तुतः तत्त्वज्ञान का विषय है। पाश्चात्यों ने उसे नीतिशास्त्र के अंतर्गत रखा और भारतीयों ने धर्मशास्त्र में ही अंतर्भूत माना। (व्यापक राष्ट्रीय जीवन के संदर्भ में सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ बनी हुई व्यक्ति की चारित्रिक विशेषताएँ मूल्य रूप में निश्चित होती हैं।) जीवनविकास की आरंभिक स्थिति में उपयोगितावाद के लक्ष्य से बढ़कर मनुष्य ने सांस्कृतिक विकास के साथ ही अपने जीवन में आचार के मानदण्ड, 比 共 共 出 型

विचारधारा का आदर्श, जीवनविषयक ध्येयनिर्मिति, आदर्श का मानदण्ड आदि कल्पनाओं का निर्माण किया और धीरे-धीरे उन्होंने मूल्यों का रूप ग्रहण किया। मूल्यों के अपनाने और निमाने में जीवन की कसौटी माना जाने लगा। जीवन विषयक मूल्यों में कुछ स्थायी बन गये जो हर काल, हर युग, एवं हर स्थिति में उच्चतम सिद्ध हों; परंतु जीवन की गतिशीलता एवं सामाजिक हितसम्बन्धों की परिवर्तन- शीलता के कारण समय-समय पर मूल्यों का स्वरूप एवं महत्त्व कुछ परिवर्तित होता रहा। मूल्यों की समकालिकता कालौघ एवं सामाजिक परिवेश के साथ बनी रहती है। शाश्रत मूल्यों और समकालिक मूल्यों में सामाजिक परिवेश का प्रधान महत्त्व है। आचारव्यवहार एवं चारित्रिक आदर्श की कसौठी पर खरे उतरनेपर जीवनविषयक मूल्य नैतिक मल्यों का रूप धारण करते हैं। मानवी व्यवहार उनकी मूल मित्ति है। अतः नैतिक मूल्यों में समयानुकूल परिवर्तन आना अनिवार्य है। नैतिक मुल्यों के आधार पर उसने जीवनसंहिता बनायी, धर्मशास्त्र और नीतिशास्त्र का निर्माण किया और सौंदर्यविषयक मूल्य कला के अधिष्ठान बने। समाज और युग की सापेक्षता में यद्यपि कुछ मूल्यों में अन्तर आता रहा है, परंतु कुछ मूल्य शाश्वत बने रहे हैं। जो तात्कालिक एवं अशाश्वत होते हैं उनके स्थान पर नये मूल्योंका अविर्भाव होता है परंतु पुराने बिलकुल नष्ट नहीं हो जाते। कुछ परम्परागत मूल्य नया रूप लेकर फिर से आते हैं। ये सांस्कृतिक होते हैं। व्यावहारिक मूल्य बदल सकते हैं, क्योंकि वे व्यापारिक हो जाते हैं। काल, युग, देश और परिस्थिति की सापेक्षता में कुछ अपना महत्त्व खो बैठते हैं। पर दया, क्षमा, शांति, ममता जैसे मूल्य शाश्वत मूल्य हैं। शाश्वत मूल्य समकालिक मूल्यों का आधार बनते हैं। व्यक्ति के व्यवहारों, विचारों एवं अन्य क्रियाप्रतिक्रियाओं पर इन बदलते हुए जीवनमूल्यों का प्रभाव अवश्य होता है। इसीलिए मॅकलिव्हर कहते हैं कि "मूल्यविहीन समाज की कल्पना भी असम्भव है।"१ मूल्यों को यह समाजपरकता एवं समकालीनता, नैतिकता

  1. Society without values can not be understood. ( Community, P. 63 )

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के साथ जोडकर आचारविचारों के मानदण्डों में अन्तर लाती है। सहिष्णुता शाश्रत मूल्य है परंतु स्थान-काल-सापेक्षता में धार्मिक सहिष्णुता हिंदु धर्म का आदर्श है और मुसलमानों ने धार्मिक कट्टरता को मूल्य माना है। परपुरुषस्पर्श पाप के समान मानने- वाली भारतीय स्त्री और पाश्चास्य स्त्री की नैतिक मूल्य धारणा में अन्तर है। सौंदर्य- विषयक मूल्यों को भी समाजसापेक्ष ही मानना पडेगा। चीनियों ने छोटे तलवों को स्त्री की शारीरिक सुन्दरता का मानदण्ड माना तो ऑस्ट्रेलिया के लोगोंने चपटी नाक को। हब्शियों में मोटे होठ सुन्दरता का प्रतीक हैं तो भारतीय पतले होठों को सुन्दर मानते हैं। अंग्रेज रसिक नीली आँखों की सराहना करता है, भारतीय कवि काले कमलनयनों का वर्णन करता है। सौंदर्यवृत्ति और सौंदर्यात्मक दृष्टिकोन मूलतः सार्व- जनीन एवं सार्वभौम होते हुए भी सौंदर्यविशेष के अंकन की पद्धति एवं अभिव्यक्ति काल, स्थान, व्यक्ति और समाज की सापेक्षता में कुछ भिन्नता रखती है। यही प्रधान कारण है कि युग, और समाज एवं सांस्कृतिक परिवेश की सापेक्षता में अभित्यक्ति-विशेष में अन्तर आता है। व्यक्ति अपने भावों, विचारों, संवेदनाओं और अनुभूतियोंको समाज के कॅनवास पर ही व्यक्त करता है। उससे प्ररणा ग्रहण कर उसी में उन्हें व्यक्त करने की प्रक्रिया में व्यक्ति की कोई भी क्रिया-प्रतिक्रिया व्यक्तिअंश ही से सर्वथा युक्त या नितान्त समाज- विच्छिन्न नहीं हो सकती। व्यवहार में भाषाओं, वक्तव्यों और क्रियाओं के द्वारा अपने अनुभव को वह हर क्षण व्यक्त करता है। अपने मन की गहनतम अनुभूतियों को, उत्कट संवेदनाओं को तथा रागात्मक चेतना को संप्रेषित करने के लिए वह अत्यन्त लालायित हो उठता है। सौंदर्यात्मक प्रकृति तथा जगजीवन की अनगिनत अनुमवराशियों से प्रेरित होकर उस अनुभूति को रंग, रेखा, स्वर, भाषा आदि के द्वारा व्यक्त करने से कला का जन्म होता है। मानव ने आदिम स्थिति से ही अपने अन्तर्गत 'स्व' को कला के रूप में व्यक्त किया है और उस की अपनी अभिव्यक्ति समस्त जगत की अभिव्यक्ति बन गयी है। जीवन की परिष्कृति, संस्कारशीलता एवं प्रतिभासंपन्नता ने कला को जन्म दिया। प्रकृति और जगत् के कई अमूर्त तत्त्वों और प्रेरकों (stimulus) ने मूर्तरूप धारण किया। संगीत की स्वरबद्ध रागरागिनियाँ बनीं, चित्रकला की रंगरेखाओं द्वारा नवनिर्माण हुआ, स्थापत्य कला ने रूपाकार में अभिव्यक्ति पायी और उसी मानव चेतनाने शब्दों का माध्यम ग्रहण करके साहित्य को जन्म दिया। साहित्य सब कलाओं के पश्चात् बना परंतु सबसे श्रेष्ठ प्रमाणित हुआ। चित्रकला की दृश्यमयता, संगीत की नादमधुरता, नृत्य की लयबद्धता, स्थापत्य की रचनाकुशलता को शब्दों द्वारा अंकित करते हुए काव्य स्रोत फूट पडा। सौंदर्य-सृष्टि कला है। जिस सौंदर्यात्मक चेतना से कलाओं एवं साहित्य का उदय हुआ वह भी वस्तुतः समाज की सांस्कृतिक चेतना का ही सामुदायिक रूप है।

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१२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

आदिम मनुष्य की सौंदर्यभावना आज से काफी भिन्न रही है। सौंदर्यभावना वातावरण, युगमान्यता, मानवमन की भावना और वासना के अनुसार परिवर्तित होती हैं। मानव की चेतना ने प्रकृति के सौंदर्य से प्रेरित होकर जनजीवन के सौंदर्य को अपनाया और कला के माध्यम से उसे व्यक्त किया अतः कलाओं का उदय एवं साहित्यसृजन भी समाजनिरपेक्ष स्थिति में अस्तित्व नहीं रख सकता। साहित्य, कला और समाज का अटूट एवं सापेक्ष सम्बन्ध इस प्रकार से प्रमाणित हो जाता है। कलाकार या सर्जक की काव्यानुभूति वस्तुतः व्यक्तिगत होती है, परंतु जिस माध्यम के सहारे वह उसे अभिव्यक्ति देता है, वह भाषा समाज की ही देन है। अभिव्यक्ति का स्थल भी समाज ही है। सर्जकका व्यक्तित्व जिस समाज में बनता है, उस समाज के बाह्य परिवेश, संस्कृति एवं मूल्यों का प्रभाव उसके व्यक्तित्व पर अवश्य ही पडता है। अपनी उत्कट अनुभूति को, व्याक्तित्व से उन्मुक्त करके, विश्वैक बनाकर काव्य में व्यक्त करता है; फिर भी विश्वैकता में मानवीयता समाजनिरपेक्ष हो ही नहीं सकती। स्पष्ट है कि साहित्य और समाज का सम्बन्ध भी अटूट है। कभी समाज साहित्य को प्रभावित करता है, कभी साहित्य समाजको। साहित्य की समाजसापेक्षता को महत्त्व देते हुए डॉ. भगीरथ मिश्र लिखते हैं, "समाज और साहित्य का अटूट और अगाध सम्बन्ध है। समाज की जीवनधारा में साहित्य का कमलवत् विकास होता है, समाज के तत्त्व का परिणाम साहित्य का नवनीत है, समाज के शरीर का मुख साहित्य हैं। वह समाज की घरती पर उगमेवाले जीवन का फूल है। ... वह समाज की बुद्धि का परिणाम और अनुभव एवं अनुभूति का सार है। साहित्य समाज की चिरस्थायी सृष्टि है। .... साहित्य] समाज की सृष्टि होता हुआ भी, अपने निजी समाज की सृष्टि करता है। अतः साहित्य और समाज का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है।"१ समाज और साहित्यका अन्योन्याश्रित सम्बन्ध मान्य करने पर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि समाज के नित्य परिवर्तनशील होने के कारण ही उससे साहित्य, कला, साहित्यान्तर्गत चर्चा, साहित्य के मानदण्डादि साहित्यशास्त्रीय तत्त्वों पर प्रभाव पडता है और उनमें कुछ परिवर्तन भी आ सकता है। इस दृष्टि से समाज एवं साहित्य के मूल्य एवं स्वरूप को परिवर्तित करनेवाले कुछ सामाजिक स्रोतों का संक्षेप में विवेचन अपेक्षित हो जाता है। मानवजीवन एवं साहित्य को प्रभावित करनेवाले सामाजिक स्रोतों में धर्म, राजनीति, समाजव्यवस्था का ढाँचा, दर्शनविशेष, विभिन्न शास्त्रों का विकास, सामाजिक स्थित्यंतर आदि महत्त्वपूर्ण हैं। धर्म, राजनीति, दर्शन आदि का साहित्य और समाज से अन्योन्यक्रम सम्बन्ध अनिवार्य है। इन सभी स्रोतों के मिलन से ही सांस्कृतिक इकाई बनती है। १. आलोचना, अंक २०, पृ. ९.

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धर्म नित्य ही साहित्य और समाज को प्रभावित करता आया है। विशेषतः भारतीय समाज आरंभ से धर्मप्राण रहा है। धर्म के अधिष्ठान पर सामाजिक विचार प्रवाह में, बदलते जीवनमूल्यों की सापेक्षता ने सौंदर्यात्मक एवं साहित्यिक मूल्यों में अन्तर उपस्थित किया और उसने समकालीन समाज एवं साहित्य को प्रभावित किया है। भारतीय संस्कृति धर्मप्राण है, अतः प्राचीन कालसे ही राजनीति, समाज जीवन आदि सभी को धर्म ने प्रभावित किया। साहित्य के मूल्य धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थ रहे। वैदिक युग की सौंदर्यचेतना प्राकृतिक सुन्दरता से उद्बुद्ध होकर विराट एवं दिव्यं शक्ति तथा जीवन की कल्पना, यज्ञादि कर्मकाण्ड और दार्शनिक मंथन में व्यक्त हुई और उसी के चारों ओर साहित्य संपन्न हुआ। महाभारत रामायणकालीन भारत में धर्म और नैतिकता की प्रबलता से नैतिक आदर्श ही स्वीकार किये गये, भावों का उदात्तीकरण करने की प्रवृत्ति विशेष रही और सामाजिक कल्याण साहित्य का आदर्श बना। राम के समान बनो, रावण के समान नहीं, इस प्रकार साहित्य का प्रयोजन स्थिर हुआ। आचारशुद्धि और पावित्र्यादि नैतिक तत्त्व साहित्य में व्यक्त हुआे। जैन धर्म ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह जीवन का मूल्य मानकर मातृभाव एवं सर्व जीवों की समानता पर बल दिया, और हिंसा के विरोध में क्रांति की। बौद्ध धर्म ने कर्मदण्ड और उच्चनीच का भेद मिटाकर अहिंसा, शांति, वैराग्य, निवृत्तिपरकता, करूणा, और दुखवाद का प्रचार किया। जैन और बौद्ध धर्म के समय बदले हुए इन जीवनमूल्यों ने तत्कालीन साहित्यिक प्रेरणाओं एवं रचनाओं पर पर्याप्त प्रभाव डाला है। पारम्परिक वीररस, शृंगार या किसी अन्य रस से पूर्ण महाकाव्यों की परम्परा में कुछ कालतक अभाव उत्पन्न हुआ। धार्मिक क्रांतियों तथा धार्मिक मतमतांतरों की सापेक्षता में नीति की परिभाषा भी बदलती गई। इस्लाम की धार्मिक कट्टरता और एकेश्वरवादिता ने निम्नवर्ग को ही नहीं, बल्कि सन्तों को भी पर्याप्त प्रभावित किया और साहित्य में अभिव्यक्ति पायी। इस्लाम के प्रभाव के फलस्वरूप तत्कालीन भारत में और उसके अनन्तर भी कई धार्मिक संप्रदायों के सिद्धातों में परिवर्तन हुआ। इस्लाम के आतंक की संकीणतापूर्ण प्रतिक्रिया मक्तिकाव्य में भी दृष्टिगोचर होती है। सन्तों ने जीवनमूल्यों और अन्य सब तत्त्वों का प्रत्यक्षीकरण जनसमुदाय में किया। कई धार्मिक भावनाओं के समिश्रण से योग, तपस्या, एकेश्वरवाद, द्वैत, अद्वैत आदि तत्त्व निम्नश्रेणी या जनता तक भक्ति पहुँचे और केंवल समाज ही नहीं, साहित्य भी परमात्मा के चरणों में आत्मसमर्पण के मूल्य को व्यंजित करने लगा। सद्वृत्ति, सदाचार, सामाजिक उदारता, ईश्वरोन्मुखता से परिपूर्ण समर्पण और प्रेमाश्रयी भक्तिभावना जीवन और साहित्य के लक्ष्य बने। इसाई धर्म के कारण भी कई परिवर्तन आये। राजनीति साहित्य को अत्यधिक प्रभावित करती रही। राजसत्ता, शासनपद्धति और उसके अन्तर्गत समाजजीवन से समकालिक सर्जक प्रेरणा ग्रहण करता है

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और उसकी प्रवृत्तियों के अनुरूप काव्य के प्रयोजन निश्चित किये जाते हैं। साम्राज्यवाद, सामन्तवाद, गणतंत्र शासन आदि राज्यपद्धतियों के अस्तित्व में कवियों या साहित्यकारों का स्थान एवं भूमिका बदल गयी। कभी वह आश्रयदाता की सेवा में रत, उसका कृपाभिलाषी सेवक एवं प्रशंसक बना, कभी भक्तिभावना में सराबोर हुआ तो कमी चारण, आज भी उन्मुक्त स्वतंत्रता से अनुभूतियों की अभिव्यक्ति का अवसर पा रहा है। परन्तु साफ है कि राजनीतिक स्थिति, राजा-प्रजा के सम्बन्ध, राजनीतिक शांति-अशांति, युद्धजन्य स्थिति, बाहरी आक्रमण, राजा की श्रेष्ठता कनिष्ठता आदि के साथ भारतवर्ष में साहित्य और कलाओं के निर्माण एवं विकास में सदा अन्तर आया है। विदेशी शासन के जुल्म के विरोध में किये गये आन्दोलनादि ने भी साहित्य को प्रेरित किया। राजा की विलासिता, वैभवसंपन्नता, कट्रता आदि का प्रभाव साहित्य पर अवश्य होता है। राजा और जनता के आपसी सम्बन्ध, उसकी शासनव्यवस्था, नीति, धर्म, न्याय, विदेशनीति आदि सारी बातों के फलस्वरूप समकालिक जनता में विशेष भावबोध जगता है। कालविशेष के काव्य में वह विशेष भाव ही व्यक्त होता रहता है, सम्भवतः पहले की अपेक्षा नितान्त भिन्न रूप में। समाजविकास की स्थिति में संस्कृति और सभ्यता में जो अन्तर आता है, व्यक्ति को नई प्रेरणाएँ देता है। इस विकास के कारण भौतिक और सामाजिक स्थितियाँ बदलती हैं। समाज का ढाँचा, तौरतरीके, चालचलन की पद्धतियाँ, पारस्परिक सम्बन्ध, खानापानादि विधियाँ आदि के प्रभाव में सर्जक का और कला के आस्वादक का व्यक्तित्व तैयार होता है। परिवारप्रथा, विवाहपद्धतियाँ, उपनयन आदि सांस्कृतिक विधियों के अतिरिक्त स्त्री का समाज में स्थान, स्त्री-पुरुष का सम्बन्ध, मनोरंजन के साधनादि कई बातें जीवन की चेतना को प्रभावित करती हैं और युग के अनुरूप समाज पर इनका प्रभाव होता है। दर्शन ने साहित्य को कुछ कम प्रभावित नहीं किया। वस्तुतः दर्शन तो बुद्धि द्वारा जगत को समझने का प्रयत्न है और साहित्य भावना द्वारा। दर्शन समस्याओं का हल खोजता है और साहित्य मानवीय हृदय पर खडे हुए प्रभावों को व्यंजित करता है। दर्शन तर्कवितर्क का आश्रय है और साहित्य भाव-विचारादि का, परंतु दोनों परस्पर पूरक हैं। विशेषतः भारत में साहित्य, कला और शास्त्र तीनों भी धर्म और भौतिक परिस्थिति के साथ ही दार्शनिक पचडों में फँस गए थे और विभिन्न दार्शनिकों के प्रभाव में उसके स्वरूप में अन्तर आया था। भारतीय षड्दर्शनों के आधिपत्य में बुद्धिजीवी समाज ही नहीं संस्कृत साहित्य और काव्यशास्त्र आया था। बहुधा लोग दर्शन को स्थिर वस्तु मानते हैं, पर देखा गया है कि दर्शन कभी स्थिर नहीं होता। अपनी सीमा में परिपूर्ण दिखाई देनेवाला होने पर मी दर्शन

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वास्तव में जीवन की परिपूर्ण व्याख्या नहीं कर सका। शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धान्त ने शुद्धाद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, विशिष्टाद्वैत जैसे दर्शनों को जन्म दिया और उन दर्शनों ने समकालिक समाज एवं साहित्य को अत्यधिक प्रभावित किया। सूफी दर्शन एवं नाथ, सिद्ध संप्रदाय के दर्शन का आधार कुछ सन्तों ने ग्रहण किया। फलस्वरूप उनके काव्य में उस प्रकार का प्रभाव अंकित है। दर्शन यद्यपि मस्तिष्क का कार्य है, फिर मी वह कला और साहित्य को प्रभावित करता है क्योंकि सर्जक मनोभाव मात्र व्यक्त नहीं करता, उसका अपना दर्शनविशेष होता है। उसके आधार पर मनमस्तिष्क की क्षमता से संपन्न आत्माभिव्यक्ति कलाका रूप धारण करती है। प्राचीन काल में विभिन्न दार्श- निक मतमतांतरों ने जीवनमूल्यों, जीवनविषयक दृष्टिकोणों एवं साहित्यिक प्रेरणाओं, और अभिव्यक्ति को प्रेरित किया और आधुनिक काल में कुछ विशेष विचार प्रवाहों तथा सैद्धान्तिक वादों के दर्शन ने मानवजीवन को प्रभावित किया। आधुनिक काल में भारी परिवर्तन लानेवाले दो दार्शनिक मतप्रवाह हैं, एक मार्क्सवाद और दूसरा गांधीवाद। मार्क्सवाद, जिसने ब्रह्म की सत्ता को अस्वीकार करते हुए द्वंद्वात्मक भौतिकवाद की प्रतिष्ठापना की और समाजपरिवर्तन का आधार अर्थसम्बन्ध एवं उत्पादन और विनिमय ग्राह्य किया, शोषक-शोषितों के संघर्ष, वर्गसंघर्ष से सर्वहारा की क्रांति मचा दी, वर्गहीन समाजरचना का लक्ष्य रखते हुए समाज को प्रमुखता दी, लोकजीवन, निम्नवर्ग, बहुजनहित, यथार्थवाद एवं आर्थिक स्वयंनिर्भरता पर बल देते हुए पूँजीवाद के विरोध में आवाज़ उठाई; समाज की परम्परागत कल्पनाओं और मूल्यों में आमूलाग्र परिवर्तन किया, कला और साहित्य को संस्कृति का अंग मानकर समाज के लिये आवश्यक माना। कॉडवेल जैसे विद्वान ने जीवन के इन्हीं मूल्यों को साहित्यिक मूल्यों का स्थान देकर उपयुक्ततावाद को महत्ता दी। महान् व्यक्तिचरित्रों को त्याग कर निम्न श्रेणी का पीडित, दलित व्यक्ति साहित्य में नायक बनाया गया। साहित्य की प्रवृत्तियाँ, लक्ष्य तथा मूल्य उसी विचारधारा के अनुकूल बने। मार्क्सताद ने समाजजीवन और साहित्यिक मूल्यों पर अपना जितना प्रभाव डाला, उतना ही अधिक प्रभावी सक्षम दर्शन गांधीवाद का रहा है। गांधीवाद और साभ्यवाद बस्तुतः एक ही हेतु, वर्गहीन समान समाजरचना का रखते हैं, परंतु दोनों के मार्ग पूर्णतः भिन्न हैं। गांधीदर्शन के सत्य, अहिंसा, अस्तेय, व्यापक करुणा एवं मानवतावाद के प्रसार से जीवनदृष्टि में आमूलाग्र परिवर्तन आया। वीरता की कल्पनाएँ अहिंसा तत्त्वने बदल दीं। प्रेम की व्यापकता ने व्यक्तिगत प्रेमतंबंधों से व्यापक विश्वबंधुत्व की असीम सीमातक पहुँचा दिया, शांति की महत्ता बढी। इस दर्शन ने विश्व को मानवता का नया दर्शन एवं दृष्टिकोण दिया। वश्वबंधुत्व, विश्वकत्याण एवं शांति आदि तत्त्वों का प्रभाव साहित्य में प्रतिबिंबित होने लगा।

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काल के प्रवाह में नये-नये दर्शन धार्मिक संप्रदायों, राजनीतिक स्थित्यंतर एवं समाजव्यवस्था के नये ढाँचे बने और उन्होंने समाज एवं सामयिक युग को प्रभावित किया। परंतु वैज्ञानिक युग ने मानवी जीवन को जितनी अधिक तेज़ गति से प्रभावित किया कि जो परिवर्तन एक हज़ार वर्षों में नहीं हुआ, सौ वर्षों में हो गया। औद्योगि- कता और वैज्ञानिक प्रगति ने मानव की परम्पराओं को घक्का पहुँचाया, बुद्धिवाद ने अंधश्रद्धा को उखाड दिया, विभिन्न शास्त्रों के उदय, ज्ञान-विज्ञानान्तर्गत शाखाओं के व्यापक विकास ने जगत में परस्पर निकटतम संपर्क बढाया और औद्योगिक क्रांति ने पूरे मानवजीवन को झकझोर डाला। विज्ञानयुन की महत्तम देन बौद्धिकता का आग्रह है पर वह मात्र तार्किकता एवं बौद्धिक विलास नहीं, बल्कि एक विकसनशील प्रक्रिया है। इसी बुद्धिवाद ने प्रकृति पर अधिकाधिक विजय पायी और सभ्यता को चरम सीमा तक पहुँचाते हुए मानव के जीवन में क्रांति मचा दी। जगत के प्रति आश्चर्य, नवीनता में गूढता, देववाद में विश्वास, परम्परा का अनुकरण, अंधश्रद्धा, आस्तिकता आदि बातों का प्रभाव जीवन में कम होने हुए प्रायः नष्ट हो गया। मानव के जीवन में हर बात को बुद्धि की कसौटी पर कसने की जिज्ञासा जागत हुई। शारीरिक और मानसिक सुख के साथ बौद्धिक संतोष की तीव्र इच्छा जगी। अणु, परमाणु के आविष्कार से महाभयंकर अस्त्रनिर्माण में विध्वंसक वृत्ति भी बढने लगी। मानव की सौंदर्यकल्पना को बुद्धिवाद एवं विज्ञानयुग ने भिन्न बनाया। हज़ारों वर्षों के परम्परागत ज्ञान, कल्पना, आध्यात्मिक विचार आदि पर पहली बार प्रहार किया गया और भावुकता को ललकारा गया। जीवन यांत्रिकता से परिपूर्ण हुआ, जीवनमान में (standard of living) अन्तर आया। समाज में स्त्री का स्थान उच्च बना। इस पूरे प्रभाव के फलस्वरूप मान्यताओं में परिवर्तन आना और साहित्य का प्रभावित होना स्वाभाविक था। मानव के स्वतंत्र अस्तित्व एवं व्यक्तित्व की प्रधानता का स्वर ऊँचा हुआ, सामान्य मानव की अभिव्याक्त, व्यक्तिगतता, सुष्-दुष्ट अंग भी चित्रित किये जाने लगे। परम्परागत साहित्यिक मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगकर सुख्यतः साहित्यिक एवं कला के क्षेत्र में विवाद उत्पन्न होने लगे। साहित्य या कला के संदर्भ में कला क लिए कला (Art for art's sake) और जीवन के लिए कला जैसे परस्पर विरोधी दृष्टिकोणों की उपस्थिति हुई। टॉलस्टॉय जैसे विद्वान जनहित, समाजकल्याण को कला का मूल्य मानते रहे, पर अन्य कई नवमतमादी जीवनसे विच्छिन्न, मात्र व्यक्तिगत अथवा कलात्मक किसी भी प्रकार की अभिव्यक्ति को स्वीकृति देने लगे। कला के लिए कला मानने के कारण कला पर न नैतिक बंधन रहा, न सामाजिक। ्लीलता-भश्लीलता की कल्पनाओं में भी अन्तर आ गया। सात्र के अस्तित्ववाद ने

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क्षणवाद को जन्म दिया और निराशा, कुण्ठा, तथा अवसाद को कला में प्रश्रय दिया। व्यक्ति की अपनी क्षण की अनुभूति एवं चिंतन की अभिव्यक्ति को प्रधानता मिली। विज्ञानयुग में मानवजीवन के विकास के साथ ही विभिन्न शास्त्रों और उनकी उपशाखाओं का विकास हुआ। समाजशास्त्र, मनोविज्ञान जैसे शास्त्रों के उदय एवं विकास ने जीवन की ओर देखने की दृष्टि बदल दी। मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के ज्ञान से मानव के व्यवहार को मिन्न तरीके से देखा जाने लगा और उसके प्रभाव ने मानव जीवन एवं साहित्य को नई दिशा दी। मनोविज्ञान के मनोविश्लेषणादि सिद्धान्तों ने मानवजीवनविषयक नैतिक एवं सामाजिक हितकल्पनाओं में अन्तर आया। मानव व्यवहार, आचार, प्रतिक्रियाओं का अध्ययन और विश्लेषण करने के कारण जीवन की ओर देखने की दृष्टि बदल गई। विशेष रूप से मनोविश्लेषण के सिद्धान्त ने (psycho- analysis) मानवजीवन में खलबली मचा दी। फ्राइड, यंग और एडलर जैसे मनो- वैज्ञानिकों ने मानवी मन, भावों एवं व्यवहार की नूतन व्याख्या की, जिससे जीवन चिंतन में मोड आया। मानवमन को हिमनग की उपमा देते हुए मानस में अवचेतना की कल्पना कर उसे ही मुख्य माना। सामाजिक और सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण चेतन पर दबाव आ जाता है। चेतन (conscience), अवचेतन (subconscience) और अचेतन (unconscience) ये मानस की तीन स्थितियाँ मानकर उनमें होनेवाले क्रिया- व्यापार की व्याख्या की। मनुष्य की प्रधान प्रवृत्ति काम-'लिबिडो' है। बाह्य संस्कारों के प्रभाव से दमित होकर वह अवचेतन में स्थान पाती है और प्रयोजन का अवसर देखकर कभी-कभी उदात्तीकरण के रूप में ये दमित कुण्ठित वासनाएँ ऊपर आकर व्यवहार में व्यक्त होती हैं। फाइड ने इसी आधार पर स्वप्नों की व्याख्या की है। अवचेतन की गहरी गर्त में दबी कुण्ठा, दमित वासना कलाकृति के रूप में अभिव्यक्ति पाती है। एडलर ने व्यक्ति के मानस में हीनता का भाव मुख्य मानकर हीनतानिवारण या क्षतिपूर्ति के साधन रूप में कला या साहित्य का उपयोग माना है। इसीके परिणाम- स्वरूप साहित्य में अंतश्चेतनावाद का उदय हुआ। इस सारे प्रभाव के फलस्वरूप साहित्य में भी नये-नये वादों और विचारप्रवाहों का उदय हुआ। आदर्शवादिता के बजाय यथार्थता, वास्तवता, अतिवास्तवता, क्षणवाद आदि की ओर साहित्यप्रवाह मुडा। वासनाओं का यथातथ्य चित्रण, अतिवास्तव, घोर शंगारदशन, काममय अश्लील वर्णन साहित्य में सहजतया प्रविष्ट हुआ। साहित्य के दृष्टिकोणों, प्रयोजनों और मूल्यों में परिवर्तन होने के कारण साहित्य- शास्त्रीय चर्चा भी इस नये प्रकाश में की जाने लगी। शास्त्रान्तर्गत कई सिद्धान्तों के अस्तित्व एवं उपयुक्तता पर प्रश्नचिन्ह अंकित किये जाने लगे। युग और समाज के साथ आनेवाले इन सब विभिन्न परिवर्तनों ने मानतजीवन को जितना प्रभावित किया रस ... २

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१८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

उससे कहीं अधिक साहित्य को प्रभावित किया। साहित्यान्तर्गत कतिपय सिद्धान्तों के पुनर्परीक्षण की आवश्यकता प्रतीत होने लगी। कला और साहित्यशास्त्र के बारे में सोचते हुए उपर्युक्त समग्र विवेचन के फलस्वरूप एक बात स्पष्टतः सामने आती है कि वह भी सामाजिक परिवर्तन से सर्वथा मुक्त नहीं रह सकता। शास्त्र, कला और साहित्य की अपेक्षा अधिक परिवर्तनशील होता है। परंतु पूरा शास्त्र निश्चितता रखता है। परम्परागत एवं स्वयंपूर्णता उसकी विशेषता है परंतु शास्त्रान्तर्गत व्यक्त कई सिद्धान्त स्वयंपूर्ण होते हुए भी अपने तक ही सीमित रहते हैं। शास्त्र और सिद्धान्त के परस्पर सम्बन्ध को स्पष्ट करते हुए श्री. बेडेकर ने उचित ही कहा है, "सिद्धान्त स्वयंपूर्ण और सीमित होते हैं। इसके विपरीत शास्त्र कभी भी पूर्णत्वतक न पहुँचा हुआ परंतु अपरिभित होता है। कई सिद्धान्तों की परम्परा से शास्त्रीय प्रगति निरंतर रूप से होती रहती है .. वस्तुतः प्रत्येक सिद्धान्त समकालिक ज्ञान की पृष्ठभूमि, संपन्नता और सीमा की दृष्टि से उचित होता है, परंतु नई ज्ञानसंपदा के कारण पूर्वकालिक सिद्धान्त में त्रुटियाँ परिलक्षित होने के कारण किसी प्रतिभावान मनुष्य द्वारा एक नये सिद्धान्त का प्रतिपादन किया जाता है। समयान्तर से ज्ञानसंपदा में अधिक विकास होने पर वह सिद्धान्त भी गलत प्रमाणित हो सकता है।"१ उपर्युक्त चर्चा के फलस्वरूप यह प्रमाणित हो जाता है कि मानव के जीवनयापन एवं विकास में सामाजिक परिवेश का कितना प्रभाव होता है। मानवचरित कला, साहित्य और शास्त्र से समाज का अन्योन्याश्रित रूप में सम्बन्ध है। अतएव रससिद्धान्त के शास्त्रीय महत्त्व के साथ सामाजिक परिवेश के संदर्भ में उसकी परख आवश्यक है।

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१. साहितय विचार पृ. २-३

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द्वितीय अध्याय मानवजीवन का विकास और विभिन्न भावों का उन्मेष

भरतमुनि के रससूत्र में "भाव " की महनीय भूमिका (role) है। विभाव, व्यभिचारी भाव, स्थायी भाव, सात्त्विक भाव, अनुभाव आदि सबके साथ भाव शब्द जुडा हुआ है। मानव में भाव की उत्पत्ति कब, किस स्थिति में तथा किस रूप में हुई और भावविशेष का अस्तित्व कब रहा, भावों में कैसे-कैसे परिवर्तन आया इस पर विचार करना आवश्यक है। कारण कि रसविशेष की गौणता-प्रधानता की स्थापना का रहस्य भी भावों की स्थिरता, विकास एवं सामाजिक विकास के साथ संस्कारों के सम्मिलन "प्राप्त हो सकता है। अतः इस अध्याय में भावों के उन्मेष, विकास और परिवर्तन के साथ ही शाश्वतता-अशाश्वतता का विचार करना अभीष्ट है। भावों की उत्पत्ति, विकास एवं अभिव्यक्ति का अध्ययन मनोविज्ञान का विषय है। मनोविज्ञान मानव में कुछ मूल प्रवृत्तियों (instinct) अथवा मूल प्रेरणाओं (drives or motives) का अस्तित्व मानता है। मूलप्रवृत्तियों से संलग्न भावनाओं का अस्तित्व मानते हुए किसी बाह्य प्रेरक (stimulus) से उनका उदय होना बताया गया है। इस दृष्टि से विचार करे तो मनुष्य में आदिम स्थिति में सारी भावनाओं की उत्पत्ति एवं अभिव्यक्ति होना आवश्यक था, पर आदिमानव की स्थिति का अध्ययन करने से पता चलता है कि उसके आदिम जीवन में उसमें सब भावों का उन्मेष भी नहीं था, न आज कीसी अभिव्यक्ति ही थी। अतः इसके अध्ययन में मनोविज्ञान से पर्याप्त सहायता प्राप्त नहीं हो सकती। मानववशशास्त्र (Anthropology) मानव की उत्पत्ति और जीवनविकास का अध्ययन करता है। उसके अनुसार मानव इस भूमिपर अकेला उत्पन्न हुआ। वन्य आदिम जीवन में उसने अपने को अकेले पाया, उसके बाद धीरे-धीरे बाह्य प्राकृतिक पर्यावरण और अन्य व्यक्तियों के साथ उसका संपर्क आया। मानवसंपर्क से द्वैतस्थिति का अनुभव करते हुए धीरे-धीरे समाज बना। इस प्रकार उसके जीवन का विकास अकेलेपन से दो बन जाने और दो से समष्टि बन जाने की ओर उन्मुख है। व्यष्टि से

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२० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

समष्टि की ओर जाने में ही उसके जीवनविकास की लम्बी कहानी अन्तर्हित है। इस विकासक्रम में मानव ने सभ्यता और संस्कृति का विकास किया और इस विकास के साथ ही बाह्य वातावरण एवं अनुमत्रों के कारण उसमें विभिन्न भावों का उन्मेष हुआ। उसके जीवनविकास के अध्ययन की दिशा उस संदर्भ में प्राप्त हो सकती है। अतः मनोविज्ञान या शरीरविज्ञानादि के अतिरिक्त मानववंशशास्त्र और समाजशास्त्र के आधारपर मानव की मूछ भावस्थिति और सामाजिक पर्यावरण से उसमें आया हुआ परिवर्तन जाना जा सकता है और उस संदर्भ में कुछ कल्पनाएँ की जा सकती हैं। आदि- मानव के जीवन से विकसित स्थिति तक जीवनावस्था को और सामाजिक परिवेश की सापेक्षता में मानवीय भावों की उत्पत्ति एवं विकास को परखना ही इस अध्याय का उद्देश्य है। मानवजीवनविकास का क्रमबद्ध इतिहास व्यवस्थित रूप में स्पष्ट करना कठिन है, परंतु मानववशशास्त्रियों ने उसके विकास की जो स्थितियाँ एवं विशेषताएँ स्थिर की हैं, उनसे यहाँ सहायता ली जायेगी। उन्होंने जिन साधनों का उपयोग किया है, उनमें प्रागैतिहासिक काल के प्रस्तरीभूत अवशेष, उत्खनन के स्तर (stryr), पाषाण के साधन, हथियार, वस्तुएँ, कुछ शिल्पकृतियाँ, आभूषण, बर्तन, मुद्राएँ आदि वस्तुएँ हैं। उनके सहारे मानव की विकसित जीवनस्थिति और व्यावहारिक जीवन की कल्पना की जा सकती है। उनके अतिरिक्त प्रागैतिहासिक काल के कुछ चित्र और शिल्प प्राप्त होते हैं। उनके आधार पर मानव का स्वभावविशेषता और भावस्थिति प्रसंगविशेष के संदर्भ में जानी जा सकती है और भावों के विकास की कल्पना की जा सकती है। मानव ने भूमिपर जन्म पाते समय मूलतः कुछ शारीरिक एवं बौद्धिक विशेषताएँ प्राप्त की थीं। उसके जीवनविकास का रहस्य उसे प्रकृतया प्राप्त इन विशेषताओं में है, जिनका उल्लेख मानववशशास्त्री कून (Coon) ने किया है। उनके अनुसार मानव में प्रकृतिदत्त पाँच विशेषताएँ हैं। जगत् में जन्म लेते समय मनुष्य ने पाँच विशेषताएँ पायी थीं, जो कुछ पुरानी एवं कुछ नयी थीं, या कुछ दोनों के संमिश्र रूप में थीं। पर इन्हीं विशेषताओं के आधारपर वह भूमि तथा प्रकृति पर अधिकार प्राप्त कर सका। ये विशेषताएँ हैं - सीधा सरल कद, मुक्तता से हिल सकनेवाले हाथ और अंगुलियाँ, तीक्ष्ण दृष्टि, तर्कशक्ति एवं निर्णयक्षमतासंपन्न मस्तिष्क, साथ ही बोलने की शक्ति।"१ ₹. When man first appeared in the world, he possessed five special features, some old and some new and some combination of both which gave him the chance to become master of the earth. There were his erect posture, his free moving arms and hands, his sharp focussing eyes, a brain eapable of fine judgement and decision as well as keen perception and the power of speech ( Carleton Coon in ' The History of a Man ' P. 13 )

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आदि मानव की उत्पत्ति के विषय में मानववंशशास्त्रियों में चाहे जितनी मत- भिन्नता रही हो, परंतु इस निष्कर्षतक लगभग सारे शास्त्री भवश्य पहुँचे कि मानव ने पशु या बन्दर से मिन्न प्रकार की विशेषताओं के साथ जन्म पानेके समय से एक मेघावी आदिमानव (Homosapies) की संतानें जीवन को विकसित, परिवर्धित एवं परिवर्तित करती आयी हैं। मानव के जीवनविकास में उसका सम्बन्ध मुख्यतः प्रकृति, पशु और मानव से रहा। प्राकृतिक वातावरण, भौगोलिक पर्यावरण, जलवायु आदि ने उसके कद, शरीर- रचना, स्वभाव, बोलचाल का ढंग, आवाज आदिपर प्रभाव डाला। पशुसंपर्क के अनंतर मानवसंपर्क ने ही वस्तुतः उसका विकास किया। प्रतिकूल स्थिति में संघर्ष करते हुए प्रकृति पर विजय पाने और जीवनविकास करने में द्वैत की स्थिति का बडा हाथ रहा है। मानव का मानव से संपर्क आने पर व्यष्टि से समष्टि की ओर बढने के मार्ग में उसके जीवन का विकास गतिशील एवं परिवर्तनशील रहा है। समष्टिगत जीवन में उसके व्यक्तिगत जीवन की सीमाएँ व्यापक बनती गयीं। बेंजामिन फ्रँकलिन ने मनुष्य को साधननिर्माता प्राणी कहा है (Man is a tool-making animal) और थॉमस कार्लाईल ने उसे "साधनउपयोग- कर्ता" प्राणी कहा है ( Man is a tool-using animal)। इन दो विचारों में उसके जीवनविकास का रहस्य समाया हुआ है। आरंभिक स्थिति में उसका ऐसा ही रूप था। जीवन के आदिकाल से उसने अपनी बुद्धि एवं हस्तकौशल के सहारे पत्थर को तराशकर विभिन्न साधन बनाना आरंभ किया और उन्हीं साधनों के द्वारा जीवन को सुखमय, समृद्ध एवं सुरक्षित बनाया। अर्थात् उसके प्रगतिशील जीवन का यही मूलाधार है। केवल सुरक्षितता और जीवनयापन में सुलभता के उद्देश्य से विभिन्न साधनों की निर्मिति करते हुए वह सभ्यता और संस्कृति का निर्माता बना। एक ओर बुद्धि द्वारा जीवन में विकसित स्थिति तक पहुँचने के लिए वह प्रयत्नशील रहा और दूसरी ओर इस परिवर्तित और विकसित जीवन में निरंतर नवीन अनुभव, नूतन अनुभूतियाँ भी प्राप्त करता आया है। इसी से बौद्धिकता के साथ उसका भावगत जीवन भी अधिकाधिक समृद्ध, स्पष्ट एवं व्यक्त बनता गया। विद्वानों ने मानव के जीवनविकास की कहानी डेढ़ लाख वर्ष पुरानी मानी है। ५०,००,००० वर्ष पूर्व से १०,००,००० वर्ष पूर्व तक आदिम बर्बर स्थिति में जीवन बिताते हुए उसने धीरे-धीरे विकास किया। प्राप्य सारे साधनों के आधार पर मॉर्गन, टायलर, कूल, बील्स, कार्क, गोल्डनवायझर आदि मानववंशशास्त्रियों के अन्वे- षण महत्त्वपूर्ण है। मानवजीवनविकास का क्रमबद्ध इतिहास प्रस्तुत करना कठिन हैं, परंतु विद्वानों ने उस विकास को विभिन्न कालों में विभाजित किया है। उनमें मतविभिन्नता

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२२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

होते हुए भी बा्स का विभाजन अधिकांशतः मान्य है। उसने मानवजीवनविकास को आठ विभागों में बाँटा है।9 ( १) पुराणप्रस्तर काल ( Lower Paleolithic age) 1,00,00,000 B.C. (२ ) मध्यप्रस्तर युग ( Middle Paleolithic age ) 50,000 B. C. (३) नूतनप्रस्तर युग ( Upper Paleolithic age) 25,000 B. C. (४) मेसोलिथिक काल ( Mesolithic age ) 12,000 B. C. (५) कृषियुग -निओलिथिक काल ( Neolithic age ) 10,000 B. C. (६ ) ताम्र युग ( Copper age ) 4,000 B. C. ( ७) ब्रांझ युग ( Bronze age ) 3,000 B. C. (८) लोह युग ( Iron age) 1,500 B. C. क्ॅहम क्लॉर्क ने अपने "फ्रॉम सॅव्हेजरी टु सिविलायझेशन " नामक ग्रंथ में मानव के जीवनविकास को चार स्थितियों में विभाजित किया है।२ नृतत्त्वशास्त्रियों के इस विभाजन का आधार ग्रहण करके मानवजीवनविकास को निम्नलिखित कुल सात अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है। (१) अतिपुरातन युग १,००,००० इ. पू. आदिमानव (२) पाषाण ५०,००० इ. पू. से १२,००० इ. पू. तक शिकारीमानव (३ ) मध्यपाषाण युग १२,००० इ. पू. से ८,००० इ. पू. तक मत्स्योपजीवी एवं पशुपालक (४) नवपाषाण युग ८,००० इ. पू. से ६,००० इ. पू. तक कार्तकार (५) धातुयुग ६,००० इ. पू. से ३,००० इ. पू. तक संस्कृति- निर्माण-कर्ता (६) धर्म और राजसंस्था युग ३,००० इ. पू. धर्मप्राण मानव (७) विज्ञानयुग आधुनिक मानव उपर्युक्त विभाजन के अनुसार कालविशेष में मानव की कोई एक विशिष्टतापूर्ण भूमिका (role) रही है। अतः उसके अनुसार समकालीन परिवर्तित स्थिति की सापेक्षता में उसके जीवन का विकास, संस्कार और समाज के संगठन के स्वरूप का संक्षेप में परिचय करना उचित होगा। ₹ An Introduction to Anthropology-by Beals, P. 56. ₹ From Savagery to Civilization-Crahame Clark. The Lower Savagery निम्न वन्य मानवस्थिति The Higher Savagery उच्चतर वन्यस्थिति Primitive Barbarism बर्बर युग Origin of Civilization सभ्यता की ओर मानव

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आदिमानव : प्रथम हिमयुग के अनन्तर परिवर्तित जलवायु में प्रथम आदिमानव जंगली पशुवत् स्थिति में था। खानाबदोश जीवन बिताते हुए जंगल में रहना, भटकना, खाना और ज़िन्दा रहना, इतने तक ही उसका जीवन सीमित था। खाने की तलाश एवं आत्मरक्षा जीवन के प्रधान उद्देश्य थे। प्राकृतिक परिवेश में स्वैर और संस्कारहीन जीवन में अपनी शारीरिक भूख मिटाना उसके जीवन की परम सीमा थी। धीरे-धीरे पत्थर के हथियार और साधन बनाना उसने सीख लिया, जिनकी सहायता वह स्वयंरक्षा और सुरक्षितता के लिये ग्रहण करता था। पत्थर के हथियार से शिकार में कौशल प्राप्त करने लगा और कुछ समय पश्चात पेड़ से उतरकर गुफाओं में या पहाड की ओट में वह निवास करने लगा। गुफाओं के निवास में दल बने और परस्पर सहयोग से शिकार का आरंभ हुआ। दलों में आरम्भ में संगठन, मित्रता या नीतिनियमों का अस्तित्व संमव ही नहीं था। अत्यंत स्वार्थमय और स्वकेन्द्रित जीवन में स्वैर मुक्त लैंगिकता थी। उसकी इस प्राथमिक स्थिति को, स्वमाव को, नृतत्त्वशास्त्री कार्क ने उचित शब्दों में व्यक्त किया है। वे लिखते हैं-"मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आदिमानव प्रकृति का एक बच्चा ही था। वह छोटे बच्चेके समान ही अन्तर्गत जीवन और बाह्य वातावरण में भेद करना नहीं जानता था और अपनेको पशुओं और अन्य प्राणियों तथा प्रकृति से अभिन्न मानता था। "१ शिकारी मानव : पत्थर के विभिन्न हथियारों और साधनों के बनाने और उपयोग में कौशल प्राप्त करनेपर दलों में सहयोग से शिकार करने में उसने पर्याप्त सफलता प्राप्त की। उससे पूर्व ही अगनि का आविष्कार हो चुकने के कारण अब वह मांस भूनकर खाने और ठंडक से बचने के लिये गुफा के द्वारपर अग्नि जलाने की योजना करने लगा।२ गुफावासी शिकारी मानव में कुछ स्थिरता आयी, भटकना कम हुआ और दलों में कुछ संगठन की वृत्ति एवं स्थैर्य आया। पशुओं के मांस के अतिरिक्त वह हड्डियों और खाल का उपयोग करने लगा। हड्डी की सूई से खाल के कपडे बनाने के साथ हड्डियों

₹ Psychologically the savage is a true child of nature, like a child, he fails to discriminate between the inner life, the soal and the external environment and feels himself one with the nature, animate and inanimate. ( From Savagery to Civilization, P. 30 ) The use of fire is the only open and shut difference between man and all the other animals. ( The Story of a Man-by Coon, P. 317)

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२४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

से अन्य आभूषणादि बनाने और पत्थर के बर्तन तराशने में सफल हुआ। दलगत परस्पर व्यवहार बढ़े, स्त्रीपर अधिकार की लालसा वृद्धिंगत हुई और व्यावहारिक पारस्परिक जीवन प्रभावित किया जाने लगा। मत्स्योपजीवी तथा पशुपालक मानव : दूसरी बार हिमस्तर पिघलने से भौगोलिक स्थिति एवं जलवायु में पर्याप्त परिवर्तन आया। बड़े-बड़े जंगली जानवर नष्ट होकर सूअर, मछलियाँ, विभिन्न पंछी और खरगोश आदि छोटे छोटे प्राणी बचे। शिकार कम होकर जलाशय से मानव मछलियाँ पकडना, संग्रह करना, सुखाना आदि प्रधान कार्य करने लगा। तालाब के किनारे झोंपडी में मानव के पारिवारिक जीवन के बीज बोये गये। पुरुष कार्यवश बाहर जाने लगे और स्त्रियाँ घर में बैठकर जाले बुनना, फंदे तैयार करना, नये-नये हथियार बनाना आदि कार्य करने लगीं। श्रमविभाजन के साथ नये-नये तंत्रों का प्रयोग, लकडी का उपयोग मनुष्य ने सीखा। तीर कमान बनाना, हडडियों से कंधी आदि बनाना, लकडी के बर्तन और अन्य वस्तुओं का उपयोग करना आरम्भ हुआ। शिकार के अलावा पशु को पालतू बनाया गया। कुत्ते को रक्षा के निमित्त तथा, गौ को दूध के लिये पाला जाने लगा। घर के आसपास ज़मीन साफ करके प्रारंभिक रूप में खेती का आरंभ हुआ। इस विकसनशील जीवन में रक्तसम्बन्धों (kinship) के निर्माण के साथ कार्यविभाजन तथा अर्थव्यवस्था और लैंगिकता के आधारपर परिवार संस्था का उदय हुआ। उद्योगप्रियता, कलाकारिता एवं कौशल से जीवन उन्नत बनने लगा। काइ्तकार मानव : कृषि का आरंभ मनुष्य के जीवनविकास में क्रांति की घटना है। ज़मीन से अनाज पैदा करना, वृक्ष का ज्ञान, मिट्टी का उपयोग, ईटें बनाना, घर बनाना आदि सब बातों के ज्ञान से मनुष्य के जीवनविकास का स्तर उच्च बना। मांस के बदले दूध, धान का समावेश उसके खाने में हुआ। इस सुधार ने नई आवश्यकताओं को जन्म दिया। गिरोह के बदले घर में निवास, विवाहसम्बन्ध से पारिवारिक स्थिर सम्बन्ध और बस्तियों का जीवन आदि का प्रचलन हुआ। समाज स्थिर बनने से सामाजिक सम्बन्ध और नियम दृढ बनते गये। श्रमविभाजन (division of labour) के आधार पर पारिवारिक सम्बन्थ एवं स्थान का निर्णय होने लगा। परिवारसंस्था का विशेष विकास होकर बहुपत्नीप्रथा का प्रचलन हुआ। सामाजिक सम्बन्ध (social relation) परस्पर लेनदेन और व्यवहार बढ़ते गये। कबीला, गाँव, बस्ती, नगर आदि का न्यायकर्ता कोई एक मुखिया रहता था। उसकी आज्ञा या आदेश का पालन हरएक का कर्तव्य माना जाने लगा। सभ्यता और संस्कृति के विकास ने पारिवारिक एवं सामाजिक सम्बन्ध दढ बनाये।

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संस्कृतिनिर्माता मानव : कृषि के साथ धातुओं के उपयोग ने जीवन को अत्यधिक विकसित किया। ताम्र, कास्य, लोह आदि की सहायता से खेती के साधन, आभूषण, बर्तन और अन्य कई वस्तुएँ बनायी जाने लगीं। नदियों के तीरों पर विभिन्न संस्कृतियाँ उदित एवं उन्नत हुई। सुमेरियन संस्कृति, ईजिप्त संस्कृति, सिंधु संस्कृति आदि प्राचीन समृद्ध संस्कृतियों की विकसित स्थिति के दर्शन उत्खनन में हुए हैं। सिंधु-संस्कृति और मोहेंजोदरो का काल संस्कृतिनिर्माता भारतीय मानव के जीवन का चरमविकास का काल था। राज्यव्यवस्था, नगरों का निर्माण, विकास एवं कलाओं का विकास आदि द्वारा मनुष्य ने भौतिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक जीवन में उच्च स्तर प्राप्त किया। इस काल में दंड, न्याय, नीति का अधिरक्षक न्यायदेवता राजा माना जाता था।

वेदकालीन मानव : सभ्यता और संस्कृति के उच्च स्तर तक पहुँचने के साथ-साथ मनुष्य की प्रज्ञा ने आत्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर देवताओं को आवाहन करके प्रार्थनाओं और सूक्तियों का सर्जन किया। चातुर्वर्ण्य, चार आश्रम और चार पुरुषार्थमय जीवनादर्श निश्चित किया। शास्त्र, विद्या, विज्ञानादि में अत्यंत उन्नत तत्कालीन समाज में भौतिकता की सीमाओं को लाँधकर मानवजीवन आध्यात्मिक एवं दार्शनिक चेतना से अनुप्रणित था। रामायण, महाभारतकालीन जानपदीय और नागरी संस्कृति में सदाचार, सद्भाव एवं नैतिक कल्पनाओं पर अधिष्ठित आदर्श जीवन की कल्पना को विशेष महत्ता प्राप्त हुई। मित्र, भाई, पुत्र, पत्नी-पति, राजा-प्रजा, नेता, गुरु-शिष्य आदि सम्बन्धों के आदर्श, उत्तरदायित्त्व और नियम निश्चित हुए और सद्गुणों की महत्ता बढ़ी। बहुपतिविवाह, बहुपत्नीविवाह, एकपत्नीव्रत आदि तत्त्व समय के साथ सामने आते रहे। कर्म के अनुसार पुनर्जन्म की कल्पना, आश्रमव्यवस्था, मानवीय पौरुष आदि को विशेष महत्ता मिलने लगी। आधुनिक मानव : ईसा के पूर्व और पश्चात् भारतीय जीवन में विभिन्न परिवर्तन आये। राज्य- व्यवस्था निरन्तर बनी रही। राज्य का स्वरूप, राजा-प्रजा के सम्बन्ध, सत्ता, बाहरी शासकों के धर्मादि प्रभाव से जीवन के मानदण्ड, समाज की स्थिति, नैतिकता की कल्पनाएँ बदलती रहीं। मानवजीवन के इस पूरे लम्बे विकास में उसके मस्तिष्क की क्षमता ने विचारोंको विकसित किया और भावों के उन्मेष की शक्ति प्रदान की।

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२६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

उसके भावविश्व के विकास का आरम्भ तो आत्मरक्षा से हुआ। उसकी प्राथमिक भाव स्थिति इन्द्रियसंवेदनजन्य रही। डार्विन के सिद्धान्त से भी यह स्वीकृत हुआ है कि आत्मरक्षा के प्रयास में मनुष्य की आरंभिक भावस्थिति शारीरिक क्रिया- प्रतिक्रियाओंतक सीमित थी। मूलतः पायी हुई भावक्षमता ने मानव-जीवन की समाजसापेक्ष विकासस्थिति में विभिन्न वस्तुओं, स्थितियों, घटनाओं और व्यक्तियों के संपर्क से विभिन्न प्रेरक (stimulus) पाये और भावों का उन्मेष होता रहा। मानव के भावविकास में परिवर्तन आनेका प्रधान कारण उसका द्वैत और तत्पश्चात् समष्टि बनना है। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक वॉटसन महोदय के कथन से इसे पुष्टि मिलती है कि बच्चे के भावनिक विकास में उत्तरोत्तर तीव्र भावनाओं का अभिक्षण (frequency) कम होता है और सामाजिक मान्यता एवं प्रयोग से निश्चित बनी स्थिति के अनुकूल तथा सांस्कृतिक दबाव के अनुसार उसके भावनाओं के बंध (patterns) बदलते हैं।१ साथ ही किसी समाज की स्थितिविशेष तथा उसकी संस्कृति का प्रभाव भावों के उदय एवं अभिव्यक्ति पर पडता है। मनोवैज्ञानिक वेल्ड के कथन से भी यह स्पष्ट होता है कि, "मनुष्य का व्यवहार मूलप्रवृत्तिगत नहीं होता, बल्कि वह समाज के पारस्परिक आदानप्रदान के लिए अर्जित एक सांस्कृतिक साधन है। "२ संस्कृतियों की विभिन्नता से सम्बन्धित भावाभिव्यक्ति के सन्दर्भ में शोधकार्य कई नृतत्त्वशास्त्रियों ने किया है। उदाहरण स्वरूप हमारी संस्कृति में गोलाकार विस्फारित नयन आश्चर्य सूचित करते हैं, चीनियों में वही क्रोध का प्रतीक है। अतः समाजविकास एवं संस्कारों की सापेक्षता में मनुष्य के भावों के उन्मेष, विकास और परिवर्तन तथा अभिव्यक्ति का स्वरूप अंकित करने के लिये यह सारी पृष्ठभूमि उपयुक्त सिद्ध होगी। ? The emotional development of the child is characterized by decreasing frequency of intense emotion to socially approved and experimentally determined situation and by a change in the patterns of emotion a behaviour to accord with cultural pressure. ( Experimental Psychology, P. 102) ₹ The behaviour need not be instinctive but merely a cultural acquired means of social communication ... There are many anthropological findings on the differences of expressive movement in different cultures, for instance in our culture round, wide opened eyes suggest surprise but to the Chinese, they mean anger. ( Psychology as Science, P. 83 )

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मानव-जीवन-विकास की इन सारी स्थितियों को देखते हुए एक बात स्पष्ट हो जाती है कि जीवन के विकासक्रम में प्रधानतः चार अवस्थाओं से मनुष्य को गुजरना पड़ा। सामाजिक दृष्टि से इस विकास का विचार करने से प्रतीत होता है कि इन्हीं चार स्थितियों ने निय ही उसके समग्र जीवन को प्रेरित एवं परिवर्तित किया है। प्रथम स्थिति अकेलेपन की रही है। उसमें मनुष्य ने जगत् में अपने को अकेला पाया और वह प्राकृतिक साहचर्य में जीवनयापन करता रहा। दूसरी स्थिति द्वैत की रही, जिसमें व्यक्ति का किसी अन्य मनुष्य या स्त्री से संपर्क आया। तीसरी स्थिति में उसका जीवन दल अथवा समूह से बद्ध रहा है। उसके अनन्तर उत्तरोत्तर सभ्यता एवं संस्कृति के विकास के साथ मनुष्य व्यापक समष्टि का एक अंग बन गया। इस प्रकार मानवजीवनविकास की लम्बी कहानी व्यष्टिजीवन से व्यापक होती हुई समष्टिजीवन तक प्रवहमान बनी रही। अकेलापन, द्वैत, समूहगत जीवन और समष्टिगत जीवन इन चार स्थितियों की सापेक्षता में उसके जीवनविकास, भावस्थिति और स्वभाव की विशेषताओं में अन्तर आता रहा। इन चारों स्थितियों के विकास को देखने पर मनुष्य के भावोन्मेष, भावविकास एवं मावाभिव्यक्ति की प्रक्रिया स्पष्ट होने लगती है। आरंभ में केवल मनोवेगों के रूप में ही इस प्रक्रिया का जन्म हुआ और अन्ततः संस्कारों के साथ वह अधिकाधिक परिवर्तित होती आई है। आरंभ में सुखदुख़ात्मक इन्द्रियज वेदना के अनुसार मनोवेग उत्पन्न हुए और बाद में वासनाओं एवं प्रवृत्तियों का सुत्रपात हुआ। क्रोध-मयादि भाव मनुष्य में वासना रूप में थे, उनको बाद में भावरूप प्राप्त हुआ। प्रत्येक भाव आदिम रूप में इन्द्रियज संवेदना, वासना तथा शारीरिक बाह्य एवं आंतरिक रचना के अनुरूप व्यक्त होता रहा। इसका विस्तार से दिग्दर्शन चार्लस डार्विन ने "मानव और पशुओं में भावनाओं की अभिव्यक्ति " नामक पुस्तक में किया है। धीरे-धीरे भाव की प्रतिष्ठा से उसका कार्यक्षेत्र बढता रहा और जीवन में पारस्परिक सम्बन्धों का क्षेत्र विकसित होता गया। सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य के व्यापार बढते गये, साथ ही भावों में बहुविधता, एवं जटिलता भी आती गयी। व्यक्तिसंपर्क एवं समाजसापेक्षता से भावों की स्थिति में अन्तर आता गया। सामाजिक परिवेशगत विभिन्न स्थितियों के कारण मनुष्य के जीवन पर विभिन्न संस्कार हुए, प्रसंगवत् कुछ भाव उदित हुए और उन्होंने समाज में अभिव्यक्ति पायी। मूलतः वासनिक एवं इन्द्रियसवेदनजन्य भावों में सामाजिक संस्कार से विभिन्न प्रकार का परिवर्तन आया। कुछ भाव सामाजिक स्थिति के कारण किसी कालविशेष में दमित हो गये और कुछ फीके पड़ गये। परिष्कार एवं संस्कारों के फलस्वरूप कुछ भावों ने प्रच्छन्न रूप धारण किया। जीवन के व्यापारों की जटिलता के साथ-साथ भावों में सुक्ष्मता मी आयी। बौद्धिक विकास, सभ्यता एवं संस्कृति के विकास ने कई

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२८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

भावों को स्थूल नहीं रहने दिया बल्कि उनमें सूक्ष्मता के साथ सम्मिश्रता भी आयी। संस्कार एवं सभ्यता के कारण ही तो मनुष्य पशु से भिन्न भावस्थिति तक पहुँच गया है। कुछ भावों को अर्जित (conditioned) रूप में स्वीकार किया गया। समाज के प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दबाव ने भावों को सूक्ष्म, सम्मिश्र एवं प्रच्छन्न बनाया। कुछ भाव समाज के विकास में स्थिरता पाकर स्थायी रूप में बने रहे और कुछ सन्दर्भविशेष में क्षणिक काल तक उभरते रहे। दिन-ब-दिन सामाजिक जीवन की जटिलता के साथ भावों की प्रच्छन्नता, खण्डितता, क्षणिकता एवं सूक्ष्मता बढ़ती रही। मानव के जीकनविकास में अन्तर्भूत इन चार स्थितियों की सापेक्षता में भावोन्मेष एवं भावविकास की कल्पना की जा सकती है। ऐसी कल्पना की जा सकती है कि आदिमानव के जीवन में सामान्य सुखदुःखात्मकता के अनुभव का अस्तित्व था, परंतु भय, काम, क्रोध और आश्चर्य का उदय प्रबल रूप में हुआ था। प्राकृतिक वातावरण में अचानक परिवर्तन आँधी-तूफान, अतिवृष्टि, कड़ी धूप, बादलों की आवाज, बिजली की दमक, घना अँधेरा आदि प्राकृतिक उत्पातों एवं पीडादायी भयावह बातों से भय का अनुभव उसने किया होगा। समस्त प्राकृतिक पर्यावरण में अपनेको अकेले पाकर आत्मरक्षा की प्रेरणा से भयभीत मानव सुरक्षा के लिए भय से दूर भागने की चेष्टा में रहा होगा। आत्मरक्षा और शारीरिक बचाव की प्रबल प्रेरणा मात्र आरंम में भय के कारण थी। प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मैगडुगल भी भय के मूल में बचने की प्रवृत्ति का अस्तित्व मानते हैं। भय को पलायन करने का आवेगपूर्ण व्यवहार कहा जाता है। ( Fear is the behavioural impulse to escape.) प्रकृति के अतिरिक्त किसी पशु को दूसरे पशुपर या स्वयं उसपर आक्रमण करते देखकर उसने अपने को भय की स्थिति में पाया। प्रकृति और पशु से उत्पन्न भय की अभिव्यक्ति पलायन एवं भात्मरक्षानिमित्त किये गये प्रयत्नों में हुई। उसके आंतरिक भावों की अभिव्यक्ति लकीरों से पत्थरों पर अंकित पशुओं की आकृतियों में हुई है।9 पत्थरों एवं पेड़ की शाखाओं के उपयोग से बचाव के तरीके सीखनेपर यह भय कुछ कम होता गया। भय के साथ ही इस अवस्था में क्रोध एवं आश्चर्य का उदय होना स्वाभाविक है। पशुओं के द्वारा पीडा पहुँचाये जाने पर अथवा भोजन की प्राप्ति में रोड़ा अटकाये जानेपर मनुष्य तमतमा उठता था। आत्मरक्षा में प्रतिरोध आना ही क्रौध का प्रधान कारण था। इस विषय में "ऐपिक ऑफ मॅन" ग्रंथ में मनुष्य की भावदशा का प्राचीनतम चित्र उपलब्ध है।२ उसमें नैण्डरथल मानव की जंगली मैंसे से मुठभेड का का प्रसंग अंकित है। हाथ में पथरीला हथियार उठाये, पशु से सामना करने के लिए ₹ Art and Society Plates, 1, 2, 4, 6. २ The Epic of Man, P.15.

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मानवजीवन का विकास और विभिन्न भावों का उन्मेष २९

वह तैयार है। मैंसे के प्रति क्रोध उसके चेहरेपर स्पष्ट है, भौंएँ तनी हुई हैं, आँखें विस्फारित हैं; हाथ ऊपर उठा हुआ है, हाथ में पत्थर का हथियार लिये पशु की ओर क्रोध एवं आवेश से जा रहा है। आदिम स्थिति में शारीरिक चेष्टाओं द्वारा अभिव्यक्त क्रोध एवं आवेश के साथ ही शिकार के समय उत्साह के दर्शन भी होते हैं। इस स्थिति में प्रकृति के नवीन चमत्कारों एवं रूपों ने जहाँ एक ओर उसमें मय उत्पन्न किया, दूसरी ओर उसके आश्चर्य और कुतूहल को बढ़ाया। आरंभ की स्थिति में विस्मय और जिज्ञासा का स्वरूप स्पष्ट नहीं था, परंतु ज्ञान और अनुभव वृद्धि के साथ कुछ बातों के विषय में विस्मय की मात्रा कम होती गई तो अन्य विषयों में आश्चर्य जगने लगा। इस अवस्था में 'काम' का स्वरूप मनुष्य में शारीरिक आकर्षण एवं लैंगिकता तक ही सीमित था। अपनी शारीरिक भूख मिटाने के लिए, वासनातृप्ति के लिए अभि- व्यक्त उसका लैंगिक जीवन पशु से अधिक भिन्न नहीं था। अतः स्वैर लैंगिकता से युक्त कामभाव अत्यंत संकुचित एवं स्वार्थपरक ही था। अकेलेपन की स्थिति में सुखदुःखात्मकता के सामान्य अनुभव से मनुष्य में आनंद का या दुःख का भाव उदित हुआ था। मनोवैज्ञानिक बच्चे में सुखदुःखात्मकता का मूलतः स्थूल रूप में अस्तित्व मान्य करते हैं। शारीरिक पीडा कष्टादि से दुःखात्मकता और शारीरिक सुख, भोजनादि की प्राप्ति से आनंदात्मक भाव का अनुभव इस स्थिति में संभव था। शारीरिक पीडा पहुँचने पर, जीवनयापन में कुछ कठिनाई या प्रतिरोध होने पर या इच्छा की अतृप्ति में मनुष्य ने दुःखात्मक भाव का अनुभव किया और शिकार की प्राप्ति होने पर या पशु को सरलता से मारने पर विजय प्राप्ति के कारण आनंद की भावना अचानक हास्य में प्रकट हुई। जुगुप्सा भाव और संवेदना का संमिश्रित रूप है। अतः अपने स्वरूप में वह अन्य भावों से भिन्न हैं। मुख्य रूप से वह प्रत्यक्ष आस्वाद या उसकी विषद कल्पना के प्रति अरुचिपूर्ण प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। यही प्रतिक्रिया ऐसे स्थलोंपर भी उत्पन्न होती है, जहाँ प्राण, स्पर्श और दर्शन के शक्ति के माध्यम से पहले प्रकारकी अनुभूति जागृत होती है।9 अतः पशुसमान जंगली जीवन-स्थिति में जुगुप्सा उत्पन्न होने का प्रश्न ही

₹. Disgust-a combination of emotion and sensation-is distinct in its nature, and refers to something revolting primarily in relation to the sense of taste, as actually perceived or vividly imagined and secondarily to anything which causes a similar feeling, through the sense of smell, touch or vision. ( The Expression of the Emotions in Man and Animals, P. 127. )

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३० रससिद्धांन्त का सामाजिक मूल्यांकन

नहीं उठता। जिस समय उसने अपने जीवन को सुरुचिपूर्ण, सुंदर, सुस्थिर एवं कलात्मक बनाना आरंम किया तथा अपने जीवन में मांस भूनकर खाना, अन्न बनाना, शरीर की सफाई और सजावट करना, घर बनाना, और सजाना आदि सारी बातों में सौंदर्या- त्मकता की महत्ता उसने अनुभव की, उस समय उसमें शारीरिक वितृष्णा या जुगुप्सा कां यह स्थूल भाव जगने लगा। उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि आरंभिक अकेलेपन की स्थिति में मानव में भय-काम-क्रोध और विस्मय का उदय हुआ। सुखदुख की स्थूल प्रतीति मात्र उसे हुई और जुगुप्सा, हास्य, युद्धप्रवृत्ति, उत्साह, आवेश का प्रारंभिक रूप में उन्मेष हुआ। द्वैत की स्थिति ने मनुष्य के भावोन्मेष में आमूलाग्र परिवर्तन किया। अपने साथ किसी अन्य के अस्तित्व का एहसास होनेपर, उसकी भावनात्मक स्थिति परिवर्तित हो गयी। स्त्री के संपर्क ने स्वैर काम के साथ सौंदर्याकर्षण को जागृत किया और जीवन-जगत् के पुनर्निर्माण की लालसा तीव्रतर होती रही। इस स्थिति में सबसे प्रबल भाव काम भाव हो सकता है। साथ ही अन्य किसी व्यक्ति के संपर्क के कारण मयक्रोधादि भावों की स्थिति में भी अंतर आया। द्वैत की स्थिति में अपने साथ अन्य को पाने के कारण भय से मुक्ति पाने के प्रयास में अधिक विश्वास उत्पन्न हुआ और अकेलेपन की वृत्ति के दूर होने से भय की अनुभूति भी कम हुई। अब वह आत्मरक्षा के लिए दूसरे की सहायता ले सकता था। पर साथ ही दूसरे व्यक्ति के बचाव एवं रक्षा का विचार भी उसमें धीरे-धीरे आता गया। भागने या चिल्लाने के स्थान पर भयमुक्ति के लिए प्रयत्न किये जाने लगे। मानवसंपर्क के अतिरिक्त कुछ नये अनुभवों, ज्ञान एवं कौशल के कारण भय की मात्रा एवं तीव्रता कम होती गई और क्रोध की अभिव्यक्ति स्पष्ट रूप में होने लगी। क्रोध एक ऐसा भाव है कि जो किसी अन्य व्यक्ति के संपर्क में उदित एवं व्यक्त होता है। पशु या प्रकृति के प्रति उसकी क्रोधाभिव्यक्ति में कुछ विशेषता नहीं थी। प्रत्यक्ष किसी अन्य व्यक्ति के संपर्क में क्रोध के विषयों में वृद्धि हुई, परिवर्तन हुआ और उसकी अभिव्यक्ति भी अधिक स्पष्ट तथा भिन्न होने लगी। जैसे-जैसे मनुष्य में लाभ का विचार बढता गया, वैसे-वैसे क्रोध के उदय के कारण भी उपस्थित होने लगे। अन्य व्यक्ति के सहयोग से विकास की गति भी बदल गई और विस्मय ने धीरे- धीरे जिज्ञासा का रूप लिया। भौतिक वस्तुओं के अतिरिक्त अन्य कई विषयों में विस्मय जगने लगा और सौंदर्यात्मक चेतना से भी आश्चर्य को बल मिला। आरंभ में चिल्लाने, दौडने आदि शारीरिक चेष्टाओं के द्वारा भय, क्रोध, आश्चर्य, हर्ष, शोकादि व्यक्त करनेवाला मनुष्य अब कुछ संकेतों, ध्वनियों एवं उद्गारों का प्रयोग करने लगा।

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मानवजीवन का विकास और विभिन्न भावों का उन्मेष ३१

विस्मयादि बोधक उच्चारणों एवं शब्दों को कुछ विद्वान भाषा का आदिरूप मानते हैं। वस्तुतः मानवसंपर्क के अनंतर ही भाषा की उत्पत्ति और वृद्धि सम्भव है। द्वैत की स्थिति में प्राकृतिक या भौतिक वस्तुओं एवं स्थितियों के स्थानपर मानव में किसी व्यवहार के प्रति विस्मयभाव में आनंद के साथ उदासी, निराशा आदि संलग्न भाव उदित होने लगे। सुखदुःख की स्थूल भावना द्वैत की स्थिति में अधिक स्पष्ट एवं तीव्र हुई। अपने अतिरिक्त किसी अन्य के लिए आनंद या शोक उत्पन्न होना सामाजिक दृष्टि से अधिक श्रष्ठता रखता है। आनंद का भाव कुछ व्यापक बना। अपने आनंद को अन्य व्यक्ति के साथ व्यक्त करने में मनुष्य अग्रसर हुआ और अपने प्रिय व्यक्ति को पीडा पहुँचना, उसका घायल होना, उसकी मृत्यु होना आदि कारणों से दुःख का अनुभव करने लगा। स्वरक्षा के साथ ही अपने साथी अथवा स्त्री की रक्षा के निमित्त किये जानेवाले प्रयत्नों में क्रोध के अतिरिक्त धैर्य, उत्साह और आवेश के दर्शन विशेष रूप में होने लगे। जीवन के विकास के पथ पर (कुछ समय के पश्चात्) यह द्वैत की स्थिति भी कुछ अधूरी सी प्रतीत हुई और अपने-आप मनुष्य गुफाओं में दल बनाकर, समूहों का संगठन कर रहने लगा। यद्यपि आरंभ में उसका दलगत जीवन संगठित नहीं था, अपितु सामूहिक संस्कारों से उसके जीवन को प्रभावित अवश्य किया। दल अथवा समूह का एक सदस्य बनने से समूह के संस्कारों एवं नियमों का अप्रत्यक्ष दबाव उसपर पड़ने लगा और उसका व्यष्टिजीवन अधिक व्यापक बनता गया। दल के एक अभिन्न अंग के नाते अब उनके हितसम्बन्धों की रक्षा का प्रश्न उसके जीवन में अपने-आप ही महत्त्वपूर्ण हो गया। जीवन के विकास, विभिन्न अनुभवों एवं ज्ञान के ग्रहण, साधनों में कुशलता प्राप्ति के साथ ही सामूहिक जीवन की स्थिति ने उसके सारे भावों की स्थिति, स्वरूप और उन्मेष के कारणों को बदल डाला। समूह के सहारे बाह्य बातों से उसका भय तो कम हुआ, परंतु वह अन्य दल या किसी मनुष्य से भय का अनुमव करने लगा। धीरे-धीरे अदृश्य शक्ति की कल्पनाएँ सामने आई। टोटम, जादू, अज्ञात शक्ति, भूत-पिशाच्च आदि से वह डरने लगा। समाजसम्पर्क से परस्र के विषय में चिंता बढने लगी। प्रत्यक्ष भय की मात्रा तो कम हुई पर चिंता बढ़ने लगी। समूहों के नियमों की पाबन्दी, दल के नेता का प्रकोप, आदि से भय उत्पन्न होने लगा। दलों में व्यक्तिगत स्वार्थ-सिद्धि के हेतु, नेतापद प्राप्त करने के उद्देश्य से या स्त्री पर अधिकार की लालसा से मनुष्य में लाभ की मात्रा बढती गई और उसकी पूर्ति में किसी तरह प्रतिबंध आने पर तुरंत क्रोध का उन्मेष होने लगा। दल के संगठन एवं समझौते के साथ-साथ धीरे-धीरे क्रोधाभिव्यक्तिपर नियंत्रण आया। व्यक्ति, प्रसंग- विशेष, स्त्री, लाभकारी वस्तु आदि क्रोध के कारणों में तो वृद्धि हुई पर व्यक्ति की

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३२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

क्रोधाभिव्यक्ति संयत बनी। सभ्यतावृद्धि के साथ उत्तरोत्तर क्रोध को दबाने एवं शिष्ट तरीके से, किसी अन्य मार्ग से व्यंजित करने की प्रवृत्ति बढ़ती गई। भाषा के विकास ने भय, क्रोधादि भावों की अभिव्यक्ति बदल दी। मारना, पीटना, चिल्लाना आदि शारीरिक एवं आंगिक चेष्टाओं के स्थानपर शब्दों द्वारा क्रोध व्यक्त किया जाने लगा। साथ ही धीरे-धीरे ईर्ष्या, द्वेष, वैर, खीझ, क्षोम, अप्रसन्नता आदि क्रोध की विभिन्न छटाएँ व्यक्त होने लगीं। काम भाव के उन्मेष और व्यंजना में दलगत जीवन में भी अधिक अंतर नहीं आया, क्योंकि आरंभ में स्त्रियाँ दल की संपत्ति होती थीं और स्वैर लैंगिकता के कारण दल में स्वार्थपरक व्यवहार भी किये जाते थे। अतः नैतिकता आदि का उदय तक नहीं हुआ था परंतु जब स्त्री पर अधिकार की लालसा से दलों में पारस्परिक संघर्ष बढ़े, तब उसके मनुष्य के काममय जीवन में कुछ व्यवस्था उत्पन्न करने की आवश्यकता प्रतीत हुई। मानव में विकसित होनेवाली लज्जारक्षा एवं सौंदर्याकर्षण ने इसमें संस्कार किया। किसी एक स्त्रीपर अधिकार करने का आकर्षण बढ़ता गया। लज्जारक्षा के निमित्त खाल से बनाये कपड़ों के उपयोग और विभिन्न आभूषणों द्वारा9 साजशंगार की बढ़ती कल्पनाओं तथा अन्य सुविधाओं के कारण उत्तरोत्तर सौंदर्यवृत्ति (Aesthetic Sense) वृद्धिं- गत होने लगी। स्त्रियाँ सजघजकर सौंदर्यसाघक मनुष्य को मोहित करने लगीं और इस आकर्षणपूर्ण सौंदर्यभावना ने रति को और पुष्ट बनाया। स्त्री को प्राप्त करने के साथ- साथ उसके मोहक सौंदर्याकर्षण ने मानव के कामभाव को मानसिक स्तर पर पहुँचाया। वासनाजन्य शारीरिक लैंगिकता के स्थानपर मानसिक प्रेम और तीव्र आकर्षण के उदय ने मानवीय प्रेम के क्षेत्र का विस्तार किया। जीवन में स्थिरता एवं संपन्नता आने के साथ जब मानव ने घर में निवास करना आरंभ किया तब स्त्री की रक्षा का प्रश्न उपस्थित हुआ। परिवारसंस्था के बीज इसी स्थिति में निहित हैं। इसने जहाँ एक ओर मात्सर्य, ईर्ष्या उत्पन्न की, वहाँ दूसरी ओर व्यक्ति में प्रेम आकर्षण, चिंता और उत्तरदायित्व का एहसास जगाया। परिवार के उदय के साथ उसमें स्त्री और संतान का उत्तरदायित्व, पालपोस एवं उनकी रक्षादि का भार पुरुषार पडा और इससे रतिभावना परिपुष्ट होती रही। काम के साथ प्रेम के अन्य स्वरूपों का उदय भी इस स्थिति में हुआ। समूहसापेक्ष जीवन में सुखदुख की कल्पनाओं में अंतर आने के कारण मनुष्य के आनंद और दुःख के उदय के कारणों और उनकी अभिव्यक्ति में भी भिन्नता आयी। सामूहिक शिकार, मछलियों को मारना और कृषि आदि में परस्पर सहायता जैसी कुछ ₹. Necklace of stag teeth, fish vertebra and shells. ( Art through the ages, P. 32 )

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मानवजीवन का विकास और विभिन्न भावों का उन्मेष ३३

बातों के कारण सम्मिलित रूप में हर्ष को प्रकट किया जाने लगा। सामूहिक रूप से शिकार में सफलता प्राप्त करने के अनंतर विजयश्री के उन्माद में उसके चारों ओर नाचते-कूदते, चिल्लाते हुए नृत्य के द्वारा प्रकट किया जानेवाला हर्ष विभिन्न स्वांगादि के दर्शन से हास्य उत्पन्न कर देता था। व्यक्तिगत स्वार्थ एवं आनंद की सीमाएँ कुछ व्यापक बनीं और शारीरिक सुख के स्थान पर मानसिक और बौद्धिक संतोष उत्पन्न होने लगा। मानव की सहसंवेदना ने दुःख को व्यापक रूप में अनुभूत किया और दया, करूणा, सहानुभूति प्राथमिक रूप में जगने लगी। हर्ष और शोक के समान ही विस्मय ने भी मानसिक स्तर प्राप्त किया। अचानक घटना, दैवी चमत्कार, महान् कार्य आदि के दर्शन से व्यक्ति विस्मय का अनुभव करने लगा। साथ ही जुगुप्सा जैसे शरीरसंवेदनजन्य भाव का भी मानसिक स्तर पर विकास हुआ। केवल देखने, खाने, सूँघने की क्रिया से उत्पन्न शारीरिक वितृष्णा के स्थान पर मानसिक घृणा जगी । अप्रीतिकर, दुष्ट, पीडादायी व्यक्ति का कार्य मानसिक घृणा का विषय बना। समूह-जीवन में मनुष्य के ममत्व का विस्तार होता गया और परदुःख का अनुभव करने की भावना भी जागत हुई। दल के किसी सदस्य की मृत्यु पर व्यक्त होनेवाला दुःख तत्कालीन शवसंस्कार के एक चित्र में अंकित हैं। उससे इस स्थिति की कल्पना आ सकती है।9 चित्र में शव के साथ दल के अन्य सदस्य उपस्थित हैं। शामन जंगली मैंसे की पूजा करता है। बाद में शवदफन किया जाता है। ऐसे प्रसंगों पर पारस्परिक सहानुभूति व्यक्त होती है। इसी सहानुभाव ने आगे चलकर व्यक्ति में दया, करूणा, क्षमा, सहानुमृति आदि को जगाया। इस प्रकार व्यक्ति के समूहसापेक्ष व्यक्तित्व ने उसके भावोन्मेष को प्रभावित किया और भावों का स्वरूप एवं अमिव्यक्ति पहले की अपेक्षा बहुत परिवर्तित हो गई। प्रथम अव्यवस्थित और बाद में संगठित दल में रहते हुए ही घीरे-धीरे एक ओर वह उससे विभक्त बनकर परिवार बनाकर रहने लगा, दूसरी ओर कई परिवारों ने संगठित रूप में एक समाज, नगर या राज्य का रूप धारण किया। सम्यता एवं संस्कृति की विकसित स्थिति में वह समाज का एक सदस्य बन गया। समष्टि के सदस्यत्व ने उसके भावोन्मेष को बहुत परिवर्तित किया। अब वह अपने परिवार, समाज, नगर, राज्य और राष्ट्र इस प्रकार विकसित होनेवाले क्षेत्रों का एक सदस्य बना, अथात् व्यष्टि-समष्टि का संपके एवं उत्तरदायित्व का बोझ उस पर अनायास ही आ पड़ा। संस्कृति के विकास के साथ उसकी आस्था ने

१. The Epic of Man, P. 33 रस ... ३

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३४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

धर्म, नीति आदि को जन्म दिया और कलात्मक चेतना एवं सौंदर्यभावना ने कला की सर्जना में अभिव्यक्ति पायी। धर्म-अधर्म, नीति-अनीति, आदर्श की कल्पनाओं ने मनुष्य में सद्गुणों की महत्ता, जीवनमूल्यों का महत्त्व बढ़ाया। धर्म और नीति के आदर्श मानवी व्यवहार के निकष बने। अत एव इन दोनों ने मावों को भी अधिक समाजसम्मत, आदर्शात्मक, सूक्ष्म और सम्मिश्र बनाया। परिवारांतर्गत पारस्परिक सम्बन्ध एवं व्यवहार, समाज की अर्थव्यवस्था, कार्य- विभाजन और नगर के नेता या राजा का आदेश, तथा धर्म और नीति के नियमादि के मूल्य आदि सभी के कारण भय की आरंभिक मात्रा तो बहुत कम हुई, परंतु मनुष्य चिंता का अनुभव करने लगा। अनीति, सामाजिक बुराई, अन्याय, पशुता, दुराचार, पाप और अनिष्टकारी व्यक्ति या वस्तु से जहाँ एक ओर भय या चिंता उत्पन्न हुई, वहाँ दूसरी ओर इनके प्रति क्रोध का और कहीं-कहीं जुगुप्सा या घृणा भी व्यक्त की जाने लगी। सभ्यतावृद्धि के साथ भविष्य की चिंता के साथ मनुष्य में भय, शंका, आवेग, भ्रम, संभ्रम, आकुलता आदि विभिन्न भावस्थितियाँ उत्पन्न हुई। सम्मान या प्रतिष्ठा की रक्षा और अपनी उच्चता एवं योग्यता के निर्वाह में प्रतिरोघक बातों से वह चिन्तित रहने लगा। समाजसापेक्ष व्यक्तित्व में व्यक्तिगत लाभालाभ की कल्पनाओं की सामाजिक नीति-नियमों, पाबन्दियों से टकराहट होंने के कारण व्यक्ति में क्रोध जागृत हुआ, पर अब मुक्त (overt) क्रोध के बदले चिडाचिडाहट, झुंझलाहट, द्वेष, ईर्ष्या, खीज, क्षोभ, कुढन, अप्रसन्नता आदि विभिन्न छटाएं व्यक्त होने लगीं। शिष्ट एवं विकसित समाज में क्रोध को नियंत्रित, प्रच्छन्न एवं समाजमान्य मार्ग से अभिव्यक्ति मिलने लगी और द्वेष, ईर्ष्या आदि के रूप में क्रोध व्यक्त होने लगा। आचार्य शुक्ल ने वैर को क्रोध का अचार या मुरब्बा कहा है, वह सही है।9 क्रोध को मन में दबाये रखकर प्रसंगविशेषपर विशेष ढंग से व्यक्त करने में शिष्टता और बुद्धिमानी प्रतीत होने होने लगी। व्यक्तिगत क्रोध के अतिरिक्त समाज, राज्य या शत्रु के प्रति सामूहिक क्रोधाभिव्यक्ति होने लगी। शारीरिक संघर्ष के अलावा मानसिक संघर्ष बढ़ता रहा और धन, अधिकार, सम्मान विशेष पदप्रतिष्ठा की प्राप्ति के लिये प्रच्छन्न रूप में क्रोध व्यक्त किया जाने लगा। इन्हीं बातों ने व्यक्ति या समूह में उत्साहप्रदर्शन की लालसा बढ़ाई। सामूहिक स्थिति की सापेक्षता में व्यक्तिगत स्वार्थ अधिक व्यापक बना फिर भी विनयकामना, अधिकारप्राप्ति, सत्ता की रक्षा, राज्य, नगर या राष्ट्र की रक्षा के निमित्त युद्ध किए जाने लगे। धीरे-धीरे युद्ध में प्रदर्शित उत्साह, आवेग, अमर्ष, आवेशादि भाव

१. चिंतामणी, भाग १, पृ. १३८.

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मानवजीवन का विकास और विभिन्न भावों का उन्मेष ३५

वीरत्व के प्रतीक बने। शक्तिसंपन्नता के बावजूद धैर्य, वीरता, साहस आदि मानवीय गुणों को समाज में प्रतिष्ठा मिली। पीडादायी शत्रु के प्रति केवल उत्साहप्रदर्शन एवं संघर्ष और क्रोध आदि व्यक्त किया जाता था, बल्कि मनुष्य उस से घृणा भी करने लगा। नीति की कल्पनाओं, शिष्टता एवं श्रीलता की धारणाओं ने मनुष्य में अनिष्ट, अनैतिक एवं अश्लील बातों से घृणा उत्पन्न की। घृणा का यह रूप पूर्णतः सामाजिक ही है। सामाजिक जीवन की सापेक्षता ने काम भाव को सबसे अधिक प्रभावित किया। समाजसंगठन के पश्चात् स्त्री-पुरुष रति के अतिरिक्त पारिवारिक एवं सामाजिक सम्बन्धों में प्रेम के व्यवहार बढ़े। परिवार एवं सभाज में स्त्री का स्थान, संतान की रक्षा एवं पालपोस का उत्तरदायित्व, अन्य सदस्यों से संपर्क एवं सम्बन्ध के फलस्वरूप भावस्थितियाँ उत्पन्न हुई। स्वैर काम के स्थान पर संतुलित एवं परिष्कृत रति के अधिष्ठान पर परिवारसंस्था स्थिर हुई। मातापिता और पुत्र, भाई-बहन, स्वामी-सेवक, गुरू-शिष्य, राजा-प्रजा आदि विभिन्न सम्बन्धों के साथ स्नेह, वत्सलता, आदर, श्रद्धा, सख्य, स्वामिभक्ति आदि विभिन्न भावों का उदय हुआ और उनमें उत्तरोत्तर स्थायित्व आकर सद्गुणों में परिवर्तन हुआ। शिकारी मानव की जीवन स्थिति में ही मातृत्व की प्रतिष्ठा बढ़ चुकी थी, जिसके दर्शन खुदाई में प्राप्त तत्कालीन स्त्री-मूर्तियों से होते हैं।' यह स्त्री-मूर्ति 'वीनस ऑफ विलेन्डार्फ' नाम से प्रसिद्ध है। इस मूर्ति की रेखाकृति की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया गया है, बल्कि उसके शरीर के अंगों, विशेषतः उरोजों, जंघाओं को उभारकर तराशा गया है। विद्वानों का इस विषय में कथन है कि मातृत्व तथा शिशुजन्म का महत्त्व इसमें संकेतित हो सकता है। मनुष्य ने उन अंगों को स्पष्टतः अंकित किया है, जिन्हें वह सौंदर्य और यौनचेतना की दृष्टि से महत्त्व देता था। ईजिप्त की गॉडेस ऑफ थिसिस मातृत्व का प्रतीक है और उसके माध्यम से वात्सल्य को श्रेष्ठत्व प्रदान किया गया है।२ प्रगतिशील समाज में जैसे-जैसे स्त्री का स्थान एवं स्थिति विकसित होती गई और व्यक्ति की सौन्दर्यात्मक दृष्टि परिष्कृत होती रही, काम भाव में मी परिष्कार एवं संस्कार आया। गोपनीयता, परिष्कृति और सौन्दर्यात्मकता की विशेषता उसमें प्रकट होने लगी। सिंधु संस्कृति के प्रगतिशील

₹. ( i ) Female figure, known as the Venus of Willendarf, Vienna. -History of Arts. (ii ) Statutte, known as the Venus of Lespugue. २. The Heritage of Indian Art, P. 80. Art and Images, Plate III.

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३६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन समाज में मानव द्वारा अंकित स्त्रीसौन्दर्य का रूप एक 'कासे की नृत्यांगना' में व्यक्त होता है।' सामाजिक जीवन की स्थिरता ने वात्सल्य, स्नेह, सख्य, भक्ति के साथ ही आदर, लोम, दया, मित्रता, सहानुभूति, सहिष्णुता और मानवता को जन्म दिया। स्त्री और बच्चों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों से भावात्मक सम्बन्ध जुडे, जो आज तक विभिन्न प्रकार से बने रहे हैं। इस विकास की दिशा में ही पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय प्रेम- भावना का उदय हुआ। अपने घर, राज्य, राष्ट्र और अखिल मानव से प्रेम का व्यापक विस्तार सामाजिक जीवन के कारण ही हो सका। इतना ही नहीं, पशु से भी प्रेममाव की परिणति हुई। दया, क्षमा, शांति, भूतदया एवं सहिष्णुता सद्गुण बने। मानव के समग्र जीवन को प्रेम के संस्कार ने प्रावित कर दिया। आरंभिक स्थिति में भयकारी अज्ञात बातों के प्रति अपने संस्कारशील जीवन में मनुष्य आदर, श्रद्धा या भक्ति व्यक्त करने लगा। प्रेम ने कभी अमूर्त रूप धारण किया, कभी अमूर्त विषय के प्रति भी इस प्रेमभाव की जागृति हुई। प्रेम में आस्था के संमिश्रण से भक्ति का उदय हुआ है। आरंभिक स्थिति में अज्ञान से भयभीत होनेवाला मनुष्य आगे चलकर आदर एवं श्रद्धा समर्पित करने लग गया। उसके सामाजिक जीवनविकास के आरंभस्थल पर ही आस्था के चिन्ह अंकित हैं। पचीस हज़ार वर्ष पूर्व गुफावासी मानवजीवन के अंकित एक चित्र से इसकी कल्पना की जा सकती है।२ शामन बैठा है; उसके हाथ में पत्थर पर अंकित एक मूर्ति है। गुफा की भित्तियों पर मानवीय हाथों के चिन्ह अंकित हैं। शामन कुछ बता रहा है और सुननेवालों के चेहरे पर आश्चर्य और श्रद्धायुक्त भाव हैं। यही श्रद्धा का भाव उत्तरोत्तर देवता, श्रेष्ठ व्यक्तियों, राजा, नेता आदि के साथ राष्ट्र के प्रति विकसित होता गया। श्रद्धाभाव के उदय एवं विकास ने आश्चर्य को पुष्ट किया। दैवी चमत्कारों, विश्वासों और प्राकृतिक घटनाओं के प्रति विस्मय जगने लगा। मनवीय महानता के दर्शन से अचरज जागृत होने लगा। ईश्वरविषयक कल्पनाओं ने ही आत्मिक और आध्यात्मिक आनंद की स्थिति उत्पन्न की और भक्ति के आवेग में निराशा, पीडा, ग्लानि आदि का अनुभव मनुष्य को होने लगा। सामाजिक जीवन के विकास ने आनंद और शोक की स्थितियाँ बदल दीं। जहाँ एक ओर व्यक्तिगत स्वार्थ के हेतु अपने उच्चत्त्र की भावना से प्रेरित होकर ₹. Heritage of Indian Art. -( Bronze dancing girl. ) R. The Epic of Man, P. 30. -(Shaman, Priestly Character.)

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मानवजीवन का विकास और विभिन्न भावों का उन्मेष ३७

दूसरे का उपहास करने या उसे नीचा दिखाने में व्यक्ति हर्ष का अनुभव करता था, दूसरी ओर अपने आनंद को समष्टि में बाँटने की इच्छा से सामूहिक आनंद का आस्वाद भी करता था। मनोरंजन के विभिन्न साधनों द्वारा हर्ष की अभिव्यक्ति हास्य द्वारा होने लगी। सामाजिक विकास एवं सभ्यतापूर्ण शिष्ट व्यवहार में मनुष्य के जीवनक्रम से विपरीत, विसंगत एवं विकृत व्यक्ति, स्थिति, प्रसंग अथवा कार्य मनुष्य में हास्य उत्पन्न करने लगा। धर्म और आदर्श के प्रभाव में व्यक्तिगत कारण नहीं, बल्कि समानगत हीनता, दरिद्रता, पीडादायी स्थिति मनुष्य को दुःखी बनाने लगी। दुःख की व्यापक अनुभूति ने मनुष्य को अधिक संस्कारशील बनाया है। शोक के अतिरिक्त ग्लानि, अवसाद, चिंता, खिन्नता, उदासीनता, उद्वेग, असंतोष आदि की संमिश्र स्थिति सभ्यता के साथ उत्तरोत्तर बढ़ती रही है। उपर्युक्त भावोन्मेष एवं भावविकास की प्रक्रिया के साथ ही भावाभिव्यक्ति ने भी सामाजिक संदर्भ में प्रेरणा ग्रहण की है। इस विकासदिशा में यह दिखाई देता है कि व्यष्टि और समष्टि के विकसनशील और परिवर्तनशील सम्बन्धों ने भावाभिव्यक्ति को अत्यधिक प्रभावित किया है। भावों के उदय के प्रेरक (stimulus) जीवन की बदलती स्थितियों में बदलते रहे। कुछ स्थितियों में पहले कुछ प्रेरक बने रहे, कुछ में वे नष्ट हुए और नये कारणों का उदय हुआ और उस के फलस्वरूप भावों ने भी नया भिन्न रूप धारण किया। समय, स्थिति और सामाजिक संदर्भ के बदलने से भावों के प्रेरकों की वृद्धि के साथ अभिव्यंजना में फर्क़ आया। समाज में जैसे-जैसे शिष्टता, पद्धति, नीति, धर्म आदि विचारधाराओं का उदय होता गया, वैसे-वैसे भावों की अभिव्यक्ति समाजमान्य तरीके से करने की ओर प्रवृत्ति बढ़ी। आरंभिक स्थिति में भय, क्रोध, काम, आश्चर्य, सुखदुःखादि भाव शारीरिक चेष्टाओं एवं आंगिक क्रियाओं द्वारा व्यक्त होते थे, परंतु इन भावों ने मानसिक स्तर प्राप्त करने पर उनकी अभिव्यक्ति संकेतों, ध्वनियों और मुख पर अमिव्यक्त भंगिभाओं द्वारा की जाने लगी। भाषा के संस्कार से भाव को व्यक्त रूप प्राप्त हो गया पर साथ ही समाज संस्कार के कारण मुक्त (overt) भाव को छिपाने की प्रवृत्ति बढ़ी। दमित या प्रच्छन्न रूप में अथवा किसी परिष्कृत एवं समाजमान्य मार्ग से भावाभिव्यक्ति करने के प्रयास में व्यक्ति जुट गया। भाषा के व्यवहार से शब्दों द्वारा अभिव्यक्त क्रोध, भय, उल्लास, दुख की तीव्र अभिव्यक्ति कम कर के संयम एवं विवेक की स्थिति प्रदर्शित करना सभ्यता का संस्कार ही है। भाषिक गाली-गलौज द्वारा अभिव्यक्त किया जानेवाला क्रोध आगे चलकर शिष्ट एवं विकसित समाज में विवेकहीन असभ्य स्थिति का निदर्शक माना जाने लगा। अत एव उसका परिवर्तन वैर आदि में हो गया।

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३८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

काम की आंगिक अभिव्यक्ति ने जहाँ एक ओर लजा एवं सौंदर्य ने विशेष रंगत एवं मोहकता उत्पन्न की, वहाँ दूसरी ओर गोपनीयता से उसको आकर्षक एवं परिष्कृत स्तर पर स्थापित भी किया। कलात्मक सौंदर्य-चेतना ने वाणी एवं व्यवहार में कई सकेतों एवं भंगिभाओं को व्यक्त किया। कामभाव को कहीं-कहीं उदात्तीकृत रूप में भी व्यक्त किया जाने लगा। शाब्दिक अभिव्यक्ति, संस्कारशील गोपनीयता, शिष्ट व्यवहार, सामाजिक हित की धारणा तथा सौंदर्य का साक्षात्कार और आस्था उत्पन्न हुई। इसी कारण श्ीलता-अश्लीलता की कल्पना का उदय होकर कामभावना की अभिव्यक्ति में परिष्कार हुआ। सामाजिक संस्कार के ही कारण भावाभिव्यक्ति सूक्ष्म, प्रच्छन्न, सम्मिश्र और सूचक बनती गई। मनुष्य की भावात्मक चेतना एवं सौंदर्यात्मक वृत्ति ने कलात्मक अभिव्यक्ति पायी और चित्र, शिल्प, साहित्य आदि के द्वारा अपने मन के विभिन्न प्रच्छन्न भावों की अनुभूति को अभिव्यक्ति दी। मानवजीवनविकास के अध्ययन में प्राप्त पत्थर पर अंकित चित्रों एवं शिल्पाकृतियों में मानव की चेतना सजीव बनकर उपस्थित हुई है। अपने समाजगत जीवन में अनुभवों को मानव ने जिस समय जिस रूप में पाया था, गुफाभित्तियों के कॅनवास पर अंकित किया। समकालीन स्थिति में अनुभूत भावों की आालोडित स्थिति की व्यंजना के दर्शन प्राचीन कला में स्थान-स्थान पर होते हैं। भाषा के संस्कार एवं विकास के बाद वही माध्यम ग्रहण कर मानव ने अपनी गहनतम भावसंपत्ति को भाषिक अभिव्यक्ति दी एवं साहित्यसर्जना की। इस प्रकार प्रकृति एवं समाज की सापेक्षता में अनुभूत तथा विभिन्न क्रिया-प्रतिक्रियाओं से उद्बुद्ध भावावेगों की अभिव्यक्ति विभिन्न काल की कला और साहित्य में हुई है। भावों की परिवर्तनशीलता, विकास एवं प्रच्छन्नता के बावजूद रागात्मक स्तर पर मानव के भाव- विश्व ने काव्य में अभिव्यक्ति पायी है, और गोचर रूप धारण कर लिया है। रससिद्धान्त का मूल आधार भाव ही है। रससूत्र ( "विभावानुभावव्यभिचारी संयोगाद्रस निष्पत्तिः।") में भरतमुनि ने स्थायी भाव और संचारी भावों की योजना को महत्त्व दिया है। साथ ही अनुभवों और सात्त्विक भावों के अभिव्यंजित रूप को भी महत्ता दी है। भाव के कारणों के रूप में विभाव की स्थापना की है। सामाजिक सन्दर्भ से विचार करने पर प्रतीत होता है कि भावादि की इस स्थापना में भावोन्मेष एवं विकास की प्रक्रिया का पूर्णत्व है। रससिद्धान्त में भावों की योजना एवं स्थापना में भारतीय समाज की चेतना का प्रतिबिम्ब झलकता है। आचार्य शुक्ल ने भाव के विषय में कहा है, "भाव ही कर्म के मूल प्रवर्तक और 'शील' के संस्थापक हैं। "१ भारतीय मनीषा समाज में भावों की स्थिरता को हित-रक्षा और शील एवं चारित्र्य के आदर्शानुरूप मानती है। १. रसमीमांसा, पृ १६१.