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मानवजीवन का विकास और विभिन्न भावों का उन्मेष ३९
रससिद्धान्त में रति, उत्साह, कोध, जुगुप्सा, हास्य, शोक, विस्मय, मय और शम आदि नौ स्थायी भावों को स्वीकार किया गया है। उसमें रसों का गौणत्व- प्रधानत्व एवं भाव का क्रम, भारतीय समाजविकास के संस्कार एवं विचारधारा के अनुरूप स्थिर हुआ है। मानव-जीवन विकास में किसी भाव का उदय प्रथम होने पर भी सामाजिक एवं सांस्कृतिक विकास में सामाजिक श्रेय की दृष्टि से गौण-प्रधान स्थान प्राप्त हुआ है। सब से प्रधान स्थान रति को (रटगार रस को) दिया गया है। वस्तुतः विकासक्रम में आदिम भाव भय होते हुए भी जीवनादर्श दृष्टि से वह गौण ही माना गया है, अतः भय को गौण या उपरस का स्थान प्राप्त हुआ। सामाजिक एवं नैतिक नियमों ने सब से अधिक महत्ता परिष्कृत काम को दी और शंगार को रसराज माना गया। रति मात्र लैंगिकता या भोग का प्रतीक नहीं; बल्कि जगत के संभरण का मूल उत्स है। अतः भारतीय चिंतन में मिथुन को शुभ एवं पवित्र रूप में ही माना गया है।१ इसकी विस्तारपूर्ण चर्चा पाँचवें अध्याय में की गई है। रससिद्धान्त में अग्रस्थान प्राप्त होने का कारण उस के इस महत्त्व में ही निहित है। स्त्रीपुरुषहेतुक कहने में अनौचित्य नहीं; बल्कि रति को शुभ्र, उज्जल, शोभादायी माना गया है तथा उसकी व्यंजना भी कुलीन पात्र में की गई है। मानव की सौंदर्यात्मक वृत्ति रसिकता, स्नेह, सौंदर्याकर्षण और द्वैत की स्थिति ने ही तो जगजीवन का निर्माण किया है। सौंदर्य एवं आवर्षण के कारण अपने जीवन को सुन्दरतम, परिष्कृत और विकसनशील बनाने में वह सफल हुआ है, अतः सौंदर्य के दर्शन का प्रतीक रति को माना गया है। फ्राइड जैसे मनो- वैज्ञानिक भी रति को ही जीवन का आदि स्रोत मानते हैं। अतः प्राचीन काल से आज तक वह सर्वमान्य है। केवल सादर्याकर्षण की महत्ता उसके जीवनसंस्कार के लिये पर्याप्त नहीं, उत्साह एवं आवेशपूर्ण कार्यों ने व्यक्तित्व को सफल एवं पूर्ण बनाया है। वीरत्व की व्यंजना में व्यक्तित्व के आदर्शात्मक पहलू का अंकन भारतीय परम्परा को उज्जवल बनाये हुए हैं। अतः स्थायी भावों में उत्साह का द्वितीय स्थान है। क्रोध के साथ आरंभिक स्थिति में आक्रमणकारी वृत्ति, आवेश या उमंग तथा उत्साह के दर्शन होते हों, परन्तु वीरत्व में त्याग, उत्साह और कठिन कार्य की पूर्ति की महत्ता होती है। क्रोध की अपेक्षा उत्साहादि की महत्ता संस्कारशील समाज में अधिक प्रमाणित हुई। आचार्य शुक उत्साह को 'शीलदशा' कहते हैं। उत्साह के पूर्व क्रोध और भय के भाव मनुष्य में उदित हुए। परंतु सामाजिक सन्दर्भ में वे क्रमशः अविवेक और कमज़ोर व्यक्तित्व के परिचायक होने से गौण ही माने गये और क्रम की दृष्टि से भयानक को तो उपरस का स्थान प्राप्त हुआ। मनुष्य के संस्कारशील जीवन- विकास के प्राह में सामाजिक सापेक्षता में क्रोधपर नियंत्रण रखना उचित माना गया
१. साहित्यविचार, पृ. ३०.
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है और विकास के साथ अविवेकी क्रोधाभिव्यक्ति पर संयम पाने की लालसा संस्कार का लक्षण माना गया। क्रोध को मुख्य रसों में स्थान दिया गया है। परंतु उसके आश्रय राक्षसादि बहुमुख बहुबाहवः बनने में शील के हीनत्व का संकेत मिलता है। मनुष्य में जुगुप्सा केवल सौंदर्यानुभूति एवं संस्कारों के अपनाने के पश्चात् उत्पन्न हुई है। इस दृष्टि से देखा जाय तो जुगुप्सा का आरंभ संस्कार और समाज की सापेक्षता में होने से यह माव काम्य नहीं है। सामाजिक दृष्टि से अत्यंत गौण और शीलपक्ष की दृष्टि से हीन भाव ही है, परंतु शंगार की सौंदर्यात्मक प्रवृत्ति से बिलकुल विपरीत, असुन्दरत्व का द्योतक है। अतः रसचतुष्टय में उसका अन्तर्भाव किया गया है। बीभत्स के गौणत्व एवं हीनत्व को लक्षित कर रसमालिका से हटाने का प्रस्ताव आधुनिक आलोचकों ने किया है। इसका प्रधान कारण उनकी मानसशास्त्रीय दृष्टि रही है। रसमालिका में बीभत्स को प्रधान रस का स्थान तो दिया गया परंतु काव्य में स्वतंत्र रूप से उसका अधिक महत्त्व नहीं है। मानव जीवन विकास के आरंभिक काल में हास्य की प्रवृत्ति का विकास सीमित रहा। रसमालिका में उसे गौंण एवं उपरस का स्थान प्राप्त हुआ है। कारण यह है कि सामाजिक व्यंग, विसंगति, विपरीतता और शंगार अर्थात् शंगार की विकृति के रूप में हास्य की उत्पत्ति मानी गयी है, अतः सामाजिक श्रेय की दृष्टि से उसे हेय माना गया। आज तक इन कारणों में पर्याप्त अंतर आता गया है, परंतु कहीं भी सौंदर्य तथा औचित्य की विपरीतता एवं विकृति हास्य का निदर्शक होती है। अद्भुत भाव संस्कार प्राप्ति एवं सभ्यता के साथ उत्तरोत्तर कम होता गया। मनुष्य की उदात्तता, महानता और वीरत्व आदि के दर्शन से विस्मय जगना संस्कार- शीलता का ही लक्षण है। अतः रसमालिका में अद्भुत को उपरस का स्थान भले ही प्राप्त हुआ हो, परंतु उसका वर्णन सामाजिक श्रय एवं संस्कारशीलता की दृष्टि से उच्च ही है। वीरत्वव्यंजक महान कार्यों में वीरत्वदर्शन से लोकोत्तर असाधारणत्व के प्रति आश्चर्य की अनुभूति भी संस्कारशील व्यक्ति का एक भाव है, अतः सामाजिक दृष्टि से अद्भुत की महत्ता अवश्य है, परंतु स्वतंत्र रूप में उसका महत्त्व उतना नहीं है। रससिद्धान्त में भावों के उदित होने के कारणों को विभाव कहा गया है। विभाव शब्द का अर्थ है विज्ञान। कारण, निमित्त, हेतु का यह पर्याय है। इसका अर्थ विभावित करना, निश्चित ज्ञान किया जाना है अर्थात् लोक में जो-जो पदार्थ हैं, लौकिक इत्यादि भावों के उद्बोधक हुआ करते हैं, काव्य में वे ही विभाव कहलाते हैं।' विभाव दो प्रकार के माने गये हैं-आलम्बन विभाव और उद्दीपन विभाव। विभाव भाव के कारण अथवा प्रेरक होते हैं। वे भी नित्य परिवर्तनशील होते हैं। विभाव भले ही १. भरत का नाट्यशास्त्र, पृ. ४०९.
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बदल जाय, परंतु हर समय भाव के लिए किसी विभाव की आवश्यकता तो होती ही है। अतः रससूत्र में विभाव को विशेष महत्ता दी गई है। जीवन की बदलती हुई परिस्थितियों के साथ मनुष्य की अनुभूतियों में अन्तर आता है और तद्नुरूप जीवनदृष्टि भी बदलती है तथा किसी भाव के आलम्बन भी। प्राचीन काल में लेखकों या कवियों के पास जीवनविषयक सामाजिक समस्याओं का विशेष दृष्टिकोण नहीं था। आज कई प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न होती हैं, युग की बदलती संवेदनाएँ मानवजीवन में नित्य नयी साम्मिश्र अनुभूतियाँ जगाती हैं। भावों के स्वरूप, नयी अनुभूतियों और संवेदनाओं आदि सभी पर युगीन जीवन की धारणा और देशकालस्थिति का प्रभाव पड़ता है। काव्य के आलम्बन और उद्दीपन विभाव में अंतर आने के उपर्युक्त दो कारण हैं। देश या समाज की स्थिति, परम्परा एवं संस्कार के कारण अनुभूति में कभी- कभी अधिक प्रभाविता तो कभी-कभी न्यूनता आती है। समय-समय पर सामाजिक भाव स्थितियाँ बदलती हैं। नीतिविषयक धारणाओं, पापपुण्यादि कल्पनाओं, और जीवनविषयक दृष्टियों में अंतर आता है। सामाजिक एवं नैतिक मूल्यों में परिवर्तन आता है। फलस्वरूप लेखक में नयी प्रेरणाएँ एवं संवेदनाएँ जगती हैं और काव्य में अभिव्यक्ति पाती हैं। इसी के फलस्वरूप विभावों में समय-समय पर अंतर आना स्पष्टतः परिलक्षित होता है। पहले किसी उज्ज्वल एवं पवित्र व्यक्ति में रति की व्यंजना की जाती थी। आगे चलकर केवल व्यक्ति ही नहीं, बल्कि प्रकृति, अज्ञात प्रिय और अमूर्त वस्तु में भी रतिव्यंजना की जाने लगी। विकृत वेश, अलंकारादि और आचरण की विकृतियों के कारण आरम्भ में भट, ब्राह्मण, विदूषक अथवा कंजूस हास्य रस के आलंबन थे। फिर कायर व्यक्ति हास्य के आलम्बन बने और भक्तिकाल में ढोंगी साधु, रीतिकाल में पेट्ठ वैद्य, खटमल, अत्याचारपरायण व्यक्ति आदि आलम्बनों को स्वीकार किया गया। आज शोषक-उत्पीडक, टैक्स, घूस, भूखमरी, अकाल, परतंत्रता, डॉक्टर, वकील, नेता, मिनिस्टर, कवि, कर्क, फैशनपरस्त नवयुवक, पत्रकार, अघकचरे साहित्य- कार आदि कई नये आलम्बनों का उदय हुआ है। पतिपत्नी, समाज, प्राचीन रूढि, बेकारी, विदेशी सभ्यता आदि के संदर्भ में हास्य की व्यंजना होती है। वीर रस के आलम्बनरूप में शत्रु या प्रतिस्पर्धक को ग्रहण किया जाता था। अब प्रतिस्पर्धी के साथ विरोधी वर्ग आदि तो है, परंतु समाज में अत्याचारी, शासक, राष्ट्रद्रोही पूँजीपति, शोषक सामन्त, साम्राज्यवादी और समाज के उत्पीडक आदि के प्रति उत्साह एवं वीरत्व का भाव जागृत होना व्यंजित है। युद्धवर्णनों में ही क्रोध का आलम्बन शत्रु होंता था और रौद्र रस की व्यंजना होती थी परंतु सामाजिक यथार्थ, साम्राज्यविरोध और वर्गसंघर्ष के कारण क्रोध के आलम्बनों में पर्याप्त अन्तर आया है।
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४२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
शोषक वर्ग, पूँजीपति, घूसखोर, सांप्रदायिक साम्राज्यवादी, आदि के साथ ही जाति- वाद, रूढिग्रस्तता, आर्थिक वैषम्य, रंगभेद, जडता, अशिक्षा, भूख, बेकारी आदि भीषण परिस्थिति क्रोध का कारण बनी। राजा-महाराजाओं की लडाइयों में नाश, पराजय, किसी सामन्त की मृत्यु अथवा युद्ध का दुःखद अन्त करुण रस को व्यंजित करने में समर्थ था। बाद में कभी अलौकिक आलम्बन भी ग्रहण किये गये। राष्ट्रीय और सांस्कृतिक पतन, भारतमाता की दयनीयता, पीडित वर्ग, शोषित दीन-दलित, शरणार्थी, पीडित जनता आदि कई शोक के कारण बने। फिर कभी अव्यक्त प्रियतम, महान व्यक्ति का बलिदान, जोहर जैसे प्रसंग शोक की व्यंजना के आलम्बन बने। मांस, विष्ठा, दुर्गधयुक्त पदार्थ आदि के स्थानपर बीभत्स रस (जुगुप्सा) के लिए नये आलम्बन ग्रहण किये जाने लगे। जुगुप्सा भाव को समाजविकास एवं परिवर्तन के क्रम में मानसिक स्तर प्राप्त होनेके कारण उसके आलम्बनों में अपने-आप अन्तर आया। आज मानसिक धरातल पर जुगुप्सा का ग्रहण करते हुए मानसिक घृणा उत्पन्न करनेवाले सभी कारण उसके आलम्बन बने हैं। वर्तमान पूँजीवादी समाज, अत्याचारी, वृणित आचरणवाला व्यक्ति, घृणित कार्य, रूढ परंपराएँ, रीतिरिवाज, देशद्रोही, झूठ, पाखण्डी, लम्पट, दुष्ट, रिश्वतखोर, स्वार्थी, व्यमिचारी, शोषक आदि कतिपय नये आलम्बन स्वीकृत किये गये हैं। इन सभी बदलते हुए आलम्बनों को देखने पर यह मान्य करना पड़ता है कि भावों, विभावों तथा अनुभावों में जीवन की परिस्थितियों की सापेक्षता में अन्तर आता है। जीवन की परिवर्तित स्थिति के साथ नित्य नये विभावों को ग्रहण किया जाता है। अतः अमुक रस या भाव के लिए अमुक आलम्बन-उद्दीपन होते हैं, ऐसा निश्चिततः कहना कठिन हो जाता है। भावों के आलम्बन स्थायी रूप से निश्चित नहीं माने जा सकते। साथ ही जिस सन्दर्भ में उनको स्वीकार किया गया है, उस सन्दर्भ के अनुकूल विभावादि की योजना एवं संगठन करना पडता है। काव्यगत सन्दर्भ के अनुकूल विभावादि की योजना एवं संगठन ही काव्य में रसानुकूल बनता है और वही कलात्मक औचित्य है। अतः किसी भाव के उदय के लिए कोई एक कारण या वातावरण निश्चित रूप से स्थिर करना कठिन और असम्भव है। देश, काल, स्थिति और सन्दर्भ के साथ आलम्बत और उद्दीपन विभावों तथा अनुभावों में अन्तर आता है। विभावादि की रचना और संगठन के अनुकूल रसनिर्मिति हो सकती है। इसी प्रकार का विचार इलियट के ऑब्जेक्टिव्ह कोरिलेटिव्ह में प्रतिबिम्बित हुआ दिखाई देता है। इलियट के अनुसार कला में सवेदना या मनोविकार की अभि- व्यक्ति केव्रल वस्तुनिष्ठ प्रतिरूपता से सम्बन्धित है। वस्तुरूप प्रतिरूपता (objective corelative) की उसकी परिभाषा में उसने स्पष्ट किया है कि "कला के रूप में
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भावना की अभिव्यक्ति का एकमात्र मार्ग वस्तुनिष्ठ है। अर्थात् वस्तुसमुदाय, परिस्थिति और घटनाओं की शुंखला से भावविशेष का एक नियोजित सूत्र है, ताकि ये बाह्य तत्त्व, जिनकी परिणति मूर्त मानस अनुभव में हो जाती है, व्यक्त करनेपर तुरन्त भावोद्रेक हो जाता है।"१ हिन्दी के कुछ विद्वानों ने इलियट के वस्तुनिष्ट प्रतिरूपवाद के साथ भरतमुनि के विभाव, अनुभावादि के संयोग से रसनिष्पत्ति के रससूत्र का सम्बन्ध जोडने का प्रयास भी किया है।२ डा. रामरतन भटनागर रससिद्धान्त के विभावादि से उसका सम्बन्ध जोडते हैं। परंतु उसकी कमी का उल्लेख करते हुए इस सन्दर्भ में आपने लिखा है, "बहिर्गत आवेग और अन्तरंगी रसस्थिति में सम्पूर्ण साम्य है जो इस सूत्र से प्रकट होंता है, ऐसा इलियट का मत है। परन्तु इलियट "संयोग" और "निष्पत्ति" की व्याख्या में नहीं पडते, जो मिन्न रससृष्टियों का निर्माण करती है। आवेगों की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिये कवि या कलाकार कैसे उपयुक्त और सार्थेक प्रतिरूप खोज लेता है, इसकी विवेचना इलियट ने नहीं की है। "३ उस फार्मला में आलम्बन (A set of objects), उद्दीपन (Situation) और अनुभवादि (A chain of events) के होने की झाँकी मिलती है। परंतु रससूत्र की पूर्ण व्याख्या इलियट की वस्तुनिष्ठ प्रतिरूपता के आधार पर नहीं की जा सकती। केवल तुलना के लिये यह निर्देश किया जा सकता है। निष्कर्ष रूप में कहना हो तो रससूत्रान्तर्गत भाव-विभाव-अनुभाव आदि की व्याख्या का प्रयास मनोविज्ञान की भित्ति पर करने की अपेक्षा मानव के सामाजिक जीवनविकास के सन्दर्भ में करना उचित हैं। सामाजिक विकास की प्रक्रिया में विभिन्न स्थितियों में विभिन्न भावों के विकास एवं परिवर्तन की कल्पना आती है। सामाजिक श्रेय की दृष्टि से ही समाज में कुछ भावों को स्थिरता एवं प्रधानता प्राप्त हुई और कुछ भावों को गौणता। भावों, विभावों और अनुभवों में सामाजिक परिवर्तन की सापेक्षता में निरन्तर अन्तर आता रहा है।
₹. The only way of expressing emotion in the form of art is by finding an objective corelative, in other words a set of objects, a situation, a chain of events which shall be a formula of that particular emotion such that when the eternal facts which must terminate in sensory experiences are given, the emotion is immediately aroused. -Selected Essays, P. 124. २. अनुसंधान और आलोचना, पृ. १२८; मूल्य और मूल्यांकन, पृ. १२९. ३. मूल्य और मूल्यांकन, पृ. १३०
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तृतीय अध्याय सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में रसचर्चा का विकास
भारतीय काव्यशास्त्र में रससिद्धान्त का सुत्रपात एक महत्त्वपूर्ण घटना है। ईसा पूर्व २०० के लगभग भरतमुनि ने प्रथमतः नाट्यशास्त्र में रससिद्धान्त की शास्त्रीय रूप में प्रतिष्ठा की। तब से लेकर आज तक लगभग दो सहस्र वर्षो का यह चर्चाप्रवाह, नदी के प्रवाह के समान अखण्ड रूप से प्रवहमान है। आचार्यो ने शास्त्रीय दृष्टि से रससिद्धान्त की पर्याप्त चर्चा की है। सामाजिक दृष्टिकोण भी उस चर्चा का दूसरा पक्ष हो सकता है। विभिन्न युगों से गुज़रते हुए रससिद्धान्त पर कई समसामयिक परिवेशगत प्रभाव अंकित हुए हैं। समसामयिक राज- नीतिक स्थिति, सामाजिक व्यवस्था, सांस्कृतिक परिवर्तन, धर्म और नीति की कल्पनाएँ एवं साहित्य सर्जन के साथ ही कला एवं दर्शनविषयक दृष्टि का भी प्रभाव रहा है। दिखायी यह देता है कि ऐतिहासिक दृष्टि से रसचर्चा का विकास समग्र सामाजिक विकास का ही अंग है। इस अध्याय में हम सामाजिक परिवेश के संदर्भ में रसचर्चा के विकास एवं ऐतिहासिक क्रम को परखने का प्रयत्न करेंगे।
प्रदर्शित होगा : रसचर्चा को ऐतिहासिक रूप में प्रस्तुत करना हो तो उसका विकासक्रम इस प्रकार
भरतपूर्वी रसचर्चा एवं भरत का रससिद्धान्त (लगभग ई. पू . २०० तक) भारतीय इतिहास में यह काल शक, हूण, सातवाहन शासकों का रहा है।
६०० ई. से ८५० ईसवीतक मामह, दण्डी आदि आचार्य भरत के टीकाकार (काव्यवादी धारा ) नाट्यवादी आचार्य (भारतीय इतिहास में गुप्त एवं हर्षवर्धन शासनोत्तर काल है।)
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सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में रसचर्चा का विकास ४५
८५० ई. से ११५० ई. तक (आनन्दवर्धन से अभिनव गुप्ततक ) ( यह काल मध्यकालीन सामन्तवादी शासन का है।)
११५० ई. से १७०० ई. तक 1 संस्कृत पण्डितों की परम्परा गौडीय वैष्णव भक्त परम्परा (विश्वनाथ, पण्डितराज जगन्नाथ) (इस काल में भारतीय समाज मुसलमानों एवं मुगलों के शासनाधीन था।)
१७०० ई. से १९०० ई. तक हिन्दी और अन्य भाषाओं में काव्यशास्त्रीय विकास (इस समय देश में मुगल सत्ता का व्हास हुआ तथा देश अंग्रेज़ों के शासनाधीन हुआ।)
१९०० ई. के पश्चात् आधुनिक रसचर्चा भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम-नवनिर्माण युग-(रिनेसॉ)
रसवादी समन्वयवादी रसविरोधी
सूत्रपात-भरतमुनि क पूर्ववर्ती एवं भरत का रससिद्धान्त : विकास का प्रथम चरण- भरतमुनि के काल के संबंध में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद होते हुए भी सूत्र, भाष्य एवं कारिकादि शैली के प्रकाश में अधिकांश विद्वानों को उनका समय ई. पू. २०० से ई. प. २०० तक मान्य है।' भारतीय इतिहास में यह काल मौर्य साम्राज्य के पतन और गुप्त साम्राज्य के उदय के बीच का काल रहा है। इतिहासकारों ने इस काल को अंधकारपूर्ण काल कहा है, परन्तु राजनीति, कला, संस्कृति और साहित्य की स्थिति के सन्दर्भ में यह विचार पूर्णतः सही प्रतीत नहीं होता। इस काल को संधिकाल कहा जायेगा।
१. संस्कृत साहित्यश्ास्त्राचा इतिहास पृ. १५
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४६ रससिद्धान्त का सामाजजिक मूल्यांकन
मौर्यों के पतन से लेकर गुप्तों के उत्थान तक का समय भारतीय इतिहास में अंधःकारमय रहा है। मौर्य साम्राज्य के ध्वंस (१८० ईसवी) के फलस्वरूप राजनीतिक केंद्रीय सत्ता का अस्तित्व नहीं था। शक, कुशाण, हूण, पह्व, कण्व, आंध्र, शुंग, सातवाहन आदि बाहरी शासकों का शासन स्थापित हो चुका था। बाहरी सत्ता की इतनी महान विजय होने से राजनीतिक अराजकता का साम्राज्य फैलना सहज संभव था। इसके फलस्वरूप भारत में प्रथम बार एक महान आंतरसांस्कृतिक स्थिति इस काल में उत्पन्न हुई थी। सामन्तवाद (feudalism) के कारण राजनीतिक स्थिति में घूमिलता उत्पन्न हुई थी। प्रत्येक शासक अपनी सीमाओं की रक्षा एवं विस्तार में उलझा था और उसी स्पर्धा में जुटा था। सामन्तीय शासकों (feudal empire) के रूप में अनेक नयी शक्तियाँ बाहर से आई, जिसके कारण भारतीय धर्म, कला आदि सभी पर उनका प्रभाव पडा है। सामन्तवाद की अधिकता ने परस्पर होड़, द्वेष, स्वार्थवृत्ति, आक्रमणशीलता की प्रवृत्ति को बढ़ावा देकर जीवन को अनिश्चित एवं अशांत बनाया था। राज्यविस्तार एवं आत्मरक्षा में लगे रहने के कारण राजा और जनता का प्रत्यक्ष सम्बन्ध नहीं रहा। उनके हितों के प्रति राजा सतर्क नहीं थे, फिर भी युगीन जीवन, साहित्य, सभ्यता एवं कला पर सामन्ती वातावरण ने अपना प्रभाव अवश्य डाला।
आलोच्य काल के पूर्ववर्ती काल में बौद्ध धर्म को राजाश्रय प्राप्त होने के कारण उसकी प्रतिष्ठा बढ़ी थी और उसने समाज, साहित्य, कला आर जीवन में निवृत्ति परकता की झलक ला दी थी। इस काल में अधिकांश शासकों की वैदिक धर्म के प्रति श्रद्धा होने के कारण बौद्ध धर्म उनकी छत्रछाया से दूर रहा और वैदिक धर्म में धार्मिक पुनरुत्थान की स्थिति उत्पन्न हो गई। बुद्धदेव और उनके अनुयायियों ने ब्राह्मण धर्म को झकझोरकर उसकी जड़ता तोड डाली और बौद्ध क्रांति की जो शिक्षाएँ अत्यावश्यक दीख़ पडीं, उन्हें ग्रहण करके ब्राह्मणत्व एक बार फिर नवीन हो रहा था। ब्राह्मणत्व के इस संशोधित और नवीन रूप का युग गुप्त काल ही माना जाता हैं, किन्तु वस्तुतः इसका आरंभ ईसा के दो सौ वर्ष पूर्व मानना चाहिये। असल में इस प्रक्रिया के प्रमाण मौर्य-वंश के पतन के बाद दिखलाई पड़ने लगे।
इस स्थिति के विषय में राधाकुमुद मुखर्जी लिखते हैं, "शुंग काल में ब्राह्मण परम्परावादिता का पुनरुत्थान इसके लक्षण हैं-वैदिक धार्मिक कृत्यों, संस्कारों, पुरोहितवाद और ब्राह्मण-आधिपत्य की पुनःप्रतिष्ठा, कृष्ण भागवत धर्म का उदय तथा बौद्धों को दण्डित करना। "१ वैदिक धर्म के यज्ञादि को स्वीकार न करने के कारण अवतारवाद के प्रभाव स्वरूप नये देवताओं का उदय हुआ। १. भारतीय संस्कृति और कला, पृ. ११५.
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बौद्ध और जैन धर्मों के द्वारा की गई बौद्धिक क्रांति के बावजूद भी समाज के व्यावहारिक जीवन में आश्रम एवं वर्णव्यवस्था बनी रही थी। व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में चार पुरुषार्थों और पुनर्जन्मसिद्धान्त की प्रतिष्ठा थी। वर्णों में ब्राह्मण और क्षत्रिय उच्च माने जाते थे। मनुस्मृति के वचनों से प्रमाण मिलता है कि स्त्री का स्थान उच्च होकर भी धार्मिक कार्यों में उसे विशेष अधिकार नहीं था एवं सामाजिक परिवेश में उसका अधिक विकास नहीं हुआ था। समाज में दासप्रथा का अस्तित्व था और कर्मविभाजन में शूद्रों के लिए परसेवा का कार्य नियत किया गया था। तत्कालीन व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन का यथातथ्य चित्र कामसूत्र के वर्णन- द्वारा उपस्थित होता है। यद्यपि कामसूत्र और मनुस्मृति के काल में कुछ अंतर है और उनसे भरत के काल में भी कुछ अंतर हो सकता है, फिर भी भरतकालीन सामाजिक स्थिति की कल्पना करने में उससे सहायता अवश्य मिलती है। तत्कालीन नागरी जीवन अत्यंत संपन्न, सुखी एवं संस्कृत था। आर्थिक सम्पन्नता के साथ ही सांस्कृतिक उच्चता के दर्शन भी तत्कालीन विदग्ध गोष्ठियों द्वारा होते हैं। (इन गोष्ठियों के स्वरूप तथा विशेषताओं का विस्तार से विवेचन अन्य अध्याय में किया गया है।) स्थायी नाट्यशालाओं के होने के उल्लेख भी प्राप्त होते हैं।' भारतीय सांस्कृतिक विकासक्रम में वैदिक संस्कृति की विरासत के साथ बाहरी संस्कृति का मिलन हो रहा था। प्राचीन परम्परा के आधार पर कुलीन आदर्श की प्रतिष्ठा थी। पाणिनि का व्याकरण, पतंजलि का महाभाष्य, आयुर्वेद के चरक-सुश्रुतादि ग्रंथ, अथर्ववेद, कामसूत्र, छंदशास्त्र, कौटिल्य का अर्थशास्त्र आदि के साथ मनुस्मृति, ब्राह्मणों और पुराणों का निर्माण हो चुका था। इन सारे ग्रन्थों का प्रभाव भरतकालीन काव्यचर्चा पर दिखाई देता है। उस समय तक भास और अश्वघोष ने बुद्ध धर्म को स्वीकार करके और बौद्ध प्रसंगों को भाषा का अधिकार एवं काव्य की विकसित शैली प्रदान की थी। उसके नाटक अधिकतर बौद्ध दर्शन के प्रभाव में लिखे गये थे।२ तत्कालीन जीवन में कलासंपन्नता में व्यक्तित्व की गरिमा मानी जाती थी। नाट्यकला, संगीत, नृत्य, चित्रकला आदि विभिन्न कलाएँ उन्नत स्थिति तक पहुँच चुकी थीं। सांची, भरहूत, गांधार आदि स्थानों पर चित्र और शिल्प द्वारा अंकित मूर्तियों में, मथुरा, अमरावती तथा अजता की शिल्पकला और मूर्तियों के सुन्दर अंकन में, विभिन्न मुद्राओं (gestures), भंगिमाओं (poses) और भावस्थितियों में
१. प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद, पृ. ११, ३५ History of Sanskrit Literature, P. 45 स्वतंत्र कलाशास्त्र, पृ. ४० R. History of Sanskrit Criticism, pp. 74, 76.
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४८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
तत्कालीन परिष्कृत सौन्दर्यचेतना के दर्शन होते हैं।9 गौतमबुद्ध की मूर्तियों में तत्कालीन संस्कृत एवं परिष्कृत कलादृष्टि संचित है। तत्कालीन सारी कलाओं की मूल मित्ति धार्मिक और आध्यात्मिक रही है और कलाओं कों धार्मिक व्रतों और उत्सवों में अनिवार्यतः स्वीकार किया गया था। कामसूत्र में कला की उपयोगिता पापक्षालनार्थ बताई गई है। यदि कलाओं का धार्मिक आवरण छूट जाता था और वे नितान्त मनोरंजनार्थ बन जाती थी तो हीन मानी जाती थी। अतः तत्कालीन समाज में विट, नट, विदूषक, आदि व्यावसायिक कलाकारों को हीन माना जाता था।२ कौटिल्य ने अपने "अर्थशास्त्र" में नट का उल्लेख वेश्या के साथ किया है।3 मनु ने कला को केवल कामज कहा है, "कामजो दशमो गणः ।"४ तत्कालीन समाज में महाकाव्यों की लोकप्रियता थी और उनकी कथाएँ कहनेवालों की परम्परा भी थी। ऐसे समाज के सदस्य मरत, निश्चित रूप से नाट्य की शास्त्रीय परम्परा, प्रयोगशीलता एवं साहित्यिकता से भली-भाँति परिचित थे। परम्परा के ग्रहण के साथ उसकी स्वतंत्र प्रज्ञा ने तत्कालीन सामाजिक परिवेश से चेतना ग्रहण कर नाट्यशास्त्रान्त- र्गत रससिद्धान्त की स्थापना की। भरत ने चार वेदों से प्रेरणा ग्रहण करते हुए पाँचवें वेद की स्थापना की। ऋग्वेदसे पाठ, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय, अथर्ववेद से रसों को ग्रहण करने का उल्लेख है।५नाट्यशास्त्र के कई उल्लेखों से उस पर वेदों का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। पूर्ववर्ती बाद्ध-जैन धर्म के प्रभाव से बचकर भरत द्राह्मणधर्म परम्परा का पुनरुत्थान करने की आकांक्षा रखनेवाले थे। अपनी समकालिक धार्मिक उथलपुथल से प्रेरणा ग्रहण कर के ब्राह्मणवादी विचारधारा से युक्त उन की दृष्टि रससिद्धान्त की स्थापना में व्यक्त हुई है। वे ब्राह्मणत्व-परम्परा के आचार्य होनेके साथ ही सुधारवादी वृत्ति के भी थे। ब्राह्मणश्रेष्ठत्व से परिपूर्ण वर्णपद्धति के हिमायती होते हुए भी, शूद्र और स्त्री आदि को वेदपठनादि का अधिकार न होना उन की सुधारवादी विचारधारा को मान्य नहीं हुआ, अतः पाँचवें वेद की रचना करके सब वर्णों के लिये अर्थात सर्वसाधारण के लिये उन्होंने वेद का द्वार खोल दिया। पाँचवें वेद के निर्माण के लिये चार वेदों से सामग्री ग्रहण करने में उनका परभ्पराभिमान, नवमतवादिता और उदार विचारधारा का परिचय प्राप्त होता है। यह पाँचवाँ वेद अपौरूषेय, अलौकिक और सीमित जन के लिये नहीं, बल्कि जनसामान्य, शिक्षित-अशिक्षित सब के लिए है। १. अजंता की बोलती तसबीरें पृ. ३८, ६०, ७१. २. प्राचीन भारतीय कला, पृ. ६५ ३. कौटिल्य अर्थशास्त्र, अधि. ११, प्र. १६०. ४. मनुस्मृति ७, ४७. ५. नाट्यशास्त्र प्रथम अध्याय
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परंतु स्वयं इस दृष्टिकोण को अपनाने की प्रतिज्ञा करके इसी हेतु से प्रेरित होते हुए भी, भरतमुनि की धर्म की कट्टरता एवं परम्परावादिता की झलक कहीं-कहीं दिखायी देती है। नायकों की स्थापना, उनके भेद, विशेषता आदि पर दृष्टिपात करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है। तत्कालीन समाज में ब्राह्मण और क्षत्रिय उच्च माने जाते थे। मनुष्यजीवन के व्यवहार की कुलीनता का आदर्श उच्चवर्ण ही होता है, अतः भरत ने केवल ब्राह्मण और क्षत्रिय वर्ण के, उच्च संस्कृति के वीर उदात्त, आदर्श (ideal) नायकों को ही प्रतिष्ठा दी है। धीरललित, धीरोदात्त, धीरप्रशान्त, धीरोद्धत आदि चार प्रकार के नायकों तथा नायिकाभेद के वर्णनों में ब्राह्मणवादी उच्चवर्णीय दृष्टि स्पष्ट होती है, साथ ही सामन्तवाद के प्रति आस्था व्यक्त होती है। रसों के लक्षणों में भी वही विशेषता मिलती है। इस प्रकार भरत की प्रतिज्ञा और स्थापना में कुछ विरोधाभास (paradox) प्रतीत होता है। भरत का आदर्श तत्का- लीन उच्चभ्न नागरिक, सामन्त अथवा अभिजात नायक और उसी प्रकार का उच्च जीवन (high class level) था। उसीको स्वीकार करते हुए भरत ने अपनी स्थापनाएँ की हैं। वीर शंगारादि रसों को विशेष प्रधानता दी है। तत्कालीन संपन्न जीवन में शृंगार की महत्ता रही होगी। इन रसों के आलम्बन, आश्रय नायक-नायिका उच्च कुल के माने गये हैं, शद्र या ग्रामीण नहीं। सामाजिक धर्मनिष्ठता के कारण भरत की स्थापना में नाट्य को भी धार्मिक भित्ति दी गई है। इस वेद की निर्मिति ब्रम्हा द्वारा होना, प्रयोग के लिये भरत की नियुक्ति, देवासुर संग्राम की कथा आदि सारी बातों की योजना की पृष्ठभूमि में आस्थापूर्ण धार्मिक वातावरण सूचित होता है। श्री. बेडेकर ने यज्ञ की कथा, देवासुर- संघर्ष की पराकथा (myth) का उल्लेख किया भी है।' इसमें मूलतः भरत की धार्मिक आस्था, पुरूषार्थचतुष्टय में उनकी श्रद्धा एवं वैदिक परम्परा के प्रति निष्ठा व्यक्त होती हैं। नाटक को "क्रीडनक" कहकर उसके प्रयोग के महत्त्व, अभिनेता की प्रतिष्ठा, अभिनय के प्रभाव द्वारा रसनिष्पत्ति आदि की चर्चा भरत की प्रयोगशीलता एवं व्यवहारवादिता को ही स्पष्ट करती है। प्रयोग या कार्य को महत्ता देने में उन्होंने व्यवहारवादी दृष्टि अपनायी है। रंगमंचीय परिवेश को यथार्थवादी दृष्टि देकर देवा- सुरयुद्ध की पराकथा द्वारा नाटक का प्रयोजन भी सामाजिक ही बताया है। अभिनय और मुद्रादि में सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का अनुकरण करने में, तथा कथावस्तु में सामाजिक समस्याओं को गूँथने में भरतमुनि नाट्य को समूहजीवन का दर्पण मानते
१. साहित्याविचार, पृ. २७ रस. ४
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हैं। इस प्रकार समाज रंगमंच की कल्पना ग्रहण करने में उसकी यथार्थवादिता स्पष्ट होती है। वेदाध्ययन के अनधिकार के विरुद्ध कर्मकाण्ड तथा संकीर्णता के दायरों को त्यागकर सब के लिये नाट्य का विधान किया गया था। इस प्रकार लोक-रंगमंच की स्थापना के द्वारा लोकपक्ष ग्रहण कर मानवसत्य को चित्रित करनेवाले सार्वजनिक वेद- प्रमाण प्रस्तुत करने में भरत की व्यापक सामाजिक यथार्थवादी दृष्टि व्यक्त होती है। ब्रह्मा द्वारा पाँचवें वेद के निर्माण की कथा के रूप में नाटक का प्रयोजन बताने में भी उनके सामाजिक सुधारवादी विचार निहित हैं। ' अर्थात् लोकानुकरण एवं लोकपक्ष का ग्रहण अभिनय, मुद्रा, वृत्ति आदि सारी बातों को लोकपक्ष के रूप में ग्रहण करते हुए भी रससिद्धान्त की स्थापना में उसके मावों, विभावों, अनुभावों आदि में तत्कालीन सांस्कृतिक, सामाजिक और सामन्तवादी झलक मिलती है। चार रसों के ग्रहण में जीवन की सुरूपता के साथ कुरूपता, सत् के साथ असत् तो हैं पर अन्य सामग्री (आलम्बन, उद्दीपन आदि सब) अर्थकामी, सामन्तीय एवं उच्चवर्णीय संस्कृति के दर्शन कराती है। स्त्री, शूद्र, मूर्ख को हास्य के आलम्बन मानने में भरत का हेतु कुलीनता तथा आदर्श की रक्षा करना जान पडता है। जहाँ वे समाज के यथावत् ग्रहण और अनुकरण में हर स्तर के स्वीकार की वृत्ति अपनाते हैं, त्रैलोक्य में जो कुछ है, उसका अनुकरण करने का विधान करते हैं, वहाँ राष्ट्रीय वृत्ति में ब्राह्मणधर्म की स्पष्ट सी झलक है। रंगमंच पर नारी की आवश्यकता को तो वे स्वीकार करते हैं, पर नायिकाभेदों पर कामसूत्र की अभिजात्य दृष्टि का प्रभाव ही बना रहा है। उच्चवर्णीय शंगार, सामन्तों की वीरता, रणभूमि का चित्रण आदि में तत्कालीन वर्गगत जीवन का आदर्श निभाया गया है। समाज में नट, विदूषक, विटादि की क्रमशः गिरती हुई स्थिति और ग्राम्यत्व तथा हीन स्तर का संकेत "अभिशाप की कथा" में है।२ रस सिद्धान्त में भरत की प्रधान स्थापना रसानुभव के सम्बन्ध में है। निष्पत्ति और आस्वाद की प्रक्रिया को सूत्रमय शैली में गूँथकर उन्होंने गुड़पाक का दृष्टांत दिया है, जिस में नितांत व्यावहारिक दृष्टि है। कुछ विद्वान भरत के रससिद्धान्त की स्थापना में किसी वेदकालीन दर्शनविशेष का अस्तित्व मानते हैं। ३ परंतु भरत ने अभिनेता और नाट्यप्रयोग को ध्यान में रखते हुए षाडवरस के दष्टान्त से रसास्वाद की प्रक्रिया स्पष्ट की है। यह दृष्टान्त अत्यंत
१. भरत का नाट्यशास्त्र, प्रथम अध्याय, श्लोक १२६. २. भरत का नाट्यशास्त्र ३. रससिद्धान्त की दार्शनिक और नैतिक व्याख्या, पृ. ३०
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सरल, सीधा और व्यावहारिक है। इसी प्रकार डॉ. काणे रससिद्धान्त को शरीर- शास्त्रीय एवं मानसशास्त्रीय भित्ति पर आधारित मानते हैं।9 परंतु इसकी पृष्ठभूमि में स्पष्टतः आयुर्वद का आधार होने का दावा है। इस की व्यापक चर्चा एक विद्वान द्वारा की गयी है जो उचित लगती है। वे लिखते हैं, "भरत के रससिद्धान्त की वास्तविक पार्श्ववभूमि मानसशास्त्रीय नहीं है, जितनी चिकित्साशास्त्र एवं शरीरशास्त्र से सम्बन्धित है। भरत ने 'गुड़पाक' और स्वादयुक्त अन्य पेय-पदार्थों की निर्मिति से रस की उत्पत्ति की तुलना की है जो पूर्णतः वैद्यकीय अवधारणा है। वैद्यकीय चिकित्सकों में गुड़पाक नाम से प्रचलित विशेष प्रकार की निर्मिति के सम्बन्ध की चर्चा भरत द्वारा की गई है।२ रस प्राशन का पदार्थ है और उस के स्वाद की इंद्रिया है जिह्ा। जिह्वास्वाद प्राथमिक, सरल एवं स्पष्ट स्थिति है और हर व्यक्ति के लिए, सामान्य जन के लिए सुलभ एवं सम्भव है। अर्थात भरत ने अत्यंत व्यावहारिक स्तर और यथार्थ दृष्टिकोण से रस की निष्पत्ति और उसके आस्वाद की प्रक्रिया को स्पष्ट किया है। इस प्रकार भरत के काल में वैदिक परम्पराएँ, बौद्ध धर्म का प्रभाव, भारतीय षट् दर्शनों का विकास विद्यमान था। परंतु नये ब्राह्मणवाद के उदय के हिमायती भरत ने समाजोन्मुखी दृष्टि अपना कर रसास्वाद में सामूहिक एकात्मता और भावात्मक एकाग्रता पर बल देकर सूत्रमय शैली में रससिद्धान्त की स्थापना की। भरत के पश्चात् काल : रसचर्चा का विकास - द्वितीय चरण (६०० ईसवी से - ८५० ईसवी तक) आदि मध्यकाल भरत के पश्चात् गुप्त साम्राज्य के उदय तक का लगभग चार-पाँच सौ वर्षों का काल भारतीय इतिहास में तमोयुग रहा है। बाह्य संस्कृतियों के प्रभाववश भारत में . The theory of Rasa has a semi-physiological and semi- psychological basis. - History of Sanskrit Poetics, P. 342. R. The true background of Bharat is not so much psycholo- gical, as it is patholo gical or physiological ... preparation of drinks, " Guda-Paka" and beverages with which Bharat compares the making of Rasa is a purely medical concept. He is only speaking of a particular kind of preparation which is known as 'गुडपाक' among medical men. -Ramendra Kumar Sen, Historical Quarterly, March 1954.
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आर्थिक स्थैर्य, शांति एवं सुव्यवस्था के साथ ही व्यवसाय स्वातंत्र्य होनेके कारण व्यापार में पर्याप्त वृद्धि हुई। मानव का जीवन-स्तर (standard of living), रहनसहन, आभूषण, कपडे आदि उत्तम प्रकार के थे। उन में सम्पन्नता के साथ ही परिष्कृत सौंदर्यदृष्टि व्यक्त होती थी। वैष्णव, शैव और मागवत सम्प्रदाय और वैदिक धर्म के प्रभाव में शक्ति, सूर्य, कुबेर, वरुण, हनुमान, यम, ब्रह्मा, लक्ष्मी आदि देवीदेवताओं की पूजा आरम्भ हो चुकी थी। यज्ञप्रथा अश्वमेध के रूप में शेष थी पर वैदिक धर्म की बलिपूजा आदि प्रथाएँ बन्द हो गई थीं और वैदिक देवताओं के स्थान पर नये देवताओं की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। बौद्ध और जैन धर्म से बचकर हिंदुधर्म का पुनरुज्जीवन हुआ। बौद्ध धर्म को आश्रय देने के बावजूद अन्य धर्मो के प्रति हर्ष में सहिष्णुता थी। गुप्त सम्राटों ने हिंदू धर्म को प्रश्रय देते हुए सब धर्मों के प्रति उदारता की वृत्ति अपनायी थी। अतः स्पष्ट है कि यह धार्मिक उन्नति का काल रहा है। इस समय बौद्ध धर्म में विभिन्न मतमतान्तरों का उदय हुआ था; महायान कई शाखाओं में विभक्त हो गया था और धर्म में विशखलता एवं हीनावस्था उत्पन्न हो गई थी। राजनीतिक समृद्धि एवं शान्ति, राजाश्रय, सम्राटों की कलाप्रियता एवं कलाभिज्ञता के कारण शिल्प, चित्र, वास्तु कलाओं को उन्नत स्तर प्राप्त हुआ था। शिल्पकला में संकेतवाद और निसर्गवाद से परिपूर्ण भावमयता, अर्थमयता, गांभीर्य, प्रसन्नता एवं प्रशान्तता के साथ आध्यात्मिकता का रंग चढा है। कृष्णसप्रदाय की शिल्पकला में नर्तक-नर्तकी के कलापूर्ण चित्र अंकित हैं। शैव शिल्पों में दैवी शक्ति के द्वारा आशा, बल और सुरक्षा का भाव व्यक्त होता है। बुद्धप्रतिमा का विशेष प्रचलन होकर बौद्ध शिल्प में सद्गुण और सौष्ठव के मिश्रण से शिल्प और आध्यात्मिकता का सुन्दर संयोग हुआ है। अजता की चित्रकला में कल्पनारम्यता और प्रमाणबद्धता के साथ आध्यात्मिकता भी ओतप्रोत है। साथ ही इस काल में शास्त्रीय संगीत को उच्च स्तर प्राप्त हुआ था। उसमें विभिन्न भावों की अभिव्यक्ति और रागों की निर्मिति इसी काल की देन है। कविश्रेष्ठ कालिदास इसी काल की देन है। उनके विभिन्न काव्य और नाटक, मारवि के नाटक आदि के साथ विष्णुशर्मा के पंचतंत्र, अमरसिंह के अमरकोश, वसुबन्धु के अमिनयकोश, वाग्मट के अष्टांगसंग्रह आदि शास्त्रीय ग्रंथों ने साहित्य को समृद्ध बनाया। छठी शताब्दी में मेधाविन, धर्मकीर्ति जैसे तर्कशास्त्रियों ने ग्रंथनिर्मिति की। प्रतिभावान कवियों की प्रज्ञा के साथ ही राजाश्रय, समाजजीवन की स्थिरता और जनरुचि का प्रभाव साहित्य पर रहा। संस्कृत भाषा के साथ पाली और प्राकृत में भी साहित्यसर्जना हुई। इस काल में साहित्य में अभिजात्य का आना स्वाभाविक था; नायक नायिका, कथावस्तु, घटना, स्थान और चित्र सबमें सम्पन्न नागरी जीवन और राजप्रासादों का अंकन था। कवियों की प्रतिभा नाटक, काव्यादि दृश्य-श्रव्य में मुक्त रूप से संचर'
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करती थी। राजदरबार में विद्वत्-समाजों और गोष्ठियों का आयोजन होता था। दरबार में कवियों की परीक्षा ली जाती थी। असफल कवि सफल भावक बननेकी चेष्टा करता था। इस समय की काव्यगोष्ठियों की विस्तृत चर्चा अन्य अध्याय में की गई है। इन कवियों के सन्दर्भ में प्रसिद्ध काव्यशास्त्री डे कहते हैं -"वे निश्चित रूप से राजदरबार से सलग्न रहते थे। संक्षेपतः उनके अपने काव्यलेखन व्यवसाय के लिए पोषक उच्च स्तरीय संपन्न जीवन बिताते थे, फिर भी यह मानना पडता है कि वे नित्य ही किसी-न-किसी धनी व्यक्ति के आश्रय में ही रहते थे।" भारतीय षट्दर्शनों विशेष रूप से न्याय, सांख्य और मीमांसा का पर्याप्त विकास हुआ था और उन में अ्रंथरचना भी हुई थी। गुप्तकालीन शांति और समृद्धियुक्त समाज में राजाश्रय पाकर कवियों की प्रतिमा ने कलात्मक सर्जना (creative production) की। कवियों में चिंतनपरकता कम रही, परंतु इस काल के पश्चात् जो अशांति उत्पन्न हुई, उसके कारण चिंतनपरकता विशेष बढ़ी और हर्षोत्तर काल में काव्यशास्त्रीय चर्चा का पुनः एक बार प्रारम्भ हुआ। बौद्ध धर्म की चिन्तनपरकता ने समाज को विशेष प्रभावित किया। बौद्ध तथा अन्य दर्शनों के विकास, आयुर्वेद, ज्योतित्र आदि शास्त्रों के चिन्तन का प्रभाव समाज के बुद्धिजीवी वर्ग पर विशेष पड़ा और इन सारे प्रभावों में पलकर काव्यशास्त्रीय चर्चा की धारा फूट पड़ी। रससिद्धान्त की चर्चा करनेवाली दो घाराएँ इस काल में थीं। एक धारा विशेष रूप में काव्य का ही विचार करती थी और दूसरी ने नाटक अर्थात् दृश्य काव्य को ही अपनी चर्चा का केंद्र बनाया। भामह, दण्डी, उद्भट, वामन, रूद्रट, रूद्रभट्ट प्रथम धारा के काव्यशास्त्री माने जा सकते हैं और दूसरी में भरत के टीकाकार शंकुक और भट्टलोल्लट आते हैं। ये सारे आचार्य साधारणतः इस काल के अन्तर्गत आते हैं। इसके पूर्ववर्ती काल में संस्कृत साहित्य का बहुमुखी विकास हो चुका था। नाटकों के साथ मुक्तक, महाकाव्य, गद्य-पद्य, मिश्र आदि विभिन्न रूपों और विधाओं में काव्यरचना हुई थी। अतः नाटक के साथ काव्य की चर्चा का आरम्भ होना स्वाभाविक था। राजाश्रय में नाटकों की अपेक्षा संगीतकला एवं काव्यकला को महत्ता मिलनेसे काव्यरचना, काव्यपाठ और काव्यास्वाद की ओर विद्वानों
₹. They were invariably attached to court of kings. They probably lived well to be able to turn their vocation of writing poetry, but it may be supposed that they had always some patrons among rich people. - A History of Sanskrit Literature CX.
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सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में रसचर्चा का विकास
का ध्यान आकर्षित हुआ। समाज में भी काव्य की लोकप्रियता बढ़ी। अतः काव्य को रस के अतिरिक्त गुण, अलंकार, रीति आदि के संदर्भ में समझाने का विशेष प्रयास किया जाने लगा। इस काल की काव्यचर्चा के ग्रंथों के शीर्षक भी काव्यदर्शन, काव्या- लंकार, काव्यानुशासन, काव्यप्रकाश हैं, जिनमें काव्यशरीर का विश्लेषण करके उसकी विशेषताओं को स्पष्ट करना इन काव्यशास्त्रियों का उद्देश्य रहा है। इस प्रकार रसचर्चा का रूख श्रव्य काव्य की ओर मुडना संभव था। काव्य में रस के स्थान को मानते हुए भी अलंकार-चारुत्व में रस को समेटकर रसवदलंकार की स्थापना की गई थी। कालिदासादि कवियों के काव्य में अलंकारप्रचुरता थी, अतः काव्य के क्षेत्र में रस की अपेक्षा अलंकार की चर्चा विशेष हुई। रस की उत्पत्तिवादी भूमिका बनी रही। विषयभूत रसदृष्टि को अपनाकर रस को अलंकारों में ही अन्तर्भूत करने के कारण भामह आदि रसवादी धारा से दूर जाते हुए प्रतीत होते हैं। डॉ. नगेन्द्र ने इन्हें रसविरोधी आचार्य तक कह दिया है।' परंतु तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक तथा साहित्यिक परिवेश को ध्यान में रखने से वह उचित प्रतीत नहीं होता। अभिनय के स्थान पर शब्द और अर्थ का विचार, भाषा का लालित्य, अलंकार, गुणादि प्रधान हो जाते हैं। वैसे इन बातों का संकेत भरत के विवेचन में है, पर विशाल काव्यसंपदा पाने पर उसके रसादि की चर्चा करने की अपेक्षा, अन्य उपकरणों की चर्चा करना भामह- द्वारा उचित समझा जाना स्वाभाविक था। रस को भले ही गौण स्थान मिला और अलंकारों में अन्तर्भूत कर दिया गया, तथापि रस का नितान्त विरोध नहीं हुआ। डॉ. आनन्दप्रकाश दीक्षित ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि "रससिद्धान्त को परोक्ष या अपरोक्ष दोनों रूपों में सभी संप्रदायों से जो सहायता मिली है, उनमें अलंकारवादियों में भामह, दण्डी, उद्भट तथा रुय्यक का नाम विशेष महत्त्वपूर्ण है।"२ दण्डी ने श्रव्य, दृश्यादि सभी को काव्य के अन्तर्गत समेटकर गुण, प्रतिमा, रीति आदि की चर्चा करते हुए रस को काव्यगत मानकर उत्पत्तिवादी भूमिका ही निभाई है। डॉ. त्रिपाठी दण्डी को काव्यविद्या की शास्त्रीय प्रतिष्ठा का उत्तराधिकारी मानते हैं।३ वामन ने काव्य के गुणों को विशेष महत्ता देते हुए कान्ति की चर्चा के अंतर्गत रस को समेट लिया है। रस का केवल एक स्थान पर उल्लेख करते हुए उन्होंने शंगार को मान्य किया है। रससिद्धान्त के प्रति उद्भट की विशेष आस्था उसके ग्रंथों
१. रससिद्धान्त पृ. १८ २. रससिद्धान्त : स्वरूपविश्लेषण ५ृ. ५ और पृ. १९६ ३. भाचार्य दण्डी और उनका काव्यादर्श, पृ. ३९४
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में भरत की टीका, भामह विवरण और 'काव्यालंकार संग्रह' से स्पष्ट होती है। श्रव्यकाव्यपरक दृष्टि रखते हुए भी काव्य में रस का स्थान उन्हें मान्य है। भरत के स्थायी, संचारी, व्यभिचारी, विभाव, अनुभाव योजना से उत्पत्तिवादी भूमिका ही उन्हें स्वीकार्य जान पड़ती है।' रूद्रटने रस को अलंकार, रीति, गुणादि में अंतर्भूत करने की अपेक्षा रीति कों ही रससापेक्ष माना तथा भरत की रसोत्पत्ति को मान्य करते हुए काव्य में रस की अनिवार्यता को घोषित किया। रूद्रभट्ट का समय कुछ बाद का है। परंतु उनके द्वारा कथित 'नवकाव्य रसाः स्मृताः' में रसवाद तथा अलंकारवाद का समन्वय दिखाई देता है। उपर्युक्त सारे आचार्य रसविरोधी नहीं थे। समसामयिक सामाजिक स्थिति, साहित्यिक चेतना और काव्य की विपुलता के अनुसार उत्पन्न काव्य की महत्ता को स्वीकार करते हुए उनके अलंकार, रीति, गुण आदि की चर्चा करने के कारण रस को गौण स्थान प्राप्त हुआ। काव्यभाषा शरीर की विचिकित्सा की गई। इनके अतिरिक्त भद्लोलट और शंकुक ने रससूत्र के 'संयोग' और 'निष्पत्ति' शब्द को लेकर रससूत्र की दृश्यकाव्यपरक व्याख्या की। वे तत्कालीन गोष्ठी आदि के अलावा चिन्तनपरकता से अधिक प्रभावित थे। उन्होंने दर्शन एवं तर्कशास्त्र के प्रभाव में रस की उत्पत्ति, स्थान, प्रक्रियादि की समग्र चर्चा करते हुए विचारमंथन किया। इस गुत्थी को सुलझाने के लिए उन्होंने दार्शनिक विचार से भी तार्किक प्रणाली उपयुक्त समझी। रसचिन्तन में दार्शनिक तर्कों का आधारग्रहण और विभिन्न प्रतीकों एवं रूपकों की योजना का आरंभ इनसे हुआ। मीमांसक भट्टलोलट ने उत्पत्तिवाद का ग्रहण करके उत्पाद्य-उत्पादक सम्बन्ध, अनुमाप्य-अनुमापक सम्बन्ध तथा पोष्य-पोषक सम्बन्ध के आधारपर रसोत्पत्ति को स्पष्ट करके आरोपवाद का प्रतिपादन किया। सम्भवतः भट्टलोलट ने समकालीन दर्शनविचार से प्रेरणा ग्रहण करके इस प्रकार के आधार की स्थापना की है। कुछ विद्वान उन्हें अद्वैतवेदांती मानते हैं२ तो कुछ उन पर शैव मत का प्रभाव बताते हैं।३ भटलोलट की इस स्थापना के पश्चात् भी रससूत्र की समस्या वैसी ही बनी रही। उसको सुलझाने के प्रयास में शंकुक ने भट्टलोलट के उत्पत्ति-वाद और आरोप- वाद का खण्डन किया और अनुमानतत्त्व तथा चित्रतुरग-न्याय सिद्धान्त प्रमाणित करने का प्रयास किया। कुछ विद्वान उनकी चर्चा पर बौद्धमत का प्रभाव मानते हैं४
१. काव्यालंकार, ४-४ २. संस्कृत साहित्यशास्त्राचा इतिहास, पृ. १५१ ३. स्वतंत्र कलाशास्त्र, पृ. ६९ ४. रससिद्धान्त, पृ.३०
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कुछ न्यायदर्शन की छाप।9 शंकुक के काश्मीर-निवासी होने से उन पर बौद्ध मत का प्रभाव सहजसम्भव था। डॉ. पाण्डये चित्रतुरगन्याय के उपमानग्रहण के विषय में तत्कालीन चित्रकलाविकास की ओर संकेत करते हैं।२ उस समय बौद्ध शिल्प और कला का स्वतंत्र संप्रदाय (school) था जिसमें गांभीर्य और सहजता के साथ आध्यात्मिक प्रभाव भी था। इस और दर्शन के समन्वय से परिपूर्ण समकालीन कला से प्रेरणा ग्रहण कर इस उपमान की योजना करना उचित ही था। इस प्रकार रसचिंतन का विकास श्रव्यकाव्यपरकऔर दृश्यकाव्यपरक, अर्थात् काव्य- वादी और नाट्यवादी दो धाराओं में हुआ। दृश्यकाव्य के सन्दर्भ में सूत्र की व्याख्या ही चलती रही। काव्यशास्त्रीय दृष्टि से यह काल परिवर्तन काल था। ऐतिहासिक समृद्धि, सामाजिक सुव्यवस्था, सांस्कृतिक संपन्नता और साहित्यिक गरिमा के कारण इस युग में रसचर्चा धूमिल हुई। तत्कालीन उपलब्ध नाटक, महाकाव्य, मुक्तक, सूक्तियाँ आदि की चर्चा के साथ ही काव्य के सन्दर्भ में कई संप्रदायों ( school) का उदय हुआ और नाट्यरस का प्रवाह काव्यरस की ओर मुड़ गया। शास्त्रीय संगीत के विकास और राजाश्रय से काव्यपाठादि को महत्ता प्राप्त हुई। सभी आचार्यों का दृष्टिकोण नितान्त वस्तुपरक (objective ) एवं उत्पत्तिवादी था। काव्यवादी धारा के आचार्यों ने नितान्त साहित्यिक दृष्टि अपनायी और नाट्य- वादियों ने यथार्थवादी प्रायोगिक एवं दार्शनिक तर्कवाद पर बल दिया। व्याकरणशास्त्र के आधार पर काव्य के अंगों उपांगों का वर्णन किया। इस दूसरे चरण में नाट्यवादी धारा के मिलन के बीज निहित हैं और नाट्यरस काव्यरस की ओर रसचर्चा के प्रयाण का संकेत प्राप्त होता है।
भारतीय इतिहास का मध्य-मध्यकाल: रसचर्चा का विकास-तृतीय चरण (८५० ईसवी से ११५० ईसवी तक) गुप्तकाल एवं हर्षवर्धन के पश्चात् का भारतीय मध्ययुग का इतिहास राजनीतिक अशान्ति, अव्यवस्था और अराजकता से परिपूर्ण पर काव्यशास्त्रीय दृष्टि से सम्पन्नता का काल कहा जा सकता है। यह रसचर्चा का चरमविकास स्थल है। हर्ष की मृत्यु के पश्चात् साम्राज्यवाद का व्हास हुआ। एकछत्र साम्राज्य के विघटन से राजनीतिक एकता नष्ट होकर देश अनेक खण्डों में विभक्त हुआ। फल- स्वरूप विभिन्न स्वतंत्र राज्य स्थापित होकर वंशीय राज्यशासन (Class Monarchy) का उदय हुआ। राज्यों में उत्तराधिकार और सत्ता के लिए परस्पर वैरभाव, स्पर्धा और ईर्ष्या का आधिक्य होता रहा। अपने राज्य की सीमा-रक्षा एवं विस्तार में राजा-
१. रसगंगाधर का शास्त्रीय अध्ययन, पृ. १६५ २. स्वतंत्र कलाशास्त्र, पृ. ९७
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५८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
सामन्त सदा जुटे रहते थे। राजपूतों की वीर परम्परा में दम्भ, जातीयवाद, राष्ट्रीयत्व का अभाव, पृथकत्व की भावना के कारण उनके राज्य विद्रोह के केन्द्र बने, और अन्ततः विदेशी शासकों के भक्ष्य हुए। प्राचीन जनपदों का अन्त होने से राज्यशासन का आधार राजवंश ही बना। समाज में शासक, सेनाधिकारी, सामन्त, राजा, उपराजा, ठाकुर आदि की सत्ता रूढ थी। कृषक, दास आदि श्रेणियाँ अस्तित्व में आयीं। सामन्तीय संस्कृति के प्रभाव में उद्दाम शौर्य और कामिनीसौंदर्य की प्रतिष्ठा हुई। परस्पर प्रतिद्वंद्विता, वैमनस्य, ईर्ष्या, संघर्ष, युद्धलिप्सा, षड्यंत्र में अराजकता (Anarchy) एवं नृशंसता (tyranny) उत्पन्न हुई। नित्य युद्ध के वातावरण से समाज में आतंक बना रहता था। तत्कालीन विभिन्न लेखों में राजाओं द्वारा चातुर्वर्ण्य और आश्रमव्यवस्था का पोषण किये जानेका उल्लेख है। बर्बरों का जातीय सम्मिश्रण तेज़ी से होने के कारण वर्णव्यवस्था का विघटन एवं परिवर्तन सम्भव था। पालनरेशों के शासनकाल में बौद्ध धर्म का पर्याप्त प्रचार एवं प्रभाव होने के बावजूद प्रत्यक्ष व्यवहार में वर्णव्यवस्था बनी रही। समाज में ब्राह्मणों का वर्चस्व तथा धार्मिक, आत्मिक और बौद्धिक श्रेष्ठता अब भी स्वीकृत थी। उनमें कई शाखा-उपशाखाएँ उत्पन्न हुई थीं। समाज में धर्मोपदेशों और दार्शनिकों की विशेष महत्ता थी। ब्राह्मणों के पश्चात् क्षत्रियों को स्थान था। छुआछूत की प्रथा में वृद्धि हुई थी। जातिप्रथा अधिकाधिक कठोर (rigid) बनी थी। चंडाल, चमार, डोम, नट आदि पंचमवर्ग के माने जाते थे। अनुलोम और अन्तर्जातीय विवाह रूढ थे। हरिश्चन्द्र ब्राह्मण का भद्रा नामक क्षत्रिय स्त्री से विवाह का उल्लेख प्राप्त है।9 समाजविघटन से बौद्धों के विरोध में ब्राह्मणवाद के धार्मिक बंघन अधिक कडे बने। आज तक कई बाह्य कबीलों और जातियों को अपने में समालेनेवाली सभा हिंदु संस्कृति की एकता नष्ट होकर सामाजिक दृष्टि संकीर्ण बन गई। समाज में सामान्य स्त्री का जीवन हीन और परावलम्बी था। राजपूतों में स्त्रियों का आदर और सम्मान था। स्वयंवर प्रथा और जौहर जैसी उज्ज्वल परम्पराएँ भी थीं। राजवंश सम्बन्धित अभिजात उच्च वर्ग सुखी एवं उपभोगशील था। इतिहास के एक विद्वान (ल्युनिया) ने तत्कालीन समाज को यथार्थ रूप में शब्दबद्ध किया है। हिन्दू समाज अपनी समाहित करने की शक्ति खो बैठा था। लोगोंको अज्ञान, मिथ्या
?. We are informed in Pratihar inscription dated 861 that Harishchandra, a Brahmin by caste, married Bhadra, a Kshatriya girl. - Evolution in Indian Culture, Page No. 386
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सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में रसचर्चा का विकास ५९
विश्वास तथा चमत्कारादि के भुलावे में रखा जाता था। विभिन्न भव्य तथा भडकीले समारोहों में समय नष्ट किया जाता था। जातियों की वृद्धि तथा जातिप्रथा का कठोर पालन प्रचलित था और ब्राह्मणों का अतीव वर्चस्व स्थापित हो गया था। वे अपने को समग्र आत्मिंक और धार्मिक ज्ञान के स्वामी मानते थे। सारांशतः इन सब बातों ने सब लोगों को सामाजिक और राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत संकीर्ण बना दिया था। १ शुंगकाल से वैदिक धर्म के पुनरुत्थान की जो प्रक्रिया आरम्भ हुई, उसको गुप्काल में बल मिला और तेरहवीं शताब्दी तक उसके तीव्रतर होने पर बौद्ध धर्म का रूप अत्यन्त विकृत हो गया। वज्रयानादि में रूपान्तर के कारण विहारों में विलासिता बढ़ने से मंत्रशक्ति, तांत्रिक क्रिया, रहस्यमयता, तंत्रवाद, गुहयसाधनादि का आडम्बर बढ़ा और धीरे-धीरे वज्तयान लुप हो गया। जैन धर्म के कुछ राजाओं से आश्रय प्राप्त होने पर भी उसकी विशेष उन्नति नहीं हुई। हिंदू धर्म के उत्थान को कुमारिल भट्ट और शंकराचार्य की दार्शनिक क्र्ांति से गति मिली। शंकराचार्य ने अन्य दार्शनिक मतों को हराकर शास्त्रार्थ द्वारा अद्वैत का प्रतिपादन किया और ब्रह्मवाद तथा ज्ञान को ही मोक्षप्राप्ति का साधन बनाया। कुमारिल भट्ट ने याज्ञिक कर्मकाण्ड का विरोध कर वैदिक अनुष्ठान को स्वर्ग और मोक्षप्राप्ति का मार्ग बताया। इससे हिंदु धर्म के नये रूपोदय के साथ पौराणिक धर्म परम्परा की महत्ता बढ़ी और अवतारवाद (incarnation) तथा भक्तिसप्रदायों का उदय हुआ। विष्णु, शिव, शक्ति, राम, कृष्ण आदि विभिन्न देवताओं की पूजाविधि का प्रारम्म हुआ। आत्मा, कर्म रूपादि की कल्पना से सगुण निर्गुण की कल्पनाएँ विकसित हुई। "मानव का रूप ग्रहण करने से अज्ञात निर्गुण परमात्मा चिन्त्य एवं सगुण बनता है। अवतारवाद के सिद्धान्त में भारतीय दार्शनिक विचारों का आग्रह
₹. Hindu society had lost its assimilative power. The people were kept in ignorance, fed with unwholesome,superstition and beguiled with gorgeous and never ending festivals. The number of growing of sub-castes and rigidity of the caste-system and the dominance of the Brahmins, who claimed to be custodian of all spiritual and secular knowledge, narrowed considerably the social and political vision of the people. - Evolution in Indian Culture, Page No. 351.
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६० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
और किसी देवता के लोक प्रचलित भक्तिभाव के समन्वय को सहज ही में स्वीकृति मिली। १ वैष्णव, शैव, शाक्त, कापालिक, पाशुपत आदि कई भक्तिपंथों एवं उपपंथों का उदय हुआ। मूर्तिपूजा, मूर्तियों की स्थापना, मन्दिरों का निर्माण, साजसज्जा का महत्त्व बढ़ा। कालान्तर से मूर्तियों को उपलक्षण न मानकर उनको जीवित मान लेने के कारण उनका स्थान, भोग, शंगार, वस्त्रादि के साथ विभिन्न विधियाँ सम्पन्न होने लगीं। वज्रयानियों के समान शक्ति में रहस्यमयी शक्ति, गुहयसाधना, वामाचार, बलि का महत्त्व, तंत्रमंत्र का आधिक्य हुआ। शिवशक्ति का कार्य पुरुषप्रकृति के रूप में स्थापित कर विभिन्न मन्त्र-तन्त्र, मुद्रा, मंडल निश्चित हुए। युग्मनग्नता परस्पर आर्लिंगन का प्रतीक बना। शून्य, महासुख और विज्ञान तीन तत्त्व बने। इष्टदेवता पूजा और कर्मकाण्ड के स्थान पर सहजयान के प्रभाव में सहजयौगिक ध्यान की महत्ता बढ़ी। हठयौगिक क्रिया, महासुख, कायासाधना, अप्सरायोग आदि पर बल दिया जाने लगा। बौद्ध तन्त्रवाद के समान ही हिंदु तन्त्रवाद विकसित हुआ। शैव तांत्रिकवाद शुद्ध चैतन्य (शून्य-शिव का) पुरुषरूप में और यथार्थ की गतिशीलता (शक्ति की) स्त्री के रूप में व्याख्या करता है। बौद्ध तांत्रिकवाद की शून्यता की स्त्री के रूप में और गतिशीलता की पुरुषरूप में कल्पना करता है। हिंदु दर्शन का चरमविकास हुआ। बौद्ध दार्शनिक धर्मकीर्ति और शास्त्ररक्षित- द्वारा दार्शनिक विकास सम्पन्न हुआ। वैभाषिक, सौत्रांतिक, योगाचार और माच्यानिक ऐसी चार शाखाओं में पर्याप्त ग्रंथनिर्मिति हुई। जैन दर्शन हरिभद्र विद्यानंद, हेमचंद्र ने ग्रंथरचना की, पर जैन और बौद्ध दर्शन के विरोध में आस्तिक दर्शनों का विकास हुआ। खण्डनमण्डनादि उत्कृष्ट ग्रंथों का निर्माण हुआ। इस दार्शनिक क्रांति के नेता शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट थे। कलाविकास के इस काल में भक्ति और दार्शनिक आंदोलन का प्रभाव था। स्थापत्य, शिल्पकला और चित्रकला के विकास में मन्दिरों, मूर्तियों, गुफाचित्रों का विकास हुआ। काश्मीर के मन्दिरों में सूर्य, विष्णु, शिव, शक्ति आदि कई मूर्तियों की स्थापना हुई। दीवारों पर अनेक मूर्तियाँ अंकित हैं। मंदिरों के शिल्प में भव्यता, 8. This unknowable nirguna God becomes knowable when it takes human shape and the compromise between the rigidity of Hindu philosophical thoughts and popular demand for devotion of personal God, was easily attested by the doctrine of avataras. 104 ori spa - Evolution in Indian Culture, Page No. 400
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उदात्तता और सौष्ठव कम होकर अलंकार बहुलता आयी। अजता एलोरा की गुफाओं में और उडीसा के मन्दिरों पर विभिन्न नायिकाओं और नायकों, इंद्र की नर्तकियों, सुरसुन्दरियों, तथा अप्सराओं आदि की मोहक मूर्तियँाँ अपनी सुकुमारता और आभूषणप्रियता से मण्डित हैं। सौंदर्य के साथ उनमें तरल पारदर्शी, गोलाई से परिपूर्ण नग्नता और अश्लीलता की झलक है। राधाकमल मुकर्जी इसका संकेत कर कहते हैं, "इन आँखों की पुतलियाँ अंकित नहीं की गई हैं, अतः उसका अभिप्राय भिन्न ही है ... ध्यान देने की बात है कि अंतराभिमुखता को व्यक्त करनेके उद्देश्य से अवसर आँखों की पुतलियाँ बनायी नहीं गई हैं ... आखिर सुरसुंदरी अथवा नायिका अज्ञात मानवीय आत्मा के अतिरिक्त और क्या है, जो अपनी प्रवृत्ति एवं गति में ईश्वर के समान है। "१ शैव मन्दिरों पर रतिमग्र युगल मूर्तियों में भी असांसारिकता और इंद्रियसुख, अमूर्तता और सौंदर्य का अपूर्व सयोग है। हीन अमिरुचि और अनैतिकता की प्रवृत्ति ने मूर्तियों को अश्लील बनाया और नग्न मूर्तियों में शंगारिक प्रतीकवाद की स्थापना हुई। खजुराहों में स्नेहमयी माँ बच्चे को प्यार करती है, प्रेमपत्र लिख़नेवाली प्रेमिका, नर्तिका, शिवपार्वती युगल, अवलोकितेश्वर, दर्पण में देखती हुई सुन्दरी इत्यादि मूर्तियाँ हैं। श्री. राधाकमल मुखर्जी के मत में मिथुन का आध्यात्मिक महत्त्व मन्दिरनिर्माण की शैली में है। जहाँ इनकी तमाम मूर्तियों में अलंकरण अनिवार्य रूप से मिलन की ओर संकेत करती है वहाँ स्वयं मन्दिर गुहापर्वत मेरू की तरह बनाया जाता है, जो स्वर्ग और पृथ्वी को विभाजित करता है या आदि विश्वपुरुष के शरीर की तरह बनाया जाता है, जो अपनेको माया और यथार्थ के धृवों में विभाजित करता है।२ प्रज्ञावान कवियों के साथ असफल कवि-आलोचकों का एक वर्ग भावक समाज में तैयार हो गया था। कीर्ति की लालसा एवं आश्रयदाता का विजयगान करने के हेतु काव्य- सृजन में धर्म की अपेक्षा 'अर्थ' की प्रधानता हुई। साहित्यनिर्मिति अत्यंत मौलिक और सभी विषयों से संपृक्त है। लालित्यपूर्ण कृतियों की अपेक्षा ज्ञानात्मक ग्रंथनिर्मिति अधिक हुई। भवभूति के अतिरिक्त कालिदास की प्रतिमा का नाटककार कवि नहीं हुआ पर साहित्यान्तर्गत गद्य, नाट्य, काव्य, विज्ञान, शास्त्र और दशन क क्षेत्र म महान ग्रथों का निर्माण हुआ। दार्शनिक क्षेत्र में खण्डनमण्डन की प्रवृत्ति रही। मानवजीवन का समग्र दृष्टिकोण ही अधिक चिन्तनात्मक, विश्लेषणात्मक और दार्शनिक था। दर्शन सामान्य जनता की वस्तु न होनेसे चर्चागोष्ठियों के सदस्य बुद्धिमान जन, विद्वन्मंडली, दार्शनिक आदि रहे। चर्चा में क्रिया-प्रतिक्रिया, सिद्धान्त-प्रस्ताव-निरूपण, प्रतिपादन, खण्डन- १. भारतीय संस्कृति और कला, पृ. २७२ २. भारतीय संस्कृति और कला, पृ. २४९
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मण्डनादि की अधिकता थी। इस तरह आध्यात्मिक चेतना के परिवेश में मूल्य चिंतनशीलता, विवेचनाशक्ति की प्रगल्मता एवं गहराई ले परिपूर्ण जीवनदृष्टि के प्रभाव में काव्य चर्चा का प्रवाह बहा। इस दार्शनिक क्रांति के काल में बौद्ध और जैन धर्म की अपेक्षा वेदान्त दर्शन, शैव मत, अद्वैत, मीमांसा, सांख्य का विशेष प्रभाव था। काव्यचर्चा इन दार्शनिक मतों के प्रकाश में की जाने लगी और तदनुरूप प्रतीकों और रूपकों की योजना की गई। काश्मीर और कन्नौज - विद्या, कला एवं दर्शन तथा काव्यसर्जना और काव्य- चर्चा के संपन्न प्रमुख केंद्र थे। काश्मीरी प्रणयी राजाओं के शासनकाल में आनंदवर्धन ( १० वीं शती), अभिनवगुप्त (११ वीं), क्षेमेन्द्र (११ वीं), मम्मट (१२ वीं) आदि काव्याचार्य हुए। कान्यकुब्ज के यशोवर्धन, महीपाल, महेन्द्रपाल के आश्रय में भवभूति, राजशेखर जैसे आचार्य थे। काव्य के संदर्भ में रसचर्चा के विचार का आरंभ तो हो चुका था। उसमें उठनेवाली समस्याओं का मौलिक चिन्तन करते हुए आचार्यों मेंसे हर एक ने किसी-न-किसी रूप में रस की सत्ता को स्वीकार किया और रससिद्धान्त की चर्चा के अंतर्गत केवल धर्ममुख और पूर्ववर्ती प्रामाण्यपूर्ण विवेचन में मौलिक क्रांति करते हुए रसतत्त्व की व्यापक, सूक्ष्म एवं गहनतम व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इस काल के प्रथम आचार्य आनंदवर्धन ने रस का स्वतंत्र रूप से विवेचन करते हुए ध्वनिमत के अंतर्गत रसध्वनि की स्थापना की। नाटक और प्रबंधकाव्य के लिए रसास्वाद की चर्चा संभव थी पर मुक्तक की व्याख्या के लिए समस्या उत्पन्न होने पर ध्यनि मत का उद्घाटन हुआ और रस को व्यंजनात्मक माना गया। रसवाद और ध्वनि की पटरी बाँध दी गई। बौद्धिक जागरूकता पर आधारित बौद्धिकता एवं तटस्थता का प्रवेश उसमें हुआ। दरबारी वातावरण, राजाश्रय, सामयिक कवि सभा, काव्य की कसौटियाँ एवं सूक्ष्म विचारपरकता के प्रमाव में अलंकारशास्त्रांतर्गत स्थापनाओं के अतिरिक्त सूक्ष्मग्राही और मार्मिक तत्त्व की खोज उनकी मौलिकता है। तत्कालीन काव्यगोष्ठियों का विस्तारपूर्वक विवेचन अन्यत्र किया गया है, परंतु संक्षेप में कहना हो तो काव्यगोष्ठियाँ विदग्धगोष्ठियों से भिन्न बनकर दरबार से संलग्न एवं श्रव्यकाव्यपरक बनी थीं। उसके स्वरूप के प्रभाव से आनन्दवर्धन को श्रव्यकाव्य की महत्ता को समझाने के लिए अलंकारादि के साथ ध्वनिमत का प्रतिपादन करना पडा और रस की महत्ता को स्वीकार करना पडा। दरबारी काव्य में वक्रोक्ति, व्यंजकता अधिक बढ़ रही थी, वह उस काल के काव्य की प्रधान विशेषता ही थी। कुछ विद्वानों के मत से काव्य में ध्वनि द्वारा रस की प्रतिष्ठा करनेका कारण आनन्दवर्धन का अपने आसपास के रचनात्मक वातावरण में मंदी का अनुभव करना था। "१ १. कविता के नये प्रतिमान, पृ. ५२
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रस को ध्वन्यात्मकता में अन्तर्भूत कर वस्तुध्वनि और अलंकारध्वनि का परिचय रसध्वनि के अन्तर्गत माना गया है। "तेन रस एवं वस्तुतः आत्मा" कहते हूए प्रबन्ध काव्य में रस की ओर ध्यान देने की उन्होंने सूचना दी है। काव्यगत शब्दार्थों के संयोग से रसिक के मन में विशेष अनुभूति होगी, जिसका वह आस्वाद करता है। वह आस्वाद व्यंजनाशक्ति के द्वारा होने के कारण रस व्यंग्य है। यह विचार उनके विवेचन की विशेष उपलब्धि है, जिससे रस चिंतन का नया द्वार खुलता है। रसचिंतन में रसिक पाठक का स्थान प्रधान हुआ और रस की चर्चा का रुख बदला। इस धारणा पर भी समकालीन काव्यचर्चा के स्वरूप का अधिक प्रभाव है। इस काल में महाकवि तो अधिक नहीं हुए, परन्तु भावक वर्ग को विशेष महत्ता प्राप्त हुई। यही नाट्यरस और काव्यरस का मिलनबिन्दु है। ध्वन्यात्मकता या व्यंजकता की प्रतिष्ठा से अभिनयप्रधान नाट्यार्थ और शब्दार्थपूर्ण काव्यार्थ को एक केंद्र में लाया गया। इन दो धाराओं के परस्पर मिलन से काव्यशास्त्रीय रसचर्चा को प्रगल्मता, नवीनता एवं सूक्ष्मता प्राप्त हुई। इसके बीज मूलतः समकालीन सामाजिक जीवन में ही अवस्थित हैं। पूर्ववर्ती रसचर्चा और ध्वनिमतोत्तर रसचर्चा की सीमारेखा पर भट्टनायक का उदय हुआ। उन्होंने ध्वनिमत का खण्डन कर आदर्शवादी दृष्टिकोण से विषयीगत व्याख्या करके संतुलित एवं विकसनशील विवेचन प्रस्तुत किया। इन्हें शैव आनंदवादी द्वैतवादी कहा गया है, कुछ विद्वान मीमांसक मानते हैं तो किसीने वेदांती सांख्यवादी माना है। जगत् एक नाटक है और हर मनुष्य निरंतर उसमें रसास्वादन करता रहता है एसी भूमिका धारण कर रस का विषयीगत विचार किया। नाट्य के साथ ही श्रव्य काव्य का ग्रहण कर भावकत्व, भोजकत्व शक्ति और साधारणीकरण के सिद्धान्त की स्थापना की। सहृदयगत स्थिति को मान्यता देकर विध्ननाश, साधारणीकरण और आनंदवाद की स्थापना के साथ रस की अखण्ड, अद्वैत और एकांत सत्ता स्थापित की। संस्कारों के बल पर मानवमात्र के हृदय की एकता एवं वासनात्मक स्थायी भाव की रसात्मक अभिव्यक्ति का सिद्धान्त स्थापित किया। भट्टनायक की स्थापनाओं में समकालीन दार्शनिक चिन्तन का स्पष्ट प्रभाव है, परंतु साथ ही श्रव्य काव्य की लोकप्रियता के बढ़ने के साथ-साथ उसके आस्वाद की चर्चा करना उनके लिए आवश्यक हो गया। समकालीन काव्य-गोष्ठयों और दरबारी वातावरण के फलस्वरूप जो एक विशेष वर्ग 'भावक' उत्पन्न हुआ था, उसके कारण रचयिता की अपेक्षा काव्य के आस्वाद की समस्या को विशेष प्रधानता मिली। श्रव्य काव्य के आस्वाद के संदर्भ में अलंकार, वक्रोक्ति, रीति आदि विभिन्न मतों के साथ ध्वनि की प्रतिष्ठा हो चुकी थी। श्रव्य काव्य के आस्वाद के लिए नाटक के प्रेक्षक से भिन्न प्रकार की प्रक्रिया से गुजरना पडता था। अतः भावकत्व, भोजकत्व शक्तियों का
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उल्लेख कर साधारणीकरण का सिद्धान्त रखकर यह कठिनाई दूर करने का प्रयास भट्ट- नायक ने किया। साधारणीकरण के द्वारा बौद्धिक क्षमता और व्यक्तिगत विभिन्नता के बावजूद श्रव्य काव्य के आस्वादन में भी सरलता उत्पन्न करने का उद्देश्य भट्ट- नायक का था। इस काल के सर्वश्रेष्ठ आचार्य अभिनवगुप्त ने रससिद्धान्त का व्यापक एवं सूक्ष्म व्याख्यान करते हुए पहली बार रसास्वादन के कलात्मक प्रश्न को दार्शनिक आधारभूमि प्रदान की। आत्मतत्त्व को महत्त्व देकर शैवाद्वैत के आधार पर रसतत्त्व की व्याख्या कर रस की एकान्त आनन्दरूपता की स्थापना की। अभिनवगुप्त पर शैव मत के साथ ही शंकराचार्य का अद्वैत और बौद्ध के विज्ञानवाद का प्रभाव माना जाता है। श्रव्य काव्य के सन्दर्भ में रसचर्चा स्थिर होने पर अपने काल की चिंतनपरक विचारधारा के रससिद्धान्त की चर्चा करना एवं निष्कर्ष प्रस्तुत करना अभिनवगुप्त के लिए स्वाभाविक था। क्षेमेन्द्र ने औचित्य को रसजीवित कहकर रसौचित्य और रसाभास की पर्याप्त चर्चा कर रसचर्चा में योगदान किया। सम्भवतः दरबार के दूषित वातावरण में रचित एवं पठित काव्यरचना में शंगारिक अश्लीलता और अनैतिकता का आधिक्य होने से उससे बचने के लिए समग्र विवेचन करना पड़ा और औचित्य को प्रतिष्ठा देनी पड़ी। कुन्तक ने वक्रोक्ति की स्थापना रमणीयता के लिए रस का महत्त्व स्वीकार करते हुए कहा, "रसेन वर्तते तुल्यम्।" वक्रोक्ति नित्य की अपेक्षा भिन्न प्रकार की भाषासरणी, दरबारी काव्य का प्रभाव है। भोजने 'सरस्वती कण्ठाभरण' और 'शंगारतिलक' में नाट्य और काव्य के सन्दर्भ में रस की चर्चा की। शृंगार को 'अहंकार' रूप में सर्वश्रेष्ठ और एकमात्र रस घोषित करने में तत्कालीन सामंतवादी, दम्भी, व्यक्तित्व की झाँकी और अहंभाव (egoism) की स्पष्ट छाप है। मम्मट ने ध्वनिमत का खण्डन करके पूर्ववर्ती सभी मतों की चर्चा एवं व्यवस्थापन के साथ रसचर्चा का विशदता से वर्णन किया। सबसे अधिक रसचर्चा इसी काल में हुई। अन्य काव्यमतों की अपेक्षा ध्वनि और रस की चर्चा के विकास ने दोनों मतों को परस्पर मिला दिया। रसवाद ने ध्वन्यात्मकता को और ध्वनिमत ने रसध्वनि के रूप में रस को स्वीकार किया। ध्वनिमत के प्रभाव में व्यंजना शक्ति और रस की व्यंजकता को महत्त्व प्राप्त हुआ जिससे काव्यार्थ एवं नाट्यार्थ को महत्ता मिली। दोनों धाराओं का मिलन हुआ। काव्यरस को प्रतिष्ठा प्राप्त होकर नाट्यरस उसीमें समा गया और नट के स्थान पर सहृदयगत रसास्वाद की स्थिति की चर्चा विशेष रूप में हुई। काव्यानुभूति को जीवनानुभूति की सापेक्षता के स्थान पर आध्यात्मिक अनुभूति के रूप में देखा और परखा जाने लगा। वस्तुपरक दृष्टि बदलकर व्यक्तिपरकता एवं आत्म-
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निष्ठता आ गयी। दार्शनिक खण्डनमण्डन, चर्चा विवादादि रूप में काव्यानुभुति, रस- निष्पत्ति, रसास्व्ाद आदि परखा जाने लगा। उससे उत्पन्न सब्र गुत्थियों को सुलझाने के लिए दार्शनिक रूपकों, प्रतीकों की योजना से रससूत्र और तदनुषंगिक चर्चा समकालीन दो चिन्तनों के फलस्वरूप आध्यात्मिक परिवेश में रंग गई। अभिनय के स्थान पर सूक्ष्म व्यंजक भावों का स्वीकार, दृश्य की अपेक्षा श्रव्य का विचार, एवं भावना के अतिरिक्त कल्पना की स्थापना हुई। जीवनानुभूति और सूक्ष्म संवेदनशक्ति तथा विवेचन-प्रगल्मता से परिपूर्ण रसचर्चापर शैवाद्वैत और सांख्य मीमांसा का प्रभाव रहा है। मुक्तक और दरबारी काव्य के संदर्भ में उभरनेवाली समस्याओं के फलस्वरूप काव्यरस की चर्चा हुई। प्रकाश, लोचन, मीमांसा, दर्शन आदि विभिन्न शीर्षकों के ग्रंथों द्वारा रसचर्चा परिपक्व बनाई गई। भरत की यथार्थ परकता और विषयपरकता के स्थान पर विषयीगत चेतना, अलौकिक अनुभूति, आदर्शमय और अखण्ड बन गई।
उत्तर मध्यकालीन भारत: रसचर्चा का विकास - चतुर्थ चरण - (११५० ईसवी से १७०० ईसवी तक़) बारहवीं शताब्दी तक भारत के राजनीतिक विघटन, परस्पर वैरभाव और सामन्तशाही से उत्पन्न अराजकता से बाहरी आक्रमकों ने लाभ उठाया। गझनी का मुहम्मद, शहाबुद्दीन घोरी आदि तुर्कों ने दिल्ली और कन्नोज पर आक्रमण कर मन्दिरों का ध्वंस एवं धन की लूट कर अपना आधिपत्य स्थापित किया। बारहवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक मुसलमानों और मुगलों का शासन अखण्ड रूप से रहा, अतः दो विभिन्न संस्कृतियों तथा धर्मों के संघर्ष और समन्वय का यह काल रहा है। प्रांतीय शासकों ने विद्रोह कर स्वतंत्र राज्यों की स्थापना की थी। तेरहवीं शताब्दी के बाद अफगाण-तुर्क शासन समाप्त होकर भारत मुगल साम्राज्याधीन बना। पूर्णतः विदेशी शासन के दबाव में भिन्न संस्कृति, धर्म, सामाजिक रीति- रिवाज एवं व्यवस्था के होने कारण यह काल सामाजिक एवं सांस्कृतिक संघर्षमय रहा है। शुंगकाल से विदेशी लोगों को भारत ने अपने में समा लिया था पर मुसलमान- मुगल अपनी जातिभिन्नता और कटरता के कारण भारतीयता में पूर्णतः घुल नहीं गये; (absorb) परंतु परस्पर संघर्ष-समन्वय से गुज़रते हुए अनुकूलन (adaptation) और समायोजना (adjustment) से सामंजस्य पैदा हुआ। अफगाण सुलतानों के काल में राजनीतिक अराजकता एवं अव्यवस्था थी, परंतु मुगलों ने दिल्ली के तख्त पर बादशाह की स्थापना की। छोटे-छोटे राजा बनने की अपेक्षा दिल्ली और आग्रा दरबार में मनसबदार, मन्त्री आदि स्थान पाने में हिंदू राजा रस ... ५
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अपना सम्मान समझने लगे। सामन्तवादी पद्धति नष्ट होकर नई स्थिति उत्पन्न हुई। बादशाह की कृपा महत्तम बनी। जाति का ही नहीं, राष्ट्रीय रूप में मुगलशासन स्थिर हुआ। मुगल बादशाहों की उदारता, सहिष्णुता और उत्तम शासन के फलस्वरूप शान्ति समृद्धि और सुव्यवस्था उत्पन्न हुई। राजपूतों से संधि करके, विवाहसम्बन्ध द्वारा या हिंदुओं को उच्च पद देकर सामान्य विरोध को दूर करने में मुगल बादशाह सफल रहे और केन्द्रीय व्यापक सुदृढ साम्राज्य की स्थापना हुई। सुलतानशाही में प्रथम सुलतान की मृत्यु होते ही जनयुद्ध (civil war) होता था या उसकी हत्या कर उत्तराधिकार का कब्जा किया जाता या। विना नियम या कानून से सब करना सामन्तों, जागीरदारों और सरदारों (kingmakers) पर निर्भर करता था पर मुगलों के काल में बादशाहत सुव्यवस्थित थी। विजयनगर और राजपुताने में राजपूतों का विकास हुआ था; जिससे हिंदु राजा धर्म और संस्कृति की रक्षा करते थे। इस काल की राजनीतिक स्थिति को एक इतिहासकार वर्णित करते हैं कि 'राज्य सेना की शक्ति से विकसित हो गया था, उसके शासक विशेष रूपसे अपने व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा एवं सक्षमता बढ़ाने में सतर्क रहते थे। शासन व्यवस्था में कोई निश्चित एवं सुसंगत नीति के न होनेसे केवल स्वार्थान्धता का अनुसरण किया जाता था। अतः कुछ समय के पश्चात् शासन अधिकाधिक महत्त्वाकांक्षी और विद्रोही बनता गया, जिसके फलस्वरूप राज्य के पतन के अलावा और कुछ न हो सका।"१ समाज में सर्वोच्च केंद्रीय, मूर्धन्य एवं अग्र स्थान बादशाह को प्राप्त था। समाज स्पष्टतः उच्चवर्ग, मध्यवर्ग और निम्नवर्ग ऐसी तीन श्रणियों में विमक्त था। शासक और जनता में घोर खाई थी। मन्त्री, सरदारादि उच्चवर्ग आराम और विलास- मय जीवन बिताता था। दरबार ही कला, संस्कृति, धन का केंद्र था। मध्यश्रेणी में व्यापारी, शिल्पी, कर्मचारी आदि धनी थे पर कोतवाल से अपने घन को छिपाने के प्रयास में रहते थे। आम जनता की स्थिति हीन थी। किसान, मज़दूर, शिल्पी, ग्रामीण जन आदि का जीवन कठिन था। बालविवाह, बहुपत्नीत्व, जातिप्रथा का प्रचलन था, विधवाविवाह अमान्य था। फलज्योतिष आदि में हिंदू मुसलमान दोनों की श्रद्धा
₹. The State grew on military strength, its rulers were mainly concerned to adopt measure to safeguard and strengthen their own authorities and its aristocracy having no consistent policy, pursued selfish interest and in course of time grew more ambitious and tarbulent just a State could not but collapse. - An Advance History of India, P. 396.
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सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में रसचर्चा का विकास ६७
थी। गुलाम प्रथा, दासदासियों को खरीदना और पर्दा पद्धति आदि रूढ था। यद्यपि राजघरानों की स्त्रियाँ शिक्षित एवं कलासंपन्न थीं, परंतु सामान्य स्त्री की स्थिति हीन ही थी। दरबार या हरम में दासियाँ और नर्तकियाँ रखनेकी प्रथा का प्रचलन था। स्त्रीस्वातंत्र्य की पूर्णतः हानि हुई थी। समाज का नैतिक स्तर हीन बना था। उच्चवर्ग और निम्नवर्ग, राजा-प्रजा, धनी- गरीब तथा दरबारी संस्कृति और लोकजीवन में गहरी खाई होने से भारतीय परॅपरा और संस्कृति में भ्रष्टता एवं अनैतिकता आयी थी। सामाजिक नीतिनियमों (public morals) के स्थान पर हीनवृत्ति, रिश्वतखोरी, दुष्टता, ईर्ष्या, चाटुकारिता उत्पन्न हुई थी। जादूटोने में विश्वास, मिखारियों की बढती संख्या और सामाजिक अपकर्ष की स्थिति थी। जानवरों की कुश्तियाँ, जुआ, शिकार, कबूतर उड़ाना, शतरंज, ताश, नृत्य, संगीत आदि मनरंजन के साधन प्रचलित थे। हिंदुओं के देश में मुसलमानों की प्रतिष्ठा थी। जातियों-उपजातियों में अधिकाधिक वृद्धि हुई थी। आर्थिक संपन्नता और समृद्धता थी। इस्लाम के प्रभाव एवं हिंदु धर्म का राजाश्रय नष्ट होने से हिंदु धर्म का विकास अवरुद्ध हुआ था। मुगलशासन में औरंगजेब के अतिरिक्त सब सम्राट धर्मसहिष्णु एवं उदार होने के कारण दोनों धर्मों का परस्पर पर प्रभाव हुआ। इस्लामी मानवीय समानता, विश्वबंधुत्व, जातिबंधन का त्याग और एकेश्वरवाद आदि का प्रभाव हिंदु दार्शनिक एवं धार्मिक प्रज्ञा पर पड़ता रहा और धार्मिक क्रांति का बीज बोया गया। अफगानों के काल में उठी हिंदू-धर्मजागृति की लहर को मुगलों के काल में बल मिला।
दक्षिण में सातवीं शताब्दी से ही आलवारों की प्रधानता थी, जो प्रेममय कोमल मानवी भावनाओं को महत्ता देते थे। अफगाण-मुगल साम्राज्य में ज़बरदस्ती से धर्मान्तरादि के कारण हिंदू धर्म के लिए जो आव्हानपरक स्थिति उत्पन्न हुई, उसमें आलवारों की भक्ति का कुछ सहारा मिला। हिंदू धर्म में अनाचारी और एकाधिकारी (monopolist) ब्राह्मणों का वर्चस्व तो था ही, कठोर जातिबंधन, अस्पृश्यों को मन्दिरों में प्रवेश की मनाही, स्त्रीविषयक संकीर्ण दृष्टि, पूजाविधि आदि कर्मकाण्ड का आडम्बर, तंत्रमन्त्र, अंधविश्वास (superstition) आदि कई बुराइयाँ उत्पन्न हुई थीं। एक ओर यह अनास्था और दूसरी ओर धर्म पर संकट आने से जो तनावपूर्ण धार्मिक स्थिति उत्पन्न हुई थी, उसके कारण ही धार्मिक क्रांति का उदय हुआ। रामानंद ने दक्षिण में धार्मिक कर्मकाण्ड और जातपात का बंधन तोडकर जन- भाषा के माध्यम से धार्मिक जागरण किया। आलवारों के मानवीय दैवी उपासनामार्ग से कुछ प्रेरणा मिली और भक्तिपन्थों का उदय हुआ। सर्वधर्मसहिष्णुता, परमात्मा का एकत्व, अद्वैत श्रद्धा तथा भक्ति और प्रेम की पवित्रता पर बल देकर सिद्धान्तों और तत्त्वों के बोझ से मुक्त भक्तिमार्ग का उदय हिंदु धर्म में अनोखी क्रांति थी। यह
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६८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
क्रांति न केवल धार्मिक थी, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी थी। सब वर्णों और जातियों के प्रति समान दृष्टि एवं धर्मशुद्धीकरण में उदार दृष्टि अपनायी गई। बारहवीं शताब्दी में रामानुज ने जीव और जगतू को ईश्वर के दो रूप मानते हुए विशिष्टाद्वैत की प्रतिष्ठा की, जिसमें विवेक, अंतर्ज्ञान, सर्वव्यापकता और पारलौकि- कता का समन्वय था। तेरहवीं शताब्दी में मध्वाचार्य ने ईश्वर और जीव की पृथक् सत्ताएँ मानकर द्वैतवाद की स्थापना की अर विष्णु या हरिदर्शन का हेतु अंतिम मोक्ष मानकर ज्ञान को भक्ति की ओर मोड़ दिया। तेरहवीं शताब्दी में ही निम्बार्क ने जीव और ब्रह्म के अभिन्न होते हुए भी व्यावहारिक रूप से मिन्न होने का द्वैताद्वैत सिद्धान्त सामने रखा। सोलहवीं शती में वल्भाचार्य ने पुष्टि मार्ग के द्वारा प्रेममय उपासना की महत्ता स्थापित की। भक्ति आंदोलन के कारण शंकराचार्य का अद्वैतवाद कुछ फीका पडा और वैष्णव संप्रदाय एवं दर्शन की महत्ता बढ़ी। धर्म ने समकालीन स्थिति को चुनौती देकर वर्ण- विहीन हिंदू धर्म का आंदोलन चलाया। उसके फलस्वरूप कई रहस्यवादी संतों का उदय हुआ। कबीर, रामानंद, नामदेव, चैतन्य, नानक आदि ने इस क्रान्ति को आगे बढ़ाया। भारतीय मनीषा विशुद्ध मानवीय अनुरक्ति एवं निष्ठा की प्रौढ़ता के साथ परात्परता को देवता के समीप पहुँचने का प्रतीक मानने लगी। विनम्रता, सहजशीलता और आत्मसमर्पणपरक भक्ति और प्रेम पर बल दिया गया। पाँचों मुगल सम्राटों के शासनकाल में उनके सक्रिय आश्रय, सुव्यवस्था और शांति के फलस्वरूप कलाओं का विकास एवं नवीन शैली का उदय हुआ। संगीत, वास्तु, चित्र, अक्षर, पुतले बनाना आदि कलाएँ विकसित हुई। विजयस्तंभों और इमारतों पर हिन्दू-मुस्लिम शैलियों का समन्वय है। विशाल मसज़िदों, किलों, बुरजों और जलाशयों का निर्माण हुआ। पत्थर की मूर्तियाँ ही नहीं, वरन पत्थर की बेलबूटियाँ फूल-फल आदि नक्काशी बनायी गई। संगीत कला में खयाल, तराना, ठुमरी, गझल, कव्वाली का उदय हुआ। परंतु भारतीय परंपरा में पूर्ववर्ती स्थापित संगीत का धार्मिक सम्बन्ध टूटकर इस काल में दरबारी वातावरण के कारण सामाजिक स्तर हीन बना। समाज विलासिता एवं भोग का केन्द्र बना। उस्ताद, नर्तिका और गवैये का स्थान हीन हुआ। कला लोककला के पद से हटकर व्यावसायिक बनने के कारण सामान्य समाज उससे दूर रहा। चित्रकला में जहाँ एक ओर मुगल शैली में व्यक्तिचित्रों की भरमार रही, वहाँ दूसरी ओर राजपूत शैली में लोक-सामान्य की अनुभूति थी। पर मुगल कला अभिजात वर्ग का प्रतिनिधित्व करती है। दरबारों, अमीरों, शाही परिवार सामन्तादि के ऐतिहासिक प्रसंगों तथा दन्तकथाओं के चित्र हैं। लडाइयों, शाही हरमों के साथ ही भाखेट, मदिरापान के दृश्य अंकित हैं। बाघ, हिरन सिंहादि, राजा, राजपुत्र, सरदारों