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के चित्र हैं। सरदार हुक्का पीते हुए खिड़की में बैठे हैं। व्यक्तिचित्रों में (portraits) कृत्रिमता, कलात्मकता, गोलाई, कान्ति, सुकुमारता, रंगरेखाओं की चमकदमक, तरलता, डीलडौल और अलंकारिता है। दरबारी भव्यता और दिव्यता के साथ गहरे रंगों की योजना एवं लाल नीले स्वर्णमय बारिकी से सजावट है। सूक्ष्मचित्रकारों के साथ भौतिकता और मनरंजन की विशेषता है। चित्रों में सजीवता मौलिकता; जीवितता, एवं बल ( vigour) की अपेक्षा कृत्रिमता और भावनाभाव है। इसी काल की राजपूत शैली की कला इससे नितांत भिन्न है, जो लोककला कहला सकती है। इसमें ग्रामजीवन, धर्म, वातावरण, समारोह, बाज़ार, कारीगर, खेल आदि सामान्य जीवन की झाँकियों के अतिरिक्त रामायण-महाभारत की घटनाओं, बुद्ध की कथाओं और जीवनप्रसंगों का चित्रण है। अजन्ता की गुफाओं में गाय, हाथी, मोर, हिरन आदि पशुपंछियों को देवताओं का स्वरूप देकर शिव-पार्वती, कृष्ण आदि के भक्तों के सहित चित्रित है। लोकप्रचलित विषयों के ग्रहण से जातीय भावना, वीरता, शांति, धर्मनिष्ठा और विश्वास अंकित है। मानवीय शंगार (रति), दुःख- कातरता, करूणा, दया, अनुकम्पा, सहानुभूति, वात्सल्यादि का सुंदर अंकन है। राधाकृष्ण को प्रेमी और प्रेमिका के रूप में अंकित करने से धर्म और प्रेम को मिला दिया। भारतीय धर्म और अध्यात्म से जुडी हुई इस कला में चारूता (grace), आकर्षकता (charm) और सारल्य (sincerity) व्यक्त होता है। आध्यात्मिक धरातल पर प्रतिष्ठित सजीव, सहज, स्वाभाविक, सूक्ष्म, कल्पनाप्रचुर और बौद्धिक प्रज्ञा से परिपूर्ण लोककला के दर्शन होते हैं। इन दोनों शैलियों को तुलनात्मक रूप में व्यक्त किया गया है। "तत्कालीन लोकप्रिय देवताओं में प्रेम-प्रणय और धर्म के सहज सुखद संकेत थे। इस तरह राजपूत चित्रकला का संप्रदाय सौंदर्यात्मक सुसंगतियुक्त था और उसकी आध्यात्मिकता में मानवीय जीवन एवं धर्म का समन्वय था; अतः वह मुगल चित्रकला से उच्चतर प्रमाणित हुआ।"१ इस काल में संस्कृत साहित्य की अवनति हुई। अरबी, फारसी, उर्दू, हिन्दी आदि देशीय भाषाओं का विकास हुआ। उर्दू व्यवहार की भाषा (lingua franca) बनी। जनभाषा की महत्ता बढ़ी। अलंकारिक शास्त्री कवीन्द्र रूपगोस्वामी इसी काल के हैं। संगार, भक्ति और वेदान्तपरक श्रेष्ठ ग्रंथों की रचना हुई। ?. Love, romance and religion were happily symbolised in popular divinities. Thus the Rajput school of painting had so beautifully harmonised and blended the human life and religion that in its spiritual ideology, it because superior to the Moghal art of painting. -Evolution in Indian Culture, P. 491.
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७० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन इस काल में प्रथमतः आक्रमणकारियों से घोर संघर्ष हुआ। धीरे-धीरे संघर्ष कम होकर दोनों संस्कृतियों के परस्पर प्रभाव में मेल (harmony), समन्वय ( synthesis), सहिष्णुता (tolarance) और सहकार्य से समन्वयात्मक दृष्टि पाकर सामंजस्य आया। समाज में विचारकों के दो भिन्न वर्ग बने। एक बुद्धिवादी पण्डित आचार्यों का वर्ग, जो राजाश्रय, दरबार एवं उच्च वर्ग से सम्बन्धित थे और दूसरा जनजीवन की धारा में भक्तिरस से ओतप्रोत भक्तगणों का वर्ग था। आचार्य संस्कृत पंडितों की परम्परा पर आभिजात्य जीवन के संस्कार थे, अतः उनकी कला और काव्यचर्चा पर बादशाह की रुचि, दरबारी ठाठबाट एवं समकालीन दर्शन का प्रभाव दिखाई देता है। ये दार्शनिक विचारक उच्चवर्गीय संस्कृति के प्रभाव से बच नहीं सके। पर दूसरी धारा वैष्णव धर्म की भक्ति और प्रेममय मार्ग को अपनाकर तथा दरबारी विलासिता से मुँह मोड़कर मन्दिरों में राधाकृष्ण के युगल-प्रेम में रंग गयी। भक्ति के माध्यम के लिए उन्होंने अपने काल के प्रभावी भाव रति को चुना। जनसामान्य की शृंगार - रुचि को कृष्णभक्ति का उत्कट एवं प्रभावी माध्यम बनाया गया। उस पर आध्यात्मिकता का मुलम्मा चढ़ाकर उसी में जीवनकी सार्थकता मानी गयी। सामाजिक जीवन में वैचारिक विभिन्नत्व एवं जीवनगत भिन्न दृष्टिकोण का प्रभाव इस काल की काव्यशास्त्रीय चर्चा पर पड़ा है। रसचर्चा का एक प्रवाह संस्कृत पण्डितों और आचार्यो का और दूसरा गौडीय भक्तों का रहा है। रसचर्चा में पर्यास परिवर्तन आया। रुय्यक, वाग्भट, हेमचन्द्र, मम्मट, जयदेव, भोजराज, विश्वनाथ, भानुदत्त, रूपगोस्वामी, पण्डितराज जगन्नाथ, अप्पय दीक्षित आदि आचार्यों ने नाट्य और काव्य के सन्दर्भ में चर्चा की। अभिनवगुप्त की स्थापना तथा ध्वनिवादी तत्त्व का आधार ग्रहण कर रस की पुनर्व्यवस्था की गयी। रामचन्द्र गुणचन्द्र ने नाटक के सन्दर्भ में भरत और धनंजय की चर्चा को आगे बढ़ाते हुए नाटक का मुख्य आकर्षण रस माना, तथा उन्होंने पहली बार रस की सुखात्मता के साथ दुःखात्मता की चर्चा की। कटु भावों पर आश्रित रसों की अनुभूति दुःखात्मक होती है। उनकी इस स्थापना में इन दोनोंपर जैन दर्शन का प्रभाव परिलक्षित होता है। मुस्लिम धर्म के कारण भारतीय धर्म आक्रान्त थे, जिनमें हिंदु धर्म के साथ ही जैन और बौद्ध धर्भ भी थे। यद्यपि इनकी लोकप्रियता कम थी, फिर भी अपनी सीमा में वे बद्ध थे। रामचन्द्र गुणचन्द्र पर जैन धर्म की साधन कठोरता, शरीर को आत्मा का दुश्मन मानना, अपरिमित कष्ट, अनशन, उपवास एवं दुःखमार्ग का अनुसरण करना और प्रत्येक सुख को दुःख का कारण मानना आदि तत्त्वों का प्रभाव अवश्यमेव था। रुय्यक ने महिमभट्ट का कठोर खण्डन कर ध्वनिविरोध किया और 'असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य' के अन्तर्गत रस का ग्रहण किया। जयदेव ने 'चन्द्रालोक' में रस- ध्वनि का महत्त्व प्रमाणित किया। शारदातनय शुद्ध रसशास्त्र का ग्रंथ है। काव्य और
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रस, शब्द और अर्थ, भाव और रस का सम्बन्ध स्पष्ट करते हुए रूपक-भेदों की चर्चा की गयी और रस को असंलक्ष्यक्रम व्यंग्य माना गया। इस युग के महान काव्याचार्यों विश्वनाथ (१४ वीं शती) और पण्डितराज जगन्नाथ (१७ वीं शती) ने रसचर्चा का व्यापक विचार किया। विश्वनाथ के पूर्ववर्ती आचार्यों ने अलंकार, रीति आदि को काव्य-आत्मा माना था। यद्यपि विश्वनाथ किसी दर्शनविशेष से प्रभावित न थे, अपितु उन्होंने रस की प्रतिष्ठा काव्य में करना उचित माना और रसात्मक काव्य पर बल दिया। उनकी स्थापना में पूर्ववर्ती साहित्यिक विवाद ही प्रधान है। उन्होंने काव्य और नाटक दोनों को ग्रहण कर "वाक्यं रसात्मकं काव्यम्" कहकर अन्य सब तत्त्वों का समाहार रसतत्त्व में माना। साधारणी- करण के संबंध में पूर्ववर्ती मान्यता को महत्ता एवं व्यापकता दी। आचार्य धनंजय ने ध्वनिमत का खण्डन कर केवल नाट्य के सन्दर्भ में आठ स्थायी भावों को मान्यता दी। अप्पय दाक्षित ने (१६ वीं शती) व्यंग्य काव्य, उत्तम काव्य का लक्षण माना और ध्वनि काव्य के अन्तर्गत रस को रखकर केवल उल्लेख मात्र किया। रस धारा के अंतिम आचार्य एवं श्रेष्ठ संस्कृत कवि तथा मार्मिक काव्यशास्त्री पण्डितराज जगन्नाथ ने आदर्शवादी दृष्टि अपनाकर रसतत्त्व के अंगों-उपांगों की चर्चा की। रसविषयक पूर्ववर्ती सब मान्यताओं के सन्दर्भ में अभिनव का अनुमोदन किया। परंतु दर्शन-भेद से इनकी मान्यताएँ भिन्न एवं मौलिक हैं। शब्दार्थ के बदले रमणीयता को ही काव्य मानकर रसनिष्पत्ति की व्याख्या को 'भग्नावरणचित्' के द्वारा समझाया है। रमणीयता की अवधारणा (concept) उनकी अपनी है; जिस पर समकालीन दरबारी रंगत में रंगी वृत्ति का प्रभाव परिलक्षित होता है। चमत्कार पर विशेष बल दिया है। वेदान्त के पण्डित होने से अद्वैतवादी प्रौढ भित्ति पर रस की स्थापना करने में वे सफल रहे हैं। पण्डितराज वेदान्त के दर्शन तथा अन्य कई शास्त्रों के पण्डित होते हुए भी शाहजहाँ के दरबार में सम्मानित थे। अतः शाहजहाँ जैसे विलासमय मुगल बादशाह के समकालीन वातावरणगत कुछ संस्कार उनकी विचारधारा पर अनायास हुए हैं। रस की चर्चा में पूर्ववर्ती समग्र मान्यताओं के बावजूद काव्य को रमणीयत्त्व का साज चढानेवाले की चेतना मुगल दरबार के विलास, रंगढंग, शान शौकत से रंगी हुई थी। औचित्य की व्यापक भूमि को रसदोषों का मानदण्ड माना। सम्भवतः तत्कालीन सामाजिक हीन स्थिति, एवं बढ़ती हुई अनैतिकता के कारण औचित्य का महत्त्व काव्य के लिए उन्होंने विशेष महसूस किया हो। भक्ति संप्रदाय से प्रभावित गौडीय वैष्णव आचार्य रूपगोस्वामी और मधुसूदन सरस्वती ने कृष्णभक्ति के शंगारमय स्वरूप को ग्रहण कर मधुर रस की प्रतिष्ठापना की और रसचर्चा में अभिनव क्रान्ति ला दी। उज्जवल मधुर रस की स्थापना में सब रसों का समाहार माना गया। समकालिक सांप्रदायिक प्रभाव में रसचर्चा मधुर रस से सराबोर
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हो जाना आश्चर्य की बात नहीं। तेरहवीं शताब्दी से वैष्णव संप्रदाय की लोकप्रियता के साथ ही राम और कृष्ण के लीला-गान की प्रबल धारा जनता के बीच बही। उसने जनमानस को अत्यधिक प्रभावित किया।
रसचर्चा का अन्य भाषाओं में विकास हिन्दी काव्यशास्त्र का विकास (१७ वीं शताब्दी से १९ वीं शताब्दी तक)
संस्कृत में रसचर्चा का पर्याप्त विकास होने के पश्चात् दार्शनिक आवरण में गुँथ- कर पण्डितराज के हाथों रससूत्र का समापन हुआ। सत्रहवीं शताब्दी के पश्चात् मुगल साम्राज्य का व्हास होने पर भारतीय जीवन में अत्यधिक परिवर्तन आया। संस्कृत साहित्य एवं भाषाविकास की अवनति हुई और देशी भाषाओं के विकास को गति प्राप्त हुई। शिवाजी महाराज ने मुगलों को ज़बरदस्त चुनौती देकर साहस आर वीरता से राज्य की स्थापना की तथा हिन्दु धर्म और संस्कृति को प्रतिष्ठा प्राप्त कराई। उनके आध्यात्मिक गुरू समर्थ रामदास ने स्वार्थ और परमार्थ का मार्ग दिखाया। भारत में फिर एक बार स्वसंस्कृति, स्वधर्म, और स्वराज्य की चेतना फूट पड़ी। औरंगज़ेब की कट्टरता को चुनौती देनेवाले पंजाब के अंतिम पातशाह गुरू गोविंदसिंह ने सिख धर्म का विकास किया। 出 此 共 地 地
पतनोन्मुखी हिंदु-मुसलमान दरबारों का दूषित वातावरण समाज में फैला हुआ था। उसका फायदा उठाकर अंग्रेजों ने डेढ़ सौ वर्ष तक राज्य किया। अंग्रेज़ी संस्कार, शिक्षा एवं शासन के प्रभाव में भौतिक विकास हुआ। बुद्धिवादियों में सामाजिक एकता, जातिविरोध और राष्ट्रीय चेतना जागृत हुई। सारे समाजजीवन का आधुनिकीकरण (modernisation) होने से नये रीति-रिवाज, विद्या, कला, शिक्षा, साहित्य आदि का नवनिर्माण हुआ।
परन्तु साहित्य निमिति और काव्यशास्त्रीय चर्चा को विशेष अनुकूलता प्रास्त नहीं हुई। इस्लामी संस्कृति के अवशेषों के कारण समाज में दरबारी संस्कार का प्रभाव था। रियासतों के आश्रय में कवि अपने को आचार्य मानकर कवित्व की अपेक्षा काव्य-चर्चा की ओर उन्मुख रहते थे। संस्कृत ग्रंथों के आधार पर काव्यशास्त्रीय चर्चा को आगे बढ़ाते हुए अलंकार, रस, रीति आदि का शास्त्रीय व्याख्यान देशी भाषाओं में किया गया।
रसचर्चा के ग्रंथों में इस काल में भी दो धाराएँ रहीं। एक धारा भक्तिरस के प्रभाव में रसादि की चर्चा करती रही। कृपाराम की 'हिततरंगिणी' रसरीति पर सर्वप्रथम ग्रंथ है। कृपाराम की उक्ति से ज्ञात होता है कि उसने भरत के नाट्यशास्त्र
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का आधार ग्रहण किया है१। पर डॉ. मिश्र ने कहा है, "पर अन्त में स्वाधीनपतिका आदि नायिका के रस भेदों से स्पष्ट होता है कि उसमें भानुदत्त का आधार था, क्योंकि भरत ने केवल आठ भेद किये हैं, दस नहीं।" नन्ददास ने 'रसमंजरी' में नायिका मेद का वर्णन किया हैं। 'रसिकप्रिया' में केशवदास रस का वर्णन कृष्ण और राधा के सन्दर्भ में करते हुए "नवरस में व्रजराज नित" कहते हैं। रसिकों के लिए 'रसिकप्रिया' का निर्माण कर उसमें रस को विभावों, अनुभावों और संचारी भावों द्वारा प्रकाशित स्थायी भाव कहा गया है। इस धारा ने नवरसों का विस्तृत निरूपण कर शंगाररस, नायिकाभेद, सखी, दूती, नायिकाओं के हाव-भाव, नखशिख वर्णन सभी अंगों का सूक्ष्म वर्णन किया।२ इस काल में रस चर्चा व्रजभाषा में अवतरित हुई। आचार्यों की सीमित संकुचित दृष्टि के कारण उसमें मौलिक परिवर्तन नहीं आया। केवल शंगार और भक्ति रस का निरूपणात्मक एवं अनुकरणात्मक पद्धति से वर्णन किया गया। रस चर्चा का आधुनिक स्वरूप: (१९ वीं शताब्दी से आज तक) भारतीय इतिहास में यह काल अत्यंत महत्त्वपूर्ण तथा राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक पुनर्जागरण (Renaissance) का काल है। पाश्चात्य प्रभाव के साथ अन्य क्रान्तिकारी परिवर्तन आये और भारतीय समाज, संस्कृति और विचारधारा में आमूलाग्र परिवर्तन हुआ। पुराने विचारों, प्रथाओं और पद्धतियों के स्थान पर शास्त्र, साहित्य, दर्शन, अर्थशास्त्र, इतिहास आदि के कारण विचारधारा में अन्तर आया। पूर्ववर्ती रहस्यपरकता, अंधविश्वास, दंतकथाओं का इतिहास तथा राजसत्ता तथा की निरंकुशता के स्थान पर नवोन्नत समाज, राजनीतिक उत्थानपतन और विज्ञानादि के प्रभाव से राष्ट्रीय नवनिर्माण की प्रवृत्ति जगी। विश्वास और श्रद्धा के स्थान पर तर्क (reasoning) और न्याय (judgement), अंधविश्वास के स्थान पर बुद्धिवादिता और विघटन के स्थानपर उत्कट इच्छा (zeal) ने नवनिर्माण की चेतना के बीज बो दिये। इसके फलस्वरूप भारत में १९ वीं शताब्दी के अन्त में रिनेसाँ (renaissance) का काल रहा। परंतु भारतीय पुनर्जागरण अंग्रेजी रिनेसाँ से बहुत मिन्न है, जिसे श्री. लुनिया ने इन शब्दों में व्यक्त किया गया है, "आत्माभिव्यक्ति की नई सर्जनात्मक प्रेरणा उत्पन्न
१. 'कृपाराम यों कहत हैं, भरत ग्रंथ अनुमानि'- -हिन्दी काव्यशास्त्र का इतिहास. पृ.५१ २. हिन्दी काव्यशास्त्र का इतिहास पृ. ६७-६८
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७४ रससिद्धांन्त का सामाजिक मूल्यांकन
करने के लिए राष्ट्रीयत्त्व की प्रेरणा पुनः जागृत करने का वह एक प्रयास था। उसमें भारतीय रिनेसाँ को भव्य रूपाकार देने एवं पुनर्रचना करने की प्रेरणा थी। अतः भारतीय सांस्कृतिक जीवन की कायापलट हुई, जिसने पूर्ववर्ती संस्कारों या पृष्ठभूमि को बनाये रखकर उस पर नया आवरण या साज चढ़ाया। 9 राजनैतिक सर्वव्यापी आन्दोलन ने अंग्रेज शासन को ज़बरदस्त चुनौती दी। आत्मबलिदान और त्यागपूर्ण क्रांतिकारियों की परम्परा बनी। अंग्रेज़ी वस्तुओं का बहिष्कार और बंग आंदोलन से सांस्कृतिक आधारभूमि प्राप्त होकर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को बल मिला। जन आन्दोलन, सत्य, आत्मिक बल, अहिंसात्मक सत्याग्रह तथा नैतिक बल के आधार पर राष्ट्रीय आन्दोलन आगे बढ़ा। मार्क्सकी द्वंद्वात्मक भौतिक- वादी प्रणाली से प्रेरित होकर सामाजिक वर्गहीन समाजरचना करके राजनीतिक स्वाधीनता प्राप्ती की ओर कुछ क्रान्तिकारियों का रुख हुआ। इस वेगवान बहुरुपी आन्दोलन के फलस्वरूप १९४७ में रक्तपात के बिना स्वाधीनता प्राप्त हुई। रियासतों, सामन्तवाद और निरंकुशता का नाश होकर भारतीय गणतंत्रात्मक संघराज्य की स्थापना हुई। यह युग राजनीतिक स्वाधीनता आन्दोलन के समसामयिक, सांस्कृतिक,सामाजिक और धार्मिक पुनरुत्थान का रहा है। पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव के कारण समाज में तीन वर्ग उत्पन्न हुए थे। एक वर्ग पाश्चात्य कल्पनाएँ, पोशाक, रीति-रिवाज, विचारधारा आदि को श्रेष्ठ मानता था और पाश्चात्यों का अनुकरण करनेमें महानता मानकर भारतीय संस्कृति के खिलाफ़ दृष्टिकोण रखता था। यह दल (progressive group) कहलाता था। दूसरा वर्ग, जो इसकी प्रतिक्रियास्वरूप जन्मा था और पुरातनवादियों का था, धार्मिक पुनर्जागरणवादी (revivalist group) कहलाता था। तीसरा मध्यवर्ग (middle group), निरपेक्षता एवं होकर तर्कशक्ति के आधार पर प्राचीनता का विश्लेषण कर नवीनता को अपनाने के पक्ष में था। इस वर्ग के कवियों, लेखकों और नेताओं की धारणा अधिक विकसित एवं शुद्ध थी, जिसके कारण स्वच्छंदता की धारा बही।
. It is the attempt of a reawakened national spirit to explore a new creative impulse of self expression that shall give the spiritual force for a magnificant reshaping and reconstructing Indian Renaissance, therefore is the rejuvenation of Indian cultural life that puts on a new garb without completely being arift moorings. -Evolution of Culture, P. 510
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इसी समय धार्मिक आडम्बर एवं सिद्धान्तों की कठोरता तोडकर, ब्राह्मोसमाज, प्रार्थनासमाज, रामकृष्ण मिशन, आर्यसमाज आदि ने हिंदु धर्म की आंतरिक क्षमता बढ़ाई और पुनः परीक्षण करके नयी पृष्ठभूमि पर न्यायसंगत परीक्षण किया। धार्मिक आन्दोलन सामाजिक सुधारों के संयोजन से ही आगे बढ़ा। कई संस्थाओं ने समाजविकास में मानवीयता की रक्षा कर मिशनरी वृत्ति से धार्मिक और सामाजिक पुनर्घटना एवं पुर्नर्निर्माण का कार्य किया। सतीपद्धति, बालविवाह, बहुपत्नीविवाह आदि कुप्रथाएँ बंद कर स्त्री-शिक्षा, समान अधिकार, अन्तर्जातीय विवाह, जातियों में परस्पर खानपान की स्वतंत्रता और उदारता का प्रचलन किया। पर्दा पद्धति हटाने का प्रयास किया। मद्यपान, निरक्षरता, जातिभेद, स्पृश्यास्पृश्यता, दरिद्रता आदि बुराइयों को दूर करके भारत का भौतिक एवं नैतिक विकास किया तथा सामाजिक कर्तव्य के प्रति चेतना (consciousness) उत्पन्न की।
हिंदू धर्म और समाज में विज्ञान के विचारों और राजनीतिक, सामाजिक तत्त्वज्ञान का सापेक्ष समायोजन हो गया। आधुनिक शास्त्रीय विचारप्रणालियों के प्रकाश से हिंदू धर्म और दर्शन को नवीन अर्थ प्राप्त हुआ। नवभारतीय संस्कृति में व्यक्तिवाद का उदय हुआ। व्यक्तिस्वातंत्र्य, विभक्त परिवारपद्धति और मध्यवर्ग के कारण भारतीय जीवनमान (standard of living) में अन्तर आया।
संस्कृत साहित्य के पुनरुज्जीवन के साथ ही विभिन्न देशी भाषाओं का पर्याप्त विकास हुआ। विभिन्न शास्त्रीय, कलाओं और साहित्यिक ग्रंथों के निर्माण के साथ ही विभिन्न विद्याओं का सूत्रपात एवं विकास हुआ। बंकिमचन्द्र, रवीन्द्रनाथ, शरदचन्द्र, प्रेमचन्द्र, इकबाल आदि कतिपय साहित्यिकों पर सरस्वती का वरदहस्त सिद्ध हुआ। पाश्चात्य विचारों एवं साहित्यिक विशेषताओं और प्रवृत्तियों का पर्याप्त प्रभाव रहा और पाश्चात्यपौरस्त्य प्रणालियों का समन्वय हुआ। वैज्ञानिक अनुसंधान का विकास होने से विभिन्न शाखान्तर्गत विषयों पर शोधकार्य की वृत्ति बढ़ी। कलाविषयक दृष्टिकोण और सौंदर्यदृष्टि (aesthetic sense) के विकास से कला और साहित्यविषयक रसग्रहणात्मकता भी बढ़ी विभिन्न कलाओं के विकास के साथ ही उनमें नयी प्रणालियों एवं दृष्टिकोणों का उदय हुआ।
परम्परागत विदग्ध-गोष्ठियों की परम्परा अब सभागोष्ठियों, संगोष्ठियों और परिसंवादों के रूप में बची हैं। परन्तु अंकपत्रिकाओं के प्रचलन से साहित्यशास्त्रीय चर्चा को व्यापक, विविधतापूर्ण पर्याप्त अवकाश प्राप्त हुआ और अन्य शास्त्रों के आधार पर साहित्यिक और साहित्यशास्त्र के अध्ययन-आलोचना की नई प्रवृत्तियों और पद्धतियों का उदय एवं विकास हुआ।
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७६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन पतिया
आधुनिक भारत के पुनर्जागरण (renaissance) युग के आरम्भ में तर्कवादिता की प्रवृत्ति विशेष थी और पूर्ववर्ती उत्थान एवं आदर्शवादी धारा का आग्रह था। उसके पश्चात् स्वच्छन्दतावादी प्रवृत्तियों के साथ जीवन की सुरम्यता एवं कल्पनामयता में साहित्यिक रमे। परंतु वर्तमान काल में समसामयिक (contemporary) समाज में व्यक्तिचेतना क्रांतिकारी एवं यथार्थवादी बन गयी। इस प्रकार आधुनिक युग में परिवर्तनशील प्रवृत्तियाँ नित्य ही प्रभावी रहीं। तर्कशीलता सर्वव्यापी व्यवहारविचारों में आमूल परिवर्तन ले आयी। देवत्त्व के बदले मानवत्व की प्रतिष्ठा हुई। मानवता (humanism) का महत्त्व बढ़ा और सारी संस्कृति को यथार्थवादी और परिपूर्ण तथा मानवकेन्द्रित बनाने की प्रेरणा ने मानव की चिन्तनात्मक प्रज्ञा, प्रयोगशक्ति और विचारक्षमता को जागत एवं आंदोलित किया। इस बौद्धिकतापूर्ण सामाजिक पहलू से धर्मनिरपेक्ष संस्कृति की खोज हुई।
किन्तु स्वाधीनता के कुछ वर्ष पश्चात् मानव के स्वप्न भंग हो गये। क्षणवाद ने उसे ग्रस लिया। विकसित विज्ञान के प्रभाव से कृत्रिम एवं यांत्रिक बने जीवन में मनुष्य अपने को कटा हुआ, टूटा हुआ-सा पाने लगा। यांत्रिक सभ्यता, महंगाई आदि ने अनास्था जगाई। राजनीतिक स्थिति ने घोर निराशा उत्पन्न की। बुद्धिवाद के कठोर आघात ने जीवन की निष्ठा और आस्था नष्ट कर दी। मूल्यहीन जीवन के संघर्ष में मनुष्य के मन में 'अलगाव'-सा उत्पन्न हुआ।
इस पूरी परिस्थिति के कारण आधुनिक काल में काव्यशास्त्रीय चर्चा में पर्यास उथलपुथल हुई और स्वतंत्र काव्यशास्त्र का विकास हुआ। रससिद्धान्त के परम्परागत स्वरूप पर प्रश्नचिन्ह लगाये गये। भारतीय भाषाओं में, विशेष रूप से मराठी, हिन्दी और बंगला में रसविषयक चर्चा हुई; जिसमें दृष्टिविस्तार तथा मूल्यांकन किया गया।
एक धारा के द्वारा संस्कृत के काव्यशास्त्रीय, रसविषयक ग्रंथों को अन्य भाषाओं में अनृदित किया गया। दूसरी के अन्तर्गत कुछ विद्वान् रसवाद का परम्परावादी निरूपण एवं व्याख्यान करते रहे। तीसरी धारा नवयुग से प्रेरणा ग्रहण करते हुए विभिन्न दृष्टियों से रसवाद की व्याख्या और आलोचना करनेमें जुट गई। विभिन्न शास्त्रों के आधारपर रसवाद का नवमूल्यांकन, परिष्कार एवं परिवर्धन करने की दृष्टि इन विद्वानों ने अपनायी। इस नवीन चेतना ने रससिद्धान्त का पुनर्व्याख्यान और पुनर्विकास करने का प्रयास किया। इसमें रसपरम्परा की पूर्ववर्ती स्थापनाओं की व्याख्या के साथ पाश्चात्य विचारधाराओं, समीक्षाप्रणालियों, नवविचारों के आधारपर रसवाद को कुछ लचीला बनानेका प्रयास किया गया। कुछ पूर्ववर्ती स्थापनाओं के क्षेत्र में शोध की आवश्यकता समझायी गयी। चौथी आधुनिकतम धारा ने रस का सम्पूर्ण विरोध किया।
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सामाजिक परिवर्तन के परिप्रेक्ष्य में रसचर्चा का विकास ७७
आधुनिक विद्वानों ने रसनिप्यत्ति और रसास्वाद की समस्या को लेकर विभिन्न दृष्टिकोणों से चर्चा की है। ज्ञान और विज्ञान के चरम विकास के फलस्वरूप तथा विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन के कारण विद्वानों को किसी प्रश्न की ओर देखने या उसका मूल्यांकन करनेके विभिन्न दृष्टिकोण प्राप्त हुए। मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, नीतिशास्त्र, जीवशास्त्र आदि विज्ञान की कई शाखा-उपशाखाओं तथा सामाजिक शास्त्रों ने मानव- जीवन की ओर देखने की नयी दृष्टि प्रदान की। स्थूल आदर्शवादी परम्परा को मान्य करके आगे बढ़नेवाली दृष्टि से निन्तात भिन्न नूतनतम विशेष विचारधारा का स्वीकार एवं आग्रह भी किया जाने लगा। यह नये युग के अनुसार परिवर्तित मानवजीवन के नृतनतम स्वरूप एवं दृष्टि का ही प्रतिफल है। आज किसी भी बात को परम्परा से विभिन्न कर नूतन दृष्टि से आँकनेका प्रयास अभीष्ट माना जाता है। अतएव आधुनिक विद्वानों ने रससिद्धान्त को आप प्रमाण न मानकर उसे अपने एक नये दृष्टिकोण से देखने का प्रयास किया। इसमें प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का सरलीकरण या व्याख्यान के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक, नैतिक, दार्शनिक दृष्टि से मूल्यांकन की वृत्ति विशेष रही। भरतमुनि द्वारा स्थापित स्थायी और संचारी भावों के स्वरूप एवं संख्या के सन्दर्भ में पर्याप्त विवेचन एवं मतभिन्नता प्रकट की गई थी। मनोविज्ञान के प्रभाव के कारण ही कई विद्वानों ने पूरे रससिद्धान्त को, भाव-विभावादि सामग्री से रसनिष्पत्ति एवं रसास्वाद की प्रक्रिया तक, मनोवैज्ञानिक आधार द्वारा समझाया। 'भाव' को मनोविज्ञान के आधार पर व्याख्यित करनेसे विवाद उत्पन्न हुआ। उसे भावना (feeling), भाव (emotion) या स्थिरभाव (sentiment) कहा गया, जिसके कारण भावसंख्या के प्रश्र पर पर्याप्त मतभिन्नता रही है। रस के स्वरूप का विवेचन करते हुए अलौकिकत्व और ब्रह्मानन्दसहोदरत्व का विशेष पुनराख्यान किया गया। रस की सहृदयनिष्ठता पर विशेष बल दिया गया। रस के भावमय स्वरूप को महत्ता देकर हृरदय की मुक्तावस्था के आधार पर उसे समझाया गया। कुछ विद्वानों ने रस और भाव को एक ही मानते हुए रस के स्थान पर भाव शब्द को स्वीकार किया और "भावगंध " की चर्चा की, आधुनिक काल में प्रथमतः रससिद्धान्त के सब उपकरणों एवं प्रक्रिया को मनोविज्ञान के आधार पर समझाने का प्रयास किया गया और रस का तात्पर्य भावना या इमोशन माना गया। कुछ विद्वान "रससिद्धान्त " को प्राचीन समाज की स्थिति के अनुरूप स्थापना मानकर ऐतिहासिक महत्ता प्रदान करते हैं। उसमें परिवर्तन करना उनको अमान्य है। प्रगतिवादी समीक्षकों के सम्मुख वर्गहीन समाजरचना, समानता आदि नितान्त सामाजिक दृष्टिकोण होने के कारण उन्होंने रससिद्धान्त को एकांगी, अपूर्ण एवं सामन्तवादी प्रवृत्ति से जनित मानकर त्याज्य घोषित किया। मार्क्सवाद से विशेष प्रभावित होनेके कारण सामाजिक चेतना, लोककल्याण, वर्गहीन समाजरचना, लोक के लिये ही काव्य की
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७८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
महत्ता आदि धारणाओें समाज में स्थिरता पा रही यीं। अतः ये विचारक समाजशास्त्रीय दृष्टि से रससिद्धान्त का विचार करने लगे और अपनी विचारधारा के अनुरूप न लगने पर उसका कड़ा विरोध करने लगे। कहीं अपने सिद्धान्तों के अनुसार रससिद्धान्त को मोड़कर उसका व्याख्यान किया गया। कुछ विद्वानों ने रससिद्धान्त को मानवीयता की उच्च भूमि परस्थित करते हुए समन्वयात्मक विवेचन किया है। परंतु उसके पश्चात् समाजजीवन में जो स्थिति उत्पन्न हुई, उसके फलस्वरूप व्यक्तिचेतना स्वतंत्र, मुक्त एवं यथार्थपरक बनी। प्रयोगवादियों में व्यक्तिगत चेतना, यथार्थता तथा बौद्धिकता के आग्रह की अधिकता थी। परम्परा को तोडने के अति आग्रह के साथ, खण्डित भावराशि और क्षणानुभूति जीनेवाले इन व्यक्तियों ने रस को सर्वथा अस्वीकार किया। इन आलोचकों ने रससिद्धान्त की शाश्वतता को ललकारा तथा सर्वथा अनुपयुक्त घोषित किया। इस प्रकार सर्वथा नूतन सामाजिक स्थिति में आलोचकों की परिवर्तित संवेदना एवं दृष्टि रसवाद को उसी रूप में स्वीकार करने के लिये तैयार नहीं है। आज आलोचकों को अधिक से अधिक "अनुभूति" शब्द सहनीय है, 'भाव' नहीं, और 'रस' तो बिलकुल नहीं। निष्कर्ष रूप में रससिद्धान्त की चर्चा के विकास, उसमें स्थापित नूतन तत्त्वों और उसमें घटित परिवर्तनों पर समसामयिक सामाजिक परिवर्तन, जीवनदृष्टि, कलात्मक चेतना और साहित्यगत विशेषताओं का प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है। आचायों ने अपने समकालीन समाज, दर्शन, कलात्मक सर्जना आदि से प्रेरणा ग्रहण की और समय-समय पर रससिद्धान्त में कुछ परिवर्तन किये गये। रसचर्चा का ऐतिहासिक विकास एक तरह से सामाजिक चिंतन का विकास ही है।
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चतुर्थ अध्याय नाटयरस से काव्यरस की ओर
अब तक रससिद्धान्त की चर्चा के विकास के इतिहास को सामाजिक परिप्रेक्ष्य की कसौटी पर कसकर यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि समसामयिक सामाजिक परिवर्तित स्थिति ने उसे कितना प्रभावित किया है। परंतु रससिद्धान्त का सूत्रपात एवं उसके क्रमिक विकास की शृंखला पर दृष्टिपात करने पर एक बात सामने आती है कि रससूत्र की व्याख्याओं एवं भाष्यों के प्रवाह में एक समय आया जब नाट्यरस के साथ श्रव्य-काव्यरस की चर्चा होने लगी और अंततः वह प्रधानतया श्रव्य काव्य के संदर्भ तक ही सीमित हो गई। अतः सामाजिक परिप्रेक्ष्य में नाट्यरस से काव्यरस तक इस स्थलांतरण के कारणों और उनकी पृष्ठभूमि का विशद विचार करना भी आवश्यक हो जाता है। यही इस अध्याय में विवेच्य है। साहित्यनिर्मिति के साथ-साथ तद्विषयक रसिकवृत्ति का जन्म होता है। साहित्य- सर्जना के साथ ही उसके आस्वादन की क्रिया का भी आरम्भ होता है। अतः सर्जना और आस्वाद में परस्पर अत्यंत निकट एवं स्वाभाविक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। शास्त्रीय स्थापनाओं और सिद्धान्त-विवेचन पर साहित्य सर्जना, उसका आस्वाद, साहि त्यविषयक चर्चा आदि का प्रभाव होना स्वाभाविक है। काव्यचर्चा और काव्यशास्त्रीय सिद्धान्तस्थापना में गोष्ठियों की परम्परा का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है। प्राचीन काल में आज जैसे मासिक पत्रिकाओं, ग्रंथों आदि के समान लिखित सामग्री के अभाव में केवल मौखिक रूप से काव्य- चर्चाओं का अस्तित्व होना स्वाभाविक था। मौखिक रूप से साहित्यचर्चा की जाती थी, इसके द्वारा साहित्य, काव्यकला, संगीतकला, नाट्य आदिगत समस्याओं को सुलझाने का कार्य संपन्न होता था। काव्यचर्चा के लिए सामूहिक रूप से चर्चा-सभाओं का आयोजन किया जाता था, जो गोष्ठी कहलाती थी। मानवलोक में ही नहीं, देवलोक में भी गोष्ठियों के होने
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८० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
का उल्लेख बाणभट्ट के 'हर्षचरित' में प्राप्त होता है।१ देवताओं की गोष्ठी की कल्पना भारतीय कला में एक शिलापट्ट पर अंकित है। इस चित्र में 'ब्रह्मा की गोष्ठी' का दृश्य है। इंद्रादि देवताओं के साथ ब्रह्मा कमलासन पर बैठे हैं और इस सभा में विद्यादि पर चर्चा हो रही है।२ विद्यागोष्ठी की परम्परा भी प्राचीन भारतीय जीवन में रही है। वैदिक युग में समाज या समागोष्ठी के रूप में 'समन' का उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। 'समान' एक प्रकार का मेला ही होता था। यह परम्परा वैदिक काल से चली आती हुई अबाध गति से प्रवहमान रही। लोकरूचि, साहित्यिक एवं कला- विषयक अभिरुचि, बदली हुई जीवनदृष्टि और साहित्यिक एवं कलाओं की सर्जना के स्वरूपादि से प्रभावित होकर समसामयिक अनुभूति के अनुसार परिवर्तित होती रही है।
गोष्ठियों का विस्तारपूर्वक वर्णन प्रथमतः वात्स्यायन के कामसूत्र में मिलता है। तत्कालीन संपन्न एवं समृद्ध समाज के यथार्थ चित्रण के साथ उसमें विभिन्न गोष्ठियों का वर्णन भी है। तत्कालीन समाज में सारी कलाएँ मानवजीवन एवं समाजजीवन में इतनी घुलमिल गई थीं कि वे समाजजीवन का अभिन्न अंग-सा प्रतीत होती थीं। 'कामसूत्र' में उल्लिखित कलाएँ उस काल में उन्नत स्थिति तक पहुँची हुई थीं। कलाओं का ज्ञान या अभिरुचि होना कुलीनता, गौरव और विद्वत्ता का लक्षण माना जाता था। राजसभा, विद्वन्मण्डली और सभासमानों के रूपमें विभिन्न गोष्ठियों का आयोजन होता था। वात्स्यायन ने तत्कालीन विदग्ध नागरक के व्यक्तित्व और व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन को प्रस्तुत करते हुए समाज-जीवन की महत्त्वपूर्ण संस्थाओं के रूप में गोष्ठियों का उल्लेख किया है।
'गोष्ठी' शब्द 'गोष्ठ' शब्द से उत्पन्न हुआ है तथा उसका अर्थ मण्डल, सभा या एकत्रित आना आदि है।३ गोष्ठियों के सम्बन्ध में लिखा गया है, 'समानविद्या- वित्तशीलबुद्धिवयसानुरूपैरालापैरेभासनवन्घो गोष्ठी।" तत्कालीन गोष्ठियों का सदस्य नागरक, संस्कृत एवं संपन्न नागरी संस्कृति का प्रतिनिधि है। नागरक शब्द का अर्थ केवल शहर या नगर का निवासी नहीं, बल्कि रईस और संस्कृत मनुष्यों का प्रतिनिधि है। पाणिनि ने कैशिकी वृत्ति के संदर्भ में नागरक का उल्लेख करते हुए कहा है कि
१. हर्षचरित - एक सांस्कृतिक अध्ययन, पृ. १२ २. गुप्त आर्ट चित्र १८ ३. हिन्दी मानककोश
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यह कुशल एवं विदग्ध कलाओं में अभिरुचि रखनेवाला व्यक्ति था। कामसूत्र के 'नागरकवृत्तम्' में इसी नागरक का जीवन वर्णित है।१ कामसूत्रकार ने एक सूत्र द्वारा नागरक का लक्षण बताते हुए लिखा है कि वेदा- ध्ययन के पश्चात् गृहस्थाश्रम को स्वीकार कर अपने वर्ण के अनुसार कार्य करते रहने- वाला नागरक विशेषतः शहर में बसता है। उचित व्यत्रसाय कर गृहस्थाश्रम में लग जाता है।२ ऐसे व्यक्ति को शहर में रहकर सज्जनों के संग में अपना जीवन आदर्श बनाना चाहिये।3 नागरक के जीवन को आदर्श बताकर ग्रामवासियों को बताया गया है कि वे देहात के व्यक्तियों को नागरी जीवन की रोचक घटनाएँ सुनाएँ और नागरक जीवन बिताने के लिए प्रवृत्त करें। नागरक को वात्स्यायन ने 'विदग्ध' विशेषण दिया है। "नागरको विदग्धजनः ।"४ विदग्ध अर्थात् सुशिक्षित, सुसंस्कृत, चतुर, निपुण तथा पण्डित। विदग्ध शब्द वि + दह से बना भूतकालिक धातुसाधित विशेषण है। अर्थात् यौगिक घात्वर्थ, 'विशेष रूप से भुना हुआ' (well roasted ) होता है। परंतु लक्षणा से योगरूढ अर्थ सुसंस्कृत, चतुर, पण्डित, निपुण नागरक बना। प्रकृतिदत्त वस्तु पर मानवकृत प्रयत्नपूर्वक संस्कारों से बननेवाली स्थिति विदग्धता है।५ इस विदग्ध नागरक के महँगे शहरी जीवन का विस्तार से वर्णन करते हुए वात्स्यायन लिखते हैं कि भोजनोत्तर विश्राम के पश्चात् दिन के तीसरे प्रहर में अच्छे कपडे वगैरह पहनकर वह गोष्ठीविहार या सामूहिक सभा के लिए जाता है जहाँ कला, काव्यचर्चा और काव्यकलाविषयक समस्याओं पर विचार होता है। ये चर्चाएँ अधिक-
?. The whole section of the book is called Nagarakarittam, where he describes the life of a city man, not of a mere dweller in the city - such a person would only a Nagar - but of a Nagaraka, who according to Panini, is a city - bred man, skilled in the arts and knaveries that specially develop in a big city, one possessing the virtues and vice of a cockney, he might be a clever artist or a knave, as the kasika - Vritti so naively explained. - Social Life in Ancient India, P. 144 २. कामसूत्र, १-४-१ ३. कामसूत्र, १-४-१ ४. कामसूत्र, १-४-२ ५. संस्कृत काव्याचे पंचप्राण, पृ. ७८ रस ... ६
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८२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
तर बौद्धिक होती हैं। रात को वाद्यसंगीत तथा शास्त्रीय संगीत और नृत्यादि के कार्य- क्रमों में वह उपस्थित होता है।१ गोष्ठियाँ दो प्रकार की होती थीं। कुछ गोष्ठियाँ दैंनिक होती थीं और कुछ नैमित्तिक (occasional)। अरनी दिनचर्या को निभाते हुए काव्य कला चर्चा में सहभागी होनेवाले नागरक के जीवन में नैमित्तिक गोष्ठियों को वात्स्यायन ने पाँच भागों में विभांजित किया है। समाज, यात्रा और घटा नामक गोष्ठियाँ विभिन्न पूजाविधियों आदि से सम्बन्धित थीं। गोष्ठियाँ सामाजिक सम्मिलन से सम्बन्धित होती थीं, जिनमें स्त्री और पुरुष दोनों सम्मिलित रहते थे। उसी समय समस्या-क्रीडाएँ, समपानकम् (बगीचों में एक- त्रित आना) (garden parties) सोमपान आदि के एकत्रित समारंभ आयोजित किये जाते थे। २ काव्यशास्त्रादि से सम्बन्धित गोष्ठियाँ दो प्रकारकी थीं। इन गोष्ठियों या समाओं के द्वारा तत्कालीन नागरक का समाजजीवन, कलाभिरुचि, मनोरंजन एवं बौद्धिक क्रिया- प्रतिक्रियाओं का परिचय प्राप्त हो सकता है, अतः समाज और गोष्ठी आदि संस्थाओं का परिचय विस्तार से प्राप्त करना आवश्यक है। वात्स्यायन ने इन गोष्ठियों के सदस्यों के बारे में स्पष्टतः उल्लेख किया है कि समान सामाजिक प्रतिष्ठा एवं रुचि रखनेवाले ही एकत्रित होकर सभा सम्मेलनादि में उपस्थित हो जायें। सरस्वती के मन्दिर में महीने में या पंद्रह दिनों में एक निश्चित तिथि या पवित्र दिन निश्चितता एवं नियमितता से समाज का आयोजन होता था।3 देवायतन में नागरकों का समूह एकत्रित होता था और सामूहिक नृत्यगान या गोष्ठी हुआ करती थी। एकत्रित होकर वे लोग ऋतु भी मनाते थे। वसन्तोत्सव, जो संपन्नता एवं समृद्धता का प्रतीक माना जाता था, सर्वाधिक धूमधाम से मनाया जाता था। समाज में अनेक नर्तकों, गायकों और कलाकारों को स्थायी रूप से नियुक्त किया जाता था और देवताओं की प्रशस्ति में उनका कार्यक्रम हुआ करता था। अन्य नगरों से आनेवाले कलाकारों के समूह को भी कलाप्रदर्शन का अवसर दिया जाता था और कौशल दिखाने पर दूसरे
१. कामसूत्र, २२-२४ २. घटानिचन्धनं गोष्ठीसमवायः समापानकम् उद्यानगमनं समस्या क्रीडाय प्रवर्तयेत्। -कामसूत्र, सूत्र २६ ३. पक्षस्य मासस्य वा प्रज्ञातेऽहनि सरस्वत्या भवने नियुक्तानां नित्य समाजः । कुशीलवाश्वागन्तवः प्रेक्षकमेषां दघुः । -कामसूत्र सू.२७
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दिन पुरस्कार दिये जाते थे। कभी-कभी विशेष उत्सवों के अवसर पर नागरकों के पारस्परिक सहकार्य से "समाज" का आयोजन किया जाता था। वहाँ स्थायी रंगमंचों की व्यवस्था होती थी। यह जाति, धर्म आदि बंधनों से मुक्त एक सार्वजनिक उत्सव होता था। सब वर्णों के लोगों द्वारा वहाँ सम्मिलित रूप में सरस्वती, शिव और कामदेव की पूजा की जाती थी। यह विशुद्ध रूप में लोकोत्सव ही रहता था जिसमें मित्रता, अनुराग, मनोरंजन आदि के साथ सहकारिता का उदय होता था। रंगमंच पर प्रस्तुत किए जानेवाले नाटक, नृत्य और संगीतादि कलाओं को इन अवसरों पर विशेष महत्ता मिलती थी। रसिक नागरक अपने या किसी गणिका के घर पर गोष्ठियों में सम्मिलित होता था। विद्या, बुद्धि, संपत्ति, आयु और शील में समान होनेवाले मित्रों और सहचरों के साथ घर में, महफिल में या किसी नागरक के निवासस्थान पर गोष्ठियों का आयोजन होंता था। सुयोग्य वेश्याओं के साथ बैठकर भी मधुर मनोरंजन, काव्यसमस्यापूर्ति, मानसी काव्यक्रिया, पुस्तकवाचन और काव्यकलादि बौद्धिक चर्चाएँ होती थीं।9 प्रतिभावान कलाकारों या गणिकाओं को निमंत्रित किया जाता था। विभिन्न काव्यसमस्याओं के साथ ही देशभाषाविज्ञान, छन्द, नाटक, आख्यान, प्रतिमाला खेल (छन्द के अंत्याक्षर में छन्द गाना ), काव्यक्रिया, साहित्यिक स्पर्धाएँ आदि का अन्तर्भाव इन गोष्ठियों में होता था।
पुरुषों के साथ स्त्रियाँ भी इसमें सम्मिलित होती थीं। अविवाहित लडकियों के लिए काव्य गोष्ठियों या सभाओं में रुचि होना विशेष गुण माना जाता था। इन सभाओं में केवल संस्कृत का ही प्रयोग नहीं होता था, अपितु देशभाषा का भी होता था। देशभाषा और संस्कृत दोनों अधिकार होना नागरक के. लिए उचित समझा जाता था।
वात्स्यायन ने दो प्रकार की गोष्ठियों का उल्लेख करते हुए एकको लोकविदिष्टा परमहिंसात्मिका और दूसरी को लोकचित्तानुवर्तिनी कहा है। दुष्ट भाव रखनेवाली और अवांछनीय तत्वोंवाली, सत्तारूढ दल की दलनिन्दा या हानि पहुँचानेवाली गोष्ठियों में न जाने का उपदेश भी उन्होंने नागरकों को दिया है।२
१. वेश्याभवने सभायामन्यतमस्योदवसिते वा समानविद्या बुद्धिशीलवित्तवयसां सह वेश्याभिमुखपैरालापैरासनबन्धो गोष्ठी। नत्र चैषां काव्यसमस्या कलासमस्या च। सूत्र ३४, ३५ २. हिन्दी कामसूत्र, देवदत्तशास्त्री (जयमंगल टीका), पृ. १२२
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रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
स्पष्ट है कि वात्स्यायन जनमानस-पारखी था। सभाओं के अवांछनीय तत्त्वों के उदय का कुछ एहसास उसे भी हुआ था, इसीलिये उसने स्पष्ट सूचना दी है। उसने कहा है कि गरीब-अमीर सभी को उत्सवों में भाग लेना चाहिए, नाटक नृत्यादि केवल मनोरंजक नहीं, बल्कि मोक्ष सहायक एवं पापक्षालक भी है। इन सभा गोष्ठियों और समाजों के विस्तृत अध्ययन से प्रारंभकालीन काव्यचर्चा के स्वरूप का निश्चित चित्र अंकित करने में सहायता मिल सकती है। यह स्पष्ट है कि नागरकों की दैनिक या नैमितिक गोष्ठियों और समा-समानों के आयोजन द्वारा कला, साहित्य, शास्त्रादि विषयों पर बौद्धिक चर्चाएँ होती थीं और समस्याओं का समाधान भी प्रस्तुत किया जाता होगा। तत्कालीन समाज में यद्यपि नागरक श्रेष्ठी रहते थे परंतु समाजों और गोष्ठियों में सामान्य जन और ग्रामवासी भी सहयोगी बन जाते थे। अर्थात् इन समाजों और विदग्ध गोष्ठियों का स्वरूप सार्वजनीन था। सामुदायिक एकत्व (Racial Homogeneity) के दर्शन इनमें होते हैं। काव्यनाट्यचर्चाएँ, समस्याओं पर विचारविमर्श और उनका समाधान, विभिन्न कलाओं का प्रस्तुतीकरण (performance) आदि बातों में विदग्ध नागरकों के साथ सामान्य जनों का भी सम्बन्ध आता था। साहित्य और कलाओं का समाजजीवन में घुला हुआ रूप इससे अन्यत्र कहीं नहीं दिखाई देता। स्थायी रंगमंचों का तत्कालीन अस्तित्व नाट्यप्रयोगों की परम्परा का साक्षी है। देशमाषा का प्रयोग सम्भवतः बौद्ध धर्म के प्रभावके कारण था। लोकचित्तानुवर्तिनी सभाओं का महत्त्व अधिक था। स्पष्ट है कि नागरकों की विदग्ध गोष्ठियों में संपन्न एवं समृद्ध नागरक के जीवन को महत्त्व होते हुए भी ग्रामीणों की अवहेलना वहाँ नहीं थी। एक मनुष्य की अपेक्षा समाज, सामुदायिकता, सहकारिता एवं एकत्रितता की महत्ता थी। गोष्ठियों में समष्टिसहित व्यक्ति को ग्रहण कर जीवनादर्श रखा गया था, अतएव समाज में एकत्रित आने का सर्वात्तम माध्यम ये गोष्ठियाँ ही थीं। जीवनानुभूति का समन्वय गोष्ठियों के स्वरूप में स्पष्टतः दिखाई देता है। काव्यचर्चा का स्वरूप भी संस्थागत होने के कारण उसमें समूहात्मक भावना एवं व्यापक सामाजिक दृष्टि का अन्तर्भाव था। वात्स्यायन और भरत के काल में कुछ अन्तर अवश्य है परंतु भरत के नास्यशास्त्र में अंकित उच्च एवं अभिजात जीवन बात्स्यायनकालीन जीवन से नितान्त मिन्न नहीं हो सकता। साथ ही नाट्य की लोकप्रियता एवं प्रचलन भी भरत के समय तक बना रहा था। अतः भरत ने वात्स्यायन से प्रेरणा ग्रहण की अथवा नहीं इस विवादग्रस्त प्रश्न को छोड देने पर भी इतना तो कहा जा सकता है कि पूर्ववर्ती काल में प्रचलित काव्यचर्चा का स्वरूप एवं परम्परा भरत के काल में भी उपर्युक्त गोष्ठियों के रूप में समान रूप में प्रचलित रही। गोष्ठियों के संस्थागत ( Institutional) स्वरूप की विशेषताओं का प्रमाव तत्कालीन काव्यनाट्यचर्चा और रससिद्धान्त पर भी होना
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स्वाभाविक था। चचाएँ ऐसी ही सभाओं में होती होंगी। काव्य और नाट्य का घनिष्ट सम्बन्ध होने के कारण दोनों विषयों पर चर्चाएँ होती थीं। गोष्ठियों में चर्चित विषयों को देखने पर लगता है कि अवश्य ही काव्य और नाट्य के सन्दर्भ में दो भिन्न धाराओं में चर्चा होती होगी। काव्यक्रिया, कीडा, समस्यापूर्ति, छन्दरचना, छन्दपूर्ति के रूप में काव्यचर्चा की स्वतंत्र धारा का अस्तित्व था। नाट्यविषयक चर्चा में सिद्धान्तग्रंथ के रूप में प्रथमतः भरत की ही ग्रंथरचना प्राप्त होती है। उसके नाट्यशास्त्र से पता चलता है कि भरत ने नाट्य पर ही विशेष बल देते हुए रससिद्धान्त की स्थापना की है, पर साथ ही काव्य के अलंकारादि पहलुओं का उल्लेख भी उसमें है। पूर्वोक्त विवेचन से यह प्रमाणित हो जाता है कि विदग्ध गोष्ठियों के संस्थागत स्वरूप, काव्यचर्चा स्तर, स्थायी रंगमंचों पर प्रस्तुत की जानेवाली नाट्यपरंपरा आदि समकालीन अनुकूल परिवेश का प्रभाव भरत पर था। इसी पृष्ठभूमि पर रससिद्धान्त में नाट्यरस के सन्दर्भ में शास्त्रीय स्थापना का सूत्रपात उसने किया। सातवाहनादि शासकों के पश्चात् गुप्तसाम्राज्य के उदयतक का काल भरत का पूर्ववर्ती काल रहा है। इस काल में राजनीतिक धूमिलता के बावजूद काव्यगोष्ठियों की परम्परा समाज में बनी रही थी। गुप्तकाल में राजाश्रय पाकर इन गोष्ठियों ने नया व्यापक रूप प्राप्त कर लिया। गुप्तकालीन सुवर्णयुग में राजनीति, धर्म, सामाजिक एवं आर्थिक संपन्नता और साहित्य की समृद्धि के साथ ही व्यक्ति और समाज के जीवन में मनोरंजन एवं ज्ञानसंवर्धन के लिए सभाओं का महत्त्व बढ़ा। नृत्य-संगीतादि के साथ काव्यशास्त्रान्तर्गत चर्चाओं का अन्तर्भाव इन गोष्ठियों में होता था। हर्षवर्धन के काल में गोष्ठियों के अस्तित्व का उल्लेख है। स्वयं राजा रसिक, कवि, कलाप्रिय तथा काव्यशास्त्राभिरुचिसंपन्न होने से कवियों को आश्रय देता था और सम्मान के साथ ऐसी गोष्ठियों का आयोजन करता था। दण्डी के काव्यादर्श, भामह और वामन क ग्रंथों तथा बाणमट्ट के ग्रंथों में समकालीन गोष्ठियों के उल्लेख हैं। दण्डीके समय काव्यगोष्ठियों को पूर्णतः राजाश्रय प्राप्त हो चुका था। उनमें पौरस्थ कवि और दक्षिणात्य कवि इस प्रकार का भेद था। इसी समय कवि और आलोचक (भावक) की अलग-अलग मान्यताएँ सभागोष्ठियों में प्रस्तुत की जा रही थीं। इन्हीं मान्यताओं के आधार पर चर्चाएँ होती थीं तथा कवित्वज्ञान की सार्थकता सिद्ध होती थी। भावकों के अस्तित्व एवं सत्ता का प्रारंभ इन गोष्ठियों में हुआ। कविगण मावकों की सत्ता से आक्रान्त तो नहीं हुए थे, परंतु असफल कवि भावक बनकर काव्य- परीक्षक बनने की अभिलाषा रखते थे। दरबार में काव्यपाठ की प्रथा भी प्रचलित थी। काव्यपाठ में सफल न होनेवाले दूसरों के गुणदोष-विवेचन में अपनी प्रतिमा का बल दिखाने की चेष्टा करते थे।9
१. काव्यादर्श १-१०५
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८६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
दण्डी ने काव्यादर्श के आरम्भ में कवि-कर्म के मार्गों और गुणों का उल्लेख किया है। महाकाव्य और सूक्ति-काव्य का पाठ होता था और इन काव्यचर्चाओं, कवियों और गोष्ठियों के प्रति जनता के मन में विशेष आकर्षक बना रहता था। वाणी की परमसिद्धि काव्यरचना में ही मानी जाती थी। इस सन्दर्भ में दण्डी लिखते हैं, "बिना कवि हुए या बिना पाण्डित्य के गोष्ठियों में भाग लेना दुर्बलता प्रकट करना था अतः वाणीविदग्धों को सरस्वती से काव्यसम्बन्धी कौशल का अनुग्रह अभीष्ट था। श्रमादुमास्या खलु कीर्तिभीप्सुमि :- से दण्डी का अभिप्राय है कि काव्यरचनासिद्धि प्राप्त होने पर काव्यगोष्ठियों में डटकर जाने में आनन्द आता था और उसी कवि के चारों ओर काव्यप्रतिभा की कीर्ति का प्रसार होता था। इन गोष्ठियों में काव्य के रचना- प्रकार, नये नये सिद्धान्त, अलंकारादि के स्थान पर वाणी के मार्ग और कविमार्ग को महत्ता थी और काव्ययुत्पत्ति में मर्मज्ञों को विशेष अभिरुचि थी।9 इस युग में इन्हीं काव्यगोष्ठियों से काव्यप्रयोग, सिद्धान्त आदि सारे जन्म लेते थे। श्री त्रिपाठीजी के मत में दण्डी का काव्यप्रयोजन 'कामसूत्र' के नागरक की गोष्ठी-सा था। वे लिखते हैं, "गोष्ठी का आनन्द और अच्छी रचना के लिए साधुवाद का अस्तित्व था। परंतु नागरक की गोष्ठियों से मुख्य भिन्नता इन गोष्ठियों में मुझे यह दिखाई देती है कि राजाश्रय में पलनेवाली इनोष्टियों में भावक का अस्तित्व नूतन है जिसके कारण गोष्ठियों का स्वरूप बदल गया। भामह ने विद्याओं का वर्णन करके पंचमी विद्या साहित्यविद्या मानी है।२ वामन ने युवती के रूप में काव्य में सौंदर्य के बावजूद गुण को महत्ता दी और अलंकार को आभूषण माना। वह काव्य का प्रयोजन कीर्तिआधायक मानते हैं। कवि की मृत्यु के बाद स्वर्गप्राप्ति की आकांक्षा उसने व्यक्त की है।
बाणभट्ट के हर्षचरित का आरंभ विद्यागोष्ठी से हुआ है।३ इसी समय कई अन्य प्रकार की गोष्ठियाँ प्रचलित थीं जैसे - पदगोष्ठी, काव्यगोष्ठी, नृतगोष्ठी, वाद्यगोष्ठी, काव्यकहानियाँ गोष्ठी आदि।४ प्रबुद्ध नागरिक इन गोष्ठियों में भाग लेते थे, उनके बुद्धिचातुर्य का परीक्षण इनमें होता था, साथ ही मनोरंजन भी होता था। राजसभाओं में विदग्धों का मण्डल जुटता था जहाँ विद्या, शास्त्र कलादि के विषय में होड़-सी लगती थी। विलासिता, वाक्वातुरी और मनोरंजन के साथ ही विद्याशास्त्राध्ययन एवं कला- प्रियता आदि इन गोष्ठियों में व्यक्त होती थीं।
१. काव्यदर्श, १-१०४ २. काव्यमीमांसा, पृ. १० ३. हर्षचरित-एक सांस्कृतिक अध्ययन, पृ. ४ ४. हर्षचरित-एक सांस्कृतिक अध्ययन, पृ. १३
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इन गोष्ठियों की तुलना पूर्ववर्ती विदग् गोष्ठियों से करने पर पर्याप्त मिन्नता दिख़ाई देती है। एकछत्र गुप्त साम्राज्य में सुख और शांति होने के कारण पूर्ववर्ती श्रेष्ठीयुक्त समाजव्यवस्था के स्थान पर भिन्न प्रकार की समाजस्थिति उत्पन्न हुई थी। गोष्ठियों की स्वरूप-भित्रता के मूल में वस्तुतः सामाजिक परिवेशगत भिन्नता ही प्रधान है। इस युग में राजा महामानव के रूप में माना जाता था और उसके आश्रित कवि उसकी प्रसन्नता एवं मर्जी संपादन के इच्छुक तथा कीर्ति के अभिलाषी थे। काव्य- रचनाकारों में इस कारण से परस्पर स्पर्धा-भाव वृद्धिंगत हुआ था। एक व्यक्ति की महत्ता बढ़ने के कारण पूर्ववर्ती सामाजिक समष्टिसापेक्ष विदग्ध गोष्ठियों के स्थान पर काव्यचर्चा व्यष्टिपरक बनने लगी। गोष्ठियाँ राजा से सम्बन्धित दरबार के आश्रित कवि, विदग्ध पंडित, दार्शनिक, सामन्त आदि से ही सम्बद्ध रहीं। जनता के सन्मुख सभा- समाजों में सामुदायिक रूप से खुले मंच पर प्रस्तुत किये जानेवाले नाटक-नृत्य या संगीत के स्थान पर राजदरबारों और अंतःपुरों में स्थित मच पर सीमित प्रेक्षकों और श्रोताओं के सम्मुख कलादर्शन और काव्यपाठ होने लगे। सार्वजनिक स्थल पर संपन्न होनेवाली विदग्ध गोष्ठियों के स्थान पर विशेष उच्चवर्गसमन्वित चचाएँ होने लगीं। प्रायोगिकता और लोकपक्ष के स्थान पर व्यक्तिपरकता एवं स्पर्धावृत्ति की प्रधानता बढ़ी। जीवनानुभूति और कलानुभूति में अंतर आने लगा और साहित्यचर्चा में समाजोनमुख़ता के बदले दरबारोन्मुखता आयी। दरबारी प्रभाव में श्रव्य काव्य के पाठ की महत्ता बढ़ने से विलासिता, अलंकारिकता एवं विदग्धतापूर्ण काव्य पंक्तियों को प्रभावी वाणी द्वारा प्रस्तुत करके श्रोताओं को आश्चर्यमुग्ध करने की प्रवृत्ति बढ़ी। दरबारों में नाट्य, महाकाव्य जैसे लम्बे आख्यानादि के लिए अवसर कहा ? अतः मुक्तकों के सर्जन एवं पाठ का विशेष प्रचलन हुआ। तत्कालीन उपलब्ध साहित्य में भी काव्य, नाटक और मुक्तकों की विपुलता थी। अतएव इस पृष्ठभूमि के कारण श्रव्यकाव्य की प्रधानता के फलस्वरूप रस की चर्चा काव्य के संदर्भ में आरम्भ हुई। भरतमुनि द्वारा प्रस्थापित नाट्य- रस की चर्चा का प्रवाह काव्य की ओर मुडने में समकालीन गोष्ठियों का प्रभाव रहा। गुप्तकाल के परवर्ती काल में काव्यगोष्ठियों का स्वरूप कुछ विकृत-सा बनता गया। जनता के आमोदमय सम्मेलन, नाट्यप्रयोगादि के स्थान पर दरबारों में कलाकारों, संगीतज्ञों, रसिक कवियों का जमघट होने लगा। दार्शनिकों और विद्वानों का क्षेत्र भी दरबार आश्रय था। साथ ही समाज के उच्च प्रबुद्ध वर्ग पर विभिन्न दार्शनिक मतप्रवाहों का प्रभाव विशेष रहा। अतः काव्यचर्चा के साथ ही दर्शन, अध्यात्म की अति- बौद्धिक चर्चाएँ होने लगीं। फिर प्रत्यक्ष के स्थान पर अप्रत्यक्ष, लौकिक के बदले अलौकिक, स्थूल के बदले अति सूक्ष्म की ओर बढ़ने का प्रयास काव्यशास्त्रियों द्वारा होने लगा। श्रव्य काव्य के सन्दर्भ में रस की चर्चा का आरंभ तो हो चुका था। इन दरबारी
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८८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
आचार्यों-कवियों, दार्शनिक विद्वानों एवं विचारकों की चिंतनपरकता के कारण काव्यानु भूति में बहुत अन्तर आने लगा और काव्यरस की चर्चा में अधिकाधिक सूक्ष्मता आने लगी।
इस काल की काव्यगोष्ठियों तथा कवि के स्थान आदि के उल्लेख राजशेखर की 'काव्यमीमांसा' में प्राप्त होते हैं, जिनसे उसका स्वरूप स्पष्ट हो जाता है।' इस काल में कविशिक्षा को विशेष महत्ता प्राप्त हो चुकी थी। विदग्ध नागरक की दिनचर्या, सार्वजनिक सभागोष्ठी आदि के स्थानपर अब कवि की दिनचर्या, राजा के कर्तव्य, ब्रह्मसभादि का आयोजन आदि पर विशेष बल दिया जाने लगा। कवि की दिनचर्या और राजा के कर्तव्यों के सन्दर्भ में सूचना देते हुए राजशेखर ने कहा है, "कीर्ति के इच्छुक कवियों को किन विषयों में सतर्क रहना चाहिए।२" कवि-गोष्टी के सभ्य सदस्य अपनी भाषा एवं संस्कारों की समानता रखें। राजशेखर स्वयं कवि तथा नाटककार था। उसने शास्त्र और काव्य के रूप में साहित्य का विभाजन उसने किया है। 'काव्य- मीमांसा' के दसवें अध्याय में कविचर्या और राजचर्या मुख्य विषय है। कवि की दिन- चर्या का वर्णन करते हुए उसने लिखा है कि भोजन के पश्चात् कवि काव्यगोष्ठी करें। कभी-कभी प्रश्नोत्तर भी करें। काव्यसमस्याओं की पूर्ति, सुन्दराक्षरों का अभ्यास, चित्रबन्धों का निर्माण करें। चौथे प्रहर में अकेले सीमित आदमियों के साथ पूर्वोग में बनाये काव्य की परीक्षा करें, न्यून्य की पूर्ति करें, अधिक का त्याग और परिवर्तन करें। समय समय पर केवल चुने हुए रसिकों की मंडली में काव्य की शोधनपूर्वक परीक्षा करनी चाहिए। अनेक बार रसावेग में विवेक छूटता है।३ विदग्ध गोष्ठी का महत्त्व जानते हुए उसने लिखा है कि अपनी कृति की जनता के बीच क्या मान्यता है, यह कवि को जानना चाहिए। परंतु जनता तो निरंकुश रहती है, उससे डरना भी ठीक नहीं। स्वयं, अपनी शक्ति को पहचनना चाहिए। कवि के पश्चात् ही उसके काव्य की प्रशंसा होती है। परंतु उसकी कीर्ति का वही मार्ग है। विदग्ध गोष्ठी के कारण कवि की रचना समाज के सम्मुख प्रस्तुत होती है, सज्न उसकी प्रशंसा करते हैं, एवं बालक, स्त्रियाँ आदि की मुखपरम्परा से उसका प्रचार होता है।४ गोष्ठियों का उल्लेख करते हुए राजचर्या में वह कहता है कि राजा को कवि होना चाहिये। यदि वह स्वयं कवि हो तो उसे कविसमाज की संस्थापना करनी चाहिये। राजा के कवि होने पर सारा समाज ही कवि बन जाता है। राजा को कविपरीक्षा के लिए सभा ... बडे बडे शहरों में
१. काव्यमीमांसा, पृ. १३६. २. वही ३. काव्यमीमांसा, पृ. ३१ ४. काव्यमीमांसा, पृ. ३२
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ब्रह्मसभा आयोजित करनी चाहिये और उसमें जो कवि प्रवीण प्रमाणित होंगे, उन्हें ब्रह्मरथयान या पट्टबन्ध देकर सम्मानित करना चाहिए। काव्यगोष्ठी कविसमाज तथा ब्रह्मसभा द्वारा कवि के कवित्व की परीक्षा तथा कीर्ति और यश का प्रचार होता था और राजाश्रय प्राप्त होता था।
'काव्यमीमांसा' के आधार पर यदि तत्कालीन कवि के कर्म और काव्यचर्चा के स्वरूप को निर्धारित करें तो स्पष्ट होता है कि जनरूचि के साथ ही राजा की प्रसन्नता तथा कीर्ति की लालसा ने साहित्यिकों को प्रभावित किया था और अलंकारिकता, वाक्चातुर्य, उक्तिचमत्कार और काव्यस्पर्धा की ओर उन्मुख किया। इस समय की स्थिति को चित्रित करते हुए डॉ. हजारीप्रसाद कहते हैं, "इन दिनों नागरक लोग विन्दुमती और अक्षर पहली से मनोविनोद करते थे; राजदरबार में चमत्कारिक उक्तियों से कवियों को पछाडने का प्रयत्न करते थे, आशुकवित्व द्वारा सभा को चकित करके यशस्वी बनते थे। इस काल में प्रज्ञावान पण्डित परीक्षा के लिये ब्रह्मसभा में उपस्थित होकर सफलता प्राप्त करते थे।१ ऐसी समा के सदस्य की विशेषता श्री.ग. डयं. देशपाण्डे ने इन शब्दों में व्यक्त की है, "काव्यगोष्ठी, कविसमाज और ब्रह्मसभा इन समी में सहृदय काव्य का आस्वाद लेता था। "२
राजशखर द्वारा वर्णित कविगोष्ठियों के सदस्यों में भावकों का अस्तित्व प्रमुख था। असफल कवि भावक बन जाते थे। भावकत्व एवं भावयित्री और कारयित्री प्रतिभा का उल्लेख भी आगे चलकर विशेष होने लगा। जो भावक भी है और कवि भी वह कुकाव्य की रचना नहीं कर सकता।३ उसने लिखा है कि भावकत्व और कवित्व प्रतिभा से युक्त व्यक्ति विदग्धगोष्ठी में थिरकती हुई सुक्तियों की काव्यरचना करते थे। कृश कवित्व के लिए अवसर पडने पर किसी कवि को चाहे काव्यगुणों से संपन्न बताकर ऊँचा उठा देते वरन् ईर्ष्या से दोषों की जननी करते हुए उसके काव्य को तार-तार करा देते थे। भावकों द्वारा कवि के गुणदोषों का सभागोष्ठियों में प्रचार होने के कारण तथा राजा द्वारा काव्यसभाओं का आयोजन होने के कारण समष्टिपरकता नष्ट हुई। राजशेखर ने काव्यगोष्ठी को पाठशाला ही कहा है जहाँ कवि को शिक्षा- दीक्षा मिलती थी। सूक्तिकाव्य से लेकर रसकाव्यतक चर्चा के पाठ वहाँ होते थे। भावक के सम्बन्ध में आचार्य के मत बताकर राजशेखर ने उनके दो नाम बताये हैं। अरोचकी, जिसको कोई भी रचना अच्छी नहीं लगती, और अतृणाभ्यव्यवहारी, ऐसा भावक जो सब पर वाह वाह करता है। राजशेखर ने अपनी ओरसे भावकों के और दो मेद
१. साहित्य का मर्म, पृ. ७ २. भारतीय साहित्यशास्त्र, पृ. १७ ३. काव्यमीमांसा, पृ. ३१
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जोड़ दिये हैं, मत्सरी और तत्वाभिनिवेशी।' इससे तत्कालीन गोष्ठी के सदस्यों और उनकी चर्चा के स्वरूप की कल्पना करने में सहायता मिल सकती है। राजशेखर के पश्चात् गोष्ठियों का स्वरुप लगभग उसी रुप में चलता रहा। मुसलमान और मुगल राजाओं के दरवारों में उनका प्रवाह कुछ मन्द पड़ गया और शेर-शायरी और शङ्गारपूर्ण मुक्तकों की भरमार रही। दरबारों में विद्वानों, कवियों, आचार्यों या गोष्ठियों के बदले संस्कृत ग्रंथों के आधार पर अन्य देशी भाषाओं में काव्यशास्त्रीय ग्रंथों के निर्माण का प्रचलन रहा। कवि ऐसे लक्षणग्रंथों का निर्माण करके आचार्य कहलाते थे। इस काल की काव्यशास्त्रीय सामग्री एवं रीतिकाल के इतिहास से उपर्युक्त कथन की सत्यता प्रमाणित हो सकती है। मुसलमानों और मुगलों के शासन के फलस्वरुप संस्कृत भाषा, साहित्य एवं साहित्यशास्त्र की अवनति होती रही। अतः जिन आचार्यो ने इन काव्यशास्त्रीय ग्रंथों का निर्माण किया उनपर सम- कालीन चर्चा के बदले व्यक्तिगत प्रतिभा एवं तर्कशक्ति का प्रभाव अधिक है। सम्भवतः पण्डितराज जगन्नाथ के काल तक कविगोष्ठियों का अस्तित्व विद्वान आचार्यों तक ही सीमित था। अन्त में राजाश्रय के अमाव में उनका व्हास होना भी स्वाभाविक ही था। उपर्युक्त काव्यगोष्ठियों के स्वरुप-विश्लेषण के आधार पर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भरतमुनि के काल से पण्डितराज जगन्नाथ तक विद्वान् काव्यशास्त्री एवं विचारक समकालीन काव्यगोष्ठियों से किसी न-किसी अनुपात में प्रभावित अवश्य थे। गोष्ठियों और काव्यचर्चा के स्वरूप तथा समकालीन सामाजिक परिबेश के अनुसार उनमें नित्य ही परिवर्तन होता रहा और इस परिवर्तन का प्रभाव रस की चर्चा पर अनिवार्यतः हुआ है। गोष्ठियों के परिवर्तनशील प्रवाह-कम में यह देखा जाता है कि नाट्यरस के संदर्भ में चर्चा का रूख काव्यरस की ओर बढ़ने के मूल में भी वस्तुतः समाजस्थिति की ही प्रेरणा है। गोष्ठियों और सामाजिक परिवेश के परिवर्तन के साथ काव्यचर्चा जैसे-जैसे लोक से दरबार की ओर, जनता से राजा या सीमित सदस्यों की ओर बढ़ती गई वैसे-वैसे लोकपक्ष से आत्मपक्ष की, प्रायोगिकता की अपेक्षा कल्पना की प्रधानता होने लगी। भरतकालीन विदग्धगोष्ठी, गुप्तकालीन विद्यागोष्ठी, तत्पश्वात् राजशेखर- कालीन कविचर्या, राजचर्या, ब्रह्मसभा एवं कविपरीक्षा और बाद में मुगल शासन के दरबारी शायरों और पण्डितों की परम्परा के पूरे विकास-क्रम को देखने पर उसका पारम्परिक वैभिन्य स्पष्ट हो जाता है। इस पूरे इतिहास के प्रवाह में नागरक गोष्ठियों का स्वरूप परिवर्तित होता रहा और लोकानुवर्तिनी, सामुदायिक एवं संस्थ।
१. काव्यमीमांसा, पृ. ३४
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(institution) के रूप में स्थित, मनोरंजक एवं बौद्धिक व्यापक कलात्मक भूमिका से युक्त विदग्धगोष्ठियों, शासकों के रंजन, कवि की कीर्ति एवं यश का साधन तथा परीक्षा और स्पर्धा का स्थल बनकर काव्यपाठ में संपन्न होने लगी। समाज के खुले रंगमच से हटकर अन्तःपुर के सीमित एवं संकीर्ण दायरों में फँस गई; जनतासंपर्क से दूर हटकर विद्वान विचारकों एवं दार्शनिकों के बंधन में आई। उनके सदस्य सामान्य जन, कला- संपन्न, प्रतिभावान विदग्ध नागरक नहीं रहे, अपितु वहाँ सीमित विद्वानों, दार्शनिकों का गुट बना। इस सारे परिवर्तन के फलस्वरूप काव्यचर्चा में नाट्यरस का विलुस हो जाना और काव्यरस का उभर आना स्वाभाविक था। नाटककार, नाट्यप्रयोग, अभिनय और प्रेक्षकादि की महत्ता कम होकर एकांतिक मनोरंजन एवं काव्यपाठ की कुशलता, शंगारप्रधान मुक्तक काव्य की ध्वन्यात्मकता तथा उक्तिचमत्कार की महत्ता बढ़ी। श्रव्यकाव्य के बढ़ते हुए प्रचलन के फलस्वरूप रसचर्चा करनेवाले विचारकों तथा काव्यशास्त्रियों का एक वर्ग तैयार हुआ। यह उच्चस्तरीय चिंतनप्रणाली से युक्त वर्ग समाज से अधिकाधिक अलगावयुक्त (alienated) बनता गया और रस की चर्चा में विशेषतः आत्मरतता, व्यक्तिगतता एवं सूक्ष्मता आने लगी। सर्वजनसुलभ दृश्य काव्य की अपेक्षा ससंवेद्य, रसमय, ध्वन्यात्मक, सूक्ष्मभावव्यंजक श्रव्यकाव्य को प्रधानता मिली। लगभग बारहवीं शताब्दी में रस की चर्चा नाट्य के संदर्भ में न रहकर वह पूर्णतः काव्यरस में परिणत हो गई। नाट्यरस और काव्यरस का मिलन होकर काव्यरस की चर्चा का ही प्रवाह अखण्ड रूप से बहने लगा। दर्शन के प्रभाव से काव्यरस की चर्चा अध्यात्मपरक दृष्टि के प्रभाव में होने लगी। जनसामान्य को तृप्ति देनेवाले नाट्यरस की अपेक्षा सूक्ष्म एवं भावरम्य हृदयसंवेद् काव्यरस की चर्चा विशेष होने लगी। प्रज्ञावानों की गहन चिंतनशीलता ने संवेदनक्षम एवं सूक्ष्मतर काव्यरस को ही अपनाया और विभिन्न आध्यात्मिक रूपकों की रचना की गई।
रसचर्चा का प्रवाह नाट्यरस से काव्यरस की ओर मुड़ने में समकालीन का्य- गोष्ठियों का अत्यधिक प्रभाव उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हो जाता है। इन काव्यगोष्ठियों क परिवर्तित स्वरूप ने काव्य चर्चा एवं सिद्धान्तनिरूपण के साथ ही रस की चर्चा को प्रभाविद किया तथा उसमें कई परिवर्तन लाये गये। इस परिवर्तन को देखने पर एक अन्य बात सामने आती है कि समकालीन काव्यचर्चा का स्वरूप और सामाजिक स्थिति के प्रभाव-स्वरूप आचार्यों ने काव्य अथवा रस के आस्वाद में विशेष योग्यताओं एवं विशेषताओं की अपेक्षा की है और उसके व्यक्तित्व की अवधारणा भी निश्चित रूप में व्यक्त की है। अतः भरतमुनि से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ विभिन्न विद्वानों द्वारा विभिन्न अवधारणाओं का परीक्षण करना यहाँ अभीष्ट है।
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संगीत के लिये श्रोता की, नाट्य, चित्रकला एवं नृत्य के लिये प्रेक्षक की और काव्य के लिये पाठक की आवश्यकता होती है। जैसे रसनिष्पत्ति में कवि का अधिक सम्बन्ध है, वैसे ही रसानुभव में अधिकारी केवल आस्वादक (appreciator) ही होता है। विषयपक्ष में काव्यार्थ की महत्ता होती है, तो विषयी पक्ष में आस्वादक की प्रधानता होती है। रसास्वादक की महत्ता बताते हुए डॉ. निर्मला जैन लिखती हैं, "रस एक समूहावलम्नित प्रक्रिया है और रसज्ञ पाठक इस समूह के अंतरंग या काव्यचक्र में कवि और आदर्श पाठक की परम्परावलम्बित स्थिति पर पूर्व और पश्चिम दोनों के मनीषियों ने समान बल दिया है।"१ रसास्वाद की महत्ता बताते हुए प्राचीन आचार्यों ने आस्वादक की योग्यता एवं अवधारणा (concept) का व्याख्यान किया हैं और उसे एक विशेष व्यक्तित्व में ढाला है। समाज के विभिन्न परिवर्तनों के फलस्वरूप जैसे दृश्य या श्रव्य काव्य की महत्ता बढ़ी, वैसे उसे समझने के लिये आचार्यों को योग्य प्रेक्षक, श्रोता एवं पाठक आस्वादक की आवश्यकता प्रतीत हुई। समकालीन सामाजिक स्थिति और संस्कृति, विशेष दार्शनिक मतवाद से प्रभावित होकर काव्यशास्त्रियों ने आस्वादक की भूमिका (role) एवं व्यक्तित्व (personality ) की अवधारणाएँ प्रस्तुत की हैं। रसचकर की एक-एक आर पर आस्वाद की एक-एक नई भूमिका आती रही है। रसचर्चा के विकसनशील रंगमंच पर आस्वादक विभिन्न व्यक्तित्व-अवधारणाएँ ग्रहण कर मुखौटोंसहित अवतीर्ण होते हैं। आस्वादक की इन भूमिकाओं एवं व्यक्तित्व विशिष्टताओं को आचार्यो ने विशेष शब्दों से अभिहित किया है। उन शब्दों का अपना-अपना महत्त्व है। भरत ने जिसे सुमनस प्रेक्षक कहा था उसी के लिए बाद में 'प्रमाता प्रेक्षक' शब्द, प्रयुक्त हुआ। बाद में सामाजिक, सहृदय, रसिकयोगी, भक्त आदि कई शब्दों द्वारा विभिन्न रूपों में आस्वादक की भूमिकाओं का परिचय मिलता है। इन सारे आचार्यों, काव्यशास्तिरियों एवं विचारकों ने रसचर्चा के लिए किसी-न- किसी विचारधारा, दार्शनिक मतवाद समसामयिक काव्यचर्चा एवं लोकरुचि से प्रेरणा ग्रहण की और उसके अनुसार प्रतीकों एवं रूपकों की रचना तथा आस्वादक की अवधारणा की है। ये सारे परिवर्तित शब्द एक प्रकार से वैचारिक विकास और सामाजिक भनोविज्ञान के विकास का प्रतीक हैं। इन व्यक्तियों का निर्माण उनकी अपनी प्रतिभा की सूझ भले ही हो, अपितु तत्कालीन सामाजिक जीवन, सांस्कृतिक धारणाओं, विशिष्ट दर्शन, समकालिक जीवनदृष्टि (world view), तथा कलाविषयक लोकमत के मूलगत प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। रसचर्चा के विकास के इतिहास में जैसे-जैसे रसचर्चा नाट्यरस से काव्यरस की ओर उन्मुख होती जाती रही, सुमनस प्रेक्षक से महान १. रससिद्धान्त और सौंदर्यशास्त्र, पृ. २५१
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योगीतक आस्वादक की व्यक्तित्वविषयक अवधारणायें (personality concepts) परिवर्तित हुई हैं। अतः उन्हें सामाजिक परिप्रेक्ष्य में परखना उचित होगा।
भरत का "सुमनस प्रेक्षक"-भरत की यथार्थवादी दृष्टि ने सामाजिक परिवेश से युक्त मानव को, प्रेक्षक को नाट्यरस का आस्वादक बनाया। विदग्ध नागरक के साथ ही जनसामान्यों एवं सारे वर्णों के लिए पाँचवें वेद का निर्माण करना उनका उद्देश्य था।9 प्रेक्षक उनके नाटक का अपरिहार्य पक्ष है। कवि, काव्य, नाटक के साथ ही वे नट और आस्वादक को महत्ता देते हैं। अतः उन्होंने यथार्थ के कलात्मक रूपांतरण पर बल देकर नाट्यधर्मी और लोकधर्मी की स्थापना की और अभिनेता नट और प्रेक्षक के आंतरिक सम्बन्ध के प्रत्यक्षीकरण से रसानुभव चित्रित किया है। भरत- मुनि ने नाट्यशास्त्र में स्पष्टतः कहा है, "आस्वादयन्ति सुमनसः प्रेक्षकाः"। 'सुमनस' का अर्थ होता है, निर्मल मनवाला, अच्छा एवं संस्कारशील व्यक्ति। रस- सिद्धान्त की मूल भित्ति भावनात्मक और आदर्शवादी होने के कारण संस्कारशील और संवेदनशील प्रेक्षक की अपेक्षा रखना स्व्राभाविक था। भरत ने प्रेक्षक की विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए कहा है कि बौद्धिक पृष्ठभूमि, कला और साहित्य का ज्ञान, सौंदर्य- वर्धक साधनों का ज्ञान, मानसशारीर अवस्थाओं का परिचय, विभिन्न भाषाओं एवं बोलियों का ज्ञान, एकाग्रता शक्ति, तीत्र ग्राहिका शक्ति, निरपेक्ष बुद्धि, चरित्र तथा संस्कार, अभिनीत वस्तु के प्रति रुचि और तन्मयता की शक्ति उसमें हो।२ स्पष्ट है कि बौद्धिकता एवं ससंवेद्यता और सौंदर्यदृष्टि की अपेक्षा भरत ने आस्वादक में रसानुमव के लिये मानसिक स्थिति का अनुकूल होना आवश्यक बताया है। विदग्ध नागरकों के जीवन को आदर्शवत माननेवाला आ्मवासी सुमनस व्यक्ति भी योग्य आस्वादक बन सकता है यह नितान्त व्यावहारिक दृष्टि है। नाट्य में दृश्यत्व या प्रयोग की महत्ता थी, अतः उसके प्रेक्षक के लिये आवश्यक योग्यता भरत को अभिप्रेत रही। भरत के व्यावहारिक दृष्टि को अपनाने के कारण ही हीन बौद्धिक एवं निम्न मानसिक स्तर रखनेवाले व्यक्ति को रसानुभव के लिये अयोग्य बताया है। भरत का प्रेक्षक उसके समकालीन समाज का विदग्ध नागरक है तथा सभागोष्ठियों का सदस्य है। भरत की यह धारणा तत्कालीन संवेदनामय विकसित जीवनदृष्टि और दृश्य काव्य के सन्दर्भ में नाट्यरस की चर्चा से प्रभावित थी। यह सुमनस प्रेक्षक संस्कारशील और संवेदनाक्षम प्रेक्षकसमूह का एक अंग है। अर्थात् इस रूप में भरत ने "जन" को अपनाकर सामाजिक आदर्श व्यवहारवादी दृष्टि का परिचय दिया है। उसकी सामाजिक व्यापक दृष्टि ने समूहविज्ञान को जाना था और समूह का एक अंश (individual in
१. भरत का नाट्यशास्त्र, पृ. ६ २. भरत का नाट्यशात्त, अध्याय २७, पृ. ३१२
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group) एक व्यक्ति मानकर उसे प्रत्यक्ष अभिनयादि से अभिव्यक्त नाट्यरस का आस्वादक माना था। आदर्श प्रेक्षक की अपनी कल्पना स्पष्ट करते हुए भरत कहते हैं, "जो व्यक्ति नाटक या नृत्यादि का अच्छा प्रेक्षक हो वह सब प्रकार से सद्गुणशीलता से युक्त हो तभी ठीक-ठीक रसग्रहण कर सकता है। वह शास्त्रों का जानकार, नाटक के छः अंगों का ज्ञाता, चार प्रकार के आतोद्य बाजों का मर्मज्ञ, सब प्रकार के पहनावे का जानकार, नाना देशभाषाओं का पण्डित, सब कलाओं और शिल्प में विचक्षण, चतुर, अभिज्ञ, मर्मज्ञ हो तो ठीक है।"१ इन लक्षणों के होते हुए भी प्रत्येक दर्शक रसानुभव नहीं कर सकता। "आयु, जन्मजात संस्कार और किसी नाट्यप्रदर्शन को देखते समय दर्शक की मानसिक एवं शारीरिक दशा रस के लिये महत्त्वपूर्ण बाते वे मानते हैं।"२ भरत की आस्वादक की स्थापना को स्पष्ट करते हुए डॉ. रमेशकुन्तल मेघ लिखते हैं, "भरत ने सुमनस प्रेक्षक पर बल दिया है, जो यथार्थ के कलात्मक रूपान्तरण तदनुकूल अन्तरानुभूति (empathy) से प्रत्यक्षीकरण कर सके। "३ 'प्रेक्षकप्रमाता' - भट्टलोल्लट और शंकुक, भरत के रससूत्र के प्रथम व्याख्या- कारों ने विचारधारा को बनायें रखकर ही रसास्वाद की समस्या को ज्ञानात्मक एवं बौद्धिक पृष्ठममि पर विवेचित करने का प्रयास किया। रसास्वाद की समस्या को ज्ञानात्मक एवं बौद्धिक स्तर पर तार्किकता की सहायता से सुलझाने के प्रयास के कारण इन्होंने उसके आस्वादक, नाटक के प्रेक्षक के व्यक्तित्व की कल्पना भी प्रमाता प्रेक्षक के रूप में की। आठवीं शताब्दी में भारत में दार्शनिक सिद्धान्तों की जो बाढ़ आई थी, उसमें शंकराचार्य के अद्वैत मीमांसादर्शन और न्यायदर्शन ने विशेष प्रभाव डाला था। तार्किकता और चिंतनपरकता से अधिक प्रभावित होने के कारण इन दोनों ने सुमनस प्रेक्षक को प्रमाता प्रेक्षक बनाया। प्रमाता प्रेक्षक सुशिक्षित उच्च वर्ग का सदस्य था। तर्कशास्त्र के आधार पर दार्शनिक मतवाद के सहारे आस्वाद की ज्ञानात्मक गुत्थी को सुलझाते हुए प्रेक्षक के सन्दर्भ में भरत की अवधारणा (concept) को उन्हें परि- वर्तित करना पडा। अतएव ज्ञानानुभव में सक्षम एवं समर्थ, बुद्धिवान प्रमाता प्रेक्षक की व्यक्तित्व-कल्पना सामने आई। यह प्रमाता प्रेक्षक यथार्थ को इंद्रियों के परे अनुमानादि के द्वारा प्रत्यक्षज्ञान (perception) के आधार पर ग्रहण कर ज्ञान की विलक्षणता का अनुभव करने में समर्थ होता है। उनकी इस स्थापना में दृश्यकाव्य का सन्दर्भ एवं यथार्थ दृष्टि भरत के अनुसार ही रही परंतु तार्किकता की कसौटी पर रसास्वाद की समस्या को सुलझाने के कारण प्रेक्षक में विशेष गुणों की आशा की गई। उसमें विशेष बौद्धिक क्षमता तथा ज्ञानप्राप्ति में प्रयत्नवादिता की आशा की गयी। 'सामाजिक'-
१. भरत का नाट्यशास्त्र, अ. २७ २. भरत का नाट्यशास्त्र, अ. २७ ३. मध्यकालीन रसदर्शन और समकालीन सौंदर्यबोध पृ. १५
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प्रमाता प्रेक्षक दसवीं शती में आते-आते पूर्णतः शहरी बन गया। उसके व्यक्तित्व में व्यक्ति और समष्टि का योग करके उसे सामाजिक बनाया गया। भट्टनायक ने आस्वादक को "सामाजिक" शब्द से अभिहित किया है। भट्टनायक सांख्यवादी दार्शनिक विचारों से प्रभावित थे। अतः इनका आस्वादक सांख्यवादी व्यक्तित्व से पूर्ण है। सत्त्व, रज, तम में युक्त होकर रज और तम का निवारण करके सत्त्व की विजय होने में ही उसके व्यक्तित्व की महत्ता है। तत्कालीन कविगोष्ठियों का जो रूप राजशेखर द्वारा 'काव्यमीमांसा' में अंकित है उसके अनुसार असफल कवि 'भावक' बने थे और काव्य का आस्वाद एवं आलोचना करते थे। अर्थात् काव्य के आस्वादन का 'भावक' नामक नया वर्ग तैयार हुआ था। श्रव्यकाव्य की प्रधानता होने के कारण उसका श्रोता भावक आस्वादक विशिष्ट क्षमता से संपन्न माना जाना उचित था। भट्टनायक ने रसास्वाद की प्रक्रिया में 'भावकत्व' और भोजकत्व तत्त्वों की स्थापना एवं व्याख्यान किया और भावना भोगादि शक्तियों की कल्पना कर के आस्वादक के व्यक्तित्व की धारणा में प्राकृतिक एवं दार्शनिक व्यक्तित्व का समन्वय किया है। भट्टनायक पर समकालीन समाज की स्थिति, काव्यगोष्ठियों का स्वरूप, श्रव्यकाव्य का बढ़ता हुआ प्रचलन एवं दार्शनिक मतवादों का गहरा प्रभाव है। इस पूरे प्रभाव से समन्वयात्मक दृष्टि अपनाते हुए उन्होंने आस्वादक के व्यक्तित्व की अवधारणा स्थिर की। एक प्रकार से व्यष्टि और समष्टि का सम्मिलन इस स्थापना में है। सामाजिक शब्द में समाज का होना अभिप्रेत है। समाज में होनेवाला व्यक्ति अर्थात तत्कालीन समाज का अंश समाजजीवन की विशिष्टताओं के सहित व्यक्तित्व धारण करता है और नाट्यकाव्यादि का आस्वाद करता है। इस व्यक्तिनिष्ठता और समाजनिष्ठता के सम्मिश्रण में भट्टनायक की उदार दृष्टि के साथ अन्तर्मुखी वृत्ति की छाया है। निबिड- निजमोहनिवारण, सविद्विश्रांति जैसी आस्वाद की स्थितियों की धारणा में दर्शन की और उनका झुकाव दिखायी देता है, परंतु वे अब तक व्यावहारिक पक्ष से पूर्णतः दूर नहीं हटे हैं। भट्टनायक के 'सामाजिक'के विषय में प्रा. ग. 5यं. देशपांडे ने वात्स्यायन की विदग्ध गोष्ठी का संदर्भ देकर लिखा है कि-इस सम्मेलन को 'समाज' कहा जाता था तथा उसमें भाग लेनेवाले सामाजिक कहलाते थे। सामाजिक का नाम लेते ही काव्य का आस्वादक सम्मुख उपस्थित हो जाता है,१ क्योंकि साहित्यशास्त्र में ये दोनों पर्याय शब्द है, पर उनका कथन उचित नहीं लगता। भटटनायक का आस्वादक 'सामाजिक' इस रूप में साधारण समाज का अंग नहीं हो सकता, क्योंकि उनके काल में काव्यगोष्ठियों का स्वरूप बहुत बदल चुका था। दरबारी वातावरण में काव्यचर्चा एवं रसचर्चा का स्रोत
१. भारतीय साहित्यशास्त्र पृ. ८२
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उमड़ पड़ता था। अतः सामाजिक स्थापना उनकी अपनी मौलिक सूझ है। यह सामाजिक जिसके सामने कवि काव्यपाठ करते थे, काव्य का श्रोता एवं नाटक का प्रेक्षक भी होता था। वह आस्वादक सामाजिक राजशेखरसूचित बुद्धजीवी है, राजगोष्ठियों की प्रतियोगिताओं में कवि से स्पर्धा करनेवाला हैं। एक ओर साधारणीकरण से निजमोहादिनिवारण और दूसरी ओर निजसंविदविश्रांति ये लक्षण समष्टियुक्तता के साथ ही व्यक्तिनिष्ठता एवं अन्तर्मुखता को व्यक्त करते हैं। अतः डॉ. रमेशकुन्तल मेघ के शब्दों में सामाजिक व्यक्तित्व उचित रूप में अंकित हुआ है, भट्टनायक के सामाजिक की धारणा आदर्श विश्रांत ध्यानलीन वैश्वक स्व (contemplation universal self) है, जिसे सांख्य का पुरुष कह सकते हैं।9 'सहृदय' काव्य का आस्वादक अपनी भूमिकाएँ बदलते हुए काश्मीरी शैव आचार्यों के हाथों आकर सहृदय बना। अभिनवगुप् द्वारा की गई सहृदय की स्थापना दरबार और अध्यात्म के रंगों से सराबोर होकर अलौकिकता से युक्त बनी और लौकिक घरातल से एकदम ऊपर उठकर अधिक सूक्ष्म, गहरा एवं अलौकिक व्यक्तित्व उसने धारण किया। इस काल में नाटक का महत्त्व बिलकुल कम होकर श्रव्यकाव्य की प्रधानता हुई थी। दरबार में प्रस्तुत किया जानेवाला व्यंजकतापूर्ण, उक्तिचमत्कारों से परिपूर्ण काव्य काव्यशास्त्रियों के सन्मुख था। काव्यगोष्ठियाँ भी दरबार में पलती थीं, अतः काव्य के श्रोता में काव्य समझने की क्षमता, योग्यता एवं प्रतिभा होने की अपेक्षा की गई और मानसिक संस्कार की अपेक्षा बौद्धिक संस्कार को महत्ता मिली। आनन्दवर्धन ने भी काव्य के आस्वादक सहृदय को महत्ता दी थी। अतः कुछ विद्वान "सहृदय" की धारणा के निर्माण, व्याख्यान एवं प्रचलन का श्रेय आनन्दवर्धन को देते हैं। अभिनवगुप्त ने सहृदय में जन्मजन्मान्तर के वासनासंस्कार, पाण्डित्य और प्रतिभाशक्ति को महत्ता दी और आस्वादनप्रक्रिया में विन्नहरण, हृदयसंवाद जैसे शब्दों की योजना की। श्रव्य काव्य की प्रधानता के कारण आस्वादक-सहृदय में कई विशेषताओं की अपेक्षा की गई। उसके व्यक्तित्व को सामान्य योग्यता से युक्त नहीं बल्कि विशेष योग्यता, शक्ति रखनेवाला व्यंजित किया गया। श्रव्य काव्य को सुनने, समझने तथा अनुशीलन करने की शक्ति की आवश्यकता होती है। श्रव्य काव्य में दृश्यकाव्य-सी प्रत्यक्षता एवं सुलभ रसग्रहण की प्रक्रिया न होने से पूर्वसंस्कार की महत्ता होती है। उसका बार-बार अनुशीलन करना पडता है। अर्थात् सहृदय की अवधारणा में काव्यानुशीलन-कुशलता, बौद्धिक उच्चता एवं संस्कारशीलता की अपेक्षा करना स्वाभाविक था। इस स्थापना में समष्टिपरकता की अपेक्षा व्यक्तिनिष्ठता को महत्ता मिली।
१. मध्यकालीन रसदर्शन और समकालीन सौंदर्यबोध पृ. १२६
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नाट्यरस से काव्यरस की ओर ९७
अभिनवगुप्त का सहृदय भरतमुनि के सुमनस प्रेक्षक से नितान्त भिन्न माना गया। इन दोनोंमें ऊपरी तौर से समानता दीखने के बावजूद पर्याप्त भिन्नता है। सुमनस प्रेक्षक से लगभग हज़ार वर्ष बाद सहृदय की अवधारणा स्थापित की गई। भरत की यथार्थपरक दृष्टि, नाट्यरस का सन्दर्भ एवं समष्टिपरकता के स्थान पर काव्यरस के साथ ही दरबारी छाप और दार्शनिक मतवाद से कारण अभिनवगुप्त प्रभावित थे। अतः उन्होंने सहृदय में तीन विशेषताएँ मानी हैं। सहृदयत्व अर्थात् भावनाओं का होना, विमलप्रतिभाशाली व्यक्तित्व अर्थात् प्रतिभा का होना और विमल मनोमुकुर-पूर्वग्रह से रहित साफ मन होना आवश्यक माना गया है। श्रव्य काव्य के आस्वाद के लिये इन गुणों की नितान्त आवश्यकता उनको प्रतीत हुई। रस की चर्चा का सन्दर्भ बदल जाने के कारण अब सुमनस प्रेक्षक से आस्वादक के कार्य का निर्वाह नहीं हो सकता था। अतः काव्यास्वाद के समय व्यंग्यार्थ समझने के लिये ज्ञान की सापेक्षता में प्रतिभा का होना, पूर्वसंस्कारों का अस्तित्व भी आवश्यक था। अतः मुकुल के समान पवित्र मन होने का आग्रह किया गया। कुछ विद्वान मनोमुकुर की पवित्रता का सम्बन्ध तंत्रवाद के नैर्मल्य से लगाते हैं।9 सहृदय कवि के समान हृदयवाला हो, जिसके कारण हृदयसंवाद करने की क्षमता उसमें हो। तन्मयीभवन की क्षमता ही हृदयसंवाद करा सकती है। अतः "कविः सामाजिक तुल्य" कहते हुए अभिनव ने सहृदय को भी कवितुल्य होना धोषित किया है। सहृदय की सारी विशेषताओं का उल्लेख अभिनवगुप्त के इन शब्दों में है, येषां काव्यानुशीलनाभ्यासवशाद्विशदीभूते मनोमुकुरे वर्णनीयतन्मयीभवनयोग्यता ते हृदयसंवाद भाजः सहृदयः ।२ अभिनवगुप्त की धारणा पर तत्कालीन दरबारी काव्यपाठ एवं श्रव्य काव्य की महत्ता के अतिरिक्त दार्शनिक प्रभाव अधिक था। डॉ. निर्मला जैन उनकी सहृदय की धारणा पर शैवदर्शन का प्रभाव मानते हुए लिखती हैं, काश्मीर शैव परम्परा में सहृदय शब्द की लोकप्रियता का एक प्रमाण तो यही है कि ग्रंथों के नाम तक "सहृदयदर्पण, " "सहृदयालोक" अथवा "सहृदय-हृदयालोक" जैसे हुआ करते थे। अनेक प्राचीन ग्रंथों में ध्वन्यालोक को "सहृदयालोक" और "सहृदय-हृदया- लोक" भी कहा गया है। अभिनवगुप्त ने "लोचन" में आनन्दवर्धन को सहृदय- चक्रवर्ती नाम से सादर स्मरण किया गया है। कुछ लोगों का तो यहाँ तक कहना है कि ध्वनिकारिकाओं के निर्माता का नाम सहृदय था।३ १. रससिद्धान्त और सौंदर्यशास्त्र, पृ. २४१ २. ध्वन्यालोकलोचन, पृ. ३९-४० ३. रससिद्धान्त और सौंदर्यशास्त्र, पृ. २४१ रस ... ७
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९८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट होता है कि तत्कालीन काव्यचर्चाओं और राजगोष्ठियों में होनेवाली चर्चाओं में काव्य के आलोचक और काव्यशास्त्री आचार्य की दुहरी भूमिका सहृदय को निभानी पड़ती थी। सहृदय की धारणा पर पाण्डित्य की महानता, दरबारी वातावरण की प्रधानता, श्रव्यकाव्य की महत्ता और दर्शन के महत्त्व का प्रभाव अवश्य ही है। आत्मतत्त्व को प्रधानता देकर अभिनवगुप्त ने सहृदय की धारणा में अध्यात्मवादी व्यक्तित्व में दरबारी व्यक्तित्व को मिला दिया और रस का समन्वय चित्त- वृत्ति, आत्मन, आनंदरूप, भगनावरण आदि से करके सहृदय के रूपक द्वारा आत्म- चैतन्यरूप ब्रह्मानंदसहोदर का आस्वादन सिद्ध किया और रसना तथा चर्वणा का अधिकारी बनाया। इसके पश्चात् आस्वादक के व्यक्तित्व की बिलकुल मिन्न अवधारणायें प्रस्तुत की गयीं। एक और राजदरबारों में पली काव्यचर्चाओं को रसिकता से ग्रहण करनेवाला काव्यरसिक योगी बना और दूसरी ओर दरबार से बिलकुल दूर वैष्णव भक्ति के प्रांगण में वही आस्वादक भक्त बन गया। सामन्तवाद के सच्चे प्रतिनिधि राजा भोज ने श्रंगार को एकमेव रसराज का स्थान देकर उसके अधिकारी आस्वादक को 'रसिक' का नामाभिधान किया। रसिक वही हो सकता है जो अहंकार से युक्त हो। रसिक का व्यक्तित्व राजविलासी जीवन में पला हुआ है। संपन्न सम्राट के निरंकुश शासनाधिकार अर अभिमान से परिपूर्ण दृष्टिकोण से इस व्यक्तित्व की अवधारणा स्थिर हुई है। यह अहंकार भी जन्मजन्मांतर से प्राप्त होता है। पूर्वजन्मसंस्कार से उद्बुद्ध अहंकार को भोज ने श्रृंगार के अन्तर्गत स्थान दिया और तदनुसार राजविलासी जीवन एवं भोग का प्रभाव 'रसिक' के व्यक्तित्व पर परिलक्षित होता है। डॉ. राघवन सहृदय के साथ 'रसिक' के व्यक्तित्व की तुलना करते हुए रसिक की विशेषता व्यक्त करते हैं, "भोज द्वारा 'रसिक' शब्द केवल काव्य या नाट्य के आस्वादक के अर्थ में नहीं बल्कि एक विशेष मनुष्य के रूप में प्रयुक्त है। 'रसिक' शब्द द्वारा मानव के व्यक्तित्व की श्रेष्ठता का सन्दर्भ-निदर्शन है और समाज में 'नीरस' कहे जानेवाले व्यक्ति से अपने को मिन्न एवं श्रेष्ठ सिद्ध करनेवाला है।"१
{. The word Rasika did not simply mean the man in the state of an enjoyer of poetry, or drama, but was applied by Bhoja, to man as man. That is, it is an attribute referring to same excellence in man's personality which goes to make up the grace that distinguishes his behavi- our in society from another, who is called ' Nirasa '. Bhoja's Shringara Prakash, P. 466.