5. Pages 124–153
Page 124
नाट्यरस से काव्यरस की ओर १९
यह रसिक भरतमुनि के सुमनस प्रेक्षक, प्रमाता प्रेक्षक अथवा सामाजिक आदि से भिन्न है। वह 'सहृदय' से कुछ मिलताजुलता परंतु अपने सामन्ती युग की सीमाओं में बँधा व्यक्तित्व है। सामन्ती वातावरण में श्रृंगार रस से प्रावित मुक्तक काव्यपंक्तियों का रसपान रसिकता से करनेवाले आस्वादक का यह व्यक्तित्व था। एक ओर से रसिकश्रेष्ठ आस्वादक का प्रवेश रसचर्चा के मंच पर हुआ और दूसरी ओर से भक्त साधक के रूप में वह अवतीर्ण हुआ। वैष्णव भक्तों ने सपूर्ण रसचर्चा को ही भक्ति के रंग में सराबोर कर दिया और मधुर रस की स्थापना की। शिवशक्ति और राधा-कृष्ण आदि युगलों के वर्णनों से युक्त काव्यपंक्तियों से टपकनेवाली रस की बूँदों का पान करनेवाले आस्वादक के व्यक्तित्व की अवधारणा भक्ति एवं श्रद्धा से युक्त साधक के रूप में की जाना सर्वथा स्वाभाविक था। साधना और सिद्धि के नितांत सामन्तवादी ऐश्वर्यात्मक रसिकतापूर्ण धारणा के विपरीत आत्मरत श्रद्धावान भक्त का व्यक्तित्व है। इसमें न मुक्ति है, न भोग, न समाधि, न विश्रांति। भोज के समकालीन रसिक आस्वादक का, विश्वनाथ के रसिक काव्यमर्मज्ञ क रूप का परिष्कार होते हुए दरबारी प्रभाव के साथ ही वेदांत के अतीव प्रभाव ने उसें 'रसिकयोगी' बनाया। इस नामाविधान में विरोधा- भास (paradox) प्रतीत होता है, पर काव्यरस की पूर्ण प्रतिष्ठा होने के पश्चात् शाही दरबारी जीवन के निरंकुश शासन के परिवेश में पले सुंदर, रमणीय एवं अलंकारिक काव्य का आस्वादक रसिक तो था ही, साथ ही पण्डित भी। अतः इस काल का आस्वादन केवल रसिक नहीं रहा, पाण्डित्य से युक्त वेदान्ती पण्डित बना था। योग और शृंगार के मिलन से मांसलता, स्थूलता और देशकालयुक्त नवचैतन्य से समन्वयपूर्ण अजीब व्यक्तित्व की अवधारणा इस काल में हुई। यह विरोधाभासात्मक दो रूपों के सम्मिश्रण की अवधारणा का स्वरूप अर्धनारीश्वर के रूप की स्मृति जगाता है। शाही दरबार के अन्तर्मुखी व्याक्तिवाद एवं अध्यात्म के स्वयंप्रकाशी वेदान्त के कारण इस व्यक्तित्व में एक ओर सौंदर्याकर्षण, कलाभिरुचि, रमणीयता में रमने की वृत्ति, मादकता, ऐन्द्रियकता, स्थूलता, मांसलता आदि बाह्य रूपाकर्षण है और दूसरी ओर वेदान्ती स्वयंप्रकाश, ब्रह्म, आत्मा के रूप में देशकालयुक्त चैतन्य के अखण्डत्व और विलक्षण चमत्कारादि की झलक भी परिलक्षित होती है। आस्वादक की उपर्युक्त विभिन्न व्याक्तित्वधारणाओं के दिग्दर्शन के उपरान्त निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि समकालिक सामाजिक स्थिति, बाह्य परिवेश, युगीन प्रभाव, साहित्य के स्वरूप और दार्शनिक मतवादों के प्रभाव के फलस्वरूप रसचर्चा के सन्दर्भ में विभिन्न प्रतीक एवं रूपक अपनाये गये और रसचर्चा का स्वरूप अधिकाधिक सूक्ष्म बनता गया। साथ ही इस प्रभाव ने रस के आस्वादक के व्यक्तित्व की अवधारण (personality concept) को परिवर्तित किया है। एक भोर इस प्रभाव ने
Page 125
१०० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
आस्त्रादक के व्यक्तितव को स्वष्ट, सूक्ष्म एवं प्रौढ़ बनाने में सहाय्यता दी, दूसरी ओर उसका लौकिक पक्ष छूटता गया और व्यक्तित्व की अवधारणा अधिकाधिक वायवी, सूक्ष्म और उलझनमरी बनती गई और प्रत्यक्षवादी दृष्टिकोण से हटकर व्यवहारवादी यथार्थ से परे आध्यात्मिकता एवं आदर्श में साकार होने लगी। इस व्याख्या के प्रवाह में सामन्तवादी परिवेश के प्रभाव ने उसे सामान्य सामाजिक से ऊपर उठाकर रसिक बनाया और फिर उसका अध्यात्मवादी सहृदय और वेदान्त योगी में परिवर्तन हो गया। नाट्यरस अदृश्य होकर काव्यरस की चर्चा का प्रवाह आगे बढ़ा। उसकी प्रवह- मान धारा ने लोकजीवन से संबद्ध सुमनस प्रेक्षक का स्थान दूर हटकर सामन्ती वातावरण में पलनेवाला और अध्यात्मवादी आकर्षण से परिपूर्ण आस्वादक बना।
Page 126
पंचम अध्याय
रस के देवता और वर्ण
रससिद्धान्त में स्थापित रसविषयक चर्चा के अंतर्गत एक विशेष बात दिखाई देती है कि प्रत्येक रस का एक देवता और निश्चित एक वर्ण बताया गया है। इन देवताओं एवं वर्णों के नामाभिधान का उद्देश्य एवं अर्थ क्या हो सकता है और इनका प्रत्यक्ष रस के स्वरूप से कुछ सम्बन्ध हो सकता है या नहीं ये बातें इस सम्बन्ध में विचारणीय हैं। इस जटिल समस्या को सुलझाने के लिये प्राचीन दैवतशास्त्र का आधार ग्रहण करके तत्कालीन विकसनशील सामाजिक स्थिति के सन्दर्भ में देवताओं के व्यक्तित्व का अध्ययन करना मनोरंजक होगा। तथा इस दृष्टि से देवताओं की योजना तथा सामाजिक मनोविज्ञान के आधार पर वर्ण की स्थापना का अध्ययन करना इस अध्याय का लक्ष्य है। दैवतशास्त्र (Mythology) मानव के सांस्कृतिक जीवन से सम्बन्धित शास्त्र है। मानव के संस्कारशील सामाजिक जीवन से दैवतशास्त्र का संपर्क अन्य शास्त्रों की अपेक्षा निकटतम है। साथ ही साहित्य के साथ उसका सम्बन्ध मी अपरिहार्य है। दैवतशास्त्र के अन्तर्गत कतिपय दैवतों या पुराकथाओं (Myth) का अंतर्भाव होता है। मानवजीवन की आदिकालीन स्थिति से देवकथाओं उसके जीवन में अहं स्थान पा चुकी हैं। मिथक का जादू सनातन होता है क्योंकि मनुष्य के शैशव के इतिहास और मानव के सामूहिक अनुभव एवं सामूहिक स्वप्न भी मिथ के रूप में साकार होते हैं। आदि मानव की कबीला-संस्कृति में भी देवकथाओं का अस्तित्व था। सम्भवतः उनका पूर्ववर्ती रूप जादू का-सा था। परंतु पुराकथा या देवकथा अपनी लोकप्रियता के कारण युगीन समाज एवं साहित्य को प्रभावित करती हैं। प्राचीन काल से आज तक साहित्य में किसी-न-किसी रूप में दैवतकथा (Myth) का अस्तित्व रहा है। भज तो पश्चिम में समीक्षा-शास्त्र के अंतर्गत भी मिथकीय समीक्षा (Mythic Criticism) का विशेष प्रचलन है।
Page 127
१०२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
देवकथाओं के विषय में समाजशास्त्र, मानववशशास्त्र, दैवतशास्त्र एवं समाज मनोविज्ञान के कतिपय मनीषियों ने पर्याप्त विचार एवं विवेचन किया है। युंग ने इसे सामूहिक अवचेतन का अभिधान देते हुए लिखा है, "प्रकृति की काल्पनिक कथाएँ अथवा वर्णन किसी समूहविशेष के जीवन और संस्कृति का परिचय देते हैं जबकि मिथक उस समूह के मूलभूत श्रद्धाओं, विश्वासों, एवं मूल्यों का प्रतिनिधित्व करते हैं। "१ अर्थात् पराकथाओें या वर्णन पूर्णतः काल्पनिक ही होते हैं, अपितु वे किसी समूह का प्रतिनिधित्व करते हैं। परंतु नृतत्वशास्त्री मॅकिनोव्हस्की पराकथाओं को काल्पनिक मानने के लिये तैयार नहीं हैं। युंग का कथन हैं कि, "आदिम लोगों के समान हमें भी मिथक अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक पर्यावरण का वास्तविक और प्रत्यक्ष अंग प्रतीत होते हैं। "२ अवश्य ही प्राचीन लोगों के लिये पराकथा अपने सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन का एक अंग और सत्यरूप ही प्रतीत होती हो, जैसे आज हमें भी होती है। हर समाज में और हर काल में पराकथाओं का न केवल अस्तित्व था बल्कि समकालीन समाज पर उनका अत्यधिक प्रभाव रहा होगा और समकालीन स्थिति भी पराकथाओं में कुछ परिवर्तन मी लायी होगी। फ्राईड ने मिथक और प्रतीक (Myth and Symbol) के सहअध्ययन का प्रवर्तन किया और अवचेतन की अवधारणा स्थिर करके, इच्छाओं की पूर्ति के रूप में स्वप्नव्याख्या के सन्दर्भ में पराकथाओं की चर्चा की है। मिथक और पराकथा का समाज और संस्कृति से अभिन्न सम्बन्ध है। सामाजिक परिवेश, विभिन्न इच्छाओं, कल्पनाओं, प्रथाओं आदि से निसृत सामाजिक अवचेतन के रूप में पराकथाओं का नित्य ही अस्तित्व है। इससे यह प्रमाणित होता है कि पराकथाओं का मूलोद्गम प्रकृति नहीं, बल्कि मानवसमाज ही है। सांस्कृतिक जीवन निर्माण की प्रक्रिया में मिथकों का महत्त्व अधिक है। मिथक में सभी मनुष्य के सामाजिक जीवन के अमूर्त (abstract) बिम्ब मिलते हैं। डॉ. रमेशकुन्तल मेघ मिथकों के सामाजिक महत्त्व का उल्लेख करते हुए लिखते हैं, "मिथकों का सम्बन्ध कर्मकाण्ड (ritual) में उभरा था। अतः मिथकों का मॉडल प्रकृति न होकर . " ... as stories and descriptions of an imaginative nature, which provide a group with the meaning of their life and culture, Myths represent the fundamental beliefs, convi- ctions and values of group," - A Handbook of Social Psychology, P. 562. ?. With us, as with primitive people, myths are real and actual part of the social and cultural environment. - Ibid; P. 262.
Page 129
१०४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
सम्भवतः वस्तुनिष्ठ पद्धति से विवेचित करना अत्यंत आवश्यक है।9 इसी दृष्टिकोण से दैवतशास्त्र को परखा जाय जो कई तथ्य सामने आते हैं और स्पष्ट होता है कि मानव के जीवनविकास एवं समाज परिवर्तन तथा संस्कृतिविकास के साथ देवताओं के सन्दर्भ में कल्पनाओं, उनके रूपों में एवं अवारणाओं में समय-समय पर परिवर्तन आ रहे होंगे। अतः साहित्यशास्त्रान्तर्गत देवताओं का विचार करते हुए विकसनशील दैवतशास्त्र की दृष्टि अपना कर यह देखना होगा कि भारतीय साहित्य परम्परा में स्वीकृत पराकथाओं का और देवताओं की अवतारणा का निर्माण एवं विकास कैसे हुआ है। भारतीय साहित्य में मिथकों की परम्परा प्राचीन काल से रही है। प्राचीन धार्मिक और अन्य साहित्य में मिथकों की कल्पनाएँ हैं। वेदों, ब्राह्मणों, पुराणों, उपनिषदों और महाकाव्यों में मिथकों का अस्तित्व है। वेदों से लेकर महाकाव्यों तक वह परंपरा आज तक अख़ण्ड रूप से बनी रही है। प्राचीन साहित्य और मानव जीवन धर्म एवं धर्मशास्त्र से प्लावित एवं अभिन्न होने के कारण मिथकों के निर्माण में अधिक आस्थापूर्ण परिवेश प्राप्त हुआ और प्राचीन जन-जीवन के भावों, संवेदनों और जीवनदृष्टियों से सम्बन्धित घटनाओं और स्थितियों को स्वीकार कर पराकथाओं का निर्माण किया गया। इस आधार के कारण ही दैवतशास्त्रान्तर्गत (Mythology) विभिन्न देवताओं का उदय, विकास और परिवर्तन हुआ होगा। प्रकृति के सान्निध्य में रहनेवाले वैदिक ऋषियों, मुनियों ने तत्कालीन जीवन एवं संस्कृति विशेष के परिवेश में देवताओं की कल्पनाएँ कीं, उनके चरित्रनिर्माण में विभिन्न प्रतिमाओं का निर्माण किया तथा उनसे प्रार्थनाएँ कीं। शब्द और अर्थ में भावप्रतिष्ठा होने के पश्चात् प्रतिमाएँ बनीं। भारतीय देवताओं के उदय, विकास एवं चरित्रनिर्माण की प्रक्रिया आरम्भ वेदकाल से मानना ही उचित होगा। वैदिक काल में आर्यो ने देवताओं की जो प्रतिमाएँ ( Images) बनाई, उनसे ही कुछ मिथकों का निर्माण हुआ और उनमें निरन्तर् विकास एवं परिवर्तन होता रहा तथा सामयिकता के साथ देवताओं के व्यक्तित्व की अवधारणाओं (concepts) में परिवर्तन होता रहा। एक देवता के कई अवतारों की कल्पना सामने आई और समय-समय पर नये-नये अवतारों की कल्पना, समकालीन सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्थिति के प्रभाव में बदलती रही। महाकाव्यों और पुराणों के काल में अवतारवाद की कल्पना का विशेष प्रचलन हुआ, त्रिमूर्ति की कल्पना हुई और उसके पश्चात् विभिन्न भक्तिसंप्रदायों के रूप में यह धारा अधिक प्रवाहित होती रही। अत- एव यह स्पष्ट है कि प्रतीक रूप में देवताओं का उदय धर्मशास्त्र में प्रथम हुआ, परंतु भारतीय शास्त्रकारों ने धर्मेतर विषयों में भी अपनी धर्मबुद्धि का परित्याग नहीं किया। शुद्ध साहितत्यिक वस्तु में भी उसका ग्रहण किया और आज तक भी किया जा रहा है। १. वैदिक दैवतांचे अभिनवदर्शन, पृ. ६०
Page 130
रस के देवता और वर्ण १०५
भरत ने रससिद्धान्त की स्थापना करते हुए प्रत्येक रस के लिए भिन्न देवता एवं वर्ण निश्चित किये हैं। रस के देवताओं के संदर्भ में विचार करने पर ज्ञात होता है कि भरत पर पूर्ववर्ती परंपरा या समकालीन संस्कारों का प्रभाव था, जिसमें वेदों का प्रभाव सब से अधिक रहा। नाट्यशास्त्र को उन्होंने पाँचवाँ वेद कहा ही है। अतः रस के देवता एवं वर्ण की व्यवस्था की व्याख्या के मूल में इसको स्वीकार करना पडेगा कि भरत के पूर्ववर्ती आचार्यो की मान्यताओं के अतिरिक्त वेदों में आस्था (faith) का प्रभाव उनपर अवश्य रहा है। आरम्भ में भरत ने ब्रह्मा और महेश्वर शिव की वन्दना करते हुए अपनी देवताविषयक श्रद्धा व्यक्त की है। आरम्भ में देवकथा के प्रयोग की कल्पना में भारतीय परम्परा का निर्वाह भी भरत द्वारा किया गया है। नाट्य जैसी विद्या के प्रयोगशील एवं शास्त्रविवेचन के समग्र ग्रंथ को पाँचवाँ वेद नाट्याभिधान, ब्रह्मा द्वारा उसका निर्माण किए जाने की कथा, नाटक के निर्माण में शिव द्वारा नृत्य की योजना करना आदि बातें मिथकीय सृष्टि करती हैं। ब्रह्मा की भरतमुनि को आज्ञा कि, 'इसका अभिनय करो', त्रेतायुग का आरम्भ, देवदानव, यक्ष, नाग आदि के कारण देश का आक्रान्त हो जाना, इन्द्र का देवताओं का प्रमुख होकर भी कमलयोनि ब्रह्मा के सम्मुख हाथ जोंडकर प्रणत भाव से कहना, 'श्रेष्ठ भगवन्', देवासुरद्वंद्व कथा का नाट्यप्रयोग, असुरों द्वारा विध्न उपस्थित करना आदि सारी बातें और कथा एक दैवतकथा या पुराकथा (Myth) के रूप में आई है। तत्कालीन समाज में देवताओं के प्रति होनेवाली आस्था एवं उनके प्रति कल्पनाएँ, उनके व्यक्तित्व स्वरूप की अवधार- णाएँ आदि के साथ भरत की प्रज्ञा एवं आस्था ने रस के प्रतीक बनाये हैं। प्रत्यक्ष नाट्यप्रयोग के समय भी ब्रह्मा, वरुण, सूर्य, शिव, वायु, विष्णु, कुबेर, देवी इ० देवताओं का उल्लेख भरत ने किया है। संपूर्ण रससिद्धान्त की उत्पत्ति का सम्बन्ध प्रा. बेडेकर ने देवासुर कथा से जोडा है, वह युक्तियुक्त प्रतीत होता है।१ रस के देवता एवं वर्णों के निर्धारण के विषय में विचार करने पर कतिपय प्रश्न उपस्थित होते हैं। वे इस प्रकार हैं : रस के देवता और वर्ण मिश्चित करने में भरत का उद्देश्य क्या रहा होगा? विशिष्ट रस के लिए ही विशेष देवता या वर्ण ही निश्चित क्यों किये गये ? उनमें क्या संगति हो सकती है ? चार ही प्रमुख रसों की स्थापना में भरतमुनि की देवतावियषक कौनसी दृष्टि कार्य कर रही है ? गौण या प्रधान देवताओं की कल्पना हो सकती है या नहीं ? रसों के लिए विभिन्न वर्णों के निर्धारण में देवताओं का कुछ सम्बन्ध है या नहीं ? या अन्य किसी आधार पर वर्णों की योजना हुई हो ? साथ ही भरत की इस योजना से मतभेद प्रकट करते हुए अन्य विद्वानों द्वारा सुझाई गई देवता और वर्णविषयक योजना कहाँ तक उचित है? १. साहित्यविचार, पृ. ३२
Page 131
१०६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
इन सारे प्रशों को सुलझाने के पूर्व भरत द्वारा की गई स्थापना को प्रस्तुत करना आवश्यक है। आठ रसों के लिए आठ देवता नियुक्त करते हुए भरत ने कहा है, श्रृंगारो विष्णुदैवतो, हास्य प्रथमदैवतः रौद्रो रुद्राभिदैवत्यः करुणे यमदैवतः बी मत्सस्य महाकाल: कालदेवो भयानकः वीरो महेन्द्रदेवः स्वाद् भुतो ब्रह्म देवाः।' रस के साथ ही रस के वर्णा के विषय में वे बताते हैं- श्यामो भवति श्रृंगारा सितो हास्य प्रकीर्तितः कपोतः करुणश्वैव, रक्तो रौ्र: प्रकीर्तितः गौरो वीरस्तु विज्ञेयः, कृष्णश्चैव भयानकः नीलवर्णस्तु बीमत्सः पीताश्चैवाद्भुतः स्मृतः ।२
भरत की इस स्थापना के अनुसार सुविधा के लिए तालिका बनाई जाय तो अधिक स्पष्ट होगा। जैसे-
रस देवता वर्ण
श्रृंगार विष्णु श्याम वीर इंद्र-महेन्द्र गौर रौद्र रुद्र लाल बीभत्स महाकाल नील हास्य प्रथम शुभ्र अद्भुत ब्रह्मा पीत करुण यम कपोत - ( भूरा ) भयानक काल देव कृष्ण - काला
उपर्युक्त देवताओं के निर्धारण की ओर दृष्टिपात करने पर स्पष्ट होता है कि विष्णु को अग्रस्थान दिया गया है। शिव के चार रूपों (रुद्र, कालदेव, महाकाल और प्रथम उसके गण ) की योजना की गई है। यह स्पष्ट है कि शुंगकाल में महादेव, महेश्वरादि आर्येतर देवताओं का महत्त्व अधिक हुआ था। शिव अतिप्राचीन अनार्य देवता थे। मोहेन्जोदारो के उत्खनन में जो मुद्राएँ प्राप्त हैं, उनमें शिव का चित्र
१. नाट्यशास्त्र, पृ. ३३४ २. नाट्यशास्त्र, पृ. ३३३
Page 132
रस के देवता और वर्ण १०७
अंकित है। सिन्धु घाटी में प्राप्त मुद्रा पर अंकित पशुपति इसके साक्षी है।9 तब से लेकर आज तक शिवोपासना भारत में निरंतर बनी रही है। शिव के स्वरूप एवं अवतारों की कल्पनाओं में समय-समय पर परिवर्तन आता रहा। भरत पर भी सम- कालीन शिवोपासना एवं शिव के स्वरूप का प्रभाव रहा हो। ब्रह्मा-विष्णु-महेश त्रिमूर्ति की कल्पना ने अवतारवाद पर प्रभाव डाला था। देवताओं के निर्धारण के संदर्भ में विभिन्न विद्वानों द्वारा विचार किया गया है। 'रसकलश' के लेखक पं. हरिऔधजी लिखते हैं, "रस के गुणलक्षणों का आदर्श देवता होता है और उसीके अनुसार उस रस की कल्पना होती है। "२ डॉ. वजवासीलाल श्रीवास्तव अपने शोधप्रबन्ध में लिखते है, "किसी वस्तु की चित्रात्मक एवं सुग्राह्य अभिव्यक्ति के प्रतीकरूप में रूप एवं धर्मसाम्य के आधार पर समगुणधर्म स्वमाव वस्तुओं के उदाहरण दिये जाते हैं- करुण रस के देवता यम है। इसका आशय यह है कि करूण रस के आश्रय के गुणधर्मस्वभाव यम के सदश होंगे। "३ परंतु आश्रय में देवता के प्रतीकत्व की संगति लगाना असंगत लगता है, क्योंकि करूण रस का आश्रय यदि यमसदश व्यक्ति हो तो रस की स्थिति ही बदल जायेगी। अभिनव द्वारा इस सन्दर्भ में किया गया विवेचन अधिक उचित लगता है। उन्होंने अपनी व्याख्या में लिखा है, "उस उस रस की सिद्धि के लिये उस उस देवता की पूजा करनी चाहिये, इसके लिये देवताओं का निरूपण किया गया है। विष्णु का अर्थ यहाँ कामदेव है। प्रथम, शिव के गण, हास्य रस के देवता है। रूद्र तीनों लोकों का संहार करनेवाले हैं (वे ही रौद्र रस के देवता है)। वे त्रैलोक्य के संहारशक्ति है इसलिये वे ही यमराज को (प्राणियों के वध आदि के लिये) प्रेरित करते हैं। (उन रुद्र की प्रेरणा से) यमदेव द्वारा वघ आदि के सम्पादित हो जाने पर करूण रस (उत्पन्न) होता है, बीभत्स रस के महाकाल अधिष्टाता देवता हैं, यह शेष समझाना चाहिये क्योंकि (महाकाल-रूप) शिव ही उस (बीभत्स रस) के विभाव कंकाल, रमशान आदि का सेवन करता है। भयानक रस के विभाव भी बीमत्स रस के समान होते हैं, इसलिये उसका देवता कालदेव को बतलाया है। वीर रस का देवता महेन्द्र को माना गया है, उस महेन्द्र शब्द से। महेन्द्र अर्थात् त्रैलोक्य के राजा का ग्रहण है। (अद्भुत रस के देवता ब्रह्मा को बतलाया है क्योंकि) ब्रह्मा अचिन्त्य (जिसकी मनुष्य कल्पना भी नहीं कर सकता, इस प्रकार के) आश्रर्य- जनक पदार्थ का रचयिता होता है।"४ १. प्रतिभाविज्ञान २. रसकलश, पृ. ७४ ३. करूण रस, पृ. ३२ ४. हिन्दी अभिनवभारती, पृ. ५३०-३१
Page 133
१०८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
अभिनव की इस व्याख्या से रस के देवताओं की योजना का उद्देश्य तो प्रमाणित हो जाता है परंतु उसके निर्धारण का आधार स्पष्ट नहीं हो सकता। डॉ. कृष्णदेव झारी इस योजना की पृष्ठभूमि में सांस्कृतिक दृष्टि को महत्ता देते हुए कहते हैं, "निश्चय ही आचार्य ने रसों के स्वरूप-बोध को सरल और स्पष्ट बनाने के लिये ही उनके वर्ण और देवता की कल्पना की है। अभिनवगुप्त के उपर्युक्त कथन से स्पष्ट है, रसों के वर्ण निश्चित करने की सामाजिक उपादेयता है। साथ ही इनका आधार भी मनोवैज्ञानिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक है। "१ परंतु अपने इस विधान को लेखक पूरी तरह निभा नहीं पाये, उल्टे भरत की प्राचीन योजना को उन्होंने व्यर्थ बताया है।२ इस विषय में श्री. बटेकृष्ण का मत उचित प्रतीत होता है कि भरतमुनि ने वर्ण और देवता का कथन करके अमूर्त भाव के मूर्त रूप और उसके प्रभाव आदि का चित्रण मनोवैज्ञानिक ढंग से करने का प्रयत्न किया है।"३ भरत की इस योजना में एक बात स्पष्ट दिखाई देती है कि रस के देवता और वर्ण की स्थापना उन्होंने प्रतीक रूप में की है। प्रतीक रूप में हो, चित्रात्मक या दृश्यात्मक अभिव्यक्ति नित्य ही अधिक सुस्पष्ट, सुग्राह्य, सुलम एवं प्रभावकारी होती है। यह मनोवैज्ञानिक सत्य है कि दृश्यात्मकता वस्तु को अधिक स्पष्ट एवं प्रभावी बनाने में सहायक होती है। रसवाद की स्थापना के लिये जो माध्यम चुना है, वह नाटक दृश्यात्मक एवं चित्ररूप ही है। नाटक की इसी दृश्यात्मकता एवं चित्रमयता में भरत की वस्तुवादी (objective ) दृष्टि निहित है। अतएव दृश्य एवं चित्रमय माध्यम से प्रभाव करने में भरत की मनोवैज्ञानिक मौलिक दृष्टि ही है। साथ ही समाज और संस्कृतिपरक मार्मिक एवं सुक्ष्म दृष्टि भी उसमें परिलक्षित होती है। भरत ने दैवतशास्त्र से प्रतीक रूप में तत्त्व गृहीत करके देवताओं और वर्णों के रूप और गुणधर्म का साम्य रसविशेष के रूप, गुण और धर्म से जोडा और व्यक्त रूप देने का प्रयास किया है। भारतीय परम्परा में सभी प्रतिमाएँ (images) भावविशेष की निदर्शक रही हैं। शंकर का क्रोध, विष्णु की रति, लक्ष्मी का वात्सल्य, शक्ति का भय, बुद्ध की करुणा, महावीर की शांति आदि परम्परा से मान्य संकेत हैं। शब्द और अर्थ में भावप्रतिष्ठा हो जाने के बाद ही ये विभिन्न प्रतिमाएँ बनी हैं। "१ अर्थात् भरत की स्थापना के मूल में जितना मनोवैज्ञानिक ठोस आधार है, उतना ही सांस्कृतिक एवं सामाजिक भी। इसमें सभ्यता के चिन्ह, संस्कृति का विकास एवं सामाजिक संस्कार अंकित हैं। वेदों से लेकर भरत के समय तक देवताविषयक जो कल्पनाएँ, उनके
१. बीभत्स रस और हिन्दी साहित्य, पृ. २०९ २. वही ,, ३. वीर रस का शास्त्रीय अध्ययन, पृ. ३० पृ. २१०
Page 134
रस के देवता और वर्ण १०९
व्यक्तित्व के स्वरूप की अवधारणाएँ समाज में संस्कार के रूप में प्रचलित थीं, वह स्थापना उनका निचोड ही है ऐसा कहना अनुचित न होगा। इसलिए इस सामाजिक और सांस्कृतिक आधार को ग्रहण करते हुए देवताओं के बदलते व्यक्तित्व को तत्कालीन सांस्कृतिक परिवेश पर कसकर देखना होगा। विभिन्न देवताओं की कल्पना का उदय, देवकाल से उनका स्थान, रूपचित्रण और चारित्रिक विशेषताएँ, प्राप्त विभिन्न उपाधियाँ, विशेषण तथा उनके जीवनगत विभिन्न घटनाओं और कथाओं (Myth) आदि का उल्लेख. करके ही उसका स्वरूप स्पष्ट होगा और फिर रस के साथ उसकी संगति या विसंगति दिखाकर उपर्युक्त सारे प्रश्ों को सुलझाया जा सकता है। इसके साथ ही देवताओं के सन्दर्भ में एक विशेष बात सामने आती है कि भरतमुनि से आज तक विद्वानों ने इस विषय में चर्चा की है। कुछ ने कुछ परिवर्तन सुझाये और कुछ ने पूर्ववर्ती स्थापना को मान्य किया। नवीन स्थापनाओं के मूल में, सामाजिक बदलते सन्दर्भ के साथ देवता की धारणा बदलने के कारण दृष्टि बदली हुई है। अतः सामाजिक परिप्रेक्ष्य में उसका भी अध्ययन किया जा सकता हैं। सर्वप्रथम रस, शंगार का देवता विष्णु माना गया है तथा उसका वर्ण श्याम बताया गया है। विष्णु का अस्तित्व वेदकाल से प्राप्त होता है। वह आकाश में व्यास है, अतः उसका आकाशसदश, नील एवं श्याम वर्ण बताया गया है। "शान्ताकारं भुजगशयनं ... गगनसदश मेघवर्णे शुभांगम् " ... इस वर्णन में उसे श्याम एवं सुन्दर वर्णित किया गया है। जैसे विष्णु को वेदों में गौण स्थान प्राप्त हुआ। वैदिक दैवत- शास्त्र इंद्रप्रधान है, अतः विष्णु की महत्ता कम ही रही है। वेदोत्तरकाल में ब्राह्मणों में उसे प्रधान स्थान प्राप्त हुआ और उपेन्द्र नाम भी मिला। ऋग्वेद में उसका वर्णन बृहच्छरीर, युवा कुमार आदि विशेषणों से किया गया है।२ त्रिविक्रम-तीन पदों का होना, दुलोक में निवास करना, तीन पदों से सारे भुवन में निवास करना वर्णित है। उसका सम्बन्ध यज्ञ से जोड़ा जाता है और सूर्य से भी। सम्भवतः वह तेज की स्वीकृति के कारण हो। वेदोत्तरकाल में प्रचलित उसके रूप का उल्लेख करते हुए डॉ. रा. ना. दाण्डकर लिखते हैं, "वेदोत्तर काल में विष्णु का जो स्वरूप सम्मत हुआ उसका सुदर्शनचक्र सूर्यचक्र का प्रतीक हो सकता है। विष्णु के हाथ का पद्म सूर्यके जीवनदायी प्रकाश का प्रतीक और विष्णु के पीताम्बर का सूर्य की तेजवान किरणों के समूह का द्योतक होना असम्भव नहीं। "३ उसके वाहन गरूड का सम्बन्ध सूर्यपक्षी से जोडा जा सकता है। विष्णु की शारीरिक विशेषताओं के सन्दर्भ में दो कथाएँ (Myths) हैं।
१. चिंतन और कला पृ. ७२. २. ऋग्वेद १५५.२. ३. वैदिक देवतांचे अभिनवदर्शन, पृ. ११९.
Page 135
११० रससिद्धांन्त का सामाजिक मूल्यांकन
'त्रीणि विक्रमणानि' (तीन कदम) और वृत्रसंहार के अवसर पर इन्द्र की सहायता, अर्थात् सारे लोकों को तीन पदों से व्याप्त कर लेना एवं राक्षसों का सहार करके सुरक्षा कार्य में सहयोग देना। बाद में विष्णु को त्रिमूर्ति में स्थान प्राप्त हुआ। जगत की निर्मिति करना और विश्व के विभागों को संभालकर रखना, पृथिवी, दुलोक और शेष भुवनों को धारण किए रहने का उल्लेख है।9 अन्य कई विशेषताएँ जैसे सुकृत्य, इत्यारा न होना, वरिष्ठ दाता, उदार संरक्षक, अदाम्म्य, उदार, दानी आदि शब्द हैं। हिरण्यगर्भ विशेषण भी महत्त्वपूर्ण है। गर्म को स्थिर करने के लिए उसको पुकारा गया हैं।२ और उससे प्रार्थना की गई है कि वे गर्भाशय में एक रुचिर पुत्र का आधान करें और उनके सर्वोत्तम रूप से संपन्न पुत्र प्राप्त हो। उसे सर्जना का प्रतीक माना गया है। सारी प्रार्थनाओं के आधार पर उसके व्यक्तित्व का एक विशेष पहलू स्पष्ट होता है, वह विष्णु का एक विशेषण 'शिपिविष्ट'। कोई विद्वान 'शिपिविष्ट' का अर्थ खल्वाट लगाते हैं तो किसीने उसे 'hairy dwarf' कहा है। गोल्डनेर ने उसे वामनस्वरूप का द्योतक कहा है, परंतु भाषाशास्त्र के आधार पर उस शब्द का अर्थ लगाते हुए डॉ. दाण्डकर ने शिपि का अर्थ पुरुषलिंग-बढनेवाला, क्रियाशील, छोटा-बडा होनेवाला पुरुषलिंग लगाते हुए लिखा है, "शिपिविष्ट शब्द से विष्णु देवता का प्राचीन लिंगसम्बन्ध स्वरूप स्पष्टतः सूचित किया गया है। विष्णु का सुलभ प्रसूत्व (fertility) अवन्ध्यत्व और साधारणतः सृजनकल्पना से पूर्ववर्ती स्थित सम्बन्ध शिपिविष्ट शब्द से सूचित होता है।"३ 'यज्ञो देवेभ्य निलयत विष्णुरूपं कृत्वा स पृथिवीं प्राविशत्' का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं, "पृथ्वीमाता के गर्भ में विष्णु द्वारा प्रवेश किसी सुलभ- विधि, सस्यप्रदत्तविधि (fertility rite ) का प्रतीक रूप से वर्णन किया गया है।"४ विष्णु का सम्बन्ध गर्भ से बताकर वह उसका संरक्षक, सुप्रजननक्षम रूप ध्वनित है। "विष्णुर्योनि कल्पयतु " अर्थात सृजनशीलत्व, प्रभूतप्रसूत्व और अवन्ध्यत्वादि (fertility productivity) गुणविशेष सामने आते हैं।
विष्णु के व्यक्तित्व के अंकन से स्पष्ट होता है कि सुन्दरता, उज्जवलता, युवावस्था, सृजनशीलता और उर्वराशक्ति का प्रतीक है। अतः शंगार रस के देवता के रूप में विष्णु की नियुक्ति अत्यंत उचित एवं सुसंगत प्रतीत होती है। इसकी व्याख्या के सन्दर्भ में अभिनवगुप्त ने लिखा है कि "शंगाररस के देवता विष्णु अर्थात् कामदेव है। " परंतु कामदेव विष्णु अवतार नहीं है, बल्कि ब्रह्मा का मानसपुत्र
१. ऋ० १.१५८-१, २, ४. २. ऋ० १०.१८४-१. ३. वैदिक देवतांचे अभिनवदर्शन, पृ. १३९. ४. वैदिक देवतांचे अभिनवदर्शन, पृ. १४०. निंकार कनन 8
Page 136
रस के देवता और वर्ण १११
है। लगभग बारहवीं शती में शंगार की विशेष महत्ता थी और कामदेव को रति के सन्दर्भ में महत्त्व मिल चुका था, अतः कामदेव को उसका ही रूप मान लिया गया। भारतीय धर्मशास्त्र में वैदिक जीवन में भी तत्त्वचिन्ता और धार्मिक कर्मकाण्ड के साथ ही व्यावहारिक जीवन को महत्ता दी गई है। काम की महत्ता से ही आगे चलकर कामदेव की कल्पना उदित हो गई होगी। विष्णु कामदेवः, कामदेवरूपी विष्णु देवता, ऐसा कहते हुए कामदेव को ही विष्णु माना गया परंतु भरत की योजना के अनुसार विष्णु को ही शृंगार के देवता मानना उचित प्रतीत होता है। उसके रूप एवं व्यक्तित्व के प्रकाश में स्पष्ट होता है कि कामदेव उससे भिन्न है। डॉ. कृष्णदव झारी रस के देवता की योजना व्यर्थ मानते हुए शोध की आवश्यकता महसूस करके लिखते हैं, "सम्भवतः भगवान् विष्णु इनके प्रतिरूप श्रीकृष्ण रसिकशिरोमणी माने जाते हैं। उनके श्यामवर्ण के कारण ही शृंगार का वर्ण श्याम मान्य हुआ है। अतः संगार का देवता रासरसिक श्रीकृष्ण को ही मानना उचित है क्योंकि श्याम वर्ण की संगति भी उसीसे ठीक बैठती है। "१ परंतु इसमें कुछ नया कहने की इच्छा के अतिरिक्त अन्य कुछ तथ्य नहीं है। श्रीकृष्ण वस्तुतः विष्णु के बारह अवतारों में आठवाँ अवतार है, अर्थात् यह अस्तित्व पश्चात् के काल में लोकप्रिय हुआ। विष्णु के व्यक्तित्व की कल्पना मूलभूत एवं सार्थ है जो भरत को अभिप्रेत थी। विष्णु में रसिकता से भी बढकर सृजन एवं सुन्दरता का सुन्दर संयोग है। अतः उसमें परिवर्तन की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती। संस्कृत के रीतिकालीन कवियों ने भी मधुर रस की स्थापना के साथ कृष्ण को देवता का स्थान दिया। उनकी स्थापना में तत्कालीन सामाजिक स्थिति और राधाकृष्ण की भक्ति में सराबोर जनरुचि का ही प्रतिबिम्ब झलकता है। उन सामयिक बातों के प्रभाव को छोड दें तो विष्णु की महत्ता एवं प्रतीकत्व ध्यान में लेते हुए उनकी शृंगार रस के लिए योजना यथार्थ प्रतीत होती है। वीर रस के देवता इन्द्र को बताते हुए उसका वर्ण गौर बताया है। वेदकालीन प्रधान देवता इन्द्र होने से पूरा ऋग्वेदीय दैवतशास्त्र इन्द्रप्रधान है। इन्द्र का परिचय देते हुए दैवतशास्त्र के कोश में लिखा है कि, "वैदिक देवकथा में इसे युद्ध और वर्षा का देवता माना गया है। यह एक खुशमस्त, गौर-केशपाशयुक्त, युद्धवीर राजा था, इसने मृत्यु के पश्चात् देवत्व पाया। "२ इन्द्र भारतीयों के अति परम राष्ट्रीय देवता १. बीभत्स रस और हिन्दी साहित्य, पृ. २११. R. In Vedic myth a God of battle and rain. It appears to have been a real king, a jolly fair haired fighting man of Nordi type, who was deified after death. ( Dictionary, P. 103 )
Page 137
११२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
रहे हैं। उनके शरीर की कई विशेषताओं का वर्णन किया गया है। उनके रूपचित्रण में शरीर, सिर, भुजाएँ और उदर का वर्णन है।2 सोमपान के प्रसंग में उदर का विशेष वर्णन है। जबडे पीसना, मदमत्त होना, मूछों का हिलाना आदि क्रियाओं का वर्णन भी है। इन्द्र का हिरण्य वर्ण कहा गया है।२ "हिरण्यबाहु " इन्द्र की बाहें आजानु, महान् शक्तिशाली और सुडौल हैं। केश और रमश्र हिरण्यवर्ण है।३ उनके मनमोहक रूप में सूर्य की प्रभा चमकती है। वज्र उनका अपना अस्त्र है पर कभी-कभी वे धनुष्य और बाण लेकर भी आते हैं।४ इन्द्र सुनहरे रथपर चलते हैं, जो लहलहाती अयालवाले अथवा हिरण्यवर्ण केशवाले हैं।५इन्द्र के कई व्यवहारों (mannarisms) का वर्णन है, जिसके कारण उसका नेता-रूप में अत्यंत सजीव चित्र उभरकर आता है। इन्द्र के सोमपान का अत्यधिक वर्णन वेदों में हैं। सोम इन्द्र को पृथिवी और आकाश को धारण करने अथवा पृथिवी को विस्तृत बनाने के लिए उत्तेजित करता है। वृत्रवध जैसे सामरिक कार्य अथवा शत्रुओं पर विजय पाने के लिये वीरता का वर्णन है।' इन्द्र के व्यक्तित्व का उल्लेख करते हुए डॉ. दाण्डेकर लिखते हैं, "इन्द्र का व्यक्तित्व विकसनशील था। (Indra's personality was a growing personality) इन्द्रविषयक ऋग्वेद के उल्लखों का अध्ययन-विश्लेषण करने पर प्रतीत होता है कि एक महान वैश्विक शक्ति, युयुत्सु वैदिक आर्यों का विजयी नेता और प्राचीन दैवतशास्त्र से संबद्ध अहि (dragan), संहारक वीर ऐसे त्रिविध स्वरूप में वैदिक कवियों ने इन्द्र को गौरान्वित किया है। "७ वृत्रहा इन्द्र नामाभिधान के सन्दर्भ में प्राप्त मिथ से प्रमाणित होता है कि वृत्र नामक दैत्य का वज्र से निःपात करने का वीरकार्य इन्द्र ने ही किया। उसका मरुदजों से सम्बन्ध दिखाना या पर्जन्यदेवता कहना शक्ति का प्रतीक है। उसके व्यक्तित्व वर्णन से सूचित होता है कि उसने विशिष्ट तरीके से जन्म पाया और अपने पराक्रम से देवत्व प्राप्त किया। उसके जीवनचित्रण में अधिकतर मानवजीवननिाष्ठा, मानवीय स्वभावधर्म और स्वरूप का अंकन है। डॉ. दाण्डेकर इस विषय में लिखते हैं, "सामान्य मानव में दिखाई देनेवाली स्वमाव- न्यूनताएँ (human weakness) वैदिक कवियों ने इन्द्र में अंकित कीं। इन्द्र के व्यक्तित्व में अतिमानव और मानव का हृदयंगम संगम है। उससे इस देवता का वास्तव
१. भारतीय संस्कृतिकोश, पृ. ५३० २. ऋ, १ - ७.२ ३. ऋ. १० - ९६.५, २३.४ ४. ऋ. ८ - ४५. ४, १०-१०३.२.३ ५. ऋ. ८.३२, ३९. ६. ऋ. ९०. २, १९. २. ६ ४७, १.२ ७. वैदिक देवतांचे अभिनवदर्शन, पृ. ७१
Page 138
रस के देवता और वर्ण ११३ स्वरूप समझ में आता है ... नितान्त यथार्थपरकता से इन्द्र के मूलभूत व्यक्तित्व का वर्णन करना हो तो इन शब्दों में किया जा सकता है कि वे न देवता थे, न सामान्य मानव भी। वह अतिमानव थे, वीर थे।१ इसके अतिरिक्त कुछ अन्य विद्वानों ने इन्द्र को आक्रमणकारी,वैदिक भारतीयों का नेता कहा है, यही नेता आगे चलकर राष्ट्रीय वीर बन गया और अनन्तर सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रीय वीर बना। इस प्रकार भारतीय संस्कृति के विकासक्रम में इन्द्र का व्यक्तित्व दिव्य वीर के रूप में सामने आता है। उसकी युद्धवीरता और दानवीरता के उल्लेख हैं।२ डॉ. सूर्यकान्त ने उसका वर्णन करते हूए लिखा है, "शारीरिक पौरुष और भौतिक लोक पर इन्द्र का आधिपत्य ये दो प्रमुख विशेषताएँ हैं। वह एक दिगन्तव्यापी शासक है, किन्तु उनका यह शासकत्व सनातन नियमों के प्रवर्धन में नहीं खिला है और न ही वह नैतिक शासन की स्थापना में उमरा है, वह तो अबाध युद्धलालसा में प्रस्फुटित हुआ है। जबकि उसकी बलवती भुजाएँ विजयकल्याण संपादन करती हैं, उसकी दानशीलता में चमकी हैं।३ इन्द्र का व्यक्तित्व, गौर वर्ण, अस्त्रशस्त्रादि के सन्दर्भ में वीर रस के लिए उसकी नियुक्ति सयुक्तिक प्रतीत होती है। साथ ही यह भी प्रमाणित होता है कि विष्णु के समान ही इन्द्र को भरत ने उच्च स्थान दिया है। सृजन के साथ संहार एवं रक्षा का कार्य करनेवाले वीर नेता का प्रतीक इन्द्र वीर रस के देवता और गौर वर्ण वीर रस के लिए आवश्यक माना गया है। इस योजना को प्राचीन और आधुनिक सभी विद्वानों द्वारा स्वीकृत किया गया है। रौद्र रस के देवता रुद्र माने गये हैं तथा उनका वर्ण लाल है। रौद्र एवं बीभत्स रस के देवता के रूप में रुद्र और महाकाल की योजना करना तत्कालीन समाज में शिव का महात्म्य व्यक्त करती है। मूलतः भारतीय संस्कृति में शिव प्राचीनतम आर्येतर देवता हैं, जिसका प्रथमतः परिचय सिन्धु घाटी में प्राप्त मुद्रा (seal) पर अंकित चित्र से होता है।४ उस मुद्रा पर पशुपति शिव का चित्र अंकित है, सिर पर दो बहुत बडे सींग और आसपास जानवर हैं। यही पशुपति शिव वैदिक काल में रुद्र बना और वैदिक आर्य का एक प्रधान देवता बना। वेदोत्तर काल में रुद्र के कई रूपों की कल्पना का विकास हुआ और शिवोपासना का आधिक्य हुआ। त्रिमूर्ति में महेश को महत्ता मिली। वैसे वेदोंमें १. वैदिक देवतांचे अभिनवदर्शन, पृ. ८६. ६७ २. ऋ. ९० (१.३०-१), (४. ३१.७), (८. १४. ४) ३. वैदिक दैवतशास्त्र, पृ. १७७ ४. प्रतिभाविज्ञान रस. ८
Page 139
११४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन रुद्र को गौण स्थान प्राप्त है। उसका रंग भूरा, होठ सुन्दर, बाल घुँघराले, आँखें चौधियाँ देनेवाली, एक हाथ है। उसके अनेक रूप हैं। द्ुतिमान सूर्य की भाँति वे चमकते हैं। स्वर्णिम आभूषणों से प्रसाधित हैं। भाँति-माँति के रूपोंवाला निष्क पहनते हैं। रथ पर बैठते हैं। सहस्राक्ष हैं। उनका उदर काला और पीठ लाल हैं।' वे नीलकण्ठ और नीलाशिखण्ड हैं। ताम्र और लोहित वर्ण के हैं।२ उनके हाथ में वज्र और धनुष्यबाण हैं। वे स्थिर एवं तीव्र गतिवाले हैं। रूद्रों के साथ मरुतों के साहचर्य का वर्णन नित्य ही जाता है। अथर्ववेद और परवर्ती वैदिक काल में भी रुद्र का उल्लेख है। रुद्र युग की भाँति भीमकाय एवं घातक हैं। वे वृषभ, दढ, बलवान, अजेय, अमर, शक्तिशाली, त्वरित गति एवं त्वेश होनेवाले हैं, अजय और शुषुम्न हैं। कहीं तो भूलोक का सबसे बडा महान असुर कहा गया हैं।३ जगत्पिता या कल्याणकारी और शिव भी कहा गया है। उसकी अनुदारता का संकेत कर कहीं भीषण शस्त्रों से भीति और उनके अमर्ष से भय के भाव सूक्तों में झलकते हैं। उससे प्रार्थना की गई है कि वे क्रोध में आकर अपने उपासकों, उनके माता-पिताओं, उनके अपत्यों एवं परिजनों, पशुओं एवं अश्वों को क्षति न पहुँचायें।४ क्रोध आने पर भी अपने वज्र को लौटा दें और अपने उपासकों, उनके बच्चों और गौओं को किसी प्रकार की क्षति न पहुँचायें।" यहाँ तक कहा गया है कि देवगण एक बार रुद्र के सज्जितघनुष और शत्रु को देखकर काँप उठे थे और डर रहे थे कि कहीं वे उन्हें धराशायी न कर दें।4 प्राकृतिक आधार पर रुद्र को तूफान का देवता माना गया है। इन्द्र के विपरीत इसका वज्र कर हैं। "प्रारंभिक वैदिक पराकथा में अपने ग्यारह पुत्रों, रुद्रोंसहित होनेवाले तूफान के देवता के रूप में उसका अंकन है।"७ कहीं-कहीं उसे अगनि का देवता भी कहा गया है। ओल्डनबर्ग ने इसको पर्वतों का शासक माना है। रुद्र शब्द की विभिन्न व्युत्पत्तियाँ बताते हुए उनकी विशेषताओं पर प्रकाश डाला जा सकता है।
१. अथर्ववेद १५. १. ७ २. ब्राह्मणसंहिता १६. ७ ३. ऋग्वेद २. १. ९ ४. ,, १-११४. ७ ५ ,, ६-२८. ७ ६. शत. ब्रा. ९-१. १, ९-१. १. ६ 9. In early Vedic myth a storm god, who was accompanied by his eleven sons, the Rudras. -Everyman's Dictionary.
Page 140
रस के देवता और वर्ण ११५
रुद् याने चिलाना, चिल्लानेवाला, रुद्र का अर्थ चमकना, रुद्र याने लोहित होना। पिशल अर्थात् चमकीला और लोहित आदि भी अर्थ है। ऋग्बेदकाल और उसके पश्चात् के काल में रुद्र के दो भिन्न व्यक्तित्व (double personality ) स्पष्ट होते हैं। एक मयानक विध्वंसक रूप, भयानक जानवर जैसे (ruddy boar of the heaven), स्वर्ग का बडा असुर, मृत्यु का लानेवाला है। डॉ. दाण्डेकर वेदपूर्वकालीन दैवत शिव का कुछ प्रभाववश वैदिक काल में रुद्र और उत्तर-वैदिक काल में रुद्र-शिव की अवधारणा में विकास होना बताते हैं। वही आगे चलकर महादेव बना। रुद्र के लाल रंगादि का उल्लेख द्राविडी देवताओं पर चढाई जानेवाली बलि आदि से करते हुए उन्होंने लिखा है कि "प्राचीनतम द्राविडी देवता शिव का, जिसका अर्थ लाल है, सम्बन्ध इससे विशेष रूप से उस काल में प्रचलित उस देवता की पूजाविधि से भली भाँति जोडा जा सकता है। इसी देवता का वैदिक रूप रुद्र नामक है, इसका अर्थ भी लाल है। यद्यपि इसके विषय में मूलभूत रक्तबलि का सम्बन्ध नष्ट करने का प्रयास बाद में किया गया और उसके अन्य सम्बन्धों (साहचयों) पर बल दिया गया हो, फिर भी मूलतः वही रूप है।' इस प्रकार वैदिक काल में और वेदोत्तर काल में भी रुद्र का व्यक्तित्व अन्य देवताओं से नितान्त भिन्न रहा है। वेदपूर्व द्रविडों के देवता से मिलाजुला असुर देवता का रूप, लाल रंग-रूप, तूफान, अगनि या मृत्यु देवता का रूपांकन आदि भरत द्वारा स्वीकृत हैं। उनकी पीठ का लाल रंग, बभ्रु और लाल रंग उसीका द्योतक है। रुद्र शब्द लाल रंग का द्योतक है। अरुश, बभ्र, बम्लुश, ताम्र, लोह, विलोहित, नीललोहित आदि वर्णन सार्थ प्रतीत होता है। बीभत्स रस के देवता महाकाल माने गये हैं और उनका वर्ण नील है। भरत की स्थापना में शिव की महत्ता यहाँ स्पष्ट होती है। शिव के कई रूपों की कल्पना
₹. The name of ancient Dravidian god, namely, Siva, which means red, can thus be very well linked up with the form of worship which must have been most common in respect of that god. The Vedic version of this ancient god, namely, Rudra, also bears the name, which means red, though, in his case, attempts seem to have been made to suppress the original association of his redness with blood offerings and the emphasis quite a different kind of association. ( Papers on Vedic and allied subjects, P. 35 ).
Page 141
११६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन वेद और वेदोत्तर काल में की गई है। इनमें प्रलयंकर महादेव की कल्पना है। महा- काल अर्थात् मैरव रमशान में रहता है, मुण्डों की माला धारण करता है, रक्त की बलि चाहता है। यह विश्वात्मा का ही एक रूप है। ईश्वर एक है, परंतु भेद है। उत्पत्ति- वलय का वह अधिपति है और दीखने में भयानक है।१ मृत्यु का वह अधिपति है, इसके चार मुख हैं, एक-एक मुख एक युग है। प्राचीन भारतीय कोश के अनुसार यह उज्जैन के शंकर का एक अवतार है। इसने दूषण नामक एक असुर को एक हुंकार से भस्मसात कर दिया। दैवतशास्त्र के कोश में इस विषय में उल्लेख है- "वेदकालीन कथा में शिव का विध्वंसक रूप है। इस शब्द का अर्थ दीर्घतम काल और सब वस्तुओं का नाश करनेवाला होता है। उसका स्त्रीरूप काली है पर शिव और पार्वती काल और काली कैसे बन गये यह स्पष्ट नहीं है। उनमें प्राचीन युद्धदेवी और उसके पति के रूप में संयोग होना दिखायी देता है पर काल के आधार पर केवल यह प्रमाणित नहीं हो सकता।"२ महाकाल का नील रंग नीलकण्ठ के रूप से सम्बन्धित है। महाकाल मैरव के इस रूप को लक्षित कर भरत ने बीमत्स रस के लिए योजना की है। वैसे महाकाल के रूप में अधिक वर्णन प्राप्त नहीं होता है पर जो है, उससे बीभत्स का प्रतीकत्व व्यक्त होता है। बीभत्स रस के देवता के संदर्भ ने आपत्ति उठाते हुए कहा गया है कि उसके देवता का निर्णय फिरसे होना चाहिए। महाकाल से एक तो व्यर्थ की आवृत्ति का दोष है और इससे रस का बोध नहीं होता। रुद्र को तो रौद्र रस ने देवता के रूप में पहले प्रतिष्ठित किया जा चुका है। महाकाल शिव उससे भिन्न नहीं है। "३ परंतु इस विधान में तथ्य कम है, शिव और रुद्र को एक कहना ब्रह्माविष्णु को एक कहने जैसा है। वस्तुतः महाकाल, कालदेव, रुद्र, पशुपति आदि शिव के भिन्न-भिन्न रूप होते हुए भी प्रत्येक की विशेषताएँ अलग-अलग हैं। उनके साथ कुछ विशेष पराकथाएँ
१. वायुपुराण - ३२- ११.२२ R. In Vedic myth one of the destructive aspects of Siva, the word means great time and as such he is the destructor of all things. The feminine aspect of this is Kali. How Shiva and Parwati became Kala and Kali is not clear. There would appear to have been fusion of same early was goddess and her husband with these too, but even then the time factor does not fit into the picture. (Dictionary P. 132). ३. बीभत्स रस और आधुनिक हिन्दी साहित्य, पृ. २१२
Page 142
रस के देवता और वर्ण ११७
(myths) सम्मिलित हैं। महाकाल के उपर्युक्त रूपवर्णन से स्पष्ट है कि वह रुद्र से भिन्न है, अतः यह विरोध निराधार है। ये लेखक वाल्मीकि को बीभत्स रस का देवता ठहराने का सुझाव पेश करते हैं और बताते हैं कि देवता की आधुनिक धारणा आदर्श व्यक्ति या महापुरुष होनी चाहिए।' इस विषय में उठायी गई आपत्ति और नया सुझाव परिवर्तित दृष्टिकोण का परिचायक है। बीमत्स रस का आधार ही आधुनिक विद्वानों के द्वारा मानसिक घृणा मानने के कारण यह कठिनाई उनके समक्ष उपस्थित हुई। वस्तुतः भारतीय प्रतिभानिर्माण के मूल में यही प्रवृत्ति कार्य करती है। पूर्वविवेचन से स्पष्ट है कि इन स्थापनाओं में मानवीय मूल्यों एवं विशेषताओं के आरोपण से व्यक्तित्वविषयक धारणाएँ बनी हैं और भरत ने प्रतीक रूप में देवताओं के उन्हीं रूपों को अपनाया है। अतः व्यक्ति या प्रतीक भले ही बदल जाय, मूल बल तो वही है। अतः नयी स्थापना का कुछ प्रयोजन प्रतीत नहीं होता। हास्यरस के देवता प्रमथ है और उसका वर्ण श्वेत है। हास्य रस को शंगार का उपरस बताते हुए उसकी विकृति से हास्य की उत्पत्ति बताई गयी है। परंतु देवता की योजना में वैसा सम्बन्ध स्थापित नहीं हो सकता। प्रमथ का अर्थ है शिव के गण। शिवदेवता का प्रभाव भरत पर यहाँ भी स्पष्ट है। शिव के गण, रुद्र, महाकाल, कालदेव आदि को भरत ने महत्ता दी है। प्र+मथ+अव्-प्रमथतीति शिवपरिषद - नानाशस्त्रधरा शम्भोर्गणास्तु प्रमथाः स्मृतः महाबलाः शूराः संख्याता वस्तुकोष्टमः। अपरे गायनास्ताल मृदंगापणवादिभिः नानारूपघरास्ते वे संख्यया कोज्याधिकाः सततं चानुच्छिति विचरण महेश्वरम् ।२ पुराण के अनुसार इनकी संख्या छत्तीस हज़ार बताई गई है। (षट्त्रिंशतु सहस्राणि प्रमथः द्विजसत्तमाः ।) मत्स्यपुराण में इनका वर्णन है। यह एक भूत गण है, जो शिव का गण है। ये बुरी नज़र के भूत हैं। ये रुद्र तथा दक्षित अग्नि के अनुयायी हैं। इनका मुख पशुवत् और अन्य आकृति क्रूर मुखों जैसी होती है। ३ प्रमथ के मिथक (Myth) का आधार स्पष्ट करने का यत्न अन्य कुछ विद्वानों द्वारा किया गया है। डॉ. बरसानेवाले चतुर्वेदी ने नारदमोहप्रसंग का वर्णन करते हुए प्रमथों द्वारा दिल्लगी करने का सम्बन्ध हास्य से जोडा है।४ प्राचीन काल के शिल्प में भी हास्य की लोकप्रियता, एवं महत्ता के संकेत मिलते हैं। कई मुद्राओं पर अंकित विभिन्न चित्र विभिन्न पराकथा- ओं और पौराणिक कथाओंका संकेत करते हैं। उनमें शिव के गणों, नागों, प्रमथों
१. बीभत्स रस और आधुनिक हिन्दी साहित्य, पृ. २१२ २. शब्दकल्पद्रुम, पृ. ४४७६. ३. मत्स्यपुराण, १३३-३५. ४. हिन्दी साहित्य में हास्यरस, पृ. २४
Page 143
११८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन और किन्नरों के चित्र प्राप्त हैं। कइयों पर मिश्रित प्रतिमाएँ हैं, उनमें शिव के प्रमथों एवं और गणों का अंकन है। उनमें नरानन, छाग, नरानन मेष, अर्धगजनर, अर्धछाग, अर्धनर, अर्धवेष, अर्धवृषभ, मुख मात्र नराकृति आदि कई वैचित्र्यपूर्ण चित्र अंकित हैं।9 इस विचित्रता, विलक्षणता एवं विकृतिपूर्णता के कारण प्रमथों को हास्य के देवता के रूप में स्वीकृत करना स्वाभाविक है। अद्भुत रस के देवता ब्रह्मा माना है और उसका वर्ण पीत है। वस्तुतः आज ब्रह्मा को देवताओं में सर्वप्रथम आदिदेवता का स्थान प्राप्त है और त्रिमूर्ति में विश्व निर्माता ब्रह्मा अग्रस्थ है फिर भी भरत ने इसकी गौण रस के लिए नियुक्ति की है और रससंख्या में पीछे का क्रम प्राप्त है। परंतु इस संदर्भ में गहराई से विचार करने पर लगता है कि वेदों के अत्यधिक प्रभाव से विष्णु और इन्द्र को प्रधान स्थान देकर ब्रह्मा को गौण स्थान दिया है। त्रिमूर्ति की महत्ता पश्चात् के काल में विशेष रही। फिर भी प्रजापति के रूप में ब्रह्मा का स्थान जगत् का निर्माता का एवं उच्च ही रहा। अथर्ववेद में ब्रह्मा को ईश्वर का रूप भाना गया है।२ ब्रह्म ज्येष्ठा संमृता वीर्याणि ब्रह्माये ज्येष्ठ माततान भूतानां ब्रह्मा प्रथमोत जज्ञे तेनार्हति ब्रह्मणा स्पर्धितुनः । अर्थात् ब्रह्म ने बल धारण किया, सृष्टि के आरम्भ में द्युलोक का विस्तार कर प्रथम प्रकट हुआ, उसका प्रतिस्पर्धी भला कौन हो सकता है ?" मुण्डकोपनिषद में भी- ब्रह्मा देवानां प्रथमः संबभूव विश्वस्य कर्ता, माना गया है। पुराणों में वह दुय्यम बना और शिव शक्ति और विष्णु को महत्ता प्राप्त हुई। शेषशाई विष्णु की नाभि से उत्पन्न कमल में वास करनेवाला अजयोनि होने से उसे गौण स्थान प्राप्त हुआ।2 आगे चलकर ब्रह्मा के न विभिन्न अवतार बने और न शिव और विष्णु के समान उसका कोई संप्रदाय विशेष (cult) चलाया गया। कुछ पराकथाओं के सहारे पता चलता है कि सरस्वती के अभिशाप के कारण ब्रह्मा का महत्त्व कम हुआ और देवताओं में गौण स्थान प्राप्त हुआ। रूपमण्डन में ब्रह्मा का वर्णन लाल वर्ण, चार सिर, चार मुख, धर्म, अर्थ, काम, मोक्षदायी चार वेदोमय किया है। शुभ्र वस्त्र परिधान कर ताम्र वर्णवाले इस देवता का वाहन सुनहरा राजहंस है। ब्रह्मा के अद्भुत रूप का परिचय देते हुए कहा गया है कि "उत्तर वैदिक काल में, ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के सहित त्रिमूर्ति रूप में जगत् के कल्याण के लिए अवतीर्ण हुए। उनकी जन्मकथा के अनुसार वे नारायण नामक १. प्रतिमाविज्ञान मुद्रासंख्या ३७८, ८० और ३८१. २. अथर्ववेद ११।२२।२१ ३. भारतीय कला
Page 144
रस के देवता और वर्ण ११९
सुवर्णपुष्प में पानी पर तरते आये। उन्होंने स्वयं अर्धनारीश्वर का रूप धारण किया अर्थात अर्धशरीर पुरुष रूप में और आधा स्त्री रूप ग्रहण किया। "१ ब्रह्मा विश्व- निर्माता अर्थात् अचिन्त्य, आश्चर्यजनक पदार्थों का रचयिता है, अतः उसको अद्भुत रस का देवता मानना उचित ही है। ब्रह्मा के रूप-रंग का विशेष वर्णन नहीं है और जो है उससे पीत रंग की संगति नहीं बैठती। परंतु राजहंस के सुवर्ण वर्ण से पीत रंग का सम्बन्ध जोडा जा सकता है अथवा विश्वक्षितिज पर फैलनेवाली स्वार्णम आभा विश्वनियन्ता ब्रह्मा का चिन्ह हो सकता है। अद्भुत रस के देवता के सन्दर्भ में चर्चा करते हुए विश्वनाथ ने गंधवों को स्थान देना उचित माना है।२ इसमें सन्देह नहीं है कि गन्धर्वों की सृष्टि एवं जगत् अद्भुतरम्य है, परंतु सारे विश्व का निर्माता एवं नियन्ता ब्रह्मा माना जाने के कारण उससे अधिक आश्चर्यकारक क्या हो सकता है ? अतः विश्वनाथ की इस स्थापना में नवीनता के सिवा अन्य कुछ नहीं। करुण रस के देवता यम माने गये हैं तथा उसका वर्ण कपोत बताया गया है। वेदों में अन्य देवताओं की तुलना में यम को गौण माना गया. है। इसके नाम से कभी पुकारा नहीं गया है, परंतु अन्य देवताओं के साथ इनका नाम मिलता है। उसने छिपी हुई अग्नि को ढूँढ निकाला। यम पूर्णतः मानव भी नहीं, उसे पितरों का राजा और अधिपति कहा गया है, पर अन्यों से मिन्न माना गया है। मृतकों का राजा भी कहा गया है।३ वह पितृगणों का राजा है और वही पहला मर्त्य है, मृतात्माओं के मार्ग से जानेवाला, उन्हें मार्ग दिखानेवाला, मानवों को एकत्रित लानेवाला एवं मार्ग- दर्शक रहा है।४ वह मानवों को विश्राम का स्थान देता है।५ वेदोत्तर काल में उसका रूप परिवर्तित हो गया। वह मृतात्माओं का भयंकर न्यायाधीश बना और उसका मृत्यु से निकट सम्बन्ध आया है और अन्त तक वह यम
. Brahma, in later Vedic myth, a senior god of the great Traid with Vishnu and Siva. He was said to be born from a golden cage of Narayan which floated on the water. He devided himself into two halves, a male half called Purush and a female half called Satarupa. -Dictionary, P. 40 २. साहित्यदर्पण, पृ. १२० ३. ऋ० ९-११३.८; १०.१६-९ ४. ऋ० १०-१४-१ ५. अथर्ववेद १८.२.२७
Page 145
१२० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
का दूत बना।9 उल्लूक, कपोत, श्वान आदि उसके दूत बने और वह मृत्यु का राजा माना गया है। उसके सम्बन्ध में पराकथाओं में यम-यमी के संवाद का निषेध कर नैतिकता के पालन का आदर्श बताया जाता है, पर यम-यमी ही मानववंश के आद्य- जनक रहे हैं। प्रथम यज्ञकर्ता, संतति हित के लिए प्राणार्पण करनेवाला आद्यमानव यम अमर बना, जिसने यज्ञ में स्वदेह की आहुति दी। ( He was first to die) इस महान् कार्य के लिए उसे देवता उपाधि प्राप्त हुई। उसके इस यज्ञसमर्पण की त्यागमय घटना का सम्बन्ध श्री. बेडेकर ने करूण रस की आस्वाद्यता से लगाया है। इसकी मूलभूमि यम का त्यागमय बलिदान ही है।२ यम के स्वरूप के विषय में विद्वानों में पर्याप्त मतभेद रहा है। प्रकृतिवादी उसका सम्बन्ध सूर्यदेवता और चन्द्रदेवता से जोड़कर मृत्यु को डूबते सूरज का प्रतीक मानते हैं। देवत्ववादी विद्वान उसे देवता ही मानते हैं। वह मर्त्य है, इसलिए वैवस्वत सूर्य और यम का सम्बन्ध जोड़ा जाता है। विकासवादी परम्परा यम-यमी को मानव जाति के आद्य जनक मानकर कहती है कि सुवर्णयुग की पृथ्वी का आद्य राज्यकर्ता, पृथ्वी पर वास करनेवाला, मृत्यु के उपरान्त परलोक जानेवाला मृतात्माओं का राजा है। यम के स्वरूप की उत्क्रांति होकर वही यज्ञ का पुरोहित और यजमान बना। बौद्धिक काल के पश्चात् मनु आदि स्रष्टा बना और यम का अस्तित्व कम होने लगा, यमकथा नष्ट होने लगी। फिर यम मृतात्माओं का राजा बना। उनके पापपुण्यों का फैसला कर पापियों को भयंकर सज़ा देनेवाला आतंकपूर्ण मयानक रूप उत्तरकालीन पौराणिक साहित्य में स्थिर हुआ। इस प्रकार उसके स्वरूप की धारणा में आमूलाग्र परिवर्तन हुआ। इसी बात को लक्षित कर डॉ. दाण्डेकर ने भी लिखा है, "पश्चात् के काल में भी यम का जो रूप अंकित है, उसके अनुसार वह पुण्यशील आत्माओं का उदार राज्यकर्ता, पितरों का सहायकारी पिता है। उसका सम्बन्ध मृत्यु से कुछ भी नहीं था और उसका वास्तविक कार्य मृत्यु के पश्चात् ही आरम्भ होता था। परंतु अब तो यम का सम्बन्ध साक्षात् मृत्यु से निश्चित किया गया है।३ डॉ. वजवासीलाल श्रीवास्तव ने 'करुण रस' नामक
१. अथर्ववेद ५.१०.१२ २. साहित्यविचार 3. The benevolent rules of the blessed souls, the helpful father of fathers, who had originally nothing to do with death, as such and whose proper function even as represented in the later stage, commenced after death now come to be identified with death. (Yama in Veda, P. 16)
Page 146
रस के देवता और वर्ण १२१
अपने शोधप्रबन्ध में अपना मत व्यक्त किया है कि यम के दो भिन्न रूप थे। वेद- कालीन उपनिषद के यम और पुराणों के यम की भिन्नता दर्शाते हुए वे लिखते हैं, "जहाँ वैदिक काल के यम ब्रह्मज्ञानी हैं, तथा पुण्यात्मा व्यक्तियों के लिए मंगलदाता तथा श्रव्य एवं भक्ति के आधार हैं, वहाँ परवर्ती काल के यम भयावह राक्षस है। वह नरयान में आरूढ है, तथा खड्ग-खेटक धारण किये हुए राक्षसों से आवृत्त है। उप- निषद् काल के यम ब्रह्मज्ञानी है। ब्रह्मज्ञान के अन्तर्ज्ञान मुख्य विषय है।१ करुण रस के देवता की यथार्थता बताते हुए अभिनवगुप्त ने लिखा है' "करुण रस के देवता यम है। रौद्रात् करुण की निर्मिति होती है। रुद्र तीनों लोकों के संहार करनेवाले हैं। वे त्रेलोक्य के संहारकर्ता हैं इसलिए वे ही यमराज को प्राणियों के वध के लिए प्रेरित करते हैं। अभिनव की इस बात से असम्मति प्रकट करते हुए डॉ. कृष्णदेव झारी ने सुझाव प्रस्तुत किया है कि, "किन्तु क्यों न भूतदया और करूणा के अवतार बुद्ध को करूणा के देवता बनाया जाय?" अन्य कुछ विद्वानों ने बुद्ध को शान्त के देवता मानना उचित समझा है। पर हम समझते हैं कि बुद्ध को करूणा का देवता ही बनाना उचित है।२ इस सुझाव में भी नवीनता के सिवा अन्य कुछ तथ्य नहीं है। भरत की योजना में यम मृतात्माओं का देवता और यज्ञ में प्रथम बलि आदि विशेषताओं के सहित करुण रस के प्रतीक हैं। उसके लिए बुद्ध की नियुक्ति भरत द्वारा जानबूझकर नहीं की गई, क्योंकि भरत की दृष्टि हिंदूधर्म को बौद्धधर्मप्रवाह से बचाने की थी और साथ ही यज्ञादि कर्म में उनकी प्रगाढ आस्था थी। भयानक रस के देवता कालदेव है और वर्ण काला माना गया है। कालदेव भी शिव का ही एक रूप है। शिव के प्रलयंकर रूप का अंकन इसमें है। "काल: कालरूपः सर्वसंहारको रुद्रः ।" इसके अन्य नाम काल, कालरूप, सर्वसंहारक रुद्र, कालाझनि रुद्र, कालमैरव आदि हैं। उज्जैन में कालमैरव के बारे में कथा प्रचलित है कि शंकर ने ब्रह्मदेव का सिर तोडा जिससे वह काशी में निवास करने लगा। उससे कालदेव का निर्माण हुआ है। यम का भी एक नाम कालमैरव है। परंतु वह इस रूप से मिन्न है। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में उल्लेख है, अनादि निधन: काल: रुद्रः संघर्षणः स्मृतः कलनात्सर्वभूतानां स काल परिकीर्तिकः। इस सन्दभ में एक प्राचीन चित्र प्राप्त है। सृष्टि की प्रलय के निरन्तर विवर्त का एक प्रतीकात्मक विवरण महाप्रलय के रूप में है। विकरालता लम्बी जिह्वा में रूप व्यक्त ह।3 कालदेव के विषय में एक पराकथा प्राप्त है। विष्णु और ब्रह्मा शिव के
१. करुण रस, पृ. ३३. २. बीभत्स रस और हिन्दी साहित्य. पृ. २१२. ३. भारतीय प्रतीकविद्या. पृ. ७० चित्रसंख्या ११.
Page 147
१२२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
साथ घमंड से व्यवहार करने लगे। तब शंकर के क्रोध से मैरव का निर्माण हुआ। कालमैरव, आमर्दक या पापमक्षक कालराज का जन्म होते ही, उसने बायें पैर के नाखून का पाँचवाँ सिर तोड डाला। काल को ग्यारह रुद्रों में से एक माना जाता है।9 कालदेव की भयकरता और उग्रता मयानक रस के लिए प्रतीकात्मकता सिद्ध करती है और अंधकारमय रात्रि-सा उसका काला वर्ण भी भयसूचक ही है। भरत ने आठ ही रसों की स्थापना की है। अतः आठ देवता और आठ ही वर्ण हैं। पर इनके अतिरिक्त विद्वानों ने अन्य देवताओं की स्थापना भी की है जो एक विशेष सांस्कृतिक दृष्टि व्यक्त करती है। शान्त रस का स्वीकार भरत में नहीं है, पर अभिनव ने "बुद्धः शान्तेब्जजोद्भुतो" कहा है। विश्वनाथ ने वात्सल्य रस के लिए देवी आदिशक्ति कालीमाता ब्राह्मी आदि माताएँ एवं अधिष्ठात्री देवियाँ मानीं और वर्ण कमलवर्ण के समान शुभ्र माना है।२ साथ ही शान्त रस का वर्ण कुन्दपुष्प या चन्द्रमासमान मानकर लक्ष्मी-नारायण उसके देवता माने हैं। ३ इन स्थापनाओं में उनके समकालीन देवताविषयक कल्पनाओं का प्रतिबिम्ब झलक पडता है। विभिन्न "मक्तिसंप्रदायों के विकास में शैवों, वैष्णवों और शाक्तों की महत्ता थी। शाक्तों में देवी की उपासना को विशेष प्रधानता प्राप्त हो चुकी थी। उपर्युक्त सारे विवेचन के आधार पर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भरत के मन पर तत्कालीन समाज में मान्य एवं परम्परागत विकसित देवताओं के व्यक्तित्व की अवधारणाओं का स्पष्ट प्रभाव है। वेद, उपनिषद और पुराणों से चलती आई हुई पराकथाओं (Myths) के आधार पर रस के देवताओं की योजना भरत द्वारा की गई है। यहाँ पर एक विशेष बात दिखाई देती है कि भरत ने चार मुख्य रसों के देवताओं के रूप में विष्णु, इन्द्र और शिव को प्रधानता दी है। उपरसों में ब्रह्मा यम और शिव के कालमैरव रूप एवं प्रमथों को महत्ता है। शिव के विभिन्न रूपों एवं गणादि को विशेष महत्ता देना तत्कालीन समाज में प्रचलित एवं लोकप्रिय शिवोपासना का प्रभाव है। आर्येतर देवता शिव की उपासना का विशेष सूत्रपात भरत के काल में हो चुका था; अतः यह योजना भी स्वाभाविक थी। विशिष्ट देवता, उसका रूप-रंग, आकृति, व्यक्तित्व, चरित्र-वृत्तियाँ, विशिष्टताएँ इन सारी बातों का सम्बन्ध प्रतीकरूप में रस के साथ जुड़ा हुआ है और प्रत्येक देवता का पूरा व्यक्तित्व सांस्कृतिक एवं सामाजिक अंशों का परिपाक है.।
१. प्राचीन चरित्रकोश २. साहित्यदर्पण, पृ. १२३ ३. साहित्यदर्पण, पृ, १२०
Page 148
रस के देवता और वर्ण १२३
किसी भी रस के लिए प्रतीकरूप में देवी की योजना नहीं है। शायद रस शब्द पुरुषवाचक होने के कारण देवता की योजना करना भरत ने उचित समझा होगा। साथ ही देवी या शक्ति की उपासना का विशेष प्रचलन भरत के काल में नहीं था। वेदों में सरस्वती के अतिरिक्त अन्य देवियों को अधिक महत्ता नहीं है। पुराणकाल में देवी के रूपों एवं नामों को प्रधानता प्राप्त हुई। भरत के सम्मुख सरल, स्थूल एवं अखण्ड सुसूत्र जीवन था, अधिक सूक्ष्म, उलझनमरा, समस्यापूर्ण अथवा जटिल जीवन नहीं था। अतः जीवन की मुख्य बातों को लेकर भावविशेषों को स्वीकार कर सिद्धान्त स्थापना के साथ ही पूर्वपरम्परा से प्राप्त रससंख्या को ग्रहण कर किया गया। अतः चार मुख्य और चार उपरसों की स्थापना की। परंतु इन रसों की उत्पाद्य-उत्पादनादि व्यवस्था में देवताओं की योजना की संगति बिठाना कठिन हो जाता है। इसमें छानबीन करने की कोशिश करने पर भी शंगार के देवता विष्णु और उसके उपरस हास्य के प्रमथ इनमें संगति कैसे स्थापित की जाय १ और उनमें वैसा परस्पर सम्बन्ध स्थापित करना उचित भी नहीं प्रतीत होता। कुछ देवताओं के संदर्भ में खींचातानी से सम्बन्ध जोडा भी जा सकता है, परंतु उसकी आवश्यकता भी नहीं है। सम्भवतः रस के देवताओं की योजना रस का मानवीकरण (personification) करने में सफल हो सकती है, अतः वहाँ तक ही उसकी सीमा मानी जाय। आधुनिक काल में देवताविषयक वह आस्तिकता एवं श्रद्धा नहीं बची है, जो प्राचीन काल में थी। अतः आज देवताओं के निर्णय की बात ही नहीं उठती। आज विद्वान इस विषय को अधिक महत्त्व भी नहीं देते, परंतु ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में सामाजिक धरातल पर प्रतीकत्व के रूप में उसकी महत्ता को स्वीकार किया जा सकता है। इस निष्कर्ष के आधार पर यह भी देखना आवश्यक हो जाता है कि रसों के विभिन्न वर्णों के निर्धारण से देवताओं का कुछ सम्बन्ध है या नहीं ? या अन्य किसी आधार पर वर्णों की योजना हुई है ? आचार्य अभिनवगुप्त ने रंगों की कल्पना का आधार तो स्पष्ट नहीं किया, परंतु उसके उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए कहा है, "यह रंगों का कथन रसों की पूजा आदि के अवसर पर उनके ध्यान लगाने में उपयोगी होता है। दूसरे व्याख्याकारों के मत में उस-उस रस के अभिनय के समय तदनुरूप मुख के राग (रंगने) में भी उपयोगी होता है।१ अमिनव की व्याख्या से उद्देश्य तो कुछ व्यक्त होता है, परंतु वर्णों के निर्धारण का आधार स्पष्ट नहीं हो सकता। डॉ. श्रीवास्तव आश्रय की बाह्यव्यंजना (अनुभाव) उस वर्ण के समान मानते हैं।२ परंतु आश्रय के अनुभाव से वर्ण की संगति लगाना
१. अभिनवभारती पृ. ५३१. २. करुण रस पृ. ३२.
Page 149
१२४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
उचित नहीं लगता क्योंकि करुण रस का आश्रय ही यमसदश हो तो रस की स्थिति बदल जायेगी। पूर्ववर्ती विद्वानों के विभिन्न मतों के बावजूद भी वह बात स्पष्ट नहीं हो पायी है कि रसों की वर्ण-योजना का वास्तविक आधार क्या है। भरत की देवता और वर्णयोजना में एक बात तो स्पष्टतः सामने आती है कि भरत ने यह स्थापना प्रतीक रूप में की है। रस को चित्रात्मक, दृश्यात्मक रूप में व्यक्त करने के लिए उन्होंने सामाजिक एवं सांस्कृतिक धारणा के आधार पर प्रतीक की योजना की। अतः रसों की भावमयता स्पष्ट करने के लिए विभिन्न रंगों की योजना की। चित्रों के रंग, अभिनेता की वेषभूषा, वातावरण का रंग आदि का उल्लेख भी भरत ने किया है। दूसरे अध्याय में भाव से रस का सम्बन्ध जोडा है। पूर्वविवेचन में स्पष्ट किया जा चुका है कि देवताओं के विभिन्न वर्ण प्राचीन साहित्य में वर्णित हैं। विष्णु का श्याम वर्ण, इन्द्र का हिमवर्ण, रुद्र की लाल पीठ, महाकाल का नीलवर्ण, कालदेव का काला रंग आदि से वर्णों की कुछ संगति बिठाई जा सकती है परंतु सब रसों के संदर्भ में यह आधार प्रमाणित नहीं हो सकता। अतः इस विषय में अधिक अध्ययन की आवश्यकता है। मनुष्य के जीवन में रंगसंवेदना का विशेष महत्त्व हैं। रंगों की संवेदना और उनके प्रभाव से मानव ने कुछ संकेत भी निश्चित किये हैं। देश, वहाँ की जलवायु, वातावरण और स्थिति रंगों के आस्वाद एवं अनुभव को नित्य ही प्रभावित करती है और उस प्रभाव के अनुरूप संस्कार वहाँ के मानव पर होते हैं। अर्थात् रंगों की संवेदन- शीलता एवं संकेतात्मकता का सम्बन्ध किसी संस्कृति और समाजविशेष से जुड़ जाता है। किसी विशिष्ट समाज में एक रंग कुछ महत्ता रखता है, विशेष भाव या लक्षण का निदर्शक होता है तो अन्य समाज के लिये वही वर्ण अन्य बात का सूचक होता है, जैसे पाश्चात्यों में नीली आँखें सुंदरता की प्रतीक है, भारत में काली आँखें। वहाँ सुनहरे बाल और यहाँ काले घुँघराले बाल सुंदरता व्यक्त करते हैं। अतः सौंदर्या- त्मक दृष्टि एवं वर्णों के संकेतों में देश, समाज, संस्कृति एवं व्यक्ति के अनुसार विभिन्नता हो सकती है। मनोविज्ञान से भी यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि वर्णों का एक विशेष भावात्मक मूल्य (emotive value) होता है, जिसका मनुष्य के जीवन में महत्त्वपूर्ण स्थान है। वुंड ने कहा है कि "रंग का सम्बन्ध मावना से है और उनसे भावनाओं को बल मिलता है। "१ वर्ण के भावात्मक मूल्य से कोई रंगविशेष सूचित होता है। एक अंग्रेज़ आलोचक मिस डाउने ने इस विषय में पर्याप्त विचार किया है और काव्य में व्यंजित रंगविशेषों से भावात्मक संगति बिठाई है।"२ १. काव्यदर्पण से उद्धृत - The colours are not simple sensations, they have an affective tone proper to themselves. (प. २९) २. Creative imagination - The Poetry of Colour. (पृ. ३६)
Page 150
रस के देवता और वर्ण १२५
पाश्चात्यों में वर्ण के भावात्मक मूल्य की दृष्टि से मनोविज्ञान के आधार पर विचार किया गया है पर साथ ही भारत में भी प्राचीन काल से रंगों के भावात्मक मूल्य के संकेत अप्रत्यक्षतः प्राप्त होते हैं । भारतीय परंपरा में विभिन्न रागों के वर्ण निश्चित किये गये हैं। प्रातिशारण्यसूत्र में छन्दों के वर्ण होने का उल्लेख है। 'रूपमण्डन' में चित्रों के रंगों की विशेष भावात्मक व्याख्या है।9 इनमें भावात्मक मूल्य के साथ सांस्कृतिक सन्दर्भ भी जुडा हुआ ह। डॉ. झारी ने इस विषय में कहा है, "वास्तव में रंगों का आधार स्पष्ट रूप से सांस्कृतिक है । मानवसंस्कृति के इतिहास में भिन्न जातियों के अपने-अपने व्यवहार और सभ्यता के चिन्ह तथा सामाजिक संस्कार बन जाते हैं।" डॉ. कीथ ने "संस्कृत ड्रामा " नामक ग्रंथ में भरत की वर्णयोजना की व्याख्या करने का प्रयास किया है।२ परंतु इसमें भी त्रुटि मालूम होती है। संस्कार के अनुसार देखा जाय तो प्रेम का रंग लाल माना गया है। फिर शंगार के लिए लाल के स्थान पर श्याम वर्ण की योजना क्यों ? श्याम वर्ण के साथ संगति बैठने के लिए डॉ. झारी शृंगार के देवता ही बदलना चाहते हैं, परंतु विष्णु से श्याम वर्ण की संगति होती है। भारत में काले रंग को अशुभ मानते हैं, नील को नहीं। नीला रंग तो गंभीरता, भव्यता और विशालता का प्रतीक है।२ यह महाकाल के नीले कण्ठ का रंग हो सकता है। कालदेव का काला वर्ण भयसूचक है, महाकाल का नील वर्ण बीभत्स का नहीं, बल्कि गंभीरता का सूचक है। यम के कपोतों का भूरा वर्ण उदासी, शोक, कारुण्य व्यक्त करता है। रुद्र की पीठ तो लाल है पर साथ ही
१. सम्मेलनपत्रिका, पृ. ४२०-४२४. R. In each case the theosists give full determinents and the consequent of each emotion which becomes a sentiment and a special colour is ascribed to each, it is not surpri- sing to find that red is associated with the fury, black with fear, whiteness may, in association with the comic sentiment, be explained by the flashing teeth of a llaughing maiden, and the dark (yama) colour of the erotic sentiment is a reflex of the favoured hue of the beloved, grey accords with pathos but the connection of yellow with wonder, dark blue with horror and orange with heroism is not obvious. -Sanskrit Drama, P. 391 3. Creative Imagiantion, P. 87
Page 151
१२६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
लाल रंग क्रोधसूचक ही है। हास्य के सफेद रंग की संगति धवल दंतपक्तियों से बैठाई जाती है। निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि भरतकालीन समाज में प्रचलित दैवतशास्त्र के अनुसार अवधारणाओं को स्वीकार करके रसों के लिए देवताओं की नियुक्ति की गई है। रसों के वर्णों की योजना का आधार सांस्कृतिक एवं भावात्मक है।
Page 152
षृष्ठ अध्याय
रससंख्या
रसचर्चा के प्रवाह में रससंख्या का प्रश्न बहुचर्चचित एवं विवादग्रस्त है। भरत की स्थापना को लेकर उसके पश्चात् आज तक इस चर्चा की सुदीर्घ परम्परा बनी रही। अधिकतर आचार्य परम्परा का पालन करते रहे और आप्तवचन पर विश्वास कर परम्परा के प्रति उनका आग्रह रहा। परंतु कहीं-कहीं मुनिवचन से विद्रोह करके रससंख्या, गौणत्व-प्रधानता में शोधन, परिवर्धन एवं परिवर्तन किया गया। रस की संख्या में विस्तार, संकोच, उसका वर्गीकरण और गौणत्व-प्रधानत्व आदि कतिपय विषयोंपर चचाएँ होती रहीं और उस प्रवाह में एक रस से लेकर कितने ही रस गिनाये गये, कभी किसीने एक रस को रसराज माना तो दूसरे किसी विद्वान ने अन्य (किसी) रस में सब रसों का समाहार माना। कभी-कभी केवल नवीनता के मोह में नवनवीन रसों की उद्भावनाएँ की गई पर पानी में क्षणिक उठनेवाले बुदबुदों की भाँति वे नष्ट हो गई। नवीन उद्भावनाओं में व्यक्तिगत प्रतिमा एवं सूझ का योगदान था, परंतु इनके अतिरिक्त अन्य कुछ प्रभावी कारण भी हो सकते हैं। रससंख्या के सन्दर्भ में परम्परा से मान्य रसों की रसमयता का पुनराख्यान करना, कुछ रसों का अन्य रसों में अन्तर्भाव उचित मानना और नवीन रसों की उद्भावना करना इन तीनों प्रकार से चर्चा की जाती है। रससंख्या में परिवर्तन और विकास की अखण्ड परम्परा के मूल में होनेवाले प्रधान कारणों की चर्चा करना भावश्यक प्रतीत होता है। किसी कालविशेष में जिस काव्य की सर्जना होती है, उस समग्र काव्य का एक विशेष 'टोन' होता है। कालविशेष में विशेष प्रकार की प्रवृत्तियाँ समकालीन साहित्य में व्यक्त होती हैं। साहित्य समसामयिक परिस्थिति से प्रत्यक्ष वा अप्रत्यक्ष रूप में प्रेरणा ग्रहण करता है और उस साहित्य के स्वरूप, अनुभूति और अभिव्यक्ति पर समकालीन चेतना का प्रभाव होता है। कालभेद से साहित्य की रूपात्मक विविधता
Page 153
१२८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
ही उत्पन्न नहीं होती, साथ ही विषय-चयन और जीवन के साहित्यिक चित्रण में भी अंतर आता है। इससे साहित्य में चित्रित आलम्बनादि में भी परिवर्तन होता है जिसके कारण रसों की संख्या एवं भेदों में कुछ घटाई-बढ़ाई अवश्य होती है। समाजगत वातावरण के प्रभाव में मानव-जीवन विशेष प्रभावित होता है, जिसके फलस्वरूप कई भाव विशेष जागृत होते हैं इस दृष्टि से विशिष्ट युग में समाज की वातावरणगत स्थिति की सापेक्षता में पूरे समाजजीवन में कोई भावविशेष का प्रभावकारी प्राधान्य रहता है। उसके अनुरूप उसी विशेष भाव की अभिव्यक्ति मानवजीवन तथा समाज- जीवन में प्रमुखता रखती है। प्रगतिवादी समीक्षा के समर्थक श्री. क्रिस्टोफर कॉडवेल ने इस भाव को सामूहिक मावना (Collective Emotion) कहा है। इनके मत में काव्य मनुष्यों की व्यक्त होनेवाली आत्मचेतना होती है, परन्तु व्यक्तिरूप में नहीं, अपितु अन्यान्य व्यक्तियों के साधारण भावों के साझेदार के रूप में है।' समाज की परिवर्तनशीलता के साथ साहित्य सामूहिक भाव प्रगट करता है। परि- स्थितियों और संस्कारों के कारण देश या समाज में कोई भावविशेष अपनी स्थिति बना लेता है। सच्चे कलाकार को सामूहिक भाव की पहचान होनी चाहिये। प्रगति- वादी लेखक अमृतराय ने कॉडवेल के सामूहिक भाव को लोकहृदय से संबद्ध करते हुए उसकी विशेषताओं को स्पष्ट किया है।२ सामूहिक भाव युग तथा समाजजीवन- सापेक्ष होनेसे परिवर्तनशील होते हैं। वे किसी युग या समाजविशेष की परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। कॉडवेल के सामूहिक भावना के मूल में स्थित आर्थिक सम्बन्धों को हटाकर साधारण रूप से इस कल्पना को स्वीकार किया जा सकता है। विशेष युग में समकालीन स्थिति की सापेक्षता में उदित होनेवाला सामूहिक भाव साहित्य को प्रभावित अवश्य करता है। सामाजिक परिवेशगत स्थिति, संस्कृति, धर्म, समाज, संस्था, व्यक्ति और राजनीति आदि का समग्र रूप पर्यावरण तथा युगविशेष को प्रभावित करता है और उसका एक सामूहिक भाव प्रधान बनाता है। इस प्रकार सामूहिक भाव को समान शास्त्रीय दृष्टि ही नहीं, अपितु मनोवैज्ञानिक आधार भी है, अतः इस पृष्ठभूमि को लेकर समकालीन साहित्यिक उपलब्धि, परिवेशगत स्थितिविशेष और सामूहिक भाव के आधार पर रससंख्या की समस्या को सामाजिक दृष्टिकोण से परखना इस अध्याय में अभीष्ट है। सबसे प्रथम रससंख्या का विकासक्रम प्रस्तुत करना उचित होगा। भरत की रस- सिद्धान्त की स्थापना में आठ ही रस हैं। शंगार, वीर, रौद्र, बीभत्स, हास्य, अद्भुत,
₹. Illusion and Reality, P. 31. २. नयी समीक्षा, पृ. २४