Books / Rasa Siddhant Ka Samajik Mulyanka Durga Dixit

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रससंख्या १२९

करुण और भयानक इन आठ रसों में प्रथम चार को प्रधान और चार को गौण बताया गया है। दण्डी भामह ने आठ रसों को ही स्वीकृत किया। उसके पश्चात् उद्मट ने शान्त रस की स्थापना करके नौ रस मान्य किये। कुछ लोग इस पर आपत्ति उठाते हुए कहते हैं कि सम्भवतः नाट्य और श्रव्य काव्य की दो भिन्न धाराएँ रही हों और उनमें से श्रव्य की धारा ने शान्त को पहले ही स्वीकार किया हो। पर इतना निश्चित है कि उद्भट में शान्त रस की स्वीकृति पहली बार प्राप्त होती है। रुद्रट ने प्रेयान् को मिलाकर दस रस गिनाये। रुद्रभट्ट ने भी नौ ही माने। धनंजय ने प्रेयान् या भक्ति का खण्डन करते हुए मृगया, अक्ष आदि को उसमें मिलाया। इससे लगता है कि मक्ति रस की स्थापना उसके पूर्व हो चुकी होगी। रसों की संख्या में वृद्धि की प्रवृत्ति इतनी अधिक बढती गई कि आचार्यों में यह एक समस्या ही उत्पन्न हो गई। इसका उल्लेख लोल्लट के कथन में है। "श्री. लोल्लट ने रससंख्या की बढ़ती हुई अराजकता को ध्यान में रखकर विद्वत्परिषद बुलाने का आग्रह प्रकट किया था।"१ और अभिनव ने भी स्पष्टतः उल्लेख किया है कि, "तेन रसान्तर संभवेपि पार्षद प्रसिद्धया संख्या नियमः।" रससंख्याविकास के प्रवाह में रुद्रट ने तो यहाँ तक कहा कि आस्वाद्यता की कसौटी को सारे भावों का रसरूप मान लिया जा सकता है। इस अतिविस्तारवादी वृत्ति पर अभिनवगुप्त ने अंकुश लगाया और नौ रसों की प्रतिष्ठापना नाट्य और काव्य के लिये की, जिनमें शान्त को भी स्वीकार किया था। इसके अतिरिक्त लौल्य, भक्ति, स्नेह आदि रस गिनाये गये। उसके पश्चात् फिर विस्तार की प्रवृत्ति बढ़ती ही गई और भोज ने प्रेयान, उदात्त, उद्धत आदि की स्थापना कर बारह रस गिने। ंगार को अहंकार के रूप में भिन्न रसराजत्व प्रदान किया गया। इसके अतिरिक्त स्वातंत्र्य, हर्ष, आनन्द, प्रशम, परिवश्य, साध्वस, विलास, अनुराग तथा संयम आदि कतिपय रस गिनाये गये। नाट्यदर्पणकार रामचन्द्र गुणचन्द्र के समय व्यसन (तृष्णा), दुःख, अरति, और सुख ये रस माने जाते थे। चौदहवीं शताब्दी के आचार्य विश्वनाथ ने वत्सल रस की स्थापना के साथ ही अद्भुत को रसराजत्व दिया। भानुदत्त ने रस का लौकिक अलौकिक रूप में वर्गीकरण करते हुए नौ पूर्वमान्य रसों के अतिरिक्त भक्ति, वत्सल, और लौल्य को स्वीकार करते हुए कार्पण्य (स्पृहा) तथा माया इन दो नये रसों की प्रतिष्ठापना की। संगीतसुधाकर ने ब्रम्ह, संभोग, विप्रलंभ की स्थापना की। वैष्णव आचार्य रूपगोस्वामी ने विरोधों के बावजूद भक्ति रस और मधुर रस की प्रधानता प्रतिष्ठापित की। बाद में क्रीडनक नामक रस माना गया। पुनः पण्डितराज जगन्नाथ १. आधुनिक हिन्दी और मराठी में काव्यशास्त्रीय अध्ययन, पृ. १२७. रस ... ९

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१३० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन जैसे संस्कृत के अन्तिम आचार्य काव्यशास्त्री ने विस्तारवादी वृत्ति का खण्डन करते हुए नौ रसों को मान्यता दी। परंतु तत्पश्चात् यह विस्तारवादी प्रवृत्ति नष्ट नहीं हुई। रससंख्या में वृद्धि एवं परिवर्तन का क्रम बना रहा। हिन्दी, मराठी और अन्य भाषा के काव्यशास्त्र में यह प्रक्रिया निरन्तर चलती रही। आचार्य शुक्ल जी ने प्रकृति रस की उद्भावना की। वही मराठी में उदात्त रस के रूप में प्रस्फुटित हुई। श्री. शि. म. परांजपे ने देशभक्ति रस की स्थापना की। प्रेम रस की स्थापना आचार्य कालेलकर ने की, प्रो. जावडेकर ने क्रान्ति रस माना तो श्री. देशपांडे 'अनिलः' ने प्रक्षोम की उपलब्धि की। श्री. वाटवे ने उद्वेग की प्रतिष्ठापना और विनोद रस का व्याख्यान किया। श्री. इलाचन्द्र जोशी ने विषाद को रस माना तो डॉ. पु. ग. सहस्रबुद्धे ने सोंदर्यरस की नवीन उद्भावना प्रस्तुत की। डॉ. गणपतिचन्द्र गुप्त ने बौद्धिक रस की स्थापना की है। यहाँ तक कि आज ऐतिहासिक रस और वैज्ञानिक रस की माँग हो रही है। इस विषय में सर्वप्रथम एवं प्रधान प्रश्न यह है कि भरतमुनि द्वारा आठ ही रसों की स्वीकृति एवं स्थापना क्यों की गयी ? भरत द्वारा आठ रसों की स्वीकृति के कारणों में विद्वानों में पर्याप्त मतभिन्नता रही है। सम्मवतः भरत के पूर्व रस की दो धाराएँ प्रचलित रही हों। एक वासुकी और दूसरी द्रुहिण की। भरत ने द्रुहिणवादी अष्टरसों को स्वीकार किया है। इस बात को स्वयं उन्होंने स्पष्ट भी किया है। आठ रसों के ग्रहण के मूल में अथर्ववेद से प्रेरणा ग्रहण करने की बात कही जाती है। अथर्ववेद में आयुर्वेद की प्रधानता है। अतः बहुत सम्भव है कि भरत ने आयुर्वेद से रससंख्या को स्वीकार किया हो परंतु आयुर्वेद में षड्रस माने गये हैं, अतः रसों की संख्या का प्रश्न उस आधार पर सुलझाया नहीं जा सकता। इस विषय में एक अन्य कारण बताया जा सकता है कि भरत के सम्मुख नाट्य- प्रयोग, अभिनय तथा रंगमंच था। रंगमंचीय दृष्टि से शांत का प्रभाव नहीं हो सकता। अतः नौ रसों की पूर्वपरम्परा के होते हुए भी आठ रसों को स्वीकार किया होगा और नाट्य के लिए शांत को उचित नहीं समझा होगा। परंतु यह कारण भी पर्याप्त समाधान नहीं दे सकता। बौद्ध और जैन धर्मों के प्रभाव से उत्पन्न निवृत्ति- परकता को स्वीकार न करके वस्तुवादी दृष्टि इसके मूल में हो सकती है। आठ रसों में चार को प्रधान और चार को गौण क्यों माना गया ? अतः रसचतुष्ट की स्थापना के मूल में स्थित कारणों का विचार करना आवश्यक है। अभिनवगुप्त द्वारा कथित कारण है कि, "शृंगारादि चार रसों से हास्यादि चार रसों की उत्पत्ति में पुरुषार्थचतुष्टय अर्थात धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष का आधार है।" परंतु अभिनवगुप्त के इस मत का खण्डन करते हुए डॉ. झारी कहते हैं कि अभिनव क

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इस मत से सहमत होना कठिन है, क्योंकि करुणादि 'उत्पाद्य' चार रसों में भी पुरुषार्थ और सौन्दर्यातिशयता पायी जाती है।' भावप्रकाशकार चार वेदों से चार रसों के स्वीकार किये जाने की बात करते हैं। उनके मतानुसार भरत ने चार वेदों से प्रेरणा ग्रहण की है। ब्रह्मा से प्रमावित होकर सामवेद से शृंगार, ऋग्वेद से वीर रस, अथर्ववेद से रौद्र रस और यजुर्वेद से बीभत्स रस फिर प्रत्येक से क्रमशः हास्य, अद्भुत, करुण और भयानक पैदा हुए।२ परंतु यह बात भी ठीक नहीं लगती। क्योंकि चार रसों में से किसी एक-एक की प्रधानता किसी वेद में नहीं हैं। श्री. ग. वयं. देशपांडे ने भी पुरुषार्थनिष्ठता को महत्ता दी है।३ स्वयं भरत ने नाट्य के सन्दर्भ में उल्लेख किया है। क्वचिद्धर्मः, क्वचित्क्रीडा, क्कचिदर्थः, कचिच्छमः, क्ृचिद्धास्यं, क्वचिद्युद्धं, क्वचित्काम,: कचिद्धः। धर्मो धर्म- प्रवृत्तानां, कामः कामोपसेविनाम् कहा है। अर्थात् स्पष्टतः यद्यपि चार पुरुषार्थों की सिद्धि नहीं लिखी है, फिर भी तत्कालीन मानवजीवन के अंतिम आदर्श का संकेत इसमें है। फिर भी भरतप्रणीत चार रसों की धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष से संगति नहीं बैठती। पुरुषार्थ पुरुष का स्वयं प्रार्थित अर्थ। अतः उपर्युक्त कथन भी पूर्णतः लागू नहीं होता। फिर शान्त का क्या होगा ? क्या मोक्ष की पूर्ति के लिए उसका स्वीकार करना पडेगा? प्रा. बेडेकर ने रसव्यूह बनाकर देवासुर, द्वंद्व कथा के द्वारा असत् और सत् के प्रतीक एवं प्रतिनिधित्व करनेवाले चार रस माने हैं।४ डॉ. वाटवे मुख्य प्रवृत्तियों (primary emotions) को प्रधानता देते हुए मनोवैज्ञानिक भित्ति पर भावों की अप्रधानता-प्रधानता को स्वीकार कर आठ रसों का प्रधानत्व मान्य करते हैं। उनसे भी सहमत होना कठिन है, क्योंकि मनोविज्ञान के भावों को रससिद्धान्त के भाव मान लेने से सब समस्याएँ सुलझ नहीं सकती। अतः वह आधार अधूरा है। प्रो. तालवार ने कहा है, "ब्रह्मा प्रभावित हुए तो उनके चार मुखों से चार रसों का संचरण हुआ-श्ृंगार, रौद्र, वीर और बीभत्स। भरतमुनि ने इन्हीं चार रसों को आदि रस माना है। "५ प्राचीन भारतीय चिंतन की प्रधान भित्ति धर्म ही रही है। भरतकालीन समाज में कलाओं का अंतिम लक्ष्य धर्म था। चार पुरुषार्थ तत्कालीन सामाजिक जीवन की आधारशिलाएँ थीं। भरतमुनि पर वैदिक धर्म का विशेष प्रभाव रहा है। प्राचीन

१. बीभत्स रस और हिन्दी साहित्य, पृ. ५४. २. भारती पत्रिका, मई १९६६, पृ. ११२. ३. भारतीय साहित्यशास्त्र, पृ. ३४६. ४. साहित्यविचार, पृ. ४०. ५. जनभारती, पृ. ५१

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१३२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

भारतीय धर्मप्रधान समाज एवं संस्कृति में कर्मवाद, वर्णाश्रमव्यवस्था, पुरुषार्थनिष्ठा आदि के साथ समाजजीवन के तत्त्वों का धर्म के अंतर्गत समावेश था। धर्म के सूत्र में गुँथा हुआ प्राचीन भारतीय जीवन एक प्रकार की सामूहिक एकता एवं एकसंघता से युक्त था। कलाओं का स्थान भी जीवन में घुलामिला तथा धर्म से सम्बद्ध था। साहित्य और जीवन की धर्म से अभिन्नता को प्रा. दि. के. बेडेकर ने इन शब्दों में व्यक्त किया है, "लौकिक और पारलौकिक, नैतिक, सामाजिक और व्यक्तिगत, रुखा व्यावहारिक एवं उत्साहपूर्ण कलात्मक सब व्यवहारों में आज समाज में जो द्वैत उत्पन्न हुआ है, वह प्राचीन काल में नहीं था। आज व्यक्ति के लिए धर्म स्वयं तक सीमित, पारलैकिक निष्ठा एवं व्यवहार के रूप में मात्र बचा है।"१ दैवतशास्त्र तथा विभिन्न कलाओं के विकास में भी समाज की यही धर्मसापेक्ष दृष्टि स्पष्टतः दिखाई देती है। विभिन्न देवताओं को प्रतीक रूप में मानते हुए मानवीय चरित्रों के आरोपण से उन्हें कुछ विशेषताओं के द्योतक बनाये हैं। आरम्म में नित्य त्रिमूर्ति की स्तुति की जाती है। भारतीय चिंतन में जैसे त्रिमूर्ति, त्रिशूल आदि कई परम्परागत आदर्श कल्पनाओं एवं सकेतों में त्रिकू की महत्ता या तीन संख्या का महत्त्व है, वैसे ही चार संख्या का भी रहा है। ब्रह्मा के चार मुख, चार आश्रम, चार वर्ण, चार वेद, चार संहिता, चार काया (बौद्धों में), चार आनंद (वज्रयान के), चार यज्ञ (चतुमेध), चार धातु (पृथ्वी, आप, तेज, वायु), चतुर्व्यूह, चार युग आदि के द्वारा भारतीय संस्कृति में चार संख्या की लोकप्रियता स्पष्ट हो सकती है। अतः रसों की चार संख्या की स्वीकृति से इसकी संगति बिठायी जा सकती है। ब्रह्मा ने 'नाट्यवेद' की निर्मिति की, अतः ब्रह्मा के चार मुखों से प्राप्त इस पाँचवें वेद के रसों की चार संख्या की संगति लगती है। परंतु रसों के देवताओं की स्थापना में ब्रह्मा गौण रस (उपरस) के देवता बनाये गये हैं। अतः देवताओं की महत्ता के आधार पर संख्या का प्रश्न सुलझाया नहीं जा सकता। श्री. बेडेकर का देव और असुर के द्वंद्व को भारतीय नाट्य के रसचतुष्टय का अधिष्ठान मानना२ स्वीकार किया जा सकता है। क्योंकि मरत ने आरम्भ में ही अपनी वेदश्रद्धा व्यक्त की है तथा नाट्यप्रयोग एवं शास्त्रीय सिद्धान्त स्थापना के आधाररूप में देवासुरद्वंद्व को ग्रहण किया है। उसके लिए दो कथाएँ स्वीकृत की गई हैं, असुरविजय और अमृतमंथन। ये दोनों ही पौराणिक कथाएँ सुर और असुरों के जीवन से सम्बन्धित हैं और उसके प्रेक्षक भी देव और असुर हैं।

१. साहित्यविचार, पृ. २७. २. साहित्यविचार, पृ. ४१.

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भरत के सम्मुख तत्कालीन लोकजीवन था। चरित्रविषयक दृष्टिकोण, जीवनप्रसंग, विभिन्न घटनाएँ आदि को ध्यान में लेकर भरत ने अपने सम्मुख उपस्थित जीवन से, जो आभिजात्य, उच्च कुलीन संस्कृति से युक्त एवं आदर्शसंपन्न, वर्णाश्रम व्यवस्था से बद्ध था, प्रेरणा ग्रहण कर अच्छा-बुरा, सत्-असत् के विरोधात्मक बिंदुओं को सुरों और असुरों के रूप में उपस्थित किया है। प्रत्यक्षतः यह देव-दानवों के संग्राम का नाट्य ही नहीं बल्कि मानवसमाज में निरन्तर घटित होनेवाले कतिपय प्रसंगों का प्रतिनिधित्व करता है। तत्कालोन एकसन्घ, इकाईपूर्ण उच्च संस्कारशील जीवन को आदर्शवत् मान- कर उसको इस प्रतीक के द्वारा भरत ने उपस्थित किया है, जिसके कारण इन चार रसों को स्वीकार किया गया। इनमें मुख्यतः ब्राह्मणत्व और क्षत्रियत्व की प्रतिष्ठा है, धर्म और युद्ध की महत्ता है, यथार्थवादिता से आदर्श की रक्षा है। भरतपूर्व काल से व्यवहार में मान्य, पूर्ववर्ती आचार्यों से स्वीकृत रसों के नामों की ओर देखने से पता चलता है कि महाकाव्यों का प्रभाव रसों के स्वीकारने में अवश्य रहा होगा। प्रत्यक्षतः समाज में जो घटनाएँ घटित होती थीं, महाकाव्यों के काल में जिस युद्धप्रधान संस्कृति की जो महत्ता या विशेषता रही, उससे युद्धवीरता भारतीय सांस्कृतिक जनजीवन का आदर्श रही थी। मानव के जीवनादर्श एवं अनुभवों की विशेषताओं को देखने पर पता चलता है कि समाज के सांस्कृतिक परिवेश से ही रस की धारा फूटी है। आदिकवि की पंक्ति "मा निषाद ... " में करूण की उत्कट व्यंजना की रसधारा फूट पडी है। डॉ. कृष्णदेव झारी उसे बीमत्स का उद्गम स्थल मानते हैं। एक बात निश्चित है कि महाकाव्य ही भारतीय रसधारा का आद्य प्रणयन स्थान रहा जिससे धाराएँ उन्मुक्त रूप से बहीं और तत्पश्चात् फिर शास्त्ररूप में उसकी चचाएँ चलती रहीं। तब से प्रवाहित रस की परम्परा को देखने पर ज्ञात होता है कि रामायण और महाभारत अष्टरस ही क्यों, बल्कि नवरसों से ओतप्रोत हैं। अतः आठ रसों के स्वीकार की कल्पना प्राचीन भारतीय जीवन के परिवेश में संगत है। अभिजात, उन्मुक्त परंतु स्थूल, रति एवं वीरता से परिपूर्ण प्राचीन भारतीय जीवन उन्नत एवं सम्पन्न होते हुए विभिन्न भावनाओं की उत्कट अभिव्यक्तियों से परिपूर्ण था। परम्परा ने वीरता और रति के कतिपय आदर्श विरासत के रूप में प्रत्यक्ष रखे हैं। अतः समग्र भारतीय सांस्कृतिक जीवन का साररूप अष्टरस में व्याप्त है। शृंगार को अग्रस्थान देने के कतिपय कारण विद्वानों द्वारा प्रस्तुत किये जा चुके हैं, परंतु जैसे पहले स्पष्ट किया गया है कि सामाजिक संदर्भ में प्रसूतत्व एवं निर्माण के सूचक संकेत के रू। ों विष्णु का ग्रहण और मानव की उत्पत्ति का कारण यह भाव होने से उसे अग्रस्थान स्वाभाविकतया प्राप्त होता है। वीरत्व की प्रतिष्ठा

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१३४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन भरतकालीन समाज में अवश्य ही थी, जिसके फलस्वरुप रौद्र और बीमत्स आये। शंगार के मूल में रतिभाव का स्वीकार है। स्पष्ट है कि मानव का मूल जीवनाधार यही प्रवृत्ति है। सर्जनात्मकता एवं निर्माणक्षमता के प्रतीक के रूप में रतिभाव ने ही तो मानव में सर्व- प्रथम सौंदर्यवृत्ति को जगाया और सारे जगत से आकर्षण उत्पन्न किया। अर्थात् साहित्य के प्राण सौंदर्यवृत्ति को जगानेवाली यह मूलभूत उर्वराशक्ति है। शंगार के विभिन्न अर्थों एवं सम्बन्धों को स्पष्ट कर विद्वानों ने उसके अग्रस्थान की चर्चा की है। प्रा. बेडेकर ने मिथुनमाव की महत्ता को भारतीय परम्परा-प्रवाह के सन्दर्भ में समझाते हुए शंगार का अर्थ शुभ लगाना उचित माना है। किसी ने युवावस्था की ओर संकेत किया है। अर्थात् लगभग सारे काव्यशास्त्रियों ने शंगार रस को रससंख्या में अग्रस्थान देना मान्य किया है। सूक्ष्म अवलोकन करें तो इसमें सन्देह नहीं है कि आदिकवि की प्रतिमा से एक मिथुन में भग्न क्रौंच पंछी के जोडे के क्रंदन से रसधारा फूट पडी है। अतएव संगार की प्रधानता को स्वीकार करना पडता है। परन्तु श्री. न. चिं. केळकर शंगार के अग्रस्थान को मान्य करते हुए कहते हैं, "लोग कहेंगे कि मानवसृष्टि की परम्परा बनाये रखने के लिये रतिभाव आवश्यक है और रतिभाव जिसका स्थायीभाव है वह शंगार रस। इससे शृंगार को प्रथम स्थान देना चाहिये। परंतु यह प्रमाण व्यर्थ है। मानवसृष्टि की परम्परा बनाये रखने के लिये अर्थात जैसे संतति-उत्पत्ति के लिए रतिभाव आवश्यक है, वैसे संततिसंरक्षार्थ "वात्सल्य" भाव की आवश्यकता होती है। "१ आधुनिक आलोचकों का वैयक्तिक दृष्टिकोण मात्र कहा जा सकता है, अन्यथा आज भी शृंगारपूर्ण साहित्य की माँग एवं खपत अधिक है। वीर रस के स्वीकार में किसी ने भी कभी आपत्ति नहीं उठायी। सम्भवतः वीर रस युद्ध प्रधान संस्कृति में स्वीकृत किया गया होगा। भरतकालीन समाज में युद्ध की विशेष प्रधानता होने के कारण युद्धवीर को स्वीकार कर प्रधान रूप देना स्वाभाविक ही था। पर साथ ही धर्मवीरता और दानवीरता के आदर्श उसके समक्ष थे। अर्थात् भेदों की दृष्टि से आचार्यो ने नित्य परिवर्तन अपनाये। वीर रस के कई भेद-उपभेद गिनाये गयें और आधुनिक काल में वीरत्व की व्याख्या नये सन्दर्भ में करते हुए "पंचम- विशिख" की स्थापना का प्रयास भी रहा अर्थात् अहिंसा वीर। रौद्र के सम्बन्ध में भरत की स्थापना पर आचार्यो में मतभिन्नता रही है। कुछ विद्वान क्रोध के तामसिक स्वरूप के कारण रौद्र का स्थान अस्वीकार करते हैं। कुछ रौद्र रस का अंतर्भाव वीर रस में करना चाहते हैं। डॉ. वाटवे ने२ अमर्ष को वीर रस का स्थायीभाव मानकर रौद्र रस की पृथक् सत्ता को ही अस्वीकार किया है। बीभत्स रस के स्वीकार १. हास्यरसविचार, पृ. ३१३-१४. २. रसविमर्श, पृ. २५९; अभिनव काव्यप्रकाश, १०३।१०७

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में आधुनिक कतिपय विद्वानों में विरोध की भावना दिखाई देती है। प्रा. बेडेकर को लगता है भरतकालीन रणभूमि से संलग्न जीवन से प्रेरित और देवासुरसंग्राम कथा से निकटवर्ती जीवन की कल्पना में रौद्र और बीभत्स को निकाल डालना, किसी गाडी के एक पहिये को ही निकाल डालना है ।9 कोई बीभत्स रस की आस्वाद्यता पर प्रश्नचिन्ह लगाकर तो कोई मनोवैज्ञानिक कसौटी पर कसकर उसकी अनावश्यकता को प्रकट करते हैं। डॉ. वाटवे तथा श्री. द.के. केळकर२ अनास्वाद्य और साहित्य में अप्रधान होने के कारण बीभत्स रस का बहिष्कार करना चाहते हैं। बीभत्स रस के पारम्पारिक रूप को पूर्णतया त्याग कर, नये युग में मानसिक जुगुप्सा पर आधारित बीभत्स रस का व्यापक व्याख्यान डॉ. कृष्णदेव झारी ने अपने प्रबन्ध में किया है। भरत की हास्य रस की स्थापना में संस्कृत साहित्यान्तर्गत हास्यविनोद, राजाश्रयी विदूषक आदि अभिजात जीवन में पनपनेवाला हास्य था और उसे शंगार की विकृति मात्र मानकर उपरस का स्थान प्राप्त हुआ। प्राचीन काल में हास्य रसप्रधान साहित्य भी अधिक उपलब्ध नहीं था। अतः रसमालिका में यद्यपि हास्य को स्थान प्राप्त है, परंतु उसके विकसित रूप को नहीं। युगपरिवर्तन में हास्यप्रधान साहित्य की उपलब्धि, मुक्त समाजजीवन आदि के साथ हास्य का विकास होकर आधुनिक विद्वान श्री.न. चिं. केळकर ने उसे रसराज की उपाधि प्रदान की है और स्पष्ट आधारों के साथ रसराजत्व सिद्ध करने का प्रयास किया है।३ बीसवीं सदी की यह स्थापना साहित्याभिरुचि एवं हास्यप्रधान विपुल साहित्यसर्जना का फल है। अद्भुत रस को वीर का उत्पाद्य मानकर भरतकालीन वीर नायक के अद्भुतरम्य कृतित्व की व्यंजना को महत्ता थी। भरत के पश्चात् उसकी विशेष चर्चा न होकर आप्तवचनप्रमाण माना गया और नारायण ने चमत्कार रूप में उसे रसराज की उपाधि दी। सम्भवतः तेरहवीं चौदहवीं शताब्दी के आसपास साहित्यसर्जना पर दरबारी चमत्कारपूर्ण प्रवृत्ति का विशेष प्रभाव रहा होगा। आधुनिक विद्वान परिवर्तित युग के परिवेश में भद्भुत के अस्तित्व पर भी आपत्ति उठाते हैं।४ करुण रस की उत्पत्ति में "रौद्रात् भवति करुणः" पर विद्वानों में पर्याप्त विचार रहा। परंतु प्रा. बेडेकर ने रसव्यूह के आधार पर राक्षसवत् आश्रय के क्रोधाभिव्यक्ति के कार्य के फलस्वरूप नायक का आत्मत्याग और उससे करुण रस की उत्पत्ति दिखाकर इस समीकरण को अच्छी तरह से समझाया है। "एको रसः करुणः इव" कहनेवाले भवभूति के कविहृदय पर रामायण के कारुण्य का अधिक प्रमाव रहा, जिसके कारण

१. साहित्यविचार, पृ. ४५ २. रसविमर्श, पृ. २५९; काव्यालोचन, पृ. १३४।१३५ ३. हास्यरसविचार, पृ. ३१७ ४. अभिनव काव्यप्रकाश, पृ. १०९

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१३६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

"उत्तररामचरित " की रचना हुई। इस प्रभाव के फलस्वरूप उसने उसे रसराज का स्थान दिया। मयानक रस को आचार्यों ने गौणत्व देकर आज के युग में "मानसिक भय" आदि के आवरण में मयानक रस का प्रश्न गौण ही माना है। भरत द्वारा स्वीकृत रसों की मालिका में शान्त और भक्ति का अन्तर्भाव नहीं है। उसके कारण भी सामाजिक परिवेश में ढूँढे जा सकते हैं। रसमालिका में शान्त रस का अस्तित्व पहले से विवाद्य रहा है। कुछ विद्वान शान्त का अन्तर्भाव भरत की स्थापना में करते हैं और कुछ श्लोकों के आधार पर नाट्य शास्त्र में शान्त रस का अस्तित्व प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं।१ परंतु अन्य कुछ विद्वान उसे प्रक्षिप्त मानते हैं। डॉ. राघवन के मत में भरत के रससिद्धान्त में रस रूप में शान्त रस को मान्यता न मिली हो, परंतु शान्त के उल्लख मिलते हैं। वे कहते हैं, "हम भरत की स्थापना में शान्त रस के कुछ अंश हूँढ सकते हैं। भरत स्वयं एक ऋषी होने से उन्होंने ऋषियों के समूह को नाट्यशास्त्र दिया। अतः कहीं भी ऋषी, तप, वन आदि का ध्यान क्वचित ही हटा सके हैं। वस्तुतः शान्त रस के कुछ अंशों एवं स्थितियों का उल्लेख भरत द्वारा अवश्य ही किया गया है"२ अभिनव ने उल्लेख किया है कि "प्रतीयत एवेति मुनिनाप्यंगीक्रियत एवं क्वचिच्छमः इत्यादि वदतः।" इनसे दो बातें प्रमाणित हो जाती हैं कि तत्कालीन समाज में काव्यशास्त्रीय चर्चाओं और आचार्यों में शान्त रस प्रचलित था। साथ ही मौर्यकाल से अशोक के काल तक राजाश्रय के कारण समाज पर जैन और बाद्ध धर्म का विशेष प्रभाव था। उस पृष्ठ- भूमि पर भरत द्वारा शान्त का अस्वीकार सूचित हो जाता है। साथ ही अन्य एक बात भी स्पष्ट हो जाती है कि भरत शान्त रस की परम्परा से भली-भाँति परिचित थे, काव्य में शान्त का महत्त्व भी उस समय था; इतना होते हुए भी उन्होंने रसमालिका में शान्त रस को स्वीकार नहीं किया। शान्त रस के अस्वीकार का कारण राघवन यों बताते हैं कि, "भरत के सम्मुख के मोक्षप्राप्ति के लिये और विरागपूर्ण नाटक नहीं थे। '3 इस

१. भरत का नाट्यशास्त्र, अ. ६, १०३-४-१०८-१०. R. We ean explore the possibilities of finding some aspects of S'anta in Bharat's accepted text ... Bharat, himself was a sage, gave a Natyashastra to an assemblange of sages. Bharat therefore, could hardly have lost sight of Rsis, the forests, Tapas, etc. As a matter of fact, Bharat does mention aspects of Santa rasa and its attendant conditions. -Number of Rasas; P. 17 3. Bharat did not have before him a specimen of drama written only for Moksha and Viragins. -Number of Rasas; P. 20.

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से सहमत होना कठिन है क्योंकि भरत के काल में अश्वघोष के नाटक लोकप्रियता पा चुके थे। बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को काव्यमय अभिव्यद्धि देने के हेतु से लिखे गये उसके नाटकों में शान्त रस की ही प्रधानता थी। अतः उनका यह तर्क निरर्थक प्रतीत होता है। नाट्यशास्त्र एवं रससिद्धान्त की स्थापना के मूल में भरत की दृष्टि विशुद्ध भनो- रंजनपरक और बोधवादी प्रयोगात्मकता से परिपूर्ण थी, इसका उल्लेख स्वयं उन्होंने ही किया है, अतः अभिनय तथा प्रवृत्तिकारक आस्वाद की दृष्टि से शान्त की अस्वीकृति करना सम्भव था। डॉ. दीक्षित ने शान्त रस के अस्वीकार के सन्दर्भ में भरत द्वारा अस्वीकृति, उसमें विक्रीयाजनकता होना, एवं वीर और बीभत्स में अन्तर्भाव होने की ओर संकेत किया है।9 रसचर्चा के ऐतिहासिक विकासकम में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि भरत की तत्कालीन समाज में उदित होनेवाले ब्राह्मणत्व-प्रधान धर्म में, विशेष श्रद्धा थी। वे बौद्ध और जैन धर्म के प्रभाव से बचना चाहते थे। पूर्ववर्ती समाज में इन धर्मों के प्रभावस्वरुप उत्पन्न निवृत्तिपरकता, विरक्ति और जीवन-भोग से वितृष्णा के स्थान पर प्रवृत्तिपरक यथार्थ दृष्टि साहित्य को देना भरत को अभीष्ट था । अतः उन्होंने शान्त रस को जानबूझकर अस्वीकार किया। भरत ने बौद्ध और जैन धर्म की निवृत्ति- परकता से आंतकित जनता को मोक्ष, निर्वाण, निवृत्ति आदि के बदले मनोरंजन-प्रधान प्रयोगशील रंगमंचीय, दृश्य एवं प्रवृत्तिपरक दृष्टिकोण दिया। तत्कालीन समाजस्थिति में भरत द्वारा साहित्यशास्त्र को यह बडा योगदान प्राप्त हुआ। उन्होंने प्रवृत्तिपरकता, वैदिक आस्था एवं प्रयोगशील दृष्टि के सहारे तत्कालीन जीवन को आदर्श की चौखट में बाँधकर रस की स्थापना की अतः शान्त रस से वे दूर रहे। शान्त रस के साथ भक्ति को भी भरत द्वारा स्वीकृत रसमालिका में स्थान नहीं है। परंतु यह प्रश्न उतना विवादग्रस्त नहीं है, जितना शान्त रस का विवाद्य है। भक्ति का विकास पुराणकाल में विशेष रूप से हुआ है। वेदकालीन समाज में प्राकृतिक देवताओं का आवाहन, यज्ञादि क्रियाओं की महत्ता थी और यज्ञ के चारों ओर ही जनजीवन गुँथा हुआ था। भरत पर वेदकालीन संस्कारों की विशेष छाप थी, जिसका उल्लेख किया जा चुका है। उपनिषद काल में ब्रह्म आर आत्मा की खोज हुई तथा उनके परस्पर सम्बधों की चर्चा के साथ चिंतनपरक दृष्टिकोण उपस्थित हुआ। फिर प्राकृतिक देवताओं के आवाहन के स्थान पर ब्रह्ममायादि की चर्चा विशुद्ध ज्ञानपरक दृष्टिकोण से होती रही। गौतम बुद्ध के उपदेश में ज्ञानपरकता, विचार, विवेक, कर्मकाण्ड का विरोध, जातपात का नाश, ईश्वर के अस्तित्व की अस्वीकृति आदि तत्त्वों

१. रससिद्धान्त : स्वरुपविश्लेषण, पृ. २५८.,

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१३८ रससिद्धान्द का सामाजिक मूल्यांकन के कारण भक्ति को स्थान नहीं था। यह बात अलग है कि आगे चलकर वे स्वयं भक्ति के उच्चतम आदर्श बन गये। मौर्यों के कालतक बौद्ध धर्म के उपदेश की छाप समाज पर पूर्णतः पडी हुई थी। भरत के काल में ब्राह्मणत्वप्रधान नये धर्म का उदय हो रहा था। उसे भरत ने विशेष रूप में स्वीकृत किया था। अतः भक्ति की विशेष प्रधानता भरत के समाज में नहीं थी। यद्यपि महाकाव्यों में भक्ति का स्रोत मिलता है' फिर भी भक्ति का वास्तविक उदय एवं विकास तथा विभिन्न संप्रदायों का विकास गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात् हुआ है। उसके प्रभावस्वरूप उस काल के साहित्य में भी मक्ति यह "सामूहिक भाव" ही बन गया था। परंतु भरत के काल में यह स्थिति नहीं थी। भरत द्वारा आठ रससंख्या की स्थापना के पश्चात् विकासक्रम में लगभग पाँच- सात सौ वर्षों में उसमें कुछ परिवर्तन नहीं दिखायी देता। परंतु उसके पश्चात् रससंख्या के विस्तार की और भेद-उपभेदादि चर्चा की बाढ़-सी आयी। समय-समय पर स्वीकृत रसों के नाम एवं महत्ता का गहराई से अध्ययन करने के पश्चात् प्रतीत होता है कि इस परिवर्तन के मूल में सामाजिक परिवर्तन एवं विकासक्रम ही हैं। कालपरिवर्तन के साथ समाज की परिस्थिति विशेष के अनुसार साहित्य का "सामूहिक भाव" रहा है। साहित्य में होनेवाले "सामूहिक भाव" ने काव्यशास्त्रीय चर्चा को अवश्य ही प्रभावित किया है। अतः रससंख्या के सन्दर्भ में उसी आधार को ग्रहण कर परीक्षण करना उचित होगा। युगीन प्रभाव में प्रधानतया राजनीति, धर्मक्रांति, विभिन्न धार्मिक संप्रदायों का विकास, सामाजिक परिवर्तन, दार्शनिक मतवाद और विशिष्ट साहित्यचेतना का महत्त्व रहा है। इस युगीन सामाजिक परिवेश के अतिरिक्त कहीं-कहीं व्यक्तिगत सूझ एवं नवीनता के मोह से रससंख्या में वृद्धि हुई है परंतु उसका महत्त्व कम रहा है। अतः समय-समय पर स्वीकृत रसों का समूह-विशेष बनाकर सामाजिक परिवेशगत प्रभाव को परखना यहाँ उद्देश्य है। शान्त-ब्राह्म-प्रशान्त-माया आदि रसों के मूल में यह दार्शनिक प्रभाव महत्त्वपूर्ण है। भरत के पश्चात् पाँच-सात शताब्दियों के अनन्तर रसमालिका में शान्त को प्रतिष्ठा देने का कार्य उद्भट द्वारा सम्पन्न हुआ। वेबर, व्हिन्टरनिट्स, डे आदि सब के मत में पाँचवीं शती में शान्त का स्वीकार हुआ है। जिस कारणवश भरत ने शान्त को स्वीकार नहीं किया, उसी कारण से बाद में उसका स्वीकार हुआ है। चौथी शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक का काल भारतीय दर्शनों के विकास का काल रहा है। गुप्त-वर्धन शासनकाल में हिंदु धर्म के विकास एवं राजाश्रय प्राप्ति के साथ बौद्ध धर्म का प्रचार एवं महत्त्व भी बढ़ा था। साथ ही भारतीय षड्दर्शनों का विकास निरंतर होता रहा। आठवीं शताब्दी में शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट द्वारा दार्शनिक क्रांति सम्पन्न हुई। इस स्थिति के फलस्वरूप भारतीय जीवन एवं साहित्य को

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रससंख्या १३९

दार्शनिक प्रभाव, सूक्ष्म चिन्तनपरकता, प्रगल्भ प्रज्ञा का विलास एवं ब्रह्मवाद ने प्रभावित किया। अद्वैतवाद के साथ ब्रह्मवाद, मायावाद, आत्मा-ब्रह्म की अमरता, विशुद्ध चैतन्य आदि के सहारे आध्यात्मिक आदर्शवाद की स्थापना हो गई। मेरे मत में उपर्युक्त सारे रसों के स्वीकार में यही दार्शनिक पृष्ठभूभि महत्त्व- पूर्ण है। वही इन रसों का मूल उत्स है। इसी काल में दार्शनिकता के धागों से रससूत्र गुँथा जाने लगा, आध्यात्मिक रूपकों एवं प्रतीकों को ग्रहण किया गया और उस आवरण को पुष्ट बनाने के लिए आध्यात्मिक भाव एवं दार्शनिक मतवाद के पोषक रसों को स्वीकार किया गया। इस काल के सारे काव्यशास्त्रियों, शंकुक, रुद्रट, भट्टतौत, भट्टनायक, अभिनवगुप्त, मम्मट, क्षेमेन्द्र आदि ने, शान्त को स्वीकृति दी है। समकालीन चिंतन के कारण जीवन के सुखदुःखादि एवं मिथ्या जगत के परे, सत्य में अधिक विश्वास होनेसे "निर्वेद " की महत्ता बढ़ी। अभिनवगुप्त ने तो शान्त रस को महत्ता देते हुए उसी में अन्य सभी रसों का परिहार माना। शंकराचार्य के अद्वैत की "माया" मिथ्या के प्रभाव से भानुदत्त के माया रस (मिथ्याज्ञान-स्थायीभाव) की स्थापना करने में ब्रह्मवाद की छाया है। वस्तुतः माया रस और शान्त रस परस्पर विपरीत हैं। माया का स्थायीभाव है मिथ्याज्ञान और शान्त रस का निर्वेद। अतः माया रस प्रवृत्तिमूलक है और शान्त रस निवृत्तिपरक। यहाँ इस भेद में पड़नेकी आवश्यकता नहीं है। यह निश्चित कहा जा सकता है कि दोनों की स्वीकृति के मूल में दार्शनिक प्रवाह ही है। संगीतसुधाकर के रचयिता का ब्राह्म रस संत ज्ञानेश्वर के "ब्रह्म रस" के वर्णन से मिलता है। जैन अनुयोग सुत्र में नौ रसों में नवम रस प्रशान्त है। इसे जैन दर्शन की फलश्रुति कहा जायेगा। परंतु इन रसों के स्वीकार की स्थापनाएँ लगभग समकालीन हैं। इस समय उत्तर भारत में अभिनवगुप्त ने शान्त रस को महत्तम पद पर स्थित किया, उसी काल में दक्षिण के महान सन्त ज्ञानेश्वर ने नवरसों को मान्यता देते हुए कहा, "नाना नवरस सुदब्धि परिपूर्ण" ... परंतु उन्होंने आठ रसों की अपेक्षा शान्त को विशेष महत्ता दी और उसमें शागार के सिर पर पाँव रखने की सामर्थ्य का होना बताया है।9 शान्तादि अन्य रसों के स्वीकार में अन्य एक कारण हो सकता है कि रस की चर्चा विशेषतः जब केवल काव्यरस के रूप में होने लगी तब शान्त आदि रसों का परिपोष सफल रूप से हो सकता था। अतएव उसके ग्रहण में कुछ प्रतिरोध नहीं रहा। इसीलिये सम्भवतः नितान्त नाट्यपरक दृष्टि रखनेवाले धनंजय शान्त रस के स्वीकार का विरोध करते हैं।२ १. ज्ञानेश्वरी, अध्याय १३, श्लोक ११५५ २. दशरुपक, पृ. १४८

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१४० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

सामाजिक परिवेश, परिवर्तन एवं स्थिति की सापेक्षता में साहित्यिक अभिव्यक्ति, आलम्बनादि में भी पर्याप्त अन्तर आया है। युगीन सामाजिक परिवेश की सापेक्षता में साहित्य का विशेष "टोन" बनता है और "सामूहिक भाव " भी भिन्न बन जाता हैं। शृंगार, प्रेयान, सख्य, प्रेम, वात्सल्य, स्नेह, उद्वेग, विषाद, आदि विभिन्न रसों की स्वीकृति में समकालीन सामाजिक स्थिति का प्रभाव ही विशेष रूप में परिलक्षित होता हैं। "रति" ने सामाजिक सम्बन्धों में भिन्न रूप धारण किया और सम्बधों के अनुसार उसका रूप एवं नाम बदलता आया है। इन सभी रूपों का चित्रण तो काव्य में प्राचीन काल से होता आया है पर नवयुग में भिन्न-भिन्न सन्दर्भों में उन भावों की उत्कटता प्रतीत होने के कारण काव्यशास्त्रियों को "रस का स्थान" देने का मोह होता है। आधुनिक युग में जो एक प्रकार का मानसिक तनाव, जटिलता, घुटन, और पीड़ा का अनुभव हो रहा है, उसने साहित्य में अभिव्यक्ति पायी है। अतः साहित्य में उद्वेग, विषाद, अवसाद, निराशा आदि भावों की विशेष अभिव्यक्ति है। काव्यशास्त्रियों को इन भावविशेषों में "रस" के नाम से अभिहित करने का आकर्षण उत्पन्न होकर रस की प्रतिष्ठा दी जाती है। परंतु वस्तुतः आज मानव के जटिलतम जीवन में कई ऐसे सम्मिश्र भावों का उदय होता है, उन सभी भावों को रस का स्थान देना उचित नहीं हो सकता। रस के लिये आस्वाद्यता आदि कई कसौटियों के साथ ही भाव की सघनता से काव्य में रसविभोरावस्था प्राप्त कराने की सामर्थ्य आवश्यक होती है। क्षणैक होनेवाले भावसंस्पर्श में वह सम्मत नहीं होती। अतः इन सारे रसों की स्वीकृति काव्यशास्त्र में विवाद्य बनी रही है। स्वातंत्र्यपूर्व काल में भारत में देशभक्ति की जैसी लहर उत्कटता एवं तीव्रतर रूप में उठी, वैसी पहले कभी नहीं उठी थी। राजनीतिक क्रान्ति ने पूरे साहित्य को झकझोर डाला। कवि क्रान्ति के नारे लगाने लगे, मातृभूमि का प्रेम और अंग्रेजों के प्रति प्रक्षोभ व्यक्त किया जाने लगा। सारा भारत राजनीतिक आन्दोलन के वातावरण से रंग गया था। कवियों ने समकालीन स्थिति से प्रेरणा ग्रहण कर अनुभूति को वाणी दी और उससे जो काव्यस्रोत फूट पडा, वह क्रान्ति की भावना, देशप्रेम, राष्ट्रभक्ति, प्रक्षोभ आदि विभिन्न भावों से ओतप्रोत था। अतएव रससंख्या में उन्हीं समकालीन उत्कट भावों, सामूहिक भावविशेषों के ग्रहण की वृत्ति बढ़ी और इन्हीं विभिन्न भावों को "रस" की प्रतिष्ठा देने का प्रयास किया गया। पुराणकाल में भक्ति को प्रधानता मिली। रामकृष्णादि देवताओं के विभिन्न अवतारों की कल्पना एवं तद्सम्बन्ध में कथाएँ प्रचलित हुई और विभिन्न देवताओं की आराधना से उनको प्रसन्न करने की कल्पनाएँ उदित हुई, परिणामस्वरूप विभिन्न भक्तिसंप्रदायों क भी उदय हुआ। साहित्य में भक्ति रस की विशेष रूप से अभिव्यक्ति होने लगी और काव्यशास्त्र में उसके अन्तर्भाव की चर्चाएँ भी सम्भवतः काव्यगोष्ठियों में होने लगी

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रससंख्या १४१

भक्ति रस की प्रारंभिक उपस्थिति का श्रेय डॉ. दीक्षित आचार्य दण्डी को देते हैं।9 जो सामयिक प्रभाव के फलस्वरुप उचित प्रतीत होता है। विदेशी आक्रमणकारियों से आक्रान्त एवं उनके अत्याचारों से पीडित जनता को भक्तिरस से प्लावित काव्यधारा से शान्ति देने का तथा अपने धर्म की रक्षा करने का प्रयास भक्त कवियों ने किया आर समाज में धार्मिक क्रान्ति ही उपस्थित हुई। वैसे भक्ति के बीज तो भागवत में मिलते हैं। परंतु उसका लहलहाता वृक्ष विभिन्न सम्प्रदायों की शाखा-उपशाखाओं में इस काल में फला-फूला। भक्ति-आन्दोलन के फलस्वरूप भक्ति की भावना इतनी उत्कटता तक पहुँची कि काव्यत्व के स्तर पर आस्वाद्यता से परिपूर्ण बनी। सारा काव्य भक्तिरस से सराबोर हुआ और भक्ति "सामूहिक भाव" बना। इस पूरी स्थिति के फलस्वरूप वैष्णव मक्तों ने भक्ति रस तथा मधुर रस की स्थापना कर उसे रसराज का पद घोषित किया। मुसलमानी-मुगल शासन में शंगार की धारा भक्ति में मिल गई। देवी-देवताओं के अवतारों में कृष्ण-राधा आराध्य बने और उनकी आराधना में मन्दिरों में साज-शँगार और अन्य सारी विधियाँ सम्पन्न की जाने लगीं। समकालीन स्थिति, जनरुचि एवं व्यक्तिगत सूझ से इस काल के वैष्णव भक्तों ने मधुर रस की स्थापना से रसचर्चा को मण्डित कर दिया। वातावरण से इनके प्रेरणाग्रहण को कल्पना श्री. जयशंकर प्रसाद के इस वक्तव्य से आती है कि "यद्यपि भक्ति को भी इन्हीं लोगों ने मुख्य रस बना लिया था, किन्तु उसमें व्याज से वासना की बात कहने के कारण वह दृढ प्रभाव जमाने में असमर्थ थी। क्षणिक भावावेग हो सकता था। "२ भक्ति रस की स्थापना के पश्चात् प्रश्न उपस्थित हुआ कि उसे शृंगार के अन्तर्गत रखे या भक्ति के मधुर रस शृंगार का स्थान कदापि नहीं ले सकता, न ही विशुद्ध भक्ति का। मध्यकालीन राजनीतिक संत्रास, सामाजिक पतन एवं धार्मिक विवृत्ति के कारण मानव की चेतना देवता के चरणों में अर्पित हुई और समकालीन शंगार की उन्मुक्त धारा को देवता की भक्ति में समर्पित कर दिया गया। मधुर रस इसी का निचोड है। आधुनिक काल में भारतीय जीवन एवं साहित्य पर पाश्चात्य संस्कृति, सभ्यता एवं साहित्य और संपर्क के कारण भारतीय साहित्य में नवीन आलम्बनों, भावों और अनुभूतियों की उद्भावना हुई है। इससे प्रभावित होने के कारण केवल साहित्य के रूपों में ही परिवर्तन नहीं आया, बल्कि उसकी चेतना एवं संवेदना भी पर्याप्त परिवर्तित हुई। पाश्रात्य स्वच्छन्दतावाद की प्रवृत्तियों के प्रभाव ने साहित्य में स्वच्छन्दता, प्रकृतिप्रेम, व्यक्तिगत प्रणयानुभूति की अभिव्यक्ति को प्रधानता मिली। प्रकृति

१. रससिद्धान्त : स्वरुप-विश्लेषण, पृ. २६८ २. काव्य कला तथा अन्य निबन्ध

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१४२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन का उदात्त, मव्य, सुंदर, कमनीय, रौद्र, शंगारिक विभिन्न रूपों में चित्रण किया जाने लगा। मानव के सभ्य, प्रगतिशील एवं कृत्रिम जीवन में उत्तरोत्तर प्रकृति के अधिकाधिक पास पहुँचने का प्रयास, उत्कटता एवं तीव्र इच्छा बढ़ती रही और केवल उद्दीपक रूप में प्रकृति को स्वीकार करने की अपेक्षा उसको मानवीकरण द्वारा आलम्बन आश्रय का भी स्थान मिला। एक काल विशेष में प्रकृति ही काव्य की प्रधान चेतना बनी। उस काल के काव्य में यही 'सामूहिक भाव' बन गया था। स्वाभाविकतः विद्वानों द्वारा प्रकृति रस और उदात्त रस की माँग की जाने लगी। मराठी के विद्वान श्री. विष्णुशास्त्री चिपळूणकर ने लगभग उसी समय उदात्त रस की स्थापना की, जिस समय आचाय शुक्ल ने प्रकृति रस का महत्त्व स्थापित किया। स्पष्ट है कि विष्णुशास्त्री का उदात्त रस, भोज प्रणीत उदात्त रस से नितान्त मिन्न है। समकालीन अत्याधुनिक साहित्यदृष्टि एवं समीक्षाशास्त्र में सौंदर्यचिंतन एवं सौंदर्यशास्त्र (aesthetics) की विशेष महत्ता है। साहित्य में सुन्दरम् की स्थापना स्वच्छन्दता- बादियों द्वारा ही की गई है और आधुनिकता का एक लक्षण सौंदर्यत्त्त्व माना जाता है। सम्भवतः इस प्रेरणा से ही डॉ. पु.ग.सहस्रबुद्धे ने सौंदर्य रस की प्रा छा की है।१ उपर्युक्त रससंख्या के विकासक्रम के विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि रससंख्या के विकास के मूल में समकालीन सामाजिक परिवेशगत परिस्थितियों का प्रभाव, प्रधान साहित्यिक चेतना एवं 'सामूहिक भाव' ही प्रधान कारण हैं। रससंख्या की वृद्धि के साथ कुछ रसों की अनुपयुक्तता, अनास्वाद्यता, समयानुसार क्षीणता या अप्रभावकारिता व्यक्त करके संकोच की प्रवृत्ति रही है। उसके मूल में भी उपर्युक्त कारणों के बावजूद व्यक्तिगत सूझ एवं मतभिन्नता महत्त्वपूर्ण रही है। रससंख्या की वृद्धि एवं संकोच की यह प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं हो सकती। परंतु इसके विषय में इतना ही कहा जा सकता है कि यदि एक-एक भाव को रस का स्थान देने का प्रयास बढ़ता जाये तो उसका कहीं अन्त ही नहीं हो सकता। रस के परिपोष के लिए भावविभोरता एवं मग्नता का अनुभव होना आवश्यक होता है। भाव में उतनी क्षमता एवं सघनता होनेसे ही वह रस की कोटि तक पहुँचने में समर्थ हो सकता है। अतः भावव्यंजना को रस मानकर उसके स्वतंत्र रूप की स्थापना कर संख्या में वृद्धि या परिवर्तन का जो प्रयास किया जाता है, वह सिद्धान्ततः भ्रमपूर्ण प्रतीत होता है। आज रससंख्या का प्रश्न उतना चर्चित नहीं है। क्योंकि आज रस को ही अस्वीकार करने की दृष्टि प्रबल हो रही है। अतः नवीन काव्य में बौद्धिकता के अतिरिक्त भावात्मकता को यदि स्थान भी है, तो भावों की सघनता के रूप में नहीं, खण्डित भावराशि बौद्धिक अंश से जुड़ी हुई है; भाव का संस्पर्श मात्र है। फिर भी १. हंसपत्रिका, १९६८.

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रससंख्या १४३

"बुद्धि-रस" की माँग की जाती है। इस पर डॉ. इन्द्रनाथ मदन के शब्दों में इतना ही कहना पर्याप्त है कि "तथाकथित बुद्धिरस की कल्पना रसवादियों की तुष्टि के लिये की जाती है, मक्ति रस की अवधारणा हो सकती है तो बौद्धिक युग में बुद्धि रस कि, फिर निन्दा रस की भी हो।"१

१. आलोचना और साहित्य, पृ. ४१

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सप्तम अध्याय

समूह, व्यक्ति और रसात्मक बोध की स्थिति

मानवमन की विभिन्न संवेदनाओं एवं अनुभूतियों की भाषिक अभिव्यक्ति साहित्य का रूप धारण करती है। साहित्यिक रूप में अभिव्यक्त कवि की यह अनुभूति केवल स्वतंत्र इकाई नहीं होती। कवि और आस्वादक समाज के अंगरूप हैं। उन का व्यक्तित्व भी समाजसम्बन्ध से नितान्त मुक्त नहीं हो सकता, बल्कि वह समाज- जीवन से एक विशेष प्रकार का सापेक्ष सम्बन्ध रखता है। सामाजिक और मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समाज में मनुष्य के कुछ समूहों का अस्तित्व मान्य है, जिनका वह स्वयं सदस्य होता है। इन समूहों की विशेषताओं एवं उनके अन्तर्गत होनेवाली आंतरक्रियाओं (Interaction) का अध्ययन मनोविज्ञान का विषय है। कुछ विशेष प्रकार की आंतरक्रियाएँ इन समूहों में घटित होती रहती हैं। साहित्य के आस्वादक का व्यक्तित्व समाज की सापेक्षता में बनने के कारण उस समाजविशेष की विशेषताओं से युक्त होता है। भिन्न-भिन्न समूहों की कुछ विशेषताएँ होती हैं, जिनसे मनुष्य का व्यक्तित्व विकसित होता रहता है । अतः समाज-मनोविज्ञान की सहायता से विभिन्न समूह, उनकी विशेषताएँ, उनके सदस्यों पर समूह का प्रभाव और आंतरक्रियाएँ आदि के परिप्रेक्ष्य में सामाजिक दृष्टिकोण से रसात्मक स्थिति की परीक्षा की जा सकती है। साथ ही जो कलाकृति या साहित्यिक कृति पाठकों एवं दर्शकों के सम्मुख उपस्थित होती है, उसके रूप पर आस्वाद की स्थिति एवं सफलता अवलम्बित होती है। यदि साहित्य दृश्य रूप में दर्शकों के सम्मुख उपस्थित किया जाता है तो वहाँ प्रेक्षकों के समुदाय का अस्तित्व रहता है, परंतु जब वही साहित्य मौनपाठ की वस्तु बन जाता है तो एकांत में उसका रसास्वाद किया जाता है। इन दोनों स्थितियों में समूह और व्यक्ति के सम्बन्धों में अन्तर आता है और उसके समाजसापेक्ष व्यक्तित्व, व्यक्तित्व के विभिन्न स्तरों और रसात्मक बोध की स्थिति में भी अन्तर आता है। उदाहरण के लिए नाटक,

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समूह, व्यक्ति और रसात्मक बोध की स्थिति १४५

मंचीय काव्यपाठ और काव्य के मौन-पाठ के भिन्न प्रकार के प्रस्तुतीकरण के उनका प्रभाव पाठकों पर भिन्न स्तर एवं कोटि का हो सकता है। नाटक दृश्य काव्य है, मंचीय काव्य-पाठ उससे भिन्न अस्तित्व रखते हुए भी, प्रवृत्तिगत सदशता रखता है, कविता शब्दार्थ में व्यक्त होने के कारण अमूर्त एवं गहनतम अर्थसहित और प्रतीकों से युक्त होती है। स्पष्ट है कि ये तीनों स्थितियाँ कलाकृतियों के विभिन्नत्व के बावजूद आस्वादक के लिए भी भिन्न पृष्ठभूमि बनाती हैं। अतः इस अध्याय में समाज मनोविज्ञान के आधार पर इस बात को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि काव्य का रसास्वाद करते समय कौन-कौनसी आंतरक्रियाएँ घटित होती हैं और उनका प्रभाव रसास्त्राद में कहाँ तक होता है। समाज में होनेवाले विभिन्न प्रकार के समूहों की विशेषताओं और काव्यास्वाद से उनके सम्बन्ध को परखना यहाँ अभीष्ट है। मनुष्य की वृत्ति का उसके सामाजिक और सामूहिक व्यवहार के साथ निकटतम सम्बन्ध रहता है। समाज में रहना उसका मूलगत स्वमाव है, इसलिए वह अन्य व्यक्तियों के साथ नित्य सम्बन्ध स्थापित करता रहता है। समाज में रहने से वह कई प्रकार के सामूहिक व्यवहार स्वेच्छापूर्वक करता है। कुछ व्यवहार ऐसे भी होते हैं, जो वह इच्छा न होते हुए भी विवश होकर करता है। समूह के प्रभाववश उसके व्यवहार में अन्तर आता है। देखा यह जाता है कि समूह का व्यवहार, उन मनुष्यों के वैयक्तिक व्यवहार से बहुत भिन्न होता है, जिनसे मिलकर उस समूह का निर्माण हुआ है। समान उद्दिष्ट, स्थान, भूमिका, सदस्यों की आंतरक्रिया इन चार बातों के आधार पर समूह निर्माण होता है। सामाजिक जीवन में समूह का अधिक महत्त्व है। जब्र शिक्षक पढ़ाते हैं और विद्यार्थी श्रवणभक्ति करते हैं, कभी-कभी बीच में शोरगुल भी करते हैं, तब वहाँ प्रत्यक्ष आदान-प्रदान की प्रक्रिया कम होती है। परंतु आंतरक्रिया घटित तो होती ही है। अंधेरे में बठकर प्रेक्षकगण चित्रपट देखते हैं, फूट- बॉल का मॅच खेला जाता है तब अनगिनत प्रेक्षक आस्वाद करते हैं और तालियाँ बजाते हैं। ये सारे उदाहरण समूहों के ही हैं। कुछ समूह तात्कालिक होते हैं और कुछ दीर्धकाल टिकनेवाले होते हैं। मनोवैज्ञानिकों और समाजशास्त्रियों ने समूह को साधारणतः दो स्थूल विभागों में रखा है। संगठित समूह और असंगठित समूह। रेलगाडी की प्रतीक्षा में स्थानक पर एकत्रित सैंकडों यात्री, बाजार में कई लोगों की लगी भीड़ आदि असंगठित समूह हैं। उनमें सम्मिलित रूप में किसी का ध्यान किसी एक केंद्र या स्थान में केंद्रित नहीं रहता। साम्प्रदायिक दंगों, उपद्रवों, लूट, हत्या आदि संहारक कार्यों में रत अथवा कभी किसी समारोह के अवसर पर निकलनेवाले जुलूस आदि की भीड़ भी असंगठित रस ... १०

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१४६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन समूह के उदाहरण हैं। परंतु किसी चर्चा-सभा के लिए एकत्रित श्रोतागण, नाटक, नौटंकी या भाषण के स्थान पर लोग असंगठित रूप से एकत्र आते हैं, परन्तु उनमें पर्याप्त संगठन और व्यवस्था बनी रहती है। समाजशास्त्रियों ने इन्हींके बीच अन्तर मानकर संगठित और असंगठित समूहों का विभाजन करते हुए झुण्ड (Herd), भीड़ (Crowd), श्रोतृवृंद (Audience) और जनता (Public ) आदि विभिन्न भेदों की चर्चा की है। संगठित समूहों में ही श्रोतृवृंद (Audience), सभा (Assembly), समिति, विभिन्न सभाएँ आदि आते हैं। झुण्ड (Herd) : झुण्ड तो प्रायः पशुओं के होते हैं, जो सामूहिक जीवन की सहजप्रवृत्ति (Gregarious Instinct) के कारण बनते हैं। परंतु साम्प्रदायिक दंगों और राजनीतिक स्थलांतरों के अवसर पर बननेवाले झुण्ड अत्यंत अस्थिर एवं सामयिक होते हैं। चुनाव के समय नेताओं के पीछे जानेवाला, किसी मॅच के समय एकत्रित होनेवाला और उत्कट बननेवाला जनसमुदाय झुण्ड का ही रूप ग्रहण करता है। झुण्ड में अंधानुकरण की प्रवृत्ति तथा भेडचाल से अनुसरण करने की वृत्ति दिखाई देती है। अतः मानव के सामाजिक जीवन की दृष्टि से उसको अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं है। भीड़ (Crowd): बहुत से व्यक्तियों के किसी एक स्थानपर एकत्रित होने पर भीड़ का निर्माण होता है। रेल का स्थानक, मेला, बाज़ार, समारोह आदि स्थानों पर लोग भीड़ करते हैं। युंग के अनुसार, "किसी एक केन्द्र या आकर्षणबिंदु के चारों ओर एकत्रित होनेवाला लोगों का समुदाय भीड़ कहलाता है।"१ मॅक्लेवर की परिभाषा में भीड़ का स्वरूप अधिक स्पष्ट होता है। वे लिखते हैं, "भीड़ मानव का एक ऐसा समुदाय होता है, जिसमें शारीरिक सामीप्य के साथ ही प्रत्यक्ष अल्पकालीन और अवस्थारहित पारस्परिक सम्बन्ध रहता है।"२ थाऊलेस ने भीड़ के अस्तित्व में प्रयोजन को महत्ता. देते हुए लिखा है, "किसी भी सर्वसामान्य प्रयोजन या हित के कारण जब बहुत से ₹. A crowd is a gathering of a considerable number of persons around a centre or point of common attraction. -Handbook of Social Psychology, P. 387. R. Crowd is a physically compact organization of human beings brought into direct, temporary and unorganised contact with one another.

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१४६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन समूह के उदाहरण हैं। परंतु किसी चर्चा-सभा के लिए एकत्रित श्रोतागण, नाटक, नौटंकी या भाषण के स्थान पर लोग असंगठित रूप से एकत्र आते हैं, परन्तु उनमें पर्याप्त संगठन और व्यवस्था बनी रहती है। समाजशास्त्रियों ने इन्हींके बीच अन्तर मानकर संगठित और असंगठित समूहों का विभाजन करते हुए झुण्ड (Herd), भीड़ (Crowd), श्रोतृवृंद (Audience) और जनता (Public ) आदि विभिन्न भेदों की चर्चा की है। संगठित समूहों में ही श्रोतृवृंद (Audience), सभा (Assembly), समिति, विभिन्न सभाएँ आदि आते हैं। झुण्ड ( Herd) : झुण्ड तो प्रायः पशुओं के होते हैं, जो सामूहिक जीवन की सहजप्रवृत्ति (Gregarious Instinct) के कारण बनते हैं। परंतु साम्प्रदायिक दंगों और राजनीतिक स्थलांतरों के अवसर पर बननेवाले झुण्ड अत्यंत अस्थिर एवं सामयिक होते हैं। चुनाव के समय नेताओं के पीछे जानेवाला, किसी मॅच के समय एकत्रित होनेवाला और उत्कट बननेवाला जनसमुदाय झुण्ड का ही रूप ग्रहण करता है। झुण्ड में अंधानुकरण की प्रवृत्ति तथा भेडचाल से अनुसरण करने की वृत्ति दिखाई देती है। अतः मानव के सामाजिक जीवन की दृष्टि से उसको अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान नहीं है। भीड़ (Crowd): बहुत से व्यक्तियों के किसी एक स्थानपर एकत्रित होने पर भीड़ का निर्माण होता है। रेल का स्थानक, मेला, बाज़ार, समारोह आदि स्थानों पर लोग भीड़ करते हैं। युंग के अनुसार, "किसी एक केन्द्र या आकर्षणबिंदु के चारों ओर एकत्रित होनेवाला लोगों का समुदाय भीड़ कहलाता है।"१ मॅक्लेवर की परिभाषा में भीड़ का स्वरूप अधिक स्पष्ट होता है। वे लिखते हैं, "भीड़ मानव का एक ऐसा समुदाय होता हैं, जिसमें शारीरिक सामीप्य के साथ ही प्रत्यक्ष अल्पकालीन और अवस्थारहित पारस्परिक सम्बन्ध रहता है।"२ थाऊलेस ने भीड़ के अस्तित्व में प्रयोजन को महत्ता. देते हुए लिखा है, "किसी भी सर्वसामान्य प्रयोजन या हित के कारण जब बहुत से ₹. A crowd is a gathering of a considerable number of persons around a centre or point of common attraction. -Handbook of Social Psychology, P. 387. R. Crowd is a physically compact organization of human beings brought into direct, temporary and unorganised contact with one another.

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समूह, व्यक्ति और रसात्मक बोध की स्थिति १४७

व्यक्ति स्वयंस्फूर्ति से एकत्र हो जाते हैं, तो भीड़ का निर्माण हो जाता है। मनुष्यों का वह समूह केवल सामयिक ही होता है। "१ उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर मीड़ का स्वरूप स्पष्ट किया जा सकता है। भीड़ में विवेक की कमी और भावनाविवशता की अधिकता रहती है। उसमें सम्मिलित लोगों में अनुकरण करने की प्रबल प्रवृत्ति होती है। भीड़ में शामिल होकर मनुष्य स्वयं विचार-विमर्श नहीं करता, अपितु अन्य जन जो करते हैं, वही काम वह भी करने लगता है। विचार के स्थान पर भावनातिरेक की प्रबलता रहती है। वहाँ मनुष्यों का पारस्परिक सामीप्य होते हुए भी उसके सदस्य परस्पर को अच्छी तरह से नहीं जानते। भीड़ का व्यापार, व्यवहार अपेक्षाकृत उच्छंखल एवं स्वच्छन्द बना रहता है। कभी-कभी साम्प्रदायिक उत्पात के कारण आक्रोश, लूटमार आदि का भी स्वरूप धारण कर लिया जाता है। तब भीड़ की परिणति झुण्ड में हो जाती है। भीड़ का प्रत्येक सदस्य किसी एक प्रयोजन से एकत्रित होने के कारण उनमें भावनाओं एवं विचारों की उत्कट सत्ता स्थापित होती है और उसका प्रत्येक सदस्य भीड़ की शक्ति का अनुभव करने लगता है। उनमें एक विशेष मानसिक एकसूत्रता (Mental Homogeneity) उत्पन्न होती है। सब सदस्यों के अवधान का केंद्र एक होकर उसके अनुसार प्रतिक्रियाएँ भी होती हैं। मावनिक प्रक्षुब्घता, भयाकुलता, क्रोधातिरेक अथवा हर्षातिरेक की भावना से (Emotionality) और अतार्किकता (Irrationality) तथा विवेकशून्यता से भीड़ की शक्ति का अनुभव सदस्य करतें हैं। परन्तु स्वअस्तित्व (Individuality) की भावना का लोप हो जाता है। कोई भी अपने उत्तरदायित्व का अनुभव नहीं करता। उद्वेगों, विचारों और कार्यों की अस्थिरता के कारण जो व्यक्ति उसका नेता होता है, क्षणभर में पूरी भीड़ उसीके विरोध में बन जाती है। भीड़ के सारे कार्य और व्यवहार आवेगमय रहते हैं। परस्पर सामीप्य होने के कारण कार्य की शक्ति और गति बढ़ती रहती है। भीड़ का अंग बनकर मानव का व्यवहार नित्य उसके साधारण व्यवहार की अपेक्षा मिन्न बनना समूहमन है। साधारण स्थिति में व्यक्तिगत रूप से जो कार्य या कल्पना वह नहीं करता, वह भीड़ में शामिल होकर करता है। इस व्यवहार की व्याख्या करते हुए मानसशास्त्रियों ने समहमानस (Group mind) की कल्पना सिद्धान्त को प्रस्तुत किया है। भीड़ का एक पृथक मन होता है, जो . A crowd is transitory continuous group organised with completely permeable boundaries, spontaneously formed as a result of some common interest. -General and Social Psychology, P. 258.

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१४८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

उन व्यक्तियों में से प्रत्येक के मन सें भिन्न होता है, जिनसे भीड़ बन गई हो। अपने व्यक्तित्व की सत्ता भीड़ का सदस्य भीड़ में खो देता है। समूहमन को लेकर विद्वानों ने विभिन्न सिद्धान्त (Theories) प्रस्तुत किये हैं। भीड़ में प्रत्येक व्यक्ति के मन में अन्य व्यक्तियों के मनों में घुलमिल जाने पर एक नये सामूहिक मन का निर्माण होता है। इसमें सम्मिलित सारे व्यक्तियों के भाव और विचार एक ही दिशा में प्रवाहित होते हैं, व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व बिलकुल दबा जाता है, नष्टप्राय-सा होता है। पृथक् मनों की सत्ता नष्ट होने तथा भीड़ का अंग बन जाने के कारण समूहमन में ही मनुष्य की व्यक्तिगतता विलीन हो जाती है और वह उसी प्रकार के कार्य के लिये प्रवृत्त होता है, जैसे सामूहिक मन उसे प्रवृत्त करता है। सामूहिक मन का प्रभाव ही भीड़ में रहता है। सामूहिक मानस की सत्ता व्यक्तियों के पृथक मनों से भिन्न होती है। बहुत से व्यक्तियों के बहुत से मनों की इकाई के रूप में वह बनता है, अतः उसकी शक्ति भी अधिक रहती है। श्रोतृवृन्द (Audience): श्रोतृवृन्द या प्रेक्षकवृन्द (Audience) भीड़ से कुछ भिन्न होता है। रास्ते पर जब मदारी कुछ खेल दिखाता है और वहाँ उसे देखने के लिए कुछ दर्शक एकत्रित हो जाते हैं; तब दर्शक या प्रेक्षक का अस्तित्व उत्पन्न हो जाता है। किसी मुशाहिरे, जलसे में या सभा में श्रोताओं के रूप में लोग उपस्थित होते हैं, उनमें जो एक प्रकार की व्यवस्था रहती है, वह भंग नहीं की जाती। भीड़ के समान ही इन श्रोताओं एवं दर्शकों में शारीरिक सामीप्य तो रहता है, पर उनका ध्यान भाषण, खेल या सभा के किसी कार्य, नाटक आदि में केन्द्रित रहता है। किसी एक अवधानबिन्दु के चारों ओर केन्द्रित होनेवाले सदस्य भीड़ के श्रोतृवृन्द है। प्रेक्षकगण या श्रोतृवृन्द की परिभाषा करते हुए युंग ने लिखा है, "श्रोतृवृन्द भीड़ का एक संस्थागत व्यवस्थित रूप है। "१ उन्होंने प्रेक्षकगण के तीन प्रधान लक्षण बताये हैं। (१) निश्चित हेतु का अस्तित्व, (२ ) पूर्वनियोजित स्थान और काल की आवश्यकता. (३) वक्ता और श्रोता में एक प्रकार का तादात्म्य और आंतरक्रिया (interaction) का घटित होना।२ श्रोतृतृन्द या प्रेक्षकवृन्द का स्वरूप पूर्वनियोजित होता है और अनियंत्रित भी। नाटक,

₹. Audience is a form of Institutionalised crowd. -Handbook of Social Psychology, P. 399. R. ... specific purpose, predetermined time and place, standard form of polarization and interaction between the performer and the audience. -Handbook of Social Psychology, P. 399.

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चित्रपट देखनेवाले, वक्ता का भाषण सुननेवाले, कुश्ती या क्रिकेट देखने, संगीत- समादि में सम्मिलित होनेवाले सदस्य श्रोतृवृन्द के अन्तर्गत ही आते हैं। खेल के मैदान पर जनसमुदाय, रेडिओ के श्रोता, टेलिव्हिजन या दिलचस्पी से रेस देखने- वाले इन सभी का सामान्यतः श्रोतृवृन्द में अन्तर्भाव होता है। श्रोतृवृन्द का व्यवहार कभी-कभी उत्स्फूर्त होता है। सारे श्रोता, दर्शक वहाँ उपस्थित होकर आस्वाद करते हुए प्रशंसा करते हैं। किसी संगीत-सभा में एकाघ कठिन तान से समपर आते हुए 'वाह वा' 'क्या खूब' आदि वचनों या तालियों द्वारा अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं। स्प्राउट ने श्रोतागण की परिभाषा देते हुए उसकी विशेषता पर प्रकाश डाला है। "हमने श्रोतृवृन्द या दर्शनवृन्द को भीड़ का स्वरूप कहा है। क्योंकि जिसे हमें श्रोतागण कहना चाहिये, उसमें बहुतांश परिस्थितियों में व्यवहार का एक विशेष स्वरूप स्वीकृत होता है, और जिसमें आरम्भ और अन्त निश्चित होता है।"१ युंग ने अपने सामाजिक मनोविज्ञान के ग्रंथ में श्रोतृवृन्द की अधिक विस्तार से व्याख्या की है। श्रोतृवृन्द का व्यवहार भीड़ के विपरीत होता है, जैसे उसमें कुछ अलिखित नियम, शिष्टाचार, परम्पराएँ होती हैं। उसका निश्चित समय और स्थान तो रहता ही है, साथ ही विभिन्न साधनों से व्यक्तियों को आकर्षित किया जाता है। सब लोग जब नाटक या चित्रपट देखने या किसी वक्ता का भाषण सुनने आते हैं तो श्रोतासमूह बनता है। प्रथमतः उसके सदस्य व्यक्तियों में परस्पर बातें चलती रहती हैं, परंतु किसी एक केन्द्र पर उनका अवधान केन्द्रित किया जाता हैं। युंग के मत से श्रोतृवृन्द में दुहरी आंतरक्रिया घटित होती है, जिसका उल्लेख आगे चलकर किया जायेगा। शास्त्रज्ञों ने श्रोतृवृन्द के कतिपय भेद-उपभेद माने हैं। युंग प्रेक्षकवृन्द के तीन उपभेद मानते हैं। एक जिज्ञासु श्रोतृवृन्द (Information Seeking Audience) जो स्वयं क्रियाशील नहीं रहता, परन्तु नेता या वक्ता के भाषण से तादात्म्य पाता है। यह श्रोतूवृन्द ज्ञानप्राप्ति का इच्छुक होता है। दूसरा मनरंजनप्रिय ( Recreation seeking Audience) है, जो केवल मनरंजन के हेतु से नाटक, नौटंकी, चित्रपट, संगीत, जादू आदि देखने आता है। अपना अस्तित्व तत्काल भूलकर तलीन हो जाता है। तीसरे प्रकार का श्रोतृवृन्द संभाषणात्मक श्रोतृवृन्द (Conversational Audience) वह है, जो भावों और विचारों का आदानप्रदान करता है तथा {. We have called the 'audience' an ' institutionalised crowd ' because in the vast mejority of situations, which we should call ' audiences', there is an accepted pattern of contact, a formal begging of a formal end. -Social Psychology, P. 67.

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१५० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

परस्पर परिवहन एवं शुद्धिकरण करता है। इसके सदस्यों का बौद्धिक स्तर अधिक उच्च रहता है। अन्य विद्वानों द्वारा भी श्रोतृवृन्द के विभिन्न भेद माने गये हैं। आर. टी. लेपियर ( R. T. Lapiere) ने नाट्य के दर्शक (Dramatic Audience), भाषण के श्रोता (Lecture Audience), तो एस. एच. ब्रीट ने खेल, तमाशा, जादूगर के चारों ओर होनेवाले प्रेक्षक ( Pedestrian Audience), अक्रियात्मक श्रोतृवृन्द (Passive Audience), विशेष चुना हुआ श्रोतृवृन्द (Selected Audience), सुव्यवस्थित श्रोतृवृन्द (Organised Audience) और संगीतादि मनोरंजनात्मक श्रोतृवृन्द ( Concerted Audience) ऐसे भेद माने हैं। श्रोतृवृन्द या प्रेक्षकगण की इन विशेषताओं के बावजूद भीड़ से उसकी मिन्नता को स्पष्ट करना होगा। उद्देश्य, स्थिति, व्यवहार, प्रतिक्रियाएँ, एकाग्रता, प्रभावकारिता, आकर्षणबिन्दु, अवधान, संख्या का प्रभाव आदि की दृष्टि से दोनों में पर्याप्त अन्तर है। भीड़ में पूर्वनियोजित उद्देश्य नहीं रहता और श्रोतृवृन्द का कोई एक निश्चित उद्देश्य रहता है। भीड़ अपने आप इकडा होती है, श्रोतृवृन्द को निमंत्रित किया जाता है। भीड़ के लिए निश्चित समय या स्थान का बन्धन नहीं होता परंतु श्रोतृवृन्द के लिए समय और स्थान तो पूर्व नियोजित ही होता है। जहाँ भीड़ का व्यवहार या उसकी प्रत्यक्ष प्रतिक्रियाएँ अनिश्चित होती हैं, वहाँ श्रोताओं में निश्चित व्यवहार का संकेत रहता है। भीड़ में लोग पास-पास बैठते हैं, शारीरिक सामीप्य रहता है और परस्पर सम्बन्ध भी आता है। वे परस्पर के प्रेक्षक बनते हैं। ( They stimulate each other) साथ ही उस अन्तर्गत प्रेरक (Stimulus) के प्रभाववश प्रतिक्रियाएँ व्यक्त की जाती हैं। वहाँ विवेकशीलता या बुद्धि कार्यशील नहीं रहती ( Interac- tion is almost inactive) परंतु श्रोतृवृन्द भीड़ के समान अनियंत्रित (unco- ntrolled ), अव्यवस्थित (unorganised) एवं नियमहीन (disordered) नहीं होता, अपितु उसमें एकाग्रता और आंतरक्रिया की एक निश्चित प्रक्रिया रहती है। उसका आकर्षणबिन्दु दृश्य ही नहीं, बल्कि अदृश्य, वस्तुरूप या सूक्ष्म भी रहता है। लोकमत या जनता ( Public) : व्यवहार में जिसे पब्डिक कहा जाता है, उससे मनोविज्ञान की दृष्टि से लोकमत का स्वरूप भिन्न होता है। यह भीड़ और श्रोतृवृन्द से मिन्न होता है। मनुष्यों का ऐसा असंगठित समूह कि जिसमें विचार, सम्मति, इच्छा और रुचि का ऐक्य हो पर सम्मिलित रूप में व्यक्तियों का सामीप्य न हो, जनता कहलाता है। भीड़ या श्रोतृवृन्द की तरह जनता में कन्धे से कन्धा मिला हुआ नहीं रहता अर्थात् शारीरिक सामीप्य नहीं होता। इसके सभी सदस्य एक स्थान पर एकत्रित नहीं होते। परस्पर से दूर होते हुए और शारीरिक सामीप्य न होने पर भी उनमें मतों, इच्छाओं और विचारों की दृष्टि से समानता बनी रहती है, जिसे मानसिक सामीप्य

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कहा जा सकता है। गाने का शौक रखनेवाला, नाटक में रुचि रखनेवाला, वर्ग- हीन समाज में विश्वास करनेवाला, खेल का ही शौक रखनेवाला, मात्र राजनीति में दिलचस्पी लेनेवाला ऐसे जनता या लोकमत के कितने ही उपभेद बन सकते हैं। प्रत्येक समाज में भिन्न रुचियों, इच्छाओं, विचारों और भावों के आधार पर भिन्न-भिन्न पब्छिक निर्माण होता रहता है, परंतु आश्चर्य की बात यह है कि इस भिन्नत्व में भी एकता की स्थिति इनमें पायी जाती है। किसी एक प्रकार की जनता में (Public) सादृश्य दिखायी देता है। प्रत्यक्ष संगठन के अभाव में भी एकात्मता ( polarization ) और सादृश्य (similarity) के कारण ही जनता में सामान्यतः किसी विशेष स्थिति में एक प्रेरक से (stimulus) एक प्रकार की प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती है। भीड़ और जनता में महदन्तर है। भीड़ का सदस्य जैसे अपनी व्यक्तिगत विवेकक्षमता को खोकर उसका अविभाज्य अंग बनता है, वैसा पब्लिक में नहीं होता। जनता का सदस्य उसका अंग तभी बनता है जब वह विशेष प्रकार की रुचि, इच्छा या विचार रखता हो। उसकी विवेकशक्ति, व्यक्तिगतता कुछ सीमा तक बनी रहती है और साथ ही बाह्य सामाजिक बातों का प्रभाव उसकी रुचियों पर होता रहता है, पर वह व्यक्तित्व को एकदम खो नहीं देता। इसीलिए तो समाज में विभिन्न प्रकार की जनता (public) देखी जाती है। आंतरक्रिया ( Interaction) : समूह के विभिन्न रूपों - भीड़, श्रोतृगण और जनता में अनेक सदस्यों का एकत्रित आना तो निहित है। ये सदस्य किसी प्रयोजन में एकत्रित आते हैं तो सामाजिक सम्बन्धों में उनमें एक विशेष प्रकार की आंतरक्रिया घटित होती है जिसका पर्याप्त विवेचन मनोवैज्ञानिकों ने किया है। समूह में परस्पर सदस्यों में अथवा बाह्य किसी प्रेरक और समूह के सदस्योंमें जो आंतरक्रिया होती रहती है, उसके विवेचन के लिए आंतरक्रिया के स्वरूप को संक्षेप में स्पष्ट करना उचित होगा। आंतरक्रिया (Interaction) शब्द से स्पष्ट है कि वह परस्पर सम्बन्धों में होनेवाली अन्तर्गत प्रक्रिया है। वह मनुष्य और मनुष्य, मनुष्य और समूह, समूह और समूह, इस प्रकार के विभिन्न स्तरों पर घटित होती है। परंतु प्रक्रिया की दृष्टि से आंतरक्रिया को दो भेदों में विभाजित किया जाता है। पहली लिनियर इन्टरअक्शन (Linear Interaction) वह है, जो क्रमशः किसी एक प्रेरक (stimulus) से दूसरे की ओर उससे तीसरे की ओर एक रेखा में घटित होती है। इसे ही ( non-reciprocal) कहा जाता है। दूसरे प्रकार की आंतर- क्रिया को वर्तुलांतर्गत (circular-reciprocal) कहा जाता है जिसमें एक प्रेरक दूसरे का, दूसरा तीसरे का या तीसरा पहले का प्रेरक बन सकता है। अर्थात् यहाँ पर

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१५२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

आंतरक्रिया की प्रक्रिया आदानप्रदान के रूप में होती रहती है। अध्यापक का पढ़ाना और विद्यार्थी का ग्रहण करना, किसी विवादचर्चा या सभा के अवसर पर, मॅच के मैदान या नाट्यगह में भी इसी प्रकार की आंतरक्रिया का अस्तित्व रहता है। एफू. एच. आलपोर्ट ने आंतरक्रिया के कतिपय प्रकार (forms) मानकर उसके विभिन्न आधारों का विवेचन किया है, जिनमें मानवी विभिन्न मुद्रा, प्रतीक, उत्स्फूर्त अभिव्यक्ति, चेहरे के हावभाव, संकेत, भाषा आदि का अंतर्भाव है।9 सामाजिक जीवन में आंतरक्रिया की महत्ता इसलिए है कि इसी के आधार पर मानवी जीवन में विभिन्न स्तरों पर आदानप्रदान (give and take) होता रहता है। जीवन के हर क्षेत्र में और विशेष रूप से साहित्य में विचारों, भावों आदि के संप्रेषण की विशेष महत्ता होती है। वाणी का संचार संप्रेषण का एक ऐसा साधन है, जो लोगों में मानसिक सामीप्य की स्थापना कर सकता है। इस संप्रेषण के द्वारा ही मनुष्य को परस्पर के मनोभावों को जानकर सुखदुःख के प्रति सहभावना व्यक्त करना, तथा परस्पर के पास आना सम्भव हो सका है। अर्थात् समूह के इन विभिन्न रूपों के आधार पर उन में घटित होनेवाली आंतरक्रियाएँ भिन्न होती हैं। नाटक देखनेवाले प्रेक्षक या भाषण सुननेवाले श्रोता, किसी सभा या नौटंकी के श्रोतृवृंद किसी एक स्थान पर एकत्रित आते हैं। उनमें शारीरिक सामीप्य होने से नाटक, व्याख्यान, नौटंकी, सर्कस आदि देखते या सुनते समय अपनी कुछ प्रति- क्रियाओं का अनुभव उस समूह के सदस्य करते हैं और उनमें से कुछ अपनी प्रति- क्रिया को व्यक्त भी करते हैं। परंतु रेडिओ से व्याख्यान सुननेवालों, घर में बैठे टेलिव्हिजन में मॅच देखनेवाले प्रेक्षकों या श्रोताओं का अपना एक भिन्न समूह बन जाता है, जो नाटकादि के श्रोतागण से कुछ भिन्न एवं व्यापक है। उसके लिए संप्रेषण के साधनों और विषयों में अंतर आ जाता है। भीड़, श्रोतागण और जनता आदि में होनेवाली आंतरक्रिया, सदस्यों की स्थिति और संप्रेषण के माध्यम की विभिन्नता के आधार पर साहित्य के आस्वाद (ग्रहण) का विचार करना होगा। नाटक, भाषण और काव्य इन तीन विधाओं का प्रधानरूप से विचार करते हुए उनसे सम्बन्धित समूहों की स्थितियों और विशेषताओं के परिप्रेक्ष्य में संप्रेषण की स्थिति एवं आंतरक्रिया की प्रक्रिया को परखना आवश्यक है। काव्यशास्त्रीय चर्चा में दृश्य काव्य की ही चर्चा विशेष हुई है, अर्थात् नाटक के संदर्भ में रस की उत्पत्ति और आस्वादादि की चर्चा उपस्थित हुई। भरतमुनि के सम्मुख तत्कालीन नाटक एवं उसके प्रयोग और श्रोतागण का अस्तित्व था। उस आधार पर कुछ तत्त्वों का दिग्दर्शन उसने किया है जो समूह मनोविज्ञान की दृष्टि से उचित सिद्ध होता है। नाटक जब रंगमंच पर अभिनीत किया जाता है, तब नट रंगमंच ₹. F. H. Alport - Social Psychology.

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समूह, व्यक्ति और रसात्मक बोध की स्थिति १५३

पर विभिन्न अभिनय के द्वारा नाट्यार्थ या काव्यार्थ को उपस्थित करता है और उसका आस्वाद प्रेक्षक नाट्यगह में बैठे-बैठे करते हैं। उसके हावभाव, वाणी, आहार्य पोशाक आदि के द्वारा नाट्यार्थ सुगम तथा सरल बनता जाता है। प्रेक्षकगण एकत्रित बैठे शारीरिक सामीप्य रखे हुए विवेकशील एवं पूर्व नियोजित स्थल पर उपस्थित होते हैं। यहाँ श्रोताओं एवं प्रेक्षकों में नाट्य के विषय में पहले से आकर्षण बना हुआ है। युंग ने दृश्यविधान का प्रभाव बताते हुए जिन पाँच तत्त्वों का उल्लेख किया है, उनमें पूर्व- योजना महत्त्वपूर्ण है। प्रेक्षकों को किसी आकर्षक बात के कारण पहले से उस नाटक या व्याख्यान के प्रति उत्सुकता रहती है। अभिनव गुप् ने इसका उल्लेख करते हुए लिखा है कि प्रेक्षकों को कल्पना होती है कि वे किसी मनोरंजक, आनंदप्रद, सरस एवं आकर्षक को देखने जा रहे हैं, सर्वपरिषत्साधारणप्रमोदसारापर्यन्तसरसत्वेन आदरणीय लोकोत्तर दर्शनश्रवणयोगी भविष्यानि इत्यभिसंधिसंस्कारात्।9 यह पूर्वपीठिका भरतमुनि ने सम्मवतः अच्छी तरह से समझी थी। साथ ही सभागृह का आकार और प्रेक्षकों की संख्या ( Size of the hall and number of audience) का जो निर्देश मानसशास्त्री करते हैं, उसका उल्लेख भी भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है। युंग के मन में श्रोतृवृन्द की संख्या पर भी आस्वाद का स्वरूप अवलंबित रहता है। नाटक या चित्रपट देखते समय श्रोतागण परस्पर पास-पास बैठे हुए होते हैं, पारस्परिक शारीरिक सामीप्य के बावजूद एक अज्ञात सहदयता के सूत्र में सारे बँधे हुए होते हैं। फिर भी उनमें विभिन्न लोकमतों (public) का अंतर्माव होता है। विभिन्न रुचियों, बौद्धिक सरों, विचारों एवं भावों के होने पर भी कहीं-न-कहीं सदृश्यता विद्यमान रहती है। वहाँ श्रोतृवृन्द, कवि या नाटककार के बीच सम्पर्क स्थापित करनेवाला माध्यम नट का अभिनय या नाटक का प्रस्तुतीकरण होता है। श्रोतृवृन्द में इस समय दुहरी आंतरक्रिया का आरम्भ होता है। एक आन्तरक्रिया की प्रक्रिया श्रोताओं में परस्पर घटित होती है, दूसरी नट, व्याख्याता और प्रेक्षक गण में भी घटित होती रहती है। इस दूसरी आंतरक्रिया की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए युंग ने लिखा है, "ये प्रक्रियाएँ केवल प्रस्तुतकर्ता (performer) और प्रेक्षकवृन्द में आंतरक्रिया की नहीं होती बल्कि प्रेक्षकवृन्द के सदस्यों में परस्पर आंतरक्रिया घटित होती है।"२ १. अभिनवभारती, भाग १, पृ. ३६ R. These processes involve not only the interaction between the performer and the audience but also the interaction among the members of the audience. -Handbook of Social Psychology; P. 402.

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१५४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

श्रोतृवृन्द, समागृह या चित्रपटगह में बैठे आपस में बातें करते हैं, यद्यपि वे पूर्वयोजना से उपस्थित रहते हैं। उनका अवधान परस्पर बातों आदि से हटाकर नाटक की ओर खींचने के लिये नांदी आदि रखी जाती है। आरंभ का महत्त्व इसी कारण से होता है, जिसमें दीपव्यवस्था, सजावट, ध्वनिक्षेपकादि का भी अंतर्भाव होता है। इसके पश्चात् प्रेक्षकों की परस्पर आंतरक्रिया रुक जाती है और उनका अवधान नाटक के प्रस्तुतीकरण में लगता है। उनके संपर्क का माध्यम वाचिक, आंगिक, आहार्यादि से संपन्न अभिनय होता है। अभिनय के कारण प्रेक्षक के सम्मुख दृश्य- विधान कर इंद्रिय संवेदनाएँ जागृत होती हैं और प्रेक्षक उसमें आस्वाद लेने लगता है। नेत्रेन्द्रिय एवं कर्णेन्द्रिय के आधार पर प्रत्यक्ष दृश्यविधान के सहारे उस काव्य या नाटकगत रस का अनुभव सहृदय, सहजता और सफलता से कर सकता है। नट और प्रेक्षकों में आंतरक्रिया की जो प्रक्रिया इस स्तर पर आरम्भ होती है, वह वस्तुतः नाटककार और प्रेक्षकों में है। नाट्यार्थ का कर्ता नाटककार और आस्वादक प्रेक्षकगण इनके बीच में नट माध्यम बनता है, जिसका साधन अभिनय होता है, वहाँ वर्तुलबद्ध आंतरक्रिया (circular interaction) घटित होकर श्रोतागण नाट्यार्थ का आस्वाद करते हैं, अर्थात् कर्तानट (अभिनय)प्रेक्षक इनके परस्पर प्रेरकत्व से (stimulus) घटेत होने से तथा प्रत्यक्ष दृश्यविधान के होने से वह प्रक्रिया अधिक सरल, स्पष्ट एवं प्रभावकारी भी होती है। इस प्रक्रिया में माध्यम का महत्त्व भी अपेक्षाकृत अधिक रहता है, जिसका उल्लेख नाटक के प्रेक्षक (theatre audience) के सन्दर्भ में करते हुए मनोवैज्ञानिक लेपियर लिखते हैं कि, "उत्तम अभिनेतागण कोई सामान्य नाटक भी अपने बढ़िया अभिनय के द्वारा प्रस्तुत कर प्रेक्षक को खुश करता है, वहाँ निम्न श्रेणी का अभिनय किसी अच्छे नाटक की हानि कराता है। "१ सफल प्रयोग के कारण सभी स्तर के प्रेक्षक विभिन्नता के बावजूद भी नाटक का आस्वाद करते हैं। इसका एकमात्र कारण उसकी दृश्यात्मकता है। कदाचित् इसी कारण से भरतमुनि ने सब वर्णों और प्रकार के लोगों के लिये मनोरंजक एवं बोधपरक साहित्यविधा का चयन किया होगा। युंग ने दृश्यविधान की आस्वादमयता का उल्लेख करते हुए लिखा है कि, "दृश्यात्मक साधन नित्य ही विषय से अपरिचित एवं कम बुद्धिमानों तथा कम उम्र के प्रेक्षकों के लिये अधिक प्रभावकारी होता है। "२ ?. A good cast satisfy an audience with a bad play, whereas a poor cast may ruin what might otherwise be a good play. -Social Psychology-by Lapiere and Farnsworth, P. 424. R. Visual aids are always effective with audience that an unfamiliar with the material and less intelligent and younger also. -Handbook of Social Psy. P. 460.

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समूह, व्यक्ति और रसात्मक बोध की स्थिति १५५

नाटक के प्रयोग को ही प्रत्यक्ष रूप में न देखते हुए एकान्त में पढ़ा जाय तो प्रभाव कुछ अवश्य कम होगा। वहाँ कवि और पाठक में आंतरक्रिया तो होती है, परंतु उसका स्वरूप अमूर्त एवं सूक्ष्म होता है। अतएव पाठक की अनुभवक्षमत। तथा संवेदनशीलता अधिक महत्त्वपूर्ण होती है। उसके अभाव में प्रभाव फीका पड़ जायेगा। नाटक देखनेवाले प्रेक्षकों के समूह में अधिक सघनता, स्पष्टता एवं सरलता होती है। पर श्रोतृत्ृन्द वैयक्तिक बोधरहित होने के कारण निर्वैयक्तिकता से युक्त बनकर साधारणीकरण की क्रिया एवं तादात्म्य होने के लिये अधिक अवसर मिलता है। नाटक के समान ही महाकाव्य का प्रत्यक्ष प्रयोग या पाठ किया जाय तो दृश्यमयता के कारण आस्वादन में अंतर आता है। नाट्यप्रयोग के अतिरिक्त किसी वक्ता के भाषण के अवसर पर अथवा किसी काव्यपाठ करनेवाले कवि की सभा में जो श्रोतागण सम्मिलित होते हैं, उनकी स्थिति का विश्लेषण करने से कुछ भिन्नता दिखाई देती है। वक्ता के भाषण, कवि के काव्यपाठ या अन्य किसी सभा में किसी एक प्रस्तुत कर्ता (performer) की उपस्थिति होती है जो किसी शब्दबद्ध काव्य, विचारों आदि को व्यक्त करने का प्रयासपूर्ण कार्य करता है। वक्ता या काव्यपाठ करनेवाला कवि अपने काव्यपाठ या भाषणादि को आवाज़ में उतारचढाव करके एवं हावमावादि बलादि के द्वारा स्पष्ट, आकर्षक, सुलभ बनाकर श्रोताओं का ध्यान (attention) अपनी ओर खींच लेता है। यहाँ पर श्रोता और वक्ता में परस्पर आंतरक्रिया का आरंभ होकर श्रोता कर्णेद्रियों के सहारे रसग्रहण, आस्वाद करता है। 'वक्ता-वक्तव्य-श्रोता' इस प्रक्रिया में दोनों का परस्पर पर प्रभाव होता रहता है, कारण दोनों परस्पर प्रेरक (stimulus) बनते रहते हैं। वक्ता के लिये श्रोता के अवधान की महत्ता अधिक होती है जिसे संत ज्ञानेश्वर ने भी 'वक्तृत्वा अवधानाचि चारा' कहकर व्यक्त किया है। अवधान के आधार पर ही वह अपना कार्य सफल बना सकता है। इसमें वक्ता या काव्यपाठक विशेष रूप से सक्रिय रहता है और वह श्रोताओं के सम्मुख अमूर्त भावों का मूर्तीकरण, प्रत्यक्ष दृश्यविधान कराता है और प्रेक्षकगण कहीं-कहीं अपनी प्रतिक्रियाएँ उत्स्फूर्त रूप से (spontaneously) व्यक्त करते हैं जैसे कि उर्दू के शेरोशायरी का काव्यपाठक कवि और उसकी महफिल, मुशाहिरे में किसी संगीतज्ञ की सभा में या कविसम्मेलन में प्रत्यक्ष रूप से यह देखा जा सकता है। भारतीय इतिहास में प्राचीन काल से काव्यपाठ की परम्परा रही है। विशेष रूप से गुप्तसाम्राज्य का काल और उसके पश्चात् भी काव्यपाठ का एक विशेष कला में अंतर्माव किया जाने लगा। कविगण दरबारों में, राजा या अन्य दरबारियों के सम्मुख काव्यपाठ करते हुए वाहवा प्राप्त कर यश और कीर्ति प्राप्त करते थे। विदग्ध काव्यगोष्ठियों में कवि अपने काव्य का पाठ सुनाते थे और भावक उसका ग्रहण कर अभिप्राय भी व्यक्त करते थे।

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१५६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन राजशेखर ने 'काव्यमीमांसा' में काव्यपाठ के चार भेद बताये हैं। उसने लिखा है कि, "कवि लोग उसी काव्यपाठ की प्रशंसा करने हैं, जो ललित हो, काकु से युक्त हो, स्पष्ट हो, अर्थ के विचार से जिसमें शब्दों का परिच्छेद किया गया हो और जिसमें कान को सुख देनेवाले अलग अलग वर्णों का विन्यास हो। "१ काव्यपाठ के कुछ गुणों एवं नियमों का भी निर्देश उसने किया है कि जिनके पालन या अवलम्ब से कवि प्रतिष्ठा और यश पाता है। काव्यपाठ की कुछ विशेषताएँ उसके इन शब्दों में व्यक्त होती हैं, "गंभीरतापूर्ण काव्य पढते समय स्वरों में सान्द्रता हो, अनिष्ठुरता अर्थात् स्वरों की कोमलता एवं सुखदता हो, तार और मंद्र स्वर का निर्वाह ठीक तरह से किया जाय और संयुक्त वर्णलावण्य अर्थात् संयुक्त वर्णों का उच्चारण करे, जिसमें सुंदरता व्यक्त हो। "२ उपर्युक्त वक्तव्य में कंठ, ताल, लय, ध्वनि आदिविषयक तत्त्वों का जैसे अंतर्भाव है, वैसे ही स्पष्टता और सारल्य की महत्ता भी है। इससे काव्यपाठ उत्कृष्ट होगा और फलस्वरूप आस्वादन भी सुलभ अवश्य हो सकेगा। कोई वक्ता अपना मंतव्य या कोई कवि अपना काव्य-भाषण या पाठ के रूप में प्रेक्षकों के सम्मुख प्रस्तुत करता है तो उसकी क्रियाएँ (actions), मुद्राएँ (gestures), हावभाव (expressions), निश्चित स्थान पर बल ( stress), विराम (pauses) आदि का महत्त्व अधिक होता है। काव्यपाठ की महत्ता पाठौचित्य में मानते हुए श्री. बलदेव उपाध्याय लिखते हैं, "कविता को रसानुकूल होना चाहिए। विप्रलम्भ शंगार की कविता सदा भेद स्वर में पढ़ी जानी चाहिए। रस के विपरीत उत्साहमयी वीर कविता के पाठ के लिये ऊँचे स्तर का प्रयोग करना उचित होता है। औचित्य के भेदों में एक प्रकार पाठौचित्य भी होता है जिसमें सन्दर्भ और रस के अनुकूल कविता का पाठ उचित ढँग से किया जाता है।३ काव्यगत भावों की मूर्तिमत्ता में छन्दों का भी विशेष महत्त्व रहा है। साहित्य का छन्द अर्थपूर्ण शब्दों से निर्मित होता है, अतः काव्य में उसकी विशेष महत्ता होती है। छन्द, संगीत और समायोजन मानवीय मनोरागों के अर्थपरक प्रतीकों को वहन कर समस्त इन्द्रियों के संवेदना-संस्कारों को जागृत करने में सफल होते हैं। छन्द उस शब्दावली को अपनी स्वरधारा में बहाकर भाव को परिपुष्ट बनाते हैं। अर्थसहित छन्दपाठ में उच्चारण, माधुर्य शब्दों का उचित स्वराघात और स्वर और लय के संयोग से भावलीनता उत्पन्न हो सकती है। कहीं-कहीं स्वरलालित्य से सीधा पाठ भी करते हैं। उत्तम पाठशैली अभिव्यंजना में सहायता, विविधता और नवीनता होती है। कवि का सहजग्राही संस्कार होता है। पाठक को यदि छन्द का ज्ञान होता है १. काव्यमीमांसा, अ. ७, पृ. ३३ २. काव्यमीमांसा, अ. ७ ३. भारतीय साहित्यशास्त्र, पृ. २७७

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समूह, व्यक्ति और रसात्मक बोध की स्थिति १५७

तो पहली पंक्ति को सुनते ही लय से परिचित होकर स्वर के आगामी उतार-चढ़ाव से उसे आनंद आता है। अतः उत्तम काव्यपाठ और प्रभावी भाषण श्रोतृगण की आँखों के सामने कल्पित दृश्यविधान करके नेत्र एवं कर्ण की सहायता से अर्थग्रहण एवं आस्वादन सरल और सहज बना सकता है। वहाँ श्रोता का स्तर भी यदि ऐसा होगा जो कवि या वक्ता के वक्तव्य को समझ पाये, तो तादात्म्य सहज होगा, क्योंकि सहृदय को आकर्षित करने और रुचि उत्पन्न करने के तरीके उनकी सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, हेतु और स्थानादि से सम्बन्ध रखते हैं। "श्रोताओं को आकर्षित करने और दिलचस्पी बनाये रखने की पद्धतियों में, उत श्रोतृवृन्द के सदस्यों के सांस्कृतिक स्तर, सभा के उद्देश्य, स्थान एवं समय के अनुसार भिन्नता आयेगी।"१ काव्य का मौन-पाठ समूहविज्ञान की दृष्टि से अपनी भिन्न महत्ता रखता है। जब कोई घर पर बैठे-बैठे एकान्त में शब्दों का उच्चारण मुँह से न करते हुए काव्य को केवल पढ़ता है तब उस स्थिति में जिस आंतरक्रिया का प्रारम्भ होता है, वह उपर्युक्त दोनों स्थितियों से मिन्न है। कवि, काव्यार्थ और पाठक तीनों में वह क्रिया घटित होती है, जो लिनियर होते हुए भी अमूर्त, अदृश्य, सूक्ष्म और कुछ हदतक उलझनभरी (complicated) रहती है। यहाँ काव्यार्थ के द्वारा कवि उपस्थित है और आस्वादक पाठक के रूप में। मौनपठन में अभिनयादि साधन नहीं होता, काव्यपाठ या भाषण-सा बाह्य उच्चारण का अभाव होने से प्रत्यक्ष दृश्यविधान नहीं हो सकता। नेत्र और कर्ण की संवेदना प्रत्यक्ष रूप से कार्य नहीं करती है। नेत्रेन्द्रिय तो केवल पढ़ने का कार्य करके रह जाता है। शब्दों को पढ़ते समय नाट्यसंवेदनाएँ पाठक के मन में जागृत होती हैं। अर्थात् प्रत्यक्षतः बाह्य किसी दृश्यविधान, व्यक्ति या वातावरण से युक्त आंतरक्रिया न होंकर कवि की अभिव्यक्त अनुभूति (काव्यार्थ) और पाठक का मन इनमें सुक्ष्म आंतरक्रिया आरम्भ होती है। पाठक शब्द-अर्थ-रचनान्तर्गत व्यक्त कवि की अनुमूति से एकाग्र होने का प्रयास करता है। इस प्रक्रिया में पाठक को विशेष रूप से सक्रिय बनना पडता है, कवि को कम। पाठक की संवेदनशक्ति, बौद्धिक क्षमता और कल्पना शक्ति की इसमें विशेष आवश्यकता प्रतीत होती है। पाठक का अवधान खींचने के लिये अर्थमय शब्दों के अलावा अन्य कोई माध्यम नहीं रहता। पाठक सीमित क्षेत्र में व्याप्त किसी श्रोतृवृन्द (audience) का सदस्य नहीं होता, वरन् एक विशाल, ₹. The method of attracting an audience will vary with the kind of audience, the cultural background of its members, the purpose of meeting and the time and the place. -Handbook of Social Psychology, Page 304.