Books / Rasa Siddhant Ka Samajik Mulyanka Durga Dixit

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१५८ रससिद्धांन्त का सामाजिक मूल्यांकन

व्यापक जनता का एक अंग होता है। ऐसी किसी जनता (public) का सदस्य होता है, जिसमें काव्याभिरुचि, बौद्धिक संस्कार हो और साथ ही स्वकल्पनाक्षमता भी। प्राचीन आचार्यों ने भी काव्य के आस्वादक की कुछ कसौटियाँ बतायी हैं। प्रतिभाशाली ... विमलनवनवोन्मेषशाली ... आदि । अतः स्पष्ट है कि मौनपाठ का पाठक पब्लिक का सदस्य रहता है, किसी भीड़ या श्रोतृवृन्द का नहीं। यह जनता या पब्लिक समाजमनोविज्ञान के सन्दर्भ की है जिसका परिचय उपर्युक्त विवेचन में दिया गया है। गौनपाठ का सदस्य एवं उसकी आस्वादक्रिया का सम्बन्ध पब्लिक या जनता से इसलिए हैं कि कवि भी उसका एक सदस्य ही होता है। कवि काव्य के माध्यम से अपनी व्यक्तिगत अनुभूति को कला के स्तर पर अभिव्यक्त करता है और पाठक भी, जो उसी पब्लिक का एक सदस्य है, कवि द्वारा अभिव्यक्त अनुभूति का ग्रहण करता है। वहाँ (पाठकगण में) पारस्परिक शारीरिक सामीप्य के अभाव में भी रुचि, विचार, भावादि का सादृश्य बना रहता है। मौनपाठ के समय शब्दों वा वर्णों की रचना से पाठक पर भाषिक संस्कार होता है, परन्तु साथ ही अर्थ की लय से, विभिन्न संवेदनाओं के जागृत होनेसे कवि- अभिप्रेत, अव्यक्त और प्रच्छन्न भावों, विचारों, संवेदनाओं की प्रतीति सहृदय पाठक को होने लगती है। डॉ. दक्षित द्वारा इस विशेषता को इन शब्दों में अंकित किया गया है, "दृश्य काव्य में संगीत एवं वाद्य-यंत्र का अत्यधिक सहारा लिया जाता है, नृत्य उसका विशेष उपकरण है, किन्तु श्रव्य काव्य में जब रणन करते हुए अक्षरों की पायलों की झंकार का मृदुल संगीत श्रोता के कानों में गूँजने लगता है, तब कौन कह सकता है कि उसका हृदय अनन्य भाव से तरंगित नहीं हो उठता। "१ उसकी अंतः- चक्षुओं के सम्मुख काव्यगत विभिन्न प्रतीक, बिम्बादि प्रतिभाएँ प्रत्यक्षरूप होने लगते हैं और नाद, स्पर्श, वर्णादि विभिन्न संवेदनाओं के द्वारा पूरा काव्यबिंब प्रत्यक्ष हो जाता है। उसकी इस स्वयंसक्रियता ही काव्यबिम्ब को प्रत्यक्षवत्, दृश्यमान बनाकर आस्वाद कराने में सहायक होती है। अतः मौनपाठ के द्वारा काव्यास्वाद की प्रक्रिया नाट्य एवं काव्यपाठ की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म, व्यक्तिगत एवं व्यक्तिसापेक्ष रहती है। साथ ही यह स्पष्ट है कि नाटक और काव्य काव्यपाठादि का सम्बन्ध श्रोतृवृंद (Audience) से होता है, पर मौनपाठ का पब्लिक या जनता से। आस्वाद की दृष्टि से नाटक, काव्यपाठ और काव्य के मौनपाठ के संदर्भ में समूहविज्ञान के आधार पर क्रिया-प्रतिक्रियाओं में जो विभिन्नता दिखायी देती है उसमें रसास्वाद के सम्बन्ध में कतिपय प्रश्न उभरते हैं। रसास्वाद की स्थिति का इन आंतरक्रियाओं से कहाँ तक सम्बन्ध है यह देखना आवश्यक हो जाता है।

६0 १. रससिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण, पृ. १६

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नाटक के आस्वाद में दुहरी आंतरक्रिया घटित होती है। नाटक, काव्यपाठ और मौनपाठ द्वारा आस्वाद के स्वरूप में जो भिन्नता है वह मुख्यतः श्रव्य काव्य और दृश्य काव्य के स्तर की है। श्रव्य काव्य का मुखर पाठ दृश्य और श्रव्य की मिश्रित सीमारेखा पर स्थिर है। इस प्रकार नाटक के आस्वादन में कवि (काव्यार्थ) <>नट (अभिनय)-प्रेक्षकों द्वारा ग्रहण, काव्यपाठ में कवि (काव्यार्थ) मुखर पाठ कर प्रस्तुत करना- पाठकों का आस्वाद और मौनपाठ में कवि (काव्यार्थ-शब्दार्थ)-पाठक इन परस्पर सम्बन्धों में माध्यम का अन्तर भानेसे आंतरक्रिया की प्रक्रिया में परिवर्तन होता है तथा रसास्वाद पर भी उसका कुछ-न-कुछ प्रभाव होता है। नाटक के प्रयोग के समय घटित आंतरक्रिया, प्रेक्षकों की सामूहिक स्थिति और दृश्यविधान की विशेषता के इन कारणों से रसमयता की दृष्टि से नाटक उच्चतम माध्यम सिद्ध हो चुका है। मूलतः दृश्य काव्य के सन्दर्भ में ही भरतमुनि ने रसनिष्पत्ति की प्रक्रिया का प्रमेय स्थापित किया है। वस्तुतः रसवाद सामूहिक प्रभाव की इकाई पर खडा है, वहाँ सामूहिक स्तर पर रसास्वादन होता है। अभिनयादि के माध्यम से अभिनेताओं और प्रेक्षकों में परस्पर आंतरक्रिया होनेसे रसास्वादन सुलभ एवं सहज होता है। साधारण स्तर का भी प्रेक्षक क्यों न हो, दृश्यविधान की प्रभाविता और प्रत्यक्षता के कारण काव्यार्थगत या नाट्यार्थगत भावस्थितियों का सहज स्वाभाविक प्रभाव अत्यंत उत्कटता से होता है और उससे रसास्वादन भी हो सकता है। प्रत्यक्ष. दृश्यविधान में भावों की स्थिरता आकर तल्ीनता से, अपना स्वयं का अस्तित्व बहुत हदतक खोकर, वह रस का आस्वाद करके रसविभोरावस्था प्राप्त कर सकता है। प्रेक्षकगण समूह के रूप में एक संपूर्ण इकाई (polarization) के स्तर पर पहुँच कर रंगमंच पर अभिनीत नाट्य के विभावादि के संयोग से निर्माण होनेवाले रस का ग्रहण सहज रूप से करने लगता है। रंगमंच पर कन्या के ससुराल जाने का दृश्य हो, जिसे रंग, पट, यवनिका, नेपथ्य आदि पार्श्वभूमि, पार्श्वसंगीत, नायिका, उसकी सखियाँ, भाई-बहन, माँ-बाप आदि के अभिनय द्वारा, वार्तालाप अथवा भावपूर्ण गीत आदि सब के सहित प्रस्तुत किया जाता हैं। इसे देखते हुए प्रेक्षक कुछ समय तक अपने को भूलकर भी साधारण स्तर पर आकर उसमें भावतादात्म्य का अनुभव करता है। अतएव दृश्य काव्य के सन्दर्भ में रसास्वाद की स्थापना में समूहवादी दृष्टि परिलक्षित होती है। सामूहिक भावसंप्रेषण से सामूहिक मन को आस्वाद प्रदान करने की प्रेरणा रस में निहित है। मनुष्यमात्र की संवेदनात्मक एवं रागात्मक एकता में विश्वास करनेवाले रसवाद की व्याख्या सामूहिक आंतरक्रिया की भित्ति पर इस प्रकार हो सकती है, जिसमें किसी प्रकार की उलझनें एवं जटिलताएँ उपस्थित नहीं होतीं।

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एक ही समूह में विभिन्न प्रकार के प्रेक्षक होते हुए भी वे एक सामान्य श्रोतृगण (audience) के स्तर पर पहुँचते हैं। फिर भी उसमें व्यक्तिसापेक्ष कुछ-न-कुछ भिन्नत्व बना ही रहता है। नाटक पढ़ने की वस्तु नहीं है, प्रयोग की है। अतएव रसात्मक बोध पर प्रयोग का अतीव प्रभाव होता है और दृश्यात्मक प्रतीति से प्रेक्षक भावमग्नता का अनुभव करता है। प्रत्येक प्रकार के प्रेक्षक के लिए दृश्यविधान की आवश्यकता नहीं होती। सामान्य प्रक्षक दृश्यविधान और अभिनीत नाट्यप्रयोग से रसास्वाद करेगा तो अधिक संवेदनक्षम प्रेक्षक, पाठक बनकर भी उतना ही रसविभोर हो सकता है। वैसे ही साधारण नाटक के लिए तो प्रस्तुतीकरण आवश्यक है पर महान काव्य या नाटक के लिए प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता नहीं, वह तो कोने में बैठकर पढ़ा जा सकता है।

काव्यपाठ की स्थिति में इसके सन्दर्भ में अन्य प्रश्न उभरते हैं। काव्यपाठ में पाठ करनेवाले और श्रोता में आंतरक्रिया होती है तथा मंच पर पाठ करनेवाले कवि के काव्य का रसास्वाद श्रोता करता है। इस प्रक्रिया में और नाटक के दृश्यविधान के रसास्वाद में क्या अन्तर आता है यह भी देखना होगा। श्रव्य की विशेषता दृश्य से मिन्न होनेके कारण यहाँ रस के आस्वाद का स्तर मिन्न होता है। काव्यपाठ करनेवाले का कंठ, शब्दों का उतारचढाव, लयबद्धता, गानेका ढंग, तर्ज आदि के सहारे श्रव्य काव्य दृश्य बनानेमें सहायता पहुँचती है। यदि कवि स्वयं काव्यपाठ करता हो, तो उसे अभिप्रेत भावों और संवेदनाओं को वाणी द्वारा व्यक्त एवं मूर्त करनेका प्रयास करता है। उसका यह प्रयास अभिनय से कुछ साम्य रखता है। इसमें कवि विशेष क्रियाशील बनकर, अपने हृद्गत को व्यक्त करता हैं। अतः उसका अव्यक्त अभिप्रेत वाणी द्वारा व्यक्त होने से श्रोता के लिए रसास्वाद में सरलता आती है। परंतु यदि काव्यपाठक में आवश्यक कंठमाधुर्य, वाणी की स्पष्टता, व्यंजकता और काव्यपाठ के अन्य गुण बिलकुल न हो तो रसास्वाद में विन्न ही उपस्थित होगा। अत्यंत धीमी गति में काव्यपाठ करना या अत्यंत जल्दबाज़ी करना, निश्चित स्थानों पर उतारचढाव, लय (Rhythm), गति, विराम (pauses) आदि का अभाव होना रस के बोध में क्षति पहुँचाता है और रसमंग की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है। कंठ का माधुर्य, संगीतात्मकता तथा गेयता का काव्यपाठ में कुछ सीमा तक ही सम्बन्ध है। वह सत्काव्य की प्रेषणीयता में सहायक होता है, परंतु वही काव्यपाठ का एकमात्र गुण नहीं कहा जा सकता। कितने ही ऐसे कवि कविसम्मेलनों में मात्र कंठमाधुर्य के सहारे लोकप्रियता प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जो क्षणकाल तक होता तथा रस के प्रभाव की दृष्टि से उतना महत्त्व नहीं रखता। पर इसमें संदेह नहीं कि अच्छे तर्ज़ पर गाये गीत द्वारा काव्यपाठ से, भावपूर्ण रसमय काव्य का रसास्वाद श्रोताओं को उत्कटता से होता है। एक मातृप्रेम- परक काव्य का, जिसमें मातृहीन बालक के मन की स्थिति का यथार्थ अंकन है, पाठ

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स्वयं वही कवि करे तो सारा श्रोतृवृन्द उसमें रसविभोर होकर आँसू बहाने लगता है। श्रोताओं की भावविभोरता का अनुभव कई बार देखा गया है। परंतु यही कविता यदि हाथ हिलाते हुए, अनुचित ढंग से चित्रपट के किसी गाने की तर्ज़ पर अथवा बहुत अस्पष्ट या जल्दी गायी जाय तो अवश्य ही रसहानि हो जाएगी। वहाँ रसास्वाद तो दुर्लभ होगा, बल्कि रसभंग की स्थिति उत्पन्न होगी। काव्यपाठ उचित ढंग से न होना रसास्वाद का विन्न है। वीररसयुक्त समूहगान ओजपूर्ण ऊँचे स्वरों में गाने पर प्रेक्षक पर प्रभाव होकर, श्रोतृगण मंत्रमुग्ध बनकर (अर्थात् तल्ीन) रसास्वाद करते हैं, जैसे भाषण के बारे में भी कहा जाता है। श्रव्य काव्य में किसी छन्दविशेष का अस्तित्व होता है। प्राचीन विद्वानों ने छन्द और रस का अभिन्न सम्बन्ध माना है। काव्यकलान्तर्गत छन्द के कारण ही अन्य कलाओं से उसकी श्रेष्ठता प्रमाणित करते हुए पुत्तूलाल शुक्ल ने कहा, "छन्द में मग्न होते ही भाव की प्रत्येक चेष्टा प्रत्यक्ष होने लगती है, उसकी अनुभूति खींच ली जाती है, आलम्बन का रूप साकार होता है और उद्दीपन वातावरण ध्वनित होता प्रतीत होता है। रसपिपासू छन्दसंसार से, जिस काव्य का ग्रहण हृदय द्वारा करते हैं, उसके अभाव में स्थिति का ग्रहण बुद्धिव्यवसाय और अनुमान की सहायता से होता है। "१ प्राचीन आचार्यो ने भी विभिन्न रसों में छन्दों की अनुकूलता का संकेत किया है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में इसके उल्लेख हैं।२ छन्दों की रसमयता के सन्दर्भ में श्री. सुमित्रानंदन पन्त ने पल्व की भूमिका में लिखा है, "मिन्न भिन्न छन्दों की भिन्न-भिन्न गति होती है और तदनुसार वे रसविशेष की सृष्टि करने में सहायता देते हैं। रघुवंश में अजविलाप का वेतालीय छन्द करुण रस की अवतरणा करने में कितना उपयुक्त है ? जैसे अधिक उद्वेग के कारण उसका कंठ गद्गद हो गया हो, भर गया हो। "३ प्रत्येक छन्द की अपनी कोई विशेषता होती है। कविता सवैये को पढ़ने की सूचना छन्दप्रभाकर में यों है - "प्रत्येक सवैया और कवित्त को दुहराकर पढ़ना उचित है, क्योंकि उसका संपूर्ण आशय चतुर्थ पद वा चतुर्थ पद के उत्तरार्ध के आश्रित होता है। जब तक चतुर्थ पद पढ़ने का समय आता है, तब तक तीन चरणों का सम्बन्ध ठीक स्मरण नहीं रहता, परंतु दुहराने में सब आशय भली-भाँति समझ में आ जाता है।"४

१. आधुनिक हिन्दी काव्य में छन्दयोजना, पृ. ५६. २. भरत का नाट्यशास्त्र, अध्याय ४. ३. पल्व की भूमिका ४. छन्दप्रभाकर, पृ. २१७ : आधुनिक काव्य में छन्दयोजना, पृ. १६४ से उद्धृत रस .... ११

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१६२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन हिन्दी में गीतों की तथा काव्य के पाठ की परम्परा रही है। रीतिकाल में दरबारी कवियों की लोकप्रियता तथा यश का रहस्य काव्यपाठ में ही रहा है। दरबारों में राजा-महाराजा तथा अन्य दरबारियों सहित, श्रंगार, वीर रसपूर्ण काव्यपाठ करके, श्रोताओं पर जादू का-सा असर करनेवाले कवियों की संख्या पर्याप्त थी। भूषण ने अपनी वीररसपूर्ण फडकती कविता को जोशीले स्वर में बडे आवेश से सुनाकर श्रोताओं को रसविभोर किया था। परंतु इसी काल में रसज्ञ श्रोतागण के स्थान पर रसिक वर्ग बना। चारणों ने वीररसपूर्ण गीतों द्वारा जनता को रसविभोर किया था। राज- दरबारों में काव्यपाठ की परिपाठी सामन्ती विशेषता बनी और प्रेक्षक तो अरसिक एवं मूर्ख ही क्या, नासमझदार भी होने लगे। पाठ में रसात्मकता की विशेष महत्ता रही। वैसे देव और बिहारी का काव्य पढ़ें तो उसमें व्यक्त भाव, रस का बोध होता है पर काव्यपाठ से तीव्रता में वृद्धि होती है और रसात्मक स्थिति विशद रूप में उपस्थित हो जाती है। राजदरबारों में क्यों न हो, जनसामान्य तक भावसंप्रेषण के माध्यम के रूप में काव्यपाठ की परम्परा अक्षुण्ण बनी रही, जिसे स्वीकार करते हुए डॉ. विजयेन्द्र स्नातक लिखते हैं, "कुछ भी हो, यह तो स्वीकार करना पड़ेगा कि जनमानस तक काव्य को पहुँचाने की प्रक्रिया-विशेष के रूप में कविसभा या कविसम्मेलन का आविष्कार हो गया। "१ छायावाद काल के पश्चात् संगीत शैली की विशेष प्रवृत्ति आयी। पर उस काव्यास्वादप्रक्रिया में खतरा उत्पन्न हुआ। स्वर के आकर्षक आरोह- अवरोह के सहारे हीन शब्दों को गीत कहने तथा कभी-कभी आवश्यक संवेदना की कमी की पूर्ति के लिए संगीतशैली से काव्यपाठ में चमत्कृति उत्पन्न की जाने लगी। आज कविता छन्द, तुक आदि से मुक्त है। मुक्तछंद में छन्दादि बन्धनों से मुक्त होने पर भी ध्वनिमाधुरी के लिए उसमें अनुप्रास के विविध स्वरूपों का आयोजन होता है। एक भाव का एक पद्यांश में अंकन करना और भाषा तथा भाव के सुगठन के लिए विरामचिन्हों का प्रयोग, व्यंजनाशक्ति की अभिवृद्धि के लिए विदेशी शब्दों का प्रयोग आदि बातों के साथ नयी कविता में अर्थ की विशेष लय होती हैं। अतः नयी कविता के लिए काव्यपाठ की विशेष महत्ता प्रतीत होती है। आज काव्यपाठ की प्रणाली भी भिन्न बनी है। काव्यरचना में निहित विराम- चिह्नों, उच्चारणचिह्नों, विस्मयादिबोधक चिह्नों, उल्टी-सीधी लकीरों, बोल्ड टाइप के अक्षरों, खाली जगहों और लकीरों आदि के प्रयोग से पाठक खीजता है, परंतु इन सभी चिन्हों के द्वारा व्यंजित अपने भाव-बोध को कवि पाठ के द्वारा व्यक्त करता १. चिंतन के क्षण, पृ. १३८

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है। एक तरीके से लगता है कि इसमें काव्यपाठ ही मुद्रित होता है। पाठय भाषा की अभिव्यक्ति की अपूर्णता काव्यपाठ से दूर की जा सकती है। साथही कवि की अपनी- अपनी विशेष पाठप्रणाली भी होती है। कवि के आंतरिक संगठन का प्रभाव उसकी काव्यपाठ की शैली पर होता है। कहा गया है कि "भारती के काव्यपाठ की सुकुमारता सर्वेश्वर की गुरुगम्भीरता, भवानी की ओज तथा रघुवीरसहाय का तरल अयत्नज प्रवाह उनकी अपनी शैली के अनुकूल है।"१ अतः ऐसी स्थितियों में ऊपरसे आरोपित न होकर काव्य उनके व्यक्तित्व का अभिन्न अंग बन जाता है। नये काव्य में चिन्हों का उचित उच्चारण, शब्दों पर उचित बलाघात, मंद या तीव्र गति आदि के द्वारा वाकू और अर्थ की संपृक्ति से परिपूर्ण काव्य-पाठ किया जाता है, जो श्रव्य काव्य को दृश्यत्व भावस्थिति में ला सकता है। प्रश्न उपस्थित होता है कि आज यदि भूषण के पद कोई गाये तो क्या प्रभाव होगा ? एक विशेष समूह, युग और स्तर के संदर्भ में साथ काव्यपाठ का सम्बन्ध होता है। यही कारण है कि आज के कविसम्मेलन में भूषण के वीररसपूर्ण काव्य का पाठ उत्कटता से रसास्वाद नहीं कराएगा। युगानुसार श्रोतागण की स्थिति, अभिरुचि आदि का ही यह अंतर हैं। काव्यपाठ के विषय में और एक बात स्पष्ट है कि प्रबन्धकाव्य के पाठ से तो रसका अनुभव तुरन्त आ सकता है, क्योंकि उसमें पूर्वसंदर्भ होने से श्रोता रसविभोरावस्थातक पहुँचता है। परंतु मुक्तकों में रसविभोर होने के लिये अवकाश नहीं रहता। काव्यपाठ की दृष्टि से मुक्तकों को महत्ता इसीलिये मिली कि दरबारों, कविसम्मेलनों में थोड़े समय चमत्कारपूर्ण उक्ति अथवा मुक्तकाव्य सुनाकर श्रोताओं पर प्रभाव डाला जा सकता था। रस की स्थिति आचार्यों द्वारा मुक्तक में अस्वीकार करने का कारण भी यही है कि वहाँ विभावादि सारी सामग्री के अस्तित्व, रसपरिपोष एवं आस्वाद में रसविभोरता का अनुभव नहीं आ सकता है। "गागर में सागर" भर देनेवाले शब्दों की झंकार से अभिव्यक्त मुक्तकों का काव्यपाठ क्षणभर के लिये क्यों न हो श्रोता के मन में भाव सस्पर्श अवश्य ही कर जाता है। अर्थात् जिस अनुभूति का आस्वाद प्रथमतः कवि ने किया हो, श्रोता तक पहुँचाने में काव्यपाठ की सहायता अवश्य होती है, पर रस- विभोरावस्था नहीं। रस तो केवल शब्दों या वाक्यों में नहीं होता है, बल्कि संदर्भ और पूर्वस्मरण से आचार्यों ने उसका सम्बन्ध माना है कि मुक्तक की संदर्भहीनता की कठिनाई रसास्वाद के सन्दर्भ में अवश्य ही उभरती है। यह भी सोचना होगा कि यदि ऐसे काव्य का पाठ किया जाय, जिसमें रागात्मकता की अपेक्षा बुद्धितत्त्व की प्रधानता हो तो आस्वाद की स्थिति क्या होगी। १. भाषा और संवेदना, पृ. ७२-७३

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१६४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन तथाकथित बुद्धिरसपूर्ण काव्यपाठ की परम्पराआज भी कविसम्मेलनों में तथा आकाश- वाणी की कविगोष्ठियों में अक्षुण्ण है। यदि कवि स्त्रयं कविसम्मेलनों या आकाशवाणी के द्वारा अपनी रचनाओं को श्रोताओं के सम्मुख प्रस्तुत करता है, तो उपस्थित श्रोतागण पर उसका प्रभाव कहीं अधिक होता है। कवि एवं श्रोतागण में निकट सम्बन्ध होने के कारण कवि भावपूर्ण गीत गाकर जनता के, श्रोताओं के हृदय को स्पर्श कर उनको प्रभावित करने का कार्य करता है और उस भावोत्तेजक स्थिति में रसग्रहण श्रोतागण करते हैं। वे कवि लोकप्रिय भी बनते हैं। काव्यपाठ को लक्ष्य कर कविसम्मेलनों में प्रशंसा पाकर लोकप्रिय बननेवाली कविताओं के सन्दर्भ में कही गयी बात सही प्रतीत होती है कि, "कविसम्मेलनों में उन्हीं रचनाओं को प्रश्रय मिल सकता था जो मात्र सुनाई जाकर जनता के हृदयों को छू सकें अथवा उसे प्रभावित कर सकें। अधिक विचारात्मक या तातत्विक कृतियाँ इस गुण से अपना सामंजस्य न बिठा सकने के कारण स्वतः कविसम्मेलनों से दूर हो हुई। उनमें केत्रल सहज भावावेगवाले गीत ही स्थान पा सके । "१ कविता की संश्रेषणीयता के लिये मुद्रित माध्यम पर्याप्त नहीं है। समसामयिक स्थिति में काव्यपाठ की महत्ता अधिक रहती है क्योंकि वहाँ काव्यपाठ करनेवाल। और श्रोता इनमें आंतरक्रिया घटित होती है। अतः उनका समान संवेदना एवं बोधयुक्त होना आवश्यक है। यदि ऐसा न हो तो काव्यपाठ उतना प्रभावकारी नहीं बनता। पर कुछ ऐसे गीत या काव्य है (वीर, शंगार, करुणादि रस से ओतप्रोत ) जिनका उचित काव्यपाठ किसी काल में भी किया जाय, लोकप्रिय होता है। ऐसी कालजयी कृतियाँ कम ही होती हैं। समकालिकता में महत्ता रखनेवाली अधिक रहती हैं। ऐसा काव्य कि जिसमें भावावेग एवं संगीततत्त्व भी कम है, सामान्य जनता में भले ही स्थान न पाता हो, अपितु "एक खास श्रोतावर्ग" उसका आस्वाद लेने में समक्ष है। भावातिरेक के अलावा अन्य तत्त्वों से परिपूर्ण काव्य अर्थात् विचारोत्तेजक, विशेष भावबोधसंपन्न, बौद्धिक प्रेरणा से युक्त, नवीन भावबोध की अभिव्यक्तिसे पूर्ण, नूतनतम प्रतीकों तथा बिम्बों के अंकन से युक्त काव्य के पाठ में साधारण श्रोतागण नहीं, बल्कि एक विशेष प्रकार के श्रोता अवश्य ही आस्वाद लेते हैं। ऐसा काव्य सुनते हुए काव्य- पाठ की अधिक सरलता, स्पष्टता एवं उचित बलादि के आधार पर उसमें अभिप्रेत बिम्बों, प्रतीकों, संवेदनाओं, अनुभूतियों, भावबोधों से परिचित एवं समरस होकर पाठक में नया भावबोध जगता है। यह आस्वाद रागात्मक प्रेरणासंपन्न कविता के समान नहीं होता, परंतु एक विशेष सुस्पष्टता, सुकरता उत्पन्न होकर श्रोता के मनमस्तिष्क में भावबोध जागृत होता है। नवकाव्य की दुरूहता भी इससे कुछ हद तक कम होने में मदद मिल सकती हैं। १. नया हिन्दी काव्य, पृ. ३०१

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काव्यपाठ के द्वारा श्रोता पर जो प्रभाव पडता है क्या उसी प्रकार का प्रभाव भी मौनपाठ की स्थिति में सम्भव है? रसमय काव्य के पाठ से श्रोता का मन रसविभोर होता है और उस भावोद्वेलन की रसमय स्थिति में काव्य का प्रभाव भी अधिक काल तक बना रहता है। परंतु काव्य को यदि एकान्त में मौनरूप से पढ़ा जाय तो उसका प्रभाव अवश्य ही कुछ भिन्न होगा। इसका कारण यह है कि काव्यपाठ के अन्य उपकरण ध्वनि, नादतत्त्व, बाह्याभिव्यक्ति के अन्य साधन, सक्रियता (activity), मुद्राएँ, अभिनयादि बातों का पूर्ण अभाव होने के कारण पूरी प्रक्रिया सूक्ष्म, अप्रत्यक्ष एवं आत्मकेन्द्री बन जाती है। अतएव आस्वादक की मनस्थिति में कुछ अन्तर अवश्य ही आता है। वह अपनी कल्पनाशक्ति एवं संवेदनशीलता, अनुभूतिग्रहण की बौद्धिक क्षमता के अनुरूप काव्य का आस्वाद ले सकता है। प्राचीन रसमय काव्य की बात छोड़ भी दें और बौद्धिक कहे जानेवाले नए काव्य के सन्दर्भ में काव्यपाठ का विचार करें तो भी कहा जा सकता है कि बुद्धितत्त्व या ावबोध से परिपूर्ण नई कविता को उसकी गद्यमय लय में, उचित ढंग से श्रोताओं के सम्मुख पढ़ा जाय तो श्रोताओं पर निश्चित प्रभाव अवश्य होगा। उसकी सूक्ष्म गहन अनुभूतियों, निगूढ़ प्रतीकों, बिम्बों, संकुल संवेदनाओं, सम्मिश्र भाववीचियों और विभिन्न अन्तर्दशाओं के अन्वेषण के प्रयास और प्रच्छन्न नादतत्त्व के कारण साधारण पाठक के पल्ले भले ही कम पडते हो, तथापि अभिरुचिसंपन्न एवं विशेष बौद्धिक स्तरवाले पाठक उसका भावग्रहण या रसग्रहण कर सकते हैं। वहाँ अनिवार्यतः रस की स्थिति उत्पन्न होगी ऐसा नहीं कहा जा सकता। उसी काव्य के मौनपाठ में पाठक बाह्य प्रभाव से दूर स्वयंप्रभाविता, कल्पना एवं अनुभूति के क्षेत्र में जो काव्यास्वाद करेगा वह व्यक्तिसापेक्ष अधिक होगा। सामूहिक अंश तो विशेष पाठक-वर्ग की रुचि के रूप में वहाँ अवशिष्ट रहेगा। एक उदाहरण से इस बात को स्पष्ट किया जा सकता है। नये भावबोध से संपन्न एक कविता की कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं- महासंघ का मोटा अध्यक्ष धरा हुआ गद्दी पर। / खुजलाता है उस्थ / सर नहीं/ हर सवाल का उत्तर देने से पेश्तर /

बीस बडे अखबारों के प्रतिनिधि /पूछे पचीस बार/ क्या हुआ समाजवाद / कहे महासंघपति / पचीस बार / हम करेंगे विचार / आँख मारकर / पचीस बार वह हँसे, वह पचीस बार / हँसे फिर अख़बार।

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एक नयी तरह की हँसी यह है/ पहले / भारत में सामूहिक हास परिहास तो नहीं ही था लोग आँख से आँख मिला हँस लेते थे/

इनमें सब लोग दायें-चायें झाँकते हैं/ और यह मुँह फाडकर हँसी जाती है। / १ इस कविता को यदि श्रोतृवृन्द के सम्मुख पढ़ा जाय तो इसमें परम्परागत वृत्तछन्द और संगीत तत्त्वादि के न होने पर भी गद्यात्मक लय के कारण कुछ विशेष शब्दों पर बलाघात होने के कारण ये पंक्तियाँ श्रोताओं पर प्रभाव अवश्य करेंगी और श्रोताओं में भावबोध जगायेंगी। आज के सरकार के प्रति आक्रोश की भावना, कसा हुआ व्यंग्य, बड़े पदों पर स्थित व्यक्तियों की खुलनेवाली पोल के द्वारा व्यंग्य, हास्य, क्षोभ, सात्त्विक क्रोध आदि की अनुभूति कराने में यह काव्य सक्षम है। रस के न होने पर भी अनुभूति पूर्ण भावबोध की उत्कटता (intensity) की दृष्टि से इसमें कोई कसर नहीं। इसमें पाठक न रौद्र रस का अनुभव कर सकता है, न वीर रस का। अपितु यहाँ कवि अनुभूति का साक्षात्कार काव्यपाठ द्वारा अवश्य ही होता है। मौखिक पाठ के अलावा मौनपाठ के सन्दर्भ में इसका विचार करें तो कहा जा सकता है कि पढ़ने पर ये काव्यपक्तियाँ पाठक के मनमस्तिष्क में मानवीय जीवन के पहलू का संस्पर्श करायेंगी और क्षणभर में अभीष्ट छाप छोडती जायेंगी। रसहीन काव्य को पढ़ते समय उस प्रकार का आस्वादन नहीं हो सकता, जिस प्रकार परम्परागत रसमय काव्य के मौनपाठ से हो सकता है। वहाँ विभावादि सामग्री के अभाव के बावजूद कवि की अनु- भूति, भावबोध, संवेदन आदि कला के स्तर तक पहुँचे हों तो पाठक उसका आस्वाद कर सकता है। इसी सन्दर्भ में अन्य एक उदाहरण प्रस्तुत करना उचित होगा। अज्ञेय की कविता है- साँप / तुम सभ्य तो हुए नहीं । नगर में बसना भी, / तुम्हें आया नहीं / एक बात पुछूँ/ (उत्तर दोगे ?)/ तब कैसे सीखा डसना / विष कहाँ पाया ? /

१. आत्महत्या के विरुद्ध, पृ. १२

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समूह, व्यक्ति और रसात्मक बोध की स्थिति १६७

अज्ञेय ने नागरी सभ्यता पर तीखा व्यंग्य करते हुए जीवन के कठोर सत्य का दर्शन इस क्षुब्ध व्यंग्योक्ति द्वारा कराया है। इसमें रस की उपकरणादि सामग्री नहीं है और न रसमय आस्वाद की प्रक्रिया भी घटित हो सकती है। परंतु आधुनिक भावबोधसंपन्न पाठकों का विशेष वर्ग इसे सुनकर या पढ़कर मानवजीवन के पहलू विशेष के साक्षात्कार का अनुभव अवश्य करेगा। व्यंग्य की तीखी अनुभूति की प्रतीति पाठक की बुद्धि के साथ ही मन को भी स्पर्श करेगी। पाठ के द्वारा यह अनुभूति अधिक सुस्पष्ट एवं सघन रूप में श्रोतातक पहुँचायी जा सकती है मौनपाठ में उसका अनुभव श्रोता की सक्षमता पर निर्भर रहेगा। उपर्युक्त दो उदाहरणों के बावजूद केवल रचनाप्रक्रिया एवं बौद्धिक तत्त्व पर बल देनेवाले काव्य के विषय में भी विचार करना आवश्यक होता है। नवकाव्य के अंतर्गत भी दो प्रकार का काव्य हो सकता है। एक प्रकार की कविता बौद्धिक संदिग्धता (ambiguity) प्रधान होती है, जिसमें भावविरहितता रहती है। दूसरे प्रकार की कविता बौद्धिक तत्त्व के होते हुए भी सूक्ष्म भावांकन से ओतप्रोत रहती है। भले ही कवि इसे बौद्धिक कहे, परंतु उसमें प्रच्छन्न रूप से भी क्यों न हो भाव का अस्तित्व होता है। प्रथम प्रकार की कविता सरल रूप से पढ़ी जाने पर बौद्धिक प्रभाव करती है। उसमें भावों का अस्तित्व न होने के कारण काव्यपाठ से कवि के अंतर्गत विचार सरलीकृत रूप में पाठक की समझ में आयेंगे। यही कविता मौनपाठ में अधिक दुरूह, रूखी और अनाकलनीय मालूम हो सकती है। दूसरे प्रकार की कविता का पाठ विशेष ढंग से करने पर उसमें निहित भावबोध को अधिक सुस्पष्ट एवं सुग्राह्य और अधिक प्रभावी रूप प्राप्त होगा और श्रोतृवृन्द भाव और बुद्धि के समन्वययुक्त अनुभूति का आस्वाद कर सकेगा। ये मुक्तछन्द कविताएँ विशेष लयसंधान से पढ़ी जाने पर भावात्मक स्थिति जगाने में सक्षम रहती हैं। इसीलिये तो की वसम्मेलनों में नयी कविताएँ भी लोकप्रियता पा सकती हैं। कविता में भाव का संस्पर्श जहाँ भी हो, तो वह श्रोताओं पर अपना प्रभाव जमाने में सफल होती है। शमशेर की एक कविता है, दिल के सीने में तड़पता है, तड़पता है जैसे हवा मे कोई सिसकता है सूर्य फूल चुपचाप ढुलते चले जाते आखिर किसलिये प्राण में केसर बरसता है।15

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१६८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

मधुरात यह इस तरह क्यों है ? इस कविता के पाठ और मौन पाठ से पाठक के "मन में समकालीन मानवनियति के भयानक अंश का आभास जागृत होता है। इस के संबंध में डॉ. परमानन्द श्रीवास्तव ने भी लिखा है "शमशेर की कविता में लय का जो रचाव है, वही उनका काव्यार्थ भी है। लय का रचाव आत्मानुशासित कविव्यक्तित्व का प्रभाव है। "१ कवि के व्यक्तित्व ने समकालीन मानवजीवन की स्थिति से अनुभूति ग्रहण कर भय के संस्पर्श से युक्त अभिव्यक्ति की है। पाठक के मन में विशेष अनुभूति जगाते हुए भावस्पर्श करने की सामर्थ्य इसके पाठ में हो सकती है। निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि नाटक का प्रयोग, काव्य का पाठ एवं मौनपाठ इन तीन स्थितियों का समूहमनोविज्ञान की दृष्टि से तथा सामाजिक संदर्भ से क्रमशः प्रेक्षकवृन्द्र, श्रोतृवृन्द और पब्लिक (जनता) से सम्बन्ध होता है और रसास्वाद की स्थिति इन तीनों स्थितियों में मिन्न होती है। साथ ही नाटक, काव्य और नव-काव्य के सन्दर्भ में काव्यपाठ की विशेष लय, पद्धति एवं प्रभावकारिता के कारण सुलभता एवं सुग्राहयता में अंतर आता है और वह रसास्वाद में सहायक होता है। भावात्मक संस्पर्श से युक्त बौद्धिक अनुभूति भी काव्यपाठ द्वारा श्रोता में भाव-बोध जगाने में समर्थ होती है। हर समय रसात्मक स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती परंतु भाव संस्पर्श अवश्य होता है। नाट्यप्रयोग, काव्यपाठ और मौनपाठ में क्रमशः देखना सुनना और मनन-ग्रहण की प्रक्रिया आस्वादक में घटित होने के कारण उत्तरोत्तर रसात्मक बोध की स्थिति सूक्ष्म हो सकती है।

कि भग

१. नयी कविता का परिप्रेक्ष, पृ. ९९

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अष्टम अध्याय साधारणीकरण की सामाजिक व्याख्या

रससिद्धान्त के अन्तर्गत साधारणीकरण की अत्यन्त जटिल एवं बहुचर्चित समस्या रही हैं। साधारणीकरण के सन्दर्भ में प्राचीन और आधुनिक विद्वानों ने अपनी-अपनी विचारधारा के अनुसार व्याख्यान-प्रत्याख्यान करने का प्रयास किया है। व्याख्या के इस दीर्ध प्रवाह में साधारणीकरण का प्रश्न अधिकाधिक जटिल, दुर्बोध एवं उलझनभरा बनता गया। काव्यानुभूति की जटिल समस्या के समाधान के रूप में भट्टनायक ने साधारणीकरण को पहली बार प्रस्तुत किया। तब से आज तक उसके विभिन्न पहलुओं, पक्षों तथा आधारों पर शास्त्रीय दृष्टिकोण से उसकी पर्याप्त चर्चा हुई है। साधारणीकरण को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में परखते हुए उसकी महत्ता क्या हो सकती है तथा बदलते समाज की सापेक्षता में उसका स्थान सार्वभौम हो सकता है या नहीं यह देखना इस अध्याय का प्रधान उद्देश्य है। कवि की अनुभूति पाठक की अपनी अनुभूति कैसे बन जाती है इस समस्या को लेकर साधारणीकरण के तत्त्व का अन्वेषण हुआ है। साधारणीकरण के द्वारा पाठक के लिए सभी भाव साधारणीकृत रूप में उपस्थित होते हैं और पाठक औचित्य का अवलम्ब लेकर भाव को आस्वाद रूप में ग्रहण करता है। कवि और पाठक-सामाजिक एक ही स्तर या भावभूमि पर उपस्थित होकर रसपान करते हैं। रस की निष्पत्ति की चर्चा करते हुए मट्टनायक द्वारा साधारणीकरण के तत्त्व का संस्थापन इस रूप में किया गया कि "अभिधा के बाद दूसरे स्वीकार करने योग्य काव्यव्यापार "भावकत्व" से निबिड़- निजमोह रूपी संकट विभावादि के साधारणीकरण हो जाने के कारण नष्ट हो जाता है और तब रज तथा तम पर अधिकार कर के सत्त्वोद्रेक का प्रकाश फैलने और निज- संवित-विश्रांति के प्राप्त होने से "भोजकत्व-शक्ति" के सहारे परब्रह्मास्वाद के समान अनुभव तथा स्मृति आदि से विलक्षण रस का भोग किया जाता है।१ १. रससिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण, पृ. ११७ से उद्धृत

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१७० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

साधारणीकरण का संकेतमय उल्लेख भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में मिलता है, परंतु 'साधारणीकरण' शब्द वहाँ प्रयुक्त नहीं है और न उसकी विशद व्याख्या है। उनके अनुसार भावों से रस निष्पन्न होते हैं पर 'सामान्य गुणयोग' से। सामान्य याने साधारण अर्थात् जो विशेष नहीं।9 भावों की सामान्य प्रस्तुति का संकेत तो यहाँ मिलता है किन्तु सिद्धान्तरूप में सर्वप्रथम सांकेतिक प्रतिपादन एवं सूचन भट्टनायक ने किया। अभिनवगुप्त ने भट्टनायक प्रतिपादित भावना का खण्डन किया और साधा- रणीकरण की स्थापना विस्तार कर अपने मत में उसकी प्रक्रिया का व्याख्यान किया। उन्होंने न केवल विभावादि का बल्कि स्थायी भाव का साधारणीकरण मान्य किया।२ विश्वनाथ ने साधारणीकरण की अपने ढँग से व्याख्या करते हुए प्रमाता और आश्रय के परस्पर तादात्म्य पर बल दिया।३ पण्डितराज जगन्नाथ ने आश्रय के तादात्म्य की बात को स्वीकार करते हुए साधारणीकरण की प्रक्रिया को तर्कसगत सिद्ध किया।४ हिन्दी में प्रथमतः आचार्य रामप्रकाश शुक्ल ने साधारणीकरण की चर्चा की और आलम्बन धर्म के साधारणीकरण और आलम्बन के साधारणीकरण की व्याख्या प्रस्तुत की।५ डॉ. नगेन्द्र ने मनोवैज्ञानिक आधार पर विचार करते हुए आश्रय और नायक से ग्राहक के तादात्म्य को अस्वीकार कर कवि अनुभूति का साधारणीकरण माना है।8 डॉ. आनन्दप्रकाश दीक्षित ने काव्यशास्त्रीय उदाहरणों के आधार पर समग्र विभावादि के साधारणीकरण का सिद्धान्त प्रस्तुत किया है।" केशवप्रसाद मिश्र ने 'मधुमती भूमिका' के रूप में साधारणीकरण की स्थापना की है। श्यामसुन्दर- दास ने इसी मधुमती भूमिका को स्वीकार किया है। मराठी के विद्वानों ने साधारणी- करण के नाम को नहीं, बल्कि प्रक्रिया को लेकर पर्याप्त चर्चा की है। श्री.न.चिं. केलकर उसे सविकल्प समाधि कहते हैं तो डॉ. द. के. केलकर स्वायत्त तादात्म्य का अभिधान देते हैं। श्री. वा. श्री. जोग इसे सहानुभूतिपूर्ण ताटस्थ्य कहते हैं और श्री. पटवर्धन जिज्ञासापूर्ण ताटस्थ्य कहते हैं। काका कालेलकर ने इसे अनासक्त तन्मयता के नाम से अभिहित किया है और ना. सी. फडके ने प्रत्यभिज्ञा पुनःप्रत्ययप्रतीति कहकर इसको स्पष्ट किया है । प्रगतिवादी आलोचक कॉडवेल के १. भरत का नाट्यशास्त्र. पृ. ४१३. २. अभिनवभारती- भाग १, पृ. २७९. ३. साहित्यदर्पण, ३।१०. ४. हिन्दी रसगंगाघर, पृ. ७४. ५. रसमीमांसा, पृ. ३१२, पृ. २७०, पृ. २६६, पृ. ३११-१२-१३. ६. विचार और अनुभूति, पृ. ३१-३२. ७. रससिद्धान्त : स्वरूप विश्लेषण, पृ. १३४-१३५.

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साधारणीकरण की सामाजिक व्याख्या १७१

सामूहिक भाव की समग्रतः व्याख्या करते हुए सामूहिक भाव (collective emotion) से साधारणीकरण का सम्बन्ध जोड़ते हैं।9 प्रयोगवादी आलोचक परम्परागत साधारणी- करण को अपर्याप्त मानकर नये रूप की माँग करते हैं। आधुनिक काल में, नई कविता क लिए परम्परागत साधारणीकरण की सीमाओं को अपर्याप्त कहते हुए अज्ञेय कहते हैं, "जब चमत्कारिक अर्थ मर जाता है और अभिधेय बन जाता है, तब कुछ शब्दों की रागोत्तेजक शक्ति भी क्षीण हो जाती है। उस अर्थ में रागात्मक सम्बन्ध नहीं स्थापित होता, कवि तब उस अर्थ की प्रतिपत्ति करता है कि इससे पुनः राग का संचार हो, पुनः रागात्मक सम्बन्ध हो। साधारणीकरण का अर्थ यही है। नहीं तो अगर भाव भी वेही पुराने हैं, रस भी और संचारी व्यमिचारी की तालिकाएँ बन चुकी हैं, तो कवि को नया कहने के लिए क्या रह गया १२ अर्थात् शब्दों में रागोत्तेजकता भरकर क्षमता पैदा करना, जिन के बल पर व्यक्ति अपने मन की निजी असाधारण अनुभूति समाजसाधारण बनाए। इस नये रूप को भी राममूर्ति त्रिपाठी नया मत माननेको तैयार नहीं हैं। उनके मत में इस बात का संकेत इससे बहुत पूर्व आनन्दवर्धन के द्वारा हो चुका है। उपर्युक्त विभिन्न मतों एवं विचारधाराओं से स्पष्ट होता है कि भरत से लेकर आजतक काव्यशास्त्रीय विद्वानों द्वारा विभिन्न संकेत एवं व्याख्याएँ प्रस्तुत की गई। इन व्याख्याओं को देखने पर पता चलता है कि विभिन्न विद्वानों के अपने-अपने दृष्टिकोणों का प्रभाव रहा है। शास्त्रीय सिद्धान्त की चर्चा करनेवालों ने संविद्विश्रांति को माना, मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण रखनेवालों ने कवि की अनुभूति को पाठक में निमग्न करना चाहा शुकजी जैसे लोकमंगलवादी आचार्य ने व्यक्तिहृदय को लोकहृदय में समर्पित करना उचित माना, प्रगतिवादियों ने मार्क्सवाद के प्रभाव में कॉडवेल के सामूहिक भाव में साधारणीकरण की छाया देखी आर प्रयोगवादियों ने भाषा के नित्य नवीन प्रयोगों द्वारा नई अभिव्यक्ति में साधारणीकरण के नये रूप की माँग की। आज साधारणीकरण का प्रश्न आलोचक के सामने शास्त्रीय समस्या के रूप में उपस्थित नहीं होता, वरन् अन्य कुछ कठिनाइयाँ लेकर आता है। शास्त्र के आधार पर उसके विभिन्न आधारों, विशेषताओं, प्रक्रियागत स्थितियों की चर्चा से कुछ तथ्य उपस्थित हुए हैं। पूर्ववर्ती शास्त्रीय चर्चा के आधार पर कहा जा सकता है कि साधारणीकरण पाँच प्रकार का माना गया है। (१ ) काव्यवस्तु का साधारणीकरण. (२ ) काव्यगत भावों का साधारणीकरण. (३) सहृदय का साधारणीकरण. कि १. नयी समीक्षा, पृ. २४. २. दूसरा सप्तक, पृ. १२.

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१७२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

(४) काव्यभाषा का साधारणीकरण. (५) अभिनय और साधारणीकरण. (६) कवि, काव्य और पाठक साधारणीकरण. इन बातों की ओर ध्यान देने पर स्पष्ट होता है कि कवि, काव्य, (वस्तु, भाव, भाषा आदि) और पाठक ये तीन अंश साधारणीकरण की चर्चा में महत्त्त्रपूर्ण है। इनको सामाजिक पृष्ठभमि पर परखना आवश्यक है। जब कोई व्यक्ति कलाकृति या काव्यकृति का आस्वाद करता है तो साधारणी- करण के द्वारा उस (कलाकार) की कलागत अनुभूति उसकी अपनी अनुभूति होनी चाहिए। वस्तुतः काव्यगत वस्तु, विषय, पात्र (चरित्र) आदि सभी बातों की सहायता से साधारणीकृत स्थिति में पाठक को पहुँचना चाहिए। परंतु काव्यवस्तु, विषयादि के सद्न्भ में विचार करने पर स्पष्ट होता है कि युग, समाज और सन्दर्भ के साथ काव्यगत वस्तु, विषय एवं आशय में नित्य परिवर्तन आता रहता है। प्राचीन काल से आज तक समाज विभिन्न स्थितियों से गुज़रता हुआ विकास की ओर बढ़ता जा रहा है। समाजजीवन और जगत के परिवर्तन में विज्ञान के कारण अत्यन्त क्षिप्र गति आयी है। प्राचीन सामाजिक विकास की तुलना में आधुनिक समाजविकास एवं परिवर्तन अत्यन्त गतिशील है। यंत्रयुग एवं विज्ञान के प्रभाव ने मानवजीवन की स्थितियाँ, सामाजिक व्यवस्थादि को इतना अधिक परिवर्तित कर दिया है कि नित्य नये प्रश्न उभरते हैं। समाजपरिवर्तन के क्रम में समाजव्यवस्था के साथ ही धर्म, नीति और संस्कारों में अंतर आ रहा है। नित्य नूतन वास्तविकता से जूझनेवाले आधुनिक मानवजीवन की स्थितियाँ जटिल एवं उलझनमरी बन गई हैं। प्राचीन सीमित, स्थूल एवं कुछ हद तक साँचेबन्द जीवन से भिन्न अत्यंत गतिशील, परिवर्तित एवं त्रिघटित जीवनस्थितियों में भिन्न-मिन्न अनुभूतियाँ कविमन में उदित होती हैं। मानवजीवन एवं समाज को महत्त्वपूर्ण प्रतीत होनेवाले कई नये विषय, समस्याएँ, दृष्टिकोण सामने आते हैं। अर्थात् काव्य के आशय में परिवर्तन आ जाता है। समसामयिक स्थिति के अनुसार उभरनेवाले नये विषय सामने आते हैं, कुछ विषय पुराने पड़े जाते हैं। परिणामतः चेतना, नवीन प्रेरणा एवं नूतन दृष्टि का साहित्य में आ जाना सर्वथा अटल है। अतः इस परिवर्तित, खण्डित, विघटित एवं जटिल समाज- जीवन में अनुभूत प्रेरणाओं की प्रतीति यदि नित्य काव्य में आती रहती है तो उसके साधारणीकरण का प्रश्न उपस्थित होता है। प्राचीन काल की स्थूल, सरल एवं अखण्ड भावात्मक जीवनाभिव्यक्ति एवं जीवन की स्थूल पृष्ठमूमि पर साधारणीकरण की प्रक्रिया सरल एवं सहज संभव थी। पर आज वह स्थूलता नहीं रही। परम्परा से विच्छिन्न स्थिति में अभिव्यक्त अनुभूति बदल रही है। आज पुराने आलम्बन भी नये सन्दर्भों में ग्रहण किये जाते हैं। तीन हजार वर्ष

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साधारणीकरण की सामाजिक व्याख्या १७३

पूर्व सामाजिक स्थिति से प्रेरणा ग्रहण करते हुए कवि की अनुभूति ने महाकाव्यों में जिस रूप में अभिव्यक्ति पायी थी, उसके अनन्तर भारतीय समाज में अंतर आता रहा है। फलस्वरूप गुप्तकालीन वैभवसम्पन्न अभिजात जीवन का प्रतिबिम्ब कालिदास के काव्य में झलक पड़ा और आज का कवि वैज्ञानिक युग में स्थित मानवजीवन की गहनतम उलझी अनुभूतियों की अभिव्यक्ति में प्रयत्नशील है। मोटे तौर से युग परिवर्तन के इन तीनों "माइल स्टोन्स" पर परिवर्तित जीवनदृष्टि, जीवनादर्श, तथा नये व्यक्तित्व की साकारता सामयिक साहित्य में प्रतिबिम्बित हुई है। इसको एक उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। देशभक्ति की प्रेरणा, अहिंसात्मक राजनीतिक आन्दोलन आदि भारतीय इतिहास में पहले कभी नहीं थे पर आधुनिक विज्ञानवादी युग में यह एक काल की चेतना बन गई। चरित्रों की नूतन सृष्टि वातावरणगत चेतना के कारण होती है। वाल्मीकि रामायण के राम, तुलसी के रामचरित मानस के राम, और निराला की "राम की शक्तिपूजा" के राम इन तीन व्यक्तित्वों की ओर दृष्टिपात करने से पता चलेगा कि ये तीनों भिन्न युग में संस्कृत, पले एवं प्रभावित कवियों की सृष्टि है। ये तीनों भिन्न व्यक्तित्व क्यों बने ? इसकी कारणमीमांसा साभाजिक गति- शीलता एवं परिवर्तन में ही मिलेगी। राम का व्यक्तित्व और चरित्र साकार करने में तीनों स्थानों पर निश्चित अंतर है। यहाँ आलम्बन प्राचीन ही है पर उसका स्वरूप बदला, अर्थ, व्यक्तित्व-सन्दर्भ नया है यहाँ साधारणीकरण कैसे होगा? प्राचीन काल में साधारणतः प्रख्यात, धीरोदात्त एवं ऐतिहासिक कथावस्तु और पात्रों के स्वीकार की बात मान्य थी, अतः वहाँ साधारणीकरण सरल था। काव्यास्वाद के समय पृष्ठभूमि में पाठक के मन में कथावस्तु एवं पात्रों के प्रति अनुकूल कुछ संस्कार बना रहता था। अतः उससे साधारणीकरण करना कहीं अधिक सुलभ, सरल एवं सम्मवनीय था। पर अब इन नये चरित्रों की सृष्टि होती है, पुराने आलम्बन, पुरानी कथाएँ सर्वथा नये सन्दर्भों में ग्रहण की जाती हैं, उनका क्या होगा ? महाभारत की कथा तो प्रख्यात है पर उसको तथा उसके पात्रों को स्वीकृत कर प्रतीक रूप में स्थापना करते हुए जो नवयुगचेतना "अन्धा युग " में कवि ने चित्रित की है, उसके साथ उसी प्रकार साधारणीकरण सम्मव नहीं, जैसे महाभारत की कथा से था। आज कवि राम का परमात्मा रूप या मर्यादापुरुषोत्तम रूप ही चित्रित करने में संतुष्ट नहीं वरन् मनोविज्ञान की दृष्टि से, व्यक्तिगतता से कौतूहलमूलक, प्राचीन सन्दर्भ मात्र संकेत रूप में ग्रहण करके नवीन सृष्टि करता है। राम के समान ही कृष्ण, सीता, उर्मिला, कर्ण, शिवाजी महाराज आदि प्राचीन विख्यात पात्रों को आलम्बन ही नितान्त नृतनतम रूप में और सन्दर्भ में उप- स्थित किये जाते हैं। प्राचीन आलम्बन ही नहीं बल्कि एक व्यक्ति के रूप में स्वयं कवि भी आलम्बन या आश्रय बन जाता है। आज पूर्वसकेत और पूर्वग्रह से सर्वथा मुक्त, स्वतंत्र और मिन्न व्यक्तित्व के रूप म मनोवैज्ञानिक गहराई से परिपूर्ण, कौतूहलमूलक

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१७४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन कथावस्तु तथा चरित्रों का ग्रहण नये सन्दर्भ में किया जाता है। व्यक्त के साथ अव्यक्त आलम्बन भी हैं, प्रकृति को भी आलम्बन बनाकर उसमें व्यक्तित्व ढाल दिया जाता है। कवि की यह सृष्टि सर्वथा नवीनतम और आधुनिक काल की उपज है। अतः आलम्बन के सन्दर्भ परिवर्तित होने और काव्यवस्तु के नितान्त बदलने से साधारणी- करण का प्रश्न उठता है। फिर प्रश्न यह है कि क्या प्राचीन आलम्बन और उनके सन्दर्भ आज के काव्य में बेकार सिद्ध होते हैं ? क्या वे मात्र इतिहास की वस्तु बन जाते हैं ? और आज के सन्दर्भ परम्परावादी काव्य के हिमायती पाठकों की समझ में नहीं आ सकते ? यदि ऐसा होता तो पूर्ववर्ती सारा का सारा काव्य उपयोगहीन एवं त्याज्य बन जाता। आज भी पूर्ववर्ती उच्च सफल साहित्य पढ़ा जाता है, पाठक उसे पसन्द करते हैं। इसका अर्थ यह है कि साधारणीकरण की स्थिति वहाँ सीमित है। क्या मात्र इतिहासकालीन वस्तु में झाँक कर पूर्वकालीन कौतूहलमूलक वस्तु देखने का आनंद उसमें है या प्राचीन गरिमा की झलक से पाठक उसकी ओर आकर्षित होते हैं ? प्राचीन मूर्ति या किसी शिल्प को देखते हुए आजका प्रेक्षक जब उसकी प्रशंसा करता है, तब उसकी मनस्थिति उस समय कुछ भिन्न होती है। प्राचीनतम मूर्ति और समसामयिक नवीन शिल्प दोनों कलाकृतियों के आस्वाद में जो अंतर आता है, वह युगपरिवर्तित स्थिति के कारण ही होता है। मात्र कुतूहल, प्राचीनता का गौरव, प्रशंसा इतना ही उसका हेतु नहीं होता। प्राचीन कलाकृति (काव्य) को पढ़ते समय आज के सन्दर्भों और संकेतों में उसका आस्वादन सम्भव नहीं। पाठक को उसे पढ़ते समय कुछ समय तक उस वातावरण एवं परिवेश में पहुँचना पडता हैं, अन्यथा काव्यानुभूति सफल नहीं हो सकती। हर युग में उसके आलम्बनों एवं सन्दर्भों से उस परिवेशसापेक्षता में साधारणीकरण सम्भव है, अन्यथा नहीं। कालिदास का शाकुन्तल पढ़ते समय उसमें अभिव्यक्त आशय, कथावस्तु, पात्रादि को गुप्तकालीन समाजस्थिति से बिलकुल विच्छिन्न करके देखा नहीं जा सकता। शकुन्तला की कथा आज निरर्थक लगेगी, यदि उस सन्दर्भ से हटाकर उसे पढ़ा जाय। पाठक को क्षणभर के लिए क्यों न हो, गुप्तकालीन अभिजात जीवन की पृष्ठभूमि पर घटित परिस्थिति में पहुँचना पडता है, अन्यथा साधारणीकरण असम्भव है। यहाँ पर साधारणीकरण के तत्त्व में सीमा आ जाती है। यह कठिनाई कवि की सफल एवं सक्षम अनुभूतिक्षमता एवं रचनाकौशल पर निर्भर होगी। युग और देश के अनुसार संदर्भ मिन्न अर्थ रखते हैं। चीन से भारत के युद्ध का उत्तरकालिक चित्र नरेश मेहता की एक कविता में व्यक्त है। युद्धोत्तर जर्जर चीन का वर्णन उसमें है, वहाँ की त्रस्त जनता, पेकिंग की सडकों

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साधारणीकरण की सामाजिक व्याख्या १७५

पर छायी मुर्दनी आदि का चित्रण है। इस कविता का विषय और अंकन क्या भारतीय, रुसी और चीनी व्यक्ति के लिए समान ही अनुभूति जगायेगा ? क्या इस कविता को पढ़कर समान मनस्थिति का अनुभव सब कर सकते हैं? समसामयिक सन्दर्भ पाठकों को भिन्न प्रकार से प्रेरित करते हैं। पर कभी-कभी यह भी देखा जाता है कि समसामयिक सन्दर्भ कुछ समय बीतने पर सार्वजनीन बन जाते हैं। जिन विषयों एवं सन्दर्भों में कवि की गहन अनुभूति और अभिव्यक्ति की सक्षमता एवं सफलता से व्यक्त हुई हो, वही सार्वजनीन बनती है, अन्यथा सम- सामयिकता में ही उसका अस्तित्व रहकर साधारणीकरण नित्य नहीं हो सकता। पाठक या सहृदय का साधारणीकरण सबसे अधिक विचारणीय बात है। काव्यानुभूति में सबसे अधिक महत्त्व पाठक का है। पाठक, दर्शक और श्रोता ऐसी तीन स्थितियाँ कलास्वाद में होती हैं। पाठक हो या दर्शक, वह जब किसी कलाकृति का आस्वाद करता है अपनी व्यक्तिगतता से सर्वथा मुक्त नहीं हो सकता। देश, व्यक्ति, काल आदि बन्धनों से सर्वथा छूट जानेकी बात मले ही कही गई हो पर इन बन्धनों से सर्वथा मुक्त होना असम्भव हैं किसी-न-किसी अंश में उसमें ये संस्कार बचे रहते हैं।'

यह बात तो माननी ही पडेगी कि किसी को किसी विशेष प्रकार के साहित्य से आनन्द आता है और वह अन्य किसी प्रकार की रचना से सर्वथा उदासीन रहता है। ऐसा क्यों है ? एक पाठक किसी कवि की विशेष प्रकार की कविता को या कविता- विशेष को पसन्द करता है और उसी कवि की अन्य कविता नहीं। किसी अन्य पाठक को वह अन्य कविता पसन्द आती है। ऐसा क्यों? पसन्दगी की यह विभिन्नता क्यों है ? इतना ही नहीं एक पाठक अपने जीवन के किसी काल में एक कवि के काव्य पर लट्टू होता है, पश्चात् किसी काल अन्य के काव्य को बेहद पसन्द करता है और पहले से उदासीन बन जाता है। कालिदास के मेघदूत को पसन्द करनेवाला रामायण में उतना नहीं रमता। यदि साधारणीकरण का तत्त्व मान्य किया जाय तो ये सारी स्थितियाँ उपस्थित नहीं होनी चाहिए। कोई कविताविशेष पसन्द आना, अच्छी लगना, समझ में आना ये व्यावहारिक शब्द साधारणीकरण के तत्त्व से सम्बन्धित हैं। कुछ लोग नई कविता के प्रति नाक भौ सिकोडते हुए कहते हैं कि "इसमें कुछ समझ में नहीं आता "। समझ में न आना, दुर्बोध, अनाकलनीय अथवा दुरूह होना आदि साधारणीकरण की त्रुटियाँ व्यक्त करती है और इसके कारणों को यदि खोजना हो तो सामाजिक परिवेश, तथा परिवर्तन की सापेक्षता में व्यक्तित्व विकास एवं संस्कार- शीलता को परखना आवश्यक होता है।

१. रससिद्धान्त : स्वरूप विश्लेषण, पृ. १३६

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१७६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन एक व्यक्ति का व्यक्तित्व दूसरे से किसी-न-किसी अंश में मिन्न होता है। "पिण्डे पिण्डे मतिर्भिन्ना" अतः व्यक्तिगत अभिरुचि (interest), प्रवृत्ति (attitude) और क्षमता (ability) कि दृष्टि से व्यक्ति-व्यक्ति में अंतर आना स्वाभाविक में सफल-असफल होगा, साथ ही अनुकूल स्थिति उसमें उत्पन्न होगी। "जाकी रही भावना जैसा, प्रभु मूरत देखी तिन वैसी"-सहृदय पाठक अपनी व्यक्तिगत भिन्रताओं और संस्कारों के अनुरूप काव्यानुभूति की प्रक्रिया में अनुभव प्राप्त करते हैं। परंतु ये संस्कार कहीं जन्मतः नहीं होते। मनोविज्ञान से प्रमाणित है कि मनुष्य पर अनुवंश (heridity) से भी परिस्थितियों (environment) का अत्यधिक प्रभाव होता है। कालविशेष और समाज की गतिशीलता की सापेक्षता में मनुष्य के संस्कारों में अंतर आता है। उसकी भावुकता, बौद्धिकता, धार्मिक धारणाओं और अन्य संस्कारों में जो परिवर्तन होता है, उसमें कभी गति अत्यन्त धीमी रही है, कभी बहुत ही क्षिप्र रही है। विज्ञानयुग ने मनुष्य की भावुकता को ललकारा और बौद्धिकता का संस्कार मानव पर बहुत शीघ्र और प्रभावी रूप से होता रहा इस परिवर्तन को देखने पर लगता है कि जिस समय रसवाद की स्थापना की गई, उस समय रागात्मक इकाई एवं भावुकता को सामने रखकर रस की सिद्धि मानी गई। भावात्मक घरातल पर सामूहिक एकता की जो बात की गई है, उससे बहुत भिन्न स्थिति आज उत्पन्न हो चुकी है। उसके पश्चात् धर्म, नीति, और विज्ञान के परिवर्तन हुए जिससे मनुष्य की भावुकता में अंतर आता गया है। विज्ञान का विकास एवं बुद्धिवाद की अति ने भावुकता को खण्डित किया। समाज का विघटन आरम्भ हुआ। सामाजिक विघटन के समानान्तर मानवजीवन की भावनिक और बौद्धिक स्थितियों में परिवर्तन आता रहा। ज्ञान और विज्ञान से स्थापित भौतिकवादी और बौद्धिक संस्कारों ने एक ओर समाज का विघटन किया। पारम्परिक संस्कार, जीवन के भावात्मक मूल्य, नीति के आदर्श, धर्म की पाबन्दी आदि सभी मूल्यों को एक साथ उखाडकर छिन्न-भिन्न कर डाला। खण्डितता और विच्छिन्नता आधुनिक युगजीवन की विशेषताएँ बनीं। नयी संवेदनाओं, नये नैतिक मूल्यों, धार्मिक अश्रद्धा आदि का विकास होनेसे जीवनमूल्यों के साथ ही मानव की दृष्टि बदल गई। बौद्धिक संस्कारों से वह चिकित्सक अधिक बना विचारशील हुआ और हर बात को टुकड़ों में विभक्त कर बुद्धि की कसौटी पर कसकर उचित-अनुचित का निर्णय करने लगा। फिर भौतिकवादी जीवन का आकर्षण बढ़ा जिसमें नैतिक मूल्य, धार्मिक श्रद्धा, भावुकता, मानसिक या अध्यात्मिक जगत्, सामूहिक एकता ये बातें नहीं रहीं। उसके मानसिक संस्कारों एवं भावुकतापर बुद्धि ने विजय पायी।

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तब प्रश्न यह है कि क्या ऐसी स्थिति में मानवमन की सारी भावुकता समाप्त हो गई है ? क्या बौद्धिक संस्कार इतने जडमूल बन गये हैं या बन सकते हैं कि मूल संस्कारों को बिलकुल नष्ट कर दें। मनोविज्ञान और समाजशास्त्र दोनों भी इस बात से सहमत हैं कि परिस्थिति (environment) या परिवेश मानव के संस्कारों एवं जीवनमूल्यों में भले ही परिवर्तन लाता हो पर उसके मूलगत संस्कार तो कुछ बने ही रहते हैं, अतः भावात्मकता का बिलकुल नष्ट हो जाना सम्भव नहीं। ये प्राचीन संस्कार, केवल इस जन्म के ही नहीं बल्कि पूर्वजन्म के भी अंशतः बचे रहते हैं। मनोविज्ञान तो पीढियों के अनुवंशगत संस्कारों का अस्तित्व मान्य करता है। अतः अंशतः क्यों न हो, शेष भावात्मक संस्कार काव्य के आस्वाद में पाठक को क्रियाशील बनाते हैं। भावात्मकता से प्रावित प्राचीन काव्य के पाठ में बौद्धिक संस्कारशील व्यक्ति आनन्द पाता है, उसका यही कारण है। पर यदि वह अपने ही नवीन संस्कारों के प्रति या प्राचीन के प्रति प्रतिबद्ध होता है तो कठिनाई उपस्थित हो जाती है। अतः स्पष्ट होता है कि संस्कारपरिवर्तन में वर्षों का व्यवधान अवश्य है। एक हज़ार वर्ष पूर्व समाजगत संस्कार, एक सौ वर्ष पूर्व की समाजगत स्थितियाँ और आज के समाज का स्वरूप इन तीन स्थितियों का चित्र उपस्थित करने पर ही स्पष्ट होगा कि नीति, धर्म और संस्कारों में कितना अंतर आया है और धीरे-धीरे समाज विघटन के साथ खण्डितता से परिपूर्ण जीवन का एहसास कितना बढ़ता जा रहा है। साधारणीकरण के विचार में वर्षों का यह व्यवधान तथा काल की सीमा महत्त्वपूर्ण हो जाती है। वह साधारणीकरण के तत्त्त्र-निर्वाह में भी एक सीमा उत्पन्न करती है। यन्त्रयुग में बुद्धिवाद ने व्यक्ति को स्वतंत्र इकाई बनाया। यही महान परि- वर्तन है। व्यक्तिवादी चेतना के फलस्वरूप, सामाजिक स्तर पर दो व्यक्तियों के सौंदर्यबोधों में जो समानता पहले गहीत थी, वह आज नहीं हो सकती। यह व्यक्ति- विशिष्टता एवं वेभिन्य साधारणीकरण में बाधा बनकर अवश्य ही आता है। किसी प्राचीन काव्य का मूल्यांकन करते समय भिन्न दृष्टियाँ दिखायी देती हैं। जो व्यक्ति जिस प्रकार का अपना एक दृष्टिकोण रखता है, उसके अनुकूल उस कवि के काव्य का मूल्यांकन करता है। तुलसी के रामचरितमानस के अध्ययन में इसी प्रकार की विभिन्नता युगपरिवर्तन के साथ परिलक्षित होती है। रामचरितमानस जिस काल में लिखा गया, उस काल में वह अतीव लोकन्रिय रहा होगा और पाठक उसे अतीव श्रद्धा एवं भक्ति- भाव से पढ़ते होंगे। परंतु क्या रामचरितमानस की लोकप्रियता एवं महानता आज तक भक्तिभाव के कारण ही बची है? आज मी भक्तिभाव से उसे पढ़नेवाले कुछ पाठक मिलेंगे। परंतु वह श्रद्धा, भक्ति, धर्म का रूप या जीवनादर्श आज नहीं बचा है। एक रस ... १२

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१७८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन नास्तिक, जिसे परमात्मादि का अस्तित्व ही मान्य नहीं, जिसका धार्मिकता में विश्वास नहीं, क्या उसे वह भक्तिभाव आस्वाद्य हो सकता है? अतः देखा यह जाता है कि युगपरिवर्तन के साथ धर्म व नीति की कल्पनाओं में जो मौलिक परिवर्तन आया है, उसने मानवजीवन के संस्कारों को प्रभावित किया। इसलिए किसी काव्य का मूल्य समी कालों में समान नहीं आँका जाता। कभी किसी को रामचरितमानस भक्तिरसपूर्ण काव्य होने के कारण अच्छा लगा, कोई उसमें व्यक्त सामाजिक उदात्त आदर्श से प्रमावित है, और तुलसी को लोकनेता कहकर कोई उसमें वर्गहीन समाजरचना के तत्त्व देखता है। मार्क्सवादी विचारक उस दर्शन के प्रभाव में आकर तुलसी के काव्य का मूल्यांकन करते हुए उसकी महानता प्रमाणित करते हैं। यही दृष्टि-विभिन्नता काल और व्यक्तिपरक भिन्न होती है। युग के बीतने पर आलोचकों या पाठकों की दृष्टि विशेष बदलती जाती है और उसके अनुरूप आस्वादन एवं मूल्यांकन भी बदलता है। इसीलिए तो प्राचीन काव्य के मूल्यांकन-पुनर्मूत्यांकन की आवश्यकता प्रतीत होती है। किसी कालविशेष में विशेष दृष्टिकोण का प्रभाव होता है। अतः विशिष्ट दृष्टियों से किसी रचना का मूल्य आँका जाता है। जैसे आचार्य रामचन्द्र शुक्क का काल एक नैतिक आदर्श, संस्कृति-रक्षा एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान का काल रहा है। साथ ही उनका अपना दृष्टिकोण लोकमंगलवादी है, अतः तुलसी की महत्ता को उन्होंने उस दृष्टि से आँका। पर बाद में तुलसी के काव्य का मूल्यांकन करनेवालों में कई विभिन्न कारणों से तुलसी के प्रशंसक हैं। आदर्शवाद के अधिष्ठाता, मर्यादावाद के रक्षक, सामाजिक समानतावादी एवं समन्वयवादी१ तथा आर्थिक विषमता के सहारक२ जैसे कई रूपों में उनकी महत्ता का वर्णन किया गया। इसमें व्यक्तिगत भिन्न दृष्टिकोणों के अतिरिक्त वर्णों के कारण बदले संस्कारों की झलक स्पष्ट रूप में है। परिवर्तित संस्कारों के कारण ही एक काल की कृति किसी अन्य काल में निरर्थक- सी भी प्रतीत होती है। किसी कवि का कालबाह्य (outdated) हो आना, काल की सीमा को ही व्यक्त करता है। वहाँ एक युग की कृति का अन्य युग में साधारणीकरण क्यों नहीं होता ? यदि ऐसा है तो समसामयिक कृतियों का मूल्य कालान्तर से शून्य होगा। पर सभी कृतियों का ऐसा नहीं होता। प्रत्येक युग का अपना एक 'टोन' होता है, सूक्ष्म अवचेतनीय तत्त्व उसमें समाये हुए होते हैं। संस्कारशील चेतना पर आधारित उस युग की कुछ प्रेरणाएँ होंती हैं, उनको खोजकर काव्य के स्तर पर व्यक्त करना कवि का कर्तव्य होता है। कवि का समाज से तीन प्रकार का सम्बन्ध होता है। १. रामविलास शर्मा - 'तुलसी में संघर्ष' २. रमेशकुन्तल मेघ - 'तुलसी-आ. वातायन से'

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समसामयिक सामाजिक संस्कारों का स्वीकार, विद्रोह या तटस्थता। इनमें सामंजस्य स्थापित कर कालातीत सार्वजनीन शाश्रत काव्यसर्जना करना उसका कौशल है। यह आवश्यक नहीं और सम्भव भी नहीं है कि हर युग में पाठक कवि के किसी विशेष भाव से ही प्रभावित हो। रामचरितमानस के उदाहरण से स्पष्ट है कि हर महान कृति उसी रूप में सबको सभी कालों में पसन्द आयेगी ऐसा नहीं, पर कलाकृति की शाश्वतता इसमें है कि किसी-न-किसी प्रकार से वह कृति-काव्यकृति हर युग में कम-अधिक लोकप्रिय रहती है। सम्भवतः किसी युग में उसका महत्त्व कम भी पड़ जाता है, पर काल के प्रवाह में वह नष्ट नहीं हो सकती। मराठी के प्रसिद्ध आलोचक श्री. श्री.के. क्षीरसागर इस बात से सहमत हैं कि, "परंतु शाश्वत साहित्य कहने पर ऐसा मानना गलत होगा, वह एक ही स्वरूप का होगा-उसी प्रकार ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि वह हर काल में समान रूप से और समान कारणों से लोकप्रिय होगा। रामायण की धर्मभावना का आवाहन सब कालों में समान ही होगा ऐसा नहीं। ज्ञानेश्वरी के पठन में भावुकता सब कालों में बनी रहेगी ऐसा नहीं।"१ फिर प्रश्न यह है कि कुछ शाश्वत कृतियाँ किन विशेषताओं के कारण शाश्वत बनती हैं ? हर युग में संस्कारों में परिवर्तन के बावजूद पाठक उन कृतियों को पढ़ते हैं। साहित्यिक रुचि, संस्कार एवं भावुकता में अंतर आने पर भी एक युग की कृति दूसरे युग में अच्छी क्यों लगती है ? वाल्मीकि, कालिदास, तुलसीदास, शेक्सपीअर, वर्डस्वर्थ ये सारे भिन्न-भिन्न युग के हैं और उनके समकालीन संस्कार मिन्न रहे हैं और आज से भी नितांत भिन्न। क्या प्राचीन इतिहास या काल में झाँकने मात्र की उत्कट जिज्ञासा एवं कुतूहल इसका कारण है ? कोई प्राचीन मूल्य शिल्प या प्राचीन काव्यकृति के अध्ययन में युगपरिवर्तन के अतिरिक्त अन्य दो प्रधान प्रवृत्तियाँ महत्त्वपूर्ण हो सकती हैं। मनुष्य की यह सहज वांछा होती है कि प्राचीन काल के जीवन में झाँके। प्राचीनता, प्राचीन सौंदर्य और सम्बन्ध की रक्षा करने की आकांक्षा उसके मन में सदैव रहती है। विकास के गति-सूत्र से परिचित होने में उसे एक प्रकार का आनंद आता है या ये प्राचीन कलाकृतियाँ प्राचीन गरिमा को व्यक्त करती हैं। किसी कृति का वर्णन या प्रशंसा अजायबघर में स्थित प्राचीन मूर्ति जैसा होता है। क्षणभर के लिये वह प्राचीन गौरव एवं गरिमा की ओर संकेत करती है और पाठक या प्रेक्षक को आनंद देती है। वह थोडी देर तक उसके आस्वाद से सुख प्राप्त करता है, पर गहन अनुभूति नहीं प्राप्त कर सकता। प्राचीन काव्यकृति से यदि ऐसा मात्र क्षणमर गरिमा की दर्शनोत्सुकता से आस्वाद किया जायेंगा तो वह साधारणीकृत कैसे होगा?

१. टीकाविवेक, पृ. ९९

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१८० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

युग-युग में परिवर्तन होता रहता है यह बात जितनी सत्य है, उतना ही यह भी सत्य है कि इस सांस्कृतिक विकास में एक क्रम चलता रहता है। एक युग बीतता है, परिवर्तित होता है, पर पूर्ववर्ती युग से सर्वथा विच्छिन्न नहीं रहता, उसका सम्बन्ध कुछ जुड़ा रहता है। वर्तमान का एक छोर भूतकाल से जुडा रहता है और दूसरा भविष्य से संलग्र रहता है। मानव की स्वाभाविक प्रवृत्ति यह है कि वह वर्तमान को भूत और भविष्यत् से संलग्न बनाकर जीवनगत संस्कार ग्रहण करता है। ऐतिहासिकता के बने रहने पर भविष्य की सृष्टि होती रहती है। अर्थात् साहित्यिक और सामाजिक परम्परा को बनाये रखकर क्रियाएँ-प्रतिक्रियाएँ चलती रहती हैं। प्राचीन युग की कलाकृति पाठक को इसीलिये अच्छी लगती है कि उसके सर्जन में उन संस्कारों एवं तत्त्वों का संयोग रहता है, जिनसे उसका वर्तमान जीवन भी सम्पन्न है। पाँचवीं सदी का काव्य पढ़ते समय वर्तमानकाल का पाठक कुछ ऐसे तत्त्व उसमें ढूँढता है जो मिलते- जुलते हैं। आचार्य शुक को तुलसी में लोकमंगल की भावना दिखायी देती है, वह वस्तुतः अपने युग की एक आवश्यकता या समकालीन संस्कार था। अतः पिछले युग से विभिन्न बात तुलसी में वे देख सके। अतः पुनर्मूल्यांकन के द्वारा पाठक ऐसी कुछ बातें भी उसमें ढूँढना चाहते हैं, जो उसमें पहले प्रतीत नहीं हुई हों। पाठक के काव्य-आस्वादन में साधारणीकरण के स्तर पर पहुँचने का दूसरा एक आयाम है। वह उस काव्य में ऐसे कुछ तत्त्व पाता है, संस्कार या अर्थ ढूँढता है, जो उस युग को अभीष्ट तथा उचित थे और उसमें उसे संतोष मिलता है और वे ही बातें वर्तमान युग में भी अभीष्ट होने से उसे वह काव्य पसन्द आता है। कुछ काव्यकृतियाँ थोडे युगों की लोकप्रियता एवं अनुकूलता प्रास्त करती हैं और कुछ अनेक युगों की। व्यापक लोकप्रियता और अनुकूलता प्राप्त करनेवाली शाश्वत कृतियों में पाठक को चिरंतन सौंदर्य के दर्शन होते हैं। उन कृतियों में जीवन का ऐसा अमर सत्य पाते हैं जो युगानुकूलता से बढ़कर चिरंतन होता है, समान एवं संस्कृति में शाश्त्रत होता है। जब तक समाज का आदर्श स्थिर रूप निश्चित नहीं हो सकता, (और वह सम्भव भी नहीं है) तब तक परिवर्तनशीलता में कुछ शाश्वतता भी बनी रहेगी और रह-रहकर उसके दर्शन काव्य में होते रहेंगे। युगानुकूल भाव वहन करने की सामर्थ्य और स्थितिनुरूप अर्थवहन करने की क्षमता युक्त रचना अपने चिरंतन सत्य के कारण शाश्रत बन जाती है। इसीलिए कालिदास का शाकुन्तळ, शेक्सपीयर के नाटक, वाल्मीकि रामायण ये काव्यकृतियाँ कई वर्षों से पढ़ी जा रही हैं। पाठक हर युग में उसकी कुछ विशेषताओं का आस्वाद करता है। कालिदास की कथावस्तु को, पात्रों एवं प्रसंगों को आज के संस्कारों में प्रतिबद्ध करके देखने से साधारणीकरण में बाधा उपस्थित होती है; परंतु कालिदास की काव्यकृति में समकालीन वास्तव का और उसके अपने व्यक्तित्व

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का जो अद्वितीय संगम है वही शाश्वतता का एक मात्र कारण है, जो पाठक को आज की युग-संस्कृति को भूलाकर कालिदास के काल में पहुँचा देता है और मानवजीवन के शाश्वत सत्य और सौंदर्य का बोध कराता है। शाश्वत साहित्य की सार्वकालिकता का प्रश्न सहजसुलम हो जाता है; फिर भी यह बात तो भुलाई नहों जा सकती कि संस्कार कभी अमर नहीं होते, वे बनते- बिगडते हैं। वर्तमान काल की परिस्थितियाँ और संस्कार विकासकाल में बदलते रहते, हैं इच्छाओं, भावनाओं और संस्कारों में अंतर आता है। साधारणीकरण के तत्त्व की यह कमी है कि संस्कारों को चिरंतन मानकर उसकी स्वीकृति की गई है। काव्य के साधारणीकरण को आलोचना की प्रणालियाँ प्रभावित करती रहती हैं। वैयक्तिक स्तर पर मनोविश्लेषणात्मक आलोचना नवीन संस्कारयुक्त अभिनव चरित्रों की सृष्टि को प्रभावित करती है। व्यक्तिगत आलोचना पद्धति से किसी कवि की महत्ता अधिक आँकी जाती है, किसी की कम। आचार्य रामचन्द्र शुक्क की परिष्कृत आस्वादनशीलता पर सन्देह नहीं किया जा सकता। साथ ही तुलसीदास, सूरदास एवं जायसी जैसे भक्तिकाल के प्रतिभासंपन्न कवियों की महानता को पाठक स्वीकार करते हैं। एक ही काल में काव्यसृष्टि करनेवाले सूरदास और तुलसीदाम की प्रतिभा ने भिन्न प्रेरणाओं और चेतनाओं से ओतप्रोत काव्यसर्जना की। आचार्य शुक्क जब इनकी कविता का मूल्यांकन करते हैं तो सब भक्तकवियों का महत्त्व तो बताते हैं, परंतु तुलसी की महत्ता का वर्णन करते हुए नहीं अघाते। इतना ही नहीं वरन् तुलसी की अपेक्षा सूर को किंचित् गौण स्थान देते हैं। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि यहाँ उनकी विशिष्ट आलोचना-पद्धति और अपने काल से प्रेरित लोकमंगलवादी दृष्टिकोण का प्रभाव परिलक्षित होता है। युगपरिवर्तित संस्कारों की बात बीते युग के काव्यास्वाद के सन्दर्भ में ही नहीं, अपितु समकालिक काव्य के आस्वाद से भी उठती है। परम्परावादी पाठक नवीन काव्य को पसन्द नहीं करते या समझ नहीं सकते और आज के कुछ औसत पाठक भी समकालीन काव्य को दुरूह एवं दुर्बोध प्रतीत करते हैं। यह कठिनाई साधारणीकरण में बाधा है। अतः इसका उत्तर भी हूँढना होगा। यह दुर्बोधता और दुरूहता काव्य में क्यों है ? क्या वहाँ साधारणीकरण का तत्त्व निरर्थक है? भावात्मक संश्लिष्टता और सामूहिक रागात्मक प्रभाविता को ध्यान में रखकर काव्यसर्जना और काव्यास्वाद की चर्चा करते हुए साधारणीकरण की बात सरल होती है। पर उसमें त्रुटि तब प्रतीत होती है जब आलोचना की नितान्त साहित्यिक, व्यक्तिवादी एवं मनोवैज्ञानिक अवधारणाएँ स्थिर होती जा रही हैं। आज का आलोचक कविता का आधार भावात्मक सं्लिष्टता नहीं मानता बल्कि

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१८२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

विश्लेषिका वृत्ति से जनित मानता है।' बौद्धिकता से संपृक्त प्रक्रिया सम्पन्न काव्य- कृति का साधारणीकरण कैसे सम्भव है ? आज काव्यक्षेत्र में अपने काव्य को समझाने की नौबत कवि पर आ पडी है। अपनी कविता पर अलग से भाष्य करना पडता है, उसका मूल्य एवं मर्म खोलने का प्रयास वह करता है। काव्य में उत्पन्न यह परावलंबित्व साधारणीकरण के अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। पर इसका उत्तर भी समाजगत संस्कारविकास में प्राप्त होता है। विज्ञानयुग के बौद्धिक संस्कार ने भावुकता को इतना अधिक खण्डित कर दिया है कि साहित्यकार भी जीवन के रागात्मक पक्ष से सर्वथा दूर, दार्शनिक गुत्थियों एवं बौद्धिक तकों से सम्पृक्त विचार-बोध काव्य में अभिव्यक्त करने लगे हैं और सर्वथा नये रूप में। काव्यजगत की इस नई बौद्धिक स्थिति को देखकर एक ओर बुद्धि रस की माँग भी होने लगी और दूसरी ओर अनाकलनीय, दुर्बोध एवं दुरूह कहकर इस काव्य की मर्त्सना होने लगी। पाठकों के पल्ले ये बातें नहीं पडती । यदि समकालिक भाबबोध से सम्पृक्त काव्यसर्जना हो रही है, जो पाठक उसे क्यों नहीं समझ पाते हैं ? विषय- वस्तु का क्षेत्र तो बहुत अधिक व्यापक बना है और कई विभिन्न विषय काव्य में अनुभूतियों के द्वारा व्यक्त किये जाने लगे हैं। विगत कुछ वर्षों में युगीन भातबोध इतना तेज़ी से बदलता गया है कि मनुष्य के भावों, संवेदनों, विचारों और अनुभूतियों ने नयी वास्तविकता से टक्कर लेकर बौद्धिक नवतत्त्वों की अनुभूति प्राप्त की। साहित्य की आस्था भी बौद्धिकता की आधारशिला पर स्थित, सूक्ष्म एवं जटिल बनती गयी। अज्ञेय नत्रकाव्य के बौद्धिकता-प्राधान्य की ओर संकेत कर कहते हैं कि "इस कविता का मुख्य उरदानसाधन बौद्धिक धारणाएँ हैं, जो प्रायः विज्ञान, राजनीति, शास्त्र, मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण शास्त्र आदि की अजीवी हैं। "२ विभिन्न शास्त्रों एवं ज्ञानविषयों के व्यापक विकास में मनुष्य के ज्ञान एवं विचार का क्षेत्र जितना व्यापक बनता गया है, अधिकाधिक उलझन, जटिलता, सम्मिश्रता, खण्डितता एवं सूक्ष्मता उत्पन्न होती है। आंतरिक संघर्ष ने जीवन को झकझोर डाला और यौवनपरिकल्पनाओं से मन कुंठित एवं दमित बना, सौंदर्यचेतना आक्रान्त बनी। मूल्यविघटन की चरमस्थिति में यथार्थ सत्य अस्ततयस्त एवं कटु बनकर समसामयिक वास्तव के रूप में जब कवि के सामने उपस्थित होता है तो उस जीवनानुभूति का रागात्मक सम्बन्ध-स्थापन असम्भव-सा प्रतीत होता है। अतः कवि भावुकता एवं खण्डित चेतना को ऐतिहासिक कालक्रम से विलग एवं विच्छिन्न करके व्यक्त करने लगता है। यह सामयिक सन्दर्भ जब कविता में व्यक्त होता है तो वह दुरूह तथा दुर्बोध बनता है, अर्थात् वहाँ साधारणीकरण की समस्या उपस्थित होती है। समसामयिक सन्द्भों में भी साधारणीकरण न हो सकने के कारणों पर विचार करना होगा। ₹. Poetry is an escape from emotion. २. दूसरा सप्तक, पृ. १४.

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आवश्यक नहीं कि कवि अपने समय में ही लोकप्रिय रहे। समसामयिक सन्दमों और संस्कारों को अपनाने में सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा कवि में अधिक संवेदनक्षमता होने के कारण वह सामयिकता को शीघ्र अपनाता और व्यक्त करता है। समाज को सामयिक संस्कारों के स्वीकारने में देर लगती है। समसामयिक सन्दर्भ कालान्तर से सार्वजनीन बनते हैं। पर जब तक सार्वजनीनता प्राप्त नहीं होती, तब तक वे सामान्य पाठक की बुद्धि, संवेदनक्षमता एवं आकलनशीलता के परे होते हैं तब तो साधारणीकरण का प्रश्न उपस्थित होता है। अन्य एक बात इसमें महत्त्वपूर्ण है कि सामयिक संस्कार एवं सन्दर्भ स्थिरता प्राप्त नहीं करते । सामयिकता में गतिशीलता एवं परिवर्तनशीलता अधिक होने के कारण उन सन्दर्भों में एवं संस्कारों का ग्रहण कुछ ही लोगों से किया जाता है। वैसे ही कवियों के अनुभूत बोध भी होते हैं। पूर्णतः पची हुई बातें या संस्कार न होने के कारण सूक्ष्म संस्पर्शमय खण्डित भावानुभति, एवं युगबोध का वह अनुभव करता है और तुरन्त उसे व्यक्त कर देता है। अतः वह भाव-बोध कुछ सीमा तक अजनबी-सा लगता है आर पाठक के लिए साधारणीकरण नहीं हो सकता। विशेषीकरण (specialization) और अतिवैयक्तिकता (individuality) आज के जीवन का महत्त्वपूर्ण तत्त्व बन गया है। पूर्ववर्ती वाल में समाजजीवन एवं मानवजीवन अधिक संश्िष्ट स्थिति में थे; समष्टिपरक जीवन की महत्ता अधिक थी। नवयुग का प्रधान संस्कार स्वतंत्र एवं विशिष्ट व्यक्तिचेतना का है और साथ ही नवीनता (novelty) और आधुनिकता (modernity) के मोह से आज का कवि किसी अछूते विषय या उसके अछूते पक्ष को, अचर्चित दायरे को, किसी अनोखे कोण को (obscure corner) छूना चाहता है और वह भी नित्य नये ढँग एवं प्रयोग के आधार पर ही। कलाकार के इस मोह, आस्था और समकालीन अस्थिर संस्कारमय स्थिति के कारण कुछ अस्पष्टता, उलझन, सूक्ष्मता एवं असंगतता ( absurdity) आ जाती है और कवि उसे अपरिहार्य भी मानते हैं। नूतनता के चमत्कारों, नये उपमानों, शब्दों और नये प्रयोगों के कारण कभी-कभी काव्य पहेली-सा बन जाता है। कुछ ऐसे अटपटे प्रयोग कवि करते हैं जिनके कारण काव्य को "काव्य" "कविता" कहना भी कठिन हो जाता है। अर्थात् समकालिक काव्य से अनगढ़, अटपटे और बेमेल प्रयोगों को छोड देने पर तो जो बचेगा वह आज की कविता हैं। फिर भी नये काव्य को न समझ सकनेवाले पाठक कुछ अवश्य हैं। साथ ही इस नयी भावानुभूति, भावबोध का सफलतापूर्वक आस्वादन करनेवाले पाठक भी हैं। ऐसा क्यों? इसका उत्तर भी उसी पृष्ठभूमि पर दिया जा सकता है कि समकालीन संस्कार समाज के व्यक्तियों पर कम अधिक प्रभाव डालते हैं और नये बौद्धिक संस्कार प्राचीन

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१८४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

संस्कारों को एकदम नहीं मिटाते। अतः आज का पाठक प्राचीन शाश्वत एवं महान काव्य तो पढ़ता है और आज का काव्य विशेष रुचि से पढ़ता है। आचार्य शुक्क सच्चा कवि उसी को मानते हैं जिसे लोकहृदय की पहचान हो और जो अनेक विचित्रताओं से बीच मनुष्यजाति के सामान्य हृदय को देख सके। "१ आज लोकहृदय को छूनेवाला काव्य भले ही न लिखा जाता हो, बौद्धिक अनुभूति या भावबोध भी हृदय से सर्वथा विछिन्न नहीं हो सकता। केवल बौद्धिक तार्किकता कविता नहीं बनती, वे दार्शनिक विचार होंगे। कवि की वस्तुगत अनुभूति कविता में तभी साकार हो सकती है जब वह उत्कट बन जाये। अतः बौद्धिक संस्कार भी मूलगत भावात्मक संस्कार के द्वारा व्यक्त होकर अभिव्यक्ति पाते हैं। भावों के साधारणीकरण का प्रक्ष उपस्थित होने पर महत्त्वपूर्ण बात सामने आती है कि प्रगतिवादी समीक्षकों ने साधारणीकरण और कॉडवेल के सामूहिक भाव को एक ही माना है। कॉडवेल ने काव्य के साथ सामूहिक भावना को (collective emotion) को जोड दिया है और वे काव्य को समूह-विशेष के विचारों का प्रकाशनकर्ता मानते हैं। समाज के विकास एवं परिवर्तन के साथ आगे बढ़नेवाला साहित्य सामूहिक भाव प्रकट करता है। हिन्दी में अमृत राय ने सामूहिक भाव की चर्चा करते हुए उसे लोकहृदय से जोड़ा है तथा साधारणीकरण सिद्धान्त और सामूहिक भाव दोनों को एक दूसरे का पर्याय माना है। वे लिखते हैं, "हमें सामूहिक भाव और साधारणीकरण में परस्पर कोई विरोध नहीं दिखाई देता। हमारी समझ में यह विरोध तभी परिलक्षित होता है जब कि साधारणीकरण को या सम्पूर्ण रस-सिद्धान्त को मानवसुलभ विचार और अनुभूति की सीमा से परे हटाकर किसी लोकोत्तर जगत की चीज़ बना दिया जाता है।"२ ऊपरी तौर पर इन में पर्याप्त समानता परिलक्षित होने पर भी वस्तुतः दोनों में मिन्नत्व है। साधारणीकरण की प्रक्रिया और सामाजिक भाव की एकता दोनों में अंतर है। एक मात्रात्मक एकता पर स्थिर है और दूसरा आर्थिक सम्बन्घों पर। इन दोनों की तुलनात्मक चर्चा करते हुए सामूहिक भाव के सन्दर्भ में डॉ. आनन्दप्रसाद दीक्षित द्वारा कई प्रश्न उपस्थित किये गये हैं, जो सामूहिक भाव और साधारणीकरण को एक मानने में नितान्त बाघक ही प्रमाणित होते हैं।३ अतः इतना निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि सामूहिक भाव का साधारणीकरण से समत्व मान्य नहीं किया जा सकता। साधारणीकरण के तत्त्व में यह कमी है कि इसमें कवि के भावों, विचारों एवं अनुभूति की सर्वमान्यता स्वीकृत है और साथ ही आस्वादमूलक बातों की आशा रखी १. रसमीमांसा, पृ. २६६ २. नयी समीक्षा, पृ. २४ ३. रससिद्धान्त : स्वरूप विश्लेषण, पृ. ४०३

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गई है। परंतु युगपरिवर्तन के फलस्वरूप यह देखा जा रहा हैं कि कवि की मान्यता अनुभूति एवं दृष्टिकोण पाठक को मान्य नहीं हो सकता। इसके दो कारण सम्भव हैं। एक बौद्धिक विचिकित्सा प्रणाली का प्रचलन और दूसरा है अतिवैयक्तिकता का प्राधान्य। यह आवश्यक नहीं कि वह कवि की अनुभूति से अनुकूल एवं रहमत हो। असहमति के साथ साधारणीकरण कैसे सम्भव है? आज भावात्मक एकता के स्थान पर बौद्धिक अनुभूति की अभिव्यक्ति को महत्ता है। सामायिक अनुभूति का साधारणीकरण हो भी तो वह भावात्मक स्तर पर रसात्मक स्थिति में नहीं हो सकता, बौद्धिक स्तर का ही हो सकता है। इसीलिये सम्भवतः विनयकुमार शर्मा सुमिन्रानन्दन पंत के काव्य का बुद्धिगत साधारणीकरण सहजसम्भव मानते हैं।' आज जीवन की ओर देखने का वास्तववादी यथार्थमूलक दृष्टिकोण कवियों के द्वारा केवल सौंदर्योकन नहीं कराता, अपितु असौदर्यात्मक, भद्दे चित्रण भी किये जाते हैं। आज काव्य में ऐसे कतिपय उदाहरण प्राप्त होते हैं। समकालिक वास्तव का नम्न चित्रण करते हुए अश्लीलता, अकलात्मकता की बात जहाँ उठती है वहाँ तो साधारणी- करण हो ही नहीं सकता। साथ ही कलात्मकता के अभाव में उसे काव्य की संज्ञा भी प्राप्त नहीं हो सकती। वे सारी अभिव्यक्तियाँ मात्र व्यक्तिगत दमित कुण्ठाओं और यौनकल्पनाओं से परिपूर्ण हैं। ऐसे अनगढ़ प्रयोगों में न सौंदर्य है, न सत्य। अर्थात् वे कवि की व्यक्तिगत निधि मात्र रहेंगे, साधारण के लिये नहीं। काव्यभाषा का स धारणीकरण : काव्य के संप्रेषण के लिये कवि-अभिप्रेत के साधारण बनने के अतिरिक्त उसका काव्यात्मक भाषा में व्यक्त होना आवश्यक होता है। भट्टनायक ने काव्यात्मक भाषा का प्रश्न साधारणीकरण के विषय में उठाकर उसे महत्त्व दिया था। यह निश्चित है कि काव्यभाषा के बिना काव्य की कल्पना नहीं की जा सकती। वही उसकी महत्त्वपूर्ण इकाी है। परंतु भाषा यह कोई स्वयंभू, स्वतंत्र और अपने-आप नहीं बनी। वह मनुष्य की सामाजिक क्रिया-प्रक्रियाओं के फलस्वरूप उत्पन्न हुई है। आदिम स्थिति में मानव ने संकेतों और इंगितों से विकसित होकर आदानप्रदान एवं अपने अनुभव को व्यंजित करने के लिए भाषा को अपनाया और तब से जैसे-जैसे वह नये-नये अनुभव प्राप्त करता रहा, उनको व्यक्त करने के लिए नित्य नवीन शब्दों आदि को प्रयुक्त कर भाषा का व्यवहार करता आया और तब से निरंतर विकासशीलता के कारण भाषा बदलती रही है। कहा जाता है कि "भाषा अनुभव ही है-'Language is experience' जीवनचर्या, जीवनबरोध एवं पारस्परिक आदानप्रदान का प्रतीक भाषा है। भाषा के १. पंत और उनका काव्य, पृ. १९५

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१८६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन

विकसित होने की प्रक्रिया अत्यन्त धीमी है। साथ ही वह एक व्यक्ति से नहीं वरन् अनेक व्यक्तियों द्वारा गढ़ी जाती है। अर्थात् भाषा पर युगीन सांस्कृतिक प्रभाव होता रहता ह और युगसन्दर्भो के अनुरूप वह अपना रूप बदलती रहती है। नवयुग में नवीनतम शास्त्रों, ज्ञान-विज्ञान एवं विभिन्न विषयों के विकास ने भाषा में बहुत व्यापकता एवं विकास उत्पन्न किया। जैसे-जैसे मानवजीवन के संस्कार, मावबोध एवं ज्ञान आदि बढ़ता गया; माषा के रूप एवं शैली भी बदलती रही। अतः प्रत्येक युग के काव्य को समझने के लिए कवि की भाषा की विशेषताओं से परिचित होना आवश्यक होता है। काव्यभाषा के उपादान से भली भाँति परिचित होने पर पाठक युगविशेष की काव्यसंपदा का आस्वाद ले सकता है क्योंकि भाषा मानवजीवन का अभिन्न अंग है। मानवजीवन में भाषा का व्यवहार दो रूपों में होता है। बोली भाषा और साहित्यिक भाषा। बोलचाल की भाषा में नित्य ही परिवर्तन होता रहता है। भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम भाषा है परंतु यह कहना कठिन है कि भाव या भाषा इनमें से प्रथम किसका आविर्भाव हुआ। फिर भी यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि भाषा विशेष संवेदना का वहन करती है और युगविशेष की संवेदना के अनुरूप भाषाभिव्यक्ति में कुछ अन्तर आता है। जीवन बदलता है, उसके अनुभवों, विभिन्न भावों और पूरी जीवन प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग भाषा ही है। अपनी अनुभूतियों को भाषा के रूप में अंकित करना कवि को अभीष्ट होता है। अतः भाषा रचनाकार या कवि की संवेदना का माध्यम एवं स्रोत ही हैं। कवि के अन्तस्तल में अनुभूति के रूपाकरण की जो प्रक्रिया घटित होती है, उसी समय से भाषा से उसका एक सम्बन्धविशेष जुड़ जाता है। अर्थ- बोध के साथ संवेदनात्मक गहराई बढ़ती जाती है और भाषा का रूप बदलता है। इसीलिए मिन्न युगों में भिन्न कवियों की भाषा में अन्तर आता दिखाई देता है। भाषा की संवेदना गतिशील होती है। उसके सम्बन्ध में डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी लिखते हैं, "भाषा और संवेदना एक जैसा संश्लेषक है, जिसे इतना अलग अलग नहीं देखा जा सकता। पर भाषा भावों की अनुवर्तिनी है, यह मान्यता वैज्ञानिक नहीं लगती। "१ भावों के परिवर्तन का प्रभाव भाषा एवं सामयिक संवेदना पर अवश्य ही होता है। भाषा पर सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिस्थितियों का प्रभाव भी अधिक होता है। काव्य भाषा पर सांस्कृतिक चेतना का ही प्रभाव अधिक होता है और उसके अनुरूप प्रतीकों, भावचित्रों, बिम्बों आदि का अंकन कवि करता है अर्थात् काव्यभाषा परिवेश से जुडी हुई होती हैं। सम्भवतः इसीलिए तुलसीदास, सूरदास, भारतेन्दु, महावीरप्रसाद द्विवेदी, जयशंकर प्रसाद, निराला और अज्ञेय सब कवियों की काव्यशाषा में अन्तर है।

१. भाषा और संवेदना, पृ. १००.

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साधारणीकरण की सामाजिक व्याख्या १८७

हिन्दी काव्यविकास में भाषा के रूपपरिवर्तन से परिष्कारादि हुआ। काव्यभाषा के रूप में व्रजभाषा के स्थान पर खड़ी बोली की प्रतिष्ठा हुई। यहाँ केवल भाषापरिवर्तन नहीं हुआ बल्कि संवेदना मूलतः बदल गई, उसका नयी दिशा में संचरण होने लगा। व्रज में होनेवाले माधुर्य, सुकोमलता, एवं कोमल भावाभिव्यक्ति की क्षमता के कारण प्रेम एवं भक्ति के परिपाक के लिए वह भाषा प्रयुक्त की गई। कालान्तर से सामाजिक चेतना और संवेदना परिवर्तित होने के कारण भारतेन्दु काल में खडी बोली को स्वीकार किया गया और अभिव्याक्ति का विशेष ढंग अपनाया गया। राजनीतिक स्वातंत्र्य के आन्दोलन के प्रवाह बहने लगे थे। ऐसे समय भारत की दयनीय स्थिति यही ज्वलन्त प्रश्न था। खड़ी बोली के स्वीकार का आग्रह रखकर उसमें समकालिक अनुभूति को अंकित किया गया, तब वे उस काल में अत्यन्त सरस प्रतीत हुई। भारत के अतीत की भव्बता की ओर संकेत कर उसकी सांप्रतिक दीन अवस्था पर आँसू बहाते हुए लिखा है, अब कहँ देखह तहँ दुःख़हि दुःख दिखाई, हा हा भारत-दुर्दशा न देखी जाई। (भारत-दुर्दशा) उस भाषा में कर्णकटुता, कर्कशता एवं अव्यवस्थित रूप भले ही हो परंतु अनुभूति की सचाई, नैतिक साहस, सत्यप्रेम और देशप्रेम आदि विशेष रूप में व्यक्त होने से तत्कालीन पाठकों को ये पंक्तियाँ रसात्मक बोध कराने में समर्थ थीं और उनका पूर्णतः साधारणीकरण होना भी सुलम था। सम्मत्रतः आज ये काव्यपंक्तियाँ साधारणीकृत रूप में नहीं आतीं या उनसे रसास्वाद की स्थिति भी नहीं उत्पन्न हो सकती। द्विवेदी युग में खड़ी बोली की दुर्बलता दूर हो कर उसमें नयी शक्ति आयी। अपने युग की चेतना को वहन करते हुए चेतावनीपूर्वक पंक्तियाँ लिखी गई- विद्यार्थी मजदूर कृषक ही सच्चा राष्ट्र बनाते हैं। उनके विना राव राजागण कहीं नहीं कुछ कर पाते हैं। कृषको उठो, छात्रगण जागो, मज रो रोना छोडो। अनना सच्चा रूप देख लो गली गली रोना छोडो।१ इन पंक्तियों में कालगत अभिव्यक्ति के द्वारा रस की अनुभूति पाठकों ने अवश्य की थी। आज तटस्थता से आस्वाद करने पर रसात्मकता उस स्तर की नहीं मालूम होती। कांति की भावना को कालगत विशेष अभिव्यक्ति मिली और माखनलाल चतुर्वेदी, नवीन, दिनकर आदि कवियों की कविताएँ उस काल में अत्यन्त रसमयी प्रतीत हुई। सुभद्राकुमारी चौहान के काव्य में देशप्रेम की अपूर्व धारा का अनुभव तत्कालीन पाठकों ने किया। १. आधुनिक काव्यधारा, पृ. १६७ से उद्धृत