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१८८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन परंतु इन स्थलों के आस्वाद में आज अन्तर आता है। आज परिस्थिति में अन्तर आने से संवेदना बदली हुई है, अतः तटस्थता से उसका पठन करने पर रसा- तमकता का अनुभव नहीं आयेगा। समकालिक संवेदनाविशेष के कारण अत्यन्त रसमय स्थल भी नीरस प्रतीत होने लगते हैं। इन उदाहरणों से यह स्पष्ट हो सकता है कि साधारणीकरण के मूल में भाषा का अत्यधिक महत्त्व है। भावावेग की अनुभूति में स्थिति के बदलने से अन्तर आता है। आज यदि सुभद्राकुमारी के काल जैसी स्थिति देश में पुनः एक बार आये तो उस काव्य की अनुभूति और भी भिन्न होगी। परिस्थिति बदलने से हमारी संवेदना में अन्तर आता है। अतः साधारणीकरण के विचार में समकालिकता और संस्कार का विशेष महत्त्व है। संस्कार तो साधारण स्तर पर रहते हैं पर समकालिकता अधिक महत्त्वपूर्ण रहती है। भाषाविशेष की अभिव्यक्ति ही रसात्मकता उत्पन्न करती है। काव्यभाषा से इस परिवर्तन का सम्बन्ध तब आता है जब कवि समकालीन चिंताधारा को अनुभूत कर व्यक्त करना चाहता है और नवीनतम ढंग से व्यंजना करने की उसकी आकांक्षा रहती है तब इस नये भावबोध की अभिव्यक्ति के लिए उसे नये प्रकार की भाषा को अपनाना पडता ही है। युगपरिवर्तित संस्कारों ने मानव के आचार-पोशाक में परिवर्तन किया, नवयुग के काव्य की पोशाक भी परिवर्तित करनी पडती है और फिर नवयुग के कवि आलोचक अपनी कठिनाई को व्यक्त करते हुए कहते हैं, "प्राचीन काल में ज्ञान का क्षेत्र जब सीमित और अधिक संयत था तब कवि, वैज्ञानिक, साहित्यिक आदि अलग-अलग लेबल आवश्यक थे। जो पठित था, शिक्षित था सभी ज्ञानों का पारंगत नहीं पर परिचित तो था।"१ आज विषयों एवं विचारों की व्यापकता, सूक्ष्मता तथा विविधता का ही प्रश्न नहीं है, ज्ञान की सीमा की ही समस्या नहीं बल्कि जीवनानुभव की सूक्ष्मता एवं जटिलता की प्रधान समस्या है। जो वास्तव सत्य, नये तथ्य एवं नवीनतम भावबोध कवि को अनुभूत होता है उसे व्यक्त करने के लिए भाषा के नये प्रयोगों को वह अपनाना चाहता है। नवीन अनुभवों के साथ भाषा के नवीन स्वरूप का आना स्वाभाविक ही है। अतः नवकवि अज्ञेय माँग करते हैं, "नये कवि नये तथ्यों को उनके साथ नये रागात्मक सम्बन्ध जोडकर नये सत्यों को रूप दे। उन नये सत्यों को प्रेष्य बनाकर उनका साधारणीकरण करे यही नई समस्या है।"१ अज्ञेय को प्रतीत होनेवाली साधारणीकरण की समस्या के मूल में भाषा के समाज- सापेक्ष, युगीन प्रभाव में परिवर्तित होना है। नये युग में प्राचीन युग की अपेक्षा बदलते सन्दर्भ में भाषा के नये-नये प्रयोग किये जाने लगे हैं। आज के यंत्रयुगीन जीवन में कल-कारखाने, पोस्टर्स, बिजली के १. दूसरा सप्तक, पृ. १०
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खम्भे, जैसे कतिपय नवीनतम प्रतीकों एवं बिम्बों की योजना होती है। प्राचीन काल में जिन बातों का अस्तित्व ही नहीं था उनका प्रतीकों के रूप में आना भी कैसे सम्भव था? साथ ही नये भावबोध में जो बौद्धिंक तत्त्व और खण्डित भावुकता है, सूक्ष्म एवं जटिल क्षणिक संवेदनाएँ हैं, उनको व्यक्त करने लिये परम्परागत भाषा अपूर्ण प्रतीत होती है। अतः परम्परा और प्रयोग का सामंजस्य करते हुए, कभी पूर्व परम्परा को पूर्णतः तोड-फोडकर नूतनतम रूप को अपनाकर कवि अभिव्यक्ति करना चाहता है। नये कवियों के अगुआ स्पष्ट शब्दों में कह देते हैं, "तब तो भाषा केवल एक मुहावरा थी, लेकिन आज क्या वह स्थिति है ? विशेष ज्ञानों के इस युग में भाषा एक रहते हुए भी उसके मुहावरे अनेक हो गये हैं। ऐसी कोई भाषा नहीं, जो सब्र समझते हो और बोलते हो। ऐसी स्थिति में कवि एक क्षेत्र का सीमित सत्य उसी क्षेत्र में नहीं, उससे बाहर आकर व्यक्त करना चाहता है, तो उसके सामने बड़ी समस्या है।"२ आज कवि के सामने इस समस्या के उपस्थित होने का कारण परिवर्तनशीलता में प्राप्त होता है। जीवनमुख, संवेदना और बोध ही बदल चुका है। संस्कार बदले हैं और इन बदले हुए संस्कारों को व्यक्त करने के लिये परम्परागत शब्द कवि को संतोषजनक नहीं प्रतीत होते। सौ वर्ष पहले स्थूल सरल जीवन था। पचास वर्ष पूर्व सांस्कृतिक पुनरुत्थान काल रहा। उस काल में संस्कृतनिष्ठ प्रौढ भाषा में जीवन के आदर्शों की अभिव्यक्ति कवियों ने की पर तब भी नवचेतना के साथ परम्पराएँ बनी रही थीं। आज का जीवन और अनुभव ही कुछ कटा हुआ, विशंखलित (unlinked), विसंगत (absurd) एवं उलझनभरा । जटिल । (complicated ) होने से नया भावबोध भी सूक्ष्मता एवं जटिलता से संपृक्त ही है, उसे व्यक्त करने की कठिनाई जब कवि अनुमव करता है तब वह नये शब्दों, प्रयोगों, प्रतीकों और बिम्बों की खोज कर, कुछ अपनाकर, कुछ स्वयं गढ़कर अभिव्यक्ति कर पाता है और तब भाषा नितान्त नये स्वरूप में सामने आती है। शैली, छन्दादि बन्घनों को बदल देने या छोड देने से काव्यभाषा-रचना की कायापालट हो जाती है। पुराने घिसे हुए शब्दों को, जो फीके पड गये हैं, अपना मूल अर्थ खो बैठे हैं या विकृत से बन गये हैं, छोड़कर नये अपनाता है। समकालीन लोकभाषा अन्य विषय एवं शास्त्र, विदेशी भाषा आदि से शब्द ग्रहण करके कवि प्रयोग करता है। कुछ शब्दों एवं प्रयोगों को वह स्वयं गढ़ता तक है, जब उपलब्ध शब्द अधूरे जान पडते हैं। कभी अर्थ की निश्चित झलक पाने के लिए मूल शब्द का कुछ रूपान्तर-सा कर देता है। शब्दों को नये सन्दर्मों के साथ कभी नई अर्थवत्ता प्राप्त होती है। इस
१. दूसरा सप्तक, पृ. १२ २. दूसरा सप्तक, भूमिका
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पूरे विकास के क्रम में समकालीन प्रभाव से गृहीत शब्दों में कवि की व्यक्तिगत चेतना भी कार्य करती रही है। और इन शब्दों को प्रयुक्त करने के कारण जब वे पाउकों के लिए दुरूह, अजनबी और अपरिचित हो जाते हैं तब साधारणीकरण में बाधा आती है। पर यह आवश्यक भी है। नवीन शब्दों के ग्रहण में ही केवल युगीन जीवन का प्रमाव नहीं होता, बल्कि शब्दों के प्रयोग, परस्पर सम्बन्ध से प्रयुक्त पदबंध, शब्दबंध (word-patterns), विशेषण-विशेष्य के परस्पर सम्बन्ध, काव्य में प्रयुक्त प्रतीक और बिम्ब आदि सभी बातों पर युगीन प्रभाव स्पष्टतः परिलक्षित होता है। कालिदासकालीन उपमादि के प्रयोग धीरे-धीरे बदलते गये हैं। स्त्री-सुन्दरता के अंकन में भी अन्तर आया है। नयी चेतना की अभिव्यक्ति इन नये-नये प्रयोगों, शैलियों और बिम्बों द्वारा होती रही। सर्वेश्वर की सरकण्डे की गाडी, घास काटनेकी मशीन, काठ की घंटियाँ, मुक्तिबोध के पोस्टर, बिजली के खम्मे, भूत-पिशाच्च, बावडी जैसे बिम्ब, कुत्ता, बिल्ली, केचुआ शराब जैसे नये उपमान अधुनातम संस्कार का शब्दरूप है। लालटेन की भोंडी परिधि में आँखें देखना, चप्पल की आवाज में नू पुरध्वनि सुनना आदि में नितान्त नवीन भाषाचेतना है। और जब इससे भी कवि को संतोष नहीं हुआ तब आडी-तिरछी रेखाओं, तिकोन, चौकोन, प्रश्नचिन्ह आदि संकेतों से वह अभिव्यक्ति के लिए छटपटाने लगा तब उसका प्रयास कविता नहीं बन पाया, मात्र छटपटाहट अनगढ़ प्रयोग मात्र हुआ। यह सारा नया शिल्प, भाषा शैली, प्रतीकादि सामने आने पर पाठक कभी चौंकता है, कभी स्वीकार करता है। पुरोगामी आक्रोश व्यक्त कर रह जाते हैं। नवयुग की यह अपरिहार्यता कभी अबूझ पहेली बनकर प्रत्यक्ष होती है तब साधारणीकरण कहाँ का रहा १ समकालीन स्थिति से असामंजस्य होने पर तो और भी कठिन स्थिति उत्पन्न होती है। परम्परा के अनुसार यह आशा की जाती है कि सामान्यतः भावात्मक काव्य पढ़ते ही पाठक उसमें तादात्म्य पाए, वह काव्य उसके हृदय को छूकर उसे रसमग बनाये। पर यह नया स्वरूप कविता को जो रूप प्रदान करता है, उसके कारण कविता एक बार पढ़ने से समझ में नहीं आती। हृदयस्पर्श तो नहीं परंतु दो-तीन बार पढ़ने से दिमाग में ज़रूर उतर जाती है। क्या इस स्थिति को साधारणीकरण की स्थिति माना जा सकता है ? यह कविता या तो बौद्धिक समाधान प्रस्तुत करेगी या समस्या को उत्पन्न कर पाठक को विचलित करेगी। यदि ये दोनों बातें होती हैं तो कविता की सफलता मानने में हर्ज नहीं। अतः समकालीन काव्य में कुछ समझ में नहीं आता है, तो कुछ हर्ज नहीं। कामायनी की दार्शनिक पृष्ठभमि, शेक्सपीयर की गहन विचारधारा, वर्डस्वर्थ की चेतना और तुलसी का विशिष्टाद्वैत लोकसामान्य की परिधि में आज भी नहीं आता
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तो क्या आपत्ति है? समकालीन सादर्यबोध अभी तक स्थिर नहीं हुआ तो हर्ज नहीं। इन कठिनाइयों के बावजूद उपर्युक्त कृतियाँ कालातीत एवं विश्वजनीन क्यों बनीं ? इनके काव्यगत भावों और विचारों में सचाई है और जीवनानु- भूति में मर्मस्पर्शी गहराई है। यदि नवीनतम प्रयोगों द्वारा समकालीन चिन्ताधारा एवं सौंदर्यानुभूति काव्य में अंकित है, तो साधारणीकरण न होने पर भी काव्य श्रष्ठ काव्य हो सकता है। श्री शिवदानसिंह चौहान इलियट के काव्य की दुरूहता का उल्लेख कर लिखते हैं, "इसके विपरीत इंग्लैड के कवि टी. एस् इलियट की कविता दुरूह है। उनके काव्य " Waste Land" को पूरी तरह समझ में विद्वान आलोचकों को तीस वर्ष लगे हैं। "१ इस उदाहरण से सामयिकता का सार्वजनीन बन जाने की गति कितनी धीमी है इसका पता चलता है। अभिनय और साधारणीकरण : साधारणीकरण में काव्यवस्तु, सहृदय और काव्यभाषा का विचार करने के साथ ही अभिनय तत्त्व को सोचना आवश्यक हो जाता है, क्योंकि दृश्यकाव्य और श्रव्यकाव्य की विभेदसीमा पर पाठक प्रेक्षक की अवस्थिति है, जो साधारणीकरण के बोध में अंतर लाती है। मूलतः भरतमुनि ने सामान्यगुणयोगेन ... रसास्वाद की बात की थी, तब उनके सामने प्रस्तुतीकरणीय नाटक था। दृश्यकाव्य में रंगनिर्देश, संगीत, अभिनय आदि बातें काव्यार्थ को व्यक्त करती हैं। अतः सात्त्विक, आंगिक, वाचिक और आहार्यादि अनुभावों द्वारा काव्यार्थ अथवा नाट्यार्थ का साधारणीकरण सरल था। प्रत्यक्षात्मकता, दश्यात्मकता एवं मूर्तता से संप्रेष्यता एवं सुलमता आकर उसका आस्वाद सामान्य से सामान्य पाठकों के लिए मूर्त एवं सरल था। प्रेक्षक समुदाय की उपस्थिति में देश-काल-आयु आदि बंधन क्षीण होकर सामूहिक रसास्वाद की स्थिति का समर्थन समाज-मनोविज्ञान भी करता है। श्रव्यकाव्य के सन्दर्भ में दृश्यात्मक पक्ष के अभाव में कुछ सीमाएँ, अमूर्तता, सेन्द्रियता एवं गूढता आपाततः आ जाती है। अभिनय के स्थान पर शब्द और अर्थ का संयोजन, शब्दों के परे होनेवाले अमूर्त अर्थ, उसकी शक्तियों के अनुकूल कवि का अभिप्रेत, यह सारा आता है, तब पाठक की स्थिति भिन्न होती है। वहाँ सामायिकता, समूह आदि छूटकर व्यक्तिगतता आती है। वैयक्तिकता आते ही साधा- रणीकरण में बाधा आती है और व्यक्तिविशिष्टता का प्रश्न भी उपस्थित होता है। श्री. जयशंकर प्रसाद भी श्रव्यकाव्य में साधारणीकरण की कमी का संकेत करते हैं।२ काव्य के आस्वादन में कवि और पाठक के अतिरिक्त काल और स्थान का स्वतंत्र आयाम साधारणीकरण के सम्बन्ध में आता है। भट्टनायक के सामने केवल नाटक नहीं १. आलोचना के मान, पृ. ९० २. काव्य और कला तथा अन्य निन्बध, पृ. ११२, ११७ ,बिा.१
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था, अधिकतर काव्य ही था। अतः काव्य के साधारणीकरण की समस्या आत्मतत्त्व और देशकाल, आयु आदि बन्धनों से मुक्ति पाकर संविद्विश्रांति में सुलझायी। भट्ट- नायक की इस स्थापना में विशिष्ट अधिभौतिक दृष्टिकोण (metaphysical view ) रहा हो, जिसने विश्व के रंगमंचपर मानवजीवनानुभूति को व्यक्त किया है इस प्रकार की चर्चा श्री. रमेशकुन्तल मेध ने की है।9 काव्यानुभूति के अन्तर्गत ही साधारणीकरण के तत्त्व को परखनेपर ये कुछ त्रुटियाँ सामने आती हैं। विशेषतः काव्य का माध्यम है भाषा, नाटक का माध्यम भाषा और अभिनय। अर्थात् नाटक के सामूहिक भावात्मक इकाई और साधारणीकरण सम्भव है, पर काव्य के लिए पूर्णता नहीं। प्राचीन आचार्यो ने परिवर्तनशीलता एवं सामाजिक गतिशीलता का विचार अधिक नहीं किया यही उसकी कमी है। साधारणीकरण के लिए भावर्संवेदनात्मकता और मूर्तता आवश्यक है जिसके कारण प्राचीन काव्य में उसकी विशेष सम्भावना थी। किन्तु जब आज बौद्धिक काव्य लिखा जा रहा है तब उसमें साधारणीकरण का वह भावात्मक स्तर नहीं हो सकता। अतः साधारणीकरण वहाँ रसात्मकता की स्थिति में नहीं होता, चिन्तन के स्तर पर होता है। साथ ही नाट्य में अभिनयादि के कारण मूर्तता रहती है, अतः साधारणीकरण सुलम है । श्रव्य में ध्वनि, अलंकार, वक्रोक्ति आदि के कारण अमूर्तता एवं सूक्ष्मता आती है, अतः भाषागत साधारणीकरण वहाँ कठिन हो जाता है। अतः श्रव्यकाव्य में साधारणीकरण की कल्पना रहती है तो सामान्य चरित्रों और भावों तक ही मान्य किया जा सकता है। अतः आचार्यों द्वारा स्वीकृत साधारणीकरण के विभिन्न आधारों में से काव्यभाषा का साधारणीकरण विशेष महत्त्वपूर्ण है। युगसंवेदना एवं संस्कार काव्य में विशेष घरातल पर व्यक्त होते हैं अतः उसीको साधारणीकरण का मूलाधार स्वीकार किया जा सकता है।
१. आलोचना पूर्णोक, ४२ प. २५
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नवम अध्याय
आनन्दवाद का सामाजिक मूल्यांकन
रसास्वाद की कलनना आनन्दानुभूति में की गयी और रस की अंतिम परिणति आनन्द में मानी गयी है। आनन्दानुभूति क्या है इसकी चर्चा करते हुए विभिन्न आचार्यो द्वारा आनन्द के स्वरूपविषयक जो स्थापनाएँ की गयी थीं, उनके अनुसार संक्षेप में ये विशेषताएँ कही जा सकती हैं। ( १ ) रस आस्वादरूप है और आस्वाद ही आनन्द है। (२ ) रस ब्रह्मानन्द-सहोदर होता है। (३) रस अलौकिक एवं लोकोत्तर-चमत्कार होता है। (४) रस की प्रतीति निर्विध्न, अखण्ड होती है। (५ ) रस प्रतीति के समय चिन्मय, अन्यज्ञानरहित, स्वप्रकाश, भावोद्रेक की स्थिति में मन की विश्रांति तथा लय की अवस्था होती है। आनन्द की अलौकिकता, ब्रह्मानन्दसहोदरता, अखण्डानुभूति, विश्रांति, सत्वोद्रेकादि सारी स्थितियाँ एवं परिभाषाएँ दर्शनशास्त्र के शब्दों से युक्त हैं। आचार्यों ने दार्शनिक शास्त्रान्तर्गत होनेवाले इन शब्दों, परिभाषाओं तथा प्रतीकों द्वारा आनन्द की चर्चा एवं सिद्धान्त-स्थापना की है। भरतमुनि के द्वारा स्थापित रससिद्धान्त की चर्चा जब मध्ययुगीन दार्शनिकों, विचारकों और काव्यशास्त्रियों की प्रज्ञा से आविर्भृत होकर प्रस्फुटित हुई, तब पूर्णतः दर्शन से रँगी हुई नज़र आती है। इन मध्ययुगीन काव्याचार्यों के द्वारा भरत के सूत्रात्मक सिद्धान्तर्गत संयोग, निष्पत्ति, आस्वादादि की समग्र एवं व्यापक व्याख्या का महान कार्य तो सम्पन्न हुआ; परंतु तत्कालीन सामाजिक स्थिति एवं समकालीन विचारधारा का अत्यधिक प्रभाव उनके विवेचन पर परिलक्षित होता है। मध्यकालीन भारतीय समाज में विशेष रूप से विचारकों एवं बुद्धिमानों पर शंकराचार्य के अद्वैतवाद और कुमारिल भट्ट द्वारा उत्पन्न दार्शनिक क्र्कांति रस ... १३
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का गहरा और स्पष्ट प्रभाव रहा। अतः रस के आचार्यों ने रस व्याख्या के लिये आकर्षक और सर्वोत्तम माध्यम के रूप में दर्शन को ही चुना। दार्शनिक तथ्य और सिद्धान्तों के साथ प्रतीकों और रूपकों को ग्रहण करके रससुत्र को समझाने के प्रयास में दार्शनिक एवं आध्यात्मिक आवरण भी उस पर डाल दिया गया। समसामयिक दार्शनिक मतों से प्रेरणा ग्रहण करना इनके लिये स्वाभाविक ही था। अतः भारतीय दर्शन के सारतत्त्व आनन्दवाद को रस के परिणत रूप में स्थापित किया गया। इस दार्शनिक एवं आध्यात्मिक भवरण के कारण रसविवेचन अत्यधिक सूक्ष्म तो हो गया परंतु साथ ही उसमें गुत्थियाँ भी उत्पन्न हुई। आनन्दवाद की सिद्धान्तगत बातों का सामाजिक दृष्टि से पुनःपरीक्षण करने से 1 स्पष्ट होता है कि आनन्दसिद्धान्त में प्रधानतया बुद्धि और व्यक्तित्व की विभिन्नता को बिलकुल उपेक्षित किया गया है। नितान्त भावात्मक मित्ति पर आधारित आनन्द की प्राप्ति के पूर्व पाठक के तन्मयीभवन की स्थिति अनिवार्य मानी गयी है। इस प्रक्रिया में समस्त विध्नों से संविति, मुक्ति, सत्वोद्रेक की स्थिति, चमत्कार, भोग, सभापति, विश्रांति, लय आदि शब्दों के द्वारा पाठक की मनस्थिति अंकित की गयी है। अर्थात् रसास्वाद के लिये पाठक के तन्मयीभवन की स्थिति अनिवार्य बतायी गयी है। आज बदले हुए सामाजिक परिप्रेक्ष्य की सापेक्षता में विचार करते हुए तन्मयीभवन की स्थिति पर प्रश्नचिन्ह अंकित हो जाता है। ध्यान, धारणा, विश्रांति, लय, सत्त्व-रज-तम का परिहार होने पर पाठक में सत्वोद्रेक की स्थिति का उत्पन्न होना यहाँ अपेक्षित है। यह स्थिति योगी की समाधि द्वारा प्राप्त मुक्ति की स्थिति के समान है। आचार्यों की इस स्थापना में नितान्त दार्शनिक दृष्टि है। परंतु क्या तन्मयी- भवन और समाधि द्वारा प्राप्त परब्रह्मास्वाद की स्थिति दोनों एकही समान स्तर पर स्थित या एक ही मानी जा सकती है ? विचार करने पर स्पष्ट होता है कि तन्मय होना और परब्रह्मास्वाद करना दोनों एक नहीं हो सकता। परब्रह्मास्वाद में तन्मयता का अंतर्भाव तो हो जाता है, उसके अतिरिक्त परब्रह्मवाली बात और अधिक गहन अनुभूति को जोड़ देती है। अतः इन दोनों स्थितियों में मूलतः सम्बन्ध अवश्य है। तन्मय हो जाना मूलतत्त्व के रूप में माना गया है; उसे कोई अस्वीकार नहीं करता। उसे लोकोत्तर-चमत्कार कहा गया है। वैसे परब्रह्ममास्वाद तो लोकोत्तर ही है; उस पर आपत्ति नहीं उठायी जा सकती। परंतु परब्रह्मास्वाद-सहोदरत्व का प्रश्न जब आता है तब अन्य बातें उभरती हैं। परब्रह्मस्वाद योग से सम्बद्ध है अतः उसे लोकोत्तर आदि कहने से मात्र ब्रह्मानंद-सहोदरत्त्व, तन्मयीमवन आदि बातें नहीं सुलझ सकेंगी बल्कि उनमें स्थित मौलिक भावना को समझाना आवश्यक है। तन्मय होने की स्थिति की भी कुछ सीमा हो सकती है। प्राचीन आचार्यों ने यह सीमा ब्रह्मतक पहुँच जाने या उसके समान अर्थात् इस लोक से बिलकुल परे
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आनन्दवाद का सामाजिक मूल्यांकन १९५
पहुँचने में बताई है। दुनिया के सम्बन्धों से या विषयों से कोई सम्बन्ध न रहना उसमें अभिप्रेत है। तन्मय होने की स्थिति का मानवीय जीवन एवं समाज की स्थिति की सापेक्षता में भी विचार करना आवश्यक है। केवल लोकोत्तर कह कर काम नहीं चलेगा। तन्मय होने की स्थिति प्रधानतया मानव के शारीरिक एवं मानसिक सुख और शांति पर अवलम्चित होती है। यदि व्यक्ति का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है, तो तन्मय होने में कठिनाई उत्पन्न होती है। अतः शारीरिक या मानसिक वैफल्य उपस्थित होने पर तन्मयीमवन की स्थिति में अवरोध आयेगा। आज का मानवीय जीवन उतना शान्त, स्थूल एवं संतुलित नहीं रहा है। समग्र जीवनानुभव ही कुछ संत्रासात्मक एवं खण्डित है। आज बदली हुई समाजरचना में मनुष्य आकुलता, उलझाव, अशांति, संत्रास, पीडा और अनिश्चितता तथा क्षणवाद के एहसास से आक्रांत है। कुछ सामान्यजनों और बच्चों में यह संन्रास की स्थिति भले ही न दीखती हो, परंतु प्रबुद्ध पाठकों में संत्रासात्मक अनुभूति अवश्य है। संत्रास बौद्धिक स्तर पर ही होता है। सिनेमा देखते या कॉफी हाऊस में बड़बड़ा करने में या ताश खेलतेसमय संत्रासात्मक अनूभुति के दर्शन तो नहीं होते। अतः आज का संत्रस्त आधुनिक सिनेमा देखतेसमय तल्ीन हो सकता है। साथ ही नाट्य के लिये तन्मयीभवन की बात कुछ सरल होती है। वहाँ कुछ अन्य बातें, अभिनय, नेपथ्य, पोशाक, संगीत आदि के व्दारा प्रेक्षक का मन दृश्य में, नाट्य में तलीन हो सकता है। परंतु श्रव्य काव्य के सम्बन्ध में यह प्रक्रिया कुछ भिन्न होती है। श्रव्य काव्य के आस्वाद की प्रक्रिया में पाठक की मनस्थिति, ग्रहणशीलता एवं पूर्व संस्कार की विशेष महत्ता होने के कारण उसकी तल्लीनता में कई विध्न उपस्थित हो सकते हैं। यदि उसकी मानसिक स्थिति कुछ अस्थिर, उद्वेलित तथा विभिन्न आशंकाओं एवं समस्याओं से आकुल है, तो ध्यान-धारणादि पूर्ववर्ती कल्पनाओं को रसास्वाद में स्वीकार करना कठिन है। तन्मय होना, ध्यानमग्नता या लीनता मनोविज्ञान में अवधान (attention) से सम्बन्धित ही है। मनुष्य का अवधान विषय में उसकी रुचि, उसकी मानसिक स्थिति और विषय के स्वरूप पर अवलंबित होता है। दृश्यात्मकता अवधान के आकर्षण का प्रधान तत्त्व है। समूह का अवधान खींचने का प्रधान माध्यम वक्तव्य, नाट्य आदि होते हैं। काव्य के आस्वाद में तन्मय होने का एक अन्य कारण हो सकता है। कवि की ओर से या पाठक की ओर से रसामास न हो। कोई विन्न उपस्थित हो जाने पर तन्मयता भंग होती है। अतः तन्मयीभवन की स्थिति को नकारने से प्रश्न उपस्थित होता है कि काव्य के आस्वाद के लिए पाठक और कवि का संवाद किसी हदतक होना आवश्यक है। अतः यदि पाठक काव्य में मग्न नहीं होगा तो आस्वाद सम्पन्न कैसे हो
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सकेगा ? परंतु यह मग्नता या तल्लीनता कुछ देर के लिए ही टिकती है। अतः यह देखना होगा कि तन्मयता की स्थिति का समय के साथ भी कुछ सम्बन्ध हो सकता है या नहीं। नाटक तीन घण्टोंतक देखा जाता है।जब पूरा समय तक नाटक की विभिन्न घटनाओं, प्रसंगों एवं पात्रों के अभिनयादि द्वारा प्रेक्षक उसे देखतेसमय आस्वाद करते हैं, तब उसमें एक भाव दूसरे भाव पर चला जाता है और उसके सहजविकास की प्रक्रिया में कहीं बाधा नहीं आती साथ ही तीन घण्टों में कहीं विवेकपूर्ण ज्ञान नहीं होता। अतः वहाँतक तन्मय होने के लिए काल की कुछ सीमा नहीं होती। एकांकी के सन्दर्भ में भी वही बात होती है। नाटक और एकांकी में कोई एक संघर्ष, आदर्श संगति, या संगठन उत्पन्न होता है। वहाँ अभिनय, पात्रों के चरित्रविशेष, नेपथ्य, पार्वसंगीत आदि कई बातों से तन्मयता पूरे तीन घण्टोंतक बनी रह सकती है। क्योंकि पूरे नाटक में इन सभी बातों के कारण जो संगठन बनता है, वही वस्तुतः औचित्य होता है। महाकाव्य में रसास्वाद की स्थिति नाटक से भिन्न हौती है। दृश्यात्मकता के अभाव के कारण ही उस बृहद् काव्य में तन्मयता आना कठिन होता है। महाकाव्य एक दफा बैठे ही पढ़ा नहीं जा सकता। अतः पाठक को जिस प्रकार के तन्मयीभवन की आवश्यकता होती है, वैसी नहीं प्राप्त हो सकती। उसकी मनस्थिति में परिवर्तन भी हो सकता है और आस्वाद में कुछ खण्डितता आ जानेकी सम्भावना होती है। साथ ही यह सम्मव नहीं कि लेखक भी महाकाव्य एक बैठक में लिख सकें। उसके द्वारा अनेक स्थितियों में और अनेक समयों पर वह लिखा जाता है। लेखक उसके लिखने में कितने दिन लगाता है, पाठक कितने दिनोंतक पढ़त रहता है, उस समय उसकी मनस्थिति कैसे रहती है। आदि बातें उसमें आ जाती है। अतः वहाँ तन्मयता उत्पन्न होना कठिन हो जाता है। साथ ही प्रबन्धकाव्य में प्रसंगों या घटनाओं के वर्णन से कभी-कभी इतिवृत्तात्मकता उत्पन्न होती है ऐसे स्थलों पर पाठक का तन्मय होना सम्भव नहीं। इन लम्बे वर्णनों को संकेतात्मक ढंग और भावात्मकता में ढाल देने पर तन्मयता आ सकती है। किसी मुक्तक या गीत के पठन में पाठक तन्मयता का अनुभव करता है, पर वहाँ भी काल की सीमा रहती है। गीत की भावभंगी में पाठक का मन अवश्य ही लगता है। यह तन्मयता कुछ ही देर रहती है और तुरन्त भंग होती है। उसमें होनेवाली सूचकता, संकेतात्मकता और ध्वन्यात्मकता के कारण चमत्कार उत्पन्न होता है और वही वहाँ प्रधान बन जाता है। मुक्त काव्य में व्यंजनादि के द्वारा कवि की अनुभूति को व्यंजित किया जाता है; अतः वहाँ विभावानुभाव का अस्तित्व नहीं रहता। फिर रस- विभोरता कैसे उत्पन्न होगी ? फिर भी उसकी भावभंगिमा के कारण रस के छींटे उठते हैं, चमत्कार उत्पन्न होता है पर तन्मयता की वह स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती। रस की स्थिति अनिवार्यतः डूब जाने की स्थिति है और आस्वाद के समय किसी बात
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को अनुकूलता से ग्रहण करना एवं मन में विरोध उत्पन्न न होना, रस में डूब जानेकी स्थिति है। यह स्थिति आज मुक्तक में उत्पन्न नहीं हो सकती। उसमें केवल रस के छीटों का अनुभव आता है। मुक्तक काव्य में व्यंजना द्वारा अर्थबोध की जो प्रक्रिया घटित होती है, उसमें से स्वयंपूर्ण अर्थ तो निकल आता है, पाठक चमत्कृत हो जाता है और उसे बौद्धिक संतोष भी होता है। मुक्तकों में भावभंगिमा का चित्रण होने से पाठक रसविमोरावस्था तक तो नहीं पहुँच पाता पर रस का अनुभव कुछ सीमातक कर सकता है; अतः उसे रसानुभूति की अपेक्षा काव्यानुभूति कहना उचित होगा। काव्येतर साहित्य-रचनाओं के संदर्भ में भी आनंद का प्रश उठता है। काव्येतर विधाओं में तथ्यात्मकता अधिक होती है। कहानी, नाटक, उपन्यास आदि में रागात्मकता के साथ चरित्र या समस्या की प्रधानता रहती है। ऐसे स्थल पर आवश्यक नहीं कि भावपूर्णता से युक्त ही कहानी लिखी जाय। नथी कहानियों में जीवन के किसी क्षण का, मनुष्य के आधुनिक भावबोध का चित्र अंकित किया जाता है। नयी कहानी की संवेदना आमूलाग्र बदल चुकी है। ऐसे समय भावपूर्ण कहानी के सम्बन्ध में आधुनिक समीक्षक राजेन्द्र यादव का वक्तव्य द्रष्टव्य है। दया, करुणा आदि से आरम्भ होकर रहस्य, उत्सुकता, ईर्ष्यादि दीवारों पर चढती हुई, समर्पण, प्यार, आत्मदान, सहिष्णुता आदि के द्वारा अंत में वात्सल्य में परिणत होकर पाठक के दिल को चीरनेवाली भावपूर्ण कहानी की आलोचना करते हुए वे लिखते हैं, "लेकिन आँसू थमने पर पाठक के मन में एक सवाल कहीं उठता है कि नवरसों की यह सारी-की-सारी नुमाइश और सारे संचारी व्यमिचारी भावों की लेफ्ट-राइट आखिर कौनसा ऐसा सामाजिक या मनोवैज्ञानिक तथ्य सामने रखती है जिसे लेखिका ने विशेष रूप से अनुभव किया है ?"१ स्पष्ट है कि आधुनिक पाठक तथा आलोचक की भी दृष्टि बदलती जा रही है। आँसू और हास्यभरी भावनाओं के उद्वेलन के अतिरिक्त कुछ नया हम चाहते हैं, वह है नृतन भावबोध । उससे हमें तृप्ति मिलती है। वह काव्य या साहित्य पढने पर हम कह उठते हैं। 'वाहऽ खूच!' और कुछ समय तक बेचैन, विचलित, खोये से भी हो जाते हैं। रस काव्यनिष्ठ नहीं व्यक्तिनिष्ठ अर्थात् पाठकनिष्ठ अधिक होता है अतः रसास्वाद वास्तविक ग्राहक पाठक ही होता है। उसके व्यक्तित्व, आयु, संस्कार आदि का सम्बन्ध रसास्वाद में अत्यधिक महत्त्वपूर्ण होता है, जिसकी चर्चा साधारणी- करण और रसाभास के संदर्भ में की गई है। परंतु काव्य से प्राप्त आनंद का परीक्षण करते हुए उसका विचार फिर करना आवश्यक है। काव्य का पाठक कई प्रकार की चेतनाओं या संवेदनाओं ( sensibilities) से युक्त होता है। यद्यपि उसमें भाव मूलतः ही होते हैं परंतु भावोन्मेष के प्रेरक १. कहानी - स्वरूप और संवेदना, पृ. २२४
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१९८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
(stimulus) जीवनस्थितियों के अनुसार बदलते रहे हैं। मनुष्य की संवेदना भी हर समय, हर काल में एक जैसी नहीं हो सकती; उसकी आयु, परिवेश, स्थिति तथा संस्कार के अनुसार उसकी संवेदनाओं में अंतर आता है। पुराने काल के पाठक- आस्वादक और आज के आस्वादक की संवेदनाओं में अवश्य ही अंतर है। अतः जिस एक बात से पुराने पाठक को आनंद मिलता था, वह आज के पाठक को नापसंद भी हो सकती है। भक्ति रस में तलीन होनेवाले भक्तगण आज के वैज्ञानिक थुग में कितने मिलेंगे? और कुछ मिलेंगे भी तो क्या उनकी संवेदना पुरानी ही होगी, सामयिक नहीं १ समाज में मानव की परिवेशगत स्थितियाँ, जीवन के आदर्श, सामाजिक मानदण्ड, रुचि आदि में वैज्ञानिक युग में अत्यधिक गतिशीलता से परिवर्तन आता गया है। उससे पुराने और आधुनिक मानव की रुचि, विचारशक्ति, संस्कार, व्यक्तित्व एवं संवेदना में पर्याप्त अंतर आ गया है। ऐसी स्थिति में एक ही बात से या साहित्यकृति से सबको समान रूप से आनंदप्राप्ति होती है या होनी चाहिए इस विचार को मान्य करने में कठिनाई उपस्थित होती है। समाज में यह देखा जाता है कि आनंद व्यक्तिसापेक्ष है। एक को जिस बात से अनन्द आता है, दूसरे को उससे नहीं आता, बल्कि किसी भिन्न बात से या स्थिति से आनन्द आता है। आनन्द होना या न होना या आनन्द की कोटि भी व्यक्ति की मनस्थिति, रुचि और पूर्वग्रह, पूर्वानुभव तथा परिस्थिति पर अवलंबित होती है। अतः किसी एक कलाकृति या साहित्यकृति से सब पाठकों, आस्वादकों को समान रूप से आनन्द प्राप्त नहीं हो सकता। जिस व्यक्ति की मनस्थिति जैसी होती है, उसी प्रकार का अनुभव उसे होता है। मानसिक स्थिति भी परिस्थिति के अनुसार बदलती है और परिस्थितियाँ समाजजीवन के परिवर्तन के साथ बदलती हैं। अतः मानव के आनन्द के विषय भी बदलते हैं। बदलती मनस्थिति के कारण एक ही काव्यकृति का भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के मन पर भिन्न-भिन्न प्रभाव होता है। फिर कवि भिन्न-भिन्न पाठकों से एक-सी प्रतिक्रिया की अपेक्षा कैसे कर सकता है ? यही बात रसास्वाद के आनन्द तत्त्व में ढाल दी गई है। उसमें अनुकूल प्रभाव को गृहीत मानकर सभी पाठकों पर एक ही प्रकार का अनुकूल प्रभाव अपेक्षित है। कीट्स् के विषय में उदाहरण देते हुए डॉ. रामविलास शर्मा ने इसी प्रकार की बात कही है। "कीट्स् ने अपने एक पत्र में लिखा था कि अपनी नवयुवा- वस्था में इग्लैंड के कुछ छोटे-मोटे कवियों को वह पसन्द करता था, आगे शेक्सपीयर खूब पसन्द आने लगा, क्या एक दिन ऐसा भी आयेगा कि शेक्सपीयर भी पसन्द न आये ?'
१. साहित्य और संस्कृति, पृ. १८८
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व्यक्ति के आनन्द की मनस्थितिसापेक्षता को ध्यान में लेने पर आनन्द को काव्य का स्थिर मानदण्ड और रस की चरम परिणति मानना सहजसंभव नहीं होता। ऐसा निश्चिततः नहीं कहा जा सकता कि किसी विव्हल व्यक्ति को शाकुन्तल या रामायण सुनाया जाय तो उसकी विव्हल परिस्थिति दूर होगी। यदि आनन्द ही साहित्य की अंतिम परिणति है तो इस व्यक्ति की मनस्थिति विपरीत होने पर भी उसे आनन्द आना चाहिए। समकालीन युगबोध और जीवनगत प्राप्त संवेदनाओं के परिप्रेक्ष्य में रसास्वाद को रखने के कारण इस तत्त्व का निर्वाह होना कठिन होता है। समकालीन या पूर्वयुगीन परिप्रेक्ष्य में सामाजिक एवं सांस्कृतिक मूल्यों की ओर ध्यान न देते हुए अनुकूल आस्वाद ही रसास्वाद में ग्राह्य होने के कारण यह समस्या आज उत्पन्न होती है। पुरानी संवेदना रखनेवाले पाठक नवीन काव्य पढते हैं तो उसमें आनन्द नहीं पाते। इसका कारण भी उपर्युक्त विवेचन में मिलता है। आज के युग की स्थिति, जीवनभोग और संत्रासात्मक अनुभवों को जब कवि काव्य द्वारा व्यक्त करता है; तब उसे पढ़ने पर आज का पाठक उसमें रस का अनुभव न करने पर भी "वाह 5 खूब" कहता है। यहाँ काव्यास्वाद में उसकी अनुकूल स्वीकृति होते हुए भी उसके मन को आनन्दानुभूति नहीं होती। आधुनिक संवेदनावाला पाठक एकाध रसमय काव्य पढता है तो वहाँ रसास्वाद करता है। फिर भी आवश्यक नहीं कि उसमें आनन्द की अनुभूति ही होगी। इसका कारण है कि पाठक की काव्यास्वाद की दृष्टि, आलोचना के दृष्टिकोण एवं संवेदना में मनःस्थिति का अंतर होता है। पाठक की बदलती अभिरुचि एवं संवेदना की प्रतीति जनकाव्य और कलाकाव्य में होती है। जनकाव्य या लोककाव्य की विशेषता बताते हुए डॉ. सुधांशु लिखते हैं, "ग्रामगीतों में मानवजीवन के प्राथमिक चित्र अंकित हैं, जो प्राथमिक हैं, कृत्रिमता से दूर हैं, जिनमें मनुष्य ने अपनी लालसा, प्रेम, घृणा, विषाद को समाजमान्य धारणाओं से ऊपर नहीं उठाया है और अपनी हृदयस्थ भावनाओं को प्रकट करने में कृत्रिम शिष्टाचार का प्रतिबंध नहीं माना है ... "१ जनकाव्य की उत्पत्ति का हेतु शुद्ध मनोरंजनात्मक एवं प्राथमिक होता है। श्रमपरिहार, त्योहारादि अवसरों पर उत्साह उमंग भरने के लिये गाये हुए इन गीतों में भावों का स्पष्ट, सुन्दर और अत्यन्त स्वाभाविक चित्रण होता है। प्रकृति के अनुकरण में कोमल भावाभिव्यक्ति, उल्लास- विषाद आदि से पूर्ण मानवीय जातीयता के चित्रों में व्यक्तिगतता संपूर्णतः लोप हो जाती है। अबुद्धिवाद, जिज्ञासा, स्वच्छन्द प्रेम, तर्कहीनता ने। सारे भावों को स्वाभाविक एवं स्वैर बनाया। मानवीय मन के सहज भावों, हर्ष-विषाद, संयोग-वियोग, सुख़-दुख, क्रोध-भय को अकृत्रिम और मुक्त वाणी मिलती है। सभ्यता एवं समाजविकास के साथ आनेवाली पद्धतियों, समाज का नियंत्रण, औपचारिकताओं, नीतिनियमों की पाबन्दियों १. जीवन के तत्त्व और काव्य के सिद्धान्त पृ. १३४
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और कृत्रिम व्यवहारों (sofisticated manners) का अभाव होने के कारण सामूहिक संस्कार लोकगीतों के द्वारा (मुक्त रूप से) प्रस्फुटित होते हैं। अतः वहाँ सामूहिक भावों की इकाई के कारण रसात्मक अनुभव प्राप्त होता है और जनसामान्य को आल्हाद एवं प्रसन्नता होती है। समूहमनोविज्ञान के तत्त्व के आधार पर कहना हो तो समूह की अभिरुचि' विश्लेषण क्षमता, विवेकशक्ति निम्न स्तर पर पहुँचती है। फलतः ऐसी स्थिति में सामूहिक आनन्द की स्थिति प्राप्त हो सकती है और वही लोककाव्य-लोकगीतों के द्वारा श्रोता या पाठक को अनुभव हो सकती है। कलाकाव्य (high class poetry) में समूहगत भावों के स्थान पर कवि की व्यक्तिगत अनुभूति की अभिव्यक्ति होती है। उच्चकाव्य जनकाव्य से विकसित, संस्कृत और परिष्कृत स्थिति में बनने के कारण उसमें पौरुष संस्कारबद्धता, बौद्धिकता एवं तार्किकता आ जाती है। "इस प्रकार लोकगीत कलाकाव्य में विकसित होने से काव्यगत प्रक्रिया के समग्र स्वरूप एवं कार्य में परिवर्तन आता है। कार्य और क्रीडा में उत्स्फूर्त चेतना से युक्त और स्त्रीत्व से परिपूर्ण प्रेरणा थी, वह अब इस चेतनात्मक कला-काव्य में प्रयत्नपूर्वक सर्जना बनी जिसमें पौरुषमयता प्रधान है।"१ बदलते सामाजिक संदर्भ से उच्चवर्णीय कलाकाव्य ने अपना अलग रूप प्राप्त किया परंतु वह भी कालप्रवाह में बदलता हुआ दिखायी देता है। कलाकाव्य में कवि की बदली संवेदना ने, संस्कारयुक्त चेतना और बौद्धिकता ने गहनतम भाव-बोधाभिव्यक्ति पायी। ऐसी स्थिति में कलाकाव्य के आस्वादक का भी बदलती संवेदना से युक्त होना स्वाभावित है। जनसामान्य के आस्वाद से उसका आस्वाद मिन्न एवं व्यक्तिगत होता है। यदि वह अर्थ की तहतक पहुँचता है तो उसे बौद्धिक संतोष, और जीवनबोध के एहसास की कुछ प्राप्ति तो उसे अवश्य होती है। जिसमें संस्कार और संवेदनाएँ कम या निम्न स्तर की हैं, वह आस्वादक बौद्धिक संतोष नहीं पा सकेगा, जैसे जनकाव्य का आस्वाद भी जनसामान्य जिस रूप में करता है, उस रूप में शिक्षित व्यक्ति नहीं कर सकता। अर्थात् यहाँ सामाजिक (आस्वादक) की संवेदना का प्रश्न ही मुख्यता रखता है। ₹. Thus will be development of the folk poetry into art poetry, the whole nature and function of poetic activity undergoes a change, what begins as a spontaneous accompaniment to work or play largely feminine in inspiration, develop into deliberate product of a conscious art, predominently masculine in origin. -Literature and Society, Davis Daiches, P. 26.
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आनन्दवाद का सामाजिक मूल्यांकन २०१
फिर क्या आनन्द की दो कोटियाँ मानी जायें ? फिर तो सामाजिक या सामूहिक आनंद और व्यक्तिगत आनंद ऐसे दो स्तरों पर आनंद को विभाजित करना पडेगा। आलोचना की बदली हुई पद्धतियों ने पाठक के साथ कवि को भी प्रभावित किया है। वैज्ञानिक पद्धति, व्यावहारिक आलोचना और मनोविश्लेषणात्मक आलोचना ने रसमयता की अपेक्षा चरित्रगठन और समस्या पर अधिक बल दिया है। मानव- जीवन के आदर्श चित्रणों और कल्पनाजन्य वर्णनों की अपेक्षा स्वाभाविक वास्तव सत्य ढूँढनेकी प्रवृत्ति विशेष जगी है। अतः आज के कवि ने काव्यबोध पाने के लिये सारी पुरानी परतों को हटाकर तथा तमाम बाह्य आवरणों से शून्य बनकर व्यक्ति के चारों ओर महाशून्य को देखा।परम्परा के आवरणों से रहित नग्न सत्य के दर्शन कराने में वह जुटा है। पुराने कवियों की तरह आज का कवि भावुकता का शिकार नहीं बनता, बल्कि उसकी नवीन चेतना ने शरीर को रोमांचित करनेवाली भावुकता के स्थान पर बुद्धि को झकझोरनेवाले अनुभवों को अभिव्यक्ति देना उचित माना। कवि अपनी अनुभूति को सर्जनात्मक कल्पना का रूप देकर पाठक के सम्मुख उपस्थित करता है। उसका अनुभव काव्य के द्वारा व्यक्त होकर पाठक को प्रतीत होता है परंतु कवि की अनुभूति स्वतंत्र नहीं, भावना, विचार और संवेदना ये उसके तीन रंग हैं, वह इन तीनों की इकाई है। भावना उसका एक अंग है, विचार और संवेदना भी उतने ही महत्त्वपूर्ण हैं। रसवाद ने भावना को तो महत्ता दी पर संवेदना और विचार का क्या होगा? संवेदना ही भावनानिर्मिति करती है, पर उससे उत्पन्न होकर भी भावना को संवेदना से अलग करना पड़ता है। संवेदना केवल भावना नहीं, विचार से भी जुड़ी रहती हैं। रसवाद में बुद्धितत्त्व को स्थान न देने के कारण यह कठिनाई उपस्थित होती है। अनुभव सामाजिक हो या स्वानुभूत मानसिक क्षमताओं और युगीन आदर्शों के अनुरूप तथा समय की प्रामाणिकता से संबद्ध होकर कवि परिवेशगत कुछ अनुभव- विशेष ही प्राथमिकता रखते हैं और सप्रेषणीय बन जाते हैं। मन पर होनेवाले संस्कारों का अर्थ ग्रहण कर लेने के कविमन के प्रयास से 'अनुभव' बनता जाता है अतः कलाकार का व्यक्तित्व प्रच्छन्न रूप से कलाकृति में अभिव्यक्त होता है। दुनिया का ऐसा कौनसा कलाकार है, जो उसके चारों ओर के परिवेश एवं जीवनस्थिति से किसी-न-किसी अंश में जुड़ा हुआ नहीं है ? अपने परिवेश से जुड़े रहने में केवल अनुकूलन एवं अनुसरण ही नहीं होता बल्कि वितृष्णा, त्याग, स्वीकार, तटस्थता, जिज्ञासा, अनास्था, घुटन, ऊब, अलगाव, संतुष्ठि-असंतुष्टि, टूटने या जुड़ने की अनुभूति आदि कईं प्रकार की चेतनाओं का अस्तित्व वह पाता है और अपनी अनभूतियों और स्मृतियों में तात्कालिक संवेदनाओं को वह सजाता है। साहित्य का मूल रूप उसका 'अनुभव' है जो परिवेशगत संस्कारों से ग्रहण किया जाने के कारण आज अत्यंत जटिल बनता जा रहाहै।
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२०२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
आज परिवेशगत स्थितियों के परिप्रेक्ष्य में पुराने नाते-रिश्ते, मानवीय आपसी सम्बन्ध आदि के नाम यद्यपि वे ही हैं, पर उनमें अब वे संकेत या संवेदनाएँ शेष नहीं हैं, जो पुराने काल में जिस अर्थ में रूढ थीं। नई स्थिति और नई वास्तविकता के कारण व्यक्ति-व्याक्ति के बीच कुछ नया सम्बन्ध जन्म ले रहा है। नये सम्बन्ध बदले, पुरानी रूढियाँ और मर्यादाएँ पुरानी पड़ गई और पुरानी सामन्तवादी परम्परा के विरोध में नयी संवेदना एवं चेतना जागृत हुई। कवि में जगी हुये नयी संवेदनाएँ उसके द्वारा वर्तमान जगत्-जीवन की अभिव्यक्ति कराती हैं। जो उसने भोगा हुआ है, उसकी अभिव्यक्ति के लिए वह आकुल है। समकालिक त्रासात्मक अनभूति, क्षोभ, संत्रास, पीडा, घुटन, उद्वेग, ऊब, उसे ढंग से व्यक्त करनी पडती है। इस संवेदना में भावा- त्मकता कम और बुद्धितत्त्व अधिक है। इस प्रकार नयी अनुभूति को नये रूप में व्यक्त करने से ही वह प्रभावी बन सकती है। तब त्रास या घुटन की अनुभूति से भला वह आनन्द कैसे उत्पन्न कर सकता है ? आज के कवि के लिए 'शाश्वत' 'चिर' 'आदर्श' जैसे कविता के हेतु नहीं रहे। स्वस्थ-अस्वस्थ, संतुलित-असंतुलित, क्षणभर की अनुभूतियाँ काव्य में अभिव्यक्ति पाना चाहती हैं। कवि रस की योजना के लिए बैठा नहीं रहता। आज वह द्रष्टा या स्रष्टा की अपेक्षा उपभोक्ता की भूमिका निभाता हुआ भोगे हुए को यथार्थ अभिव्यक्त करता है। इस गतिधर्मी युग में अणुमात्र से ही वह संतुष्ट है। बौद्धिकता के प्रश्नय से युक्त और विज्ञानवाद से परिपूर्ण समाजजीवन की सापेक्षता में साहित्य को आनन्द एवं रसबोधतक सीमित रखना असंभव हुआ है। आज के काव्य के बौद्धिक प्रतीक और उपमानादि रसबोध की अपेक्षा चमत्कार उत्पन्न करते हैं। प्राचीन काल के साहित्यकार से आज के साहित्यकार की बदली हुई संवेदना का नया रूप एक उदाहरण से स्पष्ट किया जा सकता है। शाकुन्तल में दुष्यन्त और शकुन्तला की कथा में दुष्यन्त को विस्मरण होना, शकुन्तला की वन्चना करना आदि काव्यप्रसंगों पर अंगूठी गुम होने और अभिशाप जैसी बातों का आयोजन कवि कालिदास को करना पडा। तत्कालीन समाज में राजा के विपरीत बात करना संभव नहीं था। अतः इन प्रसंगों के साथ बाँधी गई बातों एवं प्रसंगगत योजनाओं में कालिदासकालीन कवि संवेदना का स्पष्ट रूप झलक पडता है। राजा के आदर्श चरित्र की उच्चता एवं गरिमा निभाने का प्रयास गुप्तकालीन संवेदना की फलश्रुति है। आज का कवि या साहित्यकार नयी संवेदना से युक्त व्यक्तिवादी यथार्थपरक दृष्टि रखने के कारण ऐसे स्थलों पर कुछ अन्य योजना करने की अपेक्षा दुष्यन्त की पुरुषवृत्ति पर सीधा प्रहार करेगा और यथार्थपरकता से उसके चरित्र का अंकन करेगा। आदर्श की रक्षा का प्रयास प्राचीन संवेदना थी पर आज का संवेदनाशील साहित्यकार उसे नहीं मानता। आज का साहित्यकार पाठक से इस प्रकार की आशा भी नहीं रखता कि पाठक उसकी अभिव्यक्त अनुभूति को अनुकूलता से पढ़ें और वह जो कुछ लिखेगा,
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आनन्दवाद का सामाजिक मूल्यांकन २०३
पाठक सर्वथा उससे सहमत हो। रसास्वाद की आनन्दमयता में पाठक का भनुकूल आस्वाद ग्राह्य है, प्रतिकूल नहीं। पर आवश्यक नहीं कि कवि जो कुछ लिखता है उससे सब पाठक सहमत ही हों। असम्मति के कारण आनन्द की आशा नहीं की जा सकती। आज कवि समकालिक वास्तव के यथार्थ अंकन में प्रयत्नशील है, जिसमें मद्दापन एवं नग्नता का भी दर्शन हो सकता है। कवि की संवेदना में परिवर्तन आने के कारण काव्य की प्रवृत्ति आज बिलकुल बदल चुकी है। कविता द्वारा केवल रसोद्रेक करने के बदले प्रभाव डालना कवि का उद्देश्य है। युगमानस ने कवि और काव्य को प्रभावित किया है। अतः परम्परागत विभावानु- भावादि सामग्री से युक्त तथा भावात्मक एकता पर आधारित किसी रस को इसमें ढूँढना असम्भव हो गया है। कई सम्मिश्र एवं उलझे हुए भाव-बोधों को बौद्धिक स्तर पर अभि- व्यक्ति देकर पाठक को उद्वेलित करने की सामर्थ्य कवि की प्रतिभा रखती है। उत्साह, घृणा, तीखा व्यंग्य, आक्रोश आदि कतिपय भावखण्ड उसमें अंकित है। पर साथ ही इस नये जीवन की नयी वास्तविकता को, नये सत्य को नये रूप में अभिव्यक्ति मिलने के कारण उसमें आनन्द के बजाय घृणा, संत्रास, कुंठा आदि सब कुछ है। इसमें वैयक्तिक प्रतीकों एवं मानसिक विकृतियों तक ने अभित्यक्ति पायी है। उदाहरण के रूप में नये काव्य की कुछ पंक्तियों को दिया जा सकता है। काव्य में 'भय' का अंकन तो आज भी होता है परंतु आज के कवि को प्रतीत होनेवाला भय भूतपिशाच का या राक्षस का नहीं। मानवजीवन की वर्तमान आकुल स्थिति में प्रतीत होनेवाली भयावह चेतना को वाणी देते हुए कवि को नये- पुराने प्रतीकों और बिम्बों की योजना करनी पडती है। अन्तरतम का घोर अन्धःकार, कुहासा, घुटन, आत्मपीडन, छटपटाहट, घबराहट, आतंक, अकेलापन, मृत्यु की आशंका ये सारी नयी संवेदनाएँ भूत प्रेत, देव-दानव, भूतहे मकान, तहखाने, खण्डहर भैरव, पिशाच, ब्रह्मराक्षस, भूतों का जुलूस आदि बिम्बों के द्वारा व्यक्त हई हैं। कुछ पंक्तियाँ यों हैं- वावडी की उन घनी गहराइयों में शून्य ब्रह्मराक्षस एक बैठा है, व भीतर से उमडती गूँज की भी गूँज बड़बड़ाहट शब्द पागल से गहन अनुमानिता तन की मलिनता दूर करने के लिए प्रतिपल पाप-छाया दूर करने के लिए, दिन-रात स्वच्छ करने-
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२०४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
ब्रह्मराक्षस घिस रहा है देह हाथ के पंजे, बराचर वाह-छाती-मुँह छपाछप खूब करते साफ,
... ... वावडी को घेर डाले खूब उलझी हैं खडे हैं मौन औदुम्बर व शाखों पर लटकते घुग्घुओं के घोसले परित्यक्त, भूरे, गोल .. १ कवि-मन की भयावहतापूर्ण चेतना इसमें व्यक्त हुई है। उपर्युक्त और ऐसी अन्य कविताओं में भावविभावों के ढाँचे पर रचे गये मयानक रस को खोजना असम्भव है परंतु मानवजीवन की संकुल, सम्मिश्र, अनभुतियों, अंतरतम में छिपे भावखण्डों एवं अंतरदशाओं का अन्वेषण कर उनको नूतन प्रतीकों तथा बिम्बों द्वारा कवि ने अभिव्यक्ति दी है। इसे पढ़नेवाला पाठक अर्थात् वह एक वर्गविशेष जो समकालिक युगबोधों से अभिज्ञ और संवेदनाओं से युक्त है, उन भावखण्डों और विचारवीचियों की सूक्ष्मता से अवश्य ही आन्दोलित होगा। इसे पढ़कर किसी अलौकिक, ब्रह्मानन्द- सहोदर आनन्द की प्राप्ति के स्थान पर जीवन के भाव सत्य का कलात्मक स्तर पर दर्शन होगा और पाठक को काव्यानभुति अवश्य ही होगी। आज क्रोध का स्वरूप भी राक्षसादि में प्रकट होकर रौद्र में परिवर्तित नहीं होता। मानसिक क्षोभ, निराशा, छटपटाहट, तीव्र नापसन्दगी, वितृष्णा, असंतोष और आक्रोश से नयी संवेदना प्लावित है। व्यक्ति-व्यक्ति से क्रूद्ध है और समकालिक वाता- वरण से भी। व्यक्तिगत कुंठा और क्षोभ के विभिन्न कारण राजनीतिक स्थिति, सामाजिक आडम्बर और खोखली समाजव्यवस्था में हैं। स्वतंत्रता के पश्चात् प्राप्त स्थिति, राज- नीतिक दुराचार एवं दुरवस्था ने स्वप्नभंग से प्रताडित नवयुवकों में आक्रोश, मानसिक बेचैनी, घुमडन, घुटन, व्यथा और आकुलता को जगाया। यह क्षोम, छटपटाहट और घुटन कभी आक्रोश द्वारा तो कभी कठोर व्यंग द्वारा व्यक्त होने लगी। कहीं-कहीं व्यंग इतने कठोर हो जाते हैं कि चोट करते हैं। तारसप्तक की 'पूंजीवाद के प्रति' कविता में पूंजीवाद से घृणा, क्रोध और व्यंग की प्रतिक्रियाएँ एक साथ व्यक्त हुई हैं।
१. चाँद का मुँह टेढ़ा है। (पृ. ११)
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उसे पढ़कर न रसानुमूति होती है और न आनन्द भी। पूंजीवाद से पीडित समाज- जीवन के कठोर सत्य के दर्शन पाठक करता है। अज्ञेय ने 'घृणा का गान' गाते हुए लिखा है, सुनो, तुम्हें ललकार रहा हूँ, सुनो घृणा का गान
तुम सत्ताधारी, मानवता के शव पर आसीन जीवन के चिररिपु, विकास के प्रतिद्वंद्वी प्राचीन, तुम स्मशान के देव! सुनो यह रणमेरी की तान आज तुम्हें ललकार दूँ, सुनो घृणा का गान१ इसमें मानसिक घृणा के साथ आवेश और उग्रता है, क्षोभ है और व्यंग्य भी। ये पंक्तियाँ पाठक को भावस्पर्श करके उद्वेलित करने की क्षमता रखती हैं। करुण रस के चित्रण में वैयक्तिक शोकादि के वर्णन आज प्राप्य नहीं हैं। उसके स्थान पर समष्टिगत चेतना में व्यक्त होनेवाली पीडा, संत्रास, अवसाद है और व्यक्तिगत पीडा, वेदना, कुंठा, निराशा, क्षणवाद, सुनापन आदि भावखण्डों ने अभिव्यक्ति पायी है। डॉ. माचवे की कविता 'भूख और भूखों की कैसी दिवाली' में सामाजिक सन्दर्भ में शोक की अभिव्यक्ति है, खेत में निर्वस्त्र दुभिक्षावसन्र खडा अप्रसन्न सृजक-कृषक जिसका है थाल आज खाली। उन को तम-तोम
... ... ... कृष्णक्षितिज व्योम, प्रज्वलित 'रोम' कलाकार नीरो क्यों छेडते भूपाली ? शोक के अतिरिक्त सहानुभुति, उदासी, निराशा और पीडा व्यंग्य के साथ उभरकर आती हैं। ऐसी काव्यकृति से क्या रस और आनन्द की आशा की जा सकती है ?
१. इत्यलम्, पृ. ५२
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-िम क्षण की अनुभति रसविभोर होने की स्थिति उत्पन्न नहीं करती। क्षणभर के लिए अनुभव उत्पन्न होता है और मिट जाता है, फिर अन्य भाव का अनुभव होता है। अतः विभिन्न भावों और भाव-बोधों का क्षणिक संस्पर्शात्मक अनुभव आनन्द नहीं दे सकता बल्कि जीवन के किसी पहलू का साक्षात्कार करा सकता है। रागात्मक एकता में व्यक्तिगतता और बौद्धिकता के कारण बाधा उत्पन्न होती है। भौतिकतावादी दृष्टि रागात्मकता से सम्बन्ध विच्छेद देती है। मस्तिष्क और हृदय के विचारतत्त्व और भावतत्त्व को लेकर आलोचकों में पर्याप्त मतभेद रहा। पर प्रगतिवादी आलोचक रांगेय राघव ने समन्वयात्मक मार्ग अपनाकर दोनों एक ही मस्तिष्क की शक्तियाँ होने के कारण उनमें द्वैत नहीं बल्कि एकत्व माना है। साहित्य में व्यक्त होनेवाला 'अनुभव' एक नवनिर्माण है, जो प्रतीकों (symbols) एवं प्रतिमाओं के द्वारा साकार होता है। अतः आनन्द को काव्यास्वाद या रसास्वाद का स्थिर मानदण्ड मानना असंभव है रसास्वादात्मक आनन्द को साहित्य का एकमात्र मानदण्ड मानना कुछ आलोचक गलत प्रमाणित करते हैं।9 पुराने साहित्यकार का उद्देश्य रसमय काव्य लिखकर पाठकों को आनंद देना था। अतः कल्पनाओं की उडानों तथा लम्बे वर्णनों के आधार पर कलाकृति के आदर्शात्मक निर्वाह से पाठक को आनंद देने में वह प्रयत्नशील था। आज के साहित्यिक का उद्देश्य रसमय काव्य लिखना नहीं है, उसकी संवेदना ने चारित्यगठन और समस्यामूलक लेखन की ओर विशेष मोड़ लिया है। ऐसी स्थिति में समाजपरक आदर्श से हटकर यथार्थ होना स्वाभाविक है। समाजविकास के प्रवाह में जो-जो विभिन्न स्थितियाँ उत्पन्न होती रहीं, उनके फलस्वरूप कई प्रकार की समस्याएँ उभरकर आती रहीं, बदलती रहीं और साहित्य को प्रभावित करती रहीं। बालविवाह, विधवा की स्थिति, शराबखोरी, दहेज-प्रथा, प्रेमविवाह, यंत्रयुग से उत्पन्न समस्याएँ, यौनसम्बन्ध और विभक्त परिवार आदि कई समस्याएँ समाज में उभरकर आई, जिन्होंने नवलेखक को आकर्षित किया। नवलेखकों की संवेदना ने उन्हें अनुभूत कर समस्यामूलक नाटकों, काव्यों, कहानियों द्वारा व्यक्त किया। 'समस्याप्रधानता' के कारण पाठकों की रसास्वाद की स्थिति में अन्तर आ गया। समस्याप्रधान नाटक, उपन्यास या चरित्रप्रधान काव्य में कहीं इच-बीच में रसमय स्थल उपस्थित होते हैं, रसनिर्मिति होती है पर वहाँ सम्पूर्णतः रस की अवस्थिति नहीं रहती और वैसी पाठक की प्रत्याशा भी नहीं होती। समस्या ही उस साहित्य का केन्द्रबिंदु है।वहाँ रसनिष्पत्ति लेखक का उद्देश्य नहीं, अतः रसपरिपोष की अपेक्षा समस्या पर तीखा प्रहार करके उससे विह्वलता जगाने का प्रयास लेखक करता है। परिणाम स्वरूप पाठक को उससे अन्ततः आनंदप्राप्ति नहीं होती बल्कि उस समस्याविशेष के दिग्दर्शन १. कल्पना, जुलाई १९६५, रसास्वाद : नयी कविता : मूल्यांकन
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से वह कभी विचलित होता है, बार-बार सोचने लगता है, विचारमन हो जाता है। जीवन के सत्य का एहसास उसके मन में जगता है। ऐसी रचना में समस्या, उसके विकास, संघर्ष या हल की ओर लेखक प्रयत्नशील होता है और पाठक की उत्सुकता भी उसी दिशा में बनी रहती है। यदि ऐसी स्थिति में पाठक केवल आनंद पाकर रह जाय, विभिन्न रसों का आस्वाद करे तो समस्या का क्या होगा? 'आधे अधूरे' नाटक देखते समय प्रेक्षकों को नाटक के अन्तर्गत प्रसंगों में कहीं किसी रस का कुछ मात्रा में अनुभव आता है पर रसात्मक अनुभूति उसमें अंतिम हेतु न होने के कारण मूल समस्या पर लेखक बल देता है। वहाँ समस्या विकसित होती जाती है, रस अपने आप तिरोहित हो जाता है। पाठक समस्या की ओर आकर्षेत होते हैं तथा उद्विग्रता, जीवन के सत्य का एहसास, और वास्तविकता के दर्शन कुछ विचलित होकर बाहर पडता है और कहता है 'वाहऽ खूच'। यहाँ 'वाहऽ खूब' कहने में आनन्द की अभिव्यक्ति नहीं है। बौद्धिक चेतना से युक्त इन समस्याप्रधान नाटकों में उस स्तर पर रसानुभति नहीं हो सकती परंतु काव्यानुभूति या साहित्यानुभूति अवश्य ही होती है। यहाँ चरित्र, प्रसंग वर्णन बँधे हुए रास्ते से नहीं जाते, विभावादि की उपस्थिति नहीं भी रहती अतः भावात्मक स्तर पर रसानुभूति भले ही न हो, पर विचारों का उद्रेक अवश्य ही होता है। समाज की बदलती संवेदनाएँ, कवि तथा पाठक के व्यक्तित्व की विशेषताएँ सामाजिक एवं सांस्कृतिक विभिन्नताएँ तथा बुद्धितत्त्व इन सारी बातों की ओर आनन्दवाद की स्थापना में ध्यान न देने के कारण उसमें अपूर्णत्व प्रतीत होता है। इस अपूर्णत्व के लिए भरतकालीन धर्म, अर्थ और राज्य की व्यवस्था को जिम्मेदार मानते हुए एक आलोचक कठोरतापूर्वक से लिखते हैं, 'धर्म और राज्य का तथा समाज के सबल वर्गों का स्वार्थ सदा इसी में रहा है कि आम लोगों को अपने अस्तित्व के बारे में सोचने के लिए प्रस्तुत न होने दिया जाए। धार्मिक श्रद्धा और भरतमुनि के रस ने इस स्वार्थ को बड़ी ही खूबसूरती से सिद्ध किया। भरत ने काव्यविषयों को अत्यन्त परिमित एवं व्यक्तित्व को बहिष्कृत ही नहीं किया, लोकसामान्य के अन्तरंग प्रवाह को उनके देशकालगत परिस्थितियों से हटाकर राजा एवं कुलीन वर्ग की ओर मोड़ देने की स्थायी राज्य-सेवा भी की। ... एकांगी होते हुए भी भरत के आनन्द को जो दिव्य अलौकिक और ब्रह्मानन्द-सहोदर घोषित किया गया, वह शायद इसीलिए कि भरत का शास्त्र अनालोच्य रहकर शाश्वत बन सके।9 इस मत से सहमत होना बहुत कठिन है। वस्तुतः आनन्दवाद, रस याने आनंद और रस की परम परिमिति आनन्द में ही होती है, इस प्रकार का मत भरत का अपना नहीं है। भरत ने हर्षादि कहकर रसास्वाद की स्थिति को जिह्वास्वादपरक अत्यन्त सतल १. कल्पना, मई ६९, पृ. ७९.
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एवं वस्तुपरक बताया था। नाट्य के सन्दर्भ में प्रेक्षकों के समुदाय की उपस्थिति रसा- स्वाद में व्यक्तिभिन्नता का अवसर कम रहता है फिरभी भरत ने एक स्थान पर स्पष्टतः उल्लेख किया है कि सब व्यक्तियों को समान रूप से एक रस का अनुभव नहीं आ सकता। मेरे मत में आनन्द की प्रतिष्ठा, महत्ता और सारे स्वरूपनिरूपण के मूल में दार्शनिक मतप्रवाहों का आचार्यों पर होनेवाला प्रमाव ही है। आनन्द के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए तथा उसकी उच्चतम कोटि के दिग्दर्शन के लिए आचार्यो ने कुछ शब्दविशेष प्रयुक्त किये हैं। आनन्द क लिए अलौकिक, अखण्ड, ब्रह्मानन्द-सहोदर, वेदान्तरस्पर्शशून्य, सत्वोद्रेक प्रकाशानन्द, संविद्विश्रांति कहा गया है। उपर्युक्त शब्दावली भी पूर्णतः दार्शनिक ही है। रस के आचार्यों द्वारा आनन्द का स्वरूप स्पष्ट करने के लिए प्रयुक्त एक शब्द है 'अखण्ड' और अद्वैत। आनन्द को वे अखण्ड लोकोत्तर दिव्य मानते हैं-वह पूर्ण (Absolute) है। सम्पूर्ण आनन्द की स्थिति में पूर्णता का, समग्रता का संकेत है परंतु आज के वैज्ञानिक जीवन में अखण्डानुभूति का अनुभव कवि और पाठक के लिए ही दुष्कर एवं दुर्लभ है। आनन्द सम्पूर्ण होता है अर्थात् उसके टुकडे नहीं हो सकते, उसमें भिन्नत्व सम्भव नहीं। पूर्व-विवेचन में यह स्पष्ट किया जा चुका है कि आनन्द की स्थिति व्यक्तिसापेक्ष होती है। किसी एक क्षण का आनन्द या किसी एक स्थिति में अनुभूत आनन्द तो अखण्ड हो सकता है परंतु समय, वस्तु, व्यक्ति और सन्दर्भ के बदल जानेके पश्चात् आनन्द की वह स्थिति उत्पन्न होगी जो मात्रा, गुण, कोटि तथा स्वरूप में पहले से किसी-न-किसी अंश में भिन्न ही होगी। कालिदास का मेघदूत और शाकुंतल पढ़ने पर पाठकों के अनुभव में अन्तर दिखाई देगा। रामायण में दशरथ की रानियाँ विधता होने का वर्णन, पझ्मावत में रानियों का सति हो जाने का प्रसंग, निराला की 'भारत की विधवा' कविता और विधवासमस्या पर लिखा गया 'सिंदूर की होली' सा समस्याप्रधान नाटक, इनमें विषय सामान्यतः एक होते हुए भी पाठक का आस्वाद और काव्यानुभूति भिन्न ही होगी अतः अखण्डत्व को व्यावहारिक पृष्ठभूमिपर और समसामयिक सन्दर्भ में स्वीकार करना कठिन है। भिन्न विषय, कारण, स्थिति और व्यक्ति के अनुसार काव्यास्वाद में अवश्य ही अन्तर आता है। रस से प्राप्त होनेवाले आनंद को उच्चत्व प्रदान करते हुए आचार्यों द्वारा अलौकिक कहा गया होता। आनंद को अलौकिक अर्थात् लौकिकता से परे माना गया। सामाजिक व्यवहार में जिस प्रकार का आनंद प्राप्त है वैसा नहीं बल्कि उससे उच्चतम कोटि का आनंद उनको अभिप्रेत था। अलौकिकत्व में उच्चता का तो बोध होता है, परंतु दार्शनिक आवरण से फिर व्यक्तिवादी भूमि पर ही आनंद स्थिर हो जाता है, अतः प्रगतिवादी समीक्षकों ने इसका विरोध किया। डॉ. रागेय राघव समन्वयात्मक दृष्टि अपनाते हुए लिखते हैं, "इससे उत्पन्न आनंद अलौकिक माना गया है। इस अलौकिक का अर्थ दैवी नहीं बल्कि असामान्य है जो भावों की
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सुबदुःखात्मकता शांत होने पर उदित होता है। "१ आगे चलकर वे लिखते हैं कि प्रगतिशील चिंतन यह मानता है कि आनंद संवेदना की अनुभूति है और संवेदना अपने-आपमें समान नहीं होती। वह एक सामाजिक क्रिया-प्र्रिया है अतः व्यक्ति का यह आनंद समाज के आनंद का ही परोक्ष पर्याय है। "२ इन शब्दों में आनंद के असामान्यत्व को तो वे स्व्रीकार कर लेते हैं परंतु असामान्यत्व में अंतर्भूत होनेवाला व्यक्तिपक्ष तथा आत्मपक्ष ही विवाद्य है। रस की अलौकिकता को मान्य करने पर व्यक्तित्व भिन्नता, संवेदना की परिवर्तनशीलता की बात उठती है। रसवाद में अनुकूल संवेदनाएँ ग्रहण की गई हैं तथा पाठकों के भावों और सवेदनाओं को शाश्वत रूप में स्वीकार किया गया है। अतः आनंद की व्याख्या में आत्मपरकता आ ही जाती है। यदि भावों को शाश्वत माने तो आनंद को भी स्वीकार किया जा सकता है। अतः वहाँ अलौकिकत्व का स्वीकार है। परंतु यदि भौतिक आधार ग्रहण करें, मानव के भावों तथा संवेदनों को परिवर्तनशील मान लें तो अलौकिकत्व की मान्यता पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित हो जाता है। क्योंकि काव्य मानव में एक प्रकार की संवेदना जगाता है, और संवेदना अपने-आप में एक ही नहीं रहती, समाज और युग की सापेक्षता में उसमें परिवर्तन आता रहता है। अखण्डत्व और अलौकिकत्व में आत्मा की अमरता में विश्वास और आत्मिक सम्बन्ध माना गया है। इसमें जीवन जगत के प्रति के प्रति एक प्रकार की निष्ठा और श्रद्धा है। अखण्डत्व और अद्वैत की स्थिति इप विश्वास के कारण मान्य की जा सकती है। परंतु भविष्य के विषय में कहना कठिन है। आज अद्वैत की कल्पना का विघटन होता जा रहा है। रसवाद काव्य में भावना और कल्पना पर विशेष बल देता हैं। पहले काव्य में काल्पनिकता की बहुलता थी, आदर्श की स्थापना थी और अलौकिक अनुभूति पर बल था। आभिजात्य जीवन-का चित्रण तथा रसमय व्यंजना में अलौकिक आनंद की व्याख्या की गई परंतु आज काव्य लौकिक अनुभूति की ओर विशेष रूप से मुड रहा है। आज मानव व्यक्तित्व की खोज हैं, उलझनमरे जीवन की गुस्थियों से परिपूर्ण अनुभव साहित्य में साकार करने की आकांक्षा हैं। कवि भोगे हुए को चित्रित करना चाहता है, यथार्थ का आकर्षण है। यथार्थ तो नित्य परिवर्तनशील रहता है अतः भावों, अनुभूतियों, संवेदनाओं और आस्वादक के व्यक्ति की परिवर्तनशीलता एवं भिन्नता को स्वीकार करने पर अलौकिकत्व को स्वीकार करना असम्भव हो जाता है। डॉ. रांगेय राघव कहते हैं १. प्रगतिशील साहित्य के मानदण्ड, पृ. ३११ २. प्रगतिशील साहित्य के मानदण्ड, पृ. ३१२ रस .... १४
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२१० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन "रसवादी इस सब को बाह्यपक्ष मानते हैं और आत्मपक्ष के आनंद को वह समाज से निरपेक्ष मानते हैं और सहृदय के लिये रस की निष्पत्ति समान भाव से मानते हैं। वह रसवाद का सामन्तीय समाज के ढाँचे का रूप हैं।" स्पष्ट है कि अलौकिकता और अखण्डता के आधार पर व्यक्त होनेवाली अविच्छिन्नता एवं एकता रसास्वाद के स्तर पर आज नहीं आ सकती। रसवादियों ने "सहृदय " कहकर पाठक की योग्यता का वर्णन किया है परंतु पाठक या सहृदय ऐसा प्राणी नित्य नहीं हो सकता जो आदर्शतम स्थितितक पहुँचा हुआ हो, सत्व-रज-तम से मुक्त स्थितितक लोकोत्तरत्व का अनुभावन करे। वह समाज का एक अभिन्न अंग होता है। समाज परिवर्तनशील है, उसका नित्य विकास होता रहता है, उस विकास में भी कोई निश्चित नियम नहीं हो सकता। समाजविकास एव परिवर्तन समसामयिक साहित्य, साहित्यिक अभिरुचि और मर्मज्ञता पर प्रभाव करता है और रुचि में भी अंतर लाता है। ऐसी स्थिति में एक को किसी एक साहित्य कृतिसे प्राप्त आनंद दूसरे के आनंद से भिन्न होगा और नवकाव्य में अभिव्यक्त सामयिक बोधजन्य अनुभव अलौकिकत्व से युक्त नहीं हो सकता। आानंद को लोकोत्तर बताया गया है। एक विद्वान लोकोत्तर के विभिन्न अर्थ यों लिखते हैं-"व्यष्टि के ऊपर समष्टि भोग्य, जनसामान्य की भोगसामर्थ्य उपलब्धि क्षमता से उपर का सूक्ष्म गहन आनंद "२ यही सूक्ष्म, गहन और व्यापक आनंदमयता अधिक आत्मपरक, व्यक्तिपरक एवं एकांगी धारणा बन जाती है और व्यक्तित्वभिन्नता इस धारणा में व्यवरोध उत्पन्न करती है। काव्यानंद की व्याख्या के प्रवाह में सर्वोच्च स्वरूप या कोटि को व्यक्त करने के लिये "ब्रह्मानंद-सहोदरत्व" का प्रयोग किया गया है। ब्रह्मानंद से तुलना करते हुए आनन्द को उसका सहोदर बताकर उसके सदश एवं समकक्षी बताया गया है। यहाँ भी दार्शनिक मतवाद और वेदान्त स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है। काव्य से प्राप्त होने- वाले आनन्द के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए ब्रह्मवाद के अतिरिक्त अन्य कोई उपमा तत्कालीन विचारकों के पास नहीं थी। अतः कलात्मक आनन्द के स्वरूप को स्पष्ट करने की कठिनाई उनके सामने उपस्थित होने पर यही एक मार्ग उनके लिए था और इसी लिए दार्शनिक शब्दावली ग्रहण कर लोकानुभूति से भिन्न काव्यानुभूति को ब्रह्मानन्द के समकक्ष स्थापित कर दिया गया। आनन्दवाद का तत्त्व निश्चिततः सामयिक युग की संस्कृति से बद्ध है। इस स्थापना पर तत्कालीन सामाजिक प्रभाव, दार्शनिक चिंतन, शैवमत, वेदान्त, योगादि का स्पष्ट प्रभाव है। अभिनव गुप्त ने अपने ग्रंथ में आनन्द की कई स्थितियों १. प्रगतिशील साहित्य के मानदण्ड, पृ. ३१० २. कल्पना, मई ६९
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का उल्लेख किया है।9 डॉ. नामवरसिंह ने योग के प्रभाव का उल्लेख करते हुए लिखा है, 'काव्य के रस को ब्रह्मानन्द के तुल्य प्रमाणित करने का सारा प्रयास एक अन्य ऐतिहासिक आवश्यकता की ओर संकेत करता है। वह आवश्यकता थी, सहृदय अथवा सामाजिक को काव्यरस की महिमा के बारे में कायल करने की। सम्भवतः उस समय योग की विशेष महिमा थी-योग से ब्रह्म ही नहीं बल्कि ब्रह्मानन्द को प्राप्ति निश्चित थी। सवाल यह था कि योग को छोडकर कोई काव्य का सेवन क्यों करे। उस समय कविता के सम्मुख योग उसी प्रकार की चुनौती के रूप में था, जैसे आधुनिक युग में विज्ञान ।२
ब्रह्मानन्द-सहोदरत्व की धारणा को स्वीकार करने में भी कुछ समस्याएँ उपस्थित हो जाती हैं। यह एक उच्चतम स्तर का आनन्द तो सही परंतु लौकिक एवं व्याव- हारिक पक्ष से दूर हट जाता है। अतः प्रगतिवादी समीक्षक डॉ. रांगेय राघव लिखते हैं, 'रससिद्धान्ती जिसे ब्रह्मानन्द सहोदर कहते हैं वह महान आनन्द कहा जाना चाहिए क्योंकि वह काव्य की केवल आत्मवादी व्याख्या है। जैन और बौद्ध तो ब्रह्म में विश्वास नहीं करते।' इसमें काव्यानुभूति समाजानुभूति या लोकानुभूति से नितान्त भिन्न हो जाती है। प्रत्यक्षतः लोक में या व्यवहार में तो हम देखते हैं कि किसी एक रस का आस्वाद एक प्रकार के पाठक करते हैं, तो दूसरे अन्य का। रस से प्राप्त होनेवाला आनन्द मनुष्य को ऐन्द्रियक तुष्टि तो नहीं देता। आनंद की चार कोटियाँ बताई जा सकती हैं। ऐन्द्रियक आनंद सर्वसामान्य कोटि का, जो पशुपंछियों के जीवन में भी होता है। पंचेन्द्रियों से प्राप्त शारीरिक आनंद प्राथमिक एवं स्थूल होने के कारण अन्य कलाओं के आस्वाद में कुछ हदतक उसका सम्बन्ध भले ही स्वीकार किया जा सकता हो, तथापि काव्यानंद या रसानंद से प्राप्त आनंद से कदापि नहीं। मानसिक आनंद या प्रसन्नता संस्कारों का मूल्य रखता है परंतु वह व्यक्तिसापेक्ष एवं स्वार्थपरक भी हो सकता है। पैसा कमा कर घनी बन जाने की कल्पना से अथवा गत सुखद स्मृति से प्राप्त आनंद मानसिक ही होता है, जो अधिक सूक्ष्म, सर्वन्यापी एवं उच्चतम नहीं होता। विवेचन-विश्लेषण से प्राप्त होनेवाला बौद्धिक आनंद कवि या पाठक को पूर्णतः संतुष्टि नहीं दे सकता। तर्क, वादविवाद, वितण्डा से जनित आनंद काव्यानंद नहीं हो सकता । अतः स्पष्ट होता है कि काव्यानंद केवल ऐन्द्रिय, मानसिक या बौद्धिक आनंद नहीं हो सकता बल्कि इन तीनों के सम्मिश्रण से भिन्न प्रकार का एवं कोटि का, उच्चतम सम्मिश्र (complex) स्वरूप में होता है।
१. रससिद्धान्त और सौंदर्यशास्त्र, पृ. ७३. २. कविता के नये प्रतिमान पृ. ५३.
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२१२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन इसलिये फिर दर्शन में और अध्यात्म में आत्मिक आनंद या आध्यात्मिक आनंद की कलपना की गई। मानवी जीवन में ऐन्द्रिय, मानसिक और बुद्धिजन्य आनंद से परे, उच्च आनंद की कोटि आत्मिक आनंद मानी गई और आत्मा की मुक्ति ब्रह्म की प्राप्ति में बतायी गयी। इस पूरे दार्शनिक मतप्रताह में ब्रह्मानंद की कोटि उच्चतम घोषित की गई। दार्शनिक भूमिपर काव्य के रसास्वाद का विचार करते हुए आनंद की व्याख्या के लिये ब्रह्मानंद-सहोदरत्व का ग्रहण इस तरह स्वीकार किया गया। डॉ. रामविलास शर्मा का कथन उचित है कि "साहित्य के शास्त्रीय विवेचन पर से यदि हम ब्रह्मानंद- सहोदर का आवरण हटा दे, तो उसके नीचे हमें बहुत कुछ सचाई मिल सकती है।"१ आचार्य शुक को भी ब्रह्मानंद सहोदरत्व को ग्रहण करने में कठिनाई मालूम पडी। उनकी व्यावहारिक और लोकमंगलवादी दृष्टि ने आनंद की व्याख्या करते हुए रस की आनन्दपरकता को मानसिक भूमिपर ही स्थित किया है। करुण रस से श्रोता के मन में आनन्दप्राप्ति कैसे हो सकती है इस बात को लेकर वे लिखते हैं, "मेरी समझ में रसास्वादन का प्रकृत स्वरूप आनन्द शब्द से व्यक्त नहीं होता। लोकोत्तर, अनिर्वचनीय आदि विशेषणों से न तो उसके अवाचकत्व का परिहार है, न प्रयोग का प्रायश्चित। क्या क्रोध, शोक, जुगुप्सा, आदि आनन्द का रूप धारण करके ही श्रोता के हृदय में प्रकट होते हैं? उसे कुछ भी लगा नहीं रहने देते ... क्या दुःख के भेद सुख के भेद से प्रतीत होने लगते हैं ?... हरिश्रन्द्र के दुःख और महमूद के अत्याचार के उदाहरण देकर वे पूछते हैं, क्या दुःखान्त कथा पढ़कर बहुत देरतक खिन्नता बनी नहीं रहती? चित्त का यह द्रुत होना क्या आनन्दप्रद है ? इस आनन्द शब्द ने काव्य के महत्त्व को बहुत कम कर दिया है, उसे नाच-तमाशे की तरह बना दिया है।" उक्त प्रसंग से प्राप्त अनुभूति को वे दुःखात्मक स्वीकार करते हैं और रसास्वाद की आनन्द- परकता की चर्चा में फिर मानसिक मुक्तदशा के आनन्द का अधिष्ठान वे दे देते हैं। वे लिखते हैं, "पर आनन्द शब्द को व्यक्तिगत सुखभोग के स्थूल अर्थ में ग्रहण करना मुझे ठीक नहीं जँचता। ... करुण रसप्रधान नाटक के दर्शकों के आँसुओं के सम्बन्ध में यह कहना कि "आनन्द में भी तो आँसू आते हैं," केवल बात टालना है। दर्शक वास्तव में दुःख का ही अनुमत्र करते हैं। हृदय की मुक्तदशा होने के कारण वह दुःख रसात्मक होता है।"२ काव्यास्वाद में हृदय की मुक्तावस्था को स्वीकार करने के कारण रसास्वाद की आनन्दपरकता की यह संगति बिठाई गई है। परंतु काव्यास्वाद की एकाग्रता में ही अधिक खण्डितता एवं व्यवधान उत्पन्न होने पर अखण्ड काव्यास्वाद की आशा नहीं की १. रसमीमांसा, पृ. १०१ २. रसमीमांसा, पृ. २७१
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आनन्दवाद का सामाजिक मूल्यांकन २१३ 3. जा सकती और फिर प्रत्यक्षतः आनंद की अनुभूति तो नहीं हो सकती। काव्यानुभूत दुख, उद्वेग, पीड़ा, संत्रासात्मक अनुभूति ग्रहण कर पाठक का मन उसके अनुकूल बनेगा भी और कभी-कभी नहीं भी। अतः समसामयिकता के प्रति जागरूक व्यक्तियों के लिये रसात्मक आनन्द में काव्यास्वाद की परिणति को स्वीकार करना कठिन है। आज की सापेक्षता में आनन्द का तत्त्व कुछ एकांगी एवं अपूर्ण प्रतीत होता है। रस की चरम परिणति आनन्द में मानने की अपेक्षा काव्यानुभूति का अन्य एक स्तर मानना ही उचित होगा। नये समाज के साथ जब नये-नये प्रशों पर विचार किया जाता है तब काव्य में बौद्धिकता की स्थिति उत्पन्न होती है। ऐसे समय तन्मयता से काव्य के आस्वाद को स्थिति में कुछ अंतर आता है। अतः आस्वाद की दो मिन्न स्थितियाँ हो सकती हैं। रसानुमूति की स्थिति में रस में डूब्र जाने, रसविभोर होने से मन हर्षित होता है और पाठक तन्मयता से हर्ष या सुख का तथा पीडाहीनता का अनुभव करता है। परंतु इसके साथ ही किसी काव्य से अन्य प्रकार की अनुभूति पाठक को होती है। वह रसानुभूति से भिन्न होती है। उसमें काव्यगत बौद्धिक बातों को समझकर, ग्रहण कर, भी पाठक अपने को व्यग्र या दुःखी नहीं पाता। वस्तुतः बुद्धि का धर्म तो विचलित करना है, वह कभी स्थिर नहीं रखती परंतु उपर्युक्त स्थिति को केवल बौद्धिक ग्रहण या अनुभूति नहीं कहा जा सकता, वरन् इसे काव्यनुभूति या सौंदर्यानुभूति कहना उचित जान पड़ता हैं। अतः काव्यास्वाद में रसानुभूति के दो स्तर हो सकते हैं। एक भावुकतापरक, विभोर होने की स्थिति और दूसरी काव्यानुभूति। इन दोनों स्तरों को मान्य करने पर अन्य सारे प्रश्न सुलझ सकते हैं।
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दशम अध्याय रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन
रसास्वाद की प्रक्रिया में काव्य पढ़तेसमय कवि द्वारा अभिव्यक्त आशय और काव्यगत समग्र विभावादि सामग्री पाठक के मनश्चक्षुओं के सम्मुख उपस्थित होती है और वह अनुभूति अपने समग्र रूप में, पाठक की अपनी अनुभूति होने लगती है। पाठक काव्यास्वाद में एकरूप होते हुए उस रसविशेष में तल्लीन होता जाता है और रस का उन्मुक्त आस्वाद करतो है। वह रसविभोरावस्था में पहुँचकर रस की गहन अनुभूति की प्रतीति करता है! परंतु कभी-कभी काव्य पढ़तेसमय कात्यगत रससामग्री के उपस्थित होने पर भी पाठक उस स्थिति से एकरूप नहीं हो पाता। फलतः ऐसी स्थितियों में रसपरिपोष की प्रक्रिया क होते हुए भी रसास्वाद की गहन अनुभूति की स्थितितक पाठक पहुँच नहीं सकता। रसास्वाद कहीं खण्डित हुआ सा प्रतीत होता है अथवा रसात्मक-बोध में क्षीणता आ जाती है। काव्य में रस की सामग्री एवं प्रक्रिया का अस्तित्व होते हुए भी किसी कारणवश पाठक की रसात्मक अनुभूति क्षीण या फीकी होती जाती हैं और गहनतम अनुभूति के स्थान पर उपहास, घृणा अथवा हास्य जैसे हलके भाव जागृत हो जाते हैं। गहन रसानुभूति और क्षीण रसात्मक अनुभूति (भावानुभूति या केवल अनुभूति मात्र) ये सर्वथा दो भिन्न स्थितियाँ हैं। दूसरी स्थिति को ही काव्यशास्त्र में "रसाभास" कहा गया है। काव्यास्वाद की इस स्थिति को रसाभास कहकर प्राचीन आचार्यो ने रसाभास के स्वरूप, आधार और कारणों के सन्दर्भ में शास्त्रीय दृष्टिकोण से पर्याप्त चर्चा की है। सामाजिक दृष्टिकोण से रसाभास की स्थिति का परीक्षण किया जाय तो सामाजिक आधारों की स्थिति, निर्विध्न रसास्वाद न कर पाने के कारण, कवि की अनुभति की संप्रेषणीयता की असंभाव्यता आदि से संबंधित अनेक प्रश्न उपस्थित होते हैं।
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रसामास का सामाजिक मूल्यांकन २१५
रसाभास की स्थिति में पाठक को रस का केवल आभास होता है याने रस के सारे लक्षणों आदि के उपस्थित होते हुए भी वह प्रत्यक्ष रसानुभव नहीं कर सकता। किसी बात का आभास होने का अर्थ होता है कि वह वस्तु वहाँ है ऐसा लगता तो है, पर वह प्रत्यक्षतः वहाँ नहीं होती। आभास शब्द आ भास से बना है जिसका अर्थ चमक, दीपि, द्रुति, कांति, शोभा आदि होता है। कोश में इसके अन्य अर्थ छाया, प्रतिबिम्ब, धोखा या भ्रम आदि मिलते हैं।9 कहीं रस्सी पड़ी हुई हो तो दूर से देखने पर अंधेरे में साँप मालूम होता है। प्रकाश फैल जाते ही पता चलता है कि वह साँप नहीं, रस्सी है। सीपी में चाँदी जान पड़ना भी आभास ही है। व्यवहार में आभास या भ्रम के कतिपय उदाहरण देखे जाते हैं। रास्ते से चलते समय हम एकाध व्यक्ति को सामने से आते हुए देखते है तो लगता है कि यह हमारा परिचित अमुक व्यक्ति है पर प्रत्यक्ष जब्र वह पास आता है तो स्पष्ट होता है कि नहीं, वह हमारा मित्र नहीं है, कोई दूसरा ही है। यहाँ दूर से अपना ही मित्र होने की भावना, उसके पास आने पर कुछ विसंगति, विभेद या असंगति स्पष्ट होते ही, दूर होजाती है और वहाँ केवल आमास का अनुभव होता है। रसप्रतीति की स्थिति में भी जब कभी ऐसी कोई बात खटकती है तो रसात्मक अनुभूति के स्थान पर वहाँ "आभास" मात्र रह जाता है। पण्डितराज जगन्नाथ ने रसाभास की स्थिति को एक व्यावहारिक उदाहरण के सहारे अच्छे तरीके से व्यक्त किया है। "जिस प्रकार शरबत पीतेसमय उसमें किरकिरी आ जाय तो शरबत का सारा मज़ा जाता रहता है, आस्वाद फीका हो जाता है, उसी प्रकार यदि रसानुभव में खटकनेवाली बातें उपस्थित होती हैं, तो वहाँ रसभंग समझना चाहिये और उसे रसामास कहना चाहिये। "२ जैसे शरबत में किरकिरी खटकती है, रास्ते पर मित्र से मिलने का आनंद उसके पास आने पर दूर हो जाता है, वैसे ही काव्यास्वाद के बीच में कुछ ऐसी बातें आ जाती हैं, जो पाठक के मन में खटकती हैं और उसके कारण रसामास की स्थिति उत्पन्न होती है। परम्परा के दृष्टिक्रम से देखा जाय तो भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में रसाभास का स्पष्टतः उल्लेख नहीं है और रसाभास शब्द भी नहीं है। परंतु 'शंगार की अनुकृति में हास्य उत्पन्न होता है' इस कथन में उसका कुछ संकेत मिलता है। साथ ही वेश, अलंकारादि के औचित्य का संकेत उन्होंने किया है। लोकस्वभावानुकरण और लोकवृत्तानुकरण में अंशतः इसको स्वीकार किया गया है और आयु एवं व्यक्तिभेद के अनुसार मिन्न रसों के भिन्न जनों के आस्वाद की चर्चा की गई है। अभिनवगुप्त ने स्थायी व्यभिचारी भावों के अनौचित्य पर बल देते हुए कहा, "औचित्येन प्रवृत्तौ चित्तवृत्तेरास्वाद्यत्वे स्थायिन्या १. शब्दकल्पद्रुम, मानककोश २. रसगंगाधर, पृ. १४२
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२१६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
रसो, व्यभिचारिण्या भावः अनौचित्येन तदाभास:"।' मम्मट ने अनौचित्य को ही रसाभास का आधार माना है।२ विश्वनाथ ने "अनौचित्यप्रवृत्तत्वं आभासो रसभावयो: "३ कहकर और पण्डितराज जगन्नाथ ने "अनुचित विभावालम्बनत्व रसाभासत्वम् " कहकर विभावादि के अनौचित्य पर ही बल दिया है।४ साधारणतः सभी आचार्यों ने रसाभास का एकमात्र आधार "अनौचित्य" घोषित किया है परंतु अनौचित्य के निश्चित स्वरूप के सम्बन्ध में उनमें मतैक्य नहीं दिखाई देता। निम्नलिखित विभिन्न स्वरूपों में अनौचित्य रसाभास का कारण माना गया है। रस का अनौचित्य (१) विरोधी रस की संयोजना (शारदातनय) (२) अंगीरस का अंगरस पर अधिक्षेप ( शिंगभूपाल) विभाव का अनौचित्य भाव का अनौचित्य स्वभाव का अनौचित्य लोक और शास्त्र का अनौचित्य५
अनौचित्य में उचित न होने का भाव है। अन् उपसर्ग न समाससूचक अर्थ व्यक्त करता है, जिससे अभाव होने या विपरीत होने का संकेत मिलता है। उचित शब्द उच् धातु से बना है जिसका मूल अर्थ प्रसन्न होना या प्रसन्न करना है। कोश में उचित शब्द के अन्य अर्थ प्रसादकारी, रमणीय वस्तु, समंजस, शिव, ऋजु लोकशास्त्र के प्रसिद्ध गुणों का समुदाय आदि हैं।६ डॉ. राघवन ने औचित्य के लिए अप्रोप्रिएटनेस, एडप्टेशन, हारमनी, प्रपोर्शन आदि पर्यायवाची शब्दों का प्रयोग किया है। इन सबके बीच क्षमेन्द्र की औचित्य की परिभाषा अधिक सार्थ प्रतीत होती है कि, "जो जिसके अनुरूप है, उसे उचित कहते हैं और उसके भाव को औचित्य।"७ उचित होना, अनुरूप होना, संगत लगना आदि का सम्बन्ध मानवजीवन एवं व्यवहार में अत्यन्त प्रधान रहा है। क्या उचित है और क्या अनुचित है इसका
१. लोचन, पृ. ७८ २. तदाभासा अनौचित्यप्रवर्तिताः (काव्यप्रकाश, सू. ४९) ३. साहि त्यदर्पण-३।२६२ ४. हिन्दी रसगंगाघर, पृ. १४२ ५. रससिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण, पृ. २१६ ६. मानक हिन्दी कोश ७. औचित्यविचारचर्चा, अ. ७
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सराभास का सामाजिक मूल्यांकन २१७
निर्णय एवं विचार मनुष्य की निर्णायक बुद्धि प्रतिक्षण करती रहती है। बुद्धि के इस धर्म को ही विवेक कहा जाता है। विवेक का उदय मानवजीवन में जन्म से ही नहीं होता। बालक मूलतः विवेक से परिपूर्ण नहीं होता। उसकी आयुवृद्धि के साथ ही विवेकशीलता बढ़ती जाती है। बालक की क्रियाओं में अधिकतर विवेकहीनता पायी जाती है, परंतु जैसे-जैसे वह बड़ा बनता जाता है, बढ़ती आयु के साथ उसके जीवनविकास में विवेक का महत्त्व भी बढ़ता जाता है। व्यक्तिगत जीवन को सामाजिक सम्पर्क एवं सामंजस्य में विकसित करते हुए विवेकशीलता की नितान्त आवश्यकता प्रतीत होती है। विवेक की वृद्धि ही उसके व्यक्तिगत जीवन का सामाजिक जीवन से सामंजस्य स्थापित कर उसके जीवन को संतुलित ( balanced) रखने का कार्य करती है। अतः वह उचितानुचित के विवेक से उचित की स्वीकृति और अनुचित के त्याग की वृत्ति अपनाता है। जहाँ अनुचित को स्वीकार किया जाता है वहाँ समाज- जीवन के प्रवाह में कुछ बाधा अवश्य आती है।
परंतु मात्र आयु के कारण मनुष्य में विवेकबुद्धि विकसित होती तो सारे वयोवृद्ध विवेकसंपन्न ही हो जाते। केवल आयु ही विवेक को जन्म नहीं देती, साथ ही मनुष्य की समाजसापेक्ष जीवनस्थितियाँ, उनमें प्राप्त विभिन्न अनुभव और भिन्न-भिन्न प्रसंग उसकी विवेकशीलता को विकसित करते हैं और वह विवेक की क्षमता से ही अपने जीवन की प्राप्त स्थिति, प्रसंग या परिवेश के सन्दर्भ में उचितानुचित का निर्णय करता है। विवेक मात्र स्वतंत्र स्वायत्त शक्ति नहीं, वह मनुष्य की आयु के साथ उसकी शिक्षा, संस्कार, समाज में उसका स्थान (status) और उसका परिवेश आदि सब पक्षों की सापेक्षता में निर्णय देती है और मनुष्य औचित्य-अनौचित्य का निर्णय करता है।
व्यक्तिगत विवेकबुद्धि से निर्णीत औचित्य और अनौचित्य सार्वजनीन एवं सार्व- कालिक नहीं हो सकता। एक व्यक्ति को जो बात उचित लगती है, वही दूसरे के लिए अनुचित हो सकती है। एक काल में जो औचित्यपूर्ण माना गया है, कालान्तर में वही अनौचित्यपूर्ण एवं त्याज्य माना जा सकता है। स्पष्ट है कि औचित्य-अनौचित्य की अवधारणा (concept) को किसी एक सीमा में बांधा नहीं जा सकता। वह परिवर्तनशील, गतिशील तथा सापेक्ष धारणा है। एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति से समाज में आदानप्रदान होता रहता है और उस सापेक्षता में उसका व्यत्तिजीवन विकसित एवं अभिव्यक्त होता रहाता है। विकसनशील व्यक्तिजीवन की अभिव्यक्ति पर औचित्य- अनौचित्य का विवेक प्रभाव डालता रहता है और विवेकशीलतापर परिवर्तनशील सामाजिक परिवेश का प्रभाव रहता है। सामाजिक आदानप्रदान में कुछ संकेत बनते हैं, विभिन्न प्रथाएँ, विचारधाराएँ एवं मान्यताएँ रूढ होती रहती हैं और सारा सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश उस युगविशेष को प्रभावित करता है। कालान्तर में वे संस्कार