9. Pages 244–273
Page 244
२१८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
समाजजीवन में किसी अंश में बने रहते हैं और उनकी सापेक्षता में व्यावहारिक धरा- तल पर व्यक्ति की विवेकशीलता औचित्य-अनौचित्य का निर्णय करती है। अन्य शब्दों में कहना हो तो विवेक का निर्णय भी स्वतंत्र नहीं रहता, संदर्भ की सापेक्षता से विच्छिन्न नहीं होता। अतएव व्यक्ति, उसका परिवेश, प्राप्त स्थिति, घटना और उसका सन्दर्भ इन सारी बातों की सापेक्षता में उचित-अनुचितता का निर्णय परिवर्तित हो सकता है। औ चित्य की परिवर्तनशीलता एवं गयात्मकता ने जीवन की गतिशीलता से सामजस्य बनाये रखा है। औचित्य-अनौचित्य का विचार-चिंतन पाश्चात्यों ने नीतिशास्त्र के अन्तर्गत किया हैं। वे अच्छा-बुरा (good and bad) और सही-गलत ( right or wrong) के रूप में विचार करते हैं। मॅकेंझी उसे शिव कहता है जिसका अंतिम फल मूल्यवान एवं महत्त्वपूर्ण होता है। सही साधारणतः नियम के अनुसार व्यवहार का अर्थ हैं। सही और शिव ये दोनों भिन्न धारणाएँ हैं। औचित्य सही के अधिक निकट है पर शिवत्व से भी युक्त है। जो सही है वह सामयिक काल में शिव नहीं भी हो सकता, पर कालान्तर में वही शिवत्वपूर्ण प्रमाणित हो जाता है। औचित्य की कल्पना में सही की नियमबद्धता और शिव के मूल्यवान-फलदायी दोनों तत्त्वों का समाहार हो जाता है। 'उचित' सही और शिव का ही रूप है इस कथन का आधार क्या है यह बताना कठिन है। 'शिव' मानवजीवन के आदर्शो की ओर (ideals) निर्देश करता है और 'सही' व्यवहार, आधार तथा मानवजीवन के नियमों का संकेत देता है। सांस्कृतिक एवं सामाजिक परिवेश में व्यक्ति अपने-अपने आदर्शों की स्थापना करने लगता है और उनका पालन करने का प्रयास करते हुए औचित्य की रक्षा करता है। परंतु जिस समय सामाजिक परिवेश एवं सांस्कृतिक परम्परा परिवर्तित हो जाने पर प्राचीन आदर्श और नये यथार्थ में संघर्ष की स्थिति उत्पन्न होती है उस समय औचित्य की कल्पनाएँ भी कुछ बदलने लगती हैं। आदर्श और यथार्थ के सामंजस्य के किंचित काल के लिए भी दूर जाने पर परम्परागत मूल्यों के विघटन की स्थिति उत्पन्न होती है। प्राचीन, पूर्ववर्ती मूल्यों के स्थान पर नये मूल्यों की माँग होने लगती है और प्राचीन मूल्य अनु- पयुक्त सिद्ध होते हैं। पूर्ववर्ती सिद्धान्त-तत्त्वों का जो अस्तित्व एवं महत्त्व समाज एवं युग में रहा हो, युगपरिवर्तन में वहाँ फीका पड जाता है, बदल जाता है। फिर नये मूल्यों की स्थापना होने लगती है। औचित्य-अनौचित्य की कल्पनाओं में इस स्थिति के कारण अन्तर आ जाता है। प्राचीनों ने लोक और शास्त्र का अनुकरण औचित्य- अनौचित्य के लिए अनिवार्य माना है। परंतु इस परिवर्तनशील स्थिति में जहाँ कवि नये मूल्यों को स्वीकार करके उनकी स्थापना अपने काव्य में करता है, वहाँ अनौचित्य का प्रश्न उपस्थित हो जाता है और फिर रसाभास की स्थिति उत्पन्न होने की सम्भावना उत्पन्न हो जाती है।
Page 245
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २१९
युग और स्थिति के अनुसार मानवजीवन के व्यवहारनियम बदलते हैं, पुराने नियमों का स्थान नये नियम ले लेते हैं, जिनका प्रभाव जीवन की स्थितियों, विचारों, आदर्शों और भावाभिव्यक्ति पर होता है। इन सारी बातों के साथ औचित्य अनौचित्य की कल्पनाएँ भी बदलती रहती हैं और वे नित्य ही साहित्य को प्रभावित करती रहती हैं। प्राचीन समाज में वर्णों और आश्रमों पर आधारित समाजजीवन नितान्त भिन्न था। आज जाति, वर्ण आदि को तोडने के लिए बुलन्द आवाज़ उठ रही है। भारतीय संस्कृति जातिभेदों के कठघरे से बाहर आकर अपने समकालिक मानदण्डों को अपनाने की कोशिश कर रही है। विवाहसंस्था के कतिपय रूपों में औचित्य की कल्पनाओं का परिवर्तन दिखाई देता है। एकपतनीत्व, बहुपतित्व, बहुपत्नीत्व, बालविवाह, विधवाविवाह, प्रौढविवाह, प्रेमविवाह, अन्तर्जातीय विवाह, तलाक प्रथा आदि विभिन्न सामाजिक सम्बन्धों और रूढियों ने मानवजीवन एवं व्यवहार में औचित्य की कल्पनाओं को प्रभावित किया है। प्राचीन समाज में रति की प्रतिष्ठा अत्यंत पवित्र एवं उज्जवल रूप में थी जिसकी झलक भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में ही नहीं अपितु धर्मशास्त्र में भी मिलती है। भारतीय समाज एवं संस्कृति ने जीवन के सारे पक्षों को धर्म के अन्तर्गत समेट लिया है। मिथुनों की पूजा की प्रथा भी भारतीय परम्परा में चलती रही है। रति को अत्यंत पवित्र एवं उदात्त रूप भारतीय संस्कृति ने दिया और विवाह को एक पवित्र और जन्मजन्मांतर का सम्बन्ध मानकर उस पर आध्यात्मिक आवरण चढ़ा दिया। न केवल भौतिक हेतु तक रति सीमित रही बल्कि एक आध्यात्मिक एवं शाश्वत रूप पाकर अतीव पवित्र, मंगल, शाश्वत एवं मर्यादाशील भी बनी। स्वाभाविकतः पत्नी के लिए पति के अलावा किसी पर अनुरक्त होना अनौचित्यपूर्ण माना गया। स्त्रीजीवन में पातिव्रत की पराकाष्ठा का आदर्श सावित्री द्वारा उपस्थित करने के कारण भारतीय नारी के लिए पति परमेश्वर बना। ऐसी समाजरचना एवं संस्कारों के प्रभाव के कारण काव्य में इनसे विपरीत प्रसंगों की व्याख्या आचार्यों ने अनुचित एवं रसाभास के रूप में की है। किसी स्त्री का पति मूर्ख नपुंसक और नालायक हो, शराबी हो तो धर्मशास्त्र ने जैसे पति को छोडकर दूसरा विवाह करने की अनुमति दी है। परंतु विवाह और प्रेम में परस्पर भिन्नता है। स्त्री यदि पति के अतिरिक्त किसी अन्य के प्रति अनुरक्त है, तो भारतीय समाज उसे उचित नहीं मानता और काव्य में ऐसे प्रसंग आने पर वहाँ रसाभास घोषित कर देता है। पाश्चात्थ देशों में यह स्थिति नहीं है। भारतीय संस्कृति ने समाज-जीवन में वर्णविभाजन और आश्रम्यवस्था को महत्ता दी थी और वर्णाश्रम के घागों से ही सारा प्राचीन जीवन गुँथा हुआ था। उस पर ही मानवजीवन एवं समाजजीवन के आदर्श (ideals) निर्धारित होते थे।
Page 246
२२० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
ब्रह्मचारी, संन्यासी, ब्राह्मण, क्षत्रिय, शूद्र, सभी के लिए कुछ नियम समाजद्वारा निर्धारित किये गये थे और उनका कठोर पालन आवश्यक माना जाता था। उसमें बाधा आने पर समाज उसे अनुचित मानता था। अब वर्णाश्रमव्यवस्था टूट चुकी है। वर्ण, वर्ग आदि भेदों से पूर्णतः रहित समाजरचना की माँग है और व्यक्ति की स्वतंत्र इकाई की सत्ता स्वीकृत की जा रही है। ब्रह्मचर्य से संन्यास तक की जीवन की अव- स्थाओं में बद्ध न होने पर भी अवस्थानुसार आचार, व्यवहार एवं भावोन्मेष तो होता ही है। अतः इसके विपरीत घटित होने पर मानव और समाज उस घटना को अनुचित मानता है। काव्य में ऐसे स्थल रसामास की कोटि में परिगणित होते हैं। संस्कृति और समाज के विकास के साथ ही मानवजीवन में पारस्परिक सम्बन्धों का विकास हुआ। भाई-बहन, पिता-पुत्र, माता-पिता, गुरु-शिष्य, पति-पत्नी आदि पारस्वारिक सम्बन्धों के निर्धारण में संस्कृति का महत्त्वपूर्ण हाथ है। मानववशशास्त्र से यह बात प्रमाणित है कि आदिम स्थिति में मानव के लिए न माता-पिता का सम्बन्ध था, न माता-पुत्र आदि सम्बन्ध निश्चित थे। परस्पर सम्बन्धों का स्थापन एवं विकास समाज निर्माण एवं संस्कृति के साथ होता गया। समाज एवं संस्कृति ने उन सम्बन्धों के अनुकूल आदर्श स्थापित किये। साथ ही इस प्रकार के आदर्शो, संकेतों तथा आचार के नियमों की रेखाएँ भी निश्चित होती गई। कौन किसके साथ किस प्रकार का व्यवहार करता है, इन नियमों और संकेतों के बाधक अथवा प्रतिकूल व्यवहार एवं आचार को अनुचित माना जाने लगा। काव्य में भी परस्पर निश्चित सम्बन्धों के विपरीत अनुचित का चित्रण बाधक बन सकता है। वहीं रसाभास उत्पन्न होता है। गुरुशिष्य परम्परा की भारतीय संस्कृति में एक विशेष महत्ता रही है। गुरु को अत्यधिक प्रतिष्ठा दी गई और 'आचार्य देवो भव' कहकर उसे देवतासम माना गया। गुरुकुलपद्धति से शिक्षा-ग्रहण की परम्परा प्राचीन भारतीय समाज में प्रचलित होने से गुरु-शिष्य के पारम्परिक सम्बन्ध पिता-पुत्रवत् होते थे। पिता के स्थान पर गुरू की मान्यता होने से श्रद्धा और भक्ति के पात्र माने जाते थे। गुरुपतनी मातासमान मानी जाती थी। अतः गुरूपत्नीविषयक रतिव्यंजना अनुचित एवं रसामास का आधार मानी गई। आज शिक्षा की प्रणाली में पर्याप्त अन्तर आया है। शिक्षक-केन्द्रिय शिक्षा पद्धति आज विद्यार्थी-केन्द्रिय (piodo-centric) बन गई है, जिसके फल. स्वरूप शिक्षक आज गुरू या आचार्य देवता नहीं, बल्कि विद्यार्थी के मददगार, सहाय्यक मित्र के रूप में ( helper) माना जाने लगा है। गुरूमुख से विद्या का प्रवाह हटा है, और स्वयं-अध्ययन ( self-study) पर बल दिया जाने लगा है। इस स्थिति में भी जो प्राचीन संस्कार बचे रहते हैं, वे समाजजीवन को प्रभावित करते हैं। शैक्षिक चिंतना में अन्तर भले ही आए, पर समाज में मान्य गुरू की प्रतिष्ठा किसी हदतक बनी रहेगी। अतएव काव्य में इस प्रकार का वर्णन आने पर रसाभास की स्थिति उत्पन्न होगी।
Page 247
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २२१
इस बात के साथ ही गुरूजन, मातापिता आदि बड़ों के साथ व्यवहार के कुछ संकेत समाज में मान्य रहते हैं। किसी व्यक्ति को बड़ों से या अपने पिता से क्रोध व्यक्त करना, स्त्री का अत्यधिक क्रोध व्यक्त करना, बच्चे का क्रोधाविष्ट होकर बुरी या उलटी- सीधी बातें कह देना अत्यन्त अनुचित माना गया है। इसलिए उस प्रकार का वर्णन काव्य में रसप्रसंग में आने पर रसामास उत्पन्न होता है। आचार के नियम तथा औचित्य की कल्पनाएँ मात्र व्यक्तिजीवन से सम्बन्घित नहीं रहतीं, बल्कि समाज में और सार्वजनीन जीवन में अभिव्यक्त होती हैं, जिन पर बाह्य सामाजिक परिवेश का अधिक नियंत्रण रहता है। वे ही नैतिक-अनैतिकता का रूप लेती हैं। अर्थात् संस्कृतिविशेष और सामाजिक जीवनगत व्यवहार नीति के आधाररूप हो जाते हैं। जब सांस्कृतिक एवं सामाजिक संदर्भ से मानव के व्यवहार में औचित्य का विचार होता है तब नीति की धारणा का उदय होता है। सामाजिक सन्दर्भ में अच्छा- बुरा अर्थात् शिव-अशिव कल्पनाओं से व्यवहार के कुछ आदर्श उपस्थित किये जाते हैं और उनके विपरीत स्थिति को अनैतिकता कहा जाता है। औचित्य व्यक्तिगत भी हो सकता है पर नीति सामुदायिक परिवेश से संबद्ध होती है। नीति शब्द बड़ा व्यापक अर्थ रखता है। नीति शब्द 'नी' धातु से बन। है जिसका अर्थ ले जाने या ले चलने की क्रिया होता हैं। 'नीति' के विभिन्न अर्थ, उचित, ठीक रास्ते पर चलने की क्रिया, आचारव्यवहार के ढँग, व्यवहार का ऐसा रूप जो सब की दृष्टि से लोक और समाज कल्याण के लिए आवश्यक ठहराया गया हो, सदाचार तथा सद्व्यवहार आदि है।9 युक्ति, हिकमत, उपाय के अर्थ में भी नीति का प्रयोग होता है। नीति का अर्थ सर्वप्रथम राज्य या शासन की रक्षा या व्यवस्था के लिए शासक या शासित के सम्बन्ध ठीक तरह से बनाये रखने के लिए किये गये सिद्धान्तों या तत्वों के अर्थ में अर्थात् राजनीति के अर्थ में, माना जाता था। नीति कई प्रकार की मानी गई हैं। देशनीति, राजनीति, समाजनीति, कालनीति आदि भेदों में नीति का वर्गीकरण किया जाता है।२ इन विभिन्न अर्थों को देखते हुए नीति की कल्पना के उदय एवं विकास की कल्पना की जा सकती है। मानव के जीवनविकास में संस्कृति एवं समान की सापेक्षता में मानवव्यवहार को संचालित करनेवाले नियम नीतिनियम हैं। मानव के सांस्कृतिक नीवन का निचोड नीति है। आदिम स्थिति में मानव के जीवन में विभिन्न प्रथाओं, (taboos) के रूप में नीति का अस्तित्व था और बाद में उसने शास्त्र का रूप ग्रहण किया। भारतीय परम्परा में तो नीतिशास्त्र (ethics) जैसा कोई शास्त्र नहीं था। भारत में व्यक्ति या समाज के व्यावहारिक एवं दैनिक जीवन की व्याख्या १. मानक हिन्दी कोश, बृहद् हिन्दी कोश २. नीतिकाव्य, पृ. ५
Page 248
२२२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
धर्मशास्त्र ने की। भानवीय आचरण और कर्तव्य की मीमांसा अत्यन्त गहराई से प्रत्यक्ष जीवन के ठोस धरातल पर करने के कारण नीति मानवजीवन की सापेक्षता में सदैव धर्म से संबद्ध रही और नीति का प्रयोग मात्र राजनीति के अर्थ में किया गया। लोकमान्य तिलक के कथन से इस बात को पुष्टि मिलती है कि "नीतिशास्त्र प्राचीन ग्रंथों में प्रायः राजनीति शास्त्र के लिए प्रयुक्त किया जाकर कर्तव्याकर्तव्य के शास्त्र को धर्मशास्त्र कहने की प्राचीन परिपाठी रही है।"१ साधारणणतः जगत में अन्य सारे प्राचीन देशों में प्रारंभ में यही स्थिति रही। वस्तुतः धर्म और नीति में तात्विक भेद नहीं है। फिर भी दोनों शब्दों की अवघारणाओं में ( concept) अंतर है। धर्म 'घा' अर्थात् धारण करनेवाला और नीति 'नी' आगे ले जानेवाली है। धर्म में भयवृत्ति का आधार ग्रहण करके पापपुण्यादि कल्पनाओं से मानव-व्यवहार एवं आचार पर नियंत्रण रखा गया। नीति में विवेकबुद्धि का विशेष आधार होते हुए उचित-अनुचित का भेद करने की क्षमता है। प्रारंभ में व्यापक समूह के कार्यलक्ष्य में धर्म ही मार्गदर्शक रहा। धर्म के मानदण्ड पाप और पुण्य की एक कसौटी रही, जो मानव आचार की आधारशिला बनी। एक प्रकार से यह पूर्णतः धार्मिक नीति ही रही। प्राचीन भारतीय समाज में, चार पुरुषार्थों पर अधिष्ठित समाज में, धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में सारा मानव-जीवन समेटा हुआ था। किसी काल में धर्मप्राण जीवन एवं साहित्य का उद्देश्य ही मोक्ष रहा। मोक्ष ही नैतिक एवं आध्यात्मिक मूल्य होने के कारण वहाँतक ले जानेवाला सही रास्ता धर्म ही माना गया। धर्म में बौद्धिकता या विवेकशीलता की अपेक्षा श्रद्धा और आस्था की प्रधानता थी। जीवन के आचार के मानदण्ड (standard of conduct) और कर्तव्य के आदर्श (ideals of duties) धर्म के अनुसार निश्चित किये गये थे। तत्कालीन समाज में उचित- अनुचित का विचार एवं निर्णय इन धार्मिक मानदण्डों का ही अनुकरण करता था। किंतु चिंतनपरकता, बौद्धिकता एवं मस्तिष्क की जिज्ञासा के नीति फलस्वरूप का उदय हुआ। कर्म के साथ विवेकबुद्धि को जोड़ देने के कारण उचित अनुचित के विचार ने नीति को जन्म दिया। मानवी जीवन को आदर्श की ओर ले जानेवाले मार्ग का लक्षण नीति है। वस्तुतः आदर्श दर्शन का विषय है। इसके दो पक्ष होते हैं। एक स्थितिपरक जो जीवन की स्थिति को बनाये रखना चाहता है और दूसरा उस लक्ष्यतक गतिशील बनाता है। व्यावहारिक नीति धर्म के रूप में तत्कालिक जीवन को बनाये रखती थी और आध्यात्मिक नीति अंतिम लक्ष्यतक ले जाती थी। वर्णाश्रम व्यवस्था की कर्तव्याकर्तव्य का विक्लेषण धर्मशास्त्र में किया गया और सत्यं वद, धर्मे चर आदि १. गीतारहस्य, लो. तिलक, पृ. ४९
Page 249
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २२३
सत्कर्मों, सद्गुणों और सदाचारों का आदर्श सेवा, दया, क्षमा, त्यागादि में माना गया। स्वर्ग, नरक, पाप-पुण्य, पुनर्जन्म, पूर्वजन्मकर्म आदि की कल्पनाओं द्वारा एक प्रकार के लोम एवं भय से सामान्य मानवजीवन का आचरण नियंत्रित एवं संचालित किया गया था। धार्मिक और नैतिक मानदण्डों से मनुष्य की औचित्य-अनौचित्य की कल्पनाओं में अंतर आता है। विदेशियों ने मानवी आचार का अध्ययन और चिंतन नीतिशास्त्र के अन्तर्गत किया है। भावपक्ष पर बल देकर 'अच्छा-बुरा' और विचारपक्ष को अधिक प्रधानता देकर 'सही-गलत' (right or wrong) की कल्पना की है। अच्छा वह भावगत मूल्य है जो विवेक से बहिष्कृत होता है और सुखद फल की अपेक्षा रखता है। परंतु सही वह बौद्धिक प्रेरणा है, जो कर्तव्याकर्तव्य के दायित्व का चिंतनपरकता से निर्णय करती है। "अंतिम अच्छा" (intrinsic good ) की कल्पना उसमें की गई है परंतु अंतिम सही की नहीं। सामान्यतः नीतिशास्त्र के अंतर्गत मानव के आचार में क्या सही और क्या गलत होता है इसका अध्ययन किया जाता है।' कहा जा सकता है कि मानव-आचार के आदर्श और यथार्थ दो बिन्दुओं को जोडनेवाली रेखा नीति है और इसके मार्ग को कर्तव्य कहते हैं। कर्तव्य मार्ग पर नीति-रेखा मानवजीवन की सार्थकता के लक्ष्यतक जाती है। वह रेखा सरल है; अर्थात सरलता ही नीति का मूलतत्त्व (Basic ethical concept) है। अच्छा-बुरा (good or bad) या शिव-अशिव और सही-गलत ( right - wrong) की चर्चा करते हुए पाश्चात्यों ने नीति के अंतिम मानदण्ड (Ultimate moral standard) के सन्दर्भ में विभिन्न सिद्धान्तों की चर्चा की है। ये सिद्धान्त प्रधानतः दो भागों में विभक्त हैं। नियमों का आदर्श (Legal theories) और उपयुक्ततावादी आदर्श (Teleological theories)। नियमों का आदर्श बाह्य या अंतर्गत नियमों को ही नीति के अंतिम मानदण्ड के रूप में स्वीकार करता है तथा सही (right) और नियमों (laws) पर उसका विशेष बल रहता है।२ उपयुक्ततावादी सिद्धिान्त शिवत्व (good) पर अधिक बल देता है और सुख़द फलदायी तथा "अच्छा" ही नीति का मानदण्ड माना जाता है। उसके अंतर्गत तीन उपसिद्धान्त आते हैं। आनन्दवाद (Hedonism), हेतुवाद ( Rationalism) ₹. Ethics may be defined as the study of what is right or good in conduct. -Manual of Ethics, P. 1. R. According to legal theories, a law, either external or internal, is the ultimate moral standard. -Manual of of Ethics, P. 113.
Page 250
२२४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
और पूर्णतावाद (Perfectionalism)१। आनन्दवाद मानवीय इच्छाओं की आनन्दमय तृप्ति में विश्वास करता है। ऐन्द्रिय स्व के सुख और संतोष को नैतिकता का अंतिम मानदण्ड मानता है। मनुष्य नित्य ही अपनी इच्छाओं की परिपूर्ति के लिये प्रयत्नशील रहता है। इच्छापूर्ति से वह सुखी बनता है। इस मत के अंतर्गत मनोवैज्ञानिक आनन्दवाद (Psychological Hedonism), नैतिक आनन्दवाद (Ethical Hedonism), अहंवादी आनंदवाद (Egoistic Hedonism) और सार्वभौमिक आनन्दवाद (Universalistic Hedonism) आते हैं। मूल्यवाद ऐन्द्रिय स्व का दमन कर के विशुद्ध रूप में हेतुप्रधान 'स्व' का साक्षात्कार करना नैतिकता की अंतिम कसौटी मानता है। पूंर्णत्व का आदर्श स्व का पूर्णत्व अथवा संपूर्ण स्व का साक्षात्कार ऐन्द्रिय संवेगों और इच्छाओं के द्वारा होना ही नैतिकता क अंतिम मानदण्ड मानता है। नीतिशास्त्रान्तर्गत विभिन्न सिद्धान्तों पर विचार करने से पता चलता है कि नीति के मूल में सुखप्राप्ति, पूर्णत्वप्राप्ति, इच्छाओं की सफलता, आनन्दप्राप्ति और अपने उद्देश्य की परिपूर्ति का हेतु रहा है। नीति के पालन में व्यक्तिगत सुख की अपेक्षा समाजकल्याण और सामाजिक हितरक्षा का भाव विशेष है। व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन की परस्पर सार्थकता का आदर्श नीति उपस्थित करती है। साथ ही अन्य मूल्यों के साथ नैतिक औचित्य की महत्ता मानवजीवन में अधिक रहती है। नीतियुक्त आचरण और व्यावहारिक प्रसंगों में नैतिक औचित्य विभिन्न प्रकार से परिलक्षित होता है यथा, गुणौचित्य, कमौचित्य, स्वभावौचित्य आदि। प्रत्यक्षतः नैतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति की धारा तीन प्रवाहों में बहती हुई प्रतीत होती है। वर्णाश्रमधर्म युक्त नीतिनियमों का पालन सूक्तियों के रूप में धर्म का रूप लेता है। जीवनादर्श (ideals) की उपलब्धि में वैचारिक प्रतिक्रिया शास्त्र बनती है और भावनात्मक स्तरपर नैतिक तत्त्व ही काव्य में अभिव्यक्त होते हैं।
. Hedonism regards pleasure and gratification of the sensuous Self as the ultimate moral standard. It regards the realization of the purely rational self by suppressing the sensuous Self as the ultimate moral standard. Perfection regards the perfection of the Self or realisation of the complete or total Self by regulating the sensuous impulse and desires with the help of reason as the ultimate moral standard. -Manual of Ethics, P. 113.
Page 251
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २२५
सारे नीतिनियम समाज और मानव के परस्पर आदानप्रदान की प्रक्रिया के फलस्वरूप ही बने हैं, जिनका पूर्वरूप नियम या रूढि मात्र था। जीवन एवं समाज की स्थितियाँ बदलने के कारण समाज में मान्य कुछ नियम भी परिवर्तित हो जाते हैं और साथ ही कुछ संस्कारों के रूप में स्थिर हो जाते हैं तथा कवि और अन्य लोगों को प्रभावित करते रहते हैं। समाजपरिवर्तन के साथ साधारण नीतिनियमों में अंतर अवश्य आता है, पर कुछ पक्के बने संस्कारों में अधिक अन्तर नहीं आता। नीतिशास्त्र के अनुसार नीति के नियमों को अपरिवर्तनशील माना गया है। उनका पालन कभी-कभी नहीं किया जाता। यह बहुत संभव है कि नीति के विशेष नियम जीवन की किसी मिन्न स्थिति में भिन्नत्व रखेंगे परंतु सामान्यतः उनके स्थूल नियम सार्वत्रिक ही होते हैं। नीति के मूल में स्थित "शिव" तत्त्व की स्वीकृति तो सर्वमान्य है। प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, सत्य, क्षमादि गुण (virtues) भी शाश्वत हैं पर इन विभिन्न गुणों, धर्मों और आदर्शों का सन्दर्भ बदल जाने से उनके व्यावहारिक मूल्य में अंतर आ जाता है। नीति की इस परिवर्तनशीलता, सन्दर्भसापेक्षता और युगप्रभाविता के कारण ही उसे सार्वकालिक या शाश्वत नीति और परिवर्तनशील या समकालिक नीति में विभाजित करना पडता है। समकालिक नीति अधिक परिवर्तनशील हो सकती है और वही व्यवहार में नैतिक औचित्य का रूप ग्रहण करती है। नैतिक औचित्य काव्यप्रसंगों की स्थिति पर निर्भर करता है और वहाँ अनौचित्य होने पर रसाास की स्थिति उपस्थित होती है। नैतिक आचित्य की कल्पना-धारणाओंमें काल, युग, समाज और सन्दभसापेक्षता के कारण अंतर आ जाता है। देवर-भाभी के परम्परागत आचार-नियमों का उल्लंघन आज एकदम अनौचित्यपूर्ण एवं अनैतिक बन जाता है पर संभवतः अतिप्राचीन काल में नहीं था। ऋग्वेदकालीन भाई-बहन के सम्बन्ध यमयमी के प्रसंग से व्यक्त होते हैं, वे आज सर्वथा अनैतिक माने जाते हैं। जूर में अपनी पत्नी को बेच डालना किसी काल में नैतिकता से पूर्ण रहा हो, पर आज सर्वथा अनैतिक माना जायेगा। नैतिकता की धारणाएँ युगीन प्रभाव तथा समकालीन सामाजिक स्थिति की अनुकूलता में प्रचलित रहीं और समय-समय पर परिवर्तित होती रहीं। नैतिक औचित्य-अनौचित्य के निर्णय के लिए समकालीन सामयिक प्रभाव एवं प्रसंगविशेष का संदर्भ महत्त्वपूर्ण होता है। अतः नीति-अनीति की कल्पनाओं की परिवर्तन शीलता का रसास्वाद से निकट सम्बन्ध है। रसभास के नैतिक आधार का संकेत तो प्राचीन आचार्यों के विवेचन में मिलता है परंतु उसका स्पष्टतः उल्लेख डॉ. आनन्दप्रसाद दीक्षित ने अपने ग्रंथ में किया है।१
१. रससिद्धान्त : स्वरूप-विक्केत्रण, पृ. २३६ रस ... १५
Page 252
२२६ रससिद्धान्त का सामानिक मूल्यांकन
नैतिक औचित्य-अनौचित्य की दृष्टि से प्राचीन काव्यप्रसंगों पर कई प्रश्न उपस्थित होते हैं। किसी प्राचीन काव्यप्रसंग में अभिव्यक्त नैतिक तत्त्वों के औचित्य-अनौचित्य की चर्चा आज के नैतिक मानदण्डों की कसौटी पर करना अनुचित होगा। आज का नवीन बोध-संस्कारयुक्त पाठक यदि कोई प्राचीन काव्यप्रसंग पढ़ता है तो नवीन युग-बोध, परिवर्तित नैतिक मानदण्डों एवं औचित्य-अनौचित्य के संकेतों से विपरीत अंकन उसमें वह पाता है। ऐसे स्थानों पर यदि वह अपनी इस नवीन बोधपरक दृष्टि से उसका रसास्वाद करेगा तो अवश्य ही रसाभास की स्थिति उत्पन्न होगी और यदि इस प्रकार की स्थिति उत्पन्न होती है तो सारा-का-सारा प्राचीन काव्य ही रसाभासा- त्मक, अनैतिक, अनुचित एवं त्याज्य ठहर जायेगा। यह स्थिति उचित नहीं है। वस्तुतः हर समय प्राचीन काव्य पढ़ते समय रसाभास की स्थिति उत्पन्न नहीं होती इसका प्रधान कारण पाठक या सहृदय की आस्वादन-प्रक्रिया से जुडा हुआ है। प्राचीन काव्यप्रसंग पढ़ते हुए पाठक के सम्मुख दो दृष्टियाँ हो सकती हैं। एक यह कि उस पूरे काव्यप्रसंग, उसमें अंकित भावों, विचारों आदि को तत्कालीन परिवेश तथा सन्दर्भ-विशेष की सापेक्षता में ही पढ़ा जाय। उस युग एवं स्थान की संगति में उसका आस्वाद करने पर ही रसात्मक बोध सफलता से प्राप्त हो सकता है। रामद्वारा सीतात्याग की प्राचीन घटना आज गलत एवं अन्यायकारी कही जा सकती है और उस प्रसंग पर रसात्मक बोध में कुछ अनुचितता का एहसास उत्पन्न होकर वह प्रसंग रसाभास उत्पन्न कर सकता है। उस करुण रसमय प्रसंग पर इस नवीन बोधपरक एहसारु से क्रोध उत्पन्न हो सकता है। उस सन्दर्भ-विशेष में युगीन संकेतों एवं आदशों से विच्छिन्न रखकर काव्यप्रसंग रसास्वाद किया जाने पर रसाभास का अनुभव हो सकता है। अतः किसी भी काव्यप्रसंग को युगविशेष और सन्दर्भविशेष में रखकर ही देखना उचित होता है। रसास्वाद में पाठक की दूसरी दृष्टि नितान्त भिन्न एवं व्याक्तिगत होती है। वह काव्यप्रसंगविशेष को उस काल, स्थल या सन्दर्भ से विच्छिन्न करके आज के संदर्भों में देखता है। यहाँ पर काव्यगत मूल्य की अपेक्षा सामाजिक मूल्य अधिक प्रभावी हो जाता है। परिणामस्वरूप पाठक को बहुत बार रसास्वाद में खटकनेवाली अनुचित, अनैतिक बातें उपस्थित-सी लगती हैं, जिससे रसाभास की स्थिति उत्पन्न होती है। सन्दर्भविशेष में देखना और सामयिक बोध से संपन्न होना ये दो स्थितियाँ भिन्न होते हुए भी पाठक में हो सकती हैं। यदि पाठक नवीन बोध-संस्कारसंपन्न नहीं होगा तो आधुनिक काव्यगत प्रसंगों के आस्वादन में वही स्थिति उत्पन्न होगी जो पुराने प्रसंगों के संदर्भ में नवीन संस्कारयुक्त पाठक की हो सकती है। इस समस्या को सुलझाने का मार्ग एक ही है कि कलागत या काव्यगत युग, स्थिति एवं सन्दर्भ की सापेक्षता में रसानुभूति करना। ऐसे कतिपय प्रसंग एवं स्थल प्राचीन काव्य में
Page 253
रसाभास का [सामाजिक मूल्यांकन २२७
हो सकते हैं, जिन पर आज आपत्ति उठाई जा सकती हैं, फिर[भी ऐसे काव्य का रसास्वाद इसीलिए सम्भव होता है कि उस काव्य प्रसंग को पढ़ते समय कुछ क्षणों के- लिए ही क्यों न हो, पाठक उस कलाकृति में व्यक्त परिवेश में पहुँच जाता है और उसकी सापेक्षता में उसे अनौचित्य की प्रतीति नहीं होती। फिर वहाँ रसाभास का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। किंतु दूसरे प्रकार के पाठकों के लिए अधिकांश प्राचीन काव्य रसाभासात्मक ही होगा।
श्लीलता-अश्लीलता का प्रश्न भी इसी प्रकार की सापेक्षता रखता है। इन कल्पनाओं पर युग और समाज का प्रभाव अत्यधिक होता है। समाज में या रंगमच पर मुक्त रूप से चुम्बनालिंगनादि क्रियाएँ मारतीय समाज में अश्लील एवं अनैतिक मानी जाती हैं, परंतु पाश्चात्यों में नहीं। शराब पीने जैसी बातें भारतीयों ने निषिद्ध मानीं, पाश्चात्यों ने नहीं। विदेशियों में पुरुषों के लिए ही नहीं, स्त्रियों के लिए भी व्यवहारो- पचार (manners) के अन्तर्गत उनको स्थान है। वहाँ की जलवायु, स्थिति और पर्यावरण के साथ ही सामाजिक मान्यताएँ हमसे मिन्न होती हैं और इसी सन्दर्भ में उसकी अधिक महत्ता होती है।
श्लीलता-अश्लीलता का सम्बन्ध नैतिकता से ही नहीं, अन्य कुछ तत्वों से भी है। कबीर की नायिका की सेजमिलन की बात अनैतिक और अश्लील कैसे हो सकती हैं ? सूर के मुरली और श्रीकृष्ण शंगार के पद या वृक्षलतामिलन का शृंगारिक रूप अश्लील नहीं माना जा सकता। अतः वह वर्णन जिस सन्दर्भ में किया गया है, उस का विशेष स्मरण इस विचार में रखना पड़ता है। विशेष रूप से समय युग, स्थान (देश), संस्कृतिभिन्नता, सुरुचि और काव्यगत सन्दर्भ में ये बातें इस विषय से सम्बन्ध रखती है।
श्लीलता-अश्लीलता की कल्पनाएँ युगानुसार बदलती रहती हैं। प्राचीन काल, मध्यकाल और आधुनिक काल में स्त्री-पुरुष के सम्बन्धों का काव्य में जो चित्रण हुआ है उस पर समकालीन स्थिति का प्रभाव अवश्यमेव है। नैतिकता, शिष्टता, लोकाचार, पावित्र्य-अपावित्र्यादि की कल्पनाओं में पीढ़ियों के अन्तर आने के कारण अश्लीलता की कल्पना में भी अन्तर आता है। स्थानभेद से संस्कृति में भिन्नत्व आता है। पाश्चात्यों में चुम्बनादि, अर्धनग्नता एवं स्त्री-पुरुष का मुक्त व्यवहार आदि में किसी प्रकार की अशिष्टता एवं भद्दापन प्रतीत नहीं होता, जहाँ भारतीय संस्कृति उसे निषिद्ध मानती है। कपडे, फॅशन्स, जीवनपद्धति, शिष्टाचार के नियम, आदर्श, व्यवहार की कल्पनाएँ आदि के विषय में स्थानमेद से जो अन्तर आता है, वह वस्तुतः समाज और संस्कृति से सम्बन्ध रखता है। डॉ. हरदेव बाहरी श्ीलता-अश्लीलता को सुरुचि और संस्कृति का प्रश्न मानते
Page 254
२२८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन हैं, नैतिकता का नहीं।9 सांस्कृतिक स्तर पर ही विशेष रूप से सुरुचि का विकास होता है। संस्कृति ही मानव को पशुत्व से ऊपर उठाकर, पाशविकता के अंशों को दूर करके बुद्धि, इच्छा आदि पर संस्कार करके उसका मानसिक पक्ष सबल करती है। अतः सांस्कृतिक स्तर मेद के कारण ही श्लीलता की कल्पना में भिन्नत्व उत्पन्न होता है। आयु-भेद के कारण भी श्लीलता के मानदण्ड बदलते हैं। बड़े-बूढ़ों या बच्चों की रुचि आदि में भिन्नता होती है। आयुवृद्धि के साथ परिपक्वता (maturity) आती है और उसका प्रभाव संस्कार पर होता है। सुरुचिसम्पन्नता संस्कार और शिक्षा से उत्पन्न होती है। ग्रामीण-नागरी, शिक्षित-अशिक्षित समाज के शिष्ट -अशिष्ट संस्कारों के कारण वाणी भाषा और भाषाभिव्यक्ति में अन्तर आता है। परंतु वस्तुतः कलात्मकता ही साहित्य या कला की श्लीलता-अश्लीलता की प्रधान एवं सर्वोच्च कसौटी मानी जा सकती है। अतः कलात्मक (Aesthetic) स्तर पर पहुँचकर अभिव्यक्त अनुभूति में अश्लीलता का प्रश्न उपस्थित नहीं होता। विवाह के पश्चात् लडकी के ससुराल जाने के समय बिदाई का प्रसंग, माँ-बाप का दुःख, "अर्थोऽहि कन्या परकीय एव " कहकर पिता का मूक रोदन, अन्य सारे व्यक्तियों द्वारा भारी हृदय से उसे बिदा करना आदि पूरे प्रसंगों की उचित अभिव्यक्ति भारतीय रंगमंच पर काव्य में सार्थकता एवं रसमयता रखती है। पाश्चात्यों के लिए वही अनुभूति बिलकुल पराई होने के कारण रसोत्कट नहीं बन सकती। ऐसा दृश्य मंच पर प्रस्तुत होता देखकर भारतीय संस्कारसम्पन्न व्यक्ति रसोत्कटता का अनुभव करेगा। परंतु उसे यदि कोई योरोपीय देखे या योरोपीय संस्कारबद्ध कोई भारतीय देखे (जैसे ईसाई), तो रसास्वाद में अवश्य ही अन्तर आयेगा। उस प्रसंगविशेष के साथ जुड़ हुए संस्कारों एवं भावात्मक संकेतों से अपरिचित होनेके कारण उनको रसात्मक अनुभव नहीं हो सकता। अतः रसात्मक बोध में संस्कार की विशेष महत्ता होती है। परिवर्तित समाजस्थिति एवं मानवजीवन के कारण पुराने नीतिनियमों, सिद्धान्तों और नैतिक औचित्य की कल्पनाओं को उसी रूप में स्वीकार करना कठिन हो जाता है। वर्ण, जाति आदि भेदों पर आधारित मध्यकालीन समाजरचना की संकीर्णता ने समाज में एक दरार-सी उत्पन्न की थी। अधमपात्र, हीन या शूद्र, चाण्डालादि पात्रों में रतिव्यंजना अनुचित मानी गई। इसका कारण तत्कालीन कुलीनता का आदर्श एवं उच्चता की ओर उनका विशेष रूख है। आज मानवीय समानता का युग है। आज का स्वतंत्र व्यक्ति पूछ सकता है कि क्या अधमपात्र को प्रेम करने का अधिकार नहीं है? क्या उसमें भी वे भावनाएँ और सहज प्रवृत्तियाँ नहीं १. भालोचना १७-१९५६
Page 255
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २२९
होतीं ? केवल बाह्य भेदों के आधार पर मिन्नत्व या विषमता को आज सर्वथा त्याज्य एवं गर्हणीय माना जाता है। जाति-विघटन के इस काल में जाति, वर्ग, स्तर आदि की गरिमा को महत्ता देनेवाला व्यक्ति दकियानुसी कहलाएगा। अतः आज काव्य में औचित्य की मर्यादा के लिये जाति, वर्ण आदि का प्रश्न उपस्थित नहीं हो सकता। प्राचीन काल में साहित्यचित्रण में आदर्श एवं उच्चता पर विशेष बल था। उच्चता और कुलीनता का आधार स्पष्टतः वर्णविभाजन था। अतः आचार्यों ने ऐसी कल्पनाएँ कीं और काव्य में तत्कालीन कुलीनता एवं उच्चता के आदर्श के विपरीत वर्णन त्याज्य एवं रसाभास के कारण माने। आज समता एवं स्वातंत्र्य के युग में इन बातों में विश्वास नहीं किया जा सकता। वस्तुतः ओचित्य तो केवल मनोवैज्ञानिक तथ्य की माँग करता है। यदि एक उच्च वर्णीय और निम्नवर्णीय पात्र में परम्पर रति व्यंजित है तो ठीक है। एक इसमें कुछ अनौचित्य नहीं है, परंतु दोनों मानसिक और बद्धिक स्तर तथा चारित्रिक उच्चता में समान हों। शंगार को उत्तम प्रकृति मानने में आचार्यों ने जाति और वर्ण के अनुसार परिष्कृति की ओर संकेत किया है और उस जमाने में कुलीनता उच्च वर्ग में ही होती थी। अधमपात्रगत रति के प्रदर्शन से यदि ग्राभ्यता, अशिष्टता के साथ ही गोपनीयता का अभाव भी उत्पन्न होता है तो वह प्रसंग अश्लील या अनुचित प्रतीत होकर रसामास उत्पन्न करेगा। परंतु अधमता की कल्पना युगानुसार बदलती है। इस विषय में दो दृष्टियाँ हो सकती हैं। एक पक्ष प्राचीन आदर्शों को स्वीकार कर रसास्वाद में ऐसे नये प्रसंगों पर आपत्ति उठायेगा और वहाँ रसाभास अनुभव करेगा। परंतु दूसरा पक्ष उस प्रसंगविशेष को उसी पृष्ठभूमि पर परखते हुए औचित्य-अनौचित्य का निर्णय करेगा। पौराणिक या ऐतिहासिक कुछ प्रसंग व्यक्ति एवं उनके कार्य उस काल के नैतिक आदर्श के रूप में स्थापित होकर संस्कृति का महान भाग ही बन जाते हैं, परंतु युगसापेक्षता में परिवर्तित जीवनस्थिति एवं सामाजिक मूल्यों के अनुसार उन नैतिक आदशों एवं व्यक्तियों के कार्यों पर आपत्ति उठायी जाती है और शंकाएँ उपस्थित की जाती हैं। अतः आज की दृष्टि में प्राचीन आदर्शो, प्रसंगों एवं व्यक्तियों के कार्यो को देखने में एक प्रकार का खतरा है, जिससे साधारणीकरण भी नहीं हो सकता और रसास्वाद भी नहीं। अतः उन प्राचीन चरित्रों के कार्य एवं आदशों को आज की नैतिक कसौटी पर, मनोवैज्ञानिक एवं सामाजिक धरातल पर अनुचित प्रमाणित करना उनके साथ अन्याय करना होगा। आज व्यक्तित्व के नये पहलू के दिग्दर्शन की अभिलाषा उत्पन्न हुई है, तथा नववाद से प्ररित होकर किसी प्रसंग या व्यक्ति के पुनर्मूल्यांकन के नूतन प्रयत्न हो रहे हैं। व्यक्तित्व के किसी नये पहलू का उद्घाटन करने तथा पारम्परिक चरित्र को नितान्त विपरीत रूप में
Page 256
२३० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
प्रतिष्ठित करने का यत्न है। इस स्थिति में प्राचीन आदर्श एवं पूर्वग्रह को लेकर इस नई सर्जना की परीक्षा करना उतना ही खतरनाक होगा, जितना आज के नैतिक निकषों पर प्राचीन कृतियों ओर प्रसंगों की उचितता-अनुचितता का निर्णयकरना। परंतु नैतिक मूल्यों एवं औचित्य के सिद्धान्तों की पर्याप्त चर्चा करने के उपरान्त भी रसाभास के सन्दर्भ में एक प्रधान समस्या समक्ष आती है कि काव्यास्वाद में व्याव- हारिक नैतिक मूल्यों एवं सामाजिक आचार के नियमों एवं औचित्य-अनौचित्य का सम्बन्ध हो या न हो ? फिर क्या समाजनियमों तथा नीति-धर्म आदि के बन्धनों में काव्य- साहित्य बन्द रहे ? यह कदापि उचित नहीं हो सकता कि व्यावहारिक नीतिनियमों तथा औचित्य-अनौचित्य की कल्पनाओं का नियंत्रण साहित्य पर रहे। साथही एक बात स्पष्ट है कि साहित्यिक या कलात्मक नीति व्यावहारिक नीति से सर्वथा मिन्नता रखती है। व्यावहारिक नीतिनियमों में जो बात अनैतिक कही जाती है, कदाचित् कलात्मक परिवेश में वह नैतिक हो सकती है। अतएव कलात्मक नीति को व्यावहारिक नीति के निकष पर कसना हानिकारक हो सकता है। व्यावहारिक नीतिनियमों के आधार पर काव्य को कसना उसे संकीर्ण कठघरे बंद करना होगा। नैतिकता एवं व्यावहारिक औचित्य के बंधनों का आतंक साहित्य और कला पर होने के कारण वह अपनी कलात्मकता एवं साहित्यिकता खोकर नीतितत्वों से परिपूर्ण उक्तियाँ या उपदेश मात्र रह जायेगा। तब तो केवल समाजहित ही साहित्य का प्रयोजन बनेगा और फिर सारे उपदेश-ग्रंथों का अन्तर्भाव साहित्य में करना पडेगा। वस्तुतः यह देखा जाता है कि नैतिकता, बोधपरकता एवं उपदेशात्मकता के कारण काव्य में इतिवृत्तात्मकता आ जाती है और रस की हानि तो होती ही है, साथ ही काव्यत्व का भी पूर्णतः हनन हो जाता है। ध्यान रखना होगा कि काव्यसर्जना की प्रक्रिया में यद्यपि कवि-व्यक्तित्व पर नैतिक नीतिनियम अधिक्षेप नहीं कर सकते, परंतु परिवेशगत समसामयिक नैतिक धारणाओं और औचित्य की कल्पनाओं से वह पूर्णतः अछूता एवं अप्रभावित भी नहीं रह सकता। नीति के बन्धनों में पडकर काव्यसर्जना करने के प्रयास में उसकी प्रतिभा कुण्ठित हो जाती है और रसमय काव्य की सृष्टि हो ही नहीं सकती। कवि का संप्रेष्य संपूर्ण काव्य होता है। अपनी समग्र इकाई (totality) लिये वह व्यक्त होता है। काव्य में रसनिष्पत्ति उसकी समग्रता में ही संभव है। अतः व्यावहारिक नैतिक मूल्यों की छाया काव्य में होते हुए भी, उन नैतिक बन्घनों के परे कलात्मक नैतिकता का वह सर्जक होता है और वही कलात्मक नैतिकता और औचित्य कला का वास्तविक निकष बन जाता है। यह समग्रता एवं इकाई कलाकृति में अनुस्यूत है पर रसास्वाद की प्रक्रिया में इसके दो पक्ष विश्लेषित किए जा सकते हैं। काव्य को पढ़ते ही कवि का सम्प्रेष्य, उद्देश्य, कथावस्तु या आशय और साधारण रूप में विषय प्रधानतया पाठक के सम्मुख आता है। वहाँ पात्रों के सन्दर्भ तथा
Page 257
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २३१
कथावस्तु के विषय में पाठक के मन में कुछ पूर्वसंस्कार या पूर्वग्रह बना रहता हैं। ऐसे समय उन पूर्वकल्पनाओं एवं संस्कारों के विपरीत वर्णन आने पर रसात्मक बोध में बाधा आ जाती है। यह बात सत्य होते हुए भी कि विषय, आशय या कथ्य ही कलाकृति का पूर्णत्व नहीं, काव्यास्वाद की प्रक्रिया में पाठक के मन पर प्रथम प्रभाव विषय का ही किसी-न-किसी रूप में होता है। अतः उस आशय के संदर्भ में पाठक की प्रति- क्रिया तुरंत होती है। व्यक्ति पर किसी संस्कृति, परिवेश, युग तथा समाज और धर्मादि के संस्कार होते हैं, नीतिनियमों के संस्कार बने हुए होते हैं और औचित्य की कत्पनाएँ स्थिर बनी हुई होती हैं। अतः उसके मन में इन सबके अनुकूल प्रतिक्रिया होगी और बहुत सम्भव है कि उनके विपरीत वर्णन होने पर रसास्वाद में कुछ खटकेगा और रसाभास का अनुभव होगा। जहाँ विषय या कथावस्तु में कोई पूर्वसंदर्भ नहीं है; पाठक की नैतिक कल्पनाओं को जिस चित्रण से कोई ठेस नहीं पहुँचती, वहाँ यह प्रश्न उपस्थित ही नहीं हो सकता। वहाँ तो केवल रसास्वाद की प्रक्रिया की सफलता कलात्मक नैतिकता और औचित्य की कसौटी पर अवलम्बित होगी।
अपने कथ्य या आशय को कवि किसी विशेष रूप से माषा के माध्यम से अभिव्यक्ति देता है, वही काम अन्य कलाकार अन्य माध्यम से करते हैं। यह कलाकृति का कलापक्ष होता है। कलाकृति या काव्य एक समग्र इकाई है। उसको आशय और अभिव्यक्ति में पूर्णतः विभाजित नहीं किया जा सकता। एक ही काव्यकृति के वे दो समान धरातल पर स्थित आयाम हैं। पाठक को विषय का ज्ञान भले ही काव्यास्वाद के आरम्भ में होता हो, परंतु काव्यास्वाद की प्रक्रिया कवि-अनुभूति को अनुभूत करने में ही होती है। अतः जिस रूप में कवि ने अपने कथ्य को अभिव्यक्त किया है, वही रूपभंगिमा एवं कलात्मकता काव्यास्वाद-प्रक्रिया में प्रमुख हो जाती है। कवि अभिप्रेत आशय के रूपायन से कलात्मक बनी हुई वह कृति पढ़तेसमय पाठक को उस समग्र रूप में औचित्य एवं नैतिकता का अनुभव होता है और वह कृति औचित्यपूर्ण प्रतीत होने पर रसास्वाद में विध्न नहीं आता तथा रसाभास भी उत्पन्न नहीं हो सकता। उस संपूर्ण कलारचना में यदि कलात्मक औचित्य की कहीं कमी प्रतीत होती है तो पाठक के आस्वाद में 'किरकिरी' आती है ओर रसाभास की स्थिति उत्पन्न होती है।
जैसा कि कहा जा चुका है कि कवि किसी उद्देश्य से काव्य में प्राचीन सन्दर्भो या पात्रों को नितान्त नये रूप में, प्राचीनता के विपरीत किसी स्वभाव या चरित्रविशेष के रूप में प्रस्तुत करता हैं। किसी प्रसंगविशेष को अपने हेतु के अनुसार रूप देकर अंकित करता है। यदि ऐसे समय पाठक पूर्वग्रहद्षित दृष्टि से रसास्वाद करने लगे तो उसमें अनुचितता की प्रतीति होकर रस का आभास मात्र होगा। अतः ऐसे स्थलों पर पाठक
Page 258
२३२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
को अधिक सतर्कतापूर्वक एवं पूर्वग्रहरहित दृष्टि से काव्य का आस्वाद करना होगा, अन्यथा आस्वाद की प्रक्रिया में दोष उत्पन्न होने की सम्भावना होगी। कवि ने जिस प्रकार के पात्र की सृष्टि की है, उसमें पारम्परिक नीतिनियमों का उल्लंघन हो सकता है, औचित्य के विपरीत कार्य भी दिखायी दे सकता है क्योंकि निर्मित पात्र कवि या साहित्यकार की अपनी अलग सृष्टि है। इस पात्र या प्रसंग को जिस रूप में कवि उपस्थित करना चाहते हैं, उसके अनुकूल भावादि का अंकन होना स्वाभाविक है और आवश्यक भी। वीर नायक को भय से काँपते हुए दिखाना परम्परा के विपरीत है और काव्य के औचित्यविचार की दृष्टि से सर्वथा अनुचित एवं रसाभास का कारण माना गया है। परंतु यदि कविद्वारा निर्मित पात्र का चरित्र ही ऐसा हो कि वीरता के अतिरिक्त कुछ विशेषताएँ भी कवि उसमें चित्रित करना चाहता है तब उस स्थिति में वीर में कँपकँपी भरना, काव्यगत प्रसंग या वातावरण की सापेक्षता में उचित ही होगा, अनुचित नहीं। अतएव स्पष्ट है कि कलात्मक औचित्य ही रसास्वाद का वास्तविक एवं प्रधान आधार है तथा उसका अभाव रसाभास की स्थिति उत्पन्न करता है।
कवि काव्यगत वीर-नायक की वीरता का वर्णन करते हुए विपक्षी नेता या शत्रु को भी उतना ही वीर चित्रित करता है परंतु उसमें कुटिलता व्यंजित करता है। विपक्षी पात्र का वीर होकर भी कुटिल होना वस्तुतः वीरनायक की परम्परा के शास्त्रीय संकेत के विपरीत है और सामाजिक आदर्श के विरोध में है, फिरभी वहाँ उस विपक्षी के वीरतापूर्ण प्रसंग से रसास्वाद की प्रक्रिया में सहायता मिलती है। रसाभास की स्थिति पाठक के लिये रसास्वाद में अपूर्णता या क्षीणता लानेवाली ही नहीं होती, बल्कि कविद्वारा प्रत्याशित एवं अभिप्रेत रसास्वाद के उत्कट अनुभूति-ग्रहण में सहायक बनती है। शत्रु की अटूट वीरता एवं उसके कुटिलतापूर्ण कार्य से नायक की वीरता चमक उठती है। कलात्मक अनौचित्य कलाकार की भावभंगिमा की अस्पष्टता, अतिवायवीता और कृत्रिमता से उत्पन्न हो सकता है। यदि कथ्यगत अनुभूति कवि द्वारा पूर्णतः अनुभूत नहीं होती है और वह अपनी अनुभूति को वैश्च्विक वस्तुरूप देकर अभिव्यक्त करनेमें यदि सफल नहीं बनता है तो वह आरोपित अनुभूति पाठकों को रसात्मक आस्वाद नहीं दे सकती। इस बात की ओर संकेत करते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, "आरोपित भाव यदि कवि अनुभव नहीं करता, कल्पना द्वारा लाता है, यदि कवि का भाव ही उदासीन है या अनौचित्य ज्ञान के कारण विरक्त है, तो आश्रय के भाव का वह केवल आरोपित या आहार्य रूप में करता है।"१ अतिकाल्पनिकता और अतिवायवीयता आ जानेसे कवि-कल्पना आस्वाद्य नहीं बन
१. रसमीमांसा, पृ. ९१
Page 259
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २३३
सकती। अतिरंजकता और व्यक्तिनिष्टता के कारण भी रसात्मक आस्वाद में पाठक को कुछ खटकता है और रसाभास की स्थिति उत्पन्न होती है। अतः कवि की भावभंगिमा और अभिव्यक्ति का कौशल रसास्वाद में सहायक होता है, अन्यथा कलात्मक अभिव्यक्ति में अनौचित्य आ जाने क कारण रसाभास उत्पन्न होता है। किसी नायक-नायिका के रतिवर्णन में नायक रति प्रदर्शित करता हो पर यदि नायिका उदासीन ही हो तो उस स्थिति में पाठक शगार रस का आस्वाद नहीं कर सकता। वीर पुरुष की वीरता का वर्णन कवि करता हो और प्रतिद्वंद्वी दुर्बल हो या हाथ जोडे बैठा हो, तो पाठक को उक्त प्रसंग में वीर रस की अनुभूति प्राप्त नहीं हो सकती। प्राचीन आचार्यों ने आलम्बनगत क्षीणता या अनौचित्य के रूप में इस कमी को निर्देशित किया हैं। कवि द्वारा चित्रित प्रसंगगत विशेषताओं में विपरीतता आ जानेसे भी रसात्मक बोध में बाघा पहुँच सकती है। प्रेम, भय और आश्चर्य तीनों स्थितियों में मनुष्य में कँप-कँपी उत्पन्न हो सकती है। यदि इस स्थिति के चित्रण में कहीं अभाव या असंगति आ जाय तो अवश्य ही रसाभास की स्थिति उत्पन्न होगी। सामाजिक या व्यावहारिक नीति-अनीति की कल्पनाओं और औचित्य- अनौचित्य के निर्णयों की पृष्ठभूमि में भावी अनिष्टताओं और हानियों से बचने की प्रतृत्ति होती है। काव्यगत या कलात्मक नैतिकता में हानि-लाभ का व्यावहारिक स्तर छूट जाता है और नितान्त कलात्मक स्तरपर निर्णय किया जाता है। कवि अपने कथ्य को वस्तुगत रूप में अभिव्यक्त करके पाठकतक पहुँचाता है। यदि कलाकृतिगत कवि-अनुभूति पाठक की अपनी अनुभूति बन जाने में सक्षम है तो वही कला का वास्तविक निकष है। उस समग्र कलाकृति के अन्तर्गत स्थित औचित्य और नैतिकता ही कलात्मक औचित्य होगा, जो रसास्वाद के लिए अनिवार्यतः आवश्यक है। एक उदाहरण द्वारा इसे अधिक स्पष्ट किया जा सकता है। प्रसाद के "धृवस्वामिनी" नाटक में चन्द्रगुप्त रामगुप्त को मारकर घवस्वामिनी से विवाह करता है। क्या सामाजिक नैतिकता से चन्द्रगुप्त के कार्य की उचितता प्रमाणित हो सकती है ? कदापि नहीं। परंतु काव्यप्रसंग में उसका कार्य कलागत, औचित्य और कलात्मक नैतिकता से पूर्ण है। कलागत नैतिकता देशकालपरिस्थिति की सापेक्षता न रखते हुए, सन्दर्भविशेष की सापेक्षता रखती है। अतएव कलात्मक औचित्य ही रसास्वाद का प्रधान आधार है और वही औचित्य कलाकृति के सन्दर्भ में पाठक की मनस्थिति को अनुकूल तथा प्रतिकूल बनाकर रसास्वाद कराने में सहायक होता है। कलात्मक औचित्य को पाठक की दृष्टि से मनो- वैज्ञानिक ठोस आधार प्राप्त होता है। काव्य पढ़ते समय काव्यगत आशय और अभिव्यक्ति के सन्दर्भ में पाठक की एक विशेष मनस्थिति बनने लगती है और उसमें यदि कलात्मक स्तरपर कोई बात नहीं खटकती है, तो वह रसप्रतीति कर सकता है, अन्यथा नहीं।
Page 260
२३४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
काब्यास्वाद के समय पाठक का निर्वैयक्तिक (impersonal) बनना और व्यक्तिगतता के परे कलात्मक स्तरपर काव्य का आस्वादन करना रसास्वाद में प्रधान माना गया है परंतु स्पष्ट है कि पाठक की आयु, रुचि, संस्कार आदि बातें रसास्वाद में कुछ प्रभाव डालती हैं। छोटा बालक शंगार का आस्वाद नहीं कर सकता अतः उसकी आयु के अनुसार शंगार रसमय काव्य उसके लिए रसाभासमय होगा। कोई गंभीर विद्वान अद्भुत रसानुमूति नहीं कर सकता। एक नास्तिक के लिए भक्तिरस का आस्वाद पूर्णतः प्राप्त नहीं हो सकता। पाठक जब काव्य में सर्वसाधारण व्यावहारिक औचित्य के विपरीत बातें पाता है, तो उसका मन उन्हें स्वीकार करनेके लिए तैयार नहीं रहता। बूढे में रति होना, कायर में वीरता होना मनोविज्ञान की दृष्टि से कुछ असंगत है और अस्वाभाविक भी। अतः यदि काव्यप्रसंग में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अनुचित बातें चित्रित की जाती हैं तो पाठक की मनस्थिति प्रतिकूल बनती है और कुछ खटकने से रसास्वाद में अपूर्णता आती है। मनोविज्ञान से यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि मनुष्य की क्रिया-प्रतिक्रियाओं को कोई प्रेरक (stimulus) आवश्यक होता है। आयुवृद्धि के साथ मानवी भावों का उन्मेष, उसके कारण एवं उसकी प्रतिक्रियाएँ आदि मिन्न होते हैं। वय और समाजगत स्थान (status) के अनुकूल काव्य में वर्णन होनेसे कलात्मक औचित्य की रक्षा होती है, अन्यथा नहीं। उसके विपरीत चित्रण होनेसे अनौचित्य उत्पन्न होता है और रसास्वाद में बाघा उत्पन्न होती है। इतना ही नहीं, वह वर्णन मनुष्य की मानसिक विकृति (mental conflict) और अवमानवीय मनोवैज्ञान का प्रश्न बन जाता है। कवि कान्य में एक अत्यंत सुशीला एवं सहृदया परंतु कुरूप नायिका के वर्णन- द्वारा रति व्यंजित करतें हैं। यहाँ रसास्वाद में पाठक की मनस्थिति कैसी होगी इस पर यदि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार करें तो कहा जा सकता है, मनोविज्ञान से यह बात मान्य है कि प्रेम के आंतरिक स्वरूप, गरिमा एवं महानता को स्वीकार करते हुए भी मनुष्य में रूपाकर्षण का मोह तथा सौदर्य का आकर्षण मूलतः होता है। अतः कुरूपा नायिका का वर्णन पढ़ते समय पाठक को मानसिक ग्लानि या घृणा का अनुभव होता है और उस प्रसंग में वह शंगार रस का अनुभव नहीं कर सकता। काव्यगत पात्रों और प्रसंगों का अनुभव करते समय पाठक का मन यवहार में पायी जानेवाली सामान्य बातों एवं घटनाओं के अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक घरातलपर कार्यशील रहता है। कवि द्वारा उपस्थित पात्रों, घटनाओं और चरित्रों के अनुकूल भावों, विभावों, अनुभावों आदि का चित्रण होना चाहिए, अन्यथा रसाभास की स्थिति उत्पन्न होगी। परंतु पाठक की मनस्थिति अनुकूल होने के लिए फिर वही आधार ग्रहण करना पडेगा जो कवि के कथ्य और अभिव्यक्ति के सन्दर्भ में बताया जा चुका है। कवि परम्परागत निम्न या उपेक्षणीय पात्र को लेकर सर्वथा नये दृष्टिकोण से सर्जना
Page 261
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २३५
करता है, उस समय उस प्राचीन पात्र को नितान्त नया रूप देकर नये व्यक्तित्व में ढालने में कवि की अपनी सर्जकता होती है। कर्ण, एकलव्य, रावण, कुन्ती, कैकेयी ऐसे कतिपय पात्रों को कवि द्वारा नृतनतम रूप में चित्रित किया गया है। वहाँ कवि के प्रधान उद्देश्य को समझना पडेगा। और पूर्वग्रह से रहित नितान्त कलात्मक दृष्टि अपना कर पाठक यदि उसका ग्रहण करेगा तो उसे पढ़नेके उपरान्त पाठक पर उसका अनुकूल परिणाम हो सकता हैं। पाठक उस काव्य को पढ़ना आरम्भ करता है तो प्रथमतः कर्ण या रावण के प्रति उसका पूर्वसंस्कार जागृत होकर रसाभास उत्पन्न होनेकी सम्भावना रहती है। अतः निरपेक्ष वृत्तिसे आस्वादन की महत्ता है। केवल ऐतिहासिक और पुराणकालीन पात्रों के साथ नये सन्दर्भ जोडकर कवि उपस्थित नहीं करते हैं, अपितु कुछ नये पात्र और प्रसंग भी कवि द्वारा उपस्थित किये जाते हैं। जब कवि की उस पात्र के प्रति सहानुभूति होती है तब पाठक को भी संपूर्ण काव्य में अनुकूलत प्रतीत होती है। वस्तुतः सहानुभूतिपर ही रस का आस्वाद अवलम्बित होता है। नायक-नायिका के प्रणयप्रसंग में चित्रित शृंगार के विषय में भी इसका अनुमव पाठक कर सकता है। रावण और सीता में रतिव्यंजना अस्वीकार क्यों है ? वहाँ पाठक की सहानुभूति सीता की ओर होती है। शूर्पणखा और राम के प्रसंग में राम के प्रति श्रद्धा होने के कारण शूर्पणखा घृणा का पात्र बनती है और शृंगार रस के बदले रसाभास का अनुभव होता है। अतः जिस पात्रके प्रति पाठक के मन में अनुकूलता उत्पन्न होती है, उसके अनुसार रस का आस्वाद सुलभ एवं निर्विन्न हो सकता है। एकाघ विदूषक रास्ते में किसी सुन्दरी से प्रेमयाचना करता हो तो वहाँ शृंगार रसके बदले हास्य ही उत्पन्न होगा। अशोकवन में सीता के प्रति रावण की रतिव्यंजना शोक उत्पन्न करता है, शंगार रस नहीं। यहाँ प्रसंगविशेष के सन्दर्भ में पाठक की सहानुभूति सीता की ओर है। अतः उसे भय या त्रास से परिपूर्ण अनुभूति ही होती है। इससे प्रमाणित होता है कि रसाभास का प्रधान आधार काव्यगत सन्दर्भ और उससे उत्पन्न पाठक की सहानुमूति है। कवि के द्वारा निर्मित व्यक्तित्व को कवि के उद्देश्य, रचना कौशल और काव्यगत संदर्भ के साथ परखकर औचित्य का निर्णय करना उचित होगा, अन्यथा विपरीत प्रमाव होकर रसाभास उत्पन्न होगा। इस दिशा में पाठक को अत्यंत सावधानी बरतनी होगी।
कवि द्वारा अभिव्यक्त ऐसे वर्णनों में यदि अभिघात्मक पद्धति का स्वीकार है तो रसास्वाद सरलतम हो सकता है और उसके उद्देश्य को सहज ही समझ सकने के कारण रसाभास की संभावना कम रहती है। परंतु यदि व्यंग्यात्मक ढंग से उसे प्रस्तुत किया गया हो या वक्रतापूर्ण चित्रण हो तो ग्रंथ की समापि के पश्चात् पाठक के मन में अनुकूल माव उत्पन्न होगा। कवि दिनकरजी के "रश्मिरथी" काव्य में पहले सें अंततक कर्ण के चरित्र को अत्यधिक ऊँचा उठाया है और सरलतम ढंग से चित्रित किया
Page 262
२३६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
गया है। कवि का उद्देश्य प्रथम से ही स्पष्ट हो जाता है और काव्य में अंकित कर्ण के व्यक्तित्व की महानता की सापेक्षता में, उस सन्दर्भगत सारे प्रसंग औचित्यपूर्ण एवं नैतिक लगते हैं, यहाँतक कि पाण्डवों के विपक्ष में उसका लड़ना उचित जान पडता है और कहीं रसाभास की स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती। "रावण महाकाव्य" में वैसी ही स्थिति है। फिर कवि की यह जो नितांत नवीन सृष्टि है, वह उसकी अपनी है। उसके पात्र, प्रसंग और सन्दर्भ कला के रूप में समग्र इकाई बन जाते हैं और तब फिर व्याव- हारिक स्तर की नैतिकता या औचित्य छूटकर कलात्मक औचित्य सामने आ जाता है। फिर यदि कोई वीर भय से काँपता है, कायर शूरता दिखाता है, राजा भीख माँगता है तो भी काव्यगत सन्दर्भ की सापेक्षता में वह उचित हो सकता है। उदाहरण के लिए शेक्सपीयर के नाटकों के पात्रों को लिया जा सकता है। मॅकबेथ वीर है, फिर भी खून से लथ पथ हाथोंसहित मयभीत रूप में उसका चित्रण है। आयागो भी वीर सैनिक के रूप में चित्रित है। परम्परा की दृष्टि से देखा जाय तो वीर पुरुष में कुटिलता, छल-कपट होना अनुचित एवं अनैतिक माना गया है। परंतु उस पात्र-विशेष को नाटक के सन्दर्भ में रखकर देखने से उसमें होनेवाली कुटिलता पाठक को नहीं खटकती और वह काव्य प्रसंग प्रभावी एवं उत्कट बन जाता है। उस पात्रविशेष के चरित्रविकास के सन्दर्भ में यदि कुये बातें संगति रखती हैं तो वहाँ अनौचित्य उत्पन्न नहीं होता। हत्या के उपरांत मॅकबेथ के मन में भय उत्पन्न होना, उसके व्यक्तित्व में धब्बा नहीं बल्कि यह व्यावहारिक अनौचित्य कलागत औचित्य बनकर कविद्वारा चित्रित वह व्यक्तित्व सफल एवं रसमय बन जाता है। हॅम्लेट के प्रतिशोधपूर्ण कार्य एवं प्रलाप निंद्य एवं अनुचित प्रमाणित नहीं होते बल्कि उसके काव्यगत चरित्र को उभारने में सहायक होते हैं। अतः वहाँ अनौचित्य उत्पन्न नहीं होता। आज कवियोंद्वारा मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण की दृष्टि से मानव के अंतर्जगत के उद्घाटन का प्रयास किया जाता है। जहाँ चेतन, अवचेतन गत क्रिया-प्रतिक्रियाओं को कभी सीधे ढंग से तो कभी वक्रतापूर्ण तरीके से उद्घाटित किया जाता है, तब वहाँ उसमें कलात्मक औचित्य की ही अपेक्षा रहती है, व्यावहारिक औचित्य की नहीं। अतः उस चरित्रविशेष के सन्दर्भ में वह चित्रण अत्यन्त संगत, स्वाभाविक एवं औचित्यपूर्ण लगता है और रसास्वाद में सहायक होता है। रसाभास के विचार में सामाजिक एवं नैतिक औचित्य-अनौचित्य के विचार के साथ धार्मिक एवं राजनैतिक परिवर्तनशीलता का भी विचार करना आवश्यक हो जाता है। किसी विदेशी शासन के कारण उत्पन्न स्थिति की सापेक्षता में समकालीन काव्य में जो चित्रण होता है, उसके बारे में समसामयिक पाठकों का अनुमव भिन्न होता है। अंग्रेज़ शासनकाल में अंग्रेज़ों की प्रशंसा में लिखा गया काव्य
Page 264
२३८ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
चित्रित होते हैं, वहाँ रसमयता का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। परंतु प्रकृति में चेतनत्व का अमाव होता है फिर भावों की उत्पत्ति, प्रकाशन और रसनिष्पत्ति करनेकी क्षमता उसमें कैसे आ सकती है? जब काव्य में प्रकृति को रूपक या अन्योक्ति के सहारे मानवीकरण के रूप में चित्रित किया जाय, तब उसमें पर्याप् चेतनता, सेंद्रियता और संवेदनक्षमता उत्पन्न हो सकती है। अर्थात् यह कवि के कौशलपर निर्भर रहेगा। काव्य एक प्रकार की पुनःसृष्टि है, जो कवि की सर्जनात्मक क्षमता की उपज होती है। यदि कवि प्रकृति को भावुक, कार्यशील (active) और प्रभावी बनाने में सफल होता है तो साधारणीकरण के लिए भी कठिनाई पैदा नहीं हो सकती और काव्यास्वाद में भी बाधा उत्पन्न नहीं हो सकती। मेघदूत में मेघ को दूत के रूप में व्यंजित करके जो रसात्मक काव्यसर्जन कालिदास ने किया है क्या उसकी प्रभाविता एवं रसात्मकता पर कोई आपत्ति उठा सकता है ? निराला की "जूही की कली" में संयोग शृंगार की इतनी उत्कट व्यंजना है कि पाठक उसका आस्वाद करते हुए उसे किसी प्रकार अनुचित नहीं मानता। कवि अन्योक्ति, रूपक आदि के सहारे, ध्वन्यात्मकता के द्वारा रसात्मक सफल अभिव्यक्ति करता है। जब प्रकृति में रति आदि मावों की व्यंजना होती है, तब उसके रसास्वाद में पाठक को प्रकृतिगत भावों का आस्वादन नहीं करते, बल्कि उनके माध्यम से मानव के भावों और अनुभूतियों का संस्पर्श उनको होता है। प्रकृति वहाँ साधन मात्र बन नाती है, पाठक को अन्ततः प्रतीति मानवीय भावों की ही होती है। ऐसी स्थिति में रसाभास ही उत्पन्न होता है। परंतु जहाँ कवि की सर्जनाशक्ति ने रूपक, अन्योक्तिद्वारा प्रकृति को ही रसात्मकता बोधतक पहुँचाया है, वहाँ रसाभास की स्थिति उत्पन्न नहीं हो सकती। उस स्थिति में रसात्मक बोध संभव है। पशुपक्षियों की भी ऐसी कतिपय कहानियाँ हैं, जो उनके वास्तविक जीवन का परिचय कराती हैं। उनके द्वारा मानवसदश भावभावनाओं, वासनाओं से युक्त जीवन का परिचय होता है। पशुजीवन की रति आदि की अभिव्यक्ति काव्यास्वाद में बाधक माननेका कारण यह हो सकता है कि उनमें भावप्रकाशन का अभाव, बुद्धिमत्ता की अक्षमता, और शिष्टता एवं संस्कार की सर्वथा कमी रहती है। परंतु आधुनिक काल में तो यह बात प्रमाणित हो चुकी है कि हास्य एवं विस्मयादि के अतिरिक्त अन्य सारे भावों का उदय एवं अभिव्यक्ति पशुपक्षियों में संभव है। चकवाचकवी, चातक, हंस, चेतक, शेर आदि को प्राचीन कवियों ने उद्दीपक रूप में ग्रहण किया था। परंतु आज काव्य में वे आश्रय-आलम्बन बन गये हैं। आज न वे मानवजीवन की अनुभृतियों का संकेत मात्र करानेमें सहायक हैं, बल्कि स्वयं वीरता, मय, प्रेम, क्रोध
Page 265
रसाभास का सामाजिक मूल्यांकन २३९
आदि कई भावों का प्रभावपूर्ण, उत्कट तथा हृद्य दर्शन कराते हैं। शिकारकथाएँ तथा पशुजगत से सम्बन्धित अन्य कथाएँ (जैसे मृग, सिंह आदि के परिवारगत सम्बन्धों की कथाएँ) मानवजीवन का प्रतीक ही नहीं बनतीं, बल्कि उनके मनोभावों को साहित्य के स्तरपर उपस्थित करती हैं। ऐसी कथाओं एवं वर्णनों के प्रति पाठक उदासीन नहीं रहता, भावविभोर होता है। फिर ऐसे वर्णनों से उसे रसानुभव प्राप्त नहीं हो सकता इसका प्रधान कारण यही है कि इन कथाओं द्वारा मानवमन की रति आदि ही व्यक्त होती है, साथ ही पशुपक्षियों में भावाभिव्यक्ति और कार्य की निश्चितता एवं सूक्ष्मता का अभाव रहता है। अतः उन्हें रंगमंचपर प्रस्तुत करना और काव्य में दृश्यात्मक स्वरूप में लाना कठिन होता है। भाव, अनुभावादि की व्यंजना वहाँ कठिन है और कविकौशल से की भी जाय तो अस्पष्ट एवं सूक्ष्म होती है। रसपरिपोष के लिए जिस प्रकार की गहनता की आवश्यकता होती है, उसका अभाव वहाँ होता है। पशुपक्षियों के रतिभाव की अभिव्यक्ति को लक्ष्य करते हुए आचार्य शुक्ल ने लिखा है, "आचार्यों ने तिर्यक्विषयक रतिभाव का जो उल्लेख रसाभास के भीतर किया, उससे यह स्पष्ट लक्षित होता है कि जिस भाव के प्रति कवि या श्रोता का मन उदासीन है, उसको भी रसाभास या। भावाभास के भीतर ही रखना चाहते थे। मृगी के प्रति मृग जिस रति- भाव का अनुभव करता है, वह अनुचित नहीं, बात यह है कि मृगी-रूपी आलम्बन में मनुष्य श्रोता या पाठक अपने दाम्पत्य रति की पूर्ण चरितार्थता का अनुभव नहीं कर सकता। "१ अतएव प्रकृति और पशुओं में व्यंजित रति आदि की योजना कविकौशल से रूपकादि द्वारा होने पर रसामास के अंतर्गत नहीं आती, इसका आधार भी कलात्मक औचित्य ही है। उपर्युक्त विवेचन के आधारपर निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रसाभास का प्रधान आधार नैतिक एवं सामाजिक औचित्य ही है। परंतु सामाजिक नैतिकता से कलात्मक नैतिकता एवं औचित्य भिन्न है तथा रसाभास के संदर्भ में यह सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। काव्य या कलाकृति के आस्वाद में पाठक को खटकनेवाली बातें सामाजिक आदर्श, नैतिकता एवं पूर्वपरम्परागत संकेतों से कुछ सम्बन्ध तो रखती हैं परंतु विशेषतः उनका सम्बन्ध कलात्मक औचित्य से होता है। कलात्मक औचित्य कलाकार या कवि का उद्देश्य और अभिव्यक्ति-कौशलपर निर्भर रहता है। विशेष काव्यप्रसंग के संदर्भ में पाठक के मन की प्रतिक्रिया मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अनुकूल बनती जाती है। उसके मन में किसी पात्रविशेष के प्रति सहानुभूति उत्पन्न होती है और उसक अनुसार रसास्वाद या रसामास की स्थिति उत्पन्न होती है। व्यावहारिक १. रसमीमांसा, पृ. १५२
Page 266
२४० रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन औचित्य की कल्पनाएँ देश, व्यक्ति, संस्कार, और सन्दर्म की सापेक्षता में मिन्नता रखती हैं, पर कलात्मक औचित्य सार्वजनीनता रखता है। कला के सन्दर्भ में औचित्य का निर्वाह रसास्वाद की दृष्टि से प्रधानतम है, अन्यथा रसाभास ही उत्पन्न होता है।
Page 267
उ प सं हा र
समाजशास्त्र (Sociology), समाजमनोविज्ञान (Social Psychology), नीतिशास्त्र (Ethics), दैवतशास्त्र (Mythology), मानववशशास्त्र ( Anthro- pology ) आदि विभिन्न सामाजिक शास्त्रों का मूल उत्स मानव का जीवन है। अतः मानव-जीवन से उनका निकट सम्बन्ध है और मानवसमाज ही उनकी आधारशिला है। इसी कारग रससिद्धान्त का सामाजिक परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकन करनेके इस शोध कार्य में उपर्युक्त शास्त्रों से सहायता ग्रहण करनी पडी। इस मूल्यांकन के फलस्वरूप निष्कर्षतः कुछ बातें उपस्थित होती हैं। कला, शास्त्र, साहित्य और समाज मानवनिर्मित है। मानव का जीवन आनुवं- शिक विशेषताओं के अतिरिक्त पर्यावरण से प्रतिबद्ध होता है। मानवकृत पर्यावरण में समाज सबसे महत्त्वपूर्ण है जो मानवनिर्मित होते हुए भी मानव पर नियंत्रण करता है। अतः मानव और समाज का अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। समाजविरहित मानवजीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। मानवकृत कलासर्जना पर समाज का प्रभाव किसी-न-किसी अंश में पडता ही है। अतः समाज और साहित्य का भी अन्योन्याश्रित सम्बन्ध है। कवि या कलाकार समाज का एक अंग है। उसकी अनुभूति का उससे अपने परिवेश से प्राप्त होना अपरिहार्य है। सामाजिक पर्यावरण के अन्तर्गत राजनीति, धर्म, समाज- व्यवस्था तथा विभिन्न विचारप्रवाहों के फलस्वरूप परिवर्तन आते हैं, जो साहित्य को नित्य ही प्रभावित करते हैं। शास्त्र भी मानव की प्रज्ञा से निर्मित होनेके कारण सामाजिक पर्यावरण से अतीव दूर नहीं हो सकता। इससे सामाजिक दृष्टि का शास्त्रीय सिद्धान्त से सम्बन्ध प्रमाणित हो जाता है। रससिद्धान्त के प्राणाधार मात्र हैं। मनोविज्ञान के अतिरिक्त मानववंशशास्त्र भी भावोन्मेष, भावविकास एवं भावाभिव्यंजना के अध्ययन में उपयुक्त सिद्ध होता है। आदिमानव से आज के मानव तक जीवन-विक्रासयात्रा के अध्ययन के फलस्वरूप रस ... १६
Page 268
२४२ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
प्रमाणित हो जाता है कि मनुप्य को आदिम स्थिति में अकेलेपन का, विकास के प्रथम चरणपर ही द्वैत स्थिति का और तत्पश्चात् विकास के साथ समाज के अभिन्न अंग होनेका अनुभव हुआ। व्यष्टि से समष्टि की ओर मानव जीवन-विकास के साथ उसमें भावों का उदय एवं विकास हुआ। परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ नये- नये भावों का उन्मेष हुआ, पूर्ववर्ती भावों के प्रेरकों (stimulii) में अंतर आया, कुछ भाव फीके पडते गये, कुछ तीव्र हुए। भावों में सम्मिश्रता एवं सूक्ष्मता आती गई। आरम्भ की स्थिति में भय, क्रोध एवं काम स्थूल प्राथमिक रूप में मनुष्य में उदित हुए, परन्तु सभ्यता और संस्कृति, सामाजिक पर्यावरण और मानव के परस्पर सम्पर्क सम्बन्ध के फलस्वरूप मानवजीवन का भावविश्व अधिकाधिक व्यापक एवं परिष्कृत बनता गया। समाजजीवन में अर्जित सौंदर्यदृष्टि, कलात्मक सर्जना एवं धर्मादि आस्थाओं ने उसके भाव जगत् को प्रभावित एवं परिवर्तित किया है। भावोन्मेष, भावविकास एवं भावाभिव्यंजन की प्रक्रिया एवं परिवर्तनशीलता को देखनेपर प्रतीत होता है कि रससूत्र के भाव-विभाव-अनुभावादि की व्याख्या का यह आधार हो सकता है। अष्ट स्थायी भावों की स्वीकृति का प्रधान आधार सामाजिक श्रय है। विभाव, आलम्बन, उद्दीपन को स्थिर मानना और अमुक रस का अमुक विभाव बताना युक्त नहीं; औचित्य ही उसकी वास्तविक कसौटी हो सकती है। रससूत्र की चर्चा का ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करते हुए उसे समकालीन सामाजिक परिप्रेक्ष्य में परखने पर कुछ विशेष तथ्य सामने आये हैं। समकालीन समाज जीवन एवं मानवजीवन की आदर्श दृष्टि इस विकासक्रम में स्पष्ट है। भरतमुनि सुधार- वादी आचार्य थे, परन्तु वैंदिक प्रभाव एवं युगीन प्रमाव और समाजस्थिति की प्रेरणा एवं मान्यताओं का प्रभाव उन पर अवश्य है। गुप्त-हर्षकाल के पश्चात् एकछत्र साम्राज्य की विरासत में प्राप्त दरबारी प्रभाव, सम्पन्न काव्यसाहित्य की उपलब्धि और दार्शनिक मतवादों के विकास के फलस्वरूप काव्यचर्चा दो धाराओं में बही। काव्य की चर्चा अलंकारादि के सन्दर्भ में विशेष हुई और कुछ आचार्य भरत के सूत्र को तार्किक मतवाद से सुलझाने में व्यस्त रहे। अतएव रस का स्थान इस काल में अपेक्षाकृत गौण हुआ, पर रस का विरोध किसीने नहीं किया। वंशीय राजसत्ता, राज्यविघटन और सामन्तवादी समाज में उत्पन्न अराजकता से और दार्शनिक क्रांति के प्रभावस्वरूप तंत्रवादादि की भी अतीवता से तत्कालीन रसचर्चा दार्शनिक मतवाद के आवरण में वेष्टित हुई और ध्वनिसिद्धान्त के सहारे उसे बल मिला। व्यंजना पर विशेष बल देनेसे कावय की महत्ता बढ़ी। समकालीन समग्र रसचर्चा में दार्शनिक प्रभाव एवं आध्या- त्मिकता के कारण सूक्ष्मता आई। नाट्यरस और काव्यरस का मिलनबिंदु और रस की विषयीगत चर्चा का आरम्मस्थल यही है। इसके पश्चात् रससूत्र की व्याख्यात्मक चर्चा के रूा में कई ग्रंथों की निर्मिति होकर रसनिष्पत्ति और रसास्वाद के सूक्ष्मतम विवेचन
Page 269
उपसहार २४३
का आधार दर्शन एवं तर्कशास्त्र बना। मुसलमानों के शासनकाल में भारतीय समाज, धर्म, संस्कृति और साहित्य की अवनति हुई और धर्मसंघर्ष, समन्वय एवं दार्शनिक विकास के फलस्वरूप रसचर्चा की एक धारा राजदरबारों में पण्डितों के द्वारा सम्पन्न हुई और दूसरी समकालीन वैष्णव आंदोलन से सराबोर होकर भक्ति रस से प्लावित हुई। मराठों के तथा अंग्रेजों के शासनकाल में हिन्दी काव्यशास्त्र का उदय एवं विकास हुआ। आधुनिक भारत में नवजागरण, पाश्चात्य प्रभाव एवं सामाजिक स्थित्यन्तर के परिणामस्वरूप रससिद्धान्त को नितांत नूतनतम दृष्टि से परखने की प्रवृत्ति बढी और विभिन्न विद्वानों द्वारा मिन्न-मिन्न दृष्टि से रसचर्चा होती रही। रसचर्चान्तर्गत अध्यात्मपरकता को नकारा गया और नये विचारबोध ने रससिद्धान्त को चुनौती देकर उसकी आवश्यकता पर प्रश्नचिन्ह उपस्थित किया गया। इस सारे परिप्रेक्ष्य में समाज- विकास एवं परिवर्तन की सापेक्षता में रसचर्चा के परिवर्तन द्रष्टव्य है। समसामयिक विदग्ध गोष्ठियों ने काव्यचर्चा एवं रसचर्चा को नित्य ही प्रभावित किया है। अतः नाट्यरस से काव्यरस तक रसचर्चा के प्रमाण को इन गोष्ठियों के विकास की सापेक्षता में परखने पर कुछ तथ्य सामने आते हैं। काव्यगोष्ठियों का स्वरूप प्रारम्भ में संस्थागत ( Institutional) था। परन्तु युग एवं समाज- परिवर्तन के साथ उसमें अधिकाधिक व्यक्तिपरकता आती गई। उसके फलस्वरूप रस- चर्चा समूहवादी वस्तुपरक यथार्थ दृष्टि से हटकर, अध्यात्मपरक, आत्मनिष्ठ, व्यक्तिगत एवं विषयीगत (subjective) बनती गई। नाट्यरस के स्थानपर काव्यरस की चर्चा के प्रतिष्ठान का रहस्य इन कविगोष्ठियों के विकास में प्राप्त होता है। एक अन्य बात इस सन्दर्भ में प्रमाणित हो जाती है कि समकालीन समाजस्थितियों ने रस के आस्वादक की व्यक्तित्वधारणा को अत्यधिक प्रभावित किया। अपने काल की स्थिति के अनुरूप आस्वादक के व्यक्तित्व की धारणा का अंकन आचार्यों द्वारा किया गया। रस का सन्दर्भ नाट्य से हटकर काव्य से स्थापित होनेपर आस्वादक में विशेष गुणों का होना आवश्यक प्रतीत हुआ और उसके व्यक्तित्व की धारणा बदलती गयी। रसचर्चा के रंगमंचपर आस्वादक विभिन्न कालोंमें विभिन्न रूपों एवं भूमिकाओं को धारण करके उप- स्थित हुए। ये भूमिकाएँ क्र्मशः अधिकाधिक सुक्ष्मतम होती, चिन्तनपरकता से परिवेष्टित होती गई। सुमनस प्रेक्षक, प्रमाता प्रेक्षक, सामाजिक, सहृदय रसिक, रसिक योगी, भक्त आदि सभी व्यक्तित्वधारणाओं के अभिधान समकालीन समाज दर्शन, विशेष दृष्टि एवं जीवनबोध का ही प्रतिबिम्ब है। भरतमुनि द्वारा योजित रस के देवता एवं वर्ण के अध्ययन में भारतीय दैवतशास्त्र का आधार लिया गया है। देवता एवं वर्ण की योजना के मूल में भरतमुनि की व्यक्ति- गत सूझ के बावजूद वैदिक प्रभाव एवं देवताओं के व्यक्तित्व के सम्बन्ध में तत्कालीन समाज की मान्य धारणाएँ तथा जीवनादर्श हैं। सृजनत्व एवं उर्वराशक्ति के प्रतीक
Page 270
२४४ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन विष्णु शंगार रस के देवता, राष्ट्रीय वीरत्व का द्योतक इन्द्र वीर रस के देवता, सहारकर्ता के रूप में लाल पीठवाले रुद्र रौद्र के देवता और यम करुण रस के देवता माने गये हैं। शिवजी के विचित्र प्रमथों की हास्य के, विश्वनिर्माता ब्रझ्मा की अद्भुत के, भयावह महाकाल को भयानक के और स्मशानवासी कालदेव की बीभत्स के देवता के रूप में योजन। यथार्थ प्रतीत होती है। इसके अतिरिक्त भरतमुनिपश्चात् आजतक विभिन्न विद्वानों द्वारा इस योजना के खण्डन एवं नूतन प्रस्तावादि के पीछे व्यक्तिगत सूझ, नूननता का आग्रह और देवताविषयक परिवर्तित कल्पनाओं का विशेष हाथ है। वर्णयोजना के पीछे सांस्कृतिक संकेत और रंगों के भावात्मक मूल्य की महत्ता है। रससिद्धान्त की चर्चा में इस प्रश्न की गौणता होते हुए भी रससंख्या की वृद्धि, संकोच तथा प्रधान-गौणत्व का प्रश्न बहुचर्चित है। सामाजिक परिप्रेक्ष्य में इसे परखने पर प्रमाणित होता है कि रससंख्या के निर्धारण एवं मान्यता को पहले से ही समकालीन साहित्यिक उपलब्धि, युगीन सांस्कृतिक प्रभाव, जीवनादर्श एवं सामाजिक भाव (social tone) ने प्रभावित किया है। भरतमुनि द्वारा स्थापित अष्टरसों में तत्कालीन अभिजात जीवन की गहरी छाप है। शान्त और भक्ति को अष्टवर्ग में स्थान न मिलने का कारण बौद्ध धर्म के प्रभावस्वरूप उत्पन्न निवृत्तिपरकता से बचनेका महान प्रयास करनेवाले सुधारवादी एवं ब्राह्मणधर्म के हिमायती भरतमुनि की दृष्टि हैं। तबसे समाजपरिवर्तन के साथ विभिन्न राजनीतिक स्थितियों, धार्मिक क्रांतियों, साहित्यिक चेतनाओं एवं व्यक्तिगत सूझ के कारण विभिन्न रसों की माँग एवं स्थापना की गई। समाजप्रवाह एवं साहित्य में कुछ बचे और अनावश्यक सिद्ध होने पर नष्ट हुए। समाजपरिवर्तन के क्रम में आधुनिक काल में तीव्रतम गति प्राप्त हुई। पूर्ववर्ती रूढियों, विचारप्रवाहों, जीवनदृष्टि, मूल्यों आदि में नये संस्कार होकर समाजजीवन बदलता गया और उसकी सापेक्षता में मानव जीवनमूल्यों एवं नैतिकता-अनैतिकता की कल्पनाओं तथा समाजगत व्यक्तियों के परस्पर सम्बन्धों में भी पहले की अपेक्षा अन्तर आया है। एक हज़ार वर्ष पूर्व अभिजात जीवन के आदर्श एवं मानदण्ड, मध्यकालीन दरबारी जीवन की आधीनता एवं असहायता, अंग्रेजों के शासन में जकड़े हुए व्यक्ति- जीवन की प्रतिबद्धता और स्वतन्त्रता के पश्चात गणतंत्रवादी समाजरचना में वैज्ञानिक युग से बद्ध मानवजीवन का अनुभव, इस सारे जीवनविकास ने संस्कारों, परस्पर सम्बन्धों, संकेतों, मूल्यों एवं व्यक्ति के स्थान (status) में अन्तर उत्पन्न किया है। इन सारी परिवर्तनशील मान्यताओं, परिस्थितियों एवं विश्वासों ने हर युग में व्यक्ति के भावों एवं विकारों एवं साहित्य को भी प्रभावित किया है। हर युग की संवेदना भिन्न रही है। अतः प्रत्येक युग के साहित्य का भी एक विशेष टोन रहा है। संस्कारों के परिवर्तन से तथा संवेदना के अन्तर से साहित्य में एक समाज एवं युग में
Page 271
उपसंहार २४५
विभिन्न कोटि के काव्य द्वारा एक ही प्रकार की अनुभूति व्यक्त हुई अथवा एक काल की एक ही अनुभूति को दो कवियों ने भिन्न प्रकार से व्यक्त किया है। इसी लिए भक्तिकालीन संवेदना से रीतिकालीन संवेदना भिन्न रही। वैज्ञानिक युग में इस पूरे परिवर्तन का क्रम बेहद तेज़ी से बढ़ता रहा। उसने युग के साहित्यशास्त्रीय विचार को प्रभावित किया। इस आमूलाग्र परिवर्तन से आज काव्यास्वाद के नये विभिन्न आयाम उत्पन्न हुए हैं। इस समसामयिकता के संदर्भ में रसास्वाद की स्थिति को सामाजिक परिप्रेक्ष्य में परखने पर रससिद्धान्तगत रसाभास, साधारणीकरण, आनन्दवाद आदि के सन्दर्भ में समसामयिकता और संस्कारों की अधिक महत्ता प्रतीत होती है। रसास्वाद की स्थिति में अन्तर आनेसे ूर्ववर्ती तत्त्वों का पुनःपरीक्षण अनिवार्य हो जाता है। व्यक्ति-व्यक्ति में होनेवाली रूचिभिन्नता, स्थानीय संस्कार, विशिष्ट मनस्थिति, पर्यावरण के भिन्न संस्कार, लिंगभिन्नत्व, आयु आदि के साथ समकालीन समाज एवं युग का संस्कार रसास्वाद की स्थिति में विचारणीय है। रसात्मक बोध की स्थिति को समूह मनोविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में परखने पर कुछ महत्त्वपूर्ण तथ्य प्रकाशित हो जाते हैं। समूह, व्यक्ति और रसात्मक स्थिति नाटक, काव्य का पाठ और मौनपाठ के स्तर पर भिन्न बन जाती है। नाटक के प्रक्षक की भूमिका से रसास्वाद और उसी नाटक का मौनपाठ करते हुए रसास्वाद, मंचीय काव्यपाठ से रस का आस्वाद और उसी काव्य के मौनपाठ से रसास्वाद इन सभी आस्वादप्रक्रियाओं में अन्तर विभिन्न स्थितियों को आन्तरक्रिया (interaction) के स्तर पर परखनेसे प्रमाणित होता है। रसास्वाद की सफलता के लिये नाट्य का प्रयोग, प्रेक्षकगण का अस्तित्व महत्त्वपूर्ण होते हैं, जो भरतमुनि को अपेक्षित है। काव्यपाठ से रसमय काव्य का प्रभाव श्रोताओं पर होता ही है। लय और छन्द का काव्यपाठ में विशेष महत्त्व होता है। नवीन भावबोधसम्पन्न काव्य का पाठ भी सुग्राह्यता उत्पन्न करने में सहायक होता है। भावात्मकता का अंश होने पर लयात्मक काव्यपाठ से श्रोताओं को काव्यानुभूति में अधिक सुलभता एवं सफलता होती है। रस का अभाव होनेपर भी यदि भावसामग्री किसी अंश में उस काव्य में हो तो रस आता है। बुद्धिप्रधान काव्य का पाठ पाठकों के आस्व्ाद में सुकरता उत्पन्न करता है और सुप्त भावात्मक क्षमता व्यक्त करने की सामर्थ्य भी रखता है। साधारणीकरण के सन्दर्भ में भी व्यक्ति-भिन्नता, समाज की परिवर्तनशीलता एवं भाषा के संस्कार को विशेष महत्ता देनी चाहिये। समसामयिक स्थिति में पाठक और कवि की संवेदना में वर्षों का व्यवधान महत्त्वपूर्ण है। काल के परिवर्तन से काव्य के आलम्बन वे ही रहनेपर भी उनके सन्दर्भ बदल जाते हैं। अतः नई संवेदना से युक्त पाठक द्वारा प्राचीन काव्य का आस्वाद और प्राचीन अभिरूचिसंपन्न पाठक द्वारा
Page 272
२४६ रससिद्धान्त का सामाजिक मूल्यांकन
आधुनिक भावबोधयुक्त नूतनतम काव्य का आस्वाद इनमें अन्तर उपस्थित होता है। निष्कर्षतः प्रतीत होता है कि साधारणीकरण में समकालीन संस्कार एवं सामाजिक युगबोध का प्रभाव रहता है। काव्यभाषा संस्कार का महत्त्व इस दृष्टि से अधिक है।
आचार्यों द्वारा स्थापित आनन्दवाद सम्बन्धित संपूर्ण शब्दयोजना पर मध्यकालीन अध्यात्मपरक संस्कार एवं प्रभाव है और चिन्मयानन्द, तन्मयीभवन, तादात्म्य, निर्विकल्प समाधि आदि स्थितियों को आज स्वीकार करना कठिन प्रतीत होता है। व्यक्ति की परिवर्तित संवेदना, अभिव्यक्ति एवं आस्वाद में अन्तर लायी है। नितान्त आनन्द के स्थान पर अन्य कुछ संमिश्र संवेदना काव्य जगाता है। अखण्ड आनन्द की स्थिति आज कैसे सम्मत्र हो सकती है यह भी समस्या है। ब्रह्मानन्द, अलौकिक जैसे विशेषण आनन्द की उच्चतम स्थिति के प्रतीक हैं, जो आज स्वीकार्य नहीं है। फिर भी काव्य के आस्वाद से जो प्राप्त होता है वह मात्र आनन्द नहीं, और कुछ होता है। उसकी व्याख्या करना कठिन है। पर आज कवि का भोगा हुआ क्षण अभि- व्यक्ति पाता है, घुटन, संत्रास, उदासी, उद्वेग आदि सबकुछ नूतनतम ढंग से अभिव्यक्ति पाता है और पाठक को विचलित कर देता है अवश्य। अतः काव्यास्वाद के दो स्तर मानना अधिक उचित होगा। एक रसानुभूति, रसमग्नता या रसविभोशवस्था और दूसरी काव्यानुभूति है। नवीन भावबोधसम्पन्न काव्य से काव्यानुभूति का अनुमव अवश्य होता है। रसाभास के मूल में प्राचीन आचार्यों द्वारा अनोचित्य को प्रधान माना गया है। नैतिक आधार पर रसामास की चर्चा भी आधुनिक विद्वानों ने की है, परन्तु सामाजिक परिप्रेक्ष्य में औचित्य-अनौचित्य, नैतिकता-अनेतिकता की कल्पनाओं का परीक्षण करने से प्रमाणित होता है कि ये तत्त्त् पूर्णतः गतिशील, परिवर्तनशील एवं समाजस्थितिसापेक्ष होते हैं। अतः ये रसाभास के स्थिर मानदण्ड नहीं हो सकते। अनौचित्य की प्राचीन मान्यताएँ आज ढह चुक्ी हैं। नैतिकता को नया सन्दर्भ प्राप्त हुआ है। अतः रसाभास की वे मान्यताएँ अब उपयुक्त नहीं हैं। रसामास का प्रधान आधार सामयिक संस्कार, मनोविज्ञान एवं कलात्मक औचित्य ही माना जा सकता है और नये-पुराने सभी काव्य का रसास्त्राद समसामयिक संदर्भ में ही सफलता से किया जा सकता है, अन्यथा सारा काव्य रसाभासात्मक लगेगा। सामाजिक परिवेश में इन सारी बातों का परीक्षण करनेपर वर्तमान नये काव्य के संदर्भ में रससिद्धान्त मानदण्ड के रूप में अपूर्ण, अधूरा होने का प्रमाण मिलता है। रससूत्र के अनुमार भात्रविभोरवस्था की स्थिति, रस की गहनतम अनुभूति आज संभव नहीं है। कुछ नवकविताओं में भावबोध अमूर्त एवं अस्पष्ट होते हुए भी इतना उत्कट होता है कि पाठकों के मन में भाव जगाने की सामर्थ्य रखता है। मानवजीवन यंत्रयुग
Page 273
उपसंहार २४७
से बद्ध विचारबद्ध एवं बौद्धिक बनता जा रहा है। परन्तु जब तक मानवका मन और चेतना जिन्दा है, भाव स्पर्श खण्डित रूप में ही क्यों न हो होता रहेगा तथा तबतक काव्यत्व नष्ट नहीं हो सकता। और जबतक काव्य का अस्तित्व है, आलोचना की विभिन्न प्रणालियों के बावजूद भविष्य में भावस्पर्श का अन्वेषण बना रहेगा इसमें कोई शंका नहीं है।