Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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साहित्य की सर्जन-प्रक्रिया और रस-सिद्धान्त ३८७

इस प्रकार कवि का 'स्थायी भाव' (केन्द्रीय तत्त्व, विचार, प्रयोजन) 'आलम्बन' से प्रेरित एवं 'उद्दीपन' से उद्दीप्त होकर 'संचारी भाव' के सहयोग से 'अनुभावों' के माध्यम से अप्रत्यक्ष रूप में व्यक्त (व्यंजित) होता है-इसी क्रिया को काव्य-सर्जन या कला-सर्जन प्रक्रिया के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। अस्तु, स्थायी भाव, संचारी भाव, आलम्बन, उद्दीपन, अनुभाव आदि केवल काव्य-वस्तु के घटक तत्त्व और पाठक की आस्वादन-प्रक्रिया के साधक तत्त्व ही नहीं है, अपितु वे स्वयं कवि, कलाकार एवं स्रष्टा की भी अभिव्यक्ति-प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों के सूचक हैं, जिनके आधार पर किसी भी अभिव्यक्ति-प्रक्रिया या सर्जन-प्रक्रिया का तर्क- संगत विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत किया जा सकता है। वसे, आधुनिक मनोविज्ञान व मनोविश्लेषण के आधार पर इन सोपानों का और भी सूक्ष्म विवेचन-विश्लेषण संभव है-किन्तु इसके लिए प्रस्तुत प्रबन्ध में अवकाश नहीं है, अतः यहाँ इतना ही पर्याप्त होगा।

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रस-सिद्धान्त का व्यापक स्वरूप : स्थापनाएँ

अब तक विभिन्न अध्यायों में रस-सिद्धान्त के व्यापक रूप की प्रतिष्ठा का प्रयास करते हुए उसके विभिन्न पक्षों का विवेचन-विश्लेषण अलग-अलग संदर्भों में प्रस्तुत किया गया हैं जिससे उसके विकसित रूप की विभिन्न विशेषताओं का बोध खण्ड- खण्ड रूप में होता है। प्रस्तुत अध्याय में उन सभी विशेषताओं का आकलन करते हुए उन्हें इस प्रकार प्रस्तुत किया जायगा जिससे कि रस-सिद्धान्त के व्यापक रूप का बोध समग्र एवं समन्वित रूप में एक साथ प्राप्त हो सके। किन्तु यहाँ हमारी शैली संकेतात्मक ही रहेगी अर्थात् उसमें पूर्व उपलब्ध निष्कर्षों का संकेत मात्र ही किया जा सकेगा, विस्तृत-निरूपण नहीं-अतः ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि इन संकेतों को सम्यक् रूप में ग्रहण करने के लिए पूर्ववर्ती अध्यायों में निरूपित निष्कर्षों का अध्ययन भली-भाँति कर लिया जाय अन्यथा संभव है कि अनेक निष्कर्ष अस्पष्ट, असंगत एवं अव्यावहारिक प्रतीत हों। सर्व प्रथम हम स्वयं 'रस' शब्द के अर्थ को ही लेते हैं। परम्परागत मतों के अनुसार भरत मुनि ने इसे काव्यगत या कलागत तत्त्व मानते हुए 'आस्वाद्य' पदार्थ माना था, जबकि परवर्ती युग में इसका अर्थ 'आस्वाद्य' से 'आस्वाद' या 'आस्वाद की अनुभूति' हो गया जो अधिक समीचीन है। अस्तु, काव्य के संदर्भ में रस 'काव्यास्वाद की अनुभूति' का पर्याय है तो कला के संदर्भ में इसे 'कलास्वाद की अनुभूति' या संक्षेप में 'कलानुभूति' भी कह सकते हैं। सौन्दर्य-शास्त्र एवं मनोविज्ञान की शब्दावली में 'कलानुभूति' को ही 'सौन्दर्यानुभूति' कहा जाता है-अतः इस दृष्टि से रस=काव्यानुभूति=कलानुभूति=सौन्दर्यानुभूति अर्थात् रस का व्यापक अर्थ 'सौन्दर्यानुभूति' (Aesthetic Experience) सिद्ध होता है।

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काव्य एवं कला के संदर्भ में उनकी अनुभूति अर्थात् सौन्दर्यानुभूति को एक यूनिवर्सल धारणा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है क्योंकि कलागत वस्तु, शैली, प्रक्रिया आदि के सम्बन्ध में विश्व के विभिन्न कला-सिद्धान्तों में परस्पर मत-भेद होते हुए भी सौन्दर्यानूभूति एक ऐसा बिन्दु है, जहाँ आकर सब समन्वित हो जाते हैं; अर्थात् विभिन्न सिद्धान्तों में पारस्परिक मत-भेद इस सौन्दर्यानुभूति के स्वरूप एवं आधार को लेकर है, स्वयं सौन्दर्यातुभूति के अस्तित्व के सम्बन्ध में प्रायः सब में मतक्य है। यह स्थिति लगभग वैसी ही हैं जैसी कि सभी आस्तिकवादी दर्शन ब्रह्म या परमसत्ता के अस्तित्व को तो स्वीकार करते हैं, किन्तु उसके रूप-भेद एवं सृष्टि-सम्बन्धों को लेकर एक-दूसरे का विरोध करते हैं। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि रस की धारणा कला-शास्त्र के मूलाधार (Fundamental) की द्योतक या सूचक है; इसी लिए किसी भी सिद्धान्त का अनुयायी रस या सौन्दर्याुभूति के अस्तित्व का विरोध नहीं करेगा-ऐसा सामान्य रूप में कहा जा सकता है।

सौन्दर्यानुभूति (रस) के स्वरूप एवं आधार को लेकर विभिन्न कला-सिद्धान्तों एवं काव्यशास्त्रीय मतों में परस्पर जो मत-भेद हैं वह निरर्थक एवं निराधार नहीं है; उसके पीछे वास्तविक आधार हैं। यह बात न केवल सौन्दर्यानुभूति पर लागू होती है अपितु विभिन्न क्षेत्रों के प्रत्येक मूलाधार पर लागू होती है क्योंकि मूलाधार विभिन्न वस्तुओं के परस्पर-विरोधी तत्त्वों व लक्षणों के सामान्यीकृत रूप पर आधा- रित होता है. अर्थात् मूलाधार के आधार अपने-आप में एक नहीं होते, वे अनेक होते हैं-ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि मूलाधार से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों एवं तत्त्वों में परस्पर भिन्नता हो। ऐसी स्थिति में सत्य के शोधक के लिए यह आवश्यक है कि वह आधार से सम्बन्धित विभिन्न अंगों, पक्षों व रूपों की अनेकता को स्वीकार करता हुआ मूलाधार की स्थापना में उन सभी का योगदान स्वीकार करे, न कि एक ही अंग, पक्ष, रूप या प्रवृत्ति को लेकर मूलाधार की स्थापना का सारा श्रय उसी को प्रदान कर दे-किन्तु व्यवहार में प्रायः यह देखा जाता है कि विद्वान् एवं बुद्धिमान लोग भी सत्य के एकपक्षीय, एकांगी व एक रूपी बोध को ही निजी मत का का आधार बनाते हुए उसे ही समग्र तत्व के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास करते हैं, जिसके फल स्वरूप दूसरे पक्ष, दूसरे अंग व दूसरे रूप के समर्थकों से उसका विरोध होता हैं। कहा जा सकता है कि यह 'अंध गज-न्याय' की स्थिति है-हाथी की सत्ता सभी स्वीकार करते है किन्तु उसके रूप के सम्बन्ध में विभिन्न व्यक्ति अपने-अपने एकांगी व एकपक्षीय बोध को ही सर्वांगीण एवं सर्वपक्षीय ज्ञान या सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते हैं। परम्परागत काव्य-शास्त्र एवं कलाशास्त्र पर भी यह बात भली-भाँति लागू होती है तथा रस-सिद्धान्त के समर्थक एवं विरोधी भी इसके अपवाद नहीं है-अतः ऐसी स्थिति में सत्य की स्थापना या सत्य के सर्वांगीण बोध के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने ही बोध, ज्ञान व विश्वास को सब कुछ न

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३९० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन मानकर इतर विश्वासों व धारणाओं पर भी तटस्थता पूर्वक विचार करते हुए परस्पर-विरोधी विभिन्न विशेषताओं का समन्वय एवं समीकरण करते हुए उन्हें यथा-शक्ति सर्व सामान्य रूप में प्रतिष्ठित करें-यदि रस-सिद्धान्त की ही शब्दावली में कहें तो उनका निर्विशेषीकरण या साधारणीकरण करें। साहित्य में ही नहीं, विज्ञान में भी सत्य का बोध-तथ्यों के निर्विशेषीकरण या साधारणीकरण द्वारा होता है। वस्तुतः दर्शन की शब्दावली में जो आदर्शीकरण (Idealization) है, साहित्य की शब्दावली में वही साधारणीकरण तथा विज्ञान की शब्दावली में सामान्यीकरण या विज्ञानीकरण की प्रक्रिया है; अतः न केवल रस-सिद्धान्त के लिए अपितु सभी प्रचलित सिद्धान्तों के विज्ञानीकरण के लिए सामान्यीकरण की प्रक्रिया अपेक्षित है। उपयुक्त व्यापक दृष्टि से परम्परागत सिद्धान्तों पर विचार करने से ज्ञात होता है कि रसेतर संप्रदाय भी सौन्दर्यानुभूति (रस) की सत्ता को ही प्रमुख मानते हैं। अलंकारवादियों ने अलंकार का लक्ष्य काव्य में सौन्दर्य, उत्पन्न करना, रीति- वादियों ने शोभा उत्पन्न करना, वक्रोक्तिवादियों ने लावण्य का संचार करना,ध्वनि- वादियों ने चारुत्व प्रदान करना, औचित्यवार्दियों ने काव्य को चारुत्व एव रमणीय बनाना स्वीकार किया है-यह स्वयं उन्हीं की उक्तियों से सिद्ध हो जाता है; ऐसी स्थिति में सौन्दर्य, शोभा, लावण्य, चारुत्व, रुचिकर, रमणीयता-इन सभी शब्दों को सौन्दर्य के ही पर्यायवाची के रूप में ग्रहण करते हुए यह कहा जाय कि काव्यगत या कलागत प्रमुख तत्त्व या उसका सामान्य गुण तो 'सौन्दर्य' ही है, अलंकार, रीति, वक्रोक्ति आदि सब उसके साधन या माध्यम मात्र हैं तो अनुचित न होगा। विस्तृत विवेचन एवं विश्लेषण से यह भली-भाँति प्रमाणित हो जाता है कि ये सभी सिद्धान्त काव्यगत सौन्दर्य की उत्पत्ति के ही विभिन्न साधनों, विधियों एवं प्रकारों का विवेचन-विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं, किन्तु दुर्भाग्य यह है कि इनमें से प्रत्येक स्वयं के द्वारा प्रस्तुत साधन को ही काव्य का साध्य घोषित करता हुआ एक ओर तो स्वयं साध्य की अवमानना करता है और दूसरी ओर अन्य संप्रदायों द्वारा प्रस्तुत साधनों का तिरस्कार करता है; इस प्रकार एक साधन को ही सब साधनों एवं साध्य का भी स्थानापन्न बनाने की दुश्चेष्टा करता है-इससे उनकी मौलिकता एवं तार्किकता का तो परिचय मिलता है किन्तु सत्य की शोध अधूरी, एवं अपूर्ण ही रह जाती है। अब यदि हम इनमें समन्वय स्थापित करते हुए एकांगी मतों का सर्वांगीण रूप देते हुए कहें कि काव्यगत साध्य सौन्दर्य है, जबकि अलंकार, गुण, वक्ता, ध्वनि, औचित्य आदि सब उस साध्य के ही विभिन्न साधन हैं; जिस प्रकार एक स्वादिष्ट व्यंजन अनेक प्रकार के द्रव्यों से बन सकता है, उसी प्रकार काव्यगत सौन्दर्य की भी उत्पत्ति या उद्दीप्ति विभिन्न साधनों से संभव है, यह दूसरी बात है कि कोई साधन अधिक महत्त्वपूर्ण है और कोई कम। इस स्थापना को आगे बढ़ाते हुए कहा जा सकता है-ये सब काव्यगत सौन्दर्य के साधन हैं; तथा काव्यगत सौन्दर्य के

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आस्वादन से पाठक को जो अनुभूति प्राप्त होती है, वही सौन्दर्यानुभूति या रस है। यह एक ऐसा बिन्दु है जहाँ आकर सभी सिद्धान्त रस सिद्धान्त से समन्वित हो जाते हैं। संक्षेप में-अलंकार, गुण, वकता, व्यंजना आदि-सौन्दर्य-सौन्दर्यानुभूति या रस। उपयुक्त सिद्धान्तों के अतिरिक्त पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में भी अनेक और सिद्धान्त प्रचलित हैं जो काव्य में अनुकृति, औदात्य, औचित्य, कल्पना, बिम्ब, प्रतीक आदि को प्रमुखता प्रदान करते हैं, किन्तु उनके विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनमें से कुछ तो काव्य-वस्तु एवं विचार तत्त्व को प्रमुखता देते हैं; जबकि कुछ शैली पक्ष के विभिन्न तत्त्वों की व्याख्या करते हैं; किन्तु विषय-वस्तु का अंतिम लक्ष्य सौन्दर्य के घटक तत्त्वों को प्रस्तुत करना तथा शैली सम्बन्धी तत्त्वों या साधनों का लक्ष्य वस्तु को 'रूप' या सौन्दर्य प्रदान करना है। कोई भी वस्तुगत तत्त्व या शैली का प्रकार अपने आप में महत्त्वपूर्ण नहीं है जब तक कि वह काव्यगत सौन्दर्य का साधन, अंग या माध्यम न बन जाय। अस्तु, इन सिद्धान्तों को भी काव्य सौन्दर्य के साधनों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। पाश्चात्य काव्य-शास्त्र एवं सौन्दर्य-शास्त्र में अनेक ऐसे सिद्धान्त भी उपलब्ध हैं तो काव्यगत सामग्री में भाव तत्त्व को ही प्रमुखता प्रदान करते हुए सारी वस्तु की नियोजना उसी के साधन या अंग-रूप में करने का निर्देश देते हैं या अभिव्यंजना के सभी साधनों व माध्यमों का लक्ष्य भाव की व्यंजना करना बताते हैं-इस वर्ग के सिद्धान्त परम्परागत भारतीय रस-सिद्धान्त के ही समरूप हैं, अतः उन्हें भारतीय शब्दावली में 'रस- सिद्धान्त' (जबकि पश्चिम में वे 'भाव सिद्धान्त' के नाम से प्रसिद्ध हैं) कह सकते हैं। उनके भी अनेक रूप-भावोद्दीप्तिवाद, भावावलम्बनवाद, भावाभिव्यक्तिवाद, भावाभिव्यक्तिवाद, भावप्रेषणवाद आदि-उपलब्ध होते हैं, जिनका विवेचन- विश्लेषण विस्तार से करते हुए अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जहाँ औचित्य व उदात्त सम्बन्धी सिद्धान्त काव्यगत बौद्धिक तत्त्वों को प्रमुखता प्रदान करते हैं वहाँ ये भावात्मक तत्त्वों को महत्त्व देते हैं : इसी प्रकार कुछ सिद्धान्त कल्पनात्मक तत्त्वों (बिम्ब, प्रतीक आदि) को काव्यत्व का आधार घोषित करते हैं। किन्तु इन सबका समन्वय इसी रूप में होता है कि बौद्धिक, भावात्मक, कल्पनात्मक या शैलीगत तत्त्वों के द्वारा काव्य में सौन्दर्य की उद्दीप्ति होती है तथा उसी की अनुभूति रस है। अस्तु, परम्परागत सिद्धान्तों में से कुछ विषय-वस्तु के साधनों की और कुछ शैलीगत साधनों की व्याख्या करते हैं, किन्तु उन सबकी सार्थकता विषय और शैली, वस्तु और रूप के संयोग से 'सौन्दर्य' की उत्पत्ति में ही है, वही उनका साध्य या लक्ष्य है तथा उसी सौन्दर्य की अनुभूति 'रस' है। इस प्रकार परम्परागत सिद्धान्तों से साहित्य के घटक तत्त्वों के रूप में विचारात्मक, भावात्मक, एवं कल्पनात्मक तत्त्वों की सत्ता पर प्रकाश पड़ता है।

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शैली पक्ष के सभी तत्त्व अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, बिम्ब, प्रतीक आदि-भी कल्पना-शक्ति के ही विभिन्न व्यक्त रूपों के सूचक हैं, अतः उनका भी समन्वय कल्पनात्मक तत्त्वों में हो जाता है। अतः कहना चाहिए कि काव्य में तीनों प्रकार के तत्त्वों-विचारात्मक, भावात्मक, कल्पनात्मक-की ही नियोजना से सौन्दर्य की सृष्टि होती है; यह दूसरी बात है कि किसी कृति में कोई एक प्रकार प्रमुख हो जाय। परम्परागत रस सिद्धान्त भावात्मक तत्त्वों को ही प्रमुखता देता है, जबकि अन्य सिद्धान्त (जैसे-उदात्त) विचारात्मक तत्त्वों का तथा कल्पनात्मक तत्त्वों (अलंकार, बिम्बादि) को प्रमुखता देते हैं, जबकि सत्य यह है कि किसी कृति में किसी की प्रमुखता होतो है और किसी में किसी की । एक ही कवि बिहारी के अलग-अलग दोहों में हम विचार, भाव एवं कल्पना की प्रमुखता प्रमाणित कर सकते हैं; अतः यह कहना कि साहित्य के सभी रूपों एवं कृतियों में सदा एक ही प्रकार के तत्त्वों की प्रमुखता रहती है-एकांगी व एक पक्षीय कथन होगा। वास्तविकता यह है कि विचार, भाव, कल्पना में से कोई एक प्रमुख एवं शेष दो गौण रूप में विद्यमान रहते हैं तथा इस दृष्टि से साहित्यिक कृतियों को तीन वर्गों में-विचार- प्रधान, भाव-प्रधान एवं कल्पना-प्रधान वर्गीकृत किया जा सकता है। इन तीनों से ही सौन्दर्यानुभूति प्राप्त होती है किन्तु उनके आस्वाद में परस्पर थोड़ा अन्तर अवश्य रहता है-इसका स्पष्टीकरण आगे किया जाता है। सौन्दर्यानुभूति के प्रसंग में सर्व प्रथम 'सौन्दर्य' की व्याख्या अपेक्षित है। 'सौन्दर्य' क्या है-इसका भी सर्व सम्मत् उत्तर सौन्दर्य-शास्त्रियों के द्वारा शताब्दियों तक किये गये प्रयास से भी उपलब्ध नहीं हो पाया। व्यावहारिक दृष्टि से सौन्दर्य दो अर्थों में प्रयुक्त होता है-अभिधात्मक एवं लाक्षणिक। अभिधात्मक अर्थ में हम वस्तुओं के बाह्य रूप की उस विशेषता को सौन्दर्य कहते हैं जो हमारी चक्षुरन्द्रिय को आकर्षित करती है जबकि लाक्षणिक अर्थ में उन सब विशेषताओं को 'सौन्दर्य' कहते जो कि न केवल हमारी विभिन्न इन्द्रियों, को भी अपितु मन, बुद्धि, चेतना को आकर्षित करता है। कला-क्षेत्र में सौन्दर्य अपने इस व्यापक लाक्षणिक अर्थ में ही प्रयुक्त होता है जबकि व्यवहार जगत् में ऐसा कम होता है। सौन्दर्य-शास्त्र के विवेचक एवं चिन्तक भी कई बार कला-सौन्दर्य की मीमांसा करते समय उसके अभिवात्मक एवं लाक्षणिक अर्थों के अन्तर को ध्यान में नहीं रख पाते, वे व्याख्या एक की करते हैं, आधार दूसरे को बना लेते हैं, जिससे वे भ्रान्त एवं असंगत निष्कर्षों पर पहुँच जाते हैं। वस्तुतः इस छोटी सी प्रारम्भिक भ्रान्ति के कारण हमारी समस्त चिन्तन-परम्परा अपने लक्ष्य से आगे-पीछे भटकती रही है। इस भ्रान्ति के निराकरण का सबसे बड़ा उपाय यह है कि हम 'सौन्दर्य' के स्थान पर किसी ऐसे शब्द का प्रयोग करें जो उसके उभयपक्षी अर्थों को अभिधात्मक रूप में ही प्रस्तुत कर सके क्योंकि किसी भी वैज्ञानिक विश्लेषण एवं सुसंगत निर्णय के लिए लक्षणा शक्ति बाधक ही सिद्ध होती

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है। जब हम सौन्दर्य के दोनों प्रकार के अर्थों-चक्षुरिन्द्रिय को आकर्षित करने वाली विशेषता एवं समस्त इन्द्रियों, मन, बुद्धि, चेतना को आकर्षित करने वाली विशे- षता-को समन्वित एवं समीकृत करते हैं तो 'आकर्षण' शब्द की उपलब्धि होती है। वस्तुतः 'आकर्षण' शब्द सौन्दर्य के संकीर्ण और व्यापक, अभिधात्मक एवं लाक्षणिक आदि सभी प्रकार के अर्थों को व्यापक, स्पष्ट एवं निर्दोष रूप में प्रस्तुत करता है। अतः हम अपने पूर्व उपलब्ध निष्कर्ष में संशोधन करते हुए कह सकते हैं कि काव्य एवं कला में सभी विचारात्मक, भावात्मक एवं कल्पनात्मक तत्त्वों का लक्ष्य सौन्दर्य या आकर्षण की उद्दीप्ति करना है तथा यह सौन्दर्य या आकर्षण की अनुभूति ही सौन्दर्यानुभूति या रस की अनुभूति है। अस्तु, संक्षप में-रस=सौदर्यानुभूति=आकर्षण की अनुभूति। जैसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है-विभिन्न कलाकृतियों में क्र्मशः विचारात्मक, भावात्मक, या कल्पनात्मक तत्त्वों की प्रमुखता (एवं शेष दो का गौण रूप में योग) रहती है-इस प्रमुखता के अनुसार ही उनमें उद्दीप्त सौन्दर्य एवं उसकी अनूभूति में सूक्ष्म अन्तर आ जाता है; इनसे सौन्दर्य या आकर्षण के तीन रूपों- क्रमशः बौद्धिक आकर्षण, भावात्मक आकर्षण एवं कल्पनात्मक आकर्षण-की उद्दीप्ति होती है तथा इनसे प्राप्त आस्वाद की अनुभूति भी क्रमशः इसी प्रकार बौद्धिक आकर्षण से युक्त, भावात्मक आकर्षण से युक्त एवं रूपात्मक आकर्षण से युक्त होती है। परम्परागत काव्य-शास्त्र एवं सौन्दर्य-शास्त्र में कलागत सौन्दर्य या आकर्षण के इन तीन रूपों की विवेचना क्रमशः उदात्त (Sublime), सौन्दर्य (Beauty) एवं चमत्कार के अन्तर्गत हुई है। वस्तुतः सूक्ष्म विश्लेषण से यह स्पष्ट हो जाता है कि परम्परागत विवेचन में 'सौन्दर्य' की अवधारणा भावात्मक आकर्षण पर, औदात्य की अवधारणा बौद्धिक आकर्षण पर तथा चमत्कार की अवधारणा कल्पनात्मक या रूपा- त्मक आकर्षण पर ही प्रतिष्ठित है। परम्परागत भाव-वादियों एवं रस-वादियों ने उपयुक्त तीन रूपों में से प्रारंभ में एक पर ही-भावात्मक सौन्दर्य या आकर्षण पर ही अधिक बल दिया, किन्तु आगे चलकर उन्होंने वैचारिक सौन्दर्य एवं अभिव्यंजना के महत्त्व को भी न्यूनाधिक रूप में स्वीकार कर लिया। भारतीय आचार्यों द्वारा 'तत्त्व-ज्ञान' या तत्त्व-बोध' स्थायी भाव पर आधारित 'शान्त रस' एवं पाश्चात्य आचार्यों -ई० एफ० कैरिट्ट, कार्लिंगवुड एवं सैंतायना द्वारा बौद्धिक अनुभूति पर आधारित 'औदात्य भाव' को मान्यता देना वस्तुतः रस-सिद्धान्त या भाव-सिद्धान्त में बौद्धिक तत्त्वों को ही समन्वित करने की चेष्टा के सूचक हैं; तथा इसी प्रकार भट्ट- नायक द्वारा स्थायी भाव का गुण, अलंकार द्वारा 'सुन्दरीभूत' होने की, बात तथा अभिनव गुप्त द्वारा ध्वनि के माध्यम से रस के व्यंजित होने की धारणा तथा कैरिट्ट एवं कालिंगवुड द्वारा भाव की अभिव्यंजना (Expression of emotion) पर बल देना, रस-सिद्धान्त या भाव-सिद्धान्त में कल्पना या शैलीगत तत्त्वों को समन्वित करने के

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लक्ष्य को ही सूचित करता है। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि पूर्ववर्ती परम्परा में भी रस-सिद्धान्त के क्षत्र को भाव-प्रधान साहित्य की सीमा के बाहर निकाल कर विचार प्रधान एवं कल्पना-प्रधान (रूप-प्रधान) साहित्य तक व्याप्त करने के प्रयास होते रहे हैं, यह दूसरी बात है कि पारस्परिक मेल, संगति एवं सामंजस्य के अभाव में वे परस्पर सूत्र-बद्ध नहीं हो पाये। अस्तु, रस को सौन्दर्यानुभूति या आकर्षण की अनुभूति के अर्थ में व्यापक रूप में ग्रहण करते हुए विचार-प्रधान, भाव-प्रधान, व कल्पना-प्रधान साहित्य में क्रमशः बौद्धिक औदात्य, भावात्मक सौन्दर्य, कल्पनात्मक चमत्कार की प्रमुखता स्वीकार की जा सकती है-साहित्यकार की रुचि, प्रवृत्ति, विषय-वस्तु एवं काव्य-रूप की विशिष्टता के अनुसार इनमें किसी भी प्रकार के साहित्य की रचना सम्भव है; तथा उन सभी से हम आकर्षण की अनुभूति या रस की निष्पित्ति की सम्भावना स्वीकार करते हैं, इतना अवश्य है कि उस अनुभूति के स्तर-मानसिक स्तर एवं प्रभाव की प्रकृति एवं मात्रा-में परस्पर थोड़ा अन्तर अवश्य रहेगा। कुछ रचनाओं का प्रभाव बौद्धिक स्तर तक सीमित रहता है तो कुछ हृदय को भी द्रवित करती हैं तो कुछ केवल चमत्कार उत्पन्न करके ही रह जाती हैं। अवश्य ही उच्चस्तरीय अनुभूति वही मानी जायगी जो केवल इन्द्रियों, मन ओर बुद्धि को ही प्रभावित एवं आकर्षित न करके चेतना के विभिन्न पक्षों और अंगों को प्रभावित, उद्वेलित एवं समन्वित करती हो; किन्तु ऐसी अनुभूति सभी रचनाओं से संभव नहीं है। आचार्य शुक्ल ने इसीलिए रसानुभूति के अनेक स्तर-भेद करते हुए बौद्धिक आकर्षण एवं कल्पनात्मक आकर्षण- चमत्कार-की अनुभूति को 'मध्यम कोटि' की अनुभूति कहा है। किन्तु इस बारे में कोई एक निर्णय देना आंशिक सत्य की प्रतिष्ठा करना होगा-कुछ विद्वान जो शृंगार को ही एक मात्र रस मानते रहे हैं वे भावात्मक सौन्दर्य को; शान्त और उदात्त को प्रमुखता देने वाले बौद्धिक आकर्षण को तथा कल्पना और शैली को प्रमुखता देने वाले चमत्कार एवं अद्भुत रस या रूपात्मक आकर्षण को ही सर्वश्रेष्ठ घोषित करते रहे हैं। वस्तुतः सौन्दर्य, औदात्य एवं चमत्कार कवि और पाठक की प्रकृति, रुचि एवं प्रवृत्ति के तीन पक्षों-भाव-प्रधान, विचार-प्रधान, कल्पना-प्रधान- के सूचक हैं; अतः व्यक्तित्व-भेद के अनुसार विभिन्न कवियों और पाठकों की रुचि, एवं प्रवृत्ति इनमें से किसी एक में अधिक सम्भव है। कई बार किसी एक युग, समाज, एवं वर्ग की ही रुचि एवं प्रवृत्ति इनमें से किसी एक पक्ष की ओर अधिक उन्मुख हो जाती है-अतः इस सम्बन्ध में हम 'रुचि-भेद' को ही मूल आधार मान सकते हैं। सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति के क्षेत्र में सौन्दर्य एवं माधुर्य के लाक्षणिक अर्थ को ही अभिधात्मक रूप में ग्रहण कर लिए जाने के कारण ही यह शंका प्रस्तुत हुई कि कला में कुरूप, असुन्दर, वीभत्स एवं करुण आदि से रस या आनन्द की अनुभूति क्यों होती है ? यदि हम सौन्दर्य के स्थान पर आकर्षण एवं उसके तीन भेदों को ध्यान

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में रख कर विचार करें तो इस शंका का मूलाधार ही नहीं रहता। जिन रचनाओं में ऐन्द्रियक सौन्दर्य नहीं होता उनमें भावात्मक आकर्षण रहता है, तथा जिनमें भावात्मक दृष्टि से कुरूपता या वीभत्सता रहती है उनमें बौद्धिक आकर्षण रहता है, इसी से उनमें हमारी रुचि एवं प्रवृत्ति होती है। उदाहरण के लिए, हमारी कुरूप माँ या कुरूप सन्तान हमारी इन्द्रियों को विकर्षणमूलक बोध प्रदान करती हैं फिर भी उनमें हमारी रुचि, प्रवृत्ति एवं आत्मीयता का कारण भावात्मक सम्बन्ध है-सहानुभूति और आत्मीयता के कारण उनसे हमें प्रसन्नता प्राप्त होती है। इसी प्रकार महात्मागाँधी का बाह्य व्यक्तित्व कुरूप होता हुआ भी बौद्धिक आकर्षण के कारण हमें आकर्षित करता है। सौ रुपये का मैला-कुचला नोट ऐन्द्रियक दृष्टि से विकर्षक होता हुआ भी बौद्धिक आकर्षण के कारण इतना ग्राह्य होता है कि उसे हम किसी सुन्दर, चिकने व रंग-बिरंगे कागज के बदले में भी देना नहीं चाहेंगे। संक्षेप में, व्यावहारिक जीवन के कुरूप एवं कुत्सित रूप एवं कटु भाव कला में औदात्य या बौद्धिक तत्त्वों से अथवा कल्पनात्मक (रूपगत) तत्त्वों से समन्वित होकर ही हमें आकर्षण की अनुभूति प्रदान करते हैं। इसीलिए हमें उनसे आह लाद की अनुभूति होती है क्योंकि प्रत्येक प्रकार के आकर्षण का आस्वाद अन्ततः प्रसन्नता दायक होता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रस भाव या स्थायी भाव न होकर भाव या अनुभूति की एक ऐसी अनुभूति है जो निवयक्तिक या साधारणीकृत होती है। एक तो कवि या साहित्यकार अपनी रचना में भावों, विचारों एवं कल्पित रूपों को नहीं-अपितु इनकी अनुभूति को प्रस्तुत करता है जिसे पाठक निवयक्तिक या साधारणीकृत रूप में ग्रहण करता है। भारतीय एवं पाश्चात्य कला-चिन्तन के क्षत्र में प्रचलित विभिन्न सिद्धान्त-भावकत्व व्यापार, साधारणीकरण, सहानुभुति (Empathy), तटस्थता (Detachment), निःस्वार्थता (Disinterestedness), निवैयक्तिकता, मानसिक अन्तराल (Psychical distance) आदि से सम्बन्धित विभिन्न सिद्धान्त-अन्ततः कलानुभूति के निवयक्तिक या सामान्यीकृत रूप का ही प्रतिपादन करते हैं; मनोविज्ञान के अनुसार इसे 'अहं शून्य' या 'अहं से मुक्त' अनुभूति कह सकते है। डा० भगवानदास ने अपने ग्रन्थ 'The Science of Emotions' में सप्रमाण सिद्ध किया है कि हमारी सभी अनुभूतियों के मूल में आकर्षण-विकर्षण की अनुभूति होती है; जिनमें अहं समन्वित हो जाने पर राग-द्वष मूलक सभी भावों का उद्भव हो जाता है। अतः कह सकते हैं 'आकर्षण+अहं=भावानुभूति' या 'भावानुभूति- अहं=आकर्षण' अर्थात् अनुभूति की निवयक्तिकता का अर्थ है, उसका अहं से मुक्त होना और अहं से मुक्त अनुभूति (अनुकूल या प्रसन्नतादायक अनुभूति) ही 'आकर्षण' की अनुभूति है। वस्तुतः लौकिक क्षत्र की अन्य अनुभूतियों एवं कलानुभूतियों में 'अहं' का ही अन्तर है। व्यावहारिक क्षेत्र में आकर्षण की अनुभूति तुरन्त ही अहं से मिश्रित

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३९६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

होकर इच्छा, राग-द्वष आदि में परिणित हो जाती है, जिससे हम शुद्ध आकर्षण का आस्वाद प्राप्त नहीं कर पाते जबकि कलानुभूति में हम अहं मुक्त अनुभूति अर्थात् शुद्ध आकर्षण की अनुभूति का आस्वाद प्राप्त करते हैं, किन्तु जो लोग काव्य रचयिता या काव्यगत पात्र के प्रति व्यक्तिगत राग-द्वष के कारण आस्वादन के समय अहं- मुक्त नहीं हो पाते वे शुद्ध आकर्षण या रस की शुद्ध अनुभूति भी प्राप्त करने में असमर्थ रहते हैं। यदि व्यावहारिक जीवन में भी हम अहं मुक्त होने की स्थिति प्राप्त कर लें तो उस स्थिति में समस्त जगत् एक रंगीन मंच तुल्य प्रतीत हो सकता है। संसार में सुन्दर वस्तुओं, सुन्दर दृश्यों, व सुन्दर व्यक्तियों का अभाव नहीं है किन्तु अपन-पराये (अहं) की भावना के कारण ही हम कई बार दूसरों की सुन्दर वस्तु से प्रसन्नता के स्थान पर ईर्ष्या, कुण्ठा, अभाव, लोभ, क्रोध आदि के कटु एवं कष्ट-दायक भावों की अनुभूति प्राप्त करते हैं। अस्तु, संक्षप में रस विभिन्न तत्त्वों व रूपों की अनुभूति का निवयक्तिक आस्वादन मात्र है, वह चाहे किसी भी माध्यम से प्राप्त हो। निवयक्तिक अनुभूति मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आकर्षण की अनूभूति है। रस के परम्परागत अवयवों के मनोवंज्ञानिक विश्लेषण एवं व्यापक दृष्टि से विवेचन से उनके ऐसे रूपों की उपलब्धि होंती है जो न केवल भाव-प्रधान साहित्य अपितु विचार-प्रधान एवं कल्पना-प्रधान रचनाओं की भी व्याख्या के आधार बन सकते हैं। संक्षप में कहें तो हमने स्थायी भाव को मानव-मन की सभी पर- म्परागत एवं चिरकालीन प्रवृत्तियों के प्रतिनिधि के रूप में 'केन्द्रीय तत्त्व', संचारी भाव की विभिन्न अनुभू तियों, व तत्त्व बोध एवं रूप-बोध से प्राप्त संचरणशील अनु- भूतियो के प्रतिनिधि के रूप में 'सहयोगी तत्त्व', आलम्बन-विभाव को न केवल व्यक्ति विशेष तक सीमित रखकर पदार्थों, वस्तुओं, लक्ष्यों आदि सभी आधारभूत विषयों के रूप में स्वीकार करते हुए 'आधारभूत हेतु', के रूप में, 'उद्दीपन विभाव' को स्थितियों, परिस्थितियों, वातावरण सम्बन्धी सभी तत्त्वों का प्रतिनिधि मानते हुए 'परिवेश या सन्दर्भ' के रूप में तथा अनुभावों को विभिन्न अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों के रूप में स्वीकार करते हुए 'माध्यम' की संज्ञा प्रदान की है। वस्तुतः रसावयवों के इन नये रूपों-केन्द्रीय तत्त्व (स्थायी भाव), सहयोगी तत्त्व (संचारी भाव), आधारभूत हेतु (आलम्बन), सन्दर्भ या परिवेश (उद्दीपन) एवं माध्यम (अनुभाव) के आधार पर न केवल रस-सिद्धान्त के विभिन्न अवयवों की परम्परागत विशेषताओं को व्यापक सन्दर्भ प्राप्त हो जाता है अपितु वह भाव-प्रधान, विचार- प्रधान एवं कल्पना-प्रधान-तीनों प्रकार के साहित्य के घटक तत्त्वों एवं उनकी सर्जन- प्रक्रिया व आस्वादन-प्रक्रिया की भी व्याख्या सुसंगत रूप में करने को क्षमता प्राप्त कर लेता है-यह विस्तार से विभिन्न अध्यायों में स्पष्ट किया जा चुकाहै। साहित्य के विभिन्न बाह्य रूपों या विधाओं का भी विश्लेषण इनके आधार पर भली-भाँति सम्भव है।

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रस-सिद्धान्त का व्यापक स्वरूप : स्थापनाएँ ३९७

इस प्रकार इस नूतन एवं व्यापक रूप में रस सिद्धान्त का समन्वय एक ओर तो विभिन्न परम्परागत भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-शास्त्रीय मतों, सौन्दर्य शास्त्रीय सिद्धान्तों व मनोवैज्ञानिक स्थापनाओं से हो जाता है तो दूसरी ओर उसका सबन्ध भाव- प्रधान, व कल्पना-प्रधान अथवा सौन्दर्यमूलक, औदात्यमूलक एवं चमत्कारमूलक साहित्य से, प्रचलित काव्य-रूपों व विधाओं एवं अभिव्यंजनाशैलियों से और सर्जन-प्रक्रिया व आस्वाद-प्रत्रिया की बहुमान्य मनोविश्लेषणात्मक व मनोविज्ञानिक व्याख्याओं से भी स्थापित हो जाता है-ऐसी स्थिति में वह एकांगी व एक पक्षीय सिद्धान्त न रहकर काव्यानुभूति, व सौन्दर्यानुभूति की सर्वांगीण व्याख्या का आधार बन जाता है। फिर भी उसकी यह चरम परिणति या-उसका अंतिम रूप नहीं है; इसमें भी अनेक संशोधन, परिवर्तन परिष्कार की अपेक्षाएँ संभव है, किन्तु वर्तमान संदर्भ में एक व्यक्ति की दृष्टि जितना देख सकती है; उतना उसमें अवश्य है। वैयक्तिक दृष्टि की उपलब्धि एवं सीमाएं-दोनों की ही उसमें संभावना है-यह दूसरी बात है कि हमने अपनी वैयक्तिक दृष्टि को भी निवयक्तिक रूप देने का प्रयास पूरी शक्ति से किया है। पर पूर्ण निवयक्तिकता का दावा करना मिथ्याभिमान व अहंकार का ही सूचक होगा और बिना पूर्ण निव यक्तिकता के सत्य के पूर्ण रूप के साक्षात्कार की बात भी मिथ्या सिद्ध होगी। अस्तु, कलानुभूति या रसानुभूति के पूर्ण एवं अन्तिम सत्य को खोज लेने का दावा हम नहीं करते, किन्तु तत्त्व-विकास एवं सत्यानुसंधान की दीर्घ शृंखला में एक नूतन कड़ी जोड़ देने का एक विनम्र प्रयास अवश्य इसे कह सकते हैं।

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सहायक पुस्तक-सूची (क) हिन्दी पुस्तकें

१. अभिनव भारती (हिन्दी); सं० डा० नगेन्द्र एवं आचार्य विश्वेश्वर २. अरस्तू का काव्य-शास्त्र, सं० डा० नगेन्द्र ३. आचाय क्षेमेन्द्र; डा० मनोहरलाल गौड ४. आधुनिक हिन्दी मराठी में काव्य-शास्त्रीय अध्ययन; डा० मनोहर काले ५. कला, साहित्य और समीक्षा; डा० भगीरथ प्रसाद मिश्र ६. काव्य-दर्पण; रामदहिन मिश्र ७. काव्य में उदात्त तत्त्व; डा० नगेन्द्र काव्य-प्रकाश; मम्मट, अनु० हरिमंगल मिश्र 15 ९. काव्यादर्श दंडी, अनु० रणवीर सिंह १०. कुवलयानन्द; सं० डा० भोलाशंकर व्यास ११. ग्रीक साहित्य-शास्त्र; हरीश करुण १२. नये प्रतिमान : पुराने निकष; लक्ष्मीकान्त वर्मा १३. नाट्य-शास्त्र; सं० बलदेव उपाध्याय १४. पाश्चात्य समीक्षा; ड० केसरी नारायण शुक्ल १५. बीभत्स रस और हिन्दी साहित्य; डा० कृष्णदेव भारी १६. भारतीय काव्य-शास्त्र की परम्परा; डा० नगेन्द्र १७. भारतीय काव्य-सिद्धान्त; सं० काका कालेलकर १८. भारतीय नाट्य परम्परा और दशरूपक; डा० हजारी प्रसाद द्विवेदी १९. भारतीय दर्शन; श्री बलदेव उपाध्याय २०. भारतीय साहित्य-शास्त्र; श्री बलदेव उपाध्याय २१. मनोविज्ञान; डा० जदुनाथ, सिन्हा २२. मनोविश्लेषण और मानसिक प्रवृत्तियाँ; डा० पद्मा अग्रवाल २३. रस-गंगाधर, पं० जगन्नाथ, अनु० मदन मोहन भा २४. रस-मीमांसा; पं० रामचन्द्र शुक्ल २५. रस-विमर्श; डा० राममूर्ति त्रिपाठी २६. रस-सिद्धान्त; डा० नगेन्द्र (प्रथम संस्करण)

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२७. रस-सिद्धान्त की दार्शनिक व नैतिक व्याख्या; डा० तारकनाथबाली २८. रस-सिद्धान्त और सौन्दर्य-शास्त्र; डा० निर्मला जैन २९. रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण; डा० आनन्द प्रकाश दीक्षित ३०. रस-शास्त्र और सहित्य-समीक्षा; डा० कृष्णदेव भारी ३१. समीक्षा-दर्शन; डा० रामलालसिंह ३२. सरल मनोविज्ञान; लालजी शुक्ल ३३. साधारणीकरण : शास्त्रीय विवेचन; डा० रामलखन शुक्ल ३४. सामान्य मनोविज्ञान; डा० एस० एस० माथुर ३५. सामान्य मनोविज्ञान; रामबाबू गुप्त ३६. साहित्य-दर्पण; आ० विश्वनाथ, ३७. साहित्य-विज्ञान ;; डा० गणपतिचन्द्र गुप्त ३८. साहित्यिक निबन्ध; डा० गणपतिचन्द्र गुप्त ३९. सिद्धान्त और अध्ययन; डा० गुलाबराय ४०. सौन्दर्य-मीमांसा (हिन्दी अनुवाद); कान्त ४१. हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास; डा० गणपतिचन्द्र गुप्त (ख) अँग्रेजी पुस्तकें

  1. Aesthetics ; Benedetto Croce, 1956. 2. Aesthetics & Criticism ; Harold Osborne, 1955. 3. A History of Esthetics ; K.E. Gilbert and Kuhn, 1954. 4. A History of Aesthetics; Bosanquet ; Second, 5. A History of Criticism and Literary Taste in Europe; G. Saintsbury, 7th edition. 6. An Introduction to Aesthetics ; E.F. Carritt, 1955. 7. An Introduction to Aesthetics ; Huntermeads, 1952. 8. An Introduction to the Study of Literature ; W.H. Hu son, '57 9. An Introduction to Social Psychology ; W. Mcdougall, 1950. 10. An outline of Psychology ; W, Mcdougall, 1949. 11. Art as Experience ; John Dewey, 1934. 12. Biographia Literaria ; S.T. Coleridge, 1939. 13. Contemporary Studies in Aesthetics ; Coleman, 1968. 14 Creative Imagination ; J.E. Downey, 1929. 15. Critique of Judgement ; Kant, Trans. Bernard, 1951. 16. Elements of Poetry ; I.R. Krenzer, 1955. 17 Elizabathen and Metaphysical Imagery ; Tuve, 1957. 18. Emotions in Man and Animal ; P.T. Young, 1947. 19. Encyclopaedia of Arts ; D.D. Runes, 1946

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  1. English Prose Style ; Herbart Read, 1956. 21 Evolution and Creation ; Oliver Lodge, 1926. 22. Illusion and Reality ; Christopher Caudwell, 1947. 23. Indian Aesthetics ; Dr. K.C. Pandey. 24. Language and Reality ; W.H. Urban, 1957. 25. Language and Reality ; M. Hope Parker, 1949. 26. Literary Criticism : A short History ; Brooks, 1957. 27. Nature of Thought ; Brand Blanshard, 1939. 28 Origin Through Evolution ; Nathen Fasten, 1930. 29. Poetic Process ; George Whally, 1953. 30. Psychology ; R.S. Woodworth, 1937. 31. Studies in Sanskrit Aesthetics ; A.C. Shastri, '52. 32. The Analysis of Beauty ; William Hogarth, 1955. 33. The Art and Art-Criticism. T.M. Greene, 1947. 34 The Meaning of Art ; Herbar't Read 1951. 35. The Principles of Art ; R.G. Collingwood, 1945. 36. The Psychology and Imagination ; J. P. Sartre, 1948. 37. The Psychology of Jung ; J. Jacobi, 1946. 38. The Quest for Beauty ; J. L. Jarrett, 1957. 39 The Science of Emotions ; Dr. Bhagwan dass, 1953. 40. The Sense of Beauty ; George Santayana, 1949. 41. The Structure and Dynamics of the Psyche ; C.G. Jung, 1963. 42. The Theory of Beauty ; E.F. Carritt, 1949. 43 Western Aesthetics ; Dr. K.C. Pandey, 44. What is Art ? Leo Tolstoy.

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हमारे उत्कृष्ट आलोचना-ग्रन्थ

आस्था के चरण डा० नगेन्द्र ५०.०० रस सिद्धान्त डा० नगेन्द्र २५.०० भारतीय काव्यशास्त्र की परम्परा डा० नगेन्द्र २०.०० भारतीय काव्यशास्त्र की भूमिका डा० नगेन्द्र १७.५० देव और उनकी कविता डा० नगेन्द्र १२.०० आालोचक की आस्था डा० नगेन्द्र ७.०० अ्नुसंधान और आलोचना डा० नगेन्द्र ४.०० आधुनिक हिन्दी-कविता की मुख्य प्रवृत्तियाँ डा० नगेन्द्र ५.५० सियारामशरण गुप्त डा० नगेन्द्र १०.०० काव्य-बिम्ब डा० नगेन्द्र ४.०० साकेत : एक अध्ययन डा० नगेन्द्र ७.५० सुमित्रानन्दन पंत डा० नगेन्द्र ७.५० आधुनिक हिन्दी नाटक डा० नगेन्द्र ५.०० नई समीक्षा, नये संदर्भ डा० नगेन्द्र ७.०० कामायनी के अध्ययन की समस्याएं डा० नगेन्द्र ४.०० हिन्दी समस्या नाटक डा० मान्धाता शोभा २५.०० रस-सिद्धान्त और सौंदर्यशास्त्र डा० निर्मला जैन ३०.०० रंगमंच और नाटक की भूमिका डॉ० लक्ष्मीनारायण लाल १२.०० देव-ग्रन्थावली डा० लक्ष्मीधर मालवीय २०.०० महिमभट्ट डा० ब्रजमोहन चतुर्वेदी २५.०० ताजुज़्बेकी डा० भोलानाथ तिवारी 5.00 साहित्यिक अनुसंधान के प्रतिमान सं० डा० देवराज उपाध्याय १०.०० सूर की काव्य-साधना डा० गोविन्दराम शर्मा २०.०० विद्यापति-विभा डा० वीरेन्द्रकुमार बड़सूवाला १५.०० हिन्दी नाटकों की शिल्पविधि का विकास डा० शान्ति मलिक ४०.०० साहित्य का वैज्ञानिक विवेचन डा० गणपतिचन्द्र गुप्त ३५.००

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