Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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के ही विभिन्न भेदों का अनुसन्धान करते हुए विभिन्न वर्गों की स्थापना की जानी चाहिए। रस-सिद्धान्त के भारतीय आचार्यों ने प्रायः कलागत स्थायीभाव-यदि अनेक स्थायीभाव हैं तो प्रमुख या अंगी स्थायीभाव-को ही आधार माना है किन्तु इसके कुछ अपवाद भी मिलते हैं। यथा, अभिनवगुप्त द्वारा स्थापित शान्तरस के स्थायीभाव 'तत्त्व-ज्ञान' को, भोजराज द्वारा प्रतिपादित 'उदात्त रस' के स्थायीभाव 'मति' को, भानुदत्त द्वारा प्रतिपादित मायारस के स्थायीभाव 'मिथ्याज्ञान' को, भारतेन्दु द्वारा उल्लिखित प्रमोद रस के स्थायीभाव 'आनन्द' को, 'स्थायीभाव' कहना ही असंगत होगा क्योंकि जहाँ तत्त्व-ज्ञान, मति और मिथ्याज्ञान भाव न होकर बौद्धिक तत्त्व हैं; वहाँ 'आनन्द' भी एक अनुभूति मात्र है-उसे भाव-विशेष के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। जैसा कि हम अन्यत्र बौद्धिकरस की विवेचना करते समय बता चुके हैं, तत्त्व-ज्ञान, उदात्त (मति) आदि काव्यगत बौद्धिकता की प्रमुखता के सूचक हैं तथा इस प्रकार की रचनाओं में 'स्थायीभाव' की प्रमुखता न होकर 'स्थायी विचार' या केन्द्रीय तत्त्व की प्रमुखता रहती है; अतः विचार-प्रधान रचनाओं में स्थायीभाव की अपेक्षा केन्द्रीय विचार या तत्त्व का अनुसंधान करना अधिक उचित होगा। अस्तु, स्थायीभाव को आधार बनाने की बात केवल उन्हीं रचनाओं पर लागू होगी जिनमें किसी स्थायीभावात्मक प्रवृत्ति की ही प्रमुखता हो तथा अन्य तत्त्व गौण हों। वस्तुतः परम्परागत रस-सिद्धान्त की सबसे बड़ी सीमा यही है कि वह केवल उन भाव-प्रधान रचनाओं पर लागू होता है जिनमें प्रमुखता स्थायीभाव की है; विचार-प्रधान एवं कत्पना-प्रधान रचनाओं की व्याख्या वह सम्यक् रूप में नहीं कर पाता। अवश्य ही अभिनवगुप्त की शान्तरस की धारणा या भोजराज की उदात्तरस की स्थापना, विचार-प्रधान साहित्य को ध्यान में रखकर हुई होगी, किन्तु उन धारणाओं के अनुसार रस-सिद्धान्त के स्वरूप एवं अंगों में अपेक्षित संशोधन- परिवद्धन नहीं हो पाया; अर्थात् आधार और लक्ष्य बदल जाने पर भी रस के अवयवों का निरूपण पूर्ववत् ही रहा। अतः यदि हमें रस-सिद्धान्त को व्यापक रूप में प्रतिष्ठित करना है, उसे केवल भाव-प्रधान रचनाओं तक ही सीमित नहीं रखना है तो उसके परम्परागत प्ररूप में भी संशोधन-परिवर्तन करना आवश्यक है। अतः हम थोड़ी देर के लिए परम्परागत स्वरूप को भूलकर स्वतन्त्र दृष्टि से रस-भेदों के वर्गीकरण का प्रयास करते हैं। जंसा कि इसी खण्ड के विगत अध्यायों में स्पष्ट किया जा चुका है-व्यापक रूप में रस काव्यानुभूति या सौन्दर्यानुभूति का पर्याय है। वह काव्य या कला में विभिन्न साधनों द्वारा उत्पन्न सौन्दर्य या आकर्षण के आस्वाद की अनुभूति है। यह सौन्दर्य या आकर्षण तीन प्रकार ने तत्त्वों द्वारा उत्पन्न या उद्दीप्त होता है- (१) भावात्मक तत्त्व (२) विचारात्मक या बौद्धिक तत्त्व और (३) कल्पनात्मक या

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शैली सम्बन्धी तत्त्व यद्यपि प्रत्येक रचना में ये तीनों ही प्रकार के तत्त्व न्यूनाधिक मात्रा में सदा विद्यमान रहते हैं, किन्तु विभिन्न रचनाओं में प्रमुखतया विभिन्न वर्ग के तत्त्वों की रहती है। साहित्यकार की रुचि-भेद, लक्ष्य-भेद, एवं विषय-वस्तु के भेद के कारण किसी में भावात्मक तत्त्व किसी में विचारात्मक तत्त्व एवं किसी में कल्पनात्मक तत्त्व प्रमुख एवं अन्य तत्त्व गौण हो जाते हैं। इस दृष्टि से सभी रचनाओं को सर्व प्रथम तीन वर्गों में बाँटा जा सकता है-(१) भाव-प्रधान (२) विचार-प्रधान और (३) कल्पना-प्रधान। इन तीनों प्रकार की रचनाओं में आकर्षण के ही तीन रूपों की क्रमशः प्रमुखता रहती है-भावात्मक आकर्षण, बौद्धिक आकर्षण एवं रूपात्मक (=शैली सम्बन्धी) आकर्षण। परम्परागत शब्दावली में इन तीनों को क्रमशः सौन्दर्य, औदात्य एवं चमत्कार की भी संज्ञा दी जा सकती है। अब प्रत्येक वर्ग के भी अवान्तर-भेद रचनागत प्रमुख तत्त्व के उपभेदों के आधार पर किये जा सकते हैं। संक्षेप में, भाव, विचार एवं कल्पना के भेदोपभेद के आधार पर ही उनकी काव्यात्मक अनुभूति (=रस) के भेद निर्धारित किये जा सकते हैं। अतः आगे क्रमशः ऐसा ही करने का प्रयास किया जायगा।

• भाव-प्रधान साहित्य के भेदोपभेद-

सर्व प्रथम हम भाव-प्रधान साहित्य को लेते हैं। इसका वर्गीकरण भाव- विशेष की ही प्रमुखता के आधार पर करना उचित होगा, किन्तु स्वयं भावों को किस आधार पर वर्गीकृत किया जाय-इसका सर्वमान्य एवं सम्यक् उत्तर अभी तक आधुनिक मनोविज्ञान भी नहीं दे पाया है। किन्तु डा० भगवानदास ने अपने ग्रन्थ 'The Science of Emotions' में सभी भावों को मूलतः आकर्षण-विकर्षण की प्रक्रियाओं के रूप में स्वीकार करते हुए उन्हें एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया है। हमने 'साहित्य-विज्ञान' में इस वर्गीकरण पर विस्तार से विचार करते हुए उसे संशोधित रूप देने की चेष्टा की है; जिससे हमारे सभी भाव एक सुसंगत एवं व्यापक आधार पर वर्गीकृत हो जाते हैं। यहाँ संक्षेप में उक्त वर्गीकरण का परिचय दिया जाता है।

डा० भगवान दास के अनुसार हमारे सभी भावों के मूल में आकर्षण या विकर्षण की प्रवृत्ति विद्यमान रहती है। सामान्य आकर्षण या विकर्षण के साथ जब हमारे 'अहं' तत्त्व का मिश्रण हो जाता है तो वे राग-द्वेष में परिणत होकर आलंबन- भेद के अनुसार विभिन्न भावों का रूप धारण कर लेते हैं; इसे यहाँ तालिका के रूप में स्पष्ट किया जाता है।

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तालिका : आकर्षण-विकर्षण के आधार पर भावों का वर्गीकरण

परिस्थिति-भेद आकर्षण विकर्षण (राग) (द्वेष) (१) समान व्यक्ति के प्रति आकर्षण या विकर्षण प्रेम या घृणा

(२) समलैंगिक समान व्यक्ति के प्रति आकर्षण या विकर्षण- मैत्री या घृणा

(३) बड़े के प्रति आकर्षण या विकर्षण श्रद्धा (भक्ति) या भय

(४) छोटे के प्रति आकर्षण या विकर्षण - स्नेह, (वात्सल्य) करुणा या क्रोध

तालिका के अनुसार परिस्थिति-भेद से आकर्षण के क्रमशः प्रेम, मैत्री, श्रद्धा, स्नेह, करुणा-इन पाँच भावों की तथा विकर्षण से क्रमशः घृणा, भय और क्रोध की व्युत्पति संभव है। यहाँ हमने विभिन्न भावों के आलम्बन की ही प्रमुख विशेषता का संकेत किया है किन्तु इससे यह न समझना चाहिए कि विभिन्न भावों की व्युत्पति या उद्दीप्ति के लिए केवल आलम्बन का ही सम्पर्क पर्याप्त है, अपितु आलम्बन के साथ-साथ भावानुकूल परिस्थितियों का भी संयोग अपेक्षित है। तालिका में प्रस्तुत आठ भावों के अतिरिक्त चार भाव और उल्लेखनीय हैं- हास्य, आश्चर्य, उत्साह और निर्वेद। इन भावों में से हास्य और आश्चर्य तो क्रमशः विचार और कल्पना मिश्रित हैं, जबकि उत्साह और निर्वेद चेष्टात्मक प्रवृत्ति की दो स्थितियों-प्रवृत्तियों और निवृत्ति के सूचक हैं। हास्य में विद्रूपता या अनौचित्य को तथा आश्चर्य में वैचित्र्य को इस प्रकार प्रस्तुत किया जाता है कि वे सामन्यतः आकर्षक प्रतीत होते हैं। पर जहाँ हम दूसरों पर हँसना या चकित होना पसन्द करेंगे, वहाँ स्वयं उसके पात्र बनना कम चाहेंगे-अतः व्यवहारिक क्षेत्र में ये दोनों भाव आकर्षण-विकर्षणयुक्त अर्थात् उभयात्मक हैं, किन्तु फिर भी अपेक्षाकृत 'हास्य' में हमारी प्रवृत्ति तथा 'आश्चर्य' में निवृत्ति अधिक रहती है। अतः इन्हें क्रमशः बौद्धिक प्रवृत्ति से समन्वित आकर्षण-विकर्षण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। जिस प्रकार आकर्षण की प्रवृत्ति और चेष्टात्मक प्रवृत्ति के संयोग से उत्साह की व्युत्पत्ति होती है, उसी प्रकार विकर्षण एवं चेष्टात्मक प्रवृत्ति के संयोग से निर्वेद (निष्क्रियता) की स्थिति उत्पन्न होती है। आकर्षण का चेष्टात्मक रूप जहाँ हमें

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प्रवृत्ति की प्रेरणा देता है, वहाँ विकर्षण का चेष्टात्मक रूप निवृत्ति की प्रेरणा देता है-जिसे 'निर्वेद' भाव कहा जाता है।

उपयुक्त विवेचन के अनुसार कुल प्रमुख भाव बारह सिद्ध होते हैं। रस सिद्धान्त का मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करते समय पीछे हमने मानव-मन की उन मूल प्रवृत्तियों या सहज प्रवृत्तियों के भी बारह ही प्रकार निश्चित किये हैं, जिनसे विभिन्न भावों, भावनाओं या स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों का विकास सम्भव है। उपर्युक्त बारह भाव भी पूर्वोक्त मूल प्रवृत्तियों व स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों के अनुरूप है। अतः हमारे विचार से भाव-प्रधान साहित्य का वर्गीकरण पूर्वोक्त बारह सहज प्रवृत्तियों एवं तत्सम्बन्धी भावों के आधार पर इस प्रकार किया जा सकता है-

सहज प्रवृत्ति मूलभाव काव्य-रस

१. काम प्रवृत्ति प्रणय शू गार रस २. सन्तति पालन की प्रवृत्ति - वात्सल्य (स्नेह) वात्सल्य रस ३. सामाजिकता या सामूहिकता की प्रवृत्ति सहानुभूति या। सख्यभाव सख्य रस

४. आत्मसमर्पण या दन्यता की प्रवृत्ति -> श्रद्धा या दन्यता भक्ति रस

५. हास्य की प्रवृत्ति हास्य हास्य रस ६. संग्रह या अधिकार की प्रवृत्ति -> उत्साह वीर रस ७. निवृत्ति की प्रवृत्ति > घृणा वीभत्स रस ८. पलायन की प्रवृत्ति भय भयानक रस ९. युयुत्सा की प्रवृत्ति क्रोध रौद्र रस 1 १०. आत्मगौरव या आत्म प्रतिष्ठा की प्रवृत्ति आत्मत्याग या बलिदान । का भाव (निर्वेद)3 शान्त रस

११. शरणागति की प्रवृत्ति करुणा (शोक) करुण रस १२. जिज्ञासा की प्रवृत्ति आश्चर्य अद्भुत रस

उपयुक्त बारह भावों एवं रसों के सम्बन्ध में यह तथ्य भी ध्यान में रखा जाना चाहिए कि जहाँ प्रथम छह भाव व रस आकर्षक-मूलक हैं, वहाँ अन्तिम छह विकर्षण मूलक हैं। यदि हम इस वर्गीकरण को संक्षिप्त रूप देना चाहें तो सभी भावों और रसों को दो ही वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-(१) आकर्षणमूलक भाव-प्रणय, वात्सल्य, सख्य, श्रद्धा (भक्ति), हास्य और उत्साह। (२) विकर्षण मूलक भाव-घृणा, भय, कोध, निर्वेद, शोक (करुणा) और आश्चर्य।

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यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि परम्परागत दृष्टिकोण के अनुसार स्नेह और सख्य भाव को मान्यता नहीं दी जाती, किन्तु हमारे विचार से छोटे भाई-बहिनों, एवं मित्रों के प्रति क्रमश; स्नेह और सख्य भाव की अनुभूति व्यवहारिक क्षेत्र एवं काव्य-दोनों में ही उपलब्ध होती है। रामायण के राम का भरत के प्रति स्नेह, कृष्ण और सुदामा का सख्य भाव, शेक्सपियर 'मर्चेन्ट आफ् वेनिस' में चित्रित मैत्री भावना-ये सभी रसानुभूति प्रदान कर सकते हैं। अतः व्यापक दृष्टि से इन्हें भी रस रूप में स्वीकार किया जाना आवश्यक है। इतना अवश्य है कि स्नेह को वात्सल्य के अन्तर्गत भी स्थान दिया जा सकता है, क्योंकि दोनों मूलतः एक ही प्रकृति के हैं।

• विचार-प्रधान साहित्य के भेदोपभेद- अब हम साहित्य के दूसरे वर्ग-विचार-प्रधान-को लेते है। जिस प्रकार भाव-प्रधान साहित्य के भेदोपभेदों के निर्धारण के लिए भाव के भेदोपभेदों को आधार बनाया गया था, उसी प्रकार विचार-प्रधान में विचार के भेदोपभेद विचार- णीय हैं। मनोविज्ञान के अनुसार विचार के तीन स्तर-भेद माने जाते हैं-(१) प्रत्यक्षात्मक विचार (Perception) (२) कल्पनात्मक विचार (Manipulation) और (३) प्रत्ययात्मक विचार (Conception)। साहित्य में भी विचारों के ये तीनों रूप उपलब्ध होते हैं, कहीं उन्हें प्रत्यक्ष रूप में कहीं ऐन्द्रियक बिम्बों के रूप में, कहीं कल्पनात्मक रूपों के रूप में और कहीं प्रत्यय रूप में उनकी व्यंजना की जाती है। इस लिए विचार के प्रस्तुती-करण की दृष्टि से हमने 'साहित्य-विज्ञान' में विचार प्रधान साहित्य के तीन प्रकार निश्चित किये हैं- (१) जिसमें विचार ऐन्द्रियानुभूति भावानुभूति के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। (२) जिसमें विचार को कल्पना- त्मक रूप के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। और (३) जिसमें विचार को अन्य विचार के सहयोग से प्रस्तुत किया जाता है। यहाँ तीनों के उदाहरण प्रस्तुत हैं- (क) विचार का भावानुभूति के माध्यम से प्रस्तुतीकरण- माखी गुड़ में गडि रही, पंख रही लपटाय। ताली पीटे सिर धुनैं, मीठै बोई माय। (ख) विचार का कल्पनात्मक रूप के माध्यम से प्रस्तुतीकरण- माली आवत देखिक कलियाँ कर पुकार। फूले-फूले चुनि लिये, काल्हि हमारी बार। (ग) विचार का अन्य विचार या तथ्य के सहयोग से प्रस्तुतीकरण- करत करत अभ्यास के जड़ मति होत सुजान। रसरी आवत जात तै, सिल पर होत निसान।।

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उपयुक्त तीनों उदाहरणों में कवि का लक्ष्य विचार विशेष को ही प्रस्तुत करने का रहा है, किन्तु उनमें क्रमशः ऐन्द्रियकता (भावानुभूति), कल्पनात्मक रूप एवं अन्य विचार को साधन रूप में ग्रहण किया गया है। दर्शन एवं नीतिशास्त्र की दृष्टि से सभी विचारों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है- (१) सत्य, उचित या उच्च विचार। (२) असत्य, अनुचित या हे य विचार। साहित्य में प्रथम प्रकार के विचारों की अनुभूति से औदात्य भाव या शांत रस अथवा बौद्धिकरस की सृष्टि होती है, जब कि दूसरे प्रकार के विचारों के प्रति उपहास या व्यंग्य का भाव उद्दीप्त होता है यहाँ दोनों के उदाहरण प्रस्तुत हैं- (क) 'दुःख की पिछली रजनी बीच, विकसता सुख का नवल प्रभात!' (ख) स्वारथ सुकृत न श्रमु वृथा, देखि विहंग विचारि। बाज पराये पनि परी, तू पच्छीननु न मारि॥ (ग) मरत प्यास पिंजरा परयो सुआ सम के फेर। आदर दे दे बोलियतु वायस बलि की बेर।। उप्युक्त उदाहरणों में जहाँ प्रथम सार्वभौमिक सत्य या महान् विचार को प्रस्तुत करता है, अतः उसमें औदात्य की सत्ता है जबकि शेष उदाहरणों में ऐसे तथ्यों एवं कार्यों पर व्यंग्य किया गया है, जो सामाजिक या नैतिक दृष्टि से अनुचित विचार या तत्त्व के द्योतक हैं। प्रायः हास्य और व्यंग्य को एक ही समझा जाता है, किन्तु हमारे विचार से दोनों में सूक्ष्म अन्तर है। यद्यपि दोंनों में असंगत विचार एवं भावानुभूति का योग रहता है किन्तु हास्य में विचार भाव के अधीन होता है जबकि व्यंग्य में भाव विचार के अधीन रहता है-अतः हास्य को जहाँ हम भाव-प्रधान साहित्य में स्थान देते हैं, वहाँ व्यंग्य को विचार-प्रधान का ही एक भेद मानना उचित होगा। वस्तुत: चिन्तन-प्रक्रिया के भी दो पक्ष होते हैं; एक जिज्ञासा और दूसरा तर्कं। जिज्ञासा ग्राह्य विचारों में प्रवृत्त होती है जबकि तर्क अग्याह्य विचारों का निषेध या उनसे निवृत्त करता है। अतः जहाँ ग्राह्य विचारों (=उच्च, उचित, सत्य विचार) से औदात्य या शान्ति की अनुभूति प्राप्त होती है, वहाँ दूसरे वर्ग के विचारों से तर्क- शक्ति की ही प्रक्रिया से विरक्ति, उपहास एवं व्यंग्य की प्रेरणा मिलती है। अतः इस दृष्टि से विचारप्रधान रचनाओं के दो वर्ग-जिज्ञासा मूलक एवं तर्क मूलक-करते हुए उनमें क्रमशः औदात्य एवं व्यंग्य सम्बन्धी रचनाओं को स्थान दिया जा सकता है।

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• कल्पना-प्रधान साहित्य के भेदोपभेद- वैसे तो भाव-प्रधान एवं विचार-प्रधान साहित्य में भी क्रमशः भावों एवं विचारों की व्यंजना के लिए कल्पना-शक्ति का सहयोग प्रायः लिया जाता है, किन्तु कल्पना-प्रधान साहित्य में हम उन रचनाओं को स्थान देंगे जिनमें कल्पना का लक्ष्य भाव और विचार की अभिव्यक्ति करना न होकर स्वयं कल्पना-शक्ति का ही चमत्कार उत्पन्न करना हो। अवश्य ही, इस प्रकार की रचनाओं में भी विचार और भाव न्यूनाधिक मात्रा में उपलब्ध होंगे, किन्तु वहाँ उनकी स्थिति एवं महत्ता कल्पना के समक्ष गौण रहेगी। काव्यगत कल्पना के मुख्यतः चार भेद किये जा सकते हैं-(१) जहॉ कल्पना मूल ऐन्द्रियक बिम्बों को केवल बिम्बात्मकता के लिए ही प्रस्तुत करती हो। (२) जहाँ कल्पना शक्ति वस्तुओं, क्रिया-कलापों एवं तथ्यों को अस्वाभाविक, विचित्र एवं चमत्कारपूर्ण ढंग से प्रस्तुत करती हो। (३) जहाँ शैलीगत साधनों-वर्ण-विन्यास, शब्द-योजना, अनुप्रास, श्लेष आदि के द्वारा चमत्कार उत्पन्न किया गया हो। वस्तुतः कल्पना के प्रथम दो भेद जहाँ विषयगत वैचित्र्य के सूचक हैं, वहाँ अन्तिम भेद शैली- गत चमत्कार का सूंचक है। इनके कतिपय उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं- (क) फूल खिले हैं-रंग-बिरंगे; सफेद, लाल, नीले, पीले ! (ख) इत आवति, चलि जाति उत, चली छ-सातक हाथ। चढ़ी हिंडौरें सै रहै, लगी उसासनु साथ।। (ग) पानी गये न उबर, मोती, मानस, चून। उपयुक्त तीनों उदाहरणों में कल्पना-शक्ति का लक्ष्य वैचित्र्य उत्पन्न करने का है, जिसे हम दूसरे शब्दों में 'कल्पनात्मक आकर्षण या चमत्कार', कह सकते हैं। प्रायः कल्पना शक्ति भाव एवं विचार के सम्यक् सहयोग के अभाव में उच्चकोटि की रसानु- भूति या सौन्दर्यानुभूति प्रदान करने में असमर्थ और असफल ही सिद्ध होती है; तथा उस स्थिति में वह रचना में शुष्कता, कृत्रिमता, अस्वाभाविकता, अस्पष्टता आदि दोषों का संचार करती है। सामान्यतः कल्पना-प्रधान साहित्य कौतूहल की प्रवृत्ति को तुष्ट करता हुआ मनोरंजन के लक्ष्य की ही पूर्ति करता है। • काव्य-रूपों की दृष्टि से विवेचन- अब तक हमने स्वतन्त्र दृष्टि से काव्य या साहित्य के वस्तु तत्त्व के आधार पर उसके तीन रूपों-भाव प्रधान, विचार-प्रधान, एवं कल्पना-प्रधान-के भेदोपभेदों का विवेचन करते हुए उनके स्वरूप-भेदों को स्पष्ट करने का प्रयास किया है; उसमें उनके बाह्य रूपों की दृष्टि से कोई विचार नहीं किया गया है, जबकि परम्परागत साहित्य-

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शास्त्र में साहित्य का वर्गीकरण मुख्यतः उसके बाह्य रूप-भेदों के आधार पर ही किया जाता है। रूप-भेदों का परम्परागत प्रचलित वर्गीकरण इस प्रकार हैं- काव्य (साहित्य)

पद्यात्मक गद्यात्मक उभयात्मक

प्रबन्ध काव्य गीत काव्य मुक्तक काव्य नाटक एकांकी

कथा-साहित्य निबन्ध आलोचना

उपन्यास कहानी तालिका में प्रस्तुत भेदों के अतिरिक्त भी अनेक भेद; यथा-जीवनी. संस्मरण, आत्मकथा, रेखाचित्र, रेडियो रूपक, गद्य-काव्य आदि उपलब्ध हैं, जिन्हें हमारे विचार से उनकी प्रकृति को देखते हुए उपयुक्त भेदों के ही उपभेद के रूप में स्थान दिया जा सकता है; जैसे-जीवनी आत्म-कथा, संस्मरण रेखाचित्र को कथा-साहित्य के उपभेदों में, गद्यकाव्य को निबन्ध के उपभेद में, रेडियो रूपक को एकांकी के उपभेद के रूप में समन्वित किया जा सकता है। वस्तुतः यहाँ मूल प्रश्न विभिन्न रूप-भेदों के विस्तार या संकोच का नहीं है, अपितु यह है कि क्या रस-सिद्धान्त का सम्बन्ध इन सभी रूपों से स्थापित होता है, या उसका क्षेत्र नाटक एवं प्रबन्ध काव्य तक ही सीमित है, क्योंकि अनेक विद्वानों के विचार से रस-सिद्धान्त की स्थापना मूलतः नाटक को ध्यान में रखकर ही की गयी थी तथा आगे उसे प्रबन्ध काव्यों पर भी लागू किया गया, जबकि अन्य रूपों में विभाव, अनुभाव, संचारी आदि की योजना सम्यक् रूप में सम्भव नहीं-अतः अन्य काव्य- रूपों पर उसे लागू करना उचित नहीं। अवश्य ही इस आक्षप में आंशिक सत्य है; विभावादि के प्रस्तुतीकरण की जैसी सम्भावना नाटक में होती है, वसी ही अन्य काव्य- रूपों में नहीं है; तथा मूलतः नाट्यकला की दृष्टि से ही रस-सिद्धान्त की स्थापना हुई थी। किन्तु परवर्ती युग में प्रबन्ध-काव्य एवं मुक्तक को ध्यान में रखकर ही रस सिद्धान्त में संशोधन-परिवर्द्धन भट्टनायक, अभिनवगुप्त प्रभृति आचार्यों द्वारा हुआ। फिर भी यह तथ्य है कि मुक्तक, गीति, निबन्ध, आलोचना आदि में प्रायः रचयिता (आश्रय) के ही भावों, अनुभावों, दृष्टिकोण एवं विचारों की अभिव्यक्ति होती है- शेष अवयव, आलम्बन, उद्दीपन, संचारी आदि उसमें प्रत्यक्ष रूप में उस प्रकार प्रस्तुत

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नहीं होते जिस प्रकार कि नाटक या प्रबन्धकाव्य में सम्भव है। दूसरे, जहाँ नाटक में विभावादि के प्रस्तुतीकरण द्वारा ही भाव को व्यक्त किया जाता है, वहाँ उपयुक्त रूपों में विभावादि के स्थान पर कल्पना-शक्ति एवं शैलीगत तत्त्वों के माध्यम से भी भाव को संवेदित या संप्रेषित कर दिया जाता है। तीसरे, गद्य साहित्य के अनेक रूप-भेदों में स्थायी भाव की प्रमुखता न होकर लेखक के दृष्टिकोण, विचार या तत्त्व- बोध की प्रमुखता रहती है; जबकि विभावादि से सम्बन्धित सूत्र में इनके लिए कोई अवकाश नहीं है। अतः निश्चय ही रस सिद्धान्त का परम्परागत रूप जो कि आचार्य भरत के सूत्र पर आधारित है- मुक्तक, गीति, निबन्ध, समीक्षा आदि रूपों का विवे- चन, विश्लेषण एवं मूल्यांकन सम्यक् रूप में नहीं कर पाता। अस्तु, उपयुक्त स्थिति हमारे मूल लक्ष्य के प्रतिकूल है किन्तु यह बात परम्परागत रूप पर ही लागू होती हैं; यदि हम रस को व्यापक रूप में ग्रहण करते हुए प्रत्येक प्रकार की कलानुभूति, काव्यानुभूति या काव्यात्मक सौन्दर्यानुभूति को ही रस की अनुभूति की पर्याय मानते हैं तो उस स्थिति में निश्चय ही सभी काव्य-रूपों का सम्बन्ध रसानुभूति से स्वीकार करना होगा क्योंकि अन्ततः काव्य या साहित्य की श्रेणी में आने वाली प्रत्येक रचना का प्रमुख गुण या आधारभूत लक्षण रसानुभूति (सौन्दर्यानुभूति) प्रदान करने की क्षमता ही है; उसकी विषय-वस्तु एवं बाह्य विधा जो चाहे हो। किन्तु इस सम्बन्ध की स्थापना या उसके सम्यक् विश्लेषण के लिए हमें एक तो विभिन्न काव्य-रूपों के आधारभूत अवयवों, तत्त्वों या अंगों का विश्लेषण करना होगा तथा दूसरे उन्हें ध्यान में रखकर ही रसानुभूति के अवयवों-विभावादि पर पुनर्विचार करना होगा। अतः आगे क्रमशः ऐसा ही करने का प्रयास किया जाता है।

काव्य-रूपों के आधारभूत तत्त्व-परम्परागत साहित्य-शास्त्र में विभिन्न काव्य- रूपों के वैशिष्ट्य एवं उनके पारस्परिक अन्तर को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न तत्त्वों का निर्धारण किया गया है; जो संक्षेप में इस प्रकार है-

नाटक प्रबन्ध-काव्य कथा-साहित्य गीति-काव्य निबन्ध समीक्षा

१. वस्तु १. वस्तु १. वस्तु X विषय-वस्तु आलोच्यकृति २. पात्र २. पात्र २. पात्र वैयक्तिकता वैयक्तिकता X ३. संवाद ३. संवाद ३. संवाद X X X ४. देश-काल ४. देशकाल ४. देशकाल X X X

५. शैली संगीतात्मकता ५. शैली ५. शैली कोमलता शैली शेली (संक्षिप्तता ६. उद्देश्य ६. उद्देश्य ६. उद्देश्य भावात्मकता X दृष्टिकोण/निर्णय

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यहाँ हमने पाश्चात्य साहित्य-शास्त्र के प्रचलित तत्त्व-निरूपण को ही स्थूल रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे एक बात स्पष्ट है कि उपयुक्त्त तत्त्व विभिन्न काव्य- रूपों के भेदक लक्षण कम हैं, उनकी पारस्परिक समानता के द्योतक अधिक हैं; यथा-नाटक, प्रबन्ध-काव्य और कथा-साहित्य में तात्त्विक दृष्टि से कोई अन्तर नहीं है, जिससे यह भ्रान्ति उत्पन्न हो सकती है कि इनमें परस्पर कोई अन्तर नहीं है। वस्तुतः तात्त्विक समानता के होते हुए भी इनमें विभिन्न तत्त्वों की नियोजन- पद्धति एवं उपयोग-विधि में अन्तर है, जिसका यहाँ उल्लेख नहीं किया गया-अतः कहना चाहिए कि प्रचलित निरूपण भ्रामक या दोष-पूर्ण है। हमारे विचार में विभिन्न काव्य-रूपों का स्वरूप स्पष्ट करने एवं उनके पार- स्परिक अन्तर को उद्घाटित करने के लिए उन पर तीन दृष्टियों से विचार किया जाना चाहिए-एक तो प्रत्येक काव्य-रूप की मूल प्रकृति की दृष्टि से, दूसरे उसकी विषय-वस्तु के क्षेत्र-विस्तार की दृष्टि से और तीसरे उसके माध्यम या बाह्य रूप के भेदक लक्षणों की दृष्टि से। जहाँ तक मूल प्रकृति की बात है, कुछ काव्य-रूप भाव- प्रधान हैं, कुछ विचार-प्रधान एवं कुछ कल्पना-प्रधान। उदाहरण के लिए, जहाँ पद्यात्मक रूपों में भावात्मकता अपेक्षाकृत अधिक सम्भव है, वहाँ गद्यात्मक में अपेक्षाकृत न्यून रहेगी। फिर गद्य और पद्य में भी क्र्मशः प्रबन्ध-काव्य निबन्ध, समीक्षा आदि में विचार-तत्त्व की, नाटक और गीति काव्य में भाव तत्त्व की तथा मुक्तक, काव्य व उपन्यास-कहानी में कल्पना की प्रमुखता स्वीकार की जा सकती है-यद्यपि इसके अपवाद भी रचयिता के लक्ष्य-विशेष के अनुसार सम्भव है। जहाँ तक विषय-वस्तु के विस्तार की बात है, हम सृष्टि के सभी विषयों को साहित्य की दृष्टि से निम्नांकित वर्गों में वर्गीकृत कर सकते हैं- (१) प्राकृतिक जगत्-(क) स्थान, पदार्थ, दृश्य, स्थितियाँ आदि। (देश) (ख) वातावरण, जलवायु, परिवेश आदि। (काल) (२) प्राणी जगत्-(क) व्यक्ति (मानव) (ख) मानवेतर प्राणी। (३) परिस्थितियाँ और घटनाए। (४) क्रिया-कलाप, कार्य आदि। (५) भावानुभूतियाँ-प्रवृत्तियाँ, मनोवृत्तियाँ, भावनाएँ आदि। (६) विचार (तत्त्व), सिद्धान्त आदि। जिन काव्य-रूपों का लक्ष्य जीवन को सम्पूर्ण रूप में प्रस्तुत करना है उनमें तो उपयुक्त सभी वर्गों का प्रस्तुतीकरण सम्भव है, किन्तु जो जीवन के एक ही पक्ष को लेकर चलते हैं इनमें से किसी एक ही वर्ग को प्रमुख बनाकर शेष को गौण कर देते हैं; इस दृष्टि से नाटक प्रबन्ध, उपन्यास-प्रथम प्रकार के हैं, तथा गोति, मुक्तक,

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निबन्ध, समीक्षा, कहानी, एकांकी आदि दूसरे प्रकार के हैं। दूसरे प्रकार के रूपों में भी क्रमशः भावानुभूति (गीति काव्य में) विचार या कल्पना (मुक्तक में), विचार (निबन्ध, समीक्षा आदि में), पात्र, घटना या कार्य में से किसी एक (एकांकी, कहानी आदि में) को प्रमुखता दी जाती है, पर इसके सम्बन्ध में कोई सामान्य नियम निर्धारित नहीं किया जा सकता। बाह्य रूप-भेदों या माध्यम की दृष्टि से विभिन्न काव्य-रूपों में एक अन्तर तो यह है कि यहाँ नाटक एवं एकांकी को अभिनय (अनुमति) के माध्यम से प्रस्तुत करने का लक्ष्य रहता है, वहाँ शेष काव्य रूप भाषा-माध्यम तक ही सीमित रहते हैं। तदनन्तर पद्यात्मक काव्य-रूप छन्द एवं लय का आश्रय ग्रहण करते हैं जबकि गद्यात्मक रूपों में ऐसा नहीं होता। तीसरे, प्रबन्ध, उपन्यास, कथा आदि में लेखक किसी अन्य पात्र के माध्यम से अपनी बात कह सकता है, वहाँ गीत, निबन्ध, समीक्षा आदि में वह स्वयं ही कथ्य को प्रस्तुत करता है। इसी प्रकार निबन्ध, समीक्षा आदि में भी रचयिता के पास भाषा-शैली का ही प्रमुख माध्यम रह जाता है। अस्तु, विभिन्न काव्य-रूपों की प्रकृति, विषय-वस्तु के क्षेत्र-विस्तार, शैली या माध्यम की विशेषताए संक्षप में यहाँ प्रस्तुत की जाती हैं-

सामान्य प्रकृति विषय-क्ष त्र शैली या माध्यम

१. प्रबन्ध काव्य भाव-प्रधान सम्पूर्ण जीवन छन्द, लय, भाषाशैली २. गीति काव्य भाव-प्रधान जीवन का एक पक्ष संगीत, छन्द शैली, ३. मुक्त काव्य कल्पना-प्रधान लय, भाषा-शैली ४. उपन्यास कल्पना-प्रधान सम्पूर्ण जीवन भाष-शैलो ५. कहानी कल्पना-प्रधान एक पक्ष ६. निबन्ध विचार-प्रधान एक पक्ष ७. आलोचना विचार-प्रधान आंशिक जीवन ८. नाटक भाव-प्रधान आंशिक जीवन अभिनय, संगीत, वाद्य, भाषा-शैली ९. एकांकी कल्पना-प्रधान एक पक्ष उपयुक्त विश्लेषण के सम्बन्ध में यह उल्लेखनीय है कि एक तो इसमें भाव- प्रधान, विचार-प्रधान, कल्पना-प्रधान आदि से यही तात्पर्य है कि उनमें क्रमशः भाव- विचार, कल्पना की प्रमुखता रहती है, किन्तु अंग-रूप में दूसरे तत्त्व भी समन्वित रहते हैं। दूसरे, रूप भेदों की प्रकृति का निर्णय विभिन्न रूप भेदों की प्रमुख प्रवृत्तियों को ध्यान में रखकर ही किया गया है किन्तु रचयिता की रुचि, प्रवृत्ति एवं उसके लक्ष्य के अनुसार इनमें बहुत-कुछ परिवर्तन की भी संभावना है: अतः इसे सामान्य नियम के रूप में ग्रहण करना उचित न होगा। वस्तुतः इस दृष्टि से प्रत्येक काव्य

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३६८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

रूप का विस्तृत अध्ययन-रचयिता की मूल प्रकृति, रुचि, प्रवृत्ति, प्रेरणा, प्रयोजन एवं उसके आधारभूत विषय की विशेषताओं के आधार पर किये जाने की अपेक्षा है। फिर भी यहाँ प्रस्तुत विश्लेषण से विभिन्न काव्य-रूपों के भेदक लक्षणों का बोध प्राप्त करने में थोड़ी सहायता अवश्य मिलेगी-ऐसा हमारा विश्वास है। • रसावयवों का पुनविवेचन-

अब हमें रस के परम्परागत अवयवों-स्थायी भाव, संचारी भाव, और अनुभाव-पर इस दृष्टि से विचार करना है कि उनसे विभिन्न काव्य-रूपों के विवे- चन-विश्लेषण में कहाँ तक सहायता प्राप्त हो सकती है ? इस सम्बन्ध में एक बात तो यह उल्लेखनीय है कि इन अवयवों की परम्परागत व्याख्या के अनुसार इनका क्षेत्र अत्यन्त सीमित, संकीर्ण एवं रूढ़िबद्ध हो गया है, अतः इनके क्षेत्र विस्तार की अपेक्षा है। दूसरे, वे केवल भाव-प्रधान साहित्य के ही संदर्भ में उपयुक्त सिद्ध होते हैं जबकि अब उन्हें विचार-प्रधान एवं कल्पना-प्रधान साहित्य पर भी लागू किये जाने की आवश्यकता है-अतः इस दृष्टि से भी उनमें संशोधन परिवर्तन की अपेक्षा है। अस्तु, इन दोनों ही अपेक्षाओं की पूर्ति का प्रयास यहाँ किया जाता है। स्थायी भाव-सर्व प्रथम हम 'स्थायी भाव' को लेते हैं। जैसा कि इसका मनोवज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करते समय पीछे स्पष्ट किया गया था-मनोविज्ञान की दृष्टि से स्थायी भाव किसी एक मनोवैज्ञानिक तत्त्व का पर्याय नहीं है अपितु उसमें मानव-मन की उन सभी स्थिर एवं दीर्घकालीन भावात्मक प्रवृत्तियों का समन्वय हो जाता है, जिन्हें मनोविज्ञान के क्षेत्र में सहज प्रवृत्ति (Instinct), भावना (Senti- ment). मनोवृत्ति (Temperament), भावात्मक दृष्टिकोण (Attitude) आदि कहा जाता है। वस्तुतः अनुभूति, संवेग, व्युत्पन्न भाव, मनः स्थिति (Mood) आदि अस्थिर, अल्पकालीन एवं संचरणशील भावात्मक प्रवृत्तियों की तुलना में उपयुक्त प्रवृत्तियाँ स्थिर, दीर्घकालीन या स्थायी हैं-इसी से जहाँ संचरणशील प्रवृत्तियों को इस सिद्धान्त में संचारी भाव कहा गया, वहाँ इन्हें स्थायी भाव की संज्ञा दी गयी है। किन्तु स्थायी भावों का नामकरण उनसे सम्बन्धित मूल भावों (Primary emotions) के आधार पर किये जाने के कारण स्थायी भावों का क्षेत्र सीमित दिखाई पड़ता है, जबकि वस्तुतः ऐसा नहीं है। उदाहरण के लिए 'रौद्र रस' के स्थायी भाव को 'क्रोध' कहा गया है जबकि 'कोध' स्वयं स्थायी भावात्मक न होकर संचरणशील भाव है-अतः इसका मून आधार युयुत्सा की प्रवृत्ति है तथा इसके स्थायी भावात्मक रूप में द्वष, प्रतिशोध, विद्रोह क्रान्ति आदि की वे सभी भावनाएँ स्व्रीकार की जा सकती हैं जिनकी अभिव्यक्ति मुख्यतः या मूलतः 'क्रोध' के रूप में होती है। अस्तु, स्थायी भावों का क्षेत्र मूल भावों तक सीमित नहीं है, अपितु प्रत्येक मूल भाव से सम्बन्धित उन सभी भावनाओं, मनोवृत्तियों एवं चारित्रिक प्रवृत्तियों को उनके

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अन्तर्गत स्थान दिया जा सकता है, जो एक ओर तो व्यक्ति के जीवन में तथा दूसरी ओर काव्य, नाटक, उपन्यास आदि में प्रारम्भ से लेकर अन्त तक स्थायी प्रेरणा, लक्ष्य, या मूलाधार के रूप में कार्य करती है। वस्तुतः काव्य में जहाँ स्थायी भाव के भावात्मक रूप का ही चित्रण प्रमुख रूप में होता है, वहाँ उपन्यास, कहानी, निबन्ध, समीक्षा आदि में क्रमशः उसकी स्थिर मनोवृत्ति, चारित्रिक प्रवृत्ति, वैचारिक दृष्टि एवं दृष्टिकोण का भी चित्रण संभव है। यदि परम्परागत रूढ़ियों से मुक्त होकर स्वतन्त्र एवं व्यापक दृष्टि से विचार करें तो यह स्पष्ट होगा कि जिन्हें भारतीय आचार्यों ने 'स्थायी भाव' की संज्ञा दी है, वे वस्तुतः वे मनोवैज्ञानिक तत्त्व हैं जो व्यक्ति के मन में-उपचेतन या अचेतन स्तर पर-सदा विद्यमान रहते हैं और व्यक्ति के जीवन को प्रेरित एवं संचालित करते रहते हैं; प्रत्येक व्यक्ति का चरित्र, स्वभाव, व्यवहार, क्रिया-कलाप-इन्हीं स्थिर किन्तु विकासोन्मुख मानसिक तत्त्वों से परिचा- लित होता है। इन्हें मनोविज्ञान की शब्दावली में 'प्रेरक तत्त्व' (Motive) कहा जाता है। पहले मनोवैज्ञानिक का यह विचार था कि केवल सहज प्रवृत्तियाँ (Insti- nets) ही हमारी प्रेरक शक्तियाँ हैं किन्तु अब यह समझा जाने लगा है कि सहज प्रवृत्तियाँ परिस्थिति, वातावरण एवं संस्कार से मिलकर अनेक भावात्मक एवं चारि- त्रिक प्रवृत्तियों में विकसित होती है; तथा इसके अतिरिक्त कुछ प्रेरणाएँ जन्मजात न होकर वैयक्तिक एवं सामाजिक वातावरण से अरजित भी होती हैं जबकि सहज प्रवृ- त्तियाँ जन्मजात ही होती हैं-अतः सभी व्यक्तियों की एक मात्र प्रेरक शक्ति के रूप में केवल वासनाओं या सहज प्रवृत्तियों तथा उनके विकसित रूपों को ही स्वीकार करना दृष्टिकोण की एकांगिता का परिचायक होगा। कुछ प्रेरणायें स्वाभाविक न होकर अस्वाभाविक या असामान्य (Abnormal) भी होती हैं, जिनका अध्ययन मनोविश्लेषण में प्रस्तुत किया गया है-इन्हें 'कुठा' या 'ग्रन्थि' (जैसे हीनता की ग्रन्थि) कहा गया है तथा कुछ व्यक्तियों के जीवन में कुठाओं एवं ग्रन्थियों का प्रभाव इतना प्रमुख हो जाता है कि उनके समक्ष अन्य सभी प्रेरक गौण हो जाते हैं तथा मनोविश्लेषणात्मक उपन्यासों में इन्ही को प्रमुखता दी जाती है। ऐसी स्थिति में इन्हें भी व्यक्ति-विशेष या रचना विशेष के संदर्भ में स्थायी प्रेरणा (या रस सिद्धान्त की शब्दावली में 'स्थायी भाव') के रूप में स्वीकार करना होगा। वस्तुतः आधुनिक मनोविज्ञान में प्ररकों (Motives) के अन्तर्गत सहज प्रवृत्ति से लेकर अवचेतन मन की ग्रन्थियों तक विभिन्न स्थिर तत्त्वों को स्थान देते हुए उनका वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है- (क) प्र रक या प्रेरणा के दो प्रमुख भेद-(१) जन्मजात (२) अजित। (ख) जन्मजात प्ररणाओं के उपभेद-भूख, प्यास, काम, क्रोध, आदि से सम्बन्धित वासनाए या सहज प्रवृत्तियाँ। (ग) अजित प्ररणाओं के भी दो प्रकार-(१) वैयक्तिक (२) सामाजिक।

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३७० रस-सिद्धान्त का पुनर्वविवेचन

१-वैयक्तिक प्रेरणाओं के भेद-(१) आकांक्षा (२) लक्ष्य (३) रुचि (४) अचेतन प्रेरणाएँ-कुण्ठाएँ व ग्रन्थियाँ आदि। (५) मनोवृत्तियाँ (६) आदत (७) व्यसन-शौक (चारित्रिक वैशिष्ट्य)। २-सामाजिक प्रेरणाओं के भेद-(१) सामुदायिकता या सामाजिकता की प्रवृत्ति (२) आत्म-स्थापन की प्रवृत्ति (३) अधिकार-भावना (४) युयुत्सा (युद्ध-संघर्ष) की प्रवृत्ति । इस प्रकार हम देखते हैं कि मनोविज्ञान की दृष्टि से प्रेरकों के अन्तर्गत उन सभी स्थिर मानसिक तत्त्वों, भावों एवं प्रवृत्तियों को स्थान दिया जाता है जो व्यक्ति के समस्त व्यवहार (क्रिया-कलाप) को प्रेरित एवं संचालित करते हैं। इनमें परम्परागत सभी स्थायीभाव न केवल भली भाँति समन्वित हो जाते हैं, अपितु उनका क्षेत्र भी इतना व्यापक हो जाता है कि जीवन से सम्बन्धित सभी प्रकार की साहित्यिक रचनाओं-भाव प्रधान कविताओं, विचार-प्रधान मुक्तकों, कल्पना प्रधान उपन्यासों या चरित्र-प्रधान अथवा मनोविश्लेषणात्मक कथा-साहित्य आदि सभी की व्याख्या उनके आधार पर सम्भव है। वस्तुतः आज के न केवल गद्यात्मक साहित्य में अपितु पद्यात्मक काव्य में भी पात्र के भाव-विशेष के स्थान पर उसकी मनोवृत्ति, चारित्रिक प्रवृत्ति, आकांक्षा, कुण्ठा, ग्रन्थि आदि का ही निरूपण कलात्मक माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है-अवश्य ही इनमें सम्बन्धित वृत्ति, प्रवृत्ति, आकांक्षा आदि का चित्रण अनुभूति के रूप में तथा विभिन्न भावों के सहयोग से ही किया जाता है, किन्तु फिर भी उनमें प्रमुखता उपयुक्त तत्त्वों में से ही किसी एक की सम्भव है। अतः हम परम्परागत स्थायी भाव के क्षेत्र में न केवल स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों को अपितु प्ररक के अन्तर्गत उल्लिखित सभी प्ररणाओं, मनोवृत्तियों एवं प्रवृत्तियों को स्थान देना आवश्यक समझते हैं। साथ ही यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि 'स्थायी भाव' शब्द में 'भाव' शब्द संकीर्णता का द्योतक है-क्योंकि यह केवल भावात्मक रचनाओं या भाव-प्रधान रचनाओं पर ही लागू होता है-अतः इसे 'स्थायी तत्त्व' या 'केन्द्रीय तत्त्व' कहना अधिक उचित होगा। जहाँ भाव-प्रधान रचनाओं में स्थायी तत्त्व या केन्द्रीय तत्त्व कोई स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति या भावना विशेष होगी, वहाँ विचार-प्रधान रचनाओं में साहित्यकार का लक्ष्य-विशेष, या प्रतिपाद्य तत्त्व ही केन्द्रीय तत्त्व के रूप में स्वीकार्य होगा तथा इसी प्रकार कल्पना प्रधान साहित्य में भी बिम्ब-विशेष या रूप-विशेष का प्रस्तुतीकरण ही उसका लक्ष्य होगा-अस्तु, इसका निर्णय रचना-विशेष के अनुसार किया जा सकता है, किन्तु सामान्य रूप में हम सभी प्रकार की रचनाओं के संदर्भ में 'स्थायीभाव' के स्थान पर 'केन्द्रीय तत्त्व' संज्ञा का प्रयोग करते हुए उसके अन्तर्गत उस तत्त्व-विशेष को ग्रहण करेंगे जो कि सम्पूर्ण रचना में आधारभूत केन्द्रीय एवं प्ररक तत्त्व के रूप में दृष्टिगोचर होता है।

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संचारी भाव-संचारी भाव में परम्परागत रस-सिद्धान्त के अनुसार उन संचरणशील एवं अस्थिर भाव-दशाओं एवं अनुभूतियों को स्थान दिया जाता है जो एक ओर तो स्थायी भाव पर ही आधारित होती हैं तथा दूसरी ओर उसी की पुष्टि एवं अभिव्यक्ति में योग देती हैं। संचारी भाव के मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर पीछे स्पष्ट किया जा चुका है कि परम्परागत ३३ संचारियों में मनो- विज्ञान के व्युत्पन्न भावों, मिश्रित भावों, एवं अनुभूतियों के विभिन्न भेदों को स्थान दिया गया है तथा साथ ही कुछ ऐसी शारीरिक प्रवृत्तियों को भी सम्मिलित कर लिया गया है जो संचारी भाव की अपेक्षा अनुभाव के स्वरूप के अधिक अनुकूल हैं। अस्तु, स्थायी भाव की ही भाँति संचारी भावों का भी निर्धारण भाव-प्रधान साहित्य की ही दृष्टि से हुआ है, अतः विचार-प्रधान एवं कल्पना-प्रधान साहित्य की दृष्टि से भी इसके स्वरूप एवं क्षेत्र में संशोधन व विस्तार अपेक्षित है। हमारे विचार में 'संचारी भाव' का मूल प्रयोजन स्थायी भाव के ही विभिन्न अंगों, स्थितियों, रूप- भेदों को प्रस्तुत करने का है-उदाहरण के लिए प्रणय स्थायी भाव के अन्तर्गत नायक की उपस्थिति में नायिका के मन में 'हर्ष', उसकी अनुपस्थिति में 'चिन्ता', उसकी प्रतीक्षा में 'औत्सुक्य', उसकी स्मृति में 'विषाद' आदि संचारियों का उद्दीपन होना-'प्रणय' के ही विभिन्न स्थिति-भेदों का परिचायक होगा। वस्तुतः जिस प्रकार अनेक बूँदों से समुद्र का बोध होता है, या अनेक मणियों के सामूहिक रूप से माला का, उसी प्रकार विभिन्न संचारियों के योग से स्थायीभाव का बोध होता है-अतः कहना चाहिए कि संचारी भाव स्थायी भाव के ही 'घटक' 'पूरक' या साधक तत्त्व हैं। सामान्य रूप में यदि स्थायीभाव को हम 'स्थायी तत्त्व' या 'केन्द्रीय तत्त्व' की संज्ञा देते हैं तो 'संचारी भाव' को स्थिति-विशेष, परिस्थिति-विशेष, क्षण- विशेष एवं अंग-विशेष से सम्बन्धित उसका घटक, साधक या पोषक तत्त्व कह सकते हैं। वस्तुतः स्थायी भाव यदि केन्द्रीय या अंगी तत्त्व है तो संचारी भाव उसी पर केन्द्रित अंग या साधक तत्त्व है। सामान्य रूप में हम उसे सहयोगी या पूरक तत्त्व कह सकते हैं। विचार प्रधान एवं कल्पना-प्रधान साहित्य में उन बिन्दुओं, बिम्बों, सूत्रों, तथ्यों व निष्कर्षों की अनुभूति को संचारी या 'सहयोगी तत्त्व' के रूप में ग्रहण कर सकते हैं जो मूल भाव, आशय, तत्त्व, रूप आदि-जिन्हें हम सामान्य रूप में 'केन्द्रीय तत्त्व' की संज्ञा देते हैं-प्रतिपादन, चित्रण, पोषण या अभिव्यंजन में सहयोग देते हैं या जिनके द्वारा केन्द्रीय तत्त्व की पुष्टि एवं अभिव्यक्ति होती है। विभाव-'विभाव' का स्वरूप स्पष्ट करते हुए रस सिद्धान्त के आचार्यों ने इसे स्थायी भाव एवं रस के 'हेतु, कारण अथवा निमित्त' के रूप में स्वीकार किया है। डा० आनन्द प्रकाश दीक्षित के शब्दों में-'अतएव लोक में प्रचलित हेतु, कारण अथवा निमित्त शब्दों के लिए रस शास्त्र में पृथक रूप से 'विभाव' शब्द को ग्रहण

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३७२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

किया गया है।" वस्तुतः पीछे विभाव का मनोवैज्ञानिक अध्ययन प्रस्तुत करते समय यह भली भाँति स्पष्ट कर दिया गया है कि विभिन्न विद्वानों की मान्यता के अनुसार रस-शास्त्र में स्थायीभाव एवं संचारी भावों की उद्दीप्ति के कारणों को ही विभाव, की संज्ञा दी गयी है; ये कारण भी दो प्रकार के हैं-एक, 'आलम्बन', और दूसरा 'उद्दीपन'। इन दोनों के भी परम्परागत विवेचन एवं मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर यह प्रतिपादित किया गया था कि आलम्बन के अन्तर्गत व्यक्ति-विशेष तथा 'उद्दीपन' के अन्तर्गत प्रकृति, ऋत एवं दृश्यों को ही लेना संकुचित दृष्टि का परिणाम है। भाव के संदर्भ में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उन सभी प्रकार के पदार्थों, वस्तुओं, व्यक्तियों एवं प्रयोजनों को आलम्बन में स्थान दिया जा सकता है जो भाव- विशेष की उद्दीप्ति के आधारभूत कारण हैं तो 'उद्दीपन' के अन्तर्गत उन सब स्थितियों, परिस्थितियों, घटनाओं एवं मनोवंज्ञानिक स्थितियों को ग्रहण किया जा सकता है जो भाव-विशेष के उद्दीपन एवं पोषण में आलम्बन को सहयोग देती हैं। दूसरे शब्दों में 'उद्दीपन' के अन्तर्गत न केवल प्राकृतिक वातावरण को अपितु सामाजिक परिवेश राजनीतिक परिस्थितियों, सांस्कृतिक अवस्थाओं एवं मनोवैज्ञानिक स्थितियों आदि उन सभी तथ्यों को लिया जा सकता है जो 'आलम्बन' को भावोद्दीपन के उपयुक्त संदर्भ प्रदान करती है। हम जंगल में सिंह को देखकर भयभीत होते हैं, जबकि चिड़िया घर एवं सर्कस में ऐसा नहीं होता-यद्यपि दोनों ही परिस्थितियों में आलम्बन विद्यमान है, फिर भी एक स्थिति में भय का भाव उद्दीप्त होता है, तथा दूसरी में नहीं-वस्तुतः दोनों में अन्तर आलम्बन का नहीं; स्थिति, परिस्थिति, परिवेश, या संदर्भ का है। संदर्भ-विशेष में ही वस्तु-विशेष अपना प्रभाव या भाव उत्पन्न करती-अस्तु, हम परम्परागत शब्द 'उद्दीपन' को व्यापक अर्थ प्रदान करते हुए उसके स्थान पर 'परिवेश' या 'संदर्भ' का प्रयोग करें तो अधिक उचित होगा। विचार-प्रधान एवं कल्पना-प्रधान साहित्य की दृष्टि से भी 'आलम्बन' को 'आधार' या 'हेतु' (आधारभूत हेतु) तथा 'उद्दीपन' को 'परिवेश' या 'संदर्भ' कहा जा सकता है। अनुभाव-रस-शास्त्रीय विवेचना में 'अनुभाव' के दो अर्थ किये जाते हैं- एक जो भाव का अनुवर्ती हो तथा दूसरा जो भाव का अनुभव (प्रतीत या बोध) म्रदान करे। नाटक और काव्य में उन शारीरिक, मानसिक एवं सात्त्विक चेष्टाओं व अभिव्यक्तियों को जो भाव-विशेष की व्यंजना करती हैं, अनुभाव के तीन भेदों के रूप में स्वीकार किया गया है; और साथ ही यह भी निर्देश है कि लोक में इन्हें 'कार्य' कहा जाता है। इसका स्पष्टीकरण हम चतुर्थ खण्ड में विस्तार से कर चुके हैं; अतः पुनरावृत्ति से बचते हुए यही कहना पर्याप्त समझेंगे कि जहाँ नाटक की

१. रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण; पृ० सं० १७-१८।

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रस-भेद एवं काव्य-रूप : पुनर्वविवेचन ३७३

बात है, उसमें अभिनेता कार्य नहीं करते-चेष्टाओं से ही कार्यों की अनुकृति का प्रस्तुतीकरण व भावों की व्यंजना करते हैं, किन्तु लौकिक दृष्टि से हमारे वे समस्त क्रिया-कलाप, कार्य-व्यापार एवं व्यवहार-भेद जो हमारी किसी न किसी मानसिक प्रवृत्ति के व्यंजक हैं, 'अनुभाव' के ही क्षेत्र में आते है। जिस प्रकार नाटक में नायक एवं अन्य पात्रों के मनोभावों की अभिव्यक्ति शारीरिक, मानसिक, सात्त्विक चेष्टाओं के माध्यम से होती है. उसी प्रकार व्यावहारिक जीवन में हमारी विभिन्न सहज प्रवृत्तियों, मनोवृत्तियों, भावनाओं, चारित्रिक प्रवृत्तियों, धारणाओं, रुचियों एवं दृष्टिकोणों की अभिव्यक्ति हमारे विभिन्न क्रिया-कलापों, कार्यों एवं व्यवहारों से होती है तथा मनोविज्ञान में इन सबको 'व्यवहार' (Behaviour) के अन्तर्गत हो लिया जाता है। पर कला की दृष्टि से इन्हें अभिव्यक्ति के माध्यम या केवल 'माध्यम' के रूप में भी स्वीकार किया जा सकता है। वस्तुतः रस-सिद्धान्त के व्यापक रूप की दृष्टि से जहाँ भाव-प्रधान साहित्य में उन सब क्रिया-कलापों, कार्यों एवं व्यावहारिक प्रवृत्तियों को 'अनुभाव' के अन्तर्गत लिया जा सकता है जो मूल भाव या केन्द्रीय तत्त्व से सम्बन्धित हैं तो विचार-प्रधान एवं कल्पना-प्रधान साहित्य में हम केन्द्रीय तत्त्व को व्यक्त करने वाले उन सब साधनों को जो कि केन्द्रीय तत्त्व से पृथक होते हुए भी उसकी अभिव्यक्ति या पुष्टि के प्रत्यक्षीकरण का कार्य करते हैं-अनुभाव के अन्तर्गत ले सकते हैं तथा सामान्य रूप में इन्हें 'माध्यम' की संज्ञा दे सकते हैं। विचार तत्त्व की पुष्टि या अभिव्यक्ति में जहाँ विभिन्न युक्तियाँ, तर्क, प्रमाष, सादश्य, दृष्टान्त, उदाहरण आदि माध्यम का कार्य करते हैं, वहाँ कल्पना- प्रधान साहित्य में कल्पित रूप की अभिव्यक्ति में योग देने वाले साधनों-यथा; उपमान, प्रतीक, अप्रस्तुत-रूप, आदि-को 'माध्यम' के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। अस्तु, 'अनुभाव' के स्थान पर 'माध्यम' शब्द का प्रयोग परम्परागत अर्थ को सुरक्षित रखता हुआ भी उसे अपेक्षाकृत अधिक व्यापक एवं संगत रूप प्रदान करता है, क्योंकि 'माध्यम' का सम्बन्ध न केवल भावों की अभिव्यक्ति से है, अपितु विचारों के प्रस्तुतीकरण, कल्पनात्मक तत्त्वों की व्यंजना एवं विभिन्न वस्तुओं, पदार्थों व कलाकृतियों के रूप-विधान से भी है; तथा साथ ही, 'माध्यम' रूप की अभिव्यक्ति एवं उसके बोध के उस उभयपक्षी कार्य का भी सूचक है, जो अनुभाव का मूल लक्ष्य रहा है। अतः व्यापक दृष्टि से 'अनुभाव' का अर्थ है-'माध्यम'। रसावयवों का समन्वित रूप-स्थायी भाव, संचारी भाव, विभाव,(आलंबन और उद्दीपन), अनुभाव आदि के पुनर्विवेचन से उपलब्ध निष्कर्षों को यहाँ समन्वित रूप में प्रस्तुत किया जाता है- (क) स्थायी भाव- (अ) परम्परागत अर्थ-विभिन्न स्थायी भावात्मक प्रवृतियाँ जो मूल भावों से सम्बन्धित हैं।

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३७४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

(आ) व्यापक अर्थ में-वे सभी स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियाँ, मनोवृत्तियाँ, चारित्रिक प्रवृत्तियाँ, रुचियाँ, ग्रन्थियाँ, प्रेरणायें आदि जो व्यक्ति के समस्त क्रिया-कलाप या व्यवहार की स्थायी आधार हैं तथा जिन्हें मनोविज्ञान में 'प्रेरक' (Motives) की संज्ञा दी गयी है। (इ) पर्यावायची नूतन शब्द -- 'केन्द्रीय तत्त्व' (ख) संचारी भाव- (अ) परम्परागत अर्थ-विभिन्न अस्थिर एवं संचरणशील अनुभूतिमाँ जो स्थायी भाव की पुष्टि में योग देती हैं। (आ) व्यापक अर्थ में-विभिन्न तथ्यों, तत्त्वों, रूपों, सूत्रों व निष्कर्षों की अनुभूति जो केन्द्रीय तत्त्व की पुष्टि में योग देती है। (इ) नया पर्यायवाची शब्द-'सहयोगी तत्त्व' (ग) विभाव (आलम्बन-उद्दीपन)- (अ) परम्परागत अर्थ-विभाव का 'कारण', आलम्बन का 'व्यक्ति विशेष', एवं उद्दीपन का 'उद्दीपक वातावरण या दृश्य'। (आ) व्यापक अर्थ में-'आलम्बन' के अन्तर्गत वे सभी पदार्थ, वस्तुएँ, व्यक्ति अवं प्रयोजन जो केन्द्रीय तत्त्व के आधारभूत हेतु हैं, तथा 'उद्दीपन' के अन्तर्गत वे सब स्थितियाँ, परिस्थितियाँ, घटनाएँ, सामा- जिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक, व मनोवैज्ञानिक पृष्ठ-भूमियाँ जो आलम्बन एवं केन्द्रीय तत्त्व में सम्बन्ध स्थापित करती हैं, रखी जा सकतो हैं। (इ) नया नामकरण-'आलम्बन' को 'आधारभूत हेतु' तथा 'उद्दीपन' को 'परिवेश या संदर्भ' कहना उचित होगा। (घ) अनुभाव- (अ) परम्परागत अर्थ-नाटक में पात्रों की शारीरिक, मानसिक एवं सात्विक चेष्टाएँ जो भाव की अभिव्यक्ति व प्रतीति में सहायक होती हैं। (आ) व्यापक अर्थ में-भावप्रधान साहित्य में उन सब चेष्टाओं, क्रिया- कलापों, कार्य-व्यवहारों जिनके माध्यम से केन्द्रीय तत्त्व व्यक्त होता है तथा विचार-प्रधान साहित्य में उन सब युक्तियों, प्रमाणों, तर्कों, उदाहरणों आदि को तथा कल्पना-प्रधान साहित्य में उन सब उपमानों, प्रतीकों, अप्रस्तुत तत्त्वों को जो केन्द्रीय तत्त्व की अभिव्यक्ति एवं प्रतीति में योग देते हैं-अनुभाव के अन्तर्गत रखा जा सकता है। (इ) नया नाम-इन्हें सभी प्रकार के साहित्य में 'माध्यम' कहना उचित होगा।

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रस-भेद एवं काव्य-रूप : पुनर्विवेचन ३७५

अस्तु, संक्षेप में स्थायी भाव, संचारी भाव, आलम्बन, उद्दीपन, अनुभाव को व्यापक दृष्टि से क्रमशः केन्द्रीय तत्त्व, सहयोगी तत्त्व, आधारभूत हेतु, संदर्भ एवं माध्यम का नाम देना उचित होगा। वस्तुतः ये नाम मूल शब्दावली के परिवर्तित या आरो- पित अर्थों के सूचक नहीं है, अपितु मूल के अर्थ को सुरक्षित रखते हुए भी वे उनके व्यापक एवं सामान्यीकृत रूप को प्रस्तुत करते हैं। उदाहरण के लिए यदि खाद्य पदार्थों की सूची में दिए गए विवरण-'लड्डु समोसा, आम' आदि-में संशोधन करते हुए उन्हें करमशः 'मिष्ठान, नमकीन एवं फल' की नामावली प्रस्तुत करदें तो इससे मूल सूची का आशय सुरक्षित रहता हुआ भी वह व्यापक एवं सामान्यीकृत अर्थ प्राप्त कर लेता है; अस्तु, ऐसा ही संशोधन हमने रस-शास्त्रीय शब्दावली में किया है। इसके आधार पर एक ओर तो भाव, विचार एवं कल्पना को प्रमुखता देने वाले साहित्य-भेदों का तथा दूसरी ओर विभिन्न काव्य-रूपों का विवेचन, विश्लेषण एवं मूल्यांकन अपेक्षाकृत अधिक सरल, स्पष्ट एवं सुसंगत रूप में सम्भव है-यह विश्वास पूर्वक कहा जा सकता है। • रसावयव एवं परम्परागत तत्त्व- रसावयवों के परिवर्तित एवं व्यापक रूपों की तुलना काव्य-रूपों के परम्परागत तत्त्वों से करते हुए उनमें परस्पर सामंजस्य स्थापित किया जा सकत। है। सामान्यतः आधुनिक साहित्य-शास्त्र में प्रबन्ध काव्य, नाटक, उपन्यास, कहानी आदि के छह तत्त्व माने जाते हैं-(१) कथा वस्तु (२) पात्र (३) संवाद (४) देश-काल (५) शैली एवं (६) उद्देश्य। रस के परम्परागत एवं शोधित अवयवों के साथ इनका सामंजस्य इस प्रकार स्थापित किया जा सकता है- रस के परम्परागत अवयव शोधित अवयव आधुनिक साहित्य-शास्त्र में प्रचलित तत्त्व

१. स्थायी भाव = केन्द्रीय तत्त्व = उद्देश्य

२. संचारी भाव = सहयोगी तत्त्व = वस्तु

३. आलम्बन = (आधारभूत हेतु) = पात्र

४. उद्दीपन = संदर्भ (परिवेश) = देश-काल

५. अनुभाव = माध्यम Sसंवाद (वाचिक अनुभाव), शैली उपयुक्त तालिका का स्पष्टीकरण करते हुए कहा जा सकता है कि जिस प्रकार भाव-प्रधान रचनाओं का मूल उद्देश्य किसी स्थायी भाव को व्यक्त करना होता है, वहाँ विचार प्रधान में किसी विचार, सिद्धान्त या संदेश का प्रतिपादन करना हो सकता है, जिसे हमने सामान्य रूप में 'केन्द्रीय तत्त्व' की संज्ञा दी है। इसी प्रकार कथावस्तु को उसी केन्द्रीय तत्त्व के साधन एवं नायक व अन्य पात्रों को उसकी

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३७६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन अभिव्यंजना के आधारभूत तत्त्व के रूप में स्वीकार करते हुए उन्हें क्र्मशः सहयोगी तत्त्व एवं आधारभूत हेतु के समकक्ष स्थान दिया गया है जो अनुचित नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार संदर्भ (परिवेश) में देश-काल का तथा माध्यम के विभिन्न अंगों में संवाद एवं शैली का भी समन्वय हो जाता है। विभिन्न अवयवों की दृष्टि से विभिन्न काव्य-रूपों का भी विश्लेषण किया जा सकता है-कुछ काव्य-रूपों में उपयुक्त पाँचों अवयव होते हैं, जबकि कुछ में कम होते हैं; इसका स्पष्टीकरण यहाँ तालिका के माध्यम से किया जाता है- तालिका-विभिन्न काव्य-रूप एवं रस के अवयव केन्द्रीय तत्त्व माध्यम संदर्भ या परिवेश आधारभूत सहयोगी तत्त्व हेतु (स्थायी भाव) (अनुभाव) (उद्दीपन) (आलम्बन) (संचारी) (१) महाकाव्य • (२) नाटक (३) उपन्यास (४) कहानी X (५) गीतिकाव्य • X X (६) मुक्तककाव्य X X (७) एकांकी X X (८) समीक्षा X X (९) निबन्ध X X

उपयुक्त्त तालिका में बिन्दु () जहाँ अवयव-विशेष की उपस्थिति का सूचक है, वहां गुणक-चिह्न (X ) उसके अभाव का द्योतक है। यहाँ हमने विभिन्न काव्य-रूपों में विभिन्न अवयवों की उपस्थिति एवं अभाव का उल्लेख सामान्य रचनाओं की दृष्टि से किया है, किन्तु विशिष्ट रचनाओं में उनके अपवाद भी संभव है। वस्तुतः केन्द्रीय तत्त्व एवं माध्यम-इन दो अवयवों की तो सभी काव्य रूपों में अपेक्षा है जबकि संदर्भ, आधार, एवं सहयोगी तत्त्व उत्तरोत्तर न्यून एवं गौण सिद्ध होते हैं। अवयवों के इस विस्तार एवं संकोच का मूल कारण रचयिता की जीवन-दृष्टि एवं विषय-वस्तु का विस्तार एवं संकोच ही है; जहाँ साहित्यकार व्यापक दृष्टि से समग्र जीवन को प्रस्तुत करता है, वहाँ सभी अवयव उपलब्ध होते हैं किन्तु जहां जीवन का आंशिक या एकांगी रूप होता है, वहाँ उसी के अनुसार कुछ अवयव गौण या तिरोहित हो जाते हैं। इस प्रकार अवयवों का प्रयोग जहाँ एक ओर जीवन-क्षेत्र के विस्तार एवं संकोच का प्रमाण माना जा सकता है वहाँ

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रस-भेद एवं काव्य-रूप : पुनर्विवेचन ३७७

दूसरी ओर वह काव्य-रूप की भी तुलनात्मक स्थिति का परिचायक सिद्ध होता है। अतः साहित्य के अध्ययन, विवेचन एवं विश्लेषण में इन अवयवों को आधार-रूप में भी ग्रहण किया जा सकता है। अस्तु, प्रस्तुत अध्याय में विवेचित विभिन्न साहित्य-भेदों, रस-भेदों एवं रस के अवयवों के आधार पर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि साहित्य की किसी भी रचना के तात्त्विक एवं रूपात्मक विवेचन, विश्लेषण एवं मूल्यांकन में रस-सिद्धान्त (अपने विकसित रूप में) पूर्णतः समर्थ है-इतना ही नहीं विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित अन्य पद्धतियों की अपेक्षा वह इन लक्ष्यों की पूर्ति अधिक कुशलता एवं प्रौढता से कर सकता है-ऐसा भी कहा जाय तो कदाचित् अनुचित न होगा।

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साहित्य की सर्जन-प्रक्रिया ७ त्रौर रस-सिद्धान्त

रस सिद्धान्त के भारतीय एवं पाश्चात्य आचार्यों ने रस या सौन्दर्यानुभूति (कलानुभूति) की जितनी मीमांसा सामाजिक या पाठक की आस्वादन-प्रक्रिया की दृष्टि से की है, उतनी कलाकार या कवि की सर्जन-प्रक्रिया की दृष्टि से नहीं की; अतः रस-सिद्धान्त के परम्परागत स्वरूप पर यह आक्षेप किया जा सकता है कि वह साहित्य के स्रष्टा एवं उसके सर्जन-व्यापार की उपेक्षा करता है-और निश्चय ही यह आक्षेप एक सीमा तक उचित प्रतीत होता है, किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि रस-सिद्धान्त में ऐसी क्षमता या सम्भावना का अभाव है जिसके बल पर सर्जन- प्रक्रिया का विश्लेषण किया जा सके। वस्तुतः इस दृष्टि से रस-सिद्धान्त पर विचार हो नहीं किया, अन्यथा सर्जन-प्रक्रिया की जैसी स्पष्ट एवं सुसंगत व्याख्या रस- सिद्धान्त द्वारा संभव है, वसी कदाचित् किसी अन्य काव्य-शास्त्रीय या सौन्दर्यशास्त्रीय सिद्धान्त द्वारा संभव नहीं-इस तथ्य की पुष्टि इस अध्याय में प्रस्तुत विवेचन- विश्लेषण से हो सकेगी; ऐसा हमारा विश्वास है। • रस-सिद्धान्त के विभिन्न अवयव एवं सर्जन-प्रक्रिया- जिस प्रकार रस-सिद्धान्त के विभिन्न अवयव स्थायी, संचारी, विभाव, अनुभाव आदि-साहित्य की विषय-वस्तु के विश्लेषण एवं आस्वादन-व्यापार की व्याख्या में सहायक सिद्ध होते हैं, उसी प्रकार ये सर्जन-प्रक्रिया के विवेचन-विश्लेषण के भी आधार प्रमाणित होते हैं, इतना अवश्य है कि इन अवयवों पर इस दृष्टि से विचार करते समय उनके उस व्यापक एवं विकसित अर्थ को ध्यान में रखना

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साहित्य की सर्जन-प्रक्रिया और रस-सिद्धान्त ३७९

होगा जिसे पीछे स्पष्ट किया जा चुका है। संक्षेप में वह व्यापक अर्थ इस प्रकार है- (क) स्थायीभाव = स्थायीभावात्मक प्रवृत्तियाँ भावनाएँ, मनोवृत्तियाँ, ग्रन्थियाँ, रुचियाँ, =केन्द्रीय तत्त्व प्रेरेणाए आदि (ख) संचारीभाव अनुभूतियां, अनुभव, बोध, =सहयोगी तत्त्व

(ग) आलम्बन = व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ, लक्ष्य आदि। =आधारभूत हेतु

(घ) उद्दीपन = स्थितियाँ, परिस्थितियाँ, वातावरण आदि। =संदर्भ (परिवेश)

(ङ) अनुभाव = चेष्टाए, कार्य-व्यवहार,वचन। अभिव्यक्ति के साधन आदि =माध्यम

उपयुक्त अवयवों के आधार पर सर्जन-प्रक्रिया की विस्तृत व्याख्या करने से पूर्व हम अपनी परिकल्पना (Hypothesis) को इस प्रकार प्रस्तुत कर सकते हैं- साहित्यकार या कवि अपनी स्थायीभावात्मक प्रवृत्ति अर्थात् मूल प्रकृति, रुचि, मनोवृत्ति, प्रेरणा आदि के अनुसार आलम्बन या विषय-वस्तु के प्रति संदर्भ-विशेष, परिवेश, वातावरण (उद्दीपन) के प्रभाव से आकर्षित होकर इसमें प्रवृत्त होता है तथा जब उस विषय में उसकी प्रवृत्ति इतनी गहरी हो जाती है कि उसका आधारभूत विषय के साथ आन्तरिक स1मंजस्य या तादात्म्य स्थापित हो जाता है, तो वह विभिन्न सहयोगी तत्त्वों-(संचारी तत्त्वों) सम्बन्धित अनुभूतियों, अनुभवों, बोध व विचार- सूत्रों के सहयोग से उसे वाणी (भाषा), चेष्टा (अभिनय) आदि विभिन्न प्रकार के अनुभावों या कलात्मक माध्यम से व्यक्त कर देता है। संक्षेप में, यही कलाकार की सर्जन-प्रक्रिया है; जिसे रस-सिद्धान्त के पाँच अवयवों या सूत्रों के आधार पर विवेचित किया जा सकता है। इस परिकल्पना (Hypothesis) की पुष्टि तथा इसके औचित्य की परीक्षा के लिए हम आगे आधुनिक मनोविज्ञान व मनोविश्लेषण के आधार पर सर्जन-प्रक्रिया का विवेचन रसेतर दृष्टि से प्रस्तुत करते हुए, उससे उपलब्ध निष्कर्षों के आधार पर उपयुक्त परिकल्पना की पुनर्परीक्षा करेंगे। • आधुनिक मनोविश्लेषण के आधार पर सर्जन-प्रक्रिया का विवेचन- कला ओर साहित्य का सर्जन स्रष्टा की मानसिक प्रवृत्तियों एवं मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से होता है, अतः इस दृष्टि से सर्जन-प्रत्रिया शुद्ध मनोवैज्ञानिक विषय हैं, किन्तु अभी तक मनोविज्ञान के क्षेत्र में कला एवं साहित्य से सम्बन्धित प्रवृत्तियों का अध्ययन स्वतन्त्र रूप से नहीं हुआ अर्थात् विभिन्न मानसिक प्रवृत्तियों

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३८० रस-सिद्धान्त का पुनर्वविवेचन

का अध्ययन लोक-व्यवहार की दृष्टि से हुआ है, कला-संदर्भ में उनके विश्लेषण का प्रयास न के बराबर ही है: किन्तु मनोविज्ञान की ही एक शाखा ,मनोविश्लेषण' (Psycho-analysis) में अवश्य इस प्रकार का प्रयास अनेक शोध-कर्त्ताओं द्वारा गम्भीरतापूर्वक हुआ है। इन शोध-कर्त्ताओं में फ्रायड, एडलर, युग के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं अतः हम साहित्य की सर्जन-प्रक्रिया के विवेचन-विश्लेषण की प्रामाणिकता के लिए 'मनोविश्लेषण' के निष्कर्षों को आधार-रूप में ग्रहण कर सकते हैं। मनोविश्लेषण के आचार्य मानव-मन को तीन स्तरों या खण्डों में विभक्त करते हैं-चेतन, अचेतन एवं उपचेतन। फ्रायड ने इन्हें क्रमशः अहं (Igo), इदम् (Id), एवं नैतिकमन (Super ego) के नाम से पुकारा है तो युग ने नया वर्गीकरण करते हुए मन के केवल दो ही स्तर माने हैं-चेतन (Conscious) और अचेतन (Unconscious) तथा अचेतन मन के दो भेद (भाग)-व्यक्तिगत अचेतन मन (Personal Unconscious) एवं सामूहिक अचेतन मन (Collective Unconscious) किये हैं। उपयुक्त्त तीनों प्रकार के वर्गीकरण में स्थूल रूप में इस प्रकार सामंजस्य स्थापित किया जा सकता है-

मन के स्तर फ्रायड का नया वर्गोकरण युँग का वर्गोकरण

(१) चेतन (Conscious) = अहं (Ego) = चेतन मन (२) अचेतन (Unconscious) = इदम (Id) = अचेतन मन- (सामूहिक अचेतन) (३) उपचेतन (Sub-Conscious)= नैतिकमन। = व्यक्तिगत अचेतनमन (Super-ego)f यद्यपि उपयुक्त वर्गीकरण के अनुसार फ्रायड एवं युग में मत-भेद परिलक्षित होता है किन्तु यह मत-भेद नामकरण की दृष्टि से ही अधिक है, लक्षणों की दृष्टि से उनमें बहुत-कुछ मतक्य है। जहाँ तक कला-सर्जन की प्रक्रिया का सम्बन्ध है, मनो- विश्लेषण के विद्वानों ने इसे अचेतन मन (Unconscious) से ही सम्बन्धित किया है। प्रायः सभी ने अचेतनमन की शक्ति की अभिव्यक्ति के विभिन्न प्रकारों में से एक कला- सर्जन को माना है। अतः हमें यहाँ सर्व प्रथम अचेतन मन का स्वरूप स्पष्ट कर लेना चाहिए। अचेतन मन-मनोविश्लेषण के विद्वानों के अनुसार मानसिक शक्तियों का सबसे बड़ा स्रोत एवं आधार अचेतन (Unconscious) ही है, जो एक प्रकार से सम्पूर्ण मन का तीन-चौथाई भाग है। यद्यपि हम प्रत्यक्ष रूप में अचेतन मन की शक्तियों एवं क्रियाओं का बोध प्रायः नहीं करते किन्तु वस्तु-स्थिति यह है कि चेतन एवं अचेतन मन की सभी प्रकार की मानसिक प्रवृत्तियों को प्रेरित एवं संचालित

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वन साहित्य की सर्जन-प्रक्रिया और रस-सिद्धान्त ३८१

का करने वाला अचेतन मन ही मान गया है। हमारी जन्मजात वासनायें एवं दमित ण' इच्छाएँ, कुण्ठाएँ आदि भी इसी में दबी रहती है, जो बाह्य परिस्थितियों के प्रभाव रा से कई बार ऊपर आकर व्यक्त भी हो जाती हैं। रूप युग ने अचेतन मन को ही दो भागों में-व्यक्तिगत एवं सामूहिक अचेतन की मन-विभक्त करते हुए स्पष्ट किया कि जहाँ व्यक्तिगत अचेतन मन में व्यक्ति की कर निजी अनुभूतियाँ और कुण्ठाए दबी रहती हैं, वहाँ सामूहिक अचेतन मन का सम्बन्ध केवल व्यक्ति से ही नहीं समस्त परिवार, वंश और जाति की पूर्व परम्परा से होता क्त है, अर्थात् उसमें हमारी जाति (Race) के पूर्वजों की वे सभी मानसिक प्रवृत्तियाँ दम् व विशेषताए रहती हैं जो हमें वंश-परम्परा से प्राप्त हुई हैं; अतः इसका क्षेत्र एवं रण बल निश्चय ही व्यक्तिगत अचेतन मन से अधिक व्यापक एवं प्रबल होता है। तन मन हमारे अचेतन मन में स्थित विभिन्न वंशगत प्रवृत्तियां भाव प्रतिमाओं (Arche-

s) type) के रूप में संचित रहती हैं जो दो प्रकार की मानी गयी हैं-(१) स्त्री-गुण प्रधान 'ऐनिमा' (Anima) और (२) पुरुष गुण-प्रधान (Animus) ऐनिमस। व्यक्ति स्य की प्रकृति, स्वभाव एवं प्रवृत्तिरयां का निर्धारण भी इन्हीं प्रतिमाओं की प्रधानता के अनुसार होता है-किसी में नारी की भाँति कोमलता एवं भीरूता होती है तो किसी रण में दृढ़ता एवं निडरता होती है जो वस्तुतः इस बात पर निर्भर है कि उसमें किस प्रकार की भाव-प्रतिमाओं की प्रमुखता है। कला एवं साहित्य में भी जातीय प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति इन भाव-प्रतिमाओं के ही माध्यम से होती है। न) मनोविश्लेषण और कला-सर्जन की प्रक्रिया-मनोविश्लेषण के अनुसार कला- मन सर्जन की शक्ति का आधार अचेतन मन की शक्ति है जिसे विभिन्न आचार्यों ने विभिन्न नामों से पुकारा है। फ्रायड ने इसे 'काम-शक्ति' (Libido) से भिन्न मानते हुए दमित काम-वासना के उदात्तीकरण को ही कला-सर्जन की प्रक्रिया के से रूप में स्वीकार किया जबकि एडलर ने इसे 'हीनता की ग्रन्थि' के रूप में विवेचित किया। किन्तु इन दोनों ही विद्वानों का दृष्टिकोण अत्यन्त संकीर्ण एवं संकुचित था, है। वस्तुतः केवल मात्र काम वासना या हीनता की ग्रन्थि को ही कला-सर्जन के आधार ना- के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता; अतः युग ने अपेक्षाकृत अधिक व्यापक एवं कर संतुलित दृष्टि का परिचय देते हुए कला का सम्बन्ध विभिन्न प्रकार की वृत्तियों- धार्मिक, सामाजिक, वैयक्तिक, काम-वासनात्मक आदि-से स्थापित किया। साथ का ही उन्होंने सर्जनात्मक प्रेरणा (Creative urge) एवं सर्जन-शक्ति (Creative energy) से के सिद्धान्त को भी स्थापना की। युग के विचारानुसार प्रत्येक व्यक्ति के मन में सज- की र्नात्मक वृत्ति एवं शक्ति न्यूनाधिक मात्रा में सदा विद्यमान रहती है। यह कामवृत्ति तन न होकर उससे भिन्न है जिसका लक्ष्य सन्तानोत्पादन द्वारा जाति-रक्षा करना न लत होकर कल्पनात्मक सृष्टि द्वारा मन की भूख को-प्रेरणा को-संतुष्ट करना है।

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३८२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

सामान्य व्यक्ति की अपेक्षा कलाकार में यह अधिक प्रबल होती है। इसके बल पर वह कला-सर्जन करता है। सर्जनात्मक वृत्ति का सम्बन्ध सामूहिक अचेतन मन (Collective uncons- cious) से हैं-अर्थात् यह केवल व्यक्ति-विशेष की निजी प्रवृत्ति न होकर, पूँरे समाज, वंश एवं जाति की प्रवृत्ति है जो कि हमारे सामूहिक अचेतन मन में स्थित है। सामूहिक अचेतन मन में पूरे मानव-समाज ने-यहाँ तक कि उसके पूर्वज पशु-समाज ने भी-जो अनुभव और संस्कार प्राप्त किये, वे सूक्ष्म प्रतिमाओं (Archetypes) के रूप में विद्यमान हैं, तथा वे ही कला-सर्जन की आधारभूत मानसिक सामग्री का रूप ग्रहण करते हैं। जब बाह्य प्रभाव से कलाकार की सर्जनात्मक वृत्ति या सर्जन शक्ति उद्दीप्त होकर सक्रिय होती है तो उसकी आन्तरिक भाव-प्रतिमाओं में से जो अधिक विकसित होंगी-वे कला के रूप में व्यक्त हो जाती हैं।

इस प्रकार कला का सम्बन्ध मूलतः सामूहिक अचेतन मन में विद्यमान वंश परम्परागत सर्जनात्मक वृत्ति से है, किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि उसकी व्यक्ति- गत वृत्तियों, अनुभूतियों व संवेदनाओं का उससे कोई सम्बन्ध नहीं है। अवश्य ही जब उसकी सर्जन वृत्ति उद्दीप्त होकर सर्जन-शक्ति के रूप में कार्य करती है तो वह सामूहिक मन की सामग्री के साथ-साथ वैयक्तिक मन की सामग्री का भी उपयोग एवं संयोजन करती है; यहाँ तक कि जिन कलाकारों व साहित्यकारों में वैयक्तिक कुण्ठाओं, ग्रन्थियों एवं प्रवृत्तियों की प्रमुखता होती है, उनकी रचनाओं में सामूहिक मन की अपेक्षा वैयक्तिक मन की अनुभूतियाँ अधिक मुखर होती हैं। इस दृष्टि से कला-वस्तु के दो वर्ग भी किये जा सकते हैं-एक, जिनमें सामूहिक मन की प्रमुखता परिलक्षित होती है; दूसरा-जिसमें वर्याक्तक मन की प्रमुखता है। इसी प्रकार कलाकार में नारी प्रतिमाओं (Anima) या पुरुष प्रतिमाओं (Animus) की प्रमुखता के अनुसार भी उसकी विषय-वस्तु की प्रकृति में परिवर्तन संभव है किसी की प्रवृत्ति कोमल भावों, सुन्दर पदार्थों में होती है तो किसी की कठोर भावों व असुन्दर वस्तुओं में होती है-इस अन्तर का कारण अचेतन मन में संचित एवं वंश-परम्परागत प्रतिमाओं का अन्तर है।

फिर भी कला-वस्तु में यदि वैयक्तिक मन की अपेक्षा सामूहिक मन की सामग्री अधिक हो तो अवश्य ही उसका प्रभाव अधिक व्यापक होगा-अर्थात् उसका साधारणीकरण व्यापक रूप में हो सकेगा। इसीलिए युग ने सामूहिक मन को अधिक महत्त्व दिया हैं। डा० पद्मा अग्रवाल के शब्दों में-'युग के दृष्टिकोण से कला में व्यक्तिगत अनुभव का कम महत्त्व है। उनके अनुसार अच्छी भली कला वही है जिसमें वंश-परम्परागत विशेषताए या जातीय गुण समायें हों, अर्थात् (उनसे सम्ब- न्धित) भाव प्रतिमाओं का प्रदर्शन (अभिव्यंजन) हो। इस कारण से युग ने कला

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साहित्य की सर्जन-प्रक्रिया और रस-सिद्धान्त ३८३

के सम्बन्ध में 'सामूहिक अज्ञात मन' पर 'व्यक्तिगत अज्ञात मन" से अधिक बल दिया है। इस प्रकार युग के विश्लेषण के अनुसार कला की सर्जन-प्रक्रिया के सम्बन्ध में निम्नांकित निष्कर्ष प्रस्तुत किये जा सकते हैं- (१) कला का मूलाधार व्यक्ति का सामूहिक अवचेतन मन है-जिसमें वंश-परम्परागत एवं जातीय विशेषताएँ भाव-प्रतिभाओं के रूप में विद्यमान रहती हैं। (२) सामूहिक मन में अतीतकाल से सर्जन की वृत्ति एवं शक्ति विद्यमान है। (३) यह सर्जन की वृत्ति उद्दीप्त होकर वंश-परम्परागत एवं वैयक्तिक अनुभूतियों-भाव-प्रतिमाओं-की अभिव्यक्ति कला के रूप में करती है। (४) वंयक्तिक मन की भाव-प्रतिमाओं को अपेक्षा, सामूहिक मन की भाव- प्रतिमाओं का कला-सर्जन की दृष्टि से अधिक महत्त्व है। • रसावयवों का पुनराख्यान उपयुक्त्त विवेचन एवं निष्कर्षों को ध्यान में रखते हुए अब हम रस के विभिन्न अवयवों पर क्रमशः पुनर्विचार कर सकते हैं। सर्व प्रथम स्थायी भाव को लेते हैं-रस सिद्धान्त के अनुसार कला या रचना का यह वह आधारभूत केन्द्रीय तत्त्व है तो अनादि काल से मानव-मन में वासना के रूप में स्थित है; इसी की अभिव्यक्ति कला के माध्यम से होती है। यदि इस केन्द्रीय तत्त्व को हम युग की शब्दावली में सामूहिक अचेतन मन में स्थित वंश-परम्परागत अनादिकाल की भाव- प्रतिमाओं या वृत्तियों अथवा वासनाओं के रूप में ग्रहण करें तो अनुचित न होगा। युग ने भी इन्हें समस्त मानव जाति में दीर्घकाल से विद्यमान स्थिर, स्थायी या चिरकालीन संस्कारों व वृत्तियों के रूप में स्वीकार किया है तथा ये सभी लक्षण भारतीय आचार्यों ने स्थायी भाव के उल्लिखित किये हैं-अतः यदि हम स्थायी भाव को सामूहिक अचेतन मन की स्थायी भाव-प्रतिमाओं के रूप में या कला केन्द्रीय तत्त्व के रूप में स्वीकार कर सकते हैं। स्थायो भाव की तुलना में संचारी भाव-क्षणिक, चंचल किन्तु उसका सहयोगी तत्त्व माना गया है। संचारी भाव स्थायी भाव की तुलना में दुर्बल होता है तथा वह उसी पर निर्भर रहता है। व्यापक रूप में इसे हमने व्यक्ति की अनु- भूतियाँ, अनुभवों, प्रत्यक्ष-बोधादि के रूप में ग्रहण करते हुए 'सहयोगी तत्त्व' की संज्ञा दी है। यदि तुलनात्मक दृष्टि से विचार किया जाय तो प्रतीत होगा कि युग

१. मनोविश्लेषण एवं मानसिक प्रक्रियाएँ : ड० पदमा अग्रवाल; पृ० सं० १९३

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३८४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

ने सामूहिक मन की तुलना में वैयक्तिक मन की जो विशेषताएँ बताई हैं, वे सब स्थायीभाव के संदर्भ में संचारी भाव में दृष्टिगोचर होंगी। जिस प्रकार सामूहिक मन की भाव प्रतिमाएँ कला की आधारभूत सामग्री प्रदान करती हैं किन्तु उनमें वैयक्तिक मन की संचरणशील अस्थिर भाव-वृत्तियों व अनुभूतियों का योग अपेक्षित है-यहाँ तक कि कई बार ये प्रमुख भी हो उठती है-उसी प्रकार स्थायी भाव भी केन्द्रीय तत्त्व होता हुआ भी संचारी भावों -- विभिन्न अनुभूतियों का सहयोग प्राप्त करता है। अस्तु, स्थायीभाव यदि सामूहिक मन की वृत्तियों एवं संस्कारों का सूचक है तो संचारी भाव वैयक्तिक मन की अनुभूतियाँ, धारणाओं, वृत्तियों आदि का द्योतक माना जा सकता है। कलाकार की सर्जन-शक्ति (Creative energy) को सर्जन के लिए प्रेरित एवं उद्दीप्त करने के लिए बाह्य कारणों व परिस्थितियों का भी योग सदा अपेक्षित है-यह तथ्य मनोविज्ञान एवं मनोविश्लेषण के भी प्रतिकूल नहीं है। दूसरे शब्दों में, कलाकार की सर्जन-शक्ति एक तो किसी रुचिकर विषय का सन्धान प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष में करती रहती है, तो दूसरी र विभिन्न स्थितियाँ, परिस्थितियाँ, वातावरण, परिवेश एवं संदर्भ के प्रभाव के कारण भी विषय-विशेष में उसकी रुचि एवं प्रवृत्ति अधिक होती है। जीवन और जगत् में नाना प्रकार के विषय हैं, किन्तु वे स्थिति-विशेष या परिस्थिति-विशेष में ही हमें रुचिकर प्रतीत होते हैं। कुछ विषय जो मध्यकालीन कवियों के लिए रुचिकर थे, आज रुचिकर प्रजीत नहीं होते-इसका कारण वातावरण, परिस्थिति, परिवेश एवं संदर्भ का परिवर्तन ही है। कई बार एक सामान्य विषय भी परिस्थिति-विशेष या युग-विशेष के वातावरण में कवि के लिए इतना अधिक आकर्षक एवं रुचिकर सिद्ध होता है कि उसकी सर्जन- शक्ति उद्दीप्त होकर सक्रिय हो जाती है। अस्तु, सजन-शक्ति की उद्दीप्ति एवं स्रियता के लिए दो तत्त्व आवश्यक हैं-एक आधारभूत विषय और दूसरा- परिस्थिति या वातावरण। रस-सिद्धान्त के आचार्यों ने इन दोनों का निरूपण क्रमशः विभाव के दो भेदों-आलम्बन एवं उद्दीपन-के रूप में किया है, जिन्हें हमने व्यापक रूप में क्रमशः आधार-हेतु, एवं संदर्भ (परिवेश) की संज्ञा दी है। कलाकार की सर्जन-शक्ति उद्दीप्त होकर विभिन्न प्रकार के साधनों एवं माध्यमों से व्यक्त होती है-वह वाणी, चेष्टाओं, मुद्राओं, सात्विक भावों आदि किसी भी माध्यम से व्यक्त हो सकती है; जब वह वाणी के माध्यम से व्यक्त होती है तो साहित्य एवं काव्य की; चेष्टाओं के माध्यम से व्यक्त होती है तो अभिनय, नृत्य आदि कलाओं की तथा रेखाओं के माध्यम से व्यक्त होने पर चित्र-कला की संज्ञा प्राप्त करती है। वस्तुतः हमारे अचेतन मन की वृत्तियों-सामूहिक एवं वैयक्तिक इन सभी की अभिव्यक्ति विभिन्न प्रकार के माध्यम से संभव है; किन्तु उन्हें हम दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं-एक जो स्वयं व्यक्ति के व्यक्तित्व से अभिन्न

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साहित्य की सर्जन-प्रक्रिया और रस-सिद्धान्त ३८५ हैं; दूसरे जो व्यक्तित्व से भिन्न बाह्य पदार्थ हैं। इस दृष्टि से काव्य, अभिनय, नृत्य गीत आदि के माध्यम व्यक्ति के व्यक्तित्व से अभिन्न हैं, जबकि अन्य कलाओं में बाह्य पदार्थों-रंग, तूलिका, आदि साधनों-का भी सहयोग अपेक्षित हैं। अतः अभि- व्यक्ति के प्रत्यक्ष माध्यम तो वे ही हैं जो हमारे व्यक्तित्व से भिन्न नहीं है, तथा इन्हें भी तीन रूपों में वर्गीकृत किया जा सकता है-(१) वाणी या भाषा। (२) सत्त्वोद्रेक (३) चेष्टा (अभिनय, नृत्य आदि से सम्बन्धित)। वस्तुतः ये तीनों प्रकार के माध्यम अनुभाव के ही तीन भेदों-वाचिक, सात्विक व आंगिक के ही सूचक हैं। अस्तु, अभित्र्यक्ति के माध्यम ही अनुभाव हैं, इसीलिए हमने व्यापक रूप में इन्हें 'माध्यम' की संज्ञा दी है। कला के माध्यम के सम्बन्ध में मनोविश्लेषण की यह महत्त्वपूर्ण स्थापना है कि अचेतन मन अपनी वृत्तियों, भावनाओं व संस्कारों को सामान्य भाषा में या अभिधात्मक शैली में व्यक्त नहीं करता क्योंकि अचेतन मन में वे भाव-प्रतिमाओं, बिम्बों (Images), आदि के रूप में संचित रहते हैं। अतः अचेतन मन की अभि- व्यक्ति सदा बिम्बों व प्रतीकों के माध्मम से अप्रत्यक्ष रूप में ही होती है। दूसरे शब्दों में अचेतन स्तर की अनुभूतियाँ अभिधा के स्थान पर सदा लक्षणा एवं व्यंजना शक्ति का ही प्रयोग करती है, इसी से काव्य-भाषा में उपमान, बिम्ब, प्रतीक या अप्रस्तुत-योजना की प्रमुखता रहती है। रस-सिद्धान्त के आचार्यों ने भी स्थायीभाव के अभिधात्मक उल्लेख को 'स्वशब्दवाच्य दोष मानते हुए, स्थायीभाव की अभि- व्यक्ति सदा अप्रत्यक्ष या 'व्यंजना शक्ति' के द्वारा ही आवश्यक मानी है। इसमें स्थायीभाव की व्यंजना पर विशेष बल देने का मूलाधार कदाचित यही मनोवैज्ञानिक तथ्य या सत्य है कि स्वाभाविक रूप में वह सदा अप्रत्यक्ष रूप में-बिम्बों एवं प्रतीकों केमाध्यम से ही-व्यंजित होता है; उसका 'कथन' या 'उल्लेख' तो भाषा की बौद्धिक प्रक्रिया मात्र है। रस-सिद्धान्त के अनुसार कवि और सामाजिक में तादात्म्य या कला-वस्तु का साधारणीकरण भी अपेक्षित है। इसका आधार भी, यही है कि कलाकार पहले स्वयं विषय के साथ तादात्म्य स्थापित करता है तथा फिर उसे व्यक्त करता है; किन्तु अपने व्यक्तित्व से सम्बन्धित स्वयं की रुचि पर आधारित विषय के साथ कवि का तादात्म्य होना कठिन नहीं, किन्तु सामाजिक के साथ तादात्म्य होना अवश्य कठिन है। इसका उत्तर युग के अनुसार यह दिया जा सकता है कि कवि जिस विषय को ग्रहण करता है, वह उसके 'सामूहिक अचेतत मन' की वृत्ति एवं प्रवृत्ति के अनुकूल होता है या अनुकूल रूप प्राप्त कर लेता है, इसीलिए वह समूह या समाज के लिए भी संप्रेष्य एवं ग्रहण हो जाता है; किन्तु यदि फिर भी इसमें वैयक्तिक मन की अत्यधिक प्रमुखता हो तो यह भी संभव है कि समूह या समाज को वह रूचिकर प्रतीत न हो -इसे ही हम 'साधारणीकरण' का अभाव कह सकते हैं। किन्तु ऐसा बहुत कम

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३८६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन होता है-प्रायः अचेतन मन की सर्जन-शक्ति के उद्दाम आवेग में कवि का चेतन मन जो कि सदा 'अहं' पर केन्द्रित होता है-कुछ क्षणों के लिए अहं की सीमाओं का उल्लंघन करके सामूहिक मन में निमज्जित हो जाता है-व्यक्ति और समूह की सीमाएँ लुप्त हो जाती हैं-ऐसी स्थिति में ही सच्ची एवं उदान्त कला का सर्जन होता है जो व्यक्ति, युग और प्रदेश की सीमाओं से ऊपर उठकर यूनिवर्सल रूप प्राप्त कर लेती है। किन्तु जहाँ ऐसा नहीं होता वहाँ कला-कृति का प्रभाव की सीमित रहेगा। अस्तु, हम सर्जन-प्रक्रिया के विभिन्न सोपानों में वैयक्तिक मन का अहं से मुक्त होकर सामूहिक मन से संयुक्त हो जाना भी आवश्यक मान सकते हैं ; इसी प्रक्रिया को रस सिद्धान्त की शब्दावली में 'वैयक्तिक अनुभूतियाँ का साधारणीकरण' कह सकते हैं। उपयुक्त्त विवेचन से उपलब्ध निष्कर्षों को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत किया जा सकता है- • सर्जन-प्रक्रिया की मूल शक्ति हमारे सामूहिक अचेतन मन की वंश- परम्परागत एवं जातीय वृत्तियों, संस्कारों, भावनाओं में निहित है, जिसे युग ने सामूहिक अवचेतन मन की शक्ति के रूप में स्वीकार किया है। इसी को रस की शब्दावली में 'स्थायी भाव' या 'केन्द्रीय तत्त्व' कहा जा सकता है। • बाह्य विषय एवं परिस्थितियों व वातावरण के प्रभाव से ही अचेतन मन की सर्जन-शक्ति प्ररित और उद्दीप्त होकर सर्जन-कार्य में प्रवृत्त होती है। 'बाह्य विषय' को रस-शास्त्रीय शब्दावली में 'आलम्बन' (आधार हेतु ) एवं 'परिस्थितियों व वातावरण' को 'उद्दीपन' (व्यापक रूप में-'संदर्भ या परिवेश') कहा जाता है। • सामूहिक अचेतन मन की सर्जन शक्ति उद्दीप्त होकर वैयक्तिक अचेतन मन की सामग्री-अनुभूतियां, अनुभव, बोध, आदि-का उपयोग करती है ; जिससे सामूहिक मन की वृत्तियाँ वैयक्तिक मन की अनुभूतियों से समन्वित हो जाती हैं। वैयक्तिक मन की इस सामग्री को ही रस सिद्धान्त में 'संचारी भाव' (सहयोगी तत्त्व) कहा गया है। • सामूहिक अचेतन मन की भाव-प्रतिमाएं, वैयक्तिक मन की अनुभूतियों के सहयोग से बिम्वों व प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त होती हैं। बिम्बों व प्रतीकों के कारण ही भाषा-शैली में अभिधा के स्थान पर लक्षणा व व्यंजना का संचार हो जाता है। अभिव्यक्ति के माध्यम को ही रस- शास्त्रीय शब्दावली में 'अनुभाव' कहा गया है, जिसे व्यापक दृष्टि से हमने 'माध्यम' का ही पर्याय माना है।