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रस : समन्वयात्मक दृष्टि से ३२७
रूप या आकर्षण-युक्त शैली में प्रस्तुत न किया जायगा तब तक न तो वह कलात्मक रूप में परिणत हो पायेगा और न ही सामान्य पाठक या सामाजिक की उसमें सामान्य रूचि एवं प्रवृति (बौद्धिक रूचि एवं प्रवृति नहीं) हो सकेगी। अतः उन्हें तो आकर्षण की अनिवार्यता स्वीकार करनी ही होगी, यह दूसरी बात है कि वे 'आकर्षण' के स्थान पर सौन्दर्य या माधुर्य के लाक्षणिक प्रयोग के अभ्यस्त होने के कारण उसे अधिक पसन्द करें। रही बात भाववादियों की-जिनमें पाश्चात्य भावोद्दीप्तिवादी, भाववलम्बन- वादी, भाव-प्रेषणावादी, भावाभिव्यक्तिवादी तथा भारतीय रसवादी आचार्य आ जाते हैं-अवश्य ही कला के भाव तत्त्व में ही रुचि एवं प्रवृत्तिकी क्षमता मानते हैं कि उसके लिए 'आकर्षण' की अपेक्षा नहीं समझी जायगी। इनमें भी दो प्रकार के विद्वान् हैं, कुछ तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष में भावतत्त्व को कलागत सौन्दर्य का ही अंग, साधन या आधार स्वीकार करते हैं; इस वर्ग के विद्वानों को तो 'सौन्दर्य' के स्थान पर 'आकर्षण' स्वीकार कर लेने से भी विशेष अन्तर नहीं पड़ेगा। दूसरे वर्ग में वे विद्वान आते हैं जिन्होंने कलागत भाव की व्याख्या सौन्दर्य निरपेक्ष रूप में की है; इस वर्ग में अनेक भारतीय रसवादी आते हैं। इन दोनों के अतिरिक्त एक तीसरा वर्ग और भी है जो भाव और सौन्दर्य से पृथक 'सौन्दर्यात्मक भाव' (Aesthetic) का अस्तित्व मानते हुए कलानुभूति का सारा श्रेय उसकी प्रदान करते हैं। यहाँ हम इन दोनों के ही दृष्टिकोण से आकर्षण तत्त्व की स्थिति पर विचार करेंगे। पहले भारतीय रसवादी आचार्यों की दृष्टि से विचार करते है। इनमें अनेक आचार्यों ने तो स्वयं ही कलागत भाव का सम्बन्ध सौन्दर्य से मानते हुए, उसी की परिणति रस में बताई है। यथा-भट्टनायक ने भावन-प्रक्रिया का आधार विभावों का दोषाभाव, गुण अलंकार से युक्त हो जाना माना है तो अभिनव गुप्त ने इसी बात को और भी स्पष्ट शब्दों में स्वीकार करते हुए काव्य में साधारणीकरण का कारण अर्थ का गुण, अलंकार आदि से 'सुन्दरीभूत' हो जाना या सौन्दर्य युक्त हो जाना बताया है-यह अन्यत्र विस्तार से स्पष्ट किया जा चुका है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भी रसानुभूति के व्यावहारिक स्वरूप की मीमांसा करते हुए लिखा है- 'सुन्दर और कुरूप-काव्य में बस ये ही दो पक्ष हैं ........ शुद्ध काव्य क्षेत्र में न कोई बात भली कही जाती है, न बुरी ........ सब बातें केवल दो रूपों में दिखाई जाती हैं-सुन्दर और असुन्दर।' अन्यत्र वे प्रतिपादित करते हैं-'कविता केवल वस्तुओं के रूप-रंग के सौन्दर्य की छटा नहीं दिखाती प्रत्युत कर्म और मनोवृत्ति के सौन्दर्य के भी अत्यन्त मार्मिक दृश्य सामने रखती है। ........ यह रसदशा नहीं तो और क्या है?' इसी प्रकार आचार्य नन्द दुलारे वाजपेयी ने भी सौन्दर्य और रस का अभिन्न सम्बन्ध मानते हुए लिखा है-'इसी सौन्दर्य-संवेदन को भारतीय परिभाषिक शब्दावली में 'रस' कहते हैं।' डॉ० नगेन्द्र ने 'रस' की विस्तृत व्याख्या के अनन्तर ये
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३२८ रस-सिद्धान्त का पुनर्वविवेचन
निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं-'अतः संक्षेप में रस के तीन अर्थ है : (१) भाव मूलक काव्य-सौन्दर्य (२) भाव मूलक काव्य-सौन्दर्य की अनुभूति (३) सामान्य काव्य- सौन्दर्य®। यहाँ 'भाव' शब्द चाहे तीनों निष्कर्षों में न आ पाया हो किन्तु 'सौन्दय' सर्वत्र विद्यमान है। अतः यदि हम भट्टनायक से लेकर डा० नगेन्द्र की परम्परा के अनुसार काव्यगत भाव के संदर्भ में सौन्दर्य या आकर्षण को आवश्यक मानें तो अनुचित न होगा। उक्त प्रश्न पर एक अन्य दृष्टि से भी विचार किया जा सकता है-मधुर भावों में तो सर्वसाधारण की रूचि एवं प्रवृत्ति सहज है किन्तु काव्यगत कटु भावों में सामाजिक की प्रवृत्ति का क्या कारण है ? रस,सैद्धान्तिक आचार्यों के अनुसार कटु भावों का निवैयक्तिक, निर्विशेष या साधारणीकृत हो जाना ही इसका कारण है। पर मनोविज्ञान की दृष्टि से 'निर्वयक्तिकता' को क्या कहा जायगा? डॉ० भगवान दास ने अपने ग्रन्थ 'दी साइन्स आफ इमोशन्स' में प्रतिपादित किया है कि विभिन्न भाव मूलतः आकर्षण-विकर्षण के विकसित रूप हैं; जब आकर्षण और विकर्षण के साथ 'अहंतत्त्व संयुक्त हो जाता है तो वे क्रमशः राग-द्वष में परिणत हो जाते हैं और उन्हीं से परिस्थिति भेद से अनेक भाव उत्पन्न होते हैं; जैसे, राग बडे के प्रति श्रद्धा में, छोटे के प्रति स्नेह में, समलैंगिक के प्रति मित्रता में, भिन्न लैगिक के प्रति रति में परिणत हो जाता है। अस्तु, यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि आकर्षण+अहं=राग या भाव। जिसे रस सैद्धान्तिक आचार्यों ने वैयक्तिकताशून्य या निवैयक्तिक, निर्विशेष, साधारणीकृत भाव कहा है, वह वस्तुतः 'अहं शून्य भाव' है, जिसे 'आकर्षण' कहना उचित होगा; क्योंकि यदि 'आकर्षण अहं=भाव' उचित है तो 'भाव-अहं=आकर्षण' भी उचित होगा। भट्टनायक एवं अभिनवगुप्त की रस-निष्पत्ति प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन करते हुए डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने भी बताया है कि साधारणीकरण का मूल कारण हमारी चेतना का अहं के बन्धन से मुक्त हो जाना है; इसी को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'हृदय की मुक्त दशा' मानी है। ऐसी स्थिति में काव्यगत 'निर्विशेष भाव' की अनुभूति को 'अहंशून्य भाव' या 'आकर्षण' की अनुभूति कहें, तो अनुचित न होगा क्योंकि अन्ततः परम्परागत दर्शन और आधुनिक मनोविश्लेषण-दोनों की ही दृष्टि से 'अहं' का बन्धन ही व्यक्ति की चेतना व अनुभूति को 'इद' या सामाजिक बोध से पृथक करता है। काव्यजन्य भावानुभूति के निर्विशेष या साधारणीकृत रूप को आकर्षण की अनुभूति मान लेने पर सौन्दर्यानुभूति की अनेक समस्याएं स्वतः ही सुलभ जाती हैं। हमारी कलागत कुरूप, वीभत्स एवं करुण में क्यों प्रवृत्ति होती है तथा उनसे
रस-सिद्धान्त; पृ० सं० ८
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हम आनन्दित क्यों होते हैं-इसका सम्यक् उत्तर न भाब के आधार पर दिया जा सकता है और न सौन्दर्य के आधार पर जबकि आकर्षण के प्रसंग में यह समस्या उपस्थित ही नहीं होती। व्यावहारिक जीवन में भी एक कुरुप, गन्दा, नग्न भिखारी भी हमें आकर्षित करके अपनी दीनता के बोध को संप्रेषित करने में सफल हो जाता है ? हम अपनी कुरूप माता के भी या कुरूप पुत्र के भी दर्शन के लिए लालायित रहते हैं या महात्मा गान्धी जैसे व्यक्ति को देखकर भी भाव विभोर हो जाते हैं; अथवा फटा पुराना सौ रुपये का नोट भी दस रुपये के नये नये नोटों के बदले में स्वीकार कर लेते हैं; काले कोयलों और गन्दी खाद को भी घर या खेत के लिए रुचिपूर्वक खरीदते हैं-अवश्य ही इन सब उदाहरणों में हमारी रुचि एवं प्रवृत्ति के कारण भिन्न-भिन्न प्रतीत होंगे किन्तु एक बात स्पष्ट है कि उनके आलम्बन सभी सौन्दर्य-युक्त या सुन्दर नहीं हैं। इसका तात्पर्य है कि जीवन में भी हम ऐसे पदार्थों, तत्त्वों या व्यक्तियों को रुचि पूर्वक ग्रहण करते हैं जो बाह्य रूप की दृष्टि से भले ही कितने ही कुरुप क्यों न हों ! इन के मूल में रुचि, स्वार्थ, आवश्यकता आदि अनेक कारण दृष्टि-गोचर होंगे, किन्तु वे सब आकर्षण के ही विभिन्न भेद हैं। आकर्षण के अनेक स्तर एवं भेद हैं-ऐन्द्रियक आकर्षण, भावात्मक आकर्षण, बौद्धिक आकर्षण आदि। रुचि, प्रवृत्ति जिज्ञासा आदि आंकर्षण के ही भावात्मक एवं बौद्धिक रूप की सूचक हैं। यह सब हम अन्यत्र स्पष्ट करेंगे-यहाँ हमारा प्रयोजन इतना ही स्पष्ट करना है कि जहाँ 'कुरूप भिखारी' 'कुरूप माता' 'फटे हुए पुराने नोट में सौन्दर्य की सत्ता नहीं मानते वहाँ भी उनमें भावात्मक या बौद्धिक आकर्षण अवश्य मान लेंगे; अन्ततः कुरूप भिखारी भी अपनी चेष्टाओं द्वारा हमें आकर्षित कर लेता है तथा सौ रुपये का मैला कुचला नोट भी किसी को इतना आकर्षित कर सकता है कि वह घन्टों हमारा साथ न छोड़े। कहा जा सकता है कि हमने यहाँ आकर्षण में बौद्धिक आकर्षण को भी सम्मिलित करके उचित रहीं किया-जो लोग कला या रस का क्षेत्र भावनाओं तक ही सीमित समझते हैं, उनके मन में अवश्य ऐसा विचार उठेगा; किन्तु यदि हम कला में बौद्धिक तत्त्वों का भी आस्तित्त्व स्वीकार करते हैं तो उनसे बौद्धिक आकर्षण की भी उद्दीप्ति संभव है। यह बौद्धिक आकर्षण कला के सामान्य सौन्दर्य या आकर्षण से कितना भिन्न या अभिन्न है, इसका निर्णय हम अन्यत्र करेंगे; यहाँ यह स्पष्ट है कि 'आकर्षण का अर्थ क्षेत्र 'सौन्दर्य' जैसे शब्द की अपेक्षा अधिक व्यापक तो है ही, साथ ही वह उन समस्याओं का भी समाधान कर पाता है जो 'सौन्दर्य' या 'माधुर्य' जैसे शब्दों के लाक्षणिक प्रयोगों के कारण उत्पन्न हुई हैं। क्या लौकिक आकर्षण एवं कलाजन्य आकर्षण को एक ही माना जा सकता है-इस प्रश्न का उत्तर भी अन्यत्र दिया जायगा। यहाँ संक्षेप में कहा जा सकता है कि हमें आकर्षित करने वाले सड़क के भिखारी एवं रंग-मंच के भिखारी में 'आकर्षण'
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३३० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
की दृष्टि से तो अन्तर नहीं है किन्तु परिस्थितियों का भेद अवश्य है जिससे एक परिस्थिति में उत्पन्न 'आकर्षण' शक्ति एवं मात्रा की दृष्टि से उतना सबल नहीं होता जितना अन्यत्र उत्पन्न आकर्षण हो सकता है। वस्तुतः आकर्षण की मात्रा के साथ- साथ उसकी प्रकृति में भी अन्तर रहता है-विभिन्न प्रकार की कलाओं, एवं विभिन्न विषयों पर आधारित कलाओं में आकर्षण तो सर्वत्र विद्यमान रहता है-यदि वे कला कोटि में आती है तो-किन्तु आकर्षण की प्रकृति एवं मात्रा में उनमें परस्पर अन्तर संभव है। आकर्षण की प्रकृति एवं मात्रा का विस्तृत विवेचन हम अपने अन्य ग्रन्थ 'साहित्य-विज्ञान' में सप्रमाण कर चुके हैं; यहाँ हम उस ग्रन्थ में उपलब्ध निष्कर्षों के आधार पर संक्षेप में आकर्षण शक्ति के रूप-भेदों पर प्रकाश डालते हैं। कला में ऐन्द्रियक, भावात्मक एवं बौद्धिक-तीनों प्रकार के तत्त्व रहते हैं, जिनसे क्रमश: ऐन्द्रियक आकर्षण, भावात्मक आकर्षण एवं बौद्धिक आकर्षण की सृष्टि होती है। विभिन्न कला कृतियों में ऐन्द्रियक, भावात्मक एवं बौद्धिक तत्त्व समान रूप में ही नहीं होते, किसी में कोई तत्त्व अधिक और कोई गौण होता है। इसी स्थिति के अनुसार कुछ कला दृष्टियों में ऐन्द्रियक आकर्षण की, कुछ में भावात्मक आकर्षण की कुछ में बौद्धिक आकर्षण की प्रमुखता रहती है तो कहीं-कहीं कल्पनात्मक या रूपात्मक आकर्षण की भी प्रमुखता संभव है। अस्तु, कला-कृति एवं काव्य के वस्तुगत तत्त्वों के अनुसार आकर्षण के भी विभिन्न भेद किये जा सकते हैं-जिनका निरूपण एवं स्पष्टीकरण अन्यत्र किया जायगा; यहाँ हमारा प्रतिपाद्य इतना ही है कि कला कृति में सौन्दर्य या आकर्षण की उद्दीप्ति विभिन्न साधनों एवं माध्यमों से की जाती है, तथा उनसे उत्पन्न या उद्दीप्त सौन्दर्य अथवा आकर्षण के विभिन्न भेदों में प्रकृति, गुण एवं मात्रा की दृष्टि से परस्पर अन्तर रहना भी स्वाभाविक है- किन्तु अन्ततः वे सभी आकर्षण की ही कोटि में आते हैं तथा कला के माध्यम से अनुभूत किसी भी प्रकार के आकर्षण से रसानुभूति की उपलब्धि संभव है। अस्तु, पूर्वोक्त स्थापना के अनुसार 'रस' का अर्थ या तात्पर्य 'सौन्दर्यानुभूति' था, जिसे अब अधिक स्पष्ट एवं निश्चित रूप देने के लिए कहा जा सकता है- 'आकर्षण की अनुभूति' ही सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति है। परम्परागत रस सिद्धान्त में मुख्यतः भावात्मक आकर्षण का ही विवेचन विश्लेषण हुआ है; जब कि उसे व्यापक रूप देने के लिए बौद्धिक, कल्पनात्मक, एवं रूपात्मक (शैली जन्य) आकर्षण को भी स्वीकृति देते हुए उसकी भी विवेचना आवश्यक है। अतः आगे विभिन्न अध्यायों में आकर्षण के विभिन्न भेदों की व्याख्या करते हुए रस-सिद्धान्त को व्यापक रूप देने का प्रयास किया जायगा।
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४ बौद्धिक रस : एक स्थापना
कला और साहित्य में बौद्धिक तत्त्व-विचार, प्रत्यय, सिद्धान्त आदि- न्यूनाधिक रूप में सदा विद्यमान रहते हैं; यह एक सामान्य तथ्य है जिसकी पुष्टि के लिए विशेष प्रमाणों की आवश्यकता नहीं। मनोविज्ञान के अनुसार हमारे विभिन्न संवेदन विचार से संपृक्त होकर ही, भाव, मनोवेग, संवेग आदि में परिवर्तित होते हैं, अतः कोई भी भाव, भावना एवं स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति विचार से नितान्त शून्य नहीं हो सकती। फिर भी साहित्य में विचार की दो स्थितियाँ संभव हैं-एक तो वह जिसमें विचार किसी भाव या भावना का अंग बनकर प्रस्तुत हो तथा वहाँ उसका लक्ष्य भी भाव विशेष की पुष्टि में योग देना होता है। दूसरी स्थिति यह है कि वह भाव का अंग या सहायक न होकर वही प्रमुख होता है तथा उसी की अनुभूति को किसी न किसी प्रकार संवेद्य रूप दे दिया जाता है। दूसरी स्थिति के द्योतक कतिपय उदाहरण यहाँ प्रस्तुत हैं- (क) करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते सिल पै परत निसान।। (ख) माखी गुड़ में गडि रही पंख रही लपटाय। ताली पीट सिर धुन मीठै बोइ माय। (ग) अपने न दोष पेखे, पर के औगुण पेखे, दुष्ट को सुभाव, उठि निन्दा ही करतु है। X X पाँव के तरे की नहीं सूझे आग मूरख कू, और सूँ कहत तेरे सिर पै बरतु है।
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३३२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
उपयुक्त उदाहरणों में क्रमशः अभ्यास की महिमा, लोभ की बुराई और दुष्ट के लक्षणों का निरूपण किया गया है; इनमें किसी भाव-विशेष की सत्ता दृष्टिगोचर नहीं होती-अतः इन्हें हम सामान्य रूप में विचार-प्रधान काव्य के उदाहरण के रूप में ग्रहण करते हुए 'विचारात्मकता' या 'बौद्धिकता' को उसकी प्रमुख प्रवृत्ति मान सकते हैं। • परम्परागत साहित्य-शास्त्र और बौद्धिकता- जैसा कि अन्यत्र बताया जा चुका है, परम्परागत साहित्य-शास्त्र में भी अनेक ऐसे सिद्धान्त स्थापित हुए हैं जो विचार तत्त्व या बौद्धिकता को ही प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष में महत्त्व प्रदान करते हैं। इनमें चार प्रमुख हैं-अनुकृति, औचित्य, उदात्त और शान्त रस। अनुकृति सिद्धान्त के अनुसार कवि या कलाकार वस्तुओं, एवं व्यक्तियों एवं घटनाओं का वर्णन अपने पूर्व ज्ञान के अधार पर करता है, अतः इस दृष्टि से अनुकृति सिद्धान्त पूर्व ज्ञान या यथार्थ ज्ञान का अनुमोदक सिद्ध होता है। अरस्तु ने कला से प्राप्त होने वाली प्रसन्नता को भी ज्ञान-प्राप्ति का आनन्द माना है। अतः निश्चय ही अनुकृति सिद्धान्त विचार या ज्ञान की प्रमुखता का घोषक है, किन्तु वह भाव-निरूपण का भी निषेध नहीं करता। उसका बल 'यथार्थता' या 'स्वाभा- विकता' पर अधिक है-यह ययार्थता चाहे विचार या ज्ञान की हो अथवा भाव और अनुभव की। औचित्य सिद्धान्त विषय-वस्तु की उपयुक्तता, उचित-संघटना, एवं संगति का निर्देशक है। वैसे 'औचित्य' बुद्धि की प्रक्रिया से सम्बन्धित है-कोई वस्तु या कार्य उचित है या नहीं; इसका निर्णय हम विवेक बुद्धि के आधार पर करते हैं। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि औचित्य सिद्धान्त काव्य में भाव तत्त्व का निषेध करता है; अधिक से अधिक यही कहा जा सकता है कि वह भावों के भी उचित (=स्वाभाविक) प्रतिपादन पर बल देता है। इस प्रकार अनुकृति एवं औचित्य-दोनों बौद्धिक तत्त्व होते हुए भी काव्य एवं कला में विचार और भाव-दोनों के ही यथार्थ एवं संगत रूप के अनुमोदक हैं; अतः इन्हें शुद्ध बुद्धिवादी सिद्धान्त के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता जबकि शान्तरस और उदात्त सिद्धान्त का सम्बन्ध प्रत्यक्ष रूप में काव्यगत बौद्धिकता से है, किन्तु इनके स्वरूप के सम्बन्ध में विद्वानों में मत-भेद है; अतः काव्यगत बौद्धिकता के संदर्भ में इनकी व्याख्या करने से पूर्व इनके स्वरूप का विश्लेषण व स्पष्टीकरण कर लेना उचित होगा। • शान्त रस का स्वरूप-विवेचन- प्रायः यह स्वीकार किया जाता है कि भारतीय रस-सिद्धान्त के प्रतिष्ठाता भरत ने आठ ही रस-भेद माने थे, नवें रस के रूप में शान्त रस की कल्पना परवर्ती
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बोद्धिक रस : एक स्थापना ३३३
आचार्यों की उपलब्धि है; अतः 'नाटय् शास्त्र' में शान्त रस सम्बन्धी धारणाएँ बाद में प्रक्षिप्त की हुई हैं। हमारे विचार में शांत रस भरत की अपनी खोज हो या बाद के विद्वानों की-इससे इसके महत्त्व में कोई अन्तर नहीं पड़ता। किन्तु शांत रस की स्थापना रस सिद्धान्त की विकासोन्मुखता को अवश्य प्रमाणित करती है, क्योंकि इसके अन्तर्गत उस काव्य या साहित्य को स्थान दिया गया है जो किसी अन्य रस के अन्तर्गत नहीं आता। वस्तुतः जहाँ अन्य आठ रसों का सम्बन्ध किसी भाव-विशेष की प्रमुखता से है, वहाँ इसका सम्बन्ध विचार-विशेष की प्रमुखता से है। ऐसी स्थिति में यह पूछना कि इसका 'स्थायी भाव' या प्रमुख भाव क्या है-निरर्थक प्रतीत होगा क्योंकि जिस रचना का स्थिर, प्रमुख एवं केन्द्रीय तत्त्व ही 'विचार' है, उसमें भाव-विशेष की प्रमुखता को खोजने का प्रयास ही असंगत होगा। फिर भी रसों की परम्परागत व्याख्या में स्थायी भाव विभाव, संचारी भाव आदि के विश्लेषण को प्रमुखता दी गयी थी-अतः शांत रस के बारे में भी उसी विश्लेषण पद्धति को अपनाना स्वाभाविक था। अस्तु, शांत रस के स्थायी भाव को खोजने का प्रयास अपने आप में असंगत था, फिर भी वह किया गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि विभिन्न आचार्य विभिन्न निष्कर्षों पर पहुँचे। भरत के 'नाट्य शास्त्र' में प्रक्षिप्त अंशों के अनुसार शांत रस का स्थायी भाव शम है तो रुद्रट के अनुसार सम्यग्ज्ञान (सम्यक् ज्ञान) है'। आनन्दवर्धन ने तृष्णाक्षय-सुख को ही शांत रस का स्थायी भाव बताते हुए प्रतिपादित किया कि यदि तृष्णा (इच्छा) को सारे भावों को उपलक्षण मान लें तो तृष्णाक्षय- सुख सभी तृष्णाओं, भावों या चित्तवृत्तियों की शांति का द्योतक होगा, अतः तृष्णाक्षयसुख एवं शम (शांति) में कोई अन्तर नहीं है।१ 'लोचन' में एक अज्ञात विद्वान् के मतानुसार सवचित्तवृत्ति प्रथम शांत-रस का स्थायी भाव है जब कि एक अन्य विद्वान् के अनुसार 'निर्विशेष चित्तवृत्ति को ही इस रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।१ भोजराज ने 'सरस्वती कंठाभरण' में घृति को तथा 'शृ'गार-प्रकाश' में शम को शांत रस के स्थायी भाव के रूप में प्रतिष्ठित किया है। अभिनवगुप्त ने 'अभिनव-भारती' में प्रायः सभी मतोंपर पुनर्विचार करते हुए तत्त्व-ज्ञान को ही शांत रस का स्थायी भाव प्रमाणित किया है।4 इस प्रकार विभिन्न विद्वानों ने क्रमशः शम, सम्यग्ज्ञान, तृष्णाक्षय-सुख, सर्वचित्तवृत्तिप्रशम, निर्विशेष चित्तवृत्ति, धृति, एवं तत्त्व-ज्ञान को शांत रस के स्थायी भाव के रूप में प्रस्तुत किया है। आगे चलकर तत्त्व-ज्ञानजन्य निर्वेद को ही शांत रस के स्थायी भाव के रूप में उल्लिखित करने की परम्परा या रूढ़ि चलती रही, पर इसका स्वरूप अब भी अस्पष्ट एवं भ्रान्त है। विभिन्न आचार्यों ने इस
{-x, The Numbur of Rasas; By V. Raghavan; 1940, Pages 59-84
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३३४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
रस के स्थायी भाव के सम्बन्ध में इतने अधिक मत क्यों प्रस्तुत किये-इसका समाधान अभी प्रस्तुत नहीं हो पाया है। हमारे विचार से इन सभी मतों का चाहें स्वीकार न किया जाय किन्तु वे आंशिक रूप में शांत रस की विभिन्न विशेषताओं का उद्घाटन अवश्य करते हैं-अतः उन पर समन्वयात्मक दृष्टि से विचार करते हुए शांत की मूल प्रकृति का अनुसंधान किया जा सकता है। अतः आगे हम ऐसा ही करने का प्रयास करेंगे। यदि हम यहाँ इस परिकल्पना (Hypothesis) को लेकर चलें कि शांतरस किसी भाव-विशेष के आस्वाद से सम्बन्धित न होकर विचार-विशेष के आस्वाद से सम्बन्धित है, अतः उससे वस्तुओं का भावन तथ्यों एवं तत्त्वों के बोध के रूप में होता है तथा शान्तरस की अनुभूति तत्त्व बोध की अनुभूति होती है-अतः उसका स्थायी भाव-केन्द्रीय तत्त्व-तत्त्वबोध की प्रवृत्ति है; तो कदाचित् उपयुक्त्त विभिन्न मतों में समन्वय स्थापित हो सकता है। यहाँ क्रमशः उन पर विचार किया जाता है। सर्वप्रथम 'शम' को लीजिए। 'शम क्या है ? हिन्दी में इसे हम 'शान्ति' का पर्याय मान सकते हैं। तत्त्व बोध के समय हमारी भावात्मक प्रवृत्तियाँ शान्त या निष्क्रिय हो जाती हैं, फलस्वरूप हमें मानसिक शान्ति=बौद्धिक शान्ति का अनुभव प्राप्त होता है। यदि यह अनुभव अधिक गम्भीर हो तो उसी के अनुरूप आनन्द की अधिकता का भी द्योतक सिद्ध हो सकता है। अस्तु, 'शम' तत्त्व बोधजन्य मानसिक या बौद्धिक शान्ति का ही पर्याय है। सम्यग्ज्ञान या 'सम्यक् ज्ञान' शुद्ध ज्ञान या शुद्ध तत्त्व-बोध (जिसमें हम अपने पूर्वाग्रहों-दुराग्रहों से मुक्त होकर सत्य का साक्षात्कार करते हैं-) का ही परिचायक है, अतः यह तो स्पष्ट ही हमारी परिकल्पना के अनुरूप है। इसी प्रकार तत्त्व-बोध या बौद्धिक तल्लीनता के क्षणों में हम व्यावहारिक जीवन की समस्याओं, आवश्यक- ताओं, इच्छाओं, तृष्णाओं आदि से मुक्त हो जाते हैं-इसीलिए तत्त्ववेताओं व आचार्यों को 'फिलास्फर (दार्शनिक) एवं भुलक्कड़ प्रोफेसर' की संज्ञा दी जाती है, जो तत्त्वबोध की इसी स्थिति के परिचायक हैं-ऐसी स्थिति तृष्णाक्षयसुख, सर्वचित्त- वृत्ति प्रशम, निर्विशेषचित्तवृत्ति आदि स्थायी भाव भी इसी तत्त्व-बोध की भावात्मक स्थिति के द्योतक माने जा सकते हैं। अभिनवगुप्त ने इन सभी मतों के स्थान पर तत्त्व-ज्ञान को ही स्थायी भाव प्रमाणित किया है जो हमारी तत्त्वबोध की परिकल्पना से अभिन्न है; दोनों में शब्दावली का ही अन्तर है, अर्थ का नहीं। 'ज्ञान' परम्परागत शब्द है जबकि 'बोध' आधुनिक मनोविज्ञान एवं साहित्य का ही बहु प्रचलित शब्द है। आज की शब्दावली में 'ज्ञान' शब्द शुष्क विचार का पर्याय बन गया है जब कि 'बोध' ज्ञान या विचार के अनुभूतिगम्य रूप या भावात्मक रूप का सूचक है। प्राचीन दर्शन में
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बौद्धिक रस : एक स्थापना ३३५
ज्ञान का अर्थ-क्षेत्र व्यापक था, जिसमें विचार, अनुभव, बोध आदि सभी अर्थ सम्मिलित थे। अस्तु, अभिनवगुप्त का 'तत्त्व-ज्ञान' हमारे 'तत्त्व-बोध' का ही पर्याय है, और यदि न भी है तो उसे इसी अर्थ में ग्रहण करना होगा क्योंकि साहित्य और विज्ञान में यही तो अन्तर है। जहाँ साहित्येतर या वैज्ञानिक पुस्तकों से तत्त्व का ज्ञान मात्र होता है वहाँ साहित्य एवं कला से उसका बोध प्राप्त होता है, अतः प्रस्तुत संदर्भ में तत्त्व-ज्ञान को तत्त्व-बोध के ही अर्थ में ग्रहण करना आवश्यक है। अभिनव-परवर्ती आचार्यों ने तत्त्व-ज्ञानजन्य निर्वेद की चर्चा करते-करते, तत्त्व-ज्ञान को तो प्रायः भूला ही दिया-मध्यकाल एवं आधुनिककाल के आचार्यों ने प्रायः 'निर्वेद' को ही शान्तरस के स्थायी के रूप के उल्लिखित किया है, तथा 'निर्वेद' का सम्बन्ध पलायन, वैराग्य, अध्यात्म आदि से स्थापित करते हुए शुद्ध बौद्धिक आनन्द को एक आध्यात्मिक या रहस्यात्मक आनन्द में परिणत कर दिया है जो निश्चय ही आचार्यों के दृष्टि-संकोच का परिचायक है। तत्त्व-बोध की अनु- भूति एवं प्रवृत्ति यदि स्थिर एवं दीर्घकालीन हो जाय तो उस, स्थिति में सम्भव है कि हम सांसारिक विषयों एवं इच्छाओं से मुक्त हो जायँ तथा इसी स्थिति को विरक्ति या निर्वेद की स्थिति मान सकते हैं, पर यह आवश्यक नहीं है कि तत्त्व-बोध की प्रत्येक अनुभूति हमें स्थायी रूप में विरक्त या वरागी बना दे। फिर भी बौद्धिक अनुभूति व्यक्ति में धैर्य, संतोष, निष्क्रियता आदि का भी संचार कर सकती है- इसीलिए कुछ आचार्यों ने धृति एवं संतुष्टि का भी उल्लेख शान्तरस के स्थायी भाव के रूप में किया है। अस्तु, शान्त रस की अनुभूति में प्रमुख तो तत्त्व-बोध की अनुभूति ही है-उसके अवान्तर भेद शम या मानसिक शांति, तृष्णाओं या इच्छाओं से मुक्ति का सुख, सांसारिक विषयों से विरक्ति का सूचक निर्वेद, धैर्य, संतोष आदि अनेक हो सकते हैं। यदि रस-सिद्धान्त की ही शब्दावली में कहें तो शान्तरस की रचना में केन्द्रीय या स्थायी तत्त्व तो तत्त्वबोध की अनुभूति ही है अस्थिर, गौण या संचारी तत्त्वों में भले ही हम शम, निर्वेद, घृति आदि विभिन्न तत्त्वों को स्थान दें। अतः इस विश्लेषण के अनुसार शान्त रस को बौद्धिक तत्त्वों की काव्यात्मक या कलात्मक अनुभूति से प्राप्त बौद्धिक आनन्द का पर्याय स्वीकार करें तो अनुचित न होगा। विभिन्न आचार्यों ने शान्तरस के स्वरूप को स्पष्ट करते हुए उसके अन्य लक्षणों पर भी प्रकाश डाला है, जिनसे भी इस निष्कर्ष की पुष्टि होती है कि शान्त- रस बौद्धिक आनन्द है। यहाँ 'अभिनव भारती' से कतिपय उद्धरण प्रस्तुत हैं- (क) 'वह तत्त्व-ज्ञान, वैराग्य, चित्तशुद्धि आदि विभावों (कारणों) से उत्पन्न होता है। .... निर्वेद, स्मृति, धृति, शौच, स्त्तम्भ, रोमांच, आदि उसके व्यभिचारि भाव हैं।"
६. हिन्दी अभिनव-भारती; आचार्य विश्वेश्वर; प्रथम संस्करण; पृ० सं० ६०९-१०
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(ख) 'जहाँ न दुःख रहता है, न सुख, न द्वेष रहता है, और न ईर्ष्या रहती है। समस्त प्राणियों में समभाव वाला वह शान्तरस प्रसिद्ध माना गया है।" (ग) 'रत्यादि स्थायी भाव विकार रूप हैं और शान्तरस (उन सबका) प्रकृति रूप है। विकार (अथात् शृंगार आदि अन्य सब रस) प्रकृति से उत्पन्न होते हैं और अन्त में फिर उसी में लीन हो जाते हैं।" (घ) शान्तरस में 'शम' चेष्टा के अभाव का द्योतक है; अतः कुछ लोगों के विचार से शान्तरस की इस निष्क्रिय स्थिति को रंगमंच पर अभिनीत करना कठिन है। (ङ) 'तत्त्वज्ञानी को सर्वत्र ही दृढ़तर वैराग्य होता देखा जाता है। .... किन्तु उस प्रकार का वैराग्य तो ज्ञान की ही पराकाष्ठा का नाम है, यह बात भी स्वयं पतंजलि मुनि ने कही है।" (च) 'इसलिए निर्वेद स्थायिभाव नहीं है, किन्तु तत्त्वज्ञान ही स्थायिभाव है।" (छ) निर्वेद एवं वैराग्य भी सवथा एक ही बात नहीं है-शान्त रस का सम्बन्ध निर्वेद से है न कि वैराग्य से।" (ज) 'तत्त्वज्ञान ही मोक्ष का साधन है, इसीलिये उसी को स्थायिभाव मानना उचित है।"२ (झ) 'ज्ञानानन्दादि विशुद्ध धर्मयोगी परिकल्पित विषय-भोग रहितोऽत्र स्थायी' अर्थात् विशुद्ध ज्ञानानन्द (=बौद्धिक आनन्द) के धर्म या लक्षणों से युक्त परिकल्पित विषय-भोग रहित (=ऐन्द्रियक विषयों एवं तत्त्वों के बाह्य ज्ञान से रहित) तत्त्वज्ञान (तत्त्व-बोध) या आत्मज्ञान ही शान्तरस का स्थायी भाव है।१ (ञ्) अन्य सारी भावात्मक प्रवृत्तियाँ तत्त्वज्ञान की ही संचारी भाव हैं। (वही पृ० ६२७) (ट) सभी रसों का आस्वाद भी अन्ततः विभिन्न विषयों की विमुखताजन्य मानसिक शान्ति के रूप (शम) में होता है, अतः यह कहा जा सकता है कि सभी रसों की परिणति शान्त रस में होती है।"४
७.८. हिन्दी अभिनव-भारती ; आचार्य विश्वेश्वर ; प्रथम संस्करण ; पृ० सं० ६०९-१० ९-१०. वही पृ० सं० ६१७ ११. वही, पृ० सं० ६१९। १२-१३. वही ; पृ० सं० ६२३ ; १४. वही ; पृ० सं० ६२५
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उपयु क्त उद्धरणों के आधार पर शान्तरस के प्रमुख लक्षण ये निर्धारित किये जा सकते हैं-(१) उसकी उत्पत्ति तत्त्व-बोध की अनुभूति से होती है। (२) निर्वेद, चित्त-शुद्धि (व्यक्तिगत राग-द्वेष से मुक्ति), पूर्व स्मृति, धैर्य्य, पवित्रता का भाव, आदि उसकी संचरणशील अवस्थाएँ हैं। (३) उसमें राग-द्वेष से उत्पन्न दुःख-सुख आदि से मन मुक्त हो जाता है। (४) शान्तरस मानव चेतना की मूल प्रकृति या स्थिति- शान्ति की अवस्था-का सूचक है जबकि विभिन्न मनोविकार मन की उद्दीप्त स्थिति के सूचक हैं; इसीलिए एक का सम्बन्ध मानव-प्रकृति की मूल एवं स्थिर प्रकृति से है जबकि अन्य मनोविकारों एवं भावों का सम्बन्ध उसी प्रकृति की विकृत या परि- वर्तित अवस्था से है। (५) शान्तरस में निष्क्रियता की स्थिति भी सम्भव है। (६) तत्त्व-बोध की चरम स्थिति में व्यक्ति बाध्य विषयों से निवृत्त या विरक्त हो जाता है, किन्तु इस निवृत्ति (निर्वेद) को वैराग्य भाव से भिन्न समझना चाहिए। (७) तत्त्व बोध मोक्ष या मुक्ति (=आचार्य शुक्ल के शब्दों में-'आत्मा की मुक्तावस्था) का साधक है। (८) अन्ततः शान्तरस राग-द्वेष से मुक्त शुद्ध 'ज्ञानानन्द' या बौद्धिक आनन्द का पर्याय है। (९) अन्य भाव शान्तरस के संचारी रूप में आ सकते हैं। (१०) सभी रसों या कला-रूपों के आस्वाद की चरम परिणति शान्तरस अथांत राग- द्वेष से मुक्त बौद्धिक आनन्द में होती है। अतः यहाँ अधिक विस्तार में न पड़कर इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि शान्तरस का मूलाधार तत्त्व-बोध है; तत्त्व-बोध की गम्भीर अवस्था में व्यक्ति राग- द्वेष से मुक्त एवं व्यावहारिक जगत् की इच्छाओं, आवश्यकताओं व समस्याओं से ऊपर उठकर शुद्ध बौद्धिक आनन्द का आस्वादन करता है; जिसे मानसिक शान्ति (शम), विरक्ति (निर्वेद), मुक्ति या मुक्त-दशा आदि विभिन्न रूपों में निर्देशित किया गया है। हमारे विचार से इसे यों भी कहा जाय कि काव्यगत बौद्धिकता से बौद्धिक आकर्षण की उद्दीप्त होती है तथा उसी के विकसित एवं गम्भीर रूप का आस्वादन ही-'शान्तरस' है; जिसे दूसरे शब्दों में 'बौद्धिकरस' कहा जा सकता है-तो अनु- चित न होगा। मध्ययुगीन आचार्यों ने केवल वैराग्य, मोक्ष, भक्ति, अध्यात्म आदि तक ही शान्तरस के क्षेत्र को सीमित करके न केवल अभिनवगुप्त के आशय को सीमित कर दिया अपितु स्वयं शान्तरस को ही एक ऐसा संकीर्ण, सीमित एवं अव्यावहारिक रूप दे दिया जो काव्य की अपेक्षा दर्शन के अधिक अनूकूल है। • उदात्त का स्वरूप-विवेचन- 'उदात्त' (Sublime) सम्बन्धी सिद्धान्त पाश्चात्य काव्यशास्त्र का एक अत्यन्त प्राचीन सिद्धान्त है जिसकी विस्तृत विवेचना सर्व प्रथम ग्रीक आचार्य लौंजाइनस (लगभग प्रथम शती ईस्वी) के ग्रन्थ 'On the Sublime' में उपलब्ध है। लौंजाइनस ने उदात्त को काव्य के आधारभूत प्रमुख तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए विचार, भाव, अलंकार, शैली, रूप आदि सभी के औदात्य को इसके अन्तर्गत
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सम्मिलित कर लिया जो निश्चय ही अति व्याप्ति के दोष से युक्त है। परवर्ती युग में कला-मीमांसा एवं सौन्दर्य-शास्त्र के क्षेत्र में भी उदात्त तत्त्व को व्यापक मान्यता प्राप्त हुई तथा अनेक उच्चकोटि के विद्वानों ने इसके स्वरूप का विवेचन-विश्लेषण कला के संदर्भ में किया। जिसका संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जाता है। शब्द-कोष के अनुसार 'उदात्त' (Sublime) का सामान्य अर्थ है-'raised, aloft, high up, highest, top' अर्थात् ऊपर उठा हुआ, उन्नत, उच्च, सर्वोच्च, शिखर आदि। किन्तु कला के संदर्भ में इसका अर्थ यह ग्रहण किया जाता है-"of ideas, truths, subjects belonging to the highest regions of thought, reality or human activity" (Oxford Dictionary) अर्थात् वे विचार, तत्त्व या सत्य अथवा विषय जिनका सम्बन्ध तत्त्व-चिन्तन, यथार्थता (=यथार्थ बोध) एवं मानवी-प्रक्रिया के सर्वोच्च स्तर से है।' इन सभी अर्थों को समन्वित करते हुए कहा जा सकता है कि उदात्त का सामान्य अर्थ 'उन्नत' या 'उच्च' है किन्तु कला-संदर्भ में तत्त्व-चिन्तन की सर्वोच्चता को उदात्त का गुण माना जाता है। संक्षेप में, उदात्त=सर्वोच्च विचार। सुप्रसिद्ध दार्शनिक काण्ट (Immanuel Kant) ने अपने ग्रन्थ 'critique of Judgment' में कलाजन्य आस्वादों के दो प्रमुख भेद-सौन्दर्य (Beautiful) एवं उदात्त (Sublime) करते हुए दोनों की मीमांसा अत्यन्त सूक्ष्म रूप में प्रस्तुत की है। काण्ट के मतानुसार सौन्दर्य और उदात्त के भेदक लक्षण ये हैं-(१) सौन्दर्य का सम्बन्ध प्रकृति एवं वस्तु के बाह्य रूप से है जबकि उदात्त का रूप-निरपेक्ष तत्त्वों से है। (२) सौन्दर्य में बोध के अनिश्चित रूप का प्रस्तुतीकरण होता है जबकि उदात्त में बुद्धि या तर्क के स्पष्ट रूप का होता है। (३) सौन्दर्य गुण से सम्बन्धित है, उदात्त मात्रा से। (४) सौन्दर्य की अनुभूति सुन्दर वस्तुओं के प्रत्यक्ष बोध से प्राप्त होती है जबकि उदात्त विभिन्न शक्तिशाली वेगों (मनोवेगों) के तात्कालिक अवरोध या नियंत्रण से प्राप्त अप्रत्यक्ष अनुभूति पर आधारित होता है। (५) अतः जहाँ सौन्दर्य आकर्षक तत्त्वों से प्रवृत्ति मूलक अनुभूति का द्योतक है वहाँ उदात्त विकर्षक तत्त्वों से विकर्षण, निवृत्ति (=निर्वेद ?) से उत्पन्न निषेधात्मक आनन्द है। स्वयं काण्ट के शब्दों में-"Hence it is incompatible with (Physical) Charm ; and as the mind is not merely attracted by the object but is ever being alternately repelled, the satisfaction in the snblime does not so much involve a positive pleasure*"which rather des- erves to be called negative pleasure." अर्थात् "अस्तु, यह (उदात्त) आकर्षण
- Oxford Dictionary. 16. Critique of Judgment ; Translated by J. H. Bernard; Page 83.
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(भौतिक) से अतुलनीय है; इसमें मस्तिष्क का वस्तु से आकर्षित होना तो दूर रहा, अपितु उसके स्थान पर प्रायः विकर्षित होता है, अतः उदात्तजन्य संतोष के मूल में विधेयात्मक (प्रवृत्तिमूलक) प्रसन्नता नहीं होती .... अपितु उसे निषेधात्मक (निवृत्ति- मूलक) प्रसन्नता कहा जाय तो अधिक उचित होगा।" अस्तु, संक्षेप में करें तो काण्ट के मतानुसार उदात्त वस्तुओं के ऐन्द्रियक गुणों के स्थान पर उनके आन्तरिक बुद्धिगम्य तत्त्वों पर आधारित हैं; उसके अनुभूति काल में जीवन की अन्य प्रबल मनोवेग (भाव) अवरुद्ध या नियंत्रित रहते हैं; उसके मूल में आकर्षण न होकर विकर्षण रहता है अतः वह प्रवृत्तिमूलक न होकर निवृत्ति- मूलक होता है तथा उससे प्राप्त प्रसन्नता भी प्रवृत्यात्मक न होकर निवृत्यात्मक या निर्वेदमूलक होती है। इस प्रकार उदात्त का बौद्धिकता, भावों की शान्ति, निवृत्ति, निर्वेद आदि से घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित होता है, तथा ये सभी लक्षण पीछे शान्तरस के भी द्योतक माने गये हैं-अतः यदि उदात्त को भारतीय शब्दावली में 'शान्त रस' का भी पर्याय कहदें तो कदाचित् अनुचित न होगा। किन्तु हमें ऐसा निर्णय करने से पूर्व काण्ट के अतिरिक्त अन्य विद्वानों की भी उदात्त सम्बन्धी धारणाओं पर विचार कर लेना चाहिए। हीगल ने उदात्त की उच्चता एवं भव्यता को अपेक्षाकृत अधिक व्यापक आधार पर प्रतिष्ठित करते हुए उसे एक ओर तो यूनिवर्सल या सार्वभौमिक सत्य एवं हित का रूप दिया तो दूसरी ओर उसे अध्यात्म या आलौकिक सत्ता से सम्बन्धित किया१। आगे चलकर ब्रडले ने पुनः उदात्त को लौकिक स्तर पर प्रस्तुत करते हुए इसे सांसारिक महानता या वस्तुओं के महान गुणों से सम्बन्धित किया। यदि कोई वस्तु सुन्दर होने के साथ-साथ महान भी हो तो ब्रडले के विचार से उसे उदात्त कहा जा सकता है। फिर भी सौन्दर्य और उदात्त की अनुभूति में सूक्ष्म अन्तर है "The pleasure we take in sublimity is conditioned by a previous negative stage of repulsion in which we feel 'checked, baffled, mena ced ........ this however, is followed by a feeling of 'expansion or uplifting.' अर्थात् औदात्य की अनुभूति में हम जिस प्रसन्नता का आस्वादन करते है वह पूर्व विकसित 'विकर्षण' की निषेधात्मक स्थिति से सम्बन्धित होती है। इस स्थिति में हम (हमारी भावनाएँ) नियंत्रित, अवरुद्ध या प्रशमित अनुभव करते है। .... इसके अनन्तर हम आत्म-विस्तार या ऊपर उठने (=मुक्ति) की ही अनुभूति प्राप्त करते हैं।' अस्तु, हीगल के अनुसार जहाँ उदात्त आध्यात्मिक तत्त्वों से सम्बन्धित अनुभूति है वहाँ ब्र डले के अनुसार वह महान् तत्त्वों के बोध से प्राप्त निषेधात्मक या निवृत्तिमूलक अनुभूति है जिसमें आत्म-विस्तार होता है।
- 'The Theory of Beauty': E. F. caritt; 1949; Pase 224. 18. The same; Pase 230.
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जार्ज सैंतायना ने अपनी कृति-'The sense of Beauty' में औदात्य की विस्तृत विवेचना करते हुए इसे विभिन्न दृश्यों के बोध से उत्पन्न विराग और मुक्ति का भावावेग माना है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि कुछ लोग केवल कुरूप, कुत्सित एवं भयानक से ही उदात्त का सम्बन्ध मानते हैं जो ठीक नहीं। उन्होंने औदात्य की काव्यगत निष्पति की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए प्रतिपादित किया- "Love makes us poets and the approach of death should make us philosophers ........ when a man knows that his life is over, he can look back upon it from a universal stand-point ........ this comprehe- nsive and impartial views, this synthesis and objectification of ex- perience, constitutes the liberation of the soul and the essense of sublimity ........ emotion of detachment and liberation in which the sublime really consists."१ अर्थात् "जहाँ प्रणय हमें भावुक कवि बना देता है वहाँ मृत्यु का चिन्तन हमें दार्शनिक में परिणत कर देता है। जब एक व्यक्ति सोचता है कि उसका जीवन समाप्ति पर है तो वह एक निवयक्तिक या सार्वजनिक दृष्टि से उस पर विचार कर सकता है। ....... यह निष्पक्ष एवं व्यापक दृष्टि तथा जीवन- अनुभव का समन्वय एवं साधारणीकरण-ये मिलकर आत्मा को वह मुक्ति प्रदान करते हैं जिसे हम उदात्त का सार तत्त्व कह सकते हैं। ........ वस्तुतः निर्वेद एवं मुक्ति के भावों में ही औदात्य का अस्तित्व होता है।" इन शब्दों को पढ़कर लगता है मानों कोई भारतीय दार्शनिक ही शान्तरस की व्याख्या कर रहा है। वस्तुतः सैतायना की उपयुक्त व्याख्या में अभिनव गुप्त का यह मत कि शान्तरस का स्थायी भाव तत्त्व-ज्ञान ही मोक्ष का साधन है या आचार्य शुक्ल की यह धारणा की हृदय की मुक्तावस्था ही रस-दशा है-समन्वित रूप में दिखाई पड़ती है। कला में करुण एवं वीभत्स के आस्वादन का मूलकारण भी सैंतायना के अनुसार औदात्य की अनुभूति ही है। औदात्य के कारण ही इनमें हम शुद्ध बुद्धि या चतन्य सत्ता के मूलस्वरूप का साक्षात्कार करते हुए आनन्दानुभूति प्राप्त करते हैं। वस्तुतः इन भावों की अनुभूतियों के समय हमारी सत्ता शुद्ध बौद्धिकता में परिणत हो जाती है, जिसे अनेक दार्शनिकों ने 'अमरता' या दिव्यता' का नाम दिया है। सैतायना महोदय ने उदात्त को 'कुरूपता' से पृथक बताते हुए यह भी प्रति- पादित किया है कि वह शुद्ध एवं गम्भीर चिन्तना से प्राप्त ऐसा आनन्द है जिसमें हम सर्वथा विषय-निरपेक्ष हो जाते हैं और अन्तरात्मा का साक्षात्कार करने लगते हैं। दूसरे शब्दों में इसे आत्मानुभूति कहा जा सकता है। उसमें हम एक ऐसी स्थिति में
- The Sense of Beauty ; George Santayana ; page 180-181
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पहुँच जाते है जहाँ जीवन और मृत्यु को भी तुच्छ समझते हुए सार्वभौमिक सत्य से तादात्म्य स्थापित कर लेते हैं। इस प्रकार विभिन्न विद्वानों द्वारा प्रस्तुत व्याख्याओं के आधार पर औदात्य के प्रमुख लक्षण संक्षेप में निम्नलिखित बताये जा सकते हैं- (क) सामान्य अर्थ : उन्नत, उच्च या महान्। (ख) कला सन्दर्भ में : सर्वोच्च विचार (आक्सफोर्ड डिक्शनेरी) (ग) बौद्धिकता, भाव-शान्ति, निवृत्ति, निर्वेद (काण्ट) (घ) सार्वभौमिक सत्य, अध्यात्म (हीगल) (ड) महानता, विकर्षणजन्य निवृत्ति, भावनाओं का अवरोध, आत्म-विस्तार की अनुभूति, निषेधात्मक स्थिति। (ब्रडले) (च) निवयक्तिक दृष्टि से चिन्तनजन्य अनुभूति, निर्वेद एवं मुक्ति का भाव, शुद्धबुद्धि या चेतना की क्रिया, आत्मानुभूति, सार्वभौमिक सत्य का बोध। उपयुक्त सूची में अनेक लक्षणों की पुनरावृत्ति हुई है, अतः उन्हें परस्पर सम्बद्ध एवं समान्वित करते हुए उदात्त के प्रमुख गुण ये बताये जा सकते हैं- (१) उच्चता या महानता (२) बौद्धिकता (६) भावात्मक शान्ति (४) निर्वेद भाव (५) निवृत्तिमूलक (६) सार्वभौमिक सत्य-बोध (७) आध्यात्मिक (८) मुक्तिबोध (९) शुद्ध चिन्तन-प्रक्रिया से सम्बन्धित। यदि हम तुलनात्मक दृष्टि से विचार करें तो उपयुक्त सभी लक्षण शान्तरस में भी उपलब्ध होंगे। जिस प्रकार भारतीय आचार्यों ने-मुख्यतः अभिनवगुप्त ने- शान्तरस को तत्त्व-ज्ञान या तत्त्व-बोध जन्य निर्वेद की एक ऐसी अनुभूति माना है जिसमें आत्मा मुक्त होकर शुद्ध 'ज्ञानानन्द' या बौद्धिक आनन्द का अनुभव प्राप्त करती है; उसी प्रकार पाश्चात्य चिन्तकों ने-मुख्यतः सैतायना ने-उदात्त को सार्वभौमिक सत्य के बोध से प्राप्त शुद्ध बुद्धि एवं चेतना के साक्षात्कार एवं आत्मा- नुभूति, मुक्ति एवं निर्वेद की आनन्दात्मक अनुभूति के रूप में स्वीकार किया है। हमारे कुछ आचार्यों ने शान्तरस को अलौकिकता एवं अध्यात्म तक सीमित करने का प्रयास किया है तो दूसरी ओर हीगल ने उदात्त के विषय में भी ऐसा ही किया है। अन्य रसों या कटु एवं करुण भावों के बोध में भी शान्तरस एवं उदात्त भाव की सत्ता दोनों पक्षों ने ही स्वीकार की है तथा दोनों ने ही इन्हें निषेधात्मक, निवृत्तिमूलक, विकर्षणमूलक समान रूप में माना है-अतः शान्तरस एवं औदात्य में आश्चर्यजनक रूप में समानता दृष्टिगोचर होती है। भिन्न देश-कालों के विद्वानों में एक ही तथ्य के सम्बन्ध में इस प्रकार का मतक्य स्थापित होना इस तथ्य की सार्वभौमिकता, सार्व- कालिकता एवं सार्वजनीनता का प्रमाण है।
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अस्तु, हम यहाँ शान्तरस और औदात्य में शाब्दिक अन्तर मानते हुए भी अर्थ और लक्षणों की दृष्टि से इन्हें परस्पर पर्यायवाची घोषित कर सकते हैं तथा जिस प्रकार शान्तरस का स्थायी तत्त्व-'तत्त्व-बोध' को माना था, उसी प्रकार उदात्त को भी मान सकते हैं। वस्तुतः पाश्चात्य आचार्यों ने प्रायः उदात्त के सर्वोच्च विचार, निरपेक्ष तत्त्व-बोध, सार्वभौमिक सत्य-बोध आदि के रूप में उल्लिखित किया है- अतः उदात्त एवं 'तत्त्व-बोध' को समानार्थक भी मान लिया जाय तो अनुचित न होगा। · बौद्धिक रस की स्थापना- शान्तरस एवं उदात्त तत्त्व के अध्ययन एवं विश्लेषण से स्पष्ट है कि पूर्ववर्ती आचार्यों ने इनके माध्यम से काव्यगत बौद्धिकता या बौद्धिक काव्य की व्याख्या का प्रयास किया है। ये सिद्धान्त न केवल काव्यगत विचारात्मकता का अस्तित्त्व प्रमा- णित करते हैं, अपितु उसकी महत्ता को भी मान्यता प्रदान करते हैं-अतः इनके आधार पर-इन दोनों सिद्धान्त को समन्वित करते हुए-हम काव्य एवंकला में 'बौद्धिक रस' की स्थापना कर सकते हैं। हमारे दृष्टिकोण से जिस कलाकृति में विचार तत्त्व ही उसका केन्द्रीय या प्रमुख तत्त्व हो तथा उसी को व्यक्त एवं संवेदित करने के लिए अन्य साधनों-भाव, कल्पना या शैली आदि-का उपयोग किया गया हो, जिससे उस कृति में बौद्धिक आकर्षण (बौद्धिक स्तर का आकर्षण) उत्पन्न होता हो, तो उसके आस्वादन की अनुभूति को हम 'बौद्धिक रस' की संज्ञा दे सकते हैं; इसी को अभिनवगुप्त ने 'ज्ञानानन्द' तथा पाश्चात्य विचारकों ने 'बौद्धिक आनन्द' (Intellectual Joy) के रूप में मान्यता दी है। क्या बौद्धिक रस में शान्त रस एवं उदात्त तत्त्व पूर्णतः समन्वित हो जाते हैं ? क्या बौद्धिक रस की सीमा इन्हीं दो तत्त्वों तक सीमित है ? इन प्रश्नों के उत्तर में कहा जा सकता है कि शान्तरस एवं उदात्त तत्त्व के व्यापक एवं सामान्य रूप को ही बौद्धिक रस में ग्रहण किया जायगा, उस स्थिति में केवल 'अलौकिता, आध्यात्मिकता या सार्वभौमिकता' के सूचक विशेषणों को जिनसे इनका क्षेत्र सीमित हो जाता है- परित्याग करना आवश्यक होगा। शान्तरस एवं उदात्त की कुछ स्थापनाएँ परस्पर- विरोधी एवं असंगत भी हैं, उन्हें भी त्यागना या उन्हें परस्पर समन्वित करना आव- श्यक है। उदाहरण के लिए, शान्तरस के सन्दर्भ में कुछ आचार्य 'शम' या 'शान्ति' के भाव को प्रमुखता देते हैं तो कुछ 'निर्वेद' को-ऐसी स्थिति में हम किसे ग्रहण करें, यह समस्या है। हमारे विचार मे ये दोनों ही तत्त्व बुद्धि की दो प्रक्रियाओं को सूचित करते हैं। बुद्धि की दो प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं-जिज्ञासा और तर्क। जिज्ञासा के कारण वह किसी विषय में प्रवृत्त होती है तो तर्क के कारण वह उससे निवृत्त होती है। जिज्ञासा सन्तुष्ट होने पर 'शान्ति' की अनुभूति तथा तर्क सफल होकर निवृत्ति या 'निर्वेद' की अनुभूति प्रदान करता है। अतः शम जहाँ जिज्ञासा की शान्ति का
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सूचक है, निर्वेद वहाँ तर्क की चरम परिणति का द्योतक है' अतः शम और निर्वेद- बुद्धि की ही प्रक्रिया एवं बौद्धिक रस की दो स्थितियों के सूचक हैं, जिस प्रकार प्रेम या शृगार की दो स्थितियाँ 'संयोग' और 'वियोग' हैं, उसी प्रकार इन्हें भी बौद्धिक रस की दो स्थितियों के रूप में स्वीकार करना चाहिए। दूसरे प्रश्न के उत्तर में कहा जा सकता है कि बौद्धिक रस में शान्त और उदात्त सम्बन्धी सभी क्षेत्र समन्वित हो जायेंगे किन्तु उसका क्षेत्र इन्हीं तक सीमित नहीं रहेगा। यदि बौद्धिक अनुभूति का कोई क्षेत्र इस शान्त और उदात्त की सीमा से बाहर भी पड़ता है तो उसे हम बौद्धिक रस के क्षेत्र में स्थान दे सकते हैं, इतना अवश्य है कि उसे अन्ततः बौद्धिक आकर्षण से युक्त होना चाहिए अर्थात् कोई भी बौद्धिक तत्त्व काव्य या कला में कलात्मक या आकर्षक रूप में ही स्थान प्राप्त कर सकता है; अतः वह बौद्धिक आकर्षण से युक्त होकर ही कला का अंग बन सकता है। • बौद्धिक रस की व्यंजना : आधार और प्रत्रिया- बौद्धिक रस का आधार-तत्त्व 'तत्त्व-बोध' है, तथा तत्त्व का स्वरूप वस्तु की भाँति स्थूल एवं इन्द्रियगोचर नहीं होता; इसलिए काण्ट ने उदात्त के आधार को भी सूक्ष्म एवं ऐन्द्रिय-शून्य बताया है। जहाँ सौन्दर्य से उत्पन्न होने वाली भावात्मक अनु- भूतियों के लिए काव्य और कला में वस्तुओं एवं पदार्थों के ऐन्द्रिय-गुणों एवं बाह्य रूपों का चित्रण अपेक्षित होता है, वहाँ तत्त्व-बोध जन्य बौद्धिक आकर्षण के लिए न ये अपेक्षित हैं, और न ही पर्याप्त। इसीलिए इसमें परम्परागत विभाव, अनुभाव, संचारी भाव की पद्धति अव्यावहारिक एवं अनुपयोगी सिद्ध होगी। आचार्य अभिनवगुप्त ने कदाचित् इसी दृष्टि से 'काव्यार्थ के भावन' में प्रत्येक अर्थ (विचार) को ही विभाव माना है तो दूसरी ओर सैंतायना ने उदात्त की व्यंजना के लिए व्यक्तियों एवं पदार्थों के स्थान पर क्रियाओं एवं क्रिया-कलापों के चित्रण को श्रयस्कर बताया है। हमने 'साहित्य-विज्ञान' में विचार-प्रधान साहित्य का विश्लेषण करते हुए काव्य या साहित्य में तत्त्व-बोध की प्रक्रिया के तीन रूप निर्धारित किये हैं-(१) तत्त्व या विचार को अनुभूतिगम्य बनाने के लिए किसी अन्य तत्त्व या विचार को तर्क, प्रमाण, सादृश्य, दृष्टान्त आदि के रूप में प्रस्तुत किया जाना। (२) तत्त्व या विचार को किसी भावात्मक प्रवृत्ति से सुसम्बन्धित करके उसे भाव के सहयोग से प्रस्तुत करना। (३) विचार को कल्पना एवं शैली के चमत्कार से युक्त करके प्रस्तुत करना। संक्षेप में विचार या तत्त्व का प्रतिपादन या उसकी व्यंजना किसी अन्य विचार, भाव या कल्पना के सहयोग से की जाती है; यहाँ तीनों के कतिपय उदाहरण प्रस्तुत हैं- (क) विचार का अन्य विचार के सहयोग से प्रस्तुतीकरण : (१) करत-करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान। रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान॥
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(२) सब सहायक सबल के कोउ न निबल सहाय। पवन जगावत आग को, दीपहिं देत बुझाय । (ख) विचार का भाव के सहयोग से प्रस्तुतीकरण : (३) स्वारथ, सुकृत न श्रम वृथा, देखु विहंग विचारि। बाज पराये पानि परि तू पच्छीननु न मारि॥ (४) माखी गुड़ में गड़ि रही पंख रही लपटाय। ताली पीटै सिर धुन मीठं बोइ माय॥ (ग) विचार का कल्पना या शैली के सहयोग से प्रस्तुतीकरण : (५) माली आवत देखि क कलियाँ कर पुकार। फूले-फूले चुनि लिये काल्हि हमारी बार॥ (६) मृग मरीचिका के चिर पथ पर, सुख आता प्यासों के पग धर, रुद्ध हृदय के पट लेता कर, गर्वित कहता 'मैं मधु हूँ मुझसे, क्या पतझड़ का नाता ? उपयुक्त उदाहरणों का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाय तो स्पष्ट होगा कि इनका आधार या प्रतिपाद्य तत्त्व विचार है, जिसे संप्रषित करने के लिए क्रमशः अन्य विचार, भाव या कल्पना का सहयोग प्राप्त किया गया है। वैसे ती मानव-मन की प्रत्येक अभिव्यक्ति में भाव, विचार एवं कल्पना का मिश्रण किसी न किसी मात्रा में उपलब्ध होगा किन्तु उनकी मात्रा एवं पारस्परिक अनुपात-भेद के कारण ही हम किसी में विचार की, किसी में भाव को एवं किसी में कल्पना एवं शैली की प्रमुखता स्वीकार करते हैं। अतः न्यूनाधिक मात्रा में भाव, विचार एवं कल्पना की सत्ता तो उपयुक्त सभी उदाहरणों में दृष्टिगोचर होगी, किन्तु उनमें प्रमुखता विचार तत्त्व की है, अतः इस आधार पर उपयुक्त वर्गीकरण प्रस्तुत किया गया है। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि जहाँ विचार को भाव के सहयोग से प्रस्तुत किया जाता है, वहाँ विचार ही प्रमुख एवं भाव गौण होता है, जबकि अन्य रसों- शृंगार, वीभत्स, हास्य आदि-में भाव प्रमुख और विचार गौण रहता है। पीछे ख वर्ग के दोनों उदाहरणों में क्रमशः व्यंग्य एवं ग्लानि के भाव की व्यंजना हुई है, किन्तु इस व्यंजना का लक्ष्य विचार-विशेष को संप्रेष्य बनाना रहा है, अतः इन उदाहरणों को शुद्ध हास्य या वीभत्स में स्थान देना अनुचित होगा। भाव के सहयोग से प्रस्तुत विचार-प्रधान रचना में परम्परागत विभाव, अनु- भाव, संचारी आदि भी खोजे जा सकते हैं, जैसे कि पूर्वोक्त उदाहरण संख्या-चार में
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बौद्धिक रस : एक स्थापना ३४५
सम्भव है। यहाँ 'मक्खी' ग्लानि भाव का आश्रय है, ताली पीटना अनुभाव, 'मीठ ने डबा दिया' यह मति संचारी है। पर यहाँ प्रश्न यह उपस्थित होता है कि इसका स्थायी भाव या मूल भाव क्या है ? उत्तर में कहा जा सकता है-'निर्वेद' है। अवश्य ही 'निर्वेद भाव' शान्तरस एवं बौद्धिक रस का पोषक है किन्तु यह बात सर्वत्र लागू नहीं होती। अतः इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि विचार को भाव के सहयोग से प्रस्तुत करने के लिए स्थूल विभावादि का भी आयोजन किया जा सकता है, किन्तु यह सर्वत्र आवश्यक नहीं है।
• सामान्य तत्त्व-बोध एवं काव्य जन्य बोध- बोध बुद्धि की प्रक्रिया है जो लोक-व्यवहार, दर्शन, विज्ञान और साहित्य- आदि विभिन्न क्षेत्रों से सम्बन्धित है। अतः यहाँ यह विचारणीय है कि सामान्य बोध एवं काव्य के माध्यम से होने वाले तत्त्व-बोध में क्या अन्तर है ? इसके उत्तर में दो बातें कहीं जा सकती है; एक तो सामान्य बोध में हम निजी रुचियों, पूर्वा- ग्रहों, स्वार्थों आदि से बँधे रहते हैं, अतः प्रत्येक तत्त्व, विचार या सिद्धान्त का बोध वयक्तिक दृष्टि से करते हैं, जिससे उसका बोध भी एकांगी या एकपक्षीय हो पाता है। उदाहरण के लिए-'कश्मीर भारत का है या पाकिस्तान का ?' इस समस्या पर विचार करते समय हमारे निष्कर्ष पूर्वाग्रहों से प्रभावित रहेंगे ; अतः जहाँ भारतीय की दृष्टि में वह भारत का सिद्ध होता है वहाँ पाकिस्तानी की दृष्टि में पाकिस्तान का प्रतीत होगा। ऐसी स्थिति में विचार के एक वैयक्तिक, सीमित एवं संकीर्ण रूप का ही बोध होगा, जिसका हमारी अन्तश्चेतना एवं शुद्ध बुद्धि के साथ तादात्म्य संभव नहीं। वह हमारे अहं की सीमाओं से रुद्ध रहेगा। अतः उसकी अनुभूति बौद्धिक अनुभूति तो होगी किन्तु उसका स्तर ऊपरी एवं हलका रहेगा; इस लिए उसमें उस सार्वजनीनता (Universality) का प्रादुर्भाव संभव नहीं, जो रसानुभूति का प्रमुख लक्षण है। दूसरे, सामान्य बोध में तत्त्व बुद्धिग्राह्य होकर ही रह जायगा, उसमें उस विशेष सौंदर्य या आकर्षण का संचार नहीं हो पायेगा जो काव्य जन्य बोध में संभव है। एक दार्शनिक अपने विवेचन से यह तो सिद्ध कर देगा कि वह यह संसार नश्वर है, अतः सबको मरना है, किन्तु उसके विवेचन में कदाचित् उस आकर्षण की उद्दीप्ति न हो पाये जो कबीर की निम्नांकित उक्ति में उपलब्ध है : माली आवत देखिक कलियाँ कर पुकार। फूले-फूले चुनि लिये, काल्हि हमारी बार। अस्तु सामान्य बोध एवं कलाजन्य बोध में इन्हीं दो बातों का अन्तर है- (१) बोध की तटस्थता, निवेयक्तिकता या सार्वजनीनता और (२) बौध का आकर्षण-युक्त होना। यदि संयोगवश व्यावहारिक क्षेत्र में भी हमारा कोई बोध
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३४६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
उपयुक्त दोनों विशेषताओं से समन्वित हो जाय तो वहाँ भी उसी शुद्ध बौद्धिक आनन्द या बौद्धिक रस की अनुभूति संभव है जो विचार-प्रधान काव्य से उपलब्ध होती है। काव्यानुभूति में उपयुक्त दोनों विशेषताओं का संचार किन कारणों से होता है-इसका स्पष्टीकरण हम अन्यत्र काव्यानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया पर पुन्विचार करते समय करेंगे। अतः यहाँ निष्कष रूप में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि काव्य या साहित्य में न्यून मात्रा में तो बौद्धिक तत्त्व सदा विद्यमान रहते हैं, किन्तु जब वे किसी रचना में प्रमुखता प्राप्त कर लेते हैं तो ऐसी रचना को हम विचार-प्रधान रचना मानते हुए उससे बौद्धिक आकर्षण की उद्दीप्ति की तथा बौद्धिक रस की अनुभूति की संभावना कर सकते हैं तथा परम्परागत सिद्धान्तों में से औचित्य, उदात्त शांत रस आदि का भी समन्वय इसी बौद्धिक रस में किया जा सकता है। किन्तु इस प्रसंग में इस बात का सदा ध्यान रखा जाना चाहिए कि साहित्य और कला में विचार की प्रमुखता या प्रधानता का महत्त्व उसी स्थिति में है जबकि वह आकर्षण शक्ति या बौद्धिक आकर्षण से युक्त हो पाता है, अन्यथा उसकी स्थिति उस 'शून्य' के समतुल्य है जो किसी अन्य अंक (=कला-प्रसंग में 'आकर्षण') के साय जुड़कर तो उसके महत्त्व को दस गुना बढ़ा देती हैं; किन्तु स्वतन्त्र रूप में उसका कोई मूल्य नहीं है। वस्तुतः कोरे विचार के आधार पर दर्शन और विज्ञान की रचना तो संभव है, किन्तु कला और साहित्य के लिए उसका सौन्दर्य या आक- र्षण से युक्त होना अत्यावश्यक है।
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५ कल्पना और शैली की दृष्टि स रस का विवेचन
जैसा कि हम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके हैं, भारतीय रसवादी आचार्यों एवं पाश्चात्य भाववादी चिन्तकों ने कला और साहित्य में भाव तत्त्व को प्रमुखता देते हुए भी ऐन्द्रियक विषयों, कल्पनात्मक तत्त्वों व शैली के गुणों का भी महत्त्व न्यूनाधिक रूप में स्वीकार किया है। एक ओर जहाँ प्राचीन भारतीय आचार्यों ने गुण, अलंकार, दोषाभाव, भावकत्व व्यापार, व्यंजना-शक्ति या ध्वनि को स्थायी भाव के साधारणीकरण एवं उसकी अभिव्यंजना का साधन माना है तो आधुनिक युग के भारतीय आचार्यो-जिनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डा० नगेन्द्र प्रमुख हैं-ने ऐन्द्रिय बोघ, प्रत्यक्षानुभूति एवं कल्पना शक्ति को काव्यगत भावादि के भावन व संप्रेषण का आधार माना है। इसी प्रकार पाश्चात्य भाववादी चिन्तकों ने भी कला के माध्यम से भावानुभूति, भावाभिव्यक्ति एवं भाव-संप्रेषण के लिए ऐन्द्रिय बोध व कल्पना-शक्ति की विभिन्न प्रत्रियाओं को स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है। वस्तुतः कलानुभूति में कला की विषय वस्तु के साथ साथ उसकी अभिव्यंजना-शैली का भी पर्याप्त महत्त्व है; विषय और शैली-दोनों एक दूसरे के पूरक हैं, तथा दोनों के ही सहयोग से कलात्मक सौन्दर्य या आकर्षण की उद्दीप्ति होती है। अतः कोई भी सिद्धान्त जो केवल विषय या केवल अभिव्यंजना शैली पर बल देता है, कला के मर्म का उद्घाटन नहीं कर सकता। परम्परागत सिद्धान्तों में जहाँ अनुकृति, औदात्य आदि ने केवल वस्तु पक्ष पर ही बल दिया वहाँ अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि,
१. द्रष्टव्य-प्रस्तुत प्रबन्ध के तृतीय खण्ड में 'रसानुभूति का कलागत आधार' शीर्षक अध्याय।
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३४८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन बिम्ब, प्रतीक आदि ने केवल शैली पक्ष को ही अपना लक्ष्य बनाया-ऐसी स्थिति में ये सभी सिद्धान्त जहाँ एकांगी व एक पक्षीय हैं वहाँ वे एक-दूसरे के पूरक भी हैं। रस सिद्धान्त में भी प्रांरभ में वस्तुपक्ष पर ही अधिक बल था किन्तु परवर्ती आचार्यो ने गुण, अलंकार, ध्वनि आदि शैली तत्त्वों से इसका सम्बन्ध स्थापित करके उसे परिपूर्ण सिद्धान्त का रूप देने का प्रयास किया। फिर भी रस की दृष्टि से शैली पक्ष का विवेचन-विश्लेषण, वस्तु पक्ष की अपेक्षा गौण रूप में ही हुआ है तथा वस्तु और शैली में परस्पर गहरा सम्बन्ध स्थापित नहीं हो पाया है, इसलिए आज भी यह आक्षेप प्रस्तुत किया जाता है कि रस-सिद्धान्त शैली पक्ष की उपेक्षा करता है। फिर शैली पक्ष में से भी केवल ध्वनि से ही रस का सम्बन्ध अधिक माना गया है-अलंकार, बिम्ब, प्रतीक आदि से बहुत कम। वस्तुतः कल्पना और शैली की दृष्टि से रस-सिद्धान्त का विवेचन-विश्लेषण बहुत कम हुआ है। यदि हम रस का कलानुभूति या सौन्दर्यानभृति मानते हुए उसे व्यापक रूप प्रदान करना चाहते हैं तो निश्चय ही उपयुक्त तत्त्वों व पक्षों की उपेक्षा नहीं कर सकते। अस्तु, प्रस्तुत अध्याय में हम ऐन्द्रियक गुणों, कल्पना एवं शैली के तत्त्वों की दृष्टि से रस के विवेचन- विश्लेषण का प्रयास करते हुए उनके पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट करेंगे। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि ऐन्द्रियक गुणों का समावेश कल्पनात्मक बिम्बों के अन्तर्गत हो जाता है (इसके सम्बन्ध में अधिक स्पष्टीकरण आगे किया जायगा), अतः अध्याय के शीर्षक में इनका उल्लेख पृथक रूप में नहीं किया गया है। • कल्पना शक्ति और साहित्य- कल्पना शक्ति (Imagination) के स्वरूप एवं उसकी प्रक्रियाओं का सूक्ष्म विवेचन-विश्लेषण आधुनिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में किया गया है, जिससे यह स्पष्ट है कि कल्पना एक ऐसी मानसिक शक्ति है जो कि अप्रत्यक्ष वस्तुओं के भी रूप-गुणों का प्रत्यक्षीकरण करवाती हुई उन्हें नूतन रूप में प्रस्तुत करने की क्षमता से युक्त है। हमारे दैनिक जीवन में प्रत्यक्ष अनुभूति से प्राप्त संवेदन, संस्कार व अनुभव हमारे अवचेतन मन में बिम्ब रूप में विद्यमान रहते हैं; कल्पनाशक्ति इन्हीं बिम्बों को यथार्थ या परिवर्तित रूप में प्रस्तुत करके पुराने संवेदनों का पुनरुत्पादन या नये रूपों की सृष्टि करती है। वस्तुतः मानसिक बिम्बों (Images) के रूप में संचित संवेदनों व अनुभवों के आधार पर ही कल्पना शक्ति काव्य वस्तु का उत्पादन करती है और उसे विभिन्न रूपों में प्रस्तुत करती है। अतः कल्पना का सम्बन्ध साहित्य के वस्तु-पक्ष एवं शैली-पक्ष दोनों से ही है। वस्तुपक्ष की कल्पना-साहित्य के वस्तु पक्ष की दृष्टि से कल्पना-शक्ति के
२. कल्पना शक्ति के मनोवज्ञानिक, सौन्दर्य शास्त्रीय विवेचन के लिए द्रष्टव्य- 'साहित्य-विज्ञान' (साहित्य का वैज्ञानिक विवेचन), खण्ड-२।
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कल्पना और शैली की दृष्टि से रस का विवेचन ३४९
कार्य को हमने पाँच प्रक्रियाओं में विभक्त किया है-(१) द्रव्य या वस्तु का चेतन- स्तर पर प्रस्तुतीकरण (२) द्रव्य का विस्तार (३) नये द्रव्य का आविर्भाव (४) द्रव्य या विषय-वस्तु को अनुभूति गम्य बनाना और (५) विषय-वस्तु को देश-काल एवं व्यक्ति के सम्बन्धों से मुक्त करना। इन पाँचों प्रक्रियाओं की विस्तृत व्याख्या हम अन्यत्र कर चुके हैं, अतः यहाँ संक्षेप में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि इन प्रत्रियाओं द्वारा क्रमशः ये कार्य संम्पादित होते हैं-(१) अवचेतन एवं अचेतन स्तर पर विद्यमान संस्कारों, प्रत्ययों और बिम्बों को चेतन-स्तर पर लाना। यह कल्पना- शक्ति की पहली प्रक्रिया है। (२) इसके अनन्तर कल्पना-शक्ति विभिन्न संस्कारों, प्रत्ययों, संवेदनों आदि का विश्लेषण एवं विस्तार करती हुई उन्हें मूर्त रूप प्रदान करती है। (३) साथ ही वह पूर्व अनुभूत रूपों के अनुरूप, उनसे भिन्न या पृथक रूप में नूतन रूपों की सृष्टि करती है। (४) नूतन रूपों को अनुभूर्ति गम्य बनाने के लिए उनमें ऐन्द्रियक एवं भावात्मक गुणों का संचार करती है। (५) अन्त में वह विषय- वस्तु को निरवयक्तिक एवं देश-काल से मुक्त रूप प्रदान करती है। इस प्रकार कल्पना- शक्ति की ही प्रक्रिया द्वारा विभिन्न तथ्य, विचार, प्रत्यय, अनुभव, संवेदन आदि काव्य-वस्तु या कलागत द्रव्य के रूप में परिवर्तित होते हैं। शैली पक्ष और कल्पना-काव्य वस्तु या कलागत तत्त्वों का काव्यात्मक या कलात्मक रूप प्रदान करने का कार्य भी कल्पना-शक्ति द्वारा ही संपन्न होता है। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार कल्पना शक्ति की अनेक प्रकार की प्रक्रियाओं द्वारा मूल विषय का रूपान्तरण विभिन्न रूपों में होता है, जिन्हें हम मुख्यतः पाँच प्रकारों या भेदों में विभक्त कर सकते हैं-(१) संयोजनात्मक रूप-विधान (२) विश्लेषणात्मक रूप-विधान (३) विस्थापनात्मक रूप-विधान । (४) विनिमयात्मक रूप-विधान () समावयात्मक रूप-विधान। इन भेदों की भी विस्तृत विवेचना हम अपने शोध-प्रबन्ध 'साहित्य विज्ञान' में कर चुके हैं, अतः यहाँ उसकी पुनरावृत्ति न करते हुए संक्षप में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि इन पाँचों रूप-भेदों में कल्पना-शक्ति क्रमशः पाँच कार्य करती हैं-(१) एक विषय के साथ दूसरे का संयोजन। (२) मूल, विषय का ही विश्लेषण एवं विस्तार। (३) मूल (प्रस्तुत) विषय के स्थान पर अन्य (अप्रस्तुत) विषय की स्थापना। (४) एक विषय (प्रस्तुत) के गुणों का अन्य विषय (अप्रस्तुत) में विनिमय या आदान-प्रदान; और (५) विभिन्न विरोधी गुणों या तत्त्वों में बाह्य एकता या एकरूपता की स्थापना, जिसे रसायन-शास्त्र में समावयात्मक परिवर्तन कहते हैं। कल्पना-शक्ति की उपयुक्त प्रक्रियाओं द्वारा ही काव्य, साहित्य एवं कला में
३. साहित्य विज्ञान; (साहित्य का वैज्ञानिक विवेचन); पृ० सं० १८८-१९२ ४. वही; पृ० सं० ३६८-७४।
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३५० रस-सिद्धान्तों का पुनर्विवेचन
शैली के सभी रूपों, तत्त्वों या गुणों का सर्जन, उत्पादन एवं संचार होता है, जिन्हें परम्परागत काव्य-शास्त्र एवं सौन्दर्य-शास्त्र में विभिन्न तत्त्वों या शैली-गुणों के रूप में मान्यता दी गई है। दुर्भाग्य से परम्परागत काव्य-शास्त्र के विभिन्न सिद्धान्त एवं संप्रदाय जो कि काव्य में शैली या रूप को ही प्रमुखता प्रदान करते हैं तथा जिन्हें सौन्दर्य-शास्त्र में 'रूपवादी' कहा जाता है-इनमें से किसी एक ही रूप या तत्त्व को मान्यता देते हुए काव्यात्मकता या कलात्मकता का सारा श्रेय उसी का प्रदान कर देते हैं जो अतिवादिता एवं एकांगिता का परिचायक है। शैली सम्बन्धी परम्परागत तत्त्वों एवं सिद्धान्तों का सम्बन्ध उपयुक्त पाँचों प्रक्रियाओं एवं तत्सम्बन्धी रूप-भेदों से है इस सम्बन्ध में आगे स्पष्ट किया जाता है। परम्परागत शैली तत्त्व एवं कल्पनात्मक रूप-विधान-जैसा कि ऊपर संकेत किया जा चुका है, भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-शास्त्र के शैली, अभिव्यक्ति या या अभिव्यंजन सम्बन्धी सभी तत्त्वों व सिद्धान्तों का समन्वय कल्पना-शक्ति की पूर्वोक्त पाँच प्रत्रियाओं एवं तदजन्य रूपों या रूप-भेदों में किया जा सकता हैं। किन्तु विभिन्न तत्त्वों या सिद्धान्तों का सम्बन्ध कल्पना की विभिन्न प्रत्रियाओं एवं रूप-भेदों से है। अतः यहाँ प्रत्येक प्रक्रिया एवं रूप-भेदों से सम्बन्धित परम्परागत तत्त्वों का परिचय संक्षप में प्रस्तुत किया जाता है- (१) संयोजनात्मक रूप-विधान-जहाँ कल्पना शक्ति प्रस्तुत विषय का अप्रस्तुत विषय से संयोजन करती है, वहाँ संयोजनात्मक रूप-विधान होता है जिसके अन्तर्गत परम्परागत सादृश्यमूलक अलंकारों को स्थान दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए-शकुन्तला। (२) विश्लेषणात्मक रूप-विधान-इसमें कल्पना-शक्ति मूल विषय (प्रस्तुत विषय) के साथ किसी बाह्य या अप्रस्तुत विषय का संयोजन या मेल न करके उसी का विश्लेषण एवं विस्तार इस प्रकार कर देती है जिससे कि उसके विभिन्न आकर्षक तत्त्व उद्दीप्त हो जायें। इसी प्रक्रिया को परम्परागत काव्य-शास्त्र में 'बिम्ब-विधान' (Imagery) कहते हैं। (३) विस्थापनात्मक रूप-विधान-इसमें प्रस्तुत विषय के स्थान पर अप्रस्तुत विषय ही स्थापित हो जाता है-यहाँ तक कि प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत की सत्ता अदृश्य हो जाती है। इसे भारतीय काव्य-शास्त्र में ध्वनि (व्यंजना शक्ति) तथा पाश्चात्य काव्य-शास्त्र में प्रतीक (Symbol) की योजना कहते हैं। (४) विनिमयात्मक रूप-विधान-इसमें कल्पना-शक्ति द्वारा प्रस्तुत एवं अप्रस्तुत विषयों के रूप-गुणों को परस्पर आदान-प्रदान या विनिमय (Exchange) हो जाता है। इसी प्रक्रिया को परम्परागत काव्य-शास्त्र में 'लक्षणा शक्ति', 'लाक्षणिक प्रयोग' तथा 'वक्रोक्ति' की संज्ञा दी जाती है।
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(५) समावयात्मक रूप-विधान-इसमें प्रस्तुत और अप्रस्तुत विषय के परस्पर विरोधी या आन्तरिक रूप में विरोधी गुणों व तत्त्वों में या प्रस्तुत के ही परस्पर विरोधी तत्त्वों में, बाह्य एकरूपता स्थापित हो जाती है; जिसे परम्परागत काव्य शास्त्र में अनुप्रास, वृत्ति, यमक आदि शब्दालंकारों तथा वैदर्भी, गौड़ी आदि रीतियों के रूप में विवेचित किया जाता है।
यहाँ हम उपयुक्त पाँच-भेदों का स्पष्टीकरण एवं विश्लेषण तालिका-रूप में प्रस्तुत करते हैं- तालिका : कल्पनात्मक रूप-विधान और परम्परागत शैली-तत्त्व
कल्पनात्मक रूप-भेद लक्षण परम्परागत तत्त्व उदाहरण
१. संयोजनात्मक प्रस्तुत एवं १. सादृश्य क) 'तापस-बाला सी गंगा रूप-विधान अप्रस्तुत का मूलक कल' (गंगा=प्रस्तुत; संयोजन । अलंकार। तापस-बाला=अप्रस्तुत) २. विश्लेषणात्मक प्रस्तुत के ही २. बिम्ब- (ख) 'बेंटी भाल, तमोल मुख, रूप-विधान। गुणों का विधान। सीस सिलसिले बार, विस्तार या दृग आँजे, राजे खरी, विश्लेषण। वेई सहज सिंगार।' ३. विस्थाप- प्रस्तुत के ३. व्यंजना- (ग) 'मधुर-मधुर मेरे दीपक नात्मक रूप स्थान पर शक्ति या जल !' विधान। अप्रस्तुत की ध्वनि। (घ) 'अली कली ही सौं प्रतिष्ठा । बध्यो .... ।' ४. विनिमयात्मक प्रस्तुत एवं ४. प्रतीक- (ङ) अरसानि गही वह बानि रूप-विधान। अप्रस्तुत के योजना। गुणों का परस्पर कछू .... ' ५. लक्षणा- (च) 'आँचल में है दूध और आदान-प्रदान शक्ति आँख में पानी। या विनिमय। (लाक्षणिक (छ) 'राखी सजी पर कलाई प्रयोग) नहीं .... ' ६. वक्रोक्ति ५. समवयात्मक प्रस्तुत या ७. अनुप्रास, (ज) 'पाप करे तो पा रूप-विधान अप्रस्तुतआन्तरिक यमक, पकर .... ' विषम तत्त्वों में श्लेष आदि (भ) 'पानी गये न ऊबरे, बाह्य साम्य शब्दा- मोती मानस, चून।' की स्थापना। लंकार। (ङ)"मृदु मंद मंद, मंथर, ८. वृत्ति या मंथर ... ' गुण।
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३५२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
उपयुक्त तालिका से स्पष्ट है कि मूलतः शैली सम्बन्धी सभी तत्त्व-गुणादि कल्पना की ही विभिन्न प्रक्रियाओं एवं रूप-भेदों पर आधारित हैं; तथा विभिन्न परम्परागत सिद्धान्त विभिन्न रूप-भेदों की ही व्याख्या अपनी-अपनी दृष्टि से प्रस्तुत करते हैं। परम्परागत सिद्धान्तों में एक प्रवृत्ति यह भी रही है कि वे अपना क्षेत्र- विस्तार करने के लिए कई बार ऐसे तत्त्वों या रूपों पर भी अपना लेबिल लगा देते हैं जो मूलतः उनके क्षेत्र से बाहर पड़ते हैं। उदाहरण के लिए अलंकार सिद्धान्त में सादृश्य मूलक अलंकारों को छोड़कर अन्य अलंकार इसी प्रकार के हैं। विरोध मूलक अलंकारों के मूल में लक्षणा शक्ति कार्य करती है, अतः वे वक्रोक्ति के ही विभिन्न रूप हैं, तो व्यंजना मूलक अलंकार-यथा, अप्रस्तुत प्रशंसा, व्याजस्तुति, अन्योक्ति आदि-मूलतः ध्वनि के उदाहरण हैं। इस तथ्य का स्पष्टीकरण विस्तार से 'साहित्य-विज्ञान' में करते हुए प्रत्येक सिद्धान्त के प्रकृत क्षेत्र एवं बाह्य क्षेत्र का निर्धारण किया जा चुका है। यहाँ हमने तालिका में विभिन्न सिद्धान्तों या तत्त्वों का उल्लेख उनके प्रकृत क्षेत्र को ही ध्यान में रखकर किया है-अन्यथा सभी तत्त्व किसी न किसी रूप में सभी सिद्धान्तों में अधिकृत या अनधिकृत रूप में उपलब्ध होंगे।
कल्पना, शैली और रस-कल्पना शक्ति की विभिन्न प्रक्रियाओं के द्वारा कला एवं साहित्य में विभिन्न रूप भेदों या शैली के तत्त्वों (अलंकार, बिम्ब; वक्ता प्रतीक, ध्वनि, अनुप्रास आदि) की सृष्टि या उद्भावना होती है किन्तु कल्पना-शक्ति का अन्तिम लक्ष्य या उद्देश्य यही नहीं है। अन्ततः उपयुक्त सभी रूप-भेदों या तत्त्वों की सार्थकता काव्य-वस्तु में सौन्दर्य या आकर्षण का संचार करने में है; यदि कोई रूप-भेद या शैली-गुण सौन्दर्य या आकर्षण की उद्दीप्ति में असमर्थ सिद्ध होता है तो वहाँ उसका काव्यात्मक या कलात्मक दृष्टि से कोई महत्त्व नहीं है। कल्पना की उपयुक्त्त प्रक्रियाओं द्वारा पूर्वोक्त रूप-भेदों एवं तत्त्वों में आकर्षण की उद्दीप्ति क्यों और कैसे होती है-यह पृथक अनुसंधान का विषय है, जिसका निरूपण हम आकर्षण-शक्ति सिद्धान्त के संदर्भ में अन्यत्र (साहित्य-विज्ञान में) विस्तार से कर चुके हैं। यहाँ निष्कर्ष रूप में यह कहा जा सकता है कि जब स्वयं कवि की कल्पना सहज आकर्षण की प्रेरणा से किसी विषय-वस्तु का संयोजन, संप्रेषण एवं अभिव्यंजन करती है तो स्वतः ही उसकी अभिव्यंजना में आकर्षण की क्षमता का संचार हो जाता है। कला-विवेचकों एवं काव्य-शास्त्रियों ने कल्पनात्मक रूप-भेदों द्वारा उत्पन्न आकर्षण को ही सुन्दरता, शोभा, चारुता, दीप्ति, रमणीयता, रुचिरता आदि विभिन्न नामों से पुकारा है, तथा इसी को सौन्दर्य-शास्त्र में 'सौन्दर्य (Beauty) के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है, किन्तु जैसा कि हम पिछले अध्यायों में स्पष्ट कर चुके हैं, इसे हम सामान्य रूप में तथा व्यापक अर्थ में 'आकर्षण' ही कहना उचित एवं श्रयस्कर समझते हैं। सौन्दर्य या आकर्षण की हो अनुभूति 'सौन्दर्यानुभूति' या 'रसानुभूति' है-इसका स्पष्टीकरण भी अन्यत्र किया जा चुका है। अतः कल्पना
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और रस के सम्बन्ध को सूत्र रूप में इस प्रकार स्पष्ट किया जा सकता है- संयोजन=अलंकरण विश्लेषण=बिम्ब-विधान सौन्दर्य कल्पना-शक्ति-विस्थापन=प्रतीक या ध्वनिर -या-सौन्दर्यानुभूति या विनिमय=वक्रोक्ति, लक्षण आकर्षण रसानुभूति। समन्वय=अनुप्रास, श्लेष कल्पना प्रधान साहित्य और रस-साहित्य में कल्पना की सामान्यतः दो स्थितियाँ हो सकती हैं-एक जिसमें, कल्पना शक्ति भाव एवं विचार की प्रेरणा से उनकी सहयोगिनी के रूप में विषय का प्रस्तुतीकरण या रूप-विधान करती है; दूसरी स्थिति वह है जिसमें कल्पना स्वयं प्रमुख होकर भाव एवं विचार को गौण कर देती है। जिस रचना में दूसरी स्थिति हो अर्थात् कल्पना भाव और विचार को गौण कर देती हो, उसे हम 'कल्पना-प्रधान रचना' कह सकते हैं। कल्पना- प्रधान रचना में भी कल्पना का प्रयोग इस ढंग से हो सकता है कि वह रचना में आकर्षण की उद्दीप्ति कर सके; इस प्रकार के आकर्षण को हम 'कौतूहल' या 'चमत्कार' का नाम दे सकते हैं, किन्तु जहाँ वह भावानुभव या वैचारिक औचित्य से सवथा शून्य होने के कारण अस्वाभाविता एवं अध्यात्मिकता के दोष से ग्रस्त हो जाती है, वहाँ वह आकर्षण की उद्दीप्ति में असफल सिद्ध होती है। अतः कला और साहित्य में कल्पना का सहज स्वाभाविक या संतुलित रूप ही ग्राह्य है। जिस प्रकार भाव-प्रधान रचना से सौन्दर्य या माधुर्य की तथा विचार-प्रधान से औदात्य या शान्त रस की सृष्टि होती है, उसी प्रकार कल्पना-प्रधान साहित्य में चमत्कार की सृष्टि होती है, जिसे परम्परागत दृष्टि से 'अद्भुत रस' भी कहा जा सकता है। वस्तुतः सौन्दर्य शृंगार का आलम्बन है, औदात्य शान्त का तथा चमत्कार अद्भुत का है तथा ये तीनों क्रमशः साहित्य में भाव, विचार एवं कल्पना की प्रधानता पर बल देते हैं, इसीलिए भावात्मकता को पसन्द करने वाले आचार्यों ने शृंगार (प्रेम) को, विचारात्मकता या बौद्धिकता में रुचि रखने वालों ने शान्त को तथा कल्पना एवं शैली को महत्ता प्रदान करने वालों ने अद्भुत रस को ही एक मात्र रस घोषित करते हुए रुचि-भेद का प्रदर्शन किया है। हमारे विचार में ये तीनों रस कलागत वस्तु की तीन स्थितियों के सूचक हैं जो रसास्वाद के तीन पक्षों या भेदों को प्रमाणित करते हैं-अतः तीनों ही महत्त्वपूर्ण एवं ग्राह्य हैं। जिस प्रकार मिष्टान्नों के नाना रूप-भेद एवं स्वाद हैं, फिर भी सभी को 'स्वादिष्ट' कहा जाता है, वसे ही काव्य-वस्तु एवं काव्य-रूपों के भेद से उनके आस्वाद में भी परस्पर सूक्ष्म अन्तर का होना स्वाभाविक है; इसीलिए आचार्यों ने रसास्वाद के अनेक भेद- शृंगार, करुण, वीभत्स, अद्भुत किये हैं, किन्तु अन्ततः सभी रसानुभूति के अन्तर्गत समन्वित हो जाते हैं, अतः इन भेदों को बहुत अधिक महत्त्व नहीं दिया जाना चाहिए।
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६ रस-भेद एवं काव्य-रूप : पुनर्विवेचन
साहित्य के क्षेत्र में रचनाओं के वर्गीकरण की अनेक पद्धतियाँ प्रचलित हैं, जिनमें से कुछ विषय-वस्तु के स्रोत (पौराणिक, ऐतिहासिक, कल्पना-प्रसूत) को, कुछ विषय-वस्तु की मुख्य प्रवृत्ति को, (जैसे आदर्शवादी, स्वच्छन्दतावादी, यथार्थवादी आदि), कुछ रचयिता के लक्ष्य-यथा, सामाजिक, मनोविश्लेषणात्मक प्रगतिवादी आदि-को तथा कुछ बाह्य रूपों-जैसे, महाकाव्य, नाटक, उपन्यास आदि-को आधार रूप में स्वीकार करती है। दूसरी ओर, रस सिद्धान्त के क्षेत्र में भाव-विशेष की प्रमुखता के आधार पर रचनाओं का वर्गीकरण किया जाता है तथा उन्हें विभिन्न रस-भेदों के अनुसार संज्ञा दी जाती है। वर्तमान स्थिति में साहित्य में प्रचलित वर्गीकरण की विभिन्न पद्धतियों से रस-सद्धान्तिक वर्गीकरण का सामंजस्य नहीं है- इसके मुख्यतः दो कारण हैं-एक तो रस-सैद्धान्तिक वर्गीकरण अपने-आप में भी सर्व-सम्मत, स्पष्ट, निश्चित, संगत एवं व्यापक नहीं है। दूसरे, साहित्य के वर्गीकरण की अन्य पद्धतियाँ भी किसी सुनिश्चित एवं वैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित नहीं हैं। ऐसी स्थिति में न केवल रस सैद्धान्तिक पद्धति में संशोधन की अपितु इतर पद्धतियों को भी सुनिश्चित रूप दिये जाने की आवश्यकता है। अतः हम यहाँ रस-सैद्धान्तिक पद्धति एवं अन्य पद्धतियों पर विचार करते हुए इन आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रयास करेंगे।
• रस-भेदों का वर्गीकरण- भारतीय आचार्यों ने कलाकृति में प्रस्तुत या व्यंजित प्रमुख स्थायीभाव के आधार पर विभिन्न रस-भेदों की स्थापना की है; उनके मतानुसार जितने स्थायी
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रस-भेद एवं काव्य-रूप : पुनर्विवेचन ३५५
भाव हैं, उतने ही रस-भेद सम्भव है, किन्तु स्थायी भावों की संख्या के सम्बन्ध में आचार्यों में मत-भेद दृष्टिगोचर होता है। आचार्य भरत ने मूलतः आठ स्थायी भावों के आधार पर आठ रसों का निरूपण किया था-१. शृंगार (रति स्थायी भाव) २. हास्य (हास्य) ३. करुण (शोक) ४. रौद्र (कोध) ५. वीर (उत्साह) ६. भयानक (भय) ७. बीभत्स (जुगुप्सा) और ८. अद्भुत (आश्चर्य)। आगे चलकर भरत के 'नाटय शास्त्र में ही नवाँ रस-शान्त-और जोड़ दिया गया तथा उसका स्थायी भाव 'शम' को बताया गया है। यद्यपि परवर्ती आचार्यों में शान्त-रस के स्थायी भाव के सम्बन्ध में अत्यधिक मत-भेद रहा; किसी ने निर्वेद को, किसी ने तत्त्व-ज्ञान को तो किसी ने तृष्णा-क्षय सुख को शान्तरस का स्थायी भाव सिद्ध करने का यत्न किया-किन्तु फिर भी शान्त रस की सत्ता प्रायः सभी को मान्य रही। हाँ जो आचार्य किसी एक ही रस-भेद को एक मात्र रस मानते थे, वे अवश्य इसके अपवाद हैं। परवर्ती युग में विभिन्न आचार्यों द्वारा और भी कई रस भेदों की स्थापना की गयी; जिनमें से प्रमुख का उल्लेख यहाँ किया जाता है-(१) प्रेयान् (स्नेह), लौल्य (लालसा), उदात्त (मति), उद्धत (गर्व), कार्पण्य (स्पृहा), ब्राह्म (आनन्द), माया (मिथ्या ज्ञान), वात्सल्य (वत्सलता), सख्य (मैत्री), भक्ति (भक्ति भाव), देश-भक्ति देश-भक्ति का भाव), प्रकृति-रस (प्रकृति प्रेम) आदि। यहाँ कोष्ठक में प्रत्येक रस से सम्बन्धित स्थायी भाव का उल्लेख किया गया है।
उपयुक्त सूची में प्रस्तुत रसों में से पूर्वोक्त नौ रसों के अतिरिक्त भक्ति एवं वात्सल्य को ही विद्वानों की स्वीकृति प्राप्त हुई तथा भक्ति का भी अन्तर्भाव शान्त- रस में कर दिया गया-इस प्रकार वात्सल्य को मिलाकर कुल दस भेद ही परम्परा के द्वारा मान्य हैं, शेष की उपेक्षा कर दी गयी। अवश्य ही उपेक्षित रसों में से अनेक का समन्वय पूर्व प्रचलित रस-भेदों में ही हो जाता है, फिर भी यह कहना अत्युक्ति होगी कि शेष सभी भेद त्याज्य एवं उपेक्षणीय ही थे। हमारे विचार में अनेक भेदों की उपेक्षा इसलिए भी कर दी गयी कि उन्हें समभने के लिए रूढ़ि-मुक्त दृष्टि, व्यापक दृष्टिकोण एवं गंभीर चिन्तन की अपेक्षा थी। उदाहरण के लिए, भोजराज द्वारा प्रस्तुत उदात्त रस, जिसका स्थायीभाव मति को बताया गया था, एक अत्यन्त गम्भीर एवं नूतन अनुसंधान का परिचायक था; उसका महत्त्व हम आज पाश्चात्य उदात्त या औदात्य (Sublime) के संदर्भ में समझ सकते हैं। हम पीछे औदात्य के स्वरूप का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट कर चुके हैं कि औदात्य कला- संदर्भ में बौद्धिक अनुभूति का आस्वाद है-इसी बौद्धिक अनुभूति का सँकेत भोजराज ने 'मति' स्थायी के रूप में दिया है। वस्तुतः भोजराज अपने देश और काल से बहुत
१. रस-सिद्धान्त: ५१० नगेन्द्र ; पृ० सं० २४२-२५४
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३५६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
आगे थे, इसी से उनकी अनेक मान्यताओं के साथ समकालीन एवं परवर्ती आचार्यों द्वारा न्याय नहीं हो पाया। अतः हमारे विचार से परम्परागत रस-भेद सम्बन्धी वर्गीकरण पर पुनर्विचार करते हुए उसे व्यापक एवं संगत रूप दिये जाने की आवश्यकता है। यहाँ उपयुक्त लक्ष्य की पूर्ति का प्रयास करने से पूर्व इस बात पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए कि क्या इस प्रकार का वर्गीकरण उपयोगी एवं महत्त्वपूर्ण सिद्ध होगा क्योंकि आधुनिक युग के अनेक विद्वान् इसे अनावश्यक एवं अनुपयोगी ही नहीं अपितु काव्य-रचना के मार्ग में बाधक भी मानते हैं। इसके उत्तर में हमारा निवेदन है कि किसी वस्तु को सम्यक् विवेचन-विश्लेषण के लिए ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में वर्गीकरण की पद्धति न केवल उपयोगी हैं, अपितु आवश्यक भी है। किन्तु यदि कोई वर्गीकरण ही व्यापक आधार पर प्रतिष्ठित न हो या उसका रूप संगत न हो तो उस रूप में वह अवश्य हमारे अध्ययन-विवेचन विश्लेषण में बाधक सिद्ध हो सकता है। अतः दोष वर्गीकरण का नहीं, वर्गीकरण के दोषपूर्ण प्रयास का है। फिर भी यदि निर्दोष वर्गीकरण को भी हमारे कुछ विद्वान् काव्य-रचना या काव्य- मूल्यांकन में बाधक मानें तो इसके उत्तर में क्या कहा जा सकता है। सम्भवतः ऐसे विद्वानों के लिए न केवल वर्गीकरण अपितु अध्ययन, विवेचन, विश्लेषण एवं मूल्यांकन की प्रत्येक प्रक्रिया ही बाधक सिद्ध हो सकती है। तुलसीदासजी के कथानुसार कुछ व्यक्तियों के लिए दिन का प्रकाश और रात्रि की ज्योत्त्स्ना भी अहितकर सिद्ध होती है-अतः ऐसे व्यक्तियों को अपवाद मानकर हम आगे बढ़ सकते हैं।
वैसे यहाँ यह तथ्य भी उल्लेखनीय है कि काव्य-रचना का समन्वित प्रभाव सामान्यतः उसके मूलभाव या स्थायीभाव अथवा केन्द्रीय तत्त्व के अनुरूप ही होता है; इसीलिए जाने या अनजाने इस दृष्टि से साहित्य का वर्गीकरण विभिन्न देश-काल के आचार्य करते रहे हैं; यथा-अरस्तू का त्रासदी एवं कामदी का वर्गीकरण, काण्ट का सौन्दर्यात्मक एवं औदात्य के आधार पर कला-भेदों का निरूपण, हीगल द्वारा असुन्दर (Ugliness), उदात्त (Sublime), करुण (Tragic), हास्य (Comic) के आधार पर कला का पृथक-पृथक विवेचन, टालस्टाय द्वारा व्यापक एवं नैतिक भावों से आधार पर कला की उत्कृष्टता एवं निकृष्टता का विश्लेषण, जाज सैतायना द्वारा रति, करुण, उदात्त एवं हास्य से सम्बन्धित रचनाओं के महत्त्व का निरूपण-ये उदाहरण इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि कलागत भाव की प्रमुखता के आधार पर उनका वर्गीकरण, विश्लेषण एवं मूल्यांकन संभव है, यह दूसरी बात है कि इस दृष्टि से वर्गीकरण का कोई भी प्रयास अभी पूर्णतः सफल नहीं हुआ। किसी भी वर्गीकरण को सुसंगत एवं वैज्ञानिक रूप देने के लिए सर्व प्रथम हमें यह देखना चाहिए कि उसका आधार क्या है तथा तदनन्तर उस आधारभूत तत्त्व