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शक्ति के अनुसार ही टिक पाये। रस-सिद्धान्त सबसे पुराना होता हुआ भी आज जीवित है जबकि अलंकार और ध्वनि अपेक्षाकृत बाद में आकर भी आधुनिक काल के पूर्व तक ही बहु प्रचलित एवं बहुमान्य रहे। दूसरी ओर इनसे भी न्यून शक्ति वाले सिद्धान्त-रीति, वक्रोक्ति एवं औचित्य आदिअपने जन्म के कुछ समय बाद ही काल- कवलित हो गये। यद्यपि इस बात के अनेक अपवाद भी खोजे जा सकते हैं, फिर भी सामान्यतः विभिन्न सिद्धान्तों का यह जीवन-काल (प्रचलन-काल) एक सीमा तक उनकी आन्तरिक शक्ति का द्योतक है। इनमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण रस सिद्धान्त की जीवन-शक्ति का एक प्रमाण यह भी है कि हर नये युग में यह उसकी आवश्यकता- नुसार विकासोन्मुख या परिवर्तनशील रहा। यह ठीक है कि सर्वप्रथम इसका प्रतिपादन नाटक की दृष्टि से हुआ था, किन्तु परवर्ती युग में जब वह काव्य से संयुक्त हुआ तो इसने उन तत्त्वों को ग्रहण कर लिया जो काव्यत्व की दृष्टि से अपेक्षित थे। भट्टनायक द्वारा, अभिधा, भावकत्व एवं भोजकत्व शक्तियों का आविष्कार एवं दोषाभाव तथा गुण-अलंकार के संयोजन से काव्य-वस्तु के भावन के सिद्धान्त की स्थापना नव परिवर्तित स्थितियों की माँग के अनुरूप ही थी। नाटक में अभिनय के कारण उसके विभावादि प्रत्यक्ष रूप में प्रस्तुत हो जाते हैं, जबकि काव्य में उनका चित्र या बिम्ब-ग्रहण केवल अभिधा के द्वारा संभव नहीं। दूसरे, भट्टनायक के समय तक भामह, दंडी, वामन, रूद्रट जैसे आचार्यों द्वारा काव्य-क्षेत्र में अलंकार, रीति या गुण-दोष सम्बन्धी सिद्धान्त भली-भाँति प्रतिष्ठित हो चुके थे ; तीसरे, उस समय के साहित्य में भी अलंकरण की प्रवृत्ति का प्राधान्य था-प्रमाण के लिए, बाण- भट्ट की 'कादम्बरी' या 'हर्ष-चरित', दंडी के 'दश कुमार चरित' आदि को देखा जा सकता है-अतः काव्य-क्षेत्र में रस-सिद्धान्त की प्रतिष्ठा को सुरक्षित रखने के लिए यह आवश्यक था कि अभिनय की प्रक्रिया के समकक्ष शब्द-शक्ति की प्रक्रियाओं को तथा भावन के साधन के रूप में दोषाभाव एवं गुणालंकार के योग को स्वीकार किया जाता। भट्टनायक द्वारा इसी लक्ष्य की पूर्ति सफलतापूर्वक हुई। अभिनवगुप्त ने एक अन्य दृष्टिकोण से रस-सिद्धान्त के स्वरूप का विकास किया-उनसे पूर्व ध्वनि सिद्धान्त की प्रतिष्ठा सम्यक रूप में हो जाने के कारण तथा काव्य-चिन्तना के प्रौढ़ स्वरूप प्राप्त कर लेने के कारण काव्य में अर्थ-तत्त्व की महत्ता बढ़ती जा रही थी। अमरु, विल्हण, भतृ हरि जैसे मुक्तककार यह सिद्ध कर चुके थे कि भाव के विभिन्न अंगों-आलम्बन, उद्दीपन, अनुभाव, संचारी आदि-के प्रस्तुतीकरण के बिना भी काव्य में सौन्दर्य उत्पन्न किया जा सकता है ; फिर 'नीति-शतक' जैसे ग्रन्थों में तो भाव-विशेष का चित्रण न होकर तत्त्व-विशेष या विशिष्ट विचार का ही प्रतिपादन ऐसे ढंग से किया गया था कि वहाँ आलम्बन-उद्दीपन खोजने पर भी उपलब्ध नहीं होते। वस्तुतः मुक्तकों एवं नीति-काव्यों में कवि का लक्ष्य भाव का चित्रण करना न होकर अर्थ (तत्त्व या विचार) को ही संवेद् बनाने
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२९८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन का रहता था, तथा सहृदय पाठकों एवं रसिक समाज ने ऐसे मुक्तकों एवं नीति-ग्रन्थों का आस्वादन करके यह प्रमाणित कर दिया था कि काव्यत्व की दृष्टि से इनमें कोई न्यूनता नहीं हैं-इनसे भी रसानुभूति प्राप्त होती है। इतना ही नहीं, कुछ लोगों ने तो अमरु के एक-एक मुक्तक पर सौ-सौ प्रबन्ध काव्यों तक को न्यौंछावर कर देने की भी बात कही-जो कदाचित् अतिशयोक्ति मात्र थी ; पर इससे मुक्तकों की लोकप्रियता अवश्य ध्वनित होती है। इसके अतिरिक्त स्वयं अभिनव गुप्त दार्शनिक थे, दर्शन में अर्थ-तत्त्व ही प्रमुख रहता है और यदि दर्शन के तत्त्वों को जन-साधारण तक पहुँचाना है तो उन्हें रसात्मक या काव्यात्मक रूप देना होगा-इस स्थिति से भी वे भली-भाँति परिचित थे। अस्तु, इन सब स्थितियों एवं परिस्थितियों के अनुसार उन्होंने रस-सिद्धान्त को एक सर्वथा नूतन दिशा दी-एक तो उन्होंने विभावानुभाव व्यभिचारी के संयोग से रस-निष्पत्ति की बात को गौण करते हुए 'काव्यार्थ के भावन' को ही रस घोषित किया जो निश्चय ही 'अर्थ' या 'विचार' तत्त्व की प्रमुखता का सूचक है। दूसरे, उन्होंने 'काव्येऽपि गुणालंकार सौन्दर्यातिशयकृतं' की बात को स्वीकार करते हुए काव्यगत सौन्दर्य के साधन-रूप में गुण और अलंकार को मान्यता दी ; तीसरे उन्होंने रस की अभिव्यक्ति एवं व्यजना पर विशेष बल देकर ध्वनि सिद्धान्त के साथ सामंजस्य स्थापित किया और चौथे, शान्तरस के महत्त्व को स्थापित करके ऐसी काव्य-रचना का मार्ग प्रशस्त किया जो दार्शनिक तत्त्वों से समन्वित हो या जिसमें दारशनिक तत्त्वों की अनुभूति को काव्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया हो। आचार्य अभिनवगुप्त का यह चतुमुखी प्रयास रस-सिद्धान्त को एक ऐसा रूप प्रदान कर देता है कि जिससे वह काव्यगत बौद्धिकता, चमत्कार, शैली के सौन्दर्य एवं अभिव्यंजना के वैशिष्ट्य को भी मूल्य के रूप में स्वीकार कर सके। दुर्भाग्य से अभिनवगुप्त के कुछ समय बाद ही राष्ट्र की परिस्थितियों में ऐसा परिवर्तन हुआ जिससे हमारे चिन्तकों को शान्तिपूर्ण चिन्तन के स्थान पर आक्रमण- कारियों के आघात से उत्पन्न स्थिति का सामना करने की तैयारी में प्रवृत्त होना पड़ा। स्वधर्म रक्षा-हमारा सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया। धर्म-रक्षा के लिए जिस मनोबल एवं नैतिकबल की अपेक्षा थी, वह दर्शन की सुदृढ़ता के द्वारा ही सम्भव था-अतः ग्यारहवीं शती से लेकर सत्रहवीं शती तक भारतीय मस्तिष्क की समस्त प्रतिभा विभिन्न दार्शनिक सिद्धान्तों एवं उन्हें व्यावहारिक रूप देने वाले धर्म- सम्प्रदायों की स्थापना में लग गयी-विशिष्टा द्वत, द्वत, द्वताद्वत, शुद्धाद्वत आदि सिद्धान्त और उनसे सम्बन्धित धर्म-सम्प्रदाय इसी स्थिति के परिणाम कहे जा सकते हैं। फलतः यह स्वाभाविक था कि हमारा काव्य-शास्त्रीय चिन्तन अवरुद्ध हो गया, नये चिन्तन की बात तो दूर रही, अभिनव गुप्त की स्थापनाओं को भी परवर्ती विद्वान् पूर्णतः हृदयंगम नहीं कर पाये-उनकी काव्यार्थ के भावन की बात एक प्रकार से गौण ही
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रही। फिर भी क्षेमेन्द्र जैसे एक-दो आचार्यों ने काव्य-शास्त्र के क्षेत्र में भी नूतन प्रयास किये किन्तु वे शक्तिशाली सिद्ध नहीं हुए। अस्तु, अभिनवगुप्त ने रस-सिद्धान्त को जो व्यापक रूप प्रदान किया था, वह सीमित रूप में ही परवर्तियों द्वारा ग्राह्य हो पाया। अवश्य ही आचार्यगण अब एक ही ग्रन्थ के विभिन्न अध्यायों में रस के अतिरिक्त गुण, अलंकार एवं ध्वनि की भी चर्चा या व्याख्या करने लग गये किन्तु उनमें परस्पर गहरा सामंजस्य स्थापित नहीं हो पाया-गुण अलंकार आदि की स्थिति रस के सहयोगी स्वतन्त्र सिद्धान्तों की सी रही-वे रस के अंग नहीं बन पाये; सिद्धान्त में यह स्वीकार भी कर लिया गया था, किन्तु व्यवहार में ऐसा नहीं हो पाया। ध्वनि अवश्य अपेक्षाकृत अधिक निकट आ पाई, किन्तु फिर भो उसकी सत्ता रस से पृथक ही बनी रही। वस्तुतः मम्मट, विश्वनाथ, जगन्नाथ आदि ने इन सिद्धान्तों को समन्वित करने का लक्ष्य सामने रखा, किन्तु उनमें इतनी शक्ति नहीं थी कि इस लक्ष्य को सम्यक् रूप में पूर्ण कर पाते, अतः 'समन्वय' के स्थान पर वे उनका 'संग्रह' या अधिक से अधिक उनमें 'पारस्परिक मित्रता का भाव' ही स्थापित कर पाये। अतः व्यवहार में रस का लगभग वही रूप प्रचलित रहा जो अभिनवगुप्त से पूर्व था। अभिनवगुप्त की उपलब्धियों की उपेक्षा का कदाचित् एक कारण यह भी था कि वे रस-सिद्धान्त को जहाँ अर्थ तत्व की बौद्धिक भूमि की ओर अग्रसर करना चाहते थे-जो कि भारतीय मनीषा के विकास-क्रम की दृष्टि से अपेक्षित भी था- वहाँ राष्ट्र की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों के कारण उसे सवथा विरोधी दिशा में प्रयाण करना पड़ा-परवर्ती भक्ति आन्दोलन शुद्ध भावना का आन्दोलन था, वह धर्म, दर्शन एवं जीवन के प्रति भावात्मक या रागात्मक दृष्टिकोण लेकर आया, क्योंकि परिवर्तित परिस्थितियों में भारतीयता को जीवित रखने का यही एक साधन था-अतः वह इसके लिए दोषी भी नहीं है, किन्तु इससे हमारा समाज बौद्धिकता से न केवल विमुख हुआ अपितु उसकी घोर निन्दा में भी प्रवृत्त हुआ। सन्त और भक्त अनेक सम्प्रदायों में विभक्त होते हुए भी एक बात में सब एक-मत हैं; वह है ज्ञान की निन्दा। आचार्य शुक्ल के भ्रान्त वर्गीकरण के कारण सन्तों को ज्ञानमार्गी समझ लिये जाने की भ्रान्ति आज भी प्रचलित है, पर हमें यह न भूलना चाहिए कि सबसे बड़े संत कबीर ने प्रेम के अढ़ाई अक्षरों के सम्मुख जीवन भर की ज्ञान-साधना को व्यर्थ घोषित किया है; वेदों और स्मृतियों के शास्त्रीय ज्ञान की तुलना में आँखों देखी अनुभूति को अधिक महत्त्वपूर्ण माना है, और यही बात मध्यकाल के अन्य संतों और भक्तों पर लागू होती है। कुतुबन, जायसी, मंझन आदि तो प्रेममार्ग के पथिक ही थे, भावुक सूरदास भी उद्धव के माध्यम से ज्ञान-मार्ग का उपहास किये बिना नहीं रहते। तुलसीदास ने-जिनकी निन्दा भी स्तुति के शब्दों में होती थी-ज्ञान के मार्ग की प्रत्यक्ष में प्रशंसा करते हुए भी उसे 'कृपाण
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की धार बताकर अपने मंतव्य को अप्रस्तुत रूप में प्रस्तुत किया है। इसका व्याव- हारिक जीवन पर भी प्रभाव पड़ा-विभिन्न क्षेत्रों में तर्क के स्थान पर भावना की ही प्रतिष्ठा हो गयी। अस्तु, ऐसी परिस्थितियों में रस-सिद्धान्त को बौद्धिकता की ओर अग्रसर करने का लक्ष्य पूरा न हुआ तो यह आश्चर्य की बात नहीं है। किन्तु भक्तिकाल में रस का विकास दूसरी दिशा में हुआ। भक्ति-काव्य में रागतत्त्व की प्रमुखता के कारण उसे शान्त रस में स्थान देना संभव नहीं था; शान्त का केन्द्रीय तत्त्व तत्त्व-चिन्तनजन्य अनुभूति-जिसे 'शम' या निर्वेद कहा गया है- है जबकि भक्ति में भाव, विभाव, अनुभाव आदि विद्यमान थे क्योंकि भक्तों का आराध्य निर्गुण ब्रह्म न होकर सगुण प्रभु था; ऐसी स्थिति में यह समस्या उपस्थित हुई कि भक्तों के काव्यात्मक उद्गारों को साहित्य या काव्य में किस प्रकार स्थान दिया जाय ? उनकी काव्यात्मकता या रसात्मकता का शास्त्रीय मूल्यांकन किस आधार पर किया जाय ? इन समस्याओं के समाधान के रूप में ही विभिन्न आचार्यों द्वारा भक्तिरस, उज्ज्वलरस, वात्सल्यरस, सख्यभाव, माधुर्यभाव आदि की स्थापना हुई-अतः कहना चाहिए कि भक्तिकाल की अपेक्षाओं की पूर्ति भी रस- सिद्धान्त के द्वारा सम्यक् रूप में हुई। इसी प्रकार उत्तर मध्यकाल या रीतिकाल में लोकवृत्ति के अनुसार शृंगार-रस, नायिका-भेद, ऋतु-वर्णन आदि का भी विस्तार हुआ जो आज की दृष्टि में निरर्थक होता हुआ भी युग-विशेष के संदर्भ में सार्थक था। आधुनिक युग में भी भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से से लेकर डॉ० नगेन्द्र तक युगीन परिस्थितियों के अनुरूप रस-सिद्धान्त के नव विकास के प्रयत्न बराबर होते रहे हैं; भारतेन्दु ने देश-प्रेम, समाज-सुधार की भावना, आदि को भी रस से सम्बन्धित करने का संकेत किया तथा अयोध्यसिंह उपाध्याय ने इसे आंशिक रूप में क्रियान्वित भी किया। आगे चलकर डॉ० गुलाबराय ने सर्व प्रथम रस की मनोवैज्ञानिक व्याख्या की आवश्यकता की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने पाश्चात्य काव्य-शास्त्र और आधुनिक मनोविज्ञान के सन्दर्भ ने भावों के वर्गीकरण, कल्पना-शक्ति से रस के सम्बन्ध-स्थापन एवं सामाजिक दृष्टि से रसानुभूति के विश्लेषण के नूतन प्रयास किये। डॉ० नगेन्द्र ने आचार्य शुक्ल के कार्य को आगे बढ़ाते हुए आधुनिक काव्य-संदर्भ एवं पाश्चात्य काव्य-चिन्तन की दृष्टि से रससिद्धांत का पुनराख्यान किया। डॉ० कृष्णदेव झारी ने न केवल पद्य साहित्य पर अपितु गद्य-साहित्य पर भी-'गोदान' जैसे उपन्यास पर भी-रस-सिद्धान्त को लागू करके उसके स्वरूप को व्यापकता प्रदान करने का प्रयास किया, यह दूसरी बात है कि उनकी स्थापनाएँ अभी विद्वानों का ध्यान आकर्षित नहीं कर पायी हैं। अस्तु, संक्षेप में कहें तो आज की बदली हुई परिस्थितियों की माँग को ध्यान में रखकर विभिन्न प्रतिभाएं रस-सिद्धान्त के आधुनिकीकरण के प्रयास में संलग्न हैं, और इसमें कोई
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संदेह नहीं कि यदि भारतीय मेधा, में अब भी शक्ति बची है तो अवश्य ही वह अपने इस प्रयास में सफल होगी। किन्तु दुर्भाग्यपूर्ण से यहाँ एक ऐसी स्थिति एवं मनोवृत्ति का भी उल्लेख करना पड़ रहा है जो कि निष्क्रियता एवं निरर्थकता से युक्त है। कई बार राष्ट्र एवं समाज के जीवन में ऐसी परिस्थितियाँ आती हैं कि जब पूरा समाज या उसका एक वर्ग किन्हीं विशिष्ट संदर्भों एवं संस्कारों के कारण अनास्था से ग्रस्त होकर प्रत्येक वस्तु एवं कार्य को निरर्थक समझने लगता है। दुर्भाग्य से यदि यह वर्ग अपनी इस निरर्थकता की अनुभूति को भाषा के माध्यम से व्यक्त भी कर पाये तो उससे ऐसी रचनाओं की सृष्टि होगो जिनमें विशेष प्रकार की अनुभूतियाँ होंगी, जिन्हें मनोविश्लेषण की शब्दावली में 'अपसाधारण' या 'अन्नार्मल (Abnormal) कहा जा सकता है। यह 'अब्नार्मल' अनुभूति या संवेदना न तो मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों द्वारा विश्लेषित हो पाती है और न ही साहित्य-शास्त्र के किसी परम्परागत मूल्य की परिधि में समा पाती है। पाठक या सामाजिक में से भी इस संवेदना को वे ही ग्रहण कर पाते हैं, जो स्वयं 'अब्नार्मल' है या जिन्हें इस अब्नामल स्थिति का बोध प्राप्त हैं। इस स्थिति के कारण काव्य-शास्त्र एवं साहित्य-चिन्तन के लिए समस्या उपस्थित हो गयी है-वह यह है कि इस असामान्य संवेदना या अनूभूति को किस रूप में ग्रहण किया जाय ? क्या इसे युग-विशेष की सीमित या रुग्ण प्रवृत्ति या मनोवृत्ति के रूप में स्वीकार किया जाय या इसे भी एक मूल्य मानकर अभि- शंसित किया जाय? इसके सम्बन्ध में संप्रति अनेक दृष्टिकोण प्रचलित हैं; एक दृष्टिकोण जो कि स्वयं इसी वर्ग का है, उसके अनुसार यह प्रवृत्ति ही मूल्य है, इस- लिए मूल्यांकन के उन सब मानदण्डों को त्याग दिया जाय जो इस प्रवृत्ति के विरुद्ध पड़ते हैं, दूसरा दृष्टिकोण विरोधी पक्ष का है, उसके अनुसार परम्परागत मानदण्ड शाश्वत तत्त्वों पर आधारित है अतः उन्हीं के आधार पर नयी प्रवृत्तियों का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। यहाँ हमें इन दोनों ही दृष्टिकोणों पर तटस्थ दृष्टि से विचार करते हुए कोई समाधान ढूँढ़ना चाहिए। पहले पक्ष की स्थापनाएँ मुख्यतः निम्नलिखित हैं- • रस-सम्प्रदाय के माध्यम से छायावाद की अधिकांश कविता का मूल्यांकन संभव है लेकिन छायावाद के बाद के साहित्य को तो रस के अन्तर्गत रखा ही नहीं जा सकता .. ।१ • 'आज की संवेदना में जहाँ अनेक जटिलताएँ हैं, वहीं उसकी मनोवैज्ञानिक चेतना भी है जो बिना किसी विशिष्ट चेतना-प्रवाह के समझना सम्भव नहीं है।'२
१. 'नये प्रतिमान : पुराने निकष-'लक्ष्मीकांत वर्मा; पृ० सं० ३-३६ २. वही पृष्ठ संख्या १८ (भाषा-दोष मूल अंश में ही है।)
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• 'रस आदि में काव्य-दृष्टि भिन्न रही है ........ यह भिन्नता मनः स्थितियों की है, संस्कारों की है और इन सबसे बढ़कर परिवेश की है।" · 'नयी कविता का विषय है क्षण की अनुभूति; रस का आधार है वासना और स्थायी भाव।" • 'नयी कविता आकर्षण को नहीं, विकर्षण को भी टटोलती है, रिझाती कम, सताती अधिक है।" • 'आज की मूल समस्या जिस अर्थहीनता से शुरू होती है वह उसी में समाप्त हो जाती है। यह .... भिन्न स्तर पर सम्पूर्ण परिवेश के सम्बन्ध में सापेक्ष उपजी हुई दृष्टि है इसलिये यह मूल्यवान भी है। .... ऐसी दशा में जब तक अर्थ- हीनता को हम कोई मूल्य नहीं मानते तब तक हम आगे बढ़ ही नहीं सकते।" • 'दूसरी विशेष प्रवृत्ति है ... सिनसिज्म ! आज का नया साहित्यकार .... सिनसिज्म को मूल्य के रूप में स्वीकार करता है। ... वस्तुतः कोई भी कलाकार बिना सिनसिज्म के भविष्य-द्रष्टा नहीं हो सकता।" उपर्युक्त विचारों को संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए कहा जा सकता है कि एक तो आज की कविता की आधारभूत काव्य-दृष्टि, विषय-वस्तु, मनः-स्थिति, संस्कार, अनुभूति आदि सब कुछ नयी या भिन्न है, अतः परम्परागत मानदंड के आधार पर उसका मूल्याँकन सम्भव नहीं। दूसरे, नयी कविता का मूल्यांकन उसकी विशिष्ट प्रवृत्तियों-जैसे अर्थहीनता का बोध, सिनसिज्म आदि-के आधार पर होना चाहिये क्योंकि नया कवि इन प्रवृत्तियों को ही मूल्य के रूप में स्वीकार करता है। हमें यहाँ इन दोनों ही विचारों या धारणाओं पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए। सर्व प्रथम यह देखना है कि छायावाद युग के बाद अर्थात् पिछले २५-३० वर्षों में हमारे साहित्य में सभी कुछ बदल गया है-विषय, दृष्टि, अनुभूति, संस्कार, भाव-बोध आदि-यह कहाँ तक ठीक है ? कविता या साहित्य में सब-कुछ बदलने का अर्थ है, उसके स्रष्टा या मनुष्य में सब-कुछ बदल जाना। क्या आधुनिक मनोविज्ञान, समाज-शास्त्र एवं नृ-तत्त्व-शास्त्र से इस बात की पुष्टि होती है कि धरती पर मनुष्य के एक ऐसे नये रूप का विकास हो गया है जो मानसिक दृष्टि से पूर्ववर्ती मनुष्य से सर्वथा भिन्न है ? यहाँ यह भी देखना चाहिए कि यह भिन्नता केवल बाहय है या आन्तरिक। बाह्य भिन्नता तो न केवल आज के मनुष्य और कल
३. 'नये प्रतिमान : पुराने निकष-'लक्ष्मीकांत वर्मा; पृ० सं० ३-३६ ४-५. रस-सिद्धांत : डॉ० नगेन्द्र; पृ० सं० ३५१-४ ६-७. नये प्रतिमानः पुराने निकष पृ० सं० २४-२७
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के मनुष्य में है, अपितु दो सगे भाइयों में या प्रत्येक व्यक्ति में एक-दूसरे से मिलेगी। उदाहरण के लिये-आदिमानव से लेकर आज तक मनुष्य में काम की प्रवृत्ति बराबर मिलती है; यहाँ तक कि आदि मानव के पूर्वज पशुओं में भी यह थी, किन्तु उसका बाह्य रूप निरन्तर विकासोन्मुख रहा है। सभ्यता के विकास के साथ-साथ उसी काम प्रवृत्ति का विकास रति, प्रेम, दाम्पत्य भाव आदि के रूपों में हो गया। अब इस प्रेम या दाम्पत्य भाव का भी रूप सर्वत्र समान नहीं मिलता-कहीं पत्नी सहचरी है, कहीं अनुचरी, कहीं दासी मात्र। कहीं एक पत्नीव्रत का पालन होता है तो कहीं बहुपत्नीत्व का। इस प्रकार इन सब सम्बन्धों के मूल में एक ही सहज प्रवृत्ति के होते हुए भी उसके व्यक्त रूप में परस्पर थोड़ा-बहुत अन्तर अवश्य परि- लक्षित होगा। इतना ही नहीं, इनमें से प्रत्येक रूप के भी व्यक्ति-भेद से असंख्य भेद किये जा सकते हैं; यथा-मोहन लम्बी लड़की शीला से प्रेम करता है; सोहन साँवले रंग की लड़की श्यामा से प्रेम करता है; सुरेश एक धनी परिवार की कन्या के प्रति प्रेम भाव जताता है किन्तु हृदय से उसे नहीं चाहता ! यहाँ हम एक ही भावना के व्यक्ति-भेद से असंख्य रूप देखते हैं; पर वास्तव में ये असंख्य रूप संकीर्ण दृष्टि से देखने पर परस्पर भिन्न दिखाई पड़ते हुए भी मूलतः एक ही प्रवृत्ति के विभिन्न रूप हैं-अतः जब तक विभिन्न व्यक्तियों में यह आधार भूत प्रवृत्ति या मूल वासना समान रूप से विद्यमान है तब तक यह बाह्य अन्तर उस साहित्य के लिये कोई महत्त्व नहीं रखता जो कि मनुष्य की मूल प्रवृत्तियों पर आधारित है। कालिदास का यक्ष अपनी प्रयसी को संदेश मेघ को दूत बना कर भेजता है; जायसी का रत्नसेन हीरामणि तोते को माध्यम बनाता है; और अयोध्यासिंह उपाध्याय पवनदूत को प्रस्तुत करते हैं, जबकि आज का नया कवि इन सब माध्यमों को बाहियात एवं निरर्थक मानकर कदाचित् सीधे एक्सप्रैस-टेलीग्राम या टेलीफोन की हो शरण लेना उचित समभेगा और ऐसी स्थिति में वह दावा कर सकता है कि वह कवि के रूप में कालिदास, जायसी, उपाध्याय आदि सबसे भिन्न है; उसकी काव्यवस्तु भी भिन्न है क्योंकि इससे पहले किसी ने टेलीफोन का उल्लेख नहीं किया और उसकी संवेदनाएँ भी भिन्न हैं क्योंकि फोन पर संदेशों का आदान-प्रदान जैसी अनुभूति प्रदान करता है, वैसी बादल, तोते या पवन के माध्यम से संभव नहीं !
अतः यदि आधारभूत वासनाओं, सहज प्रवृत्तियों, व मूल भावों के चिरन्तन एवं सामान्य रूप को भुला कर केवल उन साधनों एवं माध्यमों की दृष्टि से विचार किया जाय जो कि वासनादि की अभिव्यक्ति के साधन एवं माध्यम हैं तो निश्चय ही आज का मनुष्य और उसकी संवेदनाएँ बिल्कुल बदल गयी हैं, तथा उस स्थिति में प्राचीन मनुष्यों या कवियों को समझना आज के व्यक्ति के लिए और आज के व्यक्ति की संवेदनाओं का समझना प्राचीन व्यक्ति के लिये असम्भव मान लिया जायगा, किन्तु इसके विपरीत तथ्य यह है कि मेघदूत के माध्यम से व्यक्त कालिदास
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की संवेदनाएँ आज लगभग पन्द्रह-बीस शताब्दियों के बाद भी हमारे लिये उतनी ही सं-प्रष्य है जितनी कि किसी आधुनिक कवि द्वारा फोन पर प्रेयसी से किया गया वार्तालाप हो सकता है-और यह भी विश्वासपूर्वक कहा जा सकता है कि आने वाली शताब्दियों में भी यह स्थिति बदलने वाली नहीं है। ऐसी स्थिति में विचारणीय यह है कि वह कौनसी बात है जिसके कारण आज के व्यक्ति का भी तादात्म्य दो हजार वर्ष पुराने कवि से हो जाता है; यद्यपि हमारा आज का परिवेश, दृष्टिकोण रुचि, प्रवृत्ति एवं अनुभूति के माध्यम आदि बदल गये हैं। इसका उत्तर मनो- विज्ञान, मनोविश्लेषण, समाजशास्त्र एवं नृतत्त्व शास्त्र से प्राप्त किया जा सकता है। उनके अनुसार मनुष्य में जो कुछ परिवर्तन हुआ है वह उसकी बाह्य अभिव्यंजना-प्रणालियों एवं उसके साधनों में हुआ है, आन्तरिक दृष्टि से आज भी वह वही है। मनुष्य के समस्त भावजगत् को परिचालित करने वाली आधारभूत वासनाएँ या सहज प्रवृत्तियाँ आज भी उसमें वही हैं, जो लाखों-करोड़ों वर्ष पूर्व उसके पूर्वज में थी; इतना ही नहीं मनुष्य की अनेक सहज-प्रवृत्तियाँ पशुओं में भी विद्यमान हैं, इसलिए इन्हें पाशविक वृत्तियाँ भी कहते हैं। हम दूसरों की संवेदनाओं के आलम्बनों एवं अभिव्यंजना-साधनों के विभिन्न होते हुए भी उन सब को इसलिये हृदयंगम कर पाते हैं कि अभी तक मानव-मानव के बीच सभी संवेदनाओं का मूल आधार एक है। अतः नये कवियों या नये आलोचकों का यह दावा कि आज का परिवेश, बोध, संवेदनाएँ बदल गयी हैं इसलिए उनका ग्रहण या विश्लेषण संभव नहीं, यह विज्ञान-सम्मत नहीं है; कदाचित् उनकी 'सिनसिज्म' की ही प्रवृत्ति का सूचक है। फिर भी एक बात सोची जा सकती है कि अन्ततः आज के मनुष्य में बाह्य साधनों की दृष्टि से ही सही-कोई अन्तर तो आया ही है; अतः क्यों नहीं हम उनका मूल्यांकन किसी नये मानदड से करें, आखिर पुराने मानदंडों या मूल्यों से ही चिपके रहने में क्या रखा है ! इसके उत्तर में हमारा निवेदन है कि साधन एवं माध्यम की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति में दूसरे से कोई न कोई अन्तर उपलब्ध होगा। हर व्यक्ति का व्यक्तित्व दूसरे व्यक्ति से किसी न किसी मात्रा में भिन्न है, यदि हम इस भिन्नतासूचक प्रदृत्तियों के आधार पर मानदंड का निर्धारण करें तो फिर जितने व्यक्ति होंगे उतने ही मानदंड तैयार करने होंगे-और इतना ही नहीं, यदि हम प्रत्येक व्यक्ति, प्रत्येक रचना या प्रत्येक वर्ग की रचना के लिए अलग-अलग मूल्यों एवं मानदंडों की स्थापना किसी प्रकार कर भी लें तो ऐसे मूल्य मूल्य नहीं रहेंगे क्योंकि मूल्यों एवं मानदंडों का लक्ष्य विशिष्ट संदर्भों को किसी एक स्तर पर स्थापित करना है, जब भिन्न-भिन्न संदर्भ भिन्न-भिन्न स्तरों, मूल्यों या मानदंडों से सम्बन्धित रहेंगे तो उस स्थिति में उनकी भिन्नताओं या विशिष्टताओं का सामान्यी- करण नहीं हो सकेगा। उदाहरण के लिये, जब अलग-अलग कपड़े की दूकानों पर
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कपड़े का मूल्य पूछते हैं तो हमारे मन में दो बातें निश्चित रहती हैं, एक तो मीटर का नाप और दूसरा रुपये का मूल्य सबके यहाँ समान है। पर यदि कोई दुकानदार कहे कि हमारी कम्पनी कपड़े का जो थान तैयार करती है, वह सूत के अभाव में या लागत अधिक होने के कारण दूसरे थानों से छोटा होता है, अतः हमारे यहाँ 'मीटर' भी अलग होता है-वह सौ सेन्टीमीटर का न होकर पचास या साठ सेन्टीमीटर का होता है; या जो रुपया हम लेते हैं, वह भी सौ पैसे का न होकर, सवा सौ पैसों का होता है-तो यह स्थिति हमें किस तरह की लगेगी, इसका अनुमान किया जा सकता है। हर विक्रता इसी तर्क के अनुसार अपना-अपना अलग मीटर, किलोमीटर या रुपये-पसे का हिसाब रखें तो इससे निश्चय ही मूल्य और मूल्यांकन की सारी पद्धति ही निरर्थक एवं लक्ष्य-विहीन हो जायेगी। कपड़ा सस्ता हो या मँहगा, सूती हो या रेशमी, उसका भाव चाहे कुछ भी हो -- किन्तु मीटर सबका एक ही होगा; इसी तथ्य पर कपड़े का व्यवसाय निर्भर है। अवश्य ही कविता को नापना कपड़े को नापने जंसा नहीं है; हमने जो उदाहरण दिया वह बहुत स्थूल है, किन्तु तथ्य यह है कि मूल्य और मूल्यांकन सर्वत्र ही व्यक्ति-वैशिष्ट्य पर नहीं अपितु भिन्न-भिन्न व्यक्तियों या वस्तुओं के सामान्य गुणों या स्तरों के सूचक होते हैं; मूल्यों की स्थापना का आधारभूत लक्ष्य भी यही है-अतः विशिष्ट व्यक्तियों के लिए विशिष्ट मानदण्ड की माँग करना स्वतोव्याघात है; वैसा ही स्वतोव्याघात है, जैसा कि कोई नमकीन चीनी, या मीठे नमक की माँग करे। अब हम उनके दूसरे तर्क पर विचार कर सकते हैं जिसके अनुसार अर्थहीनता का बोध, सिनसिज्म आदि को मूल्यों के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए क्योंकि नयी कविता की ये मुख्य प्रवृत्तियाँ हैं। इस सम्बन्ध में सर्वप्रथम तो हमारा यह निवेदन है कि प्रवृत्तियों एवं मूल्यों में अर्थ एवं स्वरूप की दृष्टि से बहुत बड़ा अन्तर है; 'प्रवृत्ति' को ही 'मूल्य' मानना इस बात का सूचक है कि या तो वे 'मूल्य' और 'मूल्यांकन' का अर्थ ही नहीं समझते या फिर जानबूझकर अनजान बने हुए हैं। फिर भी स्थिति जो भी हो, हम यहाँ प्रस्तुत चर्चा को आगे बढ़ाने से पूर्व मूल्य-निर्धारण की प्रक्रिया एवं मूल्यों के स्वरूप को भी स्पष्ट कर लेना चाहते हैं। 'मूल्य' शब्द मूलतः अर्थ-शास्त्र का पारिभाषिक शब्द है, जिसका प्रयोग अब जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में होने लगा है। मानव-सभ्यता के इतिहास में किसी समय ऐसी भी स्थिति थी जब कि समाज मूल्यों के बिना भी जीवन-यापन करता था; उस समय विभिन्न वस्तुओं का सामान्य मूल्य निर्धारक कोई तत्त्व या माध्यम न होने के कारण वस्तुओं, पदार्थों, कार्यों का विनिमय उन्हीं वस्तुओं पदार्थों या, कार्यों के माध्यम से होता था। अर्थात् रोटी के बदले रोटी, चर्म के बदले चर्म, या गाय के बदले गाय ही दी जाती थी-ऐसा कोई साधन नहीं था कि एक रोटी दे तो बदले में दूसरा उस कुछ और दे सके। वैदिक युग में हमें ऐसे उदाहरण मिलते हैं जिनसे ज्ञात 共 地 老 光
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होता है कि इस समय तक सामान्य मूल्य निर्धारण के रूप में 'गाय' का उपयोग होता था। अर्थात् किसी वस्तु का सामान्य मूल्य कितना है, इसका निर्धारण इस बात से होता था कि वह कितनी गायों के बराबर है। आगे चल कर गाय का स्थान सिक्के ने ले लिया। सिक्के के प्रचलन से स्थिति में परिवर्तन यह हुआ कि सभी वस्तुओं, पदार्थों, क्रिया-कलापों, कार्य एवं श्रम का मूल्य एक सामान्य वस्तु सिक्कों के माध्यम से चुकाया जाने लगा; अब गाय के बदले में गाय या श्रम के बदले में श्रम ही देना आवश्यक नहीं रहा। प्रत्येक वस्तु चाहे वह जड़ हो या चेतन, मृत हो या जीवित, प्राचीन हो या नयी-सबका सामान्यीकरण सिक्के के माध्यम से हो जाता है। अस्तु, अर्थ-शास्त्र की दृष्टि से विभिन्न वस्तुओं के गुणों और महत्त्व की पारस्परिक समानान्तर या सापेक्ष स्थिति का निर्धारक मूल्य है। जब हम 'मूल्य' शब्द का प्रयोग अन्य क्षेत्रों में करते हैं तो वहाँ भी वह विभिन्न संदर्भों को एक सामान्य तत्त्व से सम्बन्धित करने का साधन या माध्यम सिद्ध होता है; चाहे तो इसे विभिन्न तत्त्वों के सापेक्ष महत्त्व का द्योतक भी कह सकते हैं। विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न मूल्यों का निर्वारण एवं विकास प्रायः होता रहता है। मल्य-निर्धारण या विकास की पद्धति यह है कि सर्वप्रथम क्षेत्र-विशेष के विभिन्न तथ्यों या तत्त्वों का संकलन करके उनका वर्गीकरण किया जाता है। वर्गीकरण के अनन्तर प्रत्येक वर्ग की विशेषता या प्रवृत्ति का विश्लेषण किया जाता है; फिर उन विशेषताओं या प्रवृत्तियों के ग्राह्य तत्त्वों का सामान्यीकरण कर लिया जाता है; और तत्त्वों का ग्राह्य सामान्यीकृत रूप ही 'मूल्य' है जिसे दर्शन की भाषा में 'आदर्श' भी कहा जा सकता है। अब यदि साहित्य के संदर्भ में मूल्य की विवेचना की जाय तो कहा जा सकता है कि मूल्यों का आधार कोई एक रचना नहीं होगी, अपितु विभिन्न वर्गों की विभिन्न विशेषताओं का सामान्यीकृत रूप ही मूल्य है। जिन विशेषताओं के आधार पर मूल्यों का निर्धारण होता है, वे अपने आप में व्यापक एवं महत्त्वपूर्ण होनी चाहिए; क्योंकि उनके आधार पर निर्धारित मूल्य की व्यापकता एवं महत्ता का आधार भी उन विशेषताओं में निहित है। व्यापकता का सम्बन्ध देश-काल से है। एक ही देश और एक ही काल के एक वर्ग की रचनाओं की विशेषता के आधार पर निर्धारित मूल्य, उस मूल्य की अपेक्षा संकीर्ण एवं गौण होगा जो अनेक देशों और अनेक काल-खण्डों के अनेक वर्गों की सामान्य विशेषताओं पर आधारित है। ऐसी स्थिति में निश्चय ही व्यापक एवं स्थायी महत्त्व के मूल्य की स्थापना के लिए हमें एक वर्ग की विशिष्ट प्रवृत्तियों की अपेक्षा विभिन्न वर्गों की सामान्य प्रवृत्तियों को अधिक महत्त्व देना होगा; अन्यथा हमारे मूल्य या मानदण्ड एकांगी सिद्ध होंगे। देश- काल की व्यापकता की दृष्टि से स्थानीय एवं क्षणिक तत्त्वों व प्रवृत्तियों की अपेक्षा
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अन्तर्देशीय एवं स्थायी तत्त्वों व प्रवृत्तियों को अधिक महत्त्वपूर्ण मानना होगा। वर्ग विशेष की क्षणिक प्रवृत्तियों पर आधारित मूल्य निश्चय ही सीमित एवं अल्प- कालीन सिद्ध होगा जबकि यूनिवर्सल मूल्यों के लिए हमें उन तत्त्वों व विशेषताओं की खोज करनी होगी जो होमर, बाल्मीकि, कालिदास, वर्जिल दाँते, शेक्सपीयर, गेटे, आदि भिन्न देशीय एवं भिन्न युगीन कवियों में समान रूप में विद्यमान हैं। जिनकी दृष्टि बाह्य प्रवृत्तियों तक ही सीमित है, वे कदाचित् इन सबकी उस आन्तरिक एकता को न खोज पाये, जिसके कारण ये रचनाएँ सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक बन गयी हैं तथा हर युग एवं हर देश के हर सहृदय को संवेद्य होती हैं, किन्तु इसी से यह समझ लेना कि उनमें कोई आन्तरिक एकता है ही नहीं-बहुत बड़ी भूल होगी। समुद्र की लहरों को अलग-अलग रूप में देखने वाले लोग भले ही उसकी आन्तर्निहित एकता को न समझ पायें, किन्तु इसी से समुद्र की आन्तरिक एकता खंडित नहीं हो जाती। अस्तु, संक्षेप में व्यापक एवं सामान्य मूल्यों के निर्धारण के लिए एक अत्यन्त व्यापक दृष्टि एवं व्यापक आधार की अपेक्षा है, जबकि हमारे नये कवि ऐसे मूल्यों के पक्ष में है जो एक वर्ग की व एक काल-खण्ड की विशिष्ट प्रवृत्तियों पर आधारित हो। जिस प्रकार देश-काल की व्यापकता के आधार पर यूनिवर्सल मूल्यों की स्थापना संभव है, उसी प्रकार देश-काल खंड के वर्ग-विशेष की विशेषताओं के आधार पर वर्गीय मूल्य भी स्थापित किये जा सकते हैं, जिनका उपयोग उक्त वर्ग तक ही सीमित रहेगा। किन्तु ऐसा करते समय भी 'प्रवृत्ति' एवं 'विशेषता' के अन्तर को ध्यान में रखना होगा; प्रवृत्ति का मूल्य के निर्धारण में योग नहीं हो सकता जबकि विशेषता का होता है। कल्पना कीजिए कि एक रसोइया ठीक समय पर सफाई से भोजन तैयार करता है। वह मिर्च-मसाले ठीक डाल कर भोजन को सुस्वादु बनाता है। वह बर्तनों को भी साबुन से भली-भाँति साफ करता है। पर वह कभी-कभी झूठ बोलता है; पैसे भी उधार माँगता है। वह पिक्चर देखने का शौकीन है।' ........ आदि-आदि। अब यदि कई रसोइयों में यही विशेषताएँ और प्रवृत्तियाँ मिलती हों तथा इनके आधार पर हमें किसी भोजनालय का मानदण्ड या मूल्य निर्धारित करना हो तो उसकी इन विशेषताओं को आधार बना सकते हैं- समय पर भोजन का बनना, साफ सुथरा बनना, स्वादिष्ट बनना, बर्तनों का साफ होना ; आदि। पर यदि कोई कहे कि आजकल सारे रसोइये सिगरेट पीते हैं, पिक्चर जाते हैं-अतः इन प्रवृत्तियों को भी अच्छे रसोइये के गुण या मूल्य के रूप में स्वीकार किया जाय तो यह बात हास्यास्पद लगेगी। हाँ, यदि कोई यह सिद्ध करदे कि अच्छे भोजन की निर्माण की प्रक्रिया के साथ रसोइये का सिगरेट पीना आवश्यक है, तो अवश्य ही हम उसे मूल्य सूचक तत्त्वों में स्थान दे देंगे। अस्तु, मूल्यों के निर्धारण के लिए व्यक्तियों की सामूहिक या वर्गीय प्रवृत्तियों
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का विश्लेषण एवं उनकी विशेषताओं का उद्घाटन आवश्यक है; साथ ही किसी प्रवृत्ति एवं विशेषता को मूल्य के आधार रूप में स्वीकार किया जाय या नहीं-इसका निर्णय भी विवेक बुद्धि के आधार पर किया जाना चाहिए। अब यदि पूर्वोक्त तर्कों पर विचार किया जाय तो श्री लक्ष्मीकान्त वर्मा के अनुसार आज के कवियों में अर्थहीनता एवं सिनिसिज्म की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं, अतः जब तक इन्हें मूल्य रूप में स्वीकार न किया जायगा, तब तक आगे नहीं बढ़ा जा सकता। प्रश्न है-अर्थहीनता के बोध एवं सिनिसिज्म की प्रवृत्ति से काव्य की कलात्मकता में क्या योग मिलता है ? क्या यह बात वैसी ही नहीं है कि सभी रसोइये सिगरेट पीते हैं, अतः सिगरेट को भोजन का मानदण्ड या मूल्य मान लिया जाय ? अधिक से अधिक हम यही कर सकते हैं कि सिगरेट पीने वाले रसोइये को, यदि वह भोजन स्वादिष्ट बनाता है तो सिगरेट पीना उसकी आदत या प्रवृत्ति मानकर उसे क्षमा कर सकते हैं, पर यदि रसोइया यह कहे कि सिगरेट की गन्व भोजन तक पहुँच जाती है, इससे उसका बनाया हुआ भोजन उन लोगों को स्वादिष्ट नहीं लगता जो सिगरेट नहीं पीते; इसलिए भोजन करने वालों के लिए भी-यदि वे उसके भोजन का स्वाद लेना चाहते हैं तो-सिगरेट पीना स्वीकार करना चाहिए या सिगरेट पीने को गुण या मूल्य रूप में मानना चाहिए-तो इसका क्या उत्तर होगा ? कदाचित् इसे हम रसोइये की बेतुकी बात कह सकते हैं या रसोइये की दृष्टि से यह हमारी जिद्द या हठ हो सकती है कि हम बीसवीं शती में रहते हुए भी सिगरेट नहीं पीते ! हमारे विचार में लगभग ऐसी ही स्थिति नयी कविता के सर्जकों एवं पाठकों व आलोचकों के मध्य बनी हुई है। अस्तु, हमारे विचार में कवियों की वस्तुगत प्रवृत्तियों को मूल्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता-यूनिवर्सल मूल्य को बात जाने दीजिए-वर्गीय मूल्य के रूप में भी नहीं। वस्तुतः 'मूल्य' शब्द उपलब्धि का सूचक है न कि न्यूनता या अभाव का। उपयुक्त प्रवृत्तियों के अतिरिक्त नयी कविता के अन्य अभावों को- रागात्मकता के अभाव को, साधारणीकरण के अभाव को, प्रसन्नता प्रदान (रिझाने की) करने की क्षमता के अभाव को, स्थायी भावों एवं तत्त्वों के अभाव को-भी मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित करने की दुश्चेष्टा की गयी है। वस्तुत; जब तक यह प्रमाणित नहीं हो जाता कि निरर्थकता-बोध, एवं सिनिसिज्म की प्रवृत्तियाँ काव्य के काव्यत्व या उसके कलात्मक गुणों के लिए अनिवार्य हैं तथा उपर्युक्त अभाव काव्य की संवेदनशीलता एवं कलात्मकता में कोई न्यूनता या त्रुटि उत्पन्न नहीं करते तब तक इन्हें 'मूल्य' रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास बेतुका ही होगा। दूसरी ओर, उपयुक्त प्रवृत्तियों एवं अभावों के होते हुए भी यदि कोई कविता काव्यात्मक अनुभूति या सौन्दर्यानुभूति प्रदान करने में समर्थ हो तो केवल इनके कारण ही उसकी अवहेलना करना भी विवेकशून्यता का परिचायक होगा। वस्तुतः
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कलाकृति के सौन्दर्य के मूल्यांकन में उसके आधारभूत पदार्थों के कला-निरपेक्ष तत्त्वों, गुण-दोषों, प्रवृत्तियों आदि की चर्चा उसी प्रकार अनावश्यक एवं महत्त्वशून्य है जिस प्रकार किसी चित्र में चित्रित गुलाब के फूल को देख कर यह मीमांसा करना कि गुलाब के फूल का उपयोग गुलकन्द बनाने में किस प्रकार होता है, या गुलकन्द के क्या-क्या गुण-दोष हैं, या इस गुलाब की गन्ध अच्छी या बुरी होती है। अवश्य ही इन सब बातों का सम्बन्ध गुलाब के फूल से है, तथा गुलाब का फूल ही उक्त कृति का आधारभूत विषय है किन्तु फिर भी चित्रकला की दृष्टि से ये सब बातें गौण ही नहीं, निरर्थक भी हैं। अतः कलाकार या कला-कृति की वैयक्तिक एवं विशिष्ट प्रवृत्तियों को, जब तक कि उनका सम्बन्ध कला के सामान्य गुणों से स्थापित नहीं हो जाता. 'मल्य' के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता-प्रवृत्तियाँ प्रवृत्तियाँ ही रहेंगी। अब हमें दूसरे पक्ष के मत पर भी विचार कर लेना चाहिए जिसके अनुसार काव्य की इन नूतन प्रदृत्तियों का मूल्यांकन परम्परागत सिद्धान्तों या मूल्यों-जिनमें मुख्य रस-सिद्धान्त है-के आधार पर किया जा सकता है, इतना ही नहीं किया जाना आवश्यक है। इस पक्ष का नेतृत्व करते हुए डॉ० नगेन्द्र ने विरोधियों की विभिन्न दलीलों पर विचार करने के अनन्तर प्रतिपादित किया है-'नयी कविता यदि अनुभूति का आधार मान कर चलती है तो रस से उसकी मुक्ति नहीं है; रस के पाश से वह यह यह कह कर भी नहीं निकल सकती कि हमारी अनुभूति शुद्ध मानव- अनुभूति है, आनन्दानुभूति नहीं हैं, क्योंकि प्रत्येक सच्ची अनुभूति की कलात्मक अनुभूति-तीव्र से तीव्र द्वन्दव की कलात्मक अनुभूति भी-समंजित अर्थात् अद्वन्द्वमयी ही हो सकती है; द्वन्द्व प्रक्रिया में हो सकता है, परिणति में नहीं ........ ।' हमारे दृष्टिकोण से डॉ० नगेन्द्र भी यहाँ एक अनावश्यक आग्रह करते हुए प्रतीत होते हैं; जिस रसात्मकता के सुन्दर पाश (या बाहुपाश ?) में जाने के लिए डॉ० नगेन्द्र बार-बार नये कवियों को प्रेरित कर रहे हैं, वह कभी भी सफल नहीं हो सकता क्योंकि जब उन्होंने पहले से ही रसात्मकता के पाश को किसी उर्वशी का पाश न समझ कर विष-कन्या का स्पर्श मान लिया है तो यह कैसे संभव है कि वे उसमें बँध कर ही रहेंगे। दूसरे, नये कवियों की ओर से अज्ञ यजी पहले ही कह चुके हैं कि 'रस का आधार है समाहिति, अद्वन्द्व किन्तु नयी कविता द्वन्द्व और असामंजस्य की कविता है।' यह ठीक है किसी कविता में रागात्मकता, संवेद्यता, प्रेषणीयता एवं रसात्मकता या सौन्दर्यानुभूति के लिए विभिन्न अनुभूतियों की अन्ततः समाहिति आवश्यक हैं, किन्तु जिनका लक्ष्य ही पाठक को 'रिझाना' न होकर 'सताना' मात्र है, उन्हें इन सब तत्त्वों व प्रक्रिया की क्या आवश्यकता है ! फिर यह भी नहीं कहा जा सकता कि
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प्रत्येक अनुभूति की परिणिति कलात्मक या रसात्मक अनुभूति में होती है; अनुभूति सत्य होकर भी कला-शून्य रूप में व्यक्त हो सकती है। हमारे विचार में कोरी अनुभूति या सच्ची अनुभूति ही रसात्मकता के लिए पर्याप्त नहीं है-इसके लिए अनुभूति का कल्पनात्मक माध्यम से अभिव्यंजन, निर्विशेषीकरण, तादात्म्य आदि भी आवश्यक है। स्वयं डॉ० नगेन्द्र के अनुसार भाषा का भावमय प्रयोग ही अनुभूति को साधारणीकृत रूप दे पाता है। इसी को दूसरे शब्दों में अभिव्यंजना की शक्ति कह सकते हैं। अवश्य ही नये कवियों के पास कुछ अनुभूतियाँ हैं, पर उनकी अभिव्यक्ति के लिए प्रतिभा और कल्पना का जो संयोग अपेक्षित है, वह भी उनके पास है-यह निर्विवाद रूप में कैसे कह सकते हैं। अस्तु, प्रत्येक अनुभूति की परिणति सदा 'रस' में नहीं होती-इस बात को डॉ० नगेन्द्र की अपेक्षा स्वयं नये कवि और उनके आचार्य अधिक अच्छी तरह जानते हैं-अतः यदि वे रस को अस्वीकार करें तो स्वाभाविक ही है। इतना अवश्य है कि रस के अभाव में भी कोई अभिव्यक्ति कविता बन सकती है या नहीं-इस सम्बन्ध में अवश्य दो मत हैं। नये कवियों के अनुसार 'रस' कविता के लिए आवश्यक नहीं है, अतः वे रस-सिद्धान्त को भी अस्वीकार करते हैं। अस्तु, हमारे विचार में रस और नयी कविता में परस्पर सम्बन्ध न भी स्थापित हो तो इससे रस-सिद्धान्त की स्थिति में विशेष अन्तर नहीं पड़ता, क्योंकि स्वयं नयी कविता के प्रवक्ता के अनुसार कालिदास के काव्य से लेकर छायावादी काव्य तक तो रस-सिद्धान्त लागू होता है; किन्तु नयी कविता इसकी अपवाद है। जो सिद्धान्त लगभग दो हजार वर्ष तक के साहित्य के लिए उपयुक्त है, उसकी मान्यता एवं प्रतिष्ठा में इस बात से विशेष अन्तर नहीं पड़ता कि विगत बीस वर्षों का साहित्य उसे स्वीकार करने को प्रस्तुत नहीं। यदि हम अपने सीमित दायरे से बाहर निकल कर देखे तो बीस शताब्दियों के सम्मुख बीस वर्ष विशेष महत्त्व नहीं रखते। फिर भी हमारा विश्वास है कि ज्यों-ज्यों नयी कविता अपने असामान्य या 'अब्नार्मल' लक्षणों को त्याग कर सामान्य और नार्मल होती जायगी, त्यों-त्यों वह रस के भी निकट आती जायगी और कविता के वास्तविक स्वरूप को प्राप्त करती जायगी, अन्यथा वह साहित्य के इतिहास की वस्तु मात्र बनकर रह जायगी। साहित्य में में ऐसे आन्दोलन भी आते रहते हैं जिनकी आयु कुछ दशाब्दियों से अधिक नहीं होती। जैसा कि हम पहले निवेदन कर चुके हैं, प्रत्येक धारा एवं प्रवृत्ति का जीवन-काल उसकी अन्तर्निहित शक्ति पर अवलम्बित होता है; अतः यह भविष्य ही बता सकेगा कि हमारी नयी कविता में कितनी शक्ति है। जहाँ तक रस-सिद्धान्त की बात है-यह किसी एक विद्वान् या, एक वर्ग, एक देश, एक भाषा और एक काल के आधार पर प्रतिष्ठित नहीं है; इसे विभिन्न देशों और विभिन्न काल-खंडों की मान्यता प्राप्त है; और इस मान्यता का एक मात्र कारण यह है कि वह क्षण-विशेष, काल-विशेष स्थान-विशेष या वर्ग-विशेष की परिवर्तनशील प्रवृत्तियों पर आधारित न होकर उन स्थायी भावनाओं पर आधारित
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हैं जो 'यूनिवर्सल' हैं। अपने इस आधार की दृढ़ता-या शक्ति-के कारण यह जीवित ही नहीं है, अपितु दिन पर दिन विकासोन्मुख है। भारत में ही नहीं, बाहर भी जर्मन, फ्रेच, रूसी, ब्रिटिश, अमरीकन आदि विद्वानों ने भी अपने-अपने अनुभव एवं दृष्टिकोण के अनुसार कला के संदर्भ में एक ऐसे सिद्धान्त की स्थापना की है, जो कृति की भावात्मकता, संप्रेषणीयता, तादात्म्य एवं रसात्मकता का विवेचन- विश्लेषण करता है, जिसे विभिन्न भाषाओं में विभिन्न नाम दिये गये हैं, किन्तु भारतीय शब्दावली में उसे निस्संकोच रस-सिद्धान्त कहा जा सकता है। रस-सिद्धान्त के इस सार्वभौमिक रूप का परिचय हम इसी प्रबन्ध के द्वितीय खंड में प्रस्तुत कर चुके हैं। अस्तु, हमारे सामने समस्या रस-सिद्धान्त को मान्यता या प्रतिष्ठा दिलवाने की नहीं है, अपितु यह है कि जो रस सिद्धान्त अब तक केवल भारतीय विद्वानों के चिन्तन पर आधारित था, उसे पाश्चात्य कला-चिन्तकों की धारणाओं से समन्वित करके किस प्रकार राष्ट्रीय से अन्तर्राष्ट्रीय या यूनिवर्सल रूप प्रदान किया जाय ? अवश्य ही विभिन्न देशों में इसके विभिन्न रूप प्रचलित हैं, जो एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं; उन्हें परस्पर सम्बन्धित एवं समन्वित करके एक व्यापक रूप प्रदान किया जा सकता है। दूसरे, उसके अनेक पक्ष अब भी अविकसित हैं, जिनके विकास की पूरी संभावना है, अतः उन्हें विकसित करने का भी लक्ष्य हमारे सामने है। तीसरे, रसेतर क्षेत्र के आचार्यों एवं विद्वानों तथा उनके सिद्धान्तों-यथा, अलंकार, रीति, अनुकृति, औदात्य, बिम्ब आदि-के साथ भी रस-सिद्धान्त का भली-भाँति सामंजस्य नहीं हो पाया है, जबकि हमारे विचार से यदि इन सभी सिद्धान्तों का लक्ष्य एक ही वस्तु के अन्तर्निहित सौन्दर्य का उद्घाटन करना है तो अवश्य ही इनमें परस्पर सामंजस्य होना स्वाभाविक है। अन्ततः अन्य सिद्धान्त भी कलागत सौन्दर्य एवं सौन्दर्यानुभूति की ही व्याख्या कुछ अन्य दृष्टियों से करते हैं-लक्ष्य उनका भी वही है जो रस- सिद्धान्त का है; अतः उनमें सामंजस्य-स्थापना की पूरी संभावना है। चौथे, अभी तक रस-सिद्धान्त को प्रायः नाटक और काव्य पर ही लागू किया जाता रहा है, जबकि अन्य काव्य-रूपों के भी वह प्रतिकूल नहीं है। किन्तु उसका व्यावहारिक रूप इस दृष्टि से विकसित नहीं है। इसी प्रकार कवि की सर्जन-प्रक्रिया की व्याख्या भी रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से उतनी स्पष्ट रूप में नहीं हुई है जितनी कि उसकी आस्वादन प्रक्रिया का हुई है। फिर रस के काव्य-शास्त्रीय एवं मनोवैज्ञानिक पक्षों में भी अनेक दृष्टियों से असंगत है। अस्तु, पाश्चात्य काव्य-शास्त्र, सौन्दर्य-शास्त्र, मनोविज्ञान एवं आधुनिक काव्य-रूपों (विशेषतः उपन्यास, कहानी, निबन्ध आदि) की दृष्टि से रस-सिद्धान्त का पुनराख्यान करते हुए उसे अपेक्षाकृत अधिक व्यापक, प्रौढ़ एवं प्रामाणिक रूप प्रदान किया जा सकता है। (प्रस्तुत प्रबन्ध के चार खंडों में इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए क्रमशः भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-शास्त्र, सौन्दर्य-शास्त्र एवं मनोविज्ञान की दृष्टि से रस-सिद्धान्त का अध्ययन करते हुए) कतिपय निष्कर्षों की उपलब्धि अलग-अलग की गई थी जबकि आगे हम भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के निष्कर्षों का समन्वय एवं समीकरण करते हुए रस-सिद्धान्त के पुनराख्यान का प्रयास करेंगे।
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२ रस: व्यापक संदर्भ में
प्रस्तुत प्रबन्ध के प्रारम्भिक तीन खंडों में विभिन्न दृष्टियों से रस के सम्बन्ध में विचार करते हुए हम अन्ततः इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि रस के साधन एवं माध्यम जो भी हो, उसके स्वरूप एवं प्रक्रिया के बारे में भी चाहे मत-भेद हो, किन्तु यह प्रायः सभी को मान्य है कि काव्य के संदर्भ में रस अन्ततः काव्यानभूति का आस्वाद' है, जिसे कला के संदर्भ 'काव्यानुभूति का आस्वाद' कहा जा सकता है। सौन्दर्य-शास्त्रीय दृष्टि से इसी 'काव्यानुभूति' या 'कलानुभूति, को 'सौन्दर्यानुभूति' (Aesthetic Experience) की संज्ञा दी जाती है। अतः यदि हम इस को व्यापक संदर्भ प्रदान करते हुए सौन्दर्य-शास्त्र की शब्दावली का प्रयोग करे तो उसे निःसंकोच 'सौन्दर्यानुभूति' कहा जा सकता है-इस निष्कर्ष की स्थापना तृतीय खंड में सम्यक् रूप में की जा चुकी है। किन्तु यह निष्कर्ष मूलतः उन काव्य-शास्त्रियों एवं सौन्दर्य-शास्त्रियों के मतों के आधार पर स्थापित था जो सामान्यतः कला का आधारभूत तत्त्व 'भाव' को मानते हैं ; ऐसी स्थिति में यह निष्कर्ष एक वर्गीय, एकांगो एवं संकीर्ण भी कहा जा सकता है ; इसे सर्व सामान्य, एवं व्यापक रूप देने के लिए उन विचारकों की सहमति आवश्यक है जो काव्य या कला में भाव को ही प्रमुख न मानकर उसके अन्य तत्त्वों या पक्षों को मानते हैं। सामान्यतः सौन्दर्य-शास्त्र में विद्वानों के दो वर्ग हैं-एक वस्तुवादी (Materialist) और दूसरे रूपवादी (Formalist)। इसी प्रकार भारतीय काव्य-शास्त्र में भी रसेतर संप्रदायों में भी अलंकार, विक्ोन्ति, ध्वनि आदि को रूपवादी कहा जा सकता है, जो कथ्य की अपेक्षा कथन-विधि या शैली को प्रमुखता देते हैं। अस्तु, रस को व्यापक स्वरूप प्रदान करने के लिए विपक्षी मतों की दृष्टि से भी विचार अपेक्षित है।
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रस : व्यापक संदर्भ में ३१३
भारतीय काव्य-सिद्धान्त और रस- सर्वप्रथम हम भारतीय संप्रदायों-अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, एवं औचित्य-की दृष्टि से विचार करते हैं। यह तो निश्चित है कि प्रायः विभिन्न संप्रदायों के संस्थापकों के दृष्टिकोण में उस तटस्थता एवं वैज्ञानिकता का अभाव था जिसके कारण वे इतर सिद्धान्तों के महत्त्व को समभ पाते या उनके साथ सामंजस्य स्थापित कर पाते ; उनका लक्ष्य प्रायः अपने ही संप्रदाय द्वारा अनुमोदित तत्त्व को 'सर्वप्रमुख' ही नहीं अपितु 'एक मात्र' आधार सिद्ध करने का रहा। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक था कि अलंकार, रीति, वक्रोक्ति आदि के प्रतिपादक या तो रस के सम्बन्ध में मौन रहे, या फिर उसे अपने ही तत्त्व के अन्तर्गत समन्वित करके उस पर अपना लेबिल लगा दिया-यथा ; अनेक अलंकारवादी रस को भी रसवत् अलंकार के रूप में या ध्वनिवादी उसे रस-ध्वनि के रूप में ग्रहण करते हुए क्रमशः अलंकार ध्वनि को ही काव्यात्मा स्वीकार करते हैं। जैसा कि हम 'साहित्य-विज्ञान' में विस्तार से स्पष्ट कर चुके हैं, इन संप्रदायों में परस्पर सामंजस्य की अपेक्षा स्पर्द्धा का भाव अधिक रहा; जिससे वे बिना इस बात का विचार किये कि काव्य का कौनसा पक्ष या क्षेत्र उनकी सीमा में पड़ता है, समस्त काव्य-क्षेत्र पर अपना अधिकार सिद्ध करने में लगे रहे, जिसका परिणाम यह हुआ कि उचित और अनुचित सभी तत्त्व प्रत्येक क्षेत्र में नाम- भेद के साथ विद्यमान हैं। ऐसी स्थिति में यह आशा नहीं की जानी चाहिए कि इन संप्रदायों के आचार्य स्पष्ट रूप में 'रस' को मान्यता देते। फिर भी अप्रत्यक्ष में कुछ बिन्दु ऐसे मिलते हैं जहाँ रस के व्यापक स्वरूप के साथ उनका सामंजस्य हो जाता है ; और जैसा कि हम पीछे निवेदन कर चुके हैं, वह व्यापक स्वरूप है-रस अर्थात् "सौन्दर्यानुभूति"। यह विचित्र बात है कि अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि और औचित्य-इन सभी संप्रदायों के संस्थापकों व आचार्यों ने प्रायः अपने-अपने द्वारा अनुमोदित तत्त्व को काव्यगत सौन्दर्य का साधन मात्र स्वीकार किया है। 'अलंकार' संप्रदाय के प्रमुख आचार्य दंडी ने अलंकार की परिभाषा ही इन शब्दों में की है- "काव्यशोभाकरान् धर्मान्लङ्कारान् प्रचक्षते' (काव्यादर्श, २।१) अर्थात् काव्य के शोभाकारक धर्म अलंकार कहे जाते हैं। यहाँ यदि 'शोभाकारक' का अभिप्राय 'सौन्दर्य कारक' या 'सौन्दर्य-उत्पादक' ले लिया जाय तो अनुचित न होगा। इसी बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए उद्भट ने भी स्वीकार किया है-"चारुत्व हेतुत्वे पि गुणानामलंकाराणां ........ " अर्थात् गुण और अलंकार चारुत्व के हेतु हैं।१ यहाँ 'चारुत्व' शोभा, सुन्दरता या सौन्दर्य का ही पर्याय है। किन्तु वामन ने तो अलंकार का सौन्दर्य से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध माना है कि उसे 'सौन्दर्य' का ही पर्याय १. भारतीय काव्य शास्त्र की परंपरा, पृ० सं० ४१
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३१४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
घोषित कर दिया, ऐसी स्थिति में यदि अलंकार सिद्धान्त के अनुसार 'काव्यानुभूति' को 'सौन्दर्यानुभूति' कहा जाय तो अनुचित न होगा। रीति-संप्रदाय के प्रवर्त्तक वामन ने काव्य में अलंकार की अपेक्षा 'रीति' को अधिक महत्त्व प्रदान करते हुए उसे ही काव्यात्मा के रूप में स्वीकार किया है। प्रश्न है-यह 'रीति' क्या है ? इसके उत्तर में कहा गया है-'विशेष प्रकार की पद-रचना ही रीति है' और उस 'विशेष प्रकार' का अर्थ है-'गुण-युक्त रचना'; और ये 'गुण' क्या हैं ? इसका उत्तर है-'काव्यशोभायाः कर्त्तारो धर्मा गुणः' अर्थात् काव्य में शोभा उत्पन्न करने वाले धर्म ही गुण हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि गुण केवल साधन-मात्र हैं; उनका साध्य तो शोभा ही है ; और काव्यानुभूति इस शोभा या सुन्दरता अथवा सौन्दर्य की ही अनुभूति है। ध्वनिकार ने काव्य-संदर्भ में 'शोभा' या 'सौन्दर्य की अपेक्षा 'चारुत्व' शब्द पर विशेष बल दिया है। ध्वनि की परिभाषा करते हुए उन्होंने लिखा है-"जो चारुत्व किसी अन्य उक्ति से प्रकाशित नहीं किया जा सकता, उसे प्रकाशित करने वाला व्यंजना व्यापार युक्त शब्द ही ध्वनि' कहलाने का अधिकारी हो सकता है।" (ध्वन्यालोक १।१५) यहाँ निश्चय ही ध्वनि का लक्ष्य तो 'चारुत्व' या सौन्दर्य का प्रकाशन है, जबकि व्यंजना व्यापार उसका साधन या माध्यम मात्र है। अतः केवल व्यंजना या कोरी व्यंजना या ध्वनि काव्य की द्योतक नहीं मानी जा सकती है। 'आज रविवार है।' इस वाक्य से यह अर्थ व्यंजित होता कि 'हमें छुट्टी है' या 'हमें कॉलेज नहीं जाना' है' आदि-पर फिर भी यह काव्यत्व का सूचक नहीं है। यद्यपि परवर्ती आचार्यों ने ध्वनि के प्रसंग में व्यंजना-व्यापार को इतना महत्त्व दिया कि 'चारुत्व' गौण हो गया किन्तु सैद्धान्तिक व व्यावहारिक-दोनों दृष्टियों से ही यह प्रमाणित होता है कि व्यंजना व्यापार केवल चारुत्व प्रकाशन का साधनमात्र है ; साध्य तो उसका 'चारुत्व' ही है। साथ ही यह भी ज्ञातव्य है कि ध्वनिकार ने शब्दालंकार, अर्थालंकार, वृत्ति, रीति, प्रबन्ध, रस आदि विभिन्न प्रसंगों में इन सबका लक्ष्य चारुत्व या सौन्दर्य को ही माना है ; यहाँ कतिपय उद्धरण प्रस्तुत हैं- (क) 'अनुप्रासादि शब्दगत चारुत्व के हेतु हैं।' (धवन्यालोक ; १।१) (ख) 'उपमादि अर्थगत चारुत्व के हेतु हैं।' (वही) (ग) 'अतिशयोक्ति जिस अलंकार को प्रभावित करती है, उसे ही चारुत्वा- तिशय प्राप्त होता है। (ध्वन्यालोक ; ३।३७) (घ) 'जो प्रबन्ध के सौन्दर्यातिशय को चाहता है उसे इन रसों में से किसी ............ एक रस को ही प्रधान-रूप से समाविष्ट करना चाहिए।' (ध्वन्यालोक ; ३।२१) (ड़) '(ध्वनि में) व्यंजकत्व पूर्वोक्त चारुत्व-हेतु व्यंग्य के बिना नहीं रहता।' (ध्वन्यालोक ; ३।३३)
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अस्तु, उपयुक्त उद्धरणों से स्पष्ट है कि ध्वनिकार के मत में अनुप्रास, उपमा, अतिशयोक्ति, आदि शब्द का लक्ष्य काव्य में चारुत्व या सौन्दर्य का प्रकाशन है ; ध्वनि का भी यही लक्ष्य है ; जहाँ अन्य साधन इस लक्ष्य की पूर्ति में असफल हो जाते हैं, वहाँ व्यंजना-शक्ति या ध्वनि इसकी पूर्ति करती है। ऐसी स्थिति में काव्यानुभूति को चारुत्व या सौन्दर्य की अनुभूति माना जाय तो ध्वनिकार को भी स्वीकार्य होगा। वक्रोक्ति-संप्रदाय के प्रवर्त्तक कुन्तक ने 'वक्रोक्ति' को ही काव्यात्मा के रूप में प्रतिष्ठित करते हुए प्रतिपादित किया है कि 'वकोक्ति' का अर्थ है-'प्रसिद्ध कथन से भिन्न या विचित्र अभिधा' तथा 'विचित्र' का अर्थ स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया है- 'ऐसी उक्ति जिसमें कवि-कर्म का कौशल, उसकी भंगिमा या शोभा (चारुता) हो।' अतः संक्षेप में, कुन्तक के अनुसार वक्रोक्ति का स्वरूप इस प्रकार बताया जा सकता है- · वक्रोक्ति =विचित्र उक्ति · विचित्र उक्ति =वैदग्ध्यपूर्ण उक्ति। · वैदग्ध्यपूर्ण =कवि कर्म कौशल जन्य शोभा या चारुता से युक्त। इसी प्रकार वक्रोक्ति के भेदोपभेदों का निरूपण करते समय भो उसे कवि व्यापार के वचित्र्य से शोभित (कवि व्यापार वऋत्व प्रकार ......... विच्छिति शोभिनः ; वक्रोक्ति जीवित्तम् १।१८), माना है। वर्ण-विन्यास वकता के प्रसंग में उन्होंने वकता को शोभातिशय कारी माना है। वस्तुतः डा० नगेन्द्र के शब्दों में 'कुन्तक ने स्थान-स्थान पर वक्र, विचित्र, चारु आदि शब्दों का पर्याय रूप में प्रयोग किया है।" अस्तु, कुन्तक का अन्य संप्रदायों से इस बात का तो मत-भेद है कि काव्य में सौन्दर्य की सृष्टि किस साधन या माध्यम से होती है, किन्तु इस बात को वे भी स्वीकार करते हैं कि अन्ततः काव्य में कवि व्यापार का लक्ष्य शोभा चारुता या सौन्दर्य की सृष्टि करना है, जिससे पाठक आहू लादित होता है। अस्तु, 'काव्यानुभूति=सौन्दर्यानुभूति'-इस मत के सम्बन्ध में कुन्तक की भी सहमति मानी जा सकती है। औचित्य-संप्रदाय के संस्थापक आचार्य क्षेमेन्द्र ने तो प्रायः सर्वत्र ही औचित्य का लक्ष्य काव्य में शोभा, रुचिरता या सौन्दर्य की स्थापना करना अथवा उसकी अभिवृद्धि करना स्वीकार्य किया है, जो निम्नांकित उद्धरणों से स्पष्ट है- क) 'अलंकार तभी शोभा बढ़ाने में समर्थ होते हैं, जबकि उनका विन्यास उचित स्थान (औचित्य पूर्ण) पर हो।' (ख) 'औचित्य के बिना न अलंकार रुचिरता देते हैं न गुण।'
२. हिन्दी वक्रोक्ति जीवितम् ; भूमिका पृ० सं० ३२
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(ग) 'प्रतिपाद्य अर्थ के अनुरूप अलंकार का प्रयोग हो तो इस औचित्य से काव्य-भारती इस प्रकार शोभित होती है ; जैसे-पीन-स्तनों पर पड़े हार से सुन्दरी।' इस प्रकार औचित्य-संप्रदाय के अनुसार भी औचित्य काव्य-सौन्दर्य का साधक या रक्षक मात्र है ; किन्तु वह स्वयं सौन्दर्य का पर्याय नहीं है। व्यावहारिक दृष्टि से भी देखें तो औचित्य एक बौद्धिक तत्त्व है जो काव्य में संगति, संतुलन आदि के द्वारा उसके सौन्दर्य की रक्षा करता है। 'राम दशरथ के पुत्र थे', 'दो और दो चार होते हैं'-इन वाक्यों में पूर्ण औचित्य होते हुए भी' वे सौन्दर्य के अभाव में काव्यात्मक नहीं माने जा सकते। अस्तु, काव्य में औचित्य का भी कोई स्वतंत्र महत्त्व नहीं है, उसका महत्त्व उसी सीमा तक है जहाँ तक वह शोभा, रुचिता या सौन्दर्य की उत्पत्ति एवं रक्षा में योग देता है ; अतः इस संप्रदाय के अनुसार भी काव्यानुभूति को 'सौन्दर्या- नुभूति' कहा जा सकता है क्योंकि काव्यत्व सौन्दर्य का ही पर्याय है। अस्तु, अलंकार, रीति, ध्वनि, वक्रोक्ति एवं औचित्य-इन पाँचों संप्रदायों की आधारभूत स्थापनाओं के विश्लेषण से स्पष्ट है कि भले ही वे काव्यात्मा के रूप में क्रमशः अलंकारादि को प्रतिष्ठित करें किन्तु अन्ततः वे सभी स्वीकार कर लेते हैं कि अलंकार, रीति (गुण), ध्वनि आदि ये सब काव्य में शोभा, रुचिरता, चारुता, सुन्दरता या (इन सब को समन्वित रूप में कहें तो) सौन्दर्य की सृष्टि, उत्पत्ति, अभिव्यक्ति या रक्षा के साधन मात्र हैं; अतः काव्य का प्रमुख तत्त्व सौन्दर्य है, जिसे काव्य का धर्म या उसकी आत्मा के रूप में स्वीकार किया जा सकता है; शेष सब तत्त्व उसी के साधक या सहायक मात्र हैं। इस स्थिति में काव्यानुभूति का अर्थ है- काव्यत्व या सौन्दर्य की अनुभूति। अन्यत्र हम यह स्पष्ट कर चुके हैं कि व्यापक दृष्टि से 'रस' का भी अर्थ-'सौन्दर्यानुभूति' है। अतः उपयुक्त सभी तत्त्वों को अन्ततः सौन्दर्यानुभूति या रस के संयोजक, घटक या साधक तत्त्वों में स्थान देते हुए उनके पारस्परिक सम्बन्ध की स्थापना सूत्र-रूप में इस प्रकार की जा सकती है-
अलंकार, रीति (गुण), सौन्दर्य -- >सौन्दर्यानुभूति ध्वनि, या वक्रोक्ति, (काव्यगत सौन्दर्य) रस औचित्य, उपयुक्त निष्कर्ष के अनुसार अलंकार, रीति, ध्वनि आदि को एक ही वर्ग में अर्थात् सौन्दर्य के साधनों में ही स्थान दिया गया है, किन्तु इसका यह तात्पर्य नहीं है कि इनमें परस्पर कोई अन्तर नहीं है-अवश्य ही, इनमें परस्पर सूक्ष्म अन्तर है तथा उसी अन्तर के अनुसार उनसे उत्पन्न होने वाले 'सौन्दर्य' एवं उसकी अनुभूति की प्रकृति में परस्पर थोड़ा-बहुत अन्तर रहेगा; इस अन्तर का स्पष्टीकरण अन्यत्र
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रस : व्यापक संदर्भ में ३१७
किया जायगा, यहाँ हमारा प्रतिपाद्य यही है कि अन्ततः ये सभी तत्त्व या गुण काव्यगत या कलागत सौन्दर्य की सृष्टि में योग देते हुए पाठक या सामाजिक को सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति प्रदान करते हैं। अतः रस के संदर्भ में इन्हें विच्छिन्न, पृथक या असम्बद्ध तत्व न मानकर रस की आधारभूत वस्तु-सौन्दर्य-के घटक साधक एवं पोषक तत्त्वों के रूप में इनका रस से घनिष्ठ सम्बन्ध स्वीकार करना चाहिए। • पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्त एवं रस- पाश्चात्य काव्य-शास्त्र के प्रमुख सिद्धान्तों में अनुकृति, औदात्य, औचित्य, अलंकार, कल्पना, बिम्ब, प्रतीक आदि हैं जो कि काव्य की प्रकृति की व्याख्या विभिन्न रूपों में करते हैं। इन सिद्धान्तों का रस से कोई सम्बन्ध स्थापित हो सकता है या नहीं, और यदि हो सकता है तो किस रूप में-इस प्रश्न पर विचार करने के लिए इनके स्वरूप की विवेचना यहाँ अपेक्षित है। अनुकृति सिद्धान्त के मूल प्रवर्त्तक तो प्लेटो थे, किन्तु इसे विकसित करने का श्रय अरस्तू को प्राप्त है। प्लेटो के अनुसार काव्य में मिथ्या जगत् की मिथ्या अनुकृति प्रस्तुत की जाती है, अतः वह सत्य के प्रचार में बाधक सिद्ध होता है, जबकि अरस्तू ने कला का मूल गुण ही 'प्रकृति की अनुकृति' को मानते हुए, कलाजन्य आनन्द का आधार इसी को बताया। इसमें कोई संदेह नहीं कि काव्य में प्रकृति और जगत् के स्वरूप का वर्णन-चित्रण प्रायः उसी रूप में किया जाता है, जिस रूप में वह हमें दृष्टिगोचर होता है-इसी तथ्य की व्यंजना 'अनुकृति' (Imitation) के अन्तर्गत की गयी है; पर यदि सूक्ष्मता से विचार करें तो काव्य के संदर्भ में 'अनुकृति' शब्द अनुपयुक्त सिद्ध होगा। कवि मूल पात्रों के क्रिया-कलापों के अनुरूप वर्णन या चित्रण करता है, उनका अनुकरण नहीं; अनुकरण की बात एक सीमा तक अभिनय कला पर ही लागू होती है-काव्य पर नहीं। अतः यहाँ 'अनुकरण' को लाक्षणिक प्रयोग मानते हुए उसका लक्ष्यार्थ 'अनुरूप वर्णन या चित्रण' अथवा 'प्रकृति के सद्दश वर्णन' ग्रहण करना चाहिये। पर अनुकृति सिद्धान्त अपने-आप में एक अविकसित एवं एकांगी सिद्धान्त है-वह कलागत यथार्थ-चित्रण, स्वाभाविकता, भावात्मक सत्य की तो व्याख्या करता है, किन्तु इस बात का उत्तर नहीं दे पाता कि जिन दृश्यों, घटनाओं व पात्रों को हम जगत में 'कुरूप' 'वीभत्स' या 'घृणित' कहते हैं, उनकी अनुकृति (या सादृश्य-विधान) कला के माध्यम से सुन्दर, मधुर एवं आनन्ददायक क्यों प्रतीत होती है ? अरस्तू ने इसका उत्तर दिया है-जब हम चित्र में घोड़े की अनुकृति देखते हैं तो इससे हमारे ज्ञान में अभिवृद्धि होती है, और ज्ञान की उपलब्धि से दारशनिक को ही नहीं-जन-सामान्य को भी आनन्द प्राप्त होता है। अरस्तू का यह उत्तर शंका का समाधान करने में असमर्थ है क्योंकि घोड़े का चित्र देखकर उन
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व्यक्तियों का ही ज्ञान बढ़ेगा जिन्होंने पहले कभी घोड़ा नहीं देखा हो; दूसरे, ज्ञान- प्राप्ति का संतोष कला की अपेक्षा दर्शन, इतिहास, कानून-शास्त्र आदि से अधिक संभव है। अस्तु, अनुकृति सिद्धान्त काव्य की सम्यक् व्याख्या नहीं कर पाता। इसलिए इस सिद्धान्त को विकसित करते हुए बूचर ने अनुकृति का अर्थ 'सादृश्य- विधान', पाट्स ने 'मूल के अनुरूप प्रभाव उत्पन्न करना', स्काटजेम्स ने 'कल्पनात्मक पुर्ननिर्माण' एवं डॉ० नगेन्द्र ने 'भावात्मक एवं कल्पनात्मक पुनः सृजन' किया है। हमारे विचार में काव्य में अनुकृति या सृष्टि के अनुरूप वर्णन-चित्रण तो रहता है किन्तु उस वर्णन में प्रभावोत्पादकता, भावात्मकता या प्रेषणीयता भी आवश्यक है; इस पक्ष की अरस्तू ने उपेक्षा करदी है। हाँ, यदि अनुकृति या अनुरूप वर्णन सौन्दर्या्मिक (=प्रभावोत्पादक या भावात्मक) रूप को प्राप्त करके पाठक को आनन्दानुभूति प्रदान करने में समर्थ हो तो वह अवश्य कला की कोटि में आ सकता है। संक्षेप में, अनुकृति+सौन्दर्यानुभूति=काव्य। लौंजाइनस ने 'औदात्य' (Sublime) को ही काव्य का सर्वश्रष्ठ तत्त्व घोषित किया तथा आगे चलकर काण्ट, हीगल, बर्क, ब्रडले, सैंतायना प्रभृति ने भी इसे कला के एक महत्त्वपूर्ण तत्त्व के रूप में मान्यता दी है। सामान्यतः 'औदात्य' का अर्थ 'उच्चता', 'महानता', 'अलौकिकता', आदि किया जाता है तथा इन सब का सम्बन्ध तात्त्विक बोध या बुद्धि की प्रक्रिया से है। काव्य की वस्तु यदि उदात्त गुणों से समन्वित हो तो निश्चय ही उसमें महानता का संचार होता है किन्तु केवल 'औदात्य' के बल पर ही कोई रचना काव्यात्मक या कलात्मक श्रेणी में नहीं आ जाती। सुकरात, बुद्ध, व्यास, दयानन्द, विवेकानन्द, अरविन्द, गाँधी आदि महान् चिन्तकों के विचार औदात्य के यथार्थ रूप को प्रस्तुत करते हैं फिर भी वे 'काव्य' को श्रणी में नहीं रखे जा सकते क्योंकि उदात्त केवल वस्तुगत गुण है, कलात्मक या काव्यात्मक अभिव्यंजना से ही वह कला या काव्य में परिणित हो सकता है। दूसरी ओर यदि अभिव्यंजना कलात्मक या काव्यात्मक हो तो बिना 'उदात्त' के भी कोई रचना कला-श्रणी में आ सकती है; बिहारी-देव की रचनाएँ इसकी प्रमाण है। अतः औदात्य स्वयं काव्यत्व का साधक तत्त्व नहीं है, वह अतिरिक्त बाह्य तत्त्व है। मूर्ति पीतल की बन सकती है, पर यदि सोने की बनायी जाय तो उसका मूल्य बढ़ जायगा-अवश्य ही यह मूल्य-वृद्धि मूर्ति के कलात्मक महत्त्व की अभिवृद्धि में कोई विशेष योग नहीं देगी; उसमें प्रयुक्त द्रव्य की उत्तमता की ही सूचक होगी; ठीक इसी प्रकार विषय-वस्तु उदात्त हो तो वह रचना के कलात्मक नहीं-वस्तुगत गुणों की अभिवृद्धि में अतिरिक्त योग देगा। इसलिए सैतायना ने स्पष्ट किया है कि कला में केवल उदात्त की नहीं-उदात्त की अनूभूति अपेक्षित है। अतः सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति के विभिन्न घटक या संयोजक तत्त्वों में उदात्त को भी स्थान दिया जा सकता है।
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अनेक पाश्चात्य आचार्यों ने-मुख्यतः होरेस, सिसरो, क्विन्टिलियन, दमित्रियस प्रभृति ने-औचित्य, अलंकार, गुण, रीति आदि सिद्धान्तों की भी स्थापना की, जो क्रमशः भारतीय औचित्य, अलंकार, गुण, रीति के अनुरूप हैं। इन्होंने भी इन तत्त्वों को काव्य में सौन्दर्य, आकर्षण, दीप्ति, शोभा आदि की उत्पत्ति के साधन रूप में ही स्वीकार किया है। दमित्रियस के शब्दों में -- 'Often the subject-matter is naturally unattractive and even repulsive, but a touch of brightness is added by the writer. (On style; Page 134) अर्थात् विषय-वस्तु तो स्वाभाविक रूप में ही आकर्षण-शून्य या विकर्षक भी हो सकती है, किन्तु लेखक द्वारा (अलंकारों के प्रयोग से) उसमें दीप्ति उत्पन्न की जाती है। इन सिद्धान्तों पर विस्तार से हम अपने 'साहित्य-विज्ञान' में विचार कर चुके हैं; यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि भारतीय तत्त्वों के अनुरूप इन तत्त्वों को भी काव्य-सौन्दर्य एवं सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति के साधनों के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। कल्पना, बिम्ब और प्रतीक-ये तीनों सिद्धान्त वस्तुतः एक प्रक्रिया के विभिन्न रूपों को सूचित करते हैं। वह प्रक्रिया है-कल्पना की। कल्पना द्वारा एक ओर विषय-वस्तु का विस्तार होता है तो दूसरी ओर शैली-पक्ष में बिम्बों एवं प्रतीकों की योजना होती है। अतः हम यहाँ तीनों पर समन्वित रूप में ही विचार कर सकते हैं। काव्य में कल्पना के महत्त्व की स्थापना आधुनिक युग में मुख्यतः स्वछन्दता वादी कवियों-वर्ड् सवर्थ, कालरिज, प्रभृति के द्वारा हुई। अनुकृति सिद्धान्त कवि की मौलिकता, स्वच्छन्दता एवं नूतनता के प्रतिकूल पड़ता है क्योंकि वह सारा महत्त्व प्रकृति या जगत् को देता हुआ कवि को उसका अनुकर्त्ता मात्र घोषित कर देता है- ऐसी स्थिति में कवि की मौलिक प्रतिभा एवं नूतन सर्जना के लिये कहाँ अवकाश रहता है ! इसी के विरुद्ध कल्पना की खोज एवं स्थापना हुयी। कॉलरिज ने अपने 'बायग्राफिया लिट्ररिया' में कल्पना की विस्तार से मीमांसा करने अनन्तर उसे काव्य की आत्मा घोषित करते हुए लिखा-"Finally, good sense is the body of poetic genius, Fancy its drapery, Motion its life and Imagination the soul that is every-where and in each, and forms all into one graceful and intelligent whole." (Biographia Literaria II, Page 13) अर्थात्-'अन्ततः विवेक' शक्ति काव्यात्मक प्रतिभा का शरीर है। अनुमान शक्ति उसकी पोशाक, आवेग उसका जीवन और कल्पना-शक्ति ही वह आत्मा है जो प्रत्येक (काव्य एवं कवि) में सर्वत्र होती है .... ।' कवि को इस कल्पना- शक्ति की ही अभिव्यक्ति काव्य में बिम्ब-योजना (Imagery) एवं प्रतीक-योजना (Symbol) के रूप में होती है।
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अवश्य ही काव्य के शैली पक्ष या अभिव्यंजना-शक्ति की दृष्टि से कल्पना का महत्त्व है, तथा बिम्ब और प्रतीक ही नहीं, पूर्वोक्त अलंकार, वक्ोक्ति एवं ध्वनि का भी आयोजन कल्पना-शक्ति के द्वारा ही होता है; इसे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डा० नगेन्द्र जैसे प्रमुख रसवादी विद्वान भी स्वीकार करते हैं। अतः कहना चाहिए कि कल्पना का सम्बन्ध किसी एक ही तत्त्व से नहीं, अपितु शैली-पक्ष या अभिव्यंजना- शक्ति के प्रायः सभी गुणों से है। पर विचारणीय यह है कि क्या केवल कल्पना के बल पर काव्य-सृष्टि या सौन्दर्य-सृष्टि सम्भव है ? क्या कल्पना को ही काव्य का एक मात्र शक्ति या तत्त्व घोषित किया जा सकता है ? इन प्रश्नों का उत्तर कल्पना को काव्यात्मा मानने वाले विद्वान् कवि कालरिज के शब्दों में ही प्राप्त किया जा सकता है। उन्होंने कल्पना एवं कल्पनाजन्य बिम्बों (Images) की काव्यगत महत्ता पर विचार करते हुए लिखा है-"Images become proofs of original genius only so far as they are modified by a predominant passion." (Biographia Literaria, Chapter 15) अर्थात् कल्पनात्मक बिम्ब उसी सीमा तक प्रतिभा (काव्य-प्रतिभा) को प्रमाणित करते हैं जहाँ तक वे किसी भावावेग से अनुप्राणित या परिष्कृत हो ? कॉलिज के ही विचारों का अनुमोदन अन्य स्वच्छन्दतावादी कवियों एवं आलोचकों द्वारा हुआ है तथा आज भी उनका उपयुक्त्त विचार मान्य है। सी० डी० लेविस ने अपनी पुस्तक 'The Poetic Image' (प्रथम प्रकाशन-काल १९४७) में कालरिज के ही विचार-को पल्लवित करते हुए विस्तार से स्पष्ट किया है कि कल्पना और बिम्ब-योजना के लिए उनका भावानुभूति से प्रेरित एवं अनुप्राणित होना अत्यावश्यक है। उनके शब्दों में-"Images, however, beautiful .... do not of themselves chara- cterize the poet. They become proofs of original genius only as far as they are modified by pre-dominant passion; or by associated thoughts or images awakened by that passion'. (The Poetic; Page 19) अर्थात् 'बिम्ब कितने ही सुन्दर क्यों न हो; वे अपने-आप में कवित्व (कवि) के परि- चायक नहीं है। वे उसी सीमा तक काव्य-प्रतिभा के प्रमाण हैं जहाँ तक वे प्रमुख भावावेश से परिष्कृत या अनुप्रमाणित हैं, या उस भावावेश के द्वारा उद्वलित प्रत्यय या बिम्ब से सम्बन्धित है। यहाँ 'उस भावावेश के द्वारा उद्व'लित' अंश स्वयं लेविस महोदय द्वारा जोड़ा हुआ अंश है; उनके विचार से यदि बिम्ब पूर्णतः भावा- वेग से अनुप्राणित या परिष्कृत न भी हो तो कम के कम भावावेश से प्रेरित अवश्य हो। अस्तु, हम यहाँ विस्तार में न पड़कर, इतना ही कहना पर्याप्त समभते हैं कि शुष्क या भावशून्य कल्पना से काव्य में सुन्दर बिम्बों या सौन्दर्यात्मक बिम्बों अथवा सौन्दर्य का उत्पादन या सर्जन सम्भव नहीं। दूसरे, कल्पना, बिम्ब आदि के
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विवेचन से यह भी स्पष्ट होता है कि अन्ततः इनका भी लक्ष्य भावावेग की प्रेरणा या सहायता से इन्हें भी सौन्दर्य के साधक तत्त्वों में स्थान दे दिया जाय तो अनुचित न होगा। पाश्चात्य सिद्धान्तों के विश्लेषण से उपलब्ध निष्कर्षों को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है- · 'अनुकृति' का काव्य में लक्ष्यार्थ अर्थात् 'अनुरूप-वर्णन' ग्रहण किया जाना चाहिए तथा इस दृष्टि से यह सिद्धान्त काव्य के वस्तुपक्ष की यर्थाथता एवं स्वाभा- विकता पर प्रकाश डालता है, किन्तु केवल यथार्थता या स्वाभाविकता के कारण ही व्यावहारिक जगत् के कुरूप एवं वीभत्स दृश्य सुन्दरता में परिणत नहीं हो सकते। इस समस्या का समाधान अरस्तू भी नहीं कर पाते। हमारी प्रत्येक अनुकृति कला या काव्य नहीं, अपितु अनुकृत रूप की सौन्दर्य में परिणति ही काव्य है। अतः अनुकृति काव्य-सौन्दर्य का एक गौण साधन मात्र है। · उदात्त एक बौद्धिक तत्त्व है जो काव्य एवं कला के वस्तु-पक्ष का अतिरिक्त किन्तु महत्त्व-वद्ध क तत्त्व है। पर काव्यत्व के लिए उसकी भी सौन्दर्य में परिणति आवश्यक है। इसके लिए उदात्त की भावानुभूति अपेक्षित है। • पाश्चात्य आचार्यों द्वारा प्रतिपादित औचित्य, अलंकार, गुण-रीति आदि भारतीय औचित्य, अलंकारादि के अनुरूप हैं, अतः इन्हें भी काव्य-सौन्दर्य के साधन रूप में स्वीकार किया जा सकता है। · कल्पना, बिम्ब, प्रतीक-मूलतः कल्पना-शक्ति की ही विभिन्न प्रत्रियाओं के सूचक हैं। यद्यपि कालरिज ने कल्पना को काव्य की आत्मा माना है किन्तु साथ ही यह भी स्वीकार किया है कि कल्पना, बिम्ब आदि भावात्मकता से अनु- प्राणित या भाव-प्रेरित होने पर ही काव्य में सौन्दर्य की व्यंजना कर पाते हैं। अब पूर्वोक्त भारतीय मतों के निष्कर्ष के साथ इन निष्कर्षों को समन्वित करते हुए उनका रस या सौन्दर्यानुभूति से इस प्रकार सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है-(१) पूर्वोंक्त सभी भारतीय एवं पाश्चात्य तत्त्व किसी न किसी प्रकार काव्यगत सौन्दर्य के साधक, पोषक या संरक्षक हैं। (२) किसी भी साधन से उत्पन्न काव्यगत (कलागत) सौन्दर्य की अनुभूति अन्ततः आहलादक होती है जिसे 'सौन्दर्यां- नुभूति' या रसानुभूति कहा जा सकता है; इस प्रकार सभी तत्त्व काव्य-सौन्दर्य के साधन-रूप में सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति से भी सम्बन्धित हैं। स्पष्टता के लिए सभी भारतीय एवं पाश्चात्य तत्त्वों को तीन वर्गों में भी विभक्त किया जा सकता है-(१) बौद्धिक तत्त्व (२) भावात्मक तत्त्व और (३) कल्पनात्मक तत्त्व। इन तीनों को भी दो वर्गों में रखा जा सकता है- (१) वस्तु-पक्ष से सम्बन्धित और (१) शैली या अभिव्यक्ति पक्ष से सम्बन्धित।
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३२२ रस-सिद्धान्त पुनर्विवेचन
पूर्वोक्त तत्त्वों में से बौद्धिक तत्त्वों में औचित्य, अनुकृति एवं औदात्य, भावात्मक तत्त्वों में स्थायीभाव एवं उसके विभिन्न अवयव-विभाव, अनुभाव, संचारी आदि (इनकी व्याख्या इस अध्याय में नहीं की गयी, किन्तु अन्यत्र पहले की जा चुकी है-) एवं कल्पनात्मक तत्त्वों में-अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, बिम्ब, प्रतीक आदि आते हैं। इन सब तत्त्वों का पारस्परिक सम्बन्ध यहाँ तालिका के माध्यम से स्पष्ट किया जाता है। तालिका : विभिन्न तत्त्वों का रसानुभूति या सौन्दर्यांनुभूति से सम्बन्ध
काव्य के साधक तत्त्व पाठक की काव्यगत साध्य तत्त्व उपलब्धि
वस्तुगत तत्त्व शैलीगत तत्त्व
. (क) बौद्धिक तत्त्व सौन्दर्य- सौन्दर्यानुभूति (१) औचित्य (शोभा, चारुता, (रसानुभूति) (२) अनुकृति (ग) कल्पनात्मक तत्त्व दीप्ति, रुचिरता, (३) औदात्य (१) अलंकार आदि) (ख) भावात्मक तत्त्व (२) गुण (१) स्थायीभाव (३) वकोति (२) विभाव (४) ध्वनि (३) अनुभाव (५) बिम्ब (४) संचारी भाव (६) प्रतीक
अस्तु, उपयुक्त तालिका को भी सूत्र-रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-बौद्धिक तत्त्व+भावात्मक तत्त्व-कल्पनात्मक तत्त्व=सौन्दर्य- सौन्दर्यानुभूति। इन तत्त्वों का सौन्दर्याभूति या रस से किस प्रकार सम्बन्ध स्थापित होता है तथा विभिन्न तत्त्वों के अनुसार सौन्दानुभूति के स्वरूप में क्या परिवर्तन होता है-इन सब प्रश्नों पर आगे विचार किया जायगा, यहाँ तो इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि विभिन्न तत्त्व जिस सीमा तक काव्य-सौन्दर्य के उत्पादन, पोषण एवं संरक्षण में सहायक सिद्ध होते हैं, उसी सीमा तक वे रसानुभूति से भी सम्बन्धित हैं-यह दूसरी बात है कि उनके पारस्परिक सम्बन्ध का उद्घाटन पूर्ववर्ती रसवादी आचार्यों द्वारा सम्यक् रूप में न हो पाया हो। साथ ही स्वयं सौन्दर्य या काव्यात्मक सौन्दर्य का स्वरूप क्या है-इसका भी स्पष्टीकरण अपेक्षित है। इन अपेक्षाओं की पूर्ति का प्रयास हम अगले अध्यायों में करेंगे, अतः यहाँ इतना ही पर्याप्त होगा।
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३ रस : समन्वयात्मक दृष्टि से
विभिन्न भारतीय एवं पाश्चात्य काव्य-सिद्धान्तों के संदर्भ में रस पर विचार करते हुए पिछले अध्याय में इस निष्कर्ष की उपलब्धि की गयी थी कि व्यापक रूप में रस काव्यगत या कलागत सौन्दर्य की अनुभूति हैं तथा काव्यगत सौन्दर्य का सर्जन, उत्पादन, निर्माण या प्रकाशन विभिन्न वस्तुगत एवं शैलीगत तत्त्वों के सहयोग से होता है। यद्यपि विभिन्न सिद्धान्तों में अलंकार, रीति, वक्रोक्ति, ध्वनि, बिम्ब, प्रतीक, औचित्य, आदि विभिन्न तत्त्वों को काव्य के आधारभूत तत्त्व के रूप में स्थापित किया गया है जो एकांगिता एवं अतिवादिता से युक्त है, किन्तु सत्य यह है कि ये सभी तत्त्व किसी न किसी किसी रूप में काव्य सौन्दर्य के घटक या साधक हैं-यह दूसरी बात है कि किसी का महत्त्व न्यून एवं किसी का अधिक है। अस्तु, सभी तत्त्वों का काव्यगत सौन्दर्य से तथा सौन्दर्यानुभूति या रस से न्यूनाधिक सम्बन्ध अवश्य है : इस स्थापना से रस-सिद्धान्त को एक व्यापक संदर्भ प्राप्त हो जाता है तथा वह सभी तत्त्वों व सिद्धान्तों से सम्बन्धित हो जाता है, किन्तु यहाँ एक नयी समस्या उपस्थित हो जाती है, वह यह कि स्वयं 'सौन्दर्य का स्वरूप एवं लक्षण क्या है-इसका निर्धारण कैसे किया जाय। सौन्दर्य शास्त्र में विभिन्न कलाओं की दृष्टि से सौन्दर्य की व्याख्या का प्रयास विभिन्न शताब्दियों में शताधिक विद्वान कर चुके है-किन्तु अभी तक वे किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाये हैं; ऐसी स्थिति में काव्यगत सौन्दर्य की व्याख्या करना सरल कार्य प्रतीत नहीं होता। फिर भी जब तक स्वयं 'सौन्दर्य' का अर्थ स्पष्ट न करलें तब तक सौन्दर्याुभूति या रस के सम्बन्ध में भी कुछ नहीं सोचा जा सकता है; अतः हमें भी इस समस्या का सामाना करना ही होगा।
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३२४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
• सौन्दर्य का सामान्य लक्षण- यदि हम सौन्दर्य की परम्परागत परिभाषाओं एवं व्याख्याओं से बचकर व्याव- हारिक दृष्टि से सौन्दर्य का विश्लेषण करें तो ज्ञात होगा कि इसका सम्बन्ध वस्तुओं के उन प्रतीत्यात्मक गुणों से है, जिन्हें देखकर हमें आकर्षण की अनुभूति होती है। सामान्यतः सभी इन्द्रियों की यह प्रकृति है कि बाह्य पदार्थों, वस्तुओं, दृश्यों, व्यक्तियों आदि के संपर्क से वे विशिष्ट प्रकार का प्रभाव या बोध ग्रहण करती है; यह बोध भी मुख्यतः दो प्रकार का होता है-एक अनुकूल और दूसरा-प्रतिकूल। जिन पदार्थों से इन्द्रियों को अनुकूल प्रभाव या बोध प्राप्त होता है, उनके प्रति वे आकर्षण तथा प्रतिकूल प्रभाव या बोध प्रदान करने वाले पदार्थों के प्रति विकर्षण अनुभव करती हैं। प्रत्येक इन्द्रिय के प्रभाव को इस दृष्टि से दो वर्ग में विभाजित किया जाता है, यथा-श्रवरोन्द्रिय से मधुर और कर्कश, स्वादेन्द्रिय से मधुर एवं कटु, स्पर्शेन्द्रिय से कोमल और कठोर, घाशेन्द्रिय से सुगन्ध एवं दुर्गन्ध तथा चक्षुरिन्द्रिय से सुन्दर एवं असुन्दर का बोध प्राप्त होता है। इस दृष्टि से 'सौन्दर्य' वस्तुओं के उस गुण का सूचक है जो हमारी चक्षुरिन्द्रिय को अनुकूल या आकर्षक प्रभाव या बोध प्रदान करे-सौन्दर्य की यह सामान्य परिभाषा मानी जा सकती है। उपयुक्त्त दृष्टि से 'सौन्दर्य' वस्तुओं के उस गुण या प्रभाव का ही द्योतक है जो हमारी चक्षुरिन्द्रिय को प्रभावित या आकर्षित करें, किन्तु हम कई बार ऐसे गुणों के लिए भी 'सौन्दर्य' शब्द का प्रयोग करते हैं जिनका सम्बन्ध हमारी चक्षुरिन्द्रिय से न होकर अन्य इन्द्रियों से होता है; यथा-जब हम कहते हैं-'तुम बहुत सुन्दर गाती हो' या 'तुम्हारे विचार बहुत सुन्दर है'-तो निश्चय ही यहाँ 'सुन्दर' का सम्बन्ध चक्षुरिन्द्रिय से नहीं होता। गीत की सुन्दरता का बोघ श्रवणेन्द्रिय के माध्यम से होता है तथा विचाररो की सुन्दरता का निर्णय बुद्धि करती है-किन्तु फिर भी यहाँ 'सुन्दर' शब्द का प्रयोग किया गया है, जो वस्तुतः लाक्षणिक प्रयोग है। हम केवल 'सुन्दर' या 'सौन्दर्य' का ही नहीं अन्य इन्द्रियों से सम्बन्धित गुणों के वाचक शब्दों का प्रयोग लाक्षणिक अर्थ में करते हैं; जैसे-'आपका व्यवहार बड़ा मधुर एवं कोमल है; यहाँ 'मधुर' एवं 'कोमल' का प्रयोग भी लाक्षणिक अर्थ में हुआ है। अस्तु, सौन्दर्य, मधुर, कोमल आदि शब्दों का प्रायः दोहरा प्रयोग होता रहता है; एक वाच्यार्थ या अभिधात्मक अर्थ में और दूसरा लक्ष्यार्थ में। यहाँ इसका भी निषेध नहीं किया जा सकता कि अन्य अर्थों- व्यंग्यार्थ, प्रतीकार्थ आदि में भी इनका प्रयोग प्रसंगानुसार एवं भाषा (अभिव्यक्ति) की आवश्यकतानुसार होता रहता है। अब यहाँ यह विचारणीय है कि काव्य के संदर्भ में हम 'सौन्दर्य' का प्रयोग किस अर्थ में करते हैं-वाच्यार्थ में या लक्ष्यार्थ में अथवा किसी अन्य प्रकार के अर्थ में? हमारे विचार से सामान्यतः काव्य का आस्वाद सुनकर ही लिया
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जाता है, यह दूसरी बात है कि कई बार हम पुस्तक के माध्यम से उसे पढ़ते या देखते भी हैं; ऐसी स्थिति में-विशेषतः जब कि हम काव्य को सुन रहे हैं, उसे 'सुन्दर' बताना लाक्षणिक प्रयोग का ही सूचक होगा। वैसे भी काव्य में जिन व्यक्तियों घटनाओं, दृश्यों एवं कार्य-व्यापारों का वर्णन या चित्रण होता है, वे हमारी प्रत्यक्ष या चाक्षुष अनुभूति के विषय नहीं बनते; हम पहले शब्दों को सुनकर या पढ़कर उनका अर्थ-बोध प्राप्त करते हैं, तथा यह अर्थ-बोध बुद्धि की प्रतिक्रिया है-इसके अनन्तर अर्थ-बोध भी भावना के स्तर पर पहुँचता है जो भावना या संवेदन की प्रक्रिया है। अस्तु, भले ही हम चक्षुओं के माध्यम से पुस्तक का अध्ययन करें किन्तु अन्ततः वह बोध चाक्षुष अनुभूति तक ही सीमित नहीं रहेगा, अपितु बुद्धि एवं भावना के स्तर पर पहुँचेगा तथा जब हम काव्य को सुन्दर बताते हैं तो उसका भी सम्बन्ध इनमें से किसी एक प्रक्रिया से नहीं रहेगा-उन सबके समन्वित प्रभाव का ही वह सूचक होगा। अतः यहाँ निश्चय ही 'सौन्दर्य' का प्रयोग लाक्षणिक अर्थ में किया जाता है; इसीलिए हम काव्य के संदर्भ में 'सौन्दर्य' के स्थान पर 'माधुय' 'कोमल' (यथा-'कोमल कान्त पदावली' में) का भी प्रयोग कर सकते हैं क्योंकि 'माधुय' एवं 'कोमल भी यहाँ लाक्षणिक अर्थ में ही प्रयुक्त होंगे। वास्तव में परम्परागत भारतीय काव्य-चिन्तन के क्षेत्र में 'माधुय' शब्द का भी प्रयोग बहु-प्रचलित रहा है। अस्तु, यहाँ 'सौन्दर्य', 'माधुय' आदि शब्दों का लाक्षणिक अर्थ एक ही है। प्रश्न है, काव्य संदर्भ में 'सौन्दर्य' या 'माधुर्य' का लाक्षणिक अर्थ क्या है ? इसके लिए पहले हमें इनके वाच्यार्थ को स्पष्ट करना होगा। जसा कि पहले स्पष्ट किया जा चुका है, वाच्यार्थ के रूप में हम कह सकते हैं-'वस्तु का जो गुण चक्षुरिन्द्रिय को आकर्षित करे वह सौन्दर्य है तथा जो स्वादेन्द्रिय को आकर्षित करे (=अनुकूल प्रभाव प्रदान करे) वह 'माधुर्य' है। इनके लाक्षणिक अर्थ में हम इन दोनों अर्थों का समीकरण इस प्रकार कर सकते हैं- • सौन्दर्य=जो चक्षुरिन्द्रिय को आकर्षित करे। (वाच्यार्थ) ·माधुर्य=जो स्वादेन्द्रिय को आकर्षित करे। (वाच्यार्थ) · सौन्दर्य/माधुर्य=जो ........ आकर्षित करे। (लक्ष्यार्थ)
अस्तु, संक्षेप में काव्य-संदर्भ में 'सौन्दर्य' का लक्ष्यार्थ है-'वह गुण या शक्ति जो आकर्षित करे। इसे और संक्षेप में कहें तो 'आकर्षण-शक्ति' ही 'सौन्दर्य' है। वस्तुतः 'आकर्षण' शब्द ही एक ऐसा शब्द है, जिसका प्रयोग न केवल सभी इन्द्रियों के सम्बन्ध में अपितु बुद्धि, मन और चेतना के भी विभिन्न संदर्भों में अनकूल प्रभाव के लिए इसका प्रयोग अभिधात्मक रूप में ही किया जा सकता है जबकि सौन्दर्य, का प्रयोग चक्षुरिन्द्रिय के अतिरिक्त अन्य सभी प्रसंगों में लक्ष्यार्थ में ही होता है। शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक विवेचन में लक्ष्यार्थ शब्दों का प्रयोग भ्रामक एवं दोषपूर्ण सिद्ध होता है; यथा-
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'मनोविज्ञान' में यदि कोई बुद्धि की अल्पता को सूचित करने के लिये 'गदभ' विशेषण का प्रयोग करदे तो इससे अनर्थ हो सकता है। अतः निश्चय ही 'सौन्दर्य' के स्थान पर 'आकर्षण' का प्रयोग न केवल काव्य में अपितु अन्य कलाओं के संदर्भ में भी निर्दोष एवं संगत सिद्ध होगा। हमारे विचार में 'सौन्दर्य-शास्त्र' के क्षेत्र में शताब्दियों के बाद भी सौन्दर्य की व्याख्या स्पष्ट न हो पाने का एक बड़ा कारण यह भी है कि विभिन्न विचारकों ने कलागत सौन्दर्य को लक्ष्यार्थ के स्थान पर वाच्यार्थ में ग्रहण कर लिया, अतः वे अपने लक्ष्य से दूर चले गये या भटक गये। • सौन्दर्यानुभूति या रस की व्याख्या- जब हम 'सौन्दर्य' को 'आकर्षण' मानते है तो 'सौन्दर्यानुभूति' को 'आकर्षण की अनुभूति' मानने में कोई बाधा नहीं है। कला एवं काव्य में विषय-वस्तु को आकर्षण-युक्त या आकर्षक रूप या माध्यम में प्रस्तुत किया जाता है; वस्तुगत तत्त्व चाहे स्वयं आकर्षक हों या न हो, शैलीगत तत्त्वों के द्वारा उनमें आकर्षण उत्पन्न किया जाता है। इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए ग्रीक आचार्य दमित्रियस ने बहुत पहले अपने ग्रन्थ 'On style' में लिखा था-"Often the subject-matter is naturally unattractive and even repulsive, but a touch of brightness is added by the writer" (Para, 134) अर्थात् विषय-वस्तु तो प्रायः स्वभाविक रूप में ही आकर्षण-शून्य या विकर्षक होती है किन्तु लेखक अपनी (प्रतिभा के) स्पर्श से उसमें दीप्ति (=आकर्षण) उत्पन्न करता है।' इसी प्रकार होरेस ने भी लिखा-'कविताओं का सुन्दर होना ही पर्याप्त नहीं, वे आकर्षक भी होनी चाहिए-उनमें ऐसी शक्ति होनी चाहिए कि श्रोता के मन को जिधर चाहे खींचलें।' दूसरी ओर भामह ने भी स्वीकार किया कि 'शब्द-रचना की चतुराई जितनी चित्ताकर्षक होती है, उतनी अन्य नहीं।' वस्तुतः इसमें कोई संदेह नहीं कि विभिन्न आचार्यों ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप में काव्य में आकर्षण की सत्ता को स्वीकार करते हुए अलंकार आदि का लक्ष्य आकर्षण उत्पन्न करना ही माना है तथा शोभा, रुचिरता, रमीयणता चारुता, सुन्दरता आदि का समन्वय भी 'आकर्षण' में हो जाता है। रूपवादी या शैली को प्रमुखता देने वाले आचार्य तो 'आकर्षण' को सहज ही स्वीकार कर लेंगे, क्योंकि उन्होंने अन्ततः रूपगत आकर्षण के ही विभिन्न साधनों की व्याख्या की है, किन्तु वस्तुवादी आचार्यो को इसमें थोड़ी कठिनाई प्रतीत हो सकती है क्योंकि उन्हें इससे विचार तत्त्व या भाव तत्त्व की उपेक्षा हो जाने की आशंका हो सकती है। इस सम्बन्ध में हमारा निवेदन यह है कि जहाँ तक विचार तत्त्व या बौद्धिक तत्त्वों-औचित्य, अनुकृति, औदात्य आदि-की बात है, यह पीछे स्पष्ट किया जा चुका है कि कोई भी विचार चाहे वह कितना संगत (=औचित्यपूर्ण), यथार्थ (=अनुकृति मूलक) एवं उच्च (=औदात्य से युक्त) क्यों न हो, जब तक उसे आकर्षक