Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २६५

कठिन है कि किस उद्दीपक से सदा किस भाब की उद्दीप्ति होगी क्योंकि अन्ततः यह उद्दीप्त होने वाले व्यक्ति पर निर्भर है कि वह किसी वस्तु या स्थिति को किस रूप में ग्रहण करता है।२२ यदि हम मैक्डूगल एवं वुडवर्थ के विचारों पर तुलनात्मक दृष्टि से सोचें तो यह स्पष्ट होगा कि मैक्डूगल ने जहाँ उद्दीपन के रूप में 'आलम्बन' या वस्तु (Object) पर अधिक बल दिया है, वहाँ वुडवर्थ ने वस्तु की अपेक्षा बाह्य परिस्थिति को अधिक महत्त्व दिया है वस्तुतः मनोवैज्ञानिक दृष्टि से आलम्बन की अपेक्षा परिस्थिति का ही अधिक महत्त्व सिद्ध होता है-क्योंकि स्वयं आलम्बन से हम उसी स्थिति में प्रभावित होंगे जबकि परिस्थितियाँ इसके अनुकूल हो। दूसरे, स्वयं आलम्बन भी परि- स्थिति के ही विभिन्न घटक तत्त्वों में से एक है; अतः हमारे विचार में वुडवर्थ का दृष्टिकोण अधिक विकसित कहा जा सकता है। डा० जदुनाथ सिन्हा ने उपयुक्त तथ्य पर सूक्ष्मता से विचार करते हुए प्रतिपादित किया है कि कोई भी अकेली वस्तु (आलम्बन) भाव को उद्दीप्त नहीं कर सकती, अपितु व्यक्ति से सम्बन्धित परिस्थिति ही ऐसा कर सकती है। उदाहरणार्थ, एक मुक्त शेर का दर्शन जो व्यक्ति के जीवन के लिए खतरा उपस्थित करता है, भय उत्पन्न करता है। किन्तु जब वही शेर लोहे के पिंजरे में बन्द रहता है तो भय उत्पन्न नहीं होता।२१ इससे स्पष्ट है कि भय का मूल कारण केवल आलम्बन नहीं, अपितु परिस्थिति का संयोग है। 'परिस्थिति' से यहाँ क्या आशय-इसे स्पष्ट करते हुए उन्होंने लिखा है- 'परिस्थिति व्यक्ति को प्रभावित करने वाली स्थितियों का जटिल समूह है।२४ डा० सिन्हा ने यह भी प्रतिपादित किया है कि भावोद्दीप्ति के लिए परिस्थिति का भौतिक रूप में प्रस्तुत होना या उसका प्रत्यक्षीकरण होना आवश्यक नहीं है अपितु उसकी स्मृति, कल्पना या चिन्तना भी भाव को उद्दीप्त कर सकती है। वस्तुतः किसी भी ऐसी स्थिति का बोध जो व्यक्ति की रुचियों या उसके हितों को प्रभावित करती हो -भाव को जागृत कर सकता है।१4 परिस्थिति के भावोद्दीपक रूप को कुछ मनोवैज्ञानिकों ने 'मनोवैज्ञानिक परि- स्थिति' भी कहा है। रामबाबू गुप्त ने इसके सम्बन्ध में लिखा है -- 'सबसे पहले व्यक्ति में संवेग की उत्पत्ति के लिए मनोवैज्ञानिक परिस्थिति का उपस्थित होना आवश्यक है। 'मनोवैज्ञानिक परिस्थिति' का तात्पर्य ऐसी उत्तेजना के उपस्थित होने से है जिसके प्रति व्यक्ति प्रक्रिया करने लगता है।२ डा० एर० एस० माथुर के अनुसार भाव या संवेग की उत्पत्ति सदा मनोवैज्ञानिक कारणों से ही होती है-मादक पदार्थों से संभव

  1. the same : Page 366 २३. २४, २५, 'मनोविज्ञान : डा० जदुनाथ सिन्हा, चतुर्थ संस्करण पृ० सं० २४८ २६. सामान्य मनोविज्ञान' (ले० रामबाबू गुप्त) द्वितीय; संस्करण पृ० सं० ४०२

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२६६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

नहीं।१ इन मनोवैज्ञानिक कारणों को ही कुछ अन्य विद्वानों ने मनोवैज्ञानिक परि- स्थिति' (Psychological situation) का नाम दिया है।१८ मनोवैज्ञानिक परिस्थिति से यह भी सूचित होता है कि उद्दीपक स्थिति आन्तरिक या मानसिक भी हो सकती है; अर्थात् उसका बाह्य रूप में प्रस्तुत होना आवश्यक नहीं है। वुडवर्थ महोदय ने 'परिस्थिति' के साथ प्रायः 'बाह्य' विशेषण का प्रयोग किया जिसे यह भ्रान्ति संभव है कि भावोद्दीपन के लिए बाह्य स्थितियों का होना आवश्यक है जबकि स्मृति, कल्पना एवं विचार के रूप में मन के भीतर उदित होने वाली परिस्थितियाँ भी व्यक्ति के भावों को उद्वलित कर सकती है। इसी तथ्य पर विशेष बल देते हुए डॉ० माथुर ने स्पष्ट किया है कि संवेग को उत्पन्न करने के लिए बाह्य उदीपक या आन्तरिक उद्दीपक (व्यक्ति की मनोदशा) का होना आवश्यक है। परिस्थितियाँ व्यक्ति को किस प्रकार उद्दीप्त करती हैं-इसका स्पष्टीकरण करते हुए बताया गया है। परिस्थितियों के बोध से व्यक्ति की सहज प्रवृत्तियाँ (वासनाएँ) उद्वलित होकर सक्रिय हो जाती हैं तथा उसी उद्वलन का अनुभव (या व्यक्स रूप) भाव या संवेग के रूप में होता है।२९ कई बार व्यक्ति अपने मनोबल, अभ्यास या किसी अन्य शक्ति से अपनी वासनाओं एवं प्रवृत्तियों पर इतना नियंत्रण कर लेता है कि वे परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होती-ऐसी स्थिति में संभव है कि वह व्यक्ति परिस्थितियों के अनुरूप भावोद्दीपन से मुक्त रहे। अः कोई भी परि- स्थिति भाव को उद्वलित करने में कहाँ तक सफल सिद्ध होती है-यह सम्बन्धित व्यक्ति की निजी क्षमताओं, शक्तिओं एवं मनः स्थितियों पर निर्भर है। उदाहरण के लिए एक चिड़चिड़े स्वभाव का व्यक्ति जिस बात पर वुरी तरह कुपित हो सकता है; उसी को अन्य व्यक्ति केवल हँसकर, मुस्कराकर या उपेक्षा से देखकर टाल सकता है अतः भावोद्दीपक के रूप में आलम्बन एवं परिस्थिति के महत्त्व को निर्धारित करते समय हमें उनकी एक सीमा को भी ध्यान रखना चाहिए; अर्थात् परिष्कृत रुचियों नियंत्रित प्रवृत्तियों एवं संयमित चरित्र वाला व्यक्ति अन्य व्यक्तियों की तुलना में परिस्थितियों से कम प्रभावित होता है; अतः उसके भावोद्दीप्त होने की भी संभावना अपेक्षाकृत कम रहती है। अस्तु, विभिन्न मनोविज्ञान-विशारदों द्वारा की गयी विभाव-पक्ष (Stimulus) की विवेचना से उपलब्ध निष्कर्षों को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है :

२७. सामान्य मनोविज्ञान (ले० डॉ० एस० एस० माथुर); चतुर्थ संस्करण; पृष्ठ संख्या १६३ 28. 'Emotions in man and animal' P. T. young; Page 44 २९. 'मनोविज्ञान'; डॉ० जदुनाथ सिन्हा; पृ० सं० २४८

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विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २६७

• मनोवैज्ञानिकों ने भाव या संवेग की उत्पत्ति के लिए किसी न किसी उद्दीपक (Stimulus) का होना आवश्यक माना है जिसे रस-शास्त्रीय शब्दावली में 'विभाव' कहा जा सकता है। • इस उद्दीपक या विभाव की भी मनोवैज्ञानिकों ने मुख्यतः दो रूपों- आलम्बन (object) एवं परिस्थिति (Situation)-में चर्चा की है। परिस्थिति के भी दो उपभेद किये जा सकते हैं-बाह्य एवं आन्तरिक। • भावों का विभाव से इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है कि उनके विवरण के बिना भावों का निरूपण या विभिन्न भावों को एक दूसरे से पृथक करना कठिन है। · विभिन्न परिस्थितियों के साथ प्रयुक्त विशेषण भी भावात्मक प्रत्रिया के सूचक हैं; यथा-'भयानक' 'विचित्र', हास्यास्पद आदि। • भावों की उद्दीप्ति सदा विभाव से ही होती है किन्तु सभी व्यक्तियों या भावों के लिये सामान्य विभाव निर्धारित नहीं किये जा सकते। · भावोद्दीप्ति में वस्तु या आलम्बन की अपेक्षा परिस्थिति का योग अधिक रहता है। • परिस्थिति से अभिप्राय किसी भी ऐसी भौतिक, या मानसिक स्थिति से है जो प्रत्यक्ष, कल्पना, स्मृति, विचार आदि के रूप में व्यक्ति को प्रभावित या या उद्दीप्त कर सके। · परिस्थितियाँ व्यक्ति की वासनाओं या सहज प्रवृत्तियों को प्रभावित करके उन्हें उद्व लित या सक्रिय कर देती हैं, उसीका व्यक्त एवं उद्व लित रूप भावानु- भूति है। · यह आवश्यक नहीं है कि प्रत्येक विभाव सभी व्यक्तियों को समान रूप में प्रभावित करे। • तुलनात्मक दृष्टि से विभाव का विवेचन रस-सैद्धान्तिक एवं मनोवैज्ञानिक-दोनों दृष्टियों से किये गये विभाव के अध्ययन से उपलब्ध निष्कर्षों के आधार पर अब तुलनात्मक दृष्टि से विभाव का विवेचन किया जा सकता है। जहाँ तक विभाव को भाव की उद्दीप्ति का कारण मानने की बात है-रस-सिद्धान्त एवं मनोविज्ञान, दोनों ही एक मत हैं किन्तु हमारे विचार में भाव विभावों से उत्पन्न नहीं होते, अपितु उद्वलित या उद्दीप्त ही होते हैं। भाव का बीज व्यक्ति के मन में किसी न किसी स्थायी वृत्ति के रूप में सदा विद्यमान रहता है; इसी स्थायी वृत्ति को रूप-भेद से वासना, सहज प्रवृत्ति, भावना या स्थायी भाव कहा जाता है। इसीलिए अभिनव गुप्त ने काव्य के माध्यम से भावों की उत्पत्ति न मान कर उनकी अभिव्यक्ति ही मानी है वस्तुतः यह बात काव्येतर भावों पर भी लागू होती है। व्यावहारिक जीवन में भी हमारे भाव

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२६८ रस-सिद्धान्त का पुरनवविवेचन

उत्पन्न नहीं होते, अपितु उत्तेजित या उद्वलित ही होते हैं। मनौवैज्ञानिकों ने भी परिस्थिति के प्रभाव से सहज प्रवृत्ति के उद्वलन को या व्यक्ति की उद्वलित मनो- दशा को भाव की संज्ञा दी है, जो इस बात का प्रमाण है कि भाव किसी न किसी रूप में पहले से विद्यमान होते हैं-अन्यथा उनका उद्वलन कैसे संभव है ? वस्तुतः मनौवैज्ञानिकों ने मानव-मन की एक ही भावात्मक प्रवृत्ति को स्थिति-भेद से अनेक रूप-भेदों में विभक्त कर दिया है; यथा, उसके जन्मजात रूप को 'सहज प्रवृत्ति का ; आलम्बन-विशेष के संपर्क से बिकसित रूप को भावना (Sentiment) का; तथा अपेक्षाकृत अस्थायी रूपों को 'मनोदशा' (Mood) 'संवेग', 'भाव' आदि का नाम दे दिया है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से उचित होते हुए भी व्यावहारिक दृष्टि से भ्रामक सिद्ध हो सकता है। जैसा कि अन्यत्र कहा जा चुका है, रस सिद्धान्त के आचार्यों ने भावात्मक प्रवृत्ति के विभिन्न स्थायी रूपों को एक ही नाम-स्थायी भाव-दिया है; जिसकी अभिव्यक्ति विभिन्न संचरणशील भावों एवं संवेगों के रूप में होती है। अस्तु, हम रस-संद्धान्तिक र दृष्टिकोण का अनुमोदन करते हुए कह सकते हैं कि भाव एवं संवेग विभावों से मौलिक रूप में उत्पन्न नहीं होते, अपितु वे विभिन्न स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों के ही जाग्रत, उद्वलित या पुष्ट रूप को व्यक्त करते हैं अर्थात् विभाव हमारी स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों को प्रभावित, जाग्रत एवं उद्वलित करते हैं-इस जाग्रत एवं उद्वलित रूप को ही भावों का उत्पन्न होना कहा जाता है जो कि दोषपूर्ण प्रयोग है। जिस प्रकार समुद्र के उद्वलित रूप की ही सूचक लहरों को समुद्र से पृथक नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार भावों को भी स्थायी भाव से पृथक करना संभव नहीं। अस्तु, हमारे विचार से विभावों को स्थायी भावों के उद्वलन का ही कारण मानना चाहिए-यह दूसरी बात है कि प्रयोग-सुविधा के लिए हम उनसे भावों की उत्पत्ति की बात भी कहते रहें। जिस प्रकार रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने विभाव के दो भेद-आलम्बन और उद्दीपन-किये हैं; लगभग उसी प्रकार मनौवैज्ञानिकों ने भी विभाव पक्ष (stimulus) के अन्तर्गत वस्तु (object) एवं परिस्थिति (situation) का उल्लेख किया है। यहाँ यह विचारणीय है किक्या हम इन दोनों को क्रमशः 'आलम्बन' और 'उद्दीपन' का पर्याय मान लें ? यहाँ उल्लेखनीय है कि शब्दकोष के अनुसार अंग्रेजी के 'आब्जैक्ट' (object) शब्द का एक अर्थ 'विषय' भी है तो दूसरी ओर रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने आलम्बन की परिभाषा करते हुए उसे भाव का विषय ही माना है, किन्तु मनोविज्ञान के हिन्दी लेखकों ने 'आब्जैक्ट' के लिए वस्तु शब्द का प्रयोग करके उसके अर्थ-क्षेत्र को इतना सीमित कर दिया है कि उससे सहसा व्यक्ति का बोध नहीं होता। दूसरी ओर रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने भाव के 'आलम्बन' के रूप में प्रायः व्यक्ति की ही चर्चा की है, जिससे इसका अर्थ-क्षेत्र व्यक्ति तक ही सीमित रह गया है। शारदा तनय ने 'भाव-प्रकाश' में विभिन्न रसों के आलम्बन-भेदों का

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विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २६९

जो निरूपण किया है, उससे भी यही धारणा पुष्ट होती है कि रस का (या स्थायी भाव) आलम्बन या विषय कोई वस्तु या पदार्थ न होकर व्यक्ति ही हो सकता है। हमारे विचार में यह अत्यन्त संकीर्ण एवं रूढिबद्ध धारणा हैं-कदाचित श्रृंगार-रस की ही दृष्टि से इसका पोषण हुआ है क्यों कि उसमें आलम्बन के रूप में व्यक्ति-विशेष का होना आवश्यक है, किन्तु यह बात अन्य स्थायी भावों एवं रसों पर लागू नहीं होती। एक देश-भक्त साहसी एवं आत्म-त्यागी युवक जिसका लक्ष्य भारत माँ को स्वतंत्र करवाने का रहा हो, किसी व्यक्ति-विशेष को आलम्बन के रूप में स्वीकार नहीं करेगा; इसी प्रकार हिमालय की चोटी तक पहुँचने का लक्ष्य रखने वाले वीर तेनजिंग की गाथा में उसकी भावना का विषय किसी व्यक्ति-विशेष को ही बनाया जाय, यह आवश्यक नहीं है। कदाचित यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि जब तक साहित्य में आलम्बन के रूप में व्यक्ति-विशेष को सामने न लाया जायगा तब तक काव्य-वस्तु का साधारणीकरण एवं रसास्वादन संभव नहीं; आचार्य रामचन्द्र शुक्ल इस प्रकार का तर्क दे भी चुके हैं-किन्तु इसके सम्बन्ध में हमारा निवेदन यह है कि उपयुक्क धारणा को स्वीकार कर लेने पर साहित्य का क्षेत्र केवल व्यक्तियों तक ही सीमित हो जायगा, सृष्टि के अन्य प्राणियों एवं वस्तुओं को उसमें विषय के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकेगा जब कि स्वयं आचार्य शुक्ल भी प्रकृति को शुद्ध आलम्बन के रूप में प्रस्तुत करने के पक्षपाती थे ; इधर महादेवी वर्मा ने अनेक ऐसे सुन्दर एवं मार्मिक संस्मरण लिखे हैं, जिनमें आलम्बन के रूप में बिल्ली, नेवले आदि पालतू पशुओं को प्रस्तुत किया गया है। वस्तुतः काव्य में साधारणीकरण का आधार आलम्बन का व्यक्ति विशेष होना नहीं है, अपितु स्वयं काव्य-रचयिता या काव्य-गत आश्रय के साथ पाठकों का तादात्म्य स्थापित होना है। इस सम्बन्ध में विस्तार से अन्यत्र विचार किया जायगा-यहाँ इतना ही निवेदन करना है कि साहित्य के आलम्बन के रूप में उन सब विषयों को स्वीकार किया जा सकता है जो साहित्यकार की अनुभूति के विषय बन सकते हों। ऐसी स्थिति में 'आलम्बन' को 'विषय या (object) (आब्जंक्ट) का पर्याय माना जाय तो अनुचित न होगा। विभाव के दूसरे भेद को रस-सद्वान्तिक आचार्यों ने 'उद्दीपन' कहा है, जब कि मनोवैज्ञानिकों के अनुसार वह 'परिस्थिति या मनोवैज्ञानिक परिस्थिति है 'उद्दीपन' शब्द किसी विशेष पदार्थ का सूचक नहीं है, अपितु यह एक विशेषणमूलक शब्द है, जिसके अन्तर्गत सृष्टि के उन सभी पदार्थों तत्त्वों, स्थितियों एवं परि- स्थितियों को स्थान दिया जा सकता है जो किसी न किसी भाव को उद्दीप्त करते हों। पर दुर्भाग्य से इस पर भी हमारे आचार्यों की श्रृगार-रस-प्रियता का ऐसा प्रभाव पड़ा कि इसका क्षेत्र केवल आँगिक चेष्टाओं, मुद्राओं, अलंकारों आदि तक सीमित हो गया जो कि अप्रत्यक्ष में नारी-सौन्दर्य के ही विभिन्न पक्षों के द्योतक हैं।

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२७० रस-सिद्धान्त का पुनवविवेचन

बड़ी विचित्र बात है, स्वयं नायिका को जहाँ 'आलम्बन' माना गया है, वहां उसकी चेष्टाओं को उससे अलग 'उद्दीपन' की संज्ञा दी गयी है, जो व्यावहारिक दृष्टि से भी संगत नहीं है। क्या हम व्यक्ति से पृथक उसके व्यक्तित्व की कल्पना कर सकते हैं-और दोनों को अलग-अलग श्रेणियों में रख सकते हैं !

जिन आचार्यों की दृष्टि नायिका के रूप-व्यूह को पार कर आगे भी बढ़ी है, वह भी वन, उपवन उद्यान, नदी-तट, चन्द्र-ज्योत्स्ना, आदि तक ही पहुँच पायी है अर्थात शृंगार के संयोग और वियोग-दोनों पक्षों में ही प्राकृतिक वातावरण को ही एक मात्र उद्दीपन के रूप में उल्लिखित किया जाता रहा है। अवश्य ही देश- काल का वातावरण ही विभिन्न परिस्थितियों का घटक होता है किन्तु उस वाता- वरण को केवल प्राकृतिक वातावरण या रमशानघाट तक ही सीमित कर देना कहाँ तक उचित है ? वस्तुतः विभिन्न रसों के 'उद्दीपन' के रूप में हमारे आचार्यों ने जो सूचियाँ प्रस्तुत की हैं, वे अत्यन्त सीमित, संकीर्ण एवं स्थूल दृष्टि की ही परिचायक हैं। हमारे विचार में प्रत्येक ऐसी स्थिति को जो किसी भी प्रकार से- प्रत्यक्ष, कल्पना, विचार आदि के रूप में-भावोत्तेजन या भावोद्दीपन में सहायक हो 'उद्दीपन' या 'मनोवैज्ञानिक परिस्थिति' का नाम दिया जा सकता है। उदाहरण के लिये 'गबन' उपन्यास में उसका नायक जिन परिस्थितियों में घर से पलायन करके कलकत्ता भाग जाता है, या 'गोदान' का होरी जिन सामाजिक, आर्थिक एवं राज- नीतिक परिस्थितियों के कारण हताश एवं निराश होकर हमारी करुणा का आलम्बन बनता है-वे सब उद्दीपन की ही अंग हैं। अस्तु, सैद्धान्तिक, दृष्टि से उद्दीपन मनोवंज्ञानिक परिस्थिति का ही पर्याय है, यह दूसरी बात है कि व्यवहार में उसे अत्यन्त संकीर्ण एवं सीमित रूप में ग्रहण किया गया है। यहाँ यह भी ध्यातव्य है कि विभिन्न विषयों एवं परिस्थितियों की स्मृति एवं चिन्ता (चिन्तना या विचार) को भी मनौवैज्ञानिकों ने उद्दीपक (stimulus) एवं 'मनोवैज्ञानिक परिस्थिति' के रूप में स्वीकार किया है, जब कि रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने स्मृति और चिन्ता को संचारी भावों में स्थान दिया है। ऐसी स्थिति में यही विचारणीय है कि स्मृति और चिन्ता को विभाव में स्थान दिया जाय या उन्हें संचारी भाव के रूप में ही रहने दिया जाय ? हमारे विचार में जिस व्यक्ति विषय या परिस्थिति का स्मरण या विचार उदित होता है, वह व्यक्ति विषय या परिस्थिति स्वयं तो विभाव ही है, किन्तु सम्बन्धित स्मृति और 'चिन्ता' की प्रक्रिया को संचारी भाव मानना उचित होगा। स्मृति के सदा दो पक्ष होते हैं- एक वह वस्तु जिसका स्मरण आता है; दूसरा वह व्यक्ति जिसके मन में स्मरण होता है। अवश्य ही अनुभूति के रूप में व्यक्ति और वस्तु मिश्रित हो जाते हैं, किन्तु फिर भी तात्त्विक दृष्टि से दोनों एक ही नहीं हैं। अतः वस्तु (या स्मृत व्यक्ति) को

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विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २७१ विभाव में तथा स्मरण करने वाले व्यक्ति के भावोद्वलन को संचारी रूप में स्वीकार किया जा सकता है। विभाव पक्ष का सम्बन्ध संचारी भावों से है या स्थायी भावों से-इसके सम्बन्ध में भी रस-सैद्धान्तिक आचार्यों का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिलता। अनेक आचार्यों ने तो विभावों को रस के ही उद्दीपक के रूप में उल्लिखित किया है तो कुछ ने उनका सम्बन्ध स्थायी भाव से स्थापित किया है। व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाय तो स्थायी, संचारी एवं रस-तीनों एक ही प्रक्रिया की तीन स्थितियों के सूचक हैं। व्यावहारिक जीवन में जिन कारणों से प्रभावित होकर हमारी भावनाएं (स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियाँ) उद्वलित होकर संचरणशील अस्थिर भावों में व्यक्त होती हैं, उन्हीं को काव्य के संदर्भ में रस के कारणों या विभावों के रूप में स्वीकार किया गया है। वस्तुतः अन्तर केवल संदर्भ का है, किन्तु वस्तु एक ही है अर्थात् स्थायी भाव के उद्वलन, संचारी भाव के संचरण एवं रस की निष्पत्ति-तीनों एक ही कार्य-व्यापार की विभिन्न स्थितियों के सूचक हैं। अतः हमारे विचार में विभाव का सम्बन्ध प्रसंग-भेद से इन तीनों से ही है। अस्तु, मनौव ज्ञानिक दृष्टि से भावोद्व लन एवं रस-निष्पत्ति के कारण के रूप में विभाव की स्थापना एवं उसके दो भेद-आलम्बन और उद्दीपन, सैद्धान्तिक दृष्टि से स्वथा समीचीन एवं संगत सिद्ध होते हैं किन्तु व्यवहार में आलम्बन को केवल व्यक्तियों तक तथा उद्दीपन को नारी-चेष्टाओं व प्राकृतिक दृश्यों व वातावरण तक सीमित कर दिया गया है, जो उचित नहीं है। रस-सिद्धान्त को अपेक्षाकृत अधिक व्यापक, विकसित एवं संगत रूप प्रदान करने के लिये, उपयुक्त्त अध्ययन के आधार पर विभाव सम्बन्धी रूढ़ धारणाओं में निम्नाँकित संशोधन-परिवर्तन प्रस्तावित किये जा सकते हैं- • विभाव को भाव का उत्पादक न मान कर केवल उद्दीपक ही मानना चाहिए क्यों कि भाव का मूलाधार जन्मजात वासनाओं, सहज प्रवृत्तियों, भावनाओं (sentiments), मनोवृत्तियों, आदि स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों में निहित है। • जब विभाव स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों को प्रभावित करता है तो उससे भावावेगों (=संचारी भावों) का उद्वलन होता है; अतः विभाव का सम्बन्ध स्थायी एवँ संचारी दोनों से रहता है। ऐसी स्थिति में विभाव को केवल स्थायी भाव या रस में से किसी एक से ही सम्बन्धित मानना उचित न होगा। • विभाव के परम्परागत दो भेदों-आलम्बन एवं उद्दीपन को क्रमशः मनोविज्ञान के 'विषय' (object) एवं 'परिस्थिति' के समानान्तर स्थान देते हुए उनके स्वरूप को और व्यापक किये जाने की आवश्यकता है। रस-सैद्धान्तिक

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२७२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

आचार्यों ने 'आलम्बन' के अन्तगंत केवल व्यक्ति को स्थान दिया है जब कि मनो- विज्ञान के अनुसार इसमें व्यक्ति, वस्तु, पदार्थ, लक्ष्य आदि उन सब उद्दीपकों को स्थान दिया जाना चाहिए जो भावोद्दीपन के तात्कालिक कारण या विषय हैं। · आलम्बन की ही भाँति 'उद्दीपन' का भी क्षेत्रविस्तार करते हुए उसमें न केवल प्राकृतिक वातावरण को अपितु उन सब सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, वैयक्तिक, भौतिक मानसिक स्थितियों, परिस्थितियों व घटनाओं को स्थान दिया जाना चाहिए जो प्रत्यझ या अप्रत्यक्ष में व्यक्ति के भावोद्व लन में सहायक होती हैं नारी-चेष्टाओं एवं उसके आंगिक सौन्दर्य को उद्दीपन में स्थान देना उचित नहीं- उन्हें आलम्बन के अन्तर्गत ही लिया जाना चाहिए। • उद्दीपन में केवल स्थूल भौतिक परिस्थितियों एवं घटनाओं को नहीं अपितु उनकी सूक्ष्म कल्पना, स्मृति, एवंचिन्तना को ग्रहण किया जाना चाहिए। हमारा विश्वास है कि उपयुक्त संशोधन रस-सिद्धान्त की आधारभूत स्थाप- नाओं के प्रतिकूल न होते हुए भी, उसे एक ऐसा व्यापक रूप प्रदान कर देते हैं कि जिससे वह साहित्य की विषय-वस्तु के रूप में प्रस्तुत सृष्टि की प्रायः सभी प्रकार की वस्तुओं, स्थितियों, मनः स्थितियों, परिस्थितियों एवं घटनाओं की व्याख्या अत्यन्त संगत व मनोविज्ञान-सम्मत रूप में करने में समर्थ सिद्ध हो सकता है।

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५ अप्रनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन

रस के चार अवयवों में से तीन-स्थायीभाव, संचारी भाव, एवं विभाव- का विवेचन पीछे प्रस्तुत किया जा चुका है, अतः अब अवशिष्ट एक अवयव-अनुभाव का विवेचन मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया जाता है; किन्तु इससे पूर्व उसके परम्परागत स्वरूप को समझने के लिए उसका रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से अध्ययन आवश्यक है। अतः यहाँ क्रमशः रस-सैद्धान्तिक एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययन-विवेचन प्रस्तुत किया जाता है। • अनुभाव का रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से अध्ययन- आचार्य भरत ने अनुभाव का स्वरूप स्पष्ट करते हुए प्रतिपादित किया कि वाणी, अंग तथा सत्त्व द्वारा सम्पादित नानार्थों से निष्पन्न अभिनय को यह अनु- भावित करता है, अतः यह 'अनुभाव' है। उन्होंने इसके सम्बन्ध में एक परम्परागत श्लोक को भी उद्घृत किया है जिसके अनुसार 'वाणी और अंगों के अभिनय से वाणी और अंग-उपांग से संयुक्त अर्थ जिससे अनुभावित होता है। उसका नाम 'अनुभाव' माना गया है।१ इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि नाटक के संदर्भ में वाणी (ध्वनि, भाषा आदि), शारीरिक चेष्टाओं एवं सत्त्वोद्रेक आदि के माध्यम से जो

. अथानुभावा इति कस्मादुच्यते। यदयमनुभावयति नानार्थाभिनिष्पन्नो वागगसत्वः कृतोभिनय इति। (नाटयशास्त्र ।७।५) -भारतीय काव्य-शास्त्र की परम्परा; डॉ० नगेन्द्र; पृष्ठ सं० ९, २२। २. वागंगाभिनयेनेह यतस्त्वर्थोऽनुभावयते। वागंगोपांग संयुक्त स्त्वनुभाव स्ततः स्मृतः ॥ (वही)

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२७४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

नाटककार के या विभिन्न पात्रों के गूढ़ अर्थों या मनोभावों का अनुभव प्रेक्षक को प्रदान करते हैं-वे ही 'अनुभाव' कहलाते हैं। अनुभव प्रदान करने के कारण ही, इन्हें 'अनुभाव' कहा गया है किन्तु 'अनुभाव' शब्द की व्युत्पति 'अनुभव' से है-इसे स्वीकार करने में अनेक विद्वानों को आपत्ति है क्योंकि उनके विचारानुसार 'अनुभाव' शब्द 'अनु' और 'भाव' के योग से बना है, तथा 'अनु' का अर्थ 'पीछे' है-अतः व्युत्पति की दृष्टि से कहा जा सकता है कि जो भाव के पीछे उत्पन्न होता है या जो भाव का अनुवर्ती है, वह 'अनुभाव' है।

उप्युक्त दृष्टि से 'अनुभाव' दो प्रकार के अर्थों का सूचक कहा जा सकता है; एक 'अनुभव करवाने वाला' तथा दूसरा 'भाव का अनुवर्ती'। वस्तुतः अनुभाव पर दोनों ही बातें पूरी तरह लागू होती हैं-प्रेक्षक की दृष्टि से वह नाटककार एवं पात्रों के भावों या मनोभावों का अनुभव या भावन प्रदान करता है तो स्वयं पात्रों एवं अभिनेताओं की दृष्टि से वह भाव के अनन्तर, भाव-विशेष की प्रकृति के अनुसार, भावों के अनुवर्ती के रूप में ही प्रकट होता है-अतः हमारे विचार में उपयुक्त दोनों अर्थ अनुभाव के दो पक्षों को सूचित करते हैं, अतः उनमें परस्पर कोई असंगति नहीं है। भरत के उपयुक्त उद्धरण में अनुभावों के सम्बन्ध में वाणी, अंग और सत्त्व का भी उल्लेख है जो उनकी इस धारणा का द्योतक है कि अनुभावों का प्रकटी- करण वाणी, आंगिक चेष्टाओं एवं सत्त्वोद्रेक के रूप में होता है तथा इसीलिए उन्होंने अनुभावों के तीन प्रकार निश्चित किये हैं-(१) वाचिक अर्थात् वाणी एवं शब्दों के माध्यम से होने वाली चेष्टाएँ। (२) आंगिक अर्थात् शरीर के माध्यम से होने वाली चेष्टाए। और (३) सात्त्विक अर्थात् सत्त्वोद्रेक (अश्रु, स्वेद, कम्प आदि) के रूप में प्रकट होने वाले अनुभाव। अस्तु, आचार्य भरत के अनुसार अनुभाव अभिनेताओं की उन वाचिक, आंगिक एवं सात्त्विक चेष्टाओं का नाम है जिनके माध्यम से प्रेक्षक उनके मनोभावों का अनुभव या भावन या बोध प्राप्त करता हैं। भरत-परवर्ती आचार्यों ने भी अनुभाव की कतिपय अन्य विशेषताओं के उद्घाटन का प्रयास किया है। धनंजय ने लिखा है-भावों के सूचक विकार अनुभाव कहलाते हैं। ........ ये रस के कार्य हैं तथा लोक-व्यवहार में इनको प्रत्यक्ष रूप में देखा जा सकता है।" इसी मत को दूसरे शब्दों में प्रस्तुत करते हुए विश्वनाथ ने भी लिखा है-'उद्बुद्ध (इत्यादि) को बाहर प्रकाशित करने वाला, लोक में जो 'कार्य"

३. रस-सिद्धान्तः स्वरूप-विश्लेषण -- डॉ० आनन्द प्रकाश दीक्षित, पृ० सं० २२ ४. दशरूपक; अध्याय ४।३

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अनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २७५

कहलाता है, वही काव्य और नाटक में अनुभाव है।" लगभग यही मत रसगंगाधर- कार पं० जगन्नाथ का है-'उन (रति आदि स्थायी भावों के) जो कार्य लोक में प्रसिद्ध हैं, वे ही 'अनुभाव' हैं।" अस्तु, विभिन्न मतों के पर्यालोचन से स्पष्ट है कि अनुभाव के स्वरूप के सम्बन्ध में आचार्यों में विशेष मत-भेद नहीं है। प्रायः सभी ने भरत की मान्यता को स्वीकार करते हुए, उसी के स्पष्टीकरण में बताया है कि वे भावों के सूचक होते हैं, वे आंगिक या शारीरिक विकार हैं, लोक व्यवहार में इन्हें 'कार्य' कहते हैं- अर्थात् विभिन्न भावों के उद्वेलन या उद्बोधन से हमारे में जो विकार या परिवर्तन आते हैं तथा जिनसे भावोद्वेलन की सूचना मिलती है, उन्हें 'अनुभाव' कहा गया है। लोक-व्यवहार में भावोद्वेलन के कारण हम भाँति-भाँति की चेष्टाएँ एवं कार्य करते हैं-जसे, भय में प्राण-रक्षा के लिये भागना, क्रोध में किसी को मारने-पीटने के लिए आगे बढ़ना, हास्य में हँसना, मुस्कराना, ताली बजाना आदि ; काव्य-शास्त्रीय शब्दावली में इन्हीं भावोद्वेलनजन्य विकारों, परिवर्तनों, चेष्टाओं एवं क्रिया-कलापों को सामूहिक रूप में 'अनुभाव' की संज्ञा दी गयी है क्योंकि इन्हीं के माध्यम से अभिनेता भावों का अभिनय एवं कवि व चित्रकार उनका चित्रण करता है तो दूसरी ओर प्रेक्षक, पाठक एवं सामाजिक उनका बोध प्राप्त करता है। अनुभाव के प्रकार एवं भेदों के सम्बन्ध में रस-सैद्धान्तिक आचार्यों में थोड़ा मत-भेद मिलता है। जैसा कि पीछे बताया जा चुका है, भरत ने तो इनके मुख्यतः तीन ही प्रकार-वाचिक, आंगिक एवं सात्त्विक-निर्धारित किये थे, किन्तु पर्वती युग के अनेक विद्वानों ने इनका वर्गीकरण नये ढंग से भी करने का प्रयास किया है। भानुदत्त ने इनके चार प्रकार निर्धारित करते हुए उन्हें (१) कायिक (२) मानसिक (३) आहार्य एवं (४) सातत्विक की संज्ञा दी है"। इनमें कायिक और सात्त्विक तो क्रमशः भरत के 'आंगिक' एवं 'सात्त्विक' के ही पर्याय है, किन्तु अन्य दो नये हैं। शारदातनय और शिगभूपाल ने अन्य प्रकार से वर्गीकरण करते हुए सभी अनुभावों को तीन वर्गों में विभक्त किया है -(१) मन आरम्भानुभाव एवं (३) बुद्धयारम्भानुभाव।

५. उद्बुद्धं कारण: स्वः स्वरबहिर्भावं प्रकाशयन्। लोके यः कार्यरूप: सोऽनुभावः काव्य नाट्ययोः॥ -साहित्य दर्पण: ३।१३२-३ ६. यानिच कार्यतया, तान्यनुभाव शब्देन - रसगंगाधर; प्रथम आनन, पृ० सं० १३५ ७. रस-तरंगिणी; पृ० ४९; रस-सिद्धांत : स्वरूप-विश्लेषण; पृ० सं० २३ ८. भाव-प्रकाशनम्; पृ० ६; रसार्णव-सुधा (शिंगभूपाल); पृ० ४८ (रस-सिद्धान्तः स्वरूप विश्लेषण; पृ० २३ के आधार पर)

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२७६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

मनआरम्भानुभावों का सम्बन्ध मुख्यतः स्त्रियों से मानते हुए उनके भी दस उपभेद- भाव, हाव, हेला, शोभा क्रान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रागल्म्य, धर्य तथा औदार्य-किये गये हैं।९ वागारम्भानुभावों के अन्तर्गत वाक् या वाणी द्वारा प्रकट होने वाले अनुभावों को स्थान देते हुए उनके भी एकादश भेद किये गये हैं-(१) आलाप (चाटूक्ति) (२) विलाप (दुःख भरे वचन) (६) प्रलाप (व्यर्थ कथन) (४) अनुलाप (बार-बार कहना) (५) अपलाप (पूर्वोक्त का अन्यथा-योजन) (३) संदेश (७) अतिदेश (प्रस्तुत वस्तु का अन्य अभिधेय से सूचन) (८) निर्देश (९) उपदेश (१०) अतिदेश, जसे-'मैने कहा' का अतिरिक्त प्रयोग । (११) व्यपदेश अर्थात् व्याजपूर्वक कुछ कहना। इसी प्रकार जिन अनुभावों के पीछे बुद्धि का विशेष प्रयोग परिलक्षित होता है, उन्हें 'बुद्धयारम्भानुभाव' की संज्ञा देते हुए उनके भी अनेक भेदों-रीति, वृत्ति, प्रवृत्ति, आदि-का निरूपण किया गया है। उपयुक्त तीन प्रकार के अनुभावों के अतिरिक्त एक और भेद भी शारदातनय एवं शिंग भूपाल ने स्वीकार किया है, वह है-गात्रारम्भ अनुभाव।" इसके भी दो उपभेद माने गये हैं-एक नारी सम्बन्धी वर्ग एवं दूसरा पुरुष सम्बन्धी। नारी सम्बन्धी गात्रारंभानुभावों में लीला, विलास, विच्छित्ति, विभ्रम, किलकिंचित, मोट्टायित, कुट्टमित, विव्वोक, ललित, विहृत-इन दस को स्थान दिया गया है जबकि पौरुषगा त्रारम्भानुभाव के अन्तर्गत शोभा, विलास माधुर्य, धैर्य, औदार्य, ललित आदि को सम्मिलित किया गया है।१ यदि हम अनुभावों के उपयुक्त वर्गों पर विचार करें तो स्पष्ट होगा कि ये मूलतः शृंगार रस को ही ध्यान में रखकर वर्गीकृत किये गये हैं-अन्यथा मनोभावों एवं अनुभावों के क्षेत्र में पुरुष एवं नारी के आधार पर वर्गीकरण करना अनावश्यक प्रतीत होता है। वस्तुतः इन विद्वानों ने नारी या नायिका के जिन मानसिक एवं शारीरिक अनुभावों का उल्लेख किया है, उन्हें अन्य आचार्यों ने नायिका के हावों तथा अलंकारों में स्थान दिया है। परवर्ती युग के विद्वानों में यह भी विवाद का विषय रहा है कि नायिका के इन अलंकारों एवं हावों को विभाव में स्थान दिया जाय या अनुभाव में ? अस्तु, इसके सम्बन्ध में हम अन्यत्र विचार करेंगे, यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि उपयुक्त वर्गीकरण का सम्बन्ध मूलतः शृंगार रस से ही है, अतः इन्हें अनुभावों के सामान्य भेदों से पृथक रखना ही उचित होगा। अनुभावों का एक अन्य वर्ग 'सात्त्विक भाव' संज्ञक है, जिसके सम्बन्ध में भी विवादास्पद स्थिति है। स्वयं भरत ने एक स्थान पर तो इन्हें अनुभावों से पृथक

९. भाव-प्रकाशनम्; ८/१३ १०. रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण; पृ० सं० २४-२५ ११. भाव प्रकाशनम्, पृ०-२०। रसार्णव-सुधा; ५८/२१५ १२. वही।

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अनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २७७

भावों के रूप में निरूपित किया है तो अन्यत्र वे इन्हें अनुभावों का ही एक वर्ग मानते हुए, उसके अन्तर्गत इन आठ सात्त्विक भावों का उल्लेख किया है-(१) स्वेद (पसीना) (२) स्तम्भ (३) वेपथु (कम्प) (४) अश्रु (५) ववर्ण्य (मुह का रँग बदल जाना) (६) रोमाँच (७) स्वर-भंग (८) प्रलय (मूर्छा)। आचार्य भरत ने ४९ भावों के अन्तर्गत भी इन आठ सात्त्विक भावों की गणना की है-अतः दुविधा है कि इन्हें 'भाव' की श्रणी में स्थान दिया जाय या 'अनुभाव' की श्रणी में ? आधुनिक युग के आचार्यों ने अनुभावों के भेदोपभेद-निरूपण को विशेष महत्त्व नहीं दिया। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सात्त्विक अनुभावों एवं मानसिक संचारियों के भेद को अवश्य स्पष्ट करने का यत्न किया है। उनके विचार से-'सात्त्विक अनुभाव में वही वस्तु रखी गयी है जो बाहर शरीर पर लक्षित हो। मानसिक अवस्था स्वयं गोचर नहीं होती, उसका कोई चिह्न या संकेत गोचर होता है। 'अनुभाव' किसी 'भाव' का सूचक होता है, अतः मानसिक अवस्था जो सूच्य हुआ करती है, वह सूचकों में नहीं रखी गयी, संचारियों में रखी गयी।१३ इसी प्रकार नायिका की प्रणय सूचक चेष्टाओं को, जिन्हें काव्य-शास्त्र में 'हाव' की संज्ञा दी गयी है, उन्हें विभाव में स्थान दिया जाय या अनुभाव में-इस प्रश्न पर आचार्य शुक्ल ने विस्तार से विचार करते हुए प्रतिपादित किया है-"हिन्दी के लक्षण-ग्रन्थों में 'हाव' प्रायः 'अनुभाव' के अन्तर्गत रखे मिलते हैं, पर यह ठीक नहीं है। 'अनुभाव' के अन्तर्गत केवल आश्रय की चेष्टाएँ ही आ सकती हैं। 'आश्रय' की चेष्टाओं का उद्देश्य किसी भाव की व्यंजना करना होता है। पर 'हावों' का सन्निवेश किसी भाव की व्यंजना कराने के लिये नहीं होता, बल्कि नायिका का मोहक प्रभाव बढ़ाने के लिये, अर्थात् उसकी रमणीयता की वृद्धि के लिये होता है। जिसकी रमणीयता या चित्ताकर्षकता का वर्णन या विधान किया जाता है, वह 'आलम्बन' होता है, अतः हाव नामक चेष्टाएँ आलम्बनगत ही मानी जायेंगी और आलम्बनगत होने के कारण उनका स्थान 'विभाव' के अन्तर्गत ठहरता है।" किन्तु पं० रामदहिन मिश्र ने शुक्लजी के उपयुक्त्त निष्कर्ष का विरोध करते हुए लिखा है- 'हाव' अनुभाव के अन्तर्गत ही हैं और यह ठीक है। हिन्दी लक्षण-ग्रन्थों में ही नहीं, संस्कृत के आकर ग्रन्थों में भी यही बात है। अंगज अलंकारों में 'हाव' की गणना है, और ये अलंकार अनुभाव ही हैं। ....... रस-उद्दीपक आलम्बन की चेष्टाएं उद्दीपन कहलाती हैं, पर हाव इस प्रकार का नहीं होता, क्योंकि यह कार्यरूप है, कारण-रूप नहीं है। इससे विभाव के अन्तर्गत 'हाव' की गणना नहीं की जा सकती।"१५

१३. रस-मीमांसा; पृ० सं० २१९ १४. 'आगरा-यूनीवर्सिटी सेलेक्शन्स इन हिन्दी प्रोज'; पृ० ६४ १५. काव्य-दर्पण; पृ० ८३

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२७८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित ने उपयुक्त विवाद पर पुनर्विचार करते हुए स्पष्ट किया है कि दोनों विद्वानों में मत-भेद का कारण यह है कि जहाँ शुक्ल जी ने भानुदत्त का अनुसरण करते हुए 'हाव' को व्यापक अर्थ में-जिसके अन्तर्गत उसके दस भेदों का भी समावेश हो जाता है-ग्रहण किया है जबकि मिश्रजी ने 'हाव' नामक विशिष्ट अलंकार को ही दृष्टिगत रखा है। डॉ० दीक्षित ने शुक्लजी के ही मत का अनुमोदन करते हुए लिखा है- "हम समझते हैं कि इस प्रश्न का एक-मात्र समाधान भानुदत्त का अनुसरण करते हुए यही हो सकता है कि आलम्बन हो चाहे आश्रय, दोनों में ये चेष्टाएँ अनुभाव ही बन कर उपस्थित होती हैं, किन्तु आलम्बन के अनुभाव आश्रय में स्थायी भाव को विशेष रूप से उद्दीप्त करने में सहायक होते हैं, अतएव उस समय ये अनुभाव भी विषय जाने से उद्दीपन की श्रेणी में पहुँच जाते हैं। ........ हम इन्हें 'उद्दीप्त' तथा 'उद्दीपक अनुभाव' ही कहना उपयुक्त समभते हैं। संभवतः शुक्लजी को भी यही मान्य था।"१६ यहाँ डॉ० दीक्षित ने हावादि को 'उद्दीपक अनुभाव' बताकर आचार्य शुक्ल एवं पं० मिस्र-दोनों के मध्य सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया है और एक प्रकार से उन्होंने दोनों की ही बात स्वीकार करली है; क्योंकि 'उद्दीपक' शब्द 'विभाव' का पर्याय है तो 'अनुभाव' स्वयं अनुभाव है ही, किन्तु इससे विवाद का कोई निर्णय नहीं हो जाता। विभाव और अनुभाव-दोनों को संयुक्त करके उन्होंने जिस तीसरे तत्त्व की स्थापना की है, वह वस्तुतः अपने-आप में असंगत है। यदि कोई कहे कि यह नमक है या चीनी-इसके उत्तर में हम अपना निर्णय दें कि वह 'नमकीन चीनी' है तो यह कैसा प्रतीत होगा ? अवश्य ही यह हमारी समन्वयात्मक बुद्धि का तो प्रमाण होगा किन्तु व्यवहार में 'नमकीन चीनी' एक निरर्थक प्रयोग सिद्ध होगा। हमारे विचार में उपयुक्त विवाद का मूल कारण यह है कि शृंगार रस में नायक और नायिका-दोनों एक-दूसरे के लिए आलम्बन एवं आश्रय हैं ; तथा दोनों के ही प्रणय भाव की अभिव्यक्ति परस्पर प्रभावित करती है। यथा-नायक की उपस्थिति में या उसके प्रेमपूर्ण व्यवहार से जब नायिका प्रफुल्लित होकर सहज भाव में जो-कुछ भी करती है; उसे देखकर नायक का भावावेग और भी तीव्र हो जाता है। इस प्रकार दोनों की ही भावाभिव्यंजक चेष्टाए जहाँ स्वयं के लिए अनुभाव हैं, वहाँ दूसरे के लिए विभाव सिद्ध होंगी; अतः उन्हें एक की दृष्टि से अनुभाव कहा जा सकता है, तो दूसरे की दृष्टि से वरिभाव। हमारे शृगार रस के आचार्यों ने तो स्वयं नायिका को तो सदा आलम्बन ही माना तथा उसकी प्रणयपूर्ण चेष्टाओं एवं भावा- भिव्यक्तियों को भी पुरुष की रसिक की दृष्टि से ही देखा, किन्तु वे यह भूल गये

१६. रस-सिद्धान्तः स्वरूप-विश्लेषण; पृ० २९

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अनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २७९ कि स्वयं नायिका कोई पत्थर की मूर्ति या प्रदर्शनी में रखी हुई निर्जीव सौन्दर्यं- प्रतिमा नहीं होती, अपितु उसके भी एक जीता-जागता हृदय होता है, जो पुरुष के हृदय से भी अधिक संवेदनशील, आर्द्र एवं कोमल होता है-अतः नायक की उपस्थिति में वह सहज भाव से जो भी चेष्टाएँ करती हैं; वे भले ही पुरुष की दृष्टि में उसके अलंकार या सौन्दर्य की ही साधक हों, किन्तु स्वयं उसके लिए तो वे उसकी भावनाओं की ही अभिव्यंजक हैं संस्कृत-हिन्दी के आचार्यत्व पर पुरुष-वर्ग का ही एकाधिकार रहने के कारण कदाचित् यह स्थिति उत्पन्न हो गयी है कि नायिका का सहज स्वाभाविक व्यवहार भी सौन्दर्य-सामग्री या अलंकरण मात्र बन गया है। 'हाव' के सम्बन्ध में एक बात यह भी उल्लेखनीय है कि उसकी परम्परागत परिभाषा भी दोषपूर्ण है। आचार्यों ने संभोगेच्छा-सूचक भ्र-नेत्रादि विकारों को 'हाव' माना है,१ किन्तु जब हम हावों के अवान्तर भेदों-पर दृष्टिपात करते हैं तो ज्ञात होता है कि सभी हाव केवल 'संभोगेच्छा' के सूचक नहीं हैं। प्रिय के द्वारा प्रेमपूर्वक भेंट की हुई माला को धारण करके गर्व पूर्वक फूले-रहना, या प्रिय की उपस्थिति में भावावेग के कारण कुछ का कुछ कर बैठना, या मानपूर्वक उसकी बहुमूल्य भेंट को भी ठुकराना-जिन्हें क्रमशः 'मोटायित', 'विभ्रम' एवं 'विव्वोक' संज्ञक हाव माना गया है क्या संभोगेच्छा का ही सूचक माना जायगा, उसके उद्वलित प्रणय भाव का नहीं ? वस्तुतः हाव के विभिन्न भेद प्रणय भाव की ही विभिन्न भंगिमाओं के द्योतक हैं, अतः हाव के लक्षण में संभोगेच्छा सूचक चेष्टाओं को नहीं अपितु प्रणय भाव की सूचक या उसे व्यक्त करने वाली चेष्टाओं को स्थान दिया जाना चाहिए। वस्तुतः जिस प्रकार प्रणय भाव के लिए स्थायी भावों में 'रति' शब्द का प्रयोग किया गया है, कुछ उसी प्रकार यहाँ 'संभोच्छा का किया गया है, जो उचित नहीं। अस्तु, नायिका या नायक की सभी प्रेमपूर्ण चेष्टाओं को चाह वे हाव में आती हों या नहीं, हम उन्हें अनुभावों में ही स्थान देना उचित समझते हैं। हाँ, जो चेष्टाएँ भाव-सूचक न होकर कृत्रिम एवं यत्नज हों तथा जान बूझकर नायक को आकर्षित करने के लिए की जाती हों-उन्हें चाहें तो अनुभावों से पृथक स्थान दिया जा सकता है। शृंगार रस के अतिरिक्त रौद्र, वीभत्स, और हास्य में भी कई बार आश्रय की चेष्टाए आलम्बन के भावों को और आलम्बन की चेष्टाएँ आश्रय के भावों को उद्दीप्त करती हैं; यथा-परशुराम-लक्ष्मण संवाद के प्रसंग में लक्ष्मण की धृष्टता परशुराम के क्रोध में अभिवृद्धि करती जाती है तो उनके क्रोध की अभिवृद्धि के साथ- साथ लक्ष्मण का उपहास भाव भी अधिक तीव्र होता जाता है। लोक-व्यवहार में भी

१७. भ्र नेत्रादि विकारस्तु संभोगेच्छा प्रकाशकः । भाव एवाल्प संलक्ष्य विकारो हाव उच्यते ।। -साहित्य-दर्पण; ३।९४

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२८० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

हम देखते हैं कि जब दो व्यक्ति लड़ते हैं तो दोनों की कटूक्तियों से एक-दूसरे का क्रोध और तीव्र होता जाता है-अर्थात्, ऐसी स्थिति में दोनों ही व्यक्ति अपने-आप में करोध भाव के आश्रय तथा सामने वाले के लिए उसके उद्दीपक होते हैं। अतः यहाँ शास्त्रीय दृष्टि से किसके उद्गारों को वाचिक अनुभाव माना जाय और किसे विभाव माना जाय, यह निर्णय करना कठिन है ऐसी स्थिति में तटस्थ द्रष्टा के लिए तो दोनों की ही क्ोधपूर्ण उक्तियाँ व चेष्टाएँ अनुभाव प्रतीत होंगी; पर यदि हमारा तादात्म्य उसमें से किसी एक से होता है और दूसरे से नहीं- या काव्य में कवि की दृष्टि एवं अनुभूति के अनुसार हमारा तादात्म्य किसी एक से हो जाता है तो वही आश्रय होगा एवं उसका विरोधी पात्र आलम्बन के रूप में स्वीकार्य होगा। राम-रावण-युद्ध में जब हमारा तादात्म्य राम के साथ होता है तो वहाँ रावण ही आलम्बन रूप में ग्राह्य होता है। अस्तु, यह बात प्रेम, घृणा, करोध, मैत्री आदि उन सभी भावों के प्रसंग में लागू होती है जिनमें दो पात्रों का भाव एक-दूसरे के भाव पर आश्रित हो, या जिनकी भावपूर्ण चेष्टाएँ एक-दूसरे को प्रभावित एवं उत्तेजित करती हो। मध्यकालीन कवियों एवं आचार्यों ने सदा नायिका को आलम्बन-रूप में ही देखा है; उसकी भावनाओं को स्वयं उसी की दृष्टि से समझने-समझाने की चेष्टा बहुत कम की है; कदाचित् इसी स्थिति के कारण यह भ्रान्त धारणा प्रचलित हो गयी है कि नायिका की भावाभिव्यंजक चेष्टाओं को विभाव पक्ष में आलम्बन के अलंकारों में ही स्थान देना उचित है; अनुभावों में नहीं। किन्तु आज के युग में इस भ्रान्ति का निराकरण हो जाना चाहिए। अस्तु, अनुभावों के रस-सद्धान्तिक विवेचन-विश्लेषण से उपलब्ध निष्कर्षों को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है- · व्युत्पत्ति की दृष्टि से 'अनुभाव' शब्द का अर्थ है-जो भाव का अनुवर्ती है या भाव के पीछे या उसके अनुरूप उदित या प्रकट होता है। · भरत ने प्रेक्षक की दृष्टि से 'अनुभाव' का सम्बन्ध 'अनुभव' से स्थापित करते हुए प्रतिपादित किया कि पात्रों या अभिनेताओं की जिन चेष्टाओं से दर्शकों को भाव का अनुभव (प्रतीति या बोध) प्राप्त होता है, वे अनुभाव हैं। • भरत-परवर्ती आचार्यों ने अनुभाव के कुछ अन्य लक्षणों पर प्रकाश डाला-(१) वे भावों के सूचक विकार (या शारीरिक मानसिक परिवर्तन) हैं। (२) वे विभिन्न भावों को बाहर व्यक्त करते हैं। (३) लोक-व्यवहार में इन्हें 'कार्य' कहा जाता है। · अनुभाव मूलतः तीन प्रकार के माने गये हैं-(१) वाचिक (२) आंगिक एवं (३) सात्त्विक।

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अनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २८१

· परवर्ती-युग के आचार्यों ने अनुभावों का नूतन वर्गीकरण करते हुए मन, बुद्धि, वाणी एवं गात्र के आधार पर उनके विभिन्न भेदोपभेद किये, जो अनुभाव के सामान्य रूप से सम्बद्ध न होकर केवल शृंगार रस की दृष्टि से हैं-अतः वे मान्य नहीं हैं। · नायिका की प्रणय-सूचक चेष्टाओं को 'हाव' के विभिन्न भेदों में स्थान देते हुए, उन्हें विभाव में परिगणित किया जाता है जो ठीक नहीं-वस्तुतः वे अनुभाव ही हैं। • अनेक भावों में दो व्यक्तियों की भावाभिव्यंजक चेष्टाएँ एक दूसरे के लिए भावोत्तेजक भी सिद्ध होती हैं; ऐसी स्थिति में जिस व्यक्ति के साथ हमारा तादात्म्य हो, उसकी चेष्टाओं को 'अनुभाव' मानना चाहिए। • सात्त्विक भावों को आचार्य भरत ने एक ओर तो अनुभावों से पृथक भावों में परिगणित किया है तो दूसरी ओर उन्हें अनुभावों के एक विशिष्ट वर्ग के रूप में स्वीकार किया है; ऐसी स्थिति में यह विवादास्पद है कि उन्हें अनुभाव माना जाय या नहीं ? · अनुभावों के भेदों में कुछ ने मानसिक एवं आहार्य (वेशभूषा से सम्बन्धित) को स्वीकृति दी है तो कुछ ने नहीं-अतः इन पर भी पुनर्विचार की अपेक्षा है। उपयुक्त विवादास्पद विषयों का समाधान प्रस्तुत करने से पूर्व अनुभावों पर मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार कर लिया जाय तो उचित होगा क्योंकि उस स्थिति में हम मनोविज्ञान के निष्कर्षों का भी उपयोग कर सकेंगे। · अनुभाव : मनोवैज्ञानिक विवेचन- आधुनिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी भावों के विवेचन-विश्लेषण में विभाव या उद्दीपक के साथ-साथ अनुभावों को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता है। मक्डूगल महोदय के अनुसार प्रत्येक प्रकार की भावानुभूति में किसी न किसी प्रकार का शारीरिक परिवर्तन होता है जिसे 'संवेग की अभिव्यंजना' का नाम दिया जाता है।" वस्तुतः 'सांवेगिक अभिव्यंजना' के अन्तर्गत विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने भाव- प्रेरित या भावोद्व लनजन्य विभिन्न प्रकार की आंगिक चेष्टाओं का ही विवेचन किया है जिन्हें रस-सैद्धान्तिक शब्दावली में 'अनुभाव' कहा जाय तो अनुचित न होगा।

  1. "That each kind of emotional experience is normally accomp- anied by bodily changes which are called the expressions of the emotion." -An Outline of Psychology : Mcdougall ; page 317

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२८२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

सांवेगिक अभिव्यंजना (Emotional Expression) की व्याख्या करते हुए वुडवर्थ ने लिखा है-'जब कोई व्यक्ति अपने द्वारा अनुभूत भावों को व्यक्त करना चाहता है तो वह उन्हें या तो भाषा के माध्यम से अथवा अभिव्यंजनात्मक चेष्टाओं के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास कर सकता है। किन्तु इस प्रकार की यत्नज अभिव्यंजना के अतिरिक्त भी व्यवहार-पद्धति या चेष्टाओं के कुछ ऐसे अनैच्छिक एवं अकृत्रिम रूप होते हैं जिनके माध्यम से भावात्मक अनुभूतियाँ अपेक्षा- कृत स्पष्ट एवं यथार्थ रूप में व्यक्त होती हैं।९ इस प्रकार वुडवर्थ महोदय ने स्पष्ट ही संवेगात्मक अभिव्यक्तियों के दो प्रकार मान लिये हैं-(१) ऐच्छिक या यत्नज चेष्टाओं के रूप में अभिव्यक्ति। (२) अनैच्छिक एवं अकृत्रिम चेष्टाओं के रूप में अभिव्यक्ति। इसका अर्थ यह है कि भावोद्दीप्ति के अनन्तर व्यक्ति जान-बूझकर या सोच समभकर जो क्रिया-कलाप करता है, उन्हें भी इनके अन्तर्गत स्थान दिया जा सकता है। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति किसी सुन्दरी पर मुग्ध होकर उसका पीछा करता है, या उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है; यहाँ उसके ये दोनों ही कार्य उसके रति भाव से ही प्रेरित हैं; अतः इन्हें भी 'ऐच्छिक' एवं 'यत्नज' कार्यों के रूप में भावाभिव्यंजक चेष्टाओं या कार्यों में स्थान दिया जाय तो अनुचित न होगा। इन भावाभिव्यंजक चेष्टाओं का स्रोत एवं लक्ष्य क्या है-इस प्रश्न पर भी अनेक मनोवैज्ञानिकों ने गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए विभिन्न सिद्धान्त स्थापित किये हैं। डारविन महोदय के अनुसार तो इनका अस्तित्व मनुष्यों में ही नहीं पशु- पक्षियों तक में भी है तथा इनका सम्बन्ध पूर्व-मानव युग की उस अवस्था से है जबकि मनुष्य पशु की भाँति भाषा-विहीन था। उस समय वह अपनी विभिन्न शारीरिक चेष्टाओं से ही दूसरों को डराने-धमकाने या उनसे प्यार करने का काम करता था तथा उस समय व्यावहारिक दृष्टि से भी इनका भारी उपयोग था। किन्तु अब उतना उपयोग न होते हुए भी पूर्व परंपरा के संस्कारों के कारण ही हम विभिन्न प्रकार की भावाभिव्यंजक चेष्टाए करते हैं।२ जेम्स-लेंगे के सिद्धान्त के अनुसार तो जिन चेष्टाओं को हम भावाभिव्यंजक कहते हैं, वे वास्तव में भावाभिव्यंजक न होकर भाव की उत्तेजक या पोषक हैं; क्योंकि उनके कारण भाव उद्दीप्त होता है। उनके शब्दों में-"सामान्य लोक बुद्धि

  1. 'A person who wishes to give expression to his feelings can, of course, attempt to describe them in language or, he may use expressive gestures. Apart from such intentional expression, there are involuntary forms of behaviour which reveal the emotional state more or less clearly and truthfuly.' -Psychology : R. S. Woodworth & D. G. Marquis, page 348 20. Same; Page 349.

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अनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २८३

कहती है कि हम दुःख के कारण रोते हैं, भय के कारण भागते हैं या क्रोधित होने के कारण आक्रमण करते हैं। किन्तु इससे अधिक तर्क-संगत कथन यह है कि हमें शोक इसलिए होता है क्योंकि हम रोते हैं; हमें भय इसलिए लगता है क्योंकि हम काँपते हैं; क्रोध इसलिए आता है क्योंकि हम आक्रमण करते हैं।' ........ जेम्स के विचार से किसी वस्तु के विचार से पहले शारीरिक क्रियाए होती हैं र्और फिर भाव उत्पन्न होता है; अतः ये भाव की परवर्ती न होकर उसकी पूर्ववर्ती हैं। किन्तु उनका यह विचित्र सिद्धान्त अब भली-भाँति खंडित हो गया है। विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक एवं मनोवैज्ञानिक प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि हमारी विभिन्न भावात्मक चेष्टाए भाव की परवर्ती ही हैं, पूर्ववर्ती नहीं। डॉ० जदुनाथ सिन्हा के शब्दों में कहा जा सकता है-"अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि भाव अभिव्यक्तियों के पूर्ववर्ती होते हैं। भाव आन्तरिक अंगों और पेशियों के परिवर्तनों में प्रकट होते हैं जो आन्तरिक और पंशिक संवेदनाएँ उत्पन्न करते हैं। किन्तु आन्तरिक तथा पैशिक संवेदनाए भाव का निर्माण नहीं करतों, अपितु वे उन्हें तीव्र अवश्य करती हैं। ........ जेम्स की देन केवल यही है कि भाव की पुष्टि में आंगिक संवेदनाओं के योग पर उन्होंने अधिक बल देकर उनके महत्त्व को स्पष्ट किया"२९ अस्तु, आंगिक संवेदनाएँ व चेष्टाए भाव की परवर्ती होती हुईं भी भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। भावाभिव्यंजक चेष्टाओं के सम्बन्ध में मनोविज्ञान के क्षेत्र में और भी कई सिद्धान्त प्रचलित हैं, जिनमें से यहाँ कतिपय उल्लेखनीय हैं। कैनन तथा बार्ड नामक दो विद्वानों ने यह स्थापित किया कि हमारे संवेगात्मक व्यवहार (या चेष्टाओं) और संवेगात्मक अनुभूतियों-इन दोनों की उत्पत्ति एक ही साथ स्वतंत्र रूप में होती है; यह उत्पत्ति हाइपोथलेमस (Hypothalamus) के द्वारा होती है।११ जब हमारे सामने कोई भावोद्दीपक परिस्थिति आती है, तो सर्वप्रथम उसका सम्पर्क तत्सम्बन्धी ज्ञानेन्द्रियाँ के ग्राहक से होता है जिससे उसमें स्नायु प्रवाह उत्पन्न हो जाता है। यह स्नायु प्रवाह ज्ञानवाही नाड़ियों द्वारा बृहन्मस्तिष्कीय बल्क में पहुँचने के पहले हाइपोर्थलेमस में पहुँचता है, जिससे वह क्रियाशील हो जाता है। हाइपोथलेमस से स्नायु-प्रवाह एक ही साथ दो ओर चलता है, एक बृहन्मस्तिष्कीय बल्क की ओर दूसरा माँसपेशियों तथा ग्रन्थियों या ग्राहकों (Receptors) की ओर। जो स्नायु प्रवाह बृहन्मस्तिष्कीय बल्क में पहुँचते हैं उनसे संवेगात्मक अनुभूति होती है और जो ग्राहकों में पहुँचते हैं उनसे संवेगात्मक व्यवहारों (शारीरिक परिवर्तनों) की उत्पत्ति होती है।'6 इस प्रकार इस सिद्धान्त के अनुसार संवेगात्मक २१. 'मनोविज्ञान'; डॉ० जदुनाथ सिन्हा; पृ० सं० २५७; २२. वही; पृ० सं० २६३ २३. 'सामान्य मनोविज्ञान' : रामबाबू गुप्त; पृ० सं० ४२१; २४. वही

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२८४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

अनुभूति एवं संवेगात्मक चेष्टाए दोनों एक ही साथ स्वतंत्ररूप में हाइपोथैलेमस द्वारा उत्पन्न होती हैं। इसीलिए इस सिद्धान्त को हाइपोथैलेमस सिद्धान्त (Hypothalamic Theory) का नाम दिया गया है। यद्यपि यह सिद्धान्त भावानुभूति एवं भावाभिव्यंजक चेष्टाओं की आन्तरिक प्रक्रिया को स्पष्ट करने में योग देता है किन्तु इससे आंशिक सत्य पर ही प्रकाश पड़ता है। अन्य विद्वानों के अनुसार हाइपोथैलेमस के अतिरिक्त भी स्नायु-मंडल (Nervous System) के कुछ ऐसे अंग होते हैं जिनका सम्बन्ध सांवेगिक अभिव्यक्तियों से रहता है, जबकि कनन-बार्ड ने सारा महत्त्व हाइपोथैलेमस की प्रक्रिया को ही दे दिया है। इसी प्रकार लीपर (Leeper) द्वारा प्रतिपादित 'प्रेरणात्मक सिद्धान्त' (Motivational Theory) भी यहाँ उल्लेखनीय है।२५ इसके अनुसार प्रत्येक संवेग का एक विशिष्ट लक्ष्य होता है जो कि प्राणी के संवेगात्मक व्यवहार को संचालित तथा निर्देशित करता है तथा संवेगात्मक अवस्था में प्राणी में जो शारीरिक परिवर्तन होते हैं, वे उसे स्थिति-विशेष के अनुरूप व्यवस्थित या अनुकूलित (Adjustment) करने में सहायक सिद्ध होते हैं।२६ इस प्रकार संवेगात्मक परिवर्तनों व चेष्टाओं का लक्ष्य व्यक्ति को परिस्थितियों से अभियोजित करने में सहायता प्रदान करना है। यह सिद्धान्त भी आंशिक रूप में मान्य है। उपर्युक्त सभी सिद्धान्तों के समन्वय के आधार पर एक नूतन सिद्धान्त भी स्थापित हुआ है, जिसे 'सक्रियकरण सिद्धान्त' (Activation theory) कहा जाता है। इसके अनुसार संवेगास्था में व्यक्ति का कोई अंग-विशेष ही नहीं अपितु सम्पूर्ण व्यक्तित्व सक्रिय रहता है; अतः उसे किसी एक ही अंग या उसकी प्रक्रिया से सम्बन्धित करना उचित नहीं।२ वस्तुतः मस्तिष्क तरंगों पर किये गये वैज्ञानिक अनुसंधान से यह प्रमाणित हो गया है कि तीव्र भावोत्तेजना की अवस्था में व्यक्ति का कोई अंग कम और कोई अधिक-उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व न्यूनाधिक मात्रा में उद्दीप्त या सक्रिय हो उठता है; तथा इसी सक्रियता को हम संवेगात्मक चेष्टाओं के रूप में ग्रहण करते हैं। इस प्रकार संवेगात्मक अभिव्यंजना एवं चेष्टाओं के बारे में विभिन्न सिद्धान्त स्थापित एवं खंडित हुए हैं, किन्तु अभी मनोवैज्ञानिक इनके सम्बन्ध में किसी सर्वमान्य निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाये हैं-अतः इस क्षेत्र में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से और खोज की आवश्यकता है। भाविाभिव्यंजक चेष्टाओं का वर्गीकरण-भाव या संवेग की प्ररणा से होने वाले विभिन्न शारीरिक व मानसिक परिवर्तनों व चेष्टाओं की व्याख्या करते हुए

२५-२६. सामान्य मनोविज्ञान : रामबाबू गुप्त, पृ० सं० ४२४ २७. वही; पृ० सं० ४२४-५

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अनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २८५

मनोवैज्ञानिकों ने उन्हें अनेक वर्गों में विभक्त किया है। डॉ० एस० एस० माथुर ने सभी प्रकार के परिवर्तनों को मुख्यतः तीन वर्गों में प्रस्तुत किया है८-(१) चेतना में परिवर्तन (२) बाह्य व्यवहार में परिवर्तन और (३) आन्तरिक क्रियाओं में परिवर्तन। चेतना सम्बन्धी परिवर्तनों में मुख्यतः व्यक्ति की स्मृति का क्षीण पड़ जाना, तर्क-शक्ति का कुठित हो जाना, संकल्प शक्ति का निर्बल हो जाना, क्रिया-कलापों पर बौद्धिक नियंत्रण का न रह पाना, मनोदशा के अनुसार ही वस्तु का एकांगी बोध प्राप्त करते हुए असंगत कार्य कर बैठना, अनैच्छिक क्रियाओं का प्रधान हो जाना-आदि का उल्लेख किया गया है९, जबकि दूसरे वर्ग में उन परिवर्तनों को लिया गया है जो बाह्य व्यवहार में भी दृष्टिगोचर होते हैं। इसके भी तीन उपभेद किये गये हैं-(क) मुखमंडलीय प्रकाशन या मुखाकृति में परिवर्तन; जैसे-मुह बना लेना, भौंहों का चढ़ जाना, होठों का फड़कने लगना, चेहरे का रंग बदल जाना, सिर पर पसीना आने लगना आदि।1 (ख) वाणी में परिवर्तन; जैसे-रोना, चिल्लाना, हँसना, जोर से बोलना, कराहना, स्वर में उतार-चढ़ाव या गंभीरता; जल्दी-जल्दी बोलना या बहुत कम बोलना आदि। (ग) शारीरिक मुद्रा में परिवर्तन; इनमें विभिन्न संवेगात्मक शारीरिक चेष्टाओं एवं मुद्राओं को लिया जाता है ; जैसे-'जब हम क्रोधित होते हैं तो तन कर खड़े हो जाते हैं हाथों को इधर-उधर फैंकने लगते हैं। भयभीत होने लगते हैं तो दुबक कर बैठ जाते हैं। प्रसन्न होते हैं तो हमारा सीना तन जाता है और सिर ऊँचा उठ जाता है। दुःखी होने पर हमारा सारा शरीर झुक जाता है। किन्तु यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि सभी व्यक्ति एक-जँसी ही चेष्टाएँ नहीं करते। एक व्यक्ति भयभीत होकर भागता है तो दूसरा किंकर्तव्यविमूढ़ होकर बैठ जाता है। यह अन्तर निश्चय ही व्यक्ति की मानसिक एवं चारित्रिक प्रवृत्तियों के अनुसार होता है। इसी प्रकार विभिन्न स्थानों, देशों, जातियों एवं संस्कृतियों में भी संवेगात्मक अभिव्यक्ति के बाह्य रूपों या मुद्राओं में परस्पर थोड़ा-बहुत अन्तर मिलता है ; जसे कहीं लोग भातृत्व भाव के कारण गले मिलते हैं, कहीं हाथ मिलाते हैं तो कहीं चुम्बन लेते हैं। अतः बाह्य मुद्राओं में देश-काल एवं संस्कृति के अनुसार भी अन्तर संभव है। तीसरे वर्ग में आन्तरिक क्रियाओं के परिवर्तन को लिया जाता है। इनका अध्ययन व निरीक्षण बाह्य रूप में संभव नहीं, इसलिए मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार के यंत्रों-न्यूमोग्राफ, फिग्मोमानोमीटर, प्लीथस्मोग्राफ, इलेक्ट्रोकाडियाग्राफ, साइकोगेलवानो मीटर आदि-की सहायता से इनका ज्ञान प्राप्त किया है। इस वर्ग

२८. सामान्य मनोविज्ञान ; डॉ० एस० एस० माथुर ; पृ० स० १६६ २९. वही, पृ० स० १६७ ३०. वही ; पृ० स० १६७ ३१. वही, पृ० स० १६८

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२८६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

के अन्तर्गत मुख्यतः इन परिवर्तनों को लिया जाता है९-(१) साँस की गति में परिवर्तन (२) हृदय की गति में परिवर्तन (३) नाड़ी की गति में परिवर्तन (४) रक्त-संचार में परिवर्तन (५) रक्तचाप में परिवर्तन (६) रक्त के रासायनिक तत्त्वों में परिवर्तन (७) पाचनक्रिया में परिवर्तन (८) त्वक-प्रतिक्रिया में परिवर्तन। (९) ग्रथियों की क्रियाओं में परिवर्तन। इन परिवर्तनों के कारण ही व्यक्ति का चंचल या निष्क्रिय हो जाना साँस की गति का तेज या मंद हो जाना, हृदय की गति का धीमा पड़ जाना, भूख का मंद हो जाना या न लगना, रोंगटे खड़े हो जाना, शरीर में रोमांच या सिहरन उत्पन्न होना, पसीना आना, अश्र-मोचन होना-आदि प्रक्रियाए सम्पन्न होती हैं। अस्तु, मनोविज्ञान के अनुसार संवेगात्मक उद्वलन के कारण न केवल बाह्य रूप में गोचर होने वाले परिवर्तन होते हैं, अपितु आन्तरिक रूप में भी शरीर के प्राय; सभी संस्थानों में इस प्रकार के परिवर्तन होते हैं जिन्हें यंत्रों की सहायता के बिना जानना या समझना कठिन है।

लोक-व्यवहार एवं कला के क्षेत्र में संवेगात्मक अभिव्यंजना का कितना महत्त्व है; इस प्रश्न पर विचार करते हुए वुडवर्थ महोदय ने स्पष्ट किया है कि सभ्यता एवं संस्कृति के विकास के साथ-साथ हम अपनी अनेक संवेगात्मक चेष्टाओं को नियंत्रित करना सीखते जाते हैं, क्योंकि अनेक अनुभावों का उन्मुक्त प्रदर्शन सभ्य समाज में ठीक नहीं समझा जाता ; इसीलिए एक प्रौढ़ व्यक्ति की अपेक्षा एक बालक की संवेगात्मक चेष्टाए अधिक सरल, स्पष्ट एवं सहज होंगी। किन्तु इसके विपरीत कला और अभिनय के क्षेत्र में संवेगात्मक चेष्टाओं का उत्तरोत्तर विकास होता जा रहा है क्योंकि उसमें इनके माध्यम से ही भावों का प्रदर्शन या बोध प्रस्तुत किया जाता है। वस्तुतः अभिनय कला में तो चेष्टाओं, मुद्राओं, स्वर, वाणी, नाद आदि के माध्यम से ही बहुत-कुछ व्यक्त किया जाता है ; अतः वहाँ इन्हें 'भावों की भाषा' भी कह दिया जाय तो अनुचित न होगा।१ वस्तुतः कलाकार की सफलता ही संवेगात्मक अभिव्यक्तियों के प्रस्तुतीकरण की सफलता में निहित है-हमारे विचार में यह बात न केवल अभिनय-कला पर अपितु अन्य कलाओं पर भी लागू होती हैं, यह दूसरी बात है कि

३२. सामान्य मनोविज्ञान : डॉ० एस० एस० माथुर ; पृ० स० १७० 33. "There is a language of the emotions, composed of gestures and postures, of exclamations and inflexions. and tones of the voices and of facial expressions .. ..... Actors appropriate it to a large extent ....... the result is that this language of the emotions is much more expressive than the average adults facial and vocal behaviour during emotion." -Psychology : Woodworth ; page 351

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उनमें इनके प्रस्तुतीकरण का माध्यम अभिनय न होकर शब्द, रेखा, ध्वनि आदि कोई और हो। आचार्य भारत ने अपने नाट्य-शास्त्र में कदाचित् इसलिए इनका विवेचन विश्लेषण अत्यन्त विस्तार से किया है। अन्त में हम यहाँ अनुभावों या भावाभिव्यंजक चेष्टाओं के मनोवैज्ञानिक अध्ययन से उपलब्ध-निष्कर्षों को सूत्र-रूप में प्रस्तुत करते हैं- • मनोविज्ञान के अनुसार भावों के अध्ययन में भावाभिव्यंजक चेष्टाओं एवं परिवर्तनों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। सामान्य रूप में इन्हें 'सांवेगिक अभिव्यंजना (Emotional expression) कहा जाता है। • इन सांवेगिक अभिव्यंजना-प्रकारों के माध्यम से एक ओर तो व्यक्ति भावों को सूचित या व्यक्त करता है तो दूसरी ओर अन्य लोग इनके द्वारा भावों का बोध भी प्राप्त करते हैं। • कुछ सांवेगिक अभिव्यंजनाएँ अकृत्रिम एवं सहज होती हैं तो कुछ ऐच्छिक या यत्नज। · भावाभिव्यंजक चेष्टाओं के स्रोत एवं प्रयोजन के बारे में मनोविज्ञान में अनेक सिद्धान्त प्रचलित हैं; यथा- (क) डारविन के मतानुसार पूर्व मानव-युग में प्राणी भाषा के स्थान पर इनसे कार्य चलाता था, उसी के परम्परागत संस्कार के रूप में आज भी मनुष्य इनका प्रयोग करता है। (ख) जेम्स एवं लेंगे नामक विद्वानों का सिद्धान्त है कि ये चेष्टाएँ भाव-प्रेरित नहीं होती अपितु इन चेष्टाओं के कारण भाव उद्दीप्त या अनुभूत होता है। पर यह सिद्धान्त खंडित हो चुका है। (ग) कैनन तथा बार्ड के सिद्धान्त के अनुसार भावानुभूति एवं भावाभिव्यंजक चेष्टाएँ दोनों एक-दूसरे से स्वतंत्र या पृथक हैं तथा वे एक साथ ही हाइपोर्थलेमस (Hypothalamus) के माध्यम से उद्दीप्त होती हैं। यह सिद्धान्त आंशिक सत्य को प्रस्तुत करता है। (घ) लीपर के सिद्धान्त के अनुसार संवेगात्मक अभिव्यक्तियों या चेष्टाओं का लक्ष्य व्यक्ति को परिस्थिति के अनुकूल आचरण के लिए प्रेरित करता है। (ङ) सक्रियकरण सिद्धान्त के अनुसार संवेगात्मक अभिव्यक्तियों का सम्बन्ध व्यक्ति के किसी एक अंग से नहीं अपितु उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की सक्रियता से है। • भावाभिव्यंजक चेष्टाओं का वर्गीकरण मुख्यतः तीन वर्गों में किया गया है-(१) चेतना सम्बन्धी परिवर्तन। (२) बाह्य व्यवहार सम्बन्धी चेष्टाए एवं (३) आन्तरिक परिवर्तन।

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२८८ रस-सिद्धान्तों का पुनर्विवेचन

• अनुभावों का तुलनात्मक अध्ययन- अनुभावों के सम्बन्ध में पूर्वोवक्त रस-सैद्धान्तिक एवं मनोवैज्ञानिक निष्कर्षों पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार करने से यह भली-भाँति स्पष्ट हो जाता है कि दोनों प्रकार के निष्कर्षों में परस्पर गहरा साम्य है; रस-सद्धान्तिक आचार्यों एवं मनो- वैज्ञानिक शोध-कर्त्ताओं-दोनों ने ही अनुभावों या भावों की आंगिक अभिव्यंजना को भावों के अध्ययन, विवेचन एवं विश्लेषण की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना है। साथ ही दोनों के द्वारा निरूपित लक्षणों में गहरी समानता मिलती है; दोनों ही वर्गों के विद्वानों ने अनुभावों को भाव के परवर्ती, भाव के सूचक एवं भावाभिव्यक्ति के प्रकृत माध्यम के रूप में स्वीकार किया है। मनोविज्ञान के कुछ विद्वानों को- जिनमें जेम्स एवं लेंगे का नाम उल्लेखनीय है, यह भ्रान्ति अवश्य हुई कि अनुभाव भाव के परवर्ती या अनुवर्ती न होकर उसके पूर्ववर्ती है, किन्तु अब इस भ्रान्ति का निराकरण भली-भाँति हो गया है; अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि अनुभाव भाव के व्यक्त रूप के सूचक हैं। कैनन-बार्ड का हाइपोथलेमस-सिद्धान्त दोनों को स्वतन्त्र मानता है; किन्तु इस सिद्धान्त में सत्य इतना ही है कि जिस हाइपोथैलेमस की प्रत्रिया से भावानुभूति होती है, तत्क्षण उसी की प्रक्रिया से आंगिक चेष्टाएँ होती हैं; किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं होता कि एक का दूसरी से कोई सम्बन्ध नहीं है। क्या बिना आंगिक अभिव्यक्ति के भावोद्दीपन या बिना भावोद्दीपन के आंगिक परिवर्तन संभव है ? हमारे विचार में ये दोनों प्रक्रियाएँ इतनी सूक्ष्म एवं तात्कालिक हैं कि उनके पारस्परिक सम्बन्ध को भले ही यंत्रों के माध्यम से अभी नहीं देखा जा सका हो, किन्तु लोक-व्यवहार में इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उपलब्ध है, अर्थात् प्रेम, क्रोध, घृणा, आश्चर्य, भय आदि की अभिव्यक्ति में की जाने वाली विभिन्न चेष्टाओं में परस्पर इतना अन्तर है कि उन चेष्टाओं को देखकर ही सम्बन्धित भाव का बोध हो जाता है। अतः कैनन-बार्ड के सिद्धान्त को अभी अपूर्ण ही समझा जाता है जो ठीक ही है। भावाभिव्यंजक चेष्टाओं के स्रोत एवं प्रयोजन के बारे में रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने विचार नहीं किया है, पर सामान्यतः लौकिक दृष्टि से इन्हें कार्य कहा गया है जो इस बात का सूचक है कि हमारी विभिन्न भावानुभूतियों की अभिव्यक्ति अन्ततः कार्य-रूप परिणत होती है। ध्यान रहे रस-संद्धान्तिक अनुभावों का सम्बन्ध केवल संचारी भावों या मनोविज्ञान के 'संवेगों' (Emotions) से ही नहीं है, अपितु स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों-जिन्हें मनोविज्ञान में सहजप्रवृत्ति, मनोवृत्ति, भावना आदि रूपों में स्वीकार किया जाता है)-से है; अतः संवेगों या संचारी भावों की अभिव्यक्ति जहाँ क्षणिक चेष्टाओं व शारीरिक-मानसिक परिवर्तनों के रूप होती है, वहाँ स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति दीर्घकालीन क्रिया-कलापों के रूप में होती है; जिन्हें लौकिक क्षेत्र में 'कार्य' तथा मनोविज्ञान में 'ऐच्छिक कर्म' कहा जाता है। उदाहरण के लिए, जायसी के 'पद्मावत' में रत्नसेन प्रणय स्थायी भाव की प्रेरणा से

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अनुभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २८९

घर त्याग कर नदी और पहाड़ों को पार करता हुआ, अनेक कष्ट सहन करता हुआ, विभिन्न प्रयत्नों से पद्मावती को प्राप्त करने का कार्य सम्पादित करता है-इस प्रसंग में रत्नसेन ने जो भी छोटे-बड़े यत्न किये एवं कष्ट उठाये, वे सब उसके प्रणय-भाव से ही प्रेरित एवं उसी की दढ़ता एवं सबलता के द्योतक हैं जिनसे पाठक या दर्शक को भी उसकी भावना की गंभीरता का परिचय मिलता है; ऐसी स्थिति में क्या इन सब चेष्टाओं, प्रयत्नों एवं क्रिया-कलापों को उसके प्रणय भाव के व्यंजक या सूचक अनुभावों के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता ? इसी प्रकार राम सीता की प्राप्ति के लिए समुद्र पर पुल बाँधने से लेकर रावण का संहार कर देने तक भाँति-भाँति के जो कार्य संपादित करते हैं, उन सबके मूल में उनकी सीता के प्रति प्रणय भावना या रघुकुल की मर्यादा बचाने की कर्त्तव्य-भावना अथवा आततायी को दंड देने का उत्साह अथवा पत्नी से वंचित करने वाले शत्रु से प्रतिशोध की भावना-इनमें किसी न किसी भावना या स्थायी भाव की सबल प्रेरणा एवं अभि- व्यक्ति को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। यहाँ हमने भावनाओं के अनेक भेदों का उल्लेख इसलिये किया है कि कवि अपने दृष्टिकोण से राम-रावण-युद्ध की व्याख्या किसी भी रूप में कर सकता है; कोई राम को कर्त्तव्य भाव से प्रेरित मान सकता है तो कोई उनके प्रेरणा-स्रोत के रूप में प्रणय भाव, उत्साह भाव या द्वेषभाव को चित्रित कर सकता है। अस्तु, कवि उन्हें कोई भी रूप दे किन्तु उनके विभिन्न प्रयत्नों, क्रिया-कलापों या कार्यों के मूल में किसी न किसी स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति की प्रेरणा उसे अवश्य दिखानी होगी-अन्यथा सारा आयोजन यांत्रिक एवं निरर्थक प्रतीत होगा। यह बात न केवल रत्नसेन एवं राम के प्रसंग में लागू होती है, अपितु प्रत्येक काव्य, नाटक, उपन्यास आदि के पात्रों तथा लौकिक क्षेत्र में जन- सामान्य पर भी लागू होती है। यदि विश्लेषणात्मक दृष्टि से देखा जाय तो प्रत्येक व्यक्ति के प्रत्येक कार्य के मूल में किसी न किसी स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति की न्यूनाधिक प्रेरणा अवश्य परिलक्षित होगी; इसी प्रेरणा-शक्ति को मनोविज्ञान में अलग से प्रेरणा या अनुप्रेरणा (Motivation) को संज्ञा दी गयी है। डॉ० एस०एस० माथुर के अनुसार मनोविज्ञान में अनुप्रेरणा का अत्यधिक महत्त्व है, क्योंकि अनुप्रेरणाओं को समभे बिना मानव-व्यवहार की तर्क-संगत व्याख्या करना सम्भव नहीं। एक व्यक्ति किसी भी समय कोई विशेष प्रकार का व्यवहार करता है, उसका यदि हम मनोवैज्ञानिक दृष्टि से कारण खोजना चाहें तो हमारे लिए सर्वप्रथम यह जानना आवश्यक हो जायगा कि उसने किस अनुप्रेरणा के वशीभूत होकर वैसा क व्यवहार किया।8 इसीलिए मनोवैज्ञानिकों ने अनुप्रेरणा की परिभाषा करते हुए लिखा है-'प्राणी के व्यवहार को परिचालित करने वाली जन्मजात एवं अजित वृत्तियों

  • से ३४. सामान्य मनोविज्ञान: डॉ० एस० एस० माथुर; पृ० १३३

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२९० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन को प्रेरक कहते हैं।१4 इसके स्वरूप को और स्पष्ट करते हुए रामबाबू गुप्त ने लिखा है -- 'प्रेरक (Motive) वह अन्तरवृत्ति है जो कि प्राणी में क्रिया (कार्य ?) को उत्पन्न करती है। यह इस क्रिया को तब तक जारी रखता है जब तक कि उसके उद्देश्य की पूर्ति न हो जाय।"६ इन प्रेरकों या अनुप्रेरणाओं में मनुष्य की प्रायः सभी सहज प्रवृत्तियों, भावनाओं, चारित्रिक प्रवृत्तियों, वैयक्तिक एवं सामाजिक आकांक्षाओं-आदि उन सभी प्रवृत्तियों को सम्मिलित किया जाता है जिन्हें हम सामूहिक रूप में स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों का नाम दे चुके हैं। अस्तु, उपयुक्त्त विवेचन से स्पष्ट है कि जिस प्रकार हमारे संचरणशील (संचारी) क्षणिक संवेगों की अभिव्यक्ति विभिन्न अल्पकालीन शारीरिक परिवर्तनों व चेष्टाओं में होती है, उसी प्रकार हमारी दीर्घकालीन स्थिर मनोवृत्तियों या स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति विभिन्न क्रिया-कलापों, कार्यों एवं व्यवहारों के रूप में होती है। इनमें अनुभावों के सभी लक्षण मिलते हैं तथा आचार्यों ने इन्हें 'कार्य' के रूप में तथा वुडवर्थ आदि मनोवैज्ञानिकों ने 'ऐच्छिक कर्म' के रूप में अनुभावों के अन्तर्गत स्थान दिया है-अतः हमारे विचार में अनुभावों का मूल प्रयोजन विभिन्न परिस्थितियों के अनुसार व्यक्ति की उद्दीप्त प्रवृत्तियों एवं भावनाओं की अभिव्यक्ति एवं संतुष्टि में योग देना भी मान लिया जाय तो अनुचित न होगा। साथ ही हमारा यह भी प्रस्ताव है कि कला एवं साहित्य की विषय वस्तु का रस सैद्धान्तिक दृष्टि से विश्लेषण करते समय आश्रय के विभिन्न प्रयत्नों, क्रिया-कलापों व कार्य-व्यवहारों को भी स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति के 'अनुभाव' के रूप में स्वीकार किया जाय। उपर्युक्त स्थिति में अनुभावों के दो प्रमुख वर्ग हो जायेंगे-एक में मूल स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति से प्रत्यक्ष रूप में सम्बन्धित 'ऐच्छिक कर्मों' को स्थान दिया जायगा जब कि दूसरे वर्ग में संचारी भाव या संवेग से सम्बन्धित क्षणिक या अल्प- कालीन चेष्टाओं को रखा जा सकता है। वुडवर्थ ने भी प्रथम प्रकार की चेष्टाओं को 'यत्नज' एवं 'ऐच्छिक' विशेषण से तथा द्वितीय प्रकार को 'अयत्नज' या 'सहज' के विशेषण से भूषित किया है, जिससे हमारे वर्गीकरण की भी पुष्टि होती है। संचारी भावों से सम्बन्धित सहज चेष्टाओं एवं परिवर्तनों को रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने क्रमशः आंगिक, वाचिक, मानसिक, सात्त्विक, आहार्य आदि वर्गों में वर्गीकृत किया गया है जबकि मनोवैज्ञानिकों ने इनके मुख्यतः तीन ही प्रकार माने हैं- (१) चेतना सम्बन्धी परिवर्तन,। (२) बाह्य व्यवहार सम्बन्धी परिवर्तन एवं (३) आन्तरिक परिवर्तन। किन्तु इन्हीं तीनों प्रकार के परिवर्तनों के अन्तर्गत जिन क्रियाओं एवं तत्त्वों की विवेचना की गयी है, उन्हें देखते हुए कहा जा सकता है कि ३५. सामान्य मनोविज्ञानः रामबाबू गुप्त पृ० १५७ ३६. सामान्य मनोविज्ञान : रामबाबू गुप्त, पृ० १५७

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अनुभाव का मनोवज्ञानिक विवेचन २९१

इनके अन्तर्गत रस-सद्धान्तिक भेदों में से 'आहारय' (वेशभूषा) को छोड़कर शेष सभी समाविष्ट हो जाते हैं; यथा-चेतना सम्बन्धी परिवर्तनों में स्मृति का कुठित होना, एकांगी बोध, भ्रम आदि मानसिक क्रियाओं को स्थान दिया गया है जो रस-सैद्धान्तिक आचार्यों के मांनसिक अनुभावों के द्योतक हैं। इसी प्रकार द्वितीय वर्ग में मुख मंडलीय प्रकाशन, शारीरिक मुद्राओं में परिवर्तन, वाणी में होने वाले परिवर्तन आदि को लिया गया है जिनमें सभी आंगिक एवं वाचिक अनुभाव आ जाते हैं। तीसरे वर्ग में श्वास, रक्तचाप, स्वेद, अश्र आदि से सम्बन्धित नौ प्रकार के आन्तरिक परिवर्तनों का समावेश किया गया है। जो सात्त्विक अनुभावों के अनुरूप हैं। सात्त्विक अनुभावों में जहाँ अश्र, स्वेद, कम्प, स्तम्भ आदि प्रकट लक्षणों को ही ध्यान में रखा गया है, वहाँ मनोवज्ञानिकों ने लक्षणों के मूल में कार्य करने वाले विभिन्न संस्थानों की व्याख्या शरीर-विज्ञान की शब्दावली में प्रस्तुत को है। अस्तु, सामान्य रूप में आंगिक, वाचिक, मानसिक एवं सात्त्विक अनुभाव उत्तरोत्तर सूक्ष्मता एवं गम्भीरता के द्योतक हैं जो क्रमशः मनोविज्ञान के शारीरिक, वाचिक, चेतना सम्बन्धी एवं आन्तरिक परिवर्तनों के अनुरूप हैं। अतः रस-सैद्धान्तिक आचार्यों का अनुभाव-विवेचन आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से भी संगत सिद्ध होता है; इतना अवश्य है कि मध्यवर्ती युग के आचार्यों ने केवल शृंगार-रस की दृष्टि से अनुभाव के भेदोपभेदों में जो विस्तार किया है, उसे सामान्य रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती-प्रणय भावना के विशेष संदर्भ में भले ही वे महत्त्वपूर्ण सिद्ध हों। लोक-व्यवहार, कला, साहित्य एवं अभिनय में भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से अनुभावों का महत्त्व अत्यधिक है-इस तथ्य को भी दोनों पक्षों ने समान रूप में स्वीकार किया है। • निष्कर्ष- अन्त में निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि रस-सैद्धान्तिक आचार्यों का अनुभाव विवेचन रस के अन्य अवयवों की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक संगत एवं वैज्ञानिक है। इतना अवश्य है कि यदि अनुभावों के परम्परागत क्षेत्र से मध्यकालीन आचार्यों द्वारा किये गये अनावश्यक भेदोपभेदों को त्याग कर, उसमें आंगिंक, वाचिक सात्त्विक आदि विकारों के अतिरिक्त विभिन्न स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों से सम्बन्धित क्रिया-कलापों, कार्यों एवं व्यवहार-भेदों को भी स्थान दे दिया जाय तो इससे निश्चय में ही रस-सिद्धान्त के स्वरूप को अधिक व्यापकता प्राप्त हो सकेगी। वस्तुतः काव्य, ने नाटक; उपन्यास आदि में पात्रों के द्वारा सम्पादित होने वाले विभिन्न क्रिया-कलापों वं का स्थायी भाव एवं रस से सम्बन्ध स्थापित किये बिना न तो उनकी ही मीमांसा हो न पाती है और न ही इससे रस-सैद्धान्तिक व्याख्या में परिपूर्णता आ पाती है-अतः क दोनों ही दृष्टियों से यह आवश्यक है कि साहित्य में चित्रित क्रिया-कलापों एवं कार्यों को भी अनुभाव के रूप में स्थायी भाव एवं रस से सम्बन्धित किया जाय जोकि रस-सैद्धान्तिक आचार्यों के भी मंतव्य के प्रतिकूल नहीं है।

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पंचम खंड रस-सिद्धान्त: संशोधन और पुनर्निर्माण

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१ रस-सिद्धान्त का पुनर्निर्माण : क्यों त्रपरौर कैसे ?

सृष्टि के विकास का यह नियम है कि परिवर्तित परिस्थितियों में प्रकृत शक्ति या परम्परागत वस्तु अपना स्वरूप परिवर्तित कर लेती है ; यदि वह ऐसा नहीं करती तो नष्ट होकर काल के गाल में समा जाती है। परिस्थिति और वातावरण के थपेड़ों को सहन करने के लिए प्रकृति और शक्ति को अपनी स्थिति एवं गति में ऐसा परिवर्तन करना पड़ता है जिससे कि वह परिस्थितियों की प्रतिकूलता एवं वातावरण के विरोध का सामना करने में सक्षम हो सके; इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए वह दो प्रकार के प्रयास करती है-एक तो अपनी आन्तरिक शक्ति को जाग्रत, उद्वलित एवं व्यक्त करके अपनी क्षमताओं का विस्तार करती है; दूसरे आन्तरिक शक्ति की अभिव्यक्ति के साथ-साथ अपने बाह्य द्रव्य एवं रूप में भी इस प्रकार के परिवर्तन करती है जिससे कि वह अपनी बढ़ी हुई क्षमताओं को सँभाल सके, उसे सुव्यवस्थित एवं सुनियोजित कर सके; हो सकता है ऐसा करने के प्रयास में जिस अंग या पक्ष को वह पहले बहुत महत्त्व देती थी, उसी को अब गौण एवं उपेक्षणीय कर दे और यदि यह स्थिति दीर्घकाल तक रही तो यह भी संभव है कि उपेक्षणीय एवं अनुपयोगी अंग सदा के लिए उससे वियुक्त हो जाय। वन-मानुष से आदमी बनने की प्रक्रिया भी इसी प्रकार के प्रयास की कहानी है ; जिसे हम वैज्ञानिक शब्दावली में 'विकास-क्रम का सिद्धान्त' कहते हैं। भौतिक विज्ञान, जीव-विज्ञान एवं मनोविज्ञान-इन सभी क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुशीलन से प्रमाणित हो चुका है कि सृष्टि में सभी तत्त्व परिवर्तनशील हैं ; पर साथ ही कोई भी तत्त्व या तत्त्वों का समूह-द्रव्य-अपने-आप में सर्वथा नूतन या पूर्ववर्ती तत्त्व से सर्वथा निरपेक्ष भी नहीं है। विज्ञान का यह यूनिवर्सल सिद्धान्त है कि

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२९६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

सृष्टि में कभी भी सर्वथा नूतन द्रव्य उत्पन्न नहीं किया जा सकता-जिसे हम नूतन कहते हैं, वह वस्तुतः नूतन न होकर किसी न किसी पुरातन तत्त्व का ही संशोधित, परिवर्तित या विकसित रूप होता है। उदाहरण के लिए जिसे हम 'नयी कुर्सी' कहते हैं, वह वस्तुतः किसी पुरानी लकड़ी का ही नया 'रूप मात्र' होता है ; और वह पुरानी लकड़ी भी किसी पुराने पेड़ की शाखा मात्र तथा वह पुराना पेड़ किसी पुराने बीज का स्फुट एवं विकसित रूप मात्र है। अस्तु, शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टि से सृष्टि का अर्थ ही है-विभिन्न तत्त्वों का एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तन। जिसे हम नूतन सृष्टि कहते हैं, वह विज्ञान की शब्दावली में 'रूप-परिवर्तन' या 'रूपान्तरण' मात्र है ; तथा साथ ही यह भी निश्चित है कि प्रत्येक रूप प्रत्येक स्थिति में अन्ततः अस्थायी, अस्थिर, परिवर्तनशील एवं नाशवान है। कदाचित् इसी सत्य को हृदयंगम करते हुए हमारे दार्शनिकों ने सृष्टि या जगत् को मिथ्या घोषित करते हुए उसे 'रूपात्मक प्रतीति' या 'मायाजाल' मात्र बताया था। उपयुक्त निष्कर्ष केवल भौतिक पदार्थों पर ही नहीं, जैविक एवं मनोवैज्ञानिक क्षेत्र के भी प्रत्येक अवयव या तत्त्व पर लागू होता है। साहित्य और साहित्य-शास्त्र भी उसका अपवाद नहीं है। प्रत्येक काव्य-धारा एवं चिन्तन-परम्पराअपनी अन्तर्निहित शक्ति के अनुसार वातावरण और परिस्थितियों के द्वन्द्व से प्रेरित एवं उद्दीप्त होकर आगे बढ़ती है या विकसित होती है, किन्तु जब वह इस द्वन्द का सामना करने में अक्षम होकर उससे विरत हो जाती है तो वह स्थिर, जड़ एवं रूढ़ स्वरूप को प्राप्त करके अतीत की वस्तु बन जाती है। प्रत्येक शास्त्र एवं प्रत्येक सिद्धान्त का भाग्य भी इसी तथ्य में निहित है कि परिस्थितियों की प्रतिकूलता से निपटने या ट्वायनबी के शब्दों में 'नयी चुनौतियों का सामना करने' में वह कहाँ तक सक्षम सिद्ध होता है? अवश्य ही उसकी यह क्षमता उसकी अन्तर्निहित शक्ति की मात्रा पर निर्भर होती है, क्योंकि वह अपनी इस अप्रयुक्त शक्ति को ही आवश्यकतानुसार क्षमता या सक्रिय शक्ति में परिवर्तित करता है, किन्तु जिसके पास शक्ति का भंडार ही सीमित है, या जिसकी आधारभूत शक्ति ही अल्प है- वह चाहे तो भी अपेक्षित क्रियात्मक क्षमता के रूप के विकास में समर्थ नहीं हो पाता। यही कारण है कि जिस व्यक्ति, समाज, संस्कृति, साहित्य या शास्त्र की सम्पूर्ण शक्ति का परिवर्तन, विकास या अभिव्यंजन क्षमताओं में हो चुकता है तो वह गतिशून्यता, निष्क्रियता एवं जड़ता की स्थिति को प्राप्त करके अपना जीवन-काल समाप्त कर लेता है ; वैज्ञानिक दृष्टि से इसे हम 'विकास की एक आवृत्ति को पूर्ण कर लेना' कह सकते हैं ; क्योंकि जिस प्रकार जगत् में कभी भी किसी नये द्रव्य का सर्जन नहीं होता, उसी प्रकार उसका समूल नाश भी कभी नहीं होता। अब यदि हम उपयुक्त दृष्टिकोण से भारतीय साहित्य-शास्त्र पर विचार करें तो ज्ञात होगा कि उसमें विभिन्न सिद्धान्त स्थापित हुए हैं, किन्तु वे अपनी