Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २३५

(घ) वे स्थायीभाव रूपी सूत्र में कोई प्रभाव उत्पन्न नहीं कर सकते या स्थायी भाव पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता जबकि वो स्वयं स्थायी भाव पर आश्रित रहते हैं। (ङ.) वे स्वयं को तथा स्थायी भाव को अपने रंग-रूप के माध्यम से प्रकाशित करते हैं; पर-कहीं स्थायी भाव अपने मूल रूप में भी प्रकाशित हो जाता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि अभिनवगुप्त ने संचारी भावों की अनेक सूक्ष्म विशेषताओं का उद्घाटन करते हुए स्थायी भाव से उनके पार्थक्य को भली-भाँति स्पष्ट किया है। परवर्ती आचार्यों ने प्रायः इन्हीं विशेषताओं का पिष्टपेषण किया है, किन्तु कुछ ने मौलिक दृष्टि का भी परिचय दिया है। यथा, आचार्य हेमचन्द्र ने 'काव्यानुशासन' में संचारी की विशेषताओं में 'स्थायीधर्मोपजीवनेन स्वधर्मार्पणेन' अर्थात् स्थायी भावों के धर्म पर आश्रित होने, अपने धर्म को अर्पित कर देने (स्वधर्म से शून्य) का भी उल्लेख किया है, जिसका तात्पर्य कदाचित् यही है कि उनकी स्थायी से पृथक कोई स्वन्तन्त्र सत्ता नहीं होती। रस प्रदीपकार ने संचारी भावों को स्थायी भाव का उपकारक एवं गतिकारक बताया है तो काव्य प्रकाशकार ने इन्हें स्थावी भाव का सहकारी माना है। इसी प्रकार रसतरंगिणीकार भानुदत्त के विचार से ये एक ही रस पर सदा अवस्थित नहीं रहते वरन् अनेक रसों में संचार करते रहते हैं; इसीलिए इन्हें संचारी या व्यभिचारी कहा जाता है। अस्तु, ये सभी लक्षण क्रमशः संचारी की स्वधर्मशून्यता, परतन्त्रता, सहकारिता, अनेको- न्मुखता को सूचित करते हैं। आधुनिक युग के अनेक आचार्यों ने इन पर पुनर्विचार करते हुए इनकी नयी व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। पं० रामदहिन मिश्र के अनुसार 'संचरण- शील' अर्थात् अस्थिर मनोविकारों या चित्तवृत्तियों को संचारी भाव कहना चाहिए जब कि आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने विस्तृत विवेचना के अनन्तर यह निष्कर्ष प्रति- पादित किया है कि जहाँ स्थायी भावों का काव्य में साधारणीकरण हो जाता है वहाँ संचारियों का नहीं होता। उनके शब्दों में 'जो भाव ऐसे हैं जिन्हें किसी भी पात्र को प्रकट करते देख या सुनकर दर्शक या श्रोता भी उन्हीं भावों का-सा अनुभव कर सकते हैं वे तो प्रधान भावों में रखे गये हैं, शेष भाव और मन के वेग संचारियों में डाले गये हैं।१ इसे वे और स्पष्ट करते हुए लिखते हैं-'प्रधान भावों की गिनती में वे ही भाव रखे गए हैं जिनके आलम्बन 'सामान्य' हो सकते हैं। शेष भाव या मनो- वेग संचारियों की श्रेणी में डाले गए हें क्योंकि उनमें से किसी-किसी के स्वतन्त्र विषय होंगे भी तो भी श्रोता या दर्शक का ध्यान उनकी ओर प्रवृत्त नहीं रहेगा।"१

६. काव्य दर्पण, पृ० सं० ६७ ११. वही, पृष्ठ सं० २०५ १०. रसमीमांसा पृष्ठ सं० २०२,

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आचार्य शुक्ल की उपयुक्त धारणा सवथा नूतन होती हुई भी तर्क-संगत प्रतीत नहीं होती। जैसाकि पींछे स्थायीभाव के प्रसंग में विस्तार से स्पष्ट किया जा चुका है, यह मानना कि काव्य में केवल स्थायी का ही साधारणीकरण होता है, संचारी का नहीं-भ्रान्तिमूलक है। कल्पना कीजिए, एक नायिका अपने प्रिय के विरह में विषाद से ग्रस्त हो रही है या एकाएक प्रिय के आगमन से हर्ष- विभोर हो रही है-क्या ऐसी स्थिति में पाठक या सामाजिक उसके विषाद एवं हर्ष से तादात्म्य स्थापित नहीं करेगा ? क्या चित्रपट पर नायक-नायिका के पुनर्मिलन को देखकर दर्शक भी उल्लसित नहीं हो उठते ? क्या यहाँ रति भाव का ही साधारणीकरण होगा-हर्ष और विषाद का नहीं ? वस्तुत स्थायीभाव की अभि- व्यक्ति की प्रायः संचारियों के रूप में होती है, अतः यदि संचारियों का साधारणी- करण नहीं होता तो स्थायी का भी सम्भव नहीं। अस्तु, आचार्य शुक्ल द्वारा निरूपित उक्त लक्षण को स्वीकार करना उचित प्रतीत नहीं होता। • निष्कर्ष विभिन्न आचार्यों द्वारा निर्दिष्ट लक्षणों का अध्ययन कर लेने के अनन्तर अब निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि व्यभिचारी या संचारी भावों की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं- (क) वे विभिन्न प्रकार से प्रक्षक के सम्मुख स्थायी भावों को व्यक्त या प्रकाशित करते हैं। (ख) वे समुद्र-तरंग की भाँति (भरत) स्थायीभावों से ही उदबुद्ध होते हैं, और उन्हीं में विलीन हो जाते हैं; स्थायीभावों से पृथक या स्वतन्त्र रूप में उनकी कोई सत्ता नहीं है। (अभिनवगुप्त) (ग) वे स्थायीभावों की भाँति जन्मजात नहीं होते हैं और न ही विभावादि के अभाव में वे विद्यमान रह पाते हैं। (अभिनव गुप्त) (घ) वे उद्दीप्त एवं लुप्त होते रहते हैं। (अभिनवगुप्त) (ङ.) वे स्थायीभाव को प्रभावित नहीं करते अपितु स्वयं उस पर आश्रित रहते हैं। (अभिनवगुप्त) (च) स्थायी भाव का प्रकाशन सामान्यतः संचारी भावों के रूप में होता है। (अभिनवगुप्त) (छ) संचारी भावों में स्वधर्म शून्यता, परतन्त्रता, सहकारिता एवं अनेको- न्मुखता की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। (हेमचन्द्र, भानुदत्त प्रभृत्ति) (ज) संचारी भाव संचरणशील एवं अस्थिर मनोविकार या चित्तवृत्तियाँ हैं। (रामदहिन मिश्र)

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• मनोवैज्ञानिक दृष्टि से संचारी का विवेचन संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करते समय सर्वप्रथम यह विचारणीय है कि आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से इन्हें भावात्मक प्रवृत्तियों की किस श्रेणी स्थान दिया जाय ? जैसा कि अन्यत्र कहा जा चुका है, आधुनिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में भावात्मक प्रवृत्तियों के अनेक श्रेणी-भेद उपलब्ध हैं; यथा-(१) सहज प्रवृत्ति (instinct) (२) भावना (sentiment) (३) मनोवृत्ति (temperament) (४) भावा- त्मक दृष्टिकोण (attitude) (५) मनोदशा (mood) (६) मूलभाव (primary emotion) (७) मिश्रित भाव (complex emotion) (८) व्युत्पन्न भाव (derived emotion) (९) अनुभूति या भावानुभूति (feeling)। इस सूची में से सहज प्रवृत्ति स्वयं भावावेग-रूपी न होकर विभिन्न भावात्मक प्रवृत्तियों की मूलाधार है-इसीलिए इसे यहाँ स्थान दिया गया है। उपयुक्त सभी प्रवृत्तियों को भी दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-प्रथम, वे जो मानव मन में अत्यन्त दीर्घकाल तक स्थिर रहती हैं तथा द्वितीय वे जो अल्पकालीन या अस्थिर हैं। प्रथम वर्ग में सहज प्रवृत्ति भावना मनोवृत्ति एवं भावात्मक दृष्टिकोण को स्थान दिया जा सकता है क्योंकि इनका व्यक्ति के जीवन, व्यक्तित्व एवं चरित्र से इनका गहरा एवं दीर्घकालीन सम्बन्ध होता है; इसीलिए इनकी विवेचना पीछे स्थायीभाव के अन्तर्गत की जा चुकी है तथा वहाँ यह भी स्पष्ट किया जा चुका है कि इन चारों को सामूहिक रूप में रस-सैद्धान्तिक स्थायी भावों में भी स्थान दे दिया जाय तो अनुचित नहीं होगा। अतः यहाँ संचारी भावों के सम्बन्ध में केवल द्वितीय वर्ग की अल्पकालीन अस्थिर वृत्तियों-मनोदशा, मूलभाव, मिश्रित भाव, व्युत्पन्न भाव एवं अनुभूति-पर ही क्रमशः विचार किया जाता है। (क) मनोदशा-मनोदशा या मूड (mood) किसी भावावेग का स्थिर रहने वाला परवर्ती प्रभाव है। उदाहरण के लिए जब कोई व्यक्ति किसी कारण से क्रोधित होता है तो क्रोध प्रकट रूप में शान्त हो जाने पर भी उस व्यक्ति के मन में थोड़ी- बहुत चिड़चिड़ाहट, या क्षोभ की वृत्ति बहुत समय तक बनी रह सकती है, इसी मनः स्थिति को सामान्य भाषा में भी 'मूड' खराब होना कहा जाता है। वस्तुतः यह भावा वेग का ही अधिक विस्तृत एवं दीर्घकालीन रूप है। डॉ० जदुनाथ सिन्हा के अनुसार -'भाव मनोदशा के रूप में स्थिर रहता है। भाव मनोदशा का कारण है। मनो- दशा भाव की अपेक्षा कम तीव्र होती है किन्तु उसका स्थितिकाल अधिक दीर्घ होता है।' मनोदशा स्वयं भी कई बार भाव की उद्दीप्ति के लिए पृष्ठभूमि तैयार करती है। यदि एक व्यक्ति क्रोध या संताप की मनोदशा में है तो वह छोटो-छोटी बात पर उत्तजित या उद्दीप्त हो सकता है। इसी प्रकार जब व्यक्ति प्रसन्नतापूर्ण मनोदशा या मनःस्थिति में होता है तो उसके व्यवहार में भी अनुकूल परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है।

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मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनोदशा का परिवर्तन शारीरिक कारणों से भी सम्भव है। अस्वस्थता, रुग्णता, अनिद्रा, मद्यपान आदि कारणों से भी मनोदशाओं में विभिन्न प्रकार के परिवर्तन सम्भव हैं। अब यदि हम उपयुक्त विवेचन को ध्यान में रखकर विचार करें तो ज्ञात होगा कि आचार्योंद्वारा परिगणित तेतीस संचारियों में से दन्य गर्व, निर्वेद, त्रास अमर्ष, शंका, औत्सुक्य-सात को मनोदशाओं में स्थान दिया जा सकता है क्योंकि ये न तो भावावेग (emotion) की भाँति अत्यन्त तीव्र एवं चंचल होते हैं और न ही भावना की भाँति अत्यन्त दीर्घकाल तक स्थिर रहते हैं। वस्तुतः जब व्यक्ति के मन में किसी कारण से दैन्य, गर्व, अमर्ष आदि का संचार होता है तो कुछ समय तक वह मन ही मन इनमें डूबा रहता है। यह स्थिति भावावेग से अपेक्षाकृत दीर्घकालीन तो होती है किन्तु बाह्य उत्तजना इनमें उतनी तीव्र नहीं रहती। वस्तुतः ये संचारी व्यक्ति की उस मनःस्थिति या मनोदशा के परिचायक हैं, जो कुछ घंटों तक स्थिर रहती है। किन्तु ये जीवन में दीर्घकाल-महीनों या वर्षों तक-स्थिर नहीं रह पाते।१२ (ख) मूलभाव-मंक्डूगल महोदय ने भावों को तीन वर्गों में विभक्त किया है-(१) मूलभाव (Primary emotions) (२) मिश्रित भाव (Complex emot- ion) और (३) व्युत्पन्न भाव (Derived emotion) । इनमें से यहाँ केवल मूल भाव का ही विवेचन किया जाता है। उल्लेखनीय है कि 'प्राइमरी इमोशन्स' के लिये हिन्दी में अनेक शब्द प्रचलित हैं; यथा-मौलिक भाव, प्राथमिक भाव, स्वतंत्रभाव, मूल भाव आदि। हमारे विचार में इनके लिये 'मूलभाव' का प्रयोग करना अधिक उप- युक्त है। मूल भावों का सहज प्रवृत्तियों से सीधा सम्बन्ध माना जाता है, तथा मनो- वैज्ञानिकों के विचार से इन्हें अन्य भावात्मक अनुभवों को अपना अवयव बनाने की अपेक्षा नहीं रहती और न ही ये किन्हीं पूर्ववर्ती या अन्य भावानुभूतियों पर आश्रित रहते हैं। सामान्यतः प्रत्येक सहज प्रवृत्ति के साथ एक मूलभाव का भी घनिष्ठ सम्बन्ध माना जाता है। मूलभावों पर हम पीछे स्थायीभावों के प्रसंग में विचार कर चुके हैं, अतः यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि मनोवैज्ञानिकों ने मुख्यतः भय, क्रोध, प्रणय, घृणा, आश्चर्य वात्सल्य, हास्य आदि को मूलभावों के रूप में स्वीकार किया है जब कि रस-संद्धान्तिक आचार्यों ने इन्हें 'स्थायीभाव' की संज्ञा दी है। किन्तु इसका स्पष्टीकरण पीछे किया जा चुका है कि ये भाव स्वयं स्थायी भाव न होकर इनके मूल में निहित सहज प्रवृत्ति (Instinct) भावना (Sentiment)

१२. यदि किसी कारण से इनमें कोई मनोदशा जीवन की दीर्घ प्रवृत्ति के रूप में विकसित हो जाय तो वह चारित्रिक प्रवृत्ति का भी रूप धारण कर सकती है; जैसे-दैन्यता के कारण हीनता का भाव विकसित हो सकता है।

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मनोवृत्ति (Temperament) या रागात्मक दृष्टिकोण (Attitude) ही दीर्घ एवं स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियाँ हैं। किन्तु मूलभावों का इन स्थायी प्रवृत्तियों से सीधा सम्बन्ध होने के कारण तथा प्रवृत्ति-विशेष में इन्हीं की प्रमुखता के कारण ही इन्हें स्थायी विशेषण से विभूषित कर दिया गया है, जो वैज्ञानिक दृष्टि से संगत नहीं। उदारहण के लिये-व्यवहार में हम व्यक्तियों को 'टोपीवाला' 'धोतीवाला' 'दूध- वाला' या 'सब्जीवाला'-आदि नामों से पुकारने लगते हैं; किन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि टोपीवाले की टोपी को या 'सब्जीवाले' की सब्जी को हम व्यक्ति के रूप में स्वीकार कर रहे हैं। अस्तु, रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने विभिन्न स्थायी भावा- त्मक दीर्घकालीन प्रवृत्तियों को उनसे सम्बद्ध मूलभावों के नाम से पुकारा है- किन्तु, इससे यह न समभना चाहिये कि वे मूलभाव स्वयं प्रत्येक स्थिति में स्थायी भाव हैं। यदि सचमुच ही में उन आचार्यों का आशय इसके विपरीत था तो उस स्थिति में भी हमें उनकी इस त्रुटि का निराकरण करते हुए कहेंगे कि मूलभावों से सम्बन्धित स्थायी प्रवृत्तियों को ही स्थायीभाव के रूप में ग्रहण करना चाहिए न कि स्वयं मूल भावों को। अब प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या हम मूल भावों को संचारी रूप में ग्रहण कर सकते हैं या नहीं ? हमारे विचार में इसका उत्तर स्वीकारात्मक दिया जा सकता है। अनेक रस-सद्धान्तिक आचार्यों ने भी स्थायीभावों के संचारी रूप में परिवर्तन की संभावना को भी स्वीकार किया है। जो व्यावहारिक दृष्टि से भी उचित है क्योंकि क्रोध की उद्दीप्ति रौद्ररस में ही नहीं, वीर, शृगार, वीभत्स आदि में भी संभव है-अतः इन रसों में तो स्पष्ट ही क्रोध संचारी भाव माना गया है, किन्तु हमारा निवेदन यह है कि रौद्र रस में भी क्रोध सदा विद्यमान नहीं रहेगा; (उसके मूल में व्याप्त द्वष भावना या प्रतिशोध की भावना ही स्थायी रहेगी) अतः ऐसी स्थिति में भावावेग रूप में उद्दीप्त होने वाले क्षणिक क्रोध को भी संचारी क्यों न माना जाय ? वस्तुतः मनोविज्ञान की दृष्टि से प्रत्येक मूल भाव अपने उद्दीप्त रूप में तो सदा क्षणिक या अल्पकालीन ही होता है; अतः उन्हें संचारी ही माना जाना चाहिए किन्तु हम यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि रस-सैद्धान्तिक आचार्यों द्वारा परिगणित सभी स्थायी भावों पर यह बात लागू नहीं होती क्योंकि उनमें से अनेक में भावना (Sentiment) एवं स्थिर रागात्मक दृष्टिकोण के रूप में भी विकास की संभावना रहती है; यथा-प्रेम, घृणा वात्सल्य, सख्य का विकास भावना में तथा निर्वेद एवं भक्ति का स्थिर भावात्मक दृष्टिकोण के रूप में विकास संभव है। अतः रस सैद्धान्तिक स्थायी भावों में से भय, क्रोध, शोक, हास्य, आश्चर्य (विस्मय) ही ऐसे हैं जो अपनी आधारभूत सहज प्रवृत्ति के अतिरिक्त अन्य प्रवृत्तियों के साथ भी संचरण कर सकते हैं; अतः इन पाँच भावों को तो निश्चय ही संचारियों में स्थान दिया जा सकता है। इस सम्बन्ध में स्थायी भावों के प्रसंग में भी हम अपना निष्कर्ष

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दे चुके हैं कि भयानक, रौद्र, करुण, हास्य, अद्भुत रस में अनेक स्थायी भाव क्रमशः आत्मरक्षा, की भावना, द्वष भावना, करुणा, उपहास एवं कौतूहल की प्रवृत्तियाँ ही स्थायी भाव हैं न कि भय, क्रोध आदि अल्पकालीन मूलभाव। वस्तुतः इस दृष्टि से स्थायी भावों के नामकरण एवं निर्धारण में आमूलचूल परिवर्तन व संशोधन की आव- श्यकता है। अब हमें यह देखना है कि आचार्यों द्वारा परिगणित स्थायीभावों के अति- रिक्त संचारियों में से भी किसी को मूलभाव की श्रेणी में स्थान दिया जा सकता है या नहीं ? हमारे विचार में इसका उत्तर निषेधात्मक ही होगा क्योंकि पूर्वोक्त तेंतीस संचारियों में से कोई भी ऐसा नहीं है जिसमें मूल भाव के लक्षण मिलते हों। मराठी के प्रसिद्ध विद्वान् डॉ० के० ना० वाटवे० ने शंका, अमर्ष, त्रास एवं गर्व को प्राथमिक भावना या मूलभाव (Primary emotion) के रूप में मानने का सुझाव देते हुए लिखा है-"प्रस्तुत व्यभिचारी भाव तो केवल पर्याय भेद से स्थायी भाव ही बन जाते हैं। शंका अथवा त्रास का तात्पर्य ही भय है। अधिक से अधिक अन्तर यही किया जा सकता है कि एक में प्रत्यक्ष विषय से भय उत्पन्न होता है तो दूसरे में उसके चिन्तन से। अमर्ष का तात्पर्य ही है-कोध, और यह हम पहले निरूपित कर चुके हैं कि गर्व तो 'एसरशन' नामक सहज प्रवृत्ति. की सहचर भावना है।"१ हमारे विचार में डॉ० वाटवे का यह निष्कर्ष स्वीकार्य नहीं है। प्रथम तो मनोवैज्ञानिकों ने भी शंका, त्रास एवं गर्व को प्राथमिक भाव या मूल भाव (Primary emotions) के रूप में स्वीकार नहीं किया है। दूसरे शंका न तो किसी स्थिर भावना के रूप में विकसित हो सकती है और न हीं वह कोई स्वतन्त्र या सहज प्रवृत्तियों मे सीधा सम्बन्धित मूल भाव है। तीसरे, शंका के भी दो रूप हैं-एक बौद्धिक तर्क के रूप में और दूसरा भावात्मक आशंका के रूप में। जब कृष्ण के मथुरा चले जाने पर माता यशोदा को शंका होती है कि देवकी उन्हें ठीक प्रकार खिला-पिला रही है या नहीं-या हम अपने प्रिय व्यक्ति के पत्र न आने पर भी उसके कुशल-क्षेम के बारे में तरह-तरह को शंकाएँ करने लगते हैं; इस प्रकार की अकारण शंका के मूल में वात्सल्य, प्रेम या रागात्मकता ही होती है। रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने संचारी भाव के रूप में जिस शंका का निरूपण किया है, वह हमारे विचार में यही रागमूलक शंका है, जो भावो- त्ेजना की दृष्टि से बहुत तीव्र एवं उद्दीप्त न होती हुई भी व्यक्ति के मन को व्यथित करती रहती है। किन्तु ज्यों ही प्रिय के कुशल-समाचार मिल जाते हैं, हमारी शंका दूर हो जाती है-अस्तु, इसे किसी भी स्थिति में न तो मूलभाव (Primary emotion) माना जा सकता है और न ही स्थायीभाव। इसी प्रकार त्रास का भय से घनिष्ठ सम्बन्ध होते हुए भी यह स्थायीभाव

१३. भारतीय काव्य सिद्धान्त; सं० काका कालेलकर; पृ० १६२

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न होकर स्थिति-विशेष से सम्बन्धित अल्पकालीन भावावेग मात्र है। हम जीवन में दीर्घकाल तक त्रस्त नहीं रह सकते-या तो उससे किसी न किसी प्रकार मुक्ति पा लेंगे अन्यथा त्रास शोक में परिणत हो जायगा। वस्तुतः त्रास भी एक स्थिर एवं स्वतन्त्र भावना न होकर अस्थिर पराश्रित भावावेग है-इसका संचार न केवल भयानक अपितु रौद्र, वीभत्स, वीर आदि रसों में भी सम्भव है। अमर्ष भी शुद्ध क्रोध न होकर निराशा मिश्रित कोध है, जिसमें क्रोध अपेक्षाकृत अधिक गम्भीर एवं स्थिर रूप प्राप्त कर लेता है किन्तु दीर्घकाल तक स्थिर रहने वाली स्थायी भावना के रूप में इसका भी विकास सम्भव नहीं है। गर्व का एसरशन (assertion) की प्रवृत्ति से भी सम्बन्ध स्थापित किया जा सकता है किन्तु उस स्थिति में वह आत्मगौरव, दर्प, अभिमान, एवं अधिकार-भावना में परिणत हो जायगा। हमारे विचार में संचारी रूप में गर्व अभिमान की स्थायी भावना से थोड़ा भिन्न है-यथा; एक माँ अपने पुत्र की भारी सफलता का समाचार सुनकर थोड़ी देर के लिए गर्व से फूल सकती है; या एक प्रयसी प्रियतम से बहुमूल्य भेंट पाकर भी गर्वित हो सकती है-किन्तु उनका यह गर्व उनके जीवन का स्थायीभाव नहीं बन जायगा, और न ही यह कहा जा सकता है कि इसका अस्तित्व उपयुक्त प्रसंगों में क्रमशः वात्सल्य एवं प्रणय से पृथक या स्वतन्त्र रूप में है। अस्तु, डॉ० वाटवे जसे विद्वान का आदर करते हुए भी हम यहाँ उनसे अपनी असहमति व्यक्त करते हैं। वस्तुतः शंका, अमर्ष, त्रास एवं गर्व- ये चारों ही स्थायीभाव की अपेक्षा संचारी अधिक हैं, तथा मनौवैज्ञानिक दृष्टि से भी इन्हें हम मूल भाव (Primary emotion) न मानकर मनोदशा (Mood) के रूप में ही स्वीकार कर सकते हैं। अस्तु, आचार्यों द्वारा परिगणित संचारियों में से मूलभाव की श्रेणी में कोई भी नहीं आता-यह निस्संकोच कहा जा सकता है। (ग) मिश्रितभाव-मैक्डूगल द्वारा वर्गीकृत भावों में से एक वर्ग मिश्रित भावों (Complex emotions) का है, जिसमें ऐसे भावों (emotions) को स्थान दिया गया है जो दो या दो से अधिक सक्रिय सहज प्रवृत्तियों से उत्पन्न विभिन्न मूल भावों के संयुक्त रूप होते हैं-दूसरे शब्दों में, जिनमें भिन्न प्रकृति के अनेक मूल भावों का योग होता है, उन्हें 'मिश्रित भाव' कहा गया है। उदाहरण के लिये दया में वात्सल्य (स्नेह) और सहानुभूति मूलक वेदना का मिश्रण है, या उपेक्षा में क्रोध और अरुचि का मिश्रण होता है; अतः दया और उपेक्षा को मिश्रित भावों में स्थान दिया जाता है। मैक्डूगल महोदय ने मिश्रित भावों को भी दो प्रकार से वर्गीकृत किया है; प्रथम वर्ग में वे मिश्रित भाव आते हैं जिनके मूल में किसी भावना की सत्ता आवश्यक नहीं होती, जबकि द्वितीय वर्ग में ऐसे मिश्रित भावों को स्थान दिया गया है जिनसे मूल में किसी न किसी भावना या स्थायी भाव का अस्तित्व अनिवार्य रूप में होता है। प्रथम वर्ग के प्रमुख मिश्रित भावों के अन्तर्गत प्रशंसा, आतंक, श्रद्धा, कृतज्ञता, अरुचि, उपेक्षा, मौग्ध्य (मोह), असूया को तथा द्वितीय वर्ग में तिरस्कार, चिन्ता ईर्ष्या,

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प्रतिशोध, अप्रसन्नता, लज्जा, करीड़ा, हर्ष, विषाद, दया, प्रसन्नता, विस्मय को स्थान दिया गया है।" यदि रस सैद्धान्तिक दृष्टि से इन दोनों वर्गों पर विचार किया जाय तो ज्ञात होगा कि इनमें प्रथम वर्ग के दो भाव-असूया एवं मोह तथा द्वितीय वर्ग के चार भाव-चिन्ता, बरीड़ा, हर्ष एवं विषाद ही संचारी भावों की गिनती में आते हैं; शेष मिश्रित भावों की रस-सैद्धान्तिक भाव-निरूपण में कहीं कोई चर्चा नहीं है। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि क्या हम इन अवशिष्ट मिश्रित भावों को संचारियों में स्थान देते हुए उनकी संख्या में वृद्धि कर सकते हैं या नहीं ? किसी भी भाव को संचारी मानने के लिए आचार्यों के अनुसार उसमें अनेक विशेषताओं का होना आवश्यक है, एक तो वह स्थायी भाव अर्थात् मनोविज्ञान की दृष्टि स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति पर पूर्णतः आश्रित हो, दूसरे वह स्थायी भाव के बाह्य प्रकट रूप को सूचित करता हो या उसके प्रकटीकरण में सहायक सिद्ध हो, तीसरे वह अपेक्षाकृत अल्प- कालीन या अस्थिर हो और चौथे वह जन्म-जात प्रवृत्ति या सहज प्रवृत्ति पर ही आधारित न हो। यदि इन विशेषताओं को ध्यान में रखकर पूर्वोक्त मिश्रित भावों पर कमशः विचार किया जाय तो स्पष्ट होगा कि इनमें से प्रायः सभी में संचारी की विशेषताए, उपलब्ध होती हैं। यथा-भक्ति रस में आराध्य या आलम्बन के प्रति प्रशंसा, श्रद्धा एवं कृतज्ञता, के भावों का उद्दीपन एवं संचरण स्वाभाविक है, पर साथ ही इनका स्थिति काल एक परिस्थिति-विशेष तक ही सीमित रहेगा। न केवल भक्ति- रस में अपितु वीर-रस में भी इनका उद्दीपन एवं संचरण सम्भव है। साथ ही इनका प्रकटीकरण सम्बन्धित स्थायी भावना की अभिव्यक्ति एवं पुष्टि में सहायक भी सिद्ध होगा। इसी प्रकार भयानक, रौद्र, वीभत्स एवं करुण में आतंक, अरुचि, उपेक्षा, तिरस्कार, प्रतिशोध, अनुकम्पा के भावों का उद्दीपन एवं संचार की सम्भावना को अस्वीकार नहीं किया जा सकता तथा इनके संचरण से स्थायी भावना की पुष्टि में योग मिलेगा-ऐसा भी निस्संकोच कहा जा सकता है। इसी प्रकार प्रिय के द्वारा अनपेक्षित व्यवहार करने पर क्षणिक अप्रसन्नता के भाव का तथा उसके अद्भुत क्रिया- कलापों पर विस्मय के भाव का उद्दीपन भी सम्भव है, अतः ये शृंगार-रस के संचारी माने जा सकते हैं तथा अन्य रसों में भी परिस्थिति के अनुसार इनका उद्दीपन असम्भव नहीं है। अस्तु, हमारे विचार से इसमें कोई संदेह नहीं कि उपयुक्त्त सभी मिश्रित भाव परिस्थिति-भेद के अनुसार विभिन्न स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों के संदर्म में उनके सहयोगी एवं सहायक के रूप में अल्पकाल के लिए उद्दीप्त हो सकते हैं। अवश्य ही मैक्डगल महोदय के अनुसार प्रथम वर्ग के मिश्रित भावों के लिए भावना (Sentiment) पर आश्रित होना आवश्यक नहीं माना है किन्तु इसका यह तात्पर्य भी नहीं है कि वे कभी भी भावना-विशेष से सम्बन्धित नहीं हो सकते। उदाहरण के लिए हम किसी के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता, उपेक्षा आदि का प्रदर्शन सामान्य रूप में भी कर 14. An Introduction to Social Psychology : Page 104-136.

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सकते हैं किन्तु अनेक बार इनके पीछे हमारी आलम्बन के प्रति विकसित भक्ति-भावना या घृणा भावना का भी अस्तित्व सम्भव है। अतः इनकी संचारी रूप में गणना उसी स्थिति में होगी जब वे हमारी किसी दीर्घकालीन स्थायी भावना के सहचारी रूप में व्यक्त होंगे। अस्तु, निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि संचारियों की परम्परागत सूची को परिपूर्ण करने के लिए उपयुक्त सभी मिश्रित भावों-प्रशंसा, आतंक, श्रद्धा, कृतज्ञता, अरुचि, उपेक्षा, निन्दा (तिरस्कार), ईर्ष्या, प्रतिशोध, अप्रसन्नता (नाराजगी), लज्जा, दया (करुणा, अनुकम्पा), विस्मय आदि को भी उसमें सम्मिलित कर लिया जाय तो यह अनुचित नहीं होगा। (घ) व्युत्पन्न भाव-मनोवैज्ञानिकों ने भावों के तीसरे वर्ग को व्युत्पन्न भाव (Derived emotion) की संज्ञा देते हुए,१५ उनके सम्बन्ध में बताया है कि वे 'किसी विशेष मूल प्रवृत्यात्मक (सहज प्रवृत्ति से सम्बन्धित) क्रिया या क्रियाओं से सम्बन्धित नहीं होते। उनका सम्बन्ध किसी भी चेष्टात्मक प्रवृत्ति के व्यापार से हो सकता है। इच्छा की उत्पत्ति किसी भी चेष्टात्मक प्रवृत्ति के जागृत, होने से होती है। ........ व्युत्पन्न भाव इच्छाओं से सम्बन्धित होते हैं। मैक्डूगल महोदय के शब्दों में- 'each of them is a state of feeling or emotion which is not the immed- iate effect and expression of the excitement of any one instinct or disposition, but rather arises when any of the conative tendencies operate under certain conditions ......... they arise only when the various active tendencies of our nature operate under special mental conditions. They seem to be connected with no special conative dispositions; but each of them rises to colour our whole consciousness when any one of these dispositions operates under the appropriate conditions" अर्थात् उनमें (व्युत्पन्न भावों में से) प्रत्येक भाव या अनुभूति की एक ऐसी मनोदशा का सूचक है जो किसी विशिष्ट सहज प्रवृत्ति या मानसिक प्रवृत्ति के प्रत्यक्ष उद्बोधन या प्रभाव से सम्बन्धित नहीं होती वरन् वह किसी स्थिति-विशेष के अन्तर्गत परिचालित चेष्टात्मक प्रवृत्तियों के प्रभाव से उद्दीप्त होती है ......... वे उसी स्थिति में उदबुद्ध होते हैं जब हमारी विभिन्न प्रकृत चेष्टात्मक या क्रियात्मक प्रवृ- त्तियाँ किसी विशिष्ट मानसिक स्थिति के प्रभाव से उद्वलित (सक्रिय) होती हैं। वे (व्युत्पन्न भाव) किसी विशिष्ट चेष्टात्मक मनःस्थिति से सम्बन्धित नहीं होते अपितु किसी भी मनःस्थिति में अनुकूल (उपयुक्त) परिस्थितियों के प्रभाव से उद्दीप्त होकर हमारी सम्पूर्ण चेतना को अपने रंग में रंग सकते हैं।' इन व्युत्पन्न भावों के अन्तर्गत आहलाद, विषाद, नैराश्य, आशा, विश्वास, चिन्ता खेद, पश्चाताप या ग्लानि एवं वेदना का उल्लेख किया गया है।

  1. Same Page 271 16. An Introduction to Social Psychology :Page 365,

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अब यदि व्युत्पन्न भावों की तुलना संचारी भावों से की जाय तो ज्ञात होता है कि जहाँ तक सामान्य लक्षणों की बात है, इन दोनों में गहरा सम्बन्ध है। आचार्यों ने संचारी की विशेषता बताते हुए किसी विशिष्ट सहज प्रवृत्ति या भावना से उनका प्रत्यक्ष या स्थिर सम्बन्ध न होना, अनेक स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों के साथ उनका संचरण करना, कुछ क्षणों में उनका स्थायी भावों को भी अपने रंग में रंग कर व्यक्त करना-आदि का उल्लेख किया है जो व्युत्पन्न भावों के उपर्युक्त लक्षणों में भी उपलब्ध हैं। अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि सैद्धान्तिक दृष्टि से दोनों एक ही श्रेणी के हैं, किन्तु दोनों की सूचियों में परस्पर गहरा अन्तर है। ग्लानि, चिन्ता, हर्ष, विषाद, व्याधि (वेदना)-ये पाँच भाव ही ऐसे हैं जो दोनों सूचियों में उपलब्ध हैं, शेष संचारी एवं व्युत्पन्न भाव परस्पर भिन्न हैं। इन पाँच भावों में से भी चिन्ता, हर्ष एवं विषाद की गणना पहले मिश्रित भावों के अन्तर्गत भी की जा चुकी है, अतः यह दुविधा उत्पन्न होती है कि इन्हें मूलतः मिश्रित भाव माना जाय या व्युत्पन्न भाव। इस दुविधा के मूल में स्वयं मैक्डूगल महोदय की त्रटि है-उन्होंने इनका उल्लेख दोनों वर्गों में किया है। ऐसी स्थिति में उनकी त्रटि निराकरण करते हुए कहा जा सकता है कि चिन्ता के दो रूप हैं; एक शुद्ध बौद्धिक चिन्तन एवं दूसरा भाव-प्रेरित। बौद्धिक चिन्तना हमें निर्वेद की स्थिति तक पहुँचा सकती है तो भाव- प्रेरित चिन्ता प्रिय के सम्बन्ध में विभिन्न प्रकार की आशंकाओं या शत्र के द्वारा सम्भावित अनिष्ट की शंकाओं को जन्म दे सकती है; अतः इसका सम्बन्ध किसी एक ही सहज प्रवृत्ति से सिद्ध नहीं होता और न ही इसमें मूल भाव की सी उत्त जना या गम्भीरता दृष्टिगोचर होती है, अतः इसे मिश्रित भाव की अपेक्षा व्युत्पन्न भाव ही मानना अधिक उचित है। यही बात हर्ष एवं विषाद की; जैसा कि हम आगे अनुभूति (Feeling) का विवेचन करते समय स्पष्ट करेंगे ये दोनों न तो मिश्रित भाव हैं और न ही व्युत्पन्न भाव अपितु अनुभूति (Feeling) के दो रूप हैं; अतः इन्हें इन दोनों श्रेणियों से ही पृथक किया जाना चाहिए। इस प्रकार व्युत्पन्न भावों में से ग्लानि, और वेदना (व्याधि) ही संचारी रूप में रह जाते हैं। यहाँ यह भी विचार कर लिया जाना चाहिए कि विश्वास, आशा, निराशा आदि अवशिष्ट व्युत्पन्न भावों को भी संचारी माना जा सकता है या नहीं ? हमारे विचार में विश्वास सामान्यतः हमारे व्यक्ति-विशेष के ज्ञान या धारणा का अधिक योग रहता है किन्तु परिस्थिति-विशेष में स्थिति इसके विपरीत भी हो सकती है। यथा-यदि किसी प्रमी को प्रणय की प्रारम्भिक अवस्था में यह विश्वास हो जाय कि उसकी प्रयसी उसके अतिरिक्त किसी भी और के प्रति अनुरक्त नहीं है, वह पूर्णतः उसे ही चाहती है तो निश्चय ही यह विश्वास यहाँ उसके लिए अमित आहलाद का कारण ही नहीं, अपितु उसकी प्रणय भावना को भी अधिक तीव्रता एवं गम्भीरता प्रदान करने वाला सहयोगी या संचारी भाव सिद्ध होगा; अतः विश्वास को स्थिति-

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २४५

विशेष में संचारी भाव माना जा सकता है। इसी प्रकार प्रेमी-प्रमिकाओं, माँ-पुत्र तथा उत्साह एवं अवसाद के बीच भावनाओं की जो दीर्घशृंखला विकासोन्मुख रहती है उसके मूल में आशा ही सहकारी रूप में कार्य करती रहती है। रत्नसेन ने पद्मावती के लिए जो भारी संघर्ष किया वह उसकी प्राप्ति की आशा के बल पर ही किया या 'साकेत' की उर्मिला के तिल-तिलकर विरह के बारह वर्षों को बिताने में सफल हुई तो इसी आशा के बल पर कि अन्ततः लक्ष्मण आयेंगे-और यही आशा जब निराशा में परिणत हो जाती है तो विभिन्न भावों की परिणति करुण में हो जाती है। ऐसी स्थिति में स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों के विकास में आशा और निराशा के योग को कैसे अस्वीकार किया जा सकता है? अतः सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक दोनों ही दृष्टियों से हम विश्वास, आशा, निराशा को संचारी मानने के पक्ष में हैं। (५) अनुभूति-मनोविज्ञान के अनुसार भावात्मक प्रवृत्तियों का सर्वाधिक अस्थिर, परिवर्तनशील, एवं व्यक्त रूप अनुभूति (Feeling) है। अनुभूति के लक्षणों पर प्रकाश डालते हुए डॉ० एस० एस० माथुर ने लिखा है-यह एक प्रारम्भिक (elementary) सरल मानसिक प्रक्रिया है जो प्राणी को सुख-दुःख की अनुभूति करवाती है। एक प्रारम्भिक सरल मानसिक प्रक्रिया होने के कारण इसका विश्लेषण सम्भव नहीं। यह बहुत चंचल एवं क्षणिक होती है। इसका सम्बन्ध किसी अंग-विशेष से नहीं होता।१ आगे उन्होंने अन्भूति (Feeling) और भाव (Emotion) का अन्तर स्पष्ट करते हुए प्रतिपादित किया है कि अनुभूति एक सरल एवं प्राथमिक मानसिक प्रक्रिया है परन्तु भाव एक जटिल भावात्मक मानसिक प्रक्रिया है। अनुभूति और भाव में परस्पर गहरा सम्बन्ध है। प्रत्येक भाव में अनुभूति का योग अवश्य रहता है, किन्तु यह आवश्यक नहीं कि प्रत्येक अनुभूति में भाव का उद्दीपन हो। भावोद्दीपन के समय व्यक्ति में अनेक प्रकार के आन्तरिक एवं बाह्य शारीरिक परिवर्तन होते हैं तथा वह विभिन्न प्रकार की चेष्टाएँ भी करता है जबकि शुद्ध अनुभति के समय व्यक्ति अपेक्षाकृत निष्क्रिय रहता है। अनुभूतियों के मुख्यतः दो ही रूप माने गये हैं-सुख और दुःख। संचारी भाव की दृष्टि से अनुभूतियों की सरलता, क्षणिकता एवं परतंत्रता उसके अनुकूल है। एक ही स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति के उद्बोधन एवं विकास-काल में हम अनेक प्रकार की सुख-दुःख पूर्ण अनुभूतियों का अनुभव प्राप्त करते हैं तो दूसरी ओर प्रत्येक स्थायी भाव के उद्दीपन के समय दुःख या सुख की न्यूनाधिक अनुभूति अवश्य प्राप्त करते हैं-अतः इन्हें संचारी भाव के रूप में स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है। जैसा कि पहले संकेत किया जा चुका है, हमारे संचारियों में से शोक, हर्ष और विषाद क्रमशः सुख एवं दुःख की ही अनुभूतियों के पल्लवित एवं विकसित रूप हैं। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि परिस्थिति-विशेष के कारण हर्ष,

  1. सामान्य मनोविज्ञान (डॉ० एस० एस० माथुर) पृ० १५५

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२४६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

विषाद अपेक्षाकृत दीर्घकालीन रूप में विकसित होकर मनोदशा :(Mood) के रूप में भी परिणत हो सकते हैं। अवशिष्ट संचारी भाव-अब तक विभिन्न भावात्मक प्रवृत्तियों के अन्तर्गत परम्परागत सँचारियों में से पन्द्रह का समावेश किया जा चुका है किन्तु १९ संचारी भाव फिर भी बच जाते हैं, जिन्हें मनोविज्ञान के अनुसार भावों की किसी भी श्रणी में स्थान देना कठिन है। इन अवशिष्ट संचारी भावों में से कुछ तो शारारिक अवस्था के सूचक हैं, कुछ मानसिक एवं बौद्धिक के तथा कुछ विशिष्ट भाव न होकर भावानुभूति के अनुमापक हैं। अतः इन्हें निम्नांकित चार वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- (क) शारीरिक अवस्था के सूचक संचारी : (१) श्रम (२) आलस्य (३) निद्रा (४) मरण । (ख) मानसिक अवस्था-विशेषतः विकृत अवस्था-के सूचक संचारी (१) मद (२) उन्माद (३) स्वप्न (४) अपस्मार (५) अवहित्था। (ग) बौद्धिक प्रवृतियों या क्रियाओं के सूचक तत्व : (१) मति (२) स्मृति (३) तर्क (४) धृति (५) जड़ता (६) विबोध। (घ) भावानुभूति की तीव्रता को अनुमापक स्थितियाँ। (१) आवेग (आतुरता) (२) उग्रता (३) चपलता। यद्यपि मनोवैज्ञानिक दृष्टि से उपयुक्त्त अठारह संचारियों को भाव के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती फिर भी अनेक आचार्यों ने विभिन्न तर्कों के बल पर इन्हें भाव सिद्ध करने का प्रयास किया है ; अतः इसके सम्बन्ध में यहाँ पुनर्विचार की अपेक्षा है। सर्व प्रथम हम शारारिक एवं मानसिक अवस्था के सूचक संचारियों (जो ड्पर वर्ग क एवं ख में दिये गये हैं) को ही लेते हैं। सामान्यतः रस-सिद्धान्त के अनुसार हमारे मनोभावों को सूचित करने वाली शारीरिक अवस्थाओं एवं मानसिक परिवर्तनों को क्रमशः कायिक एवं मानसिक अनुभावों के अन्तर्गत स्थान दिया जाता है ; जो मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी संगत है-ऐसी स्थिति में हम क्यों न उपयुक्त दोनों वर्गो के संचारियों को संचारी भाव न मानकर अनुभाव मानें? इसका उत्तर देते हुए आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने प्रतिपादित किया है कि' ........ सात्त्विक अनुभाव में वही वस्तु रखी गई है जो बाहर शरीर पर लक्षित हो। मान- सिक अवस्था स्वयं गोचर नहीं होती, उसका कोई चिह्न या संकेत गोचर होता है। 'अनुभाव' किसी भाव का सूचक होता है, अतः मानसिक अवस्था जो सूच्य हुआ करती है, वह सूचकों में नहीं रखी गई, संचारियों में रखी गई।"८

१८. रस-मीमांसा ; पृ० २१९

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २४७

हमारे विचार में आचार्य प्रवर का उपर्युक्त तर्क सद्धान्तिक रूप में तो ठीक है किन्तु व्यवहार में उपयुक्त संचारियों की स्थिति इसके विपरीत है। क्या श्रम, निद्रा, मरण, उन्माद, अपस्मार अवहित्था (अपने को छिपाना) ऐसी स्थितियाँ नहीं हैं जिनका प्रकटीकरण बाह्य गोचर रूप में नहीं होता ? क्या किसी व्यक्ति को निद्रावस्था, मृतावस्था या उन्मादग्रस्त अवस्था में देखकर ही उसकी इन अवस्थाओं का ज्ञान या बोध प्राप्त करना संभव नहीं ? तथा दूसरी ओर सात्त्विक अनुभावों में जिस स्तंभ (निष्क्रय अवस्था) एवं प्रलय (अचेतावस्था) का उल्लेख किया गया है, वे उपर्युक्त कसौटी की दृष्टि से निद्रा, उन्माद, मरण से क्या इतनी भिन्न हैं कि उन्हें पृथक श्रेणी में स्थान दिया जाय ? हमारे विचार में जितना ज्ञान हमें स्तंभ एवं अचेतावस्था का बाह्य रूप में हो सकता है, उतना ही निद्रा, अपस्मार, उन्माद मृत्यु का भी संभव है-अतः इसमें कोई औचित्य नहीं है कि हम केवल परम्परा का अनुसरण या समर्थन करने के लिए ही एक वर्ग को अनुभावों में एवं द्वितीय को संचारियों में स्थान दें। वस्तुतः सात्त्विक अनुभावों एवं नायिका के २८ अलंकारों, (जिन्हें प्रणय भाव के अनुभावों के रूप में भी उल्लिखित किया जाता है) में स्तंभ, प्रलय, मद का भी समावेश किया गया है जो व्यावहारिक दृष्टि से क्रमशः जड़ता, अपस्मार, एवं मद संचारियों से भिन्न प्रकृति के नहीं हैं। इनके पक्ष में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि उपयुक्त्त संचारियों के दो स्तर हैं-एक स्तर शारीरिक एवं दूसरा मानसिक या भावात्मक। आचार्यों ने इनके दूसरे स्तर को अर्थात् मानसिक या भावात्मक रूप को ही संचारियों में स्थान दिया है न कि शारीरिक अवस्था से सम्बन्धित रूप को। इस तर्क का औचित्य देखने के लिए स्वयं आचार्य भरत तथा परवर्ती आचार्यों द्वारा की गयी व्याख्या अवलोकनीय है। आचार्य भरत तथा परवर्ती आचार्यों ने उपयुक्त्त संचारियों की व्याख्या इस प्रकार की है- •मद नामक व्यभिचारी भाव मद्य के उपयोग से उत्पन्न होता है। ........ कोई मत्त होकर गाता है, कोई रोता है, और कोई हँसता है ........ कोई सोता है। • श्रम नामक व्यभिचारी भाव दूर की यात्रा और व्यायाम-सेवन आदि विभावों से उत्पन्न होता है। शरीर दबाने, और मालिश करने .... आदि अनुभावों से अभिनेय हैं। • आलस्य नामक व्यभिचारी भाव खेद, रोग, गर्भ आदि विभावों से उत्पन्न होता है। · मरण नामक व्यभिचारी भाव रोग और चोट से होता है। आंत, यकृत शूल की वेदना, वात-पित-कफ के वैषम्य ;-... विसूचिका (हैजा) आदि रोगों से उत्पन्न होता है।

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२४८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

उपयुक्त अशों में जिस प्रकार इन संचारियों की व्याख्या की गयी है, उससे स्पष्ट है कि आचार्यों ने इन्हें क्रमशः मद्य-पान, शारारिक श्रम, शारीरिक दुर्बलता विभिन्न रोगों या चोट से सम्बन्धित मद, श्रम, आलस्य, मरण आदि से भिन्न नहीं माना है, जो भावावेग की अपेक्षा शारीरिक अवस्थाओं के ही सूचक हैं। यदि हम इसी प्रकार की अवस्थाओं को संचारी भावों में स्थान देना चाहें तो फिर सभी शारीरिक रोगों तथा मानसिक दशाओं को इनमें स्थान दिया जा सकता है तथा उस स्थिति में कायिक, मानसिक एवं सात्विक अनुभावों की अलग सत्ता रखने की भी आवश्यकता नहीं रहेगी-सभी प्रकार के अनुभाव संचारी भावों में ही परि- गणित हो जायेंगे ! मराठी के विद्वान् प्रा० रा० श्री० जोग का तर्क है कि 'आधुनिक मानस- शास्त्र में चेतनावस्था (conscious) के साथ अवचेतनावस्था (unconscious) को भी महत्त्व प्राप्त है। यदि इस दृष्टि से निद्रा, सुप्त, अपस्मार मोह, प्रबोध आदि पर विचार करें तो उनकी वास्तविकता सहज ध्यान में आ जाती है। इस प्रकार इनके मत में जो संचारी भाव नितांत शारीरिक अवस्था रूप प्रतीत होते हैं, उनके पीछे मनोभावों की स्थिति स्वीकार करना आवश्यक है। श्री जोग का मूल ग्रन्थ हम नहीं देख पाये, यह विवरण डॉ० काले के द्वारा उनके शोध प्रबन्ध में प्रस्तुत है-अतः हम नहीं कह सकते कि श्री जोग का आशय पूर्णतः यही है या कुछ और किन्तु यदि वस्तुतः यही है तो स्पष्ट ही यह भ्रान्तिमूलक है। जिन शारीरिक या मानसिक चेष्टाओं के 'पीछे मनोभावों की स्थिति' होती है, अर्थात् जो चेष्टाए मनोभावों के अस्तित्व की सूचक होती है, उन्हें रस-शास्त्रीय शब्दावली में भाव या संचारी भाव न कहकर 'अनुभाव' की संज्ञा दी जाती है। अवश्य ही आधुनिक मनो- विश्लेषण के अनुसार अपस्मार, स्वप्न आदि को भी विभिन्न मानसिक ग्रन्थियों के व्यक्त लक्षणों के रूप में स्वीकार किया जाता है, किन्तु ये स्वयं किसी मनोग्रन्थि या मनोभावना के पर्याय नहीं हैं। अतः प्रा० जोग का मत स्वतः ही खंडित हो जाता है। पं० रामदहिन मिश्र ने उपयुक्त्त संचारियों की भावात्मकता का निरूपण एक अन्य प्रकार से किया है ; एक ओर तो उन्होंने उन आचार्यों को दोषी सिद्ध किया है जिन्होंने उपयुक्त्त संचारियों की व्याख्या भावपरक न करके स्थूल शारारिक लक्षणों के रूप में की है, अतः उन्होंने उनकी नयी परिभाषाएँ प्रस्तुत की हैं तथा दूसरी ओर उन्होंने विभिन्न संचारियों के काव्यात्मक उद्धरण प्रस्तुत करते हुए उनकी भावा- त्मकता एवं मार्मिकता को प्रमाणित किया है। अवश्य ही मिश्रजी का यह प्रयत्न अधिक प्रामाणिक एवं संगत प्रतीत होता है-अतः इस पर यहाँ गम्भीरता से विचार करना आवश्यक है।

१९. हिन्दी-मराठी काव्य-शास्त्र का तुलनात्मक अध्ययन ; डॉ० काले ; पृ० ७२

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २४९

सर्व प्रथम उन्होंने 'मरण' संचारी को लिया है। इसकी परम्परागत व्याख्या को त्याज्य सिद्ध करते हुए उन्होंने इसका नूतन लक्षण इस प्रकार प्रस्तुत किया है-'चित्तवृत्ति की ऐसी दशा जिसमें मृत्यु के समान कष्ट की अनुभूति हो अथवा वह दशा भावान्तर से इस प्रकार अभिभूत हो गयी हो कि मृत्युकष्ट नगण्य जान पड़े। जैसे- 'आज पति हीना हुई शोक नहीं इसका, अक्षय सुहाग हुआ, मेरे आर्यपुत्र तो- अजर अमर हैं सुयश के शरीर में।' अब यदि 'मरण' संचारी के उपयुक्त लक्षण एवं उदाहरण का विश्लेषण किया जाय तो इसमें अनेक असंगतियाँ दृष्टिगोचर होंगी-एक तो 'मृत्यु के समान कष्ट होना' और मृत्युकष्ट नगण्य जान पड़ना' दो परस्पर विरोधी स्थितियाँ हैं। दूसरे, उदाहरण में नायिका के द्वारा पति के मरण पर जिस औदात्य की व्यंजना हुई है, वह 'मरण कष्ट' की अनुभूति से सर्वथा शून्य है। फिर संचारी भाव आश्रय की मनः स्थिति का एक अंग होता है न कि आलम्बन की चेष्टा या स्थिति का सूचक। यहाँ जो पतिदेव मरण को प्राप्त हुए हैं, वे तो सर्वथा मौन, जड़ या भावना शून्य ही दिखाये गये हैं तथा पत्नी की उक्तियों के आलम्बन मात्र हैं। अतः मिश्रजी द्वारा निरूपित न तो लक्षण ही और न ही उनके द्वारा प्रस्तुत उदाहरण ही 'मरण' संचारी की भावात्मकता को प्रमाणित कर पाया है। इसी प्रकार उनके द्वारा 'श्रम' संचारी का निरूपण भी द्रष्टव्य है। उनके शब्दों में-"श्रम संचारी का यह लक्षण है-'रति और मार्ग चलने आदि से उत्पन्न खेद का नाम श्रम है। ........ दर्पणकार के उदाहरण का यह तुलसीकृत अनुवाद है जो उससे कहीं सुन्दर है- पुरे तें निकसी रघुवीर बधू धरि धीर दिये मग में डग द्वं। X X X फिर बूभकति है चलनो अब केतिक पर्ण कुटी करि हो कित हं।२१ उपयुक्त उद्धरण की विवेचना के अनन्तर वे लिखते हैं-"पर कितनी दूर अब चलना है और कहाँ कुटिया छवावोगे' में जो हृदय-मंथन है वह तो शरीर-वृत्ति नहीं है। इस कथन में भी तो श्रम-व्यंजना है। इससे श्रम को केवल शारारिक वृत्ति मानने वाले मनोवैज्ञानिकों का मानमर्दन तो अवश्य हो जाता है।२२ अब हमें देखना है कि यह मानमर्दन सचमुच होता है या नहीं-एक तो मिश्रजी ने जहाँ आरंभ में आचार्यो की परिभाषा पर स्थूलता का जो आरोप लगाया था, वह यहाँ वापस ले लिया है क्योंकि 'यात्रा से होने वाली थकावट' श्रम के स्थूल २०-२२ काव्य-दर्पण-पं० रामदहिन मिश्र (संचारी विवेचन)

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२५० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

शारारिक रूप की ही द्योतक है ; इसका कारण कदाचित् यह है कि सौभाग्य से तुलसी-काव्य में एक ऐसा उदाहरण उपलब्ध हो गया है कि जिसमें सीता की यात्रा जन्य थकावट का ही निरूपण है ! फिर यह उदाहरण कम भावात्मक या मार्मिक भी नहीं है ! ऐसी स्थिति में यदि स्वतः ही मनोवैज्ञानिकों का मान-मर्दन हो जाय तो आश्चर्य ही क्या ! किन्तु यदि तनिक गम्भीरता से विचार किया जाय तो इस छन्द का प्रतिपाद्य सीता का 'श्रम' नहीं अपितु उसकी सुकुमारता या नजाकत है ! अभी घर से निकल कर दो डग भी नहीं चली पर इतने में ही वे पूछने लगी हैं कि पर्णकुटी कहाँ करेंगे-इससे सीता की अतिशय सुकुमारता की व्यंजना होती है न कि उसके 'श्रम' की। वस्तुतः नायिका की सुकुमारता को भी उसका एक अलंकार या सौन्दर्यपरक तत्त्व माना जाता है-उसी का सौन्दर्य प्रस्तुत छन्द की मार्मिकता का कारण है। यदि इस छन्द में सचमुच ही यात्राजन्य श्रम का निरूपण हुआ होता तो भी वह किसी स्थायीभाव का पोषक या उस पर आश्रित संचारी भाव का द्योतक न होकर शारीरिक दशा का ही सूचक होता है। अस्तु, यह प्रमाणित नहीं होता कि यहाँ श्रम एक संचारी भाव है। वैसे स्वयं हमने भी आज से लगभग बारह-तेरह वर्ष पूर्व अपने शोध प्रबन्ध में उपयुक्त संचारियों को भावात्मक सिद्ध करने का प्रयास करते हुए निम्नांकित तर्क एवं उदाहरण प्रस्तुत किये थे२१ जिन पर अब पुनर्विचार की अपेक्षा है- "काव्य के क्षेत्र में मरण मद, जड़ता चपलता .... आदि अन्य संचारी भाव भी स्मृति की तरह विशेष परिस्थितियों में भावों के समकक्ष संवेदनशील हो जाते हैं; यहाँ कुछ संचारियों के साहित्यिक उदाहरण द्रष्टव्य हैं- मरण- धरि धीरजु उठि बठ भुआलु। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालु। कहाँ लखन, कह रामुसनेही। कहँ प्रिय पुत्र बधू वैदेही।। बिलपत राउ विकल बहु भाँती। भई जुग सरस सिराती न राती।। X X X भयउ विकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।। सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहि न प्रेम पनु मोर निबाहा॥ हा! रघुनन्दन प्रान पिरीते । तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।। हा ! जानकी लखन हा! रघुवर। हा! पितु हित चित चातक जलधर॥ राम राम कहि राम कहि, राम राम कहि राम ! तनु परिहरि रघुबर बिरंह, राउ गयउ सुरधाम !!

२३. हिन्दी काव्य शृंगार-परम्परा और महाकवि बिहारी; पृ० सं० ९

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २५१

मद- तजी संक सकुचति न चित बोलति बाकु कुबाकु। दिन छिनदा छाकी रहति, छुटतु न छिन छबि छाकु।। X X X यहाँ पर ध्यान रहे कि आचार्यों ने मरण, मद आदि संचारियों में उनके स्थूल रूप को जोकि बाह्य घटनाओं पर आधारित होता है-न लेकर उनके सूक्ष्म संवेदनापूर्ण रूप को लिया है। शारीरिक व्याधियों से सम्बन्धित मरण, जड़ता और अपस्मार को तथा सुरापान जन्य मद को संचारी भावों से उसी प्रकार पृथक समभना चाहिए जिस प्रकार पेट में दर्द आने से होने वाली पीड़ा को हम शोक भाव से भिन्न समभते हैं।"२४ हमारी उपयुक्त स्थापना पर पुनर्विचार करने पर स्पष्ट होगा कि हमने 'मरण' 'मद' आदि के जो काव्यात्मक उदाहरण प्रस्तुत किये हैं, वे शारीरिक कम भावात्मक अधिक हैं, अर्थात इन उदाहरणों में चोट लगने से होने वाली मृत्यु का नहीं पुत्र-वियोग जन्य वेदना से होने वाली मृत्यु का तथा सुरापान जन्य मद के स्थान पर सौन्दर्यानुभूति जन्य मस्ती का ही निरूपण क्रमशः हुआ है-अतः इनमें निश्चय ही 'मरण' 'मद' आदि का रूप भावात्मक है। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से विचार कर कहा जाय तो यहाँ 'भावात्मक' की अपेक्षा 'भावाश्रित' कहना अधिक उचित होगा। विरह की असह्य वेदना के कारण जिस प्रकार अन्य वाचिक, कायिक एवं सात्त्विक चेष्टाएँ होती हैं, उसी प्रकार उसी की गम्भीरता के अनुसार मरण की स्थिति भी आ जाती है। कामशास्त्र के आचार्यों ने भी काम-दशाओं में गुण-कथन, उद्वग, प्रलाप उन्माद, संज्वर, जड़ता और मरण का उल्लेख किया है जो कामग्रस्त या विरह- व्यथा से पीड़ित व्यक्ति की विभिन्न मानसिक अवस्थाओं की सूचक बाह्य दशाएँ एवं चेष्टाए हैं जिन्हें शृ गाररस के अनुभावों में ग्रहण करना चाहिए। तुलसी ने इन्हीं दशाओं का निरूपण वात्सल्य भावना के संदर्भ में कुशलतापूर्वक किया है जो निश्चय ही मार्मिक है ! किन्तु इस मार्मिकता का मूलाधार स्वयं वात्सल्य स्थायी का गांभीर्य है। यहाँ हमें यह न भूलना चाहिए कि स्थायी भावों से संपृक्त होने के कारण केवल संचारी ही नहीं, अनुभाव भी मार्मिक बन जाते हैं। अनुभाव ही क्यों -उपन्यास, नाटक या चित्रपट पर प्रस्तुत भिखारी का चित्रण या अभिनय जलते हुए घर का दृश्य, या नायिका का नृत्य-ये सब मार्मिक प्रतीत होते हैं, पर क्या इसीसे हम इन्हें संचारी भाव मान लें? अस्तु, हम पूर्व धारणा में संशोधन करते हुए निष्कर्ष रूप में स्वीकार करते हैं कि उपर्युक्त शारीरिक एवं मानसिक अवस्थाओं के सूचक विभिन्न तत्त्व जिन्हें

२४. वही, पृ० सं० १०-११

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२५२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

आचार्यों ने संचारी में स्थान दिया है, विभिन्न आन्तरिक एवं बाह्य स्थितियों के सूचक अनुभाव ही हैं-यह दूसरी बात है कि मूल भावना के सम्पर्क या कवि की कलात्मक अभिव्यक्ति के कारण इनमें सौन्दर्य, माधुर्य या मार्मिकता का संचार हो जाय। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ये शारीरिक या मानसिक प्रभाव या परिवर्तन मात्र हैं। जिन्हें भाव-विशेष के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। बौद्धिक भाव-पीछे अवशिष्ट संचारियों के तीसरे वर्ग में हमने बौद्धिक प्रवृत्तियों या क्रियाओं के सूचक तत्त्वों के अन्तर्गत मति, स्मृति, तर्क, धृति, जड़ता एवं विबोध को स्थान दिया है जो मनोविज्ञान की दृष्टि से मूलतः बौद्धिक क्षेत्र से सम्बन्धित है। मनोवैज्ञानिकों ने चेतना को तीन खण्डों-(१) ज्ञान (२) अनुभूति और (३) चेष्टा या क्रिया-में विभक्त करते हुए समस्त बौद्धिक प्रवृत्तियों एवं तत्त्वों को अनुभूति या भाव पक्ष से पृथक ज्ञान के क्षेत्र में स्थान दिया है; अतः इस दृष्टि से उपयुक्त तत्त्वों को भाव के रूप में ग्रहण करना अनुचित प्रतीत होता है। किन्तु मनोवैज्ञानिकों ने यह भी स्वीकार किया है कि व्यवहार में बौद्धिक एवं भावात्मक प्रवृत्तियाँ एक- दूसरी से सर्वथा पृथक या विच्छिन्न नहीं रह पाती, अपितु, प्रत्येक बौद्धिक प्रवृत्ति में थोड़ी बहुत भावात्मकता या प्रत्येक भात्रात्मक प्रवृत्ति के मूल में किंचित् बौद्धिकता का सम्मिश्रण प्रायः रहता है, इसलिये जब कोई बौद्धिक तत्त्व किसी भाव-विशेष का सहचारी या अंग बन जाता है तो उसका भी तदनुरूप हो जाना स्वाभाविक है। यथा-स्मृति एक सर्वथा बौद्धिक तत्त्व है; जब बच्चा भूगोल या गणित का पाठ याद करता है तो उस समय प्रायः भावात्मकता से मुक्त रहता-सिवाय इस ख्याल के कि यदि पाठ याद नहीं हुआ तो अध्यापक महोदय के दण्ड का पात्र बनना होगा-किन्तु यही स्मृति जब किसी प्रिय व्यक्ति के साथ सम्बद्ध होकर प्रणय भावना की अंग बन जाती है तो अत्यधिक भावात्मक एवं मार्मिक हो जाती है; प्रमाण-स्वरूप यहाँ कुछ कवियों की उक्तियाँ प्रस्तुत हैं ; वहै चतुराई सों चिताई, चाहिबे की छबि, वहै छैलताई न छिनक विसरति है। आनन्द-निधान प्रान प्रीतम सुजान जू की सुधि सब भाँतिन सों बेसुध करति है। -घनानन्द विरल डालियों के निकुज सब ले दुःख के निश्वास रहे। उस स्मृति का समीर चलता है, मिलन कथा फिर कौन कहे। -प्रसाद

उपयु क्त अंशों में स्मृति के उस रूप का चित्रण है जो प्रणय-भावना से अनुस्यूत हो जाने के कारण अत्यन्त मर्मस्पर्शी हो गया है। कदाचित् स्मृति के इसी रूप को ध्यान में रखकर आचार्य शुक्ल ने लिखा था-'स्मृतियाँ हमें केवल सुख-पूर्ण दिनों की

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २५३

झाँकियाँ ही नहीं समझ पड़ती। वे हमें लीन करती हैं, हमारा मर्म-स्पर्श करती हैं, बस इतना ही हम कह सकते हैं।'२५ अस्तु, यह स्पष्ट है कि स्मृति के शुद्ध बौद्धिक रूप के अतिरिक्त उसका भावात्मक रूप भी सम्भव है जिसे संचारी रूप में ग्रहण किया जा सकता है। यही बात मति, तर्क, घृति, जड़ता विबोध आदि पर भी लागू होती हैं। इनके भी अनेक भावात्मक रूप काव्य-क्षेत्र में उपलब्ध हैं; यहाँ कतिपय उदाहरण प्रस्तुत हैं- (क) तर्क : क्षमा करो इस भाँति न तुम तज दो मुझे। स्वर्ण नहीं हे राम चरण-रज दो मुझे। जड़ भी चेतन मूर्ति हुई पाकर जिसे। उसे छोड़ पाषाण भला भावे किसे॥ -मैथिलीशरणगुप्त श्याम गौर किमि कहौं बखानी ? गिरा अनयन नयन बिनु बानी ! -तुलसी (ख) धृति : रे मन साहसी साहस राख सुसाहस से सब जेर फिरेंगे। ज्यों 'पदमाकर' या सुख में दुख त्यों दुख से सुख सेर फिरेंगे॥ वैसे ही वेरु वजावत श्याम सुनाम हमारहु टेर फिरेंगे। एक दिना नहिं एक दिना कबहु फिर वे दिन फेर फिरेंगे।। -पझ्माकर

(ग) जड़ता : रही अचल सी ह्व मानो लिखी चित्र की आहि। तजे लाज डर लोक को कहौ विलोकत काहि॥ -बिहारी

(घ) विबोध : वे और शत्रु सब, ये कृतघ्न फिर, इनका क्या विश्वास करू"। प्रतिहिंसा, प्रतिशोध दबाकर मनही मन चुपचाप मरूँ। श्रद्धा के रहते यह सम्भव नहीं कि कुछ कर पाऊँगा। तो फिर शान्ति मिलेगी मुझको, जहाँ खोजता जाऊँगा। -प्रसाद

२५. चिन्तामणि; पृ० २६०

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२५४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन यहाँ हमने कतिपय ऐसे उद्धरण प्रस्तुत किये हैं जिनमें क्रमशः तर्क, धृति, जड़ता, विबोध आदि बौद्धिक वृत्तियों का चित्रण विभिन्न भावों के अंग रूप में हुआ है। इनमें ये बौद्धिक तत्त्व पूर्वोक्त शारीरिक एवं मानसिक अवस्थाओं के सूचक तथाकथित संचारियों की भाँति केवल स्थायी भाव के उत्कर्ष या अपकर्ष के सूचक ही नहीं हैं, अपितु उन्हें पुष्ट करने या उन्हें नया मोड़ देने में योग देने वाले सहयोगी तत्त्व हैं तथा कुछ क्षणों के लिए भावना के स्वरूप को अपने रंग में रंग देने की क्षमता से भी युक्त हैं। अतः यदि इन बौद्धिक तत्त्वों को संचारी या सहयोगी तत्त्वों के रूप में स्वीकार कर लिया जाय तो अनुचित न होगा। यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि अनेक मनोवैज्ञानिकों ने भावों के ऐसे वर्ग का भी निरूपण किया है, जिसे 'बौद्धिक भाव' (intellectual emotions) की संज्ञा दी जा सकती है। डॉ० जदुनाथ सिन्हा इन बौद्धिक भावों का पृथक रूप में विवेचन करते हुए लिखते हैं-ये उन भावों के समूह हैं जो शुद्ध बौद्धिक प्रत्रियाओं के साथ होते हैं। वे हैं-आश्चर्य, कौतूहल, सत्य-ज्ञान का प्रेम।२ यहाँ आश्चर्य, कौतूहल का भी उल्लेख है जिन्हें मूल भावों के रूप में स्वीकार किया जाता है। किन्तु उपयुक्त संचारियों को भी बौद्धिक भावों के रूप में मान्यता दी जा सकती है। अस्तु, मति, स्मृति, तर्क धृति, जड़ता, विबोध आदि को हम मूलतः बौद्धिक प्रवृत्तियों के रूप में स्वीकार करते हुए भी विशेष परिस्थिति में-जबकि किसी भावना-विशेष के अंग रूप में या उसके सहचारी रूप में प्रकट होते हैं तो वहाँ-उन्हें संचारी तत्त्वों के रूप में मान्यता दे दी जाय तो अनुचित न होगा। हाँ, उनके साथ 'भाव' विशेषण लगाना आवश्यक नहीं है क्योंकि मनोविज्ञान के अनुसार भावनाओं की पुष्टि में केवल भाव ही नहीं बौद्धिक तत्त्व भी योग देते हैं। उदाहरण के लिए एक व्यक्त के बाह्य रूप-रंग एवं व्यवहार को देखकर हम उससे प्रभावित होते हैं; उसके प्रति हमारी सद्भावना जगती है; आगे चलकर जब हमें ज्ञात होता है कि उस व्यक्ति ने अनेक महान् कार्य किये हैं तो वह प्रारम्भिक सद्भावना क्रमशः श्रद्धा एवं भक्ति के रूप में विकसित हो सकती है। अस्तु, उपयुक्त संचारियों की मनोवैज्ञानिक दृष्टि से बौद्धिक तत्त्वों के रूप में स्वीकार करने के साथ-साथ रस-सैद्धान्तिक आचार्यो की इस परम्परागत मान्यता में भी संशोधन करने की आवश्यकता है कि स्थायी भाव (स्थायी भावना) की पुष्टि में योग देने वाले सभी तत्त्व भावात्मक होते हैं-बौद्धिक नहीं। वैसे स्पष्ट रूप में किसी आचार्य ने ऐसा नहीं लिखा किन्तु रूढ़ि के रूप में ही यह धारणा प्रचलित है कि सभी संचारी भाव 'भाव' हैं। संचारी के साथ 'भाव' के सहभाव ने भी उक्त धारणा को प्रचलित करने में योग दिया है। यदि हम 'संचारी भाव' के स्थान पर 'संचारी तत्त्व' का प्रयोग करें तो उपयुक्त त्र टि का निराकरण सम्भव है। २६. मनोविज्ञान : डॉ० जदुनाथ सिन्हा; पृ० २७४

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २५५

भावानुभूति के अनुमापक संचारी भाव-अवशिष्ट संचारियों के पूर्वोक्त चार वर्गों में से अब केवल अन्तिम वर्ग और विचारणीय है। इस वर्ग को हमने 'भावनु- भूति की तीव्रता की अनुमापक स्थितियाँ' का शीर्षक देते हुए, इसमें आवेग, उग्रता एवं चपलता को स्थान दिया है। हमारे विचार से आवेग किसी विशिष्ट प्रकार के भाव का सूचक नहीं है, अपितु कोई भी भाव जब अधिक उद्दीप्त होकर 'भावा- वेग' में परिणत हो जाता है तो वहाँ 'आवेग' की स्थिति मानी जा सकती है। इसी प्रकार विभिन्न भाव जब अपेक्षाकृत अधिक उग्र या प्रचंड, या चंचल हो जाते हैं तो उन स्थितियों को 'उग्रता' या 'चंचलता' का नाम दिया जाता है। उदाहरण के लिए यहाँ इनके काव्यात्मक रूप प्रस्तुत हैं : (क) आवेग : 'हा ! लक्ष्मण हा! सीते 'दारुण आर्तनाद गूँजा ऊपर; और एक तारक सा तत्क्षण टूटा गिरा सम्मुख भू पर। चौंक उठे सब हरे ! हरे ! कह हा मैंने किसको मारा; आहत जन के शोणित पर ही गिरी भरत-रोदन-धारा। -मै० श० गुप्त (ख) उग्रत : आज बंदनी मेरी रानी इड़ा यहाँ है। ओ यायावर अब तेरा निस्तार कहाँ है ! -प्रसाद (ग) चपलता: अहह कितना कंटकित पथ यह तुम्हारा अहित, हितकर, क्या यही उपयोग है पीयूष जीवन का गिराना- गर्त दुख में व्यर्थ जिसके हेतु जिसने सुधि न ली हो, और तुमको छोड़कर यों गया जैसे जीर्ण कन्था। -भट्ट उपर्युक्त सभी उदाहरण पं० रामदाहिन मिश्र द्वारा प्रस्तुत हैं जिनमें क्र्मशः शोक के आवेग, क्रोध की उग्रता एवं करुणाजन्य चपलता का निरूपण किया गया; यहाँ आवेग, उग्रता एवं चपलता मूल भावों से पृथक भाव न होकर उन्हीं की गति के उतार-चढ़ाव के द्योतक हैं। मनोवज्ञानिकों ने भी अनुभूति की तीव्रता एवं गम्भीरता के अनुमापन के लिए उसके कुछ प्रकार स्थिर करने का प्रयास किया है। वुड्ट के अनुसार अनुभूति के तीन अनुमापक हैं-(१) सुखात्मक-दुःखात्मक (२) उद्दीप्ति- शान्ति (३) तनाव-शैथिल्य। किन्तु इन्हें परवर्ती मनोवैज्ञानिकों ने विशेष महत्त्व नहीं दिया। सामान्यतः सभी भावनाएँ एवं भाव परिस्थिति के अनुसार चंचल, गम्भीर,

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२५६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

उग्र, प्रचंड एवं शान्त रूप प्राप्त कर लेते हैं-उनकी चंचलता या गम्भीरता सदा एक-रूप नहीं रहती; ऐसी स्थिति में चंचलता, उग्रता, प्रचंडता आदि को यदि अलग भावों के रूप में मान्यता दी जाय तो इनके सम्बन्ध में यह भ्रान्ति उत्पन्न होगी कि इनका स्वतन्त्र या पृथक महत्त्व है। अतः हमारे विचार में चंचलता, गम्भीरता, उग्रता आदि सभी भावों के उतार-चढ़ाव को सूचित करने वाली स्थितियाँ हैं, जिन्हें पृथक रूप में मान्यता देना उचित न होगा। • निष्कर्ष- (क) रस-सैद्धान्तिक आचार्यों के अनुसार संचारीभाव के निम्नांकित लक्षण हैं- (क) स्थायी भावों के प्रकाशक (ख) समुद्र-तरंग की भाँति स्थायी भावों से सम्बन्धित (ग) स्वधर्म शून्य (घ) परतन्त्र (ङ) अनेकोन्मुख (च) संच- रणशील (छ) अस्थिर । (ख) मनोविज्ञान में भावात्मक प्रवृत्तियों के अनेक भेद हैं-यथा, (१) सहज प्रवृत्ति (२) भावना (३) मनोवृत्ति (४) भावात्मक दृष्टिकोण (५) मनो दशा (६) मूल भाव (७) मिश्रित भाव (८) व्युत्पन्न भाव एवं (९) अनु- भूति। इनमें प्रथम चार शेष भेदों की तुलना में स्थायी या स्थिर एवं दीर्घकालीन हैं जब कि शेष 'अपेक्षाकृत अस्थिर एवं अल्पकालीन हैं। रस-सिद्धान्त के 'स्थायी भाव' में प्रथम चार को तथा संचारी भाव में शेष पाँच भेदों को स्थान दिया जा सकता है। (ग) परिगणित संचारियों में से दैन्य, गर्व, निर्वेद, त्रास, अमर्ष, शंका औत्सुक्य-ये सात मनोविज्ञान की 'मनोदशा' (mood) के अनुरूप हैं। (घ) असूया, मोह, चिन्ता ब्रीड़ा, हर्ष एवं विषाद-ये संचारी भाव मनो- विज्ञान के मिश्रित भाव (complex emotions) हैं। (ङ) ग्लानि और व्याधि-ये दो संचारी मनोविज्ञान के व्युत्पन्न भाव (derived emotion) के अन्तर्गत आती हैं। (च) हर्ष और विषाद-अनुभूति (feeling) की श्रेणी में आते हैं। (छ) शेष अठारह संचारियों में से कुछ शारीरिक अवस्था से तथा कुछ मानसिक अवस्था के सूचक हैं, जिन्हें 'संचारी भाव न मानकर अनुभाव मानना उचित होगा। (ज) मति, स्मृति, तर्क, धृति, जड़ता, विबोध-बौद्धिक प्रवृत्तियों से सम्बन्धित क्रियाएँ हैं, जो विशेष परिस्थिति में ही संचारी भाव' के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं, अन्यथा वे शुष्क बौद्धिक क्रियाएँ हैं। (भ) आवेग, उग्रता और चपलता-भाव के उतार-चढ़ाव के द्योतक हैं, अतः इनका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।

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४ विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन

भारतीय रस सिद्धान्त के अनुसार कला एवं साहित्य में रस.निष्पत्ति के लिए अपेक्षित तत्त्वों में विभाव का महत्त्वपूर्ण स्थान है। यद्यपि विभाव स्वयं कोई भाव- विशेष न होकर भावोद्दीपन का कारण मात्र है ; किन्तु इसके अभाव में किसी भी भाव की उद्दीप्ति कठिन है-अतः इस दृष्टि से यह रस के अनिवार्य उपकरणों या साधनों में से एक है। • रस-सिद्धान्त की दृष्टि से विभाव का विवेचन- रस-सिद्धान्त के विभिन्न आचार्यों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से 'विभाव' का विवेचन करते हुए उसका स्वरूप स्पष्ट करने का प्रयास किया है। आचार्य भरत के अनुसार लोक में प्रचलित हेतु कारण अथवा निमित्त का पर्यायवाची रस-शास्त्र में 'विभाव' है।' वाणी, सत्व आदि के अभिनय के द्वारा यह (चित्तवृत्तियों के) विभावन में योग देता है ; इसी से इसे 'विभाव' कहते हैं।२ विभावन का अर्थ है-विशेष रूप से भावन या ज्ञापन। अतः भरत के अनुसार नाटक में जिन कारणों या साधनों के द्वारा भाव का विभावन, ज्ञापन या बोध होता है ; उन्हें 'विभाव' कहा जाता है। धनंजय ने 'दशरूपक 'में 'विभाव' शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार करते हुए स्पष्ट किया कि विभाव वह तत्त्व है जिसे विभावित करके सामाजिक रसास्वाद

१. विभाव : कारणं निमित्तं हेतुरिति पर्यायाः (नाट्यशास्त्र, चौ० ७/४) २. विभाव्यतेऽनेन वांगंगसत्वाभिनय इति विभाव : (वही) ३. यथा विभावितं विज्ञातमिति अर्थान्तरम् ........ अनेन यस्मात् तेनायं विभाव इति संज्ञित : (वही)

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२५८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

करता है। इसके एक अन्य लक्षण के रूप में उन्होंने यह भी लिखा है कि विभाव भाव को पुष्ट करने वाला है।' साहित्य-दर्पणकार विश्वनाथ के अनुसार 'रत्यायुद्बोध का लोकं विभावा: काव्य नाट्ययो : अर्थात् लोक में जो रत्यादि के उद्बोधक हैं वे ही काव्य और नाटकादि में विभाव कहलाते हैं।4इसी प्रकार पं० जगन्नाथ के अनुसार भी स्थायीभावों के लोक प्रचलित कारणों को 'विभाव' कहते हैं।१ अस्तु, उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि भरत, धनंजय, विश्वनाथ, जगन्नाथ- इन सभी ने विभाव को भाव के हेतु या कारण के रूप में ही स्वीकार किया है; किन्तु वे किस प्रक्रिया के हेतु या कारण हैं-इस सम्बन्ध में इनमें किंचित् मत-भेद अवश्य परिलक्षित होता है। जहाँ भरत के अनुसार वे विभावन, भावन या भाव- बोध के कारण हैं वहाँ धनंजय, विश्वनाथ एवं जगन्नाथ प्रभृति के अनुसार वे रति आदि स्थायी भावों के उद्बोधक या कारण हैं। वस्तुतः भरत ने सामाजिक या पाठक की दृष्टि से विभाव का लक्षण निरूपित किया है जब कि अन्य तीनों ने सामान्य रूप में लौकिक दृष्टि से विवेचन किया है ; अन्यथा मूल बात एक ही है। लौकिक दृष्टि से जिन कारणों से भाव का उद्बोधन होगा, काव्य या नाटक में उन्हीं कारणों से पाठक या प्रेक्षक को भाव का बोध होगा-अतः उपयुक्त्त दोनों व्याख्यायें एक ही प्रक्रिया के दो पक्षों से सम्बन्धित हैं, तात्त्विक दृष्टि से उनमें परस्पर विशेष अन्तर नहीं है। आधुनिक युग के अनेक विद्वानों ने विभाव की परिभाषा नूतन शब्दावली में भी प्रस्तुत की है ; यथा-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने विभाव का स्वरूप-विवेचन करते हुए स्पष्ट किया है-'विभाव से अभिप्राय उन वस्तुओं या विषयों के वर्णन से है जिनके प्रति किसी प्रकार का भाव या संवेदना होती है।" अन्यत्र उन्होंने यह भी लिखा है-'कवि .... ऐसी वस्तुओं का चित्रण करता है जो मन में कोई भाव उठाने या उठे हुए भावों को और जमाने में समर्थ होती है ........ (यह) विभाव पक्ष है।" आचार्य शुक्ल ने यहाँ एक तो विभाव के काव्यगत रूप को ही विशेष रूप से ग्रहण किया है, तथा दूसरे उन्होंने विभाव की अपेक्षा केवल भाव के उद्बोधन के लिए ही नहीं, 'उठे हुए भावों को और जमाने के लिए' अर्थात् उनकी पुष्टि के लिए भो मानी है, जो ठीक ही है। पं० रामदहिन मिश्र ने भी विभाव की परिभाषा प्रस्तुत करते हुए लिखा है-'जिस वस्तु या व्यक्ति के प्रति वह भाव व्यक्त होता है वह

४. दशरूपक ; अध्याय ४२ ५. साहित्यदर्पण ; अध्याय ३/२८ ६. रस गंगाधर ; प्रथम आनन ; पृष्ठ-१३४ ७. 'काव्य-दर्पण' (रामदहिन मिश्र) में उदधृत पृ० सं० ४६ ८. रस-मीमांसा, पृ० १५५

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विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २५९

विभाव कहा जाता है। .... जिसे व्यवहार-जगत् में कारण कहा जाता है।" पूर्ववर्ती विद्वानों ने विभाव को भाव के उद्बोधन एवं उसकी पुष्टि का ही कारण माना था जबकि यहाँ मिश्रजी ने 'जिस के प्रति व्यक्त होता .... ' कहकर अप्रत्यक्ष में उसकी अभिव्यक्ति को भी सम्मिलित कर लिया है ; जिसे स्वीकार करने में हमें कोई आपत्ति नहीं है। वस्तुतः जिन कारणों से भावों का उद्बोधन, पोषण होगा वे ही यदि उनकी अभिव्यंजना के भी कारण माने जायँ तो इसमें अनौचित्य की कोई बात परि- लक्षित नहीं होती। अस्तु, उपयुक्त सभी व्याख्याओं के आधार पर विभाव का पहला लक्षण यह माना जा सकता है कि लोक में या काव्य में जिन कारणों से भाव का उदबो- धन, पोषण या अभिव्यंजन हो, उन्हें रस-शास्त्रीय शब्दावली में 'विभाव' कहा जाता है। विभिन्न आचार्यों ने विभाव की परिभाषा करते हुए 'लोक' 'लोक-प्रचलित' या 'लोक प्रसिद्ध' 'लोक-व्यवहार' आदि की भी चर्चा की है ; इस पर यहाँ विशेष रूप से ध्यान दिया जाना चाहिए। ये काव्यगत विभावों की एक अन्य विशेषता की ओर संकेत करते हुए प्रतीत होते है-वह विशेषता यह है कि काव्यगत विभाव भी वे ही होने चाहिए जो लोक प्रचलित हैं। दूसरे शब्दों में, इसे लौकिकता या स्वा- भाविकता भी कहा जा सकता है। अर्थात् काव्य में भावोद्दीप्ति या भावाभिव्यक्ति के लिए ऐसे ही विभावों का आयोजन या निरूपण होना चाहिए जो कि लोक-प्रच- लित या स्वाभाविक हों या जो स्वाभाविक प्रतीत हों, अन्यथा वे विभावन, बोध एवं साधारणीकरण में सहायक सिद्ध न होंगे। अतः विभावों का स्वाभाविक होना उनका दूसरा लक्षण माना जा सकता है। विभाव के भेदोपभेद भी किये गये हैं। विभिन्न आचार्यों ने प्रायः विभाव के दो ही उपभेद माने हैं-(१) आलम्बन और (२) उद्दीपन। आलम्बन के अन्तर्गत सामान्यतः विषयभूतः विषयभूत विभाव को एवं उद्दीपन के अन्तर्गत निमित्त रूप सामग्री को लिया जाता है।" पं० रामदहिन मिश्र ने इसे स्पष्ट करते हुए लिखा है -'जिन पर अवलम्बित होकर भाव उत्पन्न होते हैं वे आलम्बन विभाव हैं .... और जो स्थायी भावों को उद्दीपित करते हैं वे उद्दीपन विभाव हैं।"१ विभिन्न रसों के आलम्बन-भेदों में प्रायः विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों की तथा उद्दीपन-भेदों में देश- काल सम्बन्धी विशेषताओं की चर्चा की गयी है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि आचार्यों के अनुसार जिस व्यक्ति के कारण भावोद्बोधन होता है, वह आलम्बन है तथा देश-काल की जिन विशेषताओं के कारण भाव उद्दीप्त होता है, वे उद्दीपन के अन्तर्गत रखी गयी हैं।

९. काव्य-दर्पण, पृ० ४६ १०. रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण ; पृ० सं० १८ ११. काव्य-दर्पण ; पृ० ४६

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२६० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

आलम्बन और उद्दीपन के भी अनेक उपभेद किये गयें हैं। साहित्य-कौमुदी- कार के अनुसार आलम्बन के दो प्रमुख भेद हैं-(१) विषय और (२) आश्रय।१२ जहाँ रत्यादि भावों को जागरण का कारण विषय विभाव (आलम्बन), वहाँ जिस व्यक्ति के आश्रय से या जिस व्यक्ति के मन में भाव उद्वलित होता है, वह आश्रय है। हमारे विचार से यह भेद स्वयं विभाव के स्वरूप को ही तिरोहित कर देता है ; आश्रय भाव का कारण न होकर स्वयं वह व्यक्ति है जिसके हृदय में भाव उद्वेलित होता है-ऐसी स्थिति में उसे विभाव या भाव के कारणों में कैसे स्थान दिया जा सकता है ? कदाचित् पाठक या प्रक्षक की दृष्टि से ही 'आश्रय' को भी विभाव पक्ष में स्थान दिया गया है क्योंकि काव्यगत आश्रय पाठक या सामाजिक के रस-बोध का कारण सिद्ध होता है ; किन्तु उस स्थिति में से काब्य या नाटक की समस्त सामग्री को ही 'विभाव' कहा जा सकता है, क्योंकि काव्य की प्रत्येक वस्तु अन्ततः पाठक को भी किसी रूप में प्रभावित या उद्वलित करती ही है। वस्तुत 'आश्रय' को विभाव पक्ष या आलम्बन के भेदों में स्थान देना असंगत एवं भ्रामक है। हाँ, विभाव पक्ष से पृथक रूप में भावाश्रय की सत्ता को सूचित करने के लिए 'आश्रय' का प्रयोग किया जाय तो इसे मान्यता दी जा सकती है। शारदातनय ने 'भाव प्रकाश' में विभिन्न रसों के अनुसार भी आलम्बन-भेदों का निरूपण किया है। उनके मतानुसार विभिन्न रसों के आलम्बन निम्नांकित रूपों में होते हैं।1 (क) शृंगार रस : मधुर, सुकुमार, रूप यौवन संपन्न युवक-युवती। (ख) हास्य : व्यंग्य, विकृताकार, परचेष्टानुकारी व्यक्ति। (ग) वीर : त्यागी, सत्यवादी, शूरवीर, विक्रमी पुरुष । (घ) अद्भुत : विचित्र आकृति एवं वेश भूषा वाले तथा विचित्र क्रिया- कलाप करने वाले व्यक्ति। (ङ) रौद्र : बहुबाहु, बहुमुख, भीम दंष्ट्र तथा क्र् र, उद्धत व्यक्ति। (च) करुण : कृशकाय, दुःखी, दीन, मलिन, रोगी, दरिद्र व्यक्ति। (छ) बीभत्स : निन्दित आकृति, वेशभूषा एवं आचरण वाले व्यक्ति। (ज) भयानक : महारण्य में प्रविष्ट, महान् संग्राम में गये हुए अथवा गुरु एवं राजा के अपराधी लोग। उपयुक्त वर्गीकरण में विभिन्न प्रकार के व्यक्तियों के उन रूप-गुण-भेदों एवं चारित्रिक प्रवृत्तियों का निरूपण किया गया है जो विभिन्न रसों से सम्बन्धित स्थायी

१२. 'यमुद्दिश्य रत्यादि : प्रवत्त ते सोऽस्य विषयः आश्रयस्तु तदाधारः' ; सा० कौ० पृ० २९ (डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित द्वारा उद्धृत रस० स्व० पृ० १९) १३. 'भावप्रकाश' ५/६ ; (रस सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण ; पृष्ठ २०)

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बिभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २६१

भावों के उद्व लत में योग दे सकते हैं। आलम्बन के रूप-भेदों को समझाने की दृष्टि से यह प्रयास समीचन है किन्तु इससे कहीं-कहीं भ्रान्ति की भी संभाबना है। उदाहरण के लिए, वीर रस के संदर्भ में यहाँ जिन गुणों की चर्चा की गयी हैं वे, वीर रस के स्थायीभाव के आश्रय के लिए अपेक्षित हैं न कि आलम्बन के लिए। उदाहरण के लिए, राम-रावण-युद्ध के प्रसंग में राम उत्साहपूर्वक रावण के विरुद्ध युद्ध में प्रवृत्त हैं- यहाँ राम उत्साह भाव के आश्रय हैं और रावण आलम्बन है, जिसमें उपयुक्त्त गुणों -वीरता, सत्यवादिता, शूरवीरता आदि की अपेक्षा नहीं है। यही बात रौद्र एवं भयानक के आलम्बन पर लागू होती है। पूर्वोक्त वर्गीकरण से एक भ्रान्ति यह भी उत्पन्न होती है कि काव्य में या लोक-व्यवहार में स्थायी भावों की उद्वीप्ति सदा व्यक्तियों के द्वारा ही संभव है, अर्थात् प्रत्येक स्थायीभाव के आलम्बन के रूप में सदा व्यक्ति-विशेष का ही होना अपेक्षित है ; उसके स्थान पर किसी अन्य वस्तु को नहीं रखा जा सकता। हमारे विचार में यह ठीक नहीं है। एक व्यक्ति परीक्षा में स्वर्ण-पदक की प्राप्ति के लिए निरन्तर उत्साहपूर्वक संलग्न है ; या दूसरा व्यक्ति अर्थ दंड या कारावास की संभा- वना से भयभीत है ; ऐसी स्थितियों में व्यक्ति के उत्साह या भय का मूल कारण क्रमशः स्वर्ण-पदक प्राप्ति का लक्ष्य एवं कारावास की संभावना का विचार मात्र है -अतः यहाँ आलम्बन के रूप में व्यक्ति-विशेष के स्थान पर सम्बन्धित स्थितियों, संभावनाओं या तत्सम्बन्धी विचारों को ही ग्रहण किया जाना चाहिए। इसी प्रकार 'उद्दीपन' के भी भेद किये गये हैं। शारदा तनय ने पूर्वीक्त आठों रसों के अनुकूल आठ प्रकार के उद्दीपकों की चर्चा इस प्रकार की है।८(१) शृंगार रस का ललित (२) हास्य का ललिताभास (३) वीर का स्थिर (४) अद्भुत का चित्र (विचित्र) (५) रौद्र का रूक्ष (६) करुण का खर (७) वीभत्स का निन्दित (८) भयानक का विकृत। इनसे विभिन्न रसों एवं उनके स्थायीभावों की प्रकृति से सम्बन्धित विभिन्न तत्त्वों के बोध में तो सहायता मिलती है किन्तु इन्हें ही अन्तिम मान लेना अनुचित है। उदाहरण के लिए रूक्ष वातावरण में सदा रौद्र की ही उद्दीप्ति हो या विकृत से भयानक की ही हो-यह कोई सार्वकालिक नियम नहीं है। कुछ अन्य आचार्यों ने अन्य दृष्टिकोण से उद्दीपन विभाव के चार प्रभेद किये हैं : यथा- (१) आलम्बन के गुण (२) उसकी चेष्टाएँ (३) उसका अलंकरण और (४) तटस्थ।१ इनमें से प्रथम तीन तो स्वयं आलम्बन की ही चारित्रिक प्रवृत्तियों एवं बाह्य साज- सज्जा को सूचित करते हैं जबकि चतुर्थ में बाह्य देश-काल के वातावरण को सम्मि- लित किया गया है। यदि इस वर्गीकरण स्वीकार किया जाय तो दुष्यन्त की प्रेयसी

१४. भाव प्रकाश ; ४/५ (रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण ; पृ० २०) १५. रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण ; पृ २१

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२६२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

शकुन्तला को आलम्बन तथा उसकी चेष्टाओं एवं फूल मालाओं को उद्दीपन में या क्रोध स्थायी भाव के विभाव रावण को आलम्बन रूप में तथा उसके शस्त्रादि को उद्टीपन में सम्मिलित किया जायगा। दूसरे शब्दों में इस वर्गीकरण के अनुसार आल- म्बन के अन्तर्गत केवल व्यक्ति के शरीर को तथा उद्दीपन में उसकी वेश-भूषा, साज- सज्जा, चारित्रिक प्रवृत्तियों आदि को स्थान देना होगा, जो असंगत एवं अव्यावहारिक प्रतीत होगा। व्यवहारिक एवं काव्यात्मक-दोनों ही दृष्टियों से व्यक्तित्व (जिसमें वेशभूषा, साज-सज्जा, वैयक्तिक गुण, चारित्रिक प्रवृत्तियाँ सम्मिलित है) से पृथक व्यक्ति का कोई महत्त्व नहीं है-अतः दोनों को पृथक करके एक को 'आलम्बन' एवं अन्य को 'उद्दीपन' कहना स्थूल दृष्टि का ही परिचायक है। वस्तुतः शृंगार रस के क्षेत्र में नायिका के हाव-भावों एवं अलंकारों को अनावश्यक महत्त्व दिये जाने के कारण ही इस प्रकार के वर्गीकरण प्रचलित हुए हैं जो असंगत एवं भ्रामक हैं। हमारे विचार में उद्दीपन के अन्तर्गत देश-काल से सम्बन्धित उन सभी स्थितियों एवं परि- स्थितियों का समावेश किया जा सकता है जो किसी भाव के उद्व लन, पोषण एवं अभिव्यंजन में सहयोग देते हैं। जहाँ आलम्बन का भाव के उद्वलन से सीधा सम्बन्ध रहता है वहाँ उद्दीपन का अप्रत्यक्ष योग रहता है-इसी तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमने आलम्ब का कार्य 'योग देना' एवं उद्दीपन का 'सहयोग देना' कहा है। आलम्बन और उद्दीपन में एक मौलिक अन्तर यह भी माना जा सकता है कि जहाँ आलम्बन भाव के आश्रय की निजी या वैयक्तिक स्थितियों से सम्बन्धित होता है, वहाँ उद्दीपन बाह्य एवं आनुसंगिक परिस्थितियों का द्योतक होता है। अस्तु, अब तक के विवेचन-विश्लेषण से उपलब्ध निष्कर्षों को संक्षेप में यहाँ इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है ; • जिन कारणों से भाव का उद्बोधन, पोषण एवं अभिव्यंजन होता है, उन्हें रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से विभाव की संज्ञा दी जाती है। • विभाव लोक-प्रचलन के अनुसार या स्वाभाविक होने चाहिए। • विभाव के दो मुख्य भेद हैं-आलम्बन और उद्दीपन। विभाव के भेदों में आश्रय की गणना करना अनुचित है। · आलम्बन के अन्तर्गत सामान्यतः उस व्यक्ति को लिया है जो सम्बन्धित भाव का विषय, लक्ष्य या कारण होता है। किन्तु हमारे विचार से इसमें व्यक्तियों को ही नहीं वैयक्तिक स्थितियों, प्ररणाओं एवं लक्ष्यों आदि का भी समावेश किया. जाना चाहिए। • आलम्बन की प्रकृति के अनुसार शारदातनय द्वारा किये गये आठ-भेद स्थूल और कहीं-कहीं भ्रामक भी हैं। • उद्दीपन के अन्तर्गत उन परिस्थितियों का समावेश किया जाना चाहिए

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विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २६३

जो भावोद्वलन या उसकी पुष्टि व अभिव्यक्ति में अप्रत्यक्ष रूप में सहयोग देती हैं। · उद्दीपन के परम्परागत भेदोपभेद सीमित, असंगत एवं भ्रामक हैं। · विभाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन- आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार किसी भी भाव की उद्दीप्ति के लिए किसी न किसी उद्दीपक कारण (Stimulus) का होना आवश्यक है, जिसे रस-सैद्धान्तिक शब्दावली में 'विभाव' कहा जा सकता है। इस उद्दीपक कारण की व्याख्या विभिन्न मनोवैज्ञानिकों ने अत्यन्त विस्तार से की है। मैक्डुगल के विचार से भावात्मक तत्त्वों का विवरण प्रस्तुत करना प्रायः कठिन होता है। सामान्यतः जब हम किसी भावानु- भूति की चर्चा करते हैं तो उस समय किसी विशेष आलम्बन (Object) या परि- स्थिति (Situation) के संपर्क से प्राप्त अनुभव का ही आख्यान करते हैं।" अतः इस दृष्टि से भावानुभूति का आलम्बन या परिस्थिति से गहरा सम्बन्ध होता है। इसे दूसरे शब्दों में यों भी कहा जा सकता है कि आलम्बन एवं परिस्थिति का उल्लेख किये बिना भावानुभूति को समभना कठिन है। भावानुभूति के प्ररक या उद्दीपक आलम्बन के सम्बन्ध में यह भी उल्लेखनीय है कि यह आवश्यक नहीं है कि आलम्बन-विशेष से सदा एक ही प्रकार का भाव उत्तेजित हो। एक ही आलम्बन से विभिन्न व्यक्तियों के मन में विभिन्न प्रकार के भाव उद्दीप्त हो सकते हैं; इतना ही नहीं, एक ही व्यक्ति अलग-अलग अवसरों या परिस्थितियों में एक ही आलम्बन से विभिन्न प्रकार की भावानुभूतियाँ प्राप्त कर सकता है।1 अतः भाव-विशेष का कोई विशिष्ट आलम्बन निर्धारित नहीं किया जा सकता। फिर भी इतना अवश्य है कि लोक-व्यवहार में विभिन्न वस्तुओं एवं पदार्थों (आलम्बन) के साथ उन्हीं विशेषणों का प्रयोग होता हैं, जो उनसे उत्पन्न या उद्दीप्त होने वाले विशिष्ट भावों के द्योतक होते हैं। यथा-'भयानक', 'उत्तेजक', 'अद्भुत', 'महान्' आदि विशेषण स्वयं वस्तुओं के निरपेक्ष गुणों के सूचक शब्द नहीं है अपितु वे

  1. "The emotional qualities are more difficult to describe than the sensory qualities. In both cases we can only indicate the quality we experience by pointing to an object or situation .... ' : An Outline of Psychology : Page 315 17. In the presence of the same object, the emotional experiences of different persons may be very different and even those of the same person on successive occasions may vary widely with changes in his general condition." Same : Page 315

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२६४ रस-सिद्धान्त का पुनविवेचन

उनके संपर्क से होने वाली हमारी भावात्मक प्रतिक्रिया के हैं।" इस प्रकार मैक्डूगल ने भावोद्दीपन एवं उसके उद्दीपक आलम्बन के स्वरूप की व्याख्या करते हुए उनमें परस्पर घनिष्ठ सम्बन्ध स्वीकार किया है। बुडवर्थ ने तो 'भाव' की परिभाषा में ही उसके उद्दीपक कारण को प्रमुख रूप में स्थान देते हुए लिखा है-'भाव (संवेग) व्यक्ति की उद्दीप्त या उत्तेजित अवस्था के सूचक हैं तथा प्रत्येक भाव का विवरण ........ उसे उद्दीप्त करने वाली बाह्य परिस्थिति के आधार पर ही दिया जा सकता है। विभिन्न भावों की पहचान भी उन्हें उद्दीप्त करने वाली बाह्य परिस्थितियों के द्वारा ही की जाती है।" वस्तुतः विशिष्ट भाव की उद्दीप्ति परिस्थिति-विशेष की अनुकूलता एवं उसकी प्रतिक्रिया के अनुसार ही होती है।१० वुडवर्थ ने न केवल परिस्थितियों के महत्त्व को स्वीकार किया है अपितु उन्होंने विभिन्न भावों का विश्लेषण करते हुए विस्तार से स्पष्ट किया है कि किस प्रकार की परिस्थिति में किन-किन भावों का उद्दीपन संभव है।२ और साथ ही उन्होंने भी मक्डूगल के इस मत का अनुमोदन किया है कि यह निर्धारित करना 18. "Yet in a general way the quality of our emotional reaction to to an object does signify the nature of the object. Common speech and literary usage recognise this fact ; as when they des- cribe as 'fear-ful' an object that frightens ; as 'provoking' one that angers us ; as 'strange' or 'marvellous' or 'wondrous' or curious one that evokes our curiosity ; or describe a landscape as sublime or awful ...... Common speech goes even further and invents substantives to denote those qualities of things in virtue of which they excite in us the various emotional qualities ; such substantives as awfulness, hatefulness, sublimity, frightfulness, mysteriousness." -- An outline of Psychology : Page 315-6 19. " .... The several emotions are distinguished, In practice, by sta- ting the external situation, in which each occurs and the type of overt response demanded," -Psychology : Page 344 20. " .. Any particular emotion is the stirred up state appropri- ate to a certain situation ······.· ? The same : page 344 21. " .... Fear is aroused by danger situation .... Anger is aroused by situations in which an activity .... is thwarted by some obstacle .... Mirth is evoked by a variety of situations .... " -The same : Page 366