Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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मनोविज्ञान : सामान्य परिचय २०५

प्रेरणा-शक्तियों आदि का भी अध्ययन होने लगा और अब मानव ही नहीं -पशुओं पर भी मनोवैज्ञानिक प्रयोग होने लगे हैं; अतः कहना चाहिए कि ज्यों- ज्यों इसके अध्ययन-क्षेत्र में विस्तार होता गया त्यों-त्यों इसकी परिभाषा में भी नये तत्त्व सम्मिलित होते गये हैं। सम्भव है, भविष्य में और भी नये क्षेत्रों के सम्मिलित होने पर इसकी परिभाषा में नये तत्त्वों को और स्थान दिया जाय। ऐसी स्थिति में हमारे विचार से क्षेत्र-विशेष की दृष्टि से नहीं अपितु सामान्य दृष्टि से इसकी परिभाषा की जानी चाहिए। अतः हम कह सकते हैं-'मनोविज्ञान वह विषय है जिसमें मानसिक पक्ष से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों व तत्त्वों का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति से प्रस्तुत किया जाता है।' यहाँ यह कहने की आवश्यकता नहीं कि 'मानसिक पक्ष' के अन्तर्गत पशु-पक्षी के मस्तिष्क से लेकर मनुष्य तक के मन की सभी वृत्तियों, प्रवृत्तियों, अनुभूतियों, चेष्टाओं, क्रियाओं आदि का समावेश हो जाता है।

• मनोविज्ञान का विकास 'मनोविज्ञान' की एक स्वतन्त्र विषय के रूप में स्थापना आधुनिक युग की देन है; अन्यथा यह पहले दर्शनशास्त्र का ही एक अंग था। प्राचीन ग्रीक आचार्यों ने लगभग सातवीं शती ईसा-पूर्व में मनोवैज्ञानिक अध्ययन की परम्परा का प्रवर्त्तन किया। प्रारम्भ में कुछ दार्शनिकों ने जो कि अद्वतवादी (monists) कहलाते थे, एक ऐसे तत्त्व की खोज का प्रयास किया जिसके आधार पर सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की व्याख्या की जा सके। आगे चलकर द्वतवादी या बहुवादी (plurists) एवं सोफिस्टवादी विचारों के दार्शनिक हुए जिन्होंने मानस तत्त्व के अध्ययन की परम्परा को आगे बढ़ाया। प्लेटो ने मन को विचार या प्रत्यय (idea) से अभिन्न मानते हुए उसे इस जगत से परे की वस्तु के रूप में स्वीकार किया, जबकि उनके शिष्य अरस्तू (ईसा पूर्व चतुर्थ शताब्दी लगभग) ने शरीर और मन को अभिन्न मानते हुए मनोविज्ञान को मानवात्मा के वैज्ञानिक अध्ययन के रूप में स्वीकार किया। फिर भी इस युग में मनोविज्ञान दर्शन एवं आत्मा के प्रभाव से मुक्त नहीं हो सका तथा परवर्ती मध्ययुग में भी यही स्थिति रही।

मनोविज्ञान के प्रति आधुनिक दृष्टिकोण का उन्मेष सर्वप्रथम १६ वीं- १७ वीं शताब्दी के महान् चिन्तकों-डेकार्टे (descartes) स्पाइनोजा (spinoza), लॉक (loocke) प्रभृति में दृष्टिगोचर होता है। डेकार्टे (१५९६-१६५०) ने मन की व्याख्या करते हुए अनेक नूतन स्थापनाए प्रस्तुत की। एक तो उन्होंने यह प्रतिपादित किया कि मनुष्य और पशु के व्यवहार में अन्तर का कारण 'विवेक' है, अर्थात् मनुष्य का व्यवहार विवेक से परिचालित होता है; जबकि पशु या पशुवत् मनुष्य के व्यवहार में ऐसा नहीं होता। दूसरे, उन्होंने यह स्पष्ट

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२०६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

किया कि आत्मा शरीर से तथा चेतना (consciousness) स्नायु-मण्डल (nervous system) से भिन्न है तथा ये अपने-अपने ढंग से कार्य करते हुए एक-दूसरे को प्रभा- वित करते हैं या यों कहिए कि इनमें परस्पर क्रिया- प्रतिक्रिया का सम्बन्ध रहता है। चेतना का अस्तित्व उन्होंने शरीर में स्वीकार किया किन्तु उसका शरीर के किसी स्थान-विशेष या अंग-विशेष में निवास है-इसे स्वीकार नहीं किया। इसीलिए उन्हें द्वतवादी विचारक माना जाता है। इसके विपरीत स्पाइनोजा ने अद्वतवादी विचारों को प्रतिपादित करते हुए बताया कि चेतना, मन, शरीर आदि एक ही वस्तु के विभिन्न पक्ष हैं, अतः इनमें तात्त्विक दृष्टि से कोई अन्तर नहीं। जान लॉक (१६३२-१७०४) की मनोविज्ञान के क्षेत्र में सबसे बड़ी देन उनका 'साहचर्य सिद्धान्त' (principle of association) है जिसके अनुसार हमारे मन की समस्त सामग्री साहचर्य या सम्पर्क द्वारा अजित या सीखी हुई है। बालक जन्म के समय मानसिक तत्त्वों-विचारों से शून्य होता है किन्तु ज्यों-ज्यों वह समाज के सम्पर्क में आता है त्यों-त्यों साहचर्य या अनुभव के द्वारा वह नये-नये तत्त्व ग्रहण करता जाता है जिससे उसके मस्तिष्क का विकास होता है। अठारहवीं-उन्नीसवीं शती में भी अनेक विद्वानों द्वारा मन और शरीर के सम्बन्ध को लेकर अनेक सिद्धान्तों की स्थापना की गयी जिनमें प्रमुखता द्वतवादी दृष्टिकोण की थी। कुछ विद्वानों ने मानव-मस्तिष्क की व्याख्या यंत्र (मशीन) के समानान्तर-रूप में करते हुए प्रतिपादित किया कि मानव-मन का संचालन नाड़ी-तंत्र (sensory nerves), मेरुदण्ड (spinal cord), गतिवादी नाड़ियों (motor nerves) की क्रियाओं द्वारा होता है तथा इनके कारण जो करिया मस्तिष्क में घटित होती है, उसी के समानान्तर क्रिया चेतना में घटित होती है-इसीलिए इस विचारधारा को 'समानान्तर वाद' (parallelism) की संज्ञा दी गयी है। आगे चलकर कुछ और संप्रदायों का भी विकास हुआ जिनमें अन्तर्निरीक्षणवाद (introspectionism) एवं व्यवहारवाद (behaviourism) उल्लेखनीय हैं। मनोविज्ञान को प्रयोगात्मक एवं वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान करने का श्रेय वुण्ट (wundt) महोदय को है, जिन्होंने भौतिक विज्ञान, जीव-विज्ञान एवं शरीर-रचना विज्ञान की पद्धतियों से प्रभावित होकर १८७६ ई० में लिपजिंग में एक मनोवैज्ञानिक प्रयोगशाला स्थापित की तथा इसमें मानव-व्यवहार का अध्ययन विज्ञान की प्रयोगात्मक पद्धति (experimental method) से करके यह सिद्ध किया कि मनोविज्ञान की अध्ययन पद्धति को भी वैज्ञानिक रूप दिया जा सकता है। वुण्ट की सफलता ने यूरोप और अमरीका के अनेक प्रमुख मनोवैज्ञानिकों का ध्यान आकर्षित कर लिया तथा उन्होंने भी इस पद्धति को अपनाने का प्रयास किया। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में और भी कई ऐसे प्रयोग हुए जिनकी सफलता ने मनोविज्ञान के वैज्ञानिक स्वरूप के विकास में योग दिया। डारविन के

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चचेरे भाई फ्रांसिस गॉल्टन (francis galton) ने ब्रिटेन के प्रतिभाशाली व्यक्तियों का अध्ययन करके यह प्रतिपादित किया कि प्रतिभा जन्मजात होती है। उनके निष्कर्ष से भी अधिक महत्त्वपूर्ण उनकी अध्ययन पद्धति थी जिसने अन्य अध्येताओं का मार्ग प्रदर्शन किया। इसी शताब्दी में विलियम जेम्स ने अपनी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों द्वारा मनोविज्ञान को आगे बढ़ाने में योग दिया। बींसवीं शती में मनोविज्ञान के क्षेत्र में पावलोव, वॉटसन, मैक्डूगल, थार्नडाइक, वर्दीमर, कोहलर, फ्रायड, युग, एडलर जैसी प्रतिभाओं का अवतरण हुआ जिन्होंने मनोविज्ञान की विभिन्न शाखाओं की स्थापना करते हुए उसे एक सुविकसित एवं प्रौढ़ वैज्ञानिक विषय के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया। अस्तु, आज 'मनोविज्ञान' अत्यन्त विकसित विषय है, जिसकी व्यापकता एवं गम्भीरता का अनुमान केवल इस बात से लगाया जा सकता है कि इसकी बीस से भी अधिक अलग-अलग शाखाएँ हैं जिसमें विभिन्न दृष्टिकोणों से न केवल मानव-मन अपितु पशुओं तक के मानसिक क्रिया-कलापों का अध्ययन वैज्ञानिक पद्धति द्वारा किया जा रहा है। इन शाखाओं का परिचय आगे अलग शीर्षक में प्रस्तुत किया जाता है। · मनोविज्ञान की शाखाए-जैसा कि पीछे संकेत किया जा चुका है, आधुनिक मनोविज्ञान के विस्तार एवं उसकी व्यापकता का अनुमान लगाने के लिए उसकी प्रमुख शाखाओं पर दृष्टिपात कर लेना पर्याप्त होगा। सर्वप्रथम मनोविज्ञान को दो भागों में विभक्त किया जाता है-(१) सैद्धान्तिक मनोविज्ञान और (२) व्यावहारिक मनोविज्ञान सामान्य मनोविज्ञान में विभिन्न प्रयोगों एवं परोक्षणों के आधार पर मनोविज्ञान के सामान्य सिद्धान्तों की स्थापना की जाती है, जबकि व्यावहारिक मनोविज्ञान में स्थापित सिद्धान्तों के आधार पर विभिन्न मनोवैज्ञानिक परिस्थितियों, प्रवृत्तियों एवं समस्याओं का अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। अब ज्यों-ज्यों मनोविज्ञान के अध्ययन-क्षेत्र का विस्तार होता जा रहा है, त्यों-त्यों सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक मनोविज्ञान की भी अनेक शाखा-प्रशाखाओं का प्रस्फुटन एवं विकास होता जा रहा है। वर्तमान में सैद्धान्तिक मनोविज्ञान की प्रमुख शाखायें ये हैं-(१) सामान्य मनोविज्ञान। (२) प्रयोगात्मक मनोविज्ञान (३) पशु-मनोविज्ञान (४) शारीरिक मनोविज्ञान (physiological psychology) (५) बाल-मनोविज्ञान (६) किशोर-मनोविज्ञान (७) वैयक्तिक मनोविज्ञान (८) समाज मनोविज्ञान (९) असामान्य मनोविज्ञान (१०) विकासात्मक मनोविज्ञान (११) लोक- मनोविज्ञान (१२) विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान (१३) मनोविश्लेषणात्मक मनोविज्ञान या मनोविश्लेषण (psycho-analysis) (१४) परा-मनोविज्ञान (para-psychology) (१५) मनोभौतिक विज्ञान (psycho-physics) ।

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२०८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन इसी प्रकार व्यावहारिक मनोविज्ञान की शाखाओं में मुख्यतः शिक्षा- मनोविज्ञान, औद्योगिक मनोविज्ञान, व्यापार-मनोविज्ञान, सैन्य-मनोविज्ञान, चिकित्सा मनोविज्ञान आदि की गणना की जाती है। यद्यपि यहाँ इन शाखाओं का विस्तृत परिचय देना सम्भव नहीं, किन्तु इनकी सूची मात्र के अवलोकन से स्पष्ट हो जाता है कि किस प्रकार आधुनिक मनोविज्ञान में जीवन के अलग-अलग पक्षों एवं विषयों को लेकर उनका स्वतन्त्र रूप से मनोवैज्ञानिक अध्ययन किया जा रहा है। जहाँ तक साहित्य का सम्बन्ध है, मनोविज्ञान के क्षेत्र में अभी तक उसका विशिष्ट अध्ययन नहीं हो पाया है; यह दूसरी बात है कि कुछ मनोविश्लेषकों ने अपने सिद्धान्तों को साहित्य पर भी लागू करके दिखाया है किन्तु इससे साहित्य की एकांगी ही व्याख्या हो पायी है। वस्तुतः साहित्य के विभिन्न पक्षों एवं उसकी क्रिया-प्रक्रियाओं की मनोवैज्ञानिक व्याख्या के लिए 'साहित्य-मनोविज्ञान' जैसे किसी स्वतन्त्र विषय या मनोविज्ञान की एक पृथक शाखा की स्थापना की आवश्यकता है। फिर भी वर्तमान स्थिति में साहित्य के विभिन्न तत्त्वों-अनुभूति, भाव, विचार, कल्पना, बिम्ब, प्रतीक आदि की मनोवैज्ञानिक व्याख्या के लिए सामान्य मनोविज्ञान में प्रचुर सामग्री उपलब्ध है, जिसका उपयोग आवश्यकतानुसार किया जा सकता है। •मनोविज्ञान और रस-सिद्धान्त साहित्य की प्रत्येक क्रिया-प्रक्रिया बाह्य जगत में घटित न होकर साहित्यकार एवं पाठक के अन्तर्जगत् या उसके मानसिक क्षेत्र में ही घटित होती है, अतः साहित्य सर्जन से लेकर साहित्य के आस्वादन तक की विभिन्न क्रिया-प्रक्रियाओं को शुद्ध मानसिक प्रक्रियाओं के रूप में स्वीकार किया जाय तो अनुचित न होगा। वस्तुतः पुस्तक, चित्र, मूर्ति, अभिनय आदि तो उस मानसिक प्रक्रिया के बाह्य कारण या साधन मात्र हैं, अन्यथा साहित्य एवं कलाओं से प्राप्त होने वाली अनुभूति तो पूर्णतः मानसिक जगत् की वस्तु है तथा साहित्य एवं कला के आस्वाद से प्राप्त अनुभूति को ही 'रस' की संज्ञा दी जाती है; अतः यह कहने की आवश्यकता नहीं कि एक मानसिक तत्त्व होने के कारण रस की यदि शुद्ध वैज्ञानिक व्याख्या सम्भव है तो वह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ही सम्भव है। काव्य-शास्त्र एवं साहित्यालोचन के विभिन्न सिद्धान्तों के द्वारा हम केवल काव्य-वस्तु की ही व्याख्या करते हैं जो कि रसानुभूति का साधन मात्र है; अतः स्वयं साध्य की विवेचना तो मनोविज्ञान द्वारा ही सम्भव है; यह दूसरी बात है कि आधुनिक मनोविज्ञान बावजूद अपनी सारी प्रगति के, अभी इतना समृद्ध एवं विकसित नहीं हो पाया कि उसे हम साहित्य की व्यास्या की दृष्टि से पूर्णतः सक्षम कह सकें। फिर भी उससे .जितनी सहायता सम्भव है, उतनी हमें अवश्य ग्रहण करनी चाहिए तथा आशा करनी चाहिये कि भविष्य में साहित्यिक दृष्टि से भी मनोवैज्ञानिक अध्ययन और आगे बढ़ेगा।

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२ भाव व स्थायी भाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन

मूल प्रकृति की दृष्टि से साहित्य और मनोविज्ञान दो भिन्न श्रणियों के विषय हैं-एक कला की श्रेणी में आता है तो दूसरा विज्ञान की एक शाखा के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसलिए दोनों के मूल लक्ष्य, प्रयोजन एवं पद्धति में भी गहरा अन्तर रहता है ; फिर भी एक दृष्टि से दोनों में गूढ सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। वह दृष्टि विषय-वस्तु की है अर्थात् साहित्य और मनोविज्ञान, दोनों की ही आधारभूत वस्तु प्रायः एक ही क्षेत्र से सम्बन्धित है। दोनों में ही मानव-मन की क्रिया-प्रक्रियाओं अनुभूतियों एवं तत्सम्बन्धी विचारों, भावों एवं क्रिया-कलापों को ही आधारभूत वस्तु के रूप में अपनाया जाता है। यही कारण है कि साहित्य के विवेचन विश्लेषण में एक सीमा तक मनोविज्ञान से भी सहायता ली जा सकती है तथा अनेक साहित्य-सिद्धान्त मूलतः मनोवंज्ञानिक धारणाओं पर आश्रित हैं। इस प्रकार के प्राचीन सिद्धान्तों में रस-सिद्धान्त एवं आधुनिक में फ्रायड्, एडलर, जुग आदि के मनोविश्लेषणात्मक सिद्धान्त उल्लेखनीय हैं। रससिद्धान्त में काव्यानुभूति का विश्लेषण एवं वर्गीकरण भावानुभूति की प्रक्रिया के आधार पर ही किया गया है तथा मनोविज्ञान में भी अन्य मानसिक प्रत्रियाओं के साथ-साथ भावानुभूति का भी अध्ययन, विश्लेषण, वर्गीकरण वैज्ञानिक दृष्टि से उपलब्ध है। इसीलिए रस-सैद्धान्तिक विवेचन-विश्लेषण का औचित्य देखने के लिए यह आवश्यक है कि उसे आधुनिक मनोविज्ञान की कसौटी पर परखा जाय। वस्तुतः हिन्दी, मराठी आदि के अनेक विद्वानों ने इस प्रकार के कई प्रयास किये भी हैं किन्तु वे किसी एक सर्वमान्य निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाये-इतना ही नहीं, अनेक विद्वानों के निष्कर्ष परस्पर विरोधी भी हैं। ऐसी स्थिति में, पूर्ववर्ती प्रयासों एवं उनकी उपलब्धियों को ध्यान में रखते हुए मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रस-सिद्धान्त के पुनर्विवेचन की गहरी आवश्य-

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कता है। हम प्रस्तुत खंड में इसी की आवश्यकता की पूर्ति का प्रयास करते हुए भाव, स्थायी भाव, संचारी भाव, विभाव अनुभाव आदि का विवेचन क्रमशः प्रस्तुत करेंगे। अस्तु, इस अध्याय में भाव एवं स्थायी भाव का अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। (क) भाव के सामान्य रूप का विवेचन भाव रस-शास्त्रीय दृष्टि से-आचार्य भरत ने 'भाव' शब्द की व्याख्या करते हुए इसके तीन अर्थ बताये हैं-(१) जो होते हैं वे भाव हैं।१ जो भावित करते हैं वे भाव हैं।१ और (३) कवि के आन्तरिक भाव या मनोभाव का भावन करवाने वाले। पहले दो अर्थ 'भाव' की व्युत्पत्ति से सम्बन्धित हैं जबकि तीसरा अर्थ रस-शास्त्रीय अर्थ का द्योतक है। इसलिए डॉ० नगेन्द्र ने भी लिखा है-'भरत के भाव विवेचन से स्पष्ट है कि उन्होंने व्यापक रूप से तीसरा अर्थ ग्रहण किया है : जो रस का भावन करें वे भाव हैं-अर्थात् भाव से उनका अभिप्राय रस-व्यंजक सामग्री का ही है जिसके अन्तर्गत स्थायी, संचारी के साथ विभाव और अनुभाव भी आ जाते हैं। किन्तु आगे चलकर उन्होंने विभाव और अनुभाव को पृथक कर दिया है और भावों की संख्या उनचास मानी है .... ।" अस्तु, संक्षेप में, रस-सिद्धान्त के सन्दर्भ में भरत मुनि के अनुसार भाव एक ओर तो कवि के मनोभाव से सम्बन्धित हैं तो दूसरी ओर वे रस के आधार हैं। भरत-परवर्ती संस्कृत के आचार्यों ने भाव के स्वरूप को और स्पष्ट करते हुए उसे क्रमशः सुख-दुःख की अनुभूति", चित्तवृत्ति-विशेष, मनोभाव" आदि के अर्थ में ग्रहण किया है। आधुनिक युग के अनेक हिन्दी आचार्यों ने मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भाव का स्वरुप-विवेचन किया है, जिनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डॉ० नगेन्द्र के नाम उल्लेखनीय हैं। आ० शुक्ल के विचारानुसार 'प्रत्ययबोध, अनुभूति और वेगयुक्त प्रवृत्ति-इन तीनों के गूढ़ संश्लेष का नाम भाव है" तो डा० नगेन्द्र के मतानुसार 'बाह्य जगत् के संवेदनों से मनुष्य के हृदय में जो विकार उठते हैं वे ही मिलकर 'भाव' की संज्ञा प्राप्त करते हैं।१ उपयुक्त विवेचन के आधार पर कहा जॉ सकता है कि रस-सिद्धान्त के आचार्यों द्वारा निरूपित 'भाव का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है जिसके अन्तर्गत कवि के

१. 'कि भवन्तीति भावा :' (नाट्य-शास्त्र १०४) ५. दशरूपक ४.४. २. 'किं वा भावयन्तीति भावा :' (वही ३. 'कवेरन्तर्गत भावं भावयन् भाव उच्यते' ६. साहित्य-दर्पण ३/२६०-२६१

(नाट्य शास्त्र' ७२) ७. काव्यप्रकाश ४-३५

४. 'रस-सिद्धान्त' पृष्ठ २१८ ८. रस-मीमांसा पृ० १६८ ९. रससिद्धान्त पृ० २१९

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भाव व स्थायी भाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २११

मनोभाव, सुख-दुःख की अनुभूति, चित्तवृत्ति-विशेष, प्रत्ययबोध एवं वेगयुक्त प्रवृत्ति से युक्त अनुभूति, संवेदन-जन्य मनोविकार आदि का समावेश हो जाता है। भाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन-आधुनिक मनोविज्ञान में भाव के लिए 'भाव' या तथा 'संवेग' प्रचलित है। इसका अंग्र जी पर्याय 'इमोशन' (Emotion) है, जिसकी व्युत्पत्ति पर प्रकाश डालते हुए एक अंग्रेज विद्वान ने लिखा है-"The word 'emotion' is derived from the Latin 'e' (out) and 'movere' (to move) Originally the word meant a moving out from oue place into other, in the sense of a migration. The word came to mean a moving, stirring, agitation, perturbation, and was so used in a strictly physi- cal sense ........ Finally the word came to be used to designate any agitated vehement, or excited mental state of the individual" अर्थात् 'इमोशन' शब्द की व्युत्पत्ति लैटिन के 'इ' (=बाहर)+मूवरी (=चलना) से हुई। मूलतः इस शब्द का अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान को जाना था, जिसे स्थानान्तरण या निष्क्रमण कह सकते हैं। धीरे-धीरे इसका प्रचलन चलना, उत्तेजना, व्यग्रता आदि के अर्थ में भौतिक स्तर पर हुआ। .. अन्त में इसका प्रयोग व्यक्ति की उत्तेजित उग्र अथवा क्षब्ध मानसिक दशा को सूचित करने के लिए होने लग गया।' उपर्युक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि अंग्रेजी के 'इमोशन' का प्रचलित अर्थ व्यक्ति की उद्दीप्त मानसिक अवस्था का सूचक है। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी 'इमोशन' या भाव की लगभग ऐसी ही परिभाषा की है-यहाँ क्रमशः वुडवर्थ एवं युंग महोदय द्वारा की गयी दो परिभाषाए प्रस्तुत हैं- (१) 'भाव अनुभूति की संक्रमित या उत्तजित अवस्था है।" -वुडवर्थ (२) भाव व्यक्ति की तीव्र अव्यवस्थित (या उद्दीप्त) मानसिक अवस्था है।१२ -युंग अस्तु, मनोवैज्ञानिकों के अनुसार भाव सामान्यतः व्यक्ति की उद्दीप्त मानसिक स्थिति का ही द्योतक है, किन्तु, जैसा कि मैक्डूगल महोदय ने स्पष्ट किया है कि भाव का प्रयोग सामान्यतः दो प्रकार से किया जाता है-एक व्यापक अर्थ में और दूसरा संकीर्ण अर्थ में। व्यापक अर्थ में भाव के अन्तर्गत सभी प्रकार की भावात्मक

  1. Murray. J. A. H .- A New English Dictionary on Historical Principles. 11. 'Emotion is a moved or stirred up state ...... of feeling.'-Psycho logy : Woodworth, Page 308. 12. 'An emotion is an acute disturbance of the individual, psycho- logical in origin. -Emotions in Man and Animal : P. T. young Page 51

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२१२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

प्रवृत्तियों एवं अनुभूतियों को स्थान दिया जाता है तो संकीर्ण अर्थ में उसे अनुभूति के एक विशिष्ट प्रकार तथा भावना (Sentiment) से किंचित् भिन्न रूप में ग्रहण किया जाता है।१ यदि रस-सैद्धान्तिक भाव पर इस दृष्टि से विचार करें तो ज्ञात होगा कि इसका प्रयोग व्यापक अर्थ में ही किया गया है इसीलिए इसमें आधुनिक मनोविज्ञान की अनुभूति (Feeling), मनःस्थिति (Mood), चित्तवृत्ति या भावना (Sentiment) आदि सभी प्रकार की भावात्मक प्रवृत्तियों का समावेश हो जाता है। दूसरे शब्दों में, रस-सिद्धान्त का 'भाव' सामान्यरूप में मनोविज्ञान की भावात्मक प्रवृत्तियों (Emotional tendencies) का पर्याय है। (ख) स्थायी भाव का विवेचन आचार्य भरत ने रस-सम्बन्धी भावों को मुख्यतः तीनों वर्गों में विभक्त किया है-(१) स्थायी भाव (२) संचारी भाव और (३) सातत्विक भाव। इनमें से अंतिम वर्ग (सात्त्विक भाव) को तो परवर्ती आचार्यों ने अनुभावों की श्रेणी में रखा है, अतः हम भी इनका विवेचन अनुभाव के अन्तर्गत ही करेंगे। अस्तु, अब विचारणीय वर्ग केवल दो-स्थायी एवं संचारी-ही रह जाते हैं। इन दोनों का अन्तर स्पष्ट करते हुए भरत ने तीन बातें कही हैं-(१) स्थायी भाव ही नाटक (काव्य) में रसत्व को प्राप्त होते हैं अर्थात् इन्हीं में रस-रूप में परिणत होने की क्षमता है ; जबकि संचारियों में यह क्षमता नहीं है। (२) संचारी भाव स्थायी भाव पर आश्रित रहते हैं। (३) स्थायी भाव स्वामी या नूपति की भाँति प्रमुख होते हैं तो संचारी भाव सामान्य व्यक्ति की भाँति गौण होते हैं। अपने मत को पुष्ट करने के लिए भरत ने कोई उपयुक्त तर्क या प्रमाण नहीं दिया है, केवल परम्परागत मत का उल्लेख कर दिया है। भरत परवर्ती आचार्यों ने स्थायी भाव के स्वरूप पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार करते हुए इसकी अनेक विशेषताओं का उद्घाटन किया है, जो इस प्रकार हैं- १. स्थायी भाव जन्मजात होते हैं और वासना-संस्कार के रूप में विद्यमान रहते हैं।१ (अभिनवगुप्त, हेमचन्द्र) २. ये प्राणिमात्र में जन्म से ही विद्यमान रहते हैं।२ (अभिनवगुप्त) ३. स्थायी भाव स्थिर रूप में रहते हुए विरोधी या अविरोधी भावों (=संचारी भावों) से उच्छिन्न या तिरोहित नहीं होते। (धनंजय एवं विश्वनाथ) 13. An outline of Psychology : William Mcdougall; Page 316-17 १. 'अभिनव भारती' पृ० २८४-५ एवं काव्यानुशासन पृ० ४५७ २. वही। ३. दशरूपक ४-३४ । साहित्य-दर्पण-३-१७४ ।

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भाव व स्थायी भाव का मनोवैज्ञानिक विवेचन २१३

४. स्थायी भाव दूसरे भावों (संचारी भावों) को आत्मसात् कर लेते हैं तथा संचारी भाव इन्हीं के आश्रित रहते हैं।' (धनंजय एवं जगन्नाथ) ५. स्थायी भाव समस्त प्रबन्ध में व्याप्त एवं स्थिर रहते हैं।" (जगन्नाथ) ६. स्थायी भाव ही रसत्व को प्राप्त होते हैं, रस-चर्वणा, आस्वाद या आनन्दरूपता इन्हीं से प्राप्त होती है। (भोज एवं विश्वनाथ) स्थायोभाव की उपयुक्त्त विशेषताएँ आधुनिक युग तक प्रायः सभी विद्वानों द्वारा मान्य होती रही हैं किन्तु आचार्य रामचन्द्र शुवल ने इन पर पुनर्विचार करते हुए अपना निर्णय इस प्रकार दिया है-"भावों के स्वरूप के भीतर ही वह वस्तु है जिसके अनुसार प्रधान और संचारी का विभाग होता है। वह वस्तु है आलंबन। आलंबन या तो सामान्य होता है या विशेष। जो सामान्य आलंबन हो उसके प्रति मनुष्य मात्र का-कम से कम सहृदय मात्र का-वही भाव होगा जो आश्रय का है। जो विशेष आलम्बन होगा उसके प्रति श्रोता या दर्शक स्वभावतः उसी भाव का अनुभव न करेगा जिसे व्यंजित करता हुआ आश्रय दिखाया गया है-दूसरे 'भाव' का अनुभव वह कर सकता है। इस विभेद को ध्यान में रखकर विचार करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि प्रधान भावों की गिनती में वे ही भाव रखे गये हैं जिनके आलम्बन 'सामान्य' हो सकते हैं, शेष भाव या मनोवेग संचारियों की श्रेणी में डाले गये हैं क्योंकि उनमें से किसी-किसी के स्वतंत्र विषय होंगे भी तो भी श्रोता या दर्शक का ध्यान उनकी ओर प्रवृत्त नहीं रहेगा।" आचार्य शुक्ल के उपयुक्त निष्कर्ष को स्वीकार करना कठिन प्रतीत होता है। एक तो उन्होंने स्थायीभावों की काव्यगत स्थिति-विशेष को ही ध्यान में रख कर व्याख्या की है जिससे लौकिक (व्यवहारिक) एवं मनोवैज्ञानिक दृष्टि से स्थायी- भाव की किसी विशेषता का उद्घाटन नहीं होता। दूसरे, यदि आचार्य शुक्ल के निर्णय को स्वीकार कर भी लिया जाय तो यह प्रश्न उठता है कि आठ या नौ स्थायी भावों (रति, घृणा, शोक, भय, उत्साह आदि) में ही ऐसी कौन सी विशेषता है जिसके कारण उनके आलम्बन सामान्य हो सकते हैं, शेष के नहीं ? आचार्य शुक्ल का तर्क है कि किसी को दुःखी देखकर मनुष्य मात्र क्षुब्ध हो सकता है जबकि आनन्द में यह बात नहीं है। इसी से आनन्द या हर्ष को स्थायी भाव नहीं माना गया तथा ईर्ष्या पर भी यही बात लागू होती है। हमारे विचार से आचार्य शुक्ल के ये तर्क भ्रामक हैं। काव्य में हम नायक के दुःख से जितने प्रभावित होते हैं उतने ही उसके हर्ष एवं आह लाद से ही। यदि हमारा कवि या काव्यगत पात्र के साथ तादात्म्य स्थापित हो जाता है तो उस स्थिति में उसकी प्रत्येक भावानुभूति-चाहे वह स्थायी

४. रस-गंगाधर ५. वही ६. सरस्वती कंठाभरण व साहित्य-दर्पण । ७. रस-मीमांसा; पृष्ठ २०५

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हो या संचारी-साधारणीकृत हो जाती है; अतः यह कहना उचित नहों है कि केवल स्थायी ही साधारणीकृत होते हैं, अन्य नहीं वस्तुतः स्थायी भाव तो व्यक्त ही संचा- रियों के माध्यम से होते हैं; अतः यदि व्यक्त रूप ही साधारणीकृत न हुआ तो अव्यक्त रूप (=स्थायी) का साधारणीकरण कसे सम्भव है ? अस्तु, हमारे विचार में आचार्य शुक्ल ने यहाँ स्थायी भाव की किसी मनोवैज्ञानिक विशेषता का उद्घाटन न करके उसे केवल नैतिक गुणों से मंडित करने का प्रयास किया है जो संगत प्रतीत नहीं होता। • मनोवैज्ञानिक दृष्टि से स्थायी भाव क्या हैं ? आधुनिक युग के अनेक विद्वानों ने स्थायी भावों के स्वरूप का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन करते हुए विभिन्न निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं। आचार्य रामचन्द्र शुलक के विचारानुसार कुछ स्थायी भाव-कोध, भय, शोक, आश्चर्य आदि-मनोवि- ज्ञान के मूल भाव (Primary emotions) हैं तो कुछ, जैसे-प्रीति (रति) और बैर (घृणा) भाव-कोश हैं। भाव-कोश से उनका अभिप्राय मनोविज्ञान के 'सेंटीमेंट (Sentiment) से प्रतीत होता है। डॉ० गुलाबराय ने स्थायी भावों को सहज प्रवृत्तियों (Instincts) से सम्बन्धित माना है तो डॉ० राकेशगुप्त ने स्थायी भाव एवं संचारी भाव-दोनों को ही मानसिक प्रभाव (Mental affections) के रूप में स्वीकार किया है। डॉ० नगेन्द्र ने मौलिक मनोविकार (Primary emotions) व्युत्पन्न मनोविकार (Derived emotions) एवं मनोवृति (Sentiment) से स्थायी भावों की तुलना करते हुए प्रतिपादित किया है कि इन्हें तीनों में से किसी भी वर्ग में पूर्णतः स्थान नहीं दिया जा सकता। इसी प्रकार मराठी के भी अनेक विद्वानों-रा० श्री० जोग, डॉ० के० ना० वाटवे, डॉ० सुरेन्द्र बारलिंगे प्रभृति-ने भी स्थायी भावों की तुलना सहज प्रवृत्तियों एवं भावनाओं से करते हुए परस्पर-विरोधी निर्णय दिये हैं। वस्तुतः अब तक इस बात का कोई स्पष्ट निर्णय नहीं हो पाया कि रस-सैद्धान्तिक वर्गीकरण आधुनिक मनोविज्ञान के अनुरूप है या नहीं, और यदि है तो स्थायीभाव को क्या माना जाय ? जो विद्वान् रस-सिद्धान्त को मनोविज्ञान-संगत मानते हैं, उनमें भी परस्पर मतक्य का अभाव है, क्योंकि कुछ स्थायी भाव को मूल भाव मानते हैं, तो कुछ सहज प्रवृत्ति एवं कुछ भावना मानते हैं। हमारे विचार में उपयुक्त्त स्थिति के मूल में दो कारण हैं-एक तो प्रारम्भ में, आज से पच्चीस-तीस वर्ष पूर्व, स्वयं मनोविज्ञान के क्षेत्र में ही भावात्मक प्रवृ- ८. हमने यहाँ डॉ० राकेशगुप्त के ग्रन्थ 'A Psychological Study of Ras' में प्रतिपादित निष्कर्षों का उल्लेख नहीं किया है, उन पर विस्तार से 'हिन्दी काव्य में शृंगार-परम्परा और महाकवि बिहारी' में विचार करते हुए उन्हें अग्राह्य सिद्ध किया जा चुका है।

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त्तियों का विवेचन-विश्लेषण एवं स्वरूप-निर्धारण स्पष्ट रूप में नहीं हो पाया था; जिस तत्त्व को एक मनोवज्ञानिक 'मूल भाव' के नाम से पुकारता था, उसी को दूसरा "भावना' 'भावात्मक दृष्टिकोण' आदि की संज्ञा देता था-अतः ऐसी स्थिति में स्वाभाविक है कि रस-सिद्धान्त का भी मनोवैज्ञानिक विवेचन शुद्ध एवं स्पष्ट रूप में न हो पाये। दूसरे, अनेक विद्वानों ने आधुनिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्रचलित भावा- त्मक प्रवृत्तियों के रूप-भेदों को भी भली-भाँति समभने का प्रयास नहीं किया। अस्तु, प्रस्तुत प्रयास को सफल बनाने के लिए आवश्यक है कि हम सर्व प्रथम भावा- त्मक प्रवृत्तियों के रूप भेदों को मनोवैज्ञनिक दृष्टि से भली-भाँति हृदयंगम कर लें। आधुनिक मनोविज्ञान के अनुसार हमारी विभिन्न भावात्मक प्रवृत्तियों के मूल में हमारी सहज प्रवृत्तियों (Instincts) की प्रेरणा कार्य करती है। मैक्डूगल महोदय के अनुसार हमारी ये सहज प्रवृत्तियाँ या जन्मजात प्रवृत्तियाँ ही बाह्य वातावरण एवं परिस्थितियों के प्रभाव से पोषित, विकसित एवं उद्दीप्त होती हुई विभिन्न भावात्मक प्रवृत्तियों का रूप धारण कर लेती हैं। हमारी सहज प्रवृत्तियों का विकास एवं प्रका- शन क्रमशः भावनाओं (Sentiments), चारित्रिक प्रवृत्तियों व स्वभावगत गुणों (Temperaments), भावात्मक दृष्टिकोणों (Attitudes), मनोदशाओं (Moods), मूल भावों (Primary Emotions), व्युत्पन्न भावों (Derived Emotions), अनुभू- तियों (Feelings) आदि के रूप में होता है। अस्तु, आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से ये सभी रूप भावात्मक प्रवृत्तियों के विभिन्न रूप-भेदों को सूचित करते हैं। अतः यह विचारणीय है कि रस-सिद्धान्त के स्थायी भावों को इनमें से किस भेद के अन्त- रगत स्थान दिया जा सकता है ? सहज प्रवृत्तियाँ और स्थायीभाव-भावात्मक प्रवृत्तियों के उपयुक्त रूप-भेदों में से सर्व प्रथम सहज प्रवृत्तियों का उल्लेख किया गया है जो कि मानसिक विकास की दृष्टि से भी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। डॉ० गुलाबराय ने रस-सिद्धान्त के स्थायी भावों का सम्बन्ध इन सहज प्रवृत्तियों से ही स्थापित करते हुए लिखा था-'हमारे यहाँ के नौ-दस रसों के स्थायी भावों का सम्बन्ध भी इन सहज प्रवृत्तियों से दिखाया जा सकता है किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि इन स्थायी भावों की संख्या किसी विशेष सूची के अनुकूल है फिर भी सभी स्थायी भाव किसी न किसी सहज प्रवृत्ति से सम्बन्धित हैं।" यहाँ डॉ० राय ने यह स्पष्ट नहीं किया कि स्थायी भाव स्वयं सहज प्रवृत्तियों के ही प्रतिनिधि हैं या केवल उनसे सम्बन्धित। यदि वे केवल सम्ब- न्धित ही हैं तो वह सम्बन्ध क्या है-इसका भी स्पष्टीकरण उन्होंने नहीं किया। किन्तु परवर्ती युग के अनेक विद्वानों-पं० रामदहिन मिश्र, डॉ० राजेश्वर प्रसाद चतुर्वेदी प्रभृति-ने कदाचित् डॉ० गुलाबराय से ही प्रेरणा ग्रहण करते हुए स्थायी

९. सिद्धान्त और अध्ययन; पृ० सं० १७७

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भावों को न केवल सहज प्रवृत्तियों से सम्बन्धित अपितु स्वयं सहज प्रवृत्तियों के ही अनुरूप सिद्ध किया है। वस्तुतः रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने स्थायीभाव के जो लक्षण बताये हैं, उनमें से अनेक सहज प्रवृत्तियों में भी उपलब्ध हैं। इस तथ्य को स्पष्ट करने के लिए यहाँ दोनों की तुलना तालिका रूप में प्रस्तुत की जाती है। यहाँ सहज प्रवृत्तियों के लक्षण मैक्डूगल महोदय के शब्दों में उद्घृत किये गये हैं। तालिका : स्थायी भाव एवं सहज प्रवृत्तियों की तुलना

(क) स्थायी भाव के लक्षण (ख) सहज प्रवृत्तियों के लक्षण

(१) स्थायी भाव जन्मजात होते हैं और (1) We may define an instinct as वासना-संस्कार रूप में विद्यमान an inherited or innate psycho- रहते हैं। physical disposition which determines its possessor to perceive and to pay attention to objects of a certain class, to experience an emotional excitement of a particular quality ........

(२) स्थायी भाव प्राणि-मात्र में जन्म से (2) .... We find not only that

ही विद्यमान रहते हैं। these tendencies, in stronger or weaker degree, are present in men of all races, .... but that we may find all of them or at least the germs of them, in most of the higher animals.

(३) स्थायी भाव दूसरे भावों से अवि- (3) These all important and rela- च्छिन्न (अपरिवर्तित) रहते हैं। tively unchanging tendencies which form the basis of human character and will ..... (४) संचारी भाव स्थायी भावों पर (4) Each of the principal instincts आश्रित रहते हैं। conditions, them, some one kind of emotional excitement whose quality is specific or peculiar to it ....

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तालिका से स्पष्ट है कि स्थायी भाव के चार प्रमुख लक्षण तो सहज प्रवृत्तियों में स्पष्ट रूप में उपलब्ध हैं, किन्तु शेष दो लक्षणों-सम्पूर्ण प्रबन्ध में स्थायी भाव की व्यापकता एवं रस-रूप में परिणति-की पूर्ति भी अप्रत्यक्ष रूप से हो जाती है। मैक्डू- गल महोदय के अनुसार सहज प्रवृत्तियाँ हमारे समस्त चिन्तन एवं क्रिया-कलाप की प्रेरणा-स्रोत हैं तथा वे व्यक्ति की विभिन्न चित्तवृत्तियों एवं चारित्रिक प्रवृत्तियों की भी मूलाधार हैं-ऐसी स्थिति में संपूर्ण प्रबन्ध (काव्य) में इनकी व्यापकता एवं प्रमुखता को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार सहज प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति एवं संतुष्टि से व्यावहारिक जीवन में भी अमित आह लाद की अनुभूति प्राप्त होती है, अतः काव्य-क्षेत्र में भी इनकी रस-रूप में परिणति असंभव नहीं। वस्तुतः आचार्य अभिनवगुप्त ने तो रसानुभूति का मूल कारण कला-माध्यम से वास- नाओं की अभिव्यक्ति को ही माना है तथा वासनाएँ सहज प्रवृत्तियों की ही पर्याय हैं। अस्तु, स्थायीभाव के प्रायः सभी प्रमुख लक्षणों की उपलब्धि प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष में सहज प्रवृत्तियों में हो जाती है। फिर भी स्थायीभावों को सहज प्रवृत्तियों के पर्याय के रूप में घोषित करने में एक बाधा है-वह यह कि लक्षणों की दृष्टि से दोनों में गहरा साम्य होते हुए भी व्यावहारिक दृष्टि से दोनों की नामावली एवं संख्या में गहरा अन्तर है। मैक्डूगल महोदय ने जिन बारह सहज प्रवृत्तियों को प्रमुखता दी है, उनमें से काम प्रवृत्ति एवं हास्य को छोड़कर शेष स्थायी भावों से भिन्न हैं। हाँ, इतना अवश्य है कि प्रत्येक सहज प्रवृत्ति से सम्बन्धित जिन मूल भावों (Pri- mary Emotions) की चर्चा की गयी हैं, वे अवश्य रस-सैद्धातिक स्थायी भावों से मिलते-जुलते हैं; इसे स्पष्ट करने के लिये यहाँ इनकी सूचियाँ तालिका रूप में प्रस्तुत की जाती हैं- तालिका-सहजप्रवृत्तियों, मूल भावों एवं स्थायी भावों की तुलना सहज प्रवृत्ति सम्बन्धित जूल भाव स्थायी भाव

१. पलायन की प्रवृत्ति भय भय २. युयुत्सा की प्रवृत्ति क्रोध कोध ३. विकर्षण की प्रवृत्ति जुगुप्सा जुगुप्सा

  1. "The human mind has certain innate or inherited tendencies which are the essential springs or motive powers of all thought and action, whether individual or collective, and are the bases from which the character and will of individuals and of nations are gradually developed under the guidance of the intellectual faculties." -An Introduction to Social Psychology; by William Mc Dougall; Page 17

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४. जिज्ञासा की प्रवृत्ति आश्चर्य विस्मय ५. काम प्रवृत्ति काम रति ६. संतति-पालन की प्रवृत्ति वात्सल्य वात्सल्य ७. आत्महीनता की प्रवृत्ति दैन्यता भक्ति ८. आत्म-गौरव की प्रवृत्ति स्वाभिमान उत्साह ९. सामाजिकता की प्रवृत्ति एकाकीपन X १०. संग्रह की प्रवृत्ति अधिकार भावना X ११. सर्जन की प्रवृत्ति रचनात्मक भाव X १२. हास्य की प्रवृत्ति विनोद हास्य

उपर्युक्त तालिका से स्पष्ट है कि स्थायी भावों की नामावली सहज प्रवृत्ति की अपेक्षा मूल भावों की सूची के अधिक अनुरूप है। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि स्थायी भावों को सहज प्रवृत्ति की अपेक्षा मूल भाव (Primary Emotions) की श्रेणी में क्यों न स्थान दिया जाय? इसके सम्बन्ध में हम आगे स्वतन्त्र रूप में विचार करेंगे किन्तु यहाँ इतना स्पष्ट है कि स्थायी भावों और सहज प्रवृत्तियों में लक्षणों की दृष्टि से गहरा साम्य होते हुए भी व्यावहारिक दृष्टि से दोनों में गहरा अन्तर है। हाँ, इतना अवश्य कहा जा सकता है कि मूल भावों के ही अनुरूप स्थायी भाव भी सहजप्रवृत्तियों से घनिष्ठ रूप में सम्बद्ध हैं, किन्तु फिर भी दोनों एक नहीं हैं।

मूल भाव एवं स्थायी भाव-मक्डूगल महोदय ने भावों या संवेगों (Emot- ions) को तीन वर्गों में विभक्त किया है-(१) मूलभाव (Primary emotions) (२) मिश्रितभाव (Compound emotion) और (३) व्युत्पन्न भाव (Derived emotions) । इनमें मूल भाव वे भाव या संवेग हैं जिनका मूल प्रवृत्तियों से सीधा सम्बन्ध रहता है तथा जो किसी अन्य भाव पर निर्भर या आश्रित नहीं रहते। इस वर्ग में भय, कोध, हर्ष, विषाद, प्रेम आदि की गणना की गयी है। मिश्रित भावों में अनेक मूल भाव मिश्रित होते हैं जबकि व्युत्पन्न भाव अन्य भावों पर आश्रित रहते हैं तथा उनका सहज प्रवृतियों से सीधा सम्बन्ध नहीं रहता इस दृष्टि से विचार किया जाय तो मूल भावों एवं व्युत्पन्न भावों में वैसा ही अन्तर दृष्टिगोचर होगा, जैसा कि स्थायी भाव और संचारी भाव में बताया जाता है; अर्थात् जिस प्रकार व्युत्पन्न भाव मूल भावों पर निर्भर रहते हैं, उसी प्रकार संचारी भाव स्थायी भावों पर निर्भर रहते हैं। स्थायी भावों की नामावली भी मूल की सूची के अनुरूप ही है- किन्तु फिर भी दोनों में अनेक दृष्टियों से अन्तर है। मूल भाव या संवेग व्यक्ति की एक उद्दीप्त मनः स्थिति के ही सूचक हैं। वे दीर्घ काल तक व्यक्ति के मन में स्थिर या स्थायी नहीं रहते। इस तथ्य पर प्रकाश डालते हुए एक मनोविज्ञान-शास्त्री ने लिखा है-"संवेग तीव्र उपद्रव होता है-यह एकाएक उत्पन्न होता है और तीव्रता

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लिये होता है और कुछ क्षण बाद लुप्त हो जाता है।" यदि किसी विशेष कारण से एक ही व्यक्ति के मन में एक ही मूल भाव या संवेग स्थिर रूप में विकसित हो जाता है तो उस स्थिति में वह संवेग भावना (Sentiment) में परिवर्तित हो जाता है। इसी लिए एकाएक उत्पन्न होने वाले भय तथा स्थिर रूप में विकसित भय की भावना या भीरूता में सूक्ष्म अन्तर है। अस्तु, मूल भाव या संवेग के क्षेत्र में भाव विशेष का स्थायी रूप नहीं आता, जबकि स्थायी भाव के लिये स्थिरता एवं अविच्छिन्ना आवश्यक है। ऐसी स्थिति में स्थायी भावों को मूल भावों या संवेगों की श्रेणी में भी स्थान नहीं दिया जा सकता। भावना और स्थायी भाव-जैसा कि पीछे संकेत किया गया है, मनोवैज्ञनिकों के अनुसार, जब भाव या संवेग किसी व्यक्ति-विशेष के मन में परिस्थिति वश स्थिर या स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति के रूप में विकसित हो जाता है तो उसे 'भावना' (Sentiment) का नाम दिया जाता है। रस-संद्धान्तिक स्थायी भाव मूल भावों की अपेक्षा भावना (सेंटीमेंट) के अधिक निकट है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तो यह है कि हिन्दी में लिखित मनोविज्ञान सम्बन्धी अनेक पुस्तकों में तो 'सेंटींमेंट' का हिन्दी पर्याय भी 'स्थायी भाव' ही दिया गया है, यद्यपि हमारे विचार से 'सेंटीमेंट' के लिये 'भावना' शब्द अधिक उपयुक्त है। सेंटीमेंट या भावना के स्वरूप का विवेचन करते हुये शैन्ड महोदय ने लिखा है-'भावना किसी वस्तु पर केन्द्रित भावात्मक प्रवृ- त्तियों की एक सुव्यवस्थित समष्टि है।' मॅक्डूगल के विचारानुसार 'किसी वस्तु के अनुभव से उत्पन्न, उस वस्तु के प्रति एक स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति है।' भाव एवं भावना के अन्तर को स्पष्ट करते हुए डॉ० यदुनाथ सिन्हा ने लिखा है-'भावना के निर्माण में भावात्मक प्रवृत्तियों का संगठन होता है। ........ यह एक स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति है। यह किसी भाव का अनुभव करने की स्थायी प्रवृत्ति है। भाव एक अल्पस्थायी उद्रक होता है जबकि भावना स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति होती है।१२ यदि रस-सैद्धान्तिक स्थायीभाव के पूर्वोक्त लक्षणों को ध्यान में रखकर भावना (Sentiment) के लक्षणों पर विचार किया जाय तो दोनों में गहरा साम्य दृष्टि- गोचर होगा। एक तो स्थायीभाव की ही भाँति भावना को भी क्रमशः विकसित स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति माना गया है। दोनों ही व्यक्ति के आलम्बन-विशेष के प्रति उन्मुख दीर्घकालीन भावात्मक प्रवृत्ति के सूचक हैं। दूसरे, भावना का स्वरूप- विवेचन करते हुए यह भी स्पष्ट रूप में स्वीकार किया गया है कि वह व्यक्ति के मन में अव्यक्त रूप में भी विद्यमान रह सकती है, पर साथ ही विभिन्न परिस्थितियों ११. सामान्य मनोविज्ञान-ले० डॉ० एस० एस० माथुर; पृष्ठ १६३ १२. मनोविज्ञान, पृ० सं० २५१

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में उसकी अभिव्यक्ति विभिन्न भावों के रूप में भी होती रहती है। इस तथ्य का विवेचन करते हुए मैक्डूगल ने लिखा है कि किसी व्यक्ति-विशेष के प्रति प्रणय भावना का विकास हो जाने पर उस व्यक्ति की उपस्थिति में माधुर्यभाव, उसके विपत्ति-ग्रस्त हो जाने पर भय, चिन्ता आदि तथा उसके दूर चले जाने पर दुःख आदि अनेक भावों की उद्दोप्ति संभव है।१ तीसरे, मनोवैज्ञानिकों ने यह भी स्वीकार किया है कि विरोधी भावों की उद्दीप्ति से भी भावना विच्छिन्न नहीं होती। शैण्ड महोदय के अनुसार तो जो भाव प्रम में उद्दीप्त होते हैं, वे सभी परिस्थितियों के भेद से घृणा-भावना में भी संभव हैं।" चौथे, जिस प्रकार संचारी भावों की आवृत्ति स्थायीभाव की पुष्टि में योग देती है, उसी प्रकार भावों की आवृत्ति से भावना का भी पोषण एवं विकास स्वीकार किया गया है। पाँचनें, रस-सिद्धान्त के आचार्यों के अनुसार किसी प्रबन्ध या नाटक में एक ही स्थायीभाव को प्रमुखता दी जानी चाहिए-इस विधान का अनुमोदन मैक्डूगल के इस कथन से हो जाता है कि व्यक्ति (=नायक) के मन में सामान्यतः एक भावना ही प्रमुख होती है जो अन्य भावनाओं को गौण कर देती है।१५ अस्तु, उपयुक्त तुलना से स्पष्ट है कि स्थायी भाव एवं भावना के स्वरूप में इतनी समानता है कि यदि हम दोनों को एक-दूसरे का पर्याय भी कह दें तो अनु- चित न होगा किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से पुनः एक बहुत बड़ी बाधा उपस्थित होती है-वह यह कि रस-सैद्धान्तिक स्थायी भावों की नामावली एवं मनोवैज्ञानिक द्वारा विवेचित भावनाओं की सूची में नाम और संख्या की दृष्टि से भारी अन्तर है। जहाँ तक प्रेम, घृणा, वात्सल्य की बात है, इन्हें दोनों पक्ष ही स्वीकार करते हैं किन्तु शेष स्थायी भावों (भय, कोध, विस्मय, उत्साह, हास्य आदि) को मनोवैज्ञानिक भावना के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। दूसरी ओर मनोविज्ञान के अनुसार भावनाओं की संख्या इतनी अधिक है कि इन्हें किसी एक सूची में स्थान नहीं दिया जा सकता। वसे प्रमुख भावनाओं में हम प्रम और घृणा के अतिरिक्त मैत्री, देश-भक्ति की भावना प्रतिशोध की भावना, सहानुभूति की भावना, समाज-सुधार की भावना, आदि की चर्चा कर सकते हैं। वस्तुतः भावनाओं का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उनमें न केवल व्यक्तियों एवं वस्तुओं से सम्बन्धित स्थायी रागात्मक प्रवृत्तियाँ अपितु विभिन्न विचारों सिद्धान्तों एवं सम्प्रदायों से सम्बन्धित ऐसी बौद्धिक वृत्तियों को भी स्थान दिया जा सकता है जिनका विकास भावना के स्तर पर हो गया हो ; यथा-साम्प्रदायिकता की भावना, रहस्य-भावना, भक्ति-भावना, छुआछूत की भावना, वर्ग-वैषम्य की

  1. An Introduction to Social Psyhology : Page 106 14. Same ; Page 140 15. Same ; Page 140

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भावना आदि भावनाओं के विकास में विचारों का भी योगदान संभव है, इसीलिए कुछ मनोवैज्ञानिक 'भावनाओं' के लिए 'सेंटीमेंट' के स्थान पर 'एटिच्यूड' (Atti- tude) शब्द का भी प्रयोग करते हैं। किन्तु भावनाओं के भी अनेक प्रकार हैं, कुछ में अतिशय भावुकता एवं भावात्मकता रहती है तो कुछ में बौद्धिकता एवं भावात्म- कता का मेल रहता है, अतः यह आवश्यक नहीं है कि हम सभी भावनाओं में बौद्धिकता या विचार-तत्त्व की सत्ता अपेक्षित मानें। अस्तु, यहाँ विचारणीय प्रश्न यही है कि क्या स्थायी भावों को भावनाओं की श्रणों में स्थान दिया जाय या नहीं ? फिर एक प्रश्न और भी है-वह यह कि लक्षणों की दृष्टि से तो स्थायीभाव सहज-प्रवृतियों के भी बहुत कुछ अनुरूप सिद्ध हो चुके थे ; अतः इन दोनों में से स्थायीभाव किसके अधिक निकट हैं ? इन प्रश्नों का उत्तर खोजने के लिए सर्व प्रथम हमें सहज प्रवृत्तियों और भावनाओं के अन्तर को स्पष्ट कर लेना चाहिए। सामान्यतः व्यक्ति की सभी प्रमुख भावनाओं के मूल में सहज प्रवृत्तियों की न्यूनाधिक प्रेरणा सदा विद्यमान रहती है-अतः इस दृष्टि से दोनों में गहरा सम्बन्ध है। उदाहरण के लिए, प्रणय भावना के मूल में काम प्रवत्ति आधार रूप में कार्य करती है। फिर भी दोनों में अन्तर इस बात का है कि जहाँ सहज प्रव त्ति व्यक्ति की जन्मजात अविकसित प्रवृत्ति है, वहाँ भावना उसी सहज प्रवृत्ति के परिस्थितियों एवं सामाजिक वातावरण के प्रभाव से विकसित एवं परिष्कृत रूप की सूचक है। इसीलिए एक का अस्तित्व पशुओं तक में स्वीकार किया गया है जबकि दूसरी के लिए ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसके अतिरिक्त सहज प्रवृत्तियाँ वर्ग या जाति के प्रति होती हैं, वे व्यक्ति-विशेष या वस्तु विशेष की ओर ही सदा उन्मुख नहीं होती। जैसे, काम-प्रवृत्ति की संतुष्टि के लिए भिन्न-लौङ्गिक व्यक्ति ही पर्याप्त होता है जबकि प्रणय-भावना का सम्बन्ध व्यक्ति-विशेष से होता है। सहज प्रवृत्तियाँ विचार एवं भाव की अपेक्षा 'प्रवृत्ति' या क्रिया की ओर अधिक उन्मुख रहती हैं जबकि भावना की स्थिति इसके विपरीत है; अर्थात् वह क्रियात्मक कम और भावात्मक अधिक होती है। साथ ही यह भी उल्लेखनीय है कि सहज प्रवृत्ति का उद्दीपन सामान्यतः विशिष्ट मूलभाव के रूप में ही होता है जबकि भावना में अनेक प्रकार के अनुकूल- प्रतिकूल-भावावेगों एवं अनुभूतियों का संचरण संभव है। अतः निश्चिय ही सहज प्रवृत्तियों की अपेक्षा भावनाएँ अधिक विकसित, परिष्कृत एवं गंभीर भावात्मक प्रवृत्तियाँ हैं। अब यदि साहित्य की दृष्टि से विचार किया जाय तो स्पष्ट होगा कि भाव- नाओं का महत्त्व सहज प्रवृत्तियों से अधिक है। अवश्य ही निम्नस्तरीय सस्ते साहित्य में प्रणय भावना के स्थान पर काम-प्रवृत्ति या काम-क्रीड़ाओं का चित्रण अधिक संभव है, तथा अति यर्थाथवादी साहित्य पर भी यह बात लागू होती है, किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि सच्ची सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की उपलब्धि सहज प्रवृत्तियों के

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चित्रण से नहीं, भावनाओं के ही चित्रण से संभव है। ऐसी स्थिति में साहित्य के स्थायी भावों को सहज प्रवृत्तियों पर आधारित या उनसे सम्बन्धित तो माना जा सकता है किन्तु उन्हें उनसे सवथा अभिन्न नहीं कहा जा सकता है। अस्तु, यह तो स्पष्ट है कि स्थायी भाव सहज प्रवृत्तियों की अपेक्षा भावनाओं के अधिक निकट हैं, तथा अनेक स्थायीभाव-प्रणय, घृणा, वात्सल्य और भक्ति- तो प्रत्यक्ष ही भावनाओं के पर्याय है किन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि सभी स्थायी भाव भावनाओं से अभिन्न हैं या सभी भावनाओं का समावेश स्थायीभावों में हो जाता है। अब तक हमने क्रमशः सहज प्रवृत्तियों, मूल भावों, एवं भावनाओं से स्थायी भावों की तुलना की है, किन्तु मनोविज्ञान के क्षेत्र में इनके अतिरिक्त भी कुछ भावा- त्मक प्रवृत्तियाँ हैं, जिन पर भी यहां विचार कर लिया जाना चाहिए। वे हैं- भावात्मक दृष्टिकोण (Attitude), स्वभाव (Temperament), मनोदशा (mood) आदि। भावात्मक दृष्टिकोण के सम्बन्ध में तो पीछे संकेत-रूप में कहा जा चुका है कि जिन भावनाओं में बौद्धिक तत्त्व की प्रमुखता होती है, या जिनमें विचार एवं भाव संयुक्त रूप में रहते हैं, उन्हें मनोवैज्ञानिकों ने भावात्मक दृष्टिकोण (Attitude) की संज्ञा दी है। उदाहरण के लिए आस्तिकता, आस्था, निर्वेद आदि को भावात्मक या रागात्मक दृष्टिकोण के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इसी प्रकार वे भावनाएं जो व्यक्ति के चरित्र की अंग बन जाती हैं, स्वभावगत प्रवृत्तियों में (Tem- perament) के रूप में स्वीकार की जाती हैं। मनोदशा (Mood) मूल भावों या संवेगों की अपेक्षा अधिक सघन, विस्तृत एवं दीर्घकालीन अनुभूति की द्योतक है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनोदशा (Mood) भाव का स्थिर रहने वाला पश्चात् प्रभाव है। मनोदशा भाव की अपेक्षा कम तीव्र होती है किन्तु उसका स्थितिकाल अधिक दीर्घ होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि भाव या संवेग की तुलना में क्रमशः मनोदशा (Mood), भावात्मक दृष्टिकोण (Attitude), भावना (Senti- ment), स्वभावगत प्रवृत्ति (Temperament) एवं सहज प्रवृत्ति (Instinct)-ये सभी अधिक व्यापक, दीर्घ, स्थिर एवं स्थायी होते हैं। यदि हम स्थायी भावों की नामावली पर पुनर्विचार करें तो ज्ञात होगा कि हमारे अनेक स्थायीभाव जो कि भावना के अन्तर्गत नहीं आते वे मनोदशा" (Mood), भावात्मक दृष्टिकोण (Attitude), चारित्रिक या स्वभावगत प्रवृत्ति (Tempera- ment) एवं सहज प्रवृत्ति (Instinct) के अन्तर्गत समाविष्ट हो जाते हैं यथा,क्रोध एवं शोक जब अपेक्षाकृत दीर्घकालीन हो जाते हैं तो वे मनोदशा (mood) के रूप

१६. मनोदशा भाव की अपेक्षा तो स्थिर है किन्तु इसका स्थिति-काल कुछ घन्टों तक ही रहता है, अतः उसे हमने आगे संचारी भाव के समकक्ष ही माना है।

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में विकसित हो जाते हैं। इसी प्रकार शान्त रस के स्थायीभाव निर्वेद को भी भावा- त्मक दृष्टिकोण (Attitude) के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। इसी प्रकार वीर रस का स्थायी भाव उत्साह जो कि व्यावहारिक दृष्टि से वीरता एवं कार्य- तत्परता का पर्याय है, चारित्रिक प्रवृत्ति (temperament) का ही एक रूप है। हास्य और भय-सामान्यत; मूल भाव हैं, जो परिस्थिति-विशेष में कुछ समय तक ही स्थिर रहते हैं, किन्तु जब इनका विकास व्यक्ति में स्थायी रूप से हो जाता है तो ये भी क्रमशः विनोद की प्रवृत्ति एवं भय की भावना या भीरुता की प्रवृत्ति में परिणत हो जाते हैं ; अतः इन्हें भी परिस्थितियों के अनुसार चारित्रिक प्रवृत्तियों या भावना-विशेष के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। उपयुक्त विवेचन से एक बात स्पष्ट है कि स्थायीभाव के रूप में रस-सिद्धान्त के आचार्यों ने जिन भावों का उल्लेख किया है वे मनोविज्ञान के अनुसार किसी एक ही श्रेणी में नहीं रखे जा सकते अर्थात् उनमें से कुछ भावनाओं (Sentiments) की श्रेणी के हैं, कुछ मनोदशाओं एवं भावात्मक दृष्टिकोणों की श्रेणी के और कुछ चारित्रिक प्रवृत्तियों की श्रेणी के। ऐसी स्थिति में रस-सैद्धान्तिक वर्गीकरण को संगत कैसे कहा जा सकता है ? इसके उत्तर में हमारा निवेदन है कि भावात्मक प्रवृत्तियों के ये सभी रूप मूल भावों (Primary emotions), व्युत्पन्न भावों (Deri- ved emotions) एवं अनुभूतियों (Feelings) की तुलना में पर्याप्त स्थिर, स्थायी या दीर्घकालीन हैं, अतः यदि हम इन्हें समन्वित रूप में स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों के नाम से पुकारें, तथा शेष-मूल भावों, व्युत्पन्न भावों एवं अनुभूतियों-को अस्थिर, अस्थायी या संचरणशील प्रवृत्तियों के रूप में स्वीकार करें तो मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह कोई असंगति नहीं होगी। अस्त, रस-सैद्वान्तिक वर्गीकरण असंगत न होते हुए भी मनोवज्ञानिक वर्गीकरण की तुलना में स्थूल अवश्य है। साथ ही स्थायी भावों का नामकरण भी दोषपूर्ण है। जहाँ इनके लक्षण सहज प्रवृत्तियों एवं भाव- नाओं के अनुरूप है, वहाँ उनका नामकरण भावोवेगों एवं अनुभूतियों के रूप में है, जिससे अनेक बार स्थायीभाव और संचारी भाव का भेद लुप्त हो जाता है। उदा- हरण के लिए-'कोध' एक संचरणशील अस्थायी भाव है ; कोई व्यक्ति निरन्तर क्रोध की स्थिति में नहीं रह सकता, इसीलिए किसी प्रबन्ध-काव्य या नाटक के नायक को आदि से लेकर अन्त तक क्रोधग्रस्त नहीं दिखाया जा सकता। दूसरी ओर क्रोध की उद्दीप्ति घृणा (वीभत्सरस), प्रम, उत्साह (वीर रस) में भी संभव है, जहाँ वह स्थायीभाव नहीं माना जाता। ऐसी स्थिति में क्रोध को स्थायीभाव की श्रेणी में स्थान दिया जाना कहाँ तक ठीक है ? वस्तुतः रौद्र रस का स्थायीभाव क्रोध न होकर द्वष, बैर या प्रतिशोध की भावना है जिसके अन्तर्गत न केवल क्रोध अपितु घृणा, उपहास, गर्व, खेद, आवेग, अमर्ष, हर्ष, आदि अनेक भावावेगों की उद्दीप्ति परिस्थिति-भेद से अस्थायी रूप में संभव है। ऐसी स्थिति में यदि रौद्ररस के स्थायी

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२२४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

भाव का नामकरण 'कोध' के रूप में न करके 'द्वष भावना' के रूप में किया जाता तो उपयुक्त्त असंगति न आती। यही बात 'भय', 'हास्य' 'घृणा' 'आश्चर्य' आदि अन्य स्थायी भावों पर भी लागू होती है। ये सभी भाव मनोविज्ञान के 'इमोशन' या क्षणिक भावावेग मात्र हैं जिनकी उद्दीप्ति परस्पर विरोधी भावनाओं में भी संभव हैं-ऐसी स्थिति में संचारी भावों से इनका पार्थक्य स्पष्ट नहीं होता। इतना ही नहीं स्थायीभाव के निर्धारित लक्षण भी इन पर लागू नहीं होते। उदाहरण के लिएस्थायीभाव का एक प्रमुख लक्षण यह माना गया है कि वह विरोधी भावों की उद्दीप्ति से भी विच्छिन्न नहीं होता अर्थात् वह उन्हें भी आत्मसात् कर लेता है। यथा प्रम में यदि प्रमिका प्रिय की उपस्थिति में हर्ष, किन्तु उसकी अनुपस्थिति में शोक ; उसके विलम्ब से आने पर क्रोध से ग्रस्त हो तो यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि इन विरोधी भावों के कारण उसका स्थायीभाव-प्रणय-विच्छिन्न हो गया है। किन्तु क्या यही बात क्रोध, भय, हास्य आदि पर लागू होती है ? यदि क्रोध से उद्दीप्त व्यक्ति एकाएक शत्र के हाथ में पिस्तौल देखकर भय से ग्रस्त हो जाय तो क्या हम यह कहेंगे कि उसका क्रोध विच्छिन्न नहीं हुआ ? यदि हम किसी व्यक्ति पर हँस रहे हों और बदले में वह हमारे गाल पर थप्पड़ लगादे, जिसके कारण हम हास्य के स्थान पर करोध घृणा या शोक से ग्रस्त हो जांय तो क्या यहाँ यह माना जायगा कि हमारा हास्य भाव अविच्छिन्न है ? वस्तुतः उपयुक्त सभी उदाहरणों में क्रोध, भय, हास्य आदि स्थायीभाव के रूप में ग्राह्य नहीं है। ऐसी स्थिति में रस-सिद्धान्त के समर्थक कदाचित् यही उत्तर दे सकते हैं कि प्रत्येक कोध, प्रत्येक भय स्थायीभाव नहीं होता अपितु जब ये भाव स्थायी रूप में-ऐसी परिस्थिति में कि इनका उद्दीपन बार-बार होता रहे-चित्रण हो, उसी स्थिति में उन्हें स्थायी मानेंगे, अन्यथा इनका उद्दीपन संचारी रूप में भी संभव है। यदि यही बात है तो फिर सभी संचारियों का स्थायी रूप में और सभी स्थायीभावों का संचारी रूप में चित्रण किया जा सकता है तथा उस स्थिति में स्थायी एवं संचारी का वर्गीकरण निरर्थक सिद्ध हो जाता है। हमारे विचार में यह बात मनोवैज्ञानिक सत्य नहीं है कि स्थायो एवं संचारी में केवल काव्यगत स्थिति का ही अन्तर है ; व्यवहार में कोई अन्तर नहीं। वस्तुतः भावना, दृष्टिकोण, चारित्रिक प्रवृत्ति आदि स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों को काब्य में सदा स्थायी प्रवृत्ति के ही रूप में तथा पूर्वोक्त भावों-क्ोध, भय, हास्य आदि-को सदा संचारी या क्षणिक भावावेग के रूप में ही चित्रित किया जा सकता है। अतः निश्चय ही स्थायी और संचारी के जिन भेदक लक्षणों का प्रतिपादन किया गया है, वह सर्वथा संगत एवं सार्थक है किन्तु उसमें त्रटि यह है कि स्थायी भावों का नाम- करण एवं चयन उन लक्षणों के अनुरूप नहीं किया गया-नामकरण में जहाँ स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियों (भावना आदि) को स्थान मिलना चाहिए था, वहाँ उनसे घनिष्ठ रूप में सम्बद्ध मूल भावों को स्थान दे दिया गया। फिर भी परम्परा से

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विभिन्न काव्यों में हम जहाँ रति, क्रोध, भय आदि स्थायी भावों का अस्तित्व स्वीकार करते हैं, वहाँ वास्तव में प्रणय भावना, द्वष-भावना का निरूपण होता है। अतः उपयुक्त्त त्रटि का निराकरण सरलता से किया जा सकता है। आचार्यों ने जहाँ मूलभाव का उल्लेख किया है वहाँ यदि हम तत्सम्बन्धी स्थायी भावात्मक प्रवृत्ति को स्थान दे दें तो स्थायी भाव का स्वरूप मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी संगत सिद्ध हो सकेगा। इतना अवश्य है कि एक ही रस-भेद से सम्बन्धित भावनाओं के अनेक रूप उपलब्ध हैं, अतः हमें उनका वर्गीकरण रस-विशेष के ही अनुसार करना होगा। अतः यहाँ स्थायीभावों के संशोधित एवं व्यापक रूपों की नामावली तालिका रूप में प्रस्तुत की जाती है- तालिका-स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियाँ एवं स्थायीभाव

स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियाँ या सम्बन्धित मूल भाव या भावनाओं के प्रकार स्थायी भाव

(१) प्रणय भावना। रति (प्रेम) (२) द्वष-भावना। प्रतिशोध की भावना। कोध क्ान्ति या विद्रोह की भावना। (३) भीरता की प्रवृत्ति भय (४) करुणा या सहानुभूति की प्रवृत्ति शोक (करुणा) (५) विनोद, उपहास या व्यंग्य की हास्य प्रवृत्ति (६) घृणा की भावना घृणा (७) जिज्ञासा एवं कौतूहल की प्रवृत्ति आश्चर्य (८) निर्वेद, ग्लानि या पलायन की निर्वेद प्रवृत्ति (९) भक्ति या आत्म-दैन्य की भावना भक्ति (१०) स्नेह-वात्सल्य की भावना वात्सल्य (११) मैत्री भावना सख्य (१२) आत्मगौरव की प्रवृत्ति, अधिकार उत्साह भावना, कर्त्तव्य-भावना प्रस्तुत तालिका में हमने प्रचलित नौ स्थायी भावों के अतिरिक्त भक्ति, वात्सल्य, सख्य, को भी स्थान दिया है क्योंकि इनका निरूपण मनोविज्ञान एवं साहित्य-दोनों में ही स्थायी भावात्मक रूप में मिलता है। प्रथम दो को तो मध्य- युगीन आचार्यों ने भी मान्यता दी है, किन्तु सख्य भाव उपेक्षित रहा है। हमारे

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२२६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन विचार में नरोत्तमदास के 'सुदामा-चरित' एवं शेक्सपियर के 'मर्चेन्ट आफ वेनिस' में मैत्री भावना या सख्य भाव का निरूपण सफलतापूर्वक हुआ है, अतः इन्हें भी स्वतंत्र रस के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। तालिका के अनेक वर्गों में एक ही मूल-भाव के साथ अनेक भावात्मक प्रवृ- त्तियों या भावनाओं का उल्लेख किया गया है जो इस बात का द्योतक है कि उल्लि- खित सभी भावनाएँ या प्रवृत्तियाँ सम्बन्धित स्थायीभाव या रस की पुष्टि व अभि- व्यक्ति में सक्षम हैं किन्तु मूल प्रवृत्ति एवं प्रकृति की दृष्टि से वे एक ही श्रेणी के हैं। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि तालिका में हमने प्रमुख भावनाओं का ही उल्लेख किया है फिन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि भावनाओं की संख्या इतनी ही है। वस्तुतः हमारी सभी सामान्य भावनाएँ एवं स्थायी भावात्मक प्रवृत्तियाँ साहित्य में सफलता- पूर्वक चित्रित की जा सकती हैं यह दूसरी बात है कि फिर भी सम्बन्धित मूल भावों एवं रस-भेदों की संख्या सामान्यतः इतनी ही रहेगी, क्योंकि अन्ततः भावात्मक अनु- भूति की दृष्टि से अन्य भावनाओं एवं भावात्मक प्रवृत्तियों को भी मूल भावों एवं रस-भेदों में स्थान दिया जा सकता है। उपर्युक्त्त स्थापना के सम्बन्ध में एक शंका की जा सकती है कि विभिन्न प्रकार की सभी भावात्मक प्रवृत्तियों एवं भावनाओं को कुल बारह वर्गों में ही समन्वित करने का क्या औचित्य है ? मनोवैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा करना कहाँ तक ठीक है ? इसके उत्तर में हमारा निवेदन है कि मनोविज्ञान के अनुसार भी हमारी सभी भावानात्मक प्रवृत्तियाँ मूलतः सहज प्रवृत्तियों पर आधारित हैं-जैसा कि अन्यत्र स्पष्ट किया जा चुका है; हमारी सहज प्रवृत्तियाँ ही विभिन्न परिस्थितियों, वातावरण, शिक्षा-दीक्षा एवं संस्कारों के प्रभाव से विकसित एवं परिष्कृत होकर अनेक भावनाओं व चारित्रिक प्रवृत्तियों के रूप में विकसित होती हैं-एक ही सहज प्रवृत्ति परिस्थिति भेद से अनेक भावनाओं व प्रवृत्तियों के रूप में भी विकसित हो सकती है-अतः एक सहज प्रवृत्ति से सम्बन्धित विभिन्न भावनाओं को एक ही वर्ग में स्थान दे दिया जाय तो यह अनुचित नहीं होगा। वस्तुतः एक ही वर्ग की मूल प्रेरक सहज प्रवृत्ति तो एक ही होती है किन्तु आलम्बन के भेद से वे विभिन्न भावनाओं में परिवर्तित हो जाती हैं। उदाहरण के लिए युयुत्सा की मूल प्रवृत्ति या सहज प्रवृत्ति तो एक ही है किन्तु जब किसी शत्र के प्रति युयुत्सा की प्रवृत्ति जागृत होती है तो वह द्वष या वर में परिणत हो जाती है, पर यदि उसका आलम्बन वस्तुतः हमारा शत्र न होकर मित्र या भाई हो किन्तु उसने हमें हानि पहुँचाई हो तो वहाँ वह प्रतिशोधात्मक रूप ग्रहण कर लेगी। इसी प्रकार स्वतन्त्रता सामाजिक अधिकारों या आर्थिक समानता की प्राप्ति के लिए किये गये विद्रोह या क्रान्ति के मूल में भी युयुत्सा की प्रवृत्ति ही दृष्टिगोचर होगी किन्तु परिस्थिति एवं आलम्बन-भेद के ही कारण उन्हें द्वष-भावना से भिन्न नाम दिया जाता है। अतः इस दृष्टि से

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एक सहज प्रवृत्ति पर आधारित विभिन्न भावनाओं को एक ही वर्ग में स्थान देना मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी समीचीन है। सहज प्रवृत्तियों के अतिरिक्त विभिन्न भावनाओं की वर्गीय समानता का एक और आधार-मूल भाव (primary emotion) है। भावनाए असंख्य हैं किन्तु उनकी उद्दीप्ति एवं अभिव्यक्ति प्रायः गिने-चुने मूल भावों के रूप में ही होती है। उदाहरण के लिए, द्वष-वैर, प्रतिशोध, विद्रोह, क्रान्ति आदि भावनाओं का व्यक्त रूप सामान्यतः क्रोध होगा। मूल भाव का स्वरूप विभिन्न भावनाओं की अपेक्षा उनकी आधारभूत सहज प्रवृत्ति के अनुरूप होता है। अतः पूर्वोक्त तालिका के एक वर्ग में दी गयी विभिन्न भावनाएँ एवं भावात्मक प्रवृत्तियाँ जहाँ एक ओर मूलाधार की दृष्टि से किसी एक ही सहज प्रवृत्ति पर आधारित हैं वहाँ भावोद्दीपन एवं भावाभिव्यक्ति की दृष्टि से भी मुख्यतः एक मूलभाव से सम्बन्धित हैं। अतः उपयुक्त वर्गीकरण उभय पक्षीय दृष्टि से सुसंगत सिद्ध होता है। सहज प्रवृत्तियों, भावनाओं एवं मूल भावों के पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट करने के लिए एक तालिका भी प्रस्तुत की गयी है, जिसे प्रस्तुत संदर्भ में देखा जा सकता है। अतः यहाँ निष्कर्ष रूप में इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि रस-सैद्धान्तिक स्थायी भाव मूलतः सहज प्रवृत्तियों पर आधारित हैं, उनका विकास अनेक भावनाओं में सम्भव है, किन्तु उनका प्रस्फुटन विभिन्न मूल भावों व अन्य भावों में होता है। रस- संद्धान्तिक वर्गीकरण में सबसे बड़ी त्रटि यह कि उनका नामकरण उनसे सम्बन्धित मूल भाव के आधार पर किया गया है जबकि स्वयं 'भूलभाव' अस्थिर भावावेग है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से स्थायी भावों के बारह प्रमुख वग करते हुए, उनमें लगभग बीस-बाईस भावनाओं (sentiments) को स्थान दिया जा सकता है। तालिका : सहज-प्रवृत्तियों, भावनाओं एवं मूल भावों का पारस्परिक सम्बन्ध

सहज प्रवृत्ति भावनाए या भावात्मक प्रवृत्तियाँ मूलभाव एवं स्थायीभाव

१. काम प्रवृत्ति प्रणय भावना। काम (रति) या प्रणय। २. युयुत्सा की प्रवृत्ति द्वष, प्रतिशोध, क्र्ान्ति क्रोध विद्रोह आदि की भावनाएं। ३. पलायन की प्रवृत्ति भीरता भय ४. शरणागति-प्रदान कीवृत्ति सहानुभूति, करुणा, शोक (करुणा) ५. हास्य की प्रवृत्ति विनोद, उपहास, व्यंग्य हास्य ६. विकर्षण की प्रवृत्ति घृणा घृणा

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२२८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

७. जिज्ञासा की प्रवृत्ति जिज्ञासा, कौतूहल आश्चर्य ८. आत्म दन्य की प्रवृत्ति भक्ति भावना भक्ति

९. संतति-पालन की प्रवृत्ति वात्सल्य, स्नेह, करुणा, वात्सल्य

१०. संग्रहवृत्ति/आत्म गौरव अधिकार भावना, उत्साह

की वृत्ति ११. साहचर्य की प्रवृत्ति सख्य, मैत्री सख्य

१२. चिन्तन की प्रवृत्ति निर्वेद निर्वेद

(नवान्वेषण की प्रवृत्ति)

• निष्कर्ष (क) 'भाव, शब्द का प्रयोग रस-शास्त्र में व्यापक अर्थ में किया गया है, जिसे मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सामान्य भावात्मक प्रवृत्ति (emotional tendency) के पर्याय के रूप में ग्रहण किया जा सकता है। (ख) रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से स्थायीभाव की विशेषताएँ ये हैं- (१) जन्म जात (२) वासना संस्कार-रूप में विद्यमान (३) विरोधी अविरोधी भावों से अविच्छिन्न (४) अन्य भावों को आत्मसात् कर लेना। (५) समस्त प्रबन्ध में व्याप्त एवं स्थिर। (५) रस-चर्वणा के के आधार (७) संचारीभावो के आधार। (ग) आचार्य शुक्ल ने स्थायीभाव की प्रमुख विशेषता 'आलम्बन की निर्विशेषता' को माना है, जो भ्रामक सिद्ध होती है। (घ) स्थायीभाव के परम्परागत लक्षण मनोविज्ञान में निरूपित सहज प्रवृत्तियों (instincts) के अनुरूप है, किन्तु दोनों की नामावली एवं संख्या में गहरा अन्तर है। (ङ.) नामावली की दृष्टि से स्थायीभाव मनोविज्ञान के मूलभावों (primary emotions) के अनुरूप हैं, किन्तु दोनों के लक्षणों में गहरा अन्तर है। वस्तुतः मूल भाव स्थायी या स्थिर नहीं होते-अतः उन्हें 'स्थायीभाव' के समकक्ष स्थान नहीं दिया जा सकता। (च) लक्षणों की दृष्टि से स्थायी भाव एवं मनोविज्ञान की 'भावनाओं' (sentiments) में गहरा साम्य है, किन्तु भावनाओं की संख्या एवं रूप-भेद स्थायीभाव की संख्या एवं रूप-भेद के अनुकूल नहीं है। (छ) रस-सैद्धान्तिक स्थायी भावों का परम्परागत नामकरण दोष-पूर्ण है, 6 अन्यथा रति भाव को प्रणय भावना में, जुगुप्सा को घृणा की भावना में, तथा वात्सल्य एवं भक्ति को इसी नाम की भावनाओं में स्थान दिया जा सकता है।

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(ज) क्रोध, भय, हास्य आदि संज्ञाएँ मूल भावों की द्योतक हैं, जिन्हें भावना नहीं कहा जा सकता, किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से रौद्र, भयानक, हास्य आदि में इनके भावनात्मक रूप-क्रमशः द्वष या प्रतिशोध, भीरता, विनोद का चित्रण होता है। (झ) वस्तुतः रस-सैद्धान्तिक विवेचना में स्थायी भावों में मनोविज्ञान की उन सब स्थिर एवं दीर्घ भावात्मक प्रवृत्तियों का समाहार हो जाता है जो अपेक्षाकृत मनोदशा (Mood) मूलभाव, व्युत्पन्नभाव आदि से स्थिर हैं। (ञ) परम्परागत रस-सैद्धान्तिक विवेचन में स्थायीभाव के स्वरूप के सम्बन्ध में मनोवैज्ञानिक दृष्टि से प्रमुख असंगति यह कि उनका वर्गी- करण तो सहजप्रवृत्तियों (instincts) पर आधारित है, जबकि उनका व्यावहारिक रूप भावनाओं (sentiments) के अनुरूप है तथा उनका नामकरण उनसे सम्बन्धित मूल भावों (primary emotions) के आधार पर किया गया है, जबकि अनेक मूल भावनिर्देशित रूप में स्वयं संचारी हैं। (ट) स्थायीभावों के परम्परागत वर्गीकरण में संशोधन करते हुए हम उन्हें सहजप्रवृत्तियों के अनुरूप बारह प्रमुख वर्गों में एवं लगभग बाईस भावनाओं (sentiments) में विभक्त करना उचित समभते हैं।

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३ संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन

साहित्य की दृष्टि से भावों का विवेचन करते हुए रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने उन्हें दो प्रमुख वर्गों-स्थायी भाव एवं संचारी भाव-में विभक्त किया है, जिनमें से प्रथम वर्ग या स्थायीभाव का तो विवेचन पीछे किया जा चुका है, अतः अब यहाँ संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विवेचन प्रस्तुत किया जाता है, किन्तु इससे पूर्व उनका स्वयं रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से भी अध्ययन व स्वरूप-निर्धारण अपेक्षित हैं क्योंकि आचार्य भरत से लेकर शुक्ल तक विभिन्न आचार्यों ने उनकी विभिन्न विशेषताओं का उल्लेख किया है जिनमें कहों-कहीं एक रूपता एवं मतैक्य का अभाव परिलक्षित होता है। वस्तुतः संचारी भावों का स्थायी भावों की तुलना में गौण स्थान दिये जाने के कारण उनका स्वरूप-विवेचन भी अनेक आचार्यों द्वारा गौण हो गया है, जिसके कारण इनके सम्बन्ध में अनेक अस्पष्ट एवं भ्रान्तिपूर्ण धारणाएँ भी प्रचलित हैं। अस्तु, हम संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने से पूर्व रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से इनके स्वरूप को स्पष्ट करने का यत्न करेंगे। • रस संद्धान्तिक दृष्टि से संचारी भाव का स्वरूप रस-सैद्धान्तिक विवेचन में संचारी भाव के लिए 'व्यभिचारी भाव' का भी प्रयोग पर्याय रूप में उपलब्ध है। इतना ही नहीं प्रारम्भिक आचार्यों ने तो 'व्यभिचारी' शब्द का ही प्रयोग प्रमुख रूप में किया है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि 'व्यभिचारी' की व्याख्या में 'संचरण' या 'संचार' का उल्लेख होने के कारण ही आगे इनका 'संचारी' नाम प्रचलित हो गया। शाब्दिक दृष्टि से भी व्यभिचारी और 'संचारी' के अर्थ में सूक्ष्म अन्तर है। शब्दकोष के अनुसारी 'व्यभिचारी' जहाँ पथभ्रष्ट, कुमार्ग गमन, अनियमित, असत्य, अविश्वसनीय आदि का सूचक है;' वहाँ १. संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २३१

'संचारी' का अर्थ गतिशील, अस्थिर, चंचल परिवर्तनशील है। यदि दोनों के अर्थों पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार किया जाय तो स्पष्ट होगा कि जहाँ व्यभिचारी में अनियमितता एवं भ्रष्टता का भाव अधिक है वहाँ संचारी में गत्यात्मकता एवं चंचलता पर अधिक बल है। अतः दोनों में साम्य कम और वैषम्य अधिक है क्योंकि यह आवश्यक नहीं कि सर्वदा गतिशील या चंचल रहने वाला सदा पथ-भ्रष्ट ही हो या पथभ्रष्ट होने वाला प्रत्येक व्यक्ति सदा चंचल ही रहे। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठता है कि रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने दोनों को परस्पर पर्यायवाची के रूप में क्यों ग्रहण कर लिया ? इसके उत्तर में हमारा अनुमान है कि ये दोनों शब्द इन भावों के स्वरूप-विवेचन की दो अवस्थाओं के सूचक हैं पहला शब्द (व्यभिचारी) उस अवस्था का सूचक है। जबकि इन्हें भ्रष्ट, अनियमित विकृत रूप में देखा जाता था जबकि दूसरे शब्द का प्रचलन उस समय हुआ, जब इन्हें चंचल या अस्थिर मान लिया गया। अस्तु, संचारी शब्द परवर्ती होने के साथ-साथ अधिक विकसित एवं परिष्कृत दृष्टि का परिचायक है, अतः हम इसी को प्राथमिकता देना उचित समझते हैं। आचार्य भरत ने इनके लिए 'व्यभिचारी' शब्द का प्रयोग करते हुए इसकी व्युत्पत्ति के आधार पर इनका स्वरूप स्पष्ट करने का यत्न किया था। उनके विवेचन के अनुसार 'व्यभिचारी' शब्द क्रमशः 'वि' 'अभि' एवं 'चर' के योग से निर्मित है, अतः ये तीनों निम्नांकित तीन विशेषताओं के परिचायक हैं- (१) 'वि' विविधता का सूचक है। इससे प्रतीत होता है कि संचारी भाव एक तो विविध प्रकार के होते हैं तथा दूसरे वे विभिन्न साधनों-वाणी, शारीरिक चेष्टाओं, सत्वोद्र क आदि के रूपों में प्रस्तुत होते हैं। भरत ने इस प्रसंग में 'वागंग- सत्वोपेतान' का उल्लेख विशेष रूप से किया है। (२) 'अभि' को अभिमुख्य या अभिमुखता का सूचक माना गया है। परवर्ती आचार्यों-मुख्यतः धनंजय एवं विश्वनाथ ने भी आभिमुख्य पर विशेष बल दिया है, अतः इसका अर्थ भी यहाँ भली-भाँति स्पष्ट कर लेना चाहिए। शब्दकोष के अनुसार 'अभिमुख' अनेक अर्थ हैं, यथा-सामने, सम्मुख, समीप, अनुकूल, सामने मुख किये हुए, आदि। प्रश्न है, हम यहाँ इनमें से कौनसा अर्थ ग्रहण करें ? इस सम्बन्ध में डॉ० आनन्द प्रकाश दीक्षित का मत भी उल्लेखनीय है। उन्होंने प्रारम्भ में तो अभिमुख को 'अनुकूल' के अर्थ में ग्रहण करते हुए लिखा-'रसानुकूल' संचरण करने वाले" .... जिससे प्रतीत होता है कि संचारी भावों का एक लक्षण रसों (या स्थायी भाव) के अनुकूल होना भी है; किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से यह उचित प्रतीत नहीं

  1. The Students Sanskrit-English dictionary : V. S. Apte ३. रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण; पृष्ठ सं० ३५ ४. वही; पृष्ठ संख्या-३५

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२३२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

होता। प्रम में क्रोध, अमर्ष विषाद आदि उसकी मूल प्रकृति के अनुकूल प्रतीत नहीं होते-यह दूसरी बात है कि स्थायीभाव अपनी सबलता के कारण प्रतिकूल एवं विरोधी भावों को भी अनुकूल बना लेता है या उनसे विच्छिन्न नहीं होता। ऐसी स्थिति में यह कहना कि संचारीभाव सदा रस के अनुकूल होते हैं, संगत प्रतीत नहीं होता। उपयुक्त असंगति का थोड़ा आभास कदाचित् स्वयं डा० दीक्षित को भी हो गया था क्योंकि वे आगे 'आभिमुख्येन' की एक अन्य व्याख्या प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं-"भरत द्वारा कथित 'विविध आभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणः' पंक्ति का एक दूसरा अर्थ भी लिया जा सकता हैकि 'व्यमिचारी' संज्ञा उन भावों को दी जायगी जो विविध प्रकार के रसों की अनुभूति के समय प्रेक्षक के अभिमुख-सम्मुख -प्रस्तुत हो जाते हैं अर्थात् रसानुभूति के समय प्रक्षक को इनका प्रत्यक्ष होता है, यद्यपि ये मानसिक स्थिति-मात्र हैं। किन्तु उसकी सूचना स्थित्यनुकूल किये गए वागंगादि अभिनय के प्रदर्शन से मिलती रहती है, अतएव इनका साक्षात्कार होता रहता है।" वस्तुतः व्यावहारिक दृष्टि से भी उपयुक्त व्याख्या ही समीचीन प्रतीत होती है क्योंकि स्थायी भाव (या रस) प्रायः संचारी भावों के रूप में ही प्रकट या व्यक्त होते हैं। अतः इसे यों भी कहा जा सकता है कि जिस प्रकार महाभारत में अ्जुन ने शिखंडी को सामने करके भीष्म से युद्ध किया था, उसी प्रकार स्थायीभाव जब भी उद्दीप्त होकर बाहर व्यक्त होता है को विभिन्न संचारियों को ही सामने रखकर (या उनकी पृष्ठभूमि के रूप में) व्यक्त होता है। अतः हमारे विचार से प्रस्तुत प्रसंग- में 'आभिमुख्येन' का अर्थ 'सम्मुख रूप में प्रस्तुत होने वाले' से ही ग्रहण करना उचित होगा। (३) 'चर' धातु का सामान्य अर्थ 'चलना' है किन्तु भरत ने इसका अर्थ 'चरन्ति नयन्तीत्यर्थः' करते हुए इसे 'आनयन' या 'ले आने' का सूचक माना है। उन्होंने इसका स्पष्टीकरण करते हुए बताया कि संचारी भाव स्थायी भाव को ले आते हैं किन्तु इससे यह भी न समभना चाहिए कि जिस प्रकार किसी को कन्धे पर रख कर या किसी का बाहु पकड़ कर उसे लाया जाता है, वैसे ही संचारी भाव स्थायी भाव को ले आते हैं; अपितु इसका तात्पर्य यह है कि जैसे सूर्य दिन को ले आता है, उसी प्रकार संचारी भी स्थायी भाव को ले आते हैं।" दूसरे शब्दों में, जिस प्रकार

५. वही, पृष्ठ संख्या-३६ ६. 'यथा सूर्य इदं नक्षत्रममु' वासरं नयतीति। न च तेन बाहुभयां स्कन्धेन वा नीयते। किंतु लोकप्रसिद्धमेतत्। यथायं सूर्यो नक्षत्रमिदं वा नयतीति एवमेते व्यभिचारिण इत्यवगन्तव्याः। (नाट्यशास्त्र, चौ० पृ० ८४) -रससिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण; पृष्ठ सं० ३६

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संचारी भावों का मनोवैज्ञानिक विवेचन २३३

दिन को प्रकाशित करने में सूर्य का योग रहता है वैसे ही स्थायी भाव का प्रकाशन संचारियों के द्वारा होता है। या इसे और भी स्पष्ट किया जाय तो कहा जा सकता है, जैसे सूर्य के उदय होने एवं दिन के होने की धटना वस्तुतः एक ही क्रिया के दो पक्षों को सूचित करती है, वैसे ही स्थायी भावों का आना या प्रकाशित होना व संचारी भावों का प्रकट होना-दोनों एक ही क्रिया के द्योतक हैं। वस्तुतः भरत का लक्ष्य यहाँ अन्ततः यही प्रतीत होता है कि वे संचारियों को स्थायी का प्रकट, व्यक्त या प्रकाशित रूप सिद्ध करना चाहते थे किन्तु हमारे विचार में 'चर' धातु का 'ले आना' अर्थ बहुत दूर का है; अतः उसकी उपयुक्त व्याख्या बहुत समीचीन प्रतीत नहीं होती। फिर जहाँ तक संचारी के द्वारा स्थायी के प्रकाशन की बात है वह तो 'आभिमुख्येन' से भी सूचित हो गई थी। अतः यहाँ 'चर' का सामान्य अर्थ -संचरण, संचरणशील या गतिशील ही अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। अस्तु, भरत ने 'वि' 'अभि' एवं 'चर' के आधार पर व्यभिचारी या संचारी भाव के जो तीन लक्षण निर्धारित किये हैं, उन्हें समन्वित करते हुए कहा जा सकता है कि उनके विचार से व्यभिचारी भाव वे हैं जो वाणी, चेष्टा, सत्त्वोद्र क आदि विविध प्रकार के माध्यमों से प्रक्षक के सम्मुख स्थायीभावों को व्यक्त या प्रकाशित करते हैं। धनंजय ने अपने 'दशरूपक' में व्यभिचारी भाव का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा है-'विशेषादाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणः । स्थायिन्युन्मग्ननिर्मग्ना: कल्लोला इव वारिधौ।" अर्थात् जो भाव विशेषरूप में आभिमुख्य से स्थायी भाव के अन्तर्गत उन्मग्न एवं निमग्न (उठते एवं डूबते) होते रहते हैं; जैसे समुद्र में तरंगें उठती व विलीन होती रहती हैं, वे व्यभिचारी भाव होते हैं।' इसे और स्पष्ट करते हुए धनिक ने लिखा-'जैसे समुद्र में लहरें उत्पन्न और विलीन होती रहती हैं, वैसे ही रत्यादि स्थायी भाव में निर्वेदादि व्यभिचारी भाव आर्विभूति एवं तिरोहित होते रहते हैं।' यदि हम धनंजय और धनिक की उपयुक्त व्याख्या पर विचार करें तो सर्वप्रथम एक बात तो यह स्पष्ट होती है कि धनंजय ने भरत द्वारा निरूपित लक्षणों में सर्वाधिक महत्त्व 'आभिमुख्येन' को दिया है, क्योंकि उन्होंने भरत के केवल इसी लक्षण को ग्रहण किया है। दूसरे, उन्होंने भरत की भाँति 'चर' का अर्थ 'आनय' न करके उसे संचरणशील अर्थ में ही ग्रहण किया है-अतः धनंजय के अनुसार व्यभिचारी भाव की यह (संचरणशीलता) दूसरी विशेषता मानी जा सकती है। तीसरे, उन्होंने समुद्र और तरंग का उदाहरण देकर अप्रत्यक्ष रीति में संचारी की अनेक ऐसी विशेषताओं

७. दशरूपक; संपादक-डॉ० भोलाशंकर व्यास; अध्याय ४।७, पृष्ठ-सं० १८३

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२३४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

की ओर संकेत किया है, जिनकी ओर कदाचित पूर्ववर्तियों का ध्यान नहीं गया था। जिस प्रकार तरंगों का समुद्र से पृथक एवं स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं होता, वे समुद्र के उद्वलित रूप को सूचित करती हैं, उसी प्रकार संचारी भाव की भी स्थायी भाव से अभिन्न एवं उसी के उद्दीप्त रूप के सूचक के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। साथ ही इससे यह सूचित होता है कि संचारियों का उत्थान-पतन स्थायी की ही शक्ति पर निर्भर रहता है तथा वे उसी के व्यक्त रूप के प्रकाशक हैं। धनंजय का यह उदाहरण भरत के सूर्य और दिन के उदाहरण से अनेक दृष्टियों से अधिक संगत है। भरत के विवेचन से तो यह भी भ्रान्ति उत्पन्न हो सकती थी कि जिस प्रकार दिन का अस्तित्व सूर्य पर निर्भर है, उसी प्रकार स्थायी का अस्तित्व संचारी पर निर्भर है तथा सूर्य की भाँति संचारी भाव भी स्थायी के पूर्ववर्ती हैं। अस्तु, धनंजय ने संचारियों के स्वरूप को स्पष्ट करने की दृष्टि से निश्चय ही भरत के विवेचन को न केवल आगे बढ़ाया है, अपितु उसे संशोधित भी किया है। अभिनवगुप्त-संचांरी भावों के स्वरूप को स्पष्ट करने में सर्वाधिक सफलता आचार्य अभिनवगुप्त को मिली है। उन्होंने अभिनव भारती में स्थायी भावों से इनकी तुलना करते हुए इनकी निम्नांकित विशेषताओं का उद्घाटन किया है।" (१) जहाँ स्थायी भाव के सम्बन्ध में कहा गया है कि ये जन्मजात वासनाओं के रूप में प्रत्येक व्यक्ति में विद्यमान रहते हैं, वहाँ संचारी भाव इस प्रकार की चित्तवृत्तियाँ हैं जो जन्मजात रूप में सदा विद्यमान नहीं रहतीं। (२) जहाँ स्थायी भाव विभावादि की अनुपस्थिति में भी संस्कार-रूप में विद्यमान रहते हैं, वहाँ संचारी भाव विभावादि से वियुक्त या असंपृक्त हो जाने पर नष्ट हो जाते हैं। (३) जिस प्रकार रत्न-हार में एक ही सूत्र में अनेक रत्न पिरोये हुए रहते हैं, उसी प्रकार स्थायी भाव वह :प्रच्छन्न सूत्र है जिसमें विभिन्न प्रकार के संचारी भाव रूपी रत्न बँधे रहते हैं। (४) अस्तु, संचारी भाव के और भी कई भेदक लक्षण हैं, यथा- (क) वे उदय-अस्त होते रहते हैं अर्थात् स्थायी भाव की भाँति स्थिर नहीं रहते। (ख) वे स्थायी की भाँति एक रूप नहीं होते, अनेक विचित्रताओं से युक्त होते हैं। (ग) उनके सहस्रों भेद भी सम्भव है। ८. ये पुनरमी ग्लानिशंका प्रभृतयश्चित्तवृत्ति विशेषास्ते समुचित विभावा- भावाज्जन्म मध्येऽपि न भवन्त्येव। ....... उच्यन्ते। -हिन्दी अभिनव भारती; षष्ठ अध्याय । ३१। पृ० सं० ४८०-४८१