Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया १७३

एवं सामान्य लौकिक अनुभूति में सबसे बड़ा अन्तर इस बात का है कि कलानुभूति के क्षणों में हम निर्वेयक्तिक या स्वार्थ-शून्य रूप में कला का आस्वादन करते हैं। काण्ट ने (१७२४-१८०४) प्रतिपादित किया है कि जहाँ व्यावहारिक क्षेत्र में हम लाभ-हानि, शुभ-अशुभ सार्थकता-निरर्थकता के विचार से बंधे रहते हैं, वहाँ कला- नुभूति के समय इन सबसे मुक्त रहते हैं। वैयक्तिक रुचि या स्वार्थ से मुक्त रहने के कारण ही हम एक ऐसा अनुभव प्राप्त करते हैं जिसे सार्वजनीन (universal) कहा जा सकता है। शापनहावर (१७८८-१८६०) ने भी उपयुक्त सिद्धान्त का अनुमोदन भिन्न प्रकार की शब्दावली में किया। उनके विचारानुसार हमारे समस्त दुःखों के मूल में अभाव जन्य इच्छा है ; कलास्वादन के समय हम इस वैयक्तिक इच्छा से मुक्त रहते हैं जिसके कारण हमें आनन्द की अनुभूति होती है। अतः कहना चाहिए कि जिसे काण्ट ने 'वैयक्तिक रुचि' कहा था उसी को शापनहावर ने 'वैयक्तिक इच्छा' कहा है। वस्तुतः दोनों ने ही निवैयक्तिकता का अनुमोदन विभिन्न शब्दों में किया है। टी० एस० इलियट ने निवैयक्तिकता के सिद्धान्त को भिन्न रूपों में प्रस्तुत करते हुए इसे 'व्यक्तित्व से पलायन' का नाम दिया। उन्होंने प्रतिपादित किया कि काव्य के आस्वाद का लक्ष्य एक ऐसा विशुद्ध अनुचिन्तन है जो वैयक्तिक संवेगों की हलचलों से मुक्त रहता है। इस प्रकार वस्तु जैसी सचमुच है उसी रूप में हम उसे देखने का यत्न करते है।' साथ ही उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि वैयक्तिकता के इस निषेध से कलाकार का व्यक्तित्व हीन या तुच्छ नहीं हो जाता अपितु वह एक व्यापक रूप प्राप्त कर लेता है। उनके शब्दों में-'महान् कला इस अर्थ में निर्वेयक्तिक होती है कि वैयक्तिक संवेग और वैयक्तिक अनुभव विस्तृत होकर आत्मेतर में पूर्णता को प्राप्त होते हैं। वह वैयक्तिक अनुभव और संवेग के परित्याग के अर्थ में निर्वैयक्तिक नहीं।१

इस प्रकार स्पष्ट है कि कला-स्वादन में निर्वैयक्तिकता का मूल कारण चाहे स्वयं कलाकार की कला-सर्जन के समय की निवैयक्तिक मनः स्थिति हो, या कला- वस्तु का ही निरवैयक्तिक रूप में प्रस्तुतीकरण हो अथवा स्वयं प्रमाता या सामाजिक का एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाना हो जिसे हम वैयक्तिकता-शून्य या स्वार्थ शून्य कह सकें-किन्तु इसमें कोई संदेह नहीं कि उपयुक्त्त विचारकों ने कलास्वादन की प्रारंभिक अवस्था एवं विशिष्ट स्थिति के रूप में निवैयक्तिकता या स्वार्थशून्यता (distinterestedness) को अत्यधिक महत्त्व दिया है।

१. रस-सिद्धान्त और सौन्दर्य-शास्त्र'; डॉ० निर्मला जैन ; पृष्ठ १८२ २. वही : पृ० १८३

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१७४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

(ख) रसानुभूति सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के उन्नायकों में थ्योडोर लिप्स, वर्ननली विल्हेम वोरिंगर के नाम उल्लेखनीय हैं। लिप्स ने अपने ग्रन्थ 'Haumesthetic' (१८९७) में सर्वप्रथम इस सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए लिखा कि समानुभूति (Empathy) में काव्य-वस्तु के साथ सामाजिक के व्यक्तित्व का तादात्म्य स्थापित हो जाता है-विषय और विषयी के मध्य पार्थक्य की सूचक द्वत-चेतना का लोप हो जाता है। इस सिद्धान्त के अनुसार काव्यानुभूति एवं कलानुभूति का प्रमुख तत्त्व है-अनुकृति जन्य आनन्द। जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु-विशेष पर ध्यान केन्द्रित करते हैं तो इसमें हम अपनी ही अनुभूतियों और भावों का बिम्ब पढ़ते हैं। उस स्थिति में वस्तु साधारणीकृत हो जाती है-व्यक्ति और वस्तु का अन्तर लुप्त हो जाता है और इससे हम आनन्दित होते हैं। कला के माध्यम से इसी स्थिति को प्राप्त करना या कलास्वादन के समय कला-वस्तु एवं सामाजिक में इस प्रकार के तादात्म्य-स्थापन को ही 'समानुभूति' (Empathy) कहा गया है।

समानुभूति को सहानुभूति (Sympathy) से भिन्न माना गया है। दोनों में सबसे बड़ा अन्तर इस बात का है कि जहाँ समानुभूति में दोनों पक्षों-विषय एवं विषयी -- में तादात्म्य स्थापित हो जाता है, वहाँ सहानुभूति में दोनों में थोड़ी-बहुत पार्थक्य की अनुभूति सदा बनी रहती है। समानुभूति की प्रक्रिया को भी तीन सोपानों में विभक्त किया गया है-(१) अनुकृति (२) अनुभूति और (३) प्रक्षेपण (Projection)। डॉ० निर्मला जैन ने अपने शोध-प्रबंध में इन तीनों का विवेचन करते हुए लिखा है-"सर्वप्रथम किसी कला- कृति को देखकर हमारे शरीर में उसके अनुरूप अनुकरणात्मक चेष्टाएँ स्वभावतः होती हैं जैसे किसी प्रतिमा को देखकर तदनरूप भंगिमाओं का अनुकरण करने की आकांक्षा होती है। तदुपरान्त शारारिक चेष्टाए किसी न किसी अनुभूति की ओर प्रवृत्त करती हैं और अंत में हम उन अनुभूतियों का दृश्य कला-कृति में प्रक्षेपण करते हैं।१ हमारे विचार में यहाँ तीसरे सोपान को 'प्रक्ष पण, के स्थान पर 'तादात्म्य' कहा जाय तो अधिक उचित होगा क्योंकि प्रक्षेपण चेष्टापूर्वक स्वयं को आरोपित करने की प्रवृत्ति को सूचित करता है जब कि 'तादात्म्य' में स्वतः ही कला-वस्तु एवं सामाजिक में मेल हो जाता है। वस्तुतः यह सिद्धान्त भारतीय साधारणीकरण सिद्धान्त के अनुरूप है, जिसकी विस्तृत चर्चा अन्यत्र की जायगी। (ग) मानसिक अन्तराल का सिद्धान्त-एडवर्ड बुलो ने कलानुभूति की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए एक नया सिद्धान्त स्थापित किया है, जो मानसिक अन्तराल

३. 'रस-सिद्धान्त और सौन्दर्य-शास्त्र' पृष्ठ १९०

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का सिद्धान्त (Principle psychical distance) कहलाता है।' इसके अनुसार कला- स्वाद का मूल कारण निस्संगता, अनासक्ति एवं समानुभूति न होकर कला-वस्तु से प्रमाता की मानसिक दूरी (अन्तराल) है। यहाँ 'दूरी' या 'अन्तराल' से तात्पर्य केवल स्थानीय दूरी से ही नहीं है अपितु सामयिक दूरी से भी है। कलास्वादन के समय हम कला-वस्तु से इस प्रकार सम्बन्धित हो जाते हैं कि जिससे हम उससे कल्पनात्मक दूरी अनुभव करते हैं। यह दूरी दो प्रक्रियाओं से उत्पन्न होती है ; एक तो हम अपनी व्यावहारिक चेतना को निष्क्रिय करके कलाकृति को ग्रहण करते हैं तथा दूसरे हम अपने व्यक्तिगत प्रयोजनों के संदर्भ से मुक्त रहते हैं। मानसिक अन्तराल की प्रक्रिया के भी दो पक्ष माने गये हैं -निषेधात्मक और विधेयात्मक। निषेधात्मक पक्ष के अनुसार कला-वस्तु के व्यवहारिक पक्षों तथा तत्सम्बन्धी व्यावहारिक प्रवृत्तियों का निषेध किया जाता है जबकि विधेयात्मक पक्ष के अनुसार हम कला-वस्तु को वस्तुनिष्ठ (objective) रूप में हम देखते हुए वैयक्तिक अनुभूतियों को एक ऐसा रूप देते हैं कि जिससे निजी सत्ता की अपेक्षा सामान्य विशेषताएँ परिलक्षित होने लगती हैं। बुलो ने यह भी स्पष्ट किया है कि निवैयक्तिकता या अनासक्ति के सिद्धान्त से यह भ्रान्ति उत्पन्न होती है कि कला वस्तु के साथ सामाजिक का सम्बन्ध सर्वथा बौद्धिक या भाव-शून्य रहता है, जबकि मानसिक अन्तराल का सिद्धान्त इस भ्रान्ति का निराकरण करता है अर्थात् इस सिद्धान्त के अनुसार कला की विषय-वस्तु के साथ प्रमाता का रागात्मक सम्बन्ध स्थापित होता है-इतना अवश्य है कि यह सम्बन्ध एक विलक्षण प्रकार का होता है। मानसिक अन्तराल की स्थिति में कला के साथ प्रमाता का सम्बन्ध लौकिक या व्यावहारिक स्तर पर न होकर काल्पनिक स्तर पर स्थापित होता है। सभी कृतियों एवं पाठकों के बीच इस मानसिक अन्तराल की मात्रा सर्वत्र समान नहीं रहती। यह कला-कृति के वैशिष्ट्य एवं प्रमाता की क्षमता पर निर्भर है कि दोनों के बीच मानसिक अन्तराल की मात्रा कितनी रहती है। कलास्वादन के लिए प्रमाता का वैयक्तिक पूर्वाग्रहों से मुक्त रहना भी मानसिक अन्तराल के लिये अपेक्षित है। मानसिक अन्तराल-सिद्धान्त के प्रतिपादक ने यह भी स्वीकार किया है कि अन्तराल की मात्रा का अत्यधिक होना भी उचित नहीं है क्योंकि ऐसी स्थिति प्रमाता के मन में कला-वस्तु के प्रति अविश्वसनीयता, असंभाव्यता, कृत्रिमता, एवं निरर्थ-

  1. Edward Bullough : Psychical Distance As a Factor in Art and As an Aesthetic Principle : British Journal of Psychology ; Volume V, 1912

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१७६ रस-सिद्धान्त का पुर्न्ववेचन

कता के भाव उत्पन्न कर सकती है। वस्तुतः बुलो के अनुसार आदर्श स्थिति यह है कि कला-वस्तु एवं प्रमाता के बीच मानसिक दूरी कम से कम रहे फिर भी वह सर्वथा लुप्त न हो पाये। अस्तु, संक्षेप में कहा जा सकता है कि बुलो के मतानुसार जहाँ व्यावहारिक क्षेत्र में हम विषय वस्तु के अति नैकट्य के कारण उसके वास्तविक सौन्दर्य का आस्वादन नहीं कर पाते वहाँ कलानुभूति के क्षेत्र में हम इस अति निकटता की स्थिति से ऊपर उठ जाते हैं जिससे कला-वस्तु के वास्तविक रूप का अनुभव कर पाते हैं। (घ) भाव-प्रेषण का सिद्धान्त-टालस्टाय ने कला का सर्व प्रमुख कार्य भाव-प्रेषण मानते हुए उसकी दो प्रत्रियाओं पर बल दिया है-(१) कलाकार एवं सामाजिक का पारस्परिक भावात्मक तादात्म्य एवं (२) सामाजिक की अपने व्यक्तित्व की सीमाओं से मुक्ति। उन्होंने स्पष्ट किया कि सच्ची कला के आस्वादन के समय पाठक या सामाजिक कलाकार की आत्मा से इस प्रकार संयुक्त हो जाता है कि दोनों में भावात्मक तादात्म्य स्थापित हो जाता है। दूसरे, इस स्थिति में सामाजिक अपने व्यक्तित्व की पृथकता की भावना से भी मुक्त हो जाता है। वस्तुतः तादात्म्य एवं अपने व्यक्तित्व से मुक्ति-ये दोनों प्रक्रियाए अन्योन्याश्रित हैं। इसके लिए सामाजिक को विशेष चेष्टा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। (ङ.) समन्वयात्मक सिद्धान्त-कुछ विद्वानों ने रसानुभूति के प्रसंग में किसी एक व्यापार या क्रिया पर ही बल न देकर उसकी विभिन्न प्रक्रियाओं का विश्लेषण करते हुए उनके पारस्परिक समन्वय को ही अधिक महत्त्व प्रदान किया है। इस वर्ग के विद्वानों में हरमन लात्ज (१८१७-१८८१ ई०) एवं आई० ए० रिचर्ड्स (जन्म १८९३ ई०) का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। लात्ज ने रसानुभूति की क्रिया को तीन प्रक्रियाओं में विभक्त किया-(१) इन्द्रिय-बोधानुकूलता (१) प्रसन्नता- दायक बौद्धिक उत्कर्ष और (३) सौन्दर्यानुभूति। सर्वप्रथम हम कला का बोध इन्द्रियों के माध्यम से करते हैं, जिससे हमारा मन कला-वस्तु की ओर आकर्षित होता है। यदि हमारी इन्द्रियाँ ही कला के प्रति आकर्षित नहीं हुईं तो उस स्थिति में हमारे मन में भी उसके प्रति विकर्षण उत्पन्न हो जायगा, जिसके परिणाम-स्वरूप कलानु- भूति की क्रिया अपने लक्ष्य तक पहुँचने से पूर्व ही अवरुद्ध हो जायगी। इन्द्रिय- बोधानुकूलता के अनन्तर द्वितीय अवस्था में हमारी बुद्धि इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त संवेदनाओं को हमारे संस्कारों, स्मृतियों एवं अनुभूतियों से समन्वित करती हुई प्रसन्नतादायक प्रभाव उत्पन्न करती है। इसके अनन्तर तीसरी अवस्था में हमारी

5-3. What is Art ?' : Leo Tolstoy ६. इनके मतों का विस्तृत परिचय एवं संदर्भ पीछे प्रस्तुत प्रबन्ध के द्वितीय खंड में दिया जा चुका है।

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आत्मा कला के स्वस्थ सौन्दर्य का समन्वयात्मक रूप में आस्वादन करती हुई आनन्दा- नुभूति प्राप्त करती है। इस प्रकार कला-स्वादन या रसानुभूति का कार्य इन्हीं तीनों प्रक्रियाओं के माध्यम से सम्पन्न होता है। रिचर्डस महोदय ने रसानुभूति के कार्य को मुख्यतः छह प्रक्रियाओं में विभक्त किया है-(१) कला के स्वरूप का नेत्रों (इन्द्रियों) के माध्यम से ग्रहण। (२) नेत्रों (इन्द्रियों) द्वारा प्राप्त संवेदनाओं से सम्बन्धित बिम्बों का ग्रहण । (३) स्वतन्त्र बिम्बों का उदय (४) बिम्बों से सम्बन्धित विषयों का बोध (५) भावानुभूति और (६) सामाजिक की मनोवृत्ति या भावात्मक दृष्टि (attitude) का प्रभावित होना। रिचर्डस ने यहाँ स्पष्टतः आधुनिक मनोविज्ञान के सिद्धान्तों का उपयोग करते हुए बिम्बात्मकता पर विशेष बल दिया है। साथ ही उन्होंने रसानुभूति की चरम स्थिति में प्रमाता की मनोवृत्तियों या भावात्मक दृष्टिकोणों के सामंजस्य को भी संतुष्टि या आहलाद का आधार घोषित किया है। वैसे, रिचर्ड,स महोदय भी कलाओं के माध्यम से भाव-संप्रषण की प्रक्रिया को स्वीकार करते हैं, उनके तत्सम्बन्धी विचारों का परिचय अन्यत्र दिया जा चुका है। अस्तु, उन्होंने भावात्मक संप्र षण के द्वारा मनोवृत्तियों के संतुलन को ही रसानुभूति का चरम लक्ष्य मानते हुए उसकी पूर्त्ि उपयुक्त प्रक्रियाओं के माध्यम से मानी है। अतः उन्होंने जहाँ परम्परागत निवैयक्तिकता एवं समानुभूति सम्बन्धी धारणाओं को नया रूप दिया है, वहाँ दूसरी ओर उन्होंने उन्हें मनोवज्ञानिक आधार भी प्रदान किया है। • पाश्चात्य मतों का संश्लेषण - उपयुक्त सिद्धान्तों को सूत्र रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा जा सकता है कि कला से सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की उपलब्धि का कार्य निम्नांकित प्रक्रियाओं के माध्यम से सम्पादित होता है- (क) निवैयक्तिकता (निजी स्वार्थ से मुक्ति) की प्रक्रिया के द्वारा (काण्ट) (ख) निजी इच्छाओं से मुक्ति की प्रक्रिया के द्वारा। (शापनहावर) (ग) निजी व्यक्तित्व से पलायन के द्वारा। (इलियट) (घ) समानुभूति अर्थात् काव्य-वस्तु एवं प्रमाता के तादात्म्य के द्वारा (लिप्स) (ङ) मानसिक अन्तराल की स्थापना के द्वारा (बुलो) (च) भावात्मक तादात्म्य एवं निवैयक्तिता की प्रत्रिया के द्वारा (टाल्सटाय) (छ) इन्द्रिय-बोध, बौद्धिक उत्कर्ष, एवं सौन्दर्यानुभूति की प्रक्रियाओं के द्वारा

(ज) इन्द्रिय-बोध, बिम्ब-ग्रहण, स्वतन्त्र बिम्बों के उदय, विषय-बोध भावानु (लात्ज)

भूति एवं मनोवृत्तियों के संतुलन की प्रक्रियाओं के द्वारा (रिचर्ड,स) यदि उपयुक्त मतों पर सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाय तो स्पष्ट होगा

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१७८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन कि इनमें से अनेक मत तो एक ही प्रक्रिया-विशेष के विभिन्न पक्षों के द्योतक हैं ; उनमें अन्तर शब्दावली का ही है यथा, निवैयक्तिकता, वैयक्तिक इच्छाओं से मुक्ति, वैयक्तिक स्वार्थों से पलायन, आदि सिद्धान्त इसी स्थिति के सूचक हैं कि रसानुभूति के समय प्रमाता निजी या वैयक्तिक संकीर्णताओं से ऊपर उठ जाता है। अतः इन सबका समन्वय निरवैयक्तिकता के अन्तर्गत हो जाता है। इसी प्रकार बुलो का मानसिक अन्तराल का सिद्धान्त भी अन्ततः प्रमाता को स्थानगत नैकट्य या कालगत नैकट्य की स्थिति से कल्पनात्मक रूप में ऊपर उठ जाने की बात स्वीकार करता है। प्रश्न यह है कि देश और काल की दूरी का लक्ष्य क्या है ? क्या यह ठीक नहीं है कि जहाँ देश-काल की सीमा वैयक्तिक संकीर्णता का द्योतक है वहाँ उनसे दूर चला जाना निवैयक्तिकता सार्वजनीनता, तटस्थता आदि का द्योतक है। वस्तुतः व्यक्ति की सीमा उससे सम्बन्धित देश-काल की सीमा ही है-अतः अन्ततः मानसिक अन्तराल इस सीमा से मुक्ति का ही द्योतक है। अस्तु, हमारे विचार में भले ही शाब्दिक दृष्टि से बुलो ने निवैयक्तिकता एवं अनासक्ति (Detachment) के विरुद्ध एक नये सिद्धान्त की स्थापना का भ्रम उत्पन्न किया हो किन्तु व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो उनका अपना सिद्धान्त भी निवैयक्तिकता के ही स्थूल रूप एवं बाह्य पक्ष का द्योतक है। व्यक्ति का सूक्ष्म आन्त- रिक पक्ष जहाँ उसकी निजी इच्छाओं एवं वृत्तियों का सूचक है, वहाँ उसका स्थूल बाह्य पक्ष उसकी देश-कालगत संकीर्णता से सम्बधित है। अतः कहना चाहिए कि जहाँ काट, शापनहावर, इलियट आदि ने आन्तरिक दृष्टि से निर्वैयक्तिकता का अनु- मोदन किया था, वहाँ बुलो ने उसके बाह्य पक्ष पर अधिक बल दिया है। अतः मानसिक अन्तराल के सिद्धान्त को भी निर्वेयक्तिकता की ही एक स्थिति-भेद का द्योतक मानते हुए, उसे भी इसी में-निवैयक्तिकता या तटस्थता में-ही समन्वित कर लिया जाय तो अनुचित न होगा। इसी प्रकार भावात्मक तादात्म्य, भाव-संप्रषण आदि से सम्बन्धित अवधा- रणाएँ भी समानुभूति के सिद्धान्त में समन्वित हो जाती हैं ; क्योंकि ये सब अन्ततः कवि और पाठक, कलाकार एवं सामाजिक के पारस्परिक भावात्मक तादात्म्य पर ही बल देती हैं। अन्ततः कवि की अनुभूतियों का प्रतिनिधित्व काव्य-वस्तु के माध्यम से ही होता है, अतः हम चाहे काव्य-वस्तु या काव्यगत पात्रों अथवा नायक के साथ तादात्म्य की बात कहें या स्वयं कवि एवं कलाकार के साथ तादात्म्य की कहें- व्यावहारिक दृष्टि से दोनों एक ही प्रक्रिया की सूचक हैं। अतः हमारे विचार से इन धारणाओं में परस्पर सूक्ष्म अन्तर के होते हुए भी स्थूल रूप में इन सबको 'भावा- त्मक तादात्म्य' के सिद्धान्त के अन्तर्गत ही समाविष्ट किया जा सकता है। लात्ज एवं रिचड्स के द्वारा उल्लिखित प्रक्रियाओं में भी परस्पर गहरा साम्य है ; किन्तु लात्ज ने जहाँ बिम्ब-ग्रहण की प्रक्रिया को उपेक्षित किया वहाँ रिचड् स ने बौद्धिक उत्कर्ष की प्रक्रिया को सर्वथा भुला दिया। जिसे लात्ज सौन्दर्या-

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नुभूति या आनन्दानुभूति कहते हैं, उसे रिचर्ड्स ने भावानुभूति एवं संतुलन-प्रक्रिया का नाम दिया है। अस्तु, हम दोनों मतों को एक-दूसरे का पूरक मानते हुए क्मशः सौन्दर्यानुभूति की क्रिया के अन्तर्गत क्रमशः ऐन्द्रिय-बोध, अर्थ-बोध, बिम्ब-ग्रहण, भावानुभूति एवं संवेग-संतुलन की प्रक्रियाओं को स्थान दे सकते हैं। अन्त में हम उपयुक्त सभी मतों का स्थूल रूप से संश्लेषण करते हुए कह सकते हैं कि पाश्चात्य विचारकों के अनुसार सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की क्रिया निम्नां- कित प्रक्रियाओं के माध्यम से क्रमशः सम्पादित होती है-(क) इन्द्रियबोध (ख)अर्थ- बोध (ग) बिम्ब-ग्रहण (घ) बोध का निवैयक्तिक करण एवं तादात्म्य की प्रक्रिया (ड) स्वतन्त्र बिम्बों का उदय । (च) रसानुभूति की चरम स्थिति जिसमें विभिन्न विरोधी एवं अविरोधी मनोवृत्तियाँ परस्पर लीन, सन्तुलित एवं समन्वित होकर एक विलक्षण आह लाद की स्थिति (मनःस्थिति) उत्पन्न कर देती हैं, जिसे रिचड्स के शब्दों में 'समन्वय या सामंजस्य की प्रक्रिया' कह सकते हैं।

• भारतीय आचार्यों के मत भारतीय रसवादी आचार्यों में से अनेक ने रसानुभूति की प्रक्रिया का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया है, जिसमें भट्टनायक, अभिनवगुप्त, रामचन्द्र शुक्ल, डॉ० नगेन्द्र के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इनके मतों का संक्षिप्त परिचय यहाँ क्रमशः प्रस्तुत किया जाता है। सर्व प्रथम भट्टनायक ने रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उसकी मुख्यतः तीन शक्तियों या प्रक्रियाओं की स्थापना की-(१) अभिघा शक्ति की प्रक्रिया (२) भावकत्व शक्ति की प्रक्रिया और (३) भोजकत्व शक्ति की प्रक्रिया। इन तीनों प्रक्रियाओं से काव्य-वस्तु या कला-वस्तु का क्रमशः अर्थ-बोध भावन एवं आस्वादन होता है। भावकत्व की प्रक्रिया के कारण ही काव्य वस्तु का साधारणीकरण हो जाता है, जिसका अर्थ यह है कि काव्यगत भावनाएँ किसी व्यक्ति- विशेष की अनुभूतियाँ न रहकर सर्व-साधारण की अथवा प्रत्येक सहृदय पाठक की अनुभूतियाँ बन जाती हैं। इसी को पाश्चात्य विद्वानों ने इम्पैथी (empathy) या समानुभूति का सिद्धान्त कहा है। दूसरी ओर भावकत्व की प्रक्रिया के कारण पाठक या सामाजिक अपनी वैयक्तिक सीमाओं से मुक्त हो जाता है। भावकत्व की प्रक्रिया के अन्तर पाठक या सामाजिक कलानुभूति के मधुर आस्वाद में निमग्न हो जाता है, इसी प्रक्रिया को भोजकत्व व्यापार का नाम दिया गया है। आचार्य अभिनवगुप्त ने रसानुभूति की मुख्यतः चार प्रक्रियाएँ स्वीकार की हैं-(१) अर्थ का प्रकाशन, (२) कलागत सौन्दर्य का बोध, (३) साधारणीकरण या

७. इनका विस्तृत परिचय एवं संदर्भ पीछे द्वितीय खण्ड में दिया जा चुका है।

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१८० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

तादात्म्य और (४) अभिव्यक्ति। अर्थ के प्रकाशन से तात्पर्य यह है कि सर्वप्रथम सामाजिक कलावस्तु का अर्थबोध प्राप्त करता हैं। तदन्तर सामाजिक की कला-वस्तु में रुचि उत्पन्न होती है जिसके कारण कला के वस्तुगत सौन्दर्य के प्रति उसके मन में आकर्षण उत्पन्न होता है, इसी को सौन्दर्य-बोध की प्रक्रिया कह सकते हैं। तीसरी प्रक्रिया साधारणीकरण या तादात्म्य की है जिसके द्वारा सामाजिक का कलाकार या काव्य के नायक के साथ भावात्मक तादात्म्य स्थापित हो जाता है। इसके अनन्तर अन्तिम प्रक्रिया अभिव्यक्ति की है। अभिनवगुप्त के विचारानुसार काव्य-वस्तु के आस्वादन के कारण प्रथम तीन प्रत्रियाओं के अतिरिक्त एक अन्य प्रक्रिया व्यंजना की होती है जिससे पाठक या सामाजिक की वासनाएँ या सहज प्रवृत्तियाँ उद्बुद्ध होकर अभिव्यक्त होने लगती हैं। यह अभिव्यक्ति ही कला का सर्वोच्च लक्ष्य है तथा इसी की प्रक्रिया के कारण सामात्तिक कला के माध्यम से एक विलक्षण प्रकार का आनन्द प्राप्त करता है। अभिनवगुप्त-परवर्ती मध्ययुगीन आचार्यों ने रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया के सम्बन्ध में किसी नूतन दृष्टि का परिचय नहीं दिया-रामचन्द्र गुणचन्द्र, विश्वनाथ प्रभृति ने उसके स्वरूप के सम्बन्ध में अवश्य कुछ नूतन संकेत दिये हैं, जिसकी चर्चा अन्यत्र की जा चुकी है, किन्तु जहाँ तक प्रक्रिया की बात है, उन्होंने प्रायः अभिनवगुप्त का ही अनुसरण किया है। आधुनिक युग के कतिपय आचार्यों ने अवश्य इसके सम्बन्ध में नूतन दृष्टि- कोण से विचार किया है। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने विभिन्न लेखों में रसात्मक

किया है बोध का विवेचन करते हुए, सामान्यतः उसकी निम्नांकित प्रक्रियाओं का स्पष्टीकरण

(क) कविता से सर्वप्रथम शब्द-विन्यास के कारण श्रोता का ध्यान आकर्षित होना। (ख) भावों के स्वरूप का प्रत्यक्ष होना। (ग) नाना पदार्थों के साथ उनके प्रकृत सम्बन्ध का प्त्यक्ष होना। (घ) अपने व्यक्तित्व के सम्बन्ध की भावना का परिहार होना। (ङ) काव्यगत भाव के आलम्बन से पाठक का साधारणीकरण। (च) हृदय की मुक्तावस्था का बोध या आनन्दानुभुति। उपयुक्त संकेतों के अनुसार काव्यानुभूति के अन्तर्गत क्रमशः ऐन्द्रिय-बोध, भावात्मक बोध, प्रकृत सम्बन्ध का प्रत्यक्षीकरण, वैयक्तिकता का परिहार, साधारणी- करण, मुक्तावस्था का बोध-आदि प्रत्रियाएँ स्वीकार की जा सकती हैं, किन्तु इनमें से अनेक प्रक्रियाएँ एक ही स्थिति की द्योतक हैं, उनमें परस्पर नाम का ही अन्तर है;

८. रस-मीमांसा; पृ० सं० ८८, २६० ।

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सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया १८१

यथा-आलम्बन के प्रकृत सम्बन्ध का प्रत्यक्षीकरण, निवैयक्तिकता एवं साधारणी करण-ये तीनों प्रक्रियाएँ वस्तुतः एक ही स्थिति की द्योतक हैं; अतः इन सब का समाहार साधारणीकरण की प्रक्रिया के अन्तर्गत किया जा सकता है। किन्तु जहाँ साधारणीकण नहीं होता, उस काव्यानुभूति को भी वे मध्यम कोटि की रसानुभूति मानते हुए वहाँ केवल आश्चर्य या कौतूहल की ही अनुभूति मानते हैं। अतः कहा जा सकता है कि आश्चर्य शुक्ल के मतानुसार उच्चकोटि की रसानुभूति में क्रमशः ऐन्द्रियबोध, भावात्मक बोध, साधारणीकरण एवं हृदय की मुक्त दशा के आस्वादन की प्रक्रियाए सम्पन्न होती है, वहाँ मध्यम कोटि की रसानुभूति केवल प्रथम दो प्रक्रियाओं के अनन्तर आश्चर्यपूर्ण प्रसादन या अवसादन-जिसे 'मनोरंजन' भी कहा गया है-की प्रक्रिया सम्पन्न होती है। डॉ० नगेन्द्र ने रसानुभूति एवं रस-निष्पत्ति के अन्तर्गत मुख्यतः साधारणी- करण व्यापार का विवेचन-विश्लेषण विस्तार से करते हुए विभिन्न प्रक्रियाओं का संकेत अप्रत्यक्ष रूप में किया है; यथा - • 'साधारणीकरण का आधार है भाषा का भावमय प्रयोग।' ....... 'भाषा के ये ही दो प्रयोग हैं-एक वह जिसमें प्रतीक केवल ज्ञान जगाते हैं, दूसरा वह जिससे भाव भी जगाते हैं। पहला प्रयोग हम सभी साधारणतः व्यवहार में लाते हैं, दूसरा केवल भाव-दीप्त क्षणों में-जब हमारे अपने भाव प्रतीकों पर आरूढ़ होकर उन्हें इतना भावमय बना देते हैं कि उनमें सुनने वालों के हृदयों में समान भाव उद्बुद्ध करने की शक्ति आ जाती है'। · 'जब कोई व्यक्ति अपनी अनुभूति को इस प्रकार अभिव्यक्ति कर सके कि वह सभी के हृदय में समान अनुभूति जगा सके तो ........ उसमें साधारणीकरण की शक्ति विद्यमान है।' ......... मेघनाथवध' में ........ हिन्दू पाठक भी अपने व्यक्तिगत या जातिगत संस्कारों से मुक्त होकर शुद्ध सहृदयता की भूमि पर कवि के साथ कुछ समय के लिए तादात्म्य कर लेता है।' उपर्युक्त उद्धरणों में साधाणीकरण की व्याख्या कवि को केन्द्र बनाकर की गई है। किन्तु उनमें रेखांकित अंश पाठक की प्रक्रियाओं की सूचना देते हैं, जिन्हें व्यवस्थित करते हुए कहा सकता है कि डॉ० नगेन्द्र के अनुसार रसानुभूति का मूल आधार है-साधारणीकरण तथा साधारणीकरण में क्रमशः ये प्रक्रियाए सम्पन्न होती हैं-(१) काव्य-भाषा के द्वारा भावों का उद्बोधन (२) व्यक्तिंगत एवं जातिगत संस्कारों से मुक्त हो जाना (३) काव्य-वस्तु के प्रति समानुभूति जगना और (४) कवि के साथ तादात्म्य। अस्तु, निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि

९. रस-सिद्धान्त; पृष्ठ २११-२१३

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१८२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

डॉ० नगेन्द्र के मतानुसार काव्यानुभूति या रसानुभूति में क्रमशः भावोद्बोधन, निर्वैयक्तिकता, समानुभूति एवं तादात्म्य की प्रक्रियाएँ सम्पन्न होती हैं। अन्त में हम विभिन्न भारतीय मतों में समन्वय स्थापित करने के लिए उन्हें यहाँ तालिका रूप में प्रस्तुत करते हैं- तालिका : भारतीय दृष्टि से रसानुभूति की प्रक्रियाएँ

भट्टनायक अभिनवगुप्त ऑ० शुक्ल डॉ० नगेन्द्र

१ X X =ऐन्द्रिय बोध X या प्रत्यक्षीकरण

२ अभिघा की प्रक्रिया =काव्यार्थ का (अर्थ-बोध) प्रकाशन X X

३ भावकत्व की =कलागत सौंदर्य =भावात्मक =भाषा के भाव- प्रक्रिया का बोध बोध मय प्रयोग से (अर्थ का भावन) भावोद्व लन

४ साधारणीकरण Sसाधारणीकरण =साधारणीकरण (निर्वैयक्तिता १ व तादात्म्य =समानुभूति (तादात्म्य

भोजकत्व की (हृदय की मुक्त प्रक्रिया या X =अवस्था का X

आस्वादन बोध

६ X =अभिव्यक्ति X X

उपयुक्कत तालिका के अनुसार हम भारतीय आचार्यों द्वारा उल्लिखित मतों का समन्वय निम्नांकित छह प्रक्रियाओं के अन्तर्गत कर सकते हैं- (१) ऐन्द्रिय-बोध-काव्य या कला का ऐन्द्रियक माध्यम से ग्रहण (२) अर्थबोध -ऐन्द्रियक संवेदनाओं का सामान्य अर्थ-ग्रहण

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सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया १८३

(३) भावन-भाषा के भावमय प्रयोग तथा गुण-अलंकारादि सौन्दर्य के कारण कला-वस्तु का भावात्मक रूप में ग्रहण। (४) साधारणीकरण-विषय वस्तु का निवैयक्तिक रूप में ग्रहण, जिस 'साधारणीकरण' 'तादात्म्य', 'समानुभूति' आदि का नाम दिया गया है। (५) आस्वादन-अहं से मुक्ति एवं तादात्म्य आदि के कारण कटु भावों से भी माधुर्य की अनुभूति। (६) अभिव्यत्ति-भोक्ता की अंतरचेतना या वासना का द्रवीभूत होकर सत्त्व रूप में व्यक्त होने लगना। रसानुभूति की चरम स्थिति की द्योतक अन्तिम प्रक्रिया। हमारे विचार में उपयुक्त्त छह प्रक्रियाओं के अन्तर्गत न केवल प्रमुख भारतीय मतों का समन्वय हो जाता है, अपितु रसानुभूति की क्रिया का भी एक परिपूर्ण रूप प्रस्तुत हो जाता है। • भारतीय एवं पाश्चात्य मतों का तुलनात्मक अध्ययन यदि हम उपरयुक्त भारतीय मतों के समन्वित रूप से पूर्वोक्त पाश्चात्य मतों (निष्कर्षों) की तुलना करें तो दोनों में अत्यधिक समानता दृष्टिगोचर होगी; यथा- भारतीय मत पाश्चात्य मत

(१) ऐन्द्रिय-बोध = ऐन्द्रिय-बोध (२) अर्थ-बोध = अर्थबोध

(३) भावना = बिम्ब-ग्रहण (४) साधरणीकरण = निवैयक्तिता या तादात्म्य। (५) आस्वादन = स्वतन्त्र विम्बों का उदय। (६) अभिव्यक्ति = सामंजस्य (विभिन्न अन्त- वृत्तियों में पारस्परिक समन्वय) उपयुक्त भारतीय एवं पाश्चात्य मतों में से अन्तिम दो को छोड़कर शेष में तो कहीं-कहीं शब्दावली का ही अन्तर है, अन्यथा वे अभिन्न हैं। अन्तिम में 'आस्वादन' एवं 'स्वतन्त्र बिम्बों का उदय' तथा 'अभिव्यक्ति व समन्वय' में परस्पर अवश्य अन्तर है। 'स्वतन्त्र बिम्बों का उदय' का आशय स्वतन्त्र, व्यक्ति-निरपेक्ष, कटुता से शून्य बिम्बों से लिया जाय तो वे आस्वादन या रसास्वादन की ही प्रक्रिया के द्योतक होंगे। अन्तश्चेतना के जागरण एवं अभिव्यंजन-व्यापार में मन

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१८४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

की सभी वृत्तियाँ समाधि अवस्था को प्राप्त हो जायगीं, इसीलिए इसे अभिनवगुप्त ने 'निर्विघ्न विश्रान्ति' की स्थिति से सम्बन्धित माना है-ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक है कि सभी विरोधी एवं अविरोधी प्रवृत्तियाँ परस्पर समन्वित हो जाय। वस्तुत: रिचर्ड्स द्वारा प्रतिपादित वृत्तियों के सामंजस्य का सिद्धान्त अभिनवगुप्त की 'निर्विध्न विश्रान्ति' से बहुत भिन्न नहीं है, किन्तु अभिनवगुप्त के विचार से यह यह स्थिति अभिव्यंजना की प्रक्रिया के समय प्राप्त होती है-अतः हम अन्तिम मतों में भी समन्वय स्थापित करते हुए कह सकते हैं कि अभिव्यंजना एक प्रक्रिया है, जबकि सामंजस्य एक स्थिति है, किन्तु दोनों परस्पर सम्बन्धित हैं। हमने अन्यत्र साहित्य की व्याख्या आकर्षण-शक्ति सिद्धान्त के आधार पर करते हुए काव्यास्वादन की सभी प्रक्रियाओं को आकर्षण-शक्ति की ही प्रक्रियाओं में स्थान दिया है।" आकर्षण-शक्ति सामान्यतः इन चार प्रक्रियाओं के रूप में कार्य संपादित करती है-(१) संयोजन (२) संप्रेषण (३) द्रवण और (४) अभिव्यक्ति। काव्य एवं कलाओं के आस्वादन में भी सामाजिक की प्रवृत्ति मूलतः कृति की आकर्षण-शक्ति के कारण होती है तथा उसी शक्ति के बल पर वह उपर्युक्त्त चारों प्रक्रियाओं के माध्यम से रसानुभूति प्राप्त करता है। भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों द्वारा परिगणित प्रक्रियाओं का भी समन्वय उपयुक्त चार प्रक्रियाओं में हो जाता है; देखिये- (१) संयोजन की प्रत्रिया-ऐन्द्रियक एवं बौद्धिक आकर्षण (रुचि, जिज्ञासा कुतुहल आदि) के कारण सामाजिक का कला-वस्तु के साथ सम्बन्ध स्थापित होता है, इसी में हम पूर्वोक्त ऐन्द्रिय-बोध एवं अर्थ-बोध की प्रक्रियाओं को समाविष्ट कर सकते हैं। (२) संप्रेषण की प्रत्रिया-इस प्रक्रिया से कला-वस्तु एवं सामाजिक में करमशः गहरा तादात्म्य स्थापित हो जाता है। भावन, बिम्ब-ग्रहण, साधारणीकरण आदि को इसी में स्थान दिया जा सकता है। (३) द्रवण की प्रक्रिया-इस प्रक्रिया से सामाजिक का हृदय भावानुभूतियों से आप्लावित होकर कलाकृति में विभोर हो जाता है। आस्वादन की प्रक्रिया भी इसी की पर्याय है। (४) अभिव्यक्ति की प्रक्रिया-यह आकर्षण-शक्ति की अन्तिम प्रक्रिया है, सामाजिक भावोद्रक के अनन्तर विभिन्न सात्त्विक अनुभावों के रूप में या किसी भी अन्य रूप में अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त करता है; इसी प्रक्रिया को अभिनवगुप्त ने अभीव्यक्ति के नाम से स्वीकार किया है।

१०. साहित्य-विज्ञान : प्रथमखण्ड (साहित्य की आकर्षण शक्ति); अध्याय ८-९ ।

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सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया १८५

अस्तु, यहाँ हमने भारतीय एवंपाश्चात्य मतों में समन्वय स्थापित करने के लक्ष्य से आकर्षण-शक्ति की प्रक्रियाओं का संकेत मात्र किया है-इनका विस्तृत विवेचन अन्यत्र, स्वतन्त्र दृष्टि से रस-सिद्धान्त पर विचार करते समय, किया जायगा। अतः यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि रसानुभूति की प्रक्रियाओं के सम्बन्ध में पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्रियों एवं भारतीय रस-सैद्धान्तिक आचार्यों में गहरा साम्य दृष्टिगोचर होता है जो इस सिद्धान्त की व्यापकता एवं प्रौढ़ता का परिचायक है।

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करुण, त्रासादि से रसानुभूति का ७ रहस्य

कला-विवेचन के क्षेत्र में प्रायःयह विवाद का विषय रहा है कि करुण (शोक) त्रास, भय, घृणा आदि भावों के कलात्मक आस्वादन से सौन्यानुभूति या रसानुभूति क्यों प्राप्त होती है, जबकि व्यावहारिक जीवन में ये भाव कटु, तीक्ष्ण एवं शोकप्रद माने जाते हैं। इस विषय पर विभिन्न पाश्चात्य कला-चिंतकों एवं भारतीय आचार्यों ने गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए विभिन्न मत प्रस्तुत किये हैं। हम यहाँ उनका क्रमशः अध्ययन करते हुये इस विषय पर तुलनात्मक एवं समन्वयात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। · पाश्चात्य कला-चिन्तकों के मत- पाश्चात्य कला-चिन्तकों में यहाँ सर्वप्रथम अरस्तू का नाम उल्लेखनीय है, जिन्होंने त्रासदी के प्रसंग में उपयुक्त समस्या का समाधान प्रस्तुत करने का महत्त्व- पूर्ण प्रयास किया। उन्होंने इस विषय में विरेचन-सिद्धान्त की स्थापना करते हुए प्रतिपादित किया कि जिस प्रकार रेचक औषधि शरीर से अशुद्ध एवं अस्वास्थ्यकर पदार्थों का रेचन या निष्कासन करके हमारे शरीर को शुद्ध एवं स्वस्थ बनाती है उसी प्रकार त्रासदी हमारे मन में अवस्थित दूषित मनोविकारों को निष्कासित करके उसे स्वास्थ्य एवं प्रसन्नता प्रदान करती है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि कला के माध्यम से हमारे मन के कटु, तिक्त एवं शोकप्रद भावों की अभिव्यक्ति हो जाती है और इसलिये हमें कला से आनन्दानुभूति प्राप्त होती है। हमारे विचार में अरस्तू का यह सिद्धान्त दोषपूर्ण एवं भ्रामक है। यदि त्रासदी में हमारे कटु भावों की अभि- व्यक्ति हो जाने के कारण हमें आनन्द प्राप्त होता है तो कामदी में प्रसन्नतादायक भावों की अभिव्यक्ति के कारण हमें दुःख होना चाहिये और जहाँ तक अभिव्यक्ति

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करुण, त्रासादि से रसानुभूति का रहस्य १८७

की बात है लौकिक जीवन में भी जीवन के कष्टदायक प्रसंगों में हमारे कटुभावों की अभिव्यक्ति होती है किन्तु फिर भी हमें वहाँ आनन्द प्राप्त नहीं होता। अतः विरेचन सिद्धान्त से पूर्वोक्त समस्या का समाधान नहीं होता। सत्रहवीं, अठारहवीं शताब्दी के अनेक सौन्दर्य शास्त्रियों ने उपयुक्त प्रश्न पर पुनविचार करते हुए अनेक नई स्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं। डेकाटे (१५९६-१६५० ई०) ने इस सम्बन्ध में मुख्यतः तीन विचार प्रस्तुत किये-(१) कला में दुष्ट एवं क्र्ूर पात्रों को दुःखी रूप में देखकर हमें करुणा की अपेक्षा हर्ष की अनुभूति अधिक होती है। (२) करुणा में प्रेम और सद्भावना का मिश्रण रहता है। जब हम कलागत पात्रों के प्रति करुणा की भावना अनुभूत करते हैं तो उस समय अप्रत्यक्ष में हम उनके प्रति प्रेम, सहानुभूति एवं उदारता प्रद्शित करते हैं। मानव मन की यह प्रकृति है कि वह प्रेम, सहानुभूति और उदारता के प्रदर्शन से सन्तोष एवं आनन्द की अनुभूति प्राप्त करता है। (३) रंगमंच या कला के माध्यम से प्रस्तुत शोकपूर्ण दृश्य वास्तविक दृश्य नहीं होते-उनकी अवास्तविकता और अयथार्थता का ज्ञान हमारे अन्तर्मन में बराबर बना रहता है जिससे उनकी कटुता एवं तिक्तता का प्रभाव कम हो जाता है। डेकार्टे के उपयुक्त विचारों की समीक्षा हम अन्यत्र कर चुके हैं। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि जहाँ पहले दो विचार केवल कला पर ही नहीं, वास्तविक जीवन की अनुभूतियों पर भी लागू होते हैं; अतः वे लौकिक अनुभूतियों और कलाजन्य अनुभूतियों के अन्तर को स्पष्ट नहीं कर पाते, वहाँ तीसरा विचार स्वयं कलानुभूति के ही स्वरूप को भ्रामक रूप में प्रस्तुत करता है। इससे तो यह सिद्ध होता है कि कला की अयथार्थता के कारण उसका प्रभाव लौकिक अनुभूतियों की तुलना में न्यून या अल्प मात्रा में ही होता है। इससे यह भ्रान्ति उत्पन्न होती है कि कला से कोई गम्भीर प्रभाव उत्पन्न नहीं हो सकता। वस्तुतः डेकार्टे ने अधिक से अधिक इसी बात का उत्तर दिया है कि कला में कदुभावों का प्रभाव किस प्रकार न्यून हो जाता है। जबकि मूल समस्या यह है कि उनका स्वाद किस प्रकार बदल जाता है ? आगे चलकर एडिसन (१६७२-१७१९ ई०) ने प्रतिपादित किया कि हम कलागत पात्रों से मन ही मन अपनी स्थिति की तुलना करते रहते हैं और जब हम यह देखते हैं कि कलागत पात्र तो त्रस्त एवं दुःखी हैं तो हम यह सोचकर कि हमारी स्थिति उनसे उच्चतर है, प्रसन्न एवं आह लादित होते हैं। इसका तात्पर्य तो यह हुआ कि हमारा कलागत पात्रों से तादात्म्य नहीं होता अपितु हम अपनी तुलना उनसे करते रहते हैं। यदि ऐसा ही है तो फिर हमें कामदी से ईर्ष्या, द्वष शोक की अनुभूति होनी चाहिये क्योंकि जिस प्रकार त्रासदी में हमारी स्थिति कलागत पात्रों या नायक से उच्चतर होती है, उसी प्रकार कामदी में निम्नतर होती है। वस्तुतः एडिसन का यह मत कलानुभूति के मूल स्वरूप के ही प्रतिकूल है क्योंकि इसमें कलानुभूति को भी एक सामान्य लौकिक अनुभूति के तुल्य मानते हुए

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१८८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

तादात्म्य की स्थिति की अवहेलना कर दी गयी है; अतः इसे स्वीकार्य नहीं कहा जा सकता। बर्क के अनुसार कलाजन्य आनन्द अनुकृति का आनन्द है। जब हमें इस तथ्य का बोध होता है कि कला में प्रस्तुत विषय न वास्तविक है, न मिथ्या अपितु अनु- कृति मात्र है तो इससे हमें आनन्द की अनुभूति होती है। किन्तु हमारे विचार में तो ऐसी स्थिति में हमें किसी भी भाव की अनुभूति नहीं होनी चाहिये जबकि कला से हमें भावानुभूति प्राप्त होती है।

हीगल ने इस सम्बन्ध में दो विचार प्रस्तुत किये-(१) शोकपूर्ण रचनाओं का आधार काल्पनिक होता है, इसलिए हम उनसे दुःखी नहीं होते। (२) कला में भय-त्रास, शोक आदि का चित्रण ईश्वरीय न्याय का बोध करवाने के लिए किया जाता है इसलिए हमें उससे शान्ति एवं सन्तोष प्राप्त होता है। इसी प्रकार शापेन- हावर ने भी प्रतिपादित किया कि कलागत शोक से हमारे मन में सुख के प्रति विरक्ति का भाव उत्पन्न हो जाता है तथा हम इच्छाओं के वेग से ऊपर उठ जाते हैं, इसलिये हमें उससे मुक्ति के आनन्द की अनुभूति या रसानुभूति प्राप्त होती है। आधुनिक युग के प्रसिद्ध सौन्दर्य-शास्त्री जार्ज सैंतायना के विचार से मनुष्य की बुद्धि सदा सत्य की उपलब्धि के लिये सचेष्ट एवं लालायित रहती है। सत्य भले कितना कटु क्यों न हो, उसे जानने या पहचानने की इच्छा हमारे मन में सदैव बनी रहती है। सत्य की प्यास या जिज्ञासा के कारण ही हम दुःखद घटनाओं को तल्ली- नतापूर्वक देखते हैं। ज्ञान या सत्य की उपलब्धि से हमें अमित सन्तोष प्राप्त होता है। कला में करुण से आनन्द-प्राप्ति का आधार भी यही है। सैंतायना महोदय का उपयुक्त मत आंशिक रूप में ही सत्य है। उन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास नहीं किया कि वास्तविक या व्यावहारिक जीवन में ऐसा क्यों नहीं होता ? जिज्ञासा की भावना व्यावहारिक जीवन में भी रहती है फिर भी वहाँ हम दुःखद घटनाओं से आनन्दानुभूति प्राप्त नहीं करते। इस प्रकार विभिन्न पाश्चात्य विचारकों ने विभिन्न मत प्रतिपादित किये हैं, जिन्हें सूत्र-रूप में प्रस्तुत करते हुए कहा जा सकता है कि कलागत त्रास, करुण आदि कटुभावों की माधुर्य में परिणति का कारण है- -दुःखद भावों का विरेचन हो जाना। (अरस्तू) -प्रेम, सहानुभूति एवं उदारता के प्रदर्शनजन्य संतोष। (डेकार्टे) -कलागत पात्रों से अपनी उच्चतर स्थिति का बोध। (एडिसन) -कलाकृति की अवास्तविकता या अनुकरणात्मकता का ज्ञान। (बर्क) -कलाकृति के आधार का काल्पनिक होना। (हीगल) -इच्छाओं से मुक्ति या विरक्ति की भावना का उदय। (शापनहावर)

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करुण, त्रासादि से रसानुभूति का रहस्य १८९

-जिज्ञासा एवं सत्य की प्यास के कारण। (सैतायना) -ईश्वरीय न्याय का बोध । (हीगल) उपयुक्त सूत्रों पर अंतिम रूप से विचार करने से पूर्व भारतीय मतों का भी अध्ययन कर लेना उचित होगा। ·• भारतीय मत- भारतीय रसवादी आचार्यों ने भी करुण से रसानुभूति या आनन्दानुभूति के कारणों पर अत्यन्त सूक्ष्म रूप मे विचार किया है। भट्ट नायक ने लौकिक अनु- भूतियों एवं काव्यानुभूति का पारस्परिक अन्तर स्पष्ट करते हुए दो बातों पर विशेष बल दिया है-(१) साधारणीकरण और (२) सत्त्व की प्रधानता। जैसा कि हम अन्यत्र विस्तार से स्पष्ट कर चुके हैं साधारणीकरण के कारण सामाजिक वैयक्तिकता की भावना से या निजी मोह के बन्धन से मुक्त हो जाता है तथा सत्त्व या सत् की प्रधानता के कारण वह सत्य का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करने लगता है। इस प्रकार वैयक्तिक सीमाओं से मुक्ति एवं परम सत्य की अनुभूति ही काव्यनुभूति या रसानुभूति का मूल कारण है। आचार्य अभिनवगुप्त ने रसानुभूति के मूल आधारों की व्याख्या करते हुए कलात्मकता, सौन्दर्यात्मकता; साधारणीकरण या निवैयक्तिकता के योग को तो स्वी- कार किया ही, साथ ही उन्होंने वासनाओं (या सहज प्रवृत्ति) की अभिव्यक्ति की बात भी कही। सामान्य जीवन में वासनाओं की अभिव्यक्ति उस निरवैयक्तिक एवं निर्विघ्न रूप में नहीं हो पाती, जिस रूप में कला के माध्यम से होती है। कला- जन्य अनुभूति में चमत्कारपूर्ण निर्विघ्न विश्रान्ति का आनन्द रहता है-इसीलिये वहाँ सांसारिक जीवन के दुःखात्मक भाव भी रसानुभूति या आनन्दानुभूति में परिणत हो जाते हैं। अतः संक्षेप में अभिनवगुप्त के विचारानुसार कलागत सौन्दर्य, निर्वय- क्तिकता, एवं वासनाओं की निर्विघ्न अभिव्यक्ति ही कलानुभूति की रसात्मकता के आधारभूत कारण हैं। मध्ययुगीन आचार्यों ने प्रायः अभिनवगुप्त के मत का ही अनुसरण किया है किन्तु कुछ इसके अपवाद भी हैं। रामचन्द्र गुणचन्द्र ने 'नाट्य दर्पण' में प्रतिपादित किया कि मूलतः तो काव्य में भी करुण-त्रास आदि इसी रूप में रहते हैं किन्तु कवि अपनी शक्ति से वर्णन में चमत्कार उत्पन्न कर देता है तथा नट अपने अभिनय-कौशल के सहारे उस वर्णन को और भी चमत्कारपूर्ण बना देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो शैलीजन्य चमत्कार पूर्ण एवं अभिनय-कौशल के कारण कला के दुःखात्मक भाव भी आकर्षक एवं ग्राह्य प्रतीत होते हैं। इस प्रकार वे कला के शैली पक्ष को ही इसका मूल कारण सिद्ध करते हैं।

१. रस-सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण; पृ० सं० २०८

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१६० १ ।रस-सिद्धान्त का पुन्विवेचन

आधुनिक युग के सुप्रसिद्ध रसवादी आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने निवयक्तिकता एवं साधारणीकरण की प्रक्रिया के कारण न केवल कलागत कटु भाव अपितु प्रत्यक्ष जगत् के कटु भावों की भी परिणति रसात्मकता में मानी है। साथ ही उन्होंने इस सन्दर्भ में कटु भावों के लोक मंगलकारी रूप का भी प्रतिपादन करते हुये लिखा है- 'बीज भाव (मूल भाव) द्वारा स्फुरित भावों में कोमल और मधुर-कठोर और तीक्ष्ण-दोनों प्रकार के भाव रहते हैं। यदि बीजभाव की प्रकृति मंगल-विधायनी होती है तो उसकी व्यापकता और निर्विशेषता के अनुसार सारे प्रेरित भाव तीक्ष्ण और कठोर होने पर भी सुन्दर होते हैं।२ डॉ० नगेन्द्र ने विभिन्न प्रचलित मतों का विवेचन-विश्लेषण करने के अनन्तर प्रायः सभी मतों में आंशिक सत्य स्वीकार किया तथा अपना समन्वयात्मक निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुऐ उन्होंने करुण की आनन्द में परिणति के ये कारण बताये हैं- (१) काव्यानुभूति का प्रत्यक्ष अनुभव से भिन्न कल्पनात्मक अनुभव का विषय होना। (२) काव्यगत शोक का साधारणीकृत हो जाना। (३) उसका औदात्य से मंडित हो जाना। (४) कलात्मक अन्विति के कारण आधारभूत संवेदनों के समन्वित हो जाने के कारण भी जीवन के कटु अनुभव भी आनन्दप्रद बन जाते हैं। अस्तु, संक्षेप में उनके मतानुसार कल्पनात्मक अनुभूति, साधारणीकरण, औदात्य एवं कलात्मक अन्चिति में ही करुण से रसात्मक अनुभूति का रहस्य निहित है। डॉ० कृष्णदेव झारी ने वीभत्स, भयानक, करुण आदि रसों की सूक्ष्म विवे- चना प्रस्तुत करते हुए प्रतिपादित किया है-"निस्संदेह करुण में प्रकट होने वाले आँसुओं को सुख के आँसू मानना भ्रान्तिपूर्ण ही है। वस्तुतः वे आँसू तो शोक के ही होते हैं। पर उदात्त भावना से सम्बन्ध होने के कारण यह शोक और इसके आँसू भी स्पृहणीय होते हैं। ........ इसी प्रकार क्रोध, भय, और घृणा या वीभत्स की अनु- भूति में भी घृणा आदि भाव दुःखात्मक ही होते हैं, पर वह दुःख लौकिक दुःख से भिन्न उदात्त दुःख होता है और हमें अच्छा ही लगता है, हम चाहकर उसे अपनाते हैं।" आगे चलकर उन्होंने प्रस्तुत विषय के सम्बन्ध में और विचार करते हुए लिखा है-'वास्तव में हम दुःख से निवृत्ति चाहते हैं, इसीलिए करुणा में आनन्द प्राप्त करते हैं। जब हम कुरूपता के प्रति अनिच्छा या घृणा प्रकट करते हैं, तभी हमें सौन्दर्यानुभूति होती है। ........ (करुण में) हमें रसानुभूति या संवेदनाजन्य आनन्द मिलता है। ........ हमारी सहानुभूति का विस्तार भी दुःख की निवृत्ति का हेतु होता है, और इस प्रकार हम दुःखपूर्ण दृश्यों से भी आनन्द प्राप्त करते हैं।'

२. रस-मीमांसा ; पृ० सं० ६५ ३. रस-सिद्धान्त : पृ० सं० १३२-३ ४. रस-शास्त्र और साहित्य-समीक्षा, पृ० सं० १८७

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करुण, त्रासादि से रसानुभूति का रहस्य १९१

डॉ० भारी ने यहाँ मुख्यतः चार विचार प्रतिपादित किये हैं- (१) करुणा में प्रकट होने वाले आँसू मूलतः दुःख के ही होते हैं। (२) फिर भी उनमें प्रवृत्ति का कारण है-उदात्त भावना का सम्बन्ध। (३) दुःख से निवृत्ति चाहना भी एक अन्य कारण है। (४) सहानुभूति या संवेदनाजन्य अनुभूति भी दुःखपूर्ण दृश्यों को आनन्द में परिणत कर देती है। इनमें से प्रथम विचार का खण्डन तो वे स्वयं ही चतुर्थ विचार के समय कर देते हैं-अंततः वे करुण दृश्यों से भी आनन्द-प्राप्ति की बात स्वीकार कर लेते हैं; शेष तीन धारणाएँ अवश्य समीचीन प्रतीत होती हैं। इस प्रकार उपयुक्त मतों के अनुशीलन से उपलब्ध निष्कर्षों को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए कहा जा सकता है कि भारतीय रसवादी विद्वानों की दृष्टि में कला- गत कटु भावों से रसात्मक या आनन्दात्मक अनुभूति प्राप्त होने के निम्नलिखित कारण हैं- · भट्टनायक-साधारणीकरण, सत्त्व की प्रधानता (बौद्धिकता) • अभिनवगुप्त-कलागत सौन्दर्य निवैयक्तिकता, वासनाओं की अभिव्यक्ति, निर्विघ्न अनुभूति। · रामचन्द्र गुण चन्द्र-शैली जन्य चमत्कार। • रामचन्द्र शुक्ल-मूल भाव की व्यापकता, निर्विशेषता, आर मंगल विधायकता। · ड० नगेन्द्र-कल्पनात्मक अनुभूति, साधारणीकरण, औदात्य एवं कला- त्मक अन्विति। • डॉ० कृष्णदेव झारी-उदात्त भावना, दुःख से निवृत्ति की चाह, और सहानुभूति का विस्तार। • तुलनात्मक अध्ययन एवं समन्वय- पूर्वोक्त भारतीय एवं पाश्चात्य मतों पर तुलनात्मक-दृष्टि से विचार करने पर इनमें इसप्रकार साम्य दृष्टि गोचर होता है : पाश्चात्य मत भारतीय मत (१) विरेचन (अरस्तू) = अभिव्यक्ति (अभिनवगुप्त) (२) काल्पनिकता (हीगल) = कल्पनात्मकता (डॉ० नगेन्द्र) (३) प्रेम-सहानुभूति-प्रदर्शन सहानुभूति-प्रदर्शन (डॉ० भारी) (डेकार्टे) (४) विरक्ति (शापनहावर) = निवृत्ति की चाह (डॉ० भारी) (५) ईश्वरीय न्याय या सत्य = सत्त्व की प्रधानता (भट्टनायक) का बोध (हीगल)

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१९२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

उपयुक्त पाँच मतों में परस्पर किचित् अन्तर के होते हुए भी वे सामान्य रूप में समान माने जा सकते हैं। उपयुक्त मतों के अतिरिक्त पाश्चात्य वर्ग में से दो मत-(१) अनुकरणात्मकता (बर्क) एवं (२) जिज्ञासा (सैतायना) सम्बन्धी-तथा भारतीयवर्ग में से साधारणीकरण, कलागत सौन्दर्य, निवयक्तिकता, निर्विघ्न अनु- भूति, शैलीजन्य चमत्कार, मूल भाव की व्यापकता, निर्विशेषता एवं मंगल-विधायकता औदात्य, कलात्मक अन्विति आदि से सम्बन्धित मत और हैं। इनमें से निवयक्ति- कता, निर्विशेषता का अन्तर्भाव साधारणीकरण में, कलागत सौन्दर्य, शैलीजन्य चम- त्कार, कलात्मक अन्विति का अन्तर्भाव कला-पक्ष में, तथा मूल भाव की व्यापकता, और औदात्य का कला के वस्तु-पक्ष में तथा शेष दो-अनुकरणता एवं जिज्ञासा की प्रवृत्ति को क्रमशः कलानुभूति के वैशिष्ट्य एवं प्रमाता की वृत्ति-विशेष के अन्तर्गत स्थान दिया जा सकता है। उपयुक्त सभी भारतीय एवं पाश्चात्य मतों को समन्वित रूप देने के लिए उन्हें निम्नाँकित पाँच वर्गों में वर्गीकृत किया जा सकता है : (१) कला की विषय-वस्तु से सम्बन्धित मत- (क) कलागत मूलभाव की व्यापकता एवं निर्विशेषता। (ख) कलागत मूलभाव की मंगल-विधायकता। (ग) कलागत औदात्य। (घ) कलागत सौन्दर्य। (२) कला के शैली-पक्ष से सम्बन्धित मत- (क) शैलीजन्य चमत्कार। (ख) कलात्मक अन्विति। (३) भोक्ता या प्रमाता से सम्बन्धित मत- (क) जिज्ञासा (ख) निवृत्ति की चाह (ग) उच्चस्थिति का बोध (घ) सहानुभूति का प्रदर्शन। (४) रसानुभूति की प्रक्रिया के वैशिष्टय से सम्बन्धित मत- (क) अनुकरणात्मक प्रतीति। (ख) कल्पनात्मक अनुभव (ग) साधारणीकरण (घ) निर्विध्त अनुभूति। (५) भोक्ता की उपलब्धियों के सूचक मत- (क) ईश्वरीय न्याय या सत्य का बोध। (ख) इच्छाओं से मुक्ति या विरक्ति। (ग) वासनाओं का रेचन या अभिव्यक्ति। यदि वैज्ञानिक दृष्टि से विचार किया जाय तो स्पष्ट होगा कि करुण त्रासादि की रसात्मक परिणति में उपर्युक्त सभी वर्गों का न्यूनाधिक योग-दान रहता है: अतः हम इन्हें समन्वित करते हुए कह सकते हैं कि कला की विषय-वस्तु (मूल भाव,

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करुण, त्रासादि से रसानुभूति का रहस्य १९३

सौन्दर्य एवं औदात्य), उसके शैलीपक्ष (चमत्कार एवं अन्विति) के वैशिष्ट्य, भोक्ता की विशेष प्रवृत्तियों-जिज्ञासा, निवृत्ति, सहानुभूति आदि, रसानुभूति की विभिन्न प्रक्रियाओं-अनुकरणात्मक, कल्पनात्मक बोध, साधारणीकरण आदि-और भोक्ता की विभिन्न उपलब्धियों-सत्य का बोध, इच्छाओं से मुक्ति, वासनाओं के रेचन आदि-के समन्वित प्रभाव के कारण ही कलागत कुरूप पदार्थ एवं कटु भाव सौन्दर्य एवं सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति में परिणत हो जाते हैं। वैसे निश्चय ही उपयुक्त मतों में से कुछ प्रमुख एवं शेष गौण है, किन्तु इसका निर्धारण करने के लिए इन सभी मतों का विस्तृत मनोवैज्ञानिक अध्ययन एवं प्रयोगात्मक परीक्षण अपेक्षित है जो एक स्वतन्त्र एवं पृथक शोध-प्रबन्ध में ही संभव है। वैसे हम सामान्य रूप में दो बातें कह सकते हैं; एक तो इनमें सबसे महत्त्वपूर्ण मत रसानुभूति की प्रक्रिया से सम्बन्धित मत हैं क्योंकि अन्ततः इस प्रक्रिया के कारण ही रसानुभूति उपलब्ध होती है, शेष मतों में सूचित मत तो इस प्रक्रिया के साधक या उसकी उपलब्धियाँ मात्र हैं। दूसरे जिन मतों के सम्बन्ध में भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों में परस्पर साम्य मिलता है, वे भी अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण माने जा सकते हैं। हमने अन्यत्र आकर्षण- शक्ति सिद्धान्त के अन्तर्गत इस पर विचार करते हुए इसे आकर्षण-शक्ति की अंतिम प्रत्रिया अभिव्यक्ति के आनन्द को ही इसका मूल आधार एवं शेष सबको आकर्षण- शक्ति के घटक एवं उद्दीपक साधनों के रूप में स्वीकार किया है।4 अस्तु यहाँ हम और विस्तार में न पड़कर पूर्वोक्त समन्वयात्मक निष्कर्ष को ही प्रस्तुत समस्या के समा- धान के लिए पर्याप्त समभते हैं।

५. साहित्य-विज्ञान : प्रथम खंड, अध्याय ९।

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रसानुभूति के लिए तप्रपेक्षित सामाजिक की क्षमताएँ

अनेक पाश्चात्य कला-मीमांसकों एवं भारतीय आचार्यों ने कला-कृति, काव्य नाटक आदि के सम्यक् बोध एवं आस्वादन के लिए कृति के गुणों के साथ-साथ प्रमाता या सामाजिक में भी कतिपय क्षमताओं का होना आवश्यक माना है। वस्तुतः सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की प्र्रिया एवं स्वरूप के सम्यक् विश्लेषण के लिए उसका इस दृष्टि से भी विचार आवश्यक है ; अतः हम यहाँ क्रमशः पाश्चात्य एवं भारतीय मतों का अनुशीलन करते हुए किसी सामान्य निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयास करेंगे। • पाश्चात्य कला-चिन्तकों के मत- पाश्चात्य कला-चिन्तकों में मुख्यतः एडिसन, हचेसन, बर्क, हरमन लात्ज, कालेमन प्रभृति ने सामाजिक की क्षमताओं का अनुसंधान करते हुए विभिन्न मत प्रस्तुत किये हैं।' एडिसन (१६७२-१७१९ ई०) के विचार से कलास्वादन के लिए सामाजिक में चार क्षमताएँ अपेक्षित हैं-(१) अच्छी बिम्बग्राहक कल्पना-शक्ति, (२) भाषा-शक्ति का पूरा ज्ञान (३) भावाभिव्यक्ति के साधनों या माध्यम को समझने की क्षमता, और (४) आत्म-विस्मृति का गुण । इनमें द्वितीय तो केवल काव्य एवं साहित्य पर ही लागू होता है, शेष को सभी कलाओं के संदर्भ में ग्रहण किया जा सकता है। हचेसन (१६९७-१७४७ ई०) ने प्रस्तुत विषय के सम्बन्ध में विचार करते हुए सामाजिक में दो गुणों का होना आवश्यक माना है-(१) स्वार्थशून्यता और

१. इनमें से कालेमन को छोड़कर शेष सभी का सामान्य परिचय एवं संदर्भ इसी प्रबन्ध में अन्यत्र (द्वितीय खंड में) दिया जा चुका है।

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(२) रुचि (Taste) । स्वार्थशून्यता से उनका तात्पर्य यह है कि सामाजिक को कलाओं के आस्वादन के समय किसी भी प्रकार के व्यक्तिगत हानि-लाभ के विचार से मुक्त रहना चाहिये। यही स्वार्थशून्यता ही काव्यानन्द का मूल कारण है। इसी प्रकार उन्होंने रुचि (Taste) का सिद्धान्त प्रतिपादित करते हुए बताया कि यह एक ऐसी शक्ति है जो कवि, काव्य और पाठक तीनों में विद्यमान रहती है। पाठक काव्य- रुचि या कलारुचि के कारण ही इनका आस्वादन कर पाता है। हचेसन की ही भाँति ह्य म (१७११-१७७६ ई०) ने भी कलास्वादन के लिए सामाजिक में स्वार्थभाव से मुक्ति तथा कलागत पात्रों के प्रति सहानुभूति को आवश्यक माना है। इसके अतिरिक्त उन्होंने मानवीय प्रकृति, संस्कारों एवं मानसिक परिवर्तनों को भी कलानुभूति के प्रमुख आधारों में स्थान देते हुए इनका भी सामा- जिक से घनिष्ठ सम्बन्ध स्वीकार किया है। बर्क (१७२९-१७९७ ई०) ने कलानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए तीन ऐसे माध्यमों की चर्चा की है जिनके द्वारा पाठक काव्य- वस्तु का बोध प्राप्त करता है-(१) इन्द्रियाँ (२) कल्पना शक्ति (३) तर्क या बुद्धि उनके विचारानुसार रसानुभूति में उनमें से किसी एक माध्यम का ही नहीं, अपितु तीनों का ही समन्वित योग रहता है। इन तीनों को ही समन्वित रूप में 'रुचि' (Taste) या 'आस्वादन क्षमता' का नाम दिया गया है। अस्तु, बर्क के विचारानु- सार इन्द्रियों, कल्पना और बुद्धि के समन्वित योग से निर्मित रुचि ही सामाजिक की वह क्षमता है जिसके द्वारा वह कलास्वाद प्राप्त करता है। हरमन लात्ज (१८१७-१८८१ ई०) ने प्रतिपादित किया कि कलानुभूति या रसानुभूति में कला की भावोत्पादिनी शक्ति के साथ-साथ सामाजिक की नैतिक आस्थाओं, उसके पूर्व संस्कारों, उसकी स्मृतियों और वैयक्तिक अनुभूतियों का पर्याप्त योग रहता है। इसलिये कलास्वादन के लिये कलाकृति के वैशिष्ट्य के अनुसार सामाजिक में तदनुकूल नैतिक आस्थाओं, संस्कारों, स्मृतियों और अनुभूतियों का भी होना अपेक्षित है। इसी शती के सौन्दर्यशास्त्री फ्रांसिस जे-कालेमन ने अपने द्वारा सम्पादित ग्रन्थ 'Contemporary Studies in Aesthetics' (१९६८ ई०) में विवेच्य विषय पर विस्तार से विचार करने के अनन्तर सौन्दर्य-बोध या कला-संवेदन के लिए प्रमाता में निम्नांकित गुणों को आवश्यक सिद्ध किया है।२ (क) उसकी इन्द्रियाँ स्वस्थ एवं निर्दोष हों अन्यथा वह चित्र के रंगों, संगीत के स्वरों आदि का सम्यक् बोध प्राप्त नहीं कर सकेगा।

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(ख) उसे कलाकार के माध्यम की शक्तियों व सीमाओं का ज्ञान होना चाहिए। (ग) उसे विभिन्न कला-संप्रदायों एवं प्रवृत्तियों के इतिहास एवं पूर्व परम्प- राओं का भी ज्ञान होना चाहिए जिससे वह विशिष्ट कलाकृति की मौलिकता, नूतनता या रीति-रूढ़ि को हृदयंगम कर सके। (घ) उसे उस सांस्कृतिक वातावरण का भी बोध होना चाहिए जिसमें कला- कृति की सर्जना हुई हो। (ङ.) उसकी विभिन्न प्रकार की कला-कृतियों के सम्बन्ध में पहले से ही कोई बँधी-बँधाई हुई रुचि या अरुचि नहीं होनी चाहिए। (च) वह किसी ऐसे सिद्धान्त या सम्प्रदाय से बँधा हुआ (प्रतिबद्ध) न हो कि जिसके प्रभाव से उसकी कलानुभूति के स्वरूप या आस्वाद में अन्तर पड़ जाय। (छ) उसकी कोई विशेष आयु-सीमा न हो, कलाकृति की अपेक्षा के अनुसार वह बचपन, युवावस्था एवं वृद्धावस्था-सभी की अनुभूतियों को हृदयंगम कर सकने योग्य हो। (ज) वह शान्त किन्तु संवेदनशील स्वभाव का हो ; बहुत चंचल या उत्ते- जित हो जानेवाला या कभी भी उत्तेजित न होने वाला न हो। उपयुक्त विशेषताओं को संक्षेप में इन आठ गुणों के अन्तर्गत परिगणित किया जा सकता है- (१) स्वस्थ एवं निर्दोष ऐन्द्रियक क्षमता। (२) कलामाध्यम का ज्ञान। (३) कला के इतिहास का ज्ञान (४) कलाकृति के सांस्कृतिक वातावरण का बोव (५) पूर्व विकसित रुचि-अरुचि। (६) प्रतिबद्ध न होना। (७) आयु-सीमा से मुक्त और (८) शान्त एवं संवेदनशील। अस्तु, विभिन्न पाश्चात्य मतों को यहाँ निष्कर्ष रूप में प्रस्तुत किया जाता है-(१) बिम्बग्राहक कल्पना-शक्ति (२) कला-माध्यम को समभने की शक्ति। (३) आत्म-विस्मृति (४) स्वार्थशून्यता (५) रुचि की अनुकूलता। (६) नैतिक आस्थाओं की अनुकूलता। (७) पूर्ववर्ती संस्कार (८) वैयक्तिक स्मृतियाँ (९) वैय- क्तिक पूर्ववर्ती अनुभूतियाँ (१०) कला के इतिहास का ज्ञान। (११) सम्बन्धित सांस्कृतिक वातावरण का बोध (१२) अप्रतिबद्धता। (१३) आयु-सीमा से मुक्त (१४) शान्त एवं (१५) संवेदनशील स्वभाव। यहाँ कुछ मतों को, जो एक ही आशय के सूचक थे, समन्वित रूप में प्रस्तुत किया गया है। · भारतीय आचार्यों के मत- जैसा कि हमने प्रारम्भ में संकेत किया था कि अनेक भारतीय रसवादी आचार्यों ने भी रसानुभूति के प्रसंग में सामाजिक की योग्यताओं पर विचार किया

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है। सर्वप्रथम आचार्य भरत ने सामाजिक के लिये इन गुणों को आवश्यक माना है -(१) कला और साहित्य का सामान्य ज्ञान (२) सौन्दर्यवद्ध क साधनों का ज्ञान (३) मानस तथा शारीरिक अवस्थाओं का परिचय, (४) विभिन्न भाषाओं और बोलियों का ज्ञान, (५) एकाग्रता की क्षमता, (६) तीव्र ग्राहिका शक्ति, (७) निर- पेक्ष बुद्धि, (८) चरित्र तथा संस्कार, (९) अभिनीत वस्तु के प्रति रुचि, (१०) तन्म- यता की शक्ति। आचार्य भरत ने मुख्यतः नाट्यकला की दृष्टि से ही इन गुणों की चर्चा की है। अतः इनमें कुछ ऐसे गुणों का भी समावेश हो गया है जिनकी अपेक्षा अन्य कलाओं के आस्वादन में नहीं है। इस दृष्टि से उपयुक्त सूची में से तीसरे और चौथे गुण को छोड़ा जा सकता है। शेष गुण सामान्य रूप में सभी कलाओं के लिये आवश्यक माने जा सकते हैं। आचार्य आनन्दवद्ध न ने मुख्यतः सहृदयता एवं प्रतिभा को ही सामाजिक के लिये आवश्यक माना है। भोजराज ने प्रतिभा एवं संस्कारों के अतिरिक्त सामाजिक के सात्विक अहंकार पर विशेष बल दिया। उनके विचारानुसार आत्मस्थित अहंकार ही व्यक्ति की ऐसी शक्ति है जिसके बल पर वह रसास्वादन प्राप्त करता है। इस अहंकार का आधार पूर्वजन्म की वासनाओं और संस्कारों को माना गया है। आचार्य अभिनवगुप्त ने भी इस सम्बन्ध में विचार करते हुए मुख्यतः पाठक या सामाजिक की वासना को विशेष महत्त्व प्रदान किया है। उन्होंने प्रतिपादित किया है कि सभी सामाजिकों के मन में सामान्यतः एक जैसी वासना होती है जो अना- दिकाल से प्राप्त संस्कारों से चित्रित या प्रभावित होती है। इसी के कारण हम काव्यगत भावों का आस्वाद करते हैं। यदि हम वासनाशून्य होते तो काव्यास्वाद सम्भव नहीं था। इसके अतिरिक्त कलास्वाद के विभिन्न विध्नों का निरूपण करते समय भी उन्होंने एक विध्न प्रमाता का 'निजसुख-दुःखादि विवंशीभाव' अर्थात् उसका अपने सुख-दुःख से अत्यधिक अभिभूत होना भी माना है; अतः कहा जा सकता है कि कलानुभूति की प्राप्ति के लिए प्रमाता का निजी भावों से अभिभूत न होना या शान्त होना भी अपेक्षित है। आधुनिक युग के अनेक आचार्यों ने इस प्रश्न पर गौण रूप में ही विचार किया है। सामान्यतः आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने सामाजिक की बिम्ब-ग्राहिका कल्पना- शक्ति को ही विशेष महत्त्व दिया है जो पाश्चात्य प्रभाव का सूचक है क्योंकि पूर्ववर्ती भारतीय आचार्यों ने तो प्रायः कल्पना के स्थान पर प्रतिभा एवं सहृदयता का ही उल्लेख किया है। डॉ० नगेन्द्र ने मानव-चेतना में व्याप्त एकता को सामाजिक की रसानुभूति का मूल आधार मानते हुए लिखा है-'मानव-मानव के हृदय में चेतना का एक ऐसा तार अनुस्यूत है जो एक स्थान पर भी स्पर्शपाकर समग्रतः झंकृत हो

३. नाट्यशास्त्र ; अध्याय २७ ; रस सिद्धान्त : स्वरूप-विश्लेषण ; पृ० १७६

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१९८ रस-सिद्धान्त का पुन्विवेचन

जाता है।' इसी मानव-हृदय की चेतना को दूसरे शब्दों में 'संवेदनशीलता' भी कह दिया जाय तो अनुचित न होगा। अन्त में भारतीय मतों को निष्कर्ष रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-(१) प्रतिभा (२) सहृदयता (३) कला और साहित्य का ज्ञान (४) सौंदर्य वद्ध क साधनों का ज्ञान (५) एकाग्रता की क्षमता (६) ग्राहिका शक्ति (७) निरपेक्ष बुद्धि (८) चरित्र तथा संस्कार (९) रुचि (१०) तन्मयता (११) सात्त्विक अहंकार (१२) वासना (१३) शान्तमन (१४) कल्पना शक्ति (१५) संवेदनशीलता । • तुलनात्मक अध्ययन एवं समन्वय यदि पूर्वोक्त पाश्चात्य एवं भारतीय निष्कर्षों पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार किया जाय तो उनमें गहरा साम्य परिलक्षित होगा। इसे स्पष्ट करने के लिए दोनों पक्षों के निष्कर्षों को यहाँ तालिका रूप में प्रस्तुत किया जाता है :

पाश्चात्य मत भारतीय मत

(१) बिम्बग्राहक कल्पना-शक्ति =प्रतिभा, ग्राहिकाशक्ति, कल्पना-शक्ति। (२) कला-माध्यम को समझने की =सौन्दर्यवद्ध क साधनों का ज्ञान। क्षमता (३) आत्म-विस्मृति का गुण = एकाग्रता की क्षमता, तन्मयता का गुण (४) स्वार्थ-शून्यता =निरपेक्ष बुद्धि। (५) नैतिक आस्थाएँ। (६) पूर्ववर्ती संस्कार =चरित्र तथा संस्कार।

(७) रुचि की अनुकूलता =रुचि (८) वैयक्तिक स्मृतियाँ व (९) पूर्ववर्ती अनुभूतियाँ] =वासना ?

(१०) कला के इतिहास का ज्ञान =कला और साहित्य का ज्ञान। (११) अप्रतिबद्धता =निरपेक्ष बुद्धि (१२) सांस्कृतिक वातावरण का बोध = X (१३) आयु-सीमा के प्रभाव से मुक्ति = X (१४) शान्त स्वभाव =शान्तमन (१५) संवेदनशील स्वभाव =सहृदयता, संवेदनशीलता। (१६) X =सात्त्विक अहंकार ।

उपयुक्त मतों में क्रमशः ८, ९, १२, १३ एवं १६ को छोड़कर शेष तो दोनों पक्षों में समान ही है। आठवें और नवें में वैयक्तिक स्मृतियों व पूर्ववर्ती अनुभूतियों का उल्लेख है, जिनके समानान्तर वासना को स्थान दिया जा सकता है या नहीं- यह विचारणीय है। हमारे विचार में वासना अन्तश्चेतन या अचेतन मन की प्रवृत्ति है

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तो पूर्ववर्ती स्मृतियाँ व अनुभूतियाँ भी उपचेतन एवं अचेतन मन में वासना की ही अंग बन कर स्थित रहती हैं। इसी वासना को मनोविज्ञान में 'सहज प्रवृत्ति' (Insti- nct) व मनोविश्लेषण में 'अचेतन मन की शक्ति' के रूप में स्वीकार करते हुए उसका अतीत की स्मृतियों, अनुभवों, अनुभूतियों, कुण्ठाओं ग्रन्थियों आदि से गहरा सम्बन्ध माना गया है ; अतः 'वासना' अपेक्षाकृत अधिक व्यापक रूप की सूचक है, जिसमें आठवें-नवें मन का समाहार सहज ही हो जाता है। शेष मत-सांस्कृतिक वातावरण का बोध, आयु-सीमा के प्रभाव से मुक्ति एवं सात्त्विक अहंकार भी गौण रूप में स्वीकार्य कहे जा सकते हैं। अस्तु, हमारे विचार में उपयुक्त्त सभी क्षमताओं एवं गुणों को कलाकृति के वैशिष्ट्य के अनुसार सामाजिक में आवश्यक माना जा सकता है, यह दूसरी बात है कि संदर्भ-विशेष में किसी का महत्त्व अधिक और किसी का न्यून भी सिद्ध हो सकता है। पाश्चात्य एवं भारतीय आचार्यों का इस प्रसंग में मतक्य अवश्य ही महत्त्वपूर्ण है जो अप्रत्यक्ष में रस-सिद्धान्त की महत्ता एवं सार्वदेशिकता का परिचायक है।

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चतुर्थ खंड रस-सिद्धान्त का मनोवैज्ञानिक विवेचन

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१ मनोविज्ञान : सामान्य परिचय

रस-सिद्धान्त का मनोवैज्ञानिक अध्ययन करने के लिए सर्वप्रथम हमें मनोविज्ञान का सामान्य परिचय प्राप्त कर लेना चाहिए। हिन्दी में 'मनोविज्ञान' शब्द का प्रयोग सामान्यतः अँग्रेजी के 'साइकालॉजी (psychology) के पयार्यवाची के रूप में किया जाता है तथा यह प्रायः उन्हीं अर्थों को सूचित करता है जो 'साइकालॉजी' में निहित है। 'psychology' शब्द 'psyche' (साइक अर्थात् आत्मा) एवं 'logas' (लोगस अर्थात् विज्ञान या विचार-विमर्श) के योग से बना है, अतः इस दृष्टि से वह 'आत्मा का विज्ञान' या आत्मा सम्बन्धी विज्ञान का द्योतक सिद्ध होता है किन्तु आधुनिक युग में इसका यह अर्थ प्रचलित नहीं है। प्राचीन युग में यूनानी आचार्यों ने अवश्य ही इसे 'आत्मा का विज्ञान' माना था, किन्तु अब तो आत्मा का अस्तित्व ही लुप्त हो गया है-विशेषतः विज्ञान के क्षेत्र में 'आत्मा' शब्द निरर्थक है; ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक ही था कि 'psychology' शब्द का भी अर्थ परिवर्तित हो गया है। अब इसे सामान्यतः मन, चेतना और व्यवहार से ही सम्बन्धित विज्ञान माना जाता है।

१. यहाँ उद्धृत परिभाषा निम्नांकित ग्रन्थों के आधार पर प्रस्तुत की गयी हैं- (1) An out-line of psychology : William Mcdougall (2) Psychology : R. S. woodworth & D. G. marquis. (3) An Introduction to Social Psychology : Mcdougall (4) Emotions in man and animal : P. T. young. (5) General Psychology : H. E. Garrett. (6) मनोविज्ञान-डॉ० जदुनाथ सिन्हा (हिन्दी अनुवाद) (7) सामान्य मनोविज्ञान-डॉ० एस० एस० माथुर। (8) सामान्य मनोविज्ञान-रामबाबू गुप्त

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२०४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

• मनोविज्ञान : स्वरूप-विवेचन 'मनोविज्ञान' के स्वरूप को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न विद्वानों ने इसकी विभिन्न परिभाषाएँ भी प्रस्तुत की हैं, जिनमें से कतिपय यहाँ विचारणीय हैं- (क) प्लेटो-'मनोविज्ञान आत्मा का विज्ञान है।' (ख) जेम्स-'मनोविज्ञान की सर्वोत्तम परिभाषा यह .दी जा सकती है कि ........ वह चेतना की स्थिति या अवस्था की व्याख्या एवं विवेचना प्रस्तुत करने वाला' विज्ञान है। (ग) मैक्डूगल-'मनोविज्ञान मानव-मन (मस्तिष्क) का विज्ञान है- इस परिभाषा को यथातथ्य बनाने के लिए इसके साथ दो शब्द -'विधेयात्मक' एवं 'बौद्धिक'-और जोड़े जा सकते हैं। (घ) वाटसन-'मनोविज्ञान ........ व्यवहार का विज्ञान है। (ङ.) पिल्सबरी-'मनोविज्ञान की सर्वाधिक संतोषजनक परिभाषा यह की जा सकती है। कि वह मानव-व्यवहार का विज्ञान है।' (च) मुन्न-'मनोविज्ञान अनुभव एवं व्यवहार का एक ऐसा विधायक विज्ञान है जिसकी व्याख्या अनुभव के आधार पर की जा सकती है। (छ) वुडवर्थ-'मनोविज्ञान वह विज्ञान है जो व्यक्ति के क्रिया-कलापों का अध्ययन वातावरण के संदर्भ में करता है।' (ज) वैलेन्टाइन-'मनोविज्ञान मन का वैज्ञानिक अध्ययन करने वाला विज्ञान है जिसमें केवल बौद्धिक तत्त्वों का ही नहीं भावात्मक अनुभवों, प्ररक शक्तियों, क्रिया-कलापों एवं व्यवहार का भी अध्ययन सम्मिलित है।' (भ) जेम्स ड्रवर-'मनोविज्ञान वह विधायक विज्ञान है जो कि मनुष्य और पशु के (आन्तरिक विचारों और भावों या) मानसिक जीवन की अभिव्यक्ति के सूचक व्यवहार का अध्ययन करता है। उपयुक्त्त परिभाषाओं में यह तो प्रायः स्वीकार किया गया है कि मनोविज्ञान एक विज्ञान या विधायक (positive) विज्ञान है, किन्तु इनमें परस्पर अन्तर इस बात का है कि उसका अध्ययन-क्षेत्र या विषय क्या है? वैसे क्रमशः आत्मा, चेतना, मानव-मन, व्यवहार अनुभव, वातावरण के संदर्भ में क्रिया-कलाप, प्ररक शक्तियों, मानव और पशु के मानसिक जीवन-आदि का उल्लेख है ; जो वस्तुतः मनोविज्ञान के उत्तरोत्तर विकसित रूप एवं परिवरद्धित क्षेत्र का परिचायक है। प्रारम्भ में मनोविज्ञान का अध्ययन-क्षेत्र आत्मा तक सीमित था, फिर उसका स्थान चेतना ने ले लिया है, और तदनन्तर चेतना के साथ मन, व्यवहार, अनुभूतियाँ