Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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४ रसानुभूति का कलागत त्र्राधार

सौन्दर्यानुभूति (Aesthetic Experience) या रसानुभूति का कलागत आधार क्या है-अर्थात् कला-कृति में वह विशिष्ट तत्त्व क्या है ; जिसके कारण सामाजिक को कला से सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति प्राप्त होती है-इस प्रश्न पर पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्रियों एवं भारतीय रस-विवेचकों ने गंभीरता से विचार किया है। पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्र की दृष्टि से इस प्रश्न का सामान्य उत्तर तो यही है कि कला में कलात्मकता या सौन्दर्य के कारण ही प्रमाता को कलानुभूति या सौन्दर्यानु- भूति प्राप्त होती है, किन्तु फिर एक अन्य प्रश्न उपस्थित होता है कि कलात्मकता या कलागत सौन्दर्य क्या है ? इस प्रश्न के उत्तर में शताधिक विद्वानों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से विभिन्न तत्त्वों एवं सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया है-जिनका संक्षिप्त विवरण हम प्रस्तुत खंड के प्रथम अध्याय में ही प्रस्तुत कर चुके हैं। वस्तुतः समूचा सौन्दर्य-शास्त्र ही इस प्रश्न को लेकर स्थापित एवं विकसित हुआ है, किन्तु इसका कोई सर्वमान्य उत्तर अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है। अतः यहाँ तत्सम्बन्धी सभी मतों एवं सिद्धान्तों का विवेचन-विश्लेषण करना तो संभव नहीं, किन्तु पाश्चात्य भाववादी एवं भारतीय रसवादी वर्ग के विद्वानों के तद्विषयक विचारों का अनुशीलन अवश्य यहाँ तुलनात्मक रूप में प्रस्तुत किया जायगा जिससे कलागत आधार के सम्बन्ध में उनका दृष्टिकोण स्पष्ट हो सके। • पाश्चात्य भाववादी विद्वानों के मत प्रस्तुत विषय पर पाश्चात्य भाववादी सौन्दर्य-शास्त्रियों का सामान्य मत तो यही है कि भाव तत्त्व ही कला का वह प्रमुख तत्त्व या गुण है जिसके कारण पाठक या सामाजिक को सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति प्राप्त होती है ; किन्तु इस

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भाव तत्त्व का स्वरूप क्या है ; इसे किस रूप में प्रस्तुत किया जाय तथा इसके साथ और किन-किन गुणों, तत्त्वों एवं विधि-विधानों की अपेक्षा है-इन प्रश्नों को लेकर इनमें भी परस्पर मत-भेद है, जिस पर यहाँ विचार किया जा सकता है। जैसा कि प्रस्तुत प्रबन्ध में अन्यत्र स्पष्ट किया जा चुका है ;१ स्थूल रूप में इन सभी भाववादियों को चार वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-(१) भावोद्दी- प्तिवादी (२) भावावलम्बनवादी (३) भाव-संप्रषणवादी और (४) भावाभिव्यक्ति- वादी। ये चारों ही वाद कला में भाव तत्त्व की प्रमुखता को स्वीकार करते हुए भी उसकी स्थिति एवं प्रक्रिया के बारे में एकमत नहीं हैं। भावोद्दीप्तिवादियों के अनुसार कला वस्तु का संयोजन इस प्रकार होना चाहिए कि उससे प्रमाता के भाव उद्दीप्त हो जाएँ, जबकि भावावलम्बनवादी इसी से संतुष्ट नहीं हैं, उनके विचार से स्वयं कला में भी भावों का प्रस्तुतीकरण या चित्रण अपेक्षित है क्योंकि भावोद्दीप्ति तो केवल स्थूल घटनाओं एवं तथ्यों के प्रस्तुतीकरण से भी सम्भव है। भावाभि- व्यक्तिवादी इनसे भी आगे हैं ; इनके विचारानुसार केवल भावोद्दीप्तिी एवं भावों का चित्रण ही कला के लिए पर्याप्त नहीं है, अपितु स्वयं कलाकार को स्वानुभूति के आधार पर ही अपने भावों की अभिव्यंजना कला के माध्यम से प्रस्तुत करनी चाहिए ; किन्तु भाव-प्रषणवादी भावाभिव्यक्ति के अनन्तर उनका सामाजिक तक प्रेषण या संप्रेषण होना भी आवश्यक मानते हैं। इस प्रकार इन चारों वर्गों के अनुसार क्रमशः कला के आधारभूत गुण ये हैं-(१) भावोद्दीपन की क्षमता (२) भाव का चित्रण (३) भावाभिव्यक्ति और (४) भाव-प्रेषण। उपयुक्त गुणों या तत्त्वों के अतिरिक्त भी कुछ अन्य तत्त्वों का निर्देश विभिन्न चिन्तकों द्वारा हुआ है। सत्रहवीं शती के प्रसिद्ध फ्रेंच विद्वान् ल बस्सु (Le Bossu) के अनुसार भावावेग कला के लिए आवश्यक है किन्तु सभी भाव सभी प्रकार की कृतियों के लिए उपयुक्त सिद्ध नहीं होते।१ कला-कृति की प्रकृति के अनुसार ही भावों का आयोजन होना चाहिए ; उदाहरण के लिए-जहाँ कामदी में हर्ष एवं विस्मय सम्बन्धी भावों की बहुलता रहेगी वहाँ त्रासदी में भय एवं करुणा की प्रधानता अपेक्षित है। साथ ही विभिन्न महाकाव्यों में नायक की प्रकृति का भी ध्यान रखा जाना आवश्यक है।4 यथा-'इलियड' का नायक शूरवीर योद्धा है, अतः उसमें रौद्र एवं भय सम्बन्धी भावों की प्रमुखता है जबकि 'एनीड' का नायक कोमल प्रकृति का व्यक्ति है, अतः उसमें उसी के अनुरूप कोमल एवं मधुर भावों का आयोजन

१. द्रष्टव्य-प्रस्तुत प्रबन्ध के द्वितीय खंड में 'रस-सिद्धान्त की पाश्चात्य परम्परा' शीर्षक भाग। २. इन सभी वादों का विस्तृत परिचय पीछे द्वितीय खंड में दिया जा जुका है। ३-५, 'ए हिस्ट्री आफ् ईस्थटिक्स'; गिल्बर्ट एवं कुहन ; पृ० स० २२३-२५

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हुआ है। इसके अतिरिक्त कलागत भाव में दो विशेषताएँ और अपेक्षित हैं-एक तो वे श्रोता को स्वीकार्य या ग्राह्य होने चाहिए ; दूसरे उनकी पाठक को अनुभूति भी होनी चाहिए ; इन दोनों लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उन्हें एक तो सहज रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए और दूसरे उन्हें स्पष्ट एवं असंदिग्धरूप में चित्रित किया जाना चाहिए उनके साथ ऐसे तत्वों का मिश्रण नहीं करना चाहिए कि जिससे वे अस्पष्ट एवं संदिग्ध हो जाएँ।4 इस प्रकार ल-बस्सु के अनुसार कलागत भाव में निम्नांकित विशेषताएँ अपेक्षित हैं- • कला-कृति के प्रकृति एवं लक्ष्य के अनुरूप भावों का चित्रण होना चाहिये ; जसे-कामदी में हर्ष व विस्मय सम्बन्धी तथा त्रासदी में भय और करुणा सम्बन्धी भाव का चित्रण अपेक्षित है। · काव्य में (विशेषतः महाकाव्य में) उसके नायक की प्रकृति (स्थिर भावना) के अनुसार ही भावों का चित्रण अपेक्षित है। • चित्रित भाव में सहजता एवं स्पष्टता अपेक्षित है। जिससे कि वे सामाजिक को ग्राह्य एवं अनुभूत हो सकें। अठारहवीं शती के प्रसिद्ध चिन्तक बर्क (Burke) ने नाटक एवं काव्य में भावों के प्रस्तुतीकरण को ही रसानुभूति का मूलाधार मानते हुए प्रतिपादित किया कि काव्य में भावों का प्रस्तुतीकरण शब्दों के माध्यम से होता है। ये शब्द भी तीन प्रकार के माने गये हैं-(१) पूर्णवाची शब्द ; जैसे 'मनुष्य' 'घोड़ा' आदि। (२) सरल भाववाचक शब्द-'लाल' 'गोल' आदि। (३) मिश्रित भाव वाचक शब्द-प्रेम, भय, सत्य आदि। बर्क के मतानुसार इनमें से प्रथम दो प्रकार के शब्द तो क्रमशः ध्वनि के बोध एवं बिम्ब-ग्रहण के बाद ही श्रोता में भाव उद्दीप्त कर सकते हैं जबकि तृतीय प्रकार-मिश्रित भाव वाचक-के शब्द ध्वनि-बोध के अनन्तर सीधे ही प्रमाता को भावों का बोध प्रदान कर देते हैं, उनमें मध्यवर्ती बिम्ब- बोध की प्रक्रिया अपेक्षित नहीं रहती, अस्तु वे तृतीय प्रकार की शब्दावली को अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। जैसा कि बर्क के मत की समीक्षा करते हुए हम अन्यत्र स्पष्ट कर चुके हैं ; भावात्मक या भाववाचक शब्दों का उल्लेख काव्य में भावात्मक बोध प्रदान करने की दृष्टि से प्रायः प्रभाव-शून्य ही सिद्ध होता है क्योंकि किसी भी भाव के बोध में पूर्व उसका बिम्ब-ग्रहण प्रायः आवश्यक माना जाता है तथा इसलिए रस-सैद्धान्तिक

६. 'ए हिस्ट्री आफ ईस्थैटिक्स' : गिल्बर्ट एवं कुहन ; पृ० सं० २२४ ७-९ 'वैस्टर्न ईस्थैटिक्स' : डॉ० कान्तिचन्द्र पांडेय ; पृ० स० २७२-४

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आचार्यों ने भाववाचक शब्दों के प्रयोग को 'स्वशब्द वाच्यत्व' नामक दोष माना है -अतः हमारे विचार से बर्क की उपयुक्त्त धारणा भ्रामक है। उसमें तथ्य इतना ही है कि श्रोता को शब्दों के ध्वनि-बोध के बाद बिम्ब-ग्रहण होता है तथा उसीकी प्रक्रिया से उसका भावद्वलन होता है। अस्तु, उनके मत को आंशिक एवं संशोधित रूप में स्वीकार करते हुए कहा जा सकता है कि कला में ऐसे शब्दों (या भाषा शैली) के माध्यम से भावों का प्रस्तुतीकरण होना चाहिए कि जिससे सामाजिक के भाव उद्दीप्त हो सकें। सुप्रसिद्ध जर्मन विद्वान् हरमन लात्ज (Hermann Lotze) ने प्रतिपादित किया कि कला की वह शक्ति जिसके कारण सौन्दर्यानुभूति प्राप्त होती है, निश्चय ही भावानुभूति की शक्ति ही है।१ इस सृष्टि में वास्तविक सौन्दर्य चेतना के द्वारा आस्वाद्य भाव' के अतिरिक्त और कोई नहीं है। उन्होंने कलागत भाव को 'सौन्दर्या- त्मक भाव' की संज्ञा देते हुए उसकी प्रेषणीयता के तीन स्तरों का निर्धारण किया है -(१) ऐन्द्रियक (२) आत्मिक एवं (३) बौद्धिक या चेतनात्मक। उच्चकोटि का 'सौन्दर्यात्मक भाव' वह है जिसमें ये तीनों स्तर परस्पर घुलमिल कर निमज्जित हो जाएँ।"१ दूसरे शब्दों में, लात्ज महोदय के अनुसार कलागत भाव में-जिसे सौन्दर्या- त्मक भाव भी कहा जा सकता है-ऐन्द्रियानुकूलता, बौद्धिक उच्चता एवं आत्मिक अभ्युत्थान के गुण भी अपेक्षित हैं, जिससे कि वह मानव-चेतना को उपयुक्त तीनों पक्षों को प्रभावित करता हुआ, सच्ची सौन्दर्यानुभूति प्रदान करने में समर्थ हो सके।१२ यद्यपि लात्ज महोदय का मानव-चेतना के विभिन्न पक्षों से सम्बन्धित उपयुक्त्त वर्गीकरण समीचीन प्रतीत नहीं होता, फिर भी यह स्वीकार किया जा सकता है कि कलागत भाव में ऐसी विशेषता होनी चाहिए कि वह मानव-चेतना के ऐन्द्रियक, भावात्मक, बौद्धिक आदि विभिन्न पक्षों को प्रभावित, उद्वलित एवं समन्वित कर सके।

टालस्टाय ने कला का एक मात्र लक्षण भाव-प्रेषण को मानते हुए उन गुणों का विश्लेषण किया जिनके कारण कलागत भाव प्रेषणीय होकर रसानुभूति प्रदान करता है। उनके विचारानुसार वे गुण तीन हैं-(१) वैयक्तिकता (२) स्पष्टता एवं (३) सत्यता। उन्होंने इनकी व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया है कि जब कलाकार द्वारा व्यक्त भाव वैयक्तिक अनुभूति पर आधारित, स्पष्ट एवं सत्य (स्वा- भाविक, सहज एवं यथार्थ रूप में चित्रित होगा तभी वह सामाजिक को प्रेषित हो सकेगा-अतः कलागत भाव में ये गुण आवश्यक है।१ साथ ही उन्होंने इस बात पर भी बल दिया कि कला में व्यापक एवं उदात्त भावों को ही प्राथमिकता दी जानी

१०-१२ 'ए हिस्ट्री आफ् ईस्थैटिक्स' : गिल्बर्ट-कुहन ; पृ० सं० ५०८-९

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चाहिए क्योंकि उनके कारण ही कलानुभूति में व्यापकता, उच्चता एवं सार्वज- नीनता आती है।१४ बीसवीं शती के प्रमुख भाववादी सौन्दर्य चिन्तकों में जार्ज सैंतायना, ई० एफ कैरिट्ट, आर० जी० कारलिंगवुड प्रभृति का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके कला सम्बन्धी विचारों का सामान्य परिचय अन्यत्र दिया जा चुका है-यहाँ सौन्दर्या- नुभूति या रसानुभूति के कलागत आधार के संदर्भ में ही इनकी धारणाओं पर विशेष रूप से विचार किया जाता है। सैंतायना ने अपनी कृति 'दी सेन्स आफ ब्यूटी' में सौन्दर्यानुभूति का मूल आधार कलाजन्य भावोद्दीप्ति को मानते हुए उन तत्त्वों का भी विश्लेषण किया है जो कला में सौन्दर्य की सृष्टि करते हैं या कलात्मक भावों को उद्दीप्त करते हैं। इन तत्त्वों को उन्होंने अनेक वर्गों में विभक्त किया है; यथा- ऐन्द्रियक तत्त्व, भावात्मक तत्त्व, सामाजिक तत्त्व, बौद्धिक तत्त्व, एवं रूपात्मक तत्त्व।१५ सर्वप्रथम कला में ऐन्द्रियक तत्त्व आपेक्षित हैं जो हमारी स्पर्श, घ्राण, नेत्र आदि इन्द्रियों को उद्दीप्त करते हुए सुखद प्रभाव उत्पन्न करते हैं। किसी विषय वस्तु के मूल उप- करणों का हमारी इन्द्रियों पर जितना गहरा प्रभाव पड़ेगा, उनसे प्राप्त सौन्दर्यानुभूति भी उतनी ही महान् एवं विशद कही जा सकती है ; किन्तु ऐन्द्रियक तत्त्वों की भी एक सीमा है। कला का समस्त सौन्दर्य ऐन्द्रियक प्रभाव पर ही आधारित नहीं रहता। ऐन्द्रियक तत्त्वों के अनन्तर दूसरा वर्ग भावात्मक तत्त्वों का है ; कहना न होगा कि इनमें सबसे अधिक शक्तिशाली भाव रति या प्रेम है, जिसे भारतीय आचार्यों ने भी 'रसराज' कहा है। सैतायना ने इसकी प्रशंसा में कहा है-"यदि किसी भी विषय-वस्तु को निश्चित रूप से सौन्दर्य प्रदान करना है तो उसके लिए काम या प्रेम से बढ़कर कोई और साधन संभव नहीं। .... संसार को गंभीरतम विचार और सर्वोत्तम सौन्दर्य से परिपूर्ण करने के लिए इससे बढ़कर साधन कोई और क्या हो सकता है ! इसका प्रभाव अत्यन्त शक्तिशाली एवं गंभीर होता है। वह आत्मा की गहराई तक पहुँच जाता है। उसके गुप्त रहस्य बाहर फूट पड़ते हैं। हृदय और कल्पना के सारे स्रोत एकाएक खुलकर प्रवाहित होने लगते हैं !"६ किन्तु उनके विचार से काम या प्रेम को केवल यौन सम्बन्धों के चित्रण तक ही सीमित नहीं कर देना चाहिए। य द्यपि यौन भावना से इसे सर्वथा असंपृक्त नहीं किया जासकता किन्तु व्यापक परिप्रक्ष्य देकर इसे जीवन के अन्य गंभीर भावों की ओर भी अभिमुख किया जा सकता है। धार्मिक भक्ति भावना, विश्वबंधुत्व की भावना, करुणा, वात्सल्य, स्नेह, प्रकृति-प्रेम आदि प्रणय भाव के ही विभिन्न उदात्त रूपों के सूचक हैं।१७

१३-१४ 'व्हाट इज ए आर्ट' : टालस्टाय १५-१७ 'दी सेन्स आफ ब्यूटी' : जार्ज सैतायना ; पृ० सं० ४२-७०

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सैंतायना ने प्रणय भाव के अतिरिक्त करुण और हास्य को भी कलागत सामग्री में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। करुण का सम्बन्ध मुख्यतः त्रासदी से है जिसमें विभिन्न भाव समन्वित रहते हैं जिनके कारण हमारी कल्पना और सहानुभूति जाग्रत होती है। इसी प्रकार कामदी में प्रसन्नतादायक भावों का चित्रण होता है। इसमें कुछ बौद्धिक तत्त्व भी मिश्रित रहते हैं, जिनमें वाग्वैदग्ध्य एवं व्यंग्य उल्लेख- नीय हैं।१ कलागत सामाजिक विषयों में मैत्री, समाज-हित, देश-प्रम, अधिकार भावना आदि का उल्लेख किया जा सकता है। इनका मूलाधार भाव न होकर बुद्धि है, अतः ये विषय महत्त्वपूर्ण होते हुए भी सौन्दर्यानुभूति की दृष्टि से उपेक्षणीय ही हैं। सैतायना के अनुसार एक तो इनके आलम्बन मूत्त न होने के कारण इनका बिम्ब- ग्रहण भली-भाँति नहीं हो पाता या यों कहिए कि इनकी कल्पना सम्यक् रूप में नहीं की जा सकती। दूसरे वे बिखरे हुए से प्रत्यय रूप में ही हैं, अतः इन्हें सरलता एवं गभ्भीरता से सौन्दर्यात्मक रूप नहीं दिया जा सकता।१९ फिर भी यदि कोई कलाकार इन्हें सौन्दर्य के रूप में परिवर्तित करने में सफल हो जाय तो उनका महत्त्व स्वीकार्य होगा। बौद्धिक तत्वों का सम्बन्ध मानव-मन की जिज्ञासा प्रवृति एवं ज्ञान की प्यास से है ; इसलिए सत्य शुष्क एवं कटु होते हुए भी हमारी जिज्ञासा एवं बौद्धिक संतुष्टि का लक्ष्य बनकर सौन्दर्यात्मक वस्तु में परिणत हो जाता है। बौद्धिक तत्त्वों के भावात्मक रूपों में निर्वेद एवं मुक्ति का भाव प्रमुख है, जिसे समन्वित रूप में 'औदात्य' भी कहा जाता है।२ रूपात्मक तत्त्वों में कला के रूप एवं शैली सम्बन्धी गुण आते हैं-जसे- अनुपात, अन्विति, एक-रूपता ; अलंकरण आदि। २१ सैतायना के विचार से इन तत्त्वों का महत्व उसी सीमा तक है जहाँ तक वे अभिव्यंजना (या विभिन्न भावों की व्यंजना ?) में सहायक सिद्ध होते हैं-अतः निश्चय ही इन्हें कलावस्तु में गौण स्थान प्राप्त है। उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है कि सैंतायना के विचार से सौन्दर्यानुभूति प्रदान करने की दृष्टि से कला में निम्नांकित तत्त्व अपेक्षित हैं : (१) ऐन्द्रियक तत्त्व (२) भावात्मक तत्त्व-मुख्यतः प्रेम, करुणा, हास्य। (३) सामाजिक तत्त्व : गौण रूप में । (४) बौद्धिक तत्त्व-जिज्ञासा से सम्बन्धित निर्वेद एवं मुक्ति के भाव के रूप में ; औदात्य भाव ।

१८-२० 'दी सेन्स आफ ब्यूटी' : जार्ज सैंतायना पृ० सं० ६४-१७२

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(५) रूपात्मक तत्त्व-भावाभिव्य जना के साधन के रूप में। इनमें से उन्होंने सर्वाधिक महत्त्व भावात्मक तत्त्वों को प्रदान किया है और शेष को उन्हीं के अंग या साधन रूप में स्वीकार किया है-अर्थात् उनकी सत्ता स्वतन्त्र रूप में न होकर भावाभिव्य जना में योग देने की दृष्टि से है। ई० एफ० कैरिट्ट ने 'एन इन्ट्रोडक्शन टू ईस्थटिक्स' में सर्वप्रथम कलागत सौन्दर्य को भावाभिव्यंजना का पर्याय सिद्ध करते हुए प्रतिपादित किया है- "The beauty we ascribe to sensible objects is really their expressiveness of some feeling-of fear, of confidence, of joy in life, of longing for death, a sense for the delightful commerce of the world ...... 12 अर्थात् पूर्ण वस्तुओं में हम जिसे सौन्दर्य कहते हैं, वह वस्तुतः किसी न किसी भावानु- भूति भय, विश्वास, जीवन का उल्लास, मृत्यु की कामना, संसार के आनन्दमय क्रिया कलापों का बोध-आदि की व्य जना का ही पर्याय है। आगे चलकर उन्होंने एक ओर तो उन आक्षेपों का निराकरण किया जो भावाभिव्यक्ति सिद्धान्त के विरुद्ध प्रस्तुत किये जाते हैं ; तो दूसरी ओर उन भ्रान्तियों का भी निराकरण किया जिनके कारण सामान्यतः 'भाव की अभिव्यंजना' एवं भाव के वर्णन या उद्दीपन में अन्तर नहीं किया जाता। कैरिट्ट के मतानुसार चिह्नों संकेतों या प्रतीकों के माध्यम से भाव को प्रस्तुत करना भावाभिव्यक्ति से भिन्न हैं क्योंकि शुद्ध चिह्नों, संकेतों एवं प्रतोकों का रूपान्तरण संभव है जबकि शुद्ध अभि- व्यंजना रूपान्तरित या अनुदित नहीं हो सकती। शुद्ध भावाभिव्यक्ति के लिए एक ऐसे प्रतिभाशाली कलाकार का स्पर्श अपेक्षित है, जिसकी कलम करुणा, प्रेम घृणा आदि की सच्ची अनुभूति से प्रेरित होकर संचालित होती है।२२ प्रतिभाशाली कलाकार की भावाभिव्यक्ति में दो गुण परिलक्षित होंगे-एक कल्पना या प्रेरणा और दूसरा, शिल्प या शैली। एक व्यक्ति महान् कल्पनाशील होते हुए भी शिल्प या शैली (भाषाधिकार ?) के अभाव में भावाभिव्यक्ति करने में असफल सिद्ध हो सकता है तो दूसरी ओर कोरा शिल्पी ऐसी अनुकृतियाँ प्रस्तुत कर सकता है, जो कल्पना और भावना से शून्य हो। अतः सफल भावाभिव्यक्ति के लिए कल्पना और शिल्प का समन्वय अपेक्षित है। अस्तु, निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि कैरिट्ट महोदय के विचार से कला का प्रमुख तत्त्व तो भावाभिव्यक्ति ही है, किन्तु उसके साधक तत्त्वों में कल्पना एवं शैली को भी स्वीकार किया जाना चाहिए। आर० जी० कालिंगवुड ने अपने ग्रन्थ 'दी प्रिन्सिपल्स आफ आर्ट' में मिथ्या

२१. 'एन इन्ट्रोडक्शन टवू ईस्थैटिक्स'; पृ० सं० ५० २२. वही; पृ० सं० ६०-६२

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कला एवं सच्ची कला के भेदक लक्षणों की विस्तार से मीमांसा करने के अनन्तर 'भावाभिव्यंजनो' को ही सच्ची कला का आधारभूत गुण सिद्ध किया। भावों के उद्दीपन, चित्रण, प्रस्तुतीकरण आदि को उन्होंने भावाभिव्यंजना से पृथक मानते हुए उन्हें शुद्ध कला के लक्षणों के रूप में मान्यता नहीं दी। शुद्ध कला (Art Proper) या भावाभिव्यंजक कला में उनके विचार से दो तत्त्व अपेक्षित होते हैं- एक तो व्यंजकता (expressive) और दूसरा-कल्पनात्मकता (imaginative)।२३ सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति में व्यक्ति एक तो अपने भावों व संवेगों को व्यक्त करता है, यही तथ्य 'व्यंजकता' का सूचक है तो दूसरी ओर यह भावाभिव्यक्ति यथार्थरूप में न होकर कल्पना के स्तर पर या कल्पनात्मक प्रक्रिया द्वारा होती है- इसी को कल्पनात्मकता माना गया है। इसका अर्थ यह है कि कला-सर्जन के समय कलाकार वास्तविक जीवन के यथार्थ भावों की अभिव्यक्ति नहीं करता अपितु उनकी अनुभूति को, भले ही वह कभी यथार्थ रही हो, कल्पना के द्वारा प्रस्तुत करता है। जीवन के वास्तविक शोक, भय, प्रेम, विस्मय हास्य आदि के समय तो हम अनुभूति से इतने संकुलित हो जाते हैं कि उनकी अभिव्यंजना संभव ही नहीं, अतः उस समय तो कलात्मक सर्जन की संभावना ही स्वीकार नहीं की जा सकती। यहाँ कालिंगवुड का आदर्श वर्ड सवर्थ की वह पंक्ति है, जिसके कारण अतीत की अनुभूतियों का शान्त क्षणों में पुनराख्यान ही कविता है किन्तु प्रत्येक व्यक्ति अतीत की अनुभूतियों का पुनाख्यान करने में समर्थ नहीं होता क्योंकि इसके लिए सर्जनात्मक कल्पना की अपेक्षा होती है। सामान्य व्यक्ति अतीत की अनुभूतियों का स्मृत रूप ही प्रस्तुत कर पाता है, उनका कल्पना द्वारा पुनर्निर्मित रूप प्रस्तुत नहीं कर पाता जबकि कला के लिए या पूर्ण भावाभिव्यंजकता के लिए यह आवश्यक है। अतः व्यंजकता एवं कल्पना भावाभिव्यंजना के दो अनिवार्य तत्व हैं। क्या कला में अभिव्यक्त भाव सामान्य लौकिक भाव ही होता है या कोई विशेष प्रकार का असामान्य, अलौकिक या व्यावहारिक जगत के भावों से भिन्न प्रकार का भाव होता है-यह प्रश्न भी सौन्दर्य-शास्त्रियों में विवाद का विषय रहा है। अनेक सौन्दर्य-शास्त्रियों ने कलागत भाव को 'सौन्दर्यात्मक भाव' (Aesthetic emotion) की संज्ञा देते हुए उसे सामान्य जीवन के भावों से भिन्न कोटि का माना है। कालिंगवुड ने इस पर भी विचार करते हुए स्पष्ट किया है कि सौन्दर्या- त्मक भाव की परम्परागत धारणा, जिसके अनुसार वह अलौकिक प्रकार का भाव है, अस्वीकार्य है किन्तु एक अन्य रूप में उसकी सत्ता मान्य है। एक अव्यक्त भाव में एक विशेष प्रकार की यंत्रणा रहती है किन्तु जब वही भाव व्यक्त हो जाता है तो वह यंत्रणा से मुक्त होकर सौन्दर्या्मिक भाव में परिणत हो जाता है, अर्थात्

२३. 'दी प्रिन्सिपल्स आफ आर्ट; आर० जी० कारलिंगवुड; पृ० सं० २७३

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उसमें यंत्रणा के दंश के स्थान पर संतुष्टि व विश्रान्ति से युक्त आह लादपूर्ण अनुभूति मिश्रित हो जाती है-अतः हम चाहें तो इसे विशिष्ट प्रकार का भाव मान सकते हैं, पर यह ध्यान में रहना चाहिए कि इसका वैशिष्ट्य अभिव्यंजना के बाद की ही स्थिति का सूचक है, उससे पूर्व तो-अव्यक्त रूप में तो-वह सामान्य लौकिक भाव ही होता है।२४ 'सौन्द्य त्मिक भाव' का यह विवेचन भारतीय 'रस-तत्व' के अनुरूप हैं; स्थायी भाव की व्यंजना ही 'रस' है; व्यंजना से पूर्व स्थायी भाव एक सामान्य लौकिक भाव ही होता है-यही बात यहाँ 'सौन्दर्यात्मक भाव' के सम्बन्ध में कही गयी है। कालिंगवुड ने इस पर भी विचार किया है कि पूर्वोक्त सौन्दर्यात्मक भाव में लौकिक भावों से पार्थक्य सूचक जिस विशिष्टता का प्रादुर्भाव होता है, उसका मूल कारण क्या है ? इसके उत्तर में उनका मत है कि कल्पनात्मक अनुभूति के कारण ही सामान्य भाव उस परिष्कृत या संस्कारित भाव में परिणत हो जाता है, जिसे 'सौन्दर्यात्मक भाव' कहा गया है।२५ कला में बौद्धिक तत्वों को स्थान मिलना चाहिए या नहीं-इसके सम्बन्ध में उनका विचार है कि प्रत्येक कलाकृति में भावाभिव्यंजना के साथ-साथ बौद्धिक तत्व भी मिश्रित या समन्वित रूप में विद्यमान रहते हैं, जिन्हें 'बौद्धिक भावों' का भी नाम दिया जा सकता है।२६ कवि अन्ततः मानवीय संवेदनाओं की ही अभिव्यक्ति करता है तथा उस अभिव्यक्ति में से वह बौद्धिक तत्त्वों को अलग नहीं कर देता- अतः जिस सीमा तक उसकी संवेदना में बौद्धिक तत्त्वों की अनुभूति होगी, उस सीमा तक उसकी अभिव्यंजना में भी बौद्धिक तत्त्वों का स्थान रहेगा।२७ इतना अवश्य है कि सभी कवियों या कलाकारों में बौद्धिकता समान मात्रा में नहीं रहती-दार्श- निक या दर्शन में रुचि रखने वाले कवियों में वह अपेक्षाकृत अधिक होती है। इसी प्रकार शिल्प और शैली का भी भावाभिव्यंजना में योग रहता है। यह ठीक है कि कोरा शिल्प या शैली का चमत्कार सदा मिथ्या कला की ही सृष्टि करता है, किन्तु सच्ची कला में भी भावाभिव्यंजना के साधन के रूप में उसके अस्तित्व को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। भावाभिव्यक्ति के लिए सामान्यतः प्रतिमा या कल्पना-शक्ति को ही पर्याप्त माना जाता है, किन्तु यदि उसके साथ कलाकार का शिल्प-विधि पर भी अधिकार हो तो वह उसके लक्ष्य की पूर्ति में सहायक ही सिद्ध होगा। अनुभूति और कल्पना-शक्ति, यदि विषय प्रदान करती है तो शिल्प उसे अभिव्यक्ति का माध्यम या साधन प्रदान करता है; अतः दोनों का सहयोग एवं संयोग ही कलाकृति को पूर्णता तक पहुँचा सकेगा। अन्यथा उनके शब्दों २४. 'दी प्रिन्सिपल्स आफ आर्ट' ; आर० जी० कालिंगवुड ; पृ० सं० ११७ २५. वही ; पृ० सं० २७४ २६-२८ 'दी प्रिन्सिपल्स आफ आट' : कालिंगवुड ; पृ० सं० २६४-२९७

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में-'शैली के अभाव में विषय अपरिष्कृत एवं भौंडा रहता है तो विषय के अभाव में शैली खोखली एवं निरर्थक रहती है; अतः दोनों का संयोग ही कला है।'२९ संक्षेप में कहें तो कालिंगवुड महोदय ने समन्वयात्मक दृष्टिकोण का परिचय देते हुए कला में भावाभिव्यंजना के अतिरिक्त कल्पनात्मक व्यंजना, सौन्दर्यात्मक भाव बौद्धिकता एवं शैली का भी महत्त्व स्वीकार करते हुए उन्हें रसानुभूति के लिए अनिवार्य माना है। • पाश्चात्य मतों का निष्कर्ष- रसानुभूति के कलागत आधार के सम्बन्ध में पश्चिम के प्रमुख भाववादी सौन्दर्य-शास्त्रियों के विभिन्न मतों के अनुशीलन से उपलब्ध निष्कर्षों को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है- • चार प्रमुख भाववादी वर्गों के अनुसार कला के आधारभूत तत्त्व या गुण करमशः भावोद्दीपन की क्षमता, भाव-चित्रण, भावाभिव्यक्ति और भाव-प्रेषण है। • ल-बस्सु के अनुसार कला का आधारभूत तत्त्व तो भाव ही है, किन्तु उसमें ये विशेषताएँ और अपेक्षित हैं-(क) भाव का चित्रण कला-कृति की प्रकृति एवं उसके लक्ष्य के अनुरूप होना चाहिए। (ख) नायक की प्रकृति के अनुसार ही भाव-विशेष को प्रमुखता दी जानी चाहिए। (ग) चित्रित भाव में सहजता एवं स्पष्टता होनी चाहिए जिससे वह सामाजिक को ग्राह्य एवं अनुभूत हो सके। · बर्क के अनुसार कला में ऐसे माध्यम ( शब्द, भाषा आदि) का प्रयोग होना चाहिए कि जिससे वह भाव-बोध में सहायक हो सके। · हरमन लात्ज के अनुसार कलागत भाव में ऐसी विशेषता होनी चाहिए कि वह मानव-चेतना के ऐन्द्रियक, भावात्मक, बोद्धिक आदि विभिन्न पक्षों को प्रभा- वित, उद्वलित एवं समन्वित कर सके। · टालस्टाय ने कलागत भाव में वैयक्तिकता, स्पष्टता एवं सत्यता-ये तीन गुण आवश्यक माने हैं। • सैतायना के विचारानुसार कला में भावोद्दीप्ति के लिये ये तत्त्व आवश्यक हैं-(१) ऐन्द्रियक तत्त्व (२) भावात्मक तत्त्व मुख्यतः प्रेम, करुणा हास्य। (३) सामाजिक तत्त्व-गौण रूप में। (४) बौद्धिक तत्त्व (५) रूपात्मक तत्त्व-भावा- भिव्यंजना के साधन रूप में। · कैरिट्ट ने भावाभिव्यंजना को ही कला का अनिवार्य लक्षण मानते हुए उसके साधन रूप में कल्पना और शैली को भी आवश्यक माना है।

29 " ... Subject without style is barbarism, style without subject is dilettantism. Art is the two to-gether," -The Principles of Art : R. G. Collingwood ; Page 297

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रसानुभूति का कलागत आधार १५३

· कारलिंगवुड ने केवल भावाभिव्यंजना को ही कला का एक मात्र लक्षण मानते हुए उसके सहायक तत्त्वों में कल्पनात्मक व्य जना सौन्दर्यात्मक भाव; बौद्धि- कता एवं शैली को भी स्थान दिया है। • भारतीय रसवादी आचार्यों के मत प्रायः सभी भारतीय आचार्यों ने भरत के रस-सूत्र को केन्द्र बनाकर उसकी व्याख्या के रूप में ही अपने-अपने मत प्रस्तुत किये हैं, अतः इस दृष्टि से उनमें परस्पर-मतभेद का अवकाश बहुत कम रह गया, किन्तु फिर भी अनेक आचार्यों ने भरत-सूत्र की व्याख्या करते हुए भी अपनी मौलिक दृष्टि का परिचय अवश्य दिया है-जिनमें भट्टलोल्लट, शंकुक, भट्टनायक, आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, विश्वनाथ रामचन्द्र शुक्ल, डॉ० नगेन्द्र प्रभृत्ति का नाम उल्लेखनीय है। इनकी रस सम्बन्धी स्थापनाओं का सामान्य परिचय अन्यत्र दिया जा चुका है, अतः यहाँ केवल विवेच्य विषय से सम्बन्धित मतों पर ही विशेष रूप में विचार किया जायगा। आचार्य भरत ने अपने 'नाट्यशास्त्र' के षष्ठ अध्याय में रस का स्वरूप- विवेचन करते हुए लिखा है-"रस के बिना किसी भी अर्थ का प्रवर्तन नहीं होता। विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव इन तीनों के संयोग से रस निष्पन्न होता है। ........ नाना भावों के इकट्ट होने पर रस निष्पन्न हो जाता है। ........ जैसे गुड़ आदि द्रव्यों, व्यंजनों और औषधियों से छः रस बनते हैं, इसी प्रकार स्थायी भाव नाना भावों से युक्त होकर रस बनते हैं। ........ नाना भावों के अभिनय(नाट्य) से व्यंजित तथा वाणी, अंग और सत्त्व से मिले हुए स्थायी भावों का आस्वाद प्राप्त करते हैं, इसलिए ये नाट्य रस हैं। ........ पंडितगण भावों के अभिनय (नाट्य) से मिले हुए स्थायी भावों का मन से आस्वाद लेते हैं, इसलिए ये नाट्य रस कहलाते हैं।"२९ यदि रसानुभूति के कलागत आधार की दृष्टि से उपयुक्त अंश पर विचार किया जाय तो इससे भरत की निम्नांकित स्थापनाएँ प्रकाश में आती हैं- • रस की निष्पत्ति का आधारभूत तत्त्व तो स्थायी भाव ही है, किन्तु अन्य भावों (नाना भावों) के योग से ही वह रसास्वाद प्रदान करने में समर्थ हो पाता है। • स्थायी भाव के साधन रूप में विभाव, (आलम्बन और उद्दीपन) अनुभाव एवं संचारीभाव का संयोग या उनकी योजना अपेक्षित है। · विभिन्न भावों की व्यंजना अभिनय के माध्यम से होनी चाहिए तथा अभिनय के अन्तर्गत वाणी (वाचिक), (आंगिक), सत्त्व (सात्त्विक) ये तीनों प्रकारके अभिनय आते हैं।

२९. भारतीय काव्य-शास्त्र की परम्परा ; पृ० ४। नाट्यशास्त्र ६।३३

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१५४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

उपयुक्त स्थापनाओं का निषेधात्मक पक्ष यह है कि केवल विभाव, अनुभाव और संचारीभाव के संयोग से ही नहीं अपितु उनकी अभिनय के माध्यम से व्यंजना होने पर ही रसास्वाद की उपलब्धि होगी। प्रश्न है, नाटक में तो सभी कुछ अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है; अतः इसका विशेष उल्लेख करने की क्या आवश्यकता थी, या नाटक के अतिरिक्त काव्यादि में 'अभिनय' के स्थान पर क्या होगा ? हमारे विचार से अभिनय के माध्यम से व्यंजना पर विशेष बल दिये जाने का कारण यह है कि उनके विचारानुसार लौकिक क्षेत्र में या व्यावहारिक जीवन में विभावादि की उपस्थिति से भी रसास्वाद उपलब्ध नहीं होगा; दूसरे, नाटक में भी भावों का कथन या उल्लेख नहीं अपितु उनकी 'व्यंजना' ही अपेक्षित है। यदि नाटक के स्थान पर हम काव्य एवं अन्य कलाओं पर उपयुक्त निर्देश को लागू करें तो कह सकते हैं-'काव्यात्मक या कलात्मक व्यंजना' से ही रसास्वाद प्राप्त होगा। प्रायः आलोचकों ने भरत के विभाव, अनुभाव व्यभिचारी के उल्लेख से सम्बन्धित सूत्र को तो ध्यान में रखा किन्तु उनकी 'अभिनय के माध्यम से व्यंजना' वाली बात को उपेक्षित कर दिया, जबकि विभावादि नाटक एवं काव्य वस्तुपक्ष के ही सूचक हैं; शैली पक्ष के नहीं। शैली का सूचक तो उपयुक्त अंश ही है जिसे हम काव्य और कला पर लागू करते हुए कह सकते हैं।-विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारी भावों से संयुक्त स्थायी भाव की काव्यात्मक एवं कलात्मक अभिव्यंजना से ही काव्य एवं कला में रस की निष्पत्ति होती है। अस्तु, भरत के अनुसार रसानुभूति के आधारभूत तत्त्वों में क्रमशः (१) स्थायी भाव (२) विभाव, अनुभाव, संचारी का संयोग और (३) कलात्मक अभिव्यंजना (शैली) की गणना की जा सकती है। भरत-सूत्र के व्याख्याता भट्टलोल्लट के अनुसार विभाव, अनुभाव आदि से परिपुष्ट किया हुआ स्थायीभाव ही रस है'-अतः उन्होंने रसानुभूति का आधारभूत तत्त्व तो स्थायी भाव को ही माना; किन्तु उसकी 'पुष्टि' या 'परिपुष्टि' पर विशेष बल दिया। लौकिक स्थायी भाव एवं काव्यजन्य रस में सबसे बड़ा अन्तर उनके विचारानुसार इस 'परिपुष्टि' का ही है-अतः यह विचारणीय है कि परिपुष्टि से उनका क्या तात्पर्य है ? आचार्य अभिनवगुप्त ने इस संदर्भ में दंडी के मत को भी उद्धृत किया है, जिसके अनुसार 'परिपुष्टि' का अर्थ 'बाहुल्य' 'अभिवृद्धि' या विस्तार सिद्ध होता है। दंडी ने 'रौद्ररस' को क्रोध का परिवरद्धित रूप ही माना हैं। किन्तु हमारे विचार से केवल अभिवृद्धि पुष्टि या से स्थायी भाव की मात्रा या उसके परिणाम में ही विस्तार होगा, उसके गुणों में इससे अन्तर आने की कोई सम्भावना नहीं है; करुणा का अति विस्तार अन्ततः आस्वाद की दृष्टि से भी करुण ही रहेगा-आनन्द में उसकी परिणति सम्भव नहीं। अतः निश्चय ही भट्टलोल्लट की उपयुक्त्त धारणा स्थूल वस्तुवादी ही है, जिसमें विभाव आदि तत्त्वों का तो निर्देश है किन्तु शैली पक्ष का सूचक कोई तत्त्व परिलक्षित नहीं होता।

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शंकुक ने विभावादि तत्त्वों को स्वीकार करते हुए भी दो बातों पर विशेष बल दिया-एक तो स्थायीभाव नाटकादि में प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित या प्रस्तुत नहीं होता अपितु विभावादि के माध्यम से अप्रत्यक्षरूप में प्रस्तुत होता है; दूसरे रस स्थायीभाव का परिवर्द्धित रूप न होकर अनुक्रियमाण' या अनुकृत रूप है। स्थायी भाव की अप्रत्यक्ष रूप में उपस्थिति उसकी अप्रत्यक्ष व्यंजना की तथा उसका 'अनुकृत रूप' उसके कलात्मक माध्यम की सूचना देता है-व्यावहारिक जीवन में स्थायी भाव की अनुकृति (या उसका प्रतिबिम्ब) न होकर वह यथार्थ रूप में होता है; इसीसे वे गुणात्मक या आस्वाद की दृष्टि से भिन्न प्रकार के रहते हैं। इस प्रकार शंकुक ने स्थायोभाव की अप्रस्तुत रूप में व्यंजना और अनुकृति को कला-वस्तु में स्थान देकर रस-निष्पत्ति सम्बन्धी परम्परागत धारणा को विकसित किया है। भट्टनायक ने न केवल नाटक अपितु काव्य की दृष्टि से भी रस-निष्पत्ति के आधारों की व्याख्या करते हुए अनेक नये तत्त्वों का निर्देश किया है। अभिनवगुप्त की शब्दावली में उनका मत इस प्रकार है -... काव्य में दोषाभाव तथा गुण अलंकारमयत्व रूप लक्षण के कारण और नाटक में चार प्रकार के अभिनय के द्वारा .... विभावादि के साधारणीकरण रूप .... भावकत्व व्यापार द्वारा भाव्यमान ... सत्त्वगुण के प्राधान्य से (रस की निष्पत्ति होती है) ।"१० इस उद्धरण से काव्यगत विशेषताओं के रूप में क्र्मशः (१) दोषों का अभाव (२) गुण-युक्त (३) अलंकार- युक्त (४) विभावादि का साधारणीकृत रूप में होना (५) उनका भाव्यमान होना (६) सत्त्वगुण की प्रधानता-इन छह का संकेत मिलता है। इनमें से प्रथम तीन तो स्पष्ट ही शैली सम्बन्धी तीन तत्त्वों से सम्बन्धित है ; चतुर्थ एवं पंचम का आशय यह है कि काव्य या कला में आलम्बन, परिस्थितियों (उद्दीपन), चेष्टाओं (अनुभाव) आदि का चित्रण इस प्रकार हो कि वे पाठक को ग्राह्य हो सके-उनका प्रभाव व्यक्ति-विशेष तक ही सीमित न रहकर सर्वसाधारण तक व्याप्त हो, जिससे उनका 'साधारणीकरण' हो सके-तथा साथ ही उनका केवल बौद्धिक ज्ञान ही नहीं 'भावन' भी अपेक्षित है ; इसी को 'भाव्यमान' होना कहा गया है। काव्य की जिस शक्ति के कारण उसकी विषय-वस्तु का 'भावन' होता है, उसे चाहें तो भावा- त्मकता' या 'प्रेषणीयता' भी कह सकते हैं। डॉ० नगेन्द्र ने 'भावन' का अर्थ आधुनिक शब्दावली में 'कल्पनात्मक प्रतीति' मानते हुए उसे 'साधारणीकरण' की प्रक्रिया से अभिन्न माना है। भट्टनायक के सत्त्वगुण की प्रधानता का आशय भी अन्यत्र विस्तार से स्पष्ट करते हुए बताया जा चुका है कि यह दार्शनिक शब्दावली है जिसका व्यावहारिक दृष्टि से 'बुद्धि की प्रधानता' या 'बौद्धिकता' अर्थ किया जा सकता है। इस प्रकार भट्टनायक के अनुसार रस-निष्पत्ति के लिए काव्य या कला में निम्नां- कित तत्त्व अपेक्षित हैं-

३०. हिन्दी अभिनव-भारती ; पृष्ठ ४६४-५

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१. शैली सम्बन्धी तत्त्व : दोषाभाव, गुण, अलंकार आदि। २. वस्तुगत तत्त्व : विभाव, अनुभाव, संचारी भाव। ३. अन्य अपेक्षाए : (क) व्यक्ति-विशेष के लिए ही रुचिकर न होकर सर्वसाधारण के लिए रुचिकर हो=साधारणीकरण की क्षमता। (ख) भावात्मकता या प्रेषणीयता। (ग) बुद्धि की प्रधानता (तर्क संगत, औचित्य या काव्य-सत्य से युक्त) अभिनव गुप्त ने 'अभिनय भारती' एवं 'ध्वन्यालोक-लोचन' में रस-निष्पत्ति की व्याख्या करते हुए कलागत वस्तु तत्व के सम्बन्ध में निम्नांकित संकेत दिये हैं- (क) 'काव्यार्थों को भावित करते हैं, अतएव काव्यार्थ ही रस है।' (ख) 'यद्यपि उस काव्यार्थ के विभावादि अनेक स्वरूप होते हैं, तथापि समस्त जड़ पदार्थों का संवेदना में पर्यवसान हो जाता है। (ग) 'इस प्रकार (काव्यार्थ का) स्वभाव होता है-नायक नामक विशिष्ट भोक्ता की स्थायी चित्तवृत्ति। (घ) 'जब उसका ऐसे काव्य के द्वारा प्रयोग (अभिनय या अभिख्यान) किया जाता है जो .... स्वीकृत लक्षण वाले गुण, अलंकार गीत वाद्यादि से भली-भाँति सुन्दरता को प्राप्त हो जाता है तो वह (नायक की स्थायी चित्तवृत्ति) अपने-पराये के भाव से रहित हो जाती है, जिसे 'साधारणीकरण' कहते हैं। (ङ) ..... इसीलिए वह लौकिक चित्तवृत्तियों से विलक्षण प्रतीत होने लगती है।' (च) 'इस प्रकार स्वसंवेदना विघ्नरहित विश्रान्ति हो जाना ही इस रसानु- भूति का लक्षण है।' (छ) 'अतएव व्यंजकत्व नामक व्यापार से .... भावक काव्यरसों को भावित करता है।१२ उपयुक्त उद्धरणों में सर्वप्रथम 'काव्यार्थ' का निर्देश है, जिसका आशय यह है कि अभिनवय गुप्त के विचार से काव्य के समस्त अर्थ-जिसे अंग्रजी में 'मीनिंग' (Meaning) कहा जाता है-का भावन होता है। परम्परागत रस-सूत्र से यह धारणा प्रचलित हो गयी थी कि काव्य में केवल भावों का या उनसे सम्बन्धित विभाव, अनुभाव आदि का ही भावन या बोध होता है-अभिनवगुप्त इस धारणा

३१. भारतीय काव्य-शास्त्र की परम्परा ; पृष्ठ सं० १२२-३ ३२. रस-सिद्धान्त ; पृष्ठ १७२ ; (ध्वन्योलोक लोचन से उद्धृत)

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का खंडन करते हुए आगे (ख में) बताते हैं कि केवल विभावादि का ही नहीं, 'समस्त जड़ पदार्थों का काव्य में संवेदन या भावना संभव हैं। यहाँ जड़ पदार्थों' का आशय यह भी नहीं है कि चेतन पदार्थों का भावन नहीं होता -उनका तो होता ही है क्योंकि विभावादि में उनकी गणना पहले से ही होती रही है, किन्तु अभिनव गुप्त चेतन-अद्धचेतन के अतिरिक्त जड़ पदार्थों की भी काव्य के माध्यम से संवेदना की बात विशेष रूप से कहते हैं। ऐसी स्थिति में 'काव्यार्थ का क्षेत्र केवल भावों तक ही सीमित नहीं रह जाता अपितु बौद्धिक तत्त्व भी उसमें सम्मिलित हो जाते हैं। वस्तुतः अभिनवगुप्त से पूर्व एवं उनके बाद भी, रस- सैद्धान्तिक आचार्यों ने काव्य-वस्तु या उसके विषय-क्षेत्र के सम्बन्ध में प्रायः संकीण एवं सीमित दृष्टिकोण का ही परिचय दिया है, वे भाव-विभावादि के रूप में कुछ गिनी-गिनाई हुई वस्तुओं को ही रस से सम्बन्धित बताते रहे हैं, जबकि आचार्य अभिनवगुप्त ने यहाँ अत्यन्त व्यापक दृष्टि का परिचय देते हुए सृष्टि के समस्त पदार्थों को जो कि शब्दार्थ के माध्यम से काव्य में प्रस्तुत किये जा सकते हैं, काव्य संवेदना एवं रसानुभूति के उपयुक्त माना है। अतः रस-सिद्धान्त के विषय-क्षेत्र को व्यापकता प्रदान करने की दृष्टि से यह उनकी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है-यह दूसरी बात है कि परवर्ती आचार्य इस व्यापकता को ग्रहण करने में समर्थ न हो सके। उपयु क्त काव्यार्थ की सामान्य प्रकृति नायक की चित्तवृत्ति के अनुरूप ही रहेगी अर्थात् नायक की स्थायी चित्तवृत्ति के अनुरूप ही काव्य में विभिन्न विषयों का समावेश एवं उनका पारस्परिक सम्बन्ध-स्थापन हो सकेगा, अतः काव्य-विषय में प्रमुखता नायक की स्थायी चित्तवृत्ति की रहेगी-इसी का संकेत उद्धरण ग में मिलता है। उद्धरण घ एवं ङ में गुण, अलंकार, गीत, वाद्य आदि से स्थायी चित्तवृत्ति को सुन्दरीभूत (सौन्दर्य-युक्त) हो जाने एवं उससे अपने-पराये के भाव से मुक्त हो जाने अथवा साधारणीकृत हो जाने का उल्लेख है। यहाँ गुण और अलंकार काव्य- पक्ष के द्योतक हैं जबकि गीत, वाद्य आदि नाटक से सम्बन्धित है-अतः काव्य की दृष्टि से तो गुण-अलंकार को ही ग्रहण करना उचित होगा। अभिनवगुप्त के विचार से काव्यार्थ या उनमें निहित स्थायी चित्तवृत्ति गुण अलंकारों से ही सौन्दर्ययुक्त हो जाती है ; एक ऐसे रूप को प्राप्त कर लेती है कि जिससे वह सर्व साधारण को ग्राह्य प्रतीत होती है-इसी को अपने-पराये के भाव से मुक्ति, साधारणीकरण या विलक्षणता कहा जाता है ; किन्तु ये एक ही क्रिया के विभिन्न पक्ष हैं। अस्तु, गुण अलंकार से उत्पन्न सौन्दर्य को भी काव्य के प्रमुख तत्त्वों में स्थान दिया जा सकता है। उद्धरण च में विघ्नरहित विश्रान्ति का उल्लेख है। अभिनवगुप्त ने कई प्रकार के विघ्न गिनाये हैं, जिनकी चर्चा अन्यत्र की जा चुकी है-इनमें से कुछ विघ्न काव्य की वस्तु एवं शैली से सम्बन्धित हैं ; जैसे गौणवस्तु को प्रधानता दे देना अभिव्यक्ति की अस्पष्टता आदि-इन्हें सामान्य रूप में 'काव्य-दोष' की संज्ञा देते

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हुए, यदि हम यह कहें कि काव्य में वस्तु एवं शेली का दोष-मुक्त होना भी आवश्यक है तो यह अभिनवगुप्त के मतानुकूल ही होगा। इसी को कतिपय अन्य आचार्यों ने दोषाभाव कहा है, जो अधिक संगत है। अन्तिम उद्धरण 'ध्वन्यालोक-लोचन' का है जिसमें व्यंजना शक्ति को ही काव्य की भावन-शक्ति या संवेदना का आधार माना गया है। अतः काव्य-वस्तु में व्यंजना या व्यंजकता का गुण भी आवश्यक है। इस प्रकार उपयुक्त उद्धरणों के निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि अभिनवगुप्त के मतानुसार काव्य-वस्तु में ये तत्त्व या गुण अपेक्षित हैं-(१) सृष्टि की किसी भी वस्तु या विषय का शब्दार्थ के रूप में प्रस्तुतीकरण जिसे संक्षेप में 'काव्यार्थ' कहा जा सकता है। (२) स्थायी चित्तवृत्ति (३) गुण-अलंकारादि का सौन्दर्य (४) दोषाभाव (५) व्यंजना शक्ति या व्यंजकता। अभिनवगुप्त परवर्ती आचार्यों ने प्रस्तुत विषय के सम्बन्ध में किसी नूतन दृष्टि का परिचय नहीं दिया यह दूसरी बात है कि किसी ने शृंगार रस को ही एक मात्र रस माना तो किसी ने अद्भूत, शान्त, भक्ति आदि में से किसी को। आधुनिक युग के हिन्दी विद्वानों में से कुछ ने अवश्य कला-वस्तु की व्याख्या का नया प्रयास किया है, जिनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डॉ० नगेन्द्र का नाम उल्लेखनीय है। आचार्य शुक्ल ने अपने विभिन्न लेखों में काव्यगत तत्त्वों के विषय में अनेक नये विचार प्रस्तुत किये हैं, जो मुख्यतः इस प्रकार हैं-११ (क) 'हमारे प्रम, भय, आश्चर्य .... भावों की प्रतिष्ठा करने वाले मूल आलम्बन बाहर ही के हैं-इसी चारों ओर फैले हुए रूपात्मक जगत् के ही हैं।' (ख) 'भावुकता की प्रतिष्ठा करने वाले मूल आधार या उपादान प्रत्यक्ष रूप ही हैं। इन प्रत्यक्ष रूपों की मार्मिक अनुभूति जिनमें जितनी ही अधिक होती है वे उतने ही रसानुभूति के उपयुक्त होते हैं।' (ग) "प्रत्यक्ष से हमारा अभिप्राय केवल चाक्षुष ज्ञान से नहीं है। रूप शब्द के भीतर शब्द, गंध, रस और स्पर्श भी समझ लेना चाहिए।" (घ) 'जब तक किसी भाव का कोई विषय इस रूप में नहीं लाया जाता कि वह सामान्यतः सबके उसी भाव का आलम्बन हो सके तब तक रस में पूर्णतया लीन करने की शक्ति उसमें नहीं होती।' (ङ.) ..... प्रधानपात्र में कोई मूल प्ररक भाव या बीजभाव रहता है जिसकी प्रेरणा से घटना-चक्र् चलता है और अनेक भावों के स्फुरण के लिये जगह निकलती चलती है।' (च) 'बीजभाव द्वारा स्फुटित भावों में कोमल और मधुर-कठोर और ३३. रस-मीमांसा; पृष्ठ सं० २५९-२६६

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१६० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन को अपने विवेचन में स्थान दिया है। उनके विचारों को विषय एवं शैली पक्ष में विभक्त करते हुए संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है- (१) विषय से सम्बन्धित तत्व : (क) समस्त बाह्य जगत् जिसका 'प्रत्यक्ष' (बोध) संभव है। (ख) 'प्रत्यक्ष' में चाक्षुष, श्रवण, घ्राण, स्वाद, स्पर्श-पाँचों इन्द्रियों के विषय एवं अनुभव सम्मिलित हैं। (ग) ऐन्द्रियक प्रभाव बीजभाव या मूलभाव के संपर्क से विभिन्न भावों को उद्दीप्त करते हैं। (घ) विभिन्न भावों तथा बीज भाव के विषयों का सार्वजनीन होना चाहिए। (ङ) बीजभाव में तीन गुण अपेक्षित हैं-लोकमंगल कारक; व्यापकता सार्वजनीनता। (२) शैली से सम्बन्धित तत्त्व : (क) शैली का आधारभूत तत्व कल्पना शक्ति है। (ख) कल्पना-शक्ति हृदय-प्रेरित या भाव प्ररित हो। (ग) शैली पक्ष में व्यंजकता, मार्मिकता एवं चमत्कार के गुण रहते हैं जो कल्पना की देन हैं। अस्तु, एक वाक्य में कहें तो शुक्ल जी के अनुसार रसानुभूति के लिए अपे- क्षित काव्यगत (कलागत) तत्त्वों में क्रमशः बाह्य जगत का विभिन्न इन्द्रियों से प्राप्त बोध, सार्वजनीन, व्यापक एवं लोकहितकारी बीजभाव एवं उससे प्ररित भाव, भाव प्ररित कल्पना तथा शैली की व्यंजकता, मार्मिकता एवं चामत्कारिकता को स्थान दिया जा सकता है। डॉ० नगेन्द्र ने भी कला के वस्तुपक्ष की समस्त विशेषताओं का आकलन 'राग तत्व' में तथा शैली पक्ष के विभिन्न गुणों का समाहार 'कला तत्त्व' में करते हुए अपना निष्कर्ष इन शब्दों प्रस्तुत किया है-"रस में राग तत्त्व की प्रधानता है, वही उसका सार है, किन्तु कला-तत्त्व (शब्द-अर्थ के कल्पनात्मक प्रयोग) का महत्त्व भी कम नहीं है। .... भट्टनायक का 'भावकत्व' व्यापार वस्तुतः कला तत्त्व ही है जिसे अभिनव ने भी शब्द-भेद से साधारणीकरण की प्रक्रिया के पूर्वार्ध में यथावत् स्वीकार कर लिया है। .... अतः लक्षण के अनुसार रस की परिधि में भाव-तत्त्व के साथ कल्पना-तत्त्व और इन दोनों का प्रयोग करने वाली कवि-प्रज्ञा की प्रकल्पना में बुद्धि तत्त्व का भी उचित समावेश है। ........ 'रसाभास' का रस की परिधि में अन्तर्भाव

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इस बात का सूचक है कि नैतिक-मूल्यों द्वारा पुष्ट होने पर भी, रस-सिद्धान्त उनसे परिबद्ध नहीं।१४ उपयुक्त निष्कर्ष से स्पष्ट है कि डॉ० नगेन्द्र कला या काव्य के घटक तत्वों में वे राग तत्त्व (भाव) एवं कलातत्त्व या कल्पना तत्त्व (शैली) को तो प्रत्यक्ष रूप में तथा बुद्धितत्व एवं नैतिक मूल्यों को अप्रत्यक्ष एवं गौण रूप में स्थान देते हैं। • तुलनात्मक दृष्टि से अध्ययन रसानुभूति के कलागत आधार के सम्बन्ध में विभिन्न पाश्चात्य एवं भारतीय मतों के अनुशीलन से उपलब्ध निष्कर्षों पर तुलनात्मक दृष्टि से विचार करते हुए उन्हें हम निम्नांकित छह वर्गों में प्रस्तुत कर सकते हैं - (१) बाह्य जगत से सम्बन्धित तत्त्व-आचार्य अभिनव गुप्त ने सामान्य रूप में सृष्टि के सभी पदार्थों को काव्य-विषय के रूप में स्वीकार किया है, जिन्हें आचार्य शुक्ल ने प्रत्यक्ष-बोध से सम्बन्धित रूपों तक सीमित कर दिया है। पाश्चात्य विद्वानों का इसके सम्बन्ध में कोई स्पष्ट मत उपलब्ध नहीं है।

(२) ऐन्द्रियक तत्त्व-पाश्चात्य विद्वानों में मुख्यतः हरमन लात्ज, एवं सैतायना ने व भारतीयों में आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने इस पक्ष पर विशेष बल देते हुए विभिन्न इन्द्रियों से प्राप्त बोध एवं आस्वाद को काव्यगत या कलागत उपादानों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। (३) भावात्मक तत्व-प्रायः सभी पाश्चात्य भाववादी एवं भारतीय रसवादी आचार्यों ने भाव को प्रमुख तत्त्व माना है, किन्तु उसका वर्गीकरण, गुण-भेदों का निरूपण एवं उसकी स्थिति का विवेचन विभिन्न प्रकार से किया है। संक्षेप में- (क) भाव का वर्गीकरण : पाश्चात्य विद्वानों में से कुछ ने कलागत भाव को सामान्य भाव से पृथक मानते हुए उसे 'सौन्दर्यात्मक भाव' (उदात्त भाव) आदि की संज्ञा दी है तो भारतीय आचार्यों ने उसके मुख्यतः दो ही प्रकार माने हैं-स्थायीभाव या मूल भाव एवं संचारी भाव। (ख) भाव के गुणों में दोनों ही वर्ग के विद्वानों ने प्रायः सार्वजनीनता, निवैयक्तिकता, सत्यता (स्वाभाविकता), व्यापकता आदि का निर्देश किया है। (ग) भाव की स्थिति के सम्बन्ध में अनेक पाश्चात्य विद्वानों ने व लगभग सभी भारतीय आचार्यों ने उसका नायक की प्रकृति या चित्तवृत्ति के अनुरूप होना आवश्यक माना है। (४) बौद्धिक तत्त्व-हरमनलात्ज, सैतायना, और कालिंगवुड ने विशेषरूप

३४. रस-सिद्धान्त ; पृ० सं० ३१९-३२०

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१६२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

से तथा डाँ० नगेन्द्र ने गौण रूप में कला में बौद्धिक तत्त्व का अस्तित्व स्वीकार किया है। अनेक विद्वानों के मतानुसार बौद्धिकतत्त्वों का भी भावात्मक या भाव के अंग- रूप में होना आवश्यक है। (५) सामाजिक या नैतिक तत्त्व-सैंतायना एवं डॉ० नगेन्द्र ने इन्हें बहुत उपयोगी नहीं माना जबकि आचार्य शुक्ल इन्हें भाव की प्रकृति के अंग रूप में (स्वतन्त्र या पृथक रूप में नहीं) महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं। (६) अभिव्यंजना या शैली सम्बन्धी तत्त्व-इसमें सैतायना, कालिंगवुड, आ० रामचन्द्र शुक्ल व डॉ० नगेन्द्र कल्पना-शक्ति को महत्त्वपूर्ण स्थान देते हैं, किन्तु अन्य विद्वान भी कल्पनाजन्य व्यंजकता, प्रषणीयता, चामत्कारिकता को प्रायः स्वीकार करते हैं। कुछ विद्वानों ने शैली के गुणों, (स्पष्टता, सहजता आदि) दोषों के अभाव एवं अलंकारों को भी आवश्यक माना है। इस प्रकार हम देखते हैं कि भाववादी एवं रस-सैद्धान्तिक आचार्यों ने रसा- नुभूति के लिए कलाकृति में भावात्मक तत्त्वों के अतिरिक्त भौतिक, ऐन्द्रियक, बौद्धिक नैतिक एवं कलात्मक (शैली सम्बन्धित) तत्त्वों की भी आवश्यकता प्रमुख या गौण रूप में स्वीकार की है, जिससे इस सिद्धान्त की व्यापकता एवं सूक्ष्मता का अनुमान लगाया जा सकता है। इतना अवश्यक है कि इनके सम्बन्ध में विभिन्न मतों में एक रूपता व सामंजस्य का अभाव है तथा अनेक तत्वों के बारे में स्थिति संदिग्ध भी है इसके लिए इन सबकी समन्वयात्मक व्याख्या अपेक्षित है। प्रस्तुत प्रबन्ध के अंतिम खण्ड में हम इस अपेक्षा की पूर्ति का प्रयास यथाशक्ति करेंगे। यहाँ परम्परागत मतों के अनुशीलन के रूप में इतना ही पर्याप्त होगा।

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५ सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति : प्रकृति एवं स्वरूप

पीछे यह स्पष्ट किया जा चुका है कि भारतीय काव्य-शास्त्रीय दृष्टि से 'रस' कलास्वादन से प्राप्त अनुभूति है जिसे पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्रीय शब्दावली में 'सौन्दर्यानुभूति' (Aesthetic Experience) कहा जा सकता है। भारतीय आचार्यों की ही भाँति पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्रियों ने भी रसानुभूति के स्वरूप पर विस्तार से विचार किया है, अतः हम यहाँ क्रमशः पाश्चात्य एवं भारतीय दृष्टि से रसानुभूति की प्रकृति एवं स्वरूप के सम्बन्ध में तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करेंगे। • पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्रीय दृष्टिकोण-

काव्य तथा अन्य कलाओं के आस्वादन से प्राप्त अनुभूति रोचक, प्रसन्नता- दायक, आहलादायक या आनन्दमयी होती है-यह तथ्य प्रायः सभी सौन्दर्य-शास्त्रियों द्वारा मान्य है। प्राचीन युग के विचारकों में से प्लेटो अरस्तू, लोंजाइनस, होरेस प्रभृति ने काव्य का विवेचन करते हुए काव्यानन्द के स्वरूप पर भी संकेतात्मक ढंग से विचार किया है। प्लेटो के विचार से कविता से प्राप्त होने वाला आनन्द भावो- द्वलन-जन्य है-अतः वे इसे भावात्मकता के स्तर पर प्रतिष्ठित करते हैं जबकि अरस्तू ने प्रत्येक कला से प्राप्त आनन्दानुभूति का सम्बन्ध अनुकरण की प्रवृत्ति से स्थापित करते हुए स्पष्ट किया है-" ........ सभी व्यक्ति सामान्यतः अनुकरण से प्रसन्नता प्राप्त करते हैं। ........ और इसका कारण यह है कि ज्ञानार्जन से सभी व्यक्तियों को-केवल दार्शनिकों को ही नहीं-नैसर्गिक आनन्द प्राप्त होता है ........ इसी प्रकार जब उन्हें किसी चित्र को देखकर प्रसन्नता होती है तो उसका कारण यह है कि उसके निरीक्षण से वे कुछ सीखते हैं, सोचते हैं तथा इसका पता लगाते हैं कि उसमें चित्रित

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१६४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

वस्तु क्या ?" इस उद्धरण के आधार पर कहा जा सकता है कि अरस्तू ने कला- स्वादन के आनन्द को ज्ञानार्जन जन्य आनन्द मानते हुए उसे अप्रत्यक्ष में बौद्धिक स्तर का आनन्द स्वीकार किया है। किन्तु परवर्ती युग में लौंजाइनस एवं होरेस ने काव्या- नन्द को आत्मिक स्तर की अनुभूति के रूप में ग्रहण किया है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीन युग के चिन्तकों ने काव्यानुभूति या रसानुभूति को भावात्मक, बौद्धिक या आत्मिक स्तर से सम्बन्धित माना है-वे इस सम्बन्ध में किसी एक निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाये। वस्तुतः उन्होंने काव्यानुभूति के स्वरूप पर अत्यन्त स्थूल रूप में विचार किया है, सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक विश्लेषण का प्रयास उनमें दृष्टिगोचर नहीं होता। आगे चलकर सोलहवीं-सत्रहवीं शती के विद्वानों ने रसानुभूति के स्वरूप पर अपेक्षाकृत अधिक सूक्ष्मता से विचार किया। सुप्रसिद्ध विद्वान् डेकार्ट (१५६६- १६५० ई०) ने सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति का विश्लेषण करते हुए स्पष्ट किया कि यह (रसानुभूति) एक ऐसी अनुभूति है जिसमें बौद्धिक आनन्द, कला और साहित्य के आस्वादन से उद्दीप्त भाव से समन्वित होता है।१ आनन्द का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि यह एक प्रकार का मनोनुकूल भाव है अर्थात् जब हमारी आत्मा अनुकूल वस्तु का आस्वादन करती है तो आनन्द का उद्रक होता है। उन्होंने आनन्द को भी व्यापक अर्थ में ग्रहण करते हुए उसके तीन भेद निश्चित किये- (१) ऐन्द्रियक आनन्द, (२) काल्पनिक आनन्द और (३) बौद्धिक आनन्द । काल्प- निक आनन्द के भी दो भेद किए गए-(१) पाशविक वृत्तियों (वासनाओं) से प्रेरित आनन्द, (२) साहित्यिक आधार से प्रेरित आनन्द। इनमें से बौद्धिक आनन्द को विशुद्ध आत्मचैतन्य से प्रेरित माना गया है किन्तु जब कलाओं के माध्यम से बौद्धिक आनन्द की अनुभूति होती है तो उसे सौन्दर्यात्मक आनन्द या रसानुभूति कह सकते हैं। डेकाटे ने यह स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है कि कलाजन्य अनुभूति में बौद्धिक आनन्द के साथ-साथ भावानुभूति भी समन्वित रहती है।

  1. "All men, likewise, naturlly receive pleasure from imitation ···.···. And the reason of this is,that to learn is a natural pleasure, not confined to philosophers, but common to all men, ···..... Hence the pleasure they receive from a picture; in viewing it they learn, they infer, they discover what every object is ;·····... " -- 'Aristotle's poetics and rhetoric' by T. A. Moxon; Page 9 2. "Aesthetic experience, according to him, is intellectual joy acco- mpanied by a passion or emotion that may be aroused by read- ing a strange advcture ···..... ' -'Western Aesthetics' By Dr. K. C. Pandey; Page 177

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सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति : प्रकृति एवं स्वरूप १६५

हमारे विचार में डेकार्टे ने आनन्द के अनेक स्वरूप-भेदों में काल्पनिक आनन्द को स्वीकृति देते हुए भी कलाजन्य आनन्द को बौद्धिक आनन्द बताकर ठीक नहीं किया। कला की प्रकृति को देखते हुए बौद्धिक आनन्द की अपेक्षा काल्पनिक आनन्द उसके अधिक निकट पड़ता है। इसके अतिरिक्त उनके मत में यह भी असंगति है कि एक ओर तो वे बौद्धिक आनन्द को आध्यात्मिक कोटि का आनन्द मानते हैं तो दूसरी ओर उसका सम्बन्ध येन-केन-प्रकारेण कला के साथ भी स्थापित करते हैं। बौद्धिक आनन्द के साथ उद्दीप्त भावानुभूति का भी स्पष्टीकरण वे भली-भांति नहीं कर पाये। अस्तु, सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति के विश्लेषण में उनका योग इतना ही है कि एक तो उन्होंने स्पष्ट रूप में उसे आनन्दानुभूति का पर्याय माना दूसरे, उन्होंने आनन्द के भी अनेक सूक्ष्म भेद किये जिससे परवर्ती विवेचकों ने लाभ उठाया। एडिसन (१६७२-१७१६ ई०) ने डेकार्टे की असंगतियों का निराकरण करते हुए काव्यानन्द या रसानुभूति को कल्पनाजन्य आनन्द के रूप में मान्यता दी। उन्होंने प्रतिपादित किया कि जब हमारी कल्पना, कलागत सौन्दर्य, औदात्य एवं अन्य तत्त्वों के बोध में निमग्न हो जाती है तो हम एक सुखद आत्म-विस्मृति की अवस्था में पहुँच जाते हैं-थोड़ी देर के लिए हमारी आत्मा कल्पना के नूतन लोक में विचरण करती हुई आनन्दानुभूति में लीन हो जाती है। इस प्रकार एडिसन ने रसानुभूति को विशुद्ध कल्पनाजन्य अनुभूति के रूप में स्वीकार किया। ह्रा म महोदय (१७११-१७७६ ई०) ने रसानुभूति को तर्क बुद्धि की देन न मानकर उसे शुद्ध भावानुभूति के रूप में स्वीकार किया। किन्तु एक अन्य विद्वान् बर्क (१७२९-१७९७ ई०) ने यह प्रतिपादित क्रिया कि काव्य-वस्तु का बोध इन्द्रियों, कल्पना और बुद्धि-तीनों के माध्यम से होता है, इसलिए काव्यानुभूति या रसानु- भूति में इन तीनों का ही समन्वित योग स्वीकार किया जाना चाहिये। आगे चलकर हरमन लात्ज (१८१७-१८८१ ई०) ने भी रसानुभूति का सम्बन्ध ऐन्द्रियक बोध, बौद्धिक उत्कर्ष एवं सौन्दर्यानुभूति से स्थापित करते हुए उसे शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक स्तर की प्रसन्नतादायक अनुभूति के रूप में स्वीकार किया।4 उन्होंने सौन्द- र्यानुभूति या रसानुभूति के लिये एक नये भाव की भी कल्पना की जिसे 'सौन्दर्या- त्मक भाव' (Aesthetic Emotion) कहा गया। इस प्रकार हम देखते हैं कि उपयुक्त सभी विद्वानों ने सौन्दर्यानुभूति या रसा- नुभूति का स्वरूप तो आनन्दात्मक ही माना है किन्तु उनमें मतभेद इस बात को लेकर

  1. 'Western Aesthetics' : K. C. Pandey; Page 244 ४. वही; पृष्ठ २५८ 5. 'A History of Esthetics' : K. E. Gilbert and Kuhn; Page 508-509

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१६६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

है कि इस आनन्द की प्रकृति क्या है ? सामान्यतः सभी ने आनन्द के तीन रूप स्वी- कार किये हैं-(१) ऐन्द्रियक आनन्द, (२) कल्पनात्मक आनन्द और (३) बौद्धिक आनन्द। किसी-किसी ने एक चौथे प्रकार के आनन्द की भी कल्पना की है जिसे भावात्मक आनन्द कहा जा सकता है। आनन्द के इन विभिन्न रूप-भेदों में से कला- नुभूति का सम्बन्ध किससे है-यही विवाद का विषय है जिस पर पुनर्विचार की आव- श्यकता है। वैसे देखा जाय तो यह प्रश्न सौन्दर्य शास्त्र की अपेक्षा मनोविज्ञान से अधिक सम्बन्धित है क्योंकि ऐन्द्रियकता, काल्पनिकता, बौद्धिकता, भावात्मकता आदि के स्वरूप एवं उनकी प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण मनोविज्ञान का ही विषय है। प्रस्तुत प्रबन्ध में हमारा लक्ष्य मनोवैज्ञानिक दृष्टि से भी रसानुभूति पर विचार करने का है, अतः इस सम्बन्ध में अन्यत्र विस्तार से विचार किया जायगा। किन्तु यहाँ हम इतना संकेत अवश्य कर देना चाहते हैं कि हमारे विचार में कलानुभूति में सामान्य जीवन की अनुभूतियों से सूक्ष्म अन्तर अवश्य है, जिसके कारण लौकिक जीवन की कटु अनुभूतियाँ भी कलानुभूति में मधुर बन जाती हैं। लौकिक अनुभूतियों के मूल में सामान्यतः, ऐन्द्रियक, भावात्मक एवं बौद्धिक अनुभूतियाँ ही रहतो हैं, जबकि कला में इनकी अपेक्षा कल्पनाजन्य अनुभूति की प्रमुखता रहती है। अतः संक्षेप में कहा जा सकता है कि कलानुभूति या रसानुभूति में प्रमुखता तो कल्पना- जन्य आनन्द की स्वीकार करनी होगी, यह दूसरी बात है कि उस कल्पनाजन्य आनन्द तक पहुँचने के लिए ऐन्द्रियक, भावात्मक एवं बौद्धिक अनुभूतियों का सहयोग भी न्यूनाधिक मात्रा में अपेक्षित हो। फिर भी इस सम्बन्ध में यह हमारा अन्तिम निर्णय नहीं है क्योंकि जैसाकि हम निवेदन कर चुके हैं कि इस सम्बन्ध में मनो- वैज्ञानिक दृष्टि से आगे विचार किया जायगा तथा मनोविज्ञान के आधार पर ही हम अपना अन्तिम निर्णय देंगे। प्रत्यक्षानुभूति एवं रसानुभूति में अन्तर :- सौन्दर्य शास्त्र के अनेक विद्वानों ने सामान्य जीवन की प्रत्यक्षानुभूति एवं कलाजन्य रसानुभूति के पारस्परिक अन्तर को भी स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इनमें आर० जी० कालिंगवुड का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने दोनों में मुख्यतः तीन बातों का अन्तर बताया है। एक तो जहाँ प्रत्यक्षानुभूति वास्तविकता पर आधारित होती है, वहाँ कलानुभूति या रसानुभूति कल्पना पर आश्रित होती है। प्रत्यक्षानुभूति का स्तर ऐन्द्रियक होने के कारण अपरिष्कृत होती है, वहाँ रसानुभूति में संवेदनाओं का परिष्कार या संस्कार हो जाता है। इसके अतिरिक्त लौकिक भाव काव्य के माध्यम से अनुभूत होने पर उदात्त एवं सौन्दर्यात्मक बन जाते हैं। दूसरे, जहाँ प्रत्यक्षानुभूति में हमारी आत्मगत चेतना (अपने अस्तित्व के पार्थक्य की चेतना ?) का संवेदनाओं पर नियन्त्रण रहता है वहाँ रसानुभूति में ऐसा नहीं होता अर्थात् संवेदनाए आत्मगत चेतना के नियन्त्रण से मुक्त रहती हैं। तीसरे, प्रत्यक्षानुभूति में प्रायः भावों एवं भावनाओं का उद्दीपन तो होता

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है किन्तु उनकी अभिव्यक्ति का पूरा अवसर प्राप्त नहीं होता। इसके विपरीत कला द्वारा प्राप्त रसानुभूति में न केवल हमारे भावों का उद्वलन या उद्दीपन होता है अपितु उनकी सम्यक् अभिव्यक्ति भी होती है। इसीलिए भावानुभूति एवं भावा- भिव्यक्ति का जो आनन्द उच्चकोटि की कला से प्राप्त होता है वह दैनिक जीवन की प्रत्यक्ष अनुभूतियों से सम्भव नहीं। इस प्रकार कालिंगवुड ने रसानुभूति के वैशिष्ट्य को सम्यक् रूप में स्पष्ट किया है जो निश्चित ही प्रशंसनीय है। · भारतीय दृष्टिकोण से विवेचन- अब तक हमने सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति के स्वरूप पर पाश्चात्य विद्वानों के मतों के आधार पर विचार किया है; अब यदि इसी सन्दर्भ में भारतीय रसवादी आचार्यों की दृष्टि से भी तुलनात्मक अध्ययन कर लिया जाय तो अनुचित न होगा। आचार्य भरतमुनि ने रस को एक स्वादिष्ट या प्रसन्नतादायक तत्त्व के रूप में प्रति- ष्ठित करते हुए उसकी तुलना स्वादिष्ट व्यंजनों से की थी। यद्यपि आगे चलकर रस को कलागत तत्त्व के स्थान पर कलाजन्य अनुभूति के रूप में मान्यता दी गई; जिससे भरत का मत गौण हो गया है; फिर भी उनकी धारणा का यह अंश तो सभी को मान्य है कि रसानुभूति का स्वरूप नाना प्रकार के व्यंजनों के विभिन्न प्रकार के स्वादों की भाँति विभिन्न प्रकार का होता हुआ भी अन्ततः प्रसन्नतादायक है अर्थात् उनके विचार से भी रसानुभू ति आनन्दानुभूति ही है। भरत परवर्ती व्याख्याताओं ने भी रसानुभूति के स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास विभिन्न दृष्टियों से किया है। भट्टलोल्लट ने रसानुभूति की विभावों से उत्पत्ति, अनुभावों से प्रतीति एवं संचारी भावों से पुष्टि मानते हुए उसे स्थायी भाव का ही एक परिर्वद्धित रूप माना है। वे स्थायी भाव की लौकिक अनुभूति एवं रसा- नुभूति के अन्तर को सम्यक् रूप में स्पष्ट नहीं कर पाये। उनके अनन्तर शंकुक ने भी रसानुभूति को प्रत्यक्ष अनुभूति से भिन्न एक विलक्षण अनुभूति के रूप में तो स्वीकार किया किन्तु उसके स्वरूप का विश्लेषण वे भी सम्यक रूप में नहीं कर पाये। आगे चलकर भट्टनायक ने अवश्य ही साधारणीकरण की प्रक्रिया के आधार पर लौकिक अनुभूति एवं रसानुभूति के अन्तर को स्पष्ट करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास किया। उन्होंने काव्यानन्द या सौन्दर्यानुभूति को एक ऐसे आनन्द के रूप में स्वीकार किया जिसमें सत्त्व गुण की प्रधानता रहती है। जैसाकि अन्यत्र स्पष्ट किया जा चुका है, यह सत्त्वगुण आधुनिक मनोविज्ञान की शब्दावली में बौद्धिकता का पर्याय स्वीकार किया जा सकता है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि भट्टनायक ने भी डेकार्टे की भाँति रसानुभूति को एक बौद्धिक आनन्द के रूप में मान्यता दी है। साथ ही इसमें उन्होंने रज और तम का भी मिश्रण स्वीकार किया है ; मनोवैज्ञानिक दृष्टि से 'रज'

  1. 'The Principles of Art'; By R. G. Collingwood; Page 274

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जहाँ रागात्मकता या भावात्मकता का द्योतक है वहाँ 'तम' अज्ञान, भ्रांति अथवा मिथ्या प्रतीति का द्योतक है। इस 'तम' को हम यहाँ माया या कल्पना का भी पर्याय मान सकते हैं। इस प्रकार स्पष्टतः भट्टनायक के अनुसार रसानुभूति एक ऐसे आनन्द की अनुभूति है जिसमें बौद्धिक आनन्द की प्रमुखता होते हुए भी भावात्मक एवं कल्पनात्मक आनन्द का मिश्रण रहता है। आचार्य अभिनवगुप्त ने रसानुभूति को आनन्दानुभूति के रूप में मान्यता देते हुए इसकी तीन प्रमुख विशेषताओं का निरूपण किया-(१) 'साक्षात्कारात्मिकता प्रतीति' (२) 'निर्विघ्न प्रतीति' और (३) 'विश्रान्ति रूप या चमत्कार पूर्ण प्रतीति'। 'साक्षात्कारात्मिका प्रतीति' का अर्थ यह है कि रसानुभूति के समय हमारे मानसिक चक्षुओं के सम्मुख कला-वस्तु विद्यमान रहती है। मानसिक चक्षुओं को आधुनिक दृष्टि से कल्पना-चक्षुओं के रूप में स्वीकार किया जा सकता है। 'निर्विघ्न प्रतीति' से अभिनवगुप्त का आशय है कि जहाँ लौकिक अनुभूति में हम देश काल के बन्धनों एवं वैयक्तिक सीमाओं के कारण किसी भी वस्तु की अनुभूति पूर्ण निश्चिन्तता एवं निर्विघ्नता से नहीं कर पाते वहाँ कलानुभूति में हम सभी बाह्य एवं आन्तरिक बन्धनों, विघ्नों एवं बाधाओं, से मुक्त रहते हैं। तीसरे, 'विश्रान्तिरूप चमत्कारपूर्ण प्रतीति' से उनका तात्पर्य यह है कि हम रसानुभूति में एक विलक्षण प्रकार की ऐसी अनुभूति प्राप्त करते हैं जिसमें एक ओर तो चमत्कृत होने जैसा आनन्द एवं दूसरी ओर विश्रान्ति (सभी मानसिक तनावों चिन्ताओं आदि के बोभ से मुक्ति) का सुख (जिसे संतुष्टि या शान्ति भी कह सकते हैं) मिश्रित रहता है। इस प्रकार उपयुक्त तीनों विशेषताओं को समन्वित करते हुए कहा जा सकता है कि आचार्य अभिनवगुप्त के अनुसार रसानुभूति एक ऐसी आनन्दानुभूति है, जिसमें कल्पना-शक्ति के प्रभाव, देशकाल के बन्धनों से मुक्ति का आस्वाद एवं चमत्कार पूर्ण विश्रान्ति का आनन्द मिश्रित रहता है। परवर्ती आचार्यों ने भी रसानुभूति के स्वरूप को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। इनमें रामचन्द्र गुणचन्द्र का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने रसानुभूति को सर्वत्र ही आनन्दानुभूति मानने के स्थान पर चामत्कारिक अनुभूति माना है। उनके विचार में करुण रस में आनन्द की अनुभूति नहीं होती अपितु दुःख की अनुभूति होती है। पर फिर भी उसमें कलाजन्य चमत्कार होने के कारण हमें आनन्दानुभूति का आभासमात्र होता है। आचार्य विश्वनाथ ने भी चमत्कार एवं चित्तविद्र ति को ही रस का सार मानते हुये रसानुभूति को चमत्कार जन्य आह लाद के रूप में स्वीकार किया।१

१. "लोकोत्तर चमत्कार प्राण ........ चमत्कारिश्चित्त विस्तार रूपो विस्मयापर- पर्य्याय :......... रसेसारश्चमत्कारः सर्वत्राप्यनुभूयते।" -साहित्य-दर्पण ३/३।४

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आधुनिक युग के अनेक आचार्यों ने रसानुभूति के स्वरूप पर पुनर्विचार किया है, जिनमें आचार्य, रामचन्द्र शुक्ल व डॉ० नगेन्द्र के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने रसानुभूति को सर्वथा लौकिक अनुभूति मानते हुए यहाँ तक कहा है कि काव्य और कला के आस्वादन से ही नहीं, व्यावहरिक जगत की विभिन्न प्रत्यक्षानुभूतियों से भी विशेष अवस्था में रसानुभूति की उपलब्धि सम्भव है। वह विशेष।अवस्था है-निवैयक्तिता। यदि किसी प्राकृतिक दृश्य या किसी घटना विशेष का आस्वादन हम निर्वैयक्तिक या तटस्थ होकर कर सकें तो वहाँ भी रसानुभूति सम्भव है। अतः उनके शब्दों में किसी भी माध्यम से प्राप्त 'हृदय की मुक्तावस्था' (-वैयक्तिक बन्धनों से मुक्त अवस्था) है रसानुभूति के विभिन्न आधारों का विश्लेषण करते हुए उन्होंने प्रत्यक्ष, स्मृत एवं कल्पित रूप-विधानों की चर्चा की है-जिससे यह प्रमाणित होता है कि उनके विचार से ये तीनों ही रसानुभूति प्रदान कर सकते हैं। फिर भी कला एवं काव्य में वे अधिक सम्भावना कल्पित रूप-विधानों या कल्पना शक्ति की प्रक्रिया में ही मानते हैं। कल्पना द्वारा ही भाव उद्वलित होते हैं-अस्तु, कल्पना का साधन रूप में एवं भाव का साध्य रूप में महत्त्व है।

आचार्य शुक्ल ने रसानुभूति की दो कोटियाँ भी निर्धारित की हैं; उच्चकोटि एवं मध्यम कोटि। उच्चकोटि की रसानुभूति के समय तो पाठक का काव्यगत आश्रय से तादात्म्य हो जाता है जिससे वह हृदय की मुक्त दशा का आनन्द प्राप्त करता है किन्तु मध्यम कोटि की रसानुभूति में काव्यगत आलम्बन के वैचित्र्य के कारण ऐसा नहीं हो पाता-वहाँ उसे आश्चर्यपूर्ण प्रसादन या आश्चर्यपूर्ण अवसादन अथवा कुतूहल मात्र की अनुभूति होती है, जो शुद्ध रसानुभूति न होकर उसकी आभास मात्र होती है। अस्तु, आचार्य शुक्ल के विचारानुसार रसानुभूति का स्वरूप सर्वथा लौकिक है; उसका साधन प्रत्यक्ष-बोध, स्मृति एवं कल्पना है, उसका स्तर भावात्मक होता है लौकिक भावानुभूति से उसका अन्तर केवल निर्वैयक्तिकता (वैयक्तिक सीमाओं से मुक्ति) का ही रहता है, किन्तु मध्यम कोटि की रसानुभूति में तो यह भी नहीं रहता। उससे आश्चर्य या कौतूहल की उद्दीप्ति होती है। डा० नगेन्द्र ने रसानुभूति के स्वरूप पर विस्तार से विचार करते हुए इन चार मतों की परीक्षा की है-(१) रसानुभूति ऐन्द्रिय-मानसिक आनन्द है। (२) वह आत्मिक आनन्द है। (३) काव्यानन्द (रसानुभूति) कल्पना का आनन्द है। (४) वह सभी प्रकार के लौकिक व आध्यात्मिक आनन्द से भिन्न एक विलक्षण प्रकार का निरपेक्ष आनन्द है। उन्होंने इनमें आंशिक सत्य ही स्वीकार किया है, अर्थात् रसानुभूति इन्द्रियों के माध्यम से उपलब्ध होती है किन्तु वह शुद्ध लौकिक

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ऐन्द्रिय संवेदनाओं से भिन्न भी है; इसी प्रकार उसे शुद्ध आत्मिक आनन्द या कल्पना का आनन्द भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि उसमें 'भाव की भूमिका भी अनिवार्यतः रहती है', कल्पना उसका माध्यम मात्र है। इसी प्रकार काव्यानुभूति की विलक्षणता एवं निरपेक्षता के सम्बन्ध में दिये गये विभिन्न तर्कों का खण्डन करते हुए वे लिखते हैं-' ... यह सिद्ध नहीं होता कि वह सामान्य जीवनगत अनुभव नहीं है-इस लोक का अनुभव नहीं है। उसमें ऐन्द्रिय तत्त्व है, बौद्धिक तत्त्व का भी एकान्त अभाव नहीं है और आत्मा के विश्वासियों के अनुसार आत्मानुभव का भी अस्पर्श नहीं है। इस अनुभव के स्वरूप का संघटन अन्य अनुभूतियों से भिन्न अवश्य है परन्तु उसके आधार-तत्त्व सर्वथा विलक्षण नहीं हैं।"२ इसके सम्बन्ध में उनका अपना निष्कर्ष यह है कि रसानुभूति प्रत्यानुभूति एवं स्मृतियों पर आधारित संवेदना के भावन के अनुरूप है। वे इसे न तो शुद्ध रूप में ऐन्द्रिय अनुभूति मानते हैं और न ही बौद्धिक। उनके शब्दों में "इसीलिए तो काव्यानुभूति में एक ओर ऐन्द्रिय अनुभूति की स्थूलता एवं तीव्रता (ऐन्द्रियता एवं कटुता) नहीं होती और दूसरी ओर बौद्धिक अनुभूति की अरूपता नहीं होती और इसीलिए वह पहले से अधिक शुद्ध परिष्कृत तथा दूसरी से अधिक सरस होती है।"३ डा० कृष्णदेवझारी ने भी निजी दृष्टिकोण से रसानुभूति का विवेचन करते हुए उदात्त भावानुभूतियों को ही रसानुभूति के रूप में स्वीकार किया है। उनके शब्दों में-'हमने आह लाद के मुख्य दो भेद किये हैं-एक इन्द्रियज आनन्द, जैसे रस-पान आदि, दूसरा मानसिक रागात्मक आनन्द। यह रागात्मक आनन्द ही काव्य का विषय है। इस रागात्मक आनन्द के भी दो भेद स्पष्ट रूप में प्रतीत हुए हैं एक केवल अनुरंजनकारी रागात्मक आनन्द जिसमें उदात्त भावानुभूतियों का विधान प्रायः नहीं होता .... रागात्मक आनन्द का दूसरा रूप उदात्त भावानुभूतियों का आनन्द। .... यही रस की सर्वश्रेष्ठ दशा होती है।" (रसशास्त्र और साहित्य समीक्षाः भूमिका) • निष्कर्ष इस प्रकार हम पाश्चात्य सौन्दर्य शास्त्रियों एवं भारतीय रसवादी आचार्यों के विचारों के आधार पर रसानुभूति के स्वरूप के 'सम्बन्ध में निम्नांकित निष्कर्ष प्रस्तुत कर सकते हैं- (क) प्रायः सभी भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों ने रसानुभूति का स्वरूप आनन्दात्मक ही स्वीकार किया है। रामचन्द्र गुणचन्द्र जैसे विचारकों ने इसके विपरीत रसानुभूति को दुःखात्मक भी माना है। किन्तु उनके मत को अपवाद रूप

२. रस-सिद्धान्त; पृ० सं० ११६ ३. 'रस-सिद्धान्त' : डॉ० नगेन्द्र; पृ० सं० १२०

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सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति : प्रकृति एवं स्वरूप १७१

में ही ग्रहण किया जाना चाहिए। इसके अतिरिक्त स्वयं रामचन्द्र गुणचन्द्र ने भी यह स्वीकार किया है कि करुण रस के आस्वादन में हमारी अनुभूति दुःखात्मक होती है, फिर भी उसमें चमत्कार के कारण आनन्द का आभास अवश्य होता है। इसका अर्थ है कि आनन्द के आभास को तो उन्होंने भी स्वीकार किया है। (ख) आनन्द के विभिन्न भेदों में से कुछ विद्वानों ने रसानुभूति में बौद्धिक आनन्द की प्रमुखता मानी है तो कुछ ने कल्पनाजन्य आनन्द की भी बात कही है। हमारे विचार में कलानुभूति में बुद्धि भावना एवं कल्पना-तीनों का ही योग रहता हैं। इतना अवश्य है कि कला विशेष की प्रकृति के अनुसार किसी रचना में भावना की प्रमुखता रहती है किसी में बुद्धि की और किसी में कल्पना की तथा इसी के अनुसार उनमें क्रमशः भावात्मक, बौद्धिक एवं कल्पनाजन्य आनन्द की प्रमुखता रहती है। (ग) कुछ विद्वानों ने रसानुभूति की अनेक कोटियाँ निर्धारित की हैं तो कुछ ने रसानुभूति में आनन्दानुभूति के स्थान पर आश्चर्य, कौतूहल, चमत्कार, औदात्य आदि की प्रधानता मानी है। ऐसा प्रतीत होता है कि जहाँ कलाकृति में भावना की प्रमुखता होती है वहाँ तो आनन्द की अनुभूति होती है किन्तु जहाँ कल्पना की प्रमुखता होती है वहाँ आश्चर्य, कौतूहल या चमत्कार की ही अनुभूति सम्भव है। इसी प्रकार बौद्धिक, नैतिक एवं उदात्त तत्त्वों की प्रमुखता होने पर उसमें औदात्य की भी अनुभूति मिश्रित रह सकती है। इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि सभी प्रकार की कलाकृतियों से एक ही स्तर की या एक ही प्रकार की अनुभूति सम्भव नहीं। अतः कलाकृतियों की प्रकृति के अनुरूप ही उनकी अनुभूति का भी स्तर-भेद किया जा सकता है। अतः हमारे विचार में उपयुक्त मत-भेद कलाकृतियों को प्रकृति एवं उनकी अनुभूति के स्तरभेद के ही द्योतक हैं। (घ) यह निर्विवाद रूप से स्वीकार किया जा सकता है कि रसानुभूति प्रत्यक्षानुभूति से भिन्न प्रकार की होती है। उसमें प्रत्यक्षानुभूति की अपेक्षा अधिक काल्पनिकता एवं अधिक स्वतन्त्रता रहती है। रसानुभूति में लौकिक भावनाएँ एक परिष्कृत, उदात्त एवं सौन्दर्यात्मक रूप प्राप्त कर लेती हैं। अन्त में हम कह सकते हैं कि सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति के स्वरूप के सम्बन्ध में पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्रीय एवं भारतीय आचार्यों के मतों में गहरी समानता परिलक्षित होती है-जहाँ उनमें परस्पर सूक्ष्म अन्तर भी है, वहाँ वे प्रायः एक-दूसरे के पूरक सिद्ध होते हैं। फिर भी भारतीय एवं पाश्चात्य विचारों को अन्तिम रूप में स्वीकार करने से पूर्व उन पर आधुनिक दृष्टि से भी पुनर्विचार अपेक्षित है। अतः उपयुक्त निष्कर्षों का उपयोग हम अन्यत्र स्वतन्त्र दृष्टि से रस के स्वरूप पर पुनर्विचार करते समय, इस प्रबन्ध के पाँचवें खण्ड में करेंगे। यहाँ. इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों द्वारा विभिन्न दृष्टियों से इतनी व्यापकता एवं गम्भीरता से विचार किया जाना ही इस विषय की महत्ता का सबल प्रमाण है।

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६ सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया

सौन्दर्य-शास्त्र एवं काव्य शास्त्र में जहाँ कलागत सौन्दर्य एवं तज्जन्य आनन्द के स्वरूप की मीमांसा सूक्ष्म रूप में हुई है, वहाँ सौन्दर्यानुभूति की प्रक्रिया का विश्लेषण भी गंभीरता पूर्वक किया गया है। विभिन्न सौन्दर्य-शास्त्रियों ने कला- स्वादन या सौन्दर्यानुभुति की प्रत्रिया के सम्बन्ध में अनेक सिद्धान्त स्थापित किये हैं तो भारतीय रस सैद्धान्तिक आचार्यों ने रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया का स्पष्टीकरण करते हुए विभिन्न मत प्रस्तुत किये हैं। यहाँ यह कहना अनावश्यक है कि जिस क्रिया को पाश्चात्य सौन्दर्य शास्त्र की शब्दावली में 'कलानुभूति', कलास्वादन या 'सौन्दर्यानुभूति कहा गया है, उसे ही रस-सिद्धान्त की शब्दावली में 'रसानुभूति', 'रस की अस्वादन प्रक्रिया' या काव्यानन्द की अनुभूति का नाम दिया गया है- यह विस्तार से अन्यत्र स्पष्ट किया जा चुका है ; अतः हम यहाँ सौन्दर्यानुभूति एवं रसानुभूति को पर्याय रूप में ग्रहण करते हुए क्र्मशः तत्सम्बन्धी सौन्दर्य-शास्त्रीय एवं रस-शास्त्रीय दृष्टिकोणों व सिद्धान्तों का अनुशीलन प्रस्तुत करेंगे और अन्त में उन पर तुलनात्मक व समन्वयात्मक दृष्टि से विचार करेंगे। • पाश्चात्य सौन्दर्य शास्त्रीय सिद्धान्त सौन्दर्य-शास्त्रियों ने सौन्दर्यानुभूति की प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए विभिन्न सिद्धान्तों की स्थापना की है, जिनमें नियवैक्तिकता का सिद्धान्त, रसानुभूति का सिद्धान्त, मानसिक अन्तराल का सिद्धान्त, भाव प्रेषण-सिद्धान्त, समन्वयात्मक सिद्धान्त आदि विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। इनका परिचय यहाँ क्रमशः संक्षेप में प्रस्तुत किया जाता है- (क) निवैयक्तिकता का सिद्धान्त-विभिन्न विचारकों के अनुसार रसानुभूति