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५ पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भाव-प्रेषण वादी मत
पाश्चात्य सौन्दर्य-शास्त्र एवं कला मीमांसा के क्षेत्र में अनेक विद्वानों ने कला व काव्य के लिए भावों के चित्रण या उनकी अभिव्यक्ति मात्र को पर्याप्त नहीं माना अपितु उनके लिए भावों का प्रेषण भी अनिवार्य सिद्ध किया। इन विद्वानों में टाल्सटाय रिचर्डस प्रमुख हैं। इनके तत्सम्बन्धी विचारों का परिचय यहाँ क्रमशः दिया जाता है। · टालस्टाय
सुप्रसिद्ध लेखक टालस्टाय (१८२८-१९१० ई०) ने अपनी कृति (कला क्या है?)' में अपने विचारों का प्रतिपादन करते हुए कला का मूल कार्य कलाकार द्वारा अनुभूत भावों को सामाजिक तक प्रेषित करना बताया है। उनके शब्दों में-'अपने अनुभूत भावों को उद्दीप्त करना और उन्हें किसी गति, पंक्ति, रंग ध्वनि या शब्दों के रूप-विशेष के माध्यम से इस प्रकार व्यक्त करना कि कलाकार की भावानुभूति अन्य लोगों तक प्रषित हो जाय तथा वे भी उसी अनुभूति का अनुभव कर सकें -यही कला का कार्य है।"२ इसीलिए कला की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि कला वह मानवीय करिया है जिसमें एक व्यक्ति सचेत रूप में विशिष्ट बाह्य
- 'What is Art ?' (अँग्र जी अनुवाद) 2. "To evoke in oneself a feeling one has once experienced and having evoked it in oneself then by means of movments, lines colours, sounds or forms expressed in words so to transmit that feeling that others experience the same feeling-this is the acti- vity of art." (what is Art ? page 123.)
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संकेतों के माध्यम से अपनी उन अनुभूतियों को जिन्हें निजी जीवन में अनुभूत किया है, दूसरों तक संक्रमित करता है, जिससे दूसरे लोग भी उन्हीं अनुभूतियों का अनुभव कर पाते हैं।' अतः कला किसी रहस्यात्मक दैवी विचार की अभिव्यक्ति या कोई कीड़ा-विशेष नहीं है, न ही केवल मानवीय भावों की अभिव्यक्ति है और नही केवल मनोरंजन की वस्तु है अपितु वह तो एक ऐसी वस्तु है जो दो भिन्न हृदयों को एक ही भावानुभूति के माध्यम से संयुक्त करती है। अस्तु, संक्षेप में कहें तो टालस्टाय के अनुसार भावों का प्रेषण ही कला है। भाव-प्रेषण की कोटियाँ-कला के माध्यम से होने वाले भाव-प्रेषण की प्रत्रिया का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए। टालस्टाय ने उसकी तीन कोटियाँ निर्धारित की हैं जिनसे किसी भी भावात्मक प्रेषण का मूल्यांकन किया जा सकता है। वे कोटियाँ इन तीनों गुणों पर आश्रित हैं-(१) वंयक्तिकता (२) स्पष्टता एवं (३) सत्यता। कला के द्वारा प्रषित भाव कलाकार की वैयक्तिकता या विशिष्टता से जितना अधिक संयुक्त होगा उतना ही वह अधिक सामाजिक को प्रभावित कर सकेगा, साथ ही उसकी अभिव्यक्ति की स्पष्टता भी इस प्रभाव की अभिवृद्धि में योग देगी। अतः प्रथम दोनों गुण महत्त्वपूर्ण हैं, किन्तु इनसे भी अधिक महत्त्वपूर्ण तीसरा गुण है- कलाकार की सत्यता। कलाकार द्वारा प्रषित भाव जितनी अधिक गम्भीरता से कलाकार की अनुभूति पर आश्रित होगा या जितनी अधिक ईमानदारी से उसे व्यक्त किया जायगा उतनी ही अधिक गहराई से वह पाठक के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकेगा। अतः अनुभूति की सत्यता या ईमानदारी को टालस्टाय ने सर्वाधिक महत्त्व प्रदान किया है। तादात्म्य एवं मुक्ति-भाव-प्रषण के प्रसंग में टालस्टाय ने कलाकार एवं पाठक के तादात्म्य एवं व्यक्तित्व की मुक्त दशा की चर्चा की है।१ कला के द्वारा भावों की उत्तेजना या अभिव्यक्ति ही पर्याप्त नहीं है अपितु उसके लिए भावों का प्रेषण भी अनिवार्य है-इस धारणा पर बल देते हुए उन्होंने भली-भाँति स्पष्ट किया है कि यदि पाठक या सामाजिक कलाकार की आत्मा से इतना अधिक संयुक्त हो जाता है कि दोनों में पूर्ण भावात्मक तादात्म्य स्थापित हो जाय तो उसी स्थिति में सच्ची कला का अस्तित्व स्वीकार किया जा सकता है। कला से कलाकार एवं सामाजिकों का व्यक्तित्व पृथकता की भावना से भी मुक्त हो जाता है। पृथकता एवं वैयक्तिक भिन्नता से मुक्त होकर एक व्यक्ति का दूसरे 3. "If a man is infected by the authors condition of soul. If he feels this emotion and this union with others than the object which has effected this is art.' (what is art)' page 227
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व्यक्ति से तादात्म्य स्थापित कर लेना हो कला की आकर्षण-शक्ति का सबसे बड़ा कार्य है।४ इस भाव-तादात्म्य के लिए यह आवश्यक नहीं है कि पाठक या सामाजिक कोई विशेष चेष्टा करे या अपने दृष्टिकोण व विचारों को बदले। अपितु सच्ची कला का तो गुण यही है कि बिना ऐसा किये ही दो भिन्न विचारधारा के व्यक्तियों में भी उससे भावात्मक तादात्म्य स्थापित हो जाता है। भावों की उत्कृष्टता एवं कला-कला के माध्यम से सभी प्रकार के भावों का संप्रषण किया जा सकता है। अतः टालस्टाय महोदय ने सामान्यतः देश-प्रेम, आत्म-त्याग, समर्पण, भक्ति, प्रणय, आश्चर्य, साहस, आनन्द, हास्य-व्यंग्य, निर्वेद, प्रशंसा आदि सभी को कला के लिए उपयुक्त माना है फिर भी वे इस विचार को व्यक्त किये बिना नहीं रहते कि भाव जितने अधिक उच्चकोटि के होंगे, कला भी उतनी ही अधिक उच्च होगी। कला की विषय-वस्तु भावानाएँ हैं, तथा ये भावनाएँ प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष में कला के गुणों के विकास या ह्रास में योग देती हैं। इसीलिए वे कला में ऐसे भावों या भावनाओं को प्राथमिकता देते हैं जो कि मानव जाति को ऊपर उठाने या उसका कल्याण करने में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। उनके विचार से विश्व-बंधुत्व, भ्रातृत्व भाव एवं प्रेम का संदेश देने वाली कला अपेक्षाकृत अधिक उच्च कोटि की मानी जायगी। इस प्रकार के व्यापक एवं उदात्त भावों पर आधा- रित कला को ही 'सार्वभौमिक कला' की संज्ञा दी जा सकती है। • टालस्टाय के मत की समीक्षा- भारतीय दृष्टिकोण से टालस्टाय के उपयुक्त्त विचारों की समीक्षा करते हुए कहा जा सकता है कि भाव-प्रषण वादी सिद्धान्त रस-सिद्धान्त के बहुत-कुछ अनुकूल है। कला के द्वारा भावों का प्रेषण, कलाकार एवं पाठक का तादात्म्य, सामाजिकों से भावानुभूति की एकता, वैयक्तिकता से मुक्ति आदि से सम्बन्धित विभिन्न धारणाएँ भारतीय रस वादियों की धारणाओं के अनुरूप हैं। भट्टनायक के भोग वाद में वैय- क्तिक अहं से मुक्ति एवं भावों के प्रषण को स्वीकार किया गया है तो आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने 'आत्मा की मुक्त दशा' को ही रस-दशा स्वीकार किया है। कला-
- A real work of art destroys in the consciousness of the recip- ient the seperation between himself and the artist and not that alone, but also betweeen himself and all whose minds receive the work of art. In this feeling of our personality from its separ- ation and isolation, in this uniting of it with others, lies the chief characteristic and the great attractive force of art 'What is Art ?' page 227
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कार एवं पाठक में भावात्मक तादात्म्य की बात को वैसे तो सभी रसवादी स्वीकार करते हैं किन्तु डॉ० नगेन्द्र ने इसे स्पष्ट रूप में मान्यता दी है। साधारणीकरण के प्रसंग में उन्होंने विस्तार से स्पष्ट किया है कि किस प्रकार काव्य के माध्यम से कलाकार की अनुभूतियों का साधारणीकरण हो जाता है तथा कलाकार और सामा- जिक के बीच तादात्म्य स्थापित हो जाता है। अस्तु, टालस्टाय के मत को भारतीय रस-सिद्धान्त का ही एक रूप कहा जा सकता है। अनेक दृष्टियों से टालस्टाय ने ऐसी भी स्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं जो भारतीय रस सिद्धान्त के लिए नूतन कहीं जा सकती हैं। कलाकार द्वारा व्यक्त भावनाएँ उसकी निजी अनुभूतियों पर आधारित हों तथा उन्हें पूर्ण ईमानदारी से व्यक्त किया जाय- इस बात पर भारतीय विचारकों ने बहुत कम बल दिया है। इसी प्रकार काव्यगत भावों का मूल्यांकन लोक-कल्याण की दृष्टि से भी प्रायः नहीं किया गया। आचार्य शुक्ल ने अवश्य आनन्द की साधनावस्था से सम्बन्धित लेख में मूल भाव या स्थायी भाव की व्यापकता को कला की उच्चता का आधार सिद्ध करते हुए टालस्टाय की तत्सम्बन्धी धारणाओं का खण्डन किया है; पर जहाँ तक निष्कर्ष की बात है टाल- स्टाय और शुक्ल के निष्कर्षों में अधिक अन्तर नहीं है। जिस बात का अनुमोदन टालस्टाय ने शुद्ध नीति के आधार पर किया है उसी का आचार्य शुक्ल ने मनो विज्ञान के आधार पर किया है, अर्थात् दोनों ही अन्ततः यह स्वीकार करते हैं कि भाव का आधार जितना अधिक व्यापक होगा उतना ही वह कला को अधिक उच्चता प्रदान कर सकेगा। अतः समग्र रूप में टालस्टाय की धारणाएँ भारतीय रस-सिद्धान्त के अनुरूप ही हैं-इसमें कोई संदेह नहीं।
· आई० ए० रिचड़ स- डा० आई० ए० रिचड् स ने अपने ग्रन्थ 'प्रिन्सिपल्स आफ् लिट्ररी क्रिटि- सिज्म' में काव्यास्वादन की प्रक्रिया का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए प्रतिपादित किया है कि काव्य का मूल उद्दश्य हमारी परस्पर विरोधी मनोवृत्तियों में सामंजस्य स्थापित करना है। इस उद्दश्य की पूर्ति भावात्मक प्रेषण द्वारा होती है इस सम्बन्ध में रिचर्ड् स के दो सिद्धान्त-प्रषणीयता का सिद्धान्त एवं रसास्वादन का सिद्धान्त- विशेषरूप से विचारणीय हैं। प्रषणीयता का सिद्धान्त-काव्य के माध्यम से कवि और पाठक के बीच भावात्मक तादात्म्य स्थापित होता है जिसे 'भाव-प्रषण' या 'संप्रेषण' की भी संज्ञा दी जाती है। प्रश्न है-इस प्रषणीयता से हमारा क्या तात्पर्य है ? क्या एक व्यक्ति के मन की कोई वस्तु दूसरे व्यक्ति के हृदय में पहुँच जाती है ? इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए रिचड्स ने स्पष्ट किया है कि प्रषणीयता कोई अद्भुत या रहस्यात्मक
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व्यापार नहीं है अपितु मन की एक सामान्य क्रिया मात्र है। उनके शब्दों में- "All that occurs is that, under certain conditions, separate minds have closely similar experiences" अर्थात् 'प्र षणीयता में जो कुछ होता है वह यह है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में विभिन्न मस्तिष्क प्रायः एक जैसी अनुभूति प्राप्त करते हैं।' कला एवं काव्य के लिए रिचड्स ने प्रेषणीयता को आवश्यक मानते हुए भी इस बात पर बल दिया कि कलाकार को इसके लिये विशेष प्रयत्न नहीं करना चाहिए। यदि कलाकार अपनी रचना को प्रेषणीय बनाने के लिए अपनी ओर से कोई विशेष चेष्टा करेगा तो इससे उसमें कृत्रिमता और अस्वाभाविकता आ जायगी जो कि कलात्मकता के लिए घातक है। इसलिए 'कलाकार जितना अधिक सामान्य या स्वाभाविक रूप में कार्य करेगा, अपनी अनुभूतियों के ठीक प्रकार से प्रस्तुतीकरण में वह उतना ही अधिक सफल होगा तथा उतने ही अधिक तदनुकूल भाव पाठक के मन में उत्पन्न होंगे।' अस्तु, रिचड् स के अनुसार भावानुभूतियों का सहज स्वाभा- विक रूप में प्रस्तुतीकरण ही भाव-प्रषण का मूल आधार है। रसास्वादन की प्रक्रिया-काव्यास्वादन या रसास्वादन की प्रक्रिया का भी सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए रिचड् स महोदय ने उसे छह क्रियाओं में विभक्त किया है-(१) मुद्रित (लिखित) शब्दों का नेत्रों के माध्यम से ग्रहण। (२) नेत्रों द्वारा प्राप्त संवेदनाओं से सम्बन्धित बिम्बों का ग्रहण (३) स्वतन्त्र बिम्बों का उदय (४) सम्बन्धित विभिन्न विषयों का बोध (५) भावानुभूति और (६) दृष्टिकोण का प्रभा- वित होना। इनमें से प्रथम चार क्रियाओं का सम्बन्ध तो काव्य के अर्थ-बोध की सामान्य प्रक्रिया से है जिनका लक्ष्य पाठक को भावानुभूति प्रदान करना है। किन्तु भावानु- भूति का भी महत्त्व अपने-आप में नहीं है अपितु उसका लक्ष्य पाठक के भावात्मक दृष्टिकोणों (Attitudes) को प्रभावित एवं उद्वलित करना है। भावों और भावात्मक दृष्टिकोणों में रिचर्ड्स ने लगभग वही अन्तर माना है जो भारतीय रसवादियों ने संचारी भावों एवं स्थायी भाव में माना है। दृष्टिकोण स्थायी भाव की ही भाँति स्थायी मनोवृत्ति का सूचक है जबकि भाव अपेक्षाकृत संचारी एवं क्षणिक अनुभूति है। फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि स्थायीभाव' एवं 'दृष्टिकोण' में कोई अन्तर नहीं है। स्थायी भावों की मूलाधार हमारी सहज प्रवृत्तियाँ (Instincts) हैं जबकि दृष्टिकोण बौद्धिक प्रवृत्तियों पर आधारित होते हैं। अस्तु, इस सूक्ष्म अन्तर के होते हुए भी रिचर्ड्स की उपयुक्त धारणाएँ भारतीय रस सिद्धान्त के अनुकूल हैं। काव्य में भावानुभुति की प्रधानता-काव्य में तथ्यों एवं विचारों की अभि- व्यक्ति के लिए अवकाश है पर फिर भी उनका महत्त्व गौण ही है। कविता में
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तथ्यों, विचारों एवं सिद्धान्तों का निरूपण अन्ततः भावानुभूति के लक्ष्य से ही होता है-इस धारणा पर बल देते हुए रिचर्डस महोदय ने लिखा है-" ........ the statement which appear in the poetry are there for the sake of their effect upon feelings, not for their own sake. Hence to challenge their truth or to question whether they deserve serious attention as statements, claiming their truth, is to mistake their function. The point is that many, if not most, of the statements in poetry are there as a means to the manipulation and expression of feelings and attitu- des not as contribution to any body of doctrine of any type whatever" (Practical Criticism : Page 184 ) अर्थात् जब कविता में किसी प्रकार से विचारों की अभिव्यक्ति होती है तो वहाँ वे भावों के प्रभाव के लिए होते हैं न कि स्वयं अपने लिए। अतः उनकी सत्यता को चुनौती देना या उन्हें सत्य के प्रतिपादक मान कर उन पर गंभीरता से विचार करना उनके मूल लक्ष्य को ही गलत समझना है। मूल बिन्दु यह है कि यदि अधिकतम नहीं तो अधिकांश विचार काव्य में भावों और दृष्टिकोणों की अभिव्यक्ति के निमित होते हैं-किसी सिद्धान्त विशेष के प्रति- पादक के रूप में नहीं-चाहे वह सिद्धान्त कैसा भी क्यों न हो।' अस्तु, इसमें कोई संदेह नहीं कि डॉ० रिचर्ड स काव्य में भावानुभूति की प्रमुखता स्वीकार करते हुए अप्रत्यक्ष में रसवादी धारणाओं का पोषण करते हैं। साथ ही उन्होंने भाव-प्रषण की सूक्ष्म मनौवैज्ञानिक एवं व्यावहारिक व्याख्या प्रस्तुत करके उसे स्पष्ट भी किया है। • रिचर्ड स के मत की समीक्षा भारतीय रस-सिद्धान्त की तुलना में डॉ० रिचर्डस का भाव-प्रेषण सिद्धान्त अधिक स्पष्ट, व्यावहारिक एवं मनोविज्ञान-सम्मत है। उन्होंने आधुनिक संदर्भ में काव्य-पाठन की प्रत्रिया का विश्लेषण करते हुए अर्थ-बोध, बिम्ब ग्रहण, भावानुभूति की प्रक्रियाओं को स्पष्ट किया है। अन्ततः उन्होंने भी भावानुभूति एवं भाव-प्रेषण को प्रमुखता देते हुए अप्रत्यक्ष में रस-सिद्धान्त की आधारभूत स्थापनाओं का अनुमोदन किया है, इतना अवश्य है कि उन्होंने विभाव, अनुभाव आदि अवयवों तथा साधा- रणीकरण एवं निवैयक्तिकता आदि की चर्चा स्पष्ट रूप में नहीं की, एक प्रकार से इनकी उपेक्षा करदी है, पर फिर भी उनकी स्थापनाएँ रससिद्धान्त के आधुनिकी- करण में बहुत सहायक सिद्ध हो सकती हैं। दूसरी ओर, भारतीय रस सिद्धान्त के आधार पर रिचर्डस की स्थापनाओं को भी और अधिक व्यापक रूप दिया जा सकता है, अतः निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि भारतीय रस सिद्धान्त एवं रिचर्ड स के तत्सम्बन्धी विचार एक-दूसरे के पूरक हैं। नि्ष्कष-अन्त में हम पाश्चात्य भाव-प्रेषणवादी विचार-धारा के दो प्रमुख विचारकों की महत्त्वपूर्ण धारणाओं को संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत कर सकते हैं-
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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भाव-प्रेषणवादी मत ११७
· कला एवं काव्य का मूल कार्य भावानुभूतियों का प्रेषण करना है। • ये भावानुभूतियाँ कलाकार या कवि के निजी जीवन की अनुभूतियों पर आधारित होती हैं। · 'भावात्मक प्रेषण' का अर्थ है-कवि एवं पाठक में एक जैसी अनुभूतियों का संचार। · कला जन्य भावात्मक प्रेषण में कवि एवं सामाजिक में परस्पर तादात्म्य स्थापित हो जाता है। • काव्यानुभूति या रसानुभूति में सामाजिक निवैयक्तिक रूप में अनुभूतियों का आस्वाद करता है। · रसानुभूति के लिए अपेक्षित आवश्यक गुण- (क) टाल्सटाय-अनुभूति की वैयक्तिकता, सत्यता एवं अभिव्यक्ति की स्पष्टता। (ख) रिचर्ड स-सहज स्वाभाविक अभिव्यक्ति। · कला के माध्यम से प्रषित भावों की व्यापकता पर ही कला की उच्चता निर्भर है। · कला में विचारों एवं सिद्धान्तों का स्वतंत्र महत्त्व नहीं, उनका लक्ष्य अनु- भूतियों एवं मनोवृत्तियों को उद्दीप्त एवं प्रभावित करना है। · मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रसास्वादन की प्रत्रियाएँ ये हैं-(१) अर्थबोध (२) बिम्बग्रहण (३) भावों की उद्दीप्ति (४) भावात्मक दृष्टिकोणों का उद्वलन। (५) कवि और पाठक में तादात्म्य स्थापित होना।
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तृतीय खंड रस-सिद्धान्त को सौन्दर्थ-शास्त्रीथ व्याख्या
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१ सौन्दर्य-शास्त्र : सामान्य परिचय
'सौन्दर्य-शास्त्र' आंग्ल भाषा के ईस्थेटिक्स' (Aesthetics) के पर्यायवाची के रूप में प्रचलित है तथा स्वयं 'ईस्थेटिक्स' का भी मूलाधार एक ग्रीक शब्द है जिसका अर्थ होता है-'एन्द्रिय बोध सम्बन्धी या संवेदना सम्बन्धी'। इस दृष्टि से 'सौन्दर्य-शास्त्र' शब्द 'ईस्थेटिक्स' का शुद्ध पर्याय नहीं है क्योंकि संवेदनाओं का क्षेत्र सौन्दर्यानुभूति के क्षेत्र से बहुत अधिक व्यापक होता है तथा बहुत सी संवेदनाए सौन्दर्यानुभूति के सर्वथा प्रतिकूल भी होती हैं। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि 'ईस्थेटिक्स' के पर्यायवाची के रूप में इस शब्द का प्रयोग क्यों किया जाता है तथा ऐसा करना कहाँ तक उचित है ? यदि हम 'ईस्थेटिक्स' का इतिहास देखें तो पता चलेगा कि अठारहवीं शताब्दी से पूर्व इस नाम के किसी शास्त्र-विशेष का अस्तित्व कहीं भी नहीं था। इस नाम से एक नये एवं स्वतन्त्र शास्त्र की स्थापना करने का श्रेय जर्मन विद्वान् बामगार्टन (१७१४-१७६२ ई०) को है। उनसे पूर्व सौन्दर्य की विवेचना दर्शन- शास्त्र के अन्तर्गत ही होती थी, किन्तु दर्शन के क्षेत्र में सत्य को सौन्दर्य से अधिक महत्त्व दिया जाता था। बामगार्टन से पूर्व प्रसिद्ध दर्शनवेत्ता स्पाइनोजा ने ज्ञान के दो भेद करते हुए, एक को तर्क-सम्मत ज्ञान एवं दूसरे को ऐन्द्रिय ज्ञान कहा। इनमें से प्रथम का सम्बन्ध सत्य से है जबकि दूसरे का सौंदर्य से। स्पाइनोजा तथा उसके अनुयायियों ने ज्ञान के इस दूसरे भेद-सौंदर्य को, 'अस्पष्ट', 'अनिश्चित; 'धुँधला आदि बताते हुए इसका तिरस्कार किया जो कि बामगार्टन जैसे सौंदर्योपासकों को सह्य नहीं था। अतः सौंदर्य को उचित महत्त्व प्रदान करने के लक्ष्य से ही एक स्वतन्त्र विषय की स्थापना का प्रस्ताव प्रस्तुत किया गया। यह प्रस्ताव उस युग के सौंदर्य-चिन्तकों के लिए इतना अधिक मनोनुकूल था कि उन्होंने इस नाम के औचित्य
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१२२ रस-सिद्धान्त का पुर्नविवेचन
पर अधिक विचार किये बिना ही तुरन्त स्वीकार कर लिया-और इस प्रकार एक नये विषय की स्थापना हो गई। बामगार्टन के मतानुसार ईस्थेटिक्स 'ऐन्द्रिय बोध का विज्ञान' है जिसमें संवेदनाओं का विश्लेषण होता है।' उसका सम्बन्ध 'अस्पष्ट ज्ञान' से है-'अस्पष्ट ज्ञान' वह ज्ञान है जो संवेदनाओं के रूप में प्राप्त होता है, जिसे शब्दों में ठीक-ठीक प्रस्तुत करना संभव नहीं।" यद्यपि यह परिभाषा नामकरण के अनुरूप ही है किन्तु वास्तव में 'ईस्थेटिक्स' के अन्तर्गत सौंदर्य सम्बन्धी संवेदनाओं का ही विवेचन एवं विश्लेषण अधिक किया जाता है-शेष प्रकार की अनुभूतियों एवं संवेदनाओं को प्रायः उसके क्षेत्र से बाहर रखा जाता है। इसी तथ्य को देखते हुए आगे चलकर हीगल ने स्पष्ट किया कि 'ईस्थेटिक्स केवल ललित कलाओं का दर्शन मात्र है। ललित कलाओं का भी सामान्य गुण सौंदर्य माना जाता है तथा इस शास्त्र की विवेचना करने वाले विद्वान् प्रायः सौंदर्य-मीमांसा को ही अपना लक्ष्य मानकर चलते रहे हैं।'3 इससे भी यह समझा जाने लगा कि इस शास्त्र का मुख्य विषय सौंदर्य ही है। ईस्थेटिक्स के इसी विकसित अर्थ को ध्यान में रखते हुए प्रसिद्ध सौंदर्य-शास्त्री श्री बोसाँके महोदय ने स्पष्ट रूप में स्वीकार किया था-'ईस्थेटिक्स का तात्पर्य है सौंदर्य-दर्शन।5 अस्तु, अब सामान्यतः बोसाँके के मत को ही मान्यता दी जाती है। उदाहरण के लिए हम यहाँ एक नवीनतम मत उद्धृत कर सकते हैं, जिसके अनुसार 'ईस्थेटिक्स ज्ञान की वह शाखा है जिसका मुख्य कार्य यह खोजना है कि सौन्दर्य का वास्तविक अर्थ क्या होता है। इसका सम्बन्ध सौंदर्य सम्बन्धी धारणाओं के तर्कबद्ध विवेचन, कलाओं के विशिष्ट तत्त्वों के विश्लेषण एवं सौन्दर्य सम्बन्धी समस्त निर्णयों के लिए उपयुक्त सिद्धान्तों के निर्धारण से है।" इससे स्पष्ट है कि 'ईस्थेटिक्स' शब्द का मूल अर्थ यद्यपि भिन्न है, किन्तु प्रचलित अर्थ में उसे 'सौंदर्य-शास्त्र' का ही पर्यायवाची मानना उचित है। (२) सौन्दर्य-शास्त्र का क्षेत्र-'सौंदर्य-शास्त्र' नाम से यह धारणा उत्पन्न होती है कि इसके क्षेत्र में सभी प्रकार का सौंदर्य आता होगा किन्तु वस्तुतः ऐसा
- History of Aesthetic : Bosanquet, Page 183 2. Western Aesthetices : K. C. Pandey, Page 287 3. The same, Page 2. 4. History of Aesthetic : Bosanquet, Page 3. 5. "Aesthetic is that branch of Knowledge whose function is to investigate what to be asserted when we write or talk correctly about beauty. It is concerned logically to elucidate the notion of beauty as the distinguishing feature of works of art and to propound the valid principles which underlie all aesthetic judge- ments."-"Harold osborne : Aesthetics & Criticism, Page 24.
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सौन्दर्य-शास्त्र : सामान्य परिचय १२३
नहीं है। निःसन्देह सौन्दर्य-शास्त्र प्रकृति और शिल्प के विभिन्न उपादानों में सौन्दर्य की सत्ता स्वीकार करता है किन्तु वह अपना सम्बन्ध केवल ललित कलाओं तक ही सीमित रखता है। सौन्दर्य-शास्त्रियों ने इस तथ्य को स्पष्ट रूप में स्वीकार करते हुए इसके पक्ष में अनेक तर्क दिये हैं। एक तो उनका कहना है कि प्रकृति के विभिन्न रूपों और क्रिया-कलापों का अध्ययन करना सौदर्य-शास्त्र का नहीं-भौतिक विज्ञान का कार्य है। दूसरे, सौन्दर्य-शास्त्र की परिधि में केवल वे ही रूप आ सकते हैं जो मानव के द्वारा अनुभूत होकर लिपिबद्ध रूप में सुलभ हो गये हों। दूसरे शब्दों में सौन्दर्य-शास्त्र प्रकृति एवं बाह्य जगत् का अध्ययन सीधे रूप में और उनके प्रकृत रूप में न करके कलाओं के माध्यम से उनके संवेदित रूप का ही अध्ययन करता है। सौन्दर्य-शास्त्र के आधार-भूत ग्रन्थों को देखने से भी यह स्पष्ट है कि उनमें सौंदर्य के नाम पर विभिन्न कलाओं की ही-या कलागत सौंन्दर्य की ही मीमांसा हुई। यदि उनमें प्रकृति के सौन्दर्य की कहीं चर्चा हुई भी है तो वह कलागत सौन्दर्य के प्रसंग में-उसी की मीमांसा के साधन-रूप में हुई है। अतः इस दृष्टि से सौन्दर्य-शास्त्र- केवल कला-शास्त्र ही है, और कलाओं में भी केवल ललित कलाओं से ही उसका सम्बन्ध है। इतना ही नहीं ललित कलाओं के भी केवल एक ही पक्ष-सैद्धान्तिक या दार्शनिक पक्ष तक ही उसका सम्बन्ध माना जाता रहा है। कलाओं के व्यावहारिक पक्ष-उनकी रचना के विधि-विधानों एवं तत्सम्बन्धी अन्य विशिष्ट नियमों-से सौन्दर्य शास्त्र को स्वथा असंपृक्त बताया जाता रहा है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए बोसाँके महोदय ने लिखा था-सौन्दर्य-शास्त्र दर्शन की एक शाखा है, उसकी सत्ता ज्ञान के निमित्त है, उससे व्यावहारिक पथ-प्रदर्शन की आशा नहीं रखनी चाहिए।' अस्तु सही अर्थ में सौन्दर्य-शास्त्र को, 'सौन्दर्य-शास्त्र' भी नहीं, 'कला शास्त्र' भी नहीं, अपितु 'कला-दर्शन' कहना चाहिए। बीसवीं शती तक आते जाते 'सौन्दर्य-शास्त्र' के भाग्य ने पुनः पलटा खाया। जब तक यह शास्त्र दार्शनिकों के आश्रय में था 'दर्शन' बना रहा किन्तु अब वैज्ञानिकों की कृपा-दृष्टि से पुनः इसका रूप-परिर्वन होने लग गया है। दार्शनिक लोग कलाओं के सामान्य तत्त्वों पर विचार करते थे, जबकि इस शती के विद्वान् वैज्ञानिक दृष्टि से विभिन्न कलाओं के विभिन्न पक्षों का स्वतन्त्र रूप से विश्लेषण करने में संलग्न हैं। समन्वयात्मकता से विश्लेषणात्मकता की ओर अग्रसर होने के कारण पुनः उसका रूप शास्त्रीय एवं व्यावहारिक होता जा रहा है, अब वह केवल ज्ञान- पिपासा की शान्ति का ही साधन-मात्र नहीं, कलाओं की सृष्टि, व्याख्या, आलोचना एवं अनुभूति की प्रक्रियाओं का भी सहयोगी बन गया है। दूसरी ओर अब सौन्दर्य का अर्थ सौंदर्य न रहकर-'मूल्य' हो गया है, अतः नये दृष्टिकोण से इसे 'मूल्यों की मीमांसा करने वाला विज्ञान' भी समझा जाने लगा है। अस्तु, अब तक की प्रगति के आधार पर उसे 'सौंदर्य-दर्शन' 'सौंदर्य-शास्त्र' एवं 'सौंदर्य-विज्ञान'-तीनों की संज्ञा दी जा सकती है।
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१२४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
(३) सौन्दर्य-शास्त्र का विकास-क्र्म-यद्यपि 'सौन्दर्य-विज्ञान' की स्थापना अठारहवीं शती में ही हुई है किन्तु इसके अन्तर्गत उन सब पूर्ववर्ती दार्शनिकों, साहित्याचार्यों एवं कला-मीमांसकों को भी स्थान दिया जाता है जिन्होंने किसी न किसी रूप में कलागत सौन्दर्य की समस्या पर विचार किया है। यही कारण है कि सौन्दर्य-शास्त्र का इतिहास यूनानी चिन्तन के आरम्भ से-सुकरात और प्लेटो के भी पूर्व युग से प्रारम्भ होता है। किसी नये विषय को भी परम्परागत चिन्तन से सम्बद्ध करके उसे किस प्रकार व्यापक बनाया जा सकता है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण सौन्दर्य-शास्त्र का इतिहास है। सौन्दर्य-शास्त्र के लगभग पच्चीस सौ वर्षों के इतिहास में सहस्राधिक विद्वानों के विभिन्न मंतव्यों का विवेचन उपलब्ध होता है। इन सबका परिचय यहाँ दिया जाना संभव नहीं है, अतः हम यहाँ सौन्दर्य-शास्त्र के कुछ प्रमुख वादों की ही संक्षिप्त रूप-रेखा प्रस्तुत करते हैं। (४) सौन्दर्य-शास्त्र के प्रमुखवाद-सौन्दर्य-शास्त्र की मूल समस्या सौन्दर्य के स्वरूप की व्याख्या करना रही है। इस सम्बन्ध में विभिन्न विद्वानों ने विभिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किये हैं जिन्हें हम मुख्यतः इन सात वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-(१) अध्यात्मवादी दृष्टिकोण (२) उपयोगिता वादी दृष्टिकोण (३) बुद्धिवादी दृष्टिकोण (४) भाववादी दृष्टिकोण (५) रूपवादी दृष्टिकोण (६) साहर्चयवादी दृष्टिकोण (७) मूल्य वादी दष्टिकोण। यहाँ इनका क्रमश; परिचय दिया जाता है। • अध्यात्मकवादी दृष्टिकोण सौन्दर्य की अध्यात्मवादी दृष्टिकोण से व्याख्या करने वाले पाश्चात्य विद्वानों में से प्लेटो, प्लाटिनस, हीगल आदि का नाम उल्लेखनीय है। प्लेटो ने विश्व के समस्त सौन्दर्य को मूलतः ईश्वर का रूप बताते हुए सौन्दर्यानुभूति को एक दिव्य अध्यात्म-साधना के समक्ष महत्त्व प्रदान किया। उनके विचार से विभिन्न शास्त्रों
६. यह परिचय मुख्यतः इन ग्रन्थों के आधार पर दिया जा रहा है- 1. A History of Aesthetics : Bosanquet. 2. A Hitsory of Esthetics : Gilbert & Kuhn. 3. Western Aeshetics : K. C. Pandey. 4. The Theory of Beauty : E. F. Carritt. 5. An Introduction to Aesthetics : E. F. Carritt 6. An Introduction to Aesthetics ; Hunter Mead. 7. The Quest for Beauty : J. L. Jarrett. 8. The Sense of Beauty : George Santayana. 9. The Principles of Art : R. G. Collingwood.
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सौन्दर्य-शास्त्र : सामान्य परिचय १२५
के गम्भीर अध्ययन एवं मनन से विकसित एक विशेष प्रकार की मानसिक शक्ति से ही हम सौन्दर्य का बोध कर सकते हैं। यद्यपि सौन्दर्य-बोध की यह अपूर्व क्षमता तर्क-बद्ध अध्ययन से उदित होती है फिर भी वह तर्क से शून्य होती है-सौन्दर्य तर्क-गम्य नहीं, अनुभूति गम्य है। अतः अन्य विषयों की तरह से सौन्दर्यानुभूति को हम शब्दों में अभिव्यक्त नहीं कर सकते। सौन्दर्यानुभूति के अनन्तर द्रष्टा का हृदय इस प्रकार ज्योतित हो उठता है कि उसे अखिल जगत का सौन्दर्य किसी एक ही सौन्दर्य-पुज से संबंधित दिखाई देने लगता है और विभिन्न सुन्दर वस्तुओं का स्थूल भेद उसके लिए नगण्य हो जाता है।" इस प्रकार प्लेटो ने सौन्दर्य के नाम पर सूक्ष्म- सौन्दर्य की मीमांसा की है, जिसका सम्बन्ध केवल रहस्यवादियों से ही है। सौन्दर्य- शास्त्र का विषय अलौकिक सौन्दर्य नहीं-लौकिक सौन्दर्य है, जिससे प्लेटो के विवेचन का बहुत कम सम्बन्ध है। आगे चलकर प्लॉटिनस (२०४-२६९ ई०) ने प्लेटो की ही विचार-धारा को आगे बढ़ाते हुए ईश्वर को ही सौन्दर्य का मूलाधार घोषित किया। भौतिक पदार्थों में हमारी आत्मा जिस सौन्दर्य का अन्वेषण करती है वह वस्तुतः उसके पूर्व संस्कारों का ही परिणाम है। लौकिक स्तर पर आकर हमारी आत्मा का परमात्मा से सम्बन्ध- विच्छेद हो जाता है-या यों कहिए कि उस महान सौन्दर्य-पुज से वह दूर आ जाती है, फिर भी वह अपने उस पुरातन अनुभव को सर्वथा भूल नहीं पाती ; उस ज्योतित- स्वरूप के पुनः साक्षात्कार के लिये ही वह इस जीवन में भटकती रहती है। इस प्रकार ईश्वर के रूप की प्यास ही सौन्दर्य की प्यास है या सौन्दर्य की प्यास ही ईश्वर से मिलने की प्यास है। इस प्रकार प्लाटिनस सौन्दर्य का सम्बन्ध ईश्वर से स्थापित करते हुए बहुत कुछ प्लेटो का ही अनुसरण करता है किन्तु वह कलाकृतियों की मीमांसा करते समय प्लेटो से भी एक कदम आगे बढ़ जाता है। प्लेटो ने जहाँ कलागत सौन्दर्य को हमारी वासनाओं को उभारने वाला मिथ्या सौंन्दर्य बताकर उसका तिरस्कार किया था, वहाँ प्लाटिनस ने कलागत सौन्दर्य को भी आध्यात्मिक सौन्दर्य से ही सम्बन्धित करने का प्रयास किया। कला में सौन्दर्य का आधार उसके स्थूल उपकरणों एवं भौतिक तत्त्वों में निहित नहीं है अपितु उस सूक्ष्म आत्मा में निहित है जिसे कलाकार प्रस्तुत करता है। दूसरे शब्दों में-मूर्त्ति या चित्र में कलाकार अपनी आत्मा को ढालता है और आत्मा का वही स्पर्श कला का सौन्दर्य है। मूत्ति को जो रूप कलाकार प्रदान करता है वही उसका सौन्दर्य है। दर्शकों या सामाजिकों के हृदय भी परस्पर आत्मिक एकता के सूत्र में गूथे हुए हैं-अतः जब हम कला के रूप में कलाकार की आत्मा की छवि देखते हैं तो गद्-गद् हो उठते हैं। मृत व्यक्ति की अपेक्षा जीवित में अधिक सौन्दर्य होता है, उसका कारण भी यह आत्मिक सम्बन्ध ही है। अस्तु, प्लाटिनस सृष्टि और कलाओं के समस्त सौन्दर्य को इसी आत्मिक सम्बन्ध पर आधारित मानते हुए उसे परम-तत्त्व का ही रूप सिद्ध कर देता है।
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१२६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
आधुनिक युग में सौन्दर्य की पुनः अध्यात्मपरक व्याख्याएँ प्रस्तुत करने वाले विचारकों में विल्हेन जोसेफ शिलिंग (१७७५-१८५४) एवं हीगल (१७७०-१८३१) का नाम उल्लेखनीय है। शिलिंग ने सृष्टि एवं कलाओं के सौन्दर्य को ईश्वर के रूप से अभिन्न बताया। उसके विचार से स्वयं सृष्टि भी ईश्वर की एक कला है। कलाओं में भी शाश्वत नियमों एवं चिरन्तन सत्य का ही चित्रण होता है तथा सत्य भी ईश्वर का एक रूप है ; इस प्रकार कलाओं का ईश्वर से गहरा सम्बन्ध है, इतना ही नहीं, ईश्वर ही कलाओं का प्रेरक एवं तात्कालिक कारण है। जार्ज फ्रेडरिख विल्हेम हीगल (१७७०-१८३१) ने दर्शन की द्वन्द्वात्मक-पद्धति के आधार पर सौन्दर्य की मीमांसा की। उसके विचार से परम तत्त्व के बोध के तीन साधन हैं-कला, धर्म एवं दर्शन। कलाओं में हम ऐन्द्रियक माध्यम से ईश्वर की अनुभूति प्राप्त करते हैं। उनके विचार से कला और सौन्दर्य में परस्पर अन्तर है- कला यदि ईश्वरानुभूति का माध्यम मात्र है जबकि सौन्दर्य स्वतः ही ईश्वर का रूप है। उसके शब्दों में "The sensuous object through which the absolute shines is beautiful. Beautiful object addresses itself to the senses as well as the mind" जिस ऐन्द्रियक वस्तु के माध्यम से परमतत्व प्रकाशित होता है वही सुन्दर है। सुन्दर वस्तु स्वतः ही हमारी इन्द्रियों एवं मस्तिष्क को आकर्षित कर लेती है। किन्तु यहाँ यह ध्यान रहे, हीगल सौन्दर्य की पूर्ण प्रतिष्ठा केवल कला में ही मानता है। उसके विचार से प्रकृति भी सौन्दर्य की ओर अग्रसर है, जबकि उसकी उपलब्धि कला में ही होती है। अतः कहना चाहिए कि हीगल के अनुसार कलागत सौन्दर्य में ही परमतत्व की सत्ता होती है। · उपयोगितावादी दृष्टिकोण प्राचीन एवं आधुनिक युग के अनेक विचारकों ने सौन्दर्य की समाजपरक व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हुए उसे नैतिकता एवं उपयोगिता से सम्बद्ध करने का प्रयास किया। यूनानी दार्शनिक सुकरात के विचार से किसी वस्तु की उपयोगिता में ही उसका सौन्दर्य निहित है, इसीलिए उसने कहा था-"एक गोबर से भरी हुई टोकरी भी सुन्दर कही जा सकती है यदि उसका कोई उपयोग हो, अन्यथा उपयोग की दृष्टि से अपूर्ण होने पर एक चमचमाती हुई स्वर्ण-घटित ढाल भी असुन्दर मानी जावेगी।" आगे चलकर अठारहवीं, उन्नीसवीं शती में भी अनेक विचारकों ने सौन्दर्य को सामाजिक हित से सम्बद्ध किया। एडमंड बर्क (१७२९-१७६७) ने सौन्दर्य की परिभाषा करते हुए कहा "I call beauty a social quality" अर्थात 'मैं सौन्दर्य को एक सामाजिक गुण मानता हूँ। इतना ही नहीं, उसने सौन्दर्य का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करते हुए उसे हमारी सामाजिक वृत्तियों पर आधारित सिद्ध किया' उसके विचार से हम सौन्दर्य का आस्वादन सहानुभूति, अनुकरण एवं आत्म-विस्तार
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की मनोवृत्तियों से करते हैं और ये तीनों ही प्रवृत्तियाँ सामाजिक वृत्ति (Social Instinct) पर आधारित हैं। जान रस्किन (१८१९-१९००) ने एक ओर तो कलागत सौन्दर्य को ईश्वर के दिव्यगुणों से सम्बन्धित माना, तो दूसरी ओर उसने यह भी स्पष्ट किया कि ईश्वर के गुण नैतिक गुण हैं-अत; नैतिकता को ही सौन्दर्य की आधार-शिला माननी चाहिए। विक्टर कजन (१७९२-१८६७), जाफ्ाय (१७९६-१८४२) लापराडे (१८१२- १८८३), कामते (१७८९-१८५७) आदि ने कलाओं को अकेले व्यक्ति की सृष्टि न मानकर समाज की उपज मानते हुए कलागत सौन्दर्य को सामाजिक दृष्टिकोण की देन के रूप में स्वीकार किया। काडवेल ने साम्यवादी दृष्टिकोण से सौन्दर्य की मीमांसा करते हुए प्रतिपादित किया कि देश और काल-भेद के अनुसार सौन्दर्य सम्बन्धी धारणाओं में भी परिवर्तन होता रहता है, अतः कहना चाहिए कि सौन्दर्य सामाजिक परिस्थितियों एवं दृष्टिकोण पर आधारित होता है। यही कारण है कि विभिन्न समाज की सौन्दर्य सम्बन्धी धारणाए होती हैं। · बुद्धिवादी दृष्टिकोण कुछ विद्वानों ने सौन्दर्य को बुद्धि, विचार या सत्य के प्रतिरूप के रूप में भी ग्रहण किया है। सैंट थामस (१२२७-१२७७) के विचार से "ऐन्द्रियक माध्यम से तर्क की अभिव्यक्ति ही सौन्दर्य है।" इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए लॉक (१६३२- १७०४) ने प्रतिपादित किया कि सौन्दर्य वह मिश्रित विचार है जो कि मिश्रित ढंग से प्रस्तुत किया जाता है। उसके दृष्टिकोण के अनुसार विचार दो प्रकार के होते हैं-सरल और मिश्रित। इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त विचार सरल विचार होते हैं जबकि प्राप्त एवं अप्राप्त सरल विचारों के पारस्परिक संयोग के उद्भूत विचार मिश्रित विचार होते हैं। इस प्रकार सभी मिश्रित विचार सरल विचारों से ही निर्मित होते हैं। इन मिश्रित विचारों की भी तीन श्रणियाँ की गई हैं-(१) रूप (Modes) (२) वस्तु (Substance) (३) सम्बन्ध। रूप सूचक विचारों के भी दो उपभेद किये गये हैं-सरल रूप एवं मिश्रित रूप। यह 'मिश्रित रूप' ही सौन्दर्य है। इस प्रकार लॉक के विचार से सौन्दर्य एक मिश्रित विचार है जो कि मिश्रित रूप से उत्पन्न होता है-या यों कहिये कि वह विभिन्न प्रकार के काल्पनिक विचारों के मेल से उत्पन्न होता है। कलागत सौन्दर्य न तो किसी बाह्य वस्तु के सदृश होता है और न ही सर्वथा मौलिक सृष्टि। काँट (१७२४-१८०४) ने बुद्धि के तीन रूप बताये-(१) शुद्ध बुद्धि (२) व्यावहारिक बुद्धि (३) निर्णयात्मक बुद्धि। शुद्ध बुद्धि से जहाँ सत् का ज्ञान होता है, वहाँ व्यावहारिक बुद्धि हमें औचित्य की ओर ले जाती है। शुद्ध बुद्धि 'क्या है ?' का
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उत्तर देती है तो व्यावहारिक बुद्धि 'क्या होना चाहिए ?' का निर्णयात्मक बुद्धि इन दोनों से समन्वित होती है; सौन्दर्य का सम्बन्ध इसी से है। इस प्रकार सौन्दर्य की मीमांसा करते हुए काँट इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि "स्वच्छन्द कल्पना द्वारा प्रस्तुत वह विचार जो और अधिक चिन्तन को प्रवाहित करता है- सौन्दर्य है।" · भाववादी दृष्टिकोण सौन्दर्य-शास्त्र के क्षेत्र में भावपरक दृष्टिकोण को लेकर चलने वाले विद्वानों की संख्या बहुत अधिक रही है-किन्तु इन्होंने प्रायः कलागत सौन्दर्य को ध्यान में रख कर ही अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। इन भाव-परक व्याख्याओं को भी दृष्टिकोण-भेद के आधार पर चार वर्गों में विभाजित कर सकते हैं-(१) भावोद्दीप्ति वादी दृष्टिकोण (२) भावालम्बन वादी दृष्टिकोण (३) भावाभिव्यक्ति वादी दृष्टिकोण (४) भाव-प्र षणवादी दृष्टिकोण। वस्तुतः भाववादी सभी दृष्टिकोणों का भारतीय रस-सिद्धान्त से गहरा साम्य है, अतः इन सबका विस्तृत अध्ययन पीछे 'रससिद्धान्त की पाश्चात्य परंपरा' के अन्तर्गत किया जा चुका है-अतः यहाँ इनकी पुनरावृत्ति अनावश्यक होगी। • रूपवादी दृष्टिकोण विभिन्न विद्वानों ने वस्तुओं के विभिन्न रूपगत तत्वों को सौंन्दर्य का आधार मानकर अपने विचार प्रस्तुत किये हैं। प्राचीन विद्वान् अरस्तू ने सौन्दर्य की मीमांसा करते हुए उसे तीन तत्त्वों पर आधारित माना है-(१) सम्मात्रा (Symmetry) (२) व्यवस्थित क्रम ( Orderly arrangement) (३) निश्चित आकार (Certain magnitude)। होगार्थ ने अपने ग्रन्थ 'एनेलेसिस आफ् ब्यूटी' में सौन्दर्य के छह उपादान स्थिर किये हैं-(१) वस्तु की उपयुक्तता (Fitness) (२) विभिन्नता (Variety) (३) सम्मात्रा (Symmetry) (४) स्पष्टता (Distinctiveness) (५) जटिलता (Intricacy) और (६) विशालता (Magnitude)। बर्क महोदय ने अपने एक लेख में आकार-सूक्ष्मता, मसूणता, कोमलता, वर्ण-दीप्ति, शुद्धता आदि में सौन्दर्य का अस्तित्व बताया तो दूसरी और क् साज के विचार से सौन्दर्य का निवास वैचित्र्य, एकत्व, समता व्यवस्था, अनुपात आदि गुणों में हैं। बर्कले ने सम्मात्रा (Symmetry) और अनुपात (Proportion) में सौन्दर्य का अस्तित्व माना। आधुनिक युग में पार्कर ने कलागत रूप की व्याख्या करते हुए सामंजस्य, कम, अनुपात, आवयविक संगठन आदि तत्वों पर विशेष बल दिया है। इस प्रकार रूपवादियों ने विभिन्न रूपगत विशेषताओं में ही सौन्दर्य का अस्तित्व सिद्ध किया है।
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सौन्दर्य-शास्त्र : सामान्य परिचय १२९
· साहचर्यवादी दृष्टिकोण कतिपय विद्वानों ने सौन्दर्य का सम्बन्ध व्यक्ति की आदत, या संस्कार आदि से सिद्ध किया। पिअर बफियर के अनुसार प्रत्येक जाति के प्राणियों की सुन्दरता का एक-एक आदर्श होता है। जो बात सब जातियों की रूप-आकृति में सामान्य रूप से पाई जाती है वही उस जाति के सौन्दर्य की आदर्श हो जाती है। सर जे० रेनाल्डस ने भी बफियर के सिद्धान्तों से ही मिलता-जुलता आदत का सिद्धान्त प्रतिपादित किया। उनके विचारानुसार हमें जिन वस्तुओं को जिन रूपों में देखने की आदत पड़ गई, वही उस वस्तु का सौन्दर्य माना जाने लगा। हम मनुष्य के चेहरे पर तीखी नाक और पतले ओठों को सदा से देखते आये हैं अतः वे हमारे लिए सुन्दरता के आदर्श बन गये हैं; यदि मनुष्य जाति के चेहरे पर सदा से नाक न होती या उसका चेहरा गोल के स्थान पर चौकोर होता तो आज हम उसी में सौन्दर्य मानते। एलिसन ने साहचर्य-नियम के आधार पर सौन्दर्य की व्याख्या की। उनके विचार से हमारे मन पर आनन्द प्रदायी वस्तुओं के संस्कार संचित रहते हैं। किसी वस्तु के देखने पर उससे संस्कारों के रूप में संचित आनन्द जाग्रत हो जाता है। उदाहरण के लिए जब हम किसी प्राचीन दुर्ग को देखते हैं तो उस दुर्ग से सम्बन्ध रखने वाले कई प्राचीन युद्धों की स्मृति आ जाती है जिसके फल- स्वरूप हमें सौन्दर्य का बोध होता है। अस्तु इस वर्ग के विद्वानों के विचार से सौन्दर्य का अस्तित्व हमारे साहचर्यजन्य संस्कारों में है। · मूल्यवादी दृष्टिकोण आई० ए० रिचर्ड् स, हंटरमीड, जैरिट्ट आदि विद्वानों ने सौन्दर्य की मूल्यपरक व्याख्या की है। इनके अनुसार किसी वस्तु का सौन्दर्य एक ऐसा मूल्य है (या मूल्य सम्बन्धी धारणा है) जो देश-काल की परिस्थितियों के अनुसार बदलता रहता है। किसी भी वस्तु के प्रति मूल्य सम्बन्धी दृष्टिकोण देश-काल के वातावरण, उसकी परिस्थितियों, संस्कार, शिक्षा आदि से प्रभावित होता है। रिचरड् स के अनुसार मूल्य का सम्बन्ध हमारी मूलभूत प्रवृत्तियों से होता है किन्तु ये प्रवृत्तियाँ भी देश- काल के अनुसार विकसित एवं परिवर्तित होती रहती हैं। सभी प्रकार की प्रवृत्तियाँ को मुख्यतः दो रूपों में विभाजित कर सकते हैं-(१) रागात्मक एवं (२) विरागा- त्मक। इन प्रवृत्तियों को स्वरूप की दृष्टि से इच्छा की पर्यायवाची माना जा सकता है। मानव-मन सभी प्रवृत्तियों को तुष्ट करना चाहता है, फलतः कुछ प्रवृत्तियों में परस्पर विरोध एवं संघर्ष भी होता है। हमारी एक प्रवृत्ति के कारण दूसरी प्रवृत्ति में व्याघात होता है किन्तु हमारा प्रयास यह रहता है कि हम अपनी प्रवृत्तियों को इस प्रकार संतुलित करें कि जिससे हमारी अधिकाधिक प्रवृत्तियाँ तुष्ट हो सकें। सामान्यतः अधिक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति की तुष्टि के लिए हम अपनी गौण प्रवृत्तियों की उपेक्षा भी कर देते हैं। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि वह वस्तु मूल्यवान है
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१३० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
जोकि हमारी एक प्रवृत्ति को-बिना किसी अन्य समान या अधिक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति को निराश किए संतुष्ट करती है, या यों कहिए कि जो एक प्रवृत्ति को तो तुष्ट करती है किन्तु साथ ही उससे अधिक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्तियों को असंतुष्ट नहीं करती। यहाँ एक प्रश्न है कि हमारी कौनसी प्रवृत्ति अधिक महत्त्वपूर्ण होती है, और कौनसी गौण ? इसके उत्तर में रिचड्स का विचार है कि जिस प्रवृत्ति की तुष्टि अन्य प्रवृत्तियों में अधिकाधिक संतुलन प्रस्तुत करती है तथा जिसकी तुष्टि से व्यक्ति की अधिकाधिक प्रवृत्तियाँ तुष्ट होती हैं-वही महत्त्वपूर्ण है। इस प्रकार मूल्य का आधार मानसिक प्रवृत्तियों की तुष्टि है। जेरिट महोदय ने इन मूल्यों को तीन वर्गों में विभाजित किया है-(१) साधनात्मक मूल्य (Instrumental Value) (२) आंतरिक मूल्य (Intrinstic Value) (३) परम्परागत मूल्य (Inherent Value)। साधनात्मक मूल्य उन वस्तुओं से सम्बन्धित है जो कि स्वयं प्रसन्नतादायक न होते हुए भी किसी लक्ष्य- विशेष की पूर्ति में साधन बनती है। उदाहरण के लिए चाकू का मूल्य साधनपरक मूल्य है किसी वस्तु को चाकू से काटने में हमें कोई प्रसन्नता नहीं मिलती, किन्तु वह किसी अन्य लक्ष्य में सहायक होता है। अतः उसका मूल्य साधनपरक है। किन्तु जो वस्तु स्वयं प्रसन्नता प्रदान करती है, उसे आंतरिक मूल्य का उदाहरण बताया जा सकता है; जैसे कि स्वादिष्ट आम। परम्परागत मूल्य से सम्बन्धित वस्तुएं भी उपयोगिता के अनन्तर प्रसन्नता प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए चाय या काफी को ले सकते हैं। जो व्यक्ति चाय या काफी के आदी हैं उन्हें इनके पीने से एक विशेष तृप्ति का अनुभव होता है जबकि अन्य लोगों को कदाचित् नहीं होता- या बहुत कम होता है। इस प्रकार वस्तु एवं उससे प्राप्त प्रसन्नता के आधार पर मूल्य के उपयुक्त तीन प्रकार निश्चित किये गये हैं जिनमें सौन्दर्य का सम्बन्ध तीसरे प्रकार के-या परम्परागत मूल्य से है। किन्तु परम्परागत मूल्यों में से भी सभी सौन्दर्य के पर्याय नहीं है। जहाँ उपभोक्ता निःस्वार्थभाव से ही परम्परागत मूल्यों का आस्वादन कर पाता है, उन्हें ही सौन्दर्य की श्रणी में रखा जा सकता है। कुछ अन्य विचारकों ने उपयुक्त्त वर्गीकरण के स्थान पर मूल्यों के केवल दो भेद ही स्वीकार किये हैं-(१) नैतिक मूल्य एवं (२) सौन्दर्यात्मक मूल्य। इस सौन्दर्यात्मक मूल्य के तीन उपभेद किये हैं-(१) वस्तुपरक या ऐन्द्रियक (२) रूपात्मक और (३) साहचर्य जन्य। वस्तुओं के जिस गुण में हमारी इन्द्रियों को आस्वादन प्राप्त होता है-वस्तुपरक या ऐद्रियक मूल्य माना गया है। कलाओं में रंग, ध्वनि चमक-दमक आदि से सम्बन्धित गुणों को इसी वर्ग में रखा गया है। रूपात्मक वर्ग में वस्तु की आकृति एवं शैली सम्बन्धी विशेषताएँ आती हैं। किन्तु जब हम किसी वस्तु को उसके अपने गुणों के स्थान पर किसी अन्य सम्बन्ध के कारण स्वीकार करते हैं तो वहाँ साहचर्य जन्य मूल्य माना जावेगा। उदाहरण के लिए किसी
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सौन्दर्य-शास्त्र : सामान्य परिचय १३१
प्राचीन ऐतिहासिक खंडहर का महत्त्व उसकी अपनी भव्यता के कारण न होकर उससे सम्बन्धित घटनाओं या व्यक्तियों के कारण होता है तो वहाँ उसका मूल्य साहचर्य-जन्य होता है। इस प्रकार कला का सौन्दर्य कहीं वस्तुपरक मूल्य पर, कहीं रूपात्मक मूल्य पर एवं कहीं साहचर्यजन्य मूल्य पर आधारित होता है और कहीं ये सब सम्मिलित रूप में होते हैं। किन्तु इनमें भी रूपात्मक मूल्यों को ही कलागत सौंदर्य के लिए सर्वोत्कृष्ट माना गया है। • उपसंहार-इस प्रकार हमने यहाँ सौंदर्य-शास्त्र के प्रमुख दृष्टिकोणों व सिद्धान्तों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया है, जिससे कि आगे रस-सिद्धान्त की सौंदर्य-शास्त्रीय व्याख्या में इनका उपयोग किया जा सके। वैसे, रस-सैद्धान्तिक दृष्टि से उपयुक्त दृष्टिकोणों में से भाववादी दृष्टिकोण का ही अधिक महत्त्व है क्योंकि इसी की स्थापनाएँ रस-सिद्धान्त के अधिक निकट हैं, फिर भी अन्य दृष्टिकोणों की जानकारी हमारे लक्ष्य की पूर्ति में सहायक ही सिद्ध होगी-इसका हमें विश्वास है।
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२ सौन्दर्य-शास्त्र अर्थात् रस-शास्त्र
यद्यपि हिन्दी में 'ईस्थेटिक्स' (Aesthetics) के पर्याय के रूप में 'सौन्दर्य- शास्त्र' शब्द प्रचलित हो गया है किन्तु मूलतः दोनों शब्द समानार्थक नहीं है। इसीलिए समय-समय पर विभिन्न विद्वानों ने इसके लिए अन्य शब्दों का भी प्रयोग किया है ; यथा-डॉ० कान्तिचंद्र पाण्डेय ने 'स्वतंत्र-कला शास्त्र' का डॉ० हजारी प्रसाद द्विवेदी ने 'लालित्य-मीमांसा', तथा अन्य कतिपय विद्वानों ने 'कला-शास्त्र' 'कला-म.मांसा', 'कला-दर्शन' आदि को 'ईस्थटिक्स' के पर्याय के रूप में प्रस्तुत किया है। ये सभी शब्द वस्तुतः 'ईस्थटिक्स' के अलग-अलग पक्षों या अंगों के सूचक तो हैं, किंतु इनमें से कोई भी अकेला शब्द ऐसा नहीं है जो 'ईस्थैटिक्स' के विभिन्न अर्थों को सर्वांगीण रूप में प्रस्तुत करता हो। इसलिए प्रत्येक शब्द एक पक्षीय होने के साथ-साथ भ्रामक भी है। जैसे-'सौंदर्य-शास्त्र' शब्द से यह ध्वनित होता है कि इससे सम्बधित शास्त्र के अंतर्गत सभी प्रकार के सौंदर्य का विवेचन होता होगा जबकि वस्तुतः ऐसा नहीं होता। प्राकृतिक एवं मानवी सौन्दर्य का विवेचन करना 'सौंदर्य-शास्त्र' का कार्य नहीं है-उसके क्षेत्र में तो केवल कलागत सौंदर्य ही आता है। 'कला-मीमांसा' 'कलादर्शन', 'कला-शास्त्र' आदि शब्द इसी तथ्य के द्योतक हैं-पर इन शब्दों से भी यह भ्रान्ति उत्पन्न होती है कि तत्सम्बन्धी शास्त्र में सभी प्रकार की कलाओं का विवेचन होता होगा जबकि इसका सम्बन्ध केवल ललित कलाओं से ही है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का 'लालित्य-मीमांसा' शब्द इसी तथ्य पर अधिक बल देता है किन्तु इससे ऐसा भी प्रतीत होता है मानों इस शास्त्र में केवल लालित्य या कला-सौंदर्य की ही मीमांसा होती होगी जबकि ईस्थैटिक्स का क्षेत्र इतना व्यापक है कि उसमें न केवल कलाओं के सौंदर्य की अपितु उनकी सर्जन प्रत्रिया से लेकर आस्वादन-प्रक्रिया तक के विभिन्न क्रिया-व्यापारों एवं तत्सम्बन्धी
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सौन्दर्य-शास्त्र अर्थात् रस-शास्त्र १३३
तत्त्वों की भी व्याख्या होती है। अतः यह शब्द भी इतना व्यापक नहीं है कि उससे 'ईस्थैटिक्स' से पूर्ण विस्तार का बोध हो सके। डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय का 'स्वतंत्र कला-शास्त्र' शब्द इस तथ्य को स्पष्ट करता है कि यह शास्त्र किसी अन्य दर्शन या विज्ञान के अधीन नहीं है अपितु स्वतन्त्र रूप में प्रतिष्ठित शास्त्र है-बामगार्टन ने इसी धारणा के आधार पर 'दर्शन' से अलग स्वतंत्र रूप में 'ईस्थैटिक्स' की स्थापना की थी, पर भारतीय साहित्य में बहुत पहले से कलाओं की विवेचना दर्शन शास्त्र से पृथक रूप में होती रही है तथा 'स्वतंत्र' विशेषण का प्रयोग किये बिना भी 'कला शास्त्र' अपनी पृथकता एवं स्वतंत्रता की घोषणा करने के लिए पर्याप्त है-अतः हमारे विचार में यह नामकरण भी बहुत उपयुक्त नहीं कहा जा सकता। ऐसी स्थिति में यह विचारणीय है कि क्या हिन्दी में कोई एक ऐसा शब्द नहीं है जो 'ईस्थैटिक्स के विभिन्न अर्थों को समन्वित रूप में प्रस्तुत करने में समर्थ हो ? कदाचित् हमारे विद्वानों ने अब तक गम्भीरता से इस प्रश्न पर विचार नहीं किया अन्यथा 'रस-शास्त्र' ऐसा शब्द है जो 'ईस्थैटिक्स' के सभी अर्थों को ध्वनित करने में समर्थ है। यहाँ संक्षेप में दोनों के अर्थ-साम्य को दिग्दर्शित किया जाता है। (क) व्युत्पत्ति की दृष्टि से-जैसा कि पिछले अध्याय में विस्तार से बताया जा चुका है; 'ईस्थेटिक्स' मूलतः एक ग्रीक शब्द पर आधारित है जिसका अर्थ है- 'ऐन्द्रियबोध या अनुभूति सम्बन्धी।' रस भी मूलतः ऐन्द्रियबोध, अनुभूति एवं भाव की ही व्याख्या करता है। (ख) विषय-क्षेत्र की दृष्टि से-'ईस्थटिक्स' का विषय-क्षेत्र ललित कलाओं तक सीमित है-उसमें व्यावहारिक जीवन की अन्य अनुभूतियों तथा उपयोगी कलाओं के शिल्प का विवेचन नहीं होता। भारतीय रस सिद्धान्त का भी सम्बन्ध नृत्य, काव्य, चित्र अभिनय आदि ललित कलाओं से है, अतः 'रस-शास्त्र' भी उसी क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है जो 'ईस्थैटिक्स' से सम्बन्धित है। (ग) मूल लक्ष्य की दृष्टि से-ईस्थैटिक्स का मूल लक्ष्य सौन्दर्य या लालित्य का उद्घाटन करना है, पर वह सौंदर्य या लालित्य सामान्य न होकर शुद्ध कलात्मक होता है। रसानुभूति को भी अलौकिक या व्यावहारिक क्षेत्र से भिन्न बताते हुए उसे कलानुभूति की पर्याय माना गया है। वस्तुतः ललित कलाओं के सौंदर्य की अनुभति के विवेचन विश्लेषण को रस सिद्धांत भी उतनी ही प्राथमिकता देता है जितनी कि ईस्थटिक्स में दी जाती है। अतः इस दृष्टि से भी 'रस-शास्त्र' 'ईस्थ- टिक्स' का उपयुक्त पर्याय सिद्ध होता है। (घ) विषय-विस्तार की दृष्टि से-यद्यपि ईस्थैटिक्स की मूल समस्या कला- सौन्दर्य के विवेचन की ही है, पर उसके अन्तर्गत कलाकार और सामाजिक से सम्बन्धित अन्य समस्याओं पर भी विचार किया जाता है ; जैसे-कला-सर्जन की प्रक्रिया, कला के आस्वाद का स्वरूप, कला की विषय-वस्तु का सामाजिक की दृष्टि
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१३४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
से महत्त्व, कला में शोकपूर्ण विषयों की आनन्द में परिणति के कारण-आदि। ये सारी बातें भारतीय रस-विवेचन पर भी लागू होती हैं ; अतः 'रस-शास्त्र' ईस्थै- टिक्स के इस पक्ष का भी पूर्ण प्रतिनिधित्व करता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न दृष्टियों से 'ईस्थटिक्स' के अन्य हिन्दी पर्यायों की अपेक्षा 'रस-शास्त्र' अधिक उपयुक्त शब्द है। इसका अर्थ यह नहीं है कि 'ईस्थैटिक्स' और रस-शास्त्र में किसी भी दृष्टि से कोई अन्तर नहीं है-प्रत्येक शब्द का अपना विशिष्ट संदर्भ एवं अर्थ होता है, अतः ऐसा तो किसी भी शब्द के लिए नहीं कहा जा सकता-फिर भी, दोनों के अर्थों में पर्याप्त साम्य एवं नैकट्य है। यद्यपि अब 'सौन्दर्य शास्त्र' शब्द इतना अधिक प्रचलित हो चुका है कि उसे त्यागकर नया शब्द अपनाना अव्यावहारिक सा प्रतीत होता है, किन्तु उपयुक्त तुलना से रस सिद्धान्त की पाश्चात्य 'ईस्थटिक्स' से निकटता एवं उसकी व्यापकता का बोध होता है। इतना ही नहीं, यह तुलना इस तथ्य को भी प्रमाणित करती है कि भले ही भारतीय एवं पाश्चात्य कला चिन्तकों की पृष्ठभूमि, परिस्थितियाँ एवं भाव-भूमि भिन्न-भिन्न रही हों किन्तु दोनों की यात्रा के चरण अन्ततः एक जैसी ही विचार- सारणियों पर आगे बढ़े हैं-दोनों ही कला-बोध के लिए क्रमशः ऐन्द्रिय बोध अनुभति, भावानुभूति की सीमाओं को पार करते हुए शुद्ध सौन्दर्य या लालित्य की अनुभूति तक पहुँचे हैं-इसी अनुभूति को जहाँ एक ने कलानुभूति का नाम दिया वहाँ दूसरे ने रसानुभूति के नाम से पुकारा है किन्तु तात्त्विक दृष्टि से इन दोनों में विशेष अन्तर नहीं है। अस्तु, व्यवहार में हम भले ही 'ईस्थटिक्स' के लिए सौन्दर्य शास्त्र या कला-मीमांसा जसे शब्दों का प्रयोग करें, किन्तु सिद्धांततः इसका निकटतम पर्याय 'रस-शास्त्र' ही है-ऐसा हम निस्संकोच कह सकते हैं।
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३ 'रस' : सौन्दर्य शास्त्रीय शब्दावली में
रस-सिद्धान्त की सौंदर्य शास्त्रीय दृष्टि से व्याख्या करने के लिए यह आवश्यक है कि सर्व प्रथम इस बात का निर्णय कर लिया जाय कि 'रस' को सौन्दर्य शास्त्रीय शब्दावली में क्या कहा जाय ? वैसे इस प्रश्न का उत्तर अनेक पूर्ववर्ती विद्वानों ने भी दिया है, जिनमें प्रो० ए० सी० शास्त्री, डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय, डॉ० सुरेन्द्र बारलिंग, प्रभृति का नाम उल्लेखनीय है ; अतः इस सम्बन्ध में स्वतन्त्र दृष्टि से विचार करने के पूर्व पूर्ववर्ती विद्वानों के मतों का अध्ययन कर लेना उचित होगा। प्रो० ए० सी० शास्त्री का मत-प्रो० शास्त्री ने अपने ग्रन्थ 'स्टडीज इन संस्कृत इस्थैटिक्स' में रस की सौन्दर्य शास्त्रीय व्याख्या प्रस्तुत करते हुए लिखा है- 'अब हमें यह देखना चाहिए कि 'रस' से क्या तात्पर्य है ? यह हमें एकाएक स्पष्ट कर लेना चाहिए कि पूर्व में हम जिसे 'रस' कहते हैं वही पश्चिम में 'सौन्दर्य (ब्यूटी) के नाम से पुकारा जाता है।" इस दृष्टि से रस सौन्दर्य का पर्याय सिद्ध होता है किन्तु प्रो० शास्त्री अपने इस मत पर स्थिर नहीं रह पाये। इसी संदर्भ में वे आगे चलकर लिखते हैं-'जब सौन्दर्य का अर्थ 'रस' ग्रहण किया जाता है तो इसका तात्पर्य यह है कि सौन्दर्य की अनुभूति एक अतीन्द्रिय अनुभूति है। यह आत्मा के अस्तित्व एवं चैतन्य के पूर्ण एवं अखंड रूप की आनन्दानुभूति है। अतः रस सौन्दर्य
- 'Let us now see what is meant by this 'rasa'. It should at once be made clear that what is called रस in the East, is called 'Beauty' in the west.'-Studies in Sanskrit Aesthetics' Page 3.
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की अनुभूति का आधार है। जो भी सुन्दर है वह इसलिए सुन्दर है क्योंकि उसका मूलाधार रस है'। शास्त्री जी की उपर्युक्त स्थापना उनके इस पूर्ववर्ती मत के प्रतिकूल है कि रस सौन्दर्य का पर्याय है। यहाँ उन्होंने रस को सौन्दर्य का पर्याय मानने के स्थान पर 'सौन्दर्य की अनुभूति का आधार' मान लिया है। सौन्दर्य को भी एक अतीन्द्रिय आत्मिक अनुभति का रूप देकर उसे बलात् रस के निकट लाने का प्रयास किया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि शास्त्रीजी का प्रयास यहाँ भारतीय रस और पाश्चात्य सौन्दर्य में सामंजस्य स्थापित करने का रहा है किन्तु वे किसी स्पष्ट एवं समीचीन निष्कर्ष तक नहीं पहुँच पाये। डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय का मत-डॉ० पाण्डेय ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ 'इंडियन ईस्थैटिक्स' में 'रस' की सौन्दर्य-शास्त्रीय दृष्टि से विवेचना करते हुए लिखा है-'सौन्दर्य-शास्त्र के संदर्भ में यह (रस) सौन्दर्यात्मक वस्तु को सूचित करता है। इसका अथं अत्यन्त गंभीर एवं शास्त्रीय है, किन्तु शास्त्रीय अर्थ में भी इसका मूल अर्थ 'आस्वाद की एसी वस्तु जो ऐन्द्रियक न होकर सौन्दर्यात्मक हो'-सुरक्षित है।१ अस्तु, यहाँ डॉँ० पाडेय ने रस को सौन्दर्यात्मक वस्तु या पदार्थ का पर्याय माना है। इसे यदि और स्पष्ट किया जाय तो कहा जा सकता है कि रस का तात्पर्य किसी सुन्दर पदार्थ से है। प्रस्तुत प्रसंग में उन्होंने और भी कई विचार व्यक्त किये हैं जो विचारणीय हैं ; जैसे- (क) 'रस जो कि सौन्दर्यात्मक (कलात्मक ?) पदार्थ है, अनिवार्यतः नाट्य कला से उत्पन्न होता है तथा वह प्रकृति द्वारा उत्पन्न पदार्थों में प्राप्य नहीं है।" (ख) भरतमुनि का लक्ष्य केवल उस पदार्थ की व्याख्या करना था जो कि कलात्मक अनुभूति का मूलाधार है।"
- 'So when beauty is termed ₹ it means that the feeling of beau- ty is some non-sensuous experience. It is the feeling of bliss of the self always in the fulness of its being or consciousness .... Rasa is then the basis of the feeling of beauty. Whatever is beautiful is so because it is rooted in रस.'-Studies in Sans- krit Aesthetics, Page-3 3. In the context of aesthetics, however, it stands for the aesthe- tic object. It has a highly technical meaning, though, even in the technical sense, it retains the element of original mean- ing, namely the object of relish, not sensuous but aesthetic"- Indian Aesthetics ; Page 20 ४. वही ; पृष्ठ २१ ५. वही ; पृष्ठ ३१
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'रस' : सौन्दर्य शास्त्रीय शब्दावली में १३७
(ग) रस या सौन्दर्यात्मक पदार्थ एक सौन्दर्यात्मक या कलात्मक रचना है।६ (घ) रस या सौन्दर्यात्मक तथ्य या वस्तु एक ऐसी रचना है जो विभावानु- भावादि तत्त्वों से रचित या निर्मित होती है केवल मनुष्य ही विभावादि तत्त्वों के समन्वित रूप को प्रस्तुत कर सकता है। अतः रस या कलात्मक संरचना एक ऐसी भावात्मक स्थिति है जो मान- वीय दृष्टि से की गयी हो।" डॉ० पांडेय के उपयुक्त विचारों का सारांश यह है कि रस एक सौन्दर्यात्मक पदार्थ या वस्तु है, वह एक कलात्मक संरचना है ; वह कलाकृतियों में ही प्राप्य है- प्राकृतिक पदार्थों में नहीं ; वह एक भावात्मक स्थिति है तथा उसका प्रस्तुतीकरण मनुष्य द्वारा ही संभव है। यद्यपि डॉँ० पांडेय के ये निष्कर्ष बहुत स्पष्ट एवं सुसम्बद्ध दिखाई नहीं पड़ते किन्तु संक्षेप में कहा जा सकता है कि वे रस को कलागत भावात्मक सौन्दर्य के रूप में स्वीकार करते हैं। सौन्दर्य-शास्त्र की परम्परागत शब्दावली में कोई एक ऐसा शब्द नहीं मिलता जो डाँ० पांडेय के उपयुक्त आशय को भली-भाँति व्यक्त कर सके। ऐसी स्थिति में रस को सौन्दर्य-शास्त्रीय शब्दावली में रूपान्तरित करने की समस्या ज्यों की त्यों बनी रहती है। इसके अतिरिक्त और भी कई ऐसी बातें हैं जिनके कारण हमें उपयुक्त निष्कर्ष स्वीकार्य प्रतीत नहीं होता। एक तो रस का सम्बन्ध सदा केवल भावात्मक स्थिति से ही स्वीकार करना कठिन है। दूसरे, रस का प्रस्तुतीकरण सदा मनुष्यों द्वारा ही नही, जड़ पदार्थों (कलाकृतियों के रूप में) द्वारा भी संभव है। जब एक कलाकार कला-कृति का निर्माण कर देता है तो रस के प्रस्तुतीकरण के लिए स्वयं कलाकार की सत्ता आवश्यक नहीं रहती-उस कृति के द्वारा ही रस का प्रस्तुतीकरण संभव है। इसके अतिरिक्त एक बहुत बड़ी आपत्ति यह है कि डा० पांडेय ने अपने समस्त रस-विवेचन में भरतमुनि के प्रारंभिक मत को ही आधार बनाया है-उसके परवर्ती विकसित रूप की उन्होंने उपेक्षा कर दी है। प्रारंभ में भरत ने रस को नाट्यकला के माध्यम से प्रस्तुत पदार्थ के रूप में विवेचित किया था, जिसमें अनेक अस्पष्टताएँ एवं असंगतियाँ थीं जब कि आगे चल कर अभिनवगुप्त तथा अन्य व्याख्याताओं ने रस को कलागत पदार्थ मानने के स्थान पर सामाजिक की अनुभूति के रूप में स्वीकार किया। डॉ० नगेन्द्र ने इस सम्बन्ध में विस्तृत विवेचन करते हुए स्पष्ट किया है-"भरत-सूत्र के व्याख्याता आचार्यों के विवेचन के फल-स्वरूप रस का स्वरूप क्रमशः विषयिगत होता गया और वह 'आस्वाद्य' से 'आस्वाद' बन गया। इस अर्थ-परिवर्तन का सर्वाधिक दायित्व अभि-
६. 'इ' डियन ईस्थैटिक्स' ; पृष्ठ ३५ 7. Indian Aesthetics ; page 36
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नवगुप्त पर है ........ उनके अनुसार रस का अर्थ है, आनन्द और आनन्द विषयगत न होकर आत्मगत ही होता है। .... अभिनवगुप्त से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक रस का यही रूप स्वीकार किया गया, व्याख्या का आधार थोड़ा बहुत बदल गया, किन्तु प्रतिपाद्य वही रहा।" वस्तुतः जैसा कि हम पीछे आचार्य अभिनवगुप्त तथा अन्य भारतीय आचार्यों के मतों का विवेचन करते हुए विस्तार से स्पष्ट कर चुके हैं, अन्ततः रस नाटक या काव्य के माध्यम से प्राप्य प्रक्षक की विशिष्ट अनुभूति का नाम है। रस सिद्धान्त की नूतन व्याख्या के लिए भी उसके इसी प्रौढ़तम विकसित अर्थ को ही स्वीकार करना उचित होगा जबकि डा० पांडेय ने उसके प्रारंभिक अविकसित अर्थ को आधार बनाया है। ऐसी स्थिति में डॉ० पांडेय की व्याख्या भी पूर्वोक्त समस्या के समाधान में सहायक सिद्ध नहीं होती। डॉ० सुरेन्द्र बारलिगे का मत-डॉ० बारलिंगे ने रस, सौन्दर्य और आनन्द के पारस्परिक सम्बन्धों की विवेचना करते हुए अपना निष्कर्ष इन शब्दों में प्रस्तुत किया है-'रस तो सौन्दर्य की प्रतिमा है, सौन्दर्य नहीं है। इसी कारण रस और सौन्दर्य शब्द एक-दूसरे के पूरक हैं और कला के लिए सौन्दर्य का ध्येय निर्धारित करते समय रस-सिद्धान्त से आँखें नहीं मूँदी जा सकती।' डॉ० बारलिंगे ने यहाँ 'प्रतिमा' शब्द का प्रयोग अंग्रजी के 'इमेज' (Image) के अर्थ में ही किया है- इस तथ्य की पुष्टि उनके अन्य लेख 'मूल रस सिद्धान्त और कतिपय आलोचक' से होती है। इस लेख में उन्होंने आई० ए० रिचड्स की काव्यास्वादन सम्बन्धी छह प्रक्रियाओं की विवेचना करते हुए बिम्बों के अर्थ में प्रतिमाओं का उल्लेख किया है।१ इस दृष्टि से कहा जा सकता है कि वे सौन्दर्य के बिम्ब या प्रतिबिम्ब को ही रस मानते हैं। उदाहरण के लिए, एक चित्रकार किसी सुन्दरी के सौन्दर्य को देखता है, उसका बिम्ब उसके मन में उदित होता है जिसे वह बाद में अपने चित्र के माध्यम से प्रस्तुत करता है। कला विवेचन के प्रसंग में बिम्ब, प्रतिमा या इमेज (Image) का आशय प्रायः सौन्दर्य के बिम्ब-प्रतिबिम्ब अथवा कलात्मक बिम्ब योजना से ही लिया जाता है-अतः इस स्थिति में हम डॉ० बारलिंगे के द्वारा रस के लिए प्रयुक्त 'सौन्दर्य की प्रतिमा' के स्थान पर केवल 'बिम्ब' या अधिक से अधिक 'कलात्मक बिम्ब' कह दें तो भी काम चल सकता है। अस्तु, संक्षेप में डॉ० बारलिंगे के अनुसार रस 'प्रतिमा' या 'बिम्ब' का पर्याय सिद्ध होता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि डा० बारलिंगे ने अपनी उपयुक्त व्याख्या में दो बातों पर विशेष बल दिया है; एक तो उन्होंने रस को उसके परम्परागत अर्थ में-
८. रस-सिद्धान्त (डा० नागेन्द्र) पृ० ८१ ९. सौन्दर्य तत्त्व और काव्य-सिद्धान्त; पृष्ठ ११२ १०. वही; पृष्ठ ९०
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अर्थात् आनन्द के अर्थ में-ग्रहण नहीं किया है तथा दूसरे, उन्होंने रस की व्याख्या भोक्ता की दृष्टि से न करके स्रष्टा या कवि की दृष्टि से की है। उन्होंने स्पष्ट रूप में घोषणा की है-'आज तक जिसे रस-सिद्धान्त समझा गया है, वह रस-सिद्धान्त न होकर आनन्द सिद्धान्त है। इस आनन्द-सिद्धान्त को त्याग कर हमें रस सिद्धान्त को स्वीकार करना चाहिए'।" इसी प्रकार रस की स्रष्टा की दृष्टि से व्याख्या करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया है-"कला के लिये जनक की आवश्यकता होती है और उसकी कल्पना से ही कला का जन्म होता है। ........ प्रत्येक कलाकार अपनी-अपनी कला के लिये इस प्रकार की प्रतिमाओं का निर्माण करता रहता है। इस प्रतिमा से ही कला का और कला से सौन्दर्य का दर्शन होता है। ........ सारांश यह है कि ........ भरतमुनि ने सबसे पुष्ट तन्मात्र जो 'रस' है उसे 'काव्य-नाट्य' रूप कला की प्रतिमा के लिये चुन लिया है और आगे चलकर रस शब्द अन्य संगीत आदि कला की प्रतिमाओं को व्यक्त करने के लिये भी प्रयोग में आने लगा। इस आशय से देखें तो 'रस' शब्द साहित्य आदि कलाकृतियों की प्रतिमाएँ व्यक्त करने के लिए अत्यन्त उपयुक्त शब्द है।"१२ डॉ० बारलिंगे की इन धारणाओं को संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है- (क) प्रतिमा=बिम्ब या Image (ख) रस=सौन्दर्य का बिम्ब। (ग) रस=कला-प्रतिमा (घ) कला-प्रतिमा=कवि-कल्पना उपयुक्त स्थापनाएँ निश्चय ही डॉ० बारलिंगे की नूतन दृष्टि एवं मौलिक चिन्तना की परिचायक हैं; पर वे स्पष्ट एवं सुसंगत प्रतीत नहीं होतीं। एक स्थान पर जहाँ वे रस को सौन्दर्य की प्रतिमा मानते हैं तो अन्यत्र उसे कला-प्रतिमा का पर्याय घोषित करते हैं। फिर 'कला-प्रतिमा अपने-आप में क्या है तथा उसका आवास कहाँ होता है-इसका स्पष्टीकरण भी उन्होंने किया। यदि हम 'कला-प्रतिमा' को कला से पृथक तत्त्व माने तो वह कहाँ है ? और यदि वह कलागत तत्त्व ही है तो वह कौन सा है ? फिर कला-प्रतिमा कवि कल्पना का ही पर्याय या परिणाम है तो उसका अस्तित्व कला-सर्जन से पूर्व ही सम्भव है। अस्तु, इन सब शंकाओं का समा- धान यहाँ नहीं हो पाता। इसके अतिरिक्त ड:० बारलिंगे ने रस को परम्परागत अर्थ से भिन्न अर्थ में भी ग्रहण किया है, जिसका औचित्य संदिग्ध है।
११. सौन्दर्य तत्त्व और काव्य-सिद्धान्त; पृष्ठ ११२ १२. सौन्दर्य तत्त्व और काव्य-सिद्धान्त; पृष्ठ ११
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नया प्रयास-उपयुक्त पर्यालोचन से स्पष्ट है कि रस की सौन्दर्यशास्त्रीय व्याख्या के सम्बन्ध में किये गये उपयुक्त प्रयास ऐतिहासिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होते हुए भी वे अपने लक्ष्य की पूर्ति नहीं कर पाते। ऐसी स्थिति में नूतन प्रयास की आवश्यकता है। हमारे विचार में जब तक हम रस और सौन्दर्य के परम्परागत अर्थों को भलीभाँति स्पष्ट नहीं कर लेते तब तक उनमें सामंजस्य स्थापित करना कठिन है, अतः सर्वप्रथम हमें इसी ओर प्रवृत्त होना चाहिए। 'रस' का अर्थ-विवेचन करते समय हमें यह तथ्य बराबर ध्यान में रखना चाहिए कि ज्यों-ज्यों रस सम्बन्धी विवेचना अधिकाधिक सूक्ष्म एवं गम्भीर होती गयी त्यों-त्यों 'रस' शब्द का अर्थ भी अधिकाधिक विकसित होता गया है। प्रारम्भ में आचार्य भरत ने भोज्य पदार्थों में प्राप्य रसों के समकक्ष नाट्य रस को स्थान देते हुए उसे आस्वाद्य तत्त्व माना। जिस प्रकार विभिन्न मिर्च-मसालों के संयोग से किसी भी भोज्य पदार्थ को स्वादिष्ट बना दिया जाता है, उसी प्रकार विभावादि तत्त्वों के मेल से स्थायी भाव को भी रसात्मक रूप में प्रस्तुत कर दिया जाता है- इस दृष्टि से रस स्थायी भाव का वह स्वादिष्ट रूप है जो नाटक के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। संक्षेप में, भरत की व्याख्या के अनुसार रस नाट्यगत सामग्री का ही एक संयोजित या समन्वित रूप है; इस दृष्टि से वह कलागत या वस्तुगत तत्त्व सिद्ध होता है। परवर्ती युग में रस-निष्पत्ति की प्रक्रिया की सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक व्याख्या की गयी। साथ ही उसे केवल नाटक तक ही सीमित न रखकर काव्य-संगीत आदि अन्य कलाओं के संदर्भ में भी देखा गया। इसके अतिरिक्त, उसका सामंजस्य शैलीपक्ष से भी स्थापित करने की चेष्टा की गयी, जिससे अभिधा, भावकत्व, भोजकत्व, व्यंजना शक्ति या ध्वनि के संदर्भ में भी उसकी मीमांसा की गयी। विशेषतः भट्टनायक, अभिनवगुप्त, धनंजय, मम्मट प्रभृति आचार्यों ने रस-प्रक्रिया का स्पष्टीकरण करते हुए उसे कलागत तत्त्व के स्थान पर प्रमाता की अनुभूति की विशिष्टता के रूप में मान्यता प्रदान की। आचार्य अभिनवगुप्त ने रस-प्रक्रिया का स्पष्टीकरण एवं उसकी अनेक असंगतियों का निराकरण अपनी इसी धारणा के आधार पर किया है कि रस प्रमाता की अनुभूति है। इसका अनुमोदन आधुनिक युग के भी अनेक आचार्यों- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, डॉ० बाटवे, डा० नगेन्द्र प्रभृति-ने भी किया है।१ वैसे स्वयं भरत ने भी रस को नाटक का फल या उद्देश्य बताया है, जिसका अर्थ है रस नाट्य-कला का अन्तरंग तत्त्व न होकर उसके आस्वाद से उत्पन्न परवर्ती तत्त्व या अनुभव है। नाट्यकला से पृथक रूप में, अन्य कलाओं के संदर्भ में भी यदि रस पर विचार
१३. रस-सिद्धान्त; पृष्ठ १०३
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किया जाय तो उपयुक्त स्थापना और भी स्पष्ट हो जाती है। नाटक के प्रदशन के समय उसके अंगरूप अभिनेतागण होते हैं, जिनमें रसानुभूति का अस्तित्व स्वीकार किया जा सकता है, किन्तु किसी काव्य-पुस्तक, पत्थर-निर्मित मूर्ति या चित्र जैसे निर्जीव पदार्थ में रसानुभूति का अस्तित्व किस प्रकार स्वीकार किया जा सकता है ? काव्य-कृति में अंकित शब्द एवं वाक्य अधिक से अधिक कवि की अनुभूति के संकेत मात्र ही होते हैं जिनके माध्यम से पाठक अनुभूति प्राप्त करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि अनुभूति तत्त्व या तो कवि-हृदय में संभव है या पाठक में तथा इस दृष्टि से रस (रसानुभूति) की भी निष्पत्ति कवि या पाठक के ही हृदय में सम्भव है। जहाँ तक कवि का प्रश्न है, भारतीय काव्य-शास्त्र कोई स्पष्ट उत्तर नहीं देता, किन्तु पाठक को रस की अनुभूति होती है, इसके सम्बन्ध में उसका निर्णय स्पष्ट है। अतः हम संक्षेप में, रस को काव्य या कला के प्रभाव की अनुभूति मान सकते हैं। नाटक, काव्य या कला के आस्वादन से हमारे मन पर जो प्रभाव पड़ता है, उसकी अनुभूति को ही भारतीय आचार्यों ने रस माना है। चूकि सभी प्रकार की कला-कृतियों से एक जैसा प्रभाव उत्पन्न नहीं होता-कलाकृति की वस्तुगत प्रकृति के अनुसार विभिन्न कृतियों के प्रभाव में भी परस्पर सूक्ष्म अन्तर रहता है-इस सूक्ष्म अन्तर को स्पष्ट करने के लिए ही रस के विभिन्न भेदों की कल्पना की गयी है; जैसे, श्रृगार, करुण आदि। अतः निष्कर्ष रूप में कला-प्रभाव या कलास्वाद की अनुभूति ही रस है। अब दूसरा प्रश्न है-सौन्दर्य शास्त्रीय दृष्टि से 'सौन्दर्य' क्या है ? इसके उत्तर में शताधिक मत प्रचलित हैं, किन्तु यदि हम संक्षेप में सबको समन्वित रूप में प्रस्तुत करना चाहें तो कहा जा सकता है कि जिस विशिष्ट गुण के कारण कोई कला हमें प्रभावित या आकर्षित करती है, उसी को कला-विवेचन के संदर्भ में 'सौन्दर्य' कहा गया है। सामान्य जीवन में भी हम वस्तु के उसी गुण को सौन्दर्य कहते हैं जो हमारी चक्षुरिन्द्रिय को प्रभावित या आकर्षित करता है। अभिघात्मक अर्थ में सौन्दर्य का सम्बन्ध चक्षुरिन्द्रिय से ही है किन्तु लाक्षणिक अर्थ में अन्य इन्द्रियों से सम्बन्धित आकर्षक तत्त्वों को भी सौन्दर्य मान लिया जाता है। कलाओं के क्षेत्र में 'सौन्दर्य' शब्द का अर्थ-विस्तार हो जाता है; उसमें कला के उस गुण को 'सौन्दर्य' कहा जाता है जो न केवल हमारी इन्द्रियों को अपितु मन और बुद्धि को भी आकर्षित करता है। इस दृष्टि से कला-कृति के उन सब गुणों को समन्वित रूप में 'सौन्दर्य' कहा जाता है जो कि सामाजिक को आकर्षित, प्रभावित, उद्वलित या आनन्दित करते हैं जब कि इस सौन्दर्य के आस्वाद से प्राप्त अनुभूति, जो कि प्रायः आह्लादक या आनन्द- रूपी होती है, 'रस' कहलाती है। अस्तु, हमारे विचार से 'रस' सौन्दर्य का पर्याय न होकर सौन्दर्य की अनुभूति है जिसे सौन्दर्य-शास्त्र के क्षेत्र में 'सौन्दर्यानुभूति' (Aesthetic Experience) कहा
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जाता है। वस्तुतः अब तक रस की सौन्दर्य-शास्त्रीय दृष्टि से सम्यक् व्याख्या न हो पाने का मूल कारण भी यही है कि उसे 'सौन्दर्यानुभूति' के स्थान पर 'सौन्दर्य' 'सौन्दर्यात्मक पदार्थ' 'सौन्दर्य-प्रतिमा' आदि का पर्याय मान लिया गया। अवश्य ही 'सौन्दर्यानुभूति' 'सौन्दर्य' से बहुत पृथक नहीं है, क्योंकि अन्ततः सौन्दर्य से ही उसकी अनुभूति प्राप्त होती है किन्तु फिर भी सौन्दर्य कारण है तो सौन्दर्यानुभूति उसका कार्य है। अतः कारण को ही कार्य या साधन को ही साध्य मान लेने से जो असंगति उत्पन्न हो सकती है, वही अनेक पूर्ववर्ती प्रयासों में हुई है। वस्तुतः जब हम किसी प्रयास के प्रारम्भ में ही भ्रान्तिग्रस्त होकर गलत दिशा की ओर चल पड़ते हैं तो स्वाभाविक है कि बहुत दौड़-धूप करने पर भी हम अपने लक्ष्य तक न पहुँच पायें।